| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना माझा नमस्कार असो. อนุทีปนีปาฐ अनुदीपनी पाठ ๑. จิตฺตสงฺคหอนุทีปนา १. चित्तसंग्रह अनुदीपनी อนนฺตญฺญาณํ [Pg.1] นตฺวาน, โลกาโลกกรํ ชินํ; กริสฺสามิ ปรมตฺถ-ทีปนิยา นุทีปนึ. अनंत ज्ञानी, जगाला प्रकाश देणाऱ्या (लोकालोककर) जिनाला (बुद्धाला) वंदन करून, मी 'परमत्थदीपनी' ची 'अनुदीपनी' (टीकेची उपटीका) करेन. [ตตฺถ, โลกาโลกกรนฺติ ทสสหสฺสิโลกธาตุยํ จตุสฺสจฺจธมฺมเทสนาโลกการกํ. ปรมตฺถทีปนีติ เอตฺถ อตฺโถ ทุวิโธ ปธานตฺโถจ ปริยายตฺโถจ. ตตฺถ ปธานตฺโถ ปรมตฺโถนาม, ปธานตฺโถติจ ปทวากฺยานํ มุขฺยตฺโถ อุชุกตฺโถ. ปริยายตฺโถปิ โกจิ, ยุตฺตรูโป อตฺโถ ปรมตฺโถ เยว. ปรมตฺถํทีเปติปกาเสตีติปรมตฺถทีปนี]. ตํปร มตฺถทีปนึกโรนฺโตอาจริโย ปถมํตาว พุทฺธสฺสภควโต ปณามํกโรติ ‘‘อุทยายสฺสา’’ติอาทินา. [तेथे, "लोकालोककर" म्हणजे दहा हजार लोकधातूंमध्ये चार आर्यसत्यांच्या धम्मदेशनेचा प्रकाश पसरवणारे. "परमत्थदीपनी" या शब्दाचा येथे दोन प्रकारे अर्थ होतो: प्रधान अर्थ आणि पर्याय अर्थ. तेथे प्रधान अर्थ म्हणजे "परमार्थ" होय, आणि प्रधान अर्थ म्हणजे पदांच्या व वाक्यांचा मुख्य अर्थ, सरळ अर्थ. पर्याय अर्थाने देखील जो योग्य रूप असलेला अर्थ आहे, तोच परमार्थ होय. जो परमार्थाचे दीपन (प्रकटीकरण) करतो, ती "परमत्थदीपनी" होय]. त्या "परमत्थदीपनी"ची रचना करताना आचार्य सर्वप्रथम "उदयायस्सा" इत्यादी गाथेने बुद्ध भगवंतांना वंदन करतात. ตตฺถ ‘‘อุทยา’’ติ อุทยโตอุคฺคมนโต. ‘‘ยสฺสา’’ติ ยสฺส สพฺพญฺญุพุทฺธมหาสูรสฺส. ‘‘เอกสฺสา’’ติ อทุตียสฺส, อสทิ สสฺสวา[Pg.2]. ‘‘สทฺธมฺมรํสิชาลิโน’’ติ เอตฺถสทฺธมฺโมติสตฺถุสา สนธมฺโมวุจฺจติ. ตตฺถจ จตุราสีติสหสฺสธมฺมกฺขนฺธสงฺขาโต เทสนาสทฺธมฺโมอิธาธิปฺเปโต. สทฺธมฺมสงฺขาตํรํสิชาลํอสฺส อตฺถีติ สทฺธมฺมรํสิชาลี. ตสฺสสทฺธมฺมรํสิชาลิโน. ‘‘ปพุชฺฌึสู’’ติ วิกสึสุ, จตุสฺสจฺจญฺญาณวิกาสํตญฺญาณสมฺผุลฺลํ ปาปุณึสุ. ‘‘ชนมฺพุชา’’ติ ชนสงฺขาตาอมฺพุชา. ตตฺถชนานาม อิธโพธเนยฺยสตฺตา อธิปฺเปตา, เยสพฺพญฺญุเทสนํ สุตฺวา จตุสฺสจฺจ ธมฺมํ พุชฺฌิสฺสนฺติ. อมฺพุชาติปทุมา. ‘‘ชาติกฺเขตฺเตมหาสเรติ’’ ชาติกฺเขตฺต สงฺขาเต ชนมฺพุชมหาสเร. ตตฺถ ชาติกฺเขตฺตํ นามทสสหสฺส จกฺกวาฬํ, ยํ เอกํ พุทฺธกฺเขตฺตนฺติ วุจฺจติ. ยตฺถ จ มหาโพธิสตฺตานํ พุทฺธภาวตฺถาย ปถมมหาภินีหารกาลาทีสุ เอกปฺปหาเรนปถวิกมฺปนาทีนิปวตฺตนฺติ. ยตฺถจวสนฺตาเทวพฺรหฺมาโน พุทฺธปริสาโหนฺติ. ชาติกฺเขตฺเตมหาสเรยสฺส เอกสฺส สทฺธมฺมรํสิชาลิโน มหาสูรสฺส อุทยา ตสฺมึ ชาติกฺเขตฺเต มหาสเร ชนมฺพุชาปพุชฺฌึสูติโยชนา. तेथे "उदया" म्हणजे उदयापासून, उगवण्यापासून. "यस्स" म्हणजे ज्या सर्वज्ञ बुद्धरूपी महासूर्याच्या. "एकस्स" म्हणजे अद्वितीय, ज्याच्या समान दुसरा कोणी नाही अशा. "सद्धम्मरंसिजालिनो" येथे "सद्धम्म" म्हणजे शास्त्यांचा (बुद्धांचा) शासनधम्म म्हटला जातो. आणि तेथे चौऱ्याऐंशी हजार धम्मस्कंधांच्या स्वरूपातील देशना-सद्धम्म येथे अभिप्रेत आहे. सद्धम्मरूपी किरणसमूह (रश्मीजाल) ज्याच्याकडे आहे तो "सद्धम्मरंसिजाली" होय. त्या सद्धम्मरंसिजालिनो (सद्धम्मरूपी किरणसमूह धारण करणाऱ्याच्या). "पबुज्झिंसु" म्हणजे विकसित झाले, चार आर्यसत्यांच्या ज्ञानाचा विकास होऊन ते ज्ञान प्रफुल्लित झाले. "जनम्बुजा" म्हणजे जनरूपी कमळे. येथे "जन" म्हणजे बोध प्राप्त करण्यास योग्य असलेले प्राणी (बोधनेय्य सत्त) अभिप्रेत आहेत, जे सर्वज्ञांची देशना ऐकून चार आर्यसत्यांचा धम्म जाणतील. "अम्बुज" म्हणजे कमळे. "जातिखेत्ते महासरे" म्हणजे जातिक्षेत्ररूपी जन-कमळांच्या महासरोवरात. येथे "जातिक्षेत्र" म्हणजे दहा हजार चक्रवाळ (विश्व), ज्याला एक "बुद्धक्षेत्र" असे म्हटले जाते. आणि जेथे महाबोधिसत्त्वांच्या बुद्धत्वासाठी पहिल्या महाअभिनिहार (संकल्प) इत्यादी काळांमध्ये एकाच वेळी पृथ्वीकंप इत्यादी घटना घडतात. आणि जेथे राहणारे देव व ब्रह्मा हे बुद्धांचे अनुयायी (बुद्धपरिषद) असतात. "जातिक्षेत्ररूपी महासरोवरात ज्या एका सद्धम्मरूपी किरणसमूह धारण करणाऱ्या महासूर्याच्या उदयामुळे, त्या जातिक्षेत्ररूपी महासरोवरातील जनरूपी कमळे विकसित झाली" असा अन्वय (योजना) आहे. ‘‘ตํ มหาสูร’’นฺติ สพฺพญฺญุพุทฺธมหาสูริยมณฺฑลํ. ชนมฺพุช สนฺตาเนสุปวตฺตํ มหนฺตํ โมหตมํนูทติ อปเนติ, สทฺธมฺมรํสิชาลํ วิสฺสชฺชนฺโต อนฺตรธาเปตีติ มหาโมหตโมนุโท. ตํ ‘‘มหาโมหตโมนุทํ’’. "तं महासूरं" म्हणजे सर्वज्ञ बुद्धरूपी महासूर्यमंडळ. जनरूपी कमळांच्या संतानांमध्ये (चित्तसंततीमध्ये) पसरलेला मोठा मोहरूपी अंधकार जो नष्ट करतो, दूर करतो, सद्धम्मरूपी किरणसमूह पसरवून अंतर्धान पाववतो, तो "महामोहतमोनुद" (महामोहरूपी अंधकार नष्ट करणारा) होय. त्या "महामोहतमोनुद" (महामोहरूपी अंधकार नष्ट करणाऱ्याला). เอวํ พุทฺธสฺสปณามํ กตฺวา อตฺตนา อิจฺฉิตํ ปณามปฺปโยชนํ ปริณาเมนฺโต ‘‘สญฺชาต’’นฺติอาทิมาห. ‘‘โสมหาสูโรมยฺหํ หทเย สญฺชาตํ ตโมขนฺธํ ปนูทต’’นฺติโยชนา. ตตฺถ ‘‘สญฺชาต’’นฺติ สุฏฺฐุชาตํ, อนมตคฺเคสํสาเร ทฬฺหํ ปวตฺตนฺติ อตฺโถ. ‘‘ตโมขนฺธ’’นฺติ มหาโมหตโมขนฺธํ. สพฺพกิเลสตโมขนฺธํ วา. อนฺตรายกรานิ อุปวีฬโกปฆาตกกมฺมานิปิ ตโมขนฺเธ สงฺคหิตานิ เอว. ตถา โรคาทโย อนฺตราย ธมฺมาปิ ตโมชาติกาเอวตโมตมปรายโนติอาทีสุ. ‘‘ปนูทต’’นฺติ ปนูทตุ, อปเนตุ, อนฺตรธาเปตุ. अशा प्रकारे बुद्धांना वंदन करून, स्वतःला अपेक्षित असलेले वंदनाचे प्रयोजन समर्पित करताना "सञ्जातं" इत्यादी म्हणतात. "तो महासूर्य माझ्या हृदयात उत्पन्न झालेल्या अंधकारसमूहाला नष्ट करो" असा अन्वय आहे. तेथे "सञ्जातं" म्हणजे चांगल्या प्रकारे उत्पन्न झालेला, अनादी संसारात दृढपणे प्रवृत्त असलेला असा अर्थ आहे. "तमोखन्धं" म्हणजे महामोहरूपी अंधकारसमूह किंवा सर्व क्लेशांचा अंधकारसमूह. अंतराय (अडथळा) निर्माण करणारी, पीडा देणारी आणि उपघात करणारी कर्मे देखील अंधकारसमूहातच समाविष्ट आहेत. तसेच रोग इत्यादी अंतराय निर्माण करणारे धम्म देखील अंधकारमय स्वरूपाचेच आहेत, जसे की "तमोतमपरायणो" (अंधकारातून अंधकाराकडे जाणारे) इत्यादींमध्ये म्हटले आहे. "पनूदतं" म्हणजे नष्ट करो, दूर करो, अंतर्धान पाववो. เอวํ สปฺปโยชนํ ปณามํ กตฺวา อิทานิ สนิทานํ คนฺถปฺปฏิญฺญํ กโรนฺโต ‘‘โปราณเกหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ นิทานํ นาม คนฺถปฺปฏิญฺญาย [Pg.3] อาสนฺนการณํ. กตธํปนตนฺติ, สารตฺถาภิมานีนํ ยาจนญฺจสงฺคหสฺสวิปุลตฺถตา จ. अशा प्रकारे सप्रयोजन वंदन करून, आता कारणासहित ग्रंथाची प्रतिज्ञा करताना "पोराणकेहि" इत्यादी म्हणतात. तेथे "निदान" म्हणजे ग्रंथप्रतिज्ञेचे जवळचे कारण होय. ते कारण कोणते आहे? तर, सारभूत अर्थाचा अभिमान बाळगणाऱ्यांची (सार्थ शोधणाऱ्यांची) याचना आणि या संग्रहाची विपुलता (विस्तृतता) होय. ตตฺถ ทฺวีหิ คาถาหิ สการณํ ยาจนํ ทสฺเสติ. ปุน ทฺวีหิ คาถาหิ สอุปมํวิปุลตฺถตํทสฺเสติ. ‘‘ตสฺมา’’ติอาทินา คนฺถปฺปการ คนฺถคุเณหิ สหคนฺถปฺปฏิญฺญํ ทสฺเสติ. ตตฺถ อาทิคาถายํ ‘‘อภิธมฺมตฺถสงฺคเห โปราณเกหิ วิญฺญูหิ วณฺณิตา พหูวณฺณนา อิธโลกมฺหิทิสฺสนฺตี’’ติ โยชนา. ‘‘วณฺณนา’’ติ โปราณฏีกาโย วุจฺจนฺติ. เอวญฺจสติ กสฺมา อภินวํ วณฺณนํ ยาจนฺตีติ. ‘‘เย สารตฺถาภิมานิโน, เต ตาหิพหูหิ โปราณวณฺณนาหิตุฏฺฐึ นวินฺทนฺติ. ตสฺมา ตํ ยาจนฺตี’’ติโยชนา. เอเตน อปฺปสารตฺถา เอว ตาโปราณวณฺณนาโยติปิ ทีเปติเยว. ตตฺถ ‘‘ตุฏฺฐิ’’นฺติ สนฺตุฏฺฐึ. นวินฺทนฺตินปฏิลภนฺติ. ‘‘เย’’ติเยชนา. तेथे दोन गाथांद्वारे कारणासहित याचना दर्शवितात. पुन्हा दोन गाथांद्वारे उपमेसह विपुलता दर्शवितात. "तस्मा" इत्यादींद्वारे ग्रंथाचा प्रकार आणि ग्रंथाच्या गुणांसह ग्रंथाची प्रतिज्ञा दर्शवितात. तेथे पहिल्या गाथेत "अभिधम्मत्थसंग्रहावर प्राचीन विद्वानांनी रचलेल्या अनेक व्याख्या (टीका) या जगात दिसतात" असा अन्वय आहे. "वण्णना" म्हणजे प्राचीन टीका म्हटल्या जातात. असे असताना नवीन व्याख्या का मागितली जात आहे? "जे सारभूत अर्थाचा अभिमान बाळगणारे आहेत, ते त्या अनेक प्राचीन व्याख्यांनी संतुष्ट होत नाहीत. म्हणून ते याची याचना करतात" असा अन्वय आहे. यावरून त्या प्राचीन व्याख्या अल्प-सारयुक्तच आहेत, हे देखील स्पष्ट होते. तेथे "तुट्ठिं" म्हणजे संतुष्टी. "न विन्दन्ति" म्हणजे प्राप्त करत नाहीत. "ये" असा अन्वय आहे. สารตฺถเมว อภิมาเนนฺติ, วิเสเสน นนฺทนฺติสีเลนาติ สารตฺถาภิมานิโน. เตนวินฺทนฺตีติปุริเมนสมฺพนฺโธ. ปุน ‘‘เต’’ติ ตาหิ ตุฏฺฐึ อวินฺทนฺตา เตชนา. ‘‘ม’’นฺติ อตฺตานํ นิทฺทิสติ. ‘‘สงฺคมฺมา’’ติ สมาคนฺตฺวา. ยสฺมา ปรมตฺถสฺสทีปนํ ยาจนฺติ, ตสฺมา อิมิสฺสาฏีกาย ‘‘ปรมตฺถทีปนี’’ติ นามํปิ สิทฺธํโหติ. ‘‘มหณฺณเว’’ติ มหาสมุทฺเท. ‘‘รตนานี’’ติ สุวณฺณรชตาทีนิ รตนานิ. ‘‘อุทฺธริตฺวา’’ติ อุทฺธํ อาหริตฺวา. ‘‘ยถิจฺฉกํวี’’ติยถิจฺฉิตํปิ. ยตฺตกํ อิจฺฉนฺติ, ตตฺตกํวีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ทชฺเชยฺยุํ’’ติ ทเทยฺยุํ. กามํ ททนฺตูติ อตฺโถ. เอยฺยาทิวจนานํ อนุมติ อตฺเถปวตฺตนโต. ‘‘นวตฺตพฺพาวอูนตา’’ติ มหณฺณเวรตนานํ อูนตาหานิตา นวตฺตพฺพาว. กสฺมา, อปริมาณ รตนาธิฏฺฐานตฺตา มหาสมุทฺทสฺส. ยโต โส สาคโรติ วุจฺจติ, สานํธนรตนานํ เคหคพฺภสทิสตฺตาสาคโรติ หิสฺส อตฺโถ. जे केवळ सारभूत अर्थाचाच अभिमान बाळगतात, विशेष रूपाने त्याचाच स्वीकार करण्याच्या स्वभावाचे आहेत, ते "सारत्थाभिमानिनो" (सारार्थाभिमानी) होत. "ते न विन्दन्ति" (ते प्राप्त करत नाहीत) या आधीच्या पदाशी याचा संबंध आहे. पुन्हा "ते" म्हणजे त्या प्राचीन व्याख्यांनी संतुष्ट न झालेले ते लोक. "मं" म्हणजे स्वतःचा (माझा) निर्देश करतात. "सङ्गम्मा" म्हणजे एकत्र येऊन. ज्याअर्थी ते परमार्थाचे प्रकटीकरण (दीपन) करण्याची याचना करतात, त्याअर्थी या टीकेचे "परमत्थदीपनी" हे नाव देखील सिद्ध होते. "महण्णवे" म्हणजे महासागरात. "रतनानि" म्हणजे सुवर्ण, रजत (चांदी) इत्यादी रत्ने. "उद्धरित्वा" म्हणजे वर काढून, बाहेर काढून. "यथिच्छकं वि" म्हणजे इच्छेनुसार देखील. जितकी इच्छा असेल तितकी, असा अभिप्राय आहे. "दज्जेय्युं" म्हणजे द्यावीत. "इच्छेनुसार द्यावीत" असा अर्थ आहे, कारण "एय्य" इत्यादी प्रत्ययांचा वापर अनुमतीच्या अर्थात होतो. "न वत्तब्बा व ऊनता" म्हणजे महासागरातील रत्नांची कमतरता किंवा घट कधीही बोलली जाऊ शकत नाही. का? कारण महासागर हा अमर्याद रत्नांचे स्थान आहे. म्हणूनच त्याला "सागर" म्हटले जाते; "सा" म्हणजे धन-रत्नांच्या घराच्या गाभाऱ्यासारखा (गृहगर्भसदृश) असल्यामुळे त्याला "सागर" असे म्हणतात, हाच त्याचा अर्थ आहे. ‘‘ตเถเวตฺถา’’ติ เอตสฺมึ อภิธมฺมตฺถ สงฺคเหตเถว. ‘‘วิปุลตฺถา’’ติ มหนฺตา อตฺถา. ‘‘รตนูปมา’’ติ มหณฺณเว รตนสทิสา. ‘‘สตกฺขตฺตุํปี’’ติ อเนกสตวารํปิ. ‘‘วณฺเณยฺยุํ’’ติ กามํวณฺเณนฺตุ. ‘‘ปริยาทินฺนา’’ติ ปริโต อนวเสสโต อาทินฺนา คหิตา. ปริกฺขีณาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘นเหสฺสเร’’ติ นเหสฺสนฺติ [Pg.4] นภวิสฺสนฺติ. ‘‘ตสฺมา’’ติ ยสฺมาจ ยาจนฺติ, ยสฺมาจ ปริยาทินฺนานเหสฺสนฺติ, ตสฺมา. ‘‘ตาสุวณฺณนาสู’’ติ ตาสุ โปราณฏีกาสุ. ‘‘วณฺณน’’นฺติ อภินววณฺณนํ, อภินวฏีกํกริสฺสนฺติ สมฺพนฺโธ. กีทิสํวณฺณนํ กริสฺสตีติ อาห ‘‘นานาสารตฺถ สมฺปุณฺณ’’นฺติอาทิ. ตตฺถ ‘‘อุตฺตานปทพฺยญฺชน’’นฺติ อุตฺตานปทญฺจ อุตฺตานวากฺยญฺจ. ‘‘นาติสงฺเขปวิตฺถาร’’นฺติ นาติสงฺเขปํนาติวิตฺถารญฺจ. มนฺทา พุทฺธิ เยสํ เต มนฺทพุทฺธิโน. ‘‘มนฺทา’’ติ มุทุกา. ‘‘พุทฺธี’’ติ ญาณํ. มนฺทพุทฺธิโน โสตุชเน ปโพเธติ วิกาเสติ, ญาณ วิกาสํปาเปตีติ มนฺทพุทฺธิปฺปโพธนา. ‘‘กริสฺส’’นฺติ กริสฺสามิ. ‘‘ต’’นฺติ ตํวณฺณนํ. ‘‘ปรมตฺเถสุปาฏวตฺถิโนสุณนฺตู’’ติ โยชนา. ปฏุโนภาโวปาฏวํ. ปฏุโนติ พฺยตฺตสฺสปณฺฑิตสฺส. ปาฏเวน อตฺโถ เยสํ เต ปาฏวตฺถิโน. อิติสทฺโท ปริสมาปนโชตโก. โส หิ คนฺถารพฺภวิธานสฺส อิธปริสมาปนํ ปรินิฏฺฐานํ ญาเปตุํ คนฺถารพฺภวากฺยสฺสปริยนฺเต โยชิโต. อวยว วากฺยานํ ปิโยชียติเยว. เอสนโยสพฺพตฺถ. “तथैवेत्थ” (तथैव इत्थ) म्हणजे याच अभिधम्मत्थसंगहामध्ये. “विपुलत्था” म्हणजे महान अर्थ. “रतनूपमा” म्हणजे महासागरातील रत्नांसारखे. “सतक्खत्तुंपि” म्हणजे अनेक शेकडो वेळासुद्धा. “वण्णेय्युं” म्हणजे इच्छेनुसार वर्णन करोत. “परियादिन्ना” म्हणजे पूर्णपणे, काहीही शिल्लक न ठेवता घेतलेले, ग्रहण केलेले. म्हणजेच 'परिक्खीणा' (संपलेले/क्षीण झालेले) असे म्हटले आहे. “नहेस्सरे” म्हणजे होणार नाहीत, अस्तित्वात राहणार नाहीत. “तस्मा” म्हणजे ज्या कारणाने याचना करतात आणि ज्या कारणाने ते संपणार नाहीत, त्या कारणाने. “तासुवण्णनासू” म्हणजे त्या जुन्या टीकांमध्ये. “वण्णनं” म्हणजे नवीन वर्णन, नवीन टीका करतील असा संबंध आहे. कशा प्रकारचे वर्णन करतील? म्हणून म्हटले आहे - “नानासारत्थ सम्पुण्णं” (विविध सारभूत अर्थांनी परिपूर्ण) इत्यादी. त्यात “उत्तानपदब्यञ्जनं” म्हणजे स्पष्ट पदे आणि स्पष्ट वाक्ये. “नातिसङ्खेपvitthārं” म्हणजे अतिशय संक्षिप्तही नाही आणि अतिशय विस्तृतही नाही. ज्यांची बुद्धी मंद आहे ते 'मंदबुद्धी' होत. “मंदा” म्हणजे मंद/मृदू. “बुद्धी” म्हणजे ज्ञान. मंदबुद्धी असलेल्या श्रोत्यांना प्रबोधित करते, विकसित करते, त्यांच्या ज्ञानाचा विकास घडवून आणते, म्हणून 'मंदबुद्धिप्पबोधना' (मंदबुद्धींना प्रबोधित करणारी). “करिस्सं” म्हणजे मी करीन. “तं” म्हणजे त्या वर्णनाला (टीकेला). “परमत्थेसुपाटवत्थिनो सुणन्तु” (परमार्थामध्ये नैपुण्याची इच्छा असणाऱ्यांनी ऐकावे) अशी योजना आहे. चतुर असण्याचा भाव म्हणजे 'पाटवं' (नैपुण्य). 'पटु' म्हणजे चतुर, पंडित. नैपुण्याने ज्यांचा अर्थ (प्रयोजन) आहे ते 'पाटवत्थिनो' (नैपुण्याची इच्छा असणारे). 'इति' हा शब्द समाप्ती दर्शवणारा आहे. तो ग्रंथाच्या आरंभाच्या विधीची येथे समाप्ती किंवा पूर्णता दर्शवण्यासाठी ग्रंथारंभाच्या वाक्याच्या शेवटी जोडला गेला आहे. अवयव वाक्यांनाही तो जोडला जातोच. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. คนฺถารพฺภคาถาวณฺณนานิฏฺฐิตา. ग्रंथाच्या आरंभीच्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन) समाप्त झाले. ๑. เอวํ คนฺถารพฺภวิธานํ กตฺวา อิทานิ อาทิคาถาย สมฺพนฺธํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อภิธมฺมตฺถสงฺคห’’นฺติอาทิมาห. สมฺพนฺธนฺติ การณปฺผลสํโยคํ. ตตฺถ คาถาปวตฺตนํ การณํ นาม. ปญฺจปิณฺฑตฺถ ทสฺสนํ ผลํ นาม. การณปฺผลสํโยโค สมฺพนฺโธนาม. ‘‘สปฺปโยชเน’’ติ ผลปฺปโยชนสหิเต. คนฺเถน อภิธาตพฺโพ กเถตพฺโพติ คนฺถาภิเธยฺโย. นิปตสฺส กมฺมํ นิปจฺจํ. นิปจฺจ กิริยา, นิปจฺจากาโร, นิปจฺจการสฺสกรณนฺติ สมาโส. ‘‘สา’’ติ รตนตฺตยวนฺทนา. ทสฺสิตาติสมฺพนฺโธ. ‘‘อภิหิตา’’ติ กถิตา. ปกาสิตาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปธานตฺถภูตา’’ติ อธิปฺเปตตฺถภูตาติ อธิปฺปาโย. ทุวิโธหิ อตฺโถวจนตฺโถ จ อภิธานตฺโถจ. ตตฺถ คจฺฉตีติ คโต, ปุริโสติ วุตฺเตคจฺฉติ ปเทน วุตฺโต โยโกจิ คจฺฉนฺโต วจนตฺโถนาม. ปุริโสติ ปเทนทสฺสิโต [Pg.5] ปธานตฺโถ อธิปฺเปตตฺโถ อภิเธยฺยตฺโถ นามาติ. ‘‘อภิธมฺมตฺถา’’ติ. १. अशा प्रकारे ग्रंथाच्या आरंभाचा विधी करून, आता पहिल्या गाथेचा संबंध दाखवताना “अभिधम्मत्थसंगहं” इत्यादी म्हटले आहे. 'संबंध' म्हणजे कारण आणि फळ यांचा संयोग. त्यात गाथेची प्रवृत्ती हे 'कारण' आहे. पाच पिण्डार्थांचे (एकत्रित अर्थांचे) दर्शन हे 'फळ' आहे. कारण आणि फळ यांचा संयोग म्हणजेच संबंध होय. “सप्पयोजने” म्हणजे फळ आणि प्रयोजनासह. ग्रंथाद्वारे जे सांगितले जावे, कथित केले जावे ते 'ग्रंथाभिधेय' (ग्रंथाचा प्रतिपाद्य विषय) होय. नम्रतेचे कर्म म्हणजे 'निपच्चं'. नम्रतेची क्रिया, नम्रतेचा भाव, नम्रतापूर्वक वागणे असा हा समास आहे. “सा” म्हणजे ती त्रिरत्नवंदना. 'दाखवली आहे' असा संबंध आहे. “अभिहिता” म्हणजे कथित, 'प्रकाशित केली आहे' असा याचा अर्थ आहे. “पधानत्थभूता” म्हणजे अभिप्रेत असलेला मुख्य अर्थ असा अभिप्राय आहे. अर्थ दोन प्रकारचा असतो - वचनार्थ (शब्दाचा अर्थ) आणि अभिधानार्थ (प्रतिपाद्य अर्थ). त्यात 'जो जातो तो गेला' आणि 'पुरुष' असे म्हटले असता, 'जातो' या पदाने सांगितलेला कोणताही जाणारा हा 'वचनार्थ' होय. 'पुरुष' या पदाने दर्शवलेला मुख्य अर्थ, अभिप्रेत अर्थ हा 'अभिधेयार्थ' होय. “अभिधम्मत्था” म्हणजे... ตตฺถ วุตฺตาภิธมฺมตฺถา, จตุธา ปรมตฺถโต; จิตฺตํ เจตสิกํ รูปํ, นิพฺพานมิติ สพฺพถา. ติ "तेथे सांगितलेले अभिधम्मत्थ (अभिधम्म अर्थ) परमार्थ रूपाने चार प्रकारचे आहेत; चित्त, चेतसिक, रूप आणि निर्वाण हे सर्व प्रकारे (अभिधम्मत्थ आहेत)." เอวํ วุตฺตา อภิธมฺมตฺถา. เอวํ วุตฺตตฺตาเยวจ เตจตฺตาโร อภิธมฺมตฺถา เอว อิธปธานตฺถภูตาติ จ, - ปธานตฺถาเอว อิธคนฺถาภิเธยฺย ภาเวน อธิปฺเปตาติ จวิญฺญายตีติ อธิปฺปาโย. अशा प्रकारे अभिधम्मत्थ सांगितले आहेत. अशा प्रकारे सांगितल्यामुळेच ते चार अभिधम्मत्थच येथे मुख्य अर्थ आहेत आणि मुख्य अर्थच येथे ग्रंथाचा प्रतिपाद्य विषय (ग्रंथाभिधेय) म्हणून अभिप्रेत आहेत, असे समजले पाहिजे असा अभिप्राय आहे. เกจิปนวเทยฺยุํ, เตอภิธมฺมตฺถา สงฺคหปฺปกรณํ ปตฺตา วิสุํ สงฺคหตฺถานามภเวยฺยุํ, นอภิธมฺมตฺถา นาม. อิธ จ สงฺคหตฺถา เอว อภิเธยฺยภาเวน อธิปฺเปตาติ วุตฺตํ อภิเธยฺโย อภิธมฺมตฺถ สงฺคหปฺปเทนาติ. วุจฺจเต. เตอภิธมฺมตฺถา สงฺคหปฺปกรณํ ปตฺตาปิ อภิธมฺมตฺถา เอวนาม โหนฺติ, น วิสุํ สงฺคหตฺถานาม. ตตฺถ วุตฺตาภิธมฺมตฺถาติหิ วุตฺตํ, นตุวุตฺตํ ตตฺถ วุตฺตาสงฺคหตฺถาติ. เอวญฺจสติ สงฺคหิตภาวมตฺตํ วิสิฏฺฐํ โหติ. ตเทว อิธ อภิเธยฺโย นาม สิยาติ วุตฺตํ ‘‘สงฺคหิตภาโวปิ อภิเธยฺโย เยวา’’ติอาทิ. ตตฺถ ‘‘สงฺคหิตภาโว’’ติจิตฺตสงฺคโห, เจตสิกสงฺคโหติอาทินา สงฺคหณกิริยา. สา สงฺคหิเตหิ ธมฺเมหิ อญฺญา นโหติ. เตสฺเววธมฺเมสุสงฺคยฺหตีติ วุตฺตํ ‘‘สงฺคหิตภาโวปิ อภิเธยฺโย เยวา’’ติ. กิญฺจาปิเตหิ อญฺญานโหติ, เต สฺเวว สงฺคยฺหติ. สาปน คนฺถสฺสปธานตฺโถ นโหติ. อิธ จ ปธานตฺโถว อธิปฺเปโตติ วุตฺตํ ‘‘ตํนสุนฺทร’’นฺติ. กสฺมา นสุนฺทรนฺติ อาห ‘‘นหิโส’’ติอาทึ. เอตฺถจหิสทฺโท อิมสฺส วากฺยสฺสเหตุวากฺยภาวํ โชเตติ. เอสนโยปรตฺถปิ. ‘‘อิโตปฏฺฐาย จา’’ติอาทิ คนฺถ ครุโทสวิวชฺชนํ. ตตฺถ ‘‘อิมสฺสสงฺคหสฺสา’’ติ อิมสฺสอภิธมฺมตฺถสงฺคหสฺส. ‘‘ทุตียา’’ติทุตียาฏีกา. ‘‘ทฺเวปี’’ติ ทฺเวปิฏีกาโย. ‘‘วิสุทฺธิมคฺเคมหาฏีกา’’ติ อาจริยธมฺมปาลตฺเถเรน กตาปรมตฺถมญฺชูสานามฏีกา. สา พฺรมฺมรฏฺเฐ ติริยปพฺพตวาสินา เถเรนกตํ จูฬฏีกํ อุปาทาย มหาฏีกาติ ปากฏา. ตํสนฺธาเยตํ วุตฺตํ. काही लोक कदाचित असे म्हणतील की, ते अभिधम्मत्थ 'संगह' प्रकरणात आल्यामुळे स्वतंत्रपणे 'संगहत्थ' (संग्रहाचे अर्थ) ठरतील, 'अभिधम्मत्थ' नव्हे. आणि येथे 'अभिधम्मत्थसंगह' या पदाने 'संगहत्थ'च प्रतिपाद्य विषय म्हणून अभिप्रेत आहेत असे म्हटले आहे. यावर उत्तर दिले जाते: ते अभिधम्मत्थ 'संगह' प्रकरणात आले तरीही ते 'अभिधम्मत्थ'च राहतात, स्वतंत्रपणे 'संगहत्थ' होत नाहीत. कारण "तेथे सांगितलेले अभिधम्मत्थ" असेच म्हटले आहे, "तेथे सांगितलेले संगहत्थ" असे म्हटलेले नाही. आणि असे असताना केवळ संग्रहित असण्याचा भावच विशिष्ट ठरतो. तोच येथे प्रतिपाद्य विषय असावा म्हणून "संग्रहित असण्याचा भाव देखील प्रतिपाद्य विषयच आहे" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "संग्रहित असण्याचा भाव" म्हणजे चित्तसंग्रह, चेतसिकसंग्रह इत्यादी संग्रह करण्याची क्रिया. ती संग्रहित केलेल्या धम्मांपेक्षा वेगळी नसते. त्या धम्मांमध्येच तिचा संग्रह होतो, म्हणूनच "संग्रहित असण्याचा भाव देखील प्रतिपाद्य विषयच आहे" असे म्हटले आहे. जरी ती त्यांच्यापेक्षा वेगळी नसली आणि त्या धम्मांमध्येच समाविष्ट होत असली, तरी ती ग्रंथाचा मुख्य अर्थ नाही. आणि येथे मुख्य अर्थच अभिप्रेत असल्यामुळे "ते योग्य नाही" (तं न सुंदरं) असे म्हटले आहे. ते योग्य का नाही? हे सांगण्यासाठी "न हि सो" (कारण तो...) इत्यादी म्हटले आहे. येथे 'हि' हा शब्द या वाक्याचा हेतू दर्शवतो. हाच नियम पुढेही लागू होतो. "इतोपट्ठाय च" (इथून पुढे) इत्यादी ग्रंथातील दोषांचे निवारण करण्यासाठी आहे. तेथे "इमस्स संगहस्स" म्हणजे या अभिधम्मत्थसंगहाची. "दुतीया" म्हणजे दुसरी टीका. "द्वेपि" म्हणजे दोन्ही टीका. "विसुद्धिमग्गे महाटीका" म्हणजे आचार्य धम्मपाल थेरांनी लिहिलेली 'परमत्थमंजूसा' नावाची टीका. ती ब्रह्मदेशातील (म्यानमारमधील) तिरियपब्बत येथे राहणाऱ्या थेरांनी लिहिलेल्या 'चूळटीका' (लघुटीका) च्या संदर्भाने 'महाटीका' म्हणून प्रसिद्ध आहे. त्याला उद्देशूनच हे म्हटले आहे. คนฺถปฺปกาโรจ [Pg.6] ปการวนฺเตหิ ธมฺเมหิ สเหวสิชฺฌติ, วินา นสิชฺฌตีติ อธิปฺปาเยน ‘‘โสอภิธมฺมตฺถปเทนา’’ติ วุตฺตํ. กามญฺจ โส เตหิ สเหวสิชฺฌติ, วินานสิชฺฌติ. อภิธมฺมตฺถปทํ ปน สงฺคหณกิริยาปการํน วทตีติ วุตฺตํ ‘‘ตํ นสุนฺทร’’นฺติ. ทุวิธํ นามํ อนฺวตฺถนามํ รุฬินามนฺติ. ตตฺถ, อตฺถานุคตํ นามํ อนฺวตฺถนามํ, ยถา สุขิตสฺสชนสฺส สุโขตินามํ. อตฺถรหิตํ อาโรปิตํ นามํ รุฬินามํ, ยถา ทุกฺขิตสฺสชนสฺส สุโขติ นามํ. อิธ ปน อนฺวตฺถนา มนฺติทสฺเสตุํ ‘‘อตฺถานุคตา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘อตฺถานุคตา’’ติ สกตฺถานุคตา. สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตานุคตาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘คนฺถสมญฺญา’’ติ คนฺถสมฺมุติ. คนฺถสฺสนามนฺติ วุตฺตํ โหติ. สงฺคหคนฺโถนาม ปาฬิยํตตฺถ ตตฺถ วิปฺปกิณฺเณธมฺเม เอกตฺถ สภาคราสิกรณวเสน ปวตฺโต คนฺโถ. ตํ อุคฺคณฺหนฺโต อปฺปเกน คนฺเถนพหุเกธมฺเมสุเขนชานาติ. ‘‘ตทุคฺคหปริปุจฺฉาทิวเสนา’’ติ ตสฺสอุคฺคโหจ ปริปุจฺฉาจาติ ทฺวนฺโท. อาทิสทฺเทน ธารณาทีนิ สงฺคณฺหาติ. ตตฺถ ปาฐสฺสวาจุคฺคตกรณํ อุคฺคโหนาม. อุคฺคหิ ตสฺสปาฐสฺส อตฺถคฺคหณํ ปริปุจฺฉานาม. ‘‘อนายาสโต’’ติ นิทฺทุกฺเขน. ‘‘ลทฺธพฺพํผลานุผล’’นฺติ สมฺพนฺโธ. สรูปโต อวพุชฺฌนํ สรูปาวโพโธ. อาทิสทฺเทน ลกฺขณาวโพโธ รสาว โพโธติอาทึ สงฺคณฺหาติ. อนุปาทาปรินิพฺพานํ อนฺโต ปริโยสานํ ยสฺสาติ อนุปาทาปรินิพฺพานนฺตํ. ตตฺถ ‘‘อนุปาทาปรินิพฺพาน’’นฺติ ตณฺหาทิฏฺฐีหิ ขนฺเธสุ อนุปาทายปรินิพฺพานํ. อนุปาทิเสส ปรินิพฺพานนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ผลานุผล’’นฺติ ผลญฺเจว อนุผลญฺจ. ตตฺถ ‘‘ผล’’นฺติ มูลปฺผลํ. ‘‘อนุผล’’นฺติ ปรมฺปรปฺผลํ. ปโยเชตีติ ‘‘ปโยชนํ’’. ปโยเชตีติ นิโยเชติ. กึ นิโยเชติ. ผลตฺถิกํชนํ. กตฺถ นิโยเชติ. ผลนิพฺพตฺตเกกมฺเม. กิมตฺถาย นิโยเชติ. ตสฺสกมฺมสฺส กรณตฺถายาติ. ผลานุภวนตฺถาย ตตฺถตตฺถ ผลานุภวนกิจฺเจสุ ปยุชฺชียตีติ ปโยชนนฺติ ปิวทนฺติ. ‘‘สามตฺถิยโต’’ติ วจนสามตฺถิยโต. กึ วจนสามตฺถิยนฺติ. การณวจนํ ผลํปิทีเปติ. ผลวจนํ การณํปิทีเปติ. ยถาตํ อสุกสฺมึ รฏฺเฐ สมฺมาเทโว วุฏฺโฐติ วุตฺเต ตํ รฏฺฐํสุ [Pg.7] ภิกฺขนฺติ วิญฺญายติ. อสุกรฏฺฐํ สุภิกฺขนฺติวุตฺเต ตสฺมึ รฏฺเฐ สมฺมาเทโว วุฏฺโฐติ วิญฺญายตีติ. ปโยชนํ ปน อภิธมฺมตฺถ สทฺเทน ทสฺเสตพฺพํ นตฺถิ, สงฺคหวจนสามตฺถิเยเนว สิทฺธํ โหตีติ อธิปฺปาเยน ‘‘สงฺคหสทฺเทนา’’ติ วุตฺตํ. สามตฺถิยทสฺสเน ปน สุฏฺฐุ ปริปุณฺณวจนํ อิจฺฉิตพฺพํ โหติ. อิตรถา อนิฏฺฐตฺถปฺปสงฺโคปิ สิยาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตํ น สุนฺทร’’นฺติ วตฺวา ‘‘นหี’’ติอาทินา เหตุวากฺเยน ตทตฺถํ สาเธติ. ग्रंथप्रकार आणि प्रकारयुक्त धर्मांसोबतच सिद्ध होतो, त्याशिवाय सिद्ध होत नाही, या अभिप्रायाने 'तो अभिधम्मत्थपदाने' (so abhidhammatthapadena) असे म्हटले आहे. आणि तो त्यांच्यासोबतच सिद्ध होतो, त्यांच्याशिवाय सिद्ध होत नाही, हे निश्चित आहे. परंतु 'अभिधम्मत्थपद' हे संग्रह करण्याच्या क्रियेचा प्रकार सांगत नाही, म्हणून 'ते योग्य नाही' (taṃ na sundaraṃ) असे म्हटले आहे. नाव (नाम) दोन प्रकारचे असते: अन्वर्थनाम (सार्थक नाव) आणि रूढिनाम. त्यात, अर्थाला अनुसरून असणारे नाव म्हणजे अन्वर्थनाम होय, जसे की सुखी माणसाचे नाव 'सुख' असणे. अर्थरहित, केवळ लादलेले नाव म्हणजे रूढिनाम होय, जसे की दुःखी माणसाचे नाव 'सुख' असणे. परंतु येथे अन्वर्थनाम दर्शवण्यासाठी 'अर्थानुगत' (atthānugatā) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात 'अर्थानुगत' म्हणजे स्वतःच्या अर्थाला अनुसरून असणारे. शब्दाच्या प्रवृत्तीच्या कारणाला अनुसरून असणारे, असा याचा अर्थ होतो. 'ग्रंथसमज्ञा' (ganthasamaññā) म्हणजे ग्रंथाची संमती (संज्ञा). ग्रंथाचे नाव, असा याचा अर्थ होतो. संग्रहग्रंथ म्हणजे पाळि साहित्यामध्ये तिथे तिथे विखुरलेल्या धर्मांना एका ठिकाणी समान समूहाच्या रूपाने एकत्र करून प्रवृत्त झालेला ग्रंथ. त्याचा अभ्यास करणारा मनुष्य लहान ग्रंथाच्या माध्यमातून अनेक धर्मांना सहजपणे जाणतो. 'त्याचे ग्रहण आणि परिपृच्छा (प्रश्न विचारणे) इत्यादींच्या द्वारे' (taduggahaparipucchādivasena) यामध्ये त्याचा अभ्यास (ग्रहण) आणि परिपृच्छा असा द्वंद्व समास आहे. 'इत्यादी' (आदि) शब्दाने धारणा (स्मरण) इत्यादींचा संग्रह होतो. त्यात पाठाचे मुखोद्गत करणे म्हणजे 'उग्गह' (ग्रहण) होय. ग्रहण केलेल्या त्या पाठाचा अर्थ समजून घेणे म्हणजे 'परिपृच्छा' होय. 'अनायासाने' (anāyāsato) म्हणजे दुःखाशिवाय (सहजपणे). 'मिळवण्यायोग्य फल आणि अनुफल' (laddhabbaṃ phalānuphalaṃ) असा संबंध आहे. स्वतःच्या रूपाने जाणणे म्हणजे 'स्वरूपावबोध' होय. 'इत्यादी' शब्दाने लक्षणावबोध, रसावबोध इत्यादींचा संग्रह होतो. अनुपादा परिनिर्वाण (उपादानरहित परिनिर्वाण) हा ज्याचा अंत किंवा समाप्ती आहे, ते 'अनुपादापरिनिर्वाणांत' होय. त्यात 'अनुपादा परिनिर्वाण' म्हणजे तृष्णा, दृष्टी इत्यादींच्या द्वारे स्कंधांचे उपादान न करता होणारे परिनिर्वाण. म्हणजेच 'अनुपादिशेष परिनिर्वाण' असे म्हटले आहे. 'फल आणि अनुफल' (phalānuphalaṃ) म्हणजे फल आणि अनुफल दोन्ही. त्यात 'फल' म्हणजे मूळ फल. 'अनुफल' म्हणजे परंपरा-फल (अनुषंगिक फल). जे प्रवृत्त करते ते 'प्रयोजन' (payojana) होय. प्रवृत्त करते म्हणजे नियोजित करते. कोणाला नियोजित करते? फल इच्छिणाऱ्या माणसाला. कुठे नियोजित करते? फल उत्पन्न करणाऱ्या कर्मामध्ये. कशासाठी नियोजित करते? त्या कर्माच्या आचरणासाठी. फलाचा अनुभव घेण्यासाठी तिथे तिथे फलाचा अनुभव घेण्याच्या कार्यामध्ये जे प्रवृत्त केले जाते, त्याला 'प्रयोजन' असेही म्हणतात. 'सामर्थ्यामुळे' (sāmatthiyato) म्हणजे शब्दाच्या सामर्थ्यामुळे. शब्दाचे सामर्थ्य म्हणजे काय? कारणाचा शब्द फलालाही प्रकाशित करतो. फलाचा शब्द कारणालाही प्रकाशित करतो. जसे की, 'अमुक देशात चांगला पाऊस पडला' असे म्हटले असता, 'तो देश सुभिक्ष (समृद्ध) आहे' हे समजते. 'अमुक देश सुभिक्ष आहे' असे म्हटले असता, 'त्या देशात चांगला पाऊस पडला' हे समजते. परंतु 'अभिधम्मत्थ' या शब्दाने दर्शवण्यासारखे कोणतेही प्रयोजन नाही, ते 'संग्रह' या शब्दाच्या सामर्थ्यानेच सिद्ध होते, या अभिप्रायाने 'संग्रहशब्दाने' (saṅgahasaddena) असे म्हटले आहे. परंतु सामर्थ्य दर्शवताना अत्यंत परिपूर्ण शब्दाची अपेक्षा असते. नाहीतर अनिष्ट अर्थाचा प्रसंगही येऊ शकतो, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'ते योग्य नाही' असे सांगून 'नही' (कारण की नाही) इत्यादी हेतूवाक्याने त्या अर्थाचे प्रतिपादन केले आहे. ๒. เอวํ สปฺปโยชเน ปญฺจปิณฺฑตฺเถติ เอตฺถ ปญฺจปิณฺฑตฺเถ ทสฺเสตฺวา อิทานิ เตสํปญฺจนฺนํ ปิณฺฑตฺถานํ วิสุํวิสุํ ปญฺจปฺปโยชนานิ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิมาห. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุปญฺจสุ ปิณฺฑตฺเถสุ. นสงฺขฺยาตพฺพนฺติ อสงฺขฺเยยฺยํ. สงฺขาตุํอสกฺกุเณยฺยนฺติ อตฺโถ. นปเมตพฺพนฺติ อปฺปเมยฺยํ. ปเมตุํ อสกฺกุเณยฺยนฺติ อตฺโถ. เอวํ กิจฺจปจฺจยานํ กตฺถจิ สกฺกตฺถ ทีปนํ โหติ. สกวจนํ ปาฬิวจเนน สาเธตุํ ‘‘ยถาหา’’ติ ปุจฺฉิตฺวา ปาฬิคาถํ อาหริ. ตตฺถ ‘‘ยถาหา’’ติ กถํ อาห อิจฺเจวตฺโถ. อนนฺตเร วุตฺตสฺส อตฺถสฺส สาธกํ วจนํ กถํ ปาฬิยํ อาห, กถํ อฏฺฐกถายํ อาห, กถํ ฏีกายํ อาหาติ เอวํ ยถารหํ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ‘‘เตตาทิเสนิพฺพุเต อกุโตภเย ปูชยโต’’ติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘เต’’ติ พุทฺธ พุทฺธ สาวเก. ‘‘ตาทิเส’’ติ ตถา รูเปสี ลกฺขนฺธาทิคุณ สมฺปนฺเน. ‘‘นิพฺพุเต’’ติ กิเลส นิพฺพาเนน นิพฺพุเต. นตฺถิ กุโตจิ เหตุโต ภยํ เยสํ เต อกุโต ภยา. อนาคามิ ขีณาสวา. ‘‘ภย’’นฺติ จิตฺตุตฺราสภยํ. ‘‘ปูชยโต’’ติ ปูเชนฺตสฺส. ‘‘ตํ ปโยชน’’นฺติตสฺสารตนตฺตย วนฺทนาย ปโยชนํ. ‘‘สงฺคหการา’’ติ พุทฺธโฆสตฺเถราทโย ปจฺฉิม อฏฺฐกถาการา วุจฺจนฺติ. เตหิ โปราณฏฺฐกถาสุ ตตฺถ ตตฺถ วิปฺปกิณฺเณปกิณฺณกวินิจฺฉเยยุตฺตฏฺฐาเนสุ สงฺคเหตฺวา อภินว อฏฺฐกถาโย กโรนฺติ. ตสฺมา สพฺพาอภินวอฏฺฐกถาโย สงฺคหา นาม โหนฺติ. เต จ อาจริยา สงฺคหการา นาม. เตน วุตฺตํ ‘‘สงฺคหการาติ พุทฺธโฆส. เป… วุจฺจนฺตี’’ติ. เต อนฺตราย นีวารณเมว อิจฺฉนฺตีติ กถํ วิญฺญายตีติ เจ. เตสํ วจเนน [Pg.8] วิญฺญายตีติ ทสฺเสตุํ สงฺคหการ คาถํ อาหริ. ‘‘รตนตฺตเยกตสฺส เอตสฺสนิปจฺจการสฺส อานุภาเวน อนฺตราเย อเสสโตโสเสตฺวาติ โยชนา. ‘‘หี’’ติ ญาปกเหตุ โชตโก. ‘‘วุตฺต’’นฺติ อฏฺฐสาลินิยํ วุตฺตํ. २. अशा प्रकारे 'सप्रयोजन पाच पिण्डार्थ' (sappayojane pañcapiṇḍatthe) यामध्ये पाच पिण्डार्थ दर्शवून, आता त्या पाच पिण्डार्थांचे वेगवेगळे पाच प्रयोजन दर्शवताना 'तथ' (तिथे) इत्यादी म्हणाले. 'तथ' (तिथे) म्हणजे त्या पाच पिण्डार्थांमध्ये. ज्याची गणना करता येत नाही ते 'असंख्येय' (asaṅkhyeyya) होय. मोजणे अशक्य आहे, असा याचा अर्थ आहे. ज्याचे मोजमाप करता येत नाही ते 'अप्रमेय' (appameyya) होय. मोजमाप करणे अशक्य आहे, असा याचा अर्थ आहे. अशा प्रकारे कृत्य-प्रत्ययांचे (kiccapaccaya) कुठे कुठे स्वार्थ-दीपन (स्वतःचा अर्थ स्पष्ट करणे) होते. स्वतःचे वचन पाळि वचनाने सिद्ध करण्यासाठी 'जसे म्हटले आहे' (yathāha) असे विचारून पाळि गाथा उद्धृत केली. त्यात 'जसे म्हटले आहे' (yathāha) म्हणजे 'कसे म्हटले आहे' असाच अर्थ आहे. लगेचच आधी सांगितलेल्या अर्थाचे साधक वचन पाळिमध्ये कसे म्हटले आहे, अट्ठकथेमध्ये कसे म्हटले आहे, टीकेमध्ये कसे म्हटले आहे, अशा प्रकारे योग्यतेनुसार अर्थ समजून घ्यावा. 'ते तादृश, परिनिर्वृत, कुठूनही भय नसलेल्यांची पूजा करणाऱ्याचे' (te tādise nibbute akutobhaye pūjayato) अशी योजना आहे. त्यात 'ते' (te) म्हणजे बुद्ध आणि बुद्ध-श्रावक. 'तादृश' (tādise) म्हणजे तशाच प्रकारचे शील, स्कंध इत्यादी गुणांनी संपन्न असलेले. 'परिनिर्वृत' (nibbute) म्हणजे क्लेशांच्या निर्वाणाने (शांत होण्याने) परिनिर्वृत झालेले. ज्यांना कोणत्याही कारणाने भय नसते, ते 'अकुतोभय' (akutobhaya) होत. म्हणजेच अनागामी आणि क्षीणासव (अर्हत). 'भय' (bhaya) म्हणजे चित्ताचा थरकाप उडवणारे भय. 'पूजा करणाऱ्याचे' (pūjayato) म्हणजे पूजा करणाऱ्या व्यक्तीचे. 'ते प्रयोजन' (taṃ payojanaṃ) म्हणजे त्या त्रिरत्न वंदनेचे प्रयोजन. 'संग्रहकार' (saṅgahakārā) म्हणजे बुद्धघोष थेर इत्यादी नंतरचे अट्ठकथाकार म्हटले जातात. त्यांच्याद्वारे जुन्या अट्ठकथांमध्ये तिथे तिथे विखुरलेल्या प्रकीर्णक निर्णयांना योग्य ठिकाणी संग्रहित करून नवीन अट्ठकथा तयार केल्या जातात. म्हणून सर्व नवीन अट्ठकथांना 'संग्रह' असे म्हटले जाते. आणि ते आचार्य 'संग्रहकार' या नावाने ओळखले जातात. म्हणूनच म्हटले आहे: 'संग्रहकार म्हणजे बुद्धघोष... इत्यादी म्हटले जातात'. ते केवळ अंतरायांचे (अडथळ्यांचे) निवारणच इच्छितात, हे कसे समजते? ते त्यांच्या वचनावरून समजते, हे दर्शवण्यासाठी संग्रहकारांची गाथा उद्धृत केली. 'त्रिरत्नांच्या ठिकाणी केलेल्या या नमस्काराच्या प्रभावाने अंतरायांना पूर्णपणे नष्ट करून' अशी योजना आहे. 'ही' (hī) हा ज्ञापक हेतू दर्शवणारा शब्द आहे. 'म्हटले आहे' (vuttaṃ) म्हणजे अट्ठसालिनीमध्ये म्हटले आहे. ๓. ‘‘กถญฺจโหตี’’ติ สมฺพนฺโธ. อิติ อยํ ปุจฺฉา. ‘‘วุจฺจเต’’ติ วิสชฺชนา กถียเต. ‘‘หี’’ติวิตฺถารโชตโก. ‘‘วนฺทนา กิริยาภินิปฺผาทโก ปุญฺญปฺปวาโห’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อเนก…เป… วาเร’’ติ อจฺจนฺต สํโยคตฺเถ อุปโยค วจนํ. ‘‘ปุญฺญาภิสนฺโท’’ติ ปุญฺญาภิโสโต, ปุญฺญปฺปวาโหติ ตสฺเสว เววจนํ. ‘‘โส จ ปุญฺญาติสฺสโย โหตี’’ติ สมฺพนฺโธ. กสฺมา โส ปุญฺญา ติสฺสโย โหตีติ. เขตฺต สมฺปตฺติยา จ อชฺฌาสย สมฺปตฺติยา จ โหตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘อนุตฺตเรสู’’ติอาทิมาห. สํวฑฺฒิตฺถาติ สํวฑฺฒิโต. ปุญฺญาภิสนฺโท. สํวฑฺฒิตสฺสภาโว สํวฑฺฒิตตฺตํ. สุคนฺเธหิวิย สุปริสุทฺธํวตฺถํ ปริภาวียิตฺถาติ ปริภาวิโต. ปุญฺญาภิสนฺโทเยว. ปริภาวิตสฺส ภาโว ปริภาวิตตฺตํ. อุภยตฺถาปิ เหตุ อตฺเถ นิสฺสกฺกวจนํ. ‘‘มหาชุติโก’’ติ มหาเตโช. ‘‘มหปฺผโล’’ติ มูลปฺผเลน มหปฺผโล. ‘‘มหานิสํโส’’ติ อานิสํสปฺผเลน มหานิสํโส. อานิสํสปฺผลนฺติ จ ปรมฺปรา ผลํ วุจฺจติ. อญฺญํ ปุญฺญํ อติกฺกมนฺโต สยติ ปวตฺตตีติ อติสฺสโย. ปุญฺญญฺจ ตํ อติสฺสโยจาติ ปุญฺญาติสฺสโย. อติสฺสยปุญฺญํ, อธิก ปุญฺญนฺติ อตฺโถ. ‘‘โส อนุพลํ เทติ, โอกาสลาภํ กโรตี’’ติ สมฺพนฺโธ. กถญฺจ อนุพลํ เทติ, กถญฺจ โอกาสลาภํ กโรตีติ อาห ‘‘สยํ ปโยค สมฺปตฺติภาเวฐตฺวา’’ติอาทึ. ตตฺถ ปโยคสมฺปตฺตินาม อตีต ปุญฺญกมฺมานํ พลวตรํ อุปตฺถมฺภกกมฺมํ โหติ. ‘‘พหิทฺธา’’ติ พหิทฺธสนฺตานโต. ‘‘วิปตฺติปจฺจเย สมฺปตฺติปจฺจเย’’ติ โยเชตพฺพํ. ตตฺถ, วิปตฺติปจฺจยานาม-ราชโตวา โจรโตวา-ติอาทินา อาคตา ทุกฺขุปฺปตฺติปจฺจยา. สมฺปตฺติปจฺจยานาม กายจิตฺตานํ สปฺปาย ปจฺจยา. จตฺตาโร ปจฺจยา จ อุปฏฺฐากกุลานิ จ อารกฺข เทวตาทโย จ สุขุปฺปตฺติ ปจฺจยา. เตหิ ปจฺจเยหิ ปาโมชฺช พหุ ลสฺส [Pg.9] เถรสฺส สนฺตาเน รตฺติทิวํ ปีติปสฺสทฺธิสุขสมาธีนํ ปวตฺติยา อชฺฌตฺตภูตา อุตุจิตฺตาหารา จ อติ ปณีตา โหนฺติ. เตหิ สมุฏฺฐิตา สรีรฏฺฐกธาตุโย จ อติปณีตา เอว หุตฺวา อุปพฺรูหนฺติ. ตตฺถ สรีรฏฺฐกธาตุโย นาม ปถวิ อาทโย วาตปิตฺตเสมฺหาทโยจ. ‘‘อนุพลํเทตี’’ติอภินวํถามพลํ ปวตฺเตติ. ‘‘ปุญฺญนฺตรสฺสา’’ติ ปวตฺติวิปากชนกสฺส พหุวิธสฺส ปุญฺญ กมฺมสฺส. ‘‘อถา’’ติ ตสฺมึ กาเลติ อตฺโถ. ‘‘พลวพลวนฺติโย หุตฺวา’’ติ ปกติ พลโต อติพลวนฺติโย หุตฺวา. ‘‘ตสฺมึ เถรสนฺตาเน’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิฏฺฐปฺผลฆนปูริเต’’ติ อิฏฺฐปฺผลภูตานํ รูปสนฺตตีนํ ฆเนน ปูริเต. ‘‘โอกาโส นาม นตฺถี’’ติ ปติฏฺฐาโนกาโส นาม นตฺถิ. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. ‘‘ทูรโต อปนีตาเนว โหนฺตี’’ติ สมฺพนฺโธ. อิฏฺฐปฺผลสนฺตานํ วิพาธนฺติ นีวาเรนฺตีติ อิฏฺฐปฺผลสนฺตานวิพาธกานิ อุปปีฬกูปฆาตกกมฺมานิ. อนิฏฺฐปฺผล สนฺตาน ชนกานิ, อกุสล ชนก กมฺมานิ, อปุญฺญ กมฺมานีติ ตานิติวิธานิ อกุสลกมฺมานิ ทูรโต อปนีตาเนว โหนฺติ, เตสํ วิปากสฺส อโนกาสกรเณนาติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘นหี’’ติอาทึ. ‘‘ตโต’’ติ ตสฺมา อปุญฺญ กมฺมานํ ทูรโต อปนีตตฺตา. อภิวาเทตพฺพานํ มาตาปิตุ สมณพฺราหฺมณาทีนํ อภิวาทนกมฺเมครุํกรณํ อภิวาทน สีลํ นาม. ตํ อสฺส อตฺถีติ อภิวาทนสีลี. คุณวุทฺธวยวุทฺเธ อปเจติ อตฺตานํ นีจวุตฺติ กรเณน ปูเชติสีเลนาติ วุทฺธาปจายี. อุภยตฺถาปิสมฺปทาน วจนํ. เอวนฺติอาทินิ คมน วจนํ. นิคมนฺติ จ นิฏฺฐงฺคมนํ. ตสฺมาติอาทิ ลทฺธคุณ วจนํ. ลทฺธคุโณติ จ ตํตํปสงฺค วิโสธนํ ปริปุณฺณํ กตฺวา ลทฺโธวิสุทฺโธ อตฺโถ วุจฺจติ. ตถา วจน สามตฺถิเยน ลทฺโธ อตฺถนฺตโรปิ อยมิธ อธิปฺเปโต. ‘‘นเกวลญฺจ เถรสฺเสว อนนฺตราเยน ปริสมาปนตฺถํ โหตี’’ติ โยชนา. ‘‘โสตูนญฺจคหณ กิจฺจ สมฺปชฺชนตฺถ’’นฺติสมฺพนฺโธ. สุณนฺตีติ โสตาโร. เตสํ. ‘‘คณฺหนฺตาน’’นฺติ อุคฺคณฺหนฺตานํ. ‘‘วนฺทนาสิทฺธิยา’’ติร ตนตฺตเยวนฺทนา ปุญฺญสฺสสิทฺธิโต. ชวนวินิจฺฉเย ยสฺมา อนฺตราย นีวารณํนาม ทิฏฺฐธมฺเม อิจฺฉิตพฺพํ ผลํ โหติ. ทิฏฺฐ [Pg.10] ธมฺโม จ ปถม ชวนสฺส วิปากกฺเขตฺตํ. ตสฺมา อุปตฺถมฺภน กิจฺจํ ปตฺวาปิ ปถม ชวน เจตนา เอว อิธปริยตฺตาติ อธิปฺปาเยน ‘‘ทิฏฺฐธมฺมเวทนียภูตา’’ติ วุตฺตํ. สา ปน ปถม ชวน เจตนา อุปตฺถมฺภน กิจฺจํ ปตฺวาปิ สพฺพทุพฺพลา เอวสิยา. กสฺมา, อลทฺธาเสวนตฺตา. เสส เจตนาโย เอว พลวติโย สิยุํ. กสฺมา, ลทฺธา เสวนตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘สตฺตชวนปกฺเข อธิปฺเปตตฺตา อุปลทฺธพฺพตฺตา ตํ นสุนฺทร’’นฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิตี’’ติ วากฺยปริสมาปนํ. ‘‘ยถา อปฺปมตฺตกํ โหติ. เอวเมวํ อปฺปมตฺตกํ โหตี’’ติ โยเชตพฺพํ. ‘‘ตถาหี’’ติ ตโต เอวาติ อตฺโถ. ปฏฺฐาเนปิ=กพฬีกาโรอาหาโร อิมสฺสกายสฺส อาหาร ปจฺจเยนปจฺจโย=ติวิภตฺโต. อิตรถา ‘กพฬีกาโร อาหาโร อาหารสมุฏฺฐานานํ รูปานํ อาหารปจฺจเยน ปจฺจโย’ติ วิภตฺโต สิยาติ. ‘‘อธุนาวา’’ติ อิมสฺมึ ภเว เอว. เอวํ วนฺทนายปโยชนํ ทีเปตฺวา อิทานิ เสสานํ ปิณฺฑตฺถานํ ปโยชนํ ทีเปตุํ ‘‘ยสฺมาปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ, ‘‘อาทิโตวิทิเตสตี’’ติอาทิมฺหิ-ภาสิสฺสํ อภิธมฺมตฺถ สงฺคห-นฺติ ปทํ สุตฺวา วิญฺญาเตสติ, ‘‘อุสฺสาโหชายติ’’. อิมํ อุคฺคเหตฺวา สุทุลฺลเภ อภิธมฺมตฺเถ จ อนายาเสน ชานิสฺสาม, ตมฺมูลกสฺส จ อนุปาทา ปรินิพฺพานนฺตสฺส ปโยชนสฺสภาคิโน ภวิสฺสามาติ จิตฺตุปฺปาท สมฺภวโตติ อธิปฺปาโย. ३. "कथञ्च होति" (कसे होते) हा संबंध आहे. हा प्रश्न आहे. "वुच्चते" (सांगितले जाते) हे उत्तर दिले जात आहे. "हि" हा शब्द विस्ताराचा द्योतक आहे. "वंदना क्रियेद्वारे निष्पन्न होणारा पुण्यप्रवाह" हा संबंध आहे. "अनेक...पे... वारे" (अनेक वेळा) हे अत्यंत संयोगाच्या अर्थात द्वितीया विभक्तीचे वचन आहे. "पुण्याभिसंद" म्हणजे पुण्याचा प्रवाह (पुण्याभिस्रोत), पुण्यप्रवाह हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. "आणि तो पुण्याचा अतिशय (उत्कर्ष) होतो" हा संबंध आहे. तो पुण्याचा अतिशय का होतो? क्षेत्र संपत्तीमुळे आणि अध्याशय संपत्तीमुळे तो होतो, हे दर्शवण्यासाठी "अनुत्तरेसु" इत्यादी म्हटले आहे. "संवड्ढित्थ" म्हणजे संवर्धित झालेला. पुण्यप्रवाह. संवर्धित असण्याचा भाव म्हणजे संवर्धितत्व. सुगंधी द्रव्यांप्रमाणे अत्यंत शुद्ध वस्त्र सुवासित केले जाते, तसा सुवासित केलेला (परिभावित). तो पुण्यप्रवाहच होय. परिभावित असण्याचा भाव म्हणजे परिभावितत्व. दोन्ही ठिकाणी हेतूच्या अर्थात पंचमी विभक्तीचे वचन आहे. "महाजुतिको" म्हणजे महातेजस्वी. "महप्फलो" म्हणजे मूळ फळाने महाफलदायी. "महानिसंसो" म्हणजे आनिसंस (फायदा) रूपी फळाने महा-अनुशंसक. आणि आनिसंस-फल म्हणजे परंपरा-फल म्हटले जाते. इतर पुण्याचा अतिक्रम करून जो राहतो किंवा प्रवृत्त होतो, तो 'अतिशय' होय. आणि ते पुण्य जे अतिशय आहे, ते 'पुण्यातिशय' होय. अतिशय पुण्य किंवा अधिक पुण्य असा याचा अर्थ आहे. "तो अनुबल (अतिरिक्त बळ) देतो, संधी (अवकाश) प्राप्त करून देतो" हा संबंध आहे. आणि तो कसा अनुबल देतो आणि कसा अवकाश प्राप्त करून देतो? हे सांगण्यासाठी "स्वतः प्रयोग संपत्तीच्या भावात राहून" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे प्रयोग संपत्ती म्हणजे भूतकाळातील पुण्यकर्मांचे अधिक बलवान असे उपष्टंभक (पोषक) कर्म असते. "बहिद्धा" म्हणजे बाह्य संतानापासून (प्रवाहापासून). "विपत्तीचे प्रत्यय (कारण) आणि संपत्तीचे प्रत्यय" असे जोडले पाहिजे. तेथे, विपत्तीचे प्रत्यय म्हणजे राजाकडून किंवा चोराकडून इत्यादींमुळे उद्भवणारे दुःखाच्या उत्पत्तीचे प्रत्यय (कारणे) होत. संपत्तीचे प्रत्यय म्हणजे काय आणि चित्ताला अनुकूल (सप्पाय) असणारे प्रत्यय होत. चार प्रत्यय (चीवर इत्यादी), उपस्थायक कुळे आणि आरक्षक देवता इत्यादी सुखाच्या उत्पत्तीचे प्रत्यय आहेत. त्या प्रत्ययांमुळे अत्यंत प्रमुदित असणाऱ्या थेरांच्या संतानामध्ये (चित्तप्रवाहात) रात्रंदिवस प्रीती, प्रस्सद्धी, सुख आणि समाधी यांच्या प्रवृत्तीसाठी अंतर्गत ऋतू, चित्त आणि आहार हे अत्यंत प्रणीत (उत्कृष्ट) होतात. त्यांच्यापासून समुत्थित झालेल्या शरीरातील अष्टक धातू देखील अत्यंत प्रणीत होऊन वृद्धिंगत होतात. तेथे शरीरातील अष्टक धातू म्हणजे पृथ्वी इत्यादी आणि वात, पित्त, कफ इत्यादी होत. "अनुबल देतो" म्हणजे नवीन शक्ती आणि बल प्रवृत्त करतो. "पुण्यांतराला" म्हणजे प्रवृत्ती-विपाक उत्पन्न करणाऱ्या बहुविध पुण्यकर्माला. "अथ" म्हणजे त्या काळात, असा अर्थ आहे. "बलवबलवंत होऊन" म्हणजे नैसर्गिक बलापेक्षा अत्यंत बलवान होऊन. "त्या थेरांच्या संतानामध्ये" हा संबंध आहे. "इष्टफल-घन-पूरित" म्हणजे इष्टफल स्वरूप असणाऱ्या रूपसंतानीच्या समूहाने परिपूर्ण असलेल्या. "अवकाश नाही" म्हणजे प्रतिष्ठेसाठी जागा नाही. "इति" म्हणजे म्हणून. "दूरच सारली जातात" हा संबंध आहे. जे इष्टफल संतानाला बाधा आणतात किंवा अडथळा आणतात, ते इष्टफलसंतानविबाधक म्हणजे उपपीडक आणि उपघातक कर्मे होत. अनिष्टफल संतान उत्पन्न करणारी, अकुशल उत्पन्न करणारी कर्मे, अपुण्य कर्मे - ही तीन प्रकारची अकुशल कर्मे दूरच सारली जातात, कारण त्यांच्या विपाकाला संधी मिळत नाही, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच "न हि" इत्यादी म्हटले आहे. "ततो" म्हणजे त्या कारणाने, apuñña (अपुण्य) कर्मे दूर सारली गेल्यामुळे. अभिवादन करण्यास योग्य असणाऱ्या माता-पिता, श्रमण-ब्राह्मण इत्यादींच्या अभिवादन कर्मामध्ये आदर करणे म्हणजे 'अभिवादनशील' होय. जो तसा वागतो तो 'अभिवादनशील' होय. गुणवृद्ध आणि वयोवृद्ध लोकांचा आदर करतो, स्वतःला नम्र ठेवून त्यांच्या पूजनीय शीलतेचा आदर करतो, तो 'वृद्धापचायी' होय. दोन्ही ठिकाणी संप्रदान विभक्तीचे वचन आहे. "एवं" इत्यादी गमनवाचक शब्द आहेत. आणि "निगमन" म्हणजे निष्कर्षाप्रत पोहोचणे होय. "तस्मा" इत्यादी प्राप्त गुणांचे वाचक शब्द आहेत. आणि 'लब्धगुण' म्हणजे त्या त्या प्रसंगाचे संशोधन परिपूर्ण करून प्राप्त झालेला विशुद्ध अर्थ म्हटला जातो. तसेच वचन सामर्थ्याने प्राप्त झालेला दुसरा अर्थ देखील येथे अभिप्रेत आहे. "केवळ थेरांच्याच निर्विघ्न समाप्तीसाठी नाही" अशी योजना आहे. "आणि श्रोत्यांच्या ग्रहण करण्याचे कार्य सिद्ध होण्यासाठी" हा संबंध आहे. जे ऐकतात ते श्रोते. त्यांचे. "ग्रहण करणाऱ्यांचे" म्हणजे शिकणाऱ्यांचे. "वंदना सिद्धीने" म्हणजे त्रिरत्न वंदनेच्या पुण्याच्या सिद्धीमुळे. जवन विनिश्चयामध्ये ज्याअर्थी अंतरायाचे निवारण हे दृष्टधर्मात (याच जन्मात) इच्छिलेले फल असते. आणि दृष्टधर्म हे प्रथम जवनाचे विपाकक्षेत्र आहे. म्हणून उपष्टंभन कार्य प्राप्त करूनही प्रथम जवन चेतनाच येथे पर्याप्त आहे, या अभिप्रायाने "दृष्टधर्मवेदनीयभूत" असे म्हटले आहे. परंतु ती प्रथम जवन चेतना उपष्टंभन कार्य प्राप्त करूनही अत्यंत दुर्बळच असू शकते. का? कारण तिला आसेवन लाभलेले नसते. उर्वरित चेतनाच बलवान असू शकतात. का? कारण त्यांना आसेवन लाभलेले असते, असे जाणावे. "सात जवनांच्या पक्षात अभिप्रेत असल्यामुळे आणि उपलब्ध असल्यामुळे ते योग्य नाही" हा संबंध आहे. "इति" हे वाक्य समाप्ती दर्शवते. "जसे अल्प प्रमाणात असते, तसेच अल्प प्रमाणात असते" असे जोडले पाहिजे. "तथाहि" म्हणजे म्हणूनच, असा अर्थ आहे. पट्ठानमध्ये देखील = "कवळिकार आहार या शरीराला आहार प्रत्ययाने प्रत्यय होतो" = असे विभागले आहे. अन्यथा 'कवळिकार आहार हा आहारसमुत्थित रूपांना आहार प्रत्ययाने प्रत्यय होतो' असा विभाग झाला असता. "अधुना वा" म्हणजे याच भवात. अशा प्रकारे वंदनेचे प्रयोजन स्पष्ट करून, आता उर्वरित पिंडांर्थांचे प्रयोजन स्पष्ट करण्यासाठी "यस्मा पना" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे, "सुरुवातीलाच समजले असता" इत्यादीमध्ये - 'भासिस्सं अभिधम्मत्थसंगहं' हे पद ऐकून ते समजले असता, "उत्साह निर्माण होतो". "याचे ग्रहण करून आम्ही अत्यंत दुर्मिळ अशा अभिधम्मार्थाला सहजपणे जाणून घेऊ, आणि त्यावर आधारित असणाऱ्या उपादानरहित परिनिर्वाणरूपी प्रयोजनाचे भागीदार होऊ" असा चित्तोत्पाद संभवतो, असा अभिप्राय आहे. ปิณฺฑตฺถานุทีปนา นิฏฺฐิตา. पिण्डत्थानुदीपनी (थोडक्यात अर्थाचे स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ๔. ปทตฺเถ. ‘‘พุชฺฌี’’ติ อญฺญาสิ. ‘‘เอตฺถา’’ติ เอตสฺมึ ปเท. จ สทฺโท วากฺยารมฺภ โชตโก. วากฺยา รมฺโภติ จ มูลวากฺเย ยํ ยํ วตฺตพฺพํ อวุตฺตํ, ตสฺส ตสฺส กถนตฺถาย อนุวากฺยสฺส อารมฺโภ. พุชฺฌนกิริยาวุจฺจติญาณํ. กถํปนอวิปรีตตฺเถ ปวตฺโต สมฺมาสทฺโท อเสส พฺยาปนํ ทีเปตีติ ปุจฺฉาย ปุริมตฺถเม วพฺยติเรกโต จ อนฺวยโต จ ปุน วิตฺถาเรนฺโต ‘‘ตถาหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ, ‘‘ตถาหี’’ติ ตสฺส วจนสฺส อยํ วิตฺถาโรติ โชเตติ. ‘‘อวิปรีต’’นฺติ กิริยาวิเสสน ปทเมตํ. ‘‘อตฺตโน [Pg.11] วิสเย เอวา’’ติ อตฺตโน ญาณวิสเย เอว เตสํ วิสโยจาติ สมฺพนฺโธ. ยสฺมา เอโกปิ ธมฺโม กาลเทสสนฺตานาทิเภเทน อนนฺต เภโท โหติ. ตสฺมา ปเทสญาณิกา ปจฺเจกพุทฺธาทโย เอกธมฺมํปิ สพฺพาการโต ชานิตุํ น สกฺโกนฺติ. เตนาห ‘‘เตหี’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘สพฺพาการโต’’ติ สภาวโต, เหตุโต, ปจฺจยโต, ผลโต, นิสฺสนฺทโต, กาลโต, เทสโตติอาทินา อากาเรน. ‘‘ยตฺถา’’ติ ยสฺมึ อวิสเยธมฺเม. ‘‘เต วิปรีตํ พุชฺเฌยฺยุํ, โส อวิสโย นามธมฺโมนตฺถี’’ติโยชนา. ตํ วิตฺถาเรนฺโต ‘‘เตหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ, ‘‘ติยทฺธคเต’’ติ ตีสุกาเลสุ คเต ปวตฺเต. ‘‘อทฺธามุตฺตเก’’ติ กาลตฺตยวิมุตฺตเก. ‘‘หตฺถมณิเกวิยา’’ติ หตฺถ ตเล ฐปิตมณิรตนานิวิย. ‘‘สพฺเพ ธมฺมา’’ติอาทิ ปาฬิสาธกํ. ตตฺถ, ‘‘อาปาต’’นฺติ อภิมุขํ ปตนํ. อาพาธนฺติปิ ปาโฐ, โอตฺถริตฺวา อุปฏฺฐานนฺติ อตฺโถ. ‘‘สพฺพญฺญุมหาภวงฺค’’นฺติ สพฺเพสํสพฺพญฺญุพุทฺธานํ ปจฺฉิมภเว ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย ปวตฺตํ อฏฺฐสุ มหาวิปาเกสุ ปถมมหาวิปากํ ภวงฺค จิตฺตํ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ มหาภวงฺเค. ‘‘นิจฺจกาลํ อุปฏฺฐหนฺตี’’ติ สพฺพกาลํ อุปฏฺฐานาการ ปตฺตา หุตฺวา ติฏฺฐนฺติ. กสฺมา, กสฺสจิ อาวรณสฺส อภาวโต. อิทํปิหิ เอกํ อุปฏฺฐานํ นามาติ. ‘‘อาวชฺชนายา’’ติ มโนทฺวาราวชฺชน จิตฺเตน. ธมฺมา มหนฺตา. ภวงฺคํ ปริตฺตกํ. ตสฺมา ปริตฺตกํ ภวงฺคํ เอกกฺขเณ มหนฺตานํ ธมฺมานํ นปโหตีติ โจทกสฺส อธิปฺปาโย. ‘‘นโจเทตพฺพเมต’’นฺติ เอตํ ฐานํ นโจเทตพฺพํ. ‘‘ปรมุกฺกํสปตฺตาน’’นฺติ เอตฺถ ‘‘อุกฺกํโส’’ติ อจฺจุคฺคโม อจฺจุตฺตโร. ปรโม อุกฺกํโส ปรมุกฺกํโสติวิคฺคโห. ४. पदांच्या अर्थामध्ये: 'बुज्झि' म्हणजे जाणले. 'एत्थ' म्हणजे या पदात. 'च' हा शब्द वाक्याच्या आरंभाचा द्योतक (दर्शक) आहे. 'वाक्यारंभ' म्हणजे मूळ वाक्यात जे काही सांगायचे राहून गेले आहे, ते सांगण्यासाठी उपवाक्याचा आरंभ करणे होय. जाणण्याच्या क्रियेला 'ज्ञान' म्हटले जाते. परंतु, यथार्थ (अविपरीत) अर्थात प्रवृत्त झालेला 'सम्मा' शब्द संपूर्ण व्याप्ती कशा प्रकारे दर्शवतो? या शंकेचे निरसन करण्यासाठी, पूर्वार्थालाच व्यतिरेक आणि अन्वय पद्धतीने पुन्हा सविस्तर स्पष्ट करताना 'तथाहि' (तसेच) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, 'तथाहि' हे त्या वचनाचा हा विस्तार आहे, असे दर्शवते. 'अविपरीत' हे क्रियाविशेषण पद आहे. 'आपल्या विषयातच' म्हणजे आपल्या ज्ञानविषयातच त्यांचा विषय आहे, असा संबंध आहे. कारण एकही धर्म काळ, देश, संतान इत्यादींच्या भेदाने अनंत भेदांचा असतो. म्हणून प्रादेशिक ज्ञान असणारे प्रत्येकबुद्ध इत्यादी एका धर्मालाही सर्व प्रकारे जाणू शकत नाहीत. म्हणूनच 'तेहि' (त्यांच्याद्वारे) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'सर्वाकाराने' (सब्बाकारतो) म्हणजे स्वभावाने, हेतूने, प्रत्ययाने (कारणाने), फलाने, निस्यंदाने (परिणामाने), काळाने, देशाने इत्यादी आकाराने. 'यत्थ' म्हणजे ज्या अविषयभूत धर्मामध्ये. 'ते विपरीत जाणतील, असा कोणताही अविषय नावाचा धर्म अस्तित्वात नाही' अशी योजना (रचना) आहे. त्याचे स्पष्टीकरण करताना 'तेहि' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, 'तियद्धगत' म्हणजे तिन्ही काळात (भूत, वर्तमान, भविष्य) गेलेल्या किंवा प्रवृत्त झालेल्या. 'अद्धामुक्तक' म्हणजे तिन्ही काळांतून मुक्त असलेल्या (उदा. निर्वाण). 'हत्थमणिकेविय' म्हणजे हाताच्या तळव्यावर ठेवलेल्या मणिरत्नाप्रमाणे. 'सब्बे धम्मा' (सर्व धर्म) इत्यादी पाळी वाक्य याचे साधक (प्रमाण) आहे. त्यामध्ये, 'आपात' म्हणजे समोर येणे (प्रत्यक्ष होणे). 'आबाधन्ति' असाही पाठ आहे, त्याचा अर्थ 'व्यापून उपस्थित होणे' असा आहे. 'सब्बञ्ञुमहाभवङ्ग' (सर्वज्ञमहाभवंग) म्हणजे सर्व सर्वज्ञ बुद्धांच्या अंतिम जन्मात प्रतिसंधीपासून प्रवृत्त होणारे, आठ महाविपाकांपैकी पहिले महाविपाक असलेले भवंग चित्त होय. 'तत्थ' म्हणजे त्या महाभवंगामध्ये. 'निच्चकालं उपट्ठहन्ति' म्हणजे सर्वकाळ उपस्थित राहण्याच्या अवस्थेला प्राप्त होऊन राहतात. का? कारण कोणत्याही आवरणाचा (अडथळ्याचा) अभाव असल्यामुळे. कारण हे देखील एक प्रकारचे 'उपस्थान' (उपस्थित असणे) आहे. 'आवर्जनाने' (आवज्जनाय) म्हणजे मनोध्वारावर्जन चित्ताने. धर्म महान (विशाल) आहेत आणि भवंग मर्यादित आहे. म्हणून मर्यादित भवंग एकाच क्षणात महान धर्मांना ग्रहण करण्यास समर्थ नाही, असा आक्षेप घेणाऱ्याचा अभिप्राय आहे. 'न चोदेतब्बमेतं' म्हणजे या विषयावर आक्षेप घेतला जाऊ नये. 'परमुक्कंसपत्तानां' (परमोत्कर्ष प्राप्त झालेल्यांच्या) यामध्ये 'उक्कंसो' म्हणजे अत्यंत वर गेलेला, सर्वोत्तम. परम (सर्वोच्च) उत्कर्ष तो 'परमुक्कंसो' असा विग्रह आहे. เอวํ สมฺมาสทฺทสฺส อตฺถํ วิจาเรตฺวา อิทานิ สํสทฺทสฺส อตฺถํ วิจาเรนฺโต ‘‘สํสทฺโทปนา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ, ‘‘อุปสคฺโค’’ติ อุปสคฺคปทํ. ‘‘ปฏิเวธธมฺเมสู’’ติ ปฏิจฺจสมุปฺปาทาทีนํ ปฏิวิชฺฌนญฺญาเณสุ. นตฺถิ อาจริโย เอตสฺสาติ อนาจริโย. สมาสนฺเต กกาเรน สห อนาจริยโก. อนาจริยกสฺส ภาโว อนาจริยกตา. ตํ อนาจริยกตํ. ตตียา รุปฺปสมาปตฺติ นาม [Pg.12] อากิญฺจญฺญายตนชฺฌานํ. ตํ ภควา อาฬารสฺส สนฺติเก อุคฺคณฺหาติ. จตุตฺถารุปฺปสมาปตฺติ นาม เนวสญฺญา นาสญฺญายตนชฺฌานํ. ตํ อุทกสฺสสนฺติเก อุคฺคณฺหาตีติ วุตฺตํ ‘‘อาฬารุทกมูลิกา’’ติ. ‘‘อนลงฺกริตฺวา’’ติ อาวชฺชนสมาปชฺชนาทิวเสน อนลงฺกริตฺวา. อนาเสวิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ฉฑฺฑิตตฺตา’’ติ เอตาสมาปตฺติโยนาลํ โพธาย, อถ โข ยาวเทว ตตีย จตุตฺถารุปฺปภวปฺปฏิลาภาย สํวตฺตนฺตีติ เอวํ อาทีนวํ ทิสฺวา ฉฑฺฑิตตฺตา. ‘‘พุชฺฌนกิริยายา’’ติ ปฏิเวธญฺญาณสฺส. ‘‘กุโต ปฏิเวธธมฺมา’’ติ ตา กุโต ปฏิเวธธมฺมา โหนฺติ. ปฏิเวธธมฺมา เอว จ พุทฺธภาวายปทฏฺฐานาโหนฺตีติ อธิปฺปาโย. अशा प्रकारे 'सम्मा' शब्दाच्या अर्थाचा विचार करून, आता 'सं' शब्दाच्या अर्थाचा विचार करताना 'संशब्दोपना' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, 'उपसग्गो' म्हणजे उपसर्ग पद. 'पटिवेधधम्मेसु' (प्रतिवेध धर्मांमध्ये) म्हणजे प्रतीत्यसमुत्पाद इत्यादींच्या प्रतिवेध (साक्षात्कार) करणाऱ्या ज्ञानांमध्ये. ज्याला कोणी आचार्य (गुरू) नाही तो 'अनाचार्य' (अनाचरियो). समासाच्या शेवटी 'क' कार लागून 'अनाचारियक' असा शब्द बनतो. अनाचारियकाचा भाव म्हणजे 'अनाचारियकता' (गुरूशिवाय असण्याची अवस्था). ती 'अनाचारियकता'. तिसरी अरूप समापत्ती म्हणजे 'आकिंचन्यायतन ध्यान'. ते भगवंतांनी आळार कालामाच्या जवळ शिकून घेतले होते. चौथी अरूप समापत्ती म्हणजे 'नैवसंज्ञानासंज्ञायतन ध्यान'. ते भगवंतांनी उद्दक रामपुत्ताच्या जवळ शिकून घेतले होते, म्हणूनच 'आळार-उद्दक-मूलिका' (आळार आणि उद्दक यांच्याकडून शिकलेली) असे म्हटले आहे. 'अनंलकरित्वा' (अलंकृत न करता) म्हणजे आवर्जन, समापत्ती इत्यादींच्या द्वारे अलंकृत न करता, म्हणजेच त्याचे सेवन न करता (अनासेवित्वा) असे म्हटले आहे. 'छड्डितत्ता' (त्याग केल्यामुळे) म्हणजे या समापत्ती बोधीसाठी (ज्ञानासाठी) पुरेशा नाहीत, तर त्या केवळ तिसऱ्या आणि चौथ्या अरूप भवाच्या प्राप्तीसाठीच कारणीभूत ठरतात, असा दोष पाहून त्यांचा त्याग केल्यामुळे. 'बुज्झनकिरियाय' (जाणण्याच्या क्रियेचे) म्हणजे प्रतिवेध ज्ञानाचे. 'कुतो पटिवेधधम्मा' म्हणजे त्या कशा प्रकारे प्रतिवेध धर्म होतात? प्रतिवेध धर्मच बुद्धत्वाचे पदस्थान (कारण) असतात, असा अभिप्राय आहे. ปาฬิยํ. ‘‘ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุธมฺเมสู’’ติ อิมสฺมึ ภเว อิโต ปุพฺเพ กสฺสจิสนฺติเก อนนุสฺสุเต สุจตุสฺสจฺจ ธมฺเมสุ. ‘‘อภิสมฺพุชฺฌี’’ติปเท อภิสมฺโพธิสงฺขาตํ อรหตฺตมคฺคญฺญาณํ วุตฺตํ. ตเทว ญาณํ สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺส ปทฏฺฐานํ โหติ. ตปฺปจฺจยา ตทนนฺตรา เอวสพฺพญฺญุตญฺญาณํ ปาตุพฺภวตีติ วุตฺตํ ‘‘ตตฺถ จ สพฺพญฺญุตํ ปาปุณาตี’’ติ. ‘‘ตทนนฺตรา’’ติ จ อรหตฺต มคฺควีถิยาจ จตุนฺนํ ปจฺจเวกฺขน วารานญฺจ อนนฺตเร กาเลติ อตฺโถ. ‘‘นิมิตฺตตฺเถ’’ติ นิมิตฺต เหตฺวตฺเถ. ‘‘ภุมฺม’’นฺติ อฏฺฐกถาสุอาคตํ สตฺตมีวิภตฺติยานามํ. ตาสุ หิ ปจฺจตฺตวจนํ, อุปโยควจนํ, กรณ วจนํ, สมฺปทาน วจนํ, นิสฺสกฺกวจนํ, สามิวจนํ, สุมฺมวจนนฺติ เอวํ อนุกฺกเมน สตฺตนฺนํ วิภตฺตีนํ นามานิ อาคตานีติ. पाळीमध्ये, 'पुब्बे अननुस्सुतेसु धम्मेसु' (पूर्वी न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये) म्हणजे या जन्मात यापूर्वी कोणाकडूनही न ऐकलेल्या चार आर्यसत्य रूपी धर्मांमध्ये. 'अभिसम्बुज्झि' या पदात अभिसंबोधी नावाचे अर्हत् मार्गज्ञान सांगितले आहे. तेच ज्ञान सर्वज्ञता-ज्ञानाचे पदस्थान (जवळचे कारण) असते. त्याच्या प्रत्ययाने (कारणाने) आणि त्यानंतर लगेचच सर्वज्ञता-ज्ञान प्रकट होते, म्हणूनच 'तत्थ च सब्बञ्ञुतं पापुणाति' (आणि तेथे सर्वज्ञता प्राप्त करतो) असे म्हटले आहे. 'तदनंतरा' म्हणजे अर्हत् मार्गवीथीच्या आणि चार प्रत्यावेक्षण वारांच्या (अवलोकनांच्या) लगेचच नंतरच्या काळात, असा अर्थ आहे. 'निमित्तत्थे' म्हणजे निमित्त किंवा हेतूच्या अर्थात. 'भुम्मं' म्हणजे अट्ठकथांमध्ये आलेले सप्तमी विभक्तीचे नाव. कारण त्या (अट्ठकथां)मध्ये पच्चत्तवचन (प्रथमा), उपयोगवचन (द्वितीया), करणवचन (तृतीया), संप्रदानवचन (चतुर्थी), निस्सक्कवचन (पंचमी), सामिवचन (षष्ठी) आणि भुम्मवचन (सप्तमी) अशा अनुक्रमाने सात विभक्तींची नावे आली आहेत. ‘‘ทสพลญฺญาเณสู’’ติ ฐานาฐาน โกสลฺลญฺญาณาทีสุ ทส ญาณพเลสุ. ‘‘วสิภาว’’นฺติ เอตฺถ อตฺตโน วสํ วตฺเตตุํ สมตฺถตา สงฺขาโตสตฺติ วิเสโส วโสนาม. วโส เอตสฺส อตฺถีติ วสี-วสิคเณหีติอาทีสุวิย. วสิโน ภาโว วสิภาโว. ตํ วสิภาวนฺติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘วสิภาว’’นฺติ อิสฺสรภาวนฺติ. กตฺถจิ ปน ‘‘วสี’’ติ อิตฺถิลิงฺคปทํปิ ทิสฺสติ=ตตฺริมา ปญฺจวสิโย อาวชฺชนวสีสมาปชฺชนวสี=ติอาทีสุ. 'दसबळञाणेसु' (दशबल ज्ञानांमध्ये) म्हणजे स्थानास्थान-कौशल्य ज्ञान इत्यादी दहा ज्ञानबलांमध्ये. 'वसिभावं' (वशीभाव) यामध्ये स्वतःच्या नियंत्रणात ठेवण्याची समर्थता असणारी विशिष्ट शक्ती म्हणजे 'वश' होय. ज्याच्याकडे हा 'वश' आहे तो 'वशी' - जसे 'वसीगण' इत्यादींमध्ये. वशीचा भाव म्हणजे 'वशीभाव'. तो 'वशीभाव' असा अर्थ आहे. म्हणूनच 'वसिभावं' म्हणजे 'ईश्वरभाव' (प्रभुत्व/नियंत्रण) असे म्हटले आहे. परंतु काही ठिकाणी 'वशी' हे स्त्रीलिंगी पद देखील दिसते - जसे 'तत्रिमा पंचवसियो आवज्जनवसी समापज्जनवसी' (तेथे या पाच वशीलता आहेत - आवर्जनवशीलता, समापज्जनवशीलता) इत्यादींमध्ये. สมฺมาสมฺพุทฺธปท. सम्मासम्बुद्धपद (सम्यक्संबुद्ध पद). ๕. อตุลปเท[Pg.13]. อเนเกหิคุณปเทหิ ปวตฺติตาวนฺทนา ‘‘อเนกคุณปทวิสยานาม’’. ‘‘อิติกึทุตีเยนา’’ติ อิติ ตสฺมา ทุตีเยน อตุลปเทน กึ ปโยชนํ อตฺถีติ อตฺโถ. ‘‘นน สมตฺถา’’ติ นสมตฺถา น โหตีติ โยชนา. สมตฺถา เอวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘มตฺตการิโน’’ติ ปมาณการิโน. ‘‘เถโร จ เตสํ อญฺญตโร’’, ตสฺมา มตฺตํ น กโรติ, ทุตียํ อตุล ปทํ อาหรีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อปิจา’’ติ กิญฺจิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ อตฺโถ. ‘‘นเกวลํ วนฺทนาย อนฺตรายนีวารณเมว อิจฺฉิ ตพฺพํ โหตี’’ติ โยชนา. ‘‘วนฺทนายา’’ติ วนฺทนาเหตุ. โสปิ ปญฺญาปาฏวาทิ อตฺโถ. ‘‘คนฺถปาริสุทฺธิยา’’ติ คนฺถโทสานาม ปทโทส วากฺยโทส อตฺถโทสาทโย อตฺถิ. เตหิ โทเสหิ อิมสฺส คนฺถสฺส ปาริสุทฺธิยา. กถํ ปน วนฺทนาย ปญฺญาปาฏวาทิ อตฺโถสมฺภวตีติ วุตฺตํ ‘‘อนุสฺสติฏฺฐาเนสู’’ติอาทิ. อนุสฺสติฏฺฐานานิ นาม พุทฺธ ธมฺม สงฺฆสีลาทีนิ. จิตฺตสมาธานํ อาวหตีติ จิตฺตสมาธานาวโห. ‘‘ติกฺขาสูราหุตฺวาวหตี’’ติ คมฺภีเรสุ อตฺถ พฺยญฺชน ปเทสุ อมนฺทา วิสฺสฏฺฐา หุตฺวา วหติ. ‘‘ตทตฺถายปี’’ติ ปญฺญาปาฏวาทิ อตฺถายปิ. คุณนามปทานํ คุณตฺโถนามวิคฺคห วากฺเยสุ ปากโฏ, สิทฺธปเทสุ อปากโฏ. ตสฺมา ตานิ วิคฺคหตฺถํ อชานนฺตานํ สนฺติเก นาม มตฺตานิ สมฺปชฺชนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ยถาวุตฺต วจนตฺถโยเคปิ…เป… ปวตฺตตฺตา’’ติ. ‘‘สภาวนิรุตฺตึ ชานนฺตาน’’นฺติ มาคธ ภาสํ ชานนฺตานํ. มาคธภาสาหิ มูลภาสาติ จ อริยภาสาติ จ มาคธภาสาติ จ ปาฬิภาสาติ จ ธมฺมนิรุตฺตีติ จ สภาวนิรุตฺตีติ จ วุจฺจติ. ‘‘ภาวตฺถสุญฺญ’’นฺติ เอตฺถ คุณนามานํ คุณตฺโถ ภาวตฺโถ นาม. โส เอวสกตฺโถติ จ วจนตฺโถติ จ วิคฺคหตฺโถติ จ วุจฺจติ. กิริยนามาทีสูปิ เอเสวนโย. ‘‘สตฺถู’’ติ สตฺถุโน. ‘‘สมญฺญามตฺต’’นฺติ นามสญฺญามตฺตํ ภวิตุํ นารหติ. ตถาหิ อนาถปิณฺฑิโกเสฏฺฐิ ราชคหํ อนุปตฺโต พุทฺโธ โลเก อุปฺปนฺโนติ สุตฺวา อุทานํ อุทาเนสิ=โฆโสปิ โข เอโสทุลฺลโภ โลกสฺมึ ยทิทํ พุทฺโธ=ติ. ตสฺมา พุทฺโธติ นามํปิ โลเก มหนฺตํ สุทุลฺลภํคุณปทํ โหติ. สมฺมาสมฺพุทฺธ นาเมวตฺตพฺพเมวนตฺถีติ. ‘‘สภาวนิรุตฺตึ [Pg.14] อชานนฺตานํ ปน ปทสหสฺสํ วุจฺจมานํปี’’ติ ติฏฺฐตุ เอกํ อตุลปทํ, ปทสหสฺสํปิ วุจฺจมานํ สตฺถุสมญฺญามตฺตเมว สมฺปชฺชติ. ตาทิสาหิ ชนา อิทํ โลเก มหนฺตํ คุณปทนฺติปิ นชานนฺติ. ภาวตฺถํ กึชานิสฺสนฺติ. ५. ‘अतुलपदे’ (अतुल या पदाबाबत). अनेक गुणपदांद्वारे केलेली वंदना ‘अनेकगुणपदविसय’ (अनेक गुणपदांच्या विषयाशी संबंधित) या नावाने ओळखली जाते. ‘इति किंदुतीयेन’ याचा अर्थ असा की, म्हणून त्या दुसऱ्या ‘अतुल’ पदाचे काय प्रयोजन आहे? ‘न न समर्था’ म्हणजे समर्थ नसलेली नाही, अशी योजना आहे. म्हणजेच ती समर्थच आहे, असा अभिप्राय आहे. ‘मत्तकारिनो’ म्हणजे प्रमाण (मर्यादा) बाळगणारे. ‘थेर (स्थवीर) हे त्यांच्यापैकीच एक आहेत’, म्हणून ते मर्यादा ठेवत नाहीत, तर दुसरे ‘अतुल’ पद ग्रहण करतात, असा अभिप्राय आहे. ‘अपि च’ (शिवाय) याचा अर्थ काहीतरी सांगण्यासारखे आहे असा आहे. ‘केवळ वंदनेने अंतराय (अडथळे) निवारणच इच्छिले पाहिजे असे नाही’ अशी योजना आहे. ‘वंदनाया’ म्हणजे वंदनेच्या हेतूने. तो प्रज्ञा-पाटव (बुद्धीची प्रगल्भता) इत्यादी अर्थ देखील आहे. ‘गंथपारिसुद्धिया’ (ग्रंथाच्या परिशुद्धीसाठी) म्हणजे ग्रंथाचे दोष जसे की पददोष, वाक्यदोष, अर्थदोष इत्यादी असतात. त्या दोषांपासून या ग्रंथाच्या परिशुद्धीसाठी. पण वंदनेने प्रज्ञा-पाटव इत्यादी अर्थ कसा संभवतो? म्हणून ‘अनुस्सतिट्ठानेसु’ (अनुस्मृतीच्या स्थानांमध्ये) इत्यादी म्हटले आहे. अनुस्मृतीची स्थाने म्हणजे बुद्ध, धम्म, संघ, शील इत्यादी होत. जे चित्ताची एकाग्रता (समाधान) घडवून आणते, ते ‘चित्तसमाधानावह’ होय. ‘तिक्खा सूरा हुत्वा वहती’ म्हणजे गंभीर अर्थ आणि व्यंजन पदांमध्ये ती मंद न होता, स्पष्ट व प्रगल्भ होऊन वाहते (प्रवृत्त होते). ‘तदत्थायपि’ म्हणजे त्या प्रज्ञा-पाटव इत्यादी अर्थासाठी सुद्धा. गुणवाचक नामांचा ‘गुणार्थ’ हा विग्रह वाक्यांमध्ये स्पष्ट असतो, परंतु सिद्ध पदांमध्ये (साधित शब्दांमध्ये) तो अस्पष्ट असतो. म्हणून, जे विग्रहार्थ जाणत नाहीत त्यांच्यासाठी ती केवळ नाममात्र ठरतात, म्हणूनच ‘यथावृत्त वचनार्थयोगेपि...पे... प्रवृत्तत्वात्’ असे म्हटले आहे. ‘सभावानिरुत्तिं जानन्तानं’ म्हणजे मागध भाषा (मागधी भाषा) जाणणाऱ्यांना. कारण मागध भाषेलाच मूळ भाषा, आर्य भाषा, मागध भाषा, पाळि भाषा, धम्म निरुत्ती आणि स्वभाव निरुत्ती असे म्हटले जाते. ‘भावत्थसुञ्ञं’ (भावार्थाने शून्य) यामध्ये गुणवाचक नामांचा गुणार्थ म्हणजेच भावार्थ होय. त्यालाच स्वार्थ, वचनार्थ आणि विग्रहार्थ असेही म्हटले जाते. क्रियावाचक नामे इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ‘सत्थु’ म्हणजे शास्त्यांचे (बुद्धांचे). ‘समञ्ञामत्तं’ (केवळ संज्ञा किंवा नाव) हे केवळ नामसंज्ञा असण्यास पात्र नाही. कारण, जेव्हा अनाथपिंडिक श्रेष्ठी राजगृहाला पोहोचले आणि त्यांनी ‘लोकात बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत’ असे ऐकले, तेव्हा त्यांनी उद्गार (उदान) काढले की—‘या जगात बुद्ध हा घोष (शब्द) ऐकणे देखील अत्यंत दुर्मिळ आहे.’ म्हणून, ‘बुद्ध’ हे नाव देखील जगात अत्यंत दुर्मिळ असे महान गुणपद आहे. मग ‘सम्मासम्बुद्ध’ (सम्यक्संबुद्ध) या नावाविषयी तर बोलण्याची गरजच नाही. ‘परंतु स्वभाव निरुत्ती न जाणणाऱ्यांसाठी हजारो पदे जरी म्हटली तरी...’ एक ‘अतुल’ पद तर दूरच राहो, हजारो पदे जरी म्हटली तरी ती शास्त्यांचे केवळ नाममात्रच ठरतात. कारण असे लोक हे जगातले महान गुणपद आहे हे देखील जाणत नाहीत, मग ते त्याचा भावार्थ काय जाणणार? ‘‘อตุโล’’ติ อญฺเญน โส อสทิโสติ วา, อญฺโญ วาเตน สทิโสตสฺสนตฺถีติวา, - ทฺวิธาปิอตฺโถลพฺภติ. สาธกคาถายํ ‘‘ปฏิปุคฺคโล’’ติ ยุคคฺคาหีปุคฺคโล. กิญฺจาปิ มกฺขลิ ปูรณาทโย วิสุํวิสุํ - อหํ สพฺพญฺญู สพฺพทสฺสาวี - ติจ, อหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ-ติจ ปฏิชานนฺตา ยุคคฺคาหิโน หุตฺวา วิจรนฺติ. ธมฺมโต ปน สิเนรุ ปพฺพต ราชสฺส สนฺติเก สกฺขร กถลานิวิยสมฺปชฺชนฺตีติ. ‘‘อนจฺฉริย’’นฺติ นตาว อจฺฉริตพฺพํ โหตีติ อตฺโถ. ‘‘พุทฺธภูตสฺสา’’ติ พุทฺธภาวํ ภูตสฺสปตฺตสฺส. ‘‘ยํ พุทฺธ ภูตสฺส อตุลตฺตํ, เอตํ อนจฺฉริย’’นฺติ โยชนา. ยทิ เจตํ อนจฺฉริยํ โหติ, กตมํ ปน ตาว อจฺฉริยํ ภวตีติ อาห ‘‘สมฺปติชาตสฺสา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘สมฺปติชาตสฺสา’’ติ อชฺเชวชาตสฺสปิ อสฺส ภควโต. กถํ อตุลตา ปญฺญายตีติ อาห ‘‘ตทาหี’’ติอาทึ. ‘‘เอกงฺคณานี’’ติ เอกตลานิ. ตทาหิ โพธิสตฺตสฺสปุญฺญานุภาเวน อติมหนฺโต โอภาโส ปาตุพฺภวติ. = อุฬาโร โอภาโส ปาตุรโหสิ อติกฺกมฺมเทวานํ เทวานุภาว=นฺติหิ วุตฺตํ. เตน โอภาเสน ผริตา สพฺเพ ปถวิ ปพฺพตาทโย ชาติผลิกกฺขนฺธาวิย สุปฺปสนฺนา โหนฺติ. ทสสหสฺส จกฺกวาฬานิ เอกตลํ หุตฺวา ปญฺญายนฺติ. เตน วุตฺตํ ‘‘อเนกานิ จกฺกวาฬสหสฺสานิ เอกงฺคณานิ อเหสุ’’นฺติ. ‘‘ปรมาย ปูชายาติ ถุติมงฺคลวจนปูชาย. ‘‘โลกสฺสา’’ติ สพฺพ สตฺตโลกโต. เอวํ อจฺฉมฺภิ วาจํ นิจฺฉาเรสิ ธมฺมตาย สญฺโจทิตตฺตาติ อธิปฺปาโย. ตตฺถ ‘‘อจฺฉมฺภิวาจ’’นฺติ วิสารทวาจํ. อาสภึ วาจนฺติปิ ปาโฐ. อุตฺตมวาจนฺติ อตฺโถ. ‘‘นิจฺฉาเรสี’’ติ อุทาหรติ. อิทมฺปิ อนจฺฉริยํ, อญฺญํ ปิตโต อจฺฉริยตรํ อตฺถีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ยทาปนา’’ติอาทิ อารทฺธํ. ปารมิตา คุเณหิ เตน สทิโส โกจินตฺเถว ถเปตฺวา อญฺเญ จ มหาโพธิ สตฺเตติ อธิปฺปาโย[Pg.15]. ‘‘อสฺสา’’ติ เตน สทิสสฺส. ‘‘นตฺถิภาโว ทีเปตพฺโพ’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ทีเปตพฺโพ’’ติ พุทฺธวํสปาฬิโต อาหริตฺวา ทีเปตพฺโพ. ‘‘กุโตสาวกโพธิสตฺตานํ สตสหสฺสํ สกฺขิสฺสตี’’ติ โยชนา. ปารมิโย ปกาเรนวิจินนฺติ เอเตนาติ ปารมิปวิจโย. ญาณํ. ตํปนญาณํ มหาโพธิสตฺตานํ เอว อุปฺปนฺนํ นโหติ. ปจฺเจกโพธิสตฺต สาวกโพธิสตฺตานํปิ อุปฺปนฺนเมว. ตเทว จ สพฺเพสํปิ โพธิสตฺตานํ นิยตพฺยากรณปฺปฏิลาเภ ปธานการณนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘สาวกโพธิสตฺตาปี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ โพธิวุจฺจติวิโมกฺขญฺญาณํ. อริยมคฺคสฺเสตํ นามํ. โพธิมฺหิสชนฺติ ลคฺคนฺตีติ โพธิสตฺตา. ‘‘ลคฺคนฺตี’’ติ ตปฺปฏิลาภตฺถาย นิยต จิตฺตา โหนฺตีติ อตฺโถ. โพธิ อตฺถาย ปฏิปนฺนา สตฺตา โพธิสตฺตาติปิ ยุชฺชติ. พุทฺธ สุญฺเญปิโลเก กมฺมสฺสกตาญาเณ ฐตฺวา วฏฺฏทุกฺขโต โมกฺขธมฺมปริเยสิโน สตฺตาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘สมฺภาร ธมฺเม’’ติ ทสวิเธ ปารมิ ธมฺเม. วฏฺฏํ อนุสรนฺติ อนุคจฺฉนฺตีติ วฏฺฏานุสาริโน. ปถวิยํ ปํสุจุณฺณานิ วิย ปกติยา วปุถุภูตาชนาติ ปุถุชฺชนา. มหนฺตาปุถุชฺชนาติ มหาปุถุชฺชนา. วฏฺฏานุสาริโน จ เต มหาปุถุชฺชนาจาติ สมาโส. เตสํ ภาโวติ วิคฺคโห. อยํ ภาโวเยว เตสํ ภูมีติ จ วุจฺจติ. อตฺถโต ปน โมกฺขธมฺมนิรเปกฺขตา เอว. อจฺฉนฺทิกตาติปิ วุจฺจติ. ‘‘โอกฺกนฺตา’’ติ ปวิฏฺฐา. ตโยนิยตา, โพธิสตฺตนิยโต จ จูฬโสตาปนฺนนิยโต จ อริย โสตาปนฺนนิยโต จ. ตตฺถ โพธิสตฺตนิยโต โพธิสมฺภารพเลน สิทฺโธ. จูฬโสตาปนฺน นิยโต ปจฺจยาการานุโพธญฺญาณพเลน. อริยโสตาปนฺน นิยโต โสตาปตฺติ มคฺคญฺญาณ พเลน. เตสุ โพธิสตฺตนิยโต อิธ อธิปฺเปโตติ วุตฺตํ ‘‘เอเกน ปริยาเยนา’’ติอาทิ. วตฺตพฺพเมวนตฺถิเตสํ ทฺวินฺนํ โพธิสตฺตานํ ปารมิ ปวิจยญฺญาณ สมฺปตฺติยา วินา นิยตพฺยากรณ ลาภา สงฺกาย เอว อภาวโตติ อธิปฺปาโย. "अतुलो" (अतुल्य) म्हणजे तो दुसऱ्या कोणासारखा नाही (असदृश) किंवा त्याच्याशी तुलना करता येईल असा दुसरा कोणी नाही - अशा दोन्ही प्रकारे अर्थ घेतला जातो. साधक गाथेमध्ये "प्रतिपुद्गल" म्हणजे बरोबरी करणारा (प्रतिस्पर्धी) पुद्गल (व्यक्ती). जरी मक्खलि (गोशाल), पूरण (कस्सप) इत्यादी वेगवेगळ्या प्रकारे - "मी सर्वज्ञ, सर्वदर्शी आहे" आणि "मी सम्यक्संबुद्ध आहे" असा दावा करत बरोबरी करणारे बनून वावरत असले, तरी धर्माच्या (सत्याच्या) दृष्टीने ते पर्वतराज सुमेरूच्या समोर खडे आणि वाळूच्या कणांसारखे ठरतात. "अनच्छरियं" (आश्चर्यकारक नसलेले) म्हणजे जे आश्चर्यचकित होण्यासारखे नाही, असा अर्थ आहे. "बुद्धभूतस्स" म्हणजे बुद्धत्वाला प्राप्त झालेल्याचे. "बुद्धत्वाला प्राप्त झालेल्याचे जे अतुल्यत्व आहे, ते आश्चर्यकारक नाही" अशी याची योजना (संबंध) आहे. जर हे आश्चर्यकारक नाही, तर मग कोणते आश्चर्यकारक आहे? हे सांगण्यासाठी "सम्पतिजातस्स" (नुकत्याच जन्मलेल्याचे) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "सम्पतिजातस्स" म्हणजे आजच जन्मलेल्या त्या भगवंतांचे. त्यांची अतुल्यता कशी दिसून येते? हे सांगण्यासाठी "तदाहि" (कारण तेव्हा) इत्यादी म्हटले आहे. "एकंगणानि" म्हणजे एकसमान पातळीचे (एक मैदान). कारण तेव्हा बोधिसत्त्वांच्या पुण्याच्या प्रभावाने अत्यंत महान प्रकाश (अवभास) प्रकट होतो. "देवांच्या दैवी प्रभावालाही मागे टाकणारा एक भव्य प्रकाश प्रकट झाला" असे म्हटले आहे. त्या प्रकाशाने व्यापलेली सर्व पृथ्वी, पर्वत इत्यादी शुद्ध स्फटिकाच्या तुकड्यांप्रमाणे अत्यंत निर्मळ होतात. दहा हजार चक्रवाळ (विश्वे) एकाच पातळीवर आल्यासारखे दिसतात. म्हणूनच म्हटले आहे की, "अनेक हजार चक्रवाळ एक मैदान (एकसमान पातळीचे) झाले." "परमाय पूजाय" म्हणजे स्तुती आणि मंगल वचनांच्या पूजेने. "लोकस्स" म्हणजे सर्व सत्त्वलोकाकडून (प्राणिमात्रांकडून). अशा प्रकारे, धम्मतेने (नैसर्गिक नियमाने) प्रेरित होऊन त्यांनी निर्भय वाणी उच्चारली, असा अभिप्राय आहे. तेथे "अच्छम्भिवाचं" म्हणजे विशारद (निर्भय) वाणी. "आसभिं वाचं" (ऋषभ वाणी) असाही पाठ आहे, ज्याचा अर्थ उत्तम वाणी असा आहे. "निच्छारेसि" म्हणजे उच्चारली. हे देखील आश्चर्यकारक नाही, यापेक्षाही अधिक आश्चर्यकारक दुसरे काहीतरी आहे, हे दर्शवण्यासाठी "यदा पन" (परंतु जेव्हा) इत्यादी सुरू केले आहे. पारमिता गुणांच्या बाबतीत त्यांच्यासारखा इतर कोणीही नाही, केवळ इतर महाबोधिसत्त्वांना वगळता, असा अभिप्राय आहे. "अस्स" म्हणजे त्यांच्यासारख्याचा. "नत्थिभावो दीपेतब्बो" (अभाव दर्शवला पाहिजे) असा संबंध आहे. "दीपेतब्बो" म्हणजे बुद्धवंश पाळीमधून उद्धृत करून स्पष्ट केला पाहिजे. "मग लाखो श्रावक बोधिसत्त्व कसे समर्थ होतील?" अशी योजना आहे. ज्याद्वारे पारमितांचा विविध प्रकारे शोध घेतला जातो, तो "पारमिपविचय" (पारमिता-विचय) होय. हे एक ज्ञान आहे. ते ज्ञान केवळ महाबोधिसत्त्वांनाच उत्पन्न होते असे नाही, तर प्रत्येकबोधिसत्त्व आणि श्रावकबोधिसत्त्वांनाही उत्पन्न होतेच. आणि तेच सर्व बोधिसत्त्वांना 'नियत व्याकरणा'ची (निश्चित भविष्यवाणीची) प्राप्ती होण्याचे मुख्य कारण आहे, हे दर्शवण्यासाठी "श्रावकबोधिसत्तापि" (श्रावक बोधिसत्त्व देखील) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "बोधी" म्हणजे विमोक्ष ज्ञान (मुक्तीचे ज्ञान) म्हटले जाते. हे आर्यमार्गाचे नाव आहे. जे बोधीमध्ये आसक्त होतात (लग्न होतात), ते "बोधिसत्त्व" होत. "लग्गन्ति" (आसक्त होतात) म्हणजे त्याची प्राप्ती करण्यासाठी ज्यांचे चित्त निश्चित (दृढ) असते, असा अर्थ आहे. बोधीच्या प्राप्तीसाठी प्रतिपन्न (मार्गस्थ) झालेले सत्त्व (प्राणी) म्हणजे "बोधिसत्त्व", हे देखील योग्य ठरते. बुद्धशून्य जगातही 'कम्मस्सकता ज्ञाना'वर (कर्मस्वकीयता ज्ञानावर) अधिष्ठित राहून संसारदुःखातून मुक्तीच्या धर्माचा शोध घेणारे सत्त्व, असे म्हटले आहे. "संभार धम्मे" म्हणजे दहा प्रकारच्या पारमिता धर्म. जे संसाराचे (भवचक्राचे) अनुकरण करतात (त्याच्या मागे जातात), ते "वट्टानुसारिनो" (संसारानुसारी). पृथ्वीवरील धुळीच्या कणांप्रमाणे जे स्वभावतःच विपुल (असंख्य) लोक आहेत, ते "पुथुज्जना" (पृथग्जन/सामान्य लोक). महान पृथग्जन म्हणजे "महापुथुज्जना" (महापृथग्जन). "जे संसारानुसारी आहेत आणि महापृथग्जन आहेत" असा हा समास आहे. त्यांचा भाव (अवस्था) हा विग्रह आहे. हा भावच त्यांची "भूमी" (अवस्था) असे म्हटले जाते. अर्थाच्या दृष्टीने पाहता, ही केवळ मोक्षधर्माविषयीची निरपेक्षता (उदासीनता) आहे. याला "अच्छन्दिकता" (इच्छा नसणे) असेही म्हणतात. "ओक्कन्ता" म्हणजे प्रविष्ट झालेले (प्रवेश केलेले). नियत (निश्चित झालेले) तीन प्रकारचे असतात: बोधिसत्त्व-नियत, चूळसोतापन्न-नियत (लहान स्रोतआपन्न) आणि आर्यसोतापन्न-नियत. तेथे बोधिसत्त्व-नियत हा बोधी-संभाराच्या बलाने सिद्ध होतो. चूळसोतापन्न-नियत हा प्रत्ययाकार-अनुबोध ज्ञानाच्या (प्रतीत्यसमुत्पाद समजण्याच्या ज्ञानाच्या) बलाने सिद्ध होतो. आर्यसोतापन्न-नियत हा स्रोतापत्ती-मार्गज्ञानाच्या बलाने सिद्ध होतो. त्यांच्यापैकी येथे "बोधिसत्त्व-नियत" अभिप्रेत आहे, हे दर्शवण्यासाठी "एकेन परियायेen" (एका पर्यायाने) इत्यादी म्हटले आहे. त्या दोन्ही बोधिसत्त्वांना पारमिता-विचय ज्ञानसंपत्तीशिवाय नियत व्याकरणाची (निश्चित भविष्यवाणीची) प्राप्ती होण्याबाबत शंकेला वावच नाही, हे सांगण्याची गरजच नाही, असा अभिप्राय आहे। ปทสิทฺธิวิจาเรยํ วุตฺตํ วิภาวนิยํ=ตุลายสมิโตตุลฺโย. ตุลฺโย เอว ตุโลยการ โลปวเสนา=ติ. ตํสนฺธาย ‘‘ย การสฺสวาวเสนา’’ติ [Pg.16] วุตฺตํ. ยญฺจวุตฺตํ ตตฺเถว=อถวาสมีตตฺเถ อการปจฺจยวเสน ตุลายสมีโตตุโล=ติ. ตํ สนฺธาย ‘‘อการสฺสวาวเสนา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘ตุลายา’’ติ โลเก ธารณตุลาสทิสาย ปญฺญายาติ อตฺโถ. ‘‘สมีโต’’ติ สมํ กโต. นหิ ตุลสทฺโท ภวิตุํ นยุตฺโต. ยุตฺโต เอวาติ อธิปฺปาโย. กถํ วิญฺญายตีติ อาห ‘‘ตุลยิตุ’’นฺติอาทึ. ตตฺถหิ ‘‘ตุลยิตุํ อสกฺกุเณยฺโย’’ติวจเนน ตสฺสกมฺมสาธนตฺตํทสฺเสติ. ‘‘กมฺมสาธเนเนวา’’ติ ปุพฺเพ-ตุลยิตพฺโพ อญฺเญน สห ปมิตพฺโพติ ตุโลติ เอวํ อิธวุตฺเตน กมฺม สาธน วจนตฺเถเนว. ‘‘ตทตฺถสิทฺธิโต’’ติ ตสฺส วิภาวนิยํ วุตฺตสฺส ทุวิธสฺส อตฺถสฺส สิทฺธิโต. ‘‘ตโต’’ติ ตุลสทฺทโต. จินฺตาย กึ ปโยชนํ อตฺถิ. นตฺถิเยวาติ อธิปฺปาโย. วทติ สีเลนาติ วตฺตา. วาที ปุคฺคโล. วตฺตุโน อิจฺฉาวตฺติจฺฉา. วตฺตุํ อิจฺฉาวตฺติจฺฉาติปิวทนฺติ. วตฺติจฺฉํ อนุคโต สมฺมุติ สงฺเกตโวหาร สิทฺธตฺตาติ สมาโส. ‘‘เอต’’นฺติ เอตํ ทฺวิธาสิทฺธวจนํ. ‘‘เจ’’ติ เจวเทยฺย. ‘‘นา’’ติ นยุตฺตํ. ‘‘ยถาสุต’’นฺติ ตุล อิติ สุตํ. ‘‘ยุตฺต’’นฺติ ยถาสุต นิยาเมเนว ยุตฺตํ วชฺเชตฺวา. ‘‘อสฺสุตสฺสา’’ติ ธารณตุลาปริยายสฺส อิตฺถิลิงฺคตุลาสทฺทสฺส. ตโตเยวยการ ยุตฺตสฺสตุลฺยสทฺทสฺส จ อสฺสุตสฺส. อิตฺถิลิงฺเคสติ, ตโตปิ เอโก อกาโรติ กตฺวา สมีตตฺเถ ทุตีโย ตทฺธิต อกาโรปิ อสฺสุโตเยวนามโหติ. ‘‘ปริกปฺปนายา’’ติ ปริกปฺเปตฺวา กถนาย. ปโยชนาภาวโต น ยุตฺตนฺติสมฺพนฺโธ. อตุลปทํ. पदसिद्धीच्या विचारामध्ये 'विभावनी' मध्ये म्हटले आहे - 'तुलाय समितो तुल्यो' (तुलेने मोजलेला तो 'तुल्य'). 'तुल्य' हाच 'य' काराच्या लोपामुळे 'तुल' होतो. त्या संदर्भात 'य-काराच्या लोपामुळे' असे म्हटले आहे. आणि तिथेच जे म्हटले आहे - 'अथवा समीप अर्थामध्ये 'अ' प्रत्यय लागल्यामुळे तुलाय समीतो तुलो (तुलेच्या समीप असलेला तो 'तुल' होय)'. त्या संदर्भात 'अ-काराच्या प्रभावामुळे' असे म्हटले आहे. तेथे 'तुलाया' म्हणजे लोकव्यवहारातील वजन करण्याच्या तराजू सारख्या प्रज्ञेने, असा अर्थ आहे. 'समीतो' म्हणजे समान केलेला. 'तुल' हा शब्द असणे अयोग्य नाही, तर तो योग्यच आहे, असा अभिप्राय आहे. ते कसे समजले जाते? म्हणून 'तुलयितुं' (मोजण्यासाठी) इत्यादी म्हटले आहे. कारण तेथे 'तुलयितुं असक्कुणेय्यो' (मोजण्यास अशक्य) या वचनाने त्याचे कर्मसाधनत्व (कर्मवाचकत्व) दर्शविले आहे. 'कर्मसाधनानेच' म्हणजे पूर्वी - 'ज्याचे मापन केले जावे किंवा दुसऱ्याशी तुलना केली जावी तो तुल' अशा प्रकारे येथे सांगितलेल्या कर्मसाधन वाचक अर्थानेच. 'त्या अर्थाच्या सिद्धीमुळे' म्हणजे 'विभावनी' मध्ये सांगितलेल्या त्या द्विविध (दोन प्रकारच्या) अर्थाच्या सिद्धीमुळे. 'ततो' म्हणजे 'तुल' या शब्दापासून. (अशा) चिंतेचे काय प्रयोजन आहे? काहीच नाही, असा अभिप्राय आहे. जो बोलण्याच्या स्वभावाचा आहे तो 'वक्ता' (बोलणारा), म्हणजेच वाद घालणारा पुद्गल (व्यक्ती). वक्त्याची इच्छा म्हणजे 'वत्तिच्छा' (बोलण्याची इच्छा). 'बोलण्याची इच्छा ती वत्तिच्छा' असेही म्हणतात. वक्त्याच्या इच्छेचे अनुकरण करणारा, संमती आणि संकेत व्यवहाराने सिद्ध झालेला, असा हा समास आहे. 'एतं' म्हणजे हे दोन प्रकारे सिद्ध झालेले वचन. 'चे' म्हणजे जर असे म्हटले तर. 'न' म्हणजे योग्य नाही. 'यथासुतं' म्हणजे 'तुल' असे ऐकले गेले आहे. 'युत्तं' म्हणजे जसे ऐकले आहे त्याच नियमाने जे योग्य आहे ते सोडून. 'अस्सुतस्स' म्हणजे वजन करण्याच्या तराजूचा वाचक असलेल्या स्त्रीलिंगी 'तुला' शब्दाचे जे ऐकले गेले नाही. आणि म्हणूनच 'य' कार युक्त अशा 'तुल्य' शब्दाचे जे ऐकले गेले नाही. स्त्रीलिंग असताना, त्यावरूनही एक 'अ' कार करून, समीप अर्थामध्ये दुसरा तद्धित 'अ' कार देखील न ऐकलेलाच (अश्रुत) ठरतो. 'परिकल्पनाया' म्हणजे परिकल्पना करून सांगण्यासाठी. प्रयोजनाचा अभाव असल्यामुळे ते योग्य नाही, असा संबंध आहे. 'अतुल' पद. ๖. เอวํ ทฺวินฺนํ ปทานํ ปทตฺถ สํวณฺณนํ กตฺวา อิทานิ เตสํเยว อตฺถุทฺธารสํวณฺณนํ กโรนฺโต ‘‘อิเมหิ ปนา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘สมฺปทา’’ติ สมฺปตฺติโย. ‘‘โพธิสมฺภารสมฺภรณํ นาม’’ สมตึ สปารมีนํ ปริปูรณํ. ‘‘มหาวชิรญฺญาณ’’นฺติ ภควโต อาสวกฺขยญฺญาณมฺปิ วุจฺจติ. ตสฺส ปุพฺพภาเค พุทฺธภาวตฺถาย อนุปทธมฺมวิปสฺสนาวเสน ฉตฺตึส โกฏิ สตสหสฺส สงฺขานํ เทวสิกํ วฬญฺชนกปฺผลสมาปตฺตีนํ ปุพฺพภาค วิปสฺสนาญาณมฺปิ มหาวชิรญฺญาณนฺติ [Pg.17] วุจฺจติ. สพฺพมฺเปตํ มหาฏีกายํ วุตฺตํ. ‘‘มหาโพธิยา’’ติ สพฺพญฺญุ พุทฺธานํ อภิสมฺโพธิ สงฺขาตสฺส อคฺคมคฺคญฺญาณสฺส. ปหิยฺยนฺติ ปหาตพฺพา ธมฺมา เอเตนาติ ปหานํ. ปชหนฺติ ปหาตพฺเพธมฺเมเอเตนาติวา ปหานนฺติ กตฺวา ตํ อคฺคมคฺคญฺญาณมฺปิตํ วิปสฺสนาญาณมฺปิ ปหานนฺติ วุจฺจตีติ อิมินา อธิปฺปาเยน ‘‘ปหานสมฺปทายํ วา สา สงฺคหิตา’’ติ วุตฺตํ. ปญฺจสีลานิ. ปาณาติปาตสฺส ปหานํสีลํ, เวรมณิสีลํ, เจตสิกํสีลํ, สํวโรสีลํ, อวีติกฺกโมสิลนฺติอาทีสุวิย เอตฺถหิ ปหานสีลํ นาม ยถา วุตฺเตน อตฺเถน เวรมณิสีลเมวาติ ยุชฺชติ. ปหานํ นาม โกจิธมฺโม นโหตีติ อธิปฺปาเย ปน สติปหาน สีเสน ปหานสาธกํ ตเทวญาณทฺวยํ อุปจาเรนปหานนฺติ คเหตพฺพํ. อิตรถา ปหานสมฺปทา นาม อสารา อผลาติ อาปชฺเชยฺยาติ. ปจฺเจกพุทฺธ พุทฺธสาวกา กิเลเส ปชหนฺตาปิ วาสนาย สห อปฺปชหนโต จิตฺต สนฺตาเน โมหวาสนาย วิชฺชมานตฺตา สพฺพญฺญุ ภาวํ นคจฺฉนฺติ. ตสฺมา ยถาเตสํ กิเลสปฺปหานํ ปหานสมฺปทา นาม นโหติ. นตถาสพฺพญฺญุพุทฺธานนฺติ อาห ‘‘สหวาสนายา’’ติอาทึ. วิภาวนิยํญาณสมฺปทา ปถมํ วุตฺตา. ตโต ปหาน สมฺปทา. ฏีกายํ ปน ปหานสมฺปทา ปถมํ วุตฺตา. ตโต อธิคม สมฺปทานาม วุตฺตา. ตโต ญาณสมฺปทา. ปหานสมฺปทายญฺจ อคฺคมคฺคญฺญาณํ ทสฺสิตํ. อธิคม สมฺปทาติ จ สพฺพญฺญุตญฺญาณปฺปฏิลาโภ วุตฺโต. ญาณสมฺปทายมฺปน เตหิ ทฺวีหิ ญาเณหิ อวเสสานิทสพลญฺญาณาทีนิสพฺพญฺญาณานิทสฺสิตานิ. อิธปิ ฏีกานยเมว สมฺภาเวนฺโต ‘‘ปหานสมฺปทาเยวปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘สพฺพญฺญุตญฺญาณปฺปทฏฺฐาน’’นฺติ สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺสปทฏฺฐานํ, อาสนฺน การณํ. ‘‘น หิ มคฺคญฺญาณโต อญฺญา ปหานสมฺปทานาม อตฺถิ’’. ปรมตฺถโต นตฺถีติ อธิปฺปาโย. อิทญฺจ วิสุทฺธิมคฺเค=ปหานนฺติ โกจิ ธมฺโมนาม นตฺถิ อญฺญตฺร วุตฺตปฺปการานํ ปาณาติปาตาทีนํ อนุปฺปาทมตฺตโต=ติ อาคตตฺตา วุตฺตํ. ปหายกธมฺมสมาทาเนน ปน ปหาตพฺพ ธมฺมานํ อนุปฺปาโท นาม เอโกปณีต ธมฺโมโหติ. เอกํ สนฺติ ปทํ โหติ. ตถาหิ วุตฺตํ ปฏิสมฺภิทา มคฺเค=อุปฺปาโท ภยํ[Pg.18], อนุปฺปาโท เขมนฺติ สนฺติปเท ญาณํ. ปวตฺติ ภยํ, อปฺปวตฺติ เขมนฺติ สนฺติปเทญาณ=นฺติ. ตทงฺคปฺปหานํ ปนตทงฺคอนุปฺปาโท นาม. วิกฺขมฺภนปฺปหานํ วิกฺขมฺภน อนุปฺปาโท นาม. สมุจฺเฉทปฺปหานํ สมุจฺเฉท อนุปฺปาโท นามาติ วตฺตพฺพํ. อิธ ปน อนุปฺปาท สมฺปาปกํ วิปสฺสนา ญาณญฺจ มคฺคญฺญาณญฺจ อุปจาเรน ปหานนฺติ อธิปฺเปตํ. กสฺมา, อุปริญาณ สมฺปทาทีนํ ปจฺจยตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘สมฺปทาสงฺกโร’’ติ สมฺปทาสมฺเภโท, สมฺปทาสมฺมิสฺโส. ‘‘ญายาคต’’นฺติ ยุตฺติโต อาคตํ. ‘‘สีลาทิคุเณหี’’ติ สีล สมาธิ ปญฺญา วิมุตฺติ วิมุตฺติญฺญาณทสฺสน คุเณหิ. ‘‘อิทฺธิธมฺเมหี’’ติ อิทฺธิวิธาภิญฺญาทีหิ อิทฺธิคุเณหิ. ‘‘ลกฺขณานุพฺยญฺชนปฺปฏิมณฺฑิตสฺสา’’ติ ทฺวตฺตึส มหาปุริสลกฺขเณหิ จ อสีติ ขุทฺทกลกฺขเณหิ จ ปฏิมณฺฑิตสฺส. ‘‘อาสโย’’ติ จิตฺต สนฺตาเน อธิสยิโต อิจฺฉาวิเสโส. ‘‘อชฺฌาสยสฺสา’’ติ อโลภชฺฌาสยาทิกสฺสอชฺฌาสยสฺส. ‘‘อุฬารตา’’ติ ปณีตตา. ‘‘หิตชฺฌาสยตา’’ติหิตกามตา. อปริปาก คตินฺทฺริยานํ สตฺตานํ อินฺทฺริยปริปากกาลาคมนญฺจ เอตฺถ วตฺตพฺพํ. ‘‘อภิญฺญาตาน’’นฺติ อติปากฏานํ. ‘‘ทฺเวปหานสมฺปทา’’ติ ทฺเวปหาน สมฺปทา ญาณสมฺปทา. สมฺมาสมฺพุทฺธปเท. ‘‘สามํ สจฺจานิ อภิสมฺพุชฺฌี’’ติ เอตฺถ อภิสมฺโพธิสงฺขาตํ อคฺคมคฺคญฺญาณํ คหิตํ. ตญฺจ ปหานกิจฺจปฺปธานํ โหติ. ‘‘ตตฺถ จ สพฺพญฺญุตํ ปตฺโต’’ติ เอตฺถ สพฺพญฺญุตญฺญาณํ. ‘‘พเลสุ จ วสิภาว’’นฺติ เอตฺถ ทสพลญฺญาณานิ คหิตานิ. เตน วุตฺตํ ‘‘ทฺเว…เป… สมฺมาสมฺพุทฺธปเทนวิภาวิตา’’ติ. ६. अशा प्रकारे दोन पदांच्या पद-अर्थाचे स्पष्टीकरण करून, आता त्यांचाच अर्थ-उद्धार स्पष्ट करताना भगवंतांनी “इमेहि पना” इत्यादी म्हटले. त्यात “संपदा” म्हणजे संपत्ती होय. “बोधिसंभारसंभरण” म्हणजे तीस पारमितांची परिपूर्णता होय. “महावजिरज्ञान” (महावज्रज्ञान) हे भगवंतांच्या आसवक्खयज्ञानाला (आस्रवक्षयज्ञानाला) देखील म्हटले जाते. त्याच्या पूर्वभागात, बुद्धत्वाच्या प्राप्तीसाठी अनुपद-धम्म-विपस्सना (अनुपदधर्मविपश्यना) च्या द्वारे दररोज छत्तीस कोटी शंभर हजार संख्येच्या फळसमापत्तींचा उपभोग घेण्याच्या पूर्वभागातील विपस्सना ज्ञानाला देखील 'महावजिरज्ञान' असे म्हटले जाते. हे सर्व महाटीकेमध्ये सांगितले आहे. “महाबोधी” म्हणजे सम्यक् संबुद्धांच्या अभिसंबोधी नावाच्या अग्र मार्ग ज्ञानाचे. ज्याच्याद्वारे नष्ट केले जावे असे धर्म नष्ट केले जातात, ते 'प्रहाण' होय. किंवा ज्याच्याद्वारे नष्ट करण्यायोग्य धर्मांचा त्याग केला जातो ते 'प्रहाण' होय, असे मानून त्या अग्र मार्ग ज्ञानाला आणि त्या विपस्सना ज्ञानाला देखील 'प्रहाण' म्हटले जाते, याच अभिप्रायाने “किंवा ते प्रहाणसंपदेमध्ये समाविष्ट आहे” असे म्हटले आहे. पंचशील. प्राणातिपाताचे (जीवहिंसेचे) प्रहाणशील, विरमणशील, चेतनाशिल, संवरशील, अव्यतिक्रमशील इत्यादींप्रमाणेच, येथे 'प्रहाणशील' म्हणजे वर सांगितलेल्या अर्थानुसार 'विरमणशील' (विरतीशील) च असणे योग्य आहे. परंतु, “प्रहाण नावाचा कोणताही स्वतंत्र धर्म अस्तित्वात नाही” या अभिप्रायाने, प्रहाण साध्य करणाऱ्या त्या दोन ज्ञानांनाच उपचाराने 'प्रहाण' असे ग्रहण करावे. अन्यथा, प्रहाणसंपदा ही निस्सार आणि निष्फळ ठरेल असा प्रसंग येईल. प्रत्येकबुद्ध आणि बुद्धश्रावक हे क्लेशांचा प्रहाण (त्याग) करत असले तरी, वासनेसह (संस्कारांसह) त्याग करत नसल्यामुळे, त्यांच्या चित्तसंततीमध्ये मोहवासना शिल्लक राहिल्याने ते सर्वज्ञत्व प्राप्त करत नाहीत. म्हणूनच, ज्याप्रमाणे त्यांच्या क्लेशांचे प्रहाण हे 'प्रहाणसंपदा' म्हटले जात नाही, त्याप्रमाणे सर्वज्ञ बुद्धांच्या बाबतीत नाही, हे दर्शवण्यासाठी “सहवासना” इत्यादी म्हटले आहे. विभाविनीमध्ये 'ज्ञानसंपदा' प्रथम सांगितली आहे, त्यानंतर 'प्रहाणसंपदा'. परंतु टीकेमध्ये 'प्रहाणसंपदा' प्रथम सांगितली आहे, त्यानंतर 'अधिगमसंपदा' सांगितली आहे, आणि त्यानंतर 'ज्ञानसंपदा'. प्रहाणसंपदेमध्ये अग्र मार्ग ज्ञान दर्शविले आहे. 'अधिगमसंपदा' म्हणजे सर्वज्ञता-ज्ञानाची प्राप्ती असे म्हटले आहे. तर 'ज्ञानसंपदे'मध्ये त्या दोन ज्ञानांव्यतिरिक्त उर्वरित दशबलज्ञान इत्यादी सर्व ज्ञाने दर्शविली आहेत. येथेही टीकेच्याच पद्धतीचे समर्थन करत “प्रहाणसंपदेमध्येच...” इत्यादी म्हटले आहे. “सब्बञ्ञुताञाणपदट्ठाण” (सर्वज्ञताज्ञानपदस्थान) म्हणजे सर्वज्ञताज्ञानाचे पदस्थान, म्हणजेच आसन्न कारण होय. “कारण मार्गज्ञानाशिवाय दुसरी कोणतीही प्रहाणसंपदा नाही.” परमार्थतः ती नाही, असा अभिप्राय आहे. आणि हे विसुद्धिमग्गात “प्रहाण नावाचा कोणताही स्वतंत्र धर्म नाही, केवळ वर सांगितलेल्या प्राणातिपात इत्यादींच्या अनुत्पाद मात्रतेमुळेच त्याला प्रहाण म्हणतात” असे आल्यामुळे सांगितले आहे. परंतु प्रहाण करणाऱ्या धर्मांच्या समादानाने प्रहाण करण्यायोग्य धर्मांचा अनुत्पाद हा एक प्रणीत धर्म होतो. ते एक शांत पद होते. तसेच पटिसंभिदामग्गात म्हटले आहे - “उत्पाद हे भय आहे, अनुत्पाद हे क्षेम आहे, हे शांत पदाचे ज्ञान आहे. प्रवृत्ती हे भय आहे, अप्रवृत्ती हे क्षेम आहे, हे शांत पदाचे ज्ञान आहे.” तदंग-प्रहाण म्हणजे तदंग-अनुत्पाद होय. विष्कंभन-प्रहाण म्हणजे विष्कंभन-अनुत्पाद होय. समुच्छेद-प्रहाण म्हणजे समुच्छेद-अनुत्पाद होय, असे म्हटले पाहिजे. परंतु येथे अनुत्पाद प्राप्त करून देणारे विपस्सना ज्ञान आणि मार्ग ज्ञान यांनाच उपचाराने 'प्रहाण' असे अभिप्रेत आहे. का? कारण ते पुढील ज्ञानसंपदा इत्यादींचे प्रत्यय (कारण) आहेत, असे जाणावे. “संपदासंकर” म्हणजे संपदांचा संभेद, संपदांचे परस्परांमध्ये मिसळणे होय. “न्यायागत” म्हणजे युक्तीने सिद्ध झालेले. “शीलादी गुणांनी” म्हणजे शील, समाधी, प्रज्ञा, विमुक्ती आणि विमुक्तीज्ञानदर्शन या गुणांनी. “ऋद्धीधर्मांनी” म्हणजे ऋद्धिविध-अभिज्ञा इत्यादी ऋद्धीगुणांनी. “लक्षण आणि अनुव्यंजनांनी सुशोभित” म्हणजे बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी आणि ऐंशी अनुव्यंजनांनी सुशोभित असलेल्या. “आशय” म्हणजे चित्तसंततीमध्ये सुप्त असलेला विशिष्ट इच्छेचा प्रकार. “अध्याशयाचे” म्हणजे अलोभ-अध्याशय इत्यादी अध्याशयाचे. “उदारता” म्हणजे प्रणीतता. “हिताध्याशयता” म्हणजे हितकामता होय. ज्या प्राण्यांची इंद्रिये परिपक्व झालेली नाहीत, त्यांच्या इंद्रियांच्या परिपाकाचा काळ येथे सांगितले पाहिजे. “अभिज्ञात” म्हणजे अत्यंत प्रसिद्ध. “दोन प्रहाणसंपदा” म्हणजे प्रहाणसंपदा आणि ज्ञानसंपदा या दोन संपदा. सम्यक्संबुद्ध या पदामध्ये. “स्वतः सत्यांचा अभिसंबोध केला” यामध्ये अभिसंबोधी नावाचे अग्र मार्ग ज्ञान ग्रहण केले आहे. आणि ते प्रहाणकार्यात प्रधान असते. “आणि त्यात सर्वज्ञता प्राप्त केली” यामध्ये सर्वज्ञताज्ञान ग्रहण केले आहे. “आणि बलांवर वशित्व मिळवले” यामध्ये दशबलज्ञाने ग्रहण केली आहेत. म्हणूनच “दोन... पे... सम्यक्संबुद्ध पदाने स्पष्ट केले आहेत” असे म्हटले आहे. สมฺปทานิฏฺฐิตา. संपदा समाप्त झाली. ๗. สสทฺธมฺมคณุตฺตมปเท. ยถา=สสงฺฆํโลกนายกํ นมสฺสิสฺสํ=ติ เอตฺถสหสทฺทสฺส สมวายตฺถตฺตา อหํโลกนายกญฺจ สงฺฆญฺจ นมสฺสิสฺสนฺติ เอวํ สมวายตฺโถ วิญฺญายติ. ตถา อิธปิ สมฺมาสมฺพุทฺธญฺจสทฺธมฺมญฺจ คณุตฺตมญฺจ อภิวาทิยามีติ เอวํ กิริยาสมวายตฺโถ สหสทฺเทน ทีปิโตติ ทสฺเสตุํ ‘‘ทูรโตหํ…เป… เอวมิทํ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘อิท’’นฺติ สสทฺธมฺมคณุตฺตมปทํ. เอตฺถ [Pg.19] จ‘‘สมวาโย’’ติ ทฺวินฺนํ ติณฺณํ พหูนํ วา อตฺถานํ เอกสฺมึ ทพฺเพวา คุเณวากิริยายวาสมํ อเวจฺจ อยนํปวตฺตนํ สมวาโย. ปจฺจานุตาป ปจฺจานุโมทนาทิฐาเนสุ=อหํ ปุพฺเพทานํ นททิสฺสํ, สีลํ นรกฺขิสฺสํ. - อเนกชาติ สํสารํ สนฺธาวิสฺส=นฺติอาทินา อตีเตปิกาเล อนาคตวจนํ ปยุชฺชตีติ อาห ‘‘นมสฺสิสฺส’’นฺติ นมสฺสึติ. ‘‘คุณีภูตาน’’นฺติ สมาสปเท วิเสสนภูตานํ, อปฺปธานภูตานนฺติ อตฺโถ. อพฺภูต ตพฺภาเวจายํ อีกาโร. ยถา, กาโก เสตี ภวติ, พโก กณฺหีภวตีติ. เอตฺถ จ ‘‘เสตี ภวตี’’ติ อเสตปุพฺโพ เสโตภวติ. ‘‘กณฺหีภวตี’’ติ อกณฺหปุพฺโพ กณฺโหภวตีติ อตฺโถ. ตถา อิธปิ. พุทฺธํ ธมฺมญฺจ สงฺฆญฺจวนฺทิตฺวา-ติอาทีสุ วิสุํวิสุํ ปธานตฺตา อคุณภูตาปิ ธมฺมสงฺฆา อิธสมาสปเท อญฺญปทตฺถสฺสคุณภูตาโหนฺติ. อยํ อพฺภูตตพฺภาวตฺโถ นาม. ‘‘อภิวาทิตภาโว’’ติ วุตฺเต ตปจฺจยสฺส พหุลํ อตีตกาลวิสยตฺตา ปุพฺเพคนฺถารมฺภกาเล ธมฺม สงฺฆานํปิ เถรสฺส วนฺทนาสิทฺธิ ทสฺสิตา โหติ. ‘‘อภิวาเทตพฺพ ภาโว’’ติ วุตฺเตปน ตพฺพปจฺจยสฺสกาลสามญฺญวิสยตฺตาน ตถา ทสฺสิตา โหติ. ทานํ ทาตพฺพํ, สีลํ รกฺขิตพฺพนฺติอาทีสุ วิย ธมฺมสงฺฆานามสพฺพกาลํปิ อภิวาเทตพฺพาติ. เอวํ ธมฺมสงฺฆานํ สพฺพกาลํปิ อภิวาทนารหคุโณ เอว ทสฺสิโตติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ, ‘‘อภิวาทน’’นฺติ อิทํ กิริยาสมวายทสฺสนโต วุตฺตํ. กาลวิเสสํ ปน นทีเปติเยว. ‘‘อตฺตโน นิทสฺสเนนา’’ติ สปุตฺตทาโร อาคโตติ อตฺตนา นีหริตฺวา ทสฺสิเตน ปโยเคน. โสหิ ปโยโค กิริยา สมวายสฺเสว. นคุณสมวายสฺสาติ. เอตฺถ จ เถรสฺส วนฺทนาวจเน เถโร อิเมหิ เยวปเทหิ รตนตฺตยํตีหิทฺวาเร หิวนฺทตีติ คเหตฺวา ‘‘อภิวาทิยา’’ติ เอตฺถ อภิวาทิยาธีติ จ อตฺถํ นีหรนฺติ. อปฺปธาน กิริยาปเท ปน ตทตฺถ นีหรณํ อสมฺภาเวนฺโต ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘อปิจา’’ติ กิญฺจิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ อตฺถโชตเน อยํ นิปาตสมุทโย. ‘‘คนฺถปฺปฏิญฺญายา’’ติ คนฺถปฺปฏิญฺญาวจเนน. ‘‘สหฆเฏตฺวา’’ติ เอกโต สมฺพนฺธิตฺวา. ७. ससद्धम्मगणोत्तमपदे। जसे 'ससंघं लोकनायकं नमस्सिस्सं' (संघासह लोकनायकाला नमस्कार करीन) येथे 'सह' शब्दाचा समवाय (एकत्र असणे) अर्थ असल्यामुळे 'मी लोकनायक आणि संघ या दोघांना नमस्कार करीन' असा समवाय अर्थ समजला जातो. तसेच येथेही 'सम्मासम्बुद्ध, सद्धम्म आणि गणोत्तम (उत्कृष्ट संघ) यांना अभिवादन करतो' अशा प्रकारे क्रिया-समवाय अर्थ 'सह' शब्दाने दर्शविला आहे, हे दाखवण्यासाठी 'दूरतोहं...पे... एवमिदं दट्ठब्बं' (दूरून मी... याप्रमाणे हे पाहावे) असे म्हटले आहे. 'इदं' म्हणजे 'ससद्धम्मगणोत्तम' हे पद. आणि येथे 'समवाय' म्हणजे दोन, तीन किंवा अनेक अर्थांचे एकाच द्रव्यात, गुणात किंवा क्रियेत समान रीतीने एकत्र येणे किंवा प्रवृत्त होणे म्हणजे समवाय होय. पश्चात्ताप, पश्चादानुमोदन इत्यादी प्रसंगी 'मी पूर्वी दान दिले नाही, शीलाचे रक्षण केले नाही' - 'अनेकजाति संसारं संधाविस्सं' (अनेक जन्मांच्या संसारात मी भटकलो) इत्यादींमध्ये भूतकाळातही भविष्यकाळाचे वचन (क्रियापद) वापरले जाते, म्हणून 'नमस्सिस्सं' म्हणजे 'मी नमस्कार केला' असे म्हटले आहे. 'गुणीभूतानं' म्हणजे समासात विशेषण बनलेल्या, अप्रधान बनलेल्या (असा अर्थ आहे). हा 'ई' कार 'अभूततद्भाव' (जे पूर्वी नव्हते ते होणे) या अर्थात आहे. जसे, 'काको सेती भवति' (कावळा पांढरा होतो), 'बको कण्हीभवति' (बगळा काळा होतो). आणि येथे 'सेती भवति' म्हणजे जो पूर्वी पांढरा नव्हता तो पांढरा होतो. 'कण्हीभवति' म्हणजे जो पूर्वी काळा नव्हता तो काळा होतो, असा अर्थ आहे. तसेच येथेही. 'बुद्धं धम्मं च संघं च वन्दित्वा' (बुद्ध, धम्म आणि संघाला वंदन करून) इत्यादींमध्ये स्वतंत्रपणे प्रधान असल्यामुळे अप्रधान नसलेले देखील धम्म आणि संघ येथे समासात अन्य पदाच्या अर्थाचे विशेषण (अप्रधान) बनतात. याला 'अभूततद्भाव' अर्थ म्हणतात. 'अभिवादितभावो' असे म्हटले असता 'त' प्रत्यय बहुधा भूतकाळाचा विषय असल्यामुळे, पूर्वी ग्रंथारंभाच्या वेळी थेरांनी धम्म आणि संघालाही वंदन केल्याची सिद्धी दर्शविली जाते. परंतु 'अभिवादेतब्ब भावो' असे म्हटले असता 'तब्ब' प्रत्यय सामान्य काळाचा विषय असल्यामुळे तसे दर्शविले जात नाही. 'दान दिले पाहिजे, शीलाचे रक्षण केले पाहिजे' इत्यादींप्रमाणे धम्म आणि संघ हे सर्वकाळातही अभिवादन करण्यास योग्य आहेत. अशा प्रकारे धम्म आणि संघाचा सर्वकाळातही अभिवादानास पात्र असणारा गुणच दर्शविला आहे, हा अर्थ दाखवण्यासाठी 'तत्थ' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे, 'अभिवादनं' हे क्रिया-समवाय दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. परंतु ते विशिष्ट काळ दर्शवत नाही. 'अत्तनो निदस्सनेन' म्हणजे 'तो आपल्या पत्नी-मुलांसह आला' याप्रमाणे स्वतः काढून दाखवलेल्या प्रयोगाने. कारण तो प्रयोग क्रिया-समवायाचाच आहे, गुण-समवायाचा नाही. आणि येथे थेरांच्या वंदनवचनात, थेर याच पदांनी त्रिरत्नांना तीनही द्वारांनी वंदन करतात असे गृहीत धरून 'अभिवादिया' येथे 'अभिवादियाधि' असा अर्थ काढतात. परंतु अप्रधान क्रियापदात तो अर्थ काढणे अशक्य असल्यामुळे 'अपि च' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'अपि च' हा काहीतरी सांगण्यासारखे आहे हे दर्शवण्यासाठी निपातांचा समूह आहे. 'गन्थप्पटिञ्ञाय' म्हणजे ग्रंथाच्या प्रतिज्ञेच्या वचनाने. 'सहघटेत्वा' म्हणजे एकत्र संबंध जोडून. วจนตฺเถ[Pg.20]. สธโน ปุริโส, ธนวาปุริโส-ติ อาทโย สมาสตทฺธิตสทฺทา เยภูยฺเยน อติสฺสยตฺถ ทีปกา โหนฺติ. นหิ อปฺปเกน ธเนน ตถา โวหรนฺติ. ตสฺมา อิธาปิ ตถา รูปํ อติสฺสยตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อตฺตนานิมฺมิเตน…เป… สรณภูเตนา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ, ‘‘อตฺตนานิมฺมิเตนา’’ติ อตฺตนา อุปฺปาทิเตน. ‘‘นหี’’ติอาทินา ตทตฺถเมว พฺยติเรกโต วิวรติ. ตตฺถ, ‘‘ปรนิมฺมิเตนา’’ติ พุทฺธนิมฺมิเตนาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตถา โถมน’’นฺติ สสทฺธมฺม คณุตฺตมนฺติ โถมนํ. ‘‘อิทํปี’’ติ ทุตียตฺถ สมฺปิณฺฑเน อยํปิกาโร. นเกวลํ ปุริมปททฺวยเมว สตฺถุ อสาธารณคุณปทํ โหติ. อถ โข อิทํปิ ปทํ สตฺถุ ปจฺเจกพุทฺธาทีหิ อสาธารณ ปทเมวโหตีติ โยชนา. वचनार्थात (शब्दाच्या अर्थात). 'सधनो पुरिसो' (धनासह असलेला पुरुष), 'धनवा पुरिसो' (धनवान पुरुष) इत्यादी समास आणि तद्धित शब्द बहुधा अतिशयता (अधिकता) दर्शवणारे असतात. कारण थोड्याशा धनाने तसा व्यवहार केला जात नाही. म्हणून येथेही तशा प्रकारचा अतिशय अर्थ दर्शवण्यासाठी 'अत्तनानिम्मितेन...पे... सरणभूतेन' (स्वतः निर्माण केलेल्या... शरणभूत झालेल्या) असे म्हटले आहे. तेथे, 'अत्तनानिम्मितेन' म्हणजे स्वतः उत्पन्न केलेल्या. 'न हि' इत्यादींद्वारे तोच अर्थ व्यतिरेक रूपाने (नकारात्मकतेने) स्पष्ट केला आहे. तेथे, 'परनिम्मितेन' म्हणजे बुद्धांनी निर्माण केलेल्या, असा अभिप्राय आहे. 'तथा थोमनं' म्हणजे 'ससद्धम्मगणोत्तमं' अशी स्तुती. 'इदम्पि' मधील 'अपि' (पि) हा कार दुसऱ्या अर्थाचा संग्रह करण्यासाठी आहे. केवळ पूर्ववर्ती दोन पदेच शास्त्यांचे (बुद्धांचे) असाधारण गुण दर्शवणारे पद नाहीत. तर हे पद देखील प्रत्येकबुद्ध इत्यादींपेक्षा शास्त्यांचे असाधारण पदच आहे, अशी योजना (अन्वय) आहे. ธมฺมวจนตฺเถ. ‘‘ธาเรตี’’ติ วหติ. คาถายํ ‘‘รกฺขตี’’ติ อปายาทิทุกฺขโตรกฺขติ. ‘‘เยส’’นฺติ กิเลสานํ. ‘‘อิมสฺมึ อตฺเถ’’ติ กิเลสสมุจฺฉินฺทนสงฺขาเต ธารณตฺเถ. ‘‘นิพฺพานญฺจนิปฺปริยายโต ธมฺโม นามา’’ติ กสฺมา วุตฺตํ, นนุ นิสฺสรณปฺปหานเมว นิพฺพานสฺส กิจฺจํ, อิทญฺจ สมุจฺเฉทปฺปหานนฺติ โจทนํ ปริหรนฺโต ‘‘อริยมคฺคาหี’’ติอาทิมาห. ‘‘นิพฺพาเนน สเหว หุตฺวา’’ติ อารมฺมณาธิปติภูตํ อารมฺมณู ปนิสฺสยภูตญฺจ นิพฺพานํ อตฺตโน ปติฏฺฐํ กตฺวาติ อธิปฺปาโย. อปิจ, สมุจฺเฉโทติ จ นิสฺสรณนฺติ จ อตฺถโต สมานคติกํ โหติ. ตสฺมา นิสฺสรณํปิ มุขฺยธารณ เมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. นิสฺสรณเมววา ปธานธารณนฺติ ปิยุชฺชติเยว. ‘‘ธารณูปาโยเยวโหติ’’. นมุขฺยธารณํ. กสฺมา, สมุจฺเฉท กิจฺจาภาวโต. ‘‘เอเตปญฺจ ปริยายธมฺมาเยว’’. กสฺมา, นิพฺพานสฺสวิยมคฺคานํ สมุจฺเฉท กิจฺเจ อสหายตฺตาติ. เอตฺถ จ ‘‘สามญฺญปฺผลานี’’ติ สมณสฺส ภาโว สามญฺญํ. อริยมคฺคสฺเสตํ นามํ. สามญฺญสฺสผลํ สามญฺญปฺผลํ. ทุตียวิกปฺเป อกิจฺจ ปจฺจยภูตาปิ เกจิกิตกปจฺจยา กมฺมตฺเถคตา กิจฺจปจฺจยานํปิ อตฺถํ ทีเปติ. ยถา, ทิฏฺฐํ, สุตํ, มุตํ, วิญฺญาตนฺติ วุตฺตํ ‘‘ธารณารโห’’ติ. ‘‘ยถา วุตฺต ธมฺมา เยวา’’ติ ปญฺจมุขฺยธมฺมา, ปญฺจปริยายธมฺมาเยว. ‘‘เกจี’’ติ จตฺตาโร มคฺคา. ปุน ‘‘เกจี’’ติ นิพฺพานเมว. พหุวจน โสเตปติตตฺตา [Pg.21] เอตฺถ พหุวจนํ รุฬํ. ปุน ‘‘เกจี’’ติ จตฺตาโร สามญฺญปฺผล ธมฺมา. ‘‘เกจี’’ติ ปริยตฺติ ธมฺโม. เอตฺถาปิ พหุวจนํ โสตปติตเมว. ‘‘ธาเรนฺต’’นฺติ ธาเรนฺตํ ปุคฺคลํ. ตตีย วิกปฺเป ‘‘อปตมานํ วหนฺตี’’ติ อปตมานํ กตฺวา วหนฺติ. จตุตฺถ วิกปฺเป ‘‘เอตฺถา’’ติ เอตสฺมึ ธมฺเม. ธมฺโมวทีปํ เอเตสนฺติ ธมฺมทีปา. ธมฺโมว ปฏิสรณํ เอเตสนฺติ ธมฺมปฺปฏิสรณา. ธมฺมทีปา ภิกฺขเว ภวถ ธมฺมปฺปฏิสรณา, อนญฺญปฺปฏิสรณา ติหิ วุตฺตํ. ลทฺธา ปติฏฺฐา เอเตสนฺติ ลทฺธปฺปติฏฺฐา. ยุชฺชติเยว. ธมฺมทีปปาฐานุโลมตฺตาติ อธิปฺปาโย. ธมฺมวิจารณายํ, โจทโกปฏิปตฺติ ธมฺมํ ทสวิธ ธมฺมโต อญฺญํมญฺญมาโน ‘‘กสฺมา’’ติอาทินา โจเทติ. โส ปน ปฏิปตฺติ ธมฺโม ตโต อญฺโญน โหติ, ตตฺเถว อนฺโตคโธติ ทสฺเสนฺโต ‘‘โสปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘มคฺคสฺส ปุพฺพภาคปฺปฏิปทา โหตี’’ติ ยถา อมฺพรุกฺโข อมฺพปุปฺผอมฺพปฺผลสฺส ปติฏฺฐา ภาเวน ปุพฺพภาค นิสฺสโย โหติ. กสฺมา, อิโตเยวตสฺส ปุปฺผปฺผลสฺส ชาตตฺตา เอตฺเถวสํ วฑฺฒิตตฺตา จ. ตถา ปฏิปตฺติ ธมฺโมปิ อริยมคฺคปฺผลสฺสปติฏฺฐาภาเวน ปุพฺพภาคูปนิสฺสยปฺปฏิปทาโหติ. กสฺมา, อิโตเยว ตสฺสชาตตฺตา เอตฺเถวสํ วฑฺฒิตตฺตา จ. วุตฺตญฺเหตํ มหาวคฺค สํยุตฺเต. เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว เยเกจิ เมพีชคามภูตคามาวุฑฺฒึ วิรุฬึ เวปุลฺลํ อาปชฺชนฺติ. สพฺเพเต ปถวึ นิสฺสาย ปถวึ ปติฏฺฐาย. เอวเมว โข ภิกฺขเว ภิกฺขุสีลํ นิสฺสาย สีเลปติฏฺฐาย อริยํ อฏฺฐงฺคีกํ มคฺคํ ภาเวนฺโต วุฑฺฒึ วิรุฬฺหึ เวปุลฺลํ ปาปุณาติ ธมฺเมสูติ. ‘‘ปุพฺพเจตนาวิยทาเน’’ติ ยถา ติวิธํ ปุญฺญํ, ทานมยํ ปุญฺญํ สีลมยํ ปุญฺญํ ภาวนามยํ ปุญฺญนฺติ วุตฺเต ทานวตฺถุ ปริเยสนโต ปฏฺฐาย ทานํ อารพฺภปวตฺตา สพฺพา ปุพฺพภาค เจตนา ทานวจเน สงฺคหิตา ทานนฺตฺเวว สงฺขฺยํคตา. เอวํ โส ปฏิปตฺติ ธมฺโม อริย มคฺควจเน เอวสงฺคหิโต, อริยมคฺโค ตฺเวว สงฺขฺยํ คโตติ วุตฺตํ โหติ. धम्मवचनत्थे (धम्म शब्दाच्या अर्थाविषयी) - 'धारेति' (धारण करतो) म्हणजे वहन करतो. गाथेत 'रक्खति' (रक्षण करतो) म्हणजे अपाय इत्यादी दुःखांपासून रक्षण करतो. 'येसं' (ज्यांचे) म्हणजे क्लेशांचे. 'इमस्मिं अत्थे' (या अर्थामध्ये) म्हणजे क्लेशांच्या समूच्छेदरूप (पूर्ण नाशाच्या) धारण करण्याच्या अर्थामध्ये. 'निर्वाण हे मुख्य रूपाने धम्म आहे' असे का म्हटले आहे? निर्वाणाचे कार्य तर केवळ निस्सरण प्रहाण (दुःखातून सुटका) आहे, आणि हे (मार्गाचे कार्य) समूच्छेद प्रहाण (क्लेशांचा समूळ नाश) आहे, या आक्षेपाचे परिहार करताना 'आर्यमार्ग ग्रहण करणारा' (अरियमग्गाही) इत्यादी म्हटले आहे. 'निर्वाणासोबतच होऊन' (निब्बानेन सहेव हुत्वा) म्हणजे आलंबन-अधिपती आणि आलंबन-उपनिषय झालेल्या निर्वाणाला आपला आधार बनवून, असा अभिप्राय आहे. शिवाय, समूच्छेद आणि निस्सरण हे अर्थाने समानच आहेत. म्हणून निस्सरण सुद्धा मुख्य धारणच आहे असे समजावे. किंवा निस्सरण हेच मुख्य धारण आहे, असे योजणे योग्यच आहे. 'धारणोपायच होतो' (धारणोपायोयेव होति) - हे मुख्य धारण नाही. का? कारण यात समूच्छेद (क्लेशांचा नाश करण्याचे) कार्य नसते. 'हे पाच केवळ पर्यायधम्मच आहेत' (एते पंच परियायधम्मायेव). का? कारण निर्वाणाप्रमाणे मार्गांच्या समूच्छेद कार्यात ते असहाय (मदत न करणारे) असतात. येथे 'सामञ्ञप्फलानि' (श्रामण्यफळे) म्हणजे श्रमणाचा भाव तो 'श्रामण्य' (सामञ्ञ). हे आर्यमार्गाचे नाव आहे. श्रामण्याचे फल ते 'श्रामण्यफल' (सामञ्ञप्फल). दुसऱ्या विकल्पात अकृत्य प्रत्यय असूनही काही कृदंत प्रत्यय कर्म अर्थात जाऊन कृत्य प्रत्ययांचाही अर्थ दर्शवतात. जसे, 'दिट्ठं, सुतं, मुतं, विञ्ञातं' (पाहिलेले, ऐकलेले, विचार केलेले, जाणलेले) या अर्थी 'धारणार्ह' (धारणारहो) असे म्हटले आहे. 'यथावत सांगितलेले धम्मच' (यथा वृत्त धम्मा येव) म्हणजे पाच मुख्य धम्म आणि पाच पर्याय धम्मच. 'केचि' (काही) म्हणजे चार मार्ग. पुन्हा 'केचि' (काही) म्हणजे निर्वाणच. बहुवचनाच्या श्रवणामुळे येथे बहुवचन रूढ झाले आहे. पुन्हा 'केचि' (काही) म्हणजे चार श्रामण्यफल धम्म. 'केचि' (काही) म्हणजे परियत्ति धम्म (प्रवचन/शास्त्र). येथेही बहुवचन केवळ श्रवणामुळेच आले आहे. 'धारेन्तं' म्हणजे धारण करणाऱ्या पुद्गलाला (व्यक्तीला). तिसऱ्या विकल्पात 'अपतमानं वहन्ति' म्हणजे खाली न पडू देता वाहून नेतात. चौथ्या विकल्पात 'एत्थ' म्हणजे या धम्मामध्ये. धम्मच ज्यांचा दीप आहे ते 'धम्मदीपा'. धम्मच ज्यांचे प्रतिशरण (आश्रय) आहे ते 'धम्मप्पटिसरणा'. 'भिक्खूहो, धम्मदीप व्हा, धम्मप्रतिशरण व्हा, अनन्यप्रतिशरण व्हा' असे जे म्हटले आहे, ते याच अर्थाने. ज्यांनी आधार प्राप्त केला आहे ते 'लद्धप्पतिट्ठा'. हे योग्यच आहे. 'धम्मदीप' या पाठाशी सुसंगत असल्यामुळे असा अभिप्राय आहे. धम्मविचारात, आक्षेप घेणारा प्रतिपत्ति धम्माला दहा प्रकारच्या धम्मापेक्षा वेगळा मानून 'कस्मा' (का?) इत्यादी प्रश्न विचारतो. परंतु तो प्रतिपत्ति धम्म त्यापेक्षा वेगळा नसून त्यातच अंतर्भूत आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'सो पण' (तो तर) इत्यादी म्हटले आहे. 'मग्गस्स पुब्बभागप्पटिपदा होति' (मार्गाची पूर्वभाग प्रतिपदा असते) - जसे आंब्याचे झाड हे आंब्याची फुले आणि आंब्याची फळे यांच्या उत्पत्तीसाठी पूर्वभागाचा आश्रय असते. का? कारण याच झाडापासून त्या फुला-फळांची उत्पत्ती होते आणि येथेच त्यांची वाढ होते. तसेच प्रतिपत्ति धम्म देखील आर्यमार्ग आणि फलाच्या उत्पत्तीसाठी पूर्वभागाचा उपनिषय (मुख्य कारण) असणारी प्रतिपदा ठरतो. का? कारण यातूनच त्याची उत्पत्ती होते आणि येथेच त्यांची वाढ होते. तसेच महावग्ग संयुत्तात म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे कोणतीही बीजग्राम आणि भूतग्राम (वनस्पती) वाढ, वृद्धी आणि विशालता प्राप्त करतात, ती सर्व पृथ्वीचा आश्रय घेऊन, पृथ्वीवर प्रतिष्ठित होऊनच. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शीलाचा आश्रय घेऊन, शीलावर प्रतिष्ठित होऊन आर्य अष्टांगिक मार्गाची भावना (अभ्यास) करत धम्मांमध्ये वाढ, वृद्धी आणि विशालता प्राप्त करतो.' 'पुब्बचेतना विय दाने' (दानात पूर्वचेतनेप्रमाणे) - जसे दानमय पुण्य, शीलमय पुण्य आणि भावनामय पुण्य असे त्रिविध पुण्य सांगितले असता, दानाची सामग्री शोधण्यापासून घेऊन दानाविषयी प्रवृत्त झालेली सर्व पूर्वभागातील चेतना 'दान' या शब्दातच समाविष्ट होते आणि तिला 'दान' असेच म्हटले जाते. त्याचप्रमाणे, ती प्रतिपत्ति (साधना) आर्यमार्गाच्या शब्दातच समाविष्ट आहे आणि तिला 'आर्यमार्ग' असेच म्हटले जाते, असे सांगितले आहे. อิมสฺมึ ธมฺมสํสนฺทเน อปรมฺปิ วตฺตพฺพํ วทนฺโต ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘ยทคฺเคนา’’ติ เยนการณโกฏฺฐาเสน ธารณูปาโยติอาทินา การณภาเคนาติ อตฺโถ. วนฺทนํ อรห ตีติ [Pg.22] วนฺทเนยฺโย. ตสฺมึ วนฺทเนยฺเย. ‘‘ปุถุชฺชนกลฺยาณโก’’ติ เอตฺถ ติวิโธ กลฺยาณโก วินยกลฺยาณโก สุตฺตนฺตกลฺยาณโก อภิธมฺมกลฺยาณโกติ. ตตฺถ วินเย ปญฺญตฺตาย กลฺยาณปฺปฏิปตฺติยา สมนฺนาคโต ภิกฺขุ วินยกลฺยาณโก นาม. โส อิธ ภิกฺขุ ปาติโมกฺข สํวรสํวุโต วิหรติ อาจาร โคจร สมฺปนฺโน, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสูติ เอตฺถ เวทิตพฺโพ. ตตฺถ วินเย ปญฺญตฺตากลฺยาณปฺปฏิปตฺติทุวิธา, อาทิ พฺรหฺมจริยกสีลํ อภิสมจาริกสีลนฺติ. ตตฺถ, อุภโตวิภงฺคปริยาปนฺนํ สีลํ อาทิพฺรหฺมจริยกํ นาม. ขนฺธกปริยาปนฺนํ สีลํ อภิสมจาริกํ นาม. या धम्म-तुलनेमध्ये (धम्मसंसांदने) आणखीही काही सांगण्यासारखे सांगताना 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'यदग्गेन' म्हणजे ज्या कारणाने किंवा ज्या कारणभागाने, जसे की 'धारणोपाय' इत्यादी कारणभागाने, असा अर्थ आहे. वंदनेस पात्र असणारा तो 'वंदनीय' (वन्दनेय्यो). त्या वंदनीयामध्ये. 'पुथुज्जनकल्याणको' (कल्याणकारी पृथग्जन) - येथे तीन प्रकारचे कल्याणक आहेत: विनयकल्याणक, सुत्तन्तकल्याणक आणि अभिधम्मकल्याणक. त्यापैकी, विनयात प्रज्ञप्त (सांगितलेल्या) कल्याणकारी प्रतिपत्तीने (आचरणाने) युक्त असलेला भिक्खू 'विनयकल्याणक' होय. तो येथे 'भिक्खू प्रातिमोक्ष-संवर-संवृत होऊन राहतो, आचार आणि गोचर यांनी संपन्न असतो, सूक्ष्म दोषांमध्येही भय पाहणारा असतो आणि शिक्षापदांचे ग्रहण करून त्यात स्वतःला प्रशिक्षित करतो' या अर्थाने जाणावा. तेथे विनयात प्रज्ञप्त असलेली कल्याणकारी प्रतिपत्तीने दोन प्रकारची आहे: आदिब्रह्मचर्यक शील (आदिब्रह्मचरियकसीलं) आणि अभिसमाचारिक शील (अभिसमाचारिकसीलं). त्यापैकी, उभय विभंगात (उभतोविभङ्ग) समाविष्ट असलेले शील म्हणजे 'आदिब्रह्मचर्यक शील' होय. आणि खंधकात (खण्डक) समाविष्ट असलेले शील म्हणजे 'अभिसमाचारिक शील' होय. สุตฺตนฺเตสุ วุตฺตาย กลฺยาณปฺปฏิปตฺติยา สมนฺนาคโต คหฏฺโฐ วา ปพฺพชิโต วา สุตฺตนฺต กลฺยาณโก นาม. โส จตูหิ ภิกฺขเว ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต อริยสาวโก สพฺพํ ทุคฺคติภยํ สมติกฺกนฺโต โหติ. กตเมหิ จตูหิ. อิธ ภิกฺขเว อริยสาวโก พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ อิติ ปิโส ภควา…เป… สตฺถาเทวมนุสฺสานํ, พุทฺโธ, ภควาติ. ธมฺเม อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโม…เป… ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺโพ วิญฺญูหีติ. สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต โหติ สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสาติ. อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคโต โหตีติ เอตฺถ เวทิตพฺโพ. ตตฺถ พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาโท นาม อรหํ, สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ติอาทิกานํ คุณปทานํ อตฺถ ชานนญฺญาเณน ยุตฺโต ปสาโท. อริเยหิกามียนฺติ อิจฺฉียนฺตีติ อริยกนฺตานิ. สุปริสุทฺธสฺส อาชีวฏฺฐมกสีลสฺเสตํ นามํ. จตฺตาริมานิ ภิกฺขเว โสตาปตฺติยงฺคานิ. กตมานิ จตฺตาริ. สปฺปุริสสํเสโว, สทฺธมฺมสฺสวนํ, โยนิโส มนสิกาโร, ธมฺมานุ ธมฺมปฺปฏิปตฺตีติอาทีนิ พหูนิ สุตฺตนฺตานิ อิธ วตฺตพฺพานิ. सूत्रांमध्ये (सुत्तन्तांमध्ये) सांगितलेल्या कल्याणकारी प्रतिपदेने (आचरणाने) युक्त असलेला गृहस्थ किंवा प्रवजित हा "सुत्तन्त कल्याणक" म्हणून ओळखला जातो. भिक्खूंनो, तो चार धर्मांनी युक्त असलेला आर्यश्रावक सर्व दुग्गतिभयाचे पूर्णपणे उल्लंघन करतो. कोणत्या चार? इथे, भिक्खूंनो, आर्यश्रावक बुद्धांच्या ठायी अचल श्रद्धेने युक्त असतो—"असे ते भगवान... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान आहेत." धम्माच्या ठायी अचल श्रद्धेने युक्त असतो—"भगवंतांनी धम्म सुविख्यात सांगितला आहे... पे... विद्वानांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा आहे." संघाच्या ठायी अचल श्रद्धेने युक्त असतो—"भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... पे... जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे." आणि आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त असतो, असे येथे जाणावे. त्यात "बुद्धांच्या ठायी अचल श्रद्धा" म्हणजे "अरहंत, सम्मासम्बुद्ध" इत्यादी गुणपदांच्या अर्थाला जाणणाऱ्या ज्ञानाने युक्त असलेली श्रद्धा होय. आर्यांकडून जे इच्छिले जातात, ते "आर्यप्रिय" (अरियाकांत) होत. हे अतिशय शुद्ध अशा "आजीव अष्टमक शीलाचे" नाव आहे. भिक्खूंनो, ही चार सोतापत्तीची अंगे आहेत. कोणती चार? सत्पुरुष-संगत, सद्धम्म-श्रवण, योग्य विचार (योनिशो मनसिकार), आणि धम्मानुधम्म-प्रतिपत्ती—इत्यादी अनेक सूत्रे येथे सांगावीत. อภิธมฺเม วา สุตฺตนฺเตสุ วา วุตฺตาย กลฺยาณปฺปฏิปตฺติยา สมนฺนาคโตคหฏฺโฐ วา ปพฺพชิโต วา อภิธมฺมกลฺยาณโก นาม. โส อิธ สุตวา อริยสาวโก อริยานํ ทสฺสาวี อริย ธมฺมสฺสโกวิโท [Pg.23] อริยธมฺเมสุ วินีโต. โส รูปํ อตฺตโต น สมนุปสฺสตีติ เอตฺถ เวทิตพฺโพ. ตตฺถ, ‘‘สุตวา’’ติ เอตฺถ ขนฺธา, ยตน, ธาตุ, ปฏิจฺจสมุปฺปาท, สติปฏฺฐานา, ทีสุ อุคฺคห ปริปุจฺฉา วินิจฺฉยญฺญาณ สมนฺนาคโต คหฏฺโฐ วา ปพฺพชิโต วา สุต วา นามาติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺโต. โส เอว ปุถุชฺชน กลฺยาณโกติ จ วุจฺจติ. अभिधम्मात किंवा सुत्तन्तांमध्ये सांगितलेल्या कल्याणकारी प्रतिपदेने युक्त असलेला गृहस्थ किंवा प्रवजित हा "अभिधम्म-कल्याणक" म्हणून ओळखला जातो. तो येथे "श्रुतवान आर्यश्रावक, आर्यांचे दर्शन घेणारा, आर्यधम्मात कुशल, आर्यधम्मात विनीत" असा जाणावा. तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाही, असे येथे जाणावे. त्यात, "श्रुतवान" म्हणजे स्कंध, आयतन, धातू, प्रतीत्यसमुत्पाद, स्मृतिप्रस्थान इत्यादींविषयी ग्रहण, परिपृच्छा आणि निश्चय-ज्ञानाने युक्त असलेला गृहस्थ किंवा प्रवजित हा "श्रुतवान" होय, असे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे. त्यालाच "कल्याणक पृथग्जन" असेही म्हणतात. ทุเว ปุถุชฺชนา วุตฺตา, พุทฺเธนาทิจฺจพนฺธุนา; อนฺโธ ปุถุชฺชโน เอโก, กลฺยาเณโก ปุถุชฺชโน. ติ आदित्यबंधू बुद्धांनी दोन प्रकारचे पृथग्जन सांगितले आहेत; एक अंध पृथग्जन आणि दुसरा कल्याणक पृथग्जन. จ วุตฺตํ. องฺคุตฺตเร ปน จตุกฺกนิปาเต กตโม ปุคฺคโล อปฺปสฺสุโต สุเตน อุปปนฺโน โหติ. อิเธกจฺโจ ธมฺมํ สุณาติ เอกายปิ จาตุปฺปทิกาย คาถาย อตฺถ มญฺญาย ธมฺม มญฺญาย ธมฺมา นุ ธมฺมปฺปฏิปนฺโน โหติ. อยํ อปฺปสฺสุโตสุเตน อุปปนฺโนติ วุตฺตํ. สุตวาติ จ สุเตน อุปปนฺโนติ จ อตฺถโต เอกนฺติ. ปุถุชฺชน กลฺยาณโก สงฺเฆ เสกฺเขสุสงฺคหิโต. วุตฺตํเหตํ ปริวาเร เก สิกฺขนฺตีติ. ปุถุชฺชน กลฺยาณเกน สทฺธึ สตฺต อริยปุคฺคลา สิกฺขนฺติ. อรหา ขีณาสโว สิกฺขิตสิกฺโขติ. ทกฺขิณ วิภงฺคสุตฺต อฏฺฐกถายํ ปน. ติ สรณ สรณํ คโต อุปาสโกปิ โสตาปตฺติผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺเน สงฺคหิโตติ วุตฺตํ. ตตฺถ, โสตาปตฺติผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺโนนาม โสตาปตฺติ มคฺคฏฺโฐ อริยปุคฺคโล. ‘‘โสหิสงฺคหิโต’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เอตฺตาวตา ปฏิกฺขิตฺตํ โหตี’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สงฺเฆ อสงฺคหิโต’’ติ สงฺฆํสรณํ คจฺฉามีติ จ, สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆติ จ, เอวรูเปสุ ฐาเนสุ อาคเต สงฺฆ วจเน อสงฺคหิโต. ‘‘น หิตํ สรณํ คจฺฉนฺตสฺสสรณคมนํ สมฺปชฺชตี’’ติ อิทํ สงฺฆํสรณํ คจฺฉามีติ เอตฺถ สงฺฆ วจเนตสฺสปุคฺคลสฺส อสงฺคหิต ภาวสาธนตฺถํ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘ตํ ปฏิกฺขิตฺตํ โหตี’’ติ. สเจ ปน สพฺพํ ภควโต สาวกสงฺฆํ อนุทฺธิสฺสตเมว ปุคฺคลํ สงฺฆํสรณํ คจฺเฉยฺย อายสฺมนฺตํ สรณํ คจฺฉามีติ. สรณ คมนํ น สมฺปชฺชติเยว. อถ สพฺพํ ภควโต สาวกสงฺฆํ อุทฺทิสฺส ตสฺส สนฺติเก สรณํ คจฺเฉยฺย สงฺฆํ สรณํ คจฺฉามีติ. สมฺปชฺชติเยว[Pg.24]. อิทญฺจ ทหรกาเล สพฺพปฺปถมํ สรณคมนํ สนฺธาย วุตฺตํ. อิทญฺหิ สรณ คมนํ นาม สกึ คเหตฺวา รตนตฺตเย สทฺธํ อชหนฺตสฺส ยาวชีวํปิ น ภิชฺชติ. ปุนปฺปุนํ คหณ กิจฺจํ นตฺถิ. ปุนปฺปุนํ คณฺหนฺเตปิ โทโสนตฺถิ. ปุนปฺปุนํ ปุญฺญํ วฑฺฒติ. สพฺพปฺปถมํ คหณกาเล จ อญฺเญน ทินฺนตฺตา ลทฺธํ นโหติ. อตฺตโนวจี เภเทน ลทฺธํ โหติ. ตสฺมา อญฺญสฺส สนฺติเก อคฺคเหตฺวา สยเมว วจีเภทํ คณฺหนฺตสฺส คหฏฺฐสฺส สรณ คมนํ สมฺปชฺชติเยว. ตถา สพฺพานิ คหฏฺฐสีลานีติ. สามเณร สรณ คมนมฺปน ภิกฺขุนาทินฺนเมว ลพฺภติ. ตญฺจ โข อุภินฺนํปิฐานกรณ สมฺปตฺติยา สติ เอวาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘โว’’ติ ตุมฺหากํ. โยธมฺโม จ เทสิโต โยวินโยจปญฺญตฺโต. ‘‘มมจฺจเยนา’’ติ มมาติกฺกเมน. มยิ ปรินิพฺพุเตติ วุตฺตํ โหติ. สตฺถา ภวิสฺสตีติ ปาฐเสโส. ‘‘สํวณฺณิโต’’ติ สุฏฺฐุตรํวณฺณิโต โถมิโต. ‘‘กลฺยาณปฺปฏิปตฺติยํ ฐิโตปี’’ติ ตีสุกลฺยาณปฺปฏิปตฺตีสุ อญฺญตรปฺปฏิปตฺติยํ ฐิโตปิ. ‘‘อฏฺฐิโตปี’’ติ สพฺพปฺปฏิปตฺติพาหิโร ทุสฺสีโลปาปธมฺโมติ อธิปฺปาโย. วิเสสโต ปน วินยปฺปฏิปตฺติ เอว อิธ ปริยตฺตาติ ทฏฺฐพฺพา. ‘‘โส’’ติ โสทุสฺสีโล ปาปธมฺโม. อตฺตโนปิ สรณํ นโหติ. อวสฺสํ อปายคามีเยว โส โหตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘กุโต สรณํ ภวิสฺสตี’’ติ โยชนา. ‘‘อเนเกสุ สุตฺตสหสฺเสสู’’ติ วินเยปิ พหูนิ ครหสุตฺตปทานิ ทิสฺสนฺติ สุตฺตนฺเตสุปิ. วิเสสโต ปน อคฺคิกฺขนฺโธปมสุตฺตาทีสุ. असे म्हटले आहे. अंगुत्तर निकायाच्या चतुक निपातात म्हटले आहे की, कोणता मनुष्य अल्पश्रुत असूनही श्रुताने संपन्न असतो? इथे एखादा मनुष्य धम्म ऐकतो, आणि अगदी एका चार चरणांच्या गाथेचा अर्थ समजून, धम्म समजून, धम्मानुधम्म-प्रतिपन्न होतो. याला "अल्पश्रुत असूनही श्रुताने संपन्न" असे म्हटले आहे. "श्रुतवान" आणि "श्रुताने संपन्न" हे अर्थाने एकच आहेत. कल्याणक पृथग्जन हा शैक्ष संघाच्या अंतर्गत समाविष्ट केला जातो. कारण परिवारात विचारले आहे—"कोण शिकत आहेत?" कल्याणक पृथग्जनासह सात आर्यपुद्गल शिकत आहेत. अरहंत क्षीणासव हा "शिक्षित-शिक्ष" आहे. परंतु, दक्खिणविभंगसुत्त अट्ठकथेत म्हटले आहे की, त्रिशरणाला गेलेला उपासकसुद्धा सोतापत्तिफल-साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न असलेल्यांमध्ये समाविष्ट केला जातो. त्यात, "सोतापत्तिफल-साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न" म्हणजे सोतापत्ति-मार्गस्थ आर्यपुद्गल होय. "तो समाविष्ट आहे" असा संबंध आहे. "एवढ्याने नाकारले जाते" असा संबंध आहे. "संघात समाविष्ट नसलेला" म्हणजे "संघं सरणं गच्छामि" आणि "भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे" अशा ठिकाणी आलेल्या "संघ" या शब्दात तो समाविष्ट नाही. "त्या शरणागताचे शरणगमन सिद्ध होत नाही" हे "संघं सरणं गच्छामि" यातील "संघ" शब्दात त्या पुद्गलाचा असमावेश सिद्ध करण्यासाठी म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे—"ते नाकारले जाते". पण जर कोणी भगवंतांच्या संपूर्ण श्रावकसंघाला उद्देशून न करता, केवळ एखाद्या विशिष्ट व्यक्तीला उद्देशून "मी आयुष्यमानाला शरण जातो" असे म्हणून शरण गेला, तर त्याचे शरणगमन सिद्ध होत नाही. परंतु जर भगवंतांच्या संपूर्ण श्रावकसंघाला उद्देशून, एखाद्या व्यक्तीच्या समक्ष "मी संघाला शरण जातो" असे म्हणून शरण गेला, तर ते सिद्ध होतेच. आणि हे बालपणीच्या सर्वप्रथम शरणगमनाला अनुसरून म्हटले आहे. कारण हे शरणगमन एकदा ग्रहण केल्यावर, त्रिरत्नावरील श्रद्धा न सोडणाऱ्याचे आयुष्यभर कधीही भंग पावत नाही. ते पुन्हा पुन्हा ग्रहण करण्याची गरज नसते. पुन्हा पुन्हा ग्रहण केले तरी त्यात काही दोष नाही. त्यामुळे पुन्हा पुन्हा पुण्य वाढते. सर्वप्रथम ग्रहण करताना ते दुसऱ्याने दिल्यामुळे मिळत नाही, तर स्वतःच्या वाणीच्या उच्चाराने प्राप्त होते. म्हणून दुसऱ्याच्या समक्ष ग्रहण न करता, स्वतःच वाणीने उच्चार करून ग्रहण करणाऱ्या गृहस्थाचे शरणगमन सिद्ध होतेच. त्याचप्रमाणे गृहस्थांची सर्व शीलेही सिद्ध होतात. परंतु सामणेराचे शरणगमन भिक्खूने दिल्यावरच लाभते. आणि ते दोघांच्याही योग्य स्थानावर असण्याच्या समृद्धीवरच अवलंबून असते, असे जाणावे. "वो" म्हणजे तुमचे. जो धम्म देशिला आहे आणि जो विनय प्रज्ञप्त केला आहे. "ममच्चयेन" म्हणजे माझ्या पश्चात, माझ्या परिनिर्वाणानंतर, असे म्हटले आहे. "तो तुमचा शास्ता होईल" हा उर्वरित पाठ आहे. "संवण्णितो" म्हणजे चांगल्या प्रकारे वर्णित किंवा प्रशंसित. "कल्याणप्रतिपदेत स्थित असलेलाही" म्हणजे तीन कल्याणप्रतिपदांपैकी कोणत्याही एका प्रतिपदेत स्थित असलेला. "अस्थित असलेलाही" म्हणजे सर्व प्रतिपदांच्या बाहेरील, दुःशील आणि पापी स्वभावाचा, असा अभिप्राय आहे. विशेषतः येथे विनयप्रतिपदाच अभिप्रेत आहे, असे जाणावे. "तो" म्हणजे तो दुःशील पापी मनुष्य स्वतःसाठीही शरण नसतो. तो निश्चितच अपायगामी होतो, असा अभिप्राय आहे. "तो इतरांना कसा शरण होईल?" अशी योजना आहे. "अनेक सूत्रसहस्त्रांमध्ये" म्हणजे विनयात आणि सुत्तन्तांमध्येही अनेक निंदाव्यंजक सूत्रपदे दिसतात. विशेषतः अग्गिक्खन्धोपम सुत्त इत्यादींमध्ये. สทฺธมฺมวจนตฺเถ. กิเลเสสเมนฺติ วูปสเมนฺตีติ สนฺโตติ วจนตฺถํ สนฺธาย ‘‘สมิตกิเลสาน’’นฺติ วุตฺตํ. สนฺต สทฺโท ปน ปสตฺเถจ, ปูชิเตจ, สปฺปุริเสจ, ปณฺฑิเตจ, ทิสฺสตีติ อิมํ อภิธานตฺถํ สนฺธาย ‘‘ปสตฺถาน’’นฺติอาทิวุตฺตํ. ‘‘สจฺโจวา ธมฺโม สทฺธมฺโม’’ติ โยชนา. เอเตน สภาวโต อตฺถิสํวิชฺชตีติ สนฺโตติ ทสฺเสติ. ‘‘โส’’ติ อญฺญติตฺถิย ธมฺโม. ‘‘ธาเรนฺตสฺสา’’ติ สวนุคฺคหธารณปฺปฏิปชฺชนาทิวเสน ธาเรนฺตสฺส. อหิโตเยว สมฺปชฺชติ, เยภุยฺเยน ทุคฺคติ วิปากตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อยํ ปนา’’ติ สตฺถุ สทฺธมฺโม ปน. ‘‘ตถา ธาเรนฺตสฺสา’’ติ [Pg.25] อยํ เม หิโตติ ธาเรนฺตสฺส หิโตเยวสมฺปชฺชติ, สุคติ นิพฺพาน สมฺปาปกตฺตาติ อธิปฺปาโย. सद्धम्म या शब्दाच्या अर्थाच्या संदर्भात: 'जे क्लेशांचे शमन करतात, उपशमन करतात ते संत (शांत)' या शाब्दिक अर्थाचा संदर्भ घेऊन "शमितक्लेश" (ज्यांचे क्लेश शांत झाले आहेत अशांचे) असे म्हटले आहे. 'संत' हा शब्द प्रशंसनीय, पूजनीय, सत्पुरुष आणि पंडित यांच्यासाठी देखील वापरला जातो, हा अभिधेयार्थ लक्षात घेऊन "प्रशंसनीयांचे" इत्यादी म्हटले आहे. "सत्य असलेला धम्म तो सद्धम्म" अशी वाक्यरचना आहे. याद्वारे, जो स्वभावाने अस्तित्वात आहे आणि जाणला जातो तो 'संत' (सत्य/विद्यमान) आहे, असे दर्शविले आहे. "तो" म्हणजे अन्यतीर्थियांचा (इतर पंथांचा) धम्म. "धारण करणाऱ्याला" म्हणजे श्रवण करणे, ग्रहण करणे, धारण करणे आणि आचरण करणे इत्यादींद्वारे धारण करणाऱ्याला. तो (अन्यतीर्थियांचा धम्म) अहितकारकच ठरतो, कारण बहुतांश करून त्याचे फळ दुर्गती देणारे असते, असा अभिप्राय आहे. "परंतु हा" म्हणजे शास्त्यांचा (बुद्धांचा) सद्धम्म होय. "तशा प्रकारे धारण करणाऱ्याला" म्हणजे 'हा माझ्या हिताचा आहे' असे समजून धारण करणाऱ्याला तो हितकारकच ठरतो, कारण तो सुगती आणि निब्बाण (निर्वाण) प्राप्त करून देणारा आहे, असा अभिप्राय आहे. ‘‘สมานทิฏฺฐิสีลาน’’นฺติ สมานทิฏฺฐิกานํ สมานสีลานญฺจ. เอเตน สมานทิฏฺฐิสีลา ชนา คณียนฺติ เอตฺถาติ คโณ. สํหนียนฺติ เอกโตกรียนฺติ เอตฺถาติ สงฺโฆติ อิมมตฺถํ ทีเปติ. สห เอกโต ธมฺมํ จรนฺตีติ สหธมฺมิกา. เอกสฺส สตฺถุโน ธมฺม วินเย ปพฺพชิตา. เตสํ สหธมฺมิกานํ. ภควโต สาวกสงฺโฆ อุตฺตมคโณ นาม. เย เกจิ โลเก สงฺฆาวา คณาวา. ตถาคตสฺส สาวกสงฺโฆ เตสํ อคฺคมกฺขายตีติ หิ วุตฺตํ. โสเยว อิธ คณุตฺตโมติ วุจฺจติ วิเสสน ปร นิปาต วเสนาติ อธิปฺปาโย. อุตฺตมสทฺทสฺส คุณนามตฺตา ‘‘คุณมฺหิเยว ปวตฺตตี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘เตนา’’ติ อุตฺตม สทฺเทน. ‘‘คโณติ สงฺโฆเยว วุจฺจติ’’ สงฺฆสทฺทสฺสปิ สมูหฏฺเฐ นิรุฬฺหตฺตา, ‘‘โส วินยกมฺเมสุ ปสิทฺโธ’’ติ ปญฺจสงฺฆา จตุวคฺคสงฺโฆ, ปญฺจวคฺคสงฺโฆ, ทสวคฺคสงฺโฆ, วีสติวคฺคสงฺโฆ, อติเรกวีสติวคฺคสงฺโฆ, จตุวคฺคกรณียํ กมฺมํ, ปญฺจวคฺคกรณียํ กมฺมนฺติอาทินา ปสิทฺโธ ปากโฏ. ทกฺขิณา วุจฺจติ กมฺมญฺจ กมฺมผลญฺจ สทฺทหิตฺวา อายตึ วิปากปฺผลปฺปฏิ ลาภตฺถาย ทินฺนํ ทานกมฺมํ ทกฺขนฺติ วฑฺฒนฺติ สตฺตา เอตายาติ กตฺวา. ตํทกฺขิณํ ปฏิคฺคณฺหิตุํ อรหตีติ ทกฺขิเณยฺโย. ‘‘อรหตี’’ติ จ อนุตฺตร ปุญฺญกฺเขตฺต วิเสสตฺตาทายเกน อิจฺฉิต ปตฺถิตสฺส อายตึ ผลสฺส สุฏฺฐุสมฺปาทนวเสน ทายกสฺส จ อวิราธนโต อสงฺขฺเยยฺยาปฺปเมยฺยวฑฺฒิ อาวหนโต จ ปฏิคฺคณฺหิตุํ อรหติ. เอวรูปํหิทานํ นาม อุฬารทานํ โหติ. ตํ เยสุทุสฺสีเลสุทิยฺยติ. เตสํ เขตฺต ทุฏฺฐตฺตา ทายเกน อิจฺฉิตปตฺถิตํ ผลํ น สมฺปาเทติ. นิปฺผลํ วา โหติ. อปฺปปฺผลํ วา. เอวํสติ, เต ทายกญฺจ วิราเธนฺติ นาม. ปุญฺญปฺผลานิ จ วินาเสนฺติ นาม. สยญฺจ ตํทานํ ปฏิคฺคหณโต วา ปริโภคโต วา สทฺธาเทยฺยํ วินิปาตนโต วา ทุคฺคติ ภาคิโน โหนฺติ. ตสฺมาเต เอวรูปํ ทานํ ปฏิคฺคณฺหิตุํ นารหนฺตีติ. ‘‘อุปสมฺปทากมฺมํ สมฺมุติ นามา’’ติ เอเกน ปริยาเยน สมฺมุติ กมฺมํ นาม. ตญฺหิ กามํเตร สสุสมฺมุติ กมฺเมสุนาคตํ. ญตฺติ จตุตฺถ กมฺมวาจา สงฺขาตาย [Pg.26] ปน สงฺฆสมฺมุติยา สิทฺธตฺตา เตน ปริยาเยน สมฺมุติ กมฺมนฺติ วุจฺจตีติ. ‘‘อุปสมฺปนฺนภูมึ ปตฺวา’’ติ อุปสมฺปนฺนภูมิ สงฺขาตํ อุปริฐานนฺตรํ ปตฺวา. ตถา หิ วุตฺตํ วินเย ภิกฺขุ วิภงฺเค. ญตฺติ จตุตฺเถน กมฺเมน อกุปฺเปน ฐานารเหนาติ. ตตฺถ, ‘‘ฐานารเหนา’’ติ อุปสมฺปนฺน ภูมิสงฺขาตํ ฐานนฺตรํ ปาเปตุํ อรเหนาติ อตฺโถ. ‘‘อุปสมฺปนฺนภูมี’’ติ จ อุปสมฺปนฺน สีลํ วุจฺจติ. ‘‘วินยกมฺเมสุ ปสิทฺโธ’’ติ. สุณาตุเมภนฺเต สงฺโฆ ติอาทีสุ ปากโฏ. อปิจ ‘‘สมฺมุติ สงฺโฆ’’ติ, เทวสงฺฆาสมาคตาติอาทีสุ วิย พหูนํ สมูหนฏฺเฐน โลกสมฺมุติยา สิทฺโธสงฺโฆ สมฺมุติ สงฺโฆติปิ ยุชฺชติ. ‘‘อริยปุคฺคลสมูโห’’ติ ปุถุชฺชนกลฺยาณโก ภิกฺขุ ปุพฺเพ วุตฺตนเยน โสตาปตฺติ มคฺคฏฺเฐ สงฺคหิโตติ, เตน สห อฏฺฐวิโธ อริย ปุคฺคลสมูโห. ‘‘สมฺมุติ สงฺเฆ อนฺโตคโธเยวา’’ติ เอเตน ทกฺขิเณยฺยสงฺโฆ นาม วิสุํ นวตฺตพฺโพ. ตสฺมิญฺจ นวตฺตพฺเพ สติ, สมฺมุติ สงฺโฆติปิ วตฺตพฺพ กิจฺจํ นตฺถิ. ภควโต สาวกสงฺโฆ ตฺเวว วตฺตพฺพํ โหตีติ ทสฺเสติ. สจฺจเมตํ. อิธ ปน สงฺฆวจเนน อาคตฏฺฐานสฺส ทุวิธตฺตา สงฺฆสฺส ทุวิธตา วุตฺตา. ตตฺถ สมฺมุติ สงฺฆสฺส อาคตฏฺฐานํ วินยกมฺเมสูติ วุตฺตเมว. อิทานิ อริยสงฺฆสฺส อาคตฏฺฐานํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตถาปี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ สรณ คมน…เป… อนุสฺสติฏฺฐาเนสุ อุปสมฺปนฺนภูโต ภิกฺขุสงฺโฆว คเหตพฺโพ. ทกฺขิณาวิสุทฺธิฏฺฐาเน ปน ปุคฺคลิกทาเนสุ จตูหิ โสตาปตฺติยงฺเคหิ สมนฺนาคโต อุปาสโกปิ สามเณโรปิ ยุชฺชติ. สงฺฆิก ทาเนสุ ปน ภิกฺขุสงฺโฆว. ‘‘ตถา ตถา สํวณฺเณตฺวา’’ติ อาหุเนยฺโย, ปาหุเนยฺโย, ทกฺขิเณยฺโย, อญฺชลีกรณียฺโย, อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา, ติอาทินาสุฏฺฐุ โถเมตฺวา. โส ทกฺขิเณยฺย สงฺโฆ. ‘‘ปุถุชฺชน สงฺโฆ’’ติ อิทํ อริย สงฺเฆน วินาเกวลํ ปุถุชฺชนสงฺฆํ สนฺธาย วุตฺตํ. เอตฺถ จ สงฺฆ วจเนน สงฺฆ ปริยาปนฺโน เอโกปิ ภิกฺขุ คเหตพฺโพ. โส สเจ ปุถุชฺชโน โหติ, อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ นโหติ. ยทิ อริย ปุคฺคโล โหติ, อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โหติ. "समानदृष्टी आणि समान शील असणाऱ्यांचे" म्हणजे ज्यांची दृष्टी समान आहे आणि ज्यांचे शील समान आहे अशांचे. याद्वारे, ज्यामध्ये समान दृष्टी आणि शील असणारे लोक मोजले (एकत्र केले) जातात तो 'गण' होय. ज्यामध्ये लोक एकत्र बांधले जातात किंवा एकत्र केले जातात तो 'संघ' होय, हा अर्थ स्पष्ट होतो. जे एकत्र मिळून धम्माचे आचरण करतात ते 'सहधम्मिक' (सधर्मी) होत. एकाच शास्त्यांच्या धम्म-विनयामध्ये प्रवज्जित झालेले, त्या सहधम्मिकांचे. भगवंतांचा श्रावकसंघ हा 'उत्तम गण' होय. "जगात जे काही संघ किंवा गण आहेत, त्यांमध्ये तथागतांचा श्रावकसंघ हा सर्वश्रेष्ठ (अग्र) म्हटला जातो" असे सांगितले आहे. तोच येथे विशेषणाच्या परनिपातामुळे 'गणोत्तम' (उत्तम गण) असे म्हटले आहे, असा अभिप्राय आहे. 'उत्तम' हा शब्द गुणवाचक नाम असल्यामुळे "तो गुणाच्या बाबतीतच प्रवृत्त होतो" असे म्हटले आहे. "त्याद्वारे" म्हणजे 'उत्तम' या शब्दाद्वारे. "गण म्हणजे संघच म्हटला जातो", कारण 'संघ' हा शब्द देखील समूह या अर्थी रूढ आहे. "तो विनयकर्मांमध्ये प्रसिद्ध आहे" जसे की पाच प्रकारचे संघ: चतुर्वर्ग संघ (चार भिक्खूंचा संघ), पंचवर्ग संघ, दशवर्ग संघ, विंशतिवर्ग संघ (वीस भिक्खूंचा संघ), अतिरेकविंशतिवर्ग संघ; आणि चतुर्वर्गकरणीय कर्म, पंचवर्गकरणीय कर्म इत्यादींद्वारे तो प्रसिद्ध व स्पष्ट आहे. 'दक्षिणा' म्हणजे कर्म आणि कर्माच्या फळावर श्रद्धा ठेवून भविष्यात विपाक (फळ) मिळवण्यासाठी दिलेले दानकर्म होय; ज्याच्याद्वारे प्राणी आपले पुण्य वाढवतात किंवा वृद्धिंगत करतात. ती दक्षिणा स्वीकारण्यास जो पात्र असतो, तो 'दक्षिणेय्य' (दक्षिणापात्र) होय. "पात्र आहे" म्हणजे अनुत्तर पुण्यक्षेत्राच्या वैशिष्ट्यामुळे, दायकाने (दात्याने) इच्छिलेल्या व प्रार्थना केलेल्या भविष्यातील फळाची उत्तम प्रकारे प्राप्ती करून देण्याद्वारे, दायकाचा अपेक्षाभंग न करण्याद्वारे आणि असंख्य व अपार वृद्धी घडवून आणण्याद्वारे तो ती दक्षिणा स्वीकारण्यास पात्र ठरतो. कारण अशा प्रकारचे दान हे 'उदार दान' (महान दान) असते. ते दान जेव्हा दुःशीलांना (शील नसलेल्यांना) दिले जाते, तेव्हा त्यांचे क्षेत्र दुष्ट (वाईट) असल्यामुळे ते दायकाने इच्छिलेले व प्रार्थना केलेले फळ मिळवून देत नाही, किंवा ते निष्फळ ठरते अथवा अल्पफळ देणारे ठरते. असे असताना, ते दुःशील दायकाचा एक प्रकारे अपेक्षाभंग करतात आणि पुण्यफळांचा नाश करतात. तसेच स्वतः देखील त्या दानाचा स्वीकार केल्यामुळे किंवा उपभोग घेतल्यामुळे, श्रद्धेने दिलेल्या दानाचा अपव्यय केल्यामुळे दुर्गतीचे भागीदार होतात. म्हणून ते अशा प्रकारचे दान स्वीकारण्यास पात्र नसतात. "उपसंपदा कर्म हे संमती कर्म होय" म्हणजे एका पर्यायाने त्याला संमती कर्म म्हटले जाते. कारण ते जरी प्रत्यक्षपणे 'तेरा संमती कर्मां'मध्ये आलेले नसले, तरी ज्ञप्ति-चतुर्थ कम्मवाचेद्वारे होणाऱ्या संघ-संमतीने सिद्ध होत असल्यामुळे, त्या पर्यायाने त्याला 'संमती कर्म' असे म्हटले जाते. "उपसंपदा भूमीला प्राप्त करून" म्हणजे उपसंपदा भूमी नावाच्या उच्च पदाला प्राप्त करून. कारण विनय पिटकातील भिक्खू विभंगामध्ये असे म्हटले आहे: "अकोपित (अबाधित) आणि स्थान-योग्य अशा ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्माद्वारे." तेथे, "स्थान-योग्य" म्हणजे उपसंपदा भूमी नावाच्या उच्च पदावर पोहोचवण्यास योग्य, असा अर्थ आहे. आणि "उपसंपदा भूमी" म्हणजे उपसंपन्न शील (भिक्खूचे शील) म्हटले जाते. "विनयकर्मांमध्ये प्रसिद्ध आहे" हे "भन्ते, संघाने माझे ऐकावे" इत्यादी वाक्यांमध्ये स्पष्ट आहे. शिवाय, "संमती संघ" म्हणजे 'देवसंघ एकत्र आले' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे अनेक लोकांच्या समूहाच्या अर्थाने लोकसंमतीने सिद्ध झालेल्या संघाला देखील 'संमती संघ' म्हणणे योग्य ठरते. "आर्यपुद्गल समूह" म्हणजे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीने सोतापत्ती-मार्गस्थ (स्रोतापन्न मार्गावर असलेला) भिक्खू म्हणून समाविष्ट केलेला कल्याणकारी पृथग्जन भिक्खू आणि त्याच्यासह आठ प्रकारचे आर्यपुद्गल (आर्य व्यक्ती) यांचा समूह होय. "तो संमती संघामध्येच अंतर्भूत आहे" याद्वारे 'दक्षिणेय्य संघ' (दक्षिणापात्र संघ) वेगळा सांगण्याची गरज नाही, असे दर्शविले आहे. आणि तो वेगळा सांगण्याची गरज नसल्यास, 'संमती संघ' असे देखील म्हणण्याचे काही प्रयोजन उरत नाही. केवळ "भगवंतांचा श्रावकसंघ" असेच म्हणणे योग्य आहे, असे दर्शविले आहे. हे सत्य आहे. परंतु येथे 'संघ' या शब्दाच्या प्रयोगाच्या स्थानांच्या द्विविधतेमुळे संघाचे दोन प्रकार सांगितले आहेत. त्यापैकी, संमती संघाचे येण्याचे स्थान 'विनयकर्मांमध्ये' आहे, हे आधीच सांगितले आहे. आता आर्यसंघाचे स्थान दर्शवताना "तरी देखील" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये शरणगमन...पे... आणि अनुस्मृतीच्या स्थानांमध्ये उपसंपन्न झालेला भिक्खू संघच ग्रहण करावा. परंतु दक्षिणाविशुद्धीच्या (दानाच्या शुद्धीच्या) स्थानामध्ये, वैयक्तिक दानांच्या बाबतीत, चार सोतापत्ती-अंगांनी युक्त असलेला उपासक किंवा सामणेर देखील योग्य ठरतो. परंतु सांघिक दानांच्या बाबतीत केवळ भिक्खू संघच ग्रहण करावा. "त्या त्या प्रकारे प्रशंसा करून" म्हणजे 'आहुनेय्य, पाहुनेय्य, दक्षिणेय्य, अंजलीकरणीय, जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र' इत्यादी शब्दांनी उत्तम प्रकारे स्तुती करून. तो दक्षिणेय्य संघ होय. "पृथग्जन संघ" हे आर्यसंघाशिवाय केवळ पृथग्जन (सामान्य) संघाचा संदर्भ घेऊन म्हटले आहे. आणि येथे 'संघ' या शब्दाने संघात समाविष्ट असलेला एक भिक्खू देखील ग्रहण करावा. तो जर पृथग्जन असेल, तर तो अनुत्तर पुण्यक्षेत्र ठरत नाही. जर तो आर्यपुद्गल असेल, तर तो अनुत्तर पुण्यक्षेत्र ठरतो। ทกฺขิณวิภงฺคสุตฺเต [Pg.27] สงฺฆิกทาเน ภวิสฺสนฺติ โข ปนานนฺท โคตฺรภุโน กาสาวกณฺฐา ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา. เตสํปิ สงฺฆํ อุทฺทิสฺส ทานํ ทสฺสนฺติ. ตทาปานนฺท สงฺฆคตํ ทกฺขิณํ อสงฺขฺเยยฺยํ อปฺปเมยฺยนฺติ วทามีติ วุตฺตตฺตา สงฺฆิกฏฺฐานํ ปตฺวา โกจิ ภิกฺขุ ทกฺขิเณยฺย สงฺเฆ อสงฺคหิโตติ นตฺถีติ ทฏฺฐพฺโพ. दक्षिणाविभंग सुत्तात संघिक दानाविषयी म्हटले आहे - 'हे आनंदा! भविष्यात केवळ कुळात जन्मलेले (गोत्रभू), गळ्यात काषाय वस्त्र धारण करणारे (कासावकंठ), दुःशील आणि पापी वृत्तीचे लोक असतील. लोक संघाला उद्देशून त्यांनाही दान देतील. हे आनंदा! त्या वेळीही संघात गेलेले दान (संघिक दान) हे असंख्येय आणि अप्रमेय असते, असे मी म्हणतो.' असे म्हटलेले असल्यामुळे, संघिक स्थानाला प्राप्त झाल्यावर, कोणताही भिक्खू दक्षिणेय्य (दानाला पात्र) संघात समाविष्ट नाही, असे मानू नये (अर्थात सर्व भिक्खू त्यात समाविष्ट आहेत असे समजावे). เขตฺตํ ทูเสนฺตีติ เขตฺตทุฏฺฐานิ. ติณานิ. เขตฺตทุฏฺฐา กิเลสา. วุตฺตญฺหิธมฺมปเท. शेताला दूषित करतात म्हणून ते 'शेत-दूषक' (खेत्तदुट्ठा) होत. तृण (गवत). क्लेश हे शेत-दूषक आहेत. धम्मपदात म्हटलेच आहे - ติณโทสานิ เขตฺตานิ, ราคโทสา อยํปชา; ตสฺมาหิ วีตราเคสุ, ทินฺนํ โหติ มหปฺผลํ. तण हे शेतांचे दोष आहेत, आणि राग (आसक्ती) हा या प्रजेचा दोष आहे; म्हणूनच वीतरागींना (आसक्तीरहितांना) दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते. ติณโทสานิ เขตฺตานิ, โทสโทสา อยํปชา; ตสฺมาหิ วีตโทเสสุ, ทินฺนํ โหติ มหปฺผลํ.ติณโทสานิ เขตฺตานิ, โมหโทสา อยํปชา; ตสฺมาหิ วีตโมเหสุ, ทินฺนํ โหติ มหปฺผลนฺติ. तण हे शेतांचे दोष आहेत, आणि द्वेष हा या प्रजेचा दोष आहे; म्हणूनच वीतद्वेषींना (द्वेषरहितांना) दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते. तण हे शेतांचे दोष आहेत, आणि मोह हा या प्रजेचा दोष आहे; म्हणूनच वीतमोहींना (मोहरहितांना) दिलेले दान महाफळ देणारे ठरते. อิธ ปน สาติสฺสยโต เขตฺตทุฏฺเฐ กิเลเส ทสฺเสตุํ ‘‘สกฺกายทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉานุสยาน’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘สพฺภาวา’’ติ สนฺตสฺส วิชฺชมานสฺสภาโว สพฺภาโวติวิคฺคโห. ‘‘อสฺสา’’ติ ปุถุชฺชน สงฺฆสฺส. ‘‘สทฺธมฺมปเท วุตฺตนเยนา’’ติ อปิจยทคฺเคนาติ วุตฺตนเยน. परंतु येथे, शेताला अत्यंत दूषित करणाऱ्या क्लेशांना दाखवण्यासाठी 'सक्कायदिट्ठि-विचिकिच्छा-अनुसयानं' (सत्कायदृष्टी, विचिकित्सा आणि अनुशय) असे म्हटले आहे. 'सब्भावा' म्हणजे विद्यमान असण्याचा भाव (अस्तित्व), असा विग्रह आहे. 'अस्सा' म्हणजे पृथग्जन संघाचा. 'सद्धम्मपदात सांगितलेल्या पद्धतीने' म्हणजे 'अपिचयदग्गेन' (संचय नष्ट करण्याच्या दृष्टीने) सांगितलेल्या पद्धतीने. สสทฺธมฺมคณุตฺตมปทตฺถานุทีปนี นิฏฺฐิตา. 'ससद्धम्मगणूत्तमपदत्थानुदीपनी' समाप्त झाली. ๘. ‘‘อภิวาทิยา’’ติ สุขีโหหิสปฺปุริสาติ เอวํ อภิวทาเปตฺวา. อภิวาทนญฺจ นาม วนฺทนาเมวาติ วุตฺตํ ‘‘วนฺทิตฺวา’’ติ. วนฺทนฺโตหิ วนฺทเนยฺเย วุทฺเธ ตถา วทาเปติ นาม. ตถา วทนญฺจ วนฺทเนยฺยานํวุทฺธานํ วตฺตํ. ‘‘ปจฺจุปฏฺฐาเปตฺวา’’ติ ปฏิมุขํ อุปฏฺฐาเปตฺวา. ‘‘ติวิธา’’ติ ทฺวาร เภเทน ติวิธา. ‘‘วนฺทเนยฺยาน’’นฺติ พุทฺธาทีนํ. ‘‘นิปชฺชนฺโต’’ติ นิปตนฺโต. ‘‘อวนฺทิเยสู’’ติ ภิกฺขูหิ อวนฺทิตพฺเพ สุนวกตราทีสุ. ‘‘คุณปทานี’’ติ คุณทีปกานิ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธติอาทิปทานิ. เอตฺถจกาเยนวนฺทตีติอาทิ อุปจาร วจนํ โหติ. ยถา จกฺขุนา รูปํ ปสฺสตีติ. ตถาหิ วุตฺตํ อฏฺฐกถาสุ [Pg.28] จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวาติ กรณวเสน จกฺขูติ ลทฺธโวหาเรน รูปทสฺสน สมตฺเถน จกฺขุ วิญฺญาเณน รูปํ ทิสฺวา. โปราณา ปนาหุ จกฺขุ รูปํ น ปสฺสติ, อจิตฺตตฺตา. จิตฺตํ น ปสฺสติ, อจกฺขุตฺตา. ทฺวารารมฺมณ สงฺฆฏฺฏเน ปน สติ จกฺขุ ปสาทวตฺถุ เกนจิตฺเตน ปสฺสติ. อีทิสี ปเนสา กถา ธนุนา วิชฺฌตีติอาทีสุ วิย สสมฺภาร กถานาม โหติ. ตสฺมา จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวาติ จกฺขุ วิญฺญาเณน รูปํ ทิสฺวาติ อยเมเวตฺถ อตฺโถติ. เอตฺถหิ ‘‘กาเยนา’’ติ กาย วิญฺญตฺติสงฺขาตํ ทฺวาร รูปํ กรณํ โหติ. ตสฺมา จกฺขุนาติ วจเน อุปจาร วจเน สติ กาเยนาติ วจนํปิ อุปจาร วจนนฺติ วิญฺญายติ. ตถา จกฺขุนาติ ปเท จกฺขุวิญฺญาเณนาติ อตฺเถ สติ กาเยนาติ ปเทปิ กายกมฺเมนาติ อตฺโถ วิญฺญายติ. วาจาย วนฺทติ, มนสาวนฺทตี,ติ ปเทสุปิ เอสนโย. เอวญฺจ สติ, กาย กมฺเมนวนฺทามิ, วจีกมฺเมน วนฺทามิ, มโนกมฺเมน วนฺทามิ, ตีหิ กมฺเมหิ วนฺทามีติ อิทเมว มุขฺยวจนนฺติ สิทฺธํ โหติ. สพฺพมิทํ อินฺทฺริย สํวรสีลฏฺฐาเน อฏฺฐกถาสุ อาคตตฺตา วุตฺตํ. จกฺขุนาติ อิทํ ปน มุขฺย กรณ วจนเมว สมฺภวติ. กสฺมา, จกฺขุสฺส ทสฺสนสงฺขาตสฺส จกฺขุวิญฺญาณสฺส วตฺถุ ปุเรชาตินฺทฺริยปจฺจยวิเสสตฺตา. โสเตน สทฺทํสุตฺวาติอาทีสุปิ เอสนโย. ८. 'अभिवन्दिया' (अभिवादन करून) म्हणजे 'हे सत्पुरुषा, सुखी हो!' असे वदवून घेऊन. अभिवादन म्हणजेच वंदना होय, म्हणून 'वंदित्वा' (वंदन करून) असे म्हटले आहे. वंदन करणारा मनुष्य वंदनीय वृद्धांकडून तसे वदवून घेतो. आणि तसे बोलणे हे वंदनीय वृद्धांचे कर्तव्य (वृत्त) आहे. 'पच्चुपट्ठापेत्वा' म्हणजे समोर उपस्थित करून (प्रतिमुख उपस्थित करून). 'तिविधा' म्हणजे द्वारांच्या भेदाने तीन प्रकारची. 'वन्दनेय्यानं' म्हणजे बुद्ध इत्यादी वंदनीयांचे. 'निपज्जन्तो' म्हणजे जमिनीवर पडत (साष्टांग दंडवत घालत). 'अवन्दियेसु' म्हणजे भिक्खूंनी वंदन न करावयाच्या व्यक्तींमध्ये, जसे की नवदीक्षित इत्यादींमध्ये. 'गुणपदानि' म्हणजे गुणांचे प्रकटीकरण करणारी पदे, जसे की 'अरहं सम्मासम्बुद्धो' इत्यादी पदे. येथे 'कायेन वन्दति' (कायाने वंदन करतो) इत्यादी उपचार वचन (लाक्षणिक विधान) आहे. जसे 'डोळ्याने रूप पाहतो' (चक्खुना रूपं पस्सति). तसे अठ्ठकथांमध्ये म्हटले आहे - 'डोळ्याने रूप पाहून' (चक्खुना रूपं दिस्वा) म्हणजे करण (साधन) भावाने 'डोळा' असा व्यवहार करून, रूप पाहण्यास समर्थ असलेल्या चक्षु-विज्ञानाने (चक्खु-विञ्ञाण) रूप पाहून. परंतु प्राचीन आचार्य म्हणतात - 'डोळा रूप पाहत नाही, कारण तो अचित्तक (चेतनाहीन) आहे. चित्त पाहत नाही, कारण ते चक्षुहीन आहे. परंतु जेव्हा द्वार आणि आलंबन (विषय) यांचा संयोग होतो, तेव्हा चक्षु-प्रसाद रूपी वस्तू कोणत्यातरी चित्ताच्या साहाय्याने पाहते.' असे बोलणे हे 'धनुष्याने विद्ध करतो' (धनुना विज्झति) इत्यादी विधानांप्रमाणे 'ससंभार कथा' (घटकांच्या साहाय्याने केलेले वर्णन) म्हटले जाते. म्हणूनच, 'डोळ्याने रूप पाहून' याचा अर्थ 'चक्षु-विज्ञानाने रूप पाहून' असाच येथे घ्यावा. कारण येथे 'कायेन' (कायाने) म्हणजे काय-विज्ञप्ती (कायरूपी हालचाल) नावाचे द्वाररूप हे साधन (करण) आहे. म्हणूनच, 'डोळ्याने' हा शब्द जसा उपचार (लाक्षणिक) शब्द आहे, तसाच 'कायाने' हा शब्दही उपचार शब्द आहे असे समजले पाहिजे. तसेच 'डोळ्याने' या पदाचा अर्थ 'चक्षु-विज्ञानाने' असा होत असताना, 'कायाने' या पदाचा अर्थही 'कायकर्माने' असा होतो. 'वाचेने वंदन करतो', 'मनाने वंदन करतो' या पदांमध्येही हाच नियम लागू होतो. आणि असे असताना, 'मी कायकर्माने वंदन करतो, मी वचीकर्माने वंदन करतो, मी मनःकर्माने वंदन करतो, मी तिन्ही कर्मांनी वंदन करतो' हेच मुख्य वचन आहे असे सिद्ध होते. हे सर्व इंद्रिय-संवर-शीलाच्या संदर्भात अठ्ठकथांमध्ये आल्यामुळे सांगितले आहे. परंतु 'डोळ्याने' हे मुख्य करण (साधन) वाचकच असणे शक्य आहे. कारण काय? तर दर्शन स्वरूप चक्षु-विज्ञानासाठी चक्षु (डोळा) हा वस्तू-पुरेजात-इंद्रिय-प्रत्यय-विशेष (भौतिक आधार आणि पूर्वजात इंद्रिय प्रत्यय) आहे. 'कानाने शब्द ऐकून' इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. กาเยนวนฺทติ, วาจายวนฺทตี,ติ เอตฺถ ตํกายวจีวิญฺญตฺติ รูป ทฺวยํ กิญฺจาปิ สหชาต เจตนา กมฺเมน ชาตํ โหติ. น ตํ เจตนากมฺมํ วิญฺญตฺติ ทฺวเยนชาตํ. เอวํ สนฺเตปิ ตํ รูป ทฺวยํ ตสฺสาเจตนาย กายวนฺทนากมฺม, วจีวนฺทนากมฺม สิทฺธิยา อุปนิสฺสย ปจฺจยวิเสโส โหติ. ยถาตํ มาติโต ชาโต ปุตฺโต วุทฺธิ ปตฺโต ตํ ตํ กมฺเมสุ มาตุยา พล วูปนิสฺสโย โหติ. เอวญฺจ กตฺวา ตํ รูปทฺวยํ อภิธมฺเม ทฺวารรูปนฺติ วุตฺตํ. ตสฺมา ‘กาเยน, วาจายา,ติ อิทํปิ มุขฺย กรณ วจนเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. กาเยนาติ ปน กายกมฺเมนาติ อตฺเถ สติ, ตสฺสกมฺมสฺส วนฺทนากิริยาย สห อเภโท อาปชฺชตีติ เจ. นาปชฺชติ. กสฺมา เจตนาหํ ภิกฺขเว กมฺมํ วทามิ, เจตยิตฺวา กมฺมํ กโรติ ‘กาเยน, วาจาย, มนสาติ อิมสฺมึ สุตฺเต ยถาหิ ‘‘เจตยิตฺวา’’ติ ปุริมเจตนาหิ เจต ยิตฺวา[Pg.29]. ‘‘กมฺมํ กโรตี’’ติ ปจฺฉิมํ สนฺนิฏฺฐาปน เจตนา กมฺมํ กโรตีติ อตฺโถ. ตถา อิธปิ ปุริมปจฺฉิมเจตนา สมฺภวโตติ. เอตฺถ หิ ‘‘กายกมฺเมนา’’ติ ปุริมเจตนา กมฺมํ คยฺหติ. ‘‘วนฺทตี’’ติ ปจฺฉิม สนฺนิฏฺฐาปนเจตนากมฺมนฺติ. 'कायाने वंदन करतो, वाचेने वंदन करतो' यामध्ये ती काय-विज्ञप्ती आणि वची-विज्ञप्ती ही दोन्ही रूपे जरी सहजात चेतना-कर्माने उत्पन्न झालेली असली, तरी ते चेतना-कर्म त्या दोन्ही विज्ञप्तींमुळे उत्पन्न झालेले नसते. असे असले तरी, ती दोन्ही रूपे त्या चेतनेच्या काय-वंदनकर्म आणि वची-वंदनकर्माच्या सिद्धीसाठी उपनिषय-प्रत्यय-विशेष (बलवान आलंबन किंवा साहाय्यक कारण) ठरतात. जसे की, आईपासून जन्मलेला मुलगा मोठा झाल्यावर विविध कामांमध्ये आईच्या शक्तीचा आधार (उपनिषय) घेतो. आणि असे असल्यामुळे त्या दोन्ही रूपांना अभिधम्मात 'द्वाररूप' असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'कायाने, वाचेने' हे देखील मुख्य करण (साधन) वाचकच मानले पाहिजे. परंतु जर अशी शंका घेतली की, 'कायाने' म्हणजे 'कायकर्माने' असा अर्थ घेतल्यास, त्या कर्माचा वंदनक्रियेशी अभेद (एकसारखेपणा) होईल का? तर नाही, होणार नाही. कारण काय? 'भिक्खूंनो, मी चेतनेलाच कर्म म्हणतो; चेतना करून (विचारपूर्वक) मनुष्य काया, वाचा आणि मनाने कर्म करतो' या सुत्तात ज्याप्रमाणे 'चेतयित्वा' (चेतना करून) म्हणजे पूर्व-चेतनांनी विचार करून, आणि 'कर्म करतो' म्हणजे नंतरची निश्चित करणारी चेतना कर्म करते, असा अर्थ होतो. त्याचप्रमाणे येथेही पूर्व आणि उत्तर चेतना संभवतात. कारण येथे 'कायकर्माने' याने पूर्व-चेतना रूपी कर्म घेतले जाते, आणि 'वंदन करतो' याने नंतरची निश्चित करणारी चेतना रूपी कर्म घेतले जाते. ๙. ‘‘รจยนฺโต’’ติ วิทหนฺโต. ‘‘รจยิสฺสตี’’ติ อปจฺจกฺเข อตีเต อนาคตวจนํ. ‘‘โปตฺถการุฬฺห’’นฺติ โปตฺถก ปตฺเตสุลิขนวเสน อารุฬฺหํ. ९. 'रचयन्तो' म्हणजे रचना करणारा (तयार करणारा). 'रचयिस्सति' हे परोक्ष भूतकाळात भविष्यकाळाचे वचन आहे. 'पोत्थकारूळ्हं' म्हणजे पुस्तकाच्या पानांवर लिहिण्याच्या रूपाने आरूढ केलेले (ग्रंथस्थ केलेले). ๑๐. อภิธมฺมตฺถปเท. ‘‘อภิธมฺเม’’ติ อภิธมฺมปฺปกรเณ. ‘‘เอตฺถ, เอเตนา’’ติ วจเนหิ สงฺคหสทฺทสฺส เอกเสสวิธานํปิ วิญฺญายติ. ‘‘อญฺญํปาฬิทฺวยํ วุจฺจติ’’. กสฺมาตํ ปาฬิทฺวยํ อภิธมฺโม นามาติ วุตฺตํ ‘‘ตญฺจา’’ติอาทิ. ‘‘ยถาปวตฺเต’’ติ อตฺตโน ปจฺจยานุรูปํ ปวตฺเต. ‘‘ปรมตฺถธมฺเม เอวา’’ติ ทฺเว เม ภิกฺขเว ปุคฺคลา, ตโยเมภิกฺขเว ปุคฺคลาติอาทินา ปญฺญตฺติโวหาเรน ปวตฺตาปิ เทสนา ปรมตฺถ ธมฺเมหิ วินา นปวตฺตติ. ปรมตฺถ ธมฺมานํ นานตฺตวเสเนว ปุคฺคลานํ นานตฺตสมฺภวโต. ตสฺมา ปรมตฺถธมฺเม เอว ทีเปติ. น อาณาวิธานํ ทีเปติ. ‘‘ทฺวีสุธมฺเมสู’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมวจนํ. ‘‘โยอิตรโต’’ติ นิทฺธารณียํ. ‘‘โย’’ติ โย ธมฺโม. ‘‘อิตรโต’’ติ อิตร ธมฺมโต สุตฺตนฺต ธมฺมโต. ‘‘เอวญฺจ กตฺวา’’ติ อิมินาการเณนาติ อตฺโถ. อฏฺฐกถาสุ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. เทเสตพฺพปฺปการานํ อนวเสสวิภตฺติวเสน อติเรกตา, สุทฺธ ธมฺมาธิฏฺฐาน เทสนา ปวตฺติวเสน วิเสสตา โยเชตพฺพา. ‘‘ยโต’’ติ ยสฺมา อนวเสสวิภตฺติโต, อติวิตฺถารเทสนาภาวโตติ วุตฺตํ โหติ. กสฺมา เทเวสุ เอว เทเสนฺตีติ อาห ‘‘น หิ มนุสฺสา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘น หิ มนุสฺสา ปฏิคฺคเหตุํ สกฺโกนฺตี’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปวตฺตนโยคฺย’’นฺติ ปวตฺตนตฺถาย ปโหนฺตํ. ‘‘กถามคฺค’’นฺติ เทสนากถาปพนฺธํ. ‘‘เอกมาติกานุ พนฺธา’’ติ กุสลา ธมฺมา อกุสลา ธมฺมาติอาทิกํ เอกํ อภิธมฺม มาติกํ อนุคตา. ‘‘ตสฺสา’’ติ อภิธมฺมสฺส. อติเรก วิเสสตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ติสฺสํ อฏฺฐสาลินิยํ. อาทิมฺหิเยวตตฺถ เกนฏฺเฐน อภิธมฺโม, ธมฺมาติเรก ธมฺมวิเสสฏฺเฐ นา-ติ [Pg.30] วตฺวา ตทตฺถํ วิตฺถาเรนฺโต สุตฺตญฺหิ ปตฺวา ปญฺจกฺขนฺธา เอกเทเสเนว วิภตฺตา, นนิปฺปเทเสน. อภิธมฺมํ ปตฺวา ปน นิปฺปเทสโตว วิภตฺตา-ติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘ธมฺมนามิกาน’’นฺติอาทึ. ‘‘ธมฺโม ปนา’’ติ ปาฬิทฺวยมาห.‘‘เอวํ สนฺเตปี’’ติ อฏฺฐสาลินิยํ เอวํ วิจาริเตปิสติ. ‘‘สพฺพเชฏฺฐโก’’ติ ติณฺณํ ปิฏกานํ มชฺเฌสพฺพเชฏฺฐโก. กสฺมา สพฺพเชฏฺฐโก สิยาติ อาห ‘‘วินยํ วิวณฺเณนฺตสฺสหี’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘วิวณฺเณนฺตสฺสา’’ติ ครหนฺตสฺส. จรติ ปวตฺตตีติ จกฺกํ. โลกสฺมึ เกนจิ สมเณน วา พฺราหฺมเณน วา เทเวน วา มาเรน วา พฺรหฺมุนา วา ปฏินิวตฺติตุํ อสกฺกุเณยฺยํ อาณาวิธานํ อาณาจกฺกํ นาม. ตถา อสกฺกุเณยฺยํ เทสนา วิธานํ ธมฺมจกฺกํ นาม. ตตฺถ, โย ปน ภิกฺขุ เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวติ, ปาราชิโก โหติ อสํวาโส-ติอาทินา นเยน ปวตฺตํ อาณาวิธานํ อาณาจกฺกํ นาม. จตฺตาริมานิ ภิกฺขเว อริยสจฺจานี-ติอาทิกํ เทสนาวิธานํ ธมฺมจกฺกํ นาม. ตทุภยํปิ โกจิ ภินฺทิตุํ ปาราชิกํ วา ภิกฺขุํ อปาราชิกํ กาตุํ จตุสฺสจฺจํ วา ธมฺมํ อสจฺจํ กาตุํ นสกฺโกติ. อถ โข กโรนฺโตเยว เทวทตฺโตวิย อาปายิโก โหติ. ปาราชิโกจ ภิกฺขุ อตฺตานํ สุทฺธํ อกโรนฺโต อปายคามีเยว โหติ. เอวํ สพฺเพสุ วินย สิกฺขาปเทสุ. เอวํ เกนจิ ปฏินิวตฺติตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา ตทุภยํปิ อปฺปฏิวตฺติยํ จกฺกํ นาม โหติ. ‘‘วินโย นาม สาสนสฺส มูล’’นฺติ วินเย ฐิเต ภิกฺขุสงฺโฆ ปญฺญายติ. ภิกฺขุ สงฺเฆ ปญฺญายนฺเต ติวิโธปิสทฺธมฺโมปญฺญายติ, ติวิธํปิ สตฺถุสาสนํ ติฏฺฐติ. เอวํ วินโย ติวิธสฺสสาสนสฺส มูลํ โหตีติ. กถญฺจปริยตฺติสทฺธมฺเม ปญฺญายนฺเต ติวิธํปิ สาสนํ ติฏฺฐตีติ. วุจฺจเต. ตตฺถ สาสนํ ติฏฺฐตีติ กิตฺตกํกาลํ ติฏฺฐตีติ. ปญฺจวสฺสสหสฺสานิ ติฏฺฐตีติ โปราณฏฺฐกถาสุกถยึสุ. มิจฺฉาวาทิโนปนวทนฺติ วินเย จูฬวคฺเคภิกฺขุนิกฺขนฺธเก สเจ อานนฺท มมสาสเนมาตุคาโม ปพฺพชฺชํ นลเภยฺย. วสฺสสหสฺสํ สทฺธมฺโม ติฏฺเฐยฺย. อิทานิ มาตุคามสฺส ปพฺพชฺชา อนุญฺญาตา โคตมิยา ปุนปฺปุนํ อายาจนํ อุปาทาย. ปญฺเจวทานิ อานนฺท วสฺสสตานิ สทฺธมฺโมฐสฺสตีติ วุตฺตํ. ตสฺมา พุทฺธสาสนํ [Pg.31] ปญฺจวสฺสสตานิ เอว ติฏฺฐติ. ตโตปรํ เอกทิวสํปิ น ติฏฺฐติ. อิทานิ สาสนปฺปฏิ รูปกมตฺตํ โหตีติ. ตํ เตสํ มิจฺฉา วจนมตฺตํ. ‘‘ปญฺเจววสฺสสตานี’’ติ อิทํ ปน สนฺนิฏฺฐาน วจนํ นโหติ. มาตุคามานํ อาทีนว ทีปนมตฺตวจนํ. โส จ อาทีนโว อฏฺฐครุธมฺเม สณฺฐเปตฺวา สตฺถารา เอว ปฏิพาหิโต. ปุน ‘‘วสฺสสหสฺส’’นฺติ อิทเมวสนฺนิฏฺฐาน วจนํ ชาตนฺติ. เอตฺถปิเกจิวทนฺติ วสฺสสหสฺสเมว สาสนํ ติฏฺฐติ, ตโตปรํ เอกทิวส มตฺตํปิ น ติฏฺฐติ, อนฺตรธายติ. ตทา สีมาโยปิ อสีมา โหนฺติ. ปจฺฉาตาสุ อุปสมฺปาทิตาปิ อนุปสมฺปนฺนา โหนฺติ. อิทานิ สาสนปฺปฏิ รูปกมตฺตํ โหตีติ. อิทํปิ เตสํ อตฺถญฺจการณญฺจ อทิสฺวา อชานิตฺวา วุตฺตตฺตา มิจฺฉา วจนมตฺตํ โหติ. อยํ ปเนตฺถ อตฺโถ. ‘‘วสฺสสหสฺสํ สทฺธมฺโม ติฏฺเฐยฺยา’’ติ วสฺสสหสฺสเมว สทฺธมฺโม อปริหายมาโน ติฏฺเฐยฺย. ตโตปรํ ปน น ติฏฺเฐยฺย, อนุกฺกเมน ปริหายมาโน คจฺเฉยฺยาติ. กถํ ปน อปริหายมาโน ติฏฺฐติ, กถญฺจ ปริหายมาโน คจฺฉตีติ. วุจฺจเต. ปญฺจสงฺฆา เวทิตพฺพา. เยสุ สงฺเฆ สุสทฺธมฺโม ติฏฺฐติ. กตเม ปญฺจ. ขีณาสวสงฺโฆ, อนาคามิสงฺโฆ, สกทาคามิสงฺโฆ, โสตาปนฺนสงฺโฆ, ปุถุชฺชนกลฺยาณกสงฺโฆ,ติ. ตตฺถ, วสฺสสหสฺสพฺภนฺตเร สพฺเพปญฺจสงฺฆา ปญฺญายนฺติ. เอวํ วสฺสสหสฺสํ สทฺธมฺโม อปริหายมาโน ติฏฺฐติ. ตโตปรํ ขีณาสวสงฺโฆ น ปญฺญายติ. เสสานิ จตฺตาริวสฺสสหสฺสานิ อนุกฺกเมน เสสานํ จตุนฺนํ สงฺฆานํ เขตฺตานิ ชาตานิ. เอวํ ตโตปรํ ปริหายมาโน คจฺฉตีติ อยเมตฺถ อตฺโถ. การณํ วุจฺจเต. ‘‘สทฺธมฺโม ติฏฺเฐยฺยา’’ติ เอตฺถ ติวิโธ สทฺธมฺโม ‘ปริยตฺติสทฺธมฺโม, ปฏิปตฺติสทฺธมฺโม, ปฏิเวธสทฺธมฺโม,ติ. โส เอว ติวิธํ สาสนนฺติ จ วุจฺจติ. ตตฺถ, ปริยตฺติ สทฺธมฺโม นาม สาฏฺฐกถานิตีณิปิฏกานิ. โสจ เอตรหิ ปริปุณฺโณ ติฏฺฐติ. กถํ ปริยตฺติ สาสนํ ปฏิรูปกมตฺตํ ภเวยฺย. ภิกฺขู จ ปริยตฺติกมฺมิกา อเนก สตสหสฺสมตฺตา ปญฺญายนฺติ. กถญฺจิทํ สาสนํ ตโตปรํ เอกทิวสํปิ น ติฏฺเฐยฺย. เต จ ภิกฺขู สีลปฺปฏิปตฺติยํ ฐิตา อเนก สตสหสฺสมตฺตา เอตรหิ สนฺธิสฺสนฺติ. กถญฺจ ปฏิปตฺติ สาสนํ ตโตปรํ [Pg.32] น ติฏฺเฐยฺย. ปริยตฺติยาจ ปฏิปตฺติยาจ ติฏฺฐมานายปฏิเวธสทฺธมฺโมปิ น ติฏฺฐตีติ น วตฺตพฺโพ. ยถาหิ-เอโก ธนเสฏฺฐิ นาม อตฺถิ. โส ปุตฺตธีตุ ปรมฺปรานํ อตฺถาย มหนฺตารตนนิธโย ภูมิยํ พหูสุฏฺฐาเนสุ นิทหิตฺวา ฐปิตา โหนฺติ. โปตฺถเกสุ จ เตสํ ปวตฺตึ ปริปุณฺณํ ลิขิตฺวา ฐเปติ. ตตฺถ นิมีสุ จ โปตฺถเกสุ จ อกฺขเรสุ จ ธรนฺเตสุ เตนิธโย นสฺสนฺติ อนฺตรธายนฺตีติ น วตฺตพฺพาเยว. เอวมิทํ สาสนํ ทฏฺฐพฺพํ. ตตฺถหิ นิธีนํนิธานภูมิสทิสํ เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ, ธนรตนสทิสานิ ธมฺมรตนานิ. ยถา จ เสฏฺฐิวํเสชาโต พลสมฺปนฺโน ปุริโส โปตฺถกํ ปสฺสิตฺวา สุฏฺฐุ ขณนฺโต ตานิรตนานิ ลภิสฺสติเยว. เอวมิธปิ พลสมฺปนฺโน ภิกฺขุ เทสนาธมฺมํ สุตฺวา สุฏฺฐุ ปฏิปชฺชนฺโต ตานิธมฺมรตนานิ ลภิสฺสติเยว. ลภมาเน จ สติ, กถํ ตานิธมฺมรตนานิ อนฺตรหิตานิ. สีมานญฺจ ปวตฺติวานิวตฺติ วา อาณาจกฺกสฺเสว วิสโย โหติ. น ธมฺมจกฺกสฺส. ยญฺจ วุตฺตํ-ปญฺเจววสฺสสตานิสทฺธมฺโม ฐสฺสตีติ จ, - วสฺสสหสฺสํ สทฺธมฺโม ติฏฺเฐยฺยาติ จ. อิทญฺจ วจนํ ธมฺมจกฺกเมว โหติ, น อาณาจกฺกํ. พทฺธสีมาโย จ นิวตฺตมานา ทฺวีหิ การเณหิ นิวตฺตนฺติ อนฺตรธายนฺติ. อาณาจกฺกภูตาย กมฺมวาจาย สมูหนเนน วา, สาสนสฺส วา อนฺตรธาเนน. ตตฺถ วสฺสสหสฺสปริยนฺเต กมฺมวาจาย สมูหนนญฺจ นตฺถิ. สาสนนฺตรธานญฺจ นาม อนาคเต ธาตุปรินิพฺพาเนน ปริจฺฉินฺนํ โหติ. ธาตุปรินิพฺพาเนหิ ชาเต สพฺพํ อาณาจกฺกํ วิคตํ โหติ, อนฺตรธายติ. ธมฺมจกฺกํ ปน เทวโลเกสุ ยาวานาคตพุทฺธกาลาปิ ปวตฺติสฺสติเยว อาฬวกปุจฺฉาคาถาโย วิย. อปิจโย โว อานนฺท มยา ธมฺโม จ วินโย จ เทสิโต ปญฺญตฺโต. โส โว มมจฺจเยน สตฺถา-ติ วุตฺตํ. โสจติ ปิฏกภูโต ธมฺมวินโย สตฺถา เอตรหิ ติวิธํปิ สาสนํ โลกสฺส ทีเปนฺโต ปกาเสนฺโต ติฏฺฐติ. ยโตพุทฺธภาสิกานํ เทวมนุสฺสานํ นานา พาหิรเกหิ ชเนหิ อสาธารโณ มหนฺโต ญาณาโลโก เอตรหิ วิชฺโชตมาโน ปวตฺตติ. เตหิ สพฺพญฺญุตญฺญาเณน เทสิตานิ เอตรหิธรมานานิ จตุราสีติ ธมฺมกฺขนฺธ สหสฺสานิ สุตฺวา อนมตคฺเคสํสาเร [Pg.33] อนนฺตาสุ โลกธาตูสุ สพฺพํโลกตฺตยปฺปวตฺติญฺจ, สพฺพํธมฺมปฺปวตฺติญฺจ, สพฺพญฺญุตญฺญาณานุคติเกน สุตมยญฺญาเณน ชานนฺติ. อายติญฺจ สคฺคตฺถาย จ มคฺคผลนิพฺพานตฺถาย จ นานาปุญฺญกิริยวตฺถูนิ อารภนฺติ, ปพฺพชนฺติ. ปริยตฺตึ ปริยาปุณนฺติ. ปฏิปตฺตึ ปูเรนฺติ. ภาวนํภาเวนฺติ. อิทํ สพฺพํ สาสนปฺปฏิรูปกมตฺตํน โหติ. เอกนฺต สาสนํ โหติ. กสฺมา, ยถา ธมฺมํ ยถา วินยํ ปฏิปชฺชนโต. อิมาย จ ปฏิปตฺติยา อายตึ สคฺคมคฺคผล นิพฺพานปฺปฏิลาภาย สํวตฺตนิกตฺตาติ. เอตฺตาวตา สพฺพํ มิจฺฉาวาทีนํ มิจฺฉาวจนํ วิธมิตํวิทฺธํสิตํ โหตีติ. १०. अभिधम्मत्थपदे (अभिधम्मत्थ या पदात). 'अभिधम्मे' म्हणजे अभिधम्म प्रकरणात (ग्रंथात). 'येथे, याच्याद्वारे' (एत्थ, एतेन) या शब्दांवरून 'संग्रह' (संगह) शब्दाचे एकशेषविधान देखील समजले जाते. 'दुसरे पाळिद्वय (दोन पाळि) म्हटले जाते.' ते पाळिद्वय 'अभिधम्म' का म्हटले जाते? म्हणून 'तञ्च' (आणि ते) इत्यादी म्हटले आहे. 'यथापवत्ते' म्हणजे आपल्या प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) अनुरूप प्रवृत्त होणारे. 'परमत्थधम्मे एव' (परमार्थ धर्मांनाच) म्हणजे 'हे भिक्खूहो, हे दोन पुद्गल आहेत', 'हे भिक्खूहो, हे तीन पुद्गल आहेत' इत्यादी प्रज्ञप्ति-व्यवहाराने (संकेताने) प्रवृत्त झालेली देशना देखील परमार्थ धर्मांशिवाय प्रवृत्त होत नाही. कारण परमार्थ धर्मांच्या विविधतेमुळेच पुद्गलांची विविधता संभवते. म्हणून ते (अभिधम्म) केवळ परमार्थ धर्मांनाच प्रकाशित करते, आज्ञा-विधानाला (विनय नियमांना) प्रकाशित करत नाही. 'द्वीसु धम्मेसु' (दोन धर्मांमध्ये) हे निर्धारण अर्थातील सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. 'यो इतरातो' (जो इतरांपेक्षा) हे निर्धारणीय आहे. 'यो' म्हणजे जो धर्म. 'इतरातो' म्हणजे इतर धर्मापेक्षा, म्हणजेच सुत्तन्त (सूत्र) धर्मापेक्षा. 'एवञ्च कत्वा' (असे करून) म्हणजे या कारणाने, असा अर्थ आहे. 'अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे' असा संबंध आहे. उपदेश करण्यायोग्य प्रकारांच्या संपूर्ण (निशेष) विभाजनामुळे 'अतिरेकता' (अधिकता) आणि शुद्ध धर्माधिष्ठित देशनेच्या प्रवृत्तीमुळे 'विशेषता' जोडली पाहिजे. 'यतो' म्हणजे ज्या अर्थी संपूर्ण विभाजनामुळे, अति-विस्तृत देशनेचा भाव असल्यामुळे, असे म्हटले आहे. देवांनाच का उपदेश केला? म्हणून 'न हि मनुस्सा' (कारण मनुष्य नाही...) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'कारण मनुष्य ग्रहण करण्यास समर्थ नाहीत' असा संबंध आहे. 'पवत्तनयोग्यं' म्हणजे प्रवृत्त करण्यासाठी पुरेसे असणारे. 'कथामग्गं' म्हणजे देशनेच्या कथेचा प्रवाह (प्रबंध). 'एकमातिकानुबन्धा' म्हणजे 'कुसला धम्मा, अकुसला धम्मा' इत्यादी एकाच अभिधम्म मातृकेचे (अनुक्रमणिकेचे) अनुसरण करणारे. 'तस्सा' म्हणजे अभिधम्माची. 'अतिरेक विशेषता' असा संबंध आहे. 'तत्थ' म्हणजे त्या अट्ठसालिनीमध्ये. तेथे सुरुवातीलाच 'कोणत्या अर्थाने अभिधम्म? धर्माच्या अतिरेक (अधिकता) आणि धर्माच्या विशेष अर्थाने' असे सांगून, त्याचा अर्थ स्पष्ट करताना म्हटले आहे की—सूत्रात तर पाच स्कंध एका अंशानेच (एकदेशाने) विभाजित केले आहेत, संपूर्णपणे (निःप्रदेश रूपाने) नाही. परंतु अभिधम्मात ते संपूर्णपणे (निःप्रदेश रूपानेच) विभाजित केले आहेत. म्हणूनच 'धम्मनामिकानं' इत्यादी म्हटले आहे. 'धम्मो पना' याने दोन पाळि (वचने) सांगितले आहेत. 'एवं सन्तेपि' (असे असतानाही) म्हणजे अट्ठसालिनीमध्ये असा विचार केला गेला असतानाही. 'सब्बजेट्ठको' म्हणजे तिन्ही पिटकांमध्ये सर्वात ज्येष्ठ (श्रेष्ठ). तो सर्वात ज्येष्ठ का असावा? म्हणून 'विनयं विवण्णेन्तस्स हि' (विनयाची निंदा करणाऱ्याची...) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'विवण्णेन्तस्स' म्हणजे निंदा करणाऱ्याची. जे चालते किंवा प्रवृत्त होते ते 'चक्र' होय. जगात कोणत्याही श्रमणाने, ब्राह्मणाने, देवाने, माराने किंवा ब्रह्मदेवाने मागे फिरवता न येण्याजोगे जे आज्ञा-विधान आहे, त्याला 'आज्ञाचक्र' (आणाचक्क) म्हणतात. तसेच, मागे फिरवता न येण्याजोग्या देशना-विधानाला 'धम्मचक्र' म्हणतात. त्यामध्ये, 'जो भिक्खू मैथुन धर्माचे सेवन करतो, तो पाराजिक होतो, संवासास (संघात राहण्यास) अयोग्य होतो' इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेले आज्ञा-विधान म्हणजे 'आज्ञाचक्र' होय. 'हे भिक्खूहो, ही चार आर्यसत्ये आहेत' इत्यादी देशना-विधान म्हणजे 'धम्मचक्र' होय. या दोन्हीलाही कोणीही खंडित करू शकत नाही, याने पाराजिक झालेल्या भिक्खूला अपाराजिक करू शकत नाही, किंवा चार आर्यसत्यांच्या धर्माला असत्य करू शकत नाही. उलट, असे करण्याचा प्रयत्न करणारा देवदत्ताप्रमाणे नरकगामी (अपायगामी) होतो. आणि पाराजिक झालेला भिक्खू स्वतःला शुद्ध न करता अपायगामीच होतो. सर्व विनय शिक्षापदांच्या बाबतीत असेच आहे. अशा प्रकारे, कोणाकडूनही मागे फिरवले जाऊ शकत नसल्यामुळे, हे दोन्हीही 'अप्रतिवर्त्य चक्र' (मागे न फिरवता येणारे चक्र) म्हटले जाते. 'विनय हा शासनाचा पाया (मूळ) आहे', कारण विनयाचे अस्तित्व असतानाच भिक्खूसंघ दिसून येतो. भिक्खूसंघ दिसून येत असताना तिन्ही प्रकारचा सद्धम्म दिसून येतो, आणि तिन्ही प्रकारचे शास्त्यांचे (बुद्धांचे) शासन टिकून राहते. अशा प्रकारे विनय हा त्रिविध शासनाचा पाया ठरतो. आणि परियत्ति-सद्धम्म ज्ञात असताना तिन्ही प्रकारचे शासन कसे टिकून राहते? ते सांगितले जाते. तेथे 'शासन टिकून राहते' म्हणजे किती काळ टिकून राहते? 'पाच हजार वर्षे टिकून राहते,' असे प्राचीन अट्ठकथांमध्ये सांगितले आहे. परंतु मिथ्यावादी (चुकीचे मत मांडणारे) लोक म्हणतात की—विनय पिटकाच्या चुळवग्ग मधील भिक्खुनी खन्धकात म्हटले आहे: 'आनंदा, जर माझ्या शासनात स्त्रियांना प्रव्रज्या मिळाली नसती, तर सद्धम्म एक हजार वर्षे टिकला असता. आता महाप्रजापती गोतमीच्या वारंवार केलेल्या याचनेमुळे स्त्रियांना प्रव्रज्या दिली गेली आहे, त्यामुळे आता, आनंदा, सद्धम्म केवळ पाचशे वर्षेच टिकेल.' म्हणून बुद्धांचे शासन केवळ पाचशे वर्षेच टिकते, त्यानंतर एक दिवसही टिकत नाही. आता केवळ शासनाचे प्रतिरूप (आभास) उरले आहे. हे त्यांचे केवळ मिथ्या वचन (असत्य विधान) आहे. 'केवळ पाचशे वर्षेच' हे काही अंतिम निश्चित वचन नाही. हे केवळ स्त्रियांच्या प्रव्रज्येतील दोष (आदीनव) दाखवणारे वचन आहे. आणि तो दोष शास्त्यांनी (बुद्धांनी) आठ गरूधर्मांची स्थापना करून आधीच दूर केला आहे. त्यामुळे पुन्हा 'एक हजार वर्षे' हेच अंतिम निश्चित वचन ठरते. येथे काही लोक असेही म्हणतात की, शासन केवळ एक हजार वर्षेच टिकते, त्यानंतर एक दिवसही टिकत नाही, ते अंतर्धान पावते. तेव्हा सीमा देखील असीमा होतात (भिक्खूंच्या उपोसथादी कर्मांच्या सीमा नष्ट होतात). त्यानंतर त्या सीमांमध्ये उपसंपदा घेतलेले देखील अनुपसंपन्न (दीक्षा न घेतलेले) ठरतात. आता केवळ शासनाचे प्रतिरूप उरले आहे. हे देखील त्यांचे अर्थ आणि कारण न पाहता व न जाणता बोलल्यामुळे केवळ मिथ्या वचनच आहे. येथे हा अर्थ आहे—'सद्धम्म एक हजार वर्षे टिकेल' म्हणजे एक हजार वर्षांपर्यंतच सद्धम्म कोणताही ऱ्हास न होता (अपरिहीण राहून) टिकेल. त्यानंतर मात्र तो तसा टिकणार नाही, तर हळूहळू ऱ्हास पावत जाईल. पण तो ऱ्हास न होता कसा टिकतो आणि ऱ्हास पावत कसा जातो? ते सांगितले जाते. पाच प्रकारचे संघ समजले पाहिजेत, ज्या संघांमध्ये सु-सद्धम्म टिकून राहतो. ते पाच कोणते? क्षीणासव (अर्हत) संघ, अनागामी संघ, sakadāgāmisaṅgho (सकदागामी संघ), सोतापन्न संघ आणि पृथग्जन-कल्याणक संघ. त्यामध्ये, पहिल्या एक हजार वर्षांच्या काळात हे पाचही संघ दिसून येतात. अशा प्रकारे एक हजार वर्षे सद्धम्म ऱ्हास न पावता टिकून राहतो. त्यानंतर क्षीणासव संघ दिसून येत नाही. उर्वरित चार हजार वर्षे ही अनुक्रमाने उर्वरित चार संघांची क्षेत्रे (काळ) बनतात. अशा प्रकारे त्यानंतर तो ऱ्हास पावत जातो, हा येथे अर्थ आहे. याचे कारण सांगितले जाते. 'सद्धम्म टिकून राहील' यामध्ये त्रिविध सद्धम्म अभिप्रेत आहे—परियत्ति-सद्धम्म (अभ्यास), प्रतिपत्ति-सद्धम्म (आचरण) आणि प्रतिवेध-सद्धम्म (साक्षात्कार). यालाच 'त्रिविध शासन' असेही म्हणतात. त्यामध्ये, परियत्ति-सद्धम्म म्हणजे अट्ठकथांसह तिन्ही पिटक होय. आणि तो सध्या परिपूर्ण स्वरूपात अस्तित्वात आहे. मग परियत्ति-शासन केवळ प्रतिरूप (आभास) कसे असू शकेल? आणि परियत्तिचे (अभ्यासाचे) कार्य करणारे अनेक लाखो भिक्खू दिसून येतात. मग हे शासन त्यानंतर एक दिवसही कसे टिकणार नाही? आणि शील-प्रतिपत्तीमध्ये (आचरणात) स्थित असलेले ते लाखो भिक्खू आजही आढळतात. मग प्रतिपत्ति-शासन त्यानंतर कसे टिकणार नाही? आणि परियत्ति व प्रतिपत्ति टिकून असताना प्रतिवेध-सद्धम्म देखील टिकत नाही, असे म्हणता येणार नाही. जसे की—कोणी एक श्रीमंत श्रेष्ठ (श्रीमंत व्यापारी) आहे. त्याने आपल्या मुला-मुलींच्या आणि वंशजांच्या कल्याणासाठी जमिनीमध्ये अनेक ठिकाणी मोठे रत्ननिधी पुरून ठेवले आहेत. आणि पुस्तकांमध्ये त्यांची माहिती परिपूर्ण लिहून ठेवली आहे. तेथे ते नकाशे, पुस्तके आणि अक्षरे सुरक्षित असताना, ते निधी नष्ट झाले किंवा अंतर्धान पावले असे म्हणता येणार नाही. याचप्रमाणे हे शासन पाहिले पाहिजे. कारण तेथे निधी पुरून ठेवलेल्या जमिनीप्रमाणे त्रिपिटक बुद्धवचन आहे, आणि धन-रत्नांप्रमाणे धम्मरत्ने आहेत. आणि ज्याप्रमाणे त्या श्रेष्ठीच्या वंशात जन्मलेला एखादा बलवान मनुष्य ते पुस्तक पाहून, नीट खोदकाम करून ती रत्ने मिळवेलच; त्याचप्रमाणे येथेही एखादा बलवान (श्रद्धावान) भिक्खू देशना-धम्म ऐकून, योग्य प्रकारे आचरण करून ती धम्मरत्ने मिळवेलच. आणि ती मिळत असताना, ती धम्मरत्ने अंतर्धान पावली आहेत असे कसे म्हणता येईल? आणि सीमांची प्रवृत्ती (अस्तित्व) किंवा निवृत्ती (नष्ट होणे) हा केवळ आज्ञाचक्राचाच विषय आहे, धम्मचक्राचा नाही. आणि जे म्हटले आहे की—'सद्धम्म केवळ पाचशे वर्षे टिकेल' आणि 'सद्धम्म एक हजार वर्षे टिकेल', हे वचन धम्मचक्राचेच आहे, आज्ञाचक्राचे नाही. आणि बद्ध सीमा नष्ट होताना दोन कारणांनी नष्ट होतात किंवा अंतर्धान पावतात—आज्ञाचक्र स्वरूप असलेल्या कम्मवाचेच्या (कर्मवाचेच्या) लोपामुळे किंवा शासनाच्या अंतर्धानामुळे. तेथे एक हजार वर्षांच्या समाप्तीनंतर कम्मवाचेचा लोप झालेला नाही. आणि शासनाचे अंतर्धान हे भविष्यात 'धातू-परिनिर्वाणाने' (धातुपरिनिब्बानाने) निश्चित केले गेले आहे. धातू-परिनिर्वाण झाल्यावर सर्व आज्ञाचक्र नाहीसे होते, अंतर्धान पावते. परंतु धम्मचक्र मात्र देवलोकांमध्ये भावी बुद्धांच्या काळापर्यंत देखील प्रवृत्त राहीलच, जसे की आलवकाच्या प्रश्नांच्या गाथा. शिवाय, 'आनंदा, मी जो धम्म आणि विनय उपदेशिला आहे व प्रज्ञप्त केला आहे, तोच माझ्या पश्चात तुमचा शास्ता (गुरू) असेल,' असे म्हटले आहे. तो पिटक स्वरूप धम्म आणि विनय हाच शास्ता सध्या तिन्ही प्रकारचे शासन जगाला प्रकाशित करत, दीपवत टिकून आहे. ज्या अर्थी बुद्धभाषिक देव आणि मनुष्यांचा, इतर बाह्य लोकांसाठी असाधारण असलेला, महान ज्ञानप्रकाश सध्या देदीप्यमान होऊन प्रवृत्त आहे. त्यांच्याद्वारे (बुद्धांद्वारे) सर्वज्ञता-ज्ञानाने उपदेशिलेले आणि सध्या अस्तित्वात असलेले चौऱ्याऐंशी हजार धम्मस्कंध ऐकून, अनादी संसारात आणि अनंत लोकधातूंमध्ये सर्व त्रिलोक-प्रवृत्ती आणि सर्व धम्म-प्रवृत्ती, सर्वज्ञता-ज्ञानाचे अनुसरण करणाऱ्या श्रुतमय ज्ञानाने लोक जाणतात. आणि भविष्यात स्वर्गासाठी तसेच मार्ग, फल व निर्वाणासाठी विविध पुण्यक्रियांची सुरुवात करतात, प्रव्रज्या घेतात, परियत्तिचा अभ्यास करतात, प्रतिपत्ति पूर्ण करतात आणि भावनेची भावना (ध्यान) करतात. हे सर्व केवळ शासनाचे प्रतिरूप (आभास) नाही, तर हे निश्चितच (एकांततः) शासन आहे. का? कारण ते धम्म आणि विनयाला अनुसरून आचरण करत आहेत. आणि हे आचरण भविष्यात स्वर्ग, मार्ग, फल आणि निर्वाण प्राप्तीसाठी कारणीभूत ठरणारे आहे. एवढ्याने सर्व मिथ्यावाद्यांचे मिथ्या वचन पूर्णपणे खंडित व उद्ध्वस्त होते. ปณามคาถาวณฺณนา. प्रणामगाथा-वर्णन. ๑๑. ทุตียคาถาวณฺณนายํ. ‘‘อาทิคาถายา’’ติ ปถมคาถาวากฺเยน. ‘‘ตํ ตํ ปโยชนสหิเต’’ติ เตนเตนปโยชเนน สหิเต. ‘‘ปญฺจ อตฺเถ’’ติ ปญฺจปิณฺฑตฺเถ. ‘‘เตอภิธมฺมตฺเถ’’ติ อภิธมฺมตฺถปเท ทีปิเต เตอภิธมฺมตฺเถ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ติสฺสํ ทุตียคาถายํ. ‘‘นตุ วุตฺต’’นฺติ นปนปกรณํปิ ปุพฺเพวุตฺตํ โหติ. อภิธมฺมตฺถา กุโตปุพฺเพวุตฺตา โหนฺตีติ โยชนา. เอวํตีสุ อตฺถวิกปฺเปสุ ปถมสฺส กาลวิโรธํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ทุตีย ตตียานํ สทฺทโตวิโรธํ วตฺตุํ ‘‘นจา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘อาทิมฺหิ เยวา’’ติ เอเตน ยทากทาจิ ปจฺจามสนํ อปฺปธานนฺติ ทสฺเสติ. ‘‘อปฺปธานปทานี’’ติ อภิธมฺมตฺถสงฺคหนฺติ อิมสฺมึ เอกสฺมึ สมาสปเท ปุริมานิ วิเสสน ปทานิ. ตตฺถ สพฺพถาปิ วุตฺตาติ โยชิเต สติ, ตสฺมึ อภิธมฺมตฺถสงฺคหปฺปกรเณ ตสฺมึ อภิธมฺมตฺถ ปเทวา สพฺพถา มยา วุตฺตาติ อตฺโถ โหติ. โส น ยุชฺชติ. ตสฺมึ อภิธมฺเม พุทฺเธน ภควตา สพฺพถา วุตฺตาติ อตฺโถ ยุชฺชติ. อปฺปธานปทํ ปจฺจามสตีติ โทโสปน อาปชฺชเตว. เตนาห ‘‘เอวญฺหิสตี’’ติอาทึ. ตตฺถ, ‘‘เอวญฺหิสตี’’ติ อฏฺฐสาลินิยํ วิย อิธ อภิธมฺมตฺถสงฺคหปทํ ปจฺจามสนฺเต สติ. หิสทฺโท ผล วากฺยโชตโก. ลทฺธคุณโชตโกติปิ ยุชฺชติ. ‘‘ปฏิกฺขิตฺตา โหติ’’ [Pg.34] ตสฺมึ อภิธมฺมตฺถสงฺคหปเท มยา สพฺพถา วุตฺตาติ อตฺถสฺส สมฺภวโต. น เกวลํ โส เอว โทโส อาปชฺชติ. อปโรปิโทโส อตฺถีติ ทสฺเสตุํ ‘‘สาหี’’ติอาทิมาห. ธาตุกถายํ วุตฺเตนสงฺคหาสงฺคหาทิปฺปกาเรนาติโยชนา. ११. दुसऱ्या गाथेच्या स्पष्टीकरणात: ‘आदिगाथाया’ (पहिल्या गाथेत) म्हणजे पहिल्या गाथेच्या वाक्याने. ‘तं तं पयोजनसहिते’ (त्या त्या प्रयोजनासह) म्हणजे त्या त्या प्रयोजनाने युक्त. ‘पञ्च अत्थे’ (पाच अर्थ) म्हणजे पाच एकत्रित अर्थ (पिंडार्थ). ‘तेअभिधम्मत्थे’ म्हणजे ‘अभिधम्मत्थ’ या पदाने स्पष्ट केलेले ते अभिधम्म-अर्थ. ‘तत्थ’ (तेथे) म्हणजे त्या दुसऱ्या गाथेत. ‘न तु वृत्तं’ (परंतु सांगितले नाही) म्हणजे हे प्रकरण देखील पूर्वी सांगितले गेले नाही. अभिधम्म-अर्थ पूर्वी कोठे सांगितले गेले आहेत? अशी योजना (संबंध) आहे. अशा प्रकारे तीन अर्थ-विकल्पांपैकी पहिल्याचा काल-विरोध दाखवून, आता दुसऱ्या आणि तिसऱ्याचा शब्द-विरोध सांगण्यासाठी ‘न च’ इत्यादी म्हटले आहे. तेथे ‘आदिम्हि येव’ (सुरुवातीलाच) याने कधीतरी केलेला संदर्भ (परामर्श) हा अप्रधान असतो, असे दर्शविते. ‘अप्रधानपदानि’ म्हणजे ‘अभिधम्मत्थसंगह’ या एका सामासिक पदातील पूर्व विशेषण पदे होत. तेथे ‘सब्बथापि वृत्ता’ (सर्व प्रकारे सांगितले आहे) असे जोडले असता, त्या ‘अभिधम्मत्थसंगह’ प्रकरणामध्ये, त्या ‘अभिधम्मत्थ’ पदातच ‘माझ्याद्वारे सर्व प्रकारे सांगितले गेले आहे’ असा अर्थ होतो. तो योग्य ठरत नाही. त्या अभिधम्मात बुद्ध भगवंतांनी सर्व प्रकारे सांगितले आहे, हा अर्थ योग्य ठरतो. अप्रधान पदाचा संदर्भ घेतल्यास दोष देखील निर्माण होतोच. म्हणूनच ‘एवं हि सति’ (असे असताना) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे, ‘एवं हि सति’ म्हणजे ‘अट्ठसालिनी’ प्रमाणे येथे ‘अभिधम्मत्थसंगह’ या पदाचा संदर्भ घेतला असता. ‘हि’ हा शब्द फल-वाक्याचा द्योतक (दर्शक) आहे. तो प्राप्त गुणाचा द्योतक आहे, असे मानणे देखील योग्य आहे. ‘पटिक्खित्ता होति’ (नाकारले जाते) कारण त्या ‘अभिधम्मत्थसंगह’ पदात ‘माझ्याद्वारे सर्व प्रकारे सांगितले गेले आहे’ हा अर्थ संभवत नाही. केवळ तोच दोष निर्माण होतो असे नाही. दुसराही दोष आहे हे दर्शवण्यासाठी ‘सा हि’ (ती खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. ‘धातुकथा’ मध्ये सांगितलेल्या संग्रह-असंग्रह इत्यादी प्रकारांनी, अशी योजना आहे. ๑๒. ปรมตฺถปทวณฺณนายํ. วิเสสนปทํ นาม กตฺถจิ ภูตกถนตฺถายวา ปยุชฺชติ กณฺโหกาโก, เสโตพโก,ติ. กตฺถจิ อญฺญนิวตฺตนตฺถาย วา ปยุชฺชติ นีโลปโฏ, นีลํปุปฺผ, นฺติ. อิธ ปน อญฺญ นิวตฺตนตฺถายาติ ทสฺเสตุํ ‘‘ทุวิธานิหิสจฺจานี’’ติอาทิมาห. ปญฺญาปียตีติปญฺญตฺติ. ปญฺญาปนญฺจ นาม สมคฺคานํ ชนานํ โวหาเรน จ สมฺปฏิจฺฉเนน จาติ ทฺวีหิ องฺเคหิ สิชฺฌตีติ อาห ‘‘เตจมหาชนา’’ติอาทึ. ‘‘ตสฺมาเต สมฺมุติ สจฺจนฺติ วุจฺจนฺตี’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สมฺมตตฺตา’’ติ โวหริตตฺตาเจว สมฺปฏิจฺฉิตตฺตา จ. ‘‘วจีสจฺจวิรติสจฺจาน’’นฺติ เอตฺถ วจีสจฺจํ นาม มุสาวาทรหิตํ สจฺจวจนํ. วิรติสจฺจํ นาม สมฺมาวาจาวิรติ. สาหิ มุสาวาทาทีหิ วจีทุจฺจริเตหิ วิรมณมตฺเตน วจีสจฺจนฺติ วุจฺจติ. ‘‘วตฺถุภูตตฺตา’’ติ อธิฏฺฐานภูตตฺตา. สมฺมุติสจฺจนฺติ วุจฺจนฺติ, สมฺมตตฺตา สมฺมุติ จ, สา สจฺจานํ วตฺถุภูตตฺตา สจฺจญฺจาติ กตฺวา. สมฺมุติยา สิทฺธํ สจฺจํ สมฺมุติสจฺจนฺติปิ ยุชฺชติ. ‘‘สมฺมาปฏิปชฺชนฺตา’’ติ ปาโณ นหนฺตพฺโพ, สพฺเพสตฺตา อเวรา โหนฺตูติอาทินา สมฺมาปฏิปชฺชนฺตา. ‘‘สพฺพโลกิยสมฺปตฺติโย’’ติ ทานสีลาทีนํ ปุญฺญกิริยวตฺถูนํ ผลวิปากภูตา สพฺพโลกิยสมฺปตฺติโย. สพฺเพ ‘‘โพธิสมฺภารธมฺเม’’ติ ทานปารมิสีลปารมิอาทิเกปารมิธมฺเม. ‘‘อาราเธนฺตี’’ติ สมฺปาเทนฺติ. ‘‘มิจฺฉาปฏิปชฺชนฺตา’’ติ ทุจฺจริต ทุราชีวมิจฺฉาชีวาทีนํ วเสน มิจฺฉาปฏิปชฺชนฺตา. ‘‘เอวํ มหนฺตํ สมฺมุติ สจฺจ’’นฺติ เอเตน อหํ ปรมตฺถ สจฺจเมวคณฺหามีติ สมฺมุติ สจฺจํ นภินฺทิตพฺพํ. ภินฺทนฺโตหิ สพฺพสมฺปตฺตีหิ ปริพาหิโร อสฺสาติ ทสฺเสติ. กถญฺจ ตํ ภินฺทตีติ. สตฺโต นาม นตฺถิ. สตฺตสฺส ภวโตสงฺกนฺติ นาม นตฺถิ. ภวนิพฺพตฺตกํ กุสลากุสลกมฺมํ นาม นตฺถีติ คณฺหนฺโต อุจฺเฉททิฏฺฐิยํ ติฏฺฐติ. สพฺพสมฺปตฺตีหิ ปริพาหิโร โหติ. อปาย ปูรโก ภวตีติ. ‘‘วิชฺชมานนฺตฺเวว คณฺหาเปตี’’ติ สญฺญา จิตฺตทิฏฺฐิ [Pg.35] วิปลฺลาสานํ วตฺถุภาเวน คณฺหาเปติ. เตนาห ‘‘สกฺกายทิฏฺฐี’’ติอาทึ. ‘‘เอวํ วิปรีตญฺหิ สมฺมุติสจฺจ’’นฺติ เอเตนสมฺมุติ สจฺจเมวทฬฺหํ คเหตฺวา ปรมตฺถ สจฺจํ นภินฺทิตพฺพํ. ภินฺทนฺโตหิ ตาหิ ทิฏฺฐีหิ นมุจฺจติ. กถญฺจ ตํ ภินฺทติ. ขนฺเธ วา ขนฺธมุตฺตเกวา อตฺตชีเว คเหตฺวา เตจ อตฺตชีวา ปรมฺมรณา อุจฺฉิชฺชนฺตีติ คณฺหนฺโต อุจฺเฉททิฏฺฐิยํ ติฏฺฐติ. เต จ อตฺตชีวา ภวาภเวสุสสฺสตา หุตฺวา ภวโตภวํ สํสรนฺติ สนฺธาวนฺตีติ คณฺหนฺโตสสฺสตทิฏฺฐิยํ ติฏฺฐติ. ‘‘นวิสํวาเทนฺตี’’ติ วิปรีตํ นาปาเทนฺติ. ‘‘ตํ ปนา’’ติ สภาวสจฺจํ ปน. อนุภวนเภทมตฺตํ อุปาทาเยว เวทนา สุขาติ วุตฺตา. สพฺพาการโต สุขภูตตฺตา เวทนา สุขาติ วุตฺตา นโหติ. ‘‘สพฺพาปิเวทนา ทุกฺขา เอวา’’ติ ปธานตฺโถ. ตตฺถ อนุภวนเภโท ติวิโธ. สาตโต วา อนุภวนํ, อสฺสาตโต วา, มชฺฌตฺตโต วา. ‘‘ทุกฺขา เอวา’’ติ ภยฏฺเฐน ทุกฺขา เอว. ภยฏฺเฐนาติ จ สํสาร ภยทสฺสีหิภายิตพฺพฏฺเฐน. สุโข วิปาโก เยสํ เต สุขวิปากา. เตภูมกกุสลา. ‘‘กุสลสมฺมตา’’ติ เอเตน สภาวสจฺเจปิ เอเตโวหารา โลกสมฺมุติ นิสฺสิตาติ ทีเปติ. ‘‘สาสวตา’’ติ อาสเวหิ สหิตภาโว. ‘‘สํกิเลสิ กตา’’ติ สํกิเลส ธมฺเมหิ สํยุตฺตภาโว. โอเฆหิ จ โยเคหิ จ อุปาทาเนหิ จ ปตฺตพฺพภาโว ‘‘โอฆนียโยคนีย อุปาทานียตา’’. อธิกา อตฺตา อชฺฌตฺตา. พหิทฺธารุกฺเขรูปธมฺมารุกฺขสฺส อตฺตานาม สารฏฺเฐน. สาขายํ รูปธมฺมา สาขาย อตฺตานาม สารฏฺเฐน. สตฺตสนฺตานปริยาปนฺนา ปน รูปารูปธมฺมา ตณฺหาปริคฺคห ทฬฺหฏฺเฐน ตโต พหิทฺธา อตฺตโต อธิกา อตฺตาติ อตฺเถน อชฺฌตฺตาติ โลกสมฺมุติ โหติ. เตนาห ‘‘อชฺฌตฺตติกญฺจา’’ติอาทึ. ทุกฺขนิโรธ มคฺคภาโว จ, อิติ อิทํ จตุกฺกํ อริยสจฺจํ นามาติ โยชนา. ‘‘อิทเมวา’’ติ อิทํ จตุกฺกเมว. ‘‘อจลมาน’’นฺติ เอเตน อริยสทฺทสฺส อตฺถํ ทีเปติ. เตภูมก ธมฺมานํ สุขตา นาม จลา โหติ. กสฺมา, อนิจฺจ ธมฺมตฺตา. เต ธมฺเมสุขาติ คเหตฺวา อตฺตโน อชฺฌตฺตงฺคํ กโรนฺตา อจิเรเนว ทุกฺขํ ปาปุณนฺติ. เต ธมฺเม ทุกฺขาติ ญตฺวา เตหิวิมุตฺตา ปุน ทุกฺขํ ปาปุณนฺตีติ นตฺถิ. เอสนโย เสสอริยสจฺเจสุ[Pg.36]. ‘‘เตสู’’ติอาทิมฺหิ ทุวิธานิหิ สจฺจานีติ วุตฺเตสุ ทฺวีสุ สจฺเจสุ. ‘‘เตน วุตฺต’’นฺติอาทิ ลทฺธคุณวจนํ. ‘‘โย วินา อญฺญาปเทเสนา’’ติ เอตฺถ อญฺญาปเทโส นาม อฏฺฐธมฺม สโมธานํ นิสฺสาย ฆฏสณฺฐานํ ปญฺญายติ, ปฏสณฺฐานํ ปญฺญายติ, ตํ สณฺฐานํ อตฺตโน สภาเวน วินา อญฺญาปเทเสน สิทฺธํ โหติ. ยาปนจินฺตน กิริยา นาม อตฺถิ. ยํ จิตฺตนฺติ วุจฺจติ. สา อญฺญาปเทเสน สิทฺธา น โหติ. อตฺตโน สภาเวเนวสิทฺธา. เอสนโย ผุสนกิริยา, เวทยิตกิริยา, ทีสูติ. อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘โยวินา อญฺญาปเทเสนา’’ติอาทิมาห. ‘‘จิตฺเตนปริกปฺเปตฺวา’’ติ มโนวิญฺญาณ จิตฺเตน อวิชฺชมานํ สณฺฐานํ วิชฺชมานํ กตฺวา. ‘‘สวิคฺคหํ กตฺวา’’ติ สรีรํ กตฺวา. วตฺถุ ทพฺพสหิตํ กตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘จิตฺตมโยจิตฺตนิมฺมิโต’’ติ สุปินนฺเต ทิฏฺฐรูปานิ วิย จิตฺเตนปกโต จิตฺเตน นิมฺมิโต. กสฺมา สภาวสิทฺโธ ปรมตฺโถ นามาติ อาห ‘‘โสหี’’ติอาทึ. ‘‘สนฺตี’’ติ เอเตน อสธาตุ วเสน อตฺโถติ สิทฺธํ วุตฺตํ. สทฺทาพุทฺธีหิ อรณียโต อุปคนฺตพฺพโต อตฺโถติปิวทนฺติ. ‘‘อิตรโต’’ติ ปริกปฺปสิทฺธโต. ‘‘ปรโม’’ติ อธิโก. เตนาห ‘‘อุกฺกํสคโต’’ติ. เอเตน ปรมสทฺทสฺส อธิกตฺถํ วทติ. อิทานิ ตสฺส อุตฺตมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิวุตฺตํ. ตตฺถ, อิมสฺมึ พุทฺธสาสเน ปญฺจสาสน กิจฺจานิ มหนฺตานิ อภิญฺเญยฺยานํ ธมฺมานํ อภิชานนํ. ปริญฺเญยฺยานํ ปริชานนํ. ปหาตพฺพานํ ปหานํ. สจฺฉิ กาตพฺพานํ สจฺฉิกรณํ. ภาเวตพฺพานํ ภาวนาติ. ตตฺถ สพฺเพปิ ปรมตฺถ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา นาม. ทุกฺข สจฺจธมฺมา ปริญฺเญยฺยา นาม. สมุทย สจฺจธมฺมา ปหาตพฺพา นาม. สามญฺญปฺผลานิ จ นิพฺพานญฺจ สจฺฉิกาตพฺพา นาม. มคฺคสจฺจธมฺมา ภาเวตพฺพา นาม. เตสุ ธมฺเมสุ เตสํ กิจฺจานํ สิทฺธิยา อิมสฺมึ สาสเน สาสนกิจฺจํ สิทฺธํ โหติ. นิฏฺฐานํ คจฺฉติ. เต จ ธมฺมา เอว รูปานํ สาสน กิจฺจานํ อวิราธกตฺตา อวิสํวาทกตฺตา อุตฺตมฏฺเฐน ปรมตฺถา นาม โหนฺตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘เย’’ติเยชนา. ‘‘อย’’นฺติ อยํ ธมฺโม. ‘‘ตสฺสา’’ติ ตสฺสอภิญฺเญยฺยสฺส, ตสฺสปริญฺเญยฺยสฺส, ตสฺสปหาตพฺพสฺส, ตสฺสสจฺฉิกา ตพฺพสฺส [Pg.37] ตสฺสภาเวตพฺพสฺสาติ สมฺพนฺโธ. ปรมตฺถวณฺณนา นิฏฺฐิตา. १२. परमत्थपदवण्णना (परमार्थपदवर्णना) मध्ये. विशेषण पद हे कधीतरी वास्तविक स्थिती सांगण्यासाठी वापरले जाते, जसे की 'कण्होकाको' (काळा कावळा), 'सेतोबको' (पांढरा बगळा). कधीतरी ते इतरांना वगळण्यासाठी (व्यावृत्तीसाठी) वापरले जाते, जसे की 'नीलोपटो' (निळे वस्त्र), 'नीलं पुप्फं' (निळे फूल). येथे मात्र इतरांना वगळण्याच्या अर्थाने हे दर्शवण्यासाठी 'दुविधा हि सच्चानि' (दोन प्रकारची सत्ये आहेत) इत्यादी म्हटले आहे. जे प्रज्ञापित केले जाते ती 'पण्णत्ति' (प्रज्ञप्ती) होय. आणि प्रज्ञापना ही सर्व लोकांच्या व्यवहाराने आणि स्वीकृतीने अशा दोन अंगांनी सिद्ध होते, म्हणून 'ते च महाजना' (आणि ते महाजन) इत्यादी म्हटले आहे. 'तस्मा ते सम्मुतिसच्चं ति वुच्चन्ति' (म्हणून त्यांना संमूर्ती सत्य म्हटले जाते) असा संबंध आहे. 'सम्मतत्ता' (संमत असल्यामुळे) म्हणजे व्यवहारात आणल्यामुळे आणि स्वीकारल्यामुळे. 'वचीसच्चविरतीसच्चानं' (वाणीचे सत्य आणि विरतीचे सत्य) यामध्ये 'वचीसच्च' म्हणजे असत्य भाषणापासून (मुसावादापासून) रहित असलेले सत्य वचन. 'विरतीसच्च' म्हणजे सम्यक् वाचेची विरती (अकुशल वाणीपासून अलिप्त राहणे). कारण ती असत्य भाषणादी वाणीच्या दुश्चरित्रांपासून केवळ विरमित होण्याने 'वचीसच्च' म्हटले जाते. 'वत्थुभूतत्ता' (वस्तुभूतत्वामुळे) म्हणजे अधिष्ठानभूतत्वामुळे. संमत असल्यामुळे 'सम्मुति' (संमूर्ती) आणि ती सत्यांचे अधिष्ठान (वस्तुभूत) असल्यामुळे 'सच्च' (सत्य) मिळून 'सम्मुतिसच्च' (संमूर्ती सत्य) असे म्हटले जाते. संमूर्तीने (लोकसंमताने) सिद्ध झालेले सत्य म्हणजे 'संमूर्ती सत्य' असेही योग्य ठरते. 'सम्मापटिपज्जन्ता' (सम्यक् आचरण करणारे) म्हणजे 'प्राण्याची हिंसा करू नये, सर्व प्राणी वैररहित होवोत' इत्यादी प्रकारे सम्यक् आचरण करणारे. 'सब्बलोकियसम्पत्तियो' (सर्व लौकिक संपत्ती) म्हणजे दान, शील इत्यादी पुण्यक्रियावस्तूंचे फलविपाक असणाऱ्या सर्व लौकिक संपत्ती. सर्व 'बोधिसम्भारधम्मे' (बोधिसंभार धर्म) म्हणजे दानपारमिता, शीलपारमिता इत्यादी पारमिता धर्म. 'आराधेन्ति' (आराधन करतात) म्हणजे संपादन करतात. 'मिच्छापटिपज्जन्ता' (मिथ्या आचरण करणारे) म्हणजे दुश्चरित्र, वाईट उपजीविका (दुराजीव) आणि मिथ्या आजीविका इत्यादींच्या प्रभावाने मिथ्या आचरण करणारे. 'एवं महन्तं सम्मुतिसच्चं' (असे हे महान संमूर्ती सत्य आहे) याने 'मी केवळ परमार्थ सत्यच ग्रहण करतो' असे म्हणून संमूर्ती सत्याचा भंग करू नये (ते नाकारू नये). कारण त्याचा भंग करणारा सर्व संपत्तींपासून वंचित होतो, हे दर्शवले आहे. आणि तो त्याचा भंग कसा करतो? 'सत्त्व (प्राणी) नावाचे काही नाही, सत्त्वाचे एका भवातून दुसऱ्या भवात संक्रमण होत नाही, भवामध्ये जन्म देणारे कुशल-अकुशल कर्म नावाचे काही नाही' असे ग्रहण करणारा उच्छेददृष्टीत (उच्छेददिट्ठि) स्थिर होतो. तो सर्व संपत्तींपासून वंचित होतो आणि अपाय (दुर्गती) भरणारा होतो. 'विज्जमानन्त्वेव गण्हापेति' (विद्यमान म्हणूनच ग्रहण करवतो) म्हणजे संज्ञा, चित्त आणि दृष्टी यांच्या विपर्यासांचे (विपल्लास) अधिष्ठान म्हणून ग्रहण करवतो. म्हणूनच 'सक्कायदिट्ठि' (सत्कायदृष्टी) इत्यादी म्हटले आहे. 'एवं विपरीतं हि सम्मुतिसच्चं' (असे हे विपरीत संमूर्ती सत्य आहे) याने संमूर्ती सत्यालाच घट्ट पकडून ठेवून परमार्थ सत्याचा भंग करू नये. कारण त्याचा भंग करणारा त्या दृष्टींमधून मुक्त होत नाही. आणि तो त्याचा भंग कसा करतो? स्कंधांमध्ये किंवा स्कंधांहून वेगळ्या अशा आत्मा किंवा जीवाचे ग्रहण करून, 'ते आत्मा आणि जीव मृत्यूनंतर नष्ट होतात' असे मानणारा उच्छेददृष्टीत स्थिर होतो. आणि 'ते आत्मा आणि जीव विविध भवांमध्ये शाश्वत राहून एका भवातून दुसऱ्या भवात संसार करतात, धावतात' असे मानणारा शाश्वतदृष्टीत (सस्सतदिट्ठि) स्थिर होतो. 'न विसंवादेन्ति' (विसंवाद करत नाहीत) म्हणजे विपरीतता आणत नाहीत. 'तं पन' (ते मात्र) म्हणजे स्वभाव सत्य मात्र. केवळ अनुभवाच्या भेदाला अनुसरूनच 'वेदना सुखावह आहे' असे म्हटले आहे. सर्व प्रकारे सुखरूप असल्यामुळे वेदना सुखावह म्हटली गेली आहे असे नाही. 'सब्बा पि वेदना दुक्खा एवा' (सर्व वेदना दुःखच आहेत) हा मुख्य अर्थ आहे. तेथे अनुभवाचा भेद तीन प्रकारचा आहे: साताने (सुखाने) अनुभवणे, असाताने (दुःखाने) अनुभवणे किंवा मध्यस्थतेने (उपेक्षेने) अनुभवणे. 'दुक्खा एव' (दुःखच आहेत) म्हणजे भयाने (भयाच्या अर्थाने) दुःखच आहेत. 'भयाच्या अर्थाने' म्हणजे संसारभय पाहणाऱ्यांनी घाबरण्याजोगे असल्याच्या अर्थाने. ज्यांचा विपाक सुखकारक असतो ते 'सुखविपाका' (सुखविपाक) होत. ते त्रिभूमिक कुशल (तेभूमककुसला) होत. 'कुसलसम्मता' (कुशलसंमत) याने स्वभाव सत्यामध्येही हे व्यवहार लोकसंमूर्तीवर (लोकसंमतीवर) आश्रित आहेत, हे स्पष्ट होते. 'सासवा' (सासवाता) म्हणजे आसवांसह (आसवांनी युक्त) असणे. 'संकिलेसिकता' (संक्लेशितता) म्हणजे संक्लेश धर्मांशी संयुक्त असणे. ओघ, योग आणि उपादानांद्वारे प्राप्त होण्याजोगा भाव म्हणजे 'ओघनीय-योगनीय-उपादानीयता' होय. अधिक असलेला आत्मा म्हणजे 'अज्झत्ता' (अध्यात्म). बाहेरील वृक्षातील रूपधर्म हे वृक्षाचा 'आत्मा' म्हणजे साराच्या अर्थाने आहेत. फांदीमधील रूपधर्म हे फांदीचा 'आत्मा' म्हणजे साराच्या अर्थाने आहेत. परंतु सत्त्वाच्या संतानामध्ये (प्रवाहात) समाविष्ट असलेले रूप आणि अरूप धर्म हे तृष्णेच्या दृढ परिग्रहामुळे, त्या बाहेरील आत्म्यापेक्षा अधिक 'आत्मा' या अर्थाने 'अज्झत्ता' (अध्यात्म) अशी लोकसंमूर्ती होते. म्हणूनच 'अज्झत्ततिकं च' (अध्यात्मत्रिक) इत्यादी म्हटले आहे. आणि दुःखनिरोध मार्गभाव, अशी ही चार आर्यसत्ये (अरियसच्च) आहेत, अशी योजना आहे. 'इदमेव' (हेच) म्हणजे हे चतुष्टयच. 'अचलमानं' (अचल) याने 'आर्य' शब्दाचा अर्थ स्पष्ट होतो. त्रिभूमिक धर्मांचे सुखत्व हे चंचल (चल) असते. का? अनित्य धर्म असल्यामुळे. त्या धर्मांना 'सुख' असे मानून स्वतःचे अध्यात्म अंग बनवणारे लवकरच दुःखाला प्राप्त होतात. त्या धर्मांना 'दुःख' असे जाणून त्यांच्यापासून विमुक्त झालेले पुन्हा दुःखाला प्राप्त होत नाहीत. हाच नियम उर्वरित आर्यसत्यांच्या बाबतीतही लागू होतो. 'तेसु' (त्यांच्यामध्ये) इत्यादीमध्ये 'दोन प्रकारची सत्ये आहेत' असे म्हटलेल्या दोन सत्यांमध्ये. 'तेन वृत्तं' (म्हणून म्हटले आहे) इत्यादी प्राप्त गुणांचे वचन आहे. 'यो विना अञ्ञापदेसेन' (जो इतर निर्देश किंवा आधाराशिवाय) यामध्ये 'इतर निर्देश' (अञ्ञापदेसो) म्हणजे आठ धर्मांच्या (अष्टद्रव्यांच्या) समूहाचा आश्रय घेऊन घट-संस्थान (घड्याचा आकार) प्रज्ञापित होतो, पट-संस्थान (वस्त्राचा आकार) प्रज्ञापित होतो; तो आकार स्वतःच्या स्वभावाशिवाय इतर निर्देशाद्वारे सिद्ध होतो. जीवन चालवणारी आणि विचार करणारी क्रिया अस्तित्वात आहे, ज्याला 'चित्त' म्हटले जाते. ती इतर निर्देशाद्वारे सिद्ध होत नाही, तर स्वतःच्या स्वभावानेच सिद्ध होते. हाच नियम स्पर्शक्रिया (फुसनक्रिया), वेदनक्रिया (वेदयितक्रिया) इत्यादींच्या बाबतीतही आहे. हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'जो इतर निर्देश किंवा आधाराशिवाय' इत्यादी म्हटले आहे. 'चित्तेन परिकप्पेत्वा' (चित्ताने परिकल्पना करून) म्हणजे मनोविज्ञान चित्ताने अविद्यमान (अस्तित्वात नसलेल्या) आकाराला विद्यमान (अस्तित्वात असलेले) करून. 'सविग्गहं कत्वा' (सविग्रह करून) म्हणजे शरीर धारण करून, म्हणजेच वस्तूला द्रव्याने युक्त करून, असे म्हटले आहे. 'चित्तमयो चित्तनिम्मितो' (चित्तमय आणि चित्तनिर्मित) म्हणजे स्वप्नात दिसणाऱ्या रूपांप्रमाणे चित्ताने बनवलेले, चित्ताने निर्माण केलेले. स्वभावसिद्ध असलेला 'परमार्थ' का म्हटला जातो? म्हणून 'सो हि' (तोच) इत्यादी म्हटले आहे. 'सन्ति' (आहेत) याने 'अस्' धातूच्या योगाने 'अस्तित्व आहे' हे सिद्ध होते, असे म्हटले आहे. शब्द आणि बुद्धीद्वारे प्राप्त करण्यायोग्य (गम्य) असल्यामुळे त्याला 'अत्हो' (अर्थ) असेही म्हणतात. 'इतरतो' (इतरापेक्षा) म्हणजे परिकल्पनेने सिद्ध झालेल्यापेक्षा. 'परमो' (परम) म्हणजे अधिक (श्रेष्ठ). म्हणूनच 'उक्कंसगतो' (उत्कर्ष प्राप्त झालेला) असे म्हटले आहे. याने 'परम' शब्दाचा अधिक (श्रेष्ठ) अर्थ सांगितला आहे. आता त्याचे उत्तमत्व दर्शवण्यासाठी 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, या बुद्धशासनात पाच मोठी शासनकृत्ये आहेत: अभिज्ञेय (जाणून घेण्यायोग्य) धर्मांचे अभिज्ञान (विशेष ज्ञान), परिज्ञेय (पूर्णपणे समजून घेण्यायोग्य) धर्मांचे परिज्ञान, प्रहातव्य (त्याग करण्यायोग्य) धर्मांचा प्रहाण (त्याग), साक्षात्करणीय (साक्षात्कृत करण्यायोग्य) धर्मांचा साक्षात्कार आणि भावयितव्य (भावना/विकास करण्यायोग्य) धर्मांची भावना (विकास). त्यामध्ये सर्वच परमार्थ धर्म हे 'अभिज्ञेय' आहेत. दुःखसत्य धर्म हे 'परिज्ञेय' आहेत. समुदायसत्य (समुदयसत्य) धर्म हे 'प्रहातव्य' आहेत. श्रामण्यफळे आणि निर्वाण हे 'साक्षात्करणीय' आहेत. मार्गसत्य धर्म हे 'भावयितव्य' आहेत. त्या धर्मांमध्ये त्या कृत्यांच्या सिद्धीने या शासनात शासनकृत्य सिद्ध होते, ते पूर्णत्वास जाते. आणि ते धर्म अशा प्रकारच्या शासनकृत्यांचे अविरोधक आणि अविसंवादक असल्यामुळे उत्तम अर्थाने 'परमार्थ' (परमत्था) ठरतात, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'ये' (जे) अशी योजना आहे. 'अयं' (हा) म्हणजे हा धर्म. 'तस्स' (त्याचा) म्हणजे त्या अभिज्ञेयाचा, त्या परिज्ञेयाचा, त्या प्रहातव्याचा, त्या साक्षात्करणीयाचा आणि त्या भावयितव्याचा, असा संबंध आहे. परमार्थवर्णना समाप्त झाली. ‘‘ตํ นสุนฺทร’’นฺติ พฺยญฺชนโต นสุนฺทรํ. นเกวลํ พฺยญฺชนโตเยว นสุนฺทรํ, อตฺถโตปิ นสุนฺทรเมว. จตุสจฺจ ธมฺมาหิ ปจฺเจกพุทฺธญฺญาณสฺสปิ โคจรา โหนฺติ. ปญฺจเญยฺย ธมฺมา ปน สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺเสว. ตตฺถ จตุสจฺจ ธมฺมา นาม ปรมตฺถ ธมฺมา เอว. ปญฺจเญยฺยธมฺมา ปน สพฺพ ปญฺญตฺติยา สห สพฺพปรมตฺถ ธมฺมา. สพฺพญฺญุพุทฺธานํ จตุสจฺจาภิ สมฺโพโธ ธมฺม ปญฺญตฺติยา สห สิชฺฌติ. ปจฺเจกพุทฺธานํ จตุสจฺจ สมฺโพโธ ธมฺมปญฺญตฺติยา สห นสิชฺฌติ. ตสฺมา เต สยํ ปฏิวิทฺธํ จตุสจฺจ ธมฺมํ นาม ปญฺญตฺตึ นีหริตฺวา ปเรสํ เทเสตุํ น สกฺโกนฺติ. เตสํ จตุสจฺจสมฺโพโธ มูคสฺส สุปินทสฺสนํ วิย โหตีติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. ตสฺมา ปญฺญตฺติยา สห ปญฺจ เญยฺย ธมฺมา เอว สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺส โคจราติ สกฺกาวตฺตุนฺติ. “ते सुंदर नाही” (तं नसुन्दरं) हे व्यंजनाच्या (शब्दाच्या) दृष्टीने सुंदर नाही. केवळ व्यंजनाच्या दृष्टीनेच सुंदर नाही असे नाही, तर अर्थाच्या दृष्टीनेही ते सुंदर नाहीच. कारण चतुःसत्य धर्म हे प्रत्येकबुद्धाच्या ज्ञानाचेही गोचर (विषय) असतात. परंतु पाच ज्ञेय धर्म (पंचज्ञेय धर्म) हे केवळ सर्वज्ञता-ज्ञानाचेच (विषय) असतात. त्यामध्ये चतुःसत्य धर्म म्हणजे केवळ परमार्थ धर्मच होत. परंतु पाच ज्ञेय धर्म हे सर्व प्रज्ञप्तींसह सर्व परमार्थ धर्म आहेत. सर्वज्ञ बुद्धांचा चतुःसत्याचा अभिसंबोध (साक्षात्कार) हा धर्मप्रज्ञप्तीसह सिद्ध होतो. प्रत्येकबुद्धांचा चतुःसत्य संबोध हा धर्मप्रज्ञप्तीसह सिद्ध होत नाही. म्हणून ते स्वतः साक्षात्कृत केलेल्या चतुःसत्य धर्माला प्रज्ञप्तीद्वारे मांडून इतरांना उपदेश करण्यास समर्थ नसतात. त्यांचा चतुःसत्य संबोध हा मुक्या माणसाने पाहिलेल्या स्वप्नासारखा असतो, असे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे. म्हणून, प्रज्ञप्तीसह पाच ज्ञेय धर्म हेच सर्वज्ञता-ज्ञानाचे गोचर आहेत, असे म्हणता येऊ शकते। ปรมตฺถปทวณฺณนา นิฏฺฐิตา. परमार्थपद-वर्णना समाप्त झाली। ๑๓. จิตฺตวจนตฺเถ. นหิ สา อารมฺมเณนวินา ลพฺภติ. จินฺเตตีติ วุตฺเต กึ จินฺเตติ, อารมฺมณํ จินฺเตตีติ เอวํ อารมฺมณภูเตน กมฺมปเทน วินา อสมฺภวโต. ตสฺมา อิธ จินฺตนาติ ทฏฺฐพฺพา, ตสฺมา อสฺส นามํ สิทฺธนฺติ ทฏฺฐพฺพนฺติ สมฺพนฺโธ. สุตมยญฺญาณํ, จินฺตามยญฺญาณ, นฺติ เอตฺถ อารมฺมณสฺส ภูตสภาว จินฺตาปิ อตฺถิ, สาปญฺญาเอวาติ ตํ นิวตฺเตตุํ ‘‘อารมฺมณ…เป… ณูปลทฺธิเยวา’’ติ วุตฺตํ. จิตฺตํ, มโน, มานสํ, วิญฺญาณ, นฺติ สพฺพํ จิตฺตสฺส นามํ. อารมฺมณ ปจฺจยปฺปฏิพทฺธํ โหติ. น อญฺญปจฺจยปฺปฏิพทฺธํ. น จ อญฺญปจฺจเยน ลทฺธํ นามํ. เอวรูปสฺส อารมฺมณ วิชานน สงฺขาตสฺส อตฺถนฺตรสฺสโพธกํ นโหตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘สนฺเตสุ จา’’ติอาทิวุตฺตํ. ‘‘เอเตนา’’ติ อิทํ กตฺตุโน กิริยาสาธเน อติสฺสยูปการกํ กรณ สาธนํ วทตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตญฺหี’’ติอาทิวุตฺตํ. ‘‘จินฺตนมตฺต’’นฺติ เอตฺถ มตฺตสทฺโท วิเสสนิวตฺติ อตฺโถติ, เตน นิวตฺติตํ อตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘สพฺเพปิหี’’ติอาทินา. ‘‘วิคฺคโห วา’’ติ สรีรํ วา. ปจฺจเยน [Pg.38] อายตฺตา ปจฺจยายตฺตา. ‘‘อายตฺตา’’ติ สมฺพนฺธา. วตฺตนํ วุตฺติ. อุปฺปชฺชนํ วา ฐิติ วา. ปจฺจยายตฺตา วุตฺติ เอเตสนฺติ ‘‘ปจฺจยายตฺต วุตฺติโน’’. ‘‘ถาเมนา’’ติอาทิ อญฺญมญฺญเววจนานิ. ‘‘เอกํ ภาวสาธนเมว ปธานโต ลพฺภตี’’ติ อิทํ ธมฺมานํ ตํ ตํ กิริยา มตฺตภาวํ สนฺธาย วุตฺตํ. กิริยามตฺตภูตาปิ ปน เต ธมฺมาสยํ นานาปจฺจยา วตฺถายํ ฐิตา วา โหนฺติ นานาปจฺจยุปฺปนฺนาวตฺถายํ ฐิตา วา. ตสฺมา ปรมตฺถ ปเทสุปิ ยถารหํ ตทญฺญสาธนานํ ปฏิลาโภ อวาริโต โหติ. อิตรถา เหตุ ปจฺจโย, อารมฺมณ ปจฺจโย, สหชาตปจฺจโย, นิสฺสยปจฺจโยติอาทีสุ กถํ ภาวสาธนํ ยุตฺตํ สิยาติ. ‘‘ปธานโต’’ติ มุขฺยโต. ‘‘อเภทสฺส จินฺตนสฺสเภทกรณ’’นฺติ อิทํ จินฺเตตีติ จิตฺตนฺติกตํ กตฺตุสาธนํ สนฺธาย วุตฺตํ. ‘‘สิลาปุตฺตกสฺสา’’ติ เภสชฺชมูลานํ ปิสนสิลาโปตกสฺส. ตสฺส สรีรํ นาม วิสุํ องฺคํ นตฺถิ. อภินฺนํปิ ภินฺนํ กตฺวา วุจฺจติ ‘‘สิลาปุตฺตกสรีร’’นฺติ. อิทํ อเภทสฺสเภทกรณํ นาม อภูตรูปํ โหติ. ปโยชเน สติ วตฺตพฺพํ, อสติ น วตฺตพฺพนฺติ อาห ‘‘ตถากรณญฺจา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ปรปริกปฺปิตสฺสา’’ติ ปเรหิ อญฺญติตฺถา จริเยหิ ปริจินฺติตสฺส. ‘‘สติหิ…เป… กปฺปนายา’’ติ สเจ อตฺตา อตฺถิ, อตฺตา จินฺเตติ, ตสฺมา อตฺตา จิตฺโตนามาติอาทิ วตฺตพฺพํ. น วตฺตพฺพํ จินฺเตตีติ จิตฺตนฺติ, จิตฺตสฺส กิริยามตฺตตฺตา. น ปน อตฺตาทิโก กตฺตา นาม อตฺถิ. ตสฺมา กิริยา มตฺตเมว กตฺตารํ กตฺวา ‘‘จินฺเตตีติ จิตฺต’’นฺติ วุตฺตํ. เตน วิญฺญายติโลเก อตฺตาทิโกกตฺตา นาม นตฺถีติ. อิทํ อเภทสฺสเภท ปริกปฺปนาย ปโยชนนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อตฺตปฺปธาโน’’ติ กิริยาสาธเน พหูนํการกานํ มชฺเฌ สยํปธาโน สยํเชฏฺฐโก หุตฺวา. ‘‘ตํกตฺตุภาว’’นฺติ โลเกสิทฺธํ กตฺตุภาวํ. ‘‘ปุน กรณภาว’’นฺติ ปุน โลเก สิทฺธํ กรณภาวํ. เอวํ จิตฺตสฺส วจนตฺถํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตสฺส อภิธานตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อปิเจตฺถา’’ติอาทิมาห. ยถยิทํ เย อิเม ติรจฺฉานคตา ปาณา จิตฺตาวิจิตฺตา. เอวํ จิตฺตํ วิจิตฺตํ ยํ อญฺญํ อตฺถิ, ตํ อญฺญํ เอกนิกายํปิ นสมนุปสฺสามี-ติ โยชนา. ‘‘นิกาย’’นฺติ สตฺตชาติสมู หํ[Pg.39].‘‘นิสฺสกฺเก กรณวจน’’นฺติ วิภตฺตาปาทานตฺเถ กรณวจนํ. เอเตน ตโต จรณโต จิตฺตโตติ อตฺถํ วทติ. คาถายํ. ‘‘ตํ ตํ สภาโว’’ติ วิชานนผุสนาทิโก สภาโว, อคฺคิสฺสอุณฺโหวิย. ‘‘กิจฺจสมฺปตฺติโยรโส’’ติ เตน เตน ธมฺเมน กรณกิจฺจญฺจ, ตํ กิจฺจํ กตฺวา ลทฺโธ สมฺปตฺติคุโณ จ. อคฺคิสฺส วตฺถุมฺหิ ปริปาจนกิจฺจํ วิย, โอภาสนคุโณวิย จ. ‘‘คยฺหากาโร’’ติ ญาเณน คเหตพฺโพ ตสฺส ตสฺส ธมฺมสฺส ธชภูโต อากาโร. สมฺปตฺติ รโสเยว วุจฺจติ. ‘‘ผลํวาปี’’ติ การิยปฺผลํ วาปิ, อคฺคิสฺส ธูโมวิย. ‘‘อาสนฺนการณ’’นฺติ อตฺตโน อนนฺตเร ผลนิพฺพตฺตกํ การณํ, อคฺคิสฺส อคฺคิการก ปุริโส วิย. ‘‘อล’’นฺติ สมตฺถา. ‘‘วิพุทฺธิโน’’ติ วิเสสพุทฺธิ สมฺปนฺนสฺส ปณฺฑิตสฺส. ‘‘ปุพฺพงฺคมรส’’นฺติ อารมฺมณคฺคหเณ ปธานรส กิจฺจํ. ‘‘สนฺธาน ปจฺจุปฏฺฐาน’’นฺติ นิรนฺตรปฺปวตฺตาการปจฺจุปฏฺฐานํ. ‘‘นาม รูปปทฏฺฐาน’’นฺติ ผสฺสาทินามญฺจ วตฺถุ รูปญฺจจิตฺตสฺสปทฏฺฐานํ. १३. ‘चित्त’ या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत: कारण ते (चित्त) आलंबनाशिवाय (विषयाशिवाय) प्राप्त होत नाही. ‘विचार करतो’ (चिंतेति) असे म्हटले असता ‘काय विचार करतो?’, ‘आलंबनाचा विचार करतो’ अशा प्रकारे आलंबनरूप कर्मपदाशिवाय ते असंभव असल्यामुळे. म्हणून येथे ‘चिंतन’ (विचार करणे) असे समजले पाहिजे, म्हणून त्याचे नाव सिद्ध होते असे समजले पाहिजे, असा संबंध आहे. ‘श्रुतमय ज्ञान’, ‘चिंतामय ज्ञान’ यामध्ये आलंबनाच्या वास्तविक स्वभावाचे चिंतन देखील असते, आणि ती प्रज्ञाच आहे, हे स्पष्ट करण्यासाठी आणि इतर गोष्टींचे निवारण करण्यासाठी “आलंबन...पे... केवळ उपलब्धीच” (आलंबण...पे... णूपलब्धियेव) असे म्हटले आहे. चित्त, मन, मानस, विज्ञान हे सर्व चित्ताचेच नाव आहे. ते आलंबन-प्रत्ययावर (कारणावर) अवलंबून असते. इतर प्रत्ययावर अवलंबून नसते. आणि इतर प्रत्ययाने प्राप्त झालेले हे नाव नाही. अशा प्रकारच्या आलंबन-विजानन (जाणून घेणे) संज्ञेच्या इतर अर्थाचा बोध करून देणारे ते नाही, हे दर्शवण्यासाठी “सन्तेसु च” इत्यादी म्हटले आहे. “एतेन” (याद्वारे) हे कर्त्याच्या क्रियासाधनात अत्यंत उपकारक असणारे ‘करण साधन’ सांगते, हे दर्शवण्यासाठी “तञ्हि” इत्यादी म्हटले आहे. “चिंतनमात्र” (चिंतनमत्तं) यामध्ये ‘मात्र’ शब्द विशेष-निवृत्तीच्या अर्थात आहे, त्याद्वारे निवृत्त केलेला अर्थ “सब्बेपिहि” इत्यादींद्वारे दर्शवला आहे. “विग्गहो वा” म्हणजे शरीर किंवा. प्रत्ययावर (कारणावर) आश्रित असणारे ते ‘प्रत्ययायत्त’. “आयत्ता” म्हणजे संबंध. वर्तन म्हणजे वृत्ती. उत्पन्न होणे किंवा टिकून राहणे. प्रत्ययावर आश्रित वृत्ती ज्यांची आहे ते “प्रत्ययायत्तवृत्ती” (पच्चयायत्तवुत्तिनो). “थामेन” इत्यादी एकमेकांचे समानार्थी शब्द आहेत. “एक भावसाधनच प्रामुख्याने प्राप्त होते” हे धर्मांच्या त्या त्या क्रियामात्रभावाला उद्देशून म्हटले आहे. क्रियामात्र झालेले असूनही ते धर्म स्वतः विविध प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) अवस्थेत स्थित असतात किंवा विविध प्रत्ययांनी उत्पन्न झालेल्या अवस्थेत स्थित असतात. म्हणून परमार्थ पदांमध्येही योग्यतेनुसार इतर साधनांची प्रााप्ती निषिद्ध नाही. अन्यथा हेतू-प्रत्यय, आलंबन-प्रत्यय, सहजात-प्रत्यय, निश्रय-प्रत्यय इत्यादींमध्ये भावसाधन कसे योग्य ठरेल? “प्रधानतो” म्हणजे प्रामुख्याने. “अभिन्न अशा चिंतनाचा भेद करणे” हे ‘विचार करतो ते चित्त’ (चिंतेति चित्तं) या कर्तृसाधनाला उद्देशून म्हटले आहे. “सिलापुत्तकस्स” म्हणजे औषधी वनस्पतींची मुळे वाटण्याच्या पाटा-वरवंट्यातील वरवंट्याचे. त्याचे शरीर नावाचा वेगळा अवयव नसतो. अभिन्न असूनही भेद करून “वरवंट्याचे शरीर” (सिलापुत्तक-सरीरं) असे म्हटले जाते. हे ‘अभिन्नतेमध्ये भेद करणे’ काल्पनिक (अभूतरूप) असते. प्रयोजन असेल तरच बोलावे, नसताना बोलू नये, म्हणून “तथाकरणञ्च” इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये “परपरिकप्पितस्स” म्हणजे इतरांनी, इतर पंथांच्या आचार्यांनी कल्पिलेल्या. “सतिहि...पे... कप्पनाय” म्हणजे जर आत्मा असेल, आत्मा विचार करतो, म्हणून आत्म्याला चित्त म्हणावे इत्यादी बोलले पाहिजे. ‘विचार करतो ते चित्त’ असे बोलू नये, कारण चित्त हे केवळ क्रियामात्र आहे. परंतु आत्मा इत्यादी नावाचा कोणी कर्ता अस्तित्वात नाही. म्हणून क्रियामात्रालाच कर्ता मानून “विचार करतो ते चित्त” (चिंतेति चित्तं) असे म्हटले आहे. यावरून हे समजते की जगात आत्मा इत्यादी नावाचा कोणी कर्ता नाही. हे अभिन्नतेमध्ये भेद कल्पिण्याचे प्रयोजन आहे, असे म्हटले आहे. “अत्तप्पधानो” म्हणजे क्रियासाधनात अनेक कारकांमध्ये स्वतः प्रधान, स्वतः ज्येष्ठ होऊन. “तंकत्तुभावं” म्हणजे लोकात सिद्ध असलेला कर्तृभाव. “पुन करणभावं” म्हणजे पुन्हा लोकात सिद्ध असलेला करणभाव. अशा प्रकारे चित्ताचा शब्दार्थ दर्शवून, आता त्याचा अभिधेय अर्थ (वाच्यार्थ) दर्शवताना “अपिचेत्थ” इत्यादी म्हटले आहे. जसे की, हे जे तिर्यक योनीतील (प्राण्यांचे) प्राणी आहेत, ते चित्तविचित्र (विविध चित्त असलेले) आहेत. अशा प्रकारे चित्त विचित्र आहे, जे इतर आहे, त्या इतर एकाही समूहाला (निकायला) मी पाहत नाही, अशी योजना आहे. “निकाय” म्हणजे प्राण्यांच्या जातींचा समूह. “निस्सक्के करणवचनं” म्हणजे अपादान अर्थातील तृतीया विभक्ती (करण वचन). यावरून ‘त्या आचरणापासून, चित्तापासून’ असा अर्थ होतो. गाथेमध्ये: “तं तं सभावो” म्हणजे जाणून घेणे, स्पर्श करणे इत्यादी स्वभाव, जसे अग्नीचा उष्ण स्वभाव. “किच्चसम्पत्तियोorसो” म्हणजे त्या त्या धर्माचे कार्य (करणकृत्य) आणि ते कार्य करून प्राप्त झालेला समृद्धीचा गुण. जसे अग्नीचे वस्तू शिजवण्याचे कार्य आणि प्रकाश देण्याचा गुण. “गय्हाकारो” म्हणजे ज्ञानाने ग्रहण करण्याजोगा त्या त्या धर्माचा ध्वजभूत आकार. त्यालाच ‘संपत्ती रस’ म्हटले जाते. “फलंवापि” म्हणजे कार्याचे फळ देखील, जसे अग्नीचा धूर. “आसन्नकारणं” म्हणजे स्वतःच्या लागलीच नंतर फळ उत्पन्न करणारे कारण, जसे अग्नी निर्माण करणारा माणूस. “अलं” म्हणजे समर्थ. “विबुद्धिनो” म्हणजे विशेष बुद्धीने संपन्न असलेल्या पंडिताचे. “पुब्बङ्गमरसो” म्हणजे आलंबन ग्रहण करण्यातील मुख्य कार्य (रस). “सन्धान पच्चुपट्ठानं” म्हणजे निरंतर प्रवृत्तीच्या आकाराचे उपस्थान (प्रकट होणे). “नामरूपपदट्ठानं” म्हणजे स्पर्श इत्यादी नाम आणि वस्तू रूप हे चित्ताचे पदस्थान (तात्कालिक कारण) आहे। จิตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. चित्त-वर्णना समाप्त झाली। ๑๔. ‘‘เจตสิ ภว’’นฺติ จิตฺตสฺมึ ปาตุภูตํ. ‘‘เอเตน สิทฺธา โหนฺตี’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สา เอว ผสฺสาทีนํ ชาติ. ยาจิตฺตสฺสชรา, สา เอว ผสฺสาทีนํชรา’’ติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘เอกวณฺฏูปนิ พนฺธานี’’ติ เอเกน วณฺฏทณฺฑเกน อุปนิพนฺธานิ. ‘‘เอกชาติยาทิ อุปนิพนฺธา’’ติ เอกชาติกถา ทิวเสน อุปนิพนฺธา. ‘‘เจ’’ติ เจวเทยฺย. ‘‘นา’’ติ น วตฺตพฺพํ. คาถายํ. ‘‘ธมฺมา’’ติ นามกฺขนฺธ ธมฺมา. ‘‘มนสา เอวา’’ติ กตฺตุภูเตน มเนน เอว. ‘‘ปกตา’’ติ ปวตฺติตา. ‘‘นิมฺมิตา’’ติ นิปฺผาทิตา. ‘‘จิตฺตกิริยา ภูตา เอวา’’ติ อารมฺมณํ วิชานนฺตํ จิตฺตํ ผุสนาการํ ชเนตฺวาว วิชานาติ. โส ผุสนากาโร ผสฺโสติ วุจฺจติ. อวเสสา ปน สพฺเพปิ เจตสิกธมฺมา ผสฺสํ ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชนฺติ. ผสฺโส เหตุ ผสฺโส ปจฺจโย เวทนากฺขนฺธสฺส อุปาทาย. สญฺญากฺขนฺธสฺส. สงฺขารกฺขนฺธสฺส อุปาทายาติ หิ วุตฺตํ. เอวํ สนฺเตปิ จิตฺตมูลกตฺตา จิตฺตนิสฺสิตตฺตา จ เตปิธมฺมา จิตฺตกิริ ยาภูตา [Pg.40] เอว โหนฺตีติ. ‘‘เอเตนา’’ติ เอเตนคาถาปเทน. วิภาวนิยํ ปน เอกาลมฺพณตา มตฺเตน วิภาเวติ. ปริปุณฺณานิ เจ ตสิกงฺคานิ อุปริ เถเรน สยเมว วกฺขมานตฺตาติ อธิปฺปาโย. อิธ ปน ปทตฺถวิภาวนฏฺฐานตฺตา ปริปุณฺเณหิ องฺเคหิ วิภาเวตุํ วฏฺฏตีติ อาห ‘‘ตํ นสุนฺทร’’นฺติ. ‘‘วตฺถุมฺหี’’ติ ปฏโกฏฺฐกาทิมฺหิ. ‘‘นานาจิตฺตกมฺมานี’’ติ หตฺถิ อสฺสรูปาทีนิ. วิชานนมตฺตํ จิตฺตํ, กุสลนฺติ วา อกุสลนฺติ วา วตฺตพฺพํ นตฺถิ. นานาเจตสิเก หิ ยุตฺตตฺตา เอว ตถา วตฺตพฺพํ โหติ. วุตฺตํเหตํ ภควตา. ปภสฺสรมิทํ ภิกฺขเว จิตฺตํ. ตญฺจ โข อาคนฺตุเกหิ อุปกฺกิเลเสหิ อุปกฺกิลิฏฺฐนฺติ. เตนาห ‘‘อุทกํ วิยจิตฺต’’นฺติอาทึ. १४. “चेतसि भव” म्हणजे चित्तात प्रकट झालेले. “याने सिद्ध होतात” असा संबंध आहे. “तीच स्पर्श इत्यादींची उत्पत्ती (जाती) आहे. जी चित्ताची जरा (वृद्धत्व) आहे, तीच स्पर्श इत्यादींची जरा आहे” इत्यादी प्रकारे योजना करावी. “एकवण्टूपनिबंधानि” म्हणजे एकाच देठाने बांधलेले. “एकजातियादि उपनिबंधा” म्हणजे एकाच जातीच्या कथेच्या दिवसाने बांधलेले. “चे” म्हणजे जर द्यावे. “ना” म्हणजे बोलू नये. गाथेमध्ये. “धम्मा” म्हणजे नामस्कंध धर्म. “मनसा एव” म्हणजे कर्ता झालेल्या मनानेच. “पकता” म्हणजे प्रवृत्त केलेले. “निम्मिता” म्हणजे निष्पादित केलेले. “चित्तक्रिया भूता एव” म्हणजे आलंबन जाणणारे चित्त स्पर्शाचा आकार उत्पन्न करूनच जाणते. तो स्पर्शाचा आकार 'स्पर्श' (फस्स) म्हटला जातो. उर्वरित सर्वच चैतसिक धर्म स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न होतात. “स्पर्श हा हेतू आहे, स्पर्श हा प्रत्यय आहे, वेदनास्कंधाच्या उत्पत्तीसाठी, संज्ञास्कंधाच्या, संस्कारस्कंधाच्या उत्पत्तीसाठी” असे म्हटले आहे. असे असतानाही, चित्तमूलक असल्यामुळे आणि चित्तावर आश्रित असल्यामुळे ते धर्म चित्तक्रियास्वरूपच होतात. “एतेन” म्हणजे या गाथापदाने. विभावनीमध्ये (टीकेमध्ये) केवळ एकाच आलंबनाच्या भावाने स्पष्ट केले आहे. परिपूर्ण चैतसिक अंग पुढे थेरांनी स्वतःच सांगायचे असल्यामुळे हा अभिप्राय आहे. परंतु येथे पद-अर्थ स्पष्ट करण्याचे स्थान असल्यामुळे परिपूर्ण अंगांनी स्पष्ट करणे योग्य आहे, म्हणून “ते सुंदर (योग्य) नाही” असे म्हटले आहे. “वत्थुम्ही” म्हणजे कापड, भिंत इत्यादींवर. “नानाचित्तकम्मानि” म्हणजे हत्ती, घोडे इत्यादींची विविध चित्रे. केवळ जाणणे हे चित्त आहे, ते कुशल आहे की अकुशल आहे असे म्हणता येत नाही. कारण विविध चैतसिकांशी युक्त असल्यामुळेच तसे म्हणावे लागते. भगवंतांनी असे म्हटलेच आहे - “भिक्खूहो, हे चित्त प्रभास्वर (तेजस्वी) आहे. आणि ते आगंतुक उपक्किलेशांनी (मळांनी) मलीन होते.” म्हणूनच “पाण्याप्रमाणे चित्त” इत्यादी म्हटले आहे. เจตสิกวณฺณนา นิฏฺฐิตา. चैतसिक वर्णन समाप्त झाले. ๑๕. รุปฺปตีติ ปทํ กตฺตริวาเหตุกมฺมนิวาสิทฺธํ. รุปฺปนญฺจวิการาปตฺติ เอวาติ ทสฺเสตุํ ‘‘สีตุณฺหาทีหี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘วิสมปฺปวตฺติวเสนา’’ติ ธาตูนํ วิสมปฺปวตฺติวเสน. ธาตุกฺโข ภวเสนาติ วุตฺตํ โหติ, ‘‘เกนรุปฺปตี’’ติ เอตฺถ ‘‘เกนา’’ติ เหตุ อตฺเถวา เหตุ กตฺตริวา กรณวจนํ ทฏฺฐพฺพํ. ตถา สีเตนาติอาทีสุปิ. ฑํสมกสา นาม สูจิมุขา ขุทฺทกมกฺขิกาเจว มหนฺต มกฺขิกา จ. วาตา นาม ปุรตฺถิมวาตาทโย. อาตโป นาม สูริยาตโป. สรึสปานาม อหิ วิจฺฉิก สตปทิกาทโย. เตสํ สมฺผสฺเสหิปิ รุปฺปติ. มรณํ วา คจฺฉติ, มรณ มตฺตํ วา ทุกฺขํ. ‘‘เย ธมฺมา’’ติ ทฺวาทสวิธา สปฺปฏิฆรูปธมฺมา. ‘‘อญฺเญส’’นฺติ โสฬสนฺนํ อปฺปฏิฆรูปานญฺจ อรูปธมฺมานญฺจ. ‘‘เตสู’’ติ นิทฺธารเณภุมฺมํ. อิทานิ ปาฬิยา สทฺธึ มุขฺยรุปฺปนํ สํสนฺเทนฺโต ‘‘สมาคโม จา’’ติอาทิมาห. สมาคโม จ นาม อญฺญมญฺญาภิฆฏฺฏนํ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. อาปาตาคมนญฺจ อารมฺมณกรณญฺจ ฐเปตฺวาติ โยชนา. ‘‘มหาภูตานเมว วา’’ติ อาโปธาตุ วชฺชิตานํ ติณฺณํ มหาภูตานเมว วา. ‘‘วิการํ อาปชฺชตี’’ติ วตฺวา ตเมวตฺถํ วิวรนฺโต ‘‘ยสฺมึ ขเณ’’ติอาทิมาห. ‘‘สยํปิ วิการปตฺตา โหนฺตี’’ติ [Pg.41] เตมหาภูตาสยํปิ ปกตึ วิชหิตฺวา โอมตฺตาธิมตฺตภาวํ ปาปุณนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘โอมตฺตาธิมตฺตรูปสนฺตตีนญฺจา’’ติ ปรมฺปรโต อุปฺปชฺชมานา รูปสนฺตติโย สนฺธาย วุตฺตํ. เอวํ ปาฬินเยน วิปตฺติวเสน รุปฺปนํ วตฺวา อิทานิ วิปตฺติ วา โหตุ, สมฺปตฺติ วา. ปุริมปจฺฉิ มสนฺตตีนํ วิสทิสปฺปวตฺติภูโต วิกาโรปิ เอเกน ปริยาเยน รุปฺปนํนามาติ กตฺวา ปุน ตํ รุปฺปนํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อปิเจตฺถา’’ติอาทิมาห. ‘‘ฆฏฺฏนวเสน รุปฺปน ธมฺมาน เมวา’’ติ อาปาตาคมนาทิวเสน รุปฺปนธมฺเมหิวินา อภิฆฏฺฏนวเสนรุปฺปน สภาวานํ รูปธมฺมานเมว สิทฺธนฺติ ปุจฺฉา. ‘‘สวิคฺคหา โหนฺตี’’ติ ทพฺพ สณฺฐานาการสหิตา โหนฺติ. กสฺมา, โอฬาริกสภาวตฺตา. พหูนญฺจรูปกลาปานํ เอกกฺขเณ เอกาพทฺธภาเวนปวตฺตตฺตา. อรูปธมฺมาหิ สณฺหสุขุมสภาวา จ โหนฺติ. สเจ อเนกสตสหสฺสานิปิ เอกโต ปวตฺเตยฺยุํ. ทพฺพสณฺฐานภาวํ นคมิสฺสนฺติเยว. เอกสฺมิญฺจ สตฺตสนฺตาเน เอกกฺขเณ เอก กลาโปว ปวตฺตติ. กสฺมา, อนนฺตร ปจฺจยูปนิพนฺเธน ปวตฺตตฺตา. ตสฺมาเต สวิคฺคหาน โหนฺติ. รูปธมฺมา ปน โอฬาริก สภาวา จ โหนฺติ. พหูนํ สนฺนิจเยสติ ทพฺพสณฺฐานตฺถาย สํวตฺตนฺติ. เอกกฺขเณ จ พหุกลาปาปิ เอกาพทฺธาหุตฺวา ปวตฺตนฺติ. ตสฺมา เตสวิคฺคหาโหนฺตีติ. १५. “रुप्पति” (बाधित होते) हे पद कर्ता किंवा हेतुकर्मभावात सिद्ध होते. आणि 'रुप्पन' (बाधित होणे) म्हणजे विकार पावणेच होय, हे दर्शवण्यासाठी “शीत, उष्ण इत्यादींनी” असे म्हटले आहे. तेथे “विषमप्रवृत्तीच्या वशाने” म्हणजे धातूंच्या विषम प्रवृत्तीमुळे. धातूंच्या क्षोभामुळे असे म्हटले आहे, “कशाने बाधित होते?” येथे “कशाने” (केण) हे हेतू अर्थी किंवा कर्ता अर्थी तृतीया विभक्तीचे (करणवाचक) रूप समजावे. तसेच “शीताने” (थंडीने) इत्यादींमध्येही. 'दंसमकसा' (डास व माश्या) म्हणजे सुईसारखे तोंड असणाऱ्या लहान माश्या आणि मोठ्या माश्या. 'वाता' (वारा) म्हणजे पूर्व दिशेचा वारा इत्यादी. 'आतपो' (ऊन) म्हणजे सूर्याचे ऊन. 'सरिसपा' (सरपटणारे प्राणी) म्हणजे साप, विंचू, पैसा (शंभर पायांचा कीडा) इत्यादी. त्यांच्या स्पर्शानेही बाधित होते. किंवा मृत्यू पावते, अथवा मृत्यूतुल्य दुःख होते. “ये धम्मा” (जे धर्म) म्हणजे बारा प्रकारचे सप्रतिघ रूपधर्म. “अन्यांचे” (अञ्ञेसं) म्हणजे सोळा अप्रतिघ रूपांचे आणि अरूप धर्मांचे. “त्यांच्यामध्ये” (तेसू) हे निर्धारण अर्थी सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. आता पाळी भाषेसोबत मुख्य बाधनाचा (रुप्पन) मेळ घालताना “समागम आणि...” इत्यादी म्हटले आहे. 'समागम' म्हणजे परस्परांचे संघट्टन (धडकणे) म्हटले जाते, असा संबंध आहे. विषयाचे समोर येणे आणि आलंबन करणे सोडून, अशी योजना आहे. “किंवा महाभूतांचेच” म्हणजे आपोधातू (जलधातू) वगळता इतर तीन महाभूतांचेच. “विकार पावते” असे सांगून त्याच अर्थाचे विवरण करताना “ज्या क्षणी” इत्यादी म्हटले आहे. “स्वतःही विकार पावतात” म्हणजे ती महाभूते स्वतःही आपली मूळ प्रकृती सोडून कमी किंवा अधिक भावाला प्राप्त होतात, असा अर्थ आहे. “कमी-अधिक रूपसंततींचे” हे परंपरेने उत्पन्न होणाऱ्या रूपसंततींच्या संदर्भात म्हटले आहे. अशा प्रकारे पाळीच्या नियमाने विपत्तीच्या वशाने बाधित होणे (रुप्पन) सांगून, आता विपत्ती असो वा संपत्ती असो. पूर्व आणि उत्तर संततींच्या विषम प्रवृत्तीरूप विकारही एका पर्यायाने 'रुप्पन' (बाधित होणे) च आहे, असे मानून पुन्हा ते बाधन दर्शवताना “शिवाय येथे...” इत्यादी म्हटले आहे. “संघट्टनाच्या वशाने बाधित होणाऱ्या धर्मांचेच” म्हणजे विषयाच्या समोर येणे इत्यादी वशाने बाधित होणाऱ्या धर्मांशिवाय, केवळ संघट्टनाच्या वशाने बाधित होण्याचा स्वभाव असणाऱ्या रूपधर्मांचीच सिद्धी होते का? असा प्रश्न आहे. “सविग्गहा होन्ति” (साकार असतात) म्हणजे द्रव्य, संस्था (आकार) आणि आकृतीने युक्त असतात. का? कारण ते ओळारिक (स्थूल) स्वभावाचे असतात. आणि अनेक रूपकलापांच्या एकाच क्षणी एकमेकांशी बद्ध होऊन प्रवृत्त होण्यामुळे. कारण अरूप धर्म हे सूक्ष्म आणि अतिसूक्ष्म स्वभावाचे असतात. जरी अनेक लाखो अरूप धर्म एकत्र प्रवृत्त झाले, तरी ते द्रव्य किंवा आकाराच्या भावाला प्राप्त होणारच नाहीत. आणि एका सत्त्वाच्या संततीमध्ये एका क्षणी एकच कलाप प्रवृत्त होतो. का? कारण ते अनंतर प्रत्ययाच्या संबंधाने प्रवृत्त होतात. म्हणून ते साकार (सविग्रह) नसतात. परंतु रूपधर्म हे स्थूल स्वभावाचे असतात. अनेक रूपधर्मांचा संचय झाला असता ते द्रव्याच्या आकारासाठी कारणीभूत ठरतात. आणि एकाच क्षणी अनेक कलापही एकमेकांशी बद्ध होऊन प्रवृत्त होतात. म्हणून ते साकार (सविग्रह) असतात. ‘‘สีตาทิคฺคหณสามตฺถิเยนา’’ติ สีเตนปิ รุปฺปติ, อุณฺเหนปิ รุปฺปตีติอาทินา โลกสฺส ปจฺจกฺขโต ปากฏสฺส สีตาทิวจนสฺสสามตฺถิเยน. ตญฺหิ วจนํ โลกสฺส อปากฏํ อรูปธมฺมานํ รุปฺปนํ อิธนาธิปฺเปตนฺติ ทีเปตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘โวหาโร นามา’’ติ นามสญฺญา นามาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘โลโกปจาเรนา’’ติ พหุชนสฺส อุปจาเรน โวหาเรน กถเนน. ‘‘ปากฏ นิมิตฺตวเสเนวา’’ติ ปากฏสฺส สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตสฺส วเสเนว. ‘‘สีตาทิคฺคหเณน วินาปี’’ติ ปิสทฺเทน สีตาทิคฺคหณสามตฺถิเยนปีติ ทีเปติ. เอวํ สนฺเตปิ ปาฬิสาธกํ นาม น สกฺกาสพฺพตฺถ ลทฺธุํ. ปากฏนิมิตฺต วจนเมว สพฺพตฺถ สาธารณนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘ตปฺปสงฺคนิวตฺตี’’ติ ตสฺส อรูปธมฺมานํ รูปตาปสงฺคสฺส นิวตฺติ. ‘‘อิทฺธิวิกุพฺพนาวสปฺปวตฺตา’’ติ เอตฺถ อิทฺธิวิกุพฺพนานามอิทฺธิยานานปฺปการมาปนํ. ‘‘รูปตา สิทฺธี’’ติ [Pg.42] รูปนฺติ นาม สญฺญาสิทฺธิ. ‘‘อิทํ ปนา’’ติ อิทํ รูปํ ปน. ‘‘อนุคฺคหานํ สีตาทีนํ วเสนา’’ติ กิญฺจาปิปาฬิยํ สีตาทิวจนํ อุปฆาตกานํ สีตาทีนํ วเสน วุตฺตํ. เตจ พฺรหฺมโลเก นตฺถิ. อนุคฺคาหกา เอว อตฺถิ. เตสํวเสนาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปาฬิยํ นิทฺทิฏฺฐานี’’ติ สญฺชานาตีติ โข ภิกฺขเว ตสฺมา สญฺญาติ วุจฺจติ. กิญฺจ สญฺชานาติ. นีลํปิ สญฺชานาติ, ปีตมฺปิ สญฺชานาตี-ติอาทินา จ, วิชานาตีติ โข ภิกฺขเว ตสฺมา วิญฺญาณนฺติ วุจฺจติ. กิญฺจ วิชานาติ. มธุรํปิ วิชานาติ, อมฺพิลํปิ วิชานาตี-ติอาทินา จ-ปาฬิยํ นิทฺทิฏฺฐานิ. “शीतादिग्रहणाच्या सामर्थ्याने” (सीतादिग्गहणसामत्थियेन) म्हणजे 'थंडीनेही पीडित होतो, उष्णतेनेही पीडित होतो' इत्यादी प्रकारे लोकांना प्रत्यक्षपणे प्रकट असलेल्या 'शीत' इत्यादी शब्दांच्या सामर्थ्याने. कारण ते वचन जगाला अप्रकट असलेल्या अरूप धर्मांचे (अमूर्त घटकांचे) पीडित होणे (रुप्पन) येथे अभिप्रेत नाही, हे दर्शवते असा अभिप्राय आहे. “व्होहारो नाम” (व्यवहार नाम) म्हणजे नामसंज्ञा असे म्हटले आहे. “लोकोपचारेण” म्हणजे बहुजनांच्या व्यवहाराने, बोलण्याने. “प्रकट निमित्ताच्या वशानेच” म्हणजे प्रकट असलेल्या शब्दाच्या प्रवृत्तीच्या निमित्ताच्या वशानेच. “शीतादिग्रहणाशिवाय सुद्धा” यातील 'सुद्धा' (अपि) शब्दाने 'शीतादिग्रहणाच्या सामर्थ्याने सुद्धा' हे दर्शवले जाते. असे असले तरी, पाळी भाषेतील साधक (प्रमाण) सर्व ठिकाणी मिळणे शक्य नाही. प्रकट निमित्त असलेले वचनच सर्व ठिकाणी साधारण (समान) आहे असे समजावे. “तप्पसंगनिवत्ती” म्हणजे त्या अरूप धर्मांच्या 'रूप' असण्याच्या प्रसंगाची निवृत्ती. “इद्धिविकुब्बनावशप्पवत्ता” येथे 'इद्धिविकुब्बना' (ऋद्धिविकुर्वण) म्हणजे ऋद्धीच्या विविध प्रकारांचे प्रकटीकरण करणे. “रूपता सिद्धी” म्हणजे 'रूप' अशी नामसंज्ञा सिद्ध होणे. “परंतु हे” (इदं पन) म्हणजे परंतु हे रूप. “अनुग्राहक शीत इत्यादींच्या वशाने” म्हणजे जरी पाळीमध्ये 'शीत' इत्यादी शब्द उपघातक (पीडा देणाऱ्या) शीत इत्यादींच्या वशाने म्हटले असले, तरी ते ब्रह्मलोकात नाहीत. तेथे केवळ अनुग्राहक (अनुकूल) शीत इत्यादीच आहेत; त्यांच्या वशाने, असा अभिप्राय आहे. “पाळीमध्ये निर्दिष्ट केले आहे” म्हणजे 'भिक्खूहो, जे संजाणते (ओळखते) म्हणून त्याला संज्ञा (सञ्ञा) म्हटले जाते. काय संजाणते? निळेही संजाणते, पिवळेही संजाणते...' इत्यादी प्रकारे, आणि 'भिक्खूहो, जे विजाणते (विशेष रूपाने जाणते) म्हणून त्याला विज्ञान (विञ्ञाण) म्हटले जाते. काय विजाणते? गोडही विजाणते, आंबटही विजाणते...' इत्यादी प्रकारे पाळीमध्ये निर्दिष्ट केले आहे. รูปปทวณฺณนา นิฏฺฐิตา. रूपपदाचे वर्णन समाप्त झाले. ๑๖. นิพฺพานปเท. ‘‘ขนฺธาวา’’ติ ภวนฺตเร อปายาทีสุ ภวิสฺสมานา ขนฺธาวา. น หิ อตีต ธมฺมา, นิพฺพายนฺติ นาม, สตฺเต ปีเฬตฺวา นิรุทฺธตฺตาติ อธิปฺปาโย. ปจฺจุปฺปนฺนา จ ธมฺมา เอตรหิ ปีเฬนฺติ, อวสฺสํ อุปฺปชฺชมานา อนาคตธมฺมา จ อนาคเต ปีเฬสฺสนฺติ, กถํ เต นิพฺพายนฺติ นามาติ อาห ‘‘ปจฺจุปฺปนฺเนสุ…เป… วตฺตพฺพเมว นตฺถี’’ติ. ‘‘วิสเยภุมฺม’’นฺติ วิสยาธาเรภุมฺมํ. วิสยาธาโร นามมนุสฺสาภูมิยํ คจฺฉนฺตีติอาทีสุ วิย มุขฺยาธาโร นโหติ. เตน ปน วินา อญฺญตฺถ ตํ กิริยํ กาตุํ นสกฺโกติ. ตสฺมา อาธารภาเวน ปริกปฺปิโต อาธาโรติ ทสฺเสตุํ ‘‘ยถาอากาเส’’ติอาทิวุตฺตํ. ยถา สกุณานํ ปกฺขน กิริยา นาม อากาเสน วินา อญฺญตฺถ นสิชฺฌติ. ตถา วฏฺฏทุกฺขธมฺมานํ นิพฺพุติ กิริยาปิ นิพฺพาเนน วินา อญฺญตฺถ นสิชฺฌตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘เยหิเต’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘เย’’ติ เยติวิธวฏฺฏทุกฺขสนฺตาปธมฺมา. หิสทฺโทนิปาโต. เตสทฺโท วจนาลงฺกาโร. ‘‘ตพฺพินิมุตฺต’’นฺติ นิพฺพานวินิมุตฺตํ. นิพฺพุติฐานํ นาม นตฺถิ. ตสฺมา นิพฺพานํ เตสํ นิพฺพุติ กิริยาย วิสยา ธาโรโหตีติ อธิปฺปาโย. ยถา อยํ ปทีโป นิพฺพายติ. ตถาธีรา นิพฺพนฺตีติ โยชนา. ‘‘ตํ ตํ กิเลสานํ วา’’ติ เต สํเตสํกิเลสานํ วา. ‘‘ขนฺธานํ วา’’ติ อนาคตภเวสุ ขนฺธานํ วา. ‘‘ปุนอปฺปฏิสนฺธิกภาว’’นฺติ สนฺตานสฺส ปุน ปฏิสนฺธานาภาวํ ปาปุณนฺติ [Pg.43] อริยา ชนา. ยถา มคฺเค กรณวจนํ ทิสฺสติ อทฺธา อิมายปฏิปตฺติยา ชรามรณมฺหา ปริมุจฺจิสฺสามีติอาทีสุ. น ตถา นิพฺพาเนติ อาห ‘‘มคฺเควิยา’’ติอาทึ. นิพฺพาเนปนภุมฺมวจนเมว ทิสฺสติ ยตฺถนามญฺจรูปญฺจ. อเสสํ อุปรุชฺฌตีติอาทีสุ. ตสฺมา นิพฺพาเน กรณ วจนํ น ทิสฺสติ, กรณ ลกฺขณสฺเสว อภาวโตติ ทสฺเสตุํ ‘‘น จ นิพฺพาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. กรณ ลกฺขณํ นามกตฺตุโน สหการี ปจฺจยภาโว. นนุ อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา นิพฺพายนฺตีติ ทิสฺสตีติ. สจฺจํ, ตตฺถ ปน วิเสสเน กรณ วจนํ. น กรณการเก. ตญฺหิ สอุปาทิเสสนิพฺพานธาตุยานิวตฺตนตฺถํ วุตฺตนฺติ. १६. निर्वाणपदाच्या संबंधात: “स्कंधा वा” (किंवा स्कंध) म्हणजे इतर भवांमध्ये, अपाय इत्यादींमध्ये भविष्यात उत्पन्न होणारे स्कंध. कारण भूतकाळातील धर्म हे 'निर्वाण पावतात' असे म्हणता येत नाही, कारण ते प्राण्यांना पीडित करून आधीच निरुद्ध (नष्ट) झाले आहेत, असा अभिप्राय आहे. आणि वर्तमानकाळातील धर्म सध्या पीडित करत आहेत, आणि भविष्यात नक्कीच उत्पन्न होणारे अनागत (भविष्यातील) धर्म भविष्यात पीडित करतील, मग ते कसे काय निर्वाण पावतील? म्हणून म्हटले आहे - “वर्तमानामध्ये... पे... बोलणेच शक्य नाही.” “विषये भूमं” म्हणजे विषयाधार अर्थातील सप्तमी विभक्ती. विषयाधार म्हणजे 'मनुष्य भूमीवर चालतात' इत्यादींमधील मुख्य आधार नव्हे. परंतु, त्याशिवाय इतर ठिकाणी ती क्रिया करणे शक्य नाही. म्हणून आधारभावाने कल्पिलेला आधार हे दर्शवण्यासाठी “जसे आकाशामध्ये” इत्यादी म्हटले आहे. जसे पक्ष्यांची उडण्याची क्रिया आकाशाशिवाय इतर ठिकाणी सिद्ध होत नाही, तसेच संसारदुःखाच्या धर्मांची निवृत्ती (निर्वाण) क्रिया देखील निर्वाणाशिवाय इतर ठिकाणी सिद्ध होत नाही, हे दर्शवण्यासाठी “येहि ते” (ज्यांच्याद्वारे ते) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “ये” म्हणजे जे त्रिविध संसारदुःखाच्या संतापाचे धर्म आहेत. 'हि' हा शब्द निपात आहे. 'ते' हा शब्द वचनालंकार (वाक्यशोभा वाढवणारा) आहे. “तद्विनिमुक्तं” म्हणजे निर्वाणाशिवाय मुक्त. निर्वाणाचे दुसरे स्थान नाही. म्हणून निर्वाण हा त्यांच्या निवृत्तीच्या क्रियेचा विषयाधार होतो, असा अभिप्राय आहे. 'जसा हा दिवा विझतो (निर्वाण पावतो), तसेच धीर पुरुष निर्वाण पावतात' अशी योजना आहे. “त्या त्या क्लेशांचा किंवा” म्हणजे त्या त्या क्लेशांचा किंवा. “स्कंधांचा किंवा” म्हणजे अनागत (भविष्यातील) भवांमधील स्कंधांचा किंवा. “पुन्हा प्रतिसंधी न होणारी अवस्था” (पुनअप्पटिसंधिकभावं) म्हणजे आर्य जन संतानाच्या (चित्तप्रवाहाच्या) पुन्हा प्रतिसंधी न होण्याच्या (पुनर्जन्म न घेण्याच्या) अवस्थेला प्राप्त होतात. जसे मार्गाच्या बाबतीत करण वाचक (तृतीया विभक्ती) दिसते - 'नक्कीच या प्रतिपदेने (आचरणाने) आम्ही जरामरणापासून मुक्त होऊ' इत्यादींमध्ये. निर्वाणाच्या बाबतीत तसे नाही, म्हणून “मार्गाप्रमाणे” इत्यादी म्हटले आहे. परंतु निर्वाणाच्या बाबतीत केवळ भूमवचन (सप्तमी विभक्ती) दिसते - 'जिथे नाम आणि रूप पूर्णपणे निरुद्ध होते' इत्यादींमध्ये. म्हणून निर्वाणामध्ये करण वाचक (तृतीया विभक्ती) दिसत नाही, कारण तेथे करण लक्षणाचाच अभाव आहे, हे दर्शवण्यासाठी “आणि निर्वाण नाही” इत्यादी म्हटले आहे. करण लक्षण म्हणजे कर्त्याचा सहकारी प्रत्यय (कारण) असणे. शंका: 'अनुपादिशेष निर्वाणधातूने निर्वाण पावतात' असे तर दिसते? उत्तर: सत्य आहे, परंतु तेथे विशेषणामध्ये करण वाचक (तृतीया विभक्ती) आहे, करण कारकामध्ये नाही. कारण ते सउपादिशेष निर्वाणधातूच्या निवृत्तीसाठी म्हटले आहे. นิพฺพานปทวณฺณนา. निर्वाणपदाचे वर्णन. ทุตียคาถาวณฺณนา นิฏฺฐิตา. दुसऱ्या गाथेचे वर्णन समाप्त झाले. ๑๘. กามาวจรปเท. ‘‘กามียตี’’ติ อิจฺฉียติ. นิมิตฺตสฺสาทวตฺถุ มชฺฌิมฏฺฐกถายํ อาคตํ. ‘‘เตกามียนฺตี’’ติ เต อวีจินิรยาทโย อิจฺฉียนฺติ. ‘‘ตตฺถ อุปฺปนฺนานมฺปี’’ติ อวีจินิรยาทีสุ อุปฺปนฺนานํปิ สตฺตานํ. ‘‘ภวนิกนฺติ นาม โหตี’’ติ ภวสงฺขาตํ อตฺตโน ขนฺธํ เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโสเม อตฺตาติ คณฺหนฺตี ตณฺหา ภวนิกนฺติ นาม. สา เนรยิกสตฺตานํปิ อตฺถิเยว. ‘‘กาเม อวจรตี’’ติ กาเมปริยาปนฺนํ โหติ. กาเม อนฺโตคธํ โหติ. รูปารูปภูมีสุ อุปฺปนฺนํปิ รูปารูปสงฺขฺยํ นคจฺฉติ. กามสงฺขฺยเมว คจฺฉติ. กามคณนเมวคจฺฉตีติ อตฺโถ. ‘‘ตีสุภเวสุ อุปฺปนฺนานิปี’’ติ กามรูปารูปสตฺตสนฺตาเนสุ อุปฺปนฺนานิปิ น ตตฺรปริยา ปนฺนาเนว โหนฺติ. ตตฺร อปริยาปนฺนาเนว โหนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘กามาวจรตาปตฺติโทโส’’ติ กามาวจร ธมฺมาติ วตฺตพฺพตา ปตฺติโทโส. ‘‘รูปาวจรตาทิมุตฺติโทโส’’ติ อิเม รูปาวจร ธมฺมา น โหนฺติ, อรูปาวจร ธมฺมา น โหนฺติ, โลกุตฺตร ธมฺมา น โหนฺตีติ เอวํ วตฺตพฺพตาปตฺติ โทโสติ วุตฺตํ โหติ. เอสนโย ‘‘รูปารูปาวจรตาปตฺติ โทโส กามาวจรตามุตฺติ โทโส’’ ติปเทสุ[Pg.44]. อวจรสทฺทสฺส อุปฺปนฺนตฺเถ คหิเตปิ เอเตโทสา นาปชฺชนฺติ. กสฺมา, โลเก เยภูยฺยนยตพฺพหุลนยานํปิ สพฺภาวาติ อิมมตฺถํ วทนฺโต ‘‘นนุเยภูยฺย วุตฺติวเสนปี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘เกสญฺจี’’ติ เกสญฺจิ ปุคฺคลานํ วา ธมฺมานํ วา. ยถามิคลุทฺทโก คาเม จรนฺโตปิ วเน จรณพหุลตฺตา วนจรโกติ นามํ ลภติ. ราชหตฺถี อญฺญตฺถ จรนฺโตปิ สงฺคาเม จรณพหุลตฺตา สงฺคามาวจโรติ นามํ ลภติ. อยํ เยภูยฺยนโย นาม. ยสฺมึ วเน อมฺพรุกฺขาปิ อตฺถิ, อญฺญรุกฺขาปิ อตฺถิ. อมฺพรุกฺขพหุลตฺตา ปน ตํ วนํ อมฺพวนนฺติ นามํ ลภติ. เอวํ สิมฺพลิวนาทีสุ. อยํ ตพฺพหุลนโย. อิธ ปน ภูมิโย ตพฺพหุลนเยน กามรูปารูป นามํ ลภนฺติ, ธมฺมา เยภูยฺยนเยน กามาวจราทิ นามํ ลภนฺตีติ. เอวํ คหิเต สติ, เต โทสานา ปชฺชนฺตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตสฺมา อิธปิ…เป… โทโสตี’’ติอาห. ‘‘นา’’ติ น โกจิโทโส นตฺถิ. อตฺถิ เอวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตสฺมาสฺสา’’ติ เอตฺถ ‘‘อสฺสา’’ติ อวจรสทฺทสฺส. ‘‘ตถา อตฺถํ อคฺคเหตฺวา’’ติ อุปฺปชฺชนตฺถํ อคฺคเหตฺวา. ‘‘ปริคฺคาหินิยา กามตณฺหาย กโต’’ติ ตถา ปริคฺคาหินิยา กามตณฺหาย โคจรวิสยตฺตาตายตณฺหาย กโตนาม โหติ. เอเตน กาเมตีติ กาโม, กามตณฺหา. อวจรติ เอตฺถาติ อวจรํ. กามสฺส อวจรนฺติ กามาวจรํ. กาม ตณฺหาย โคจรวิสยตฺตา กามาวจรนฺติ อยมตฺโถปิ สิชฺฌติ. १८. "कामावचरपदे" (कामावचर या पदात). "कामीयती" म्हणजे इच्छा केली जाते. निमित्त-आस्वाद-वस्तू (निमित्तस्सादवत्थु) हे मज्झिम-अट्ठकथेत आले आहे. "ते कामीयन्ती" म्हणजे ते अवीची निरय (नरक) इत्यादींची इच्छा केली जाते. "तत्थ उप्पन्नानम्पि" म्हणजे अवीची निरय इत्यादींमध्ये उत्पन्न झालेल्या सत्त्वांचेही. "भवनिकन्ति नाम होती" म्हणजे भवसंज्ञक स्वतःच्या स्कंधाला 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे ग्रहण करणारी तृष्णा 'भवनिक' (भवावरील आसक्ती) या नावाने ओळखली जाते. ती नरकातील सत्त्वांमध्येही असतेच. "कामे अवचरती" म्हणजे कामामध्ये समाविष्ट (परियापन्न) होते, कामाच्या अंतर्गत असते. रूप आणि अरूप भूमींमध्ये उत्पन्न झाले तरी ते रूप-अरूप संख्येत जात नाही, तर काम संख्येतच जाते, काम गणनेतच जाते असा अर्थ आहे. "तीसु भवेसु उप्पन्नानिपि" म्हणजे काम, रूप आणि अरूप सत्त्वसंतानांमध्ये उत्पन्न झाले तरी ते तेथे अपरियापन्न (असमाविष्ट) नसतात, तर तेथे अपरियापन्नच असतात असा अभिप्राय आहे. "कामावचरतापत्तिदोषो" म्हणजे हे कामावचर धर्म आहेत असे म्हणण्याच्या आपत्तीचा दोष. "रूपावचरतादिमुत्तिदोषो" म्हणजे हे रूपावचर धर्म नाहीत, अरूपावचर धर्म नाहीत, लोकोत्तर धर्म नाहीत असे म्हणण्याच्या आपत्तीचा दोष, असे म्हटले आहे. हाच नियम "रूपा रूपावचरतापत्ति दोषो कामावचरतामुत्ति दोषो" या पदांमध्येही आहे. 'अवचर' शब्दाचा अर्थ 'उत्पन्न' असा घेतला तरी हे दोष उद्भवत नाहीत. का? कारण जगात 'येभूय्यनय' (बहुतांश नियम) आणि 'तब्बहुलनय' (प्राचुर्य नियम) यांचे अस्तित्व असल्यामुळे, हा अर्थ सांगताना "ननु येभूय्यवुत्तिवसेनपि" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "केसञ्चि" म्हणजे काही पुद्गलांचे किंवा धर्मांचे. जसे एखादा शिकारी गावात फिरत असला तरी वनात जास्त फिरत असल्यामुळे त्याला 'वनचर' हे नाव मिळते. राजहत्ती इतर ठिकाणी फिरत असला तरी युद्धात जास्त फिरत असल्यामुळे त्याला 'संग्रामावचर' हे नाव मिळते. याला 'येभूय्यनय' म्हणतात. ज्या वनात आंब्याची झाडेही आहेत आणि इतर झाडेही आहेत, परंतु आंब्याची झाडे जास्त असल्यामुळे त्या वनाला 'आम्रवन' (अम्बवन) हे नाव मिळते. याचप्रमाणे शाल्मली वन (सिम्बलीवन) इत्यादींमध्ये. हा 'तब्बहुलनय' आहे. येथे भूमी प्राचुर्य नियमाने काम, रूप, अरूप हे नाव मिळवतात आणि धर्म बहुतांश नियमाने कामावचर इत्यादी नाव मिळवतात. असे गृहीत धरले असता ते दोष उद्भवत नाहीत, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी "तस्मा इधपि...पे... दोषोति" असे म्हटले आहे. "ना" म्हणजे कोणताही दोष नाही, असे नाही; दोष आहेच असा अभिप्राय आहे. "तस्मास्सा" येथे "अस्सा" म्हणजे 'अवचर' शब्दाचा. "तथा अत्थं अग्गहेत्वा" म्हणजे उत्पन्न होण्याचा अर्थ न घेता. "परिग्गाहिनिया कामतण्हाया कतो" म्हणजे त्याप्रमाणे परिग्रह करणाऱ्या कामतृष्णेचा गोचरविषय असल्यामुळे त्या तृष्णेने केलेला असा अर्थ होतो. यावरून 'कामयते इति कामो' म्हणजे कामतृष्णा. 'अवचरति एत्थाति अवचरं' (यात वावरते म्हणून अवचर). कामाचे अवचर ते 'कामावचर'. कामतृष्णेचा गोचरविषय असल्यामुळे 'कामावचर' हा अर्थही सिद्ध होतो. รูเปอวจรตีติ รูปาวจรํ. ‘‘รูเป’’ติ โสฬสวิธายรูปภูมิยา. ‘‘อวจรตี’’ติ ตตฺถ ปริยาปนฺนภาเวน ปวตฺตติ. อรูเป อวจรตีติ อรูปาวจรํ. ‘‘อรูเป’’ติ จตุพฺพิธาย อรูปภูมิยา. ‘‘อวจรตี’’ติ ตตฺถ ปริยาปนฺนภาเวน ปวตฺตตีติ อิมมตฺถํ วทติ ‘‘รูปารูปาวจเรสุปิ อยํนโย เนตพฺโพ’’ติ. รูเป ภโว รูปํ. รูปตณฺหา. อรูเป ภโว อรูปํ, อรูปตณฺหา. รูปสฺส อวจรํ รูปาวจรํ. อรูปสฺส อวจรํ อรูปาวจรนฺติ อิมมตฺถํ ทีเปติ ‘‘เตสุ ปนา’’ติอาทินา. ‘‘อตฺรา’’ติ อิมสฺมึ ฐาเน. ยทิปิ โลโภ, ราโค, กาโม, ตณฺหา, ติสพฺพมฺเปตํ โลภสฺสเววจนํ โหติ. รูปราโค อรูปราโคติ ปน วิสุํ วิภตฺตตฺตา อิธ กามสทฺเทน ตํ ทญฺโญโลโภ [Pg.45] คยฺหติ. ‘‘สพฺโพปิ โลโภ’’ติ เอเตนสสฺสตุจฺเฉท ทิฏฺฐิสหคโตปิ สงฺคหิโตติ ทฏฺฐพฺพํ. रूपात वावरते म्हणून 'रूपावचर'. "रूपे" म्हणजे सोळा प्रकारच्या रूपभूमीत. "अवचरती" म्हणजे तेथे परियापन्न (समाविष्ट) भावाने प्रवर्तित होते. अरूपात वावरते म्हणून 'अरूपावचर'. "अरूपे" म्हणजे चार प्रकारच्या अरूपभूमीत. "अवचरती" म्हणजे तेथे परियापन्न भावाने प्रवर्तित होते, हा अर्थ "रूपारूपावचरेसुपि अयं नयो नेतब्बो" (रूप आणि अरूपावचरांमध्येही हाच नियम लावावा) याने सांगितला आहे. रूपात होणारा भव म्हणजे रूप, रूपतृष्णा. अरूपात होणारा भव म्हणजे अरूप, अरूपतृष्णा. रूपाचे अवचर ते रूपावचर. अरूपाचे अवचर ते अरूपावचर, हा अर्थ "तेसु पना" इत्यादींनी स्पष्ट केला आहे. "अत्रा" म्हणजे या ठिकाणी. जरी लोभ, राग, काम, तृष्णा हे सर्व लोभाचेच समानार्थी शब्द आहेत, तरीही रूपराग आणि अरूपराग असे वेगवेगळे विभागले असल्यामुळे, येथे 'काम' शब्दाने त्याव्यतिरिक्त इतर लोभ घेतला जातो. "सब्बोपि लोभो" (सर्वच लोभ) याने शाश्वत आणि उच्छेद दृष्टीने युक्त असलेला लोभही समाविष्ट केला आहे असे समजावे. ๑๙. ‘‘รูปารูปสทฺทา ตาสุ ภูมีสุ นิรุฬฺหา’’ติ อนิมิตฺตา หุตฺวา นิรุฬฺหาติ อธิปฺปาโย. อิทานิ สนิมิตฺตํ นยํ วทติ ‘‘อปิจา’’ติอาทินา. ‘‘นิสฺสโยปจาโร’’ติ ฐานูปจาโร, ยถา สพฺโพคาโม อาคโตติ. ‘‘นิสฺสิโต ปจาโร’’ติ ฐานฺยูปจาโร. ยถา ธชา อาคจฺฉนฺตีติ. ‘‘ยํ เอตสฺมึ อนฺตเร’’ติ เย เอตสฺมึ อนฺตเร ขนฺธธาตุ อายตนา. ยํ รูปํ, ยา เวทนา, ยาสญฺญา, เย สงฺขารา, ยํวิญฺญาณนฺติ โยชนา. ‘‘สุวิสท’’นฺติ เยภูยฺยาทิ นเยหิ อนากุลตฺตาสุวิสุทฺธํ. ‘‘กึ วิกฺเขเปนา’’ติ จิตฺตวิกฺเขเปน กึ ปโยชนนฺติ อตฺโถ. १९. "रूपारूपशब्दा तासु भूमीसु निरुळ्हा" म्हणजे निमित्तविरहित (अनिमित्त) होऊन रूढ झाले आहेत असा अभिप्राय आहे. आता सनिमित्त नियम "अपिचा" इत्यादींनी सांगतात. "निस्सयोपचारो" म्हणजे स्थानोपचार, जसे 'सर्व गाव आला आहे'. "निस्सितोपचारो" म्हणजे स्थानी-उपचार, जसे 'ध्वज येत आहेत'. "यं एतस्मिं अन्तरे" म्हणजे या दरम्यान जे स्कंध, धातू आणि आयतने आहेत. जे रूप, जी वेदना, जी संज्ञा, जे संस्कार, जे विज्ञान अशी योजना करावी. "सुविसदं" म्हणजे येभूय्य (बहुतांश) इत्यादी नियमांमुळे गोंधळ नसलेले, अत्यंत विशुद्ध. "किं विक्खेपेना" म्हणजे चित्तविक्षेपाने काय प्रयोजन, असा अर्थ आहे. ๒๐. ‘‘ลุชฺชนปฺปลุชฺชนฏฺเฐนา’’ติ ภิชฺชนปฺปภิชฺชนฏฺเฐน. ‘‘ยตฺถา’’ติ ยสฺมึ เตภูมเก ธมฺมสมูเห. ‘‘นิวิสตี’’ติ นิจฺจํ วิสติ, อุปคจฺฉติ. ‘‘ตสฺสา’’ติ มิจฺฉาคฺคาหสฺส. ‘‘เตส’’นฺติ โลกุตฺตร ธมฺมานํ. ‘‘เยส’’นฺติ โลกิย ธมฺมานํ. ‘‘ลุชฺชน’’นฺติ ขณิกภงฺเคน ภิชฺชนํ. ‘‘ปลุชฺชน’’นฺติ สณฺฐานเภเทน สนฺตติจฺเฉเทน นานปฺปการโต ภิชฺชนํ. นิพฺพานํ ปน อิธ น ลพฺภติ จิตฺตสงฺคหาธิการตฺตาติ อธิปฺปาโย. โส จ อปริยาปนฺนภาโว, วิสุํ เอกาจตุตฺถี อวตฺถา ภูมินามาติ โยชนา. २०. "लुज्जनप्पलुज्जनट्ठेना" म्हणजे तुटणे आणि नष्ट होणे (भिज्जन-पभिज्जन) या अर्थाने. "यत्था" म्हणजे ज्या त्रिभूमिक धर्मसमूहात. "निविसती" म्हणजे निरंतर प्रवेश करतो, जवळ जातो. "तस्सा" म्हणजे मिथ्याग्रहाचा. "तेसं" म्हणजे लोकोत्तर धर्मांचा. "येसं" म्हणजे लौकिक धर्मांचा. "लुज्जनं" म्हणजे क्षणिक भंगाने नष्ट होणे. "पलुज्जनं" म्हणजे आकृतीचा भेद होऊन आणि संततीचा छेद होऊन वेगवेगळ्या प्रकारे नष्ट होणे. परंतु येथे निर्वाण प्राप्त होत नाही, कारण हा चित्तसंग्रहाचा अधिकार आहे असा अभिप्राय आहे. आणि तो अपरियापन्न भाव, स्वतंत्रपणे एक चौथी अवस्था 'भूमी' या नावाने ओळखली जाते, अशी योजना करावी. จตุพฺภูมิวิภาควณฺณนา นิฏฺฐิตา. चार भूमींच्या विभागाचे वर्णन समाप्त झाले. ๒๑. ‘‘หีน’’นฺติ สทฺธาสติอาทีหิ โสภณธมฺเมหิ อยุตฺตตฺตาหีนํ. ‘‘สพฺพหีน’’นฺติ โลภาทีหิ ปาปธมฺเมหิ ยุตฺตตฺตา สพฺพ จิตฺเตหิ หีนตรํ. ‘‘ตทตฺโถ’’ติ อุปริมานํ จิตฺตานํ โสภณสญฺญากรณสุขตฺโถ. ‘‘อาทิโต’’ติอาทิมฺหิ. ‘‘วีถิจิตฺตวเสนาติ เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโสเม อตฺตาติ เอวํ ปวตฺตสฺส ภวนิกนฺติ ชวนวีถิจิตฺตสฺส วเสน. เอวญฺจสติ, กึ การณํ โลภมูลจิตฺตสฺสปถมํ วจเนติ อาห ‘‘อกุสเลสุ ปนา’’ติอาทึ[Pg.46].‘‘ทฺวีหิวฏฺฏมูเลหี’’ติ โลภโมหสงฺขาเตหิ ทฺวีหิ วฏฺฏมูเลหิ. २१. "हीनं" म्हणजे श्रद्धा, स्मृती इत्यादी शोभन धर्मांनी युक्त नसल्यामुळे हीन. "सब्बहीनं" म्हणजे लोभ इत्यादी पापधर्मांनी युक्त असल्यामुळे सर्व चित्तांपेक्षा अत्यंत हीन. "तदत्थो" म्हणजे वरील चित्तांना शोभन संज्ञा देण्याच्या सुलभतेसाठी. "आदितो" इत्यादींमध्ये. "वीथिचित्तवसेना" म्हणजे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे प्रवृत्त होणाऱ्या 'भवनिक' नावाच्या जवनवीथिचित्ताच्या द्वारे. असे असताना, अकुशल चित्तांमध्ये लोभमूलक चित्त आधी सांगण्याचे काय कारण? हे सांगण्यासाठी "अकुसलेसु पना" इत्यादी म्हटले आहे. "द्वीहि वट्टमूलेही" म्हणजे लोभ आणि मोह संज्ञक दोन वट्टमूलांच्या (संसारचक्राच्या मुळांच्या) द्वारे. ๒๒. ‘‘สินิทฺธจิตฺต’’นฺติ สาตเวทนายุตฺตตฺตาลูขจิตฺตํ น โหตีติ อธิปฺปาโย. สุมนสฺสภาโวติ วุตฺเต กายิกสุขเวทนายปิ ปสงฺโค สิยาติ วุตฺตํ ‘‘มานสิก…เป… นาม’’นฺติ. ‘‘สุมนาภิธานสฺสา’’ติ สุมนนามสฺส. ‘‘ปวตฺตินิมิตฺต’’นฺติ ปวตฺติยา อาสนฺน การณํ. กถํ ปน ภาโว ปวตฺตินิมิตฺตํ นามโหตีติ อาห ‘‘ภวนฺติ…เป… กตฺวา’’ติ. นิมิตฺเต ภุมฺมํ. ตถาหิ ภาโว นาม สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตนฺติ วุตฺตํ. อิทานิ นิมิตฺต ลกฺขณํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยถาหี’’ติอาทิมาห. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ ปโยเค. ‘‘ทนฺต นิมิตฺต’’นฺติ ทนฺตการณา. ‘‘ตํ เวทนา นิมิตฺต’’นฺติ ตํ เวทนาการณา. เอตฺถ สิยา, ‘‘เอตสฺมินฺติ นิมิตฺเต ภุมฺม’’นฺติ วุตฺตํ, นิมิตฺตญฺจนาม อการกํ อสาธนํ, ตํ กถํ สาธนวิคฺคเห ยุชฺชตีติ. อธิกรณ สาธนานุรูปตฺตา สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตสฺสาติ ทฏฺฐพฺพํ. เอเตนาติ จ เอตสฺมาติ จ เหตุ อตฺเถ อุภยวจนนฺติ วทนฺติ. อาสนฺนเหตุ นามสาธนรูโป ภวตีติ เตสํ อธิปฺปาโย. สุฏฺฐุ กโรติ, ปกติปจฺจเยน อนิปฺผนฺนํ กมฺมํ อตฺตโน พเลน นิปฺผาเทตีติ สงฺขาโร. ‘‘ปุพฺพาภิสงฺขาโร’’ติ ปุพฺพภาเค อภิสงฺขาโร. ปโยเชติ นิโยเชตีติ ปโยโค. อุเปติ ผลสงฺขาโต อตฺโถ เอเตนาติ อุปาโย. ‘‘อาณตฺติยาวา’’ติ เปสนายวา. ‘‘อชฺเฌสเนน วา’’ติ อายาจเนน วา. ‘‘ตชฺเชตฺวา วา’’ติ ภยํ ทสฺเสตฺวา วา. ‘‘ตํ ตํ อุปายํ ปเร อาจิกฺข’’นฺติ. กถํ อาจิกฺขนฺตีติ อาห ‘‘อกรเณ’’ติอาทึ. ‘‘ตสฺมึ ตสฺมึ กมฺเม ปโยเชตีติกตฺวา อิธ สงฺขาโร นามา’’ติ โยชนา. ‘‘ปจฺจย คโณ’’ติ ปกติปจฺจยคโณ. ‘‘เตนา’’ติ สงฺขาเรน. ‘‘สาธารโณ’’ติ กุสลากุสลาพฺยากตานํ สาธารโณ. ‘‘ทุวิเธน สงฺขาเรนา’’ติ ปโยเคน วา อุปาเยน วา. ‘‘โย ปน เตนสหิโต’’ติอาทินา ปุพฺเพวุตฺตเมวตฺถํ ปการนฺตเรนปากฏํ กาตุํ ‘‘โสปน ยทา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘อิตี’’ติอาทิ ลทฺธคุณ วจนํ. ‘‘ปจฺจยคณสฺเสวนาม’’นฺติ ปจฺจยคณสฺเสว วิเสส นามนฺติ [Pg.47] วุตฺตํ โหติ. อุปฺปนฺนตฺเถ อิกปจฺจโยติ กถํ วิญฺญายตีติ อาห ‘‘ยสฺมึ สมเย’’ติอาทึ. ‘‘ปาฬิย’’นฺติ ธมฺมสงฺคณิปาฬิยํ. ‘‘อสลฺลกฺเขตฺวา’’ติ อจินฺเตตฺวา อิจฺเจวตฺโถ. สพฺพเมตํ นยุชฺชติเยว. กสฺมา, ปาฬิอฏฺฐกถาหิ อสํสนฺทนตฺตา, อตฺถยุตฺติพฺยญฺชนยุตฺตีนญฺจ อวิสทตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ต’’นฺติ จิตฺตํ. ‘‘เอเตนา’’ติ ปุพฺพปฺปโยเคน. ‘‘ยถาวุตฺตนเยนา’’ติ ติกฺขภาวสงฺขาตมณฺฑนวิเสเสน. ‘‘โส ปนา’’ติ ปุพฺพปฺปโยโค ปน. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. ‘‘ตํ นิพฺพตฺติโต’’ติ เตน ปุพฺพปฺปโยเคน นิพฺพตฺติโต. ‘‘วิรชฺฌิตฺวา’’ติ อยุตฺตปกฺเขปติตฺวา. เอเตนปฏิกฺขิตฺตา โหตีติ สมฺพนฺโธ. คาถายํ. ‘‘จิตฺตสมฺภวี’’ติ จิตฺตสฺมึ สมฺภูโต. วิเสโส สงฺขาโร นามาติ โยชนา. สโลมโก, สปกฺขโกตฺยาทีสุวิยาติ วุตฺตํ. สาสวา ธมฺมา, สารมฺมณา ธมฺมาตฺยาทีสุวิยาติ ปน วุตฺเต ยุตฺตตรํ. ‘‘ปาฬิอฏฺฐกถา สิทฺธ’’นฺติ ปาฬิอฏฺฐกถาโต สิทฺธํ. อปิจยตฺถวิสุทฺธิมคฺคาทีสุ อสงฺขารํ จิตฺตํ, สสงฺขารํ จิตฺตนฺติ อาคตํ. ตตฺถ อยํ ปจฺฉิมนโย ยุตฺโต. อุปายสมุฏฺฐิตสฺส อเนกสตสมฺภวโต ‘‘อิทญฺจ นยทสฺสนเมวา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘อุทาสินภาเวนา’’ติ มชฺฌตฺตภาเวน. ‘‘ยโต’’ติ ยสฺมา. วิการปตฺโต โหติ. ตโต อธิมตฺตปสฺสนํ วิญฺญายตีติ โยชนา. २२. "सिनिद्धचित्त" (स्निग्धचित्त) म्हणजे सुखद वेदनेने युक्त असल्यामुळे जे रूक्ष चित्त नाही, असा अभिप्राय आहे. "सुमनसभाव" (आनंदी भाव) असे म्हटले असता शारीरिक सुखवेदनेचाही प्रसंग येईल, म्हणून "मानसिक...पे... नाम" असे म्हटले आहे. "सुमनाभिधानस्स" म्हणजे सुमन नावाच्या. "पवत्तिनिमित्त" म्हणजे प्रवृत्तीचे (उत्पत्तीचे) आसन्न (जवळचे) कारण. पण भाव हा प्रवृत्तीचे कारण कसा होतो? म्हणून "भवन्ति...पे... कत्वा" असे म्हटले आहे. 'निमित्त' या शब्दात सप्तमी विभक्ती आहे. कारण भाव हा शब्दाच्या प्रवृत्तीचे निमित्त (कारण) आहे असे म्हटले आहे. आता निमित्ताचे लक्षण दाखवताना "यथाहि" इत्यादी म्हटले आहे. "तत्थ" म्हणजे त्या प्रयोगात. "दन्तनिमित्त" म्हणजे दातांच्या कारणामुळे. "तं वेदनानिमित्त" म्हणजे त्या वेदनेच्या कारणामुळे. येथे शंका येऊ शकते की, "एतस्मिं" यामध्ये निमित्त अर्थी सप्तमी विभक्ती आहे, आणि निमित्त हे अकारक व असाधन असते, मग ते साधनविग्रहात (साधन रूपाने) कसे जोडले जाऊ शकते? अधिकरण साधनाच्या अनुरूपतेमुळे ते शब्दाच्या प्रवृत्तीचे निमित्त आहे, असे समजावे. "एतेन" आणि "एतस्मा" हे दोन्ही शब्द हेतू अर्थी वापरले जातात, असे म्हणतात. आसन्न हेतू हा साधनरूप असतो, असा त्यांचा अभिप्राय आहे. जो चांगल्या प्रकारे करतो, मूळ प्रत्ययाने (प्रकृती-प्रत्ययाने) जे कर्म निष्पन्न होत नाही, ते आपल्या बलाने निष्पन्न करतो, तो 'संखार' (संस्कार) होय. "पुब्बाभिसंखारो" म्हणजे पूर्वभागातील अभिसंस्कार. जो प्रवृत्त करतो, नियोजित करतो, तो 'प्रयोग' होय. ज्याच्याद्वारे फलसंज्ञक अर्थ प्राप्त होतो, तो 'उपाय' होय. "आणत्तिया वा" म्हणजे आज्ञेने किंवा प्रेरणेने. "अज्झेसनेन वा" म्हणजे याचनेने किंवा विनंतीने. "तज्जेत्वा वा" म्हणजे धमकावून किंवा भीती दाखवून. "त्या त्या उपायाची इतरांना माहिती देणे." ते कसे सांगतात? म्हणून "अकरणे" इत्यादी म्हटले आहे. "त्या त्या कर्मात प्रवृत्त करतो म्हणून येथे 'संखार' (संस्कार) असे म्हटले आहे", अशी योजना आहे. "पच्चयगणो" म्हणजे प्रकृती-प्रत्ययांचा समूह (किंवा कारणांचा समूह). "तेन" म्हणजे संस्काराने. "साधारणो" म्हणजे कुशल, अकुशल आणि अव्याकृत यांच्यासाठी साधारण (समान). "दुविधेन संखारेन" म्हणजे प्रयोगाने किंवा उपायाने अशा दोन प्रकारच्या संस्कारांनी. "यो पन तेन सहितो" इत्यादींद्वारे पूर्वी सांगितलेलाच अर्थ दुसऱ्या प्रकारे स्पष्ट करण्यासाठी "सो पन यदा" इत्यादी म्हटले आहे. "इति" इत्यादी प्राप्त गुणांचे वचन आहे. "पच्चयगणस्सेव नामं" म्हणजे प्रत्ययसमूहाचेच (कारणसमूहाचेच) विशेष नाव आहे, असे म्हटले आहे. उत्पन्न अर्थी 'इक' प्रत्यय कसा समजला जातो? म्हणून "यस्मिं समये" इत्यादी म्हटले आहे. "पाळियं" म्हणजे धम्मसंगणि पाळीमध्ये. "असल्लक्खेत्वा" म्हणजे विचार न करता, असाच अर्थ आहे. हे सर्व योग्य ठरत नाही. का? कारण पाळी अट्ठकथांशी (अट्टकथांशी) विसंगत असल्यामुळे आणि अर्थयुक्ती व व्यंजनयुक्ती स्पष्ट नसल्यामुळे, असा अभिप्राय आहे. "तं" म्हणजे चित्त. "एतेन" म्हणजे पूर्वप्रयोगाने. "यथावृत्तनयेन" म्हणजे सांगितलेल्या पद्धतीने, तीक्ष्णभावसंज्ञक विशेष अलंकृततेने. "सो पन" म्हणजे पूर्वप्रयोग तर. "इति" म्हणजे म्हणून. "तं निब्बत्तितो" म्हणजे त्या पूर्वप्रयोगाने उत्पन्न झालेला. "विरज्झित्वा" म्हणजे अयोग्य पक्षात पडल्यामुळे. याने ते नाकारले जाते, असा संबंध आहे. गाथेमध्ये, "चित्तसम्भवी" म्हणजे चित्तात उत्पन्न झालेला. विशेष संस्कार आहे, अशी योजना आहे. जसे 'सलोमक' (लोमयुक्त), 'सपक्ष' (पंखयुक्त) इत्यादींमध्ये म्हटले आहे. परंतु "सासवा धम्मा" (सासव धर्म), "सारम्मणा धम्मा" (सालंबन धर्म) इत्यादींप्रमाणे म्हटले असता अधिक योग्य होईल. "पाळिअट्ठकथासिद्धं" म्हणजे पाळी अट्ठकथांवरून सिद्ध झालेले. शिवाय, विसुद्धिमग्ग इत्यादींमध्ये 'असंखार चित्त' (असंस्कारिक चित्त) आणि 'ससंखार चित्त' (ससंस्कारिक चित्त) असे आले आहे. तेथे हा नंतरचा नियम (नय) योग्य आहे. उपायाने उत्पन्न होणाऱ्याचे अनेक शेकडो प्रकार संभवत असल्यामुळे "हे केवळ नयाचे (नियमाचे) दर्शन आहे" असे म्हटले आहे. "उदासीनभावेन" म्हणजे तटस्थ भावाने (मध्यस्थ भावाने). "यतो" म्हणजे ज्या कारणाने. विकार प्राप्त होतो. त्यावरून तीव्र दर्शन (विपश्यना) समजली जाते, अशी योजना आहे. ๒๓. อิทานิ สหคตวจน สมฺปยุตฺตวจนานิ วิจาเรนฺโต ‘‘เอตฺถจา’’ติอาทิมารภิ. ‘‘น ปน เต เภทวนฺตา โหนฺตี’’ติ กสฺมา วุตฺตํ. น นุ เตปิจกฺขุ สมฺผสฺโส, โสตสมฺผสฺโส, ติอาทินา จ, กามวิตกฺโก, พฺยาปาทวิตกฺโก, ติอาทินา จ, ทุกฺเข อญฺญาณํ, ทุกฺขสมุทเย อญฺญาณ, นฺติอาทินาจ เภทวนฺตา โหนฺตีติ. สจฺจํ. เต ปน เภทา อิมํ จิตฺตํ ภินฺนํ น กโรนฺติ. ตสฺมา เต เภทวนฺตาน โหนฺตีติ วุตฺตา. น จ เตสํ อยํ วิกปฺโป อตฺถีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิมสฺมึ จิตฺเต’’ติ โลภมูลจิตฺเต. ‘‘กตฺถจี’’ติ กิสฺมิญฺจิ จิตฺเต. เยวาปนาติ วุตฺเต สุธมฺเมสุ อาคตานิเยวาปนกานิ. ‘‘อญฺเญหี’’ติ โทสมูลโมหมูเลหิ. นนุตานิปิ อิธ คเหตพฺพานีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นา’’ติ น คเหตพฺพานิ. กสฺมาติ อาห ‘‘เตสุหี’’ติอาทึ[Pg.48]. เตปิ อิธ นคเหตพฺพา สิยุํ. น ปน น คเหตพฺพา. กสฺมา, เวทนาย จ สยํ เภทวนฺตตฺตา, ทิฏฺฐิสงฺขารานญฺจ วิกปฺปสพฺภาวาติ อธิปฺปาโย. २३. आता 'सहगत' शब्द आणि 'संपयुत्त' शब्द यांचा विचार करताना "एत्थ च" इत्यादी सुरू केले आहे. "पण ते भेदयुक्त (भिन्न) नसतात" असे का म्हटले आहे? काय ते देखील चक्खु-सम्फस्स (चक्षु-स्पर्श), सोत-सम्फस्स (श्रोत्र-स्पर्श) इत्यादींद्वारे, आणि कामवितक्क (कामवितर्क), ब्यापादवितक्क (व्यापादवितर्क) इत्यादींद्वारे, आणि दुःखाविषयी अज्ञान, दुःखसमुदयाविषयी अज्ञान इत्यादींद्वारे भेदयुक्त (भिन्न) नसतात का? सत्य आहे. परंतु ते भेद या चित्ताला भिन्न करत नाहीत. म्हणून ते भेदयुक्त नसतात, असे म्हटले आहे. आणि त्यांचा हा विकल्प (भेद) नसतो, असा संबंध आहे. "इमस्मिं चित्ते" म्हणजे लोभमूलक चित्तात. "कत्थचि" म्हणजे कोणत्याही चित्तात. 'येवापनक' (किंवा जे इतर धर्म) असे म्हटले असता, शुद्ध धर्मांमध्ये आलेले 'येवापनक' धर्म अभिप्रेत आहेत. "अञ्ञेहि" म्हणजे द्वेषमूलक आणि मोहमूलक चित्तांद्वारे. काय ते देखील येथे ग्रहण केले पाहिजेत? असा संबंध आहे. "न" म्हणजे ग्रहण करू नयेत. का? म्हणून "तेसु हि" इत्यादी म्हटले आहे. ते देखील येथे ग्रहण करण्यायोग्य नसावेत. परंतु असे नाही की ते ग्रहण करू नयेत. का? कारण वेदना स्वतःच भेदयुक्त असल्यामुळे आणि दृष्टी व संस्कारांमध्ये विकल्पाचे अस्तित्व असल्यामुळे, असा अभिप्राय आहे. ๒๔. ‘‘โสมนสฺสสฺสการณ’’นฺติ โสมนสฺสุปฺปตฺติยา การณํ. โสมนสฺสุปฺปตฺติยา การเณ วุตฺเต ตํ สหคต จิตฺตุปฺปตฺติยาปิการณํ สิทฺธํ โหตีติ กตฺวา ตเมว วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เตนาห ‘‘โสมนสฺสปฺปฏิสนฺธิโกหี’’ติอาทึ. หีเนน วา…เป… อารมฺมเณน สมาโยโค, เตน สมายุตฺตสฺสาปิ จิตฺตํ อุปฺปชฺชมานนฺติอาทินา วตฺตพฺพํ. ตถา พฺยสนมุตฺติยํปิ. อุเปกฺขาการเณ ‘‘พฺยสนมุตฺตี’’ติ อิทํ โทมนสฺสปฺปสงฺคปริหารวจนํ. อชฺฌาสโยวุจฺจติ อชฺฌาวุตฺตํ เคหํ. ทิฏฺฐิสงฺขาโต อชฺฌาสโยยสฺสาติ ทิฏฺฐชฺฌาสโย. ตสฺส ภาโว ทิฏฺฐชฺฌาสยตา. ‘‘อโยนิโส อุมฺมุชฺชน’’นฺติ อนุปายโต อาภุชนํ, มนสิกรณํ. ‘‘จินฺตา ปสุตวเสนา’’ติ คมฺภีเรสุ ธมฺเมสุ จินฺตาปสวนวเสน, วีมํสา วฑฺฒนวเสน. ‘‘ทิฏฺฐการณเมวา’’ติ ทิฏฺฐํ การณปฺปฏิรูปกเมว. เตนาห ‘‘สารโตสจฺจโต อุมฺมุชฺชน’’นฺติ. ‘‘ตพฺพิปรีเตนา’’ติ ตโต วิปรีเตน. อทิฏฺฐชฺฌาสยตา, ทิฏฺฐิวิปนฺนปุคฺคลปริวชฺชนตา, สทฺธมฺมสวนตา, สมฺมาวิตกฺกพหุลตา, โยนิโส อุมฺมุชฺชนญฺจ ทิฏฺฐิวิปฺปโยคการณนฺติ วตฺตพฺพํ. २४. "सोमनस्सस्स कारणं" म्हणजे सोमनस्याच्या (आनंदाच्या) उत्पत्तीचे कारण. सोमनस्याच्या उत्पत्तीचे कारण सांगितले असता, त्यासह उत्पन्न होणाऱ्या चित्ताच्या उत्पत्तीचे कारणही सिद्ध होते, असे मानून तेच सांगितले आहे, असे समजावे. म्हणूनच "सोमनस्सपटिसंधिको हि" इत्यादी म्हटले आहे. हीन किंवा...पे... आलंबनाशी (विषयाशी) संयोग, आणि त्याने युक्त असलेल्या चित्ताची उत्पत्ती होते, इत्यादी प्रकारे सांगितले पाहिजे. तसेच संकटातून मुक्तीच्या बाबतीतही. उपेक्षेच्या कारणात "व्यसनमुत्ती" (संकटातून मुक्ती) हे दौर्मनस्याच्या प्रसंगाचे निवारण करणारे वचन आहे. 'अज्झासय' (अध्याशय/आशय) म्हणजे व्यापलेले घर असे म्हटले जाते. दृष्टीसंज्ञक आशय ज्याचा आहे, तो 'दिट्ठज्झासय' (दृष्टी-आशय) होय. त्याचा भाव म्हणजे 'दिट्ठज्झासयता' (दृष्टी-आशयता). "अयोनिसो उम्मुज्जनं" म्हणजे अयोग्य पद्धतीने (अयोनिशः) विचार करणे, मनसिकार करणे. "चिन्ता पसुतवसेन" म्हणजे गंभीर धर्मांमध्ये चिंतन करण्याच्या प्रवृत्तीमुळे, विमर्शाच्या (मीमांसेच्या) वृद्धीमुळे. "दिट्ठकारणमेव" म्हणजे पाहिलेले कारणरूपच. म्हणूनच "सारतो सच्चतो उम्मुज्जनं" (सार रूपाने आणि सत्य रूपाने प्रकट होणे) असे म्हटले आहे. "तब्बिपरीतेन" म्हणजे त्याच्या उलट (विपरीत). अदिट्ठज्झासयता (दृष्टी-आशयाचा अभाव), दृष्टीभ्रष्ट व्यक्तींचे वर्जन (टाळणे), सद्धम्मश्रवण (सद्धर्माचे श्रवण), सम्मावितक्कबहुलता (सम्यक् वितर्काची बहुलता) आणि योनिशः मनसिकार (योनिसो उम्मुज्जन) हे दृष्टीविप्रयोगाचे (दृष्टीरहिततेचे) कारण आहे, असे म्हटले पाहिजे. ‘‘อิเมสํ ปน จิตฺตานํ อุปฺปตฺติวิธานํ วิสุทฺธิมคฺเคคเหตพฺพ’’นฺติ วิสุทฺธิ มคฺเคขนฺธ นิทฺเทสโต คเหตพฺพํ. วุตฺตญฺหิตตฺถ. ยทา หินตฺถิกาเมสุ อาทีนโวติอาทินานเยน มิจฺฉาทิฏฺฐึ ปุเรกฺขิตฺวา หฏฺฐตุฏฺโฐ กาเมวา ปริภุญฺชติ, ทิฏฺฐมงฺคลาทีนิ วา สารโตปจฺเจติ สภาว ติกฺเขน อนุสฺสาหิเตนจิตฺเตน. ตทา ปถมํ อกุสล จิตฺตํ อุปฺปชฺชติ. ยทา มนฺเทน สมุสฺสาหิเตน จิตฺเตน, ตทาทุตียํ. ยทา มิจฺฉา ทิฏฺฐึ อปุเรกฺขิตฺวา เกวลํ หฏฺฐตุฏฺโฐ เมถุนํ วา เสวติ, ปร สมฺปตฺตึ วา อภิชฺฌายติ, ปรภณฺฑํ วา หรติ สภาวติกฺเขเนว อนุสฺสาหิเตน จิตฺเตน. ตทา ตตียํ. ยทา มนฺเทน สมุสฺสาหิเตนจิตฺเตน, ตทา จตุตฺถํ. ยทา ปน กามานํ วา อสมฺปตฺตึ อาคมฺม อญฺเญสํ วา โสมนสฺสเหตูนํ อภาเวน จตูสุปิ วิกปฺเปสุ โสมนสฺสรหิตาโหนฺติ[Pg.49], ตทาเสสานิ จตฺตาริ อุเปกฺขาสหคตานิ อุปฺปชฺชนฺตีติ. परंतु या चित्तांच्या उत्पत्तीची पद्धत विसुद्धिमग्गमधून ग्रहण करावी, विसुद्धिमग्गच्या खन्ध-निद्देस (स्कंध निर्देश) मधून ती ग्रहण करावी. कारण तेथे असे म्हटले आहे: जेव्हा हीन अशा कामभोगांमध्ये 'आदीनव' (दोष) इत्यादी विविध प्रकारे मिथ्यादृष्टीला पुढे ठेवून, हर्षित व संतुष्ट होऊन कामभोगांचा उपभोग घेतो, किंवा दृष्ट-मंगल इत्यादींना सारभूत मानतो, तेव्हा स्वभावाने तीक्ष्ण आणि असंस्कारित (असंखारिक) चित्ताने पहिले अकुशल चित्त उत्पन्न होते. जेव्हा मंद आणि ससंस्कारित (ससंखारिक) चित्ताने (तेच कृत्य केले जाते), तेव्हा दुसरे. जेव्हा मिथ्यादृष्टीला पुढे न ठेवता, केवळ हर्षित व संतुष्ट होऊन मैथुनसेवन करतो, किंवा दुसऱ्याच्या संपत्तीचा लोभ (अभिज्झा) करतो, किंवा दुसऱ्याची वस्तू चोरतो, स्वभावाने तीक्ष्ण आणि असंस्कारित चित्ताने, तेव्हा तिसरे. जेव्हा मंद आणि ससंस्कारित चित्ताने, तेव्हा चौथे. परंतु जेव्हा कामभोगांच्या अप्राप्तीमुळे किंवा इतर सोमनस्य देणाऱ्या हेतूंच्या अभावामुळे, चारही पर्यायांमध्ये सोमनस्यरहित असतात, तेव्हा उर्वरित चार उपेक्षासहगत (उपेक्खासहगत) चित्ते उत्पन्न होतात. โลภมูลจิตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. लोभमूलक चित्तांचे वर्णन समाप्त झाले. ๒๕. โทสมูลจิตฺเต. ‘‘วิรูป’’นฺติ ทุฏฺฐํ, ลุทฺทํ. ทุมฺมนสฺส ภาโวติ วุตฺเต กายิกทุกฺขเวทนายปิ ปสงฺโค สิยาติ วุตฺตํ ‘‘มานสิก…เป… นาม’’นฺติ. ปฏิหญฺญติ พาธติ. ‘‘สนฺตตฺเต’’ติ สนฺตาปิเต. २५. दोषमूलक चित्ताच्या बाबतीत: 'विरूप' म्हणजे दुष्ट, क्रूर. 'दुर्मनस्क भाव' असे म्हटले असता कायिक दुःख-वेदनेचाही प्रसंग येईल, म्हणून 'मानसिक...पे... नाम' असे म्हटले आहे. 'पटिहञ्ञति' (प्रतिघात होतो) म्हणजे बाधा पोहोचते. 'संतत्त' म्हणजे संतापित. ๒๖. ‘‘เภทกโร’’ติ อญฺญมญฺญวิเสสกโร. ‘‘เภทกราน โหนฺตี’’ติ อิมสฺส จิตฺตสฺส อญฺญมญฺญวิเสสกราน โหนฺติ. โทมนสฺสคฺคหณํ ปสงฺคนิวตฺตนตฺถํ คหิตนฺติ โยชนา. ปสงฺโคติ จนานปฺปการโต สชฺชนํ ลคฺคนํ. กถํ ปสงฺโคติ อาห ‘‘ยทาหี’’ติอาทึ. ‘‘ตุฏฺฐึ ปเวเทนฺตี’’ติ ตุฏฺฐามยํ อิเมสํ มรเณนาติอาทิ จิกฺขนฺติ. เอวํ สหคตปฺปสงฺคํ นิวตฺเตตฺวา สมฺปยุตฺตปฺปสงฺคํ นิวตฺเตตุํ ‘‘ปฏิฆคฺคหณํปี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ติรจฺฉานคตปาณวเธ อปุญฺญํ นาม นตฺถิ. อาทิกปฺปโต ปฏฺฐาย มนุสฺสานํ ยถากาม ปริโภคตฺถาย โลกิสฺสริเยนถาวรฏฺฐายินา นิมฺมิตตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘วิสฺสฏฺฐา’’ติ อนาสงฺกา. ‘‘อญฺเญวา’’ติ อญฺเญ วา ชเน. วิมติ เอว เวมติกํ. เวมติกํ ชาตํ เยสํ เต เวมติกชาตา. ปุริมจิตฺตสฺสโลภสหคตภาโว อิมานิอฏฺฐปิ โลภสหคตจิตฺตานินามาติ อิมินา จูฬนิคมเน เนว สิทฺโธวิยาติ โยชนา. จูฬนิคมเนน ปฏิฆสมฺปยุตฺต ภาเวสิทฺเธ โทมนสฺสสหคตภาโวปิ เตนสิทฺโธ เยวาติ กตฺวา ‘‘เตสํ คหณํ’’ติ วุตฺตํ. ‘‘เตส’’นฺติ โทนสฺสปฏิฆานํ. อิมสฺมึ จิตฺเต อิสฺสามจฺฉริยกุกฺกุจฺจานิจถินมิทฺธานิ จ อนิยตโยคีนิ จ โหนฺติ เยวาปนกานิ จ. เตนาห ‘‘ปุริมจิตฺเต’’ติอาทึ. โทมนสฺสํ อิมสฺมึ จิตฺเต อตฺถิ, อญฺญจิตฺเตสุ นตฺถิ, ตสฺมา อสาธารณ ธมฺโม นาม. อนญฺญสาธารณ ธมฺโมติปิ วุจฺจติ. ‘‘ยถาตํ’’ติ ตํ นิทสฺสนํ ตทุทาหรณํ ยถา กตมนฺติ อตฺโถ. ‘‘อุปลกฺเขตี’’ติ [Pg.50] สญฺญาเปติ. อาตปํตายติรกฺขตีติ อาตปตฺตํ. เสตจฺฉตฺตํ. ลทฺธํ อาตปตฺตํ เยนาติ ลทฺธาตปตฺโต. ราชกุมาโร. โส อาตปตฺตํ ลทฺโธติ วุตฺเต สพฺพํ ราชสมฺปตฺตึ ลทฺโธติ วิญฺญายติ. ตสฺมา อิทํ อุปลกฺขณ วจนํ ชาตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘อุภินฺน’’นฺติ ทฺวินฺนํ โทมนสฺส ปฏิฆานํ. ปุพฺเพ โทมนสฺสสหคตนฺติ วตฺวา นิคมเน ปฏิฆสมฺปยุตฺตจิตฺตานีติ วุตฺตตฺตา ‘‘อิมสฺส…เป… สิทฺธิโต’’ติ วุตฺตํ. २६. 'भेदकरो' म्हणजे परस्परांमध्ये भेद करणारा. 'भेदकराना होन्ति' म्हणजे या चित्ताच्या परस्परांमधील भेदाचे कारण असणारे होतात. 'दौर्मनस्य' (दोमनस्स) चे ग्रहण प्रसंगाचे (अतिव्याप्तीचे) निवारण करण्यासाठी केले आहे, अशी योजना आहे. 'प्रसंग' म्हणजे विविध प्रकारे आसक्त होणे किंवा चिकटणे. प्रसंग कसा होतो? हे सांगण्यासाठी 'यदा हि' इत्यादी म्हटले आहे. 'तुट्ठिं पवेदेन्ति' (संतुष्टता प्रकट करतात) म्हणजे 'यांच्या मृत्यूने आम्ही संतुष्ट आहोत' इत्यादी सांगतात. अशा प्रकारे सहगत-प्रसंगाचे निवारण करून, संप्रयुक्त-प्रसंगाचे निवारण करण्यासाठी 'पटिघग्गहणम्पि' (प्रतिघ ग्रहण देखील) इत्यादी म्हटले आहे. तिर्यंच (प्राणी) प्राण्यांच्या वधात अपुण्य (पाप) असे काही नाही. सृष्टीच्या आरंभापासूनच मनुष्यांच्या इच्छेनुसार उपभोगासाठी लोक-ईश्वराने स्थिर राहणारे हे निर्माण केले आहे, असा अभिप्राय आहे. 'विस्सट्ठा' म्हणजे नि:शंक. 'अञ्ञेवा' म्हणजे इतर लोकांना. विमती (शंका) म्हणजेच वैमत्य (वेमतिक). ज्यांच्या मनात शंका उत्पन्न झाली आहे, ते 'वेमतिकजाता' (शंकाग्रस्त) होत. पूर्वीच्या चित्ताचा लोभसहगत भाव 'ही आठही लोभसहगत चित्ते आहेत' या लघु-निष्कर्षामुळेच (चूळनिगमन) सिद्ध झाल्यासारखा आहे, अशी योजना आहे. लघु-निष्कर्षाने प्रतिघ-संप्रयुक्त भाव सिद्ध झाल्यावर, दौर्मनस्य-सहगत भाव देखील त्यानेच सिद्ध होतो, म्हणून 'तेसं गहणं' (त्यांचे ग्रहण) असे म्हटले आहे. 'तेसं' म्हणजे दौर्मनस्य आणि प्रतिघ यांचे. या चित्तामध्ये ईर्ष्या (इस्सा), मात्सर्य (मच्छरिय), कुक्कुच्च (पश्चात्ताप) आणि थिन-मिद्ध (आळस व तंद्रा) हे अनियतयोगी (अनियमितपणे जोडले जाणारे) आणि 'येवापनक' (इतर चैतसिक) देखील असतात. म्हणूनच 'पुरिमचित्ते' (पूर्वीच्या चित्तात) इत्यादी म्हटले आहे. दौर्मनस्य या चित्तात आहे, इतर चित्तात नाही, म्हणून तो 'असाधारण धर्म' आहे. त्याला 'अनन्यसाधारण धर्म' असेही म्हणतात. 'यथातं' म्हणजे त्याचे निदर्शन (उदाहरण), जसे केले आहे तसे, असा अर्थ आहे. 'उपलक्खेति' म्हणजे संज्ञापित करतो (लक्षात आणून देतो). जो उन्हापासून रक्षण करतो तो 'आतपत्त' (छत्र) होय, म्हणजेच श्वेतछत्र. ज्याने छत्र प्राप्त केले आहे तो 'लद्धातपत्त' (छत्रप्राप्त) राजकुमार होय. 'त्याने छत्र प्राप्त केले' असे म्हटले असता, त्याने सर्व राजसंपत्ती प्राप्त केली असा बोध होतो. म्हणून हे उपलक्षण-वचन (लाक्षणिक विधान) झाले आहे, असे समजावे. 'उभिन्नं' म्हणजे दौर्मनस्य आणि प्रतिघ या दोघांचे. पूर्वी 'दौर्मनस्य-सहगत' असे म्हणून निष्कर्षात 'प्रतिघ-संप्रयुक्त चित्ते' असे म्हटल्यामुळे 'याच्या...पे... सिद्धीमुळे' असे म्हटले आहे. ๒๗. ‘‘อนิฏฺฐโลกธมฺเมหี’’ติ อลาโภ จ, อยโสจ, นินฺทาจ, ทุกฺขญฺจาติ จตูหิ อนิฏฺฐโลกธมฺเมหิ. ‘‘ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา’’ติ อหํ อลาภาทีหิ มาสมาคจฺฉีติ ปตฺเถนฺตสฺสปิ กุโตเมเอตฺถโลเกตํ ปตฺถนา ปูรณํ สพฺพกาลํ ลพฺภาติ อตฺโถ. ‘‘ลพฺภา’’ติ จ กมฺมตฺถทีปกํ ปาฏิปทิกปทํ. อิเมสํ อุปฺปตฺติวิธานํ วิสุทฺธิมคฺเค สงฺเขปโตว วุตฺตํ ตสฺส ปาณาติ ปาตาทีสุ ติกฺขมนฺทปฺปวตฺติกาเล ปวตฺติเวทิตพฺพาติ. २७. 'अनिष्ट लोकधर्मांद्वारे' म्हणजे अलाभ (नुकसान), अयश (अपकीर्ती), niंदा आणि दुःख या चार अनिष्ट लोकधर्मांद्वारे. 'ते येथे कोठून मिळणार?' म्हणजे 'मला अलाभ इत्यादी प्राप्त होऊ नयेत' अशी प्रार्थना करणाऱ्यालाही या जगात ती प्रार्थना पूर्ण होणे सर्वकाळ कोठून मिळणार? असा अर्थ आहे. 'लब्भा' हे कर्म-अर्थ दर्शवणारे प्रातिपदिक पद आहे. यांच्या उत्पत्तीची पद्धत विसुद्धिमग्गमध्ये संक्षेपानेच सांगितली आहे, तिची प्राणातिपात (जीवहिंसा) इत्यादींच्या वेळी तीक्ष्ण आणि मंद प्रवृत्तीच्या काळात होणारी प्रवृत्ती समजून घ्यावी. โทสมูลจิตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. दोषमूलक चित्तांचे वर्णन समाप्त झाले. ๒๘. โมหมูลจิตฺเต. ‘‘มูลนฺตรวิรเหนา’’ติ อญฺญมูลวิรเหน. สํสปฺปตีติ สํสปฺปมานา. เอวํ นุ โข, อญฺญถานุ โขติ เอวํ ทฺวิธา เอรยติ กมฺปตีติ อตฺโถ. วิกฺขิปตีติ วิกฺขิปมานํ. ‘‘นิยมนตฺถ’’นฺติ อิทํ วิจิกิจฺฉาสมฺปยุตฺตํ นามาติ นิยมนตฺถํ. อิทญฺหิ ปฏิฆสมฺปยุตฺตํ วิย นิคมเนน สิทฺธํ น โหติ. ‘‘อิธ ลทฺโธกาสํ หุตฺวา’’ติ มูลนฺตร วิรหตฺตา เอว อิธลทฺโธกาสํ หุตฺวา. ปกติ สภาวภูตํ, อิติ ตสฺมา นตฺถีติ โยชนา. ‘‘อโนสกฺกมาน’’นฺติ ปจฺฉโต อนิวตฺตมานํ. ‘‘อสํสีทมาน’’นฺติ เหฏฺฐโต อปตมานํ. อุภเยน อพฺโพจฺฉินฺนนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อติสมฺมุฬฺหตายา’’ติ มูลนฺตร วิรเหน โมเหน อติสมฺมุฬฺหตาย. ‘‘อติจญฺจลตายา’’ติ สํสปฺปมานวิกฺขิปมาเนหิวิจิกิจฺฉุทฺธจฺเจหิ อติจญฺจลตาย. ‘‘สพฺพตฺถปี’’ติ สพฺเพสุปิ อารมฺมเณสุ. อฏฺฐกถายํ สงฺขาร เภเทน อวิชฺชาย ทุวิธภาโวว วุตฺโต. กถํ วุตฺโต. อวิชฺชา อปฺปฏิปตฺติ มิจฺฉา ปฏิปตฺติโต ทุวิธา ตถา สสงฺขา ราสงฺขารโตติ [Pg.51] วุตฺโต. ‘‘ติวิธภาโววา’’ติ อิมสฺมึ จิตฺเตสงฺขารวิมุตฺตาย อวิชฺชาย สทฺธึ ติวิธภาโวว. อิเมสํ ทฺวินฺนํ จิตฺตานํ อุปฺปตฺติวิธานํ วิสุทฺธิมคฺเคสงฺเขปโตววุตฺตํ ตสฺสอสนฺนิฏฺฐานวิกฺเขปกาเลปวตฺติ เวทิตพฺพาติ. २८. मोहमूलक चित्ताच्या बाबतीत: 'मूलान्तरविरहेण' म्हणजे इतर मूलांच्या (हेतूंच्या) अभावामुळे. 'संसप्पति' म्हणजे संसर्पण करणारी (द्विधा मनःस्थिती असणारी). 'असे आहे की काय, की अन्यथा आहे?' अशा प्रकारे दोन प्रकारे हलते किंवा कंपित होते, असा अर्थ आहे. 'विक्खिपति' म्हणजे विक्षिप्त होणारे (विखुरणारे). 'नियमनार्थ' म्हणजे 'हे विचिकित्सा-संप्रयुक्त आहे' अशा नियमनासाठी (निश्चितीसाठी) आहे. कारण हे प्रतिघ-संप्रयुक्त चित्ताप्रमाणे निष्कर्षाने सिद्ध होत नाही. 'येथे संधी प्राप्त करून' म्हणजे इतर मूलांच्या अभावामुळेच येथे संधी प्राप्त करून. प्रकृती स्वभावभूत आहे, म्हणून ती नाही, अशी योजना आहे. 'अनोसक्कमानी' म्हणजे मागे न हटणारे. 'असंसीदमानी' म्हणजे खाली न पडणारे (खचून न जाणारे). या दोन्ही शब्दांनी 'अविच्छिन्न' (अखंड) असे म्हटले आहे. 'अतिसंमूळ्हताय' म्हणजे इतर मूलांच्या अभावामुळे मोहाने अत्यंत संमोहित झाल्यामुळे. 'अतिचंचलतारे' म्हणजे संसर्पण करणाऱ्या व विक्षेप करणाऱ्या विचिकित्सा आणि उद्धच्च (औद्धत्य) यांच्यामुळे अत्यंत चंचल झाल्यामुळे. 'सब्बत्थपि' म्हणजे सर्वच आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये). अट्ठकथा (अट्टकथा) मध्ये संस्कारांच्या भेदाने अविद्येचे द्विविध स्वरूपच सांगितले आहे. ते कसे सांगितले आहे? अविद्या ही अप्रतिपत्ती (अज्ञान) आणि मिथ्याप्रतिपत्ती (चुकीचे ज्ञान) या दोन प्रकारांनी, तसेच ससंस्कारिक व असंस्कारिक या रूपाने द्विविध सांगितली आहे. 'त्रिविध भावच' म्हणजे या चित्तामध्ये संस्कारमुक्त अविद्येसह त्रिविध भावच आहे. या दोन्ही चित्तांच्या उत्पत्तीची पद्धत विसुद्धिमग्गमध्ये संक्षेपानेच सांगितली आहे, तिची अनिश्चितता (असंनिठ्ठान) आणि विक्षेप (विक्खेप) यांच्या काळात होणारी प्रवृत्ती समजून घ्यावी. ๒๙. ‘‘สพฺพถาปี’’ติ นิปาตสมุทาโย วา โหตุ อญฺญมญฺญเววจโน วา, วิสุํ นิปาโตวาติ เอวํ สพฺพปฺปการโตปิ. อกุสลปเท อกาโร วิรุทฺธตฺโถ. ยถา อมิตฺโต, อสุโร, ติทสฺเสตุํ ‘‘อกุสลานี’’ติอาทิมาห. ‘‘ปฏิวิรุทฺธภาโว’’ติ โมหาทีหิ อกุสเลหิ วิรุทฺธภาโว. ภาวนํนารหนฺตีติ ‘‘อภาวนารหา’’. กถํ ปน ภาวนํนารหนฺตีติ อาห ‘‘ปุนปฺปุน’’นฺติอาทึ. ‘‘นิยามํ โอกฺกมนฺตาปี’’ติ ปญฺจานนฺตริย กมฺมภาเวน นิยตมิจฺฉาทิฏฺฐิภาเวน จ นิยามํ โอกฺกมนฺตาปิ. อปายํ ภชนฺตีติ อปายภาคิโน. กมฺมการกา. เตสํ ภาโว. ตาย. ‘‘วฏฺฏโสตนิยเต’’ติ สํสารวฏฺฏ โสตสฺมึ นิยเต. ‘‘ถิรตรปตฺตา’’ติ สมาธิวเสน ถิรตรภาวํ ปตฺตา. อิทานิ ตเมวตฺถํ ปการนฺตเรน วิภาเวตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ‘‘สิยุ’’นฺติ ปทํ ธาตุปจฺจเยหิ สิทฺธํ นิปฺผนฺนปทํ นาม นโหติ. กสฺมา, อิธปริกปฺปตฺถสฺส อสมฺภวโต. นิปาตปทํ โหติ. กสฺมา, อเนกตฺถตา สมฺภวโต. อิธ ปน ภวนฺติ สทฺเทน สมานตฺโถ. เตนาห ‘‘นิปาตปทํ อิธ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ. २९. “सब्बथापि” (सर्वथापि) हा निपातांचा समूह असो किंवा एकमेकांचे समानार्थी शब्द असोत, अथवा स्वतंत्र निपात असो, अशा प्रकारे सर्व प्रकारे (हा अर्थ होतो). ‘अकुशल’ या पदातील ‘अ’ कार हा विरुद्ध अर्थाचा आहे. जसे ‘अमित्र’ (शत्रू), ‘असुर’, हे दर्शवण्यासाठी “अकुसलानि” (अकुशले) इत्यादी म्हटले आहे. “पटिविरुद्धभावो” (प्रतिविरुद्धभाव) म्हणजे मोहादी अकुशलांशी असलेला विरुद्ध भाव. जे भावनेला (साधनेला) पात्र नाहीत ते “अभावना रहा” (भावना-अपात्र). पण ते भावनेला पात्र कसे नाहीत? हे सांगण्यासाठी “पुनप्पुनं” (पुन्हा पुन्हा) इत्यादी म्हटले आहे. “नियामं ओक्कमन्तापि” (नियमात प्रवेश करणारेही) म्हणजे पाच आनंतर्य कर्मांच्या भावाने आणि नियत मिथ्यादृष्टीच्या भावाने नियमात (नियत मार्गात) प्रवेश करणारेही. जे अपायाला (दुर्गतीला) प्राप्त होतात ते ‘अपायभागिनो’ (अपायभागी) होत. कर्म करणारे (कम्मकारका). त्यांचा भाव (ते कृत्य). त्याच्याद्वारे. “वट्टसोतनियते” (वर्तस्रोतनियते) म्हणजे संसारचक्राच्या प्रवाहात नियत (निश्चित) असलेले. “थिरतरपत्ता” (स्थिरतरप्राप्त) म्हणजे समाधीच्या प्रभावाने अधिक स्थिरतेला प्राप्त झालेले. आता तोच अर्थ दुसऱ्या प्रकारे स्पष्ट करण्यासाठी “अपि च” इत्यादी म्हटले आहे. “सियुं” हे पद धातू आणि प्रत्ययांनी सिद्ध झालेले निष्पन्न पद नाही. का? कारण येथे कल्पित अर्थाचा असंभव आहे. हे निपातपद आहे. का? कारण अनेक अर्थांची शक्यता आहे. परंतु येथे ‘भवन्ति’ या शब्दाशी याचा समान अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - “येथे निपातपद पाहावे” (निपातपदं इध दट्टब्बं). อกุสลวณฺณนา. अकुशल-वर्णन (अकुशलाचे स्पष्टीकरण). ๓๐. อเหตุกจิตฺเต. ‘‘สพฺพนิหีน’’นฺติ สพฺพจิตฺเตหิ หีนํ. ปุน ‘‘สพฺพนิหีน’’นฺติ สพฺพาเหตุเกหิ หีนํ. ‘‘ต’’นฺติ อกุสล วิปากํ. ३०. अहेतुक चित्तामध्ये. “सब्बनिहीनं” (सर्वहीन) म्हणजे सर्व चित्तांपेक्षा हीन. पुन्हा “sabbanihīna” (सर्वहीन) म्हणजे सर्व अहेतुक चित्तांपेक्षा हीन. “तं” (ते) म्हणजे अकुशल विपाक. ๓๑. สุตฺตปาฬิยํ, ‘‘กฏฺฐ’’นฺติ สุกฺขทารุํ. ‘‘สกลิก’’นฺติ ฉินฺทิตผาลิตํ กฏฺฐกฺขณฺฑกํ. ‘‘ถุส’’นฺติ วีหิสุงฺกํ. ‘‘สงฺการ’’นฺติ กจวรํ. จกฺขุญฺจรูเป จ ปฏิจฺจ ยํวิญฺญาณํ อุปฺปชฺชติ. ตํ จกฺขุวิญฺญาณนฺตฺเวว วุจฺจตีติอาทินา โยเชตพฺพํ. ตตฺถ ‘‘รูเป’’ติ รูปารมฺมณาน[Pg.52]. ‘‘สทฺเท’’ติอาทีสุปิ เอสนโย. เอตฺถ จ วิญฺญาณานิ เอกวตฺถุ นิสฺสิตานิ โหนฺติ. ตสฺมา วตฺถุ ทฺวาเรสุ เอกวจนํ วุตฺตํ. อารมฺมณานิ ปน เอกวิญฺญาเณนาปิ พหูนิ คหิตานิ. ตสฺมา อารมฺมเณสุ พหุวจนํ. ‘‘ทุกฺขยตี’’ติ ทุกฺขํ กโรติ. นามธาตุ ปทญฺเหตํ. ยถา อตฺตานํ สุเขติ วีเณตีติ สทฺทวิทู. ธาตุปาเฐสุ ปน สุขทุกฺขตกฺกิริยายํติ วุตฺตํ. ตกฺกิริยาติ จ สุขกิริยา ทุกฺข กิริยาติ อตฺโถ. สาตกิริยา อสฺสาตกิริยาติ วุตฺตํ โหติ. จ สทฺโท โอกาสตฺโถติ กตฺวา ‘‘ทุกฺกรํ โอกาสทาน’’นฺติ วุตฺตํ. ३१. सुत्तपाळिमध्ये, “कट्ठं” (काष्ठ) म्हणजे सुके लाकूड. “सकलिकं” (शकलिका) म्हणजे कापलेला किंवा फोडलेला लाकडाचा तुकडा. “थुसं” (तुष) म्हणजे धान्याचे टरफल (कोंडा). “संकारं” (संकार) म्हणजे कचरा. डोळा आणि रूप यांना अनुसरून जे विज्ञान उत्पन्न होते, त्याला ‘चक्षुविज्ञान’ असेच म्हटले जाते, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. तेथे “रूपे” म्हणजे रूपाचे आलंबन (विषय). “सद्दे” (शब्द) इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. आणि येथे विज्ञाने एकाच वस्तूवर (इंद्रियावर) आश्रित असतात. म्हणून वस्तू आणि द्वारांच्या बाबतीत एकवचन वापरले आहे. परंतु आलंबने (विषय) एका विज्ञानाद्वारेही अनेक ग्रहण केली जातात. म्हणून आलंबनांच्या बाबतीत बहुवचन वापरले आहे. “दुक्खयति” म्हणजे दुःख निर्माण करतो. हे नामधातूचे पद आहे. जसे व्याकरणकार ‘स्वतःला सुखी करतो’ किंवा ‘वीणा वाजवतो’ असे म्हणतात. धातूपाठांमध्ये तर ‘सुख-दुःख करण्याची क्रिया’ असे म्हटले आहे. ‘तक्किरिया’ (ती क्रिया) म्हणजे सुखक्रिया आणि दुःखक्रिया असा अर्थ आहे. साताक्रिया (सुखकारक क्रिया) आणि असाताक्रिया (असुखकारक क्रिया) असे म्हटले आहे. ‘च’ हा शब्द अवकाशाच्या (संधीच्या) अर्थात असल्यामुळे “अवकाश देणे कठीण आहे” (दुक्करं ओकासदानं) असे म्हटले आहे. ๓๒. ‘‘จกฺขุสฺส อสมฺภินฺนตา’’ติ จกฺขุปสาทรูปสฺส อภินฺนตา. ตสฺมิญฺหิ ภินฺเนสติ อนฺธสฺส จกฺขุสฺส รูปานินุปฏฺฐหนฺตีติ. ‘‘โสตสฺสอสมฺภินฺนตา’’ติอาทีสุปิ เอสนโย. ‘‘อาโลกสนฺนิสฺสยปฺปฏิลาโภ’’ติ จกฺขุ จ อาโลเกสติ กิจฺจการี โหติ. อสติ นโหติ. ตถา รูปญฺจ. ตสฺมา อาโลโก เตสํ วิสยวิสยีภาวูปคมเน สนฺนิสฺสโย โหติ. ตสฺส อาโลกสนฺนิสฺสยสฺส ปฏิลาโภ. เอสนโย อากาสสนฺนิสฺสยาทีสุ. อิเมสํ องฺคานํ ยุตฺติ ทีปนา อุปริรูปสงฺคเห อาคมิสฺสติ. ‘‘อฏฺฐกถาย’’นฺติ อฏฺฐสาลินิยํ. ตตฺถ ‘‘ตสฺมึ ปน อาปาตํ อาคจฺฉนฺเตปิ อาโลกสนฺนิสฺสเย อสติ จกฺขุวิญฺญาณํ นุปฺปชฺชตี’’ติ วจนํ อสมฺภาเวนฺโต ‘‘ตํ วินา อาโลเกนา’’ติอาทิมาห. ‘‘อภาวทสฺสน ปร’’นฺติ อภาวทสฺสนปฺปธานํ. ३२. “चक्खुस्स असंभिन्नता” (डोळ्याची अखंडता) म्हणजे चक्षुप्रसाद रूपाची अखंडता (न तुटणे). कारण त्यात बिघाड झाला असता, अंध व्यक्तीच्या डोळ्यासमोर रूपे प्रकट होत नाहीत. “सोतस्स असंभिन्नता” (कानाच्या अखंडते) इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. “आलोकसन्निसयप्पटिलाभो” (प्रकाशाच्या आश्रयाचा लाभ) म्हणजे प्रकाश असतानाच डोळा आपले कार्य करतो. प्रकाश नसताना करत नाही. तसेच रूपाचेही आहे. म्हणून, त्यांचा विषय आणि विषयी भाव प्राप्त होण्यासाठी प्रकाश हा आश्रय ठरतो. त्या प्रकाशाच्या आश्रयाचा लाभ (म्हणजे हा शब्द). आकाश-आश्रय (अवकाश-आश्रय) इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. या अंगांची (घटकांची) सुसंगती स्पष्ट करणारे विवरण पुढे ‘रूपसंग्रह’ मध्ये येईल. “अट्ठकथायं” (अट्टकथेत) म्हणजे अट्ठसालिनीमध्ये. तेथे “ते (रूप) समोर आले तरीही, प्रकाशाचा आश्रय नसल्यास चक्षुविज्ञान उत्पन्न होत नाही” या विधानाचा असंभव दर्शवत “त्या प्रकाशाशिवाय” इत्यादी म्हटले आहे. “अभावदस्सनपरं” म्हणजे अभावाचे दर्शन घडवण्यास प्राधान्य देणारे. ๓๓. วิปากวจนตฺเถ. วิปจฺจตีติ วิปากํ. วิปจฺจตีติ จ วิปกฺกภาวํ อาปชฺชติ. ปุพฺเพ กตกมฺมํ อิทานิ นิพฺพตฺตึ ปาปุณาตีติ วุตฺตํ โหติ. อิทานิ ตทตฺถํ ปากฏํ กโรนฺโต ‘‘อยญฺจ อตฺโถ’’ติอาทิมาห. อฏฺฐกถายํ อายูหน สมงฺคิตาปิ อาคตา. อิธ ปนสา เจตนา สมงฺคิตาย สงฺคหิตาติ กตฺวา ‘‘จตสฺโส สมงฺคิถา’’ติ วุตฺตํ. สมงฺคิตาติ จ สมฺปนฺนตา. ‘‘ตํ ตํ กมฺมายูหน กาเล’’ติ ปาณาติ ปาตาทิกสฺส ตพฺพิรมณาทิกสฺส จ ตสฺส ตสฺส ทุจฺจริตสุจริตกมฺมสฺส อายูหนกาเล. สมุจฺจินนกาเลติ อตฺโถ. ‘‘สพฺพโส อภาวํ ปตฺวาน นิรุชฺฌตี’’ติ ยถา อพฺยากต [Pg.53] ธมฺมานิรุชฺฌมานา สพฺพโส อภาวํ ปตฺวา นิรุชฺฌนฺติ. ตถา นนิรุชฺฌนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘สพฺพาการ ปริปูร’’นฺติ ปาณาติปาตํ กโรนฺตสฺส กมฺมานุ รูปาพหูกาย วจีมโน วิการา สนฺทิสฺสนฺติ. เอสนโย อทินฺนาทานาทีสุ. เอวรูเปหิ สพฺเพหิ อาการ วิกาเรหิ ปริปูรํ. ‘‘นิทหิตฺวา วา’’ติ สณฺฐเปตฺวา เอว. ‘‘ยํสนฺธายา’’ติ ยํกิริยาวิเสสนิธานํ สนฺธาย. ३३. ‘विपाक’ या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत: जे परिपक्व होते ते ‘विपाक’ (फळ) होय. ‘विपच्चति’ (परिपक्व होते) म्हणजे परिपक्व भावाला प्राप्त होते. पूर्वी केलेले कर्म आता उत्पत्तीला प्राप्त होते, असे म्हटले आहे. आता तोच अर्थ स्पष्ट करताना “अयं च अत्थो” (आणि हा अर्थ) इत्यादी म्हटले आहे. अट्ठकथेमध्ये ‘आयूहण-समंगिता’ (कर्म गोळा करण्याची संपन्नता) देखील आली आहे. परंतु येथे ती चेतना संपन्नतेमध्ये समाविष्ट केली आहे म्हणून “चतस्सो समंगिता” (चार संपन्नता) असे म्हटले आहे. ‘समंगिता’ म्हणजे संपन्नता (युक्त असणे). “तं तं कम्मायूहणकाले” (त्या त्या कर्माच्या संचयकाली) म्हणजे प्राणातिपात (हिंसा) इत्यादी आणि त्यापासून विरती इत्यादी त्या त्या दुष्कृत्य आणि सुकृत्य कर्मांच्या संचयकाली. ‘समुच्चिननकाले’ (एकत्र करण्याच्या वेळी) असा अर्थ आहे. “सब्बसो अभावं पत्वान निरुज्झति” (पूर्णपणे अभावाला प्राप्त होऊन निरुद्ध होते) म्हणजे जसे अव्याकृत धर्म निरुद्ध होताना पूर्णपणे अभावाला प्राप्त होऊन निरुद्ध होतात, तसे (हे) निरुद्ध होत नाही, असा अभिप्राय आहे. “सब्बाकारपरिपूरं” (सर्व प्रकारे परिपूर्ण) म्हणजे प्राणातिपात करणाऱ्याच्या कर्माला अनुरूप असे अनेक कायिक, वाचिक आणि मानसिक विकार दिसून येतात. हाच नियम अदत्तादान (चोरी) इत्यादींमध्येही आहे. अशा प्रकारच्या सर्व आकार-विकारांनी परिपूर्ण. “निदहित्वा वा” म्हणजे प्रस्थापित करूनच. “यं संधाय” म्हणजे ज्या क्रियाविशेषणाच्या प्रस्थापनेला उद्देशून. คาถายํ. ‘‘สชฺชู’’ติ อิมสฺมึ ทิวเส. ‘‘ขีรํ วมุจฺจตี’’ติ ยถา ขีรํ นาม อิมสฺมึ ทิวเส มุจฺจติ. ปกตึ ชหติ. วิปริณามํ คจฺฉติ. น ตถา ปาปํ กตํ กมฺมนฺติ โยชนา. กถํ ปน โหตีติ อาห ‘‘ทหนฺตํ พาลมนฺเวตี’’ติ. ‘‘ภสฺมาฉนฺโนวปาวโก’’ติ ฉาริกา ฉนฺโนวิย อคฺคิ. ‘‘โส ปนา’’ติ กิริยา วิเสโส ปน. ‘‘วิสุํ เอโก ปรมตฺถ ธมฺโมติปิ สงฺขฺยํ น คจฺฉตี’’ติ วิสุํ สมฺปยุตฺต ธมฺม ภาเวน สงฺขฺยํ น คจฺฉตีติ อธิปฺปาโย. โส หิ กมฺมปจฺจยธมฺมตฺตา ปรมตฺถ ธมฺโม น โหตีติ น วตฺตพฺโพ. เตนาห ‘‘อนุสยธาตุโย วิยา’’ติ. ‘‘โส’’ติ กิริยาวิเสโส. ‘‘ต’’นฺติ กมฺมํ วา, กมฺมนิมิตฺตํ วา, คตินิมิตฺตํ วา. ‘‘ตทา โอกาสํ ลภตี’’ติ วิปจฺจนตฺถาย โอกาสํ ลภติ. โอกาสํ ลภิตฺวา ปจฺจุปฏฺฐาตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตาสุ จ ตูสุสมงฺคิตาสุ. ‘‘อิตี’’ติ ลทฺธคุณวจนํ. ‘‘เอวญฺจ กตฺวา’’ติอาทิ ปุน ลทฺธคุณวจนํ. ‘‘ปาฬิย’’นฺติ ธมฺมสงฺคณิ ปาฬิยํ. ‘‘กมฺมสนฺตานโต’’ติ อรูปสนฺตานํ เอว วุจฺจติ. ‘‘เย ปนา’’ติ คนฺถการา ปน. ‘‘เตส’’นฺติ คนฺถการานํ. อาปชฺชตีติ สมฺพนฺโธ. เตสํ วาเทติ วา โยเชตพฺพํ. ยญฺจอุปมํ ทสฺเสนฺตีติ โยชนา. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ วจเน. น จ น ลภนฺตีติ โยชนา. ‘‘ตทา’’ติ ตสฺมึ ปริณตกาเล. ‘‘นาฬ’’นฺติ ปุปฺผผลานํ ทณฺฑกํ. गाथेमध्ये: “सज्जु” (लगेच) म्हणजे आजच्याच दिवशी. “खीरं वमुच्चति” (दूध बदलते) म्हणजे जसे दूध आजच्याच दिवशी बदलते (दही बनते), आपला मूळ स्वभाव सोडते आणि विकाराला प्राप्त होते, तसे केलेले पाप कर्म लगेच फळ देत नाही, अशी योजना आहे. मग ते कसे होते? हे सांगण्यासाठी “दहन्तं बालमन्वेति” (मूर्खाचा पाठलाग करत त्याला जाळते) असे म्हटले आहे. “भस्माछन्नोव पावको” म्हणजे राखेने झाकलेल्या अग्नीप्रमाणे. “सो पना” (परंतु तो) म्हणजे क्रियाविशेषण. “विसुं एको परमत्थधम्मोतिपि संखं न गच्छति” (स्वतंत्रपणे एक परमार्थ धर्म म्हणून गणला जात नाही) म्हणजे संप्रयुक्त धर्माच्या भावापेक्षा वेगळा म्हणून तो गणला जात नाही, असा अभिप्राय आहे. कारण तो कर्मप्रत्ययधर्म असल्यामुळे परमार्थ धर्म नाही असे म्हणता येत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - “अनुशय धातूंप्रमाणे” (अनुसयधातुयो विया). “सो” म्हणजे क्रियाविशेषण. “तं” म्हणजे कर्म, किंवा कर्मनिमित्त, किंवा गतिनिमित्त. “तदा ओकासं लभति” (तेव्हा संधी प्राप्त करतो) म्हणजे परिपक्व होण्यासाठी संधी प्राप्त करतो. संधी प्राप्त करून तो समोर उपस्थित होतो, असा अभिप्राय आहे. “तत्था” (तेथे) म्हणजे त्या संपन्नतांमध्ये. “इति” हे प्राप्त गुणाचे वचन आहे. “एवञ्च कत्वा” (असे करून) इत्यादी पुन्हा प्राप्त गुणाचे वचन आहे. “पाळियं” म्हणजे धम्मसंगणि पाळिमध्ये. “कम्मसन्तानतो” (कर्मसंतानापासून) म्हणजे अरूप संतानालाच म्हटले आहे. “ye panā” (जे ग्रंथकार आहेत ते). “तेसं” म्हणजे त्या ग्रंथकारांचे. ‘आपाद्यते’ (प्राप्त होते) असा संबंध आहे. किंवा ‘त्यांचा वाद’ अशी योजना करावी. ‘जी उपमा दर्शवतात’ अशी योजना आहे. “तत्था” म्हणजे त्या वचनात. ‘आणि ते प्राप्त करत नाहीत असे नाही’ अशी योजना आहे. “तदा” म्हणजे त्या परिपक्वतेच्या काळी. “नाळं” म्हणजे फुले व फळांचे देठ. ๓๔. ‘‘สมฺภโว’’ติ ปสงฺคการณํ. อภิวิเสเสน จรณํ ปวตฺตนํ อภิจาโร. วิเสส วุตฺติ. น อภิจาโร พฺยภิจาโร. สามญฺญ วุตฺติ. ปกฺขนฺตเรน สาธารณตาติ วุตฺตํ โหติ. ปกฺขนฺตเรน สาธารณตา นามปกฺขนฺตรสฺส นานปฺปการโต สชฺชนเมว ลคฺคนเมวาติ วุตฺตํ พฺยภิจารสฺสาติ ปสงฺคสฺส อิจฺเจวตฺโถติ. เอตฺถจาติอาทินา [Pg.54] สมฺภวพฺยภิจารานํ อภาวเมว วทติ. อกุสลเหตูหิ จ สเหตุกตา สมฺภโว นตฺถีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตส’’นฺติ อกุสลวิปากานํ. ‘‘อพฺยภิจาโรเยวา’’ติ พฺยภิจารรหิโตเยว. ३४. "संभव" (संभवो) म्हणजे प्रसंगाचे कारण. विशेष रूपाने प्रवृत्त होणे म्हणजे 'अभिचार' म्हणजेच विशेष वृत्ती. अभिचार नसणे म्हणजे 'व्यभिचार' म्हणजेच सामान्य वृत्ती. दुसऱ्या बाजूने (पक्षान्तराने) साधारणता (समानता) असे म्हटले आहे. दुसऱ्या बाजूने साधारणता म्हणजे दुसऱ्या पक्षाच्या विविध प्रकारांमुळे केवळ संलग्न होणे किंवा केवळ जुळणे, असा 'व्यभिचाराचा' म्हणजेच प्रसंगाचा अर्थ आहे. "एत्थ च" (आणि येथे) इत्यादींद्वारे संभव आणि व्यभिचार यांचा अभावच सांगितला आहे. अकुशल हेतूंमुळे सहेतुकतेचा संभव नसतो, असा संबंध आहे. "तेसं" म्हणजे त्या अकुशल विपाकांचे. "अव्यभिचारोयेव" म्हणजे व्यभिचाररहितच (नियमपूर्वकच). ๓๕. ‘‘ปญฺจทฺวาเร อุปฺปนฺน’’นฺติ ปญฺจทฺวารวิการํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺนตฺตา วุตฺตํ. เตนาห ‘‘ตญฺหี’’ติอาทึ. เอสนโย มโนทฺวาราวชฺชเนปิ. ३५. "पंचद्वारे उत्पन्न" (पञ्चद्वारे उप्पन्नं) असे पंचद्वाराच्या विकाराला (बदलाला) अनुसरून उत्पन्न झाल्यामुळे म्हटले आहे. म्हणूनच "तं हि" (ते खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. हाच नियम मनोद्वारावर्जनाच्या (मनोद्वारावज्जन) बाबतीतही लागू होतो. ยทิ หิ อยมตฺโถสิยา, เอวญฺจสติ, อยมตฺโถ อาปชฺชตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตส’’นฺติ วีถิจิตฺตานํ. อุปฺปาทสทฺโทนิยตปุลฺลิงฺโคติ กตฺวา ‘‘ฏีกาสุ ปน…เป… นิทฺทิฏฺฐํ’’ สิยาติ วุตฺตํ. ‘‘วุตฺตนเยนา’’ติ สมฺปยุตฺตเหตุวิรหโตติ วุตฺตนเยน. วิปจฺจน กิจฺจํ นาม วิปากานํ กิจฺจํ. วิปากุปฺปาทนกิจฺจํ นาม กุสลากุสลานํ กิจฺจํ. ‘‘ตํ ตํ กิริยามตฺตภูตานี’’ติ อาวชฺชน กิริยา หสนกิริยามตฺตภูตานิ. ปฏิสนฺธิภวงฺคจุติจิตฺตานิ นาม เกวลํ กมฺมเวคุกฺขิตฺตภาเวนสนฺตาเนปติตมตฺตตฺตา ทุพฺพล กิจฺจานิ โหนฺติ. ปญฺจ วิญฺญาณานิ จ อสารานํ อพลานํ ปสาทวตฺถูนํ นิสฺสาย อุปฺปนฺนตฺตา ทุพฺพลวตฺถุกานิ โหนฺติ. สมฺปฏิจฺฉนาทีนิ จ ปญฺจวิญฺญาณานุพนฺธ มตฺตตฺตา ทุพฺพล กิจฺจฏฺฐานานิ โหนฺติ. ตสฺมา ตานิ สพฺพานิ อตฺตโน อุสฺสาเหนวินา เกวลํ วิปจฺจนมตฺเตน ปวตฺตนฺติ. ‘‘วิปากสนฺตานโต’’ติ ปญฺจทฺวาราวชฺชนญฺจ มโนทฺวาราวชฺชนญฺจ ภวงฺควิปากสนฺตานโต ลทฺธปจฺจยํ โหติ. โวฏฺฐพฺพนํ ปญฺจวิญฺญาณาทิ วิปากสนฺตานโต ลทฺธปจฺจยํ. ‘‘อิตรานิ ปนา’’ติ หสิตุปฺปาทจิตฺต มหากิริยจิตฺตาทีนิ. ‘‘นิรนุสยสนฺตาเน’’ติ อนุสยรหิเต ขีณาสวสนฺตาเน. ‘‘อุสฺสาหรหิตานิ เอวา’’ติ ยถา รุกฺขานํ วาตปุปฺผานิ นาม อตฺถิ. ตานิ ผลุปฺปาทกสิเนหรหิตตฺตา ผลานิ น อุปฺปาเทนฺติ. ตถา ตานิ จ วิปากุปฺปาทกตณฺหาสิเนหรหิตตฺตา อุสฺสาหพฺยาปาร รหิตานิ เอว. जर हा अर्थ असेल, तर असे असताना हा अर्थ प्राप्त होतो, असा संबंध आहे. "तेसं" म्हणजे त्या वीथिचित्तांचे. 'उत्पाद' (उप्पादा) हा शब्द निश्चित पुल्लिंगी असल्यामुळे "टीकांमध्ये तर...पे... निर्दिष्ट केले आहे" असे म्हटले आहे. "वृत्तक्रमाने" (वृत्तनयेन) म्हणजे संप्रयुक्त हेतूंच्या विरहामुळे (अभावामुळे) सांगितलेल्या क्रमाने. विपाकांचे कार्य म्हणजे 'विपच्चन कृत्य' (परिपक्व होण्याचे कार्य) होय. कुशल आणि अकुशल चित्तांचे कार्य म्हणजे 'विपाकोत्पादन कृत्य' (विपाक उत्पन्न करण्याचे कार्य) होय. "ते ते केवळ क्रियामात्र झालेले" म्हणजे आवर्जन क्रिया आणि हास्यक्रियामात्र झालेले चित्त होय. प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती चित्ते ही केवळ कर्मवेगाने फेकली गेल्यामुळे चित्तसंततीमध्ये पडल्यामात्रे करून दुर्बळ कृत्ये असणारी असतात. पाच विज्ञाने (पंचविज्ञान) ही असार व दुर्बळ अशा प्रसादवस्तूंना (इंद्रियांना) आश्रय करून उत्पन्न झाल्यामुळे दुर्बळवस्तुक असतात. संपटिच्छन (स्वीकृती) इत्यादी चित्ते ही केवळ पंचविज्ञानांच्या अनुबंधमात्रे करून दुर्बळ कृत्यांच्या स्थानावर असतात. म्हणून ती सर्व स्वतःच्या उत्साहाशिवाय केवळ परिपक्व होण्यामात्रे करून (विपच्चनमात्रेने) प्रवृत्त होतात. "विपाक-संततीपासून" (विपाकसंतानतो) म्हणजे पंचद्वारावर्जन आणि मनोद्वारावर्जन हे भवांग-विपाक-संततीपासून प्रत्यय (कारण) प्राप्त करणारे असतात. वोट्ठब्बन (व्यवस्थापन) हे पंचविज्ञानादी विपाक-संततीपासून प्रत्यय प्राप्त करणारे असते. "इतर तर" (इतराणि पना) म्हणजे हसितुत्पादचित्त आणि महाक्रियाचित्त इत्यादी. "निरनुशय संततीमध्ये" (निरनुसयसंताने) म्हणजे अनुसयरहित अशा क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) चित्तसंततीमध्ये. "उत्साहरहितच" म्हणजे ज्याप्रमाणे वृक्षांना 'वातपुष्पे' (वाऱ्याने गळणारी फुले) असतात, ती फळ उत्पन्न करणाऱ्या स्नेहाने (रसाने) रहित असल्यामुळे फळे उत्पन्न करत नाहीत; त्याचप्रमाणे ती चित्ते देखील विपाक उत्पन्न करणाऱ्या तृष्णारूपी स्नेहाने रहित असल्यामुळे उत्साह आणि व्यापाराने रहितच असतात. ๓๖. เวทนาวิจารณายํ. ‘‘ปิจุปิณฺฑกานํ วิยา’’ติ ทฺวินฺนํ กปฺปาสปิจุปิณฺฑกานํ อญฺญมญฺญสงฺฆฏฺฏนํ วิย อุปาทารูปานญฺจ อญฺญมญฺญสงฺฆฏฺฏนํ ทุพฺพลเมวาติ โยชนา. ‘‘เตสํ อารมฺมณภูตาน’’นฺติ ติณฺณํ มหาภูตานํ. ‘‘กายนิสฺสยภูเตสู’’ติ กายนิสฺสยมหาภูเตสุ[Pg.55].‘‘เตหี’’ติ ปญฺจวิญฺญาเณหิ. ‘‘ปุริมจิตฺเตนา’’ติ สมฺปฏิจฺฉนจิตฺตโต. ‘‘ต’’นฺติ อกุสลวิปากสนฺตีรณํ. ปฏิเฆน วินา นปฺปวตฺตติ. กสฺมา นปฺปวตฺตตีติ อาห ‘‘เอกนฺตากุสลภูเตนา’’ติอาทึ. ‘‘อพฺยากเตสุ อสมฺภวโต’’ติ อพฺยากต จิตฺเตสุ ยุชฺชิตุํ อสมฺภวโต. กมฺมานุภาวโต จ มุญฺจิตฺวา ยถาปุริมํ วิปากสนฺตานํ กมฺมานุภาเวน ปวตฺตํ โหติ. ตถา อปฺปวตฺติตฺวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘เกนจี’’ติ เกนจิ จิตฺเตน. ‘‘วิสทิสจิตฺตสนฺตาน ปราวฏฺฏนวเสนา’’ติ ปุริเมนวิปาก จิตฺต สนฺตาเนน วิสทิสํ กุสลาทิ ชวน จิตฺตสนฺตานํ ปรโต อาวฏฺฏา ปน วเสน. ตถาหิทํ จิตฺตทฺวยํ ปาฬิยํ อาวฏฺฏนา, อนฺวาวฏฺฏนา, อาโภโค, สมนฺนาหาโรติ นิทฺทิฏฺฐํ. ‘‘สพฺพตฺถาปี’’ติ อิฏฺฐารมฺมเณปิ อนิฏฺฐารมฺมเณปิ. ‘‘อตฺตโน ปจฺฉา ปวตฺตสฺส จิตฺตสฺส วเสนา’’ติ อตฺตโน ปจฺฉา ปวตฺตํ จิตฺตํ ปฏิจฺจ น วตฺตพฺโพติ อธิปฺปาโย. ‘‘อตฺตโน ปจฺจเยหิ เอว โส สกฺกา วตฺตุ’’นฺติ อตฺตโน ปจฺจเยสุ พลวนฺเตสุ สติ, พลวา โหติ. ทุพฺพเลสุ สติ, ทุพฺพโล โหตีติ สกฺกาวตฺตุนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘วิสทิส จิตฺตสนฺตาน’’นฺติ โวฏฺฐพฺพนกิริยจิตฺตสนฺตานํ. ३६. वेदना-विचारात. "कापसाच्या गोळ्यांप्रमाणे" (पिचुपिण्डकानं विय) म्हणजे कापसाच्या दोन गोळ्यांचा परस्परांशी होणारा संघट्ट (आघात) ज्याप्रमाणे दुर्बळ असतो, त्याचप्रमाणे उपादारूपांचा परस्परांशी होणारा संघट्ट दुर्बळच असतो, अशी योजना करावी. "त्या आलंबनभूत असलेल्यांच्या" (तेसं आरम्मणभूतानं) म्हणजे तीन महाभूतांच्या. "कायनिश्रयभूत असलेल्यांमध्ये" (कायनिस्सयभूतेसू) म्हणजे कायनिश्रयरूपी महाभूतांमध्ये. "त्यांच्याद्वारे" (तेही) म्हणजे पंचविज्ञानांद्वारे. "पूर्वीच्या चित्ताद्वारे" (पुरिमचित्तेन) म्हणजे संपटिच्छन चित्तापासून. "ते" (तं) म्हणजे अकुशल विपाक संतीरण चित्त. ते प्रतिघाशिवाय (द्वेषाशिवाय) प्रवृत्त होत नाही. ते का प्रवृत्त होत नाही? म्हणून "एकांत अकुशल असल्यामुळे" (एकन्ताकुसलभूतेन) इत्यादी म्हटले आहे. "अव्याकृतांमध्ये असंभव असल्यामुळे" (अव्याकतेसु असंभवतो) म्हणजे अव्याकृत चित्तांमध्ये ते जुळणे असंभव असल्यामुळे. कर्माच्या प्रभावापासून मुक्त होऊन, ज्याप्रमाणे पूर्वीची विपाक-संतती कर्माच्या प्रभावाने प्रवृत्त झाली होती, त्याप्रमाणे प्रवृत्त न होता, असा अभिप्राय आहे. "कोणाद्वारे" (केनचि) म्हणजे कोणत्याही चित्ताद्वारे. "विसदृश चित्तसंततीच्या परिवर्तनामुळे" (विसदिसचित्तसन्तान परावट्टनवसेन) म्हणजे पूर्वीच्या विपाक चित्तसंततीपेक्षा विसदृश अशा कुशलादी जवन चित्तसंततीच्या नंतरच्या परिवर्तनामुळे. म्हणूनच पालिमध्ये या दोन चित्तांना 'आवर्त्तना' (आवट्तना), 'अनुवर्त्तना' (अन्वावट्तना), 'आभोग' (आभोगो) आणि 'समन्नाहार' (समन्नाहारो) असे निर्दिष्ट केले आहे. "सर्व ठिकाणीही" (सब्बत्थापि) म्हणजे इष्ट आलंबनातही आणि अनिष्ट आलंबनातही. "स्वतःच्या नंतर प्रवृत्त होणाऱ्या चित्ताच्या वशाने" (अत्तनो पच्छा पवत्तस्स चित्तस्स वसेन) म्हणजे स्वतःच्या नंतर प्रवृत्त होणाऱ्या चित्ताला अनुसरून असे म्हणू नये, असा अभिप्राय आहे. "स्वतःच्या प्रत्ययांद्वारेच (कारणांद्वारेच) ते सांगता येणे शक्य आहे" (अत्तनो पच्चयेहि एव सो सक्का वत्तुं) म्हणजे स्वतःचे प्रत्यय बलवान असताना ते बलवान होते आणि दुर्बळ असताना दुर्बळ होते, असे सांगता येणे शक्य आहे, असा अभिप्राय आहे. "विसदृश चित्तसंतती" म्हणजे वोट्ठब्बन (व्यवस्थापन) क्रियाचित्तसंतती होय. ๓๗. สงฺขาร วิจารณายํ ‘‘วิปากุทฺธาเร’’ติ อฏฺฐสาลินิยํ วิปากุทฺธาร กถายํ. ‘‘อุภยกมฺเมนปี’’ติ สสงฺขาริก กมฺเมนปิ, อสงฺขาริก กมฺเมนปิ. ‘‘เถเรนา’’ติ มหาทตฺตตฺเถเรน. ‘‘ตทุภยภาวาภาโว’’ติ สสงฺขาริก อสงฺขาริกภาวานํ อภาโว. ‘‘ตานิปิ หิ อปริพฺยตฺตกิจฺจานิเยวา’’ติ เอตฺถ อาวชฺชน ทฺวยํ ชวนานํ ปุเรจาริก กิจฺจตฺตา อปริพฺยตฺตกิจฺจํ โหตุ. หสิตุปฺปาทจิตฺตํ ปน ชวนกิจฺจตฺตา กถํ อปริพฺยตฺตกิจฺจํ ภเวยฺยาติ. ตมฺปิ สพฺพญฺญุตญฺญาณาทีนํ อนุจาริกมตฺตตฺตา อปริพฺยตฺตกิจฺจํ นาม โหตีติ. ‘‘อฏฺฐมหาวิปาเกสุ วิย วตฺตพฺโพ’’ติ มหาวิปากานํ สสงฺขาริกา สงฺขาริกภาโว ปุริมภเว มรณาสนฺนกาเล อารมฺมณานํ ปโยเคน สห วา วินา วา อุปฏฺฐานํ ปฏิจฺจ วุตฺโต, ตถา วตฺตพฺโพติ อธิปฺปาโย. ३७. संस्कार-विचारात. "विपाकोद्धारात" (विपाकुद्धारे) म्हणजे अट्ठसालिनीमधील विपाकोद्धार कथेमध्ये. "दोन्ही कर्मांद्वारेही" (उभयकम्मेनपि) म्हणजे ससंस्कारिक कर्माद्वारेही आणि असंस्कारिक कर्माद्वारेही. "स्थविरांद्वारे" (थेरेन) म्हणजे महादत्त स्थविरांद्वारे. "त्या दोन्ही भावांचा अभाव" (तदुभयभावाभावो) म्हणजे ससंस्कारिक आणि असंस्कारिक भावांचा अभाव. "ती देखील अपरिपक्व (अस्पष्ट) कृत्ये असणारीच आहेत" (तानिपि हि अपरिब्यत्तकिच्चानियेव) - येथे आवर्जन द्वय (दोन्ही आवर्जने) हे जवनांचे पूर्वगामी कृत्य असल्यामुळे अपरिपक्व कृत्य असो; परंतु हसितुत्पादचित्त हे जवन कृत्य असल्यामुळे अपरिपक्व कृत्य कसे असू शकेल? ते देखील सर्वज्ञता-ज्ञानादींचे केवळ अनुगामी असल्यामुळे अपरिपक्व कृत्यच ठरते. "आठ महाविपाकांप्रमाणे म्हणावे" (अट्ठमहाविपाकेसु विय वतब्बो) म्हणजे महाविपाकांचा ससंस्कारिक-असंस्कारिक भाव हा पूर्वभवात मरणासन्न काळी आलंबनांच्या प्रयोगासह किंवा प्रयोगाशिवाय उपस्थित होण्याला अनुसरून सांगितला आहे, तसे म्हणावे, असा अभिप्राय आहे. ๓๘. ‘‘ทุพฺพล กมฺมนิพฺพตฺเตสู’’ติ ปฏิสนฺธิ ภวงฺค จุติกิจฺจานิ สนฺธาย [Pg.56] วุตฺตํ. ‘‘ทุพฺพลวตฺถุ กิจฺจฏฺฐาเนสู’’ติ จกฺขาทิวตฺถุเกสุ อาวชฺชนาทิ ทุพฺพลกิจฺจ ทุพฺพลฏฺฐานิเกสุ. ‘‘ตตฺถา’’ติอาทินา ตทตฺถํ วิวรติ. ตตฺถ ‘‘วิกฺเขปยุตฺต’’นฺติ วิกฺเขปกิจฺเจน อุทฺธจฺเจนยุตฺตํ หุตฺวา. ‘‘กปฺปฏฺฐิติกํ’’ นาม สงฺฆเภทกมฺมํ. ฉสุวตฺถุ รูเปสุ หทยวตฺถุเมว สุวณฺณรชตํ วิย สารวตฺถุ โหติ. อิตรานิ ผลิกานิวิย ปสาทมตฺตตฺตา อสารานิ โหนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘จกฺขาทีสุ ทุพฺพลวตฺถูสู’’ติ. ทสฺสนาทีนิ จ กิจฺจานิ ชวน กิจฺจสฺส ปุเรจรตฺตา ขุทฺทกิจฺจานิ โหนฺติ. เตนาห ‘‘ทสฺสนาทีสู’’ติอาทึ. ३८. "दुर्बळ कर्माने उत्पन्न झालेल्यांमध्ये" (दुब्बलकम्मनिब्बत्तेसु) हे प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती कृत्यांच्या संदर्भाने म्हटले आहे. "दुर्बळ वस्तू आणि कृत्यांच्या स्थानांमध्ये" (दुब्बलवत्थुकिच्चट्ठानेसु) म्हणजे चक्षू इत्यादी वस्तूंवर आश्रित असलेल्या आवर्जन इत्यादी दुर्बळ कृत्ये आणि दुर्बळ स्थानांच्या संदर्भात. "तेथे" (तत्थ) इत्यादींद्वारे त्याचा अर्थ स्पष्ट केला आहे. तेथे "विक्षेपयुक्त" (विक्खेपयुत्तं) म्हणजे विक्षेप कृत्याने म्हणजेच औद्धत्याने (उद्धच्च) युक्त होऊन. "कल्पस्थायिक" (कप्पट्ठितिकं) म्हणजे संघभेद कर्म होय. सहा वस्तुरूपांमध्ये हृदयवस्तूच (हदयवत्थु) सोन्या-चांदीप्रमाणे सारवस्तू असते. इतर वस्तू स्फटिकाप्रमाणे केवळ प्रसादमात्र (संवेदनशील) असल्यामुळे असार असतात, म्हणूनच "चक्षू इत्यादी दुर्बळ वस्तूंमध्ये" (चक्खादीसु दुब्बलवत्थूसु) असे म्हटले आहे. दर्शन (पाहणे) इत्यादी कृत्ये ही जवन कृत्याच्या पूर्वगामी असल्यामुळे लहान (गौण) कृत्ये असतात. म्हणूनच "दर्शनादींमध्ये" (दस्सनादीसु) इत्यादी म्हटले आहे. ๓๙. อิธ ทีปนิยํ อิจฺเจวนฺติ ปทํ อฏฺฐารสาติปทสฺสวิเสสนนฺติ กตฺวา ‘‘สพฺพถาปีติ ปทสฺส…เป… เวทิตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ. วิภาวนิยํ ปน ตํ สพฺพถาปีติ ปทสฺส วิเสสนนฺติ กตฺวา ‘‘สพฺพถา ปีติกุสลากุสลวิปากกิริยาเภเทนา’’ติ วุตฺตํ. ३९. येथे 'दीपनी' मध्ये 'इच्चेवम्' हे पद 'अठरा' या पदाचे विशेषण मानून "सब्बथापि (सर्व प्रकारे) या पदाचे... पे... समजले पाहिजे" असे म्हटले आहे. परंतु 'विभावनी' मध्ये त्याला 'सब्बथापि' या पदाचे विशेषण मानून "सर्व प्रकारे प्रीति, कुशल, अकुशल, विपाक आणि क्रिया यांच्या भेदाने" असे म्हटले आहे. อเหตุกจิตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. अहेतुक चित्त वर्णन समाप्त झाले. ๔๐. โสภณจิตฺเตสุ. อวุตฺตาปิ สิทฺธา โหติ. ยถา อฏฺฐจิตฺตานิ โลกุตฺตรานีติ จ วุตฺเต อวุตฺเตปิสิชฺฌนฺติ เสสจิตฺตานิ โลกิยานีติ จ สอุตฺตรานีติ จาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อตฺตสมงฺคีโน’’ติ อตฺตนา ปาปกมฺเมน สมนฺนาคเต. ‘‘อนิจฺฉนฺเต เยวา’’ติ สเจปิ อวีจินิมิตฺตสฺสาทวตฺถุ วิย เกจิ อิจฺฉนฺตุ. อชานนฺตานํ ปน อิจฺฉา อปฺปมาณนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘โสภคฺค ปตฺติยา’’ติ เอตฺถ สุภคสฺส ภาโว โสภคฺคนฺติ วิคฺคโห. สุภคสฺสาติ จ สุสิริกสฺส. ४०. शोभन चित्तांमध्ये. न बोलताही सिद्ध होते. जसे "आठ चित्ते लोकोत्तर आहेत" असे म्हटले असता, न सांगताही उर्वरित चित्ते लौकिक आणि सोत्तर (स-उत्तर) आहेत हे सिद्ध होते, असा अभिप्राय आहे. "अत्तसमङ्गीनो" (स्वतःशी युक्त) म्हणजे स्वतः केलेल्या पापकर्माने युक्त असलेला. "इच्छा नसतानाही" म्हणजे जरी अवीचि नरकाच्या निमित्ताच्या आस्वादाच्या वस्तूची काही लोक इच्छा करत असले तरी, अज्ञान्यांची इच्छा ही अप्रमाण आहे, असा अभिप्राय आहे. "सौभाग्य प्राप्तीसाठी" येथे 'सुभगाचा भाव म्हणजे सौभाग्य' असा विग्रह आहे. आणि 'सुभग' म्हणजे अत्यंत शोभायमान (सुश्रीक). ๔๑. ‘‘ยาถาวโต’’ติ ยถา สภาวโต. เอตฺถ สิยา ชานาตีติ ญาณนฺติ วุตฺตํ, กึ สพฺพํ ญาณํ ยาถาวโต ชานาตีติ. กิญฺเจตฺถ. ยทิ สพฺพํ ญาณํ ยาถาวโต ชานาติ. เอวํ สติ, ญาเณน จินฺเตนฺตานํ อชานนํ นาม นตฺถิ, วิรชฺฌนํ นาม นตฺถีติ อาปชฺชติ. อถ สพฺพํ ญาณํ ยาถาวโต น ชานาติ, กตฺถจิ ชานาติ, กตฺถจิ น ชานาติ. เอวญฺจสติ, ยตฺถ ชานาติ, ตตฺเถว ตํ ญาณํ โหติ. ยตฺถ น ชานาติ, ตตฺถ ตํ ญาณเมว น โหตีติ อาปชฺชตีติ. วุจฺจเต[Pg.57]. ญาเณน จินฺเตสฺสามีติ จินฺเตนฺตานํปิ ยตฺถ ยตฺถ ยาถาวโต ชานนํ น โหติ, ตตฺถ ตตฺถ ญาณ วิปฺปยุตฺต จิตฺตํ โหติ. ญาณปฺปฏิ รูปกา จ ธมฺมา อตฺถิ จิตฺตญฺจ วิตกฺโก จ, วิจาโร จ, ทิฏฺฐิ จ. เอเตหิ จินฺเตนฺตาปิ อหํ ญาเณน จินฺเตมีติ มญฺญนฺติ. ‘‘เทยฺย ธมฺมปฏิคฺคาหก สมฺปตฺตี’’ติ เทยฺยธมฺม วตฺถุ สมฺปตฺติ, ปฏิคฺคาหก ปุคฺคล สมฺปตฺติ. ‘‘อพฺยาปชฺชโลกูปปตฺติตา’’ติ เอตฺถ อพฺยาปชฺชโลโก นาม กายิกทุกฺข เจตสิก ทุกฺข รหิโต อุปริเทวโลโก วา พฺรหฺมโลโก วา. อุปปชฺชนํ อุปปตฺติ. ปฏิสนฺธิวเสน อุปคมนนฺติ อตฺโถ. อพฺยาปชฺชโลกํ อุปปตฺติ ยสฺส โส อพฺยาปชฺช โลกูปปตฺติ. ตสฺส ภาโวติ วิคฺคโห. ‘‘กิเลส ทูรตา’’ติ สมาปตฺติ พเลน วา, อญฺญตรปฺปฏิปตฺติยา วา, วิกฺขมฺภิต กิเลสตา วา, อริยมคฺเคน สมุจฺฉินฺน กิเลสตา วา. ४१. "याथावतो" म्हणजे यथास्वभावतः (यथार्थपणे). येथे असे म्हटले जाऊ शकते की, 'जे जाणते ते ज्ञान आहे', मग काय सर्व ज्ञान यथार्थपणे जाणते? यात काय विशेष? जर सर्व ज्ञान यथार्थपणे जाणत असेल, तर असे असताना, ज्ञानाने विचार करणाऱ्यांना अज्ञान किंवा चूक (भ्रम) नावाची गोष्टच उरणार नाही, असा प्रसंग येईल. आणि जर सर्व ज्ञान यथार्थपणे जाणत नसेल, काही ठिकाणी जाणत असेल आणि काही ठिकाणी जाणत नसेल, तर अशा वेळी, जेथे ते जाणते तेथेच ते ज्ञान असते, आणि जेथे ते जाणत नाही तेथे ते ज्ञानच नसते, असा प्रसंग येईल. यावर उत्तर दिले जाते: "मी ज्ञानाने विचार करीन" असा विचार करणाऱ्यांनाही जेथे जेथे यथार्थ ज्ञान होत नाही, तेथे तेथे 'ज्ञान-विप्रयुक्त' (ज्ञानाविरहित) चित्त असते. आणि ज्ञानासारखे भासणारे धर्मही आहेत, जसे की चित्त, वितर्क, विचार आणि दृष्टी. यांच्याद्वारे विचार करणारे देखील "मी ज्ञानाने विचार करत आहे" असे मानतात. "देय्यधम्म-प्रतिग्राहक संपत्ती" म्हणजे दान देण्याच्या वस्तूची समृद्धी (देय्यधम्म वस्तू संपत्ती) आणि दान स्वीकारणाऱ्या व्यक्तीची पात्रता (प्रतिग्राहक पुद्गल संपत्ती). "अव्यापज्झलोक-उपपत्ती" येथे 'अव्यापज्झलोक' म्हणजे शारीरिक दुःख आणि मानसिक दुःखापासून रहित असलेला वरचा देवलोक किंवा ब्रह्मलोक होय. 'उपपत्ती' म्हणजे जन्म घेणे. प्रतिसंधीच्या द्वारे जाणे असा याचा अर्थ आहे. ज्याची अव्यापज्झलोकात उपपत्ती (जन्म) होते, तो 'अव्यापज्झलोक-उपपत्ती' होय. त्याचा भाव म्हणजे ही अवस्था, असा विग्रह आहे. "क्लेश दूरता" म्हणजे समापत्तीच्या बलाने किंवा इतर साधनांच्या द्वारे क्लेशांचे दमन होणे (विक्खंभित क्लेशता) किंवा आर्यमार्गाने क्लेशांचे समूळ उच्चाटन होणे (समुच्छिन्न क्लेशता) होय. เตสํ อุปฺปตฺติ วิธานํ วิสุทฺธิ มคฺเค ขนฺธนิทฺเทเส เอวํ วุตฺตํ. ยทาหิ เทยฺยธมฺม ปฏิคฺคาหกาทิ สมฺปตฺตึ อญฺญํ วา โสมนสฺสเหตุํ อาคมฺม หฏฺฐตุฏฺโฐ อตฺถิทินฺนนฺติอาทินยปฺปวตฺตํ สมฺมาทิฏฺฐึ ปุเรกฺขิตฺวา อสํสีทนฺโต อนุสฺสาหิโตปเรหิ ทานาทีนิ ปุญฺญานิ กโรติ, ตทาสฺส โสมนสฺสสหคตํ ญาณ สมฺปยุตฺตํ จิตฺตํ อสงฺขารํ โหติ. ยทา ปน วุตฺตนเยน หฏฺฐตุฏฺโฐ สมฺมาทิฏฺฐึ ปุเรกฺขิตฺวา อมุตฺต จา คตาทิวเสน สํสีทมาโน วา ปเรหิ วา อุสฺสาหิโต กโรติ, ตทาสฺส ตเทว จิตฺตํ สสงฺขารํ โหติ. อิมสฺมิญฺหิ อตฺเถ สงฺขาโรติ เอตํ อตฺตโน วา ปเรสํ วา วเสน ปวตฺตสฺส ปุพฺพปฺปโยคสฺสาธิวจนํ. ยทา ปน ญาติ ชนสฺส ปฏิปตฺติ ทสฺสเนน ชาตปริจยาพาลทารกา ภิกฺขู ทิสฺวา โสมนสฺส ชาตาสหสา กิญฺจิ เทว หตฺถคตํ ททนฺติ วา วนฺทนฺติ วา, ตทา ตตียํ จิตฺตํ อุปฺปชฺชติ. ยทา ปน เทถวนฺทถาติ ญาตีหิ อุสฺสาหิตา เอวํ ปฏิปชฺชนฺติ, ตทา จตุตฺถํ จิตฺตํ อุปฺปชฺชติ. ยทา ปน เทยฺยธมฺม ปฏิคฺคาหกาทีนํ อสมฺปตฺตึ อญฺเญสํ วา โสมนสฺสเหตูนํ อภาวํ อาคมฺม จตูสุปิ วิกปฺเปสุ โสมนสฺสรหิตา โหนฺติ. ตทา เสสานิ จตฺตาริ อุเปกฺขาสหคตานิ อุปฺปชฺชนฺตีติ. त्यांच्या उत्पत्तीची पद्धत 'विशुद्धिमार्ग' ग्रंथातील 'स्कंधनिर्देश' मध्ये अशा प्रकारे सांगितली आहे. कारण जेव्हा देय्यधम्म (दानाच्या वस्तू) आणि प्रतिग्राहक (दान स्वीकारणारे) इत्यादींची समृद्धी किंवा इतर सौमनस्याचे (आनंदाचे) कारण मिळून, हर्षित व संतुष्ट होऊन, "दान दिले पाहिजे" इत्यादी नियमाने प्रवृत्त झालेल्या सम्यक् दृष्टीला समोर ठेवून, संकोच न बाळगता आणि इतरांनी प्रवृत्त न करता दान इत्यादी पुण्यकर्मे करतो, तेव्हा त्याचे 'सौमनस्य-सहगत ज्ञान-संप्रयुक्त असंखारिक' चित्त उत्पन्न होते. परंतु जेव्हा सांगितलेल्या पद्धतीने हर्षित व संतुष्ट होऊन, सम्यक् दृष्टीला समोर ठेवूनही, मुक्तहस्त नसणे इत्यादी कारणांमुळे संकोच करत किंवा इतरांनी प्रवृत्त केल्यावर करतो, तेव्हा त्याचे तेच चित्त 'ससंखारिक' होते. कारण या अर्थामध्ये 'संखार' (संस्कार) हा स्वतःच्या किंवा इतरांच्या प्रेरणेने प्रवृत्त झालेल्या पूर्वप्रयोगाचा (प्रयत्नाचा) वाचक आहे. परंतु जेव्हा नातेवाईकांच्या आचरणाला पाहून परिचय झालेले लहान मुले भिक्खूंना पाहून आनंदित होऊन अचानक हातात असलेली कोणतीही वस्तू देतात किंवा त्यांना वंदन करतात, तेव्हा तिसरे चित्त उत्पन्न होते. परंतु जेव्हा "द्या, वंदन करा" असे नातेवाईकांनी प्रवृत्त केल्यावर ते तसे करतात, तेव्हा चौथे चित्त उत्पन्न होते. परंतु जेव्हा देय्यधम्म आणि प्रतिग्राहक इत्यादींची असंपत्ती (कमतरता) किंवा इतर सौमनस्याच्या कारणांचा अभाव यामुळे चारही पर्यायांमध्ये ते सौमनस्य-रहित (आनंदरहित) असतात, तेव्हा उर्वरित चार 'उपेक्षा-सहगत' चित्ते उत्पन्न होतात. ๔๒. อฏฺฐปีติ เอตฺถ ปิสทฺเทน อิมานิ จิตฺตานิ น เกวลํ อฏฺเฐว โหนฺติ[Pg.58]. อถ โข ตโต พหูนิปิ พหุตรานิปิ โหนฺตีติ อิมํ สมฺปิณฺฑนตฺถํ ทีเปตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘เตนา’’ติอาทิวุตฺตํ. ทสสุ ปุญฺญกิริยาวตฺถูสุ ทิฏฺฐุชุ กมฺมํ นาม ญาณ กิจฺจํ. ตํ กถํ ญาณ วิปฺปยุตฺต จิตฺเตหิ กโรนฺตีติ. วุจฺจเต. ญาณ สมฺปยุตฺต จิตฺเตหิ ทิฏฺฐึ อุชุํกโรนฺตา เตสํ อนฺตรนฺตรา ญาณโสเต ปติตวเสน ญาณวิปฺปยุตฺต จิตฺเตหิปิ กโรนฺติเยว. สพฺเพสตฺตา กมฺมสฺสกาติอาทินา, พุทฺโธ โสภควา, สฺวากฺขาโต โส ธมฺโม, สุปฺปฏิปนฺโน โส สงฺโฆ, ติอาทินา จาติ ทฏฺฐพฺพํ. เตนาห ‘‘อิมานิ อฏฺฐ จิตฺตานี’’ติอาทึ. ตตฺถ ทสปุญฺญกิริยวตฺถูนิ นาม ‘ทานํ, สีลํ, ภาวนา, อปจายนํ, เวยฺยาวจฺจํ, ปตฺติทานํ, ปตฺตานุโมทนํ, ธมฺมสฺสวนา, ธมฺมเทสนา, ทิฏฺฐุชุ กมฺมํ,. เตหิ คุณิตานิ วฑฺฒิตานิ. ตานิ จ อฏฺฐฉสุ อารมฺมเณสุ อุปฺปชฺชนฺติ. ตีณิ จ กมฺมานิ กโรนฺตา เต เหว อฏฺฐหิ กโรนฺติ. ตานิเยว จ สพฺพานิ อตฺถิ หีนานิ, อตฺถิ มชฺฌิมานิ, อตฺถิ ปณีตานิ. ตสฺมา ปุน อนุกฺกเมน อารมฺมณาทีหิ วฑฺฒนํ กโรติ. ตตฺถ ‘‘ตานิ ฐเปตพฺพานี’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สุทฺธิกานี’’ติ อธิปตีหิ อมิสฺสิตานิ. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ อิติ มนสิ กริตฺวา. ตถา ญาณวิปฺปยุตฺตานิ ทฺเวสหสฺสานิ สตํ สฏฺฐิ จ โหนฺตีติ โยชนา. ‘‘วีมํสาวชฺชิเตหี’’ติ วีมํสาธิปติ วชฺชิเตหิ. ‘‘ตถาคุณิตานี’’ติ สพฺพานิ ปุญฺญกิริยาทีหิ สมํ คุณิตานิ. ‘‘โกสลฺเลนา’’ติ โกสลฺลสงฺขาเตน. ‘‘นานาวชฺชนวีถิย’’นฺติ ญาณวิปฺปยุตฺต วีถีหิ วิสุํ ภูตาย อาวชฺชนาย ยุตฺต วีถิยํ. ‘‘เตเนวา’’ติ วีมํสาธิปติภูเตน เตเนว อุปนิสฺสยญฺญาเณน. เอวํ สนฺเตปิ น สกฺกาภวิตุนฺติ สมฺพนฺโธ. ४२. "आठही" (अट्ठपि) येथे 'पि' (सुद्धा) या शब्दाने ही चित्ते केवळ आठच नसतात, तर त्यापेक्षाही पुष्कळ आणि अधिक असतात, हा संकलन-अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी "तेना" (त्यामुळे) इत्यादी म्हटले आहे. दहा पुण्यक्रियावस्तूंमध्ये 'दिट्ठुजुकम्म' (दृष्टी सरळ करणे) हे ज्ञानाचे कार्य आहे. ते ज्ञान-विप्रयुक्त चित्तांनी कसे करतात? यावर उत्तर दिले जाते: ज्ञान-संप्रयुक्त चित्तांनी दृष्टी सरळ करत असताना, त्यांच्या मध्यंतरी ज्ञानप्रवाहात पडल्यामुळे ते ज्ञान-विप्रयुक्त चित्तांनी देखील करतातच. "सर्व प्राणी आपापल्या कर्माचे मालक आहेत" इत्यादीने, "बुद्ध हे भगवंत आहेत, धम्म सुविख्यात आहे, संघ सुप्रतिपन्न आहे" इत्यादीने हे समजले पाहिजे. म्हणूनच "ही आठ चित्ते" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे दहा पुण्यक्रियावस्तू म्हणजे: दान, शील, भावना, अपचायन (आदर करणे), वेय्यावच्च (सेवा करणे), पत्तिदान (पुण्य देणे), पत्तानुमोदन (पुण्याचा स्वीकार करणे), धम्मसवण (धम्म ऐकणे), धम्मदेसना (धम्म उपदेश करणे) आणि दिट्ठुजुकम्म (दृष्टी सरळ करणे). त्यांच्याद्वारे गुणिले (गुणित) होऊन वाढतात. आणि ती आठ चित्ते सहा आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये) उत्पन्न होतात. आणि तीन कर्मे (कायिक, वाचिक, मानसिक) करताना ते या आठ चित्तांनीच करतात. ती सर्व चित्ते काही हीन, काही मध्यम तर काही प्रणीत (उत्कृष्ट) असतात. म्हणून पुन्हा अनुक्रमाने आलंबन इत्यादींनी वाढ होते. तेथे "ती ठेवली पाहिजेत" असा संबंध आहे. "शुद्धिक" म्हणजे अधिपतींनी अमिश्रित (मिश्रित नसलेली). "इति कत्वा" म्हणजे असे मनात ठेवून. तसेच ज्ञान-विप्रयुक्त चित्ते दोन हजार एकशे साठ (२१६०) होतात, अशी योजना आहे. "वीमंसावज्जितेहि" म्हणजे मीमांसा-अधिपतींनी रहित (वगळलेले). "तथागुणित" म्हणजे सर्व पुण्यक्रिया इत्यादींनी गुणिले केलेले. "कौशल्याने" म्हणजे कौशल्य नावाच्या ज्ञानाने. "नानावज्जनवीथियं" म्हणजे ज्ञान-विप्रयुक्त वीथींपेक्षा भिन्न असलेल्या आवर्जनाने युक्त वीथीमध्ये. "तेनेव" म्हणजे मीमांसा-अधिपती झालेल्या त्याच उपनिश्रय-ज्ञानाने. असे असतानाही ते शक्य नाही, असा संबंध आहे. ๔๓. วจนตฺเถ ‘‘รุชฺชนฏฺเฐนา’’ติ ตุทนฏฺเฐน. ‘‘อหิตฏฺเฐนา’’ติ หิตวิรุทฺธฏฺเฐน. ‘‘อนิปุณฏฺเฐนา’’ติ อสณฺหา สุขุมฏฺเฐน. ‘‘อนิฏฺฐวิปากฏฺเฐนา’’ติ อนิฏฺฐํ วิปากํ เอเตสนฺติ อนิฏฺฐ วิปากานิ. เตสํ ภาโว อนิฏฺฐ วิปากฏฺโฐ. เตน อนิฏฺฐ วิปากฏฺเฐน. ‘‘ตปฺปฏิ ปกฺขตฺตา’’ติ ราคาทีหิ ปฏิปกฺขตฺตา. เอวํ ปริยายตฺถ สงฺขาตํ อภิธานตฺถํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อฏฺฐกถาสุ อาคตํ วจนตฺถํ ทสฺเสติ กุจฺฉิเตติอาทินา. ตตฺถ ‘‘กุจฺฉิเต’’ติ เชคุจฺฉิตพฺเพ, นินฺทิ ตพฺเพ [Pg.59] วา. จาเลนฺติ ตทงฺคปฺปหานวเสน, กมฺเปนฺติ วิกฺขมฺภนปฺปหานวเสน, วิทฺธํเสนฺติ สมุจฺเฉทปฺปหานวเสน. ‘‘ตนุกรณฏฺเฐนา’’ติ สลฺลิขนฏฺเฐน. ‘‘อนฺตกรณฏฺเฐนา’’ติ ปริโยสานกรณฏฺเฐน. ‘‘อปิ จา’’ติอาทิ ทีปนีนยทสฺสนํ. ‘‘โกสลฺล สมฺภูตฏฺเฐนา’’ติ มหาอฏฺฐกถานโย. ตตฺถ, กุสลสฺส ปณฺฑิตสฺส ภาโว เอกาสลฺลํ. ญาณํ. เตน สมฺภูตํ สญฺชาตํ โกสลฺล สมฺภูตํ ติวิคฺคโห. ४३. शब्दाच्या अर्थामध्ये, "रुज्जनट्ठेन" (पीडा देण्याच्या अर्थाने) म्हणजे "तुदनट्ठेन" (टोचण्याच्या किंवा छळण्याच्या अर्थाने). "अहितट्ठेन" म्हणजे हिताच्या विरुद्ध असण्याच्या अर्थाने. "अनिपुणट्ठेन" म्हणजे अ-सूक्ष्म किंवा स्थूल असण्याच्या अर्थाने. "अनिठ्ठविपाकट्ठेन" म्हणजे ज्यांचा विपाक (परिणाम) अनिष्ट असतो, ते 'अनिष्ट विपाक' आहेत. त्यांचा भाव म्हणजे 'अनिष्ट विपाकट्ठ'. त्या अनिष्ट विपाकट्ठ अर्थाने. "तप्पटिपक्खत्ता" म्हणजे रागादी क्लेशांच्या विरुद्ध (प्रतिपक्ष) असल्यामुळे. अशा प्रकारे पर्यायी अर्थ म्हणून ओळखला जाणारा अभिधेय अर्थ दाखवून, आता अट्ठकथांमध्ये आलेला शाब्दिक अर्थ 'कुच्छित' (निंद्य) इत्यादी शब्दांद्वारे दाखवितात. त्यामध्ये, "कुच्छित" म्हणजे जुगुप्सा करण्यायोग्य (घृणास्पद) किंवा निंदनीय. 'चालेंति' (कंपित करतात किंवा दूर करतात) म्हणजे तदंग-प्रहाणाच्या द्वारे, 'कंपेंति' (थरथर कापतात) म्हणजे विक्खंभन-प्रहाणाच्या द्वारे, आणि 'विद्धंसेन्ति' (विनाश करतात) म्हणजे समुच्छेद-प्रहाणाच्या द्वारे. "तनुकरणट्ठेन" म्हणजे संलेखन (क्लेशांना क्षीण करणे) करण्याच्या अर्थाने. "अन्तकरणट्ठेन" म्हणजे अंत (समाप्त) करण्याच्या अर्थाने. "अपि च" इत्यादी दीपनीच्या पद्धतीचे दर्शन आहे. "कोसल्लसम्भूतट्ठेन" हा महाअट्ठकथेचा दृष्टिकोन आहे. त्यामध्ये, कुशल म्हणजे पंडिताचा भाव म्हणजे 'कोसल्ल' (कौशल्य) होय, जे ज्ञान आहे. त्याने संभूत (उत्पन्न) झालेले ते 'कोसल्लसम्भूत' असा विग्रह आहे. ๔๔. ‘‘พลวกมฺเมนา’’ติ ติเหตุ กุกฺกฏฺฐ กมฺเมน. ‘‘ทุพฺพล กมฺเมนา’’ติ ติเหตุโกมเกน วา ทฺวิเหตุก กุสล กมฺเมน วา. ‘‘เกหิจิ อาจริเยหี’’ติ โมรวาปิ วาสี มหาทตฺตตฺเถรํ สนฺธาย วุตฺตํ. ‘‘สงฺคหกาเรนา’’ติ ภทฺทนฺต พุทฺธโฆสตฺเถเรน. ‘‘สนฺนิหิต ปจฺจยวเสนา’’ติ อาสนฺเน สณฺฐิตปจฺจย วเสน. ปจฺจุปฺปนฺน ปจฺจยวเสเนวาติ วุตฺตํ โหติ. อุปฏฺฐิตานิ กมฺมาทีนิ อารมฺมณานิ. ปวตฺตานิ มหาวิปากานิ. ‘‘อวิปาก สภาวโต’’ติ อวิปจฺจนสภาวโต. อวิปากุปฺปาทนสภาวโตติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อฏฺฐกถาย’’นฺติ ธมฺมสงฺคณิฏฺฐกถายํ. ‘‘อิธา’’ติ มหาวิปากจิตฺเต. ‘‘ตถา อปฺปวตฺติยา จา’’ติ ทานาทิวเสน อปฺปวตฺติโต จ. ४४. "बलवकम्मेन" (बलवान कर्माने) म्हणजे तिहेतुक उत्कृष्ट कर्माने. "दुब्बलकम्मेन" (दुर्बल कर्माने) म्हणजे तिहेतुक ओमक (हीन) कर्माने किंवा द्विहेतुक कुशल कर्माने. "केहिचि आचरियेहि" (काही आचार्यांच्या मते) हे मोरवापी-वासी महादत्त थेरांना उद्देशून म्हटले आहे. "संगहकारेण" (संग्रहकर्त्याद्वारे) म्हणजे भदन्त बुद्धघोष थेरांद्वारे. "सन्निहितपच्चयवसेन" म्हणजे जवळ असलेल्या प्रत्ययाच्या (कारणाच्या) प्रभावाने. याचा अर्थ 'प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) प्रत्ययाच्या प्रभावानेच' असा आहे. उपस्थित झालेली कर्मादी आलंबने आहेत. प्रवृत्त झालेले महाविपाक चित्त आहेत. "अविपाकस्वभावतो" म्हणजे विपाक न देण्याच्या स्वभावामुळे. विपाक उत्पन्न न करण्याच्या स्वभावामुळे, असे म्हटले आहे. "अट्ठकथायं" (अट्ठकथेमध्ये) म्हणजे धम्मसंगणी-अट्ठकथेमध्ये. "इध" (इथे) म्हणजे महाविपाक चित्तामध्ये. "तथा अप्पवत्तिया च" म्हणजे दानादींच्या द्वारे प्रवृत्त न झाल्यामुळे सुद्धा. ๔๕. มหากิริยจิตฺเต. ‘‘อุปรี’’ติ วีถิสงฺคเห ตทา รมฺมณ นิยเม. ‘‘สยเมวา’’ติ อนุรุทฺธตฺเถเรเนว. ‘‘วกฺขตี’’ติ วุจฺจิสฺสติ. ‘‘ยถารห’’นฺติ ขีณาสวสนฺตาเน อุปฺปนฺนานํ มหากิริยานํ อรหานุรูปํ. ภูตกถน วิเสสนํ เตน นิวตฺเตตพฺพสฺส อตฺถสฺส อภาวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตํ’’ติ สเหตุกคฺคหณํ. ‘‘พฺยวจฺเฉทกวิเสสน’’นฺติ อเหตุก วิปากกิริย จิตฺตานญฺจ สพฺภาวาตปฺปสงฺคสฺส อวจฺเฉทกํ วิเสสนํ. ‘‘ยถา สกฺขร กถลิกํปิ มจฺฉคุมฺพํปิ ติฏฺฐนฺตํปิ จรนฺตํปิ ปสฺสตี’’ติ วจเน สกฺขร กถลิกํ ติฏฺฐนฺตํ, มจฺฉคุมฺพํ ติฏฺฐนฺตํปิ จรนฺตํปิ ปสฺสตีติ เอวํ ยถา ลาภ โยชนา โหติ. ตถา อิธ ปีติ. ४५. महाक्रिया चित्तामध्ये. "उपरि" (पुढे) म्हणजे वीथि-संग्रहामध्ये तदारम्मण (तदालंबन) नियमामध्ये. "सयमेव" (स्वतःच) म्हणजे अनुरुद्ध थेरांद्वारेच. "वक्खति" म्हणजे सांगितले जाईल. "यथारहं" (योग्यतेनुसार) म्हणजे क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) संतानामध्ये उत्पन्न होणाऱ्या महाक्रिया चित्तांच्या अर्हत्त्वाला अनुरूप. हे सत्यकथन करणारे विशेषण आहे, कारण त्याद्वारे निवारण करण्यासारखा दुसरा कोणताही अर्थ अस्तित्वात नाही, असा अभिप्राय आहे. "तं" (ते) म्हणजे सहेतुक ग्रहण करणे होय. "ब्यवच्छेदकविसेसनं" (व्यवच्छेदक विशेषण) म्हणजे अहेतुक विपाक आणि क्रिया चित्तांच्या अस्तित्वाच्या प्रसंगाला वगळणारे विशेषण. "जसे खडे आणि गोटे, तसेच माशांचा थवा स्थिर असलेला किंवा फिरत असलेला पाहतो" या वाक्यामध्ये, खडे आणि गोटे स्थिर केलेले, आणि माशांचा थवा स्थिर असलेला किंवा फिरत असलेला पाहतो, अशी योग्य जुळणी (योजना) होते. त्याचप्रमाणे येथेही समजावे. ๔๖. ‘‘ยทิท’’นฺติ ยา อยํ ทีปน สมตฺถตา, ‘‘อิทํ สามตฺถิย’’นฺติ โยชนา. อยํ สมตฺถ ภาโวติ อตฺโถ. เภทวจเน โจทนายาติ [Pg.60] สมฺพนฺโธ. รจนาคาถายํ. ‘‘เอตานี’’ติ โสภณ กามาวจร จิตฺตานิ. ‘‘ปุญฺญ ปาป กฺริยาเภทา’’ติ ปุญฺญ ปาป กฺริยเภเทน. ४६. "यदिदं" (जे हे) म्हणजे जी ही स्पष्ट करण्याची क्षमता आहे, "हे सामर्थ्य" अशी योजना आहे. हा समर्थ भाव आहे, असा अर्थ आहे. भेदवचनामध्ये 'चोदना' (आक्षेप किंवा प्रेरणा) असा संबंध आहे. रचना-गाथेमध्ये. "एतानि" (ही) म्हणजे शोभन कामावचर चित्ते होत. "पुञ्ञपापक्रियाभेदा" (पुण्य-पाप-क्रियाभेदा) म्हणजे पुण्य, पाप आणि क्रिया यांच्या भेदाने. ๔๗. กตเม ธมฺมา กามาวจรา. เหฏฺฐโต อวีจินิรยํ ปริยนฺตํ กริตฺวา อุปริโต ปรนิมฺมิต วสวตฺติเทเว อนฺโต กริตฺวาติ เอวํ ปาฬิยํ นิทฺทิฏฺฐตฺตา อิธกามสทฺเทน สโหกาสากามภูมิ วุจฺจตีติ อาห ‘‘กาเม กามภูมิย’’นฺติ. ปริยาปนฺนาติ ปาฐเสโส. ‘‘กฺริยา จา’’ติ เอตฺถ จ สทฺโท ปน สทฺทตฺโถ. อิติ สทฺโท อิจฺเจวํ สทฺทตฺโถ. เอเตน ปฏิสิทฺธาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึ จิตฺตสงฺคเห. ‘‘ตสฺสา’’ติ สพฺพถาสทฺทสฺส. ภโว นาม อินฺทฺริย พทฺธสนฺตานคโต ธมฺม สมูโห วุจฺจติ. อิธ ปน กามาวจรา ธมฺมาติ ปเท กามสทฺโท. โส จ ปถวิ ปพฺพตาทีหิ สทฺธึ สพฺพํ กามภูมึ วทตีติ วุตฺตํ ‘‘ภูมิปริยาโย จา’’ติอาทิ. ‘‘อินฺทฺริยานินฺทฺริยพทฺธ ธมฺม สมูโห’’ติ อินฺทฺริยพทฺธ ธมฺม สมูโห สตฺตสนฺตานาคโต, อนินฺทฺริยพทฺธ ธมฺม สมูโห ปถวิ ปพฺพตาทิ คโต. ตตฺถ ชีวิตินฺทฺริเยน อนาพทฺโธ อนายตฺโต อนินฺทฺริยพทฺโธติ. ४७. कोणते धर्म कामावचर आहेत? खाली अवीची निरयापर्यंत (नरकापर्यंत) मर्यादा करून आणि वर परनिर्मितवसवत्ती देवांचा अंतर्भाव करून, अशा प्रकारे पाळीमध्ये (पालि ग्रंथात) निर्दिष्ट केल्यामुळे, येथे 'काम' शब्दाने अवकाशासह कामभूमी सांगितली जाते, म्हणून "कामे कामभूमियं" (कामामध्ये म्हणजे कामभूमीमध्ये) असे म्हटले आहे. "परियापन्ना" (अंतर्भूत असलेले) हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. "क्रिया च" यामध्ये 'च' हा शब्द 'पण' या अर्थाचा आहे. 'इति' हा शब्द 'अशा प्रकारे' या अर्थाचा आहे. याने 'प्रतिषिद्ध' (वर्जित) असा संबंध आहे. "इध" (इथे) म्हणजे या चित्त-संग्रहामध्ये. "तस्सा" म्हणजे 'सब्बथा' (सर्वथा) या शब्दाचा. 'भव' म्हणजे इंद्रियांशी बद्ध असलेल्या संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) असलेला धर्मसमूह होय. परंतु येथे 'कामावचरा धम्मा' या पदामध्ये 'काम' शब्द आहे. तो पृथ्वी, पर्वत इत्यादींसह संपूर्ण कामभूमीला दर्शवितो, म्हणून "भूमिपरियायो च" (भूमीचा पर्याय सुद्धा) इत्यादी म्हटले आहे. "इंद्रिय-अनिंद्रियबद्ध धर्मसमूह" म्हणजे इंद्रियबद्ध धर्मसमूह जो सत्त्वांच्या संतानामध्ये (जीवप्रवाहामध्ये) असतो, आणि अनिंद्रियबद्ध धर्मसमूह जो पृथ्वी, पर्वत इत्यादींमध्ये असतो. त्यामध्ये, जो जीवितेंद्रियाशी बद्ध नाही, त्याच्या अधीन नाही, तो 'अनिंद्रियबद्ध' होय. อิติกามจิตฺตสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. अशा प्रकारे कामचित्त-संग्रह-दीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๔๘. รูปาวจรจิตฺเต. ‘‘สมุทิเตนา’’ติ ปญฺจงฺค สมุทิเตน. ปญฺจนฺนํ องฺคานํ เอกโต สามคฺคิภูเตนาติ อตฺโถ. ปญฺจนฺนญฺหิ เอกโต สามคฺคิยํ สติเยว อปฺปนา โหติ, โน อสติ. สามคฺคิยนฺติ จ สุฏฺฐุ พลวตาย สมคฺคภาเวติ อตฺโถ. ‘‘ปฏิปชฺชิตพฺพตฺตา’’ติ ปตฺตพฺพตฺตา. ฌานํ ทุวิธํ อารมฺมณูปนิชฺฌานญฺจ ลกฺขณู ปนิชฺฌานญฺจาติ อาห ‘‘กสิณาทิกสฺสา’’ติอาทึ. อิธ ปน อารมฺมณูปนิชฺฌานํ อธิปฺเปตํ. อุปนิชฺฌานนฺติ จ กสิณ นิมิตฺตาทิกํ อารมฺมณํ เจตสา อุปคนฺตฺวานิชฺฌานํ โอโลกนํ. ฌานสทฺทสฺสฌาปนตฺโถปิ สมฺภวตีติ วุตฺตํ ‘‘ปจฺจนีก ธมฺมานญฺจ ฌาปนโต’’ติ. อคฺคินา วิย กฏฺฐานํ กิเลสานํ ทยฺหนโตติ อตฺโถ. เอกคฺคตา เอว สาติสฺสย ยุตฺตา อปฺปนาปตฺตกาเลติ อธิปฺปาโย. ปุพฺพภาเค ปน ปถมชฺฌาเน [Pg.61] วิตกฺกสฺส พลวภาโว อิจฺฉิตพฺโพ. ‘‘สาหี’’ติอาทินา ตทตฺถํ วิวรติ. สาหิ เอกคฺคตาติ จ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. เอโก อตฺตาสภาโว อสฺสาติ เอกตฺตํ. เอกตฺตํ อารมฺมณมสฺสาติ เอกตฺตา รมฺมณา. เอกคฺคตา. ตสฺส ภาโวติ วิคฺคโห. ४८. रूपावचर चित्तामध्ये. "समुदितेन" (एकत्रित झालेल्याने) म्हणजे पाच अंगांनी एकत्रित झालेल्याने. पाच अंगांच्या एकत्र येण्याच्या सामर्थ्याने (सामग्रीभूत झाल्याने), असा अर्थ आहे. कारण पाच अंगांची एकत्र सामग्री (एकता) असतानाच 'अर्पणा' (समाधीची उच्च अवस्था) होते, नसताना नाही. आणि 'सामग्री' म्हणजे अत्यंत बलवान असा ऐक्यभाव (समग्रभाव), असा अर्थ आहे. "पटिपज्जितब्बतत्ता" (प्रतिपत्तव्य असल्यामुळे) म्हणजे प्राप्त करण्यायोग्य असल्यामुळे. ध्यान दोन प्रकारचे आहे - आरम्मणूपनिज्झान (आलंबनाचे ध्यान) आणि लक्खणूपनिज्झान (लक्षणांचे ध्यान), म्हणून "कसिणादिकस्स" (कसिण इत्यादींचे) असे म्हटले आहे. परंतु येथे 'आरम्मणूपनिज्झान' (आलंबनाचे ध्यान) अभिप्रेत आहे. आणि 'उपनिज्झान' म्हणजे कसिण-निमित्त इत्यादी आलंबनाजवळ चित्ताने जाऊन त्याचे ध्यान करणे (अवलोकन करणे). 'झान' (ध्यान) शब्दाचा अर्थ 'जाळणे' (झापन) असाही संभवतो, म्हणून "पच्चनीक धम्मानञ्च झापनतो" (प्रतिपक्षी धर्मांना जाळण्यामुळे) असे म्हटले आहे. अग्नीने लाकूड जळण्याप्रमाणे क्लेशांचे दहन होणे, असा अर्थ आहे. एकाग्रता हीच अत्यंत श्रेष्ठतेने युक्त होऊन अर्पणा प्राप्त करण्याच्या काळातील असते, असा अभिप्राय आहे. परंतु पूर्वभागात (सुरुवातीला) प्रथम ध्यानामध्ये वितक्काचा (वितर्क) बलवान भाव असणे आवश्यक आहे. "सा ही" (तीच) इत्यादींद्वारे त्याचा अर्थ स्पष्ट केला आहे. "तीच एकाग्रता असेही म्हटले जाते" असा संबंध आहे. एकच आत्मस्वभाव ज्याचा आहे, ते 'एकत्व' होय. एकत्व हेच ज्याचे आलंबन आहे, ते 'एकत्तारम्मणा' (एकाग्रता) होय. त्याचा भाव (एकत्तारम्मणता) असा विग्रह आहे. อคฺคสทฺโท โกฏิ อตฺโถ. โกฏฺฐาสฏฺโฐวา. ‘‘ตถา ปวตฺตเน’’ติ จิตฺตสฺส เอกคฺคภาเวน ปวตฺติยํ. ‘‘อาธิปฺปจฺจคุณโยเคนา’’ติ อธิปติภาวคุณโยเคน. อินฺทฺริยปจฺจยตาคุณโยเคนาติ วุตฺตํ โหติ. สาเยว เอกคฺคตา เอกคฺคตา, สมาธี,ติ จ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สมาธี’’ติ ปทสฺส-สํ-อาธี-ติ-วา, สมอาธีติ-วา, ทฺวิธา ปทจฺเฉโท. ตตฺถ สํอุปสคฺโค สมฺมาสทฺทตฺโถ. สมสทฺโท ปน ธมฺเมน สเมน รชฺชํ กาเรตีติอาทีสุ วิย นามิกสทฺโทติ ทฺวิธา วิกปฺปํ ทสฺเสนฺโต ‘‘สาเยว จิตฺต’’นฺติอาทิมาห. สาเยว จิตฺตํ-สมฺมา จ อาธิยตีติ สมาธิ, สาเยว จิตฺตํ-สมญฺจ อาธิยตีติ สมาธีติ ทฺวิธา วิกปฺโป. ตตฺถ สมฺมา จาติ สุนฺทเรน. อาธิยตีติ อาทหติ. อาทหนญฺจ ฐปนเมวาติ วุตฺตํ ‘‘ฐเปตี’’ติ. สมญฺจาติ อวิสมญฺจ. ‘‘ตตฺเถวา’’ติ ตสฺมึ อารมฺมเณ เอว. ‘‘ลีนุทฺธจฺจาภาวา ปาทเนนา’’ติ ลีนสฺส จ อุทฺธจฺจสฺส จ อภาโว ลีนุทฺธจฺจาภาโว. ตสฺส อาปาทนํ อาปชฺชาปนนฺติ วิคฺคโห. วิวิเธน จิตฺตสฺส สํหรณํ วิสาหาโร. น วิสาหาโร อวิสาหาโร. สาเยว จ นิทฺทิฏฺฐา. อิติ เอวํ อิเมสุ ทฺวีสุ อตฺเถสุ เอกคฺคตา เอว สาติสฺสยยุตฺตาติ โยเชตพฺพํ. เอวํ ปน สติ, เอกคฺคตา เอว ฌานนฺติ วตฺตพฺพา, น วิตกฺกาทโยติ โจทนํ ปริหรนฺโต ‘‘วิตกฺกาทโยปนา’’ติอาทิมาห. อปิสทฺโท สมฺปิณฺฑนตฺโถ. ปนสทฺโท ปกฺขนฺตรตฺโถ. ตสฺสา เอกคฺคตาย. ‘‘สา ติสฺสย’’นฺติ อติสฺสเยน สห. ‘‘โอสกฺกิตุ’’นฺติ สํสีทิตุํ. ‘‘นํ’’ติ จิตฺตํ. ‘‘สํสปฺปิตุ’’นฺติ เอวํ นุ โข อญฺญถานุ โขติ ทฺวิธา จญฺจลิตุํ. ‘‘อุกฺกณฺฐิตุ’’นฺติ อญฺญาภิมุขี ภวิตุํ. อารมิตุนฺติ วุตฺตํ โหติ. ลทฺธํ สาตํ เยนาติ ลทฺธสฺสาตํ. ‘‘สาตํ’’ติ สารตฺตํ. ‘‘อุปพฺรูหิตํ’’ติ ภุสํวฑฺฒิตํ. ‘‘สนฺต สภาวตฺตา’’ติ อุปสนฺต สภาวตฺตา. ‘‘ตถา อนุคฺคหิตา’’ติ อารมฺมณาภิมุขกรณาทิวเสน อนุคฺค หิตา[Pg.62]. สมาธิสฺส กามจฺฉนฺทนีวรณปฺปฏิปกฺขตฺตา ‘‘สยํ…เป… นีวาเรตฺวา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘นิจฺจลํฐตฺวา’’ติ อปฺปนากิจฺจมาห. 'अग्ग' (अग्र) या शब्दाचा अर्थ 'कोटि' (शिखर किंवा टोक) असा आहे, किंवा 'कोठ्ठास' (भाग/विभाग) असा आहे. 'तथा पवत्तने' म्हणजे चित्ताच्या एकाग्रभावाने प्रवृत्ती होणे. 'आधिप्पच्चगुणयोगेन' म्हणजे अधिपतीभावाच्या गुणाच्या योगाने; म्हणजेच इंद्रियप्रत्ययता गुणाच्या योगाने, असे म्हटले आहे. तीच एकाग्रता 'एकाग्रता' आणि 'समाधी' असेही म्हटले जाते, असा संबंध आहे. 'समाधि' या पदाचा 'सं-आधि' किंवा 'सम-आधि' असा दोन प्रकारे पदच्छेद होतो. त्यामध्ये 'सं' हा उपसर्ग 'सम्मा' (सम्यक) या शब्दाच्या अर्थाचा आहे. 'सम' हा शब्द 'धर्माने आणि समतेने राज्य करतो' इत्यादींप्रमाणे नामवाचक शब्द आहे, असे दोन पर्याय दाखवत 'सायेव चित्तं' (तीच चित्त) इत्यादी म्हटले आहे. 'तीच चित्त सम्यक प्रकारे स्थापित करते म्हणून समाधी' आणि 'तीच चित्त समतेने स्थापित करते म्हणून समाधी' असे दोन पर्याय आहेत. त्यामध्ये 'सम्मा' म्हणजे सुंदर रीतीने. 'आधियति' म्हणजे धारण करते किंवा स्थापित करते. धारण करणे म्हणजेच स्थापन करणे, म्हणून 'ठपेति' (स्थापित करते) असे म्हटले आहे. 'समं' म्हणजे विषमता नसलेले (अविषम). 'तत्थेव' म्हणजे त्याच आलंबनात (आरम्मणात) च. 'लीनूद्धच्चाभावापादनेन' म्हणजे लीनता (आळस) आणि उद्धच्च (चंचलता) यांचा अभाव म्हणजे 'लीनूद्धच्चाभाव'; त्याचे संपादन करणे (मिळवणे) असा विग्रह आहे. चित्ताचे विविध प्रकारे विखुरणे म्हणजे 'विसाहार' (विक्षेप). विक्षेप नसणे म्हणजे 'अविसाहार'. तीच (एकाग्रता) निर्दिष्ट केली आहे. अशा प्रकारे या दोन्ही अर्थांमध्ये एकाग्रता हीच अतिशय युक्त (श्रेष्ठ) आहे, असे जोडले पाहिजे. असे असताना, एकाग्रता हेच ध्यान म्हटले पाहिजे, वितर्क इत्यादी नव्हे, या आक्षेपाचे परिहार करताना 'वितक्कादयोपना' इत्यादी म्हटले आहे. 'अपि' शब्द एकत्र जोडण्याच्या अर्थाचा आहे. 'पन' शब्द दुसऱ्या पक्षाच्या अर्थाचा आहे. त्या एकाग्रतेच्या. 'सातिसयं' म्हणजे अतिशयाने युक्त. 'ओसक्कितुं' म्हणजे खचून जाणे किंवा मागे हटणे. 'नं' म्हणजे चित्ताला. 'संसप्पितुं' म्हणजे 'असे की काय किंवा दुसऱ्या प्रकारे की काय' अशा प्रकारे दोन प्रकारे चंचल होणे. 'उक्कंठितुं' म्हणजे दुसऱ्याकडे अभिमुख होणे (उत्कंठित होणे); म्हणजेच रममाण होणे, असे म्हटले आहे. ज्याने सुख (सात) मिळवले आहे ते 'लद्धसात'. 'सात' म्हणजे आसक्ती किंवा सुख. 'उपब्रूहितं' म्हणजे अत्यंत वाढवलेले. 'संतसभावत्ता' म्हणजे उपशांत स्वभाव असल्यामुळे. 'तथा अनुग्गहिता' म्हणजे आलंबनाकडे अभिमुख करणे इत्यादींच्या द्वारे अनुग्रहित केलेली. समाधी ही कामच्छंद नीवरणाची प्रतिपक्ष (विरोधी) असल्यामुळे 'स्वतः...पे... निवारण करून' असे म्हटले आहे. 'निच्चलं ठत्वा' (निश्चल राहून) याद्वारे अर्पणा-कृत्य (अर्पणा समाधीचे कार्य) सांगितले आहे. เอวํ อุปนิชฺฌานตฺถํ ทสฺเสตฺวา ฌาปนตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘เตสุ จา’’ติอาทิมาห. ‘‘ตปฺปจฺจนีกา’’ติ เตสํ ฌานงฺค ธมฺมานํ ปจฺจนีกา ปฏิปกฺขา. ‘‘มนสฺมึ ปี’’ติ มโนทฺวาเรปิ. ปเคว กายวจีทฺวาเรสูติ เอวํ สมฺภาวนตฺโถ เจตฺถ ปิสทฺโท. อปิสทฺโทปิ ยุชฺชติ. ‘‘ฌาปิตา นาม โหนฺตี’’ติ ฌานงฺค ธมฺมคฺคีหิ ทฑฺฒานาม โหนฺติ. ‘‘เอวํ สนฺเตปิ เตสํ สมุทาเย เอว ฌาน โวหาโร สิทฺโธ’’ติ โยชนา. ‘‘ธมฺม สามคฺคิปธาน’’นฺติ ฌานฏฺฐาเน ฌานงฺค ธมฺมานํ มคฺคฏฺฐาเน มคฺคงฺค ธมฺมานํ โพธิฏฺฐาเน โพชฺฌงฺค ธมฺมานํ สมคฺคภาวปฺปธานํ. अशा प्रकारे 'उपनिज्झान' (जवळून ध्यान करणे) चा अर्थ दाखवून, 'झापन' (दहन करणे) चा अर्थ दाखवताना 'तेसु च' इत्यादी म्हटले आहे. 'तप्पच्चनीका' म्हणजे त्या ध्यानांग धर्मांचे प्रत्यनीक (शत्रू) किंवा प्रतिपक्ष. 'मनस्मिं पि' म्हणजे मनोध्वारातही; मग काय आणि वची (काया आणि वाचा) द्वारांमध्ये तर काय सांगावे! अशा प्रकारे येथे 'अपि' शब्द संभावनेच्या अर्थाने वापरला आहे. 'अपि' शब्द देखील योग्य ठरतो. 'झापिता नाम होन्ति' म्हणजे ध्यानांग रूपी धर्माच्या अग्नीने दग्ध (जळून खाक) झालेले असतात. 'असे असले तरी त्यांच्या समूहालाच ध्यान हा व्यवहार सिद्ध होतो' अशी योजना आहे. 'धम्मासामग्गीपधानं' म्हणजे ध्यानाच्या स्थानी ध्यानांग धर्मांचे, मार्गाच्या स्थानी मार्गांग धर्मांचे आणि बोधीच्या स्थानी बोज्झंग (बोध्यंग) धर्मांचे समग्रभावाला (एकत्र येण्याला) प्राधान्य असणे. เอวํ สงฺคหการานํ มติยา ฌานํ วตฺวา อิทานิ อปเรสานํ มติยา ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อปเร’’ติอาทิมาห. อปเร ปน วทนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ตตฺถ ‘‘ยถา สกํกิจฺจานี’’ติ สสฺส อิทํ สกํ. สสฺสาติ อตฺตโน. อิทนฺติ สนฺตกํ. ยานิยานิ อตฺตโน สนฺตกานีติ อตฺโถ. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. ‘‘ปฏฺฐาเน ฌานปจฺจยํ ปตฺวา…เป… สาเธนฺติเยว’’. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ. ฌานปจฺจโยติ ฌานงฺคานิฌานสมฺปยุตฺตกานํ ธมฺมานํ ตํ สมุฏฺฐานานญฺจ รูปานํ ฌานปจฺจเยน ปจฺจโย. มคฺคปจฺจโยติ มคฺคงฺคานิ มคฺคสมฺปยุตฺตกานํ ธมฺมานํ ตํ สมุฏฺฐานานญฺจ รูปานํ มคฺคปจฺจเยน ปจฺจโยติ. ‘‘ปญฺจสมุทิตาทีนี’’ติ ปญฺจสมูห ทสสมูหานิ. ‘‘ปถมชฺฌานาทิภาวสฺเสวจา’’ติ ปถมชฺฌานาทิ นามลาภสฺเสวจาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ฌานภาวสฺสา’’ติ ฌานนามลาภสฺส. ‘‘ตถาวิธกิจฺจวิเสสาภาวา’’ติ ตถาวิธานํ อารมฺมณาภินิโรปนาทีนํ กิจฺจ วิเสสานํ อภาวโต. अशा प्रकारे संग्रहकारांच्या मतानुसार ध्यान सांगून, आता इतरांच्या मतानुसार ते दाखवण्यासाठी 'अपरे' इत्यादी म्हटले आहे. 'इतर लोक म्हणतात' असा संबंध आहे. त्यामध्ये 'यथा सकंकिच्चानि' म्हणजे स्वतःचे जे कार्य आहे ते 'सकं'. 'सस्स' म्हणजे स्वतःचे. 'इदं' म्हणजे स्वतःचे केलेले; म्हणजेच जे जे स्वतःचे आहे, असा अर्थ आहे. 'इति' म्हणजे म्हणून. 'पट्ठान ग्रंथात ध्यानप्रत्ययाला प्राप्त करून...पे... सिद्धच करतात.' कारण तिथे म्हटले आहे: 'ध्यानप्रत्यय म्हणजे ध्यानांगे ही ध्यानसंप्रयुक्त धर्मांना आणि त्यांच्यापासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपांना ध्यानप्रत्ययाने प्रत्यय (कारण) होतात. मार्गप्रत्यय म्हणजे मार्गांगे ही मार्गसंप्रयुक्त धर्मांना आणि त्यांच्यापासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपांना मार्गप्रत्ययाने प्रत्यय होतात.' 'पंचसमुदितादीनि' म्हणजे पाचचा समूह, दहाचा समूह इत्यादी. 'पठमज्झानादिभावस्सेव च' म्हणजे प्रथम ध्यान इत्यादी नाव मिळणे हाच अभिप्राय आहे. 'झानभावस्स' म्हणजे ध्यान हे नाव मिळणे. 'तथाविधकिच्चविसेसाभावा' म्हणजे तशा प्रकारच्या आलंबनावर चित्त रोखणे (आरम्मणाभिनिरोपन) इत्यादी विशिष्ट कृत्यांचा अभाव असल्यामुळे. ๔๙. ‘‘เอตฺถ สิยา’’ติ เอตสฺมึ ฐาเน ปุจฺฉาสิยา. ‘‘องฺค เภโท’’ติ ปถมชฺฌาเน ปญฺจ องฺคานิ, ทุตียชฺฌาเน จตฺตาริ องฺคานี ติอาทิโก องฺคเภโท. ‘‘ปุคฺคลชฺฌาสเยนา’’ติ ปุคฺคลสฺส อิจฺฉาวิเสเสน. อิติ อยํ วิสชฺชนา. ‘‘โส’’ติ โส ปุคฺคโล. ‘‘หี’’ติ วิตฺถาร โชตโก. วิตกฺโก สหาโย ยสฺสาติ วิตกฺกสหาโย. ‘‘วิตกฺเก นิพฺพินฺทตี’’ติ โอฬาริโกวตายํ วิตกฺโก, นีวรณานํ อาสนฺเน ฐิโตติ เอวํ วิตกฺเก อาทีนวํ ทิสฺวา [Pg.63] นิพฺพินฺทติ. ตสฺส อชฺฌาสโยติ สมฺพนฺโธ. วิตกฺกํ วิราเชติ วิคเมติ อติกฺกมาเปตีติ วิตกฺกวิราโค. วิตกฺกวิราโค จ โส ภาวนา จาติ สมาโส. ‘‘อุตฺตรุตฺตรชฺฌานาธิคมเน’’ติ อุตฺตริ อุตฺตริฌานปฺปฏิลาเภ. อชฺฌาสย พเลน ปาทกชฺฌานสทิสํ น โหตีติ สมฺพนฺโธ. เจโตปณิธิ อิชฺฌตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วิสุทฺธตฺตา’’ติ สีลวิสุทฺธตฺตา. ४९. 'एत्थ सिया' म्हणजे या ठिकाणी प्रश्न असू शकतो. 'अंगभेदो' म्हणजे प्रथम ध्यानात पाच अंगे, द्वितीय ध्यानात चार अंगे इत्यादी अंगांचा भेद. 'पुग्गलज्झासयेन' म्हणजे पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) इच्छेच्या विशेषतेमुळे; हे त्याचे उत्तर (विसर्जन) आहे. 'सो' म्हणजे तो पुद्गल (व्यक्ती). 'हि' हा विस्ताराचा द्योतक आहे. वितर्क ज्याचा सहाय्यक आहे तो 'वितर्कसहाय्यक'. 'वितक्के निब्बिन्दति' म्हणजे हा वितर्क खरोखरच स्थूल (ओळारिक) आहे, तो नीवरणांच्या जवळ स्थित आहे, अशा प्रकारे वितर्कामध्ये दोष (आदीनव) पाहून तो कंटाळतो (निर्वेद प्राप्त करतो). त्याचा आशय (अज्झासय) असा संबंध आहे. वितर्काचा विराग करतो, त्याला घालवतो, त्याचे अतिक्रमण करतो म्हणून 'वितर्कविराग'. वितर्कविराग आणि ती भावना असा हा समास आहे. 'उत्तरुत्तरज्झानाधिगमने' म्हणजे उत्तरोत्तर (पुढील पुढील) ध्यान प्राप्त करण्यामध्ये. आशयाच्या बलामुळे ते पादक-ध्यानासारखे होत नाही, असा संबंध आहे. चेतोप्रणिधी (चित्ताचा संकल्प) समृद्ध होतो, असा संबंध आहे. 'विसुद्धत्ता' म्हणजे शीलविशुद्धतेमुळे. ๕๐. สงฺขาร เภทวิจารณายํ. ‘‘สงฺขาร เภโท น วุตฺโต’’ติ ปถมชฺฌาน กุสล จิตฺตํ อสงฺขาริกเมกํ, สสงฺขาริกเมกนฺติอาทินา น วุตฺโตติ อธิปฺปาโย. ‘‘โส’’ติ สงฺขาร เภโท. ‘‘สิทฺธตฺตา’’ติ สงฺขาร เภทสฺส สิทฺธตฺตา. กถํ สิทฺโธติ อาห ‘‘ตถาหี’’ติอาทึ. สุขา ปฏิปทา เยสํ ตานิ สุขปฺปฏิปทานิ. เตสํ ภาโวติ วิคฺคโห. ‘‘โย’’ติ โยคีปุคฺคโล. ‘‘อาทิโต’’ติอาทิมฺหิ. ‘‘วิกฺขมฺเภนฺโต’’ติ วิโมเจนฺโต วิโยคํ กโรนฺโต. ทุกฺเขน วิกฺขมฺเภตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กามาทีนวทสฺสนาทินา’’ติ องฺคารกาสู ปมากามาพหุทุกฺขาพหุปายาสา, อาทีนโว เอตฺถภิยฺโยติอาทินา กาเมสุอาทีนวํ ทิสฺวา. อาทิสทฺเทน วิตกฺกาทีสุ อาทีนวทสฺสนํ สงฺคยฺหติ. ‘‘เตเนวา’’ติ กามาทีนวทสฺสนาทินา เอว. เอตฺถ อภิญฺญาเภเทน สงฺขาร เภโท น วตฺตพฺโพ, ปฏิปทา เภเทเนว วตฺตพฺโพติ ทสฺเสตุํ ‘‘ขิปฺปาภิญฺญชฺฌานานํปี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ, อภิชานนํ อภิญฺญา. ขิปฺปาสีฆา อภิญฺญา เยสํ ตานิ ขิปฺปาภิญฺญานิ. ทนฺธา อสีฆา อภิญฺญา เยสํ ตานิ ทนฺธาภิญฺญานิ. ฌานานิ. ‘‘ยทิ เอว’’นฺติ เอวํ ปฏิปทา เภเทน สงฺขาร เภโท ยทิ สิยาติ อตฺโถ. ‘‘วฬญฺชนกาเล’’ติ สมาปตฺติ สมาปชฺชนกาเล. ปฏิพนฺธกา นาม อนฺตรายิกา. ‘‘สนฺนิหิตาสนฺนิหิตวเสนา’’ติ อาสนฺเน สณฺฐิตาสณฺฐิตวเสน. สุทฺธํ วิปสฺสนายานํ เยสํ เต สุทฺธวิปสฺสนายานิกา. ‘‘สุทฺธํ’’ติ สมถชฺฌาเนน อสมฺมิสฺสํ. ‘‘สตฺเถน หนิตฺวา’’ติ ปเร น สตฺเถน หนนโต ฉินฺทนโต. ‘‘สหสา’’ติ สีฆตเรน. ‘‘มรนฺตานํ อุปฺปนฺนํ’’ติ มรณาสนฺนกาเล อุปฺปนฺนํติ อธิปฺปาโย. อนาคามิโน หิ สุทฺธ วิปสฺสนายานิกาปิ สมานา [Pg.64] สมาธิสฺมึ ปริปูรการิโน นาม โหนฺติ. อิจฺฉนฺเต สุสติ กิญฺจิ นิมิตฺตํ อารพฺภมนสิการ มตฺเตนปิ ฌานํ อิชฺฌติ. เตนาห ‘‘ตํปิ มคฺคสิทฺธคติก’’นฺติ. ‘‘รูปีพฺรหฺมโลเก’’ติ อิทํ อฏฺฐนฺนํ สมาปตฺตีนํปิ ตตฺถ ปากติกภาวํ สนฺธาย วุตฺตํ. อรูปี พฺรหฺมโลเก ปน เอกา เอว สมาปตฺติ ปากติกาสมฺภวติ. อุปปตฺติสิทฺธชฺฌานานํ ภวนฺตเร สนฺนิหิต ปจฺจยเภเทน สงฺขาร เภโท วุตฺโต, โส กถํ ปจฺเจตพฺโพติ อาห ‘‘เอกสฺมึ ภเวปิ…เป… ยุตฺตานิ โหนฺตี’’ติ. เอกสฺมึ ภเวสพฺพปฺปถมํ ลทฺธกาเล สงฺขาร เภทสฺส อาสนฺนตฺตา วฬญฺชนกาเลปิ โส เอว สงฺขาร เภโท สิยาติ อาสงฺกาสมฺภวโต อิทํ วุตฺตํ. เตน ภวนฺตเร อุปปตฺติ สิทฺธชฺฌานานํ สนฺนิหิต ปจฺจยเภเทน สงฺขารเภเท วตฺตพฺพเมว นตฺถีติ ทสฺเสติ. อิทานิ ตานิ มคฺค สิทฺธชฺฌาน อุปปตฺติ สิทฺธชฺฌานานิ สนฺนิหิตปจฺจยํ อนเปกฺขิตฺวา มคฺคกฺขณ อุปปตฺติกฺขเณสุ สิทฺธกาเล ฌานุปฺปตฺติ ปฏิปทาย เอว สพฺพโส อภาวํ คเหตฺวา อปรํ วิกปฺปํ ทสฺเสตุํ ‘‘ฌานุปฺปตฺติ ปฏิปทา รหิตตฺตา วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. เอวํ มหคฺคตฌานานํ อฏฺฐกถาวเสน สิทฺธํ สงฺขาร เภทํ วตฺวา อิทานิ ปาฬิวเสนาปิ โส สิทฺโธ เยวาติ ทสฺเสตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิ อารทฺธํ. ทุกฺขปฺปฏิปทาปุพฺพกานํ ทฺวินฺนํ ทนฺธาภิญฺญขิปฺปาภิญฺญสมาธีนํ. ‘‘เอตฺตาวตา’’ติ เอตํ ปริมาณํ อสฺสาติ เอตฺตาวํ. เอตฺตาวนฺเตน. เอตฺถ สิยา, กสฺมา อิธ สงฺขารเภโท น วุตฺโตติอาทินา วจนกฺกเมน สิทฺโธ โหตีติ สมฺพนฺโธ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยํ. ५०. संस्कार-भेदाच्या विचारामध्ये. "संस्कार-भेद सांगितलेला नाही" याचा अर्थ असा आहे की, प्रथम ध्यान कुशल चित्त हे एक असंस्कारिक आणि एक ससंस्कारिक इत्यादी प्रकारे सांगितलेले नाही, असा अभिप्राय आहे. "तो" म्हणजे संस्कार-भेद. "सिद्ध झाल्यामुळे" म्हणजे संस्कार-भेदाच्या सिद्धतेमुळे. तो कसा सिद्ध होतो, हे सांगण्यासाठी "तथा हि" (तसेच) इत्यादी म्हटले आहे. ज्यांची प्रतिपदा (साधना मार्ग) सुखकारक आहे, ते 'सुख-प्रतिपदा' होय; त्यांचा भाव (अवस्था) असा विग्रह आहे. "जो" म्हणजे योगी पुद्गल (साधक). "सुरुवातीपासून" इत्यादींमध्ये. "विक्खंभेन्तो" (दाबून टाकणारा/नष्ट करणारा) म्हणजे मुक्त करणारा, वियोग करणारा. दुःखाने विक्षिप्त करतो (दाबून टाकतो) असा संबंध आहे. "कामादींमधील दोषदर्शनाद्वारे" म्हणजे 'काम हे निखाऱ्यांच्या खड्ड्यासारखे आहेत, अत्यंत दुःखदायक आणि अत्यंत त्रासदायक आहेत, यात दोषच अधिक आहेत' इत्यादी प्रकारे कामांमधील दोष पाहून. 'आदि' शब्दाने वितर्क इत्यादींमधील दोषदर्शन समाविष्ट होते. "त्यामुळेच" म्हणजे कामादींमधील दोषदर्शनाद्वारेच. येथे अभिज्ञा-भेदाने संस्कार-भेद सांगू नये, तर प्रतिपदा-भेदानेच सांगावा, हे दर्शवण्यासाठी "क्षिप्र-अभिज्ञा ध्यानांचे देखील" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, विशेष जाणणे म्हणजे 'अभिज्ञा' होय. ज्यांची अभिज्ञा शीघ्र (जलद) असते, ते 'क्षिप्र-अभिज्ञा' होय. ज्यांची अभिज्ञा मंद (हळूहळू) असते, ते 'दंधाभिज्ञा' (मंद-अभिज्ञा) होय. ही ध्याने आहेत. "जर असे असेल तर" याचा अर्थ असा की, जर अशा प्रकारे प्रतिपदा-भेदाने संस्कार-भेद होत असेल तर. "वापरण्याच्या वेळी" (वळंजनकाले) म्हणजे समापत्तीमध्ये समापन्न होण्याच्या वेळी. 'प्रतिबंधक' म्हणजे अंतराय निर्माण करणारे (अडथळे). "सन्निहित आणि असन्निहित असल्यामुळे" म्हणजे जवळ उपस्थित असणे किंवा नसणे यानुसार. ज्यांचे केवळ विपश्यना हेच यान (वाहन) आहे, ते 'शुद्ध-विपश्यनायानिक' होत. "शुद्ध" म्हणजे शमथ-ध्यानाने अमिश्रित (केवळ विपश्यना). "शस्त्राने मारून" म्हणजे इतरांद्वारे शस्त्राने मारले जाण्याने किंवा कापले जाण्याने. "सहसा" म्हणजे अत्यंत वेगाने (त्वरेने). "मरणाऱ्यांना उत्पन्न होते" याचा अर्थ मरणासन्न काळात उत्पन्न होते असा आहे. कारण अनागामी हे शुद्ध-विपश्यनायानिक असूनही समाधीमध्ये परिपूर्णता प्राप्त करणारे असतात. इच्छा असल्यास, कोणत्याही निमित्ताला आरंभ करून केवळ मनसिकार केल्याने देखील ध्यान सिद्ध होते. म्हणूनच म्हटले आहे: "ते देखील मार्ग-सिद्ध गतीचे आहे." "रूपी ब्रह्मलोकात" हे आठही समापत्तींच्या तेथील स्वाभाविक अस्तित्वाला उद्देशून म्हटले आहे. परंतु अरूपी ब्रह्मलोकात केवळ एकच समापत्ती स्वाभाविकपणे संभवते. उपपत्तीने (पुनर्जन्माने) सिद्ध झालेल्या ध्यानांचा दुसऱ्या भवामध्ये सन्निहित प्रत्यय-भेदाने संस्कार-भेद सांगितला आहे, तो कसा मानावा? म्हणून म्हटले आहे: 'एका भवामध्ये देखील...पे... योग्य होतात.' एका भवामध्ये सर्वप्रथम ध्यान प्राप्त करतेवेळी संस्कार-भेदाच्या निकटतेमुळे, वापरण्याच्या वेळी देखील तोच संस्कार-भेद असावा, अशी शंका येणे शक्य असल्यामुळे हे म्हटले आहे. याद्वारे हे दर्शवले आहे की, दुसऱ्या भवामध्ये उपपत्ती-सिद्ध ध्यानांच्या सन्निहित प्रत्यय-भेदाने संस्कार-भेदाविषयी काही बोलण्याची आवश्यकताच नाही. आता, त्या मार्ग-सिद्ध ध्यानांना आणि उपपत्ती-सिद्ध ध्यानांना सन्निहित प्रत्ययाची अपेक्षा न ठेवता, मार्गक्षण आणि उपपत्तीक्षणांमध्ये सिद्ध होण्याच्या वेळी ध्यानोत्पत्तीच्या प्रतिपदेचाच सर्वथा अभाव गृहीत धरून, दुसरा पर्याय दर्शवण्यासाठी "किंवा ध्यानोत्पत्तीच्या प्रतिपदेने रहित असल्यामुळे" इत्यादी म्हटले आहे. अशा प्रकारे महग्गत ध्यानांचा अट्ठकथेच्या आधारे सिद्ध झालेला संस्कार-भेद सांगून, आता पाळीच्या (मूळ पाठाच्या) आधारे देखील तो सिद्धच आहे हे दर्शवण्यासाठी "शिवाय" इत्यादी सुरू केले आहे. दुःख-प्रतिपदा पूर्व असणाऱ्या दोन, म्हणजे मंदाभिज्ञा आणि क्षिप्राभिज्ञा समाधींच्या. "एवढ्याने" म्हणजे याचे परिमाण एवढे आहे ते 'एत्ताव'. एवढ्या परिमाणाने. येथे असे असावे, 'येथे संस्कार-भेद का सांगितला नाही?' इत्यादी वचनक्रमाने तो सिद्ध होतो, असा संबंध आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे। ๕๑. วิภาวนิปาเฐ. ปริกมฺมํ นาม ปถวี, ปถวี, อาโป, อาโป-ติอาทิกํ, รูปํ อนิจฺจํ, รูปํ ทุกฺขํ, รูปํ อนตฺตา-ติอาทิกญฺจภาวนาปริกมฺมํ อธิกาโร นาม ปุพฺพภเวกตภาวนากมฺมํ. ปุพฺพภเวฌานมคฺคผลานิปตฺเถตฺวา กตํ ทานสีลาทิ ปุญฺญกมฺมญฺจ. ‘‘อิทํ ตาวนยุชฺชตี’’ติ เอตฺถ ตาวสทฺโท วตฺตพฺพนฺตราเปกฺขเน นิปาโต. เตน อปรํปิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ ทีเปติ. ปุพฺพาภิสงฺขาโร ทุวิโธ ปกติ ปุพฺพาภิสงฺขาโร, ปโยคปุพฺพาภิสงฺขาโรติ. ตตฺถ ปริกมฺม ปุพฺพาภิสงฺขาโร ปกติ ปุพฺพาภิสงฺขาโร นาม, อยํ ปกติ ปจฺจยคโณ เอว. ปุพฺเพ วุตฺโต ปุพฺพปฺปโยโค ปโยคปุพฺพาภิสงฺขาโร นาม[Pg.65]. โส เอว อิธาธิปฺเปโตติ ทสฺเสตุํ ‘‘นหี’’ติอาทิมาห. ‘‘อนฺตมโส’’ติ อนฺติม ปริจฺเฉเทน. ‘‘อาโลปภิกฺขา’’ นาม เอกา โลปภิกฺขา. โส ปริกมฺมสงฺขาตปุพฺพาภิสงฺขาโร. ฌานานิ จ สพฺพานิ อุปฺปนฺนานิ นาม นตฺถีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. ‘‘โส’’ติ ภาวนาภิสงฺขาโร. ‘‘เตสํ’’ติ สพฺเพสํปิ ฌานานํ. น หิ โลกิยชฺฌานานิ นาม…เป… อตฺถิ, อิเมสํ สตฺตานํ สพฺพกปฺเปสุปิ กปฺปวินาสกาเล ฌานานิ ภาเวตฺวา พฺรหฺมโลก ปรายนตา สพฺภาวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปุพฺเพ สมถกมฺเมสุ กตาธิการสฺสา’’ติ อาสนฺนภเวกตาธิการํ สนฺธาย วุตฺตํ. ทูรภเว ปน สมถกมฺเมสุ อกตาธิกาโร นาม โกจิ นตฺถีติ. ‘‘เอวเมวา’’ติ เอวํ เอว. วิปากชฺฌาเนสุ สงฺขาร เภทสฺส ปุพฺพ กมฺมวเสน วตฺตพฺพตฺตา ‘‘กุสล กฺริยชฺฌาเนสู’’ติ วุตฺตํ. ‘‘อถวาติอาทิโก ปจฺฉิม วิกปฺโป นาม’’ อถวา ปุพฺพาภิสงฺขาเรเนว อุปฺปชฺชมานสฺส นกทาจิ อสงฺขาริกภาโว สมฺภวตีติ อสงฺขาริกนฺติ จ, พฺยภิจาราภาวโต สสงฺขาริกนฺติ จ น วุตฺตนฺติ อยํ วิกปฺโป. ตตฺถ อสงฺขาริกนฺติ จ น วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘พฺยภิจารา ภาวโต’’ติ อสงฺขาริกภาเวน ปสงฺคาภาวโต. สสงฺขาริกนฺติ จ น วุตฺตํ. ยทิ วุจฺเจยฺย. นิรตฺถ กเมวตํภเวยฺย. กสฺมา, สมฺภว พฺยภิจารานํ อภาวโต. สมฺภเว พฺยภิจาเร จ. วิเสสนํ สาตฺถกํ สิยาติ หิ วุตฺตํ. น จ นิรตฺถกวจนํ ปณฺฑิตา วทนฺติ. กสฺมา, อปณฺฑิตลกฺขณตฺตา. สติ ปน สมฺภเว จ พฺยภิจาเร จ, ตถา สกฺกา วตฺตุํ. กสฺมา, สาตฺถกตฺตา. สาตฺถกเมว ปณฺฑิตา วทนฺติ. กสฺมา, ปณฺฑิต ลกฺขณตฺตาติ อธิปฺปาโย. ५१. विभावनीपाठात. 'परिकम्म' (पूर्व-तयारी) म्हणजे 'पठवी, पठवी' (पृथ्वी, पृथ्वी), 'आपो, आपो' (जल, जल) इत्यादी, आणि 'रूपं अनिच्चं' (रूप अनित्य आहे), 'रूपं दुक्खं' (रूप दुःख आहे), 'रूपं अनत्ता' (रूप अनात्मा आहे) इत्यादी भावना-परिकम्म होय. 'अधिकार' म्हणजे पूर्वजन्मात केलेले भावनाकर्म. पूर्वजन्मात ध्यान, मार्ग आणि फल यांची आकांक्षा धरून केलेले दान, शील इत्यादी पुण्यकर्म होय. "इदं तावनयुज्जति" (हे तर योग्य नाही) येथे 'ताव' हा शब्द दुसऱ्या वक्तव्याची अपेक्षा करणारा निपात (अव्यय) आहे. त्याद्वारे आणखीही काही सांगायचे आहे, हे दर्शविले जाते. 'पुब्बाभिसंखार' (पूर्व-अभिसंस्कार) दोन प्रकारचा आहे - 'पकति पुब्बाभिसंखार' (नैसर्गिक पूर्व-अभिसंस्कार) आणि 'पयोग पुब्बाभिसंखार' (प्रयोगात्मक पूर्व-अभिसंस्कार). त्यामध्ये परिकम्म-पुब्बाभिसंखार हाच 'पकति पुब्बाभिसंखार' होय, हा केवळ नैसर्गिक प्रत्यय-समूह (कारण-समूह) आहे. पूर्वी सांगितलेला पूर्वप्रयोग हा 'पयोग पुब्बाभिसंखार' होय. तोच येथे अभिप्रेत आहे, हे दर्शवण्यासाठी "न हि" इत्यादी म्हटले आहे. "अन्तमसो" म्हणजे अंतिम मर्यादेने. "आलोपभिक्खा" म्हणजे एक घास भिक्षा. तो परिकम्म नावाचा पूर्व-अभिसंस्कार होय. आणि सर्व ध्याने उत्पन्न झाली आहेत असे नाही, असा संबंध आहे. "इति" म्हणजे म्हणून. "सो" म्हणजे भावना-अभिसंस्कार. "तेसं" म्हणजे सर्वच ध्यानांचे. कारण लौकिक ध्याने...पे... अस्तित्वात आहेत, या प्राण्यांना सर्व कल्पामध्ये कल्पविनाशाच्या वेळी ध्यानांची भावना करून ब्रह्मलोकात परायण होण्याची शक्यता असते, असा अभिप्राय आहे. "पुब्बे समथकम्मेसु कताधिकारस्स" (पूर्वी समथ कर्मांमध्ये अधिकार प्राप्त केलेल्याचे) हे जवळच्या जन्मात केलेल्या अधिकाराला उद्देशून म्हटले आहे. दूरच्या जन्मात समथ कर्मांमध्ये अधिकार न मिळवलेला असा कोणीही नाही. "एवमेव" म्हणजे अशाच प्रकारे. विपाक ध्यानांमध्ये संस्काराच्या भेदाचे पूर्व कर्माच्या वशने सांगायचे असल्यामुळे "कुसल क्रियज्झानेसू" (कुशल आणि क्रिया ध्यानांमध्ये) असे म्हटले आहे. "अथवा इत्यादी नंतरचा विकल्प आहे" - अथवा पूर्व-अभिसंस्कारानेच उत्पन्न होणाऱ्या ध्यानाचा कधीही 'असंखारिक' (असंस्कारित) भाव संभवत नाही म्हणून त्याला 'असंखारिक' असे म्हटले नाही, आणि व्यभिचाराचा (अपवादाचा) अभाव असल्यामुळे 'ससंखारिक' (ससंस्कारित) असेही म्हटले नाही, हा तो विकल्प आहे. तेथे 'असंखारिक' असे म्हटले नाही, असा संबंध आहे. "व्यभिचाराभावातो" म्हणजे असंखारिक भावाचा प्रसंग येत नसल्यामुळे. 'ससंखारिक' असेही म्हटले नाही. जर म्हटले असते, तर ते निरर्थकच झाले असते. का? कारण संभव आणि व्यभिचार यांचा अभाव असल्यामुळे. संभव आणि व्यभिचार असतानाच विशेषण सार्थ ठरते, असे म्हटले आहे. आणि पंडित लोक निरर्थक वचन बोलत नाहीत. का? कारण ते अपंडिताचे (मूर्खाचे) लक्षण आहे. परंतु संभव आणि व्यभिचार असताना तसे बोलणे शक्य आहे. का? कारण ते सार्थ ठरते. पंडित लोक सार्थच बोलतात. का? कारण ते पंडिताचे लक्षण आहे, असा अभिप्राय आहे. ๕๒. ปฏิปทา อภิญฺญาววตฺถาเน. ‘‘นิมิตฺตุปฺปาทโต’’ติ ปฏิภาคนิมิตฺตสฺส อุปฺปาทโต. สุขาปน ปฏิปทา, ปจฺฉาทนฺธํ วา ขิปฺปํ วา อุปฺปนฺนํ ฌานํ สุขปฺปฏิปทํ นาม กโรตีติ โยชนา. ‘‘ปุพฺพภเว’’ติ อาสนฺเน ปุพฺพภเว. อนฺตรายิกธมฺมา นาม ‘กิเลสนฺตรายิโก จ, กมฺมนฺตรายิโก จ, วิปากนฺตรายิโก จ, ปญฺญตฺติ วีติกฺกมนฺตรายิโก จ, อริยูปวาทนฺตรายิโก จ. ตตฺถ ติสฺโส นิยตมิจฺฉาทิฏฺฐิโยกิเลสนฺตรายิโก นาม. ปญฺจานนฺตริย กมฺมานิ [Pg.66] กมฺมนฺตรายิโก นาม. อเหตุก ทฺวิเหตุกปฺปฏิสนฺธิวิปากา วิปากนฺตรายิโก นาม. ภิกฺขุ ภาเวฐิตานํ วินย ปญฺญตฺตึ วีติกฺกมิตฺวา อกตปฺปฏิกมฺโม วีติกฺกโม ปญฺญตฺติวีติกฺกมนฺตรายิโก นาม. ปฏิกมฺเมปนกเต อนฺตรายิโก น โหติ. อริยปุคฺคลานํ ชาติอาทีหิ อุปวทิตฺวา อกฺโกสิตฺวา อกตปฺปฏิกมฺมํ อกฺโกสนํ อริยูปวาทนฺตรายิโก นาม. อิธปิ ปฏิกมฺเม กเต อนฺตรายิโก น โหติ. เสเสสุ ตีสุ ปฏิกมฺมํ นาม นตฺถิ. อิเม ธมฺมา อิมสฺมึ ภเว ฌานมคฺคานํ อนฺตรายํ กโรนฺตีติ อนฺตรายิกา นาม. เตหิ วิมุตฺโต อนฺตรายิก ธมฺม วิมุตฺโต นาม. ‘‘กลฺยาณปฺปฏิปตฺติยํ ฐิโต’’ติ สีลวิสุทฺธิ อาทิกาย กลฺยาณปฺปฏิปตฺติยํ ปริปูรณ วเสน ฐิโต. ‘‘ฉินฺนปลิโพโธ’’ติ อาวาสปลิโพธาทีนิ ทสวิธานิ ปลิโพธกมฺมานิ ฉินฺทิตฺวา ฐิโต. ‘‘ปหิตตฺโต’’ติ, ยนฺตํ ปุริสถาเมน ปุริสปรกฺกเมน ปตฺตพฺพํ, น ตํ อปตฺวา วีริยสฺส สณฺฐานํ ภวิสฺสตีติ เอวํ ปวตฺเตน สมฺมปฺปธาน วีริเยน สมนฺนาคโต. โส หิ ปหิโต เปสิโต อนเปกฺขิโต อตฺตภาโว อเนนาติ ปหิตตฺโตติ วุจฺจติ. ‘‘นสมฺปชฺชตีติ นตฺถิ’’. สเจ ปญฺจปธานิยงฺคสมนฺนาคโต โหตีติ อธิปฺปาโย. ปญฺจปธานิยงฺคานิ นาม สทฺธาสมฺปนฺนตา, อสาเฐยฺยํ, อาโรคฺยํ, อลีนวีริยตา, ปญฺญวนฺตตา,ติ. ५२. प्रतिपदा आणि अभिज्ञा यांच्या निर्धारणामध्ये. "निमित्तुप्पादातो" म्हणजे प्रतिभाग-निमित्ताच्या उत्पत्तीपासून. सुखकारक प्रतिपदा, नंतर हळूहळू किंवा वेगाने उत्पन्न झालेल्या ध्यानाला 'सुखप्रतिपदा' बनवते, अशी योजना आहे. "पुब्बभवे" म्हणजे जवळच्या पूर्वजन्मात. 'अंतरायिक धर्म' (अडथळा आणणारे धर्म) म्हणजे - 'किलेसंतरायिक' (क्लेश-अंतरायिक), 'कम्मंतरायिक' (कर्म-अंतरायिक), 'विपाकंतरायिक' (विपाक-अंतरायिक), 'पण्णत्तिवीतिक्कमंतरायिक' (प्रज्ञप्ति-अतिक्रमण-अंतरायिक) आणि 'अरियूपवादंतरायिक' (आर्य-उपवाद-अंतरायिक) होत. त्यामध्ये तीन प्रकारच्या नियत मिथ्यादृष्टी म्हणजे 'किलेसंतरायिक' होय. पाच आनंतर्य कर्मे म्हणजे 'कम्मंतरायिक' होय. अहेतुक आणि द्विहेतुक प्रतिसंधी विपाक म्हणजे 'विपाकंतरायिक' होय. भिक्खू भावात असताना विनय प्रज्ञप्तीचे (नियमांचे) उल्लंघन करून त्याचे प्रायश्चित्त (पठिकम्म) न करणे, हे उल्लंघन म्हणजे 'पण्णत्तिवीतिक्कमंतरायिक' होय. परंतु प्रायश्चित्त केले असता तो अंतराय (अडथळा) ठरत नाही. आर्य पुद्गलांची (व्यक्तींची) जात इत्यादींवरून निंदा करून, त्यांना शिवीगाळ करून त्याचे प्रायश्चित्त न करणे, ही निंदा म्हणजे 'अरियूपवादंतरायिक' होय. येथेही प्रायश्चित्त केले असता तो अंतराय ठरत नाही. उर्वरित तिन्हींमध्ये प्रायश्चित्त (पठिकम्म) नावाचे काही नसते. हे धर्म या जन्मात ध्यान आणि मार्गांमध्ये अडथळा आणतात, म्हणून त्यांना 'अंतरायिक' म्हणतात. त्यांच्यापासून मुक्त असलेला तो 'अंतरायिक धर्म विमुक्त' होय. "कल्याणप्पटिपत्तियं ठितो" म्हणजे शीलविशुद्धी इत्यादी कल्याणकारी प्रतिपदेमध्ये परिपूर्णतेने स्थित असलेला. "छिन्नपलिबोधो" म्हणजे आवास-पळिबोध (निवासस्थानाचा अडथळा) इत्यादी दहा प्रकारच्या पळिबोध कर्मांना छेदून (नष्ट करून) स्थित असलेला. "पहितत्तो" म्हणजे, जे पुरुषाच्या सामर्थ्याने, पुरुषाच्या पराक्रमाने प्राप्त करण्यासारखे आहे, ते प्राप्त केल्याशिवाय वीर्याचा (प्रयत्नाचा) संकोच होणार नाही, अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या सम्यक्प्रधान वीर्याने युक्त असलेला. ज्याने आपला आत्मभाव (शरीर) प्रेषित (समर्पित) केला आहे आणि त्याची अपेक्षा सोडली आहे, त्याला 'पहितत्त' (प्रहित-आत्मन्) म्हटले जाते. "न संपज्जतीति नत्थि" (यशस्वी होत नाही असे नाही) - जर तो पाच प्रधान अंगांनी युक्त असेल, असा अभिप्राय आहे. पाच प्रधान अंगे म्हणजे - श्रद्धासंपन्नता, निष्कपटता (अशाठ्य), आरोग्य, अलीनवीर्यता (आळस नसणे) आणि प्रज्ञावंतता होत. ๕๒. วิปากชฺฌาเน. ‘‘มุทุภูตํ’’ติ ภาวนา พลปริตฺตตฺตามนฺทภูตํ. มนฺทภูตตฺตา จ ทุพฺพลํ. ‘‘นานา กิจฺจฏฺฐาเนสุ จา’’ติ ทสฺสนสวนาทีสุ. ‘‘หีเนสุปิ อตฺตภาเวสู’’ติ อเหตุก ทฺวิเหตุกปุคฺคเลสุปิ. ‘‘อสทิสํปี’’ติ ติเหตุกุกฺกฏฺฐํปิ กมฺมํ อเหตุกวิปากํปิ ชเนตีติอาทินา อสทิสํปิ วิปากํ ชเนติ. ‘‘ภวงฺคฏฺฐาเนสุ เยวา’’ติ เอตฺถ ภวงฺค สทฺเทน ปฏิสนฺธิฏฺฐาน จุติฏฺฐานานิปิ สงฺคยฺหนฺติ. ‘‘กุสลสทิสเมวา’’ติ ปถมชฺฌานกุสลํ ปถมชฺฌาน วิปากเมว ชเนติ, ทุตียชฺฌาน กุสลํ ทุตียชฺฌาน วิปากเมว ชเนตีติอาทินา กุสล สทิสเมว วิปากํ ชเนติ. ‘‘กุสลเมว…เป… กฺริยชฺฌานํ นาม โหติ’’ อเภทู ปจาเรนาติ อธิปฺปาโย. เภทมฺปิ อเภทํ กตฺวา อุปจาโร โวหาโร อเภทู ปจาโร. ५२. विपाक ध्यानामध्ये. "मुदुभूतं" म्हणजे भावनेचे बल अल्प असल्यामुळे मंद झालेले. आणि मंद झाल्यामुळे ते दुर्बळ असते. "नाना किच्चट्ठानेसु चा" म्हणजे दर्शन (पाहणे), सवन (ऐकणे) इत्यादींमध्ये. "हीनेसुपि अत्तभावेसू" म्हणजे अहेतुक आणि द्विहेतुक पुद्गलांमध्येही (व्यक्तींमध्येही). "असदिसंपी" म्हणजे तिहेतुक उत्कृष्ट कर्म देखील अहेतुक विपाक उत्पन्न करते, इत्यादी प्रकारे असमान (असदृश) विपाक देखील उत्पन्न करते. "भवंगट्ठानेसु येवा" येथे 'भवंग' शब्दाने प्रतिसंधीचे स्थान आणि चुतीचे (मृत्यूचे) स्थान देखील समाविष्ट केले जाते. "कुसलसदिसमेवा" म्हणजे प्रथम ध्यान कुशल हे प्रथम ध्यान विपाकच उत्पन्न करते, द्वितीय ध्यान कुशल हे द्वितीय ध्यान विपाकच उत्पन्न करते, इत्यादी प्रकारे कुशलासारखाच विपाक उत्पन्न करते. "कुशलच...पे... क्रिया ध्यान असते" हे अभेदोपचाराने (अभेद उपचाराने) म्हटले आहे, असा अभिप्राय आहे. भेदाला देखील अभेद मानून केलेला उपचार किंवा व्यवहार म्हणजे 'अभेदोपचार' होय. ๕๔. สงฺคหคาถา [Pg.67] วณฺณนายํ. ฌานานํ เภโท ฌานเภโท. อตฺถโต ปน ฌาเนหิ สมฺปโยคเภโท ฌานเภโทติ วุตฺโต โหตีติ อาห ‘‘ฌาเนหิ สมฺปโยคเภเทนา’’ติ. ปถมชฺฌานิกํ จิตฺตนฺติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘ตเมวา’’ติ รูปาวจร มานสเมว. วิภาวนิยํ ปน อุปริสงฺคหคาถายํ ฌานงฺค โยคเภเทน, กตฺเวเกกนฺตุ ปญฺจธาติ วจนํ ทิสฺวา อิธ ฌาน เภเทนาติ ฌานงฺเคหิ สมฺปโยคเภเทนาติ วุตฺตํ. เอวํ สนฺเตปิ อิธ ฌานเภทสฺส วิสุํ อธิปฺเปตตฺตา ‘‘อญฺโญหิ ฌานเภโท’’ติอาทิ วุตฺตํ. ५४. संग्रहगाथा वर्णनात. ध्यानांचा भेद म्हणजे ध्यानभेद. अर्थाच्या दृष्टीने मात्र ध्यानांशी संप्रयोगाचा (जोडणीचा) भेद म्हणजेच ध्यानभेद असे म्हटले आहे, म्हणून “ध्यानांशी संप्रयोगभेदाने” असे म्हटले आहे. “प्रथमध्यानिक चित्त” इत्यादी प्रकारे योजना करावी. “त्यालाच” म्हणजे रूपावचर मनालाच. विभावनीमध्ये (टीकेमध्ये) मात्र वरील संग्रहगाथेत “ध्यानअंगांच्या योगाच्या भेदाने, प्रत्येकाला पाच प्रकारे करून” असे वचन पाहून, येथे “ध्यानभेदाने” म्हणजे “ध्यानअंगांच्या संप्रयोगभेदाने” असे म्हटले आहे. असे असूनही, येथे ध्यानभेदाचा स्वतंत्रपणे अभिप्राय असल्यामुळे “दुसराच ध्यानभेद आहे” इत्यादी म्हटले आहे. รูปาวจรจิตฺตทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. रूपावचरचित्तदीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๕๕. อรูปจิตฺตทีปนิยํ. ‘‘ภุโส’’ติ อติเรกตรํ. ‘‘สรูปโต’’ติ ปรมตฺถ สภาวโต. นตฺถิ ชฏา เอตฺถาติ อชโฏ. อชโฏ อากาโสติ อชฏากาโส. ‘‘ปริจฺฉินฺนากาโส’’ติ ทฺวารจฺฉิทฺทวาตปานจฺฉิทฺทาทิโก อากาโส, ยตฺถ อากาส กสิณ นิมิตฺตํ อุคฺคณฺหนฺติ. กสิณ นิมิตฺตํ อุคฺฆาเฏตฺวา ลทฺโธ อากาโส กสิณุคฺฆาฏิมากาโส, กสิณํ อุคฺฆาเฏน นิพฺพตฺโต กสิณุคฺฆาฏิโมติ กตฺวา. รูปกลาปานํ ปริจฺเฉทมตฺตภูโต อากาโส รูปปริจฺเฉทากาโส. ‘‘อนนฺตภาเวน ผรียตี’’ติ จตุรงฺคุลมตฺโตปิโส อนนฺต นามํ กตฺวา ภาวนามนสิกาเรน ผรียติ. ‘‘เทวานํ อธิฏฺฐานวตฺถู’’ติ มหิทฺธิกานํ คามนคร เทวานํ พลิปฺปฏิคฺคหณฏฺฐานํ วุจฺจติ, ยตฺถ มนุสฺสา สมเย กุล เทวตานํ พลึ อภิหรนฺติ. ‘‘พลึ’’ติ ปูชนีย วตฺถุ วุจฺจติ. ‘‘ตสฺมึ’’ติ กสิณุคฺฆาฏิมากาเส. ‘‘ตเทวา’’ติ ตํ อารมฺมณเมว. กุสลชฺฌานํ สมาปนฺนสฺสวา, วิปากชฺฌาเนน อุปปนฺนสฺสวา, กฺริยชฺฌาเนน ทิฏฺฐธมฺม สุข วิหาริสฺสวา, ติโยเชตพฺพํ. อนนฺตนฺติ วุจฺจติ, ยถาปถวีกสิเณ ปวตฺตนโต ฌานํ ปถวีกสิณนฺติ วุจฺจตีติ. ‘‘เอกเทเส’’ติ อุปฺปาเทวา ฐิติยํ วา ภงฺเควา. อนฺตรหิตตฺตา อนนฺตนฺติ วุจฺจติ. ‘‘อนนฺต สญฺญิเต’’ติ อนนฺต นามเก. ‘‘อนนฺตนฺติ ภาวนาย [Pg.68] ปวตฺตตฺตา’’ติ อิทํ ปถมา รุปฺปวิญฺญาณํ อนนฺตนฺติ เอวํ ปุพฺพภาค ภาวนาย ปวตฺตตฺตา. ‘‘อตฺตโน ผรณาการ วเสนา’’ติ ปุพฺพภาคภาวนํ อนเปกฺขิตฺวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘นิรุตฺติ นเยนา’’ติ สกตฺเถ ยปจฺจยํ กตฺวา นการสฺสโลเปน. ‘‘ปาฬิยา นสเมตี’’ติ วิภงฺค ปาฬิยานสเมติ. ‘‘อนนฺตํ ผรตี’’ติ อนนฺตํ อนนฺตนฺติ ผรติ. ‘‘ปถมา รุปฺปวิญฺญาณาภาโว’’ติ ตสฺส อภาว ปญฺญตฺติมตฺตํ. ‘‘เนวตฺถี’’ติ นตฺถิ. ‘‘อสฺสา’’ติ จตุตฺถา รุปฺปชฺฌานสฺส. อถวาติอาทีสุ ‘‘ปฏุสญฺญา กิจฺจสฺสา’’ติ พฺยตฺตสญฺญา กิจฺจสฺส. ‘‘สงฺขาราวเสส สุขุมภาเวน วิชฺชมานตฺตา’’ติ อิมสฺส อตฺถํ วิภาเวนฺโต ‘‘เอตฺถจา’’ติอาทิมาห. ‘‘มุทฺธภูตํ’’ติ มตฺถกปตฺตํ. ‘‘เทสนาสีสมตฺตํ’’ติ ราชา อาคจฺฉตีติอาทีสุ วิย ปธาน กถามตฺตนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ตสฺเสวา’’ติ ปถมา รุปฺปวิญฺญาณสฺเสว. กุสลภูตํ ปถมา รุปฺปวิญฺญาณํ ปุถุชฺชนานญฺจ เสกฺขานญฺจ กุสลภูตสฺส ทุตียารุปฺปวิญฺญาณสฺส อารมฺมณํ โหติ. อรหา ปน ติวิโธ. ตตฺถ, เอโกปถมา รุปฺเปฐตฺวา อรหตฺตํ ปตฺวา ปถมารุปฺปํ อสมาปชฺชิตฺวาว ทุตียา รุปฺปํ อุปฺปาเทติ. ตสฺส กุสลภูตํ ปถมา รุปฺปํ กฺริยภูตสฺส ทุตียา รุปฺปสฺส อารมฺมณํ. เอโกปถมา รุปฺเปฐตฺวา อรหตฺตํ ปตฺวา ปุน ตเมว ปถมา รุปฺปํ สมาปชฺชิตฺวา ทุตียา รุปฺปํ อุปฺปาเทติ. เอโก ทุตียา รุปฺเปฐตฺวา อรหตฺตํ คจฺฉติ. เตสํ ทฺวินฺนํ กฺริยภูตํ ปถมา รุปฺปวิญฺญาณํ กฺริยภูตสฺเสว ทุตียารุปฺปสฺส อารมฺมณํ. เตนาห ‘‘วิญฺญาณํ นามา’’ติอาทึ. ५५. अरूपचित्तदीपनीमध्ये. “भुसो” म्हणजे अत्यंत किंवा अतिरेक. “सरूपतो” म्हणजे परमार्थ स्वभावाने. येथे जटा (गुंतागुंत) नाही म्हणून अजट. अजट असलेले आकाश म्हणजे अजटाकाश. “परिच्छिन्नाकाश” म्हणजे दाराचे छिद्र, खिडकीचे छिद्र इत्यादींमधील आकाश, जेथे आकाश-कसिण निमित्त ग्रहण केले जाते. कसिण निमित्त बाजूला सारून (उद्घाटित करून) प्राप्त झालेले आकाश म्हणजे “कसिणुग्घाटिमाकाश” (कसिण-उद्घाटित आकाश) होय; कसिण बाजूला सारल्याने उत्पन्न झालेले ते “कसिणुग्घाटिम” असे म्हटले जाते. रूपकलापांच्या केवळ परिच्छेद (मर्यादा) स्वरूप असलेले आकाश म्हणजे “रूपपरिच्छेदाकाश” होय. “अनंतभावाने व्यापले जाते” म्हणजे चार बोटे एवढे जरी असले तरी त्याला “अनंत” असे नाव देऊन भावना-मनसिकाराने व्यापले जाते. “देवांचे अधिष्ठान-वस्तू” म्हणजे महाऋद्धिवान ग्राम-नगर देवतांचे बळी (पूजा-साहित्य) स्वीकारण्याचे स्थान म्हटले जाते, जेथे लोक योग्य वेळी कुलदेवतांना बळी (नैवेद्य) अर्पण करतात. “बळी” म्हणजे पूजनीय वस्तू म्हटली जाते. “त्यामध्ये” म्हणजे कसिण-उद्घाटित आकाशामध्ये. “तेच” म्हणजे तेच आलंबन. कुशलध्यान समापन्न झालेल्याचे, किंवा विपाकध्यानाने उत्पन्न झालेल्याचे, किंवा क्रियाध्यानाने दृष्टधम्मसुखविहार करणाऱ्याचे, असे जोडावे. “अनंत” असे म्हटले जाते, जसे पृथ्वीकसिणावर प्रवृत्त झाल्यामुळे ध्यानाला “पृथ्वीकसिण” म्हटले जाते. “एका भागात” म्हणजे उत्पत्तीत, किंवा स्थितीत, किंवा भंगात. अंतर्हित (नाहीसे) झाल्यामुळे “अनंत” म्हटले जाते. “अनंत संज्ञित” म्हणजे अनंत नावाच्या. “अनंत अशा भावनेने प्रवृत्त झाल्यामुळे” म्हणजे हे प्रथम अरूपविज्ञानाला “अनंत” अशा पूर्वभाग भावनेने प्रवृत्त केल्यामुळे. “स्वतःच्या व्यापण्याच्या आकाराच्या वशाने” म्हणजे पूर्वभाग भावनेची अपेक्षा न करता, असा अभिप्राय आहे. “निरुक्ति नयाने” म्हणजे स्वार्थामध्ये “य” प्रत्यय करून “न” काराचा लोप करून. “पाळीशी (मूळ पाठाशी) जुळत नाही” म्हणजे विभंग पाळीशी जुळत नाही. “अनंत व्यापतो” म्हणजे “अनंत, अनंत” असे व्यापतो. “प्रथम अरूपविज्ञानाचा अभाव” म्हणजे त्याची केवळ अभाव-प्रज्ञप्ती होय. “नेवत्थि” (काहीही नाही) म्हणजे नाही. “त्याचे” म्हणजे चतुर्थ अरूपध्यानाचे. अथवा इत्यादींमध्ये “पटुसंज्ञा कृत्याचे” म्हणजे स्पष्ट संज्ञा कृत्याचे. “संस्कारांच्या अवशेषाच्या सूक्ष्मभावाने विद्यमान असल्यामुळे” याचा अर्थ स्पष्ट करताना “येथे च” इत्यादी म्हटले आहे. “मूर्धभूत” म्हणजे शिखरावर पोहोचलेले (मस्तकावर पोहोचलेले). “देशनाशीर्षमात्र” म्हणजे “राजा येत आहे” इत्यादींप्रमाणे केवळ प्रधान कथेपुरतेच म्हटले आहे. “त्याचेच” म्हणजे प्रथम अरूपविज्ञानाचेच. कुशलभूत प्रथम अरूपविज्ञान हे पृथग्जनांच्या आणि शैक्षांच्या कुशलभूत द्वितीय अरूपविज्ञानाचे आलंबन असते. अर्हत मात्र तीन प्रकारचे असतात. त्यामध्ये, एक प्रथम अरूपध्यानात राहून अर्हत्त्व प्राप्त करून, प्रथम अरूपध्यानाची समापत्ती न मिळवताच द्वितीय अरूपध्यान उत्पन्न करतो. त्याचे कुशलभूत प्रथम अरूपध्यान हे क्रियाभूत द्वितीय अरूपध्यानाचे आलंबन असते. एक प्रथम अरूपध्यानात राहून अर्हत्त्व प्राप्त करून पुन्हा त्याच प्रथम अरूपध्यानाची समापत्ती मिळवून द्वितीय अरूपध्यान उत्पन्न करतो. एक द्वितीय अरूपध्यानात राहून अर्हत्त्वाला प्राप्त होतो. त्या दोघांचे क्रियाभूत प्रथम अरूपविज्ञान हे क्रियाभूत द्वितीय अरूपविज्ञानाचेच आलंबन असते. म्हणूनच “विज्ञान नाम” इत्यादी म्हटले आहे. อรูปจิตฺตานุทีปนา. अरूपचित्त-अनुदीपनी समाप्त झाली. ๕๗. โลกุตฺตรจิตฺเต. ‘‘ชลปฺปวาโห’’ติ อุทกธาราสงฺฆาโฏ. ‘‘ปภวโต’’ติอาทิปวตฺติฏฺฐานโต. ‘‘ยถาหา’’ติ กถํ ปาฬิยํ อาห. ‘‘เสยฺยถิท’’นฺติ โส กตโม. ‘‘อยํ ปี’’ติ อยํ อริยมคฺโคปิ. เอกจิตฺตกฺขณิโก อริยมคฺโค, กถํ ยาว อนุปาทิเสส นิพฺพานธาตุยาสวติ สนฺทตีติ อาห [Pg.69] ‘‘อานุภาวปฺผรณวเสนา’’ติ. ปาฬิยํ คงฺคาทีนิ ปญฺจนฺนํ มหานทีนํ นามานิ. ‘‘สมุทฺท นินฺนา’’ติ มหาสมุทฺทาภิมุขํ นินฺนา นมิตา. ‘‘โปณา’’ติ อนุปติตา. ‘‘ปพฺภารา’’ติ อโธวาหิตา. ‘‘กิเลสานํ’’ติ อนุปคมเน กมฺมปทํ. ปาฬิยํ ‘‘ฆโฏ’’ติ อุทก ปุณฺณฆโฏ. ‘‘นิกุชฺโช’’ติ อโธมุขํ ฐปิโต. ‘‘โนปจฺจาว มตี’’ติ ปุน โนคิลติ. ‘‘น ปุเนตี’’ติ น ปุน เอติ นุปคจฺฉติ อริยสาวโก. ‘‘น ปจฺเจตี’’ติ น ปฏิ เอติ. ตทตฺถํ วทติ ‘‘น ปจฺจาคจฺฉตี’’ติ. เอวํ ตํ อนิวตฺตคมนํ ปาฬิสาธเกหิ ทีเปตฺวา อิทานิ ยุตฺติสาธเกหิ ปกาเสตุํ ‘‘ยถา จา’’ติอาทิมาห. ‘‘ยโต’’ติ ยํ การณา. ‘‘เต’’ติ ปุถุชฺชนา. ‘‘ทุสฺสีลา’’ติ นิสฺสีลา. ‘‘อุมฺมตฺตกา’’ติ ปิตฺตุมฺมตฺตกา. ‘‘ขิตฺต จิตฺตา’’ติ ฉฏฺฏิตปกติ จิตฺตายกฺขุมฺมตฺตกา. ‘‘ทุปฺปญฺญา’’ติ นิปฺปญฺญา. ‘‘เอฬมูคา’’ติ ทุปฺปญฺญตาย เอว ปคฺฆริตลาล มุข มูคา. ‘‘ตสฺมึ มคฺเค เอวา’’ติ อฏฺฐงฺคีเก อริยมคฺเค เอว. โส ปน มคฺโค ปถม มคฺโค, ทุตีย มคฺโค, ตตีย มคฺโค, จตุตฺถ มคฺโค,ติ จตุพฺพิโธ โหติ. ‘‘อาทิโต ปชฺชนํ’’ติ จตูสุ มคฺเคสุ อาทิมฺหิ ปถม มคฺคโสตสฺส ปชฺชนํ คมนํ. ปฏิลาโภติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘โสตาปตฺติยา’’ติ โสตสฺส อาปชฺชเนน. ‘‘อธิคมฺมมาโน’’ติ ปฏิลพฺภมาโน. สพฺเพ โพธิปกฺขิย ธมฺมา อนิวตฺต คติยา ปวตฺตมานา โสโตติ วุจฺจนฺตีติ สมฺพนฺโธ. สมฺโพธิ วุจฺจติ จตูสุ มคฺเคสุ ญาณํ. อุปริสมฺโพธิ เอว ปรายนํ เยสํ เต อุปริสมฺโพธิ ปรายนา. ปรายนนฺติ จ ปฏิสรณํ. กถํ โสตาปตฺติ วจนํ มคฺเคน สมานาธิกรณํ โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ปถม มคฺค สงฺขาตาย โสตาปตฺติยา’’ติอาทิ. ‘‘มคฺเคตี’’ติ คเวสติ. มาเรนฺต คมโนนิรุตฺตินเยน มคฺโคติ สิชฺฌตีติ วุตฺตํ ‘‘กิเลเส มาเรนฺโต คจฺฉตีติ มคฺโค’’ติ. ५७. लोकोत्तर चित्तात. 'जलप्पवाहो' (जलप्रवाह) म्हणजे पाण्याचा प्रवाह किंवा पाण्याचा संचय. 'पभवतो' (उगमस्थानापासून) म्हणजे उत्पत्तीच्या स्थानापासून. 'यथाह' (जसे म्हटले आहे) म्हणजे पाळीमध्ये (पालि पाठात) कसे म्हटले आहे. 'सेय्यथिदं' (जसे की हे) म्हणजे तो कोणता. 'अयं पि' (हा सुद्धा) म्हणजे हा आर्यमार्ग सुद्धा. एकचित्तक्षणिक असलेला आर्यमार्ग, अनुपदिशेष निर्वाणधातू पर्यंत कसा वाहतो किंवा प्रवाहित होतो? म्हणून म्हटले आहे: 'आनुभावप्फरणवसेन' (प्रभावाच्या प्रसाराने). पाळीमध्ये गंगा इत्यादी पाच महानद्यांची नावे आहेत. 'समुद्दनिन्ना' (समुद्राकडे झुकलेली) म्हणजे महासमुद्राच्या दिशेने झुकलेली किंवा नमलेली. 'पोणा' (प्रवण) म्हणजे तिकडेच कललेली. 'पब्भारा' (प्राग्भार) म्हणजे खाली वाहणारी. 'किलेसानं' (क्लेशांचे) हे न जाण्याच्या (निवृत्तीच्या) अर्थातील कर्मपद आहे. पाळीमध्ये 'घटो' (घडा) म्हणजे पाण्याने भरलेला घडा. 'निकुज्जो' (उलटा केलेला) म्हणजे खाली तोंड करून ठेवलेला (उपडा). 'नोपच्चावमती' म्हणजे पुन्हा ओकत नाही (मागे फिरत नाही). 'न पुनेति' (पुन्हा येत नाही) म्हणजे आर्यश्रावक पुन्हा येत नाही, जवळ जात नाही. 'न पच्चेति' म्हणजे परत येत नाही. त्याचा अर्थ सांगताना म्हणतात 'न पच्चागच्छति' (पुन्हा परत येत नाही). अशा प्रकारे, पालि प्रमाणांद्वारे त्या न परतणाऱ्या गमनाला स्पष्ट करून, आता युक्तीच्या प्रमाणांनी ते प्रकट करण्यासाठी 'यथा चा' (आणि जसे) इत्यादी म्हटले आहे. 'यतो' म्हणजे ज्या कारणाने. 'ते' म्हणजे पृथग्जन (सामान्य लोक). 'दुस्सीला' (दुःशील) म्हणजे शीलरहित. 'उम्मत्तका' (उन्मत्त) म्हणजे पित्तामुळे वेडे झालेले. 'खित्तचित्ता' (विक्षिप्त चित्त असलेले) म्हणजे ज्यांचे मूळ चित्त नष्ट झाले आहे किंवा जे यक्षबाधेमुळे वेडे झाले आहेत. 'दुप्पञ्ञा' (दुर्बुद्धी) म्हणजे प्रज्ञारहित. 'एळमूगा' (मूक-बधिर) म्हणजे प्रज्ञारहिततेमुळेच ज्यांच्या तोंडातून लाळ गळत आहे असे मुके लोक. 'तस्मिं मग्गे एव' (त्याच मार्गावर) म्हणजे अष्टांगिक आर्यमार्गावरच. तो मार्ग प्रथम मार्ग, द्वितीय मार्ग, तृतीय मार्ग आणि चतुर्थ मार्ग असा चार प्रकारचा असतो. 'आदितो पज्जनं' (सुरुवातीला प्रवेश करणे) म्हणजे चार मार्गांपैकी सुरुवातीच्या पहिल्या मार्ग-प्रवाहामध्ये गमन करणे (प्रवेश करणे). याचा अर्थ 'प्राप्ती' (पटिलाभ) असा सांगितला आहे. 'सोतापत्तिया' (स्रोतापत्तीने) म्हणजे प्रवाहामध्ये प्रवेश केल्याने. 'अधिगम्ममानो' म्हणजे प्राप्त केला जाणारा. न परतणाऱ्या गतीने प्रवृत्त होणारे सर्व बोधिपाक्षिक धर्म 'स्रोता' (प्रवाह) म्हटले जातात, असा संबंध आहे. 'संबोधी' म्हणजे चार मार्गांमधील ज्ञान होय. ज्यांचे अंतिम ध्येय केवळ उपरी-संबोधी (उच्च संबोधी) आहे, ते 'उपरीसंबोधिपरायणा' होत. 'परायण' म्हणजे शरण किंवा आश्रय. 'स्रोतापत्ती' हा शब्द 'मार्गा'शी कसा सामानाधिकरण (समान अर्थ दर्शवणारा) होतो? म्हणून म्हटले आहे: 'प्रथम मार्ग म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या स्रोतापत्तीने' इत्यादी. 'मग्गेति' म्हणजे शोध घेतो. मारत जाणे या निरुक्तीच्या नियमाने 'मार्ग' हा शब्द सिद्ध होतो, म्हणून म्हटले आहे: 'क्लेशांना मारत (नष्ट करत) जो जातो, तो मार्ग होय.' ๕๘. สกทาคามิ มคฺเค. ‘‘สกึ อาคจฺฉตี’’ติ อิโตคนฺตฺวา ปุน อิธ อาคจฺฉตีติ อตฺโถ. ‘‘สีเลนา’’ติ ปกติสภาเวน. กามโลกํ อาคจฺฉนฺติ เอเตหีติ กามโลกาคมนา. กิเลสา. เตสํ สพฺภาเวน วิชฺชมานภาเวน. ปาฬิยํ ‘‘เอกจฺจสฺส ปุคฺคลสฺสา’’ติ กตฺตุ อตฺเถสามิวจนํ. เอกจฺเจน ปุคฺคเลน อปฺปหีนา นีติ สมฺพนฺโธ[Pg.70]. ‘‘สหพฺยตํ’’ติ สหายภาวํ. ‘‘อาคามีโหตี’’ติ วตฺวา ตเมวตฺถํ วทติ ‘‘อาคนฺตฺวา อิตฺถตฺต’’นฺติ. อาคจฺฉติ สีเลนาติ อาคนฺตฺวา. อิตฺถํ ภาโว อิตฺถตฺตํ. อิมํ กามตฺตภาวํ อาคนฺตฺวา, ตสฺมา อาคามี นาม โหตีติ โยชนา. ‘‘อยญฺจ อตฺโถ’’ติ ปฏิสนฺธิวเสน สกึ อิมํ โลกํ อาคจฺฉตีติอาทิโก อตฺโถ. ‘‘กิเลส คติวเสนา’’ติ กามโลกา คมน กิเลส คติวเสน. มคฺคสหาเยน ฌาเนน วิกฺขมฺภิตา กิเลสา มคฺเคน สมุจฺฉินฺน คติกา โหนฺติ. อยํ มคฺคสหาโยฌานานุภาโว นาม. เตนาห ‘‘น หี’’ติอาทึ. ‘‘เทวโลกโต’’ติ เอตฺถ พฺรหฺมโลโกปิ สงฺคหิโต. ปจฺฉิมสฺมึ ปน อตฺเถ สตีติ โยชนา. อาคมนสีโล อาคนฺตฺวา. น อาคนฺตฺวา อนาคนฺตฺวา. ‘‘เตนา’’ติ อนาคมเนน. ‘‘นานตฺถา สมฺภวโต’’ติ ทฺวีสุ อิตฺถตฺตสทฺเทสุ เอกสฺมึ อิมํ กามาวจร โลกนฺติ เอกสฺมึ อิมํ มนุสฺส โลกนฺติ เอวํ นานตฺถานํ อสมฺภวโต. ปาฬิยํ ‘‘สพฺยา พชฺโฌ’’ติ เจโตทุกฺข สงฺขาเตน เจตสิกโรคา พาเธน สหิโต. เตนาห ‘‘เตหิ ปฏิฆานุสยสฺสา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘เต’’ติ ปุถุชฺชน โสตาปนฺน สกทาคามิโน. สพฺยา พชฺฌานามาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปจฺฉิมสฺส วากฺยสฺสา’’ติ อาคนฺตฺวา อิตฺถตฺตํ โสตาปนฺน สกทาคามิโน เตน ทฏฺฐพฺพาติ วากฺยสฺส. ‘‘ทฺวีสุ สกทาคามีสู’’ติ อาคนฺตฺวา อิตฺถตฺตนฺติ วุตฺตตฺตา เตน อตฺเถน สกทาคามินามเกสุ ทฺวีสุ โสตาปนฺน สกทาคามีสุ. ‘‘ปุริมสฺสา’’ติ โสตาปนฺนสฺส. ‘‘อนญฺญ สาธารเณ เนวา’’ติ ทุตีย ผลฏฺฐาทีหิ อสามญฺเญเนว. พฺรหฺมโลเกฐิตานํ โสตาปนฺนานํ สตฺตกฺขตฺตุ ปรม ตาทิภาโว นตฺถิ วิย ทุตีย ผลฏฺฐานํ สกทาคามิ ภาโวปิ นตฺถิ. เตนาห ‘‘ปถม ทุตีย ผลฏฺฐาปี’’ติอาทึ. ‘‘ตสฺมา’’ติอาทิ ลทฺธคุณวจนํ. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ อิมินา การเณน. ‘‘เหฏฺฐู ปรูปปตฺติวเสนา’’ติ อุปริโต อาคนฺตฺวา เหฏฺฐูปปตฺติ จ, เหฏฺฐโต อาคนฺตฺวา อุปรูปปตฺติ จาติ เอวํ เหฏฺฐูปรูปปตฺติวเสน. ‘‘เอวญฺจ กตฺวา’’ติอาทิ ทุตีย ลทฺธ คุณวจนํ. ‘‘ปญฺจนฺนํ อิธ นิฏฺฐา’’ติ ปญฺจนฺนํ ปุคฺคลานํ อิธ กามโลเก นิฏฺฐา อนุปาทิเสส นิพฺพานปตฺตีติ วุตฺตํ [Pg.71] โหติ. ‘‘โส ปนา’’ติ สกทาคามิ ปุคฺคโล ปน. เยสํ ปน อฏฺฐกถา จริยานํ อตฺโถ, เตสํ อตฺเถโส สกทาคามิ ปุคฺคโล ปญฺจวิโธว วุตฺโต, น ฉฏฺโฐ ปุคฺคโลติ โยชนา. เยสํ ปน อิมํ โลกนฺติ อตฺโถ, เตสํ อตฺเถ ฉฏฺโฐปิ ลพฺภตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘มหาปรินิพฺพาน…เป… อาคโต เยวา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘สกึ อาคมนฏฺเฐน อาคโต เยวา’’ติ สกึ อาคมนฏฺเฐน สกทาคามีสุ อาคโตเยว. สพฺพญฺญุ พุทฺธาปิ ปถม ผลฏฺฐ ภูตา สตฺตกฺขตฺตุ ปรมตายํ สณฺฐิตา วิยาติ โยชนา. เอตฺถ จ ‘‘สตฺตกฺขตฺตุปรมตายํ’’ติ สตฺตกฺขตฺตุ ปรมภาเว. อิทญฺจ นิทสฺสน วจนมตฺตํ. สพฺพญฺญุ พุทฺธาปิ ทุตีย ผลฏฺฐภูตา สกึ อาคมนปฺปกติยํ สณฺฐิตาเยว โหนฺติ. กสฺมา, ตสฺมึ ขเณ ตํ สภาวานติ วตฺตนโตติ อธิปฺปาโย. สพฺโพปิ โส ฉพฺพีโธ ปุคฺคโล อิธ…เป… ทฏฺฐพฺโพ. เอเตน ยํ วุตฺตํ วิภาวนิยํ ปญฺจสุ สกทาคามีสุ ปญฺจมโกว อิธาธิปฺเปโตติ. ตํ ปฏิกฺขิตฺตํ โหติ. กสฺมา, ปญฺจมโก เอว อิธ สกทาคามิปเท อธิปฺเปเตสติ อิตเร จตฺตาโร กตฺถ อธิปฺเปตา สิยุนฺติ วตฺตพฺพตฺตา. ชนกภูโต สมาโน. ‘‘ญายาคตา เอวา’’ติ ยุตฺติโต ปรมฺปราคตา เอว. เตนาห ‘‘ยถา’’ติอาทึ. ‘‘อวิรุทฺโธ’’ติ ญาเยน อวิรุทฺโธ. ५८. सकदागामी मार्गात. 'सकिं आगच्छती' (एकदा येतो) म्हणजे येथून जाऊन पुन्हा येथे येतो असा अर्थ आहे. 'सीलेन' म्हणजे स्वभावतः. ज्यांच्याद्वारे कामलोकात येतात ते कामलोकागमन (क्लेश) होत. 'तेसं' म्हणजे त्यांच्या अस्तित्वामुळे. पाळीमध्ये 'एकच्चस्य पुग्गलस्स' (एका व्यक्तीचा) हा कर्त्याच्या अर्थात षष्ठी विभक्तीचा प्रयोग आहे. 'एकच्चेन पुग्गलेन अप्पहीना' (एका व्यक्तीने नष्ट न केलेले) असा संबंध आहे. 'सहब्यतं' म्हणजे सहभागाला (मैत्रीला). 'आगामी होति' असे म्हणून तोच अर्थ 'आगन्त्वा इत्थत्तं' (येथे येऊन) या शब्दांनी सांगतात. स्वभावाने येतो म्हणून 'आगन्त्वा' (येऊन). 'इत्थं भावो' म्हणजे 'इत्थत्तं' (या मनुष्यलोकात येणे). या काम-अस्तित्वात (कामलोकात) येऊन, म्हणून 'आगामी' असे नाव होते, अशी योजना आहे. 'अयञ्च अत्हो' म्हणजे प्रतिसंधीच्या (पुनर्जन्माच्या) वशने एकदा या लोकात येतो, इत्यादी अर्थ आहे. 'किलेस गतिवसेन' म्हणजे कामलोकात जाणाऱ्या क्लेशांच्या गतीच्या वशने. मार्गाच्या सोबती असलेल्या ध्यानाने दाबलेले क्लेश मार्गाद्वारे समूळ नष्ट होतात. याला मार्गाचा सोबती असलेल्या ध्यानाचा प्रभाव म्हणतात. म्हणूनच 'न ही' इत्यादी म्हटले आहे. 'देवलोकतो' यामध्ये ब्रह्मलोकाचाही समावेश होतो. परंतु नंतरचा अर्थ असताना, अशी योजना करावी. येण्याचा स्वभाव असलेला तो 'आगन्त्वा' (येऊन). न येणारा तो 'अनागन्त्वा' (न येऊन). 'तेन' म्हणजे न येण्याने. 'नानत्था सम्भवतो' म्हणजे दोन 'इत्थत्त' शब्दांपैकी एकामध्ये 'हा कामावचर लोक' आणि दुसऱ्यामध्ये 'हा मनुष्यलोक' अशा वेगवेगळ्या अर्थांचा असंभव असल्यामुळे. पाळीमध्ये 'सब्याबज्झो' म्हणजे चित्ताच्या दुःखाने युक्त, मानसिक रोगाच्या पीडेने युक्त. म्हणूनच 'तेहि पटिघानुसयस्स' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'ते' म्हणजे पृथग्जन, सोतापन्न आणि सकदागामी. 'सब्याबज्झ' नावाचे, असा संबंध आहे. 'पच्छिमस्स वाक्यस्स' म्हणजे 'येथे येऊन सोतापन्न आणि सकदागामी यांनी ते पाहावे' या वाक्याचा. 'द्वीसु सकदागामीसू' म्हणजे 'आगन्त्वा इत्थत्तं' असे म्हटल्यामुळे त्या अर्थाने सकदागामी नावाच्या दोन (सोतापन्न आणि सकदागामी) व्यक्तींमध्ये. 'पुरिमस्स' म्हणजे सोतापन्नाच्या. 'अनञ्ञ साधारणेनेव' म्हणजे दुसऱ्या फलस्थ इत्यादींपेक्षा असाधारण अशाच. ब्रह्मलोकात राहिलेल्या सोतापन्नांची 'सत्तक्खत्तुपरमता' (सात जन्मांची मर्यादा) जशी नसते, तसेच द्वितीय फलस्थ सकदागामी अवस्थाही नसते. म्हणूनच 'पठम दुतिय फलट्ठापि' इत्यादी म्हटले आहे. 'तस्मा' इत्यादी प्राप्त गुणांचे वचन आहे. 'इति कत्वा' म्हणजे या कारणाने. 'हेट्ठूपरूपपत्तिवसेन' म्हणजे वरून या लोकात येऊन खाली जन्म घेणे आणि खालून वर जाऊन जन्म घेणे, अशा प्रकारे खाली आणि वर जन्म घेण्याच्या वशने. 'एवञ्च कत्वा' इत्यादी दुसरे प्राप्त गुणांचे वचन आहे. 'पञ्चन्नं इध निट्ठा' म्हणजे पाच पुद्गलांची (व्यक्तींची) येथे कामलोकात निष्ठा (अनुपादिशेष निर्वाण प्राप्ती) होते, असे म्हटले आहे. 'सो पन' म्हणजे तो सकदागामी पुद्गल (व्यक्ती) तर. ज्या अट्ठकथाचार्यांचा हा अर्थ आहे, त्यांच्या मते हा सकदागामी पुद्गल पाच प्रकारचाच सांगितला आहे, सहावा पुद्गल नाही, अशी योजना आहे. ज्यांचा अर्थ 'या लोकात' असा आहे, त्यांच्या मते सहावा देखील मिळतो, हे दाखवण्यासाठी 'महापरिनिब्बान...पे... आगतो येव' असे म्हटले आहे. तेथे 'सकिं आगमनट्ठेन आगतो येव' म्हणजे एकदा येण्याच्या अर्थाने सकदागामींमध्ये आलेलाच आहे. सर्वज्ञ बुद्ध देखील प्रथम फलस्थ होऊन 'सत्तक्खत्तुपरमता' मध्ये राहिलेल्यांसारखेच आहेत, अशी योजना आहे. येथे 'सत्तक्खत्तुपरमतायं' म्हणजे सात जन्मांच्या मर्यादेत. आणि हे केवळ उदाहरणाचे वचन आहे. सर्वज्ञ बुद्ध देखील द्वितीय फलस्थ होऊन एकदा येण्याच्या स्वभावातच स्थित असतात. का? कारण त्या क्षणी त्या स्वभावाचे उल्लंघन होत नाही, असा अभिप्राय आहे. तो सर्व सहा प्रकारचा पुद्गल येथे...पे... पाहावा. याद्वारे जे 'विभावनी' मध्ये म्हटले आहे की, पाच सकदागामींमध्ये पाचवाच येथे अभिप्रेत आहे, त्याचे खंडन होते. का? कारण जर येथे सकदागामी पदाने पाचवाच अभिप्रेत असेल, तर इतर चार कुठे अभिप्रेत असतील, असे म्हणावे लागेल. जनक (उत्पादक) असलेला. 'ञायागता एवा' म्हणजे युक्तीने परंपरेने आलेलेच. म्हणूनच 'yathā' (जसे) इत्यादी म्हटले आहे. 'अविरुद्धो' म्हणजे न्यायाशी अविरुद्ध. ๕๙. โอรมฺภาโค นาม เหฏฺฐาภาโค กามโลโก. โอรมฺภาคาย สํวตฺตนฺตีติ โอรมฺภาคิยานิ กามราค พฺยาปาท สํโยชนาทีนิ. ‘‘โส’’ติ อนาคามิ ปุคฺคโล. ५९. 'ओरंभाग' (अधोभाग) म्हणजे खालचा भाग असलेला कामलोक. जे ओरंभागाकडे (खालच्या भागाकडे) घेऊन जातात, ते 'ओरंभागिय' (अधोभागीय संयोजने) होत, जसे की कामराग, व्यापाद (द्वेष) इत्यादी संयोजने. 'सो' म्हणजे अनागामी पुद्गल (व्यक्ती). ๖๐. มหปฺผลํ กโรนฺติ สีเลนาติ มหปฺผล การิโน. เตสํ ภาโว ‘‘มหปฺผล การิตา’’. สีลาทิ คุโณ. ‘‘อรหตี’’ติ ปฏิคฺคหิตุํ อรหติ. ‘‘อรหโต’’ติ อรหนฺตสฺส. ‘‘นิพฺพจนํ’’ติ นิรุตฺติ. วิคฺคห วากฺยนฺติ วุตฺตํ โหติ. สุทฺธิกสุญฺญตาย ตถา น วจิตฺตานิ, สุญฺญตปฺปฏิปทาย ตถา น วจิตฺตานีติอาทินา โยเชตพฺพํ. ตตฺถ ‘‘สุทฺธิก สุญฺญตายา’’ติ สุทฺธิกสุญฺญตวาเร. ‘‘สุญฺญตปฺปฏิปทายา’’ติ สุญฺญตปฺปฏิปทาวาเร. ‘‘สจฺจ สติปฏฺฐาน วิภงฺเคสุ ปนา’’ติ สจฺจ วิภงฺค สติปฏฺฐาน วิภงฺเคสุ ปน, สพฺพํ จิตฺต วฑฺฒนํ ปาฬิ อฏฺฐกถาสุ เทสนาวาเร วิจาเรตฺวา เวทิตพฺพํ. ६०. जे शील पालनाने महान फळ मिळवून देतात, ते 'महप्फलकारिनो' (महान फलदायी) होत. त्यांचा भाव म्हणजे 'महप्फलकारिता' (महान फलदायित्व). शील इत्यादी गुण. 'अरहति' म्हणजे स्वीकारण्यास योग्य आहे. 'अरहतो' म्हणजे अरहंताचे. 'निब्बचनं' म्हणजे निरुक्ती (व्युत्पत्ती). विग्रह वाक्य असे म्हटले आहे. शुद्धिकशून्यता आणि शून्यताप्रतिपदेमध्ये चित्तांची तशी योजना करू नये, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. तेथे 'सुद्धिकसुञ्ञताया' म्हणजे शुद्धिकशून्यता वारात. 'सुञ्ञतप्पटिपदाया' म्हणजे शून्यताप्रतिपदा वारात. 'सच्च सतिपट्ठान विभङ्गेसु पना' म्हणजे सच्चविभंग आणि सतिपट्ठानविभंग यामध्ये, सर्व चित्तवर्धन पाळी अट्ठकथांमधील देशनावारात विचार करून जाणून घ्यावे. ๖๑. ผลจิตฺเต[Pg.72]. โสตาปตฺติยา อธิคตํ ผลํ โสตาปตฺติ ผลํ. ตตฺถ ‘‘อธิคตํ’’ติ ปฏิลทฺธํ. อฏฺฐงฺคีก ผลํ สนฺธาย ‘‘เตน สมฺปยุตฺต’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘นิรุตฺตี’’ติ วิคฺคโห. ६१. फलचित्तात. सोतापत्तीने प्राप्त केलेले फल म्हणजे 'सोतापत्तिफल'. तेथे 'adhigataṃ' (अधिगत) म्हणजे प्राप्त केलेले. अष्टांगिक फलाचा संदर्भ देऊन 'तेन सम्पयुत्तं' (त्याच्याशी संप्रयुक्त) असे म्हटले आहे. 'निरुत्ती' म्हणजे विग्रह. ๖๒. ตนุภูเตปิ กาตุํ น สกฺโกติ, กุโต สมุจฺฉินฺทิตุํ. ‘‘ตานี’’ติ อินฺทฺริยานิ. ‘‘ปฏู นี’’ติติกฺขานิ. ‘‘โส’’ติ จตุตฺถ มคฺโค. ‘‘ตา จา’’ติ รูปราค, อรูปราค, มาน, อุทฺธจฺจ, อวิชฺชาทโย จ. ‘‘อญฺเญ จา’’ติ เตหิ ทสหิ สํโยชเนหิ อญฺเญ อหิริกาโนตฺตปฺปาทิเก, สพฺเพปิ ปาป ธมฺเม จ. ६२. दुर्बल (तनु) देखील करू शकत नाही, तर समूळ नष्ट (समुच्छेद) करणे तर दूरच राहिले. 'तानी' म्हणजे इंद्रिये. 'पटूनी' म्हणजे तीक्ष्ण. 'सो' म्हणजे चौथा मार्ग (अर्हत मार्ग). 'ता चा' म्हणजे रूपराग, अरूपराग, मान, उद्धच्च, अविद्या इत्यादी. 'अञ्ञे चा' म्हणजे त्या दहा संयोजनांशिवाय इतर अहीरिक (निर्लज्जपणा), अनोत्तप्प (पापाची भीती नसणे) इत्यादी सर्व पापधर्म (अकुशल धर्म). ๖๓. กิริย จิตฺต วิจารณายํ. น คหิตํ อิติ อยํ ปุจฺฉา. อภาวา อิติ อยํ วิสชฺชนาติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘อสฺสา’’ติ กิริยานุตฺตรสฺส. ‘‘นิรนุสยสนฺตาเนปี’’ติ อนุสย รหิเต อรหนฺต สนฺตาเนปิ. ‘‘อิตี’’ติ วากฺย ปริสมาปนมตฺตํ. ‘‘วุจฺจเต’’ติ วิสชฺชนา กถียเต. ปุน อนุปฺปชฺชนํ อนุปฺปาโท. อนุปฺปาโท ธมฺโม สภาโว เยสํ เต อนุปฺปาท ธมฺมา. เตสํ ภาโวติ วิคฺคโห. วิปากญฺจ ชเนตีติ สมฺพนฺโธ. กถํ ชเนตีติ อาห ‘‘กุสล…เป… กตฺวา’’ติ. ตตฺถ, ‘‘กตฺวา’’ติ สาเธตฺวา. สเจปิ กเรยฺยาติ โยชนา. ‘‘โกจี’’ติ อพฺยตฺโต โกจิ อริยสาวโก. ตทา ผล จิตฺตเมว ปวตฺเตยฺยาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปฏิพาหิตุํ อสกฺกุเณยฺโย’’ติ อปฺปฏิพาหิโย อานุภาโว อสฺสาติ สมาโส. ६३. क्रियाचित्ताच्या विचारामध्ये. 'घेतले नाही' हा प्रश्न आहे. 'अभावामुळे' हे उत्तर आहे, इत्यादी प्रकारे जोडले पाहिजे. 'अस्सा' (तिला/त्याला) म्हणजे क्रिया-अनुत्तराचे. 'निरनुसयसंतानेपि' म्हणजे अनुसय-रहित (सुप्त क्लेशांशिवाय) अर्हत संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) सुद्धा. 'इति' हे केवळ वाक्य पूर्ण करण्यासाठी आहे. 'वुच्चते' (म्हटले जाते) याद्वारे उत्तर सांगितले जाते. पुन्हा उत्पन्न न होणे म्हणजे 'अनुत्पाद' (अनुप्पाद). ज्यांचा स्वभाव अनुत्पाद धर्म आहे, ते 'अनुत्पादधम्मा' (अनुत्पादधर्मी). त्यांचा भाव (अस्तित्व) असा विग्रह आहे. 'आणि विपाक उत्पन्न करतो' हा संबंध आहे. तो कसा उत्पन्न करतो, हे सांगण्यासाठी 'कुशल...पे... करून' असे म्हटले आहे. तेथे, 'कत्वा' (करून) म्हणजे साध्य करून. 'जरी केले तरी' अशी योजना आहे. 'कोची' (कोणीतरी) म्हणजे कोणताही अप्रकट आर्यश्रावक. 'तेव्हा फलचित्तच प्रवृत्त व्हावे' हा संबंध आहे. 'प्रतिबंध करण्यास असमर्थ' म्हणजे ज्याचा प्रभाव रोखता येत नाही, असा हा समास आहे. ๖๔. ‘‘อาทิ อนฺต ปเทสฺเว วา’’ติอาทิมฺหิ ทฺวาทสา กุสลานีติ จ, อนฺเต กฺริย จิตฺตานิ วีสตีติ จ ปเทสุ. รูเป ปริยา ปนฺนานิ จิตฺตานิ. อรูเป ปริยา ปนฺนานิ จิตฺตานิ. ‘‘ปถมาย ภูมิยา ปตฺติยา’’ติ ปถมภูมึ ปาปุณิตุํ. ‘‘สามญฺญ ผลํ อธิปฺเปตนฺติ วุตฺตํ’’ อฏฺฐสาลินิยํ. อตฺถโต ปน ธมฺม วิเสโสติ สมฺพนฺโธ. มคฺค ผล นิพฺพาน สงฺขาโต ธมฺม วิเสโส โลกุตฺตรภูมิ นามาติ โยชนา. อวตฺถา ภูมิ เอว นิปฺปริยายภูมิ. กสฺมา, อวตฺถา วนฺตานํ ธมฺมานํ สรูปโต ลทฺธตฺตา. อิตรา โอกาสภูมิ นิปฺปริยาย ภูมิ น โหติ. กสฺมา, ปญฺญตฺติยา มิสฺสกตฺตา. ‘‘ธมฺมานํ ตํ ตํ อวตฺถา วิเสสวเสเนว สิทฺธา’’ติ เอเตน อวตฺถา ภูมิ เอว ปธาน ภูมีติ [Pg.73] ทสฺเสติ. กามตณฺหาย วิสยภูโต โอฬาริกากาโร กามาวจรตา นาม. ภวตณฺหาย วิสยภูโต มชฺฌิมากาโร รูปารูปาวจรตา นาม. ตาสํ ตณฺหานํ อวิสยภูโต สณฺห สุขุมากาโร โลกุตฺตรตา นาม. หีนานํ อกุสล กมฺมานํ วเสน หีนา อปายภูมิโย. ปณีตานํ กุสล กมฺมานํ วเสน ปณีตา สุคติ ภูมิโย. ตตฺถ จ นานา อกุสล กมฺมานํ วา นานา กุสล กมฺมานํ วา โอฬาริก สุขุมตา วเสน นานา ทุคฺคติ ภูมิโย นานา สุคติ ภูมิโย จ สิทฺธา โหนฺตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อปิ จา’’ติอาทิมาห. ६४. 'आदि आणि अंत पदांमध्ये' म्हणजे सुरुवातीला 'बारा अकुशल चित्ते' आणि शेवटी 'वीस क्रिया चित्ते' या पदांमध्ये. रूपभूमीत समाविष्ट असलेली चित्ते. अरूपभूमीत समाविष्ट असलेली चित्ते. 'पहिल्या भूमीच्या प्राप्तीसाठी' म्हणजे पहिल्या भूमीला प्राप्त करण्यासाठी. 'श्रामण्यफळ अभिप्रेत आहे असे म्हटले आहे' अट्ठसालिनीमध्ये. अर्थाच्या दृष्टीने तर 'धम्मविशेष' (धर्माचा विशेष प्रकार) असा संबंध आहे. मार्ग, फल आणि निर्वाण म्हणून ओळखला जाणारा धम्मविशेष म्हणजे 'लोकोत्तर भूमी' अशी योजना आहे. अवस्था-भूमी हीच मुख्य (निप्परियाय) भूमी आहे. का? कारण अवस्था प्राप्त करणाऱ्या धर्मांचे स्वरूपतः अस्तित्व लाभल्यामुळे. दुसरी 'ओकासभूमी' (अवकाश भूमी) ही मुख्य भूमी नाही. का? कारण ती प्रज्ञप्तीशी (संकल्पनेशी) मिश्रित असल्यामुळे. 'धर्मांच्या त्या त्या अवस्था-विशेषाच्या आधारेच सिद्ध होते' याद्वारे अवस्था-भूमी हीच प्रधान भूमी आहे हे दर्शविले आहे. कामतण्हा (काम तृष्णा) चा विषय असणारा स्थूल आकार म्हणजे 'कामावचरता' होय. भवतण्हा (भव तृष्णा) चा विषय असणारा मध्यम आकार म्हणजे 'रूप-अरूपावचरता' होय. त्या तृष्णांचा विषय नसलेला सूक्ष्म व अतिसूक्ष्म आकार म्हणजे 'लोकोत्तरता' होय. हीन अकुशल कर्मांच्या प्रभावाने हीन अशा 'अपाय भूमी' होतात. प्रणीत (उत्कृष्ट) कुशल कर्मांच्या प्रभावाने प्रणीत अशा 'सुगती भूमी' होतात. आणि तेथे विविध अकुशल कर्मांच्या किंवा विविध कुशल कर्मांच्या स्थूल व सूक्ष्म भावामुळे विविध दुर्गती भूमी आणि विविध सुगती भूमी सिद्ध होतात, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. ๖๕. คาถาย ปุพฺพทฺธํ นาม-อิตฺถ เมกูน นวุติ, ปฺปเภทํ ปน มานสนฺติ ปาททฺวยํ. อปรทฺธํ นาม เอกวีสสตํวาถ, วิภชนฺติ วิจกฺขณาติ ปาททฺวยํ. ตํ อิมินา น สเมติ. กถํ น สเมติ. อิมินา วจเนน สกลมฺปิ คาถํ เอกูน นวุติปฺปเภทํ มานสํ เอกวีส สตํ กตฺวา วิภชนฺตี-ติ เอวํ เอกวากฺยํ กตฺวา โยชนํ ญาเปติ. ‘‘ปถมชฺฌาน สทิสฏฺเฐนา’’ติ โลกิย ปถมชฺฌาน สทิสฏฺเฐน. ยํ จตุรงฺคีกํ, ตํ สยเมว ทุตียชฺฌานนฺติ สิทฺธํ. ยํ ติยงฺคีกํ, ตํ สยเมว ตตียชฺฌานนฺติ สิทฺธํ. ยํ ทุวงฺคีกํ, ตํ สยเมว จตุตฺถชฺฌานนฺติ สิทฺธํ. ยํ ปุน ทุวงฺคีกํ, ตํ สยเมว ปญฺจมชฺฌานนฺติ สิทฺธํ. ‘‘เอวํ วุตฺต’’นฺติ วิภาวนิยํ ฌานงฺควเสน ปถมชฺฌาน สทิสตฺตา ปถมชฺฌานญฺจาติ เอวํ วุตฺตํ. วิตกฺกาทิ องฺคปาตุภาเวน ปญฺจธา วิภชนฺตีติ สมฺพนฺโธ. น อิตรานิ โลกิยชฺฌานานิ สาติสฺสยโต ฌานานิ นาม สิยุํ. กสฺมาติ อาห ‘‘ตานิ หี’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ตานี’’ติ โลกิยชฺฌานานิ. ‘‘อุเปจฺจา’’ติ อุปคนฺตฺวา. ‘‘ฌาเปนฺตี’’ติ ทหนฺติ. ปกติยา เอว สิทฺโธ โหติ, น ปาทกชฺฌานาทิวเสน สิทฺโธ. ‘‘กิจฺจ’’นฺติ ปญฺจงฺคีก ภาวตฺถาย กตฺตพฺพ กิจฺจํ. ‘‘เตน ปจฺจย วิเสเสนา’’ติ ปาทกชฺฌานาทินา ปจฺจย วิเสเสน. ‘‘ตสฺมึ’’ติ ปจฺจย วิเสเส. ยถาโลกิยชฺฌาเนสุ อุปจารภูตา ภาวนา กาจิ วิตกฺก วิราค ภาวนา นาม โหติ…เป… กาจิ รูป วิราค ภาวนา นาม. อสญฺญิ คามีนํ ปน สญฺญา วิราค ภาวนา นาม โหติ. เอวเมวนฺติ โยชนา. ‘‘สา’’ติ อุปจาร ภาวนา[Pg.74].‘‘อุเปกฺขา สหคตํ วา’’ติ เอตฺถ วา สทฺเทน รูปสมติกฺกมํ วา สญฺญา สมติกฺกมํ วาติ อวุตฺตํ วิกปฺเปติ. อาทิกมฺมิกกาเล เอวํ โหตุ, วสิภูตกาเล ปน กถนฺติ อาห ‘‘ฌาเนสู’’ติอาทึ. นานาสตฺติยุตฺตา โหตีติ วตฺวา นานาสตฺติโย ทสฺเสติ ‘‘กาจี’’ติอาทินา. ยา อุปจาร ภาวนา. ‘‘วิตกฺกํ วิราเชตุํ’’ติ วิตกฺกํ วิคเมตุํ. อตฺตโน ฌานํ อวิตกฺกํ กาตุนฺติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘อติกฺกาเมตุํ’’ติ. สา อุปจาร ภาวนา. เสสาสุปิ อุปจาร ภาวนาสุ. ६५. गाथेचा पूर्वार्ध म्हणजे—'इत्थ मेकून नवुति, प्पभेदं पन मानसं' (येथे एकोणनव्वद प्रकारांचे मन) हे दोन चरण आहेत. उत्तरार्ध म्हणजे—'एकवीससतंवाथ, विभजन्ति विचक्खणा' (किंवा एकशे एकवीस प्रकारांत विद्वान विभागतात) हे दोन चरण आहेत. ते याच्याशी जुळत नाही. कसे जुळत नाही? या वचनाने संपूर्ण गाथेला 'एकोणनव्वद प्रकारांचे मन एकशे एकवीस करून विभागतात' असे एक वाक्य करून योजना स्पष्ट केली जाते. 'प्रथमध्यान सदृशतेने' म्हणजे लौकिक प्रथमध्यानाच्या सदृशतेने. जे चतुरंगी (चार अंगांचे) आहे, ते स्वतःच 'द्वितीय ध्यान' आहे असे सिद्ध होते. जे त्र्यंगी (तीन अंगांचे) आहे, ते स्वतःच 'तृतीय ध्यान' आहे असे सिद्ध होते. जे द्व्यंगी (दोन अंगांचे) आहे, ते स्वतःच 'चतुर्थ ध्यान' आहे असे सिद्ध होते. जे पुन्हा द्व्यंगी आहे, ते स्वतःच 'पंचम ध्यान' आहे असे सिद्ध होते. 'असे म्हटले आहे' म्हणजे विभावनीमध्ये ध्यान-अंगांच्या आधारे प्रथमध्यानाच्या सदृशतेमुळे 'प्रथमध्यान' असे म्हटले आहे. वितर्क इत्यादी अंगांच्या प्रकटीकरणानुसार पाच प्रकारे विभागतात, असा संबंध आहे. इतर लौकिक ध्याने अतिशयतेने (उत्कृष्टतेने) 'ध्याने' म्हटली जाऊ शकत नाहीत. का? म्हणून 'तानि हि' (कारण ती) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'तानि' म्हणजे लौकिक ध्याने. 'उपेच्चा' म्हणजे जवळ जाऊन. 'झापेन्ति' म्हणजे जाळतात (नष्ट करतात). ते प्रकृतीनेच (स्वभावानेच) सिद्ध होते, पादक-ध्यानादींच्या (पायाभूत ध्यानांच्या) आधारे सिद्ध होत नाही. 'किच्चं' (कृत्य) म्हणजे पाच अंगांच्या भावासाठी करावे लागणारे कृत्य. 'त्या प्रत्यय-विशेषाने' म्हणजे पादक-ध्यानादी प्रत्यय-विशेषाने. 'तस्मिं' म्हणजे त्या प्रत्यय-विशेषात. ज्याप्रमाणे लौकिक ध्यानांमध्ये उपचारभूत असणारी एखादी भावना 'वितर्क-विराग भावना' नावाचे असते...पे... एखादी 'रूप-विराग भावना' नावाचे असते. असंज्ञी भूमीत जाणाऱ्यांसाठी तर 'संज्ञा-विराग भावना' नावाचे असते. 'याचप्रमाणे' अशी योजना आहे. 'सा' म्हणजे उपचार भावना. 'उपेक्षा सहगत किंवा' येथे 'वा' (किंवा) शब्दाने रूप-समतीक्रम (रूपाचे उल्लंघन) किंवा संज्ञा-समतीक्रम (संज्ञेचे उल्लंघन) या न सांगितलेल्या पर्यायांचा विचार केला आहे. आदिकर्मिक काळात (सुरुवातीच्या काळात) असे असो, वशीभूत काळात (प्रभुत्व मिळवल्यावर) कसे? म्हणून 'झानेसु' (ध्यानांमध्ये) इत्यादी म्हटले आहे. विविध शक्तींनी युक्त असते असे सांगून 'काची' (कोणतीतरी) इत्यादींद्वारे विविध शक्ती दर्शविल्या आहेत. जी उपचार भावना आहे. 'वितर्क विराग करण्यासाठी' म्हणजे वितर्क दूर करण्यासाठी. स्वतःचे ध्यान 'अवितर्क' (वितर्करहित) करण्यासाठी असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'अतिक्कामेतुं' (ओलांडण्यासाठी) असे म्हटले आहे. ती उपचार भावना आहे. इतर उपचार भावनांमध्ये सुद्धा. ๖๖. (ก) ‘‘สา วิปสฺสนา’’ติ วุฏฺฐานคามินิ วิปสฺสนา. ‘‘วิปสฺสนา ปากติกา เอวา’’ติกาจิ วิราค ภาวนา นาม น โหตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘นิยาเมตุํ’’ติ อวิตกฺกเมว โหตูติ วทมานา วิย ววตฺถเปตุํ. ‘‘อธิปฺปาโย’’ติ ปาทกวาทิตฺเถรสฺส อธิปฺปาโย. ‘‘สมฺมสียตี’’ติ อิทํ ฌานํ อนิจฺจํ ขยฏฺเฐน, ทุกฺขํ ภยฏฺเฐน, อนตฺตา อสารกฏฺเฐนาติ สมฺมสียติ สมนุปสฺสียติ. ตํ อฏฺฐกถาย น สเมติ. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ. ยโต ยโต สมาปตฺติโต วุฏฺฐาย เย เย สมาปตฺติ ธมฺเม สมฺมสิตฺวา มคฺโค นิพฺพตฺติโต โหติ. ตํ ตํ สมาปตฺติ สทิโสว โหติ. สมฺมสิตสมาปตฺติ สทิโสติ อตฺโถติ. เอตฺถ หิ ‘‘ยโต ยโต สมาปตฺติโต วุฏฺฐายา’’ติ เอเตน ปาทกชฺฌานํ กถิตํ โหติ. ‘‘ปาทกชฺฌาเน สตี’’ติ เอเตน อยํ วาโทปิ ปาทกชฺฌาเนน วินา นสิชฺฌตีติ ทสฺเสติ. ‘‘วิปสฺสนาปิ…เป… ปตฺตา โหตี’’ติ เอเตน อิมสฺมึ วาเทปิ วิปสฺสนา นิยาโม อิจฺฉิตพฺโพติ ทสฺเสติ. เตนาห ‘‘ยถาโลกิยชฺฌาเนสู’’ติอาทึ. กามญฺเจตฺถ…เป… อวิโรโธ วุตฺโต วิย ทิสฺสติ. กถํ. ปญฺจมชฺฌานโต วุฏฺฐาย หิ ปถมชฺฌานาทีนิ สมฺมสโต อุปฺปนฺนมคฺโค ปถมตฺเถรวาเทน ปญฺจมชฺฌานิโก, ทุตีย วาเทน ปถมาทิชฺฌานิโก อาปชฺชตีติ ทฺเวปิ วาทา วิรุชฺฌนฺติ. ตตีย วาเทน ปเนตฺถ ยํ อิจฺฉติ, ตํ ฌานิโก โหตีติ เต จ วาทา น วิรุชฺฌนฺติ, อชฺฌาสโย จ สาตฺถโก โหตีติ เอวํ อวิรุทฺโธ วุตฺโต โหตีติ. เอตฺถ ปน ยํ อิจฺฉติ, ตํ ฌานิโก โหติ. อิจฺฉาย ปน อสติ, วิโรโธเยว. เตนาห ‘‘อิเม ปน วาทา. …เป…[Pg.75]. วิโรโธ ปริหริตุํ’’ติ. ปาฬิยํ ‘‘อชฺฌตฺตํ สุญฺญตํ มนสิ กโรตี’’ติ อชฺฌตฺตสนฺตาเนตํ ตํ ฌานญฺจ ฌานสหคตญฺจ ขนฺธ ปญฺจกํ นิจฺจ สุข อตฺต ชีวโต สุญฺญตํ มนสิ กโรติ. ‘‘น ปกฺขนฺทตี’’ติ น ปวิสติ. ‘‘สนฺนิสาเทตพฺพํ’’ติ สนฺนิสินฺนํ กาตพฺพํ. ‘‘เอโกทิกาตพฺพํ’’ติ เอกมุขํ กาตพฺพํ. ‘‘สมาทหาตพฺพํ’’ติ สุฏฺฐุ ฐเปตพฺพํ. ‘‘นิสฺสายา’’ติ ปาทกํ กตฺวาติ อธิปฺปาโย. ६६. (क) 'ती विपश्यना' (सा विपस्सना) म्हणजे वुट्ठानगामिनी विपश्यना (प्रस्थानाभिमुख विपश्यना) होय. 'विपश्यना केवळ सामान्यच असते' (विपस्सना पाकतिका एवा) याचा अर्थ असा की, कोणतीही विराग भावना नावाची गोष्ट नसते असा अभिप्राय आहे. 'नियमन करण्यासाठी' (नियामेतुं) म्हणजे 'हे केवळ अवितर्कच असावे' असे सांगत असल्याप्रमाणे निश्चित करणे होय. 'अभिप्राय' (अधिप्पायो) म्हणजे पादकवादी थेरांचा अभिप्राय होय. 'समसन केले जाते' (सम्मसीयति) म्हणजे या ध्यानाचे अनित्यतेच्या अर्थाने क्षय म्हणून, दुःखाच्या अर्थाने भय म्हणून, आणि अनात्मतेच्या अर्थाने निस्सार म्हणून समसन केले जाते, सम्यक् दर्शन केले जाते. हे अट्ठकथेशी (भाष्याशी) जुळत नाही. कारण तिथे म्हटले आहे: 'ज्या ज्या समापत्तीमधून उठून, ज्या ज्या समापत्ती धर्मांचे समसन करून मार्ग उत्पन्न होतो, तो त्या त्या समापत्तीसारखाच असतो. समसन केलेल्या समापत्तीसारखा असतो असा अर्थ आहे.' येथे 'ज्या ज्या समापत्तीमधून उठून' (यतो यतो समापत्तितो वुट्ठाय) याने पादकध्यान (पादकज्झान) सांगितले आहे. 'पादकध्यान असताना' (पादकज्झाने सति) याने हा वाद देखील पादकध्यानाशिवाय सिद्ध होत नाही हे दर्शविले आहे. 'विपश्यना देखील...पे... प्राप्त होते' (विपस्सनापि...पे... पत्ता होति) याने या वादात देखील विपश्यनेचा नियम इच्छिला पाहिजे हे दर्शविले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे 'यथालोकीयध्यानांमध्ये' (यथालोकियज्झानेसू) इत्यादी. जरी येथे...पे... विरोध नसलेला सांगितल्यासारखा दिसतो. कसा? पाचव्या ध्यानातून उठून पहिल्या ध्यानादींचे समसन करणाऱ्याला उत्पन्न झालेला मार्ग पहिल्या थेरांच्या मते पाचव्या ध्यानाचा (पंचमज्झानिक) आणि दुसऱ्या मते पहिल्या इत्यादी ध्यानाचा (पठमादिज्झानिक) ठरतो, अशा प्रकारे दोन्ही वाद विरुद्ध ठरतात. परंतु तिसऱ्या मते, जो ज्याची इच्छा करतो, तो त्या ध्यानाचा होतो, त्यामुळे ते वाद विरुद्ध ठरत नाहीत आणि आशय (अज्झासयो) देखील सार्थ ठरतो, अशा प्रकारे अविरोध सांगितला आहे. येथे मात्र जो ज्याची इच्छा करतो, तो त्या ध्यानाचा होतो. परंतु इच्छा नसताना विरोधच होतो. म्हणूनच म्हटले आहे 'पण हे वाद...पे... विरोध टाळण्यासाठी' (इमे पन वादा...पे... विरोधो परिहरितुं). पाळीमध्ये 'अध्यात्म शून्यता मनात आणतो' (अज्झत्तं सुञ्ञतं मनसि करोति) म्हणजे अध्यात्म संतानातील (अध्यात्म प्रवाहातील) त्या ध्यानाला आणि ध्यानसहगत पाच स्कंधांना नित्य, सुख, आत्मा आणि जीव या दृष्टीने शून्य म्हणून मनात आणतो. 'प्रवेश करत नाही' (न पक्खन्दति) म्हणजे प्रवेश करत नाही. 'सन्निसिद्ध केले पाहिजे' (सन्निसादेतब्बं) म्हणजे शांत केले पाहिजे. 'एकोदी केले पाहिजे' (एकोदिकातब्बं) म्हणजे एकाग्र केले पाहिजे. 'समाहित केले पाहिजे' (समादहातब्बं) म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित केले पाहिजे. 'निश्रित करून' (निस्साय) म्हणजे पादक (आधार) करून असा अभिप्राय आहे. ๖๗. (ก) วาทวิจารณายํ. อุปจาร ภาวนา เอว อุปริชฺฌาเน ฌานงฺคํ นิยาเมตีติ วุตฺตํ. เหฏฺฐา ปน อชฺฌาสโย เอว อุปริชฺฌาเน ฌานงฺคํ นิยาเมตีติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘อชฺฌาสโย เอวา’’ติ เอว สทฺเทน ปาทกชฺฌานํ นิวตฺเตติ. ‘‘อิธ อุปจาร ภาวนา เอวา’’ติ เอว สทฺเทน อชฺฌาสยํ นิวตฺเตติ. เอเตสุ หิ ทฺวีสุ สห ภาวีสุ อุปจาร ภาวนา เอว ปธานํ โหติ. อชฺฌาสโย ปน ตสฺส นานา สตฺติโยคํ สาเธติ. ‘‘อชฺฌาสย สามญฺญํ สณฺฐาตี’’ติ มคฺเค ยํ ลทฺธพฺพํ โหติ, ตํ ลพฺภตุ, มยฺหํ วิเสโส นตฺถีติ เอวํ อชฺฌาสย สามญฺญํ สณฺฐาติ. ‘‘ตสฺมิ’’นฺติ อชฺฌาสย วิเสเส. ‘‘โส’’ติ อชฺฌาสย วิเสโส. กสฺมา ยุตฺตนฺติ อาห ‘‘อิจฺฉิ ติจฺฉิต…เป… นิพฺพตฺตนํ’’ติ. ‘‘สพฺพชฺฌาเนสุ จิณฺณวสิภูตานํ’’ติ อิทํ สมาปชฺชนนฺติ จ นิพฺพตฺตนนฺติ จ ปท ทฺวเย สมฺพนฺธ วจนํ. ‘‘วิปสฺสนา วิเสสตฺถาย เอวา’’ติ วุฏฺฐาน คามินิ วิปสฺสนา วิเสสตฺถาย เอว. ยสฺมา ปน อฏฺฐสุ สมาปตฺตีสุ เอเกกาย สมาปตฺติยา วุฏฺฐาย วุฏฺฐิต สมาปตฺติ ธมฺม สมฺมสนํ อาคตํ, น ปน อญฺญชฺฌาน สมฺมสนํ. ตสฺมา ปาทกชฺฌานเมว ปมาณนฺติ โยชนา. ปาฬิปเทสุ ‘‘คหปตี’’ติ อาลปน วจนํ. ‘‘วิวิจฺเจวา’’ติ วิวิจฺจิตฺวา เอว. วิวิตฺโต วิคโต หุตฺวา เอว. ‘‘อุปสมฺปชฺชา’’ติ สุฏฺฐุ สมฺปาปุณิตฺวา. ‘‘อิติ ปฏิสญฺจิกฺขตี’’ติ เอวํ ปจฺจเวกฺขติ. ‘‘อภิสญฺเจตยิต’’นฺติ สุสํ สมฺปิณฺฑิตํ, สํวิทหิตํ. ‘‘ตตฺถ ฐิโต’’ติ ตสฺมึ ปถมชฺฌาเน อปริหีโน หุตฺวา ฐิโต. ‘‘เมตฺตาเจโต วิมุตฺตี’’ติ เมตฺตาฌานสงฺขาตา เจโตวิมุตฺติ, อญฺญตฺถ อลคฺคนวเสน จิตฺตสฺส ปวตฺติ. ตถา กรุณา เจโตวิมุตฺติ. มุทิตา เจโตวิมุตฺติ. ‘‘วิเวกช’’นฺติ กายวิเวก จิตฺตวิเวกานํ วเสน ชาตํ. ‘‘ปีติ สุขํ’’ติ ปีติยา จ สุเขน จ สมฺปนฺนํ. อถวา, วิเวเกหิ ชาตานิ [Pg.76] ปีติ สุขานิ อสฺสาติ วิเวกชํ ปีติ สุขํ. มชฺเฌ นิคฺคหิตาคโม. รูปเมว รูปคตํ, เวทนา เอว เวทนา คตนฺติอาทินา สมาโส. คตสทฺโท จ ปทปูรณมตฺเต ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘เตเนว ธมฺม ราเคน ตายธมฺมนนฺทิยา’’ติ วิปสฺสนานิ กนฺติมาห. สหตฺเถ จ กรณ วจนํ. โอปปาติโก โหตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตตฺถ ปรินิพฺพายี’’ติ พฺรหฺมโลเก อวสฺสํ ปรินิพฺพาย น ธมฺโม. เตนาห ‘‘อนาวตฺติ ธมฺโม ตสฺมา โลกา’’ติ. ‘‘ปาทกชฺฌานเมว ปมาณ’’นฺติ ปาทกชฺฌานเมว มคฺเคฌานงฺคํ นิยาเมสฺสติ, น สมฺมสิตชฺฌานนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปาทกํ อกตฺวา’’ติ อาสนฺเน อสมาปชฺชิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ยํ ยํ ฌานํ อิจฺฉนฺตี’’ติ มคฺเค อิจฺฉนฺติ. ६७. (क) वादाच्या विचारामध्ये. उपचार भावनाच वरील ध्यानात ध्यानांग निश्चित करते असे म्हटले आहे. खाली मात्र आशयच (अज्झासयो) वरील ध्यानात ध्यानांग निश्चित करतो असे म्हटले आहे. तेथे 'आशयच' (अज्झासयो एव) यातील 'एव' (च) शब्दाने पादकध्यानाची निवृत्ती होते. 'येथे उपचार भावनाच' (इध उपचार भावना एव) यातील 'एव' शब्दाने आशयाची निवृत्ती होते. या दोन्ही सहगामींमध्ये उपचार भावनाच प्रधान असते. आशय मात्र त्याच्या विविध शक्तींचा योग साधतो. 'आशय सामान्य प्रस्थापित होतो' (अज्झासय सामञ्ञं सण्ठाति) म्हणजे मार्गात जे मिळवायचे आहे, ते मिळो, मला काही विशेष नाही, अशा प्रकारे सामान्य आशय प्रस्थापित होतो. 'त्यात' (तस्मिं) म्हणजे आशय विशेषात. 'तो' (सो) म्हणजे आशय विशेष. का योग्य आहे? म्हणून म्हटले आहे 'इच्छिलेल्या...पे... उत्पत्ती' (इच्छि तिच्छित...पे... निब्बत्तनं). 'सर्व ध्यानांमध्ये वशित्व प्राप्त केलेल्यांचे' (सब्बज्झानेसु चिण्णवसिभूतानं) हे 'समापज्जनं' (समापत्तीत प्रवेश करणे) आणि 'निब्बत्तनं' (उत्पन्न करणे) या दोन्ही पदांशी संबंधित वचन आहे. 'विपश्यनेच्या विशेष अर्थासाठीच' (विपस्सना विसेसत्थाय एव) म्हणजे वुट्ठानगामिनी विपश्यनेच्या विशेष अर्थासाठीच. परंतु ज्याअर्थी आठ समापत्तींपैकी प्रत्येक समापत्तीमधून उठून, उठलेल्या समापत्तीच्या धर्मांचे समसन करणे आले आहे, इतर ध्यानांचे समसन नाही. म्हणून पादकध्यानच प्रमाण आहे अशी योजना आहे. पाळी पदांमध्ये 'गृहपती' (गहपती) हे संबोधनाचे वचन आहे. 'विविच्चेव' (विविच्चेव) म्हणजे विविक्त (अलिप्त) होऊनच. विविक्त, विगता (दूर) होऊनच. 'उपसंपज्जा' (उपसम्पज्जा) म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्राप्त करून. 'असा विचार करतो' (इति पटिसञ्चिक्खति) म्हणजे असे प्रत्यवेक्षण करतो. 'अभिसंचेती' (अभिसञ्चेतयितं) म्हणजे चांगल्या प्रकारे संकलित केलेले, नियोजित केलेले. 'तेथे स्थित' (तत्थ ठितो) म्हणजे त्या पहिल्या ध्यानात नष्ट न होता स्थित असलेला. 'मैत्री चेतोविमुक्ती' (मेत्ताचेतोविमुत्ती) म्हणजे मैत्री ध्यानाने युक्त चेतोविमुक्ती, इतर ठिकाणी आसक्त न होता चित्ताची प्रवृत्ती होय. तसेच करुणा चेतोविमुक्ती, मुदिता चेतोविमुक्ती. 'विवेकज' (विवेकजं) म्हणजे कायविवेक आणि चित्तविवेक यांच्या प्रभावाने उत्पन्न झालेले. 'प्रीती-सुख' (पीति सुखं) म्हणजे प्रीती आणि सुखाने युक्त असलेले. किंवा विवेकापासून उत्पन्न झालेली प्रीती आणि सुख ज्याचे आहे ते 'विवेकज प्रीती-सुख' होय. मध्ये निग्गहीत (अनुस्वार) आगम आहे. 'रूपच रूपगत, वेदनाच वेदनागत' इत्यादी प्रकारे समास आहे. आणि 'गत' शब्द केवळ पदपूर्तीसाठीच समजला पाहिजे. 'त्याच धम्मरागाने, त्याच धम्मनंदीने' (तेनेव धम्मरागेन तायधम्मनन्दिया) याने विपश्यनेची आसक्ती सांगितली आहे. सह-अर्थात तृतीया विभक्ती (करण वचन) आहे. 'औपपातिक होतो' (ओपपातिको होति) असा संबंध आहे. 'तेथे परिनिर्वाण पावणारा' (तत्थ परिनिब्बायी) म्हणजे ब्रह्मलोकात अवश्य परिनिर्वाण पावणारा स्वभाव असलेला. म्हणूनच म्हटले आहे 'त्या लोकातून परत न येणारा' (अनावत्ति धम्मो तस्मा लोका). 'पादकध्यानच प्रमाण' (पादकज्झानमेव पमाणं) म्हणजे पादकध्यानच मार्गातील ध्यानांग निश्चित करेल, समसन केलेले ध्यान नाही असा अभिप्राय आहे. 'पादक न करता' (पादकं अकत्वा) म्हणजे जवळ समापत्तीत प्रवेश न करता असे म्हटले आहे. 'ज्या ज्या ध्यानाची इच्छा करतात' (यं यं झानं इच्छन्ति) म्हणजे मार्गात इच्छा करतात. ๖๖. (ข) ‘‘ตถา วิโธ’’ติ ตถา ปกาโร. อาสนฺเน วุฏฺฐิตสฺเสว ฌานสฺส. ‘‘จิตฺตสนฺตานํ วิเสเสตุํ’’ติ สเจ ปาทกชฺฌานํ ปถมชฺฌานํ โหติ, ตโต ปรํ ปวตฺตํ จิตฺตสนฺตานํ วิตกฺเก นินฺนํ โหติ, วิตกฺเก ปกฺขนฺทติ. อถ ปาทกชฺฌานํ ทุตียชฺฌานํ โหติ. ตโต ปรํ ปวตฺตํ จิตฺตสนฺตานํ วิจาเร นินฺนํ โหติ, วิจาเร ปกฺขนฺทตีติอาทินา นเยน จิตฺตสนฺตานํ วิเสเสตุํ. ‘‘ยํ ตตฺถ วุตฺตํ’’ ติยํ วิภาวนิยํ วุตฺตํ. ६६. (खा) 'तथाविध' (तथा विधो) म्हणजे त्या प्रकारचा. नुकत्याच उठलेल्या ध्यानाचाच. 'चित्तसंतानाला विशेषित करण्यासाठी' (चित्तसन्तानं विसेसेतुं) म्हणजे जर पादकध्यान पहिले ध्यान असेल, तर त्यानंतर प्रवृत्त झालेले चित्तसंतान वितर्काकडे झुकलेले असते, वितर्कात प्रवेश करते. जर पादकध्यान दुसरे ध्यान असेल, तर त्यानंतर प्रवृत्त झालेले चित्तसंतान विचाराकडे झुकलेले असते, विचारात प्रवेश करते, इत्यादी पद्धतीने चित्तसंतानाला विशेषित करण्यासाठी. 'जे तेथे म्हटले आहे' (यं तत्थ वृत्तं) म्हणजे जे विभावनीमध्ये (विभावनीयं) म्हटले आहे. เวทนา วิจารณายํ. ‘‘น สิทฺโธ’’ติ สิทฺโธ น โหติ. ‘‘อญฺญถา’’ติ อญฺเญน ปกาเรน. คหิเต สตีติ โยชนา. ปาทกชฺฌานาทีนํ วเสน สิทฺโธติ คหิเต สตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ยาย กาย จิ เวทนาย ยุตฺตา หุตฺวา’’ติ โสมนสฺส เวทนาย วายุตฺตา หุตฺวา อุเปกฺขา เวทนาย วา ยุตฺตา หุตฺวา. ‘‘เตหิ นิยมิตาย เอเกกาย มคฺค เวทนายา’’ติ ปาทกชฺฌานาทีหิ นิยมิตาย มคฺเค โสมนสฺส เวทนาย เอว วาสทฺธึ ฆฏิเยยฺย มคฺเค อุเปกฺขา เวทนาย เอว วาติ อตฺโถ. เวทนา นาม เอกํ ฌานงฺคํ โหติ. ตสฺมา มคฺเคฌานงฺค นิยเม สิทฺเธ มคฺเค เวทนา นิยโมปิ สิทฺโธ. ตานิ ปน ปาทกชฺฌานาทีนิ มชฺเฌ วุฏฺฐาน คามินิ วิปสฺสนายํ นกิญฺจินิยาเมนฺติ. เอวญฺจ สติ, ปาทกชฺฌานาทีหิ นิยมิตาย มคฺเค เอเกกาย เวทนาย สทฺธึ ทฺเว ทฺเว วิปสฺสนา เวทนาโย ฆฏิเยยฺยุํ. มคฺเค โสมนสฺส เวทนาย วา สทฺธึ ทฺเว วิปสฺสนา เวทนาโย ฆฏิเยยฺยุํ. มคฺเค อุเปกฺขา [Pg.77] เวทนาย วา สทฺธึ ทฺเว วิปสฺสนา เวทนาโย ฆฏิเยยฺยุํติ วุตฺตํ โหติ. เอวญฺจสติ เอกวีถิยํ ชวนานิ ภินฺน เวทนานิ สิยุํ. ตญฺจ น ยุชฺชติ. ตสฺมา มคฺเค เวทนา นิยโม ปาทกชฺฌานาทิ นิยเมน สิทฺโธ น โหติ, วิปสฺสนา นิยเมเนว สิทฺโธติ อธิปฺปาโย. ตานิ ปน ปาทกชฺฌานาทีนิ มชฺเฌ วุฏฺฐาน คามินิ วิปสฺสนายํ น กิญฺจิ น นิยาเมนฺติ. เวทนํ นิยาเมนฺติ เยวาติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตํปิ น ยุชฺชตี’’ติ วตฺวา ‘‘ปาทกชฺฌานาทีนํ วเสเนวา’’ติอาทิมาห. ‘‘ฉ เนกฺขมฺมสฺสิตา อุเปกฺขา’’ติ เอกาว จตุตฺถชฺฌานุ เปกฺขา ฉสุ อารมฺมเณสุ โสมนสฺสานิ ปชหิตฺวา ปวตฺตตฺตา ฉ เนกฺขมฺมสฺสิตา อุเปกฺขา นาม โหติ. ‘‘ฉ เนกฺขมฺมสฺสิตานิ โสมนสฺสานี’’ติ เอกํ วปถมชฺฌาน โสมนสฺสํ ฉสุ อารมฺมเณสุ ฉ เคหสฺสิตานิ ปชหิตฺวา ปวตฺตตฺตา ฉ เนกฺขมฺมสฺสิตานิ โสมนสฺสานิ นาม โหนฺติ. อฏฺฐกถายญฺจ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปถมาทีนิ จ ตีณิ ฌานานี’’ติ จตุกฺกนเย ตีณิ โสมนสฺส ฌานานิ ปาทกานิ กตฺวา. ‘‘สุทฺธสงฺขาเร จ ปาทเกกตฺวา’’ติ อารมฺมณ ภาเวน ปาทเกกตฺวาติ อธิปฺปาโย. อยญฺจ ปาทกชฺฌานาทีนํ วเสน วุฏฺฐาน คามินิ วิปสฺสนายญฺจ มคฺเค จ เวทนา ปริณาโม อฏฺฐสาลินิยํปิ วิตฺถารโต วุตฺโต. ‘‘อมานุสี รตี โหตี’’ติ มนุสฺสานํ เคหสฺสิตรตึ อติกฺกมฺม ฐิตตฺตา อมานุสี นาม รติ โหติ. ‘‘สมฺมธมฺมํ วิปสฺสโต’’ติ สมฺมา อนิจฺจ ลกฺขณ ธมฺมํ ปสฺสนฺตสฺส ภิกฺขุโนติ สมฺพนฺโธ. वेदना विचारामध्ये. 'सिद्ध होत नाही' म्हणजे सिद्ध होत नाही. 'अन्यथा' म्हणजे दुसऱ्या प्रकारे. 'ग्रहण केले असता' असा संबंध आहे. पादक ध्यानादींच्या प्रभावाने सिद्ध होते, असे ग्रहण केले असता, असे म्हटले आहे. 'कोणत्याही वेदनेशी युक्त होऊन' म्हणजे सोमनस्य वेदनेशी युक्त होऊन किंवा उपेक्षा वेदनेशी युक्त होऊन. 'त्यांच्याद्वारे नियमन केलेल्या प्रत्येक मार्ग वेदनेशी' म्हणजे पादक ध्यानादींद्वारे नियमन केलेल्या मार्गात सोमनस्य वेदनेशीच जोडले जावे किंवा मार्गात उपेक्षा वेदनेशीच जोडले जावे, असा अर्थ आहे. वेदना हे एक ध्यान-अंग आहे. म्हणून मार्गात ध्यान-अंगाचा नियम सिद्ध झाला असता, मार्गात वेदनेचा नियमही सिद्ध होतो. परंतु, ती पादक ध्यानादी मध्यंतरीच्या वुट्ठाणगामिनी विपश्यनेमध्ये काहीही नियमन करत नाहीत. आणि असे झाले असता, पादक ध्यानादींद्वारे नियमन केलेल्या मार्गातील प्रत्येक वेदनेसोबत दोन-दोन विपश्यना वेदना जोडल्या जातील. मार्गातील सोमनस्य वेदनेसोबत दोन विपश्यना वेदना जोडल्या जातील किंवा मार्गातील उपेक्षा वेदनेसोबत दोन विपश्यना वेदना जोडल्या जातील, असे म्हटले आहे. आणि असे झाले असता, एकाच वीथीमध्ये जवने भिन्न वेदनांनी युक्त होतील. आणि ते योग्य नाही. म्हणून मार्गातील वेदनेचा नियम पादक ध्यानादींच्या नियमाने सिद्ध होत नाही, तर विपश्यनेच्या नियमानेच सिद्ध होतो, असा अभिप्राय आहे. परंतु, ती पादक ध्यानादी मध्यंतरीच्या वुट्ठाणगामिनी विपश्यनेमध्ये काहीही नियमन करत नाहीत असे नाही, तर वेदनेचे नियमन करतातच, हे दर्शवण्यासाठी 'तेही योग्य नाही' असे म्हणून 'पादक ध्यानादींच्या प्रभावानेच' इत्यादी म्हटले आहे. 'सहा नैष्क्रम्य-आश्रित उपेक्षा' म्हणजे एकच चतुर्थ ध्यान उपेक्षा, जी सहा आलंबनांमध्ये सोमनस्यांचा त्याग करून प्रवृत्त होत असल्यामुळे तिला 'सहा नैष्क्रम्य-आश्रित उपेक्षा' असे म्हणतात. 'सहा नैष्क्रम्य-आश्रित सोमनस्ये' म्हणजे एकच प्रथम ध्यान सोमनस्य, जे सहा आलंबनांमध्ये सहा गृह-आश्रित सोमनस्यांचा त्याग करून प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्यांना 'सहा नैष्क्रम्य-आश्रित सोमनस्ये' असे म्हणतात. 'अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे' असा संबंध आहे. 'प्रथमादी तीन ध्याने' म्हणजे चतुष्कनयामध्ये तीन सोमनस्य ध्यानांना पादक करून. 'शुद्ध संस्कारांना पादक करून' म्हणजे आलंबन रूपाने पादक करून, असा अभिप्राय आहे. आणि हा पादक ध्यानादींच्या प्रभावाने वुट्ठाणगामिनी विपश्यनेमध्ये आणि मार्गामध्ये वेदनेचा परिणाम 'अट्ठसालिनी' मध्येही सविस्तरपणे सांगितला आहे. 'अमानुषी रती होते' म्हणजे मनुष्यांच्या गृह-आश्रित रतीचे अतिक्रमण करून स्थित असल्यामुळे तिला 'अमानुषी रती' असे म्हणतात. 'सम्यक धर्माची विपश्यना करणाऱ्या' म्हणजे सम्यक प्रकारे अनित्य लक्षणात्मक धर्माला पाहणाऱ्या भिक्खूचा, असा संबंध आहे. ๖๗. (ข) ‘‘ฌานงฺคโยคเภเทนา’’ติ วุตฺตํ, ฌานโยคเภโท ปน อธิปฺเปโต. ‘‘ปญฺจ วิเธฌาน โกฏฺฐาเส’’ติ ปญฺจก นยวเสน วุตฺตํ. อิธ จิตฺต เภทสฺส อธิปฺเปตตฺตา ฌานเภเทติ จ ฌานนฺติ จ วุตฺเตปิ จิตฺตเมว อธิปฺเปตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ६७. (ख) 'ध्यान-अंग-योग-भेदाने' असे म्हटले आहे, परंतु ध्यान-योग-भेद अभिप्रेत आहे. 'पाच प्रकारच्या ध्यान-कोष्ठांमध्ये' हे पंचक नयाच्या दृष्टीने म्हटले आहे. येथे चित्त-भेदाचा अभिप्राय असल्यामुळे, 'ध्यान-भेद' आणि 'ध्यान' असे म्हटले असले तरी चित्तच अभिप्रेत आहे, असे समजावे. คาถาโยชนาสุ. ‘‘อปราปิ โยชนา วุตฺตา’’ติ อถวา รูปาวจรํ จิตฺตํ อนุตฺตรญฺจ ปถมาทิชฺฌาน เภเทน ยถา คยฺหติ, ตถา อารุปฺปญฺจาปิ ปญฺจเมฌาเน คยฺหตีติ เอวํ อปราปิ โยชนา วุตฺตา. ‘‘ปฐิตตฺตา’’ติ อุจฺจาริตตฺตา. อนฺติมคาถา วณฺณนายํ. ‘‘ยถา’’ติ เยน ปกาเรน. ‘‘ตํ สงฺคหํ’’ติ เอก วีสสตสงฺคหํ[Pg.78]. พุชฺฌนฺตีติ พุธา. ‘‘อาหา’’ติ จ ‘‘อาหู’’ติ จ วตฺตมานกาเลปิ อิจฺฉนฺติ สทฺทวิทูติ วุตฺตํ ‘‘กเถนฺติ วา’’ติ. อิทญฺจ วจนํ ปุพฺเพ ‘‘อิตฺถเมกูน นวุติ…เป… วิภชนฺติ วิจกฺขณา’’ติ คาถาย นิคมนนฺติ ญาปนตฺถํ ‘‘วิภชนฺติ วิจกฺขณา’’ติ วุตฺตํ โหตี’’ติ วุตฺตํ. गाथा-योजनांमध्ये. 'दुसरीही योजना सांगितली आहे' म्हणजे किंवा रूपावचर चित्त आणि अनुत्तर चित्त जसे प्रथमादी ध्यानांच्या भेदाने ग्रहण केले जाते, तसेच आरूप्य देखील पाचव्या ध्यानात ग्रहण केले जाते, अशी दुसरीही योजना सांगितली आहे. 'पठितत्वामुळे' म्हणजे उच्चारित केल्यामुळे. अंतिम गाथेच्या वर्णनामध्ये. 'जसे' म्हणजे ज्या प्रकारे. 'त्या संग्रहाला' म्हणजे एकशे एकवीसच्या संग्रहाला. 'जाणतात ते' म्हणजे बुद्ध (ज्ञानी). 'आह' आणि 'आहू' हे वर्तमानकाळातही व्याकरणकार इच्छितात, म्हणून 'सांगतात' असे म्हटले आहे. आणि हे वचन पूर्वीच्या 'इत्थमेकूननवति...पे... विभजन्ति विचक्खणा' या गाथेचा निष्कर्ष आहे हे दर्शवण्यासाठी 'विभजन्ति विचक्खणा' (विद्वान विभाग करतात) असे म्हटले आहे, असे सांगितले आहे. อิติปรมตฺถทีปนิยานามฏีกายอนุทีปนิยํ अशा प्रकारे 'परमत्थदीपनी' नावाच्या टीकेची ही अनुदीपनी आहे. จิตฺตสงฺคหสฺสอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. चित्तसंग्रहाची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๒. เจตสิกสงฺคหอนุทีปนา २. चेतसिकसंग्रह अनुदीपनी ๖๘. เอวํ [Pg.79] จิตฺต สงฺคหสฺส ทีปนึ กตฺวา เจตสิก สงฺคหสฺส ทีปนึ กโรนฺโต ปถมํ ปุพฺพาปรานุ สนฺธิญฺจ อาทิคาถาย ปโยชน สมฺพนฺธญฺจ ทสฺเสตุํ ‘‘เอวํ’’ติอาทิ มารทฺโธ. ตตฺถ ‘‘อนุปตฺต’’นฺติอาทิมฺหิ จิตฺตํ เจตสิกํ รูปํ, นิพฺพานมิติสพฺพถาติ เอวํ อนุกฺกโม วุตฺโต. เตน อนุกฺกเมน อนุปตฺตํ. เหตุ วิเสสนญฺเจตํ. ยสฺมา จิตฺตสงฺคหานนฺตรํ เจตสิก สงฺคโห อนุปตฺโต, ตสฺมา อิทานิ ตํ สงฺคหํ กโรตีติ ทีเปติ. จตฺตาริ สมฺปโยค ลกฺขณานิ ‘เอกุปฺปาทตา, เอก นิโรธตา, เอกา รมฺมณตา, เอก วตฺถุกตา,ติ. ‘‘เจตสิ ยุตฺตา’’ติ จิตฺตสฺมึ นิยุตฺตา. จิตฺตํ นิสฺสาย อตฺตโน อตฺตโน กิจฺเจสุ อุสฺสุกฺกํ อาปนฺนาติ อตฺโถ. ‘‘เจตสา วายุตฺตา’’ติ จิตฺเตน วา สมฺปยุตฺตา. จิตฺเตน สห เอกีภาวํ คตาติ อตฺโถ. ‘‘สรูปทสฺสน’’นฺติ สงฺขฺยาสรูปทสฺสนํ. สิทฺธปทํ นาม ปกติ ปจฺจเยหิ นิปฺผนฺน ปทํ. ‘‘ปุพฺพนฺตโต’’ติ เอกสฺสสงฺขต ธมฺมสฺส ปถม ภาคโต. อุทฺธํ ปชฺชนํ นาม กตมนฺติ อาห ‘‘สรูปโต ปาตุภวน’’นฺติ. ธาตุ ปาเฐสุ-ชนิปาตุภาเว-ติ วุตฺตตฺตา อาห ‘‘ชาตีติ วุตฺตํ โหตี’’ติ. ‘‘สรูป วินาโส’’ติ สรูปโต ปาตุภวนฺตสฺส ภาวสฺส วินาโส อนฺตรธานํ. ‘‘เอวํ ปรตฺถ ปี’’ติ ปรสฺมึ เอกาลมฺพณวตฺถุกาทิปเทปิ. ‘‘เอก จิตฺตสฺสปิ พหุเทวา’’ติ จกฺขุ วิญฺญาณํ รูปํ ปสฺสนฺตํ เอกเมว รูปํ ปสฺสตีติ นตฺถิ. อเนกานิ เอวรูปานิ เอกโต กตฺวา ปสฺสติ. โสตวิญฺญาณาทีสุปิ เอเสว นโย. เอวญฺจ กตฺวา ปาฬิยํ. จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุ วิญฺญาณํ. โสตญฺจ ปฏิจฺจ สทฺเท จ อุปฺปชฺชติ โสตวิญฺญาณนฺติอาทินา วตฺถุทฺวาเรสุ เอกวจนํ วตฺวา อารมฺมเณสุ พหุวจนํ กตนฺติ. ‘‘เอกตฺตํ อุปเนตฺวา’’ติ จกฺขุ วิญฺญาเณ พหูนิปิ รูปารมฺมณานิ รูปตา สมญฺเญน เอกีภาวํ กตฺวา เอกํ อารมฺมณนฺตฺเวว วุตฺตนฺติ อธิปฺปาโย. สทฺทารมฺมณาทีสุปิ เอเสว นโย. ตํ น สุนฺทรํ. กสฺมา. อตฺถ วิเสสสฺส อวิญฺญาปนโต. โกปนายํ อตฺถ วิเสโสติ[Pg.80]. ยาจิตฺตสฺส ชาติ, สาเยว ผสฺสาทีนนฺติอาทิโก อตฺโถ. เตนาห ‘‘อถ โข’’ติอาทึ. อธิปฺเปตา เอกุปฺปาทตา. เอส นโย เอก นิโรธตาทีสุ. ‘‘มูลฏีกาย’’นฺติ รูปกณฺฑมูลฏีกายํ. ‘‘สเหวา’’ติ เอกโต เอว. ‘‘อุปฺปาทาทิปฺปวตฺติโต’’ติ อุปฺปาทสฺส จ ชีรณสฺส จ นิโรธสฺส จ ปวตฺติโต. ‘‘อุปฺปาทาทโย’’ติ อุปฺปาท ชีรณ นิโรธา. ชาติชรามรณานีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘เจตสิกามตา’’ติ เจตสิกา อิติ วิญฺญาตา. ‘‘ภาวปฺปธานํ’’ติ เอกุปฺปาท ภาโว เอกุปฺปาโทติ วุตฺโต. ตถา เอก นิโรธาทีสุ. ยถา อิทํปิ สงฺเฆรตนํ ปณีต-นฺติอาทีสุ อยํ รตน ภาโว ปณีโตติ เหตฺถ อตฺโถ. ‘‘เย’’ติ เย ธมฺมา. ‘‘สหชาต ปจฺจยุปฺปนฺน รูปานิ ปี’’ติ สหชาตปจฺจยโต อุปฺปนฺนานิ รูปานิปิ. เจตสิกานิ นาม สิยุนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตทา ยตฺต วุตฺติตายา’’ติ จิตฺตายตฺตวุตฺติยาย. ‘‘เจโตยุตฺตานี’’ติ เหตุ วิเสสนํ. ตเทว เหตุมนฺต วิเสสนนฺติ จ เหตุ อนฺโต นีตวิเสสนนฺติ จ เหตุ อนฺโต คธวิเสสนนฺติ จ วทนฺติ. ‘‘เตส’’นฺติ จิตฺตสฺส สหชาตปจฺจยุปฺปนฺนรูปานํ. ‘‘นานุโภนฺตี’’ติ นปาปุณนฺติ. ‘‘น หิ สกฺกา ชานิตุํ’’ติ เอเตน ภูตกถน วิเสสนานิ เอตานีติ ทีเปติ. ภูตกถนํปิ สมานํ วตฺติจฺฉาวเสน พฺยวจฺเฉทกํปิ สมฺภวติ. ‘‘วโยปญฺญายตี’’ติ วินาโส ปกาสติ. ‘‘ฐิตายา’’ติ ติฏฺฐ มานาย เวทนาย. อญฺโญ ปกาโร อญฺญถา. อญฺญถา ภาโว อญฺญถตฺตํ. ชราวเสน ปริณาโมติ วุตฺตํ โหติ. โย ปถวีธาตุยา อุปฺปาโท, ยา ฐิติ, ยา อภินิพฺพตฺติ, โย ปาตุภาโว. เอโส ทุกฺขสฺส อุปฺปาโท, เอสา โรคานํ ฐิติ, เอโส ชรามรณสฺส ปาตุภาโวติ โยชนา. ‘‘อิตรถา’’ติ อิโต อญฺญถา คหิเต สตีติ อตฺโถ. เอกสฺมึ รูปารูปกลาเป นานา ธมฺมานํ วเสน พหูสุ อุปฺปาเทสุ จ นิโรเธสุ จ คหิเตสูติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘วิการรูปานํ’’ติ วิญฺญตฺติ ทฺวย ลหุตาทิตฺตยานํ. สพฺพานิปิ อุปาทารูปานิ จตุนฺนํ มหาภูตานํ อุปาทาย ปวตฺตตฺตา มหาภูต คณนาย จตฺตาริ จตฺตาริ สิยุํติ อิมินา อธิปฺปาเยน ‘‘สพฺเพสมฺปิ วา’’ติอาทิวุตฺตํ. สพฺเพสมฺปิ วา จกฺขาทีนํ อุปาทารูปานํ เอเกกสฺมึ กลาเป [Pg.81] พหุภาโว วตฺตพฺโพ สิยาติ โยชนา. กสฺมา พหุภาโว วตฺตพฺโพติ อาห ‘‘จตุนฺนํ มหาภูตาน’’นฺติอาทึ. ६८. अशा प्रकारे चित्त-संग्रहाचे स्पष्टीकरण करून, चैतसिक-संग्रहाचे स्पष्टीकरण करताना, सर्वप्रथम पूर्व-अपर संबंध आणि पहिल्या गाथेचे प्रयोजन व संबंध दर्शवण्यासाठी "एवं" (अशा प्रकारे) इत्यादीने सुरुवात केली आहे. त्यामध्ये "अनुपत्त" (प्राप्त झालेले) इत्यादींमध्ये चित्त, चैतसिक, रूप आणि निर्वाण अशा सर्व प्रकारे अनुक्रम सांगितला आहे. त्या अनुक्रमाने प्राप्त झालेले. आणि हे हेतूचे विशेषण आहे. ज्याअर्थी चित्त-संग्रहानंतर चैतसिक-संग्रह प्राप्त होतो, त्याअर्थी आता ते तो संग्रह करत आहेत, असे स्पष्ट होते. संप्रयोगाची चार लक्षणे आहेत: 'एक उत्पादता (एकत्र उत्पन्न होणे), एक निरोधता (एकत्र निरुद्ध होणे), एक आलंबनता (एकच आलंबन असणे) आणि एक वस्तुकता (एकच आश्रय असणे)'. "चेतसि युत्ता" म्हणजे चित्तामध्ये नियुक्त (जोडलेले). चित्ताचा आश्रय घेऊन आपापल्या कार्यांमध्ये तत्पर झालेले, असा अर्थ आहे. "चेतसा वा युत्ता" म्हणजे चित्ताशी संप्रयुक्त (युक्त). चित्तासोबत एकीभावाला प्राप्त झालेले, असा अर्थ आहे. "सरूपदस्सनं" म्हणजे संख्येचे स्वरूप दर्शन. सिद्धपद म्हणजे प्रकृती आणि प्रत्ययाने निष्पन्न झालेले पद. "पुब्बंततो" म्हणजे एका संस्कृत धर्माच्या पहिल्या भागापासून. ऊर्ध्व गमन (उत्पत्ती) म्हणजे काय? म्हणून म्हटले आहे: "स्वरूपाने प्रादुर्भूत होणे". धातूपाठांमध्ये 'जनि प्रादुर्भावे' असे म्हटल्यामुळे "जाती (जन्म) असे म्हटले आहे" असे म्हटले आहे. "सरूप विनासो" म्हणजे स्वरूपाने प्रादुर्भूत होणाऱ्या भावाचा विनाश किंवा अंतर्धान होणे. "एवं परत्थ पि" म्हणजे दुसऱ्या एका आलंबन आणि वस्तू इत्यादी पदांमध्येही. "एक चित्ताचेही अनेकच" म्हणजे चक्षु-विज्ञान रूपाला पाहताना केवळ एकच रूप पाहते असे नाही. अनेक अशा रूपांना एकत्र करून पाहते. श्रोत-विज्ञानादींमध्येही हाच नियम आहे. आणि असे करून पाळिमध्ये (पालि ग्रंथात) "चक्षू आणि रूपाचा प्रत्यय घेऊन चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होते", "श्रोत आणि शब्दाचा प्रत्यय घेऊन श्रोत-विज्ञान उत्पन्न होते" इत्यादींद्वारे वस्तू आणि द्वारांमध्ये एकवचन वापरून आलंबनांमध्ये बहुवचन केले आहे. "एकत्व आणून" म्हणजे चक्षु-विज्ञानात अनेक रूप-आलंबनांनाही रूपत्वाच्या सामान्यतेने एकीभाव करून "एकच आलंबन" असे म्हटले आहे, असा अभिप्राय आहे. शब्द-आलंबन इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. ते योग्य नाही. का? कारण अर्थाच्या विशेषाचे ज्ञान होत नसल्यामुळे. मग हा अर्थविशेष कोणता? जी चित्ताची उत्पत्ती (जाती) आहे, तीच स्पर्शादींची आहे, इत्यादी अर्थ आहे. म्हणूनच "अथ खो" (परंतु) इत्यादी म्हटले आहे. अभिप्रेत 'एक उत्पादता' आहे. हाच नियम एक निरोधता इत्यादींमध्येही आहे. "मूलटीकेमध्ये" म्हणजे रूपकांड-मूलटीकेमध्ये. "सहेव" म्हणजे एकत्रच. "उत्पाद इत्यादींच्या प्रवृत्तीमुळे" म्हणजे उत्पाद, जीर्णता (जरा) आणि निरोध यांच्या प्रवृत्तीमुळे. "उत्पाद इत्यादी" म्हणजे उत्पाद, जीर्णता आणि निरोध. जाती, जरा आणि मरण असे म्हटले आहे. "चैतसिकता" म्हणजे चैतसिक म्हणून जाणले गेलेले. "भावप्रधान" म्हणजे एक उत्पाद भाव हाच 'एक उत्पाद' असा म्हटला आहे. तसेच एक निरोध इत्यादींमध्येही. जसे "इदम्पि संघरतनं पणीतं" (हे संघरत्नही प्रणीत आहे) इत्यादींमध्ये 'हा रत्नभाव प्रणीत आहे' असा येथे अर्थ आहे. "ye" म्हणजे जे धर्म. "सहजात प्रत्ययोत्पन्न रूपेही" म्हणजे सहजात प्रत्ययाने उत्पन्न झालेली रूपेही. 'ती चैतसिके असावीत' असा संबंध आहे. "तदायत्तवृत्तीमुळे" म्हणजे चित्तावर अवलंबून असणाऱ्या वृत्तीमुळे. "चेतोयुत्तानी" हे हेतूचे विशेषण आहे. त्यालाच 'हेतुमंत विशेषण', 'हेतू अंतर्गत विशेषण' आणि 'हेतू अंतर्भूत विशेषण' असेही म्हणतात. "तेसं" म्हणजे चित्ताच्या सहजात प्रत्ययाने उत्पन्न झालेल्या रूपांचे. "नानुभोन्ति" म्हणजे प्राप्त करत नाहीत. "न हि सक्का जानितुं" (जाणणे शक्य नाही) याद्वारे हे भूत-कथन विशेषणे आहेत, असे स्पष्ट होते. भूत-कथन समान असतानाही बोलण्याच्या इच्छेनुसार (विवक्षेनुसार) व्यवच्छेदक (भेदक) असणेही संभवते. "वयो पञ्ञायति" म्हणजे विनाश प्रकट होतो. "ठिताय" म्हणजे विद्यमान (स्थित) असलेल्या वेदनेची. दुसरा प्रकार म्हणजे अन्यथा. अन्यथा भाव म्हणजे अन्यथात्व. जरेच्या (वृद्धत्वाच्या) प्रभावाने होणारा परिणाम, असे म्हटले आहे. जो पृथ्वीधातूचा उत्पाद, जी स्थिती, जी अभिनिर्वृत्ती (उत्पत्ती), जो प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद, ती रोगांची स्थिती, तो जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे, अशी योजना आहे. "इतरथा" म्हणजे यापेक्षा वेगळे ग्रहण केले असता, असा अर्थ आहे. एकाच रूप-अरूप कलापामध्ये विविध धर्मांच्या प्रभावाने अनेक उत्पाद आणि निरोधांचे ग्रहण केले जाते, असे म्हटले आहे. "विकाररूपांचे" म्हणजे दोन विज्ञाप्ती (कायविज्ञप्ती व वाग्विज्ञप्ती) आणि लहुता (लघुता) इत्यादी तीन यांचे. सर्वच उपादाय रूपे चार महाभूतांच्या आश्रयाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे, महाभूतांच्या गणनेनुसार ती चार-चार असावीत, या अभिप्रायाने "सब्बेसम्पि वा" (किंवा सर्वांचेच) इत्यादी म्हटले आहे. किंवा चक्षू इत्यादी सर्व उपादाय रूपांच्या प्रत्येक कलापामध्ये बहुभाव (अनेकत्व) सांगावा, अशी योजना आहे. बहुभाव का सांगावा? म्हणून "चतुन्नं महाभूतानं" (चार महाभूतांचे) इत्यादी म्हटले आहे. ยทิ เอวํ, เอกสฺมึ จิตฺตุปฺปาเท ลหุตาทีนิปิ เอเกกานิ เอว สิยุํ, อถ กิมตฺถํ ทฺเว ทฺเว กตฺวา วุตฺตานีติ อาห ‘‘กายลหุตา จิตฺต ลหุตาทโยปนา’’ติอาทึ. ‘‘อิมมตฺถํ อสลฺลกฺเขตฺวา’’ติ อีทิสํ วินิจฺฉยตฺตํ อจินฺเตตฺวาติ อธิปฺปาโย. วิภาวนิปาเฐ ‘‘จิตฺตานุปริวตฺติโน’’ติ เอเตน จิตฺเตน อุปฺปชฺชิตฺวา เตเนว จิตฺเตน สหนิรุชฺฌนวเสน จิตฺตํ อนุปริวตฺติสฺส. ‘‘ปสงฺคา’’ติ เจตสิกตา ปสงฺโค. ‘‘ปุเรตรมุปฺปชฺชิตฺวา’’ติ ปุเรตรํ เอเกน จิตฺเตน สห อุปฺปชฺชิตฺวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘จิตฺตสฺสภงฺคกฺขเณ’’ติ อญฺญสฺส สตฺตร สม จิตฺตสฺส ภงฺคกฺขเณ. ตถา รูปธมฺมานํ ปสงฺโค น สกฺกา นีวาเรตุํ ติโยชนา. ‘‘ปสงฺโค’’ติ เจตสิกตา ปสงฺโค. ‘‘อลมติ ปปญฺเจนา’’ติ อภิธมฺเม เวทนาตฺติเกฏีกาสุ วิย อติ วิตฺถาเรน นิรตฺถกํ โหตีติ อตฺโถ. ‘‘นิรตฺถกํ’’ติ วิภาวนิยํ ปปญฺโจ นิรตฺถโก เอวาติ อธิปฺปาโย. जर असे असेल, तर एका चित्तोत्पादामध्ये लघुता इत्यादी देखील एकेकच असावीत, मग कोणत्या कारणासाठी दोन-दोन करून सांगितले आहेत? म्हणून "कायलहुता चित्तलहुतादयोपना" (काय-लघुता, चित्त-लघुता इत्यादी परंतु) इत्यादी म्हटले आहे. "इममत्थं असल्लक्खेत्वा" (या अर्थाचे नीट लक्ष न देता) म्हणजे अशा प्रकारच्या निर्णयाचा विचार न करता, असा अभिप्राय आहे. विभावनी पाठात "चित्तानुपरिवत्तिनो" (चित्ताचे अनुवर्तन करणारे) याद्वारे चित्तासोबत उत्पन्न होऊन त्याच चित्तासोबत निरुद्ध होण्याच्या स्वरूपात चित्ताचे अनुवर्तन करतील. "प्रसंगा" म्हणजे चैतसिक असण्याचा प्रसंग (अतिप्रसंग). "पुरेतरमुप्पज्जित्वा" म्हणजे पूर्वी एका चित्तासोबत उत्पन्न होऊन, असा अभिप्राय आहे. "चित्तस्सा भंगक्खणे" म्हणजे दुसऱ्या सतराव्या समान चित्ताच्या भंगक्षणी. त्याचप्रमाणे रूपधर्मांचा प्रसंग (अतिप्रसंग) टाळणे शक्य नाही, अशी योजना आहे. "प्रसंगो" म्हणजे चैतसिक असण्याचा प्रसंग. "अलमति प्रपंचेन" (प्रपंचाची/विस्ताराची आवश्यकता नाही) म्हणजे अभिधम्मातील वेदनात्रिक-टीकेप्रमाणे अतिविस्ताराने ते निरर्थक होते, असा अर्थ आहे. "निरर्थकं" म्हणजे विभावनीमधील विस्तार निरर्थकच आहे, असा अभिप्राय आहे. ๖๙. ผสฺสวจนตฺเถ. ‘‘ผุสตี’’ติ อารมฺมณํ อาหนติ, สงฺฆฏฺเฏติ. ตญฺจ สงฺฆฏฺฏ นํ นโทสปฏิฆสฺส วิย อารมฺมณสฺส วิพาธนํ โหติ, อถ โข ภมรสฺส ปทุม ปุปฺเผสุ ปุปฺผร สคฺคหณํ วิย วิชานน มตฺเต อฐตฺวา อารมฺมณ รสปาตุภาวตฺถํ ยถารมฺมณํ สํหนน เมวาติ ทสฺเสตุํ ‘‘ผุสนญฺเจตฺถา’’ติอาทิมาห. ‘‘อาหจฺจา’’ติ อาหนิตฺวา สมฺปาปุณิตฺวา. ‘‘อุปหจฺจา’’ติ ตสฺเสว เววจนํ. อยมตฺโถ กถํ ปากโฏติ อาห ‘‘ยโต’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ยโต’’ติ ยํ การณา. ‘‘ตทนุภวนฺตี’’ติ ตํ อารมฺมณ รสํ อนุภวนฺตี, เวทนา ปาตุภวติ, เวทนา ปาตุภาวํ ทิสฺวา อารมฺมณปฺผุสนํ ญาเณ ปากฏํ โหตีติ อธิปฺปาโย. สฺวายํ ผุสน ลกฺขโณ, สงฺฆฏฺฏนรโส, สนฺนิปาตปจฺจุปฏฺฐาโน, อาปาตา คตวิสย ปทฏฺฐาโน. ตตฺถ สนฺนิปาโต นาม ติณฺณํ ติณฺณํ ทฺวารา รมฺมณ วิญฺญาณานํ สงฺคติ สมาคโม สโมธานํ. ตถาหิ วุตฺตํ. จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุ วิญฺญาณํ, ติณฺณํ สงฺคติ ผสฺโส ติอาทิ. ‘‘สงฺฆฏฺฏนรโส’’ติ อารมฺมเณ สมฺมเทว ฆฏฺฏน [Pg.82] กิจฺโจ. สงฺฆฏฺฏน กิจฺจตฺตา เอว ติณฺณํ สนฺนิปาโต หุตฺวา ธมฺม จินฺตาญาณสฺส ปฏิมุขํ อุปฏฺฐาติ ปกาสตีติ. ‘‘สนฺนิปาต ปจฺจุปฏฺฐาโน’’. ปจฺจุปฏฺฐานนฺติ วา ปญฺญาณํ วุจฺจติ ธโชรถสฺส ปญฺญาณนฺติ เอตฺถ วิย. สนฺนิปาตากาโร ปจฺจุปฏฺฐานํ ยสฺสาติ สนฺนิปาตปจฺจุปฏฺฐาโน. เวทนาปจฺจุ ปฏฺฐาโน วา. ธูโมวิย อคฺคิสฺส. เวทนาผลํ ปจฺจุปฏฺฐานํ ยสฺสาติ วิคฺคโห. อฏฺฐสาลินิยํ ปน กสฺมา ปเนตฺถ ผสฺโส ปถมํ วุตฺโต ติปุจฺฉิตฺวา มหาอฏฺฐกถา วาโทตาว ทสฺสิโต. จิตฺตสฺส ปถมาภินิปาตตฺตา. อารมฺมณสฺมิญฺหิ จิตฺตสฺส ปถมาภินิปาโต หุตฺวา ผสฺโส อารมฺมณํ ผุสมาโน อุปฺปชฺชติ. ตสฺมา ปถมํ วุตฺโต. ผสฺเสน ผุสฺสิตฺวา เวทนาย เวทยติ. สญฺญาย สญฺชานาติ. เจตนาย เจตติ. เตน วุตฺตํ ผุฏฺโฐ ภิกฺขเว เวเทติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ, ผุฏฺโฐ เจเตตีติ. อปิ จ อยํ ผสฺโส นาม ยถาปาสาทํ ปตฺวา ถมฺโภ นาม เสสทพฺพ สมฺภารานํ พลวปจฺจโย. เอวเมว สหชาต สมฺปยุตฺต ธมฺมานํ พลว ปจฺจโย โหติ. ตสฺมา ปถมํ วุตฺโตติ. สงฺคหกาเรน ปน อิทํ ปน อการณํ, เอกกฺขณสฺมิญฺหิ อุปฺปนฺน ธมฺมานํ อยํ ปถมํ อุปฺปนฺโน อยํ ปจฺฉาติ อิทํ วตฺตุํ น ลพฺภา. พลวปจฺจยภาเวปิ ผสฺสสฺสการณํ น ทิสฺสตีติ เอวํ ตํ วาทํ ปฏิกฺขิเปตฺวา อิทํ วุตฺตํ เทสนา วาเรเนว ผสฺโส ปถมํ วุตฺโตติ. ตตฺถ ‘‘เทสนาวาเร เนวา’’ติ เทสนกฺกเมเนว, ตโต อญฺญํ การณํ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. เตสุ ปน ทฺวีสุ วาเทสุ มหาอฏฺฐกถา วาโท เอว ยุตฺโต. ยญฺหิ ตตฺถ วุตฺตํ จิตฺตสฺส ปถมาภินิปาโต หุตฺวาติ. ตตฺถ ปถมาภินิปาโตติ อิทํ กิจฺจปฺปธานตฺตา วุตฺตํ. น ปนญฺเญหิ เจตสิเกหิ วินา วิสุํ ปถมํ อุปฺปนฺนตฺตา. ยถา ตํ เย เกจิ ภิกฺขเว ธมฺมา อกุสลา อกุสลภาคิยา อกุสลปกฺขิกา. สพฺเพ เต มโนปุพฺพงฺคมา, มโน เตสํ ธมฺมานํ ปถมํ อุปฺปชฺชตีติ อิมสฺมึ สุตฺเต กิจฺจปฺปธานตฺตา มโน เตสํ ธมฺมานํ ปถมํ อุปฺปชฺชตีติ วุตฺตํ. น ปน สพฺพเจตสิเกหิ วินา วิสุํ ปถมํ อุปฺปนฺนตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. พลวปจฺจย ภาเวปิ ผสฺสสฺสการณํ ทิสฺสติเยว. ผสฺโสเหตุ ผสฺโส ปจฺจโย เวทนากฺขนฺธสฺส ปญฺญา ปนาย. ผสฺโส เหตุ ผสฺโส ปจฺจโย สญฺญากฺขนฺธสฺส ปญฺญา นาย[Pg.83]. ผสฺโส เหตุ ผสฺโส ปจฺจโย สงฺขารกฺขนฺธสฺส ปญฺญาปนายาติ หิ วุตฺตํ. ตสฺมา สพฺเพสํ เจตสิกานํ ธมฺมานํ ผสฺสปฺปธานตฺตา เอว ผสฺส พลวปจฺจยตฺตา เอว จ ผสฺโส ปถมํ วุตฺโตติ ทฏฺฐพฺพํ. เอตฺถ จ จิตฺตํ อารมฺมณ วิชานนฏฺเฐน ผสฺสาทีนํ สพฺพเจตสิก ธมฺมานํ ปุพฺพงฺคมํ โหติ, ปธานํ, เชฏฺฐกํ. ผสฺโส ปน อารมฺมณ สงฺฆฏฺฏนฏฺเฐน สพฺเพสํ เจตสิก ธมฺมานํ ปุพฺพงฺคโม โหติ, ปธาโน, เชฏฺฐโกติ อยํ ทฺวินฺนํ วิเสโสติ. เอตฺถ โจทโก ผุสนํ นาม สปฺปฏิฆรูปานํ เอว กิจฺจนฺติ มญฺญมาโน ‘‘นนุจา’’ติอาทินา โจเทติ. ‘‘นนุจา’’ติ โจเทธีติ ทีเปติ. ‘‘อปฺปฏิฆสภาวา’’ติ เหตุวิเสสนํ. ‘‘กิญฺจี’’ติ กิญฺจิวตฺถุํ. อยํ ปน ผสฺโส. ‘‘จิตฺตสฺส วิการา ปตฺตึ’’ติ จลน กมฺปน ถมฺภน เชคุจฺฉ ภย ตาส ฉมฺภิตตฺตา ทิวเสน วิการา ปชฺชนํ. ‘‘เวทนา วิเสสุปฺปตฺตึ’’ติ สุขเวทนียํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ สุขเวทนา, ทุกฺขเวทนียํ ผสฺสํ ปฏิจฺจ ทุกฺข เวทนาติอาทินา นเยน ผสฺส วิเสสานุรูปํ เวทนา วิเสสุปฺปตฺตึ สาเธติ. เอตฺถ จ ผุสนํ นาม ทุวิธํ รูปปฺผุสนํ, นามปฺผุสน, นฺติ. ตตฺถ รูปปฺผุสนํ นาม โผฏฺฐพฺพ ธาตูนํ กิจฺจํ. นามปฺผุสนํ ทุวิธํ ผสฺสปฺผุสนํ, ญาณปฺผุสน, นฺติ. ตตฺถ ญาณปฺผุสนํ นาม ญาณปฺปฏิเวโธ. อปิ จ ฌานมคฺค ผล นิพฺพานานํ ปฏิลาโภปิ ผุสนนฺติ วุจฺจติ. ผุสนฺติ ธีรา นิพฺพานํ. โยคกฺเขมํ อนุตฺตรํ. ผุสามิ เนกฺขมํ สุขํ. อปุถุชฺชน เสวิตนฺติ-อาทีสุ. อิทํ อุปมา มตฺตํ สิยา, กสฺสจิ มนฺท ปญฺญสฺสาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อิท’’นฺติ เขฬุปฺปาท วจนํ. วิญฺญุสฺส ปน อติปากฏ ผสฺส นิทสฺสเนน อปฺปากฏ ผสฺส วิภาวนํ ยุตฺตเมว. เตนาห ‘‘อติปากฏาย ปนา’’ติอาทึ. ६९. स्पर्श (फस्स) या शब्दाच्या अर्थाच्या संदर्भात: "स्पर्श करतो" (फुसति) म्हणजे आलंबनावर (विषयावर) आघात करतो, संघट्टन करतो. आणि ते संघट्टन द्वेषयुक्त प्रतिघाप्रमाणे आलंबनाला बाधा पोहोचवणारे नसते, तर भुंग्याचे कमळाच्या फुलांमधून पुष्परस (मकरंद) ग्रहण करण्याप्रमाणे असते; केवळ जाणण्यापुरते मर्यादित न राहता आलंबनाच्या रसाच्या प्रकटीकरणासाठी आलंबनानुसार संघट्टन (एकत्र येणे) करणेच होय, हे दर्शवण्यासाठी "फुसनञ्चेत्थ" (आणि येथे स्पर्श करणे म्हणजे...) इत्यादी म्हटले आहे. "आहच्च" म्हणजे आघात करून, प्राप्त करून. "उपहच्च" हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. हा अर्थ कसा स्पष्ट होतो? हे सांगण्यासाठी "यतो" (ज्या कारणाने) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "यतो" म्हणजे ज्या कारणाने. "तदनुभवन्ती" म्हणजे त्या आलंबनाच्या रसाचा अनुभव घेणारी वेदना प्रकट होते. वेदनेचे प्रकटीकरण पाहून आलंबनाचा स्पर्श ज्ञानात स्पष्ट होतो, असा अभिप्राय आहे. तो हा स्पर्श-लक्षण (स्पर्श करण्याचे लक्षण असलेला), संघट्टन-रस (घर्षण करण्याचे कार्य असलेला), संनिपात-पच्चुपट्ठान (एकत्र येणे म्हणून प्रकट होणारा) आणि आपातागतविषय-पदट्ठान (प्रकट झालेल्या विषयाचे जवळचे कारण असलेला) आहे. तेथे "संनिपात" म्हणजे तीन-तीन घटकांचे - द्वार (इंद्रिय), आलंबन (विषय) आणि विज्ञान (चित्त) यांचे संघटन, समागम किंवा एकत्र येणे होय. तसेच म्हटले आहे: "चक्षू आणि रूपाला अनुसरून चक्षुविज्ञान उत्पन्न होते, या तिन्हींचा मेळ म्हणजे स्पर्श होय" इत्यादी. "संघट्टन-रस" म्हणजे आलंबनावर योग्य प्रकारे घर्षण करण्याचे (स्पर्श करण्याचे) कार्य असणे. संघट्टन कार्य असल्यामुळेच तिन्हींचा संनिपात होऊन तो धर्मचिंतन करणाऱ्या ज्ञानाच्या समोर उपस्थित होतो, प्रकाशित होतो, म्हणून तो "संनिपात-पच्चुपट्ठान" आहे. किंवा "पच्चुपट्ठान" म्हणजे प्रज्ञान (चिन्ह) म्हटले जाते, जसे "ध्वज हा रथाचे चिन्ह आहे" यामध्ये. ज्याच्या प्रकटीकरणाचा आकार संनिपात आहे तो "संनिपात-पच्चुपट्ठान" होय. किंवा तो "वेदना-पच्चुपट्ठान" (वेदना हेच प्रकटीकरण असलेला) आहे, जसे अग्नीचा धूर. ज्याचे फळ वेदना म्हणून प्रकट होते, असा याचा विग्रह आहे. परंतु, अट्ठसालिनीमध्ये "येथे स्पर्श आधी का सांगितला आहे?" असा प्रश्न विचारून महाअट्ठकथेचे मत दर्शवले आहे: "चित्ताचा पहिला अभिपात (आलंबनावर पडणे) असल्यामुळे." कारण आलंबनावर चित्ताचा पहिला अभिपात होऊन, स्पर्श आलंबनाला स्पर्श करत उत्पन्न होतो. म्हणून तो आधी सांगितला आहे. स्पर्शाने स्पर्श करून वेदनेद्वारे अनुभवतो, संज्ञेद्वारे ओळखतो, चेतनेद्वारे चेतित करतो (संकल्प करतो). म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे: "भिक्खूहो! स्पर्श झालेलाच अनुभवतो, स्पर्श झालेलाच ओळखतो, स्पर्श झालेलाच चेतित करतो." शिवाय, हा स्पर्श म्हणजे जसे प्रासादाचा (इमारतीचा) खांब हा इतर सर्व बांधकाम साहित्यासाठी प्रबळ प्रत्यय (आधार) असतो, त्याचप्रमाणे हा सहजात आणि संप्रयुक्त धर्मांसाठी प्रबळ प्रत्यय असतो. म्हणून तो आधी सांगितला आहे. परंतु, संग्रहकाराने (अभिधम्मत्थसंगहाच्या कर्त्याने) म्हटले आहे की, "हे काही कारण नाही; कारण एकाच क्षणात उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांमध्ये हा आधी उत्पन्न झाला आणि हा नंतर असे म्हणता येत नाही." "प्रबळ प्रत्यय असण्यातही स्पर्शाचे कारण दिसत नाही," अशा प्रकारे त्या मताचा निषेध करून हे म्हटले आहे की, "केवळ देशनावारानेच (उपदेशाच्या क्रमानेच) स्पर्श आधी सांगितला आहे." तेथे "देशनावारानेच" म्हणजे केवळ उपदेशाच्या क्रमानेच, त्याशिवाय दुसरे कोणतेही कारण नाही, असा अभिप्राय आहे. परंतु, या दोन मतांपैकी महाअट्ठकथेचे मतच योग्य आहे. कारण तेथे जे म्हटले आहे की "चित्ताचा पहिला अभिपात होऊन", तेथे "पहिला अभिपात" हे कार्याच्या प्राधान्यामुळे म्हटले आहे. इतर चैतसिकांशिवाय स्वतंत्रपणे आधी उत्पन्न झाल्यामुळे नाही. जसे की, "भिक्खूहो, जे काही अकुशल धर्म आहेत, अकुशलभागीय आहेत, अकुशलपक्षीय आहेत, ते सर्व मनःपूर्वंगम आहेत; मन त्या धर्मांमध्ये आधी उत्पन्न होते" या सूत्तात कार्याच्या प्राधान्यामुळे "मन त्या धर्मांमध्ये आधी उत्पन्न होते" असे म्हटले आहे. परंतु सर्व चैतसिकांशिवाय स्वतंत्रपणे आधी उत्पन्न झाल्यामुळे नाही, असे समजले पाहिजे. प्रबळ प्रत्यय असण्यातही स्पर्शाचे कारण दिसतेच. कारण असे म्हटले आहे: "स्पर्श हा हेतू आहे, स्पर्श हा प्रत्यय आहे वेदनास्कंधाच्या प्रज्ञप्तीसाठी (प्रकट करण्यासाठी). स्पर्श हा हेतू आहे, स्पर्श हा प्रत्यय आहे संज्ञास्कंधाच्या प्रज्ञप्तीसाठी. स्पर्श हा हेतू आहे, स्पर्श हा प्रत्यय आहे संस्कारस्कंधाच्या प्रज्ञप्तीसाठी." म्हणून, सर्व चैतसिक धर्मांमध्ये स्पर्शाचे प्राधान्य असल्यामुळेच आणि स्पर्श हा प्रबळ प्रत्यय असल्यामुळेच स्पर्श आधी सांगितला आहे, असे समजले पाहिजे. आणि येथे, चित्त हे आलंबन जाणण्याच्या अर्थाने स्पर्शादी सर्व चैतसिक धर्मांचे पूर्वंगम (अग्रगामी), प्रधान आणि ज्येष्ठ असते. परंतु स्पर्श हा आलंबनाच्या संघट्टनाच्या (स्पर्शाच्या) अर्थाने सर्व चैतसिक धर्मांचा पूर्वंगम, प्रधान आणि ज्येष्ठ असतो; हा या दोघांमधील फरक आहे. येथे शंकाकार "स्पर्श करणे हे केवळ सप्रतिघ (भौतिक) रूपांचेच कार्य आहे" असे मानून "ननु च" (पण काय...) इत्यादींद्वारे शंका उपस्थित करतो. "ननु च" याने शंका उपस्थित केली आहे, हे दर्शवतो. "अप्रतिघस्वभाव" (प्रतिघातरहित स्वभाव असलेले) हे हेतूचे विशेषण आहे. "किंचि" म्हणजे कोणतीही वस्तू. परंतु हा स्पर्श "चित्ताची विकारापत्ती" म्हणजे कंपन, थरथरणे, स्तब्ध होणे, घृणा, भय, त्रास, घाबरणे इत्यादींच्या रूपाने विकाराप्रत पोहोचणे होय. "वेदनाविशेषाची उत्पत्ती" म्हणजे सुखवेदनीय स्पर्शाला अनुसरून सुखवेदना, दुःखवेदनीय स्पर्शाला अनुसरून दुःखवेदना इत्यादी पद्धतीने स्पर्शाच्या विशेषतेनुसार विशिष्ट वेदनेची उत्पत्ती सिद्ध करतो. आणि येथे स्पर्श दोन प्रकारचा आहे: रूप-स्पर्श (रूपप्फुसन) आणि नाम-स्पर्श (नामप्फुसन). त्यात रूप-स्पर्श म्हणजे स्प्रष्टव्य धातूंचे (स्पर्शेंद्रियाच्या विषयांचे) कार्य होय. नाम-स्पर्श दोन प्रकारचा आहे: स्पर्श-स्पर्श (फस्सप्फुसन) आणि ज्ञान-स्पर्श (ञाणप्फुसन). त्यात ज्ञान-स्पर्श म्हणजे ज्ञानाचा प्रतिवेध (साक्षात्कार) होय. शिवाय, ध्यान, मार्ग, फल आणि निर्वाण यांची प्राप्ती होण्यालाही "स्पर्श करणे" (प्राप्त करणे) म्हटले जाते. जसे की: "धीर पुरुष अनुत्तर योगक्षेम असलेल्या निर्वाणाचा स्पर्श करतात (प्राप्त करतात)", "मी नैष्क्रम्य सुखाचा स्पर्श करतो (अनुभवतो), जे पृथग्जनांद्वारे सेवन केले जात नाही" इत्यादींमध्ये. "हे केवळ उपमामात्र असावे, एखाद्या मंदबुद्धीच्या व्यक्तीसाठी," असा अभिप्राय आहे. "इदं" (हे) हे लाळ सुटण्याच्या संदर्भातील वचन आहे. परंतु सुज्ञ व्यक्तीसाठी अत्यंत स्पष्ट स्पर्शाच्या उदाहरणाने अस्पष्ट स्पर्शाचे स्पष्टीकरण करणे योग्यच आहे. म्हणूनच "अतिपाकटाय पन" (अत्यंत स्पष्ट असलेल्याने तर...) इत्यादी म्हटले आहे। ๗๐. เวทนาวจนตฺเถ. ‘‘ตํสมงฺคีปุคฺคลานํ วา’’ติ เวทนา สมงฺคีปุคฺคลานํ วา. ‘‘สาตํ วา’’ติ สาธุรสํ วา. ‘‘อสฺสาตํ วา’’ติ อสาธุรสํ วา. ‘‘กึ เวทยตี’’ติ กตมํ เวทยติ. ‘‘สุขมฺปิ เวทยตี’’ติ สุขมฺปิ เวทนํ เวทยติ. อถวา ‘‘กิญฺจเวทยตี’’ติ กถญฺจเวทยติ. ‘‘สุขมฺปิ เวทยตี’’ติ สุขํ หุตฺวาปิ เวทยติ. สุข ภาเวน เวทยตีติ วุตฺตํ โหติ. เอวํ เสสปเทสุปิ. ‘‘กิจฺจนฺตรพฺยาวฏา’’ติ อญฺญกิจฺจพฺยาวฏา. อธิปติ ภาโว อาธิปจฺจํ. อินฺทฺริย กิจฺจํ. ‘‘เอวญฺจ กตฺวา’’ติ ลทฺธคุณวจนํ. ราชารห โภชนํ [Pg.84] ราชคฺคโภชนํ. ‘‘สูทสทิสตา’’ติ รญฺโญภตฺตการสทิสตา. ตตฺถ สูโท รญฺโญภตฺตํ ปจนฺโต รสชานนตฺถํ โถกํ คเหตฺวา ชิวฺหคฺเค ฐเปตฺวา รสํ วีมํสติ. ยถิจฺฉิตํ ปน ภุญฺชิตุํ อนิสฺสโร. ราชา เอว ยถิจฺฉิตํ ภุญฺชิตุํ อิสฺสโร. ราชา วิย เวทนา. สูโท วิย เสสเจตสิก ธมฺมา. ७०. वेदना शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. 'त्यांनी युक्त असलेल्या पुद्गलांचे किंवा' म्हणजे वेदनेने युक्त असलेल्या पुद्गलांचे. 'सातं वा' म्हणजे चांगला रस किंवा. 'असातं वा' म्हणजे वाईट रस किंवा. 'काय अनुभवतो?' म्हणजे कोणत्या वेदनेचा अनुभव घेतो. 'सुखाचाही अनुभव घेतो' म्हणजे सुखकारक वेदनेचाही अनुभव घेतो. किंवा 'किञ्च वेदयति' (कशा प्रकारे अनुभवतो) म्हणजे कशा प्रकारे अनुभव घेतो. 'सुखाचाही अनुभव घेतो' म्हणजे सुख रूप होऊनही अनुभव घेतो. सुख भावाने अनुभव घेतो, असे म्हटले आहे. याचप्रमाणे उर्वरित पदांमध्येही समजावे. 'इतर कार्यात व्यस्त' म्हणजे इतर कामांमध्ये गुंतलेले. अधिपतीचा भाव म्हणजे आधिपत्य (प्रभुत्व). इंद्रियाचे कार्य. 'आणि असे करून' हे प्राप्त झालेल्या गुणाचे वचन आहे. राजासाठी योग्य असलेले भोजन म्हणजे 'राजग्गभोजन' (उत्कृष्ट भोजन). 'स्वयंपाक्यासारखे असणे' म्हणजे राजाच्या आचाऱ्यासारखे असणे. त्यामध्ये, स्वयंपाकी राजाचे अन्न शिजवताना चव जाणून घेण्यासाठी थोडेसे अन्न घेऊन जिभेच्या टोकावर ठेवून चवीची परीक्षा करतो. परंतु इच्छेनुसार भोजन करण्यास तो असमर्थ असतो. राजाच केवळ इच्छेनुसार भोजन करण्यास समर्थ असतो. राजाप्रमाणे वेदना आहे. स्वयंपाक्याप्रमाणे उर्वरित चेतसिक धर्म आहेत. ๗๑. สญฺญาวจนตฺเถ. ‘‘สญฺชานาตี’’ติ สุฏฺฐุ ชานาติ. สุฏฺฐุชานนญฺจ นาม น วิญฺญาณสฺส วิย วิวิธชานนํ โหติ. น จ ปญฺญาย วิย ยถาภูตชานนํ โหติ. อถ โข ภูตํ วา โหตุ, อภูตํ วา. ยํ ยํ ฉ หิ วิญฺญาเณหิ วิชานาติ, ปญฺญาย วา ปชานาติ. ตสฺส ตสฺส ปจฺฉา อปฺปมุสฺสกรณ เมวาติ วุตฺตํ ‘‘ปุนชานนตฺถํ สญฺญาณํ กโรตี’’ติ. ตตฺถ ‘‘สญฺญาณ’’นฺติ นิมิตฺต กรณํ. ภวนฺตรํ ปตฺวาปิ อปฺปมุฏฺฐภาวํ สาเธติ โอปปาติก ปุคฺคลานนฺติ อธิปฺปาโย. เตหิ ปุริมํ อตฺตโน ภวํ ชานนฺติ. คพฺภเสยฺยกาปิ เกจิ ปุริมํ ภวํ ชานนฺติ, เยชาติสฺสร ปุคฺคลาติ วุจฺจนฺติ. ตตฺถ ‘‘อปฺปมุฏฺฐภาว’’นฺติ อนฏฺฐภาวํ. มิจฺฉาภินิเวส สญฺญา นาม อนิจฺเจ นิจฺจนฺติอาทิปฺปวตฺตา สญฺญา. ‘‘โพเธตุ’’นฺติ พุชฺฌาเปตุํ. ‘‘ทารุตจฺฉกสทิสาติ จ วุตฺตา’’ติ ทารุตจฺฉโก นาม กฏฺฐวฑฺฒกี. โส กฏฺฐกฺขนฺเธสุ นิมิตฺตการีโหติ. สุตจฺฉิตฉินฺทิเตสุ กฏฺเฐสุ นิมิตฺตานิ กตฺวา ฐเปติ. ปจฺฉาตานิ โอโลเกตฺวา กฏฺฐานิ กมฺเม อุปเนติ. ‘‘หตฺถิ ทสฺสก อนฺธสทิสา’’ติ เอตฺถ เอโก กิร ราชา เกฬิปฺปสุโต โหติ. โส ชจฺจนฺธานํฐาเน เอกํ หตฺถึ อาเนตฺวาฐเปนฺโต ชจฺจนฺเธ อาห ชานาถ โภ ตุมฺเห หตฺถินฺติ. เต หตฺถึ ชานิสฺสามาติ ปรามสิตฺวา อตฺตโน ปรามสิตํ ตํ ตํ องฺคมวหตฺถีติ อภินิวิสนฺติ. ทฬฺหํ สลฺลกฺเขนฺติ. ปุน ราชา เต ปุจฺฉิ กีทิโส โภ หตฺถีติ. เต รญฺโญ หตฺถิสณฺฐานํ อาจิกฺขนฺตา วิวาทํ อาปชฺชนฺติ. อาจิกฺขนเมว รญฺโญหตฺถิทสฺสนนฺติ กตฺวา เต หตฺถิทสฺสก อนฺธาติ วุจฺจนฺติ. ‘‘อุปฏฺฐิตวิสยคฺคหเณ’’ติ รตฺติยํ อนฺธกาเร รชฺชุกฺขณฺฑํ ปสฺสนฺตสฺส สปฺปสณฺฐานํ อุปฏฺฐาติ. โส อุปฏฺฐิตํ สณฺฐานมตฺตํ สปฺโปติ คณฺหาติ. เอวํ อุปฏฺฐิตวิสยคฺคหณํ โหติ. มิคโปตกานญฺจ อรญฺเญเขตฺตมชฺเฌปุริสสณฺฐานํ ติณ รูปํ ปสฺสนฺตานํ ปุริสสณฺฐา นํ [Pg.85] อุปฏฺฐาติ. เต อุปฏฺฐิตํ สณฺฐานมตฺตํ ปุริโสติ คณฺหิตฺวา โส อมฺเห ปหเรยฺยาติ ปลายนฺติ. วุตฺตา อฏฺฐสาลินิยํ. ७१. संज्ञा शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. 'संजानति' (संज्ञा करतो/ओळखतो) म्हणजे चांगल्या प्रकारे जाणतो. आणि चांगल्या प्रकारे जाणणे म्हणजे विज्ञानाप्रमाणे विविध प्रकारे जाणणे नव्हे. आणि प्रज्ञेप्रमाणे यथाभूत (जसे आहे तसे) जाणणेही नव्हे. तर मग ते सत्य असो वा असत्य. सहा विज्ञानांद्वारे जे जे जाणले जाते किंवा प्रज्ञेद्वारे जे विशेष रूपाने जाणले जाते, त्याचे नंतर विस्मरण न होऊ देणे, याच उद्देशाने 'पुन्हा ओळखण्यासाठी चिन्ह (संज्ञा) करतो' असे म्हटले आहे. तेथे 'संज्ञाण' म्हणजे निमित्त (चिन्ह) तयार करणे. दुसऱ्या जन्मात गेल्यावरही विस्मरण न होण्याचा भाव औपपातिक पुद्गलांच्या बाबतीत सिद्ध होतो, असा अभिप्राय आहे. त्यांच्याद्वारे ते स्वतःचा पूर्व जन्म जाणतात. गर्भाशयातून जन्म घेणारे (गर्भशैयागत) काही लोकही पूर्व जन्म जाणतात, ज्यांना 'जातिस्सर' (जातिस्मरण असणारे) पुद्गल म्हटले जाते. तेथे 'अप्पमुट्ठभाव' (विस्मरण न होणे) म्हणजे नष्ट न होण्याचा भाव. मिथ्याभिनिवेश संज्ञा म्हणजे अनित्याला नित्य समजणे इत्यादी प्रकारे प्रवृत्त झालेली संज्ञा होय. 'बोधेतुं' म्हणजे समजवण्यासाठी (जागृत करण्यासाठी). 'लाकूड तासणाऱ्यासारखी (सुतारासारखी) म्हटली आहे' - दारुतच्छक म्हणजे लाकूड काम करणारा सुतार. तो लाकडाच्या ओंडक्यांवर चिन्हे करतो. चांगल्या प्रकारे तासलेल्या आणि कापलेल्या लाकडांवर तो चिन्हे करून ठेवतो. नंतर ती चिन्हे पाहून तो लाकडांचा कामात उपयोग करतो. 'हत्ती पाहणाऱ्या अंधांसारखे' - येथे एक राजा क्रीडाप्रिय होता असे म्हणतात. त्याने जन्मांधांच्या ठिकाणी एक हत्ती आणून उभा केला आणि जन्मांधांना म्हटले, 'हे गृहस्थांनो, तुम्ही हत्तीला ओळखा.' त्यांनी 'आम्ही हत्तीला ओळखू' असे म्हणून हत्तीला स्पर्श केला आणि स्वतः स्पर्श केलेल्या त्या त्या अवयवालाच 'हाच हत्ती आहे' असा आग्रह धरला. त्यांनी त्याचे घट्ट आकलन केले. पुन्हा राजाने त्यांना विचारले, 'हे गृहस्थांनो, हत्ती कसा आहे?' ते राजाला हत्तीच्या आकाराचे वर्णन करताना आपसात वाद घालू लागले. त्यांचे ते वर्णन करणे म्हणजेच राजासाठी हत्ती पाहणे ठरले, म्हणून त्यांना 'हत्ती पाहणारे अंध' असे म्हटले जाते. 'उपस्थित विषयाचे ग्रहण करणे' म्हणजे रात्रीच्या अंधारात दोरीचा तुकडा पाहणाऱ्याला सापाचा आकार भासतो. तो त्या भासलेल्या केवळ आकारालाच 'साप' म्हणून ग्रहण करतो. अशा प्रकारे उपस्थित विषयाचे ग्रहण होते. आणि जंगलात शेताच्या मध्यभागी माणसाच्या आकाराचे गवताचे पुतळे (बुजगावणे) पाहणाऱ्या हरणाच्या पाडसांना माणसाचा आकार भासतो. ते त्या भासलेल्या केवळ आकाराला 'माणूस' समजून 'तो आपल्याला मारेल' या भीतीने पळून जातात. हे अट्ठसालिनीमध्ये सांगितले आहे. ๗๒. เจตนาวจนตฺเถ. เจเตตีติ เจตนา. เจตนญฺเจตฺถ อภิสนฺธานํ วา วุจฺจติ ปกปฺปนํ วา อายูหนํ วาติ เอวํ ติธา อตฺถวิกปฺปํ ทสฺเสตุํ ‘‘สมฺปยุตฺต ธมฺเม’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘อภิสนฺทหตี’’ติ อภิมุขํ สนฺทหติ, สํโยคํ กโรติ. เตนาห ‘‘ปุนปฺปุนํ ฆเฏตี’’ติ. ‘‘ฆเฏตี’’ติ สมฺพนฺธติ. ‘‘ปกปฺเปติ วาเต’’ติ อถวา เต สมฺปยุตฺต ธมฺเม ปการโต กปฺเปติ, สชฺเชติ. เตนาห ‘‘สํวิทหตี’’ติ. ‘‘สํวิทหตี’’ติ ตฺวํ ผุสนกิจฺจํ กโรหิ, ตฺวํ เวทยิต กิจฺจํ กโรหิ, ตฺวํ สญฺชานนกิจฺจํ กโรหีติอาทินา วทมานา วิย สํวิทหติ. ‘‘อายูหติวาเต’’ติ อถวา เตสมฺปยุตฺต ธมฺเม ภุโส พฺยูหยติ, ราสึ กโรติ. เตนาห ‘‘อารมฺมเณ สมฺปิณฺเฑตี’’ติ. ‘‘สโมสรนฺเต’’ติ เอกโต โอสรนฺเต. สงฺคมนฺเต. ‘‘สา’’ติ เจตนา. ‘‘ตายา’’ติ เจตนาย. ‘‘ตสฺมึ’’ติ รูปาทิเกวา อารมฺมเณ. ปุญฺญาปุญฺญ กิจฺเจวา. ปวตฺตมานาย สติยา. เชฏฺฐสิสฺโส นาม พหูสุ สิสฺเสสุ เชฏฺฐภูโต สิสฺโส. ตสฺมึ สชฺฌายนฺเต เสสา สพฺเพ สชฺฌายนฺติเยว. เตน โส อุภยกิจฺจ สาธโก โหติ. เอวํ มหาวฑฺฒกีปิ. ७२. चेतना शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. जी चेतित करते (प्रेरित करते) ती चेतना होय. आणि येथे चेतना म्हणजे अभिसंधान (एकत्र जोडणे), प्रकल्पन (योजना करणे) किंवा आयूहन (प्रयत्न/संचय करणे) असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे तीन प्रकारचा अर्थभेद दर्शवण्यासाठी 'संप्रयुक्त धर्म' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'अभिसंदहति' म्हणजे सन्मुख जोडते, संयोग करते. म्हणूनच म्हटले आहे 'पुन्हा पुन्हा जोडते'. 'घटेति' म्हणजे संबंध जोडते. 'किंवा त्यांची योजना करते' म्हणजे किंवा त्या संप्रयुक्त धर्मांची विविध प्रकारे कल्पना करते, त्यांना सजवते. म्हणूनच म्हटले आहे 'संविधान (व्यवस्थापन) करते'. 'संविधान करते' म्हणजे 'तू स्पर्शाचे कार्य कर, तू वेदनेचे कार्य कर, तू संज्ञेचे कार्य कर' इत्यादी बोलल्याप्रमाणे व्यवस्था करते. 'किंवा आयूहन करते' म्हणजे किंवा त्या संप्रयुक्त धर्मांना अत्यंत संघटित करते, त्यांचा समूह करते. म्हणूनच म्हटले आहे 'आलंबनामध्ये एकत्रित करते'. 'समोसरन्ते' म्हणजे एकत्र येणारे, एकत्र मिळणारे. 'सा' म्हणजे चेतना. 'ताया' म्हणजे चेतनेद्वारे. 'तस्मिं' म्हणजे रूपादी आलंबनामध्ये किंवा पुण्यापुण्याच्या कार्यात प्रवृत्त होत असताना. ज्येष्ठ शिष्य म्हणजे अनेक शिष्यांमध्ये जो सर्वात मोठा (प्रमुख) शिष्य असतो तो. त्याने पाठांतर केले असता इतर सर्वजण पाठांतर करतातच. त्यामुळे तो दोन्ही कार्ये साधणारा ठरतो. याचप्रमाणे मुख्य सुतार देखील असतो. ๗๓. เอกคฺคตาวจนตฺเถ. เอกตฺตารมฺมณํ นาม เอการมฺมณสฺสปิ พหูสุ สภาเวสุ เอกสภาวสงฺขาตํ อารมฺมณํ. ‘‘ตสฺมึ’’ จิตฺตสฺมึ. ‘‘นิวาเต’’ติ วาตรหิเต ปเทเส. ‘‘ทีปจฺจีนํ’’ติ ทีปชาลานํ. ७३. एकाग्रता शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. एकाग्र आलंबन म्हणजे एकाच आलंबनाच्या अनेक स्वभावांपैकी एका स्वभावाने युक्त असलेले आलंबन होय. 'तस्मिं' म्हणजे चित्तामध्ये. 'निवाते' म्हणजे वारा नसलेल्या ठिकाणी (शांत ठिकाणी). 'दीपच्चीनं' म्हणजे दिव्याच्या ज्योतींचे. ๗๔. ชีวิตินฺทฺริยวจนตฺเถ. ‘‘อิสฺสรภาโว วุจฺจติ’’ ภาวปฺปธาน นเยนาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อภิภวิตฺวา’’ติ ชีวน กิจฺเจ อตฺตโน วสํ วตฺตาเปตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. จิตฺต สนฺตานํ ชีวนฺตํ หุตฺวาติ สมฺพนฺโธ. ७४. जीवितेन्द्रिय शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. 'ईश्वरभाव (प्रभुत्व) म्हटले जाते' हे भावप्रधान पद्धतीने सांगितले आहे, असा अभिप्राय आहे. 'अभिभूत करून' म्हणजे जगण्याच्या कार्यात स्वतःचे नियंत्रण प्रस्थापित करून, असे म्हटले आहे. चित्तसंतती जिवंत होऊन, असा संबंध आहे. ๗๕. มนสีการวจนตฺเถ. สมาสมชฺเฌ สการาคโม. กรธาตุโยเค อีการาคโม จ ทฏฺฐพฺโพ. อลุตฺต สตฺตมี ปทนฺถิ เกจิ. เอวํ สติ อีทีฆตฺตํ นสิชฺฌติ. ‘‘อสุญฺญํ’’ติ อริตฺตํ. ‘‘ปฏิปาเทตี’’ติ [Pg.86] ปฏิปชฺชนํ กิจฺจสาธนํ การาเปติ. อตฺถโต นิโยเชติ นามาติ อาห ‘‘โยเชตี’’ติ. ‘‘อิทเมว ทฺวยํ’’ติ อาวชฺชน ทฺวยํ. ‘‘ตํ’’ติ ตํ ทฺวยํ. อุปตฺถมฺภิตํ หุตฺวา อารมฺมเณ นินฺนํ กโรตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘โยนิโส’’ติ อุปาเยน หิตสุข มคฺเคน. ‘‘อโยนิโส’’ติ อนุปาเยน อหิต อสุข มคฺเคน. ‘‘สมุทาจิณฺณนินฺนนิยามิตาทีหี’’ติ เอตฺถ สมุทาจิณฺณํ นาม อาจิณฺณ กมฺมวเสน สุฏฺฐุ ปุนปฺปุนํ อาจริตํ. นินฺนํ นาม อิทํ นาม ปสฺสามิ, อิทํ นาม กริสฺสามีติ ปุพฺเพ เอว อชฺฌาสเยน นินฺนํ. นิยามิตํ นาม อิทํ นาม กตฺตพฺพํ, อิทํ นาม น กตฺตพฺพํ, กตฺตพฺพํ กโรมิ, อกตฺตพฺพํ นกโรมีติ เอวํ นิยามิตํ. ‘‘อสติ การณ วิเสเส’’ติ ภวงฺค จิตฺตํ วีถิจิตฺตุปฺปตฺติยา อสติ, วีถิจิตฺตานิ จ กายจิตฺตานํ อกลฺลาทิเกวา อธิมตฺตสฺส อารมฺมณนฺตรสฺส อุปฏฺฐาเนวา อสติ. ‘‘สาธารณา’’ติ เอตฺถ สํสทฺเท พินฺทุ โลโป, ทีฆตฺตญฺจาติ อาห ‘‘สมํ ธาเรนฺตีติ สาธารณา’’ติ. ७५. 'मनसीकार' या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. समासाच्या मध्ये 'स' काराचा आगम होतो. 'कर' धातूच्या योगात 'ई' काराचा आगम देखील पाहावा. काही जण याला 'अलुत्त सप्तमी' (लोप न पावलेली सप्तमी विभक्ती) पद म्हणतात. असे असताना 'ई' चे दीर्घत्व सिद्ध होत नाही. "असुञ्ञं" (अशून्य) म्हणजे अरिक्त (रिकामे नसलेले). "पटिपादेति" (प्रतिपादन करतो) म्हणजे प्रतिपत्ती (आचरण) किंवा कर्तव्याची पूर्तता करवून घेणे. अर्थाच्या दृष्टीने नियुक्त करतो, म्हणून "योजेति" (योजित करतो) असे म्हटले आहे. "इदमेव द्वयं" (हेच दोन) म्हणजे आवर्जन द्वय (पंचद्वारावर्जन आणि मनोद्वारावर्जन). "तं" (त्याला) म्हणजे ते द्वय. उपस्तंभित (समर्थित) होऊन आलंबनाकडे (विषयाकडे) प्रवृत्त करतो, असा संबंध आहे. "योनिसो" (योग्य रीतीने) म्हणजे उपायाने, हित आणि सुखाच्या मार्गाने. "अयोनिसो" (अयोग्य रीतीने) म्हणजे अनुपायाने, अहित आणि असुखाच्या मार्गाने. "समुदाचिण्णनिन्ननियामितादीहि" यामध्ये "समुदाचिण्ण" म्हणजे आचरलेल्या कर्माच्या प्रभावाने वारंवार चांगल्या प्रकारे आचरलेले. "निन्न" (प्रवृत्त) म्हणजे "मी हे पाहीन, मी हे करीन" अशा पूर्व-अभिप्रायानेच (अध्यवसायाने) प्रवृत्त असणे. "नियामित" (नियमित) म्हणजे "हे करावे, हे करू नये; जे कर्तव्य आहे ते मी करतो, जे अकर्तव्य आहे ते मी करत नाही" अशा प्रकारे नियमन केलेले. "असतिका रणविसेसे" (विशेष कारण नसताना) म्हणजे वीथिचित्ताच्या उत्पत्तीसाठी भवंग चित्त नसताना, आणि वीथिचित्ते ही कायचित्ताच्या अस्वस्थतेत किंवा तीव्र अशा इतर आलंबनाच्या उपस्थितीत नसताना. "साधारणा" यामध्ये 'सं' शब्दातील अनुस्वाराचा (बिंदूचा) लोप आणि दीर्घत्व होते, म्हणून "जे समान रीतीने धारण करतात ते साधारण" असे म्हटले आहे. ๗๖. วิตกฺกวจนตฺเถ. ‘‘ตถา ตถา สงฺกปฺเปตฺวา’’ติ กามสงฺกปฺปาทีนํ เนกฺขมฺมสงฺกปฺปาทีนญฺจวเสน เตน เตน ปกาเรน สุฏฺฐุ จินฺเตตฺวา. ‘‘ตํ’’ติ อารมฺมณํ. ‘‘เต’’ติ สมฺปยุตฺต ธมฺเม. ‘‘อวิตกฺกมฺปิ จิตฺตํ’’ติ ปญฺจวิญฺญาณ จิตฺตญฺจ ทุตียา ทิชฺฌาน จิตฺตญฺจ. ‘‘อปิจา’’ติ กิญฺจิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ อตฺโถ. ‘‘ทุตียชฺฌานาทีนิ จา’’ติ ทุตียชฺฌาน จิตฺตาทีนิ จ. ‘‘อุปจาร ภาวนา วเสนา’’ติ สมุทาจิณฺณ วสิภูตาย อุปจาร ภาวนาย วเสน. ‘‘กึ วา เอตายยุตฺติยา’’ติ สวิตกฺก จิตฺตสนฺตาเนติอาทิกาย ยุตฺติยา กึ ปโยชนํ อตฺถีติ อตฺโถ. กิญฺจิ ปโยชนํ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. อารมฺมณํ อาโรหติเยว อารมฺมเณน อวินาภาววุตฺติกตฺตา. ‘‘ตํ’’ติ จิตฺตํ. นิยามโก นาม นาวํ อิจฺฉิต ทิสาเทสนิโยชโก. ‘‘อกุสลํ ปตฺวา’’ติ วุตฺตํ. กุสลํ ปตฺวา ปน กถํติ. กุสลํ ปตฺวาปิ ปติรูปเทสาวาสาทิวเสน สมุทา จิณฺณ นินฺนาทิวเสน จ ลทฺธ ปจฺจเย สติ จิตฺตมฺปิ สทฺธาสติ อาทโยปิ อารมฺมณ รูหเน ถามคตา เอว. อลทฺธ ปจฺจเย ปน สติ อกุสล ภาเว ฐตฺวา ถามคตํ โหติ. ‘‘มนสิการ วีริย สตีนํ’’ติ ภาวนา พลปตฺตา นนฺติ อธิปฺปาโย[Pg.87]. เอวํ ปน สติ, วิตกฺกสฺส โอกาโส นตฺถีติ. อตฺถิ. สงฺกปฺปน กิจฺจ วิเสสตฺตา. ตญฺหิ กิจฺจํ อญฺเญสํ อสาธารณํ, วิตกฺกสฺเสว กิจฺจนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘วิตกฺโกปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘สารมฺมณ สภาวา’’ติ เหตุ วิเสสนเมตํ. ‘‘ตถา วุตฺโต’’ติ วิตกฺโกติ วุตฺโต. ७६. 'वितर्क' या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. "तथा तथा सङ्कप्पेत्वा" (त्या त्या प्रकारे संकल्प करून) म्हणजे कामसंकल्प इत्यादी आणि नैष्क्रम्यसंकल्प इत्यादींच्या प्रभावाने त्या त्या प्रकारे चांगल्या रीतीने विचार करून. "तं" (त्याला) म्हणजे आलंबन (विषय). "ते" (ते) म्हणजे संप्रयुक्त धर्म. "अवितक्कम्पि चित्तं" (वितर्करहित चित्त देखील) म्हणजे पंचविज्ञान चित्त आणि द्वितीय ध्यान चित्त. "अपिचा" (शिवाय) म्हणजे काहीतरी सांगण्यासारखे आहे असा अर्थ आहे. "दुतीयज्झानादीनि चा" (द्वितीय ध्यान इत्यादी देखील) म्हणजे द्वितीय ध्यान चित्त इत्यादी. "उपचारभावना वसेना" (उपचार भावनेच्या प्रभावाने) म्हणजे अभ्यस्त आणि वशीभूत झालेल्या उपचार भावनेच्या प्रभावाने. "किं वा एताय युत्तिया" (किंवा या युक्तीने काय?) म्हणजे सवितर्क चित्तसंतानातील युक्तीने काय प्रयोजन आहे असा अर्थ आहे. काहीच प्रयोजन नाही असा अभिप्राय आहे. आलंबनावर आरूढ होतेच, कारण आलंबनाशिवाय त्याचे अस्तित्व असू शकत नाही. "तं" म्हणजे चित्त. नियामक म्हणजे नौकेला इच्छित दिशेकडे नेणारा (नाविक). "अकुशल प्राप्त करून" असे म्हटले आहे. मग कुशल प्राप्त करून कसे? कुशल प्राप्त करून देखील, प्रतिरूपदेशवास (योग्य ठिकाणी निवास) इत्यादींमुळे आणि समुदाचिर्ण (अभ्यस्त) प्रवृत्ती इत्यादींमुळे प्रत्यय (कारण) प्राप्त झाल्यावर, चित्त आणि श्रद्धा, स्मृती इत्यादी देखील आलंबनावर आरूढ होण्यात सामर्थ्यशाली होतात. परंतु प्रत्यय प्राप्त न झाल्यास, अकुशल भावात राहून ते सामर्थ्यशाली होते. "मनसिकार वीरिय सतीनां" (मनस्कार, वीर्य आणि स्मृतींचे) म्हणजे भावनेचे बल प्राप्त झालेल्यांचे, असा अभिप्राय आहे. असे असताना, वितर्काला वाव (संधी) नाही का? आहे. संकल्प करण्याच्या विशेष कार्यामुळे. कारण ते कार्य इतरांसाठी असाधारण आहे, ते केवळ वितर्काचेच कार्य आहे, हे दर्शवण्यासाठी "वितक्कोपना" इत्यादी म्हटले आहे. "सारम्मण स्वभावा" (आलंबनासह असणारा स्वभाव) हे हेतूचे विशेषण आहे. "तथा वुत्तो" (तसे म्हटले आहे) म्हणजे वितर्क असे म्हटले आहे. ๗๗. วิจารวจนตฺเถ. ‘‘วิจรตี’’ติ เอกเมกสฺมึ เอว อารมฺมเณ วิวิเธน จรติ, ปวตฺตติ. สภาวากาโร นาม นีลปีตาทิโก อคมฺภีโร อารมฺมณ สภาโว จ อารมฺมณสฺส นานา ปวตฺตากาโร จ. ‘‘อนุมชฺชนวเสนา’’ติ ปุนปฺปุนํ มชฺชนวเสน โสธนวเสน. วิตกฺโก โอฬาริโก จ โหตีติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘โอฬาริโก’’ติ วิจารโต โอฬาริโก. เอวํ เสสปเทสุ. ‘‘ฆณฺฑาภิฆาโต วิยา’’ติ ฆณฺฑาภิฆาเตน ปถมุปฺปนฺนสทฺโท วิยาติ วทนฺติ. ตถาหิ วิจาโร ฆณฺฑสฺส อนุรโว วิย วุตฺโตติ. ทณฺฑเกน ฆณฺฑสฺส อภิฆาต กิริยา วา ฆณฺฑาภิฆาโต. ตถาหิ อารมฺมเณ เจตโส ปถมาภิ นิปาโต วิตกฺโกติ จ, อาหนน ปริยาหนน รโสติ จ วุตฺตํ. ‘‘ฆณฺฑานุรโว วิยา’’ติ ฆณฺฑสฺส อนุรวสทฺโท วิย. ७७. 'विचार' या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. "विचरति" (विचार करतो) म्हणजे एकाच आलंबनावर विविध प्रकारे फिरणे, प्रवृत्त होणे. स्वभावाकार म्हणजे नील, पीत इत्यादी अगंभीर आलंबन स्वभाव आणि आलंबनाचे विविध प्रवृत्तीचे प्रकार. "अनुमज्जनवसेना" (अनुमर्दन करण्याच्या प्रभावाने) म्हणजे वारंवार घासण्याच्या (शोधण्याच्या) किंवा शुद्ध करण्याच्या प्रभावाने. वितर्क हा ओळारिक (स्थूल) असतो इत्यादी प्रकारे योजना करावी. "ओळारिको" (स्थूल) म्हणजे विचारापेक्षा स्थूल. उर्वरित पदांमध्येही असेच समजावे. "घण्डाभिघातो विया" (घंटेवरील आघाताप्रमाणे) म्हणजे घंटेवर आघात केल्याने प्रथम उत्पन्न होणाऱ्या शब्दाप्रमाणे, असे म्हणतात. तसेच, विचार हा घंटेच्या अनुनादाप्रमाणे (झंकाराप्रमाणे) म्हटला आहे. काठीने घंटेवर आघात करण्याची क्रिया म्हणजे 'घंटाभिघात' होय. तसेच, आलंबनावर चित्ताचा पहिला आघात म्हणजे वितर्क होय, आणि तो आघात करणे व पुन्हा पुन्हा आघात करणे हा त्याचा रस (कार्य) आहे, असे म्हटले आहे. "घण्डानुरवो विया" (घंटेच्या अनुनादाप्रमाणे) म्हणजे घंटेच्या अनुनादाच्या (झंकाराच्या) शब्दाप्रमाणे. ๗๘. อธิโมกฺขวจนตฺเถ. ‘‘สํสปฺปนํ’’ติ อนวตฺถานํ. ‘‘ปกฺขโต มุจฺจนวเสนา’’ติ เอวํ นุ โขติ เอโก ปกฺโข, โนนุ โขติ ทุตีโย ปกฺโข. ตาทิสมฺหา ปกฺขโต มุจฺจนวเสน. ७८. 'अधिमोक्ष' (निश्चय) या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. "संसप्पनं" (संशय) म्हणजे अनवस्थान (अस्थिरता). "पक्खतो मुच्चनवसेना" (पक्षातून मुक्त होण्याच्या प्रभावाने) म्हणजे "असे आहे काय?" हा एक पक्ष, आणि "असे नाही काय?" हा दुसरा पक्ष; अशा पक्षातून (द्विधा मनःस्थितीतून) मुक्त होण्याच्या प्रभावाने. ๗๙. วีริยวจนตฺเถ. ‘‘วีรสฺสา’’ติ วิสฺสฏฺฐสฺส. โส จ กายวจีมโน กมฺเมสุ ปจฺจุ ปฏฺฐิเตสุ สีตุณฺหาทิ ทุกฺข ภยโต อลีน วุตฺติวเสน ปวตฺโตติ อาห ‘‘กมฺมสูรสฺสา’’ติ. เอเตน อโนตฺตปฺปึ นิวตฺเตติ. อโนตฺตวฺวีหิ ปาปสูโร, อยํ กมฺม สูโรติ. ‘‘มหนฺตํ ปิกมฺม’’นฺติ กุสีตสฺส มหนฺตนฺติ มญฺญิตํ กมฺมํ. เอวํ เสเสสุ. ‘‘อปฺปกโต คณฺหาตี’’ติ อปฺปกภาเวน คณฺหาติ. อปฺปกเมวิทนฺติ มญฺญตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อตฺต กิลมถํ’’ติ กายจิตฺตกฺเขทํ. ‘‘ตํ’’ติ วีริยํ. ‘‘ตถาปวตฺติยา’’ติ กมฺมสูรภาเวน ปวตฺติยา. ‘‘เหตุเจ วา’’ติ เอเตน ภาวสทฺทสฺส อตฺถํ วทติ. ‘‘กายจิตฺต กิริยาภูตํ’’ติ เอเตน กมฺมสทฺทสฺส อตฺถํ. ‘‘วิธินา’’ติ [Pg.88] ตสฺส ปวตฺติยา ปุพฺพาภิสงฺขาร วิธาเนน. ตเมว วิธานํ กมฺเมสุ เนตพฺพตฺตา นโยติ จ, อุเปตพฺพตฺตา อุปาโยติ จ วุจฺจตีติ อาห ‘‘นเยน อุปาเยนา’’ติ. ตเมว วิธานํ ทสฺเสติ ‘‘วีริยวโต’’ติอาทินา. ‘‘อีรนฺตี’’ติ เอรยนฺติ. ‘‘กิจฺจ สมฺปตฺติยา’’ติ อารมฺมณ วิชานน ผุสนาทิ กิจฺจ สมฺปตฺติ อตฺถาย. พฺยาวฏานิ กายจิตฺตานิ เยสนฺติ วิคฺคโห. ‘‘พฺยาวฏานี’’ติ อุสฺสาหิตานิ. ‘‘ถูณูปตฺถมฺภน สทิสํ’’ติ ชิณฺณสฺส เคหสฺส อปตนตฺถาย สารตฺถมฺเภน อุปตฺถมฺภนสทิสํ. อุปตฺถมฺภกตฺถมฺภสทิสนฺติปิ วทนฺติ. ‘‘สพฺพ สมฺปตฺตีนํ มูลํ’’ติ สพฺพาสํ โลกิย สมฺปตฺตีนํ โลกุตฺตร สมฺปตฺตี นญฺจ มูลํ. กสฺมา, ปุญฺญกมฺม สมฺปตฺติยา จ ปารมิ ปุญฺญสมฺปตฺติยา จ ปติฏฺฐานตฺตา. สติหิ ปุญฺญกมฺมสมฺปตฺติยา สพฺพา โลกิย สมฺปตฺติ สิชฺฌติ. สติ จ ปารมิ ปุญฺญ สมฺปตฺติยา สพฺพาโลกุตฺตร สมฺปตฺติ สิชฺฌตีติ. เอเตน หีน วีริโย นาม สพฺพ สมฺปตฺติโต ปริพาหิโยติ ทีเปติ. ७९. वीर्य (वीरिय) या शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'वीरस्स' म्हणजे विसृष्ट (उत्साही) व्यक्तीचे. आणि तो (वीर) जेव्हा काय, वाचा आणि मनाची कर्मे उपस्थित होतात, तेव्हा थंडी, उष्णता इत्यादी दुःखांच्या भयाने आळशी न होता (अलीन वृत्तीने) प्रवृत्त होतो, म्हणून 'कर्मशूर' (कम्मसूर) असे म्हटले आहे. याद्वारे 'अनोट्टप्प' (पापभयाचा अभाव) दूर केला जातो. कारण अनोट्टप्पी (पापभय नसलेला) हा 'पापशूर' असतो, तर हा (वीर्यवान) 'कर्मशूर' असतो. 'महान कार्य देखील' (महन्तं पि कम्मं) म्हणजे आळशी माणसाला जे मोठे वाटते ते कार्य. उर्वरित शब्दांमध्येही असेच समजावे. 'अल्प समजून ग्रहण करतो' (अप्पकतो गण्हाति) म्हणजे अल्प भावाने ग्रहण करतो. हे अगदी थोडेच आहे असे मानतो, असा याचा अर्थ आहे. 'अत्तकिलमथ' म्हणजे काय आणि चित्ताचा खेद (शारीरिक व मानसिक थकवा). 'ते' (तं) म्हणजे वीर्य. 'तशा प्रवृत्तीने' (तथापवत्तिया) म्हणजे कर्मशूर भावाने प्रवृत्त होण्याने. 'हेतु किंवा' (हेतु चे वा) याद्वारे 'भाव' शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला आहे. 'काय आणि चित्ताची क्रिया असलेले' याद्वारे 'कर्म' शब्दाचा अर्थ सांगितला आहे. 'विधीने' (विधिना) म्हणजे त्याच्या प्रवृत्तीच्या पूर्व-अभिसंस्काराच्या विधानाने (नियोजनाने). त्याच विधानाला कर्मांमध्ये नेले जाण्यामुळे 'नय' (मार्ग) आणि प्राप्त केले जाण्यामुळे 'उपाय' असे म्हटले जाते, म्हणून 'नयाने आणि उपायाने' (नयेन उपायेन) असे म्हटले आहे. तेच विधान 'वीर्यवान' (वीरियवतो) इत्यादी शब्दांनी दर्शवले आहे. 'ईरन्ति' म्हणजे प्रेरित करतात. 'कृत्य संपत्तीसाठी' (किच्चसम्पत्तिया) म्हणजे आलंबन (विषय) जाणणे, स्पर्श करणे इत्यादी कृत्य संपत्तीच्या प्राप्तीसाठी. 'ज्यांची काय आणि चित्त व्यावृत्त (कार्यमग्न) आहेत' असा विग्रह आहे. 'व्यावृत्त' (ब्यावटानि) म्हणजे उत्साहित केलेले. 'खांबाच्या आधारासारखे' (थूणूपत्थम्भनसदिसं) म्हणजे जुने घर कोसळू नये म्हणून मजबूत खांबाने दिलेल्या आधारासारखे. याला 'उपष्टंभक खांबासारखे' असेही म्हणतात. 'सर्व संपत्तींचे मूळ' म्हणजे सर्व लौकिक संपत्तींचे आणि लोकोत्तर संपत्तींचे मूळ. का? कारण पुण्यकर्म संपत्ती आणि पारमिता-पुण्य संपत्ती यांच्या प्रतिष्ठेमुळे (आधारावर). कारण पुण्यकर्म संपत्ती असेल तर सर्व लौकिक संपत्ती सिद्ध होते. आणि पारमिता-पुण्य संपत्ती असेल तर सर्व लोकोत्तर संपत्ती सिद्ध होते. याद्वारे हे स्पष्ट होते की, हीन वीर्य (उत्साह नसलेला) असलेला मनुष्य सर्व संपत्तींपासून वंचित राहतो. ๘๐. ปีติวจนตฺเถ. ‘‘ปินยตี’’ติ ปิเนติ, ปินํ กโรตีติ อาห ‘‘ตปฺเปตี’’ติ. โตเสตีติ อตฺโถ. ‘‘ตุฏฺฐึ’’ติ ตุสิตํ, ปหฏฺฐํ. ‘‘สุหิตํ’’ติ สุธาตํ, สุปุณฺณํ, วทฺธิตํ. อเนกตฺถตฺตา ธาตูนํ ‘‘วฑฺเฒตี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘ปินนฺตี’’ติ ตปฺปนฺติ, โชตนฺติ, วิโรจนฺติ, ทิวา ตปฺปติอาทิจฺโจติอาทีสุ วิย. ขุทฺทิกา ปีติ นาม โลมหํส น มตฺตการิกา ปีติ. ขณิกา ปีติ นาม ขเณ ขเณ วิชฺชุปฺปาทสทิสา ปีติ. โอกฺกนฺติกา ปีติ นาม สรีรํ โอกฺกมิตฺวา โอกฺกมิตฺวาภิชฺชนฺตี ปีติ. อุพฺเพคาปีติ นาม กายํ อุทคฺคํ กตฺวา อากาเส อุลฺลงฺฆาเปนฺตี ปีติ. ผรณา ปีติ นาม กปฺปาสวตฺติยํ ผรณกเตลํ วิย สกลกายํ ผรณวเสน ปวตฺตา ปีติ. ८०. प्रीती (पीति) या शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'पीनयति' म्हणजे तृप्त करतो, पुष्ट करतो, म्हणून 'तर्पयति' (तप्पेति) असे म्हटले आहे. याचा अर्थ 'संतोष देतो' असा आहे. 'तुष्टी' (तुट्ठिं) म्हणजे तोष, प्रफुल्लता. 'सुहित' म्हणजे सुतृप्त, सुपूर्ण, वर्धित. धातूंचे अनेक अर्थ असल्यामुळे 'वर्धित करतो' (वड्ढेति) असे म्हटले आहे. 'पीनन्ति' म्हणजे तृप्त होतात, चमकतात, शोभून दिसतात; जसे 'दिवसा सूर्य तळपतो' (दिवा तप्पति आदिच्चो) इत्यादींमध्ये. 'क्षुद्रिका प्रीती' (खुद्दिका पीति) म्हणजे केवळ अंगावर रोमांच उभे करणारी प्रीती. 'क्षणिक प्रीती' (खणिका पीति) म्हणजे क्षणाक्षणाला विजेच्या चमकेसारखी उत्पन्न होणारी प्रीती. 'अवक्रांतिका प्रीती' (ओक्कन्तिका पीति) म्हणजे शरीरात वारंवार प्रवेश करून (लाटांप्रमाणे) भिजवणारी प्रीती. 'उद्वेगा प्रीती' (उब्बेगा पीति) म्हणजे शरीराला हलके करून आकाशात उडवणारी (उडी मारायला लावणारी) प्रीती. 'स्फुरणा प्रीती' (फरणा पीति) म्हणजे कापसाच्या गोळ्यात तेल पसरल्याप्रमाणे संपूर्ण शरीरात पसरून राहणारी प्रीती. ๘๑. ฉนฺทวจนตฺเถ. ‘‘อภิสนฺธี’’ติ อภิลาโส, อภิกงฺขนํ. ‘‘กตฺตุสทฺโท’’ติ กรธาตุ วเสน วุตฺตํ. ‘‘สพฺพกิริยา ปทานี’’ติ สพฺพานิ ตุมิจฺฉตฺถ กิริยา ปทานิ. ‘‘อตฺถิโก’’ติ อสิทฺโธ หุตฺวา สาเธตุํ อิจฺฉิโต อตฺโถ อสฺสาติ อตฺถิโก. อิจฺฉนฺโตติปิ วทนฺติ. ‘‘อาราเธตุกามตา วเสนา’’ติ สาเธตุ กามตาวเสน, สมฺปาเทตุ กามตา วเสน. อุสุํ สรํ อ สนฺติ [Pg.89] ขิปนฺตีติ อิสฺสาสา. อิการสฺส อุกาโร. ธนุคฺคหา. ‘‘ยเสน วา’’ติ ปริวาเรน วา, กิตฺติ สทฺเทน วา. ‘‘สเร’’ติ กณฺเฑ. วิภาวนิปาเฐ นานาวาท โสธนตฺถํ อยญฺจาติอาทิวุตฺตํ. ‘‘ยทคฺเคนา’’ติ เยน การณ โกฏฺฐาเสน. สงฺคหิตาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วิสฺสชฺชิตพฺพ ยุตฺตเกนา’’ติ วิสฺสชฺชิตพฺพ โยคฺเยน. ‘‘เตน อตฺถิโก เยวา’’ติ ปทุทฺธาโร. ‘‘โส น ยุชฺชตี’’ติ โส อตฺโถ น ยุชฺชติ. ‘‘ขิปิต อุสูนํ’’ติ ปุพฺพภาเค ขิปิต อุสูนํ. ‘‘อตฺถโต ปนา’’ติ อธิปฺปายตฺถโต ปน. ‘‘หตฺถปฺปสารณํ วิยา’’ติ โลเก กิญฺจิ อิจฺฉนฺตสฺส ชนสฺส หตฺถปฺปสารณํ วิยาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ถามปตฺโต’’ติ อธิปติ ภาว ปตฺโตติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘ตถาเหสา’’ติอาทึ. ‘‘ตณฺหาย หตฺเถ ฐิตา’’ติ อุปจาร วจนเมตํ. ตณฺหาย ปริคฺคหิตาติ วุตฺตํ โหติ. นสกฺขิสฺสนฺติเยว, โน นสกฺขิสฺสนฺติ. ตสฺมา เวทิตพฺพเมตํ ฉนฺโทเยว ตณฺหาย พลวตโรติ. กสฺมา พลวตโรติ. อาทีนวานิสํส ทสฺสนญฺญาเณน ยุตฺตตฺตาติ. ८१. छंद (छन्द) या शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'अभिसंधी' म्हणजे अभिलाषा, आकांक्षा. 'कर्तृशब्द' हा 'कृ' धातूच्या अर्थाने वापरला आहे. 'सर्व क्रियापदे' म्हणजे सर्व 'इच्छार्थक' (तुमुन्-प्रत्ययान्त) क्रियापदे. 'अर्थी' (अत्थिको) म्हणजे जो सिद्ध झालेला नाही, पण तो साध्य करण्याची इच्छा असणारा; त्याला 'इच्छिणारा' असेही म्हणतात. 'आराधितुकामतेच्या वशाने' म्हणजे साध्य करण्याच्या इच्छेमुळे, पूर्ण करण्याच्या इच्छेमुळे. जे बाण (शस्त्र) वेगाने फेकतात ते 'इष्वास' (धनुर्धारी). येथे 'इ' काराचा 'उ' कार झाला आहे. म्हणजेच धनुर्धारी. 'यशाने किंवा' (यसेन वा) म्हणजे परिवाराने किंवा कीर्तीने. 'शरात' (सरे) म्हणजे बाणात. विभावनी पाठात विविध वादांचे निराकरण करण्यासाठी 'हा देखील' (अयञ्च) इत्यादी म्हटले आहे. 'ज्या कारणाने' (यदग्गेन) म्हणजे ज्या कारणाच्या अंशाने. 'संग्रहित' म्हणजे संबंध जोडलेला. 'सोडण्यास योग्य असलेल्याने' (विस्सज्जितब्बयुत्तकेन) म्हणजे सोडण्यास योग्य अशाने. 'त्यामुळे तो अर्थीच आहे' (तेन अत्थिको येव) हा पदाचा उद्धार आहे. 'तो योग्य नाही' (सो न युज्जति) म्हणजे तो अर्थ जुळत नाही. 'फेकलेल्या बाणांचे' (खिपित उसूनं) म्हणजे पूर्वभागात फेकलेल्या बाणांचे. 'अर्थतः परंतु' (अत्थतो पना) म्हणजे अभिप्रायाच्या अर्थाने. 'हात पसरण्यासारखे' (हत्थप्पसारणं विय) म्हणजे जगात काहीतरी मिळवू इच्छिणाऱ्या माणसाने हात पसरण्यासारखे, असा अभिप्राय आहे. 'सामर्थ्य प्राप्त' (थामपत्तो) म्हणजे अधिपती भाव प्राप्त झाला आहे, असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'तथा हे' (तथाहि एसा) इत्यादी म्हटले आहे. 'तृष्णेच्या हातात राहिलेली' (तण्हाया हत्थे ठिता) हे उपचारात्मक वचन आहे. याचा अर्थ 'तृष्णेने वेढलेली' असा आहे. ते नक्कीच असमर्थ ठरणार नाहीत, असे नाही की ते असमर्थ ठरतील. म्हणून हे समजले पाहिजे की, छंद हा तृष्णेपेक्षा अधिक बलवान आहे. तो का बलवान आहे? कारण तो (छंद) आदिनाव (दोष) आणि आनिशंस (फायदे) पाहण्याच्या ज्ञानाने युक्त असतो. ๘๒. ‘‘ปกิรนฺตี’’ติ ปตฺถรนฺติ. ‘‘สมานา’’ติ สาวชฺเชหิ ยุตฺตา สาวชฺชา, อนวชฺเชหิ ยุตฺตา อนวชฺชาติ เอวํ สทิสา, สาธารณา. ८२. 'प्रकीर्ण करतात' (पकिरन्ति) म्हणजे पसरवतात (पत्थरन्ति). 'समान' (समाना) म्हणजे सावद्याने (दोषाने) युक्त असलेले सावद्य, आणि अनवद्याने (दोषरहिततेने) युक्त असलेले अनवद्य; अशा प्रकारे समान, साधारण. อญฺญสมานราสิมฺหิอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. अन्यसमान राशीचे अनुदीपन समाप्त झाले. ๘๓. อกุสลราสิมฺหิ. ‘‘มุยฺหตี’’ติ ญาตพฺพสฺสเญยฺย ธมฺมสฺส อญฺญาณ วเสน สมฺมุยฺหติ, จิตฺตสฺส อนฺธภาโว โหติ. จตุรงฺคตโม นาม ‘กาฬปกฺข จาตุทฺทสิ ทิวโส, อฑฺฒรตฺติ สมโย, ติพฺพวนสณฺโฑ, พหลเมฆจฺฉนฺโน,ติ อยํ จตุรงฺคตโม. โส จกฺขุสฺส อนฺธภาวํ กโรติ. เอวํ ตสฺส ตมสฺส จกฺขุสฺส อนฺธภาวกรณํ วิย. ญาณคติโก โหตีติ ทฏฺฐพฺโพ อฏฺฐกถา นเยน. ตเมว อฏฺฐกถา นยํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตถา เหสา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อภิธมฺมฏีกายํ ปน มิจฺฉา ญาณนฺติ มิจฺฉา วิตกฺโก อธิปฺเปโต. โส หิ มิจฺฉา สงฺกปฺโป หุตฺวา นานปฺปการ จินฺตา ปวตฺติ วเสน ญาณคติโก โหติ. โมโห ปน จิตฺตสฺส อนฺธี ภูโต[Pg.90], นานาจินฺตน กิจฺจ รหิโต, กถํ ญาณคติโก ภเวยฺยาติ ตสฺส อธิปฺปาโย. ‘‘ปาป กิริยาสู’’ติ ทุจฺจริต กมฺเมสุ. ‘‘อุปาย จินฺตาวเสนา’’ติ กตกมฺมสฺส สิทฺธตฺถาย สตฺถาวุธาทิวิธาเนสุ นานาอุปาย จินฺตาวเสน. อปฺปฏิ ปชฺชนํ อปฺปฏิ ปตฺติ. ญาณ คตึ อคมนนฺติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘อญฺญาณเมว วุจฺจตี’’ติ. ‘‘ญาณคติกา’’ติ ญาณปฺปวตฺติยา สมานปฺปวตฺติกา. โลโภ ญาณ คติโก มายาสาเฐยฺย กมฺเมสุ วิจิตฺตปฺปวตฺติกตฺตา. วิจาโร ญาณ คติโก. ตถาหิ โส ฌานงฺเคสุ วิจิกิจฺฉาย ปฏิปกฺโขติ วุตฺโต. จิตฺตสฺส ญาณ คติ กตา วิจิตฺตตฺถวาจเกน จิตฺตสทฺเทน สิทฺโธ. เต จ ธมฺมา สพฺพ สตฺเตสุ ญาณ คติกา น โหนฺติ. ญาณูปนิสฺสยํ ลภิตฺวา เอว โหนฺตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘เตหี’’ติอาทิมาห. เต สาเธนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ปกติยา วิญฺญุชาติกา นาม ติเหตุกปฺปฏิ สนฺธิกา. อญฺญปฺปฏิ สนฺธิกาปิ โพธิสตฺต ภูมิยํ ฐิตา วา ปญฺญาปสุต ภวโต อาคตา วา. สุตปริยตฺติ สมฺปนฺนา นาม ทฺวิเหตุกปฺปฏิ สนฺธิกาปิ อิมสฺมึ ภเว พหุสฺสุต สมฺปนฺนา จ ปริยตฺติ กมฺม สมฺปนฺนา จ. ८३. अकुसलराशीमध्ये (अकुशलराशीत). 'मुय्हति' (मोहग्रस्त होतो) म्हणजे जाणण्यायोग्य आणि समजण्यायोग्य धर्माच्या अज्ञानामुळे संमोहित होतो, चित्ताचा अंधभाव (अंधत्व) होतो. चतुरङ्गतम (चार प्रकारचा अंधकार) म्हणजे - 'कृष्णपक्षातील चतुर्दशीचा दिवस, मध्यरात्रीची वेळ, घनदाट जंगल आणि दाट ढगांनी आच्छादलेले आकाश', हा चतुरङ्गतम होय. तो डोळ्यांना अंध करतो. अशा प्रकारे त्या अंधकाराचे डोळ्यांना अंध करणे यासारखे आहे. 'ज्ञानगतिक होतो' हे अट्ठकथा पद्धतीनुसार समजले पाहिजे. तीच अट्ठकथा पद्धती दर्शवण्यासाठी 'तथा हेसा' इत्यादी म्हटले आहे. अभिधम्मटीकेमध्ये मात्र 'मिच्छा जाणं' (मिथ्या ज्ञान) म्हणजे 'मिच्छा वितक्क' (मिथ्या वितर्क) अभिप्रेत आहे. कारण तो मिच्छा सङ्कप्प (मिथ्या संकल्प) होऊन विविध प्रकारच्या विचार प्रवृत्तीच्या वशाने ज्ञानगतिक होतो. परंतु मोह हा चित्ताचा अंधकारमय भाव आहे, जो विविध विचार करण्याच्या क्रियेने रहित आहे, तो कसा ज्ञानगतिक होऊ शकेल? असा त्याचा अभिप्राय आहे. 'पापकिरियासू' म्हणजे दुश्चरित कर्मांमध्ये. 'उपायचिंतावसेना' म्हणजे केलेल्या कर्माच्या सिद्धीसाठी शस्त्र-अस्त्रादींच्या नियोजनात विविध उपायांच्या विचाराने. 'अप्पटिपज्जनं' म्हणजे अप्रतिपत्ती (आचरण न करणे). ज्ञानाच्या गतीला न जाणे असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे 'अञ्ञाणमेव वुच्चती' (अज्ञानच म्हटले जाते). 'ज्ञानगतिका' म्हणजे ज्ञानाच्या प्रवृत्तीसारखीच प्रवृत्ती असणारे. लोभ हा माया आणि कपटाच्या कर्मांमध्ये विविध प्रवृत्ती असल्यामुळे ज्ञानगतिक आहे. विचार हा ज्ञानगतिक आहे. कारण तो झानाङ्गांमध्ये (ध्यानांगांमध्ये) विचिकित्सेचा (शंकेचा) प्रतिपक्ष आहे असे म्हटले आहे. चित्ताची ज्ञानगती ही विविध अर्थ व्यक्त करणाऱ्या 'चित्त' शब्दाने सिद्ध होते. आणि ते धर्म सर्व प्राण्यांमध्ये ज्ञानगतिक नसतात. ज्ञानाचा उपनिश्रय (आधार) मिळवूनच ते तसे होतात, हे दर्शवण्यासाठी 'तेही' इत्यादी म्हटले आहे. 'ते साधतात' असा संबंध आहे. प्रकृतीने (स्वभावाने) 'विञ्ञुजातिका' (विज्ञजातीय) म्हणजे तिहेतुक-पटिसन्धिक (त्रिहेतुक प्रतिसंधी असणारे) होत. इतर प्रतिसंधी असणारेही बोधिसत्त भूमीवर राहिलेले किंवा प्रज्ञेच्या अभ्यासातून आलेले असतात. 'सुतपरियत्ति संपन्न' म्हणजे द्विहेतुक-पटिसन्धिक असूनही या जन्मात बहुश्रुततेने संपन्न आणि परियत्ति कर्माने संपन्न असणारे होत. ๘๔. อหิริกวจนตฺเถ. ‘‘น หิรียตี’’ติ นาม ธาตุ ปทเมตํ. หรายติ ลชฺชตีติ หิรี. หเร ลชฺชายํติ ธาตุ. น หิรี อหิรีติ วจนตฺโถ. ‘‘รุจึ อุปฺปาเทตฺวา’’ติ คามสู กรสฺส คูถราสิ ทสฺสเน วิย จิตฺตโรจน จิตฺต ขมนํ อุปฺปาเทตฺวา. อตฺตานํ ปาปกมฺม ลิมฺปโต จิตฺตสฺส อลีนตา อชิคุจฺฉนํ นาม. อตฺตานํ อสปฺปุริส ภาวปตฺติโต จิตฺตสฺส อลีนตา อลชฺชา นาม. ८४. अहिरिक (निर्लज्जता) शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'न हिरीयति' (लज्जित होत नाही) हे नामधातूचे पद आहे. जो लज्जित होतो, लाजतो ती 'हिरी' (लज्जा) होय. 'हर' हा लज्जेच्या अर्थातील धातू आहे. हिरी नसणे म्हणजे 'अहिरिक' असा शब्दाचा अर्थ आहे. 'रुचिं उप्पादेत्वा' (रुची उत्पन्न करून) म्हणजे ग्रामडुकराला विष्ठेचा ढीग पाहिल्यावर जशी चित्ताची आवड किंवा चित्ताची संमती उत्पन्न होते, तशी उत्पन्न करून. स्वतःला पापकर्माने लिप्त करताना चित्ताची अलीनता (असंकोच) म्हणजेच 'अजिगुच्छन' (घृणा न वाटणे) होय. स्वतःला असत्पुरुष भाव प्राप्त होत असताना चित्ताची अलीनता म्हणजेच 'अलज्जा' (निर्लज्जता) होय. ๘๕. อโนตฺตปฺปวจนตฺเถ. ‘‘น ภายตี’’ติ ปาปกมฺมํ ภยโต น อุปฏฺฐาติ. ‘‘น อุตฺรสตี’’ติ ปาปกมฺม เหตุ น กมฺปติ. ‘‘ตาสู’’ติ ปาปกิริยาสุ. ‘‘อสารชฺชมานํ กตฺวา’’ติ สูรํ วิสฺสฏฺฐํ กตฺวา. อสารชฺชํ นาม สูรภาโว. อนุตฺตาโส นาม ปาปกมฺม เหตุ จิตฺตสฺส อกมฺปนํ. คาถายํ. อชิคุจฺฉนสีโล ปุคฺคโล อเชคุจฺฉี. ‘‘ปาปา’’ติ ปาปกมฺมโต. ‘‘สูกโร’’ติ คามสูกโร. โส คูถโต อเชคุจฺฉี. อหิริโก ปาปโต อเชคุจฺฉีติ โยชนา. อภายนสีโล อภีรู. ‘‘สลโภ’’ติ ปฏงฺโค. ‘‘ปาวกา’’ติ [Pg.91] ทีปชาลมฺหา. สลโภ ปาวกมฺหา อภีรู วิย อโนตฺตวฺวี ปาปโต อภีรูติ โยชนา. ८५. अनोत्तप्प (भयहीनता) शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'न भायति' (भीती वाटत नाही) म्हणजे पापकर्म हे भयाचे कारण म्हणून समोर येत नाही. 'न उत्रसति' (घाबरत नाही) म्हणजे पापकर्माच्या मुळे कंप पावत नाही. 'तासू' म्हणजे त्या पापकियांमध्ये. 'असारज्जमानं कत्वा' म्हणजे शूर आणि निर्भय करून. 'असारज्ज' म्हणजे शूरभाव. 'अनुत्तासो' म्हणजे पापकर्माच्या मुळे चित्ताचे न कंप पावणे (अकंपित राहणे). गाथेमध्ये - घृणा न करण्याचा स्वभाव असलेला पुद्गल (व्यक्ती) हा 'अजेगुच्छी' होय. 'पापा' म्हणजे पापकर्मापासून. 'सूकरो' म्हणजे ग्रामडुकर. तो जसा विष्ठेपासून घृणा करत नाही, तसा अहिरिक (निर्लज्ज) पापकर्मापासून घृणा करत नाही, अशी योजना करावी. भीती न बाळगण्याचा स्वभाव असलेला 'अभीरू' (निर्भय) होय. 'सलभो' म्हणजे पतंग. 'पावका' म्हणजे दिव्याच्या ज्योतीपासून. पतंग जसा अग्नीपासून घाबरत नाही, तसा अनोत्तप्पी (पापाचे भय नसलेला) पापकर्मापासून घाबरत नाही, अशी योजना करावी. ๘๖. อุทฺธจฺจวจนตฺเถ. ‘‘อุทฺธรตี’’ติ อุกฺขิปติ. อารมฺมณสฺมึ น สนฺนิ สีทติ. วิกฺขิปตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘วฏฺเฏตฺวา’’ติ อาวฏฺเฏตฺวา. ‘‘วิสฺสฏฺฐเคณฺฑุโก วิยา’’ติ วิสฺสชฺชิโต สารเคณฺฑุโก วิย. ‘‘ธชปฏากา วิยา’’ติ วาเตริตา ธชปฏากา วิย. ८६. उद्धच्च (उद्धतपणा/चित्ताची चंचलता) शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'उद्धरति' म्हणजे वर फेकतो. आलंबनामध्ये (आरम्मणात) स्थिर होत नाही. 'विक्षिप्त होतो' असे म्हटले आहे. 'वट्टेत्वा' म्हणजे फिरवून. 'विस्सट्ठगेण्डुको विया' म्हणजे फेकलेल्या चेंडू (खेळण्याच्या चेंडू) प्रमाणे. 'धजपटाका विया' म्हणजे वाऱ्याने हलणाऱ्या ध्वज-पताकेप्रमाणे. ๘๗. โลภวจนตฺเถ. ‘‘ลุพฺภตี’’ติ คิชฺฌติ, อภิกงฺขติ. อภิสชฺชนํ อภิลคฺคนํ. มกฺกฏํ อาลิมฺปติ พนฺธติ เอเตนาติ มกฺกฏา เลโป. ‘‘ตตฺต กปาเล’’ติ อคฺคินาสนฺตตฺเต ฆฏ กปาเล. เตลสฺส วตฺถมฺหิ อญฺชนํ อภิลคฺคนํ เตลญฺชนํ. รชฺชนํ ปฏิสชฺชนํ ราโค. เตลญฺชน ภูโต ราโค เตลญฺชน ราโค. น กิเลสราโค. รตฺติ ทิวํ ปวตฺตนฏฺเฐน ตณฺหา เอว นทีโสตสทิสตฺตา ตณฺหา นที. ‘‘สตฺตานํ’’ติ ปุถุชฺชน สตฺตานํ. ‘‘สุกฺขกฏฺฐสาขาปลาสติณกสฏานี’’ติ สุกฺข กฏฺฐกสฏานิ, สุกฺข สาขา กสฏานีติอาทินา โยเชตพฺพํ. กสฏ สทฺเทน อสารภาวํ ทีเปติ. ‘‘นที วิยา’’ติ ปพฺพเตยฺยา นที วิย. ८७. लोभ शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'लुब्भti' म्हणजे हाव धरतो, आकांक्षा करतो. 'अभिसज्जन' म्हणजे चिकटणे. ज्याने माकडाला लिप्त केले जाते आणि बांधले जाते तो 'मक्कटलेप' (माकड पकडण्याचा डिंक) होय. 'तत्त कपाले' म्हणजे अग्नीने तापलेल्या मातीच्या खापरावर. तेलाचे कपड्यावर लागणे म्हणजे 'तेल-अंजन' (तेलाचा डाग). रंजित होणे, आसक्त होणे म्हणजे 'राग' होय. तेलाच्या डागासारखा झालेला राग म्हणजे 'तेलञ्जन राग' होय, क्लेशराग नव्हे. रात्रंदिवस वाहण्याच्या अर्थाने तण्हा (तृष्णा) ही नदीच्या प्रवाहासारखी असल्यामुळे ती 'तण्हा नदी' (तृष्णा नदी) होय. 'सत्तानं' म्हणजे पृथग्जन प्राण्यांचे. 'सुक्खकट्ठसाखापलासतिणकसाटानी' म्हणजे सुकलेल्या लाकडाचा कचरा, सुकलेल्या फांद्यांचा कचरा इत्यादी प्रकारे योजना करावी. 'कसाट' शब्दाने असारभाव (निरर्थकता) दर्शवला जातो. 'नदी विया' म्हणजे पर्वतावरून वाहणाऱ्या नदीप्रमाणे. ๘๘. ทิฏฺฐิวจนตฺเถ. ‘‘ทสฺสนํ’’ติ ปริกปฺปนา สิทฺเธสุ มิจฺฉา สภาเวสุ วิปรีต ทสฺสนํ. เตนาห ‘‘ธมฺมานํ’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ธมฺมานํ’’ติ รูปารูป ธมฺมานํ, อนิจฺจตาทิ ธมฺมานญฺจ. ‘‘ยาถาว สภาเวสู’’ติ ภูตสภาเวสุ. ภูตสภาโว หิ ยถา ธมฺมํ อวติ รกฺขตีติ อตฺเถน ยาถาโวติ วุจฺจติ. อตฺตานํ ปณฺฑิตํ มญฺญนฺตีติ ปณฺฑิต มานิโน. ปฏิเวธญฺญาณํ นาม อริย มคฺคญฺญาณํ. ปรมํ วชฺชนฺติ ทฏฺฐพฺพา โลเก มหาสาวชฺชฏฺเฐน ตํ สทิสสฺส อญฺญสฺส วชฺชสฺส อภาวโตติ อธิปฺปาโย. ८८. दिट्ठि (दृष्टी/मिथ्या दृष्टी) शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'दस्सनं' (दर्शन) म्हणजे कल्पनेने सिद्ध झालेल्या मिथ्या स्वभावांमध्ये विपरीत दर्शन. म्हणूनच 'धम्मानं' इत्यादी म्हटले आहे. तिथे 'धम्मानं' म्हणजे रूप आणि अरूप धर्मांचे, तसेच अनित्यता इत्यादी धर्मांचे. 'याथाव सभावेसू' म्हणजे वास्तविक स्वभावांमध्ये. वास्तविक स्वभाव हा धर्माप्रमाणे रक्षण करतो या अर्थाने 'याथाव' (यथार्थ) म्हटला जातो. स्वतःला पंडित मानणारे ते 'पंडितमानिनो' (पंडितमानी). 'पटिवेधञाण' (प्रतिवेध ज्ञान) म्हणजे आर्य मार्ग ज्ञान होय. 'परमं वज्जं' (परम दोष) हे जगात महासावद्य (मोठा गुन्हा/दोष) असल्यामुळे, त्याच्यासारखा दुसरा कोणताही दोष नसल्यामुळे असे समजले पाहिजे, असा अभिप्राय आहे. ๘๙. มานวจนตฺเถ. ‘‘มญฺญตี’’ติ ภูตสภาวํ อติกฺกมฺม อธิกํ กตฺวา อหมสฺมีติอาทินา เตน เตน อภูตากาเรน มญฺญติ. เตนาห ‘‘อหํ โลเก’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘กฏฺฐกถิงฺคโร วิยา’’ติ สุกฺขทารุกฺขนฺโธ วิย. โส ปน อุปตฺถมฺภิโต มญฺญตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อตฺตานํ อจฺจุคฺคตํ มญฺญตี’’ติ ปุคฺคลํ มาเนน อภินฺนํ กตฺวา วุตฺตํ. ‘‘อุนฺนติ ลกฺขโณ’’ติ อุนฺนมน สภาโว. ८९. मान (अभिमान/अहंकार) शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'मञ्ञति' (मानतो) म्हणजे वास्तविक स्वभावाचे उल्लंघन करून, स्वतःला श्रेष्ठ मानून 'मी आहे' इत्यादी अशा विविध असत्य आकाराने मानतो. म्हणूनच 'अहं लोके' (मी जगात) इत्यादी म्हटले आहे. तिथे 'कट्ठकथिङ्गरो विया' म्हणजे सुकलेल्या लाकडाच्या ओंडक्याप्रमाणे. तो आधार दिलेला असताना स्वतःला श्रेष्ठ मानतो असा संबंध आहे. 'अत्तानं अच्चुग्गतं मञ्ञति' (स्वतःला अत्यंत उच्च मानतो) हे पुद्गलाला (व्यक्तीला) मानाशी अभिन्न करून म्हटले आहे. 'उन्नति लक्खणो' म्हणजे उन्नत होण्याचा (वर जाण्याचा) स्वभाव असणारा. ๙๐. โทสวจนตฺเถ[Pg.92]. จณฺเฑน กายวจี มโนกมฺเมน สมนฺนาคโต จณฺฑิโก. จณฺฑิกสฺส ภาโว จณฺฑิกฺกํ. ‘‘ปหตาสีวิโส วิยา’’ติ ทณฺเฑน ปหโต อาสีวิโส วิย. ‘‘วิสปฺปนฏฺเฐนา’’ติ สกลกาเย วิวิเธน สปฺปนฏฺเฐน, ผรณฏฺเฐน. อิทญฺจ ตํ สมุฏฺฐาน รูปานํ ผรณ วเสน วุตฺตํ. ‘‘อสนิปาโต วิยา’’ติ สุกฺขา สนิปตนํ วิย. ‘‘ทาวคฺคิวิยา’’ติ อรญฺญคฺคิ วิย. ‘‘สปตฺโต วิยา’’ติ ทุฏฺฐเวรี วิย. ‘‘วิสสํสฏฺฐปูติมุตฺตํ วิยา’’ติ ยถา มุตฺตํ นาม ปกติยา เอว ทุคฺคนฺธตฺตา ปฏิกุลตฺตา ทูเร ฉฏฺฏนียนฺติ อหิตเมว โหติ. ปุน ปูติภาเว สติ, ทูรตเร ฉฏฺเฏตพฺพํ. วิสสํสฏฺเฐปน วตฺตพฺพเมวนตฺถิ. สพฺพโส อหิตราสิ โหติ. เอวํ โทโสปิ ตํ สมงฺคีโน ตสฺมึ ขเณ ปเรสํ อมนาปิยตํ อาปาเทติ. อตฺตหิต ปรหิต วินาสญฺจ กาเรติ, ปรมฺมรณา อปายญฺจ ปาเปตีติ สพฺพโส อหิตราสิ โหติ. เตน วุตฺตํ ‘‘วิสสํสฏฺฐปูติ มุตฺตํ วิย ทฏฺฐพฺโพ’’ติ. ९०. 'दोस' (द्वेष) या शब्दाच्या अर्थाबाबत. क्रूर किंवा उग्र कायिक, वाचिक आणि मानसिक कर्माने युक्त असलेला तो 'चण्डिक' (उग्र/क्रोधित) होय. चण्डिकाचा भाव (अवस्था) म्हणजे 'चण्डिक्क' (उग्रता/क्रूरता). 'काठीने मारलेल्या विषारी सापाप्रमाणे (पहत-आसीवीस विय)' म्हणजे काठीने मारलेला विषारी साप जसा (क्रोधित होतो) तसा. 'विसप्पनट्ठेन' (पसरण्याच्या अर्थाने) म्हणजे संपूर्ण शरीरात विविध प्रकारे पसरण्याच्या अर्थाने, व्यापण्याच्या अर्थाने. आणि हे त्या (चित्त-)समुत्थान रूपांच्या पसरण्याच्या (व्यापण्याच्या) संदर्भात म्हटले आहे. 'अशनिपाताप्रमाणे (अशनिपातो विय)' म्हणजे वीज कोसळण्याप्रमाणे. 'दावाग्नीप्रमाणे (दावग्गि विय)' म्हणजे जंगलातील आगीप्रमाणे. 'शत्रूप्रमाणे (सपत्तो विय)' म्हणजे दुष्ट वैऱ्याप्रमाणे. 'विषाने मिश्रित सडलेल्या मूत्राप्रमाणे (विससंसट्ठपूतियुत्तं विय)' म्हणजे जसे मूत्र हे निसर्गतःच दुर्गंधीयुक्त आणि प्रतिकूल (घृणास्पद) असल्यामुळे दूर फेकून देण्यायोग्य आणि अहितकारकच असते. त्यात पुन्हा ते सडलेले (पूतभाव) असल्यास, ते आणखी दूर फेकून दिले पाहिजे. आणि जर ते विषाने मिश्रित असेल, तर मग सांगायलाच नको (ते अत्यंत घातक असते). ते सर्वतोपरी अहितकारकच असते. त्याचप्रमाणे, 'दोस' (द्वेष) देखील त्या व्यक्तीला (ज्याच्यामध्ये तो उत्पन्न होतो) त्या क्षणी इतरांसाठी अप्रिय बनवतो. तो स्वतःचे हित आणि इतरांचे हित यांचा विनाश करतो, आणि मृत्यूनंतर अपाय (दुर्गती) मध्ये पोहोचवतो, म्हणून तो सर्वतोपरी अहिताचा समूह आहे. म्हणूनच म्हटले आहे की, 'तो (दोस) विषाने मिश्रित सडलेल्या मूत्राप्रमाणे पाहावा'. ๙๑. อิสฺสาวจนตฺเถ. ทุวิธา อิสฺสาลทฺธสมฺปตฺติ วิสยา จลภิตพฺพ สมฺปตฺติ วิสยา จ. ตตฺถ ลทฺธ สมฺปตฺติ วิสยํ ตาวทสฺเสติ ‘‘ปเรสํ ปกติยา’’ติอาทินา. ลทฺธ สมฺปตฺติคฺคหเณน อตีต สมฺปตฺติปิ สงฺคหิตาติ ทฏฺฐพฺพา. อิสฺสาปกติกาหิ เกจิ อสุโก นาม ปุพฺเพ เอวํ สมฺปตฺติโก อโหสีติ วา, อหํ ปุพฺเพ เอวํ สมฺปตฺติโก อโหสินฺติ วา สุตฺวา นสหนฺติเยว. ตํ วจนํ โสตุํปิ น อิจฺฉนฺตีติ. อสุโกติอาทินา ลภิตพฺพสมฺปตฺติ วิสยํ ทสฺเสติ. ९१. 'इस्सा' (ईर्ष्या) या शब्दाच्या अर्थाबाबत. ईर्ष्या दोन प्रकारची असते: प्राप्त झालेल्या संपत्तीच्या (लद्धसंपत्ति) विषयाशी संबंधित आणि प्राप्त करावयाच्या संपत्तीच्या (लभितब्बसंपत्ति) विषयाशी संबंधित. त्यापैकी, प्राप्त झालेल्या संपत्तीच्या विषयाला 'परेसं पकतिया' (इतरांच्या स्वभावाने) इत्यादीद्वारे दर्शविले आहे. 'प्राप्त झालेली संपत्ती' या ग्रहणाने भूतकाळातील संपत्तीचाही समावेश होतो, असे समजावे. कारण ईर्ष्याळू स्वभावाचे काही लोग 'अमुक व्यक्ती पूर्वी अशी समृद्ध होती' किंवा 'मी पूर्वी असा समृद्ध होतो' (इतरांच्या संदर्भात) असे ऐकून ते सहन करू शकत नाहीत. ते ते शब्द ऐकण्याची देखील इच्छा करत नाहीत. 'अमुक' इत्यादी शब्दांद्वारे प्राप्त करावयाच्या संपत्तीचा (लभितब्बसंपत्ति) विषय दर्शविला आहे. ๙๒. มจฺฉริยวจนตฺเถ. ‘‘มม เอวา’’ติ มมปกฺเข เอวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘คุณชาตํ’’วาติ อตฺตนิวิชฺชมานํ สิปฺปวิชฺชาทิ สมฺปตฺติ คุณชาตํ วา. ‘‘วตฺถุ วา’’ติ ธนธญฺญาทิวตฺถุ วา. ‘‘อวิปฺผาริกตาวเสนา’’ติ อญฺเญน ตํ สิปฺปวิชฺชาทิกํ วา ธนธญฺญาทิกํ วา มยฺหํ เทหีติ วุตฺเต ปรหิตตฺถาย ทาตพฺพ ยุตฺตกํ ทสฺสามีติ เอวํ จิตฺเตสติ, ปรหิตปฺผรณาวเสน ตํ จิตฺตํ วิปฺผาริกํ นาม โหติ. เทหีติ วจนมฺปิ โสตุํ อนิจฺฉนฺโต ปรหิตตฺถาย อวิปฺผาริก จิตฺโต นาม โหติ. เอวํ อวิปฺผาริกตาวเสน จรติ ปวตฺตตีติ มจฺฉรญฺจ การสฺส ฉ การํ [Pg.93] กตฺวา. ตถา ปวตฺตํ จิตฺตํ. ปุคฺคโล ปน มจฺฉรีติ วุจฺจติ. ‘‘ตํ’’ติ ลทฺธสมฺปตฺตึ. ‘‘ปเรหิ สาธารณํ ทิสฺวา’’ติอาทินา โยเชตพฺพํ. สาธารณนฺติ จ ทฺวิสนฺตกํ วาติ สนฺตกํ วา ภวิสฺสมานํ, ปเรหิ วา ปริภุญฺชิยมานํ. ‘‘นิคฺคุหนลกฺขณํ’’ติ รกฺขาวรณคุตฺตีหิสงฺโคปน สภาวํ. อตฺตนา ลทฺธ สมฺปตฺติ นาม อิสฺสาย อวิสโย. ลภิตพฺพสมฺปตฺติ ปน อุภย สาธารณํ. ตสฺมา ตตฺถ อุภินฺนํ วิเสโส วตฺตพฺโพติ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิมาห. ‘‘ยสฺส ลาภํ น อิจฺฉตี’’ติ อตฺตนา ลภตุ วา มาวา, เกวลํ ปร สมฺปตฺตึ อสหนฺโต ยสฺส ปรสฺส ลาภํ น อิจฺฉติ. ‘‘จิตฺต วิฆาโต’’ติ จิตฺต วิหญฺญนํ. ‘‘อตฺตนา ลทฺธุํ อิจฺฉตี’’ติ ปโร สมฺปชฺชตุ วา มาวา, ยตฺถ ปรลาเภสติ, อตฺตนา น ลภิสฺสติ, ตตฺถ อตฺตนาว ลทฺธุํ อิจฺฉติ. ยตฺถ อตฺตนา จ ลภติ, ปโร จ ลภติ, ตตฺถ วิฆาโต นตฺถีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อลพฺภมานกํ จินฺเตตฺวา’’ติ อตฺตนา อลภิสฺสมานํ สลฺลกฺเขตฺวา. ९२. 'मच्छरिय' (मत्सर/कृपणता) या शब्दाच्या अर्थाबाबत. 'माझेच (मम एव)' म्हणजे माझ्याच बाजूचे असा अभिप्राय आहे. 'गुणजात' म्हणजे स्वतःमध्ये असलेले शिल्प, विद्या इत्यादी संपत्ती किंवा गुणांचा समूह. 'वस्तू (वत्थु वा)' म्हणजे धन-धान्य इत्यादी वस्तू. 'अविप्फारिकतावशेन' (अ-प्रसारित होण्याच्या भावाने) म्हणजे - जेव्हा दुसऱ्याने 'ते शिल्प, विद्या इत्यादी किंवा धन-धान्य इत्यादी मला द्या' असे म्हटले असता, 'इतरांच्या हितासाठी जे देणे योग्य आहे ते मी देईन' असा विचार मनात येतो, तेव्हा परहिताच्या प्रसाराच्या भावनेमुळे ते चित्त 'विप्फारिक' (प्रसारित/उदार) म्हटले जाते. परंतु 'मला द्या' हे वचन ऐकण्याची देखील इच्छा न करणारा, परहितासाठी 'अविप्फारिक चित्त' (अ-प्रसारित/संकुचित चित्त) असलेला होतो. अशा प्रकारे जो अविप्फारिकतेने (संकुचिततेने) वागतो किंवा प्रवृत्त होतो, त्याला 'मच्छर' (मत्सर) म्हणतात, जिथे 'च' काराचा 'छ' कार केला आहे. अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेले ते चित्त होय. आणि त्या व्यक्तीला 'मच्छरी' (मत्सरी/कृपण) म्हटले जाते. 'त्याला (तं)' म्हणजे प्राप्त झालेल्या संपत्तीला. 'इतरांशी सामायिक पाहून (परेहि साधारणं दिस्वा)' इत्यादींशी याचा संबंध जोडला पाहिजे. 'साधारण' (सामायिक) म्हणजे दोघांच्या मालकीचे असणारे किंवा भविष्यात मालकीचे होणारे, किंवा इतरांद्वारे उपभोगले जाणारे. 'निग्गुहनलक्षण' (लपविण्याचे लक्षण) म्हणजे रक्षण, आवरण आणि गुप्ततेने लपवून ठेवण्याचा स्वभाव. स्वतःला प्राप्त झालेली संपत्ती ही 'इस्सा' (ईर्ष्या) चा विषय नसते. परंतु प्राप्त करावयाची संपत्ती ही दोघांनाही (ईर्ष्या आणि मत्सर) सामायिक असते. म्हणून, त्या बाबतीत दोघांमधील फरक सांगणे आवश्यक आहे, हे दर्शविण्यासाठी 'एत्थ च' (आणि येथे) इत्यादी म्हटले आहे. 'ज्याला लाभ मिळावा अशी इच्छा नसणे (यस्स लाभं न इच्छति)' म्हणजे स्वतःला मिळो वा न मिळो, केवळ दुसऱ्याच्या संपत्तीचा द्वेष करत, त्या दुसऱ्या व्यक्तीला लाभ मिळावा अशी इच्छा न करणे. 'चित्त विघात (चित्त विघातो)' म्हणजे चित्ताचा संताप किंवा क्लेश. 'स्वतःला मिळावे अशी इच्छा करणे (अत्तना लद्धुं इच्छति)' म्हणजे दुसऱ्याला समृद्धी मिळो वा न मिळो, जिथे दुसऱ्याला लाभ होत असताना आपल्याला मिळणार नाही, तिथे स्वतःलाच ते मिळावे अशी इच्छा करणे. जिथे स्वतःलाही मिळते आणि दुसऱ्यालाही मिळते, तिथे चित्ताचा विघात (संताप) होत नाही, असा अभिप्राय आहे. 'न मिळणाऱ्या गोष्टीचा विचार करून (अलब्भमानकं चिंतेत्वा)' म्हणजे स्वतःला जे मिळणार नाही, हे लक्षात घेऊन. ๙๓. กุกฺกุจฺจวจนตฺเถ. ‘‘กิริยา กตํ’’ติ กต สทฺทสฺสภาว สาธนมาห. เอวํ วจนตฺถํ ทสฺเสตฺวา อภิเธยฺยตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อตฺถโต ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘อนุโสจน วเสนา’’ติ ปจฺฉา ปุนปฺปุนํ จิตฺตสนฺตาปวเสน. โส กุกตนฺติ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กุสล ธมฺเมสู’’ติ ปุญฺญ กิริยวตฺถุ ธมฺเมสุ จิตฺต ปริยาทานาย เอว สํวตฺตติ. กุกฺกุจฺจ สมงฺคี ปุคฺคโล ปุญฺญกมฺมํ กโรนฺโตปิ จิตฺต สุขํ น ลภติ. พหุชน มชฺเฌ วสิตฺวา นานากิจฺจานิ กโรนฺโต นานา ติรจฺฉาน กถํ กเถนฺโต จิตฺต สุขํ ลภติ. ตทา ตสฺส ปุญฺญกมฺม กรณตฺถาย จิตฺตํ ปริยาทียติ, ปริกฺขิยฺยติ. จิตฺตวสํ คจฺฉนฺโต วิจรติ. เอวํ จิตฺต ปริยาทานาย เอว สํวตฺตติ. ‘‘อฏฺฐกถายํ’’ติ อฏฺฐสาลินิยํ. ‘‘กตา กตสฺส สาวชฺชานวชฺชสฺสา’’ติ ปุพฺเพ กตสฺส สาวชฺชกมฺมสฺส, อกตสฺส อนวชฺช กมฺมสฺส. กมฺมตฺเถสามิวจนํ. ‘‘อภิมุขคมนํ’’ติ อารมฺมณ กรณวเสน จิตฺตสฺส อภิมุขปฺปวตฺตนํ. เอเตน ปฏิมุขํ สรณํ จินฺตนํ ปฏิสาโรติ ทสฺเสติ. ‘‘อกตํ น กโรตี’’ติ อกตํ กาตุํ น สกฺโกตีติ อธิปฺปาโย. เอวํ กตํ น กโรตีติ เอตฺถปิ. ‘‘วิรูโป’’ติ [Pg.94] วีภจฺโฉ อโสภโณ. ‘‘กุจฺฉิโต’’ติ ครหิตพฺโพ. นนุ ปุพฺเพ จิตฺตุปฺปาโท กุจฺฉิโตติ วุตฺโต. อฏฺฐกถายํ ปน วิปฺปฏิสาโร กุจฺฉิโตติ วุตฺโต. อุภยเมตํ น สเมตีติ. โน น สเมติ, อญฺญถานุ ปปตฺติโตติ ทสฺเสตุํ ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิมาห. ‘‘เยน จ การเณนา’’ติ กตากตํ ปฏิจฺจ นิรตฺถก จิตฺตปฺปวตฺติ การเณน. โส จิตฺตุปฺปาโทว กุกตปเท คเหตุํ ยุตฺโต, นวิภาวนิยํ วิย กตากต ทุจฺจริต สุจริตนฺติ อธิปฺปาโย. นนุ วิภาวนิยมฺปิ โส จิตฺตุปฺปาโทว อุปจาร นเยน คหิโตติ เจ. ยุตฺติ วเสน จ อฏฺฐกถาคเมน จ มุขฺยโต สิทฺเธ สติ, กึ อุปจาร นเยน. เตนาห ‘‘วิภาวนิยํ ปนา’’ติอาทึ. กุกตสฺสภาโว กุกฺกุจฺจํ, อการสฺส อุการํ กตฺวาติ อยํ อฏฺฐกถานโย. อิทานิ สทฺทสตฺถนเยน อปรํ วจนตฺถญฺจ อธิปฺปายตฺถญฺจ ทสฺเสตุํ ‘‘อปิ จา’’ติอาทิ อารทฺธํ. ตตฺถ ‘‘ธาตุปาเฐสู’’ติ อกฺขรธาตุปฺปกาสเนสุ นิรุตฺติ ปาเฐสุ. ปฐนฺติเยว, โน น ปฐนฺติ. เต จ อตฺถา เจตโส วิปฺปฏิสาโร มโน วิเลโขติ เอวํ ปาฬิยํ วุตฺเตหิ กุกฺกุจฺจปริยาเยหิ สเมนฺติเยว. ตสฺมา อยํ อปโรนโย อิธ อวสฺสํ วตฺตพฺโพ เยวาติ ทีเปติ. วิปฺปฏิ สาริปุคฺคโล จ ตํ ตํ ปุญฺญกมฺมํ กโรนฺโตปิ วิปฺปฏิ สารคฺคินา ทยฺหมาน จิตฺโต ปุญฺญกมฺเม จิตฺตปฺปสาทํ นลภติ. จิตฺต สุขํ น วินฺทติ. กึ อิมินา กมฺเมนาติ ตํ ปหาย ยตฺถ จิตฺต สุขํ วินฺทติ, ตตฺถ วิจรติ. เอวํ วิปฺปฏิสาโร ปุญฺญกมฺมโต สงฺโกจนํ นาม โหตีติ. กิเลสสลฺลิขนํ นาม สนฺตุฏฺฐิ สลฺเลขปฺปฏิปตฺติยํ ฐิตสฺส ตทงฺคปฺปหานาทิวเสน ตํ ตํ กิเลสปฺปหานํ วุจฺจติ. ‘‘อนุตฺถุนนากาเรนา’’ติ ปุนปฺปุนํ วิลปนากาเรน. สงฺโกจตีติ วตฺวา ตสฺส อุภยํ อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘กุสลกมฺม สมาทาเน’’ติอาทิมาห. นมิตุมฺปิ น เทติ. กุโต สมาทาตุํ วา วฑฺเฒตุํ วา ทสฺสตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตนุกรเณนา’’ติ ทุพฺพลกรเณน. วิเสสนฏฺเฐกรณ วจนํ. ‘‘โส’’ติ ธมฺมสมูโห. ตํ ปน กุกฺกุจฺจํ. เกจิ ปน กุกฺกุจฺจํ ปจฺจุปฺปนฺน สุจริต ทุจฺจริตา รมฺมณมฺปิ อนาคต สุจริต ทุจฺจริตา รมฺมณมฺปิ กปฺเปนฺติ. ตํ ปฏิกฺขิปนฺโต ‘‘เตนา’’ติอาทิมาห[Pg.95]. มหานิทฺเทสปาเฐ ทฺวีหากาเรหิ อุปฺปชฺชติ กุกฺกุจฺจํ เจตโส วิปฺปฏิสาโร มโนวิเลโขติ ปาโฐ. ‘‘กตตฺตา จา’’ติ อกตฺตพฺพสฺส กตตฺตา จ. ‘‘อกตตฺตา จา’’ติ กตฺตพฺพสฺส อกตตฺตา จ. เกจิ ปน อยํ วิปฺปฏิสาโร นาม กทาจิ กสฺสจิ เกนจิ การเณน ปุพฺเพกต สุจริตมฺปิ อกต ทุจฺจริตมฺปิ อารพฺภ อุปฺปชฺชติ. อุมฺมตฺตกสทิสญฺหิ ปุถุชฺชน จิตฺตนฺติ วทนฺติ. ตํ ปฏิกฺขิปนฺโต ‘‘เอเตนา’’ติอาทิมาห. โส ปน เกสญฺจิ วาเท วิปฺปฏิสาโร นาม โทมนสฺสํ โหติ, น กุกฺกุจฺจนฺติ อธิปฺปาโย. โสจ โข ทฺวิธา ภาโว. อปายภเยน ตชฺชียนฺติ ตาสียนฺตีติ อปายภย ตชฺชิตา. ‘‘น อญฺเญสํ’’ติ สุจริต ทุจฺจริตํ อชานนฺตานํ อมนสิกโรนฺตานญฺจ น โหติ. กถํ วิญฺญายตีติ เจ. สุจริตทุจฺจริต นาเมน อนุโสจนาการสฺส ทสฺสิตตฺตาติ วุตฺตํ ‘‘อกตํ เม’’ติอาทิ. ยาถาวมาโน นาม เสยฺยสฺส เสยฺโย หมสฺมีติ สทิสสฺส สทิโสหมสฺมีติ หีนสฺส หีโนหมสฺมีติอาทินา ปวตฺโต ภูตมาโน. ยญฺจกุกฺกุจฺจํ อุปฺปชฺชตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อกตฺวา’’ติ ตํ กลฺยาณ กมฺมํ อกตฺวา. ‘‘กตฺวา’’ติ ตํ ปาปกมฺมํ กตฺวา. อิทํ ปน ปุพฺเพกตา กตกาเล เอว อยาถาวํ โหติ. อนุโสจน กาเลปน ยาถาวเมว. ‘‘หตฺถ กุกฺกุจฺจํ’’ติ เอตฺถ สงฺโกจนตฺโถ น ลพฺภติ. กุจฺฉิต กิริยตฺโถ เอว ลพฺภติ. หตฺถโลลตาหิ หตฺถ กุกฺกุจฺจนฺติ วุจฺจติ. ปาทโลลตา จ ปาทกุกฺกุจฺจํ. เตนาห ‘‘อสํยต กุกฺกุจฺจํ นามา’’ติ. ยํ ปน กุกฺกุจฺจํ. ‘‘ตํ’’ติ ตํ วตฺถุํ. กุกฺกุจฺจํ กโรนฺตีติ กุกฺกุจฺจายนฺตา. นามธาตุ ปทญฺเหตํ. กปฺปติ นุ โข, น นุ โข กปฺปตีติ เอวํ วินย สํสยํ อุปฺปาเทนฺตาติ อตฺโถ. ‘‘กุกฺกุจฺจปฺปกตตายา’’ติ กุกฺกุจฺเจน อปกตตาย อภิภูตตาย. ‘‘อตฺตโน อวิสเย’’ติ อาณาจกฺกฐาเน. อาณาจกฺก สามิโน พุทฺธสฺสวิสยตฺตา อตฺตโน สาวก ภูตสฺส อวิสเยติ อตฺโถ. เย ปน กโรนฺติเยว กุกฺกุจฺจายนฺตา ปีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อาปตฺตึ’’ติ ทุกฺกฏาปตฺตึ. ९३. ‘कुक्कुच्च’ (पश्चात्ताप/खंत) या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. “क्रिया कृतम्” (क्रिया केली गेली) हे ‘कृत’ (कत) या शब्दाच्या भाव-साधनाला (अस्तित्वाला) दर्शवते. अशा प्रकारे शब्दाचा अर्थ दर्शवून, अभिधेय अर्थ (मुख्य अर्थ) दर्शवताना “अत्थतो पन” (अर्थातून तर) इत्यादी म्हटले आहे. “अनुसोचन वसेन” (अनुशोचना किंवा पश्चात्तापाच्याद्वारे) म्हणजे नंतर वारंवार होणाऱ्या चित्ताच्या संतापाच्या (तगमगीच्या) द्वारे. त्याला ‘कुकत’ (वाईट रीतीने केलेले) म्हटले जाते, असा संबंध आहे. “कुसल धम्मेसु” (कुशल धर्मांमध्ये) म्हणजे पुण्यक्रियावस्तू रूपी धर्मांमध्ये चित्ताच्या परियादानासाठीच (चित्त संकुचित किंवा ग्रासून टाकण्यासाठीच) ते कारणीभूत ठरते. कुक्कुच्च (पश्चात्ताप/संशय) युक्त असलेला पुद्गल (व्यक्ती) पुण्यकर्म करत असतानाही चित्ताचे सुख प्राप्त करत नाही. बहुजनांच्या (अनेक लोकांच्या) मध्ये राहून, विविध कामे करत आणि विविध तिरच्छान कथा (निरर्थक गप्पा) मारत तो चित्ताचे सुख मिळवतो. तेव्हा त्याचे पुण्यकर्म करण्याच्या हेतूने असलेले चित्त परियादीत (ग्रासले) जाते, क्षीण होते. तो चित्ताच्या अधीन होऊन वावरतो. अशा प्रकारे ते चित्ताच्या परियादानासाठीच (चित्त ग्रासण्यासाठीच) कारणीभूत ठरते. “अट्ठकथायं” (अट्ठकथेत) म्हणजे ‘अट्ठसालिनी’ मध्ये. “कतात कतस्स सावज्जानवज्जस्स” (केलेल्या आणि न केलेल्या, सदोष आणि निर्दोष कर्माच्या) म्हणजे पूर्वी केलेल्या सावज्ज (सदोष/पाप) कर्माच्या आणि न केलेल्या अनवज्ज (निर्दोष/पुण्य) कर्माच्या. येथे कर्म अर्थामध्ये षष्ठी विभक्ती (सामीवचन) आहे. “अभिमुखगमनं” (अभिमुख जाणे) म्हणजे आलंबन (विषय) करण्याच्या द्वारे चित्ताचे त्या विषयाकडे अभिमुख प्रवृत्त होणे. याद्वारे प्रतिमुख स्मरण, चिंतन आणि प्रतिसार (पश्चात्ताप) दर्शवला जातो. “अकतं न करोति” (न केलेले करत नाही) याचा अभिप्राय असा आहे की, ‘न केलेले कर्म करण्यास तो असमर्थ ठरतो’. “कतं न करोति” (केलेले करत नाही) या बाबतीतही असाच अभिप्राय आहे. “विरूपो” (विरूप) म्हणजे बीभत्स, अशोभनीय. “कुच्छितो” (कुत्सित/निंद्य) म्हणजे गर्हणीय (निंदा करण्यायोग्य). शंका अशी की, पूर्वी ‘चित्तोत्पाद’ (चित्तुप्पाद) हा कुत्सित (वाईट) आहे असे म्हटले होते. परंतु अट्ठकथेत ‘विप्पटिसार’ (पश्चात्ताप) हा कुत्सित आहे असे म्हटले आहे. मग हे दोन्ही जुळत नाहीत का? नाही, असे नाही की ते जुळत नाहीत; कारण दुसऱ्या प्रकारे ते सिद्ध होऊ शकत नाही, हे दर्शवण्यासाठी “एत्थ च” (आणि येथे) इत्यादी म्हटले आहे. “येन च कारणेन” (आणि ज्या कारणाने) म्हणजे केलेल्या आणि न केलेल्या कर्माला अनुसरून निरर्थक चित्तप्रवृत्तीच्या कारणाने. तो चित्तोत्पादच ‘कुकत’ या पदामध्ये ग्रहण करणे योग्य आहे, ‘विभावनी’ (टीका) मध्ये सांगितल्याप्रमाणे ‘केलेले-न केलेले, दुश्चरित-सुचरित’ असे नाही, असा अभिप्राय आहे. जर असे म्हटले की, विभावनीमध्ये देखील तो चित्तोत्पादच उपचार-नयाने (लाक्षणिक अर्थाने) ग्रहण केला आहे का? युक्तीच्या आधारे आणि अट्ठकथेच्या आगमाद्वारे (परंपरेद्वारे) जेव्हा मुख्य रूपाने ते सिद्ध होत असताना, उपचार-नयाची (लाक्षणिक अर्थाची) काय गरज? म्हणूनच “विभावनियं पन” (विभावनीमध्ये तर) इत्यादी म्हटले आहे. ‘कुकत’ चा भाव म्हणजे ‘कुक्कुच्च’ होय, येथे ‘अ’ काराचा ‘उ’ कार करून हा शब्द बनला आहे, हा अट्ठकथेचा नय (पद्धत) आहे. आता व्याकरणशास्त्राच्या (सद्दसत्थ) नियमांनुसार दुसरा शब्दार्थ आणि अभिप्रेत अर्थ दर्शवण्यासाठी “अपि च” (शिवाय) इत्यादी सुरू केले आहे. त्यामध्ये “धातुपाठेषु” (धातुपाठांमध्ये) म्हणजे अक्षरे आणि धातूंचे प्रकटीकरण करणाऱ्या निरुक्ती पाठांमध्ये. ते पठण करतातच, पठण करत नाहीत असे नाही. आणि ते अर्थ पाळीमध्ये सांगितलेल्या “चेतसो विप्पटिसारो” (चित्ताचा पश्चात्ताप) आणि “मनो विलेखो” (मनाचा संकोच/खंत) या कुक्कुच्चाच्या पर्यायी शब्दांशी जुळतातच. म्हणून हा दुसरा नय (पद्धत) येथे अवश्य सांगितलाच पाहिजे, असे ते स्पष्ट करतात. आणि विप्पटिसारी (पश्चात्ताप करणारा) पुद्गल ते ते पुण्यकर्म करत असतानाही, पश्चात्तापाच्या अग्नीने त्याचे चित्त जळत असल्यामुळे, पुण्यकर्मामध्ये चित्ताचा प्रसाद (प्रसन्नता) प्राप्त करू शकत नाही. तो चित्ताचे सुख अनुभवत नाही. “या कर्माचा काय उपयोग?” असा विचार करून, त्याचा त्याग करून जेथे त्याला चित्ताचे सुख मिळते, तेथे तो वावरतो. अशा प्रकारे विप्पटिसार (पश्चात्ताप) म्हणजे पुण्यकर्मापासून संकोच पावणे (मागे हटणे) होय. “किलेससल्लikhन” (क्लेशांचे संलेखन/क्षय करणे) म्हणजे संतुष्टी आणि संलेख-प्रतिपत्तीमध्ये (तपस्येमध्ये) स्थित असलेल्या व्यक्तीच्या तदंग-प्रहाण (तात्पुरता त्याग) इत्यादींच्या द्वारे त्या त्या क्लेशांचा त्याग करणे होय. “अनुत्थुननाकारेण” (अनुत्थुनन आकाराने) म्हणजे वारंवार विलाप करण्याच्या स्वरूपात. “तो संकोच पावतो” असे सांगून, त्याचे दोन्ही अर्थ दर्शवताना “कुसलकम्म समादाने” (कुशल कर्माच्या समादानामध्ये) इत्यादी म्हटले आहे. ते (चित्ताला कुशल कर्माकडे) झुकू देखील देत नाही. मग ते समादान (स्वीकार) करण्यास किंवा वाढवण्यास कसे काय देईल? असा अभिप्राय आहे. “तनुकरणेन” (तनु करण्याद्वारे) म्हणजे दुर्बळ करण्याद्वारे. येथे विशेषण अर्थामध्ये तृतीया विभक्ती (करण वचन) आहे. “सो” (तो) म्हणजे धर्मसमूह. परंतु ते कुक्कुच्च होय. परंतु काही लोक कुक्कुच्चाला वर्तमानकाळातील सुचरित-दुश्चरित आलंबन (विषय) असणारे आणि भविष्यकाळातील सुचरित-दुश्चरित आलंबन असणारे देखील मानतात. त्याचे खंडन करताना “तेन” (त्यामुळे) इत्यादी म्हटले आहे. महानिद्देस पाठात “दोन प्रकारांनी कुक्कुच्च, चित्ताचा विप्पटिसार आणि मनोविलेख उत्पन्न होतो” असा पाठ आहे. “कतत्ता च” (केल्यामुळे) म्हणजे न करण्यायोग्य कर्म केल्यामुळे. “अकतत्ता च” (न केल्यामुळे) म्हणजे करण्यायोग्य कर्म न केल्यामुळे. परंतु काही लोक म्हणतात की, हा विप्पटिसार (पश्चात्ताप) कधीतरी, कोणालातरी, कोणत्यातरी कारणाने पूर्वी केलेल्या सुचरिताला किंवा न केलेल्या दुश्चरिताला आरंभ करून (उद्देशून) उत्पन्न होतो. कारण ते म्हणतात की, पृथग्जनाचे (पुथुज्जनाचे) चित्त हे वेड्यासारखे असते. त्याचे खंडन करताना “एतेन” (याद्वारे) इत्यादी म्हटले आहे. परंतु काहींच्या मतानुसार तो विप्पटिसार म्हणजे ‘दोमनस्स’ (दौर्मनस्य/दुःख) आहे, कुक्कुच्च नाही, असा अभिप्राय आहे. आणि तो भाव निश्चितच दोन प्रकारचा आहे. “अपायभयाने तर्जित” म्हणजे अपायभयाने भयभीत झालेले, त्रस्त झालेले. “न अञ्ञेसं” (इतरांचे नाही) म्हणजे जे सुचरित आणि दुश्चरित जाणत नाहीत किंवा त्यावर मनसिकार (लक्ष केंद्रित) करत नाहीत, त्यांना ते होत नाही. जर विचारले की, हे कसे जाणले जाते? सुचरित आणि दुश्चरित या नावाने अनुशोचना (पश्चात्ताप) करण्याचा प्रकार दर्शवला गेल्यामुळे “अकतं मे” (माझ्याकडून न केलेले) इत्यादी म्हटले आहे. ‘याथावमान’ (यथार्थ मान) म्हणजे श्रेष्ठापेक्षा “मी श्रेष्ठ आहे”, समानापेक्षा “मी समान आहे”, आणि हीनापेक्षा “मी हीन आहे” इत्यादी प्रकारे प्रवृत्त होणारा वास्तविक मान (अभिमान) होय. “आणि जे कुक्कुच्च उत्पन्न होते”, असा संबंध आहे. “अकत्वा” (न केल्यामुळे) म्हणजे ते कल्याणकारी (कुशल) कर्म न केल्यामुळे. “कत्वा” (केल्यामुळे) म्हणजे ते पापकर्म केल्यामुळे. परंतु हे पूर्वी केलेल्या किंवा न केलेल्या वेळीच अयथार्थ (असत्य) असते. परंतु अनुशोचना (पश्चात्ताप) करण्याच्या वेळी ते यथार्थच (सत्यच) असते. “हत्थ कुक्कुच्चं” (हातांची चंचलता/कुक्कुच्च) यामध्ये संकोच पावणारा अर्थ मिळत नाही. केवळ कुत्सित (वाईट) क्रियेचा अर्थच प्राप्त होतो. कारण हातांच्या चंचलतेलाच ‘हत्थ कुक्कुच्च’ म्हटले जाते. आणि पायांच्या चंचलतेला ‘पाद कुक्कुच्च’ म्हटले जाते. म्हणूनच “असंयत कुक्कुच्च” असे म्हटले आहे. परंतु जे कुक्कुच्च आहे. “तं” (ते) म्हणजे ती वस्तू (विषय). जे कुक्कुच्च (संशय/खंत) करतात त्यांना ‘कुक्कुच्चायन्त’ (शंका घेणारे) म्हणतात. कारण हे नामधातूचे पद आहे. “हे कल्पते (योग्य आहे) की नाही, हे कल्पत नाही का?” अशा प्रकारे विनय नियमांबद्दल संशय उत्पन्न करणे, असा याचा अर्थ आहे. “कुक्कुच्चप्पकतताय” (कुक्कुच्चाने प्रभावित झाल्यामुळे) म्हणजे कुक्कुच्चाने अभिभूत (व्याप्त) झाल्यामुळे. “अत्तनो अविषये” (स्वतःच्या विषयात नसणे) म्हणजे आज्ञाचक्राच्या (शासनाच्या) ठिकाणी. आज्ञाचक्राचे स्वामी असलेल्या बुद्धांचा तो विषय असल्यामुळे, स्वतः श्रावक असलेल्या व्यक्तीचा तो विषय नाही, असा अर्थ आहे. परंतु जे करतातच, ते देखील शंका घेतात (कुक्कुच्चायन्त), असा अभिप्राय आहे. “आपत्तिं” (आपत्ती) म्हणजे दुक्कट आपत्ती (दुष्कृत अपराध). ๙๔-๙๕. ถินมิทฺธวจนตฺเถสุ. ‘‘จิตฺตํ มนฺทมนฺทํ กตฺวา’’ติ จินฺตน กิจฺเจ อติมนฺทํ ปริทุพฺพลํ กตฺวา. จิตฺตํ คิลานํ มิลาตํ กตฺวาติ [Pg.96] วุตฺตํ โหติ. ‘‘อชฺโฌตฺถรตี’’ติ อภิภวติ. อารมฺมณ วิชานเน วา ชวนกิจฺเจ วา ปริหีนถามพลํ กโรติ. ‘‘ถิยตี’’ติ ปทํ ปาฬิวเสน สิทฺธนฺติ อาห ‘‘ถินํ ถิยนา’’ติอาทึ. ‘‘อกมฺมญฺญภูเต กตฺวา’’ติ กายกมฺมาทีสุ อกมฺมกฺขเม ปริทุพฺพเล กตฺวา. [มุคฺคเรน โปเถตฺวา วิยาติ วุตฺตํ โหติ ]. ‘‘เต’’ติ จิตฺต เจตสิเก สมฺปยุตฺต ธมฺเม. ‘‘โอลียาเปตฺวา’’ติ อวลีเน อวสีทนฺเต กตฺวา. เตนาห ‘‘อิริยา ปถํ ปี’’ติอาทึ. ถินํ จิตฺตํ อภิภวติ, วิชานน กิจฺจสฺส เคลญฺญตฺตา ถินสฺส. มิทฺธํ เจตสิเก อภิภวติ, ผุสนาทิ กิจฺจสฺส เคลญฺญตฺตา มิทฺธสฺสาติ อธิปฺปาโย. ९४-९५. ‘थीनमिद्ध’ (स्त्यान-मिद्ध) या शब्दांच्या अर्थाच्या बाबतीत. “चित्त मंद-मंद करून” म्हणजे चिंतन करण्याच्या कार्यात अत्यंत मंद आणि दुर्बळ करून. चित्ताला आजारी (ग्लान) आणि कोमेजलेले करून, असे म्हटले आहे. “अज्झोत्थरति” (आच्छादित करते) म्हणजे अभिभूत करते (दाबून टाकते). आलंबन (विषय) जाणण्याच्या कार्यात किंवा जवन-कार्यात (जवनकिच्च) शक्ती आणि बल नष्ट करते. “थियति” हे पद पाळि भाषेनुसार सिद्ध होते, म्हणून “थीनं थियना” (थीन म्हणजे स्तब्धता) इत्यादी म्हटले आहे. “अकम्मञ्ञभूते कत्वा” (अकर्मण्य करून) म्हणजे कायिक कर्म इत्यादींमध्ये अकार्यक्षम आणि अत्यंत दुर्बळ करून. [मुद्गलाने मारल्यासारखे, असे म्हटले आहे]. “ते” म्हणजे चित्त आणि चेतसिक या संप्रयुक्त धर्मांना. “ओलीयापेत्वा” म्हणजे संकुचित आणि अवनत (खाली बसलेले) करून. म्हणूनच “इरियापथं पि” (इर्यापथ देखील) इत्यादी म्हटले आहे. थीन (स्त्यान) चित्ताला अभिभूत करते, कारण थीन हे जाणण्याच्या कार्यातील ग्लानी (आजारपण) आहे. मिद्ध (आळस) चेतसिकांना अभिभूत करते, कारण मिद्ध हे स्पर्श इत्यादी कार्यातील ग्लानी आहे, असा अभिप्राय आहे. ๙๖. วิจิกิจฺฉาวจนตฺเถ. ‘‘จิกิจฺฉนํ’’ติ โรคาปนย นตฺเถ กิตธาตุวเสน สิทฺธํ สงฺขต กิริยา ปทนฺติ อาห ‘‘ญาณปฺปฏิกาโรติ อตฺโถ’’ติ. ‘‘ปฏิกาโร’’ติ จ โรคสฺส ปฏิปกฺข กมฺมํ. ‘‘เอตายา’’ติ นิสฺสกฺกวจนํ. วิจินนฺติ ธมฺมํ วิจินนฺตีติ วิจิโน. ธมฺม วีมํสกา. กิจฺฉติ กิลมติ เอตายาติ กิจฺฉา. วิจินํ กิจฺฉาติ วิจิกิจฺฉาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘สภาวํ’’ติอาทิมาห. ‘‘วิจิกิจฺฉตี’’ติ สงฺขตธาตุปทํ. ตญฺจ กงฺขายํ วตฺตตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘วิจิกิจฺฉติ วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ทฺวิธา เอฬยติ กมฺปตีติ ทฺเวฬกํ. ตถา ปวตฺตํ จิตฺตํ. ทฺเวฬกสฺส ภาโวติ วิคฺคโห. ‘‘พุทฺธาทีสุ อฏฺฐสู’’ติ พุทฺเธ กงฺขติ, ธมฺเม กงฺขติ, สงฺเฆ กงฺขติ, สิกฺขาย กงฺขติ, ปุพฺพนฺเต กงฺขติ, อปรนฺเต กงฺขติ, ปุพฺพนฺตา ปรนฺเต กงฺขติ, อิทปฺปจฺจยตา ปฏิจฺจ สมุปฺปนฺเนสุ ธมฺเมสุ กงฺขตีติ เอวํ วุตฺเตสุ อฏฺฐสุ สทฺเธยฺย วตฺถูสุ. ตตฺถ ‘‘พุทฺเธ กงฺขตี’’ติ อิติปิ โส ภควา อรหํติอาทินา วุตฺเตสุ พุทฺธคุเณสุ อสทฺทหนฺโต พุทฺเธ กงฺขติ นาม. สฺวากฺขาโต ภควตา ธมฺโมติอาทินา วุตฺเตสุ ธมฺม คุเณสุ อสทฺทหนฺโต ธมฺเม กงฺขติ นาม. สุปฺปฏิปนฺโน ภควโต สาวกสงฺโฆติอาทินา วุตฺเตสุ สงฺฆคุเณสุ อสทฺทหนฺโต สงฺเฆ กงฺขติ นาม. ติสฺสนฺนํ สิกฺขานํ วฏฺฏ ทุกฺขโต นิยฺยานฏฺเฐสุ อสทฺทหนฺโต สิกฺขาย กงฺขติ นาม. อตฺตโน อตีต ภวสฺส อตฺถิ นตฺถิภาเว กงฺขนฺโต ปุพฺพนฺเต กงฺขติ นาม. อตฺตโน ปรมฺมรณา อนาคต ภวสฺส อตฺถิ นตฺถิภาเว กงฺขนฺโต อปรนฺเต กงฺขติ นาม. ตทุภยสฺส อตฺถิ นตฺถิ ภาเว [Pg.97] กงฺขนฺโต ปุพฺพนฺตา ปรนฺเต กงฺขติ นาม. อิมสฺมึ ภเว อตฺตโน ขนฺธานํ ปฏิจฺจ สมุปฺปาเท จ ปฏิจฺจ สมุปฺปนฺนภาเว จ กงฺขนฺโต อิทปฺปจฺจยตา ปฏิจฺจ สมุปฺปนฺเนสุ ธมฺเมสุ กงฺขติ นาม. ‘‘วิมติ วเสนา’’ติ เวมติกภาเวน. ปวตฺตมานา วิจิกิจฺฉา. วิจิกิจฺฉา ปฏิรูปกา นาม สพฺพ ธมฺเมสุ อปฺปฏิหตพุทฺธีนํ สพฺพญฺญุ พุทฺธานํ เอว นตฺถีติ วุตฺตํ ‘‘อสพฺพญฺญูนํ’’ติอาทิ. ९६. ‘विचिकित्सा’ (विचिकिच्छा) या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. “चिकित्सन” म्हणजे रोगाचे निवारण करण्याच्या अर्थी ‘कित्’ धातूवरून सिद्ध झालेले क्रियापद आहे, म्हणून “ज्ञानप्रतिकार असा अर्थ आहे” असे म्हटले आहे. आणि “प्रतिकार” म्हणजे रोगाच्या विरुद्ध केलेले कार्य. “एताय” (याच्याद्वारे) हे अपादान विभक्तीचे वचन आहे. जे धर्माची निवड (विचय) करतात ते ‘विचिन्’ (विचारक) होत, म्हणजेच धर्माचे मीमांसक (परीक्षक). जिच्याद्वारे मनुष्य क्लेश पावतो किंवा थकून जातो ती ‘किच्छा’ (कृच्छा/क्लेश) होय. विचार करताना होणारा क्लेश म्हणजे ‘विचिकित्सा’ (विचिकिच्छा) हा अर्थ दर्शवताना “स्वभाव” इत्यादी म्हटले आहे. “विचिकिच्छति” हे धातूचे रूप आहे. आणि ते शंकेच्या (कांक्षेच्या) अर्थाने वापरले जाते हे दर्शवण्यासाठी “विचिकिच्छति वा” (किंवा शंका घेतो) इत्यादी म्हटले आहे. जे दोन प्रकारे कंपित होते (दोलायमान होते) ते ‘द्वेळक’ (द्वैध) होय. तसेच प्रवृत्त झालेले चित्त. ‘द्वेळकाचा भाव’ (द्विधा मनःस्थिती) हा विग्रह आहे. “बुद्ध इत्यादी आठ गोष्टींमध्ये” म्हणजे बुद्धांविषयी शंका घेतो, धर्माविषयी शंका घेतो, संघाविषयी शंका घेतो, शिक्षेविषयी (सिक्खा) शंका घेतो, पूर्वान्ताविषयी (भूतकाळाविषयी) शंका घेतो, अपरान्ताविषयी (भविष्याविषयी) शंका घेतो, पूर्वान्त-अपरान्ताविषयी शंका घेतो, आणि इदंप्रत्ययता-प्रतीत्यसमुत्पन्न धर्मांविषयी शंका घेतो, अशा प्रकारे सांगितलेल्या आठ श्रद्धा ठेवण्यायोग्य गोष्टींमध्ये (श्रद्धेय वस्तूंमध्ये). त्यामध्ये “बुद्धांविषयी शंका घेतो” म्हणजे ‘इतिपि सो भगवा अरहं’ इत्यादी गाथेने सांगितलेल्या बुद्धगुणांवर श्रद्धा न ठेवता बुद्धांविषयी शंका घेणे होय. ‘स्वाक्खातो भगवता धम्मो’ इत्यादीने सांगितलेल्या धर्मगुणांवर श्रद्धा न ठेवता धर्माविषयी शंका घेणे होय. ‘सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसंघो’ इत्यादीने सांगितलेल्या संघगुणांवर श्रद्धा न ठेवता संघाविषयी शंका घेणे होय. तीन शिक्षांच्या (शील, समाधी, प्रज्ञा) संसार-दुःखातून मुक्त करण्याच्या सामर्थ्यावर श्रद्धा न ठेवता शिक्षेविषयी शंका घेणे होय. स्वतःच्या भूतकाळातील अस्तित्वाच्या असण्या-नसण्याबद्दल शंका घेणे म्हणजे पूर्वान्ताविषयी शंका घेणे होय. स्वतःच्या मृत्यूनंतरच्या भविष्यकाळातील अस्तित्वाच्या असण्या-नसण्याबद्दल शंका घेणे म्हणजे अपरान्ताविषयी शंका घेणे होय. त्या दोन्हीच्या (भूतकाळ आणि भविष्यकाळ) असण्या-नसण्याबद्दल शंका घेणे म्हणजे पूर्वान्त-अपरान्ताविषयी शंका घेणे होय. या जन्मात स्वतःच्या स्कंधांच्या प्रतीत्यसमुत्पादाविषयी आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न भावाविषयी शंका घेणे म्हणजे इदंप्रत्ययता-प्रतीत्यसमुत्पन्न धर्मांविषयी शंका घेणे होय. “विमतीच्या वशाने” म्हणजे संशयात्मक भावाने प्रवृत्त होणारी विचिकित्सा होय. विचिकित्सेसारखी भासणारी (विचिकित्सा प्रतिरूपक) शंका ही सर्व धर्मांमध्ये अप्रतिहत बुद्धी असणाऱ्या सर्वज्ञ बुद्धांना कधीच नसते, म्हणूनच “असर्वज्ञांना” इत्यादी म्हटले आहे. อกุสลราสิมฺหิอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. अकुशल राशीवरील अनुदीपना (स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ๙๗. สทฺธาวจนตฺเถ. ‘‘สนฺนิสินฺนํ’’ติ อจลิตํ. ‘‘สุฏฺฐู’’ติ อนสฺสนฺตํ อจลนฺตญฺจ กตฺวา. ‘‘ธาเรตี’’ติ เอวเมว โหตีติ สลฺลกฺขณวเสน ธาเรติ. ตถา ฐเปตีติ. สทฺทหนฺติ วา สทฺธา สมฺปนฺนา สตฺตา. สทฺธาตุํ อรหนฺตีติ สทฺเธยฺยานิ. อกาลุสฺสํ วุจฺจติ อนาวิลํ จิตฺตํ. อกาลุสฺสํ เอว อกาลุสฺสิยํ. ตสฺส ภาโวติ วิคฺคโห. ‘‘โอกปฺปนา’’ติ อโหสาธุ อโหสุฏฺฐูติ อธิมุจฺจนวเสน จินฺตนา. ‘‘มิจฺฉาธิโมกฺโข เยวา’’ติ ทิฏฺฐิสมฺปยุตฺโต อธิโมกฺโขเยว. ‘‘วิตฺเต อสตี’’ติ ธเน อสติ. ธนญฺหิ วิตฺตนฺติ วุจฺจติ. ยํ ยํ อิจฺฉติ, ตํ ตํ วินฺทนฺติ เอเตนาติ กตฺวา. ‘‘เตสํ’’ติ มนุสฺสานํ. ९७. ‘श्रद्धा’ (सद्धा) या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. “सन्निसिन्नं” (स्थिर झालेले) म्हणजे अचलित. “सुट्ठु” (चांगल्या प्रकारे) म्हणजे नष्ट न होणारे आणि अचल करून. “धारेति” (धारण करते) म्हणजे ‘हे असेच आहे’ अशा लक्षणाने धारण करते. तसेच प्रस्थापित करते. किंवा जे श्रद्धा ठेवतात ते श्रद्धासंपन्न प्राणी होत. जे श्रद्धा ठेवण्यास योग्य आहेत ते ‘श्रद्धेय’ होत. ‘अकालुष्य’ म्हणजे निर्मळ (अनाविल) चित्त म्हटले जाते. अकालुष्य म्हणजेच अकालुष्यता. त्याचा भाव हा विग्रह आहे. “ओकप्पना” (अधिमुक्ती/दृढ विश्वास) म्हणजे ‘अहो साधू, अहो सुष्ठु’ अशा अधिमुक्तीच्या (निश्चयाच्या) भावनेने केलेले चिंतन. “मिच्छाधिमोक्खो येव” (मिथ्या अधिमोक्षच) म्हणजे दृष्टीशी (मिथ्या दृष्टीशी) संप्रयुक्त असलेला अधिमोक्षच होय. “वित्ते असति” म्हणजे धन नसताना. कारण धनालाच ‘वित्त’ म्हटले जाते. ज्याच्याद्वारे मनुष्य ज्या ज्या गोष्टीची इच्छा करतो, ती ती प्राप्त करतो म्हणून (त्याला वित्त म्हणतात). “तेसं” (त्यांच्या) म्हणजे मनुष्यांच्या. ๙๘. สติวจนตฺเถ. ‘‘สรตี’’ติ อนุสฺสรติ. ‘‘กตานี’’ติ ปุพฺเพกตานิ. ‘‘กตฺตพฺพานี’’ติ อิทานิ วา ปจฺฉา วา กตฺตพฺพานิ. กลฺยาณ กมฺมํ นามปกติยา จิตฺตสฺส รติฏฺฐานํ น โหติ. ปาป กมฺมเมว จิตฺตสฺส รติฏฺฐานํ โหติ. ตสฺมา กลฺยาณ กมฺเม เอว อปฺปมชฺชิตุํ วิสุํ สตินาม อิจฺฉิตพฺพา. ปาปกมฺเม ปน วิสุํ สติยา กิจฺจํ นตฺถิ. สพฺเพปิ จิตฺตเจตสิกา ธมฺมา อปมตฺต รูปา โหนฺติ. เตนาห ‘‘อิตราปนา’’ติอาทึ. ‘‘สติเยว น โหตี’’ติ วิสุํ สติ นามโก เอโก เจตสิโกเยว น โหติ. กตมา ปน สา โหตีติ อาห ‘‘กตสฺสา’’ติอาทึ. ตตฺถ กตสฺส อปฺปมชฺชนํ นาม เกสญฺจิ อนุโมทนวเสน เกสญฺจิ อนุโสจนวเสน อปฺปมชฺชนํ. กตฺตพฺพสฺส อปฺปมชฺชนํ นาม นิจฺจกาลมฺปิ กาตุํ อภิมุขตา. ‘‘กตสฺสา’’ติ [Pg.98] วา ภุมฺมตฺเถ สามิวจนํ. ตถา เสเสสุ ทฺวีสุ ปเทสุ. สพฺเพสุ ราชกมฺเมสุ นิยุตฺโต สพฺพกมฺมิโก. ‘‘นิยุตฺโต’’ติ อปฺปมตฺโต หุตฺวา พฺยาวฏกาย จิตฺโต. สพฺเพสุ ฐาเนสุ อิจฺฉิตพฺพาติ สพฺพตฺถิกา. สา หิ ฉสุ ทฺวาเรสุ จิตฺตสฺส อารกฺข กิจฺจา โหติ อินฺทฺริย สํวรณ ธมฺมตฺตา. ตสฺมา ฉสุ ทฺวาเรสุ อิฏฺฐารมฺมเณ โลภมูลจิตฺตสฺส อนุปฺปชฺชนตฺถาย สา อิจฺฉิตพฺพา, อนิฏฺฐา รมฺมเณ โทสมูล จิตฺตสฺส, มชฺฌตฺตารมฺมเณ โมหมูล จิตฺตสฺสาติ. อปิ จ, โพชฺฌงฺค ภาวนา ฐาเนสุ อิทํ สุตฺต ปทํ วุตฺตํ. ตสฺมา ภาวนา จิตฺตสฺส ลีนฏฺฐาเนปิ สา อิจฺฉิตพฺพา ลีนปกฺขโต จิตฺตสฺส นีวารณตฺถายาติอาทินา โยเชตพฺพา. ९८. ‘स्मृती’ (सति) या शब्दाच्या अर्थाच्या बाबतीत. “सरति” (स्मरण करते) म्हणजे अनुस्मरण करते. “कतानि” (केलेले) म्हणजे पूर्वी केलेले. “कत्तब्बानि” (करण्यायोग्य) म्हणजे आता किंवा नंतर करण्यायोग्य. कल्याणकारक कर्म हे सामान्यतः चित्ताच्या आनंदाचे (रतीचे) स्थान नसते. पाप कर्मच चित्ताच्या आनंदाचे स्थान असते. म्हणूनच कल्याणकारक कर्मामध्येच अप्रमाद राखण्यासाठी (जागरूक राहण्यासाठी) ‘स्मृती’ (सति) नावाच्या स्वतंत्र धर्माची आवश्यकता असते. परंतु पाप कर्मामध्ये स्वतंत्र स्मृतीचे काही कार्य नसते. सर्वच चित्त आणि चेतसिक धर्म हे अप्रमाद रूप (जागरूक) असतात. म्हणूनच “इतरा पना” (परंतु इतर) इत्यादी म्हटले आहे. “सतियेव न होति” म्हणजे स्वतंत्र स्मृती नावाचा एक चेतसिकच नसतो. मग ती कोणती असते? हे सांगण्यासाठी “कतस्स” (केलेल्याचे) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये केलेल्या कर्माचा अप्रमाद म्हणजे काहींच्या अनुमोदनाने आणि काहींच्या पश्चात्तापाने (अनुशोचनाने) होणारा अप्रमाद होय. करण्यायोग्य कर्माचा अप्रमाद म्हणजे नेहमीच ते करण्यासाठी तत्पर असणे. किंवा “कतस्स” हे सप्तमीच्या अर्थी षष्ठीचे वचन आहे. तसेच उर्वरित दोन पदांमध्येही आहे. सर्व राजकार्यांमध्ये नियुक्त असलेला तो ‘सब्बकम्मिक’ (सर्वकर्माधिकारी) होय. “नियुक्त” म्हणजे अप्रमत्त (जागरूक) होऊन कार्यात मग्न असलेले चित्त. सर्व ठिकाणी जिची आवश्यकता असते ती ‘सब्बत्थिका’ (सर्वार्थिका/सर्वत्र उपयुक्त) होय. कारण ती सहा द्वारांवर चित्ताच्या रक्षणाचे कार्य करते, कारण ती इंद्रिय संवराचा धर्म आहे. म्हणूनच सहा द्वारांवर इष्ट आलंबन (प्रिय विषय) असताना लोभमूलक चित्त उत्पन्न होऊ नये म्हणून, अनिष्ट आलंबन असताना द्वेषमूलक चित्त उत्पन्न होऊ नये म्हणून, आणि तटस्थ आलंबन असताना मोहमूलक चित्त उत्पन्न होऊ नये म्हणून तिची आवश्यकता असते. शिवाय, बोध्यंग भावनेच्या प्रसंगी हे सूत्रातील पद सांगितले आहे. म्हणूनच भावना-चित्ताच्या लीन (आळसयुक्त) अवस्थेतही, चित्ताला लीनतेपासून वाचवण्यासाठी तिची आवश्यकता असते, अशा प्रकारे योजना करावी. ๙๙-๑๐๐. หิริโอตฺตปฺปวจนตฺเถสุ. ‘‘กายทุจฺจริตาทีหิ ลชฺชตี’’ติ ตานิกาตุํ ลชฺชติ. ตานิ หีนกมฺมานิ ลามกกมฺมานีติ หีเฬตฺวา ตโต อตฺตานํ รกฺขิตุํ อิจฺฉติ. เตนาห ‘‘ชิคุจฺฉตี’’ติ. ‘‘อุกฺกณฺฐตี’’ติ วิรุชฺฌติ, วิโยคํ อิจฺฉติ. ‘‘เตหิ เยวา’’ติ กาย ทุจฺจริตาทีหิเยว. ‘‘อุพฺพิชฺชตี’’ติ อุตฺตสติ, ภยโต อุปฏฺฐาติ. คาถาสุ. ‘‘อลชฺชิเยสู’’ติ อลชฺชิตพฺเพสุ กลฺยาณ กมฺเมสุ. ‘‘ลชฺชเร’’ติ ลชฺชนฺติ. ‘‘อภเย’’ติ อภายิตพฺเพ กลฺยาณกมฺเม. ยสฺมา ปน สปฺปุริสา อตฺตานํ ปริหรนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘หิริยา อตฺตนิ คารวํ อุปฺปาเทตฺวา’’ติ อตฺตโน ชาติคุณาทิกํ วา สีล คุณาทิกํ วา ครุํ กตฺวา มาทิสสฺส เอว รูปํ ปาปกมฺมํ อยุตฺตํ กาตุํ. ยทิ กเรยฺยํ, ปจฺฉา อตฺตานํ อสุทฺธํ ญตฺวา ทุกฺขีทุมฺมโน ภเวยฺยนฺติ เอวํ หิริยา อตฺตนิ คารวํ อุปฺปาเทตฺวา. ‘‘โอตฺตปฺเปน ปเรสุ คารวํ อุปฺปาเทตฺวา’’ติ ปรานุวาทภยํ ภายิตฺวาติ อธิปฺปาโย. ตตฺถ ปรานุวาทภยํ นาม ปเรสํ สาธุ ชนานํ ครหา ภยํ. อญฺญมฺปิ อปายภยํ สํสาร วฏฺฏภยญฺจ เอตฺถ สงฺคยฺหติเยว. โลกํปาเลนฺตีติ โลกปาลา. ‘‘โลกํ’’ติ สตฺตโลกํ. ‘‘ปาเลนฺตี’’ติ อปาย ภยโต รกฺขนฺติ. ९९-१००. हिरिओत्तप्प (ह्री आणि अपत्राप्य) या शब्दांच्या अर्थांमध्ये: 'कायदुश्चरित इत्यादींमुळे लज्जित होतो' म्हणजे ती (पापकर्मे) करण्यास लज्जित होतो. ती हीन कर्मे, हलकी कर्मे आहेत असे मानून (त्यांचा तिरस्कार करून) त्यांपासून स्वतःचे रक्षण करण्याची इच्छा करतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'जिगुच्छति' (घृणा करतो). 'उक्कण्ठति' म्हणजे विरोध करतो, वियोगाची (त्यांच्यापासून दूर होण्याची) इच्छा करतो. 'तेहि येव' म्हणजे कायदुश्चरित इत्यादींपासूनच. 'उब्बिज्जति' म्हणजे भयभीत होतो, भयाने ग्रासतो. गाथांमध्ये: 'अलज्जियेसु' म्हणजे लज्जित न होण्याजोग्या कल्याणकारी कर्मांमध्ये. 'लज्जरे' म्हणजे लज्जित होतात. 'अभये' म्हणजे भय न बाळगण्याजोग्या कल्याणकारी कर्मामध्ये. कारण सत्पुरुष स्वतःला (पापापासून) दूर ठेवतात, असा संबंध आहे. 'हिरिया अत्तनि गारवं उप्पादेत्वा' (ह्रीद्वारे स्वतःमध्ये आदर निर्माण करून) म्हणजे स्वतःचे कुल, गुण इत्यादी किंवा शील, गुण इत्यादींना श्रेष्ठ मानून, 'माझ्यासारख्या व्यक्तीला अशा प्रकारचे पापकर्म करणे अयोग्य आहे; जर मी ते केले, तर नंतर स्वतःला अशुद्ध जाणून दुःखी व खिन्न होईन,' अशा प्रकारे ह्रीद्वारे स्वतःमध्ये आदर निर्माण करून. 'ओत्तप्पेन परेषु गारवं उप्पादेत्वा' (ओत्तप्पद्वारे इतरांबद्दल आदर निर्माण करून) म्हणजे पर-निंदेच्या भयाने भयभीत होऊन, असा अभिप्राय आहे. तेथे 'पर-निंदेचे भय' म्हणजे इतर सज्जन लोकांच्या निंदेचे भय होय. इतरही अपाय-भय (नरकादी गतींचे भय) आणि संसारचक्र-भय यांचा येथे समावेश होतोच. जगाचे पालन करतात म्हणून 'लोकपाल'. 'लोकं' म्हणजे सत्त्वलोक (प्राणिमात्र). 'पालेन्ति' म्हणजे अपाय-भयापासून रक्षण करतात. ๑๐๑. อโลภวจนตฺเถ. อกาโร วิรุทฺธตฺโถติอาห ‘‘โลภปฺปฏิปกฺโข’’ติ. โลภสฺส ปฏิวิรุทฺโธติ อตฺโถ. ปฏิวิรุทฺธตา จ ปหายก ปหาตพฺพ ภาเวน เวทิตพฺพาติ ทสฺเสตุํ ‘‘โสหี’’ติอาทิมาห[Pg.99]. ตตฺถ โส เนกฺขมฺมธาตุวเสน หุตฺวา ปวตฺตตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘หิต สญฺญิเตสู’’ติ อิทํ เม อตฺถาย หิตาย สุขายาติ เอวํ สญฺญิเตสุ. ‘‘ลคฺคนวเสนา’’ติ อมุญฺจิตุกามตาวเสน. เตสฺเวว ปวตฺตตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ภวโภค สมฺปตฺติโย คูถราสึ วิย หีเฬตฺวา’’ติ อิทํ โพธิสตฺตานํ วเสน นิทสฺสน วจนํ. ตตฺถ ‘‘หีเฬตฺวา’’ติ ครหิตฺวา. นิกฺขมนฺติ เอเตนาติ เนกฺขมฺโม. โส เอว ธาตูติ เนกฺขมฺมธาตุ. १०१. अलोभ या शब्दाच्या अर्थामध्ये: 'अ' हा कार (उपसर्ग) विरुद्ध अर्थी आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'लोभप्पटिपक्खो' (लोभाचा प्रतिपक्ष/विरोधी). लोभाच्या अत्यंत विरुद्ध असलेला, असा अर्थ आहे. आणि ही विरुद्धता 'त्याग करणारा' (प्रहाता) आणि 'त्याग केला जाणारा' (प्रहातव्य) या भावाने जाणून घ्यावी, हे दर्शवण्यासाठी 'सो हि' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे त्याचा संबंध 'तो नैष्क्रम्यधातूच्या (नेक्खम्मधातु) रूपाने होऊन प्रवृत्त होतो' असा आहे. 'हितसञ्ञितेसु' म्हणजे 'हे माझ्या कल्याणासाठी, हितासाठी आणि सुखासाठी आहे' अशा प्रकारे समजल्या गेलेल्या गोष्टींमध्ये. 'लग्गनवसेन' म्हणजे न सोडण्याच्या इच्छेच्या (आसक्तीच्या) वशाने. त्यांचा संबंध 'त्यांच्यामध्येच प्रवृत्त होतो' असा आहे. 'भवभोग संपत्तीचा विष्ठेच्या ढिगाऱ्याप्रमाणे तिरस्कार करून' हे बोधिसत्त्वांच्या संदर्भात उदाहरणाचे वचन आहे. तेथे 'हीळेत्वा' म्हणजे तिरस्कार करून (निंदा करून). ज्याच्याद्वारे निष्क्रमण (बाहेर पडणे) करतात ते 'नेक्खम्म' (नैष्क्रम्य) होय. तोच धातू म्हणजे 'नेक्खम्मधातु' (नैष्क्रम्यधातु) होय. ๑๐๒. อยํ นโย โทสปฺปฏิปกฺโข, โมหปฺปฏิปกฺโขติอาทีสุปิ เนตพฺโพ. १०२. हाच नियम 'दोष-प्रतिपक्ष' (द्वेषाचा विरोधी), 'मोह-प्रतिपक्ष' (मोहाचा विरोधी) इत्यादींच्या बाबतीतही लागू करावा. ๑๐๓. ตตฺร มชฺฌตฺตตายํ. ‘‘ลีนุทฺธจฺจานํ’’ติ จิตฺตสฺส ลีนตา เอโก วิสมปกฺโข. อุทฺธฏตา ทุตีโย วิสมปกฺโข. ลีนํ จิตฺตํ โกสชฺเช วิสมปกฺเข ปตติ. อุทฺธฏํ จิตฺตํ อุทฺธจฺเจ วิสมปกฺเข ปตติ. ตทุภยมฺปิ อกุสล ปกฺขิกํ โหติ. ตถา จิตฺตสฺส อติ ลูขตา เอโก วิสม ปกฺโข. อติปหฏฺฐตา เอโกติอาทินา สพฺพํ โพชฺฌงฺควิธานํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ตตฺร มชฺฌตฺตตา ปน สมฺปยุตฺต ธมฺเม อุโภสุ อนฺเตสุ ปาเตตุํ อทตฺวา สยํ มชฺฌิมปฺปฏิปทายํ ทฬฺหํ ติฏฺฐติ. १०३. तेथे मध्यस्थतेमध्ये (तत्र मज्झत्ततायं): 'लीन-उद्धच्चानं' म्हणजे चित्ताची लीनता (आळस/मंदता) हा एक विषम पक्ष (अयोग्य बाजू) आहे. उद्धतपणा (चंचलता) हा दुसरा विषम पक्ष आहे. लीन झालेले चित्त 'कोसज्ज' (आळस) या विषम पक्षात पडते. उद्धत झालेले चित्त 'उद्धच्च' (चंचलता) या विषम पक्षात पडते. हे दोन्हीही अकुशल पक्षाचे असतात. तसेच चित्ताचा अतिशय कोरडेपणा हा एक विषम पक्ष आहे, अतिशय हर्षित असणे हा दुसरा विषम पक्ष आहे, इत्यादी प्रकारे सर्व बोध्यंग-विधान सविस्तर सांगितले पाहिजे. परंतु तेथील मध्यस्थता (तत्रमज्झत्तता) संप्रयुक्त धर्मांना दोन्ही टोकांमध्ये पडू न देता, स्वतः मध्यम प्रतिपदेमध्ये दृढपणे स्थिर राहते. ๑๐๔. ปสฺสทฺธาทีสุ. ‘‘ตตฺถ ตํ วีนฺทนฺตี’’ติ เตสุ ปุญฺญ กมฺเมสุ ตํ จิตฺต สุขํ ปฏิลภนฺติ. १०४. प्रस्सद्धि (प्रश्रब्धि) इत्यादींमध्ये: 'तत्थ तं विन्दन्ति' म्हणजे त्या पुण्यकर्मांमध्ये ते त्या चित्तसुखाचा लाभ घेतात. ๑๐๕. ลหุตา ทฺวเย. ‘‘ตตฺตปาสาเณ’’ติ สนฺตตฺเต ปาสาณปิฏฺเฐ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ปุญฺญกมฺเมสุ. १०५. लहुता (लघुता) द्वयीमध्ये: 'तत्तपासाणे' म्हणजे तापलेल्या दगडाच्या पाठीवर (पृष्ठावर). 'तत्थ' म्हणजे पुण्यकर्मांमध्ये. ๑๐๖-๑๑๐. มุทุตา ทฺวยาทีสุ สพฺพํ สุวิญฺเญยฺยํ. १०६-११०. मुदुता (मृदुता) द्वयी इत्यादींमध्ये सर्व काही सहज समजण्याजोगे आहे. ๑๑๑. วิรติตฺตเย. ‘‘กถา, เจตนา, วิรติ, วเสนา’’ติ ‘กถาสมฺมาวาจา, เจตนา สมฺมาวาจา, วิรติ สมฺมาวาจา, วเสน. ตํ กถาวาจํ สมุฏฺฐาเปตีติ ตํ สมุฏฺฐาปิกา. ยา ปน ปาป วิรมณากาเรน จิตฺตสฺส ปวตฺตีติ โยชนา. ‘‘สมาทิยนฺตสฺส วา’’ติ มุสาวาทา วิรมามีติอาทินา วจีเภทํ กตฺวา สมาทิยนฺตสฺส วา. ‘‘อธิฏฺฐหนฺตสฺส วา’’ติ วจีเภทํ อกตฺวา จิตฺเตเนว ตถา อธิฏฺฐหนฺตสฺส วา. อิเมหิ ทฺวีหิ ปเทหิ สมาทาน วิรติปฺปวตฺตึ วทติ[Pg.100]. ‘‘อวีติกฺกมนฺตสฺส วา’’ติ เอเตน สมฺปตฺต วิรติปฺปวตฺตึ วทติ. ‘‘เอตายา’’ติ สมฺมาวาจา วิรติยา. สา ปน กตฺตุนา จ กฺริยาย จ สหภาวินี หุตฺวา สมาทาน กฺริยํ สุฏฺฐุตรํ สาเธติ. ตสฺมา สา กรณ สาธนํ นาม โหติ. เตนาห ‘‘กรณตฺเถวากรณ วจน’’นฺติ. พหูสุชวนวาเรสุ ปวตฺตมาเนสุ ปุริม ปุริม ชวนวารปริยาปนฺนา สมฺมาวาจา ปจฺฉิม ปจฺฉิม ชวนวารสมุฏฺฐิตาย สมาทาน กฺริยาย ปจฺจโย โหติ. สา ปน ตาย กฺริยาย อสหภาวิตฺตา กรณลกฺขณํ น สมฺปชฺชติ. เหตุ ลกฺขเณ ติฏฺฐติ. เตนาห ‘‘เหตุ อตฺเถวา กรณวจน’’นฺติ. อิทญฺจ อตฺถโต ลพฺภมานตฺตา วุตฺตํ. สมฺมาวาจาติ ปทํ ปน กิตสาธน ปทตฺตากรณตฺเถ เอวสิทฺธํ. น หิ อการก ภูโต เหตุ อตฺโถ สาธนํ นาม สมฺภวติ. ‘‘สมาทาน วจนานี’’ติ สมฺมาวาจา สมุฏฺฐิตานิ สมาทาน วจนานิ. ‘‘ตโต’’ติ ตโตปรํ. ‘‘เตสํ’’ติ เต สํวทมานานํ. อิทญฺจ สพฺพํ สมฺมาวาจาติ วจเน วจีเภทวาจํ ปธานํ กตฺวา วุตฺตํ. สมฺปตฺตวิรติ สมุจฺเฉท วิรติภูตาย ปน สมฺมาวาจาย วจีเภเทน กิจฺจํ นตฺถิ. วิรติ กิจฺจ เมวปธานนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘ปวตฺตมานา’’ติ ปวตฺตมานตฺตา. วิเสสน เหตุ ปทเมตํ. १११. विरती-त्रयीमध्ये (तीन प्रकारच्या विरतींमध्ये): 'कथा, चेतना, विरती यांच्या वशाने' म्हणजे 'कथा-सम्मावाचा (सम्यक्-वाचा), चेतना-सम्मावाचा, विरती-सम्मावाचा यांच्या वशाने'. जी त्या कथारूप वाणीला उत्थापित करते, ती 'तंसमुट्ठापिका' (तिची उत्थापक) होय. जी पापापासून परावृत्त होण्याच्या रूपाने चित्ताची प्रवृत्ती आहे, अशी योजना करावी. 'समादियन्तस्स वा' म्हणजे 'मी मृषावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) परावृत्त होतो' इत्यादी प्रकारे वाणीचा प्रयोग करून समादान (व्रत ग्रहण) करणाऱ्याचे. 'अधिट्ठहन्तस्स वा' म्हणजे वाणीचा प्रयोग न करता केवळ चित्तानेच तसा निश्चय करणाऱ्याचे. या दोन पदांद्वारे 'समादान-विरती'ची प्रवृत्ती सांगितली आहे. 'अवीतिक्कमन्तस्स वा' (अतिक्रमण न करणाऱ्याचे) याद्वारे 'संपत्त-विरती'ची (प्राप्त प्रसंगी होणारी विरती) प्रवृत्ती सांगितली आहे. 'एताय' म्हणजे या सम्यक्-वाचा विरतीद्वारे. ती कर्ता आणि क्रिया यांच्याशी सहगामी होऊन समादान-क्रियेला अधिक चांगल्या प्रकारे साध्य करते. म्हणून तिला 'करण साधन' म्हटले जाते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'करण अर्थामध्येच करण वचन आहे'. अनेक जवन-वारांमध्ये (चित्तवीथीच्या जवन क्षणांमध्ये) प्रवृत्त होत असताना, पूर्व-पूर्व जवन-वारांमध्ये समाविष्ट असलेली सम्यक्-वाचा ही उत्तर-उत्तर जवन-वारांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या समादान-क्रियेसाठी प्रत्यय (कारण) बनते. परंतु ती त्या क्रियेसोबत सहगामी नसल्यामुळे तिच्यात करण-लक्षण प्राप्त होत नाही, ती हेतू-लक्षणात राहते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'हेतूच्या अर्थामध्येच करण वचन आहे'. आणि हे अर्थाच्या दृष्टीने प्राप्त होत असल्यामुळे म्हटले आहे. 'सम्मावाचा' हे पद कृत्-साधन पद असल्यामुळे करण अर्थामध्येच सिद्ध होते. कारण अकारक असलेला हेतू-अर्थ साधन होऊ शकत नाही. 'समादान वचनानि' म्हणजे सम्यक्-वाचेने उत्थापित झालेली समादानाची वचने. 'ततो' म्हणजे त्यानंतर. 'तेसं' म्हणजे संभाषण करणाऱ्यांचे. आणि हे सर्व 'सम्मावाचा' या शब्दात वाणीच्या प्रयोगाला प्रधान मानून म्हटले आहे. परंतु संपत्त-विरती आणि समुच्छेद-विरती रूप असलेल्या सम्यक्-वाचेमध्ये वाणीच्या प्रयोगाचे काही काम नसते. तेथे विरतीचे कार्यच प्रधान असते, हे दर्शवण्यासाठी 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. 'पवत्तमाना' म्हणजे प्रवृत्त होत असल्यामुळे. हे विशेषण हेतू-पद आहे. ๑๑๒-๑๑๓. สมฺมากมฺมนฺเตปิ สมฺมาอาชีเวปิ วตฺตพฺพํ นตฺถิ. ११२-११३. सम्यक्-कर्मान्त आणि सम्यक्-आजीव यांच्या बाबतीतही काही वेगळे सांगण्यासारखे नाही. ๑๑๔. ‘‘สมฺปตฺตํ วตฺถุํ’’ติ ปาณาติ ปาตาทิกมฺมสฺส วตฺถุํ. สาปจฺจุปฺปนฺนารมฺมณาเยว. กสฺมา, อตฺตโน ปจฺจกฺเข สมฺปตฺต วเสนวตฺถุสฺสธรมานตฺตา. ‘‘สมาทิยนฺตสฺส วา อุปฺปนฺนา’’ติ ปาณาติ ปาตาปฏิวิรมาธีติอาทินา สมาทิยนฺตสฺสยา สมาทานกฺขเณ อุปฺปนฺนา วิรติ. ‘‘สา ปน ปจฺจุปฺปนฺนารมฺมณา โหตี’’ติ เอตฺถ กถํ ปจฺจุปฺปนฺนา รมฺมณา โหตีติ. ปาณาติ ปาตาปฏิวิรมาธีติ วทนฺตสฺส จิตฺตํ อนุกฺกเมน ปาณสทฺทาทีนํ อตฺถํ อารมฺมณํ กตฺวา ปวตฺตติ. ตตฺถ ‘‘ปาโณ’’ติ โวหารโต สตฺโต. ปรมตฺถโต ชีวิตินฺทฺริยํ. โส จ สตฺโต ตญฺจชีวิตินฺทฺริยํ โลเก สพฺพกาลมฺปิ สํวิชฺชติเยว. เอวรูปํ ชีวิตินฺทฺริย สามญฺญํ สนฺธาย ปจฺจุปฺปนฺนารมฺมณาติ วุตฺตํ. อทินฺนาทานา ปฏิวิรมาธีติอาทีสุปิ เอเสว นโย. ‘‘อนาคตา รมฺมณาวา’’ติ [Pg.101] เอตฺถ เอกทิวสํ นิยเมตฺวา สมาทิยนฺตสฺส ตสฺมึ ทิวเส ธรมาน สตฺตาปิ อตฺถิ. อุปฺปชฺชิสฺสมานสตฺตาปิ อตฺถิ. ตทุภยมฺปิ ปาณวจเน สงฺคหิตเมว. ปาณุเปตํ กตฺวา สมาทิยนฺตสฺส วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. อปิ จ อนาคตกาลิกมฺปิ สมาทานํ อตฺถิเยว. อหํ อสุกทิวสโต ปฏฺฐาย ยาวชีวมฺปิ ปาณาติปาตา วิรมาธีติอาทิ. เอวํ สมาทาน วิรติ อนาคตา รมฺมณาปิ โหตีติ. ‘‘ปจฺจยสมุจฺเฉทวเสนา’’ติ ตํ ตํ กิเลสานุสย สงฺขาตสฺส ปจฺจยสฺส สมุจฺเฉทวเสน. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ११४. “संपत्तं वत्थुं” (प्राप्त वस्तू) म्हणजे प्राणातिपात (जीवहिंसा) इत्यादी कर्माचा विषय होय. ती (विरती) केवळ वर्तमानकालीन आलंबन असणारीच असते. का? कारण स्वतःच्या प्रत्यक्ष समोर प्राप्त झालेल्या वस्तूच्या विद्यमानतेमुळे. “समादियन्तस्स वा उप्पन्ना” (किंवा समादान करणाऱ्याला उत्पन्न झालेली) म्हणजे प्राणातिपातापासून विरत होणे इत्यादींद्वारे समादान करणाऱ्या व्यक्तीला समादानाच्या क्षणी उत्पन्न झालेली विरती होय. “सा पन पच्चुप्पन्नारम्मणा होती” (पण ती वर्तमानकालीन आलंबन असणारी असते) यात 'ती वर्तमानकालीन आलंबन असणारी कशी होते?' प्राणातिपातापासून विरत होणे इत्यादी म्हणणाऱ्याचे चित्त अनुक्रमाने 'प्राण' (प्राणी) शब्दादींच्या अर्थाला आलंबन करून प्रवृत्त होते. तेथे “पाणो” (प्राण) म्हणजे व्यवहाराने 'सत्त्व' (प्राणी) होय. परमार्थाने ते 'जीवितेंद्रिय' होय. तो प्राणी आणि ते जीवितेंद्रिय जगात सर्वकाळ अस्तित्वात असतेच. अशा प्रकारच्या सामान्य जीवितेंद्रियाला उद्देशून 'वर्तमानकालीन आलंबन असणारी' असे म्हटले आहे. अदिन्नादानापासून (चोरीपासून) विरत होणे इत्यादींमध्येही हाच न्याय आहे. “अनागता रम्मणा वा” (किंवा भविष्यकालीन आलंबन असणारी) यात एका दिवसाचा नियम करून समादान करणाऱ्यासाठी त्या दिवशी विद्यमान असणारे प्राणीही असतात आणि उत्पन्न होणारे प्राणीही असतात. ते दोन्हीही 'प्राण' या शब्दात समाविष्टच आहेत. प्राण्याला उद्देशून समादान करणाऱ्यासाठी तर काही बोलण्याची गरजच नाही. शिवाय, भविष्यकालीन समादानही असतेच. “मी अमुक दिवसापासून घेऊन जन्मभर प्राणातिपातापासून विरत राहीन” इत्यादी. अशा प्रकारे समादान विरती भविष्यकालीन आलंबन असणारीही होते. “पच्चयसमुच्छेदवसेना” (प्रत्यय-समुच्छेदाच्या वशाने) म्हणजे त्या त्या क्लेशांच्या अनुसय संज्ञक प्रत्ययाचा (कारणाचा) समूळ उच्छेद करण्याच्या वशाने होय. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. ๑๑๕-๑๑๖. อปฺปมญฺญาทฺวเย. อปิจาติอาทีสุ. ‘‘กลิสมฺภเวภเว’’ติ ทุกฺขุปฺปตฺติปจฺจยภูเต สํสารภเว. ‘‘ปาเปกลิ ปราชเย’’ติ กลิสทฺโท ปาเป จ ปราชเย จ วตฺตตีติ อตฺโถ. สตฺเตหิ กลึ อวนฺติ รกฺขนฺติ เอตายาติ กรุณา. สตฺเตหีติ จ รกฺขณตฺถโยเค อิจฺฉิตสฺมึ อตฺเถ อปาทาน วจนํ. ยถา-กาเก รกฺขนฺติ ตณฺฑุลา-ติ. สตฺเตวา กลิโต อวนฺติ รกฺขนฺติ เอตายาติ กรุณา. กลิโตติ จ รกฺขณตฺถ โยเค อนิจฺฉิตสฺมิมฺปิ อปาทานวจนํ. ยถา-ปาปาจิตฺตํ นิวารเยติ. เอกสฺมึ สตฺเต ปวตฺตาปิ อปฺปมญฺญา เอว นาม โหนฺติ. ยถา ตํ สพฺพญฺญุตญฺญาณํ เอกสฺมึ อารมฺมเณ ปวตฺตมฺปิ สพฺพญฺญุตญฺญาณเมว โหตีติ. ११५-११६. दोन अप्पमञ्ञांमध्ये (अप्रमाणांमध्ये). 'अपि च' इत्यादींमध्ये. “कलिसम्भवभवे” म्हणजे दुःखाच्या उत्पत्तीला कारणीभूत असणाऱ्या संसारभवात होय. “पापे कलि पराजये” म्हणजे 'कलि' हा शब्द पापात आणि पराजयात वापरला जातो, असा अर्थ आहे. जिच्याद्वारे प्राण्यांचे कलीपासून (पाप किंवा पराजयापासून) रक्षण केले जाते, ती 'करुणा' होय. येथे 'सत्तेहि' (प्राण्यांपासून) हे रक्षणाच्या अर्थाच्या योगाने इच्छित अर्थामध्ये अपादान विभक्तीचे वचन आहे. जसे - “कावळ्यांपासून तांदळाचे रक्षण करतात” (काके रक्खन्ति तण्डुला). किंवा जिच्याद्वारे प्राण्यांचे कलीपासून रक्षण केले जाते, ती 'करुणा' होय. येथे 'कलितो' (कलीपासून) हे रक्षणाच्या अर्थाच्या योगाने अनच्छित अर्थामध्येही अपादान विभक्तीचे वचन आहे. जसे - “पापापासून चित्ताचे निवारण करतो” (पापा चित्तं निवारये). एका प्राण्यावर प्रवृत्त झाली तरी ती 'अप्पमञ्ञा' (अप्रमाण) च म्हटली जाते. जसे की, ते सर्वज्ञताज्ञान एका आलंबनावर प्रवृत्त झाले तरी सर्वज्ञताज्ञानच असते. ๑๑๗. ปญฺญินฺทฺริเย วตฺตพฺพํ นตฺถิ. ११७. प्रज्ञेंद्रियाच्या (पञ्ञिन्द्रिय) बाबतीत काही बोलण्यासारखे नाही. โสภณราสิมฺหิอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. शोभनराशीवरील अनुदीपनी समाप्त झाली. ๑๑๘. เอตํ ปริมาณํ อสฺสาติ เอตฺตาวํ. ‘‘เอตฺตาวตา’’ติ เอตฺตาวนฺเตน-ผสฺโส, เวทนา, สญฺญา,ติอาทิวจนกฺกเมน. ‘‘จิตฺตุปฺปาเทสู’’ติ เอตฺถ-กตเม ธมฺมา ทสฺสเนน ปหาตพฺพา. จตฺตาโร ทิฏฺฐิคตสมฺปยุตฺต จิตฺตุปฺปาทา-ติอาทีสุ จิตฺตเจตสิก สมูโห จิตฺตุปฺปาโทติ วุจฺจติ. อิธ ปน จิตฺตานิ เอว จิตฺตุปฺปาทาติ วุจฺจนฺตีติ อาห ‘‘จิตฺตุปฺปาเทสูติ จิตฺเตสุ อิจฺเจว อตฺโถ’’ติ. ‘‘สพฺพทุพฺพลตฺตา’’ติ สพฺพจิตฺเตหิ ทุพฺพลตรตฺตา. ‘‘ภาวนา พเลนา’’ติ วิตกฺก วิราคสตฺติ [Pg.102] ยุตฺเตน อุปจาร ภาวนา พเลน, วุฏฺฐาน คามินิ วิปสฺสนา ภาวนา พเลน จ. ‘‘พลนายกตฺตา’’ติ พล ธมฺมานํ นายกตฺตา, เชฏฺฐกตฺตา. ११८. “एवढे याचे परिमाण आहे” म्हणून 'एत्तावं' (एवढे). “एत्तावता” म्हणजे एवढ्याद्वारे - स्पर्श, वेदना, संज्ञा इत्यादी वचनक्रमाने होय. “चित्तुप्पादेसू” (चित्तोत्पादांमध्ये) येथे - “कोणते धर्म दर्शनाने प्रहातव्य (नष्ट करण्याजोगे) आहेत? चार दृष्टीगतसंप्रयुक्त चित्तोत्पाद” इत्यादींमध्ये चित्त आणि चैतसिकांच्या समूहाला 'चित्तोत्पाद' (चित्तुप्पाद) म्हटले जाते. परंतु येथे चित्तांनाच 'चित्तोत्पाद' म्हटले जाते, म्हणून “चित्तुप्पादेसूती चित्तेसु इच्चेव अत्थो” (चित्तोत्पादांमध्ये म्हणजे चित्तांमध्येच असा अर्थ आहे) असे म्हटले आहे. “सब्बदुब्बलत्ता” म्हणजे सर्व चित्तांपेक्षा अत्यंत दुर्बल असल्यामुळे होय. “भावना बलेना” म्हणजे वितर्क-विराग शक्तीने युक्त अशा उपचार-भावना बलाने आणि वुट्ठानगामिनी (व्युत्थानगामिनी) विपश्यना-भावना बलाने होय. “बलनायकत्ता” म्हणजे बलधर्मांचे नायकत्व (नेतृत्व) किंवा ज्येष्ठत्व असल्यामुळे होय. ๑๑๙. อกุสล เจตสิเกสุ. ‘‘ปจฺฉิมํ’’ติ สพฺเพสุปิ ทฺวาทสา กุสล จิตฺเตสูติ วจนํ. ‘‘ปุริมสฺสา’’ติ สพฺพา กุสล สาธารณา นามาติ วจนสฺส. ‘‘สมตฺตน วจนํ’’ติ-กสฺมา สพฺพากุสล สาธารณา นามาติ. ยสฺมา สพฺเพสุปิ. ล. จิตฺเตสุ ลพฺภนฺติ, ตสฺมา สพฺพา กุสล สาธารณา นามา-ติ เอวํ สาธน วจนํ. ยสฺมา ปน อิเมหิ จตูหิ วินานุปฺปชฺชนฺติ, ตสฺมา เต สพฺเพสุ เตสุ ลพฺภนฺตีติ โยชนา. กสฺมา วินา นุปฺปชฺชนฺตีติ อาห ‘‘น หิตานี’’ติอาทึ. ‘‘เตหี’’ติ ปาเปหิ. สพฺพ ปาป ธมฺมโตติ อตฺโถ. ‘‘ตถา ตถา อามสิตฺวา’’ติ ทิฏฺฐิ ขนฺเธสุ นิจฺโจ ธุโว สสฺสโตติอาทินา อามสติ. มาโน อหนฺติ วา เสยฺโย สทิโสติอาทินา วา อามสติ. เอวํ ตถา ตถา อามสิตฺวา. ‘‘เตสู’’ติ ทิฏฺฐิมาเนสุ. นิทฺธารเณ ภุมฺมํ. ทิฏฺฐิ ปรามสนฺตี ปวตฺตตีติ โยชนา. ‘‘ตํ คหิตาการ’’นฺติ ตํ อหนฺติ คหิตํ นิมิตฺตาการํ. สกฺกาย ทิฏฺฐิ เอว คติ เยสํ เต ทิฏฺฐิ คติกา. อวิกฺขมฺภิต สกฺกาย ทิฏฺฐิกา. ‘‘อหนฺติ คณฺหนฺตี’’ติ มาเนน คณฺหนฺติ. ‘‘น หิ มานสฺส วิยา’’ติ ยถา มานสฺส อตฺตสมฺปคฺคหเณ พฺยาปาโร อตฺถิ, น ตถา ทิฏฺฐิยา อตฺตสมฺปคฺคหเณ พฺยาปาโร อตฺถีติ โยชนา. เอตฺถ จ อตฺตสมฺปคฺคหณํ นาม ปเรหิ สทฺธึ อตฺตานํ เสยฺยาทิวเสน สุฏฺฐุปคฺคหณํ. ‘‘น จ ทิฏฺฐิยา วิยา’’ติ ยถา ทิฏฺฐิยา ธมฺมานํ อยาถาวปกฺขปริกปฺปเน พฺยาปาโร อตฺถีติ โยชนา. ตตฺถ อยาถาวปกฺโข นาม อตฺตา สสฺสโต อุจฺฉินฺโนติอาทิ. มจฺฉริยํ อตฺตสมฺปตฺตีสุ ลคฺคนโลภสมุฏฺฐิตตฺตา โลภสมฺปยุตฺตเมว สิยาติ โจทนํ ปริหรนฺโต ‘‘มจฺฉริยํ ปนา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘ตาสํ’’ติ อตฺตสมฺปตฺตีนํ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ११९. अकुशल चैतसिकांमध्ये (अकुसल चेतसिकेसु). “पच्छिमं” (पश्चिम/नंतरचे) म्हणजे “सर्व बारा अकुशल चित्तांमध्ये” हे वचन होय. “पुरिमस्सा” (पूर्वेचे/आधीचे) म्हणजे “सर्व अकुशल-साधारण नाम” या वचनाचे होय. “समत्तन वचनं” (साधन वचन) - “सर्व अकुशल-साधारण का म्हटले जाते?” कारण सर्वही... पे... चित्तांमध्ये ते आढळतात, म्हणून त्यांना 'सर्व अकुशल-साधारण' म्हटले जाते, असे हे साधन वचन आहे. परंतु ज्या अर्थी या चारांशिवाय ते उत्पन्न होत नाहीत, त्या अर्थी ते त्या सर्वांमध्ये आढळतात, अशी योजना करावी. “त्यांच्याशिवाय का उत्पन्न होत नाहीत?” म्हणून “न हि तानी” इत्यादी म्हटले आहे. “तेही” म्हणजे पापांनी होय. सर्व पापधर्मांमुळे असा अर्थ आहे. “तथा तथा आमसित्वा” (तशा तशा प्रकारे स्पर्श करून/ग्रहण करून) म्हणजे दृष्टी स्कंधांमध्ये 'नित्य, ध्रुव, शाश्वत' इत्यादी प्रकारे स्पर्श करते (ग्रहण करते). मान (अहंकार) 'मी' किंवा 'श्रेष्ठ, समान' इत्यादी प्रकारे स्पर्श करतो. अशा प्रकारे तशा तशा प्रकारे स्पर्श करून होय. “तेसू” (त्यांच्यामध्ये) म्हणजे दृष्टी आणि मानामध्ये होय. हे निर्धारण अर्थी सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. 'दृष्टी स्पर्श करत प्रवृत्त होते' अशी योजना आहे. “तं गहिताकारं” म्हणजे तो 'मी' असा ग्रहण केलेला निमित्ताकार होय. सत्कायदृष्टी (सक्काय दिट्ठि) हीच ज्यांची गती आहे, ते 'दृष्टीगतिक' होत. ज्यांची सत्कायदृष्टी विक्खंभित (शमित) झालेली नाही ते होत. “अहन्ति गण्हन्ति” (मी म्हणून ग्रहण करतात) म्हणजे मानाने ग्रहण करतात. “न हि मानस्स विया” म्हणजे ज्याप्रमाणे मानाचा आत्म-संप्रग्रहामध्ये (स्वतःला मोठे मानण्यात) व्यापार असतो, तसा दृष्टीचा आत्म-संप्रग्रहामध्ये व्यापार नसतो, अशी योजना आहे. येथे 'आत्म-संप्रग्रह' म्हणजे इतरांशी तुलना करून स्वतःला श्रेष्ठ इत्यादी मानून चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करणे होय. “न च दिट्ठिया विया” म्हणजे ज्याप्रमाणे दृष्टीचा धर्मांच्या अयथाभूत पक्षाच्या परिकल्पनेमध्ये व्यापार असतो, तसा (मानाचा नसतो), अशी योजना आहे. तेथे 'अयथाभूत पक्ष' म्हणजे 'आत्मा शाश्वत आहे, उच्छिन्न आहे' इत्यादी होय. “मत्सर (मच्छरिय) हे स्वतःच्या संपत्तीमध्ये आसक्त असणाऱ्या लोभापासून उत्पन्न होत असल्यामुळे ते लोभसंप्रयुक्तच असावे” या आक्षेपाचे परिहार करताना “मच्छरियं पना” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “तासं” म्हणजे स्वतःच्या संपत्तीचे होय. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. ๑๒๐. โสภณเจตสิเกสุ. ‘‘ตีสุ ขนฺเธสุ’’ติ สีลกฺขนฺธ สมาธิกฺขนฺธ ปญฺญากฺขนฺเธสุ จ. ‘‘สมฺมาทิฏฺฐิ ปจฺฉิมโก’’ติ สมฺมาทิฏฺฐิยา ปจฺฉโต อนุพนฺธโกติ อตฺโถ. สมฺมาทิฏฺฐิยา ปริวา รมตฺโตติ [Pg.103] วุตฺตํ โหติ. ‘‘ตสฺมึ อสติ ปี’’ติ ทุตียชฺฌานิก มคฺคาทีสุ ตสฺมึ สมฺมาสงฺกปฺเป อสนฺเตปิ. ‘‘สีลสมาธิกฺขนฺธ ธมฺเมสุ ปนา’’ติ ‘สมฺมาวาจา, สมฺมากมฺมนฺโต, สมฺมาอาชีโว,ติ อิเม ตโย ธมฺมา สีลกฺขนฺธ ธมฺมา นาม. สมฺมา วายาโม, สมฺมาสติ, สมฺมาสมาธี,ติ อิเม ตโย ธมฺมา สมาธิกฺขนฺธา นาม. อิเมสุ สีลกฺขนฺธ สมาธิกฺขนฺเธสุ. ‘‘เอโก เอกสฺส กิจฺจํ น สาเธตี’’ติ เตสุ สมฺมาวาจา สมฺมากมฺมนฺตสฺส กิจฺจํ น สาเธติ. สมฺมา อาชีวสฺส กิจฺจํ น สาเธติ. สมฺมากมฺมนฺโต จ สมฺมาวาจาย กิจฺจํ น สาเธตีติอาทินา สพฺพํ วตฺตพฺพํ. ‘‘สีเลสุ ปริปูรการิตา วเสนา’’ติ สีลปฺปฏิปกฺข ธมฺมานํ สมุจฺฉินฺทการิตา วเสนาติ อธิปฺปาโย. มุสาวาท วิรติ มุสาวาทเมว ปชหิตุํ สกฺโกติ. น อิตรานิ ปิสุณวาจาทีนีติ โยชนา. เอตฺถ สิยา. มุสาวาทวิรติ นาม กุสล ธมฺโม โหติ. กุสล ธมฺโม จ นาม สพฺพสฺส อกุสล ธมฺมสฺส ปฏิปกฺโข. เอกสฺมิมฺปิ กุสล ธมฺเม อุปฺปชฺชมาเน ตสฺมึ สนฺตาเน สพฺพานิ อกุสลานิ ปชหิตุํ สกฺโกนฺตีติ วตฺตพฺพานิ. อถ จ ปน มุสาวาท วิรติ มุสาวาทเมว ปชหิตุํ สกฺโกติ, น อิตรานีติ วุตฺตํ. กถมิทํ ทฏฺฐพฺพนฺติ. วุจฺจเต. ปชหิตุํ สกฺโกตีติ อิทํ ปญฺจสุ ปหาเนสุ ตทงฺคปฺปหาน วจนํ. ตทงฺคปฺปหานนฺติ จ เตน เตน กุสลงฺเคน ตสฺส ตสฺส อกุสลงฺคสฺส ปหานํ ตทงฺคปฺปหานํ นาม. อิทํ วุตฺตํ โหติ, อิธ สปฺปุริโส ปาณาติปาตา ปฏิวิรมามีติอาทินา วิสุํ วิสุํ สิกฺขาปทานิ สมาทิยิตฺวา ปาณาติ ปาตวิรติ สงฺขาเตน กุสลงฺเคน ปาณาติปาต สงฺขาตํ อกุสลงฺคํ ปชหติ. อทินฺนาทาน วิรติ สงฺขาเตน กุสลงฺเคน อทินฺนาทาน สงฺขาตํ อกุสลงฺคํ ปชหตีติอาทินา วิตฺถาเรตพฺพํ. เอกสฺมิมฺปิ กุสล ธมฺเม อุปฺปชฺชมาเน ตสฺมึ สนฺตาเน สพฺพานิ อกุสลานิ น อุปฺปชฺชนฺตีติ เอตฺถ ปน อโนกาสตฺตา เอว น อุปฺปชฺชนฺติ, น ปหานตฺตา. น หิ ตสฺมึ สนฺตาเน ตสฺมึ ขเณ ตานิ อกุสลานิ เอว น อุปฺปชฺชนฺติ. อถโข สพฺพานิ อญฺญานิ กุสล จิตฺตานิ จ น อุปฺปชฺชนฺติ. สพฺพานิ อพฺยากต จิตฺตานิ จ น อุปฺปชฺชนฺติ. ตานิ อโนกา สตฺตา เอว น อุปฺปชฺชนฺติ. น ปหานตฺตา น อุปฺปชฺชนฺติ. ตทงฺคปฺปหานาทิ วเสน ปน ปหานํ สนฺธาย อิธ [Pg.104] ปชหิตุํ สกฺโกติ-น สกฺโกตีติ วุตฺตํ. เอตฺตาวตา ตทงฺคปฺปหานํ นาม สุปากฏํ โหติ. มุสาวาท วิรติ มุสาวาทเมว ปชหิตุํ สกฺโกติ. น อิตรานีติ อิทญฺจ สุฏฺฐุ อุปปนฺนํ โหตีติ. ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ กายงฺคโจปนตฺถาย วาจงฺคโจปนตฺถาย จ ปวตฺตานิ กายวจีโจ ปน ภาคิยานิ นาม. กามาวจร กุสเลสฺเวว วิรติโย สนฺทิสฺสนฺติ. ‘‘กามาวจร กุสเลสุ ปี’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมวจนํ. กามภูมิยํ อุปฺปนฺเนสุ เอว กามาวจร กุสเลสุ สนฺทิสฺสนฺติ. ติวิธ กุหนวตฺถูนิ จ วิรมิตพฺพวตฺถุฏฺฐาเนฐิตานิ. เอตฺถ จ กุหนํ นาม วิมฺหาปนํ ลาภสกฺการ สิโลกตฺถาย มนุสฺสานํ นานามายาสาเฐยฺย กมฺมานิ กตฺวา อจฺฉริยพฺภุต ภาวกรณนฺติ วุตฺตํ โหติ. ตํ ปน ติวิธํ ‘ปจฺจยปฺปฏิเสวนกุหนญฺจ, สามนฺตชปฺปน กุหนญฺจ, อิริยา ปถสณฺฐา ปน กุหนญฺจ. ตตฺถ มหิจฺโฉเยว สมาโน อปฺปิจฺฉาการํ ทสฺเสตฺวา อาทิโต อาคตา คเต จตุปจฺจเย ปฏิกฺขิปิตฺวา ปจฺฉา พหุํ พหุํ อาคเต ปจฺจเย ปฏิคฺคณฺหาติ. อิทํ ปจฺจยปฺปฏิเสวน กุหนํ นาม. ปาปิจฺโฉเยว สมาโน อยํ ฌานลาภีติ วา อภิญฺญาลาภีติ วา อรหาติ วา ชโน มํ สมฺภาเวตูติ สมฺภาวนํ อิจฺฉนฺโต อตฺตานํ อุตฺตริ มนุสฺส ธมฺมานํ สนฺติเก เต วา อตฺตโน สนฺติเก กตฺวา วญฺเจติ. อิทํ สามนฺตชปฺปน กุหนํ นาม. ปาปิจฺโฉเยว สมาโน อยํ สนฺตวุตฺติ สมาหิโต อารทฺธวีริโยติ ชโน มํ สมฺภาเวตูติ สมฺภาวนํ อิจฺฉนฺโต อิริยา ปถ นิสฺสิตํ นานาวญฺจนํ กโรติ. อิทํ อิริยา ปถ สณฺฐาปน กุหนํ นาม. ‘‘สิกฺขาปทสฺส วตฺถูนี’’ติ สุรา ปาน วิกาล โภชน นจฺจคีตวาทิต ทสฺสน สวนาทีนิ. สุราเมรยปานา วิรมาธีติ สมาทิยนฺตสฺส สุราเมรยปาน เจตนา วิรมิตพฺพ วตฺถุ นาม. วิกาล โภชนา วิรมามีติ สมาทิยนฺตสฺส วิกาเล ยาวกาลิก วตฺถุสฺส ปริภุญฺชน เจตนา วิรมิตพฺพ วตฺถุ นาม. เสเสสุปิ เอเสว นโย. โลกุตฺตร จิตฺเตสุ. ‘สพฺพถาปี,ติ จ ‘นิยตา’ติ จ ‘เอกโต วา’ติ จ ตีณิ วิเสสนานิ. โลกิเยสุ ปน ‘กทาจี’ติ จ ‘วิสุํ วิสุํ’ติ จ ทฺเว ทฺเว วิเสสนานิ. ตตฺถ โลกุตฺตเรสุ ‘สพฺพถาปี’ติ อิทํ สมุจฺเฉทปฺปหาน ทสฺสนํ [Pg.105] โลกิเยสุปิ ตพฺพิปรีตํ ตทงฺคปฺปหาน ทสฺสนํ อธิปฺเปตนฺติ กตฺวา ‘‘เอเกก ทุจฺจริตปฺปหานวเสเน วา’’ติ วุตฺตํ. १२०. शोभन चेतसिकांमध्ये. 'तीन स्कंधांमध्ये' म्हणजे शीलस्कंध, समाधिस्कंध आणि प्रज्ञास्कंधांमध्ये. 'सम्यक् दृष्टी सर्वात शेवटी असणारी' म्हणजे सम्यक् दृष्टीच्या मागे अनुगमन करणारी, असा अर्थ आहे. सम्यक् दृष्टीचा केवळ परिवार (अनुयायी) आहे, असे म्हटले आहे. 'तो नसतानाही' म्हणजे द्वितीय ध्यान मार्ग इत्यादींमध्ये तो सम्यक् संकल्प नसतानाही. 'परंतु शील आणि समाधि स्कंधांच्या धर्मांमध्ये' - 'सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव' हे तीन धर्म शीलस्कंध धर्म म्हणून ओळखले जातात. सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी हे तीन धर्म समाधिस्कंध म्हणून ओळखले जातात. या शीलस्कंध आणि समाधिस्कंधांमध्ये. 'एक दुसऱ्याचे कार्य साध्य करत नाही' म्हणजे त्यांच्यामध्ये सम्यक् वाचा ही सम्यक् कर्मान्ताचे कार्य साध्य करत नाही. सम्यक् आजीवाचे कार्य साध्य करत नाही. आणि सम्यक् कर्मान्त हा सम्यक् वाचेचे कार्य साध्य करत नाही, इत्यादी सर्व सांगितले पाहिजे. 'शीलांमध्ये परिपूर्णता आणण्याच्या प्रभावाने' म्हणजे शीलाच्या विरोधी धर्मांचा समूळ उच्छेद करण्याच्या प्रभावाने, असा अभिप्राय आहे. मृषावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) विरती ही केवळ मृषावादाचाच त्याग करू शकते. पिशुनवाचा (चहाडी) इत्यादी इतरांचा नाही, अशी योजना आहे. येथे अशी शंका येऊ शकते. मृषावाद विरती हा कुशल धर्म आहे. आणि कुशल धर्म हा सर्व अकुशल धर्मांचा विरोधी असतो. एका जरी कुशल धर्माचा उदय झाला, तरी त्या संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) सर्व अकुशल धर्मांचा त्याग केला जाऊ शकतो, असे म्हटले पाहिजे. तरीसुद्धा, 'मृषावाद विरती केवळ मृषावादाचाच त्याग करू शकते, इतरांचा नाही' असे म्हटले आहे. हे कसे समजून घ्यावे? उत्तर दिले जाते. 'त्याग करू शकते' हे पाच प्रकारच्या प्रहाणांपैकी (त्यागांपैकी) 'तदंगप्रहाण' (विशिष्ट अंगाने त्याग) याविषयीचे वचन आहे. आणि तदंगप्रहाण म्हणजे त्या त्या कुशल अंगाने त्या त्या अकुशल अंगाचा त्याग करणे, याला तदंगप्रहाण म्हणतात. हे असे म्हटले आहे - येथे सत्पुरुष 'मी प्राणातिपातापासून (हिंसेपासून) अलिप्त राहतो' इत्यादी प्रकारे वेगवेगळी शिक्षापदे ग्रहण करून, प्राणातिपात-विरती नावाच्या कुशल अंगाने प्राणातिपात नावाच्या अकुशल अंगाचा त्याग करतो. अदत्तादान-विरती (चोरी न करणे) नावाच्या कुशल अंगाने अदत्तादान नावाच्या अकुशल अंगाचा त्याग करतो, अशा प्रकारे विस्तार करावा. एका जरी कुशल धर्माचा उदय झाला, तरी त्या संतानामध्ये सर्व अकुशल धर्म उत्पन्न होत नाहीत, येथे केवळ 'अवकाश (संधी) न मिळाल्यामुळे' ते उत्पन्न होत नाहीत, 'प्रहाणामुळे' (पूर्ण नाशामुळे) नाही. कारण त्या संतानामध्ये त्या क्षणी केवळ ते अकुशल धर्मच उत्पन्न होत नाहीत असे नाही. तर इतर सर्व कुशल चित्तेही उत्पन्न होत नाहीत. सर्व अव्याकृत चित्तेही उत्पन्न होत नाहीत. ती केवळ संधी न मिळाल्यामुळेच उत्पन्न होत नाहीत. प्रहाणामुळे (त्यागामुळे) ती उत्पन्न होत नाहीत असे नाही. परंतु तदंगप्रहाण इत्यादींच्या आधारे त्यागाचा संदर्भ घेऊन येथे 'त्याग करू शकते - करू शकत नाही' असे म्हटले आहे. एवढ्याने तदंगप्रहाण स्पष्ट होते. मृषावाद विरती केवळ मृषावादाचाच त्याग करू शकते. 'इतरांचा नाही' हे देखील योग्य प्रकारे सिद्ध होते. 'आणि येथे' इत्यादींमध्ये, काय-अंग हलवण्यासाठी आणि वाक्-अंग हलवण्यासाठी प्रवृत्त होणाऱ्यांना 'काय-वचन विस्पंद-भागी' (काय-वाचेच्या हालचालींशी संबंधित) म्हणतात. कामावचर कुशल चित्तांमध्येच विरती (विरतीचे प्रकार) दिसून येतात. 'कामावचर कुशलांमध्येही' हे निर्धारण अर्थातील सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. कामभूमीत उत्पन्न होणाऱ्या कामावचर कुशल चित्तांमध्येच त्या दिसून येतात. आणि तीन प्रकारच्या कुहनवस्तू (फसवणुकीच्या गोष्टी) या विरती घेण्याच्या वस्तूंच्या ठिकाणी स्थित असतात. आणि येथे 'कुहन' (फसवणूक/दंभ) म्हणजे लाभ, सत्कार आणि कीर्तीसाठी माणसांना विविध मायावी व कपटी कृत्ये करून आश्चर्यचकित करणे, असे म्हटले आहे. ते तीन प्रकारचे आहे - 'प्रत्यय-प्रतिसेवन कुहन' (प्रत्यय/साधनांच्या सेवनाने फसवणूक), 'सामन्तजल्पन कुहन' (अप्रत्यक्ष बोलण्याने फसवणूक) आणि 'इर्यापथ-संस्थापन कुहन' (शारीरिक हालचालींच्या प्रदर्शनाने फसवणूक). त्यामध्ये, एखादा अत्यंत लोभी असूनही अल्पेच्छ (कमी इच्छा असलेला) असल्याचा आव आणतो, सुरुवातीला आलेल्या चार प्रत्ययांचा (भिक्षूंच्या गरजांचा) नकार करतो आणि नंतर मोठ्या प्रमाणात आलेल्या प्रत्ययांचा स्वीकार करतो. याला 'प्रत्यय-प्रतिसेवन कुहन' म्हणतात. एखादा पापी इच्छेचा असूनही, 'हा ध्यान प्राप्त केलेला आहे' किंवा 'अभिज्ञा प्राप्त केलेला आहे' किंवा 'हा अर्हत आहे' असे लोकांनी मला मानावे अशी प्रतिष्ठा इच्छितो, आणि स्वतःला उत्तर-मनुष्य धर्माच्या जवळ दाखवून किंवा त्यांना स्वतःच्या जवळ आणून फसवणूक करतो. याला 'सामन्तजल्पन कुहन' म्हणतात. एखादा पापी इच्छेचा असूनही, 'हा शांत वृत्तीचा, समाहित आणि आरब्धवीर्य (प्रयत्नशील) आहे' असे लोकांनी मला मानावे अशी प्रतिष्ठा इच्छितो, आणि इर्यापथाचा (शारीरिक हालचालींचा) आश्रय घेऊन विविध प्रकारची फसवणूक करतो. याला 'इर्यापथ-संस्थापन कुहन' म्हणतात. 'शिक्षापदाच्या वस्तू' म्हणजे सुरापान (मद्यपान), विकालभोजन (अवेळी भोजन), नृत्य-गीत-वादित-दर्शन-श्रवण इत्यादी. 'मी सुरा-मेरय पानापासून अलिप्त राहतो' असे ग्रहण करणाऱ्यासाठी सुरा-मेरय पानाची चेतना ही विरती घेण्याची वस्तू आहे. 'मी विकालभोजनापासून अलिप्त राहतो' असे ग्रहण करणाऱ्यासाठी विकाल (अवेळी) यावकालिक वस्तूच्या उपभोगाची चेतना ही विरती घेण्याची वस्तू आहे. इतरांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. लोकोत्तर चित्तांमध्ये. 'सर्वथा', 'नियत' आणि 'एकत्र' ही तीन विशेषणे आहेत. परंतु लौकिक चित्तांमध्ये 'कदाचित' आणि 'वेगवेगळे' ही दोन-दोन विशेषणे आहेत. त्यामध्ये, लोकोत्तर चित्तांमध्ये 'सर्वथा' हे समूच्छेदप्रहाण (पूर्ण उच्छेद) दर्शवते, आणि लौकिक चित्तांमध्ये त्याच्या विपरीत तदंगप्रहाण दर्शवणे अभिप्रेत आहे, असे मानून 'एक-एक दुश्चरित्राच्या प्रहाणाच्या प्रभावाने' असे म्हटले आहे। ๑๒๑. อปฺปมญฺญาสุ. ‘‘วิภงฺเค’’ติ อปฺปมญฺญา วิภงฺเค. ‘‘การุญฺญปฺปกติกสฺสา’’ติ การุญฺญสภาวสฺส. ‘‘อนิสฺสุกิโน’’ติ อิสฺสาธมฺมรหิตสฺส. ถามคตา กรุณา โทส สมุฏฺฐิตํ วิหึสํ ปชหติ. ถามคตา มุทิตา โทสสมุฏฺฐิตํ อรตึ ปชหตีติ วุตฺตํ ‘‘วิหึสา อรตีนํ นิสฺสรณ ภูตา’’ติ. เอตฺถ จ อรติ นาม สุญฺญาคาเรสุ จ ภาวนา กมฺเมสุ จ นิพฺพิทา. โทส นิสฺสรเณ สติ โทมนสฺสนิสฺสรณมฺปิ สิทฺธเมว. นิสฺสรณญฺจ นาม ปฏิปกฺข ธมฺม สณฺฐาเนน โหติ. ตสฺมา ปุพฺพภาเคปิ อปฺปมญฺญาสุ นิจฺจํ โสมนสฺส สณฺฐานํ เวทิตพฺพนฺติ อธิปฺปาเยน ‘‘โทมนสฺสปฺปฏิปกฺขญฺจา’’ติอาทิมาห. ‘‘อฏฺฐกถายปิ สห วิรุทฺโธ’’ติ อฏฺฐสาลินิยํ อุเปกฺขา สหคต กามาวจร กุสล จิตฺเตสุ กรุณา มุทิตา ปริกมฺมกาเลปิ หิ อิเมสํ อุปฺปตฺติ มหาอฏฺฐกถายํ อนุญฺญาตา เอวา-ติ วุตฺตํ. ตาย อฏฺฐกถายปิ สห วิรุทฺโธ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ‘‘ปฏิกูลา รมฺมเณสุ ปน…เป… วตฺตพฺพเมว นตฺถี’’ติ ปฏิกูลา รมฺมณานิ นาม โสมนสฺเสน ทูเร โหนฺติ, ตถา ทุกฺขิต สตฺตา จ, ตสฺมา ตทา รมฺมณานิ อสุภ ภาวนา จิตฺตานิ จ กรุณา ภาวนา จิตฺตานิ จ อาทิโต อุเปกฺขา สหคตา เนวาติ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. ‘‘สาหิเวทนุเปกฺขา นามา’’ติ กามาวจร เวทนุเปกฺขา วุตฺตา. วิภาวนิปาเฐ, ‘‘อญฺญวิหิตสฺส ปี’’ติ อญฺญํ อารมฺมณํ มนสิกโรนฺตสฺสปิ. สชฺฌายนํ สมฺปชฺชติ, สมฺมสนํ สมฺปชฺชตีติ ปาฐเสโส. อิติ ตสฺมา. เอตฺถ สิยา ‘‘ตํ ปฏิกฺขิตฺตํ โหตี’’ติ กสฺมา วุตฺตํ. น นุ ตมฺปิ อุเปกฺขา สหคต จิตฺเตสุ กรุณา มุทิตานํ สมฺภวํ สาเธติ เยวาติ. สจฺจํ สาเธติเยว. เตน ปน ปริจย วเสน เตสุ ตาสํ สมฺภวํ ทีเปติ. อิธ ปน ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทินา ‘‘ปฏิกูลา รมฺมเณสู’’ติอาทินา จ ปริจเยน วินา ปกติยา ตาสํ อุเปกฺขา เวทนาย เอว สห ปวตฺติ พหุลตา วุตฺตาติ. ‘‘โยคกมฺม พเลนา’’ติ ยุญฺชน วีริย กมฺม พเลน. १२१. अप्पमञ्ञासु (अप्रमाणांमध्ये). 'विभङ्गे' म्हणजे अप्पमञ्ञा विभङ्गात. 'कारुञ्ञप्पकतिकस्सा' म्हणजे कारुण्यस्वभावाच्या. 'अनिस्सुकिनो' म्हणजे ईर्ष्याधर्माने रहित असलेल्या. दृढ झालेली करुणा द्वेषातून उत्पन्न होणाऱ्या हिंसेचा त्याग करते. दृढ झालेली मुदिता द्वेषातून उत्पन्न होणाऱ्या अरतीचा (अनावडीचा) त्याग करते, म्हणून 'विहिंसा अरतीनं निस्सरण भूता' (हिंसा आणि अरतीपासून सुटका होय) असे म्हटले आहे. आणि येथे 'अरती' म्हणजे शून्य घरांमध्ये (एकांतात) आणि भावना कर्मांमध्ये (ध्यानात) निर्माण होणारा कंटाळा होय. द्वेषापासून सुटका झाली असता दौर्मनस्यापासून (दुःखापासून) सुटका देखील सिद्धच होते. आणि सुटका (निस्सरण) ही प्रतिपक्ष धर्माच्या उपस्थितीने होते. म्हणून पूर्वभागातही अप्पमञ्ञांमध्ये नेहमी सौमनस्य (आनंद) स्थिती जाणावी, या अभिप्रायाने 'दोमनस्सपटिपक्खञ्च' (दौर्मनस्याचा प्रतिपक्ष) इत्यादी म्हटले आहे. 'अट्ठकथायपि सह विरुद्धो' (अठ्ठकथेशीही विरुद्ध) म्हणजे अट्ठसालिनीमध्ये उपेक्षा-सहगत कामावचर कुशल चित्तांमध्ये करुणा आणि मुदिता यांच्या परिकर्म काळातही उत्पत्तीला महाअठ्ठकथेत अनुमती दिली आहे, असे म्हटले आहे. त्या अठ्ठकथेशीही हा विरोध आहे. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. 'पटिकूला रम्मणेसु पन...पे... वत्तब्बमेव नत्थि' (प्रतिकूल आलंबनांमध्ये तर...पे... बोलण्याची गरजच नाही) म्हणजे प्रतिकूल आलंबने सौमनस्यापासून दूर असतात, तसेच दुःखित प्राणीही; म्हणून त्यावेळची आलंबने, अशुभ भावना चित्ते आणि करुणा भावना चित्ते सुरुवातीपासूनच उपेक्षा-सहगत नसतात, हे सांगण्याची गरजच नाही. 'साहिवेदनुपेक्खा नामा' म्हणजे कामावचर वेदना-उपेक्षा म्हटली आहे. विभावनी पाठात, 'अञ्ञविहितस्स पि' म्हणजे दुसऱ्या आलंबनाचे मनसिकार करणाऱ्याचेही. 'सज्झायनं सम्पज्जति, सम्मसनं सम्पज्जति' (सज्झाय/सराव संपन्न होतो, संमसन/चिंतन संपन्न होते) हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. 'इति' म्हणजे म्हणून. येथे शंका येऊ शकते की 'तं पटिक्खित्तं होति' (ते नाकारले गेले आहे) असे का म्हटले आहे? काय ते देखील उपेक्षा-सहगत चित्तांमध्ये करुणा आणि मुदिता यांच्या अस्तित्वाला सिद्ध करत नाही का? सत्य आहे, ते सिद्धच करते. परंतु, त्या परिचयाच्या (अभ्यासाच्या) प्रभावाने त्यांच्यामध्ये त्यांची उत्पत्ती दर्शविते. परंतु येथे 'एत्थ चा' इत्यादी आणि 'पटिकूला रम्मणेसू' इत्यादी द्वारे परिचयाशिवाय स्वाभाविकपणे त्यांची उपेक्षा वेदनेसोबतच प्रवृत्तीची बहुलता सांगितली आहे. 'योगकम्म बलेना' म्हणजे योगाभ्यास आणि वीर्य कर्माच्या बलाने. ๑๒๒. เจโต [Pg.106] ยุตฺตานํ จิตฺต เจตสิกานํ. ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. เหฏฺฐา จ วุตฺโต ‘กทาจิ สนฺทิสฺสนฺติ วิสุํ วิสุํ, กทาจิ นานา หุตฺวา ชายนฺตี’ติ. อุปริ จ วกฺขติ ‘อปฺปมญฺญา วิรติโย ปเนตฺถ ปญฺจปิ ปจฺเจกเมว โยเชตพฺพา’ติ. อิสฺสาทีนญฺจ นานา กทาจิ โยโค อุปริ ‘อิสฺสามจฺเฉร กุกฺกุจฺจานิ ปเนตฺถ ปจฺเจกเมว โยเชตพฺพานี’ติ วกฺขติ. มานถิน มิทฺธานํ ปน นานา กทาจิ โยโค อิธ วตฺตพฺโพ. ‘‘กทาจี’’ติ วตฺวา ตทตฺถํ วิวรติ ‘‘เตสํ’’ติอาทินา. ‘‘เตสํ’’ติ ทิฏฺฐิ วิปฺปยุตฺตานํ. ‘‘นิทฺทาภิภูต วเสนา’’ติ นิทสฺสน วจนเมตํ. เตน โกสชฺชาทีนมฺปิ คหณํ เวทิตพฺพํ. ‘‘อกมฺมญฺญตายา’’ติ อกมฺมญฺญภาเวน. เตหิ อิสฺสามจฺฉริย กุกฺกุจฺเจหิ. เตน จ มาเนน. กิจฺจ วิโรเธ วา อารมฺมณ วิโรเธ วา นานาภาโว. อวิโรเธ สหภาโว. १२२. चेतो युत्तानं म्हणजे चित्त आणि चैतसिकांचे. 'एत्थ चा' इत्यादींमध्ये. खाली देखील म्हटले आहे की 'कदाचित ते वेगवेगळ्या रूपात दिसतात, कदाचित भिन्न होऊन उत्पन्न होतात'. आणि पुढे सांगतील की 'येथे पाचही अप्पमञ्ञा आणि विरती वेगवेगळ्याच जोडल्या पाहिजेत'. आणि ईर्ष्या इत्यादींचा भिन्न आणि कदाचित होणारा योग पुढे 'येथे ईर्ष्या, मात्सर्य आणि कुक्कुच्च (पश्चात्ताप) हे प्रत्येक स्वतंत्रपणेच जोडले पाहिजेत' असे सांगतील. परंतु मान, थिन (आळस) आणि मिद्ध (ग्लानी) यांचा भिन्न आणि कदाचित होणारा योग येथे सांगण्याजोगा आहे. 'कदाचि' असे म्हणून त्याचा अर्थ 'तेसं' इत्यादींद्वारे स्पष्ट करतात. 'तेसं' म्हणजे दृष्टी-विप्रयुक्त चित्तांचे. 'निद्दाभिभूत वसेना' (झोपेने अभिभूत झाल्यामुळे) हे केवळ एक उदाहरण आहे. त्याद्वारे कौशीद्य (आळस) इत्यादींचे ग्रहण देखील जाणावे. 'अकम्मञ्ञताया' म्हणजे अकर्मण्यतेमुळे. त्या ईर्ष्या, मात्सर्य आणि कुक्कुच्च यांच्याद्वारे. आणि त्या मानाद्वारे. कार्याच्या विरोधात किंवा आलंबनाच्या विरोधात भिन्नता असते. अविरोधामध्ये सहअस्तित्व (सहभाव) असते. ๑๒๓. ‘‘โยคฏฺฐานปริจฺฉินฺทน วเสนา’’ติ สพฺพจิตฺต สาธารณา ตาว สพฺเพสุปิ เอกูนนวุติจิตฺตุปฺปาเทสุ, วิตกฺโก ปญฺจปญฺญา สจิตฺเตสูติอาทินา ยุตฺตฏฺฐาน ภูตานํ จิตฺตานํ คณนสงฺขฺยาปริจฺเฉทวเสน. ‘‘ยุตฺต ธมฺมราสิ ปริจฺฉินฺทน วเสนา’’ติ อนุตฺตเร ฉตฺตึส, มหคฺคเต ปญฺจตึสาติอาทินา ยุตฺต ธมฺมราสีนํ คณน สงฺขฺยา ปริจฺเฉท วเสน. เสสํ สุวิญฺเญยฺยํ. ‘‘ปาฬิยํ’’ติ ธมฺมสงฺคณิ ปาฬิยํ. ‘‘เตสํ นยานํ’’ติ จตุกฺก ปญฺจก นยานํ. १२३. 'योगट्ठानपरिच्छिंदन वसेना' म्हणजे सर्वचित्तसाधारण चैतसिक तर सर्व एकोणनव्वद चित्तोत्पादांमध्ये असतात, वितर्क पंचावन्न चित्तांमध्ये असतो इत्यादी प्रकारे युक्त स्थान असलेल्या चित्तांच्या गणनासंख्येच्या परिच्छेदाच्या (मर्यादेच्या) आधारे. 'युत्त धम्मरासि परिच्छिंदन वसेना' म्हणजे अनुत्तर (लोकोत्तर) चित्तांमध्ये छत्तीस, महग्गत चित्तांमध्ये पस्तीस इत्यादी प्रकारे युक्त धर्मसमूहांच्या गणनासंख्येच्या परिच्छेदाच्या आधारे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. 'पाळियं' म्हणजे धम्मसंगणि पाळीमध्ये. 'तेसं नयानं' म्हणजे चतुष्क आणि पंचक नयांचे (पद्धतींचे). ๑๒๔. ‘‘กายวจี วิโสธน กิจฺจา’’ติ กายทฺวารวจีทฺวาร โสธน กิจฺจา. १२४. 'कायवची विसोधन किच्चा' म्हणजे कायद्वार आणि वचीद्वार यांच्या शुद्धीकरणाचे कार्य. ๑๒๕. โลกุตฺตร วิรตีนํ โลกุตฺตร วิปาเกสุปิ อุปฺปชฺชนโต ‘‘อิทญฺจ…เป… ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ. ตาสํ อปฺปมญฺญานํ. เตสุ มหาวิปาเกสุ. สตฺตปญฺญตฺตาทีนิ อารมฺมณานิ ยสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘เตนา’’ติ กุสเลน. ‘‘วิกปฺป รหิตตฺตา’’ติ วิวิธาการ จินฺตน รหิตตฺตา. อปฺปนาปตฺต กมฺม วิเสเสหิ นิพฺพตฺตา อปฺปนาปตฺตกมฺม วิเสส นิพฺพตฺตา. ปญฺญตฺติ วิเสสานิ นาม ปถวีกสิณ นิมิตฺตาทีนิ. ‘‘อปิ จา’’ติอาทีสุ. น ปญฺญตฺติ ธมฺเมหิ อตฺถิ. เอวญฺจ สติ, กามวิปากานิ กามตณฺหาย อารมฺมณภูตา ปญฺญตฺติโยปิ อาลมฺเพยฺยุนฺติ. ‘‘สงฺคหนยเภทการกา’’ติ ปถ มชฺฌานิก [Pg.107] จิตฺเตสุ ฉตฺตึส. ทุตียชฺฌานิก จิตฺเตสุ ปญฺจตึสาติอาทินา สงฺคหนยเภทสฺส การกา. १२५. लोकोत्तर विरतींची लोकोत्तर विपाकांमध्येही उत्पत्ती होत असल्यामुळे 'इदञ्च...पे... दट्ठब्बं' (हे देखील...पे... पाहावे) असे म्हटले आहे. त्या अप्पमञ्ञांचे. त्या महाविपाकांमध्ये. 'सत्तपञ्ञत्तादीनि आरम्मणानि यस्स' (प्राणी-प्रज्ञप्ती इत्यादी ज्याची आलंबने आहेत) असा विग्रह आहे. 'तेना' म्हणजे कुशलाने. 'विकप्प रहितत्ता' म्हणजे विविध प्रकारच्या चिंतनाने रहित असल्यामुळे. अप्पना प्राप्त विशेष कर्मांपासून उत्पन्न झालेल्यांना 'अप्पनापत्तकम्मविसेसनिब्बत्ता' म्हणतात. प्रज्ञप्ती विशेष म्हणजे पृथ्वीकसिण निमित्त इत्यादी. 'अपि चा' इत्यादींमध्ये. प्रज्ञप्ती धर्मांमध्ये अस्तित्त्व नाही. आणि असे असताना, कामविपाक हे कामतृष्णेचे आलंबन असणाऱ्या प्रज्ञप्तींचेही आलंबन करू शकतात. 'सङ्गहनयभेदकारका' म्हणजे प्रथम ध्यानाच्या चित्तांमध्ये छत्तीस, द्वितीय ध्यानाच्या चित्तांमध्ये पस्तीस इत्यादी प्रकारे संग्रह नयाच्या भेदाचे कारक असणारे. ๑๒๖. ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. ‘‘ปญฺจสุ อสงฺขาริเกสู’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมวจนํ. ตถา ปญฺจสุ สสงฺขาริเกสูติ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. १२६. 'एत्थ चा' इत्यादींमध्ये. 'पञ्चसु असङ्खारिकेसू' (पाच असंस्कारिक चित्तांमध्ये) हे निर्धारण अर्थातील सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. तसेच 'पाच ससंस्कारिक चित्तांमध्ये' असेही. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. ๑๒๘. ‘‘ภูมิ ชาติ สมฺปโยคาทิเภเทนา’’ติ ผสฺโสตาว จตุพฺพิโธ โหติ กามาวจโร, รูปาวจโร, อรูปาวจโร จาติ. อยํ ภูมิเภโท. १२८. 'भूमी जाती संप्रयोग आदि भेदाने' म्हणजे स्पर्श हा पहिल्यांदा चार प्रकारचा असतो - कामावचर, रूपावचर, अरूपावचर आणि लोकोत्तर. हा भूमीभेद आहे. ทฺวาทสากุสลา ผสฺสา, กุสลา เอกวีสติ; ฉตฺตึเสว วิปากา จ, วีสติ กฺริยา มตา. बारा अकुशल स्पर्श, एकवीस कुशल स्पर्श; छत्तीस विपाक स्पर्श आणि वीस क्रिया स्पर्श मानले गेले आहेत. อิติ อยํ ชาติเภโท. โสมนสฺส สหคโต, ทิฏฺฐิคต สมฺปยุตฺโต, อสงฺขาริโก จ, สสงฺขาริโก จาติอาทินา สมฺปโยคาทิเภโท วตฺตพฺโพ. ‘‘จิตฺเตน สมํ เภท’’นฺติ อตฺตนา วา สมฺปยุตฺเตน จิตฺตเภเทน สมํ เภทํ. เอกูนน วุติยา จิตฺเตสุ วา. เอตฺถ จ วิจิกิจฺฉา เจตสิกํ เอกสฺมึ จิตฺเต ยุตฺตนฺติ เอกเมว โหติ. โทโส, อิสฺสา, มจฺฉริยํ, กุกฺกุจฺจนฺติ อิเม จตฺตาโร ทฺวีสุ จิตฺเตสุ ยุตฺตาติ วิสุํ วิสุํ ทฺเว ทฺเว โหนฺติ. ตถา ทิฏฺฐิมานา ปจฺเจกํ จตฺตาโร. ถินมิทฺธํ ปจฺเจกํ ปญฺจาติอาทินา สพฺพํ วตฺตพฺพนฺติ. अशा प्रकारे हा जातीभेद आहे. सौमनस्य-सहगत, दृष्टीगत-संप्रयुक्त, असंस्कारिक आणि ससंस्कारिक इत्यादी प्रकारे संप्रयोगादी भेद सांगावा. 'चित्तेन समं भेदं' म्हणजे स्वतःशी संप्रयुक्त असलेल्या चित्तभेदाप्रमाणेच भेद होय. किंवा एकोणनव्वद चित्तांमध्ये. आणि येथे विचिकित्सा चैतसिक एकाच चित्ताशी युक्त असल्यामुळे एकच असते. द्वेष, ईर्ष्या, मात्सर्य आणि कुक्कुच्च हे चार दोन चित्तांमध्ये युक्त असल्यामुळे स्वतंत्रपणे दोन-दोन असतात. तसेच दृष्टी आणि मान हे प्रत्येक चार असतात. थिन आणि मिद्ध हे प्रत्येक पाच असतात, इत्यादी प्रकारे सर्व सांगावे. เจตสิกสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. चैतसिकसंग्रहदीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๓. ปกิณฺณกสงฺคหอนุทีปนา ३. प्रकीर्णकसंग्रह अनुदीपनी ๑๒๙. ปกิณฺณกสงฺคเห[Pg.108]. อุภินฺนํ จิตฺต เจตสิกานํ. ‘‘เตปญฺญาสา’’ติ เตปญฺญาสวิธา. ‘‘ภาโว’’ติ วิชฺชมานกิริยา. โย ลกฺขณ รสาทีสุ ลกฺขณนฺติ วุจฺจติ. เตนาห ‘‘ธมฺมานํ’’ติอาทึ. ปวตฺโตติ ปาฐเสส ปทํ. เอเตน ‘เวทนา เภเทน จิตฺตเจตสิกานํ สงฺคโห’ติอาทีสุปิ เวทนา เภเทน ปวตฺโต จิตฺตเจตสิกานํ สงฺคโหติอาทินา สมฺพนฺธํ ทสฺเสติ. ‘‘วจนตฺโถ ทสฺสิโต’’ติ, กถํ ทสฺสิโตติ อาห ‘‘เวทนา เภเทน จิตฺตเจตสิกานํ สงฺคโห’’ติอาทิ. ‘‘เตสํ ทานิ ยถารหํ’’ติ เอตฺถ ‘‘เตสํ’’ติ จิตฺตเจตสิกานํ, สงฺคโห นามาติ สมฺพนฺโธ. เอเตน อยํ สงฺคโห จิตฺต เจตสิกานํ เอว สงฺคโหติ สิทฺธํ โหติ. เวทนา เหตุโต. ล. ลมฺพณวตฺถุโต สงฺคโห นามาติ สมฺพนฺโธ. เอเตน อุปริ เวทนา สงฺคโหติอาทีสุ เวทนาโต สงฺคโห เวทนา สงฺคโห. ล. วตฺถุโต สงฺคโห วตฺถุ สงฺคโหติ สิทฺธํ โหติ, เวทนาโตติอาทีสุ จ เวทนา เภทโตติอาทิ อตฺถโต สิทฺธํ โหติ. เอวํ ฉนฺนํ ปกิณฺณกสงฺคหานํ วจนตฺโถ ทสฺสิโต. เตนาห ‘‘เวทนา เภเทนา’’ติอาทึ. อาทินา ทสฺสิโตติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สงฺคโห นาม นิยฺยเต’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘นีโต นาม อตฺถี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘นิยฺยเต’’ติ จ ปวตฺตียเตติ อตฺโถ. นนุ เตสํ ‘‘สงฺคโห นาม นิยฺยเต’’ติ วุตฺตตฺตา ทฺวีหิ จิตฺต เจตสิเกหิ เอว อยํ สงฺคโห เนตพฺโพติ. น. จิตฺเตน นีเต เจตสิเกหิ วิสุํ เนตพฺพ กิจฺจสฺส อภาวโตติ ทสฺเสตุํ ‘‘จิตฺเต ปน สิทฺเธ’’ติอาทิ วุตฺตํ. १२९. प्रकीर्णकसंग्रहात. दोन्ही चित्त आणि चेतसिकांचे. "तेपञ्ञासा" (तेपन्न) म्हणजे तेपन्न प्रकारच्या. "भावो" म्हणजे विद्यमान क्रिया (अस्तित्वात असलेली क्रिया). जो लक्षण, रस इत्यादींमध्ये 'लक्षण' असे म्हटले जाते. म्हणूनच "धम्मानं" (धर्मांचे) इत्यादी म्हटले आहे. "पवत्तो" (प्रवृत्त झालेला) हा पाठातील उर्वरित शब्द आहे. याद्वारे 'वेदनाभेदाने चित्त-चेतसिकांचा संग्रह' इत्यादींमध्ये देखील 'वेदनाभेदाने प्रवृत्त झालेला चित्त-चेतसिकांचा संग्रह' अशा प्रकारे संबंध दर्शविला आहे. "वचनार्थ (शब्दाचा अर्थ) दर्शविला आहे", तो कसा दर्शविला आहे? हे सांगण्यासाठी "वेदनाभेदाने चित्त-चेतसिकांचा संग्रह" इत्यादी म्हटले आहे. "तेसं दानि यथारहं" (आता त्यांचे योग्यतेनुसार) येथे "तेसं" म्हणजे चित्त-चेतसिकांचे, आणि "संग्रह" असा संबंध आहे. याद्वारे हा संग्रह केवळ चित्त आणि चेतसिकांचाच संग्रह आहे हे सिद्ध होते. वेदना, हेतू... पे... आलंबन आणि वस्तू यांद्वारे संग्रह असा संबंध आहे. याद्वारे पुढे 'वेदनासंग्रह' इत्यादींमध्ये 'वेदनेद्वारे संग्रह तो वेदनासंग्रह'... पे... 'वस्तूद्वारे संग्रह तो वस्तुसंग्रह' हे सिद्ध होते, आणि 'वेदनेपासून' इत्यादींमध्ये 'वेदनाभेदापासून' इत्यादी अर्थाने सिद्ध होते. अशा प्रकारे सहा प्रकीर्णकसंग्रहांचा वचनार्थ दर्शविला आहे. म्हणूनच "वेदनाभेदेन" इत्यादी म्हटले आहे. "इत्यादी" द्वारे दर्शविला आहे असा संबंध आहे. "संग्रह चालविला जातो" असे म्हटल्यामुळे "नेलेला असा अर्थ आहे" असे म्हटले आहे. आणि "निय्यते" याचा अर्थ 'प्रवृत्त केला जातो' असा आहे. शंका: "त्यांचा संग्रह चालविला जातो" असे म्हटल्यामुळे चित्त आणि चेतसिक या दोन्हीद्वारेच हा संग्रह चालविला जावा का? नाही. चित्ताद्वारे तो चालविला (सिद्ध) झाला असता, चेतसिकांद्वारे स्वतंत्रपणे चालविण्याच्या कार्याचा अभाव असतो, हे दर्शविण्यासाठी "चित्त सिद्ध झाले असता" इत्यादी म्हटले आहे. ๑๓๐. เวทนา สงฺคเห. เวทนา เภทํ นิสฺสาย อิมสฺส สงฺคหสฺส ปวตฺตตฺตา ‘‘นิสฺสย ธมฺม ปริคฺคหตฺถ’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘สํยุตฺตเก’’ติ เวทนา สํยุตฺตเก. ‘‘อารมฺมณํ อนุโภนฺตี’’ติ อารมฺมณ รสํ อนุโภนฺติ. ‘‘เต’’ติ เตชนา. ‘‘ตํ’’ติ ตํ อารมฺมณํ. ‘‘สาตโต’’ติ สุขาการโต. ‘‘อสฺสาตโต’’ติ ทุกฺขา การโต[Pg.109]. ตโต อญฺโญปกาโร นตฺถิ, ตสฺมา เวทนา อนุภวน ลกฺขเณน ติวิธา เอว โหตีติ โยชนา. ‘‘ทฺเว’’ติ ทฺเว เวทนาโย. อุเปกฺขํ สุเข สงฺคเหตฺวา สุขทุกฺขวเสน วา ทฺเว เวทนา วุตฺตาติ โยชนา. ‘‘สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข’’ติ ฌานสมฺปยุตฺตํ อทุกฺขม สุขํ สนฺธาย วุตฺตํ. ปญฺจ เภทาทีสุ วิตฺถาโร เวทนา สํยุตฺเต คเหตพฺโพ. เวทยิตนฺติ จ เวทนาติ จ อตฺถโต เอกํ. ‘‘สพฺพํ ตํ ทุกฺขสฺมึ’’ติ สพฺพํ ตํ เวทยิตํ ทุกฺขสฺมึ เอว ปวิฏฺฐํ โหติ. สงฺขาร ทุกฺขตํ อานนฺท มยา สนฺธาย ภาสิตํ สงฺขาร วิปริณามตญฺจ, ยํ กิญฺจิ เวทยิตํ, สพฺพํ ตํ ทุกฺขสฺมึติ ปาฬิ. ‘‘อินฺทฺริยเภทวเสนา’’ติ โสมนสฺส สหคตํ, อุเปกฺขาสหคตํ, โทมนสฺส สหคตํ, สุขสหคตํ, ทุกฺข สหคตนฺติ เอวํ อินฺทฺริย เภทวเสน. ‘‘เยสุ ธมฺเมสู’’ติ สมฺปยุตฺต ธมฺเมสุ. ‘‘เตสํ’’ติ สมฺปยุตฺต ธมฺมานํ. ตตฺถ สุขสมฺปยุตฺตา ธมฺมา กายิก สุข สมฺปยุตฺต เจตสิก สุข สมฺปยุตฺต วเสน ทุวิธา. เอวํ อิสฺสรฏฺฐานภูตานํ สมฺปยุตฺต ธมฺมานํ ทุวิธตฺตา อนุภวน เภเท ตีสุ เวทนาสุ เอกํ สุข เวทนํ ทฺวิธา ภินฺทิตฺวา สุขินฺทฺริยํ โสมนสฺสินฺทฺริยนฺติ วุตฺตํ. ทุกฺขสมฺปยุตฺต ธมฺเมสุปิ เอเสวนโย. ‘‘อปิ จา’’ติ กิญฺจิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ อตฺโถ. ‘‘เตปี’’ติ อุเปกฺขา สมฺปยุตฺตาปิ ธมฺมา. จกฺขาทิ ปสาทกายา นาม จกฺขุ โสต ฆาน ชิวฺหา ปสาทกายา. เตสุ นิสฺสิตา นาม จกฺขุ วิญฺญาณ จิตฺตุปฺปาทาทโย. ‘‘สพฺภาวา’’ติ สนฺตภาวโต สํวิชฺชมาน ภาวโต ทุวิธา โหนฺตีติ โยชนา. ‘‘เอก รสตฺตา’’ติ มชฺฌตฺตภาเวน เอกรสตฺตา. ‘‘อิตรานี’’ติ โสมนสฺส โทมนสฺส อุเปกฺขินฺทฺริยานิ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. १३०. वेदनासंग्रहात. वेदनाभेदाचा आश्रय घेऊन हा संग्रह प्रवृत्त झाल्यामुळे "आश्रयभूत धर्मांचे ग्रहण करण्यासाठी" असे म्हटले आहे. "संयुत्तके" म्हणजे वेदनासंयुत्तात. "आरम्मणं अनुभोन्ति" म्हणजे आलंबनाच्या रसाचा आस्वाद घेतात. "ते" म्हणजे तेजना (उत्तेजना). "तं" म्हणजे त्या आलंबनाला. "साततो" म्हणजे सुखाच्या आकाराने. "अस्साततो" म्हणजे दुःखाच्या आकाराने. त्यापेक्षा दुसरा कोणताही प्रकार नाही, म्हणून वेदना अनुभवण्याच्या लक्षणाने तीन प्रकारचीच असते, अशी योजना आहे. "द्वे" म्हणजे दोन वेदना. उपेक्षेचा सुखात संग्रह करून किंवा सुख-दुःखाच्या रूपाने दोन वेदना सांगितल्या आहेत, अशी योजना आहे. "संतस्मिं एसा पणीते सुखे" (हे शांत आणि प्रणीत सुखात आहे) हे ध्यानसंप्रयुक्त अदुःख-असुख वेदनेला उद्देशून म्हटले आहे. पाच भेद इत्यादींचा विस्तार वेदनासंयुत्तातून ग्रहण करावा. 'वेदयित' (अनुभवलेले) आणि 'वेदना' हे अर्थाच्या दृष्टीने एकच आहेत. "सब्बं तं दुक्खस्मिं" (ते सर्व दुःखात आहे) म्हणजे ते सर्व अनुभवलेले दुःखातच समाविष्ट होते. "हे आनंदा! मी संस्कार-दुःखता आणि संस्कार-विपरिणामता यांना उद्देशून म्हटले आहे की, जे काही अनुभवले जाते ते सर्व दुःखातच आहे" अशी पाळी आहे. "इंद्रियभेदवशात" म्हणजे सोमनस्य-सहगत, उपेक्षा-सहगत, दोमनस्य-सहगत, सुख-सहगत आणि दुःख-सहगत अशा प्रकारे इंद्रियभेदाच्या आधारे. "येसु धम्मेसू" म्हणजे संप्रयुक्त धर्मांमध्ये. "तेसं" म्हणजे संप्रयुक्त धर्मांचे. त्यामध्ये सुखसंप्रयुक्त धर्म हे कायिक-सुख-संप्रयुक्त आणि चैतसिक-सुख-संप्रयुक्त अशा दोन प्रकारचे आहेत. अशा प्रकारे, प्रमुख स्थानी असलेल्या संप्रयुक्त धर्मांच्या द्विविधतेमुळे, अनुभवाच्या भेदातील तीन वेदनांपैकी एका सुखवेदनेचे दोन भाग करून 'सुखिंद्रिय' आणि 'सोमनस्यिंद्रिय' असे म्हटले आहे. दुःखसंप्रयुक्त धर्मांमध्येही हाच नियम आहे. "अपि च" म्हणजे काहीतरी सांगण्यासारखे आहे असा अर्थ आहे. "तेपि" म्हणजे उपेक्षा-संप्रयुक्त धर्म देखील. चक्षु इत्यादी प्रसादकाय म्हणजे चक्षु, श्रोत्र, घ्राण आणि जिव्हा प्रसादकाय होत. त्यांच्यावर आश्रित असलेले म्हणजे चक्षुविज्ञान, चित्तोत्पाद इत्यादी होत. "सब्भावा" म्हणजे विद्यमानतेमुळे किंवा अस्तित्वात असल्यामुळे दोन प्रकारचे असतात, अशी योजना आहे. "एकरसत्ता" म्हणजे तटस्थ भावाने एकरस असणे. "इतराणि" म्हणजे सोमनस्य, दोमनस्य आणि उपेक्षिंद्रिय. येथील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. ๑๓๑. เหตุสงฺคเห. ‘‘สุปฺปติฏฺฐิตภาวสาธนํ’’ติ สุฏฺฐุ ปติฏฺฐหนฺตีติ สุปฺปติฏฺฐิตา. สุปฺปติฏฺฐิต ภาวสาธนํ เหตุ กิจฺจํ นามาติ โยชนา. ‘‘อิเมปิ ธมฺมา’’ติ อิเมปิ ฉ เหตุ ธมฺมา. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุ อารมฺมเณสุ, สาเธนฺติ. ตสฺมา สุปฺปติฏฺฐิต ภาวสาธนํ เหตุกิจฺจํ นามาติ วุตฺตํ. ‘‘อปเร ปนา’’ติ ปฏฺฐานฏฺฐ กถายํ [Pg.110] อาคโต เรวตตฺเถร วาโท. ‘‘ธมฺมานํ กุสลาทิ ภาวสาธนํ’’ติ สหชาตธมฺมานํ กุสลภาวสาธนํ อกุสลภาวสาธนํ อพฺยากตภาวสาธนํ. ‘‘เอวํ สนฺเต’’ติอาทิ ตํ วาทํ ปฏิกฺขิปนฺตานํ ปฏิกฺเขปวจนํ. ‘‘เยส’’นฺติ โมหมูล จิตฺต ทฺวเย โมโห จ อเหตุก จิตฺตุปฺปาท รูป นิพฺพานานิ จ. ‘‘น สมฺปชฺเชยฺยา’’ติ สหชาต เหตุโน อภาวา ตสฺส โมหสฺส อกุสล ภาโว, อิตเร สญฺจ อพฺยากต ภาโว น สมฺปชฺเชยฺย. อิทํ วุตฺตํ โหติ. เหตุ นาม สหชาต ธมฺมานํ กุสลาทิภาวํ สาเธตีติ วุตฺตํ. เอวํ สติ, โส โมโห สมฺปยุตฺต ธมฺมานํ อกุสล ภาวํ สาเธยฺย. อตฺตโน ปน อกุสล ภาวํ สาเธนฺโต สหชาโต อญฺโญ เหตุ นตฺถิ. ตสฺมา ตสฺส อกุสลภาโว น สมฺปชฺเชยฺย. ตถา อเหตุก จิตฺตุปฺปาท รูป นิพฺพานานญฺจ อพฺยากตภาวํ สาเธนฺโต โกจิ สหชาโต เหตุ นาม นตฺถีติ เตสมฺปิ อพฺยากต ภาโว น สมฺปชฺเชยฺย. น จ น สมฺปชฺชติ. ตสฺมา โส เถรวาโท น ยุตฺโตติ. เอตฺถ สิยา. โสจ โมโห อตฺตโน ธมฺมตาย อกุสโล โหติ. ตานิ จ อเหตุก จิตฺตุปฺปาทรูป นิพฺพานานิ อตฺตโน ธมฺมตาย อพฺยากตานิ โหนฺตีติ. เอวํ สนฺเต, ยถา เต ธมฺมา. ตถา อญฺเญปิ ธมฺมา อตฺตโน ธมฺมตาย เอว กุสลา กุสลา พฺยากตา ภวิสฺสนฺติ. น เจตฺถ การณํ อตฺถิ, เยนการเณน เต เอว ธมฺมา อตฺตโน ธมฺมตาย อกุสลา พฺยากตา โหนฺติ. อญฺเญ ปน ธมฺมา อตฺตโน ธมฺมตาย กุสลา กุสลา พฺยากตา น โหนฺติ, เหตูหิ เอว โหนฺตีติ. ตสฺมา เตสํ สพฺเพสมฺปิ กุสลาทิ ภาวตฺถาย เหตูหิ ปโยชนํ นตฺถิ. ตสฺมา โส เถรวาโท น ยุตฺโต เยวาติ. น เกวลญฺจ ตสฺมึ เถรวาเท เอตฺตโก โทโส อตฺถิ. อถ โข อญฺโญปิ โทโส อตฺถีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ยานิ จา’’ติอาทิมาห. ตตฺถายํ อธิปฺปาโย. สเจ ธมฺมานํ กุสลาทิ ภาโว สหชาต เหตุปฺปฏิพทฺโธ สิยา. เอวํ สติ, เหตุ ปจฺจเย กุสล เหตุโต ลทฺธ ปจฺจยานิ รูปานิ กุสลานิ ภเวยฺยุํ. อกุสล เหตุโต ลทฺธ ปจฺจยานิ รูปานิ อกุสลานิ ภเวยฺยุํ[Pg.111]. น จ ภวนฺติ. ตสฺมา โส วาโท อยุตฺโต เยวาติ. อิทานิ ปุน ตํ เถรวาทํ ปคฺคเหตุํ ‘‘ยถาปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘ธมฺเมสู’’ติ จตุสฺสจฺจ ธมฺเมสุ. มุยฺหนกิริยา นาม อนฺธการ กิริยา. ธมฺมจฺฉนฺโท นาม ทานํ ทาตุกาโม, สีลํ ปูเรตุกาโม, ภาวนํ ภาเวตุกาโม อิจฺจาทินา ปวตฺโต ฉนฺโท. ‘‘อกฺขนฺตี’’ติ อกฺขมนํ, อโรจนํ, อมนาโป. ปาป ธมฺม ปาปา รมฺมณ วิโรโธ นาม กามราคฏฺฐานีเยหิ สตฺตวิธ เมถุน ธมฺมาทีหิ ปาป ธมฺเมหิ เจว ปญฺจกามคุณา รมฺมเณ หิ จ จิตฺตสฺส วิโรโธ, เชคุจฺโฉ ปฏิกูโล. มุยฺหนกิริยา ปน เอกนฺต อกุสล ชาติกา เอว โหติ. เอตฺตาวตา โมหมูล จิตฺต ทฺวเย โมโห อตฺตโน ธมฺมตาย อกุสโล โหตีติ อิมมตฺถํ ปติฏฺฐาเปติ. ‘‘เอวํ สนฺเต’’ติอาทิกํ ตตฺถ โทสาโรปนํ วิธมติ. อิทานิ อเหตุก จิตฺตุปฺปาท รูป นิพฺพานานิ อตฺตโน ธมฺมตาย อพฺยากตานิ โหนฺตีติ อิมมตฺถํ ปติฏฺฐาเปตุํ ‘‘โยจ ธมฺโม’’ติอาทิมาห. ‘‘เอตฺตกเมวา’’ติ อญฺญํ ทุกฺกร การณํ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อเหตุก จิตฺตานํ’’ติ อเหตุก จิตฺตุปฺปาทานํ. อตฺตโน ธมฺมตาย เอว สิทฺโธ. เอตฺตาวตา-อเหตุก. ล. นิพฺพานานิ อตฺตโน ธมฺมตาย อพฺยากตานิ โหนฺตี-ติ อิมมตฺถํ ปติฏฺฐาเปติ. ‘‘เอวํ สนฺเต’’ติอาทิ ตตฺถ โทสาโรปนํ อปเนติ. อิทานิ สพฺโพปิ โมโห อตฺตโน ธมฺมตาย อกุสล ภาเวฐตฺวา อญฺเญสํ อิจฺฉา นาม อตฺถิ, อกฺขนฺติ นาม อตฺถีติ เอวํ วุตฺตานํ อิจฺฉา อกฺขนฺติ ธมฺมานมฺปิ อกุสล ภาวํ สาเธตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถ โมโห’’ติอาทิมาห. ‘‘มุยฺหน นิสฺสนฺทานิ เอวา’’ติ มุยฺหนกิริยาย นิสฺสนฺทปฺผลานิ เอว. น เกวลํ โส โลภาทีนํ อกุสลภาวํ สาเธติ, อถ โข อโลภาทีนมฺปิ กุสลภาวํ โส เอว สาเธตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘อโลภาทีนญฺจา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘อวิชฺชานุสเยน สเหว สิทฺโธ’’ติ ตานิ สตฺตสนฺตาเน อวิชฺชานุสเย อปฺปหีเน กุสลานิ โหนฺติ. ปหีเน กิริยานิ โหนฺตีติ อธิปฺปาโย. อิทานิ โลภ โทสานํ อโลภาทีนญฺจ เหตุ กิจฺจํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตานิ ปน โลภาทีนี’’ติอาทิ วุตฺตํ. รชฺชน ทุสฺสนานํ นิสฺสนฺทานิ รชฺชนาทินิสฺสนฺทานิ. ‘‘ทิฏฺฐิ มานาทีนี’’ติ [Pg.112] ทิฏฺฐิ มาน อิสฺสา มจฺฉริยาทีนิ. อรชฺชน อทุสฺสน อมุยฺหนานํ นิสฺสนฺทานิ อรชฺชนาทิ นิสฺสนฺทานิ. ‘‘สทฺธาทีนี’’ติ สทฺธา สติ หิริ โอตฺตปฺปาทีนิ. ‘‘เหตุมุเขนปี’’ติ อเหตุก จิตฺตุปฺปาท รูป นิพฺพานานํ อพฺยากตภาโว อตฺตโน ธมฺมตาย สิทฺโธติ วุตฺโต. สเหตุก วิปาก กฺริยานํ อพฺยากต ภาโว ปน อตฺตโน ธมฺมตาย สิทฺโธติปิ สหชาต เหตูนํ เหตุ กิจฺเจน สิทฺโธติปิ วตฺตุํ วฏฺฏตีติ อธิปฺปาโย. วิภาว นิปาเฐ. ‘‘มคฺคิตพฺโพ’’ติ คเวสิตพฺโพ. อถ เตสํ กุสลาทิ ภาโว เสสสมฺปยุตฺต เหตุปฺปฏิ พทฺโธ สิยาติ โยชนา. ‘‘อปฺปฏิ พทฺโธ’’ติ เหตุนา อปฺปฏิ พทฺโธ. ‘‘กุสลาทิภาโว’’ติ กุสลาทิภาโว สิยา. ‘‘โส’’ติ กุสลาทิภาโว. ‘‘อเหตุกานํ’’ติ อเหตุก จิตฺตุปฺปาท รูป นิพฺพานานํ. อิทานิ ‘ยานิ จ ลทฺธเหตุ ปจฺจยานี’ติอาทิ วจนํ ปฏิกฺขิปนฺโต ‘‘ยถาจา’’ติอาทิมาห. ‘‘รูปารูป ธมฺเมสู’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺม วจนํ. ‘‘อรูป ธมฺเมสุ เอวา’’ติ นิทฺธารณียํ. น รูป ธมฺเมสุ ผรนฺติ. เอวํ สติ, กสฺมา เต รูป ธมฺมา ฌานปจฺจยุปฺปนฺเนสุ วุตฺตาติ อาห ‘‘เต ปนา’’ติอาทึ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ‘‘ตํ ปน เตสํ’’ติ เตสํ หํสาทีนํ ตํ วณฺณวิเสสํ. ‘‘โยนิโย’’ติ มาตาปิตุ ชาติโย. ‘‘อพฺยากตานํ ปนาติ สพฺพํ’’ติ อพฺยากตานํ ปน อพฺยากตภาโว นิรนุสย สนฺตานปฺปฏิ พทฺโธ, กมฺมปฺปฏิ พทฺโธ, อวิปากภาวปฺปฏิ พทฺโธ จาติ ทฏฺฐพฺพนฺติ อิทํ สพฺพํ. ‘‘วุตฺต ปกฺเขปตติ เยวา’’ติ ตสฺมึ ปกฺเข อนฺโตคธเมวาติ อธิปฺปาโย. १३१. हेतुसंग्रहामध्ये. "सुप्रतिष्ठितभावसाधन" म्हणजे जे चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होतात ते 'सुप्रतिष्ठित' होत. सुप्रतिष्ठित भाव सिद्ध करणे हे 'हेतुकृत्य' (हेतूचे कार्य) आहे, अशी येथे योजना आहे. "हे धर्म सुद्धा" म्हणजे हे सहा हेतू-धर्म सुद्धा. "तेथे" म्हणजे त्या आलंबनांमध्ये, सिद्ध करतात. म्हणून, सुप्रतिष्ठित भाव सिद्ध करणे हे 'हेतुकृत्य' म्हटले गेले आहे. "इतर काही (आचार्य) तर" म्हणजे पट्ठान-अट्ठकथेमध्ये आलेले रेवत थेरांचे मत होय. "धर्मांचा कुशलादी भाव सिद्ध करणे" म्हणजे सहजात धर्मांचा कुशलभाव सिद्ध करणे, अकुशलभाव सिद्ध करणे आणि अव्याकृतभाव सिद्ध करणे होय. "असे असताना" इत्यादी त्या मताचे खंडन करणाऱ्यांचे खंडनपर वचन आहे. "ज्यांचे" म्हणजे दोन मोहमूल चित्तांमध्ये असणारा मोह आणि अहेतुक चित्तोत्पाद, रूप व निब्बान हे होत. "सिद्ध होणार नाही" म्हणजे सहजात हेतूच्या अभावामुळे त्या मोहाचा अकुशलभाव आणि इतरांचा अव्याकृतभाव सिद्ध होणार नाही. हे असे म्हटले आहे. हेतू हा सहजात धर्मांचा कुशलादी भाव सिद्ध करतो, असे म्हटले आहे. असे असताना, तो मोह संप्रयुक्त धर्मांचा अकुशलभाव सिद्ध करेल. परंतु स्वतःचा अकुशलभाव सिद्ध करणारा दुसरा कोणताही सहजात हेतू नाही. म्हणून त्याचा अकुशलभाव सिद्ध होणार नाही. त्याचप्रमाणे, अहेतुक चित्तोत्पाद, रूप आणि निब्बान यांचा अव्याकृतभाव सिद्ध करणारा कोणताही सहजात हेतू नसल्यामुळे, त्यांचाही अव्याकृतभाव सिद्ध होणार नाही. आणि असे तर नाही की तो सिद्ध होत नाही (म्हणजे तो सिद्ध होतोच). म्हणून ते थेरांचे मत (थेरवाद) योग्य नाही. येथे अशी शंका असू शकते. तो मोह स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच अकुशल असतो. आणि ते अहेतुक चित्तोत्पाद, रूप व निब्बान स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच अव्याकृत असतात. असे असताना, ज्याप्रमाणे ते धर्म आहेत, त्याचप्रमाणे इतर धर्मही स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच कुशल, अकुशल आणि अव्याकृत होतील. आणि येथे असे कोणतेही कारण नाही, ज्या कारणामुळे केवळ तेच धर्म स्वतःच्या स्वभावधर्माने अकुशल आणि अव्याकृत होतात, आणि इतर धर्म मात्र स्वतःच्या स्वभावधर्माने कुशल, अकुशल किंवा अव्याकृत न होता, हेतूंमुळेच होतात. म्हणून त्या सर्वांच्याच कुशलादी भावासाठी हेतूंचे काही प्रयोजन उरत नाही. म्हणून ते थेरांचे मत मुळीच योग्य नाही. केवळ त्या थेरवादात (थेरांच्या मतात) एवढाच दोष आहे असे नाही, तर दुसराही दोष आहे हे दर्शवण्यासाठी "आणि जे..." इत्यादी म्हटले आहे. तेथे हा अभिप्राय आहे. जर धर्मांचा कुशलादी भाव सहजात हेतूंवर अवलंबून असेल, तर असे असताना, हेतू प्रत्ययामध्ये कुशल हेतूपासून प्रत्यय प्राप्त झालेली रूपे कुशल झाली पाहिजेत, आणि अकुशल हेतूपासून प्रत्यय प्राप्त झालेली रूपे अकुशल झाली पाहिजेत. पण ती तशी होत नाहीत. म्हणून तो वाद (ते मत) अयोग्यच आहे. आता पुन्हा त्या थेरवादाचे समर्थन करण्यासाठी "जसे की पुन्हा..." इत्यादी म्हटले आहे. "धर्मांमध्ये" म्हणजे चार आर्यसत्य रूपी धर्मांमध्ये. 'मुय्हनक्रिया' (संमोह क्रिया) म्हणजे अंधकार निर्माण करणारी क्रिया. 'धम्मच्छंद' म्हणजे दान देण्याची इच्छा, शील पूर्ण करण्याची इच्छा, भावना (ध्यान) भावित करण्याची इच्छा इत्यादी रूपाने प्रवृत्त झालेली इच्छा. "अखंती" म्हणजे असहनशीलता, नापसंती, अप्रियता. 'पापधर्म आणि पाप-आलंबनांचा विरोध' म्हणजे कामरागाला कारणीभूत असणाऱ्या सात प्रकारच्या मैथुनधर्मादी पापधर्मांशी आणि पाच कामगुणांच्या आलंबनांशी चित्ताचा असणारा विरोध, वीट किंवा प्रतिकूलता होय. संमोह क्रिया (मुय्हनक्रिया) तर निश्चितपणे अकुशल जातीचीच असते. एवढ्यावरून, दोन मोहमूल चित्तांमध्ये असणारा मोह स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच अकुशल असतो, हा अर्थ प्रस्थापित होतो. "असे असताना" इत्यादीद्वारे तेथील दोषाचा आरोप खोडून काढला जातो. आता, अहेतुक चित्तोत्पाद, रूप आणि निब्बान स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच अव्याकृत असतात, हा अर्थ प्रस्थापित करण्यासाठी "आणि जो धर्म..." इत्यादी म्हटले आहे. "एवढेच" म्हणजे दुसरे कोणतेही कठीण कारण नाही, असा अभिप्राय आहे. "अहेतुक चित्तांचे" म्हणजे अहेतुक चित्तोत्पादांचे. स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच सिद्ध होते. एवढ्यावरून, अहेतुक... पे... निब्बान स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच अव्याकृत असतात, हा अर्थ प्रस्थापित होतो. "असे असताना" इत्यादीद्वारे तेथील दोषाचा आरोप दूर केला जातो. आता, सर्वच मोह स्वतःच्या स्वभावधर्माने अकुशल भावात राहून, इतरांच्या 'इच्छा' नावाच्या आणि 'अखंती' (असहनशीलता) नावाच्या अशा सांगितलेल्या इच्छा व अखंती या धर्मांचाही अकुशलभाव सिद्ध करतो, हे दर्शवण्यासाठी "तेथे मोह..." इत्यादी म्हटले आहे. "संमोहाचे निस्यंद (परिणाम) च" म्हणजे संमोह क्रियेचे निस्यंद-फळच होय. तो केवळ लोभादींचा अकुशलभावच सिद्ध करतो असे नाही, तर अलोभादींचा कुशलभावही तोच सिद्ध करतो, हे दर्शवण्यासाठी "आणि अलोभादींचा..." इत्यादी म्हटले आहे. "अविद्यानुशयासोबतच सिद्ध होतो" म्हणजे प्राण्यांच्या संतानामध्ये (प्रवाहात) अविद्यानुशय नष्ट न झाल्यामुळे ते कुशल होतात. तो (अविद्यानुशय) नष्ट झाल्यावर ते क्रिया-चित्त होतात, असा अभिप्राय आहे. आता लोभ, द्वेष आणि अलोभादींचे हेतुकृत्य दर्शवण्यासाठी "ते लोभादी तर..." इत्यादी म्हटले आहे. आसक्ती (रज्जन) आणि द्वेष (दुस्सन) यांचे जे निस्यंद (परिणाम) आहेत, ते 'रज्जनादी-निस्यंद' होत. "दिट्ठी-मानादी" म्हणजे दृष्टी (मिथ्यादृष्टी), मान (अहंकार), ईर्ष्या, मात्सर्य इत्यादी. अनासक्ती (अरज्जन), अद्वेष (अदुस्सन) आणि असंमोह (अमुय्हन) यांचे जे निस्यंद आहेत, ते 'अरज्जनादी-निस्यंद' होत. "श्रद्धादी" म्हणजे श्रद्धा, सती (स्मृती), हिरी (लाज), ओत्तप्प (भय) इत्यादी. "हेतूच्या मुखाने (द्वारे) सुद्धा" म्हणजे अहेतुक चित्तोत्पाद, रूप आणि निब्बान यांचा अव्याकृतभाव स्वतःच्या स्वभावधर्माने सिद्ध होतो असे म्हटले आहे. परंतु सहेतुक विपाक आणि क्रिया चित्तांचा अव्याकृतभाव स्वतःच्या स्वभावधर्माने सिद्ध होतो असेही, आणि सहजात हेतूंच्या हेतुकृत्यामुळे सिद्ध होतो असेही म्हणणे योग्य आहे, असा अभिप्राय आहे. विभावनी-पाठात. "शोधला पाहिजे" म्हणजे शोध केला पाहिजे. किंवा त्यांचा कुशलादी भाव उर्वरित संप्रयुक्त हेतूंवर अवलंबून असावा, अशी येथे योजना आहे. "अनवलंबून" म्हणजे हेतूवर अवलंबून नसलेला. "कुशलादी भाव" म्हणजे कुशलादी भाव असावा. "तो" म्हणजे कुशलादी भाव. "अहेतुकांचे" म्हणजे अहेतुक चित्तोत्पाद, रूप आणि निब्बान यांचे. आता 'आणि जे प्राप्त-हेतू-प्रत्यय आहेत' इत्यादी वचनाचे खंडन करताना "आणि ज्याप्रमाणे..." इत्यादी म्हटले आहे. "रूप आणि अरूप धर्मांमध्ये" हे निर्धारण अर्थी सप्तमी विभक्तीचे वचन आहे. "केवळ अरूप धर्मांमध्येच" हे निर्धारणीय आहे. ते रूप धर्मांमध्ये पसरत नाहीत. असे असताना, ते रूप धर्म ध्यान-प्रत्ययोत्पन्नांमध्ये का सांगितले गेले आहेत? म्हणून "ते तर..." इत्यादी म्हटले आहे. येथील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. "ते तर त्यांचे" म्हणजे त्या हंस इत्यादींचा तो विशिष्ट रंग. "योनी" म्हणजे माता-पित्यांची जात (उत्पत्ती स्थान). "अव्याकृतांचा तर... हे सर्व" म्हणजे अव्याकृतांचा अव्याकृतभाव हा अनुशय-रहित संतानावर (प्रवाहावर) अवलंबून असलेला, कर्मावर अवलंबून असलेला आणि अविपाकभावावर अवलंबून असलेला समजावा, हे सर्व होय. "सांगितलेल्या पक्षातच समाविष्ट होतो" म्हणजे त्या पक्षातच अंतर्भूत होतो, असा अभिप्राय आहे. ๑๓๒. กิจฺจสงฺคเห. ตสฺมึ ปริกฺขีเณติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กมฺมสฺสา’’ติ กมฺมนฺตรสฺส. จุตสฺส สตฺตสฺส อภินิพฺพตฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ภวนฺตราทิปฺปฏิ สนฺธาน วเสนา’’ติ ภวนฺตรสฺส อาทิโกฏิยา ปฏิสนฺธาน วเสน. ภวสนฺตานสฺส ปวตฺตีติ สมฺพนฺโธ. กถํ ปวตฺตีติ อาห ‘‘ยาว ตํ กมฺมํ’’ติอาทึ. ‘‘อวิจฺเฉทปฺปวตฺติ ปจฺจยงฺคภาเวนา’’ติ อวิจฺเฉทปฺปวตฺติยา ปธาน ปจฺจย สงฺขาเตน องฺคภาเวน. เอเตน ภวงฺคปเท องฺคสทฺทสฺส อตฺถํ วทติ[Pg.113]. เตนาห ‘‘ตสฺสหี’’ติอาทึ. ‘‘ตสฺสา’’ติ ภวงฺคสฺส. อาวชฺชนํ อาวฏฺฏนนฺติ เอโก วจนตฺโถ. ตํ วา อาวชฺเชตีติ เอโก. ‘‘ตํ’’ติ จิตฺต สนฺตานํ. อาวฏฺฏติ วา ตํ เอตฺถาติ เอโก. อาวฏฺฏติ วา ตํ เอเตนาติ เอโก. ‘‘ตํ’’ติ จิตฺต สนฺตานํ. อาวชฺเชติ วาติ เอโก. ‘‘โวฏฺฐพฺพนํ’’ติ วิ-อว-ฐปนํติ ปทจฺเฉโท. วิภาวนิ วิจารณายํ. ‘‘เอกาวชฺชน ปริกมฺม จิตฺตโต’’ติ มคฺเคน วา อภิญฺญาย วา เอกํ สมานํ อาวชฺชนํ อสฺสาติ วิคฺคโห. ตสฺสํ วีถิยํ ‘อาวชฺชนํ, ปริกมฺมํ, อุปจาโร, อนุโลมํ, โคตฺรภู,ติ เอตฺถ ปริกมฺม ชวนจิตฺตํ อิธ ปริกมฺม จิตฺตนฺติ วุตฺตํ. ‘‘ตานี’’ติ มคฺคา ภิญฺญาชวนานิ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ วิภาวนิ ปาเฐ. ‘‘ทีฆํ อทฺธานํ’’ติ สกลรตฺติยํ วา สกล ทิวสํ วา นิทฺโทกฺกมน วเสน ทีฆํ กาลํ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ‘‘ปฏิสนฺธิยาฐานํ’’ติ ปฏิสนฺธิกิจฺจสฺส ฐานํ. กาโลหิ นาม วิสุํ จิตฺตสฺส อารมฺมณ ภูโต เอโก ปญฺญตฺติ ธมฺโมติ เอเตน กาโล นาม สภาวโต อวิชฺชมานตฺตา กถํ กิจฺจานํ ปวตฺติฏฺฐานํ นาม สกฺกา ภวิตุนฺติ อิมํ อาสงฺกํ วิโสเธติ. ‘‘อิตรถา’’ติ ตถา อคฺคเหตฺวา อญฺญถา กิจฺจฏฺฐานานํ อเภเท คหิเต สตีติ อตฺโถ. ‘‘สยํ โสมนสฺส ยุตฺตํปี’’ติ กทาจิ สยํ โสมนสฺส ยุตฺตํปิ. ‘‘ตํ’’ติ โสมนสฺส สนฺตีรณํ. ‘‘ลทฺธปจฺจย ภาเวนา’’ติ ลทฺธอนนฺตร ปจฺจยภาเวน. ‘‘อาเสวน ภาว รหิตํ ปี’’ติ อาเสวน คุณ รหิตมฺปิ. ตญฺหิ อาเสวน ปจฺจเย ปจฺจโยปิ น โหติ, ปจฺจยุปฺปนฺนมฺปิ น โหตีติ. ‘‘ปริกมฺม ภาวนา พเลน จ ปวตฺตตฺตา’’ติ อิทํ ผลสมาปตฺติ วีถิยํ ผลชวเนสุ ปากฏํ. เสสเมตฺถสุโพธเมว. १३२. कृत्यसंग्रहात. 'तस्मिं परिक्खीणे' (त्यात क्षीण झाल्यावर) असा संबंध आहे. 'कम्मस्स' (कर्माचे) म्हणजे दुसऱ्या कर्माचे (कर्मान्तराचे). 'च्युत झालेल्या (मृत्यू पावलेल्या) सत्त्वाची उत्पत्ती' असा संबंध आहे. 'भवन्तरआदिप्पटिसन्धानवसेन' म्हणजे दुसऱ्या भवाच्या (अस्तित्वाच्या) सुरुवातीच्या कोटीशी (प्रारंभाशी) प्रतिसंधी जोडण्याच्या द्वारे. 'भवसंतानाची (अस्तित्वाच्या प्रवाहाची) प्रवृत्ती (सातत्य)' असा संबंध आहे. ती प्रवृत्ती कशी होते? हे सांगण्यासाठी 'याव तं कम्मं' (जोपर्यंत ते कर्म...) इत्यादी म्हटले आहे. 'अविच्छेदप्पवत्तिपच्चयाङ्गभावेन' म्हणजे अविच्छिन्न (अखंड) प्रवृत्तीचे प्रधान प्रत्यय (मुख्य कारण) मानल्या गेलेल्या अंगभावाने (घटक रूपाने). याद्वारे 'भवङ्ग' (भवंग) या पदातील 'अङ्ग' (अंग) या शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला जातो. म्हणूनच 'तस्स हि' (त्याचेच हि...) इत्यादी म्हटले आहे. 'तस्स' म्हणजे भवंगाचे. 'आवर्जन' म्हणजे 'आवर्तन' (मन वळवणे) हा एक शाब्दिक अर्थ आहे. किंवा 'ते (चित्तसंतानाला) आवर्जित करते (वळवते)' हा एक अर्थ आहे. 'तं' म्हणजे चित्तसंतान (चित्ताचा प्रवाह). किंवा 'यात ते (चित्तसंतान) आवर्तित होते (वळते)' हा एक अर्थ आहे. किंवा 'याद्वारे ते आवर्तित होते' हा एक अर्थ आहे. 'तं' म्हणजे चित्तसंतान. किंवा 'आवर्जित करते' हा एक अर्थ आहे. 'वोट्ठब्बनं' (व्यवस्थान/निश्चय) चा पदच्छेद 'वि-अव-ठपनं' असा आहे. विभावनीच्या विचारात (टीकेत). 'एकावज्जनपरिकम्मचित्ततो' याचा विग्रह असा आहे: मार्गाने किंवा अभिज्ञेने ज्याचे आवर्जन एकसमान असते, ते. त्या वीथीमध्ये (चित्तवीथीत) 'आवर्जन, परिकर्म, उपचार, अनुलोम, गोत्रभू' यांपैकी येथे 'परिकर्म जवनचित्ताला' 'परिकर्म चित्त' असे म्हटले आहे. 'तानि' म्हणजे मार्ग आणि अभिज्ञा जवने. 'तत्थ' म्हणजे त्या विभावनीच्या पाठात. 'दीघं अद्धानं' (दीर्घ काळ) म्हणजे संपूर्ण रात्रभर किंवा संपूर्ण दिवसभर झोप लागण्याच्या (निद्रेत जाण्याच्या) रूपाने असलेला दीर्घ काळ. यातील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. 'पटिसन्धिया ठानं' म्हणजे प्रतिसंधी कृत्याचे स्थान. 'काळ हा चित्ताचे स्वतंत्र आलंबन असलेला एक प्रज्ञप्ती धर्म आहे' याद्वारे, 'काळ हा स्वभावाने (वास्तविकपणे) अस्तित्वात नसल्यामुळे तो कृत्यांच्या प्रवृत्तीचे स्थान कसा काय असू शकतो?' या शंकेचे निरसन केले आहे. 'इतरथा' म्हणजे तसे न स्वीकारता, दुसऱ्या प्रकारे कृत्य आणि स्थानांमध्ये अभेद (एकत्व) मानला गेल्यास, असा अर्थ आहे. 'सयं सोमनस्सयुत्तम्पि' म्हणजे कधीकधी स्वतः सोमनस्ययुक्त (आनंदयुक्त) देखील. 'तं' म्हणजे सोमनस्य संतीरण (तपासणारे चित्त). 'लद्धपच्चयभावेन' म्हणजे अनंतर-प्रत्यय प्राप्त झाल्यामुळे. 'आसेवनभावरहितम्पि' म्हणजे आसेवन गुणाने रहित (पुनरावृत्तीच्या प्रभावाशिवाय) देखील. कारण ते आसेवन प्रत्ययात प्रत्यय (कारण) देखील नसते आणि प्रत्ययोत्पन्न (कार्य) देखील नसते. 'परिकर्म भावना बलाने प्रवृत्त झाल्यामुळे' हे फलसमापत्तीच्या वीथीमध्ये फलजवनांच्या बाबतीत स्पष्ट आहे. यातील उर्वरित भाग सुबोधच (सहज समजण्यासारखाच) आहे। ๑๓๓. ทฺวารสงฺคเห. ‘‘อาทาสปฏฺฏมโย’’ติ อาทาสปฏฺเฏน ปกโต. ‘‘ทฺเว เอวา’’ติ ทฺเว เอว ทฺวารานิ. ‘‘ทฺวาร สทิสตฺตา’’ติ นคร ทฺวาร สทิสตฺตา. ‘‘กมฺมวิเสส มหาภูต วิเสส สิทฺเธนา’’ติ เอตฺถ กมฺมวิเสเสน จ มหาภูต วิเสเสน จ สิทฺโธติ วิคฺคโห. อาวชฺชนาทีนิ จ วีถิ จิตฺตานิ คณฺหนฺติ. ‘‘ยมฺหี’’ติ ยสฺมึ [Pg.114] จกฺขุมฺหิ. ตเทว จกฺขุ จกฺขุทฺวารํ นามาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตสํ ทฺวินฺนํ’’ติ รูป นิมิตฺตานญฺจ อาวชฺชนาทิ วีถิจิตฺตานญฺจ. ‘‘วิสย วิสยี ภาวูปคมนสฺสา’’ติ เอตฺถ รูป นิมิตฺตานํ วิสยภาวสฺส อุปคมนํ นาม จกฺขุ มณฺเฑ อาปาตาคมนํ วุจฺจติ. อาวชฺชนาทีนํ วิสยี ภาวสฺส อุปคมนํ นาม เตสํ นิมิตฺตานํ อารมฺมณ กรณํ วุจฺจติ. ‘‘มุขปฺปถภูตตฺตา’’ติ มุขมคฺคภูตตฺตา. เอวํ ทฺวาร สทฺทสฺส กรณ สาธนยุตฺตึ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อธิกรณ สาธน ยุตฺตึ ทสฺเสติ ‘‘อถวา’’ติอาทินา. ‘‘รูปานํ’’ติ รูป นิมิตฺตานํ. ‘‘จกฺขุเมว จกฺขุ ทฺวาร’’นฺติ เอเตน จกฺขุเมว ทฺวารํ จกฺขุ ทฺวารนฺติ อวธารณ สมาสํ ทสฺเสติ. ‘‘การณํ วุตฺตเมวา’’ติ เหฏฺฐา จิตฺตสงฺคเห มโนทฺวาราวชฺชนปเท วุตฺตเมว. สพฺพํ เอกูน นวุติวิธํ จิตฺตํ มโนทฺวารเมว นาม โหติ. ตถาหิ วุตฺตํ อฏฺฐสาลินิยํ อยํ นามมโน มโนทฺวารํ นาม น โหตีติ น วตฺตพฺโพติ. ‘‘อุปปตฺติ ทฺวารเมวา’’ติ อุปปตฺติภว ปริยาปนฺนํ กมฺมชทฺวารเมว. ‘‘อิธ จา’’ติ อิมสฺมึ สงฺคหคนฺเถ จ. ยญฺจ สาธก วจนนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตตฺถา’’ติ วิภาวนิยํ. ‘‘ตตฺเถว ตํ ยุตฺตํ’’ติ ตสฺมึ ปาฬิปฺปเทเส เอว ตํ สาธก วจนํ ยุตฺตํ. อิตเร ทฺเว ปจฺจยาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘มนญฺจาติ เอตฺถา’’ติ มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณํติ วากฺเย มนญฺจาติปเท. ตตฺถ ปน ชวน มโนวิญฺญาณสฺส อุปฺปตฺติยา จตูสุ ปจฺจเยสุ มนญฺจาติ เอตฺถ ทฺวารภูตํ ภวงฺคมโน จ อาวชฺชน มโน จาติ ทฺเว ปจฺจยา ลพฺภนฺติ. ธมฺเม จาติ ปเท ธมฺมารมฺมณ สงฺขาโต เอโก ปจฺจโย ลพฺภติ. จ สทฺเทน มโนวิญฺญาณ สมฺปยุตฺตกฺขนฺธา คยฺหนฺติ. เอวํ จตฺตาโร ปจฺจยา โหนฺติ. ‘‘เอตฺถ จา’’ติ อิมสฺมึ อฏฺฐกถา วจเน. ‘‘สนฺนิหิต ปจฺจยานํ เอว ตตฺถ อธิปฺเปตตฺตา’’ติ ปฏิจฺจ สทฺทสามตฺถิเยน อาสนฺเน ธรมานปจฺจยานํ เอว ตสฺมึ ปาฬิวากฺเย อธิปฺเปตตฺตา. ‘‘ทฺวารภาวารหสฺสา’’ติ วิสย วิสยีนํ วุตฺต นเยน ปวตฺติ มุขภาวารหสฺส. เอเตน อารมฺมณานิ อาปาตํ อาคจฺฉนฺตุ วา, มาวา, วีถิ จิตฺตานิ ปวตฺตนฺตุวา, มาวา, อปฺปมาณํ. ปภสฺสรปฺปสนฺนภาเวน ทฺวารภาวา รหตา เอว ปมาณนฺติ ทีเปติ. ‘‘นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ’’ติ สนฺนิฏฺฐานํ เอตฺถ คนฺตพฺพํ. ทฺวารวิการ [Pg.115] มูลกานิ ตาทิสานิ กิจฺจานิ เยสํ ตานิ ตํ กิจฺจวนฺตานิ. ‘‘กมฺมวเสน สิชฺฌนฺตี’’ติ สตฺตสนฺตาเน ปวตฺตนฺตีติ อธิปฺปาโย. ตํ กิจฺจวนฺตานิ จิตฺตานิ. วิภาวนิ ปาเฐ ‘‘มโนทฺวาร สงฺขาต ภวงฺคโต’’ติ มโนทฺวาร สงฺขาต ภวงฺค ภาวโต จ. ‘‘อารมฺมณนฺตรคฺคหณวเสน อปฺปวตฺติโต’’ติ ปฏิสนฺธิ จิตฺเตน ยถา คหิตํ กมฺมกมฺมนิมิตฺตาทิกํ อารมฺมณํ มุญฺจิตฺวา ปวตฺติกาเล ฉสุ ทฺวาเรสุ อาปาตาคตสฺส อารมฺมณนฺตรสฺส คหณ วเสน อปฺปวตฺติโต จ. เหฏฺฐาปิ ปญฺจทฺวารา วชฺชน จกฺขุ วิญฺญาณ สมฺปฏิจฺฉน สนฺตีรณ โวฏฺฐพฺพน กามาวจรชวน ตทา รมฺมณ วเสนาติอาทินา กิจฺจสีเสเนว. ล. วุตฺโต. เอตฺถหิ อาวชฺชน สมฺปฏิจฺฉนาทีนิ กิจฺจ วิเสสานํ นามานิ โหนฺติ. ‘‘เจ’’ติ เจ วเทยฺย. ‘‘นา’’ติ น วตฺตพฺพํ. ‘‘ตถา อสฺสุตตฺตา’’ติ เอกูน วีสติ ทฺวาร วิมุตฺตานีติ จ, ฉ ทฺวาริกานิ เจว ทฺวาร วิมุตฺตานีติ จ, มหคฺคต วิปากานิ ทฺวาร วิมุตฺตาเน วาติ จ, สุตํ. น ปน ทฺวาริก วิมุตฺตานีติ สุตํ. १३३. द्वारसंग्रहामध्ये. "आदासपट्टमयो" (आरशाच्या पट्टीचा बनलेला) म्हणजे आरशाच्या पट्टीने तयार केलेला. "द्वे एव" (दोनच) म्हणजे दोनच द्वारे. "द्वारसदिसत्ता" (द्वारासारखे असणे) म्हणजे नगराच्या द्वारासारखे असणे. "कम्मविसेसमहाभूतविसेससिद्धेन" यामध्ये 'कम्मविशेष आणि महाभूतविशेष यांद्वारे सिद्ध (उत्पन्न) झालेले' असा विग्रह आहे. आणि आवज्जन (आवर्जन) इत्यादी वीथिचित्ते ग्रहण करतात. "यम्हि" म्हणजे ज्या चक्खुमध्ये (डोळ्यामध्ये). तोच चक्खु 'चक्खुद्वार' या नावाचा आहे, असा संबंध आहे. "तेसं द्विन्नं" (त्या दोघांचे) म्हणजे रूपनिमित्तांचे आणि आवज्जन इत्यादी वीथिचित्तांचे. "विसयविसयीभावूपगमनस्स" यामध्ये रूपनिमित्तांच्या विषयभावाप्रत पोहोचणे म्हणजे चक्खुमंडलात गोचर होणे (आपातागमन) म्हटले जाते. आवज्जन इत्यादींच्या विषयीभावाप्रत पोहोचणे म्हणजे त्या निमित्तांना आलंबन (आरम्मण) बनवणे म्हटले जाते. "मुखप्पथभूतत्ता" म्हणजे मुख्य मार्ग स्वरूप असल्यामुळे. अशा प्रकारे 'द्वार' शब्दाची करण-साधन युक्ती दर्शवून, आता "अथवा" इत्यादींद्वारे अधिकरण-साधन युक्ती दर्शवितात. "रूपानां" म्हणजे रूपनिमित्तांचे. "चक्खुमेव चक्खुद्वारं" याद्वारे चक्खुच द्वार आहे ते 'चक्खुद्वार' असा अवधारणा-समास दर्शवितात. "कारणं वृत्तमेव" (कारण आधीच सांगितले आहे) म्हणजे खाली चित्तसंग्रहात 'मनोद्वारावज्जन' पदाच्या संदर्भात जे सांगितले आहे तेच होय. सर्व एकोणनव्वद (८९) प्रकारचे चित्त हे 'मनोद्वार'च असते. तसेच अट्ठसालिनीमध्ये म्हटले आहे की, हे नाम-मन मनोद्वार होत नाही, असे म्हणता येत नाही. "उपपत्तिद्वारमेव" म्हणजे उपपत्ति-भवात (पुनर्जन्मात) समाविष्ट असलेले कम्मज-द्वारच होय. "इध च" म्हणजे या संग्रहग्रंथात (अभिधम्मत्थसंगहात) सुद्धा. आणि जे साधक वचन आहे, असा संबंध आहे. "तत्थ" म्हणजे विभावनीमध्ये (टीकेमध्ये). "तत्थेव तं युत्तं" म्हणजे त्या पाळिप्रदेशातच (मूळ पाठातच) ते साधक वचन योग्य आहे. 'इतर दोन प्रत्यय' असा संबंध आहे. "मनञ्चाति एत्थ" म्हणजे 'मनञ्च पटिच्च धम्मे च उप्पज्जति मनोविञ्ञाणं' (मन आणि धर्मांना अनुसरून मनोविज्ञान उत्पन्न होते) या वाक्यातील 'मनञ्च' या पदात. तेथे जवन-मनोविज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठीच्या चार प्रत्ययांपैकी 'मनञ्च' यामध्ये द्वारभूत असलेले भवाङ्ग-मन आणि आवज्जन-मन हे दोन प्रत्यय प्राप्त होतात. 'धम्मे च' या पदात धम्मारम्मण (धर्मांलंबन) नावाचा एक प्रत्यय प्राप्त होतो. 'च' शब्दाने मनोविज्ञानाशी संप्रयुक्त असलेले स्कन्ध ग्रहण केले जातात. अशा प्रकारे चार प्रत्यय होतात. "एत्थ च" म्हणजे या अट्ठकथा वचनात. "सन्निहितपच्चयानं एव तत्थ अधिपेतत्ता" म्हणजे 'पटिच्च' (प्रतीत्य) शब्दाच्या सामर्थ्याने जवळ असलेल्या विद्यमान प्रत्ययांचेच त्या पाळि वाक्यात अभिप्रेत असल्यामुळे. "द्वारभावारहस्स" म्हणजे विषय आणि विषयी यांच्या सांगितलेल्या पद्धतीने प्रवृत्तीचे मुख्य द्वार होण्यास योग्य असणे. याद्वारे आलंबने गोचर होवोत वा न होवोत, वीथिचित्ते प्रवृत्त होवोत वा न होवोत, ते अमर्याद (अप्रामाणिक) आहे. प्रभास्वर व प्रसन्न भावामुळे द्वार होण्यास योग्य असणे हेच प्रमाण आहे, असे दर्शविते. "निट्ठमेत्थ गन्तब्बं" म्हणजे येथे निष्कर्ष (निश्चय) काढला पाहिजे. द्वारविकार-मूलक अशी कार्ये ज्यांची आहेत, ती 'तद्-कृत्यवान' (त्या कृत्यांनी युक्त) होत. "कम्मवसेन सिज्झन्ति" म्हणजे सत्त्वांच्या संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) प्रवृत्त होतात, असा अभिप्राय आहे. ती कृत्यवान चित्ते होत. विभावनी पाठात "मनोद्वारसङ्खातभवङ्गतो" म्हणजे मनोद्वार संज्ञक भवाङ्ग भावामुळे सुद्धा. "आरम्मणन्तरग्गहणवसेन अप्पवत्तितो" म्हणजे पटिसन्धि चित्ताने जसे ग्रहण केलेले कम्म, कम्मनिमित्त इत्यादी आलंबन सोडून प्रवृत्तीच्या वेळी सहा द्वारांमध्ये गोचर झालेल्या इतर आलंबनाचे ग्रहण न करण्याच्या प्रवृत्तीमुळे सुद्धा. खाली सुद्धा पञ्चद्वारावज्जन, चक्खुविञ्ञाण, सम्पटिच्छन, सन्तीरण, वोट्ठब्बन, कामावचर जवन, तदारम्मण यांच्याद्वारे इत्यादी कृत्य-शीर्षकानेच संक्षेपाने (ला.) सांगितले आहे. कारण येथे आवज्जन, सम्पटिच्छन इत्यादी विशिष्ट कृत्यांची नावे आहेत. "चे" म्हणजे जर असे म्हटले. "ना" म्हणजे असे म्हणू नये. "तथा अस्सुतत्ता" (तसे ऐकले नसल्यामुळे) म्हणजे एकोणवीस चित्ते 'द्वारविमुक्त' आहेत असे, आणि सहा द्वारांनी युक्त तसेच द्वारविमुक्त आहेत असे, आणि महग्गत विपाक चित्ते द्वारविमुक्तच आहेत असे ऐकले आहे; परंतु 'द्वारिक-विमुक्त' (द्वारे असणारे आणि विमुक्त असणारे) असे ऐकले नाही। ๑๓๔. อารมฺมณ สงฺคเห. ‘‘ทุพฺพล ปุริเสนา’’ติ เคลญฺญาภิภูตตฺตา วา ชราภิภูตตฺตา วา ทณฺเฑน วา รชฺชุเกน วา วินา อุฏฺฐาตุมฺปิ ปติฏฺฐาตุมฺปิ อปราปรํ คนฺตุมฺปิ อสกฺโกนฺเตน ทุพฺพล ปุริเสน ทณฺฑกํ วา รชฺชุกํ วา อาลมฺพิยติ. อาลมฺพิตฺวา อุฏฺฐาติ. ปติฏฺฐาติ. อปราปรํ คจฺฉติ. เอวเมว. อมุญฺจ มาเนหิ หุตฺวาติ ปาฐเสโส. ‘‘อาคนฺตฺวา’’ติ อารมฺมณ กรณ วเสน ตโต ตโต อาคนฺตฺวา. ‘‘วิสุํ สิทฺธานี’’ติ อาลมฺพิยตีติ เอตสฺมึ อตฺเถ สติ, อาลมฺพณนฺติ สิชฺฌติ. อารมฺมณนฺติ น สิชฺฌติ. ตานิ เอตฺถ อาคนฺตฺวา รมนฺตีติ เอตสฺมึ อตฺเถ สติ, อารมฺมณนฺติ สิชฺฌติ. อาลมฺพณนฺติ น สิชฺฌติ. เอวญฺจ สติ เอกํ ปทํ ทฺวีหิวากฺเยหิ ทสฺสนํ น สุนฺทรนฺติ. ‘‘อญฺญานิ อารมฺมณานี’’ติ รูปารมฺมณโต อญฺญานิ สทฺทารมฺมณาทีนิ. ‘‘อาคจฺฉตี’’ติ อาวิภาวํ คจฺฉติ, อุปฺปาทปฺปวตฺติ วเสน ปจฺจกฺขภาวํ ปาปุณาติ. ‘‘อาคจฺฉิตฺถา’’ติ อาวิภาวํ คจฺฉิตฺถ, อุปฺปาทปฺปวตฺติ วเสน ปจฺจกฺขภาวํ ปาปุณิตฺถ. ‘‘อนาคตํ’’ติ เอตฺถ น กาโร อวตฺถา วเสน ปฏิเสโธ. โย ธมฺโม [Pg.116] ปจฺจย สามคฺคิยํ สติ อาคมน ชาติโก อุปฺปชฺชน สีโล. โส เอว อิทานิ อาคจฺฉติ, อิทานิ อาคจฺฉิตฺถ, อิทานิ อาคมน ชาติยํ ฐิโต, นาคจฺฉติ นาคจฺฉิตฺถาติ อิมินา อตฺเถน โส อนาคโต นาม. นิพฺพาน ปญฺญตฺติโย ปน อาคมน ชาติกา น โหนฺติ. ตสฺมา อาคมนปฺปสงฺคาภาวโต อนาคตาติ น วุจฺจนฺตีติ. เตนาห ‘‘อุปฺปาท ชาติกา’’ติอาทึ. ‘‘ตํ วิจาเรตพฺพํ’’ติ วตฺวา วิจารณาการํ ทสฺเสติ ‘‘สพฺเพปิหี’’ติอาทินา. เต ยทา วตฺตพฺพ ปกฺเข ติฏฺฐนฺตีติ สมฺพนฺโธ. อุปฺปาท ชาติกานญฺเญว สงฺขต ธมฺมานํ. ตาสํ นิพฺพาน ปญฺญตฺตีนํ. ‘‘น ตถา อิเมสํ’’ติ อิเมสํ ทฺวาร วิมุตฺตานํ อารมฺมณํ ปน ตถา น โหตีติ โยชนา. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ ภว วิเสเส. วิภาวนิปาเฐ ‘‘อาวชฺชนสฺสวิยา’’ติ อาวชฺชนสฺส อารมฺมณํ วิย. อคฺคหิตเมว หุตฺวา. ‘‘เอกวชฺชน วีถิยํ อคฺคหิต ภาโว อิธ น ปมาณ’’นฺติ ฉ ทฺวารคฺคหิตนฺติ อิธ อปฺปมาณํ. ภวนฺตเร คหิตสฺส อธิปฺเปตตฺตา. ‘‘กาลวิมุตฺต สามญฺญํ’’วาติ ยํ กิญฺจิกาล วิมุตฺตํ วา น โหตีติ อธิปฺปาโย. อาคมสิทฺธิ โวหาโร นาม ‘‘กมฺมนฺติ วา, กมฺมนิมิตฺตนฺติ วา, คติ นิมิตฺตนฺติ วา, ปสิทฺโธ โวหาโร วุจฺจติ. อชาต สตฺตุราชา สงฺกิจฺจชาตเกปิ ปิตรํ มาเรติ. ตสฺมา ‘‘ทฺวีสุภเวสู’’ติ วุตฺตํ. ‘‘ฉ หิ ทฺวาเรหี’’ติ กรณ ภูเตหิ ฉหิ จกฺขาทิ ทฺวาเรหิ. ‘‘มรณาสนฺน ชวเนหี’’ติ กตฺตุ ภูเตหิ มรณาสนฺเน ปวตฺเตหิ ฉ ทฺวาริก ชวเนหิ. ‘‘อเนกํ สภาวํ’’ติ อเนกนฺต ภาวํ. ยญฺหิ อารมฺมณนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เกนจิ ทฺวาเรน อคฺคหิตเมว โหตี’’ติ เอตฺถ อสญฺญี ภวโต จุตานํ สตฺตานํ กามปฏิสนฺธิยา กมฺมาทิ อารมฺมณํ ภวนฺตเร เกนจิ ทฺวาเรน อคฺคหิตนฺติ ยุตฺตํ. กสฺมา, ตสฺมึ ภเว กสฺสจิทฺวารสฺเสว อภาวโต. อรูปภวโต จุตานํ ปน กามปฏิสนฺธิยา คติ นิมิตฺต สมฺมตํ อารมฺมณํ กถํ ภวนฺตเร เกนจิ ทฺวาเรน อคฺคหิตํ ภเวยฺย, มโนทฺวารคฺคหิตเมว ภเวยฺยาติ อิมํ โจทนํ วิโสเธตุํ ‘‘เอตฺถ จ ยสฺมา ปฏฺฐาเน’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตโต จุตานํ สตฺตานํ ยา กามปฏิสนฺธิ, ตสฺสากามปฏิ สนฺธิยา. ปจฺจุปฺปนฺนํ คตินิมิตฺตํ [Pg.117] อารมฺมณํ เอติสฺสาติ วิคฺคโห. กามปฏิสนฺธิ. ปเรสํ ปโยค พเลนาปิ กมฺมาทีนํ อุปฏฺฐานํ นาม โหตีติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘สุฏฺฐุ อาเสวิตานํ’’ติ จิรกาลํ สงฺฆ วตฺต เจติยวตฺต กรณาทิวเสน ตํ ตํ ภาวนา กมฺมวเสน จ สุฏฺฐุ อาเสวิตานํ กมฺมกมฺมนิมิตฺตานํ. ‘‘โหติ เยวา’’ติ กมฺมาทีนํ อุปฏฺฐานํ นาม โหติเยว. ‘‘อาคนฺตฺวา’’ติ อิมํ มนุสฺส โลกํ อาคนฺตฺวา คณฺหนฺติเยว. ตทาปิ นิรยปาเลหิ ทสฺสิตํ ตํ ตํ คติ นิมิตฺตํ อารมฺมณํ กตฺวา จวนฺติ. ‘‘ตํ’’ติ เรวตึ นาม อิตฺถึ. นนุ นิรยปาลา นาม ตาวตึสา ภวนํ คนฺตุํ น สกฺกุเณยฺยุนฺติ. โน นสกฺกุเณยฺยุํ. กสฺมา, มหิทฺธิก ยกฺข ชาติกตฺตาติ ทสฺเสตุํ ‘‘เตหี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘เวสฺสวณ ทูตา’’ติ เวสฺสวณมหาราชสฺส ทูตา. ‘‘อุปจารชฺฌาเนฐตฺวา’’ติ อปฺปนาฌานํ อปตฺตตาย อุปจารภาวนาภูเต กามาวจรชฺฌาเนฐตฺวา. ‘‘ตาเนว นิมิตฺตานี’’ติ ปถวีกสิณ นิมิตฺตาทีนิ ปฏิภาค นิมิตฺตานิ. ‘‘กามปฏิสนฺธิยา อารมฺมณํ’’ติ เตหิ นิมิตฺตารมฺมเณหิ อญฺญํ อุปจาร ภาวนา กมฺมํ วา ยํ กิญฺจิ อนุรูปํ คติ นิมิตฺตํ วา. ‘‘ตาเนว นิมิตฺตานิ คเหตฺวา’’ติ วจเนน ตานิ นิมิตฺตานิ มรณาสนฺน ชวเนหิ คหิตานีติ ทสฺเสติ. ตานิ จ ปญฺญตฺติ ธมฺมตฺตา กามปฏิสนฺธิยา อารมฺมณํ น โหนฺตีติ. ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนคติ นิมิตฺเต สิทฺเธ สิทฺธเมวา’’ติ ตสฺมึ ภเว คตสฺส ตตฺถ ยาวชีวมฺปิ อนุ ภวิตพฺพํ อารมฺมณํ นาม ตสฺมึ ขเณ ธรมานํ ปจฺจุปฺปนฺนมฺปิ อตฺถิ. ตโต วฑฺฒมานํ อนาคตมฺปิ อตฺถิ. ตตฺถ ปจฺจุปฺปนฺเน อุปฏฺฐหนฺเต ปฏิสนฺธิยา อารมฺมณํ สมฺปชฺชติ. อนาคตํ ปน อนุปฏฺฐหนฺตมฺปิ ปจฺจุปฺปนฺเน อนฺโตคธสทิสํ โหตีติ อธิปฺปาโย. วิภาวนิ ปาเฐน จ ปจฺจุปฺปนฺน คตินิมิตฺตํ วิย อาปาตมาคตํ, กสฺมา, ปจฺจุปฺปนฺน คติ นิมิตฺเตเนว กิจฺจ สิทฺธิโต-ติ อธิปฺปาโย. เสสเมตฺถ สุโพธํ. ‘‘ตานิหี’’ติอาทีสุ. เกจิ วทนฺติ. อเนโชสนฺติ มารพฺภ. ยํ กาลมกรีมุนีติ วุตฺตตฺตา สพฺพญฺญุ พุทฺธาทีนํ ปรินิพฺพาน จุติ จิตฺตํ สนฺติ ลกฺขณํ นิพฺพานํ อารมฺมณํ กโรตีติ. ตํ สพฺพถาปิ กามาวจรา ลมฺพณา เนวาติ อิมินา อปเนตพฺพนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตา นิหิ [Pg.118] สพฺพญฺญุ พุทฺธานํ อุปฺปนฺนานิ ปี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘โลกุตฺตร ธมฺมา’’ติอาทีสุ. ‘‘ตานี’’ติ ทฺวาทสา กุสล จิตฺตานิ อฏฺฐญาณ วิปฺปยุตฺต กุสล กฺริย ชวนานิ จ. อชฺฌาน ลาภิโน ปุถุชฺชนา มหคฺคตชฺฌานานิปิ อาลมฺพิตุํ น สกฺโกนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ปญฺญตฺติยา สห กามาวจรา รมฺมณานี’’ติ. ‘‘ตาเน วา’’ติ ญาณ สมฺปยุตฺต กาม กุสลานิ เอว. ฌานลาภีนํ ตาเนว ญาณ สมฺปยุตฺตกาม กุสลานิ. เหฏฺฐิม ผลฏฺฐานํ ตาเนว อตฺตนา อธิคต มคฺคผล นิพฺพานา รมฺมณานิ. ‘‘ฌานานิ ปตฺเถนฺตี’’ติ อายตึ ฌานลาภิโน ภเวยฺยามาติ ปตฺถนํ กโรนฺติ. ‘‘เตสํ ปี’’ติ เตสํ ปุถุชฺชนานมฺปิ. ‘‘เต’’ติ เต โลกุตฺตร ธมฺมา. ‘‘อนุโภนฺตี’’ติ สมฺปาปุณนฺติ. ‘‘นวนิปาเต’’ติ องฺคุตฺตร นิกาเย นวนิปาเต. เสสํ สพฺพํ สุวิญฺเญยฺยเมว. १३४. आलंबन संग्रहामध्ये (आरम्मण संगह). \"दुर्बल माणसाद्वारे\" म्हणजे आजाराने ग्रस्त असल्यामुळे किंवा वृद्धत्वाने ग्रस्त असल्यामुळे काठी किंवा दोरीशिवाय उठण्यास, उभे राहण्यास किंवा इकडेतिकडे जाण्यास असमर्थ असलेल्या दुर्बल माणसाद्वारे काठी किंवा दोरीचा आधार घेतला जातो. आधार घेऊन तो उठतो, उभा राहतो, इकडेतिकडे जातो. त्याचप्रमाणे. 'अमुञ्चमानेहि हुत्वा' (न सोडणारे होऊन) हा उर्वरित पाठ आहे. \"आगन्त्वा\" (येऊन) म्हणजे आलंबन करण्याच्या वशाने तिथून-तिथून येऊन. \"विसुं सिद्धानी\" (वेगळे सिद्ध होतात) म्हणजे 'आलम्बियति' (ज्याचा आधार घेतला जातो) या अर्थी 'आलम्बन' सिद्ध होते, 'आरम्मण' सिद्ध होत नाही. \"त्यात (चित्त-चैतसिक) येऊन रमतात\" या अर्थी 'आरम्मण' सिद्ध होते, 'आलम्बन' सिद्ध होत नाही. आणि असे असताना एका पदाचे दोन वाक्यांनी दर्शन करणे योग्य (सुंदर) नाही. \"अञ्ञानि आरम्मणानि\" (इतर आलंबने) म्हणजे रूप-आलंबनापेक्षा इतर शब्द-आलंबन इत्यादी. \"आगच्छति\" (येते) म्हणजे प्रकट होते, उत्पत्ती आणि प्रवृत्तीच्या वशाने प्रत्यक्षभावाला प्राप्त होते. \"आगच्छित्थ\" (आले होते) म्हणजे प्रकट झाले होते, उत्पत्ती आणि प्रवृत्तीच्या वशाने प्रत्यक्षभावाला प्राप्त झाले होते. \"अनागतं\" (अनागत/भविष्य) यामध्ये 'न' कार हा अवस्थेच्या वशाने निषेध आहे. जो धर्म प्रत्यय-सामग्री असताना येण्याच्या स्वभावाचा (उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचा) आहे, तोच आता येतो, आता आला होता, आता येण्याच्या अवस्थेत स्थित आहे, (परंतु प्रत्यक्षात अजून) येत नाही किंवा आला नव्हता, या अर्थाने त्याला 'अनागत' म्हटले जाते. परंतु निर्वाण आणि प्रज्ञप्ती या येण्याच्या स्वभावाच्या (उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाच्या) नसतात. म्हणून, त्यांच्या येण्याचा प्रसंगच नसल्यामुळे त्यांना 'अनागत' म्हटले जात नाही. म्हणूनच \"उप्पादजातिका\" (उत्पत्तीच्या स्वभावाचे) इत्यादी म्हटले आहे. \"त्याचा विचार केला पाहिजे\" असे सांगून \"सब्बेपि हि\" (सर्वच खरोखर) इत्यादींद्वारे विचार करण्याची पद्धत दर्शवितात. \"ते जेव्हा वक्तव्य पक्षावर (बोलण्याच्या बाजूवर) उभे राहतात\" असा संबंध आहे. केवळ उत्पत्तीच्या स्वभावाच्या संस्कृत धर्मांचेच. त्या निर्वाण आणि प्रज्ञप्तींचे. \"न तथा इमेसं\" म्हणजे या द्वार-विमुक्तांचे आलंबन मात्र तसे नसते, अशी योजना आहे. \"तत्थ\" (तेथे) म्हणजे त्या विशिष्ट भवामध्ये. विभावनी पाठात \"आवर्जनाचे जसे\" म्हणजे आवर्जनाच्या आलंबनाप्रमाणे. न ग्रहण केलेलेच होऊन. \"एका आवर्जन वीथीमध्ये न ग्रहण केलेला भाव येथे प्रमाण नाही\" म्हणजे सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले येथे अप्रमाण आहे, कारण दुसऱ्या भवामध्ये ग्रहण केलेले अभिप्रेत आहे. \"कालविमुक्त सामान्य\" म्हणजे जे काही कालविमुक्त नसते, असा अभिप्राय आहे. आगमसिद्ध व्यवहार म्हणजे \"कर्म, कर्मनिमित्त किंवा गतिनिमित्त\" असा प्रसिद्ध व्यवहार म्हटला जातो. अजातशत्रू राजा संकिच्च जातकामध्येही पित्याला मारतो. म्हणून \"दोन भवांमध्ये\" असे म्हटले आहे. \"सहा द्वारांनी\" म्हणजे करणभूत (साधनभूत) अशा चक्षू इत्यादी सहा द्वारांनी. \"मरणासन्न जवनांनी\" म्हणजे कर्ता असलेल्या, मरणासन्न काळात प्रवृत्त होणाऱ्या सहा-द्वारिक जवनांनी. \"अनेक स्वभाव\" म्हणजे अनैकांतिक भाव. \"जे आलंबन आहे\" असा संबंध आहे. \"कोणत्याही द्वाराने न ग्रहण केलेलेच असते\" येथे असंज्ञी भवातून च्युत (मृत) झालेल्या सत्त्वांच्या काम-प्रतिसंधीसाठी कर्म इत्यादी आलंबन दुसऱ्या भवात कोणत्याही द्वाराने न ग्रहण केलेले असणे योग्य आहे. का? कारण त्या भवामध्ये कोणत्याही द्वाराचाच अभाव असतो. परंतु अरूप भवातून च्युत झालेल्यांच्या काम-प्रतिसंधीसाठी गतिनिमित्त मानलेले आलंबन दुसऱ्या भवात कोणत्याही द्वाराने न ग्रहण केलेले कसे असू शकेल? ते तर मनोद्वाराने ग्रहण केलेलेच असेल, या शंकेचे (चोदनेचे) निरसन करण्यासाठी \"येथे आणि ज्या अर्थी प्रस्थानात (पट्ठानमध्ये)\" इत्यादी म्हटले आहे. तेथून च्युत झालेल्या सत्त्वांची जी काम-प्रतिसंधी, त्या काम-प्रतिसंधीचे. \"वर्तमान गतिनिमित्त हे जिचे आलंबन आहे\" असा विग्रह आहे. काम-प्रतिसंधी. \"इतरांच्या प्रयोगाच्या (प्रयत्नाच्या) बळानेही कर्म इत्यादींचे उपस्थित होणे होते\" इत्यादी प्रकारे योजना करावी. \"चांगल्या प्रकारे आचरलेल्या\" म्हणजे दीर्घकाळ संघवृत्त (संघाचे नियम), चेतियवृत्त (चैत्याचे नियम) करणे इत्यादींच्या वशाने आणि त्या-त्या भावना-कर्माच्या वशाने चांगल्या प्रकारे आचरलेल्या कर्म आणि कर्मनिमित्तांचे. \"होतेच\" म्हणजे कर्म इत्यादींचे उपस्थित होणे होतेच. \"येऊन\" म्हणजे या मनुष्यलोकात येऊन ग्रहण करतातच. तेव्हाही यमदूतांनी (नरकपालांनी) दाखवलेल्या त्या-त्या गतिनिमित्ताला आलंबन करून ते च्युत (मृत) होतात. \"तिला\" म्हणजे रेवती नावाच्या स्त्रीला. शंका: नरकपाल हे तावतिंस भवनात जाण्यास असमर्थ नसतील का? (ते जाऊ शकत नाहीत का?) उत्तर: नाही, ते असमर्थ नसतात. का? कारण ते महाऋद्धीशाली यक्ष जातीचे असतात, हे दर्शविण्यासाठी \"त्यांच्याद्वारे\" इत्यादी म्हटले आहे. \"वेस्सवण दूत\" म्हणजे वेस्सवण (वैश्रवण) महाराजांचे दूत. \"उपचार ध्यानात राहून\" म्हणजे अर्पणा ध्यानाला प्राप्त न झाल्यामुळे उपचार-भावनाभूत अशा कामावचर ध्यानात राहून. \"तीच निमित्ते\" म्हणजे पठवीकसिण (पृथ्वीकृत्स्न) निमित्त इत्यादी प्रतिभाग निमित्ते. \"काम-प्रतिसंधीचे आलंबन\" म्हणजे त्या निमित्त-आलंबनांपेक्षा इतर उपचार-भावना कर्म किंवा कोणतेही अनुरूप गतिनिमित्त. \"तीच निमित्ते ग्रहण करून\" या वचनाने ती निमित्ते मरणासन्न जवनांनी ग्रहण केली आहेत, हे दर्शवितात. आणि ती प्रज्ञप्ती धर्म असल्यामुळे काम-प्रतिसंधीचे आलंबन होत नाहीत. \"वर्तमान गतिनिमित्त सिद्ध झाल्यावर सिद्धच आहे\" म्हणजे त्या भवात गेलेल्याचे तेथे आयुष्यभर अनुभवले जाणारे आलंबन त्या क्षणी विद्यमान असलेले वर्तमानही असते, आणि तिथून पुढे वाढणारे अनागत (भविष्य) देखील असते. तेथे वर्तमान उपस्थित असताना प्रतिसंधीचे आलंबन प्राप्त होते. अनागत (भविष्य) मात्र उपस्थित न होताही वर्तमानात अंतर्भूत असल्यासारखे असते, असा अभिप्राय आहे. आणि विभावनी पाठाने वर्तमान गतिनिमित्ताप्रमाणे समोर आलेले (आपातगत), का? कारण वर्तमान गतिनिमित्तानेच कार्य सिद्ध होते, असा अभिप्राय आहे. येथे उर्वरित भाग सुबोध (स्पष्ट) आहे. \"तानि हि\" इत्यादींमध्ये. काही जण म्हणतात: \"अनेजोसं\" (अकंपित) या गाथेला उद्देशून, \"ज्या वेळी मुनींनी काळ केला (देह ठेवला)\" असे म्हटल्यामुळे सर्वज्ञ बुद्ध इत्यादींचे परिनिर्वाण च्युती-चित्त शांत लक्षण असलेल्या निर्वाणाला आलंबन करते. ते सर्वथा कामावचर आलंबन असणारे नसतेच, याने त्याचे खंडन केले पाहिजे हे दर्शविण्यासाठी \"ती खरोखर सर्वज्ञ बुद्धांच्या उत्पन्न झालेली असतानाही\" इत्यादी म्हटले आहे. \"लोकोत्तर धर्म\" इत्यादींमध्ये. \"ती\" म्हणजे बारा अकुशल चित्ते आणि आठ ज्ञान-विप्रयुक्त कुशल व क्रिया जवने. ध्यान न मिळवलेले पृथग्जन महग्गत ध्यानांचेही आलंबन करू शकत नाहीत, म्हणून \"प्रज्ञप्तीसह कामावचर आलंबने\" असे म्हटले आहे. \"तीच\" म्हणजे ज्ञान-संप्रयुक्त काम-कुशल चित्तेच. ध्यान मिळवलेल्यांचे तेच ज्ञान-संप्रयुक्त काम-कुशल चित्ते. खालच्या फलस्थित (श्रोतापन्न इत्यादी) व्यक्तींचे तेच स्वतः प्राप्त केलेले मार्ग, फल आणि निर्वाण हे आलंबन असते. \"ध्यानांची प्रार्थना करतात\" म्हणजे भविष्यात आम्ही ध्यान मिळवणारे व्हावे, अशी प्रार्थना करतात. \"त्यांचेही\" म्हणजे त्या पृथग्जनांचेही. \"ते\" म्हणजे ते लोकोत्तर धर्म. \"अनुभवतात\" म्हणजे प्राप्त करतात. \"नवनिपातात\" म्हणजे अंगुत्तर निकायाच्या नवनिपातामध्ये. उर्वरित सर्व सहज समजण्यासारखेच आहे. ๑๓๕. วตฺถุสงฺคเห. ‘‘วตฺถู’’ติ นิสฺสย วิเสโส วุจฺจติ. ตานิ นิสฺสย วตฺถูนิ เยสํ ตานิ ตพฺพตฺถุกานิ. ‘‘เตสญฺจ สทฺโท น ยุชฺชตี’’ติ เตสํ วาเท จ สทฺโท น ยุชฺชติ. น หิ อลุตฺต จ การํ ทฺวนฺท ปทํ นาม อตฺถีติ. ‘‘ปุพฺพปเทสุ อาเนตพฺโพ’’ติ จกฺขุ วตฺถุ จ โสตวตฺถุ จาติอาทินา อาเนตพฺโพ. สมาส ปทํ น ยุชฺชติ. น หิ สมาส ปทโต เอก เทสํ อญฺญตฺถ อาเนตุํ ยุชฺชตีติ. อวิภตฺติก นิทฺเทโส นาม จกฺขุํ, โสตํ, ฆานํ, ชิวฺหา, กาโย, หทยํ, วตฺถุ จาติ วตฺตพฺเพ ปุพฺพปเทสุ อวิภตฺติก นิทฺเทโส. เอวญฺจสติ วตฺถุ สทฺโท จ สทฺโท จ ปุพฺพปเทสุ อาเนตุํ ลพฺภนฺตีติ. กามตณฺหาย อธีเนน อายตฺเตน กามาวจร กมฺเมน นิพฺพตฺตา กามตณฺหาธีน กมฺม นิพฺพตฺตา. ‘‘รูปาทีนํ ปริโภโค’’ติ รูปาทีนํ ปญฺจกามคุณานํ ปริโภโค. ‘‘ปริตฺตกมฺมํ ปี’’ติ สพฺพํ กามาวจร กมฺมมฺปิ. ‘‘ปูรยมานํ’’ติ ปริปูเรนฺตํ. จกฺขุ ทสฺสนานุตฺตริยํ นาม. โสตํ สวนานุตฺตริยํ นาม. สพฺเพสํ ทสฺสน กิจฺจานํ มชฺเฌ พุทฺธ ทสฺสนา ทิวเสน อนุตฺตรํ ทสฺสนํ ชเนตีติ ทสฺสนานุตฺตริยํ. เอวํ สวนานุตฺตริเยปิ จตุสจฺจ ธมฺมสฺสวนา ทิวเสนาติ วตฺตพฺพํ. ‘‘อชฺฌตฺต พหิทฺธ สนฺตา เนสุ ปี’’ติ [Pg.119] อชฺฌตฺต สนฺตาเนปิ พหิทฺธ สนฺตาเนปิ. ‘‘สุทฺเธ’’ติ เกนจิ อาโลเกน จ อนฺธกาเรน จ วิรหิเต. อาโลโก หิ เอโก รูป วิเสโส. ตถา อนฺธกาโร จ. เต จ ตตฺถ นตฺถิ. ‘‘อิมสฺมึ สงฺคเห’’ติ วตฺถุ สงฺคเห. วิสิฏฺฐํ ชานนํ วิชานนํ. ตญฺจ วิชานนํ ตีสุ มโนธาตูสุ นตฺถีติ วุตฺตํ ‘‘วิชานน กิจฺจาภาวโต’’ติ. อาวชฺชน กิจฺจํ กิเมตนฺติ, มนสิการ มตฺตํ โหติ. สมฺปฏิจฺฉน กิจฺจญฺจ ปญฺจวิญฺญาเณหิ ยถา คหิตาเนว ปญฺจารมฺมณานิ สมฺปฏิจฺฉน มตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘วิเสสชานน กิจฺจานิ น โหนฺตี’’ติ. ทสฺสนํ, สวนํ, ฆายนํ, สายนํ, ผุสน, นฺติ อิมานิ กิจฺจานิ โถกํ วิเสส ชานน กิจฺจานิ โหนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ปจฺจกฺขโต ทสฺสนา ทิวเสนา’’ติอาทึ. โถกํ วิเสส ชานน กิจฺจานิ โหนฺติ. ตสฺมา ตานิ ปญฺจวิญฺญาณานีติ วุตฺตานิ. อวเสสา ปน สนฺตีรณาทโย มโนวิญฺญาณธาตุโย นามาติ สมฺพนฺโธ. นนุ มนนฏฺเฐน มโน จ ตํ วิชานนฏฺเฐน วิญฺญาณญฺจาติ วุตฺเตปิ ปญฺจวิญฺญาเณหิ วิเสโส นตฺถีติ อาห ‘‘อติสฺสย วิเสส ชานน ธาตุโยติ อตฺโถ’’ติ. เอวํ สนฺเตปิ โส อตฺโถ สทฺทยุตฺติยา สิทฺโธ น โหติ. ยทิจฺฉา วเสน วุตฺโต โหตีติ อาห ‘‘ปริยาย ปทานํ’’ติอาทิ. เอเตน โส อตฺโถ สทฺทยุตฺติยา เอว สิทฺโธ. น ยทิจฺฉาวเสน วุตฺโตติ ทสฺเสติ. ‘‘วิเสสน สมาเส’’ติ มโน จ ตํ วิญฺญาณญฺจาติ มโนวิญฺญาณนฺติ เอวรูเป กมฺมธารย สมาเส. ‘‘ปทฏฺฐานํ’’ติ เอตฺถ ปทนฺติ จ ฐานนฺติ จ การณตฺถ วจนานิ, ตสฺมา ปริยาย สทฺทา นาม. ปทญฺจ ตํ ฐานญฺจาติ วุตฺเต อติสฺสย การณนฺติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ตถา ทุกฺข ทุกฺขํ, รูป รูปํ, ราช ราชา, เทวเทโวติอาทีนิ. ‘‘กตฺถจิ ทิสฺสติ ยุชฺชติ จา’’ติ น หิ กตฺถจิ ทิสฺสติ จ. สเจปิ กตฺถจิ ทิสฺเสยฺย, น หิ ยุชฺชติ จาติ อตฺโถ. ‘‘มนโส วิญฺญาณํ’’ติ เอตฺถ ปฏิสนฺธิ จิตฺตโต ปฏฺฐาย ยาวจุติ จิตฺตา อนฺตเร สพฺพํ จิตฺต สนฺตานํ สตฺต วิญฺญาณ ธาตูนํ วเสน วิภาคํ กตฺวา อตฺโถ วตฺตพฺโพ. ปญฺจทฺวารา วชฺชนญฺจ สมฺปฏิจฺฉน ทฺวยญฺจ มโนธาตุ มตฺตตฺตา มโน นาม. ปญฺจวิญฺญาณานิ วิญฺญาณ มตฺตานิ นาม. อวเสสานิ สพฺพานิ วิญฺญาณานิ มนสฺส วิญฺญาณนฺติ [Pg.120] อตฺเถน มโนวิญฺญาณานิ นาม. ตตฺถ ‘‘มนสฺส วิญฺญาณํ’’ติ อนนฺตร ปจฺจย ภูตสฺส วา มนสฺส ปจฺจยุปฺปนฺน ภูตํ วิญฺญาณํ. เอตฺถ สมฺปฏิจฺฉน ทฺวยํ ปจฺจยมโน นาม. สนฺตีรณโต ปฏฺฐาย ยาว ทฺวารนฺตเร ปญฺจทฺวารา วชฺชนํ นาคจฺฉติ, ตาว อนฺตเร สพฺพํ มโนวิญฺญาณ สนฺตานํ ปจฺจยุปฺปนฺน วิญฺญาณํ นาม. ปุน ‘‘มนสฺส วิญฺญาณ’’นฺติ ปจฺจยุปฺปนฺน ภูตสฺส มนสฺส ปจฺจย ภูตํ วิญฺญาณํ. เอตฺถ ปญฺจทฺวารา วชฺชนํ ปจฺจยุปฺปนฺน มโน นาม. ตโต ปุเร สพฺพํ มโนวิญฺญาณ สนฺตานํ ปจฺจย มโน นาม. เสสํ สุวิญฺเญยฺยํ. อวเสสาปนาติอาทีสุ. ‘‘มโนวิญฺญาณธาตุ ภาวํ สมฺภาเวตี’’ติ อวเสสา ปน ธมฺมา มโนวิญฺญาณธาตุ จ นาม โหนฺติ, หทย วตฺถุญฺจ นิสฺสายเยว วตฺตนฺตีติ เอวํ เตสํ ธมฺมานํ มโนวิญฺญาณธาตุ ภาวญฺจ สมฺภาเวติ, วณฺเณติ. สุฏฺฐุ ปกาเสตีติ อตฺโถ. เอตฺถ ปนาติอาทีสุ. ‘‘ปาฬิยํ’’ติ อินฺทฺริย สํยุตฺต ปาฬิยํ. ทุตียชฺฌาเน เอว อปริเสส นิโรธ วจนํ วิรุทฺธํ สิยา. กถํ, สเจ ปฏิโฆ อนีวรณา วตฺโถ นาม นตฺถิ. ปถมชฺฌานโต ปุพฺเพ เอว โส นิรุทฺโธ สิยา. อถ ทุตียชฺฌานุปจาเรปิ โส อุปฺปชฺเชยฺย, ปถมชฺฌานมฺปิ ปริหีนํ สิยา. ตสฺมึ ปริหีเน สติ, ทุตียชฺฌานมฺปิ นุปฺปชฺเชยฺย. เอวํ วิรุทฺธํ สิยา. ‘‘ปุริม การณเมวา’’ติ อนีวรณา วตฺถสฺส ปฏิฆสฺส อภาวโตติ การณํ เอว. ปรโตโฆโส นาม สาวกานํ สมฺมาทิฏฺฐิปฺปฏิลาภาย ปธาน ปจฺจโย โหติ. โส จ อรูปภเว นตฺถิ. ธมฺมาภิสมโย นาม จตุสจฺจ ธมฺมปฺปฏิเวโธ, พุทฺธา จ ปจฺเจก สมฺพุทฺธา จ สยมฺภุโน ปรโต โฆเสน วินา ธมฺมํ ปฏิวิชฺฌนฺติ. เต จ ตตฺถ นุปฺปชฺชนฺติ. ‘‘รูปวิราค ภาวนายา’’ติ รูปวิราค ภาวนา พเลน. เตสํ รูปาวจร จิตฺตานํ. ‘‘สมติกฺกนฺตตฺตา’’ติ เตสุ นิกนฺติปฺปหานวเสน สุฏฺฐุ อติกฺกนฺตตฺตา. เสสํ สพฺพํ สุวิญฺเญยฺยํ. १३५. वत्थुसंग्रहात (वत्थुसंगहे). "वत्थु" (वस्तू/आधार) म्हणजे विशिष्ट आश्रय (निसय विसेस) असे म्हटले जाते. ज्यांचे ते आश्रय-वस्तू (आधार) आहेत, त्यांना "तब्बत्थुक" (त्या-त्या वस्तूवर आधारित असणारे) म्हणतात. "आणि त्यांचा शब्द जुळत नाही" याचा अर्थ त्यांच्या वादात 'च' (आणि) हा शब्द योग्य ठरत नाही. कारण 'च' कार लोप न पावलेले असे कोणतेही द्वंद्व पद नसते. "पूर्वीच्या पदांमध्ये आणले पाहिजे" म्हणजे चक्खु-वत्थु (चक्षु-वस्तू) आणि सोत-वत्थु (श्रोत्र-वस्तू) इत्यादी प्रकारे ते आणले पाहिजे. सामासिक पद योग्य ठरत नाही. कारण सामासिक पदातील एका भागाला दुसऱ्या ठिकाणी आणणे योग्य नसते. अविभक्तिक निर्देश म्हणजे चक्खु (डोळा), सोत (कान), घान (नाक), जिव्हा (जीभ), काय (शरीर), हदय (हृदय) आणि वत्थु (वस्तू) असे म्हणताना पूर्वीच्या पदांमध्ये विभक्ती नसलेला निर्देश होय. असे असताना 'वत्थु' शब्द आणि 'च' शब्द पूर्वीच्या पदांमध्ये आणता येतात. कामतण्हा (काम-तृष्णा) च्या अधीन आणि आश्रित असलेल्या कामावचर कर्माने उत्पन्न झालेले ते 'कामतण्हाधीन-कम्म-निब्बत्त' (काम-तृष्णाधीन कर्म-उत्पन्न) होय. "रूपादींचा उपभोग" म्हणजे रूप इत्यादी पाच कामगुणांचा उपभोग होय. "परित्त (मर्यादित/अल्प) कर्म सुद्धा" म्हणजे सर्व कामावचर कर्म सुद्धा. "पूर्ण करत असताना" म्हणजे परिपूर्ण करत असताना. चक्षू हे 'दस्सनानुत्तरिय' (अनुत्तर दर्शन) होय. श्रोत्र हे 'सवनानुत्तरिय' (अनुत्तर श्रवण) होय. सर्व दर्शन-कृत्यांमध्ये बुद्ध-दर्शनादींच्या माध्यमातून जे अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) दर्शन उत्पन्न करते, ते 'दस्सनानुत्तरिय' होय. याचप्रमाणे 'सवनानुत्तरिय' च्या बाबतीतही चतुरार्यसत्य धम्म-श्रवणादींच्या माध्यमातून असे समजावे. "अध्यात्म (अंतर्गत) आणि बहिद्धा (बाह्य) संतानांमध्ये सुद्धा" म्हणजे आध्यात्मिक संतानामध्ये आणि बाह्य संतानामध्ये सुद्धा. "शुद्ध" म्हणजे कोणत्याही प्रकाशाने आणि अंधकाराने रहित असलेले. कारण प्रकाश हा एक विशिष्ट रूप-विशेष आहे, तसेच अंधकार सुद्धा. आणि ते दोन्ही तेथे नसतात. "या संग्रहात" म्हणजे वत्थु-संग्रहात. विशिष्ट जाणणे म्हणजे 'विजाणन' (विज्ञान) होय. आणि ते विजाणन तीन मनोधातूंच्या ठिकाणी नसते, म्हणून "विजाणन कृत्याचा अभाव असल्यामुळे" असे म्हटले आहे. आवज्जन कृत्य म्हणजे काय? ते केवळ मनसिकार (मनस्कार) मात्र असते. आणि संपटिच्छन (स्वीकृती) कृत्य हे पंचविज्ञानांद्वारे जसे ग्रहण केले आहे तसेच पाच आरंमणांचे (आलंबनांचे) केवळ संपटिच्छन (स्वीकार) करणे होय. म्हणूनच म्हटले आहे: "विशिष्ट जाणण्याची कृत्ये होत नाहीत." दर्शन (पाहणे), श्रवण (ऐकणे), घायन (वास घेणे), सायन (चव घेणे), फुसन (स्पर्श करणे) ही कृत्ये काही प्रमाणात विशिष्ट जाणण्याची कृत्ये असतात, म्हणून "प्रत्यक्ष दर्शनादींच्या माध्यमातून" इत्यादी म्हटले आहे. ती काही प्रमाणात विशिष्ट जाणण्याची कृत्ये असतात, म्हणूनच त्यांना 'पंचविज्ञान' असे म्हटले आहे. उर्वरित संतीरण इत्यादी चित्ते 'मनोविज्ञानधातू' आहेत, असा संबंध आहे. मनन करण्याच्या अर्थाने 'मन' आणि विजाणन करण्याच्या अर्थाने 'विज्ञान' असे म्हटले तरी पंचविज्ञानांपेक्षा काही विशेष फरक राहत नाही का? म्हणून म्हटले आहे: "अतिशय विशिष्ट जाणणारी धातू असा अर्थ आहे." असे असले तरी तो अर्थ शब्दयुक्तीने (व्याकरणदृष्ट्या) सिद्ध होत नाही, तर तो स्वेच्छेने (यदृच्छेने) सांगितला गेला आहे, म्हणून "पर्याय पदांचे" इत्यादी म्हटले आहे. याद्वारे तो अर्थ शब्दयुक्तीनेच सिद्ध होतो, स्वेच्छेने सांगितलेला नाही, हे दर्शविले आहे. "विशेषण समासात" म्हणजे 'जे मन आहे तेच विज्ञान आहे ते मनोविज्ञान' अशा प्रकारच्या कर्मधारय समासात. "पदट्ठान" (पदस्थान/कारण) यामध्ये 'पद' आणि 'ठान' हे शब्द कारणाचा अर्थ सांगणारे आहेत, म्हणून ते पर्यायवाची शब्द आहेत. 'जे पद आहे तेच स्थान आहे' असे म्हटले असता 'अतिशय कारण' (मुख्य कारण) असा अर्थ समजला जातो. तसेच दुक्ख-दुक्ख (दुःख-दुःख), रूप-रूप, राज-राजा, देव-देव इत्यादी. "कुठे तरी दिसते आणि जुळते" म्हणजे ते कुठेही दिसत नाही. जरी कुठे दिसले तरी ते जुळत नाही, असा अर्थ आहे. "मनाचे विज्ञान" यामध्ये पटिसंधि-चित्तापासून (प्रतिसंधी चित्तापासून) सुरू करून च्युति-चित्तापर्यंतच्या दरम्यानच्या सर्व चित्त-संतानाचा सात विज्ञान-धातूंच्या आधारे विभाग करून अर्थ सांगावा. पंचद्वारावर्जन आणि दोन संपटिच्छन चित्ते हे केवळ मनोधातू असल्यामुळे 'मन' या नावाने ओळखले जातात. पंचविज्ञान हे केवळ विज्ञान मात्र आहेत. उर्वरित सर्व विज्ञाने 'मनाचे विज्ञान' या अर्थाने 'मनोविज्ञान' या नावाने ओळखली जातात. त्यामध्ये "मनाचे विज्ञान" म्हणजे अनंतर-प्रत्यय (लगेचच नंतर येणारे कारण) झालेल्या मनाचे प्रत्ययोत्पन्न (कारणाने उत्पन्न झालेले) विज्ञान होय. येथे दोन संपटिच्छन चित्ते हे 'प्रत्यय-मन' (कारण-मन) आहेत. संतीरणापासून सुरू करून जोपर्यंत दुसऱ्या द्वारात पंचद्वारावर्जन येत नाही, तोपर्यंतच्या दरम्यानचे सर्व मनोविज्ञान-संतान हे 'प्रत्ययोत्पन्न-विज्ञान' होय. पुन्हा, "मनाचे विज्ञान" म्हणजे प्रत्ययोत्पन्न झालेल्या मनाचे प्रत्यय (कारण) झालेले विज्ञान होय. येथे पंचद्वारावर्जन हे 'प्रत्ययोत्पन्न-मन' होय. त्याच्या आधीचे सर्व मनोविज्ञान-संतान हे 'प्रत्यय-मन' होय. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. "अवसेसा पन" (उर्वरित तर) इत्यादींमध्ये. "मनोविज्ञानधातू भावाची शक्यता दर्शवतो" म्हणजे उर्वरित धर्म हे मनोविज्ञानधातू आहेत आणि ते हृदय-वस्तूचा आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात, अशा प्रकारे त्या धर्मांच्या मनोविज्ञानधातू भावाची शक्यता दर्शवतो, त्याचे वर्णन करतो. चांगल्या प्रकारे प्रकट करतो, असा अर्थ आहे. "येथे तर" इत्यादींमध्ये. "पाळीमध्ये" (पालि ग्रंथात) म्हणजे इंद्रिय संयुत्त पाळीमध्ये. द्वितीय ध्यानातच संपूर्ण निरोधाचे वचन विरुद्ध ठरेल. कसे? जर पटिघ (प्रतिघ/द्वेष) हा नीवरण नसलेली वस्तू नसेल. तर प्रथम ध्यानाच्या आधीच त्याचा निरोध झाला असता. आणि जर द्वितीय ध्यानाच्या उपचारातही तो उत्पन्न झाला, तर प्रथम ध्यान सुद्धा नष्ट झाले असते. ते नष्ट झाले असता, द्वितीय ध्यान सुद्धा उत्पन्न झाले नसते. अशा प्रकारे ते विरुद्ध ठरेल. "पूर्वीचे कारणच" म्हणजे नीवरण नसलेल्या वस्तूच्या पटिघाचा (प्रतिघाचा) अभाव असल्यामुळे हेच कारण आहे. 'परतोघोस' (दुसऱ्याकडून ऐकलेला उपदेश) हा श्रावकांना सम्यक् दृष्टी प्राप्त होण्यासाठी मुख्य प्रत्यय (कारण) असतो. आणि तो अरूपभवात नसतो. 'धम्माभिसमय' म्हणजे चतुरार्यसत्य धम्माचा साक्षात्कार होय. बुद्ध आणि प्रत्येकबुद्ध हे स्वयंभू असल्यामुळे दुसऱ्याच्या उपदेशाशिवाय (परतोघोसाशिवाय) धम्माचा साक्षात्कार करतात. आणि ते तेथे (अरूपभवात) उत्पन्न होत नाहीत. "रूपविराग भावनेने" म्हणजे रूपविराग भावनेच्या बळाने. त्या रूपावचर चित्तांच्या. "पूर्णपणे ओलांडून गेल्यामुळे" म्हणजे त्यांच्यातील निकान्तीचा (आसक्तीचा) प्रहाण (त्याग) केल्यामुळे चांगल्या प्रकारे ओलांडून गेल्यामुळे. उर्वरित सर्व सहज समजण्यासारखे आहे। ปกิณฺณกสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนานิฏฺฐิตา. प्रकीर्णकसंग्रहदीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली। ๔. วีถิสงฺคหอนุทีปนา ४. वीथिसंग्रह अनुदीपनी ๑๓๖. วีถิสงฺคเห[Pg.121]. ‘‘เตสญฺเญ วา’’ติ จิตฺต เจตสิกานํ เอว. ‘‘วุตฺตปฺปกาเรนา’’ติ ‘ตตฺถ จิตฺตํ ตาว จตุพฺพิธํ โหติ กามาวจรํ รูปาวจรํ, ติอาทินา อิจฺเจวํ วุตฺตปฺปกาเรน. ‘‘ปุพฺพา ปรนิยามิตํ’’ติ วา ทฺวตฺตึส สุข ปุญฺญมฺหาติอาทินา นเยน ปุพฺพา ปรนิยามิตํ. ‘‘อารพฺภคาถายา’’ติ. १३६. वीथिसंग्रहात. 'तेसंञ्ञे वा' (त्या इतरांचे) म्हणजे चित्त आणि चेतसिकांचेच. 'वृत्तप्पकारेण' (सांगितलेल्या प्रकारे) म्हणजे 'तेथे चित्त प्रथम चार प्रकारचे असते: कामावचर, रूपावचर' इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने. 'पुब्बा परनियामितं' (पूर्वापर नियत केलेले) म्हणजे 'बत्तीस सुखकारक पुण्याचा' इत्यादी पद्धतीने पूर्वापर नियत केलेले. 'आरब्धगाथाया' (आरंभगाथेमध्ये) असे म्हटले आहे. วีถิ จิตฺตวเสเนวํ, ปวตฺติย มุทีริโต; ปวตฺติ สงฺคโห นาม, สนฺธิยํ ทานิ วุจฺจตี.ติ वीथिचित्ताच्या द्वारे प्रवृत्तीमध्ये (जीवनात) अशा प्रकारे प्रवृत्तीसंग्रह सांगितला आहे; आता प्रतिसंधीच्या (पुनर्जन्माच्या) वेळी प्रवृत्तीसंग्रह सांगितला जात आहे. เอวํ ปวตฺติกาเล ปวตฺติ สงฺคโห, ปฏิสนฺธิกาเล ปวตฺติ สงฺคโหติ สิทฺโธ โหติ. เกจิ วาเท ‘‘ปฏิสนฺธิ ปวตฺติยํ’’ติ นิทฺธารเณ คหิเต ทฺวีสุ ปฏิสนฺธิ สงฺคห ปวตฺติ สงฺคเหสุ อิทานิ ปวตฺติ สงฺคหํ ปวกฺขามิ, ปจฺฉา ปฏิสนฺธิ สงฺคหํ ปวกฺขามีติ อตฺโถ โหติ. ตตฺถ ‘‘ปฏิสนฺธิ สงฺคโห’’ติ ปฏิสนฺธิกาเล สงฺคโห. ‘‘ปวตฺติ สงฺคโห’’ติ ปวตฺติกาเล สงฺคโห. โส จ อุปริคาถาย น สเมตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘เอวํ สตี’’ติอาทิมาห. ‘‘ตานิ ตีณิ ฉกฺกานิ นิกฺขิตฺตานี’’ติ ฉกฺกมตฺตานิ นิกฺขิตฺตานิ, น สกลํ. วตฺถุ ทฺวารา ลมฺพณ สงฺคโหติ อธิปฺปาโย. ‘‘สา ปนา’’ติ สาวิสยปฺปวตฺติ ปน. ‘‘กาจิ สีฆตมา’’ติ กาจิ อติเรกตรํ สีฆา. ‘‘ทนฺธา’’ติ สณิกา, จิรายิกา. ‘‘อนุปปนฺนา’’ติ อสมฺปนฺนา. อสมฺปนฺน โทโส อาคจฺฉตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ธาตุเภทํ’’ติ สตฺต วิญฺญาณ ธาตูนํ วิภาคํ. ‘‘ธาตุนานตฺตํ’’ติ ธารณ กิจฺจนานตฺตํ. อิติ ตสฺมา มโนธาตุ วิสุํ วุตฺตาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘มนนํ’’ติ วิชานนภาวํ อปตฺตํ. อาวชฺชนมตฺต สมฺปฏิจฺฉนมตฺต สงฺขาตํ ชานนมตฺตํ. ‘‘ยํ กิญฺจิ มนนํ’’ติ อนฺตมโส อาวชฺชนมตฺต สมฺปฏิจฺฉนมตฺตํ ปีติ อธิปฺปาโย. ‘‘สุทฺโธ ปน มโนวิญฺญาณปฺปพนฺโธ’’ติ มโนทฺวาร วิการํ ปฏิจฺจ ปวตฺโต มโนวิญฺญาณปฺปพนฺโธ. น ภวงฺค มโนวิญฺญาณปฺปพนฺโธ. โส หิ วีถิมุตฺตตฺตา อิธ อปฺปสงฺโคติ[Pg.122]. มโนทฺวาเร ปน ทฺวิธาติ สมฺพนฺโธ. พุทฺธสฺส ภควโต ปถมาภินีหารกาโล นาม สุเมธตาปสกาเล พุทฺธ ภาวาย กาย จิตฺตานํ อภินีหารกาโล. อาทิสทฺเทน ปจฺฉิม ภเว ปฏิสนฺธิคฺคหณาทึ สงฺคณฺหาติ. ‘‘ชาติ ผลิกกฺขนฺธา วิย สมฺปชฺชนฺตี’’ติ เตน โอภาเสน อชฺโฌตฺถฏตฺตา ชาติผลิกกฺขนฺธ สทิสา โหนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อุปปตฺติ เทว พฺรหฺมานํ ปนา’’ติ อุปปตฺติปฺปฏิสนฺธิกานํ โอปปาติก เทว พฺรหฺมานํ ปน. ‘‘ปสาท นิสฺสย ภูตานํ’’ติ จกฺขาทีนํ ปสาท วตฺถูนํ นิสฺสย มหาภูตานํ. अशा प्रकारे प्रवृत्तीच्या वेळी (जीवनात) प्रवृत्तीसंग्रह आणि प्रतिसंधीच्या वेळी (पुनर्जन्मात) प्रवृत्तीसंग्रह सिद्ध होतो. काही मतांमध्ये 'प्रतिसंधी आणि प्रवृत्तीमध्ये' असे निर्धारण स्वीकारले असता, प्रतिसंधीसंग्रह आणि प्रवृत्तीसंग्रह या दोन्हीमध्ये 'आता मी प्रवृत्तीसंग्रह सांगेन, नंतर प्रतिसंधीसंग्रह सांगेन' असा अर्थ होतो. तेथे 'प्रतिसंधीसंग्रह' म्हणजे प्रतिसंधीच्या काळातील संग्रह. 'प्रवृत्तीसंग्रह' म्हणजे प्रवृत्तीच्या काळातील संग्रह. आणि तो वरील गाथेशी जुळत नाही हे दर्शवण्यासाठी 'एवं सति' (असे असताना) इत्यादी म्हटले आहे. 'ती तीन षटके सोडली आहेत' म्हणजे केवळ षटकांचाच त्याग केला आहे, संपूर्ण नाही. वस्तू, द्वार आणि आलंबन संग्रह असा अभिप्राय आहे. 'सा पना' (परंतु ती) म्हणजे विषयाची प्रवृत्ती. 'काचि सीघतमा' (काही अत्यंत वेगवान) म्हणजे काही अत्यंत वेगवान असणारी. 'दंधा' (मंद) म्हणजे हळूहळू चालणारी, दीर्घकाळ टिकणारी. 'अनुपपन्ना' म्हणजे असंपन्न (अयोग्य). असंपन्नतेचा दोष येतो, असे म्हटले आहे. 'धातुभेद' म्हणजे सात विज्ञानधातूंचे विभाजन. 'धातुनानात्व' म्हणजे धारण करण्याच्या कार्यातील विविधता. म्हणून, त्या कारणाने मनोधातू स्वतंत्रपणे सांगितली आहे, असा संबंध आहे. 'मनन' म्हणजे पूर्ण विज्ञानावस्थेला न पोहोचलेले, केवळ आवर्जन (लक्ष देणे) आणि संपटिच्छन (स्वीकारणे) या स्वरूपाचे केवळ जाणणे होय. 'यंग किंचि मननं' (जे काही मनन आहे) म्हणजे अगदी कमीत कमी आवर्जन आणि संपटिच्छन मात्र देखील, असा अभिप्राय आहे. 'परंतु शुद्ध मनोविज्ञानप्रवाह' म्हणजे मनद्वाराच्या विकाराला अनुसरून प्रवृत्त झालेला मनोविज्ञानप्रवाह होय, भवांग-मनोविज्ञानप्रवाह नव्हे. कारण तो वीथिमुक्त असल्याने येथे त्याचा संबंध नाही. 'मनोद्वाराच्या बाबतीत दोन प्रकारे' असा संबंध आहे. भगवान बुद्धांचा 'प्रथम अभिनिहार काळ' म्हणजे सुमेध तापसाच्या काळात बुद्धत्वासाठी काय आणि चित्ताचा त्यांनी केलेला संकल्प (अभिनिहार) होय. 'आदि' शब्दाने अंतिम जन्मातील प्रतिसंधी ग्रहण करणे इत्यादींचा संग्रह होतो. 'जाति-स्फटिकखंडाप्रमाणे होतात' म्हणजे त्या प्रकाशाने व्यापले गेल्यामुळे ते नैसर्गिक स्फटिकखंडासारखे होतात, असा अभिप्राय आहे. 'परंतु उपपत्ती देव आणि ब्रह्मांचे' म्हणजे उपपत्ती-प्रतिसंधी असणाऱ्या औपपातिक देव आणि ब्रह्मांचे. 'प्रसाद आणि आश्रय असणाऱ्या भूतांचे' म्हणजे चक्षु इत्यादी प्रसाद आणि वस्तूंचा आश्रय असणाऱ्या महाभूतांचे। ‘‘ยานิ ปนา’’ติอาทีสุ. ทฺวตฺติ จิตฺตกฺขณานิ อติกฺกมฺม อาปาตํ อาคจฺฉนฺตีติ โยชนา. เอวํ ปรตฺถปิ. วิภูตสฺสาติ จ อวิภูตสฺสาติ จ อิทํ อาทิมฺหิ มโนทฺวาเร ปน วิภูตสฺสาติ จ อวิภูตสฺสาติ จ ปทานํ อุทฺธรณํ. ‘‘รูปา รูปานํ’’ติ รูป ธมฺมานญฺจ อรูป ธมฺมานญฺจ. ‘‘ตาวา’’ติ วีถิ จิตฺตปฺปวตฺติ ทสฺสนโต ปถมตรํ เอวาติ อตฺโถ. ‘‘อทฺธาน ปริจฺเฉทํ’’ติ ขณกาล ปริจฺเฉทํ. วิภาวนิปาเฐ ‘‘อติมหนฺตา ทิวเสน วิสย ววตฺถานํ โหตี’’ติ วจเนน อาทิมฺหิ ‘ฉวตฺถูนิ, ฉ ทฺวารานิ, ฉ อารมฺมณานิ, ฉ วิญฺญาณานิ, ฉ วีถิโย, ฉ ธาวิสยปฺปวตฺตี,ติ เอวํ วุตฺเตสุ ฉสุ ฉกฺเกสุ ฉธาวิสยปฺปวตฺตีติ ปทมตฺตํ สงฺคณฺหาติ. ตํ อนุปปนฺนํ โหติ. เตนาห ‘‘เอวญฺหิ สตี’’ติอาทึ. ‘‘วิสย ววตฺถานตฺถ เมวา’’ติ อติมหนฺตาทิ วิสย ววตฺถานตฺถเมว วุตฺตนฺติ น จ สกฺกา วตฺตุํ. รูปา รูป ธมฺมานํ อทฺธาน ปริจฺเฉโท นาม อภิธมฺเม สพฺพตฺถ อิจฺฉิตพฺโพ. ตสฺมา ตสฺส ทสฺสนตฺถมฺปิ ตํ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘สภาวปฺปฏิลาโภ’’ติ จินฺตน ผุสนาทีนํ ปาตุภาโว วุจฺจติ. ‘‘อนิวตฺตี’’ติ อนนฺตรธานํ วุจฺจติ. ‘‘ปริหายิตฺวา’’ติ ชรา กิจฺจํ อาห. ‘‘อจฺฉราสงฺฆาฏกฺขณสฺสา’’ติ องฺคุลีนํ สงฺฆฏฺฏนกฺขณสฺส. อาจริยานนฺทตฺเถโร นาม อภิธมฺม ฏีกากาโร วุจฺจติ. ‘‘อสฺสา วิชฺชุยาฐิติ นาม วิสุํ น ปญฺญายตี’’ติ วิชฺชุปฺปาทํ ปสฺสนฺตานํ น ปญฺญายติ. ตถา จิตฺตมฺปิ วฑฺฒนานนฺตรเมว ภิชฺชตีติ โยชนา. เตนาห ‘‘ตํ ปี’’ติอาทึ. อุทยภาโค นาม วฑฺฒนภาโค, วยภาโค นาม อนฺตรธานภาโค. ‘‘เอวญฺจ กตฺวา’’ติ ลทฺธคุณ วจนํ. ‘‘เอกํจิตฺตํ [Pg.123] ทิวสํ ติฏฺฐตี’’ติ ปุจฺฉา วจนํ. ‘‘อามนฺตา’’ติ ปฏิญฺญา วจนํ. ‘‘วยกฺขโณ’’ติ ปุจฺฉา. ‘‘น เหวํ วตฺตพฺเพ’’ติ ปฏิกฺเขโป. ปจฺจตฺต วจนสฺส เอการตฺตํ. เอวํ นวตฺตพฺพนฺติ อตฺโถ. ‘‘มหาเถเรนา’’ติ โมคฺคลิ ปุตฺตติสฺส มหาเถเรน. นนุ สุตฺตนฺเตสุ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นา’’ติ น อุปลพฺภติ. ‘‘อิมสฺส วุตฺตตฺตา’’ติ อิมสฺส วจนสฺส วุตฺตตฺตา. สงฺขต ลกฺขณํ วิสโย เยสํ ตานิ สงฺขต วิสย ลกฺขณานิ. สงฺขต ธมฺมเมว อาหจฺจ ติฏฺฐติ. อยํ อภิธมฺเม ธมฺมตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘สงฺคห กาเรนา’’ติ อาจริย พุทฺธโฆสตฺเถรํ วทติ. ‘‘อตฺถิกฺขณํ’’ติ ขณทฺวยเมว วุจฺจติ. อิติ วตฺวา ตมตฺถํ สาเธนฺตีติ สมฺพนฺโธ. คาถายํ. ‘‘ตสฺเสวา’’ติ ตสฺสา ฐิติยา เอว เภโท. สพฺพทา สพฺพปาณินํ มรณํ นาม วุจฺจตีติ โยชนา. ‘‘ตมตฺถํ’’ติ ตานิ อตฺถิกฺขณํ อุปาทาย ลพฺภนฺตีติ อตฺถํ. ‘‘อถวา’’ติ เอโก เถรวาโท. ‘‘สนฺตติ วเสน ฐานํ’’ติ ฐิตาย อญฺญถตฺตํ ปญฺญายตีติ เอตฺถ ฐิตภาวสงฺขาตํ ฐานํ สนฺตติ ฐิติวเสน เวทิตพฺพนฺติ วทนฺติ. ‘‘อิมสฺมึ ปน สุตฺเต’’ติ เวทนาย อุปฺปาโท ปญฺญายติ, วโย ปญฺญายติ, ฐิตาย อญฺญถตฺตํ ปญฺญายตีติ อิทํ สุตฺตํ วทติ. ‘‘อปฺปฏิพาเหตฺวา’’ติ อนีวาเรตฺวา. ยาวฑฺฒนสฺส นิวตฺติ นาม อตฺถิ. อุทย ปริยนฺต มตฺตภูตา สา เอว นิวตฺติ. ‘‘ทฺวีหิ ขนฺเธหี’’ติ รูป ชรา รูปกฺขนฺเธน สงฺคหิตา. อรูป ชรา สงฺขารกฺขนฺเธนาติ เอวํ ทฺวีหิ ขนฺเธหิ. ยญฺจ ตตฺถ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. รูปสฺส อุปฺปาโท ทฺวิธาภินฺทิตฺวา เทสิโต. กถํ, อุปจโย สนฺตตี ติโยชนา. ‘‘วิภาคา รหสฺสา’’ติ อุปฺปาโท อุปฺปชฺช นฏฺเฐน เอโก สมาโน รูปานํ วฑฺฒน สมเย อุปฺปาโท. อุปริ วฑฺฒนฏฺเฐน อุปจโยติ วุตฺโต. อวฑฺฒิตฺวา ฐิต สมเย อุปฺปาโท ยถา ฐิต นีหาเรน จิรกาลํ ปวตฺติ อตฺเถน สนฺตตีติ วุตฺโต. เอวํ วิภาคา รหสฺส. ‘‘ยถานุโลม สาสนํ’’ติ วิเนตพฺพ ปุคฺคลานํ อชฺฌาสยานุโลม สาสนํ. “यानि पना” इत्यादींमध्ये. दोन किंवा तीन चित्तक्षण ओलांडून गोचर (आपात) होतात, असा संबंध (योजना) आहे. इतर ठिकाणीही असेच. 'विभूतस्स' (स्पष्ट) आणि 'अविभूतस्स' (अस्पष्ट) हे सुरुवातीला मनोद्वाराच्या बाबतीत 'विभूतस्स' आणि 'अविभूतस्स' या पदांचे उद्धरण (उल्लेख) आहे. “रूपा रूपाणं” म्हणजे रूप धर्मांचे आणि अरूप धर्मांचे. “तावा” म्हणजे वीथिचित्तप्रवृत्ती दर्शवण्यापेक्षा सर्वात आधीच, असा अर्थ आहे. “अद्धान परिच्छेदं” म्हणजे क्षणकाल परिच्छेद. 'विभावनी' पाठात “अतिमहंत दिवसाने विषयाचे व्यवस्थापन होते” या वचनाने सुरुवातीला ‘सहा वस्तू, सहा द्वारे, सहा आलंबने, सहा विज्ञाने, सहा वीथी, सहा प्रकारच्या विषयप्रवृत्ती’ अशा प्रकारे सांगितलेल्या सहा षटकांमध्ये 'सहा प्रकारच्या विषयप्रवृत्ती' एवढ्याच पदाचा संग्रह केला आहे. ते अयोग्य ठरते. म्हणूनच “एवंच सति” इत्यादी म्हटले आहे. “विषय व्यवस्थापनार्थच” म्हणजे अतिमहंत इत्यादी विषयांच्या व्यवस्थापनासाठीच म्हटले आहे, असे म्हणता येत नाही. रूप आणि अरूप धर्मांचा काल-परिच्छेद अभिधम्मात सर्वत्र स्वीकारला पाहिजे. म्हणून, ते दर्शवण्यासाठी देखील ते म्हटले आहे, असे समजावे. “स्वभावप्रतिलाभ” म्हणजे चिंतन, स्पर्श इत्यादींचा प्रादुर्भाव होणे असे म्हटले जाते. “अनिवत्ती” म्हणजे अंतर्धान न पावणे असे म्हटले जाते. “परिहायित्वा” याने जरा (वृद्धत्व) कार्य सांगितले आहे. “अच्छरासंघातक्खणस्स” म्हणजे बोटांच्या चिमटीच्या (टाळीच्या) क्षणाचा. 'आचार्यानंद थेर' नावाचे अभिधम्म टीकाकार म्हटले जातात. “या विजेची स्थिती स्वतंत्रपणे जाणवत नाही” म्हणजे वीज पडताना पाहणाऱ्यांना ती जाणवत नाही. त्याचप्रमाणे चित्त देखील वाढीच्या (उत्पत्तीच्या) लगेचच नंतर नष्ट होते, असा संबंध आहे. म्हणूनच “तं पी” इत्यादी म्हटले आहे. 'उदयभाग' म्हणजे उत्पत्तीचा भाग, 'वयभाग' म्हणजे अंतर्धानाचा (नाशाचा) भाग. “एवंच कत्वा” हे प्राप्त गुणाचे वचन आहे. “एक चित्त दिवसभर टिकते का?” हा प्रश्न आहे. “आमता” (होय) हे होकारार्थी वचन आहे. “वयक्खणो” (नाशक्षण) हा प्रश्न आहे. “असे म्हणता कामा नये” हा निषेध आहे. स्वतःच्या वचनासाठी 'एकारत्त' (एक रात्र). असे म्हणू नये, असा अर्थ आहे. “महाथेरांनी” म्हणजे मोग्गलिपुत्त तिस्स महाथेरांनी. 'सुलभ सूत्रांमध्ये सांगितले आहे' असा संबंध आहे. “ना” म्हणजे उपलब्ध नाही. “हे म्हटल्यामुळे” म्हणजे हे वचन म्हटल्यामुळे. संस्कृत लक्षण (संखत लक्षण) हा ज्यांचा विषय आहे, ते 'संखत विषय लक्षणे' होत. ते संखत धर्मालाच धरून राहतात. ही अभिधम्मातील धर्मता आहे, असा अभिप्राय आहे. “संग्रहकाराने” असे आचार्य बुद्धघोष थेरांना म्हटले आहे. “अत्थिक्खणं” म्हणजे दोन क्षणच म्हटले जातात. असे सांगून त्या अर्थाचे प्रतिपादन करतात, असा संबंध आहे. गाथेमध्ये. “तस्सेव” म्हणजे त्याच स्थितीचाच भेद (नाश). नेहमी सर्व प्राण्यांचा मृत्यू असे म्हटले जाते, असा संबंध आहे. “तमत्थं” म्हणजे त्या दोन क्षणांना धरून प्राप्त होणारा अर्थ. “अथवा” म्हणजे एक थेरवाद. “संततीनुसार स्थिती” म्हणजे स्थितीमध्ये बदल जाणवतो, येथे स्थितीरूप स्थिती ही संतती स्थितीनुसार जाणावी, असे म्हणतात. “परंतु या सूत्रात” म्हणजे वेदनेची उत्पत्ती जाणवते, नाश जाणवतो, स्थितीमध्ये बदल जाणवतो, असे हे सूत्र सांगते. “अप्रतिबाधित करून” म्हणजे न रोखता. वाढीची जी समाप्ती आहे, त्याला 'निवत्ती' म्हणतात. उत्पत्तीच्या मर्यादेपर्यंत असणारी तीच 'निवत्ती' होय. “दोन स्कंधांद्वारे” म्हणजे रूप-जरा ही रूपस्कंधात समाविष्ट आहे आणि अरूप-जरा ही संस्कारस्कंधात (संखारक्खंध) समाविष्ट आहे, अशा प्रकारे दोन स्कंधांद्वारे. आणि जे तिथे सांगितले आहे, असा संबंध आहे. रूपाची उत्पत्ती दोन प्रकारे विभागून उपदेशिली आहे. कशी? 'उपचय' आणि 'संतती', असा संबंध आहे. “विभागास पात्र” म्हणजे उत्पत्ती उत्पन्न होऊन नष्ट झाल्यामुळे एक समान असणारी, रूपांच्या वाढीच्या वेळी होणारी उत्पत्ती. पुढे वाढण्याच्या अर्थाने तिला 'उपचय' म्हटले आहे. न वाढता राहिलेल्या स्थितीच्या वेळी होणारी उत्पत्ती, जशी स्थिती आहे तशाच प्रकारे दीर्घकाळ प्रवृत्त राहण्याच्या अर्थाने तिला 'संतती' म्हटले आहे. अशा प्रकारे ती विभागास पात्र आहे. “यथानुलोम सासनं” म्हणजे विनीत करावयाच्या पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) आशयाला अनुकूल असणारा उपदेश. ‘‘อรูป’’นฺติอาทีสุ. ‘‘อรูปํ’’ติ สพฺพโส รูปสณฺฐาน รหิตตฺตา จิตฺต เจตสิกํ นามํ วุจฺจติ. ‘‘อรูปิ สภาวตฺตา’’ติ อรูป ธมฺม สภาวตฺตา อิจฺเจวตฺโถ. ตตฺถ อรูป ธมฺม สภาโว นาม รูป ธมฺมโต สตคุเณนวาสหสฺสคุเณนวาสณฺหสุขุมสภาโว[Pg.124]. วิภาว นิปาเฐ. ‘‘คาหก คเหตพฺพ ภาวสฺส ตํ ตํ ขณวเสน นิปฺผชฺชนโต’’ติ เอตฺถ ปญฺจทฺวาร วีถีสุ วีถิ จิตฺตานญฺจ อารมฺมณานญฺจ วิสยี วิสยภาโว คาหก คเหตพฺพ ภาโว นาม. ‘‘ตํ ตํ ขณวเสน นิปฺผชฺชนโต’’ติ วีถิ จิตฺตานิ จ เอกสฺมึ อารมฺมเณปิ อาวชฺชนาทีหิ นานา กิจฺเจหิ คณฺหนฺตา เอว คหณ กิจฺจํ สมฺปาเทนฺติ. นานา กิจฺจานิ จ นานา จิตฺตานํ วเสน สมฺปชฺชนฺติ. อารมฺมณานิ จ ปุเรชาตานิ หุตฺวา ยาว ตานิ กิจฺจานิ สมฺปชฺชนฺติ, ตาว ปจฺจุปฺปนฺนภาเวน ธรมานานิ เอว คหณํ สมฺปาเทนฺติ. เอวํ สติ, คาหกานํ วีถิ จิตฺตานญฺจ ขณตฺตยายุกตฺตา เอว คาหก กิจฺจํ นิปฺผชฺชติ, สิชฺฌติ. คเหตพฺพานํ อารมฺมณานญฺจ สตฺตรส จิตฺตกฺขณายุกตฺตา เอว คเหตพฺพ กิจฺจํ นิปฺผชฺชติ, สิชฺฌติ. เอวํ ตํ ตํ ขณ วเสน นิปฺผชฺชนโต. วิญฺญตฺติ ทฺวยํ เอก จิตฺตกฺขณิกํ. กสฺมา, จิตฺตานุ ปริวตฺติ ธมฺมตฺตา. ‘‘อุปฺปาทมตฺตา’’ติ นิปฺผนฺน รูปานํ อุปฺปาทมตฺตา. ‘‘ภงฺคมตฺตา’’ติ เตสเมว ภงฺคมตฺตา. ‘‘รูป ธมฺมานํ’’ติ นิปฺผนฺน รูป ธมฺมานํ. ‘‘อุปฺปาทนิโรธ วิธานสฺสา’’ติ อุปฺปาท นิโรธ วิธานภูตสฺส มหาอฏฺฐกถาวาทสฺส ปฏิสิทฺธตฺตาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตํ’’ติ ตํ มหาอฏฺฐกถา วจนํ. ‘‘ตสฺมึ วาเท’’ติ ตสฺมึ มหาอฏฺฐกถาวาเท. ‘‘ตตฺถ อาคตา’’ติ ตสฺมึ วาเท อาคตา. ยํ ปน วิภาวนิยํ การณํ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตํ ฏีกานยํ’’ติ ตํ โสฬส จิตฺตกฺขณายุก ทีปกํ มูลฏีกานยํ. ตทตฺถํ สาเธนฺเตน วิภาวนิ ฏีกาจริเยน วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. สงฺคหการสฺส อฏฺฐกถา จริยสฺส. ‘‘อุปจรียตี’’ติ อุปจาร วเสน โวหรียติ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘เอตานี’’ติ อารมฺมณานิ. ‘‘ตํ’’ติ ตํ เอก จิตฺตกฺขณํ. ‘‘เต จา’’ติ รูป ธมฺมา จ. ‘‘ปริปุณฺณ ปจฺจยูปลทฺธา’’ติ ปริปุณฺณํ ปจฺจยํ อุปลทฺธา. ‘‘โส’’ติ ฏีกากาโร. ‘‘อิตรานี’’ติ คนฺธรส โผฏฺฐพฺพานิ. ‘‘โคจรภาวํ’’ติ ปญฺจทฺวาริก จิตฺตานํ โคจรภาวํ. ‘‘ปุริมานิ ทฺเว’’ติ รูปสทฺทา รมฺมณานิ. ‘‘นิมิตฺต วเสน ฆฏฺเฏนฺตี’’ติ อาทาสํ ปสฺสนฺตสฺส มุขสทิสํ มุขนิมิตฺตํ มุขปฺปฏิพิมฺพํ อาทาเส อุปฏฺฐาติ. เอวํ รูปารมฺมณํ จกฺขุปสาเท สทฺทารมฺมณญฺจ โสตปสาเท ตํ สทิส นิมิตฺต วเสน ฆฏฺเฏนฺติ[Pg.125]. นวตฺถุ วเสน ฆฏฺเฏนฺติ. สยํ คนฺตฺวา น ฆฏฺเฏนฺตีติ อธิปฺปาโย. อสมฺปตฺตานญฺเญว อารมฺมณานํ. ‘‘นิมิตฺตุ ปฏฺฐาน วเสนา’’ติ นิมิตฺตสฺส อุปฏฺฐานวเสน. ‘‘นิมิตฺต อปฺปนาวเสนา’’ติ นิมิตฺตสฺส ปเวสน วเสน. มโนทฺวาเร ปน อสมฺปตฺตานิเยว หุตฺวาติ ปาฐเสโส. ‘‘อาปาตา คมนญฺเจตฺถา’’ติอาทีสุ. ‘‘ลญฺฉกานํ’’ติ ลญฺฉนการานํ. ‘‘ลญฺฉนกฺขนฺธํ’’ติ อโยมยํ ลญฺฉนกฺขนฺธํ. โส จ ลญฺฉนกฺขนฺโธ ตาลปณฺเณ อาปาเตตฺวา อกฺขรํ อุปฏฺฐาเปติ. ตตฺถ ‘‘อาปาเตตฺวา’’ติ อชฺโฌตฺถริตฺวา. ‘‘จกฺขาทิปฺปเถ’’ติ จกฺขาทีนํ วิสยกฺเขตฺเต. น เกวลํ อตฺตโน ทฺวาเรสุ เอว อาปาต มาคจฺฉนฺติ. อถ โข มโนทฺวาเรปิ อาปาต มาคจฺฉนฺติ. น เกวลํ ภวงฺค มโนทฺวาเร เอว อาปาต มาคจฺฉนฺตีติ โยชนา. ‘‘เตสุ ปนา’’ติ เตสุ อารมฺมเณสุ ปน. ตานิ อารมฺมณานิ เยสํ ตานิ ตทา รมฺมณานิ. น เอกกฺขเณ ปญฺจสุ อารมฺมเณสุ วีถิ จิตฺตานิ ปวตฺตนฺติ, เอเกกสฺมึ อารมฺมเณ เอวาติ วุตฺตตฺตา น ทฺวีสุ, น ตีสุ, น จตูสูติปิ วตฺตพฺพํ. พหุจิตฺตกฺขณาตีตานิ ปญฺจารมฺมณานิ พหุจิตฺตกฺขณาตีเต ปญฺจทฺวาเรติ โยชนา. ปญฺจทฺวาเรติ จ ปญฺจทฺวาเรสูติ อตฺโถ. ‘‘เอวํ สตี’’ติ เตสํ ปสาทานํ อาวชฺชเนน สทฺธึ อุปฺปตฺติยา สติ. ‘‘อาทิลกฺขณํ’’ติ ปญฺจารมฺมณานํ ปญฺจทฺวาเรสุ อาปาตา คมน สงฺขาตํ วิสยปฺปวตฺติยา อาทิลกฺขณํ. จลนญฺจ ทฏฺฐพฺพนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยถา คหิตํ’’ติ ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย คหิตปฺปการํ. วิภาวนิปาเฐ ‘‘โยคฺย เทสาวฏฺฐาน วเสนา’’ติ อาปาตํ อาคนฺตุํ ยุตฺตฏฺฐาเน อเวจฺจฏฺฐาน วเสน. ยุชฺชนญฺจ, มนฺถนญฺจ, โขภกรณญฺจ, ฆฏฺฏนนฺติ จ อาปาตา คมนนฺติ จ วุจฺจตีติ โยชนา. เหฏฺฐา วุตฺโตเยว อาปาตา คมนญฺเจตฺถาติอาทินา. ‘‘นานา ฐานิเยสู’’ติ นานา ฐาเนสุ ฐิเตสุ. ‘‘เอโก ธมฺมนิยาโม นามา’’ติ ยถา โพธิสตฺเต มาตุกุจฺฉิมฺหิ ปฏิสนฺธึ คณฺหนฺเต ธมฺมนิยาม วเสน สกเล ชาติกฺเขตฺเต ปถวิกมฺปนํ อโหสิ. ตถา อิธปิ ปญฺจทฺวาเรสุ เอเกกสฺมึ ทฺวาเร อารมฺมเณ ฆฏฺเฏนฺเต ธมฺมนิยาม วเสน ภวงฺค จลนํ โหติ. อยํ ธมฺมนิยาโม นาม. ‘‘สเหวา’’ติ เอกโตเยว. กถํ [Pg.126] หทย วตฺถุ นิสฺสิตสฺส ภวงฺคสฺส จลนํ สิยาติ โยชนา. เอตฺถ จ ปญฺจวิญฺญาณสฺส จลนํ สิยาติ อิทํ น วตฺตพฺพํ. กสฺมา, ตทา ปญฺจวิญฺญาณสฺส อวิชฺชมานตฺตา. ยทา จ ตํ วิชฺชติ, ตทา ตํ น จลตีติ น วตฺตพฺพํ. สพฺพมฺปิ หิ วีถิจิตฺตํ นาม จลติ เยวาติ. สนฺตติ นาม ปุพฺพา ปรปฺปพนฺโธ. สณฺฐานํ นาม สหปฺปวตฺตานํ เอกโต ฐิติ. อิธ สณฺฐานํ อธิปฺเปตํ. ปญฺจนิสฺสย มหาภูเตหิ สทฺธึ หทย วตฺถุ นิสฺสยภูตานํ เอก สณฺฐาน ภาเวน เอกาพทฺธตฺตาติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘สณฺฐาน วเสนาติ ปน วตฺตพฺพํ’’ติ. ‘‘ตาทิสสฺส อนุกฺกม จลนสฺสา’’ติ วิภาวนิยํ เภริสกฺขโรปมาย สทฺธึ รูปาทินา ปสาเท ฆฏฺฏิเต ตนฺนิสฺส เยสุ มหาภูเตสุ จลิเตสุ อนุกฺกเมน ตํ สมฺพนฺธานํ เสสรูปานมฺปิ จลเนน หทย วตฺถุมฺหิ จลิเต ตนฺนิสฺสิตสฺส ภวงฺคสฺส จลนา กาเรน ปวตฺติโตตีติ เอวํ วุตฺตสฺส อนุกฺกม จลนสฺส. ‘‘ภวงฺคปฺปวาหํ’’ติ ภวงฺค สนฺตตึ. ‘‘กุรุมานํ’’ติ กโรนฺตํ. สลฺลกฺเขนฺตํ’’ติ อิทเมวาติ สนฺนิฏฺฐาเปนฺตํ. ‘‘โยนิ โสมนสิการาทิวเสนา’’ติ โยนิ โสมนสิกาโร กุสล ชวนุปฺปตฺติยา ปจฺจโย. อโยนิ โสมนสิกาโร อกุสล ชวนุปฺปตฺติยา ปจฺจโย. นิรนุสย สนฺตานตา กฺริยชวนุปฺปตฺติยา ปจฺจโย. เตสุ จ โสมนสฺส ชวนาทีนํ อุปฺปตฺติ ปจฺจโยปิ เหฏฺฐา จิตฺต สงฺคเห วุตฺตนเยน เวทิตพฺโพ. “अरूप” इत्यादींमध्ये. “अरूप” म्हणजे सर्व प्रकारे रूप-आकाराने रहित असल्यामुळे चित्त आणि चैतसिक या नामाला (नामरूपातील नाम) म्हटले जाते. “अरूपी स्वभावत्वामुळे” म्हणजे अरूप धर्माचा स्वभाव असल्यामुळे, असा अर्थ आहे. तेथे अरूप धर्माचा स्वभाव म्हणजे रूप धर्मापेक्षा शंभर पटीने किंवा हजार पटीने अधिक सूक्ष्म व सुकुमार स्वभाव होय. विभावनी पाठात: “ग्राहक आणि ग्राह्य भावाच्या त्या त्या क्षणाच्या वशने (वेळेनुसार) निष्पन्न होण्यामुळे” येथे पंचद्वार विथींमध्ये विथीचित्त आणि आलंबन (विषय) यांचा विषयी-विषय भाव म्हणजेच ‘ग्राहक-ग्राह्य भाव’ होय. “त्या त्या क्षणाच्या वशने निष्पन्न होण्यामुळे” म्हणजे विथीचित्ते एकाच आलंबनाला देखील आवर्जन इत्यादी विविध कृत्यांद्वारे ग्रहण करूनच ग्रहण करण्याचे कृत्य पूर्ण करतात. आणि विविध कृत्ये विविध चित्तांच्या वशने (द्वारे) संपन्न होतात. आणि आलंबने पूर्वजात (आधी उत्पन्न झालेली) होऊन जोपर्यंत ती कृत्ये संपन्न होतात, तोपर्यंत वर्तमान भावाने टिकून राहूनच ग्रहण करणे संपन्न करतात. असे असताना, ग्राहक असलेल्या विथीचित्तांचे आयुष्य तीन क्षण (उत्पाद, स्थिती, भंग) असल्यामुळेच ग्राहक कृत्य निष्पन्न होते, सिद्ध होते. आणि ग्राह्य असलेल्या आलंबनांचे आयुष्य सतरा चित्तक्षण असल्यामुळेच ग्राह्य कृत्य निष्पन्न होते, सिद्ध होते. अशा प्रकारे त्या त्या क्षणाच्या वशने निष्पन्न होण्यामुळे. दोन विज्ञाप्ती (कायविज्ञप्ती व वचीविज्ञप्ती) एका चित्तक्षणाचे आयुष्य असणाऱ्या असतात. कशामुळे? चित्ताच्या अनुवर्तन करणाऱ्या (चित्तानुपरिवर्ती) धर्म असल्यामुळे. “उत्पादमात्र” म्हणजे निष्पन्न रूपांचा केवळ उत्पाद (उत्पत्ती). “भंगमात्र” म्हणजे त्यांचाच केवळ भंग (नाश). “रूपधर्मांचे” म्हणजे निष्पन्न रूपधर्मांचे. “उत्पाद-निरोध विधानाचा” म्हणजे उत्पाद आणि निरोध विधान स्वरूप असलेल्या महाअट्ठकथेच्या मताचा निषेध केला गेल्यामुळे, असा संबंध आहे. “ते” म्हणजे ते महाअट्ठकथेचे वचन. “त्या मतात” म्हणजे त्या महाअट्ठकथेच्या मतात. “तेथे आलेले” म्हणजे त्या मतात आलेले. परंतु जे विभावनीमध्ये कारण सांगितले आहे, असा संबंध आहे. “ती टीका पद्धती” म्हणजे ती सोळा चित्तक्षणांचे आयुष्य दर्शवणारी मूळ टीका पद्धती होय. त्याचा अर्थ सिद्ध करणाऱ्या विभावनी टीकाचार्यांनी म्हटले आहे, असा संबंध आहे. संग्रहकार (अभिधम्मत्थसंगहाचे लेखक) आणि अट्ठकथाचार्यांचे. “उपचार केला जातो” म्हणजे उपचाराच्या वशने (लाक्षणिक अर्थाने) व्यवहार केला जातो. विभावनी पाठात: “हे” म्हणजे आलंबने. “ते” म्हणजे तो एक चित्तक्षण. “आणि ते” म्हणजे रूपधर्म देखील. “परिपूर्ण प्रत्यय प्राप्त झालेले” म्हणजे परिपूर्ण प्रत्यय (कारण) प्राप्त झालेले. “तो” म्हणजे टीकाकार. “इतर” म्हणजे गंध, रस आणि स्प्रष्टव्य (स्पर्श). “गोचरभाव” म्हणजे पंचद्वारिक चित्तांचा गोचरभाव (विषय क्षेत्र). “पहिले दोन” म्हणजे रूप आणि शब्द हे आलंबन. “निमित्ताच्या वशने संघट्टन (आघात) करतात” म्हणजे आरसा पाहणाऱ्याला मुखासारखे मुखनिमित्त किंवा मुखाचे प्रतिबिंब आरशामध्ये उपस्थित होते. त्याचप्रमाणे रूपाचे आलंबन चक्षुप्रसादावर आणि शब्दाचे आलंबन श्रोत्रप्रसादावर त्यासारख्या निमित्ताच्या वशने संघट्टन करतात. वस्तूच्या वशने संघट्टन करत नाहीत. स्वतः जाऊन संघट्टन करत नाहीत, असा अभिप्राय आहे. अप्राप्त (इंद्रियांपर्यंत न पोहोचलेल्या) आलंबनांचेच. “निमित्त उपस्थित होण्याच्या वशने” म्हणजे निमित्ताच्या उपस्थितीच्या वशने. “निमित्त अर्पणाच्या वशने” म्हणजे निमित्ताच्या प्रवेशाच्या वशने. मनोद्वाराच्या बाबतीत मात्र अप्राप्तच होऊन, असा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. “आपातागमन (विषय क्षेत्रात येणे) आणि येथे” इत्यादींमध्ये. “लांछक” म्हणजे लांछन (मुद्रा/शिक्का) उमटवणाऱ्यांचे. “लांछनस्कंध” म्हणजे लोखंडी लांछनस्कंध (मुद्रा संच). आणि तो लांछनस्कंध ताडपत्रावर पाडून (दाबून) अक्षराला उपस्थित करतो (उमटवतो). तेथे “पाडून” म्हणजे आच्छादित करून (दाबून). “चक्षु इत्यादींच्या मार्गात” म्हणजे चक्षु इत्यादींच्या विषयक्षेत्रात. केवळ स्वतःच्याच द्वारांमध्ये ते आपाताला (विषयक्षेत्रात) येत नाहीत, तर मनोद्वारावर देखील आपाताला येतात. केवळ भवांग मनोद्वारावरच आपाताला येत नाहीत, अशी योजना (अन्वय) आहे. “त्यांच्यामध्ये मात्र” म्हणजे त्या आलंबनांमध्ये मात्र. ती आलंबने ज्यांची आहेत, ती तदालंबने होत. एकाच क्षणी पाच आलंबनांवर विथीचित्ते प्रवृत्त होत नाहीत, तर एका वेळी एकाच आलंबनावर प्रवृत्त होतात, असे म्हटल्यामुळे “दोनवर नाही, तीनवर नाही, चारवर नाही” असे देखील म्हटले पाहिजे. अनेक चित्तक्षण व्यतीत झालेली पाच आलंबने, अनेक चित्तक्षण व्यतीत झालेल्या पंचद्वारांमध्ये, अशी योजना आहे. “पंचद्वार” म्हणजे पंचद्वारांमध्ये, असा अर्थ आहे. “असे असताना” म्हणजे त्या प्रसादांची आवर्जनासोबत उत्पत्ती होत असताना. “आदिलक्षण” म्हणजे पंचालंबनांचे पंचद्वारांमध्ये आपातागमन (विषयक्षेत्रातणे) नावाचे विषयप्रवृत्तीचे आदिलक्षण होय. आणि कंपन देखील पाहावे, असा संबंध आहे. “जसे ग्रहण केले आहे” म्हणजे प्रतिसंधीपासून घेऊन ग्रहण केल्याच्या प्रकारे. विभावनी पाठात: “योग्य देशावस्थान वशने” म्हणजे आपाताला (विषयक्षेत्रात) येण्यासाठी योग्य असलेल्या स्थानावर निश्चितपणे राहण्याच्या वशने. योजन (जोडणे), मंथन (वळवळणे), क्षोभ करणे, संघट्टन करणे आणि आपातागमन असे म्हटले जाते, अशी योजना आहे. खाली “आपातागमन आणि येथे” इत्यादींद्वारे जे म्हटले आहे तेच. “नानास्थानीयांमध्ये” म्हणजे विविध स्थानांवर राहिलेल्यांमध्ये. “एक धम्मनियम नावाचा” म्हणजे ज्याप्रमाणे बोधिसत्त्वांनी मातृकुक्षीत प्रतिसंधी ग्रहण केली असता धम्मनियमाच्या वशने संपूर्ण जातिक्षेत्रात पृथ्वीकंप झाला होता. त्याचप्रमाणे येथे देखील पंचद्वारांपैकी एकेका द्वारावर आलंबन संघट्टित झाले असता धम्मनियमाच्या वशने भवांगकंपन (भवांगचलन) होते. याला धम्मनियम म्हणतात. “सह एव” म्हणजे एकत्रच. हृदयवस्तूला आश्रित असलेल्या भवांगाचे कंपन कसे होईल, अशी योजना आहे. आणि येथे “पंचविज्ञानाचे कंपन व्हावे” असे म्हणता येणार नाही. कशामुळे? कारण त्यावेळी पंचविज्ञान विद्यमान नसते. आणि जेव्हा ते विद्यमान असते, तेव्हा ते कंपित होत नाही, असे म्हणता येणार नाही. कारण सर्वच विथीचित्त कंपित होतेच. संतती म्हणजे पूर्व आणि अपर (पुढील व मागील) यांचा प्रवाह. संस्थान म्हणजे सहप्रवृत्त (एकत्र उत्पन्न होणाऱ्या) धर्मांची एकत्र स्थिती होय. येथे ‘संस्थान’ अभिप्रेत आहे. पाच आश्रयभूत महाभूतांसोबत हृदयवस्तू आश्रयभूत असलेल्या रूपांच्या एकाच संस्थान भावाने एकाबद्ध (एकत्र जोडलेले) असल्यामुळे, असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे: “परंतु संस्थानच्या वशने म्हटले पाहिजे”. “तशा प्रकारच्या अनुक्रम कंपनाचा” म्हणजे विभावनीमध्ये भेरी आणि शर्करेच्या (दगडाच्या) उपमेसोबत, रूपादींद्वारे प्रसादावर संघट्टन झाले असता, त्यावर आश्रित असलेल्या महाभूतांमध्ये कंपन झाल्यावर अनुक्रमाने त्यांच्याशी संबंधित उर्वरित रूपांचे देखील कंपन झाल्यामुळे हृदयवस्तू कंपित होते आणि त्यावर आश्रित असलेल्या भवांगाचे कंपनाच्या रूपाने प्रवृत्त होणे होते, अशा प्रकारे सांगितलेल्या अनुक्रम कंपनाचा. “भवांगप्रवाह” म्हणजे भवांग संतती. “करताना” म्हणजे करत असताना. “सलक्खेंत” (लक्ष्य करताना) म्हणजे “हेच आहे” असा निश्चय करताना. “योनिशो मनसिकार इत्यादींच्या वशने” म्हणजे योनिशो मनसिकार हा कुशल जवनाच्या उत्पत्तीचा प्रत्यय (कारण) आहे. अयोनिशो मनसिकार हा अकुशल जवनाच्या उत्पत्तीचा प्रत्यय आहे. अनुशयरहित संतती असणे हा क्रियाजवनाच्या उत्पत्तीचा प्रत्यय आहे. आणि त्यांच्यामध्ये सोमनस्य जवन इत्यादींच्या उत्पत्तीचा प्रत्यय देखील खाली ‘चित्तसंग्रहा’मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावा. ‘‘ภวงฺคปาโต’’ติอาทีสุ. ‘‘อาวชฺชนโต ปฏฺฐาย อุฏฺฐิตํ’’ติ กมฺม วิปากสนฺตานโต จ ตทารมฺมณโต จ มุญฺจิตฺวา วิสุํ กฺริยามย พฺยาปาเรน อารมฺมณนฺตรํ คเหตฺวา อุฏฺฐิตํ สมุฏฺฐิตํ. ภวงฺค จลนมฺปิ อุฏฺฐานสฺส อาทิ โหติ. ตสฺมา ตมฺปิ อุฏฺฐิเต จิตฺต สนฺตาเน สงฺคณฺหนฺโต ปถม ภวงฺค จลนโตเยว วาติ วุตฺตํ. ‘‘อิมสฺมึ ฐาเน’’ติ วีถิ จิตฺตานํ อนุกฺกเมน อตฺตโน กิจฺเจหิ อารมฺมณปฺปวตฺติฏฺฐาเน. ‘‘โทวาริโกปมา’’ติ พธิรโทวาริโกปมา. ‘‘คามิลฺโลปมา’’ติ คามทารโกปมา. ‘‘อมฺโพปมา’’ติ อมฺพปฺผโลปมา. อญฺญาปิ อุปมา อตฺถิ. มกฺกฏสุตฺโตปมา, อุจฺฉุยนฺโตปมา, ชจฺจนฺโธปมา. ตาสพฺพาปิ อฏฺฐสาลินิยํ วิปากุทฺธาร กถาโต [Pg.127] คเหตพฺพา. ‘‘ยตฺถหี’’ติอาทีสุ. ‘‘กถํ ฉ ฉกฺก โยชนา โหตี’’ติ. จกฺขุ วตฺถุ วจนญฺจ, จกฺขุทฺวาร วจนญฺจ, รูปา รมฺมณ วจนญฺจ, จกฺขุ วิญฺญาณ วจนญฺจ, จกฺขุทฺวาร วีถิ จกฺขุ วิญฺญาณ วีถิ วจนญฺจ, อติมหนฺตา รมฺมณ วจนญฺจา,ติ เอตานิ ฉวจนานิ. เตหิ ฉฉกฺเกหิ อาหริตฺวา อิมิสฺสํ วีถิยํ ทสฺสิตานิ. เสสวีถีสุปิ ยถาลาภํ ทสฺสิตพฺพานิ. เอวํ ฉฉกฺกโยชนา โหติ. ‘‘เอตฺถ จ ยตฺตกานี’’ติอาทีสุ. ‘‘เอกูน ปญฺญาส ปริมาเณสู’’ติ เอกสฺสนิปฺผนฺน รูปธมฺมสฺส เอกปญฺญาส มตฺเตสุ ขุทฺทกกฺขเณสุ อุปฺปาทกฺขณญฺจ ภงฺคกฺขณญฺจ ฐเปตฺวา มชฺเฌ เอกูน ปญฺญาส มตฺตานิ ฐิติกฺขณานิ สนฺติ. เตสุ ขเณสุ อนุกฺกเมน อุปฺปนฺนา เอกูน ปญฺญาส จกฺขุ ปสาทา จ สนฺติ. ‘‘กิสฺมิญฺจี’’ติ เตสุ กตรสฺมึ นาม จกฺขุ ปสาเท น ฆฏฺเฏนฺตีติ น วตฺตพฺพานิ. ‘‘เตสุ ปนา’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมวจนํ. ‘‘ยเทว เอกํ จกฺขู’’ติ นิทฺธารณียํ. ตํ ปน กตมนฺติ. อตีต ภวงฺเคน สทฺธึ อุปฺปชฺชิตฺวา ตํ อติกฺกมฺม ภวงฺค จลนกฺขเณ ลทฺธฆฏนํ เอกํ จกฺขุ. ตํ ปน จกฺขุ วิญฺญาณสฺส วตฺถุ ภาวญฺจ ทฺวารภาวญฺจ สาเธติ. เสสวิญฺญาณานํ ทฺวารภาวํ สาเธตีติ. เตนาห ‘‘ยถารหํ’’ติ. เอตเทว เอตํ เอว จกฺขุ กิจฺจ สาธนํ นาม โหติ วีถิ จิตฺตุปฺปตฺติยา วตฺถุ กิจฺจทฺวาร กิจฺจานํ สาธนโต. ‘‘ยํ มชฺฌิมายุกํ’’ติ มนฺทายุก อมนฺทายุกานํ มชฺเฌ ปวตฺตตฺตา ยํ มชฺฌิมายุกนฺติ วทนฺติ. ตํ กิจฺจ สาธนํ นามาติ โยชนา. ‘‘อิตรานิ ปนา’’ติ เอกูน ปญฺญาส ปริมาเณสุ จกฺขุ ปสาเทสูติ วุตฺตานิ, เตสุ เอกํ กิจฺจ สาธนํ ฐเปตฺวา เสสานิ อิตรานิ อฏฺฐ จตฺตาลีส จกฺขูนิ โมฆวตฺถูนิ นาม โหนฺติ. รูปา รมฺมเณหิ สทฺธึ ลทฺธ ฆฏฺฏนานมฺปิ สตํ วีถิ จิตฺตุปฺปตฺติยา วตฺถุ กิจฺจทฺวาร กิจฺจรหิตตฺตา. เตสุ กตมานิ มนฺทายุกานิ นามาติ อาห ‘‘ตานิ ปนา’’ติอาทึ. กิจฺจ สาธนโต ปุริมานิ นาม อตีต ภวงฺคโต ปุเร เตรสสุ ภวงฺเคสุ อาทิ ภวงฺคสฺส ภงฺคกฺขณโต ปฏฺฐาย ขเณ ขเณ อุปฺปนฺนา สตฺตตึส จกฺขุ ปสาทา. ตานิ มนฺทายุกานีติ วทนฺติ. กสฺมา, กิจฺจ สาธนโต อปฺปตรายุกตฺตา. กิจฺจ สาธนโต ปจฺฉิมานิ นาม อตีต ภวงฺคสฺส ฐิติกฺขณโต [Pg.128] ปฏฺฐาย ขเณ ขเณ อุปฺปนฺนา เอกาทส จกฺขุ ปสาทา, ตานิ อมนฺทายุกานีติ วทนฺติ. กสฺมา, กิจฺจ สาธนโต พหุตรายุกตฺตา. ตทุภยานิปิ อฏฺฐ จตฺตาลีส มตฺตานิ เวทิตพฺพานีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตโต’’ติ เตหิ อฏฺฐจตฺตาลีส มตฺเตหิ. ‘‘ปุริมตรานี’’ติ สตฺตตึส มนฺทายุเกหิ ปุริมตรานิ. ตานิ หิ จกฺขุ วิญฺญาณสฺส อุปฺปาทกฺขเณ ฐิติ ภาเวน อนุปลทฺธตฺตา อิธ น คหิตานิ. ‘‘ปจฺฉิมตรานี’’ติ เอกาทส อมนฺทายุเกหิ ปจฺฉิมตรานิ. ตานิ จ จกฺขุ วิญฺญาณสฺส อุปฺปาทกฺขเณ อุปฺปนฺนานิปิ ตสฺมึ ขเณ ฐิติ ภาเวน อนุปลทฺธตฺตา อิธ น คหิตานิ. กสฺมา ปน จกฺขุวิญฺญาณสฺส อุปฺปาทกฺขเณ ฐิติ ภาเวน อนุปลทฺธานิ ตทุภยานิ อิธ น คหิตานีติ. จกฺขุ วิญฺญาณสฺส อุปฺปาทกฺขเณ ฐิติ ภาเวน ธรมานานํ อฏฺฐจตฺตาลีส มตฺตานํ จกฺขูนํ มชฺเฌ เอว กตมํ จกฺขุ จกฺขุ วิญฺญาณสฺส วตฺถุ กิจฺจ ทฺวาร กิจฺจํ สาเธตีติ อาสงฺกิตพฺพํ โหติ. เอตฺถ จ ปญฺจ วตฺถูนิ นาม อตฺตโน ฐิติกฺขเณ เอว ปญฺจวิญฺญาณานํ วตฺถุทฺวาร กิจฺจ สาธกตฺตา จกฺขุ วิญฺญาณสฺส อุปฺปาทกฺขเณ ฐิติ ภาเวน อนุปลทฺธตฺตา อิธ น คหิตานีติ จ, จกฺขุ วิญฺญาณสฺส อุปฺปาทกฺขเณ ฐิติ ภาเวน ธรมานานนฺติ จ, วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. “भवङ्गपातो” (भवंगपात) इत्यादींमध्ये. “आवर्जनापासून सुरू होऊन उत्पन्न झालेले” म्हणजे कर्म-विपाक-संतानापासून आणि तदारम्मणापासून मुक्त होऊन, स्वतंत्रपणे क्रियामय व्यापाराने अन्य आलंबन ग्रहण करून उत्पन्न झालेले, समुत्पन्न झालेले होय. भवंग-चलन सुद्धा या उत्पत्तीची सुरुवात असते. म्हणून, त्यालाही उत्पन्न झालेल्या चित्त-संतानामध्ये समाविष्ट करताना “पहिल्या भवंग-चलनापासूनच” असे म्हटले आहे. “या स्थानामध्ये” म्हणजे वीथि-चित्तांच्या अनुक्रमाने आपापल्या कृत्यांद्वारे आलंबन-प्रवृत्तीच्या स्थानामध्ये होय. “द्वारपालाची उपमा” म्हणजे बहिऱ्या द्वारपालाची उपमा होय. “गामिल्लोपमा” म्हणजे गावातील मुलाची उपमा होय. “आंब्याची उपमा” म्हणजे आंब्याच्या फळाची उपमा होय. इतरही उपमा आहेत, जसे की माकड आणि दोरीची उपमा (मक्कटसुत्तोपमा), उसाच्या चरकाची उपमा (उच्छुयंतोपमा) आणि जन्मांधाची उपमा (जच्चंधोपमा). त्या सर्व उपमा ‘अट्ठसालिनी’ मधील विपाकोद्धार कथेमधून ग्रहण कराव्यात. “यत्थ हि” इत्यादींमध्ये. “सहा षटकांची योजना कशी होते?” असे विचारले आहे. चक्षु-वस्तूचे वचन, चक्षु-द्वाराचे वचन, रूप-आलंबनाचे वचन, चक्षु-विज्ञानाचे वचन, चक्षुद्वार-वीथि व चक्षुविज्ञान-वीथीचे वचन, आणि अतिमहंत-आलंबनाचे (अतिशय मोठ्या आलंबनाचे) वचन - ही ती सहा वचने आहेत. त्या सहा षटकांद्वारे आणून या वीथीमध्ये ते दाखविले आहे. उर्वरित वीथींमध्येही यथालाभ (योग्यतेनुसार) ते दाखवावे. अशा प्रकारे सहा षटकांची योजना होते. “येथे जेवढे” इत्यादींमध्ये. “एकोणपन्नास परिमाणांमध्ये” म्हणजे एका निष्पन्न रूपधर्माच्या एकावन्न लघुक्षणांमध्ये (लहान क्षणांमध्ये) उत्पादक्षण आणि भंगक्षण सोडून मध्ये एकोणपन्नास स्थितीक्षण असतात. त्या क्षणांमध्ये अनुक्रमाने उत्पन्न झालेले एकोणपन्नास चक्षु-प्रसाद सुद्धा असतात. “कशात तरी” म्हणजे त्यांपैकी कोणत्या चक्षु-प्रसादावर आघात होत नाही, असे म्हणू नये. “त्यांच्यामध्ये तर” हे निर्धारण अर्थातील सप्तमीचे वचन आहे. “जे एकच चक्षु” हे निर्धारणीय आहे. ते कोणते आहे? अतीत भवंगासोबत उत्पन्न होऊन, त्याला ओलांडून भवंग-चलनाच्या क्षणी ज्याचा संबंध (घटन) प्राप्त झाला आहे, ते एक चक्षु होय. ते चक्षु-विज्ञानाचे वस्तु-भाव आणि द्वार-भाव सिद्ध करते, आणि उर्वरित विज्ञानांचा द्वार-भाव सिद्ध करते. म्हणूनच “यथायोग्य” (यथारहं) असे म्हटले आहे. हेच चक्षु-कृत्य साधणारे (किच्च साधनं) म्हटले जाते, कारण ते वीथि-चित्ताच्या उत्पत्तीसाठी वस्तूचे कृत्य आणि द्वाराचे कृत्य साधते. “जे मध्यम-आयुष्य असलेले” म्हणजे मंद-आयुष्य आणि अमंद-आयुष्य यांच्या मध्ये प्रवृत्त होत असल्यामुळे ज्याला मध्यम-आयुष्य असलेले म्हणतात. ते कृत्य साधणारे आहे, अशी योजना आहे. “इतर तर” म्हणजे एकोणपन्नास परिमाण असलेल्या चक्षु-प्रसादांमध्ये जे सांगितले आहे, त्यांपैकी एक कृत्य साधणारे सोडून उर्वरित इतर अठ्ठेचाळीस चक्षु ‘मोघ-वस्तू’ (व्यर्थ वस्तू) ठरतात. रूप-आलंबनांसोबत आघात प्राप्त झालेला असला तरी, वीथि-चित्ताच्या उत्पत्तीसाठी वस्तूचे कृत्य आणि द्वाराचे कृत्य यांपासून रहित असल्यामुळे (ती मोघ-वस्तू ठरतात). त्यांच्यामध्ये कोणते मंद-आयुष्य असलेले आहेत, हे सांगण्यासाठी “ती तर” इत्यादी म्हटले आहे. कृत्य साधणाऱ्याच्या पूर्वीचे म्हणजे अतीत भवंगाच्या पूर्वीच्या तेरा भवंगांमध्ये पहिल्या भवंगाच्या भंगक्षणापासून सुरू होऊन क्षणाक्षणाला उत्पन्न झालेले सदतीस चक्षु-प्रसाद होय. त्यांना मंद-आयुष्य असलेले म्हणतात. का? कारण कृत्य साधणाऱ्यापेक्षा त्यांचे आयुष्य कमी असते. कृत्य साधणाऱ्याच्या नंतरचे म्हणजे अतीत भवंगाच्या स्थितीक्षणापासून सुरू होऊन क्षणाक्षणाला उत्पन्न झालेले अकरा चक्षु-प्रसाद होय. त्यांना अमंद-आयुष्य असलेले म्हणतात. का? कारण कृत्य साधणाऱ्यापेक्षा त्यांचे आयुष्य जास्त असते. ती दोन्ही मिळून अठ्ठेचाळीस आहेत, असे जाणावे - असा संबंध आहे. “त्यापेक्षा” म्हणजे त्या अठ्ठेचाळीस प्रमाणांपेक्षा. “त्याहून पूर्वीचे” म्हणजे सदतीस मंद-आयुष्यांपेक्षाही पूर्वीचे होय. कारण ती चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पादक्षणी स्थितीभावाने उपलब्ध होत नसल्यामुळे येथे ग्रहण केलेली नाहीत. “त्याहून नंतरचे” म्हणजे अकरा अमंद-आयुष्यांपेक्षाही नंतरचे होय. ती चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पादक्षणी उत्पन्न झाली असली तरी, त्या क्षणी स्थितीभावाने उपलब्ध होत नसल्यामुळे येथे ग्रहण केलेली नाहीत. पण चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पादक्षणी स्थितीभावाने उपलब्ध न झालेली ती दोन्ही येथे का ग्रहण केली नाहीत? चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पादक्षणी स्थितीभावाने विद्यमान असलेल्या अठ्ठेचाळीस चक्षूंच्या मध्येच कोणते चक्षु चक्षु-विज्ञानाचे वस्तूचे कृत्य आणि द्वाराचे कृत्य साधते, अशी शंका घेतली जाऊ शकते. आणि येथे पाच वस्तू (पंचवत्थूनि) आपल्या स्थितीक्षणीच पंचविज्ञानांचे वस्तू व द्वार कृत्य साधत असल्यामुळे, चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पादक्षणी स्थितीभावाने उपलब्ध न झाल्यामुळे येथे ग्रहण केली नाहीत, आणि “चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पादक्षणी स्थितीभावाने विद्यमान असलेल्या” असे म्हटले आहे, हे लक्षात घ्यावे। ‘‘เอตฺถ สิยา’’ติอาทีสุ. ‘‘อิมาย วีถิยา’’ติ อิมาย อติมหนฺตา รมฺมณ วีถิยา. ‘‘สมุทายคฺคาหิกา’’ติ รูปา รมฺมณานํ สมูหคฺคาหิกา. ‘‘วณฺณสลฺลกฺขณา’’ติ วณฺณววตฺถานิกา. ‘‘วตฺถุคฺคาหิกา’’ติ ทพฺพ สณฺฐานคฺคาหิกา. ‘‘นามคฺคาหิกา’’ติ นาม ปญฺญตฺติคฺคาหิกา. ‘‘อลาตจกฺกสฺส คาหิกา วิยา’’ติ รตฺตนฺธกาเร เอโก อลาตํ คเหตฺวา ปริพฺภมติ. อญฺโญ ตํ ปสฺสนฺโต จกฺกํ วิย มญฺญติ. ตตฺถ อลาตสฺส คตคตฏฺฐาเน ปจฺจุปฺปนฺนํ รูปํ อารพฺภ จกฺขุทฺวาร วีถิโย อุปฺปชฺชนฺติ. มโนทฺวาร วีถิโย ปน ปุริม ปุริมาหิ จกฺขุทฺวาร วีถีหิ คหิตานิ อตีต รูปานิ อมุญฺจิตฺวา เอกโต สณฺฐานญฺจ สนฺตติญฺจ กตฺวา คณฺหนฺติ. ตทา ปสฺสนฺตสฺส จกฺกํ วิย อุปฏฺฐาติ. เอวํ อยํ สมุทายคฺคาหิกา ทฏฺฐพฺพา. ‘‘นตฺถิ ตทารมฺมณุปฺปาโท’’ติอาทีสุ. ‘‘ยสฺสา’’ติ ยสฺส อารมฺมณสฺส. จิตฺตานีติ จ นานารมฺมณานีติ จ กมฺมปทานิ. อวเสเส ตสฺมึ [Pg.129] อารมฺมเณ. ‘‘สงฺคห กาเรนา’’ติ โปราณ อฏฺฐกถาโย เอกโต สงฺคเหตฺวา กตตฺตา พุทฺธโฆสตฺเถเรน กตา สพฺพา อฏฺฐกถาโย สงฺคหฏฺฐกถา นาม. โส จ สงฺคห กาโรติ วุจฺจติ. ‘‘อิธ ปี’’ติ อิมสฺมึ อภิธมฺมตฺถ สงฺคเหปิ. ‘‘เถเรนา’’ติ อนุรุทฺธตฺเถเรน. ‘‘เอกมฺปิ อิจฺฉติ เยวา’’ติ. ‘‘ยสฺส หิ จตฺตารี’’ติอาทีสุ ยสฺส อารมฺมณสฺส จตฺตาริ วา ปญฺจวา ฉวาติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘ชวนมฺปิ อนุปฺปชฺชิตฺวา’’ติอาทีสุ. ‘‘อตฺตโน ปธาน กฺริยายา’’ติ อนุปฺปชฺชิตฺวาติ ปทสฺส ปรโต ‘ยํ ปวตฺตตี’ติ อตฺตโน ปธาน กฺริยาปทํ อตฺถิ. เตน อตฺตโน กฺริยาปเทน สทฺธินฺติ อตฺโถ. ‘‘กตฺถจิ วุตฺตา’’ติ กตฺถจิ สทฺทคนฺเถสุ วุตฺตา. อปิ จ, เหตุมฺหิ ตฺวาปจฺจโย ลกฺขเณ เหตุมฺหิ จ มานนฺต ปจฺจยา โชตนียฏฺเฐน วุตฺตา, น วจนียฏฺเฐนาติ ทฏฺฐพฺพา. ‘‘ปกติ นิยาเมนา’’ติ เอเตน ปจฺจย วิเสเสสติ, จตฺตาริ วา ปญฺจวา ฉวา ชวนานิ อุปฺปชฺชนฺตีติ ทีเปติ. เตนาห ‘‘เอตฺถปนา’’ติอาทึ. ‘‘ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ’’ติ วาสทฺทตฺเถ อญฺญปทตฺถ สมาสปทนฺติ วุตฺตํ ‘‘ทฺวิกฺขตฺตุํ วา ติกฺขตฺตุํ วา’’ติ. ‘‘โวฏฺฐพฺพนสฺส อาเสวนตา’’ติ อาเสวน ปจฺจยตาวา ปจฺจยุปฺปนฺนตาวา. ‘‘อาวชฺชนายา’’ติ เอตฺถ โวฏฺฐพฺพน กิจฺจํ อาวชฺชนมฺปิ สงฺคณฺหาติ. อิธปิ อารมฺมณ ทุพฺพลตาย จตุปฺปญฺจ ชวนุปฺปตฺติ อิจฺฉิ ตพฺพาติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘อิธ ปี’’ติ อิมสฺมึ ปริตฺตา รมฺมณ วาเรปิ. ติโวฏฺฐพฺพนิกา ปญฺจ ปริตฺตา รมฺมณ วีถิโยติ โยชนา. ‘‘อิตรานี’’ติ ปริตฺต มหนฺตาติ มหนฺตา รมฺมณานิ. ‘‘อุภยถาปี’’ติ อาปาตา คมน วเสนปิ อารมฺมณ กรณ วเสนปิ. อิมสฺส ปทสฺส. "येथे असावे" (एत्थ सिया) इत्यादींमध्ये. "या वीथीने" (इमाय वीथिया) म्हणजे या अतिशय मोठ्या आलंबन वीथीने. "समुदायग्राहिका" (समुदायग्गाहिका) म्हणजे रूप-आलंबनांच्या समूहाचे ग्रहण करणारी. "वर्णसंलक्षणा" (वण्णसल्लक्खणा) म्हणजे वर्णाचे (रंगाचे) निर्धारण करणारी. "वस्तुग्राहिका" (वत्थुग्गाहिका) म्हणजे द्रव्याच्या आकाराचे ग्रहण करणारी. "नामग्राहिका" (नामग्गाहिका) म्हणजे नाम-प्रज्ञप्तीचे ग्रहण करणारी. "अलातचक्राचे ग्रहण करण्याप्रमाणे" (अलातचक्कस्स गाहिका विय) म्हणजे रात्रीच्या अंधारात कोणी एक जळणारे लाकूड (अलात) घेऊन गोल फिरवतो. दुसरा कोणी ते पाहणारा त्याला चक्रासारखे मानतो. तेथे अलाताच्या गेलेल्या जागी वर्तमान रूपाला अनुसरून चक्षुद्वार-वीथी उत्पन्न होतात. परंतु, मनोद्वार-वीथी पूर्वीच्या चक्षुद्वार-वीथींनी ग्रहण केलेल्या अतीत रूपांना न सोडता, एकत्र करून त्यांचे संस्थान (आकार) आणि संतती (प्रवाह) बनवून ग्रहण करतात. तेव्हा पाहणाऱ्याला ते चक्रासारखे भासते. अशा प्रकारे ही 'समुदायग्राहिका' समजावी. "तेथे तदालंबनाची उत्पत्ती नाही" (नत्थि तदारम्मणुप्पादो) इत्यादींमध्ये. "ज्याचे" (यस्स) म्हणजे ज्या आलंबनाचे. 'चित्तानि' आणि 'नानालंबनानि' ही कर्मपदे आहेत. उर्वरित त्या आलंबनामध्ये. "संग्रहकाराने" (संगहकारेण) म्हणजे प्राचीन अट्ठकथा एकत्र करून संग्रहित केल्यामुळे बुद्धघोष थेरांनी रचलेल्या सर्व अट्ठकथांना 'संग्रह-अट्ठकथा' (संगहट्ठकथा) असे म्हणतात. आणि त्यांना 'संग्रहकार' असे म्हटले जाते. "येथेही" (इध पि) म्हणजे या अभिधम्मत्थसंग्रहातही. "थेरांनी" (थेरेन) म्हणजे अनुरुद्ध थेरांनी. "एक देखील इच्छितातच" (एकम्पि इच्छति येवा). "ज्याला चार" (यस्स हि चत्तारी) इत्यादींमध्ये, ज्या आलंबनाचे चार किंवा पाच किंवा सहा इत्यादी प्रकारे योजन करावे. "जवन देखील उत्पन्न न होता" (जवनम्पि अनुप्पज्जित्वा) इत्यादींमध्ये. "आपल्या मुख्य क्रियेने" (अत्तनो पधान क्रियाया) म्हणजे 'अनुप्पज्जित्वा' या पदाच्या पुढे 'जे प्रवर्तित होते' असे स्वतःचे मुख्य क्रियापद आहे. त्या स्वतःच्या क्रियापदासह असा अर्थ आहे. "कुठे सांगितले आहे" (कत्थचि वुत्ता) म्हणजे काही शब्दशास्त्रांमध्ये सांगितले आहे. शिवाय, हेतूमध्ये 'त्वा' प्रत्यय आणि लक्षणात व हेतूमध्ये 'मानंत' प्रत्यय हे द्योतक अर्थाने सांगितले आहेत, वाचक अर्थाने नाही, असे समजावे. "प्रकृती नियमाने" (पकति नियामेन) याद्वारे प्रत्यय विशेषात चार किंवा पाच किंवा सहा जवने उत्पन्न होतात, हे दर्शविते. म्हणूनच "येथे पुन्हा" (एत्थपना) इत्यादी म्हटले आहे. "दोन किंवा तीन वेळा" (द्वत्तिक्खत्तुं) हे 'वा' शब्दाच्या अर्थात अन्यपदार्थ समासपद आहे, असे "दोन वेळा किंवा तीन वेळा" असे म्हटले आहे. "वोट्ठब्बनाचे आसेवनत्व" (वोट्ठब्बनस्स आसेवनता) म्हणजे आसेवन-प्रत्ययता किंवा प्रत्ययोत्पन्नता होय. "आवर्जनाचे" (आवज्जनाय) येथे वोट्ठब्बन कार्य आवर्जनालाही समाविष्ट करते. येथेही आलंबनाच्या दुर्बलतेमुळे चार किंवा पाच जवनांची उत्पत्ती मानली पाहिजे, अशी योजना आहे. तेथे "येथेही" (इध पि) म्हणजे या परीत्तालंबन वारातही. तीन वोट्ठब्बन असणाऱ्या पाच परीत्तालंबन वीथी आहेत, अशी योजना आहे. "इतर" (इतरानि) म्हणजे परीत्त आणि महंत यांतील 'महंत आलंबने'. "दोन्ही प्रकारेही" (उभयथापि) म्हणजे आपातगमनाच्या मार्गानेही आणि आलंबन करण्याच्या मार्गानेही, या पदाचा (अर्थ आहे). ๑๓๗. ‘‘มโนทฺวาเร ปนา’’ติอาทีสุ. ‘‘ปริตฺตกฺขณา ปี’’ติ จิตฺต ผสฺสาทโย อปฺปตรกฺขณาปิ. ‘‘อตีตานาคตา ปี’’ติ อตีตานาคต ธมฺมาปิ. ‘‘ฆฏฺฏเนนา’’ติ รูปาทีนํ ฆฏฺฏเนน. ‘‘ยตฺถา’’ติ ยสฺมึ ภวงฺเค. ‘‘ปญฺจทฺวารานุ พนฺธกํ’’ติ ปญฺจทฺวาร วีถิ อนุคตํ. อตีตํ อาลมฺพณํ ปวตฺเตติ เยวาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยถาปาตา คตเมวา’’ติ ปกติยา อาปาตา คตปฺปการเมว. ‘‘ตถา ตถา’’ติ ทิฏฺฐ สมฺพนฺธาทินา เตน เตน ปกาเรน. ‘‘กิญฺจี’’ติ [Pg.130] กิญฺจิ อารมฺมณํ. ‘‘ทิสฺวา’’ติ ปจฺจกฺขํ กตฺวา. ปญฺจทฺวารคฺคหิตญฺหิ อารมฺมณํ ปจฺจกฺขกตฏฺเฐน ทิฏฺฐนฺติ วุจฺจติ. ยํ กิญฺจิ อารมฺมณํ. ‘‘อนุมาเนนฺตสฺสา’’ติ เอวเมว ภวิตฺถ, ภวิสฺสติ, ภวตีติ อนุมานญฺญาเณน จินฺเตนฺตสฺส. ตํ สทิสํ อารมฺมณํ. ‘‘ปรสฺส สทฺทหนา’’ติ ปรวจนํ สุตฺวา ยถา อยํ วทติ, ตเถ เวตนฺติ สทฺทหนา. ‘‘ทิฏฺฐิ’’ วุจฺจติ ญาณํ วา ลทฺธิ วา. ‘‘นิชฺฌานํ’’ติ สุฏฺฐุ โอโลกนํ. ‘‘ขนฺตี’’ติ ขมนํ สหนํ. อญฺญถตฺตํ อคมนํ. ทิฏฺฐิยา นิชฺฌานํ ทิฏฺฐินิชฺฌานํ. ทิฏฺฐินิชฺฌานสฺส ขนฺติ ทิฏฺฐินิชฺฌานกฺขนฺติ. ‘‘เสสํ’’ติ นานากมฺม พเลนาติอาทิกํ. ‘‘เทวโต ปสํหารวเสนา’’ติ เทวตา กทาจิ เกสญฺจิ สุปินนฺเต นานารมฺมณานิ อุปสํหริตฺวา ทสฺเสนฺติ. เอวํ เทวโต ปสํหาร วเสนาปิ. อนุโพโธ นาม โลกิยญฺญาณ วเสน จตุสฺสจฺจ ธมฺมานํ อนุพุชฺฌนํ. ปฏิเวโธ นาม โลกุตฺตรญฺญาณ กิจฺจํ. อนนฺต รูป นิสฺสย ปจฺจยคฺคหเณน ปกตู ปนิสฺสย ปจฺจยมฺปิ อุปลกฺเขติ. จิตฺต สนฺตานสฺส อนนฺตรูปนิสฺสย ปจฺจยภาโว นามาติ สมฺพนฺโธ. อนนฺต รูป นิสฺสย ปจฺจยสตฺติ นาม อนนฺตร ปรมฺปร วิปฺผรณวเสน มหาคติกา โหตีติ วุตฺตํ โหติ. อนนฺต รูป นิสฺสย ปจฺจยานุ ภาโวติปิ ยุชฺชติ. กถํ มหาวิปฺผาโรติ อาห ‘‘สกึ ปี’’ติอาทึ. ‘‘สุฏฺฐุ อาเสวิตฺวา’’ติ เอตฺถ ปจฺฉา อปฺปมุสฺสมานํ กตฺวา ปุนปฺปุนํ เสวนํ สุฏฺฐุ อาเสวนํ นาม. น เกวลํ ปุริม จิตฺต สนฺตานสฺส โส อุปนิสฺสย ปจฺจยานุภาโว เอว มหาวิปฺผาโร โหติ. ปกติยา จิตฺตสฺส วิจิตฺต ภาว สงฺขาตํ จินฺตนา กิจฺจมฺปิ มหาวิปฺผารํ โหตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘จิตฺตญฺจ นามา’’ติอาทิวุตฺตํ. กถํ มหาวิปฺผารํ โหตีติ อาห ‘‘กิญฺจิ นิมิตฺตํ’’ติอาทึ. ‘‘กิญฺจิ นิมิตฺตํ’’ติ ทิฏฺฐาทีสุ นานา รมฺมเณสุ กิญฺจิ อปฺปมตฺตกํ ทิฏฺฐาทิกํ อารมฺมณ นิมิตฺตํ. ‘‘เตหิ จการเณหี’’ติ เตหิ กตฺตุภูเตหิ ทิฏฺฐาทีหิ การเณหิ. ‘‘โจทียมานํ’’ติ ปโยชียมานํ. ‘‘อชฺฌาสย ยุตฺตํ’’ติ อชฺฌาสเยน สํยุตฺตํ. ภวงฺค จิตฺตสฺส อารมฺมณํ นาม อวิภูตํ โหติ. ภวงฺคํ จาเลตฺวา อาวชฺชนํ นิโยเชตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ลทฺธ ปจฺจเยสู’’ติ อาโลกาทิวเสน วา [Pg.131] ทิฏฺฐาทิวเสน วา ลทฺธ ปจฺจยวนฺเตสุ. ตทภินินฺนากาโร นาม นิจฺจกาลมฺปิ เตสุ อารมฺมเณสุ อภิมุขํ นินฺนากาโร. เตน อากาเรน ปวตฺโต มนสิกาโร. เตน สมฺปยุตฺตสฺส. เอเตหิ วจเนหิ สุทฺธมโนทฺวาเร อารมฺมณานํ อปาตาคมนญฺจ ภวงฺค จลนญฺจ น เกวลํ ลทฺธ ปจฺจยานํ อารมฺมณานํ วเสเนว โหติ. ตาทิเสน ปน มนสิกาเรน ยุตฺตสฺส สยญฺจ วีถิ จิตฺต จินฺตนา กิจฺจสฺส จิตฺตสฺส วเสนาปิ โหตีติ สิทฺธํ โหติ. น หิ อารมฺมณนฺตเร อภินินฺนากาโร นาม นตฺถีติ สกฺกา วตฺตุํ. กสฺมา, อภาวิต จิตฺตานํ ปมาท พหุลานํ ชนานํ กทาจิ กรหจิ ภาวนา มนสิกาเร กรียมาเนปิ วีถิ จิตฺต สนฺตานสฺส พหิทฺธา นานารมฺมเณสุ อภินินฺนาการสฺส สนฺทิสฺสนโตติ. ‘‘ยถา เจตฺถา’’ติ ยถา เอตฺถ มโนทฺวาเร รูปารูป สตฺตานํ วิภูตา รมฺมเณปิ ตทา รมฺมณุปฺปาโท นตฺถิ, เอวนฺติ โยชนา. ญาณวิภงฺคฏฺฐกถายํ ปน โวฏฺฐพฺพนวาโรปิ อาคโต. ยถาห สุปิเนเนว ทิฏฺฐํ วิย เม, สุตํ วิย เมติ กถนกาเลปิ อพฺยากโต เยวาติ. ตตฺถ หิ ‘‘อพฺยากโต เยวา’’ติ สุปินนฺเต มโนทฺวาเร ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ อุปฺปนฺนสฺส อาวชฺชนสฺส วเสน อพฺยากโตเยว. ตโต ปรํ ภวงฺคปาโต. อฏฺฐสาลินิยมฺปิ วุตฺตํ อยํ ปน วาโร ทิฏฺฐํ วิย เม, สุตํ วิย เม ติอาทีนิ วทนกาเล ลพฺภตีติ. ตํ ปน ปญฺจ ทฺวาเร ปริตฺตารมฺมเณ ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ อุปฺปนฺนสฺส โวฏฺฐพฺพนสฺส วเสน วุตฺตํ. ‘‘โสปิ อิธ ลทฺธุํ วฏฺฏติ เยวา’’ติ โสปิ วาโร อิมสฺมึ มโนทฺวาเร ลทฺธุํ วฏฺฏติเยว. ‘‘ภวงฺเค จลิเต นิวตฺตนกวารานํ’’ติ ทฺวิกฺขตฺตุํ ภวงฺค จลนมตฺเต ฐตฺวา วีถิ จิตฺตานิ อนุปฺปชฺชิตฺวา ภวงฺคปาตวเสน นิวตฺตนกานํ โมฆวารานํ มโนทฺวาเรปิ ปมาณํ น ภวิสฺสติเยว. อถ อิมสฺมึวาเร วีถิ จิตฺตปฺปวตฺติ นตฺถิ. เอวํ สติ, อิมสฺมึ วีถิ สงฺคเห โส วาโร น วตฺตพฺโพติ เจ. วตฺตพฺโพเยว. กสฺมา, ฉธา วิสยปฺปวตฺตีติ อิมสฺมึ ฉกฺเก สงฺคหิตตฺตาติ ทสฺเสตุํ ‘‘วิสเย จ อาปาตาคเต’’ติอาทิ วุตฺตํ. อารมฺมณภูตา วิสยปฺปวตฺติ. เอเกกสฺมึ อนุพนฺธกวาเร. ‘‘ตทารมฺมณ วาราทโย’’ติ ตทารมฺมณ วาโร ชวนวาโร โวฏฺฐพฺพน วาโร [Pg.132] โมฆวาโร. เตสุ ปน ตทา รมฺมณวาโร วตฺถุคฺคหเณ จ นามคฺคหเณ จ น ลพฺภติ. ‘‘วตฺถู’’ติ หิ สณฺฐาน ปญฺญตฺติ. ‘‘นามํ’’ติ นาม ปญฺญตฺติ. น จ ตทา รมฺมณํ ปญฺญตฺตา รมฺมณํ โหตีติ. เตน วุตฺตํ ‘‘ยถารหํ’’ติ. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุ ทิฏฺฐวาราทีสุ ฉสุ วาเรสุ. เอตรหิ ปน เกจิ อาจริยาติ ปาฐเสโส. ‘‘อตีต ภวงฺค วเสนา’’ติ เอกํ ภวงฺคํ อติกฺกมฺม อาปาตา คเต อารมฺมเณ เอโก วาโร, ทฺเว ภวงฺคานิ อติกฺกมฺม อาปาตา คเต เอโกติอาทินา อตีต ภวงฺค เภทวเสน. ‘‘ตทา รมฺมณ วเสนา’’ติ ตทา รมฺมณสฺส อุปฺปนฺนวาโร อนุปฺปนฺน วาโรติ เอวํ ตทา รมฺมณ วเสน. กปฺเปนฺติ จินฺเตนฺติ, วิทหนฺติ วา. ‘‘ขณ วเสน พลวทุพฺพลตา สมฺภโว’’ติ ยถา ปญฺจทฺวาเร อติมหนฺตา รมฺมเณสุปิ อารมฺมณ ธมฺมา อุปฺปาทํ ปตฺวา อาทิโต เอกจิตฺตกฺขณมตฺเต ทุพฺพลา โหนฺติ. อตฺตโน ทฺวาเรสุ อาปาตํ อาคนฺตุํ น สกฺโกนฺติ. เอก จิตฺตกฺขณํ ปน อติกฺกมฺม พลวนฺตา โหนฺติ. อตฺตโน ทฺวาเรสุ อาปาตํ คนฺตุํ สกฺโกนฺติ. มหนฺตา รมฺมณาทีสุ ปน ทฺวิ จิตฺตกฺขณิกมตฺเต ทุพฺพลา โหนฺตีติอาทินา วตฺตพฺพา. น ตถา มโนทฺวาเร อารมฺมณานํ ขณ วเสน พลวทุพฺพลตา สมฺภโว อตฺถิ. กสฺมา นตฺถีติ อาห ‘‘ตทา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ตทา’’ติ ตสฺมึ วีถิ จิตฺตปฺปวตฺติกาเล. ‘‘ตตฺถา’’ติ มโนทฺวาเร. १३७. “मनोद्वारे पना” इत्यादींमध्ये. “परित्तक्खणा पि” म्हणजे चित्त, स्पर्श इत्यादी अत्यंत अल्प कालावधीचे (क्षण असणारे) देखील. “अतीतानागता पि” म्हणजे अतीत आणि अनागत धर्म देखील. “घट्टनेन” म्हणजे रूपादींच्या संघर्षाने. “यत्थ” म्हणजे ज्या भवंगात. “पञ्चद्वाराणुबन्धकं” म्हणजे पंचद्वार-वीथीचे अनुगमन करणारे. अतीत आलंबन प्रवृत्त करतेच, असा संबंध आहे. “यथापातागतमेव” म्हणजे स्वाभाविकपणे आभासात आलेल्या प्रकाराप्रमाणेच. “तथा तथा” म्हणजे पाहिलेल्या संबंधादींद्वारे त्या त्या प्रकारे. “किञ्चि” म्हणजे कोणतेही आलंबन. “दिस्वा” म्हणजे प्रत्यक्ष करून. कारण, पंचद्वाराने ग्रहण केलेले आलंबन प्रत्यक्ष केल्याच्या अर्थाने “दृष्ट” (पाहिलेले) असे म्हटले जाते. जे कोणतेही आलंबन. “अनुमानेंतस्स” म्हणजे ‘अशाच प्रकारे झाले होते, होईल, किंवा होत आहे’ असे अनुमानज्ञानाने विचार करणाऱ्याचे. त्याच्यासारखे आलंबन. “परस्स सद्दहना” म्हणजे दुसऱ्याचे वचन ऐकून ‘जसे हा बोलतो आहे, तसेच हे आहे’ अशी श्रद्धा ठेवणे. “दृष्टी” म्हणजे ज्ञान किंवा मत म्हटले जाते. “निज्झानं” म्हणजे चांगल्या प्रकारे अवलोकन करणे. “खन्ती” म्हणजे क्षमा करणे, सहन करणे किंवा अन्यथाभावास प्राप्त न होणे. दृष्टीचे अवलोकन म्हणजे ‘दृष्टी-निज्झान’. दृष्टी-निज्झानची सहनशीलता म्हणजे ‘दृष्टी-निज्झान-खन्ती’. “सेस” म्हणजे ‘नाना कर्माच्या बलाने’ इत्यादी. “देवत उपसंहारवसेन” म्हणजे देवता कधीकधी कोणाच्या स्वप्नात नाना आलंबने उपसंहृत करून दाखवतात. अशा प्रकारे देवतेच्या उपसंहाराच्या वशाने देखील. ‘अनुबोध’ म्हणजे लौकिक ज्ञानाच्या वशाने चतुरार्यसत्यांच्या धर्मांना अनुबुद्ध करणे. ‘प्रतिवेध’ म्हणजे लोकोत्तर ज्ञानाचे कार्य होय. अनन्तररूपनिस्सय-प्रत्ययाच्या ग्रहणाने पकतूपनिस्सय-प्रत्ययाचेही उपलक्षण होते. चित्त-संतानाचा ‘अनन्तररूपनिस्सय-प्रत्ययभाव’ आहे, असा संबंध आहे. ‘अनन्तररूपनिस्सय-प्रत्ययशक्ती’ ही अनंतर-परंपरा विस्फारणाच्या वशाने ‘महागतिका’ (मोठ्या गतीची) होते, असे म्हटले आहे. ‘अनन्तररूपनिस्सय-प्रत्ययाच्या प्रभावाने’ असे म्हणणे देखील योग्य आहे. तो कसा महाविस्फार आहे? हे सांगण्यासाठी “सकिं पि” इत्यादी म्हटले आहे. येथे “सुट्ठु आसेवित्वा” म्हणजे नंतर विसरून न जाता वारंवार सेवन करणे, याला ‘सुट्ठु आसेवन’ म्हणतात. केवळ पूर्व चित्त-संतानाचा तो उपनिस्सय-प्रत्ययाचा प्रभावच महाविस्फार ठरत नाही, तर प्रकृतीने चित्ताचा विचित्रभाव म्हणून ओळखले जाणारे चिंतन-कार्य देखील महाविस्फार ठरते, हे दर्शवण्यासाठी “चित्तञ्च नाम” इत्यादी म्हटले आहे. ते कसे महाविस्फार ठरते? हे सांगण्यासाठी “किञ्चि निमित्तं” इत्यादी म्हटले आहे. “किञ्चि निमित्तं” म्हणजे पाहिलेल्या इत्यादी नाना आलंबनांमध्ये कोणतेही अल्पसे पाहिलेले इत्यादी आलंबन-निमित्त. “तेहि च कारणेहि” म्हणजे कर्ता बनलेल्या त्या पाहिलेल्या इत्यादी कारणांमुळे. “चोदीयमानं” म्हणजे प्रेरित केले जाणारे. “अज्झासययुत्तं” म्हणजे अध्यशयाने युक्त असलेले. भवंग चित्ताचे आलंबन हे अविभूत (अस्पष्ट) असते. भवंगाला चलित करून आवर्जनाला नियोजित करते, असा संबंध आहे. “लद्धपच्चयेसु” म्हणजे प्रकाशादींच्या वशाने किंवा दर्शनादींच्या वशाने प्रत्यय प्राप्त झालेल्यांमध्ये. ‘तदभिनिन्नाकार’ म्हणजे सर्वकाळ त्या आलंबनांकडे अभिमुख असणारा कल. त्या आकाराने प्रवृत्त झालेला मनसिकार. त्याने संप्रयुक्त झालेल्याचे. या वचनांद्वारे, शुद्ध मनोद्वारात आलंबनांचे आभासात येणे आणि भवंगाचे चलन होणे हे केवळ प्रत्यय प्राप्त झालेल्या आलंबनांच्या वशानेच होत नाही, परंतु तशा प्रकारच्या मनसिकाराने युक्त असलेल्या आणि स्वतः वीथीचित्ताच्या चिंतन-कार्याशी संबंधित असलेल्या चित्ताच्या वशाने देखील होते, हे सिद्ध होते. कारण, इतर आलंबनांमध्ये अभिनिन्नाकार नसतोच, असे म्हणता येत नाही. का? कारण, ज्यांचे चित्त भावित नाही अशा प्रमादबहुल लोकांच्या बाबतीत कधीतरी भावना-मनसिकार केला जात असताना देखील, वीथीचित्त-संतानाचा बाहेरील नाना आलंबनांकडे अभिनिन्नाकार दिसून येतो म्हणून. “यथा चेत्थ” म्हणजे ज्याप्रमाणे येथे मनोद्वारात रूपी आणि अरूपी सत्त्वांच्या बाबतीत स्पष्ट आलंबन असताना देखील तदारंबणाचा उत्पाद होत नाही, अशी योजना करावी. ज्ञानविभंग-अट्ठकथेत मात्र ‘वोट्ठब्बन-वार’ देखील आला आहे. जसे म्हटले आहे: “स्वप्नातच माझ्याकडून पाहिलेल्यासारखे, माझ्याकडून ऐकलेल्यासारखे” असे बोलण्याच्या वेळी देखील तो अव्याकृतच असतो. तेथे “अव्याकृतच” म्हणजे स्वप्नावस्थेत मनोद्वारात दोन-तीन वेळा उत्पन्न झालेल्या आवर्जनाच्या वशाने तो अव्याकृतच असतो. त्यानंतर भवंगपात होतो. अट्ठसालिनीमध्ये देखील म्हटले आहे की, हा वार मात्र “माझ्याकडून पाहिलेल्यासारखे, माझ्याकडून ऐकलेल्यासारखे” इत्यादी बोलण्याच्या वेळी प्राप्त होतो. ते मात्र पंचद्वारात परीत्त आलंबन असताना दोन-तीन वेळा उत्पन्न झालेल्या वोट्ठब्बनाच्या वशाने म्हटले आहे. “सोपि इध लद्धुं वट्टति yeव” म्हणजे तो वार देखील या मनोद्वारात प्राप्त होणे योग्यच आहे. “भवंगे चलिते निवर्तनकवारानां” म्हणजे दोनदा केवळ भवंग-चलनावरच थांबून, वीथीचित्ते उत्पन्न न होता भवंगपाताच्या वशाने निवृत्त होणाऱ्या मोघवारांचे मनोद्वारात देखील प्रमाण असणार नाहीच. तर मग या वारात वीथीचित्ताची प्रवृत्ती नाही. असे असताना, या वीथी-संग्रहात तो वार सांगू नये का? असे जर विचारले, तर तो सांगायलाच हवा. का? कारण ‘सहा प्रकारची विषयप्रवृत्ती’ या षटकात त्याचा संग्रह केला असल्यामुळे, हे दर्शवण्यासाठी “विषये च आपातागते” इत्यादी म्हटले आहे. आलंबनभूत असणारी विषयप्रवृत्ती. प्रत्येक अनुबंधक वारात. “तदारम्मणवारादयो” म्हणजे तदारंबण-वार, जवन-वार, वोट्ठब्बन-वार आणि मोघ-वार. त्यांच्यामध्ये मात्र तदारंबण-वार हा वस्तूच्या ग्रहणात आणि नामाच्या ग्रहणात प्राप्त होत नाही. कारण “वस्तू” म्हणजे संस्थान-प्रज्ञप्ती. “नाम” म्हणजे नाम-प्रज्ञप्ती. आणि तदारंबण हे प्रज्ञप्ती-आलंबन असत नाही. म्हणून “यथारहं” असे म्हटले आहे. “तत्थ” म्हणजे त्या दृष्टवार इत्यादी सहा वारांमध्ये. “परंतु सध्या काही आचार्य...” हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. “अतीतभवंगवसेन” म्हणजे एक भवंग ओलांडून आलंबन आभासात आले असता एक वार, दोन भवंगे ओलांडून आभासात आले असता एक वार, इत्यादी प्रकारे अतीत-भवंगाच्या भेदाच्या वशाने. “तदारम्मणवसेन” म्हणजे तदारंबणाचा उत्पन्न-वार आणि अनुत्पन्न-वार अशा प्रकारे तदारंबणाच्या वशाने कल्पना करतात, विचार करतात किंवा व्यवस्था करतात. “क्षणवसेन बलवदुब्बलतासंभवो” म्हणजे ज्याप्रमाणे पानाचद्वारात अतिमहंत आलंबनांमध्ये देखील आलंबन-धर्म उत्पत्तीला प्राप्त होऊन सुरुवातीला केवळ एक चित्तक्षणापुरते दुर्बळ असतात, ते स्वतःच्या द्वारांमध्ये आभासात येण्यास समर्थ नसतात, परंतु एक चित्तक्षण ओलांडून ते बलवान होतात आणि स्वतःच्या द्वारांमध्ये आभासात येण्यास समर्थ होतात, तसेच महंत आलंबनादींमध्ये मात्र दोन चित्तक्षणापुरते दुर्बळ असतात, इत्यादी प्रकारे सांगावे. त्याप्रमाणे मनोद्वारात आलंबनांच्या क्षणाच्या वशाने बलवान किंवा दुर्बळ असण्याचा संभव नसतो. तो का नसतो? हे सांगण्यासाठी “तदा” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “तदा” म्हणजे त्या वीथीचित्त-प्रवृत्तीच्या काळात. “तत्थ” म्हणजे मनोद्वारात. ‘‘เอตฺถ สิยา’’ติอาทีสุ. ‘‘สิยา’’ติ เกสญฺจิ วิจารณา สิยา. เอกํ อาวชฺชนํ อสฺสาติ เอกาวชฺชนา. ‘‘วีถี’’ติ วีถิจิตฺตปฺปพนฺโธ. เอกาวชฺชนา จ สา วีถิ จาติ วิคฺคโห. ‘‘อาวชฺชนํ’’ติ อาวชฺชน จิตฺตํ. ตํ วา อาวชฺชตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตํ ตํ ชวเนนา’’ติ เตน เตน ชวเนน สหุปฺปนฺนํ วา ปรสฺส จิตฺตํ อาวชฺชติ กินฺติ โยชนา. ‘‘กิญฺเจตฺถา’’ติ เอตฺถ วจเน กิญฺจิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ อตฺโถ. ยทิ ตาว อาวชฺชนญฺจ ชวนานิ จาติ อธิกาโร. ‘‘ตญฺหิ จิตฺตํ’’ติ ปรสฺส จิตฺตํ. ‘‘เอวมฺปิ ภินฺนเมวา’’ติ ชวนานํ ธมฺมโต ภินฺนเมว. เอตฺถ อฏฺฐกถายํ วินิจฺฉิตนฺติ สมฺพนฺโธ. ตํ จิตฺตํ นิรุทฺธมฺปิ ชวนานมฺปิ ปจฺจุปฺปนฺนเมว โหตีติ โยชนา. ‘‘อทฺธาวเสน คหิตํ’’ติ อทฺธา ปจฺจุปฺปนฺน วเสน คหิตํ. ‘‘สนฺตติวเสน คหิตํ’’ติ สนฺตติ [Pg.133] ปจฺจุปฺปนฺนวเสน คหิตํ. อาจริยานนฺทมเต. สพฺเพสมฺปิ อาวชฺชน ชวนานํ. จิตฺตเมว โหติ, ตสฺมา ธมฺมโต อภินฺนํ. ปจฺจุปฺปนฺนญฺจ โหติ, ตสฺมา กาลโต อภินฺนนฺติ วุตฺตํ โหติ. อนนฺตรปจฺจเย อตีโต จ ปจฺจุปฺปนฺโน จ ขณ วเสน ยุชฺชติ. ยทิ อทฺธาสนฺตติ วเสน ยุชฺเชยฺย, ปจฺจุปฺปนฺโน ธมฺโม ปจฺจุปฺปนฺนสฺส ธมฺมสฺส อนนฺตร ปจฺจเยน ปจฺจโยติ วุตฺโต ภเวยฺย. กสฺมา, เอกาวชฺชน วีถิยญฺหิ สพฺพานิ จิตฺตานิ อทฺธาสนฺตติ วเสน ปจฺจุปฺปนฺนานิ เอว โหนฺตีติ. “येथे कदाचित असावे” (एत्थ सिया) इत्यादींमध्ये. “सिया” (असावे) म्हणजे काहींचा विचार असावा. ज्याला एकच आवर्जन असते, ते “एकावर्जना” (एक-आवर्जन) होय. “वीथी” म्हणजे चित्तवीथीचा प्रवाह (चित्तप्रबंध). आणि ती “एकावर्जना” (एक आवर्जन असलेली) आणि “वीथी” (चित्तवीथी) आहे, असा विग्रह आहे. “आवर्जन” म्हणजे आवर्जन चित्त. किंवा ते (चित्त) आवर्जन करते, असा संबंध आहे. “त्या त्या जवनाने” (तं तं जवनेन) म्हणजे त्या त्या जवनासोबत उत्पन्न झालेल्या किंवा दुसऱ्याच्या चित्ताला आवर्जित करते, अशी योजना (अर्थ) आहे. “किंचेत्थ” (येथे काय आहे) म्हणजे या वचनात काहीतरी सांगण्यासारखे आहे, असा अर्थ आहे. जर प्रथम आवर्जन आणि जवन असा अधिकार (विषय) असेल तर. “ते चित्त” (तञ्हि चित्तं) म्हणजे दुसऱ्याचे चित्त. “असे असूनही भिन्नच आहे” (एवम्पि भिन्नमेव) म्हणजे जवनांच्या स्वभावापेक्षा (धम्मापेक्षा) भिन्नच आहे. येथे “अट्ठकथा” (अट्टकथा) मध्ये निश्चित केले आहे, असा संबंध आहे. ते चित्त निरुद्ध (नष्ट) झाले तरी जवनांच्या दृष्टीने वर्तमानच असते, अशी योजना आहे. “अद्धावशेन गहितं” (काळाच्या दृष्टीने घेतलेले) म्हणजे वर्तमान काळाच्या (अद्धा-पच्चुप्पन्न) दृष्टीने घेतलेले. “संततिवशेन गहितं” (प्रवाहाच्या दृष्टीने घेतलेले) म्हणजे वर्तमान प्रवाहाच्या (संतति-पच्चुप्पन्न) दृष्टीने घेतलेले. आचार्य आनंदांच्या मते, सर्वच आवर्जन आणि जवनांचे चित्तच असते, म्हणून ते स्वभावाच्या (धम्माच्या) दृष्टीने अभिन्न आहे. आणि ते वर्तमानकालीन असते, म्हणून काळाच्या दृष्टीने अभिन्न आहे, असे म्हटले आहे. अनंतरप्रत्ययामध्ये (अनन्तरपच्चय) अतीत (भूतकाळ) आणि वर्तमान हे क्षणाच्या दृष्टीने योग्य ठरतात. जर ते काळ आणि प्रवाहाच्या (अद्धा-संतति) दृष्टीने योग्य ठरले असते, तर 'वर्तमान धर्म हा वर्तमान धर्माचा अनंतरप्रत्ययाने प्रत्यय (कारण) होतो' असे म्हटले गेले असते. कारण, एका आवर्जन वीथीमध्ये सर्वच चित्ते काळ आणि प्रवाहाच्या दृष्टीने वर्तमानच असतात. ๑๓๘. อปฺปนาวาเร. ‘‘อปฺปนา ชวนํ’’ติ กมฺมปทํ. ‘‘ตทา รมฺมณํ’’ติ กตฺตุปทํ. ‘‘อินฺทฺริย สมตาทีหี’’ติ สทฺธาทีนํ ปญฺจนฺนํ อินฺทฺริยานํ อญฺญมญฺญํ อนติ วตฺตนวเสน สมตาทีหิ. ‘‘ปริโต’’ติ สมนฺตโต. ‘‘อุเปจฺจา’’ติ อุปคนฺตฺวา. อปฺปนํ วหิตุํ ชเนตุํ สมตฺถ ภาโว อปฺปนาวหสมตฺถภาโว. ‘‘ยสฺส ปวตฺติยา’’ติ ยสฺส อุปจาร ชวนสฺส ปวตฺติโต. ‘‘อจิรํ กาลํ’’ติ อจิเรกาเล. ปริตฺต ชาติกา นาม กามาวจรชาติ. ‘‘โคตฺตํ’’ติ กมฺมกตฺตุ ปทํ. ‘‘อภิภุยฺยตี’’ติ ภาวนา พเลน อภิภุยฺยมานํ โหติ. อภิมทฺทียมานํ โหตีติ อตฺโถ. ‘‘ฉิชฺชตี’’ติ อิทํ ปน อภิภวนสฺส สิขาปตฺต ทสฺสนํ. ยาว ตํ โคตฺตํ เฉทํ ปาปุณาติ, ตาว อภิภุยฺยติ, มทฺทียตีติ วุตฺตํ โหติ. โคตฺตํ อภิภวตีติ โคตฺรภูติปิ ยุชฺชติ. ‘‘ปญฺจมํ’’ติ ปญฺจเม จิตฺตวาเร. ‘‘ตทาหิ ชวนํ ปติตํ นาม โหตี’’ติ ปกติยา ชวนปฺปวตฺตินาม สตฺตกฺขตฺตุ ปรโม โหติ. จตุตฺถญฺจ มุทฺธปตฺตํ. ปญฺจมโต ปฏฺฐาย ปติตํ. ตสฺมา ตสฺมึ ปญฺจมวาเร ชวนํ ปติตํ นาม โหติ. ‘‘ทุตีเยนา’’ติ ทุตีเยน เอว สทฺเทน. ‘‘ทุตียํ’’ติ ทุตีเย จิตฺตวาเร. ตทา อนุโลมํ ปถมชวนํ โหตีติ วุตฺตํ ‘‘อลทฺธา เสวนํ อนุโลม’’นฺติ. ‘‘เอเตเนวา’’ติ เอเตน เอว สทฺท ทฺวเย เนว. อฏฺฐสาลินิยํ ปน อนุญฺญาตา วิย ทิสฺสติ. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ. มนฺทปญฺญสฺส จตฺตาริ อนุโลมานิ โหนฺติ, ปญฺจมํ โคตฺรภุ, ฉฏฺฐํ มคฺคจิตฺตํ, สตฺตมํ ผลนฺติ. ‘‘อิตรฏฺฐกถาสู’’ติ วินยฏฺฐ กถาทีสุ. ‘‘ปฏิสิทฺธตฺตา’’ติ ปญฺจมํ โคตฺร ภุปฺปวตฺติยา ปฏิสิทฺธตฺตา [Pg.134] อาทิมฺหิ อฏฺฐนฺนํ อญฺญตฺรสฺมึติ วุตฺตตฺตา อิธ นิรุทฺเธติ ปทํ อวสฺสํ อิจฺฉิตพฺพเมวาติ วุตฺตํ ‘‘นิรุทฺเธ อนนฺตรเมวาติ ปทจฺเฉโท’’ติ. อนนฺตร สทฺทสฺส จ นิจฺจํ สมฺพนฺธาเปกฺขตฺตา ตเมวปทํ วิภตฺติ ปริณาเมน อธิกตนฺติ อาห ‘‘นิรุทฺธสฺสาติ อตฺถโต ลทฺธเมวา’’ติ. ‘‘วสิภูตาปี’’ติ วสิภูตาปิ สมานา. ‘‘เอกวารํ ชวิตฺวา’’ติ อิทํ โลกิยปฺปนาวเสน วุตฺตํ. โลกุตฺตร อปฺปนาปน สตฺตมมฺปิ อุปฺปชฺชติเยว. มูลฏีกา ปาเฐ ‘‘ภูมนฺตรปตฺติยา’’ติ โคตฺรภุ จิตฺตํ กามภูมิ โหติ. อปฺปนาปน มหคฺคตภูมิ วา โลกุตฺตรภูมิ วา โหติ. เอวํ ภูมนฺตรปตฺติยา. ‘‘อารมฺมณนฺตร ลทฺธิยา’’ติ ผลสมาปตฺติ วีถิยํ ผลชวนํ สนฺธาย วุตฺตํ. ตตฺถหิ ปุริมานิ อนุโลม ชวนานิ สงฺขารา รมฺมณานิ โหนฺติ. ผลชวนํ นิพฺพานารมฺมณํ. อิทญฺจ การณมตฺตเมว. ยถาวุตฺต เลฑฺฑุปมา เอว อิธ ยุตฺตรูปาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘น โข ปเนตํ เอวํ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ เอตํ อตฺถชาตํ น โข เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘อนทฺธนียา’’ติ อทฺธานํ ทีฆกาลํ นข มนฺตีติ อนทฺธนียา. อสารา. อสารตฺตา เอว สีฆตรํ รุหนฺติ. สีฆตรํ วุทฺธึ วิรุฬฺหึ อาปชฺชนฺติ. สารวนฺตา ปน สาเรน สห วฑฺฒมานตฺตา สีฆตรํ นรุหนฺติ. สีฆตรํ วุทฺธึ วิรุฬฺหึ นา ปชฺชนฺติ. เตนาห ‘‘เอกวสฺสชีวิโน’’ติอาทึ. ‘‘เอวเมวา’’ติอาทีสุ ‘‘ปติตชวเนสู’’ติ ปญฺจม ฉฏฺฐ สตฺตม ชวเนสุ. ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. ‘‘สุปกฺกสาลิภตฺต สทิสานี’’ติ ยถา สาลิภตฺตานิ สุปกฺกตฺตา เอว มุทุตรานิ หุตฺวา ทุพฺพลานิ อจิรฏฺฐิติกานิ. ตสฺมึ ทิวเสปิ ปูติภาวํ คจฺฉนฺติ. เอวํ อปฺปนา ชวนานิ. ‘‘ยสฺมา จา’’ติอาทีสุ. ‘‘ทุวิธสฺส นิยมสฺสา’’ติ ชวนนิยมสฺส จ กาลนิยมสฺส จ. ‘‘ปฏิสนฺธิยา อนนฺตร ปจฺจย ภาวิโน’’ติ สตฺตม ชวน เจตนา อนนฺตร ปจฺจโย, ตทนนฺตเร ปวตฺตํ วิปาก สนฺตานํ ปจฺจยุปฺปนฺโน, ตเมว จ อวสาเน จุติ จิตฺตํ หุตฺวา ภวนฺตเร ปฏิสนฺธิ จิตฺตสฺส อนนฺตร ปจฺจโย. เอวํ ปฏิสนฺธิ จิตฺตสฺส อนนฺตร ปจฺจย ภาเวน อวสฺสํ ภวิสฺสมานสฺสาติ อตฺโถ. อิทญฺจ การณ มตฺตเมว. มหาฏีกาวจนํ ปน กิญฺจิ วตฺตพฺพ รูปนฺติ น ปฏิกฺขิตฺตํ. ‘‘นิรนฺตรปฺปวตฺตานํ’’ติ [Pg.135] อาทีสุ. ภินฺนา อสทิสา เวทนา เยสํ ตานิ ภินฺนเวทนานิ. ‘‘อาเสวน ปจฺจนีกานํ’’ติ อาเสวน ปจฺจยปฺปฏิ ปกฺขานํ. อภินฺนา เวทนา เยสนฺติ วิคฺคโห. กฺริยชวนานนฺตรํ อรหตฺตผลํ ผลสมาปตฺติ วีถิยํ ทฏฺฐพฺพํ. เสสเมตฺถสุวิญฺเญยฺยํ. १३८. अर्पणा वारात (अप्पनावारात). 'अप्पना जवनं' हे कर्मपद आहे. 'तदारम्मणं' हे कर्तृपद आहे. 'इन्द्रिय समतादीहि' म्हणजे सद्धा (श्रद्धा) इत्यादी पाच इंद्रियांच्या परस्परांचे उल्लंघन न करण्याच्या भावनेने समता इत्यादींद्वारे. 'परितो' म्हणजे चहुबाजूने. 'उपेच्चा' म्हणजे जवळ जाऊन. अर्पणा वाहून नेण्यास किंवा उत्पन्न करण्यास समर्थ असणे म्हणजे 'अर्पणावहसमर्थभाव' होय. 'यस्स पवत्तिया' म्हणजे ज्या उपचार जवनाच्या प्रवृत्तीमुळे. 'अचिरं कालं' म्हणजे अल्प काळात. 'परित्त जातिका' म्हणजे कामावचर जाती. 'गोत्तं' हे कर्म-कर्तृ पद आहे. 'अभिभूय्यति' म्हणजे भावना बलाने अभिभूत (पराजित) केले जाते; दडपले जाते असा अर्थ आहे. 'छिज्जति' हे पराभवाच्या शिखरावर पोहोचल्याचे दर्शवते. जोपर्यंत ते गोत्र (कुळ) छेदाला प्राप्त होत नाही, तोपर्यंत ते अभिभूत केले जाते, दडपले जाते, असे म्हटले आहे. गोत्राचा अभिभव करते म्हणून 'गोत्रभू' असेही योग्य ठरते. 'पञ्चमं' म्हणजे पाचव्या चित्तवारात. 'तदाहि जवनं पतितं नाम होति' कारण सामान्यतः जवनाची प्रवृत्ती जास्तीत जास्त सात वेळा होते. आणि humane चौथे शिखर गाठलेले असते. पाचव्यापासून ते खाली पडते (पतित होते). म्हणून त्या पाचव्या वारात जवन 'पतित' (खाली पडलेले) म्हटले जाते. 'दुतियेन' म्हणजे दुसऱ्याच शब्दाने. 'दुतियं' म्हणजे दुसऱ्या चित्तवारात. तेव्हा अनुलोम हे पहिले जवन होते, म्हणून 'अलद्धा सेवनं अनुलोमं' (सेवन न मिळवता अनुलोम) असे म्हटले आहे. 'एतेनेव' म्हणजे या दोन शब्दांनीच. अट्ठसालिनीमध्ये मात्र हे मान्य केल्यासारखे दिसते. कारण तिथे म्हटले आहे: मंदप्रज्ञा असलेल्या व्यक्तीचे चार अनुलोम असतात, पाचवे गोत्रभू, सहावे मग्गचित्त आणि सातवे फलचित्त असते. 'इतरट्ठकथासू' म्हणजे विनय-अट्ठकथा इत्यादींमध्ये. 'पटिसिद्धत्ता' म्हणजे पाचव्या गोत्रभूच्या प्रवृत्तीचा निषेध केल्यामुळे, सुरुवातीला 'आठ पैकी इतर कोणत्याही' असे म्हटल्यामुळे, येथे 'निरुद्धे' हे पद आवश्यक मानलेच पाहिजे, म्हणून 'निरुद्धे अनन्तरमेवा' असा पदच्छेद केला आहे. 'अनन्तर' शब्दाला नेहमी संबंधाची अपेक्षा असल्याने, त्याच पदाचा विभक्ती बदलून स्वीकार केला आहे, म्हणून 'निरुद्धस्स' हे अर्थावरून प्राप्तच होते असे म्हटले आहे. 'वसिभूतापि' म्हणजे वशीभूत (वश केलेले) असूनही. 'एकवारं जवित्वा' (एकदा जवन करून) हे लौकिक अर्पणाच्या अपेक्षेने म्हटले आहे. लोकोत्तर अर्पणा मात्र सातव्या वेळीही उत्पन्न होतेच. मूळटीका पाठात 'भूमन्तरपत्तिया' म्हणजे गोत्रभू चित्त हे कामभूमीचे असते. अर्पणा मात्र महग्गतभूमी किंवा लोकोत्तरभूमीची असते. अशा प्रकारे भूमीच्या अंतराच्या (बदलाच्या) प्राप्तीमुळे. 'आरम्मणन्तरलद्धिया' हे फलसमापत्ती वीथीमध्ये फलजवनाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. कारण तिथे पूर्वीची अनुलोम जवने संस्कार-आलंबन असणारी असतात, तर फलजवन हे निब्बान-आलंबन (निर्वाण-आलंबन) असणारे असते. आणि हे केवळ एक कारणच आहे. वर सांगितलेली ढेकळाची उपमा (लेड्डुपमा) येथे योग्य आहे असे समजावे. 'न खो पनेतं एवं दट्ठब्बं' म्हणजे ही गोष्ट अशा प्रकारे पाहू नये. 'अनद्धनीया' म्हणजे दीर्घकाळ न टिकणारे, म्हणून अनद्धनीय. जे असार (सारहीन) आहेत. असार असल्यामुळेच ते वेगाने वाढतात. वेगाने वृद्धी आणि प्रगतीला (विरूळहीला) प्राप्त होतात. परंतु सारयुक्त गोष्टी सारासह वाढत असल्यामुळे वेगाने वाढत नाहीत. वेगाने वृद्धी आणि प्रगतीला प्राप्त होत नाहीत. म्हणूनच 'एकवस्सजीविनो' (एक वर्ष जगणारे) इत्यादी म्हटले आहे. 'एवमेव' इत्यादींमध्ये 'पतितजवेनेसु' म्हणजे पाचव्या, सहाव्या आणि सातव्या जवनांमध्ये. 'एत्थ च' इत्यादींमध्ये 'सुपक्कसालिभत्तसदिसानि' म्हणजे ज्याप्रमाणे साळीचा भात चांगल्या प्रकारे शिजल्यामुळे मऊ होऊन दुर्बळ आणि अल्पकाळ टिकणारा होतो. त्याच दिवशी तो कुजण्यास (दुर्गंधीला) प्राप्त होतो. त्याचप्रमाणे अर्पणा जवने असतात. 'यस्मा च' इत्यादींमध्ये 'दुविधस्स नियमस्स' म्हणजे जवननियम आणि काल नियम या दोन्ही नियमांचे. 'पटिसन्धिया अनन्तरपच्चयभाविनो' म्हणजे सातव्या जवनाची चेतना हा अनंतर प्रत्यय आहे, त्यानंतर प्रवृत्त होणारी विपाक-संतती हा प्रत्ययोत्पन्न आहे, आणि तीच शेवटी च्युती चित्त होऊन दुसऱ्या भवात प्रतिसंधी चित्ताचा अनंतर प्रत्यय बनते. अशा प्रकारे प्रतिसंधी चित्ताचा अनंतर प्रत्यय होण्याच्या भावाने ते अवश्य घडणारे आहे, असा अर्थ आहे. आणि हे केवळ एक कारणच आहे. महाटीकेचे वचन काहीसे सांगण्यासारखे आहे, म्हणून त्याचा निषेध केलेला नाही. 'निरन्तरपवत्तानं' इत्यादींमध्ये. ज्यांच्या वेदना भिन्न आणि असमान आहेत, ते 'भिन्नवेदना' होत. 'आसेवनपच्चनीकानं' म्हणजे आसेवन प्रत्ययाच्या प्रतिपक्षांचे (विरोधकांचे). ज्यांच्या वेदना अभिन्न (समान) आहेत, असा विग्रह आहे. क्रियाजवनानंतर अर्हत्त्वफल हे फलसमापत्ती वीथीमध्ये पाहावे. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. ๑๓๙. ‘‘สพฺพถา ปี’’ติอาทีสุ. โลเก มชฺฌิมเก หิ มหาชเนหิ อิจฺฉิตมฺปิ กิญฺจิ อารมฺมณํ อติอุกฺกฏฺเฐหิ มนฺธาตุ ราชาทีหิ อิจฺฉิตํ น โหติ. ตถา เตหิ มหาชเนหิ อนิจฺฉิตมฺปิ กิญฺจิ อารมฺมณํ อติทุคฺคเตหิ ปจฺจนฺต วาสีหิ อิจฺฉิตํ โหติ. ตสฺมา อารมฺมณานํ อิฏฺฐานิฏฺฐ ววตฺถานํ ปตฺวา อติอุกฺกฏฺเฐหิ จ อติทุคฺคเตหิ จ ววตฺถานํ น คจฺฉติ, มชฺฌิมเกหิ เอว ววตฺถานํ คจฺฉติ. เตนาห ‘‘ตตฺถ จา’’ติอาทึ. ‘‘อารมฺมณํ’’ติ กตฺตุปทํ. ‘‘วิปากจิตฺตํ’’ติ กมฺมปทํ. ‘‘กิญฺจี’’ติ กิญฺจิ รูปํ. ‘‘กิสฺมิญฺจี’’ติ กสฺมึจิ เอกสฺมึ ปุปฺเผ. ‘‘เตน วา’’ติ เตน วา สุขสมฺผสฺเสน วตฺเถน. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. १३९. 'सब्बथा पि' इत्यादींमध्ये. जगात मध्यम वर्गातील सामान्य लोकांद्वारे इच्छित असलेले एखादे आलंबन अत्यंत उच्च अशा मान्धाता राजा इत्यादींना इच्छित नसते. तसेच त्या सामान्य लोकांद्वारे अनइच्छित असलेले एखादे आलंबन अत्यंत दरिद्री आणि सीमावर्ती भागात राहणाऱ्या लोकांना इच्छित असते. म्हणून आलंबनांचे इष्ट-अनिष्ट ठरवणे हे अत्यंत उच्च किंवा अत्यंत दरिद्री लोकांच्या आधारे ठरत नाही, तर ते मध्यम वर्गातील लोकांच्या आधारेच ठरवले जाते. म्हणूनच 'तत्थ च' इत्यादी म्हटले आहे. 'आरम्मणं' हे कर्तृपद आहे. 'विपाकचित्तं' हे कर्मपद आहे. 'किञ्चि' म्हणजे कोणतेही रूप. 'किस्मिञ्चि' म्हणजे कोणत्याही एका फुलामध्ये. 'तेन वा' म्हणजे त्या सुखकारक स्पर्श असणाऱ्या वस्त्राने. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. ‘‘เวทนานิยโมปนา’’ติอาทีสุ. ‘‘อาทาเส มุขนิมิตฺตสฺส วิยา’’ติ ยถา อาทาเส มุข นิมิตฺตสฺส จลน จวนาทิโยโค นานาวณฺณโยโค จ ยถามุขเมว สิทฺโธ. ตถา วิปากานํ. เวทนา โยโค ปน ยถารมฺมณเมว สิทฺโธติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘เวทนาโยโค’’ติ นานาเวทนาโยโค. ‘‘กปฺเปตฺวา’’ติ จินฺเตตฺวา. ‘‘ปกปฺเปตฺวา’’ติ นานปฺปการโต จินฺเตตฺวา. น เกวลญฺจ วิปากานํ เอว ยถารมฺมณํ เวทนา โยโค โหตีติ โยชนา. 'वेदनानियमोपना' इत्यादींमध्ये. 'आदासे मुखनिमित्तस्स विया' म्हणजे ज्याप्रमाणे आरशात चेहऱ्याच्या प्रतिबिंबाचे हलणे, नाहीसे होणे इत्यादींचा संबंध आणि विविध रंगांचा संबंध हा मूळ चेहऱ्याप्रमाणेच सिद्ध होतो. त्याचप्रमाणे विपाकांचा वेदनेशी असलेला संबंध हा आलंबनाप्रमाणेच सिद्ध होतो, अशी योजना करावी. तिथे 'वेदनायोगो' म्हणजे विविध वेदनांचा संबंध. 'कप्पेत्वा' म्हणजे विचार करून. 'पकप्पेत्वा' म्हणजे विविध प्रकारे विचार करून. आणि केवळ विपाकांचाच आलंबनाप्रमाणे वेदनेशी संबंध होतो असे नाही, अशी योजना करावी. ‘‘อยญฺจา’’ติอาทีสุ. ‘‘อฏฺฐกถายํ ปี’’ติ ปฏฺฐาน อฏฺฐกถายมฺปิ. ‘‘ตทารมฺมณ วเสนา’’ติ ตทารมฺมณวเสน ปวตฺตานนฺติ ปาฐเสโส. ‘‘ปญฺจนฺนํ’’ติ โสมนสฺส สนฺตีรเณน สทฺธึ จตฺตาริ มหาวิปาก โสมนสฺสานิ สนฺธาย วุตฺตํ. ‘‘ปกติ นีหาเรนา’’ติ ปกติยา นิจฺจกาลํ ปวตฺตปฺปกาเรน. ปาฬิปาเฐ. ภาวิตานิ อินฺทฺริยานิ เยนาติ ภาวิตินฺทฺริโย. ‘‘มนาปํ’’ติ มโนรมฺมํ. ‘‘อมนาปํ’’ติ อมโนรมฺมํ. วิหเรยฺยนฺติ สเจ กงฺขตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปฏิกูเล’’ติ [Pg.136] อมนาเป. ‘‘อปฺปฏิกูล สญฺญี’’ติ มนาปสญฺญี. เอวํ เสเสสุ. ‘‘เตสํ’’ติ ขีณาสวานํ. ปาฬิปาเฐ. ‘‘สุมโน’’ติ โสมนสฺสิโต. ‘‘ทุมฺมโน’’ติ โทมนสฺสิโต. ปาฬิปาเฐ. ‘‘เมตฺตายวา ผรตี’’ติ อยํ สตฺโต อเวโรโหตูติอาทินา เมตฺตาจิตฺเตน วา ผรติ. ‘‘ธาตุโส อุปสํหรตี’’ติ ยถา ม ม กาโยปิ จตุธาตุ สมุสฺสโย โหติ. ตตฺถ เอกาปิ ธาตุ นาม ปฏิกูลา วา อปฺปฏิกูลา วา น โหติ. เกวลํ ตุจฺฉ สุญฺญ สภาวมตฺตา โหติ. เอวเมว อิมสฺส สตฺตสฺส กาโยปีติอาทินา ธาตุ โส อุปสํหรติ. ‘‘อสุภาย วา’’ติ อสุภ ภาวนาย วา. อสุภ ภาวนา จิตฺเตน วาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อสุภายา’’ติ วา ตสฺส อสุภภาวตฺถาย. เทวนาฏกา เทวจฺฉรา นาม. กุถิตานิ กุฏฺฐานิ เยสํ ตานิ กุถิต กุฏฺฐานิ. ‘‘สรีรานี’’ติ กายงฺคานิ. กุถิต กุฏฺฐานิ สรีรานิ ยสฺส โส กุถิตกุฏฺฐสรีโร. ‘‘กุถิตานี’’ติ อพฺภุกฺกิรณานิ. เวทนา ยุตฺตานิ โหนฺติ อิติ อปเร วทนฺตีติ โยชนา. ตสฺมา ปจฺจโย โหตีติ สมฺพนฺโธ. กถํ ปจฺจโย โหตีติ อาห ‘‘ยถา อานิสํส ทสฺสเนนา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘อฏฺฐกถายํ’’ติ วิสุทฺธิ มคฺคฏฺฐกถายํ. ‘‘พุทฺธสุพุทฺธตา ทสฺสเนนา’’ติ อตฺตโน สตฺถุภูตสฺส พุทฺธสฺส สุพุทฺธตา ทสฺสเนน. ‘‘อตฺตสมฺปตฺติ ทสฺสเนนา’’ติ มยํ ปน เอวรูปา ทุกฺขา มุตฺตามฺหาติ เอวํ อตฺตโน สมฺปตฺติ ทสฺสเนน. ‘‘อฏฺฐิกงฺกลิกเปตรูเป’’ติ นิมฺมํ สโลหิเต อฏฺฐิปุญฺชเปตสรีเร. ‘‘กุฏฺฐิโน’’ติ กุฏฺฐสรีรสฺส. ‘‘อฏฺฐกถายํ’’ติ ธมฺมปท อฏฺฐกถายํ. อติ อิฏฺเฐ เทวจฺฉร วณฺณาทิเก. อติ อนิฏฺเฐ กุถิตกุฏฺฐสรีราทิเก. ‘‘วตฺถุ ภูโต’’ติ อุปฺปตฺติฏฺฐาน ภูโต. ‘‘เตสํ เตสํ สตฺตานํ’’ติ กตฺตุ อตฺเถสามิวจนํ. ‘‘ตทุภยํ ปี’’ติ อุภยํ ตํ คหณํปิ. ‘‘เตสํ’’ติ เตสํ โลกิย มหาชนานํ. ‘‘วิปลฺลาสวเสเนว โหตี’’ติ เทวจฺฉรวณฺณาทีสุ อติอิฏฺเฐสุ อติอิฏฺฐาการโต คหณมฺปิ วิปลฺลาส วเสเนว โหติ. กสฺมา, เทวจฺฉร วณฺณาทีสุ อติ อิฏฺฐ สญฺญาย วิปลฺลาส สญฺญาภาวโต. “अयञ्चा” इत्यादींमध्ये. “अट्ठकथायं पि” म्हणजे पट्ठान अट्ठकथा (महापट्टान अट्ठकथा) मध्ये सुद्धा. “तदारम्मण वसेन” म्हणजे तदारम्मण (तदालंबन) च्या वशाने प्रवृत्त होणाऱ्यांच्या (विषयी), असा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. “पञ्चन्नं” (पाच) हे सोमनस्स (सौमनस्य) संतीरण सोबत चार महाविपाक सोमनस्स चित्तांना उद्देशून म्हटले आहे. “पकति नीहारेन” म्हणजे प्रकृतीने (स्वभावाने) नित्यकाळ प्रवृत्त होणाऱ्या प्रकारे. पाळिपाठात. ज्याने इंद्रिये भावित (विकसित) केली आहेत तो 'भावितिन्द्रिय' (भावितेंद्रिय) होय. “मनापं” म्हणजे मनोरम (मनपसंत). “अमनापं” म्हणजे अमनोरम (नापसंत). 'विहरेय्युं' (विहार करावा) चा संबंध 'सचे कङ्खति' (जर शंका असेल तर) याच्याशी आहे. “पटिकूले” म्हणजे अमनोरम (प्रतिकूल) मध्ये. “अप्पटिकूल सञ्ञी” म्हणजे अनुकूल (मनाप) संज्ञा असणारा. याचप्रमाणे उर्वरित (शब्दांमध्ये) समजावे. “तेसं” म्हणजे खीणासवांचे (क्षीणास्रवांचे/अर्हतांचे). पाळिपाठात. “सुमनो” म्हणजे सोमनस्सयुक्त (आनंदी). “दुम्मनो” म्हणजे दोमनस्सयुक्त (दुःखी). पाळिपाठात. “मेत्ताय वा फरति” म्हणजे 'हा प्राणी वैररहित असो' इत्यादी मैत्रीचित्ताने व्याप्त करतो. “धातुसो उपसंहरति” म्हणजे 'जसा माझा हा काय (शरीर) सुद्धा चार धातूंचा समूह आहे. तिथे एकही धातू प्रतिकूल किंवा अनुकूल नसतो. केवळ तुच्छ आणि शून्य स्वभावमात्र असतो. याचप्रमाणे या प्राण्याचा काय (शरीर) सुद्धा आहे' इत्यादी प्रकारे धातूंच्या रूपाने उपसंहार (विचार) करतो. “असुभाय वा” म्हणजे अशुभ भावनेने किंवा अशुभ भावना चित्ताने, असे म्हटले आहे. “असुभाय” म्हणजे त्याच्या अशुभभावासाठी. देवकन्यांना 'देवच्छरा' (देवाप्सरा) असे म्हणतात. ज्यांचे कुष्ठ (कोड) सडलेले आहे, ते 'कुथित कुष्ठ' होय. “सरीरानि” म्हणजे शरीराचे अवयव. ज्याचे शरीर सडलेल्या कुष्ठाने युक्त आहे तो 'कुथितकुट्ठसरीर' (सडलेले कुष्ठ शरीर असलेला) होय. “कुथितानि” म्हणजे सडलेले (किंवा पू इत्यादी वाहणारे). 'ते वेदनेने युक्त असतात' असे इतर (आचार्य) म्हणतात, अशी योजना आहे. 'त्यामुळे तो प्रत्यय (कारण) होतो' असा संबंध आहे. तो कसा प्रत्यय होतो? हे सांगण्यासाठी “यथा आनिसंस दस्सनेन” (जसे आनिशंस/फायदा पाहण्याने) इत्यादी म्हटले आहे. त्यात “अट्ठकथायं” म्हणजे विसुद्धिमग्ग अट्ठकथा (विशुद्धिमार्ग अट्ठकथा) मध्ये. “बुद्धसुबुद्धता दस्सनेन” म्हणजे आपले शास्ता असलेल्या बुद्धांच्या सुबुद्धतेचे (सम्यक् संबोधीचे) दर्शन केल्याने. “अत्तसम्पत्ति दस्सनेन” म्हणजे 'आम्ही तर अशा प्रकारच्या दुःखातून मुक्त झालो आहोत' अशा प्रकारे स्वतःच्या संपत्तीचे (कल्याण-प्राप्तीचे) दर्शन केल्याने. “अट्ठिकङ्कलिकपेतरूपे” म्हणजे मांस आणि रक्ताने रहित असलेल्या हाडांच्या सापळ्यासारख्या प्रेतशरीरात. “कुट्ठिनो” म्हणजे कुष्ठरोगी शरीराच्या. “अट्ठकथायं” म्हणजे धम्मपद अट्ठकथा मध्ये. अति इष्ट (अत्यंत प्रिय) अशा देवाप्सरांच्या वर्णादींमध्ये. अति अनिष्ट (अत्यंत अप्रिय) अशा सडलेल्या कुष्ठ शरीरादींमध्ये. “वत्थु भूतो” म्हणजे उत्पत्तीचे स्थान झालेला. “तेसं तेसं सत्तानं” हे कर्त्याच्या अर्थात षष्ठी विभक्तीचे वचन आहे. “तदुभयं पि” म्हणजे ते दोन्ही प्रकारचे ग्रहण (ग्रहण करणे) सुद्धा. “तेसं” म्हणजे त्या लौकिक महाजनांचे (सामान्य लोकांचे). “विपल्लासवसेनेव होति” म्हणजे देवाप्सरांच्या वर्णादी अति इष्ट गोष्टींमध्ये अति इष्ट रूपाने ग्रहण करणे सुद्धा विपल्लास (विपर्यास) च्या वशानेच होते. का? कारण देवाप्सरांच्या वर्णादींमध्ये अति इष्ट संज्ञा असणे हा विपल्लास संज्ञा (विपरीत संज्ञा) चाच भाव असल्यामुळे। วิภาวนิปาเฐ[Pg.137]. ‘‘ปวตฺติยา’’ติ ปวตฺตนโต. อฏฺฐกถาธิปฺปาเย ฐตฺวา วุตฺตตฺตา อฏฺฐกถาคารเวน’’ตํ วิจาเรตพฺพ เมวา’’ติ วุตฺตํ. อตฺถโต ปน อยุตฺตเมวาติ วุตฺตํ โหติ. เอสนโย อญฺญตฺถปิ. ‘‘ธมฺม จกฺขุรหิตา’’ติ ธมฺม ววตฺถานญฺญาณ จกฺขุ รหิตา. ‘‘กุสลากุสลานิ เยวา’’ติ เตสํ ธมฺม จกฺขุ รหิตานํ อุปฺปนฺนานิ กุสลากุสลานิเยว. คาถายํ. ‘‘รูปา’’ติ รูปโต นปฺปเวธนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สทฺทา’’ติอาทีสุปิ เอเสวนโย. นปฺปเวธนฺตีติ จ น จลนฺติ, น กมฺปนฺติ, จิตฺตญฺญถตฺตํ น คจฺฉนฺติ. ตถา อุเปกฺขา กฺริยชวนานนฺตรมฺปิ ตทารมฺมณานิ โสมนสฺสุ เปกฺขาเวทนา ยุตฺตานิ เอว สิยุนฺติ โยชนา. มูลฏีกาปาเฐ. ‘‘ตทารมฺมณตา’’ติ ตทารมฺมณตาย ตทารมฺมณภาเวน. ‘‘กตฺถจี’’ติ กตฺถจิ อภิธมฺม ปาฬิยํ. ‘‘วิชฺชมาเน จ ตสฺมึ’’ติ ตสฺมึ กฺริยชวนานุ พนฺธเก ตทา รมฺมเณ วิชฺชมาเน สติ. เอตํ ภวงฺคญฺจ นาม อนุพนฺธตีติ สมฺพนฺโธ. นทีโสโต ปฏิโสตคามินาวํ อนุพนฺธติ วิยาติ โยชนา. ‘‘สวิปฺผาริกํ เอวชวนํ’’ติ กิเลส ธมฺมานํ วิปลฺลาส ธมฺมานญฺจ วเสน ขณมตฺเตปิ อเนกสเตสุ อารมฺมเณสุ วิวิธากาเรน ผรณเวคสหิตํ กุสลากุสล ชวนเมว อนุพนฺธตีติ ยุตฺตํ. น ปน กฺริยชวนํ อนุพนฺธตีติ ยุตฺตนฺติ โยชนา. ‘‘ฉฬงฺคุ เปกฺขาวโต’’ติ จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา เนว สุมโน โหติ, น ทุมฺมโน, อุเปกฺขโก วิหรตี-ติอาทินา วุตฺตาย ฉ ทฺวาริกวเสน ฉฬงฺค สมนฺนาคตาย อุเปกฺขาย สมฺปนฺนสฺส. วตฺตนํ วุตฺติ. สนฺตา วุตฺติ อสฺสาติ สนฺต วุตฺติ. ตํ วิจาเรนฺโต ‘‘ปฏฺฐาเน ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘ยทิ เจตํ วุจฺเจยฺยา’’ติ เอตฺถ ‘‘เอตํ’’ติ กฺริยา พฺยากเตติอาทิกํ เอตํ วจนํ. ‘‘ตสฺมึ’’ติ ตสฺมึ วจเน. ‘‘เอวมาทินา’’ติ เอวมาทินา นเยน. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘อุตฺตรํ’’ติ ปริหารํ. ‘‘วิปสฺสนาจาร วเสนา’’ติ วิปสฺสนา ปวตฺติ วเสน. ‘‘เตสํ’’ติ โสมนสฺส โทมนสฺสานํ. ‘‘อิตรีตรานนฺตร ปจฺจยตา’’ติ อญฺญมญฺญานนฺตร ปจฺจยตาติ อตฺโถ. ‘‘เถเรนา’’ติ อนุรุทฺธตฺเถเรน. สพฺพานิ ตทา รมฺมณานิ, สพฺพานิ ภวงฺคานิ จ. ‘‘สมุทา จรนฺตี’’ติ จิรกาลํ สญฺจรนฺติ[Pg.138]. ‘‘เอตานิหี’’ติอาทินา เตสํ อฏฺฐารสนฺนํ ชวนานํ อนนฺตรํ ตทารมฺมณานํ อนิยมโต ปวตฺติยา การณยุตฺตึ ทสฺเสติ. สมฺภวติ อุปฺปชฺชติ เอเตนาติ สมฺภโว. ตทา รมฺมณสฺส สมฺภโว ตทา รมฺมณ สมฺภโว. อถวา, สมฺภวนํ อุปฺปชฺชนํ สมฺภโวติ อิเม ทฺเว อตฺเถ ทสฺเสตุํ ‘‘ตทา รมฺมณ สมฺภโว’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘เยสํ ปนา’’ติอาทีสุ. ‘‘เยสํ’’ติ เยสํ ปุคฺคลานํ. ‘‘อิตรานี’’ติ อุเปกฺขา สนฺตีรณ ทฺวยโต อญฺญานิ. ‘‘น โหนฺตีติ น วตฺตพฺพานี’’ติ วุตฺตํ. เอวํสติ, กสฺมา เถเรน อิธ น วุตฺตานีติ. อฏฺฐสาลินิยํ อวุตฺตตฺตา อิธ น วุตฺตานีติ. อฏฺฐสาลินิยํ ปน กสฺมา น วุตฺตานิ. เยภูยฺย นิยมโสเต ปติตตฺตา น วุตฺตานิ. น ปน อลพฺภมานตฺตา น วุตฺตานีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อฏฺฐกถายํ ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘อุเปกฺขาสหคต สนฺตีรณ ทฺวยเมว วุตฺตํ’’ติ อาคนฺตุก ภวงฺคภาเวน วุตฺตํ. ยถาห อถสฺส ยทา โสมนสฺส สหคตปฺปฏิสนฺธิกสฺส ปวตฺเต ฌานํ นิพฺพตฺเตตฺวา ปมาเทน ปริหีนชฺฌานสฺส ปณีต ธมฺโม เม นฏฺโฐติ ปจฺจเวกฺขโต วิปฺปฏิสาริ วเสน โทมนสฺสํ อุปฺปชฺชติ, ตทา กึ อุปฺปชฺชติ. โสมนสฺสานนฺตรญฺหิ โทมนสฺสํ, โทมนสฺสานนฺตรญฺจ โสมนสฺสํ ปฏฺฐาเน ปฏิสิทฺธํ. มหคฺคต ธมฺมํ อารพฺภ ชวเน ชวิเต ตทา รมฺมณมฺปิ ตตฺเถว ปฏิสิทฺธนฺติ. กุสล วิปากาวา อกุสลวิปากาวา อุเปกฺขา สหคตา เหตุกมโนวิญฺญาณ ธาตุ อุปฺปชฺชติ. กิมสฺสา รมฺมณนฺติ. รูปาทีสุ ปริตฺต ธมฺเมสุ อญฺญตรํ. เอเตสุ หิ ยเทว ตสฺมึ สมเย อาปาตมาคตํ โหติ. ตํ อารพฺภ เอตํ จิตฺตํ อุปฺปชฺชตีติ เวทิตพฺพํ-ติ. เอวํ โทมนสฺสสหคต ชวนานุรูปํ อุเปกฺขาสหคต สนฺตีรณ ทฺวยเมว อาคนฺตุก ภวงฺคภาเวน อฏฺฐกถายํ วุตฺตนฺติ. ‘‘เอตมฺปิ ยุชฺชติ เยวา’’ติ อกุสล ชวนาวสาเน เอตํ สเหตุกํ อาคนฺตุก ภวงฺคํปิ ยุชฺชติเยว. ‘‘โทมนสฺส ชวนานนฺตรํ ภวงฺค ปาโตว โหตี’’ติ อุเปกฺขา สหคต มูลภวงฺค ปาโตว โหติ. อาคนฺตุก ภวงฺเคน กิจฺจํ นตฺถิ. กสฺมา, อุเปกฺขา ปฏิสนฺธิกตฺตา. เนวตทารมฺมณ สมฺภโว อตฺถิ. กสฺมา, เตสุ อารมฺมเณสุ ตทารมฺมณวารสฺส อสมฺภวโต. น [Pg.139] หิ มหนฺตารมฺมเณสุ จ อวิภูตารมฺมเณสุ จ ตทารมฺมณวาโร สมฺภวติ. น จ มูลภวงฺค สมฺภโว อตฺถิ. กสฺมา, มูลภวงฺคภู ตสฺส โสมนสฺส ภวงฺคสฺส โทมนสฺส ชวเนน สห วิรุทฺธตฺตา. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ อิมินา การเณน. ‘‘เอกํ’’ติ เอกํ อุเปกฺขาสหคต วิปากํ. ตถา ตสฺเสว โทมนสฺสํ อุปฺปาเทนฺตสฺส เนว ตทารมฺมณ สมฺภโว อตฺถิ. น จ มูลภวงฺค สมฺภโวติ กตฺวา โทมนสฺสานนฺตรํ ฉสุ…เป… ปวตฺตตีติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘ตสฺเสวา’’ติ โสมนสฺสปฺปฏิสนฺธิกสฺเสว. เนวตทารมฺมณ สมฺภโว อตฺถิ. กสฺมา, อารมฺมณานํ อติมหนฺตตฺเตปิ อติวิภูตตฺเตปิ สติ โสมนสฺส ตทารมฺมณสฺส ชวเนน สห วิรุทฺธตฺตา. อุเปกฺขา ตทา รมฺมณสฺส จ อารมฺมเณน สห วิรุทฺธตฺตา. น หิ อติ อิฏฺฐารมฺมเณ อุเปกฺขา ตทารมฺมณํ ปวตฺตติ. มหคฺคต ปญฺญตฺตา รมฺมเณสุ ปน อุภยมฺปิ ตทารมฺมณํ นุปฺปชฺชติเยว. น จ มูลภวงฺค สมฺภโว อตฺถิ. กสฺมา, ชวเนน สห วิรุทฺธตฺตาติ. विभावनी पाठात: “पवत्तिया” (प्रवृत्तीने) म्हणजे प्रवृत्त होण्यापासून. अट्ठकथेच्या अभिप्रायावर (आशयावर) अधिष्ठित राहून सांगितल्यामुळे, अट्ठकथेच्या आदरापोटी “त्याचा विचार केलाच पाहिजे” असे म्हटले आहे. परंतु अर्थाच्या दृष्टीने ते अयोग्यच आहे, असे म्हटले गेले आहे. हाच नियम इतर ठिकाणीही लागू होतो. “धम्मचक्खुरहिता” (धम्मचक्षूने रहित) म्हणजे धम्मांचे निर्धारण करणाऱ्या ज्ञानरूपी चक्षूने रहित. “कुसलाकुसलानि येव” (कुशल-अकुशलच) म्हणजे त्या धम्मचक्षूने रहित असलेल्या व्यक्तींमध्ये उत्पन्न होणारे केवळ कुशल आणि अकुशल चित्तच होय. गाथेमध्ये: “रूपा” चा संबंध “नप्पवेधन्ति” (रूपांमुळे ते विचलित होत नाहीत) याच्याशी आहे. “सद्दा” (शब्द) इत्यादींच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. “नप्पवेधन्ति” म्हणजे ते विचलित होत नाहीत, कंप पावत नाहीत, त्यांच्या चित्तामध्ये कोणताही बदल (विकार) होत नाही. त्याचप्रमाणे, उपेक्षा-क्रिया-जवन (उपेक्षायुक्त क्रियाशील जवन) नंतर देखील तदारम्मण (तदालंबन) चित्त हे सोमनस्य (आनंद) आणि उपेक्षा वेदनेने युक्तच असावे, अशी योजना (रचना) आहे. मूलटीका पाठात: “तदारम्मणता” म्हणजे तदारम्मणतेने, तदारम्मण भावाने. “कत्थचि” म्हणजे अभिधम्म पाळीमध्ये कोठे तरी. “आणि ते विद्यमान असताना” म्हणजे क्रिया-जवनच्या मागे येणारे ते तदारम्मण विद्यमान असताना. “ते या भवंगाच्या मागे जाते” असा संबंध आहे. नदीचा प्रवाह प्रवाहाच्या विरुद्ध दिशेने जाणाऱ्या नौकेच्या मागे जातो, त्याप्रमाणे ही योजना आहे. “केवळ सविप्फारिक (विस्तार पावणारे) जवनच” म्हणजे क्लेशधर्म आणि विपर्यासधर्मांच्या प्रभावामुळे एका क्षणातही शेकडो आलंबनांवर विविध प्रकारे पसरण्याच्या वेगाने युक्त असलेले कुशल-अकुशल जवनच मागे जाते, हे योग्य आहे. परंतु क्रिया-जवन मागे जाते, हे योग्य नाही; अशी योजना आहे. “षडंग-उपेक्षावंताचे” (छळंगुपेक्खावतो) म्हणजे “डोळ्याने रूप पाहून तो आनंदी होत नाही, दुःखी होत नाही, तर उपेक्षक (तटस्थ) होऊन विहरतो” इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या सहा द्वारांच्या द्वारे सहा अंगांनी युक्त अशा उपेक्षेने संपन्न असलेल्या व्यक्तीचे. वर्तन म्हणजे वृत्ती. ज्याची वृत्ती शांत आहे, तो शांतवृत्ती होय. त्याचा विचार करताना त्यांनी “पठ्ठानमध्ये तर...” इत्यादी म्हटले आहे. “जर हे म्हटले गेले तर” येथे “हे” (एतं) म्हणजे क्रिया-व्याकृत इत्यादी हे वचन होय. “त्यात” (तस्मिं) म्हणजे त्या वचनात. “इत्यादी” म्हणजे अशा प्रकारे (या पद्धतीने). विभावनी पाठात: “उत्तरं” म्हणजे परिहार (उत्तर/समाधान). “विपश्यनाचाराच्या वशाने” म्हणजे विपश्यनेच्या प्रवृत्तीच्या वशाने. “त्यांचे” (तेसं) म्हणजे सोमनस्य (आनंद) आणि दोमनस्य (खिन्नता/दुःख) यांचे. “इतरेतर-अनंतर-प्रत्ययता” म्हणजे परस्परांच्या अनंतर-प्रत्ययतेने (लगेचच नंतर येण्याच्या संबंधाने), असा अर्थ आहे. “थेरांद्वारे” (थेरेन) म्हणजे थेर अनुरुद्ध यांच्याद्वारे. सर्व तदारम्मण चित्त आणि सर्व भवंग चित्त. “समुदाचरन्ति” म्हणजे दीर्घकाळ संचार करतात (प्रवृत्त होतात). “यांच्याद्वारेच...” इत्यादींनी त्या अठरा जवनांनंतर तदारम्मणांच्या अनियंत्रित प्रवृत्तीची कारणयुक्ती (तार्किक कारण) दर्शविली आहे. ज्याच्याद्वारे उत्पन्न होते किंवा उद्भवते, तो संभव (उत्पत्ती) होय. तदारम्मणाची उत्पत्ती म्हणजे तदारम्मण-संभव होय. अथवा, संभवणे म्हणजे उत्पन्न होणे हा संभव आहे; हे दोन अर्थ दर्शविण्यासाठी “तदारम्मण-संभव” इत्यादी म्हटले आहे. “परंतु ज्यांच्या...” इत्यादींमध्ये: “ज्यांच्या” (येसं) म्हणजे ज्या पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या). “इतर” (इतरानि) म्हणजे उपेक्षा-संतीरण द्वयीपेक्षा (दोन उपेक्षायुक्त संतीरण चित्तांपेक्षा) इतर चित्ते. “ती नसतात, असे म्हणू नये” असे म्हटले आहे. असे असताना, थेरांनी येथे ती का सांगितली नाहीत? अट्ठसालिनीमध्ये न सांगितल्यामुळे येथे ती सांगितली नाहीत. परंतु अट्ठसालिनीमध्ये ती का सांगितली नाहीत? बहुतांश सामान्य नियमांच्या प्रवाहात (येभूय्य-नियम) येत असल्यामुळे ती सांगितली नाहीत. परंतु ती उपलब्ध न झाल्यामुळे सांगितली नाहीत असे नाही, हा अर्थ दर्शविताना “अट्ठकथेमध्ये तर...” इत्यादी म्हटले आहे. “केवळ उपेक्षायुक्त दोन संतीरण चित्तेच सांगितली आहेत” हे आगंतुक भवंग रूपाने सांगितले आहे. जसे म्हटले आहे: जेव्हा सोमनस्य-सहगत (आनंदयुक्त) प्रतिसंधी असलेल्या व्यक्तीला, जीवनप्रवाहात ध्यान प्राप्त करून, नंतर प्रमादामुळे (दुर्लक्षामुळे) ध्यानाचा ऱ्हास झाल्यावर, “माझा प्रणीत धर्म (ध्यान) नष्ट झाला” असा विचार करताना पश्चात्तापामुळे दोमनस्य (खिन्नता) उत्पन्न होते, तेव्हा काय उत्पन्न होते? कारण, सोमनस्यानंतर लगेचच दोमनस्य आणि दोमनस्यानंतर लगेचच सोमनस्य येणे पठ्ठानमध्ये निषिद्ध मानले आहे. महग्गत धम्माला (महान/उदात्त धम्माला) आलंबन करून जवन प्रवृत्त झाल्यावर, तेथे तदारम्मण देखील निषिद्ध आहे. (तेव्हा) कुशल-विपाक किंवा अकुशल-विपाक असलेली, उपेक्षायुक्त अहेतुक मनोविज्ञानधातू उत्पन्न होते. तिचे आलंबन कोणते असते? रूप इत्यादी परीत्त (मर्यादित) धम्मांपैकी कोणतेही एक. कारण, यांपैकी जे काही त्या वेळी इंद्रियगोचर (समोर आलेले) होते, त्याला आलंबन करून हे चित्त उत्पन्न होते, असे समजावे. अशा प्रकारे, दोमनस्य-सहगत जवनाच्या अनुरूप केवळ उपेक्षायुक्त दोन संतीरण चित्तेच अट्ठकथेमध्ये आगंतुक भवंग रूपाने सांगितली आहेत. “हे देखील योग्यच आहे” म्हणजे अकुशल जवनाच्या शेवटी हे सहेतुक आगंतुक भवंग देखील योग्यच ठरते. “दोमनस्य जवनानंतर लगेचच भवंगपात (भवंगात जाणे) होतो” म्हणजे उपेक्षायुक्त मूळ भवंगातच जाणे होते. आगंतुक भवंगाचे काही कार्य नसते. का? कारण त्याची प्रतिसंधी उपेक्षायुक्त असते. तदारम्मणाची उत्पत्ती देखील होत नाही. का? कारण त्या आलंबनांच्या बाबतीत तदारम्मण-वाराचा (तदारम्मण प्रक्रियेचा) असंभव असतो. कारण, महान आलंबन (महंतारम्मण) आणि अविभूत आलंबन (अस्पष्ट आलंबन) यांच्यामध्ये तदारम्मण-वार संभवत नाही. आणि मूळ भवंगाची उत्पत्ती देखील संभवत नाही. का? कारण मूळ भवंग असलेले सोमनस्य भवंग हे दोमनस्य जवनाशी विरुद्ध (विसंगत) असते. “असे केल्याने” म्हणजे या कारणाने. “एक” म्हणजे एक उपेक्षायुक्त विपाक चित्त. उसीप्रमाणे, दोमनस्य उत्पन्न करणाऱ्या त्याच व्यक्तीच्या बाबतीत तदारम्मणाची उत्पत्ती संभवत नाही आणि मूळ भवंगाची उत्पत्ती देखील संभवत नाही; असे मानून दोमनस्यानंतर सहा... इत्यादींमध्ये प्रवृत्त होते, अशी योजना आहे. तेथे “त्याच्याच” (तस्सेव) म्हणजे सोमनस्य प्रतिसंधी असलेल्या व्यक्तीच्याच. तदारम्मणाची उत्पत्ती मुळीच संभवत नाही. का? कारण आलंबन अतिमहंत (अतिशय मोठे) किंवा अतिविभूत (अतिशय स्पष्ट) असले तरी, सोमनस्य तदारम्मण हे जवनाशी विरुद्ध असते आणि उपेक्षा तदारम्मण हे आलंबनाशी विरुद्ध असते. कारण, अति-इष्ट आलंबनामध्ये (अतिशय प्रिय विषयामध्ये) उपेक्षा तदारम्मण प्रवृत्त होत नाही. परंतु महग्गत (उदात्त) आणि प्रज्ञप्ति (संकल्पना) आलंबनांच्या बाबतीत दोन्ही प्रकारचे तदारम्मण मुळीच उत्पन्न होत नाही. आणि मूळ भवंगाची उत्पत्ती देखील संभवत नाही. का? कारण ते जवनाशी विरुद्ध असते. ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. ‘‘สพฺพ ธมฺเมสู’’ติ สพฺเพสุ อารมฺมณ ธมฺเมสุ. ‘‘ปถม สมนฺนาหาโร’’ติ อาวชฺชน กิจฺจํ อาห. สุตฺตนฺต ปาเฐ. ‘‘ตชฺโช’’ติ เตน อารมฺมณานํ อาปาตา คมเนน ชาโต. ‘‘ตชฺโช’’ติ วา ตทนุรูโปติปิ วทนฺติ. ‘‘วิญฺญาณภาคสฺสา’’ติ จกฺขุ ทฺวาริก วิญฺญาณ โกฏฺฐาสสฺส. ‘‘ยโต’’ติ ยสฺมึ กาเล. กถํ อาวชฺชเนน วินา นุปฺปชฺชตีติ อาห ‘‘สเจ อาวชฺชเนนา’’ติอาทึ. ‘‘เอตฺถ สิยา’’ติอาทีสุ. ยถา ปน นิราวชฺชนํ โหติ ภินฺนา รมฺมณญฺจ, เอวํ ตถาติ โยชนา. ‘‘เอกสฺสปี’’ติ เอกสฺส อาคนฺตุก ภวงฺคสฺสปิ นตฺถิ โทโส. มหาอฏฺฐกถายญฺจ นตฺถิ. อฏฺฐสาลินิยํ ปน อตฺถิเยว. ‘‘สวิปฺผนฺทนตฺตา’’ติ เอตฺถ อตฺโถ สวิปฺผาริกนฺติ ปเท วุตฺตนเยน เวทิตพฺโพ. ‘‘อิตเร สญฺจา’’ติ มหคฺคตโลกุตฺตร ชวนานญฺจ. กานิ จิ ปริตฺตารมฺมณานิปิ สมานานิ. ยทิ ตทารมฺมณู ปนิสฺส ยสฺส กามภวงฺคสฺส อภาวโต ตทารมฺมณานิ รูปารูป พฺรหฺมานํ นุปฺปชฺชนฺติ. เอวํ สติ, จกฺขุโสต ทฺวาริก จิตฺตานิปิ รูป พฺรหฺมานํ นุปฺปชฺเชยฺยุนฺติ อาห ‘‘จกฺขุ โสตวิญฺญาณานิ ปนา’’ติอาทึ. ‘‘อินฺทฺริยปฺปวตฺติ [Pg.140] อานุภาวโต’’ติ จกฺขุ วตฺถุ โสตวตฺถุ สงฺขาตานํ อินฺทฺริย วตฺถูนํ รูป พฺรหฺม สนฺตาเน ปวตฺตตฺตา เตสํ ปวตฺติ อานุภาวโต จกฺขุ โสตวิญฺญาณานิ รูปพฺรหฺมานํ ปวตฺตนฺติเย วาติ ทสฺเสตุํ ‘‘สมฺปฏิจฺฉน สนฺตีรณานี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘วิกปฺปพเลวา’’ติ กามกุสลา กุสลานํ วิย วิวิเธน อากาเรน กปฺเปตฺวา ปกปฺเปตฺวา อารมฺมณคฺคหสามตฺถิเยวาสติ. ‘‘อปฺปนาปตฺต ภาวนา กมฺมวิเสเส วา’’ติ เอตฺถ อภิญฺญา ชวนานิ วิย มหคฺคต วิปาก โลกุตฺตร วิปากานิ วิย จาติ วตฺตพฺพํ. ‘‘อฏฺฐกถายํ’’ติ ปฏิจฺจ สมุปฺปาท วิภงฺคฏฺฐกถายํ. ‘‘วิภาวนิยํ วุตฺต การณานี’’ติ อฏฺฐกถาโต อาหริตฺวา วิภาวนิยํ วุตฺตานิ ‘อชนกตฺตา ชนก สมานตฺตา ภาวโต’ติอาทีนิ การณานิ. "एत्थ च" इत्यादींमध्ये. "सब्ब धम्मेसू" म्हणजे सर्व आलंबन धर्मांमध्ये. "पठम समन्नाहारो" म्हणजे आवज्जन कृत्य म्हटले आहे, सुत्तन्त पाठात. "तज्जो" म्हणजे त्या आलंबनांच्या समोर येण्याने उत्पन्न झालेला. किंवा "तज्जो" म्हणजे त्याला अनुरूप असेही म्हणतात. "विञ्ञाणभागस्सा" म्हणजे चक्षु-द्वारिक विज्ञान भागाचे. "यतो" म्हणजे ज्या काळी. आवर्जनाशिवाय कसे उत्पन्न होत नाही, हे सांगण्यासाठी "सचे आवज्जनेना" इत्यादी म्हटले आहे. "एत्थ सिया" इत्यादींमध्ये. जसे आवर्जनरहित आणि भिन्न आलंबन असते, तसेच ते आहे अशी योजना करावी. "एकस्सपी" म्हणजे एका आगंतुक भवांगाचाही दोष नाही. महाअट्ठकथेतही नाही. परंतु अट्ठसालिनीमध्ये मात्र आहेच. "सविप्फन्दनत्ता" येथील अर्थ 'सविप्फारिकं' या पदात सांगितलेल्या पद्धतीने समजावा. "इतरे सञ्चा" म्हणजे महग्गत आणि लोकोत्तर जवनांचेही. काही परीत्तालंबन (लहान आलंबन) असणारेही समान असतात. जर तदालंबन उत्पन्न होण्यास कारणीभूत असलेल्या कामभवांगाच्या अभावामुळे रूप आणि अरूप ब्रह्मांमध्ये तदालंबन उत्पन्न होत नाही. असे असताना, चक्षु आणि श्रोत द्वारिक चित्तेही रूप ब्रह्मांमध्ये उत्पन्न होऊ नयेत, म्हणून "चक्खु सोतविञ्ञाणानि पना" इत्यादी म्हटले आहे. "इन्द्रियप्पवत्ति आनुभावतो" म्हणजे चक्षु-वस्तू आणि श्रोत-वस्तू म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या इंद्रिय वस्तूंच्या रूप ब्रह्म संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) प्रवृत्त असल्यामुळे, त्यांच्या प्रवृत्तीच्या प्रभावाने चक्षु आणि श्रोत विज्ञान रूप ब्रह्मांमध्ये प्रवृत्त होतातच, हे दर्शवण्यासाठी "सम्पटिच्छन सन्तीरणानि" इत्यादी म्हटले आहे. "विकप्पबलेवा" म्हणजे काम-कुशल आणि अकुशलांप्रमाणे विविध प्रकारे कल्पना करून आलंबन ग्रहण करण्याच्या सामर्थ्यामुळेच. "अप्पनापत्त भावना कम्मविसेसे वा" येथे अभिज्ञा जवनांप्रमाणे आणि महग्गत विपाक व लोकोत्तर विपाकांप्रमाणे असे म्हणावे. "अट्ठकथायं" म्हणजे पटिच्चसमुप्पाद विभङ्ग-अट्ठकथेत. "विभावणियं वुत्त कारणानी" म्हणजे अट्ठकथेतून घेऊन विभावणीमध्ये सांगितलेली 'अजनकत्वामुळे, जनक समानत्वामुळे' इत्यादी कारणे होत. ๑๔๐. ชวน นิยเม. อฏฺฐกถายมฺปิ ฉกฺขตฺตุํ ปวตฺติ วุตฺตา. ยถาห สเจ ปน พลวา รมฺมณํ อาปาตาคตํ โหติ. กฺริยมโนธาตุยา ภวงฺเค อาวฏฺฏิเต จกฺขุวิญฺญาณาทีนิ อุปฺปชฺชนฺติ. ชวนฏฺฐาเน ปน ปถมกามาวจร กุสล จิตฺตํ ชวนํ หุตฺวา ฉสตฺตวาเร ชวิตฺวา ตทารมฺมณสฺส วารํ เทตีติ. ‘‘มุทุตร ภาเวนา’’ติ มาตุกุจฺฉิมฺหิ ฐิตกาเลวา สมฺปติ ชาตกาเล วา วตฺถุสฺส อติมุทุภาเวน. ‘‘เกนจิอุปทฺทุต ภาเวนา’’ติ พาฬฺหเคลญฺญชาตกาเล เกนจิ วาตปิตฺตเสมฺหาทินา อุปทฺทุต ภาเวน. ‘‘อชฺโฌตฺถฏ ภาเวนา’’ติ ตสฺส เววจนมตฺตํ. มนฺทีภูโต เวโค เยสํ ตานิ มนฺทีภูต เวคานิ. ‘‘อสยฺห รูเปหี’’ติ ทุกฺขมสภาเวหิ. อภิภูตานํ สตฺตานํ. ตญฺจ โข วจนํ ปากติก สตฺตานํ วเสเนว วุตฺตํ. น สตฺตวิเสสานํ วเสน. เอวํ สติ, สตฺตวิเสสานํ วเสน กถํ ทฏฺฐพฺพนฺติ อาห ‘‘เย ปนา’’ติอาทึ. ‘‘อุปรี’’ติ มรณุปฺปตฺติฏฺฐาเน. ‘‘วุตฺตญฺหี’’ติ วิสุทฺธิ มคฺเค วุตฺตเมว. ‘‘ยมกปฺปาฏิหาริยํ’’ติ ยุคฬวตฺถูนํ เอกโต ปวตฺต อจฺฉริย กมฺมํ. ‘‘ทฺเว ฌานงฺคานี’’ติ อุเปกฺเขกคฺคตา ฌานงฺคานิ. १४०. जवन नियमामध्ये. अट्ठकथेतही सहा वेळा प्रवृत्ती सांगितली आहे. जसे म्हटले आहे - "जर बलवान आलंबन समोर आलेले असेल, तर क्रिया-मनोधातूने भवांग आवर्तित (वळवले) झाल्यावर चक्षुविज्ञानादी उत्पन्न होतात. जवन स्थानावर मात्र पहिले कामावचर कुशल चित्त जवन होऊन सहा किंवा सात वेळा जवून (धावून) तदालंबनाला संधी देते." "मुदुतर भावेन" म्हणजे मातृकुक्षीत (गर्भात) असताना किंवा नुकत्याच जन्मलेल्या काळात वस्तूच्या (इंद्रिय वस्तूच्या) अतिशय कोमलतेमुळे. "केनचिउपद्दुत भावेन" म्हणजे तीव्र आजारपणाच्या वेळी वात, पित्त, कफ इत्यादींमुळे उपद्रव (त्रास) झाल्यामुळे. "अज्झोत्थट भावेन" हा त्याचा केवळ समानार्थी शब्द आहे. ज्यांचा वेग मंद झाला आहे, ते 'मंदीभूत वेग' होत. "असह्य रूपेही" म्हणजे दुःखमय स्वभावाच्या रूपांनी. अभिभूत झालेल्या (पीडित) प्राण्यांचे. आणि ते वचन सामान्य प्राण्यांच्या अपेक्षेनेच म्हटले आहे, विशिष्ट प्राण्यांच्या अपेक्षेने नाही. असे असताना, विशिष्ट प्राण्यांच्या अपेक्षेने कसे पाहावे, हे सांगण्यासाठी "ये पना" इत्यादी म्हटले आहे. "उपरी" म्हणजे मरण आणि उत्पत्तीच्या स्थानावर. "वुत्तञ्ही" म्हणजे विसुद्धिमग्गात सांगितल्याप्रमाणेच. "यमकपाटिहारियं" म्हणजे जोडीने वस्तूंची एकत्र प्रवृत्ती होणारे आश्चर्यकारक कर्म (यमक प्रातिहार्य). "द्वे झानङ्गानी" म्हणजे उपेक्षा आणि एकाग्रता ही दोन ध्यान-अंगे होत. ‘‘โยคกมฺมสิทฺธิยา’’ติ ภาวนานุ โยคกมฺมสิทฺธสฺส. อิทฺธิ วิกุพฺพนํ นาม อิทฺธิยา นานากมฺมกรณํ. ‘‘สิทฺธิยา เอวา’’ติ สิชฺฌ นตฺถาย เอว[Pg.141]. อตฺตโน อนนฺตเร เอว อุปฺปนฺนํ ผลํ เอติสฺสาติ อานนฺตริกปฺผลา. มคฺคเจตนา. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. ‘‘มนฺทสฺสา’’ติ มนฺท ปุคฺคลสฺส. ‘‘ติกฺขสฺสา’’ติ ติกฺข ปุคฺคลสฺส. ตีณิ ผลจิตฺตานิ. ‘‘ปโยคาภิสงฺขารสฺสา’’ติ ปถมชฺฌานโต ปฏฺฐาย สมถ วิปสฺสนายุคนนฺธปฺปวตฺติ สงฺขาตสฺส ปุพฺพปฺปโยคาภิสงฺขารสฺส. ‘‘อกตาธิการสฺสา’’ติ อาสนฺเน ปุริมภเว อกต ฌานปริกมฺมสฺส ปุคฺคลสฺส. สพฺเพสมฺปิ ผลฏฺฐานํ จิณฺณวสิภาวาเนว โหนฺตีติ โยชนา. "योगकम्मसिद्धिया" म्हणजे भावना-अनुयोग कर्मात सिद्ध झालेल्याच्या. इद्धि-विकुब्बन (ऋद्धि-विकुर्वण) म्हणजे ऋद्धीद्वारे विविध प्रकारची कामे करणे. "सिद्धिया एवा" म्हणजे सिद्धीसाठीच. स्वतःच्या लगेचच नंतर उत्पन्न झालेले फल जिचे आहे, ती 'आनन्तरिकफला' (तात्काळ फल देणारी) होय, म्हणजेच मार्गचेतना. "इती" म्हणजे म्हणून. "मन्दस्सा" म्हणजे मंद पुद्गलाचे (व्यक्तीचे). "तिक्खस्सा" म्हणजे तीक्ष्ण पुद्गलाचे. तीन फलचित्ते. "पयोगाभिसङ्खारस्सा" म्हणजे प्रथम ध्यानापासून सुरू करून समथ आणि विपश्यना यांच्या युगनद्ध (एकत्र) प्रवृत्तीरूप पूर्वप्रयोग संस्काराचे. "अकताधिकारस्सा" म्हणजे जवळच्या पूर्वजन्मात ध्यानाचा परिकर्म (पूर्व तयारी) न केलेल्या पुद्गलाचे. सर्वांचेच फलस्थान हे अभ्यासाने प्राप्त वशीभाव (नियंत्रण) असलेलेच असते, अशी योजना करावी. ชวนนิยโมนิฏฺฐิโต. जवन-नियम समाप्त झाला. ๑๔๑. ทุเหตุกาทีสุ. ชาติ ทฺวิเหตุกาทโย เอว อธิปฺเปตาติ วุตฺตํ ‘‘ปฏิสนฺธิวิญฺญาณ สหคตา’’ติอาทึ. ‘‘เตสํ ทฺวินฺนํ ปี’’ติ ทฺวิเหตุกานมฺปิ อเหตุกานมฺปิ. ภุโสฌาน มคฺคผลานิ วาเรนฺติ นีวาเรนฺตีติ อาวรณานิ. วิปากานิ จ ตานิ อาวรณานิ จาติ วิคฺคโห. ‘‘วิปากานี’’ติ อเหตุก ทฺวิเหตุก วิปากานิ. เตหิ คหิตปฺปฏิสนฺธิกานํ อิมสฺมึ ภเวฌาน มคฺคผลปฺปฏิลาโภ นาม นตฺถิ. เตนาห ‘‘วิปากาวรณ สพฺภาวโต’’ติอาทึ. ‘‘เตสํ’’ติ ทุคฺคติ อเหตุก ปุคฺคลานํ. ปุคฺคลานนฺติ วุตฺตํ โหติ. น ลพฺภนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิตเรสํ’’ติ ตโต อญฺเญสํ สุคติ อเหตุก ปุคฺคลานํ. १४१. द्विहेतुक इत्यादींमध्ये. जन्म द्विहेतुक इत्यादीच अभिप्रेत आहे, म्हणून "पटिसन्धिविञ्ञाण सहगता" इत्यादी म्हटले आहे. "तेसं द्विन्नं पी" म्हणजे द्विहेतुकांचे आणि अहेतुकांचेही. जे ध्यान, मार्ग आणि फलांना अत्यंत रोखतात किंवा अडथळा आणतात, ते 'आवरण' होत. विपाक आणि तेच आवरण म्हणजे 'विपाकावरण' असा विग्रह आहे. "विपाकानि" म्हणजे अहेतुक आणि द्विहेतुक विपाक. त्यांच्याद्वारे प्रतिसंधी ग्रहण केलेल्यांना या जन्मात ध्यान, मार्ग आणि फल यांची प्राप्ती होत नाही. म्हणूनच "विपाकावरण सब्भावतो" इत्यादी म्हटले आहे. "तेसं" म्हणजे दुग्गती अहेतुक पुद्गलांचे. 'पुद्गलांचे' असे म्हटले आहे. 'मिळत नाही' असा संबंध आहे. "इतरेसं" म्हणजे त्यांच्याव्यतिरिक्त इतर सुगती अहेतुक पुद्गलांचे. ‘‘เอตฺถ สิยา’’ติอาทีสุ. ทุคฺคติ ปริยาปนฺนานญฺจ อเหตุกานํ. ‘‘มูลภวงฺเค’’ติอาทิมฺหิ ปฏิสนฺธิ จิตฺตํ หุตฺวา อาคเต มูลภวงฺเค. ‘‘ยํ กิญฺจี’’ติ ยํ กิญฺจิ ภวงฺคํ. ‘‘วุจฺจเต’’ติ วิสชฺชนา วุจฺจเต. ‘‘สพฺพ อฏฺฐกถาสุ ปฏิกฺขิตฺโต’’ติ อฏฺฐสาลินิยํ ตาว วิปากุทฺธารกถายํ โสฬสสุ กามาวจร กุสล วิปาเกสุ อฏฺฐนฺนํ อเหตุก วิปากานํ เอว อาปายิเกสุ สตฺเตสุ อุปฺปตฺตึ ทสฺเสติ. น อฏฺฐนฺนํ สเหตุก วิปากานํ. ตถา ปฏิจฺจ สมุปฺปาทฏฺฐ กถาสุ จ วิญฺญาณ ปทวณฺณนาสุ อญฺญาสุ จ อภิธมฺมาวตาราทีสูติ เอวํ สพฺพฏฺฐกถาสุ ปฏิกฺขิตฺตา นาม โหติ. ‘‘โยคสา ธนียตฺตา’’ติ [Pg.142] ปโยเคน สาเธตพฺพตฺตา. กุสลากุสลานิ หิ วฑฺเฒตุํ วา หาเปตุํ วา ปโยเค กเต วฑฺฒนฺติ เจว หายนฺติ จ. ญาณวิปฺปยุตฺตภูตํ คเหตุํ ยุตฺตํ. กสฺมา, อเหตุกสฺส ภวงฺคสฺสาติ วุตฺตสฺส มูลภวงฺคสฺส อเหตุกตฺตา. ‘‘ทฺวินฺนมฺปิ อเหตุกานํ’’ติ ทุคฺคติ อเหตุกานญฺจ สุคติ อเหตุกานญฺจ. ‘‘อปเรปนา’’ติอาทิ วิภาวนิยํ อาคโต อปเร วาโท. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ ‘อปเรปน ยถา อเหตุกานํ สเหตุก ตทารมฺมณํ โหติ, เอวํ ทฺวิเหตุกานํ ติเหตุก ตทารมฺมณํปี’ติ วณฺเณนฺติ. เตสํมตานุโรเธน จ อิธปิ ญาณสมฺปยุตฺต วิปากปฺปฏิกฺเขโป อเหตุเกเยว สนฺธายาติ วทนฺตีติ. ตํ ปน วิปากุทฺธารกถายํ ‘เอตฺเถว ทฺวาทส กมคฺโคปี’ติ จ, เอตฺเถว ทสกมคฺโคปี’ติ จ อาคเตหิ น สเมติ. ตตฺถ หิ โสฬสสุกุสลวิปาเกสุ ทฺวิเหตุก กมฺมนิพฺพตฺตานํ ทฺวินฺนํ ทฺวิเหตุกาเหตุก ปุคฺคลานํ จตฺตาริ ญาณสมฺปยุตฺต วิปากานิ วชฺเชตฺวา ทฺวาทส กมคฺโค นาม โหติ. ปุน เสเสสุ ทฺวาทส วิปาเกสุปิ อสงฺขาริก กมฺมนิพฺพตฺตานํ ทฺเว ญาณวิปฺปยุตฺต สสงฺขาริก วิปากานิ, สสงฺขาริก กมฺมนิพฺพตฺตานญฺจ ทฺเว ญาณวิปฺปยุตฺต อสงฺขาริก วิปากานิ วชฺเชตฺวา ทุติยตฺเถร วาเท ทสกมคฺโค นาม โหตีติ. เอตฺถ ปน ทฺวิ เหตุโกปิ ปุคฺคโล อธิเกน ฉนฺเทน วา วีริเยน วา จิตฺเตน วา ยุตฺโต ปริยตฺติ ธมฺมํ วา นานาวิชฺชาสิปฺปานิ วา พหุํ คณฺเหยฺย, สุเณยฺย, ธาเรยฺย, วาเจยฺย, จินฺเตยฺย. อถสฺส ญาณสมฺปยุตฺต ชวนํ พหุลํ สมุทา จเรยฺย. ตทา ตสฺส นานากมฺเมน ชวนานุ รูปํ ญาณสมฺปยุตฺต ตทารมฺมณํ น น สมฺภวตีติ วุตฺตํ. ตํ ยุตฺตํ วิย ทิสฺสตีติ. ‘‘อฏฺฐกถายํ ปิหิ. ล. วุตฺตา’’ติ กถํ วุตฺตา. เอตานิ หิ มนุสฺเสสุ จ กามาวจร เทเวสุ จ ปุญฺญวนฺตานํ ทฺวิเหตุกติ เหตุกานํ ปฏิสนฺธิกาเล ปฏิสนฺธิ หุตฺวา วิปจฺจนฺตีติอาทินา วุตฺตาติ. เต ปน ติวิธา, นววิธาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตสํ ตพฺภาโว’’ติ กุสลานํ กุสลภาโว, อกุสลานํ อกุสลภาโว. ‘‘สิกฺขน ธมฺมยุตฺตา’’ติ ตีหิ สิกฺขาหิ ปหาตพฺพานํ กิเลสานํ อตฺถิตาย สิกฺขิตพฺพตา ปกติยํ ฐิตาติ อธิปฺปาโย[Pg.143].‘‘เหฏฺฐิมานญฺจา’’ติ เหฏฺฐิม ผลานญฺจ. ยานิยานิสกานิ ยถาสกํ. ‘‘อุปริมานํ’’ติ อุปริมานํ ปุคฺคลานํ. ‘‘ปรินิฏฺฐิต สิกฺขา กิจฺจตฺตา’’ติ สิกฺขา กิจฺจํ นาม กิเลส ธมฺมานํ ปหานตฺถาย เอว โหตีติ เตสุ สพฺพโส ปหีเนสุ สิกฺขา กิจฺจํ ปรินิฏฺฐิตํ โหติ. เอวํ ปรินิฏฺฐิต สิกฺขา กิจฺจตฺตา. สุฏฺฐุ ภพฺโพติ สมฺภโว. สมฺภโวติ วิเสสน ปทเมตนฺติ อาห ‘‘ยถา สมฺภวํ’’ติ. “Ettha siyā”tiādīsu: "येथे असावे" इत्यादींमध्ये. दुर्गतीमध्ये समाविष्ट असलेल्या अहेतुक (प्राण्यांच्या). “Mūlabhavaṅge”tiādimhi paṭisandhi cittaṃ hutvā āgate mūlabhavaṅge: "मूळभवंगामध्ये" इत्यादींमध्ये प्रतिसंधी चित्त होऊन आलेल्या मूळ भवंगामध्ये. “Yaṃ kiñcī”ti yaṃ kiñci bhavaṅgaṃ: "जे काही" म्हणजे कोणतेही भवंग. “Vuccate”ti visajjanā vuccate: "म्हटले जाते" म्हणजे उत्तर दिले जाते. “Sabba aṭṭhakathāsu paṭikkhitto”ti aṭṭhasāliniyaṃ tāva vipākuddhārakathāyaṃ soḷasasu kāmāvacara kusala vipākesu aṭṭhannaṃ ahetuka vipākānaṃ eva āpāyikesu sattesu uppattiṃ dasseti. Na aṭṭhannaṃ sahetuka vipākānaṃ: "सर्व अट्ठकथांमध्ये नाकारले आहे" म्हणजे अट्ठसालिनीमध्ये तर विपाकोद्धार कथेमध्ये सोळा कामावचर कुशल विपाकांपैकी केवळ आठ अहेतुक विपाकांचेच अपायिक (नरक इत्यादी) प्राण्यांमध्ये उत्पन्न होणे दर्शवले आहे, आठ सहेतुक विपाकांचे नाही. Tathā paṭicca samuppādaṭṭha kathāsu ca viññāṇa padavaṇṇanāsu aññāsu ca abhidhammāvatārādīsūti evaṃ sabbaṭṭhakathāsu paṭikkhittā nāma hoti: तसेच प्रतीत्यसमुत्पाद अट्ठकथांमध्ये, विज्ञान पदाच्या वर्णनांमध्ये आणि इतर अभिधम्मावतार इत्यादींमध्ये अशा प्रकारे सर्व अट्ठकथांमध्ये नाकारले गेले आहे. “Yogasā dhanīyattā”ti payogena sādhetabbattā. Kusalākusalāni hi vaḍḍhetuṃ vā hāpetuṃ vā payoge kate vaḍḍhanti ceva hāyanti ca: "योगाने (प्रयत्नाने) साध्य करण्यायोग्य असल्यामुळे" म्हणजे प्रयोगाने (प्रयत्नाने) साध्य करण्यायोग्य असल्यामुळे. कारण कुशल आणि अकुशल वाढवण्यासाठी किंवा कमी करण्यासाठी प्रयत्न केला असता ते वाढतात आणि कमीही होतात. Ñāṇavippayuttabhūtaṃ gahetuṃ yuttaṃ. Kasmā, ahetukassa bhavaṅgassāti vuttassa mūlabhavaṅgassa ahetukattā: ज्ञानविप्रयुक्त ग्रहण करणे योग्य आहे. का? कारण "अहेतुक भवंगाचे" असे म्हटलेल्या मूळ भवंगाच्या अहेतुकत्वामुळे. “Dvinnampi ahetukānaṃ”ti duggati ahetukānañca sugati ahetukānañca: "दोन्ही अहेतुकांचे" म्हणजे दुर्गती अहेतुकांचे आणि सुगती अहेतुकांचे. “Aparepanā”tiādi vibhāvaniyaṃ āgato apare vādo. Vuttañhi tattha ‘aparepana yathā ahetukānaṃ sahetuka tadārammaṇaṃ hoti, evaṃ dvihetukānaṃ tihetuka tadārammaṇaṃpī’ti vaṇṇenti: "दुसरे तर" इत्यादी विभावनीमध्ये आलेले दुसरे मत आहे. तेथे म्हटले आहे की, 'दुसरे तर, ज्याप्रमाणे अहेतुकांचे सहेतुक तदारंबण होते, त्याचप्रमाणे द्विहेतुकांचे त्रिहेतुक तदारंबण देखील होते' असे वर्णन करतात. Tesaṃmatānurodhena ca idhapi ñāṇasampayutta vipākappaṭikkhepo ahetukeyeva sandhāyāti vadantīti: आणि त्यांच्या मतानुसार येथेही ज्ञानसंप्रयुक्त विपाकाचा निषेध केवळ अहेतुकालाच उद्देशून आहे, असे म्हणतात. Taṃ pana vipākuddhārakathāyaṃ ‘ettheva dvādasa kamaggopī’ti ca, ettheva dasakamaggopī’ti ca āgatehi na sameti: परंतु ते विपाकोद्धार कथेमध्ये 'येथेच बारा कर्मांचे मार्ग देखील' आणि 'येथेच दहा कर्मांचे मार्ग देखील' या आलेल्या विधानांशी जुळत नाही. Tattha hi soḷasasukusalavipākesu dvihetuka kammanibbattānaṃ dvinnaṃ dvihetukāhetuka puggalānaṃ cattāri ñāṇasampayutta vipākāni vajjetvā dvādasa kamaggo nāma hoti: कारण तेथे सोळा कुशल विपाकांमध्ये द्विहेतुक कर्माने उत्पन्न झालेल्या दोन द्विहेतुक आणि अहेतुक पुद्गलांच्या चार ज्ञानसंप्रयुक्त विपाकांना वर्ज्य करून 'बारा कर्मांचा मार्ग' होतो. Puna sesesu dvādasa vipākesupi asaṅkhārika kammanibbattānaṃ dve ñāṇavippayutta sasaṅkhārika vipākāni, sasaṅkhārika kammanibbattānañca dve ñāṇavippayutta asaṅkhārika vipākāni vajjetvā dutiyatthera vāde dasakamaggo nāma hotīti: पुन्हा उर्वरित बारा विपाकांमध्ये देखील असंस्कारिक कर्माने उत्पन्न झालेल्या दोन ज्ञानविप्रयुक्त ससंस्कारिक विपाकांना आणि ससंस्कारिक कर्माने उत्पन्न झालेल्या दोन ज्ञानविप्रयुक्त असंस्कारिक विपाकांना वर्ज्य करून दुसऱ्या थेरांच्या मतात 'दहा कर्मांचा मार्ग' होतो. Ettha pana dvi hetukopi puggalo adhikena chandena vā vīriyena vā cittena vā yutto pariyatti dhammaṃ vā nānāvijjāsippāni vā bahuṃ gaṇheyya, suṇeyya, dhāreyya, vāceyya, cinteyya: येथे द्विहेतुक पुद्गल देखील अधिक छंदाने (इच्छेने), वीर्याने (प्रयत्नाने) किंवा चित्ताने युक्त होऊन परियत्ति धम्माचे किंवा विविध विद्या व शिल्पांचे पुष्कळ ग्रहण करील, ऐकेल, धारण करील, वाचन करील, चिंतन करील. Athassa ñāṇasampayutta javanaṃ bahulaṃ samudā careyya. Tadā tassa nānākammena javanānu rūpaṃ ñāṇasampayutta tadārammaṇaṃ na na sambhavatīti vuttaṃ. Taṃ yuttaṃ viya dissatīti: तेव्हा त्याचे ज्ञानसंप्रयुक्त जवन बहुतांश वेळा कार्यरत होईल. तेव्हा त्याच्या विविध कर्मांमुळे जवनानुसार ज्ञानसंप्रयुक्त तदारंबण संभवत नाही असे नाही (म्हणजे संभवतेच), असे म्हटले आहे. ते योग्यच दिसते. “Aṭṭhakathāyaṃ pihi. La. Vuttā”ti kathaṃ vuttā. Etāni hi manussesu ca kāmāvacara devesu ca puññavantānaṃ dvihetukati hetukānaṃ paṭisandhikāle paṭisandhi hutvā vipaccantītiādinā vuttāti: "अट्ठकथेमध्ये देखील... म्हटले आहे" हे कसे म्हटले आहे? कारण हे (विपाक) मनुष्यांमध्ये आणि कामावचर देवांमध्ये पुण्यवान द्विहेतुक व त्रिहेतुक प्राण्यांच्या प्रतिसंधीच्या वेळी प्रतिसंधी होऊन विपाकात बदलतात इत्यादी प्रकारे म्हटले आहे. Te pana tividhā, navavidhāti sambandho: ते तीन प्रकारचे आणि नऊ प्रकारचे आहेत, असा संबंध आहे. “Tesaṃ tabbhāvo”ti kusalānaṃ kusalabhāvo, akusalānaṃ akusalabhāvo: "त्यांचा तो भाव" म्हणजे कुशलांचा कुशलभाव, अकुशलांचा अकुशलभाव. “Sikkhana dhammayuttā”ti tīhi sikkhāhi pahātabbānaṃ kilesānaṃ atthitāya sikkhitabbatā pakatiyaṃ ṭhitāti adhippāyo: "शिक्षण धर्माने युक्त" म्हणजे तीन शिक्षांद्वारे प्रहाण (नष्ट) करावयाच्या क्लेशांच्या अस्तित्वामुळे शिकण्याची योग्यता स्वभावातच स्थित आहे, असा अभिप्राय आहे. “Heṭṭhimānañcā”ti heṭṭhima phalānañca. Yāniyānisakāni yathāsakaṃ: "खालच्यांचे देखील" म्हणजे खालच्या फलांचे देखील. जे जे आपापले आहे ते ते यथाक्रम. “Uparimānaṃ”ti uparimānaṃ puggalānaṃ: "वरच्यांचे" म्हणजे वरच्या पुद्गलांचे. “Pariniṭṭhita sikkhā kiccattā”ti sikkhā kiccaṃ nāma kilesa dhammānaṃ pahānatthāya eva hotīti tesu sabbaso pahīnesu sikkhā kiccaṃ pariniṭṭhitaṃ hoti. Evaṃ pariniṭṭhita sikkhā kiccattā: "शिक्षाकृत्य पूर्ण झाल्यामुळे" म्हणजे शिक्षाकृत्य हे क्लेशधर्मांच्या प्रहाणासाठीच असते, त्यामुळे ते पूर्णपणे नष्ट झाल्यावर शिक्षाकृत्य पूर्ण होते. अशा प्रकारे शिक्षाकृत्य पूर्ण झाल्यामुळे. Suṭṭhu bhabboti sambhavo. Sambhavoti visesana padametanti āha “yathā sambhavaṃ”ti: अतिशय योग्य असणे म्हणजे संभव. 'संभव' हे विशेषण पद आहे, म्हणून "यथासंभव" असे म्हटले आहे. ๑๔๒. ‘‘เอตฺเถวา’’ติ เอตสฺมึ กามโลเก เอว. ‘‘ตํ ตํ ปสาทรหิตานํ’’ติ เตนเตน ปสาเทน รหิตานํ. ตสฺมึ ตสฺมึ ทฺวาเร อุปฺปนฺนานิ ตํ ตํ ทฺวาริกานิ. จตุสฏฺฐิวีถิ จิตฺตานิ. ทฺเว จตฺตาลีส วีถิ จิตฺตานิ. ‘‘พฺรหฺมโลเก วา’’ติอาทีสุ. อิทํ อฏฺฐกถา วจนํ. ยถาห รูปภเว จตุนฺนํ วิญฺญาณานํ, ตเถว ปจฺจโย. ปวตฺเต, โนปฏิสนฺธิยํ. โสจ โข กามาวจเร อนิฏฺฐ รูปทสฺสน สทฺทสวนวเสน, พฺรหฺมโลเก ปน อนิฏฺฐา รูปาทโย นาม นตฺถิ. ตถา กามาวจร เทวโลเก ปีติ. ตานิ จตฺตาริ จิตฺตานิ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ รูปโลเก. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึ วจเน. ‘‘ตํ ตํ ภูมิ ปริยาปนฺเน’’ติ ติสฺสํ ติสฺสํ ภูมิยํ ปริยาปนฺเน. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. १४२. “Etthevā”ti etasmiṃ kāmaloke eva: "येथेच" म्हणजे याच कामलोकात. “Taṃ taṃ pasādarahitānaṃ”ti tenatena pasādena rahitānaṃ: "त्या त्या प्रसादाने रहित असलेल्यांचे" म्हणजे त्या त्या प्रसादाने (इंद्रियाने) रहित असलेल्यांचे. Tasmiṃ tasmiṃ dvāre uppannāni taṃ taṃ dvārikāni: त्या त्या द्वारात उत्पन्न होणारी ती ती द्वारक (चित्ते). Catusaṭṭhivīthi cittāni. Dve cattālīsa vīthi cittāni: चौसष्ट वीथि चित्ते. बेचाळीस वीथि चित्ते. “Brahmaloke vā”tiādīsu. Idaṃ aṭṭhakathā vacanaṃ: "ब्रह्मलोकात किंवा" इत्यादींमध्ये. हे अट्ठकथेचे वचन आहे. Yathāha rūpabhave catunnaṃ viññāṇānaṃ, tatheva paccayo. Pavatte, nopaṭisandhiyaṃ: जसे म्हटले आहे की, रूपभवात चार विज्ञानांचा तसाच प्रत्यय (हेतू) होतो. प्रवृत्तीत (जीवनकाळात), प्रतिसंधीत नाही. Soca kho kāmāvacare aniṭṭha rūpadassana saddasavanavasena, brahmaloke pana aniṭṭhā rūpādayo nāma natthi. Tathā kāmāvacara devaloke pīti: आणि तो कामलोकात अनिष्ट रूप पाहणे व अनिष्ट शब्द ऐकण्याच्या रूपाने होतो, परंतु ब्रह्मलोकात अनिष्ट रूप इत्यादी नसतातच. तसेच कामावचर देवलोकात देखील (अनिष्ट नसतात). Tāni cattāri cittāni: ती चार चित्ते. “Tatthā”ti tasmiṃ rūpaloke. Vibhāvanipāṭhe: "तेथे" म्हणजे त्या रूपलोकात. विभावनी पाठात. “Idhā”ti imasmiṃ vacane: "येथे" म्हणजे या वचनात. “Taṃ taṃ bhūmi pariyāpanne”ti tissaṃ tissaṃ bhūmiyaṃ pariyāpanne: "त्या त्या भूमीत समाविष्ट" म्हणजे त्या त्या भूमीत समाविष्ट असलेले. Sesamettha suviññeyyaṃ: उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. วีถิสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. वीथिसंग्रहदीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๕. วีถิมุตฺตสงฺคหอนุทีปนา ५. वीथिमुक्तसंग्रह अनुदीपनी ๑๔๓. วีถิมุตฺตสงฺคเห[Pg.144]. ‘‘ปวตฺติสงฺคหํ’’ติ จิตฺตุปฺปาทานํ ปวตฺตาการกถนสงฺคหํ. ‘‘ปฏิสนฺธิยํ’’ติ ปฏิสนฺธิกาเล. ‘‘เตสํ’’ติ จิตฺต เจตสิกานํ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘ตทาสนฺนตายา’’ติ ตายปฏิสนฺธิยา อาสนฺนตาย. ‘‘ตํ คหเณเน วา’’ติ สนฺธิคฺคหเณน เอว สนฺธิวจเนน เอว. ‘‘วิสยปฺปวตฺติ นามา’’ติ กมฺม กมฺมนิมิตฺตาทีนํ วิสยานํ ทฺวาเรสุ อาปาตา คมน วเสน ปวตฺติ นาม. ‘‘มรณุปฺปตฺติยํ เอว สิทฺธา’’ติ มรณุปฺปตฺติยํ ชวเนสุ เอว สิทฺธา. เอเตน มรณุปฺปตฺติ วิธานํ ชวนปฺปธานํ โหติ, น จุติปฺปธานนฺติ ทีเปติ. น หิ ตสฺมึ วิธาเน ตสฺสํ จุติยํ วิสยปฺปวตฺติ วจนํ นาม อตฺถิ. ชวเนสุ เอว อตฺถิ. สา ปน จุติ ตสฺมึ ภเว อาทิมฺหิ ปฏิสนฺธิ ปวตฺติยา สิทฺธาย สิชฺฌติ เยวาติ. ‘‘เตสํ’’ติ วีถิมุตฺตานํ. ‘‘ภวนฺตี’’ติ ปาตุพฺภวนฺติ. ‘‘ตโต’’ติ อยโต. ‘‘คนฺตพฺพา’’ติ ปฏิสนฺธิคฺคหณวเสน อุปปชฺชิตพฺพา. ‘‘คจฺฉนฺตี’’ติ ปวตฺตนฺติ. ‘‘ติโร’’ติ ติริยโต. ‘‘อญฺฉิตา’’ติ คตา ปวตฺตา, อายตา วา. ‘‘สมานชาติตายา’’ติ ติรจฺฉาน คตชาติ วเสน สมานชาติ ภาเวน. ‘‘ยุวนฺตี’’ติ มิสฺสี ภวนฺติ. ‘‘สุขสมุสฺสยโต’’ติ สุขสมุทายโต. ‘‘ทิพฺพนฺตี’’ติ วิชฺโชตนฺติ. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ อิติ วจนตฺถํ กตฺวา อุปริเทวา สุราติ วุจฺจนฺตีติ โยชนา. ‘‘เวปจิตฺติปหาราทาทโย’’ติ เวปจิตฺติ อสุรินฺท ปหาราทอสุรินฺทาทิเก เทวาสุเร. ‘‘สุรปฺปฏิ ปกฺขา’’ติ ตาวตึสาเทวปฺปฏิปกฺขา. ‘‘สุรสทิสา’’ติ ตาวตึสาเทว สทิสา. ‘‘เวมานิกเปเต’’ติ เวมานิก นามเก เปเต. ‘‘วินิปาติเก’’ติ วินิปาติก นามเก ทุคฺคต เทวชาติเก. เตสํ ปวตฺติ อุปริ ‘วินิปาติกาสุรานญฺจา’ติ ปเท อาวิ ภวิสฺสติ. ‘‘เตปี’’ติ โลกนฺตริก เนรยิก สตฺตาปิ. ‘‘กาลกญฺจิกเปเต’’ติ กาลกญฺจิก นามเก เปเต. เอวํ กถาวตฺถุ ปาฬิยํ อาคตา เวสฺสภุ อาทโย ยมราชาโนปนาติ สมฺพนฺโธ. เวสฺสภู [Pg.145] จ โนตฺติ จ โสโม จ ยโม จ เวสฺสวโณ จ อิติ อิเม เปตฺติ ราชาโน. ‘‘รชฺช’’นฺติ ราชภาวํ ราชกิจฺจํ. เย จ ยกฺขรกฺขสา นาม กโรนฺตา วิจรนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กุรูรกมฺมการิโน’’ติ ลุทฺทกมฺมการิโน. ‘‘เรวติ วิมาเน’’ติ เรวติ วิมาน วตฺถุมฺหิ. ‘‘อิโต’’ติ มนุสฺส โลกโต, สุคติภวโต วา. เตหิ ยกฺข รกฺขสา นาม ภูมฏฺฐกาปิ สนฺติ, อากาสฏฺฐกาปิ. ‘‘นานากมฺมการณาโย’’ติ ทฺวตฺตึส วิธานิ กมฺมกรณ กิจฺจานิ. เตสมฺปิ นิรยปาลานนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ติสฺสนฺนํ’’ติ ติสฺสนฺนํ อปายภูมีนํ. อปายภูมิ. १४३. वीथिमुत्तसंग्रहात. ‘पवत्तिसंग्रह’ म्हणजे चित्तोत्पादांच्या प्रवृत्तीच्या प्रकारांचे कथन करणारा संग्रह. ‘पटिसंधियं’ म्हणजे प्रतिसंधीच्या वेळी. ‘तेसं’ म्हणजे चित्त आणि चेतसिकांचे. विभावनी पाठात. ‘तदासन्नतया’ म्हणजे त्या प्रतिसंधीच्या निकटतेमुळे. ‘तं गहणेन वा’ म्हणजे संधीच्या ग्रहणानेच किंवा संधीच्या वचनानेच. ‘विसयप्पवत्ति नामा’ (विषयप्रवृत्ती) म्हणजे कर्म, कर्मनिमित्त इत्यादी विषयांचे द्वारांमध्ये समोर येण्याच्या प्रक्रियेने होणारी प्रवृत्ती होय. ‘मरणुप्पत्तियं एव सिद्धा’ म्हणजे मरणाच्या उत्पत्तीमध्ये जवनांमध्येच सिद्ध होते. याद्वारे हे दर्शविले जाते की, मरणोत्पत्तीचे विधान हे जवनप्रधान असते, च्युतिप्रधान नाही. कारण त्या विधानात त्या च्युतीमध्ये विषयप्रवृत्तीचे वचन नसते, तर ते केवळ जवनांमध्येच असते. आणि ती च्युती तर त्या भवाच्या सुरुवातीला प्रतिसंधीच्या प्रवृत्तीने सिद्ध झाल्यावरच सिद्ध होते. ‘तेसं’ म्हणजे वीथिमुत्तांचे (वीथिमुक्त चित्तांचे). ‘भवन्ति’ म्हणजे प्रादुर्भूत होतात. ‘ततो’ म्हणजे त्या मार्गाने. ‘गन्तब्बा’ म्हणजे प्रतिसंधी ग्रहणाच्या वशाने उत्पन्न होण्यायोग्य. ‘गच्छन्ति’ म्हणजे प्रवृत्त होतात. ‘तिरो’ म्हणजे तिरपे. ‘अञ्चिता’ म्हणजे गेलेले, प्रवृत्त झालेले किंवा पसरलेले. ‘समानजातितया’ म्हणजे तिर्यकयोनीच्या जातीच्या वशाने समान जातीच्या भावाने. ‘युवन्ति’ म्हणजे मिश्रित होतात. ‘सुखसमुस्सयतो’ म्हणजे सुखाच्या समुदायापासून. ‘दिब्बन्ति’ म्हणजे प्रकाशतात. ‘इति कत्वा’ म्हणजे असा वचनाचा अर्थ करून, वरील देवांना ‘सुर’ म्हटले जाते, अशी योजना आहे. ‘वेपचित्तिपहारादादयो’ म्हणजे वेपचित्ती असुरेंद्र, पहाराद असुरेंद्र इत्यादी देव आणि असुर. ‘सुरप्पटिपक्खा’ म्हणजे तावतिंस देवांचे प्रतिपक्षी. ‘सुरसदिसा’ म्हणजे तावतिंस देवांसारखे. ‘वेमानिकपेते’ म्हणजे वैमानिक नावाचे प्रेत. ‘विनिपातिके’ म्हणजे विनिपातिक नावाचे दुर्गत देवजातीचे जीव. त्यांची प्रवृत्ती पुढे ‘विनिपातिकासुरानञ्च’ या पदात स्पष्ट होईल. ‘तेपि’ म्हणजे लोकांतरिक नरकातील प्राणीसुद्धा. ‘कालकञ्चिकपेते’ म्हणजे कालकंजिक नावाचे प्रेत. अशा प्रकारे कथावस्तू पाळीमध्ये आलेले वेस्सभू इत्यादी यमराजे देखील, असा संबंध आहे. वेस्सभू, नोत्ती, सोमो, यमो आणि वेस्सवणो हे प्रेतराज आहेत. ‘रज्जं’ म्हणजे राजभाव किंवा राजकृत्य. आणि जे यक्ष व राक्षस म्हणून कार्य करत फिरतात, असा संबंध आहे. ‘कुरूरकम्मकारिनो’ म्हणजे क्रूर कर्म करणारे. ‘रेवति विमाने’ म्हणजे रेवती विमान वस्तूत. ‘इतो’ म्हणजे या मनुष्यलोकातून किंवा सुगती भवातून. त्यांच्यामध्ये यक्ष आणि राक्षस नावाचे भूमीवर राहणारे (भूमष्ठक) देखील आहेत आणि आकाशात राहणारे (आकाशष्ठक) देखील आहेत. ‘नानाकम्मकारणायो’ म्हणजे बत्तीस प्रकारच्या शिक्षा देण्याची कृत्ये. त्यांचा देखील नरकपालांशी संबंध आहे. ‘तिसन्नं’ म्हणजे तीन अपायभूमींचे. अपायभूमी. อุสฺสิโต มโน เอเตสนฺติ วา, อุสฺสนฺโน มโน เอเตสนฺติ วา, ทฺวิธาวิคฺคโห. ‘‘อุสฺสิโต’’ติ อุคฺคโต. ‘‘อุสฺสนฺโน’’ติ วิปุโล. กสฺมา ติกฺขตร จิตฺตา โหนฺตีติ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘ปริปุณฺณานํ’’ติอาทึ. ปุพฺพวากฺเย อนนฺต จกฺกวาฬสาธารณ วเสน วุตฺตตฺตา ปุน ‘‘อิมสฺมึ’’ติอาทิ วุตฺตํ. วตฺตพฺพํ นตฺถิ. อิเธว สพฺพญฺญุ พุทฺธาทีนํ อุปฺปนฺนโตติ อธิปฺปาโย. ‘‘อธิคฺคณฺหนฺตี’’ติ อธิกํ กตฺวา คณฺหนฺติ. ‘‘สูรา’’ติ ปาปกลฺยาณ กมฺเมสุ สูรจิตฺตา. ‘‘สติมนฺโต’’ติ วิปุลสฺสติกา. ‘‘อิธ พฺรหฺมจริยวาโส’’ติ อิเธว สิกฺขตฺตยปูรณ สงฺขาตสฺส พฺรหฺมจริยวาสสฺส อตฺถิตา. ‘‘มริยาทธมฺเมสู’’ติ โลกจาริตฺต ธมฺเมสุ. ‘‘ธตรฏฺโฐ’’ติ ธตรฏฺโฐ มหาราชา. เอวํ วิรุฬฺหโกติอาทีสุ. ‘‘คนฺธรุกฺขาธิ วตฺถา’’ติ คนฺธรุกฺเขสุ อชฺฌาวุตฺถา. ‘‘กุมฺภณฺฑา’’ติ กุวุจฺจติ ปถวี. ปถวิ คตานิ รตนภณฺฑานิ เยสํ เตติ วิคฺคโห. ‘‘ทานวรกฺขสา’’ติ ทนุนามเทวธีตาย อปจฺจนฺติ อตฺเถน ทานว นามกา รกฺขสา. อวรุชฺฌนฺติ อนฺตรายํ กโรนฺตีติ อวรุทฺธกา. ‘‘วิคจฺฉรูโป’’ติ วิปนฺนวณฺโณ. ‘‘นิหีนกมฺมกตา’’ติ นิหีนานิปาปกมฺมานิ กตฺวา อาคตา. กาจิคนฺธปฺปิโย ชายนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ยาคนฺธปฺปิโย โชคินีติ จ วุจฺจนฺติ, ชุณฺหาติ จ วุจฺจนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อภิลกฺขิตรตฺตีสู’’ติ อภิญฺญาตรตฺตีสุ. อุโปสถรตฺตีสูติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘โคจรปฺปสุตกาเล’’ติ โคจรตฺถาย วิจริตกาเล. ‘‘ชุติอตฺเถนา’’ติ วิชฺโชตนฏฺเฐน. วสูนิ [Pg.146] ธนานิ ธาเรนฺตีติ วสุนฺธรา. วสุนฺธรา จ เต เทว ยกฺขา จาติ วิคฺคโห. ‘‘นาคาตฺเวว วุจฺจนฺตี’’ติ ปาฬิยํ นาเคสุ สงฺคยฺหนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ยา’’ติ ยา ภุมฺมเทวยกฺข ชาติโย. ‘‘ยาสํ’’ติ ยาสํ ภุมฺมเทว ยกฺขชาตีนํ. ‘‘กีฬาปสุตวเสนา’’ติ โพธิสตฺตานญฺจ พุทฺธานญฺจ อจฺฉริย ธมฺมชาตกาเล อุคฺโฆสน กีฬากมฺมวฑฺฒนวเสน. ‘‘ยาสญฺจ มนฺตปทานี’’ติ ยาสํ นิคฺคห ปคฺคหปูชนาทิ วเสน ปวตฺตานิ มนฺตปทานิ. ‘‘เตสู’’ติ + เตสุ จตูสุ อวรุทฺธเกสุ. ‘‘กีฬาโสณฺฑวเสนา’’ติ กีฬาธุตฺตวเสน. ‘‘ฆาสโสณฺฑวเสนา’’ติ ขาทนภุญฺชน ธุตฺตวเสน. โสโณ วุจฺจติ สุนโข. ‘‘สตฺเต’’ เนรยิเก วา เปเตวา. ‘‘กามญฺจ โหตี’’ติ กิญฺจาปิ โหตีติ อตฺโถ. ‘‘นิพนฺธโนกาโส’’ติ นิจฺจสมฺพนฺธโนกาโส. ‘‘สมุทาคเตสู’’ติ ปรมฺปรโต อาคเตสุ. ‘‘เทวราชฏฺฐาเนสู’’ติ อิมสฺมึ จกฺกวาเฬ ตาวตึสาภวเน เทวราชฏฺฐาเนสูติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปาฬิยํ เอวา’’ติ ทีฆนิกาเย ชนวสภสุตฺตปาฬิยํ เอว. ยจฺฉนฺติ นิยจฺฉนฺติ เอตฺถาติ ยาโม. ‘‘นิยจฺฉนฺตี’’ติ อญฺญมญฺญํ อิสฺสามจฺฉริย มูลเกหิ กลหภณฺฑนาทีหิ วิคจฺฉนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘ตํ สหจริตตฺตา’’ติ เตน ยาม นามเกน อิสฺสรเทวกุเลน นิจฺจกาลํ สห ปวตฺตตฺตา. ‘‘วสํ วตฺเตนฺตี’’ติ อิจฺฉํ ปูเรนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘उस्सितो मनो एतेसं’ किंवा ‘उस्सन्नो मनो एतेसं’ असा दोन प्रकारचा विग्रह आहे. ‘उस्सितो’ म्हणजे उन्नत (वर गेलेला). ‘उस्सन्नो’ म्हणजे विपुल. ते अधिक तीक्ष्ण चित्त असणारे का असतात? हे सांगण्यासाठी ‘परिपुण्णानं’ इत्यादी म्हटले आहे. पूर्व वाक्यात अनंत चक्रवाळांच्या साधारणतेच्या वशाने म्हटल्यामुळे पुन्हा ‘इमस्मिं’ इत्यादी म्हटले आहे. यात काही सांगण्यासारखे नाही. येथेच सर्वज्ञ बुद्ध इत्यादींचा प्रादुर्भाव होतो, असा अभिप्राय आहे. ‘अधिग्गण्हन्ति’ म्हणजे अधिक करून ग्रहण करतात (श्रेष्ठ ठरतात). ‘सूरा’ म्हणजे पाप आणि कल्याणकारी कर्मांमध्ये शूर चित्त असणारे. ‘सतिमन्तो’ म्हणजे विपुल स्मृती असणारे. ‘इध ब्रह्मचरियवासो’ म्हणजे येथेच त्रिशिक्षा पूर्ण करणाऱ्या ब्रह्मचर्यवासाचे अस्तित्व असणे होय. ‘मरियादधम्मेसु’ म्हणजे लोकचारित्र्य धर्मांमध्ये. ‘धतरट्ठो’ म्हणजे धृतराष्ट्र महाराज. याचप्रमाणे विरूढक इत्यादींच्या बाबतीत समजावे. ‘गन्धरुक्खाधिवत्था’ म्हणजे गंधवृक्षांवर राहणारे. ‘कुम्भाण्डा’ म्हणजे ‘कु’ म्हणजे पृथ्वी म्हटले जाते. पृथ्वीवरील रत्नभांडार ज्यांच्याकडे आहे, असा विग्रह आहे. ‘दानवरक्खसा’ म्हणजे दनू नावाच्या देवकन्येचे अपत्य या अर्थाने दानव नावाचे राक्षस. जे अडथळा आणतात ते ‘अवरुद्धक’. ‘विगच्छरूपो’ म्हणजे विवर्ण झालेला. ‘निहीणकम्मकता’ म्हणजे हीन आणि पापकर्मे करून आलेले. काही गंधप्रिय उत्पन्न होतात, असा संबंध आहे. ज्या गंधप्रिय आहेत त्यांना ‘जोगिनी’ (योगिनी) देखील म्हटले जाते आणि ‘जुण्हा’ (ज्योत्स्ना) देखील म्हटले जाते, असा संबंध आहे. ‘अभिलक्खितरत्तीसु’ म्हणजे प्रसिद्ध रात्रींमध्ये. याचा अर्थ उपोसथ रात्रींमध्ये असा आहे. ‘गोचरप्पसुतकाले’ म्हणजे गोचरासाठी फिरण्याच्या वेळी. ‘जुतिअत्थेन’ म्हणजे प्रकाशाच्या अर्थाने. जे वसू म्हणजे धन धारण करतात ती ‘वसुंधरा’. वसुंधरा आणि ते देव व यक्ष, असा विग्रह आहे. ‘नागात्वेव वुच्चन्ति’ म्हणजे पाळीमध्ये नागांमध्येच त्यांचा संग्रह केला जातो, असा अभिप्राय आहे. ‘या’ म्हणजे ज्या भूम्यदेव आणि यक्ष जाती आहेत. ‘यासं’ म्हणजे ज्या भूम्यदेव आणि यक्ष जातींचे. ‘कीळापसुतवसेन’ म्हणजे बोधिसत्वांच्या आणि बुद्धांच्या आश्चर्यकारक धर्मांच्या उत्पत्तीच्या वेळी घोषणा करणे आणि क्रीडाकर्म वाढवण्याच्या वशाने. ‘यासञ्च मन्तपदानि’ म्हणजे ज्यांच्या निग्रह, प्रग्रह आणि पूजनादींच्या वशाने प्रवृत्त झालेले मंत्रपदे आहेत. ‘तेसु’ म्हणजे त्या चार अवरुद्धकांमध्ये. ‘कीळासोण्डवसेन’ म्हणजे क्रीडाधूर्ततेच्या वशाने. ‘घाससोण्डवसेन’ म्हणजे खाण्यापिण्याच्या धूर्ततेच्या वशाने. ‘सोण’ म्हणजे कुत्रा म्हटले जाते. ‘सत्ते’ म्हणजे नारकीय किंवा प्रेत प्राण्यांना. ‘कामञ्च होति’ म्हणजे काहीही असो, असा अर्थ आहे. ‘निबन्धनोकासो’ म्हणजे नित्य संबंधाचा अवकाश. ‘समुदागतेसु’ म्हणजे परंपरेने आलेल्यांमध्ये. ‘देवराजट्ठानेसु’ म्हणजे या चक्रवाळातील तावतिंस भवनातील देवराजांच्या स्थानांमध्ये, असा अभिप्राय आहे. ‘पाळियं एव’ म्हणजे दीघनिकायच्या जनवसभसुत्त पाळीमध्येच. जेथे नियंत्रण करतात किंवा नियमन करतात तो ‘यामो’. ‘नियच्छन्ति’ म्हणजे परस्परांच्या ईर्ष्या आणि मत्सरामुळे होणाऱ्या कलह-भांडणादींपासून दूर राहतात, असा अर्थ आहे. ‘तं sahacaritattā’ म्हणजे त्या याम नावाच्या ऐश्वर्यशाली देवकुळासोबत नेहमी एकत्र प्रवृत्त राहिल्यामुळे. ‘वसं वत्तेन्ति’ म्हणजे इच्छा पूर्ण करतात, असे म्हटले आहे. ‘‘ปุเร’’ติ สมฺมุขฏฺฐาเน. ตํ ปน ฐานํ อุจฺจฏฺฐานํ นาม โหตีติ อาห ‘‘อุจฺเจฐาเน’’ติ. ‘‘สหสฺโส พฺรหฺมา’’ติอาทีสุ อตฺตโน สรีโรภาเสน สหสฺสํ จกฺกวาฬ โลกํ ผรนฺโต สหสฺโสนามาติ อฏฺฐกถายํ อธิปฺเปตํ. กุลเทวตาโย นาม กุล ปรมฺปร ปูชิต เทวตาโย นาม. ‘‘อุปฏฺฐหนฺตี’’ติ ยุตฺตฏฺฐาเน เทววตฺถุ เทวมาลกานิ กตฺวา สมเย สมเย ตตฺถ คนฺตฺวา คนฺธมาลาทีหิ ปูเชนฺติ, วนฺทนฺติ, โถเมนฺติ, วรํ ปตฺเถนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘อุปฏฺฐกา เอวสมฺปชฺชนฺตี’’ติ อุปฏฺฐกมตฺตาวโหนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘กสฺสจี’’ติ กสฺสจิ เหฏฺฐิมสฺส. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตาสุ พฺรหฺมภูมีสุ. ปุน ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ ทุตียตเล. ‘‘อาภา’’ติ สรีราภา. นิจฺฉรนฺติ องฺคปจฺจงฺเคหิ นิคฺคจฺฉนฺติ. ‘‘อจล สณฺฐิตา’’ติ ทุตีย ตเล [Pg.147] วิย จลิตา น โหติ. อถ โข อจล สณฺฐิตา. ‘‘เตสํ’’ติ เตสํวาทีนํ ปาเฐ. พฺรหฺมปาริสชฺชาติอาทิกํ นามํ นสิทฺธํติ โยชนา. ‘‘อิญฺชนชาติเกหี’’ติ จลนชาติเกหิ. ‘‘เหฏฺฐิมตลานํ อิญฺชิตํ ปุญฺญปฺผลํ อตฺถีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อาเนญฺช ชาติเกนา’’ติ อจลนชาติเกน อุเปกฺขาฌาเนน นิพฺพตฺตานํ จตุตฺถตลานํ. ‘‘เกนจิ อนฺตราเยนา’’ติ เตโชสํวฏฺฏาทิเกน อนฺตราเยน. ‘‘เอตฺถปี’’ติ เอตสฺมึ จตุตฺถตเลปิ. ‘‘อายุ เวมตฺตตายา’’ติ อายุปฺปมาณนานตฺตสฺส. ‘‘โอฬาริกานํ’’ติ อิทํ ปกติยา โอฬาริก สภาวตาย วุตฺตํ. น สุขุมานํ อตฺถิตาย. นตฺถิ วิหญฺญนํ เอเตสนฺติ อวิหา. กึ วิหญฺญนํ นามาติ อาห ‘‘สมถวิปสฺสนา กมฺเมสุ อวิปฺผาริกตา ปตฺตี’’ติ. จิตฺตสฺส อวิปฺผารตา ปชฺชนํ นาม นตฺถีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปสาท ทิพฺพ ธมฺม ปญฺญา จกฺขูหี’’ติ ‘ปสาท จกฺขุ, ทิพฺพจกฺขุ, ธมฺมจกฺขุ, ปญฺญา จกฺขู, หิ. ตตฺถ ปสาทจกฺขุ เอว อิธ ทิพฺพจกฺขูติปิ วุจฺจติ. ‘‘ธมฺม จกฺขู’’ติ เหฏฺฐิมมคฺคญฺญาณํ. ‘‘ปญฺญา จกฺขู’’ติ วิปสฺสนา ญาณปจฺจเวกฺขนาญาเณหิ สทฺธึ อวเสสํ สพฺพญฺญาณํ. ‘‘รูปีนํ สตฺตานํ’’ติ รูปกายวนฺตานํ สตฺตานํ. ‘‘กนิฏฺฐภาโว’’ติ อปฺปตรภาโว. ‘‘อนาคามิมคฺคฏฺฐสฺสปิ ปฏิกฺเขโป’’ติ สกทาคามิภาเวฐตฺวา ภาเวนฺตสฺเสว อนาคามิมคฺโค อุปฺปชฺชติ. โน อญฺญถาติ อาห ‘‘สกทาคามีนํ ปฏิกฺเขเปนา’’ติอาทึ. “पुरे” म्हणजे समोरच्या स्थानावर. आणि ते स्थान उच्च स्थान असते, म्हणून “उच्चेठाने” (उच्च स्थानावर) असे म्हटले आहे. “सहस्सो ब्रह्मा” इत्यादींमध्ये आपल्या शरीराच्या प्रकाशाने हजार चक्रवाळ लोकांमध्ये पसरणारा ‘सहस्स’ नावाचा (ब्रह्मा) असा अट्ठकथेत अभिप्राय आहे. ‘कुलदेवता’ म्हणजे कुलपरंपरेने पूजलेल्या देवता होत. “उपट्ठहन्ति” (उपस्थान करतात/सेवा करतात) म्हणजे योग्य ठिकाणी देवस्थान किंवा देवमाळके बनवून वेळोवेळी तिथे जाऊन गंध, पुष्प इत्यादींनी पूजा करतात, वंदन करतात, स्तुती करतात आणि वर मागतात, असा अर्थ आहे. “उपट्ठका एव संपज्जन्ति” म्हणजे केवळ सेवकच बनतात, असा अभिप्राय आहे. “कस्सचि” म्हणजे कोणत्याही खालच्या (स्तरावरील). “तत्थ” म्हणजे त्या ब्रह्मभूमींमध्ये. पुन्हा “तत्थ” म्हणजे त्या दुसऱ्या स्तरावर. “आभा” म्हणजे शरीराची प्रभा (प्रकाश). ‘निच्चरन्ति’ म्हणजे अंग-प्रत्यंगांतून बाहेर पडतात. “अचल सण्ठिता” म्हणजे दुसऱ्या स्तराप्रमाणे चंचल (चलित) नसलेली, तर अचलपणे स्थित असलेली. “तेसं” म्हणजे त्यांच्या पाठात. ‘ब्रह्मपारिसज्ज’ इत्यादी नाव सिद्ध होत नाही, अशी योजना आहे. “इञ्जनजातिकेहि” म्हणजे चंचल स्वभावाच्या (कंपनशील). खालच्या स्तरांचे चंचलपण हे पुण्याचे फळ आहे, असा संबंध आहे. “आनेञ्ज जातिकेन” म्हणजे अचल स्वभावाच्या उपेक्षा-ध्यानाने उत्पन्न झालेल्या चौथ्या स्तरावरील (ब्रह्मलोकांचे). “केनचि अन्तरायेen” म्हणजे तेजो-संवर्त (अग्नीने होणारा विनाश) इत्यादी अंतरायाने (विघ्नाने). “एत्थपि” म्हणजे या चौथ्या स्तरावरही. “आयु वेमत्तताय” म्हणजे आयुष्याच्या प्रमाणातील भिन्नतेमुळे. “ओळारिकानं” (स्थुलांचे) हे प्रकृतीने स्थूल स्वभावाचे असल्यामुळे म्हटले आहे, सूक्ष्मांच्या अस्तित्वामुळे नाही. ज्यांना कोणताही त्रास (विघात/क्लेश) होत नाही, ते ‘अविहा’ होत. त्रास (विहञ्जन) म्हणजे काय? तर “समथ आणि विपश्यना कर्मांमध्ये अकार्यक्षमता (अविस्फारिकता) प्राप्त होणे” असे म्हटले आहे. चित्ताची अकार्यक्षमता (अविस्फारता) उत्पन्न न होणे, असे म्हटले आहे. “प्रसाद-दिव्य-धम्म-पञ्ञा-चक्खूहि” म्हणजे प्रसादचक्षू, दिव्यचक्षू, धम्मचक्षू आणि प्रज्ञाचक्षू यांच्याद्वारे. तिथे प्रसादचक्षूलाच येथे ‘दिव्यचक्षू’ असेही म्हटले आहे. “धम्मचक्खू” म्हणजे खालच्या (पूर्व) मार्गांचे ज्ञान. “पञ्ञाचक्खू” म्हणजे विपश्यना ज्ञान आणि प्रत्यवेक्षण ज्ञानासह उर्वरित सर्व ज्ञान. “रूपीनं सत्तानं” म्हणजे रूपकाय (भौतिक शरीर) असलेल्या प्राण्यांचे. “कनिट्ठभावो” म्हणजे कनिष्ठ भाव (लहान किंवा कमी असणे). “अनागामिमग्गट्ठस्सपि पटिक्खेपो” (अनागामी मार्गस्थाचाही निषेध) म्हणजे सकदागामी अवस्थेत राहून भावना करणाऱ्यालाच अनागामी मार्ग उत्पन्न होतो, इतर प्रकारे नाही; म्हणून “सकदागामींच्या निषेधाने” इत्यादी म्हटले आहे. ภูมิจตุกฺกํ นิฏฺฐิตํ. भूमी-चतुष्क समाप्त झाले. ๑๔๔. ภวนฺตเร โอกฺกมนฺติ เอตายาติ โอกฺกนฺตีติ ปิยุชฺชติ. ‘‘โสตรหิโต’’ติ ปสาทโสตรหิโต. เอวํ เสเสสุปิ. ‘‘อาสิตฺตกาทิภาเวนา’’ติ อาสิตฺตกปณฺฑกาทิ ภาเวน. ‘‘ทฺวีหิ พฺยญฺชเนหี’’ติ ทฺวีหิ นิมิตฺเตหิ. ‘‘วิพจฺฉวจโน’’ติ วิปนฺนวจโน. ‘‘วตฺถุ วิปนฺนสฺสา’’ติ เอตฺถ ‘‘วตฺถู’’ติ สมฺภาร จกฺขุ วุจฺจติ. ตสฺส อาทิโต ปฏฺฐาย วิปนฺนตฺตา เตน สมนฺนาคโต ปุคฺคโล วตฺถุวิปนฺโนติ วุจฺจติ. ‘‘ตสฺส ตสฺสา’’ติ จกฺขุโส ตาทิกสฺส[Pg.148].‘‘ปสูติยํ เยวา’’ติ วิชายมานกาเลเยว. ‘‘ปญฺญาเวยฺยตฺติยภาวสฺสา’’ติ เอตฺถ พฺยตฺตสฺส ภาโว เวยฺยตฺติยํ. ‘‘พฺยตฺตสฺสา’’ติ ผรณญฺญาณสฺส ปุคฺคลสฺส. ปญฺญา สงฺขาตํ เวยฺยตฺติยํ อสฺสาติ วิคฺคโห. ทฺวิเหตุก ติเหตุกานํปิ น สกฺกา นิยเมตุนฺติ สมฺพนฺโธ. กถํ น สกฺกาติ อาห ‘‘มาตุกุจฺฉิมฺหิ วิปตฺติ นาม นตฺถี’’ติ. กตเมสํ วิปตฺตีติ. อุปฺปนฺนานมฺปิ จกฺขุ โสตานํ วิปตฺติ. เกนการเณน วิปตฺตีติ. ปรูปกฺกเมนวา มาตุยา วิสม ปโยเคน วา นานาพาเธน วา วิปตฺตีติ โยชนา. ธาตุปาเฐ ยกฺข ปูชายํติ ปฐิตตฺตา ‘‘ปูชนียฏฺเฐนา’’ติ วุตฺตํ. เอเตน ยกฺขิตพฺพา ปูชิตพฺพา ยกฺขาติ ทสฺเสติ. เย ปน กิจฺฉชีวิกปตฺตา วิจรนฺติ, เต ภูมสฺสิตา นาม โหนฺตีติ โยชนา. ‘‘ภูมิสฺสิตา’’ติ ปาเฐ ภูมิยํ สิตา นิสฺสิตาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปุญฺญนิพฺพตฺตสฺสา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘วิรูปา หุตฺวา’’ติ เต วณฺณโตปิ ทุพฺพณฺณา โหนฺติ. สณฺฐานโตปิ ทุสฺสณฺฐานา. ชีวิกโตปิ กิจฺฉชีวิกาติอาทินา วิปนฺนรูปา หุตฺวา. ‘วิวสา หุตฺวา นิปตนฺตี’ติ วินิปาติกาติปิ วทนฺติ. วิวสาติ จ อตฺตโน วเสน อิจฺฉาย วินาติ อตฺโถ. ‘‘วิวิตฺตฏฺฐาเนสู’’ติ ชนวิวิตฺเตสุ ฐาเนสุ. ปริเยสิตฺวา วา ชีวิตํ กปฺเปนฺติ. ปีเฬตฺวา วา ชีวิตํ กปฺเปนฺติ. ตาเสตฺวา ปีเฬตฺวา วา ชีวิตํ กปฺเปนฺตีติ โยชนา. ‘‘เวมานิกเปตาปี’’ติ อตฺตโน ปุญฺญนิพฺพตฺตํ ทิพฺพวิมานํ เยสํ อตฺถิ, เต เวมานิกา. เต ปน ปุญฺญาปุญฺญมิสฺสก กมฺเมน นิพฺพตฺตตฺตา เกจิ ทิวา ทิพฺพสุขํ อนุภวนฺติ, รตฺตึ เปตทุกฺขํ. เกจิ รตฺตึ ทิพฺพสุขํ อนุภวนฺติ, ทิวา เปตทุกฺขนฺติ. ปเรหิ ทตฺตํ ทินฺนํ ปุญฺญปฺผลํ อุปนิสฺสาย ชีวนฺตีติ ปรทตฺตูปชีวิโน. ‘‘ปเรหิ ทินฺนํ ปุญฺญปฺผลํ’’ติ ญาตเกหิ ปุญฺญํ กตฺวา อิทํ เม ปุญฺญํ เปตานํ กาลงฺกตานํ ญาตีนํ เทธีติ เอวํ ทินฺนํ ปุญฺญปฺผลํ. ‘‘สกลจกฺกวาฬปริยาปนฺนา เอกภูมกา’’ติ ยถา ตาวตึสาภูมิ นาม สพฺพ จกฺกวาเฬสุปิ อตฺถิ. สพฺพาปิ ทิพฺเพน วสฺสสหสฺเสน เอกอายุ ปริจฺเฉโท โหติ. อิมสฺมึ จกฺกวาเฬ วตฺตพฺพํ นตฺถิ. น ตถา นิรเยสุ วา ติรจฺฉาน โยนิยํ วา เปตฺติวิสเยวา อสุรกาเยวา มนุสฺเสสุวา ภุมฺมเทเวสุ วา [Pg.149] เอกปริจฺเฉโท นาม อตฺถิ. จตุนฺนํ อปายานํ อายุปฺปมาณ คณนาย นิยโม นตฺถีติ วุตฺตํ, น นุ พฺรหฺม สํยุตฺเต โกกาลิกํ ภิกฺขุํ อารพฺภ ภควตา วุตฺโต ทสนฺนํ นิรยานํ วิสุํ วิสุํ อตฺถีติ. สจฺจํ อตฺถิ. เต ปน ทสนิรยา อวีจินิรเย ปริยาปนฺนา หุตฺวา ตสฺส ปเทสมตฺตา โหนฺติ. น เตหิ ปเท สมตฺเตหิ สกโล อวีจินิรโย นิยตายุ ปริมาโณติ สกฺกา วตฺตุํ. อปิ จ โสปิ เตสํ อายุปริจฺเฉโท อวีจิภูมิยา นิยาเมน สิทฺโธ น โหติ. เตน เตน กมฺมวิเสเสเนว สิทฺโธ. ตสฺมา ยํ วุตฺตํ ‘‘ตตฺถ เยภูยฺเยน กมฺมปฺปมาณตฺตา’’ติ, ตํ สุ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘ตตฺถ นิรเยสู’’ติอาทึ. ‘‘เอวํ สนฺเต’’ติ น อิตร ทีปวาสีนํ อายุกปฺปสฺส อาโรหณญฺจ โอโรหณญฺจ อตฺถีติ วุตฺเต สตีติ อตฺโถ. สมาจาโร นาม ทสสุจริตานิ. วิสมาจาโร นาม ทสทุจฺจริตานิ. เตสํ นิสฺสนฺทภูตา สมฺปตฺติวิปตฺติโยติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตสํ ปี’’ติ อิตร ทีปวาสีนํปิ. โส เอวปริจฺเฉโทติ อาปชฺชติ. น จ สกฺกา ตถา ภวิตุํ. อาทิกปฺปกาเล สพฺเพสมฺปิ จตุทีป วาสีนํ อสงฺขฺเยยฺยายุกตา สมฺภวโตติ. อถ อิตรทีปวาสีนมฺปิ อายุกปฺปสฺส อาโรหณํ โอโรหณญฺจ อตฺถิ. เอวํ สติ, เอตรหิปิ เตสํ อายุกปฺโป ชมฺพุทีปวาสีนํ อายุกปฺเปน เอกคติโก สิยาติ โจทนา. นิสฺสนฺทมตฺตตฺตาติอาทิ ปริหาโร. นตฺถิ อิทํ มม อิทํ มมาติ ปวตฺตา ปาฏิปุคฺคลิกตณฺหา เอเตสนฺติ ‘‘อมมา’’. ‘‘อปริคฺคหา’’ติ ปุตฺตทาราทิปริคฺคหรหิตา. ‘‘อุปริเม จาตุมหาราชิเก’’ติ อากาสฏฺฐกจาตุมหาราชิเก. ทิเว เทวโลเก สิทฺธานิ ทิพฺพานิ. ‘‘ยาว นิมิราชกาลา’’ติ ยาว อมฺหากํ โพธิสตฺตภูตสฺส นิมิรญฺโญ อุปฺปนฺนกาลา. กสฺส ปพุทฺโธ ปุริเม อนฺตรกปฺเป อุปฺปนฺโน. นิมิราชา ปน อิมสฺมึ อนฺตร กปฺเป อุปฺปนฺโน. ‘‘มนุสฺส โลเกหิ ปญฺญาสวสฺสานิ จาตุมหาราชิเก เอโกทิพฺพรตฺติทิโว โหตี’’ติอาทิ อภิธมฺเม ธมฺม หทย วิภงฺเค อาคตนเยน วุตฺโต. จตุคฺคุณวจเน. ‘‘อุปริมานํ’’ติ อุปริมานํ เทวานํ. เอกํ วสฺสสหสฺสํ อายุปฺปมาณํ โหตีติ [Pg.150] สมฺพนฺโธ. ‘‘ทฺเว’’ติ ทฺเว วสฺสสหสฺสานิ. ‘‘อฏฺฐา’’ติ อฏฺฐวสฺสสหสฺสานิ. ‘‘เหฏฺฐิมานํ’’ติ เหฏฺฐิมานํ เทวานํ. ‘‘อุปริมานํ’’ติ อุปริมานํ เทวานํ. ยาเม เอโก รตฺติทิโวติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘จตฺตารี’’ติ มนุสฺสโลเก จตฺตาริ วสฺสสตานิ. เอวํ เสเสสุ. ‘‘อาทิอนฺต ทสฺสนวเสนา’’ติ จาตุมหาราชิเก มนุสฺสวสฺสคณนา ทสฺสนํ อาทิทสฺสนํ นาม. อิทานิ วสวตฺติยํ มนุสฺสวสฺสคณนา ทสฺสนํ อนฺต ทสฺสนํ นาม. १४४. ज्याद्वारे दुसऱ्या अस्तित्वात (भवात) प्रवेश केला जातो, त्याला 'ओक्कन्ति' (अवक्रांती/प्रवेश) असे म्हटले जाते. 'सोतरहितो' म्हणजे श्रवणेंद्रियाने (प्रसादसोताने) रहित. याचप्रमाणे उर्वरित इंद्रियांच्या बाबतीतही समजावे. 'आसित्तकादिभावेन' म्हणजे आसित्तक-पंडक (नपुंसकाचा एक प्रकार) इत्यादींच्या भावाने. 'द्वीहि ब्यंजनेहि' म्हणजे दोन्ही चिन्हांनी (स्त्री आणि पुरुष दोन्ही जननेंद्रियांनी). 'विबच्छवचनो' म्हणजे ज्याची वाणी सदोष किंवा विकृत आहे असा. 'वत्थु विपन्नस्स' यामध्ये 'वत्थु' म्हणजे भौतिक डोळा (संभार चक्खु) असे म्हटले आहे. सुरुवातीपासूनच तो सदोष असल्यामुळे, त्याने युक्त असलेल्या पुद्गलाला (व्यक्तीला) 'वत्थुविपन्न' (भौतिक दृष्टीने विकलांग) असे म्हटले जाते. 'तस्स तस्स' म्हणजे अशा प्रकारच्या चक्षूचे (डोळ्याचे). 'पसूंतियं येव' म्हणजे प्रसूतीच्या वेळीच (जन्माच्या वेळीच). 'पञ्ञावेय्यत्तियभावस्स' यामध्ये चतुर किंवा बुद्धिमान असण्याचा भाव म्हणजे 'वेय्यत्तिय' (प्रगल्भता) होय. 'ब्यत्तस्स' म्हणजे व्यापक ज्ञान (फरण-ञाण) असलेल्या पुद्गलाचे (व्यक्तीचे). प्रज्ञा नावाचे जे चातुर्य (प्रगल्भता) ज्याच्याकडे आहे, असा याचा विग्रह आहे. द्विहेतुक आणि त्रिहेतुक व्यक्तींच्या बाबतीतही नियम ठरवणे शक्य नाही, असा संबंध आहे. ते कसे शक्य नाही? म्हणून म्हटले आहे - 'मातेच्या उदरात (गर्भात) कोणतीही विपत्ती (दोष) नसते'. कोणाची विपत्ती (दोष)? उत्पन्न झालेल्या चक्षू आणि श्रोत्रांची (डोळे आणि कानांची) देखील विपत्ती (दोष) असू शकते. कोणत्या कारणामुळे ही विपत्ती होते? दुसऱ्याच्या उपक्रमामुळे (हल्ल्यामुळे), किंवा मातेच्या विषम (अयोग्य) आहार-विहारामुळे किंवा विविध आजारांमुळे ही विपत्ती होते, अशी योजना (अर्थ) आहे. धातुपाठामध्ये 'यक्ख' हा धातू पूजेच्या अर्थात पठित असल्यामुळे, 'पूजनीयतेच्या अर्थाने' असे म्हटले आहे. यावरून हे दिसून येते की, जे पूजनीय किंवा आदरणीय आहेत, ते 'यक्ष' होत. परंतु जे अत्यंत कष्टाचे जीवन जगत भटकतात, त्यांना 'भूमस्सिता' (भूमीवर आश्रित असलेले) म्हटले जाते, अशी योजना आहे. 'भूमिसिता' या पाठात, भूमीवर आश्रित (निश्रित) असलेले, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'पुञ्ञनिब्बत्तस्स' (पुण्याने उत्पन्न झालेल्या) इत्यादी म्हटले आहे. 'विरूपा हुत्वा' (कुरूप होऊन) म्हणजे ते वर्णानेही विवर्ण (कुरूप) असतात, आकारानेही कुरुप असतात आणि उपजीविकेच्या दृष्टीनेही कष्टाचे जीवन जगणारे असतात, अशा प्रकारे विकृत रूप धारण करून. विवश (अगतिक) होऊन पडतात, म्हणून त्यांना 'विनिपातिका' असेही म्हणतात. आणि 'विवसा' म्हणजे स्वतःच्या नियंत्रणाशिवाय किंवा इच्छेशिवाय, असा अर्थ आहे. 'विवित्तट्ठानेसु' म्हणजे लोकांपासून विविक्त (एकांत) असलेल्या ठिकाणी. शोध घेऊन उपजीविका करतात, किंवा पीडा देऊन उपजीविका करतात, किंवा भयभीत करून व पीडा देऊन उपजीविका करतात, अशी योजना आहे. 'वेमानिकपेतापि' (वैमानिक प्रेत देखील) म्हणजे ज्यांच्याकडे स्वतःच्या पुण्याने उत्पन्न झालेले दिव्य विमान असते, ते 'वैमानिक' होत. परंतु पुण्य आणि अपुण्य (पाप) यांच्या मिश्र कर्मामुळे उत्पन्न झाल्यामुळे, काही जण दिवसा दिव्य सुखाचा अनुभव घेतात आणि रात्री प्रेत-दुःखाचा भोग घेतात. काही जण रात्री दिव्य सुखाचा अनुभव घेतात आणि दिवसा प्रेत-दुःखाचा भोग घेतात. इतरांनी दिलेल्या पुण्यफलाचा आश्रय घेऊन जे जगतात, त्यांना 'परदत्तूपजीवी' (दुसऱ्याने दिलेल्या दानावर जगणारे) म्हणतात. 'दुसऱ्यांनी दिलेले पुण्यफल' म्हणजे नातेवाईकांनी पुण्य करून, 'माझे हे पुण्य दिवंगत झालेल्या नातेवाईकांना मिळो' अशा प्रकारे दिलेले पुण्यफल होय. 'सकलचक्रवाळपरियापन्ना एकभूमका' म्हणजे ज्याप्रमाणे तावतिंस भूमी सर्व चक्रवाळांमध्ये (विश्वप्रणालींमध्ये) अस्तित्वात आहे. त्या सर्वांचेच आयुष्य दिव्य एक हजार वर्षांच्या मर्यादेचे असते. या चक्रवाळाच्या बाबतीत काही वेगळे सांगण्याची गरज नाही. परंतु नरकामध्ये, तिर्यंच योनीमध्ये (प्राणी योनीत), प्रेतलोकात, असुरलोकात, मनुष्यांमध्ये किंवा भूम्यदेवतांमध्ये अशा प्रकारची एकच निश्चित आयुष्यमर्यादा नसते. चार अपायांच्या (दुर्गतींच्या) आयुष्यमानाची गणना करण्याचा कोणताही नियम नाही, असे म्हटले आहे. परंतु ब्रह्म संयुत्तामध्ये कोकालिक भिक्खूच्या संदर्भात भगवंतांनी दहा नरकांचे वेगवेगळे आयुष्यमान सांगितले आहे, हे खरे नाही काय? होय, ते खरे आहे, तसे आहे. परंतु ते दहा नरक अवीची नरकातच समाविष्ट असून, त्याचे केवळ भाग (प्रदेश) आहेत. त्या केवळ काही भागांवरून संपूर्ण अवीची नरकाचे आयुष्यमान निश्चित आहे, असे म्हणता येत नाही. शिवाय, त्यांची ती आयुष्यमर्यादा देखील अवीची भूमीच्या नियमाने सिद्ध होत नाही. ती त्या त्या विशिष्ट कर्मामुळेच सिद्ध होते. म्हणून जे म्हटले आहे - 'तेथे बहुतांश करून कर्माच्या प्रमाणानुसार आयुष्य असते', ते योग्यच म्हटले आहे. म्हणूनच 'तेथे नरकांमध्ये' इत्यादी म्हटले आहे. 'एवं सन्ते' म्हणजे इतर द्वीपांतील रहिवाशांच्या आयुष्यकल्पाचा चढ-उतार (आरोहण आणि अवरोहण) होत नाही, असे म्हटले असता, असा अर्थ होतो. सदाचार (समाचार) म्हणजे दहा सुचरित (सत्कर्मे). विषमाचार म्हणजे दहा दुश्चरित (पापकर्मे). त्यांचे परिणाम म्हणजेच संपत्ती (समृद्धी) आणि विपत्ती (ऱ्हास) होत, असा संबंध आहे. 'तेसं पी' म्हणजे इतर द्वीपांतील रहिवाशांचे देखील. तीच मर्यादा लागू होते, असा प्रसंग येतो. परंतु तसे असणे शक्य नाही. कारण कल्पारंभीच्या काळात चारही द्वीपांतील सर्व रहिवाशांचे आयुष्य असंख्य (असंख्येय) असणे शक्य होते. आता, जर इतर द्वीपांतील रहिवाशांच्या आयुष्यकल्पाचा देखील चढ-उतार होत असेल, तर मग आता देखील त्यांचा आयुष्यकल्प जम्बुद्वीपातील रहिवाशांच्या आयुष्यकल्पासारखाच समान गतीचा असायला हवा, अशी ही शंका (चोदना) आहे. 'केवळ परिणाम असल्यामुळे' इत्यादी त्याचे उत्तर (परिहार) आहे. ज्यांच्यामध्ये 'हे माझे आहे, हे माझे आहे' अशी वैयक्तिक तृष्णा नसते, ते 'अममा' (ममत्वरहित) होत. 'अपरिग्गहा' म्हणजे पुत्र, पत्नी इत्यादींच्या परिग्रहाने (मालकी हक्काने) रहित. 'उपरिमे चातुमहाराजिके' म्हणजे आकाशात राहणाऱ्या चातुर्महाराजिक देवलोकात. दिव्य म्हणजे देवलोकात सिद्ध झालेले. 'याव निमिराजकाला' म्हणजे आमचे बोधिसत्व असलेल्या निमि राजाच्या उत्पत्तीच्या काळापर्यंत. कस्सप बुद्ध पूर्व अंतरकल्पात उत्पन्न झाले होते. परंतु निमि राजा या चालू अंतरकल्पात उत्पन्न झाला. 'मनुष्यलोकातील पन्नास वर्षे म्हणजे चातुर्महाराजिक देवलोकातील एक दिव्य अहोरात्र (दिवस-रात्र) होय' इत्यादी अभिधम्मातील धम्महदय विभंगामध्ये आलेल्या पद्धतीने सांगितले आहे. चौपट सांगणाऱ्या वचनात. 'उपरिमानं' म्हणजे वरच्या देवलोकातील देवांचे. एक हजार वर्षे आयुष्यमान असते, असा संबंध आहे. 'द्वे' म्हणजे दोन हजार वर्षे. 'अट्ठा' म्हणजे आठ हजार वर्षे. 'हेट्ठिमानं' म्हणजे खालच्या देवलोकातील देवांचे. 'उपरिमानं' म्हणजे वरच्या देवलोकातील देवांचे. याचा संबंध 'याम देवलोकात एक अहोरात्र' इत्यादी प्रकारे जोडला पाहिजे. 'चत्तारी' म्हणजे मनुष्यलोकातील चारशे वर्षे. याचप्रमाणे उर्वरित देवलोकांच्या बाबतीतही समजावे. 'आदिअन्त दस्सनवसेन' म्हणजे चातुर्महाराजिक देवलोकातील मानवी वर्षांच्या गणनेचे दर्शन म्हणजे 'आदिदर्शन' (सुरुवातीचे दर्शन) होय. आता, वसवत्ती (परनिर्मितवसवत्ती) देवलोकातील मानवी वर्षांच्या गणनेचे दर्शन म्हणजे 'अंतदर्शन' (शेवटचे दर्शन) होय. น อติทุพฺพลํติ นาติทุพฺพลํ. ‘‘ตํ’’ติ ตํ อวิตกฺก อวิจารมตฺตฌานํ. ‘‘ภูมนฺตเร’’ติ ปถมชฺฌานภูมิโต อญฺญิสฺสํ ทุตียชฺฌานภูมิยํ. กปฺปวจเน. กปฺปียติ วสฺส, อุตุ, มาส, ปกฺข, รตฺติ, ทิวา, ทิวเสน ปริจฺฉิชฺชียตีติ กปฺโป. กปฺปียนฺติ วา นานาธมฺมปฺปวตฺติโย อตีตา ทิวเสน ปริจฺฉิชฺชียนฺติ เอเตนาติ กปฺโป. กาโล. มหนฺโต กปฺโปติ มหากปฺโป. วสฺสานํ สตภาเคหิปิ สหสฺสภาเคหิปิ สตสหสฺสภาเคหิปิ สงฺขาตุํ อสกฺกุเณยฺโยติ อสงฺขฺเยยฺโย. เอกสฺส อสงฺขฺเยยฺยสฺส อนฺตเร ทิสฺสมาโน กปฺโป อนฺตรกปฺโป. สตฺตานํ นานาอายุปริจฺเฉโท อายุกปฺโป. โส ปน มนุสฺสานํ ทสวสฺสายุกกาเล ทสวสฺเสน ปริจฺฉินฺโน. เนวสญฺญา เทวานํ นิจฺจกาลํ จตุราสีติ กปฺปสหสฺเสหิ ปริจฺฉินฺโน. อนฺตรกปฺโป นาม จูฬกปฺปา วุจฺจนฺตีติ สมฺพนฺโธ. วีสติปฺปเภทา จูฬกปฺปา วุจฺจนฺตีติ เกจิ วทนฺตีติอาทินา โยชนา. ‘‘เย’’ติ เย จตุสฏฺฐิยาทิเภทา อนฺตรกปฺปา. ‘‘ยถาวินฏฺฐํ’’ติ วินฏฺฐปฺปกาเรน วินฏฺฐปฺปกติยา. วฑฺฒมาโน กปฺโป วิวฏฺโฏ. ‘‘ยถาวิวฏฺฏํ’’ติ วิวฏฺฏปฺปกาเรน วิวฏฺฏปฺปกติยา. อจฺจเยน อติกฺกมเนน. หรเณน อปนยเนน. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ กปฺปวจเน. อฏฺฐกถายํ วุตฺตตฺตาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตเชนา’’ติ อคฺคินา. ‘‘สํวฏฺฏตี’’ติ วินสฺสติ ตทา. ‘‘เหฏฺฐา’’ติ เหฏฺฐาโลโก. ‘‘จตุสฏฺฐิวาเรสู’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมวจนํ. "न अतिदुब्बलं" म्हणजे अतिशय दुर्बळ नसलेले. "तं" म्हणजे ते अवितक्क (वितर्करहित) आणि अविचार (विचाररहित) केवळ ध्यान. "भूमन्तरे" म्हणजे पहिल्या ध्यानाच्या भूमीपासून दुसऱ्या ध्यानाच्या भूमीमध्ये. कप्प (कल्प) या शब्दाच्या संदर्भात: वर्ष, ऋतू, महिना, पक्ष (पंधरवडा), रात्र, दिवस आणि दिवसाने जे मोजले (मर्यादित केले) जाते, त्याला 'कप्प' म्हणतात. किंवा ज्याच्याद्वारे भूतकाळातील विविध धर्मांच्या प्रवृत्ती दिवसाने मोजल्या (मर्यादित केल्या) जातात, तो 'कप्प' होय. काळ. मोठा कप्प म्हणजे 'महाकप्प'. जो वर्षांच्या शेकडो, हजारो किंवा लाखो भागांनीही मोजणे अशक्य आहे, तो 'असंख्येय्य' होय. एका असंख्येय्य कप्पाच्या दरम्यान दिसणारा कप्प म्हणजे 'अंतरकप्प'. प्राण्यांच्या विविध आयुष्याची मर्यादा म्हणजे 'आयु कप्प'. तो मनुष्यांच्या दहा वर्षांच्या आयुष्याच्या काळात दहा वर्षांनी मर्यादित असतो. नेवसञ्ञा देवांच्या बाबतीत तो नेहमी चौऱ्याऐंशी हजार कप्पांनी मर्यादित असतो. 'अंतरकप्प' म्हणजे 'चूळ कप्प' (लहान कल्प) असे म्हटले जाते, असा संबंध आहे. काही जण म्हणतात की वीस प्रकारच्या भेदांना 'चूळ कप्प' म्हटले जाते, अशी योजना आहे. "ये" म्हणजे जे चौसष्ट इत्यादी भेदांचे अंतरकप्प आहेत. "यथाविनट्ठं" म्हणजे विनाश पावण्याच्या प्रकारे किंवा विनाशाच्या स्वभावाने. वाढणारा कप्प म्हणजे 'विवट्ट'. "यथाविवट्टं" म्हणजे विवट्टाच्या प्रकारे किंवा विवट्टाच्या स्वभावाने. अतिक्रमणाने (काळ निघून गेल्याने). दूर करण्याने. "तत्थ" म्हणजे त्या कप्पाच्या संदर्भात. अट्ठकथेत सांगितल्यामुळे असा संबंध आहे. "तेजेन" म्हणजे अग्नीने. "संवट्टति" म्हणजे तेव्हा विनाश पावतो. "हेट्ठा" म्हणजे खालचा लोक. "चतुसट्ठिवारेसु" हे निर्धारण अर्थातील सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. คาถาสุ. ‘‘สตฺตสตฺตคฺคินาวารา’’ติ สตฺตสตฺตวารา อคฺคินา วินสฺสนฺติ. อถวา, ภุมฺมตฺเถ ปจฺจตฺตวจนํ. สตฺตสุสตฺตสุวาเรสุ โลโก [Pg.151] อคฺคินา วินสฺสตีติ โยชนา. เตนาห ‘‘อฏฺฐเม อฏฺฐเม’’ติ. ‘‘ทกา’’ติ อุทเกน. อฏฺฐเม อฏฺฐเมวาเร โลโก ทเกน วินสฺสตีติ โยชนา. ยทา จตุสฏฺฐิวารา ปุณฺณา, ตทา เอโก วายุวาโร สิยา. ตตฺถ ‘‘ตทา’’ติ ตสฺมึ จตุสฏฺฐิวาเร. ‘‘วิวฏฺฏมานํ’’ติ สณฺฐหมานํ. ‘‘วิวฏฺฏตี’’ติ สณฺฐหติ. ‘‘สํวฏฺฏมานํ’’ติ วินสฺสมานํ. ‘‘สํวฏฺฏตี’’ติ วินสฺสติ. ‘‘ทฺเว อสงฺขฺเยยฺยานี’’ติ อฑฺฒทฺวยํ เอกํ อสงฺขฺเยยฺยนฺติ กตฺวา อุปจาเรน วุตฺตํ. ยถาตํ-อาภสฺสรานํ อฏฺฐกปฺปานีติ. ‘‘อุปฑฺเฒนา’’ติ อุทกวาเร เหฏฺฐิมภูมีสุ อุทเกน วินสฺสมานาสุ ทุตียชฺฌานภูมิ น ตาว วินสฺสติ. สํวฏฺฏกปฺเปปิ จิรกาลํ ติฏฺฐเตเยว. อิทํ สนฺธาย วุตฺตํ. สพฺพญฺเจตํ ลพฺภมานตฺตา วุตฺตํ. อสงฺขฺเยยฺยกปฺปํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ. อิทเมว ปมาณนฺติ. गाथांमध्ये: "सत्तसत्तग्गिनाद्वारा" म्हणजे सात-सात वेळा अग्नीने विनाश पावतात. किंवा, सप्तमीच्या अर्थात प्रथमा विभक्ती आहे. सात-सात वेळा जग अग्नीने विनाश पावते, अशी योजना आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "अट्ठमे अट्ठमे" (आठव्या आठव्या वेळी). "दका" म्हणजे पाण्याने. प्रत्येक आठव्या वेळी जग पाण्याने विनाश पावते, अशी योजना आहे. जेव्हा चौसष्ट वेळा पूर्ण होते, तेव्हा एक वेळ वायूची असते. तेथे "तदा" म्हणजे त्या चौसष्टव्या वेळी. "विवट्टमानं" म्हणजे प्रस्थापित होणारे. "विवट्टति" म्हणजे प्रस्थापित होते. "संवट्टमानं" म्हणजे विनाश पावणारे. "संवट्टति" म्हणजे विनाश पावते. "द्वे असंख्येय्यानि" म्हणजे दोन अर्धे भाग मिळून एक असंख्येय्य कप्प मानून उपचाराने म्हटले आहे. जसे की आभास्सर देवांचे आठ कल्प असतात. "उपाड्ढेने" (अर्ध्याने) म्हणजे पाण्याच्या वेळी खालच्या भूमी पाण्याने विनाश पावत असताना, दुसरी ध्यानभूमी तोपर्यंत विनाश पावत नाही. संवट्टकप्पामध्ये देखील ती दीर्घकाळ टिकूनच राहते. हे लक्षात घेऊन म्हटले आहे. आणि हे सर्व प्राप्त होत असल्यामुळे सांगितले आहे. असंख्येय्य कप्पाला उद्देशून म्हटले आहे. हेच प्रमाण आहे. ปฏิสนฺธิจตุกฺกํ นิฏฺฐิตํ. पटिसंधि-चतुष्क समाप्त झाले। ๑๔๕. กมฺมจตุกฺเก. ‘‘ชเนตี’’ติ อชนิตํ ชเนติ. ปาตุภาเวติ. ‘‘อุปตฺถมฺภตี’’ติ ชนิตํ อุปตฺถมฺภติ. จิรฏฺฐิติกํ กโรติ. ‘‘อุปปีเฬตี’’ติ ชนิตํ อุปปีเฬติ, ปริหาเปติ. ‘‘อุปฆาเตตี’’ติ อุปจฺฉินฺทติ. ‘‘กฏตฺตา รูปานํ’’ติ กฏตฺตานามกานํ กมฺมชรูปานํ. ‘‘กมฺมปถปตฺตาวา’’ติ เอตฺถ ปฏิสนฺธิชเนน สติ, สพฺพมฺปิ กมฺมํ กมฺมปถปตฺตํ นาม โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. วิปจฺจิตฺถาติ วิปกฺกํ. วิปกฺกํ วิปากํ เยสนฺติ วิปกฺก วิปากา. อุปตฺถมฺภมานา ปวตฺตติ. สยํปิ ปจฺจยลาเภ สตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อลทฺโธกาสสฺสา’’ติ อิทํ นิทสฺสน มตฺตํ. ลทฺโธกาสสฺสปิ อุปตฺถมฺภนํ นาม อิจฺฉิตพฺพเมว. อญฺญํ อกุสลกมฺมํ โอกาสํ ลภตีติ โยชนา. ‘‘จายํ’’ติ เจ อยํ. ‘‘กาลงฺกริยา’’ติ กาลํกเรยฺย. ‘‘อสฺสา’’ติ อิมสฺส ปุคฺคลสฺส. ‘‘ปสาทิตํ’’ติ ปสนฺนํ. ‘‘ปทูสิตํ’’ติ ปทุฏฺฐํ. ปุพฺเพ ‘มรณาสนฺน กาเล’ติ วุตฺตตฺตา อิธ ‘ปวตฺติกาเลปี’ติ วุตฺตํ. ‘‘เอตํ’’ติ กมฺมนฺตรสฺส อุปตฺถมฺภนํ. ‘‘ชีวิตปริกฺขาเร’’ติ ชีวิตปริวาเร ปจฺจเย. ‘‘สมุทาเนตฺวา’’ติ สมาห ริตฺวา[Pg.152].‘‘เอตฺถา’’ติ อุปตฺถมฺภก กมฺมฏฺฐาเน. ขนฺธสนฺตานสฺส อุปพฺรูหนนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วุตฺตนเยนา’’ติ ‘ชีวิตนฺตราเย อปเนตฺวา’ติอาทินา วุตฺตนเยน. ขนฺธสนฺตานสฺส จิรตรปฺปวตฺตินฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วุตฺตปฺปการา’’ติ ‘วิปจฺจิตุํ อลทฺโธกาสาวา วิปกฺก วิปากา วา สพฺพาปิ กุสลา กุสล เจตนา’ติ เอวํ วุตฺตปฺปการา. ‘‘ทุพฺพลตรํ กตฺวา วา วิพาธมานา’’ติ อุปปีฬก กมฺมกิจฺจํ วุตฺตํ. ‘‘ชนก กมฺมสฺส ทุพฺพล อายูหนกาเล’’ติ สมุจฺจยนกาเล. ‘‘วิหต สามตฺถิยํ’’ติ วินาสิตสตฺติกํ. ‘‘มเหสกฺเขสู’’ติ มหานุภาเวสุ. ‘‘อุปตฺถมฺภกมฺปิ ตพฺพิปริยาเยน เวทิตพฺพํ’’ติ อุปปีฬก กมฺมโต วิปริยาเยน เวทิตพฺพํ. ‘อุปริภูมิ นิพฺพตฺตกมฺปิ สมานํ เหฏฺฐาภูมิยํ นิพฺพตฺเตตี’ติอาทีสุ ‘เหฏฺฐาภูมิ นิพฺพตฺตกมฺปิ สมานํ อุปริภูมิยํ นิพฺพตฺเตตี’ติอาทินา วตฺตพฺพนฺติ อธิปฺปาโย. อชาตสตฺตุราชวตฺถุมฺหิ ตสฺส รญฺโญ ปิตุฆาตกมฺมํ มหาอวีจินิรเย นิพฺพตฺตนกมฺปิ สมานํ ปจฺฉา พุทฺธุ ปฏฺฐาน กมฺเมน พาธียมานํ วิหตสามตฺถิยํ หุตฺวา ตํ อุสฺสทนิรเย นิพฺพตฺเตติ. ขนฺธสนฺตานสฺส วิพาธนํ นาม สตฺตสฺส ทุกฺขุปฺปตฺติ กรณนฺติ สมฺพนฺโธ. กถํ โคมหึสาทีนํ ปุตฺตทารญาติมิตฺตานญฺจ วิปตฺติกรณํ ตสฺส สตฺตสฺส อุปปีฬก กมฺมกิจฺจํ ภเวยฺย. อญฺโญหิ โส ปุคฺคโล, อญฺเญ โคมหึสาทโย. น จ อญฺเญน กตํ กมฺมํ อญฺเญสํ สตฺตานํ ทุกฺขุปฺปตฺตึ วา สุขุปฺปตฺตึ วา กเรยฺยาติ โจทนา. ทุวิธนฺติอาทินา ตํ วิสฺสชฺเชติ. อานนฺท เสฏฺฐิวตฺถุมฺหิ. โสเสฏฺฐิ มหามจฺฉริโย อโหสิ. อญฺเญปิ ทานํ เทนฺเต นีวาเรสิ. โส ตโต จวิตฺวา เอกสฺมึ คามเก เอกิสฺสา อิตฺถิยากุจฺฉิมฺหิ ชาโต. ตสฺส ชาตกาลโต ปฏฺฐาย ตสฺส ปาปกมฺเมน มาตรํ อาทึ กตฺวา สกลคามิกานํ ชนานํ ทุกฺขุปฺปตฺติ โหตีติ ธมฺมปท อฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ตสฺมา นิสฺสนฺทผลวเสน อญฺเญน กตํ กมฺมํ อญฺเญสํ สตฺตานํ ทุกฺขุปฺปตฺตึ วา สุขุปฺปตฺตึ วา กโรติ เยวาติ ทฏฺฐพฺพํ. [‘‘กมฺมชสนฺตติ สีเสสู’’ติ ปฏิสนฺธิกาลโต ปฏฺฐาย อุปฺปนฺนา เอเกกา กมฺมชรูปสนฺตติ นาม อตฺถิ. สา ปจฺฉา อปราปรํ ตาทิสาย กมฺมชรูปสนฺตติยา ปวตฺตตฺถาย สีสภูตตฺตา [Pg.153] สนฺตติ สีสนฺติ วุจฺจติ. ยํ กิญฺจิ เอกํ วากมฺมชสนฺตติ สีสํ. ทฺเว วากมฺมชสนฺตติ สีสานิ ]. วิสุทฺธิมคฺคปาเฐ. ‘‘ตเทวา’’ติ ตํ อุปฆาตก กมฺมเมว. ‘‘อิธ จา’’ติ อิมสฺมึ อภิธมฺมตฺถสงฺคเห. ‘‘อิมสฺส ปี’’ติ อิมสฺส อุปฆาตก กมฺมสฺสปิ. ทุฏฺฐคามณิ รญฺโญ วตฺถุมฺหิ จ โสณตฺเถร ปิตุโน วตฺถุมฺหิ จ เตสํ มรณาสนฺนกาเล ปถมํ ทุคฺคติ นิมิตฺตานิ อุปฏฺฐหนฺติ. ปจฺฉา รญฺโญ เอกํ ปุพฺพกตํ กลฺยาณ กมฺมํ อนุสฺสรนฺตสฺส เถรปิตุ จ ตงฺขเณ เอว เอกํ กลฺยาณ กมฺมํ กโรนฺตสฺส ตานิ ทุคฺคติ นิมิตฺตานิ อนฺตรธายนฺติ. สคฺคนิมิตฺตานิ ปาตุพฺภวนฺติ. อุโภปิ จวิตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺตนฺตีติ. กุสลา กุสล กมฺมานํ ขยํ กโรตีติ กุสลา กุสล กมฺมกฺขยกโร. ‘‘อายุ กมฺเมสุ วิชฺชมาเนสู’’ติ ตสฺส สตฺตสฺส อายุ ปริจฺเฉโท จ ปริยนฺต คโต น โหติ, กมฺมานุภาโว จ ปริกฺขีโณ น โหติ. เอวํ อายุ กมฺเมสุ วิชฺชมาเนสุ. ‘‘อปราธ กมฺมสฺสา’’ติ มาตาปิตูสุวา ธมฺมิกสมณ พฺราหฺมเณสุ วา อปรชฺฌนวเสน กตสฺส อปราธกมฺมสฺส. ‘‘โส ปนา’’ติ มชฺฌิมฏฺฐกถาวาโท ปน. ‘‘อรุจฺจมาโน วิยา’’ติ อนิจฺฉิยมาโนวิย. ‘‘โส’’ติ มชฺฌิมฏฺฐกถา วาโท. ‘‘ตตฺถ ปนา’’ติ มชฺฌิมฏฺฐกถายํ ปน. ‘‘สพฺพญฺเจตํ’’ติ สพฺพญฺจ เอตํ สุตฺตวจนํ, วเสน วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. อนิจฺฉนฺเตหิ ฏีกา จริเยหิ. ‘‘วิปากํ ปฏิอิจฺฉิตพฺโพ’’ติ วิปากํ ปฏิจฺจ อิจฺฉิ ตพฺโพ. เอตฺถ ‘‘วิปากํ’’ติ กมฺมนิพฺพตฺตกฺขนฺธ สนฺตานํ วุจฺจติ. ตสฺส ชนกํ กมฺมํ ชนก กมฺมนฺติ วุจฺจติ. ตสฺเสว ขนฺธสนฺตานสฺส อุปตฺถมฺภกํ ตสฺเสว อุปปีฬกํ ตสฺเสว อุปฆาตกํ กมฺมํ อุปฆาตก กมฺมนฺติ วุจฺจตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘สาเกต ปญฺเห’’ติ วิปากุทฺธาเร อาคเต สาเกต ปญฺเห. ธมฺมทินฺนาย นาม อุคฺคเสน รญฺโญ เทวิยา วตฺถุมฺหิ สาเทวี ปุพฺเพ เอกํ อชํ ฆาเตสิ, เตน กมฺเมน อปาเยสุ ปติตฺวา ปจฺฉา ปวตฺติ วิปากวเสน พหูสุ ภเวสุ อชสรีเร โลมคณนามตฺตํ อตฺตโน สีสจฺเฉทน ทุกฺขํ อนุโภสีติ. ‘‘สา ปนา’’ติ สา เอกา ปาณาติปาต เจตนา ปน. มหาโมคฺคลาน วตฺถุ นาม ปญฺจสต โจรานํ เถรสฺส ฆาต น วตฺถุ[Pg.154]. เถโรหิ อตฺตนา ปุพฺพกเตน อุปจฺเฉทก กมฺเมน โจรฆาตนํ ลภิตฺวา ปรินิพฺพุโต. สามาวติเทวี จ วคฺคุมุทานทิตีรวาสิโน ปญฺจสต ภิกฺขู จ อตฺตโน ปุพฺพกเตหิ อุปจฺเฉทก กมฺเมหิ ตาทิสํ ปรูปกฺกมํ ลภิตฺวา สคฺเคสุ นิพฺพตฺตา. ทุสฺสิมาโร นาม กกุสนฺธ พุทฺธกาเล มารเทว ปุตฺโต วุจฺจติ. กลาพุราชานาม ขนฺติ วาทิตา ปสสฺส ฆาตโก วุจฺจติ. เต ปน ตงฺขเณ อตฺตนา กเตน อุปจฺเฉทก กมฺเมน ตงฺขเณ เอว จวิตฺวา อวีจิมฺหิ นิพฺพตฺตา. ตตฺถ ปุริม วตฺถูสุ อุปจฺเฉทก กมฺมํ อุปจฺฉินฺทน มตฺตํ กโรติ. น อตฺตโน วิปากํ เทติ. ปจฺฉิมวตฺถูสุ ปน อุปจฺฉินฺทนญฺจ กโรติ, วิปากญฺจ เทตีติ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘อุปจฺเฉทน ปุพฺพกํ’’ติ อุปจฺเฉทน ปุพฺพกํ วิปากํ ชเนตีติ โยชนา. กมฺมนฺตรสฺส วิปากํ อุปจฺฉินฺทิตฺวาว อตฺตโน วิปากํ ชเนตีติ อธิปฺปาโย. ตตฺถ ‘‘อตฺตโน วิปากํ ชเนตี’’ติ อิธ กทาจิ ชเนติ, กทาจิ น ชเนตีติ เอวํ วิภาคสฺส อกตตฺตา ‘‘ตํ น สุนฺทรํ’’ติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘อิธ ปุพฺพกเตนา’’ติอาทึ. ‘‘อฏฺฐกถาสุเยว อาคตตฺตา’’ติ เตสุ วตฺถูสุ เตชนา อุปจฺเฉทก กมฺเมน มรนฺตีติ เอวํ วตฺวา อาคตตฺตา. วิปากํ นิพฺพตฺเตตีติ วิปาก นิพฺพตฺตกํ. ตสฺส ภาโว วิปาก นิพฺพตฺตกตฺตํ. วิปาก นิพฺพตฺตกตฺตสฺส อภาโวติ วิคฺคโห. १४५. कर्मचतुष्कात. "जनयति" (उत्पन्न करतो) म्हणजे जे उत्पन्न झाले नाही ते उत्पन्न करतो, प्रकट करतो. "उपस्तम्भयति" (आधार देतो) म्हणजे जे उत्पन्न झाले आहे त्याला आधार देतो, दीर्घकाळ टिकवून ठेवतो. "उपपीडयति" (पीडा देतो) म्हणजे जे उत्पन्न झाले आहे त्याला पीडित करतो, क्षीण करतो. "उपघातयति" (नाश करतो) म्हणजे खंडित करतो. "कटत्ता रूपानां" म्हणजे 'कटत्ता' नावाच्या कर्मज रूपांचे. "कर्मपथप्राप्त" याविषयी असे जाणावे की, प्रतिसंधी उत्पन्न होत असताना सर्वच कर्म 'कर्मपथप्राप्त' होते. 'विपच्चित्थ' म्हणजे विपाकात आलेले. ज्यांचा विपाक (परिणाम) परिपक्व झाला आहे, ते 'विपक्वविपाकाः'. आधार मिळवून प्रवृत्त होते. स्वतःलाही प्रत्यय (कारण) लाभल्यास, असा अभिप्राय आहे. "संधी न मिळालेल्याचे" हे केवळ एक उदाहरण आहे. संधी मिळालेल्यालाही आधार देणे अपेक्षितच आहे. 'इतर अकुशल कर्माला संधी मिळते' अशी येथे योजना आहे. "चायं" म्हणजे 'जर हा'. "कालङ्करिया" म्हणजे काळ करेल (मृत्यू पावेल). "अस्स" म्हणजे या पुद्गलाचा (व्यक्तीचा). "प्रसादित" म्हणजे प्रसन्न. "प्रदूषित" म्हणजे प्रदुष्ट (दूषित/द्वेषयुक्त). पूर्वी 'मरणासन्न काळात' असे म्हटल्यामुळे, येथे 'प्रवृत्तिक काळातही' असे म्हटले आहे. "हे" म्हणजे दुसऱ्या कर्माचे उपस्तम्भन (समर्थन/आधार). "जीवितपरिकार" म्हणजे जीवनाचे सहायक प्रत्यय (साधने). "समुदानेत्वा" म्हणजे गोळा करून (एकत्र करून). "येथे" म्हणजे उपस्तम्भक कर्माच्या स्थानी. स्कंधसंतानाची वृद्धी करणे, असा संबंध आहे. "सांगितलेल्या पद्धतीने" म्हणजे 'जीवनाचा अंतराय दूर करून' इत्यादी सांगितलेल्या पद्धतीने. स्कंधसंतानाची दीर्घकाळ प्रवृत्ती राहणे, असा संबंध आहे. "सांगितलेल्या प्रकारची" म्हणजे 'विपाकासाठी संधी न मिळालेली किंवा विपाकात आलेली सर्वच कुशल-अकुशल चेतना', अशा सांगितलेल्या प्रकारची. "अतिशय दुर्बळ करून किंवा बाधा आणून" हे उपपीडक कर्माचे कार्य सांगितले आहे. "जनक कर्माच्या दुर्बळ संचयकाळात" म्हणजे गोळा करण्याच्या काळात. "विहतसामर्थ्य" म्हणजे ज्याची शक्ती नष्ट झाली आहे असे. "महेशख्येषु" म्हणजे महानुभाव (मोठ्या प्रभावाच्या) लोकांमध्ये. "उपस्तम्भक कर्मही त्याच्या उलट जाणावे" म्हणजे उपपीडक कर्माच्या उलट जाणावे. 'वरच्या भूमीत उत्पन्न होणारे असूनही खालच्या भूमीत उत्पन्न करते' इत्यादींमध्ये 'खालच्या भूमीत उत्पन्न होणारे असूनही वरच्या भूमीत उत्पन्न करते' इत्यादी प्रकारे म्हणावे, असा अभिप्राय आहे. अजातशत्रू राजाच्या कथेत, त्या राजाचे पितृघाताचे कर्म महाअवीची निरयात उत्पन्न करणारे असूनही, नंतर बुद्धोपस्थानाच्या (बुद्धांच्या सेवेच्या) कर्माने बाधित होऊन, त्याचे सामर्थ्य नष्ट झाल्यामुळे, त्याला उस्सद निरयात उत्पन्न करते. स्कंधसंतानाला बाधा आणणे म्हणजे प्राण्याला दुःख उत्पन्न करणे, असा संबंध आहे. गाय, म्हैस इत्यादींच्या आणि पुत्र, पत्नी, नातेवाईक व मित्र यांच्या विपत्तीला कारणीभूत होणे हे त्या प्राण्याचे उपपीडक कर्माचे कार्य कसे असू शकते? कारण तो पुद्गल (व्यक्ती) वेगळा आहे आणि गाय, म्हैस इत्यादी वेगळे आहेत. आणि दुसऱ्याने केलेले कर्म इतर प्राण्यांना दुःख किंवा सुख उत्पन्न करू शकत नाही, अशी शंका (चोदना) आहे. 'द्विविध' इत्यादी शब्दांनी त्याचे समाधान (उत्तर) दिले जाते. आनंद श्रेष्ठीच्या कथेत: तो श्रेष्ठी अत्यंत कंजूष होता. इतरांनाही दान देण्यापासून तो रोखत असे. तो तेथून च्युत होऊन एका गावात एका स्त्रीच्या गर्भात जन्माला आला. त्याच्या जन्माच्या वेळेपासून त्याच्या पापकर्मामुळे त्याच्या आईला धरून संपूर्ण गावातील लोकांना दुःख उत्पन्न झाले, असे धम्मपद अट्ठकथेत सांगितले आहे. म्हणून, निस्यंदफलाच्या (स्वाभाविक परिणामाच्या) प्रभावाने दुसऱ्याने केलेले कर्म इतर प्राण्यांना दुःख किंवा सुख उत्पन्न करतेच, असे जाणावे. ["कर्मजसंतती शीर्षेषु" म्हणजे प्रतिसंधी काळापासून उत्पन्न झालेली प्रत्येक कर्मज रूपसंतती असते. ती नंतर वारंवार तशाच कर्मज रूपसंततीच्या प्रवृत्तीसाठी मुख्य (शीर्षभूत) असल्यामुळे तिला 'संततीशीर्ष' म्हटले जाते. कोणतीही एक कर्मजसंतती शीर्ष किंवा दोन कर्मजसंतती शीर्षे.] विशुद्धिमार्गाच्या पाठात: "तदेव" म्हणजे ते उपघातक कर्मच. "इध च" म्हणजे या अभिधम्मत्थसंगहात. "इमस्स पि" म्हणजे या उपघातक कर्माचेही. दुट्ठगामणी राजाच्या कथेत आणि सोण स्थेरांच्या वडिलांच्या कथेत, त्यांच्या मरणासन्न काळात प्रथम दुर्गतीची निमित्ते प्रकट झाली. नंतर, राजाने पूर्वी केलेले एक कल्याणकारी कर्म आठवल्यामुळे आणि स्थेरांच्या वडिलांनी त्याच क्षणी एक कल्याणकारी कर्म केल्यामुळे ती दुर्गतीची निमित्ते नाहीशी झाली. सुगतीची (स्वर्गाची) निमित्ते प्रकट झाली. दोघेही च्युत होऊन स्वर्गात उत्पन्न झाले. कुशल आणि अकुशल कर्मांचा क्षय करतो तो 'कुशलाकुशलकर्मक्षयकर'. "आयुष्य आणि कर्मे विद्यमान असताना" म्हणजे त्या प्राण्याचा आयुष्यकाळ संपलेला नसतो आणि कर्माचा प्रभावही क्षीण झालेला नसतो. अशा प्रकारे आयुष्य आणि कर्मे विद्यमान असताना. "अपराध कर्माचे" म्हणजे माता-पित्यांच्या किंवा धार्मिक श्रमण-ब्राह्मणांच्या बाबतीत केलेल्या अपराधाच्या स्वरूपातील अपराध कर्माचे. "सो पन" म्हणजे मज्झिम-अट्ठकथेचा मतप्रवाह तर. "अरुच्चमानो विय" म्हणजे न आवडल्यासारखे (अनिच्छेने). "सो" म्हणजे मज्झिम-अट्ठकथेचा मतप्रवाह. "तत्थ पन" म्हणजे मज्झिम-अट्ठकथेत तर. "सब्बञ्चेतं" म्हणजे हे सर्व सुत्तवचन, 'च्या प्रभावाने म्हटले आहे' असा संबंध आहे. असहमत असलेल्या टीकाचार्यांनी. "विपाकं पटिइच्छितब्बो" म्हणजे विपाकाला अनुसरून स्वीकारला पाहिजे. येथे "विपाक" म्हणजे कर्माने उत्पन्न झालेली स्कंधसंतती होय. तिला उत्पन्न करणारे कर्म 'जनक कर्म' म्हटले जाते. त्याच स्कंधसंततीला आधार देणारे 'उपस्तम्भक कर्म', तिला पीडा देणारे 'उपपीडक कर्म' आणि तिचा नाश करणारे कर्म 'उपघातक कर्म' म्हटले जाते, असा अभिप्राय आहे. "साकेत प्रश्नात" म्हणजे विपाकाच्या विवेचनात आलेल्या साकेत प्रश्नात. धम्मदिन्ना नावाच्या उग्रसेन राजाच्या राणीच्या कथेत, त्या राणीने पूर्वी एका बकरीचा वध केला होता, त्या कर्मामुळे अपायांमध्ये पडून नंतर प्रवृत्ती-विपाकाच्या प्रभावाने अनेक जन्मांत बकरीच्या शरीरातील केसांच्या संख्येइतक्या वेळा स्वतःचे मस्तक कापले जाण्याचे दुःख भोगले. "सा पना" म्हणजे ती एक प्राणातिपाताची चेतना तर. महामोग्गल्लानाची कथा म्हणजे पाचशे चोरांनी स्थेरांचा वध केल्याची कथा होय. स्थेरांनी स्वतः पूर्वी केलेल्या उपच्छेदक कर्मामुळे चोरांकडून वध पत्करून परिनिर्वाण प्राप्त केले. सामावती देवी आणि वग्गुमुदा नदीच्या तीरावर राहणारे पाचशे भिक्खू यांनी स्वतः पूर्वी केलेल्या उपच्छेदक कर्मांमुळे तशा प्रकारचा परोपक्रम पत्करून स्वर्गात जन्म घेतला. दुस्सी मार म्हणजे ककुसंध बुद्धांच्या काळातील मारदेवपुत्र होय. कलाबू राजा म्हणजे क्षान्तीवादी तपस्वीचा वध करणारा होय. ते दोघे त्याच क्षणी स्वतः केलेल्या उपच्छेदक कर्मामुळे त्याच क्षणी च्युत होऊन अवीची नरकात उत्पन्न झाले. त्यापैकी, पहिल्या कथांमध्ये उपच्छेदक कर्म केवळ छेदनाचे कार्य करते, स्वतःचा विपाक देत नाही. परंतु नंतरच्या कथांमध्ये ते छेदनही करते आणि स्वतःचा विपाकही देते. विभावनीच्या पाठात: "उपच्छेदनपूर्वक" म्हणजे उपच्छेदनपूर्वक विपाक उत्पन्न करतो, अशी योजना आहे. दुसऱ्या कर्माचा विपाक खंडित करूनच स्वतःचा विपाक उत्पन्न करतो, असा अभिप्राय आहे. तेथे "स्वतःचा विपाक उत्पन्न करतो" याविषयी येथे 'कधी उत्पन्न करतो, कधी उत्पन्न करत नाही' असा विभाग न केल्यामुळे "ते योग्य नाही" असे म्हटले आहे. म्हणूनच "येथे पूर्वी केलेल्या..." इत्यादी म्हटले आहे. "अट्ठकथांमध्येच आल्यामुळे" म्हणजे त्या कथांमध्ये ते लोक उपच्छेदक कर्माने मरतात असे सांगून आल्यामुळे. विपाक उत्पन्न करतो तो 'विपाकनिर्वर्तक'. त्याचा भाव म्हणजे 'विपाकनिर्वर्तकत्व'. विपाकनिर्वर्तकत्वाचा अभाव, असा विग्रह आहे. ชนกจตุกฺกํ นิฏฺฐิตํ. जनकचतुष्क समाप्त झाले. ๑๓๖. ‘‘นิกนฺติ พเลน วา ปฏิพาหิยมานํ วิปากํ น เทตี’’ติ ฌานลาภิโน หุตฺวาปิ มรณกาเล อุปฺปชฺชิตุํ นิกนฺติยา สติ, ตํ ฌานํ วิปากํ น เทตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘เอกสฺสา’’ติ เอกสฺส ปุคฺคลสฺส. ‘‘เตสํ’’ติ มหคฺคตกมฺม อานนฺตริย กมฺมานํ. อนฺติม ชวนวีถิยํ กตํ นาม วตฺถุ ทุพฺพลตฺตา สยมฺปิ ทุพฺพลํ โหติ. ปฏิสนฺธึ น ชเนติ. เตนาห ‘‘อนฺติม ชวนวีถิโต ปุพฺพภาเค อาสนฺเน กตํ’’ติ. อิทญฺจ กมฺมสามญฺญ วเสน วุตฺตํ. กมฺมวิเสเส ปน สติ, น เทตีติ น วตฺตพฺพนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมํ ปนา’’ติอาทิ [Pg.155] วุตฺตํ. กตํ อาสนฺน กมฺมํ นามาติ คเหตพฺพนฺติ โยชนา. ปาฬิปาเฐ. อสฺสปุคฺคลสฺส มรณกาเลวา สมฺมาทิฏฺฐิ สมตฺตา สมาทินฺนา, มิจฺฉาทิฏฺฐิ สมตฺตา สมาทินฺนาติ โยชนา. ปรโต ปริปุณฺณํ อาคมิสฺสติ. โสมนสฺส ชนกํ ปรเจตนา ปวตฺติวเสน. สนฺตาป ชนกํ กุกฺกุจฺจวิปฺปฏิสารปฺปวตฺติวเสน. อิทํ ครุก จตุกฺกํ นาม อนนฺตเร ภเว วิปจฺจนกานํ กมฺมานํ วเสน วุตฺตนฺติ อาห ‘‘อุปปชฺชเวทนีย กมฺมานิ เอวา’’ติ. กมฺมํ นาม กุสลํ วา โหตุ, อกุสลํ วา. ปุนปฺปุนํ ลทฺธา เสวเน สติ, วิปากํ เทติ. อสติ น เทติ. กามาวจรสฺส กุสลสฺส กมฺมสฺส กตตฺตา อุปจิตตฺตา วิปากํ อุปฺปนฺนํ โหติ จกฺขุ วิญฺญาณนฺติ จ, อกุสลสฺส กมฺมสฺส กตตฺตา อุปจิตตฺตา วิปากํ อุปฺปนฺนํ โหติ จกฺขุ วิญฺญาณนฺติ จ, ปาฬิยํ วุตฺตํ. เอตฺถหิ กตตฺตาติ วตฺวา ปุน อุปจิตตฺตาติ วจนํ ปุนปฺปุนํ วฑฺฒนสงฺขาเต อาเสวเน สติ เอว วิปากํ เทตีติ ญาเปติ. ตสฺมา กตมตฺต กมฺมตฺตา กฏตฺตา กมฺมํ นามาติ วุตฺเตปิ อนนฺตรภเว วิปจฺจนก กมฺมสฺเสว อิธ อธิปฺเปตตฺตา ปุนปฺปุนํ ลทฺธา เสวนเมว อิธ คเหตพฺพนฺติ ทสฺเสตุํ อฏฺฐกถายํ ‘‘ปุนปฺปุนํ ลทฺธาเสวนํ’’ติ วุตฺตํ. १३६. “निकन्ति (आसक्ती) च्या बलाने अडथळा निर्माण झाल्यामुळे विपाक देत नाही” याचा अर्थ असा की, ध्यान प्राप्त केलेले असूनही जर मरणसमयी निकन्ति (आसक्ती) उत्पन्न झाली, तर ते ध्यान विपाक देत नाही. “एकस्स” म्हणजे एका पुद्गलाचे (व्यक्तीचे). “तेसं” म्हणजे महग्गत कर्म आणि आनंतरीय कर्मांचे. अंतिम जवनवीथीमध्ये केलेले कर्म हे वस्तूच्या दुर्बलतेमुळे स्वतःच दुर्बल असते. ते प्रतिसंधी उत्पन्न करत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे, “अंतिम जवनवीथीच्या पूर्वभागात जवळ केलेले (कर्म)”. आणि हे सामान्य कर्माच्या दृष्टीने सांगितले आहे. परंतु विशिष्ट कर्माच्या बाबतीत, ‘विपाक देत नाही’ असे म्हणता येत नाही, हे दर्शवण्यासाठी “मिच्छादिट्ठिकम्मं पना” (परंतु मिथ्यादृष्टीचे कर्म) इत्यादी म्हटले आहे. ‘केलेले आसन्न कर्म’ असे समजावे, अशी योजना आहे. पाळिपाठात: “त्या पुद्गलाच्या मरणसमयी सम्यग्दृष्टी पूर्णपणे स्वीकारली गेली किंवा मिथ्यादृष्टी पूर्णपणे स्वीकारली गेली” अशी योजना आहे. पुढे हे पूर्णपणे येईल. परचेतनेच्या प्रवृत्तीमुळे सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न करणारे. कुक्कुच्च (पश्चात्ताप) आणि विप्पटिसार (खंत) यांच्या प्रवृत्तीमुळे संताप उत्पन्न करणारे. हे ‘गरुक चतुष्क’ पुढील जन्मात विपाक देणाऱ्या कर्मांच्या दृष्टीने सांगितले आहे, म्हणूनच “उपपज्जवेदनीय कर्माणि एवा” (केवळ उपपज्जवेदनीय कर्मेच) असे म्हटले आहे. कर्म हे कुशल असो वा अकुशल. पुन्हा पुन्हा सेवन (अभ्यास) केल्यास ते विपाक देते. न केल्यास देत नाही. “कामावचर कुशल कर्माच्या कृतत्वामुळे (केल्यामुळे) आणि उपचितत्वामुळे (संचित केल्यामुळे) चक्षुविज्ञानाचा विपाक उत्पन्न होतो” आणि “अकुशल कर्माच्या कृतत्वामुळे आणि उपचितत्वामुळे चक्षुविज्ञानाचा विपाक उत्पन्न होतो” असे पाळिमध्ये म्हटले आहे. येथे ‘कृतत्वामुळे’ असे म्हणून पुन्हा ‘उपचितत्वामुळे’ असे म्हणणे हे दर्शवते की, पुन्हा पुन्हा वाढ होणे या स्वरूपाचे आसेवन (पुनरावृत्ती) झाल्यावरच कर्म विपाक देते. म्हणूनच, केवळ कर्म केल्यामुळे त्याला ‘कटत्ता कर्म’ (कृतत्व कर्म) म्हटले गेले असले, तरी येथे पुढील जन्मात विपाक देणारे कर्मच अभिप्रेत असल्याने, येथे पुन्हा पुन्हा केलेले आसेवनच घ्यावे, हे दर्शवण्यासाठी अट्ठकथेमध्ये “पुनप्पुनं लद्धासेवनं” (पुन्हा पुन्हा केलेले आसेवन) असे म्हटले आहे. ‘‘เอวญฺจ กตฺวา’’ติอาทีสุ. ‘‘ยตฺถ ตํ ปุพฺพกตํ กมฺมนฺติ อาคตํ’’ติ ยสฺมึ อฏฺฐกถา ปเทเส ตํ กฏตฺตา กมฺมํ ปุพฺพกตํ กมฺมํติ อาคตํ. ‘‘กสฺมา อิธา’’ติอาทีสุ. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึ อภิธมฺมตฺถ สงฺคเห. ปาฬิยํ. ยํ ครุกํ, ตํ วิปากํ เทติ. ตสฺมึ อสติ, ยํ พหุลํ. ตสฺมึ อสติ, ยํ อาสนฺนํ. ตสฺมึ อสติ, ยํ กฏตฺตา วา ปน กมฺมํ, ตํ วิปากํ เทตีติ อตฺโถ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. “एवञ्च कत्वा” इत्यादींमध्ये. “जिथे ते ‘पुब्बकत कम्म’ (पूर्वी केलेले कर्म) म्हणून आले आहे” म्हणजे अट्ठकथेच्या ज्या भागात ते ‘कटत्ता कर्म’ हे ‘पुब्बकत कर्म’ म्हणून आले आहे. “कस्मा इधा” इत्यादींमध्ये. “इध” म्हणजे या अभिधम्मत्थसंगहात. पाळिमध्ये: “जे गरुक (जड/महत्त्वपूर्ण) कर्म आहे, ते विपाक देते. ते नसताना, जे बहुल (वारंवार केलेले) कर्म आहे. ते नसताना, जे आसन्न (मरणसमयीचे) कर्म आहे. ते नसताना, जे कटत्ता (केलेले) कर्म आहे, ते विपाक देते” असा अर्थ आहे. यातील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. สุตฺตนฺตปาเฐ. สุขเวทนํ ชเนตีติ สุขเวทนียํ. ‘‘สมตฺตา’’ติ สุฏฺฐุคหิตา. ‘‘สมาทินฺนา’’ติ ตทตฺถวิวรณํ. ‘‘ปริยตฺตํ’’ติ สมตฺถํ. ตมฺพทาธิกสฺส ยาวชีวํ พหูนิ ปาปกมฺมานิ อาจิณฺณานิ. มรณ ทิวเส ปน สาริปุตฺตตฺเถรสฺส ธมฺมเทสนํ สุตฺวา จวิตฺวา เตน อาสนฺน กมฺเมน สคฺเค นิพฺพตฺติ. วาตกาลสฺส ยาวชีวํ พหูนิ กลฺยาณ กมฺมานิ อาจิณฺณานิ. มรณ ทิวเสปน พุทฺธสาสเน [Pg.156] วิปรีต สญฺญํ กตฺวา เตน อาสนฺน กมฺเมน อปาเย นิพฺพตฺติ. सुत्तन्तपाठात: “जे सुखद वेदना उत्पन्न करते ते सुखवेदनीय होय.” “समत्ता” म्हणजे चांगल्या प्रकारे ग्रहण केलेली. “समादिन्ना” हे त्याच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण आहे. “परियत्तं” म्हणजे समर्थ (सक्षम). तांबदाठिकाने (तांबड्या दाढेच्या चोराने) आयुष्यभर अनेक पापकर्मे केली होती. परंतु मरणसमयी स्थवीर सारिपुत्तांची धम्मदेशना ऐकून, च्युत होऊन (मृत्यू पावून) त्या आसन्न कर्मामुळे तो स्वर्गात उत्पन्न झाला. वातकालाने आयुष्यभर अनेक कल्याणकारी (चांगली) कर्मे केली होती. परंतु मरणसमयी बुद्धशासनाविषयी विपरीत संज्ञा (चुकीची धारणा) करून, त्या आसन्न कर्मामुळे तो अपाय (दुर्गती) मध्ये उत्पन्न झाला. ครุกจตุกฺกํ นิฏฺฐิตํ. गरुकचतुष्क समाप्त झाले. ๑๔๗. ทิฏฺฐธมฺมจตุกฺเก. ปสฺสิตพฺโพติ ทิฏฺโฐ. ‘‘ธมฺโม’’ติ ขนฺธายตน ธมฺม สมูโห. ทิฏฺโฐ ธมฺโมติ ทิฏฺฐ ธมฺโม. วตฺตมาโน ธมฺมสมูโห. โย อตฺตภาโวติ วุจฺจติ. อตฺตสงฺขาตสฺส ทิฏฺฐิยา ปริกปฺปิตสารสฺส ภาโว ปวตฺติ การณนฺติ กตฺวาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ทิฏฺฐ ธมฺโม วุจฺจตี’’ติอาทิมาห. ‘‘วิปากํ ปฏิสํเวเทตี’’ติ เอเตน กถํ กมฺมสาธนํ ทสฺเสติ. ปฏิสํเวทน กฺริยาปเท วิปากนฺติ กมฺมปทํ ทิสฺวา วิปากํ นาม เวทิตพฺพํ เวทนียํ. ปฏิสํเวทิตพฺพํ ปฏิสํเวทนียนฺติ วิญฺญาตตฺตา. ‘‘อุเปจฺจา’’ติ อุปคนฺตฺวา. ‘‘อุปปชฺชิตฺวา’’ติ อุเปจฺจ ปชฺชิตฺวา. ปาปุณิตฺวาติ อตฺโถ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘ทิฏฺฐ ธมฺมโต’’ติ ทิฏฺฐ ธมฺมสฺส. สามิอตฺเถ ปญฺจมี. ปาฬิยํ วุตฺตํ. ‘‘เอตฺถหี’’ติอาทิ ปุพฺพวากฺเย วุตฺต นยเมว. อปรสทฺโท นิจฺจํ อปาทานา เปกฺโข. ตญฺจ อปาทานํ นาม อนนฺตเร วุตฺตปเทหิ. ‘‘ทิฏฺฐธมฺมา นาคตานนฺตร ภเวหี’’ติ ทิฏฺฐธมฺมโต จ อนาคตานนฺตร ภวโต จาติ อตฺโถ. ‘‘ปริวตฺโต’’ติ ปพนฺโธ. อปราปริโยติ วา, อปโร จ อปโร จ อปราปโร. อปราปเร ปวตฺโต อปราปริโยติ อตฺโถ. ‘‘อุปปชฺชภวํ’’ติ อนาคตานนฺตรภวํ. อโหสิ กมฺเม ‘‘อโหสี’’ติ ปทํ อญฺญาสิ โกณฺฑญฺโญติ ปเทวิย รุฬฺหีนามปทนฺติ อาห ‘‘อโหสิ นามกํ’’ติ. ตํ ปน รุฬฺหิปทํ กุโตปวตฺตํติ อาห ‘‘อโหสิ กมฺมํ’’ติอาทึ. ‘‘เอวํ วุตฺต ปาฐวเสนา’’ติ เอตฺถ อิธ วุตฺโต ปาโฐ สา วเสโส. ปริปุณฺณปาโฐ ปน อโหสิ กมฺมํ อโหสิ กมฺม วิปาโก, อโหสิ กมฺมํ นาโหสิ กมฺม วิปาโก, อโหสิ กมฺมํ อตฺถิกมฺม วิปาโก, อโหสิ กมฺมํ นตฺถิ กมฺมวิปาโก, อโหสิกมฺมํ ภวิสฺสติ กมฺม วิปาโก, อโหสิ กมฺมํ น ภวิสฺสติ กมฺม วิปาโกติอาทินา ปฏิสมฺภิทา มคฺเค อาคโต. ‘‘สา’’ติ ปถม ชวน เจตนา. ‘‘อปฺปตร วิปากา จาตี’’ติ เอตฺถ ‘‘อิตี’’ติ เหตุ [Pg.157] อตฺเถ นิปาโต, ตสฺมา อจิรฏฺฐิติ กตฺตา ทิฏฺฐ ธมฺเม เอว ผลํ ทตฺวา วิคจฺฉติ, ตสฺมา อปฺปตร วิปากตฺตา อเหตุกมตฺตํ ผลํ ทตฺวา วิคจฺฉตีติ โยชนา. ‘‘ปจฺจโยติ จา’’ติ ปจฺจยํ ลทฺธาติ วุตฺโต ปจฺจโยติ จ. ‘‘โส’’ติ มหนฺตํ วุตฺโต ปจฺจโย. ‘‘กากวลิยาทีนํ วิยา’’ติ กากวลิยาทีนํ ปุคฺคลานํ ทิฏฺฐเวทนีย กมฺมํ วิย. ‘‘ปากฏตรปฺผลทานํ’’ติ สตฺตาหพฺภนฺตเร เอว เสฏฺฐิฏฺฐานปฺปฏิ ลาภาทิวเสน ปากฏตรปฺผลทานกํ กมฺมวิเสสํ. กมฺม ปถชวนสนฺตาเน ปวตฺตา ปถมชวน เจตนา วา อิตราปิ ปถม ชวน เจตนา วาติ โยชนา. ‘‘กาจี’’ติ เอกจฺจา ปถมชวน เจตนา. เสสานิ ทิฏฺฐธมฺม เวทนีย กมฺมานิ. १४७. ‘दिट्ठधम्मचतुक्क’ (दृष्टधर्मचतुष्क - या जन्मात विपाकात येणाऱ्या कर्मांचे चार प्रकार) मध्ये. ‘पस्सितब्बो’ (पाहण्याजोगा) म्हणजे ‘दिट्ठो’ (दृष्ट/पाहिलेला). ‘धम्मो’ म्हणजे स्कंध आणि आयतन रूपी धर्मांचा समूह. ‘दिट्ठो धम्मो’ म्हणजे ‘दिट्ठधम्मो’ (दृष्टधर्म). वर्तमान काळातील धर्मसमूह. ज्याला ‘अत्तभाव’ (आत्मभाव/अस्तित्व) असे म्हटले जाते. आत्मसंज्ञक दृष्टीने कल्पिलेल्या साराचा भाव किंवा प्रवृत्तीचे कारण, हा अर्थ दर्शवताना “दिट्ठधम्मो वुच्चती” (दृष्टधर्म म्हटला जातो) इत्यादी म्हटले आहे. “विपाकं पटिसंवेदेति” (विपाकाचा अनुभव घेतो) याद्वारे कर्मसाधन कसे दर्शविले आहे? ‘पटिसंवेदन’ (अनुभव घेणे) या क्रियापदात ‘विपाक’ हे कर्मपद पाहून, विपाक म्हणजे जे जाणण्याजोगे आहे, अनुभवण्याजोगे आहे. ‘पटिसंवेदितब्बं’ (अनुभव घेण्याजोगे) किंवा ‘पटिसंवेदनीयं’ (अनुभव घेण्यास योग्य) कारण ते विज्ञात (जाणलेले) आहे. “उपेच्चा” म्हणजे जवळ जाऊन (उपगंत्व). “उपपज्जित्वा” म्हणजे जवळ जाऊन प्राप्त होऊन (उपेच्च पज्जित्वा). ‘प्राप्त करून’ असा अर्थ आहे. विभावनी पाठात. “दिट्ठधम्मतो” म्हणजे ‘दिट्ठधम्मस्स’ (दृष्टधर्माचा). येथे स्वामी (षष्ठी) अर्थात पंचमी विभक्ती आहे. पाळीमध्ये म्हटले आहे. “एत्थही” इत्यादी पूर्व वाक्यात सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. ‘अपर’ हा शब्द नेहमी अपादान (विभक्ती) ची अपेक्षा ठेवतो. आणि ते अपादान नंतरच्या पदांद्वारे स्पष्ट होते. “दिट्ठधम्मा नागतानन्तर भवेही” म्हणजे दृष्टधर्मापासून आणि अनागत (भविष्यातील) अनंतर (लगेचच्या) भवापासून, असा अर्थ आहे. “परिवत्तो” म्हणजे प्रबंध (प्रवाह/परंपरा). किंवा ‘अपरापरियो’ म्हणजे अपर (दुसरा) आणि अपर (दुसरा) मिळून ‘अपरापरो’ (वारंवार/पुढील). अपरापरात (पुढील जन्मांमध्ये) प्रवृत्त होणारा तो ‘अपरापरियो’ असा अर्थ आहे. “उपपज्जभवं” म्हणजे अनागत अनंतर भव (भविष्यातील लगेचचा जन्म). ‘अहोसि कम्म’ (अहोसि कर्म) मध्ये ‘अहोसि’ हे पद ‘अञ्ञासि कोण्डञ्ञो’ (अज्ञासि कोंडण्य) या पदाप्रमाणे रूढ नामपद आहे, म्हणून “अहोसि नामकं” (अहोसि नावाचे) असे म्हटले आहे. पण ते रूढ पद कुठून प्रवृत्त झाले? हे सांगण्यासाठी “अहोसि कम्मं” इत्यादी म्हटले आहे. “एवं वुत्त पाठवसेना” (अशा प्रकारे सांगितलेल्या पाठाच्या वशाने) येथे सांगितलेला पाठ सावशेष (अपूर्ण) आहे. परिपूर्ण पाठ तर - “अहोसि कम्मं अहोसि कम्मविपाको, अहोसि कम्मं नाहोसि कम्मविपाको, अहोसि कम्मं अत्थि कम्मविपाको, अहोसि कम्मं नत्थि कम्मविपाको, अहोसि कम्मं भविस्सति कम्मविपाको, अहोसि कम्मं न भविस्सति कम्मविपाको” (कर्म होते, कर्माचा विपाक होता; कर्म होते, कर्माचा विपाक नव्हता; कर्म होते, कर्माचा विपाक आहे; कर्म होते, कर्माचा विपाक नाही; कर्म होते, कर्माचा विपाक होईल; कर्म होते, कर्माचा विपाक होणार नाही) इत्यादी रूपाने पटिसम्भिदामग्गात आलेला आहे. “सा” म्हणजे प्रथम जवन चेतना. “अप्पतरविपाका चाती” (आणि अल्प विपाक देणारी असल्यामुळे) येथे “इति” हा हेतू अर्थातील निपात आहे. म्हणून, ती अल्पकाळ टिकणारी असल्यामुळे दृष्टधर्मातच (याच जन्मात) फळ देऊन नष्ट होते. म्हणून, अल्प विपाक देणारी असल्यामुळे केवळ अहेतुक फळ देऊन नष्ट होते, अशी योजना आहे. “पच्चयोति चा” (आणि प्रत्यय म्हणून) म्हणजे प्रत्यय (कारण) प्राप्त करून घेतलेला प्रत्यय होय. “सो” म्हणजे मोठा सांगितलेला प्रत्यय. “काकवलियादीनं विया” म्हणजे काकवलिय इत्यादी पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) दृष्टवेदनीय कर्माप्रमाणे. “पाकठतरप्फलदानं” म्हणजे सात दिवसांच्या आतच श्रेष्ठिपद (श्रीमंत पद) प्राप्ती इत्यादींच्या रूपाने अधिक स्पष्ट फळ देणारा कर्मविशेष. कर्मपथ जवन संतानामध्ये प्रवृत्त झालेली प्रथम जवन चेतना किंवा इतरही प्रथम जवन चेतना, अशी योजना आहे. “काची” म्हणजे एखादी प्रथम जवन चेतना. उर्वरित सर्व दृष्टधर्मवेदनीय कर्मे आहेत. อุปปชฺชกมฺเม. ‘‘อตฺถ สาธิกา’’ติ สนฺนิฏฺฐานตฺถสาธิกา. ปาณฆาตาทิ กิจฺจสาธิกาติ วุตฺตํ โหติ. สุฏฺฐุ นิฏฺฐาเปตีติ สนฺนิฏฺฐาปิกา. ‘‘เสสานิ ปี’’ติ เสสานิ อุปปชฺช เวทนีย กมฺมานิปิ. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึ มนุสฺส โลเก. ‘‘มิสฺสกกมฺมานี’’ติ กุสลา กุสลมิสฺสกานิ กมฺมานิ. เวมานิกเปตวตฺถูนิ วิมานวตฺถุ ปาฬิยํ อาคตานิ. ‘‘สุคติยํ วิปตฺตึ อนุภวนฺตานิ วตฺถูนี’’ติ เอตฺถ ‘‘วิปตฺตึ’’ติ จกฺขุ โสตาทีนํ องฺค ปจฺจงฺคานํ วา วิปตฺตึ. นานา ทุกฺขุปฺปตฺติภูตํ วา วิปตฺตึ. ‘‘ทุคฺคติยํ สมฺปตฺตึ’’ติ มหิทฺธีนํ นาคสุปณฺณาทีนํ สมฺปตฺตึ. ‘‘ยถา วุตฺต วตฺถูหี’’ติ เวมานิก เปตวตฺถาทีหิ. อฏฺฐกถาปาเฐ. ‘‘เตสํ สงฺกมนํ นตฺถี’’ติ เตสํ กมฺมานํ วิปจฺจนกาล สงฺกนฺติ นาม นตฺถิ. ‘‘ยถาฐาเนเยว ปติฏฺฐนฺตี’’ติ ตานิ ทิฏฺฐ ธมฺมฏฺฐานาทิวเสน ภควตา ยถา วุตฺตฏฺฐาเน เอว ติฏฺฐนฺติ. ‘‘เอวํ วุตฺตํ’’ติ เตสํ สงฺกมนํ นตฺถีติอาทินเยน วุตฺตํ. ‘‘ยุตฺติยา วา อภาวโต’’ติ เอตฺถ ทิฏฺฐ ธมฺม เวทนียสฺส ปฏิสนฺธิ วิปากาทิ ยุตฺติยา อภาวโต. ‘उपपज्जकम्म’ (पुढील जन्मात विपाकात येणारे कर्म) मध्ये. “अत्थ साधिका” म्हणजे निश्चित अर्थाची (उद्दिष्टाची) साधिका. प्राणातिपात (जीवहत्या) इत्यादी कार्य साधणारी, असे म्हटले आहे. चांगल्या प्रकारे पूर्ण करते म्हणून ‘सन्निट्ठापिका’ (निश्चित पूर्ण करणारी). “सेसानि पी” म्हणजे उर्वरित उपपज्जवेदनीय (पुढील जन्मात अनुभवता येणारे) कर्मे सुद्धा. “इधा” म्हणजे या मनुष्यलोकात. “मिस्सककम्माणी” म्हणजे कुशल आणि अकुशल मिश्रित कर्मे. वैमानिक पेतांच्या कथा (वेमानिकपेतवत्थू) विमानवत्थु पाळीमध्ये आलेल्या आहेत. “सुगतीमध्ये विपत्तीचा अनुभव घेणाऱ्या कथा” येथे “विपत्ती” म्हणजे चक्षु (डोळे), श्रोत्र (कान) इत्यादी अंग-प्रत्यंगांची विकलता (विपत्ती), किंवा विविध दुःखांच्या उत्पत्तीचे कारण असणारी विपत्ती. “दुग्गतीमध्ये संपत्ती” म्हणजे महान ऋद्धी असलेल्या नाग, सुपर्ण (गरुड) इत्यादींची संपत्ती. “यथावृत्त वस्तूंनी” म्हणजे वैमानिक पेतवत्थु इत्यादींद्वारे. अट्ठकथा पाठात. “त्यांचे संक्रमण होत नाही” म्हणजे त्या कर्मांच्या विपाक देण्याच्या काळाचे संक्रमण (बदल) होत नाही. “यथास्थानेच प्रतिष्ठित होतात” म्हणजे ती कर्मे दृष्टधर्मस्थान इत्यादींच्या वशाने भगवंतांनी सांगितलेल्या स्थानावरच राहतात. “असे म्हटले आहे” म्हणजे त्यांचे संक्रमण होत नाही इत्यादी पद्धतीने म्हटले आहे. “किंवा युक्तीचा अभाव असल्यामुळे” येथे दृष्टधर्मवेदनीय कर्माच्या प्रतिसंधी विपाक इत्यादी युक्तीचा (तर्काचा) अभाव असल्यामुळे. ทิฏฺฐธมฺมจตุกฺกํ. दृष्टधर्मचतुष्क (या जन्मात विपाकात येणाऱ्या कर्मांचे चार प्रकार समाप्त). ๑๔๘. ปากฏฺฐานจตุกฺเก. ‘‘กายาทีนํ’’ติ โจปนกายาทีนํ. กาย วิญฺญตฺตาทีนนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อติปาเตนฺตี’’ติ อติกฺกมฺม [Pg.158] ปโยเคน อภิภวิตฺวา ปาเตนฺติ. เตนาห ‘‘อติปาตนญฺเจตฺถา’’ติอาทึ. ‘‘อทินฺนํ’’ติ สามิเกนอทินฺนํ ปรสนฺตกํ. อคมนียวตฺถูนิ นาม อวีติกฺกมนตฺถาย อนุปคนฺตพฺพานิ มาตุรกฺขิตาทีนิ อิตฺถิ ปุริสสรีรานิ. ‘‘ตสฺสา’’ติ ปรปาณสฺส. ‘‘ตโต’’ติ ปรปริคฺคหิต ภาวโต. ‘‘อจฺฉินฺทก เจตนา’’ติ ปรสนฺตกสฺส อตฺตโน สนฺตกกรณวเสน ภุสํ ปรสนฺตกา ภาวจฺฉินฺทก เจตนา. วิลุปฺปน เจตนาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘มคฺเคน มคฺคปฺปฏิปาทกสฺสา’’ติ อตฺตโน มคฺเคน ปรมคฺค สมฺปโยชกสฺส. ‘‘เอตฺถปี’’ติ ยถา อทินฺนาทาเน ปรปริคฺคหิต สญฺญิโนติ ทุตียํ องฺคปทํ วุตฺตํ. เอวํ เอตฺถปิ. เอตฺถ วทนฺติ อคมนีย วตฺถุ วเสน จิตฺตนฺติ อวตฺวา ตสฺมึ เสวน จิตฺตนฺติ วุตฺตํ. ตสฺมา อคมนีย วตฺถุ สญฺญิตาติ อวุตฺตมฺปิ วุตฺตสทิสํ โหตีติ. น โหติ. น หิ ตสฺมินฺติ วจนํ สญฺญาวิเสส สหิตํ อตฺถํ วทติ. อีทิเสสุ จ ฐาเนสุ สเจ สญฺญาปธานํ โหติ. ปาณสญฺญิตา, ปรปริคฺคหิต สญฺญิตา,ติ องฺค ปทํ วิย อิธปิ อคมนีย วตฺถุ สญฺญิตาติ ทุตียํ องฺคปทํ อวสฺสํ วตฺตพฺพํ โหติ. กสฺมา, องฺคนิยมฏฺฐานตฺตา. เตนาห ‘‘เอเตนา’’ติอาทึ. ‘‘จตุรงฺคีโกว วุตฺโต’’ติ ตสฺส จตฺตาโร สมฺภารา. อคมนีย วตฺถุ, ตสฺมึ เสวน จิตฺตํ, เสวนปฺปโยโค, มคฺเคน มคฺคปฺปฏิปตฺติ อธิวาสนนฺติ. ‘‘สา’’ติ ภิกฺขุนี. ‘‘รกฺขิตาสุ สงฺคหิตา’’ติ มาตุรกฺขิต ปิตุ รกฺขิตาทีสุ สงฺคหิตา. ‘‘ฏีกาสุ ปนา’’ติ สุตฺตนฺตฏีกาสุ ปน. ‘‘สา’’ติ ภิกฺขุนี. ปาสณฺฑา วุจฺจนฺติ ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคตาทีนิ. ตํ วาทิโน ปาสณฺฑิยา นาม. เตสํ ธมฺโม ปาสณฺฑิย ธมฺโม นาม. มิจฺฉาจาโรปิ ทุสฺสีลาย อิตฺถิยา วีติกฺกโม อปฺปสาวชฺโช. ตโต โครูป สีลิกาย มหาสาวชฺโช. ตโต สรณงฺคตาย, ปญฺจ สิกฺขา ปทิกาย, สามเณริยา, ปุถุชฺชน ภิกฺขุนิยาติอาทิ. อฏฺฐกถา ปาเฐ. ‘‘เอตฺถา’’ติ อิมสฺมึ อกุสลกายกมฺเม. ‘‘น คหิตํ’’ติ เถเรน วา อฏฺฐกถาจริเยหิ วา น คหิตํ. สุรญฺจ เมรยญฺจ ปิวนฺติ เอเตนาติ สุราเมรย ปานํ. ตทชฺโฌหรณ เจตนา กมฺมํ. ‘‘สพฺพ ลหุโก’’ติ สพฺเพสํ สุราปาน กมฺม วิปากานํ มชฺเฌ [Pg.159] โย วิปาโก ลหุกตโร, ปวตฺติวิปากมตฺโตติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อุมฺมตฺตกสํวตฺตนิโก’’ติ อุมฺมตฺตภาว สํวตฺตนิโก. ‘‘ปญฺจปี’’ติ สุราปาน กมฺเมน สห ปญฺจปิ. มูลฏีกา วจเน. ‘‘ตสฺสา’’ติ สุราปาน กมฺมสฺส. ปฏิสมฺภิทา มคฺคฏีกายํ อิมสฺส วากฺยสฺส สํวณฺณนายํ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ตตฺถ ‘‘ตพฺพิ รมณาทโย จา’’ติ ตโต สุราปานโต วิรมณาทโย จ. ‘‘มทสฺสา’’ติ มชฺชนสฺส. ‘‘อปุญฺญปถสฺสา’’ติ อกุสล กมฺม ปถสฺส. ‘‘ตพฺพิรติ ปี’’ติ ตโต สุราปานโต วิรติปิ. ‘‘นิมฺมทตายา’’ติ มชฺชนรหิต ภาวสฺส. ‘‘สา’’ติ นิมฺมทตา. ‘‘ปุญฺญปถสฺสา’’ติ กุสลกมฺม ปถสฺส. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. ‘‘ตานี’’ติ สุราปาน กมฺมตพฺพิรติ กมฺมานิ. ‘‘น อิตรํ’’ติ กมฺมปเถหิ อสมฺพนฺธํ. สุราปานํ วิสุํ ปฏิสนฺธึ น เทตีติ โยชนา. ตพฺพิรติ กมฺเม ปน สเจ อิทํ สุราปานํ นาม ปาปกมฺมํ ทุจฺจริตนฺติ ญตฺวา สมาทาน วิรติ สมฺปตฺตวิรติ วเสน ตํ สิกฺขาปทํ รกฺขติ. ตํ สีลํ อญฺเญหิ ปุญฺญปเถหิ อสมฺพนฺธมฺปิ วิสุํ ปฏิสนฺธึ น เทตีติ น วตฺตพฺพํ. ‘‘เอวมิทํ ปี’’ติ เอวํ อิทมฺปิ สุราปาน กมฺมํ กมฺม ปถปตฺตสฺส กมฺมสฺส ปริวารภูตํ เอว ปฏิสนฺธึ ชเนตีติ โยชนา. ‘‘ตตฺถา’’ติ กมฺมปถสุตฺเตสุ. สรูปโต น วุตฺตนฺติ จ สกฺกา วตฺตุนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยํ’’ติ ยํ สุราปาน กมฺมํ. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุ กมฺมปถสุตฺเตสุ. กมฺม ชนนํ นาม ทุจฺจริต กมฺมานํ ชนนํ. สกฺเกน เทวาน มินฺเทน ตสฺส อปายคามิตา วุตฺตาติ สมฺพนฺโธ. ตสฺสาสุราย ปุณฺณํ อิมํ สุรากุมฺภํกิณาถ. มูลํ เทถ คณฺหาถาติ อตฺโถ. ‘‘ตสฺสา’’ติ สุราปาน กมฺมสฺส. อปายํ คเมติ สมฺปาเปตีติ อปาย คามี. ‘‘ยทิทํ’’ติ ยา อยํ ยถาลาภ โยชนา อตฺถิ. มูลฏีกา วจเน. ‘‘กมฺมสหชาตา’’ติ อกุสล กมฺมสหชาตา ตณฺหา. ‘‘เตสํ’’ติ เตสํ ปญฺจนฺนํ กมฺมานํ. ‘‘โกฏฺฐาสโต’’ติ ธมฺมสงฺคณิยํ ผสฺโส โหติ, เวทนา โหตีติอาทินา วุตฺเต ธมฺมุทฺเทสวาเร ฌานาทิโกฏฺฐาสา นาม อาคตา. เตสุ ปญฺจ สิกฺขาปทา โกฏฺฐาสโต กมฺมปถ โกฏฺฐาสิกา เอว. กมฺมปถ โกฏฺฐาเส อนฺโตคธาติ อตฺโถ. ‘‘ปุริมานํ จตุนฺนํ’’ติ ปาณาติ ปาตาทีนํ [Pg.160] จตุนฺนํ กมฺมานํ. ‘‘ปฏิกฺขิตฺโต’’ติ ตสฺส กมฺมปถภาโว ปฏิกฺขิตฺโต. ‘‘ตตียํ’’ติ ตตีย สุตฺตํ. เอตาสุปิ จ อฏฺฐกถาสุ. १४८. पाकट्ठानचतुष्कात (प्रकट स्थान चतुष्कात). 'कायादीनं' म्हणजे हालचाल करणाऱ्या काया (शरीर) इत्यादींचे. कायाविज्ञप्ति इत्यादींचे असे म्हटले आहे. 'अतिपातेन्ति' म्हणजे मर्यादा ओलांडून, प्रयोगाने (प्रयत्नाने) पराभूत करून पाडतात (मारतात). म्हणूनच 'अतिपातनञ्चेत्था' इत्यादी म्हटले आहे. 'अदिन्नं' म्हणजे मालकाने न दिलेले, दुसऱ्याच्या मालकीचे. अगमनीय वस्तू म्हणजे (नैतिक) उल्लंघन न करण्यासाठी जवळ न जाण्यायोग्य अशी माता-रक्षित इत्यादी स्त्री आणि पुरुषांची शरीरे होत. 'तस्स' म्हणजे दुसऱ्याच्या प्राणाचे. 'ततो' म्हणजे दुसऱ्याच्या मालकीच्या भावापासून (स्वामित्वापासून). 'अच्छिन्दक चेतना' म्हणजे दुसऱ्याच्या मालकीच्या वस्तूला स्वतःच्या मालकीचे करण्याच्या हेतूने, दुसऱ्याच्या मालकीचा भाव नष्ट करणारी तीव्र चेतना. 'विलुप्पन चेतना' (लुटण्याची चेतना) असे म्हटले आहे. 'मग्गेन मग्गप्पटिपादकस्स' म्हणजे स्वतःच्या (जनन) मार्गाने दुसऱ्याच्या मार्गाशी (जननेंद्रियाशी) संयोग करणाऱ्याचे. 'एत्थपि' म्हणजे ज्याप्रमाणे अदिन्नादानात 'दुसऱ्याच्या मालकीचे असल्याची संज्ञा (जाणीव)' हे दुसरे अंगपद म्हटले आहे, त्याचप्रमाणे येथेही. येथे (काही आचार्य) म्हणतात की, 'अगमनीय वस्तूच्या संबंधात चित्त' असे न म्हणता 'त्याच्या सेवनाचे चित्त' असे म्हटले आहे. म्हणून 'अगमनीय वस्तूची संज्ञा (जाणीव)' असे न म्हटले तरी ते म्हटल्यासारखेच होते. (पण तसे) होत नाही. कारण 'त्याच्यामध्ये' (तस्मिं) हा शब्द विशिष्ट संज्ञेसह अर्थ व्यक्त करत नाही. आणि अशा ठिकाणी जर संज्ञा (जाणीव) प्रधान असेल, तर 'प्राणसंज्ञिता' (प्राण असल्याची जाणीव), 'परपरिग्गहितसंज्ञिता' (दुसऱ्याच्या मालकीचे असल्याची जाणीव) या अंगपदांप्रमाणे येथेही 'अगमनीयवस्तू संज्ञिता' हे दुसरे अंगपद अवश्य सांगायला हवे होते. का? कारण हे अंगांचे नियमन करण्याचे स्थान आहे. म्हणूनच 'एतेन' इत्यादी म्हटले आहे. 'चaturङ्गीकोव वुत्तो' (चार अंगांचाच सांगितला आहे) म्हणजे त्याचे चार घटक (संभार) आहेत: अगमनीय वस्तू, तिच्या सेवनाचे चित्त, सेवनाचा प्रयोग (प्रयत्न), आणि मार्गाने मार्गाची प्रतिपत्ती (संयोग) सहन करणे (स्वीकारणे). 'सा' म्हणजे भिक्खुणी. 'रक्खितासु सङ्गहिता' म्हणजे माता-रक्षित, पिता-रक्षित इत्यादींमध्ये समाविष्ट केलेली. 'टीकासु पना' म्हणजे सुत्तन्त टीकांमध्ये तर. 'सा' म्हणजे भिक्खुणी. 'पासंड' (पाखंड) म्हणजे बासष्ट (६२) दृष्टीगती (चुकीचे दृष्टिकोन) इत्यादी. त्याचे प्रतिपादन करणारे 'पासंडीय' (पाखंडी) होत. त्यांचा धर्म म्हणजे 'पासंडीय धर्म' (पाखंडी धर्म) होय. दुःशील (चरित्रहीन) स्त्रीशी केलेला व्यभिचार (मिच्छाचार) हा कमी दोषाचा (अल्प-सावद्य) असतो. त्यापेक्षा गो-व्रत पाळणाऱ्या (किंवा पशूंसारखे वर्तन करणाऱ्या) स्त्रीशी केलेला व्यभिचार अधिक दोषाचा (महा-सावद्य) असतो. त्यापेक्षा शरण गेलेल्या (त्रिशरण घेतलेल्या), पंचशील पाळणाऱ्या, सामणेरी आणि पृथग्जन भिक्खुणी इत्यादींशी केलेला व्यभिचार उत्तरोत्तर अधिक दोषाचा असतो. अट्ठकथा पाठात. 'एत्था' म्हणजे या अकुशल कायकर्मात. 'न गहितं' म्हणजे थेरांनी (स्थविरांनी) किंवा अट्ठकथाचार्यांनी ग्रहण केलेले नाही. ज्याच्याद्वारे सुरा (मद्य) आणि मेरय (आसव) पितात, ते 'सुरामेरयपान' होय. ते गिळण्याची (पिण्याची) चेतना हेच कर्म आहे. 'सब्ब लहुको' म्हणजे सुरापानाच्या सर्व कर्मविपाकांमध्ये जो विपाक अत्यंत हलका (कमी तीव्र) आहे, तो केवळ प्रवृत्ती-विपाक (जीवनातील विपाक) आहे असे म्हटले आहे. 'उम्मत्तकसंवत्तनिको' म्हणजे वेडेपणाला कारणीभूत ठरणारा. 'पञ्चपि' म्हणजे सुरापान कर्मासह पाचही. मूळटीकेच्या वचनात. 'तस्सा' म्हणजे सुरापान कर्माचे. पटिसम्भिदामग्ग-टीकेमध्ये या वाक्याच्या स्पष्टीकरणात (संवरणेत) म्हटले आहे, असा संबंध आहे. तेथे 'तब्बिरमणादयो चा' म्हणजे त्या सुरापानापासून विरती (दूर राहणे) इत्यादी. 'मदस्सा' म्हणजे मदाचे (उन्मादाचे/नशेचे). 'अपुञ्ञपथस्सा' म्हणजे अकुशल कर्मपथाचे. 'तब्बिरति पी' म्हणजे त्या सुरापानापासून विरती देखील. 'निम्मुदताया' म्हणजे मद-रहित (नशामुक्त) अवस्थेची. 'सा' म्हणजे ती मद-रहित अवस्था. 'पुञ्ञपथस्सा' म्हणजे कुशल कर्मपथाची. 'इती' म्हणजे म्हणून. 'तानी' म्हणजे सुरापान कर्म आणि त्यापासून विरतीचे कर्म. 'न इतरं' म्हणजे कर्मपथांशी संबंध नसलेले. सुरापान हे स्वतंत्रपणे प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) देत नाही, अशी योजना (अर्थ) आहे. परंतु, त्यापासून विरतीच्या कर्मामध्ये जर 'हे सुरापान पापमय कर्म आणि दुश्चरित आहे' असे जाणून, समादान-विरती किंवा संपत्त-विरतीच्या द्वारे त्या शिक्षापदाचे रक्षण केले जाते, तर ते शील इतर पुण्यपथांशी (कुशल कर्मांशी) संबंधित नसले तरी स्वतंत्रपणे प्रतिसंधी देत नाही, असे म्हणता येत नाही (म्हणजे ते स्वतंत्रपणे प्रतिसंधी देऊ शकते). 'एवमिदं पी' म्हणजे याचप्रमाणे हे सुरापान कर्म देखील कर्मपथाला प्राप्त झालेल्या कर्माचे परिवारभूत (सहगामी) होऊनच प्रतिसंधी निर्माण करते, अशी योजना आहे. 'तत्था' म्हणजे कर्मपथ-सुत्तांमध्ये. प्रत्यक्ष स्वरूपात (सरूपतः) सांगितले नाही, असेही म्हणता येणे शक्य आहे, असा संबंध आहे. 'यं' म्हणजे जे सुरापान कर्म. 'तत्था' म्हणजे त्या कर्मपथ-सुत्तांमध्ये. 'कर्मजनन' म्हणजे दुश्चरित कर्मांची निर्मिती होय. देवांचा राजा शक्र (इंद्र) याने त्याचे अपायगामित्व (नरकात नेणारे असणे) सांगितले आहे, असा संबंध आहे. 'त्या सुरेने (मद्याने) भरलेला हा सुराकुंभ (मद्याचा घडा) खरेदी करा. किंमत द्या आणि घ्या' असा अर्थ आहे. 'तस्सा' म्हणजे सुरापान कर्माचे. अपायाला (दुर्गतीला) नेते किंवा पोहोचवते म्हणून 'अपायगामी'. 'यदिदं' म्हणजे जी ही यथालाभ योजना (उपलब्ध अर्थानुसार जुळवणी) आहे. मूळटीकेच्या वचनात. 'कम्मसहजाता' म्हणजे अकुशल कर्मासोबत उत्पन्न झालेली तृष्णा. 'तेसं' म्हणजे त्या पाच कर्मांचे. 'कोट्ठासतो' म्हणजे धम्मसंगणीमध्ये 'स्पर्श होतो, वेदना होते' इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या धम्मुद्देशवारात (धर्मांच्या उद्देश भागात) ध्यानादी कोठ्ठास (विभाग/वर्ग) आले आहेत. त्यामध्ये पाच शिक्षापदे विभागाच्या दृष्टीने कर्मपथ-विभागातीलच (कर्मपथ-कोठ्ठासिक) आहेत. ती कर्मपथ विभागातच समाविष्ट आहेत, असा अर्थ आहे. 'पुरिमानं चतुन्नं' म्हणजे प्राणातिपात (जीवहत्या) इत्यादी पहिल्या चार कर्मांचे. 'पटिक्खित्तो' म्हणजे त्याचा कर्मपथ-भाव नाकारला (अस्वीकृत केला) आहे. 'ततीयं' म्हणजे तिसरे सुत्त. आणि या अट्ठकथांमध्ये देखील। กายกมฺมาทีสุ. สสมฺภารกาโย นาม สกโล รูปกาโย. ปสาทกาโย นาม กายปสาโท เอว. กาย วิญฺญตฺติ โจปนกาโย นาม. ‘‘โจปน’’นฺติ จ จลนํ วุจฺจติ. ‘‘โส เยวา’’ติ โจปนกาโยเยว. กายกมฺม นาม ลาโภ จ โหติ, ตสฺมา โส กมฺมานํ ปวตฺติ มุขนฺติ วุจฺจตีติ โยชนา. ‘‘กมฺมานิ วิเสเสตุํ’’ติ อิทํ กายกมฺมํ นาม, อิทํ วจีกมฺมํ นามาติ วิเสเสตุํ นิยเมตุํ. ‘‘สกฺโกนฺตี’’ติ กมฺมานิ วิเสเสตุํ สกฺโกนฺติ. ตสฺมา กายทฺวาเร วุตฺติโตติ จ วจีทฺวาเร วุตฺติโตติ จ วุตฺตนฺติ อธิปฺปาโย. มิจฺฉาจารสฺส วจีทฺวาเร อปฺปวตฺติโต ‘‘ปุริมานิ ทฺเว’’ติ วุตฺตํ. ‘‘มชฺฌิมานิ จตฺตารี’’ติ มุสาวาทาทีนิ จตฺตาริ วจีกมฺมานิ. ‘‘ฉพฺพิธานิ ตานิ วชฺชานีติ’’ติ ‘กายกมฺมํ ชเหยฺยุ’นฺติอาทีนิ ฉพฺพิธานิ ตานิ วชฺชานิ. กถํ เอกเมเกน พาหุลฺล สทฺเทน ฉพฺพิธานิ ตานิ วชฺเชตีติ. อนฺวยโต จ พฺยติเรกโต จ วชฺเชติ. กถํ, ปาณาติปาต กมฺมํ กทาจิ อปฺปเกน วจีทฺวาเร อุปฺปนฺนมฺปิ กายทฺวาเร เอว ปวตฺติ พหุลตฺตา กายกมฺมเมว โหติ. วจีกมฺม สงฺขฺยํ น คจฺฉติ. ทฺเว วา อสฺส นามานิ น ภวนฺติ. วจีทฺวาเร ปน อปฺปกวุตฺติตฺตา วจีกมฺมํ นาม น โหติ. กายกมฺมนฺติ นามํ น ชหติ. ทฺเว วา อสฺส นามานิ น ภวนฺตีติ เอวํ เอเกน กายทฺวาเร พาหุลฺล วุตฺติวจเนน ปาณาติปาต กมฺเม ฉพฺพิธานิ วชฺชานิ วชฺเชตีติ. เอวํ เสเสสุ. วนจรโก นาม วนลุทฺทโก. โส ปน กทาจิ อปฺปเกน คาเม จรนฺโตปิ วเน พาหุลฺล จาริตฺตา วนจรโก เอว โหติ. คามจรโกติ นามํ น ลภติ. ทฺเว วา อสฺส นามานิ น ภวนฺติ. เอวํ สงฺคามาวจรกาปิ. สงฺคามาวจโร นาม สงฺคาเม พาหุลฺลาวจโร หตฺถี วุจฺจติ. เอตฺถ มโนทฺวารํ สพฺพ กมฺม สาธารณตฺตา กมฺมานิ วิเสเสตุํ น สกฺโกตีติ วุตฺตํ. เอวญฺจสติ, ‘อภิชฺฌา พฺยาปาโท มิจฺฉาทิฏฺฐิ เจติ มนสฺมึ วุตฺติโต มโนกมฺมํ นามา’ติ อิทํ น วตฺตพฺพนฺติ. โน น วตฺตพฺพํ. กมฺม สิทฺธึ ปฏิจฺจ อญฺญทฺวาเรหิ อสาธารณตฺตา[Pg.161]. เตนาห ‘‘มโนกมฺมานิ ปนา’’ติอาทึ. ‘‘สิทฺธํ’’ติ นิพฺพตฺตํ. ‘‘กายกมฺมทฺวารํ’’ติ เอตฺถ ตตฺถ โจปนกาโย กายกมฺมานํ ปวตฺติ พหุลตฺตา กายกมฺม ทฺวารํ นาม. โจปนวาจา ตตฺถ วจีกมฺมานํ ปวตฺติ พหุลตฺตา วจีกมฺมทฺวารํ นาม. กุสลา กุสล ชวน จิตฺตํ ปน มโนกมฺมานํ ตตฺเถว กมฺม กิจฺจ สิทฺธิโต มโนกมฺม ทฺวารํ นามาติ เอวํ กมฺเมน ทฺวาร ววตฺถานํ เวทิตพฺพํ. ‘‘ตสฺส ทฺวารสฺส นามํ ภินฺทิตุํ วา’’ติ กาโยติ นามํ ภินฺทิตุํ วา. ‘‘อตฺตโน นามํ ทาตุนฺติ วา’’ติ วจีติ นามํ ตสฺส ทาตุํ วา. ‘‘พฺราหฺมณ คามาทีนํ พฺราหฺมณ คามาทิภาโว วิยา’’ติ ตสฺมึ อญฺญกุเลสุ วสนฺเตสุปิ พฺราหฺมณ กุลพหุลตฺตา พฺราหฺมณ คาโมตฺเวว นามํ โหติ. ตสฺมึ วเน อญฺญรุกฺเขสุ สนฺเตสุปิ ขทีรรุกฺข พหุลตฺตา ขทีรวนนฺตฺเวว นามํ โหตีติ วตฺตพฺพนฺติ. กายกมฺมํ นิฏฺฐิตํ. कायकर्म इत्यादींमध्ये. ससंभारकाय म्हणजे संपूर्ण रूपकाय होय. प्रसादकाय म्हणजे कायप्रसादच होय. कायविज्ञप्ति म्हणजे चोपनकाय होय. आणि 'चोपन' म्हणजे चलन (हालचाल) असे म्हटले जाते. 'तोच' म्हणजे चोपनकायच होय. कायकर्म हे प्राप्त होते, म्हणून ते कर्मांच्या प्रवृत्तीचे मुख (द्वार) म्हटले जाते, अशी योजना आहे. 'कर्मांचे वर्गीकरण करण्यासाठी' म्हणजे हे कायकर्म आहे, हे वचीकर्म आहे, असे विशेष रूपाने निश्चित करण्यासाठी. 'समर्थ आहेत' म्हणजे कर्मांचे वर्गीकरण करण्यास समर्थ आहेत. म्हणून कायद्वारातील प्रवृत्तीमुळे आणि वचीद्वारातील प्रवृत्तीमुळे असे म्हटले आहे, असा अभिप्राय आहे. काममिथ्याचाराची वचीद्वारात प्रवृत्ती होत नसल्यामुळे 'पहिले दोन' असे म्हटले आहे. 'मधली चार' म्हणजे मृषावाद इत्यादी चार वचीकर्मे होत. 'ती सहा प्रकारची वर्ज्ये आहेत' म्हणजे 'कायकर्म सोडावे' इत्यादी सहा प्रकारची वर्ज्ये होत. एकाच 'बाहुल्य' (प्रचुरता) शब्दाने ती सहा प्रकारची वर्ज्ये कशी वर्जित केली जातात? अन्वय आणि व्यतिरेक या दोन्ही मार्गांनी वर्जित केली जातात. कसे ते पहा, प्राणातिपात (जीवहिंसा) कर्म कधीतरी थोड्या प्रमाणात वचीद्वारात उत्पन्न झाले तरी, कायद्वारातच त्याची प्रवृत्ती अधिक प्रमाणात (बाहुल्य) असल्यामुळे ते कायकर्मच असते. ते वचीकर्माच्या संख्येत जात नाही. किंवा त्याला दोन्ही नावे मिळत नाहीत. परंतु वचीद्वारात अल्प प्रवृत्ती असल्यामुळे त्याला वचीकर्म म्हटले जात नाही. ते 'कायकर्म' हे नाव सोडत नाही. त्याला दोन्ही नावे मिळत नाहीत, अशा प्रकारे कायद्वारातील बाहुल्य प्रवृत्तीच्या एकाच वचनाने प्राणातिपात कर्मामध्ये सहा प्रकारची वर्ज्ये वर्जित केली जातात. इतर कर्मांच्या बाबतीतही असेच समजावे. वनचरक म्हणजे वनलुद्दक (वनातील शिकारी) होय. तो कधीतरी थोड्या वेळासाठी गावात फिरत असला तरी, वनातच त्याचे अधिक फिरणे (बाहुल्य) असल्यामुळे तो 'वनचरक'च असतो. त्याला 'ग्रामचरक' हे नाव मिळत नाही. किंवा त्याला दोन्ही नावे मिळत नाहीत. तसेच संग्रामावचराच्या बाबतीतही आहे. संग्रामावचर म्हणजे युद्धात प्रामुख्याने वावरणारा हत्ती होय. येथे मनोद्वार हे सर्व कर्मांसाठी साधारण (समान) असल्यामुळे ते कर्मांचे वर्गीकरण करण्यास समर्थ नाही, असे म्हटले आहे. असे असताना, 'अभिज्झा, ब्यापाद आणि मिच्छादिट्ठी (मिथ्यादृष्टी) हे मनात प्रवृत्त होत असल्यामुळे मनोकर्म आहेत' असे म्हणू नये का? नाही, असे म्हणू नये असे नाही (म्हणजेच नक्कीच म्हणावे). कारण कर्मसिद्धीच्या दृष्टीने ते इतर द्वारांपेक्षा असाधारण (विशिष्ट) आहे. म्हणूनच 'परंतु मनोकर्मे...' इत्यादी म्हटले आहे. 'सिद्ध' म्हणजे उत्पन्न झालेले. 'कायकर्मद्वार' यामध्ये, तेथे चोपनकाय हा कायकर्मांच्या प्रवृत्तीचे बाहुल्य असल्यामुळे 'कायकर्मद्वार' या नावाने ओळखला जातो. चोपनवाचा ही तेथे वचीकर्मांच्या प्रवृत्तीचे बाहुल्य असल्यामुळे 'वचीकर्मद्वार' या नावाने ओळखली जाते. परंतु कुशल आणि अकुशल जवन चित्त हे मनोकर्मांचे तेथेच कर्मकृत्य सिद्ध होत असल्यामुळे 'मनोकर्मद्वार' या नावाने ओळखले जाते; अशा प्रकारे कर्माद्वारे द्वारांची व्यवस्था समजून घ्यावी. 'त्या द्वाराचे नाव बदलण्यासाठी' म्हणजे 'काय' हे नाव बदलण्यासाठी. 'किंवा स्वतःचे नाव देण्यासाठी' म्हणजे त्याला 'वची' हे नाव देण्यासाठी. 'जसे ब्राह्मण-ग्राम इत्यादींमध्ये ब्राह्मण-ग्रामत्व असते', म्हणजेच त्या गावात इतर कुळे राहत असली तरी ब्राह्मणांच्या कुळांचे बाहुल्य असल्यामुळे त्याला 'ब्राह्मण-ग्राम' असेच नाव दिले जाते. त्या वनात इतर वृक्ष असले तरी खदिर वृक्षांचे बाहुल्य असल्यामुळे त्याला 'खदिरवन' असेच नाव दिले जाते, असे म्हणावे. कायकर्म समाप्त झाले। ๑๔๙. วจีกมฺเม. ‘‘มุสา วทนฺตี’’ติ อภูตโต วทนฺติ. ปิสติ เอตายาติ ปิสุณา. ‘‘นิรุตฺติ นเยนา’’ติ เอตฺถ ปิยสุญฺญ กรณาติ วตฺตพฺเพ อกฺขร โลปกรณํ นิรุตฺติ นโย นาม. ‘‘เยนา’’ติ เยนชเนน. ‘‘สมฺผํ’’ติ เอตฺถ สํสทฺโท สมฺมติ ทุกฺขํ เอเตนาติ อตฺเถน สุเข หิเต วตฺตตีติ อาห ‘‘สํ สุขํ หิตญฺจา’’ติ. กีทิสํ สุขํ หิตญฺจาติ อาห ‘‘สาธุชเนหิ อธิคนฺตพฺพํ’’ติ. เอเตน ปาปชเนหิ อธิคนฺตพฺพํ หิตสุขํ ปฏิกฺขิปติ. หิตสุขสฺส วินาสนํ นาม ตสฺส อาคมน มคฺคภินฺทนนฺติ อาห ‘‘หิตสุข มคฺคํ ภินฺทตี’’ติ. ‘‘ตํ วา’’ติ เอตฺถ ‘‘ตํ’’ติ หิตสุขํ. ‘‘อตฺถ ธมฺมา ปคตสฺสา’’ติ อตฺถโต จ ธมฺมโต จ อปคตสฺส. ‘‘ปฏิภาณ จิตฺตสฺสา’’ติ สุณนฺตานํ จิตฺตรติ จิตฺตหาสวฑฺฒนตฺถาย ปฏิภาณญฺญาเณน จิตฺตีกตสฺส. ‘‘ยตฺถา’’ติ ยสฺมึ กถา มคฺเค. ‘‘อตฺถ ธมฺม วินยปทํ’’ติ อตฺถ ปทญฺจ ธมฺมปทญฺจ วินย ปทญฺจ. ตตฺถ อตฺโถ นาม อาโรคฺยสมฺปตฺติ, มิตฺตสมฺปตฺติ, ปญฺญาสมฺปตฺติ, ธน สมฺปตฺติ, โภคสมฺปตฺติโย. ตาสุ โกสลฺลชนกํ วากฺยปทํ อตฺถปทํ นาม. อิทํ สุจริตํ นาม สคฺคสํวตฺตนิกํ, อิทํ ทุจฺจริตํ นาม อปาย สํวตฺตนิกนฺติ เอวํ สภาว ธมฺเมสุ โกสลฺล ชนกํ วากฺย ปทํ ธมฺม ปทํ นาม. เอวํ จิตฺตํ ทมิตพฺพํ, เอวํ อินฺทฺริยานิ ทมิตพฺพานิ, เอวํ [Pg.162] ราโค วิเนตพฺโพ, เอวํ โทโส วิเนตพฺโพติอาทินา วิเนตพฺเพสุ วินย โกสลฺลชนกํ วากฺยปทํ วินย ปทํ นาม. ยตฺถ เอวรูปํ อตฺถ ปทญฺจ ธมฺม ปทญฺจ วินย ปทญฺจ กิญฺจิ นตฺถิ. ตสฺส วาจา วตฺถุมตฺตสฺส เอตํนามํ โหตีติ โยชนา. ‘‘สมฺผํ’’ติ วุตฺตปฺปการํ นิรตฺถกวจนํ. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุ วจีกมฺเมสุ. วิสํวาทนํ นาม วิรชฺฌา ปนํ. วิสํวาทโก นาม วิรชฺฌาปนโก. อตฺถํ ภญฺชติ วินาเสตีติ อตฺถ ภญฺชนโก. ‘‘กมฺมปถเภโท’’ติ ปฏิสนฺธิ ชนโก กมฺมปถวิเสโส. ‘‘อิตโร’’ติ อตฺถ ภญฺชนกโต อญฺโญ มุสาวาโท. ‘‘กมฺม เมวา’’ติ ปวตฺติ วิปาก ชนกํ วจีกมฺมเมว. ‘‘รชานํ’’ติ ธูลีนํ. ตาสุ สุคติ ทุคฺคตีสุ อุปฺปชฺชนฺตีติ ตทุปฺปชฺชนกานิ. ‘‘ปถภูตตฺตา’’ติ อุปฺปตฺติมคฺคภูตตฺตา. ‘‘เภท ปุเรกฺขาเรนา’’ติ มิตฺตเภทปุเรกฺขาเรน. มิตฺตํ ภินฺทตีติ เภทโก. ‘‘สํกิลิฏฺฐ เจตนา’’ติ อตฺถ ปุเรกฺขาร ธมฺม ปุเรกฺขาร วินย ปุเรกฺขาร อนุสาสนิ ปุเรกฺขาร รหิตา เกวลํ เภทปุเรกฺขาร เจตนา สํกิลิฏฺฐ เจตนา นาม. ‘‘ปเร ภินฺเน เยวา’’ติ ปรชเน ปรชเนน มิถุเภทวเสน ภินฺเนเยว. ‘‘ยํ กิญฺจี’’ติ ยํ กิญฺจิ อกฺโกสวตฺถุ. ‘‘อยํ ปี’’ติ อยํ ผรุสวาจาปิ. เอวํ อกฺโกสน กมฺมํปิ อกฺโกสิตพฺพสฺส ทูเร ฐิตสฺสปิ มตสฺสปิ สมฺปชฺชตีติ โยชนา. อนตฺถํ นิรตฺถกวาจา วตฺถุ มตฺตํ วิญฺญาเปตีติ อนตฺถวิญฺญาปนโก. ‘‘สจฺจโต คณฺหนฺเต เยวา’’ติ ยถา โส กเถติ, ตถา ตํ วตฺถุ อุปฺปนฺน ปุพฺพนฺติ เอวํ สจฺจโต คณฺหนฺเตเยว. เกจิ สจฺจโต คณฺหิตฺวา กิญฺจิ วตฺถุํ ปูชนีย ฐาเน ฐเปตฺวา โถเมนฺตา ปูเชนฺตา วนฺทนฺตา ปริหรนฺติ. สมฺปรายิ กตฺถาย ตํ สรณํ คจฺฉนฺติ. สพฺพเมตํ นิรตฺถกํ โหติ. ‘‘ตทสฺสาทวเสนา’’ติ ตํ ราชกถาทึ ตตฺถ จิตฺตรตึ ลภิตฺวา อสฺสาทวเสน กเถนฺตสฺเสว กมฺมํ โหติ. อนิจฺจ ลกฺขณ วิภาวนตฺถาย วา รตนตฺตย คุณวิภาวนตฺถาย วา ปาป ครห กลฺยาณ สมฺภาวนาย วา กเถนฺตสฺส ปน สตฺถกเมว โหตีติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘อตฺถ ธมฺม วินย นิสฺสิตํ’’ติอาทึ. เสสเมตฺถ กายทฺวาเร ทีปิตเมว. १४९. वाचिक कर्मामध्ये (वचीकम्मात): 'मुसा वदन्ति' (असत्य बोलतात) म्हणजे जे घडलेले नाही (असत्य) ते बोलणे. 'पिसुती' (चूर्ण करणे/पिसणे) यावरून 'पिसुणा' (चुगली/पिशुनता) हा शब्द बनला आहे. 'निरुत्ति नयेन' (निरुक्तीच्या नियमाने) येथे 'पियसुञ्ञ करण' (प्रिय गोष्टी शून्य करणे) असे म्हणायचे असताना अक्षरांचा लोप करणे याला निरुक्तीचा नियम म्हणतात. 'येन' म्हणजे ज्या माणसाद्वारे. 'सम्फं' (व्यर्थ बडबड) यामध्ये 'सं' हा शब्द 'सम्मत' (दुःख शांत करणारे) या अर्थाने सुख आणि हितासाठी वापरला जातो, म्हणून 'सं सुखं हितञ्च' (सुख आणि हित) असे म्हटले आहे. ते सुख आणि हित कसे आहे? तर 'साधुजनेhi अधिगतब्बं' (साधुजनांद्वारे प्राप्त करण्यायोग्य) असे म्हटले आहे. याद्वारे पापी लोकांद्वारे प्राप्त होणाऱ्या सुख-हिताचा निषेध केला जातो. सुख-हिताचा विनाश करणे म्हणजे त्याच्या येण्याचा मार्ग नष्ट करणे, म्हणून 'हितसुख मग्गं भिन्दति' (सुख-हिताचा मार्ग नष्ट करतो) असे म्हटले आहे. 'तं वा' येथे 'तं' म्हणजे ते सुख-हित. 'अत्थ धम्मा पगतस्स' म्हणजे अर्थ आणि धम्मापासून दूर गेलेल्याचे. 'पटिभाण चित्तस्स' म्हणजे ऐकणाऱ्यांच्या मनात आनंद आणि उत्साह वाढवण्यासाठी प्रतिभान-ज्ञानाने (बुद्धीने) युक्त केलेल्याचे. 'यत्थ' म्हणजे ज्या संभाषणामध्ये किंवा कथेत. 'अत्थ धम्म विनयपदं' म्हणजे अर्थपद, धम्मपद आणि विनयपद. तिथे 'अर्थ' म्हणजे आरोग्यसंपत्ती, मित्रसंपत्ती, प्रज्ञासंपत्ती, धनसंपत्ती आणि भोगसंपत्ती होय. त्यांमध्ये कुशलता निर्माण करणारे वाक्य म्हणजे 'अर्थपद' होय. 'हे सुचरित स्वर्गाकडे नेणारे आहे, हे दुश्चरित अपायाकडे (दुर्गतीकडे) नेणारे आहे' अशा प्रकारे स्वभावधर्मांमध्ये कुशलता निर्माण करणारे वाक्य म्हणजे 'धम्मपद' होय. 'अशा प्रकारे चित्ताचे दमन केले पाहिजे, अशा प्रकारे इंद्रियांचे दमन केले पाहिजे, अशा प्रकारे रागाचे नियंत्रण केले पाहिजे, अशा प्रकारे द्वेषाचे नियंत्रण केले पाहिजे' इत्यादी प्रकारे विनय (शिस्त/संयम) शिकवणाऱ्या गोष्टींमध्ये कुशलता निर्माण करणारे वाक्य म्हणजे 'विनयपद' होय. जिथे अशा प्रकारचे अर्थपद, धम्मपद आणि विनयपद काहीही नसते, केवळ शब्दांचा समूह असलेल्या त्याच्या वाणीला हे नाव (सम्फप्पलाप - व्यर्थ बडबड) दिले जाते, असा संबंध आहे. 'सम्फं' म्हणजे वर सांगितल्याप्रमाणे निरर्थक वचन (व्यर्थ बडबड). 'तत्थ' म्हणजे त्या वाचिक कर्मांमध्ये. 'विसंवादन' म्हणजे फसवणे किंवा विसंगत बोलणे. 'विसंवादक' म्हणजे फसवणारा किंवा विसंगत बोलणारा. जो अर्थाचा नाश करतो किंवा हानी करतो, तो 'अत्थ भञ्जक' (हित नष्ट करणारा) होय. 'कम्मपथभेद' म्हणजे पुनर्जन्म (प्रतिसंधी) निर्माण करणारा विशिष्ट कर्मपथ. 'इतरो' म्हणजे हित नष्ट करणाऱ्या व्यतिरिक्त इतर असत्य बोलणे (मृषावाद). 'कम्म मेव' म्हणजे केवळ प्रवृत्ती आणि विपाक (फळ) देणारे वाचिक कर्मच. 'रजानं' म्हणजे धुळीचे (किंवा क्लेशांचे). त्या सुगती आणि दुर्गतींमध्ये जे उत्पन्न होतात, ते 'तदुपजनक' (त्यात उत्पन्न होणारे) आहेत. 'पथभूतत्ता' म्हणजे उत्पत्तीचा मार्ग बनल्यामुळे. 'भेद पुरक्खारेन' म्हणजे मित्रांमध्ये फूट पाडण्याच्या उद्देशाने. जो मित्रांमध्ये फूट पाडतो, तो 'भेदक' होय. 'संकिळिट्ठ चेतना' (मलीन चेतना) म्हणजे अर्थ, धम्म, विनय आणि अनुशासनाचा उद्देश नसलेली, केवळ फूट पाडण्याच्या उद्देशाने युक्त असलेली चेतना होय. 'परे भिन्ने येव' म्हणजे दुसऱ्या लोकांमध्ये आपापसात फूट पडल्यावरच. 'यं किञ्चि' म्हणजे कोणतेही शिवीगाळ किंवा निंदेचे कारण. 'अयं पि' म्हणजे ही परुष वाचा (कठोर शब्द) सुद्धा. अशा प्रकारे शिवीगाळ करण्याचे कर्म, ज्याला शिवी दिली जात आहे तो दूर असला किंवा मृत असला तरीही घडते, असा संबंध आहे. अनर्थकारक, निरर्थक आणि केवळ शब्दांचा समूह व्यक्त करणारी वाणी म्हणजे 'अनर्थविज्ञापक' होय. 'सच्चतो गण्हन्ते येव' म्हणजे जसे तो बोलतो, तसेच ती गोष्ट पूर्वी घडली आहे, असे खरे मानून स्वीकारणे. काही लोक त्याला सत्य मानून, एखाद्या वस्तूला पूजनीय स्थानी ठेवून तिची स्तुती करतात, पूजा करतात, वंदन करतात आणि तिचे जतन करतात. परलोकातील हितासाठी त्याला शरण जातात. हे सर्व निरर्थक असते. 'तदस्सादवसेन' म्हणजे त्या राजकथा इत्यादींमध्ये चित्ताचा आनंद मिळवून, आसक्तीने (आस्वादाने) बोलणाऱ्याचेच ते कर्म (व्यर्थ बडबड) होते. परंतु, अनित्य लक्षण स्पष्ट करण्यासाठी, किंवा त्रिरत्नांच्या गुणांचे वर्णन करण्यासाठी, किंवा पापाची निंदा आणि कल्याणाची प्रशंसा करण्यासाठी बोलणाऱ्याचे बोलणे सार्थ (अर्थपूर्ण) च असते, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच 'अत्थ धम्म विनय निस्सितं' (अर्थ, धम्म आणि विनयावर आधारित) इत्यादी म्हटले आहे. यातील उर्वरित भाग कायद्वाराच्या (शारीरिक कर्माच्या) संदर्भात स्पष्ट केलाच आहे. ๑๕๐. มโนกมฺเม[Pg.163]. ‘‘อภิฌายนฺตี’’ติ อติเรกตรํ ฌายนฺติ, จินฺเตนฺติ, โอโลเกนฺติ วาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อสฺสาทมตฺเต อฐตฺวา’’ติอาทิมาห. ‘‘พฺยาปาเทนฺตี’’ติ วิคตภาวํ อาปาเทนฺติ สมฺปาเปนฺติ. ตญฺจ อาปาทนํ น กายวาจาหิ. อถ โข จิตฺเตเนวาติ วุตฺตํ ‘‘จินฺเตนฺตี’’ติ. ‘‘ตพฺพิ ปรีตโต’’ติ สปฺปุริส ปญฺญตฺติโต วิปรีเตน. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุ มโนกมฺเมสุ. ‘‘อิทํ มมสฺสา’’ติ อิทํ สนฺตกํ มมสนฺตกํ ภเวยฺย, อโห สาธุ วตาติ โยชนา. ‘‘อตฺตโน กตฺวา’’ติ อตฺตโน สนฺตกํ กตฺวา. ‘‘ลาภาวติเม’’ติ เอตฺถ สุลาภํ ลภนฺตีติ ลาภา. ‘‘อตฺตโน กเรยฺยํ’’ติ อตฺตโน สนฺตกํ กเรยฺยํ. ปรภณฺฑํ วตฺถุ ยสฺสาติ ปรภณฺฑ วตฺถุโก. ‘‘วตฺถู’’ติ อารมฺมณภูตํ วตฺถุ. ยาว น ปริณาเมติ, ตาว น กมฺมปถเภโท โหตีติ โยชนา. ‘‘วุตฺตญฺเหตํ อฏฺฐกถาสู’’ติ อธิกาโร. ‘‘อยํ’’ติ อยํ สตฺโต. ‘‘ตสฺสา’’ติ ตสฺส สตฺตสฺส. ทสวตฺถุกามิจฺฉาทิฏฺฐิ นาม ‘นตฺถิทินฺนํ, นตฺถิยิฏฺฐํ, นตฺถิหุตํ’ติอาทิกา มิจฺฉาทิฏฺฐิ. ทฺวาสฏฺฐิ ทิฏฺฐิคเตสุ กาจิทิฏฺฐิโย นตฺถิกาทิ สภาวา โหนฺติ. อิธ ปน ตพฺพหุลนเยน กมฺมเมวาติ วุตฺตํ. ยถาวุตฺโตติ สมฺพนฺโธ. คจฺฉนฺตสฺส ปุคฺคลสฺส. ‘‘จิตฺตุปฺปาโท’’ติ มคฺคจิตฺตุปฺปาเท. ‘‘ปสฺสนฺโต’’ติ ตีณิ ลกฺขณานิ ปสฺสนฺโต. วุตฺโตติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นิยามํ’’ติ สมฺมตฺต นิยามํ. อวิปรีตนิยามนฺติ อตฺโถ. ปุน ‘‘นิยามํ’’ติ มิจฺฉตฺตนิยามํ. วิปรีต นิยามนฺติ อตฺโถ. ติกิจฺฉิตุํ อสกฺกุเณยฺโยติ อเตกิจฺโฉ. เอกนฺเตน อปายคามี โหตีติ อตฺโถ. ‘‘อปสฺสิตฺวา’’ติ ทิฏฺฐิฏฺฐานานํ อปสฺสิตฺวา. ‘‘มิจฺฉาธิโมกฺขมตฺเตนา’’ติ ติตฺถา จริเยสุ สทฺทหน มตฺเตนาติ อธิปฺปาโย. ‘‘สกํ อาจริยกํ’’ติ อตฺตโน อาจริยสฺส สนฺตกภูตํ. ฐิโต ปุคฺคโล. อฏฺฐกถายํ วุตฺโต, ยถาห มิจฺฉตฺตติเก มิจฺฉาสภาวาติ มิจฺฉตฺตา. วิปากทาเน สติ, ขนฺธเภทานนฺตรเมว วิปากทานโต นิยตา. มิจฺฉตฺตา จ เต นิยตา จาติ มิจฺฉตฺตนิยตา. สมฺมาส ภาวาติ สมฺมตฺตา. สมฺมตฺตา จ เต นิยตา จ อนนฺตรเมว ผลทาน นิยเมนาติ สมฺมตฺตนิยตาติ[Pg.164]. ‘‘ตสฺสา’’ติ มิจฺฉาทิฏฺฐิยา. ‘‘อโจเปตฺวา’’ติ อจาเลตฺวา. ‘‘เอเตนา’’ติ เอเตนปิ สทฺเทน. ‘‘อิเมสํ’’ติ มโนกมฺมานํ. ‘‘เอเตนา’’ติ มนสฺมึ เอวาติ วจเนน. ‘‘อุปปนฺนํ’’ติ ปริปุณฺณํ. ‘‘อุปลกฺขณาทิวเสนา’’ติ อุปลกฺขณนย นิทสฺสนนย ปธานนยาทิวเสน. ‘‘อตฺถนฺตรปฺปสงฺโค โหตี’’ติ กถํ โหติ. เอวสทฺเทน วินา ปาณาติปาต กมฺมํ กายทฺวาเร พาหุลฺล วุตฺติโต กายกมฺมํ นามาติ วุตฺเต อิทํ ลทฺธาตปตฺโต ราชกุมาโรติ วิย อุปลกฺขณนยมตฺตํ. เตน เสสทฺวาเรสุปิ พาหุลฺล วุตฺตึ อุปสลฺลกฺเขตีติ อตฺถนฺตรปฺปสงฺโค สิยาติ. เอวํ เสสนเยสุปีติ. ‘‘อปิจา’’ติ กิญฺจิ วตฺตพฺพํ อตฺถีติ โชเตติ. ‘‘เตสู’’ติ ปาณวธาทีสุ. ‘‘เอกํ องฺคํ’’ติ อุปกฺกโมติ จตุตฺถํ องฺคํ. ‘‘ตํ สหชาตา จา’’ติ เจตนา สหชาตา จ. เจตนา ปกฺเข ภวาติ เจตนา ปกฺขิกา. เจตนา วิย กายกมฺมภาวํ คจฺฉนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อพฺโพหาริกตฺตํ คจฺฉนฺตี’’ติ มโนกมฺมนฺติ โวหริตุํ อปฺปโหนกตฺตํ คจฺฉนฺตีติ อตฺโถ. อตฺตา ปธานํ เยสํ เต อตฺตปฺปธานา. อภิชฺฌาทโย. อตฺตปฺปธานา น โหนฺติ. เจตนา ปธานา โหนฺติ. อิเธว เต อตฺตปฺปธานา โหนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘ตถา ตถา’’ติ อโหวต อิทํ มมสฺสาติอาทินา เตน เตน ปกาเรน. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุ มโนกมฺเมสุ. ‘‘สพฺเพน สพฺพํ’’ติ ปาฏิปทิกปทเมตํ. สพฺพปฺปการโตติ อตฺโถ. ‘‘อิธา’’ติ มโนกมฺมฏฺฐาเน. ‘‘มโนกมฺม กิจฺจวิเสเสนา’’ติ อโหวต อิทํ มมสฺสาติอาทิเกน กิจฺจ วิเสเสน. มโนกมฺม ทีปนา นิฏฺฐิตา. १५०. मनोकर्मामध्ये (मनोकम्मे). 'अभिझायन्ति' (अभिध्या करतात) म्हणजे अत्यंत जास्त प्रमाणात ध्यान करतात, विचार करतात किंवा पाहतात, हा अर्थ दर्शविताना 'अस्सादमत्ते अट्ठित्वा' (केवळ आस्वादावर न थांबता) इत्यादी म्हटले आहे. 'ब्यापादेन्ति' (व्यापाद करतात) म्हणजे विगतभाव (विनाशभाव) प्राप्त करून देतात, पोहचवतात. आणि ते प्राप्त करून देणे काय व वाणीने होत नाही, तर केवळ चित्तानेच होते, म्हणून 'चिन्तेन्ति' (विचार करतात) असे म्हटले आहे. 'तब्बि परीततो' म्हणजे सत्पुरुषांच्या प्रज्ञप्तीपेक्षा (नियमनापेक्षा) विपरीतपणे. 'तत्थ' म्हणजे त्या मनोकर्मांमध्ये. 'इदं ममस्सा' म्हणजे हे माझे व्हावे, अहो किती चांगले होईल! अशी योजना आहे. 'अत्तनो कत्वा' म्हणजे स्वतःचे करून. 'लाभावतिमे' येथे सहज लाभ मिळतो म्हणून 'लाभा' (लाभ). 'अत्तनो करेय्यं' म्हणजे स्वतःचे करावे. दुसऱ्याचे भांड (वस्तू) ज्याचे आहे तो 'परभण्डवत्थुको' (परकीय वस्तूचा मालक). 'वत्थु' म्हणजे आलंबन बनलेली वस्तू. जोपर्यंत तो (चित्ताला) वळवत नाही, तोपर्यंत कर्मपथाचा भेद होत नाही, अशी योजना आहे. 'वुत्तञ्हेतं अट्ठकथासू' (अट्टकथांमध्ये असे म्हटले आहे) हा अधिकार आहे. 'अयं' म्हणजे हा प्राणी. 'तस्स' म्हणजे त्या प्राण्याचा. दशवस्तुक मिथ्यादृष्टी (दसवत्थुका मिच्छादिट्ठि) म्हणजे 'नत्थि दिन्नं, नत्थि यिट्ठं, नत्थि हुतं' (दान दिलेले नाही, यज्ञ केलेला नाही, हवन केलेले नाही) इत्यादी मिथ्यादृष्टी होय. बासष्ट दृष्टीगतांमध्ये (द्विसट्ठि दिट्ठिगतेसु) काही दृष्टी नास्तिकतेच्या स्वभावाच्या असतात. परंतु येथे प्रामुख्याने कर्मच म्हटले आहे. 'यथावुत्तो' हा संबंध आहे. जाणाऱ्या पुद्गलाचा. 'चित्तुप्पादो' म्हणजे मार्गचित्तोत्पादामध्ये. 'पस्संतो' म्हणजे तीन लक्षणे पाहणारा. 'वुत्तो' हा संबंध आहे. 'नियामं' म्हणजे सम्यक्त्व नियम (समत्तनियाम). अविपरीत नियम असा अर्थ आहे. पुन्हा 'नियामं' म्हणजे मिच्छत्तनियाम (मिथ्यात्व नियम). विपरीत नियम असा अर्थ आहे. ज्याचा उपचार करणे अशक्य आहे तो 'अतेकिच्छो' (अचिकित्स्य). तो एकांताने अपायगामी (नरकगामी) होतो असा अर्थ आहे. 'अपस्सित्वा' म्हणजे दृष्टीच्या स्थानांना न पाहता. 'मिच्छाधिमोक्खमत्तेना' म्हणजे तीर्थंकर आचार्यांवर केवळ श्रद्धा ठेवण्याने, असा अभिप्राय आहे. 'सकं आचरियकं' म्हणजे स्वतःच्या आचार्यांचे असलेले. स्थित असलेला पुद्गल. अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे, जसे 'मिच्छत्ततिके' मध्ये म्हटले आहे - मिथ्या स्वभावाचे असल्यामुळे 'मिच्छत्ता' (मिथ्यात्व). विपाक (फळ) देण्याबाबत, स्कंधांच्या भेदानंतर लगेचच विपाक देणारे असल्यामुळे 'नियता' (नियत). जे मिथ्या आणि नियत आहेत ते 'मिच्छत्तनियता' (मिथ्यात्वनियत). सम्यक् स्वभावाचे असल्यामुळे 'सम्मतता' (सम्यक्त्व). जे सम्यक् आणि नियत आहेत, लगेचच फल देण्याच्या नियमाने, ते 'सम्मतनियत' (सम्यक्त्वनियत) होत. 'तस्सा' म्हणजे त्या मिथ्यादृष्टीला. 'अचोपेत्वा' म्हणजे न हलवता. 'एतेना' म्हणजे या शब्दाने देखील. 'इमेसं' म्हणजे या मनोकर्मांचे. 'एतेना' म्हणजे 'मनातच' या वचनाने. 'उपपन्नं' म्हणजे परिपूर्ण. 'उपलक्खणादिवसेना' म्हणजे उपलक्षण पद्धती, निदर्शन पद्धती, प्रधान पद्धती इत्यादींच्या द्वारे. 'अत्थन्तरप्पसङ्गो होति' (इतर अर्थाचा प्रसंग होतो) हे कसे होते? 'एव' (च) शब्दाशिवाय प्राणातिपात कर्म कायद्वाराने बहुतांश वेळा होत असल्यामुळे त्याला 'कायकर्म' म्हटले असता, हे 'लद्धातपत्त राजपुत्र' याप्रमाणे केवळ उपलक्षण पद्धती आहे. त्यामुळे उर्वरित द्वारांमध्येही बहुतांश प्रवृत्तीचे उपलक्षण होते, म्हणून इतर अर्थाचा प्रसंग (अत्थन्तरप्पसङ्गो) होईल. याचप्रमाणे उर्वरित पद्धतींमध्येही समजावे. 'अपि च' म्हणजे काही सांगण्यासारखे आहे हे दर्शवतो. 'तेसू' म्हणजे प्राणातिपात इत्यादींमध्ये. 'एकं अङ्गं' म्हणजे उपक्रम हे चौथे अंग आहे. 'तं sahajātā च' म्हणजे ती चेतना सहजात आहे. चेतनेच्या पक्षात असणारे 'चेतनापक्खिका' (चेतनापक्षीय) होत. चेतनेप्रमाणे कायकर्मभावाला प्राप्त होतात, असे म्हटले आहे. 'अब्बोहारिकत्तं गच्छन्ति' म्हणजे मनोकर्म असे व्यवहार करण्यास अपुरे पडतात, असा अर्थ आहे. स्वतः प्रधान असणारे 'अत्तपधाना' (आत्मप्रधान). अभिध्या इत्यादी. ते आत्मप्रधान नसतात. ते चेतनाप्रधान असतात. येथेच ते आत्मप्रधान असतात, असा अर्थ आहे. 'तथा तथा' म्हणजे 'अहो, हे माझे व्हावे' इत्यादी त्या त्या प्रकारे. 'तत्थ' म्हणजे त्या मनोकर्मांमध्ये. 'सब्बेन सब्बं' हे प्रातिपदिक पद आहे. सर्व प्रकारे असा अर्थ आहे. 'इध' म्हणजे मनोकर्माच्या ठिकाणी. 'मनोकम्मकिच्चविसेसेना' म्हणजे 'अहो, हे माझे व्हावे' इत्यादी कार्यविशेषाने. मनोकर्मदीपना समाप्त झाली। ๑๕๑. ‘‘เอตฺถ จ ทสนฺนํ ปี’’ติอาทีสุ. ‘‘ตาปี’’ติ ตา ปุพฺพาปรเจตนาโยปิ. อาทิโต ปฏฺฐาย ปวตฺตา ตาปีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยานิปนา’’ติอาทีสุ. เอโก เอกสฺส วทติ อหํ อิมํ สตฺตํ มาเรมิ, ตฺวํ อสุกํสตฺตํ มาเรหีติ. เอวํ วตฺวา อุโภปิ อุปกฺกมํ กโรนฺติ. กมฺมํ ปน อุภินฺนมฺปิ น สิชฺฌติ. ตตฺถ อาณาปกสฺส ตฺวํ อสุกํ สตฺตํ มาเรหีติ อาณาปน กมฺมํ สเจ สิชฺฌติ. วจีทฺวาเร ปวตฺตํ กายกมฺมนฺติ วุจฺจติ. อิธ ปน อสิทฺธตฺตา วจีทฺวาเร ทิสฺส มานํ [Pg.165] วจีกมฺมนฺติ วุจฺจติ. วจีทุจฺจริตมตฺตนฺติ วุตฺตํ โหติ. เอสนโย เสเสสุปิ. १५१. 'एत्थ च दसन्नं पि' (आणि येथे दहांचेही) इत्यादींमध्ये. 'तापि' म्हणजे त्या पूर्व आणि अपर (नंतरच्या) चेतना देखील. सुरुवातीपासून प्रवृत्त झालेल्या त्या देखील, असा संबंध आहे. 'यानि पना' इत्यादींमध्ये. एक जण दुसऱ्याला म्हणतो, 'मी या प्राण्याला मारतो, तू अमक्या प्राण्याला मार.' असे बोलून दोघेही उपक्रम (प्रयत्न) करतात. परंतु कर्म दोघांचेही सिद्ध होत नाही. तिथे आज्ञा देणाऱ्याचे 'तू अमक्या प्राण्याला मार' हे आज्ञा देण्याचे कर्म जर सिद्ध झाले, तर वाणीच्या द्वारे प्रवृत्त झालेले 'कायकर्म' असे म्हटले जाते. परंतु येथे ते सिद्ध न झाल्यामुळे, वाणीच्या द्वारे दिसणारे कर्म 'वचीकर्म' (वाणीचे कर्म) म्हटले जाते. ते केवळ 'वचीदुच्चरित' (वाणीचे दुष्कृत्य) आहे असे म्हटले आहे. हाच नियम उर्वरित कर्मांच्या बाबतीतही लागू होतो. ‘‘โทสมูเลนา’’ติอาทีสุ. โทโส เอว มูลํ โทสมูลํ. โทโส มูลํ มสฺสาติ โทสมูลํ. ตํ สมฺปยุตฺต จิตฺตนฺติ ทฺวิธา อตฺโถ. พฺยาปาโท นาม โทโส เอว. โส กถํ โทเสน มูเลน ชาเยยฺยาติ วุตฺตํ ‘‘ปุริโม พฺยาปาทวชฺเชหี’’ติ. ปรโต อภิชฺฌายมฺปิ เอสนโย. วิภาวนิปาเฐ. นิธิปาฐกา นาม ราชนิธิ วิธายกา. ตตฺถ จณฺโฑ นิคฺคเหตพฺโพติ อาคตตฺตา ทุฏฺฐนิคฺคหตฺถนฺติ วุตฺตํ. ราชูนํ อทินฺนาทานํ โมหมูเลน ชายตีติ โยชนา. ‘‘พฺราหฺมณานญฺจา’’ติ สกสญฺญาย เอว ยํ กิญฺจิ หรนฺตานํ พฺราหฺมณานญฺจ กมฺมผลสมฺพนฺธาปวาทีนญฺจ. ‘‘อาหรณํ’’ติ อทินฺนาทานวเสน หรณํ. อวหรณนฺติ วุตฺตํ โหติ. โย ปน โมโห ราชูนํ อุปฺปนฺโน, โย จ พฺราหฺมณานํ อุปฺปนฺโน, โย จ กมฺม ผลสมฺพนฺธา ปวาทีนํ อุปฺปนฺโนติ สมฺพนฺโธ. ‘‘โลโภ นิทานํ กมฺมานํ สมุทยายา’’ติ โลโภ กมฺมานํ สุฏฺฐุวฑฺฒนาย นิทานํ การณํ โหตีติ โยชนา. สญฺชาตา กงฺขาเยสํ เต สญฺชาตกงฺขา. ปริโต อุฏฺฐาติ เอตฺถาติ ปริยุฏฺฐานํ. กงฺขาย ปริยุฏฺฐานํ กงฺขาปริยุฏฺฐานํ. ชนานํ ตานิกมฺมานีติ สมฺพนฺโธ. 'दोसमूलेन' (द्वेषमूलाने) इत्यादींमध्ये. द्वेष हाच मूळ म्हणजे 'द्वेषमूळ' (दोसमूल). द्वेष ज्याचे मूळ आहे ते 'द्वेषमूळ'. त्याशी संप्रयुक्त चित्त, असा दोन प्रकारे अर्थ आहे. व्यापाद म्हणजे द्वेषच होय. तो द्वेषरूप मूळाने कसा उत्पन्न होईल? म्हणून 'पुरिमो ब्यापादवज्जेहि' (पूर्वीचा व्यापाद वगळून) असे म्हटले आहे. पुढे अभिध्येच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. विभावनी पाठात. 'निधिपाठक' म्हणजे राजाच्या खजिन्याचे व्यवस्थापक. आणि तिथे 'उग्र माणसाचा निग्रह करावा' असे आल्यामुळे 'दुष्टनिग्रहार्थ' असे म्हटले आहे. राजांचे अदिन्नादान (चोरी) मोहमूळाने उत्पन्न होते, अशी योजना आहे. 'ब्राह्मणानञ्च' म्हणजे स्वतःच्या समजुतीनेच जे काही हरण करतात अशा ब्राह्मणांचे आणि कर्म-फलाच्या संबंधाचा अपवाद (अस्वीकार) करणाऱ्यांचे. 'आहरणं' म्हणजे अदिन्नादानाच्या (चोरीच्या) रूपाने हरण करणे. त्याला 'अपहरण' असे म्हटले आहे. जो मोह राजांना उत्पन्न झाला, जो ब्राह्मणांना उत्पन्न झाला आणि जो कर्म-फलाच्या संबंधाचा अपवाद करणाऱ्यांना उत्पन्न झाला, असा संबंध आहे. 'लोभो निदानं कम्मानं समुदायाय' म्हणजे लोभ हा कर्मांच्या चांगल्या वाढीसाठी निदान (कारण) ठरतो, अशी योजना आहे. ज्यांच्यामध्ये शंका उत्पन्न झाली आहे ते 'सञ्जातकाङ्खा' (जातशंक). ज्याच्याभोवती (चित्त) उठते ते 'परियुट्ट्ठान' (पर्यवस्थान). शंकेचे पर्यवस्थान म्हणजे 'कङ्खापरियुट्ट्ठान' (शंकापर्यवस्थान). लोकांची ती कर्मे, असा संबंध आहे. อกุสลกมฺมทีปนานิฏฺฐิตา. अकुशलकर्मदीपना समाप्त झाली। ๑๕๗. กุสลกมฺเม. อยํ ปน เอวมาทีสุ สุตฺตปเทสุ อาคโตติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เมตฺตํ กายกมฺมํ’’ติ เมตฺตาสหคตํ กายกมฺมํ. เอวํ วจีกมฺเมปิ. เจตนา เหตฺถ กมฺมนฺติ อธิปฺเปตา. มโนกมฺเม ปน เจตนาปิ ยุชฺชติ. อพฺยาปาโทปิ ยุชฺชติ. ญาณํ อนุปริวตฺตีติ ญาณานุปริวตฺตํ. ญาณานุปริวตฺตีติปิ ปาโฐ, โส เยวตฺโถ. ‘‘ปทกฺขิณํ’’ติ ปวฑฺฒิตํ. อปรํ ปริยายํ ทสฺเสติ ‘‘ยสฺมึ ปนา’’ติอาทินา. ทุสฺสีลสฺส ภาโว ทุสฺสิลฺยํ. ปาณาติปาตาทิกมฺมํ. ‘‘ปวตฺตมาเน’’ติ กายทฺวาเร ปวตฺตมาเน. ‘‘ยํ ปน กุสลํ’’ติ ปาณาติ ปาตาทิโต วิรติ กุสลํ[Pg.166]. ‘‘ปวตฺตมานํ’’ติ จิตฺเต ปวตฺตมานํ. ‘‘กิจฺจ สีเสนา’’ติ กิจฺจปฺปธาเนน. กิจฺจํ ปธานํ กตฺวาติ อธิปฺปาโย. เสสเมตฺถ กายกมฺเม สุวิญฺเญยฺยํ. १५७. कुशलकर्मामध्ये. हा (शब्द) अशा प्रकारच्या सुत्तपदांमध्ये आला आहे, असा संबंध आहे. 'मेत्तं कायकम्मं' (मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म) म्हणजे मैत्रीसहगत कायिक कर्म. याचप्रमाणे वाचिक कर्माच्या बाबतीतही समजावे. येथे 'चेतना' हेच कर्म अभिप्रेत आहे. मनोकर्मामध्ये (मानसिक कर्मामध्ये) चेतना देखील योग्य ठरते आणि अव्यापाद (द्वेषरहितता) देखील योग्य ठरतो. ज्ञानाच्या अनुषंगाने चालणारे ते 'ज्ञानानुपरिवत्त' होय. 'ज्ञानानुपरिवत्ती' असाही पाठ आहे, त्याचा अर्थ तोच आहे. 'पदक्खिणं' म्हणजे प्रवर्धित (वृद्धिंगत झालेले). 'यस्मिं पना' इत्यादींद्वारे दुसरा पर्याय दर्शवितात. दुःशीलाचा भाव म्हणजे 'दुःशील्य' (दुराचार), जसे की प्राणातिपात इत्यादी कर्म. 'पवत्तमाने' म्हणजे कायद्वाराच्या ठिकाणी प्रवृत्त होत असताना. 'यं पन कुसलं' म्हणजे प्राणातिपातादींपासून विरत होणे हे कुशल होय. 'पवत्तमानं' म्हणजे चित्तामध्ये प्रवृत्त होणारे. 'किच्च सीसेन' म्हणजे कृत्याच्या प्राधान्याने; कृत्याला प्रधान करून, असा अभिप्राय आहे. यातील उर्वरित भाग कायिक कर्माच्या बाबतीत सहज समजण्यासारखा आहे. ‘‘วจีกมฺเมปิ เอเสวนโย’’ติ ยสฺมึ ทุสฺสิลฺเย ปวตฺตมาเน วาจา อปริสุทฺธา โหติ. วจี สํวโร ภิชฺชตีติอาทินา วตฺตพฺพํ. ‘‘อวเสสํ ปนา’’ติ ตีหิ กายกมฺเมหิ จตูหิ วจีกมฺเมหิ อวเสสํ. ตตฺถ ‘‘ตีหิ กายกมฺเมหี’’ติ ตีหิ กายทุจฺจริต วิรติ กมฺเมหิ. ‘‘จตูหิ วจีกมฺเมหี’’ติ จตูหิ วจีทุจฺจริต วิรติ กมฺเมหิ. ‘‘สพฺพํปิ กลฺยาณ กมฺมํ’’ติ สพฺพมฺปิ ทานกมฺมํ, สพฺพมฺปิ ภาวนา กมฺมํ, อปจายน กมฺมํ, เวยฺยาวจฺจกมฺมํ, ปตฺติทานกมฺมํ, ปตฺตานุโมทนากมฺมํ, ธมฺมสวน กมฺมํ, ธมฺม เทสนา กมฺมํ, สพฺพมฺปิ ทิฏฺฐิชุกมฺมํ ตีสุทฺวาเรสุ ปวตฺตมฺปิ มโนกมฺมํ นามาติ โยชนา. อิเมสุ ปน ทฺวีสุ ปริยาเยสุ ปจฺฉิโมเยว ปธานนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยาว เทวา’’ติ อนฺติม ปริจฺเฉท โชตโก นิปาโต. มตฺถกปริจฺเฉเทนาติ อตฺโถ. 'वाचिक कर्माच्या बाबतीतही हाच नियम आहे' म्हणजे ज्या दुःशील्यामध्ये (दुराचारात) प्रवृत्त असताना वाणी अपरिशुद्ध होते, वाक्-संवर (वाणीचा संयम) भंग पावतो, इत्यादी प्रकारे म्हटले पाहिजे. 'अवसेसं पना' (परंतु उर्वरित) म्हणजे तीन कायिक कर्मांशिवाय आणि चार वाचिक कर्मांशिवाय जे उर्वरित आहे ते. त्यामध्ये 'तीही कायकम्मेही' म्हणजे तीन कायिक दुष्कृत्यांपासून विरत होण्याच्या कर्मांद्वारे. 'चतूही वचीकम्मेही' म्हणजे चार वाचिक दुष्कृत्यांपासून विरत होण्याच्या कर्मांद्वारे. 'सब्बंपि कल्याण कम्मं' (सर्वच कल्याणकारी कर्म) म्हणजे सर्व दानकर्म, सर्व भावनाकर्म, अपचायन कर्म (आदर करणे), वेय्यावच्च कर्म (सेवा करणे), पत्तिदान कर्म (पुण्यदान करणे), पत्तानुमोदन कर्म (पुण्यानुमोदन करणे), धम्मसवन कर्म (धम्मश्रवण करणे), धम्मदेसना कर्म (धम्मोपदेश करणे), आणि सर्व दिट्ठिजुकर्म (दृष्टी सम्यक् करणे) – ही तिन्ही द्वारांमध्ये प्रवृत्त होणारी कर्मे असली तरी त्यांना 'मनोकर्म' (मानसिक कर्म) असेच म्हणावे, अशी योजना आहे. परंतु या दोन पर्यायांमध्ये नंतरचाच पर्याय प्रधान आहे, असा संबंध आहे. 'याव देवा' हा अंतिम मर्यादा दर्शवणारा निपात आहे. 'शिखर मर्यादेपर्यंत' (सर्वोच्च मर्यादेपर्यंत) असा याचा अर्थ आहे. สีลปเท. ‘‘สีลยตี’’ติ สมฺมา ทหติ จ อุปธาเรติ จาติ ทฺวิธา อตฺโถ. ‘‘สุสมาหิตานี’’ติ สุปฺปติฏฺฐิตานิ. ‘‘อุปริเม กุสล ธมฺเม’’ติ มหคฺคต โลกุตฺตร กุสลธมฺเม. สตฺตสุ วิสุทฺธีสุ อุปริเม จิตฺต วิสุทฺธาทิ กุสลธมฺเม. ‘‘อธิกุสล ธมฺเม’’ติ อธิเก โพธิปกฺขิย กุสล ธมฺเม. ปเรหิ ทินฺนํ, ตเทว ปตฺตึ. สพฺพานิ ปน ตานิ ทานาทีนิ กุสลานิ. โสเธนฺติ สปฺปุริสาชนา. ตานิ เอวปุญฺญานิ. เอกเมกํ ปุญฺญกฺริยวตฺถุ. ‘‘อิมินา ปจฺจเยนา’’ติ จีวราทิ ปจฺจเยน, อนฺนปานาทิ ปจฺจเยน, ธน ธนญฺญาทิปจฺจเยน วา. ‘‘สพฺพํปิ เจตํ’’ติ สพฺพมฺปิ เอตํ ทสวิธํ ปุญฺญํ. ‘‘หีเนน ฉนฺเทนา’’ติ ยสกามตาทิวเสน หีเนน ฉนฺเทน, หีเนน จิตฺเตน, หีเนน วีริเยน, หีนาย วีมํสาย. ‘‘มชฺฌิเมนา’’ติ ปุญฺญปฺผลกามตาทิวเสน มชฺฌิเมน. ‘‘ปณีเตนา’’ติ กตฺตพฺพเมวิทนฺติ อริยวํสานุ พฺรูหนวเสน ปณีเตน ฉนฺทาทินา ปวตฺติ ตํ ปณีตนฺติ โยชนา. ‘‘ยสกามตายา’’ติ กิตฺติ สทฺทกามตาย วา, ปริวารกามตาย วา. ‘‘ปุญฺญปฺผลกามตายา’’ติ [Pg.167] ภวสมฺปตฺติ โภคสมฺปตฺติกามตาย. ‘‘อริยภาวํ นิสฺสายา’’ติ อิทํ ทานํ นาม อริยานํ วํโส. อหมฺปิ อริโย. ตสฺมา มยาปิ กตฺตพฺพเมวิทนฺติ เอวํ อริยภาวํ นิสฺสายาติ อตฺโถ. เอตฺถ จ ‘‘อริโย’’ติ อาจาร อริโยปิ ยุชฺชติ ทสฺสน อริโยปิ. ตตฺถ อาจาร อริโย นาม สปฺปุริโส ปุถุชฺชน กลฺยาณโก วุจฺจติ. ทสฺสน อริโย นาม ปรมตฺถ อริโย. ‘‘ปารมิตา ทานํ’’ติ สพฺพทาเนหิ อคฺคปตฺตํ มหาโพธิ สตฺตานํ ปารงฺคตทานํ. ตญฺหิ สพฺพ สตฺตวิโมกฺขตฺถาย ปวตฺติ ตตฺตา อคฺคปตฺตํ โหติ, ปารงฺคตํ. ตโต อุตฺตริตรสฺส กสฺสจิทานสฺส อภาวโต. เสเสสุปิ ปุญฺญ กฺริยวตฺถูสุ. ‘‘ติกทฺวยํ’’ติ ปุริมาทิ หีนาทิ ติกทฺวยํ. ‘‘อนฺติม วตฺถุนา’’ติ อนฺติม วตฺถุ อชฺฌาปชฺชเนน วา. ‘‘ทุสฺสีโล นามา’’ติ ทุสฺสีล ภิกฺขุ นาม. โส หิ ยาวภิกฺขุปฺปฏีญฺญํ น วิชหิ. ตาว ภิกฺขุ เอว. น สามเณโร, น คิหี. ตํ เจ อญฺโญ ภิกฺขุ อมูลเกน อนฺติม วตฺถุนา อนุทฺธํเสติ. อนุทฺธํเสนฺตสฺส สงฺฆาทิ เสโส. โอมสวาเท ปาจิตฺติยํ. สหเสยฺยฏฺฐาเน เตน สห อติเรก รตฺตึ สยนฺตสฺสาปิ อาปตฺติ นตฺถิ. ตสฺมา โส ทุสฺสีล ภิกฺขุตฺเวว วตฺตพฺโพติ. ‘‘ปุน กมฺมวาจาย สมาทาตพฺพนฺติ นตฺถี’’ติ ยถา สิกฺขํ ปจฺจกฺขนฺตสฺส สพฺพํ สมาทานํ ภิชฺชติ. ปุน ภิกฺขุภาวํ อิจฺฉนฺเตน ปุน กมฺมวาจาย สมาทาตพฺพํ โหติ. เอวํ ปุน กมฺมวาจาย สมาทาตพฺพนฺติ นตฺถิ. ‘‘อิตเรสุ ปนา’’ติ ลิงฺคนาสนงฺคโต อญฺเญสุ ทณฺฑกมฺมงฺเคสุ. นิจฺจสีลาทีสุ. ‘‘ยํ นิจฺจเมว วฏฺฏตี’’ติ ยํ ปาณาติปาต วิรติ สีลํ นิจฺจเมว รกฺขิตุํ วฏฺฏติ. อนิจฺจํ น วฏฺฏติ. กสฺมา, ปาณฆาตาทึ กโรนฺตสฺส สพฺพกาลมฺปิ ทุจฺจริต สมฺภวโต. เตนาห ‘‘อนิจฺจํ สาวชฺชํ โหตี’’ติ. ทุจฺจริตํ โหตีติ อตฺโถ. ‘‘ยํ นิจฺจมฺปิ วฏฺฏตี’’ติ ปกติ คหฏฺฐานํ ยํ วิกาล โภชนาทิ วิรติ สีลํ นิจฺจมฺปิ วฏฺฏติ. ‘‘อนิจฺจมฺปิ วฏฺฏตี’’ติ สมาทาน ทิวสํ อติกฺกมิตฺวา วิกาล โภชนาทึ กโรนฺตสฺส วีติกฺกม โทโสวา ทุจฺจริต โทโส วา นตฺถีติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘สาวชฺชํ น โหตี’’ติ. ทุจฺจริตํ น โหตีติ อตฺโถ. ตถา ทสสีลญฺจ ปกติ คหฏฺฐานํ [Pg.168] อนิจฺจสีลํ นามาติ โยชนา. ‘‘อนิจฺจสีลเมว โหตี’’ติ ปกติ คหฏฺฐานํ ตํ ทสสีลํ ยาวชีวํ นิจฺจํ กตฺวา สมาทิยิตฺวา รกฺขนฺตานมฺปิ อปพฺพชิตตฺตา ปพฺพชิเตสุ ชาติ สภาเวเนว สิทฺธํ นิจฺจสีลํ นาม น โหติ. ยาวชีวํ กตฺวา สมาทาน วเสเนว นิจฺจํ โหตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘เวสธารเณน สห สิทฺธตฺตา’’ติ เอตฺถ กถํ เวสธารเณน สิทฺธํ โหตีติ. เวสธารณํ นาม คิหิวตฺถํ ปหาย กาสาย วตฺถ ธารณํ. กาสายวตฺถญฺจ นาม อรหตฺตธโช โหติ. น จ อรหตฺตธชํ ธาเรนฺตสฺส สิกฺขาปทํ อสมาทิยนฺตสฺสปิ วิกาเล ภุญฺชิตุํ วฏฺฏติ. ตถา นจฺจาทีนิ ปสฺสิตุํ, มาลาทีนิ ธาเรตุํ, อุจฺจาสยนาทีสุ วสิตุํ, ชาตรูปาทีนิ สาทิตุํ. กสฺมา อิติ เจ, เตสญฺหิ ตํ ตํ ยถาสกํ สีลํ นิจฺจํ สุทฺธํ กตฺวา รกฺขิตุเมว วฏฺฏตีติอาทินา การณํ เหฏฺฐา วุตฺตเมวาติ. ‘‘อปฺปนํ อปตฺตาว อธิปฺเปตา’’ติ อปฺปนาปตฺตานํ มหคฺคตภาวนานํ วิสุํ อุปริ วกฺขมานตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘เอตฺเถวา’’ติ อิมสฺมึ ภาวนา กมฺเม เอว. ‘‘เต สญฺเญวา’’ติ รตนตฺตยาทีนํ เอว จ. คนฺตุํ อารทฺโธ คมิโก. อทฺธานํ ทีฆมคฺคํ คจฺฉนฺโต อทฺธิโก. ‘‘ปริสุทฺเธนา’’ติ ลาภสกฺการาทิ นิรเปกฺขตาย อตฺตุกฺกํ สน ปรวมฺภนาทิ รหิตตาย จ ปริสุทฺเธน. ‘‘หิตปฺผรณ จิตฺเตนา’’ติ มยิ กโรนฺเต อิมสฺส เอตฺตกํ หิตสุขํ ภวิสฺสตีติ เอวํ เตสํ หิตสุเขสุ ผรณ จิตฺเตน. เมตฺตจิตฺเตนาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อตฺตโน กิจฺเจสุ วิยา’’ติ เอเตน เตสํ สพฺพํ กิจฺจํ อตฺตโนภารํ กโรตีติ ทีเปติ. ‘‘สาธารณ กรณํ’’ติ อตฺตโน ปุญฺญํ ปเรสํ ทานํ. อตฺต มนตาปเวทนิยาธุสาธูติ วจีเภทกรณํ. ตญฺหิทินฺนญฺจานุโมทิตญฺจ ทิฏฺฐธมฺมเวทนียํ ชาตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘โยนิโสมนสิกาเร ฐตฺวาติ เอตฺถ สิโลกาทิปกฺขิกํ อโยนิโสมนสิการํ ชหิตฺวา สุณนฺตสฺส อิมํ ธมฺมํ สุตฺวา อตฺถรสธมฺมรสปฺปฏิสํเวที ภวิสฺสามีติ, เทเสนฺตสฺส อิมํ เทเสนฺโต ธมฺมสฺส จ สุณนฺตานญฺจ อนุคฺคหํ กริสฺสามีติ โยนิโสมนสิกาเร ฐตฺวา. ลาภ สกฺการาทิ ปกฺขิโก มนสิกาโร อโยนิ โสมนสิกาโร [Pg.169] นาม. นิยฺยานตฺถ นิสฺสรณตฺถ ปกฺขิโก โยนิโสมนสิกาโร นาม. นิรวชฺช กมฺมานิ นาม กสิโครกฺขาทิ กมฺมานิ. นิรวชฺชสิปฺปานิ นาม วฑฺฒกิสิปฺปาทีนิ เวชฺชสิปฺปาทีนิ จ. นิรวชฺช วิชฺชาฐานานิ นาม ปรูปโรธร หิตานิ องฺควิชฺชา เวทวิชฺชา มนฺตวิชฺชาทีนิ. ‘‘โวทาน กรณํ’’ติ วิเสเสน วิสุทฺธกรณํ. ‘‘ตํ สภาวตฺตา’’ติ ทานสภาวตฺตา. ‘‘จาริตฺต สีลตฺตา’’ติ สปฺปุริสานํ ปกติ จาริตฺต สีลตฺตา. ปุน ‘‘ตํ สภาวตฺตา’’ติ ภาวนา สภาวตฺตา. ตถาหิ เทเสนฺตสฺส จ สุณนฺตสฺส จ เทสนาโสตานุสาเรน จิตฺตภาวนา ญาณภาวนาวหตฺตา เทสนาสวนา สภาวา โหนฺติ. อตฺตโน ทิฏฺฐึ สยเมว อุชุํ กโรนฺตสฺส จ ญาณภาวนา กมฺมเมว. ตถา ปรสฺส ธมฺมเทสนํ สุตฺวา อุชุํ กโรนฺตสฺสาปีติ. ‘‘ธมฺโม นาม นตฺถี’’ติ เทสนา ธมฺโม นาม นตฺถิ. กสฺมา, ทานสีลานิ เทเสนฺเตนปิ อนฺเต ลกฺขณตฺตเยน สหสจฺจปฺปกาสนสฺส กตฺตพฺพตฺตา. เอเตน เทสนาสวนา อนฺเต ลกฺขณตฺตยานุปสฺสนา ภาวนา กมฺมฏฺฐาเน ปติฏฺฐิตตฺตา ตํ สภาวา โหนฺตีติ ทสฺเสติ. ‘‘มโนกมฺม เมวา’’ติ ปทุทฺธาโร. ‘‘มนสฺมึ เอวา’’ติ มโนทฺวาเร เอว. ‘‘กิจฺจสิทฺธิโต’’ติ อปฺปนากิจฺจสฺส สิชฺฌนโต. ‘‘องฺคภาวา สมฺภวโต’’ติ อปฺปนา กิจฺจสิทฺธิยํ องฺคภาวา สมฺภวโต. ‘‘ตญฺจภาวนา มย’’นฺติ ปทุทฺธาโร. ‘‘ทานาทิวเสนา’’ติ ทานสีลวเสน. ทานวเสน อปฺปวตฺตนโตติ อิทํ ตาว ยุชฺชติ. สีลวเสน อปฺปวตฺตนโตติ อิทํ ปน ปาฬิยา น สเมติ. ปาฬิยญฺหิ มหคฺคตชฺฌาเนสุปิ ปหานํ สีลํ เวรมณิ สีลนฺติอาทิ วุตฺตนฺติ โจทนา. ตํ ปริหรนฺโต ‘‘ยํ ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘ปริยาเยน วุตฺตํ’’ติ เกนปริยาเยน วุตฺตนฺติ. ปกติ จาริตฺตํ สีลนฺติ วุจฺจติ. อุปฺปนฺเน จ ปถมชฺฌาเน นีวรณานํ ปหานํ นาม ปกติจาริตฺตเมว ปกติ นิยาเมน ปวตฺตเมว. อิติ ปกติจาริตฺตตฺตา สีลนฺติ วุตฺตํ. ปุน นีวรณานํ ปหานเมว เตหิ วิคมนฏฺเฐน เวรมณีติ จ, ปิทหนฏฺเฐน สํวโรติ จ, ปหาน กิจฺจํ อวิชหนฏฺเฐน อวีติกฺกโมติ จ, วุตฺตํ. เจตนาสีลนฺติ เอตฺถ ปน ฌานสมฺปยุตฺต เจตนา เอว วุจฺจติ. สา จ สีลชาติ กตฺตา [Pg.170] สีลนฺติ วุตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘อปฺปนาปตฺต’’นฺติ ปทุทฺธาโร. ‘‘ฌานเภเทนา’’ติ ปน วตฺตพฺพํ. รูปาวจรกุสลญฺหิ ฌานเภเทน ปญฺจวิธํ, ฌานเมว ปน ฌานงฺคเภเทน ปญฺจวิธนฺติ. 'शीलपदे' (शील या शब्दात) - 'शीलयति' (शील राखणे) म्हणजे 'सम्यक प्रकारे धारण करणे' (सम्मा दहति) आणि 'आधार देणे' (उपधारेति), असा हा दुहेरी अर्थ आहे. 'सुसमाहितानि' म्हणजे 'सुप्रतिष्ठित' (चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित झालेले). 'उपरिमे कुसल धम्मे' (उच्चतर कुशल धर्म) म्हणजे 'महग्गत' (महान/उत्कृष्ट) आणि 'लोकोत्तर' कुशल धर्म. सात विशुद्धींमध्ये (सत्तसु विसुद्धीसु) 'चित्तविशुद्धी' इत्यादी उच्चतर कुशल धर्म. 'अधिकुसल धम्मे' म्हणजे अधिक असणारे 'बोधिपक्खिय' (बोधिपाक्षिक) कुशल धर्म. इतरांनी दिलेले, तेच 'पत्ति' (पुण्यदान/पुण्य वाटा) होय. दान इत्यादी सर्व कुशल कर्मे सत्पुरुष शुद्ध करतात. तीच खरोखर पुण्यकर्मे आहेत. प्रत्येक एक 'पुण्यक्रियावस्तू' (पुण्य कर्माचे अधिष्ठान) आहे. 'इमिना पच्चयेन' (या प्रत्ययाने/साधनाने) म्हणजे चीवर इत्यादी प्रत्ययाने, अन्न-पानादी प्रत्ययाने किंवा धन-धान्यादी प्रत्ययाने. 'सब्बम्पि चेतं' म्हणजे हे सर्व दहा प्रकारचे पुण्य (दशविध पुण्य). 'हीनेन छन्देन' (हीन इच्छेने) म्हणजे कीर्तीच्या इच्छेमुळे (यसकामता) निर्माण झालेली हीन इच्छा (छन्द), हीन चित्त, हीन वीर्य (प्रयत्न) आणि हीन विमंसा (विचार/परीक्षण) याद्वारे. 'मज्झिमेन' (मध्यम) म्हणजे पुण्यफलाच्या इच्छेमुळे (पुण्णफलकामता) मध्यम इच्छेने इत्यादी. 'पणीतेन' (उत्कृष्ट/प्रणीत) म्हणजे 'हे करणेच योग्य आहे' अशा भावनेने, आर्यवंशाच्या वृद्धीसाठी (अरियवंसानुब्रूहण) उत्कृष्ट इच्छा इत्यादींद्वारे प्रवृत्त होणे, याला 'प्रणीत' अशी योजना समजावी. 'यसकामताय' (कीर्तीच्या इच्छेने) म्हणजे कीर्ती व प्रसिद्धीच्या इच्छेने किंवा परिवाराच्या (अनुयायांच्या) इच्छेने. 'पुण्णफलकामताय' (पुण्यफलाच्या इच्छेने) म्हणजे भवसंपत्ती (उत्कृष्ट जन्म) किंवा भोगसंपत्तीच्या इच्छेने. 'अरियभावं निस्साय' (आर्यभावाचा आश्रय घेऊन) म्हणजे 'हे दान म्हणजे आर्यांचा वंश (परंपरा) आहे. मीसुद्धा आर्य आहे. म्हणून, माझ्याद्वारेही हे केलेच पाहिजे,' अशा प्रकारे आर्यभावाचा आश्रय घेणे, असा अर्थ आहे. आणि येथे 'आर्य' (अरियो) या शब्दाने 'आचार-आर्य' (आचार अरियो) आणि 'दर्शन-आर्य' (दस्सन अरियो) हे दोन्ही अभिप्रेत आहेत. त्यामध्ये, 'आचार-आर्य' म्हणजे सत्पुरुष, ज्याला 'कल्याणकारी पृथग्जन' (पुथुज्जन कल्याणाको) म्हटले जाते. 'दर्शन-आर्य' म्हणजे परमार्थ आर्य (परमत्थ अरियो). 'पारमिता दानं' म्हणजे सर्व दानांमध्ये सर्वश्रेष्ठ असणारे, महाबोधिसत्त्वांचे पारंगत दान (पार गेलेले दान). कारण ते सर्व प्राण्यांच्या विमुक्तीसाठी (सब्ब सत्त विमोक्खत्थाय) प्रवृत्त असल्यामुळे सर्वश्रेष्ठ (अग्गपत्तं) आणि पारंगत असते. कारण त्यापेक्षा श्रेष्ठ दुसरे कोणतेही दान अस्तित्वात नाही. उर्वरित पुण्यक्रियावस्तूंमध्येही असेच समजावे. 'तिकद्वयं' (दोन त्रिक) म्हणजे पूर्व इत्यादी आणि हीन इत्यादी हे दोन त्रिक. 'अन्तिम वत्थुना' म्हणजे अंतिम वस्तूच्या (पाराजिकाच्या) उल्लंघनाने. 'दुस्सीलो नाम' म्हणजे दुःशील भिक्खू. जोपर्यंत तो भिक्खू असण्याची प्रतिज्ञा (भिक्खू-प्रतिज्ञा) सोडत नाही, तोपर्यंत तो भिक्खूच असतो. तो सामणेरही नसतो आणि गृहस्थही नसतो. जर दुसरा एखादा भिक्खू त्याच्यावर अमूलक (निराधार) अंतिम वस्तूचा (पाराजिकाचा) आरोप करतो, तर आरोप करणाऱ्याला 'संघादिसिस' (सङ्घादिसेस) आपत्ती येते. अपशब्दांच्या वापरात (ओमसवादे) 'पाचित्तिय' आपत्ती येते. एकाच ठिकाणी झोपण्याच्या बाबतीत (सहसेय्यट्ठाने) त्याच्यासोबत एका रात्रीपेक्षा जास्त काळ झोपल्यासही कोणतीही आपत्ती येत नाही. म्हणून त्याला 'दुःशील भिक्खू' असेच म्हटले पाहिजे. 'पुन्हा कम्मवाचेने (संघविधीने) ग्रहण करण्याची आवश्यकता नाही' (पुन कम्मवाचाय समादातब्बन्ति नत्थि) म्हणजे: ज्याप्रमाणे शिक्षेचा (सिक्खा) त्याग करणाऱ्याचे सर्व ग्रहण (समादान) नष्ट होते आणि पुन्हा भिक्खू होण्याची इच्छा असल्यास त्याला पुन्हा कम्मवाचेद्वारे ग्रहण करावे लागते, तसे येथे पुन्हा कम्मवाचेद्वारे ग्रहण करण्याची आवश्यकता नसते. 'इतरेसु पन' (परंतु इतरांमध्ये) म्हणजे लिंगनाश (भिक्खू चिन्हांचा नाश) आणि इतर दंडकर्माच्या अंगांमध्ये, तसेच नित्यशील इत्यादींमध्ये. 'यं निच्चमेव वट्टति' (जे नेहमीच पाळणे योग्य आहे) म्हणजे प्राणातिपातापासून विरतीचे (प्राणहत्येपासून दूर राहण्याचे) शील, जे नेहमीच राखणे योग्य आहे. ते अनित्य (तात्पुरते) राखणे योग्य नाही. कारण, प्राणाघात इत्यादी करणाऱ्याला सर्व काळात दुश्चरित (पाप) घडण्याचा संभव असतो. म्हणूनच म्हटले आहे: 'अनित्य (तात्पुरते न पाळणे) हे सावज्ज (दोषयुक्त) असते.' याचा अर्थ ते दुश्चरित ठरते. 'यं निच्चम्पि वट्टति' (जे नेहमीही पाळणे योग्य आहे) म्हणजे सामान्य गृहस्थांसाठी (पकति गहट्ठानां) विकालभोजनापासून विरतीचे शील इत्यादी, जे नेहमीही पाळणे योग्य आहे. 'अनित्यताही चालते' (अनिच्चम्पि वट्टति) म्हणजे समादानाचा (व्रताचा) दिवस उलटून गेल्यावर विकालभोजन इत्यादी करणाऱ्याला कोणताही अतिक्रम दोष किंवा दुश्चरित दोष नसतो, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच म्हटले आहे: 'ते सावज्ज (दोषयुक्त) नसते.' याचा अर्थ ते दुश्चरित नसते. त्याचप्रमाणे, सामान्य गृहस्थांचे दहा शील (दससील) हे 'अनित्य शील' (तात्पुरते शील) म्हणून ओळखले जाते, अशी योजना करावी. 'ते अनित्य शीलच असते' (अनिच्चसीलमेव होति) म्हणजे सामान्य गृहस्थांनी ते दहा शील आयुष्यभर नित्य पाळण्याची प्रतिज्ञा करून राखले तरीही, ते प्रव्रजित (दीक्षित) नसल्यामुळे, प्रव्रजितांमध्ये जन्मजात स्वभावानेच सिद्ध असणारे 'नित्य शील' ठरत नाही. ते केवळ आयुष्यभराच्या समादानामुळेच नित्य असते, असा अभिप्राय आहे. 'वेषधारणेसह सिद्ध होत असल्यामुळे' (वेसधारणेन सह सिद्धत्ता) - येथे वेषधारणेने कसे सिद्ध होते? 'वेषधारण' म्हणजे गृहस्थाचे वस्त्र सोडून काषाय वस्त्र (भगवे वस्त्र) परिधान करणे. आणि काषाय वस्त्र म्हणजे अर्हत्त्वाचा ध्वज (अरहत्तधजो) होय. आणि अर्हत्त्वाचा ध्वज धारण करणाऱ्याला, त्याने शिक्षापदे ग्रहण केली नसली तरीही, विकालभोजन करणे योग्य नाही. तसेच नृत्य इत्यादी पाहणे, माळा इत्यादी धारण करणे, उच्च शयनावर झोपणे, सोने-चांदी (जातरूप) इत्यादी स्वीकारणे योग्य नाही. जर विचारले 'का?', तर त्याचे कारण वर सांगितलेच आहे: 'त्यांच्यासाठी आपापले शील नेहमी शुद्ध ठेवून त्याचे रक्षण करणेच योग्य आहे' इत्यादी. 'अप्पना (अर्पणा) न पावलेलेच अभिप्रेत आहेत' (अप्पनं अपत्ताव अधिप्रेता) म्हणजे अर्पणा प्राप्त झालेल्यांच्या महग्गत भावनांचे (ध्यान साधनांचे) वर्णन पुढे स्वतंत्रपणे केले जाणार आहे, असा अभिप्राय आहे. 'एत्थेव' म्हणजे याच भावना कर्मामध्ये (ध्यान साधनेमध्ये). 'तेसंयेव' म्हणजे त्रिरत्न (रतनत्तय) इत्यादींचेच. जाण्यास निघालेला तो 'गमिक' (प्रवासी). लांबच्या मार्गाने (अद्धान) जाणारा तो 'अद्धिक' (पथिक). 'परिसुद्धेन' (परिशुद्ध) म्हणजे लाभ-सत्कार इत्यादींची अपेक्षा नसणे आणि आत्मप्रशंसा (अत्तुक्कंसन) व परनिंदा (परवम्भन) इत्यादींनी रहित असणे यांमुळे परिशुद्ध. 'हितप्फरण चित्तेन' (हिताने व्याप्त चित्ताने) म्हणजे 'मी हे करत असताना याला एवढे हित व सुख लाभेल' अशा प्रकारे त्यांच्या हित-सुखात व्याप्त होणाऱ्या चित्ताने. म्हणजेच 'मैत्री चित्ताने' (मेत्तचित्तेन) असे म्हटले आहे. 'स्वतःच्या कामांप्रमाणे' (अत्तनो किच्चेसु विय) याद्वारे हे दर्शवले जाते की तो त्यांची सर्व कामे स्वतःची जबाबदारी मानतो. 'साधारण करणं' म्हणजे स्वतःचे पुण्य इतरांना देणे (पुण्यदान करणे). प्रसन्न मनाने 'साधू, साधू' असे म्हणणे हा वाणीचा उच्चार आहे. आणि ते दिलेले व अनुमोदित केलेले पुण्य 'दृष्टधम्मवेदनीय' (याच जन्मात अनुभवता येणारे) बनते, असा संबंध आहे. 'योनिसोमनसिकारात (योग्य मनन/चित्त एकाग्रतेत) राहून' - येथे कीर्ती इत्यादींच्या बाजूचा अयोनिसोमनसिकार सोडून; ऐकणाऱ्याने 'हा धम्म ऐकून मी अर्थरस आणि धम्मरसाचा अनुभव घेईन' असा विचार करणे, आणि उपदेश करणाऱ्याने 'हा उपदेश करून मी धम्मावर आणि ऐकणाऱ्यांवर अनुग्रह करेन' असा विचार करून योनिसोमनसिकारात प्रस्थापित होणे. लाभ, सत्कार इत्यादींच्या बाजूचा मनसिकार म्हणजे 'अयोनिसोमनसिकार' होय. नैर्याणिक (मुक्तीकडे नेणारा) आणि निस्सरण (संसारातून सुटका करणारा) या बाजूचा मनसिकार म्हणजे 'योनिसोमनसिकार' होय. 'निरवद्य कर्मे' (दोषरहित कर्मे) म्हणजे शेती (कसि), गोपालन (गोरक्ख) इत्यादी कर्मे. 'निरवद्य शिल्पे' (दोषरहित कला/कौशल्ये) म्हणजे सुतारकाम (वड्ढकिसिप्प) इत्यादी आणि वैद्यकीय कौशल्य (वेज्जसिप्प) इत्यादी. 'निरवद्य विद्यास्थाने' म्हणजे इतरांना पीडा न देणाऱ्या अंगविद्या, वेदविद्या, मंत्रविद्या इत्यादी. 'वोदान करणं' म्हणजे विशेष रूपाने विशुद्ध करणे (विशुद्धीकरण). 'त्या स्वभावाचे असल्यामुळे' (तं सभावत्ता) म्हणजे दान स्वभावाचे असल्यामुळे. 'चारित्र्य शीलामुळे' (चारित्त सीलत्ता) म्हणजे सत्पुरुषांच्या नैसर्गिक चारित्र्य शीलामुळे. पुन्हा, 'त्या स्वभावाचे असल्यामुळे' म्हणजे भावना (ध्यान) स्वभावाचे असल्यामुळे. कारण, उपदेश करणाऱ्याच्या आणि ऐकणाऱ्याच्या बाबतीत, उपदेशाच्या प्रवाहाच्या अनुषंगाने चित्तभावना आणि ज्ञानभावना घडून येत असल्यामुळे, उपदेश करणे आणि ऐकणे हे त्या स्वभावाचेच असते. स्वतःची दृष्टी स्वतःच सरळ (सम्यक) करणाऱ्यासाठी ते ज्ञानभावनेचेच कर्म आहे. तसेच दुसऱ्याचा धम्मोपदेश ऐकून आपली दृष्टी सरळ करणाऱ्यासाठीही ते तसेच आहे. 'धम्मो नाम नत्थि' म्हणजे उपदेशात्मक धम्म असा वेगळा नाही. कारण, दान आणि शील यांचा उपदेश करणाऱ्यानेही शेवटी त्रिलक्षणांसह (अनित्य, दुःख, अनात्म) सत्याचे प्रकटीकरण करणे आवश्यक असते. याद्वारे हे दर्शवले जाते की, उपदेश आणि श्रवण हे शेवटी त्रिलक्षणानुपश्यना भावना कर्मस्थानात (ध्यान विषयात) प्रस्थापित होत असल्यामुळे त्या स्वभावाचेच असतात. 'मनोकम्ममेव' (मनोकर्मच) हा पदोद्धार (शब्दाचा उलगडा) आहे. 'मनस्मिं एव' म्हणजे मनोध्वारातच (मनातच). 'किच्चसिद्धितो' म्हणजे अर्पणा कर्माच्या (ध्यान समाधीच्या) सिद्धीमुळे. 'अंगभावा संभवातो' म्हणजे अर्पणा कार्य सिद्ध होण्यात अंगभाव संभवत नसल्यामुळे. 'तंच भावनामयं' हा पदोद्धार आहे. 'दानादिवशेन' म्हणजे दान आणि शीलाच्या वशाने. 'दानाच्या वशाने प्रवृत्त न होणे' हे तर योग्यच आहे. परंतु 'शीलाच्या वशाने प्रवृत्त न होणे' हे पाळी ग्रंथाशी सुसंगत नाही. कारण पाळीमध्ये महग्गत ध्यानांमध्येही 'त्याग हे शील आहे, विरती हे शील आहे' इत्यादी म्हटले आहे, हा आक्षेप (चोदना) आहे. त्याचे परिहार (उत्तर) करताना 'जे पुन्हा...' इत्यादी म्हटले आहे. 'पर्यायाने म्हटले आहे' (परियायेन वृत्तं) - कोणत्या पर्यायाने (पद्धतीने) म्हटले आहे? नैसर्गिक चारित्र्याला 'शील' म्हटले जाते. आणि प्रथम ध्यान उत्पन्न झाल्यावर नीवरणांचा (अडथळ्यांचा) त्याग करणे हे नैसर्गिक चारित्र्यच आहे, जे नैसर्गिक नियमानेच प्रवृत्त होते. अशा प्रकारे, नैसर्गिक चारित्र्य असल्यामुळे त्याला 'शील' म्हटले गेले आहे. पुन्हा, नीवरणांचा त्याग हाच त्यांच्यापासून दूर होण्याच्या अर्थाने 'विरती' (वेरमणी), त्यांना रोखण्याच्या अर्थाने 'संवर' (संवरो) आणि त्यागाचे कार्य न सोडण्याच्या अर्थाने 'अतिक्रम न करणे' (अवीतिक्कमो) असे म्हटले गेले आहे. परंतु येथे 'चेतना शील' (चेतनासील) म्हणजे ध्यानाशी संप्रयुक्त (जोडलेली) चेतनाच अभिप्रेत आहे. आणि ती शीलाची उत्पत्ती करत असल्यामुळे तिला 'शील' म्हटले गेले आहे, असे समजावे. 'अप्पनापत्तं' (अर्पणा प्राप्त) हा पदोद्धार आहे. परंतु 'ध्यानाच्या भेदाने' (झानभेदेन) असे म्हटले पाहिजे. कारण रूपावचर कुशल हे ध्यानाच्या भेदाने पाच प्रकारचे आहे, आणि ध्यान हे ध्यान अंगांच्या भेदाने पाच प्रकारचे आहे. กุสลกมฺมทีปนา นิฏฺฐิตา. कुसलकम्मदीपनी समाप्त झाली. ๑๕๓. ‘‘เอตฺถา’’ติอาทีสุ. ‘‘ธมฺมสงฺคเห’’ติ ธมฺมสงฺคณิ ปาฬิยํ. ‘‘ทสฺสเนนา’’ติ โสตาปตฺติ มคฺคญฺญาเณน. ‘‘ตํ’’ติ อุทฺธจฺจ เจตนํ. ‘‘ภาวนายา’’ติ อุปริมคฺคตฺตยสงฺขาตาย ภาวนาย. ปาฬิปาเฐ. ‘‘จิตฺตุปฺปาทา’’ติ จิตฺตเจตสิกา วุจฺจนฺติ. ‘‘สิยา’’ติ เอกจฺเจติ อตฺเถ นิปาต ปทํ. อิเมสุ ฉสุ จิตฺตุปฺปาเทสุ เอกจฺเจ ฉ จิตฺตุปฺปาทา โสตาปตฺติ มคฺเคน ปหาตพฺพา, เอกจฺเจ ฉ จิตฺตุปฺปาทา ตีหิ อุปริ มคฺเคหิ ปหาตพฺพาติ อตฺโถ. ตตฺถ ปถมปเท ‘‘เอกจฺเจ ฉ จิตฺตุปฺปาทา’’ติ กมฺมปถปตฺตกมฺมสหชาตา ฉ จิตฺตุปฺปาทา. ทุตีย ปเท ‘‘เอกจฺเจ ฉ จิตฺตุปฺปาทา’’ติ อกมฺมปถ ปตฺตา ธมฺมิเกสุ ฐาเนสุ อสฺสาทนาภิ นนฺทาทิวเสน ปวตฺตา ฉ จิตฺตุปฺปาทา. ‘‘ตตฺถา’’ติ ธมฺมสงฺคเห. ‘‘อิตรตฺถา’’ติ อิตเรสุ ภาวนาย ปหาตพฺเพสุ. ‘‘ตสฺสา’’ติ นานกฺขณิก กมฺมปจฺจยสฺส. ปาฬิปาเฐ. ‘‘สหชาตา’’ติ อตฺตโน ปจฺจยุปฺปนฺเนหิ สหชาตา. ‘‘นานกฺขณิกา’’ติ อตฺตโน ปจฺจยุปฺปนฺเนหิ อสหชาตา อตีตกาลภูเต นานกฺขเณ ปวตฺตา ปาณาติปาตาทิ เจตนา. ‘‘ยทิ เอวํ’’ติ เอวํ ยทิ สิยาติ อตฺโถ. ยทิ อุทฺธจฺจ เจตนา ทสฺสน ปเท อนุทฺธฏตฺตา ปฏิสนฺธึ นากฑฺฒตีติ วิญฺญาเยยฺย. เอวํ สตีติ ปาฐเสโส. ‘‘เจ’’ติ เจ วเทยฺย. ‘‘นา’’ติ น สกฺกา วตฺตุํ. ‘‘ตสฺสา วิปากสฺสา’’ติ ตสฺสา อุทฺธจฺจ เจตนาย วิปากสฺส. ปาฬิปาเฐ. ‘‘อิเมสุ ธมฺเมสุ ญาณํ’’ติ อิเม ธมฺเม อารมฺมณํ กตฺวา อุปฺปนฺนญฺญาณํ. ‘‘เตสํ วิปาเก’’ติ อุทฺธจฺจ สหคตานํ วิปาเก. ‘‘ญาณํ’’ติ ตํ วิปากํ อารมฺมณํ กตฺวา อุปฺปนฺนญฺญาณํ. ‘‘สพฺพ ทุพฺพลนฺติ จ สกฺกา วตฺตุํ’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อติวิย กาฬกธมฺมตฺตา’’ติ พุทฺธาทีสุ มหนฺเตสุ ฐาเนสุ สทฺธารตนสฺส [Pg.171] อนฺตรายํ กตฺวา ปวตฺตนโต อติเยวกณฺห ธมฺมตฺตา. ตสฺสา วิจิกิจฺฉา เจตนาย ปฏิสนฺธิ อากฑฺฒนมฺปิ วิญฺญาตพฺพนฺติ โยชนา. ‘‘สภาว วิรุทฺธตฺตา เยวา’’ติ วิจิกิจฺฉา อสนฺนิฏฺฐาน สภาวา. อธิโมกฺโข สนฺนิฏฺฐาน สภาโวติ เอวํ สภาว วิรุทฺธตฺตาเยว. १५३. “येथे” इत्यादींमध्ये. “धम्मसंग्रहात” म्हणजे धम्मसंगणी पाळीमध्ये. “दर्शनाने” म्हणजे सोतापत्ति-मार्गज्ञानाने. “त्या” म्हणजे उद्धच्च चेतनेला. “भावनेने” म्हणजे वरच्या तीन मार्गांनी युक्त अशा भावनेने. पाळी पाठात. “चित्तोत्पाद” म्हणजे चित्त आणि चेतसिक म्हटले जातात. “स्यात्” (असावे) हा 'काही' या अर्थातील निपात शब्द आहे. या सहा चित्तोत्पादांपैकी काही सहा चित्तोत्पाद सोतापत्ति-मार्गाने नष्ट केले जावे आणि काही सहा चित्तोत्पाद वरच्या तीन मार्गांनी नष्ट केले जावे, असा अर्थ आहे. त्यामध्ये पहिल्या पदात “काही सहा चित्तोत्पाद” म्हणजे कम्मपथाला प्राप्त झालेल्या कम्मसहजात (कर्मासोबत उत्पन्न झालेले) सहा चित्तोत्पाद होत. दुसऱ्या पदात “काही सहा चित्तोत्पाद” म्हणजे जे कम्मपथाला प्राप्त झालेले नाहीत, परंतु धम्मिक स्थानांमध्ये आस्वादन आणि अभिनंदनादींच्या वश होऊन प्रवृत्त झालेले सहा चित्तोत्पाद होत. “तेथे” म्हणजे धम्मसंग्रहात. “इतर ठिकाणी” म्हणजे भावनेने नष्ट केल्या जाणाऱ्या इतर (चित्तोत्पादां) मध्ये. “त्याच्या” म्हणजे नानाक्षणिक कम्मप्रत्ययाच्या. पाळी पाठात. “सहजात” म्हणजे स्वतःच्या प्रत्ययोत्पन्नांसोबत (कार्यांसोबत) उत्पन्न झालेले. “नानाक्षणिक” म्हणजे स्वतःच्या प्रत्ययोत्पन्नांसोबत उत्पन्न न झालेले, तर भूतकाळात वेगवेगळ्या क्षणी प्रवृत्त झालेली पाणातिपातादी चेतना होय. “जर असे असेल” म्हणजे जर असे झाले तर, असा अर्थ आहे. जर उद्धच्च चेतना दर्शन पदात नष्ट न झाल्यामुळे प्रतिसंधीला खेचून आणत नाही, असे समजले जावे. असे असताना हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. “जर” म्हणजे जर असे म्हटले तर. “नाही” म्हणजे असे म्हणता येणार नाही. “त्याच्या विपाकाचा” म्हणजे त्या उद्धच्च चेतनेच्या विपाकाचा. पाळी पाठात. “या धम्मांचे ज्ञान” म्हणजे या धम्मांना आलंबन (विषय) करून उत्पन्न झालेले ज्ञान. “त्यांच्या विपाकात” म्हणजे उद्धच्च-सहगत विपाकात. “ज्ञान” म्हणजे त्या विपाकाला आलंबन करून उत्पन्न झालेले ज्ञान. “सर्व प्रकारे दुर्बळ आहे, असेही म्हणता येऊ शकते” असा संबंध आहे. “अत्यंत काळे (अकुशल) धम्म असल्यामुळे” म्हणजे बुद्ध इत्यादी महान स्थानांमध्ये सद्धारत्नाचा अंतराय (अडथळा) करून प्रवृत्त होत असल्यामुळे ते अत्यंत कृष्ण (काळे) धम्म आहेत. त्या विचिकित्सा चेतनेचे प्रतिसंधीला खेचून आणणे देखील समजून घ्यावे, अशी योजना आहे. “स्वभाव विरुद्ध असल्यामुळेच” म्हणजे विचिकित्सा ही अनिर्णय स्वभावाची आहे आणि अधिमोक्ष हा निर्णय स्वभावाचा आहे, अशा प्रकारे स्वभाव विरुद्ध असल्यामुळेच. ‘‘สพฺพตฺถา’’ติอาทีสุ. ‘‘วิปจฺจตีติ วิปาเจตี’’ติ วทนฺติ. ตํ ปน ปทรูเปน น สเมตีติ อญฺญํ อตฺถํ วทนฺโต ‘‘สพฺพมฺปิ วา’’ติอาทิมาห. ‘‘มหาสมฺปตฺติโย สมุฏฺฐาเปตฺวา’’ติ เทวโลเก เทวสมฺปตฺติ สทิสา ทิพฺพวิมานาทิกา มหาสมฺปตฺติโย สมุฏฺฐาเปตฺวา. อิทํ ‘‘โอกาสํ กตฺวา’’ติ ปเท วิเสสนํ. ตตฺถ ‘‘สุข วิปากํ’’ติ อิทํ อฏฺฐ อเหตุก วิปากานิ สนฺธาย วุตฺตํ. รูปโลเก พฺรหฺมานํ รูปกาโย รูปาวจร กมฺเมน นิพฺพตฺโต. โส จ กามาวจร ธมฺม สมูโห เอว. เอวํ สนฺเต ตสฺมึ โลเก ปญฺจ อเหตุก วิปากานิปิ รูปาวจร กมฺเมน นิพฺพตฺตานิ สิยุนฺติ โจทนา. ตํ ปริหรนฺโต ‘‘รูปาวจร กุสลํหี’’ติอาทิมาห. ‘‘ตานี’’ติ อปายภูมิยํ อุปฺปนฺนานิ อฏฺฐ อเหตุก วิปากานิ. ‘‘สพฺพสฺมึ กามโลเก’’ติ เอกาทสวิเธ กามโลเก. ‘‘เตสุ จา’’ติ เตสุ อฏฺฐ อเหตุก วิปาเกสุ จ. ‘‘อารมฺมณนฺตเร’’ติ กสิณ นิมิตฺตาทิโต อญฺญสฺมึ อารมฺมเณ. ‘‘นิมิตฺตา รมฺมเณ’’ติ กสิณ นิมิตฺตาทิเก นิมิตฺต ปญฺญตฺตา รมฺมเณ. ‘‘ตานิ ปญฺจวิปากานี’’ติ จกฺขุ วิญฺญาณาทีนิ ปญฺจ อเหตุก วิปากานิ กามาวจร กุสล กมฺมสฺเสว วิปากานิ โหนฺตีติ โยชนา. ‘‘โสฬสก มคฺโค’’ติ โสฬสกถา มคฺโค กถาปพนฺโธ. เอวํ ทฺวาทส กมคฺโค. ‘‘อเหตุกฏฺฐก’’นฺติ อเหตุก วิปากฏฺฐกํ. สมฺมา ปกาเรน ชานาตีติ สมฺปชานํ. ญาณํ. สมฺปชาเนน กตนฺติ วิคฺคโห. น สมฺปชานกตํ อสมฺปชานกตํ. ‘‘สทฺทหิตฺวา’’ติ เอเตน ทิฏฺฐุชุ กมฺมญาณ สมฺปตฺตึ ทีเปติ. น หิ เตน ญาเณน อสมฺปนฺโน กมฺมญฺจ กมฺมผลญฺจ สทฺทหตีติ. ชานิตฺวาติ วา ปาโฐ สิยา. ‘‘เอกเมกํ’’ติ เอกเมกํ กุสลกมฺมํ. ‘‘กุสล สมเย’’ติ กุสล กมฺม กรณกาเล. กุสลุปฺปตฺติกาเล วา. ยสฺสเม อีทิสํ ปุญฺญํ [Pg.172] ปสุตํ. ตสฺสเม ภวลาโภ โภคลาโภ มิตฺตลาโภ สพฺเพลาภา เอกนฺเตน สุลาภาติ อตฺโถ. ‘‘สุลทฺธํ’’ติ อิทํ ปุญฺญํ สุลทฺธํ. เทเวสุ จ มนุสฺเสสุ สํสริตฺวาติ ปาฐเสโส. ‘‘เสเสนา’’ติ ตสฺสกมฺมสฺส วิปากาวเสเสน. อฏฺฐกถา ปาเฐ. ‘‘เอกปิณฺฑปาตสฺมึ’’ติ เอกวารํ ปิณฺฑปาตทาเน. สํยุตฺตฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ตสฺมา ยํ วุตฺตํ ‘เอกา เจตนา เอกเมว ปฏิสนฺธึ เทตี’ติ, ตํ สุวุตฺตนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปฏิปกฺเขหี’’ติ ปฏิปกฺเขหิ อกุสเลหิ. วิเสเสน ภุสํ มุฬฺโห พฺยามุฬฺโห. อติวิย พฺยามุฬฺโห อติพฺยามุฬฺโห. อติพฺยามุฬฺหตฺถาย ปจฺจยภูตนฺติ วิคฺคโห. อติทุปฺปญฺญาย ปจฺจยภูตนฺติ อตฺโถ. โส หิ เถโร วทตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ เอวํ มนสิกริตฺวา. ‘‘สนฺนิหิตปจฺจยมตฺเตนา’’ติ อาสนฺเน สณฺฐิตปจฺจย มตฺเตน. ‘‘ปุพฺพปโยค ปจฺจยมตฺเตนา’’ติ วุตฺตํ โหติ. พลวกมฺมวเสน อุปฺปนฺนตฺตา ติกฺขตรํ วิปากํ. ยทา ปโยค รหิเตน ปจฺจยคเณน อุปฺปชฺชติ, ตทา อสงฺขาริกํ นาม. ยทา ปโยคสหิเตน, ตทา สสงฺขาริกํ นาม. ตตฺถ อสงฺขาริกํ ติกฺขํ นาม. สสงฺขาริกํ มนฺทํ นาม. ตถา ทุพฺพล กมฺเมน อุปฺปนฺเน มนฺทวิปาเกปิ โยเชตพฺพํ. เอวํ ติกฺขมนฺทานํ มนฺทติกฺขตาปตฺติ นาม สิยา. น จ ตถา สกฺกา ภวิตุนฺติ อธิปฺปาโย. เอตฺถ สิยา, ยทิ ปุพฺพกมฺมวเสน อฏฺฐนฺนํ มหาวิปากานํ สงฺขารเภโท สิทฺโธ สิยา, อฏฺฐนฺนํ อเหตุก วิปากานมฺปิ โสสงฺขารเภโท สิทฺโธ ภเวยฺย. ตานิปิ หิ กานิจิ อสงฺขาริเกน กมฺเมน นิพฺพตฺตานิ, กานิจิ สสงฺขาริเกนาติ โจทนา. ตํ ปริหรนฺโต ‘‘อเหตุก วิปากานํ ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘อุภยกมฺม นิพฺพตฺตนํ’’ติ เตสํ สงฺขาร เภทรหิตตฺตา อสงฺขาริก กมฺเมนปิ วิโรโธ นตฺถิ. สสงฺขาริก กมฺเมนปิ วิโรโธ นตฺถิ. อสงฺขาริก กมฺเมนปิ นิพฺพตฺตนฺติ. สสงฺขาริก กมฺเมนปิ นิพฺพตฺตนฺติ. เอวํ อุภยกมฺม นิพฺพตฺตนํ ยุตฺตํ. ‘‘อิติ อธิปฺปาโย’’ติ ตสฺส เถรสฺส อธิปฺปาโย. ‘‘น กมฺมาคมน วเสนา’’ติ กมฺมสงฺขาตสฺส จิรกาลโต อาคมน ปจฺจยสฺส วเสน. ‘‘อาคมนํ’’ติ จ อาคจฺฉติ เอเตนาติ อาคมนนฺติ วิคฺคโห. ‘‘กมฺมภเว’’ติ อตีเต [Pg.173] กมฺมกรณภเว. ‘‘เกจนา’’ติ เกจิ. อฏฺฐสาลินิยํ ปน อาคตาติ จ. ปฏิสมฺภิทา มคฺเค ปน ทฺวิเหตุกา วุตฺตาติ จ สมฺพนฺโธ. อิมสฺมึ ฐาเน ปฏิสมฺภิทา มคฺคฏฺฐกถา วจนมฺปิ วตฺตพฺพนฺติ วทนฺโต ‘‘ตตฺถ ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘ตีสุขเณสู’’ติ กมฺมกฺขเณ นิกนฺติกฺขเณ ปฏิสนฺธิกฺขเณติ ตีสุขเณสุ. ‘‘ฏีกาการาปนา’’ติ อภิธมฺมฏีกาการาปน. ‘‘สาวเสสปาโฐ’’ติ ปาฬิยํ ติเหตุเกน กมฺเมน ทฺวิเหตุก ปฏิสนฺธิ, ทฺวิเหตุเกน กมฺเมน อเหตุก ปฏิสนฺธิ อวเสสา โหติ. เอวํ อวเสส วากฺย สหิโต ปาโฐ. สริกฺขเมว สริกฺขกํ. กมฺเมน สริกฺขกํ สทิสํ กมฺมสริกฺขกํ. วิปากํ. ‘‘มหาเถเรนา’’ติ สาริปุตฺต มหาเถเรน. เอวญฺจ กตฺวาติอาทินา ฏีกาการานํ วจนํ อุปตฺถมฺเภติ. “सब्बत्था” (सर्वत्र) इत्यादींमध्ये. “विपच्चतीति विपाचेती” (विपक्व होते म्हणजे परिपक्व करते) असे म्हणतात. परंतु ते पदरूपाशी जुळत नाही, म्हणून दुसरा अर्थ सांगताना “सब्बम्पि वा” (किंवा सर्व काही) इत्यादी म्हटले आहे. “महासम्पत्तियो समुट्ठापेत्वा” (महान संपत्ती उत्पन्न करून) म्हणजे देवलोकात देवसंपत्तीसारखी दिव्य विमाने इत्यादी महान संपत्ती उत्पन्न करून. हे “ओकासं कत्वा” (अवकाश करून/स्थान देऊन) या पदाचे विशेषण आहे. तेथे “सुख विपाकं” (सुखद विपाक) हे आठ अहेतुक विपाकांना उद्देशून म्हटले आहे. रूपलोकात ब्रह्मांचा रूपकाय (भौतिक शरीर) रूपावचर कर्माने उत्पन्न होतो. आणि तो कामावचर धर्मांचा समूहच आहे. असे असताना, त्या लोकात पाच अहेतुक विपाक देखील रूपावचर कर्माने उत्पन्न व्हावेत, अशी शंका (चोदना) उपस्थित होते. तिचे परिहार (निवारण) करताना “रूपावचर कुसलंही” इत्यादी म्हटले आहे. “तानी” (ती) म्हणजे अपायभूमीत (दुर्गतीमध्ये) उत्पन्न झालेले आठ अहेतुक विपाक. “सब्बस्मिं कामलोके” म्हणजे अकरा प्रकारच्या कामलोकात. “तेसु चा” म्हणजे त्या आठ अहेतुक विपाकांमध्ये. “आरम्मणन्तरे” (इतर आलंबनात) म्हणजे कसिण-निमित्त इत्यादींपेक्षा इतर आलंबनात. “निमित्तारम्मणे” म्हणजे कसिण-निमित्त इत्यादी निमित्त-प्रज्ञप्ती आलंबनात. “तानि पञ्चविपाकानी” म्हणजे चक्षु-विज्ञानादी पाच अहेतुक विपाक हे कामावचर कुशल कर्माचेच विपाक असतात, अशी योजना (संबंध) आहे. “सोळसक मग्गो” म्हणजे सोळा कथांचा मार्ग किंवा कथाप्रबंध. याचप्रमाणे बारा कर्मांचा मार्ग (द्वादस कम्मग्गो). “अहेतुकट्ठकं” म्हणजे अहेतुक विपाक-अष्टक. सम्यक प्रकारे जाणतो तो ‘संपजान’ (संप्रजन्य/जाणकार). ज्ञान. संपजानेन कतं (संप्रजन्याने केलेले) असा विग्रह आहे. जे संप्रजन्याने केलेले नाही ते ‘असंपजानकतं’ (असंप्रजन्यकृत). “सद्दहित्वा” (श्रद्धा ठेवून) याद्वारे दृष्टीची ऋजुता आणि कर्मज्ञानाची संपत्ती दर्शविली आहे. कारण त्या ज्ञानाने संपन्न नसलेला मनुष्य कर्म आणि कर्मफलावर श्रद्धा ठेवत नाही. किंवा “जानित्वा” (जाणून) असा पाठ असावा. “एकमेकं” म्हणजे एकेक कुशल कर्म. “कुसल समये” म्हणजे कुशल कर्म करण्याच्या वेळी किंवा कुशल चित्त उत्पन्न होण्याच्या वेळी. “माझ्याद्वारे अशा प्रकारचे पुण्य संचित केले गेले आहे. त्यामुळे मला भवलाभ, भोगलाभ, मित्रलाभ आणि सर्व लाभ निश्चितपणे सुलभतेने प्राप्त होतील” असा अर्थ आहे. “सुलद्धं” (सुप्राप्त) म्हणजे हे पुण्य सुलभतेने प्राप्त झाले आहे. “देवांमध्ये आणि मनुष्यांमध्ये संसार करून (जन्म घेऊन)” असा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. “सेसेन” (उर्वरित भागाद्वारे) म्हणजे त्या कर्माच्या विपाकाच्या उर्वरित भागाने. अट्ठकथा पाठात. “एकपिण्डपातस्मिं” म्हणजे एक वेळच्या पिंडपात दानात. संयुत्त-अट्ठकथेत असे म्हटले आहे. म्हणून जे म्हटले आहे की ‘एक चेतना एकच प्रतिसंधी देते’, ते सुवचन आहे (योग्य प्रकारे म्हटले आहे), असा अभिप्राय आहे. “पटिपक्खेही” म्हणजे प्रतिपक्षी अकुशलांद्वारे. विशेष रूपाने अत्यंत मोहित झालेला तो ‘ब्यामुळ्हो’ (व्यामूढ). अत्यंत व्यामूढ तो ‘अतिब्यामुळ्हो’. अतिव्यामूढतेसाठी जो प्रत्ययभूत (कारणभूत) आहे, असा विग्रह आहे. अति-दुर्बुद्धतेसाठी कारणभूत आहे, असा अर्थ आहे. “तो थेर (स्थवीर) बोलतो” असा संबंध आहे. “इति कत्वा” म्हणजे असा मनस्कार करून. “सन्निहितपच्चयमत्तेना” म्हणजे जवळ असलेल्या प्रत्ययाच्या (कारणाच्या) केवळ अस्तित्वाने. “पुब्बपयोग पच्चयमत्तेना” (पूर्वप्रयोगाच्या प्रत्ययमात्रेने) असे म्हटले आहे. बलवान कर्माच्या प्रभावाने उत्पन्न झाल्यामुळे विपाक अधिक तीव्र (तीक्ष्णतर) असतो. जेव्हा तो प्रयोगाशिवाय (प्रेरणेशिवाय) प्रत्यय-समूहाने उत्पन्न होतो, तेव्हा त्याला ‘असंखारिक’ (असंस्कारिक) म्हणतात. जेव्हा प्रयोगासह (प्रेरणेसह) उत्पन्न होतो, तेव्हा त्याला ‘ससंखारिक’ (ससंस्कारिक) म्हणतात. त्यामध्ये असंखारिक हे तीक्ष्ण (तीव्र) असते. ससंखारिक हे मंद असते. त्याचप्रमाणे दुर्बल कर्माने उत्पन्न झालेल्या मंद विपाकातही हीच योजना करावी. अशा प्रकारे तीक्ष्ण आणि मंद यांच्यात मंद-तीक्ष्णता प्राप्त होईल. परंतु तसे होणे शक्य नाही, असा अभिप्राय आहे. येथे अशी शंका उपस्थित होऊ शकते की, जर पूर्वकर्माच्या प्रभावाने आठ महाविपाकांचा संस्कार-भेद सिद्ध होत असेल, तर आठ अहेतुक विपाकांचा देखील तो संस्कार-भेद सिद्ध व्हायला हवा. कारण ते देखील काही असंखारिक कर्माने उत्पन्न होतात आणि काही ससंखारिक कर्माने, अशी शंका (चोदना) आहे. तिचे परिहार करताना “अहेतुक विपाकानं पना” इत्यादी म्हटले आहे. “उभयकम्म निब्बत्तनं” म्हणजे त्यांचा संस्कार-भेद नसल्यामुळे असंखारिक कर्माशीही विरोध नाही आणि ससंखारिक कर्माशीही विरोध नाही. ते असंखारिक कर्मानेही उत्पन्न होतात आणि ससंखारिक कर्मानेही उत्पन्न होतात. अशा प्रकारे दोन्ही कर्मांनी उत्पन्न होणे योग्य आहे. “इति अधिपायो” म्हणजे त्या थेरांचा (स्थविरांचा) असा अभिप्राय आहे. “न कम्मागमन वसेना” म्हणजे कर्म नावाच्या दीर्घकाळापासून चालत आलेल्या आगमनाच्या (कारणाच्या) प्रभावाने नाही. “आगमनं” म्हणजे ज्याच्याद्वारे येते ते आगमन, असा विग्रह आहे. “कम्मभवे” म्हणजे भूतकाळातील कर्म करण्याच्या भवात (अस्तित्वात). “केचना” म्हणजे काही आचार्य. अट्ठसालिनीमध्ये आले आहे आणि पटिसम्भिदामग्गात द्विहेतुक म्हटले आहे, असा संबंध आहे. या ठिकाणी पटिसम्भिदामग्ग-अट्ठकथेचे वचन देखील सांगितले पाहिजे, असे सांगताना “तत्थ पना” इत्यादी म्हटले आहे. “तीसुखणेसू” म्हणजे कर्मक्षण, निकन्तीक्षण (आसक्तीचा क्षण) आणि प्रतिसंधीक्षण या तीन क्षणांमध्ये. “टीकाकारापना” म्हणजे अभिधम्म-टीकाकार. “सावसेसपाठो” म्हणजे पाळीमध्ये (पालि पाठात) तिहेतुक कर्माने द्विहेतुक प्रतिसंधी आणि द्विहेतुक कर्माने अहेतुक प्रतिसंधी उर्वरित राहते. अशा प्रकारे उर्वरित वाक्यासह असलेला पाठ. सदृश तेच सरिक्खक (सारखे). कर्माशी सदृश (समान) ते ‘कम्मसरिक्खकं’ (कर्मसदृश) विपाक. “महाथेरेना” म्हणजे महास्थवीर सारिपुत्तांद्वारे. आणि असे करून इत्यादींद्वारे टीकाकारांच्या वचनाचे समर्थन करतात. กามาวจรกมฺมํ นิฏฺฐิตํ. कामावचर कर्म समाप्त झाले। ๑๕๔. รูปาวจรกมฺเม. ‘‘อปฺปคุณตายา’’ติ อปริจิตตาย. อวฑฺฒตาย. ‘‘หีเนหิ ฉนฺทาทีหี’’ติ ลาภสกฺการ สิโลกาทิ สาเปกฺขตาย หีเนหิ ฉนฺทาทีหิ. ‘‘เต ธมฺมา’’ติ ฉนฺทาทโย ธมฺมา. ตานิ อิธ นาธิปฺเปตานิ. กสฺมา, อุปปตฺติปฺปเภทสฺส อสาธกตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อิมาเนวา’’ติ อิมานิ เอว ฌานานิ. ‘‘ติวิธาสู’’ติ เอกสฺมึตเล พฺรหฺมปาริสชฺชาทิ วเสน ติวิธาสุ. ‘‘อฏฺฐารสปฺปเภเทน วิภชิตฺวา’’ติ ตีสุ หีน มชฺฌิมปณีเตสุ เอเกกสฺมึ หีน หีนํ หีน มชฺฌิมํ หีน ปณีตนฺติอาทินา วิภตฺเตน นววิธานิ โหนฺติ. ปุน เตสุ ตีณิ มชฺฌิมานิ. มชฺฌิมหีนํ มชฺฌิมมชฺฌิมนฺติอาทินา วิภตฺตานิ นววิธานิ โหนฺติ. เอวํ อฏฺฐารสเภเทน วิภชิตฺวา. ‘‘กมฺมทฺวารานิ นามา’’ติ กมฺมปฺปวตฺติ มุขานิ นาม. ‘‘อิเมหิ ปภาวิตตฺตา’’ติ อิเมหิ ปภาเวหิ มูลการเณหิ ปภาวิตตฺตา ปวตฺตาปิตตฺตา. ‘‘อฏฺฐารสขตฺติยา’’ติ หีนมชฺฌิมาทิเภเทน อฏฺฐารส ขตฺติยา. ตถา อฏฺฐารส พฺราหฺมณาทโย. อฏฺฐ จตฺตาลีส โคตฺตานิ นาม หีนมชฺฌิมา ทิวเสน [Pg.174] วิภตฺตานิ โคตมโคตฺตาทีนิ อฏฺฐจตฺตาลีส โคตฺตานิ. เตสํ จาริตฺต ปฏิปตฺติภูตานิ จรณานิปิ อฏฺฐจตฺตาลีส โหนฺตีติ. เอตฺถ สิยา. ปุริม วจเน หีนาทีนิ พฺรหฺมโลเก, อฏฺฐกถา วจเนหีนาทีนิ มนุสฺสโลเกติ สาเธตพฺพํ อญฺญํ, สาธกํ อญฺญนฺติ โจทนา. ตํ ปริหรติ ‘‘เอเตนหี’’ติอาทินา. ‘‘อุปลกฺเขตี’’ติ ปจฺจกฺขโต ปากฏํ เอกเทสํ ทสฺเสตฺวา อปากเฏ ตาทิเสปิ ชานาเปตีติ อตฺโถ. ‘‘สมตฺถา สมตฺถํ วา’’ติ สมตฺถา สมตฺถภาวํ วา. ‘‘ตถา หาเนนา’’ติ ตถาหิ อเนน อาจริเยน. อนุรุทฺธา จริเยนาติ วุตฺตํ โหติ. นาม รูป ปริจฺเฉเท วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. สมานาเสวเน ลทฺเธ สติ, มหพฺพเล วิชฺชมาเน มหคฺคตกมฺมํ วิปากํ ชเนติ. ตาทิสํ เหตุํ อลทฺธา อลภิตฺวา อภิญฺญา เจตนา วิปากํ น ปจฺจตีติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘สมานา เสวเน’’ติ ภูมิสมานตา วเสน สมานาเสวเน. กามชวนํ กามชวเนน สมานาเสวนํ. รูปชวนํ รูปชวเนน. อรูปชวนํ อรูปชวเนนาติ ทฏฺฐพฺพํ. เตน วุตฺตํ ‘‘สมานภูมิกโต’’ติอาทิ. ตตฺถ ‘‘ตทภาวโต’’ติ ตาทิสสฺส พลวภาวสฺส อภาวโต. เอกวารมตฺตภูตา มหคฺคต เจตนา จ. ‘‘สพฺพ ปถมภูตา’’ติ สมาปตฺติ วีถีสุ โคตฺรภุสฺส อนนฺตเร มหคฺคต ชวนํ สนฺธาย วุตฺตํ. โลกุตฺตร มคฺคเจตนา กทาจิปิ สมานา เสวนํ น ลภติ. เอวํ สนฺเตปิ อตฺตโน อนนฺตรโต ปฏฺฐาย ยาวชีวมฺปิ ภวนฺตเรปิ อริยผลํ ชเนติเยว. เอวเมวาติ วุตฺตํ โหติ. อิทํ ปวตฺติผลํ นาม โหติ, อิธ ปน ปฏิสนฺธิ ผลํ วิจาริตํ, ตสฺมา อสมานํ อิทํ นิทสฺสนนฺติ เจ. วุจฺจเต. มคฺคเจตนา นาม ตณฺหา สหายกํ วฏฺฏคามิ กมฺมํ น โหติ. อตณฺหา สหายกํ วิวฏฺฏคามิ กมฺมํ โหติ. ตสฺมา ปฏิสนฺธึ น เทติ. สเจ ปน ตํ ตณฺหา สหายกํ วฏฺฏคามิกมฺมํ ภเวยฺย. ปฏิสนฺธิ กาเลปิ ผลํ ทเทยฺย. อสมานา เสวนตา ปมาณํ น ภเวยฺย. เอวํ อญฺญการณตฺตา อสมานํ นิทสฺสนํ โหติ. น อสมานา เสวนตายาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘อุปจิตตฺตา’’ติ ปุนปฺปุนํ อาเสวน ลาเภน วฑฺฒิตตฺตา. ‘‘สา เจตนา’’ติอาทิกมฺมิกมหคฺคต เจตนา จ. ‘‘นา’’ติ โจทนา[Pg.175], น สิยาติ อตฺโถ. น จ สาปิ สมานภูมก ธมฺมโต ลทฺธา เสวนา โหติ. เอวํ สนฺเตปิ กตตฺตา ภาวิตตฺตาติ วุตฺตํ. ภาวิตตฺตาติ จ ปุนปฺปุนํ อาเสวน ลาเภน วฑฺฒิตตฺตา อิจฺเจวตฺโถ. ตสฺมา วิญฺญายติ อสมานภูมิเกหิ ปุพฺพภาคปฺปวตฺเตหิ กามชวเนหิ ปรมฺปรโต ปุนปฺปุนํ ลทฺธา เสวนตาย เอว อิธ อุปจิตตฺตาติ วุตฺตนฺติ. เตน วุตฺตํ ‘‘อุภยตฺถ ปนา’’ติอาทิ. ตตฺถ ‘‘อุภยตฺถา’’ติ อุภเยสุ กตตฺตา อุปจิตตฺตาติ จ กตตฺตา ภาวิตตฺตาติ จ วุตฺเตสุ ปาเฐสุ. ‘‘ปถม สมนฺนาหารโต ปฏฺฏายา’’ติ มหคฺคตชฺฌาเน อปฺปนาวีถิโต ปุเร ทฺวีสุ ปริกมฺม ภาวนา อุปจาร ภาวนาสุ ปริกมฺม ภาวนํ ภาเวนฺตสฺส ปถวี ปถวีติอาทินา ปถม สมนฺนาหารโต ปฏฺฐาย. โลกุตฺตร มคฺเคปน ทสสุ วิปสฺสนา ญาเณสุ สพฺพปถมํ สมฺมสนญฺญาณํ ภาเวนฺตสฺส รูปํ อนิจฺจํ เวทนา อนิจฺจาติอาทินา ปถม สมนฺนาหารโต ปฏฺฐายาติ อตฺโถ. อุปจินิตฺวาติ จ ภาเวตฺวาติ จ วฑฺเฒตฺวา อิจฺเจว อตฺโถ. ‘‘อพฺภุณฺหา’’ติ อภินวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อยํ วาโท’’ติ อนุรุทฺธา จริยสฺส วาโท. ยทิ เอวํ, อฏฺฐกถาสุ สงฺขาร ปจฺจยา วิญฺญาณ ปท นิทฺเทเสสุ อภิญฺญา เจตนา ปเนตฺถ ปรโต วิญฺญาณสฺส ปจฺจโย น โหตีติ น คหิตาติ วุตฺตํ. ตตฺถ อญฺญํ ยุตฺตํ การณํ วตฺตพฺพนฺติ, ตํ วทนฺโต ‘‘จตุตฺถชฺฌาน สมาธิสฺส ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘ฏีกาการา’’ติ อภิธมฺมฏีกาการา. ‘‘ตสฺสา ปนา’’ติอาทิ อตฺตโนวาท ทสฺสนํ. สาเธนฺติยา อภิญฺญา เจตนาย. อจิตฺตกภว ปตฺถนาสหิตํ สญฺญา วิราคนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิธา’’ติ มนุสฺส โลเก. १५४. रूपावचर कर्मामध्ये. “अप्पगुणताय” म्हणजे अपरिचिततेमुळे, अवृद्धतेमुळे (अविकसिततेमुळे). “हीनेहि छन्दादीहि” म्हणजे लाभ, सत्कार, कीर्ती इत्यादींच्या अपेक्षेने हीन (कनिष्ठ) अशा छंद (इच्छा) इत्यादींमुळे. “ते धम्मा” म्हणजे छंद इत्यादी धर्म. ते येथे अभिप्रेत नाहीत. कारण काय? कारण ते उत्पत्तीच्या (पुनर्जन्माच्या) भेदाचे साधक नसतात, असा अभिप्राय आहे. “इमानेव” म्हणजे हीच ध्याने. “तिविधासु” म्हणजे एकाच भूमीवर (तलावर) ब्रह्मपारिसज्ज इत्यादींच्या रूपाने तीन प्रकारांमध्ये. “अट्ठारसप्पभेदेन विभजित्वा” म्हणजे हीन, मध्यम आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) या तिन्हींमध्ये प्रत्येकी हीन-हीन, हीन-मध्यम, हीन-प्रणीत इत्यादी प्रकारे विभागणी केल्यास नऊ प्रकार होतात. पुन्हा त्यांमध्ये तीन मध्यम असतात. मध्यम-हीन, मध्यम-मध्यम इत्यादी प्रकारे विभागणी केल्यास नऊ प्रकार होतात. अशा प्रकारे अठरा भेदांमध्ये विभागणी करून. “कम्मद्वाराने नाम” म्हणजे कर्माच्या प्रवृत्तीचे मार्ग (द्वारे). “इमेहि पभावितत्ता” म्हणजे या प्रभावांमुळे, मूळ कारणांमुळे प्रभावित झाल्यामुळे किंवा प्रवृत्त केल्यामुळे. “अट्ठारसखत्तिया” म्हणजे हीन, मध्यम इत्यादी भेदांनी अठरा क्षत्रिय. तसेच अठरा ब्राह्मण इत्यादी. “अट्ठचत्तालीस गोत्तानि नाम” म्हणजे हीन, मध्यम इत्यादी भेदांनी विभागलेली गोतम गोत्र इत्यादी अठ्ठेचाळीस गोत्रे. त्यांच्या आचरण आणि प्रतिपत्तीरूप असणारी ‘चरणे’ देखील अठ्ठेचाळीस होतात. येथे अशी शंका उपस्थित होऊ शकते. पूर्व वचनात हीन इत्यादी ब्रह्मलोकात सांगितले आहेत, तर अट्ठकथेच्या वचनात हीन इत्यादी मनुष्यलोकात सांगितले आहेत; त्यामुळे सिद्ध करायचे काही वेगळेच आहे आणि त्याचे साधक (प्रमाण) काही वेगळेच आहे, असा आक्षेप (चोदना) आहे. त्याचे परिहार (समाधान) “एतेनही” इत्यादींद्वारे करतात. “उपलक्खेति” म्हणजे प्रत्यक्षपणे स्पष्ट असलेल्या एका भागाला दाखवून, अस्पष्ट असलेल्या तशाच दुसऱ्या भागाचेही ज्ञान करून देणे, असा अर्थ आहे. “समत्था समत्थं वा” म्हणजे समर्थ किंवा असमर्थ भाव. “तथा हानेन” म्हणजे कारण या आचार्यांनी, म्हणजेच आचार्य अनुरुद्धांनी असे म्हटले आहे. ‘नामरूपपरिच्छेद’ मध्ये म्हटले आहे, असा संबंध आहे. समान आसेवन (पुनरावृत्ती) प्राप्त झाल्यावर आणि मोठे बल विद्यमान असताना, महग्गत कर्म विपाक (फळ) उत्पन्न करते. तसे कारण न मिळाल्यामुळे (प्राप्त न झाल्यामुळे) अभिज्ञा चेतना विपाक देत नाही, अशी योजना आहे. तेथे “समानासेवने” म्हणजे भूमीच्या समानतेच्या आधारे समान आसेवन होय. कामजवन हे कामजवनाशी समान आसेवन आहे, रूपजवन हे रूपजवनाशी आणि अरूपजवन हे अरूपजवनशी, असे समजावे. म्हणूनच “समानभूमिकतो” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “तदभावतो” म्हणजे तशा बलवान भावाचा अभाव असल्यामुळे. आणि केवळ एकदाच उत्पन्न झालेली महग्गत चेतना. “सब्बपठमभूता” हे समापत्तीच्या वीथींमध्ये गोत्रभूच्या लगेच नंतर येणाऱ्या महग्गत जवनाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. लोकोत्तर मार्गचेतना कधीही समान आसेवन प्राप्त करत नाही. असे असूनही, ती आपल्या लगेच नंतरच्या क्षणापासून सुरू करून आयुष्यभर आणि दुसऱ्या जन्मातही आर्यफळ उत्पन्न करतेच. “एवमेव” (अशाच प्रकारे) असे म्हटले आहे. जर असे म्हटले की, हे प्रवृत्ती-फळ आहे, परंतु येथे प्रतिसंधी-फळाचा विचार केला आहे, त्यामुळे हे उदाहरण असमान (विसंगत) आहे, तर त्यावर उत्तर दिले जाते: मार्गचेतना ही तृष्णेच्या सहाय्याने होणारे वट्टगामी (संसारगामी) कर्म नसते. ती तृष्णेच्या सहाय्याशिवाय असणारे विवट्टगामी (संसारमुक्त करणारे) कर्म असते. म्हणून ती प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) देत नाही. पण जर ती तृष्णेच्या सहाय्याने होणारे वट्टगामी कर्म असती, तर तिने प्रतिसंधीच्या वेळीही फळ दिले असते. असमान आसेवन हे प्रमाण (कारण) ठरले नसते. अशा प्रकारे इतर कारणांमुळे हे उदाहरण असमान ठरते, असमान आसेवनामुळे नाही, असे समजावे. “उपचितत्ता” म्हणजे वारंवार आसेवन (सराव) मिळाल्यामुळे वाढलेली (पुष्ट झालेली). “सा चेतना” म्हणजे आदिकर्मिक महग्गत चेतना होय. “ना” हा आक्षेप आहे, म्हणजे ‘असे नसावे’ असा अर्थ आहे. आणि ती देखील समान भूमीच्या धर्मापासून प्राप्त झालेले आसेवन नसते. असे असूनही तिला “कृतत्वामुळे, भावितत्वामुळे” असे म्हटले आहे. ‘भावितत्वामुळे’ याचा अर्थ देखील वारंवार आसेवन मिळाल्यामुळे वाढलेली, असाच आहे. म्हणून हे समजते की, असमान भूमीच्या, पूर्वभागात प्रवृत्त झालेल्या कामजवनांद्वारे परंपरेने वारंवार प्राप्त झालेल्या आसेवनामुळेच येथे “उपचितत्वामुळे” असे म्हटले आहे. म्हणूनच “उभयत्थ पना” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “उभयत्थ” म्हणजे “कृतत्वामुळे, उपचितत्वामुळे” आणि “कृतत्वामुळे, भावितत्वामुळे” या दोन्ही पाठांमध्ये. “पठम समन्नाहारतो पट्टाय” म्हणजे महग्गत ध्यानात अर्पणावीथीच्या पूर्वी दोन भावनांमध्ये - परिकर्म भावना आणि उपचार भावना यांपैकी परिकर्म भावनेचा अभ्यास करणाऱ्याच्या “पठवी, पठवी” (पृथ्वी, पृथ्वी) इत्यादी पहिल्या समन्नाहारापासून (मनस्कारापासून) सुरू करून. लोकोत्तर मार्गात तर दहा विपश्यना ज्ञानांमध्ये सर्वात पहिल्या संमसनज्ञानाचा अभ्यास करणाऱ्याच्या “रूप अनित्य आहे, वेदना अनित्य आहे” इत्यादी पहिल्या समन्नाहारापासून सुरू करून, असा अर्थ आहे. ‘उपचिनित्वा’ आणि ‘भावेत्वा’ यांचा अर्थ ‘वाढवून’ (विकसित करून) असाच आहे. “अब्भुणhā” म्हणजे अभिनव (नवीन) असे म्हटले आहे. “अयं वादो” म्हणजे आचार्य अनुरुद्धांचे मत (वाद). जर असे असेल, तर अट्ठकथांमध्ये ‘संस्कार-प्रत्यया विज्ञाण’ या पदाच्या निर्देशात “येथे अभिज्ञा चेतना ही नंतरच्या विज्ञानाचा प्रत्यय (कारण) होत नाही, म्हणून ती घेतली नाही” असे म्हटले आहे. तेथे दुसरे योग्य कारण सांगितले पाहिजे, असे सांगताना “चतुत्थज्झान समाधिस्स पना” इत्यादी म्हटले आहे. “टीकाकारा” म्हणजे अभिधम्मटीकाकार. “तस्सा पना” इत्यादी स्वतःचे मत दर्शवणे आहे. सिद्ध करणाऱ्या अभिज्ञा चेतनेचे. अचित्तक भवाच्या (असंज्ञी जन्माच्या) प्रार्थनेने युक्त असणारा ‘संज्ञा-विराग’ असा संबंध आहे. “इध” म्हणजे मनुष्यलोकात। ‘‘อนาคามิโน ปนา’’ติอาทีสุ. ‘‘เอเตนา’’ติ เอเตน อตฺถ วจเนน. ‘‘สทฺธาธิโก’’ติ สนฺธินฺทฺริยาธิโก. เอวํ วีริยาธิกาทีสุปิ. ‘‘อตฺตนา ลทฺธ สมาปตฺตีนํ’’ติ เอกสฺสปิ ปุคฺคลสฺส พหูนํ อตฺตนา ลทฺธ สมาปตฺตีนํ. เตสุ ปุถุชฺชน โสตาปนฺน สกทาคามีสุ. ‘‘ปุถุชฺชโน’’ติ ฌานลาภิ ปุถุชฺชโน. ‘‘นิกนฺติยาสตี’’ติ กามภวนิกนฺติยา สติ. ‘‘อิตเร ปนา’’ติ โสตาปนฺน [Pg.176] สกทาคามิโน ปน. ปริหีนชฺฌานา เอว ตตฺถ นิพฺพตฺตนฺติ. น นิกนฺติ พเลนาติ อธิปฺปาโย. วิภาวนิปาเฐ ‘‘เตสํ ปี’’ติ ฌานลาภิ โสตาปนฺน สกทาคามีนมฺปิ. อิจฺฉนฺเตน ฏีกาจริเยน. ตถา นิกนฺติยา สติ ปุถุชฺชนาทโย กามาวจร กมฺม พเลน กามภเวปิ นิพฺพตฺตนฺตีติ โยชนา. เจโตปณิธิ อิชฺฌติ. กสฺมา, วิสุทฺธตฺตา. สีลวิสุทฺธตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘เต’’ติ ฌานลาภิ โสตาปนฺน สกทาคามิโน. องฺคุตฺตร ปาเฐ. ‘‘สหทสฺสนุปฺปาทา’’ติ โสตาปตฺติ มคฺคญฺญาณํ ทสฺสนนฺติ วุจฺจติ. ทสฺสนสฺส อุปฺปาทกฺขเณน สทฺธึ. นตฺถิ ตสฺส ตํ สํโยชนนฺติปิ ปาโฐ. ‘‘อิมํ โลกํ’’ติ อิมํ กามโลกํ. ‘‘วิปสฺสนา นิกนฺติ ตณฺหา’’ติ เตเนว ธมฺมราเคน ตาย ธมฺม นนฺทิยาติ เอวํ วุตฺตา วิปสฺสนา สุเข นิกนฺติ ตณฺหา. ปจฺจเย สติ กุปฺปนฺติ นสฺสนฺตีติ กุปฺปา. กุปฺปา ธมฺมา เยสํ เต กุปฺป ธมฺมา. ‘‘ธมฺมา’’ติ มหคฺคต ธมฺมา. อิเม ทฺเว โสตาปนฺน สกทาคามิโน สีเลสุ ปริปูรการิโน นาม. สีลปฺปฏิ ปกฺขานํ กิเลสานํ สพฺพโส ปหีนตฺตา. ตสฺมา เต สีเลสุ อกุปฺป ธมฺมาติ วุจฺจนฺติ. สมาธิสฺมึ ปน กุปฺป ธมฺมา เอว. ‘‘มหาพฺรหฺเมสุ น นิพฺพตฺตนฺตี’’ติ มหาพฺรหฺมตฺตํ น ลภนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘หีนชฺฌาสยตฺตา’’ติ เอตฺถ อิตฺถิโย นาม ปกติยาว หีนชฺฌาสยา โหนฺติ นีจ ฉนฺทา นีจ จิตฺตา มนฺทวีริยา มนฺทปญฺญา. กสฺมา, หีนลิงฺคตฺตา. กสฺมา จ ตา หีนลิงฺคา โหนฺติ. ทุพฺพล กมฺมนิพฺพตฺตตฺตา. ทุพฺพล กมฺมนฺติ จ ปุริสตฺต ชนกํ กมฺมํ อุปาทาย วุจฺจติ. พฺรหฺมปุโรหิตานมฺปิ สงฺคหณํ เวทิตพฺพํ. กสฺมา, พฺรหฺมปาริสชฺชานนฺติ อฏฺฐกถา วจนสฺส เยภูยฺยวจนตฺตา. เตนาห ‘‘น มหาพฺรหฺมานํ’’ติ. อิตรถา น พฺรหฺมปุโรหิตานํ น จ มหาพฺรหฺมานนฺติ วุตฺตํ สิยา. น จ ตถา สกฺกา วตฺตุํ ‘พฺรหฺมตฺตนฺติ มหาพฺรหฺมตฺต’นฺติ อิมินา วจเนน วิรุชฺฌนโต. อยญฺจ อตฺโถ น เกวลํ เยภูยฺยนยมตฺเตน สิทฺโธ. อถ โข พฺยญฺชน สามตฺถิเยนาปิ สิทฺโธติ ทสฺเสตุํ ‘‘เตหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘เต’’ติ พฺรหฺมปุโรหิตา. สํยุตฺตปาเฐ. ‘‘ปฏิภาตุตํ’’ติ เอตฺถ ‘‘ตํ’’ติ ตุยฺหํ. ธมฺมีกถา ตุยฺหํ ปฏิภาตุ, ปาตุพฺภวตุ. กเถตุ อิจฺเจว วุตฺตํ โหติ[Pg.177]. ‘‘พฺราหฺมณา’’ติ อภิภุํ ภิกฺขุํ อาลปติ. ‘‘พฺรหฺมุโน’’ติ มหาพฺรหฺมุโน อตฺถาย. เอวํ เสเสสุ ทฺวีสุ. ‘‘เตสํ’’ติ พฺรหฺมปุโรหิตานํ. วิภาวนิปาเฐ ‘‘อิติ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ’’ติ ‘‘พฺรหฺมปาริสชฺเชสุ เยวา’’ติ ปุลฺลิงฺค วจนตฺตา ปุคฺคลปฺปธานํ โหติ. นภูมิปฺปธานํ. ตสฺมา อยมตฺโถ ยุตฺติวเสน ทฏฺฐพฺโพติ. ‘‘ตีสุภวคฺเคสู’’ติ เวหปฺผลภูมิ ปุถุชฺชนภวคฺโค นาม โหติ รูปโลเก. ตโต อุปริ ปุถุชฺชนภูมิยา อภาวโต. อกนิฏฺฐภูมิ อริยภวคฺโค นาม. ตตฺถ ฐิตานํ อริยานํ ตตฺเถว นิฏฺฐานโต. เนวสญฺญาภูมิ โลกภวคฺโค นาม. ตโต อุปริ โลกสฺเสว อภาวโตติ. “अनागामिनो पना” इत्यादींमध्ये. “एतेन” म्हणजे या अर्थवचनाने. “सद्धाधिको” म्हणजे श्रद्धा-इंद्रियाने अधिक असलेला. याचप्रमाणे वीर्याधिक इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. “अत्तना लद्ध समापत्तीनं” म्हणजे एकाच पुद्गलाने (व्यक्तीने) स्वतः प्राप्त केलेल्या अनेक समापत्तींचे. त्या पृथग्जन, स्रोतापन्न आणि सकदागामी यांच्यामध्ये. “पुथुज्जनो” म्हणजे ध्यान प्राप्त केलेला पृथग्जन. “निकन्तिया सति” म्हणजे कामभवाविषयीची आसक्ती असताना. “इतरे पना” म्हणजे स्रोतापन्न आणि सकदागामी. ध्यानापासून भ्रष्ट झालेलेच तेथे उत्पन्न होतात. आसक्तीच्या बलाने नाही, असा अभिप्राय आहे. विभावनी-पाठात “तेसं पि” म्हणजे ध्यान प्राप्त केलेल्या स्रोतापन्न आणि सकदागामींचे सुद्धा. अशी इच्छा करणाऱ्या टीकाचार्यांनी (म्हटले आहे). त्याचप्रमाणे आसक्ती असताना पृथग्जन इत्यादी कामावचर कर्माच्या बलाने कामभवातही उत्पन्न होतात, अशी योजना आहे. चित्ताचा संकल्प यशस्वी होतो. कशामुळे? विशुद्धतेमुळे. शीलविशुद्धतेमुळे, असा अभिप्राय आहे. “ते” म्हणजे ध्यान प्राप्त केलेले स्रोतापन्न आणि सकदागामी. अंगुत्तर पाठात. “सहदस्सनुप्पादा” म्हणजे स्रोतापत्ती मार्गज्ञानाला ‘दस्सन’ (दर्शन) असे म्हटले आहे. दर्शनाच्या उत्पादक्षणासह. “नत्थि तस्स तं संयोजनं” असाही पाठ आहे. “इमं लोकं” म्हणजे या कामलोकाला. “विपस्सना निकन्ति तण्हा” म्हणजे त्याच धर्मरागाने, त्याच धर्मनंदीने अशा प्रकारे म्हटलेली विपश्यना सुखातील आसक्तीची तृष्णा होय. प्रत्यय (कारण) असताना जे क्षुब्ध होतात, नष्ट होतात, ते ‘कुप्पा’ (कोपणारे/नष्ट होणारे). ज्यांचे धर्म कुप्प असतात, ते ‘कुप्पधम्मा’. “धम्मा” म्हणजे महग्गत धर्म. हे दोन्ही, स्रोतापन्न आणि सकदागामी, शीलांमध्ये परिपूर्ण करणारे आहेत. शीलाच्या विरोधी असलेल्या क्लेशांचा सर्वथा प्रहाण झाल्यामुळे. म्हणून त्यांना शीलाच्या बाबतीत ‘अकुप्पधम्मा’ म्हटले जाते. समाधीच्या बाबतीत मात्र ते ‘कुप्पधम्मा’च असतात. “महाब्रह्मेसु न निब्बत्तन्ति” म्हणजे ते महाब्रह्मपद मिळवत नाहीत, असा अभिप्राय आहे. “हीनज्झासयत्ता” येथे स्त्रिया या स्वभावानेच हीन आशयाच्या, नीच छंदाच्या, नीच चित्ताच्या, मंद वीर्याच्या आणि मंद प्रज्ञेच्या असतात. कशामुळे? हीन लिंगामुळे. आणि त्या हीन लिंगाच्या का असतात? दुर्बळ कर्मामुळे उत्पन्न झाल्यामुळे. आणि ‘दुर्बळ कर्म’ हे पुरुषत्व निर्माण करणाऱ्या कर्माच्या अपेक्षेने म्हटले जाते. ब्रह्मपुरोहितांचाही यात समावेश समजावा. कशामुळे? कारण “ब्रह्मपारिसज्जानं” हे अट्ठकथेचे वचन बहुतांश लोकांच्या उद्देशाने आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - “न महाब्रह्मानं”. अन्यथा, “ब्रह्मपुरोहितांमध्ये नाही आणि महाब्रह्मांमध्येही नाही” असे म्हटले गेले असते. आणि तसे म्हणणे शक्य नाही, कारण “ब्रह्मत्व म्हणजे महाब्रह्मत्व” या वचनाशी त्याचा विरोध होईल. आणि हा अर्थ केवळ बहुतांश नियमानेच सिद्ध होत नाही. तर व्यंजनाच्या सामर्थ्यानेही सिद्ध होतो, हे दर्शवण्यासाठी “तेहि” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “ते” म्हणजे ब्रह्मपुरोहित. संयुत्त पाठात. “पटिभातु तं” येथे “तं” म्हणजे तुला. धम्मकथा तुला सुचो, प्रकट होवो. “तू बोल” असेच म्हटलेले असते. “ब्राह्मणा” असे म्हणून तो अभिभू भिक्खूला संबोधित करतो. “ब्रह्मुनो” म्हणजे महाब्रह्माच्या हितासाठी. याचप्रमाणे उर्वरित दोन्हींमध्येही समजावे. “तेसं” म्हणजे ब्रह्मपुरोहितांचे. विभावनी-पाठात “असा अर्थ समजावा” कारण “ब्रह्मपारिसज्जेसु येव” हे पुल्लिंगी वचन असल्यामुळे येथे पुद्गल-प्रधान (व्यक्ती-प्रधान) अर्थ होतो, भूमी-प्रधान नाही. म्हणून हा अर्थ युक्तीच्या आधारे समजावा. “तीसु भवग्गेसु” रूपलोकात वेहप्फलभूमी ही ‘पृथग्जन-भवग्ग’ नावाची आहे, कारण त्याच्या वर पृथग्जन भूमीचा अभाव असतो. अकनिठ्ठ भूमी ही ‘अरीय-भवग्ग’ नावाची आहे, कारण तेथे राहिलेल्या आर्यांचे तेथेच परिनिर्वाण होते. नेवसञ्ञाभूमी ही ‘लोक-भवग्ग’ नावाची आहे, कारण त्याच्या वर लोकाचाच अभाव असतो. กมฺมจตุกฺกานุทีปนา นิฏฺฐิตา. कम्मचतुक्क-अनुदीपनी समाप्त झाली। ๑๕๕. มรณุปฺปตฺติยํ. ‘‘อายุปริมาณสฺสา’’ติ อายุกปฺปสฺส. ‘‘ตทุภยสฺสา’’ติ อายุกปฺปสฺส จ กมฺมสฺส จ. ‘‘อุปฆาตก กมฺเมนา’’ติ พลวนฺเตน ปาณาติปาตกมฺเมน. ‘‘ทุสฺสิมาร กลาพุราชาทีนํ วิยา’’ติ เตสํ มรณํ วิย. อุปโรธิตํ ขนฺธ สนฺตาน มสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘อุปโรธิตํ’’ติ อุปคนฺตฺวา นิโรธาปิตํ. กมฺมํ ขิยฺยติเยว. เอวํ สติ, สพฺพํปิ มรณํ เอเกน กมฺมกฺขเยน สิทฺธํ. ตสฺมา เอกํ กมฺมกฺขย มรณเมว วตฺตพฺพนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อิตเรปิ วุตฺตา’’ติ อิตรานิปิ ตีณิ มรณานิ วุตฺตานีติ โจทนา. วุจฺจเต ปริหาโร. ‘‘สรสวเสเนวา’’ติ อตฺตโน ธมฺมตาวเสเนว. นานา อายุ กปฺปํ วิทหนฺติ สงฺขโรนฺตีติ นานาอายุกปฺป วิธายกา. ‘‘สตฺตนิกาเย’’ติ สตฺตสมูเห. นิจฺจกาลํ ฐิตึ กโรนฺตีติ ฐิติกรา. กทาจิ วุทฺธึ กโรนฺติ, กทาจิ หานึ กโรนฺตีติ วุทฺธิกรา หานิกรา จ. ‘‘เตสํ วเสนา’’ติ เตสํ อุตุ อาหารานํ วเสน. ‘‘ตโยปิ เจเต’’ติ เอเตตโยปิ ฐิติกราทโย. กมฺมํ วิปจฺจมานํ ทตฺวา ขิยฺยตีติ สมฺพนฺโธ. เอเตน เอวรูเปฐาเน กมฺมํ อปฺปธานนฺติ ทีเปติ. ‘‘ตทนุรูปํ เอวา’’ติ ตํ ทสวสฺสกาลานุ รูปํ เอว. ‘‘โภ คญฺจา’’ติ [Pg.178] ธนธญฺญาทิปริโภคญฺจ. เตสํ อุตุอาหารานํ คติ เอเตสนฺติ ตคฺคติกา. เตสํ อุตุอาหารานํ คตึ อนุวตฺตนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘ตทนุวตฺติกา’’ติ. สงฺขารวิทูหิ อญฺญตฺราติ สมฺพนฺโธ. สงฺขารวิทุโน ฐเปตฺวาติ อตฺโถ. อิทฺธิยา ปกตาติ อิทฺธิมยา. ‘‘อิทฺธิยา’’ติ เทวิทฺธิยาวา ภาวนามยิทฺธิยาวา. วิชฺชาย ปกตาติ วิชฺชามยา. ‘‘วิชฺชายา’’ติ คนฺธาริวิชฺชาย. อฏฺฐิ นฺหารุ มํส โลหิตาทิกา รสธาตุโย อยนฺติ วฑฺฒนฺติ เอเตหีติ รสายนานิ. ตานิ วิทหนฺติ เอเตหีติ รสายน วิธโย. นยูปเทสา. จิรฏฺฐิติ กตฺถาย ชีวิตํ สงฺขโรนฺติ เอเตหีติ ชีวิต สงฺขารา. อิทฺธิมย วิชฺชามย ชีวิต สงฺขาเรสุ จ รสายน วิธิสงฺขาเตสุ ชีวิต สงฺขาเรสุ จ วิทุโนติ สมาโส. ‘‘ทฺวิ สมุฏฺฐานิก รูปธมฺเมสู’’ติ อุตุสมุฏฺฐานิก รูปธมฺเมสุ จ อาหาร สมุฏฺฐานิก รูปธมฺเมสุ จ. ‘‘ปริณมนฺเตสู’’ติ วิปริณมนฺเตสุ. เตนาห ‘‘ชิยฺยมาเนสู’’ติอาทึ. ‘‘ยาวมหนฺตํ ปีติ’’ สพฺพญฺญุพุทฺธานํ กมฺมํ วิย โกฏิปตฺตวเสน อติมหนฺตมฺปิ. ‘‘อสฺสา’’ติ กมฺมสฺส. ‘‘อุปจฺเฉทก มรเณปิ เนตพฺโพ’’ติ พลวนฺเต อุปจฺเฉทก กมฺเม อาคเต ยาวมหนฺตมฺปิ ชนก กมฺมํ อตฺตโน วิปากาธิฏฺฐาน วิปตฺติยา ขิยฺยติเยว. โส จสฺสขโย น สรเสน โหติ, อถ โข อุปจฺเฉทก กมฺม พเลน โหตีติ อิธ อุปจฺเฉทก มรณํ วิสุํ คหิตนฺติ เอวํ อุปจฺเฉทก มรเณปิ เนตพฺโพ. ‘‘อกาล มรณํ’’ติ อายุกฺขยมรณาทีนิ ตีณิ มรณานิ กาลมรณานิ นาม, มรณา รหกาเล มรณานีติ วุตฺตํ โหติ. ตโต อญฺญํ ยํ กิญฺจิ มรณํ อกาล มรณนฺติ วุจฺจติ. เตนาห ‘‘ตญฺหิ ปวตฺตมานํ’’ติอาทึ. ‘‘มูลเภทโต’’ติ มูลการณปฺปเภทโต. ยสฺมา ปน มิลินฺท ปญฺเห วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. สนฺนิปตนฺตีติ สนฺนิปาตา. สนฺนิปาเตหิ อุปฺปนฺนา สนฺนิปาติกาติ อตฺถํ สนฺธาย ‘‘สนฺนิปติตานํ’’ติ วุตฺตํ. อถวา. สนฺนิปตนํ สนฺนิปาโต. ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วา โทสานํ มิสฺสกภาโว. สนฺนิปาเตน อุปฺปนฺนา สนฺนิปาติกาติปิ ยุชฺชติ. ‘‘อนิสมฺมการีนํ’’ติ อนิสาเมตฺวา อนุปธาเรตฺวา กรณ สีลานํ. ปวตฺตา อาพาธา [Pg.179] วิสมปริหารชานามาติ โยชนา. ‘‘อตฺตนา วากตานํ ปโยคานํ’’ติ สตฺถหรณ, วิสขาทน, อุทกปาตนาทิวเสน กตานํ. ‘‘วินาเสนฺตี’’ติ สตฺถวสฺส วาลุกวสฺสาทีนิ วสฺสาเปตฺวาวา สมุทฺท วีจิโย อุฏฺฐาเปตฺวาวา เอวรูเป มหนฺเต ภยุปทฺทเว กตฺวา วินาเสนฺติ. ‘‘มนุสฺส ปเถ’’ติ มนุสฺส ปเทเส. ‘‘เต’’ติ จณฺฑา ยกฺขา. ‘‘ชีวิตกฺขยํ ปาเปนฺตี’’ติ มนุสฺสานํ วา โคมหึสานํ วา เมทโลหิตานิ ปาตพฺยตฺถาย เตสุ นานาโรคนฺตร กปฺปานิ อุปฺปาเทตฺวา ชีวิตกฺขยํ ปาเปนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘วตฺตพฺพเมว นตฺถี’’ติ สกลํ รชฺชํ วา รฏฺฐํ วา ทีปกํ วา วินาเสนฺตีติ วุตฺเต สกลํ ชนปทํ วา นครํ วา นิคมํ วา คามํ วา ตํ ตํ ปุคฺคลํ วา วินาเสนฺตีติ วิสุํ วตฺตพฺพํ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. ‘‘สตฺถทุพฺภิกฺขโรคนฺตร กปฺปาปี’’ติ สตฺถนฺตร กปฺโป ทุพฺภิกฺขนฺตร กปฺโป โรคนฺตร กปฺโปติ อิเม ตโย อนฺตร กปฺปาปิ อิธ วตฺตพฺพาติ อตฺโถ. เตสุ ปน โรคนฺตร กปฺโป ยกฺขา วาเฬ อมนุสฺเส โอสฺสชฺชนฺติ, เตน พหู มนุสฺสา กาลงฺกโรนฺตีติ อิมินา เอกเทเสน วุตฺโตเยว. ‘‘อุปปีฬโก ปฆาตกานํ กมฺมานํ วิปจฺจนวเสนา’’ติ เอตฺถ เตสํ กมฺมานํ โอกาสปฺปฏิลาเภน สตฺตสนฺตาเน สุขสนฺตานํ วิพาเธตฺวา มรณํ วา ปาเปตฺวา มรณ มตฺตํ วา ทุกฺขํ ชเนตฺวา ปีฬนญฺจ ฆาตนญฺจ อิธ วิปจฺจน นาเมน วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. วิปากํ ปน ชเนนฺตุวา, มาวา, อิธ อปฺปมาณนฺติ. เอตฺถ สิยา. อฏฺฐสุ การเณสุ โอปกฺกมิกฏฺฐาเน ‘กุปฺปิตาหิ เทวตา สกลํ รชฺชาทิกํ อเสสํ กตฺวา วินาเสนฺตี’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ วินาสิตา ชนา กึ นุ โข อตฺตโน อตฺตโน กมฺม วิปากเชหิ อาพาธน ทณฺเฑหิ วา วินสฺสนฺติ, อุทาหุ วิสุํ โอปกฺกมิเกหิ อาพาธน ทณฺเฑหิ วา วินสฺสนฺติ. ยญฺเจตฺถ วุตฺตํ ‘เอวํ อกาล มรณํ อุปจฺเฉทก กมฺมุนา วา อญฺเญหิ วา อเนก สหสฺเสหิ การเณหิ โหตี’ติ. ตตฺถ ยสฺส อุปจฺเฉทก กมฺมํ นาม นตฺถิ. กึ ตสฺส อญฺเญน การเณน อกาล มรณํ นาม ภเวยฺยาติ. เอตฺถ วเทยฺยุํ, ตสฺส อญฺเญน การเณน อกาล มรณํ นาม น ภเวยฺย. สพฺเพ สตฺตา กมฺมสฺสกา, กมฺมทายาทา, กมฺมโยนี, กมฺม พนฺธู, กมฺมปฺปฏิสฺสรณาติหิ วุตฺตํติ[Pg.180]. เตสํ ตํ วาทํ ภินฺทนฺโต ‘‘เยหิเกจิ โลเก ทิสฺสนฺตี’’ติอาทิมาห. ปุน ตทตฺถํ ทฬฺหํ กโรนฺโต ‘‘ยถาหา’’ติอาทึ วทติ. ตตฺถ ทุวิธํ กมฺมผลํ, วิปาก ผลญฺจ นิสฺสนฺท ผลญฺจ. ตตฺถ วิปาก ผลํ นาม วิปากกฺขนฺธา จ จกฺขุ โสตาทีนิ กฏตฺตา รูปานิ จ. ตํ เยน ปุพฺเพ กมฺมํ กตํ, ตสฺเสว สาธารณํ โหติ. ตสฺส สนฺตาเน เอว ปวตฺตติ. นิสฺสนฺท ผลํ นาม ตสฺส สุขุปฺปตฺติยา วา ทุกฺขุปฺปตฺติยา วา อตฺตโน กมฺมานุภาเวน พหิทฺธา สมุฏฺฐิตานิ อิฏฺฐารมฺมณานิ วา อนิฏฺฐา รมฺมณานิ วา. ตํ ปน อญฺเญสมฺปิ สาธารณํ โหติ. ตํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘สกกมฺมสมุฏฺฐิตา เอว. ล. ปเรสํ สาธารณา เอวา’’ติ. โลเก อฏฺฐโลก ธมฺมา นาม สพฺเพ กมฺม วิปากชา เอวาติ น วตฺตพฺพา. อิเม จ สตฺตา สํสาเร สํสรนฺตา อฏฺฐสุโลก ธมฺเมสุ นิมฺมุชฺชนฺตา สํสรนฺติ, ตสฺมา เต วินาปิ อุปปีฬก กมฺเมน อญฺเญหิ การเณหิ นานาทุกฺขํ ผุสนฺติเยว. ตถา วินาปิ อุปจฺเฉทก กมฺเมน มรณ ทุกฺขํ ปาปุณนฺติเยว. เตน วุตฺตํ ‘‘กมฺเมน วินา ยโตกุโตจิ สมุฏฺฐิตา’’ติอาทิ. १५५. मरणाच्या उत्पत्तीविषयी (मरणुप्पत्तीमध्ये): 'आयुपरमाणस्स' म्हणजे आयुकप्पाचे (आयुष्याच्या कल्प-मर्यादेचे). 'तदुभयस्स' म्हणजे आयुकप्पाचे आणि कर्माचे, या दोन्हीचे. 'उपघातक कम्मेन' म्हणजे बलवान प्राणातिपात कर्माने. 'दुस्सीमार कलाबुराजादीनं विय' म्हणजे त्यांच्या मरणाप्रमाणे (दुस्सी मार आणि कलाबु राजा इत्यादींच्या मरणाप्रमाणे). 'ज्यांचे स्कंध-संतान उपरोधित (खंडित) केले गेले आहे' असा विग्रह आहे. 'उपरोधितं' म्हणजे जवळ जाऊन निरोधित केलेले (थांबवलेले). कर्म क्षीण होतेच. असे असताना, सर्वच मरण एका कर्मक्षयाने सिद्ध होते. म्हणून, केवळ एक 'कर्मक्षय मरण'च म्हटले पाहिजे, असे सांगितले आहे. 'इतरेपि वुत्ता' म्हणजे इतर तीन मरणेही सांगितली आहेत, अशी शंका (चोदना) आहे. त्यावर परिहार (उत्तर) दिला जातो: 'सरससेनेव' म्हणजे स्वतःच्या स्वभावधर्मानेच. जे विविध आयुकप्पांचे विधान करतात, संस्कार करतात, ते 'नाना-आयुकप्प-विधायक' (विविध आयुष्य-मर्यादा ठरवणारे) होत. 'सत्तनिकाये' म्हणजे सत्त्व-समूहात (प्राण्यांच्या समूहात). जे नित्यकाळ स्थिती (स्थैर्य) निर्माण करतात, ते 'स्थितिकर'. जे कधी वृद्धी करतात आणि कधी हानी करतात, ते 'वृद्धिकर' आणि 'हानिकर' होत. 'तेसं वसेन' म्हणजे त्या ऋतू आणि आहाराच्या वशाने (प्रभावाने). 'तयोपि चेते' म्हणजे हे तिन्ही स्थितिकरादी. कर्म विपाकाला प्राप्त होऊन (फळ देऊन) क्षीण होते, असा संबंध आहे. यावरून अशा ठिकाणी कर्म हे अप्रधान (गौण) आहे, हे दर्शवले जाते. 'तदनुरूपं एव' म्हणजे त्या दहा वर्षांच्या काळाच्या अनुरूपच. 'भोगञ्च' म्हणजे धनधान्य इत्यादींचा उपभोग. त्या ऋतू आणि आहाराची गती ज्यांच्यात आहे, ते 'तद्गतिक'. ते त्या ऋतू आणि आहाराच्या गतीचे अनुवर्तन करतात, असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'तदनुवत्तिका' असे म्हटले आहे. 'संखारविदूहि अञ्ञत्र' (संस्कारवेत्त्यांशिवाय इतर) असा संबंध आहे. संस्कारवेत्त्यांना सोडून (वगळून) असा अर्थ आहे. ऋद्धीने जे बनवले आहे, ते 'ऋद्धिमय'. 'इद्धिया' म्हणजे देवांची ऋद्धी किंवा भावनामय ऋद्धी. विद्येने जे बनवले आहे, ते 'विद्यामय'. 'विज्जाय' म्हणजे गांधारी विद्येने. हाडे, स्नायू, मांस, रक्त इत्यादी रसधातू ज्यांच्याद्वारे वाढतात, ती 'रसायने' होत. ज्यांच्याद्वारे ती रसायने तयार केली जातात, त्या 'रसायन विधी'. हे नयांचे उपदेश आहेत. दीर्घकाळ टिकून राहण्यासाठी ज्यांच्याद्वारे जीविताचे संस्कार केले जातात, ते 'जीवित-संस्कार' होत. ऋद्धिमय, विद्यामय जीवित-संस्कारांमध्ये आणि रसायन-विधी म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या जीवित-संस्कारांमध्ये जे जाणकार (विदू) आहेत, असा हा समास आहे. 'द्विसमुट्ठानिक रूपधम्मेसु' म्हणजे ऋतू-समुत्थानिक रूपधर्मांमध्ये आणि आहार-समुत्थानिक रूपधर्मांमध्ये. 'परिणमन्तेसु' म्हणजे विपरिणत (बदलत) असताना. म्हणूनच 'जीय्यमानेसु' (जीर्ण होत असताना) इत्यादी म्हटले आहे. 'यावमहन्तं पि' म्हणजे सर्वज्ञ बुद्धांच्या कर्माप्रमाणे कोटीला पोहोचल्यामुळे अत्यंत मोठे असलेलेही. 'अस्स' म्हणजे कर्माचे. 'उपच्छेदक मरणेपि नेतब्बो' म्हणजे बलवान उपच्छेदक कर्म आले असता, कितीही मोठे असलेले जनक कर्म देखील स्वतःच्या विपाक-अधिष्ठान विपत्तीमुळे क्षीण होतेच. आणि तो त्याचा क्षय स्वतःच्या स्वभावाने होत नाही, तर उपच्छेदक कर्माच्या बलाने होतो; म्हणून येथे उपच्छेदक मरण वेगळे घेतले आहे, अशा प्रकारे उपच्छेदक मरणाच्या बाबतीतही हाच नियम लावावा. 'अकाल मरणं' म्हणजे आयुष्यक्षय-मरण इत्यादी तीन मरणे ही 'काल-मरणे' होत, म्हणजेच मरणास योग्य अशा वेळी होणारी मरणे, असे म्हटले आहे. त्याहून वेगळे जे काही मरण असते, त्याला 'अकाल मरण' असे म्हणतात. म्हणूनच 'तञ्हि पवत्तमानं' इत्यादी म्हटले आहे. 'मूलभेदतो' म्हणजे मूळ कारणांच्या भेदावरून (प्रकारावरून). कारण मिलिंदपञ्हामध्ये असे सांगितले आहे, असा संबंध आहे. जे एकत्र येतात, ते 'सन्निपात'. सन्निपातांमुळे उत्पन्न झालेले ते 'सन्निपातिक' (त्रिदोषजन्य), हा अर्थ लक्षात घेऊन 'सन्निपतितानं' असे म्हटले आहे. अथवा, एकत्र येणे म्हणजे 'सन्निपात'. दोन किंवा तीन दोषांचे (वात, पित्त, कफ यांचे) मिश्रित होणे. सन्निपाताने उत्पन्न झालेले ते 'सन्निपातिक' असे म्हणणेही योग्य ठरते. 'अनिसम्मकारीनं' म्हणजे विचार न करता, परीक्षा न करता कार्य करणाऱ्या स्वभावाच्या लोकांचे. विषम परिहाराने (अयोग्य वागणुकीने) उत्पन्न झालेले आजार उद्भवतात, अशी योजना आहे. 'अत्तना वाकतानं पयोगानं' म्हणजे स्वतः केलेल्या प्रयोगांमुळे, जसे की शस्त्र चालवणे, विष खाणे, पाण्यात उडी मारणे इत्यादींद्वारे केलेल्या कर्मांमुळे. 'विनासेन्ति' म्हणजे शस्त्रांचा पाऊस, वाळूचा पाऊस इत्यादी पाडून किंवा समुद्राच्या लाटा उसळवून अशा प्रकारच्या मोठ्या भीती आणि उपद्रव निर्माण करून विनाश करतात. 'मनुस्स पथे' म्हणजे मनुष्यांच्या प्रदेशात (वस्तीत). 'ते' म्हणजे क्रूर यक्ष. 'जीवितक्खयं पापेन्ति' म्हणजे मनुष्यांचे किंवा गायी-म्हशींचे मेद आणि रक्त पिण्यासाठी त्यांच्यामध्ये विविध रोगांचे अंतःकल्प उत्पन्न करून त्यांना जीवितक्षयाप्रत (मृत्यूप्रत) पोहोचवतात, असा अर्थ आहे. 'वत्तब्बमेव नत्थि' म्हणजे जेव्हा संपूर्ण राज्य, राष्ट्र किंवा द्वीप नष्ट करतात असे म्हटले जाते, तेव्हा संपूर्ण जनपद, नगर, निगम (कस्बा), गाव किंवा त्या त्या व्यक्तीला नष्ट करतात, हे वेगळे सांगण्याची गरज नाही, असा अभिप्राय आहे. 'सत्थदुब्भिक्खरो गन्तरकप्पापि' म्हणजे शस्त्र-अंतःकल्प, दुर्भिक्ष-अंतःकल्प आणि रोग-अंतःकल्प हे तिन्ही अंतःकल्प देखील येथे सांगण्यायोग्य आहेत, असा अर्थ आहे. त्यापैकी रोग-अंतःकल्पामध्ये यक्ष क्रूर अमानुषांना सोडतात, ज्यामुळे अनेक मनुष्य मृत्युमुखी पडतात, हे एका अंशाने सांगितलेच आहे. 'उपपीळको पघातकानं कम्मानं विपच्चनवसेन' येथे त्या कर्मांना संधी मिळाल्यामुळे सत्त्वाच्या संतानामध्ये (प्रवाहात) सुखाच्या प्रवाहाला बाधा आणून, मरण आणून किंवा मरणासारखे दुःख निर्माण करून पीडा देणे आणि घात करणे, यालाच येथे 'विपच्चन' (विपाक मिळणे) या नावाने म्हटले आहे, असे समजावे. विपाक उत्पन्न करो वा न करो, येथे ते अप्रमाण (मर्यादेबाहेर) आहे. येथे अशी शंका असू शकते: आठ कारणांपैकी औपक्रमिक स्थानामध्ये 'क्रुद्ध झालेल्या देवता संपूर्ण राज्यादी सर्व काही नष्ट करतात' असे म्हटले आहे. तेथे नष्ट झालेले लोक काय स्वतःच्या स्वतःच्या कर्मविपाकामुळे उत्पन्न झालेल्या आजार किंवा दंडाने नष्ट होतात, की वेगळ्या औपक्रमिक आजार किंवा दंडाने नष्ट होतात? आणि जे येथे म्हटले आहे की, 'अशा प्रकारे अकाल मरण हे उपच्छेदक कर्माने किंवा इतर अनेक हजारो कारणांनी होते'. तेथे ज्याचे 'उपच्छेदक कर्म' नावाचे काही नाही, काय त्याचे इतर कारणाने अकाल मरण होईल का? यावर काही जण म्हणतील की, त्याचे इतर कारणाने अकाल मरण होणार नाही. कारण 'सर्व प्राणी कर्माचे मालक आहेत, कर्माचे वारसदार आहेत, कर्मापासून उत्पन्न झालेले आहेत, कर्माचे बांधव आहेत, कर्माचे शरण घेणारे आहेत' इत्यादी म्हटले आहे. त्यांचा तो वाद (मत) खोडून काढताना 'येहिकेचि लोके दिस्सन्ति' (जगामध्ये जे काही दिसते) इत्यादी म्हटले आहे. पुन्हा तोच अर्थ दृढ करण्यासाठी 'यथाह' (जसे म्हटले आहे) इत्यादी सांगतात. तेथे कर्मफळ दोन प्रकारचे असते: विपाक-फळ आणि निस्यंद-फळ. त्यापैकी 'विपाक-फळ' म्हणजे विपाक-स्कंध आणि चक्षु, श्रोत्र इत्यादी कर्मामुळे उत्पन्नलेली रूपे (कटत्ता-रूपे). ते ज्याने पूर्वी कर्म केले आहे, त्यालाच साधारण (लागू) असते. ते त्याच्याच संतानामध्ये (प्रवाहात) प्रवर्तित होते. 'निस्यंद-फळ' म्हणजे त्याच्या सुखोत्पत्तीसाठी किंवा दुःखोत्पत्तीसाठी स्वतःच्या कर्माच्या प्रभावाने बाहेरून उत्पन्नलेली इष्ट आलंबने (इष्टारम्मण) किंवा अनिष्ट आलंबने (अनिष्टारम्मण) होत. ते मात्र इतरांनाही साधारण (सामायिक) असू शकते. ते लक्षात घेऊनच 'स्वकर्मसमुत्थितच... पे... इतरांना साधारणच' असे म्हटले आहे. जगामध्ये 'अष्टलोकधर्म' (आठ लोकधर्म) हे सर्व कर्मविपाकामुळेच उत्पन्न होतात, असे म्हणता येत नाही. आणि हे प्राणी संसारात संसरण करताना अष्टलोकधर्मांमध्ये बुडत संसरण करतात, म्हणून ते उपपीडक कर्माशिवाय देखील इतर कारणांमुळे विविध दुःखांना स्पर्श करतातच (अनुभवतातच). तसेच उपच्छेदक कर्माशिवाय देखील मरणाच्या दुःखाला प्राप्त होतातच. म्हणूनच 'कर्मणा विना यतोकुतोचि समुट्ठिता' (कर्माशिवाय कुठूनही उत्पन्न झालेले) इत्यादी म्हटले आहे. ‘‘เต อุปฺปชฺชนฺตี’’ติ เต นานาโรคาทโย อุปฺปชฺชนฺติ. ‘‘น อุปาย กุสลา วา’’ติ ตโต อตฺตานํ โมเจตุํ การณ กุสลา วา น โหนฺติ. ‘‘น จ ปฏิการ กุสลา วา’’ติ อุปฺปนฺนํ โรคาทิภยํ อปเนตุํ วูปสเมตุํ ปฏิการ กมฺเมติ กิจฺฉกมฺเม กุสลา วา น โหนฺติ. ‘‘นาปิ ปริหาร กุสลา วา’’ติ ตโต โมจนตฺถํ ปริหริตุํ เทสนฺตรํ คนฺตุํ กุสลา วา น โหนฺตีติ อตฺโถ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ‘‘โรคาทโย เอว ตํ เขเปนฺตา ปวตฺตนฺตี’’ติ กถํ เต ปุพฺพกมฺมํ เขเปนฺตีติ. ตสฺส วิปากภูตํ ชีวิต สนฺตานํ วินาเสนฺตา เขเปนฺติ. วินฏฺเฐหิ ชีวิต สนฺตาเน ตํ ภวํ ชเนนฺตํ ขิยฺยติ เยวาติ. เตนาห ‘‘ยถาหี’’ติอาทึ. ‘‘กมฺมสฺสปิ ตเถวา’’ติ ตเถว ปุพฺพกมฺมสฺสปิ ติณคฺเค อุสฺสาว พินฺทุสฺเสว ปริทุพฺพลตา สิทฺธา โหติ. ชีวิเต ปริกฺขีเณ ตํ ภวํ ชเนนฺตสฺส ปุพฺพกมฺมสฺสปิ ปริกฺขีณตฺตา. ‘‘เอวญฺเจตํ’’ติ เอตํ กมฺมปฺปฏิ สํยุตฺต วจนํ อิธ อมฺเหหิ วุตฺตนเยน สมฺปฏิจฺฉิตพฺพํ. สพฺพํ ปุพฺเพกตเหตุทิฏฺฐิ นาม สพฺพํ สุขํ วา ทุกฺขํ วา สุจริตํ วา ทุจฺจริตํ วา ปุพฺพภเว อตฺตนา [Pg.181] กเตน ปุพฺพกมฺมเหตุนา เอว อุปฺปชฺชตีติ เอวํ ปวตฺตา ทิฏฺฐิ. ‘‘ยํ กิญฺจายํ’’ติ ยํ กิญฺจิ อยํ. มหาโพธิสตฺตานํ อธิมุตฺติกาลงฺกริยา นาม อิธ เม จิรกาลํ ฐิตสฺส ปารมิปูรณ กิจฺจํ นตฺถิ, อิทาเนว อิโต จวิตฺวา มนุสฺสโลเก อุปฺปชฺชิสฺสามิ, อุปรุชฺฌตุ เม อิทํ ชีวิตนฺติ อธิมุญฺจิตฺวา ทฬฺหํ มนสิกริตฺวา กาลงฺกริยา. ‘‘สยเมว สตฺถํ อาหริตฺวา’’ติ สยเมว อตฺตโน คีวํ สตฺเถน หนิตฺวาติ อตฺโถ. ‘‘เอตฺเถวา’’ติ อกาลมรเณ เอว. "ते उत्पन्न होतात" (ते उप्पज्जन्ति) म्हणजे ते विविध रोग इत्यादी उत्पन्न होतात. "उपाय कुशल नाहीत" (न उपाय कुसला वा) म्हणजे त्यातून स्वतःची सुटका करून घेण्याच्या कारणात (उपाय शोधण्यात) ते कुशल नसतात. "आणि प्रतिकार कुशलही नाहीत" (न च पटिकार कुसला वा) म्हणजे उत्पन्न झालेल्या रोगादींचे भय दूर करण्यासाठी किंवा ते शांत करण्यासाठी प्रतिकार कार्यात किंवा उपचाराच्या कार्यात ते कुशल नसतात. "तसेच परिहार कुशलही नाहीत" (नापि परिहार कुसला वा) म्हणजे त्यातून सुटका करून घेण्यासाठी स्वतःचे रक्षण करण्यास किंवा दुसऱ्या देशात जाण्यास ते कुशल नसतात, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. "रोगादीच त्याचा क्षय करत राहतात" (रोगादयो एव तं खेपेन्ता पवत्तन्ति) - ते पूर्वकर्माचा क्षय कसा करतात? त्याचे विपाकरूप असलेल्या जीवन-प्रवाहाचा (जीवित संतान) विनाश करून ते त्याचा क्षय करतात. जीवन-प्रवाह नष्ट झाल्यावर, त्या भवाला उत्पन्न करणारे (कर्म) क्षीण होतेच. म्हणूनच "जसे की" (यथाहि) इत्यादी म्हटले आहे. "कर्माचेही तसेच" (कम्मस्सपि तथेव) म्हणजे पूर्वकर्माचीही गवताच्या टोकावरील दवबिंदूप्रमाणे अत्यंत दुर्बलता सिद्ध होते. जीवन संपुष्टात आल्यावर, त्या भवाला उत्पन्न करणाऱ्या पूर्वकर्माचाही क्षय होत असल्यामुळे. "आणि हे अशा प्रकारे" (एवञ्चेतं) हे कर्माशी संबंधित वचन येथे आमच्याद्वारे सांगितलेल्या पद्धतीने स्वीकारले पाहिजे. 'सर्व काही पूर्वकृत हेतूमुळे होते' (सब्बं पुब्बेकतहेतुदिट्ठि) या दृष्टीचा (मताचा) अर्थ असा आहे की, सर्व सुख किंवा दुःख, सुचरित किंवा दुश्चरित हे पूर्वजन्मात स्वतः केलेल्या पूर्वकर्माच्या हेतूनेच उत्पन्न होते, अशी मांडलेली दृष्टी. "जे काही हे" (यं किञ्चायं) म्हणजे जे काही हे. महाबोधिसत्त्वांचे 'अधिमुक्ति-कालक्रिया' (अधिमुत्तिकालङ्करिया) म्हणजे "येथे दीर्घकाळ राहून माझे पारमिता पूर्ण करण्याचे कोणतेही कार्य उरलेले नाही, मी आताच येथून च्युत होऊन मनुष्यलोकात जन्म घेईन, माझे हे जीवन समाप्त होवो" असा दृढ संकल्प करून, मनात पक्के ठरवून केलेले मरण (कालक्रिया). "स्वतःच शस्त्र घेऊन" (सयमेव सत्थं आहरित्वा) म्हणजे स्वतःच स्वतःचा गळा शस्त्राने कापून, असा अर्थ आहे. "येथेच" (एत्थेव) म्हणजे अकाली मृत्यूमध्येच। ‘‘ตถา จา’’ติอาทีสุ. ‘‘สมาปตฺติ ลาภีนํ’’ติ นิทฺธารเณภุมฺม วจนํ. ‘‘ชีวิต สมสีสีนํ’’ติ อรหตฺต มคฺคํ ลภิตฺวา มคฺคปจฺจเวกฺขนวีถิ เอว มรณาสนฺนวีถึ กตฺวา ปรินิพฺพานตฺตา สมํ สีสํ เอเตสนฺติ สมสีสิโน. ‘‘สมํ สีสํ’’ติ ชีวิต สนฺตาน ปริยนฺเตน สมํ วฏฺฏทุกฺข สนฺตาน ปริยนฺตํ วุจฺจติ. ‘‘สพฺเพสํ ปี’’ติ สพฺเพสมฺปิ ขีณาสวานํ. ‘‘อิมํ สุตฺตปทํ’’ติ มหาปรินิพฺพานสุตฺเต อาคตํ สุตฺตปทํ. ‘‘เต’’ติ เต วาทิโน. ‘‘เตนา’’ติ เตน วาทวจเนน. กฺริยมโนธาตุ นาม ปญฺจทฺวาราวชฺชนํ. กฺริยาเหตุกมโน วิญฺญาณธาตุ นาม หสิตุปฺปาทจิตฺตํ. ‘‘อสฺสา’’ติ ปรินิพฺพายนฺตสฺส พุทฺธสฺส. ‘‘น สเมติ เยวา’’ติ สนฺตึ อนุปาทิเสสํ นิพฺพานํ อารมฺมณํ กตฺวาติ เอตฺถ ปรินิพฺพาน ชวเนหิ อารมฺมณํ กตฺวาติ วุตฺเตปิ น สเมติเยว. เตนาห ‘‘ตถาหี’’ติอาทึ. ‘‘ภวงฺคํ โอตริตฺวา ปรินิพฺพายตี’’ติ เอตฺถ ปรินิพฺพาน จุติจิตฺตเมว ภวงฺคนฺติ วุตฺตํ. จุติจิตฺตนฺติ จ ภวนฺตรํ คจฺฉนฺตสฺเสว วุจฺจติ. อิธ ปน โวหาร มตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. วิภาวนิปาเฐ. จุติปริโยสานานํ มรณาสนฺน จิตฺตานํ. ยถา ปน พุทฺธานํ ภควนฺตานํ ยาวชีวํ อุปฺปนฺนํ มหาภวงฺคจิตฺตํ กมฺมกมฺมนิมิตฺตาทโย อารมฺมณํ กโรติเยว. ตถา ปรินิพฺพาน จุติจิตฺตํ ปีติ อาห ‘‘น หี’’ติอาทึ. นนุ มรณกาเล กมฺมกมฺมนิมิตฺตาทีนํ คหณํ นาม ภวนฺตร คมนตฺถาย โหติ, พุทฺธา จ ภวนฺตรํ น คจฺฉนฺติ. ตสฺมา ‘‘น หิ. ล. น กโรตี’’ติ อิทํ น ยุตฺตนฺติ. โน น ยุตฺตํ. ภวนฺตร คมนตฺถายาติ อิทํ ชวเนหิ คหเณ ทฏฺฐพฺพํ. อิธ ปน จุติจิตฺเตน คหเณติ ทสฺเสนฺโต ‘‘นจจุติยาคหิตานี’’ติอาทิมาห. ‘‘กมฺมสิทฺธิยา’’ติ กมฺมสิชฺฌนตฺถาย[Pg.182].‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. ‘‘ตสฺสา’’ติ โสณตฺเถร ปิตุโน. ‘‘กมฺมพเลนา’’ติอาทีสุ. ‘‘อญฺเญนปิ การณ พเลนา’’ติ อาจิณฺณภาวาทิเกน การณพเลน. คตินิมิตฺตํ ปน กมฺมพเลเนวาติ ยุตฺตํ สิยา. ‘‘ตโถปฏฺฐิตํ’’ติ อนฺติมวีถิโต ปุพฺเพ พหูสุวีถีสุ อุปฏฺฐิตปฺปการนฺติอตฺโถ. ปาปปกฺขิเยสุ ทุคฺคตินิมิตฺเตสุ. กลฺยาณปกฺขิยานิ สคฺคนิมิตฺตานิ. ธมฺมาโสกรญฺโญ มรณกาเล ปาปปกฺขิยานํ อุปฏฺฐานํ กตฺถจิ สีหฬคนฺเถ วุตฺตํ. "आणि तसेच" (तथा च) इत्यादींमध्ये. "समापत्ती प्राप्त केलेल्यांचे" (समापत्ति लाभीनं) हे निर्धारणार्थी सप्तमीचे (भूम) वचन आहे. "जीवित समशीर्षींचे" (जीवित समसीसीनं) म्हणजे अर्हत् मार्ग प्राप्त करून, मार्ग-प्रत्यवेक्षण वीथीलाच मरणासन्न वीथी बनवून परिनिर्वाण प्राप्त केल्यामुळे ज्यांचे मरण आणि क्लेशक्षय एकाच वेळी (समान शीर्षावर) होतात, ते 'समशीर्षी' होत. "समान शीर्ष" (समं सीसं) म्हणजे जीवन-प्रवाहाच्या समाप्तीसोबतच संसार-दुःखाच्या प्रवाहाची समाप्ती होणे, याला म्हटले जाते. "सर्वांचेच" (सब्बेसं पि) म्हणजे सर्वच क्षीणासवांचे (अर्हतांचे). "हे सूत्रपद" (इमं सुत्तपदं) म्हणजे महापरिनिर्वाण सूत्रात आलेले सूत्रपद. "ते" (ते) म्हणजे ते वादी (प्रतिपादक). "त्याद्वारे" (तेन) म्हणजे त्या वादाच्या वचनाद्वारे. क्रिया-मनोधातू म्हणजे पंचद्वारावर्जन होय. क्रियाहेतुक-मनोविज्ञानधातू म्हणजे हसितुत्पादचित्त (हसणे उत्पन्न करणारे चित्त) होय. "त्यांचे" (अस्स) म्हणजे परिनिर्वाण प्राप्त करणाऱ्या बुद्धांचे. "जुळतच नाही" (न समेति येव) म्हणजे शांत अशा अनुपधिशेष निर्वाणाला आलंबन (विषय) करून, येथे परिनिर्वाण जवनांद्वारे आलंबन केले आहे असे म्हटले तरीही ते जुळतच नाही. म्हणूनच "तसेच" (तथाहि) इत्यादी म्हटले आहे. "भवंगात उतरून परिनिर्वाण पावतात" (भवङ्गं ओतरित्वा परिनिब्बायति) येथे परिनिर्वाण च्युतिचित्तालाच 'भवंग' म्हटले आहे. 'च्युतिचित्त' हे दुसऱ्या भवात जाणाऱ्याच्या बाबतीतच म्हटले जाते. परंतु येथे ते केवळ व्यवहारापुरतेच (औपचारिक) मानले पाहिजे. विभावनी पाठात: च्युतीपर्यंतच्या मरणासन्न चित्तांचे. ज्याप्रमाणे बुद्ध भगवंतांचे आयुष्यभर उत्पन्न होणारे महाभवंगचित्त हे कर्म, कर्मनिमित्त इत्यादींना आलंबन करतेच, त्याचप्रमाणे परिनिर्वाण च्युतिचित्तही करते, म्हणून "नाही" (न हि) इत्यादी म्हटले आहे. शंका: मरणसमयी कर्म, कर्मनिमित्त इत्यादींचे ग्रहण हे दुसऱ्या भवात जाण्यासाठी असते, आणि बुद्ध तर दुसऱ्या भवात जात नाहीत. म्हणून "नाही... पे... करत नाही" हे योग्य नाही. उत्तर: नाही, हे अयोग्य नाही. 'दुसऱ्या भवात जाण्यासाठी' हे जवनांद्वारे ग्रहण करण्याच्या संदर्भात समजले पाहिजे. परंतु येथे च्युतिचित्ताद्वारे ग्रहण करणे दर्शवताना "च्युतीद्वारे ग्रहण केले जात नाही" (न च चुतिया गहितानि) इत्यादी म्हटले आहे. "कर्मसिद्धीसाठी" (कम्मसिद्धिया) म्हणजे कर्माच्या सिद्धीसाठी. "आणि येथे" (एत्थ च) इत्यादींमध्ये. "त्यांचे" (तस्स) म्हणजे सोण स्थविरांच्या (सोणत्थेर) वडिलांचे. "कर्माच्या बलाने" (कम्मबलेन) इत्यादींमध्ये. "इतरही कारणाच्या बलाने" (अञ्ञेनापि कारण बलेन) म्हणजे आचरलेल्या सवयी इत्यादींच्या कारणाच्या बलाने. गतीचे निमित्त (गतिनिमित्त) मात्र कर्माच्या बलानेच असणे योग्य ठरेल. "तशा प्रकारे उपस्थित झालेले" (तथोपट्ठितं) म्हणजे अंतिम वीथीच्या आधी अनेक वीथींमध्ये उपस्थित झालेल्या प्रकारचा, असा अर्थ आहे. पापपक्षातील दुर्गतीचे निमित्त. कल्याणपक्षातील स्वर्गाचे निमित्त. धर्माशोक राजाच्या मरणसमयी पापपक्षातील निमित्तांचे उपस्थित होणे काही सिंहली ग्रंथांमध्ये सांगितले आहे। สกลํ ปถวึ ภุตฺวา,ทตฺวา โกฏิสตํ ธนํ; อนฺเต อฑฺฒามลกมตฺตสฺส; อโสโก อิสฺสรํ คโต; ติ จ; อโสโก โสก มาคโต; ติ จ; "संपूर्ण पृथ्वीचा उपभोग घेऊन, शंभर कोटींचे धन दान करून; शेवटी अर्ध्या आवळ्याच्या तुकड्यावरच, अशोक आपले ऐश्वर्य गमावून बसले;" आणि "अशोक शोकाकुल झाले;" असेही। ‘‘ตํ’’ติ วิปจฺจมานกํ กมฺมํ. ‘‘นิยามก สหการิ ปจฺจยภูตา’’ติ เอตฺถ ยถา นาวายํ นิยามโก นาม นาวํ อิจฺฉิตทิสาภิมุขํ นิยาเมติ, นิโยเชติ. ตถา อยํ ตณฺหาปิ ภวนิกนฺติ หุตฺวา จิตฺตสนฺตานํ คนฺตพฺพภวาภิมุขํ นิยาเมติ, นิโยเชติ. กมฺมสฺส จ อจฺจายตฺต สหายภาเวน สหการี ปจฺจโย โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘กุสลากุสล กมฺมนิมิตฺตานิ วา’’ติ อญฺญานิ กุสลา กุสลกมฺมนิมิตฺตานิ วา. ‘‘ตทุปตฺถมฺภิกา’’ติ ตสฺส กมฺมสฺส อุปตฺถมฺภิกา. ‘‘นิมิตฺตสฺสาทคธิตํ’’ติ มุขนิมิตฺตาทีสุ อสฺสาเทนฺตํ คิชฺฌนฺตํ. ‘‘ติฏฺฐมานํ ติฏฺฐตี’’ติ ติฏฺฐมานํ หุตฺวา ติฏฺฐติ. อมุญฺจิตฺวา ติฏฺฐตีติ วุตฺตํ โหติ. อนุพฺยญฺชนํ นาม ปิยสาตรูโป กถิตลปิตาทิ กฺริยาวิเสโส. ‘‘อสฺส ปุคฺคลสฺสา’’ติ อาสนฺน มรณสฺส ปุคฺคลสฺส. อฏฺฐกถา ปาเฐ. ‘‘กิเลส พลวินามิตํ’’ติ อวิชฺชา ตณฺหาทีนํ กิเลสานํ พเลน วินามิตํ. ปฏิจฺฉาทิกา อาทีน วา ยสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘ตํ’’ติ จิตฺตสนฺตานํ. ‘‘ตสฺมึ’’ติ กมฺมาทิวิสเย. อฏฺฐกถาย น สเมติ. ตสฺมึ วิสเยติหิ ตตฺถ วุตฺตํ. น วุตฺตํ ตสฺมึ ภเวติ. ‘‘ตสฺมึ วุตฺตา นํ’’ติ [Pg.183] ตสฺมึ ‘เยภูยฺเยน ภวนฺตเร ฉ ทฺวารคฺคหิตํ’ติ ฐาเน ฏีกาสุ วุตฺตานํ. ตํ สทิส ชวนุปฺปตฺติ นาม กมฺมกรณกาเล ปวตฺต ชวเนหิ สทิสานํ อิทานิ ชวนานํ อุปฺปตฺติ. ภวปฺปฏิจฺฉนฺนญฺจ กมฺมํ อปากฏญฺจ กมฺมํ น ตถา อุปฏฺฐาติ. เกวลํ อตฺตานํ อภินวกรณ วเสน ทฺวารปตฺตํ หุตฺวา อุปฏฺฐาตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘วิสีท ปตฺตา’’ติ วิสญฺญีภาเวน วิรูปํ หุตฺวา สีทนปตฺตา. ‘‘ตพฺพิปรีเตน ปาปกมฺม พหุลาปิ วตฺตพฺพา’’ติ เตปิวิสีทนฺตเร อาวุธ หตฺถา ปาณฆาตํ กโรนฺตา คณฺหถพนฺธถาติ อุคฺโฆสนฺตา ทุฏฺฐจิตฺตา โหนฺตีติอาทินา วตฺตพฺพา. อฏฺฐกถา ปาเฐสุ. อุกฺขิตฺโต อสิ ยสฺสาติ อุกฺขิตฺตา สิโก. ปตุทนฺติ วิชฺฌนฺติ เอเตนาติ ปโตทนํ. ปาชนทณฺโฑ. ตสฺส อคฺเค กตา สูจิ ปโตทน สูจิ. ‘‘ปโตทน ทุกฺขํ’’ติ วิชฺฌน ทุกฺขํ. กถํ ปน อุกฺขิตฺตาสิกาทิภาเวน อุปฏฺฐานํ กมฺมุปฏฺฐานํ นาม โหติ. กถญฺจ ตํ ปฏิสนฺธิยา อารมฺมณภาวํ อุเปตีติ อาห ‘‘โส จา’’ติอาทึ. อุปฺปชฺชมานานํ สตฺตานํ. ‘‘อิตเรสํ ปนา’’ติ รูปารูป ภเวสุ อุปฺปชฺชมานานํ ปน. ‘‘ปริปุณฺณํ กตฺวา’’ติ ตทารมฺมณ ปริโยสานายวา สุทฺธาย วา ชวนวีถิยาติ เอวํ ปริปุณฺณํ กตฺวา. อยํ ปน ภวงฺคาวสาเน จุติจิตฺตุปฺปตฺติ นาม อฏฺฐกถาสุ นตฺถิ. ยญฺจ ภวงฺคํ โอตริตฺวา ปรินิพฺพายตีติอาทิ ตตฺถ ตตฺถ วุตฺตํ. ตตฺถปิ ‘‘ภวงฺคํ’’ติ จุติจิตฺตเมว ฏีกาสุ วณฺเณนฺติ. ตสฺมา ‘‘ภวงฺคกฺขเยวา’’ติ อิทํ กถํ ยุชฺเชยฺยาติ อาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทึ. อนุรูปํ เสตีติ อนุสโย. อนุพนฺโธ หุตฺวา เสตีติ อนุสโย. อนุ อนุ วา เสตีติ อนุสโย. เอตฺถ จ อนุสโย นาม ชวนสหชาโต น โหติ. อิธ จ อนุสย นาเมน วุตฺตํ. นานาชวน สหชาตา จ อวิชฺชา ตณฺหา ปฏิสนฺธิยา วิเสส ปจฺจยา โหนฺเตว. กถํ ตา อิธ คหิตา สิยุนฺติ อาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทึ. เอวํ สนฺเต อวิชฺชา ปริกฺขิตฺเตน ตณฺหามูลเกนาติ วุตฺเตสุ สุฏฺฐุ ยุชฺชติ. อนุสเยหิ สห ชวนสหชาตานมฺปิ ลทฺธตฺตา. ตสฺมา อิธ อนุสย วจนํ น ยุตฺตนฺติ โจทนา. ยุตฺตเมวาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อปิ จา’’ติอาทิมาห. ‘‘ปริยตฺตา’’ติ สมตฺตา. ‘‘โส ปี’’ติ ผสฺสาทิ ธมฺม สมูโหปิ[Pg.184].‘‘ตถา รูปา เยวา’’ติ อคฺคมคฺเคน อปฺปหีน รูปาเยว, อนุสยภูตาเยวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ตํ’’ติ จิตฺต สนฺตานํ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตทุภยสฺมึ. กถํ ตํ ตตฺถ ขิปนฺตีติ อาห ‘‘ตสฺมึ’’ติอาทึ. ‘‘วิชานนธาตุยา’’ติ วิญฺญาณ ธาตุยา. สงฺกนฺตา นาม นตฺถิ. ยตฺถ ยตฺถ อุปฺปชฺชนฺติ. ตตฺถ ตตฺเถว ภิชฺชนฺตีติ อธิปฺปาโย. กุโต มรณกาเล สงฺกนฺตา นาม อตฺถิ วิชฺชนฺตีติ โยชนา. เอวํ สนฺเต อิทํ วจนํ อนมตคฺคิย สุตฺเตน วิรุทฺธํ สิยาติ. น วิรุทฺธํ. อิทญฺหิ อภิธมฺม วจนํ, มุขฺยวจนํ, อนมตคฺคิย สุตฺตํ ปน สุตฺตนฺต วจนํ ปริยาย วจนนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยญฺจา’’ติอาทิมาห. ปริยาเยน วุตฺตนฺติ วตฺวา ตํ ปริยายํ ทสฺเสติ ‘‘เยสญฺหี’’ติอาทินา. ‘‘โส’’ติ โส ปุคฺคโล. ‘‘เตสํ’’ติ อวิชฺชา ตณฺหา สงฺขารานญฺจ ปฏิสนฺธิ นาม รูป ธมฺมานญฺจ. ‘‘เหตุปฺผลสมฺพนฺเธน ภวนฺตรํ สนฺธาวติ สํสรตีติ วุจฺจตี’’ติ ปุพฺเพ กมฺมกรณกาเลปิ เต อวิชฺชา ตณฺหา สงฺขารา เอว โส สตฺโตติ วุจฺจนฺติ. ปจฺฉา เตสํ ผลภูตายํ ปฏิสนฺธิยา ปาตุภวนกาเลปิ สาปฏิสนฺธิ เอว โส สตฺโตติ วุจฺจติ. มชฺเฌ ธมฺมปฺปพนฺโธปิ โส สตฺโตติ วุจฺจติ. เอวํ เหตุธมฺเมหิ สทฺธึ ผลธมฺเม เอกํ สตฺตํ กโรนฺตสฺส เหตุปฺผล สมฺพนฺโธ โหติ. เอวํ เหตุปฺผล สมฺพนฺเธน โส เอว กมฺมํ กโรติ. เตน กมฺเมน โส เอว ภวนฺตรํ สนฺธาวติ สํสรตีติ วุจฺจติ. เอตฺถ จ อนมตคฺโค ยํ ภิกฺขเว. ล. อวิชฺชานีวรณานํ สตฺตานํติ เอวํ สตฺตโวหาเรน วุตฺตตฺตา สาธมฺมเทสนา ปริยายเทสนา โหติ. ปริยายเทสนตฺตา จ สนฺธาวตํ สํสรตนฺติ ปริยาโยปิ สิชฺฌติ. ยสฺสํ ปน ธมฺม เทสนายํ ธมฺมเทสนาติ วจนานุ รูปํ ธมฺมเมว เทเสติ, น สตฺตํ, น ปุคฺคลํ. อยํ ธมฺมเทสนา เอว มุขฺยเทสนา นาม โหติ. ตตฺถ เทสิต ธมฺมา ปน ปกติกาเลปิ เทสนฺตรํ กาลนฺตรํ ขณนฺตรํ สงฺกนฺตา นาม นตฺถิ. ยตฺถ ยตฺถ อุปฺปนฺนา, ตตฺถ ตตฺเถว ภิชฺชนฺติ. ขยวยํ คจฺฉนฺติ. เตน วุตฺตํ ‘น หิ อุปฺปนฺนุปฺปนฺนา ธมฺมา. ล. สงฺกนฺตา นาม อตฺถี’ติ. ปฏิโฆโส จ, ปทีโป จ, มุทฺทา จ. อาทิสทฺเทน ปฏิพิมฺพจฺฉายา จ, พีชสงฺขาโร จ, ปาฏิโภโค จ, พาลกุมาร สรีเรสุ อุปยุตฺตา วิชฺชาสิปฺโปสธา จาติ เอวํ อฏฺฐกถา ยํ [Pg.185] อาคตานิ นิทสฺสนานิ สงฺคยฺหนฺติ. ‘‘นิทสฺสนา’’นีติ จ อุปมาโย วุจฺจนฺติ. ตตฺถ ‘‘ปฏิโฆโส’’ติ คมฺภีรเลณ ทฺวาเร ฐตฺวา สทฺทํ กโรนฺตสฺส อนฺโตเลเณ ปฏิโฆโส ปวตฺตติ. ตตฺถ ทฺวาเร อุปฺปนฺโน มูลสทฺโท อนฺโตเลณํ น คจฺฉติ, อุปฺปนฺนฏฺฐาเน เอว นิรุชฺฌติ. ปฏิโฆโส จ ตโต อาคโต น โหติ. น จ วินา มูลสทฺท + ปจฺจเยน อญฺญโต ปวตฺตติ. มูลสทฺทปจฺจยา เอว ตตฺถ ปวตฺตตีติ. ตตฺถ มูลสทฺโท วิย อตีต กมฺมํ. ปฏิโฆโส วิย อนนฺตเร ปฏิสนฺธิ. เอสนโย ปทีป มุทฺทา ปฏิพิมฺพจฺฉายาสุ. ตตฺถ ‘‘ปทีโป’’ติ ปถมํ เอกํ ปทีปํ ชาเลตฺวา เตน อญฺญํ ปทีปสตมฺปิ ปทีป สหสฺสมฺปิ ชาเลติ. ‘‘มุทฺทา’’ติ ลญฺฉนเลขา. ตตฺถ เอเกน ลญฺฉนกฺขนฺเธน, เตน ลญฺฉนเลขาสตมฺปิ ลญฺฉนเลขา สหสฺสมฺปิ กโรติ. ‘‘ปฏิพิมฺพจฺฉายา’’ติ ปสนฺเนสุ อาทาสปฏฺเฏสุวา อุทเกสุวา อุปฺปนฺนา สรีรจฺฉายา. เอเตหิ นิทสฺสเนหิ ผลํ นาม เหตุโต อาคตํ น โหติ. เหตุนา จ วินา น สิชฺฌตีติ เอตฺตกมตฺถํ ทีเปติ. ‘‘พีชสงฺขาโร’’ติ กาลนฺตเร อุปฺปนฺเนสุ ปุปฺผผเลสุ อิจฺฉิตวณฺณ คนฺธรสปาตุภาวตฺถาย โรปนกาเล อมฺพพีชาทีสุ อิจฺฉิตวณฺณ คนฺธรสธาตูนํ ปริภาวนา. ตตฺถ ตปฺปจฺจยา กาลนฺตเร ปุปฺผผเลสุ อุปฺปนฺเนสุ เตวณฺณคนฺธรสา ปาตุพฺภวนฺติ. ‘‘ปาฏิโภโค’’ติ กิญฺจิ อตฺถํ สาเธตุํ ปรสฺส สนฺติเก อิณํ คณฺหนฺตสฺส ตวธนํ สํวจฺฉเรน วุฑฺฒิยา สห ทสฺสามิ, สเจ นทเทยฺยํ. อสุกํ นาม มมเขตฺตํ วา วตฺถุวา ตุยฺหํ โหตูติ ปฏิญฺญาฐปนํ. ตตฺถ ตปฺปจฺจยา ธนํ ลภิตฺวา ตํ อตฺถญฺจ สาเธติ. กาเล สมฺปตฺเต วุฑฺฒิยา สห อิณญฺจ โสเธติ. ‘‘วิชฺชาสิปฺโปสธา’’ติ โลเก ปุตฺตเก ยาวชีวํ หิตตฺถาย ทหรกาเล กิญฺจิ วิชฺชํวา สิปฺปํวา สิกฺขาเปนฺติ. ยาวชีวํ ขรโรคานํ อนุปฺปาทตฺถาย ทหรกาเล โอชวนฺตํ กิญฺจิ โอสธํ วา อชฺโฌหาเรนฺติ. ตตฺถ ตปฺปจฺจยา ปุตฺตานํ ยาวชีวํ หิตปฺปฏิลาโภ วา ตาทิสานํ โรคานํ อนุปฺปาโท วา โหติเยว. เอเตหิ ยถา กาลนฺตเร อสนฺเตสุเยว ปาฏิโภคาทีสุ มูลกมฺเมสุ ปุพฺพภาเค กตปจฺจยา เอว ปจฺฉา อตฺถ สาธนาทีนิ สิชฺฌนฺติ. ตถา กุสลา กุสล กมฺมานิ [Pg.186] กตฺวา กาลนฺตเร เตสุ อสนฺเตสุปิ ปุพฺเพ กตตฺตา เอว ปจฺฉา ปฏิสนฺธาทีนิ ผลานิ ปาตุพฺภวนฺตีติ ทีเปติ. เตนวุตฺตํ ‘‘ปฏิโฆส ปทีปมุทฺทาทีนิ เจตฺถ นิทสฺสนานี’’ติ. ‘‘กมฺมทุพฺพลภาเวนา’’ติ ตทา ชีวิตินฺทฺริยสฺส ทุพฺพลตฺตา กมฺมมฺปิ ทุพฺพลเมว โหตีติ กตฺวา วุตฺตํ. กามญฺเจตฺถ อฏฺฐกถายํ วตฺวา ทสฺสิตํ, ตถาปิ สมฺภวตีติ สมฺพนฺโธ. ตตฺถ ‘‘ตํ ปี’’ติ คตินิมิตฺตมฺปิ. ‘‘ตถา จวนฺตานํ’’ติ ทิพฺพรถาทีนิ คตินิมิตฺตํ กตฺวา จวนฺตานํ. ‘‘ทยฺหมานกาเยนา’’ติ อิตฺถมฺภูตลกฺขเณ กรณวจนํ. คาถายํ. ปญฺจทฺวาเร ปฏิสนฺธิกมฺมํ วินา ทฺวิโคจเร สิยาติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘ทฺวิโคจเร’’ติ กมฺมนิมิตฺต คตินิมิตฺตภูเต ทฺวิโคจเร. ตตฺถ ปญฺจทฺวาเร ปฏิสนฺธิ นาม ปญฺจทฺวาริก มรณาสนฺน วีถิจิตฺตานํ อนฺเต จ วนฺตานํ ปฏิสนฺธิ. สาปิ คตินิมิตฺตภูเต โคจเร สิยาติ วุตฺเต ปญฺจทฺวาริก วีถิจิตฺตานิ ปญฺจารมฺมณภูตานิ คตินิมิตฺตานิ อารมฺมณํ กโรนฺตีติปิ สิทฺธํ โหติ. เอวญฺจ สติ. เตสํ วีถิจิตฺตานํ อนฺเต อจวิตฺวา ตทนุพนฺธก มโนทฺวาริกวีถิจิตฺเตหิปิ กทาจิ เกสญฺจิ จ วนํ นนสมฺภวตีติ สกฺกา วตฺตุํ. เตสุ ปน อนุพนฺธก วีถีสุ อตีตคฺคหณ สมุทายคฺคหเณหิ จ วนฺตานํ อตีตานิปิ คตินิมิตฺตานิ ลพฺภนฺติ. วตฺถุคฺคหณนามคฺคหเณหิ จ วนฺตานํ ธมฺมา รมฺมณํปิ ลพฺภติเยว. ตสฺมา ยํ วุตฺตํ อาจริเยน กามาวจร ปฏิสนฺธิยา ฉ ทฺวารคฺคหิตํ กมฺมนิมิตฺตํ คตินิมิตฺตญฺจ ปจฺจุปฺปนฺนมตีตา รมฺมณํ อุปลพฺภตีติ. ตํ สุวุตฺตเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. ยํ ปน ‘ตเมว ตโถปฏฺฐิตํ อารมฺมณํ อารพฺภ จิตฺตสนฺตานํ อภิณฺหํ ปวตฺตตี’ติ เอวํ อนฺติมวีถิโต ปุพฺพภาเค พหูนํ วีถิวารานํ ปวตฺตนํ อาจริเยน วุตฺตํ. ตํ ตโถปฏฺฐิตํ คตินิมิตฺตํ อารพฺภาติปิ ลทฺธุํ วฏฺฏติเยว. เอวญฺจสติ, คตินิมิตฺตํปิ อตีตํ ลพฺภตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ยทาปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘สนฺตติ วเสนา’’ติ สนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺน วเสน. ‘‘ตสฺสา’’ติ คตินิมิตฺตสฺส. เยภูยฺเยน วุตฺโต, น สพฺพสงฺคาหิเกน วุตฺโตติ อธิปฺปาโย. ‘‘มโนทฺวาริก มรณาสนฺน ชวนานํปิ อิจฺฉิตพฺพตฺตา’’ติ ปุเรชาตปจฺจย ภาเวน อิจฺฉิตพฺพตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตทนุพนฺธายา’’ติ ตานิ มโนทฺวาริ กมรณาสนฺน [Pg.187] ชวนานิ อนุคตาย. ‘‘ปฏิสนฺธิยาปิ สมฺภวโต’’ติ ตสฺส ปุเรชาต ปจฺจยสฺส ปฏิสนฺธิยาปิ ปุเรชาต ปจฺจยตา สมฺภวโต. นนุ เถเรน ภินฺทิตฺวา อวุตฺเตปิ ภินฺทิตพฺเพ สติ, ภินฺทนเมว ยุตฺตนฺติ เจ. น ยุตฺตํ. กสฺมา, กมฺมนิมิตฺเตน สมานคติกตฺตา. เตนาห ‘‘นจตํ’’ติอาทึ. วิภาวนิยํ ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺพํติ วตฺวา อปเรปน อวิเสสโตว วณฺเณนฺตีติ อปเรวาโทปิ วุตฺโต. ตตฺถ ‘‘อวิเสสโต วณฺเณนฺตี’’ติ อภินฺทิตฺวาว วณฺเณนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ปุน ตํ อปเรวาทํ อสมฺปฏิจฺฉนฺโต ‘‘อฏฺฐกถายํ ปนา’’ติอาทิมาห. อิธ ปน ตํ อปเรวาทํ ปคฺคณฺหนฺโต ปุน ‘‘ยญฺจ ตตฺถา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘ตทารมฺมณายา’’ติ ตํ คตินิมิตฺตา รมฺมณาย. ‘‘เตสํ วจนํ’’ติ อปเรสํ วจนํ. ‘‘อญฺญตฺร อวิจารณายา’’ติ กสฺมา วุตฺตํ. นนุ อฏฺฐกถายํ ปนาติอาทิ สพฺพํ วิจารณา วจนเมว โหตีติ. สจฺจํ ยถา ทิฏฺฐปาฐวเสน, สาวเสส ปาฐภาวํ ปน น วิจาเรติเยว. ตสฺมา ‘‘อญฺญตฺร อวิจารณายา’’ติ วุตฺตํ. เอตฺถ สิยา. อฏฺฐกถาปาโฐ สาวเสโส โหตุ, มูลฏีกาปาโฐ ปน มโนทฺวาเร เยวาติ นิยเมตฺวา วุตฺตตฺตา กถํ สาวเสโส สิยาติ. นิยเมตฺวา วุตฺโตปิ อิธ อธิปฺเปตตฺเถ อปริปุณฺเณ สาวเสโส เอว โหตีติ. เตน วุตฺตํ ‘‘อญฺญํ การณํ นตฺถิ อญฺญตฺร อวิจารณายา’’ติ. ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนมตีตํ’’ติอาทีสุ. ตทารมฺมณาวสานาย ปญฺจทฺวาริก ชวนวีถิยา จ วนํ โหตีติ โยชนา. เอวํ อปรตฺถปิ. พลวนฺเตปิ สติ. ตทารมฺมณาวสานาย เอว วีถิยา. ‘‘วุตฺตตฺตา ปนา’’ติ อฏฺฐกถายํ เอว วุตฺตตฺตา ปน. ‘‘ปุริมภาเค เอวา’’ติ ปญฺจทฺวาริก อนฺติม วีถิโต ปุพฺพภาเค เอว. ‘‘ตาหี’’ติ เทยฺยธมฺมวตฺถูหิ. ‘‘ยถาตํ’’ติ ตํ อตฺถชาตํ กตมํ วิยาติ อตฺโถ. ‘‘อิโต’’ติ มนุสฺส ภวโต. นิมิตฺต สทิสํ สทฺทํ วณฺณนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นฏฺฐจการํ’’ติ ปติตจการํ. อฏฺฐกถาปาเฐ ญาตกา มาตาทโย ปญฺจทฺวาเร อุปสํหรนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตวตฺถายา’’ติ ตวอตฺถาย. ‘‘จีนปฏโสมารปฏาทิวเสนา’’ติ จีนรฏฺเฐ ปวตฺโต ปโฏ [Pg.188] จีนปโฏ. ตถา โสมารปเฏปิ. ‘‘ตานี’’ติ รสโผฏฺฐพฺพานิ. โผฏฺฐพฺพํ ปน อญฺญํปิ ยุชฺชเตว. อตฺถิทานีติ มนสิกตตฺตา ปจฺจุปฺปนฺนภูตานีติ วุตฺตํ. ‘‘อรูปีนํ’’ติ อรูปพฺรหฺมานํ. ‘‘เต’’ติ อรูปิโน. ‘‘ตานี’’ติ เหฏฺฐิมชฺฌานานิ. วิสฺสฏฺฐํ ลทฺธฌานํ เยสํ เต วิสฺสฏฺฐชฺฌานา. ‘‘ตโตเยว จา’’ติ วิสฺสฏฺฐชฺฌานตฺตาเยว จ. อากฑฺฒิตํ มานสํ จิตฺตํ เอเตสนฺติ วิคฺคโห. อิทญฺจ เหตุวิเสสน ปทํ. อากฑฺฒิตมานสตฺตา กามภเว อุปฺปชฺชมานานนฺติ ทีเปติ. เตสํ อรูปีนํ. ‘‘อญฺญํ ทุพฺพล กมฺมํ’’ติ อุปจารชฺฌานกมฺมโต อญฺญํ ติเหตุโกมกํ กมฺมํ. ‘‘เตสํ’’ติ รูปโลกโต จ วนฺตานํ. ‘‘สโต’’ติ สนฺตสฺส สมานสฺส. ‘‘อุปตฺถมฺภเน การณํ นตฺถี’’ติ อิทํ อุปจารชฺฌาน กมฺมสฺส ครุก กมฺมคติกตฺตา วุตฺตํ. เอกนฺต ครุกกมฺมภูตํปิ ปน มหคฺคตชฺฌาน กมฺมํ นาม นานานิกนฺติ พเลน ปฏิพาหียมานํ ปฏิสนฺธึ น เทติเยว. อุปจารชฺฌาน กมฺเม วตฺตพฺพํ นตฺถีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘ตาทิสานี’’ติ ตถา รูปานิ ทฺวิเหตุโกมก กมฺมานิ เตสํ โอกาสํ น ลภนฺติ. นีวรณานํ สุฏฺฐุวิกฺขมฺภิตตฺตาเยว. ‘‘เยนา’’ติ เยน ฉนฺทาทีนํ ปวตฺติ การเณน. ‘‘นานากมฺมานิ ปี’’ติ อุปจารชฺฌาน กมฺมโต อญฺญานิ ปจฺจุปฺปนฺน กมฺมานิปิ อตีตภเวสุ กตานิ อปรปริยาย กมฺมานิปิ. ‘‘เยน จา’’ติ เยน นานากมฺมานมฺปิ โอกาส ลาภการเณน จ. ‘‘เต’’ติ รูปี พฺรหฺมาโน. ‘‘วุตฺตนเยเน วา’’ติ สุฏฺฐุวิกฺขมฺภิตนีวรณานํ เตสํ อปฺปนา ปตฺตชฺฌานวิเสเสน [ ยสฺมา ปนาติอาทินา จ ] ปริภาวิต จิตฺตสนฺตานตฺตา’ติ จ วุตฺตนเยเนว. ‘‘ตํ การณํ’’ติ อเหตุก ปฏิสนฺธิยา อภาว การณํ. ปรมฺปร ภเวสุจ วีถิมุตฺตจิตฺตานํ ปวตฺตาการํ ทสฺเสตุนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยถา ตานิเยว โอสธานี’’ติ โลเก เอกํ โอสธํ ลภิตฺวาตํ เทวสิกํ ภุญฺชติ. เอโกปถมทิวเส ภุญฺชนฺตํ ทิสฺวา กตมํ นาม ตฺวํ โอสธํ ภุญฺชสีติ ปุจฺฉิ. อิทํ นาม โอสธํ ภุญฺชามีติ วทติ. ปุนทิวเสสุปิ โอสธํ ภุญฺชนฺตํ ทิสฺวา ตเถว ปุจฺฉิ. ตเมว โอสธํ ภุญฺชามีติ วทติ. ตตฺถ ‘‘ตเมว โอสธํ’’ติ ยํ ปถมทิวเส โอสธํ ตยาจ ปุจฺฉิตํ. มยา จ กถิตํ. ตเมว อชฺช ภุญฺชามีติ อตฺโถ. ตตฺถ [Pg.189] ปน ปถมทิวเส ภุตฺตํ โอสธํ อญฺญํ. อชฺช ภุตฺตํ อญฺญํ. ตํสทิสํ ปน อญฺญํปิ ตเมวาติ โลเก โวหรนฺติ ตานิเยว โอสธานิ ภุญฺชามีติ. เอวํ อิธปิ ตสฺสทิเส ตพฺโพหาโร ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘ตสฺมึ’’ติ ภวงฺคจิตฺเต. อวตฺตมาเน อุปปตฺติภโว โอจฺฉิชฺชติ. วตฺตมาเน น โอจฺฉิชฺชติ. ตสฺมา ตสฺส อุปปตฺติ ภวสฺส อโนจฺเฉท องฺคตฺถาย การณตฺตา ภวงฺคนฺติ วุจฺจตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อุปปตฺติ ภโว’’ติ จ กมฺมชกฺขนฺธสนฺตานํ วุจฺจติ. ‘‘ปรสมเย’’ติ อุจฺเฉท ทิฏฺฐีนํ วาเท. ‘‘วฏฺฏมูลานี’’ติ อวิชฺชาตณฺหา วุจฺจนฺติ. วฏฺฏมูลานิ สุฏฺฐุอุจฺฉิชฺชนฺติ เอตฺถาติ วิคฺคโห. ‘‘ยสฺส อตฺถายา’’ติ สอุปาทิเสสาทิกสฺส นิพฺพานสฺส ปฏิลาภตฺถาย. ‘‘ปฏฺฐปียนฺตี’’ติ ปวตฺตาปียนฺติ. ปชฺชนฺติ ปาปุณนฺติ อริยา ชนา เอตฺถาติ ปทํ. ปรโต สมนฺติปเท อนุปาทิเสสสฺส คยฺหมานตฺตา อิธ สอุปาทิเสสนฺติ วุตฺตํ. พุชฺฌนฺตีติ พุธา. สุฏฺฐุ สทฺธึ อุจฺฉินฺนํ สิเนหพนฺธนํ เยหิ เต สุสมุจฺฉินฺนสิเนหพนฺธนา. กถญฺจ สุฏฺฐุอุจฺฉินฺนํ, เกหิ จ สทฺธึ อุจฺฉินฺนนฺติอาห ‘‘อนุสยมตฺตํ ปี’’ติอาทึ. ‘‘เสสกิเลเสหี’’ติ ตณฺหาสิเนห พนฺธนโต อวเสส กิเลเสหิ. ‘‘อธิสยิตํ’’ติ วิกฺขมฺภิตุํปิ อสกฺกุเณยฺยํ หุตฺวา อติเรกตรํ สยิตํ. ‘‘อธิคมาวหํ’’ติ อธิคโม วุจฺจติ นววิโธ โลกุตฺตร ธมฺโม. ตํ อาวหตีติ อธิคมาวหํ. ‘‘สีลํ’’ติ จตุปาริสุทฺธิสีลํ. ‘‘ธุตงฺคํ’’ติ เตรสธุตงฺคํ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. “त्या” म्हणजे विपाकाभिमुख (पक्व होणारे) कर्म. “नियामक आणि सहकारी प्रत्ययभूत” यामध्ये, ज्याप्रमाणे नौकेचा नियामक (नाविक) नौकेला इच्छित दिशेकडे नेतो, नियोजित करतो; त्याचप्रमाणे ही तण्हा (तृष्णा) देखील 'भवनिकान्ती' (भवाविषयीची आसक्ती) होऊन चित्तसंतानाला जावयाच्या भवाभिमुख (भवाकडे) निर्देशित करते, नियोजित करते. आणि कर्माच्या अत्यंत अधीन अशा सहाय्यकभावाने ती सहकारी प्रत्यय (कारण) बनते, असे समजावे. “कुशल-अकुशल कर्मनिमित्त किंवा” म्हणजे इतर कुशल किंवा अकुशल कर्मनिमित्त होय. “तदुपत्थंभिका” (त्याला आधार देणारी) म्हणजे त्या कर्माला उपस्तंभन (टेका) देणारी. “निमित्तस्सादगधितं” म्हणजे मुखनिमित्त इत्यादींमध्ये आस्वाद घेणारे, लुब्ध होणारे. “तिट्ठमानं तिट्ठति” म्हणजे स्थिर राहून टिकून राहते. न सोडता टिकून राहते, असे म्हटले आहे. 'अनुव्यंजन' म्हणजे प्रिय व सुखद वाटणारे बोलणे, संभाषण इत्यादी क्रियाविशेष होय. “अस्स पुग्गलस्स” म्हणजे मरणासन्न व्यक्तीचे. हा अट्ठकथा पाठ आहे. “किलेसबलविनामितं” म्हणजे अविज्जा (अविद्या), तण्हा (तृष्णा) इत्यादी क्लेशांच्या बलाने विनामित (वळविलेले). 'पटiच्छादिका' (झाकणारी) इत्यादी ज्याची आहे, असा विग्रह आहे. “तं” म्हणजे चित्तसंतान. “तस्मिं” म्हणजे कर्मादी विषयांमध्ये. हे अट्ठकथेशी जुळत नाही. कारण तिथे “तस्मिं विसये” (त्या विषयात) असे म्हटले आहे, “तस्मिं भवे” (त्या भवात) असे म्हटलेले नाही. “तस्मिं वुत्ता नं” म्हणजे त्या 'बहुतांश करून दुसऱ्या भवात सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले' या स्थानावर टीकांमध्ये सांगितलेल्यांचे. “त्याच्यासारखी जवन-उत्पत्ती” म्हणजे कर्म करतेवेळी प्रवृत्त झालेल्या जवनांसारख्याच आताच्या जवनांची उत्पत्ती होय. भवाने आच्छादित झालेले कर्म आणि अप्रकट कर्म तशा प्रकारे उपस्थित होत नाही. केवळ स्वतःला अभिनव (नवीन) करण्याच्याद्वारे द्वाराप्रत येथे येऊन उपस्थित होते, असा अभिप्राय आहे. “विसीदपत्ता” म्हणजे अचेतनतेमुळे (मूर्च्छित अवस्थेमुळे) विरूप होऊन अवसाद (ग्लानी) पावलेले. “त्याच्या उलट, पापकर्म बहुल असलेल्यांविषयी देखील सांगावे” म्हणजे ते देखील अवसाद काळात हातात शस्त्र घेऊन प्राणातिपात (हिंसा) करणारे, “पकडा, बांधा” अशी घोषणा करणारे, दुष्टचित्त असणारे होतात, इत्यादी प्रकारे सांगावे. हा अट्ठकथा पाठांमध्ये आहे. ज्याने तलवार उपसली आहे तो 'उक्खित्तासिको' (उपसलेली तलवार असलेला). ज्याने टोचतात ते 'पतोदन' (चाबूक किंवा आर). तो हाकण्याचा दंड (चाबूक) होय. त्याच्या टोकाला लावलेली सुई म्हणजे 'पतोदनसूची' (आरीचे टोक). “पतोदनदुःखं” म्हणजे टोचण्याचे दुःख. पण उपसलेली तलवार इत्यादी रूपाने उपस्थित होणे हे 'कर्मोपस्थान' (कर्माचे उपस्थित होणे) कसे काय असू शकते? आणि ते प्रतिसंधीचे आलंबन कसे बनते? हे सांगण्यासाठी “सो च” (आणि तो) इत्यादी म्हटले आहे. उत्पन्न होणाऱ्या सत्त्वांचे (प्राण्यांचे). “इतरेसं पना” (इतरांचे तर) म्हणजे रूप आणि अरूप भवांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्यांचे तर. “परिपुण्णं कत्वा” (परिपूर्ण करून) म्हणजे तदालंबन पर्यवसान असलेल्या किंवा शुद्ध जवनवीथीने अशा प्रकारे परिपूर्ण करून. परंतु ही 'भवंगाच्या शेवटी च्युतिचित्ताची उत्पत्ती' अट्ठकथांमध्ये आढळत नाही. आणि 'भवंगात उतरून परिनिर्वाण पावतो' इत्यादी जे तिथे तिथे म्हटले आहे, तिथे देखील टीकांमध्ये “भवंग” म्हणजे च्युतिचित्तच असे वर्णन करतात. म्हणून “भवंगक्षयीच” हे कसे योग्य ठरेल? हे सांगण्यासाठी “एत्थ च” (आणि येथे) इत्यादी म्हटले आहे. अनुरूप होऊन सुप्त राहतो तो 'अनुसय' (अनुशय). अनुबंध (पाठलाग) करून सुप्त राहतो तो अनुशय. किंवा वारंवार सुप्त राहतो तो अनुशय. आणि येथे अनुशय हा जवन-सहजात (जवनासोबत उत्पन्न होणारा) नसतो. परंतु येथे अनुशय या नावाने तो सांगितला आहे. आणि विविध जवनांसोबत उत्पन्न होणारी अविज्जा व तण्हा प्रतिसंधीचे विशेष प्रत्यय (कारण) असतातच. मग त्यांचे येथे ग्रहण कसे काय होऊ शकते? हे सांगण्यासाठी “एत्थ च” इत्यादी म्हटले आहे. असे असताना, “अविज्जेने वेढलेल्या आणि तण्हामूलक असलेल्या” असे म्हटल्यास उत्तम प्रकारे जुळते. कारण अनुशयांसोबत जवन-सहजातांची देखील प्राप्ती होते. म्हणून येथे 'अनुशय' हा शब्द योग्य नाही, असा आक्षेप (चोदना) आहे. तो योग्यच आहे, हे दर्शविण्यासाठी “अपि च” (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. “परियत्ता” म्हणजे समाप्त झालेली. “सो पि” (तो देखील) म्हणजे स्पर्शादी धर्मांचा समूह देखील. “तथारूपा येव” म्हणजे अग्र मार्गाने (अर्हतमार्गाने) प्रहीण न झालेले रूपच, म्हणजेच अनुशयभूतच, असे म्हटले आहे. “तं” म्हणजे चित्तसंतान. “तत्थ” म्हणजे त्या दोन्हीमध्ये. ते त्याला तिथे कसे टाकतात? हे सांगण्यासाठी “तस्मिं” इत्यादी म्हटले आहे. “विजाननधातुया” म्हणजे विज्ञाणधातूने (विज्ञानधातूच्या द्वारे). 'संक्रांत' (एका ठिकाणाहून दुसऱ्या ठिकाणी जाणे) नावाचे काही नसते. जिथे जिथे ते उत्पन्न होतात, तिथे तिथेच ते नष्ट होतात, असा अभिप्राय आहे. मरणकाळी संक्रांत होणे कुठून असणार? अशी योजना आहे. असे असल्यास, हे वचन 'अनमतग्गिय सुत्ता'शी (अनमताग्र सूत्राशी) विरुद्ध ठरेल काय? तर नाही, विरुद्ध ठरत नाही. कारण हे अभिधम्म वचन आहे, जे मुख्य (परमार्थ) वचन आहे; तर अनमतग्गिय सुत्त हे सुत्तंत वचन आहे, जे पर्याय (व्यावहारिक) वचन आहे, हे दर्शविण्यासाठी “यंच” (आणि जे) इत्यादी म्हटले आहे. पर्यायाने (व्यावहारिक दृष्टीने) म्हटले आहे असे सांगून, तो पर्याय “येसञ्हि” (ज्यांच्यासाठी हि) इत्यादींद्वारे दर्शवितात. “सो” म्हणजे तो पुद्गल (व्यक्ती). “तेसं” म्हणजे अविज्जा, तण्हा, संखारांचे (संस्कारांचे) आणि प्रतिसंधी नाम-रूप धर्मांचे. “हेतू-फल संबंधाने दुसऱ्या भवात संसरण करतो, संसार करतो असे म्हटले जाते” म्हणजे पूर्वी कर्म करतेवेळी देखील ते अविज्जा, तण्हा आणि संखाराच 'तो सत्त्व (प्राणी)' असे म्हटले जातात. नंतर त्यांचे फल असणाऱ्या प्रतिसंधीच्या प्रादुर्भावाच्या वेळी देखील ती प्रतिसंधीच 'तो सत्त्व' असे म्हटले जाते. मध्ये असणारा धर्मप्रबंध (धर्मांचा प्रवाह) देखील 'तो सत्त्व' असे म्हटले जाते. अशा प्रकारे हेतूधर्मांसोबत फलधर्मांना एकच सत्त्व मानणाऱ्याचा हेतू-फल संबंध होतो. अशा प्रकारे हेतू-फल संबंधाने तोच कर्म करतो आणि त्या कर्माने तोच दुसऱ्या भवात संसरण करतो, संसार करतो असे म्हटले जाते. आणि येथे “भिक्खूहो, हा संसार अनमताग्र (अनादी) आहे... अविद्या-निवारण असलेल्या सत्त्वांचा...” अशा प्रकारे सत्त्व-व्यवहाराने (प्राण्यांच्या व्यवहाराने) सांगितल्यामुळे ती धर्मदेशना पर्यायदेशना (व्यावहारिक देशना) ठरते. आणि पर्यायदेशना असल्यामुळे 'संसरण करणाऱ्यांचे, संसार करणाऱ्यांचे' हा पर्याय देखील सिद्ध होतो. परंतु ज्या धर्मदेशनेमध्ये 'धर्मदेशना' या शब्दाला अनुरूप केवळ धर्माचीच देशना केली जाते, सत्त्वाची नाही, पुद्गलाची नाही; ती धर्मदेशनाच मुख्य देशना (परमार्थ देशना) होय. तिथे उपदेशिलेले धर्म तर सामान्य काळात देखील देशान्तर (दुसऱ्या देशात), कालान्तर (दुसऱ्या काळात) किंवा क्षणान्तर (दुसऱ्या क्षणात) संक्रांत होत नाहीत. जिथे जिथे ते उत्पन्न होतात, तिथे तिथेच ते नष्ट होतात. क्षय आणि व्यय पावतात. म्हणूनच म्हटले आहे: 'उत्पन्न झालेले धर्म... संक्रांत होतात असे नाही.' प्रतिध्वनी (पठिघोस), दिवा (पदींप), मुद्रा (मुद्दा) आणि 'आदी' शब्दाने प्रतिबिंब-छाया, बीजाचा संस्कार (बीजसंखार), जामीनदार (पाटiभोग), आणि लहान मुलांच्या शरीरावर उपयोगात आणलेली विद्या, शिल्प व औषध अशा प्रकारे अट्ठकथेत आलेली उदाहरणे संग्रहित केली जातात. “निदशनानि” म्हणजे उपमा असे म्हटले जाते. त्यामध्ये “प्रतिध्वनी” म्हणजे खोल गुहेच्या दाराशी उभे राहून आवाज करणाऱ्याचा गुहेच्या आत प्रतिध्वनी उमटतो. तिथे दाराशी उत्पन्न झालेला मूळ शब्द गुहेच्या आत जात नाही, तो उत्पन्न झालेल्या ठिकाणीच निरुद्ध होतो. आणि प्रतिध्वनी देखील तिथून आलेला नसतो. आणि मूळ शब्दाच्या प्रत्ययाशिवाय (कारणाशिवाय) तो इतर ठिकाणाहून प्रवृत्त होत नाही. मूळ शब्दाच्या प्रत्ययानेच तो तिथे प्रवृत्त होतो. तिथे मूळ शब्दाप्रमाणे अतीत (भूतकाळातील) कर्म आहे. प्रतिध्वनीप्रमाणे लागलीच होणारी प्रतिसंधी आहे. हाच न्याय दिवा, मुद्रा आणि प्रतिबिंब-छायेच्या बाबतीत लावावा. त्यामध्ये “दिवा” म्हणजे प्रथम एक दिवा लावून, त्याच्याद्वारे इतर शेकडो दिवे किंवा हजारो दिवे पेटवले जातात. “मुद्रा” म्हणजे शिक्क्याची रेषा. तिथे एका शिक्क्याच्या ठशाने शेकडो किंवा हजारो शिक्क्यांच्या रेषा उमटवल्या जातात. “प्रतिबिंब-छाया” म्हणजे स्वच्छ आरशाच्या पाटीवर किंवा पाण्यावर उत्पन्न झालेली शरीराची छाया. या उदाहरणांद्वारे 'फल हे हेतूपासून आलेले नसते, आणि हेतूशिवाय ते सिद्ध देखील होत नाही' एवढाच अर्थ स्पष्ट केला जातो. “बीजसंस्कार” म्हणजे कालांतराने उत्पन्न होणाऱ्या फुला-फळांमध्ये इच्छित वर्ण, गंध आणि रसाच्या प्रादुर्भावासाठी, रोपण करतेवेळी आंब्याच्या बी इत्यादींमध्ये इच्छित वर्ण, गंध आणि रसधातूंचे संस्कारित करणे होय. तिथे त्याच्या प्रत्ययाने (कारणाने) कालांतराने फुला-फळांमध्ये ते वर्ण, गंध आणि रस प्रादुर्भूत होतात. “पाटiभोग” (जामीनदार किंवा प्रतिज्ञा) म्हणजे एखादा उद्देश साध्य करण्यासाठी दुसऱ्याकडून कर्ज घेणाऱ्याचे 'तुझे धन मी एका वर्षात व्याजासह परत करीन, जर दिले नाही तर माझे अमुक शेत किंवा वास्तू तुझी होईल' अशी प्रतिज्ञा लिहून देणे. तिथे त्याच्या प्रत्ययाने धन मिळवून तो आपला उद्देश साध्य करतो. आणि वेळ आल्यावर व्याजासह कर्जाची फेड करतो. “विद्या, शिल्प आणि औषध” म्हणजे जगात मुलांच्या आजीवन हितासाठी बालपणी त्यांना एखादी विद्या किंवा शिल्प शिकवले जाते. आजीवन तीव्र रोगांची उत्पत्ती न होण्यासाठी बालपणी त्यांना एखादे शक्तिवर्धक औषध पाजले जाते. तिथे त्याच्या प्रत्ययाने मुलांचे आजीवन हित प्राप्त होते किंवा तशा रोगांची अनुत्पत्ती (न होणे) होतेच. या उदाहरणांद्वारे, ज्याप्रमाणे कालांतराने जामीनकी इत्यादी मूळ कर्मे अस्तित्वात नसताना देखील, पूर्वभागात केलेल्या प्रत्ययामुळेच (कारणामुळेच) नंतर कार्यसिद्धी इत्यादी घडून येते; त्याचप्रमाणे कुशल आणि अकुशल कर्मे करून, कालांतराने ती कर्मे अस्तित्वात नसली तरी देखील, पूर्वी केल्यामुळेच नंतर प्रतिसंधी इत्यादी फले प्रादुर्भूत होतात, हे स्पष्ट होते. म्हणूनच म्हटले आहे: “आणि येथे प्रतिध्वनी, दिवा, मुद्रा इत्यादी उदाहरणे आहेत.” “कर्मदुर्बलभावाने” म्हणजे त्यावेळी जीवितेंद्रियाच्या दुर्बलतेमुळे कर्म देखील दुर्बलच होते, असे मानून म्हटले आहे. जरी येथे अट्ठकथेत असे सांगून दर्शविले असले, तरी देखील ते संभवते, असा संबंध आहे. त्यामध्ये “ते देखील” म्हणजे गतिनिमित्त देखील. “तशा प्रकारे च्युत होणाऱ्यांचे” म्हणजे दिव्य रथ इत्यादींना गतिनिमित्त बनवून च्युत (मृत्यू पावणारे) होणाऱ्यांचे. “दह्यमान कायेने” (जळणाऱ्या शरीराने) हे इत्थंभूतलक्षणामध्ये तृतीया विभक्तीचे रूप आहे. गाथेमध्ये. पंचद्वारांमध्ये प्रतिसंधी कर्माशिवाय द्विगोचरामध्ये (दोन विषयांमध्ये) असावे, अशी योजना आहे. त्यामध्ये “द्विगोचर” म्हणजे कर्मनिमित्त आणि गतिनिमित्त रूप असलेल्या दोन विषयांमध्ये. त्यामध्ये पंचद्वारातील प्रतिसंधी म्हणजे पंचद्वारिक मरणासन्न वीथीचित्तांच्या शेवटी च्युत होणाऱ्यांची प्रतिसंधी होय. ती देखील गतिनिमित्त रूप विषयात असावी असे म्हटले असता, पंचद्वारिक वीथीचित्ते पंच-आलंबन रूप गतिनिमित्तांना आलंबन (विषय) बनवतात, हे देखील सिद्ध होते. आणि असे असताना, त्या वीथीचित्तांच्या शेवटी च्युत न होता, त्यांच्याशी अनुबद्ध असणाऱ्या मनोद्वारिक वीथीचित्तांच्या द्वारे देखील कधीकधी काहींची च्युती संभवत नाही, असे म्हणता येत नाही (म्हणजे संभवते). परंतु त्या अनुबद्ध वीथींमध्ये अतीत-ग्रहण (भूतकाळाचे ग्रहण) आणि समुदाय-ग्रहणाने च्युत होणाऱ्यांना अतीत (भूतकालीन) गतिनिमित्त देखील प्राप्त होतात. आणि वस्तू-ग्रहण व नाम-ग्रहणाने च्युत होणाऱ्यांना धम्मालंबन (धर्माचे आलंबन) देखील प्राप्त होतेच. म्हणून आचार्यांनी जे म्हटले आहे की, कामावचर प्रतिसंधीमध्ये सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले कर्मनिमित्त आणि गतिनिमित्त हे वर्तमान किंवा अतीत आलंबन म्हणून प्राप्त होते, ते सुयोग्यच म्हटले आहे, असे समजावे. आणि आचार्यांनी जे म्हटले आहे की, 'त्याच तशा प्रकारे उपस्थित झालेल्या आलंबनाला आरंभ करून चित्तसंतान वारंवार प्रवृत्त होते', अशा प्रकारे अंतिम वीथीच्या पूर्वभागात अनेक वीथीवारांचे प्रवृत्त होणे, ते तशा प्रकारे उपस्थित झालेल्या गतिनिमित्ताला आरंभ करून देखील प्राप्त होणे योग्यच आहे. आणि असे असताना, गतिनिमित्त देखील अतीत प्राप्त होते, हे दर्शविण्यासाठी “यदा पन” (परंतु जेव्हा) इत्यादी म्हटले आहे. “संततिवशेन” म्हणजे संतती-वर्तमान वशाने. “तस्स” म्हणजे गतिनिमित्ताचे. बहुतांश करून म्हटले आहे, सर्वसमावेशकतेने म्हटलेले नाही, असा अभिप्राय आहे. “मनोद्वारिक मरणासन्न जवनांचे देखील इच्छित असल्यामुळे” म्हणजे curejātapaccaya (पुरेजात-प्रत्यय) भावाने इच्छित असल्यामुळे, असा अभिप्राय आहे. “तदनुबंधाय” म्हणजे त्या मनोद्वारिक मरणासन्न जवनांच्या अनुगामी असणाऱ्या. “प्रतिसंधीमध्ये देखील संभवत असल्यामुळे” म्हणजे त्या पुरेजात-प्रत्ययाची प्रतिसंधीमध्ये देखील पुरेजात-प्रत्ययता संभवत असल्यामुळे. जर स्थविरांनी (थेरांनी) विभागून सांगितले नसले तरी, विभागणे आवश्यक असताना विभागणेच योग्य आहे, असे म्हटल्यास? तर ते योग्य नाही. का? कारण ते कर्मनिमित्ताशी समान गती असणारे आहे. म्हणूनच “न च तं” इत्यादी म्हटले आहे. विभावनीमध्ये यथासंभव योजना करावी असे सांगून, 'इतर काही जण तर विशेष न करताच (सामान्यपणे) वर्णन करतात' असा अपरवाद (दुसरा मतप्रवाह) देखील सांगितला आहे. त्यामध्ये “विशेष न करता वर्णन करतात” म्हणजे विभागणी न करताच वर्णन करतात, असे म्हटले आहे. पुन्हा त्या अपरवादाचा स्वीकार न करता “अट्ठकथायं पन” (परंतु अट्ठकथेत) इत्यादी म्हटले आहे. परंतु येथे त्या अपरवादाचे समर्थन करताना पुन्हा “यंच तत्थ” (आणि जे तिथे) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये “तदालंबनासाठी” म्हणजे त्या गतिनिमित्त आलंबनासाठी. “त्यांचे वचन” म्हणजे इतरांचे वचन. “विचार न केल्याशिवाय” असे का म्हटले आहे? 'परंतु अट्ठकथेत' इत्यादी सर्व विचार करणारेच वचन आहे ना? सत्य आहे, परंतु पाहिलेल्या पाठाच्या वशाने, उरलेल्या पाठाच्या भावाचा विचार केला जात नाही. म्हणूनच “विचार न केल्याशिवाय” असे म्हटले आहे. येथे अशी शंका येऊ शकते: अट्ठकथा पाठ सावशेष (अपूर्ण) असो, परंतु मूळ टीका पाठ तर 'मनोद्वारावरच' असा नियम करून सांगितल्यामुळे तो सावशेष कसा असू शकेल? नियम करून सांगितला असला तरी, येथे अभिप्रेत अर्थ अपूर्ण असल्यामुळे तो सावशेषच ठरतो. म्हणूनच म्हटले आहे: “विचार न केल्याशिवाय दुसरे कोणतेही कारण नाही.” “वर्तमान, अतीत” इत्यादींमध्ये. तदालंबन पर्यवसान असणाऱ्या पंचद्वारिक जवनवीथीने च्युती होते, अशी योजना आहे. इतर ठिकाणी देखील याचप्रमाणे समजावे. बलवान असताना देखील. तदालंबन पर्यवसान असणाऱ्या वीथीनेच. “सांगितल्यामुळे तर” म्हणजे अट्ठकथेतच सांगितल्यामुळे तर. “पूर्वभागातच” म्हणजे पंचद्वारिक अंतिम वीथीच्या पूर्वभागातच. “त्यांच्याद्वारे” म्हणजे देयधर्म वस्तूंनी (दानांच्या वस्तूंनी). “यथा तं” म्हणजे ती गोष्ट कशासारखी आहे, असा अर्थ आहे. “इतो” म्हणजे मनुष्य भवातून. निमित्तासारख्या शब्दाचे वर्णन करतात, असा संबंध आहे. “नट्ठचकारं” म्हणजे गळून पडलेला 'च' कार. अट्ठकथा पाठात 'नातेवाईक, माता इत्यादी पंचद्वारावर उपस्थित करतात' असा संबंध आहे. “तवत्थाय” म्हणजे तुझ्यासाठी. “चीनपट, सोमारपट इत्यादींच्या वशाने” म्हणजे चीन देशात तयार झालेले वस्त्र म्हणजे चीनपट. त्याचप्रमाणे सोमारपट देखील. “तानि” म्हणजे रस आणि स्प्रष्टव्य (स्पर्श). स्प्रष्टव्य तर इतर देखील योग्यच ठरते. 'आता आहे' असे मनसिकार केल्यामुळे 'वर्तमानकालीन झालेली' असे म्हटले आहे. “अरूपीनं” म्हणजे अरूप ब्रह्मांचे. “ते” म्हणजे अरूप (ब्रह्म). “तानि” म्हणजे खालची ध्याने. ज्यांचे प्राप्त झालेले ध्यान सुटले आहे (विस्मृत झाले आहे) ते 'विस्सट्ठज्झाना' (मुक्तध्यान). “ततोयेव च” म्हणजे ध्यान सुटल्यामुळेच. ज्यांचे मन (चित्त) आकर्षित झाले आहे, असा विग्रह आहे. आणि हे हेतू-विशेषण पद आहे. मन आकर्षित झाल्यामुळे कामभवात उत्पन्न होणाऱ्यांचे, हे स्पष्ट करते. त्या अरूप ब्रह्मांचे. “इतर दुर्बल कर्म” म्हणजे उपचार-ध्यान कर्मापेक्षा इतर त्रिहेतुक कनिष्ठ कर्म. “तेसं” म्हणजे रूपलोकातून च्युत होणाऱ्यांचे. “सतो” म्हणजे विद्यमान असताना. “उपस्तंभन करण्याचे कारण नाही” हे उपचार-ध्यान कर्माच्या गरुक (गुरू) कर्माच्या गतीचे असल्यामुळे म्हटले आहे. एकांततः गरुक कर्म केलेले देखील महग्गत (महत) ध्यान कर्म हे विविध आसक्तींच्या बलाने प्रतिबाधित (रोखले) जात असताना प्रतिसंधी देतच नाही. मग उपचार-ध्यान कर्माच्या बाबतीत तर बोलण्याची गरजच नाही, असे समजावे. “तशा प्रकारची” म्हणजे तशा रूपाची द्विहेतुक कनिष्ठ कर्मे त्यांना संधी मिळत नाही. कारण नीवरणांचे उत्तम प्रकारे विक्षंभन (दमन) झालेले असते. “येन” म्हणजे ज्या छंद इत्यादींच्या प्रवृत्तीच्या कारणाने. “नाना कर्मे देखील” म्हणजे उपचार-ध्यान कर्मापेक्षा इतर वर्तमान कर्मे देखील किंवा अतीत भवांमध्ये केलेली अपरापरिय कर्मे देखील. “येन च” म्हणजे ज्या नाना कर्मांना देखील संधी मिळण्याच्या कारणाने. “ते” म्हणजे रूपी ब्रह्म. “किंवा सांगितलेल्या न्यायानेच” म्हणजे ज्यांचे नीवरण उत्तम प्रकारे दमित झाले आहे, अशा त्यांच्या अर्पणा प्राप्त ध्यानविशेषाने [ आणि 'यस्मा पन' इत्यादींद्वारे ] संस्कारित चित्तसंतान असल्यामुळे, या सांगितलेल्या न्यायानेच. “ते कारण” म्हणजे अहेतुक प्रतिसंधीच्या अभावाचे कारण होय. आणि परंपरेने येणाऱ्या भवांमध्ये वीथीमुक्त चित्तांच्या प्रवृत्तीचा प्रकार दर्शविण्यासाठी, असा संबंध आहे. “ज्याप्रमाणे तीच औषधे” म्हणजे जगात एखादे औषध मिळवून मनुष्य ते रोज घेतो. पहिल्या दिवशी त्याला ते घेताना पाहून कोणीतरी विचारले, “तू कोणते औषध घेत आहेस?” तो म्हणतो, “मी अमुक नावाचे औषध घेत आहे.” दुसऱ्या दिवशी देखील त्याला औषध घेताना पाहून तसेच विचारले. तो म्हणतो, “मी तेच औषध घेत आहे.” तिथे “तेच औषध” म्हणजे जे पहिल्या दिवशीचे औषध तुझ्याद्वारे विचारले गेले होते आणि माझ्याद्वारे सांगितले गेले होते, “तेच मी आज घेत आहे” असा अर्थ आहे. परंतु तिथे पहिल्या दिवशी घेतलेले औषध वेगळे होते आणि आज घेतलेले औषध वेगळे आहे. परंतु त्याच्यासारखेच दुसरे असले तरी लोक व्यवहारात “तेच” असे म्हणतात की “मी तीच औषधे घेत आहे.” त्याचप्रमाणे येथे देखील त्याच्यासारख्याच गोष्टीसाठी तो व्यवहार समजावा. “तस्मिं” म्हणजे भवंगचित्तामध्ये. ते प्रवृत्त नसताना उपपत्ती-भव (पुनर्जन्म) खंडित होतो. प्रवृत्त असताना खंडित होत नाही. म्हणून त्या उपपत्ती-भवाच्या अखंडतेचे अंग (कारण) असल्यामुळे त्याला 'भवंग' असे म्हटले जाते, असा अभिप्राय आहे. “उपपत्ती-भव” म्हणजे कर्मज स्कंधांचे संतान (प्रवाह) म्हटले जाते. “परसमये” म्हणजे उच्छेददृष्टीवाल्यांच्या वादात (मतामध्ये). “वट्टमूलानि” (संसारमुळे) म्हणजे अविज्जा आणि तण्हा यांना म्हटले जाते. संसाराची मुळे जिथे पूर्णपणे उच्छिन्न (नष्ट) होतात, असा विग्रह आहे. “ज्याच्यासाठी” म्हणजे सोपाधिशेष इत्यादी निर्वाणाच्या प्राप्तीसाठी. “प्रस्थापित केले जातात” म्हणजे प्रवृत्त केले जातात. आर्य जन जिथे पोहोचतात, प्राप्त करतात, ते पद होय. पुढे 'समन्ति' पदामध्ये अनुपधिशेषाचे ग्रहण होत असल्यामुळे येथे 'सोपाधिशेष' असे म्हटले आहे. जे जाणतात ते 'बुध' (ज्ञानी). ज्यांच्याद्वारे स्नेहाचे (आसक्तीचे) बंधन पूर्णपणे उच्छिन्न केले गेले आहे, ते 'सुसमुच्छिन्नस्नेहबंधना' (पूर्णपणे उच्छिन्न स्नेहबंधन असलेले). आणि ते पूर्णपणे कसे उच्छिन्न झाले, आणि कोणासोबत उच्छिन्न झाले? हे सांगण्यासाठी “अनुसयमत्तं पि” (अनुशयमात्र देखील) इत्यादी म्हटले आहे. “शेषक्लेशांनी” म्हणजे तण्हा-स्नेह बंधनापासून उरलेल्या क्लेशांनी. “अधिशयितं” म्हणजे दमन करण्यास देखील असमर्थ होऊन अत्यंत सुप्त राहिलेले. “अधिगमावहं” म्हणजे 'अधिगम' नऊ प्रकारच्या लोकोत्तर धर्माला म्हटले जाते. त्याला प्राप्त करून देणारे ते 'अधिगमावह'. “शीलं” म्हणजे चतुःपारिशुद्धिशील. “धुतंगं” म्हणजे तेरा धुतंगे. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. วีถิมุตฺตสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. वीथिमुत्तसंग्रहदीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๖. รูปสงฺคหอนุทีปนา ६. रूपसंग्रह-अनुदीपनी ๑๕๖. รูปสงฺคเห[Pg.190]. ‘‘จิตฺตเจตสิเก’’ติ จิตฺตเจตสิก ธมฺเม. ‘‘ทฺวีหิ ปเภทปฺปวตฺตีหี’’ติ ทฺวีหิ ปเภทสงฺคหปวตฺติ สงฺคเหหิ. ‘‘เย วตฺตนฺตี’’ติ เย ธมฺมา วตฺตนฺติ ปวตฺตนฺติ. ‘‘เอตฺตาวตา’’ติ เอตฺตเกน ‘ตตฺถ วุตฺตาภิธมฺมตฺถา’ติอาทิเกน วจนกฺกเมน. นิปาตํ อิจฺฉนฺตา เอตฺตเกหิ ปญฺจหิ ปริจฺเฉเทหีติ วณฺเณนฺติ. วจนวิปลฺลาสํ อิจฺฉนฺตาติปิ ยุชฺชติ. ‘‘สมุฏฺฐาตี’’ติ สุฏฺฐุ อุฏฺฐาติ, ปาตุพฺภวติ, วิชฺชมานตํ คจฺฉติ. ‘‘กมฺมาที’’ติ กมฺมาทิปจฺจโย. ‘‘ปิณฺฑี’’ติ เอกคฺฆนตา วุจฺจติ. อุปาทาย มหนฺตานิ เอว หุตฺวาติ สมฺพนฺโธ. อินฺทฺริยพทฺธสนฺตานํ สตฺตสนฺตานํ. อชฺฌตฺต สนฺตานํติปิ วุจฺจติ. ‘‘วิสํวาทกฏฺเฐนา’’ติ วิราธกฏฺเฐน. ภูตญฺจ อภูตํ กตฺวา อภูตญฺจ ภูตํ กตฺวา สนฺทสฺสกฏฺเฐนาติ วุตฺตํ โหติ. ภูตวชฺชปฺปฏิจฺฉาทนกมฺมํ มหามายา นาม. มายํ กโรนฺตีติ มายาการา. อาวิสนํ นาม สตฺตานํ สรีเรสุ อาวิสนํ. คหณํ นาม สตฺตานํ อตฺตโนวสํ วตฺตาปนํ. ตทุภยํ กโรนฺตา กตฺถ ฐตฺวา กโรนฺติ. อนฺโตวาฐตฺวา กโรนฺติ, พหิวา ฐตฺวา กโรนฺตีติ ปากติเกหิ มนุสฺเสหิ ชานิตุํ ปสฺสิตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา อจินฺเตยฺยฏฺฐานํ นาม. ‘‘วญฺจกฏฺเฐนา’’ติ เอตา ปกติยา อติทุพฺพณฺณํ อตฺตานํ เทวจฺฉราวณฺณํ กตฺวา วญฺเจนฺติ. วสนรุกฺขคุมฺพํปิ ทิพฺพวิมานํ กตฺวา วญฺเจนฺติ. เอวรูเปน วญฺจกฏฺเฐน. ‘‘เตเนวฏฺเฐนา’’ติ วิสํวาทกฏฺฐาทินา ติวิเธเนว อตฺเถน. ตานิปิหิ อสตฺตภูตํเยว อตฺตานํ สตฺโตติ วิสํวาเทนฺติ. อรุกฺขํเยว อตฺตานํ รุกฺโขติ วิสํวาเทนฺติ. อนิฏฺฐํ, อกนฺตํ, อมนาปํเยว อตฺตานํ อิฏฺโฐ, กนฺโต, มนาโปติ วญฺเจนฺติ, ตถา สหชาตานญฺจ เตสํ อญฺญมญฺญสฺส อนฺโต วา ติฏฺฐนฺติ. อุทาหุพหิวาติฏฺฐนฺตีติ ชานิตุํ ปสฺสิตุํ อสกฺกุเณยฺยํ ฐานํ โหตีติ. ‘‘อุภยตฺถปี’’ติ มายาการาทิ มหาภูเตสุ จ ปถวิยาทิมหาภูเตสุ จ. ‘‘อภูตานี’’ติ อสนฺตานิ, อสจฺจานิ[Pg.191].‘‘อพฺภุตานี’’ติ อจฺฉริยกมฺมานิ. ‘‘อิมสฺมึ ปาเฐ’’ติ จตุนฺนํ มหาภูตานนฺติ เอวํ สมฺพนฺธ ปทสหิเต ปาเฐ. อญฺญตฺถ ปน อุปาทารูปํ อนุปาทารูปนฺติอาทีสุ ยการ วิรโห ทิฏฺโฐติ อธิปฺปาโย. ธาตูนํ อเนกตฺถตฺตา ‘‘ปถยติ ปกฺขายตี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘ปุถู’’ติ ปาฏิปทิกปทํ. ตเมว ชาตตฺเถ นิรุตฺตินเยน ปถวีติ สิทฺธนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘ปุถุมหนฺตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ปกาเรน ถวียตีติ อตฺเถ ปถวีติ อิทํ อุชุกเมว. ‘‘อาเปตี’’ติ พฺยาเปติ. ‘‘อปฺปายตี’’ติ ภุสํ ปายติ, วฑฺเฒติ. เตนาห ‘‘สุฏฺฐุ พฺรูเหตี’’ติอาทึ. นิสานตฺถวเสเนว ปริปาจนตฺโถปิ ลพฺภตีติ อาห ‘‘ปริปาเจติวา’’ติ. ‘‘สมีเรตี’’ติ สุฏฺฐุ อีเรติ กมฺเปติ. วายติ วหตีติ วาโย อตฺถาติสฺสย นเยน. ‘‘วิตฺถมฺภนํ’’ติ วิวิเธน อากาเรน ภูตสงฺฆาฏานํ ถมฺภนํ วหนํ อภินีหรณํ. กกฺขฬตา นาม ขรตา ผรุสตา. สหชาตรูปานํ ปติฏฺฐานตฺถาย ถทฺธตา ถูลตา. สา เสสภูเตสุ นตฺถีติ อาห ‘‘เสสภูตตฺตยํ อุปาทายา’’ติ. ‘‘อนวฏฺฐานตา’’ติ เอตฺถ อวฏฺฐานํ นาม อจลฏฺฐานํ. น อวฏฺฐานนฺติ อนวฏฺฐานํ. จลนนฺติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘มุทุภูตาปี’’ติอาทึ. อาพนฺธกํ นาม อาพนฺธิตพฺเพ วตฺถุมฺหิ มุทุมฺหิ สติ, ทฬฺหํ น พนฺธติ. ถทฺเธสติ, ทฬฺหํ พนฺธตีติ อิทํ โลกโตว สิทฺธนฺติ อาห ‘‘อาพนฺธิตพฺพายา’’ติอาทึ. ‘‘ตพฺภาวํ’’ติ ปริณตภาวํ. ‘‘ปริปาจกตา ทสฺสนโต’’ติ เหมนฺเต อชฺโฌหฏาหารานํ สุฏฺฐุปริปาจกตา ทสฺสนโตติ วทนฺติ. อุสติ ทหตีติ อุณฺหํ. ‘‘ทหตี’’ติ จ อุณฺหเตโชปิ อุณฺหภาเวน ทหติ, สีตเตโชปิ สีตภาเวน ทหติ. อุณฺเหน ผุฏฺฐํ วตฺถุ อุณฺหตฺตํ คจฺฉติ, สีเตน ผุฏฺฐํ วตฺถุ สีตตฺตํ คจฺฉติ. ยญฺจ อุณฺหตฺตํ คจฺฉติ, ตํ อุณฺหเตโช อุณฺหภาเวน ทหตินาม. ยญฺจ สีตตฺตํ คจฺฉติ, ตํ สีตเตโช สีตภาเวน ทหตินาม. เอวํ สีตเตโชปิ อุสติทหตีติ อตฺเถน อุณฺหตฺต ลกฺขโณนาม โหตีติ. เอวํสนฺเต นีเลนวณฺเณน ผุฏฺฐํ วตฺถุ นีลํ โหติ. ปีเตน ผุฏฺฐํ ปีตํ โหติ. นีลํปิ ปีตํปิ ตํ วตฺถุํ ทหตินามาติ เจ. นีเลน วณฺเณน ผุฏฺฐํนาม นตฺถิ. ตถา ปีเตน[Pg.192]. กสฺมา, นีลาทีนํ อุปาทารูปานํ ผุสน กิจฺจา ภาวโต. สมฺมิสฺสิตํ นาม โหติ. น จ สมฺมิสฺสนมตฺเตน ทหติ. ผุสนฺโต เอว ทหติ. ผุสนฺตานํปิ ปถวิวาตานํ ทหนกิจฺจํ นตฺถิ. ปริปาจนกิจฺจํ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. สเจ ฆนถทฺเธ สิลาถมฺเภ วิตฺถมฺภนํ อตฺถิ, สกโล สิลาถมฺโภ กปฺปาสปิจุคุฬฺโหวิย สิถิโล จ ลหุโก จ ภเวยฺย. นจ ภวติ. ตสฺมา ตตฺถ วิตฺถมฺภนํ นตฺถีติ อธิปฺปาเยน ‘‘โส ปน ฆนถทฺเธสุ สิลาถมฺภาทีสุ น ลพฺภตี’’ติ โจเทติ. ตตฺถ ปน วิตฺถมฺภนํ ลพฺภมานํ อธิมตฺเตน น ลพฺภติ, สหชาตภูตานํ อุปตฺถมฺภนมตฺเตน ลพฺภตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘นา’’ติ วตฺวา ‘‘ตตฺถหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘วหตี’’ติ ถทฺธกกฺขฬ กิจฺจํ วหติ. १५६. रूपसंग्रहात. 'चित्तचेतसिके' म्हणजे चित्त आणि चेतसिक धर्म. 'द्वीहि प्रभेदप्पवत्तीहि' म्हणजे दोन प्रकारच्या प्रभेद-संग्रह-प्रवृत्तींच्या द्वारे. 'ये वत्तन्ति' म्हणजे जे धर्म वर्ततात (प्रवृत्त होतात). 'एत्तावता' म्हणजे एवढ्या 'तत्थ वुत्ताभिधम्मत्था' इत्यादी वचनक्रमाने. निपात (अव्यय) इच्छिणारे 'एवढ्या पाच परिच्छेदांद्वारे' असे वर्णन करतात. वचनविपर्यास इच्छिणाऱ्यांसाठीही हे योग्य ठरते. 'समुट्ठाति' म्हणजे चांगल्या प्रकारे उत्पन्न होते, प्रादुर्भूत होते, अस्तित्वात येते. 'कम्मादि' म्हणजे कर्मादी प्रत्यय (कारण). 'पिण्डी' म्हणजे एकसंघता (एकत्र येणे) म्हटले जाते. उपादाय (आश्रित) होऊन मोठेच बनून, असा संबंध आहे. इंद्रियबद्ध संतान म्हणजे सत्त्व-संतान (प्राण्यांचे संतान). याला 'अध्यात्म संतान' असेही म्हटले जाते. 'विसंवादकट्ठेन' म्हणजे विसंवादन (फसवणूक/विरोध) करण्याच्या अर्थाने. जे आहे त्याला नसलेले करून आणि जे नाही त्याला असलेले करून दाखवण्याच्या अर्थाने, असे म्हटले आहे. खऱ्या दोषांना लपवण्याचे कार्य म्हणजे 'महामाया' होय. जे माया (जादू) करतात ते 'मायाकार' (जादूगार). 'आविशन' म्हणजे प्राण्यांच्या शरीरात प्रवेश करणे. 'ग्रहण' म्हणजे प्राण्यांना स्वतःच्या वशमध्ये करणे. ते दोन्ही करणारे कोठे राहून करतात? आत राहून करतात की बाहेर राहून करतात, हे सामान्य माणसांना जाणणे किंवा पाहणे अशक्य असल्यामुळे याला 'अचिंत्य स्थान' म्हटले जाते. 'वंचकट्ठेन' म्हणजे फसवणुकीच्या अर्थाने; या (यक्षिणी इत्यादी) स्वभावाने अत्यंत कुरूप असून स्वतःला अप्सरेसारखे सुंदर बनवून फसवतात. राहण्याच्या झाडाझुडपांनाही दिव्य विमान बनवून फसवतात. अशा प्रकारच्या फसवणुकीच्या अर्थाने. 'तेनेवट्ठेन' म्हणजे विसंवादकत्व इत्यादी तीन प्रकारच्या अर्थानेच. कारण ते देखील जे सत्त्व (प्राणी) नाही अशा स्वतःला 'सत्त्व' म्हणून विसंवादित करतात (भासवतात). जे झाड नाही अशा स्वतःला 'झाड' म्हणून भासवतात. अनिष्ट, अकांत (अप्रिय) आणि अमनाप (नापसंत) अशा स्वतःला इष्ट, कांत आणि मनाप म्हणून फसवतात; तसेच सोबत उत्पन्न झालेल्या त्यांच्या एकमेकांच्या आत राहतात की बाहेर राहतात, हे जाणणे आणि पाहणे अशक्य असणारे स्थान असते. 'उभयत्थपि' म्हणजे मायाकार इत्यादी महाभूतांमध्ये आणि पृथ्वी इत्यादी महाभूतांमध्येही. 'अभूतानि' म्हणजे जे विद्यमान नाहीत, असत्य आहेत. 'अब्भुतानि' म्हणजे आश्चर्यकारक कर्मे. 'इमस्मिं पाठे' म्हणजे 'चार महाभूतांचे' अशा संबंध पदासह असलेल्या पाठात. इतर ठिकाणी मात्र 'उपादारूपं अनुपादारूपं' इत्यादींमध्ये 'य' काराचा अभाव दिसतो, असा अभिप्राय आहे. धातूंचे अनेक अर्थ असल्यामुळे 'पथयति पक्खायति' (विस्तार पावते, पसरते) असे म्हटले आहे. 'पुथु' हे प्रातिपदिक पद आहे. त्यालाच 'जात' अर्थामध्ये निरुक्त नियमाने 'पथवी' (पृथ्वी) असे सिद्ध होते हे दाखवण्यासाठी 'पुथुमहन्ति' इत्यादी म्हटले आहे. 'प्रकारने थवीयति' (विस्तारित केली जाते) या अर्थाने 'पथवी' हे सरळच आहे. 'आपेतिति' म्हणजे व्यापते. 'अप्पायति' म्हणजे अत्यंत तृप्त करते, वाढवते. म्हणूनच 'सुट्ठु ब्रूहेति' (चांगल्या प्रकारे वाढवते) इत्यादी म्हटले आहे. तीक्ष्ण करण्याच्या अर्थानेच 'परिपचन' (पचवणे) हा अर्थही प्राप्त होतो, म्हणून 'परिपाचेति वा' असे म्हटले आहे. 'समीरेति' म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रेरित करते, कंपित करते. 'वायति' (वाहते) आणि 'वहति' (वाहून नेते) म्हणून 'वायू' हा अर्थातिशय नियमाने आहे. 'वित्थम्भनं' म्हणजे विविध आकारांनी भूत-संघातांचे (महाभूतांच्या समूहांचे) स्तंभन (थोपवणे), वहन आणि अभिनिर्हरण (बाहेर काढणे). 'कक्खळता' (कठीणपणा) म्हणजे खरखरीतपणा, परुषता (कठोरपणा). सहजात रूपांच्या प्रतिष्ठेसाठी (आधारासाठी) स्तब्धता (कडकपणा) आणि स्थूलता होय. ती उर्वरित भूतांमध्ये नाही, म्हणून 'सेसभूतत्तयं उपादाय' (उर्वरित तीन भूतांना आश्रित करून) असे म्हटले आहे. 'अनवट्ठानता' यामध्ये 'अवट्ठान' म्हणजे अचल स्थान (स्थिरता). जे अवट्ठान नाही ते 'अनवट्ठान' (अस्थिरता). म्हणजेच 'चलन' (कंपन/हालचाल) असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'मुदुभूतापि' इत्यादी म्हटले आहे. 'आबंधक' (बांधणारे) म्हणजे बांधल्या जाणाऱ्या वस्तूमध्ये; ती मृदू असताना घट्ट बांधत नाही. ती कठीण असताना घट्ट बांधते, हे जगावरूनच सिद्ध होते, म्हणून 'आबन्धितब्बाय' इत्यादी म्हटले आहे. 'तब्भावं' म्हणजे परिणत भाव (रूपांतरित अवस्था). हिवाळ्यात खाल्लेल्या अन्नाचे चांगल्या प्रकारे परिपचन होत असल्याचे दिसल्यामुळे, असे म्हणतात. जे उष्ण करते, जाळते ते 'उष्ण'. 'दहति' (जाळते/उष्ण करते) आणि उष्णतेजही उष्णभावाने जाळते, शीततेजही शीतभावाने जाळते. उष्णाने स्पर्श केलेली वस्तू उष्णतेला प्राप्त होते, शीताने स्पर्श केलेली वस्तू शीततेला प्राप्त होते. आणि जे उष्णतेला प्राप्त होते, त्याला उष्णतेज उष्णभावाने 'दहन करते' असे म्हणतात. आणि जे शीततेला प्राप्त होते, त्याला शीततेज शीतभावाने 'दहन करते' असे म्हणतात. अशा प्रकारे शीततेज देखील उष्णतेने दहन करते या अर्थाने 'उष्णता लक्षण' असणारेच होते. असे असल्यास, निळ्या रंगाने स्पर्श केलेली वस्तू निळी होते. पिवळ्याने स्पर्श केलेली पिवळी होते. निळेही आणि पिवळेही त्या वस्तूला 'दहन करते' असे म्हणावे का? निळ्या रंगाने स्पर्श केलेले असे काही नसते. तसेच पिवळ्यानेही नसते. का? कारण निळे इत्यादी उपादाय रूपांमध्ये स्पर्श करण्याचे कार्य नसते. ते संमिश्रित असते. आणि केवळ संमिश्रणानेच दहन होत नाही. स्पर्श करत असतानाच दहन होते. स्पर्श करणाऱ्या पृथ्वी आणि वायूचेही दहन करण्याचे कार्य नसते. परिपचन करण्याचे कार्य नसते, असा अभिप्राय आहे. जर घन आणि कठीण अशा शिलास्तंभात (दगडी खांबात) विष्टंभन (स्तंभन) असेल, तर संपूर्ण शिलास्तंभ कापसाच्या गोळ्यासारखा शिथिल आणि हलका होईल. पण तसे होत नाही. म्हणून तिथे विष्टंभन नाही, या अभिप्रायाने 'तो (वायू) घन आणि कठीण अशा शिलास्तंभ इत्यादींमध्ये आढळत नाही' अशी शंका उपस्थित केली जाते. परंतु तिथे आढळणारे विष्टंभन अतिप्रमाणात आढळत नाही, तर सहजात भूतांच्या केवळ उपष्टंभन (पाठबळ) देण्याच्या स्वरूपात आढळते, हे दाखवण्यासाठी 'नाही' असे म्हणून 'तथ्य हि' (तिथे खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. तिथे 'वहति' म्हणजे कठीण आणि खरखरीत कार्य वाहून नेते (पार पाडते). ปสาทรูเปสุ. ‘‘สมวิสมํ’’ติ สมฏฺฐานญฺจ วิสมฏฺฐานญฺจ, สมเทสญฺจ วิสมเทสญฺจ, สมปถญฺจ วิสมปถญฺจาติ เอวมาทึ สมวิสมํ. ‘‘อาจิกฺขตี’’ติ อาจิกฺขนฺตํ วิย ตํ ชานน กิจฺจํ สมฺปาเทติ. เตนาห ‘‘สมวิสมชานนสฺส ตํ มูลกตฺตา’’ติ. ‘‘อนิรากรณโต’’ติ อปฺปฏิกฺขิปนโต. ‘‘ตํ วา’’ติ รูปํ วา. สุณนฺติ ชนา. สุยฺยนฺติ ชเนหิ. เอวํ ฆายนฺตีติอาทีสุ. ‘‘ชีวิต นิมิตฺตํ’’ติ ชีวิตปฺปวตฺติการณภูโต. ‘‘นินฺนตายา’’ติ วิสยวิสยีภาวูปคมเนน นินฺนตาย. ‘‘ชีวิตวุตฺติ สมฺปาทกตฺตา’’ติ นานาวจีเภทวจีกมฺมปฺปวตฺตเนนาติ อธิปฺปาโย. อิเม ปน ปญฺจ จกฺขุ ปสาทาทโยติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ทฏฺฐุกามตา’’ติ รูปตณฺหา วุจฺจติ. อาทิสทฺเทน โสตุกามตา ฆายิตุกามตา สายิตุกามตา ผุสิตุกามตาโย สงฺคยฺหนฺติ. อตฺถโต สทฺทตณฺหา คนฺธตณฺหา รสตณฺหา โผฏฺฐพฺพตณฺหา เอว. ‘‘นิทานํ’’ติ การณํ. ทฏฺฐุกามตาทโย นิทาน มสฺสาติ วิคฺคโห. กุสลา กุสลกมฺมํ. สมุฏฺฐาติ เอเตนาติ สมุฏฺฐานํ. กมฺมเมว. ทฏฺฐุกามตาทินิทานกมฺมํ สมุฏฺฐานํ เยสนฺติ สมาโส. ปถวิอาทีนิ ภูตานิ. เตสํ ปสาโท ลกฺขณํ เอเตสนฺติ วิคฺคโห. ทุตีย วิกปฺเป. รูปาทีนํ ปญฺจารมฺมณานํ อภิฆาตํ อรหตีติ รูปาทิอภิฆาตารโห. ภูตานํ ปสาโท ภูตปฺปสาโท. โส ลกฺขณํ เอเตสนฺติ วิคฺคโห. จกฺขุ อูกาสิรปฺปมาเณ ทิฏฺฐ มณฺฑเล [Pg.193] ติฏฺฐตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ทิฏฺฐมณฺฑเล’’ติ มหาชเนหิ ปกติ จกฺขุนา ทิฏฺเฐ ปสนฺนมณฺฑเล. เตลํ สตฺตปิจุปฏลานิ พฺยาเปตฺวา ติฏฺฐติวิยาติ โยชนา. ‘‘โสตพิลํ’’ นาม โสตกูโป. ‘‘องฺคุลิเวฐนา’’ นาม องฺคุลิมุทฺทิกา. ‘‘อุปจิตตนุตมฺพโลมํ’’ติ ราสีกตญฺจ วิรฬญฺจ ตมฺพโลหวณฺณญฺจ สุขุมโลมํ. อุปจิตํ ราสีกตํ ตนุตมฺพโลมํ เอตฺถาติ วิคฺคโห. ‘‘อชปทสณฺฐานํ’’ติ อชสฺส ปาเทน อกฺกนฺตปทสณฺฐานวนฺตํ. ‘‘อุปฺปลทลํ’’ นาม อุปฺปลปณฺณํ. อุปฺปลทลสฺส อคฺคสณฺฐานวนฺตํ. ‘‘วฏฺฏิ’’ นาม อิธ มนุสฺสานํ สรีราการสณฺฐิตา อายตปิณฺฑิ. ‘‘สุกฺขจมฺมานิ จ ฐเปตฺวา’’ติ สมฺพนฺโธ. เต ปน ปญฺจปฺปสาทา. สมุทีรณํ จญฺจลนํ. ‘‘ยถาตํ’’ติ กตมํ วิย ตํ. อิเม ปสาทา วิจิตฺตา, กถํวิจิตฺตาติ อาห ‘‘อญฺญมญฺญํ อสทิสา’’ติ. กถํ อสทิสาติ อาห ‘‘เตหี’’ติอาทึ. प्रसादरूपांमध्ये. 'समविषम' म्हणजे सम स्थान आणि विषम स्थान, सम देश आणि विषम देश, सम मार्ग आणि विषम मार्ग इत्यादी समविषम होय. 'सांगतो' (आचिक्खति) म्हणजे जणू काही सांगत असल्याप्रमाणे ते जाणण्याचे कार्य पूर्ण करतो. म्हणूनच म्हटले आहे, 'सम आणि विषम जाणण्याचे ते मूळ कारण (कर्ता) आहे.' 'अस्वीकार न केल्यामुळे' (अनिराकरणतो) म्हणजे नाकार न दिल्यामुळे (अप्पटिक्खिपनतो). 'ते किंवा' (तं वा) म्हणजे रूप किंवा. लोक ऐकतात. लोकांद्वारे ऐकले जाते. याचप्रमाणे 'वास घेतात' इत्यादींमध्ये. 'जीवितनिमित्त' म्हणजे जीवन प्रवृत्तीचे (चालू राहण्याचे) कारण बनलेले. 'प्रवणतेमुळे' (निन्नतया) म्हणजे विषय आणि विषयी भावाप्रत पोहोचण्याच्या प्रवणतेमुळे. 'जीवनवृत्तीचे संपादन करणारे असल्यामुळे' म्हणजे विविध प्रकारच्या वाणीच्या भेदाने वाक्कर्म प्रवृत्त करण्यामुळे, असा अभिप्राय आहे. हे पाच चक्षुप्रसाद इत्यादी आहेत, असा संबंध आहे. 'पाहण्याची इच्छा' (दट्ठुकामता) याला रूपतण्हा (रूपतृष्णा) म्हटले जाते. 'आदि' शब्दाने ऐकण्याची इच्छा, वास घेण्याची इच्छा, चव घेण्याची इच्छा, स्पर्श करण्याची इच्छा यांचा संग्रह होतो. वास्तविक पाहता या सद्दतण्हा (शब्दतृष्णा), गंधतण्हा (गंधतृष्णा), रसतण्हा (रसतृष्णा) आणि फोट्ठब्बतण्हा (स्पर्शतृष्णा) च आहेत. 'निदान' म्हणजे कारण. 'पाहण्याची इच्छा इत्यादी ज्याचे निदान (कारण) आहे' असा विग्रह आहे. कुशल आणि अकुशल कर्म. ज्याच्याद्वारे समुत्थान (उत्पत्ती) होते ते 'समुत्थान' होय. ते कर्मच आहे. 'पाहण्याची इच्छा इत्यादी निदान असलेले कर्म ज्यांचे समुत्थान (कारण) आहे' असा समास आहे. पृथ्वी इत्यादी महाभूत आहेत. त्यांचा प्रसाद (संवेदनशीलता) हे ज्यांचे लक्षण आहे, असा विग्रह आहे. दुसऱ्या पर्यायात (विकल्पात). रूप इत्यादी पाच आलंबनांच्या (विषयांच्या) आघाताला जे योग्य आहे, ते 'रूपादिअभिघातार्ह' होय. महाभूतांचा प्रसाद म्हणजे 'भूतप्रसाद' होय. तो ज्यांचे लक्षण आहे, असा विग्रह आहे. चक्षु (डोळा) हा उवांच्या डोक्याच्या प्रमाणाच्या दृष्टमंडळात (बाहुलीत) राहतो, असा संबंध आहे. 'दृष्टमंडळात' म्हणजे सामान्य लोकांद्वारे नैसर्गिक डोळ्याने पाहिलेल्या प्रसन्न (स्वच्छ) मंडळात. जणू काही तेल कापसाच्या सात थरांना व्यापून राहते, अशी योजना आहे. 'श्रोतबील' (कानाचा मार्ग) म्हणजे श्रोतकूप (कानाचा खड्डा). 'अंगुलिवेठन' म्हणजे बोटाची अंगठी. 'उपचित-तनु-ताम्रलोम' म्हणजे एकत्रित झालेले, विरळ, तांबूस रंगाचे आणि मऊ (सूक्ष्म) केस. 'जिथे एकत्रित झालेले आणि विरळ तांबूस केस आहेत' असा विग्रह आहे. 'अजपदसंस्थान' म्हणजे शेळीच्या पायाच्या पावलाच्या आकारासारखे. 'उत्पलदल' म्हणजे कमळाचे पान. कमळाच्या पानाच्या अग्राच्या (टोकाच्या) आकारासारखे. 'वर्ति' म्हणजे येथे मनुष्यांच्या शरीराच्या आकारासारखी लांबट गोल पिंडी. 'आणि सुकलेली त्वचा वगळून' असा संबंध आहे. ते पाच प्रसाद (इंद्रिये) आहेत. 'समुदीरण' म्हणजे चंचलता. 'यथातम्' म्हणजे ते कशासारखे आहे. हे प्रसाद विचित्र (विविध) आहेत; ते कसे विचित्र आहेत? म्हणून म्हटले आहे: 'एकमेकांपासून भिन्न (असदृश) आहेत.' ते कसे असदृश आहेत? म्हणून 'त्यांच्याद्वारे' इत्यादी म्हटले आहे. โคจรรูเปสุ. ‘‘วณฺณวิเสสํ’’ติ วณฺณวิเสสตฺถํ. วณฺณวิการนฺติ วุตฺตํ โหติ. หทเย คโต ปวตฺโต ภาโว หทยงฺคตภาโว. ‘‘ภาโว’’ติ จ อธิปฺปาโย วุจฺจติ. ตํ ปกาเสติ, มุเข วณฺณวิการํ ทิสฺวา อยํ เม ตุสฺสติ, อยํ เม รุจฺจติ, อยํ เม กุปฺปติ, อยํ โสมนสฺสิโต, อยํ โทมนสฺสิโตติ เอวํ ชานนปจฺจยตฺตา. ‘‘ปกติยา ปี’’ติ วณฺณวิเสสํ อนาปชฺชิตฺวาปีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ยํ กิญฺจิทพฺพํ’’ติ สวิญฺญาณกวตฺถุํ. สมวิสมํ ปุพฺเพ ปกาสิตํ. ตํ ตํ อตฺถํ วา อาจิกฺขติ ตํ สุตฺวา ตสฺส ตสฺส อตฺถสฺส ชานนโต. อตฺตโน วตฺถุํ วา อาจิกฺขติ ตํ สุตฺวา ตสฺส วตฺถุสฺสปิ ชานนโต. ‘‘อตฺตโน วตฺถุํ สูเจตี’’ติ อิธ อิทํ นาม อตฺถีติ ปกาเสติ. ‘‘ผุสียตี’’ติ ผุสิตฺวา วิชานียติ. ‘‘ตํ’’ติ ผุสนํ. ‘‘ตสฺสา’’ติ อาโปธาตุยา. ‘‘ทฺรวตาวา’’ติ อทฺทตินฺตรสตาวา. ผุสิตฺวา คยฺหติ, สา จ อาโปธาตุ สิยาติ โจเทติ. วุจฺจเต ปริหาโร. เอวํ ปน น ลพฺภติ, ตสฺมา สา เตโชเยว. น อาโปติ. เอตฺถ เอวํ อลพฺภมานาปิ สาสีตตา อาโปเยว, น เตโช. กสฺมา, อาปสฺสปิ สีตุณฺหวเสน ทุวิธตา สมฺภวโต[Pg.194]. ตสฺมิญฺหิ โลหรเส อุณฺหตา อุณฺหอาโป, สีตวตฺถูสุ สีตตา สีตอาโปติ เจ. เอวํ ปน สติ เตโช นาม นตฺถีติ อาปชฺชตีติ ปริหาโร. ‘‘สห อปฺปวตฺตนโต’’ติ เอกโต อปฺปวตฺตนโต. ‘‘โอรปารานํ วิยา’’ติ นทิยํ ตีรํ นาม อิทํ โอริมตีรํ, อิทํ ปาริมนฺติ นิยมโต นตฺถิ. ยตฺถ สยํ ติฏฺฐติ, ตํ โอริมนฺติ, อิตรํ ปาริมนฺติ โวหรติ. เอวํ โอรปารานํ อนวฏฺฐานํ โหตีติ. เอตฺถ จ ‘‘สีตุณฺหานํ สห อปฺปวตฺตนโต’’ติ เอเตน ยทิ เต สห ปวตฺเตยฺยุํ. ตตฺถ สีตตา อาโปนาม, อุณฺหตา เตโชนามาติ วตฺตพฺพา สิยุํ. น ปน เต สห ปวตฺตนฺติ, ตสฺมา ตถา น วตฺตพฺพา โหนฺตีติ ทสฺเสติ. น น วตฺตพฺพา. กสฺมา, อุณฺหเตเชน ยุตฺโตหิ อาโป อุณฺหตฺตเมว คจฺฉติ. ยถาตํ อุณฺหเตเชน ยุตฺตา ปถวีปิ วาโยปิ อุณฺหตฺตเมว คจฺฉนฺตีติ. ตสฺมา เต สห น ปวตฺตนฺติ. สห อปฺปวตฺเตสุปิ เตสุ อญฺญตฺถ สีตวตฺถูสุ สีตตา อาโปนามาติ วตฺตพฺพเมว โหตีติ โจทนา. เอวํสนฺเต ตสฺมึ โลหรเส สพฺเพปิ รูปธมฺมา อุณฺหตฺตํ คจฺฉนฺตีติ สพฺเพปิ เตโชภาวํ ปาปุณนฺติ. ‘อุณฺหตฺต ลกฺขโณ เตโช’ติหิ วุตฺตํ. ยทิ จ สีตวตฺถูสุ สีตภาโว นาม สิยา. ตตฺถปิ เตน ยุตฺตา สพฺเพปิ รูปธมฺมา สีตตํ คจฺฉนฺติเยว. ตตฺถปิ ตวมติยา สพฺเพปิ อาโปภาวํ ปาปุณนฺติ. น ปน สกฺกา ตถา ภวิตุํ. น หิ เอวรูปํ ลกฺขณญฺญถตฺตํ นาม เตสํ อตฺถิ. ภาวญฺญถตฺตเมว อตฺถิ. ตตฺถ ‘‘ลกฺขณญฺญถตฺตํ’’ นาม ปถวี อาโปภาวํ คจฺฉติ. อาโป ปถวิภาวํ คจฺฉตีติอาทิ. ‘‘ภาวญฺญถตฺตํ’’ นาม ปถวี กทาจิ กกฺขฬา โหติ. กทาจิ มุทุกา. อาโป กทาจิ อาพนฺธนมตฺโต โหติ. กทาจิ ปคฺฆรณโก. เตโช กทาจิ อุณฺโห, กทาจิ สีโต. วาโย กทาจิ วิตฺถมฺภนมตฺโต, กทาจิ สมุทีรโณติ. เอวํ เอกเมกสฺสา ธาตุยา ติกฺข มนฺท โอมตฺตาธิมตฺตวเสน กฺริยาสงฺกนฺติ นาม อตฺถีติ. ตสฺมา ยํ วุตฺตํ ‘อุณฺหเตเชน ยุตฺโตหิ อาโป อุณฺหตฺตเมว คจฺฉติ, ยถา ตํ อุณฺหเตเชน ยุตฺตา ปถวีปิ วาโยปิ อุณฺหตฺตเมว คจฺฉนฺตี’ติ. ตํ ลกฺขณญฺญถตฺตวจนํ โหติ. น ยุชฺชติ. น หิ อุณฺหเตเชน ยุตฺตา สพฺเพเตธมฺมา [Pg.195] อุณฺหตฺตํ คจฺฉนฺติ. อตฺตโน อตฺตโน สภาวํ น วิชหนฺติ. ตถาหิ ตสฺมึ ปกฺกุถิเต สนฺตตฺเต โลหรเส ภาโว อุณฺหตฺตํ น คจฺฉติ. อาพนฺธน สภาวํ วา ปคฺฆรณ สภาวํ วา น วิชหติ. ยทิ อุณฺหตฺตํ คจฺเฉยฺย, ตํ สภาวํ วิชเหยฺย. เอวํสติ, ตสฺมึ โลหรเส อาพนฺธนากาโร วา ปคฺฆรณากาโร วา น ปญฺญาเยยฺย. สพฺเพรูป ธมฺมา วิกฺกิเรยฺยุํ. วิกฺกิริตฺวา อนฺตรธาเรยฺยุํ. น จ น ปญฺญายติ. นาปิ วิกฺกิรนฺติ. โนจ ตตฺถ อาพนฺธนากาโร อุณฺหตฺตํ คจฺฉติ. อญฺโญหิ อาพนฺธนากาโร, อญฺญํ อุณฺหตฺตํ. อาพนฺธนากาโร อาโป, อุณฺหตฺตํ เตโช. ตตฺถ ปถวิวาเยสุปิ เอเสวนโย. ตสฺมา ยํ วุตฺตํ ‘‘ยทิ เต สห ปวตฺเตยฺยุํ. ตตฺถ สีตตา อาโปนาม, อุณฺหตา เตโช นามาติ วตฺตพฺพา สิยุํ. น ปน เต สห ปวตฺตนฺติ. ตสฺมา ตถา น วตฺตพฺพา โหนฺตีติ ทสฺเสตี’’ติ. ตํ สุวุตฺตเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘เตสํ อนวฏฺฐานโต’’ติ เอเตน สเจ เต สีตุณฺหา อวฏฺฐิตา สิยุํ. อถ สพฺพกาเลปิ สีตตา อาโปนาม, อุณฺหตา เตโชนามาติ วตฺตพฺพา สิยุํ. น ปน เต อวฏฺฐิตา โหนฺติ. อนวฏฺฐิตา เอว โหนฺติ. ตสฺมา ตถา น วตฺตพฺพา โหนฺตีติ ทสฺเสติ. เอตฺถ จ อนวฏฺฐิเตสุ สนฺเตสุ ยทิ สีตตา อาโป นาม, อุณฺหตา เตโชนามาติ วเทยฺยุํ. เอวญฺจสติ, อาปเตชาปิ อนวฏฺฐิตา สิยุํ. โย อิทานิ อาโป, โสเยว ขณนฺตเร เตโช นาม. โย วา อิทานิ เตโช, โสเยว ขณนฺตเร อาโป นามาติ อาปชฺเชยฺยุํ. น จ สกฺกา ตถา ภวิตุํ. ลกฺขณญฺญถตฺเต อสนฺเต โวหารญฺญถตฺตสฺสปิ อสมฺภวโต. เตน วุตฺตํ ‘‘โอรปารานํ วิย เตสํ อนวฏฺฐานโต จ วิญฺญายตี’’ติ. ตตฺถ ‘‘วิญฺญายตี’’ติ สาสีตตา เตโชเยว, น อาโปติ วิญฺญายตีติ. गोचर रूपांमध्ये. 'वर्णविशेष' म्हणजे वर्णविशेषाच्या अर्थाने. वर्णाचा विकार (बदल) असे म्हटले आहे. हृदयात गेलेला, प्रवृत्त झालेला भाव म्हणजे 'हृदयगत भाव' होय. आणि 'भाव' म्हणजे अभिप्राय (आशय) असे म्हटले जाते. तो (भाव) प्रकट करतो, चेहऱ्यावर वर्णाचा विकार पाहून 'हा माझ्यावर प्रसन्न आहे, याला हे आवडते, हा माझ्यावर रागावला आहे, हा सोमनस्ययुक्त (आनंदी) आहे, हा दोमनस्ययुक्त (दुःखी) आहे' अशा प्रकारे जाणण्याचे कारण असल्यामुळे. 'स्वभावाने देखील' म्हणजे वर्णाचा विशेष (बदल) न पावताही, असा अभिप्राय आहे. 'जे काही द्रव्य' म्हणजे सविज्ञाणक वस्तू (सजीव वस्तू). सम-विषम पूर्वीच स्पष्ट केले आहे. तो त्या त्या अर्थाला सांगतो, ते ऐकून त्या त्या अर्थाचे ज्ञान होत असल्यामुळे. किंवा स्वतःच्या वस्तूला सांगतो, ते ऐकून त्या वस्तूचेही ज्ञान होत असल्यामुळे. 'स्वतःच्या वस्तूची सूचना करतो' म्हणजे येथे 'हे अमुक आहे' असे प्रकट करतो. 'स्पर्श केला जातो' म्हणजे स्पर्श करून जाणला जातो. 'ते' म्हणजे स्पर्श करणे. 'तिची' म्हणजे आपोधातूची. 'द्रवता किंवा' म्हणजे ओलेपणा किंवा द्रवत्व. स्पर्श करून ग्रहण केली जाते, आणि ती आपोधातू असावी, अशी शंका उपस्थित केली जाते. त्यावर उत्तर दिले जाते. परंतु असे प्राप्त होत नाही, म्हणून ती तेजोधातूच आहे, आपोधातू नाही. येथे, अशा प्रकारे प्राप्त न होत असली तरी, ती शीतता (थंडपणा) आपोधातूच आहे, तेजोधातू नाही. का? कारण आपोधातूची देखील शीत आणि उष्ण या भेदाने द्विविधता संभवते. कारण त्या वितळलेल्या लोखंडात (लोहरसात) जी उष्णता आहे ती 'उष्ण-आपो' आहे, आणि थंड वस्तूंमध्ये जी शीतता आहे ती 'शीत-आपो' आहे, असे जर म्हटले तर. परंतु असे मानल्यास 'तेजोधातू' नावाचे काही अस्तित्वातच नाही, असा प्रसंग येईल, हे उत्तर आहे. 'एकत्र प्रवृत्त न होण्यामुळे' म्हणजे एकाच वेळी प्रवृत्त न होण्यामुळे. 'अलीकडच्या आणि पलीकडच्या तीराप्रमाणे' म्हणजे नदीमध्ये 'हे अलीकडचे तीर आहे, हे पलीकडचे तीर आहे' असा कोणताही निश्चित नियम नसतो. जिथे माणूस स्वतः उभा असतो, त्याला 'अलीकडचे' आणि दुसऱ्याला 'पलीकडचे' असा व्यवहार करतो. अशा प्रकारे अलीकडच्या आणि पलीकडच्या तीरांचे अनवस्थान (अनिश्चितता) असते. आणि येथे 'शीत आणि उष्ण एकत्र प्रवृत्त न होण्यामुळे' याने जर ते एकत्र प्रवृत्त झाले असते, तर तेथे शीततेला 'आपो' आणि उष्णतेला 'तेजो' म्हटले गेले असते. परंतु ते एकत्र प्रवृत्त होत नाहीत, म्हणून तसे म्हणता येत नाही, हे दर्शविते. असे नाही की म्हणता येत नाही. का? कारण उष्ण तेजोधातूने युक्त असलेली आपोधातू उष्णतेलाच प्राप्त होते. जसे की उष्ण तेजोधातूने युक्त असलेली पठवीधातू आणि वायुधातू देखील उष्णतेलाच प्राप्त होतात. म्हणून ते एकत्र प्रवृत्त होत नाहीत. ते एकत्र प्रवृत्त होत नसले तरी, इतर थंड वस्तूंमध्ये जी शीतता आहे ती 'आपो' आहे, असे म्हणावेच लागेल, अशी शंका आहे. असे असल्यास, त्या लोहरसामध्ये सर्वच रूपधर्म उष्णतेला प्राप्त होतात, म्हणून ते सर्वच तेजोभावाला प्राप्त होतील. कारण 'उष्णता हे तेजोधातूचे लक्षण आहे' असे म्हटले आहे. आणि जर थंड वस्तूंमध्ये शीतभाव असेल, तर तेथेही त्याने युक्त असलेले सर्व रूपधर्म शीततेलाच प्राप्त होतील. तेथेही तुमच्या मतानुसार सर्वच आपोभावाला प्राप्त होतील. परंतु तसे होणे शक्य नाही. कारण त्यांच्यामध्ये अशा प्रकारचे 'लक्षण-अन्यथात्व' (लक्षणाचा बदल) नसते. केवळ 'भाव-अन्यथात्व' (अवस्थेचा बदल) असते. तेथे 'लक्षण-अन्यथात्व' म्हणजे पठवीधातू आपोभावाला प्राप्त होते, आपोधातू पठवीभावाला प्राप्त होते इत्यादी. 'भाव-अन्यथात्व' म्हणजे पठवीधातू कधी कठीण असते, तर कधी मऊ असते. आपोधातू कधी केवळ बंधनकारक असते, तर कधी प्रसरणशील असते. तेजोधातू कधी उष्ण असते, तर कधी शीत असते. वायुधातू कधी केवळ स्तंभन करणारी असते, तर कधी गतिमान करणारी असते. अशा प्रकारे प्रत्येक धातूची तीक्ष्ण, मंद, हीन आणि उत्कृष्ट अशा भेदाने क्रिया-संक्रांती (कार्यातील बदल) असते. म्हणून जे म्हटले आहे की 'उष्ण तेजोधातूने युक्त असलेली आपोधातू उष्णतेलाच प्राप्त होते, जसे की उष्ण तेजोधातूने युक्त असलेली पठवीधातू आणि वायुधातू देखील उष्णतेलाच प्राप्त होतात', ते 'लक्षण-अन्यथात्वाचे' कथन ठरते. ते योग्य नाही. कारण उष्ण तेजोधातूने युक्त असलेले हे सर्व धर्म उष्णतेला प्राप्त होत नाहीत. ते आपापला स्वभाव सोडत नाहीत. तसेच, त्या उकळलेल्या, तापलेल्या लोहरसामध्ये (लोखंडाचा) भाव उष्णतेला प्राप्त होत नाही. तो आपला बंधन-स्वभाव किंवा प्रसरण-स्वभाव सोडत नाही. जर तो उष्णतेला प्राप्त झाला असता, तर त्याने आपला स्वभाव सोडला असता. असे झाले असते तर, त्या लोहरसामध्ये बंधन-आकार किंवा प्रसरण-आकार दिसून आला नसता. सर्व रूपधर्म विखुरले गेले असते. विखुरले जाऊन नाहीसे झाले असते. परंतु तसे दिसून येत नाही असे नाही, आणि ते विखुरतही नाहीत. आणि तेथे बंधन-आकार उष्णतेला प्राप्त होत नाही. कारण बंधन-आकार वेगळा आहे आणि उष्णता वेगळी आहे. बंधन-आकार ही आपोधातू आहे, आणि उष्णता ही तेजोधातू आहे. तेथे पठवीधातू आणि वायुधातूच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. म्हणून जे म्हटले आहे की 'जर ते एकत्र प्रवृत्त झाले असते, तर तेथे शीततेला 'आपो' आणि उष्णतेला 'तेजो' म्हटले गेले असते. परंतु ते एकत्र प्रवृत्त होत नाहीत, म्हणून तसे म्हणता येत नाही, हे दर्शविते', ते सुभाषितच (योग्यच) मानले पाहिजे. 'त्यांच्या अनवस्थामुळे' याने जर ते शीत आणि उष्ण निश्चित (स्थिर) असते, तर सर्व काळातही शीततेला 'आपो' आणि उष्णतेला 'तेजो' म्हटले गेले असते. परंतु ते स्थिर नसतात. ते अस्थिरच असतात. म्हणून तसे म्हणता येत नाही, हे दर्शविते. आणि येथे, ते अस्थिर असताना जर शीततेला 'आपो' आणि उष्णतेला 'तेजो' म्हटले गेले, तर असे झाल्यास, आपोधातू आणि तेजोधातू देखील अस्थिर होतील. जी आता आपोधातू आहे, तीच दुसऱ्या क्षणी तेजोधातू ठरेल. किंवा जी आता तेजोधातू आहे, तीच दुसऱ्या क्षणी आपोधातू ठरेल, असा प्रसंग येईल. परंतु तसे होणे शक्य नाही. कारण लक्षण-अन्यथात्व नसताना व्यवहार-अन्यथात्व देखील असंभव आहे. म्हणून म्हटले आहे की 'अलीकडच्या आणि पलीकडच्या तीराप्रमाणे त्यांच्या अनवस्थामुळे देखील हे जाणले जाते'. तेथे 'जाणले जाते' म्हणजे ती शीतता तेजोधातूच आहे, आपोधातू नाही, असे जाणले जाते। ‘‘อถ ปนา’’ติอาทีสุ. ยํ ปุพฺเพ ปเรน วุตฺตํ ‘นนุ ทฺรวตา วา ผุสิตฺวา คยฺหตี’ติ. ตํ วิจาเรตุํ ‘‘อถ ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘อถ ปนา’’ติ ยทิ ปน คยฺหติ, เอวํสตีติ จ. เอวญฺจสติ อารมฺมณ ภูโต เอว สิยาติ สมฺพนฺโธ. อยํ ปเนตฺถา ธิปฺปาโย. สเจ ทฺรวภาวภูโต อาโป ผุสิตฺวา คยฺเหยฺย. เอวํ สติ[Pg.196], อโยปิณฺฑาทีสุ อาพนฺธนมตฺตภูโต อาโปปิ ผุสิตฺวา คเหตพฺโพ สิยา. กสฺมา, อาปภาเวน เอกตฺตา. เอวญฺจสติ, เตสุ อโยปิณฺฑาทีสุ โส อาโป ตานิ หตฺเถน วา ปาเทน วา ผุสนฺตสฺส ปหรนฺตสฺส วินา อิตร มหาภูเตหิ วิสุํ กายิก สุขทุกฺขานํ อารมฺมณ ปจฺจโย สิยา. ยถาตํ, เตสฺเวว อโยปิณฺฑาทีสุ ปถวิมหาภูตํ วินา อิตรมหาภูเตหิ วิสุํ กายิกสุขทุกฺขานํ อารมฺมณ ปจฺจโย โหติ. เอวํ เตโชวาเยสุปีติ. น ปน โส วิสุํ กายิกสุขทุกฺขานํ อารมฺมณ ปจฺจโย โหติ. ตสฺมา โส โผฏฺฐพฺพ สภาโว น โหติ. ยถา จ โส โผฏฺฐพฺพสภาโว น โหติ. ตถา ปกติ อุทกาทีสุ ทฺรวภาวภูโตปิ อาโป ตานิ ผุสนฺตสฺส ปหรนฺตสฺส กายิกสุขทุกฺขานํ อารมฺมณ ปจฺจโย น โหติ. น จ โผฏฺฐพฺพ สภาโวติ. เอวญฺจสติ, กถํ อโยปิณฺฑาทีสุ อาพนฺธนมตฺตภูโต อาโป กายิกสุขทุกฺขานํ ปจฺจโย น โหติ. กถญฺจ เตสุ อิตรมหาภูตานิ วิสุํ วิสุํ กายิกสุขทุกฺขานํ ปจฺจยา โหนฺตีติ. ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยญฺหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘สณฺหถทฺธตาวเสนวา’’ติ เตสุ ฐิตาย ปถวิธาตุยา สณฺหถทฺธตาวเสน วา. สณฺหปถวีสุขเวทนาย ถทฺธปถวีทุกฺขเวทนาย อารมฺมณ ปจฺจโยติ วุตฺตํ โหติ. เอวํ เสเสสุ. ‘‘อพฺภนฺตรตฺถมฺภนสฺสา’’ติ เตสํ อโยปิณฺฑาทีนํ อพฺภนฺตเร ฐิตสฺส วิตฺถมฺภน สภาวสฺส. ‘‘โน อญฺญถา’’ติ ตานิตีณิ การณานิ ฐเปตฺวา อาพนฺธน กฺริยํ ปฏิจฺจ กายิกสุขทุกฺขุปฺปตฺติ นาม นตฺถีติ อธิปฺปาโย. อิทานิ ปกติ อุทกาทีสุ ทฺรวภาวภูตํ อาโปธาตุมฺปิ ผุสิตฺวา ชานนฺตีติ มหาชนา มญฺญนฺติ. ตพฺพิโสธเนน สห ลทฺธคุณํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตสฺมา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘ปถมํ ทฺรวตา สหิตานิ. ล. ชานนฺตี’’ติ อิทํ ปธาน วจนํ. โลเก หตฺเถน ปรามสิตฺวา วา จกฺขุนา ทิสฺวา วา อิทํ รสฺสํ, อิทํ ทีฆํ, อิทํ วฏฺฏํ, อิทํ มณฺฑลนฺติอาทินา สณฺฐานํ ชานนฺตา หตฺถ ผุสเนน วา จกฺขุ ทสฺสเนน วา สเหว ตํ ชานนฺตีติ มญฺญนฺติ. ตตฺถ ปน ปุริมภาเค กายทฺวารวีถิ จิตฺเตน ปจฺจุปฺปนฺนานิ ตีณิภูตานิ ผุสิตฺวา วา จกฺขุทฺวาร วีถิจิตฺเตน ปจฺจุปฺปนฺนํ [Pg.197] รูปํ ทิสฺวา วา ปจฺฉา วตฺถุคฺคหณวีถิยา อุปฺปนฺนาย เอว สณฺฐานํ ชานนฺติ. เอเสวนโย รตฺติยํ อลาตจกฺกสณฺฐานํ ชานนฺตสฺสปิ. ตตฺถ ปน พหูนิปิ ปุพฺพาปรวีถิจิตฺตสนฺตานานิ อิจฺฉิตพฺพานิ. ตถา โลเก จกฺขุนา ทิสฺวา ทฺวารวาตปานาทีนํ ฉิทฺทวิวรานิ ชานนฺตา จกฺขุนา ทสฺสเนน สเหว ตานิ ชานนฺตีติ มญฺญนฺติ. ตตฺถ ปน ปุริมภาเค จกฺขุทฺวาริกวีถิ จิตฺเตน ปจฺจุปฺปนฺนานิ กวาฏรูปภิตฺติ รูปานิ ปุนปฺปุนํ ทิสฺวา ปจฺฉา อลาตจกฺกสฺส มชฺเฌ วิวรํปิ ชานนฺตา วิย วิสุํ อุปฺปนฺนาย มโนทฺวาริก วิญฺญาณวีถิยา เอว ตํ ฉิทฺทวิวรภูตํ อากาสํ ชานนฺติ. ตถา หตฺเถน อุทกํ ผุสนฺตสฺส ปถมํ ทฺรวสหิตานิ วิลีนานิ มุทูนิ ตีณิโผฏฺฐพฺพ มหาภูตานิ วิสุํ วิสุํ กายทฺวาริก วีถิ จิตฺเตหิ ผุสนกิจฺเจน อารมฺมณํ กริตฺวา ปจฺฉา วิสุํ สุทฺธาย มโนทฺวาริก วีถิยา เอว ทฺรวภาวสงฺขาตํ ปคฺฆรณก อาโปธาตุํ ชานนฺติ. เอวํ สนฺเตปิ ตํ ทฺรวภาวํปิ หตฺเถน ผุสเนน สเหว ชานนฺตีติ มญฺญนฺตีติ อธิปฺปาโย. "अथ पना" (परंतु जर) इत्यादींमध्ये. जे पूर्वी दुसऱ्याने म्हटले होते की, 'द्रवता स्पर्श करून ग्रहण केली जात नाही काय?' त्याचा विचार करण्यासाठी "अथ पना" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "अथ पना" म्हणजे जर ग्रहण केले जाते, तर असे असताना. आणि असे असताना ते आलंबन रूपच व्हावे, असा संबंध आहे. येथे हा अभिप्राय आहे. जर द्रवभावरूप असलेला आपो स्पर्श करून ग्रहण केला जात असता, तर असे असताना, लोखंडाच्या गोळ्या इत्यादींमध्ये केवळ बंधन रूप असलेला आपो देखील स्पर्श करून ग्रहण केला गेला असता. कारण काय? आपोभावाच्या एकत्वामुळे. आणि असे असताना, त्या लोखंडाच्या गोळ्या इत्यादींमध्ये तो आपो, त्यांना हाताने किंवा पायाने स्पर्श करणाऱ्या किंवा प्रहार करणाऱ्या व्यक्तीला, इतर महाभूतांशिवाय स्वतंत्रपणे कायिक सुख-दुःखाच्या आलंबनाचा प्रत्यय (कारण) झाला असता. जसे की, त्याच लोखंडाच्या गोळ्या इत्यादींमध्ये पृथ्वीमहाभूत हे इतर महाभूतांशिवाय स्वतंत्रपणे कायिक सुख-दुःखाच्या आलंबनाचा प्रत्यय होते. याचप्रमाणे तेजो आणि वायू महाभूतांच्या बाबतीतही होते. परंतु तो (आपो) स्वतंत्रपणे कायिक सुख-दुःखाच्या आलंबनाचा प्रत्यय होत नाही. म्हणून तो स्प्रष्टव्य स्वभाव (स्पर्शविषय) नाही. आणि ज्याप्रमाणे तो स्प्रष्टव्य स्वभाव नाही, त्याचप्रमाणे नैसर्गिक पाण्यामध्ये द्रवभावरूप असलेला आपो देखील त्याला स्पर्श करणाऱ्या किंवा प्रहार करणाऱ्याच्या कायिक सुख-दुःखाच्या आलंबनाचा प्रत्यय होत नाही आणि तो स्प्रष्टव्य स्वभावही नाही. असे असताना, लोखंडाच्या गोळ्या इत्यादींमध्ये केवळ बंधन रूप असलेला आपो कायिक सुख-दुःखाचा प्रत्यय कसा होत नाही? आणि त्यांच्यामध्ये इतर महाभूते स्वतंत्रपणे कायिक सुख-दुःखाचे प्रत्यय कशी होतात? हे दर्शवण्यासाठी "यञ्हि" (कारण जे) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "सण्हथद्धता वसेन वा" म्हणजे त्यांच्यामध्ये असलेल्या पृथ्वीधातूच्या मऊपणा किंवा कठीणपणाच्या प्रभावाने. मऊ पृथ्वी ही सुखवेदनेचे आणि कठीण पृथ्वी ही दुःखवेदनेचे आलंबन प्रत्यय होते, असे म्हटले आहे. उर्वरित महाभूतांच्या बाबतीतही असेच समजावे. "अब्भन्तरत्थम्भनस्स" म्हणजे त्या लोखंडाच्या गोळ्या इत्यादींच्या आत असलेल्या विष्टंभन (दृढता) स्वभावाच्या. "नो अञ्ञथा" म्हणजे ती तीन कारणे सोडून बंधन क्रियेवर अवलंबून कायिक सुख-दुःखाची उत्पत्ती होत नाही, असा अभिप्राय आहे. आता, सामान्य लोक असे मानतात की नैसर्गिक पाण्यामध्ये द्रवभावरूप असलेल्या आपोधातूचा देखील स्पर्श करून ते जाणतात. त्याचे निराकरण करून प्राप्त गुणाला दर्शवण्यासाठी "तस्मा" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "पठमं द्रवता सहितानि... पे... जानन्ति" हे मुख्य वाक्य आहे. लोक व्यवहारात हाताने स्पर्श करून किंवा डोळ्यांनी पाहून 'हे आखूड आहे, हे लांब आहे, हे गोल आहे, हे वर्तुळाकार आहे' इत्यादी प्रकारे आकाराला जाणताना, हाताच्या स्पर्शाने किंवा डोळ्यांच्या दर्शनानेच ते एकदम जाणतात असे मानतात. परंतु तेथे पूर्वभागात कायद्वारवीथी चित्ताने वर्तमानकालीन तीन महाभूतांना स्पर्श करून किंवा चक्षुद्वारवीथी चित्ताने वर्तमानकालीन रूपाला पाहून, नंतर वस्तू ग्रहण करणाऱ्या वीथीच्या उत्पत्तीनेच आकाराला जाणतात. हाच नियम रात्रीच्या वेळी फिरणाऱ्या मशालीच्या चक्राचा (अलातचक्र) आकार जाणणाऱ्याच्या बाबतीतही लागू होतो. तेथे अनेक पूर्व आणि उत्तर चित्तवीथींचे प्रवाह अपेक्षित असतात. त्याचप्रमाणे लोक व्यवहारात डोळ्यांनी पाहून दारे, खिडक्या इत्यादींची छिद्रे किंवा फटी जाणताना, डोळ्यांच्या दर्शनानेच ते एकदम जाणतात असे मानतात. परंतु तेथे पूर्वभागात चक्षुद्वारवीथी चित्ताने दाराचे रूप आणि भिंतीचे रूप पुन्हा पुन्हा पाहून, नंतर अलातचक्राच्या मधील छिद्र जाणण्याप्रमाणेच, स्वतंत्रपणे उत्पन्न झालेल्या मनोद्वारिक विज्ञानवीथीनेच त्या छिद्ररूप आकाशाला जाणतात. त्याचप्रमाणे हाताने पाण्याला स्पर्श करणाऱ्या व्यक्तीला सुरुवातीला द्रवतेने युक्त, विरघळलेले आणि मऊ अशा तीन स्प्रष्टव्य महाभूतांना वेगवेगळ्या कायद्वारवीथी चित्तांद्वारे स्पर्शाच्या क्रियेने आलंबन करून, नंतर स्वतंत्रपणे शुद्ध मनोद्वारवीथीनेच द्रवभावात्मक अशा वाहणाऱ्या आपोधातूला जाणतात. असे असूनही, ते त्या द्रवभावाला देखील हाताच्या स्पर्शानेच एकदम जाणतात असे मानतात, असा अभिप्राय आहे. คาโว จรนฺติ เอตฺถาติ อาห ‘‘คุนฺนํ จรณฏฺฐานํ’’ติ. อกฺขร วิทู ปน โคสทฺทํ อินฺทฺริยตฺเถปิ อิจฺฉนฺตีติ อาห ‘‘โคติ วา’’ติอาทึ. ตานิ จกฺขาทีนิ เอเตสุ รูปาทีสุ จรนฺติ, เอตานิ วา รูปาทีนิ เตสุ จกฺขาทีสุ จรนฺติ. ตตฺถ ปุริเมน คาโว อินฺทฺริยานิ จรนฺติ เอเตสูติ โคจรานีติ ทสฺเสติ. ปจฺฉิเมน โคสุอินฺทฺริเยสุ จรนฺตีติ โคจรานีติ. อิมานิ ปน ปญฺจ รูปาทีนิ. "येथे गायी चरतात (किंवा फिरतात)" म्हणून "गायींचे फिरण्याचे ठिकाण" असे म्हटले आहे. परंतु व्याकरणकार (अक्षरविद्) 'गो' शब्दाचा अर्थ 'इंद्रिय' असाही मानतात, म्हणून "गो किंवा" इत्यादी म्हटले आहे. ती चक्षु इत्यादी इंद्रिये या रूप इत्यादी विषयांमध्ये प्रवृत्त होतात, किंवा हे रूप इत्यादी विषय त्या चक्षु इत्यादी इंद्रियांमध्ये प्रवृत्त होतात. तेथे पहिल्या अर्थानुसार, 'गायी' म्हणजे इंद्रिये ज्यांच्यामध्ये प्रवृत्त होतात, म्हणून ते 'गोचर' (इंद्रियांचे विषय) आहेत, असे दर्शवले आहे. दुसऱ्या अर्थानुसार, जे 'गो' म्हणजे इंद्रियांमध्ये प्रवृत्त होतात, म्हणून ते 'गोचर' आहेत. हे पाच रूप इत्यादी विषय आहेत. ภาวทฺวเย. อิจฺฉนฏฺเฐน ฐานฏฺเฐน ฐปนฏฺเฐน จ อิตฺถี. สาหิกามรติ อตฺถาย สยํปิ อญฺญํกามิกํ อิจฺฉติ. สยญฺจ กามิเกน อิจฺฉียติ. อญฺโญ จ กามิโก ฆราวาส สุขตฺถาย ตตฺถ ฐานํ อุเปติ, ปติฏฺฐาติ. อายติญฺจ กุลวํสปฺปติฏฺฐานตฺถาย ตตฺถ กุลวํส พีชํ ฐเปตีติ. ปูรณฏฺเฐน อิจฺฉนฏฺเฐน จ ปุริโส. โสหิ อตฺตหิตญฺจ ปูเรติ, ปรหิตญฺจ อิจฺฉติ. อิธโลกหิตญฺจ ปูเรติ, ปรโลกหิตญฺจ อิจฺฉติ. อุภยโลกหิตญฺจ ปูเรติ, โลกุตฺตรหิตญฺจ อิจฺฉติ, เอสติ, คเวสตีติ. ปุมสฺสสกํ ปุํสกํ. ปุริสลิงฺคาทิ. นตฺถิ ปุํสกํ เอตสฺสาติ นปุํสกํ. ‘‘ยสฺส ปน ธมฺมสฺสา’’ติ ภาวรูปธมฺมสฺส. ‘‘ตํ’’ติ ขนฺธปญฺจกํ. มหาสณฺฐานํ [Pg.198] สตฺตานํ ชาติเภทํ ลิงฺเคติ ญาเปตีติ ลิงฺคํ. ลกฺขณปาฐกา นิมินนฺติ สญฺชานนฺติ กลฺยาณ ปาปกํ กมฺมวิปากํ เอเตนาติ นิมิตฺตํ. กิริยา กุตฺตํ. อายุกนฺตํ กปฺปียติ สงฺขรียตีติ อากปฺโป. สพฺเพเปเตลิงฺคาทโย. โสจ อวิสทาทิภาโว. ‘‘วจเนสุจา’’ติ อิตฺถิสทฺทปุริสสทฺทาทีสุ จ. ‘‘วจนตฺเถสุ จา’’ติ อิตฺถิ สณฺฐาน ปุริสสณฺฐานาทิ อตฺเถสุ จ. ‘‘นิมิตฺตสทฺโท วิยา’’ติ นิมิตฺต สทฺโท องฺคชาเต ปากโฏ วิยาติ. น ปากโฏ ทิฏฺโฐ. อปากโฏ ปน กตฺถจิ ทิฏฺโฐติ อธิปฺปาโย. ‘‘ภวนฺติ สทฺทพุทฺธิโย’’ติ สทฺทสตฺถนโย. ‘‘ภวนฺติ ลิงฺคาทีนี’’ติ อฏฺฐกถานโย. ตตฺถ หิ อิตฺถิลิงฺคาทีนํ เหตุภาว ลกฺขณนฺติ วุตฺตํ. ‘‘เอตสฺมึ สตี’’ติ จ ชาติยา สติ, ชรามรณํ โหติ. อสติ น โหตีติ เอตฺถวิย เหตุ ผลภาวปากฏตฺถํ วุตฺตํ. दोन भावांमध्ये (स्त्रीभाव आणि पुरुषभाव). इच्छिण्याच्या अर्थाने, राहण्याच्या अर्थाने आणि स्थापित करण्याच्या अर्थाने 'इत्थी' (स्त्री) म्हटली जाते. ती स्वतः कामरतीच्या (कामसुखाच्या) प्राप्तीसाठी दुसऱ्या कामुक पुरुषाची इच्छा करते. आणि स्वतःही कामुक पुरुषाद्वारे इच्छिली जाते. आणि दुसरा कामुक पुरुष गृहस्थाश्रमाच्या सुखासाठी तिच्यामध्ये स्थान मिळवतो, प्रतिष्ठित होतो. आणि भविष्यात कुलवंशाच्या प्रतिष्ठेसाठी तिच्यामध्ये कुलवंशाचे बीज स्थापित करतो. पूर्ण करण्याच्या अर्थाने आणि इच्छिण्याच्या अर्थाने 'पुरिसो' (पुरुष) म्हटला जातो. कारण तो स्वतःचे हित पूर्ण करतो आणि परहिताची इच्छा करतो. तो इहलोकाचे हित पूर्ण करतो आणि परलोकाच्या हिताची इच्छा करतो. तो दोन्ही लोकांचे हित पूर्ण करतो आणि लोकोत्तर हिताची इच्छा करतो, शोध घेतो, गवेषणा करतो. पुरुषाचे जे स्वतःचे आहे ते 'पुंसक' (पुंलिंगी), जसे की पुरुषलिंग इत्यादी. ज्याला हे पुंसक (पुरुषत्व) नाही, तो 'नपुंसक'. 'पण ज्या धर्माचा' म्हणजे भाव-रूप धर्माचा. 'ते' म्हणजे पंचस्कंध. प्राण्यांच्या जातीचा भेद दर्शवणारे मोठे संस्थान (आकार) जे सूचित करते किंवा जाणवून देते, ते 'लिंग' होय. लक्षण वाचक (सामुद्रिक शास्त्रज्ञ) ज्याच्याद्वारे कल्याणकारी आणि पापी कर्मविपाकाला ओळखतात, जाणतात, ते 'निमित्त' होय. क्रिया म्हणजे 'कुत्त' (वर्तन). आयुष्य असेपर्यंत जे कल्पिले जाते, संस्कारित केले जाते, तो 'आकल्प' (वेषभूषा) होय. हे सर्व लिंग इत्यादी आहेत. आणि तो अस्पष्टता इत्यादी भाव आहे. 'वचनांमध्ये आणि' म्हणजे स्त्री-शब्द, पुरुष-शब्द इत्यादींमध्ये. 'वचनांच्या अर्थांमध्ये आणि' म्हणजे स्त्री-संस्थान, पुरुष-संस्थान इत्यादी अर्थांमध्ये. 'निमित्त शब्दाप्रमाणे' म्हणजे निमित्त शब्द जसा जननेंद्रियाच्या बाबतीत प्रकट आहे, त्याप्रमाणे. प्रकटपणे पाहिलेला नाही, परंतु अप्रकटपणे कुठे पाहिलेला आहे, असा अभिप्राय आहे. 'शब्द आणि बुद्धी होतात' हा व्याकरणशास्त्राचा नियम आहे. 'लिंग इत्यादी होतात' हा अट्ठकथांचा नियम आहे. कारण तिथे स्त्री-लिंग इत्यादींचे कारणत्व हे लक्षण सांगितले आहे. 'हे असताना' म्हणजे जसे 'जाती' (जन्म) असताना 'जरामरण' होते, नसताना होत नाही, याप्रमाणे इथे कार्य-कारण भाव स्पष्ट करण्यासाठी सांगितले आहे। วตฺถุรูเป. นิรุตฺตินเยน วจนตฺถา ภวนฺติ. ธาตุ ทฺวยํ นาม มโนธาตุ มโนวิญฺญาณธาตุ ทฺวยํ. ‘‘อวตฺวา’’ติ หทย วตฺถุํ อวตฺวา. ‘‘ตํ’’ติ หทย วตฺถุ รูปํ. ‘‘ปญฺจา’’ติ ปญฺจวตฺถูนิ. ‘‘เตสํ’’ติ เตสํ กุสลาทีนํ. ‘‘ตตฺถ วุตฺตํ’’ติ ปฏฺฐาเน วุตฺตํ. ‘‘ยํ รูปํ นิสฺสายา’’ติ ยํ รูปํ นิสฺสาย มโนธาตุ จ มโนวิญฺญาณธาตุ จ วตฺตนฺตีติ อิมํ ปาฐํ นิทฺทิสติ. ‘‘อนญฺญ สาธารเณสุ ฐาเนสู’’ติ จกฺขุ วตฺถาทีหิ อญฺญวตฺถูหิ อสาธารเณสุ กุสลากุสลฏฺฐาเนสุ. वस्तुरूपाच्या बाबतीत. निरुक्ति-पद्धतीने शब्दांचे अर्थ होतात. 'धातू द्वय' म्हणजे मनोधातू आणि मनोविज्ञाणधातू हे दोन्ही. 'न सांगता' म्हणजे हृदयवस्तूला न सांगता. 'ते' म्हणजे हृदयवस्तू रूप. 'पाच' म्हणजे पाच वस्तू. 'त्यांचे' म्हणजे त्या कुशल इत्यादींचे. 'तिथे सांगितले आहे' म्हणजे पट्ठान ग्रंथात सांगितले आहे. 'ज्या रूपाचा आश्रय घेऊन' म्हणजे ज्या रूपाचा आश्रय घेऊन मनोधातू आणि मनोविज्ञाणधातू प्रवृत्त होतात, या पाठाचा निर्देश करते. 'इतरांशी असाधारण असलेल्या स्थानांमध्ये' म्हणजे चक्षुवस्तू इत्यादी इतर वस्तूंशी असाधारण असलेल्या कुशल-अकुशल स्थानांमध्ये। ชีวิตรูเป. ‘‘อาธิปฺปจฺจโยเคนา’’ติ อธิปติภาวโยเคน. ‘‘อธิปติภาโว’’ติ จ อินฺทฺริยปจฺจย กิจฺจํ วุจฺจติ. น อธิปติ ปจฺจยกิจฺจํ. ‘‘ชีวนฺตี’’ติ หริตภาวํ น วิชหนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. น หิ ตานิ เอกนฺเตน ชีวนฺตานิ นาม โหนฺติ. ชีวิต รูปสฺส เอกนฺต กมฺมชสฺส พหิทฺธา อนุปลทฺธตฺตา. กมฺมชรูปานิ ชีวนฺติ เยวาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กมฺเม อสนฺเตปี’’ติ กมฺมเจตนาย ปุพฺเพ นิรุทฺธตฺตา วุตฺตํ. ตทตฺถํ พฺยติเรกโต ปากฏํ กโรนฺโต ‘‘ตถาหี’’ติอาทิมาห. ‘‘อิตร รูปานี’’ติ จิตฺตชรูปาทีนิ. เอกวีถิวาโร นาม ปญฺจทฺวารวีถิวาโร. มโนทฺวารวีถิวาโร เอกชวน วาโรติ [Pg.199] วุตฺโต. ปริจฺฉินฺนํ โหติ. กสฺมา, เอเกกสฺมึ วีถิวาเร นิรุทฺเธ ภวงฺค สมเย อสทิสสฺส รูปสนฺตานสฺส ปาตุพฺภาวโตติ อธิปฺปาโย. ตญฺจ โข รูปวิเสสํ ชานนฺตสฺเสว ปากฏํ โหติ. อชานนฺตสฺส ปน ตงฺขณมตฺเต อปากฏํ. กสฺมา, ตาทิสสฺสปิ อุตุชรูปสนฺตานสฺส โถกํ ปวตฺตนโต. ยสฺสหิ โทส สมุฏฺฐิเตน รูปสนฺตาเนน มุขรูปํ ทุพฺพณฺณํ โหติ. ตสฺส โทเส นิรุทฺเธปิ ตํ รูปํ โถกํ ทุพฺพณฺณเมว ขายตีติ. ‘‘อุตุชาหารชานญฺจ สนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺนํ’’ติ อธิกาโร. เอกํ อทฺธาปจฺจุปฺปนฺนเมว โหตีติ วุตฺตํ. น นุ จกฺขุโสตาทีนิ กมฺมชรูปสนฺตานานิปิ ปวตฺติกาเล กทาจิ สุปฺปสนฺนานิ, กทาจิ ปสนฺนานิ, กทาจิ อปฺปสนฺนานิ ทิสฺสนฺตีติ. สจฺจํ, ตถา ปวตฺติ ปน สนฺตาน วิจฺเฉเทน น โหติ, นานาวิจฺฉินฺเน จ เอเกกสฺมึ สนฺตาเน เตสํ ปุนฆฏนํ นาม นตฺถิ. สกึ อนฺโธ อนฺโธเยว โหติ. พธิโรจ พธิโรเยวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ยทิ เอวํ’’ติ เอวํ ยทิ สิยาติ อตฺโถ. ‘‘อรูป ธมฺมานํ สนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺนํ’’ติ อธิกาโร. ‘‘วิปากานี’’ติ ภวงฺคภูตานิ วิปากานิ. เอกสนฺตติวเสน ปวตฺติสฺสนฺติเยว, ตสฺมา เตสํ นานาสนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺนํ นาม น วตฺตพฺพํ. กสฺมา, ยาวชีวมฺปิ เอก กมฺมนิพฺพตฺตตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อิตรานิ ปนา’’ติ กุสลา กุสล กฺริยจิตฺตานิ ปน. ‘‘ตทารมฺมณา’’ติ นิรุทฺธารมฺมณา. อทฺธานปฺผรณานุภาเวน ปวตฺตนฺติเยว. น ปน จิตฺตชรูปาทีนิ วิย อตฺตโน ชนกปจฺจเย นิรุทฺเธ นิรุชฺฌนฺติ. อยํ อรูปธมฺมานํ ชีวนฺตตฺเต วิเสโสติ อธิปฺปาโย. ‘‘อยมตฺโถ วตฺตพฺโพ’’ติ อรูป ธมฺมานํ ชีวนฺตตาวิเสโส วตฺตพฺโพ. ยถา รูปสนฺตติยํ อนนฺตร ปจฺจโย นาม นตฺถิ. จุติกาเล ภวนฺตรรูปสนฺตานสฺส กิญฺจิ ปจฺจยตฺตํ อนุปคนฺตฺวา นิรุชฺฌติ. เตน ภวนฺตร ปาตุพฺภาโว นาม เตสํ นตฺถิ. น ตถา อรูปสนฺตติยํ. ตตฺถ ปน จุติจิตฺตมฺปิ ปฏิสนฺธิยา อนนฺตร ปจฺจโย หุตฺวา นิรุชฺฌติ. เตน ภวนฺตรปาตุพฺภาโว นาม เตสํ อตฺถิ. อยมฺปิ อรูปธมฺมานํ ชีวนฺตตฺเต วิเสโส. ตสฺมา อรูปธมฺมานํปิ กมฺมชรูปานํ วิย นิจฺจํ ชีวิตโยเคน ชีวนฺตตฺตา สนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺนํ นาม น ภเวยฺยาติ น โจเทตพฺพนฺติ. กุสลา กุสล กฺริยจิตฺตานิ นาม [Pg.200] อกมฺมชานิ โหนฺติ. จิตฺตชรูปาทีนิ วิย อตีตํ กมฺมํ อนเปกฺขิตฺวา ตงฺขณิเกหิ นานาปจฺจเยหิ อุปฺปชฺชนฺติ. ตสฺมา เตสํ ชีวนฺตานํปิ สตํ อชีวนฺตานํ จิตฺตชรูปาทีนํ วิย นานาสนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺนํ นาม อตฺถิ. ชีวนฺตตา วิเสโสปิ อตฺถีติ อธิปฺปาโย. เอตฺถ เกจิ วทนฺติ. รุกฺขาทีสุปิ ชีวิตํ นาม อตฺถิ. ยโต เตสํ หริตตา จ อหริตตา จ รูหนญฺจ-อรูหนญฺจ ทิสฺสตีติ. วุจฺจเต, ยทิ เตสํ ชีวิตํ นาม อตฺถิ, อรูปชีวิตํ วา สิยา, รูปชีวิตํ วา. ตตฺถ สเจ อรูปชีวิตํ โหติ. ยถา เตน สมนฺนาคโต สตฺโต ปุนปฺปุนํ มริตฺวา ปุนปฺปุนํ ภวนฺตเร ปาตุพฺภวนฺติ. ตถา รุกฺขาปิ มริตฺวา ภวนฺตเร ปาตุพฺภเวยฺยุํ. อถ รูปชีวิตํ สิยา. ยถา สตฺตานํ จกฺขาทิ องฺเคสุ ชีวิต สนฺตาเน ภินฺเน ตานิ องฺคานิ ปุน ชีวนฺตานิ กาตุํ น สกฺโกนฺติ. ตถา รุกฺขาปิ ขนฺเธสุ วา สาขาสุวา ฉินฺเนสุ ชีวิตสนฺตาเน ภินฺเน เตขนฺธาวา สาขาโย วา ปุน อญฺญตฺถ โรเปตุํ น สกฺกา ภเวยฺยุํ. สกฺกา เอว ภวนฺติ. ตสฺมา ตทุภยํปิ ชีวิตํ นาม เตสํ นตฺถีติ ทฏฺฐพฺพํ. วิภาวนิปาเฐ. น หิ เตสํ กมฺมํเยว ฐิติการณํ โหตีติ เอตฺถ กมฺมํ ฐิติการณํ เอว น โหตีติ โยเชตพฺพํ. เตนาห ‘‘อาหารชาทีนํ’’ติอาทึ. เอกกลาเป คตา ปวตฺตา สหชาต ปจฺจยา, เตหิ อายตฺตา ปฏิพทฺธาติ วิคฺคโห. กมฺมาทีนํ รูปชนกปจฺจยานํ ชนกานุภาโว นาม รูปกลาปานํ อุปฺปาทกฺขเณ เอว ผรติ, น ฐิติกฺขเณ. อุปจยสนฺตติโย จ อุปฺปาทกฺขเณ ลพฺภนฺติ, น ฐิติกฺขเณ. ตสฺมา ตา ชนกปจฺจยานุภาวกฺขเณ ลทฺธตฺตา กุโตจิชาตนามํ ลภนฺติ. ชรตาปน ฐิติกฺขเณ เอว ลพฺภติ, น อุปฺปาทกฺขเณ. ตสฺมา สา กุโตจิชาต นามํ น ลภติ. ยทิ ปน อาหารชาทีนํ รูปธมฺมานํ ฐิติ นาม อาหาราทิ ชนกปจฺจยายตฺตา ภเวยฺย. ชรตาปิ ชนกปจฺจยานุภาวกฺขเณว ลพฺภมานา สิยา. เอวญฺจสติ, สาปิ กุโตจิชาต นามํ ลเภยฺย. น ปน ลภติ. ตสฺมา เตสํ ฐิติ นาม ชนกปจฺจยายตฺตา น โหตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิตรถา’’ติอาทิมาห. ‘‘อุปตฺถมฺภมานา’’ติ กลาปนฺตเร ฐตฺวา อุปตฺถมฺภมานา. ‘‘น ขณฐิติปฺปวตฺติยา’’ติ ขณฐิ ติภาเวน [Pg.201] ปวตฺติอตฺถาย อุปตฺถมฺภนฺติ, อนุปาเลตีติ โยชนา. สพฺเพสํปิ รูปารูปธมฺมานํ. ‘‘ตํ’’ติ วิภาวนิวจนํ. ‘‘อิทํ ปนา’’ติ ชีวิตรูปํ ปน. जीवितरूपाच्या बाबतीत. "आधिपच्चयोगेन" (अधिपतीच्या प्रत्ययाने) म्हणजे अधिपतीभावाच्या योगाने. आणि "अधिपतीभाव" म्हणजे इंद्रिय-प्रत्यय कार्य (इंद्रियांचे प्रत्ययकृत्य) म्हटले जाते. अधिपती प्रत्ययकृत्य नव्हे. "जिवंत राहतात" (जीवन्ति) म्हणजे हिरवेपणा (हरितभाव) सोडत नाहीत, असे म्हटले आहे. कारण ते (झाडे इत्यादी) एकांताने (खरोखर) जिवंत नसतात. कारण केवळ कर्मज असलेल्या जीवितरूपाची बाह्य जगात (झाडांमध्ये) अनुपलब्धता असते. "कर्मज रूपे जिवंतच राहतात" असा संबंध आहे. "कर्म नसतानाही" (कम्मे असन्तेपि) असे म्हटले आहे कारण कर्म-चेतना पूर्वीच निरुद्ध झालेली असते. तो अर्थ व्यतिरेक रूपाने स्पष्ट करताना "तथाहि" (तसेच) इत्यादी म्हटले आहे. "इतर रूपे" म्हणजे चित्तज रूप इत्यादी. "एकवीथीवार" म्हणजे पंचद्वारवीथीवार. मनोद्वारवीथीवार हा "एकजवनवार" म्हटला गेला आहे. तो परिच्छिन्न (मर्यादित) असतो. कारण, एकेका वीथीवाराचा निरोध झाल्यावर भवांग समयात विजातीय (असदृश) रूपसंतानाचा प्रादुर्भाव होतो, असा अभिप्राय आहे. आणि तो रूपविशेष जाणणाऱ्यालाच स्पष्ट होतो. न जाणणाऱ्याला मात्र त्या क्षणी तो अस्पष्ट असतो. कारण, तशा प्रकारच्या ऋतुज रूपसंतानाची देखील थोडी प्रवृत्ती (अस्तित्व) चालू राहते. कारण ज्याचे मुखरूप द्वेषाने (दोषाने) समुत्थित झालेल्या रूपसंतानामुळे विवर्ण (कुरूप) होते, त्याचा द्वेष निरुद्ध झाल्यावरही ते रूप काही काळ विवर्णच दिसते. "ऋतुज आणि आहारज रूपांचे संतान वर्तमानकाळात असते" हा अधिकार (विषय) आहे. ते केवळ एक 'अद्धा-प्रत्युत्पन्न' (दीर्घकालीन वर्तमान) असते, असे म्हटले आहे. चक्षु, श्रोत्र इत्यादी कर्मज रूपसंतान देखील प्रवृत्तीच्या काळात कधी अत्यंत प्रसन्न, कधी प्रसन्न, तर कधी अप्रसन्न दिसतात की नाही? सत्य आहे, परंतु तशी प्रवृत्ती संतान-विच्छेदाने (प्रवाहाच्या तुटण्याने) होत नाही; आणि वेगवेगळ्या विच्छिन्न झालेल्या एकेका संतानामध्ये त्यांचे पुन्हा जोडले जाणे (पुनर्घटन) होत नाही. एकदा आंधळा झालेला आंधळाच राहतो आणि बहिरा झालेला बहिराच राहतो, असा अभिप्राय आहे. "जर असे असेल" (यदि एवं) म्हणजे जर असे झाले तर, असा अर्थ आहे. "अरूप धर्मांचे संतान वर्तमानकाळात असते" हा अधिकार आहे. "विपाक" म्हणजे भवांगभूत विपाक. ते एकाच संतानाच्या रूपाने प्रवृत्त होतात, म्हणून त्यांच्या बाबतीत "नानासंतान प्रत्युत्पन्न" (विविध संतान वर्तमान) असे म्हणता येत नाही. कारण, आयुष्यभर ते एकाच कर्माने उत्पन्न झालेले असतात, असा अभिप्राय आहे. "इतर मात्र" (इतराणि पन) म्हणजे कुशल, अकुशल आणि क्रिया चित्त. "तदारम्मण" म्हणजे निरुद्ध झालेले आलंबन असणारे. ते अद्धा-स्फुरण (काळाच्या विस्ताराच्या) प्रभावाने प्रवृत्त होतातच. परंतु चित्तज रूप इत्यादींप्रमाणे स्वतःचे जनक प्रत्यय निरुद्ध झाल्यावर ते निरुद्ध होत नाहीत. हा अरूप धर्मांच्या जिवंतपणामधील विशेष (फरक) आहे, असा अभिप्राय आहे. "हा अर्थ सांगावा" म्हणजे अरूप धर्मांचा जिवंतपणाचा विशेष सांगावा. ज्याप्रमाणे रूपसंतानामध्ये "अनन्तर प्रत्यय" नसतो. च्युती (मृत्यू) च्या वेळी ते दुसऱ्या जन्मातील रूपसंतानासाठी कोणताही प्रत्यय न बनता निरुद्ध होते. त्यामुळे त्यांच्यासाठी दुसऱ्या जन्मात प्रादुर्भाव (पुनर्जन्म) नसतो. अरूपसंतानाच्या बाबतीत तसे नाही. तेथे च्युतीचित्त देखील प्रतिसंधीसाठी "अनन्तर प्रत्यय" बनून निरुद्ध होते. त्यामुळे त्यांच्यासाठी दुसऱ्या जन्मात प्रादुर्भाव असतो. हा देखील अरूप धर्मांच्या जिवंतपणातील विशेष आहे. म्हणून, अरूप धर्मांचे देखील कर्मज रूपांप्रमाणे नेहमी जीवितयोगाने जिवंत राहण्यामुळे "संतान प्रत्युत्पन्न" असू नये, अशी शंका (चोदना) घेऊ नये. कुशल, अकुशल आणि क्रिया चित्त हे अकर्मज (कर्मापासून उत्पन्न न झालेले) असतात. चित्तज रूप इत्यादींप्रमाणे भूतकाळातील कर्माची अपेक्षा न ठेवता ते तात्कालिक विविध प्रत्ययांनी उत्पन्न होतात. म्हणून, ते जिवंत असतानाही, जिवंत नसलेल्या चित्तज रूपांप्रमाणे त्यांचे "नानासंतान प्रत्युत्पन्न" असतेच. त्यांच्यात जिवंतपणाचा विशेष देखील असतो, असा अभिप्राय आहे. येथे काही जण म्हणतात— वृक्षांमध्ये देखील "जीवित" (जीवन) असते, कारण त्यांचा हिरवेपणा आणि अ-हिरवेपणा, तसेच वाढणे (रुहण) आणि न वाढणे (अ-रुहण) दिसून येते. यावर म्हटले जाते— जर त्यांच्यात जीवित असेल, तर ते एकतर अरूप-जीवित असेल किंवा रूप-जीवित असेल. त्यापैकी जर अरूप-जीवित असेल, तर ज्याप्रमाणे त्याने युक्त असलेला प्राणी वारंवार मरून वारंवार दुसऱ्या जन्मात प्रादुर्भूत होतो, त्याचप्रमाणे वृक्ष देखील मरून दुसऱ्या जन्मात प्रादुर्भूत झाले पाहिजेत. आणि जर रूप-जीवित असेल, तर ज्याप्रमाणे प्राण्यांच्या चक्षु इत्यादी अंगांमध्ये जीवितसंतान छिन्न (नष्ट) झाल्यावर त्या अंगांना पुन्हा जिवंत करता येत नाही, त्याचप्रमाणे वृक्षांचे देखील खोड किंवा फांद्या कापल्या गेल्यावर जीवितसंतान छिन्न झाल्यावर ते खोड किंवा फांद्या पुन्हा दुसरीकडे लावता (रोपण करता) आल्या नसत्या. परंतु त्या लावता येतातच. म्हणून, त्या दोन्ही प्रकारचे जीवित त्यांच्यात नसते, असे जाणावे. विभावनीपाठात— "कारण त्यांचे कर्मच स्थितीचे कारण नसते" येथे "कर्म स्थितीचे कारणच नसते" असे जोडले पाहिजे. म्हणूनच "आहारज इत्यादींचे" असे म्हटले आहे. एकाच कलापात गेलेले, प्रवृत्त झालेले सहजात प्रत्यय, त्यांच्यावर आधारित आणि बद्ध, असा विग्रह आहे. कर्मादी रूपजनक प्रत्ययांचा जनक-अनुभाव रूपकलापांच्या केवळ उत्पादक्षणीच पसरतो, स्थितीक्षणी नाही. आणि उपचयसंतान देखील उत्पादक्षणीच प्राप्त होते, स्थितीक्षणी नाही. म्हणून, ते जनकप्रत्ययाच्या अनुभावक्षणी प्राप्त झाल्यामुळे "कुतश्चित्-जात" (कुठूनतरी उत्पन्न झालेले) हे नाव मिळवतात. जरा (वृद्धत्व) मात्र केवळ स्थितीक्षणीच प्राप्त होते, उत्पादक्षणी नाही. म्हणून, तिला "कुतश्चित्-जात" हे नाव मिळत नाही. जर आहारज इत्यादी रूपधर्मांची स्थिती आहार इत्यादी जनकप्रत्ययांवर आधारित असती, तर जरा देखील जनकप्रत्ययाच्या अनुभावक्षणीच प्राप्त झाली असती. आणि असे झाले असता, तिलाही "कुतश्चित्-जात" हे नाव मिळाले असते. परंतु मिळत नाही. म्हणून, त्यांची स्थिती जनकप्रत्ययावर आधारित नसते, हा अर्थ दर्शवताना "इतरथा" इत्यादी म्हटले आहे. "उपस्तंभन करणारे" (उपत्थम्भमाना) म्हणजे दुसऱ्या कलापात राहून आधार देणारे. "क्षणस्थितीच्या प्रवृत्तीसाठी नाही" म्हणजे क्षणस्थितीच्या भावाने प्रवृत्तीसाठी आधार देतात, रक्षण करतात, अशी योजना आहे. सर्वच रूप आणि अरूप धर्मांचे. "तम्" हे विभावनीचे वचन आहे. "हे मात्र" (इदं पना) म्हणजे जीवितरूप मात्र। อาหารรูเป. ‘‘สวตฺถุกวจนํ’’ติ โภชนาทิ วตฺถุนา สห ปวตฺตตีติ สวตฺถุกํ. วจนํ. น หิ นิพฺพตฺติตํ อาหาร รูปํ นาม กพฬํ กาตุํ สกฺกา โหตีติ. ‘‘วิเวจิตานี’’ติ ปาจน กิจฺเจน วิภชิตานิ. วิสุํ วิสุํ กตานิ. ‘‘ปญฺจธา วิภาคํ คจฺฉนฺตี’’ติ เอกํ ภาคํ ปาณกา ขาทนฺติ. เอกํ ภาคํ อุทรคฺคิ ฌาเปติ. เอโก ภาโค มุตฺตํ โหติ. เอโกภาโค กรีสํ. เอโกภาโค รสภาวํ อาปชฺชิตฺวา โสณิตมํสาทีนิ อุปพฺรูหยตีติ เอวํ วุตฺตนเยน ปญฺจธา วิภาคํ คจฺฉนฺติ. ‘‘โลเก’’ติ โลกิย คนฺเถ. ‘‘ตโต’’ติ อามาสยโต. อนุผรนฺโต หุตฺวา. ‘‘ตสฺสา’’ติ รสภาคสฺส. ‘‘ภูเตสู’’ติ มหาภูเตสุ. สห อินฺทฺริเยน วตฺตตีติ เสนฺทฺริโย. กาโย. อุทยตีติ โอชา. ทการสฺส ชกาโร. อวติ ชเนตีติ โอชา. อวสทฺทสฺส โอกาโร. ‘‘อตฺตโนวตฺถุํ’’ติ อตฺตโนนิสฺสยภูตํ รูปกายํ. आहाररूपात. 'सवत्थुकवचनं' (सवत्थुक वचन) म्हणजे भोजनादी वस्तूंसोबत जे प्रवर्तित होते ते 'सवत्थुक' होय. हे वचन आहे. कारण उत्पन्न झालेल्या आहाररूपाला कवळ (घास) करणे शक्य नसते. 'विवेचितानि' म्हणजे पचनक्रियेद्वारे विभागलेले, वेगवेगळे केलेले. 'पंचधा विभागं गच्छन्ति' (पाच प्रकारे विभागले जातात) म्हणजे - एक भाग जंतू खातात, एक भाग उदराग्नी पचवतो, एक भाग मूत्र होतो, एक भाग विष्ठा होतो, आणि एक भाग रसभाव प्राप्त करून रक्त, मांस इत्यादींचे पोषण करतो; अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने पाच प्रकारे विभागले जातात. 'लोके' म्हणजे लौकिक ग्रंथात. 'ततो' म्हणजे आमाशयातून, पसरत जाऊन. 'तस्सा' म्हणजे त्या रसभागाचे. 'भूतेसु' म्हणजे महाभूतांमध्ये. इंद्रियासह जे प्रवर्तित होते ते 'सेंद्रिय' होय, म्हणजेच काय (शरीर). 'उदयति' (उत्पन्न होते) म्हणून 'ओजा'. येथे 'द' काराचा 'ज' कार झाला आहे. 'अवति' (रक्षण करते) म्हणून 'ओजा'. येथे 'अव' शब्दाचा 'ओ' कार झाला आहे. 'अत्तनोवत्थुं' म्हणजे स्वतःचा आश्रय असलेला रूपकाय. ‘‘อญฺญาปเทโส’’ นาม รูปสฺส ลหุตาติอาทีสุ อญฺญสฺส รูปสฺส กฺริยามตฺตภาเวน อปทิสนํ วุจฺจติ. ‘‘อุชุกโตว นิปฺผาทิตํ’’ติ มุขฺยโตว ชนิตํ. ยถาหิ สพฺพํ อนิปฺผนฺนรูปํ อชาติ ธมฺมตฺตา อุชุกโต กมฺมาทีหิ ชาตํ นาม น โหติ. กมฺมาทีหิ ชาตํ ปน นิปฺผนฺนรูปํ นิสฺสาย ทิสฺสมานตฺตา ฐานูปจาเรน วิญฺญตฺติ ทฺวยํ จิตฺตชํติอาทินา วุจฺจติ. น ตถา อิทํ นิปฺผนฺนรูปํ. อิทํ ปน ชาติธมฺมตฺตา อุชุกโตว กมฺมาทีหิ ปจฺจเยหิ นิปฺผาทิตํ ชนิตนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘รูปํ’’ติ วุตฺเต อนิปฺผนฺนรูปํปิ ลพฺภตีติ ตโต วิเสสนตฺถํ รูปรูปนฺติ วุจฺจตีติ อาห ‘‘รุปฺปนลกฺขณ สมฺปนฺนํ’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘รุปฺปนลกฺขณํ’’ นาม สีตุณฺหาทีหิ วิการปตฺติลกฺขณํ. ตมฺปน อนิปฺผนฺน รูเป มุขฺยโต น ลพฺภติ. นิปฺผนฺนรูเป เอว ลพฺภติ. กสฺมา, นิปฺผนฺนรูปสฺสหิ นานาวิกาโร วิการรูปนฺติ วุจฺจติ. ลกฺขณํ ลกฺขณ รูปนฺติ วุจฺจติ. วิการสฺส ปน วิกาโร นาม นตฺถิ. ลกฺขณสฺส จ ลกฺขณํ [Pg.202] นาม นตฺถิ. ยทิ อตฺถีติ วเทยฺย. วิการสฺส วิกาโร, ตสฺส จ วิกาโร, ตสฺส จ วิกาโรติ อปริยนฺตเมว สิยา. ตถา ลกฺขเณปีติ. 'अञ्ञापदेसो' (अन्य निर्देश) म्हणजे रूपाच्या लघुता इत्यादींमध्ये इतर रूपाच्या केवळ क्रियाभावाने निर्देश करणे होय. 'उजुकतोव निप्फादितं' म्हणजे मुख्यत्वेकरून उत्पन्न केलेले. कारण जसे सर्व अनिष्पन्न रूप हे अजन्म स्वभावाचे असल्यामुळे थेटपणे कर्मादींद्वारे उत्पन्न झालेले नसते. परंतु कर्मादींद्वारे उत्पन्न झालेल्या निष्पन्न रूपाचा आश्रय घेऊन दिसत असल्यामुळे, उपचाराने दोन्ही विज्ञाप्तींना 'चित्तज' इत्यादी म्हटले जाते. हे निष्पन्न रूप तसे नाही. परंतु हे जन्मस्वभावाचे असल्यामुळे थेटपणे कर्मादी प्रत्ययांद्वारे निष्पन्न केलेले म्हणजेच उत्पन्न केलेले आहे, असे म्हटले आहे. 'रूप' असे म्हटले असता अनिष्पन्न रूप देखील प्राप्त होते, म्हणून त्यापासून विशेष दर्शवण्यासाठी 'रूपरूप' असे म्हटले जाते, म्हणूनच 'रुप्पनलक्खण संपन्नं' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'रुप्पनलक्खणं' (बाधित होण्याचे लक्षण) म्हणजे शीत, उष्ण इत्यादींमुळे विकार प्राप्त होण्याचे लक्षण होय. परंतु ते अनिष्पन्न रूपामध्ये मुख्यत्वेकरून आढळत नाही. ते केवळ निष्पन्न रूपामध्येच आढळते. कारण, निष्पन्न रूपाचा विविध विकार हा 'विकाररूप' म्हटला जातो. लक्षण हे 'लक्षणरूप' म्हटले जाते. परंतु विकाराचा दुसरा विकार नसतो आणि लक्षणाचे दुसरे लक्षण नसते. जर आहे असे म्हटले, तर विकाराचा विकार, त्याचा विकार, आणि त्याचाही विकार अशी अनवस्था (मर्यादा नसलेली मालिका) निर्माण होईल. लक्षणाच्या बाबतीतही तसेच होईल. อากาสธาตุยํ. ‘‘ปกาสนฺตี’’ติ อิทํ เอกํ อิทํ เอกนฺติ ปญฺญายนฺติ. ‘‘ปริจฺฉินฺทตี’’ติ อาห ‘‘ปริโต’’ติอาทึ. ‘‘อสมฺมิสฺสํ’’ติ วตฺวา ตทตฺถํ วิวรติ ‘‘เอกตฺตํ อนุปคมนํ’’ติ. ปริจฺฉินฺทียตีติ ปริจฺเฉโทติ อาห ‘‘เตหิ วา’’ติอาทึ. ‘‘เตหิ วา’’ติ กลาปนฺตรภูเตหิ วา. ‘‘อตฺตโน วา ปเรสํ วา อกตฺวา’’ติ อตฺตโนปกฺขิกํ วา ปเรสํ ปกฺขิกํ วา อกตฺวา. ปริจฺเฉท กฺริยามตฺตํ ปริจฺเฉโทติ อาห ‘‘เตสํ วา’’ติอาทึ. ‘‘เตสํ วา’’ติ กลาปนฺตรภูตานํ วา. ‘‘อยํ ปนา’’ติ อยํ ปริจฺเฉโท ปน. ‘‘ตสฺสา’’ติ ปริจฺเฉทสฺส. โส ปาฬิยํ วุตฺโตติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ เอวํ มนสิกตฺวา. ‘‘เอเตหี’’ติ เอเตหิ มหาภูเตหิ. ‘‘อญฺญมญฺญ อพฺยาปิตตา’’ติ ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วา รูปกลาปานํ เอกกลาปตฺตูปคมนํ อญฺญมญฺญ พฺยาปิตา นาม, ตถา อนุปคมนํ อญฺญมญฺญ อพฺยาปิตตา นาม. เตนาห ‘‘เอกตฺตํ’’ติอาทึ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ติสฺสํ ปาฬิยํ. ‘‘นานากลาปคตานํ ภูตานํ’’ติ เอเตน กลาปปริยนฺตตา เอว วุตฺตา โหติ. आकाशधातूमध्ये. 'पकासन्ति' म्हणजे 'हे एक आहे, हे एक आहे' अशा प्रकारे जाणवले जातात. 'परिच्छिन्दति' याविषयी 'परितो' इत्यादी म्हटले आहे. 'असंमिस्सं' (अमिश्रित) असे सांगून त्याचा अर्थ 'एकत्तं अनुपगमनं' (एक न होणे) असा स्पष्ट केला आहे. जे मर्यादित केले जाते ते 'परिच्छेद' होय, म्हणून 'तेहि वा' इत्यादी म्हटले आहे. 'तेहि वा' म्हणजे इतर कलापांमध्ये असलेल्यांद्वारे किंवा. 'अत्तनो वा परेसं वा अकत्वा' म्हणजे स्वतःच्या बाजूचे किंवा इतरांच्या बाजूचे न करता. केवळ परिच्छेद क्रिया म्हणजे 'परिच्छेद' होय, म्हणून 'तेसं वा' इत्यादी म्हटले आहे. 'तेसं वा' म्हणजे इतर कलापांमध्ये असलेल्यांचे किंवा. 'अयं पना' म्हणजे परंतु हा परिच्छेद. 'तस्सा' म्हणजे त्या परिच्छेदाचा. तो पाळीमध्ये सांगितला आहे, असा संबंध आहे. 'इति कत्वा' म्हणजे असा विचार करून. 'एतेहि' म्हणजे या महाभूतांद्वारे. 'अञ्ञमञ्ञ अब्यापितता' (परस्पर अव्याप्तता) म्हणजे दोन किंवा तीन रूपकलापांचे एकाच कलापामध्ये विलीन होणे म्हणजे 'परस्पर व्याप्तता' होय, आणि तसे न होणे म्हणजे 'परस्पर अव्याप्तता' होय. म्हणूनच 'एकत्तं' इत्यादी म्हटले आहे. 'तत्थ' म्हणजे त्या पाळीमध्ये. 'नानाकलापगतानं भूतानं' याद्वारे कलापाची सीमाच सांगितली गेली आहे. วิญฺญตฺติ ทฺวเย. ‘‘สยญฺจา’’ติ วิญฺญตฺติ สงฺขาตํ สยญฺจ. ‘‘เตนา’’ติ จลมาเนน กายงฺเคน. ‘‘เตหี’’ติ ปจฺจกฺเข ฐิเตหิ ชเนหิ. ตตฺถาติอาทีสุ. ‘‘กายงฺควิการํ กโรนฺตสฺสา’’ติ อภิกฺกมนาทิ อตฺถาย หตฺถปาทาทีนํ กายงฺคานํ จลน สงฺขาตํ วิการํ กโรนฺตสฺส. อุปฺปชฺชนฺตา จ สพฺเพเต จิตฺตชวาตกลาปา ยถาธิปฺเปต ทิสาภิมุขา เอว อุปฺปชฺชนฺตีติ โยชนา. ‘‘ยถา วา ตถา วา อนุปฺปชฺชิตฺวา’’ติ อนิยมโต อนุปฺปชฺชิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ยสฺส โจปน กายสฺส. ‘‘เตหี’’ติ จิตฺตชวาตกลาเปหิ. นิยามโก นาวานิโยชโก. ‘‘เต จา’’ติ เตจิตฺตชวาตกลาปสงฺฆาฏา. เอเตน สกลํ กายงฺคํ นิทสฺเสติ. สกลกายงฺคํ นาวาสทิสนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘จาเรตฺวา’’ติ วิยูหิตฺวา. กถํ ปน สา นิยามกสทิสี โหตีติ อาห [Pg.203] ‘‘ยถาหี’’ติอาทิ. ยเทตํ สกฺโกตีติ วจนํ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กตีปยชวน วาเรหี’’ติ ทฺวตฺติ ชวนวาเรหิ. ‘‘ตโต’’ติ ยสฺมึ วาเร จลน สงฺขาตํ เทสนฺตร ปาปนํ ชายติ. ตโต จลนวารโต. สนฺถมฺภน สนฺธารณานิ เอว สมฺปชฺชนฺติ, น จลนสงฺขาตํ เทสนฺตร ปาปนํ. ‘‘เอตฺถา’’ติ เอติสฺสํ อฏฺฐกถายํ. นานาชวนวีถีสุ. ล. อุปตฺถมฺภเน จ ยุชฺชติเยว. น เอกิสฺสาย ชวนวีถิยํ เอว ยุชฺชตีติ อธิปฺปาโย. ยทิ นานาชวนวีถีสุ ตถา อุปตฺถมฺภนญฺจ คยฺเหยฺย. เอวํสติ, อนฺตรนฺตรา พหู ภวงฺควาราปิ สนฺติ. ตตฺถ กถํ ตทุปตฺถมฺภนํ สมฺปชฺเชยฺยาติ อาห ‘‘ตถาหี’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘อุตุชรูปสงฺฆาฏานิ ปี’’ติ ภวงฺคสมเย ปวตฺตานิ อุตุชรูปกลาปสนฺธานกานิ. ‘‘ตทาการ วนฺตานี’’ติ ตสฺสา จิตฺตชรูปสนฺตติยา อาการ วนฺตานิ. ปจฺฉิม ปจฺฉิมานํ รูปกลา ปสงฺฆาฏานํ อปราปรํ อุปฺปชฺชนนฺติ สมฺพนฺโธ. ปุริมปุริมานํ รูปกลาปสงฺฆาฏานํ ขณิกธมฺมตา จ เตสํ น สิยา. น จ เต ขณิกธมฺมา น โหนฺติ. อญฺญถา เทสนฺตร สงฺกมนสงฺขาตํ จลนํ เอว น สิยา. จลนํ ติหิ นานากฺริยานํ ปาตุพฺภาโว วุจฺจติ. นานากฺริยา จ นาม นานาธมฺมา เอว. ยสฺมา จ องฺคปจฺจงฺคานํ ขเณขเณ จลนํ นาม โลเก ปจฺจกฺขโต ทิฏฺฐํ. ตสฺมา เตสํ ขณิกธมฺมตาปิ ทฏฺฐพฺพา โหตีติ. เอเตน เตสํ ขณิกมรณํ ทสฺเสติ, ยํ รูปารูปธมฺมานํ อนิจฺจลกฺขณนฺติ วุจฺจติ. อพฺยาปาร ธมฺมตา จ อวสวตฺติตา จ เตสํ น สิยา. น จ เต อพฺยาปาร ธมฺมา, น อวสวตฺติ ธมฺมา จ น โหนฺติ. อญฺญถา ปจฺจยายตฺต วุตฺติตา เอว เตสํ น สิยา. ปจฺจยายตฺต วุตฺติตาติ จ ปจฺจเย สติ, เต วตฺตนฺติ, อสติ น วตฺตนฺตีติ เอวํ ปวตฺตา ปจฺจยายตฺต วุตฺติตา ยสฺมา จ ปจฺจยสามคฺคิยํ สติ, เต วตฺตนฺติเยว. เตสํ วตฺตนตฺถาย เกนจิพฺยาปาเรน กิจฺจํ นตฺถิ. เต มาวตฺตนฺตูติ จ อตฺตโน วเสน วตฺตนฺติ. ปจฺจเย อสติ, น วตฺตนฺติเยว. เตสํ อวตฺตนตฺถาย เกนจิพฺยาปาเรน กิจฺจํ นตฺถิ. เตมาวตฺตนฺตูติ จ อตฺตโน วเสนวตฺตนฺติ. ยสฺมา จ เตสํ ปจฺจยายตฺต วุตฺติตา นาม โลเก วิญฺญูนํ ปจฺจกฺขโตทิฏฺฐา. ตสฺมา เตสํ อพฺยาปารตา จ [Pg.204] อวสวตฺติตา จ ทฏฺฐพฺพา โหติ. เอเตน เตสํ สพฺเพหิ สตฺตปุคฺคล อตฺตากาเรหิ สพฺพโส สุญฺญํ ทสฺเสติ, ยํ รูปารูปธมฺมานํ อนตฺตลกฺขณนฺติ วุจฺจตีติ. दोन विज्ञाप्तींमध्ये. 'स्वयं च' (स्वतः आणि) म्हणजे विज्ञाप्ति म्हणून ओळखले जाणारे आणि स्वतः. 'तेन' (त्याच्याद्वारे) म्हणजे हलणाऱ्या शरीरावयवाद्वारे (कायांगाद्वारे). 'तेहि' (त्यांच्याद्वारे) म्हणजे प्रत्यक्ष समोर उपस्थित असलेल्या लोकांद्वारे. 'तथ' (तेथे) इत्यादींमध्ये. 'कायांगविकार करणाऱ्याचे' म्हणजे पुढे जाणे इत्यादी उद्देशांसाठी हात, पाय इत्यादी शरीरावयवांची (कायांगांची) हालचाल रूपी विकार (बदल) करणाऱ्याचे. आणि उत्पन्न होणारे हे सर्व चित्तज-वायू-कलाप (चित्तापासून उत्पन्न होणारे वायूचे समूह) इच्छित दिशेकडेच तोंड करून उत्पन्न होतात, असा संबंध (योजना) आहे. 'जसे किंवा तसे उत्पन्न न होता' म्हणजे अनियंत्रितपणे (अनियमाने) उत्पन्न न होता, असे म्हटले आहे. आणि ज्या हलणाऱ्या शरीराचे. 'तेहि' (त्यांच्याद्वारे) म्हणजे चित्तज-वायू-कलापांद्वारे. 'नियामक' म्हणजे जहाजाचा चालक (नाविक). 'ते च' (आणि ते) म्हणजे ते चित्तज-वायू-कलापांचे संघात (समूह). याद्वारे संपूर्ण शरीरावयव (कायांग) दर्शविले जातात. संपूर्ण शरीरावयव हे जहाजासारखे (नावेसारखे) आहेत, असे म्हटले आहे. 'चारेत्वा' (चालवून) म्हणजे प्रेरित करून (व्यूहित करून). पण ती (चित्तसंतती) नियामकासारखी (चालकासारखी) कशी होते? म्हणून 'यथाहि' (जसे की) इत्यादी म्हटले आहे. 'जे हे करू शकते' हे जे वचन म्हटले आहे, त्याच्याशी हा संबंध आहे. 'काही जवन-वारांनी (जवन-वीथींच्या आवर्तनांनी)' म्हणजे दोन किंवा तीन जवन-वारांनी. 'ततो' (त्यानंतर) म्हणजे ज्या आवर्तनात हालचाल रूपी दुसऱ्या ठिकाणी पोहोचणे (देशांतर प्रापण) घडून येते. त्या हालचालीच्या आवर्तनानंतर. केवळ स्तंभन (ताठरणे) आणि संधारण (पेलणे) हेच घडून येते, हालचाल रूपी देशांतर प्रापण (दुसऱ्या ठिकाणी पोहोचणे) होत नाही. 'एत्थ' (येथे) म्हणजे या अट्ठकथेमध्ये. वेगवेगळ्या जवन-वीथींमध्ये... (इत्यादी)... आणि उपस्तंभनात (टेका देण्यात) देखील ते योग्यच ठरते. केवळ एकाच जवन-वीथीमध्ये ते योग्य ठरत नाही, असा अभिप्राय आहे. जर वेगवेगळ्या जवन-वीथींमध्ये तसेच उपस्तंभन (टेका देणे) ग्रहण केले गेले, तर असे असताना, मध्ये-मध्ये अनेक भवंग-वार (भवंग चित्ताची आवर्तने) देखील असतात. तेथे ते उपस्तंभन कसे घडून येईल? म्हणून 'तथाहि' (तसेच) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'ऋतुज-रूप-संघात देखील' म्हणजे भवंग समयात प्रवृत्त होणारे ऋतुज-रूप-कलापांचे सांधे (संधारक). 'त्या आकाराचे' म्हणजे त्या चित्तज-रूप-संततीच्या आकाराचे असणारे. नंतर नंतरच्या रूप-कलाप-संघातांचे एकामागून एक उत्पन्न होणे, असा संबंध आहे. (जर असे नसेल तर) पूर्वीच्या पूर्वीच्या रूप-कलाप-संघातांचा क्षणिक स्वभाव (क्षणिकधम्मता) त्यांना प्राप्त होणार नाही. आणि असे नाही की ते क्षणिकधर्मी नसतात (ते क्षणिकधर्मी असतातच). अन्यथा, देशांतर संक्रमण (एका ठिकाणाहून दुसऱ्या ठिकाणी जाणे) रूपी हालचालच होणार नाही. हालचाल म्हणजे विविध क्रियांचा प्रादुर्भाव (प्रकटीकरण) होय, असे म्हटले जाते. आणि विविध क्रिया म्हणजे विविध धर्मच (अवस्थाच) होत. आणि ज्याअर्थी अवयव-प्रत्यवयवांची (हात-पाय इत्यादींची) क्षणाक्षणाला होणारी हालचाल जगात प्रत्यक्ष पाहिली जाते, त्याअर्थी त्यांची क्षणिकधम्मता (क्षणिक स्वभाव) देखील जाणली पाहिजे. याद्वारे त्यांचे क्षणिक मरण (क्षणिक विनाश) दर्शविले जाते, ज्याला रूप आणि अरूप धर्मांचे 'अनित्य लक्षण' (अनिच्चलक्खण) म्हटले जाते. (जर असे नसेल तर) त्यांची अव्यापार-धम्मता (कर्तेपणा नसणे) आणि अवशवर्तित्व (स्वाधीन नसणे) सिद्ध होणार नाही. आणि असे नाही की ते अव्यापार-धर्मी आणि अवशवर्ती-धर्मी नसतात (ते अव्यापार आणि अवशवर्ती असतातच). अन्यथा, त्यांची प्रत्ययायत्त वृत्ती (प्रत्ययांवर/कारणांवर अवलंबून असणे) सिद्ध होणार नाही. प्रत्ययायत्त वृत्ती म्हणजे - प्रत्यय (कारणे) असताना ते प्रवृत्त होतात, आणि प्रत्यय नसताना ते प्रवृत्त होत नाहीत; अशी ही प्रत्ययायत्त वृत्ती आहे, कारण प्रत्यय-सामग्री (कारणांची अनुकूलता) असताना ते प्रवृत्त होतातच. त्यांच्या प्रवृत्तीसाठी (चालण्यासाठी) कोणत्याही बाह्य व्यापाराची (प्रयत्नाची) गरज नसते. 'ते प्रवृत्त होऊ नयेत' असे म्हटले तरी ते स्वतःच्या (नियमाच्या) वशानेच प्रवृत्त होतात. प्रत्यय नसताना ते प्रवृत्त होतच नाहीत. त्यांच्या अप्रवृत्तीसाठी (थांबण्यासाठी) कोणत्याही बाह्य व्यापाराची गरज नसते. 'ते प्रवृत्त होऊ नयेत' असे म्हटले तरी ते स्वतःच्या वशानेच अप्रवृत्त राहतात (थांबतात). आणि ज्याअर्थी त्यांची ही प्रत्ययायत्त वृत्ती जगात विद्वानांना प्रत्यक्ष दिसते, त्याअर्थी त्यांची अव्यापारता (अकर्तेपणा) आणि अवशवर्तिता (अस्वाधीनता) जाणली पाहिजे. याद्वारे त्यांचे सत्त्व (प्राणी), पुद्गल आणि आत्मा या सर्व आकारांपासून पूर्णपणे शून्य असणे दर्शविले जाते, ज्याला रूप आणि अरूप धर्मांचे 'अनात्म लक्षण' (अनत्तलक्खण) म्हटले जाते. ‘‘วจีเภทํ’’ติ อกฺขร ปทภาวปตฺตํ วจีมยสทฺทปฺปการํ. อุปาทินฺนกปถวีธาตุโย นาม กมฺมช ปถวีธาตุโย. ตาสุ สงฺฆฏฺฏนนฺติ สมฺพนฺโธ. อตฺตนา สหชาเตนเยน อาการวิกาเรน อุปคจฺฉติ, เยน จ อุปลพฺภตีติ สมฺพนฺโธ. อชฺฌตฺต สนฺตานคตา สพฺเพ จตุชรูปธมฺมาปิ กตฺถจิ อุปาทินฺนกาติ วุจฺจนฺตีติ อาห ‘‘จตุชภูตาย เอว วา’’ติ. ทฺวีสุฐาน กรเณสุ กรณปกฺเข จลนาการปฺปวตฺตา จิตฺตชปถวีธาตุ ฐานปกฺเข ปถวิธาตุยํ สงฺฆฏฺฏยมานา กมฺมชปถวิยํ เอว ฆฏฺเฏติ. อิตร ปถวิยํ น ฆฏฺเฏตีติ น สกฺกา วตฺตุํติ กตฺวา อิธ เอวคฺคหณํ กตํ. ‘‘วิการ ทฺวยญฺจา’’ติ กายวิการ วจีวิการ ทฺวยญฺจ. กถํ ปน อสมฺมิสฺสํ กตฺวา เวทิตพฺพนฺติ อาห ‘‘เอตฺถจา’’ติอาทึ. ยํ ปน ตาสํ ฆฏฺฏนปฺปการวิธานํ อตฺถีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตาสํ’’ จิตฺตชปถวีนํ. ‘‘ตํ ตํ วณฺณตฺตปตฺติยา’’ติ ก, ขา, ทิวณฺณตฺตปตฺตตฺถาย. ยํ ปน กายวิญฺญตฺติฏฺฐาเน ‘อยญฺจ อตฺโถ อุปริ อกฺขรุปฺปตฺติ วิจารณายํ ปากโฏ ภวิสฺสตี’ติ วุตฺตํ. ตํ อิธ ปากฏํ กโรนฺโต ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิมาห. เตเนว หิ มูลฏีกายํ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เอตฺถ จา’’ติ มูลฏีกาปาเฐ. ‘‘ปุพฺพภาเค’’ติ ปริพฺยตฺต อกฺขรปฺปวตฺตวีถิโต ปุพฺพภาเค. ‘‘นานาชวนวีถีหี’’ติ นานปฺปกาเรหิ ชวนวีถิวาเรหิ. ‘‘ปถมชวนจิตฺตสฺสปี’’ติ ปริพฺยตฺต อกฺขรปฺปวตฺติวีถิยํ อุปฺปนฺนปถมชวน จิตฺตสฺสปิ. ตสฺส อาเสวนญฺจ นาม ตโต ปุริเมหิ วีถิวาเรหิ เอว ลทฺธํ สิยาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อาเสวนํ’’ติ จ อุปจาร วจนํ ทฏฺฐพฺพนฺติ เหฏฺฐา วุตฺตเมว. ‘‘ตสฺสา’’ติ ปริพฺยตฺตกฺขรสฺส. วุตฺตญฺจ สทฺทสตฺเถสุ. ‘‘ทีฆมุจฺจเร’’ติ ปญฺจทีฆา วุจฺจนฺติ. มิถินฺท ปญฺหาปาเฐ. ‘‘สาธิเก วีหิวาหสเต’’ติ วีหิธญฺญปูโร สกโฏ วีหิวาโห นาม. วีหิวาหานํ สาธิเก สตสฺมึ. อภิมญฺญนํ อภิมาโน. ‘‘เสสเมตฺถ กายวิญฺญตฺติยํ วุตฺตนเย นา’’ติ [Pg.205] ตถาหิ จลนจิตฺตชรูปสนฺตติยํ ปวตฺตานีติอาทินา วุตฺต นเยนาติ อตฺโถ. อิธ ปน วจีเภทกร จิตฺตชสทฺทสนฺตติยํ ปวตฺตานิ อุตุชรูปสงฺฆาฏานีติอาทินา วตฺตพฺพํ. เตนาห ‘‘ยถาสมฺภวํ’’ติ. ‘‘ปวตฺตนตฺโถ’’ติ อภิกฺกมนาทิ สชฺฌายนาทีนํ ปวตฺตาปนตฺโถ. ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. ‘‘โพเธตุ กามตา รหิเตสู’’ติ อภิกฺกมนปฏิกฺกมนาทีสุ กายวิญฺญตฺติ จ, สุตฺตนฺต สชฺฌายนาทีสุ วจีวิญฺญตฺติ จ ปรํ โพเธตุกามตา รหิตาติ ทฏฺฐพฺพา. ‘‘ทฺวีสุ โพธกวิญฺญตฺตีสู’’ติ โพธกกายวิญฺญตฺติ โพธกวจี วิญฺญตฺตีสุ. ปุริมา กายวิญฺญตฺติ, ปจฺฉิมา จ วจีวิญฺญตฺติ. ปจฺฉา สุทฺเธน มโนทฺวาริก ชวเนน เอว วิญฺญายติ, น ปญฺจทฺวาริก ชวเนนาติ โยชนา. จกฺขุวิญฺญาณ วีถิยา คเหตฺวาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กายวิญฺญาณ วีถิยา’’ติ วจีเภทํ อกตฺวา หตฺถคฺคหณาทิ วเสน อธิปฺปาย วิญฺญาปเน อยํ กายวิญฺญาณวีถิ ทฏฺฐพฺพา. กสฺมา ปน สยญฺจวิญฺญายตีติ วิญฺญตฺตีติ อยํ วิกปฺโป วุตฺโตติ อาห ‘‘สาหิ อตฺตานํ’’ติอาทึ. ‘‘มชฺเฌ’’ติ วิญฺญตฺติคฺคหณวีถิ อธิปฺปายคฺคหณวีถินํ มชฺเฌ. กถํ ปวตฺตกวิญฺญตฺตีสุ อธิปฺปายํ วิญฺญาเปติ, สยญฺจวิญฺญายตีติ ทฺเว อตฺถา ลพฺภนฺตีติ อาห ‘‘ทฺวีสุ ปนา’’ติอาทึ. อยํ อภิกฺกมติ, อยํ ปฏิกฺกมตีติ ชานนฺตา อภิกฺกมนปโยคญฺจ ตปฺปโยค ชนกจิตฺตญฺจ ชานนฺติ. ‘‘ปรสฺสกถํ’’ติ โพเธตุกามตารหิตมฺปิ ปรสฺสวจนสทฺทํ. ราคจิตฺตญฺจ ชานนฺติ. เตน วุตฺตํ มูลฏีกายํ ปรํ โพเธตุกามตาย วินาปิ อภิกฺกมนาทิปฺปวตฺตเนน โสจิตฺตสหภุวิกาโร อธิปฺปายํ. ล. ทฺวิธาปิ วิญฺญตฺติ เยวาติ. “वाचिभेद” म्हणजे अक्षरे आणि पदांच्या अवस्थेला प्राप्त झालेला, वाणीमय शब्दाचा प्रकार. “उपादिन्नक-पठवीधातू” म्हणजे कर्मापासून उत्पन्नलेली पृथ्वीतत्त्वे (कर्मज पठवीधातू). त्यांच्यामध्ये आघात (संघट्टन) होणे, असा संबंध आहे. स्वतःसह उत्पन्न झालेल्या आकारविकाराने प्राप्त होते आणि ज्याच्याद्वारे ते उपलब्ध होते, असा संबंध आहे. अध्यात्म संतानातील (अंतर्गत प्रवाहातील) सर्व चारही प्रकारच्या रूपधर्मांना काही ठिकाणी 'उपादिन्नक' म्हटले जाते, म्हणून “किंवा चार प्रकारच्या महाभूतांचेच” (चतुजभूताय एव वा) असे म्हटले आहे. दोन स्थानांच्या कारणांमध्ये, कारणपक्षातील चलन-आकारात प्रवृत्त झालेली चित्तज पठवीधातू, स्थानपक्षातील पठवीधातूवर आघात करत असताना, केवळ कर्मज पठवीधातूवरच आघात करते; इतर पठवीधातूवर आघात करत नाही, असे म्हणता येत नाही, म्हणून येथे 'एव' (केवळ) हा शब्द ग्रहण केला आहे. “आणि विकारद्वय” (विकारद्वय च) म्हणजे कायविकार आणि वाचीविकार हे दोन्ही. परंतु, ते संमिश्र न करता कसे जाणावे? यासाठी “आणि येथे” (एत्थ च) इत्यादी म्हटले आहे. त्यांच्या आघाताचा जो प्रकार किंवा विधी आहे, असा संबंध आहे. “त्यांच्या” (तासं) म्हणजे चित्तज पठवीधातूंच्या. “त्या त्या वर्णांच्या प्राप्तीसाठी” (तं तं वण्णत्तपत्तिया) म्हणजे 'क', 'ख' इत्यादी वर्णांच्या (अक्षरांच्या) प्राप्तीसाठी. कायविज्ञप्तीच्या ठिकाणी जे म्हटले होते की, 'हा अर्थ पुढे अक्षरांच्या उत्पत्तीच्या विचारात स्पष्ट होईल', तो येथे स्पष्ट करताना “आणि येथे” इत्यादी म्हटले आहे. त्यामुळेच मूळटीकेमध्ये असे म्हटले आहे, असा संबंध आहे. मूळटीकेच्या पाठात “आणि येथे” असे आहे. “पूर्वभागात” (पुब्बभागे) म्हणजे स्पष्ट अक्षरांच्या प्रवृत्तीच्या वीथीच्या पूर्वभागात. “विविध जवनवीथींद्वारे” (नानाजवनवीथीहि) म्हणजे विविध प्रकारच्या जवनवीथींच्या प्रवाहांनी. “पहिल्या जवनचित्ताचे सुद्धा” (पठमजवनचित्तस्सपि) म्हणजे स्पष्ट अक्षरांच्या प्रवृत्तीच्या वीथीमध्ये उत्पन्न झालेल्या पहिल्या जवनचित्ताचे सुद्धा. त्याचे आसेवन (पुनरावृत्ती) पूर्वीच्या वीथीप्रवाहांमुळेच प्राप्त झाले असावे, असा अभिप्राय आहे. “आसेवन” हा उपचारात्मक शब्द समजावा, हे खाली सांगितलेच आहे. “त्याचे” (तस्स) म्हणजे स्पष्ट अक्षराचे. आणि शब्दशास्त्रामध्ये (व्याकरणात) म्हटले आहे. “दीर्घ उच्चारतात” (दीघमुच्चरे) म्हणजे पाच दीर्घ स्वर म्हटले जातात. मिलिन्दपञ्ह पाठात. “शंभरहून अधिक वीहिवाहांमध्ये” (साधिके वीहिवाहसते) म्हणजे भाताच्या धान्याने भरलेली गाडी, ज्याला 'वीहिवाह' म्हणतात; शंभरहून अधिक वीहिवाहांमध्ये. अभिमान म्हणजे अहंकार. “उर्वरित भाग येथे कायविज्ञप्तीमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा” म्हणजे चलन-चित्तज-रूपसंततीमध्ये प्रवृत्त झालेले इत्यादी पद्धतीने सांगितलेला अर्थ आहे. परंतु येथे, 'वाचिभेद करणाऱ्या चित्तज शब्दसंततीमध्ये प्रवृत्त झालेले ऋतुज रूपसंघ' इत्यादी प्रकारे सांगितले पाहिजे. म्हणूनच “यथासंभव” असे म्हटले आहे. “प्रवर्तनार्थ” (पवत्तनत्हो) म्हणजे पुढे जाणे इत्यादी आणि सज्झाय (पठण) इत्यादी प्रवृत्त करण्यासाठी. “आणि येथे” इत्यादींमध्ये. “बोध करण्याची इच्छा नसलेल्यांमध्ये” (बोधेतुकामता रहितेसु) म्हणजे पुढे जाणे, मागे फिरणे इत्यादींमध्ये कायविज्ञप्ती आणि सुत्तंत सज्झायन (सूत्रांचे पठण) इत्यादींमध्ये वाचीविज्ञप्ती ही दुसऱ्याला बोध करण्याची इच्छा नसलेली समजावी. “दोन बोधक विज्ञप्तींमध्ये” (द्वीसु बोधकविञ्ञत्तीसु) म्हणजे बोधक कायविज्ञप्ती आणि बोधक वाचीविज्ञप्ती या दोन्हीमध्ये. पहिली कायविज्ञप्ती आणि दुसरी वाचीविज्ञप्ती होय. नंतर केवळ शुद्ध मनोद्वारिक जवनानेच ती जाणली जाते, पंचद्वारिक जवनाने नाही, अशी योजना आहे. चक्षुविज्ञान वीथीद्वारे ग्रहण करून, असा संबंध आहे. “कायविज्ञान वीथीद्वारे” (कायविञ्ञाण वीथिया) म्हणजे वाचिभेद न करता, हात पकडणे इत्यादींद्वारे अभिप्राय समजून घेण्याच्या बाबतीत ही कायविज्ञान वीथी समजावी. परंतु, 'ती स्वतःच जाणली जाते म्हणून विज्ञप्ती' हा विकल्प का सांगितला आहे? म्हणून “कारण ती स्वतःला...” इत्यादी म्हटले आहे. “मध्ये” (मज्झे) म्हणजे विज्ञप्ती ग्रहण करणाऱ्या वीथी आणि अभिप्राय ग्रहण करणाऱ्या वीथी यांच्या मध्ये. प्रवृत्त होणाऱ्या विज्ञप्तींमध्ये अभिप्राय कसा समजवला जातो आणि ती स्वतः कशी जाणली जाते, हे दोन अर्थ प्राप्त होतात, म्हणून “परंतु दोन्हीमध्ये” इत्यादी म्हटले आहे. 'हा पुढे जात आहे, हा मागे फिरत आहे' असे जाणणारे लोक पुढे जाण्याचा प्रयोग आणि तो प्रयोग उत्पन्न करणारे चित्त देखील जाणतात. “दुसऱ्याचे भाषण” (परस्सकथं) म्हणजे बोध करण्याची इच्छा नसलेला देखील दुसऱ्याच्या बोलण्याचा शब्द. आणि रागचित्त (आसक्तीचे चित्त) देखील जाणतात. म्हणूनच मूळटीकेमध्ये म्हटले आहे की, दुसऱ्याला बोध करण्याच्या इच्छेशिवाय देखील, पुढे जाणे इत्यादींच्या प्रवृत्तीने स्वतःच्या चित्तासह उत्पन्न होणारा विकार म्हणजे अभिप्राय होय... इत्यादी. दोन्ही प्रकारे ती विज्ञप्तीच आहे. วิการรูเปสุ. ‘‘กมฺมโยคฺยํ’’ติ อภิกฺกมนาทิกมฺเมสุ โยเชตุํ ยุตฺตํ. อทนฺธตา วุจฺจติ สีฆปฺปวตฺติ. สา ลกฺขณํ อสฺสาติ วิคฺคโห. สรีร กฺริยานุกุโล กมฺมญฺญภาโว ลกฺขณํ ยสฺสาติ สมาโส. ‘‘ธาตุโย’’ติ มหาภูตธาตุโย วา, ปิตฺตเสมฺหาทิธาตุโย วา. ปูติมุขสปฺปสงฺขาตสฺส อาปสฺส ปริยุฏฺฐานนฺติ วากฺยํ. อสยฺหภาโร นาม วหิตุํ [Pg.206] อสกฺกุเณยฺยภาโร. ‘‘สา ปวตฺตตี’’ติ กายลหุตา ปวตฺตติ. ถทฺธํ กโรนฺติ สรีรคตา ธาตุโยติ อธิกาโร. ภุสํ มาเรตีติ อามริโก. ทกาโร อาคโม. คามนิคมวิลุปฺปโก โจรคโณ. ตสฺส ภเยน ปริยุฏฺฐิตํ. ‘‘วิวฏฺฏมานํ’’ติ วิรูปํ หุตฺวา วฏฺฏนฺตํ. ‘‘มูลภูตา โหตี’’ติ อสปฺปาย เสวเน สติ, สา ปถมํ ปริยุฏฺฐาติ. สีตาธิกาวา โหติ, อุณฺหาธิกาวา. ตาย ปริยุฏฺฐิตาย เอว สพฺพปริยุฏฺฐานานิ ปวตฺตนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อิมาปนติสฺโส รูปชาติโย รูปกายสฺส วิเสสาการา โหนฺติ. อิติ ตสฺมา วิการรูปํ นามาติ โยชนา. विकाररूपांमध्ये. “कर्मयोग्य” (कम्मयोग्यं) म्हणजे पुढे जाणे इत्यादी कर्मांमध्ये योजण्यास योग्य. 'अदंधता' (अळमळम न करणे) म्हणजे शीघ्रप्रवृत्ती (जलद गती). ती जिचे लक्षण आहे, असा विग्रह आहे. शरीराच्या क्रियेला अनुकूल असलेला कर्मण्यताभाव (कार्यक्षमता) हे जिचे लक्षण आहे, असा समास आहे. “धातू” (धातुयो) म्हणजे महाभूत धातू किंवा पित्त, श्लेष्मा (कफ) इत्यादी धातू. 'पूतिमुख' नावाच्या सर्पाच्या विषाचे (आपाचे) बळावणे (परियुत्थान), असे हे वाक्य आहे. 'असह्यभार' म्हणजे वाहून नेण्यास अशक्य असलेला भार. “ती प्रवृत्त होते” (सा पवत्तति) म्हणजे कायलहुता (शरीराचा हलकेपणा) प्रवृत्त होते. शरीरातील धातू जड किंवा ताठर करतात, हा अधिकार आहे. अतिशय मारतो तो 'आमरिक' (आघात करणारा). येथे 'द' कार हा आगम (अतिरिक्त वर्ण) आहे. गाव आणि नगरे लुटणारा चोरांचा समूह. त्याच्या भयाने ग्रस्त (व्याप्त). “विवट्टमान” (विवट्टमानं) म्हणजे विरूप (विकृत) होऊन फिरणारे किंवा बदलणारे. “मूळभूत होते” (मूलभूता होति) म्हणजे अहितकारक (असात्त्विक) गोष्टींचे सेवन केले असता, ती प्रथम बळावते. ती एकतर अतिशय थंड असते किंवा अतिशय उष्ण असते. ती बळावल्यानेच इतर सर्व विकार बळावतात, असे सांगितले आहे. “या तीन रूपजाती रूपकायाचे विशेष आकार आहेत. म्हणून त्यांना विकाररूप म्हटले जाते”, अशी योजना आहे. ลกฺขณรูเปสุ. ‘‘จยนํ’’ติ สญฺจิตภาวคมนํ. ‘‘อาทิโต’’ติอาทิมฺหิ. ‘‘อุปริโต’’ติ อุปริภาเค. ‘‘อาจโย’’ติอาทิมฺหิ จโย. ‘‘อุปจโย’’ติ อุปรูปริจโย. ‘‘อทฺธานปูรณวเสนา’’ติ วสฺสสตมฺปิ วสฺสสหสฺสมฺปิ ทีฆกาลํ อตฺตภาวํ ปูรณวเสน. ‘‘เตน ปริยาเยนา’’ติ อุปสทฺทสฺส อตฺถนานตฺตํ อจินฺเตตฺวา นิพฺพตฺตึ วฑฺฒิยํ อนฺโตคธํ กตฺวา วุตฺเตน เตนปริยาเยน. ตสฺส จ เอเกกสฺส สนฺตติ ปจฺจุปฺปนฺนสฺส. ตตฺถ จิตฺตชรูเปสุ อสฺสาส ปสฺสาสานํ วา ปทวารหตฺถวาราทีนํ วา อกฺขรานํ วา นิพฺพตฺติ วฑฺฒิ ปวตฺติโย ทิสฺสนฺติเยว. ตถา นานาจิตฺตสมุฏฺฐิตานํ นานารูปสนฺตตีนํ ปีติ. อุตุชรูเปสุ อิริยา ปถนานตฺตํ ปฏิจฺจ สุขทุกฺขชนกานํ นานารูปสนฺตตีนํ นิพฺพตฺติวฑฺฒิปวตฺติโย ทิสฺสนฺติเยว. ตถา พหิทฺธา ขาณุกณฺฏกาทิสมฺผสฺเสน สีตุณฺหาทิสมฺผสฺเสน วาตาตปาทิสมฺผสฺเสน วา สรีเร อุปฺปนฺนานํ นานารูปสนฺตตีนมฺปิ จกฺขุโรคาทิรูปานมฺปีติ. อาหารชรูเปสุ อาหารนานตฺตํ ปฏิจฺจ สรีเร อุปฺปนฺนานํ สมวิสมรูปสนฺตตีนํติ. ‘‘อยํ นโย’’ติ พหิทฺธาสนฺตาเน นิทสฺสน นโย. เตน อชฺฌตฺตสนฺตาเนปิ สตฺตสนฺตานานํ หตฺถปาทาทิสนฺตานานํ เกสโลมาทิ สนฺตานานญฺจ นิพฺพตฺติ วฑฺฒิปวตฺติโย นิทสฺเสติ. ‘‘ชีรณํ’’ติ อภินวาวตฺถโต หายนํ. ปาฬิปาเฐ. ‘‘ฐิตสฺส อญฺญถตฺตํ’’ติ อญฺโญ ปกาโร อญฺญถา. อญฺญถา ภาโว อญฺญถตฺตํ[Pg.207]. เอเตน ชราวเสนวา นานาโรคาพาธาทิวเสน วา วิปริณาโม วุตฺโต. ‘‘ตถา อวตฺถาเภทโยคโต’’ติ ชาติรูปเมว อาทิมฺหิ นิพฺพตฺติ โหติ. ตโตปรํ ตเมว วฑฺฒิ โหติ. ตโต ปรํ ตเมว ปวตฺติ โหตีติ เอวํ ตถา อวตฺถาเภทโยคโต. เตนาห ‘‘สาหี’’ติอาทึ. ‘‘ปพนฺธยตี’’ติ ปพนฺธํ กโรติ. สงฺคหคาถาทีสุ ปน สุวิญฺเญยฺยา. ‘‘เอตฺถ จ ปจฺฉิมานี’’ติอาทีสุ. โวหารสิทฺธมตฺตภาวํ’’ติ ปุคฺคโล สตฺโต อตฺตา ชีโวติอาทิกา ปญฺญตฺติ นาม โวหาร สิทฺธมตฺตา โหติ. สภาวสิทฺธา น โหติ. สาหิ มหาชเนหิ ขนฺธ ปญฺจกํ อุปาทาย ปุคฺคโล นาม อตฺถีติ สมฺมตตฺตา โวหริตตฺตา โวหารสิทฺธา นาม. สภาวสิทฺธา ปน น โหติ. ตสฺมา อริยานํ โวหาเร ปุคฺคโล นาม นตฺถีติ สิชฺฌติ. อิมานิ ปน รูปานิ สภาวสิทฺธตฺตา อริยานํ โวหาเรปิ อตฺถีติ สิชฺฌนฺติ. เตนาห ‘‘ตาทิเสนา’’ติอาทึ. ‘‘สุทฺธธมฺมคติยา สิทฺเธนา’’ติ ปถวีธาตุ นาม สุทฺธธมฺโม โหติ. สา อุปฺปาทมฺปิ คจฺฉติ, ชรมฺปิ คจฺฉติ, เภทมฺปิ คจฺฉติ. ตสฺมา ตสฺสา อุปฺปาโทปิ ชราปิ เภโทปิ สุทฺธธมฺมคติยา สิทฺโธ นาม. เอวํ ลกฺขณรูปานํ สุทฺธธมฺมคติสิทฺธํ ปรมตฺถลกฺขณํ เวทิตพฺพํ. ตถา วิญฺญตฺติ ทฺวยสฺสปิ วิการรูปตฺตยสฺสปิ ปริจฺเฉท รูปสฺสปีติ. ยถา จ อิเมสํ รูปานํ. ตถา นิพฺพานสฺสปิ สุทฺธธมฺมคติสิทฺธํ ปรมตฺถลกฺขณํ อตฺถิเยว. กิเลสธมฺมาหิ อริยมคฺเค อภาวิเต ภวปรมฺปราย อุปฺปาทํ คจฺฉนฺติเยว. ภาวิเตปน อนุปฺปาทํ นิโรธํ คจฺฉนฺติเยว. ตสฺมา กิเลสธมฺมานํ อนุปฺปาทนิโรโธปิ สุทฺธธมฺมคติยา สิทฺโธ นาม. เอวํ นิพฺพานสฺสปิ สุทฺธธมฺมคติสิทฺธํ ปรมตฺถลกฺขณํ เวทิตพฺพํ. อตฺถิ ภิกฺขเว อชาตํ อภูตนฺติ อิทํ สุตฺตํปิ เอตฺถ วตฺตพฺพํ. เอเตน อริยโวหาเร นิพฺพานสฺส เอกนฺเตน อตฺถิตา ภควตา วุตฺตา โหติ. เตนาห ‘‘อิตรถา’’ติอาทึ. ‘‘นสภาวโต อนุปลทฺธตฺตา อนิปฺผนฺนานิ นาม โหนฺตี’’ติ เอเตน เอตานิ อสภาวรูปานีติ จ อลกฺขณ รูปานีติ จ อสมฺมสนรูปานีติ จ น สกฺกา วตฺตุํติปิ ทีเปติ. กสฺมา, ยถาสกํ สภาเวหิ สภาววนฺตตฺตา ยถาสกํ ลกฺขเณ หิ สลกฺขณตฺตา [Pg.208] ปฏิสมฺภิทามคฺเค สมฺมสนญฺญาณ วิภงฺเค ชาติชรามรณานมฺปิ สมฺมสิตพฺพธมฺเมสุ อาคตตฺตาติ. อฏฺฐสาลินิยมฺปิ อยมตฺโถ วุตฺโตเยว. ยถาห ปรินิปฺผนฺนนฺติ ปนฺนรสรูปานิ ปรินิปฺผนฺนานิ นาม. ทสรูปานิ อปรินิปฺผนฺนานิ นาม. ยทิ อปรินิปฺผนฺนานิ นาม. เอวํสติ, อสงฺขตานิ นาม สิยุํ. เตสํเยว ปนรูปานํ กายวิกาโร กายวิญฺญตฺติ นาม. วจีวิกาโร วจีวิญฺญตฺติ นาม. ฉิทฺทํ วิวรํ อากาสธาตุ นาม. ลหุภาโว ลหุตา นาม. มุทุภาโว มุทุตา นาม. กมฺมญฺญภาโว กมฺมญฺญตา นาม. นิพฺพตฺติ อุปจโย นาม. ปวตฺติ สนฺตติ นาม. ชีรณากาโร ชรตา นาม. หุตฺวา อภาวากาโร อนิจฺจตา นามาติ สพฺพํ ปรินิปฺผนฺนํ สงฺขตเมวาติ. ตตฺถ ‘‘เตสํเยว รูปานํ’’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมํ. เตสํเยว ทสนฺนํ รูปานํ มชฺเฌติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อิติสพฺพํ’’ติ อิทํ สพฺพํ ทสวิธํ รูปํ ปรินิปฺผนฺนเมว สงฺขตเมวาติ อตฺโถ. ขนฺธวิภงฺคฏฺฐกถายมฺปิ วุตฺโตว. ยถาห ปญฺจวิปนขนฺธา ปรินิปฺผนฺนาว โหนฺติ, โน อปรินิปฺผนฺนา. สงฺขตาว, โน อสงฺขตา. อปิจ นิปฺผนฺนาปิ โหนฺติเยว. สภาวธมฺเมสุหิ นิพฺพานเมเวกํ อปรินิปฺผนฺนํ อนิปฺผนฺนญฺจาติ จ. นิโรธสมาปตฺติ จ นาม ปญฺญตฺติ จ กถนฺติ. นิโรธสมาปตฺติ โลกิยโลกุตฺตราติ วา สงฺขตาสงฺขตาติ วา ปรินิปฺผนฺนาปรินิปฺผนฺนาติ วา น วตฺตพฺพา. นิปฺผนฺนา ปน โหติ. สมาปชฺชนฺเตน สมาปชฺชิตพฺพโต. ตถา นามปญฺญตฺติ, สาปิหิ โลกิยาทิเภทํ นลภติ. นิปฺผนฺนา ปน โหติ. โน อนิปฺผนฺนา. นามคฺคหณญฺหิ คณฺหนฺโตว คณฺหาตีติ จ. เอเตน ลกฺขณรูปานมฺปิ นิปฺผนฺนตา สิทฺธา โหติ. วิสุทฺธิ มคฺเคปน นิปฺผนฺนํ อนิปฺผนฺนํติทุกสฺส นิทฺเทเส. อฏฺฐารสวิธํ รูปํ ปริจฺเฉทวิการ ลกฺขณภาวํ อติกฺกมิตฺวา สภาเวเนว ปริคฺคเหตพฺพโต นิปฺผนฺนํ, เสสํ ตพฺพิปรีตตาย อนิปฺผนฺนนฺติ จ. นิปฺผนฺนรูปํ ปน รูปรูปํ นามาติ จ. ยํ จตูหิ กมฺมาทีหิ ชาตํ, ตํ จตุชํ นาม. ตํ ลกฺขณ รูปวชฺชํ อวเสสรูปํ. ลกฺขณรูปํ ปน น กุโตจิชาตนฺติ จ วุตฺตํ. สพฺพญฺเจตํ อาจริเยหิ คหิตนามมตฺตตฺตา วตฺติจฺฉานุคตํ โหติ. ยํ รุจฺจติ, ตํ คเหตฺวา กเถตพฺพนฺติ. लक्षणरूपांमध्ये. "चयन" म्हणजे संचित भाव प्राप्त होणे (संचित होणे). "आदितो" म्हणजे सुरुवातीला. "उपरितो" म्हणजे वरच्या भागात. "आचय" म्हणजे सुरुवातीचा संचय. "उपचय" म्हणजे वरचेवर होणारा संचय. "अद्धानपूरणवसेन" म्हणजे शंभर वर्षे किंवा हजार वर्षे अशा दीर्घकाळापर्यंत आत्मभावाचे (अस्तित्वाचे) पूरण करण्याच्या दृष्टीने. "तेन परियायेन" (त्या पर्यायाने) म्हणजे 'उप' या उपसर्गाच्या अर्थातील भिन्नतेचा विचार न करता, उत्पत्ती आणि वृद्धी यांचा अंतर्भाव करून सांगितलेल्या त्या पर्यायाने. आणि त्या प्रत्येकाची संतती (प्रवाह) वर्तमानकालीन असते. त्यामध्ये, चित्तज रूपांमध्ये (चित्तापासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपांमध्ये) श्वास-प्रश्वास, पाऊल टाकणे किंवा हात हलवणे इत्यादी क्रिया, किंवा अक्षरांची उत्पत्ती, वृद्धी आणि प्रवृत्ती (चालू राहणे) स्पष्टपणे दिसून येतेच. तसेच, विविध चित्तांमधून उत्पन्न होणाऱ्या विविध रूप-संततींची प्रीती (आनंद) देखील दिसून येते. ऋतुज रूपांमध्ये (तापमानामुळे उत्पन्न होणाऱ्या रूपांमध्ये) शारीरिक हालचालींच्या विविधतेवर अवलंबून असणाऱ्या, सुख आणि दुःख निर्माण करणाऱ्या विविध रूप-संततींची उत्पत्ती, वृद्धी आणि प्रवृत्ती दिसून येतेच. तसेच बाह्यतः खुंट, काटे इत्यादींच्या स्पर्शाने, किंवा थंड-उष्णतेच्या स्पर्शाने, किंवा वारा-उन्हाच्या स्पर्शाने शरीरात उत्पन्न होणाऱ्या विविध रूप-संततींची आणि डोळ्यांचे आजार इत्यादी रूपांची देखील (उत्पत्ती, वृद्धी व प्रवृत्ती दिसून येते). आहारज रूपांमध्ये (आहारापासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपांमध्ये) आहाराच्या विविधतेवर अवलंबून असणाऱ्या, शरीरात उत्पन्न होणाऱ्या सम आणि विषम रूप-संततींची (उत्पत्ती, वृद्धी व प्रवृत्ती दिसून येते). "अयं नयो" (हा नियम) हा बाह्य संततीमधील उदाहरणाचा नियम आहे. त्याद्वारे अध्यात्म-संततीमध्ये (अंतर्गत प्रवाहात) देखील सत्त्व-संततीची, हात-पाय इत्यादींच्या संततीची आणि केस, रोम इत्यादींच्या संततीची उत्पत्ती, वृद्धी आणि प्रवृत्ती दर्शविली जाते. "जीरण" म्हणजे नवीन अवस्थेपासून होणारा ऱ्हास (झीज). पाळिपाठात. "ठितस्स अञ्ञथत्तं" (स्थितीचे अन्यथात्व) म्हणजे दुसरा प्रकार म्हणजे 'अन्यथा'. अन्यथा असण्याचा भाव म्हणजे 'अन्यथात्व' (बदल). याद्वारे जरेमुळे (वृद्धत्वामुळे) किंवा विविध रोग-व्याधी इत्यादींमुळे होणारा विपरिणाम (बदल) सांगितला आहे. "तथा अवस्थाभेदयोगतो" (तसेच अवस्थांच्या भेदाच्या संबंधाने) म्हणजे सुरुवातीला जातिरूपच उत्पत्ती असते. त्यानंतर तीच वृद्धी होते. त्यानंतर तीच प्रवृत्ती होते; अशा प्रकारे अवस्थांच्या भेदाच्या संबंधाने (हे घडते). म्हणूनच "सा ही" (तीच ही) इत्यादी म्हटले आहे. "पबंधयति" म्हणजे प्रबंध (सातत्य) निर्माण करते. संग्रहगाथा इत्यादींमध्ये तर हे सहज समजण्यासारखे आहे. "एत्थ च पच्छिमानि" (आणि येथे शेवटची) इत्यादींमध्ये. "वोहारसिद्धमत्तभावं" (केवळ व्यवहाराने सिद्ध असणारा भाव) म्हणजे पुद्गल, सत्त्व, आत्मा, जीव इत्यादी संज्ञा केवळ व्यवहाराने सिद्ध असतात. त्या स्वभावसिद्ध नसतात. कारण, सामान्य लोकांद्वारे पंचस्कंधांना ग्रहण करून 'पुद्गल नावाचा कोणीतरी आहे' असे मानले गेल्यामुळे आणि व्यवहारात आणले गेल्यामुळे ती 'व्यवहारसिद्ध' मानली जाते. परंतु ती स्वभावसिद्ध नसते. म्हणूनच, आर्यांच्या व्यवहारात 'पुद्गल' नावाचे काहीही अस्तित्वात नाही, हे सिद्ध होते. परंतु ही रूपे स्वभावसिद्ध असल्यामुळे आर्यांच्या व्यवहारात देखील अस्तित्वात आहेत, हे सिद्ध होते. म्हणूनच "तादिसेन" (तशा प्रकारच्या) इत्यादी म्हटले आहे. "शुद्धधम्मगतिया सिद्धेन" (शुद्ध धर्माच्या गतीने सिद्ध झालेल्या) म्हणजे पृथ्वीधातू हा शुद्ध धर्म आहे. तो उत्पत्तीलाही प्राप्त होतो, जरेलाही प्राप्त होतो आणि भेदालाही प्राप्त होतो. म्हणूनच, त्याची उत्पत्ती, जरा आणि भेद हे देखील शुद्ध धर्माच्या गतीने सिद्ध झालेले आहेत. अशा प्रकारे, लक्षणरूपांचे शुद्ध धर्माच्या गतीने सिद्ध झालेले परमार्थ-लक्षण समजून घ्यावे. तसेच दोन्ही विज्ञप्तींचे, तिन्ही विकाररूपांचे आणि परिच्छेद रूपाचे देखील (परमार्थ-लक्षण समजून घ्यावे). आणि ज्याप्रमाणे या रूपांचे परमार्थ-लक्षण आहे, त्याचप्रमाणे निर्वाणाचे देखील शुद्ध धर्माच्या गतीने सिद्ध झालेले परमार्थ-लक्षण आहेच. कारण, आर्यमार्गाची भावना न केल्यास क्लेशधर्म भवपरंपरेत उत्पत्तीलाच प्राप्त होतात. परंतु भावना केल्यास ते अनुत्पाद आणि निरोधाला प्राप्त होतात. म्हणूनच, क्लेशधर्मांचा अनुत्पाद आणि निरोध देखील शुद्ध धर्माच्या गतीने सिद्ध झालेला आहे. अशा प्रकारे, निर्वाणाचे देखील शुद्ध धर्माच्या गतीने सिद्ध झालेले परमार्थ-लक्षण समजून घ्यावे. 'भिक्खूहो, जे अजन्म आहे, जे अभूत आहे, ते अस्तित्वात आहे' हे सूत्र देखील येथे सांगितले पाहिजे. याद्वारे आर्यांच्या व्यवहारात निर्वाणाचे एकांताने (निश्चितपणे) अस्तित्व आहे, असे भगवंतांनी सांगितले आहे. म्हणूनच "इतरथा" (अन्यथा) इत्यादी म्हटले आहे. "स्वभावाने उपलब्ध न झाल्यामुळे ती अनिष्पन्न असतात" याद्वारे ही 'अस्वभावरूपे' आहेत, 'अलक्षणरूपे' आहेत आणि 'असमसनरूपे' आहेत, असे म्हणता येत नाही, हे देखील स्पष्ट होते. कारण, आपापल्या स्वभावांमुळे ती स्वभावयुक्त आहेत, आपापल्या लक्षणांमुळे ती स्वलक्षणयुक्त आहेत आणि पटिसंभिदामग्ग मधील 'समसनज्ञान विभंग' मध्ये जाती, जरा आणि मरण यांचा देखील मनन करण्याजोग्या धर्मांमध्ये समावेश झाला आहे. अट्ठसालिनीमध्ये देखील हाच अर्थ सांगितला आहे. जसे म्हटले आहे - 'परिनिष्पन्न' म्हणजे पंधरा रूपे परिनिष्पन्न आहेत. दहा रूपे अपरिनिष्पन्न आहेत. जर ती अपरिनिष्पन्न असतील, तर ती असंस्कृत ठरतील. परंतु, त्याच रूपांचा कायविकार म्हणजे 'कायविज्ञप्ती' होय. वाग्विकार म्हणजे 'वचीविज्ञप्ती' होय. छिद्र किंवा विवर म्हणजे 'आकाशधातू' होय. हलकेपणा म्हणजे 'लहुता' होय. कोमलता म्हणजे 'मुदुता' होय. कर्मण्यता म्हणजे 'कम्मञ्ञता' होय. उत्पत्ती म्हणजे 'उपचय' होय. प्रवृत्ती म्हणजे 'संतती' होय. जीर्ण होण्याची अवस्था म्हणजे 'जरता' होय. अस्तित्वात येऊन नष्ट होणे म्हणजे 'अनिच्चता' होय; अशा प्रकारे हे सर्व परिनिष्पन्न आणि संस्कृतच आहे. त्यामध्ये "तेसंयेव रूपानां" (त्याच रूपांचे) हे निर्धारण अर्थातील सप्तमी विभक्तीचे रूप आहे. याचा अर्थ 'त्याच दहा रूपांच्या मध्ये' असा सांगितला आहे. "इतिसब्बं" म्हणजे हे सर्व दहा प्रकारचे रूप परिनिष्पन्नच आणि संस्कृतच आहे, असा अर्थ आहे. खंधविभंग-अट्ठकथेमध्ये देखील हे सांगितलेच आहे. जसे म्हटले आहे - 'पाचही उपादानस्कंध परिनिष्पन्नच असतात, अपरिनिष्पन्न नव्हे. ते संस्कृतच असतात, असंस्कृत नव्हे. शिवाय, ते निष्पन्न देखील असतातच. कारण स्वभावधर्मांमध्ये केवळ निर्वाण हेच एक अपरिनिष्पन्न आणि अनिष्पन्न आहे.' आणि निरोधसमापत्ती व प्रज्ञप्ती यांच्याविषयी काय म्हणावे? निरोधसमापत्ती ही लौकिक-लोकोत्तर आहे, किंवा संस्कृत-असंस्कृत आहे, किंवा परिनिष्पन्न-अपरिनिष्पन्न आहे, असे म्हणता येत नाही. परंतु ती निष्पन्न असते, कारण समापत्तीला प्राप्त होणाऱ्या व्यक्तीद्वारे ती प्राप्त केली जाते. तसेच नामप्रज्ञप्ती देखील लौकिक इत्यादी भेद प्राप्त करत नाही. परंतु ती निष्पन्न असते, अनिष्पन्न नव्हे. कारण नाम ग्रहण करणारा मनुष्य ते ग्रहण करतोच. याद्वारे लक्षणरूपांची देखील निष्पन्नता सिद्ध होते. विसुद्धिमग्ग मध्ये तर 'निष्पन्न आणि अनिष्पन्न' या द्विकाच्या निर्देशात (असे म्हटले आहे) - अठरा प्रकारचे रूप हे परिच्छेद, विकार आणि लक्षणभाव ओलांडून स्वभावानेच ग्रहण करण्याजोगे असल्यामुळे 'निष्पन्न' आहे, आणि उर्वरित रूपे त्याच्या विपरीत असल्यामुळे 'अनिष्पन्न' आहेत. आणि निष्पन्न रूपाला 'रूपरूप' असे म्हणतात. जे कर्म इत्यादी चार कारणांमुळे उत्पन्न होते, त्याला 'चतुज' म्हणतात. ते लक्षणरूप वगळता उर्वरित रूप आहे. लक्षणरूप मात्र कशापासूनही उत्पन्न होत नाही, असे म्हटले आहे. आणि हे सर्व आचार्यांनी केवळ नाव म्हणून स्वीकारलेले असल्यामुळे बोलण्याच्या इच्छेनुसार असते. जे योग्य वाटेल, ते स्वीकारून सांगितले पाहिजे. รูปสมุทฺเทสานุทีปนา นิฏฺฐิตา. रूपसमुद्देसानुदीपना समाप्त झाली. ๑๙๗. รูปวิภาเค[Pg.209].‘‘เอกวิธนยํ ตาว ทสฺเสตุํ’’ติ รูปวิภาคโต ปถมํ ทสฺเสตุํ. เอเตน เอกวิธนโย รูปวิภาโค นาม น ตาว โหตีติ ทสฺเสติ. ตํ น สเมติ. เกน น สเมตีติ อาห ‘‘วกฺขติหี’’ติอาทึ. ‘‘อชฺฌตฺติกาทิเภเทน วิภชนฺติ วิจกฺขณา’’ติ เอเตน สพฺพํรูปํ อชฺฌตฺติกพาหิรวเสน ทุวิธนฺติอาทิโก ทุวิธนโย เอว รูปวิภาคนโย นามาติ วิญฺญายติ. ตสฺมา เตน น สเมตีติ วุตฺตํ โหติ. อปิจ ปาฬิยํ. สเหตุกา ธมฺมา, อเหตุกา ธมฺมาติอาทิ ทุเกสุ สพฺพํรูปํ อเหตุกเมว, น สเหตุกนฺติอาทิ นิยมกรณมฺปิ รูปวิภาโค เอวาติ กตฺวา ตถา วุตฺตนฺติ คเหตพฺพํ. ‘‘อิตรานิ ปนา’’ติ กามาวจรนฺติอาทีนิ ปน. ‘‘ชนเกน ปจฺจเยนา’’ติ ปธานวจนเมตํ. อุปตฺถมฺภกาทิ ปจฺจยาปิ คเหตพฺพา เอว. ‘‘สงฺคมฺมา’’ติ สมาคนฺตฺวา. ‘‘กรียตี’’ติ นิปฺผาทียติ. โยธมฺโมติอาทีสุ. ‘‘ปหีโน ปี’’ติ ฉินฺทนภินฺทนาทิวเสน ปหีโนปิ. ‘‘ตสฺมึ สตี’’ติ สมุทยปฺปหาเน สติ. กิจฺจปจฺจยานํ อรหตฺถสฺส จ สกฺกตฺถสฺส จ ทีปนโต ทุวิธํ อตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อฏฺฐานตฺตา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘ตพฺพิสยสฺสา’’ติ รูปวิสยสฺส. ‘‘เอวํ’’ติ เอวํสนฺเต. ‘‘ปหีนํ ภวิสฺสตี’’ติ อนาคตภเว ปุน อนุปฺปาทตฺถาย อิเธว ปหีนํ ภวิสฺสตีติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘อุจฺฉินฺนมูลํ’’ติอาทึ. ‘‘ตาลาวตฺถุกตํ’’ติ ฉินฺนตาลกฺขาณุกํ วิย กตํ ภวิสฺสติ. ‘‘อนภาวํ กตํ’’ติ ปุน อภาวํ กตํ. ‘‘ปากโฏ’’ติ ทสฺสนาทิกิจฺจวิเสเสหิ ปญฺญาโต. ‘‘ตทุปาทายา’’ติ ตํ อุปนิธาย. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘อชฺฌตฺติกรูปํ’’ติ ปทุทฺธารณํ. อตฺตานํ อธิกิจฺจ ปวตฺตํ อชฺฌตฺตํ. อชฺฌตฺตเมว อชฺฌตฺติกนฺติ ทสฺเสติ ‘‘อตฺตภาวสงฺขาตํ’’ติอาทินา. ตํ น สุนฺทรํ. กสฺมา, อชฺฌตฺตธมฺม อชฺฌตฺติก ธมฺมานญฺจ อวิเสโส อาปชฺชตีติ วกฺขมานการณตฺตา. ‘‘ทฺวารรูปํ นามา’’ติ ปทุทฺธารปทํ. กสฺมา ทฺวารรูปํ นามาติ อาห ‘‘ยถากฺกมํ’’ติอาทึ. ปรโตปิ เอสนโย. ‘‘เทสนาเภท รกฺขณตฺถํ’’ติ ทุกเทสนาเภทโต รกฺขณตฺถํ. ตตฺถ เทสนาเภโท นาม รูปกณฺเฑ ปญฺจวิญฺญาณานํ วตฺถุ รูปญฺจ, น วตฺถุ รูปญฺจ[Pg.210], อารมฺมณ รูปญฺจ, น อารมฺมณ รูปญฺจ วตฺวา มโนวิญฺญาณสฺส น วุตฺตํ. ยทิ วุจฺเจยฺย, อารมฺมณทุเก มโนวิญฺญาณสฺส อารมฺมณ รูปํ, น อารมฺมณ รูปนฺติ ทุกปทํ น ลพฺเภยฺย. อยํ เทสนาเภโท นาม. วตฺถุทุเกสุ หทยวตฺถุวเสน ลพฺภมานํ มโนวิญฺญาณทุกํ น วุตฺตนฺติ. ‘‘ถูลสภาวตฺตา’’ติ สุขุมรูปํ อุปาทาย วุตฺตํ. ‘‘ทูเร ปวตฺตสฺสปี’’ติ ยถา สุขุมรูปํ อตฺตโน สรีเร ปวตฺตมฺปิ ญาเณน สีฆํ ปริคฺคเหตุํ น สกฺกา โหติ, ตถา อิทํ. อิมสฺส ปน ทูเร ปวตฺตสฺสปิ. ‘‘คหณโยคฺยตฺตา’’ติ ญาเณน ปริคฺคหณปตฺตตฺตาติ อธิปฺปาโย. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘สยํนิสฺสยวเสน จา’’ติ สยญฺจ นิสฺสย มหาภูตวเสน จ. ตตฺถ สยํ สมฺปตฺตา นาม โผฏฺฐพฺพธาตุโย. นิสฺสยวเสน สมฺปตฺตา นาม คนฺธรสา. อุภยถาปิ อสมฺปตฺตา นาม จกฺขุ รูป, โสต สทฺทา. โย ปฏิมุขภาโว อตฺถิ, ยํ อญฺญมญฺญปตนํ อตฺถีติ โยชนา. น จ ตานิ อญฺญปฺปการานิ เอว สกฺกา ภวิตุนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อนุคฺคห อุปฆาตวเสนา’’ติ วฑฺฒนตฺถาย อนุคฺคหวเสน, หายนาทิ อตฺถาย อุปฆาตวเสน. ‘‘ยํ กิญฺจี’’ติ จตุสมุฏฺฐานิกรูปํ คณฺหาติ. ‘‘อาทินฺนปรามฏฺฐตฺตา’’ติ ตณฺหามาเนหิ เอตํ มม เอโสหมสฺมีติอาทินฺนตฺตา, ทิฏฺฐิยา เอโส เม อตฺตาติ ปรามฏฺฐตฺตา จ. ‘‘นิจฺจกาลํ ปวตฺติวเสนา’’ติ เอเกน ชนกกมฺเมน ปฏิสนฺธิกฺขณโต ปฏฺฐาย นิจฺจกาลํ ปวตฺติวเสน. ‘‘อุปจรียตี’’ติ โวหรียติ. ‘‘อตฺถวิเสสโพโธ’’ติ รูปารมฺมณสฺส กิจฺจวิเสสโพโธ. ‘‘อสมฺปตฺตวเสนา’’ติ วิสยฏฺฐานํ สยํ อสมฺปชฺชนวเสน. อตฺตโนฐานํ วา วิสยสฺส อสมฺปชฺชนวเสน. ตตฺถ วิสยสฺส อสมฺปตฺตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิมาห. ตถา โสตสทฺเทสุ จ อญฺญมญฺญํ ลคฺคิตฺวา อุปฺปชฺชมาเนสุ. ‘‘สมฺปตฺติยา เอวา’’ติ สมฺปชฺชนตฺถาย เอว. ตถา อาโป จ สมฺปตฺติยา เอว ปจฺจโยติ โยชนา. ทุพฺพลปถวี เอว สนฺนิสฺสโย ยสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘อสฺสา’’ติ จกฺขุสฺส. ‘‘โสตสฺสปนกถํ’’ติ โสตสฺส อสมฺปตฺตคฺคหณํ กถํ ปากฏํ. สมฺปตฺตคฺคหณํ เอว ปากฏนฺติ ทีเปติ. เตนาห ‘‘ตตฺถหี’’ติอาทึ[Pg.211]. ทกฺขิณปสฺสโต วา สุยฺยติ, เจติยาทิกสฺส ปุรตฺถิมทิสาภาเค ฐิตานนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปฏิฆฏฺฏนานิฆํโส’’ติ โสเตสุ ปฏิฆฏฺฏนเวโค. ‘‘เตสํ’’ติ อาสนฺเนวา ทูเร วา ฐิตานํ. โหตุ ทูเร ฐิตานํ จิเรน สุโตติ อภิมาโน. กสฺมา ปน อุชุกํ อสุตฺวา ทกฺขิณปสฺสโตวา อุตฺตรปสฺสโต วา สุเณยฺย, อสุยฺยมาโน ภเวยฺยาติ ปุจฺฉา. ตํ กเถนฺโต ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘คนฺตฺวา วิสยเทสํ ตํ, ผริตฺวา คณฺหตีติ เจ’’ติ ตํ จกฺขุโสต ทฺวยํ ทูเรวิสยานํ อุปฺปนฺนเทสํ ผริตฺวา คณฺหตีติ เจวเทยฺยาติ อตฺโถ. ทูเรฐตฺวา ปสฺสนฺโต สุณนฺโต จ มหนฺตมฺปิปพฺพตํ เอกกฺขเณ ปสฺสติ, มหนฺตํปิ เมฆสทฺทํ เอกกฺขเณ สุณาติ. ตสฺมา อุภยํ อสมฺปตฺตโคจรนฺติ วิญฺญายติ. อิมสฺมึ วจเน ฐตฺวา อิทํ ปริกปฺปวจนํ ทสฺเสติ ตํ ทฺวยํ วิสยปฺปเทสํ คนฺตฺวา มหนฺตํปิ ปพฺพตํ วา เมฆสทฺทํ วา ผริตฺวา คณฺหาติ. ตสฺมา มหนฺตํปิ ปสฺสติ, สุณาติ. น อสมฺปตฺตโคจรตฺตา มหนฺตํ ปสฺสติ สุณาตีติ โกจิ วเทยฺยาติ วุตฺตํ โหติ. อธิฏฺฐานวิธาเนปิ ตสฺส โส โคจโร สิยาติ. เอวํสติ, ทิพฺพจกฺขุ ทิพฺพโสตาภิญฺญานํ อธิฏฺฐานวิธาเนปิ โส รูปสทฺทวิสโย ตสฺส ปสาทจกฺขุโสตสฺส โคจโร สิยาติ อภิญฺญาธิฏฺฐาน กิจฺจํ นาม นตฺถิ. จกฺขุโสตํ เทวโลกมฺปิ คนฺตฺวา ทิพฺพรูปมฺปิ ทิพฺพสทฺทมฺปิ คณฺเหยฺย. น ปน คณฺหาติ. ตสฺมา ตสฺส วิสยเทสคมนญฺจ มหนฺตเทสผรณญฺจ น จินฺเตตพฺพนฺติ วุตฺตํ โหติ. १९७. रूपविभागात (Rūpavibhāge). "प्रथम एकविध पद्धत (एकविधनय) दर्शविण्यासाठी" म्हणजे रूपविभागाच्या दृष्टीने प्रथम दर्शविण्यासाठी. याद्वारे हे दर्शविले जाते की, रूपविभाग नावाचा एकविध प्रकार अद्याप अस्तित्वात नाही. ते जुळत नाही. कशाशी जुळत नाही? म्हणून "वक्खति हि" (कारण पुढे सांगितले जाईल) इत्यादी म्हटले आहे. "बुद्धिमान लोक आध्यात्मिक (अज्झत्तिक) इत्यादी भेदांनी विभागणी करतात" याद्वारे हे समजते की, सर्व रूप हे आध्यात्मिक आणि बाह्य अशा दोन प्रकारांनी द्विविध आहे, हा द्विविध मार्गच (दुविधनय) रूपविभागणीचा मार्ग (रूपविभागनय) म्हणून ओळखला जातो. म्हणून, त्याच्याशी ते जुळत नाही, असे म्हटले आहे. शिवाय पाळिमध्ये (मूळ पाठात). "सहेतुक धम्म, अहेतुक धम्म" इत्यादी दुकांमध्ये (द्विक) "सर्व रूप हे अहेतुकच आहे, सहेतुक नाही" असा नियम करणे हा देखील रूपविभागच आहे, असे मानून तसे म्हटले आहे, असे समजावे. "परंतु इतर" म्हणजे कामावचर इत्यादी. "जनक प्रत्ययाद्वारे (उत्पादक कारणाने)" हे मुख्य वचन आहे. उपत्थंभक (पोषक) इत्यादी प्रत्यय देखील ग्रहण केले पाहिजेत. "संगम्म" म्हणजे एकत्र येऊन. "करीयति" म्हणजे निष्पन्न केले जाते. "यो धम्मो" इत्यादींमध्ये. "प्रहीण (नष्ट) झालेला असतानाही" म्हणजे छेदणे, भेदणे इत्यादींद्वारे प्रहीण झालेला असतानाही. "ते असताना" म्हणजे समुदय-प्रहाण (उत्पत्तीचा नाश) असताना. कृत्य-प्रत्ययांचे (कार्यांचे व कारणांचे) आणि अर्हत्त्वाचे व स्वार्थाचे (स्वतःच्या कल्याणाचे) प्रकटीकरण करण्यासाठी द्विविध अर्थ दर्शविण्याकरिता "अट्ठाणत्ता" (अस्थानत्वामुळे) इत्यादी म्हटले आहे. "त्याच्या विषयाचा" म्हणजे रूपविषयाचा. "असे" म्हणजे असे असताना. "प्रहीण होईल" म्हणजे अनागत (भविष्यातील) भवामध्ये पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी याच जन्मात प्रहीण होईल, असा अर्थ आहे. म्हणूनच "उच्छिन्नमूल" (मूळ उपटून टाकलेले) इत्यादी म्हटले आहे. "तालावत्थुकत" (ताडवृक्षाच्या बुंध्यासारखे केलेले) म्हणजे कापलेल्या ताडवृक्षाच्या बुंध्याप्रमाणे केले जाईल. "अनभाव कत" (अभाव केलेले) म्हणजे पुन्हा अस्तित्व नसलेले (अभाव) केलेले. "पाकट" (प्रकट/स्पष्ट) म्हणजे दर्शनादी विशिष्ट कृत्यांद्वारे ओळखले जाणारे. "तदुपादाय" म्हणजे त्याला अनुसरून. विभावनीच्या पाठात (विभावनीपाठे). "अज्झत्तिकरूप" (आध्यात्मिक रूप) हा शब्दोद्धार आहे. स्वतःला अधिकृत करून (स्वतःच्या संदर्भात) जे प्रवर्तित होते ते आध्यात्मिक (अज्झत्त) होय. आध्यात्मिक हेच 'अज्झत्तिक' आहे, हे "अत्तभावसंखात" (आत्मभाव संज्ञक) इत्यादींद्वारे दर्शविले आहे. ते योग्य नाही. कारण काय? कारण 'अज्झत्तधम्म' (आध्यात्मिक धम्म) आणि 'अज्झत्तिकधम्म' (आध्यात्मिकतेशी संबंधित धम्म) यांच्यात कोणताही भेद उरणार नाही, असे पुढे सांगितले जाणारे कारण असल्यामुळे. "द्वाररूप नाम" हा शब्दोद्धार आहे. त्याला 'द्वाररूप' का म्हणतात? म्हणून "यथाक्रम" इत्यादी म्हटले आहे. पुढेही हाच नियम (नय) आहे. "देशनाभेद रक्षणासाठी" म्हणजे द्विक-देशनाभेदापासून रक्षण करण्यासाठी. तेथे 'देशनाभेद' म्हणजे रूपकांडात पंचविज्ञानांचे वत्थुरूप (वस्तुरूप) आणि नवत्थुरूप, आरम्मणरूप (आलंबनरूप) आणि नआरम्मणरूप असे सांगून मनोविज्ञानासाठी सांगितले नाही. जर सांगितले असते, तर आरम्मण-द्विकामध्ये मनोविज्ञानाचे 'आरम्मणरूप' आणि 'नआरम्मणरूप' हे द्विकपद प्राप्त झाले नसते. यालाच 'देशनाभेद' म्हणतात. वत्थु-द्विकामध्ये हृदयवस्तूच्या आधारे प्राप्त होणारे मनोविज्ञान-द्विक सांगितले गेले नाही. "स्थूल स्वभाव असल्यामुळे" हे सूक्ष्म रूपाच्या (सुखुमरूप) तुलनेत म्हटले आहे. "दूर प्रवर्तित होत असतानाही" म्हणजे ज्याप्रमाणे सूक्ष्म रूप स्वतःच्या शरीरात प्रवर्तित होत असतानाही ज्ञानाने वेगाने ग्रहण करता येत नाही, त्याप्रमाणे हे आहे. परंतु, याचे दूर प्रवर्तित होत असतानाही. "ग्रहणयोग्य असल्यामुळे" म्हणजे ज्ञानाने ग्रहण करण्याच्या योग्यतेप्रत पोहोचल्यामुळे, असा अभिप्राय आहे. विभावनीच्या पाठात. "स्वतः आणि आश्रयाच्या (निस्सय) वशाने" म्हणजे स्वतः आणि आश्रयभूत महाभूतांच्या वशाने. तेथे 'स्वतः प्राप्त झालेले' म्हणजे फोठ्ठब्बधातू (स्पर्शधातू). 'आश्रयाच्या वशाने प्राप्त झालेले' म्हणजे गंध आणि रस. दोन्ही प्रकारे अप्राप्त म्हणजे चक्षु-रूप आणि श्रोत-शब्द. जो संमुखभाव (प्रतिमुखभाव) आहे, जे परस्परांवर आदळणे आहे, अशी योजना आहे. आणि ते इतर प्रकारे असणे शक्य नाही, असा संबंध आहे. "अनुग्रह आणि उपघाताच्या वशाने" म्हणजे वाढीसाठी अनुग्रहाच्या वशाने, आणि ऱ्हास इत्यादींसाठी उपघाताच्या वशाने. "जे काही" (यं किंचि) याद्वारे चतुःसमुत्थानिक रूप (चार कारणांनी उत्पन्न होणारे रूप) ग्रहण केले जाते. "आदिन्न-परामट्ठत्वामुळे" (ग्रहण व परामर्ष केल्यामुळे) म्हणजे तृष्णा आणि मानाने "हे माझे आहे, हा मी आहे" इत्यादी प्रकारे ग्रहण केल्यामुळे, आणि दृष्टीने "हा माझा आत्मा आहे" अशा प्रकारे परामर्ष केल्यामुळे. "नित्यकाळ प्रवृत्त राहण्याच्या वशाने" म्हणजे एकाच जनक कर्माद्वारे प्रतिसंधीच्या क्षणापासून घेऊन नित्यकाळ प्रवृत्त राहण्याच्या वशाने. "उपचरीयात" म्हणजे व्यवहारात आणले जाते. "अर्थविशेषबोध" म्हणजे रूपालंबनाच्या विशिष्ट कृत्याचा बोध. "अप्राप्त राहण्याच्या वशाने" म्हणजे स्वतः विषयाच्या स्थानापर्यंत न पोहोचण्याच्या वशाने. किंवा स्वतःच्या स्थानापर्यंत विषय न पोहोचण्याच्या वशाने. तेथे विषयाचे अप्राप्त असणे दर्शविताना "तथ" (तेथे) इत्यादी म्हटले आहे. त्याचप्रमाणे कान आणि शब्द परस्परांना स्पर्श करून उत्पन्न होत असताना. "संपत्तीनेच" म्हणजे पोहोचण्यासाठीच. त्याचप्रमाणे आपो-धातू देखील प्राप्तीनेच प्रत्यय होतो, अशी योजना आहे. "दुर्बल पृथ्वी हाच ज्याचा संनिश्रय (आश्रय) आहे" असा विग्रह आहे. "अस्स" (याच्या) म्हणजे चक्षूच्या. "श्रोताचे कसे?" म्हणजे श्रोताचे अप्राप्त ग्रहण कसे स्पष्ट होते? प्राप्त ग्रहणच स्पष्ट होते, हे तो दर्शवितो. म्हणूनच "तत्थ हि" इत्यादी म्हटले आहे. उजव्या बाजूने ऐकू येते, किंवा चैत्य इत्यादींच्या पूर्व दिशेला उभे असलेल्यांच्या बाबतीत, असा अभिप्राय आहे. "पटिघट्टन-निघंस" (प्रतिघात आणि घासणे) म्हणजे कानांवर होणारा आघाताचा वेग. "तेसं" (त्यांच्या) म्हणजे जवळ किंवा दूर उभे असलेल्यांच्या. दूर उभे असलेल्यांना उशिराने ऐकू आले, असा अभिमान (समज) असो. परंतु सरळ न ऐकता उजव्या बाजूने किंवा डाव्या बाजूने का ऐकू यावे, किंवा ऐकू न येणारे व्हावे? हा प्रश्न आहे. त्याचे स्पष्टीकरण करताना "अपि च" इत्यादी म्हटले आहे. विभावनीच्या पाठात. "जर असे म्हटले की, त्या विषयदेशात जाऊन, त्याला व्यापून ग्रहण करते" म्हणजे चक्षु आणि श्रोत हे दोन्ही दूरच्या विषयांच्या उत्पत्तीच्या स्थानाला व्यापून ग्रहण करतात, असे जर कोणी म्हटले तर, असा अर्थ आहे. दूर उभे राहून पाहणारा आणि ऐकणारा मनुष्य एकाच क्षणात मोठ्या पर्वतालाही पाहतो आणि एकाच क्षणात ढगांच्या मोठ्या गडगडाटालाही ऐकतो. म्हणून, हे दोन्ही 'अप्राप्तगोचर' आहेत, असे समजते. या वचनावर आधारित राहून तो हा कल्पित युक्तिवाद दर्शवितो की, ते दोन्ही विषयप्रदेशात जाऊन मोठ्या पर्वताला किंवा ढगांच्या आवाजाला व्यापून ग्रहण करतात. म्हणूनच ते मोठ्या गोष्टीलाही पाहतात आणि ऐकतात. 'अप्राप्तगोचर' असल्यामुळे ते मोठ्या गोष्टीला पाहतात आणि ऐकतात असे नाही, असे कदाचित कोणी म्हणेल, असे सांगितले आहे. "अधिष्ठान विधीमध्येही तो त्याचा गोचर होईल." असे असल्यास, दिव्यचक्षु आणि दिव्यश्रोत अभिज्ञांच्या अधिष्ठान विधीमध्येही तो रूप-शब्द विषय त्याच्या प्रसादचक्षु आणि प्रसादश्रोताचा विषय होईल, त्यामुळे अभिज्ञा-अधिष्ठान कृत्य नावाचे काही उरणार नाही. चक्षु आणि श्रोत देवलोकातही जाऊन दिव्य रूप आणि दिव्य शब्द ग्रहण करू शकतील. परंतु ते ग्रहण करत नाहीत. म्हणून, त्याचे विषयदेशात जाणे आणि मोठ्या प्रदेशाला व्यापणे याविषयी विचार करू नये, असे सांगितले आहे। รูปวิภาคานุทีปนา นิฏฺฐิตา. रूपविभाग-अनुदीपना समाप्त झाली. ๑๕๘. รูปสมุฏฺฐาเน. สุตฺตนฺเตสุ เจตนาสมฺปยุตฺตา อภิชฺฌาทโยปิ กมฺมนฺติ วุตฺตา. เต ปน ปฏฺฐาเน กมฺมปจฺจยํ ปตฺวา ตปฺปจฺจยกิจฺจํ น สาเธนฺติ, เจตนา เอว สาเธตีติ อาห ‘‘สา เยวา’’ติอาทึ. ‘‘ตํ สมุฏฺฐานานญฺจ รูปานํ’’ติ เหตูหิ จ เหตุสมฺปยุตฺตกธมฺเมหิ จ สมุฏฺฐานานญฺจ รูปานนฺติ อตฺถวเสน เจตสิกธมฺมานมฺปิ [Pg.212] รูปสมุฏฺฐาปกตา สิทฺธา โหติ. โส หิ อุทยติ ปสวตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘กปฺปสณฺฐาปนวเสนา’’ติ กปฺปปฺปติฏฺฐาปนวเสน. อชฺฌตฺติกสทฺโท ฉสุ จกฺขาทีสุ อชฺฌตฺติกายตเน สฺเวว ปวตฺตติ. อิธ ปน สกลํ อชฺฌตฺตสนฺตานํ อธิปฺเปตนฺติ อาห ‘‘อชฺฌตฺต สนฺตาเนติ ปน วตฺตพฺพํ’’ติ. ‘‘ขเณ ขเณ’’ติ วิจฺฉาวจนํ. ‘‘วิจฺฉา’’ติ จ พหูสุขเณสุ พฺยาปนนฺติ อาห ‘‘ตีสุตีสุขเณสู’’ติ. १५८. रूपसमुत्थानामध्ये. सुत्तांतांमध्ये चेतना-संप्रयुक्त अभिध्या इत्यादींनाही 'कम्म' (कर्म) म्हटले गेले आहे. परंतु, ते पट्ठानामध्ये कम्मपच्चय (कर्मप्रत्यय) प्राप्त करून त्या प्रत्ययाचे कार्य साध्य करत नाहीत, केवळ चेतनाच ते साध्य करते, म्हणून 'सा येवा' (तीच) इत्यादी म्हटले आहे. ‘तं समुट्ठानानञ्च रूपानं’ (आणि त्या समुत्थान रूपांचे) म्हणजे हेतूंद्वारे आणि हेतू-संप्रयुक्त धर्मांद्वारे आणि समुत्थान रूपांच्या अर्थाच्या प्रभावाने चेतसिक धर्मांची देखील रूप-समुत्थापकता (रूप उत्पन्न करण्याची क्षमता) सिद्ध होते. कारण तो उदय पावतो आणि उत्पन्न करतो, असा संबंध आहे. ‘कप्पसण्ठापनवसेन’ म्हणजे कल्प प्रस्थापित करण्याच्या दृष्टीने. ‘अज्झत्तिक’ (अंतर्गत) हा शब्द डोळे इत्यादी सहा अंतर्गत आयतनांच्या बाबतीतच वापरला जातो. परंतु येथे संपूर्ण अंतर्गत संतान (अज्झत्तसन्तान) अभिप्रेत आहे, म्हणून ‘अज्झत्त सन्तानेति पन वत्तब्बं’ (अंतर्गत संतानामध्ये असे म्हटले पाहिजे) असे म्हटले आहे. ‘खणे खणे’ (क्षणाक्षणाला) हा वीप्सावाचक (पुनरावृत्ती दर्शवणारा) शब्द आहे. आणि ‘वीप्सा’ म्हणजे अनेक क्षणांमध्ये व्याप्त असणे, म्हणून ‘तीसुतीसुखणेसू’ (प्रत्येक तीन क्षणांमध्ये) असे म्हटले आहे. ยมกปาเฐสุ. ยสฺส วา ปน ปุคฺคลสฺส. ‘‘นิรุชฺฌตี’’ติ ภงฺคกฺขณ สมงฺคิตมาห. ‘‘อุปฺปชฺชตี’’ติ อุปฺปาทกฺขณ สมงฺคิตํ. ‘‘อิตี’’ติ อยํ ปุจฺฉา. ‘‘โน’’ติ ปฏิกฺเขโป. สมุทยสจฺจสฺส ภงฺคกฺขเณ ทุกฺขสจฺจภูตสฺส รูปสฺสวา นามสฺสวา อุปฺปาโท นาม นตฺถีติ วุตฺตํ โหติ. ยสฺส กุสลา ธมฺมา อุปฺปชฺชนฺติ, ยสฺส อกุสลา ธมฺมา อุปฺปชฺชนฺตีติ ทฺเว ปาฐาคเหตพฺพา. ‘‘โน’’ติ กุสลากุสล ธมฺมานํ อุปฺปาทกฺขเณ อพฺยากตภูตานํ รูปานํ วา นามานํ วา นิโรโธ นาม นตฺถีติ วุตฺตํ โหติ. เตสุปาเฐสุ เกสญฺจิวาทีนํ วจโนกาสํ ทสฺเสตุํ ‘‘อรูปภวํ’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘เจ’’ติ โกจิวาที เจวเทยฺย. ‘‘นา’’ติ น วตฺตพฺพํ. ‘‘อุปฺปชฺชตี’’ติ จ อุทฺธฏา สิยุนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิตรตฺถ จา’’ติ ตโต อิตรสฺมึ ยสฺส กุสลา ธมฺมาติอาทิปาเฐ จ. ‘‘ตมฺปิ นา’’ติ ตมฺปิ วจนํ น วตฺตพฺพนฺติ อตฺโถ. ‘‘ปุริมโกฏฺฐาเส’’ติ อสญฺญสตฺตานํ เตสํ ตตฺถาติ อิมสฺมึ ปุริมปกฺเขติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปจฺฉิมโกฏฺฐาเส’’ติ สพฺเพสํ จวนฺตานํ ปวตฺเต จิตฺตสฺสภงฺคกฺขเณติ อิมสฺมึ ปจฺฉิม ปกฺเข. จวนฺตานํ อิจฺเจว วุตฺตํ สิยา, น ปวตฺเต จิตฺตสฺส ภงฺคกฺขเณติ, โน จ น วุตฺตํ, ตสฺมา วิญฺญายติ ปวตฺเต จิตฺตสฺส ภงฺคกฺขเณ รูปชีวิตินฺทฺริยมฺปิ น อุปฺปชฺชตีติ. รูปชีวิตินฺทฺริเย จ อนุปฺปชฺชมาเน สติ, สพฺพานิ กมฺมชรูปานิ อุตุชรูปานิ อาหารชรูปานิ จ จิตฺตสฺส ภงฺคกฺขเณ นุปฺปชฺชนฺตีติ วิญฺญาตพฺพํ โหตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปจฺฉิมโกฏฺฐาเส’’ติ สพฺเพสํ จวนฺตานํ ปวตฺเต จิตฺตสฺส ภงฺคกฺขเณติ อิมสฺมึ ปจฺฉิมปกฺเข. ตตฺถ จ ปวตฺเต จิตฺตสฺส ภงฺคกฺขเณติ อิทํ อธิปฺเปตํ. เอวํ ปาฬิสาธกํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ยุตฺติสาธกํ ทสฺเสนฺโต [Pg.213] ‘‘ยสฺมา จา’’ติอาทิมาห. ‘‘ตสฺสา’’ติ อานนฺทา จริยสฺส มูลฏีกาการสฺส. วิภาวนิยํ. ภงฺเค รูปสฺส นุปฺปาโท, จิตฺตชานํ วเสน วา. อารุปฺปํ วาปิ สนฺธาย, ภาสิโต ยมกสฺส หิ. น จิตฺตฏฺฐิติ ภงฺเค จ, น รูปสฺส อสมฺภโว. ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘น หิ น จิตฺตฏฺฐิตี’’ติ จิตฺตสฺสฐิติ นาม น หิ นตฺถิ. ‘‘ภงฺเคจา’’ติ จิตฺตสฺสภงฺคกฺขเณ จ. ตํ อสมฺภาเวนฺโต ‘‘ยมกปาฬิโย ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา’’ติ เอเตน ปาฬิสํสนฺทนา นาม ครุกตฺตพฺพาติ ทีเปติ. ‘‘คมฺภีโร จ สตฺถุ อธิปฺปาโย’’ติ เอเตน อตฺตานํ สตฺถุมตญฺญุํ กตฺวา อิทํ สนฺธาย เอตํ สนฺธายาติ วตฺตุํ ทุกฺกรนฺติ ทีเปติ. ‘‘สุทฺธํ อรูปเมวา’’ติ สุทฺธํ อรูปปฺปฏิสนฺธึ เอว. ฉ จตฺตาลีสจิตฺตานิ รูปํ ชเนตุํ น สกฺโกนฺติ. เอวํ สติ อรูปวิปากวชฺชิตนฺติ กสฺมา วุตฺตนฺติ อาห ‘‘อรูปวิปากาปนา’’ติอาทึ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘เหตุโน’’ติ รูปวิราคภาวนา กมฺมสงฺขาตสฺส เหตุสฺส. ‘‘ตพฺพีธุรตายา’’ติ รูปวิรุทฺธตาย. รูปารูปวิราคภาวนาภูโต มคฺโค. เตน นิพฺพตฺตสฺส. รูโปกาโส นาม กามรูปภโว. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘เอกูน น วุติภวงฺคสฺเส วา’’ติ ปวตฺติกาเล รูปชนกสฺส เอกูน น วุติภวงฺค จิตฺตสฺสาติ อตฺโถ. ตตฺถ ปน อรูปวิปากํ ปวตฺติกาเลปิ รูปชนกํ น โหตีติ อาห ‘‘ตตฺถา’’ติอาทึ. เกจิ ปน ปฏิสนฺธิ จิตฺตสฺส อุปฺปาทกฺขเณ รูปํ ปจฺฉาชาต ปจฺจยํ น ลภติ. ฐิติกฺขเณ รูปํ ปรโต ภวงฺคจิตฺตโต ปจฺฉาชาตปจฺจยํ ลภตีติ วทนฺติ. ตํ น คเหตพฺพนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘น หิ อตฺตนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. สยํ วิชฺชมาโน หุตฺวา อุปการโก ปจฺจโย อตฺถิปจฺจโย. ปจฺฉาชาโต จ ตสฺส เอกเทโส. ‘‘อายุสงฺขารานํ’’ติ อุสฺมาทีนํ. ‘‘ตํ’’ติ ขีณาสวานํ จุติจิตฺตํ. ‘‘ยถาหา’’ติ โส เถโร กึ อาห. ‘‘วุตฺตํ’’ติ อฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. อิติ ปน วจนโต อญฺเญสํปิ จุติจิตฺตํ รูปํ น สมุฏฺฐาเปตีติ วิญฺญายตีติ ปธานวจนํ. ปน สทฺโท อรุจิ โชตโก. ‘‘ตถา วุตฺเตปี’’ติ โชเตติ. วจีสงฺขาโร นาม วิตกฺกวิจาโร. กายสงฺขาโร นาม อสฺสาสปสฺสาสวาโต. โส สพฺเพสํปิ กามสตฺตานํ จุติ จิตฺตสฺส [Pg.214] อุปฺปาทกฺขเณ จ ตโต ปุริมจิตฺตสฺส อุปฺปาทกฺขเณ จ นนิรุชฺฌตีติ วจเนน จุติจิตฺตโต ปุพฺพภาเคเยว อสฺสาสปสฺสาสานํ อภาวํ ญาเปติ. นนุ อิมิสฺสํ ปาฬิยํ จุติกาเล อสฺสาสปสฺสาสสฺส อภาวํ วทติ. อญฺเญสํ จิตฺตชรูปานํ อภาวํ น วทติ. ตสฺมา อิมาย ปาฬิยา สพฺเพสมฺปิ จุติจิตฺตํ อสฺสาสปสฺสาสํ น ชเนตีติ วิญฺญายติ. น อญฺญานิ จิตฺตชรูปานีติ โจทนา. ตํ ปริหรนฺโต ‘‘น หี’’ติอาทิมาห. น หิ รูปสมุฏฺฐาปกจิตฺตสฺส กายสงฺขาร สมุฏฺฐาปนํ อตฺถีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘คพฺภคมนาทิวินิพทฺธาภาเว’’ติ มาตุกุจฺฉิมฺหิ คตสฺส อสฺสาสปสฺสาโส น อุปฺปชฺชติ, ตถา อุทเก นิมุคฺคสฺส. พาฬฺหํ วิสญฺญีภูตสฺส. จตุตฺถชฺฌานํ สมาปชฺชนฺตสฺส. นิโรธสมาปตฺตึ สมาปชฺชนฺตสฺส. รูปารูปภเว ฐิตสฺสาติ. ตสฺมา เอเตคพฺภคมนาทโย อสฺสาสปสฺสาสํ วินิพทฺธนฺติ นีวาเรนฺตีติ คพฺภคมนาทิวินิพทฺธา. เตสํ อภาโวติ วิคฺคโห. วินา อิเมหิ การเณหิ อสฺสาสปสฺสาสสฺส จ อญฺญจิตฺตชรูปานญฺจ วิเสโส นตฺถีติ วุตฺตํ โหติ. อญฺญํปิ ยุตฺตึ ทสฺเสติ ‘‘จุโต จา’’ติอาทินา. จุโต จ โหติ, อสฺส จิตฺตสมุฏฺฐาน รูปญฺจ ปวตฺตตีติ น จ ยุตฺตนฺติ โยชนา. โส จ สุฏฺฐุ โอฬาริโก รูปธมฺโม. อิติ ตสฺมา น สกฺกา วตฺตุํติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิมสฺส อตฺถสฺสา’’ติ วตฺวา ตํ อตฺถํ วทติ ‘‘โอฬาริกสฺสา’’ติอาทินา. ‘‘กตีปย ขณมตฺตํ’’ติ ปนฺนรสขณโสฬสขณมตฺตํ. ‘‘จิตฺตชรูปปฺปวตฺติยา’’ติ จิตฺตชรูปปฺปวตฺตนโต. ทุพฺพลา โหนฺติ, ตทา ปญฺจารมฺมณานิปิ ปญฺจทฺวาเรสุ อาปาตํ นาคจฺฉนฺติ. ‘‘ปจฺจยปริตฺตตาย วา’’ติ ตทา ปจฺฉาชาตปจฺจยสฺส อลาภโต วุตฺตํ. ทุพฺพลา โหนฺติ. ตทา ทุพฺพลตฺตา เอว ปญฺจารมฺมณานิ ปญฺจทฺวาเรสุ อาปาตํ นาคจฺฉนฺติ. ปริโยสาเนปิ เอกจิตฺตกฺขณมตฺเต. วตฺถุสฺส อาทิอนฺตนิสฺสิตานิ ปฏิสนฺธิกฺขเณ อาทิมฺหิ นิสฺสิตานิ. มรณาสนฺนกาเล อนฺเต นิสฺสิตานิ. สมทุพฺพลานิ เอว โหนฺติ. ตสฺมา ยถา สพฺพปฏิสนฺธิจิตฺตมฺปิ รูปํ น ชเนติ, ตถา สพฺพจุติจิตฺตมฺปิ รูปํ น ชเนตีติ สกฺกา วิญฺญาตุนฺติ. ‘‘ปาฬิวิโรธํ’’ติ ปุพฺเพ ทสฺสิตาย สงฺขาร ยมกปาฬิยา วิโรธํ[Pg.215].‘‘การณํ วุตฺตเมวา’’ติ จิตฺตญฺหิ อุปฺปาทกฺขเณ เอว ปริปุณฺณํ ปจฺจยํ ลภิตฺวา พลวํ โหตีติ วุตฺตเมว. ‘‘ตํ’’ติ อปฺปนาชวนํ. อจลมานํ หุตฺวา. ‘‘อพฺโพกิณฺเณ’’ติ วีถิจิตฺต วาเรน อโวกิณฺเณ. น ตถา ปวตฺตมาเนสุ องฺคานิ โอสีทนฺติ, ยถา ฐปิตาเนว หุตฺวา ปวตฺตนฺติ. ‘‘น ตโตปรํ’’ติ ตโต อติเรกํ รูปวิเสสํ น ชเนติ. ‘‘กิญฺจี’’ติ กิญฺจิจิตฺตํ. ‘‘อุตฺตรกิจฺจํ’’ติ อุปรูปริกิจฺจํ. ‘‘อฏฺฐ ปุถุชฺชนานํ’’ติ อฏฺฐ โสมนสฺส ชวนานิ หสนํปิ ชเนนฺติ. ฉ ชวนานิ ปญฺจชวนานีติ อธิกาโร. เตสํ พุทฺธานํ. สิตกมฺมสฺสาติ สมฺพนฺโธ. สิตกมฺมํ นาม มิหิตกมฺมํ. ‘‘การณํ วุตฺตเมวา’’ติ ‘รูปสฺส ปน อุปตฺถมฺภกภูตา อุตุอาหารา ปจฺฉาชาตปจฺจย ธมฺมา จ ฐิติกฺขเณ เอว ผรนฺตี’ติ เอวํ การณํ วุตฺตเมว. ‘‘อุตุโน พลวภาโว’’ติ รูปุปฺปาทนตฺถาย พลวภาโว. สนฺตติฐิติยา พลวภาโว ปน ปจฺฉาชาตปจฺจยายตฺโต โหติ. รูปํ น สมุฏฺฐาเปยฺย. โน น สมุฏฺฐาเปตีติ อาห ‘‘วกฺขติ จา’’ติอาทึ. อชฺฌตฺต สนฺตานคโต จ พหิทฺธาสนฺตานคโต จ ทุวิธาหาโรติ สมฺพนฺโธ. यमकपाठांमध्ये. 'किंवा ज्या पुद्गलाचे...' 'निरुज्झति' (निरोध पावतो) याद्वारे भंगक्षणाशी युक्त असलेल्याला म्हटले आहे. 'उप्पज्जति' (उत्पन्न होतो) याद्वारे उत्पादक्षणाशी युक्त असलेल्याला म्हटले आहे. 'इति' हा प्रश्न आहे. 'नो' (नाही) हा नकार आहे. समुदयसत्याच्या भंगक्षणी, दुःखसत्यरूप असलेल्या रूपाचा किंवा नामाचा उत्पाद होत नाही, असे म्हटले आहे. 'ज्याचे कुशल धम्म उत्पन्न होतात, ज्याचे अकुशल धम्म उत्पन्न होतात' हे दोन पाठ ग्रहण करावेत. 'नो' याद्वारे कुशल-अकुशल धम्मांच्या उत्पादक्षणी अव्याकृत असलेल्या रूपांचा किंवा नामांचा निरोध होत नाही, असे म्हटले आहे. त्या पाठांमध्ये काही वाद्यांच्या विधानाला वाव देण्यासाठी 'अरूपभवं' इत्यादी म्हटले आहे. 'चे' म्हणजे जर कोणी वादी असे म्हणेल. 'ना' म्हणजे असे म्हणू नये. आणि 'उप्पज्जति' हे उद्धृत केले जावे, असा संबंध आहे. 'इतरत्थ च' म्हणजे त्याव्यतिरिक्त इतर 'ज्याचे कुशल धम्म...' इत्यादी पाठात. 'तम्पि ना' म्हणजे ते वचनही बोलू नये, असा अर्थ आहे. 'पुरिमकोट्ठासे' (पूर्व भागात) म्हणजे 'असंज्ञसत्त्वांचे, त्यांचे तेथे' या पूर्व पक्षात असा अभिप्राय आहे. 'पच्छिमकोट्ठासे' (उत्तर भागात) म्हणजे 'सर्व च्युत होणाऱ्यांच्या प्रवृत्तीकाळातील चित्ताच्या भंगक्षणी' या उत्तर पक्षात. 'च्युत होणाऱ्यांच्या' असेच म्हटले जावे, 'प्रवृत्तीकाळातील चित्ताच्या भंगक्षणी' असे नाही, परंतु असे न म्हटलेले नाही; म्हणून हे समजते की प्रवृत्तीकाळातील चित्ताच्या भंगक्षणी रूपजीवितेंद्रिय देखील उत्पन्न होत नाही. आणि रूपजीवितेंद्रिय उत्पन्न होत नसताना, चित्ताच्या भंगक्षणी सर्व कर्मज रूपे, ऋतुज रूपे आणि आहारज रूपे उत्पन्न होत नाहीत, असे समजावे, असा अभिप्राय आहे. 'पच्छिमकोट्ठासे' म्हणजे सर्व च्युत होणाऱ्यांच्या प्रवृत्तीकाळातील चित्ताच्या भंगक्षणी या उत्तर पक्षात. आणि तेथे 'प्रवृत्तीकाळातील चित्ताच्या भंगक्षणी' हे अभिप्रेत आहे. अशा प्रकारे पाळि-साधक दाखवून, आता युक्ति-साधक दाखवताना 'यस्मा च' इत्यादी म्हणाले. 'तस्स' म्हणजे मूळटीकाकार आचार्य आनंदांचे. विभावनीमध्ये: 'भंगक्षणी रूपाचा उत्पाद होत नाही, किंवा चित्तज रूपांच्या वशने. किंवा अरूपभवाचा संदर्भ घेऊन यमकामध्ये सांगितले आहे. चित्ताच्या स्थिती आणि भंगक्षणी रूपाचा असंभव नाही,' असे म्हटले आहे. तेथे 'न हि न चित्तट्ठिती' म्हणजे चित्ताची स्थिती खरोखरच नसलेली नाही. 'भंगे च' म्हणजे चित्ताच्या भंगक्षणी सुद्धा. ते असंभाव्य ठरवत 'यमकपाळियो पना' इत्यादी म्हणाले. 'नानात्था नानाब्यंजना' याद्वारे पाळि-तुलना अत्यंत महत्त्वाची मानली पाहिजे, हे दर्शवितात. 'गंभीरो च सत्थु अधिप्यायो' याद्वारे स्वतःला शास्त्यांच्या मताचे जाणकार मानून 'याचा संदर्भ घेऊन किंवा त्याचा संदर्भ घेऊन' असे सांगणे कठीण आहे, हे दर्शवितात. 'सुद्धं अरूपमेव' म्हणजे केवळ शुद्ध अरूप-प्रतिसंधीच. शेचाळीस चित्ते रूप उत्पन्न करण्यास समर्थ नसतात. असे असताना 'अरूपविपाकवज्जितं' (अरूपविपाक वगळून) असे का म्हटले? म्हणून 'अरूपविपाकापना' इत्यादी म्हणाले. विभावनीच्या पाठात: 'हेतुनो' म्हणजे रूपविरागभावनेच्या कर्मसंज्ञक हेतूचे. 'तब्बीधुरताय' म्हणजे रूपाच्या विरुद्ध असल्यामुळे. रूप आणि अरूप विरागभावनेने युक्त असलेला मार्ग. त्याने उत्पन्न झालेल्याच्या. रूपोकास म्हणजे कामभव आणि रूपभव. विभावनीच्या पाठात: 'एकूननवुतिभवंगस्स वा' म्हणजे प्रवृत्तीकाळात रूप उत्पन्न करणाऱ्या एकोणनव्वद भवांग चित्तांचे, असा अर्थ आहे. तेथे अरूपविपाक प्रवृत्तीकाळातही रूप उत्पन्न करणारे नसतात, म्हणून 'तत्थ' इत्यादी म्हणाले. काही आचार्य म्हणतात की, प्रतिसंधी चित्ताच्या उत्पादक्षणी रूप 'पश्चातजात प्रत्यय' मिळवत नाही. स्थितीक्षणी रूप नंतरच्या भवांगचित्ताकडून पश्चातजात प्रत्यय मिळवते. ते स्वीकारू नये हे दर्शवण्यासाठी 'न हि अत्तना' इत्यादी म्हटले आहे. स्वतः विद्यमान राहून उपकारक असणारा प्रत्यय म्हणजे 'अस्तिप्रत्यय' होय. आणि पश्चातजात प्रत्यय हा त्याचाच एक भाग आहे. 'आयुसंखारानां' म्हणजे उष्मा इत्यादींचे. 'तं' म्हणजे क्षीणासवांचे च्युतीचित्त. 'यथाह' म्हणजे त्या स्थविरांनी काय म्हटले? 'वृत्तं' म्हणजे अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे. या वचनावरून इतरांचेही च्युतीचित्त रूप उत्पन्न करत नाही, असे समजते, हे मुख्य वचन आहे. 'पन' हा शब्द अरुची दर्शवणारा आहे. 'तथा वृत्तेपि' असे दर्शविते. वचीसंखार म्हणजे वितर्क आणि विचार. कायसंखार म्हणजे आश्वास-प्रश्वास वायू. तो सर्व कामलोकातील सत्त्वांच्या च्युतीचित्ताच्या उत्पादक्षणी आणि त्याच्या आधीच्या चित्ताच्या उत्पादक्षणी 'निरोध पावत नाही' या वचनाने च्युतीचित्ताच्या आधीच्या भागातच आश्वास-प्रश्वासाचा अभाव असल्याचे सूचित करतो. शंका: या पाळिमध्ये च्युतीकाळात आश्वास-प्रश्वासाचा अभाव सांगितला आहे. इतर चित्तज रूपांचा अभाव सांगितलेला नाही. म्हणून या पाळिद्वारे सर्वांचेच च्युतीचित्त आश्वास-प्रश्वास उत्पन्न करत नाही, असे समजते; इतर चित्तज रूपे नव्हे, असा आक्षेप आहे. त्याचे परिहार करताना 'न हि' इत्यादी म्हणाले. कारण रूप उत्पन्न करणाऱ्या चित्ताचे कायसंखार उत्पन्न करणे नसते, असा संबंध आहे. 'गर्भगमनादिविनिबद्धभावे' म्हणजे मातृकुक्षीत गेलेल्याचा आश्वास-प्रश्वास उत्पन्न होत नाही, तसेच पाण्यात बुडालेल्याचा, अत्यंत बेशुद्ध झालेल्याचा, चतुर्थ ध्यानात समापन्न झालेल्याचा, निरोध-समापत्तीत समापन्न झालेल्याचा आणि रूप-अरूप भवात राहिलेल्याचा. म्हणून हे गर्भगमन इत्यादी आश्वास-प्रश्वासाला रोखतात, म्हणून 'गर्भगमनादिविनिबद्ध' म्हटले आहे. त्यांचा अभाव, असा विग्रह आहे. या कारणांशिवाय आश्वास-प्रश्वास आणि इतर चित्तज रूपे यांच्यात काही विशेष फरक नाही, असे म्हटले आहे. दुसरी युक्ती देखील 'चुतो च' इत्यादींनी दर्शवितात. जो च्युत झाला आहे, आणि त्याचे चित्तसमुत्थान रूप प्रवृत्त होत आहे, हे योग्य नाही, अशी योजना आहे. आणि तो अत्यंत औदारिक रूपधर्म आहे. म्हणून असे म्हणता येत नाही, असा संबंध आहे. 'या अर्थाचा' असे सांगून तो अर्थ 'औदारिकस्य' इत्यादींनी सांगतात. 'कतीपय क्षणमात्रं' म्हणजे पंधरा क्षण किंवा सोळा क्षण मात्र. 'चित्तजरूपप्पवत्तिया' म्हणजे चित्तज रूपांच्या प्रवृत्तीमुळे. ते दुर्बळ असतात, तेव्हा पाच आलंबने देखील पाच द्वारांमध्ये स्पष्टपणे येत नाहीत. किंवा 'प्रत्ययपरित्तताय' म्हणजे तेव्हा पश्चातजात प्रत्यय न मिळाल्यामुळे म्हटले आहे. ते दुर्बळ असतात. तेव्हा दुर्बळतेमुळेच पाच आलंबने पाच द्वारांमध्ये स्पष्टपणे येत नाहीत. शेवटी देखील केवळ एक चित्तक्षण मात्र. वस्तूच्या आदी आणि अंतावर आश्रित असणारे; प्रतिसंधीक्षणी आदीवर आश्रित असणारे आणि मरणासन्न काळी अंतावर आश्रित असणारे समान रीतीने दुर्बळच असतात. म्हणून ज्याप्रमाणे सर्व प्रतिसंधीचित्त देखील रूप उत्पन्न करत नाही, त्याचप्रमाणे सर्व च्युतीचित्त देखील रूप उत्पन्न करत नाही, असे समजणे शक्य आहे. 'पाळिविरोधं' म्हणजे पूर्वी दर्शविलेल्या संस्कार यमकपाळिशी विरोध. 'कारणं वृत्तमेव' म्हणजे चित्त खरोखरच उत्पादक्षणीच परिपूर्ण प्रत्यय मिळवून बलवान होते, हे आधीच सांगितले आहे. 'तं' म्हणजे अर्पणा जवन. अचल होऊन. 'अब्बोकिण्णे' म्हणजे वीथीचित्त वाराने अव्यवहित. तसे प्रवृत्त होत असताना अवयव शिथिल होत नाहीत, तर जसे ठेवले आहेत तसेच राहून प्रवृत्त होतात. 'न ततोपरं' म्हणजे त्यापेक्षा अधिक विशेष रूप उत्पन्न करत नाही. 'किंचि' म्हणजे कोणतेही चित्त. 'उत्तरकिच्चं' म्हणजे वरील कार्य. 'अट्ठ पुथुज्जनानं' म्हणजे आठ सोमनस्य जवने हास्य देखील उत्पन्न करतात. सहा जवने, पाच जवने हा अधिकार आहे. त्या बुद्धांचे. 'सितकम्मस्स' असा संबंध आहे. सितकर्म म्हणजे मंदहास्य करण्याचे कार्य. 'कारणं वृत्तमेव' म्हणजे 'रूपाचे उपस्तंभक असणारे ऋतू, आहार आणि पश्चातजात प्रत्यय धर्म हे स्थितीक्षणीच पसरतात', असे कारण आधीच सांगितले आहे. 'उतुनो बलवभावो' म्हणजे रूप उत्पन्न करण्यासाठी बलवान असणे. संततीच्या स्थितीचा बलवानपणा मात्र पश्चातजात प्रत्ययावर अवलंबून असतो. रूप समुत्थापित करणार नाही. असे नाही की उत्पन्न करत नाही, म्हणून 'वक्खति च' इत्यादी म्हणाले. अध्यात्म संतानातील आणि बहिर्धा संतानातील असा दोन प्रकारचा आहार आहे, असा संबंध आहे। เอตฺถจาติอาทีสุ. อุตุ ปญฺจวิโธ. อชฺฌตฺตสนฺตาเน จตุชวเสน จตุพฺพิโธ, พหิทฺธา สนฺตาเน อุตุชวเสน เอโก. ตถา อาหาโรปิ ปญฺจวิโธ. เตสุ ฐเปตฺวา พหิทฺธาหารํ อวเสสานํ อชฺฌตฺต สนฺตาเน รูปสมุฏฺฐาปเน วิวาโท นตฺถิ. พหิทฺธาหารสฺส ปน อชฺฌตฺตสนฺตาเน รูปสมุฏฺฐาปเน วิวาโท อตฺถีติ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิมาห. ‘‘อุตุโอชานํ วิยา’’ติ อุตุโอชานํ อชฺฌตฺตสนฺตาเน รูปสมุฏฺฐาปนํ วิย. อฏฺฐกถาปาเฐ. ‘‘ทนฺตวิจุณฺณิตํ ปนา’’ติ ทนฺเตหิ สงฺขาทิตฺวา วิจุณฺณํ กตํ ปน. ‘‘สิตฺถํ’’ติ ภตฺตจุณฺณสิตฺถํ. ฏีกาปาเฐ. ‘‘สา’’ติ พหิทฺธา โอชา. ‘‘นสงฺขาทิโต’’ติ น สุฏฺฐุขาทิโต. ‘‘ตตฺตเกนปี’’ติ มุเขฐปิตมตฺเตนปิ. ‘‘อพฺภนฺตรสฺสา’’ติ อชฺฌตฺตาหารสฺส. ‘‘อฏฺฐอฏฺฐรูปานิ สมุฏฺฐาเปตี’’ติ อุปตฺถมฺภนวเสน สมุฏฺฐาเปติ, ชนน วเสน ปน อชฺฌตฺติกาหาโร เอว สมุฏฺฐาเปตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘อุปาทินฺนกา’’ติ อชฺฌตฺต สมฺภูตา วุจฺจนฺติ. พหิทฺธา โอชาปิ รูปํ สมุฏฺฐาเปติ [Pg.216] เยวาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เตนอุตุนา’’ติ อชฺฌตฺต อุตุนา. ‘‘เสทิยมานา’’ติ อุสฺมาปิยมานา. ‘‘ตาย จ โอชายา’’ติ อชฺฌตฺต โอชาย. ‘‘เมทสิเนหุปจย วเสนา’’ติ เมทโกฏฺฐาสรสสิเนห โกฏฺฐาสานํ วฑฺฒนวเสน. อิตรานิ ปน ตีณิรูปสมุฏฺฐานานิ. ปาฬิปาเฐ. ‘‘อินฺทฺริยานี’’ติ จกฺขาทีนิ อินฺทฺริย รูปานิ. ‘‘วิหาโร’’ติ สมาปตฺติ เอว วุจฺจติ. สมาปตฺติ จิตฺเตน ชาตตฺตา ตานิ อินฺทฺริยานิ วิปฺปสนฺน นีติ กตฺวา กสฺมา วุตฺตนฺติ ปุจฺฉติ. ‘‘อุปจริตตฺตา’’ติ ฐานูปจาเรน โวหริตตฺตา. ‘‘เตสํ น วนฺนํ’’ติ อินฺทฺริยรูปานํ. นิธิกณฺฑปาเฐ. สุนฺทโร วณฺโณ ยสฺสาติ สุวณฺโณ. สุวณฺณสฺส ภาโว สุวณฺณตา. ตถาสุสฺสรตา. ‘‘สโร’’ติ จ สทฺโท วุจฺจติ. ‘‘สุสณฺฐานํ’’ติ องฺคปจฺจงฺคานํ สุฏฺฐุสณฺฐานํ. ‘‘สุรูปตา’’ติ สุนฺทรรูปกายตา. ‘‘ยถา’’ติ เยนอากาเรน สณฺฐิเต สติ. ตถา เตน อากาเรน สณฺฐิตา โหตีติ โยชนา. ‘एत्थ च’ (येथे आणि) इत्यादींमध्ये. ऋतु पाच प्रकारचा आहे. आंतरिक संतानामध्ये (संततीमध्ये) चार प्रकारच्या (उत्पत्तीच्या) वेगाने चार प्रकारचा, आणि बाह्य संतानामध्ये ऋतु-वेगाने एक प्रकारचा. तसेच आहार देखील पाच प्रकारचा आहे. त्यांपैकी बाह्य आहार वगळता, उर्वरित आहारांच्या आंतरिक संतानामध्ये रूपसमुत्थानाविषयी (रूपाच्या उत्पत्तीविषयी) कोणताही वाद नाही. परंतु बाह्य आहाराच्या आंतरिक संतानामध्ये रूपसमुत्थानाविषयी वाद आहे, हे दर्शवण्यासाठी ‘एत्थ च’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘ऋतुओजांप्रमाणे’ (उतुओजानं विय) म्हणजे ऋतु आणि ओजांचे आंतरिक संतानामध्ये रूपसमुत्थान होण्याप्रमाणे. अट्ठकथा पाठात: ‘दंतविचुण्णितं पन’ म्हणजे दातांनी चावून चूर्ण केलेले. ‘सित्थं’ म्हणजे भाताचा कण (शीत). टीका पाठात: ‘सा’ म्हणजे बाह्य ओजा. ‘न सङ्खादितो’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे न चावलेले. ‘तत्तकेनापि’ म्हणजे केवळ मुखात ठेवल्याने सुद्धा. ‘अब्भन्तरस्स’ म्हणजे आंतरिक आहाराचे. ‘आठ-आठ रूपे समुत्थित करतो’ (अट्ठअट्ठरूपानि समुट्ठापेति) म्हणजे उपष्टंभन (टेका देणे) द्वारे समुत्थित करतो, परंतु जनन (उत्पत्ती) द्वारे केवळ आंतरिक आहारच समुत्थित करतो, असा अभिप्राय आहे. ‘उपादिन्नक’ म्हणजे आंतरिक उत्पन्न झालेल्यांना म्हटले जाते. बाह्य ओजा देखील रूप समुत्थित करतेच, असा संबंध आहे. ‘तेन उतुना’ म्हणजे आंतरिक ऋतुद्वारे. ‘सेदियमाना’ म्हणजे उष्ण केले जात असताना. ‘ताय च ओजाय’ म्हणजे त्या आंतरिक ओजेद्वारे. ‘मेदसिनेहुपचय वसेन’ म्हणजे मेद-भाग आणि स्नेह-भागाच्या वाढीच्या द्वारे. इतर तीन रूपसमुत्थान आहेत. पाळि पाठात: ‘इन्द्रियानि’ म्हणजे चक्षु इत्यादी इंद्रिय रूपे. ‘विहार’ म्हणजे समापत्तीच म्हटली जाते. समापत्ती चित्तामुळे उत्पन्न झाल्यामुळे ती इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न होतात, असे का म्हटले आहे? असा प्रश्न विचारला आहे. ‘उपचरितत्ता’ म्हणजे लाक्षणिक अर्थाने (स्थानोपचाराने) व्यवहार केल्यामुळे. ‘तेसं न वण्णं’ म्हणजे त्या इंद्रिय रूपांचा (वर्ण). निधिकण्ड पाठात: ज्याचा वर्ण सुंदर आहे तो ‘सुवर्ण’. सुवर्णाचा भाव म्हणजे ‘सुवर्णता’. तसेच ‘सुस्वरता’. ‘स्वर’ म्हणजे शब्द म्हटला जातो. ‘सुसंस्थान’ म्हणजे अंग-प्रत्यंगांचे सुयोग्य संस्थान (रचना). ‘सुरूपता’ म्हणजे सुंदर रूप असलेला काय (शरीर). ‘यथा’ म्हणजे ज्या प्रकारे स्थित असताना. ‘तथा’ म्हणजे त्या प्रकारे स्थित होते, अशी योजना करावी. ลหุตาทิตฺตเย. ทนฺธตฺตาทิกรานํ ธาตุกฺโขภานํ ปฏิปกฺเขหิ ปจฺจเยหิ สมุฏฺฐาตีติ วิคฺคโห. ‘‘เอตสฺสา’’ติ ลหุตาทิตฺตยสฺส วุตฺตา. ตสฺมา เอตํ ลหุตาทิตฺตยํ กมฺมสมุฏฺฐานนฺติ วตฺตพฺพนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘ยมเกสุปิ อทฺธาปจฺจุปฺปนฺเนเนว คหิโต’’ติ ยสฺส จกฺขายตนํ อุปฺปชฺชติ, ตสฺส โสตายตนํ อุปฺปชฺชตีติ. สจกฺขุกานํ อโสตกานํ อุปปชฺชนฺตานํ เตสํ จกฺขายตนํ อุปฺปชฺชตีติอาทีสุ อุปฺปาทวาเร ปฏิสนฺธิวเสน, นิโรธวาเร จุติวเสน อทฺธาปจฺจุปฺปนฺนํว วุตฺตนฺติ อธิปฺปาโย. อกมฺมชานํ ปวตฺติกาเล กาลเภโท วุตฺโตติ. ‘‘กมฺมวิปากชา อาพาธาติ วุตฺตํ’’ติ วีถิมุตฺตสงฺคเห อุปจฺเฉทกกมฺมทีปนิยํ ‘อตฺถิ วาต สมุฏฺฐิตา อาพาธา. ล. อตฺถิ กมฺมวิปากชา อาพาธา’ติ วุตฺตํ. ตานิ อุปปีฬกุปฆาตก กมฺมานิปิ วิปตฺติโย ลภมานานิ เอว โขเภตฺวา นานาพาเธ อุปฺปาเทนฺตีติ สมฺพนฺโธ. สรีเร ฐนฺติ ติฏฺฐนฺตีติ สรีรฏฺฐกา. ‘‘ตทนุคติกานิ เอว โหนฺตี’’ติ กมฺมชาทีนิปิ ขุพฺภิตานิ เอว โหนฺตีติ อธิปฺปาโย. เอเตน อฏฺฐสุ การเณสุ เยนเกนจิการเณน จกฺขุโรคาทิเก อาพาเธ [Pg.217] ชาเต ตสฺมึ องฺเค ปวตฺตานิ สพฺพานิ โรคสมุฏฺฐานานิ อาพาธภาวํ คจฺฉนฺติเยว. เอวํ สนฺเตปิ ตปฺปริยาปนฺนานิ กมฺมชรูปานิ ตทนุคติกภาเวน อาพาธภาวํ คจฺฉนฺติ, น อุชุกโต กมฺมวเสนาติ ทีเปติ. กมฺมสมุฏฺฐาโน อาพาโธ นาม นตฺถิ. ตถาปิ อฏฺฐสุ อาพาเธสุปิ อตฺถิ วาตสมุฏฺฐานา อาพาธาติอาทีสุ วิย อตฺถิ กมฺมสมุฏฺฐานา อาพาธาติ อวตฺวา อตฺถิ กมฺมวิปากชา อาพาธาติ วุตฺตํ. ตตฺถ อุปปีฬโก ปฆาตกกมฺมานํวเสน อุปฺปนฺโน โยโกจิธาตุกฺโขโภ สุตฺตนฺตปริยาเย น กมฺมวิปาโกติ วุจฺจติเยว. ตโต ชาโต โยโกจิ อาพาโธ กมฺมวิปากโชติ วุตฺโตติ. สุคมฺภีรมิทํฐานํ. สุฏฺฐุวิจาเรตฺวา กเถตพฺพํ. ‘‘ยโต’’ติ ยสฺมา กมฺมสมุฏฺฐานา พาธปจฺจยา. ล. ลพฺภมาโน สิยา. เกวลํ โส กมฺมสมุฏฺฐาโน อาพาโธ นาม นตฺถีติ โยชนา. ‘‘อวิหึสา กมฺมนิพฺพตฺตา’’ติ เมตฺตากรุณากมฺมนิพฺพตฺตา. สุวิทูรตายเจว นิราพาธา โหนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สณฺฐิติยา’’ติ ทุกฺโขภนีเย วิเสสนปทํ. เหตุปทํ วา ทฏฺฐพฺพํ. โขเภตุํ ทุกฺกรา ทุกฺโขภนียา. ‘‘กามํ’’ติ กิญฺจาปีติ อตฺเถ นิปาตปทํ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. लहुता (सौम्यता/हलकेपणा) इत्यादी तिन्हींमध्ये. मंदता इत्यादी धातु-क्षोभांच्या विरोधी प्रत्ययांद्वारे (कारणांद्वारे) समुत्थित होते, असा विग्रह आहे. ‘एतस्स’ म्हणजे लहुता इत्यादी तिन्हींसाठी म्हटले आहे. म्हणून हे लहुता आदि त्रिक कर्मसमुत्थान आहे, असे म्हटले पाहिजे असा अभिप्राय आहे. ‘यमक ग्रंथात देखील वर्तमान काळानेच ग्रहण केले आहे’ म्हणजे ज्याचे चक्षुआयतन उत्पन्न होते, त्याचे श्रोत्रआयतन उत्पन्न होते. चक्षु असलेल्या परंतु श्रोत्र नसलेल्या उत्पन्न होणाऱ्या जीवांचे चक्षुआयतन उत्पन्न होते, इत्यादी उत्पादवारामध्ये प्रतिसंधीच्या द्वारे आणि निरोधवारामध्ये च्युतीच्या द्वारे वर्तमान काळच सांगितला आहे, असा अभिप्राय आहे. अकर्मज रूपांच्या प्रवृत्ती काळात काळभेद सांगितला आहे. ‘कर्मविपाकज आबाध (आजार) असे म्हटले आहे’ म्हणजे वीथिमुक्तसंग्रहामध्ये उपच्छेदक कर्माचे स्पष्टीकरण करताना ‘वातसमुत्थित आबाध आहेत... पे... कर्मविपाकज आबाध आहेत’ असे म्हटले आहे. ती उपपीडक आणि उपघातक कर्मे देखील विपत्ती प्राप्त करून क्षोभ निर्माण करतात आणि विविध आजार उत्पन्न करतात, असा संबंध आहे. शरीरात राहतात म्हणून ‘शरीरस्थ’ (सरीरट्ठका). ‘तadanugatikāni eva hontī’ म्हणजे कर्मज इत्यादी देखील क्षुब्धच होतात, असा अभिप्राय आहे. याद्वारे, आठ कारणांपैकी कोणत्याही कारणाने चक्षुरोग इत्यादी आजार झाले असता, त्या अंगात प्रवृत्त होणारे सर्व रोगसमुत्थान आजारपणच प्राप्त करतात. असे असतानाही, त्या अंतर्गत असणारे कर्मज रूप तदनुगतिक भावाने आजारपण प्राप्त करतात, थेट कर्माच्या प्रभावाने नाही, असे दर्शवले आहे. कर्मसमुत्थित आजार नावाचा कोणताही स्वतंत्र आजार नाही. तरीही, आठ आजारांमध्ये ‘वातसमुत्थित आजार आहेत’ इत्यादींप्रमाणे ‘कर्मसमुत्थित आजार आहेत’ असे न म्हणता ‘कर्मविपाकज आजार आहेत’ असे म्हटले आहे. तेथे उपपीडक आणि उपघातक कर्मांच्या मुळे उत्पन्न झालेला जो काही धातुक्षोभ आहे, त्याला सुत्तंत पर्यायामध्ये कर्मविपाक म्हटले जात नाही. त्यापासून उत्पन्न झालेला जो काही आजार आहे, त्याला ‘कर्मविपाकज’ म्हटले आहे. हे स्थान अत्यंत गंभीर आहे. याचा चांगल्या प्रकारे विचार करून बोलले पाहिजे. ‘यतो’ म्हणजे ज्या कर्मसमुत्थित बाधप्रत्ययामुळे... पे... प्राप्त होणारा असावा. केवळ तो कर्मसमुत्थित आजार नावाचा नाही, अशी योजना आहे. ‘अविहिंसा कर्मनिबत्ता’ म्हणजे मैत्री आणि करुणा कर्मापासून उत्पन्न झालेली. अत्यंत दूर असल्यामुळेच ते निरुपद्रवी (निरबाध) असतात, असा संबंध आहे. ‘संठितिया’ हे ‘दुक्खोभनीय’ चे विशेषण पद आहे. किंवा हे हेतूपद मानले पाहिजे. क्षोभ करणे कठीण असलेले ते ‘दुक्खोभनीय’. ‘कामं’ हे ‘किंचापि’ (जरी काही असले तरी) या अर्थातील निपात पद आहे. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. ‘‘วุจฺจเต’’ติอาทีสุ. รูปปจฺจยธมฺมานํ ปจฺจยกิจฺจํ ติวิธํ. ชนนญฺจ อุปตฺถมฺภนญฺจ อนุปาลนญฺจ. ตตฺถ ชนนกิจฺจํ ชเนตพฺพานํ ชาติกฺขเณ เอว ลพฺภติ. เสสทฺวยํ ปน ฐิติกฺขเณปิ ลพฺภติ. ภงฺคกฺขเณ ปน สพฺพํ ปจฺจยกิจฺจํ นตฺถิ. ตตฺถ ชนนกิจฺจวเสน วิจาเรนฺโต ‘‘รูปชนกานํ’’ติอาทิมาห. ‘‘อปิจา’’ติอาทีสุ. ‘‘ตาสํ’’ติ อุปจยสนฺตตีนํ, ชรตา อนิจฺจตานญฺจ. ‘‘เตสู’’ติ กุโตจิ สมุฏฺฐาเนสุ. อิธ ปน อภิธมฺมตฺถ สงฺคเหปน. ‘‘เอวํ สนฺเตปี’’ติ ปจฺจยวิเสเสน อทิสฺสมานวิเสสตฺเถปิ. ‘‘สารตร’’นฺติ อติสารภูตํ. ‘‘เสยฺโย’’ติ เสฏฺโฐ. ‘वुच्चते’ (म्हटले जाते) इत्यादींमध्ये. रूपप्रत्यय धर्मांचे प्रत्ययकृत्य (कार्य) तीन प्रकारचे आहे: जनन (उत्पत्ती), उपष्टंभन (आधार देणे) आणि अनुपालन (संरक्षण करणे). त्यापैकी जननकृत्य हे उत्पन्न होणाऱ्यांच्या उत्पत्तीच्या क्षणीच (जातीक्षणे) प्राप्त होते. उर्वरित दोघे मात्र स्थितीच्या क्षणी (स्थितीक्षणे) देखील प्राप्त होतात. परंतु भंग क्षणी (भंगक्षणे) कोणतेही प्रत्ययकृत्य नसते. तेथे जननकृत्याच्या दृष्टीने विचार करताना ‘रूपजनकानां’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘अपि च’ इत्यादींमध्ये. ‘तासं’ म्हणजे उपचय-संतती, जरता आणि अनित्यता यांचे. ‘तेसू’ म्हणजे कोणत्याही समुत्थानांमध्ये. येथे मात्र अभिधम्मत्थसंग्रहामध्ये. ‘एवं सन्तेपि’ म्हणजे प्रत्ययविशेषाने अदृश्य विशेष अर्थामध्ये देखील. ‘सारतरं’ म्हणजे अत्यंत श्रेष्ठ/सारभूत. ‘सेय्यो’ म्हणजे श्रेष्ठ. รูปสมุฏฺฐานานุทีปนา นิฏฺฐิตา. रूपसमुत्थान-अनुदीपनी समाप्त झाली. ๑๖๙. กลาปโยชนายํ[Pg.218]. ‘‘สงฺขาเน’’ติ คณเน. ‘‘เตนา’’ติ สงฺขานฏฺเฐน เอกสทฺเทน ทสฺเสตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปิณฺฑี’’ติ เอกคฺฆโน. มูลฏีกาปาเฐ. ‘‘อุปฺปาทาทิปฺปวตฺติโต’’ติ อุปฺปาทาทิวเสน ปวตฺตนโต. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. อุปาทารูปานิ ตฺเวว วุจฺจนฺติ. ‘‘เอวํ วิการปริจฺเฉท รูปานิ จ โยเชตพฺพานี’’ติ ปญฺจวิการรูปานิ กลาปสฺเสว โจปนาทิสภาวา โหนฺติ, น เอกเมกสฺส รูปสฺส. ตสฺมา ตานิ เอเกกสฺมึ กลาเป เอเกกานิ เอว โหนฺติ. ปริจฺเฉทรูปํ ปน กลาปปริยาปนฺนํ รูปํ น โหติ. ตสฺมา ทฺวินฺนํ ทฺวินฺนํ กลาปานํ อนฺตรา ตํปิ เอเกกเมว โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘จตุนฺนํ มหาภูตานํ นิสฺสยตา สมฺภวโต’’ติ เอตฺถ จตุนฺนํ มหาภูตานํปิ ลกฺขณมตฺเตน นานตฺตํ โหติ, ปวตฺติวเสน ปน เอกคฺฆนตฺตา สงฺขานฏฺเฐนปิ เอโก นิสฺสโยติ วตฺตพฺพเมว. เอวญฺหิสติ เอกสทฺทสฺส อตฺถ จลนํ นตฺถีติ. ‘‘เตน สทฺเทนา’’ติ จิตฺตชสทฺเทน. อตฺตานํ โมเจนฺโต ‘‘อธิปฺปาเยนา’’ติ อาห. เถรสฺส อธิปฺปาเยนาติ วุตฺตํ โหติ. อตฺตโน อธิปฺปายํ ทสฺเสนฺโต ‘‘เอตฺถ ปนา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘สทฺเทนา’’ติ จิตฺตชสทฺเทน. ‘‘ตายวาจายา’’ติ วจีมยสทฺเทนาติ อตฺโถ. ‘‘วิญฺญตฺตี’’ติ วิญฺญาปนํ อิจฺเจวตฺโถ. วิญฺญาเปตีติ วิญฺญาปิโต. ตสฺส ภาโว วิญฺญาวิตตฺตํ. วิตกฺกวิปฺผารสทฺโท นาม กสฺสจิ มหนฺตํ อตฺถํ จินฺเตนฺตสฺส โสกวเสน วา ตุฏฺฐิวเสน วา พลววิตกฺโก ปวตฺตติ. โส โสกํ วา ตุฏฺฐึ วา สนฺธาเร ตุํ อสกฺโกนฺโต ทุตีเยน สทฺธึ มนฺเตนฺโต วิย อตฺตโน มุเขเยว อพฺยตฺตํ สทฺทํ กตฺวา สมุทีรติ. ปกติชโน ตํ สทฺทมตฺตํ สุณาติ วา น วาสุณาติ. สุณนฺโตปิ อกฺขรํ วา อตฺถํ วา อธิปฺปายํ วา น ชานาติ. ทิพฺพโสเตน วา วิชฺชาโสเตน วาสุณนฺโต อกฺขรํปิ อตฺถํปิ อธิปฺปายํปิ ชานาติ. ชานิตฺวา เอวํปิ เต มโน, อิตฺถํปิ เต มโนติอาทิสติ. อยํ วิตกฺกวิปฺผารสทฺโท นาม. โส วิญฺญตฺติรหิโต โสตวิญฺเญยฺโยติ มหาอฏฺฐกถายํ วุตฺโต. สงฺคหกาโรปน วจีมยสทฺโทนาม วิญฺญตฺติรหิโตติ วา อโสตวิญฺเญยฺโยติ วา นตฺถีติ ปฏิกฺขิปติ. ‘‘อาคเต’’ติ อฏฺฐกถาสุ [Pg.219] อาคเต. ‘‘ปจฺเจตพฺพา’’ติ สทฺธาตพฺพา. ‘‘ฏีกาสุปนสฺสา’’ติ อสฺสสจฺจสงฺเขปสฺส ทฺวีสุฏีกาสุ. อกฺขรญฺจ ปทญฺจ พฺยญฺชนญฺจ อตฺโถ จาติ ทฺวนฺโท. อปฺปญฺญายมานา อกฺขรปทพฺยญฺชนตฺถา ยสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘อนฺธทมิฬาทีนํ’’ติ อนฺธชาติกทมิฬชาติกาทีนํ มิลกฺขูนํ. ‘‘อุกฺกาสิตสทฺโท จ ขิปิตสทฺโท จ วมิตสทฺโท จ ฉฑฺฑิตสทฺโท จาติ ทฺวนฺโท. อาทิสทฺเทน ตาทิสา อุคฺคาร หิกฺการ หสิต โรทิตาทโย สงฺคณฺหาติ. เสสเมตฺถสุวิญฺเญยฺยํ. १६९. कलापयोजनेमध्ये. 'संखाने' म्हणजे मोजणीत. 'तेन' म्हणजे मोजणीच्या अर्थाने 'एक' या शब्दाने दर्शविले जाते, असा संबंध आहे. 'पिंडी' म्हणजे एक घनरूप. मूळटीकेच्या पाठात 'उप्पादादिप्पवत्तितो' म्हणजे उत्पाद (उत्पत्ती) इत्यादींच्या द्वारे प्रवृत्त होण्यामुळे. 'इति' म्हणजे त्यावरून/त्यामुळे. उपादारूपांनाच असे म्हटले जाते. 'याप्रमाणे विकाररूप आणि परिच्छेदरूप देखील योजावे' म्हणजे पाच विकाररूपे ही कलापाचाच (समूहाचाच) हालचाल इत्यादी स्वभाव असतात, प्रत्येक स्वतंत्र रूपाचे नव्हे. म्हणून ती प्रत्येक कलापामध्ये एकेकच असतात. परंतु परिच्छेदरूप हे कलापामध्ये समाविष्ट असणारे रूप नसते. म्हणून दोन-दोन कलापांच्या दरम्यान ते देखील एकेकच असते, असे समजावे. 'चार महाभूतांच्या आश्रयत्वाच्या संभवामुळे' येथे चार महाभूतांमध्ये केवळ लक्षणाच्या दृष्टीने भिन्नता असते, परंतु प्रवृत्तीच्या दृष्टीने एक घनरूप असल्यामुळे मोजणीच्या अर्थाने देखील 'एकच आश्रय' असे म्हटले पाहिजे. असे असताना 'एक' या शब्दाच्या अर्थाचे विचलन होत नाही. 'तेन सद्देन' म्हणजे चित्तज शब्दाने. स्वतःला (दोषातून) मुक्त करताना 'अधिप्पायेन' (अभिप्रायाने) असे म्हटले आहे. थेरांच्या (स्थविरांच्या) अभिप्रायाने असे म्हटले आहे. स्वतःचा अभिप्राय दर्शविताना 'एत्थ पन' (येथे तर) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'सद्देन' म्हणजे चित्तज शब्दाने. 'ताय वाचाय' म्हणजे वचीमय (वाणीमय) शब्दाने, असा अर्थ आहे. 'विञ्ञत्ति' (विज्ञप्ती) म्हणजे विज्ञापित करणे (कळविणे), हाच अर्थ आहे. जो विज्ञापित करतो तो विज्ञापित. त्याचा भाव म्हणजे विज्ञापितत्व. 'वितर्क-विस्फार शब्द' (वितक्कविप्फारसद्द) म्हणजे जेव्हा कोणी मोठ्या विषयाचा विचार करत असतो, तेव्हा शोकामुळे किंवा आनंदामुळे तीव्र वितर्क प्रवृत्त होतो. तो शोक किंवा आनंद आवरण्यास असमर्थ होऊन, दुसऱ्या व्यक्तीशी सल्लामसलत केल्याप्रमाणे, स्वतःच्या मुखातूनच अस्पष्ट आवाज काढून तो प्रकट करतो. सामान्य माणूस तो केवळ आवाज ऐकतो किंवा ऐकत नाही. ऐकणारा देखील अक्षर, अर्थ किंवा अभिप्राय जाणत नाही. दिव्यश्रोत्राने किंवा विद्याश्रोत्राने ऐकणारा अक्षराला, अर्थाला आणि अभिप्रायाला देखील जाणतो. जाणून घेऊन 'तुझे मन असे आहे, तुझे मन तसे आहे' इत्यादी सांगतो. याला 'वितर्क-विस्फार शब्द' असे म्हणतात. तो विज्ञप्तीरहित आणि श्रोत्रविज्ञेय आहे, असे महाअट्ठकथेत म्हटले आहे. परंतु संगहकारांनी 'वचीमय शब्द' हा विज्ञप्तीरहित किंवा अश्रोत्रविज्ञेय असतो, या मताचे खंडन केले आहे. 'आगते' म्हणजे अट्ठकथांमध्ये आलेल्या. 'पच्चेतब्बा' म्हणजे श्रद्धा ठेवण्यायोग्य. 'टीकासुपनस्सा' म्हणजे 'सच्चसंखेप'च्या दोन टीकांमध्ये. अक्षर, पद, व्यंजन आणि अर्थ यांचा हा द्वंद्व समास आहे. ज्याचे अक्षर, पद, व्यंजन आणि अर्थ स्पष्टपणे समजत नाहीत, असा याचा विग्रह आहे. 'अंधदमिळादीनं' म्हणजे अंध आणि दमिळ इत्यादी म्लेंच्छांचे. 'उक्कासितसद्द' (खोकल्याचा आवाज), 'खिपितसद्द' (शिंकेचा आवाज), 'वमितसद्द' (उलटीचा आवाज) आणि 'छड्डितसद्द' (थुंकण्याचा आवाज) यांचा हा द्वंद्व समास आहे. 'आदि' शब्दाने ढेकर, उचकी, हसणे, रडणे इत्यादींचा संग्रह होतो. यातील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. กลาปโยชนานุทีปนา นิฏฺฐิตา. कलापयोजनानुदीपनी समाप्त झाली. ๑๖๑. รูปปฺปวตฺติกฺกเม. นปุคฺคลวเสน วิเสสนํ โหติ. ภูมิวเสน วิเสสนํ โหติ. ตญฺจ โข ปวตฺติกาลวเสนาติ อธิปฺปาโย. १६१. रूपप्रवृत्तीच्या क्रमामध्ये. पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) आधारे विशेषण होत नाही. भूमीच्या (स्तराच्या) आधारे विशेषण होते. आणि ते देखील प्रवृत्तीच्या काळाच्या आधारे होते, असा अभिप्राय आहे. เอตฺถจาติอาทีสุ. ปุริเมสุ ทฺวีสุ โยนีสุ ปาฬินเยน เวทิตพฺพาติ สมฺพนฺโธ. นิกฺขนฺตา, อิติ ตสฺมา อณฺฑชาติ จ ชลาพุชาติ จ วุจฺจนฺติ. กถํ อยํ นโย ปาฬินโย นาม โหตีติ. ปาฬิยํ อณฺฑโกสํ วตฺถิโกสํ อภินิพฺภิชฺช อภินิพฺภิชฺช ชายนฺตีติ วจเนน อณฺฑโต ชลาพุโต ชาตา วิชาตา นิกฺขนฺตาติ อตฺโถ วิญฺญายติ. อฏฺฐกถายํ ปน อณฺเฑชาตา ชลาพุมฺหิชาตาติ วุตฺตํ. คพฺภปลิเวฐนาสโย นาม เยน ปลิเวฐิโต คพฺโภ ติฏฺฐติ. วิภาวนิปาเฐ ‘‘อุกฺกํสคติ ปริจฺเฉทวเสนา’’ติ อุกฺกฏฺฐปฺปวตฺตินิยมนวเสน. อุกฺกฏฺฐนยวเสนาติ วุตฺตํ โหติ. อภิรูปสฺส กญฺญา ทาตพฺพาติ เอตฺถ กญฺญา ทาตพฺพาติ สามญฺญโต วุตฺเตปิ อภิรูปสฺส ปุริสสฺสาติ วุตฺตตฺตา กญฺญาปิ อภิรูปกญฺญา เอว วิญฺญายติ. อยํ อุกฺกฏฺฐนโย นาม. ‘‘ตตฺถ ตานิ สพฺพานี’’ติอาทีสุ. ตานิสพฺพานิปิ จกฺขุ โสต ฆาน ภาว ทฺวยานิ น โอมเกน กมฺเมน ลพฺภติ. อุกฺกฏฺเฐน กมฺเมน เอว ลพฺภตีติ อธิปฺปาโย. วิภงฺคปาเฐ. สทฺทายตนํ นาม ปฏิสนฺธิกาเล น ลพฺภตีติ วุตฺตํ ‘‘เอกาทสายตนานี’’ติ. จกฺขุเวกลฺลสฺส ทส, โสตเวกลฺลสฺส อปรานิทส, จกฺขุ โสตเวกลฺลสฺสนว[Pg.220], คพฺภเสยฺยสฺสวเสน สตฺตายตนานิ. ปาฬิยํ โอปปาติ กคพฺภเสยฺยกานํ เอว วุตฺตตฺตา ‘‘ปาฬิยํ อวุตฺตํปิปนา’’ติ วุตฺตํ. อวุตฺตมฺปิ จกฺขาทิเวกลฺลํ. ‘‘อญฺญมญฺญํ อวินาภาววุตฺติตา วุตฺตา’’ติ กถํ วุตฺตา ยสฺส ฆานายตนํ อุปฺปชฺชติ, ตสฺส ชิวฺหายตนํ อุปฺปชฺชตีติ, อามนฺตา. ยสฺส วา ปน ชิวฺหายตนํ อุปฺปชฺชติ, ตสฺส ฆานายตนํ อุปฺปชฺชตีติ, อามนฺตาติอาทินา วุตฺตา เปยฺยาลมุเขน. อาจริยานนฺทตฺเถเร น ปน อิจฺฉิตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ชิวฺหาเวกลฺลตาวิยา’’ติ ชิวฺหาเวกลฺลตานาม นตฺถิ วิย. ‘‘ฆานเวกลฺลตาปิ อตฺถีติ ยุตฺตํ’’ติ เอตฺถ ปาฬิยํ อฆานกานํ อิตฺถีนํ ปุริสานํติ อิทํ มาตุคพฺเภ ฆานายตเน อนุปฺปนฺเนเยว ปุเรตรญฺจ วนฺตานํ อิตฺถิปุริสานํ วเสน วุตฺตํ. น ฆานเวกลฺลานํ อตฺถิตายาติปิ วทนฺติ. คพฺเภ เสนฺตีติ คพฺภสยา. คพฺภสยา เอว คพฺภเสยฺยา. “येथे आणि” इत्यादींमध्ये. पहिल्या दोन योनींमध्ये पाळीच्या (पाठाच्या) नियमाने जाणावे, असा संबंध आहे. बाहेर पडलेले, म्हणून त्यावरून अंडज आणि जरायुज असे म्हटले जाते. हा नियम 'पाळीचा नियम' कसा काय होतो? पाळीमध्ये “अंडकोश आणि वस्तिकोष फोडून-फोडून जन्मतात” या वचनाने अंड्यापासून आणि जरायुपासून जन्मलेले, प्रसवलेले, बाहेर पडलेले असा अर्थ समजला जातो. परंतु अट्ठकथेत “अंड्यात जन्मलेले, जरायुमध्ये जन्मलेले” असे म्हटले आहे. 'गर्भपरिवेठन-आशय' म्हणजे ज्याने वेढलेला गर्भ राहतो. विभावनीच्या पाठात “उत्कर्षगती परिच्छेदवशेन” म्हणजे उत्कृष्ट प्रवृत्तीच्या नियमाच्या वशने. उत्कृष्ट नियमाच्या वशने असे म्हटले आहे. “रूपवान पुरुषाला कन्या द्यावी” येथे 'कन्या द्यावी' असे सामान्यपणे म्हटले असले तरी, 'रूपवान पुरुषाला' असे म्हटल्यामुळे कन्या देखील रूपवान कन्याच समजली जाते. याला 'उत्कृष्टनय' (उत्कृष्ट नियम) असे म्हणतात. “तेथे ती सर्व” इत्यादींमध्ये. ती सर्व देखील म्हणजे चक्षू, श्रोत्र, घ्राण आणि दोन्ही भाव (स्त्रीभाव व पुरुषभाव) ही हीन कर्माने प्राप्त होत नाहीत. ती उत्कृष्ट कर्मानेच प्राप्त होतात, असा अभिप्राय आहे. विभंगपाठात “शब्दायतन हे प्रतिसंधीच्या वेळी प्राप्त होत नाही” म्हणून “अकरा आयतने” असे म्हटले आहे. चक्षुवैकल्य असणाऱ्याला दहा, श्रोत्रवैकल्य असणाऱ्याला इतर दहा, चक्षु-श्रोत्र दोन्ही वैकल्य असणाऱ्याला नऊ, आणि गर्भशय्यक यांच्या वशने सात आयतने असतात. पाळीमध्ये केवळ औपपातिक आणि गर्भशय्यक यांच्याविषयीच सांगितले असल्यामुळे “पाळीमध्ये न सांगितलेले देखील” असे म्हटले आहे. न सांगितलेले म्हणजे चक्षू इत्यादींचे वैकल्य होय. “परस्पर अविनाभाव प्रवृत्ती सांगितली आहे” ती कशी सांगितली आहे? “ज्याला घ्राणायतन उत्पन्न होते, त्याला जिव्हायतन उत्पन्न होते का? होय. किंवा ज्याला जिव्हायतन उत्पन्न होते, त्याला घ्राणायतन उत्पन्न होते का? होय” इत्यादी प्रकारे पेयालमूखाने (संक्षिप्त रूपाने) सांगितले आहे. परंतु आचार्य आनंद थेरांना हे मान्य नाही, असा संबंध आहे. “जिव्हावैकल्याप्रमाणे” म्हणजे जिव्हावैकल्य जसे अस्तित्वात नाही, त्याप्रमाणे. “घ्राणवैकल्य देखील असणे योग्य आहे” येथे पाळीमध्ये “घ्राणरहित स्त्रिया आणि पुरुष” असे जे म्हटले आहे, ते मातेच्या गर्भात घ्राणायतन उत्पन्न होण्यापूर्वीच आधीच मृत झालेल्या स्त्री-पुरुषांच्या वशने म्हटले आहे. घ्राणवैकल्य असणाऱ्यांच्या अस्तित्वामुळे नाही, असेही म्हणतात. जे गर्भात निजतात ते 'गर्भशया'. गर्भशया म्हणजेच 'गर्भशय्या'. ปวตฺติกาเลติอาทีสุ. มูลฏีกาปาเฐ. ‘‘โอรโต’’ติ ปฏิสนฺธึ อุปาทาย วุตฺตํ. เอกาทสมสตฺตาเห อนาคเตติ วุตฺตํ โหติ. รูปายตนํ นุปฺปชฺชิสฺสติ. โน จ จกฺขายตนํ นุปฺปชฺชิสฺสตีติ อิทํ อทฺธาปจฺจุปฺปนฺนวเสน วุตฺตํ. ตสฺมา ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย อุปฺปนฺนํ รูปายตนํ ยาวชีวํปิ อุปฺปนฺนนฺตฺเวว วุจฺจติ. น อุปฺปชฺชิสฺสมานนฺติ. จกฺขายตนํ ปน เอกาทสมสตฺตาหา โอรโต ฐิตสฺส น อุปฺปนฺนํ. ตทา อนุปฺปนฺนตฺตา เอกาทสเม สตฺตาเห สมฺปตฺเต อุปฺปชฺชิสฺสตีติ วตฺตพฺพํ โหติ. ปจฺฉิม ภวิกตฺตา ปน ตทุภยมฺปิ ภวนฺตเร นุปฺปชฺชิสฺสติเยวาติ. ฆานายตนํ นิพฺพตฺเตตีติ ฆานายตนานิพฺพตฺตตํ, กมฺมํ. เตน กมฺเมน คหิตปฺปฏิสนฺธิกานํ. อิทญฺจ ยทิ ตนฺนิพฺพตฺตเกน กมฺเมน ปฏิสนฺธึ คณฺเหยฺยุํ. ฆานายตเน อนุปฺปนฺเน อนฺตรา น กาลงฺกเรยฺยุนฺติ กตฺวา วุตฺตํ. ตนฺนิพฺพตฺตเกน กมฺเมน ปฏิสนฺธึ คณฺหนฺตาปิ ตโต พลวนฺเต อุปจฺเฉทกกมฺเม อาคเต สติ. ฆานายตนุปฺปตฺติกาลํ อปตฺวา อนฺตรา นกาลงฺกโรนฺตีติ นตฺถิ. ‘‘จกฺขุฆาเนสุ วุตฺเตสู’’ติ ฏีกายํ วุตฺเตสุ. ‘‘อตฺถโต สิทฺธา เอวา’’ติ เอกาทสมสตฺตาเห อุปฺปนฺนาติ สิทฺธา เอว. ‘‘อีทิเสสุฐาเนสู’’ติ สภาวํ วิจาเร ตุํ ทุกฺกเรสุ [Pg.221] ฐาเนสุ. อฏฺฐกถาเยว ปมาณํ กาตุํ ยุตฺตาติ อธิปฺปาโย. อฏฺฐกถาปาเฐ. ‘‘ปุริมํ ภวจกฺกํ’’ติ อวิชฺชามูลกํ เวทนาวสานํ ภวจกฺกํ. ‘‘อนุปุพฺพปฺปวตฺติทีปนโต’’ติ ยถา ปจฺฉิเม ตณฺหามูลเก ภวจกฺเก อุปปตฺติภวปฺปวตฺตึ วทนฺเตน ภวปจฺจยาชาตีติ เอวํ เอกโต กตฺวา วุตฺตา, น ตถา ปุริเม ภวจกฺเก. ตตฺถ ปน สงฺขารปจฺจยา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณ ปจฺจยา นาม รูปนฺติอาทินา อนุปุพฺพปฺปวตฺติทีปนโต. ‘‘โส ปฏิกฺขิตฺโตเยวา’’ติ อายตนานํ กมโต วินิจฺฉยฏฺฐาเน เทสนากฺกโมว ยุตฺโตติ วตฺวา โส อุปฺปตฺติกฺกโม ปฏิกฺขิตฺโต. "पवत्तिकाल" (प्रवृत्तिकाल) इत्यादींमध्ये. मूळटीका पाठात. "ओरतो" (अलीकडे) हे प्रतिसंधीला (पुनर्जन्म जोडणीला) गृहीत धरून म्हटले आहे. अकराव्या आठवड्यात आलेले नाही, असे म्हटले आहे. "रूपायतन उत्पन्न होणार नाही, परंतु चक्षुआयतन उत्पन्न होणार नाही असे नाही" हे वर्तमान काळाच्या (अद्धापच्चुप्पन्न) संदर्भाने म्हटले आहे. म्हणून, प्रतिसंधीपासून सुरू करून उत्पन्न झालेले रूपायतन हे आयुष्यभर 'उत्पन्न झालेलेच' म्हटले जाते, 'उत्पन्न होत असलेले' (उप्पज्जिस्समानं) नाही. परंतु, अकराव्या आठवड्याच्या अलीकडे असलेल्या (भ्रूणाला) चक्षुआयतन उत्पन्न झालेले नसते. त्यावेळी ते उत्पन्न न झाल्यामुळे, अकरावा आठवडा आल्यावर 'ते उत्पन्न होईल' असे म्हणावे लागते. परंतु, अंतिम जन्मातील (पच्छिमभविक) असल्यामुळे, ते दोन्हीही दुसऱ्या जन्मात उत्पन्न होणारच नाहीत. "घाणायतन उत्पन्न करते" म्हणजे घाणायतन उत्पन्न करणारे कर्म. त्या कर्माद्वारे ज्यांनी प्रतिसंधी ग्रहण केली आहे त्यांच्यासाठी. आणि हे जर त्यांनी ते उत्पन्न करणाऱ्या कर्माने प्रतिसंधी ग्रहण केली तरच (लागू होते). घाणायतन उत्पन्न होण्यापूर्वीच मध्येच ते मरण पावले नाहीत, असे गृहीत धरून हे म्हटले आहे. ते उत्पन्न करणाऱ्या कर्माने प्रतिसंधी ग्रहण करत असतानाही, त्यापेक्षा अधिक बलवान उपच्छेदक कर्म (विनाशक कर्म) आले असता, घाणायतन उत्पत्तीचा काळ येण्यापूर्वीच ते मध्येच मरण पावत नाहीत, असे नाही (म्हणजे ते मरण पावू शकतात). "चक्षु आणि घाण (इंद्रिय) यांच्याविषयी सांगितले असता" असे टीकेमध्ये म्हटले आहे. "अर्थतः सिद्धच आहे" म्हणजे अकराव्या आठवड्यात उत्पन्न होते हे सिद्धच आहे. "अशा स्थानांमध्ये" म्हणजे ज्या स्थानांमध्ये स्वभावाचा विचार करणे कठीण असते अशा स्थानांमध्ये. अट्ठकथाच प्रमाण मानणे योग्य आहे, असा अभिप्राय आहे. अट्ठकथा पाठात. "पहिले भवचक्र" म्हणजे अविद्या-मूलक आणि वेदनेपाशी समाप्त होणारे भवचक्र. "अनुक्रमे प्रवृत्ती दर्शविल्यामुळे" - जसे नंतरच्या तृष्णामूलक भवचक्रात उपपत्ती-भवप्रवृत्ती सांगताना 'भवप्रत्यया जाती' (भवामुळे जन्म होतो) असे एकत्र करून सांगितले आहे, तसे पहिल्या भवचक्रात सांगितलेले नाही. कारण तेथे "संस्कारप्रत्यया विज्ञान, विज्ञानप्रत्यया नामरूप" इत्यादींद्वारे अनुक्रमे प्रवृत्ती दर्शविली आहे. "तो नाकारलाच आहे" म्हणजे आयतनांच्या क्रमाने निर्णय करण्याच्या ठिकाणी देशनाक्रमच योग्य आहे असे सांगून, तो उत्पत्तीचा क्रम नाकारला आहे. สํยุตฺตเก ยกฺขสํยุตฺตปาฬิยํ. คาถาสุ. ‘‘กลลา’’ติ กลลโต. ‘‘อพฺพุทา’’ติ อพฺพุทโต. ‘‘เปสิยา’’ติ เปสิโต. ‘‘ฆนา’’ติ ฆนโต. ‘‘ชาติอุณฺณํสูหี’’ติ สุทฺธชาติกสฺส เอลกสฺส โลมํสูหิ. ‘‘ปริปกฺกสมูหกํ’’ติ กลลโต ปรํ โถกํ ปริปกฺกญฺจ สมูหาการญฺจ หุตฺวา. ‘‘วิวตฺตมานํ ตพฺภาวํ’’ติ กลลภาวํ วิชหิตฺวา วตฺตมานํ. ‘‘วิลีนติ ปุสทิสา’’ติ อคฺคิมฺหิ วิลีนติปุรสสทิสา. ‘‘มุจฺจตี’’ติ กปาเล นลคฺคติ. เอตานิชายนฺตีติ เอวํ อฏฺฐกถายญฺจ วุตฺตํ. ‘‘ทฺวา จตฺตาลีสเม สตฺตาเห’’ติ นวมาเส อติกฺกมฺม วีสติเมทิวเส. ยทิ เอวํ, ปญฺจเมสตฺตาเห ปญฺจปฺปสาขา ชายนฺติ, เอกาทสเมสตฺตาเห จตฺตาริ อายตนานิ ชายนฺติ, มชฺเฌปน ปญฺจสตฺตาหา อตฺถิ. ตตฺถ กถนฺติ อาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทึ. ‘‘ฉสตฺตาหา’’ติ เอกาทสเมน สทฺธึ ฉสตฺตาหา. เอกาทสเมปิ หิ ปจฺฉิมทิวเส ชาตตฺตา ฉทิวสานิ อวสิฏฺฐานิ โหนฺติ. ‘‘ปริณตกาลา’’ติ ปริปกฺกกาลา. ปริปากคตา เอว หิ กมฺมชมหาภูตา สุปฺปสนฺนา โหนฺติ. เตสญฺจ ปสาทคุณา ปสาทรูปา โหนฺตีติ. ‘‘ตสฺสา’’ติ กลลสฺส. วณฺณชาตํ วา สณฺฐานํ วาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อากาสโกฏฺฐาสิโก’’ติ มนุสฺเสหิ อากาสโกฏฺฐาเส ฐปิโต. หุตฺวาติ ปาฐเสโส. กถํ ปรมาณุโต ปริตฺตกํ สิยาติ อาห ‘‘โสหี’’ติอาทึ. ‘‘โส’’ติ ปรมาณุ. ปฏิสนฺธิกฺขเณ กลลรูปํ กลาปตฺตยปริมาณํ. ปรมาณุ ปน [Pg.222] เอกูนปญฺญาสกลาปปริมาโณ. ตสฺมา ตํ ตโต ปริตฺตกนฺติ วุตฺตํ โหติ. ปฏิสนฺธิกฺขณโต ปรํ ปน ตํปิ ขเณขเณ อุปจิตเมว โหติ. ‘‘ธาตูนํ’’ติ จตุธาตุววตฺถาเน อาคตานํ จตุนฺนํ มหาภูตานํ. กลลสฺสวา อุปจิตปฺปมาณํ คเหตฺวา วุตฺตนฺติปิ ยุชฺชติ. ‘‘วตฺถุสฺมึ’’ติ อพฺพุทาทิวตฺถุมฺหิ. ‘‘ชลาพุมูลานุสาเรนา’’ติ ชลาพุชาตกาเล ตสฺส มูลานุ สาเรนาติ อธิปฺปาโย. คาถายํ. ‘‘มาตุติโร กุจฺฉิคโต’’ติ วตฺตพฺเพ คาถาพนฺธวเสน ‘‘มาตุกุจฺฉิคโต ติโร’’ติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘มาตุยา ติโรกุจฺฉิ คโต’’ติ. ‘‘ฉิทฺโท’’ติ สุขุเมหิ ฉิทฺเทหิ สมนฺนาคโต. ลทฺธํวา ปานโภชนํ. ‘‘ตโต ปฏฺฐายา’’ติ สตฺตรสมภวงฺคจิตฺตโต ปฏฺฐาย. ‘‘รูปสมุฏฺฐาเน วุตฺตเมวา’’ติ รูปสมุฏฺฐาเน มูลฏีกาวาท วิจารณายํ ‘ยํ ปิตตฺถ น จ ยุตฺต’นฺติอาทินา วุตฺตเมว. ‘‘อชฺโฌหฏาหาราภาวโต’’ติ พหิทฺธาหาราภาวโตติ อธิปฺปาโย. ‘‘ตตฺถา’’ติ รูปพฺรหฺมโลเก. อภาวํ วณฺเณติ. กสฺมาปน วณฺเณติ, นนุ วณฺเณนฺตสฺส อฏฺฐกถา วิโรโธ สิยาติ. วิโรโธ วา โหตุ, อวิโรโธ วา. ปาฬิเยว ปมาณนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘รูปธาตุยา’’ติอาทินา วิภงฺเค ปาฬึ อาหริ. ตตฺถ ‘‘รูปธาตุยา’’ติ รูปโลกธาตุยา. รูป พฺรหฺมโลเกติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อุปปตฺติกฺขเณ’’ติ ปฏิสนฺธิกฺขเณ. อาจริยสฺส อธิปฺปายํ วิภาเวนฺโต ‘‘เอตฺถจา’’ติอาทิมาห. ‘‘โผฏฺฐพฺเพ ปฏิกฺขิตฺเตปี’’ติ ปญฺจายตนานีติ วา ปญฺจธาตุโยติ วา ปริจฺเฉทกรณเมว ปฏิกฺขิ ปนํ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘กิจฺจนฺตร สพฺภาวา’’ติ โผฏฺฐพฺพกิจฺจโต กิจฺจนฺตรสฺส วิชฺชมานตฺตา. กิมฺปน กิจฺจนฺตรนฺติ. รูปกายสฺส ปวตฺติยา เหตุปจฺจยกิจฺจํ. มหาภูตา เหตู มหาภูตา ปจฺจยา รูปกฺขนฺธสฺส ปญฺญาปนายาติ หิ ภควตา วุตฺตํ. ตตฺถ เหตุกิจฺจํ นาม รูปชนนกิจฺจํ. ปจฺจย กิจฺจํ นาม รูปูปตฺถมฺภน กิจฺจํ. กิจฺจนฺตรเมวนตฺถีติ ฆานาทีนํ วิสย โคจรภาวกิจฺจํ เตสํ กิจฺจํ นาม, ตโต อญฺญํ กิจฺจํ นาม นตฺถิ. ‘‘เยนา’’ติ กิจฺจนฺตเรน. ‘‘เต’’ติ คนฺธาทโย. อิทานิ อฏฺฐก ตานุคตํ [Pg.223] วาทํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยถาปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘เยน กิจฺจวิเสเสนา’’ติ วิสยโคจรภาวกิจฺจวิเสเสน. รูปชนนรูปูปตฺถมฺภน กิจฺจวิเสเสน จ. ‘‘สพฺพตฺถา’’ติ สพฺพสฺมึ ปาฬิปฺปเทเส. ‘‘เตสํ’’ติ คนฺธาทีนํ. ‘‘ตตฺถา’’ติ รูปโลเก. ‘‘นิสฺสนฺท ธมฺมมตฺตภาเวนา’’ติ เอตฺถ ยถา อคฺคิมฺหิ ชาเต ตสฺส นิสฺสนฺทา นาม อิจฺฉนฺตสฺสปิ อนิจฺฉนฺตสฺสปิ ชายนฺติเยว. วณฺโณปิ ชายติ, โอภาโสปิ, คนฺโธปิ, รโสปิ, ธูโมปิ, ปุปฺผุลฺลานิปิ กทาจิ ชายนฺติเยว. เตหิ วณฺณาทีหิ กรณีเย กิจฺจวิเสเส สติปิ อสติปิ. ตถา มหาภูเตสุ ชาเตสุ เตสํ นิสฺสนฺทา นาม อิจฺฉนฺตสฺสปิ อนิจฺฉนฺตสฺสปิ กิจฺจวิเสเส สติปิ อสติปิ ชายนฺติเยว. เอวํ นิสฺสนฺทธมฺมมตฺตภาเวน. อนุปฺปเวโส ยุตฺโต สิยา อชฺฌตฺต สนฺตาเนติ อธิปฺปาโย. พหิทฺธา สนฺตาเน ปน วตฺถา ภรณ วิมานาทีสุ เตสํ ภาโว อิจฺฉิ ตพฺโพ สิยา. อชฺฌตฺเตปิ วา กายํ โอฬาริกํ กตฺวา มาปิตกาเลติ. เอตฺถ จ ‘‘ธมฺมายตน ธมฺมธาตูสุ อนุปฺปเวโส’’ติ เอตฺถ อฏฺฐสาลินิยํ ตาว. เย ปน อนาปาตาคตา รูปาทโยปิ ธมฺมารมฺมณมิจฺเจว วทนฺตีติ วุตฺตํ. ตํ ตตฺถ ปฏิกฺขิตฺตํ. อนาปาตาคมนํ นาม วิสยโคจร กิจฺจรหิตตา วุจฺจติ. ตญฺจ มนุสฺสานมฺปิ เทวานมฺปิ พฺรหฺมานมฺปิ ปสาทรูเปสุ อนาปาตา คมนเมว อธิปฺเปตํ. ตํ ปน อตฺถินตฺถีติ วิจาเรตฺวา กเถตพฺพํ. อปิ จ นิสฺสนฺทธมฺมา นาม โอฬาริกานํ มหาภูตานํ วิวิธาการาปิ ภเวยฺยุํ. พฺรหฺมานํ ปน อชฺฌตฺต รูปํ อปฺปนา ปตฺตกมฺมวิเสเสน ปวตฺตํ อติสุขุมํ โหติ. ตสฺมา กามสตฺต สนฺตาเน วิย ตตฺถ ปริปุณฺณํ นิสฺสนฺทรูปํ นาม วิจาเรตพฺพเมว. ธมฺมา รมฺมณญฺจ มุขฺยธมฺมารมฺมณํ อนุโลม ธมฺมายตนนฺติ ปาฬิยํ วุตฺตํ นตฺถิ เยวาติ. ‘‘ชีวิต ฉกฺกญฺจา’’ติ วตฺตพฺพํ รูปโลเก. ‘‘ตตฺถา’’ติ อสญฺญสตฺเต. กามโลเก ชีวิตนวกํ กสฺมา วิสุํ น วุตฺตนฺติ. ปฏิสนฺธิกฺขเณ กสฺมา น วุตฺตํ. ปวตฺติกาเลปิ วิสุํ น วุตฺตเมว. ‘‘อาหารูปตฺถมฺภกสฺสา’’ติ อาหารสงฺขาตสฺส รูปูปตฺถมฺภกสฺส. ‘‘สกลสรีร พฺยาปิโน อนุปาลกชีวิตสฺสา’’ติ กายทสกภาวทสเกสุ ปริยาปนฺนสฺส ชีวิตสฺส. ‘‘เอต เทวา’’ติ [Pg.224] ชีวิตนวกเมว. ‘‘ตตฺถา’’ติ รูปโลเก. อุทยภูตสฺสา’’ติ วฑฺฒิภูตสฺส. ‘‘ทฺวีสุ อคฺคีสู’’ติ ปาจกคฺคิสฺมิญฺจ กายคฺคิสฺมิญฺจ. อาตงฺโก วุจฺจติ โรโค. พหุโก อาตงฺโก ยสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘วิสมเวปากินิยา’’ติ วิสมํ ปาเจนฺติยา. ‘‘คหณิยา’’ติ อุทรคฺคินา. ‘‘ปธานกฺขมายา’’ติ ปธาน สงฺขาตํ ภาวนารพฺภกิจฺจํ ขมนฺติยา. ‘‘เอตํ’’ติ ชีวิตนวกํ. ‘‘เถเรน จา’’ติ อนุรุทฺธตฺเถเรน จ. ‘‘เอตํ’’ติ ชีวิต นวกํ. ‘‘นิโรธกฺกโม’’ติ มรณาสนฺนกาเล นิโรธกฺกโม. ‘‘เอตฺถา’’ติ รูปโลเก. กเฬวรํ วุจฺจติ มตสรีรํ. ตสฺส นิกฺเขโป กเฬวรนิกฺเขโป. อญฺเญสญฺจ โอปปาติกานํ กเฬวรนิกฺเขโป นาม นตฺถิ. กสฺมา ปน เตสํ กเฬวรนิกฺเขโป นาม นตฺถีติ อาห ‘‘เตสญฺหี’’ติอาทึ. วิภาวนิปาเฐ. สพฺเพสํปิ รูปพฺรหฺมานํ. อาหารสมุฏฺฐานานํ รูปานํ อภาวโต ติสมุฏฺฐานานีติ วุตฺตํ. อสญฺญสตฺเต จิตฺตสมุฏฺฐานานมฺปิ อภาวโต ทฺวิสมุฏฺฐานานีติ วุตฺตํ. ‘‘ตานี’’ติ มรณาสนฺน จิตฺตสมุฏฺฐานานิ. ตํ ปริมาณํ อสฺสาติ ตาวตฺตกํ. ‘‘ลหุกครุกตาทิวิกาโร’’ติ สกลรูปกายสฺส ลหุกครุกาทิวิกาโร. อปิ จ ตตฺถ ทนฺธตฺตาทิกร ธาตุกฺโขภปจฺจยานํ สพฺพโส อภาวโต นิจฺจกาลมฺปิ สกลสรีรสฺส ลหุตาทิคุโณ วตฺตติเยว. กึ ตตฺถ ปฏิปกฺข ธมฺมปฺปวตฺติ จินฺตาย. ตถา อสญฺญสตฺเตปิ รุปฺปนวิการ จินฺตายาติ. संयुक्तनिकाय मधील यक्खसंयुक्तपाळीत. गाथांमध्ये. 'कलला' म्हणजे कललापासून. 'अब्बुदा' म्हणजे अब्बुदापासून. 'पेसिया' म्हणजे पेशीपासून. 'घना' म्हणजे घनापासून. 'जातिउण्णंसूही' म्हणजे शुद्ध जातीच्या मेंढीच्या केसांच्या धाग्यांनी. 'परिपक्कसमूहकं' म्हणजे कललाच्या नंतर थोडे परिपक्व आणि समूहाच्या आकाराचे होऊन. 'विवट्टमानं तब्भावं' म्हणजे कललभाव सोडून वर्तमान असणारे. 'विलीनति पुसदिसा' म्हणजे अग्नीमध्ये वितळलेल्या शिसे किंवा जस्तासारखे. 'मुच्चती' म्हणजे कपाळाला न चिकटणारे. हे सर्व उत्पन्न होतात, असे अट्ठकथेतही म्हटले आहे. 'द्वेचाळिसाव्या आठवड्यात' म्हणजे नऊ महिने आणि वीस दिवस उलटून गेल्यावर. जर असे असेल, तर पाचव्या आठवड्यात पाच शाखा उत्पन्न होतात, अकराव्या आठवड्यात चार आयतने उत्पन्न होतात, परंतु मध्ये पाच आठवडे आहेत. तिथे कसे होते? म्हणून 'एत्थ च' इत्यादी म्हटले आहे. 'सहा आठवडे' म्हणजे अकराव्या आठवड्यासह सहा आठवडे. कारण अकराव्या आठवड्यातही शेवटच्या दिवशी उत्पन्न झाल्यामुळे सहा दिवस शिल्लक राहतात. 'परिणतकाला' म्हणजे परिपक्व काळ. परिपक्वतेला प्राप्त झालेले कम्मज-महाभूत अत्यंत प्रसन्न असतात. आणि त्यांचे प्रसादगुण हे प्रसादरूप असतात. 'तस्स' म्हणजे कललाचा. वर्ण किंवा आकार असा संबंध आहे. 'आकासकोट्ठासिको' म्हणजे मनुष्यांद्वारे आकाशाच्या भागात ठेवलेला. 'होऊन' हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. परमाणूपेक्षा लहान कसे असू शकते? म्हणून 'सो ही' इत्यादी म्हटले आहे. 'सो' म्हणजे परमाणू. पटिसंधिक्षणामध्ये कललरूप हे तीन कलापांच्या परिमाणाचे असते. परमाणू मात्र एकोणपन्नास कलापांच्या परिमाणाचा असतो. म्हणून ते त्यापेक्षा लहान आहे असे म्हटले आहे. पटिसंधिक्षणा नंतर मात्र ते देखील क्षणाक्षणाला उपचित होत जाते. 'धातूनां' म्हणजे चतुधातुव्यवस्थानात आलेल्या चार महाभूतांचे. किंवा कललाचे उपचित प्रमाण घेऊन म्हटले आहे असे मानणेही योग्य आहे. 'वत्थुस्मिं' म्हणजे अब्बुद इत्यादी वस्तूंमध्ये. 'जलाबुमूलानुसारेण' म्हणजे जरायुज जन्माच्या वेळी त्याच्या मुळाच्या अनुषंगाने, असा अभिप्राय आहे. गाथेमध्ये. 'मातुतिरो कुच्छिगतो' असे म्हणायचे असताना गाथेच्या रचनेमुळे 'मातुकुच्छिगतो तिरो' असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'मातुया तिरोकुच्छि गतो' असे म्हटले आहे. 'छिद्दो' म्हणजे सूक्ष्म छिद्रांनी युक्त असलेला. किंवा मिळालेले अन्न-पाणी. 'ततो पट्ठाय' म्हणजे सतराव्या भवांगचित्तापासून सुरू करून. 'रूपसमुट्ठाने वृत्तमेव' म्हणजे रूपसमुत्थानामध्ये मूळटीकेच्या वादाच्या विचारामध्ये 'यं पितत्थ न च युत्तं' इत्यादीद्वारे जे म्हटले आहे तेच होय. 'अज्झोहाटआहाराभावतो' म्हणजे बाह्य आहाराच्या अभावामुळे, असा अभिप्राय आहे. 'तत्थ' म्हणजे रूपब्रह्मलोकात. अभावाचे वर्णन करतो. परंतु वर्णन का करतो? वर्णन करणाऱ्याचा अट्ठकथेशी विरोध होईल ना? विरोध असो वा नसो, पाळी हेच प्रमाण आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'रूपधातुया' इत्यादीद्वारे विभंगामध्ये पाळीचे उद्धरण दिले आहे. तेथे 'रूपधातुया' म्हणजे रूपलोकधातूमध्ये. रूपब्रह्मलोकात असे म्हटले आहे. 'उपपत्तिक्खणे' म्हणजे पटिसंधिक्षणात. आचार्यांचा अभिप्राय स्पष्ट करताना 'एत्थ च' इत्यादी म्हटले आहे. 'फोट्ठब्बे पटिक्खित्तेपि' म्हणजे पाच आयतने किंवा पाच धातू असा परिच्छेद करणे हाच निषेध समजावा. 'किच्चन्तर सब्भावा' म्हणजे फोट्ठब्बाच्या कार्याव्यतिरिक्त इतर कार्य विद्यमान असल्यामुळे. इतर कार्य कोणते आहे? रूपकायाच्या प्रवृत्तीसाठी हेतू-प्रत्यय कार्य. कारण 'महाभूते हे हेतू आहेत, महाभूते हे प्रत्यय आहेत रूपस्कंधाच्या प्रज्ञप्तीसाठी' असे भगवंतांनी म्हटले आहे. तेथे हेतूकार्य म्हणजे रूपाची उत्पत्ती करण्याचे कार्य. प्रत्ययकार्य म्हणजे रूपाला उपस्तंभन देण्याचे कार्य. इतर कार्यच नाही म्हणजे घाण इत्यादींचे विषय-गोचर भाव कार्य हेच त्यांचे कार्य आहे, त्याव्यतिरिक्त इतर कोणतेही कार्य नाही. 'येन' म्हणजे ज्या इतर कार्याने. 'ते' म्हणजे गंध इत्यादी. आता अट्ठकथेला अनुसरून असलेला वाद दर्शवताना 'yathāpanā' (यथा पना) इत्यादी म्हटले आहे. 'येन किच्चविसेसेन' म्हणजे विषय-गोचर भाव कार्यविशेषाने आणि रूपजनन व रूपोपस्तंभन कार्यविशेषाने. 'सब्बत्थ' म्हणजे सर्व पाळी प्रदेशात. 'तेसं' म्हणजे गंध इत्यादींचे. 'तत्थ' म्हणजे रूपलोकात. 'निस्सन्दधम्ममत्तभावेन' येथे जसे अग्नी उत्पन्न झाल्यावर त्याचे निस्संद इच्छिणाऱ्याला किंवा न इच्छिणाऱ्यालाही उत्पन्न होतातच. वर्णही उत्पन्न होतो, प्रकाशही, गंधही, रसही, धूरही आणि कधीकधी ठिणग्याही उत्पन्न होतातच. त्या वर्णादींद्वारे करावयाचे कार्यविशेष असो वा नसो. त्याचप्रमाणे महाभूते उत्पन्न झाल्यावर त्यांचे निस्संद इच्छिणाऱ्याला किंवा न इच्छिणाऱ्याला कार्यविशेष असो वा नसो उत्पन्न होतातच. अशा प्रकारे केवळ निस्संदधर्माच्या रूपाने. अध्यात्म संतानामध्ये अनुप्रवेश योग्य होईल, असा अभिप्राय आहे. बाह्य संतानामध्ये मात्र वस्त्र, आभूषण, विमान इत्यादींमध्ये त्यांचे अस्तित्व इच्छिले पाहिजे. किंवा अध्यात्मातही काया ओळारिक करून निर्माण केलेल्या वेळी. आणि येथे 'धम्मायतन धम्मधातूमध्ये अनुप्रवेश' याविषयी अट्ठसालिनीमध्ये म्हटले आहे की, जे अनापातागत रूपादी देखील केवळ धम्मारम्मणच आहेत असे म्हणतात, त्याचा तेथे निषेध केला आहे. अनापातागमन म्हणजे विषय-गोचर कार्याचा अभाव म्हटले जाते. आणि ते मनुष्यांच्या, देवांच्या व ब्रह्मांच्या प्रसादरूपांमध्ये अनापातागमनच अभिप्रेत आहे. ते आहे की नाही, याचा विचार करून सांगितले पाहिजे. शिवाय, निस्संदधर्म हे ओळारिक महाभूतांचे विविध प्रकारचे असू शकतात. परंतु ब्रह्मांचे अध्यात्म रूप हे अप्पना प्राप्त कर्मविशेषाने प्रवृत्त झालेले अतिसूक्ष्म असते. म्हणून कामलोकातील सत्त्वांच्या संतानाप्रमाणे तेथे परिपूर्ण निस्संद रूप हे विचार करण्याजोगेच आहे. आणि धम्मारम्मण हे मुख्य धम्मारम्मण आणि अनुलोम धम्मायतन आहे असे पाळीमध्ये म्हटलेले नाहीच. 'जीवित छक्कञ्च' हे रूपलोकात म्हणावे. 'तत्थ' म्हणजे असञ्ञसत्तात. कामलोकात जीवित-नवक स्वतंत्रपणे का म्हटले नाही? पटिसंधिक्षणात का म्हटले नाही? प्रवृत्तीकाळातही स्वतंत्रपणे म्हटलेले नाहीच. 'आहारूपत्थम्भकस्स' म्हणजे आहार नावाच्या रूपाला उपस्तंभन देणाऱ्याचे. 'सकलसरीर ब्यापिनो अनुपालकजीवितस्स' म्हणजे कायदशक आणि भावदशकांमध्ये समाविष्ट असलेल्या संपूर्ण शरीरात पसरलेल्या संरक्षक जीविताचे. 'एत देव' म्हणजे जीवित-नवकच. 'तत्थ' म्हणजे रूपलोकात. 'उदयभूतस्स' म्हणजे वृद्धी झालेल्याचे. 'दोन अग्नींमध्ये' म्हणजे पाचक अग्नीमध्ये आणि काय अग्नीमध्ये. आतंक म्हणजे रोग म्हटला जातो. ज्याला पुष्कळ रोग आहे तो असा विग्रह आहे. 'विसमवेपाकिनिया' म्हणजे विषम रीतीने पचन करणाऱ्या. 'गहणिया' म्हणजे उदराग्नीने. 'पधानक्खमाया' म्हणजे प्रधान नावाचे भावना आरंभ करण्याचे कार्य सहन करणाऱ्या. 'एतं' म्हणजे जीवित-नवक. 'थेरांनी देखील' आणि 'एतं' म्हणजे जीवित-नवक. 'निरोधक्कमो' म्हणजे मरणासन्न काळातील निरोधक्रम. 'एत्थ' म्हणजे रूपलोकात. कलेवर म्हणजे मृत शरीर म्हटले जाते. त्याचा त्याग म्हणजे कलेवरनिक्षेप. आणि इतर ओपपातिक सत्त्वांचा कलेवरनिक्षेप नसतो. परंतु त्यांचा कलेवरनिक्षेप का नसतो? म्हणून 'तेसं हि' इत्यादी म्हटले आहे. विभावनी पाठात. सर्वच रूपब्रह्मांच्या बाबतीत. आहारसमुत्थान रूपांच्या अभावामुळे 'तीन समुत्थानांचे' असे म्हटले आहे. असञ्ञसत्तात चित्तसमुत्थान रूपांचाही अभाव असल्यामुळे 'दोन समुत्थानांचे' असे म्हटले आहे. 'तानि' म्हणजे मरणासन्न चित्तसमुत्थान रूपे. तेवढे परिमाण ज्याचे आहे ते तावत्तक. 'लहुकगरुकतादिविकारो' म्हणजे संपूर्ण रूपकायाचा हलकेपणा, जडपणा इत्यादी विकार. शिवाय, तेथे मंदता इत्यादी निर्माण करणाऱ्या धातूंच्या क्षोभाच्या प्रत्ययांचा सर्वथा अभाव असल्यामुळे, नेहमीच संपूर्ण शरीराचा हलकेपणा इत्यादी गुण टिकून राहतोच. तेथे प्रतिपक्ष धर्माच्या प्रवृत्तीच्या चिंतेचे काय प्रयोजन? तसेच असञ्ञसत्तात देखील रूपाच्या विकाराच्या चिंतेचे काय प्रयोजन? รูปปฺปวตฺติกฺกมานุทีปนา นิฏฺฐิตา. रूपप्रवृत्तीच्या क्रमाचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ๑๖๑. นิพฺพานสงฺคเห. ทฺวีสุ นิพฺพานปเทสุ ปถมปทํ อวิญฺญาตตฺถํ สามญฺญ ปทํ. ทุตียํ วิญฺญา ตตฺถํ วิเสสปทํ. กิเลเส สเมตีติ สมโณ. อริยปุคฺคโล. สมณสฺส ภาโว สามญฺญํ. อริยมคฺโค. สามญฺญสฺส ผลานิ สามญฺญผลานิ. โลกโต อุตฺตรติ อติกฺกมตีติ โลกุตฺตรํ. โลเก น ปญฺญาวียตีติ ปญฺญตฺตีติ อิมมตฺถํ สนฺธาย ‘‘นหี’’ติอาทิมาห[Pg.225]. จตฺตาริมคฺคญฺญาณานิ จตุมคฺคญฺญาณนฺติ เอวํ สมาสวเสน เอกวจนนฺตํ ปทํ วากฺยํ ปตฺวา พหุวจนนฺตํ โหตีติอาห ‘‘จตูหิ อริยมคฺคญฺญาเณหี’’ติ. ‘‘ตาทิสมฺหา’’ติ อริยมคฺคสทิสมฺหา. ‘‘วิมุขานํ’’ติ ปรมฺมุขานํ. ‘‘ชจฺจนฺธานํ วิยา’’ติ ชจฺจนฺธานํ จนฺทมณฺฑลสฺส อวิสยภาโว วิย. ‘‘ตสฺสา’’ติ นิพฺพานสฺส. ตตฺถ ‘‘ชจฺจนฺธานํ’’ติ อวิสยปเท สามิปทํ. ‘‘ตสฺสา’’ติ ภาวปทํ. ‘‘ยํ กิญฺจี’’ติ กิญฺจิยํ อตฺถชาตํ. อสฺสนิพฺพานสฺส สิทฺธตนฺติ สมฺพนฺโธ. อปากฏสฺส ธมฺมสฺส. วายาโมปิ นาม น อตฺถิ. กุโต ตสฺส สจฺฉิกรณํ ภวิสฺสตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘เยนา’’ติ วายาเมน. ‘‘นิพฺพาเนน วินา’’ติ นิพฺพานารมฺมณํ อลภิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อกิจฺจสิทฺธึ’’ติ กิเลสปฺปหาน กิจฺจสฺส อสิทฺธึ. ‘‘ตโต’’ติ ตสฺมา. ‘‘วธายา’’ติ วธิตุํ. ‘‘ปริสกฺกนฺตา’’ติ วายมนฺตา. คาถายํ. ‘‘อนฺโตชฏา’’ติ อชฺฌตฺตสนฺตาเน ตณฺหาชฏา, ตณฺหาวินทฺธา. ‘‘พหิชฏา’’ติ พหิทฺธาสนฺตาเน ตณฺหาชฏา, ตณฺหาวินทฺธา. ‘‘ตสฺสา’’ติ ตณฺหาย. ‘‘วตฺถุโต’’ติ วิสุํวิสุํ ชาตสรูปโต. ปรินิพฺพายึสุ, ปรินิพฺพายนฺติ, ปรินิพฺพายิสฺสนฺตีติ ปรินิพฺพุตา. ตการปจฺจยสฺส กาลตฺตเยปิ ปวตฺตนโต. ยถา ทิฏฺฐา, สุตา, มุตา, วิญฺญาตา,ติ. วิสิฏฺฐํ กตฺวา ชานิตพฺพนฺติ วิญฺญาณํ. น นิทสฺสิตพฺพนฺติ อนิทสฺสนํ. นตฺถิ อนฺโต เอตสฺสาติ อนนฺตํ. สพฺพโต ปวตฺตา คุณปฺปภา เอตสฺสาติ สพฺพโตปภํ. ‘‘ภควตา วุตฺตํ’’ติ ทีฆนิกาเย เกวฏฺฏสุตฺเต วุตฺตํ. ‘‘สวนฺติโย’’ติ มหานทิโย วา กุนฺนทิโย วา. ‘‘อปฺเปนฺตี’’ติ ปวิสนฺติ. ‘‘ธาราติ’’ เมฆวุฏฺฐิธารา. พุทฺเธสุ อนุปฺปชฺชนฺเตสุ เอกสตฺโตปิ ปรินิพฺพาตุํ น สกฺโกตีติ อิทํ พุทฺธุปฺปาทกปฺเป เอว ปจฺเจก สมฺพุทฺธาปิ อุปฺปชฺชนฺตีติ กตฺวา วุตฺตํ. อปทาน ปาฬิยํ ปน พุทฺธสุญฺญกปฺเปปิ ปจฺเจกสมฺพุทฺธานํ อุปฺปตฺติ อาคตา เอว. ‘‘เอกสตฺโตปี’’ติ วา สาวกสตฺโต คเหตพฺโพ. เอวญฺหิ สติ อปทานปาฬิยา อวิโรโธ โหติ. ‘‘อาราเธนฺตี’’ติ สาเธนฺติ ปฏิลภนฺติ. สพฺพโต ปวตฺตา คุณปฺปภา เอตสฺสาติ อตฺถํ สนฺธาย ‘‘สพฺพโตปภา สมฺปนฺนํ’’ติ [Pg.226] วุตฺตํ. ‘‘โชติ วนฺต ตโรวา’’ติ โอภาสวนฺตตโร วา. สพฺพตฺถ ปภวติ สํวิชฺชตีติ สพฺพโตปภนฺติ อิมมตฺถํ สนฺธาย สพฺพโต วา ปภุตเมว โหตีติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘น กตฺถจิ นตฺถี’’ติ. ‘‘เอวํสนฺเต ปี’’ติ เอวํ วุตฺตนเยน เอกวิเธ สนฺเตปิ. ‘‘อุปจริตุํ’’ติ อุปจารวเสน โวหริตุํ. ‘‘ยถาหา’’ติ ตสฺมึ เยวสุตฺเต ปุน กึ อาห. ภวํ เนตีติ ภวเนตฺติ. ภวตณฺหา เอว. ‘‘สมฺปรายิกา’’ติ จุติอนนฺตเร ปตฺตพฺพา. ทฺวินฺนํ ขีณาสวานํ อนุปาทิเสสตา วุตฺตาติ สมฺพนฺโธ. เอตฺถ ‘‘อนุปาทิเสสตา’’ติ อนุปาทิเสสนิพฺพานํ วุจฺจติ. เสกฺเขสุ อรหตฺตมคฺคฏฺฐสฺส เสกฺขสฺส กิเลสุปาทิเสส วเสน อนุปาทิเสสตา วุตฺตา. ‘‘กิเลสุปาทิเสโส’’ติ จ กิเลส สงฺขาโต อุปาทิเสโส. ตถา ขนฺธุปาทิเสโสปิ. อนฺตราปรินิพฺพายีติอาทีสุ ปรินิพฺพานํ นาม กิเลสปรินิพฺพานํ วุตฺตํ. อุภโต ภาค วิมุตฺตาทีนํ ปทตฺโถ นวมปริจฺเฉเท อาคมิสฺสติ. ‘‘กิเลสกฺขเยน สเหว ขิยฺยนฺตี’’ติ ปจฺจุปฺปนฺนภเว อรหตฺตมคฺคกฺขเณ กิเลสกฺขเยน สทฺธึ เอว ขิยฺยนฺติ. อนุปฺปาท ธมฺมตํ คจฺฉนฺติ. ตถา อนาคามิ ปุคฺคลสฺส กามปฏิสนฺธิกฺขนฺธาปิ อนาคามิมคฺคกฺขเณ, โสตาปนฺนสฺส สตฺตภเวฐเปตฺวา อวเสส กามปฏิสนฺธิกฺขนฺธา โสตาปตฺติ มคฺคกฺขเณ ตํ ตํ กิเลสกฺขเย น สเหว ขิยฺยนฺตีติ. ปจฺจุปฺปนฺนกฺขนฺธา ปน กิเลสกฺขเยน สหขิยฺยนฺติ. ขนฺธุปาทิเสสา นาม หุตฺวา ยาวมรณกาลา ขีณาสวานมฺปิ ปวตฺตนฺติ. กสฺมา ปวตฺตนฺตีติ อาห ‘‘ยาวจุติยา ปวตฺตมานํ’’ติอาทึ. ปจฺจุปฺปนฺนกฺขนฺธสนฺตานํ ปน ธมฺมตาสิทฺธนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ผลนิสฺสนฺทภูตํ’’ติ วิปากผลภูตญฺจ นิสฺสนฺทผลภูตญฺจ หุตฺวา. ‘‘เตนสเหวา’’ติ กิเลสกฺขเยน สเหว. ‘‘ยสฺมาปนา’’ติอาทีสุ. ปริสมนฺตโต พุนฺธนฺติ นีวาเรนฺติ, สนฺติสุขสฺส อนฺตรายํ กโรนฺตีติ ปลิโพธา. กิเลสาภิสงฺขรณ กิจฺจานิ, กมฺมาภิสงฺขรณกิจฺจานิ, ขนฺธาภิสงฺขรณ กิจฺจานิ จ. ปลิโพเธหิ สห วตฺตนฺตีติ สปลิโพธา. สงฺขาร นิมิตฺเตหิ สห วตฺตนฺตีติ สนิมิตฺตา. ตณฺหาปณิธีหิ สห วตฺตนฺตีติ สปณิหิตา[Pg.227].‘‘ตโต’’ติ ปาปกมฺมโต, อปายทุกฺขโต จ. ‘‘โกจี’’ติ โกจิธมฺโม. ‘‘นิโรเธตุํ สกฺโกตี’’ติ สกฺกายทิฏฺฐิยา นิรุทฺธาย เต นิรุชฺฌนฺติ. อนิรุทฺธาย นนิรุชฺฌนฺติ. ตสฺมา สกฺกายทิฏฺฐิ นิโรโธ นิพฺยาปารธมฺโมปิ สมาโน เต ปลิโพเธ นิโรเธติ นาม. ‘‘นิโรเธตุํ สกฺโกตี’’ติ จ อพฺยาปาเร พฺยาปารปริกปฺปนาติ ทฏฺฐพฺพํ. สกฺกายทิฏฺฐินิโรโธเยว เต ปลิโพเธ นิโรเธตุํ สกฺโกตีติ เอตฺถ ทฺวินฺนมฺปิ นิโรโธ เอโกเยว. เอวํ สนฺเตปิ อวิชฺชา นิโรธา สงฺขาร นิโรโธติอาทีสุ วิย อเภเท เภทปริกปฺปนา โหตีติ. อุปฺปาโท จ ปวตฺโต จ อุปฺปาทปฺปวตฺตา. เต มูลํ ยสฺสาติ วิคฺคโห. เยน โอฬาริกากาเรน. มาเรนฺตีติ มารา. วธกปจฺจตฺถิกาติ วุตฺตํ โหติ. กิเลสมาราทโย. มารา ทหนฺติ ติฏฺฐนฺติ เอเตสูติ มารเธยฺยา. มาเรติ จาเวติ จาติ มจฺจุ. มรณเมว. มจฺจุทหติ ติฏฺฐติ เอเตสูติ มจฺจุเธยฺยา. ‘‘นตฺถิ ตสฺมึ นิมิตฺตํ’’ติ วุตฺเต ปญฺญตฺติธมฺเมสุปิ อุปฺปาทปฺปวตฺตมูลํ นิมิตฺตํ นาม นตฺถิ. เอวํสติ, เตหิ นิพฺพานสฺส อวิเสโส อาปชฺชตีติ โจทนา. ตํ ปริหรนฺโต ‘‘ตญฺหี’’ติอาทิมาห. วิทฺธํเสตฺวาติ จ สาเธนฺตนฺติ จ อตฺถวิเสส ปากฏตฺถาย อพฺยาปาเร พฺยาปาร ปริกปฺปนา เอว. ปณีตาทิเภเท. อิทํ พุทฺธานํ นิพฺพานํ ปณีตํ. อิทํ ปจฺเจกพุทฺธานํ นิพฺพานํ มชฺฌิมํ. อิทํ พุทฺธสาวกานํ นิพฺพานํ หีนนฺติ ภินฺนํ น โหตีติ โยเชตพฺพํ. นานปฺปกาเรน จิตฺตํ นิเธติ เอเตนาติ ปณิหิตํ. ‘‘นิเธตี’’ติ อารมฺมเณสุ นินฺนํ โปณํ ปพฺภารํ กตฺวา ฐเปตีติ อตฺโถ. ตถา ปณิธานปณิธีสุ. อตฺถโต เอกํ อาสาตณฺหาย นามํ. ‘‘ลพฺภมานาปี’’ติ ภวสมฺปตฺติ โภคสมฺปตฺติโย ลพฺภมานาปิ. ‘‘ปิปาสวินย ธมฺมตฺตา’’ติ ปาตุํ ปริภุญฺชิตุํ อิจฺฉา ปิปาสา. ปิปาสํ วิเนติ วิคเมตีติ ปิปาสวินโย. ‘‘เวทยิตสุขํ’’ติ เวทนาสุขํ. ‘‘กตมํ ตํ อาวุโส’’ติ ปาฬิปาเฐ ‘‘ตํ’’ติ ตสฺมา. ‘‘ยเทตฺถ เวทยิตํ นตฺถี’’ติ ยสฺมา เอตฺถ เวทยิตํ นตฺถิ. ตสฺมา นิพฺพาเน สุขํ นาม กตมนฺติ โยชนา. ‘‘เอตฺถา’’ติ เอตสฺมึ นิพฺพาเน. ‘‘เอตเทเวตฺถา’’ติอาทิมฺหิ. ‘‘เอต เทวา’’ติ [Pg.228] เอโสเอว. ยสฺมา เอตฺถ เวทยิตํ นตฺถิ. ตสฺมา เอโส เวทยิตสฺส นตฺถิภาโว เอว เอตฺถนิพฺพาเน สุขนฺติ โยชนา. १६१. निब्बानसंग्रहात. निब्बानाच्या दोन पदांमध्ये पहिले पद अज्ञात अर्थाचे, सामान्य पद आहे. दुसरे पद ज्ञात अर्थाचे, विशेष पद आहे. जे क्लेशांचे शमन करतात ते 'समण' (श्रमण) होत, म्हणजेच अरीयपुग्गल (आर्यपुद्गल). समणाचा भाव म्हणजे 'सामञ्ञ' (श्रामण्य), म्हणजेच अरीयमग्ग (आर्यमार्ग). सामञ्ञाची फळे म्हणजे 'सामञ्ञफले' (श्रामण्यफळे) होत. लोकातून जे उत्तीर्ण होते, लोकाचे अतिक्रमण करते, ते 'लोकुत्तर' (लोकोत्तर) होय. लोकात जे प्रज्ञापित होत नाही ते 'पण्ञत्ति' (प्रज्ञप्ति) होय, या अर्थाचा संदर्भ घेऊन "नही" (नाही) इत्यादी म्हटले आहे. 'चार मार्गज्ञाने' (चत्तारिमग्गञ्ञाणानि) म्हणजेच 'चतुमग्गञ्ञाण' अशा प्रकारे समासाच्या योगाने एकवचनी असलेले पद वाक्यात आल्यावर बहुवचनी होते, म्हणून "चार अरीयमग्गज्ञानांनी" (चतूहि अरीयमग्गञ्ञाणेहि) असे म्हटले आहे. "तादिसम्हा" म्हणजे अरीयमग्गासारख्या (आर्यमार्गासारख्या). "विमुखांन" म्हणजे पराङ्मुख असलेल्यांचे. "जन्मांधांप्रमाणे" (जच्चंधानं विय) म्हणजे जन्मांधांना चंद्रमंडळ न दिसण्याप्रमाणे (विषय न होण्याप्रमाणे). "तस्सा" म्हणजे निब्बानाचे. तेथे "जन्मांधांचे" हे अविषय पदातील स्वामीपद (षष्ठी) आहे. "तस्सा" हे भावपद आहे. "यं किञ्चि" म्हणजे जे काही अर्थजात (वस्तू). 'या निब्बानाची सिद्धता' असा संबंध आहे. अस्पष्ट/अप्रत्यक्ष असलेल्या धम्मासाठी प्रयत्न देखील नसतो, मग त्याचे साक्षात्करण कोठून होणार? असा अभिप्राय आहे. "येन" म्हणजे प्रयत्नाने. "निब्बानाशिवाय" (निब्बानेन विना) म्हणजे निब्बानाचे आलंबन न मिळवता, असे म्हटले आहे. "अकिच्चसिद्धिं" म्हणजे क्लेशप्रहाण (क्लेश नष्ट करणे) या कर्तव्याची असिद्धी (अयशस्वी होणे). "ततो" म्हणजे त्यावरून/त्यामुळे. "वधाय" म्हणजे वध करण्यासाठी (नष्ट करण्यासाठी). "परिसक्कन्ता" म्हणजे प्रयत्न करणारे. गाथेमध्ये: "अन्तोजटा" म्हणजे अंतर्गत संतानातील (चित्तप्रवाहातील) तण्हा-जटा (तृष्णेचे जाळे), तृष्णेने वेढलेले. "बहिजटा" म्हणजे बाह्य संतानातील तण्हा-जटा, तृष्णेने वेढलेले. "तस्सा" म्हणजे तण्हेचे (तृष्णेचे). "वत्थुतो" म्हणजे वेगवेगळ्या उत्पन्न झालेल्या स्वरूपावरून. ज्यांनी परिनिब्बान प्राप्त केले आहे, जे परिनिब्बान प्राप्त करत आहेत, आणि जे परिनिब्बान प्राप्त करतील, ते 'परिनिब्बुता' (परिनिर्वृत) होत. कारण 'त' (तकार) प्रत्यय हा तिन्ही काळात वापरला जातो. जसे की - दिठ्ठ (पाहिलेले), सुत (ऐकलेले), मुत (अनुभवलेले), विञ्ञात (जाणलेले). विशिष्ट करून जाणले पाहिजे ते 'विञ्ञाण' (विज्ञान) होय. जे दाखवता येत नाही ते 'अनिदस्सन' (अनिदर्शन) होय. ज्याला अंत नाही ते 'अनंत' होय. ज्यापासून गुणांची प्रभा सर्व बाजूंनी पसरते ते 'सब्बतोपभ' (सर्वतोप्रभ) होय. "भगवता वृत्तं" (भगवंतांनी म्हटले आहे) म्हणजे दीघनिकाय मधील केवट्टसुत्तात (केवर्त सूत्रात) म्हटले आहे. "सवन्तियो" म्हणजे महानद्या किंवा लहान नद्या. "अप्पेंती" म्हणजे प्रवेश करतात. "धारा" म्हणजे मेघांच्या पावसाच्या धारा. बुद्धांचा उत्पाद (जन्म) न झाल्यास एकही प्राणी परिनिब्बान प्राप्त करू शकत नाही, हे 'बुद्धोत्पाद कल्पामध्येच पच्चेकसम्बुद्ध (प्रत्येक बुद्ध) देखील उत्पन्न होतात' असे मानून म्हटले आहे. परंतु अपदान पाळीमध्ये बुद्धशून्य कल्पामध्येही पच्चेकसम्बुद्धांची उत्पत्ती सांगितलेलीच आहे. "एकसत्तोपि" (एक प्राणी देखील) याने 'सावकसत्त' (श्रावक प्राणी) ग्रहण करावा. असे मानल्यास अपदान पाळीशी कोणताही विरोध होत नाही. "आराधेन्ति" म्हणजे साध्य करतात, प्राप्त करतात. 'ज्यापासून गुणांची प्रभा सर्व बाजूंनी पसरते' या अर्थाचा संदर्भ घेऊन "सब्बतोपभा संपन्नं" (सर्वतोप्रभेने संपन्न) असे म्हटले आहे. "जोतिवन्ततरो वा" म्हणजे अधिक प्रकाशमान किंवा तेजस्वी. 'सर्व ठिकाणी उत्पन्न होते किंवा विद्यमान असते म्हणून सब्बतोपभ' या अर्थाचा संदर्भ घेऊन 'सर्व बाजूंनी ते प्रभू (समर्थ/विद्यमान) असते' असे म्हटले आहे. म्हणूनच "ते कोठेही नाही असे नाही" (न कत्थचि नत्थि) असे म्हटले आहे. "एवंसन्ते पि" म्हणजे अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने ते एकच प्रकारचे असले तरीही. "उपचरितुं" म्हणजे उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) व्यवहार करणे. "यथाह" म्हणजे त्याच सुत्तात पुन्हा काय म्हटले आहे. जे अस्तित्वाकडे (भवाकडे) नेते ते 'भवनित्ती' (भवनेत्री) होय. ती 'भवतण्हा' (भवतृष्णा) च होय. "साम्परायिका" म्हणजे च्युतीनंतर (मृत्युनंतर) लगेच प्राप्त होणारी. दोन प्रकारच्या खीण आसवांची (क्षीणासवांची) 'अनुपादिसेसता' (निरुपधिशेषता) सांगितली आहे, असा संबंध आहे. येथे "अनुपादिसेसता" म्हणजे अनुपादिसेस-निब्बान (निरुपधिशेष निर्वाण) म्हटले जाते. सेक्खांमध्ये (शैक्षांमध्ये) अरहत्तमग्गस्थ (अर्हन्मार्गस्थ) सेक्खाची 'अनुपादिसेसता' ही क्लेशांच्या उपधिशेषाच्या (किलेसुपादिसेस) आधारे सांगितली आहे. "किलेसुपादिसेसो" म्हणजे क्लेश नावाचा उपधिशेष (उपाधिशेष). तसेच "खन्धुपादिसेसो" (स्कंध-उपाधिशेष) देखील. "अन्तरापरिनिब्बायी" इत्यादींमध्ये 'परिनिब्बान' म्हणजे 'किलेसपरिनिब्बान' (क्लेश-परिनिर्वाण) म्हटले आहे. "उभतोभागविमुक्त" इत्यादी पदांचा अर्थ नवव्या परिच्छेदात येईल. "किलेसक्खयेन सहैव खिय्यन्ति" (क्लेशांच्या क्षयासोबतच नष्ट होतात) म्हणजे वर्तमान भवात अरहत्तमग्गक्षणी (अर्हन्मार्गक्षणी) क्लेशांच्या क्षयासोबतच ते नष्ट होतात. ते अनुत्पाद धर्मतेला (पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला) प्राप्त होतात. तसेच अनागामी पुद्गलाचे काम-प्रतिसंधी स्कंध अनागामी मार्गक्षणी, आणि सोतापन्नाचे (स्रोतआपन्नाचे) सात भव वगळता उर्वरित काम-प्रतिसंधी स्कंध सोतापत्ती मार्गक्षणी त्या त्या क्लेशांच्या क्षयासोबतच नष्ट होतात. परंतु वर्तमान स्कंध क्लेशांच्या क्षयासोबतच नष्ट होतात. ते 'खन्धुपादिसेस' (स्कंध-उपाधिशेष) बनून मृत्यूच्या वेळेपर्यंत खीण-आसवांचे (क्षीणासवांचे) देखील चालू राहतात. ते का चालू राहतात? म्हणून "च्युतीपर्यंत (मृत्यूपर्यंत) चालू राहणारे" इत्यादी म्हटले आहे. परंतु वर्तमान स्कंध-संतानाची (प्रवाहाची) निरंतरता ही स्वभावसिद्ध (धम्मतासिद्ध) आहे, असा संबंध आहे. "फलनिस्सन्दभूतं" म्हणजे विपाक-फल आणि निस्सन्द-फल (परिणाम-फल) दोन्ही बनून. "तेन सहैव" म्हणजे क्लेशांच्या क्षयासोबतच. "यस्मापना" इत्यादींमध्ये - जे सर्व बाजूंनी बांधतात किंवा अडथळा आणतात, शांती-सुखात विघ्न आणतात, ते 'पलिबोध' (अडथळे/प्रतिबंध) होत. क्लेश-अभिसंस्करण कार्ये, कम्म-अभिसंस्करण कार्ये आणि खन्ध-अभिसंस्करण कार्ये. जे अडथळ्यांसह (पलिबोधांसह) असतात ते 'सपलिबोध' होत. जे संस्कारांच्या निमित्तांसह (चिन्हांसह) असतात ते 'सनिमित्त' होत. जे तृष्णेच्या प्रणिधींसह (इच्छांसह) असतात ते 'सपणिहित' होत. "ततो" म्हणजे पापकर्मापासून आणि अपाय-दुःखापासून. "कोचि" म्हणजे कोणताही धम्म. "निरोधेतुं सक्कोति" (निरोध करू शकतो) म्हणजे सक्कायदिट्ठी (सत्कायदृष्टी) निरुद्ध झाल्यावर ते निरुद्ध होतात. ती निरुद्ध न झाल्यास ते निरुद्ध होत नाहीत. म्हणून सक्कायदिट्ठीचा निरोध हा निष्क्रिय धम्म असूनही त्या पलिबोधांचा (अडथळ्यांचा) निरोध करतो असे म्हटले जाते. "निरोधेतुं सक्कोति" हे निष्क्रिय गोष्टीमध्ये क्रिया कल्पिणे (उपचार करणे) असे समजले पाहिजे. "सक्कायदिट्ठीचा निरोधच त्या पलिबोधांचा निरोध करू शकतो" - येथे दोन्हीचा निरोध एकच आहे. असे असले तरी, "अविज्जा निरोधा सङ्खार निरोधो" (अविद्येच्या निरोधाने संस्कारांचा निरोध होतो) इत्यादींप्रमाणे अभेदात भेदाची कल्पना केली जाते. उत्पाद (उत्पत्ती) आणि प्रवृत्ती (चालू राहणे) हे 'उप्पादपवत्त' होत. ते ज्याचे मूळ आहे, असा विग्रह आहे. ज्या स्थूल आकाराने. जे मारतात ते 'मार' होत. याचा अर्थ वधक (नाशक) किंवा शत्रू असा आहे. जसे की किलेसमार (क्लेशमार) इत्यादी. ज्यांच्यामध्ये मार दहन करतात किंवा राहतात ते 'मारधेय्य' (माराचे साम्राज्य/क्षेत्र) होय. जे मारते आणि च्युत करते ते 'मच्चु' (मृत्यू) होय. ते मरणच होय. ज्यांच्यामध्ये मृत्यू दहन करतो किंवा राहतो ते 'मच्चुधेय्य' (मृत्यूचे क्षेत्र) होय. "त्याच्यामध्ये निमित्त नाही" असे म्हटले असता, पण्ञत्तिधम्मांमध्येही (प्रज्ञप्तिधर्मांमध्येही) उत्पाद आणि प्रवृत्तीचे मूळ असलेले निमित्त नसते. असे असल्यास, त्यांच्याशी निब्बानाचा कोणताही फरक उरणार नाही, असा आक्षेप येतो. त्याचे परिहार (निराकरण) करताना "तण्हि" इत्यादी म्हटले आहे. "विध्वंस करून" आणि "साध्य करून" हे विशिष्ट अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी निष्क्रिय गोष्टीमध्ये क्रिया कल्पिणेच आहे. प्रणीत (उत्कृष्ट) इत्यादी भेदांमध्ये: "हे बुद्धांचे निब्बान प्रणीत आहे, हे पच्चेकबुद्धांचे निब्बान मध्यम आहे, हे बुद्धश्रावकांचे निब्बान हीन (कनिष्ठ) आहे" अशा प्रकारे ते भिन्न होत नाही, असा मेळ घालावा. ज्याद्वारे चित्त विविध प्रकारे ठेवले जाते ते 'पणिहित' (प्रणिहित) होय. "निधेति" (ठेवते) म्हणजे आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये) प्रवण, प्रवृत्त आणि झुकलेले करून ठेवणे असा अर्थ आहे. तसेच 'पणिधान' आणि 'पणिधी' मध्येही. अर्थाच्या दृष्टीने हे 'आसातण्हा' (आशा-तृष्णा) चेच एक नाव आहे. "लब्भमानापि" म्हणजे भवसंपत्ती आणि भोगसंपत्ती प्राप्त होत असली तरीही. "पिपासाविनयधम्मत्ता" म्हणजे - पिण्याची किंवा उपभोगण्याची इच्छा म्हणजे 'पिपासा' (तहान). पिपासा शांत करणे किंवा दूर करणे म्हणजे 'पिपासाविनय' होय. "वेदयितसुखं" म्हणजे वेदना-सुख (संवेदनात्मक सुख). पाळी पाठातील "कतमं तं आवुसो" (हे आवुसो, ते कोणते?) यामध्ये "तं" म्हणजे 'त्यामुळे'. "यदत्थ वेदयितं नत्थि" म्हणजे कारण येथे कोणतेही संवेदन (अनुभूती) नाही. त्यामुळे निब्बानामध्ये सुख नावाचे काय आहे? अशी योजना आहे. "एत्थ" म्हणजे या निब्बानामध्ये. "एतदेवेत्थ" इत्यादींमध्ये - "एतदेव" म्हणजे हेच. कारण येथे कोणतेही संवेदन नाही, म्हणून संवेदनाचा हा अभावच या निब्बानातील सुख आहे, अशी योजना आहे। ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทีสุ. ยเทตํ ขิยฺยนํ นิรุชฺฌนํ อตฺถีติ สมฺพนฺโธ. เกจิ ปน ตํขิยฺยน นิรุชฺฌน กฺริยามตฺตํ นิพฺพานํ น โหติ. อภาว ปญฺญตฺติมตฺตํ โหตีติ วทนฺติ. ตํ ปฏิเสเธนฺโต ‘‘น หิตํ’’ติอาทิมาห. ‘‘ปญฺญตฺติรูปํ’’ติ ปญฺญตฺติสภาโว. ปาฬิปาเฐ. ‘‘ปทหตี’’ติ วีริยํ ทฬฺหํ กโรติ. ปหิโต อตฺตา อเนนาติ ปหิตตฺโต. ‘‘ปหิโต’’ติ ปทหิโต. อนิวตฺตภาเว ฐปิโต. เปสิโตติปิ วณฺเณนฺติ. ‘‘กาเยนา’’ติ นามกาเยน. ตณฺหาวเส วตฺตนฺตีติ ตณฺหาวสิกา. ‘‘เตสํ ปี’’ติ เตสํ วาเทปิ. ตสฺมึ ขย นิโรธมตฺเต อนนฺตคุณา นาม นตฺถีติ อิมํ วาทํ วิโสเธตุํ ‘‘นิพฺพานสฺส จา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘ปฏิปกฺขวเสน สิชฺฌนฺตี’’ติ เอเตน วฏฺฏธมฺเมสุ มหนฺตํ อาทีนวํ ปสฺสนฺตา เอว เตสํ นิโรเธ มหนฺตํ คุณานิสํสํ ปสฺสนฺตีติ ทีเปติ. เย ปน ยถาวุตฺตํ ขยนิโรธํ ปรมตฺถนิพฺพานนฺติ น ชานนฺติ, เตสํ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. เอวํ คุณปทานํ คมฺภีรตฺตา ตํขยนิโรธมตฺตํ อนนฺตคุณานํ วตฺถุ น โหตีติ มญฺญนฺติ. อิทานิ นิพฺพานํ ปรมํ สุขนฺติ วุตฺตํ. กถํ ตํ ขยนิโรธมตฺตํ ปรมสุขํ นาม ภเวยฺยาติ อิมํ วาทํ วิโสเธตุํ ‘‘สนฺติสุขญฺจนามา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อตฺถิภิกฺขเวติ สุตฺเต. ‘‘โนเจตํ อภวิสฺสา’’ติ เอตํ อชาตํ โนเจ สนฺตํ วิชฺชมานํ น ภเวยฺย. ‘‘นยิมสฺสา’’ติ น อิมสฺส. ปจฺจกฺขภูตํ ขนฺธปญฺจกํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิมสฺสา’’ติ วทติ. นิสฺสกฺกตฺเถ จ สามิวจนํ. อิมสฺมา ชาตา ภูตา กตา สงฺขตา สตฺตานํ นิสฺสรณํ นาม น ปญฺญาเยยฺยาติ โยชนา. ปรตฺถปิ เอสนโย. เอสนโย สพฺเพสูติอาทีสุ. ทุจฺจริต ธมฺมา นาม ปจฺจเย สติ, ชายนฺติ. อสติ, น ชายนฺตีติ เอวํ ชาตํ วิย อชาตมฺปิ เตสํ อตฺถิ. ยทิ จ อชาตํ นาม นตฺถิ. ชาตเมว อตฺถิ. เอวํสติ, อตฺตนิ ทุจฺจริตานํ อชาตตฺถาย สมฺมาปฏิปชฺชนฺตานํปิ สพฺเพ ทุจฺจริต ธมฺมา อตฺตนิ ชาตาเยว สิยุํ, โน อชาตา. กสฺมา, อชาตสฺส นาม นตฺถิตายาติอาทินา โยเชตพฺพํ. “येथ च” (एत्थ च) इत्यादींमध्ये. जे हे क्षीण होणे, निरुद्ध होणे आहे, असा संबंध आहे. काही लोक तर ते क्षीण होणे आणि निरुद्ध होणे ही केवळ क्रिया असून ते निर्वाण नव्हे, ती केवळ अभावाची प्रज्ञप्ती (संकल्पना) आहे असे म्हणतात. त्याचे खंडन करण्यासाठी “न हितं” (ते हितकारक नाही) इत्यादी म्हटले आहे. “प्रज्ञप्तीरूप” म्हणजे प्रज्ञप्तीचा स्वभाव. पाळीपाठात. “प दहति” म्हणजे वीर्य (प्रयत्न) दृढ करतो. ज्याने स्वतःला (चित्ताला) प्रहित (युक्त/एकाग्र) केले आहे तो ‘प्रहितत्त’ (प्रहितात्मा). “प्रहित” म्हणजे प्रयत्नशील, न मागे हटणाऱ्या अवस्थेत स्थित असलेला. त्याला ‘प्रेषित’ (पाठवलेला) असेही वर्णन करतात. “कायाने” म्हणजे नामकायाने (मानसिक काया). जे तृष्णेच्या वशतेत वर्ततात ते ‘तृष्णावशिका’. “त्यांच्याही” म्हणजे त्यांच्या वादातही. त्या केवळ क्षय आणि निरोधामध्ये अनंत गुण नसतात, या वादाचे निवारण करण्यासाठी “निर्वाणाचे च” (निब्बानस्स च) इत्यादी म्हटले आहे. “प्रतिपक्षाच्या वशतेने सिद्ध होतात” याद्वारे संसाराच्या धर्मांमध्ये (वट्टधम्मेसु) मोठा दोष पाहणारेच त्यांच्या निरोधामध्ये मोठा गुणांचा लाभ पाहतात, हे दर्शविले आहे. जे लोक यथोक्त क्षय-निरोधाला परमार्थ निर्वाण म्हणून जाणत नाहीत, त्यांच्याविषयी काही बोलण्याची गरजच नाही. अशा प्रकारे गुणांच्या पदांच्या गंभीरतेमुळे ते केवळ क्षय-निरोध हे अनंत गुणांचे अधिष्ठान (वस्तू) होत नाही, असे ते मानतात. आता “निर्वाण हे परम सुख आहे” असे म्हटले आहे. ते केवळ क्षय-निरोध रूप असणारे कशा प्रकारे परम सुख असू शकेल? या वादाचे निवारण करण्यासाठी “शांतिसुख च नाम” इत्यादी म्हटले आहे. “अत्थि भिक्खवे” (भिक्खूहो, आहे...) या सूत्तात. “नो चे तं अभविस्स” म्हणजे जर हे अजात, शांत, विद्यमान नसले असते. “न यिमस्स” म्हणजे याचे नाही. प्रत्यक्ष असलेल्या पंचस्कंधांना दाखवताना “इमस्स” (याचे) असे म्हणतात. आणि अपादान अर्थामध्ये षष्ठी विभक्ती आहे. या जन्मलेल्या, उत्पन्न झालेल्या, केलेल्या, संस्कृत (संस्कारित) झालेल्यापासून प्राण्यांचे निस्सरण (मुक्ती) समजले नसते, अशी योजना करावी. इतर ठिकाणीही हाच न्याय आहे. “एष नयो सब्बेसु” इत्यादींमध्ये. दुश्चरित धर्म हे प्रत्यय (कारण) असताना उत्पन्न होतात, प्रत्यय नसताना उत्पन्न होत नाहीत; अशा प्रकारे जन्मलेल्याप्रमाणे त्यांचे अजात (न जन्मलेले) देखील असते. आणि जर अजात नावाचे काही नसेल, केवळ जात (जन्मलेलेच) असेल, तर असे असताना, स्वतःमध्ये दुश्चरितांच्या अजाततेसाठी (उत्पन्न न होण्यासाठी) सम्यक् प्रतिपन्न (योग्य आचरण) करणाऱ्यांचेही सर्व दुश्चरित धर्म स्वतःमध्ये जन्मलेलेच होतील, अजात नव्हेत. कारण, अजात नावाचे काही अस्तित्वात नसल्यामुळे, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. ‘‘เอตฺตาวตา’’ติ[Pg.229], อตฺถิ ภิกฺขเว อชาตํติอาทินา ปาฬิวจเนน. สพฺเพสงฺขารา สมนฺติ วูปสมนฺติ เอตฺถาติ สพฺพสงฺขาร สมโถ. สพฺเพ อุปธโย เอตฺถ นิสฺสชฺชนฺติ อริยาชนาติ สพฺพุปธินิสฺสคฺโค. ‘‘อุปลพฺภมาโน’’ติ สนฺติลกฺขเณน ญาเณน อุปลพฺภมาโน. ‘‘เอสึสู’’ติ กตฺวา เอสนกิจฺจสฺส สิขาปตฺตํ อตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อธิคจฺฉึสู’’ติ วุตฺตํ. “एवढ्यानेच” (एत्तावता) म्हणजे “भिक्खूहो, अजात आहे” इत्यादी पाळी वचनाने. सर्व संस्कार येथे शमतात, शांत होतात म्हणून तो ‘सर्वसंस्कारशमथ’ (सब्बसंखारसमथो) होय. सर्व उपधींचा (क्लेशांचा/उपाधींचा) येथे आर्य लोक त्याग करतात म्हणून तो ‘सर्वोपधिनिसर्ग’ (सब्बूपधिनिस्सग्गो) होय. “उपलब्ध होणारा” (उपलब्भमानो) म्हणजे शांत लक्षणाच्या ज्ञानाने उपलब्ध होणारा. “शोधले” (एसींसु) असे करून शोधण्याच्या कार्याच्या शिखरावर पोहोचलेला अर्थ दर्शवण्यासाठी “प्राप्त केले” (अधिगच्छींसु) असे म्हटले आहे. นิพฺพานสงฺคหานุทีปนา นิฏฺฐิตา. निर्वाणसंग्रह-अनुदीपनी समाप्त झाली. รูปสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. रूपसंग्रह-दीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๗. สมุจฺจยสงฺคหอนุทีปนา ७. समुच्चयसंग्रह-अनुदीपनी ๑๖๒. สมุจฺจยสงฺคเห[Pg.230]. อตฺตโน อาเวณิกภูเตน สามญฺญ ลกฺขเณนติ จ สมฺพนฺโธ. อญฺญาปเทเสน เอว ตทุภยลกฺขเณน สลกฺขณานิ นาม วุจฺจนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘นิพฺพานสฺสปิ สรูปโต ลพฺภมานสภาวตา’’ติ อญฺญนิสฺสย รหิเตน ลพฺภมานสภาวตา. นนุ นิพฺพานมฺปิ ราคกฺขโย โทสกฺขโย โมหกฺขโยติอาทินา อญฺญนิสฺสยทสฺสนํ อตฺถิ เยวาติ. ทสฺสนมตฺตํ อตฺถิ. นิพฺพานํ ปน ราคาทีหิ ปฏิพทฺธํ น โหติ. อถ โข เตหิ ทูรตรํ โหติ. ปฏิปกฺขตรํ, ปฏิวิรุทฺธตรํ. ยญฺหิ รูปสฺส ขโย วโย เภโท อนิจฺจาติ วุตฺตํ. ตตฺถ รูปสฺส อุปฺปชฺชิตฺวา ขโย วุตฺโตติ โส รูปสฺส นิสฺสิโต เอว โหติ. อิธ ปน ราคาทีนํ ปุน อุปฺปาทสฺสปิ อภาโว วุตฺโตติ โส ราคาทีสุ อนิสฺสิโต เอว. น เกวลํ อนิสฺสิโต. อถ โข เตหิ ทูรตโร จ ปฏิปกฺขตโร จ เตสํ ปฏิปกฺขคุเณหิ อิมสฺสสิทฺธตฺตาติ. อนิปฺผนฺนรูปานิปิ อธิปฺเปตานิ เอว เตสมฺปิ ขนฺธายตนธาตุ สจฺเจสุ สงฺคหิตตฺตา. १६२. समुच्चयसंग्रहामध्ये. स्वतःच्या आवेणिक (असाधारण) असणाऱ्या सामान्य लक्षणाने, असा संबंध आहे. अन्य उपदेशानेच त्या दोन्ही लक्षणांद्वारे ‘स्वलक्षणे’ (सलक्खणानि) म्हटले जातात, असा अभिप्राय आहे. “निर्वाणाचे देखील स्वरूपाने प्राप्त होणारे स्वभावत्व” म्हणजे इतर आश्रयाशिवाय प्राप्त होणारे स्वभावत्व. जर शंका घेतली की, निर्वाण देखील “रागक्षय, द्वेषक्षय, मोहक्षय” इत्यादींद्वारे इतर आश्रयाचे दर्शन घडवणारे आहेच की? तर केवळ दर्शन मात्र आहे. परंतु निर्वाण हे रागादींशी बद्ध नसते. उलट ते त्यांच्यापासून अत्यंत दूर असते, अत्यंत प्रतिपक्ष (विरोधी) आणि अत्यंत विरुद्ध असते. कारण जे रूपाचा क्षय, व्यय, भेद आणि अनित्यता असे म्हटले आहे, तेथे रूपाचा उत्पन्न होऊन क्षय होणे सांगितले आहे, म्हणून तो रूपावर आश्रितच असतो. परंतु येथे रागादींच्या पुन्हा उत्पत्तीचा देखील अभाव सांगितला आहे, म्हणून तो रागादींवर अनाश्रितच आहे. केवळ अनाश्रितच नाही, तर त्यांच्यापासून अत्यंत दूर आणि अत्यंत प्रतिपक्ष आहे, कारण त्यांच्या प्रतिपक्ष गुणांमुळे याची सिद्धी होते. अनिष्पन्न रूपे देखील अभिप्रेतच आहेत, कारण त्यांचाही स्कंध, आयतन, धातू आणि सत्यांमध्ये संग्रह केला गेला आहे. อาสวาทีสุ. ‘‘ปาริวาสิยฏฺเฐนา’’ติ ปริวาสกรณฏฺเฐน. ‘‘มทนียฏฺเฐนา’’ติ มทนชนกฏฺเฐน. ‘‘ปริวาสํ คณฺหนฺตี’’ติ โทสเวปุลฺลํ อาปชฺชนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ปุน ‘‘ปริวาสํ’’ติ ทุคฺคนฺธตาทิปริวาสํ. ‘‘อาสวภริตเมวา’’ติ อาสเวหิ ปูริตเมว. ‘‘ฉฬารมฺมณานิ ทูเสนฺตี’’ติ ตานิ สาสวาทิภาวํ ปาเปนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ภวโต’’ติ ภูมิโต อิจฺเจวตฺโถ. อวธียติ ปริจฺฉินฺทียติ เอตสฺมาติ อวธิ. อปาทานํ วุจฺจติ. มริยาโท นาม ปริยนฺตปริจฺเฉโท. มริยาทมตฺตภูโต กฺริยาวิสโย มริยาทวิสโย. อวธิ นาม พฺยาปน วิธานํ, กฺริยา พฺยาปนสฺส วิสโย อภิวิธิวิสโย. ‘‘ยสฺสา’’ติ อวธิ วตฺถุสฺส. ‘‘อตฺตานํ’’ติ อวธิวตฺถุํ. ‘‘พหิกตฺวา’’ติ สมฺปตฺตมตฺตํ กตฺวาติ อธิปฺปาโย. อวธิวิจารณายํ. ‘‘สทฺทสฺสา’’ติ [Pg.231] ภควโต กิตฺติสทฺทสฺส. ‘‘ตํ’’ติ อวธิภูตํ อตฺถํ. ‘‘ยโส’’ติ กิตฺติสทฺโท. ‘‘อิตรํ’’ติ อนภิวิธิวิสยํ พหิ กตฺวา ปวตฺตติ. आसवांमध्ये (आसवादीसु). “पारिवासिय अर्थाने” म्हणजे परिवास (दुर्गंधी किंवा साठवून ठेवणे) करण्याच्या अर्थाने. “मदनीय अर्थाने” म्हणजे मद (उन्माद) उत्पन्न करण्याच्या अर्थाने. “परिवास ग्रहण करतात” म्हणजे दोषांच्या विपुलतेला प्राप्त होतात, असे म्हटले आहे. पुन्हा “परिवास” म्हणजे दुर्गंधी इत्यादींचा परिवास. “आसवभरितच” म्हणजे आसवांनी भरलेलेच. “सहा आलंबनांना दूषित करतात” म्हणजे त्यांना सासवादिभावाला (आसवांसह असण्याच्या भावाला) प्राप्त करून देतात, असा अभिप्राय आहे. “भवापासून” (भवतो) म्हणजे भूमीपासून, असाच अर्थ आहे. ज्याच्यापासून मर्यादा ठरवली जाते किंवा परिच्छेद केला जातो, तो ‘अवधी’ होय. त्याला अपादान म्हटले जाते. मर्यादा म्हणजे सीमा किंवा परिच्छेद. केवळ मर्यादारूप असलेला क्रियाविषय म्हणजे ‘मर्यादाविषय’. अवधी म्हणजे व्याप्तीचे विधान, क्रियाव्याप्तीचा विषय म्हणजे ‘अभिविधिविषय’. “ज्याचा” (यस्स) म्हणजे अवधी वस्तूचा. “स्वतःला” (अत्तानं) म्हणजे अवधी वस्तूला. “बाहेर करून” (बहीकत्वा) म्हणजे केवळ प्राप्त करून, असा अभिप्राय आहे. अवधीच्या विचारात. “शब्दाचा” (सद्दस्स) म्हणजे भगवंतांच्या कीर्तीशब्दाचा. “त्या” (तं) म्हणजे अवधीभूत अर्थाला. “यश” (यसो) म्हणजे कीर्तीशब्द. “इतर” (इतरं) म्हणजे अनभिविधिविषयाला बाहेर ठेवून प्रवृत्त होतो. กามาสวาทีสุ. ‘‘ตนฺนาเมนา’’ติ กามนาเมน. ‘‘ตทารมฺมณา’’ติ กามธมฺมารมฺมณา. ‘‘อยมตฺโถ วา’’ติ กามียตีติอาทินา วุตฺโต ปจฺฉิมตฺโถว. ‘‘มหคฺคตกุสลธมฺมา’’ติ อิธาธิปฺเปตํ กมฺมภวํ สนฺธาย วุตฺตํ. ‘‘ตํ นิพฺพตฺตา’’ติ เตน นิพฺพตฺตา. ‘‘ตทารมฺมณา’’ติ ทุวิธภวารมฺมณา. ‘‘ตณฺหา เอวา’’ติ ภวตณฺหา เอว. ‘‘ภโว เอวา’’ติ ภวารมฺมณตาย ภวนามิกา ตณฺหา เอว. ‘‘อิเม เอวา’’ติ ตณฺหาทิฏฺฐิ อวิชฺชา เอว. ‘‘ปริวุตฺเถ สตี’’ติ ปริวสิเต สติ. ‘‘กามวิสยา’’ติ กามธมฺมวิสยา. ‘‘ตสฺมึ’’ติ กามาสเว. ภววิสยา มานาทโย ปริวุตฺถา เอวาติอาทินา โยเชตพฺพํ. ตถา ทิฏฺฐิวิสยาติ ปเทปิ. कामासवांमध्ये (कामासवादीसु). “त्या नावाने” म्हणजे कामाच्या नावाने. “त्या आलंबनाचे” म्हणजे कामधर्माच्या आलंबनाचे. “किंवा हा अर्थ” म्हणजे ‘इच्छा केली जाते’ इत्यादींद्वारे सांगितलेला नंतरचाच अर्थ. “महग्गत कुशल धर्म” म्हणजे येथे अभिप्रेत असलेल्या कर्मभवाला उद्देशून म्हटले आहे. “त्याच्यापासून उत्पन्न झालेले” म्हणजे त्याने उत्पन्न झालेले. “त्या आलंबनाचे” म्हणजे दोन प्रकारच्या भवाच्या आलंबनाचे. “तृष्णाच” म्हणजे भवतृष्णाच. “भवच” म्हणजे भवाचे आलंबन असल्यामुळे ‘भव’ नावाचा असणारी तृष्णाच. “हेच” म्हणजे तृष्णा, दृष्टी आणि अविद्याच. “वेढलेले असताना” (परिवुत्थे सती) म्हणजे वासित (युक्त) असताना. “कामविषय” म्हणजे कामधर्माचे विषय. “त्यामध्ये” (तस्मिं) म्हणजे कामासवामध्ये. भवविषय असणारे मान इत्यादी वेढलेलेच असतात, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. तसेच ‘दृष्टिविषय’ या पदातही (योजना करावी). ‘‘อนสฺสาสิกํ กตฺวา’’ติ อสฺสาสปสฺสาสรหิตํ กตฺวา. ‘‘อวหนนฏฺเฐนา’’ติ อชฺโฌตฺถริตฺวา มารณฏฺเฐน. อโธกตฺวา มารณฏฺเฐนาติปิ ยุชฺชติ. ‘‘ทุตฺตรฏฺเฐนา’’ติ ตตฺถ ปตนฺตสฺส ตริตุํ ทุกฺกรฏฺเฐน. ‘‘วุตฺตนเยนา’’ติ อาสเวสุ วุตฺตนเยน. “अनस्सासिकं कत्वा” म्हणजे श्वासोच्छ्वास रहित करून. “अवहणनट्ठेन” म्हणजे दाबून (आक्रमून) मारण्याच्या अर्थाने. खाली दाबून मारण्याच्या अर्थाने देखील योग्य ठरते. “दुत्तरट्ठेन” म्हणजे तेथे पडणाऱ्याला पार करणे कठीण असण्याच्या अर्थाने. “वुत्तनयेन” म्हणजे आसवांच्या बाबतीत सांगितलेल्या पद्धतीने. ‘‘วฏฺฏสฺมึ’’ติ ติวิธวฏฺฏสฺมึ. ‘‘ภวยนฺตเก’’ติ อวิชฺชาสงฺขาราทิเก ภวจกฺเก. ‘‘อามสนํ’’ติ ปทสฺส อตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘ตถา ตถา กปฺเปตฺวา คหณ’’นฺติ. ‘‘สาสเน’’ติ ปริยตฺติสาสเน ตสฺมึ ตสฺมึ สุตฺตนฺเต. ‘‘ทิฏฺฐิโย ทิฏฺฐุปาทานํ’’ติ ทิฏฺฐิวตฺถูสุ ทฬฺหคฺคาหฏฺเฐน ทิฏฺฐิโย เอว ทิฏฺฐุปาทานํ. อตฺตวาทุปาทาเน. ปริกปฺป พุทฺธิ นาม มิจฺฉาญาณํ วุจฺจติ. ‘‘อิสฺสร นิมฺมิตํ’’ติ สกลโลกิสฺสเรน มหาพฺรหฺมุนา อาทิกปฺปกาเล นิมฺมิตํ. ‘‘อธิจฺจ สมุปฺปนฺนํ’’ติ อเหตุ อปจฺจยา สมุปฺปนฺนํ. ‘‘อจฺจนฺตสสฺสตํ’’ติ ภวปรมฺปราสุ สสฺสตํ. ‘‘เอกจฺจสสฺสตํ’’ติ ภววิเสสํ ปตฺวา เอกจฺจานํ สตฺตานํ สสฺสตํ. ‘‘อุจฺฉินฺนํ’’ติ ยตฺถกตฺถจิ ปรมฺมรณา อุจฺฉินฺนํ. ปุราณญฺจกมฺมํ ปริกฺขีณํ, นวญฺจกมฺมํ อกตํ. เอวํ สํสาร สุทฺธีติอาทินา [Pg.232] คหณนฺติ อตฺโถ. สนฺโต กาโย สกฺกาโย. ‘‘สนฺโต’’ติ ปรมตฺถโต วิชฺชมาโน. ‘‘กาโย’’ติ รูปกาโย, นามกาโย. อตฺตโน อตฺตโน กาโย วา สกฺกาโย. ปจฺจตฺตกาโย, ปาฏิปุคฺคลิก กาโยติ วุตฺตํ โหติ. ยถาวุตฺตกาย ทฺวยเมว. สกฺกาเย ทิฏฺฐิ สกฺกายทิฏฺฐิ. ตตฺถ ‘‘สกฺกาเย ทิฏฺฐี’’ติ ปุพฺพนฺตาปรนฺต กปฺปิกานํ วิย ปุพฺพนฺตา ปรนฺเตอจินฺเตตฺวา สพฺพสตฺตานํปิ อตฺตโน ขนฺเธสุ เอว ‘รูปํ เม อตฺตาติ วา’ อตฺตา เม รูปวาติ วา, อตฺตนิ เม รูปนฺติ วา, รูปสฺมึ เม อตฺตาติ วา, เอวมาทินา ธมฺมตา สิทฺธา ทิฏฺฐีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อสฺสุตวา’’ติ ขนฺธเทสนาทิเก สุญฺญตธมฺมปฺปฏิสํ ยุตฺเต เทสนา ธมฺเม อสฺสุต ปุพฺพตฺตา นตฺถิ สุตํ เอตสฺสาติ อสฺสุตวา. ‘‘ปุถุชฺชโน’’ติ โลกิยมหาชโน. ตตฺถ ปริยาปนฺโน ปน เอกปุคฺคโลปิ ปุถุชฺชโนตฺเวว วุจฺจติ. โส สุตวาปิ อตฺถิ, อสฺสุตวาปิ อตฺถิ. อิธ อสฺสุตวา อธิปฺเปโต. อริย ปุคฺคโล ปน ตตฺถ ปริยาปนฺโน น โหติ. อหนฺติวา, มมาติ วา, มยีติ วา, เมติ วา, ปรามสน ปทานิ นาม. ‘‘เสสธมฺเมวา คเหตฺวา’’ติ รูปโต อวเสเส นามกฺขนฺธ ธมฺเม อตฺตา เมติ คเหตฺวา วา. ‘‘ธมฺม มุตฺตกํ วา อตฺตานํ คเหตฺวา’’ติ ปญฺจกฺขนฺธธมฺมวิมุตฺตํ ปริกปฺปสิทฺธํ อตฺตานํ วา คเหตฺวา. จตสฺโส อวตฺถา ยสฺสาติ จตุราวตฺถิกา. เวทนาย สมฺโภครสตฺตา ‘‘สํภุญฺชึ’’ติ วุตฺตํ. ‘‘สุขิโต’’ติ สุขเวทนาย สมงฺคีปุคฺคโล. ธมฺมโต ขนฺธ ปญฺจกเมว. ตตฺถ ปน สุขเวทนาปธานตฺตา ตถา สมนุปสฺสนฺโต เวทนํ อตฺตาติ สมนุปสฺสติ นาม. ‘‘สมูหโต คเหตฺวา’’ติ อหมสฺมิ, อหํ เอโก สตฺโตติอาทินา สมูหโต. ‘‘วตฺถู’’ติ ปญฺจกฺขนฺธา วุจฺจนฺติ. ญาตปริญฺญาทิวเสน อปริญฺญาตานิ วตฺถูนิ เอเตหีติ อปริญฺญาตวตฺถุกา. เอกมุหุตฺตมตฺเตปิ กาเล. รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสตีติอาทิกํ จตุราวตฺถํ สนฺธาย ‘‘กทาจิ อตฺตโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘อตฺตนิมิตฺตํ’’ติ อภิกฺกมนาทีสุ กายวจีมโน กฺริยาสุ อหํ อภิกฺกมามิ, อหํ ปฏิกฺกมามีติอาทินา จิตฺเต ทิสฺสมานา อตฺตจฺฉายา วุจฺจติ. “वट्टस्मिं” म्हणजे त्रिविध वट्टात (संसारचक्रात). “भवयन्तके” म्हणजे अविद्या, संस्कार इत्यादींनी युक्त अशा भवचक्रात. “आमसनं” या पदाचा अर्थ दर्शवतो - “त्या त्या प्रकारे कल्पून ग्रहण करणे”. “शासने” म्हणजे परियत्ति शासनात, त्या त्या सुत्तांमध्ये. “दिट्ठियो दिट्ठुपादानं” म्हणजे दृष्टीच्या वस्तूंमध्ये दृढ पकड असण्याच्या अर्थाने दृष्टीच ‘दिट्ठुपादान’ (दृष्टी-उपादान) आहे. अत्तवादुपादानात (आत्मवाद-उपादानात). परिकल्प बुद्धी म्हणजे मिथ्याज्ञान म्हटले जाते. “इस्सर निमित्तं” म्हणजे संपूर्ण जगाचा ईश्वर असलेल्या महाब्रह्मदेवाकडून सृष्टीच्या सुरुवातीच्या काळात निर्माण केलेले. “अधिच्च समुप्पन्नं” म्हणजे अहेतुक आणि अप्रत्यय (कारण आणि प्रत्ययाशिवाय) उत्पन्न झालेले. “अच्चन्तसस्सतं” म्हणजे भवपरंपरेमध्ये शाश्वत असणारे. “एकच्चसस्सतं” म्हणजे विशिष्ट भवाला प्राप्त करून काही प्राण्यांसाठी शाश्वत असणारे. “उच्छिन्नं” म्हणजे कोठेही मृत्यूनंतर उच्छिन्न (नष्ट) होणारे. जुने कर्म क्षीण झाले आहे, नवीन कर्म केले गेले नाही; अशा प्रकारे संसाराची शुद्धी होते, इत्यादी ग्रहण करणे असा अर्थ आहे. संत काय (विद्यमान काय) म्हणजे सक्काय (सत्काय). “संतो” म्हणजे परमार्थतः विद्यमान असणारा. “कायो” म्हणजे रूपकाय आणि नामकाय. स्वतःचा स्वतःचा काय म्हणजेच सक्काय. प्रत्यत्तकाय (वैयक्तिक काय), प्रातिपुद्गलिक काय असे म्हटले आहे. यथावृत्त (वर सांगितलेले) दोन्ही कायच. सक्कायात दृष्टी असणे म्हणजे सक्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी). तेथे “सक्काये दिट्ठि” म्हणजे पूर्वान्त आणि अपरान्ताची कल्पना करणाऱ्यांप्रमाणे पूर्वान्त व अपरान्ताचा विचार न करता, सर्व प्राण्यांच्या देखील स्वतःच्या स्कंधांमध्येच ‘रूप हा माझा आत्मा आहे’ किंवा ‘माझा आत्मा रूपवान आहे’ किंवा ‘माझ्या आत्म्यामध्ये रूप आहे’ किंवा ‘रूपामध्ये माझा आत्मा आहे’ इत्यादी प्रकारे स्वभावतः सिद्ध झालेली दृष्टी, असे म्हटले आहे. “अस्सुतवा” (अश्रुतवान) म्हणजे स्कंधदेशना इत्यादी शून्यताधर्माशी संबंधित देशनाधर्माला पूर्वी कधीही न ऐकल्यामुळे, ज्याने ऐकले नाही तो ‘अस्सुतवा’. “पुथुज्जनो” (पृथग्जन) म्हणजे लौकिक महाजन (सामान्य लोक). तेथे समाविष्ट असलेला एक व्यक्ती देखील पृथग्जनच म्हटला जातो. तो श्रुतवान देखील असू शकतो आणि अश्रुतवान देखील असू शकतो. येथे अश्रुतवान अभिप्रेत आहे. आर्य पुद्गल (आर्य व्यक्ती) तेथे समाविष्ट नसतो. ‘मी’, ‘माझे’, ‘माझ्यामध्ये’ किंवा ‘मला’ ही परामाशाची (ग्रहणाची) पदे आहेत. “सेसधम्मेवा गहेत्वा” म्हणजे रूपाव्यतिरिक्त उरलेल्या नामस्कंध धर्मांना ‘हा माझा आत्मा आहे’ असे ग्रहण करून. “धम्म मुत्तकं वा अत्तानं गहेत्वा” म्हणजे पंचस्कंधधर्मापासून विमुक्त अशा परिकल्पसिद्ध आत्म्याला ग्रहण करून. ज्याच्या चार अवस्था आहेत तो ‘चतुरावस्थिक’. वेदनेच्या संभोगरसत्वामुळे “संभुंजिं” (मी उपभोग घेतला) असे म्हटले आहे. “सुखितो” म्हणजे सुखवेदनेने युक्त असलेला पुद्गल (व्यक्ती). धर्मतः पंचस्कंधच आहेत. परंतु तेथे सुखवेदनेचे प्राधान्य असल्यामुळे, त्या प्रकारे पाहणारा ‘वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतो’ असे म्हटले जाते. “समूहतो गहेत्वा” म्हणजे ‘मी आहे’, ‘मी एक प्राणी आहे’ इत्यादी प्रकारे समूहाने ग्रहण करून. “वत्थू” म्हणजे पंचस्कंध म्हटले जातात. ज्ञातपरिज्ञा इत्यादींच्या द्वारे ज्यांच्याकडून वस्तू परिज्ञात (पूर्णपणे जाणल्या) गेल्या नाहीत, ते ‘अपरिज्ञातवस्तुक’. अगदी एका मुहूर्ताच्या काळातही. ‘रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो’ इत्यादी चार अवस्थांना उद्देशून “कदाचित आत्म्यावरून” इत्यादी म्हटले आहे. “अत्तनिमित्तं” म्हणजे पुढे जाणे इत्यादी कायिक, वाचिक आणि मानसिक क्रियांमध्ये ‘मी पुढे जात आहे’, ‘मी मागे परतत आहे’ इत्यादी प्रकारे चित्तात दिसणारी आत्म्याची सावली (आत्मछाया) म्हटली जाते. ‘‘กามนฏฺเฐนา’’ติ [Pg.233] อิจฺฉนฏฺเฐน. ‘‘ฉนฺทนฏฺเฐนา’’ติ ปตฺถนฏฺเฐน. ลีนภาโว นาม จิตฺตเจตสิกานํ ปฏิกุฏนํ. อาปาทียเต อาปาทนํ. ลีนภาวสฺส อาปาทนนฺติ วิคฺคโห. ‘‘ตนฺที’’ติ อาลสฺยํ วุจฺจติ. ‘‘วิชมฺภิตตา’’ นาม กิเลสวเสน กายงฺคานํ วิชมฺภนํ สมิญฺชนปฺปสารณาทิกรณํ. สา เอว ปจฺจโย เอตสฺสาติ วิคฺคโห. “कामनट्ठेन” म्हणजे इच्छेच्या अर्थाने. “छन्दनट्ठेन” म्हणजे प्रार्थनेच्या (इच्छेच्या) अर्थाने. लीनभाव म्हणजे चित्त आणि चेतसिकांचे संकोचन (आकुंचन पावणे). प्राप्त केले जाते ते आपादन. लीनभावाचे आपादन असा विग्रह आहे. “तंदी” म्हणजे आळस म्हटला जातो. “विजम्भितता” म्हणजे क्लेशांच्या प्रभावामुळे शरीराच्या अवयवांचे जांभई देणे, आकुंचन-प्रसरण इत्यादी करणे. तीच याचे कारण आहे, असा विग्रह आहे. อนุสยปทตฺเถ. ‘‘อุปฺปชฺชนฺตี’’ติ อุปฺปชฺชิตุํ สกฺโกนฺติ. น ปน เอกนฺตโต อุปฺปชฺชนฺติ. สนฺเตสุหิ เอกนฺตโต อุปฺปชฺชนฺเตสุ อนุสยา นาม น โหนฺติ สยนกิจฺจสฺเสว อภาวโต. ‘‘อุปฺปชฺชนฺตี’’ติ วา อุปฺปชฺชิตุํ ปโหนฺติ. ปตฺโถทโน พหูนํ ชนานํ ปโหตีติอาทีสุ วิย. ปญฺญตฺติโยหิ อสภาวธมฺมชาติกตฺตา การณ ลาเภปิ อุปฺปชฺชิตุํ นปฺปโหนฺติ. อิเม ปน สภาวธมฺมชาติกตฺตา การณ ลาเภ สติ อุปฺปชฺชิตุํ ปโหนฺตีติ. เอวญฺหิสติ, อุปฺปาทํ อปตฺตานํปิ เตสํ ปรมตฺถชาติกตา สิทฺธา โหตีติ. ‘‘สห อนุเสนฺตี’’ติ เอกโต อนุเสนฺตีติ วุตฺตา กามราคานุสโย จ ปฏิฆานุสโย จ มานานุสโย จ ทิฏฺฐานุสโย จ วิจิกิจฺฉานุสโย จ. อิเมสํ สตฺตานํ สตฺตสนฺตาเน อนุสยกิจฺจมตฺตํ ฐเปตฺวา เอกโต อุปฺปตฺติ นาม นตฺถิ. ยทิ เอกโต อุปฺปชฺเชยฺยุํ. ทฺวาทสา กุสลจิตฺตานิ สตฺตสนฺตาเน นิจฺจกาลมฺปิ เอกโต อุปฺปชฺเชยฺยุํ. น จ อุปฺปชฺชนฺติ. ตสฺมา วิญฺญายติ อุปฺปชฺชนํ นาม อปฺปหีนฏฺเฐน อุปฺปชฺชนารหภาโว วุตฺโตติ. เสนฺตีติ วตฺวา ตทตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘วิสุํ’’ติอาทินา. ‘‘อวุฏฺฐิตา’’ติ อุปฺปาทํ อปตฺตา. ‘‘ตถาปวตฺตา’’ติ จาลนากาเรน ปวตฺตา. ปุน ‘‘ตถาปวตฺตา’’ติ ชวนสหชาตากาเรน ปวตฺตา. ‘‘เยสํ’’ติ กามราคานุสยาทีนํ. ‘‘อาวชฺชนํ’’ติ อาวชฺชนจิตฺตํ. ‘‘ทมถํ’’ติ สุทนฺตภาวํ. ‘‘ตถา ปวตฺตา’’ติ จิตฺตสนฺตานานุสยนากาเรน ปวตฺตา. ตาอวตฺถา เยสํ เต ตทวตฺถิกา. ยทิ เต อุปฺปาทํ อปตฺตา. เอวํสติ, เต ปรมตฺถาปิ นาม น ภเวยฺยุนฺติ โจทนํ ปริหรติ ‘‘เต ปนา’’ติอาทินา. สเจ เต กุสลาพฺยากต จิตฺตสนฺตานมฺปิ อนุคตา. เอวํสติ, เต กุสลาพฺยากตานิ นาม [Pg.234] สิยุนฺติ โจทนํ ปริหรติ ‘‘น จา’’ติอาทินา. อถ เต เอกนฺต อกุสลา สิยุํ. เอวํสติ, กุสลาพฺยากเตหิ วิรุทฺธา ภเวยฺยุํติ โจทนํ ปริหรติ ‘‘นาปี’’ติอาทินา. ยทิ อุปฺปาทํ อปตฺตา. เอวํสติ, กาลวิมุตฺตา สิยุนฺติ อาห ‘‘นาปิกาลตฺตย วินิมุตฺตา’’ติอาทึ. ‘‘สานุสเย จิตฺตสนฺตาเน’’ติ เสกฺขปุถุชฺชนานํ จิตฺตสนฺตาเน. ‘‘สห มคฺคุปฺปาทา’’ติ มคฺคุปฺปาเทน สเหว. ‘‘ตตฺถ ตตฺถ วุตฺโต’’ติ อฏฺฐกถาฏีกาสุ วุตฺโต. ‘‘อนาคตสามญฺญํ’’ติ อนาคตสทิสํ. น เอกนฺต อนาคตนฺติปิ วทนฺติ. กถํ เต สงฺขตชาติกา โหนฺตีติ อาห ‘‘เตหิ มคฺเค’’ติอาทึ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘อปฺปหีนา’’ติ มคฺเคน อปฺปหีนา. ‘‘ตทวตฺถา’’ติ อุปฺปชฺชนารหาวตฺถา. ‘‘ตํ สภาวตฺตา’’ติ กามราคาทิ สภาวตฺตา. ‘‘ตถา วุจฺจนฺตี’’ติ อนุสยาติ วุจฺจนฺติ. อนาคตา นาม น โหนฺติ. จิตฺตสนฺตาเน วตฺตมานภาเวน สิทฺธตฺตา. ‘‘หญฺจิ ปชหตี’’ติ ยทิปชหติ. ‘‘เตนหี’’ติ ตโต เอว. ‘‘รตฺโต’’ติ ราคสมงฺคี หุตฺวา. ‘‘ทุฏฺโฐ’’ติ โทสสมงฺคี หุตฺวา. ‘‘มุฬฺโห’’ติ โมหสมงฺคี หุตฺวา ปชหตีติ โทโส อาปชฺชตีติ วุตฺตํ โหติ. ปริยุฏฺฐาน ปตฺตานํ ราคาทีนํ. ‘‘มคฺควชฺฌํ’’ติ มคฺเคน วธิตพฺพํ. ‘‘อุปฺปนฺนํ’’ติ ปจฺจุปฺปนฺนํ. วตฺตมานญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ วตฺตมานุปฺปนฺนํ. ‘‘ภุตฺวา’’ติ อารมฺมณํ ปริภุญฺชิตฺวา. วิคจฺฉตีติ วิคตํ. ภุตฺวา วิคตญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ ภุตฺวา วิคตุปฺปนฺนํ. วิปจฺจนตฺถาย โอกาสํ กโรนฺตีติ โอกาสกตํ. โอกาสกตญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ โอกาสกตุปฺปนฺนํ. สมุทาจาโร วุจฺจติ ภิยฺโย ปวตฺตนํ. สมุทาจาโร จ โส อุปฺปนฺนญฺจาติ สมุทาจารุปฺปนฺนํ. ขนฺธปญฺจก สงฺขาตํ ภูมึ ลภตีติ ภูมิลทฺธํ. ภูมิลทฺธญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ ภูมิลทฺธุปฺปนฺนํ. อารมฺมณํ อธิกตรํ คณฺหาตีติ อารมฺมณาธิคฺคหิตํ. อารมฺมณาธิคฺคหิตญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ อารมฺมณาธิคฺคหิตุปฺปนฺนํ. มหคฺคตชฺฌาเนน อวิกฺขมฺภิตญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ อวิกฺขมฺภิตุปฺปนฺนํ. มคฺเคน อสมุคฺฆาฏิตญฺจ ตํ อุปฺปนฺนญฺจาติ อสมุคฺฆาฏิตุปฺปนฺนํ. เอวํ มคฺควชฺฌานํ อนุสยานํ อุปฺปนฺนภาเวน วุตฺตตฺตา ปจฺจุปฺปนฺนตา [Pg.235] ปริยาโยว เตสํ วตฺตพฺโพติ. ‘‘เสกฺขา’’ติ สตฺตเสกฺขปุคฺคลา. अनुशय पदाच्या अर्थामध्ये. 'उत्पन्न होतात' (उप्पज्जन्ति) म्हणजे उत्पन्न होण्यास समर्थ असतात. परंतु ते एकांताने (निश्चितपणे) उत्पन्न होत नाहीत. जर ते एकांताने उत्पन्न होत असते, तर त्यांना 'अनुशय' (सुप्त क्लेश) म्हटले गेले नसते, कारण त्यांच्या सुप्त राहण्याच्या (शयन) कार्याचाच अभाव झाला असता. किंवा 'उत्पन्न होतात' म्हणजे उत्पन्न होण्यास पुरेसे (समर्थ) असतात. जसे 'एक प्रस्थ भात अनेक लोकांसाठी पुरेसा आहे' इत्यादी उदाहरणांमध्ये. कारण प्रज्ञप्ती (संकल्पना) या स्वभावधर्माच्या स्वरूपाच्या नसल्यामुळे कारण (हेतू) मिळाल्यावरही उत्पन्न होण्यास समर्थ नसतात. परंतु हे (अनुशय) स्वभावधर्माच्या स्वरूपाचे असल्यामुळे कारण मिळाल्यावर उत्पन्न होण्यास समर्थ असतात. असे असल्यामुळे, जरी ते उत्पत्तीला प्राप्त झाले नसले, तरी त्यांचे परमार्थ-स्वरूपत्व सिद्ध होते. 'एकत्र सुप्त राहतात' (सह अनुसेन्ति) म्हणजे एकत्र सुप्त राहतात असे म्हटले आहे, जसे की कामरागानुशय, प्रतिघानुशय, मानानुशय, दृष्ट्यानुशय आणि विचिकित्सानुशय. या प्राण्यांच्या चित्तसंततीमध्ये केवळ अनुशय-कार्याला सोडून एकत्र उत्पत्ती नावाची गोष्ट नसते. जर ते एकत्र उत्पन्न झाले असते, तर प्राण्यांच्या चित्तसंततीमध्ये बारा अकुशल चित्ते नेहमीच एकत्र उत्पन्न झाली असती. परंतु ती उत्पन्न होत नाहीत. म्हणून हे समजले जाते की, 'उत्पन्न होणे' म्हणजे नष्ट न झाल्याच्या अर्थाने उत्पन्न होण्यास योग्य असणे असे म्हटले आहे. 'सुप्त राहतात' (सेन्ति) असे सांगून त्याचा अर्थ 'स्वतंत्रपणे' (विसुं) इत्यादी शब्दांनी दर्शविला आहे. 'न उठलेले' (अवुट्ठिता) म्हणजे उत्पत्तीला प्राप्त न झालेले. 'तसे प्रवृत्त झालेले' (तथापवत्ता) म्हणजे हालचालीच्या रूपाने प्रवृत्त झालेले. पुन्हा 'तसे प्रवृत्त झालेले' म्हणजे जवन-सहजात रूपाने प्रवृत्त झालेले. 'ज्यांच्या' (येसं) म्हणजे कामरागानुशय इत्यादींच्या. 'आवर्जन' (आवज्जनं) म्हणजे आवर्जन चित्त. 'दमन' (दमथं) म्हणजे सुदंत भाव (चांगल्या प्रकारे दमन झालेली अवस्था). 'तसे प्रवृत्त झालेले' म्हणजे चित्तसंततीमध्ये अनुशय रूपाने प्रवृत्त झालेले. ती अवस्था ज्यांची आहे, ते 'तदवस्थिक' (त्या अवस्थेतील). जर ते उत्पत्तीला प्राप्त झाले नसतील, तर ते परमार्थतः देखील नसावेत, या आक्षेपाचे परिहार 'परंतु ते...' (ते पना) इत्यादी शब्दांनी करतात. जर ते कुशल आणि अव्याकृत चित्तसंततीचे देखील अनुगमन करतात, तर ते कुशल किंवा अव्याकृत असावेत, या आक्षेपाचे परिहार 'आणि नाही...' (न चा) इत्यादी शब्दांनी करतात. जर ते एकांताने अकुशल असतील, तर ते कुशल आणि अव्याकृत चित्तांशी विरुद्ध असावेत, या आक्षेपाचे परिहार 'नाही देखील...' (नापी) इत्यादी शब्दांनी करतात. जर ते उत्पत्तीला प्राप्त झाले नसतील, तर ते कालमुक्त (त्रिकालमुक्त) असावेत, म्हणून 'तीन काळांपासून मुक्त देखील नाहीत' (नापिकालत्तय विनिमुत्ता) इत्यादी म्हटले आहे. 'सानुशय चित्तसंततीमध्ये' म्हणजे शैक्ष आणि पृथग्जनांच्या चित्तसंततीमध्ये. 'मार्ग-उत्पत्तीसह' (सह मग्गुप्पादा) म्हणजे मार्गाच्या उत्पत्तीसोबतच. 'त्या त्या ठिकाणी म्हटले आहे' म्हणजे अट्ठकथा आणि टीकांमध्ये म्हटले आहे. 'अनागत-सामान्य' म्हणजे अनागत (भविष्या) सारखे. ते एकांताने अनागत (भविष्यकालीन) देखील नाही असे म्हणतात. ते संस्कृत (संस्कारित) स्वरूपाचे कसे आहेत, हे सांगण्यासाठी 'त्या मार्गांनी...' (तेहि मग्गे) इत्यादी म्हटले आहे. विभावनी पाठात. 'नष्ट न झालेले' (अप्पहीna) म्हणजे मार्गाने नष्ट न झालेले. 'त्या अवस्थेतील' (तदवत्था) म्हणजे उत्पन्न होण्यास योग्य अशा अवस्थेतील. 'त्या स्वभावधर्माचे असल्यामुळे' (तं सभावत्ता) म्हणजे कामराग इत्यादी स्वभावधर्माचे असल्यामुळे. 'तसे म्हटले जातात' (तथा वुच्चन्ति) म्हणजे अनुशय असे म्हटले जातात. ते अनागत (भविष्यकालीन) नसतात, कारण चित्तसंततीमध्ये वर्तमान स्वरूपात ते सिद्ध असतात. 'जर त्याग करतो' (हञ्चि पजहति) म्हणजे जर त्याग करतो. 'तर मग' (तेनही) म्हणजे त्यावरूनच. 'रक्त' (रत्तो) म्हणजे रागाने युक्त होऊन. 'दुष्ट' (दुट्ठो) म्हणजे द्वेषाने युक्त होऊन. 'मूढ' (मुळ्हो) म्हणजे मोहाने युक्त होऊन त्याग करतो, असा दोष प्राप्त होतो, असे म्हटले आहे. पर्युत्थान (प्रकट रूप) प्राप्त झालेल्या राग इत्यादींचा. 'मार्गवध्य' (मग्gवज्झं) म्हणजे मार्गाने नष्ट करण्यायोग्य. 'उत्पन्न' (उप्पन्नं) म्हणजे प्रत्युत्पन्न (वर्तमानकालीन). जे वर्तमान आहे आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'वर्तमानोत्पन्न'. 'भोगून' (भुत्वा) म्हणजे आलंबनाचा उपभोग घेऊन. जे निघून जाते ते 'विगत'. जे भोगून निघून गेले आहे आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'भुक्तविगतोत्पन्न'. जे विपाकासाठी (परिणामासाठी) वाव देते, ते 'अवकाशकृत'. जे अवकाशकृत आहे आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'अवकाशकृतोत्पन्न'. 'समुदाचार' म्हणजे वारंवार प्रवृत्त होणे. जो समुदाचार आहे आणि उत्पन्न देखील आहे, तो 'समुदाचारोत्पन्न'. जे पंचस्कंध रूप भूमीला प्राप्त करते, ते 'भूमिलब्ध'. जे भूमिलब्ध आहे आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'भूमिलब्धोत्पन्न'. जे आलंबनाला अधिक प्रमाणात ग्रहण करते, ते 'आलंबनाधिगृहीत'. जे आलंबनाधिगृहीत आहे आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'आलंबनाधिगृहीतोत्पन्न'. जे महद्गत ध्यानाने विष्कंभित (दबलेले) नाही आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'अविष्कंभितोत्पन्न'. जे मार्गाने समूळ नष्ट केलेले नाही आणि उत्पन्न देखील आहे, ते 'असमुद्घाटितोत्पन्न'. अशा प्रकारे, मार्गवध्य असलेल्या अनुशयांच्या उत्पन्न भावाने सांगितल्यामुळे, त्यांची प्रत्युत्पन्नता (वर्तमानता) ही एका पर्यायानेच सांगितली पाहिजे. 'शैक्ष' (सेक्खा) म्हणजे सात शैक्ष पुद्गल (व्यक्ती). โอรมฺภาโค วุจฺจติ กามโลโกเจว ปุถุชฺชนภาโว จ. โอรมฺภาเค สนฺทิสฺสนฺตีติ โอรมฺภาคิยานิ. อุทฺธํภาโค วุจฺจติ มหคฺคตภาโวเจว อริยภาโว จ. อุทฺธํภาเค สนฺทิสฺสนฺตีติ อุทฺธํภาคิยานิ. ตตฺถ. กามจฺฉนฺโท, พฺยาปาโท,ติ อิมานิ ทฺเวสํ โยชนานิ กามโลกสงฺขาเต โอรมฺภาเค เอว สนฺทิสฺสนฺติ. ทิฏฺฐิ, วิจิกิจฺฉา, สีลพฺพตปรามาโส,ติ อิมานิ ตีณิ ปุถุชฺชนภาว สงฺขาเต. เสสานิ ปน ปญฺจ มหคฺคตภาวสงฺขาเต จ อริยภาวสงฺขาเตจ อุทฺธํภาเคปิ สนฺทิสฺสนฺติ. อถวา. ปุริมานิ ปญฺจยสฺส ตานิ มคฺเคน อปฺปหีนานิ, ตํ อุปริภวคฺเค ฐิตํปิ กามโลกสงฺขาตํ โอรมฺภาคํ อากฑฺฒนฺติ, ตสฺมา โอรมฺภาคาย สํวตฺตนฺตีติ โอรมฺภาคิยานิ. ปจฺฉิมานิ ปญฺจ ยสฺส ตานิ อปฺปหีนานิ, ตํ กามโลเก ฐิตํปิ อุทฺธํภาคํ อากฑฺฒนฺติ, ตสฺมา อุทฺธํภาคาย สํวตฺตนฺตีติ อุทฺธํภาคิยานิ. ตตฺถหิ ทฺเวรูปารูปราคา เอกนฺเตน มหคฺคตภาวํ อากฑฺฒนฺติเยว. มาโน จ อุทฺธจฺจญฺจ อวิชฺชาจาติ อิมานิ จ รูปารูปราคสหคตานิ หุตฺวา อากฑฺฒนฺติ. โอรํ เหฏฺฐิมํ กามโลกํ ภชนฺตีติ โอรมฺภาคิยานิ. อุทฺธํ รูปารูปโลกํ ภชนฺตีติ อุทฺธํภาคิยานีติปิ วณฺเณนฺติ. ‘‘อิตรานิ ปนา’’ติ ทฺเว อิสฺสา สํโยชน มจฺฉริยสํโยชนานิ. ‘‘กโมปน ทฺวินฺนํ ปี’’ติ อิธ สงฺคเห ทฺวินฺนํปิ อนุกฺกโมปน. 'ओरंभाग' (खालचा भाग) म्हणजे कामलोक आणि पृथग्जन अवस्था होय. जे खालच्या भागात (ओरंभागात) बांधून ठेवतात, त्यांना 'ओरंभागीय' (अधोभागीय संयोजने) म्हणतात. 'उद्धंभाग' (वरचा भाग) म्हणजे महद्गत अवस्था आणि आर्य अवस्था होय. जे वरच्या भागात (उद्धंभागात) बांधून ठेवतात, त्यांना 'उद्धंभागीय' (ऊर्ध्वभागीय संयोजने) म्हणतात. त्यामध्ये, कामच्छंद आणि व्यापाद ही दोन संयोजने कामलोक नावाच्या ओरंभागातच बांधून ठेवतात. दृष्टी, विचिकित्सा आणि शीलव्रतपरामर्श ही three संयोजने पृथग्जन अवस्था नावाच्या ओरंभागात बांधून ठेवतात. परंतु उर्वरित पाच संयोजने महद्गत अवस्था आणि आर्य अवस्था नावाच्या उद्धंभागात देखील बांधून ठेवतात. किंवा, ज्या व्यक्तीची पहिली पाच संयोजने मार्गाने नष्ट झालेली नसतात, ती त्याला जरी तो उच्च भवाच्या शिखरावर (भवाग्रावर) स्थित असला तरी कामलोक नावाच्या ओरंभागाकडे (खालच्या लोकाकडे) खेचून आणतात, म्हणून ती ओरंभागाकडे नेणारी असल्यामुळे 'ओरंभागीय' म्हटली जातात. ज्या व्यक्तीची नंतरची पाच संयोजने नष्ट झालेली नसतात, ती त्याला जरी तो कामलोकात स्थित असला तरी उद्धंभागाकडे (वरच्या लोकाकडे) खेचून नेतात, म्हणून ती उद्धंभागाकडे नेणारी असल्यामुळे 'उद्धंभागीय' म्हटली जातात. कारण त्यामध्ये रूपराग आणि अरूपराग हे दोघे निश्चितपणे महद्गत अवस्थेकडेच खेचून नेतात. आणि मान, औद्धत्य व अविद्या ही देखील रूपराग आणि अरूपरागाशी सहगत (युक्त) होऊन वर खेचून नेतात. जे खालच्या म्हणजेच कनिष्ठ कामलोकाचा आश्रय घेतात, ते 'ओरंभागीय' होत. जे वरच्या म्हणजेच रूप आणि अरूप लोकाचा आश्रय घेतात, ते 'उद्धंभागीय' होत, असेही वर्णन केले जाते. 'परंतु इतर' (इतराणि पना) म्हणजे ईर्ष्या संयोजन आणि मात्सर्य संयोजन ही दोन संयोजने होत. 'दोन्हींचा क्रम देखील' (कमोपन द्विन्नं पी) म्हणजे या संग्रहात दोन्हींचा अनुक्रम देखील दर्शविला आहे. ‘‘วิพาเธนฺตี’’ติ วิหึสนฺติ. ‘‘อุปตาเปนฺติจา’’ติ อุปคนฺตฺวา สนฺตาเปนฺติ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. 'बाधा पोहोचवतात' (विबाधेन्ति) म्हणजे पीडा देतात (हिंसा करतात). 'आणि संताप देतात' (उपतापेन्ति च) म्हणजे जवळ जाऊन संतप्त करतात. यातील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. อกุสลสงฺคหานุทีปนา นิฏฺฐิตา. अकुसलसंगहानुदीपनी समाप्त झाली. ๑๖๓. มิสฺสกสงฺคเห. ‘‘จิตฺตปฺปฏิปาทนํ จิตฺตนิโยชนํ. ‘‘สุคติ ทุคฺคติ วิวฏฺฏสงฺขาตาสุ จา’’ติ สุคติภว ทุคฺคติ ภวนิพฺพานสงฺขาตาสุ จ. นิพฺพานญฺหิ วฏฺฏโต คิคตตฺตา วิวฏฺฏนฺติ วุจฺจติ. ‘‘ทสฺสนาทีหิ เอวา’’ติ ทสฺสนสงฺกปฺปนาทีหิ เอว. อุชุคติ นาม [Pg.236] หิตสุขสํวตฺตนิกา ปวตฺติ วุจฺจติ. วงฺกคตินาม อหิต ทุกฺขสํวตฺตนิกา ปวตฺติ. ‘‘ปถงฺคานี’’ติ ปถสฺสมคฺคสฺส องฺคานิ. มคฺโคติ จ อุปาโย วุจฺจตีติ อาห ‘‘อุปายงฺคานี’’ติ. ‘‘อิตรานี’’ติ สมฺมาทิฏฺฐิ สมฺมาสงฺกปฺปาทีนิ องฺคานิ. อุชุคติยา คมนสฺส อุปายงฺคานิ. อิเมปิ จตฺตาโร มคฺคงฺค ธมฺมา ธมฺมา นาม อาคตา. ‘‘ตถา ตถา ปวตฺตานํ’’ติ มุสาวาทาทิวเสน ปวตฺตานํ. ‘‘นา นามคฺโควา’’ติ มิจฺฉามคฺโค จ สมฺมามคฺโค จ. १६३. मिस्सकसंग्रहात. ‘चित्तप्पटिपादनं’ म्हणजे चित्तनियोजन (चित्ताला जोडणे). ‘सुगति दुग्गति विवट्टसंखातासु च’ म्हणजे सुगतिभव, दुग्गतिभव आणि निब्बान (निर्वाण) संज्ञकांमध्ये. कारण निब्बान हे संसाराच्या चक्रातून (वट्टातून) मुक्त असल्यामुळे त्याला ‘विवट्ट’ असे म्हटले जाते. ‘दस्सनादीहि एव’ म्हणजे दस्सन (दर्शन), संकप्प (संकल्प) इत्यादींद्वारेच. ऋजुगती (सरळ मार्ग) म्हणजे हित आणि सुखाकडे नेणारी प्रवृत्ती होय. वंकगती (वाकडा मार्ग) म्हणजे अहित आणि दुःखाकडे नेणारी प्रवृत्ती होय. ‘पथङ्गानि’ म्हणजे पथाचे म्हणजेच मार्गाचे अंग. आणि मार्गाला उपाय म्हटले जाते, म्हणून ‘उपायङ्गानि’ (उपायाची अंगे) असे म्हटले आहे. ‘इतरानि’ म्हणजे सम्मादिट्ठि (सम्यक् दृष्टी), सम्मासंकप्प (सम्यक् संकल्प) इत्यादी अंगे. ऋजुगतीने जाण्यासाठी ही उपायाची अंगे आहेत. हे चार मग्गङ्ग (मार्गांग) धर्म देखील ‘धम्म’ या नावाने आले आहेत. ‘तथा तथा पवत्तानं’ म्हणजे मुसावाद (असत्य बोलणे) इत्यादींच्या वश होऊन प्रवृत्त होणाऱ्यांचे. ‘नानामग्गो वा’ म्हणजे मिच्छामग्ग (मिथ्या मार्ग) आणि सम्मामग्ग (सम्यक् मार्ग). ‘‘อตฺตาธีนวุตฺติเก’’ติ อตฺตายตฺตปฺปวตฺติเก. อตฺตโน คติ นาม จกฺขุนฺทฺริยาทีนํ ทสฺสนาทิ กิจฺจเมว วุจฺจติ. ‘‘อิสฺสรา อธิปติโน’’ติ อิทํ อาธิปฺปจฺจตฺถปากฏตฺถํ วุตฺตํ. อตฺโถ ปน ภาวปฺปธานวเสน คเหตพฺโพ. อินฺทฺริยํ อิสฺสริยํ อาธิปฺปจฺจนฺติหิ อิเม เอกตฺถาติ. ‘‘อิตฺถาการานิ’’ นาม อิตฺถิลิงฺคปุริสลิงฺคาทิ. ‘‘อญฺญถา อปฺปวตฺติยํ’’ติ อิตฺถิสณฺฐาเน ปุริสลิงฺคาทีนํ, ปุริสสณฺฐาเน อิตฺถิลิงฺคาทีนํ อปฺปวตฺติยํ. เตนาห ‘‘ตถาหี’’ติอาทึ. มโน วิชานนกิจฺเจ สมฺปยุตฺตธมฺมานํ อิสฺสโร โหติ อนญฺญาภิภวนียภาเวน ปวตฺตนโตติ สมฺพนฺโธ. เอวํ ปรตฺถ. ‘‘อารมฺมณาธิมุจฺจเน’’ติ อารมฺมเณ นิราสงฺกปฺปวตฺติยํ. ‘‘อารมฺมณุปฏฺฐาเน’’ติ จิตฺเต พุทฺธคุณาธิกสฺส อารมฺมณสฺส อุปฏฺฐาเน. ‘‘จตุสจฺจธมฺโม’’ติ เตน ปุคฺคเลน อนญฺญาต ปุพฺโพ จตุสจฺจ ธมฺโม. อนญฺญาต ปุพฺพํ อมตํ วา ปทํ. อนญฺญาตํ ญสฺสามิ อิติ ปวตฺตํ อินฺทฺริยนฺติ สมาโส. ปฏิปนฺนสฺสาติ ปน อตฺถโต สิทฺธตฺตา วุตฺตํ. ‘‘วิปฺปกตภาเวนา’’ติ อนิฏฺฐงฺคตภาเวน. ปุนปฺปุนํ ชานนกิจฺจยุตฺตานํ มชฺเฌ ฉนฺนํเสกฺขานํ. เอเตน อวสทฺทสฺสยาว สพฺพกิเลสปฺปหานา ชานนนฺติ อตฺถํ ทีเปติ. ปถม มคฺเคน ญาตํ มริยาทํ อนติกฺกมฺม ชานนนฺติปิ วณฺเณนฺติ. อาชานิตตฺถาติ อญฺญาตาวี. อรหา ขีณาสโว กตกิจฺโจ วุสิต พฺรหฺมจริโย. อญฺญาตาวิโน อินฺทฺริยนฺติ อญฺญาตาวินฺทฺริยนฺติ อตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปรินิฏฺฐิต อาชานนกิจฺจสฺสา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘ตพฺพิมุตฺตี’’ติ อตฺตคฺคาห วิมุตฺติ. ‘‘ตสฺมึ วา’’ติ ตสฺมึ อตฺตนิวา. ‘‘สํกิลิฏฺโฐ’’ติ นานากิเลเสหิ สํกิเลสิโต. ‘‘วิปฺผนฺทิโต’’ติ นานาสุขทุกฺเขหิ [Pg.237] สํกมฺปิโต. ‘‘โวทานปตฺติยา’’ติ วิสุทฺธิปตฺตตฺถาย. ‘‘ตายปฏิ ปตฺติยา’’ติ กรณตฺเถ, เหตุ อตฺเถ วา กรณวจนํ. ‘‘โวทานปตฺติยา’’ติ สามิอตฺเถ สามิวจนํ. ‘अत्ताधीनवुत्तिके’ म्हणजे स्वतःच्या अधीन राहून प्रवृत्त होणारे. स्वतःची गती म्हणजे चक्खुन्द्रिय (चक्षुरिंद्रिय) इत्यादींचे दर्शनादी कार्यच म्हटले जाते. ‘इस्सरा अधिपतिनो’ हे आधिपत्य अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी म्हटले आहे. परंतु अर्थ भावप्रधानतेच्या आधारे ग्रहण केला पाहिजे. इंद्रिय, ऐश्वर्य आणि आधिपत्य हे एकाच अर्थाचे शब्द आहेत. ‘इत्थाकारानि’ म्हणजे स्त्रीलिंग, पुल्लिंग इत्यादी. ‘अञ्ञथा अप्पवत्तियं’ म्हणजे स्त्रीच्या शरीरात पुल्लिंग इत्यादींची आणि पुरुषाच्या शरीरात स्त्रीलिंग इत्यादींची प्रवृत्ती न होणे. म्हणूनच ‘तथाहि’ इत्यादी म्हटले आहे. मन हे जाणण्याच्या कार्यात संप्रयुक्त धर्मांचे स्वामी असते, कारण ते इतरांकडून पराभूत न होता प्रवृत्त होते, असा संबंध आहे. इतर ठिकाणीही असेच समजावे. ‘आरम्मणाधिमुच्चने’ म्हणजे आलंबनामध्ये निःशंकपणे प्रवृत्त होणे. ‘आरम्मणुपट्ठाने’ म्हणजे चित्तात बुद्धगुणादी श्रेष्ठ आलंबन उपस्थित होणे. ‘चतुसच्चधम्मो’ म्हणजे त्या पुद्गलाने (व्यक्तीने) पूर्वी न जाणलेला चतुसच्च धम्म (चार आर्यसत्य). किंवा पूर्वी न जाणलेले अमृत पद. ‘अनञ्ञातं ञस्सामि’ (जे पूर्वी जाणले नाही ते मी जाणीन) अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेले इंद्रिय, असा हा समास आहे. परंतु ‘प्रतिपन्नस्य’ (मार्गावर आरूढ झालेल्याचे) हे अर्थावरून सिद्ध होत असल्यामुळे म्हटले आहे. ‘विप्पकतभावेन’ म्हणजे अपूर्ण अवस्थेत असल्यामुळे (अंतिम ध्येयाप्रत न पोहोचल्यामुळे). पुन्हा पुन्हा जाणण्याच्या कार्यात युक्त असलेल्या सहा शैक्षांच्या (सेक्खांच्या) मध्यभागी. याद्वारे सर्व क्लेशांचा प्रहाण करून जाणणे हा अर्थ स्पष्ट होतो. प्रथम मार्गाने जाणलेल्या मर्यादेचे उल्लंघन न करता जाणणे, असेही वर्णन करतात. ‘आजानितत्था’ म्हणजे अज्ञातवी (ज्याने पूर्णपणे जाणले आहे). अर्हत, क्षीणासव, कृतकृत्य आणि ज्यांनी ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे असे. ‘अज्ञातवीचे इंद्रिय म्हणजे अज्ञातविंद्रिय’ हा अर्थ दर्शवण्यासाठी ‘परिनिट्ठित आजाननकिच्चस्स’ (ज्याचे जाणण्याचे कार्य पूर्ण झाले आहे) इत्यादी म्हटले आहे. ‘तब्बिमुत्ती’ म्हणजे आत्मग्रहापासून मुक्ती. ‘तस्मिं वा’ म्हणजे त्या स्वतःमध्येच. ‘संकिलिट्ठो’ म्हणजे नाना क्लेशांनी संक्लिष्ट (मलीन) झालेला. ‘विप्फन्दितो’ म्हणजे नाना सुख-दुःखांनी कंपित झालेला. ‘वोदानपत्तिया’ म्हणजे विशुद्धी प्राप्त करण्यासाठी. ‘ताय पटिपत्तिया’ यामध्ये करण अर्थात किंवा हेतू अर्थात तृतीया विभक्ती (करणवचन) आहे. ‘वोदानपत्तिया’ यामध्ये स्वामी (षष्ठी) अर्थात षष्ठी विभक्ती (सामिवचन) आहे. ‘‘พลียนฺตี’’ติ นามธาตุนิทฺเทโส. เตนาห ‘‘พลสา กโรนฺตี’’ติ. ‘‘พลสา’’ติ พเลน. ปริโต สมนฺตโต เสนฺติ ปริวาเรนฺตีติ ปริสฺสยา. อสฺสทฺธสฺส ภาโว อสฺสทฺธิยํ. โกสชฺชสงฺขาเตน ปฏิปกฺขธมฺเมน. มุฏฺฐา นฏฺฐา สติ ยสฺสาติ มุฏฺฐสฺสติ. มุฏฺฐสฺสติสฺส ภาโว มุฏฺฐสฺสจฺจํ. ‘‘เสสทุก ทฺวยํ’’ติ อหิริกทุกํ หิริทุกญฺจ. ‘बलीयन्ति’ हा नामधातूचा निर्देश आहे. म्हणूनच ‘बलसा करोन्ति’ (बलाने करतात) असे म्हटले आहे. ‘बलसा’ म्हणजे बलाने (शक्तीने). जे चहूबाजूंनी वेढून राहतात, त्यांना ‘परिस्सया’ (परिस्रव/उपद्रव) म्हणतात. अश्रद्ध असण्याचा भाव म्हणजे ‘अस्सद्धियं’ (अश्रद्धा). कोसज्ज (आळस) संज्ञक प्रतिपक्ष धर्माने. ज्याची स्मृती (सति) नष्ट झाली आहे, तो ‘मुट्ठस्सति’ (मुषितस्मृती). मुट्ठस्सतीचा भाव म्हणजे ‘मुट्ठसच्चं’ (स्मृतीचा अभाव/विस्मरण). ‘सेसदुक द्वयं’ म्हणजे अहिरिकदुक (अह्रीकता-द्विक) आणि हिरिदुक (ह्री-द्विक). คหปติ, ชายมฺปตี, ติอาทีสุ วิย ปติสทฺโท สามิอิสฺสร ปริยาโยติ อาห ‘‘ปตีติ สามิอิสฺสโร’’ติ. ‘‘ปเรสํ’’ติ สหชาเตสุ ปเรสํ อินฺทฺริยานํ. ‘‘ปเรหี’’ติ กมฺมตฺเถ กรณวจนํ. ปเร สหชาเต อินฺทฺริย ธมฺเมติ อตฺโถ. ‘‘อธิโก’’ติ อธิกตโร. ‘‘อตฺตาธีน วุตฺตีนํ’’ติ อตฺตายตฺตวุตฺตีนํ. ‘‘ฉนฺทาคมนวเสน วา’’ติ เอตฺถ อาคจฺฉติ ผลํ เอเตนาติ อาคมนํ. อาทิการณํ, มูลการณํ, ปภวการณํ. ฉนฺโท เอว อาคมนํ ฉนฺทาคมนํ. เตนาห ‘‘ปุพฺเพ อตีตภเวสู’’ติอาทึ. สมฺปยุตฺต ธมฺเม อตฺตปราธีเน กตฺวาติ สมฺพนฺโธ. มโหโฆ ติณปณฺณกสเฏ อตฺตปราธีเน กโรนฺโต วิยาติ โยชนา. ตตฺถ ‘‘อตฺตปราธีเน’’ติ อตฺตสงฺขาโตปโร อตฺตปโร. อตฺตปเรน อธีนา อตฺตปราธีนาติ อตฺโถ. ‘‘เสเสสุปี’’ติ เสเสสุ วีริย จิตฺต วีมํสาธิปตีสุปิ. เอเตน ‘วีริยเมว อธิปติ วีริยาธิปติ. วีริยวโต กึ นาม กมฺมํ น สิชฺฌตีติ เอวํ ปุพฺพาภิสงฺขารวเสน วา ปุพฺเพ อตีตภเวสุ สุฏฺฐุ อาเสวิตวีริยาคมนวเสน วา เตสุ เตสุ กลฺยาณ ปาปกมฺเมสุ สมฺปยุตฺต ธมฺเม มโหโฆ วิย ติณปณฺณกสเฏ อตฺตปราธีเน นิจฺจํ ปคฺคหิตธุเรกตฺวา ปวตฺตํ วีริย’นฺติอาทินยํ อติทิสติ. ‘‘ปจฺฉิมา ตโย ธมฺมา’’ติ วีริย จิตฺต วีมํสา ธมฺมา. ปรวเสปิ วตฺตนฺติ, ตทา เตสํ อธิปติภาโว นตฺถีติ โจทนา. อธิปติ กิจฺจํ นาม ธุรวาหิตาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตํ ตํ กิจฺจ วิเสสํ [Pg.238] อนเปกฺขิตฺวา’’ติ จกฺขุนฺทฺริยํ ทสฺสน กิจฺเจ อิสฺสโร, โสตินฺทฺริยํ สวน กิจฺเจติอาทีสุ ตํ ตํ กิจฺจวิเสสํ อเปกฺขติ, ตถา อนเปกฺขิตฺวา. ‘‘วิชานนาทิ กิจฺจํ’’ติ ‘มโน อารมฺมณ วิชานเน’ติอาทินา วุตฺตํ สพฺพํ อินฺทฺริย กิจฺจํ. ‘गहपति’, ‘जायम्पती’ इत्यादी शब्दांप्रमाणे ‘पति’ हा शब्द स्वामी किंवा ईश्वराचा (मालकाचा) पर्याय आहे, म्हणून ‘पतीति सामीइस्सरो’ (पती म्हणजे स्वामी किंवा ईश्वर) असे म्हटले आहे. ‘परेसं’ म्हणजे सहजात (सोबत उत्पन्न होणाऱ्या) इतर इंद्रियांचे. ‘परेहि’ यामध्ये कर्म अर्थात तृतीया विभक्ती (करणवचन) आहे. इतर सहजात इंद्रिय धर्म, असा याचा अर्थ आहे. ‘अधिको’ म्हणजे अधिकतर (श्रेष्ठ). ‘अत्ताधीनवुत्तीनं’ म्हणजे स्वतःच्या अधीन राहून प्रवृत्त होणाऱ्यांचे. ‘छन्दागमनवसेन वा’ यामध्ये ज्याच्याद्वारे फल प्राप्त होते ते ‘आगमन’ होय. आदिकारण, मूळ कारण, प्रभवकारण. छंद (इच्छा) हेच आगमन म्हणजे ‘छन्दागमन’ होय. म्हणूनच ‘पुब्बे अतीतभवेसु’ (पूर्वीच्या अतीत जन्मांमध्ये) इत्यादी म्हटले आहे. संप्रयुक्त धर्मांना स्वतःच्या अधीन करून, असा संबंध आहे. ज्याप्रमाणे मोठा पूर गवत, पाने आणि कचरा यांना स्वतःच्या अधीन करतो, त्याप्रमाणे, अशी योजना आहे. तेथे ‘अत्तपराधीने’ म्हणजे स्वतः संज्ञक असलेला दुसरा तो ‘अत्तपर’. स्वतःच्या अधीन असलेले ते ‘अत्तपराधीन’, असा अर्थ आहे. ‘सेसेसुपि’ म्हणजे उर्वरित वीर्य, चित्त आणि वीमंसा (मीमांसा) अधिपतींमध्ये देखील. याद्वारे ‘वीर्य हेच अधिपती म्हणजे वीर्याधिपती’. ‘वीर्यवानाचे कोणते कार्य बरे सिद्ध होत नाही?’ अशा प्रकारे पूर्व-अभिसंस्काराच्या वश होऊन किंवा पूर्वीच्या अतीत जन्मांमध्ये चांगल्या प्रकारे आचरिलेल्या वीर्य-आगमनाच्या वश होऊन, त्या त्या कल्याणकारक व पापकारक कर्मांमध्ये संप्रयुक्त धर्मांना, मोठ्या पुराप्रमाणे गवत, पाने व कचरा यांना स्वतःच्या अधीन करून, नेहमी धुरा (जबाबदारी) वाहून प्रवृत्त झालेले वीर्य, अशा रीतीने अतिदेश (नियम लागू) केला जातो. ‘पच्छिमा तयो धम्मा’ म्हणजे वीर्य, चित्त आणि वीमंसा (मीमांसा) हे धर्म. ते दुसऱ्याच्या वशमध्ये देखील प्रवृत्त होतात, तेव्हा त्यांचा अधिपतीभाव नसतो, अशी शंका (चोदना) आहे. अधिपतीचे कार्य म्हणजे धुरा वाहणे (नेतृत्व करणे), असा संबंध आहे. ‘तं तं किच्चविसेसं अनपेक्खित्वा’ म्हणजे चक्खुन्द्रिय दर्शनाच्या कार्यात स्वामी आहे, सोतिन्द्रिय श्रवणाच्या कार्यात स्वामी आहे इत्यादींमध्ये त्या त्या विशिष्ट कार्याची अपेक्षा असते, तशी अपेक्षा न ठेवता. ‘विजानानादि किच्चं’ म्हणजे ‘मन आलंबन जाणण्याच्या कार्यात’ इत्यादी प्रकारे सांगितलेले सर्व इंद्रियांचे कार्य होय. ภุโส หรนฺติ วหนฺตีติ อาหารา. ‘‘ภุโส’’ติ อติเรกตรนฺติ อตฺโถ. กถํ ปน ภุโส หรนฺตีติ อาห ‘‘สหชาตาที’’ติอาทึ. เตเต ปจฺจย ธมฺมา เตเต ปจฺจยุปฺปนฺน ธมฺมา จาติ โยชนา. ‘‘เอตฺถา’’ติ อิมิสฺสํ ปาฬิยํ. ‘‘ปจฺจยาหาโร วา’’ติ เอตฺถ เหตุ อารมฺมณาทิโก สพฺโพปจฺจโย ปจฺจยาหาโร นาม. อาหาร ปจฺจโยปน วิสุํ เอโก ปจฺจยวิเสโส. ‘‘ปจฺจยฏฺเฐนา’’ติ เหตุ อารมฺมณาทิ ปจฺจยฏฺเฐน. ‘‘อาหารภูตา’’ติ อุปตฺถมฺภนกิจฺจวิเสสภูตาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘กฬีรงฺกุรานํ’’ติ กมฺมตฺเถ สามิวจนํ. ‘‘วฑฺฒิยา’’ติ วฑฺฒนตฺถาย. ‘‘ฐิติยา’’ติ ฐิตตฺถาย. อิเมสตฺตา วฏฺเฏ ปวตฺตนฺตีติ สมฺพนฺโธ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ‘‘ปกฺเข วิยูหิตฺวา’’ติ ปกฺเข สญฺจาเลตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปกฺเข’’ติ วา ปกฺเขหิ วาตํ พฺยูหิตฺวา. ‘‘ตทนุสยิตสฺสา’’ติ ตสฺมึ วิปาก สนฺตาเน อนุสยิ ตสฺส. ‘‘วิภาเวตฺวา’’ติ ปจฺจกฺขโต วิภูตํ ปากฏํ กตฺวา. ‘‘อลภิตฺวา’’ติ จกฺขุมฺหิ อลภิตฺวา. อปสฺสิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ตตฺเถวา’’ติ นิวาสฏฺฐาเน เอว. ‘‘สมฺปยุตฺตา’’ติ วิญฺญาเณน สมฺปยุตฺตา. ภวึสุ วฑฺฒึ สูติ ภูตา. สมฺภวํ วุฑฺฒิการณํ เอสนฺติ คเวสนฺตีติ สมฺภเวสิโน. ‘‘วุตฺตนเยนา’’ติ ‘ยถา ยวพีชานํ วา สาลิพีชานํ วา’ติอาทินา วุตฺตนเยน. ‘‘อาหาเรตี’’ติ ปวตฺเตติ. ‘‘มโนสญฺเจตนาหาโร’’ติ กุสลากุสล กมฺมภูโต มโนสญฺเจตนาหาโร. ‘‘ตโย ภเว’’ติ ตโย กามภวาทิเก อุปปตฺติภเว. ฐิติยาติ จ อนุคฺคหายาติ จ วุตฺตํ. อิตรถา อุปฺปตฺติยาติ จ วุตฺตํ สิยาติ อธิปฺปาโย. अतिशय वाहून नेतात किंवा धारण करतात म्हणून 'आहार' (असे म्हणतात). 'भुसो' म्हणजे अतिशय किंवा अधिक प्रमाणात असा अर्थ आहे. पण 'अतिशय वाहून नेतात' हे कसे? म्हणून 'सहजातादी' इत्यादी म्हटले आहे. ते ते प्रत्यय धर्म आणि ते ते प्रत्ययोत्पन्न धर्म अशी योजना करावी. 'एत्थ' म्हणजे या पाळीमध्ये (पाठात). 'प्रत्ययाहार किंवा' यामध्ये हेतू, आलंबन इत्यादी सर्व प्रत्यय म्हणजे 'प्रत्ययाहार' होय. परंतु 'आहारप्रत्यय' हा स्वतंत्रपणे एक विशिष्ट प्रत्यय आहे. 'प्रत्ययार्थाने' म्हणजे हेतू, आलंबन इत्यादी प्रत्ययांच्या अर्थाने. 'आहारभूत' म्हणजे उपस्तंभन (टेकू देण्याच्या) विशिष्ट कार्याच्या रूपाने, असे म्हटले आहे. 'कळीरंकुराणम्' (कोंबांच्या) हे कर्म अर्थातील षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे. 'वृद्धीसाठी' म्हणजे वाढीसाठी. 'स्थितीसाठी' म्हणजे टिकून राहण्यासाठी. हे प्राणी संसारात (वट्टात) प्रवृत्त होतात, असा संबंध आहे. उर्वरित भाग येथे समजण्यास सोपा आहे. 'पंख हलवून' (पक्खे वियूहित्वा) म्हणजे पंख हलवून असे म्हटले आहे. किंवा 'पक्खे' म्हणजे पंखांनी वारा निर्माण करून. 'तदनुशयितस्य' म्हणजे त्या विपाक संतानामध्ये अनुशयित असलेल्याचे. 'विभावित करून' म्हणजे प्रत्यक्षपणे स्पष्ट किंवा प्रकट करून. 'न मिळवून' (अलभित्वा) म्हणजे चक्षूमध्ये न मिळवून, न पाहून असे म्हटले आहे. 'तेथेच' म्हणजे निवासस्थानातच. 'संप्रयुक्त' म्हणजे विज्ञानाशी संप्रयुक्त. जे वाढीस प्राप्त झाले ते 'भूत' होत. जे उत्पत्तीचे किंवा वाढीचे कारण शोधतात ते 'संभवेसी' (संभव शोधणारे) होत. 'सांगितलेल्या पद्धतीने' म्हणजे 'जसे यवाचे (जवाचे) बी किंवा शालीचे (तांदळाचे) बी' इत्यादी सांगितलेल्या पद्धतीने. 'आहार करतो' म्हणजे प्रवृत्त करतो. 'मनोसंचेतनाहार' म्हणजे कुशल-अकुशल कर्मरूप मनोसंचेतनाहार होय. 'तीन भवांमध्ये' म्हणजे कामभव इत्यादी तीन उत्पत्ती भवांमध्ये. 'स्थितीसाठी' आणि 'अनुग्रहासाठी' असे म्हटले आहे. अन्यथा 'उत्पत्तीसाठी' असे म्हटले गेले असते, असा अभिप्राय आहे. ‘‘ทุพฺพลกิจฺจฏฺฐานวตฺถุกตฺตา’’ติ ทุพฺพลกิจฺจตฺตา ทุพฺพลฏฺฐานตฺตา ทุพฺพลวตฺถุกตฺตา. ‘‘อภินิปาต มตฺตานิ โหนฺตี’’ติ ทสฺสน สวนาทิ มตฺตานิ [Pg.239] โหนฺตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘วิตกฺก ปจฺฉิมกํ ฌานํ’’ติ ฌานานิ นาม วิตกฺกสฺส ปจฺฉานุคตํ โหตีติ อตฺโถ. ‘‘ตตฺถา’’ติ เตสุปญฺจวิญฺญาเณสุ. ‘‘ตา’’ติ เวทนา เอกคฺคตา. ‘‘ตํ’’ติ ฌานกิจฺจํ. เอกคฺคตา พลวตี น โหตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘มคฺคินฺทฺริย พลภาวายา’’ติ มคฺคินฺทฺริย พลภาวตฺถาย. โลกุตฺตรวิปากานิ ชวนกิจฺจานิ จ สาธิปติกานิ จ โหนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ติภูมกานี’’ติอาทิ. เสสเมตฺถ สุโพธํ. 'दुर्बलकृत्यस्थानवस्तुकत्वात्' म्हणजे दुर्बल कृत्य असल्यामुळे, दुर्बल स्थान असल्यामुळे आणि दुर्बल वस्तू (आश्रय) असल्यामुळे. 'केवळ अभिपात (स्पर्श) मात्र असतात' म्हणजे केवळ दर्शन, श्रवण इत्यादी मात्र असतात, असा अभिप्राय आहे. 'वितर्क पश्चिमतम ध्यान' म्हणजे ध्याने ही वितर्काच्या पाठीमागे जाणारी असतात, असा अर्थ आहे. 'तेथे' म्हणजे त्या पंचविज्ञानांमध्ये. 'त्या' म्हणजे वेदना आणि एकाग्रता. 'ते' म्हणजे ध्यानकृत्य. एकाग्रता बलवान नसते, असा संबंध आहे. 'मार्गेन्द्रियांच्या बलभावासाठी' म्हणजे मार्गेन्द्रियांच्या बलशाली अवस्थेसाठी. लोकोत्तर विपाक आणि जवनकृत्ये ही साधिपती (अधिपतीसह) असतात, हे 'तिभूमकानी' इत्यादीद्वारे सांगितले आहे. उर्वरित भाग येथे सुबोध (समजण्यास सोपा) आहे. มิสฺสกสงฺคหานุทีปนา นิฏฺฐิตา. मिश्रकसंग्रह अनुदीपनी समाप्त झाली. ๑๖๔. โพธิปกฺขิยสงฺคเห. ‘‘สติปฏฺฐานา’’ติ เอตฺถ ปสทฺโท ปมุขตฺโถ ปธานตฺโถติ อาห ‘‘ปมุขา ปธานา หุตฺวา’’ติ. ฐาสทฺโท คตินิวตฺติ อตฺโถติ อาห ‘‘จิตฺตคมนํ นิวตฺเตตฺวา ปวตฺตนฺตี’’ติ. ‘‘กาเย อนุปสฺสนา’’ติ กาเย ปวตฺตา อนุปสฺสนา. ปุนปฺปุนํ ปสฺสนฺติ โยคิโน เอตายาติ อนุปสฺสนา. กตมํ ปสฺสนฺตีติ อาห ‘‘อสฺสาสปสฺสาสาทิกสฺสา’’ติอาทึ. กถญฺจตํ ปสฺสนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ตํ ตํ กายภาเวนา’’ติอาทิ. อิทานิ ปุนปฺปุน สทฺทสฺส อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยาวา’’ติอาทิมาห. เวทนานุ ปสฺสนาทีสุปิ เอเสวนโย. ตํ น สุนฺทรํ. กสฺมา, สกลสฺส รูปกายสฺส อธิปฺเปตตฺตา. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ยทิ เอวนฺติอาทีสุ. ‘‘อิตราปิ สิทฺธา’’ติ กายานุปสฺสนาทโยปิ สิทฺธา. กสฺมา, ธมฺมานุปสฺสนาย อนฺโตคธตฺตา. ‘‘ตถา อนุปสฺสนฺตสฺสา’’ติ รูปฺปนลกฺขณโต อนุปสฺสนฺตสฺส. ‘‘ตํ ตํ สมูหภูตรูปธมฺมวเสนา’’ติ อสฺสาสปสฺสาสาทิ สมูหภูตสฺส รูป ธมฺมสฺส วเสน. ‘‘สุภาทิวิปลฺลาสสฺสา’’ติ สุภ สุข นิจฺจวิปลฺลาสสฺส. ‘‘โอฬาริกสฺสา’’ติ สุปากฏวเสน โอฬาริกสฺส. ‘‘อตฺตูปนิพนฺธา’’ติ อตฺเตน อุปนิพนฺธา, ปฏิพทฺธา. १६४. बोधिपक्खियसंग्रहामध्ये: 'सतिपट्ठान' (स्मृतिप्रस्थान) येथे 'प्र' हा शब्द प्रमुख किंवा प्रधान अर्थाचा आहे, म्हणून 'प्रमुख आणि प्रधान होऊन' असे म्हटले आहे. 'ठा' हा शब्द गती थांबवण्याच्या अर्थाचा आहे, म्हणून 'चित्ताचे जाणे थांबवून प्रवृत्त होतात' असे म्हटले आहे. 'कायात अनुपश्यना' म्हणजे कायामध्ये प्रवृत्त झालेली अनुपश्यना (वारंवार पाहणे). योगी ज्याच्याद्वारे वारंवार पाहतात ती 'अनुपश्यना' होय. काय पाहतात? म्हणून 'श्वास-प्रश्वास इत्यादींचे' असे म्हटले आहे. आणि ते कसे पाहतात? म्हणून 'त्या त्या कायभावाने' इत्यादी म्हटले आहे. आता 'पुन्हा पुन्हा' या शब्दाचा अर्थ दाखवताना 'यावत' इत्यादी म्हटले आहे. वेदनानुपश्यना इत्यादींमध्येही हाच नियम आहे. ते योग्य नाही. का? कारण संपूर्ण रूपकायाचा येथे अभिप्रेत अर्थ आहे. उर्वरित भाग येथे सहज समजण्यासारखा आहे. 'जर असे असेल तर' इत्यादींमध्ये. 'इतरही सिद्ध होतात' म्हणजे कायानुपश्यना इत्यादी देखील सिद्ध होतात. का? कारण त्यांचा धर्मानुपश्यनेमध्ये अंतर्भाव होतो. 'तसे पाहणाऱ्याचे' म्हणजे रूपण-लक्षणाने पाहणाऱ्याचे. 'त्या त्या समूहरूप रूपधर्माच्या वशाने' म्हणजे श्वास-प्रश्वास इत्यादी समूहरूप झालेल्या रूपधर्माच्या प्रभावाने. 'शुभादी विपर्यासाच्या' म्हणजे शुभ, सुख, नित्य अशा विपर्यासाच्या (भ्रमाच्या). 'औदारिकाच्या' म्हणजे स्पष्टपणे प्रकट असल्यामुळे स्थूल (औदारिक) असलेल्याच्या. 'आत्म्याशी बद्ध' म्हणजे आत्म्याशी बांधलेले, बद्ध असलेले. ‘‘กามํ’’ติ เอกนฺเตน. อุปสุสฺสตูติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยนฺตํ’’ติ ฌานาภิญฺญา มคฺคผลนิพฺพานํ. ‘‘วีริยสฺส สณฺฐานํ’’ติ วีริยคมนสฺส วีริยปฺปวตฺตนสฺส นิวตฺติวเสน สณฺฐานํ. อุปฺปนฺนสทฺเทน อตีต กิเลสาปิ [Pg.240] ปจฺจุปฺปนฺน กิเลสาปิ คเหตพฺพา โหนฺตีติ อาห ‘‘อสุกสฺมึ กาเล’’ติอาทึ. ‘‘มยฺหํ อุปฺปนฺนํ’’ติ อิทานิ อุปฺปนฺนํ. ‘‘ปหานายา’’ติ เอตฺถ สมุจฺเฉทปฺปหานํ อธิปฺเปตนฺติ อาห ‘‘อนุปฺปาท ธมฺมตาปาทนกรณตฺถํ’’ติ. ตตฺถ อนุปฺปาโท ธมฺโม เยสํ เต อนุปฺปาท ธมฺมา. มคฺเคน ปหีนา อกุสล ธมฺมา. อนุปฺปาท ธมฺมานํ ภาโวติ วิคฺคโห. อนุปฺปาท ธมฺมตาย อาปาทนํ. ตสฺส กรณนฺติ สมาโส. ‘‘ทิสฺวา’’ติ เตสํ อุปฺปตฺติ วตฺถุํ ทิสฺวา. ‘‘ปจฺจยสมุจฺฉินฺทนตฺถํ’’ติ ปจฺจยภูตสฺส อนุสยสฺส สมุจฺฉินฺทนตฺถํ. ‘‘อปตฺตา’’ติ อิทานิ อปตฺตา. ‘‘สมเย’’ติ พุทฺธุปฺปาทนวมกฺขเณ. ‘‘นิยามํ น โอกฺกมนฺตี’’ติ อริยมคฺคสงฺขาตํ สมฺมตฺตนิยามํ น โอกฺกมนฺติ. นปฺปวิสนฺติ. กิเลเสหิ อโกเปตพฺพตาย อกุปฺโป ธมฺโม ยสฺสาติ อกุปฺป ธมฺโม. ขีณาสโว. อกุปฺป ธมฺมสฺส ภาโว อกุปฺป ธมฺมตา. อรหตฺต ผลํ. ‘‘เตสํ’’ติ กุสลานํ ธมฺมานํ. อุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ ปหานายาติ กตฺวา วิสุทฺธิธมฺเมสุ โยคํ กโรนฺตสฺส อนุกฺกเมน ภาวนา กมฺเม มตฺถกํ ปตฺเตอาทิโต ปฏฺฐาย อุปฺปนฺนาปิ ปาปกา ปหิยฺยนฺติ. อนุปฺปนฺนาปิ นุปฺปชฺชนฺติ. อนุปฺปนฺนาปิ กุสลา อุปฺปชฺชนฺติ. อุปฺปนฺนาปิ ภาวนา ปาริปูรึ คจฺฉนฺติ. เอสนโย อนุปฺปนฺนานํ ปาปกานํ อนุปฺปาทายาติอาทีสุ. เอวํ จตูสุ มุเขสุ เอเกกมุเขนปิ สมฺมา ปทหนฺตสฺส สมฺมปฺปธานํ จตุกิจฺจสาธกํ โหติ. เตนาห ‘‘เอเตสุ ปนา’’ติอาทึ. 'कामं' म्हणजे एकांताने (निश्चितपणे). 'सुकून जावो' असा संबंध आहे. 'यंतं' म्हणजे ध्यान, अभिज्ञा, मार्ग, फल आणि निर्वाण. 'वीर्याचे संष्ठान' म्हणजे वीर्याच्या गतीचे किंवा वीर्य प्रवृत्त करण्याचे थांबवण्याच्या रूपाने संष्ठान (थांबणे). 'उत्पन्न' या शब्दाने भूतकाळातील क्लेश आणि वर्तमानकाळातील क्लेश दोन्ही ग्रहण केले पाहिजेत, म्हणून 'अमुक काळात' इत्यादी म्हटले आहे. 'माझ्यामध्ये उत्पन्न झाले' म्हणजे आता उत्पन्न झाले. 'प्रहाणासाठी' येथे समुच्छेदप्रहाण अभिप्रेत आहे, म्हणून 'अनुत्पाद धर्मता प्राप्त करून देण्यासाठी' असे म्हटले आहे. तेथे ज्यांचे अनुत्पाद धर्म आहेत ते 'अनुत्पाद धर्मी' होत. मार्गाने प्रहीन झालेले अकुशल धर्म. अनुत्पाद धर्मांचा भाव म्हणजे अनुत्पाद धर्मता. अनुत्पाद धर्मतेची प्राप्ती करून देणे. त्याचे करणे असा समास आहे. 'पाहून' म्हणजे त्यांच्या उत्पत्तीचे कारण पाहून. 'प्रत्यय समूच्छेदासाठी' म्हणजे प्रत्ययरूप असलेल्या अनुशयाचा समूच्छेद (पूर्ण नाश) करण्यासाठी. 'अप्राप्त' म्हणजे आता अप्राप्त. 'समयात' म्हणजे बुद्धोत्पाद आणि नव क्षणांमध्ये. 'नियामामध्ये प्रवेश करत नाहीत' म्हणजे आर्यमार्गाने युक्त अशा सम्यक्त्व-नियामामध्ये प्रवेश करत नाहीत. प्रवेश करत नाहीत. क्लेशांद्वारे क्षोभित न करता येण्याजोगे असल्यामुळे ज्याचा धर्म अकुप्प (अक्षोभ्य) आहे तो 'अकुप्पधर्मी' होय, म्हणजेच क्षीणासव. अकुप्पधर्मीचा भाव म्हणजे 'अकुप्पधर्मता', म्हणजेच अर्हत्वफल. 'त्यांच्या' म्हणजे कुशल धर्मांच्या. उत्पन्न झालेल्या पापधर्मांच्या प्रहाणासाठी विशुद्ध धर्मांमध्ये योग (प्रयत्न) करणाऱ्याच्या, अनुक्रमाने भावना कर्माच्या शिखरावर पोहोचल्यावर, सुरुवातीपासून उत्पन्न झालेले पापधर्म देखील नष्ट होतात. अनुत्पन्न देखील उत्पन्न होत नाहीत. अनुत्पन्न कुशल धर्म देखील उत्पन्न होतात. उत्पन्न झालेले देखील भावनेच्या परिपूर्तीला जातात. हाच नियम 'अनुत्पन्न पापधर्मांच्या अनुत्पादासाठी' इत्यादींमध्ये आहे. अशा प्रकारे चार मार्गांपैकी एका एका मार्गाने देखील सम्यक प्रयत्न करणाऱ्याचे 'सम्मदप्रधान' (सम्यक प्रधान) हे चारही कार्ये साध्य करणारे ठरते. म्हणूनच 'परंतु यांमध्ये' इत्यादी म्हटले आहे. อภิวิสิฏฺเฐน ธมฺมววตฺถานญฺญาเณน ญาตพฺพา สพฺเพ ปรมตฺถ ธมฺมา อภิญฺเญยฺยา นาม. ‘‘อภิญฺญา สิทฺธี’’ติ อภิชานน กิจฺจสิทฺธิ. วิสุํ วิสุํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา ญาตพฺพา จตุสจฺจ ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา นาม. เตหิ ทุกฺขสจฺจ ธมฺมา ปริญฺญาตพฺพภาเวน, สมุทย สจฺจ ธมฺมา ปหาตพฺพ ภาเวน, นิโรธสจฺจ ธมฺมา สจฺฉิกาตพฺพ ภาเวน, มคฺคสจฺจ ธมฺมา ภาเวตพฺพภาเวน ญาตพฺพา โหนฺตีติ. ‘‘ภาวนาสิทฺธี’’ติ ภาวนากิจฺจ สิทฺธิ. ตํ สํยุตฺตเก อิมายปาฬิยา สเมตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วิภงฺเค ปนา’’ติ อิทฺธิปาทวิภงฺเค ปน. ‘‘จิตฺต เจตสิกราสี’’ติ สห ปุพฺพภาคภาวนาย อุตฺตริ มนุสฺส ธมฺมปริยา ปนฺนา [Pg.241] จิตฺตเจตสิกราสิ. ‘‘ตตฺถ ปนา’’ติ วิภงฺเค ตสฺมึ อุตฺตรจูฬภาชนีเย ปน. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึ สงฺคเห. अतिविशिष्ट अशा धर्म-व्यवस्थान-ज्ञानाने (धर्मांच्या निश्चितीच्या ज्ञानाने) जाणण्यायोग्य असलेले सर्व परमार्थ धर्म हे 'अभिज्ञेय' (अभिञ्ञेय्य) नावाचे आहेत. "अभिज्ञा सिद्धी" म्हणजे अभिज्ञान कार्याची सिद्धी (पूर्णता). वेगवेगळ्या प्रकारे परिच्छिन्न करून (विभागून) जाणण्यायोग्य असलेले चार आर्यसत्य धर्म हे 'परिज्ञेय' (परिञ्ञेय्य) नावाचे आहेत. त्यापैकी, दुःखसत्य धर्म हे 'परिज्ञात' करण्याच्या भावाने (जाणून घेण्याच्या स्वरूपात), समुदायसत्य धर्म हे 'प्रहातव्य' भावाने (त्याग करण्याच्या स्वरूपात), निरोधसत्य धर्म हे 'सच्चिकातव्य' भावाने (साक्षात्कार करण्याच्या स्वरूपात) आणि मार्गसत्य धर्म हे 'भावितव्य' भावाने (भावना/अभ्यास करण्याच्या स्वरूपात) जाणले पाहिजेत. "भावनासिद्धी" म्हणजे भावना-कार्याची सिद्धी. त्याचा संबंध संयुत्तनिकायातील या पाळीशी (वचनाशी) जुळतो असा संबंध आहे. "विभंगात तर" म्हणजे इद्धिपादविभंगात (ऋद्धिपादविभंगात) तर. "चित्त-चेतसिक राशी" म्हणजे पूर्वभाग-भावनेसह उत्तर-मनुष्यधर्मात (उत्तरीमनुस्सधम्म) समाविष्ट असलेली चित्त आणि चेतसिकांची राशी. "तेथे तर" म्हणजे त्या विभंगातील उत्तरचूळभाजनियात तर. "येथे" म्हणजे या संग्रहात. จตฺตาริ โสตาปตฺติยงฺคานิ นาม พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต. ธมฺเม, สงฺเฆ, อริยกนฺเตหิ สีเลหิ สมนฺนาคโตติ เอวํ วุตฺตานิ โสตาปตฺติยา องฺคานิ. ตตฺถ ‘‘อริยกนฺเตหี’’ติ อริยชเนหิ กามิเตหิ อิจฺฉิเตหิ. ‘‘สีเลหี’’ติ ปญฺจนิจฺจสีเลหิ, อาชีวฏฺฐมกสีเลหิ วา. ‘‘สมฺมปฺปธาเนสู’’ติ สมฺมปฺปธานกิจฺเจสุ. 'चार स्रोतापत्तीची अंगे' म्हणजे बुद्धांच्या ठिकाणी अचल श्रद्धेने (अवेच्चप्पसादेन) युक्त असणे. धम्माच्या ठिकाणी, संघाच्या ठिकाणी आणि आर्यजनांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त असणे, अशी ही स्रोतापत्तीची अंगे सांगितली आहेत. तेथे "आर्यकान्त" म्हणजे आर्यजनांना प्रिय असलेल्या, इच्छिलेल्या. "शीलांनी" म्हणजे पंचनित्यशीलांनी किंवा आजीवअष्टमकशीलांनी (आजीव अष्टम शीलांनी) युक्त असणे. "सम्यक्प्रधानांमध्ये" म्हणजे सम्यक्प्रधानाच्या कार्यांमध्ये. ‘‘โสฬสหิกิจฺเจหี’’ติ เอเกกสฺมึ สจฺเจ จตฺตาริ จตฺตาริ กตฺวา โสฬสหิ กิจฺเจหิ. ปีฬนฏฺโฐ, สงฺขตฏฺโฐ, ติอาทีหิ โสฬสหิ อตฺเถหีติ วุตฺตํ โหติ. เต จ อตฺถา ปรโต อาคมิสฺสนฺติ. สติ เอว สมฺโพชฺฌงฺโคติ วุตฺตํ, กถํ ปน สาสติ สมฺโพธึ สมุฏฺฐาเปตีติ อาห ‘‘สาหี’’ติอาทึ. เอสนโย เสสโพชฺฌงฺเคสุปิ. ‘‘เตสุ ธมฺเมสู’’ติ อชฺฌตฺตพหิทฺธา ธมฺเมสุ. ‘‘ลีนสงฺโกจ โกสชฺชปกฺขํ’’ติ ลีนปกฺข สงฺโกจ ปกฺขโกสชฺช ปกฺขํ. ธุรํ สุฏฺฐุ ปคฺคณฺหาติ อุกฺขิปตีติ ธุรสมฺปคฺคโห. ‘‘ธุรํ’’ติ สมถธุรํ วิปสฺสนา ธุรญฺจ. ‘‘อรติ อุกฺกณฺฐ ปกฺขํ’’ติ อรติปกฺข นิพฺพิทาปกฺขํ. ธมฺเม รติ ธมฺมรติ. ธมฺเม นนฺที ธมฺมนนฺที. ธมฺเม อาราโม ธมฺมาราโม. ‘‘สารมฺโภ’’ นาม จิตฺตวิเหสา. ‘‘ทรโถ’’ นาม จิตฺตสนฺตาโป. สมาหิโต ภิกฺขเว ยถาภูตํ ปชานาติ ปสฺสตีติ วจนโต ปญฺญาย สมาธิ ปาทกตา ปากฏาติ วุตฺตํ ‘‘ตสฺสา’’ติอาทึ. สมํ อวิสมํ อตฺตโน กิจฺจํ วหติ สีเลนาติ สมวาหี. สมวาหิสฺส ภาโว สมวาหิตา. "सोळा कृत्यांनी" म्हणजे प्रत्येक सत्यामध्ये चार-चार करून सोळा कृत्यांनी. पीडनार्थ (पीडा देण्याचा अर्थ), संस्कृतार्थ (संस्कृत असण्याचा अर्थ) इत्यादी सोळा अर्थांनी असे म्हटले आहे. आणि ते अर्थ पुढे येतील. 'स्मृती हाच संबोध्यंग आहे' असे म्हटले आहे, पण ती स्मृती संबोधीला कशी उत्पन्न करते? म्हणून "तीच" इत्यादी म्हटले आहे. हाच नियम उर्वरित बोध्यंगांनाही लागू होतो. "त्या धर्मांमध्ये" म्हणजे आध्यात्मिक (अंतर्गत) आणि बाह्य धर्मांमध्ये. "लीन-संकोच-कौशीद्य पक्ष" म्हणजे लीन पक्ष (मनाची सुस्ती), संकोच पक्ष आणि कौशीद्य पक्ष (आळस). धुरा (जबाबदारी) चांगल्या प्रकारे ग्रहण करतो, उचलतो म्हणून तो 'धुरसंप्रग्रह' होय. "धुरा" म्हणजे शमथधुरा आणि विपश्यनाधुरा. "अरती-उत्कण्ठा पक्ष" म्हणजे अरती पक्ष (अरुची) आणि निर्वेद पक्ष (उदासीनता). धर्मामध्ये रती (प्रीती) म्हणजे 'धम्मरती'. धर्मामध्ये नंदी (आनंद) म्हणजे 'धम्मनंदी'. धर्मामध्ये आराम (रमण करणे) म्हणजे 'धम्माराम'. "सारंभ" म्हणजे चित्ताची विहेसा (पीडा/क्लेश). "दरथ" म्हणजे चित्ताचा संताप (दाह). "हे भिक्खूहो, समाहित (एकाग्र) झालेला पुरुष यथाभूत जाणतो आणि पाहतो" या वचनावरून प्रज्ञेसाठी समाधीचे आधारभूत असणे स्पष्ट होते, म्हणून "तिची" इत्यादी म्हटले आहे. जो आपल्या शीलाने आपले कृत्य सम आणि अविषम (समान व निष्पक्ष) पद्धतीने वहन करतो, तो 'समवाही' होय. समवाहीचा भाव म्हणजे 'समवाहिता'. สา ปน จตุพฺพิธา โหตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตสฺสา’’ติ สมฺมาทิฏฺฐิยา. ‘‘วิสาขา’’ติ อาลปน ปทํ. ‘สพฺเพ โลกุตฺตเร โหนฺตี’ติ วจนสฺส สมฺพนฺธํ ทสฺเสตุํ ‘‘เต ปน สตฺตตึสปฺปเภทา’’ติอาทิมาห. น วฏฺฐานานิ อสฺส อตฺถีติ นวฏฺฐานิกํ. ‘‘โลกุตฺตเร’’ติ โลกุตฺตร จิตฺเต. ‘‘อตฺตปฺปฏิปกฺขานํ’’ติ อตฺตนา อุชุปฺปฏิปกฺขานํ. ‘‘เต’’ติ โพธิปกฺขิย ธมฺมา. เอเตน ทสฺเสตีติ [Pg.242] สมฺพนฺโธ. ‘‘กุณฺฑลิยา’’ติ เอวํ นามกํ พฺราหฺมณํ อาลปติ. ‘‘วิชฺชา’’ติ มคฺควิชฺชา. ‘‘วิมุตฺตี’’ติ ผลวิมุตฺติ. "ती तर चार प्रकारची असते" असा संबंध आहे. "तिची" म्हणजे सम्यक् दृष्टीची. "विशाखा" हे संबोधनाचे पद आहे. 'सर्व लोकोत्तर असतात' या वचनाचा संबंध दर्शवण्यासाठी "ते तर सदतीस प्रकारांचे आहेत" इत्यादी म्हटले आहे. ज्याला कोणतेही स्थान (अधिष्ठान) नाही ते 'नवट्ठानिक' (स्थानरहित). "लोकोत्तर मध्ये" म्हणजे लोकोत्तर चित्तामध्ये. "स्वतःच्या प्रतिपक्षांचे" म्हणजे स्वतःच्या सरळ विरोधकांचे. "ते" म्हणजे बोधिपाक्षिक धर्म. याद्वारे दर्शवतो असा संबंध आहे. "कुंडलिय" या नावाच्या ब्राह्मणाला संबोधित करतो. "विद्या" म्हणजे मार्गविद्या. "विमुक्ती" म्हणजे फलविमुक्ती. โพธิปกฺขิยานุทีปนา นิฏฺฐิตา. बोधिपक्खिय-अनुदीपनी समाप्त झाली. ๑๖๕. สพฺพสงฺคเห. ‘‘ปญฺจราสโย’’ติ ปญฺจสงฺคหา. ‘‘อตีตาทิเภทภินฺนานํ’’ติ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนเภเทน, อชฺฌตฺต พหิทฺธาเภเทน, โอฬาริกสุขุมเภเทน, หีนปณีตเภเทน, ทูรสนฺติกเภเทน จ ภินฺนานํ. ‘‘อุปปตฺติ ทฺวาเรสู’’ติ จกฺขาทิ ทฺวาเรสุ. ‘‘กมฺมทฺวาเรสู’’ติ กายกมฺมทฺวาราทีสุ. ‘‘สงฺคมฺมา’’ติ สงฺคนฺตฺวา. ‘‘สมาคมฺมา’’ติ สมาคนฺตฺวา. ‘‘สาธารณ กิจฺจานิ วา’’ติ สพฺพิริยาปเถหิ สาธารณ กิจฺจานิวา. ปาฬิปาเฐ. ‘‘กิญฺจา’’ติ กสฺมา จ. ‘‘สงฺขาเรวเทถา’’ติ สงฺขารา สงฺขารา อิติ ตุมฺเห วเทถ. ‘‘กิญฺจสงฺขตํ’’ติ กตมญฺจสงฺขตํ. ‘‘รูปํ รูปตฺถายา’’ติ รูปวิกติยา ชาตตฺถาย รูปสงฺขาตํ สงฺขตํ อภิสงฺขโรนฺตีติ อตฺโถ. อุปโภโค นาม วตฺถาภรณาทิโก อนฺโตโภโค. ปริโภโค นาม มญฺจปีฐาทิโก พาหิร ปริโภโค. สมฺปรายิกญฺจ เวทนนฺติ อธิกาโร. เสเสสุปิ สญฺญาสงฺขาร วิญฺญาเณสุปิ. ‘‘ทานํ ทานตฺถายา’’ติ ทานปุญฺญสฺส ชาตตฺถาย. ทานสงฺขาตํ สงฺขตํ อภิสงฺขโรนฺตีติ อตฺโถ. อถวา ทานสฺส อตฺโถ ทานตฺโถ. ‘‘อตฺโถ’’ติ จ วิปากตฺโถ ผลตฺโถ. ทานวิปากตฺถาย ทานผลตฺถาย ทานปุญฺญสงฺขาตํ สงฺขตํ อภิสงฺขโรนฺตีติ อตฺโถ. เอวํ เสเสสุปิ. ‘‘อนุยุญฺชนฺตา’’ติ วิปสฺสนา กมฺมํ อนุยุญฺชนฺตา. ‘‘ตีสุ ธมฺเมสุ กิลมิสฺสนฺตี’’ติ วุตฺตํ. กถํ กิลมิสฺสนฺตีติ อาห ‘‘ตถาหิ ยถา’’ติอาทึ. ‘‘สุขสญฺญิเตสุ ปฏิสรเณสู’’ติ จิตฺตสาตจิตฺตรติ ปฏิลาภตฺถาย ปฏิสรเณสุ อารมฺมเณสุ. ‘‘ตาหี’’ติ สมฺปตฺตีหิ. ‘‘ตา’’ติ สมฺปตฺติโย. ปรมุกฺกํสคตํ สุขสญฺญิตฏฺฐานํ โหติ. ตสฺมา ตตฺถ ทุกฺขานุปสฺสนาญาณํ อติเรกตรํ ปวตฺเตตพฺพนฺติ ตทตฺถาย ภควา ตํ เวทนํ วิสุํ เอกํ ขนฺธํ กตฺวา ขนฺธ [Pg.243] เทสนํ เทเสตีติ อธิปฺปาโย. เอสนโย ปรตฺถปิ. ‘‘ญาณสมฺมตํ’’ติ ปุถุชฺชเนหิ ญาณสมฺมตํ. ‘‘ปรมํ อตฺตานํ กตฺวา’’ติ โลเก วิญฺญุตฺตํ ปรมํ โหติ, ตสฺมา วิชานนํ ปรมํ อตฺตานํ กตฺวา. เสสเมตฺถ สุปากฏํ. ‘‘ยตฺถภุญฺชตี’’ติอาทีสุ. ‘‘ยตฺถ ภุญฺชตี’’ติ ยสฺมึ ภาชเน ภุญฺชติ. ‘‘ยญฺจ ภุญฺชตี’’ติ ยญฺจ โภชนํ ภุญฺชติ. ‘‘เยน จ ภุญฺชตี’’ติ เยนพฺยญฺชเนน ภุญฺชติ. ‘‘โย จ โภชโก’’ติ สมีเป ฐตฺวา ปริเวสโก. ‘‘โย จ ภุญฺชิตา’’ติ โย จ ภุญฺชโก. १६५. सर्वसंग्रहात. "पाच राशी" म्हणजे पाच संग्रह. "अतीतादी भेदांनी भिन्न असलेल्यांचे" म्हणजे भूत, भविष्य आणि वर्तमान या भेदाने; आध्यात्मिक आणि बाह्य या भेदाने; स्थूल आणि सूक्ष्म या भेदाने; हीन आणि प्रणीत या भेदाने; आणि दूर व जवळ या भेदाने भिन्न असलेल्यांचे. "उत्पत्तीच्या द्वारांमध्ये" म्हणजे चक्षू (डोळे) इत्यादी द्वारांमध्ये. "कर्मद्वारांमध्ये" म्हणजे कायकर्मद्वार इत्यादींमध्ये. "संगम्मा" म्हणजे एकत्र येऊन. "समागम्मा" म्हणजे एकत्र येऊन (मिळून). "किंवा साधारण कृत्ये" म्हणजे सर्व इरियापथांशी (हालचालींशी) संबंधित साधारण कृत्ये. पाळीपाठात. "किंच" म्हणजे आणि कशामुळे. "संस्कार असे म्हणावे" म्हणजे 'हे संस्कार आहेत, संस्कार आहेत' असे तुम्ही म्हणता. "संस्कृत काय आहे?" म्हणजे कोणते संस्कृत आहे? "रूप हे रूपाच्या अर्थासाठी" म्हणजे रूपाच्या विकृतीच्या उत्पत्तीसाठी रूप संज्ञक संस्कृतचा अभिसंस्कार करतात, असा अर्थ आहे. उपभोग म्हणजे वस्त्र, आभूषण इत्यादी अंतर्गत उपभोग. परिभोग म्हणजे मंच (खाट), पीठ (आसन) इत्यादी बाह्य परिभोग. आणि सांपरायिक (परलोकातील) वेदना हा अधिकार (विषय) आहे. उर्वरित संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञानामध्येही (हाच नियम लागू होतो). "दान हे दानाच्या अर्थासाठी" म्हणजे दानपुण्याच्या उत्पत्तीसाठी. दान संज्ञक संस्कृतचा अभिसंस्कार करतात, असा अर्थ आहे. अथवा दानाचा अर्थ म्हणजे दानार्थ. आणि "अर्थ" म्हणजे विपाकार्थ (विपाकाचा अर्थ) किंवा फलार्थ (फलाचा अर्थ). दानाच्या विपाकासाठी, दानाच्या फलासाठी दानपुण्य संज्ञक संस्कृतचा अभिसंस्कार करतात, असा अर्थ आहे. याचप्रमाणे उर्वरितांमध्येही. "अनुयुक्त असणारे" म्हणजे विपश्यना कर्मामध्ये अनुयुक्त असणारे (अभ्यास करणारे). "तीन धर्मांमध्ये क्लेश पावतील" असे म्हटले आहे. ते कसे क्लेश पावतील? म्हणून "तथापि जसे" इत्यादी म्हटले आहे. "सुखसंज्ञक प्रतिशरणांमध्ये" म्हणजे चित्ताचा आनंद आणि चित्ताची रती प्राप्त करण्यासाठी प्रतिशरण असलेल्या आलंबनांमध्ये (आरम्मणांमध्ये). "त्यांच्याद्वारे" म्हणजे संपत्तींद्वारे. "त्या" म्हणजे संपत्ती. ते परम उत्कर्षाला पोहोचलेले सुखसंज्ञक स्थान असते. म्हणून तेथे दुःखानुपश्यना ज्ञान अधिक प्रमाणात प्रवृत्त केले पाहिजे, या हेतूने भगवंतांनी त्या वेदनेला स्वतंत्रपणे एक स्कंध करून स्कंध देशना दिली आहे, असा अभिप्राय आहे. हाच नियम इतरत्रही लागू होतो. "ज्ञानसंमत" म्हणजे पृथग्जनांद्वारे ज्ञान मानले गेलेले. "परम आत्मा करून" म्हणजे लोकात विज्ञानाला (जाणण्याला) परम मानले जाते, म्हणून विज्ञानाला परम आत्मा मानून. येथील उर्वरित भाग अगदी स्पष्ट आहे. "जिथे जेवतो" इत्यादींमध्ये. "जिथे जेवतो" म्हणजे ज्या पात्रात जेवतो. "आणि जे जेवतो" म्हणजे जे भोजन जेवतो. "आणि ज्याने जेवतो" म्हणजे ज्या व्यंजनाने (भाजी इत्यादीने) जेवतो. "आणि जो भोजन देणारा" म्हणजे जवळ उभा राहून वाढणारा. "आणि जो जेवणारा" म्हणजे जो भोजन करणारा. ‘‘สาสวา เอวา’’ติ สาสวา นาม โลกิย ธมฺมา. ‘‘อุสฺสาหนฺตา วิย โหนฺตี’’ติ อพฺยาปาร ธมฺมตฺตา วุตฺตํ. น หิ อพฺยาปาร ธมฺมานํ เอกนฺเตน อุสฺสาโห นาม อตฺถิ. ผลสฺส นิพฺพตฺตนโต ผลตฺถาย อุสฺสาหนฺตา วิย โหนฺตีติ. ‘‘อากิริตฺวา’’ติ ปตฺถริตฺวา. เสสเมตฺถ สุโพธํ. “सासवा एवा” (सास्रवच) म्हणजे 'सास्रव' नावाचे लौकिक धर्म होत. “उस्साहन्ता विय होन्ती” (जणू काही उत्साह दाखवत आहेत) असे अक्रिय (अब्यापार) धर्म असल्यामुळे म्हटले आहे. कारण अक्रिय धर्मांमध्ये निश्चितपणे उत्साह नावाचा प्रकार नसतो. फळाच्या उत्पत्तीमुळे फळाच्या प्राप्तीसाठी ते जणू काही प्रयत्नशील (उत्साही) असल्यासारखे असतात. “आकिरित्वा” म्हणजे पसरवून. उर्वरित भाग येथे सुबोध (समजण्यास सोपा) आहे. ธาตุสงฺคเห. ‘‘อตฺตโน เอว สภาวํ’’ติ อตฺตโน สภาวํ เอวาติปิ ยุชฺชติ. ‘‘อีหา จ พฺยาปาโร จา’’ติ อภิกฺกมามิ ปฏิกฺกมามีติอาทินา อุสฺสาโห จ, อภิกฺกมนาทิ พฺยาปาโร จ. ‘‘น จ ชีวโยคา’’ติ น จ โลกิยมหาชน สมฺมเตน ชีเวน ยุตฺตา. อฏฺฐกถาปาเฐ. ยายติ เอตฺถาติ ยนฺตํ. อุทุกฺขลํ. ยนฺต จกฺกยฏฺฐินาม ยนฺต จกฺกสมฺพนฺธา มุสลยฏฺฐิ. อรณี วุจฺจติ อคฺคินิพฺพตฺตกตฺถาย กตา ทฺเว สารฆฏิกา. อธรารณี นาม เหฏฺฐารณี. อุตฺตรารณี นาม อุทฺธารณี. ‘‘สลฺลมิวา’’ติ กณฺโฑวิย. ‘‘สูลมิวา’’ติ วิชฺฌนกทณฺโฑ วิย. ‘‘อาตุราวิยา’’ติ เตหิสลฺลสูเลหิ วิทฺธคิลานา วิย. อยถาภุจฺจ นิมิตฺตํ นาม อยถาภูตํ สตฺตปุคฺคลาทินิมิตฺตํ. ‘‘วนมิโค วิยา’’ติ ติณ รูเป ปุริส สญฺญาลาโภ วนมิโค วิย. ‘‘องฺคารกาสุยํ’’ติ องฺคารกูเป. ‘‘นานาวิธุปทฺทว นิมิตฺตโต’’ติ นานาวิธานํ อุปทฺทวานํ อุปฺปตฺติ ปจฺจยโต. ‘‘วนมกฺกโฏ วิยา’’ติ วนวานโร วิย. ทุกฺเขน ทมนํ อสฺสาติ ทุทฺทมโน. ‘‘อสฺสขฬุงฺโก’’ติ ทุฏฺฐ อสฺโส. ‘‘ยตฺถ กามนิปาติโต’’ติ ยสฺมึ ยสฺมึ อารมฺมเณ ปติตุํ กาเมติ อิจฺฉติ, ตตฺถ ตตฺถ นิปาติโต. ปุคฺคลวเส [Pg.244] อวตฺติตฺวา อารมฺมเณสุ ยทิจฺฉกํ นิปตนโตติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘รงฺคนโฏ วิยา’’ติ สมชฺชนฏโก วิย. สภาวโต อตฺถิ สํวิชฺชตีติ สนฺโต. ตโถติ จ อวิตโถติ จ อตฺถโต เอกํ. อญฺโญ ปกาโร อญฺญถา. นตฺถิ อญฺญถา อสฺสาติ อนญฺญถํ. ทุกฺขทุกฺขํ นาม กายิกทุกฺข เจตสิกทุกฺขํ. ‘‘กมฺมชานํ’’ติ วิปากกฺขนฺธกฏตฺตา รูปานํ. ‘‘อุปฺปตฺติยา’’ติ อุปฺปาทตฺถาย. ‘‘ปเควา’’ติ ปุเรตรเมว. ‘‘อุปฺปนฺนํ ปี’’ติ อุปฺปนฺนมฺปิ จกฺขุ. ‘‘ปวตฺติยา’’ติ สนฺตานฏฺฐิติยา ฐิตตฺถาย. ‘‘ปฏิชคฺคน ทุกฺขํ’’ติ โสธน ทุกฺขํ. ปจฺจยเวกลฺลํ นาม อาหารจฺเฉทาทิกํ. นนุ ภิชฺชนภเยน ปเคว ปจฺจยสมฺปาทนํ นาม สงฺขาร ทุกฺขเมว สิยาติ. สจฺจํ. อิธ ปน อาสนฺเน ภิชฺชนนิมิตฺตํ ทิสฺวา กตํ ปจฺจย สมฺปาทนํ อธิปฺเปตํ. ‘‘รกฺขาวรณคุตฺติ สํวิธาน ทุกฺขํ’’ติ นานาภยโต รกฺขณสฺส จ อาวรณสฺส จ โคปนสฺส จ สํวิธาน ทุกฺขํ. ‘‘ตทุภเยน สเหว สิชฺฌตี’’ติ กสิโครกฺขาทีนิ สงฺขาร กมฺมานิ วา รกฺขาวรณ คุตฺติสํ วิธานาทีนิวา กโรนฺตานํ ตํ ทุกฺข ทุกฺขํ ตทุภเยน ทุกฺเขน สเหว สิชฺฌติ. ‘‘เตสํ’’ติ จกฺขาทีนิ อสฺสาเทนฺตานํ น มุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปวตฺติ นิโรธ ภูตสฺสา’’ติ ปวตฺติยา นิโรธ ภูตสฺส. ‘‘ตํ ปชหติ เยวา’’ติ ตํ โลภํ ปชหติเยว. ‘‘ยาวเทวา’’ติ อุปริมปริยนฺเตน. อหํ อสฺมีติ ปวตฺโต มาโน อสฺมิมาโน. ตสฺส สมุคฺฆาตนํ สมุจฺฉินฺทนํ. ‘‘ปริญฺญาเตสู’’ติ เตสุ อนุสยิตาย ตณฺหาย ปหานวเสน ปริญฺญาเตสุ. ‘‘ตพฺพิปรีเตน ปนา’’ติ ตโต วิปรีเตน ปน. อสฺมิมานสฺส อนธิฏฺฐานภูตาติอาทิ อตฺเถน. อนินฺทฺริยพทฺธ ธมฺมา นาม ปถวีปพฺพตาทีสุ ปวตฺตา รูป ธมฺมา. धातुसंग्रहात (Dhātusaṅgaha) - “अत्तनो एव सभावं” (स्वतःचाच स्वभाव) म्हणजे स्वतःचा स्वभाव असाही अर्थ योग्य ठरतो. “ईहा च ब्यापारो चा” (चेष्टा आणि व्यापार) म्हणजे 'मी पुढे जातो, मी मागे येतो' इत्यादींद्वारे होणारा उत्साह आणि पुढे जाणे इत्यादी क्रिया (व्यापार). “न च जीवयोगा” म्हणजे लौकिक महाजनांनी (सामान्य लोकांनी) मानलेल्या जीवाशी युक्त नसलेले. अट्ठकथा पाठात - ज्याच्याद्वारे दळले किंवा कुटले जाते ते यंत्र (यन्तं) म्हणजेच उखळ (उदुक्खलं). 'यंत चक्कयट्ठि' म्हणजे यंत्राच्या चाकाशी संबंधित मुसळदांडा. 'अरणी' म्हणजे अग्नी निर्माण करण्यासाठी तयार केलेले दोन कठीण लाकडाचे तुकडे. 'अधरारणी' म्हणजे खालची अरणी. 'उत्तरारणी' म्हणजे वरची अरणी. “सल्लमिव” म्हणजे बाणाप्रमाणे. “सूलमिव” म्हणजे भोसकण्याच्या शूलाप्रमाणे (सुळाप्रमाणे). “आतुराविय” म्हणजे त्या बाण आणि शूलांनी जखमी झालेल्या आजारी माणसाप्रमाणे. 'अयथाभुच्च निमित्त' म्हणजे अयथाभूत (अवास्तव) सत्त्व-पुद्गल इत्यादींचे निमित्त. “वनमिगो विय” म्हणजे गवताच्या आकारात माणसाचा आभास झाल्यामुळे फसलेल्या रानटी हरणाप्रमाणे. “अङ्गारकासुयं” म्हणजे कोळशाच्या खड्ड्यात. “नानाविधुपद्दव निमित्ततो” म्हणजे नानाविध उपद्रवांच्या उत्पत्तीच्या कारणांमुळे. “वनमक्कटो विय” म्हणजे जंगलातील माकडाप्रमाणे. ज्याला कष्टाने ताब्यात आणले जाते तो 'दुद्दमण' (दुर्दम्य). “अस्सखळुङ्को” म्हणजे दुष्ट (अमळलेला) घोडा. “यत्थ कामनिपातितो” म्हणजे ज्या ज्या आलंबनावर पडण्याची इच्छा करतो, तिथे तिथे पडणारा. पुद्गलाच्या नियंत्रणात न राहता आलंबनांवर स्वतःच्या इच्छेनुसार पडणे, असा याचा अर्थ आहे. “रङ्गनटो विय” म्हणजे रंगमंचावरील नटाप्रमाणे. स्वभावाने जे अस्तित्वात आहे, उपलब्ध आहे, ते 'संत' (सत्). 'तथ' आणि 'अवितथ' यांचा अर्थ एकच आहे. दुसरा प्रकार म्हणजे 'अन्यथा'. ज्याला दुसरा प्रकार नाही ते 'अनन्यथा'. 'दुःखदुःख' म्हणजे कायिक दुःख आणि चैतसिक दुःख. “कम्मजानं” म्हणजे विपाकस्कंध आणि कतत्ता-रूपांचे (कर्मज रूपांचे). “उप्पत्तिया” म्हणजे उत्पत्तीसाठी. “पगेव” म्हणजे आधीच (पूर्वीच). “उप्पन्नं पि” म्हणजे उत्पन्न झालेले चक्षू देखील. “पवत्तिया” म्हणजे प्रवाहाच्या (संततीच्या) स्थितीसाठी. “पटिजग्गन दुक्खं” म्हणजे सांभाळण्याचे किंवा स्वच्छ करण्याचे दुःख. 'प्रत्ययवैकल्य' म्हणजे आहाराचा अभाव इत्यादी. शंका: नाश होण्याच्या भयाने आधीच प्रत्ययांची (साधनांची) जुळवाजुळव करणे हे 'संस्कार दुःख'च होईल ना? उत्तर: सत्य आहे. परंतु येथे जवळच नाश होण्याचे लक्षण पाहून केलेली प्रत्ययांची जुळवाजुळव अभिप्रेत आहे. “रक्खावरणगुत्ति संविधान दुक्खं” म्हणजे विविध भयांपासून रक्षण, आवरण आणि गुप्तता (गोपन) यांच्या व्यवस्थेचे दुःख. “तदुभयेन सहेव सिज्झती” म्हणजे शेती, गोरक्षण इत्यादी संस्कार कर्मे किंवा रक्षण, आवरण, गुप्तता इत्यादींची व्यवस्था करणाऱ्यांना ते दुःख-दुःख त्या दोन्ही दुःखांसह सिद्ध होते. “तेसं” म्हणजे चक्षू इत्यादींचा आस्वाद घेणाऱ्यांची सुटका होत नाही, असा संबंध आहे. “पवत्ति निरोध भूतस्सा” म्हणजे प्रवृत्तीचा निरोध झालेल्याचा. “तं पजहति yeवा” म्हणजे त्या लोभाचा त्यागच करतो. “यावदेवा” म्हणजे केवळ वरच्या मर्यादेपर्यंत. 'मी आहे' (अहं अस्मि) असा उत्पन्न होणारा मान म्हणजे 'अस्मिमान'. त्याचा समूद्घात म्हणजे समूच्छेद (पूर्णपणे नष्ट करणे). “परिञ्ञातेसू” म्हणजे त्यांच्यामध्ये अनुशयित असलेल्या तृष्णेच्या प्रहाणामुळे पूर्णपणे जाणलेल्यांवर. “तब्बिपरीतेन पना” म्हणजे त्याच्या उलट (विपरीत) अर्थाने. अस्मिमानाचे अधिष्ठान नसलेले इत्यादी अर्थाने. 'अनिंद्रियबद्ध धर्म' म्हणजे पृथ्वी, पर्वत इत्यादींमध्ये असलेले रूप धर्म. สตฺเต อนุกฺกณฺฐมาเน กโรตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิตี’’ติ ตสฺมา. เตสํ สตฺตานํ. ทุชฺชโห นาม นตฺถิ. ตสฺมา โลโภเยว ทุกฺขสมุทยาริย สจฺจํ นามาติ โยชนา. สาสวา กุสลา กุสล ธมฺมา สมุทยสจฺจํ นาม, ทุกฺข สจฺจภูตานํ วิปากกฺขนฺธกฏตฺตา รูปานํ สมุทยตฺตา สํวฑฺฒนตฺตา. มูลภาเวน วุตฺตา [Pg.245] ‘อวิชฺชา ปจฺจยา สงฺขารา’ติอาทีสุ. ‘‘นนฺทนสทิสํ’’ติ เทวโลเก นนฺทนวนุยฺยานสทิสํ. ‘‘อาทิปภวปธานภูตา’’ติ ทุกฺข ธมฺมานํ อาทิภูตา, ปภวภูตา, ปธานภูตา. ‘‘ปภวภูตา’’ติ จ ปถมุปฺปตฺติเหตุภูตา. ‘‘เตสํ’’ติ ทุกฺข ธมฺมานํ. 'प्राण्यांना कंटाळा न येणारे करतो' असा संबंध आहे. “इती” म्हणजे 'त्यामुळे'. त्या प्राण्यांचा. 'दुज्जह' (त्याग करण्यास कठीण) असे काही नाही. म्हणून लोभच 'दुःखसमुदय आर्यसत्य' आहे, अशी योजना करावी. सास्रव (आसवांसह असलेले) कुशल आणि अकुशल धर्म हे 'समुदयसत्य' आहेत, कारण ते दुःखसत्य असलेल्या विपाकस्कंध आणि कतत्ता-रूपांचे उत्पादक व संवर्धक आहेत. 'अविद्या प्रत्ययाने संस्कार' (अविज्जा पच्चया सङ्खारा) इत्यादींमध्ये मूळ कारणाच्या रूपाने सांगितले आहे. “नन्दनसदिसं” म्हणजे देवलोकातील नंदनवन उद्यानासारखे. “आदिप्रभवप्रधानभूता” म्हणजे दुःखधर्मांचे आदिभूत, प्रभवभूत (उत्पत्तीचे कारण) आणि प्रधानभूत असलेले. “प्रभवभूता” म्हणजे प्रथम उत्पत्तीचे हेतू असलेले. “तेसं” म्हणजे त्या दुःखधर्मांचे. ‘‘กตฺถจี’’ติ กามภวาทีสุ กิสฺมิญฺจิภเว. ‘‘กทาจี’’ติ อตีตาทิกาเลสุ กิสฺมิญฺจิกาเล. ‘‘เกสญฺจี’’ติ เทวมนุสฺสาทีสุ สตฺเตสุ เกสญฺจิสตฺตานํ. ‘‘กุโตจี’’ติ พหูสุการเณสุ กุโตจิการณา. ‘‘กถญฺจี’’ติ เกนจิปกาเรน. “कत्थची” म्हणजे कामभव इत्यादींपैकी कोणत्याही भवात. “कदाची” म्हणजे भूतकाळ इत्यादी काळांपैकी कोणत्याही काळात. “केसञ्ची” म्हणजे देव, मनुष्य इत्यादी प्राण्यांपैकी कोणत्याही प्राण्यांचे. “कुतोची” म्हणजे अनेक कारणांपैकी कोणत्याही कारणाने. “कथञ्ची” म्हणजे कोणत्याही प्रकारे. ‘‘ปริณาโม’’ติ ปริณมนํ อญฺญถาภาโว. ‘‘ตํ สมงฺคีนํ’’ติ เตหิ จกฺขาทีหิ สมงฺคีนํ ปุคฺคลํ. ปาฬิปาเฐ. ‘‘อาทิตฺตํ’’ติอาทีปิตํ สมุชฺชลนฺตํ. ‘‘เกนา’’ติ กรณภูเตน เกน อคฺคินา. ตถา อริยมคฺโค วิปริณาม ธมฺโม จ โหติ. โสวิปริณาม ทุกฺเขนปิ ปุคฺคลํ ภุสํ ปีเฬติเยวาติ โยชนา. ‘‘นา’’ติ น สิยา. สมนํ วูปสมนํ สนฺติ. สพฺพทุกฺขานํ สนฺตีติ วิคฺคโห. สพฺพํ วฏฺฏทุกฺขนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตสฺสา’’ติ อริยมคฺคสฺส. ‘‘ปวตฺตมานา จา’’ติ สนฺตติฐิติวเสน วตฺตมานา จ. ‘‘มหนฺตํ ปริฬาหทุกฺขํ’’ติ โสก ปริเทว ทุกฺข โทมนสฺสุปายาสานํ ปวตฺติวเสน มหนฺตํ ปริฬาห ทุกฺขํ. นิพฺพานสฺส อนุปฺปาท ธมฺมตฺตา อุปฺปาทตฺถาย ปจฺจโย นาม นตฺถิ. ตถา อปฺปวตฺติ ธมฺมตฺตา ปวตฺตตฺถาย. สมฺปาปุณิตพฺพตฺตา ปน สมฺปาปนตฺถาย ปจฺจโย อตฺถีติ อาห ‘‘สมฺปาปก ปจฺจยาภิสงฺขรณเลสํ’’ติ. สมฺปาปก ปจฺจยา นาม อริย มคฺโค จ ตสฺส ปจฺจยา จ. “परिणामो” म्हणजे परिणमन (बदल), अन्यथाभाव (वेगळे होणे). “तं समङ्गीनं” म्हणजे त्या चक्षू इत्यादींनी युक्त असलेल्या पुद्गलाला (व्यक्तीला). पाळी पाठात - “आदित्तं” म्हणजे प्रदीप्त झालेले, पेटलेले. “केना” म्हणजे साधनभूत अशा कोणत्या अग्नीने? तसेच आर्यमार्ग हा विपरिणामधर्मी असतो. तो विपरिणाम दुःखाने देखील पुद्गलाला अत्यंत पीडित करतोच, अशी योजना करावी. “ना” म्हणजे नसावे (न व्हावे). 'शमन' (समणं) म्हणजे उपशमन, शांती. 'सर्व दुःखांची शांती' असा विग्रह आहे. 'सर्व वट्टदुःख' (संसार दुःख) असा संबंध आहे. “तस्सा” म्हणजे आर्यमार्गाचा. “पवत्तमाना चा” म्हणजे प्रवाहाच्या (संततीच्या) स्थितीच्या रूपाने चालू असणारी. “महन्तं परिळाहदुक्खं” म्हणजे शोक, परिदेव, दुःख, दोमनस्य आणि उपायास यांच्या प्रवृत्तीमुळे होणारे मोठे परिदाह दुःख (जळजळीचे दुःख). निर्वाण हा अनुत्पाद धर्मी असल्यामुळे त्याच्या उत्पत्तीसाठी कोणताही प्रत्यय (कारण) नसतो. तसेच ते अप्रवृत्ती धर्मी असल्यामुळे प्रवृत्तीसाठीही प्रत्यय नसतो. परंतु ते प्राप्त करून घेण्याजोगे असल्यामुळे, प्राप्तीसाठी प्रत्यय असतो, म्हणून म्हटले आहे: “संपापक पच्चयाभिसङ्खरणलेसं” म्हणजे प्राप्ती करून देणाऱ्या प्रत्ययांच्या अभिसंस्काराचा अंश. प्राप्ती करून देणारे प्रत्यय म्हणजे आर्यमार्ग आणि त्याचे प्रत्यय (कारण) होत. ภวาภวสงฺขาตสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺสาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตเทวา’’ติ ตํ ทุกฺขกฺขนฺธํ เอว. อนุปุนปฺปุนํ ปทียเต อนุปฺปทานํ. ‘‘นิยฺยาตนฏฺโฐ’’ติ หนฺท คณฺหาติ สมฺปฏิจฺฉาปนฏฺโฐ. ‘‘ตโต’’ติ วฏฺฏทุกฺขโต. ‘‘มุจฺจนูปายสฺสา’’ติ ทานสีลนิกฺขมาทิกสฺส มุจฺจนูปายสฺส. ‘‘นิสฺสรณวิมุตฺติยา’’ติ นิสฺสรณ สงฺขาตาย วิมุตฺติยา. สงฺขาร ทุกฺขสฺส อภาวฏฺโฐ. ‘‘สมฺโมหสฺส ปหานวเสนา’’ติ เอเตน อิธ ทสฺสนํ นาม อิโต ปฏฺฐาย จตูสุ สจฺเจสุ อสมฺโมห ภาวปตฺติ เอว อาโลกปตฺติ เอว วุจฺจตีติ ทสฺเสติ[Pg.246]. เตนาห ‘‘ปฏิวิชฺฌนฏฺโฐ’’ติ. ตณฺหาย ทาโส ตณฺหาทาโส. ตณฺหาทาสสฺส ภาโว ตณฺหาทาสพฺยํ. ปรวสโต วิมุตฺติวเสน อปราธีนตา ภุชิสฺสภาโว นาม. โลกิยมคฺคาหิ ตณฺหาทาสพฺยํ นาติวตฺตนฺติ. ตณฺหาวสํ ปูรยมานา ตณฺหาวิสยํ วิปากํ ชเนนฺติ. อยํ อริยมคฺโค เอว ตณฺหาย อนารมฺมณภาเว ฐิโต ตณฺหาทาสพฺยํ อติวตฺตติ. ตณฺหาวสํ ภินฺทมาโน ตณฺหาย อวิสยํ วิปากํ ชเนตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ทุกฺขมุตฺติยา’’ติ ทุกฺขโต มุจฺจนตฺถํ. ‘‘ทุกฺขวฑฺฒิยา’’ติ ทุกฺขวฑฺฒนตฺถาย. เสสเมตฺถ สุโพธํ. ‘‘ขยวิราค นิโรธ ภูโต’’ติ เอตฺถ กิเลส ธมฺมานํ วิรชฺชนํ วิคมนํ อนฺตรธานํ วิราโค. ‘‘อนตฺถ ปทานี’’ติ อหิตปทานิ. ภยาทีนวปทานิ. ‘‘ทฺวารฉกฺกอารมฺมณ ฉกฺกเภเทนา’’ติ ทฺวารฉกฺกํ ธมฺมารมฺมณํ โหติ. เอวํสติ, อารมฺมณ ฉกฺกนฺติ น วตฺตพฺพํ ธมฺมารมฺมณสฺส วิสุํ คหิตตฺตาติ. โน นวตฺตพฺพํ. กสฺมา, ทฺวารฉกฺกโต เสสานํ ธมฺมารมฺมณานํ อตฺถิตายาติ ทสฺเสตุํ ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ปรโต ‘‘เอตฺถปี’’ติอาทีสุ เอเสวนโยติ. भवाभवसंज्ञक दुःखस्कंधाशी (दुःखाच्या समूहाशी) संबंध आहे. "तदेव" म्हणजे तोच दुःखस्कंध. वारंवार दिले जाणे म्हणजे "अनुप्रदान" होय. "निय्यातनट्ठो" (समर्पण करणे) म्हणजे "घेणे किंवा स्वीकारणे" या अर्थाने आहे. "ततो" म्हणजे संसारदुःखापासून. "मुच्चनूपायस्स" म्हणजे दान, शील, नैष्क्रम्य इत्यादी मुक्त होण्याच्या उपायांचे. "निस्सरणविमुत्तिया" म्हणजे निस्सरण (बाहेर पडणे) नावाच्या विमुक्तीने. हा संस्कारदुःखाच्या अभावाचा अर्थ आहे. "संमोहाच्या प्रहाणामुळे" याद्वारे येथे "दर्शन" म्हणजे येथून पुढे चार आर्य सत्यांमध्ये असंमोह अवस्था (भ्रमरहित अवस्था) प्राप्त करणे म्हणजेच ज्ञानप्रकाश प्राप्त करणे होय, असे दर्शविले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे "पटिविज्झनट्ठो" (वेध घेण्याच्या अर्थाने). तृष्णेचा दास म्हणजे "तृष्णादास". तृष्णादासाची अवस्था म्हणजे "तृष्णादासत्व". परस्वाधीनतेपासून मुक्त झाल्यामुळे जी पराधीनता नसणे, त्याला "भुजिस्सभाव" (स्वतंत्रता) म्हणतात. लौकिक मार्ग तृष्णादासत्वाचे उल्लंघन करू शकत नाहीत. तृष्णेच्या अधीन राहून ते तृष्णेच्या विषयरूप विपाकाला (फलाला) जन्म देतात. हा आर्यमार्गच तृष्णेच्या अनालंबन अवस्थेत स्थित राहून तृष्णादासत्वाचे उल्लंघन करतो. तृष्णेच्या प्रभावाला नष्ट करून तो तृष्णेचा अविषय असलेला विपाक उत्पन्न करतो, असा अभिप्राय आहे. "दुक्खमुत्तिया" म्हणजे दुःखापासून मुक्त होण्यासाठी. "दुक्खवड्ढिया" म्हणजे दुःख वाढवण्यासाठी. उर्वरित भाग येथे समजण्यास सोपा आहे. "खयविराग निरोध भूतो" यामध्ये क्लेशधर्मांचा विराग, नाहीसे होणे, अंतर्धान पावणे म्हणजे "विराग" होय. "अनत्थ पदानी" म्हणजे अहितकारक पदे, भय आणि आदीनवाचे (दोषांचे) स्थान. "द्वारचक्र आणि आलंबनचक्र यांच्या भेदाने" यामध्ये द्वारचक्र हे धम्मालंबन असते. असे असताना, धम्मालंबन स्वतंत्रपणे घेतले गेल्यामुळे "आलंबनचक्र" असे म्हणू नये का? नाही, असे म्हणू नये. कारण, द्वारचक्राव्यतिरिक्त इतर धम्मालंबनांचे अस्तित्व दर्शवण्यासाठी "एत्थ च" (आणि येथे) इत्यादी म्हटले आहे. पुढे "एत्थपि" (येथेही) इत्यादींमध्ये हाच नियम समजावा. สพฺพสงฺคหานุทีปนา นิฏฺฐิตา. सर्वसंग्रह अनुदीपनी समाप्त झाली. สมุจฺจยสงฺคหทีปนิยาอนุทีปนา นิฏฺฐิตา. समुच्चयसंग्रहदीपनीची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๘. ปจฺจยสงฺคหอนุทีปนา ८. प्रत्ययसंग्रह अनुदीपनी ๑๖๖. เยหิปกาเรหิ [Pg.247] ยถา. เตสํ วิภาโค ตํ วิภาโค. อยญฺจนิทฺเทโส เอกเสสนิทฺเทโส, วิจฺฉาโลปนิทฺเทโสวาติ ทสฺเสตุํ ‘‘เตสํ’’ติอาทิมาห. น สเมติ. คาถายํ ‘เยสํ’ติอาทินา ตีหิ-ย-สทฺเทหิ ทสฺสิตานํ ติณฺณํ อตฺถานํ-ต-สทฺทตฺถ สมฺภวโต. ต-สทฺทตฺถานญฺจ อนุสนฺธิยํ ปริปุณฺณํ กตฺวา วตฺตพฺพโต. ‘‘สมุปฺปชฺชตี’’ติ สุฏฺฐุ ปริปุณฺณํ กตฺวา อุปฺปชฺชติ, ปาตุภวติ. ‘‘อวินา’’ติ อวินา หุตฺวา. ‘‘สหชาต ธมฺเมหี’’ติ อวิชฺชา ปจฺจยา สงฺขาราติอาทีสุ สงฺขาราทีนํ สหชาต ธมฺเมหิ สเหว อุปฺปชฺชนํ. ‘‘กลาปวเสนา’’ติ สุทฺธ ธมฺม กลาปวเสน. ‘‘สามญฺญ ลกฺขณํ’’ติ สาธารณ ลกฺขณํ. ‘‘อตฺโถ’’ติ อิทปฺปจฺจยตา สทฺทสฺส อตฺโถ. ‘‘อยมตฺโถ ปฏิกฺขิตฺโต’’ติ ‘สมุปฺปชฺชนํ สมุปฺปาโท’ติ อยํภาวสาธนตฺโถ ปฏิกฺขิตฺโต. ‘‘อยเมวา’’ติ อยํ ภาวสาธนตฺโถ เอว. ชรามรณํ สมฺภวตีติ โยชนา. ‘‘อุปฺปาทาวา ตถาคตานํ’’ติ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ อุปฺปาเทวา สติ. ‘‘อนุปฺปาทาวา’’ติ อนุปฺปาเทวา สติ. ‘‘ฐิตาว สาธาตู’’ติ ชาติยา สติ ชรามรณสฺส ปวตฺติสภาโว โลเก ฐิโตเยว. กตมา ปน สาธาตูติ อาห ‘‘ธมฺมฏฺฐิตตา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ธมฺมฏฺฐิตตา’’ติ เกนจิ อกตา สภาวฏฺฐิตตา. ‘‘ธมฺมนิยามตา’’ติ สภาวนิยามตา. ‘‘ตตฺร ตถตา’’ติ ตสฺมึ สามญฺญลกฺขเณ สงฺขต ธมฺมานํ ตถตา. สามญฺญ ลกฺขณเมว ปฏิจฺจสมุปฺปาโท นามาติ ทสฺเสติ, น อวิชฺชาทิโก ปจฺจย ธมฺโม. กสฺมา, เตหิ วจเนหิ ธมฺมนิยามตา มตฺตสฺส ทสฺสิตตฺตา. อวิชฺชาทีนํ ธมฺม สรูปานํ อทสฺสิตตฺตา. ‘‘ธมฺมนิยามตามตฺตํ’’ติ จ ยถา วุตฺตสามญฺญ ลกฺขณเมว วุจฺจติ. ยทิ ภาวสาธนํ อิจฺเฉยฺย, ภาวสาธนํ นาม กตฺตุรหิตํ ภเวยฺย. กตฺตุรหิเต จ สติ, กถํ ปฏิจฺจ กฺริยาย สมานกตฺตุกตา ลพฺภติ. อลทฺเธ จ สมานกตฺตุกตฺเต กถญฺจ ปุพฺพกาเลตฺวา [Pg.248] ปจฺจยสมฺภโวติ. อยํ ภาวสาธนํ อิจฺฉนฺตสฺส พฺยญฺชนยุตฺติวิโรโธ. ตํ ปริหรนฺโต น เจตฺถาติอาทิมาห. คมฺภีโรจานนฺท ปฏิจฺจสมุปฺปาโท คมฺภีราว ภาโสจาติ ภควตา วุตฺตํ. ภาวสาธเน จ กเต อุปฺปชฺชน กฺริยามตฺตํ นาม วิสุํ เอโก ธมฺโม น โหตีติ กถํ ตํ คมฺภีรํ สิยาติ. อยํ ภาวสาธนํ อิจฺฉนฺตสฺส คมฺภีรวจน วิโรโธ. ตํ ปริหรนฺโต ‘‘สงฺขต ธมฺเมสุ จา’’ติอาทิมาห. อปิ จ สงฺขต ลกฺขณํ นาม สงฺขต ธมฺมโตปิ คมฺภีรํ โหติ. ตถาหิ จิตฺตํ นาม สงฺขต ธมฺโม. ตญฺจ อตฺถิ เมจิตฺตํ นามาติ สตฺตานํ ปากฏํ โหติ. ตสฺส ปน อนิจฺจตา สงฺขาตํ สงฺขต ลกฺขณํ อปากฏํ โหติ สุฏฺฐุ สนฺตติยา ปฏิจฺฉนฺนํ. ตถา เวทนา นาม สุขาวา ทุกฺขาวา สงฺขต ธมฺโม. สา จ อตฺถิ เมเวทนาติ สตฺตานํ ปากฏา โหติ. ตสฺสา ปน อนิจฺจตา สงฺขาตํ สงฺขต ลกฺขณํ อปากฏํ โหติ สุฏฺฐุ สนฺตติยา ปฏิจฺฉนฺนํ. เอวํ เสเสสุ นามธมฺเมสุ จ รูปธมฺเมสุ จ. ยโต สตฺตสุ วิสุทฺธีสุ สงฺขต ธมฺม ววตฺถาน สงฺขาตํ ทิฏฺฐิวิสุทฺธิญาณญฺจ อวิชฺชาทิปจฺจย ปริคฺคห สงฺขาตํ กงฺขาวิตรณ วิสุทฺธิญาณญฺจ ปถมํ สมฺปาเทตฺวา ปจฺฉา ทสวิธานิ สงฺขต ลกฺขณานุปสฺสนา ญาณานิ สมฺปาเทตพฺพานิ โหนฺตีติ. ยถา จ อนิจฺจตา สงฺขาตํ สงฺขต ลกฺขณํ สงฺขต ธมฺมโต คมฺภีรํ โหติ. ตถา อิทมฺปิ ปฏิจฺจสมุปฺปาท สงฺขาตํ สงฺขต ลกฺขณํ สงฺขต ธมฺมโต คมฺภีรํ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. १६६. ज्या प्रकारे म्हणजे जसे. त्यांचा विभाग म्हणजे तो विभाग. हा निर्देश एकशेष निर्देश किंवा वीप्सालोप निर्देश आहे, हे दर्शवण्यासाठी "तेसं" (त्यांचा) इत्यादी म्हटले आहे. हे जुळत नाही. गाथेमध्ये "येसं" इत्यादी तीन "य" शब्दांनी दर्शविलेल्या तीन अर्थांचा "त" शब्दाच्या अर्थाशी संबंध संभवतो. आणि "त" शब्दाच्या अर्थांचा अनुसंधानात पूर्णपणे उल्लेख करणे आवश्यक असल्यामुळे. "समुप्पज्जति" म्हणजे चांगल्या प्रकारे पूर्ण होऊन उत्पन्न होते, प्रकट होते. "अविना" म्हणजे त्याशिवाय न राहता. "सहजात धम्मेहि" म्हणजे "अविद्या प्रत्ययाने संस्कार" इत्यादींमध्ये संस्कारादींचे सहजात धर्मांसोबतच उत्पन्न होणे. "कलापवसेन" म्हणजे शुद्ध धर्म समूहाच्या (कलापाच्या) रूपाने. "सामञ्ञ लक्खणं" म्हणजे सामान्य लक्षण (साधारण लक्षण). "अत्तो" म्हणजे "इदप्पच्चयता" (इदंप्रत्ययता) या शब्दाचा अर्थ. "अयमत्यो पटिक्खित्तो" म्हणजे "समुत्पन्न होणे हाच समुत्पाद आहे" हा भावसाधन अर्थ नाकारला आहे. "अयमेव" म्हणजे हा भावसाधन अर्थच आहे. "जरामरण संभवते" अशी योजना आहे. "उप्पादा वा तथागतानं" म्हणजे सम्यक्संबुद्धांचा उत्पाद (जन्म) असो वा नसो. "अनुप्पादा वा" म्हणजे उत्पाद नसो. "ठिता व सा धातु" म्हणजे जाती (जन्म) असताना जरामरण प्रवृत्तीचा स्वभाव लोकात स्थितच असतो. ती धातू कोणती आहे? हे सांगण्यासाठी "धम्मट्ठितता" (धर्मस्थितता) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "धम्मट्ठितता" म्हणजे कोणाकडूनही न निर्माण केलेली स्वभावस्थितता. "धम्मनियामता" म्हणजे स्वभाव-नियमता. "तत्र तथता" म्हणजे त्या सामान्य लक्षणात संस्कृत धर्मांची तथता (तथाभाव). सामान्य लक्षण म्हणजेच प्रतीत्यसमुत्पाद होय, असे दर्शविले आहे, अविद्या इत्यादी प्रत्यय धर्म नव्हे. कारण, त्या शब्दांद्वारे केवळ धर्मनियमता दर्शविली गेली आहे. अविद्या इत्यादी धर्मस्वरूपांचे दर्शन घडविलेले नाही. "धम्मनियामतामत्तं" म्हणजे वर सांगितलेले सामान्य लक्षणच म्हटले जाते. जर भावसाधन मान्य केले, तर भावसाधन हे कर्त्याशिवाय होईल. आणि कर्ता नसताना, प्रतीत्य क्रियेमध्ये समानकर्तृकत्व कसे प्राप्त होईल? आणि समानकर्तृकत्व प्राप्त न झाल्यास, पूर्वकाळात प्रत्ययाचा संभव कसा होईल? हा भावसाधन इच्छिणाऱ्याचा शब्द आणि युक्तीशी विरोध आहे. त्याचे परिहार करताना "न चेत्थ" इत्यादी म्हटले आहे. "हे आनंदा, प्रतीत्यसमुत्पाद गंभीर आहे आणि गंभीर भासणारा आहे" असे भगवंतांनी म्हटले आहे. आणि भावसाधन मानल्यास, केवळ उत्पन्न होण्याची क्रिया हा स्वतंत्रपणे एक धर्म होत नाही, तर तो गंभीर कसा होईल? हा भावसाधन इच्छिणाऱ्याचा गंभीर वचनाशी विरोध आहे. त्याचे परिहार करताना "संखत धम्मेसु च" इत्यादी म्हटले आहे. शिवाय, संस्कृत लक्षण हे संस्कृत धर्मापेक्षाही गंभीर असते. जसे की, चित्त हा संस्कृत धर्म आहे. आणि "माझे चित्त आहे" हे प्राण्यांना स्पष्ट जाणवते. परंतु, त्याची अनित्यता नावाचे संस्कृत लक्षण हे संततीने (प्रवाहाने) झाकलेले असल्यामुळे स्पष्ट जाणवत नाही. तसेच वेदना, मग ती सुखकारक असो वा दुःखकारक, हा संस्कृत धर्म आहे. आणि "मला वेदना होत आहे" हे प्राण्यांना स्पष्ट जाणवते. परंतु, तिची अनित्यता नावाचे संस्कृत लक्षण हे संततीने झाकलेले असल्यामुळे स्पष्ट जाणवत नाही. याचप्रमाणे इतर नामधर्म आणि रूपधर्मांच्या बाबतीतही समजावे. ज्या अर्थी सात विशुद्धींमध्ये संस्कृत धर्मांचे व्यवस्थान नावाचे "दृष्टिविशुद्धी ज्ञान" आणि अविद्या इत्यादी प्रत्ययांचे ग्रहण नावाचे "कांक्षावितरणविशुद्धी ज्ञान" प्रथम संपादन करून, नंतर दहा प्रकारची "संस्कृत लक्षणानुपश्यना ज्ञाने" संपादन करायची असतात. आणि ज्याप्रमाणे अनित्यता नावाचे संस्कृत लक्षण हे संस्कृत धर्मापेक्षा गंभीर असते, त्याचप्रमाणे हा प्रतीत्यसमुत्पाद नावाचा संस्कृत लक्षणही संस्कृत धर्मापेक्षा गंभीर आहे, असे समजले पाहिजे. ‘‘ตพฺภาวภาวีภาโว’’ติ เอตฺถ ภวติ สํวิชฺชตีติ ภาโว. โส โส อวิชฺชาทิโก ภาโว ตพฺภาโว. ตพฺภาเว ภวนฺติ สมฺภวนฺติ สีเลนาติ ตพฺภาวภาวิโน. สงฺขาราทโย. ‘‘ภาโว’’ติ อุปฺปตฺติการณํ. ตพฺภาวภาวีนํ ภาโวติ ตพฺภาวภาวิ ภาโวติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตสฺมึ ตสฺมึ’’ติอาทิมาห. อปิ จ ‘‘ภาโว’’ติ วิชฺชมานตา วุจฺจติ. ตสฺส ตสฺส ปจฺจย ธมฺมสฺส ภาโวติ ตพฺภาโว. ตพฺภาเว สติ ภวนฺติ สมฺภวนฺติ ธมฺมตายาติ ตพฺภาวภาวิโน. เตสํ ภาโวติปิ ยุชฺชติเยว. ‘‘เหตฺวาทิ ปจฺจย สตฺตินิยามํ’’ติ เหตุปจฺจโย, อารมฺมณ ปจฺจโย, ติอาทีสุ เหตุสทฺท อารมฺมณ สทฺทาทโย โลภาทีนํ รูปารมฺมณาทีนญฺจ [Pg.249] ธมฺมานํ ตํ ตํ ปจฺจย สตฺติวิเสสํ ทีเปนฺติ. เตสญฺจ โส โส ปจฺจย สตฺติวิเสโส วิสุํ ธมฺมนิยาโม โหติ, เอวํ เหตฺวาทิ ปจฺจยสตฺตินิยามํ นิวตฺเตติ. ‘‘ตถา ตถา’’ติ มูลฏฺฐโคจรวิสยฏฺฐาทิเกน เตน เตน ปจฺจยากาเรน. โส หิ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปจฺจย ธมฺมุทฺธาร มตฺเต อฐตฺวา’’ติ ปจฺจย ธมฺมานํ นาม สญฺญาวเสน อุทฺธรณมตฺตํ อกตฺวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อาหจฺจา’’ติ อาหนิตฺวา ตํ ตํ ปจฺจยสตฺติ วิเสสํ ปาเปตฺวาติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘มตฺถกํ ปาเปตฺวา’’ติ. ปจฺจยสตฺติ วิเสโส หิ เหตุผลทีปเน ตโต อุตฺตริ วตฺตพฺพ กิจฺจาภาวโต มตฺถกํ นาม โหตีติ. ‘‘อโนสกฺกมานา’’ติ อนิวตฺตมานา. ‘‘เอตายา’’ติ ปจฺจย สตฺติยา. ปปญฺเจนฺเต อาจริเย. “तब्भावभावीभावो” (त्याच्या असण्याने होणारे अस्तित्व) यामध्ये 'भवति' (होतो) किंवा 'संविज्जति' (विद्यमान असतो) म्हणजे 'भाव' (अस्तित्व/अवस्था) होय. तो तो अविद्या इत्यादी भाव म्हणजे 'तब्भाव' (त्याचा भाव) होय. त्याच्या भावात (अस्तित्वात) जे स्वभावाने उत्पन्न होतात किंवा संभवतात, ते 'तब्भावभावी' (त्याच्या भावामुळे होणारे) होत, जसे की संस्कार इत्यादी. 'भाव' म्हणजे उत्पत्तीचे कारण. 'तब्भावभावींचा भाव' म्हणजे 'तब्भावभावी भाव' हा अर्थ दर्शवताना "त्या त्या मध्ये" इत्यादी म्हटले आहे. शिवाय, 'भाव' म्हणजे विद्यमानता (अस्तित्व) असे म्हटले जाते. त्या त्या प्रत्यय धर्माचा (कारणाचा) भाव म्हणजे 'तब्भाव' होय. तो भाव असताना जे नियमाने उत्पन्न होतात किंवा संभवतात, ते 'तब्भावभावी' होत. त्यांचा भाव (अस्तित्व) असे म्हणणे देखील योग्यच आहे. "हेतू इत्यादी प्रत्यय-शक्तीचा नियम" म्हणजे हेतू-प्रत्यय, आरम्मण-प्रत्यय इत्यादींमध्ये 'हेतू' शब्द, 'आरम्मण' शब्द इत्यादी लोभ इत्यादी आणि रूप-आरम्मण इत्यादी धर्मांच्या त्या त्या विशिष्ट प्रत्यय-शक्तीला प्रकाशित करतात. आणि त्यांची ती ती विशिष्ट प्रत्यय-शक्ती हा स्वतंत्र धर्मनियम असतो, अशा प्रकारे हेतू इत्यादी प्रत्यय-शक्तीचा नियम स्पष्ट होतो. "तशा तशा प्रकारे" म्हणजे मूळ स्थान, गोचर (विषय) स्थान इत्यादी त्या त्या प्रत्यय-आकाराने (कारणाच्या स्वरूपाने). कारण तो तसा म्हटला जातो, हा संबंध आहे. "प्रत्यय धर्मांच्या केवळ उद्धरणावर (उल्लेखावर) न थांबता" म्हणजे प्रत्यय धर्मांच्या केवळ नाम-संज्ञेच्या आधारे उल्लेख मात्र न करता, असा अभिप्राय आहे. "आहच्च" (आघात करून/स्पर्श करून) म्हणजे आघात करून त्या त्या विशिष्ट प्रत्यय-शक्तीला प्राप्त करून देणे, असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे "शिखरावर (मत्थक) पोहोचवून". कारण हेतू आणि फळ प्रकाशित करण्यामध्ये विशिष्ट प्रत्यय-शक्तीच्या पलीकडे आणखी काही सांगण्याचे कर्तव्य उरत नसल्याने, त्याला 'मत्थक' (शिखर/अंतिम सीमा) म्हटले जाते. "अनोसक्कमाना" म्हणजे मागे न हटणारे (अनिवर्तमान). "याच्याद्वारे" म्हणजे या प्रत्यय-शक्तीद्वारे, असे आचार्य विस्तारपूर्वक स्पष्ट करतात. เอตสฺมา การณา ผลํ เอตเทว ปฏิจฺจ อนาคตปกฺขโต ปจฺจุปฺปนฺนปกฺขํ อาคจฺฉติ ปาตุพฺภวตีติ ปจฺจโย. อุปฺปตฺติการณํ ปวตฺติการณญฺจ. ตตฺถ อุปฺปตฺติการณํ ชนกปจฺจโย. ปวตฺติการณํ อุปตฺถมฺภก ปจฺจโย. ‘‘เอเตนา’’ติ เหตุนา. ‘‘กายวจี มโนกมฺมํ’’ติ เอตฺถ ‘‘กมฺมํ’’ติ กฺริยาวุจฺจติ, คมน ฐาน นิสชฺชสยนาทิกํ กายิก กฺริยญฺจ. อาลาป สลฺลาป กถน สชฺฌายน คายนาทิกํ วาจสิก กฺริยญฺจ. วิชานน จินฺตน วีมํสนาทิกํ มานสิก กฺริยญฺจ. ‘‘อภิสงฺขโรนฺตี’’ติ อภินิปฺผาเทนฺติ. ‘‘เอเตหี’’ติ เอเตหิ โลกิยกุสลา กุสล เจตนา ธมฺเมหิ. อปิ จ สงฺขโรนฺติ สตฺตา เอเตหีติ สงฺขารา. ‘‘สงฺขโรนฺตี’’ติ กึ สงฺขโรนฺติ. อตฺตภาวํ สงฺขโรนฺติ. ภวาภวํ สงฺขโรนฺติ. ทิฏฺฐธมฺมิกมฺปิ อตฺถํ วา อนตฺถํ วา สงฺขโรนฺติ. สมฺปรายิกมฺปิ อตฺถํ วา อนตฺถํ วา สงฺขโรนฺตีติอาทินา. จกฺขุมฺปิ สงฺขโรนฺติ, โสตํปิ สงฺขโรนฺตีติอาทินา. ทสฺสนมฺปิ สงฺขโรนฺติ, สวนมฺปิ สงฺขโรนฺตีติอาทินา จ วตฺตุํ วฏฺฏติเยว. ‘‘วิชานาตี’’ติ วิวิเธน ชานาติ. ภูเตนปิ ชานาติ, อภูเตนปิ ชานาติ. ‘‘นมตี’’ติ โคจร วิสยตฺถาย นมติ. ‘‘รุปฺปตี’’ติ กุปฺปติ, โขภติ. ‘‘ผุสตี’’ติ สํหนติ. ‘‘เวทยตี’’ติ วิทิตํ กโรติ. ตํ ตํ อารมฺมณํ ลคฺคนวเสน ภุสํ นหติ พนฺธติ, มุญฺจิตุํ น เทตีติ ตณฺหาติปิ ยุชฺชติ. ‘‘อุปาทิยตี’’ติ [Pg.250] ทฬฺหํ คณฺหาติ. เตนาห ‘‘อมุญฺจคฺคาหํ คณฺหาตี’’ติ. ภวตีติ ภโว. อุปปตฺติภโว. ภวนฺติ เอเตนาติ ภโว. กมฺมภโว. ‘‘ชนนํ’’ติ อภินวสฺส ปาตุพฺภวนํ. ‘‘ชีรณํ’’ติ อภินวภาวโต หายนํ. ‘‘โสจนํ’’ติ จิตฺตสนฺตาปนํ. ‘‘ปริเทวนํ’’ติ โรทนํ. ‘‘ทุกฺขํ’’ติ กายรุชฺชนํ. ‘‘โทมนสฺสํ’’ติ จิตฺตรุชฺชนํ. ‘‘วิสีทนํ’’ติ พาฬฺหํ จิตฺตกิลมถภาเวน วิรูปํ หุตฺวา จิตฺตสฺสสีทนํ. ถามพลขิยฺยนํ. ยโต อสฺสาสปสฺสาสานํ วิรูปปฺปวตฺติวา ตงฺขเณ สพฺพโส อุปรุชฺฌนํ วา โหตีติ. ‘‘เกนจิ สุเขนา’’ติ ทุกฺขสจฺจโต วิมุตฺเตน เกนจิ สนฺติสุเขน. या कारणास्तव, फळ यालाच अवलंबून (प्रतीत्य) अनागत (भविष्य) पक्षाकडून प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) पक्षाकडे येते, प्रादुर्भूत होते, म्हणून त्याला 'प्रत्यय' (paccaya) म्हणतात. ते उत्पत्तीचे कारण आणि प्रवृत्तीचे (चालू ठेवण्याचे) कारण असते. त्यामध्ये उत्पत्तीचे कारण म्हणजे 'जनक प्रत्यय' (उत्पादक कारण) होय. प्रवृत्तीचे कारण म्हणजे 'उपत्थंभक प्रत्यय' (पोषक/समर्थक कारण) होय. "याच्याद्वारे" म्हणजे हेतूने. "काय, वाचा आणि मनाचे कर्म" यामध्ये 'कर्म' म्हणजे क्रिया म्हटली जाते; जसे की चालणे, उभे राहणे, बसणे, झोपणे इत्यादी कायिक क्रिया; संभाषण, चर्चा, सांगणे, सज्झाय (पाठ करणे), गायन इत्यादी वाचिक क्रिया; आणि विशेष जाणणे, चिंतन करणे, विमंसन (विचार/मीमांसा) करणे इत्यादी मानसिक क्रिया होय. "अभिसंस्करोन्ति" (अभिसंस्कार करतात) म्हणजे निष्पन्न करतात (उत्पन्न करतात). "यांच्याद्वारे" म्हणजे या लौकिक कुशल आणि अकुशल चेतना धर्मांद्वारे. शिवाय, प्राणी ज्यांच्याद्वारे संस्कार करतात, ते 'संस्कार' (संखारा) होत. "संस्कार करतात" म्हणजे कशाचा संस्कार करतात? आत्मभावाचा (व्यक्तिमत्त्वाचा) संस्कार करतात. भवाभवाचा (पुनर्जन्माचा) संस्कार करतात. इहलोकातील (दृष्टधार्मिक) अर्थाचा किंवा अनर्थाचा संस्कार करतात. परलोकातील (सांपरायिक) देखील अर्थाचा किंवा अनर्थाचा संस्कार करतात, इत्यादी. चक्षूचा (डोळ्याचा) देखील संस्कार करतात, श्रोताचा (कानाचा) देखील संस्कार करतात, इत्यादी. दर्शनाचा (पाहण्याचा) देखील संस्कार करतात, श्रवणाचा (ऐकण्याचा) देखील संस्कार करतात, इत्यादी सांगणे योग्यच आहे. "विजानाति" (जाणतो) म्हणजे विविध प्रकारे जाणतो. जे सत्य (भूत) आहे तेही जाणतो, आणि जे असत्य (अभूत) आहे तेही जाणतो. "नमति" (वाकतो/कलतो) म्हणजे गोचर विषयाच्या दिशेने झुकतो. "रुप्पति" (बाधित होतो/रूप धारण करतो) म्हणजे क्षुब्ध होतो, विचलित होतो. "फुसति" (स्पर्श करतो) म्हणजे संपर्क करतो (संघात करतो). "वेदयति" (वेदन करतो/अनुभवतो) म्हणजे जाणवून देतो (विदित करतो). त्या त्या आरम्मणाला (विषयाला) चिकटून राहण्याच्या स्वरूपात घट्ट बांधून ठेवते, सोडू देत नाही, म्हणून ती 'तण्हा' (तृष्णा) आहे, असे म्हणणे देखील योग्य आहे. "उपादियति" (उपादान करतो/ग्रहण करतो) म्हणजे दृढतेने पकडतो. म्हणूनच म्हटले आहे "न सोडता घट्ट पकडून ठेवतो". जो होतो तो 'भव' (अस्तित्व) होय, म्हणजेच 'उपपत्तिभव' (पुनर्जन्म). ज्याच्याद्वारे (भव) होतात, तो 'भव' होय, म्हणजेच 'कम्मभव' (कर्मभव). "जनन" म्हणजे नवीन प्रादुर्भाव होणे (जन्म घेणे). "जीरण" (जर्जर होणे) म्हणजे नवीन अवस्थेपासून क्षीण होणे (वृद्ध होणे). "सोचन" (शोक) म्हणजे चित्ताचा संताप (दुःख). "परिदेवन" (क्रंदन) म्हणजे रडणे. "दुःख" म्हणजे कायिक वेदना (शरीराची पीडा). "दोमनस्य" (दौर्मनस्य) म्हणजे मानसिक वेदना (चित्ताची पीडा). "विसीदन" (उद्वेग/निराशा) म्हणजे अत्यंत चित्त-क्लेशामुळे विरूप होऊन चित्ताचे खचून जाणे, शक्ती आणि बलाचा क्षय होणे; ज्यामुळे श्वास-प्रश्वासाची विपरित प्रवृत्ती होते किंवा त्या क्षणी पूर्णपणे निरोध (थांबणे) होतो. "कोणत्यातरी सुखाने" म्हणजे दुःखसत्यापासून विमुक्त अशा कोणत्यातरी शांतीसुखाने. ‘‘ทุกฺขปฺปฏิจฺฉาทิกา’’ติ ภยฏฺเฐน ทุกฺขภูตานํ เตภูมิก ธมฺมานํ ทุกฺขภาวปฺปฏิจฺฉาทิกา. ‘‘สมุทยปฺปฏิจฺฉาทิกา’’ติ ตณฺหาย ทุกฺข สมุทย ภาวปฺปฏิจฺฉาทิกา. ‘‘นิโรธปฺปฏิจฺฉาทิกา’’ติ ตณฺหานิโรธสฺเสว ทุกฺขนิโรธ ภาวปฺปฏิจฺฉาทิกา. ‘‘มคฺคปฺปฏิจฺฉาทิกา’’ติ อฏฺฐงฺคีก มคฺคสฺเสว ทุกฺขนิโรธ มคฺคภาวปฺปฏิจฺฉาทิกา. ปุพฺพนฺโต วุจฺจติ อตีเตกาเล ภวปรมฺปรา. อปรนฺโต วุจฺจติ อนาคเต ภวปรมฺปรา. ปุพฺพนฺตา ปรนฺโต วุจฺจติ ตทุภยํ. ‘‘ปฏิจฺจสมุปฺปาทปฺปฏิจฺฉาทิกา’’ติ ปจฺจุปฺปนฺนภเว ขนฺธานํ ปฏิจฺจสมุปฺปาทปฺปฏิจฺฉาทิกา. ‘‘สุตฺตนฺติกนเยนา’’ติ อภิธมฺเมปิ วิภงฺเค สุตฺตนฺต ภาชนียํ นาม อาคตํ. เตน สุตฺตนฺต ภาชนียนเยน. สาสวา กุสลา กุสล เจตนา สงฺขารา นามาติ โยชนา. ‘‘อภิธมฺมนเยนา’’ติ วิภงฺเค อภิธมฺมภาชนียนเยน. อฏฺฐกถาปาเฐ. อวิชฺชา กิริย ธมฺมานํ เนว อุปนิสฺสย ปจฺจยตฺตํ ลภติ. กุสลา กุสลมูลานิ กิริย ธมฺมานํ น อุปนิสฺสย ปจฺจยตฺตํ ลภนฺตีติ โยชนา. กิริย ธมฺมา อวิชฺชาโต จ กุสลา กุสล มูเลหิ จ อุปนิสฺสย ปจฺจยํ น ลภนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปจฺจยากาโร’’ติ ปฏิจฺจ สมุปฺปาโท. ‘‘อวิชฺชาวิราคา’’ติ อวิชฺชา วิคมนโต. เตสํปิกิริย ธมฺมานํ. วิญฺญาณาทีสุปิ กิริย วิญฺญาณํ, กิริย นามํ, กิริย มนายตนํ, กิริยผสฺโส, กิริย เวทนาติ อตฺถิตาย ‘‘เอสนโย วิญฺญาณาทีสุปี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘กุสลา กุสล วิปากสมฺปยุตฺตํ’’ติ กุสล วิญฺญาณ สมฺปยุตฺตํ, อกุสลวิญฺญาณสมฺปยุตฺตํ[Pg.251], วิปาก วิญฺญาณ สมฺปยุตฺตํ. ‘‘ตํ อนุปปนฺนํ’’ติ ปวตฺติวิปากวิญฺญาณ สหคตสฺส ขนฺธตฺตยสฺส ตํ สหชาตสฺส จิตฺตชรูปสฺส จ อวสิฏฺฐตฺตา ตํ น สมฺปนฺนํติ อตฺโถ. ตตฺถ หิ วิญฺญาณปเท ปวตฺติวเสน ทฺวตฺตึสวิธํ วิปากจิตฺตํ วิญฺญาณํ นามาติ วุตฺตํ. เอวญฺจสติ, นาม รูปปเทปิ ปวตฺติวเสน ตทุภยํ ปวตฺติวิญฺญาณสหคตํปิ คเหตพฺพเมวาติ. ‘‘ตํ ตํ วิญฺญาณ สมฺปยุตฺตา’’ติ ปฏิสนฺธิวิญฺญาณ ปวตฺติ วิญฺญาณสมฺปยุตฺตา. ‘‘ตณฺหุปาทานานิปากฏานี’’ติ ฉ ตณฺหา รูปตณฺหา สทฺทตณฺหาทิวเสน. จตฺตาริ อุปาทานานิ กามุปาทานาทิวเสนาติ เอวํ ปากฏานิเยว. ‘‘ลกฺขณมตฺตานี’’ติ สงฺขต ธมฺมานํ สงฺขตภาวสลฺลกฺขณ นิมิตฺตมตฺตานิ. ‘‘ญาติพฺยสนาทีหี’’ติ ญาติวินาสนาทีหิ. ‘‘ญาติพฺยสนาทินิมิตฺตํ’’ติ ญาติวินาสนาทิการณา. “दुक्खप्पटिच्छादिका” (दुःख झाकणारी) म्हणजे भयाने युक्त असलेल्या, दुःखभूत अशा त्रैभूमिक (तीन भूमींमधील) धर्मांच्या दुःखभावाला झाकणारी. “समुदयप्पटिच्छादिका” म्हणजे तण्हेच्या (तृष्णेच्या) दुःखसमुदयभावाला (दुःखाच्या उत्पत्तीच्या स्वरूपाला) झाकणारी. “निरोधप्पटिच्छादिका” म्हणजे तण्हानिरोधाच्याच (तृष्णानिरोधाच्याच) दुःखनिरोधभावाला झाकणारी. “मग्गप्पटिच्छादिका” म्हणजे अष्टांगिक मार्गाच्याच दुःखनिरोधमार्गभावाला झाकणारी. “पुब्बन्त” (पूर्व अंत/भूतकाळ) म्हणजे भूतकाळातील भवपरंपरा (अस्तित्वाची साखळी) म्हटली जाते. “अपरन्त” (अपर अंत/भविष्यकाळ) म्हणजे भविष्यकाळातील भवपरंपरा म्हटली जाते. “पुब्बन्तापरन्त” म्हणजे हे दोन्हीही म्हटले जाते. “पटिच्चसमुप्पादप्पटिच्छादिका” म्हणजे वर्तमान भवामध्ये (जन्मामध्ये) खंधांच्या (स्कंधांच्या) पटिच्चसमुप्पादाला (प्रतीत्यसमुत्पादाला) झाकणारी. “सुत्तन्तिकनयेन” (सुत्तन्त पद्धतीनुसार) म्हणजे अभिधम्मातही विभंगामध्ये 'सुत्तन्तभाजनीय' नावाचा भाग आला आहे. त्या सुत्तन्तभाजनीय पद्धतीनुसार. “सासवा (आसवांसह असणारे) कुसल आणि अकुसल चेतना हेच संखारा (संस्कार) होत” अशी येथे योजना (जोडणी) आहे. “अभिधम्मनयेन” म्हणजे विभंगामधील अभिधम्मभाजनीय पद्धतीनुसार. अट्ठकथा पाठात. अविज्जा (अविद्या) ही किरिया (क्रिया) धर्मांसाठी उपनिस्सय (उपनिश्रय) प्रत्ययभाव प्राप्त करत नाही. “कुसल आणि अकुसल मुळे ही किरिया धर्मांसाठी उपनिस्सय प्रत्ययभाव प्राप्त करत नाहीत” अशी योजना आहे. “किरिया धर्म हे अविज्जेपासून आणि कुसल-अकुसल मुळांपासून उपनिस्सय प्रत्यय प्राप्त करत नाहीत” असे म्हटले आहे. “पच्चयाकारो” म्हणजे पटिच्चसमुप्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद). “अविज्जाविरागा” म्हणजे अविज्जेचा नाश झाल्यामुळे. त्या किरिया धर्मांचाही. विञ्ञाण (विज्ञान) इत्यादींमध्येही किरिया विञ्ञाण, किरिया नाम, किरिया मनायतन, किरिया फस्स (स्पर्श), किरिया वेदना यांचे अस्तित्व असल्यामुळे “हाच नय (नियम/पद्धत) विञ्ञाण इत्यादींमध्येही आहे” असे म्हटले आहे. “कुसलाकुसलविपाकविप्पयुत्तं” (किंवा संपयुत्तं) म्हणजे कुसल विञ्ञाण संपयुत्त, अकुसल विञ्ञाण संपयुत्त आणि विपाक विञ्ञाण संपयुत्त. “ते अनुपपन्न (अप्राप्त) आहे” म्हणजे प्रवृत्ती-विपाक-विञ्ञाणासोबत असणाऱ्या तीन खंधांचे आणि त्याच्यासोबत उत्पन्न होणाऱ्या चित्तज रूपाचे अवशिष्ट राहिल्यामुळे ते संपन्न (पूर्ण) झाले नाही, असा अर्थ आहे. कारण तेथे 'विञ्ञाण' या पदामध्ये प्रवृत्तीच्या रूपाने बत्तीस प्रकारचे विपाकचित्त हे 'विञ्ञाण' म्हटले गेले आहे. असे असताना, 'नामरूप' या पदामध्येही प्रवृत्तीच्या रूपाने ते दोन्हीही प्रवृत्ती-विञ्ञाणासोबत असणारेच ग्रहण केले पाहिजेत. “त्या त्या विञ्ञाणाशी संपयुत्त” म्हणजे पटिसंधि-विञ्ञाण (प्रतिसंधी विज्ञान) आणि प्रवृत्ती-विञ्ञाणाशी संपयुत्त. “तण्हा (तृष्णा) आणि उपादान हे स्पष्ट आहेत” म्हणजे रूपतण्हा, सद्दतण्हा (शब्दतृष्णा) इत्यादी रूपाने सहा प्रकारच्या तण्हा; कामुपादान इत्यादी रूपाने चार उपादाने अशा प्रकारे हे स्पष्टच आहेत. “लक्खणमत्तानि” (केवळ लक्षणे) म्हणजे संखत (संस्कारित) धर्मांच्या संखतभावाचे (संस्कारित स्वरूपाचे) निर्धारण करणारी केवळ निमित्तमात्र (चिन्हे) होत. “ञातिब्यसनादीहि” म्हणजे नातेवाइकांच्या विनाशाने इत्यादी. “ञातिब्यसनादिनिमित्तं” म्हणजे नातेवाइकांच्या विनाशादी कारणांमुळे. ‘‘ขนฺธทุกฺเข’’ติ ปจฺจกฺขนฺธสงฺขาเต ทุกฺขสจฺเจ. ขนฺธปฺปวตฺติ มคฺโค นาม ตณฺหาสมุทโย เอว. ขนฺธนิโรธ มคฺโค นาม อริยมคฺโค. ‘‘ขนฺธ สมุทยภูตา’’ติ ขนฺธปฺปวตฺติยา การณภูตา. ‘‘อวิชฺชานิ วุฏานํ’’ติ อวิชฺชายนีวาริตานํ ปิหิตานํ. ‘‘อปฺปหีน ภวาภิลาสานํ’’ติ มคฺเคน อปฺปหีน ภวปตฺถนานํ. อปฺปหีนภวตณฺหานนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘วิพนฺโธ’’ติ อนฺตราโย. ‘‘อุทยภูตานํ’’ติ วฑฺฒิภูตานํ. ‘‘อวสฺสโย’’ติ นิสฺสโย. สุขเวทนา วิเสสโต ตณฺหาย ปจฺจโย โหตีติ วุตฺตํ ‘‘สุขเวทนาสทิโส’’ติอาทิ. โทมนสฺสานํ ปน ตสฺสา ปจฺจยภาโว ปรโต ปริเยฏฺฐิตณฺหายํ ปากโฏ ภวิสฺสติ. อุเปกฺขา เวทนาปิ ทุกฺเขน ปีฬิตสฺส สุขฐาเน ติฏฺฐติ. สุขํ วิย ตํ ปตฺเถตีติ. สมุทา จริตฺวา ปริจยิตฺวา. ‘‘ตณฺหา เอวา’’ติ กามตณฺหา เอว. ‘‘อตฺตนิ จา’’ติ ทิฏฺฐิยญฺจาติ อธิปฺปาโย. ‘‘อตฺตโน อารมฺมเณสู’’ติ อตฺต ชีว โลกาทีสุ ทิฏฺฐิยาคหิตา รมฺมเณสุ. ‘‘อสฺสาทน ขมนโรจนภูตายา’’ติ สาธุวตายํ มมทสฺสนนฺติ เอวํ รชฺชน ตุสฺสน กนฺติภูตาย. ‘‘อุปาทานียสฺสา’’ติ ทฬฺหํ คเหตพฺพสฺส. ‘‘อตฺถสฺสา’’ติ อตฺตโน อตฺตาทิกสฺส อตฺถสฺส. คาถายํ[Pg.252].‘‘ภวํ โหตี’’ติ ภวนฺโต วฑฺฒนฺโต โหติ. ‘‘ปราภโว’’ติ วินาสนฺโต. “खंधदुक्खे” (स्कंधदुःखात) म्हणजे वर्तमान खंधांच्या रूपाने असलेल्या दुःखसच्चात (दुःख सत्यात). खंधांच्या प्रवृत्तीचा (उत्पत्तीचा) मार्ग म्हणजे तण्हा-समुदय (तृष्णा-समुदय) च होय. खंधांच्या निरोधाचा मार्ग म्हणजे अरियमग्ग (आर्य मार्ग) होय. “खंधसमुदयभूता” म्हणजे खंधांच्या प्रवृत्तीला कारणीभूत असणारे. “अविज्जानिवुतानं” म्हणजे अविज्जेने (अविद्येने) झाकलेल्या किंवा रोखलेल्या. “अप्पहीनभवाभिलासानं” म्हणजे मार्गाद्वारे ज्यांची भवप्रार्थना (अस्तित्वाची इच्छा) नष्ट झाली नाही अशा लोकांचे. म्हणजेच ज्यांची भवतण्हा (भवतृष्णा) नष्ट झाली नाही, असे म्हटले आहे. “विबंधो” म्हणजे अंतराय (अडथळा). “उदयभूतानं” म्हणजे वृद्धीस पावणाऱ्या. “अवस्सयो” म्हणजे निस्सय (आश्रय/आधार). सुखवेदना ही विशेषतः तण्हेचा (तृष्णेचा) प्रत्यय (कारण) बनते, म्हणूनच “सुखवेदनासदृश” इत्यादी म्हटले आहे. परंतु, दोमनस्सांचा (दौर्मनस्यांचा) तिच्यासाठी प्रत्ययभाव (कारणभाव) पुढे शोध-तण्हेमध्ये (परियेद्विट्ठि-तण्हा) स्पष्ट होईल. उपेक्खा (उपेक्षा) वेदना देखील दुःखाने पीडित असलेल्या व्यक्तीसाठी सुखाच्या ठिकाणी असते. तो सुखाप्रमाणेच तिची इच्छा करतो. समुदाचरित्वा म्हणजे आचरण करून किंवा परिचय करून. “तण्हा एव” म्हणजे कामतण्हा (कामतृष्णा) च होय. “अत्तनि च” (स्वतःमध्ये) म्हणजे दिठ्ठिमध्ये (दृष्टीमध्ये) असा अभिप्राय आहे. “अत्तनो आरम्मणेsu” (स्वतःच्या आलंबनांमध्ये) म्हणजे आत्मा, जीव, लोक इत्यादींविषयी दृष्टीने ग्रहण केलेल्या आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये). “अस्सादनखमनरोचनभूताया” म्हणजे “हे चांगले आहे, हे माझे दर्शन आहे” अशा प्रकारे आसक्ती, संतोष आणि प्रियता निर्माण करणाऱ्या. “उपादानीयस्स” म्हणजे दृढतेने ग्रहण करण्यायोग्य असलेल्याचे. “अत्थस्स” म्हणजे स्वतःच्या आत्म-इत्यादी अर्थाचे (हिताचे). गाथेमध्ये. “भवं होति” म्हणजे उत्पन्न होणारा, वाढणारा होतो. “पराभवो” म्हणजे विनाश पावणारा. ‘‘อทฺธานวนฺเต ธมฺเม’’ติ เตกาลิกสงฺขต ธมฺเม. อปตมาเน กตฺวาติ ปาฐเสโส. ยถา อุปาทานํติ ทิสฺวา อุปาทารูปํติ ปเท อาทาสทฺโท วิญฺญายติ. น อุปุพฺพ ปทสทฺโท. อิตรถา อุปาทานนฺติ นสิชฺฌติ. เอวํ อทฺธา, อทฺธาน, ปเทสุปิ. เตนาห ‘‘อทฺธานํ’’ติ นสิชฺฌตีติ. สํขิปนฺติ วีสตาการา เอเตสูติ สงฺเขปา. สงฺคหา. ‘‘วฏฺฏธมฺมา’’ติ สงฺขาราทโย ธมฺมา. ‘‘เอตฺถา’’ติ เอตาสุ อวิชฺชาตณฺหาสุ. กถํ ติฏฺฐนฺตีติ อาห ‘‘ตทายตฺตวุตฺติตายา’’ติ. ‘‘ปติฏฺฐา’’ติ สุปฺปติฏฺฐิตฏฺฐานานิ. ‘‘ปภวา’’ติ วฏฺฏธมฺมปรมฺปรปฺปวตฺติยา มูล ปธาน การณานิ. ตตฺถ เหตุ จ เทเสตพฺโพ โหติ. อิตรถา อิสฺสรนิมฺมานทิฏฺฐิ อเหตุก ทิฏฺฐีนํ โอกาโส สิยาติ. ผลญฺจ เทเสตพฺพํ โหติ. อิตรถา อุจฺเฉททิฏฺฐิยา โอกาโส สิยาติ. ‘‘อทฺธุโน’’ติ ทีฆกาลสฺส. ‘‘นิวตฺเตตี’’ติ สมุจฺฉินฺทติ. ‘‘อเหตู อปจฺจยา สตฺตา ปวตฺตนฺตี’’ติ ปุพฺพเหตุรหิตา ปุพฺพปจฺจยรหิตา หุตฺวา อิเมสตฺตา ปวตฺตนฺติ. ‘‘อวิชฺชาทีหิ สาเธตพฺโพ น โหตี’’ติ ภวปรมฺปราสุ นิจฺโจ หุตฺวา สนฺธาวนฺตสฺส อวิชฺชาทีหิ กตฺตพฺพ กิจฺจํ น โหตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘เกสญฺจิ น สมฺภวนฺติเยวา’’ติ อนาคามีนํ อรหนฺตานญฺจ น สมฺภวนฺติเยว. มหาอาทีนวราสิทสฺสนตฺถํ โสกาทิวจนํ โหตีติ โยชนา. ‘‘เตสํ’’ติ อญฺเญสํ ปจฺจยานํ. ‘‘ลทฺธา’’ติ อตฺถโต ลทฺธา. ‘‘ตทวินาภาวิภาวลกฺขเณนา’’ติ เอตฺถ เตน เตน ปจฺจเยน อวินาภาวีนํ ภาโว, โส เอว ลกฺขณนฺติ วิคฺคโห. ‘‘ปรตฺถ ปี’’ติ อิโต ปเรสุ ตณฺหุปาทาน ภวคฺคหเณนาติอาทีสุปิ. ‘‘อาทิโต’’ติอาทิมฺหิ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘กิเลสภาวสามญฺญโต’’ติ กิเลสภาเวน สมานตฺตา สทิสตฺตา. ‘‘ลกฺขิตพฺพ ธมฺเมหี’’ติ วิญฺญาณาทีหิ. ‘‘ปถเมน ทุตียสฺสา’’ติ ปถมสงฺเขเปน สทฺธึ ทุตียสฺส สงฺเขปสฺส เอกา สนฺธีติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘โลกสฺส ปากฏ โวหาเรนา’’ติ [Pg.253] กิเลสธมฺมา กมฺมธมฺมา จ โลเก เหตูติ ปากฏา โหนฺติ. วิปากธมฺมา ปน ผลนฺติ ปากฏา. เอวํ โลเก ปากฏ โวหาเรน. อิธ ปน กิเลสธมฺมกมฺมธมฺมา วา โหนฺตุ, วิปากธมฺมา วา, โย โย ปจฺจยปกฺเข ฐิโต, โส โส เหตูติปิ วตฺตพฺโพเยว. โย โย ปจฺจยุปฺปนฺน ปกฺเข ฐิโต, โส โส ผลนฺติทสฺเสนฺโต ‘‘เหตุผลสทฺทาปนา’’ติอาทิมาห. อฏฺฐกถา ปาเฐ. ‘‘สชฺชนฺตสฺสา’’ติ สํวิทหนฺตสฺส. ‘‘อายูหน สงฺขารา นามา’’ติอาทิโต ปฏฺฐาย สมุจฺจยนสงฺขารา นาม. ‘‘ทกฺขิณํ’’ติ ทานวตฺถุํ. ทกฺขิโณทกํ วา. ‘‘เอตฺถ จา’’ติ อิมสฺมึ ตตียปญฺจเก จ. ‘‘วุตฺตนเยเน วา’’ติ ปถมปญฺจเก วุตฺตนเยเนว. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘อายตึ ปฏิสนฺธิยา ปจฺจยเจตนา ภโว นามา’’ติ อิทํ อุทฺเทสปาฬิยํ ยถาทิฏฺฐปาฐวเสเนว วุตฺตํ. ตถา ปุริมกมฺมภวสฺมึ อิธ ปฏิสนฺธิยา ปจฺจยเจตนา สงฺขารา นามาติ อิทญฺจ. อิธ ปน ปุพฺเพเยว ทฺวีสุเหตุปญฺจเกสุ ทฺวินฺนํ สงฺขาร กมฺมภวานํ สงฺคหิตตฺตา อฏฺฐกถายํ วุตฺตนเยเนว ทฺวินฺนํ สงฺขาร กมฺมภวานํ วิเสโส ยุตฺโต. เตนาห ‘‘ตํ อิธ น ยุชฺชตี’’ติ. ‘‘สงฺคหิตตฺตา’’ติ ปุพฺเพเยว สงฺคหิตตฺตา. ‘‘เอตํ’’ติ วิภาวนิ วจนํ. ‘‘ธมฺมวิภาครกฺขณตฺถํ’’ติ วิภงฺเค ภวปเท อุปปตฺติภวสฺสปิ วิภตฺตตฺตา เอวํ วิภตฺตสฺส ธมฺมวิภาคสฺส รกฺขณตฺถํ. ผลปญฺจกโต อนญฺญํปิ อุปปตฺติภวํ อญฺญํวิย กตฺวา ‘อุปปตฺติภวสงฺขาโต ภเวกเทโส’ติ วุตฺตํ. โส จ อุปปตฺติภโว นาม ปจฺจุปฺปนฺนเหตูหิ นิพฺพตฺตตฺตา จตุตฺเถ ผลปญฺจเก เอว สงฺคหิโต. ตสฺมา เตน อุปปตฺติภวสทฺเทน จตุตฺถ ปญฺจกเมว คหิตนฺติ ยุตฺตํ. อิตรถา ทฺเว ผลปญฺจกานิ วิปากวฏฺฏนฺติ วุตฺเต สิทฺธเมว โหติ. เอวญฺจสติ อวเสสา จาติ เอตฺถ ทุตียผลปญฺจกเมว อวสิฏฺฐํ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘อวิชฺชา นาม โมโห, โส จ อกุสล มูล’’นฺติอาทิ อภิธมฺเม มูลยมเก มูลนาเมน อาคตตฺตา วุตฺตํ. ทฺวีสุปนภว จกฺเกสุ ปุริมจกฺเก อวิชฺชา อาทิ โหติ. ปจฺฉิมจกฺเก ตณฺหา. อาทิ จ นาม มูลนฺติ จ สีสนฺติ จ วตฺตุํ วฏฺฏตีติ ปริยายํ ทสฺเสตุํ ‘‘อถวา’’ติอาทิ วุตฺตํ[Pg.254].‘‘อาคมนสมฺภาเรสู’’ติ อตีตภวโต อิมํภวํ อาคมนสมฺภาเรสุ. ตณฺหา เอว สีสํ กตฺวา วุตฺตาติ โยชนา. ‘‘เตสํ อนฺตเร’’ติ อวิชฺชาสงฺขารานํ อนฺตเร. ตณฺหาย โอกาโส นตฺถีติ กสฺมา วุตฺตํ. นนุ อวิชฺชาย สติ, ตณฺหา นาม เอกนฺเตน สมฺภวติเยว. สา จ สงฺขารานํ พลวปจฺจโย โหติ. ตสฺมา สา อวิชฺชา ปจฺจยา ตณฺหา, ตณฺหา ปจฺจยา สงฺขาราติ วตฺตพฺพา สิยาติ. ตํ ปริหริตุํ ‘‘อยญฺหี’’ติอาทิวุตฺตํ. ปฏิโลมปฏิจฺจสมุปฺปาโท นาม อวิชฺชานิโรธา สงฺขารนิโรโธติ เอวํ ปวตฺโต ปฏิจฺจสมุปฺปาโท. ‘‘ชรามรณมุจฺฉยาติอาทิ นวตฺตพฺพํ สิยา’’ติ ชรามรณมุจฺฉายาติอาทิวจนํ อนุโลมปฏิจฺจสมุปฺปาท สมฺพนฺธ วจนนฺติ กตฺวา วุตฺตํ. ‘‘อุปริวฏฺฏมูล ธมฺมปฺปฏิปาทกานํ’’ติ อุปริ ทุติยานาคตภาวาทีสุ อวิชฺชาตณฺหา สงฺขาตานํ วฏฺฏมูลธมฺมานํ นิโยชกานํ. ‘‘เต ปี’’ติ โสกาทโย ทุกฺขธมฺมาปิ. ‘‘อาสวสมฺภูตา’’ติ อาสเวหิ สมฺภูตา สญฺชาตา. ‘‘เตสํ’’ติ โสกาทีนํ ทุกฺขธมฺมานํ. ‘‘ชรามรณงฺเค คหณํ’’ติ ทฺวาทสสุ องฺเคสุ ชรามรณงฺเค สงฺคหณํ. ‘‘ปวฑฺฒตี’’ติ ภุสํ วฑฺฒติ. ‘‘อาสวสมุทยา’’ติ อาสวสมุปฺปาทา. ‘‘อวิชฺชาสมุทโย’’ติ อวิชฺชาสมุปฺปาโท. ‘‘อวิชฺชาปจฺจยาสงฺขาราตี’’ติ เอตฺถ อิติสทฺโท อาทิอตฺโถ. ‘‘นานาพฺยสน ผุฏฺฐสฺสา’’ติ ญาติพฺยสนาทีหิ นานาพฺยสเนหิ ผุฏฺฐสฺส, วิหึสิตสฺส. ‘‘ยโต’’ติ ยํ การณา, อวิชฺชาตณฺหานํ วฑฺฒนการณา. ‘‘วฏฺฏํ’’ติ สงฺขาราทิกํ ภวจกฺกํ. สํมุยฺหนํ สมฺโมโห. ปริเยสนํ ปริเยฏฺฐิ. วิปจฺจตีติ วิปาโก. วิปาโก เอว เวปกฺกํ. สมฺโมโห เวปกฺกํ อสฺสาติ สมฺโมหเวปกฺกํ. ตถา ปริเยฏฺฐิเว ปกฺกญฺจาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘ตทุภยํ’’ติอาทินา. ตทุภยํ วิปากํ เอตสฺสาติ กตฺวา ทุกฺขํ สมฺโมหเวปกฺกนฺติ จ ปริเยฏฺฐิเวปกฺกนฺติ จ วุจฺจตีติ โยชนา. อปิ จ, สมฺโมหํ วิปาเจติ สญฺชเนตีติ สมฺโมห เวปกฺกํ. เอวํ ปริเยฏฺฐิเวปกฺกนฺติปิ ยุชฺชติ. ‘‘กิจฺฉํ’’ติ กสิรํ ทุกฺขํ อาปนฺโน. ‘‘มิยฺยตี’’ติ มรติ. ‘‘จ วตี’’ติ สงฺกมติ. ‘‘อุปปชฺชตี’’ติ ภวนฺตรํ อุเปติ. ‘‘อถ จ ปนา’’ติ เอวํภูตสฺส [Pg.255] สโต. ‘‘ชรามรณสฺสา’’ติ ชรามรณ สงฺขาตสฺส อิมสฺส ทุกฺขสฺสาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นิสฺสรณํ’’ติ นิคฺคมนํ. ‘‘นปฺปชานาตี’’ติ อยํ โลโก นปฺปชานาติ. ‘‘อาคติยา’’ติ อิมสฺมึ ภเว ปฏิสนฺธิวิญฺญาณุปฺปตฺติวเสน อาคมเนน. ‘‘คติยา จา’’ติ อนาคตภเว ชาติปาตุพฺภาววเสน คมเนน จ. อาทิสงฺขาโต ปุพฺพปริยนฺโต ยสฺส อตฺถีติอาทิมนฺตํ. น อาทิมนฺตํ อนาทิมนฺตํ. ‘‘วฏฺฏปฺปวตฺตสฺสา’’ติ ติวิธวฏฺฏสงฺขาตสฺส ปพนฺธปฺปวตฺตสฺส. ชาติยา วุตฺตาย สพฺพานิ ตสฺสา นิทานานิ วุตฺตานิ เอว โหนฺตีติ กตฺวา ‘‘ชาติยา เอว วา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘อิจฺเจวํ’’ติ อิติ เอวํ. ตตฺถ อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขาราติอาทินา นเยน ปฏฺฐเปสิ มหามุนีติ สมฺพนฺโธ. อาจริย วาเทปน ‘‘อิจฺเจวํ’’ติ ชรามรณ มุจฺฉายาติอาทินานเยน. อาพนฺธํ อนาทิกนฺติ สมฺพนฺโธ. อิธปิ ตเมว สมฺพนฺธํ คเหตฺวา โยเชติ ‘‘อิจฺเจวํ อาพนฺธนฺติ. ล. ปุนปฺปุนํ อาพนฺธํ’’ติ. อวิชฺชา อาทิมฺหิ วุตฺตา. ตสฺมา สา สยํ อเหตุ อปจฺจยา หุตฺวา วฏฺฏสฺส อาทิปจฺจยภูตา โหตีติ โจทนา. ตํ ปริหรติ ‘‘วฏฺฏสฺสา’’ติอาทินา. ‘‘วฏฺฏกถาย สีสภูตตฺตา’’ติ วฏฺฏสฺส อาทินาม นตฺถิ. ตสฺส ปน ปวตฺติ นิวตฺติโย อตฺถิ. ชานนฺเตหิ ตาสํ ปกาสนตฺถาย ปฏิจฺจสมุปฺปาทกถานาม วฏฺฏกถา เอกนฺเตน กเถตพฺพา โหติ. กเถนฺเตหิ จ วฏฺฏธมฺมานํ มชฺเฌ กตมสฺส ธมฺมสฺส กิจฺจํ วฏฺฏปฺปวตฺตตฺถาย ปธานตรํ โหตีติ ชานิตพฺพํ โหติ. ตทา กิจฺจวเสน ปธานตรํ เอกํ ธมฺมํ มูลํ สีสํ กตฺวา วฏฺฏกถา กเถตพฺพาติ. อิทํ วฏฺฏกถาย สีสํ นาม. ตตฺถ อวิชฺชา นาม โมโห. โส จ มุยฺหนกิริยา. อนฺธภาวกรณญฺจสฺส กิจฺจํ. น จ ปญฺญา จกฺขุสฺส อนฺธภาวกรณ สทิสํ อญฺญํ วฏฺฏสฺส ปวตฺตตฺถาย ปธานกิจฺจํ นาม อตฺถิ. ตสฺมา อวิชฺชา เอเวตฺถ สพฺพปฺปธาน กิจฺจตฺตา วฏฺฏกถาย สีสภูตา โหติ. เอวํ วฏฺฏกถาย สีสภูตตฺตา สา อาทิมฺหิ วุตฺตาติ. ‘‘อนาทิกภาโว เอว ทสฺสิโต’’ติ อนาทิกภาโว ทสฺสิโต เอว. โน น ทสฺสิโตติ อตฺโถ. อิติ เอตํ อตฺถชาตํ ปจฺจกฺขโต สิทฺธํ. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึภเว. ‘‘ตสฺสา’’ติ อตีต ภวปริยาปนฺนาย [Pg.256] อวิชฺชาย. ‘‘อญฺญาย อวิชฺชาย เอวา’’ติ อตีตภวโตปิ ปุริมภเว สิทฺธาย อญฺญาย อวิชฺชาย เอว. ‘‘ตสฺสาปี’’ติ ปุริมตรภเว อวิชฺชายปิ. ‘‘อตฺตภาโว’’ติ ปุริมตโร อตฺตภาโว. ‘‘ปธาน ปจฺจยภูตตฺตา’’ติ ปุพฺเพ วุตฺตนเยน อนฺธภาวกรณ กิจฺจตฺตา วฏฺฏปฺปวตฺติยา ปธาน ปจฺจยภูตา โหติ. เอวํ ปธานปจฺจยภูตตฺตา. ‘‘ตสฺส ตสฺสาติ นิฏฺฐานเมว น ปญฺญาเยยฺยา’’ติ ตสฺส ปจฺจยสฺส ปจฺจโย วตฺตพฺโพ. ตสฺสปิ ปจฺจยสฺส ปจฺจโย วตฺตพฺโพติ เอวํ วสฺสสตมฺปิ วสฺสสหสฺสํปิ นิฏฺฐานเมว น ปญฺญาเยยฺย. ‘‘วุตฺโตเยวา’’ติ อวิชฺชาย ปจฺจโย วุตฺโตเยว. ‘‘ปญฺจนีวรณาติสฺสวจนียํ’’ติ ปญฺจนีวรณ ธมฺมา อวิชฺชาย อาหาโรติ วจนียํ ภเวยฺย. ตตฺถ ‘‘อาหาโร’’ติ พลวปจฺจโย วุจฺจตีติ. ‘अद्धानवन्ते धम्मे’ म्हणजे त्रैकालिक संस्कारित (संस्कृत) धर्म. ‘अपतमाने कत्वा’ (पतन न पावणारे करून) हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. जसे ‘उपादानं’ पाहून ‘उपादारूपं’ या पदात ‘आदा’ हा शब्द समजला जातो, ‘उ’ हा पूर्वपद शब्द नाही. अन्यथा ‘उपादानं’ सिद्ध होत नाही. अशाच प्रकारे ‘अद्धा’, ‘अद्धान’ या पदांमध्येही आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - ‘अद्धानं’ हे सिद्ध होत नाही. ज्यांच्यामध्ये वीस आकार (प्रकार) संकुचित (एकत्रित) केले जातात, ते ‘संक्षेप’ (संक्षिप्त संग्रह) होत. ‘वट्टधम्मा’ (संसारचक्राचे धर्म) म्हणजे संस्कार इत्यादी धर्म. ‘एत्थ’ (येथे) म्हणजे या अविद्या आणि तृष्णांमध्ये. ते कसे टिकून राहतात? म्हणून म्हटले आहे - ‘तदायत्तवृत्तिताय’ (त्यांच्यावर अवलंबून राहण्याच्या वृत्तीमुळे). ‘पतिट्ठा’ (प्रतिष्ठा/आधार) म्हणजे सुप्रतिष्ठित स्थाने. ‘पभवा’ (प्रभव/उत्पत्तीची कारणे) म्हणजे संसारधर्माच्या परंपरेच्या प्रवृत्तीची मूळ आणि मुख्य कारणे. तेथे हेतूचाही उपदेश केला पाहिजे. अन्यथा ईश्वरनिर्मितीची दृष्टी (ईश्वरनिर्मितीवाद) आणि अहेतुक दृष्टी (अहेतुकवाद) यांना वाव मिळेल. आणि फळाचाही उपदेश केला पाहिजे. अन्यथा उच्छेददृष्टीला (उच्छेदवादाला) वाव मिळेल. ‘अद्धुनो’ म्हणजे दीर्घकाळाचा. ‘निवत्तेति’ (निवृत्त करतो) म्हणजे समूळ नष्ट करतो. ‘अहेतू अपच्चया सत्ता पवत्तन्ति’ (हेतू आणि प्रत्ययाशिवाय प्राणी प्रवृत्त होतात) म्हणजे पूर्वहेतूशिवाय आणि पूर्वप्रत्ययाशिवाय होऊन हे प्राणी प्रवृत्त होतात. ‘अविद्यादीहि साधेतब्बो न होति’ (अविद्या इत्यादींद्वारे सिद्ध होणारा नसतो) याचा अभिप्राय असा आहे की, भवपरंपरेमध्ये नित्य होऊन संसरण करणाऱ्या प्राण्याचे अविद्या इत्यादींद्वारे कर्तव्य कार्य उरत नाही. ‘केसञ्चि न सम्भवन्तियेव’ (काहींना मुळीच संभवत नाही) म्हणजे अनागामी आणि अर्हतांना ते मुळीच संभवत नाहीत. मोठ्या आदीनवाचा (दोषांचा) समूह दाखवण्यासाठी शोक इत्यादींचे वचन आहे, अशी योजना आहे. ‘तेसं’ (त्यांच्या) म्हणजे इतर प्रत्ययांच्या (कारणांच्या). ‘लद्धा’ (प्राप्त करून) म्हणजे अर्थतः प्राप्त करून. ‘तदविनाभाविभावलक्खणेन’ येथे त्या त्या प्रत्ययाशी अविनाभावी असणाऱ्यांचा भाव, तोच लक्षण असा विग्रह आहे. ‘परत्थ पि’ (दुसऱ्या ठिकाणीही) म्हणजे यापुढील तृष्णा, उपादान आणि भव यांच्या ग्रहणाने इत्यादींमध्येही. ‘आदितो’ म्हणजे सुरुवातीला, विभावनी पाठात. ‘किलेसभावसामञ्ञतो’ (क्लेशभावाच्या समानतेमुळे) म्हणजे क्लेशभावाने समान असल्यामुळे, सदृश असल्यामुळे. ‘लक्खितब्ब धम्मेहि’ (लक्षित होणाऱ्या धर्मांद्वारे) म्हणजे विज्ञान इत्यादींद्वारे. ‘पठमेन दुतीयस्स’ (पहिल्याने दुसऱ्याचा) म्हणजे पहिल्या संक्षेपासोबत दुसऱ्या संक्षेपाची एक संधी आहे, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. ‘लोकस्स पाकट वोहारेन’ (लोकांच्या प्रकट व्यवहाराने) म्हणजे क्लेशधर्म आणि कर्मधर्म हे लोकात ‘हेतू’ म्हणून प्रसिद्ध आहेत. विपाकधर्म मात्र ‘फळ’ म्हणून प्रसिद्ध आहेत. अशा प्रकारे लोकात प्रकट व्यवहाराने. परंतु येथे क्लेशधर्म असो वा कर्मधर्म असो, किंवा विपाकधर्म असो, जो जो प्रत्ययपक्षात (कारणाच्या पक्षात) स्थित आहे, त्याला ‘हेतू’ असेच म्हटले पाहिजे. आणि जो जो प्रत्ययोत्पन्न पक्षात (कार्यांच्या पक्षात) स्थित आहे, तो ‘फळ’ आहे, असे दर्शवताना “हेतुफलसद्दापना” इत्यादी म्हटले आहे, अट्ठकथा पाठात. ‘सज्जन्तस्य’ म्हणजे संपादन करणाऱ्याचे. ‘आयुहन सङ्खारा नामा’ इत्यादीपासून सुरुवात करून गोळा करणारे (समुच्चयन) संस्कार होत. ‘दक्खिणं’ म्हणजे दानवस्तू किंवा दक्षिणोदक (दानाचा संकल्प सोडण्याचे पाणी). ‘एत्थ च’ (आणि येथे) म्हणजे या तिसऱ्या पंचकातही. ‘वृत्तनयेन वा’ म्हणजे पहिल्या पंचकात सांगितलेल्या पद्धतीनेच, विभावनी पाठात. ‘आयतिं पटिसन्धिया पच्चयचेतना भवो नाम’ (भविष्यातील प्रतिसंधीसाठी कारणीभूत असणारी चेतना म्हणजे ‘भव’ होय) हे उद्देसपाळीमध्ये जसा पाठ आढळतो त्यानुसारच म्हटले आहे. तसेच “पूर्वीच्या कर्मभवामध्ये येथील प्रतिसंधीसाठी कारणीभूत असणारी चेतना म्हणजे ‘संस्कार’ होय” हे देखील. परंतु येथे आधीच दोन हेतूपंचकांमध्ये संस्कार आणि कर्मभव या दोघांचा संग्रह केल्यामुळे, अट्ठकथेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच संस्कार आणि कर्मभव या दोघांमधील भेद योग्य ठरतो. म्हणूनच म्हटले आहे - “तं इध न युज्जति” (ते येथे योग्य ठरत नाही). ‘सङ्गहितत्ता’ म्हणजे आधीच संग्रहित केल्यामुळे. ‘एतं’ हे विभावनीचे वचन आहे. ‘धम्मविभागरक्खणत्थं’ (धर्मविभागाच्या रक्षणासाठी) म्हणजे विभंगामध्ये ‘भव’ पदात उपपत्तिभवाचेही विभाजन केले असल्यामुळे, अशा प्रकारे विभाजित केलेल्या धर्मविभागाच्या रक्षणासाठी. फळपंचकापेक्षा अभिन्न असणाऱ्याही उपपत्तिभवाला भिन्न असल्यासारखे करून ‘उपपत्तिभव नावाचा भवाचा एक भाग’ असे म्हटले आहे. आणि तो उपपत्तिभव वर्तमानकाळातील हेतूंमुळे उत्पन्न होत असल्यामुळे चौथ्या फळपंचकातच संग्रहित केला आहे. म्हणून त्या ‘उपपत्तिभव’ शब्दाने चौथे पंचकच ग्रहण केले आहे, हे योग्य आहे. अन्यथा “दोन फळपंचके म्हणजे विपाकवृत्त (विपाकवट्ट) होय” असे म्हटले असता ते सिद्धच होते. असे असताना ‘अवसेसा च’ (आणि उर्वरित) येथे दुसरे फळपंचकच शिल्लक राहते, असे समजावे. “अविद्या म्हणजे मोह आणि तो अकुशल मूळ आहे” इत्यादी अभिधम्मातील ‘मूलयमक’ मध्ये मूळ या नावाने आल्यामुळे म्हटले आहे. दोन भवचक्रांमध्ये पहिल्या चक्रात अविद्या ही ‘आदी’ (सुरुवात) असते, आणि दुसऱ्या चक्रात तृष्णा. ‘आदी’ ला ‘मूळ’ आणि ‘शीर्ष’ (प्रमुख) असे म्हणणे योग्य आहे, हा पर्याय दर्शवण्यासाठी “अथवा” इत्यादी म्हटले आहे. ‘आगमनसम्भारेसु’ म्हणजे भूतकाळातील भवातून या भवात यायच्या सामग्रीमध्ये. तृष्णेलाच मुख्य (शीर्ष) करून म्हटले आहे, अशी योजना आहे. ‘तेसं अन्तरे’ म्हणजे अविद्या आणि संस्कार यांच्यामध्ये. तृष्णेला वाव नाही, असे का म्हटले आहे? अविद्या असताना तृष्णा ही निश्चितपणे संभवतेच. आणि ती संस्कारांचे प्रबळ कारण (बलवप्रत्यय) असते. म्हणून “अविद्या प्रत्ययाने तृष्णा, आणि तृष्णा प्रत्ययाने संस्कार” असे म्हटले पाहिजे. त्याचे निराकरण करण्यासाठी “अयञ्हि” (हा खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. प्रतिलोम प्रतीत्यसमुत्पाद म्हणजे “अविद्या निरोधाने संस्कार निरोध होतो” अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेला प्रतीत्यसमुत्पाद होय. “जरामरणमुच्छया” इत्यादी म्हणता येणार नाही, कारण “जरामरणमुच्छाया” इत्यादी वचन अनुलोम प्रतीत्यसमुत्पादाशी संबंधित वचन मानून म्हटले आहे. ‘उपरिवट्टमूलधम्मप्पतिपादकानं’ म्हणजे पुढील दुसऱ्या अनागत भवांमध्ये अविद्या आणि तृष्णा नावाच्या संसार-मूळ-धर्मांचे नियोजन करणाऱ्यांचे. ‘ते पि’ म्हणजे शोक इत्यादी दुःखधर्म देखील. ‘आसवसम्भुता’ म्हणजे आसवांपासून उत्पन्न झालेले, निर्माण झालेले. ‘तेसं’ म्हणजे शोक इत्यादी दुःखधर्मांचे. ‘जरामरणङ्गे गहणं’ म्हणजे बारा अंगांमध्ये जरामरण या अंगात संग्रह करणे. ‘पवड्ढति’ म्हणजे वेगाने वाढते. ‘आसवसमुदया’ म्हणजे आसवांच्या उत्पत्तीमुळे. ‘अविद्यासमुदयो’ म्हणजे अविद्येची उत्पत्ती. ‘अविद्यापच्चया सङ्खाराति’ येथे ‘इति’ शब्द ‘इत्यादी’ या अर्थाने आहे. ‘नानाब्यसन फुट्टस्स’ म्हणजे ज्ञातिव्यसन इत्यादी विविध व्यसनांनी (संकटांनी) ग्रासलेल्या, पीडित झालेल्याचे. ‘यतो’ म्हणजे ज्या कारणाने, अविद्या आणि तृष्णा यांच्या वाढीच्या कारणाने. ‘वट्टं’ म्हणजे संस्कार इत्यादींचे भवचक्र. संमोहन म्हणजे संमोह (भ्रम). शोध घेणे म्हणजे परियेट्ठि (पर्येषणा). परिपक्व होणे म्हणजे विपाक. विपाक म्हणजेच वैपक्क (विपाकाची अवस्था). ज्याचा विपाक संमोह आहे तो ‘संमोहवेपक्क’ होय. तसेच ‘परियेट्ठिवेपक्क’ देखील. हा अर्थ दर्शवण्यासाठी “तदुभयं” इत्यादी म्हटले आहे. ते दोन्ही ज्याचे विपाक आहेत, म्हणून दुःखाला ‘संमोहवेपक्क’ आणि ‘परियेट्ठिवेपक्क’ असे म्हटले जाते, अशी योजना आहे. शिवाय, जे संमोहाला परिपक्व करते (उत्पन्न करते) ते ‘संमोहवेपक्क’ होय. अशाच प्रकारे ‘परियेट्ठिवेपक्क’ देखील योग्य ठरते. ‘किच्छं’ म्हणजे कष्टाला, दुःखाला प्राप्त झालेला. ‘मिय्यति’ म्हणजे मरतो. ‘चवति’ म्हणजे च्युत होतो (एका भवातून दुसऱ्या भवात संक्रमण करतो). ‘उपपज्जति’ म्हणजे दुसऱ्या भवात उत्पन्न होतो. “अथ च पना” म्हणजे असे असतानाही. ‘जरामरणस्स’ म्हणजे जरामरण नावाच्या या दुःखाचा, असा संबंध आहे. ‘निस्सरणं’ म्हणजे सुटका (बाहेर पडणे). ‘नप्पजानाति’ म्हणजे हा लोक जाणत नाही. ‘आगतिया’ म्हणजे या भवामध्ये प्रतिसंधी विज्ञानाच्या उत्पत्तीद्वारे येण्याने. ‘गतिया च’ म्हणजे अनागत (भविष्यातील) भवामध्ये जातीच्या (जन्माच्या) प्रादुर्भावामुळे जाण्याने. ज्याला ‘आदी’ नावाचा पूर्व अंत (सुरुवात) आहे ते ‘आदिमंत’ होय. ज्याला आदी नाही ते ‘अनादिमंत’ होय. ‘वट्टपवत्तस्स’ म्हणजे त्रिविध वट्ट (क्लेशवट्ट, कम्मवट्ट, विपाकवट्ट) नावाच्या निरंतर प्रवृत्तीचे. जाती (जन्म) सांगितली असता तिची सर्व निदाने (कारणे) सांगितलीच जातात, म्हणून “जातिया एव वा” (किंवा जातीचेच) असे म्हटले आहे. ‘इच्चेवं’ म्हणजे अशा प्रकारे. तेथे “अविद्याप्रत्ययाने संस्कार” इत्यादी पद्धतीने महामुनींनी प्रस्थापित केले, असा संबंध आहे. आचार्यवादात (आचार्यांच्या मतात) मात्र “इच्चेवं” म्हणजे जरामरणमुच्छा इत्यादी पद्धतीने. “आबंध अनादी आहे” असा संबंध आहे. येथेही तोच संबंध घेऊन योजना करतात - “अशा प्रकारे आबंध... पे... वारंवार आबंध”. अविद्या सुरुवातीला सांगितली आहे. म्हणून ती स्वतः हेतू आणि प्रत्ययाशिवाय होऊन संसाराचे (वट्टाचे) आदि-कारण बनते, असा आक्षेप (चोदना) आहे. त्याचे परिहार (निराकरण) “वट्टस्स” इत्यादींद्वारे करतात. ‘वट्टकथाय सीसभूतत्ता’ (संसार कथेचे मुख्य/शीर्ष असल्यामुळे) संसाराला ‘आदी’ (सुरुवात) असे काही नाही. परंतु त्याची प्रवृत्ती आणि निवृत्ती असते. जाणणाऱ्यांनी ती प्रकट करण्यासाठी प्रतीत्यसमुत्पाद कथा नावाची वट्टकथा (संसारकथा) निश्चितपणे सांगितली पाहिजे. आणि ती सांगताना वट्टधर्मांमध्ये कोणत्या धर्माचे कार्य संसारप्रवृत्तीसाठी अधिक मुख्य आहे, हे जाणून घेतले पाहिजे. तेव्हा कार्याच्या दृष्टीने अधिक मुख्य असणाऱ्या एका धर्माला मूळ किंवा शीर्ष करून वट्टकथा सांगितली पाहिजे. यालाच ‘वट्टकथेचे शीर्ष’ म्हणतात. त्यात अविद्या म्हणजे मोह होय. आणि ती संमोहित करण्याची क्रिया आहे. आणि अंधत्व निर्माण करणे हे तिचे कार्य आहे. आणि प्रज्ञाचक्षूला अंध करण्यासारखे संसाराच्या प्रवृत्तीसाठी दुसरे कोणतेही मुख्य कार्य नाही. म्हणून अविद्याच येथे सर्वप्रमुख कार्य करणारी असल्यामुळे वट्टकथेचे शीर्ष बनते. अशा प्रकारे वट्टकथेचे शीर्ष असल्यामुळे ती सुरुवातीला सांगितली आहे. “अनादिकभावो एव दस्सितो” म्हणजे अनादिपणा दर्शवलाच आहे. दर्शवला नाही असे नाही, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे हा अर्थ प्रत्यक्ष सिद्ध होतो. ‘इध’ म्हणजे या भवामध्ये. ‘तस्सा’ म्हणजे भूतकाळातील भवात समाविष्ट असलेल्या अविद्येचे. ‘अञ्ञाय अविज्जाय एव’ म्हणजे भूतकाळातील भवापेक्षाही पूर्वीच्या भवात सिद्ध असलेल्या दुसऱ्या अविद्येचेच. ‘तस्सापि’ म्हणजे त्याहूनही पूर्वीच्या भवातील अविद्येचेही. ‘अत्तभावो’ म्हणजे त्याहूनही पूर्वीचा आत्मभाव (अस्तित्व). ‘पधानपच्चयभूतत्ता’ म्हणजे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीने अंधत्व निर्माण करण्याचे कार्य असल्यामुळे ती संसारप्रवृत्तीचे मुख्य कारण (प्रधान प्रत्यय) बनते. अशा प्रकारे मुख्य कारण असल्यामुळे. “तस्स तस्साति निट्ठानामेव न पञ्ञायेय्य” म्हणजे त्या प्रत्ययाचे कारण सांगितले पाहिजे, त्या कारणाचेही कारण सांगितले पाहिजे, अशा प्रकारे शंभर वर्षे किंवा हजार वर्षे गेले तरी त्याचा अंतच समजणार नाही. ‘वुत्तोयेव’ म्हणजे अविद्येचे कारण सांगितलेच आहे. “पञ्चनीवरणतिस्स वचनीयं” म्हणजे पाच नीवरण धर्म हे अविद्येचे आहार (पोषक) आहेत, असे म्हटले पाहिजे. तेथे “आहार” म्हणजे प्रबळ कारण (बलवप्रत्यय) म्हटले जाते. ปฏิจฺจสมุปฺปาทนยานุทีปนา นิฏฺฐิตา. प्रतीत्यसमुत्पाद-नय-अनुदीपनी (स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ๑๖๗. ปฏฺฐานนเย. ‘‘เหตุ จ โส ปจฺจโย จา’’ติ เอตฺถ โลโภ เหตุชาติกตฺตา เหตุ จ โหติ. อารมฺมณานนฺตราทิ ปจฺจเยน อญฺญธมฺมสฺส ปจฺจโย จ โหตีติ อตฺถสฺส สมฺภวโต ‘‘เหตุ หุตฺวา ปจฺจโย’’ติ วณฺเณติ. เอวํ วณฺณิเตปิ ‘‘เหตุ หุตฺวา ปจฺจโย’’ติ เหตุ โหนฺโต ปจฺจโยติ อตฺเถ สติ, โส เยวตฺโถ สมฺภวตีติ ‘‘ปุน เหตุภาเวน ปจฺจโย’’ติ วณฺเณติ. เอตฺถ สิยา, เหตุ จ โส ปจฺจโย จาติ เอตฺถ ปท ทฺวยํ เอกธมฺมาธิกรณตฺตา ตุลฺยาธิกรณํ โหติ. เหตุภาเวน ปจฺจโยติ เอตฺถ ปน ปททฺวยํ ตุลฺยาธิกรณํ น โหติ. ปุริม ปทญฺหิ ธมฺม ภาวปฺปธานํ, ปจฺฉิมํ ธมฺมปฺปธานนฺติ. เอวํ สนฺเต ตุลฺยาธิกรณํ วากฺยํ ภินฺนาธิกรณํ กตฺวา วณฺเณตีติ น ยุตฺตเมตนฺติ. โน น ยุตฺตํ. มุขฺโยปจารมตฺเตน นานตฺถตฺตา. ปจฺฉิมวากฺยํหิ มุขฺยวจนํ. ปุริมวากฺยํ อุปจาร วจนํ. อุปจารวจเน จ อุปจารตฺโถ ยุชฺชติ. มุขฺยวจเน มุขฺยตฺโถติ. ‘‘เหฏฺฐาวุตฺตเมวา’’ติ ปกิณฺณกสงฺคเห วุตฺตเมว. หิโนนฺติ เอตฺถาติ เหตุ. หิโนนฺติ เอเตนาติ เหตุ. [Pg.257] ตตฺถ ‘‘หิโนนฺตี’’ติ สุฏฺฐุปติฏฺฐหนฺติ. เก ปติฏฺฐหนฺตีติ อาห ‘‘สหชาต ธมฺมา’’ติ. กถญฺจ สุฏฺฐุปติฏฺฐหนฺตีติ อาห ‘‘วุทฺธิ วิรุฬฺหิ เวปุลฺลปตฺตวเสนา’’ติ. กสฺมา เต สุฏฺฐุ ปติฏฺฐหนฺตีติ. ปติฏฺฐิตฏฺฐานสฺส ปติฏฺฐิตการณสฺส วา ถามพลสมฺปนฺนตฺตาติ ทสฺเสตุํ ‘‘อารมฺมเณ ทฬฺหนิปาตินา ถามพลสมฺปนฺเนนา’’ติ วุตฺตํ. เหตุวิเสสนญฺเจตํ. อารมฺมเณ ทฬฺหนิปาติมฺหิ ถามพลสมฺปนฺเน เอตฺถ ธมฺเมติปิ โยเชตพฺพํ. อุปการโกติ จ อุปลทฺธิเยวาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ยาทิเสนสภาเวนา’’ติ เหตุภาวาทิสภาเวน. ‘‘อุปลทฺธิเยวา’’ติ กสฺมา วุตฺตํ. นนุ อุปการก สทฺโท กตฺตารํ วา กาเรตารํ วา วทตีติ. โวหารมตฺเตน วทติ. ธมฺมโต ปน กตฺตา วา กาเรตา วา นตฺถีติ ทสฺเสตุํ ‘‘น หิ สภาว ธมฺเมสู’’ติอาทิมาห. ยทิ ธมฺมโต กตฺตาวา กาเรตาวา นตฺถิ. กสฺมา อุปการโกติ วุจฺจตีติ อาห ‘‘ตถา อุปลทฺธิยํ ปนา’’ติอาทึ. १६७. पठ्ठाननयामध्ये (प्रस्थान पद्धतीमध्ये): "जो हेतू आहे आणि तोच प्रत्यय (पच्चय) आहे" यामध्ये लोभ हा हेतू-जातीचा (हेतू स्वभावाचा) असल्यामुळे हेतू होतो. आणि आलंबन, अनंतर इत्यादी प्रत्ययांद्वारे इतर धर्मांचा प्रत्यय (कारण) होतो, हा अर्थ संभवत असल्यामुळे "हेतू होऊन प्रत्यय होतो" असे वर्णन केले आहे. असे वर्णन केले असतानाही, "हेतू होऊन प्रत्यय होतो" म्हणजे हेतू असताना प्रत्यय होतो असा अर्थ असताना, तोच अर्थ संभवतो म्हणून "पुन्हा हेतूभावाने प्रत्यय होतो" असे वर्णन केले आहे. येथे असे असू शकते की, "जो हेतू आहे आणि तोच प्रत्यय आहे" यातील दोन्ही पदे एकाच धर्माचे अधिकरण (आश्रय) असल्यामुळे सामानाधिकरण (तुल्याधिकरण) आहेत. परंतु "हेतूभावाने प्रत्यय" यामध्ये दोन्ही पदे सामानाधिकरण नसतात. कारण पूर्वपद हे धर्माच्या भावाला (अस्तित्वाला) प्राधान्य देणारे आहे आणि उत्तरपद हे धर्माला प्राधान्य देणारे आहे. असे असताना, सामानाधिकरण वाक्याला भिन्नाधिकरण करून वर्णन करणे योग्य नाही (अशी शंका येऊ शकते). नाही, हे अयोग्य नाही. मुख्य आणि उपचार (लाक्षणिक) केवळ या भेदाने भिन्न अर्थ असल्यामुळे. कारण उत्तर वाक्य हे मुख्य वचन (मुख्य अर्थ सांगणारे) आहे. पूर्व वाक्य हे उपचार वचन (लाक्षणिक अर्थ सांगणारे) आहे. आणि उपचार वचनामध्ये लाक्षणिक अर्थ योग्य ठरतो. मुख्य वचनामध्ये मुख्य अर्थ योग्य ठरतो. "खाली सांगितल्याप्रमाणेच" हे प्रकीर्णकसंग्रहात सांगितलेच आहे. ज्याच्यामध्ये (सहजात धर्म) प्रस्थापित होतात, तो हेतू होय. ज्याच्याद्वारे (सहजात धर्म) प्रस्थापित होतात, तो हेतू होय. तेथे "हिनोन्ति" म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित होतात. कोण प्रस्थापित होतात? तर "सहजात धर्म" असे म्हटले आहे. आणि कशा प्रकारे चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित होतात? तर "वृद्धी, विरूढी (वाढ) आणि विपुलता प्राप्त करण्याच्या दृष्टीने" असे म्हटले आहे. ते चांगल्या प्रकारे का प्रस्थापित होतात? प्रस्थापित होण्याचे स्थान किंवा प्रस्थापित होण्याचे कारण हे दृढ शक्तीने संपन्न असल्यामुळे, हे दर्शवण्यासाठी "आलंबनावर दृढपणे पडणाऱ्या आणि दृढ शक्तीने संपन्न असणाऱ्या" असे म्हटले आहे. आणि हे हेतूचे विशेषण आहे. "आलंबनावर दृढपणे पडणाऱ्या आणि दृढ शक्तीने संपन्न असणाऱ्या" हे येथे धर्माशी देखील जोडले पाहिजे. आणि "उपकारक" हा केवळ उपलब्धीच्या (प्राप्तीच्या) संबंधात आहे. "ज्या प्रकारच्या स्वभावाने" म्हणजे हेतूभाव इत्यादी स्वभावाने. "केवळ उपलब्धीनेच" असे का म्हटले आहे? "उपकारक" हा शब्द कर्ता किंवा करविणारा याला दर्शवतो ना? तो केवळ व्यवहारापुरता (वोहाराने) सांगतो. परंतु परमार्थतः (धर्माच्या दृष्टीने) कर्ता किंवा करविणारा कोणीही नाही, हे दर्शवण्यासाठी "सभाव धर्मांमध्ये नाही..." इत्यादी म्हटले आहे. जर परमार्थतः कर्ता किंवा करविणारा नाही, तर मग "उपकारक" असे का म्हटले जाते? यावर "परंतु तशा उपलब्धीमध्ये..." इत्यादी म्हटले आहे. อารมฺมณปจฺจเย. ‘‘อชฺโฌลมฺพมานา’’ติ อารมฺมณ กรณวเสน อธิโอลมฺพมานา. ‘‘อารมฺมณภาเวนา’’ติ โคจรวิสยภาเวน. आलंबनप्रत्ययामध्ये (आरम्मणपच्चयात): "अज्झोलम्बमाना" (अवलंबून राहणारे) म्हणजे आलंबन करण्याच्या दृष्टीने अवलंबून राहणारे. "आलंबनभावाने" म्हणजे गोचर-विषयभावाने (विषय बनण्याच्या रूपाने). อธิปติปจฺจเย. ‘‘ครุกตา’’ติ อสฺสาทนาภินนฺทนาทิวเสน วา สทฺธาปสาทาทิวเสน วา ครุกตา. ‘‘สามิโน วิย ทาเส’’ติ สามิโน อตฺตโนทาเส อตฺตโนวเส วตฺตยมานา วิย. สหชาตาธิปติ ปน เหฏฺฐา สมุจฺจย สงฺคเห วุตฺโตติ อิธ น วุตฺโต. अधिपतीप्रत्ययामध्ये (अधिपतिपच्चयात): "गरुकता" (आदरयुक्त/महत्त्व देणे) म्हणजे आस्वादन-अभिनंदन इत्यादींच्या द्वारे किंवा श्रद्धा-प्रसाद इत्यादींच्या द्वारे महत्त्व देणे. "मालक जसे दासांना" म्हणजे मालक आपल्या दासांना स्वतःच्या नियंत्रणात ठेवतात त्याप्रमाणे. परंतु "सहजात-अधिपती" खाली समुच्चयसंग्रहात सांगितलेला असल्यामुळे येथे सांगितलेला नाही. อนนฺตรปจฺจยทฺวเย. ‘‘อนฺตรํ’’ติ ฉิทฺทํ วิวรํ. ‘‘สนฺตานํ’’ติ จิตฺตสนฺตานํ. ‘‘สนฺตานานุพนฺธวเสนา’’ติ จิตฺตสนฺตานํ ปุนปฺปุนํ พนฺธนวเสน. อุปฺปาทนนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ธมฺมนฺตรสฺสา’’ติ นามกฺขนฺธ ธมฺมนฺตรสฺส. ‘‘อนนฺตร ปจฺจยตา’’ติ อนนฺตรปจฺจย กิจฺจนฺติ วุตฺตํ โหติ. ยํ กิญฺจิ ธมฺมนฺตรํ. ‘‘ปุริมปจฺฉิมภาคปฺปวตฺตานํ’’ติ นิโรธสฺส อสญฺญีภวสฺส จ ปุริมภาเค จ ปจฺฉิมภาเค จ ปวตฺตานํ. ‘‘จิตฺตุปฺปาทานํ ปี’’ติ นิโรธสฺส ปุพฺพภาเค เนวสญฺญานาสญฺญายตน กุสล กฺริย จิตฺตุปฺปาทานํ. ปจฺฉาภาเค อนาคามิผล อรหตฺตผลจิตฺตุปฺปาทานํ[Pg.258]. อสญฺญีภวสฺส ปุพฺพภาเค กามภเว จุติ จิตฺตุปฺปาทานํ. ปจฺฉาภาเค กามภเว เอว ปฏิสนฺธิ จิตฺตุปฺปาทานํ. เตสุ ปน กถํ อนนฺตรํ นาม สิยา. ทฺวินฺนํ ทฺวินฺนํ ปุริมภาค ปจฺฉิม ภาคานํ มชฺเฌ อจิตฺตกสฺส กาลสฺส อจิตฺตกสฺส รูปสนฺตานสฺส จ อนฺตริกตฺตาติ โจทนา. ตํ ปริหริตุํ ‘‘น หิ อภาวภูโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘เตสํ’’ติ ทฺวินฺนํ ทฺวินฺนํ จิตฺตุปฺปาทานํ. รูปธมฺโม อนฺตรํ น จ กโรติ นาม. อรูปธมฺมานํ อนนฺตรตา นามาติอาทินา โยชนา โหติ. ‘‘ตถาปวตฺตน สมตฺถตา’’ติ เอกีภูตานํ วิย อตฺตโน อนนฺตเร ธมฺมนฺตรํ อุปฺปาทเน สมตฺถตา. अनंतरप्रत्ययद्वयामध्ये (अनंतर आणि समनंतर प्रत्ययात): "अंतर" म्हणजे छिद्र किंवा विवर (खंड/अंतर). "संतान" म्हणजे चित्तसंतान (चित्ताची मालिका). "संतानानुबंधवशात" म्हणजे चित्तसंतानाच्या वारंवार जोडले जाण्याच्या (बंधनाच्या) कारणाने. "उत्पादन" (उत्पन्न करणे) असा संबंध आहे. "धर्मांतराचा" म्हणजे नामस्कंधरूप इतर धर्माचा. "अनंतर प्रत्ययता" म्हणजे अनंतर प्रत्ययाचे कार्य असे म्हटले आहे. कोणताही इतर धर्म. "पूर्व आणि उत्तर भागात प्रवृत्त होणाऱ्या" म्हणजे निरोध (निरोधसमापत्ती) आणि असंज्ञीभवाच्या पूर्वभागात आणि उत्तरभागात प्रवृत्त होणाऱ्या. "चित्तोत्पादांचे देखील" म्हणजे निरोधाच्या पूर्वभागात 'नेवसंज्ञानासंज्ञायतन' कुशल आणि क्रिया चित्तोत्पादांचे. उत्तरभागात (नंतरच्या भागात) अनागामीफल आणि अर्हतफल चित्तोत्पादांचे. असंज्ञीभवाच्या पूर्वभागात कामभवातील च्युती चित्तोत्पादांचे. उत्तरभागात कामभवातच प्रतिसंधी चित्तोत्पादांचे. परंतु त्यांच्यामध्ये अनंतर (व्यवधानरहितता) कशी असू शकते? कारण दोन-दोन पूर्वभाग आणि उत्तरभागांच्या मध्ये अचित्तक काळ (चित्त नसलेला काळ) आणि अचित्तक रूपसंतानाचे व्यवधान (अंतर) असते, अशी शंका (चोदना) उपस्थित होते. तिचे परिहार (निवारण) करण्यासाठी "न हि अभावभूतो..." (कारण तो अभावभूत नाही) इत्यादी म्हटले आहे. "त्यांच्या" म्हणजे दोन-दोन चित्तोत्पादांच्या. रूपधर्म हा खरोखर अंतर (व्यवधान) निर्माण करत नाही. "अरूपधर्मांची अनंतरता असते" अशी योजना येथे होते. "तशा प्रवृत्तीची समर्थता" म्हणजे जणू काही एकरूप झालेल्यांप्रमाणे स्वतःच्या लगेचच नंतर इतर धर्माला उत्पन्न करण्याची समर्थता. สหชาตปจฺจเย. ‘‘เย ปน ธมฺมา’’ติ ปจฺจยุปฺปนฺน ธมฺมา. ‘‘อตฺตนี’’ติ ปจฺจย ธมฺโม วุจฺจติ. सहजातप्रत्ययामध्ये (सहजातपच्चयात): "परंतु जे धर्म" म्हणजे प्रत्ययोत्पन्न (पच्चय्युप्पन्न) धर्म. "स्वतःमध्ये" म्हणजे प्रत्ययधर्म (पच्चयधम्म) म्हटला जातो. ‘‘อญฺญมญฺญํ อุปตฺถมฺภนฺตํ ติทณฺฑํ วิยา’’ติ ภูมิยํ อญฺญมญฺญํ นิสฺสาย อุสฺสิตา ตโยทณฺฑา อญฺญมญฺญํ อุปตฺถมฺภนฺตา วิย. ‘‘ปุริเมนา’’ติ ปุริเมน สหชาต ปจฺจเยน. ‘‘อิตรีตโร ปตฺถมฺภนํ’’ติ อญฺญมญฺโญ ปตฺถมฺภนํ. "एकमेकांना आधार देणाऱ्या तिपाईप्रमाणे (तीन काठ्यांप्रमाणे)" म्हणजे जमिनीवर एकमेकांचा आश्रय घेऊन उभे केलेले तीन दंड (काठ्या) जसे एकमेकांना आधार देतात त्याप्रमाणे. "पूर्वीच्या द्वारे" म्हणजे पूर्वीच्या सहजात प्रत्ययाद्वारे. "इतरोतर आधार" म्हणजे परस्परांना आधार देणे. ‘‘สูโท’’ติ ภตฺตการโก. ‘‘อุกฺขลี’’ติ ภตฺตปจนกุมฺภี. ‘‘วุฏฺฐิธารา’’ติ เมฆวุฏฺฐิธารา. ‘‘อุปนิสฺสโย’’ติ ภตฺตุปฺปตฺติยา อุปนิสฺสโย. ‘‘ตาสุ อสตี’’ติ สาลิกฺเขตฺต วุฏฺฐิธาราสุ อสติ. ‘‘พลวตรฏฺเฐนา’’ติ พลวตรนิสฺสยฏฺเฐน. ‘‘ปกตูปนิสฺสโย’’ติ เอตฺถ ‘‘ปกโต’’ติ ภุสํ กโต. เตนาห ‘‘สุฏฺฐุกโต’’ติ. กรณญฺจ อตฺตโน สนฺตาเน สุฏฺฐุอุปฺปาทนญฺจ สุฏฺฐุอุปเสวนญฺจ ทฏฺฐพฺพนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วุตฺตปฺปกาเรนา’’ติ ‘ยถา กเต สตี’ติอาทินา วุตฺตปฺปกาเรน. "सूद" म्हणजे आचारी (भात बनवणारा). "उक्खली" म्हणजे भात शिजवण्याचे भांडे (कुंडी). "वुट्ठिधारा" म्हणजे मेघांची पर्जन्यवृष्टी (पावसाची धार). "उपनिस्सय" म्हणजे भाताच्या उत्पत्तीचा उपनिस्सय (बलवान आश्रय). "त्या नसताना" म्हणजे भाताच्या शेतातील पर्जन्यवृष्टी नसताना. "अधिक बलवान अर्थाने" म्हणजे अधिक बलवान आश्रयाच्या अर्थाने. "प्रकृत-उपनिस्सय" (पकतूपनिस्सय) यामध्ये "प्रकृत" (पकत) म्हणजे चांगल्या प्रकारे केलेला. म्हणूनच "चांगल्या प्रकारे केलेला" असे म्हटले आहे. आणि करणे, स्वतःच्या संतानात चांगल्या प्रकारे उत्पन्न करणे आणि चांगल्या प्रकारे सेवन करणे, असा संबंध समजला पाहिजे. "सांगितलेल्या प्रकारे" म्हणजे 'जसे केले असता' इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या रीतीने. ‘‘นิสฺสยารมฺมณ ธมฺมา เอวา’’ติ นิสฺสย ปจฺจย ธมฺม อารมฺมณ ปจฺจย ธมฺมา เอว. ‘‘ปุเรชาตตามตฺตวิสิฏฺฐา’’ติ เอตฺถ มตฺตสทฺเทน นิสฺสยารมฺมณสตฺติโต วิสุํ ปุเรชาตสตฺติ นาม นตฺถีติ ทสฺเสติ. วิสุํ ปุเรชาตสตฺติ นาม อตฺถีติปิ วทนฺติ. ตํ วาทํ ทสฺเสตุํ ‘‘อาจริยานนฺทตฺเถเรนา’’ติอาทิมาห. เอตฺถ ปญฺจวตฺถูนิ จ ปญฺจารมฺมณานิ จ ปุเรชาตตฺตา เอว สุฏฺฐุพลวตาย ปญฺจวิญฺญาณานํ วตฺถุ กิจฺจ อารมฺมณ กิจฺจานิ สาเธนฺติ. ตถา หทยวตฺถุ จ มโนธาตุ [Pg.259] มโนวิญฺญาณธาตู นนฺติ. อยํ วิสุํ ปุเรชาตสตฺติ วิเสโสติ วเทยฺย. สจฺจํ. สุทฺธมโน ทฺวาเรปน อิธ ฐตฺวา นิรเยสุ เอวรูปานิ นิรยคฺคิรูปานิ อตฺถิ. อิทานิ เทเวสุ จ เอวรูปานิ ทิพฺพรูปานิ อตฺถีติ จินฺตยนฺตานมฺปิ, เตสุ ปุเร เอวรูปานิ อุปฺปชฺชึสูติ วา, เตสุ อนาคเต เอวรูปานิ อุปฺปชฺชิสฺสนฺตีติ วา จินฺตยนฺตานํปิตานิ รูปานิ นิพฺพิเสสานิ หุตฺวา มโนวิญฺญาณานํ อารมฺมณ ปจฺจยตฺตํ คจฺฉนฺติ. ตตฺถ ปุเร ชาตานิ หุตฺวา ตทา วิชฺชมานานิ ปจฺจุปฺปนฺนรูปานิ อารมฺมณ ปุเรชาตปจฺจโย. อิตรานิ อารมฺมณ ปจฺจโย เอว. น เจตฺถ ปุเรชาตานํ ปจฺจุปฺปนฺนรูปานํ ปุเรชาตตฺเตน วิเสโส อตฺถิ. น จ ตานิ ปุเรชาตปจฺจโย น โหนฺติ. ยทิ วิสุํ ปุเรชาตสตฺติวิเสโส ปุเรชาตปจฺจโยติ วเทยฺย. ตานิ ปุเรชาตปจฺจโย นาม น ภเวยฺยุํ. กสฺมา, ตาทิสสฺส วิเสสสฺส นตฺถิตาย. น จ นภวนฺติ. กสฺมา, ปุเรชาตมตฺตวิเสสสฺส อตฺถิตาย. เอตฺถ วเทยฺยุํ, ปญฺจทฺวาเรสุ ปน ปุพฺเพ วุตฺตนเยน วิสุํ ปุเรชาตสตฺติวิเสโส ทิสฺสตีติ. กิญฺจาปิทิสฺสติ. โส ปน พหุวิธานํ นิสฺสย ปจฺจย อารมฺมณปจฺจยานํ มชฺเฌ นิสฺสย สตฺติวิเสโส เอว, อารมฺมณ สตฺติวิเสโส เอว จาติ. อปิ จ วิสุํ ปุเรชาต สตฺติวิเสโส นาม นตฺถีติ อิทํ ยถาวุตฺเต สุทฺธมโนทฺวาเร ตพฺพิเสสาภาวํ สนฺธาย วุตฺตํ. วิสุํ ปุเรชาต สตฺติวิเสโส นาม อตฺถีติ อิทํ ปญฺจทฺวาเรสุ ตพฺพิเสสสฺส อตฺถิภาวํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ. ยํ รุจฺจติ, ตํ คเหตพฺพํ. “निस्सयारम्मण धम्मा एवा” म्हणजे निस्सय-प्रत्यय धर्म आणि आरम्मण-प्रत्यय धर्मच होत. “पुरेजाततामत्तविसेट्ठा” येथे 'मत्त' (मात्र) शब्दाने हे दर्शविले आहे की, निस्सय आणि आरम्मण शक्तीपेक्षा वेगळी अशी 'पुरेजात-शक्ती' नावाची कोणतीही स्वतंत्र शक्ती नाही. काही लोक असेही म्हणतात की, स्वतंत्र 'पुरेजात-शक्ती' नावाची गोष्ट अस्तित्वात आहे. तो वाद दर्शविण्यासाठी “आचार्य आनंद स्थविरांनी” इत्यादी म्हटले आहे. येथे पाच वस्तू आणि पाच आरम्मण हे पूर्वी उत्पन्न झालेले (पुरेजात) असल्यामुळेच अत्यंत बलवान होऊन पंचविज्ञानांचे वस्तू-कृत्य आणि आरम्मण-कृत्य साध्य करतात. तसेच हृदयवस्तू आणि मनोधातू व मनोविज्ञानधातू यांच्या बाबतीतही आहे. जर कोणी असे म्हटले की, हाच स्वतंत्र 'पुरेजात-शक्ती'चा विशेष आहे, तर ते सत्य आहे. परंतु, शुद्ध मनोद्वारात येथे राहूनच "नरकामध्ये अशा प्रकारची नरकाग्नीची रूपे आहेत, आता देवांमध्ये अशा प्रकारची दिव्य रूपे आहेत" असा विचार करणाऱ्यांच्या बाबतीत, किंवा "त्यांच्यामध्ये पूर्वी अशी रूपे उत्पन्न झाली होती" किंवा "त्यांच्यामध्ये भविष्यात अशी रूपे उत्पन्न होतील" असा विचार करणाऱ्यांच्या बाबतीतही ती रूपे निर्विशेष होऊन मनोविज्ञानाचे आरम्मण-प्रत्ययत्व प्राप्त करतात. त्यात, पूर्वी उत्पन्न होऊन त्या वेळी विद्यमान असणारी वर्तमान रूपे ही 'आरम्मण-पुरेजात-प्रत्यय' आहेत. इतर केवळ 'आरम्मण-प्रत्यय'च आहेत. आणि येथे पूर्वी उत्पन्न झालेल्या वर्तमान रूपांमध्ये 'पुरेजात' असण्याने काही विशेष फरक पडत नाही. आणि ती 'पुरेजात-प्रत्यय' होत नाहीत असेही नाही. जर असे म्हटले की, स्वतंत्र 'पुरेजात-शक्ती-विशेष' हाच 'पुरेजात-प्रत्यय' आहे, तर ती 'पुरेजात-प्रत्यय' ठरणार नाहीत. का? कारण तशा विशेषाचा अभाव आहे. आणि ती (पुरेजात-प्रत्यय) होत नाहीत असेही नाही. का? कारण 'पुरेजात-मात्र-विशेषा'चे अस्तित्व आहे. येथे कदाचित असे म्हटले जाईल की, पंचद्वारांमध्ये पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीने स्वतंत्र 'पुरेजात-शक्ती-विशेष' दिसून येतो. जरी तो दिसत असला, तरी तो अनेक प्रकारच्या निस्सय-प्रत्यय आणि आरम्मण-प्रत्ययांच्या मध्ये केवळ निस्सय-शक्तीचाच विशेष किंवा आरम्मण-शक्तीचाच विशेष आहे. शिवाय, "स्वतंत्र पुरेजात-शक्ती-विशेष नावाचा काही प्रकार नाही" हे जे म्हटले आहे, ते वर सांगितलेल्या शुद्ध मनोद्वाराच्या बाबतीत त्या विशेषाचा अभाव लक्षात घेऊन म्हटले आहे. आणि "स्वतंत्र पुरेजात-शक्ती-विशेष नावाचा प्रकार अस्तित्वात आहे" हे जे म्हटले आहे, ते पंचद्वारांमध्ये त्या विशेषाचे अस्तित्व लक्षात घेऊन म्हटले आहे. यापैकी जे योग्य वाटेल, ते स्वीकारावे। ปจฺฉาชาตปจฺจเย. ‘‘รุกฺขโปตกานํ วิยา’’ติ ปจฺฉา อาสิญฺจิยมานํ อุทกํ รุกฺขโปตกานํ วุทฺธวิรุฬฺหภาวํ ปาเปตฺวา อุปตฺถมฺภนวเสน อุปการโก วิยาติ โยชนา. อาหารํ อาสึ สตีติ อาหาราสา. ชิฆจฺฉา, ปิปาสา, ตณฺหา. ตาย สมฺปยุตฺตา เจตนาติ วิคฺคโห. สา ปน อาหาราสา เจตนา อุปตฺถมฺภติ เยวาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อยมตฺโถ’’ติ ‘สุปากเฏนา’ติอาทินา วุตฺโต อยมตฺโถ. สพฺพาเจสาวิจารณา คิชฺโฌปมาย อุปมามตฺตภาวํ นีวาเรตา โหตีติ. पच्छाजात-प्रत्ययाच्या संदर्भात: “रुक्खपोतकानं विय” (लहान झाडांप्रमाणे) म्हणजे नंतर शिंपडले जाणारे पाणी जसे लहान झाडांना वृद्धी आणि वाढीच्या (विरूळ्ह) अवस्थेला पोहोचवून उपस्तंभन (आधार) देण्याच्या दृष्टीने उपकारक ठरते, तशी ही योजना आहे. 'आहारं आसिंसतीति आहारासा' (आहार मिळण्याची आशा करणे म्हणजे आहाराशा). भूक, तहान आणि तृष्णा. तिच्याशी संप्रयुक्त असणारी चेतना, असा विग्रह आहे. ती आहाराशा-चेतना उपस्तंभन (पुष्टी) करतेच, असा संबंध आहे. “अयमत्यो” (हा अर्थ) म्हणजे 'सुपाकटेन' (अतिशय स्पष्टपणे) इत्यादींद्वारे सांगितलेला हा अर्थ होय. ही सर्व विचारणा गिधाडाच्या उपमेद्वारे केवळ उपमेचे स्वरूप दूर करणारी ठरते। อาเสวนฺติ [Pg.260] ตํ ปจฺจย ธมฺมํ ปจฺจยุปฺปนฺนา ธมฺมาติ อาเสวนํ. เอเตน ภุโส ปจฺจยุปฺปนฺน ธมฺเมหิ อาเสวิตพฺพตฺตา อาเสวนนฺติ วุจฺจตีติ ทสฺเสตีติ. ‘‘ตํ’’ติ ตํ ปุริมํ ปุริมํ ปจฺจย ธมฺมํ. ‘‘ภชนฺตี’’ติ อุเปนฺติ. เก ภชนฺตีติ อาห ‘‘อปราปรํ อุปฺปชฺชมานา ธมฺมา’’ติ. ‘‘ธมฺมา’’ติ จ อนนฺตรุปฺปนฺนา จิตฺตเจตสิกา ธมฺมา. กถญฺจ ตํ เตภชนฺตีติ อาห ‘‘สุฏฺฐุเสวมานา วิย ภชมานา วิย ปวตฺตนฺตี’’ติ. วิย สทฺเทน โลเก กิญฺจิชนํ เกจิชนา เกนจิ อตฺเถน สุฏฺฐุเสวนฺตา วิยาติ ทสฺเสติ. กถํ สุฏฺฐุเสวิยมานา วิย โหนฺตีติ อาห ‘‘ตสฺส ปุริมสฺสา’’ติอาทึ. ปุริมสฺส อนนฺตรสฺส จิตฺตุปฺปาทสฺสาติ อตฺโถ. ‘‘สพฺพปริปูรํ อาการํ’’ติ ชวเวคสหิเตหิ วิชานน ผุสนาทีหิ สาวชฺชาน วชฺชาทีหิ จ สพฺเพหิ ชวนคุเณหิ ปริปูรํ อาการํ. ‘‘อาเสเวตี’’ติ มํ สุฏฺฐุ เสวถาติ นิโยเชนฺตํ วิย โหติ. เตนาห ‘‘อตฺตโน วาสํ’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘วาสํ’’ติ วาสนํ. ‘‘สุฏฺฐุ คาหาเปตี’’ติ ปริปุณฺณํ เทตีติ วุตฺตํ โหติ. เอเตน ยถา โลเก เอโก ปเรสํ ยถิจฺฉิตํ เทติ. เอวํ เทนฺตํ ปน ปเร ภชนฺติเยว. มํ ภชถาติ นิโยชนกิจฺจํ นตฺถิ. เอวเมว อิธปิ สุฏฺฐุวาสทานเมว ภชาปนํ นามาติ ทสฺเสติ. ‘‘วฑฺเฒติ วา’’ติ เอเตน อาเสวนา ภาวนา วฑฺฒนาติ อิมํปริยายตฺถํ วทติ. ปุริมาภิโยโค นาม อาทิโต ปฏฺฐาย สชฺฌายนาทิกมฺเมสุ ยถาสตฺติ ยถาพลํ วา ยามกรณํ. ตถา กโรนฺตสฺส ตํ อุคฺคหณ กมฺมํ อุปรูปริ ปคุณภาวํ คจฺฉตีติ. ‘‘อาเสวนฏฺเฐนา’’ติ วฑฺฒาปนฏฺเฐน, อุปการโกติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สชาติยานํ’’ติ กุสลาทิภาเวน สมานชาติกานํ. 'आसेवन्ति तं पच्चय धम्मं पच्चयुप्पन्ना धम्माति आसेवनं' - प्रत्ययोत्पन्न धर्म ज्या प्रत्यय-धर्माचे वारंवार सेवन करतात, ते 'आसेवन' होय. याद्वारे हे दर्शविले आहे की, प्रत्ययोत्पन्न धर्मांद्वारे वारंवार सेवन केले जाण्यायोग्य असल्यामुळे याला 'आसेवन' म्हटले जाते. “तं” (त्याला) म्हणजे त्या पूर्वीच्या पूर्वीच्या प्रत्यय-धर्माला. “भजन्ति” (सेवन करतात) म्हणजे जवळ जातात. कोण सेवन करतात? यावर म्हणतात: “अपरापरं उप्पज्जमाना धम्मा” (वारंवार उत्पन्न होणारे धर्म). “धम्मा” (धर्म) म्हणजे लागोपाठ उत्पन्न होणारे चित्त आणि चैतसिक धर्म. आणि ते त्याचे कशा प्रकारे सेवन करतात? यावर म्हणतात: “सुट्ठुसेवमाना विय भजमाना विय पवत्तन्ति” (चांगल्या प्रकारे सेवा केल्यासारखे किंवा सेवन केल्यासारखे प्रवृत्त होतात). 'विय' (सारखे) या शब्दाने हे दर्शविले आहे की, जसे लोकव्यवहारात काही लोक कोणा एका व्यक्तीची विशिष्ट हेतूने चांगल्या प्रकारे सेवा करतात. ते चांगल्या प्रकारे सेवा केल्यासारखे कसे होतात? यावर “तस्स पुरिमस्स” (त्या पूर्वीच्या) इत्यादी म्हटले आहे. 'पूर्वीच्या' म्हणजे लागोपाठच्या चित्तोत्पादाचा, असा अर्थ आहे. “सब्बपरिपूरं आकारं” (सर्वपरिपूर्ण आकार) म्हणजे जवन-वेगाने युक्त अशा जाणणे, स्पर्श करणे इत्यादी आणि सावद्य-अनवद्य (दोषयुक्त व दोषरहित) इत्यादी सर्व जवन-गुणांनी परिपूर्ण आकार. “आसेवेति” (सेवन करतो) म्हणजे "माझे चांगल्या प्रकारे सेवन करा" अशी जणू आज्ञा दिल्यासारखे होते. म्हणूनच “अत्तनो वासं” (स्वतःची वासना/संस्कार) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “वासं” म्हणजे वासना (संस्कार). “सुट्ठु गाहापेति” (चांगल्या प्रकारे ग्रहण करवून घेतो) म्हणजे परिपूर्ण देतो, असे म्हटले आहे. याद्वारे, जसे लोकव्यवहारात एखादा मनुष्य इतरांना त्यांच्या इच्छेनुसार देतो; अशा प्रकारे देणाऱ्याकडे इतर लोक स्वतःहूनच आकर्षित होतात (त्याचे सेवन करतात), "माझे सेवन करा" असे सांगण्याची गरज नसते. त्याचप्रमाणे येथेही चांगल्या प्रकारे वासना (संस्कार) देणे म्हणजेच आकर्षित करणे (भजापण) होय, असे दर्शविले आहे. “वड्ढेति वा” (किंवा वाढवतो) याद्वारे आसेवन, भावना आणि वर्धन हे समानार्थी शब्द आहेत, असे सांगितले आहे. 'पुरिमाभियोग' म्हणजे सुरुवातीपासूनच सज्झाय (पठण) इत्यादी कामांमध्ये यथाशक्ती किंवा यथाबल प्रहर घालवणे (वेळ देणे). तसे करणाऱ्याचे ते ग्रहण करण्याचे कार्य उत्तरोत्तर अधिक प्रगल्भ (पगुण) होत जाते. “आसेवनट्ठेन” म्हणजे वाढवण्याच्या अर्थाने, 'उपकारक' असा संबंध आहे. “सजातीयानं” म्हणजे कुशल इत्यादी भावाने समान जातीच्या (धर्मांच्या बाबतीत). กายงฺคาภิสงฺขรณํ นาม กายสญฺเจตนากิจฺจํ. วาจงฺคาภิสงฺขรณํ วจีสญฺเจตนากิจฺจํ. จิตฺตงฺคาภิสงฺขรณํ มโนสญฺเจตนากิจฺจํ. ‘‘กิริยาภาเวนา’’ติ ทสฺสนสวนาทิกิจฺเจสุ คมนฐาน นิสชฺชาทิกิจฺเจสุ สํวิธานกิริยาภาเวน. ‘‘วตฺถุมฺหี’’ติ คพฺภวตฺถุมฺหิ. ยถาวุตฺตาภิสงฺขรณกิจฺจํ นาม กายงฺควาจงฺค จิตฺตงฺคาภิสงฺขรณ กิจฺจํ. ‘‘ตทภิสงฺขรณเวคชนิตํ’’ติ ตสฺส กายงฺคาทิกสฺส [Pg.261] อภิสงฺขรณเวเคน ชนิตํ กิริยาวิเสส นิธานกิจฺจนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สนฺตาเน’’ติ จิตฺตสนฺตาเน. 'कायांगाभिसंखरण' (कायांग-अभिसंस्कार) म्हणजे काय-संचेतनाचे कृत्य (शारीरिक चेतनेचे कार्य). 'वाचांगाभिसंखरण' (वाचांग-अभिसंस्कार) म्हणजे वची-संचेतनाचे कृत्य (वाचिक चेतनेचे कार्य). 'चित्तांगाभिसंखरण' (चित्तांग-अभिसंस्कार) म्हणजे मन-संचेतनाचे कृत्य (मानसिक चेतनेचे कार्य). “किरियाभावेन” (क्रियाभावाने) म्हणजे पाहणे, ऐकणे इत्यादी कृत्यांमध्ये आणि जाणे, उभे राहणे, बसणे इत्यादी कृत्यांमध्ये नियोजन करण्याच्या क्रियाभावाने. “वत्थुम्हि” (वस्तूमध्ये) म्हणजे गर्भ-वस्तूमध्ये (गर्भाशयात). 'यथावृत्त-अभिसंस्कार-कृत्य' म्हणजे वर सांगितलेले कायांग, वाचांग आणि चित्तांग यांचे अभिसंस्कार करण्याचे कृत्य होय. “तदभिसंखरणवेगजनितं” म्हणजे त्या कायांग इत्यादींच्या अभिसंस्काराच्या वेगाने उत्पन्न झालेले 'क्रियाविशेष-निधान-कृत्य' (विशिष्ट क्रियेचे संचय करण्याचे कार्य), असा संबंध आहे. “सन्ताने” (संतानामध्ये) म्हणजे चित्तसंतानामध्ये. วิปจฺจนภาโว จ นาม ปาตุภาโวติ สมฺพนฺโธ. นิรุสฺสาห สนฺตภาโว นาม กุสลา กุสลานํ วิย กายงฺควาจงฺคาภิสงฺขรณ กิจฺเจสุ จ อายตึ วิปจฺจน กิจฺเจสุ จ นิรุสฺสาหภาเวน สนฺตภาโว. น กิเลสุ ปสนฺตภาเวน. จิตฺตาภิสงฺขรณ กิจฺเจสุปน สมฺปยุตฺตเจตนาวเสน ยโถปฏฺฐิเตสุ อารมฺมเณสุ สมฺปยุตฺตธมฺมานํ เอกโต สนฺนิปาตคมนุสฺสาหมตฺตํ อตฺถิ. ตโตปรํ ปน สุปิน ทสฺสน กิจฺจํปิ นตฺถีติ. ‘‘มนฺทมนฺทากาเรนา’’ติ มนฺทโต อติมนฺทากาเรน. กิญฺจิชานน จิตฺตํ นาม กมฺมาทิ อารมฺมณํ อปฺปมตฺตกํปิ ชานนํ วีถิจิตฺตํ. ตสฺส ปวตฺติยา. विपच्चनभाव (विपाक अवस्था) म्हणजे प्रादुर्भाव (प्रकट होणे) असा संबंध आहे. निरुत्साह शांतभाव म्हणजे कुशल आणि अकुशल धर्मांप्रमाणे कायिक व वाचिक अभिसंस्कारांच्या कृत्यांमध्ये आणि भविष्यातील विपाक कृत्यांमध्ये निरुत्साह भावाने शांत असणे होय; क्लेशांच्या शांत भावाने नव्हे. चित्त-अभिसंस्कार कृत्यांमध्ये मात्र, संप्रयुक्त चेतनेच्या वशाने, उपस्थित झालेल्या आलंबनांवर संप्रयुक्त धर्मांच्या एकत्र येण्याचा आणि प्रवृत्त होण्याचा केवळ उत्साह असतो. त्यानंतर मात्र स्वप्न पाहण्याचे कृत्यही नसते. 'मन्दमन्दाकारेण' म्हणजे मन्दपणे, अत्यंत मन्द गतीने. 'किञ्चिजानन चित्त' म्हणजे कर्मादी आलंबनांना अगदी थोड्या प्रमाणात जाणणारे वीथिचित्त होय. त्याच्या प्रवृत्तीसाठी. ‘‘อรูปิโน’’ติ อรูปลกฺขณ สมงฺคิโน. นามลกฺขณ สมงฺคีโนติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ชนยนฺตาปี’’ติ สหชาต ธมฺเม ชเนนฺตาปิ. ‘‘สนฺตานฏฺฐิติยา’’ติ ปพนฺธปฺปติฏฺฐานสฺส. 'अरूपिनो' म्हणजे अरूप लक्षणाने युक्त असलेले. नामलक्षणाने युक्त असलेले, असे म्हटले आहे. 'जनयन्तापि' म्हणजे सहजात धर्मांना उत्पन्न करत असतानाही. 'सन्तानट्ठितिया' म्हणजे प्रवाहाच्या (संततीच्या) प्रतिष्ठेसाठी (स्थिरतेसाठी). ‘‘กสฺมาปเนตฺถา’’ติอาทีสุ. ‘‘ภาวินฺทฺริย ทฺวยํ’’ติ อิตฺถินฺทฺริย ปุริสินฺทฺริย ทฺวยํ. ‘‘อิธา’’ติ อิมสฺมึ อินฺทฺริยปจฺจเย. กสฺมา น คหิตํ. นนุ อิตฺถิลิงฺคาทีนํ ปวตฺติการณตฺตา อิธ คเหตพฺพเมวาติ อธิปฺปาโย. ชนกตฺตํ นาม ชนก กิจฺจํ. เอวํ เสเสสุปิ. ‘‘เอตํตยํปิ นตฺถี’’ติ ชนกตฺตาทิกิจฺจตฺตยํปิ นตฺถิ. เอวํสนฺเตกถํ ลิงฺคาทีนํ ปวตฺติการณํ โหตีติอาห ‘‘เกวลํ ปนา’’ติอาทึ. ‘‘ทฺวยํ’’ติ อิตฺถิภาวปุมฺภาว ทฺวยํ. น อินฺทฺริย ปจฺจยตฺเตน อินฺทฺริยํ นาม โหติ. ยถาหิ เอโก ราชา อตฺตโน วิชิเต เคหานิ กโรนฺติ. เอวํ กโรนฺตูติ เคหสณฺฐานํ ปฏฺฐเปติ. สพฺเพชนา ตเถว กโรนฺติ, โน อญฺญถา. ตตฺถ ราชา เคหุปฺปตฺติยา จ เคหฏฺฐิติยา จ กิญฺจิ กิจฺจํ น กโรติ. เคหสามิกาวา เคหวฑฺฒกิโน วา กโรนฺติ. กโรนฺตา ปน รญฺญา ปฏฺฐปิตํ สณฺฐานํ อนติกฺกมิตฺวาว กโรนฺติ. เอวเมว มิทํ ทฏฺฐพฺพํ. อุปคนฺตฺวา ฌายนฏฺเฐนาติ สมฺพนฺโธ. อุปสทฺโท อุปนิสฺสย ปเทวิย อุปริ อตฺโถ. ‘‘อุปรี’’ติ จ ถามพลวุทฺธิวเสนาติ อาห ‘‘ตสฺมึ วา’’ติอาทึ. ‘‘ตสฺมึ’’ติ อารมฺมเณ. 'कस्मापनेत्थ' इत्यादींमध्ये. 'भाविन्द्रिय द्वय' म्हणजे इत्थिन्द्रिय (स्त्री-इंद्रिय) आणि पुरिसिन्द्रिय (पुरुष-इंद्रिय) हे दोन्ही. 'इध' म्हणजे या इंद्रियप्रत्ययामध्ये. का ग्रहण केले गेले नाही? स्त्रीलिङ्ग इत्यादींच्या प्रवृत्तीचे कारण असल्यामुळे येथे ते ग्रहण केलेच पाहिजे, असा अभिप्राय आहे. 'जनकत्व' म्हणजे जनक कृत्य (उत्पन्न करण्याचे कृत्य). याचप्रमाणे इतरांच्या बाबतीतही समजावे. 'एतंतयंपि नत्थि' म्हणजे जनकत्व इत्यादी तिन्ही कृत्येही नाहीत. असे असताना लिङ्ग इत्यादींच्या प्रवृत्तीचे कारण कसे होते? म्हणून 'केवलं पन' इत्यादी म्हटले आहे. 'द्वय' म्हणजे स्त्रीभाव आणि पुरुषभाव हे दोन्ही. इंद्रियप्रत्ययत्वामुळे इंद्रिय होत नाही. जसे एखादा राजा आपल्या राज्यात घरे बांधणाऱ्यांना 'अशा प्रकारे बांधा' म्हणून घराचा नकाशा (आकार) ठरवून देतो. सर्व लोक तसेच करतात, वेगळ्या प्रकारे नाही. तिथे राजा घराच्या उत्पत्तीमध्ये किंवा घराच्या स्थितीमध्ये कोणतेही कृत्य करत नाही. घराचे मालक किंवा सुतार (बांधकाम करणारे) ते करतात. परंतु ते करताना राजाने ठरवून दिलेल्या आकाराचे उल्लंघन न करताच करतात. याचप्रमाणे हे समजले पाहिजे. जवळ जाऊन ध्यान करण्याच्या अर्थाने, असा संबंध आहे. 'उप' हा शब्द उपनिस्सय पदाप्रमाणे 'उपरि' (वर/अधिक) या अर्थात आहे. 'उपरि' म्हणजे सामर्थ्य आणि बळाच्या वृद्धीच्या वशाने, म्हणून 'तस्मिं वा' इत्यादी म्हटले आहे. 'तस्मिं' म्हणजे आलंबनावर. ‘‘สุคติ [Pg.262] ทุคฺคติ นิพฺพาน สมฺปาปกฏฺเฐนา’’ติ วุตฺตํ. โส อตฺโถ อพฺยากตมคฺคงฺเคสุ นตฺถิ. เอวญฺจสติ ตานิ กถํ มคฺคปจฺจยตฺตํ คจฺฉนฺตีติ อาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทึ. ‘‘สมฺมาทสฺสนาทินา’’ติ สมฺมาทสฺสน สงฺกปฺปนาทินา. ‘‘เตสํ’’ติ สมฺมาทิฏฺฐีนํ. ‘‘เตสํ ปี’’ติ อพฺยากต ภูตานํ สมฺมาทิฏฺฐีนมฺปิ. ‘‘เตเนวฏฺเฐนา’’ติ สมฺมาทสฺสนาทินา ลกฺขณฏฺเฐน. อถวา. ‘‘เตเนวฏฺเฐนา’’ติ สุคติ นิพฺพาน สมฺปาปกฏฺเฐเน วาติ อตฺโถ. เอวญฺจสติ สเหตุกา วิปาก กฺริยา พฺยากตธมฺมาปิ เตเนวฏฺเฐน สพฺพโส กุสลสทิสา สิยุนฺติ. น สิยุํ, ปจฺจย เวกลฺลตฺตา. วิปากาพฺยากตาหิ กมฺมเวเคน สนฺตาเน ปติตมตฺตตฺตา นิรุสฺสาหสนฺตสภาวโต ตํ สมฺปยุตฺตา เจตนา นานกฺขณิก กมฺมปจฺจยตฺตํ น คจฺฉติ. กิริยาพฺยากตา จ นิรนุสยสนฺตาเน อุปฺปนฺนตฺตา ตํ สมฺปยุตฺตเจตนาปิ ตปฺปจฺจยตฺตํ น คจฺฉติเยว. ตสฺมา เตสุ วิปาก กฺริยาพฺยากเตสุ สมฺมาทิฏฺฐาทีนิปิ สุคติ สมฺปาปกฏฺฐํ น สาเธนฺติ. กิเลสปฺปหาน กิจฺจสฺส อภาวโต นิพฺพาน สมฺปาปกฏฺฐมฺปิ นสาเธนฺติ. สภาว ลกฺขณเวกลฺลตาปน เตสํ สมฺมาทิฏฺฐาทีนํ นตฺถิเยว. ตสฺมา ตานิ มคฺคปจฺจเย สงฺคหิตานีติ. อินฺทฺริย ธมฺเมสุ อรูปินฺทฺริยานํ อาธิปฺปจฺจ กิจฺจํ อรูปธมฺเม สฺเวว ผรติ. รูปธมฺมา ปน ตํ สมุฏฺฐิตตฺตา เอว ตปฺปจฺจยุปฺปนฺเนสุ วุตฺตา. ตถา เหตุ กมฺม มคฺค ฌาเนสุ. เตน วุตฺตํ ‘‘เอสนโย กมฺมินฺทฺริยฌานปจฺจเยสุปี’’ติ. ตตฺถ กมฺมสทฺเทน นานกฺขณิก ปจฺจโย คเหตพฺโพ. 'सुगती, दुर्गती आणि निर्वाण प्राप्त करून देण्याच्या अर्थाने' असे म्हटले आहे. तो अर्थ अव्याकृत मार्ग-अंगांमध्ये नाही. असे असताना ते मार्गप्रत्ययत्वाला कसे प्राप्त होतात? म्हणून 'एत्थ च' इत्यादी म्हटले आहे. 'सम्मादस्सनादिना' म्हणजे सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प इत्यादींद्वारे. 'तेसं' म्हणजे सम्यक् दृष्टींचे. 'तेसं पि' म्हणजे अव्याकृत झालेल्या सम्यक् दृष्टींचेही. 'तेनेवट्ठेन' म्हणजे सम्यक् दृष्टी इत्यादी लक्षणाच्या अर्थाने. अथवा, 'तेनेवट्ठेन' म्हणजे सुगती आणि निर्वाण प्राप्त करून देण्याच्या अर्थानेच, असा अर्थ आहे. असे असताना, सहेतुक विपाक आणि क्रिया अव्याकृत धर्मही त्याच अर्थाने सर्व प्रकारे कुशल धर्मांसारखे होतील काय? नाही होणार, कारण प्रत्ययांची विकलता (अपूर्णता) आहे. कारण विपाक-अव्याकृत धर्म हे कर्मवेगाने संततीमध्ये केवळ पडलेले (उत्पन्न झालेले) असल्यामुळे, निरुत्साह आणि शांत स्वभावाचे असतात; त्यामुळे त्यांच्याशी संप्रयुक्त असलेली चेतना 'नानाक्षणिक कर्मप्रत्ययत्वाला' प्राप्त होत नाही. आणि क्रिया-अव्याकृत धर्म हे निरनुशय (अनुशयरहित) संततीमध्ये उत्पन्न होत असल्यामुळे, त्यांच्याशी संप्रयुक्त असलेली चेतनाही त्या प्रत्ययत्वाला प्राप्त होतच नाही. म्हणून, त्या विपाक आणि क्रिया अव्याकृत धर्मांमध्ये सम्यक् दृष्टी इत्यादी देखील सुगती प्राप्त करून देण्याचा अर्थ सिद्ध करत नाहीत. क्लेशप्रहाण कृत्याचा अभाव असल्यामुळे ते निर्वाण प्राप्त करून देण्याचा अर्थही सिद्ध करत नाहीत. परंतु, त्या सम्यक् दृष्टी इत्यादींच्या स्वभाव-लक्षणाची विकलता (अपूर्णता) मात्र नसतेच. म्हणून त्यांचा मार्गप्रत्ययामध्ये संग्रह केला आहे. इंद्रिय धर्मांमध्ये अरूप इंद्रियांचे अधिपत्य कृत्य केवळ अरूप धर्मांमध्येच पसरते. परंतु रूप धर्म हे त्यांच्यापासून समुत्थित (उत्पन्न) झाल्यामुळेच त्यांच्या प्रत्ययोत्पन्नांमध्ये सांगितले आहेत. तसेच हेतू, कर्म, मार्ग आणि ध्यानांच्या बाबतीतही आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'एस नयो कमिन्द्रियझानपच्चयेसुपि' (हाच नियम कम्म, इन्द्रिय आणि झान प्रत्ययांमध्येही आहे). तिथे 'कम्म' शब्दाने 'नानाक्षणिक प्रत्यय' ग्रहण करावा. ‘‘สมฺปยุตฺตาสงฺกา สมฺภวตี’’ติ สหชาตา นามธมฺมา ตํ สมุฏฺฐาน รูเปหิ, ปจฺฉาชาตา จ อตฺตโน อตฺตโน ปจฺจยุปฺปนฺนรูเปหิ, วตฺถุ ธมฺมา จ ตนฺนิสฺสิตนามธมฺเมหิ กาลโต จ ฐานโต จ เอก สมฺพนฺธตฺตา เตสุ สมฺปยุตฺตาสงฺกา สมฺภวติ. ‘‘วิปฺปยุตฺตปจฺจยปฺปสงฺโค นตฺถี’’ติ อารมฺมณานนฺตราทิปจฺจยาปิ อตฺตโน ปจฺจยุปฺปนฺเนหิ สมฺปยุตฺตา น โหนฺติ. ตสฺมา เตปิ วิปฺปยุตฺตปจฺจย ภาเวน วตฺตพฺพาติ เอวรูโป วิปฺปยุตฺตปจฺจยปฺปสงฺโค เตสุ อารมฺมณ ปจฺจยาทีสุ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. 'संप्रयुक्ततेची शंका संभवते' म्हणजे सहजात नामधर्म त्यांच्या समुत्थान रूपांशी, आणि पश्चाज्जात धर्म आपापल्या प्रत्ययोत्पन्न रूपांशी, तसेच वस्तू धर्म त्यावर आश्रित असलेल्या नामधर्मांशी काळ आणि स्थानाच्या दृष्टीने एकाच संबंधाने जोडलेले असल्यामुळे, त्यांच्यामध्ये संप्रयुक्ततेची शंका संभवते. 'विप्रयुक्तप्रत्ययाचा प्रसंग येत नाही' म्हणजे आलंबन, अनंतर इत्यादी प्रत्यय देखील आपल्या प्रत्ययोत्पन्नांशी संप्रयुक्त नसतात. म्हणून त्यांनाही विप्रयुक्तप्रत्यय भावाने म्हटले पाहिजे, असा विप्रयुक्तप्रत्ययाचा प्रसंग त्या आलंबन प्रत्यय इत्यादींमध्ये येत नाही, असा अभिप्राय आहे. ‘‘เหฏฺฐาวุตฺตปฺปกาเรสุ เอวา’’ติ เอตฺถ เอวสทฺเทน ปจฺจยนฺตรํ น โหตีติ [Pg.263] ทสฺเสติ. ยทิ ปจฺจยนฺตรํ น โหติ, น วตฺตพฺโพเยว. กสฺมา, เทสกสฺส ปุนรุตฺตินิรตฺถกวาทิตา ปตฺติโตติ. โน น วตฺตพฺโพ. กสฺมา, โลเก โย สยํ นตฺถิ, วิคโต โหติ. โส กสฺส ปจฺจโย ภวิตุํ อรหตีติ เอวรูปสฺส มิจฺฉาภินิเวสสฺส ปหานโต. เตน อิมมตฺถํ ญาเปติ, โลเก เกจิธมฺมา สยํ อตฺถิกาเล เอว อญฺเญสํ ปจฺจยา โหนฺติ, โน นตฺถิกาเล. เกจิ ธมฺมา สยํ นตฺถิกาเล เอว อญฺเญสํ ปจฺจยา โหนฺติ, โน อตฺถิกาเลติ อยญฺจวิภาโค อวสฺสํ อิจฺฉิตพฺโพ เยวาติ. ‘‘โอกาสทานสงฺขาเตนา’’ติ ตสฺส อญฺญสฺส จิตฺตุปฺปาทสฺส อุปฺปตฺติยา โอกาสทานสงฺขาเตน. 'पूर्वी सांगितलेल्या प्रकारांमध्येच' येथे 'एव' (च) शब्दाने दुसरा कोणताही प्रत्यय होत नाही, हे दर्शविले आहे. जर दुसरा प्रत्यय होत नाही, तर ते सांगण्याची गरजच नाही. का? कारण उपदेश करणाऱ्यांना पुनरुक्ती आणि निरर्थक बोलण्याचा दोष प्राप्त होईल म्हणून. नाही, असे म्हणता येणार नाही (ते सांगणे आवश्यकच आहे). का? कारण जगात जो स्वतः अस्तित्वात नाही, जो निघून गेला आहे, तो दुसऱ्याचा प्रत्यय (कारण) कसा होऊ शकतो? अशा प्रकारच्या मिथ्या अभिनिवेशाचा (चुकीच्या समजुतीचा) नाश करण्यासाठी ते सांगितले आहे. याद्वारे हा अर्थ समजवला आहे की, जगामध्ये काही धर्म स्वतः अस्तित्वात असतानाच इतरांचे प्रत्यय होतात, अस्तित्वात नसताना नाही. तर काही धर्म स्वतः अस्तित्वात नसतानाच इतरांचे प्रत्यय होतात, अस्तित्वात असताना नाही; हा विभाग (भेद) निश्चितपणे स्वीकारलाच पाहिजे. 'ओकासदानसंखातेन' म्हणजे त्या दुसऱ्या चित्तोत्पादाच्या उत्पत्तीसाठी 'अवकाश देणे' या अर्थाने. สุตฺตนฺเต, อตฺถีติ อย เมโก อนฺโตติ สตฺตานํ เสฏฺฐสารภูโต อตฺตานาม อนมตคฺเค สํสาเร นิจฺจกาลํ อตฺถิ. อุจฺเฉโท วา วิโมกฺโข วา สพฺพโส นตฺถิ. อยํ สสฺสตวาโท นาม เอโกวิสมนฺโต เอกาวิสมาโกฏิ. นตฺถีติ สตฺโตนาม เอกภวปรโม โหติ, มรณโต ปรํ นตฺถิ. เอกนฺเตน อุจฺฉิชฺชติ. อยํ อุจฺเฉทวาโท นาม ทุตีโย วิสมนฺโต ทุตียาวิสมโกฏิ. อิเม ปฏิจฺจ สมุปฺปาทํ อชานนฺตานํ อุโภวิสมนฺตา นาม. ชานนฺตานํ ปน ตาทิโส อตฺตานาม นตฺถิ, โย อตฺถีติ วา นตฺถีติ วา วตฺตพฺโพ ภเวยฺย. สุทฺธธมฺมปฺปพนฺโธ เอว อตฺถิ. ตสฺส จ ยาว อวิชฺชา อปฺปหีนา โหติ, ตาว อุจฺเฉโท นาม นตฺถิ. อวิชฺชาย ปน ปหีนาย ตโตปรํ น ปวตฺตติ. อตฺถิ นาม น โหติ. อยํ อนฺตทฺวยมุตฺโต มชฺฌิมญาโย นาม. พหุํ นานตฺถ สมฺภวํ วณฺเณนฺติเยว. วณฺเณนฺตานํปิ เตสํ พหุ ปโยชนํ นตฺถิ เยวาติ อธิปฺปาโย. सूत्रांमध्ये, 'आहे' हा एक अंत (टोकाची भूमिका) आहे; प्राण्यांचा श्रेष्ठ आणि सारभूत असलेला 'आत्मा' नावाचा घटक अनादी संसारात नित्यकाळ अस्तित्वात असतो. त्याचा उच्छेद किंवा विमोक्ष पूर्णपणे होत नाही. याला 'शाश्वतवाद' नावाचा एक विषम अंत किंवा पहिली विषम कोटी म्हणतात. 'नाही' म्हणजे प्राणी नावाचा घटक केवळ एकाच जन्मापुरता मर्यादित असतो, मृत्यूनंतर काहीही उरत नाही. तो पूर्णपणे नष्ट होतो. याला 'उच्छेदवाद' नावाचा दुसरा विषम अंत किंवा दुसरी विषम कोटी म्हणतात. प्रतीत्यसमुत्पाद न जाणणाऱ्यांसाठी हे दोन्ही विषम अंत आहेत. परंतु, (प्रतीत्यसमुत्पाद) जाणणाऱ्यांसाठी असा कोणताही 'आत्मा' नावाचा घटक अस्तित्वात नाही, ज्याच्याविषयी 'आहे' किंवा 'नाही' असे म्हणावे. केवळ शुद्ध धम्मांचा प्रवाहच अस्तित्वात असतो. आणि जोपर्यंत अविद्या नष्ट होत नाही, तोपर्यंत उच्छेद होत नाही. परंतु, अविद्या नष्ट झाल्यावर त्यानंतर तो प्रवृत्त होत नाही. (त्यामुळे) 'आहे' असे म्हणता येत नाही. हा दोन्ही अंतांपासून मुक्त असलेला 'मध्यम मार्ग' (मज्झिम न्याय) होय. ते अनेक प्रकारच्या भिन्न अर्थांच्या उत्पत्तीचे वर्णन करतात. परंतु, असे वर्णन करणाऱ्यांसाठीही त्याचा फारसा उपयोग नाही, असा याचा अभिप्राय आहे. ปจฺจยุทฺเทสานุทีปนา นิฏฺฐิตา. प्रत्ययोद्देश-अनुदीपनी समाप्त झाली। ๑๖๘. ปจฺจยนิทฺเทเส. ‘‘ปญฺจธา’’ติ ปญฺจวิเธหิ ปจฺจเยหิ. ‘‘เอกธา’’ติ เอกวิเธน ปจฺจเยน. เอวํ เสเสสุปิ. ‘‘อวิจฺเฉทายา’’ติ อวิจฺเฉทตฺถาย. ‘‘ปฏิปาทนายา’’ติ โยชนตฺถาย. โย โกจิ จิตฺตุปฺปาโท อวิรุทฺธสฺส ยสฺส กสฺสจิ จิตฺตุปฺปาทสฺส [Pg.264] ปจฺจโย น น โหตีติ โยชนา. ‘‘ปุนุปฺปนฺนานํ’’ติ นิรุชฺฌิตฺวา ปุน อุปฺปนฺนานํ. ‘‘ปุริมานิ ชวนานี’’ติ เอตฺถ มคฺโค โคตฺรภุโต อาเสวน ปจฺจยํ ลภติ. ผลสฺส ปน โส ภินฺนชาติกตฺตา อาเสวน ปจฺจโย น โหติ. ผลํ ปน สพฺพโส อาเสวน มุตฺตํ โหติ. ตสฺมา ตทุภยํ อิธ ปุริมชวนสงฺขฺยํ น คจฺฉตีติ วุตฺตํ ‘‘มคฺค ผลชวนวชฺชานี’’ติ. ผลชวนวชฺชานํ ปจฺฉิมานํ ชวนานํ. ‘‘สพฺพาการปาริปูรํ’’ติ เอตฺถ กุสลาทิชาติปิ สงฺคหิตาติ วุตฺตํ ‘‘ชาติมตฺเตนปี’’ติ. อภินฺนา เอว สิยุํ. น ปน ภินฺนา โหนฺติ. กทาจิ เกจิภินฺนา เอว โหนฺติ. ตสฺมา ภินฺนชาติกา ธมฺมา. ล. น สกฺโกนฺตีติ โยชนา. ‘‘กามาวจรภาวโต มหคฺคตานุตฺตรภาวปตฺติ นามา’’ติ จิตฺตสนฺตานสฺสาติ อธิปฺปาโย. โคตฺร ภุจิตฺตํ กามภูมิ. ฌานจิตฺตํ มหคฺคตภูมิ. มคฺคจิตฺตํ โลกุตฺตร ภูมิ. กมฺมเจตนาย นิรุทฺธายปิ ตสฺสา ปวตฺตากาโร นนิรุชฺฌติ. จิตฺตสนฺตานํ อนุคจฺฉติ. โส เอว อายตึ วิปากธมฺมราสิ หุตฺวา ปาตุพฺภวติ. ตสฺมา โส วิปากสฺส พีชสงฺขฺยํ คจฺฉติ. โส จ ยาว น วิปจฺจติ. ตาว สํสารปฺปวตฺติยา สติ, อนฺตรา วินฏฺโฐ นาม น โหติ. ตสฺมา กมฺมเจตนา อุปฺปชฺชมานา จิตฺตสนฺตาเน ตสฺส พีชสฺส นิธานตฺถาย อุปฺปชฺชติ, นิรุชฺฌมานา จ นิทหิตฺวา เอว นิรุชฺฌตีติ วุตฺตํ ‘‘อตฺตโน ปวตฺตาการสงฺขาต พีชนิธานญฺจา’’ติ. ‘‘เจตนาย โหตี’’ติ เจตนาย สาธารณํ โหติ. ปุเรชาตา สาลรุกฺขโปตกา ปจฺจยา โหนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ปุริมจิตฺตกฺขเณสุ อุปฺปนฺนา จตุสมุฏฺฐานิกรูปธมฺมาติ สมฺพนฺธิตพฺพํ. ‘‘อาหารชกาโย’’ติ เอวํ วุตฺตาติ ปาฐเสโส. ‘‘ปจฺฉา ชาเตนา’’ติ ปจฺฉาชาตปจฺจเยน ปโยชนํ นตฺถิ. ชิณฺณปตรุกฺขสฺส อุทกาสิญฺจนํ วิย โหตีติ อธิปฺปาโย. ‘‘ยทคฺเคนา’’ติ เยนการณ โกฏฺฐาเสน. ‘‘วตฺถุ รูปํ’’ติ นิโรธาสนฺนํ หทยวตฺถุ รูปํ. ‘‘เอวมยํ ปี’’ติ เอวํ อยํ ปจฺฉาชาตปจฺจโยปิ. วิวิเธน อากาเรน ผรณํ กาลนฺตร เทสนฺตร คมนํ วิปฺผาโร. มหนฺโต วิปฺผาโร ยสฺสาติ สมาโส. ‘‘วตฺถุมฺหี’’ติ หทยวตฺถุมฺหิ. ปญฺจหิ ขนฺเธหิ โวกิณฺโณ สมฺมิสฺโสติ ปญฺจโวกาโร. กาม รูปภโว[Pg.265]. วินา อุปฺปชฺชิตุํ น สกฺโกติ. รูปวิราคภาวนาพเลน รูปสฺส อวิกฺขมฺภิตตฺตาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปุเรชาตํ วา’’ติ เอกจิตฺตกฺขณาตีเต ปุเรชาตํ วา. ‘‘วฑฺฒนปกฺเข ฐิตํ วา’’ติ ตโต ปจฺฉา ยาว อฏฺฐม จิตฺตกฺขณา วฑฺฒนปกฺเข ฐิตํ วา. ‘‘อุปฺปนฺนํ วตฺถู’’ติ อุปฺปนฺนํ วตฺถุรูปํ. ‘‘เอตฺถา’’ติ อิมสฺมึ ปุเรชาต ปจฺจเย. กิญฺจาปิ ทิสฺสตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปจฺจนีเย’’ติ ปจฺจนีย วาเร. ‘‘ตํ’’ติ อารมฺมณปุเรชาตํ. ตสฺส อารมฺมณสฺส อปริพฺยตฺตตฺตาวาติ สมฺพนฺโธ. การณํ วทนฺติ ปฏฺฐานฏีกาจริยา. อรูปภเว มรณาสนฺนกาเล กสฺสจิ คตินิมิตฺตุ ปฏฺฐานํ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตเมว. เอวญฺจสติ, ตตฺถ อารมฺมณ ปุเรชาตํ ลทฺธพฺพเมว. ปฏฺฐาเนปน ตสฺมึภเว สพฺพํ ปุเรชาตปจฺจยํ ปฏิกฺขิปติ. กสฺมา อิติ เจ, วตฺถุ ปุเรชาตปจฺจยสฺส ตตฺถ อลทฺธพฺพตฺตาติ อิมินา อธิปฺปาเยน ‘‘อารุปฺเปวิยา’’ติ วุตฺตํ. เอตฺถ จ ปฏฺฐาเน อรูปภเว ทฺเวปิ ปุเรชาตปจฺจยา ปฏิกฺขิตฺตา, ตสฺมา สพฺเพปิ อรูป ปุคฺคลา สพฺพํปิ รูปธมฺมํ อารมฺมณํ น กโรนฺตีติปิ วทนฺติ. เอวญฺจ กตฺวา อารมฺมณ สงฺคหทีปนิยํ ‘อสญฺญีภวโต จุตานํ วิย อรูปภวโต จุตานํปิ คตินิมิตฺตภูตํ กามปฏิสนฺธิยา อารมฺมณํ ภวนฺตเร เกนจิทฺวาเรน อคฺคหิตํ, เกวลํ กมฺมพเลเนว อุปฏฺฐาปิต’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘คูถกุณปาทีนี’’ติ คูถญฺจ มตปูติสรีรานิ จ. ‘‘เอวํ วุตฺเตหี’’ติ ปฏฺฐาเน วุตฺเตหิ. เต ปน อกุสลา ธมฺมา กถํ จตุภูมิก กุสลานํ อุปนิสฺสย ปจฺจยา โหนฺตีติ อาห ‘‘ตตฺถ อานนฺตริย วชฺชานี’’ติอาทึ. ตตฺถ อานนฺตริย กมฺมกตานํ กิเลสาวรณ กมฺมาวรเณหิ สมนฺนาคตตฺตา ฌานมคฺคปฺปฏิลาโภ นาม นตฺถีติ วุตฺตํ ‘‘อานนฺตริย วชฺชานี’’ติ. ‘‘ตานี’’ติ ราคาทีนิ อกุสลานิ จตุภูมิก กุสลานํ อุปฺปตฺติยา พลวนิสฺสยา โหนฺตีติ โยชนา. ‘‘สมติกฺกมมุเขนา’’ติ ปฏฺฐาเน อกุสโล ธมฺโม กุสลสฺส ธมฺมสฺส อุปนิสฺสย ปจฺจเยน ปจฺจโยติ เอตสฺส ปญฺหสฺส วิภงฺเค ปาณํ หนฺตฺวา ตสฺส ปฏิฆา ตตฺถาย ทานํ เทติ, สีลํ สมาทิยติ, อุโปสถกมฺมํ กโรติ, ฌานํ อุปฺปาเทติ, มคฺคํ อุปฺปาเทติ, อภิญฺญํ อุปฺปาเทตีติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘ตสฺส [Pg.266] ปฏิฆาตตฺถายา’’ติ ตสฺส ปาณาติปาตกมฺมสฺส ปฏิหนนตฺถาย ปหานตฺถาย สมติกฺกมนตฺถายาติ วุตฺตํ โหติ. โส เจ ปาณาติปาตี ปุคฺคโล ปุน สํเวคํ อาปชฺชิตฺวา ตสฺส กมฺมสฺส สมติกฺกมนตฺถาย ทานํ เทติ, สีลํ สมาทิยติ, อุโปสถ กมฺมํ กโรติ. ตทา ตํ ปาณาติ ปาตกมฺมํ ตํ ปุคฺคลํ ทานกมฺเมนิโยเชติ นาม. ตถา สีลกมฺเม อุโปสถ กมฺเมติ. ยถาหิ ราชา เอวํ วเทยฺย อิมสฺมึ ทิวเส โย อุโปสถํ นุปวสติ, ตํ ฆาเตสฺสามีติ. ตทา สพฺเพปิ นาครา อุโปสถํ อุปวเสยฺยุํ. เอวมิทํ ทฏฺฐพฺพํ. ราชาวิย หิ ตสฺส ปาณาติปาตกมฺมํ. นาครา วิย โส ปาณฆาตโก. อุโปสถ กมฺม กุสลานิ วิย ตสฺส ทานสีล อุโปสถ กมฺม กุสลานีติ. ‘‘ฌานํ อุปฺปาเทติ, มคฺคํ อุปฺปาเทติ, อภิญฺญํ อุปฺปาเทตี’’ติ ปเทสุปิ เอเสวนโย. เอวํ สมติกฺกมมุเขน เอกํปิ อกุสลํ สพฺพานิ จตุภูมิก กุสลานิ อุปนิสฺสย สตฺติยา ชเนติ ปวตฺเตตีติ เวทิตพฺพํ. ‘‘ตานิเยว สพฺพานี’’ติ อานนฺตริย กมฺมสหิตานิสพฺพานิ อกุสลานิเยว สพฺเพสํ อกุสลานํ อพฺยากต ธมฺมานํ อุปฺปตฺติยา พลวนิสฺสยา โหนฺตีติ โยชนา. ทานสีลาทโย กุสลา ธมฺมา. สุฏฺฐุ พลวํ กมฺมํ อธิปฺเปตํ, น ทุพฺพลํ. อุปนิสฺสยฏฺฐานตฺตา. เตสํปิ รูปธมฺมานํ พลวนิสฺสยา นนุโหนฺตีติ สมฺพนฺโธ. กถํ โหนฺตีติ อาห ‘‘พหิทฺธารุกฺขติณาทีนํ’’ติอาทึ. ตตฺถ ปถวีรส อาโปรสวสฺโสทก พีชานิ รุกฺขติณาทีนํ พลวนิสฺสยา โหนฺติ. มูลเภสชฺชาทีนิ อชฺฌตฺตํ สนฺตานํ พลวนิสฺสยา โหนฺตีติ โยชนา. ‘‘ปกตสฺเสวา’’ติ ปถมตรํ กตสฺส อุปฺปาทนาทิกมฺมสฺเสว. ‘‘น เอวํ รูปสนฺตาเนนา’’ติ เอวํ รูปสนฺตาเนน อุปฺปาทิตา อุปเสวิตา ธมฺมา นตฺถิ. ‘‘ตํ’’ติ อุตุพีชาทิกํ. กมฺมาทิกญฺจ. ‘‘ปกตํ’’ติ ปุเรตรํ อุปฺปาทิตญฺจ อุปเสวิตญฺจ. สเจตนสฺเสว เจตนํ ปกปฺปนํ ปกรณนฺติ สมฺพนฺโธ. เจตนํ ปกปฺปนํ ปกรณํ นามาติ อตฺโถ. ‘‘ปกปฺปนํ’’ติ จ สํวิธานํ. ‘‘กิญฺจี’’ติ กิญฺจิกมฺมาทิกํ อุตุโภชนาทิกญฺจ. อตฺตโน จ อุปฺปนฺนา ราคาทโย ปรสฺส จ สนฺตาเน ปรสฺส จ อุปฺปนฺนา ราคาทโย อตฺตโน จ สนฺตาเนติ โยชนา[Pg.267]. ‘‘นิทสฺสนํ’’ติ อุทาหรณํ โหติ. มโนปโทสิกเทวา อญฺญมญฺญํ ทิสฺวา อตฺตโน มนํ ปทูเสนฺติ. พาฬฺหํ อิสฺสาธมฺมํ อุปฺปาเทนฺติ. ตสฺมึเยว ขเณ จวนฺติ. เตสํ ทฺเว อิสฺสาธมฺมา อญฺญมญฺญสฺส พลวนิสฺสยา โหนฺตีติ. กามาวจร กุสลสฺส พลวนิสฺสยา โหนฺตีติอาทินา โยเชตพฺพํ. วิภาวนิปาเฐ. ฌาน มคฺค ผล วิปสฺสนาทิเภทํ อาลมฺพณํ ปจฺจเวกฺขน อสฺสาทนาทิ ธมฺเม อตฺตาธีเน กโรตีติ โยชนา. ‘‘อตฺตาธีเน’’ติ อตฺตายตฺเต อตฺตาพทฺเธ. ปฏฺฐาเน ปญฺหวาเร ทานํ ทตฺวา สีลํสมาทิยิตฺวา อุโปสถกมฺมํ กตฺวา ตํ ครุํ กตฺวา ปจฺจเวกฺขติ. ปุพฺเพ สุจิณฺณานิ ครุํ กตฺวา ปจฺจเวกฺขนฺตีติอาทินา อาคตตฺตาทาน สีล. ล. นิพฺพานานิ เจวาติ วุตฺตํ. ราคํ ครุํกตฺวา อสฺสาเทนฺติ, อภินนฺทตีติอาทินา, จกฺขุํ ครุํ กตฺวา อสฺสาเทนฺตีติอาทินา จ อาคตตฺตา ‘‘ราค ทิฏฺฐิ จกฺขุ โสตาทีนิจา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘ปรตฺถ ปี’’ติ ปรโต นิสฺสย ปจฺจยาทีสุปิ. ‘‘โส เอวา’’ติ ปจฺจุปตฺถมฺภโก เอว. ‘‘กิญฺจี’’ติ กิญฺจิมตฺตํปิ. มหาภูเต กิญฺจิ อุปตฺถมฺเภตุํ น สกฺโกนฺตีติ โยชนา. นนุ อาหาร รูปํ มหาภูเต อุปตฺถมฺเภตุํ สกฺโกติ. ชีวิตรูปญฺจ กมฺมชมหาภูเต อนุปาเลตุนฺติ. สจฺจํ. อิธ ปน สหชาตปจฺจย กิจฺจํ อธิปฺเปตํ. เตสญฺจ ทฺวินฺนํ สหชาตปจฺจย กิจฺจํ นตฺถิ. ตํ ปรโต อาวี ภวิสฺสตีติ. ‘‘วตฺถุ วิปากานํ’’ติ วตฺถุรูปํ วิปากานํ. ปฏฺฐานปาเฐ. อารมฺมณญฺจ, นิสฺสโย จ, ปุเรชาตญฺจ, วิปฺปยุตฺโต จ, อตฺถิ จ, อวิคโต จา,ติ ฉสุปจฺจเยสุ ฆฏิเตสุ ตีณิ วิสชฺชนานิ ลพฺภนฺตีติ โยชนา. ตีณิ วิสชฺชนานิ นาม วตฺถุ กุสลานํ ขนฺธานํ ฉ หิ ปจฺจเยหิ ปจฺจโย. วตฺถุ อกุสลานํ, วตฺถุ อพฺยากตานนฺติ. เอตฺถ จ อตฺตโน อชฺฌตฺตํ วตฺถุํ อารพฺภ วตฺถุ เม อนิจฺจนฺติอาทินา สมฺมสนฺตสฺส วตฺถุรูปํ กุสลานํ ขนฺธานํ ฉหิ ปจฺจเยหิ ปจฺจโย. เอตํ มม, เอโส หมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา,ติ อุปาทิยนฺตสฺส วตฺถุ รูปํ อกุสลานํ. อุภยตฺถปิ อาวชฺชนกฺขเณ อพฺยากตานํ. อรหโต ปน ตํ อนิจฺจนฺติอาทินา สมฺมสนฺตสฺส กฺริยาพฺยากตานํ ขนฺธานนฺติ. เตนาห ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนํ วตฺถุํ’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนํ วตฺถุํ’’ติ [Pg.268] อตฺตโน ปจฺจุปฺปนฺนํ วตฺถุํ. อธิฏฺฐานวิธาเน ปน อากาส คมเน รูปกายํ อารพฺภจิตฺตํ วิย กายํ ลหุกํ อธิฏฺฐหนฺตสฺส ตปฺปริยาปนฺนํ วตฺถุ อภิญฺญาจิตฺต ทฺวยสฺสาติ โยเชตพฺพํ. ‘‘อนิฏฺเฐฐาเน’’ติ ชวนจิตฺตสฺส อาวชฺชเนน วินา อุปฺปชฺชนํ นาม กตฺถจิ อิจฺฉิตพฺพํ โหติ. กตฺถจิ อนิจฺฉิตพฺพํ. ตตฺถ นิโรธสมาปตฺติโต วุฏฺฐาเน, มคฺควีถีสุ โคตฺรภุโวทานฏฺฐาเน, อาคนฺตุก ภวงฺคฏฺฐาเนติ อิทํ อิจฺฉิตพฺพฏฺฐานํ นาม. อิโต อญฺญํ อนิจฺฉิตฏฺฐานํ นาม. เอวํ อนิจฺฉิตพฺเพ ฐาเนติ อตฺโถ. ‘‘ปกติกาเล’’ติ มรณาสนฺนกาลโต อญฺญสฺมึกาเล. ‘‘ตานิวา’’ติ อตฺตโน อตฺตโน นิสฺสยวตฺถูนิวา. ‘‘อญฺญํ วา’’ติ วตฺถุโต อญฺญํ รูปาทิกํ วา. ‘‘ภินฺนารมฺมณานิ นามา’’ติ อญฺญํ อาวชฺชนสฺส อารมฺมณํ, อญฺญํ ชวนานนฺติ เอวํ ชวนานิ อาวชฺชเนน ภินฺนารมฺมณานิ วา. เตน วุตฺตํ ‘‘ปจฺฉาอุปฺปนฺนานี’’ติอาทิ. ‘‘เตสํ’’ติ วีถิจิตฺตานํ. ‘‘ตเทวา’’ติ ตํ เอววตฺถุ รูปํ. ‘‘วตฺถุ จา’’ติ นิสฺสโย จ. ‘‘เตสํ’’ติ อฏฺฐกถาจริยานํ. น หิ คเหตุํ สกฺโกนฺตีติ สมฺพนฺโธ. เสสเมตฺถ สุโพธํ. ‘‘กสฺมา วุตฺตํ’’ติอาทีสุ. ‘‘ตสฺส ยกฺขสฺสา’’ติ อินฺทกนามสฺส ตสฺสยกฺขสฺส. ‘‘อิตเรสํปี’’ติ สํเสทโชปปาติกานํปิ. ‘‘ทุวิเธนา’’ติ รูปชนน กิจฺจํ รูปูปตฺถมฺภน กิจฺจนฺติ เอวํ ทุวิเธน. อถวา ‘‘ทุวิเธนา’’ติ อชฺฌตฺตาหารสฺส อุปตฺถมฺภนํ พหิทฺธาหารสฺส อุปตฺถมฺภนนฺติ เอวํ ทุวิเธน. ‘‘ตถารูปานญฺจา’’ติ อปฺปนาปตฺตกมฺมวิเสเสน สิทฺธานญฺจ. ‘‘อชฺฌตฺตาหาโรปี’’ติ ปิสทฺเทน ยถาวุตฺตชีวิตินฺทฺริยญฺจ อรูปาหาเร จ สมฺปิณฺเฑติ. ‘‘วตฺถุวิปากานํ’’ติ วตฺถุรูปํ วิปากานํ. ‘‘สพฺพถา’’ติ อพฺยายปทํ. ตญฺจ สพฺพวิภตฺติยุตฺตํ. อิธ ปน ปจฺจตฺตวจนนฺติ อาห ‘‘สพฺพถา’’ติ สพฺพปฺปการนฺติ. ปกาโร จ เวทิตพฺโพติ สมฺพนฺโธ. กถํ เวทิตพฺโพติ อาห ‘‘ติวิโธ’’ติอาทึ. ‘‘สหชาเต สงฺคเหตพฺพํ’’ติ ปจฺจยภาเวน สงฺคเหตพฺพํ. สหชนนํ นาม อตฺตนา สห ชเนนฺตสฺส สหชนนํ. ตญฺจ กมฺมจิตฺตาทีนํ วิย วิสุํ ชนนกิจฺจํ น โหติ. อตฺตนิ อุปฺปชฺชนฺเต เอว อิตรานิ รูปานิ อุปฺปชฺชนฺติ. อนุปฺปชฺชนฺเต น อุปฺปชฺชนฺตีติ เอวรูปํ ชนนกิจฺจํ เวทิตพฺพํ[Pg.269].‘‘วินาว สหุปฺปาทนกิจฺเจนา’’ติ อตฺตนา สหุปฺปาทนกิจฺเจ อาหารสฺส พฺยาปาโร นตฺถีติ อธิปฺปาโย. เตเนว สหชาตานิ อุปตฺถมฺภนฺโตปิ สหชาตปจฺจยตฺตํ น คจฺฉตีติ. เอสนโย รูปชีวิตินฺทฺริเยปิ. เตน วุตฺตํ ‘‘ชีวิตํปี’’ติอาทิ. ‘‘ตีสู’’ติ อารมฺมณญฺจ อุปนิสฺสโย จ อตฺถิจาติ อิเมสุ ตีสุ. อารมฺมณาธิปติมฺหิ ปุเรชาตา รมฺมณาธิปติปิ อตฺถิ. โส ปุเรชาตตฺถิ ปจฺจโย เอวาติ อตฺถิปจฺจเย สงฺคหิโต. ‘‘ตสฺมึ กเต ปวตฺตมานานํ’’ติ ตสฺมึ กมฺเม กเต ตสฺส กตตฺตา เอว ปวตฺตมานานํ. อารมฺมณากาโร โคจรวิสยากาโร. ‘‘สนฺตานวิเสสํ กตฺวา’’ติ พีชนิธานํ กตฺวาติ อธิปฺปาโย. ‘‘เต’’ติ อารมฺมณปจฺจย กมฺม ปจฺจยา. ‘‘อกาลิโก’’ติ มคฺคเจตนาวเสน อกาลิโก. โสหิ อตฺตโน อนนฺตเรผลํ ชเนติ. ตสฺมา อาคเมตพฺพสฺส อายติกาลสฺส อภาวา อกาลิโกติ วุจฺจติ. อวเสโส นานกฺขณิกปจฺจโย กาลิโก. ‘‘ปจฺจยฏฺเฐนา’’ติ ปจฺจยกิจฺเจน. โลกปฺปวตฺติยา กมฺมเหตุกตฺตาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ผลเหตู ปจาเรนา’’ติ ผลภูตาย สพฺพโลกปฺปวตฺติยา เหตุภูตสฺส กมฺมสฺส นามํ ผลมฺหิ อาโรเปตฺวา โวหาเรน สพฺเพปิ เตวีสติปจฺจยา กมฺมสภาวํ นาติวตฺตนฺตีติ โยชนา. กมฺมปจฺจย สงฺขฺยํ คจฺฉนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘วิชฺชมานา เยวา’’ติ อตฺถิปจฺจยา เอวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘สาสนยุตฺติยา วิรุทฺธเมวา’’ติ เอตฺถ สาสนยุตฺติ นาม ตีณิปิฏกานิ. ‘‘วิรุทฺธเมวา’’ติ อารมฺมณ ปจฺจยภูตา สพฺเพ ปถวี ปพฺพต นทีสมุทฺท อชฏากาสาทโย จ สพฺพาปญฺญตฺติโย จ นิพฺพานญฺจ กมฺมสงฺขฺยํ คจฺฉนฺตีติ วทนฺโต จ, สพฺเพ อตีตานาคต ธมฺมา อตฺถิปจฺจยา เอวาติ วทนฺโต จ, ตีหิ ปิฏเกหิปิ วิรุชฺฌติเยว. ปฏฺฐานปาฬิยา ปน วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. อตฺถิ สทฺโทหิ ปฏฺฐาเน ปจฺจุปฺปนฺนภาเวน วิชฺชมานตฺโถ. น ปรมตฺถ ธมฺม ภาเวน. นาปิโลก สมฺมุติวเสน. น หิ ปรมตฺถ ธมฺม ภูตาปิ อตีตานาคตธมฺมา อิธ อตฺถิ สงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ. นาปิปญฺญตฺติ โหติ. ‘‘อญฺญมญฺญปฺปฏิพทฺธโอกาเส’’ติ อญฺญมญฺญํ นิสฺสยนิสฺสิตภาเว น ปฏิพทฺเธ [Pg.270] กามรูปภโวกาเส. ‘‘ยโต’’ติ ยมฺหาปฏิสนฺธิ วิญฺญาณโต. ‘‘ยโต’’ติ วา ยมฺหาสีสโต, ยมฺหาพีชโต นิพฺพตฺตีติ โยชนา. ‘‘พีชโต วิย มหารุกฺขสฺสา’’ติ พีชปจฺจยา กฬีรงฺกุราทิกสฺส มหารุกฺขสนฺตานสฺส นิพฺพตฺติวิย. ปาฬิปาเฐ. ‘‘น โอกฺกมิสฺสถา’’ติ สเจ น โอกฺกเมยฺย. ‘‘สมุจฺจิสฺสถา’’ติ อปินุโข สมุจฺเจยฺย, วฑฺเฒยฺย. ‘‘โวกฺกมิสฺสถา’’ติ สเจ วิคเมยฺย, วินาเสยฺย. ‘‘อภินิพฺพตฺติสฺสถา’’ติ อปินุโข อภินิพฺพตฺเตยฺย, ปาตุภเวยฺย. ‘‘โวจฺฉิชฺชิสฺสถา’’ติ สเจอุจฺฉิชฺเชยฺย. ‘‘อาปชฺชิสฺสถา’’ติ อปินุโข อาปชฺเชยฺย. ‘‘ยทิทํ’’ติ ยํ อิทํ. ‘‘อิทํ’’ติ นิปาตมตฺตํ. ‘‘วิญฺญาณํ’’ติ ปฏิสนฺธิวิญฺญาณํ. ยํ วิญฺญาณํ อตฺถิ. เอเสว วิญฺญาณ ธมฺโมติ โยชนา. ‘‘รูปุปฺปตฺติยา’’ติ รูปุปฺปาทสฺส. วิญฺญาณํ ปจฺจโย เอตสฺสาติ วิญฺญาณ ปจฺจยา. รูปุปฺปตฺติ. ‘‘รูปปฺปเวณิยา’’ติ กมฺมชรูปสนฺตติยา. ‘‘อุตุอาหาราปี’’ติ อชฺฌตฺต อุตุอชฺฌตฺต อาหาราปิ. อิทญฺจ สมฺภวยุตฺติ วเสน วุตฺตํ. อตฺถโต ปน ปุริมุปฺปนฺนาย รูปปฺปเวณิยา อสติ, อชฺฌตฺตํ เต อุตุอาหาราปิ นตฺถิเยว. พหิทฺธา อุตุปน อสติปิ ปุริมุปฺปนฺนาย รูปปฺปเวณิยา รูปํ น ชเนตีติ น วตฺตพฺพํ. ฏีกาปาเฐ. ‘‘อรูปํ ปนา’’ติ อรูปภูมิปน. ‘‘ยสฺมึรูเป’’ติ กมฺมชรูเป. ‘‘ปจฺจยภาโว อตฺถี’’ติ ปจฺฉิมรูปุปฺปตฺติยา ปจฺจยสตฺติ อตฺถิ. กสฺมา วิญฺญายตีติ เจ. ‘‘ปุตฺตสฺสา’’ติอาทิมาห. ‘‘พีชภาวสงฺขาตํ’’ติ อมฺพพีชาทีนํ พีชภาวสงฺขาตํ. ‘‘นิยามรูปํ นามา’’ติ อุตุวิเสสมาห. ‘‘ยถา วา ตถา วา’’ติ อนิยมโตติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘โยนิภาวสงฺขาตํ’’ติ ตํ ตํ โคตฺตกุลชาตีนํ ชาติภาวสงฺขาตํ. ‘‘นิยามรูปํ’’ติ อุตุวิเสส สงฺขาตํ นิยามรูปํ. สทิสานิ รูปสณฺฐานานิ เยสนฺติ วิคฺคโห. ‘‘ปฏิสนฺธิรูปสฺเสว อานุภาโว’’ติ กลลกาลาทีสุ อุปฺปนฺนสฺส ปฏิสนฺธิรูปสฺเสว อานุภาโว. ปุน ตเมวตฺถํ วิเสเสตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ‘‘สมุทาคตํ’’ติ สุฏฺฐุ อุปรูปริอาคตํ. อิตฺถิภาวาทิรูปํ พีชรูปญฺจ นิยาเมตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นิยามกํ’’ติ นานาวณฺณสณฺฐานาทีนํ นิยามกํ. ‘‘ตตฺถ [Pg.271] อิมสฺมึ ภเว’’ติอาทีสุ. ธนญฺจ ธญฺญญฺจ ตโต อวเสสา สพฺเพอุปโภคปริโภคาจาติ วิคฺคโห. วิชฺชา จ สิปฺปญฺจ นานาพหุสฺสุตญฺจ ปริยตฺติ จาติ ทฺวนฺโท. ‘‘อนาคตานํ ตาสํ’’ติ ตาสํ อภินวธนธญฺญาทิสมฺปตฺตีนํ. ‘‘อุปนิสฺสย ปจฺจยตา’’ติ ปุพฺพโยคกมฺมสฺส อุปนิสฺสย ปจฺจยตา. ตตฺถ ธนธญฺญโภคานํ ปฏิลาภตฺถาย ปุพฺพโยคกรณํ นาม กสิกมฺม วาณิชฺชกมฺมาทีนํ กรณํ. ตตฺถ กสิกมฺเม ตาว ธนธญฺญโภคานํ ปฏิลาภตฺถาย กสิกมฺมกรเณ ธนธญฺญโภคา อนาคตูปนิสฺสย ปจฺจโย. อิทานิ กสิกมฺมกรณํ ตสฺส ปจฺจยุปฺปนฺนํ. ธนธญฺญ โภคานํ ปฏิลาภปริโภคกาเลสุ กสิกมฺมกรณํ อตีตูปนิสฺสย ปจฺจโย. เตสํ ปฏิลาโภ จ ปริโภโค จ ตสฺส ปจฺจยุปฺปนฺโน. กสิกมฺมกรณกฺขเณ ปน เขตฺต, วตฺถุ, พีช, เมฆวุฏฺฐิโย จ นงฺคลาทีนิ กสิภณฺฑานิ จ โคมหึสา จ กมฺมการก ปุริสา จ ปจฺจุปฺปนฺนูปนิสฺสโย. กสิกมฺมกรณํ ตสฺส ปจฺจยุปฺปนฺนํ. กมฺมสาธิกสฺส มาตาปิตาทโย ปุพฺพปุริสา ตสฺส กมฺมสฺส อตีตูปนิสฺสย ปจฺจโย. ตํ กมฺมํ ตสฺส ปจฺจยุปฺปนฺนนฺติ. เอวํ เสเสสุปิ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยํ. १६८. प्रत्ययनिर्देशामध्ये (प्रत्ययविभागात). "पंचधा" म्हणजे पाच प्रकारच्या प्रत्ययांनी. "एकधा" म्हणजे एका प्रकारच्या प्रत्ययाने. याचप्रमाणे उर्वरित शब्दांच्या बाबतीतही समजावे. "अविच्छेदाय" म्हणजे अविच्छेदासाठी (अखंडतेसाठी). "प्रतिपादनाय" म्हणजे योजनेसाठी (जोडण्यासाठी). कोणताही चित्तोत्पाद (चित्ताचा उदय) हा अविरुद्ध असलेल्या ज्या कोणत्या चित्तोत्पादाचा प्रत्यय (कारण) होत नाही असे नाही, अशी योजना आहे. "पुनुप्पन्नानं" (पुन्हा उत्पन्न झालेल्यांचे) म्हणजे जे निरुद्ध होऊन पुन्हा उत्पन्न झाले आहेत त्यांचे. "पुरिमानि जवनानि" (पूर्वीची जवने) यामध्ये मार्ग हा गोत्रभू कडून आसेवन प्रत्यय प्राप्त करतो. परंतु फलासाठी तो (मार्ग) भिन्नजातीय असल्यामुळे आसेवन प्रत्यय होत नाही. परंतु फल हे सर्वथा आसेवनापासून मुक्त असते. म्हणून ते दोन्ही येथे 'पूर्वीच्या जवनांच्या' संख्येत गणले जात नाहीत, म्हणूनच "मार्ग आणि फल जवन वगळून" (मग्गफलजवनवज्जानि) असे म्हटले आहे. फलजवन वगळता नंतरच्या जवनांचे. "सब्बाकारपारिपूरं" (सर्व प्रकारे परिपूर्ण) यामध्ये कुशल इत्यादी जातींचाही संग्रह होतो, म्हणून "केवळ जातीने सुद्धा" (जातिमत्तेनपि) असे म्हटले आहे. ते अभिन्नच असावेत, भिन्न नसावेत. कधीकधी काही भिन्नच असतात. म्हणून भिन्नजातीय धर्म... इत्यादी... समर्थ नसतात, अशी योजना आहे. "कामावचर भावापासून महग्गत आणि अनुत्तर भावाची प्राप्ती होणे" म्हणजे चित्तसंतानाची (प्राप्ती होणे) असा अभिप्राय आहे. गोत्रभू चित्त हे कामभूमी आहे. ध्यानचित्त हे महग्गतभूमी आहे. मार्गचित्त हे लोकोत्तरभूमी आहे. कर्मचेतना निरुद्ध झाली तरी तिच्या प्रवृत्तीचा आकार (प्रकार) निरुद्ध होत नाही. तो चित्तसंतानाचे अनुगमन करतो. तोच भविष्यात विपाकधर्माचा समूह बनून प्रकट होतो. म्हणून तो विपाकासाठी 'बीज' संज्ञेस प्राप्त होतो. आणि जोपर्यंत तो विपाकाला प्राप्त होत नाही, तोपर्यंत संसारप्रवृत्ती चालू असताना, मध्येच नष्ट होत नाही. म्हणून कर्मचेतना उत्पन्न होताना चित्तसंतानामध्ये त्या बीजाच्या स्थापनेसाठी (ठेवण्यासाठी) उत्पन्न होते, आणि निरुद्ध होताना ते प्रस्थापित करूनच निरुद्ध होते, म्हणूनच "स्वतःच्या प्रवृत्तीच्या आकाराने युक्त अशा बीजाची स्थापना" (अत्तनो पवत्ताकारसंखात बीजनिधानञ्च) असे म्हटले आहे. "चेतनाय होति" म्हणजे चेतनेसाठी साधारण (समान) असते. पूर्वी उत्पन्न झालेले सालवृक्षाचे अंकुर (रोपे) प्रत्यय होतात, असा संबंध आहे. पूर्वीच्या चित्तक्षणांमध्ये उत्पन्न झालेले चतुःसमुत्थानिक रूपधर्म, असा संबंध जोडला पाहिजे. "आहारजकायो" (आहारजन्य शरीर) असे म्हटले आहे, हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. "पश्चाजातेन" (नंतर उत्पन्न झालेल्याने) म्हणजे पश्चाजात प्रत्ययाने काही प्रयोजन नाही. हे जीर्ण (वाळलेल्या) पानांच्या वृक्षाला पाणी घालण्यासारखे आहे, असा अभिप्राय आहे. "यदग्गेन" म्हणजे ज्या कारणाच्या भागाने (विभागाने). "वत्थु रूपं" (वस्तुरूप) म्हणजे निरोधाच्या जवळ असलेले हृदयवस्तुरूप. "एवमयं पि" म्हणजे अशा प्रकारे हा पश्चाजात प्रत्यय सुद्धा. विविध आकारांनी पसरणे, कालान्तराने व देशान्तराने जाणे म्हणजे 'विप्फार' (विस्तार/प्रसार) होय. ज्याचा विस्तार मोठा आहे, असा हा समास आहे. "वत्थुम्हि" म्हणजे हृदयवस्तूमध्ये. पाच स्कंधांनी संमिश्र असलेला तो 'पंचवोकार' (पंचस्कंधयुक्त) होय. काम आणि रूप भव. त्याशिवाय उत्पन्न होण्यास समर्थ नाही. रूपविराग भावनेच्या बलाने रूपाचा विक्षेप न झाल्यामुळे, असा अभिप्राय आहे. "पुरेजातं वा" (किंवा पूर्वी उत्पन्न झालेले) म्हणजे एका चित्तक्षणापूर्वी उत्पन्न झालेले किंवा. "वड्ढनपक्खे ठितं वा" म्हणजे त्यानंतर आठव्या चित्तक्षणापर्यंत वाढीच्या पक्षात (स्थितीत) राहिलेले किंवा. "उप्पन्नं वत्थु" म्हणजे उत्पन्न झालेले वस्तुरूप. "एत्थ" (येथे) म्हणजे या पुरेजात प्रत्ययामध्ये. काही प्रमाणात दिसते, असा संबंध आहे. "पच्चनीये" म्हणजे प्रत्यनीक (विरोधी) वारामध्ये. "तं" म्हणजे आलंबन-पुरेजात. त्या आलंबनाच्या अस्पष्टतेमुळे, असा संबंध आहे. असे कारण प्रस्थान-टीकाकार (पट्ठानटीकाचारिय) सांगतात. अरूप भवामध्ये मरणासन्न काळी कोणाचे तरी गतिनिमित्त प्रस्थापित होणे हे अट्ठकथांमध्ये सांगितलेच आहे. आणि असे असताना, तेथे आलंबन-पुरेजात प्राप्त होण्याजोगेच आहे. परंतु प्रस्थानामध्ये (पट्ठान) त्या भवातील सर्व पुरेजात प्रत्ययाचा निषेध केला जातो. ते का? असे विचारल्यास, कारण तेथे वस्तुरूप पुरेजात प्रत्यय प्राप्त होत नाही, याच अभिप्रायाने "आरूप्य (अरूप भवा) प्रमाणेच" (आरुप्पेविय) असे म्हटले आहे. आणि येथे प्रस्थानामध्ये अरूप भवातील दोन्ही पुरेजात प्रत्ययांचा निषेध केला आहे, म्हणून सर्वच अरूप पुद्गल कोणत्याही रूपधर्माला आलंबन बनवत नाहीत, असेही म्हणतात. आणि असे मानून 'आलंबनसंग्रहदीपनी' मध्ये म्हटले आहे की: 'असंज्ञी भवातून च्युत झालेल्यांप्रमाणेच अरूप भवातून च्युत झालेल्यांचेही गतिनिमित्त बनलेले काम-प्रतिसंधीचे आलंबन दुसऱ्या भवामध्ये कोणत्याही द्वाराने ग्रहण केले जात नाही, तर ते केवळ कर्माच्या बलानेच उपस्थित केले जाते.' "गूथकुणपादीनि" म्हणजे विष्ठा आणि मृत कुजलेली शरीरे इत्यादी. "एवं वुत्तेहि" म्हणजे प्रस्थानामध्ये सांगितलेल्यांनुसार. परंतु ते अकुशल धर्म चतुर्भूमिक कुशल धर्मांचे उपनिश्रय प्रत्यय कसे होतात? यावर म्हणतात: "तेथे आनंतर्य वगळून" (तत्थ आनन्तरिय वज्जानि) इत्यादी. तेथे आनंतर्य कर्म करणाऱ्यांना क्लेशावरण आणि कर्मावरण यांनी युक्त असल्यामुळे ध्यान व मार्गाची प्राप्ती होत नाही, म्हणूनच "आनंतर्य वगळून" असे म्हटले आहे. "तानि" (ते) म्हणजे राग इत्यादी अकुशल धर्म हे चतुर्भूमिक कुशल धर्मांच्या उत्पत्तीसाठी बलवान उपनिश्रय (बलवनिस्सय) होतात, अशी योजना आहे. "समतिक्कममुखेन" (अतिक्रमण करण्याच्या मार्गाने) म्हणजे प्रस्थानामध्ये 'अकुशल धर्म हा कुशल धर्माचा उपनिश्रय प्रत्ययाने प्रत्यय होतो' या प्रश्नाच्या विभंगामध्ये म्हटले आहे की: प्राण्याची हत्या करून, त्याच्या प्रतिकारासाठी (निवारणासाठी) दान देतो, शील समादान करतो, उपोसथ कर्म करतो, ध्यान उत्पन्न करतो, मार्ग उत्पन्न करतो, अभिज्ञा उत्पन्न करतो. तेथे "त्याच्या प्रतिकारासाठी" (तस्स पटिघातत्थाय) म्हणजे त्या प्राणातिपात कर्माच्या निवारणासाठी, प्रहाणासाठी, अतिक्रमणासाठी असे म्हटले आहे. जर तो प्राणातिपाती पुद्गल पुन्हा संवेगाला प्राप्त होऊन त्या कर्माच्या अतिक्रमणासाठी दान देतो, शील समादान करतो, उपोसथ कर्म करतो, तेव्हा ते प्राणातिपात कर्म त्या पुद्गलाला दानकर्मामध्ये नियोजित करते. तसेच शीलकर्म आणि उपोसथकर्मामध्येही समजावे. जसे राजाने म्हणावे की, 'या दिवशी जो उपोसथ पाळणार नाही, त्याला मी ठार मारीन.' तेव्हा सर्वच नागरिक उपोसथ पाळतील. हे याचप्रमाणे पाहिले पाहिजे. राजाप्रमाणे त्याचे ते प्राणातिपात कर्म आहे. नागरिकांप्रमाणे तो प्राणघातक आहे. उपोसथ कर्माच्या कुशलाप्रमाणे त्याचे दान, शील व उपोसथ कर्माचे कुशल आहे. "ध्यान उत्पन्न करतो, मार्ग उत्पन्न करतो, अभिज्ञा उत्पन्न करतो" या पदांमध्येही हाच न्याय (नियम) आहे. अशा प्रकारे अतिक्रमणाच्या मार्गाने एकही अकुशल धर्म सर्व चतुर्भूमिक कुशल धर्मांना उपनिश्रय शक्तीने उत्पन्न करतो व प्रवृत्त करतो, असे जाणावे. "तानियेव सब्बानि" म्हणजे आनंतर्य कर्मासह सर्व अकुशल धर्मच सर्व अकुशल व अव्याकृत धर्मांच्या उत्पत्तीसाठी बलवान उपनिश्रय होतात, अशी योजना आहे. दान, शील इत्यादी कुशल धर्म आहेत. अत्यंत बलवान कर्म अभिप्रेत आहे, दुर्बल नाही. उपनिश्रय स्थान असल्यामुळे. त्या रूपधर्मांचेही ते बलवान उपनिश्रय होत नाहीत का? असा संबंध आहे. ते कसे होतात? यावर म्हणतात: "बाह्य वृक्ष, तृण इत्यादींचे" (बहिद्धा रुक्खतिणादीनं) इत्यादी. तेथे पृथ्वीरस, आपरस (जल), पावसाचे पाणी आणि बीजे हे वृक्ष, तृण इत्यादींचे बलवान उपनिश्रय होतात. मूळ, औषधी इत्यादी अध्यात्म संतानाचे बलवान उपनिश्रय होतात, अशी योजना आहे. "पकतस्सेव" (केलेल्याचेच) म्हणजे सर्वप्रथम केलेल्या उत्पादन इत्यादी कर्माचेच. "न एवं रूपसंतानेन" म्हणजे अशा रूपसंतानाने उत्पन्न केलेले किंवा सेवन केलेले धर्म नाहीत. "तं" म्हणजे ऋतू, बीज इत्यादी आणि कर्मादी. "पकतं" म्हणजे पूर्वी उत्पन्न केलेले आणि सेवन केलेले. सचेतन असलेल्याचीच चेतना, संकल्प आणि प्रवृत्ती असा संबंध आहे. चेतना, संकल्प आणि प्रवृत्ती असा अर्थ आहे. "पकप्पनं" म्हणजे संविधान (नियोजन). "किञ्चि" म्हणजे काही कर्मादी आणि ऋतू, भोजन इत्यादी. स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेले राग इत्यादी दुसऱ्याच्या संतानामध्ये, आणि दुसऱ्यामध्ये उत्पन्न झालेले राग इत्यादी स्वतःच्या संतानामध्ये (प्रत्यय होतात), अशी योजना आहे. "निदस्सनं" म्हणजे उदाहरण आहे. मनःप्रदोषिक देव एकमेकांना पाहून आपले मन प्रदूषित करतात. तीव्र ईर्ष्याधर्म उत्पन्न करतात. त्याच क्षणी च्युत (मृत) होतात. त्यांचे ते दोन्ही ईर्ष्याधर्म एकमेकांसाठी बलवान उपनिश्रय होतात. कामावचर कुशलाचे बलवान उपनिश्रय होतात, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. विभावनी पाठात: ध्यान, मार्ग, फल, विपश्यना इत्यादी भेदांनी युक्त असलेल्या आलंबनाला प्रत्यावेक्षण, आस्वादन इत्यादी धर्मांना स्वतःच्या अधीन करतो, अशी योजना आहे. "अत्ताधीने" म्हणजे स्वतःच्या आयत्त (अधीन), स्वतःशी बद्ध. प्रस्थानाच्या प्रश्नवारामध्ये 'दान देऊन, शील समादान करून, उपोसथ कर्म करून, त्याला आदरणीय (गुरू) मानून प्रत्यावेक्षण करतो. पूर्वी चांगल्या प्रकारे आचरलेल्या कर्मांना आदरणीय मानून प्रत्यावेक्षण करतात' इत्यादी प्रकारे आलेल्या दान, शील... इत्यादी... आणि निर्वाण सुद्धा, असे म्हटले आहे. 'रागाला आदरणीय (महत्त्वाचे) मानून आस्वादन करतात, अभिनंदित करतात' इत्यादी आणि 'चक्षूला आदरणीय मानून आस्वादन करतात' इत्यादी प्रकारे आल्यामुळे "राग, दृष्टी, चक्षू, श्रोत्र इत्यादी सुद्धा" असे म्हटले आहे. "परत्थ पि" म्हणजे पुढे निश्रय प्रत्यय इत्यादींमध्येही. "सो एव" म्हणजे उपष्टंभक (पाठबळ देणारा) च. "किञ्चि" म्हणजे थोडे देखील. महाभूतांना थोडेही उपष्टंभित करण्यास समर्थ नाहीत, अशी योजना आहे. शंका: आहाररूप महाभूतांना उपष्टंभित करण्यास समर्थ आहे आणि जीवितरूप कर्मज महाभूतांचे रक्षण करण्यास समर्थ आहे ना? उत्तर: सत्य आहे. परंतु येथे सहजात प्रत्ययाचे कार्य अभिप्रेत आहे. आणि त्या दोघांचे सहजात प्रत्ययाचे कार्य नाही. ते पुढे स्पष्ट होईल. "वत्थु विपाकानं" म्हणजे वस्तुरूप विपाकांचे. प्रस्थानपाठामध्ये: आलंबन, निश्रय, पुरेजात, विप्रयुक्त, अस्ति आणि अविगत या सहा प्रत्ययांची जुळणी केली असता तीन विसर्जन (उत्तरे) प्राप्त होतात, अशी योजना आहे. तीन विसर्जने म्हणजे: वस्तू ही कुशल स्कंधांसाठी सहा प्रत्ययांनी प्रत्यय होते; वस्तू अकुशलांसाठी; वस्तू अव्याकृतांसाठी. आणि येथे स्वतःच्या अध्यात्म वस्तूला आरंभ करून 'माझी वस्तू अनित्य आहे' इत्यादी प्रकारे संमर्शन (चिंतन) करणाऱ्यासाठी वस्तुरूप हे कुशल स्कंधांसाठी सहा प्रत्ययांनी प्रत्यय होते. 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे उपादान करणाऱ्यासाठी वस्तुरूप हे अकुशलांसाठी (प्रत्यय होते). दोन्ही ठिकाणी आवर्जन क्षणी अव्याकृतांसाठी (प्रत्यय होते). परंतु अर्हतासाठी 'ते अनित्य आहे' इत्यादी प्रकारे संमर्शन करणाऱ्यासाठी क्रिया-अव्याकृत स्कंधांसाठी (प्रत्यय होते). म्हणूनच "प्रत्युत्पन्न वस्तूला" (पच्चुप्पन्नं वत्थुं) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "प्रत्युत्पन्न वस्तूला" म्हणजे स्वतःच्या प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) वस्तूला. अधिष्ठान विधीमध्ये आकाशात गमन करताना रूपकायाला आरंभ करणाऱ्या चित्ताप्रमाणे, काया हलकी करण्याचे अधिष्ठान करणाऱ्यासाठी त्या अंतर्गत असलेली वस्तू ही दोन अभिज्ञाचित्तांसाठी (प्रत्यय होते), अशी योजना करावी. "अनिट्ठेठाने" (अनिष्ट स्थानी) म्हणजे जवनचित्ताचे आवर्जनाशिवाय उत्पन्न होणे हे कोठे तरी इच्छित असते, तर कोठे तरी अनिच्छित असते. तेथे निरोधसमापत्तीमधून उठताना, मार्गवीथींमध्ये गोत्रभू व अवदान स्थानी, आगंतुक भवांग स्थानी, हे इच्छित स्थान होय. याहून इतर हे अनिच्छित स्थान होय. अशा प्रकारे अनिच्छित स्थानी, असा अर्थ आहे. "पकृतिकाले" म्हणजे मरणासन्न काळाव्यतिरिक्त इतर वेळी (सामान्य वेळी). "तानिवा" म्हणजे स्वतःची स्वतःची निश्रयवस्तू किंवा. "अञ्ञं वा" म्हणजे वस्तूव्यतिरिक्त इतर रूप इत्यादी किंवा. "भिन्नारम्मणानि नामा" म्हणजे आवर्जनाचे आलंबन वेगळे आणि जवनांचे आलंबन वेगळे, अशा प्रकारे जवने आवर्जनापेक्षा भिन्न आलंबन असणारी असतात. म्हणूनच "नंतर उत्पन्न झालेली" (पच्छाउप्पन्नानि) इत्यादी म्हटले आहे. "तेसं" म्हणजे वीथीचित्तांचे. "तदेव" म्हणजे तेच वस्तुरूप. "वत्थु च" म्हणजे निश्रय (आश्रय) च. "तेसं" म्हणजे अट्ठकथाचार्यांचे. ग्रहण करण्यास समर्थ नाहीत, असा संबंध आहे. येथील उर्वरित भाग सुबोध (स्पष्ट) आहे. "कस्मा वृत्तं" (का म्हटले आहे) इत्यादींमध्ये. "तस्स यक्खस्स" म्हणजे इंद्रक नावाच्या त्या यक्षाचे. "इतरेसम्पि" म्हणजे संस्वेदज आणि औपपातिक जीवांचेही. "दुविधेन" म्हणजे रूप उत्पन्न करण्याचे कार्य आणि रूपाला उपष्टंभित करण्याचे कार्य, अशा दोन प्रकारे. अथवा "दुविधेन" म्हणजे अध्यात्म आहाराचे उपष्टंभन आणि बाह्य आहाराचे उपष्टंभन, अशा दोन प्रकारे. "तथारूपाणञ्च" म्हणजे अर्पणा प्राप्त झालेल्या विशेष कर्माने सिद्ध झालेल्यांचेही. "अज्झत्ताहारोपि" यातील 'अपि' (सुद्धा) शब्दाने वर सांगितलेले जीवितेंद्रिय आणि अरूप आहार यांचा संग्रह होतो. "वत्थुविपाकानं" म्हणजे वस्तुरूप विपाकांचे. "सब्बथा" हे अव्ययपद आहे. आणि ते सर्व विभक्तियुक्त आहे. परंतु येथे प्रथमा विभक्तीचे वचन आहे म्हणून "सब्बथा" म्हणजे सर्व प्रकारे, असे म्हटले आहे. प्रकार जाणावा, असा संबंध आहे. तो कसा जाणावा? यावर म्हणतात: "त्रिविध" (तिविधो) इत्यादी. "सहजाते संगहेतब्बं" म्हणजे सहजात प्रत्ययभावाने संग्रह केला पाहिजे. सहजनन म्हणजे स्वतःसोबत उत्पन्न करणाऱ्याचे सहजनन होय. आणि ते कर्म, चित्त इत्यादींप्रमाणे वेगळे जननकार्य नसते. स्वतः उत्पन्न होत असतानाच इतर रूपे उत्पन्न होतात, उत्पन्न न होता उत्पन्न होत नाहीत, अशा प्रकारचे जननकार्य जाणावे. "विनाव सहुप्पादनकिच्चेन" म्हणजे स्वतःसोबत उत्पन्न करण्याच्या कार्यात आहाराचा व्यापार (सहभाग) नसतो, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच सहजातांना उपष्टंभित करत असूनही ते सहजात प्रत्ययभावाला प्राप्त होत नाही. हाच नियम रूप-जीवितेंद्रियाच्या बाबतीतही आहे. म्हणूनच "जीवितं पि" इत्यादी म्हटले आहे. "तीसु" (तिन्हींमध्ये) म्हणजे आलंबन, उपनिश्रय आणि अस्ति या तिन्हींमध्ये. आलंबनाधिपतीमध्ये पुरेजात आलंबनाधिपती देखील आहे. तो पुरेजात-अस्ति प्रत्ययच असल्यामुळे अस्ति प्रत्ययात संग्रहित आहे. "तस्मिं कते पवत्तमानानं" म्हणजे ते कर्म केले असता, ते केल्यामुळेच प्रवृत्त होणाऱ्यांचे. आलंबनाचा आकार म्हणजे गोचर विषयाचा आकार. "संतानविसेसं कत्वा" म्हणजे बीजाची स्थापना करून, असा अभिप्राय आहे. "ते" म्हणजे आलंबन प्रत्यय आणि कर्म प्रत्यय. "अकालिको" म्हणजे मार्गचेतनेच्या दृष्टीने अकालीक (काळाचे बंधन नसलेला). कारण तो स्वतःच्या लगेचच नंतर फलाला उत्पन्न करतो. म्हणून वाट पाहाव्या लागणाऱ्या भविष्यकाळाचा अभाव असल्यामुळे त्याला 'अकालिक' म्हटले जाते. उर्वरित नानाक्षणिक प्रत्यय हा कालिक (वेळेचे बंधन असलेला) असतो. "प्रत्ययत्थेन" म्हणजे प्रत्ययाच्या कार्याने. लोकप्रवृत्ती ही कर्महेतुक असल्यामुळे, असा संबंध आहे. "फलहेतू उपचारेण" म्हणजे फलभूत असलेल्या सर्व लोकप्रवृत्तीचे हेतू असलेल्या कर्माचे नाव फलावर लादून व्यवहाराने सर्व तेवीस प्रत्यय कर्माच्या स्वभावाचे उल्लंघन करत नाहीत, अशी योजना आहे. ते कर्मप्रत्ययाच्या संख्येत गणले जातात, असे म्हटले आहे. "विज्जमाना येव" म्हणजे अस्ति प्रत्ययच आहेत, असे म्हटले आहे. "सासनयुत्तिया विरुद्धमेव" येथे शासनयुक्ती म्हणजे त्रिपिटक होय. "विरुद्धमेव" म्हणजे आलंबन प्रत्यय असलेले सर्व पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, आकाश इत्यादी आणि सर्व प्रज्ञप्ती व निर्वाण हे कर्माच्या संख्येत गणले जातात असे म्हणणारा, आणि सर्व अतीत व अनागत धर्म हे अस्ति प्रत्ययच आहेत असे म्हणणारा, या दोन्ही गोष्टी त्रिपिटकाशी विरुद्धच आहेत. प्रस्थानपाळीच्या (पट्ठानपाळि) बाबतीत तर बोलण्याची गरजच नाही. कारण प्रस्थानामध्ये 'अस्ति' हा शब्द वर्तमान भावाने विद्यमान असण्याच्या अर्थाने आहे. परमार्थ धर्माच्या भावाने नाही, आणि लोकसंकेताच्या (लोकसंमूर्ती) दृष्टीनेही नाही. कारण परमार्थ धर्म असलेले अतीत व अनागत धर्म देखील येथे 'अस्ति' संख्येत गणले जात नाहीत, आणि प्रज्ञप्ती देखील नाही. "अञ्ञमञ्ञप्पटिबद्धाओकासे" म्हणजे परस्परांच्या निश्रय-निश्रित भावाने बद्ध असलेल्या काम आणि रूप भवाच्या अवकाशामध्ये (स्थानामध्ये). "यतो" म्हणजे ज्या प्रतिसंधी विज्ञानापासून. किंवा "यतो" म्हणजे ज्या शिरापासून (मुळापासून), ज्या बीजापासून उत्पत्ती होते, अशी योजना आहे. "बीजतो विय महारुक्खस्स" म्हणजे बीजाच्या प्रत्ययाने अंकुर इत्यादी विशाल वृक्षसंतानाची उत्पत्ती होण्याप्रमाणे. पाळी पाठामध्ये: "न ओक्कमिस्सथा" म्हणजे जर अवतरित झाले नसते. "समुच्चिस्सथा" म्हणजे काय ते वृद्धिंगत झाले असते, वाढले असते. "वोक्कमिस्सथा" म्हणजे जर निघून गेले असते, नष्ट झाले असते. "अभिनिब्बत्तिस्सथा" म्हणजे काय ते अभिनिर्वृत्त झाले असते, प्रकट झाले असते. "वोच्छिज्जिस्सथा" म्हणजे जर उच्छिन्न (नष्ट) झाले असते. "आपज्जिस्सथा" म्हणजे काय ते प्राप्त झाले असते. "यदिदं" म्हणजे जे हे. "इदं" हे केवळ निपात आहे. "विञ्ञाणं" म्हणजे प्रतिसंधी विज्ञान. जे विज्ञान आहे, तोच विज्ञानधर्म आहे, अशी योजना आहे. "रूपुप्पत्तिया" म्हणजे रूपाच्या उत्पत्तीसाठी. विज्ञान हे ज्याचा प्रत्यय आहे ते विज्ञानप्रत्यय होय, म्हणजेच विज्ञानप्रत्ययाने रूपाची उत्पत्ती होते. "रूपप्पवेणिया" म्हणजे कर्मज रूपसंततीची. "उतुआहारापि" म्हणजे अध्यात्म ऋतू आणि अध्यात्म आहार सुद्धा. हे संभवयुक्तीच्या वशाने म्हटले आहे. परंतु अर्थाच्या दृष्टीने, पूर्वी उत्पन्न झालेली रूपसंतती नसताना, अध्यात्म ऋतू आणि आहार देखील नसतातच. परंतु बाह्य ऋतू हा पूर्वी उत्पन्न झालेली रूपसंतती नसतानाही रूप उत्पन्न करत नाही, असे म्हणता येत नाही. टीका पाठामध्ये: "अरूपं पना" म्हणजे अरूप भूमी तर. "यस्मिं रूपे" म्हणजे कर्मज रूपामध्ये. "प्रत्ययभावो अत्थि" म्हणजे नंतरच्या रूपाच्या उत्पत्तीसाठी प्रत्ययशक्ती आहे. ते कशावरून समजते? असे विचारल्यास "पुत्तस्स" (पुत्राचे) इत्यादी म्हणतात. "बीजभावसंखातं" म्हणजे आंबा इत्यादींच्या बीजाच्या भावाने युक्त असलेले. "नियामरूपं नामा" म्हणजे ऋतूविशेष होय. "यथा वा तथा वा" म्हणजे अनियमाने, असे म्हटले आहे. "योनिभावसंखातं" म्हणजे त्या त्या गोत्र, कुल व जातींच्या जातीभावाने युक्त असलेले. "नियामरूपं" म्हणजे ऋतूविशेषाने युक्त असलेले नियामरूप. ज्यांचे रूपाचे आकार समान आहेत, असा विग्रह आहे. "पटिसन्धिरूपस्सेव आनुभावो" म्हणजे कलल काळ इत्यादींमध्ये उत्पन्न झालेल्या प्रतिसंधी रूपाचाच हा प्रभाव आहे. पुन्हा तोच अर्थ विशेष करून दाखवण्यासाठी "अपि च" इत्यादी म्हणतात. "समुदागतं" म्हणजे चांगल्या प्रकारे उत्तरोत्तर आलेले. स्त्रीभाव इत्यादी रूप आणि बीजरूप यांना नियमित करते, असा संबंध आहे. "नियामकं" म्हणजे विविध वर्ण, आकार इत्यादींचे नियामक. "तत्थ इमस्मिं भवे" (येथे या भवामध्ये) इत्यादींमध्ये. धन आणि धान्य आणि त्याव्यतिरिक्त इतर सर्व उपभोग व परिभोग, असा विग्रह आहे. विद्या, शिल्प, विविध बहुश्रुतता आणि पर्यप्ती, असा द्वंद्व समास आहे. "अनागतानं तासं" म्हणजे त्या नवीन धनधान्य इत्यादी संपत्तींचे. "उपनिस्सय पच्चयता" म्हणजे पूर्वयोगाच्या (पूर्व प्रयत्नाच्या) कर्माची उपनिश्रय प्रत्ययता होय. तेथे धनधान्य व भोगांच्या प्राप्तीसाठी पूर्वयोग करणे म्हणजे शेती, व्यापार इत्यादी कर्मे करणे होय. तेथे शेतीमध्ये प्रथम धनधान्य व भोगांच्या प्राप्तीसाठी शेती करत असताना, धनधान्य व भोग हे अनागत (भविष्यातील) उपनिश्रय प्रत्यय असतात. आता शेती करणे हे त्याचे प्रत्ययोत्पन्न (कार्य) आहे. धनधान्य व भोगांच्या प्राप्ती व उपभोगाच्या वेळी शेती करणे हे अतीत (भूतकाळातील) उपनिश्रय प्रत्यय असते. आणि त्यांची प्राप्ती व उपभोग हे त्याचे प्रत्ययोत्पन्न आहे. परंतु शेती करण्याच्या क्षणी शेत, जमीन, बी, पावसाची वृष्टी, नांगर इत्यादी शेतीची अवजारे, बैल-म्हैस आणि काम करणारे पुरुष हे प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) उपनिश्रय असतात. शेती करणे हे त्याचे प्रत्ययोत्पन्न आहे. कर्म करणाऱ्याचे माता-पिता इत्यादी पूर्वज हे त्या कर्माचे अतीत उपनिश्रय प्रत्यय असतात. आणि ते कर्म त्याचे प्रत्ययोत्पन्न असते. याचप्रमाणे उर्वरित बाबतीतही समजावे. उर्वरित भाग सहज समजण्याजोगा आहे. ‘‘ปญฺจวิธ’’นฺติอาทีสุ. ‘‘สณฺฐานตฺตํ’’ติ อณุ, ตชฺชารี, รถเรณุ, ลิกฺขาทีนิ อุปาทาย สพฺเพสํ รูปสณฺฐานานํ ภาโว สณฺฐานตฺตํ. ‘‘ภาโว’’ติ จ เตสํ ปวตฺติ วุจฺจติ. ‘‘ปวตฺติ เหตู’’ติ จ ปรมตฺถ รูป ธมฺมา เอว. ‘‘อนุปคมนโต’’ติ เอตฺถ สภาวโต อติสุขุมตฺตา อนุปคมนํ เวทิตพฺพํ. อธิวจนสงฺขาตํ นามาภิธานนฺติ วิคฺคโห. ‘‘อธิวจนํ’’ติ จ อตฺถปฺปกาสกตฺตา อธิกํ วจนํ อธิวจนํ. ‘‘นามาภิธาน’’นฺติ จ นามปญฺญตฺติ วุจฺจติ. ‘‘คเหตพฺพ ภาโว’’ติ อิทํ จิตฺตํ นาม, อยํ ผสฺโสนามาติอาทินา กเถนฺตานํ สนฺติกา นามาภิธานํ สุตฺวา ตทนุรูปสฺส สภาวตฺถสฺส ชานนวเสน ญาเณน คเหตพฺพภาโว. นาม ปญฺญตฺตานุสาเรน ชานิตพฺพตฺตา นามนฺติ วุจฺจตีติ วุตฺตํ โหติ. อารมฺมเณ นมตีติ นามํ. อารมฺมณิก ธมฺมา วา เอตฺถ นมนฺตีติ นามนฺติปิ ยุชฺชติ. “पंचविध” इत्यादींमध्ये. “संस्थानत्व” म्हणजे अणू, तज्जारी (धुळीकण), रथरेणू, लिक्खा (उवांची अंडी) इत्यादींना धरून सर्व रूप-संस्थानांचे (आकारांचे) अस्तित्व म्हणजेच संस्थानत्व होय. आणि “भाव” म्हणजे त्यांची प्रवृत्ती (कार्य) म्हटले जाते. आणि “प्रवृत्ती हेतू” म्हणजे परमार्थ रूप धर्मच होत. येथे “अनुपगमनतः” (अगम्यतेमुळे) म्हणजे स्वभावाने अतिसूक्ष्म असल्यामुळे न पोहोचणे (अगम्य असणे) असे जाणावे. “अधिवचनसंखातं नामाभिधानं” (अधिवचन संज्ञक नामाभिधान) असा विग्रह आहे. आणि “अधिवचन” म्हणजे अर्थाचे प्रकाशन करणारे अधिक (विशिष्ट) वचन म्हणजे अधिवचन होय. आणि “नामाभिधान” म्हणजे नामप्रज्ञप्ती (नाम-संज्ञा) म्हटले जाते. “ग्रहीतव्य भाव” म्हणजे “हे चित्त आहे”, “हा स्पर्श आहे” इत्यादी सांगणाऱ्यांच्या जवळून नामाभिधान (नाव) ऐकून, त्यानुसार स्वभाव-अर्थाच्या जाणण्याच्या द्वारे ज्ञानाने ग्रहण करण्याचा भाव होय. नामप्रज्ञप्तीच्या अनुसार जाणले जाण्यायोग्य असल्यामुळे त्याला “नाम” म्हटले जाते, असे सांगितले आहे. आलंबनाकडे (विषयाकडे) जे झुकते (नमते), ते “नाम” होय. किंवा आलंबन घेणारे धर्म यात झुकतात (नमतात), म्हणूनही त्याला “नाम” म्हणणे योग्य ठरते। อิมสฺมึ [Pg.272] ปจฺจยสงฺคเห ปจฺจยธมฺเมสุ ปญฺญตฺตีนํปิ สงฺคหิตตฺตา ปญฺญตฺติ สงฺคโหปิ เถเรน อิธ นิกฺขิตฺโต. ตตฺถ ‘‘ปญฺญาวียตี’’ติ เอตฺถ ปญฺญาปนํ นาม โวหารฏฺฐปนํ. ตญฺจฐปนํ ทฺวีหิการเณหิ สิชฺฌติ วทนฺตานํ โวหาเรน จ, สุณนฺตานํ สมฺปฏิจฺฉเนน จาติ ทสฺเสตุํ ‘‘อยํ ปี’’ติอาทิมาห. ‘‘สมฺปฏิจฺฉียตี’’ติ ยถา ปุพฺพปุริเสหิ โวหรียติ, ตถา ปจฺฉิม ชนปรมฺปราหิ โวหรียตีติ วุตฺตํ โหติ. ปกาเรน ญาปียตีติ ปญฺญตฺตีติปิ ยุชฺชติ. ‘‘พฺยญฺชนตฺโถ’’ติ มนุสฺส, เทว, ปถวี, ปพฺพตาทิโก สทฺทตฺโถ. ‘‘ปญฺญา ปียนฺตี’’ติ ปกาเรน ฐปียนฺติ. สทฺทปญฺญตฺตึ อาหาติ อธิกาโร. อธิมตฺตภาวปฺปกาโร นาม ปถวีปพฺพตาทีสุ ปถวีธาตุยา อธิมตฺต ภาววิเสโส. นที สมุทฺโททกาทีสุ อาโปธาตุยา. อคฺคิกฺขนฺเธสุ เตโชธาตุยา. วาตกฺขนฺเธสุ วาโยธาตุยาติ เอวํ อธิมตฺต ภาววิเสโส. วิวิเธน ปกาเรน ปริณมนํ วิปริณาโมติ อาห ตถา ตถา วิปริณามาการนฺติ. ปถวีปพฺพตาทิโวหาโร สณฺฐิตาการํ นิสฺสาย ปวตฺโต น โหติ. ปถวี นาม เอวํ สณฺฐานา, ปพฺพโต นาม เอวํ สณฺฐาโนติ สณฺฐานนิยโม นตฺถิ. ปํสุสิลานํ ราสิปุญฺชปฺปวตฺติมตฺเตน โวหาโร สิทฺโธติ วุตฺตํ ‘‘น หิ อิธ สณฺฐานํ ปธานํ’’ติ. ‘‘กฏฺฐาทโย เอว วุจฺจนฺตี’’ติ เต เอวสณฺฐานนานตฺตํ ปฏิจฺจ นานาโวหาเรน วุจฺจนฺติ. ปถวี ปพฺพต นที สมุทฺทาทีสุ วิย ภูตานํ ปวตฺติวิเสสากาเรนาติ วุตฺตํ ‘‘น หิ อิธ สมูโห ปธานํ’’ติ. ‘‘อุปาทาปญฺญตฺตี’’ติ ปญฺจกฺขนฺธ ธมฺเม อุปาทาย เตหิ อนญฺญํ เอกีภูตํ กตฺวา ปญฺญตฺติ. น อากาส ปญฺญตฺติ ทิสาเทสปญฺญตฺติโย วิย เตหิ ขนฺเธหิ มุญฺจิตฺวา ปญฺญตฺติ. ‘‘ยโต’’ติ ยมฺหาทิสโต. ‘‘ลทฺธปฺปกาสตฺตา’’ติ ลทฺธปฺปภาสตฺตา. ‘‘อหสฺสา’’ติ ทิวสสฺส. อุทฺธุมาตกาทีนิ ‘อุทฺธุมาตกํ ปฏิกูลํ’ติอาทินา ปฏิกูลวเสน มนสิกโรนฺตสฺสปิ นิมิตฺตํ อุปฏฺฐหนฺตํ ภูตวิการปฺปกาเรน อุปฏฺฐหตีติ กตฺวา ภูตนิมิตฺเต สงฺคณฺหาติ. ‘‘อฏฺฐกถายํ’’ติ ปุคฺคลปญฺญตฺติ อฏฺฐกถายํ. ‘‘ตาสํ’’ติ ภูมิปพฺพตาทิกานํ อตฺถ ปญฺญตฺตีนํ. ‘‘ตถา ตถา’’ติ [Pg.273] อยํ ภูมิ, อยํ ปพฺพโต, ติอาทินา เตน เตน โวหาเรน. อตฺถานํ ปรมตฺถานํ ฉายาติ อตฺถจฺฉายา. ‘‘ฉายา’’ติ จ นิมิตฺตจฺฉายาโย วุจฺจนฺติ. อตฺถจฺฉายานํ อากาโร อตฺถจฺฉายากาโร. ‘‘อากาโร’’ติ จ นานาสมูห นานาสณฺฐานาทิโก อากาโร. อตฺโถติ วา สทฺทาภิเธยฺโย วจนตฺโถ. โสเยว สมูหาการาทิ นิมิตฺต มตฺตตฺตา อตฺถจฺฉายากาโรติ วุจฺจตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘สทฺทาภิเธยฺย สงฺขาเตนา’’ติอาทินา. ‘‘ทพฺพปฺปฏิพิมฺพากาเรนา’’ติ ทพฺพสงฺขาเตน ปฏิพิมฺพากาเรน. ‘‘โอลมฺพิยา’’ติ อวลมฺพิตฺวา. ‘‘คณนูปคํ กตฺวา’’ติ อย เมโก อตฺโถ, อิทเมกํ วตฺถูติ เอวํ คณนูปคํ กตฺวา. ‘‘อิเมฉา’’ติ อิเม ฉสทฺทปญฺญตฺติ โวหารา นาม นามกมฺมาทิ นาม. ‘‘อตฺตนี’’ติ นามปท สงฺขาเต อตฺตนิ. อตฺถ วิสยํ เอว หุตฺวา ปวตฺตติ ภาสญฺญูนนฺติ อธิปฺปาโย. ‘‘นาเม สตี’’ติ อกฺขรสมูโห ปทํ, ปทสมูโห วากฺยนฺติ เอวํ วุตฺเต นามปเท วิชฺชมาเน สติ. ‘‘ตทุคฺคณฺหนฺตานํ’’ติ ตํ ตํ นามปทํ วาจุคฺคตกรณ วเสน อุคฺคณฺหนฺตานํ ชนานํ. ‘‘ตทตฺถา’’ติ ตสฺส ตสฺส นาม ปทสฺส อตฺถา. ‘‘อาคจฺฉนฺติ เยวา’’ติ ภาสญฺญูนํ ญาณาภิมุขํ อาคจฺฉนฺติเยว. เอเตน อตฺตนิ อตฺถสฺส นามนํ นาม อตฺถโชตน กิจฺจเมวาติ ทีเปติ. ‘‘สุณนฺตานํ ญาณํ’’ติ เอตฺถ ‘‘ญาณํ’’ติ อุปลกฺขณ วจนํ, อกุสล วิญฺญาณสฺสปิ อธิปฺเปตตฺตา. ‘‘ตํ ตํ อตฺถาภิมุขํ นาเมตี’’ติ อารมฺมณ กรณวเสน นาเมติ. ‘‘นามคฺคหณ วเสนา’’ติ อยํ อสุโกนาม โหตูติ เอวํ นามคฺคหณวเสน. ‘‘ธารียตี’’ติ ยาวชีวํปิ อปฺปมุสฺสมานํ กตฺวา ธารียติ. นีหริตฺวา วุจฺจติ อตฺโถ เอตายาติ นิรุตฺติ. ‘‘เอตายา’’ติ กรณภูตาย เอตายนามชาติยา. ‘‘อวิทิตปกฺเข’’ติ นามปทํ อสฺสุตกาเล อวิญฺญาตปกฺเข. ‘‘ตโต นีหริตฺวา’’ติ อวิทิตปกฺขโต ญาเณน นีหริตฺวา. ‘‘กถียตี’’ติ ตํ สุตกาเล วทนฺเตน สุณนฺตสฺส อาจิกฺขียติ ชานาปียติ. ‘‘อตฺถสฺสา’’ติ อวิทิตปกฺเข ฐิตสฺส อตฺถสฺส. ‘‘เอตสฺเส วา’’ติ นามปทสฺเสว. นามปทนฺติ จ กฺริย ปทํปิ[Pg.274], อุปสคฺคปทมฺปิ, นิปาตปทมฺปิ, ปาฏิปทิกปทํปิ, อิธ นามปทนฺตฺเวว วุจฺจติ. ‘‘วิเสสนภูตานํ’’ติ อญฺญปทตฺถสมาเส สมาสปทานํ อตฺถา วิเสสนา นาม. เอวํ วิเสสนภูตานํ. ‘‘ปุคฺคลสฺสา’’ติ อญฺญปทตฺถภูตสฺส อภิญฺญาลาภี ปุคฺคลสฺส. ‘‘วทนฺตี’’ติ อานนฺทาจริยํ สนฺธาย วุตฺตํ. โส หิ ธมฺมสงฺคณิยํ ปญฺญตฺติทุกนิทฺเทเส มูลฏีกายํ ตถา วทติ. ‘‘ตพฺภาวํ’’ติ อกฺขร ปทพฺยญฺชนภาวํ. ‘‘อสฺสา’’ติ นามปญฺญตฺติยา. อกฺขรปทพฺยญฺชนํ โคจโร อารมฺมณํ อสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘อนุสาเรนา’’ติ อนุคมเนน. ‘‘โลกสงฺเกต นิมฺมิตา’’ติ โลกสงฺเกตญฺญาเณน ปวตฺติตา. ‘‘โลกสงฺเกตญฺญาณํ’’ติ จ อิทํ นามํ อิมสฺสตฺถสฺส นามํ, อยมตฺโถ อิมสฺส นามสฺส อตฺโถติ เอวํ ปุเรตรํ โลกสญฺญาณ ชานนกญฺญาณํ. ‘‘อตีต สทฺทมตฺตารมฺมณา’’ติ โสตวิญฺญาณ วีถิยา อารมฺมณํ หุตฺวา นิรุทฺธํ อตีต สทฺทมตฺตํ กุรุมานา. ‘‘เตน วุตฺตวจเน’’ติ เตน สิกฺขํ ปจฺจกฺขนฺเตน ภิกฺขุนา สิกฺขํ ปจฺจกฺขามีติ วุตฺตวจเน. ปจฺจุปฺปนฺนํ สทฺทํ โสตวิญฺญาณ วีถิยา, อตีตญฺจ สทฺทํ มโนวิญฺญาณ วีถิยาติ โยชนา. ‘‘ตานิ อกฺขรานี’’ติ สิกฺขํ ปจฺจกฺขามีติ วากฺเย อวยวกฺขรานิ. ‘‘อยํ อกฺขร สมูโห’’ติ อิทํ นามปทนฺติ วุตฺตํ โหติ. เอตสฺส อตฺถสฺส. ‘‘วินิจฺฉยวีถึ’’ติ อกฺขร ปทสลฺลกฺขณวีถิญฺจ. ‘‘เอกกฺขเร สทฺเท’’ติ ‘โค’ อิจฺจาทิเก เอกกฺขเร ปญฺญตฺติ สทฺเท. ‘‘ยา’’ติ นาม ปญฺญตฺติ. ‘‘วทนฺตสฺส มนสา’’ติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปุพฺพภาเค’’ติ ยํ กิญฺจิ อตฺถํ ปเรสํ วตฺตุกาโม วทนฺโต ตสฺส ตสฺส อตฺถสฺส นามํ ปถมํ มโนทฺวารวีถิยา นิยเมตฺวา เอว วทติ, ตํ นามํ ปุพฺพภาเค วทนฺเตน มนสา ววตฺถาปิตา นามปญฺญตฺตีติ วุจฺจติ. ปฏิปาฏิกถนํ ปวตฺติกฺกมกถนํ. ‘‘วุตฺตํ’’ติ อฏฺฐกถาสุ วุตฺตํ. ตถา อทฺธมตฺติกนฺติ จ วุตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘วุตฺตํ’’ติ จ สทฺทสตฺเถสุ วุตฺตํ. या प्रत्ययसंग्रहात (paccayasaṅgaha) प्रत्ययधर्मांमध्ये प्रज्ञप्तींचाही (paññatti) संग्रह केलेला असल्यामुळे, स्थविरांनी येथे 'प्रज्ञप्ति संग्रह' (paññatti saṅgaha) देखील समाविष्ट केला आहे. तेथे 'प्रज्ञायते' (paññāvīyati - जाणले जाते) यामध्ये 'प्रज्ञापना' (paññāpana) म्हणजे व्यवहाराची स्थापना करणे (vohāraṭṭhapana) होय. आणि ती स्थापना दोन कारणांनी सिद्ध होते - बोलणाऱ्यांच्या व्यवहाराने आणि ऐकणाऱ्यांच्या स्वीकारण्याने (sampaṭicchana), हे दर्शवण्यासाठी 'हा देखील' (ayaṃ pi) इत्यादी म्हटले आहे. 'स्वीकारले जाते' (sampaṭicchīyati) म्हणजे जसे पूर्वजांनी व्यवहार केला, तसेच नंतरच्या लोकपरंपरेनेही व्यवहार केला, असे म्हटले आहे. विशेष रूपाने जाणवून दिले जाते म्हणून ती 'प्रज्ञप्ति' (paññatti) आहे, असेही योग्य ठरते. 'व्यंजनार्थ' (byañjanattha) म्हणजे मनुष्य, देव, पृथ्वी, पर्वत इत्यादी शब्दांचे अर्थ. 'प्रज्ञाप्यन्ते' (paññāpīyanti) म्हणजे विशेष रूपाने स्थापित केले जातात. 'शब्दप्रज्ञप्ति' (saddapaññatti) विषयी सांगत आहेत, हा अधिकार (विषय) आहे. 'अधिमात्रभावप्रकार' (adhimattabhāvappakāra) म्हणजे पृथ्वी, पर्वत इत्यादींमध्ये पृथ्वीधातूचा (pathavīdhātu) अतिरेक किंवा प्रबळतेचा विशेष भाव होय. नदी, समुद्राचे पाणी इत्यादींमध्ये आपधातूचा (āpodhātu). अग्नीच्या समूहांमध्ये तेजोधातूचा (tejodhātu). वायूच्या समूहांमध्ये वायूधातूचा (vāyodhātu) - अशा प्रकारे हा अधिमात्रभावाचा विशेष आहे. विविध प्रकारे परिणत होणे (बदलणे) म्हणजे 'विपरिणाम' (vipariṇāma) होय, म्हणून 'त्या त्या विपरिणामाचा आकार' असे म्हटले आहे. पृथ्वी, पर्वत इत्यादी व्यवहार त्यांच्या निश्चित आकारावर (saṇṭhāna) अवलंबून प्रवृत्त होत नाहीत. पृथ्वीचा आकार असाच असतो, पर्वताचा आकार असाच असतो, असा आकाराचा कोणताही नियम नाही. केवळ माती आणि दगडांच्या राशीच्या (ढिगाऱ्याच्या) अस्तित्वामुळेच हा व्यवहार सिद्ध होतो, म्हणून 'येथे आकार मुख्य नाही' असे म्हटले आहे. 'लाकूड इत्यादीच म्हटले जातात' म्हणजे तेच आकाराच्या विविधतेवर अवलंबून वेगवेगळ्या व्यवहारांनी (नावांनी) ओळखले जातात. पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र इत्यादींप्रमाणे महाभूतांच्या प्रवृत्तीच्या विशेष आकारामुळेच (व्यवहार होतो), म्हणून 'येथे समूह मुख्य नाही' असे म्हटले आहे. 'उपादायप्रज्ञप्ति' (upādāpaññatti) म्हणजे पाच स्कंधधर्मांना (pañcakkhandha dhamma) उपादान करून (त्यांच्या आधारे), त्यांच्याशी अभिन्न (एकजीव) करून केलेली प्रज्ञप्ति होय. आकाशप्रज्ञप्ति किंवा दिशा-स्थानप्रज्ञप्तींप्रमाणे त्या स्कंधांना सोडून केलेली ही प्रज्ञप्ति नाही. 'यतः' (ज्यापासून) म्हणजे ज्या दिशा इत्यादींपासून. 'लब्धप्रकाशत्वात्' म्हणजे प्रकाश प्राप्त झाल्यामुळे. 'अह्नः' म्हणजे दिवसाचा. फुगलेले प्रेत (uddhumātaka) इत्यादींना 'फुगलेले प्रेत प्रतिकूल आहे' इत्यादी प्रकारे प्रतिकूलतेने मनस्कार करणाऱ्याला देखील जे निमित्त उपस्थित होते, ते महाभूतांच्या विकाराच्या रूपाने उपस्थित होते, म्हणून त्याला 'भूतनिमित्त' (bhūtanimitta) मध्ये समाविष्ट केले जाते. 'अट्ठकथेत' म्हणजे पुद्गलप्रज्ञप्ति अट्ठकथेत (Puggalapaññatti-aṭṭhakathā). 'त्यांच्या' म्हणजे भूमी, पर्वत इत्यादी अर्थप्रज्ञप्तींची (atthapaññatti). 'त्या त्या प्रकारे' म्हणजे 'ही भूमी आहे, हा पर्वत आहे' इत्यादी त्या त्या व्यवहाराने. अर्थांची म्हणजे परमार्थांची सावली म्हणजे 'अर्थछाया' (atthacchāyā). आणि 'छाया' म्हणजे निमित्ताची छाया असे म्हटले जाते. अर्थछायेचा आकार म्हणजे 'अर्थछायाकार' (atthacchāyākāra). आणि 'आकार' म्हणजे विविध समूह, विविध संस्थाने (रचना) इत्यादी आकार. किंवा 'अर्थ' म्हणजे शब्दाने अभिधेय (सांगितला जाणारा) वचनाचा अर्थ. तोच समूहाचा आकार इत्यादी केवळ निमित्त असल्यामुळे 'अर्थछायाकार' असे म्हटले जाते, हा अर्थ 'शब्दाभिधेय संज्ञेने' इत्यादीद्वारे दर्शवला आहे. 'द्रव्यप्रतिबिंबाकाराने' म्हणजे द्रव्य संज्ञेच्या प्रतिबिंबाच्या आकाराने. 'ओलबिय' (olambiya) म्हणजे अवलंबून (आश्रय घेऊन). 'गणनोपग करून' (gaṇanūpagaṃ katvā) म्हणजे 'हा एक अर्थ आहे, ही एक वस्तू आहे' अशा प्रकारे मोजणीस पात्र करून. 'हे सहा' म्हणजे हे सहा शब्दप्रज्ञप्ति व्यवहार, ज्यांना नामकर्म इत्यादी नाम म्हटले जाते. 'स्वतःमध्ये' (attani) म्हणजे नामपद संज्ञेच्या स्वतःमध्ये. ते भाषा जाणणाऱ्यांसाठी अर्थाचा विषय बनूनच प्रवृत्त होते, असा अभिप्राय आहे. 'नाम असताना' (nāme satī) म्हणजे अक्षरांचा समूह म्हणजे पद, पदांचा समूह म्हणजे वाक्य, अशा प्रकारे नामपद विद्यमान असताना. 'ते ग्रहण करणाऱ्यांना' (taduggaṇhantānaṃ) म्हणजे त्या त्या नामपदाला पाठांतराच्या (वाचोद्गत करण्याच्या) माध्यमातून ग्रहण करणाऱ्या लोकांना. 'त्यांचे अर्थ' (tadatthā) म्हणजे त्या त्या नामपदाचे अर्थ. 'येतातच' (āgacchanti yeva) म्हणजे भाषा जाणणाऱ्यांच्या ज्ञानाच्या समोर येतातच. यावरून स्वतःमध्ये अर्थाचे नमन (झुकणे) करणे हेच नामाचे अर्थ-प्रकाशन करण्याचे कार्य आहे, हे स्पष्ट होते. 'ऐकणाऱ्यांचे ज्ञान' येथे 'ज्ञान' हा उपलक्षण शब्द आहे, कारण अकुशल विज्ञानाचाही (akusala viññāṇa) येथे अभिप्रेत अर्थ आहे. 'त्या त्या अर्थाकडे झुकवते' (nāmeti) म्हणजे आलंबन (ārammaṇa) करण्याच्या माध्यमातून झुकवते. 'नामग्रहणाच्या माध्यमातून' म्हणजे 'याचे नाव अमुक असो' अशा प्रकारे नाम ठेवण्याच्या माध्यमातून. 'धारण केले जाते' (dhārīyati) म्हणजे आयुष्यभर न विसरता धारण केले जाते. ज्याद्वारे अर्थ बाहेर काढून (स्पष्ट करून) सांगितला जातो, ती 'निरुक्ती' (nirutti) होय. 'याच्याद्वारे' (etāya) म्हणजे साधनभूत असलेल्या या नामजातीद्वारे. 'अविदित पक्षात' (aviditapakkhe) म्हणजे नामपद ऐकले नसतानाच्या काळात, अज्ञात पक्षात. 'त्यातून बाहेर काढून' म्हणजे अविदित पक्षातून ज्ञानाने बाहेर काढून. 'सांगितले जाते' (kathīyati) म्हणजे ते ऐकण्याच्या वेळी बोलणाऱ्याद्वारे ऐकणाऱ्याला सांगितले जाते, पटवून दिले जाते. 'अर्थाचा' म्हणजे अविदित पक्षात राहिलेल्या अर्थाचा. 'किंवा याचाच' म्हणजे नामपदाचाच. आणि 'नामपद' म्हणजे क्रियापद देखील, उपसर्गपद देखील, निपातपद देखील, प्रातिपदिकपद देखील; येथे या सर्वांना 'नामपद' असेच म्हटले आहे. 'विशेषणभूत असलेल्यांचे' म्हणजे अन्यपदार्थ समासात (aññapadatthasamāsa) समासपदांचे अर्थ हे विशेषण असतात. अशा प्रकारे विशेषणभूत असलेल्यांचे. 'पुद्गलाचा' म्हणजे अन्यपदार्थ रूप असलेल्या अभिज्ञा प्राप्त (abhiññālābhī) पुद्गलाचा. 'म्हणतात' हे आनंदाचार्यांच्या (Ānandācariya) संदर्भाने म्हटले आहे. कारण ते धम्मसंगणीच्या (Dhammasaṅgaṇī) प्रज्ञप्तिदुकनिर्देशाच्या (paññattidukaniddesa) मूळटीकेमध्ये (Mūlaṭīkā) तसे म्हणतात. 'त्याचा भाव' (tabbhāva) म्हणजे अक्षर, पद आणि व्यंजनाचा भाव. 'तिचा' म्हणजे नामप्रज्ञप्तीचा (nāmapaññatti). अक्षर, पद आणि व्यंजन हे जिचे गोचर (विषय) किंवा आलंबन आहे, असा विग्रह आहे. 'अनुसारेण' म्हणजे अनुगमनाने (अनुसरून). 'लोकसंकेतनिर्मित' म्हणजे लोकसंकेतज्ञानाने (lokasaṅketaññāṇa) प्रवृत्त झालेली. आणि 'लोकसंकेतज्ञान' म्हणजे 'हे नाव या अर्थाचे नाव आहे, हा अर्थ या नावाचा अर्थ आहे' अशा प्रकारे पूर्वीपासून चालत आलेले लोकसंज्ञा जाणणारे ज्ञान होय. 'अतीत शब्दमात्र आलंबन असलेली' म्हणजे श्रोतविज्ञानवीथीचे (sotaviññāṇavīthi) आलंबन होऊन निरुद्ध झालेल्या केवळ अतीत शब्दाला ग्रहण करणारी. 'त्याने म्हटलेल्या वचनात' म्हणजे त्या शिक्षेचे (नियमांचे) प्रत्याख्यान करणाऱ्या भिक्खूने 'मी शिक्षेचे प्रत्याख्यान करतो' (sikkhaṃ paccakkhāmi) असे म्हटलेल्या वचनात. प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) शब्दाला श्रोतविज्ञानवीथीने आणि अतीत शब्दाला मनोविज्ञानवीथीने (manoviññāṇavīthi) ग्रहण करावे, अशी योजना आहे. 'ती अक्षरे' म्हणजे 'सिक्खं पच्चक्खामि' या वाक्यातील अवयव रूप अक्षरे. 'हा अक्षरांचा समूह' म्हणजे हे नामपद आहे, असे म्हटले आहे. या अर्थाचा. 'विनिश्चयवीथी' म्हणजे अक्षर आणि पदांचे लक्षण निश्चित करणारी वीथी. 'एकाक्षरी शब्दात' म्हणजे 'गो' इत्यादी एकाक्षरी प्रज्ञप्ति शब्दात. 'जी' म्हणजे नामप्रज्ञप्ति. 'बोलणाऱ्याच्या मनाने' असा संबंध आहे. 'पूर्वभागात' म्हणजे जो कोणी इतरांना काही अर्थ सांगू इच्छितो, तो बोलताना त्या त्या अर्थाचे नाव आधी मनोद्वारवीथीने (manodvāravīthi) निश्चित करूनच बोलतो; त्या नामाला पूर्वभागात बोलणाऱ्याच्या मनाने प्रस्थापित केलेली 'नामप्रज्ञप्ति' असे म्हटले जाते. 'परिपाटीकथन' म्हणजे प्रवृत्तीच्या क्रमाचे कथन. 'म्हटले आहे' म्हणजे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे. तसेच 'अर्धमात्रिक' (addhamattika) असेही म्हटले आहे, असा संबंध आहे. आणि 'म्हटले आहे' म्हणजे व्याकरणशास्त्रात (शब्दशास्त्र) म्हटले आहे। คาถายํ. ‘‘มตฺตา’’ติ เอกวิชฺชุปฺปาทกฺขณํ วุจฺจติ. เอกา มตฺตายสฺสาติ เอกมตฺโต. ‘‘ทีฆมุจฺจเต’’ติ ทีโฆ นาม วุจฺจเต. ‘‘ปฺลุโต’’ติ นานปฺปกาเรน รุโต คายิโตติ ปรุโต[Pg.275]. โส เอว รการสฺส ลการํ กตฺวา ปกาเร จ สรโลปํ กตฺวา ปฺลุโตติ วุจฺจติ. คีตนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปรมตฺถ สทฺทสงฺฆาฏานํ’’ติ ปรมฺปรา ปวตฺตานํ ปรมตฺถ สทฺทราสีนํ. ‘‘อเนกโกฏิสตสหสฺสานิ จิตฺตานี’’ติ ชวนวีถีนํ อนฺตรนฺตรา ภวงฺคจิตฺเตหิ สทฺธึ อเนกโกฏิสตสหสฺสานิ จิตฺตานิ. गाथेमध्ये. 'मत्ता' (मात्रा) म्हणजे विजेच्या एका चमकाचा क्षण (एकविद्युदुत्पादक्षण) म्हटला जातो. ज्याची एक मात्रा असते तो 'एकमात्र'. 'दीर्घमुच्चते' म्हणजे दीर्घ असे म्हटले जाते. 'प्लुत' म्हणजे विविध प्रकारे उच्चारलेला किंवा गायलेला, म्हणून 'परुत'. त्यातच 'र' काराचा 'ल' कार करून आणि 'प' कारामधील स्वराचा लोप करून 'प्लुत' असे म्हटले जाते. 'गीत' (गायलेले) असे म्हटले आहे. 'परमत्थ सद्दसङ्घाटानं' (परमार्थ शब्दसंघातांचे) म्हणजे परंपरेने प्रवृत्त झालेल्या परमार्थ शब्दांच्या समूहांचे. 'अनेककोटिसतसहस्सानि चित्तानि' (अनेक अब्ज चित्ते) म्हणजे जवनवीथींच्या दरम्यान भवंगचित्तांसह असणारी अनेक अब्ज चित्ते होय. ปฏฺฐานนยานุทีปนา นิฏฺฐิตา. पट्ठाननय-अनुदीपनी समाप्त झाली. ปจฺจยสงฺคหานุทีปนา นิฏฺฐิตา. पच्चयसंग्रह-अनुदीपनी समाप्त झाली. ๙. กมฺมฏฺฐานสงฺคหอนุทีปนา ९. कम्मट्ठानसंग्रह-अनुदीपनी ๑๗๐. กมฺมฏฺฐานสงฺคเห[Pg.276]. วิทิโต วิญฺญาโต นามรูป วิภาโค เยนาติ วิคฺคโห. โยคี ปุคฺคโล. ‘‘กิเลเส สเมตี’’ติ กามจฺฉนฺทาทิเก นีวรณกิเลเส อุปสเมติ. ‘‘ตถา ปวตฺโต’’ติ ภาวนาวเสน ปวตฺโต. วูปสมนวเสน วา ปวตฺโต. ‘‘ตายา’’ติ ตายภาวนา ปญฺญาย, ปสฺสนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปสฺสิตํ’’ติ สมนุปสฺสิตํ. กถํ กสิณภาวนาทิกํ โยคกมฺมํ อตฺตาว อตฺตโน ฐานํ โหตีติ วุตฺตํ ‘‘อาทิมชฺฌปริโยสานานํหี’’ติอาทิ. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘ปทฏฺฐานตายา’’ติ เอเตน ติฏฺฐติ อนิวตฺตมานํ ปวตฺตติ เอเตนาติ ฐานนฺติ อตฺเถน ปทฏฺฐานเมว ฐานนฺติ วุจฺจตีติ ทีเปติ. ‘‘สุขวิเสสานํ’’ติ ฌานสุข มคฺคสุข ผลสุขานํ. ‘‘ทสกสิณานี’’ติอาทีสุ มุขฺยโต วา อุปจารโต วา ทฺวิธาปิ อตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ทสกสิณานี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘เสสานิปี’’ติ อปฺปมญฺญาทีนิ เสสกมฺมฏฺฐานานิปิ. ยํ ยํ อนุรูปํ ยถานุรูปํ. ‘‘สมุทาจรณํ’’ติ ปุนปฺปุนํ ภุสํ ปวตฺตนํ. ‘‘สํสคฺค เภโท’’ติ เอกเมกสฺส ปุคฺคลสฺส กสฺสจิ ทฺเวจริยา, กสฺสจิ ติสฺโสติอาทินา สมฺมิสฺส วิภาโค. อฏฺฐกถายํ’’ติ วิสุทฺธิมคฺค อฏฺฐกถายํ. ‘‘สพฺพายปิ อปฺปนายา’’ติ ฌานปฺปนาย จ มคฺคปฺปนาย จ ผลปฺปนาย จ. ‘‘ยา อาสนฺเน ปวตฺตา ทูเร ปวตฺตาติ อธิกาโร. ‘‘อิตรา ปนา’’ติ ทูเร ปวตฺตาปน. ‘‘ตาสํ ปนา’’ติ ติสฺสนฺนํ ภาวนานํ ปน. ‘‘เตสํ ปี’’ติ ทฺวินฺนํ นิมิตฺตานํปิ. ‘‘วิทตฺถิจตุรงฺคุลํ’’ นาม วิตฺถารโต จตุรงฺคุลาธิกํ วิทตฺถิปฺปมาณํ. วิทตฺถิปฺปมาณํ วา จตุรงฺคุลปฺปมาณํ วาติปิ ยุชฺชติ. ตถาหิ วิสุทฺธิมคฺเค วาโยกสิณ วิธาเน จตุรงฺคุลปฺปมาณํ สีสํ วาเตน ปหริยมานํ ทิสฺวาติ วุตฺตํ. ขลมณฺฑลํ นาม กสฺสกานํ กสฺสมทฺทนภูมิภาคมณฺฑลํ. ‘‘กตํ วา’’ติ นีลาทิวณฺณวิเสสรหิตํ อรุณวณฺณํ มตฺติกกฺขณฺฑํ อุทเกน มทฺทิตฺวา จกฺกมณฺฑลํ วิย ปริมณฺฑลํ สุมฏฺฐตลํ [Pg.277] ปถวิมณฺฑลํ กโรนฺติ. เอวํ กตํ วา. ‘‘อกตํ วา’’ติ กตฺถจิ ภูมิภาเค เกนจิ อกตํ สยํ ชาตํ วา. ‘‘กสิเณน ชมฺพุทีปสฺสา’’ติ เอตฺถ. १७०. कम्मट्ठानसंग्रहामध्ये. ज्याच्याद्वारे नाम-रूपाचा विभाग जाणला गेला आहे, समजला गेला आहे, असा विग्रह आहे. योगी पुद्गल (साधक व्यक्ती). 'किलेसे समेति' (क्लेशांचे शमन करतो) म्हणजे कामच्छंद इत्यादी नीवरण क्लेशांचे उपशमन करतो. 'तथा पवत्तो' (तशा प्रकारे प्रवृत्त झालेला) म्हणजे भावनेच्या वशाने प्रवृत्त झालेला किंवा उपशमनाच्या वशाने प्रवृत्त झालेला. 'ताय' म्हणजे त्या भावनाप्रज्ञेने, 'पस्सन्ति' (पाहतात) असा संबंध आहे. 'पस्सितं' म्हणजे समनुपस्सित (पूर्णपणे पाहिलेले). कसिण-भावना इत्यादी योगकर्म स्वतःच स्वतःचे स्थान कसे होते, हे 'आदिमज्झपरियोसानानं हि' इत्यादीद्वारे सांगितले आहे. विभावनी पाठात. 'पदट्ठानताय' (पदस्थानत्वामुळे) याद्वारे - ज्याच्यामुळे ते न निवृत्त होता टिकून राहते आणि प्रवृत्त होते ते 'स्थान' होय, या अर्थाने पदस्थानच 'स्थान' म्हटले जाते, हे स्पष्ट केले आहे. 'सुखविसेसानं' (सुखविशेषांचे) म्हणजे ध्यानसुख, मार्गसुख आणि फलसुखांचे. 'दसकसिणानि' (दहा कसिण) इत्यादींमध्ये मुख्य रूपाने किंवा उपचाराने (लाक्षणिक रूपाने) दोन्ही प्रकारे अर्थ दर्शवण्यासाठी 'दसकसिणानि' इत्यादी म्हटले आहे. 'सेसानि पि' (इतरही) म्हणजे अप्पमञ्ञा (अप्रमाण) इत्यादी इतर कम्मट्ठान (कर्मस्थाने) देखील. जे जे अनुरूप, ते ते यथानुरूप. 'समुदाचरणं' म्हणजे पुन्हा पुन्हा वारंवार प्रवृत्त होणे. 'संसग्ग भेदो' (संसर्ग भेद) म्हणजे प्रत्येक पुद्गलाची (व्यक्तीची) कोणाची दोन चरित्रे (चर्या), कोणाची तीन चरित्रे इत्यादी प्रकारे मिश्र विभाग. 'अट्ठकथायं' म्हणजे विसुद्धिमग्ग अट्ठकथेमध्ये. 'सब्बाय पि अप्पनाय' (सर्वच अर्पणेसाठी) म्हणजे ध्यान-अर्पणा, मार्ग-अर्पणा आणि फल-अर्पणा यांच्यासाठी. 'जी जवळ प्रवृत्त झाली आहे आणि जी दूर प्रवृत्त झाली आहे' हा अधिकार आहे. 'इतरा पन' (परंतु दुसरी) म्हणजे दूर प्रवृत्त झालेली. 'तासं पन' (परंतु त्यांच्या) म्हणजे तीन भावनांची. 'तेसं पि' (त्यांचेही) म्हणजे दोन्ही निमित्तांचे देखील. 'विदत्थिचतुरङ्गुलं' (वितस्त-चतुरंगुल) म्हणजे विस्ताराने चार बोटे अधिक असलेले एक वितस्त (वीत) प्रमाण. किंवा वितस्त प्रमाण किंवा चार बोटांचे प्रमाण असेही योग्य ठरते. कारण विसुद्धिमग्गात वायोकसिण विधीमध्ये 'चार बोटांच्या प्रमाणाचे डोके वाऱ्याने ताडित होत असलेले पाहून' असे म्हटले आहे. 'खलमंडळ' म्हणजे शेतकऱ्यांचे धान्य मळण्याचे खळे (मळणीची जागा). 'कतं वा' (तयार केलेले) म्हणजे निळ्या इत्यादी रंगांच्या विशेषांशिवाय तांबूस रंगाचा मातीचा तुकडा पाण्याने मळून, चाकाच्या मंडळाप्रमाणे गोल आणि गुळगुळीत पृष्ठभाग असलेले पृथ्वीमंडळ तयार करतात. अशा प्रकारे तयार केलेले. 'अकतं वा' (तयार न केलेले) म्हणजे एखाद्या भूभागावर कोणाकडूनही तयार न केलेले, स्वतःच निर्माण झालेले. 'कसिणेन जम्बुदीपस्स' (जंबूद्वापाच्या कसिणाने) येथे. พุทฺโธติ กิตฺตยนฺตสฺส, กาเย ภวติ ยา ปีติ; วรเมว หิ สาปีติ, กสิเณนปิ ชมฺพุทีปสฺสาติ. बुद्ध असे कीर्तन करणाऱ्याच्या शरीरात जी प्रीती उत्पन्न होते; ती प्रीती जंबूद्वापाच्या कसिणापेक्षाही श्रेष्ठच आहे. คาถาเสโส. ตตฺถ ชมฺพุทีปสฺส กสิณโต สาปีติวรา เอวาติ โยชนา. ‘‘กสิณโต’’ติ จ สกลมณฺฑลโต. สกลสฺส ชมฺพุทีปมณฺฑลสฺส อิสฺสริยาธิปติโต ปีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘สนฺนิวิฏฺฐา’’ติ สมํ สณฺฐิตา. ‘‘สณฺฐาน ปญฺญตฺตี’’ติ มณฺฑลสณฺฐาเนน อุปฏฺฐิตา นิมิตฺตปญฺญตฺติ เอว วุจฺจติ. ‘‘ผุฏฺฐฏฺฐาเน’’ติ กาเยวา รุกฺขคฺคาทีสุวา วาเตน ปหตฏฺฐาเน. ‘‘วายุ วฏฺฏี’’ติ วาตปริมณฺฑลํ. จนฺทสูริยานํ อคฺคิสฺส จ โอภาเสน วิสิฏฺฐาติ สมาโส. ‘‘วิสิฏฺฐา’’ติ วิเสสิตา. गाथेचा उर्वरित भाग. तेथे 'जंबूद्वापाच्या कसिणापेक्षा ती प्रीती श्रेष्ठच आहे' अशी योजना आहे. 'कसिणतो' म्हणजे संपूर्ण मंडळापासून. संपूर्ण जंबूद्वाप मंडळाच्या ऐश्वर्य आणि अधिपत्यापेक्षाही (ती प्रीती श्रेष्ठ आहे) असे म्हटले आहे. 'सन्निविट्ठा' म्हणजे समान रूपाने स्थित असलेली. 'संठान पण्णत्ति' (संस्थान प्रज्ञप्ती) म्हणजे मंडळाच्या आकाराने उपस्थित झालेली निमित्त-प्रज्ञप्तीच म्हटली जाते. 'फुट्टट्ठाने' (स्पर्श केलेल्या ठिकाणी) म्हणजे शरीरावर किंवा वृक्षाच्या शेंड्या इत्यादींवर वाऱ्याने आघात केलेल्या ठिकाणी. 'वायु वट्टी' म्हणजे वातपरिमंडल (वाऱ्याचे वर्तुळ). चंद्र, सूर्य आणि अग्नी यांच्या प्रकाशाने विशिष्ट, असा समास आहे. 'विसीट्ठा' म्हणजे विशेषित. ‘‘ธูมาตํ’’ติ ธูมายิตํ. ธูมปูริตปฏํ วิยาติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘สูนภาวํ คตํ’’ติ. อนฺเต กกาโร นินฺทตฺถโชตโกติ วุตฺตํ ‘‘กุจฺฉิตตฺตา’’ติ. เชคุจฺฉิ ตพฺพตฺตาติ อตฺโถ. ‘‘ฉวสรีรสฺสา’’ติ ลามกสรีรสฺส. ‘‘ตเทวา’’ติ ฉวสรีรเมว. วิปุพฺพกํ วิจฺฉินฺนกํ นามาติ สมฺพนฺโธ. ตตฺถ วิเสเสน นีลนฺติวินีลํ. ตเมว กุจฺฉิตตฺตา วินีลกํ. ‘‘ตเทว ปุน ปจฺจิตฺวา’’ติ วินีลกสรีรเมว ปุน กาลาติกฺกเม ปจฺจิตฺวา. ปูติโลหิตานํ ปริปกฺกภาวํ ปตฺวาติ อตฺโถ. ตโต ตโต ทฺวารจฺฉิทฺทโต. ยุตฺตํ ตเทว สรีรนฺติ สมฺพนฺโธ. วิจฺฉินฺนกํ นาม, วิจฺฉิทฺทกนฺติปิ ปฐนฺติ. ‘‘อปกฑฺฒิตฺวา’’ติ ขณฺฑานิ สรีรโต โมเจตฺวา ตํ ตํ ปเทสํ กฑฺฒิตฺวา. ‘‘ปคฺฆริตโลหิต สรีรํ’’ติ ฉินฺนวิทฺธฏฺฐาเนสุ วณมุเขหิ ปคฺฆริตโลหิตสรีรํ. 'धूमातं' म्हणजे धूर निघणारे (धुमायित). धुराने भरलेल्या वस्त्राप्रमाणे, असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'सूनभावं गतं' (सुजलेल्या अवस्थेला प्राप्त झालेले) असे म्हटले आहे. शेवटी असलेला 'क' कार हा निंदा अर्थाचा द्योतक आहे, म्हणून 'कुच्छितत्ता' (कुत्सितपणामुळे) असे म्हटले आहे. जुगुप्सनीय (घृणास्पद) असणे हा याचा अर्थ आहे. 'छवसरीरस्स' म्हणजे हीन शरीराचे (शवशरीराचे). 'तदेव' म्हणजे ते शवशरीरच. 'विपुब्बकं' (पूयुक्त) आणि 'विच्छिन्नकं' (विच्छिन्न झालेले) असा संबंध आहे. तेथे विशेष रूपाने निळे असणे म्हणजे 'विनील'. कुत्सितपणामुळे त्यालाच 'विनीलक' म्हटले आहे. 'तदेव पुन पच्चित्वा' म्हणजे ते विनीलक शरीरच पुन्हा काळ उलटून गेल्यावर कुजल्यामुळे (पक्व झाल्यामुळे). पू आणि रक्ताच्या परिपक्व अवस्थेला प्राप्त होऊन, असा अर्थ आहे. त्या त्या द्वारांच्या छिद्रांमधून. 'युक्त तेच शरीर' असा संबंध आहे. 'विच्छिन्नक' याला 'विच्छिद्द्क' असाही पाठ वाचतात. 'अपकड्ढित्वा' म्हणजे शरीरापासून तुकडे वेगळे करून त्या त्या भागाला ओढणे. 'पग्घरितलोहित सरीरं' (रक्त वाहणारे शरीर) म्हणजे कापलेल्या किंवा छिद्र केलेल्या ठिकाणी जखमेच्या मुखातून रक्त वाहणारे शरीर. ‘‘พุทฺธานุสฺสตี’’ติ เอตฺถ พุทฺธสทฺโท คุณฺยูปจาร วจนํ โหติ. คุณิโน ทพฺพสฺส นาเมน คุณานํ คเหตพฺพตฺตาติ วุตฺตํ ‘‘พุทฺธคุณสฺส อนุสฺสติ พุทฺธานุสฺสตี’’ติ. เอสนโย ธมฺมานุสฺสตาทีสุ. ‘‘อรหตาที’’ติ อรหตาทิคุโณ. วิคตานิ ทุสฺสิลฺยาทิ มลานิ [Pg.278] จ มจฺเฉรญฺจ ยสฺส ตํ วิคตมลมจฺเฉรํ. ตสฺส ภาโวติ วิคฺคโห. ‘‘อตฺตนา อธิคตนิพฺพานญฺจา’’ติ เอเตน อริยปุคฺคลานํ กิเลสานํ อจฺจนฺตวูปสโม วุตฺโต. ‘‘ยํ อารพฺภา’’ติ ยํ ปุคฺคลํ อารพฺภ. หิตูปสํหาโร นาม อยํ ปุคฺคโล อเวโร โหตุ, อพฺยาปชฺโช โหตูติอาทินา อเวรตาทีนิ หิตสุขานิ ตสฺมึ ปุคฺคเล จิตฺเตน อุปสํหรณํ. กรุณา, มุทิตา, เหฏฺฐา เจตสิกสงฺคเห วุตฺตตฺถา เอว. หิตูปสํหาโร จ หิตโมทนา จ อหิตาปนยนญฺจาติ ทฺวนฺโท. ตตฺถ หิตูปสํหาโร เมตฺตาย กิจฺจํ. หิตโมทนา มุทิตาย. อหิตาปนยนํ กรุณาย กิจฺจํ. ตตฺถ ปรํ หิตสุขสมฺปนฺนํ ทิสฺวา เตน ปรหิเตน อตฺตนิ ปีติปาโมชฺชวฑฺฒนํ หิตโมทนา นาม. ปรํ ทุกฺขิตํ ทิสฺวา อยํ อิมมฺหาทุกฺขา มุจฺจตุ, มากิลมตูติ เอวํ จิตฺเตน ปรสฺมึ อหิตสฺส ทุกฺขสฺส อปนยนํ อหิตาปนยนํ นาม. ‘‘เตสํ’’ติ ปรสตฺตานํ. สสฺส อตฺตโน อิทนฺติ สกํ. ‘‘อิทํ’’ สุขทุกฺขการณํ. อตฺตนา กตกมฺมํ เอว สกํ เยสํ เต กมฺมสฺสกา. ปรสตฺตา เอว. เตสํ ภาโว. ตสฺส อนุพฺรูหนนฺติ วิคฺคโห. ‘‘สีมสมฺเภโท’’ติ อตฺตา จ ปิยปุคฺคโล จ มชฺฌตฺตปุคฺคโล จ เวริปุคฺคโล จาติ จตสฺโส สีมา. สมฺภินฺทนํ สมฺเภโท. สมฺมิสฺสนํ อนานตฺตกรณนฺติ อตฺโถ. สีมานํ สมฺเภโท สีมสมฺเภโท. สพฺพา อิตฺถิโย, สพฺเพปุริสาติอาทินา โอธิโส ปริจฺเฉทโต ผรณํ โอธิโสผรณํ นาม. สพฺเพสตฺตา, สพฺเพปาณา, สพฺเพภูตาติอาทินา อโนธิโส อปริจฺเฉทโต ผรณํ อโนธิโสผรณํ นาม. ปุรตฺถิมายทิสาย สพฺเพสตฺตา อเวราโหนฺตูติอาทินา ทิสาวิภาควเสน ผรณํ ทิสาผรณํ นาม. ‘‘ตํ สมงฺคีโน จา’’ติ ตาหิ อปฺปมญฺญาหิ สมงฺคีโน ปุคฺคลา. ‘‘นิจฺจํ โสมฺมหทยภาเวนา’’ติ สพฺพกาลํ สนฺตสีตล หทยภาเวน. พฺรหฺมสทฺโท วา เสฏฺฐปริยาโย ‘พฺรหฺมํ ปุญฺญํ ปสวตี’ติอาทีสุ วิย. อสิตพฺพํ ภุญฺชิตพฺพนฺติ อสิตํ. ปญฺจโภชนํ. ปาตพฺพนฺติ ปีตํ. อฏฺฐวิธํ ปานํ. ทนฺเตน ขายิตพฺพํ ขาทิตพฺพนฺติ ขายิตํ. ปูวกฺขชฺชผลกฺขชฺชาทิกํ นานาขาทนียํ[Pg.279]. องฺคุลีหิปิ คเหตฺวา สายิตพฺพํ เลหิตพฺพนฺติ สายิตํ. มธุปฺผาณิตาทิกํ สายนียํ. สรสปฺปฏิกูลตา นาม อตฺตโน สภาวโต ปฏิกูลตา. จตุพฺพิโธปิ หิ อาหาโร ภาชเนสุ วา หตฺถมุขาทีสุ วา ยตฺถ ยตฺถ สมฺมกฺเขติ, ลคฺคติ, ลิมฺปติ. ตํ อุทเกน โธวิตพฺพํ โหติ. อโธตํ ปน ตมฺปิ เชคุจฺฉนียํ โหติ. อาสยโต ปฏิกูลตา นาม ตสฺส อชฺโฌหรียมานสฺส กณฺฐาทีสุ ฐิเตหิ ปิตฺตเสมฺหาทีหิ อาสเยหิ สมฺมิสฺสนวเสน ปฏิกูลตา. นิธานโต ปฏิกูลตา นาม นิธานโต ปฏิกูลตา. ‘‘นิธานํ’’ติ จ อามาสโย วุจฺจติ. ปกฺกโต ปฏิกูลตา นาม ตสฺส นิธานคตสฺส ปริปกฺกกาเล คูถมุตฺตาทิภาวปตฺติโต ปฏิกูลตา. อปกฺกโต ปฏิกูลตา นาม ตสฺมึ อปริปกฺเก อชิณฺเณ สติ สรีเร นานาโรคุปฺปตฺติวเสน ปฏิกูลตา. ผลโต ปฏิกูลตา นาม ตสฺส ปริปกฺกกาลโต ปฏฺฐาย สรีเร เกสโลมาทีนํ ปฏิกูลราสีนํ วฑฺฒนวเสน ปฏิกูลตา. นิสฺสนฺทโต ปฏิกูลตา นาม ตสฺส น วหิทฺวาเรหิ วา โลมกูเปหิวา อญฺเญหิ นานาวณมุเขหิ วา อุคฺฆรณ ปคฺฆรณาทิวเสน ปฏิกูลตา. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ จตุพฺพิเธ อาหาเร. ‘‘นิกนฺติปฺปหานสญฺญา’’ติ กนฺตารมคฺเค มาตาปิตูนํ กนฺตารนิตฺตรณตฺถาย ปุตฺต มํสขาทเน วิย อติ มนุญฺเญปิ อาหาเร รสตณฺหา ปหานวเสน ปวตฺตา สญฺญา. ‘‘สลกฺขณาทิวเสนา’’ติ สลกฺขณสสมฺภาราทิวเสน. ‘‘ราเคน จรตี’’ติ เอตฺถ ‘‘ราเคนา’’ติ กรณตฺเถ, อิตฺถมฺภูตลกฺขเณวา กรณ วจนํ. ตตฺถ กรณตฺเถตาว ‘‘ราเคน จรตี’’ติ จตูสุ อิริยาปเถสุ เยภูยฺเยน ราคจิตฺเตน จรติ. ราคจิตฺเตน นิยฺยมาโน วิจรตีติ วุตฺตํ โหติ. อิตฺถมฺภูต ลกฺขเณ ปน ‘‘ราเคน จรตี’’ติ เตสุ ราคเกตุ ราคธโช หุตฺวา วิจรตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อสฺสา’’ติ ตสฺสปุคฺคลสฺส. ‘‘อุสฺสนฺโน’’ติ อุคฺคโต ปากฏตโร. พหุตโรติปิ วทนฺติ. ‘‘ปหานายา’’ติ เอตฺถ อิติสทฺโท อาทิ อตฺโถ. เตน กรุณา ภาเวตพฺพา วิหึสาย ปหานาย. มุทิตา [Pg.280] ภาเวตพฺพา อรติยา ปหานายาติ อิมํ ปาฬิเสสํ สงฺคณฺหาติ. ‘‘นิสฺสรณตาวจนโต’’ติ นิสฺสรณญฺเหตํ พฺยาปาทสฺส ยทิทํ เมตฺตาเจโต วิมุตฺติ. นิสฺสรณญฺเหตํ วิเหสายยทิทํ กรุณา เจโตวิมุตฺติ. นิสฺสรณญฺเหตํ อรติยา ยทิทํ มุทิตา เจโต วิมุตฺตีติ เอวํ นิสฺสรณ ภาววจนโต จ. จตสฺโส อปฺปมญฺญาโย. ล. โทส จริตสฺสาติ วุตฺตํ. ‘‘โทส วตฺถุตฺตาภาวโต จา’’ติ โทสุปฺปตฺติยา วตฺถุ ภาวสฺสกรณ ภาวสฺส อภาวโต จ. นีลาทีนิ จตฺตาริ กสิณานิ โทส จริตสฺสาติ วุตฺตํ. กสฺมาปเนตฺถ โทส จริตสฺส อุเปกฺขา สปฺปายการณํ วิสุํ น วุตฺตนฺติ. อญฺญการณตฺตา น วุตฺตนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิมาห. ‘‘ติสฺโส’’ติ ติสฺโส อปฺปมญฺญาโย. ‘‘มนาปิยรูปานี’’ติ มนาปิยวณฺณานิ. วิกฺขิตฺตจิตฺโต จ โหตีติ อธิกาโร. ‘‘ตสฺสา’’ติ ปมาท พหุลสฺส วิกฺขิตฺตจิตฺตสฺส จ ปุคฺคลสฺส. วุตฺตํ สิยา. วิสุทฺธิ มคฺเค ปน เอวํ วุตฺตํ นตฺถีติ อธิปฺปาโย. วิภาวนิปาเฐ. ‘‘พุทฺธิวิสย ภาเวนา’’ติ วุตฺตํ. ยทิ พุทฺธิวิสยตฺตา โมหจริตสฺส สปฺปายํ. พุทฺธิวิสยภูตานิ มรณ อุปสมสญฺญา ววตฺถานานิปิ โมหจริตสฺส สปฺปายานิ สิยุนฺติ วุตฺตํ ‘‘เอวญฺหิสตี’’ติอาทึ. ‘‘ภูตกสิณานี’’ติ ปถวีกสิณาทีนิ มหาภูตกสิณานิ. ‘‘ตตฺถาปี’’ติ วา เตสุ จตฺตาลีส กมฺมฏฺฐาเนสุปิ. เอวํสติ วณฺณกสิณานํ ปุถุลขุทฺทกตาปิ เอตฺถ สงฺคหิตา โหตีติ. ‘‘มหนฺตํ’’ติ วิทตฺถิ จตุรงฺคุลโต มหนฺตํ. ยทิ เอวสทฺโท ยถารุตเมว ยุชฺเชยฺย. เอวํสติ ขุทฺทกํ วิตกฺกจริตสฺเสว สปฺปายํ, น พุทฺธิจริตาทีนนฺติ เอวมตฺโถปิ คณฺเหยฺย. อถ พุทฺธิจริตสฺส ปน อสปฺปายํ นาม นตฺถีติ อฏฺฐกถาวจเนน วิรุชฺเฌยฺยาติ อิมินา อธิปฺปาเยน ‘‘ขุทฺทกนฺติ ปเทยุชฺชตี’’ติ วุตฺตํ. อถวา, ปุถุลํ โมหจริตสฺส, ขุทฺทกํ วิตกฺกจริตสฺเสว, นโมหจริตสฺสาติ อตฺเถ สติ, พุทฺธิจริตาทีนํ ปน ปุถุลํปิ ขุทฺทกํปิ อนุญฺญาตํ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘สพฺพญฺเจตํ’’ติ สพฺพญฺจ เอตํจริตวิภาควจนํ. อุชุวิปจฺจนีกวเสน ตีสุ อกุสล จริเตสุ ปุคฺคเลสุ. วิตกฺก จริเต [Pg.281] จ อติสปฺปายตาย สทฺธาพุทฺธิ จริเตสูติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘ราคาทีนํ ปน อวิกฺขมฺภิกา’’ติอาทึ. “बुद्धानुस्सती” यामध्ये 'बुद्ध' हा शब्द गुणांच्या उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) वापरला गेला आहे. गुणी द्रव्याच्या (गुणांचा आश्रय असलेल्या व्यक्तीच्या) नावाने गुणांचे ग्रहण करायचे असल्यामुळे “बुद्धांच्या गुणांचे अनुस्मरण म्हणजे बुद्धानुस्सती” असे म्हटले आहे. हाच नियम धम्मानुस्सती इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. “अरहतादी” म्हणजे अरहंत इत्यादींचे गुण. ज्यांचे दुःशील (दुराचार) इत्यादी मळ (दोष) आणि मत्सर (कंजूषपणा) निघून गेले आहेत, त्याला 'विगतमल मच्छेर' (मळ आणि मत्सरापासून मुक्त) म्हणतात. त्याचा भाव (अवस्था) असा विग्रह (शब्दसिद्धी) आहे. “स्वतः प्राप्त केलेले निर्वाण” याने आर्यपुद्गलांच्या क्लेशांचा अत्यंत (पूर्णपणे) उपशम (शांत होणे) सांगितला आहे. “ज्याला उद्देशून” म्हणजे ज्या पुद्गलाला (व्यक्तीला) उद्देशून. 'हितोपसंहार' म्हणजे “हा पुद्गल वैररहित असो, व्यापादरहित (द्वेषरहित) असो” इत्यादी प्रकारे त्या पुद्गलाच्या ठिकाणी चित्ताने वैररहितता इत्यादी हित आणि सुखाचा उपसंहार (संकल्प) करणे होय. करुणा आणि मुदिता यांचे अर्थ खाली चेतसिकसंग्रहामध्ये सांगितल्याप्रमाणेच आहेत. हितोपसंहार, हितमोदना (हितामध्ये आनंद मानणे) आणि अहितापनयन (अहित दूर करणे) हा द्वंद्व समास आहे. त्यामध्ये हितोपसंहार हे मेत्तेचे (मैत्रीचे) कार्य आहे. हितमोदना हे मुदितेचे कार्य आहे. अहितापनयन हे करुणेचे कार्य आहे. त्यामध्ये दुसऱ्याला हित आणि सुखाने संपन्न पाहून, त्या परहितामुळे स्वतःमध्ये प्रीती आणि प्रामोद्य (आनंद) वाढवणे म्हणजे 'हितमोदना' होय. दुसऱ्याला दुःखी पाहून “हा या दुःखातून मुक्त व्हावा, याला त्रास होऊ नये” अशा प्रकारे चित्ताने दुसऱ्याचे अहित आणि दुःख दूर करणे म्हणजे 'अहितापनयन' होय. “त्यांच्या” म्हणजे इतर प्राण्यांच्या. स्वतःचे जे आहे ते 'सक' (स्वकीय) होय. “हे” म्हणजे सुख आणि दुःखाचे कारण. स्वतः केलेले कर्मच ज्यांचे स्वतःचे आहे, ते 'कम्मस्सक' (कर्मस्वकीय) होत. ते इतर प्राणीच आहेत. त्यांचा भाव (अवस्था) म्हणजे कम्मस्सकता. त्याचे अनुब्रूहन (वर्धन) असा विग्रह आहे. “सीमासंभेद” म्हणजे स्वतः, प्रिय पुद्गल, मध्यस्थ पुद्गल आणि वैरी पुद्गल अशा चार सीमा. संभिंदन म्हणजे संभेद. याचा अर्थ संमिश्रण करणे, भेद न करणे असा आहे. सीमांचा संभेद म्हणजे 'सीमासंभेद' होय. “सर्व स्त्रिया, सर्व पुरुष” इत्यादी प्रकारे मर्यादित रूपाने (विशिष्ट गटांमध्ये) पसरवणे म्हणजे 'ओधिसोफरण' (ससीम प्रसरण) होय. “सर्व प्राणी, सर्व प्राणधारी, सर्व भूत” इत्यादी प्रकारे अमर्यादित रूपाने (कोणत्याही भेदभावाशिवाय) पसरवणे म्हणजे 'अनोधिसोफरण' (असीम प्रसरण) होय. “पूर्व दिशेकडील सर्व प्राणी वैररहित असोत” इत्यादी प्रकारे दिशांच्या विभागानुसार पसरवणे म्हणजे 'दिशाफरण' (दिशाप्रसरण) होय. “त्याच्याशी युक्त” म्हणजे त्या अप्पमण्यांशी (अप्रमाणांशी) युक्त असलेले पुद्गल. “नेहमी सौम्य हृदयभावाने” म्हणजे सर्व काळ शांत आणि शीतल हृदयभावाने. किंवा 'ब्रह्म' शब्द हा 'ब्रह्मं पुञ्ञं पसवति' (श्रेष्ठ पुण्य प्रसवतो) इत्यादी वाक्यांप्रमाणे 'श्रेष्ठ' या अर्थाचा वाचक आहे. जे खाल्ले जाते ते 'असित' (भोजन) होय, जे पाच प्रकारचे भोजन आहे. जे प्यायले जाते ते 'पीत' (पेय) होय, जे आठ प्रकारचे पेय आहे. जे दातांनी चावून खाल्ले जाते ते 'खायित' (खाद्य) होय, जसे की पिष्टान्न, फळे इत्यादी विविध प्रकारचे खाण्याचे पदार्थ. जे बोटांनी घेऊन चाखले किंवा चाटले जाते ते 'सायित' (चाटण्याचे पदार्थ) होय, जसे की मध, गुळ इत्यादी चाखण्याचे पदार्थ. 'सरसप्रतिकूलता' (रसाची प्रतिकूलता) म्हणजे स्वतःच्या स्वभावामुळेच असणारी प्रतिकूलता (किळसवाणेपणा) होय. कारण चारही प्रकारचा आहार भांड्यांमध्ये, हातावर किंवा तोंडावर इत्यादी ठिकाणी जिथे जिथे माखतो, चिकटतो किंवा लिंपला जातो, तो पाण्याने धुवावा लागतो. न धुता ठेवल्यास तो देखील अत्यंत किळसवाणा होतो. 'आशयतः प्रतिकूलता' (स्थानाच्या दृष्टीने प्रतिकूलता) म्हणजे तो आहार गिळताना गळा इत्यादी ठिकाणी असलेल्या पित्त, कफ इत्यादी आशयांच्या संमिश्रणामुळे होणारी प्रतिकूलता होय. 'निधानतः प्रतिकूलता' (साठवणुकीच्या दृष्टीने प्रतिकूलता) म्हणजे साठवण्याच्या जागेमुळे होणारी प्रतिकूलता होय. 'निधान' म्हणजे आमाशय (पोट) असे म्हटले जाते. 'पक्वतः प्रतिकूलता' (पचण्याच्या दृष्टीने प्रतिकूलता) म्हणजे तो आहार आमाशयात गेल्यानंतर, त्याच्या पचनकाळात विष्ठा, मूत्र इत्यादी भावाला (अवस्थेला) प्राप्त होत असल्यामुळे होणारी प्रतिकूलता होय. 'अपक्वतः प्रतिकूलता' (अपक्व राहण्याच्या दृष्टीने प्रतिकूलता) म्हणजे तो आहार अपक्व (न पचलेला) किंवा अजीर्ण राहिल्यास शरीरात विविध रोगांची उत्पत्ती होत असल्यामुळे होणारी प्रतिकूलता होय. 'फलतः प्रतिकूलता' (परिणामाच्या दृष्टीने प्रतिकूलता) म्हणजे तो आहार पचल्यापासून शरीरात केस, रोम इत्यादी प्रतिकूल गोष्टींच्या राशी वाढवण्यास कारणीभूत ठरत असल्यामुळे होणारी प्रतिकूलता होय. 'निस्स्यंदतः प्रतिकूलता' (स्त्रावाच्या दृष्टीने प्रतिकूलता) म्हणजे त्या आहाराचा शरीराच्या बाह्य द्वारांमधून, रोमकूपांमधून किंवा इतर विविध जखमांच्या मुखांमधून घाम, मळ इत्यादी रूपाने बाहेर पडणे किंवा पाझरणे यामुळे होणारी प्रतिकूलता होय. “त्यामध्ये” म्हणजे त्या चार प्रकारच्या आहारामध्ये. “निकान्तिप्रहाणसंज्ञा” (आसक्ती सोडण्याची संज्ञा) म्हणजे वाळवंटाच्या मार्गावर माता-पित्यांनी वाळवंट पार करण्यासाठी आपल्या पुत्राचे मांस खाण्याप्रमाणे, अत्यंत स्वादिष्ट आहारामध्ये देखील रस-तृष्णेचा त्याग करण्याच्या हेतूने प्रवृत्त झालेली संज्ञा होय. “स्वलक्षण इत्यादींच्या द्वारे” म्हणजे स्वलक्षण आणि ससंभार इत्यादींच्या द्वारे. “रागाने वागतो” यामध्ये 'रागाने' हा शब्द करण अर्थामध्ये किंवा 'इत्थंभूतलक्षण' या अर्थामध्ये तृतीया विभक्तीचा वाचक आहे. त्यामध्ये करण अर्थाच्या दृष्टीने “रागाने वागतो” म्हणजे चारही इरियापथांमध्ये बहुतांश वेळा रागयुक्त चित्ताने वागतो. रागयुक्त चित्ताने प्रेरित होऊन तो वावरतो, असा याचा अर्थ आहे. परंतु 'इत्थंभूतलक्षण' अर्थाच्या दृष्टीने “रागाने वागतो” म्हणजे तो त्यांच्यामध्ये रागाचा केतू (ध्वज) किंवा रागाची पताका धारण करून वावरतो, असे म्हटले आहे. “त्याच्या” म्हणजे त्या पुद्गलाच्या. “उत्सन्न” म्हणजे उदित झालेला, अधिक स्पष्ट झालेला. काही जण याला 'अतिशय जास्त' असेही म्हणतात. “प्रहाणासाठी” यामध्ये 'इति' हा शब्द 'इत्यादी' या अर्थाचा वाचक आहे. त्यामुळे “हिंसेच्या प्रहाणासाठी करुणेची भावना करावी, अरतीच्या प्रहाणासाठी मुदितेची भावना करावी” हा उर्वरित पाळिभाग यामध्ये समाविष्ट होतो. “निःसरणता असे म्हटल्यामुळे” कारण “व्यापादापासून सुटका म्हणजे ही मेत्ताचेतोविमुत्ती होय. विहेसेपासून सुटका म्हणजे ही करुणाचेतोविमुत्ती होय. अरतीपासून सुटका म्हणजे ही मुदिताचेतोविमुत्ती होय” अशा प्रकारे निःसरण भावाचे वचन असल्यामुळे देखील. चार अप्पमण्या ...पे... द्वेषचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहेत, असे म्हटले आहे. “द्वेषाचे वस्तूत्व (कारण) नसण्यामुळे” म्हणजे द्वेषाच्या उत्पत्तीचे कारण किंवा निमित्त नसण्यामुळे देखील. नीळ इत्यादी चार कसिण हे द्वेषचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहेत, असे म्हटले आहे. परंतु येथे द्वेषचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी उपेक्षेची भावना अनुकूल असण्याचे कारण स्वतंत्रपणे का सांगितले नाही? इतर कारणांमुळे ते सांगितले नाही, हे दर्शवण्यासाठी “येथे आणि” इत्यादी म्हटले आहे. “तीन” म्हणजे तीन अप्पमण्या. “मनापिय रूपांनी” म्हणजे मनाला प्रिय असणाऱ्या रंगांनी. “आणि विक्षिप्तचित्त होतो” हा अधिकार आहे. “त्याच्या” म्हणजे प्रमादबहुल आणि विक्षिप्तचित्त असलेल्या पुद्गलाच्या. असे म्हटले असावे. परंतु विसुद्धिमग्गात असे म्हटलेले नाही, असा अभिप्राय आहे. विभावनी पाठात “बुद्धीचा विषय असल्यामुळे” असे म्हटले आहे. जर बुद्धीचा विषय असल्यामुळे मोहचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी ते अनुकूल असेल, तर बुद्धीचा विषय असणारे मरणानुस्मरण, उपशमानुस्मरण, संज्ञा-व्यवस्थान हे देखील मोहचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल असायला हवेत, असे दर्शवण्यासाठी “असे असल्यास” इत्यादी म्हटले आहे. “भूतकसिण” म्हणजे पठवीकसिण इत्यादी महाभूतकसिण होत. “त्यामध्ये देखील” म्हणजे त्या चाळीस कम्मट्ठानांमध्ये देखील. असे असल्यास, वर्णकसिणांचे मोठेपण आणि लहानपण देखील येथे समाविष्ट होते. “मोठे” म्हणजे एका वितीपेक्षा आणि चार बोटांपेक्षा मोठे. जर 'एव' (च) हा शब्द जसा आहे तसाच वापरला, तर “लहान कसिण हे केवळ वितक्कचरित असलेल्या व्यक्तीसाठीच अनुकूल आहे, बुद्धीचरित इत्यादींसाठी नाही” असा देखील अर्थ घेतला जाऊ शकतो. परंतु “बुद्धीचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी काहीही अनुकूल नसलेले नाही” या अट्ठकथेच्या वचनाशी हा विरोध निर्माण करेल, या अभिप्रायाने “लहान” हा शब्द जोडला गेला आहे, असे म्हटले आहे. अथवा, “मोठे कसिण हे मोहचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी आणि लहान कसिण हे केवळ वितक्कचरित असलेल्या व्यक्तीसाठीच अनुकूल आहे, मोहचरित असलेल्यासाठी नाही” असा अर्थ असताना, बुद्धीचरित इत्यादींसाठी मात्र मोठे आणि लहान दोन्ही प्रकारचे कसिण अनुमत आहेत, असे समजावे. “आणि हे सर्व” म्हणजे हे सर्व चरित-विभागाचे वचन होय. थेट विरोधी असण्याच्या दृष्टीने तीन अकुशल चरित असलेल्या पुद्गलांमध्ये. आणि वितक्कचरित असलेल्या व्यक्तीमध्ये अत्यंत अनुकूलतेमुळे, तसेच सद्धाचरित आणि बुद्धीचरित असलेल्या व्यक्तींमध्ये देखील, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच “परंतु राग इत्यादींना न दावणारे” इत्यादी म्हटले आहे। ‘‘พุทฺธธมฺม. ล. คุณานํ’’ติ เอตฺถ คุณสทฺโท ปุพฺพปเทสุ โยเชตพฺโพ พุทฺธคุณานญฺจ ธมฺมคุณานญฺจาติอาทินา. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ คุณปเท. น ตปฺเปตีติ อตปฺปนีโย. ตปฺปนํ สนฺตุฏฺฐึ น ชเนตีติ อตฺโถ. สํเวชนํ สํเวคํ ชเนตีติ สํเวชนิโย. ‘‘ธมฺโม’’ติ สภาโว. สํเวชนิโย ธมฺโม ยสฺสาติ สํเวชนิย ธมฺมํ. มรณํ. ‘‘ปญฺจมชฺฌานสมาธิสฺสา’’ติ รูปาวจร ปญฺจมชฺฌาน สมาธิสฺส. ‘‘อุทยมตฺตานี’’ติ วฑฺฒิตมตฺตานิ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ปฏิกูลารมฺมเณสุ. ‘‘ปุพฺพจฺฉฏฺฏกสฺสา’’ติ ปุราณจฺฉฏฺฏกสฺส. คูถมุตฺตวิสฺสชฺชน กสฺสาติ วุตฺตํ โหติ. เตนาห ‘‘คูถราสิ ทสฺสเน วิยา’’ติ. น เต กทาจิ โสมนสฺเสน วินา อปฺปนํ ปาปุณนฺติ. พฺยาปาทวิหึสา อรตีนํ ทูริภาเวน โสมนสฺสุปฺปตฺติยา อติสุกรตฺตา ปญฺจมชฺฌาเน วิย สุขโสมนสฺสานญฺจ อวิกฺขมฺภนโต. ‘‘อุทาสินปกฺเข’’ติ อชฺฌุเปกฺขนปกฺเข. ‘‘ทฬฺหํ’’ติ ภุสํ. ‘‘วิภูตํ’’ติ ปากฏํ. นิมิตฺตํ ทฬฺหวิภูตํ กตฺวา คหณํ ทฬฺห วิภูตคฺคหณํ. ‘‘กสฺสจิ อารมฺมณสฺสา’’ติ พุทฺธคุณาทิ อารมฺมณสฺส. ‘‘ปฏิภาคนิมิตฺตํ’’ติ เอตฺถ ปฏิภาคสทฺโท ตสฺส ทิเส ปวตฺโตติ อาห ‘‘ตาทิเส’’ติอาทึ. ‘‘ตํสณฺฐาเน’’ติ เอเตน ปถวิมณฺฑลาทีสุ วิย สณฺฐานากาเรน ฐิเตสุ สภาว ธมฺม ปุญฺเชสุ เอว ตสฺสทิสํ ปฏิภาคนิมิตฺตํ นาม สิชฺฌตีติ ทสฺเสติ. ‘‘เอว’’นฺติ สมถสงฺคเห ตาว ทสกสิณานิ, ทสอสุภาติอาทินา วุตฺเตน วจนกฺกเมน. ‘‘อุคฺคหโกสลฺลํ’’ติ ภาวนากมฺมํ อารภิตุกาเมน ภิกฺขุนา อาจริยสฺส สนฺติเก สพฺพสฺส กมฺมฏฺฐาน วิธานสฺส อุคฺคหณํ อุคฺคโห. ตสฺมึ โกสลฺลํ อุคฺคหโกสลฺลํ. อปิเจตฺถ. สพฺพํ อุคฺคหิตุํ อสกฺโกนฺเตน ยํ อตฺตนา อารภิสฺสติ. ตสฺส เอกสฺส วิธานํ ปริปุณฺณํ อุคฺคเหตพฺพํ. ‘‘อุคฺคณฺหนฺตสฺสา’’ติ เอตฺถ อุกาโร อุปริ อตฺโถ. ‘‘คหณํ’’ติ จ ยถา จิตฺเต อวินสฺสมานํ หุตฺวา ลพฺภติ, ตถา กตฺวา จิตฺเตน คหณนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘อุปรูปรี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘สมนุปสฺสนฺตสฺสา’’ติ [Pg.282] สมฺมา ปุนปฺปุนํ จกฺขุนา ทสฺสนสทิสํ กโรนฺตสฺส. ปริโต สมนฺตโต กรณํ ปริกมฺมํ. ตสฺมึ นิมิตฺตคฺคหณกมฺเม ยํ ยํ กตฺตพฺพวิธานํ อตฺถิ, ตํ ตํ ปริปุณฺณํ กตฺวา คหณนฺติ วุตฺตํ โหติ. ภาวนาติ วฑฺฒนาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปุนปฺปุน’’นฺติอาทิมาห. ‘‘นิรนฺตรํ ปทหนฺตสฺสา’’ติ รตฺติทิวํ นิรนฺตรํ อารภนฺตสฺส. อุคฺคห นิมิตฺเต สณฺฐานํ คณฺหนฺโตปิ วณฺณรูปาทินา สภาว ธมฺเมน สเหว คณฺหาติ. ปฏิภาคนิมิตฺเต ปน สภาวธมฺมํ มุญฺจิตฺวา ตสฺส ทิสํ นิมิตฺต ปญฺญตฺติ สงฺขาตํ สุทฺธสณฺฐานเมว คณฺหาติ. เอตฺถ สิยา, ปฏิภาคนิมิตฺเตปิ วณฺโณ นาม สนฺทิสฺสติ เยวาติ. สจฺจํ. โส ปน ปฏิภาคมตฺตํ โหติ. น เอกนฺตวณฺโณ. เตนาห ‘‘ตปฺปฏิภาคํ วตฺถุ ธมฺมวิมุจฺจิตํ’’ติ. ‘‘สนฺนิสินฺนํ’’ติ อจลํ. ‘‘ปเวสิตํ’’ติ ภาวนาจิตฺตสฺส อพฺภนฺตเร ปกฺขิตฺตํ วิย โหตีติ อธิปฺปาโย. โอภาสตีติ โอภาโส. โอภาโส หุตฺวา ชาตนฺติ โอภาสชาตํ. โอภาสนํ วา โอภาโส. ชาโต โอภาโส อสฺสาติ โอภาสชาตํ. ‘‘ปาเตนฺตี’’ติ ปฏิปาเตนฺติ. ปุน อุปฺปชฺชนวเสน อุฏฺฐาตุํ น เทนฺติ. ‘‘เอตายา’’ติ กตฺตุ อตฺเถ กรณวจนํ. ‘‘นิมิตฺตรกฺขณวิธานํ’’ติ สมุปฺปนฺนสฺส นิมิตฺตสฺส อนสฺสนตฺถาย สตฺตวิเธหิ ปลิโพธ ธมฺเมหิ รกฺขณตฺถํ. กตเม ปน เตสตฺตวิธา ปลิโพธธมฺมา นามาติ. อิธ อมฺเหหิ วตฺตพฺพํ นตฺถิ. วิสุทฺธิ มคฺเค เอว เต วุตฺตาติ ทสฺเสตุํ คาถมาห. ‘‘อาวาโส’’ติ อสปฺปายาวาโส. ‘‘โคจโร’’ติ อสปฺปายโคจรคาโม. ‘‘ภสฺสํ’’ติ อสปฺปายวจนํ. เอวํ ปุคฺคลาทีสุ. ‘‘เสเวถา’’ติ เสเวยฺย. ‘‘เอวญฺหิปฏิปชฺชโต’’ติ เอวํหิวชฺชิตพฺเพ วชฺชนวเสน เสวิตพฺเพ เสวนวเสน ปฏิปชฺชนฺตสฺส. ‘‘กามตณฺหาย วิสยภาวํ อติกฺกมิตฺวา’’ติ เอเตน กามภูมิ กามภวสมติกฺกโม, รูปภูมิรูปภว โอกฺกโม จ วุตฺโต. วสนํ วสี. สตฺติ. สามตฺถิยนฺติ อตฺโถ. วสึ ภูตํ ปตฺตนฺติ วสิภูตํ. วสี เอว วสิตา. ยถา ปารมิตาติ. ‘‘ตโต วิจารนฺติ’’ เอตฺถ อิติสทฺโท อาทิอตฺโถ. เตน ตโต ปีตึติอาทึ สงฺคณฺหาติ. อิจฺฉนฺตานํ เตสํ สพฺพญฺญุพุทฺธานํ. ‘‘ยตฺถา’’ติ [Pg.283] เยสุทฺวีสุภวงฺเคสุ. ‘‘ภวงฺคจาเร’’ติ ภวงฺคปฺปวตฺติยํ. ‘‘ทนฺธายิตตฺตํ’’ติ ทนฺธํ หุตฺวา อยติ ปวตฺตตีติ ทนฺธายิตํ. ตสฺส ภาโว ทนฺธายิตตฺตํ. ‘‘ฐเปตุํ’’ติ อธิฏฺฐานํ กตฺวา ฐเปตุํ. ตโต อนติกฺกมิตุํ. ‘‘ยตฺถิจฺฉกํ’’ติอาทีนิ กฺริยาวิเสสนปทานิ. ‘‘ยตฺถิจฺฉกํ’’ติ ยตฺถ ยตฺถ ฐาเน อิจฺฉานุ รูปํ. ยทิจฺฉกนฺติยสฺมึ ยสฺมึ ขเณ อิจฺฉานุ รูปํ. ‘‘ยาวติจฺฉกํ’’ติ ยตฺตเกน ปมาเณน อิจฺฉานุ รูปํ. ‘‘วิตกฺกาทิกํ โอฬาริกงฺคํ ปหานายา’’ติ เอตฺถ กสฺส พเลน ปหานํ โหติ. ตํ ตํ วิราค ภาวนา พเลน ปหานํ โหติ. กาจ ตํ ตํ วิราคภาวนา นาม โหติ. อชฺฌาสย วิเสส ปริคฺคหิตา อุปจารภาวนา เอวาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ปถมชฺฌานํ ตาวา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘อาตาปวีริยํ’’ติ เยนวีริเยน โยคิโน อตฺตานํ วา กิเลส ธมฺเม วา อาตาเปนฺติ ปริตาเปนฺติ. ตํ อาตาปวีริยํ นาม. อุคฺฆาฏียมานมฺปิ อากาสเมว โหติ. ตํ อารพฺภ อุปริฌานนฺตรุปฺปตฺติยา ภาวนํ กโรนฺตสฺสปิ ปุนปฺปุนํ ตเมว ปญฺจมชฺฌานํ อุปฺปชฺชติ. อารมฺมเณ จ อนติกฺกนฺเต ฌานํปิ อนติกฺกนฺตเมว โหตีติ. ‘‘ตตฺถา’’ติ ตสฺมึ อากาสกสิเณ. ‘‘ตทติกฺกมนสมฺภโว’’ติ กสิณ นิมิตฺตาติกฺกมนสมฺภโว. ‘‘ยถาทิฏฺเฐ’’ติ ฌานจกฺขุนา ทิฏฺฐปฺปกาเร. ‘‘สมฺภาเวตฺวา’’ติ โถเมตฺวา. สมฺมา อนุสฺสรณํ สมนุสฺสรณํ. ‘‘อิตเรสํปิ วา’’ติ ปุถุชฺชน ปณฺฑิตานํปิ วา. มรณ สญฺญา ววตฺถาเนสุ ปริกมฺมญฺจ สมาธิยติ, อุปจาโร จ สมฺปชฺชตีติ โยชนา ติกฺขปญฺญานํ ปน ปุถุชฺชนานํปิ สตํ พุทฺธคุณาทีสุปิ อุปจาร สมฺภโว อฏฺฐกถายํ วุตฺโตเยว. ‘‘สมถชฺฌาเนสู’’ติ อิทํ อธิการวเสน วุตฺตํ. วิปสฺสนา กมฺมํปิ คเหตพฺพเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. ปุพฺเพทานํ ทตฺวา อิมินา ปุญฺเญน อายตึ ฌานาภิญฺญาโย วา มคฺคผลานิ วา ปฏิลภิสฺสามีติ ปตฺถนํ กตฺวา อาคโตปิ กตาธิกาโร เอวาติปิ วทนฺติ. กตโม ปน กตาธิกาโร นามาติ อาห ‘‘อาสนฺนภเว’’ติอาทึ. อฏฺฐวิเธสุ จตุกฺกนยวเสน, นววิเธสุ ปญฺจกนยวเสน วุตฺโตติ เตสํ วาทีนํ สาธกวจนํ. วิจาเรตฺวา ปน คเหตพฺพํ. อากาส กสิเณน [Pg.284] วินา อรูปชฺฌานานิ ลภิตฺวา ปุน อภิญฺญตฺถาย ปริกมฺเมกเต อากาสกสิเณปิ กตฺตพฺพตฺตา ตสฺส อภิญฺญาปาทกตา สมฺภโว วุตฺโตติ อตฺถสฺส สมฺภวโต. ปุพฺเพ อภาวิต ภาวโนติ จ อกตาธิกาโรติ จ อตฺถโต เอกํ. ‘‘อาทิกมฺมิโก’’ติ อภิญฺญากมฺเม อาทิกมฺมิโก. ‘‘ตาทิสานํ’’ติ ปุพฺเพ อกตาธิการานํ อภาวิตภาวนานํ อิทานิ อิทฺธิวิกุพฺพนํ กริสฺสามีติ อารภนฺตานํ อภิญฺญากมฺเม อาทิกมฺมิกกุลปุตฺตานนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อิทฺธิวิกุพฺพนํ’’ติ จ อุปลกฺขณวจนํ. ทิพฺพาย โสตธาตุยา สทฺทํ สวนํ กริสฺสามีติอาทิกํปิ คเหตพฺพํ. อิทญฺจ อาทิกมฺมิกวิธานาธิการตฺตา วุตฺตํ. อภิญฺญาสุ วสิปตฺตานมฺปิ ตํ ปญฺจมชฺฌานํ ฉสุอารมฺมเณสุ ยถารหํ อปฺเปติเยว. ‘‘อธิฏฺฐาตพฺพํ’’ติ ยถิจฺฉิต นิปฺผตฺตตฺถาย สตํ โหตุ สหสฺสํ โหตูติอาทินา จิตฺเตน อภิวิธาตพฺพํ. อภินีหริตพฺพนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘สตํ โหมิ, สหสฺสํ โหมีติ วา’’ติ อตฺตานํ สตํ วา สหสฺสํ วา นิมฺมินนวเสน วุตฺตํ. เสสํ ปน อญฺญถานิมฺมินนวเสน. โสตุํ วา สทฺทํ, ปสฺสิตุํ วา รูปํ, ชานิตุํ วา ปรจิตฺตํ. อนุสฺสริตุํ วา ปุพฺเพนิวุตฺถํ. อฏฺฐกถาปาเฐ. ‘‘อธิฏฺฐาตี’’ติ อภิญฺญาย อธิฏฺฐาติ. อภิวิธาติ นิพฺพตฺเตตีติ วุตฺตํ โหติ. ทุวิธํหิ อธิฏฺฐานํ ปริกมฺเมน อธิฏฺฐานํ อภิญฺญาย อธิฏฺฐานนฺติ. อิธ ปน อภิญฺญาย อธิฏฺฐานํ วุตฺตํ. ‘‘อธิฏฺฐาน จิตฺเตนา’’ติ อภิญฺญาจิตฺเตนาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปริกมฺมจิตฺตสฺสา’’ติ ปุพฺพภาเค อาวชฺชน ปริกมฺม อธิฏฺฐานปริกมฺมจิตฺตสฺส. ปจฺฉิมํ ปน ปาทกชฺฌาน สมาปชฺชนํ. ปริกมฺมจิตฺตสฺส สมาธานตฺถายาติ วุตฺตํ. ปริกมฺมจิตฺเต สมาหิเต กึ ปโยชนนฺติ อาห ‘‘ตถาหี’’ติอาทึ. ‘‘เสสาภิญฺญาสุปิ ยถารหํ วตฺตพฺโพ’’ติ ทิพฺพโสตปริกมฺเม เตเนวปริกมฺม สมาธิญฺญาณโสเตน อาสนฺเน ทิพฺพวิสยํปิ สทฺทํ สุณาตีติอาทินา วตฺตพฺโพ. ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ อิติ มนสิกตฺวา. ‘‘ตํ’’ติ ปจฺฉิมํ ปาทกชฺฌาน สมาปชฺชนํ. ‘‘อิธ นคหิตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ’’ติ เถรสฺส มเตน ทฏฺฐพฺพนฺติ อธิปฺปาโย. อิธ ปน อาทิกมฺมิกวิธานปฺปธานตฺตา ปจฺฉิมํปิ ปาทกชฺฌาน สมาปชฺชนํ [Pg.285] วตฺตพฺพเมวาติ. ‘‘กายคติกํ อธิฏฺฐหิตฺวา’’ติ อยํ กาโย วิย อิทํ จิตฺตํปิ ทนฺธคมนํ โหตูติ เอวํ จิตฺตํ กายคติกํ กรเณน อธิฏฺฐหิตฺวา. ‘‘ทิสฺสมาเนน กาเยนา’’ติ ทนฺธคมเนน คจฺฉนฺตตฺตา พหุชนานมฺปิ ทิสฺสมาเนน รูปกาเยน. ตพฺพิ ปรีเตน สีฆคมนํ เวทิตพฺพํ. ‘‘อารมฺมณมตฺตํ โหตี’’ติ อนิปฺผนฺนรูปํ สนฺธาย วุตฺตํ. ‘‘อารมฺมณ ปุเรชาตํ’’ติ นิปฺผนฺนรูปํ. อิตรํ ปน หทย วตฺถุรูปํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ปรจิตฺต วิชานนฏฺฐาเน อฏฺฐกถาฏีกาจริยานํ วิจารณา อตฺถีติ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เอตฺถ จ อฏฺฐกถายํ ตาวา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘อฏฺฐกถายํ’’ติ ธมฺมสงฺคณิ อฏฺฐกถายํปิ วิสุทฺธิมคฺค อฏฺฐกถายํปิ. ‘‘ขณิกวเสนา’’ติ ขณิกปจฺจุปฺปนฺนวเสน. อาวชฺชเน นิรุทฺเธติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เอกํ จิตฺตํ’’ติ ปรสฺส จิตฺตํ. ตเทว อตีตํ จิตฺตํ คณฺหนฺติ. ‘‘ตานี’’ติ ชวนานิ. ‘‘เตสํ’’ติ ชวนานํ. ‘‘เตนา’’ติ อาวชฺชเนน. ‘‘อิตรถา’’ติ อญฺญถา สนฺตติ อทฺธาวเสน วุตฺตนฺติ คหิเต สติ. วุตฺโต สิยา. กสฺมา, สนฺตติ อทฺธาวเสน ปจฺจุปฺปนฺเน คหิเต สติ, สพฺพาย เอกชวนวีถิยา เอกปจฺจุปฺปนฺนตฺตา. ‘‘สพฺพานิ จิตฺตานี’’ติ ชวนจิตฺตานิ. ‘‘สหุปฺปนฺนานี’’ติ อิทํ สหุปฺปนฺนานํปิ อตฺถิตาย วุตฺตํ. อาวชฺชนาทีนิ ปน ขณเภทํ นคณฺหนฺติ. สพฺพํ ปรสฺส จิตฺตํ เอกจิตฺตมิว คณฺหนฺติ. ตสฺมา กาลเภโทปิ นตฺถีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘นิพฺพานญฺจา’’ติ วุตฺตํ, กถํ นิพฺพานํ ปุพฺเพนิวุตฺถํ นาม สิยาติ. อตีเต ปรินิพฺพุตานํ มคฺคผลานิ อนุสฺสรณกาเล เตสํ อารมฺมณภูตํ นิพฺพานํปิ อนุสฺสรติเยว. ตตฺถ เตสํ มคฺคผลานํ อตีตตฺตา นิพฺพานํปิ ปุพฺเพนิวุตฺถํ นาม โหตีติ. “बुद्धधम्म... पे... गुणानां” यामध्ये 'गुण' हा शब्द पूर्वपदांशी जोडला पाहिजे, जसे की 'बुद्धगुणांचे आणि धम्मगुणांचे' इत्यादी. “तत्थ” (तेथे) म्हणजे त्या 'गुण' या पदात. जो तृप्त करत नाही तो 'अतपनीय' (तृप्ती न देणारा). तृप्ती किंवा संतोषाला उत्पन्न करत नाही असा याचा अर्थ आहे. जो संवेग (धार्मिक संवेग) उत्पन्न करतो तो 'संवेजनीय'. “धम्म” म्हणजे स्वभाव. ज्याचा स्वभाव संवेजनीय आहे तो 'संवेजनीय धम्म' होय, जसे की मरण (मृत्यू). “पंचमज्झानसमाधिस्स” (पाचव्या ध्यानाच्या समाधीचे) म्हणजे रूपावचर पाचव्या ध्यानाच्या समाधीचे. “उदयमत्तानि” म्हणजे केवळ वाढवलेले (विकसित केलेले). “तत्थ” (तेथे) म्हणजे प्रतिकूल आलंबनांमध्ये. “पुब्बच्छट्टकस्स” म्हणजे जुन्या विष्ठेचे (मलमूत्राचे). मलमूत्र विसर्जन करणाऱ्याचे, असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे: “विष्ठेचा ढीग पाहिल्याप्रमाणे”. ते कधीही सोमनस्याशिवाय (आनंदाशिवाय) अर्पणा (समाधी) प्राप्त करत नाहीत. व्यापाद (द्वेष), विहिंसा (हिंसा) आणि अरती (अरुची) दूर झाल्यामुळे सोमनस्याची उत्पत्ती अत्यंत सुलभ होते, म्हणून पाचव्या ध्यानाप्रमाणे सुख आणि सोमनस्याचा निरोध न झाल्यामुळे. “उदासीनपक्खे” म्हणजे उपेक्षा पक्षातील (तटस्थतेच्या बाजूने). “दळ्हं” म्हणजे दृढ (अतिशय). “विभूतं” म्हणजे स्पष्ट (प्रकट). निमित्ताला दृढ आणि स्पष्ट करून ग्रहण करणे म्हणजे 'दृढविभूतग्रहण' (दळ्हविभूतग्गहणं). “कस्सचि आरम्मणस्स” (कोणत्याही आलंबनाचे) म्हणजे बुद्धगुण इत्यादी आलंबनाचे. “प्रतिभागनिमित्त” (पटिभागनिमित्त) यामध्ये 'प्रतिभाग' हा शब्द त्याच्यासारख्या अर्थात वापरला जातो, म्हणून “त्याच्यासारखे” इत्यादी म्हटले आहे. “तंसंठाने” (त्याच्या आकाराचे) याद्वारे पृथ्वीमंडळ इत्यादींप्रमाणे आकाराच्या रूपाने राहिलेल्या स्वभावधर्मांच्या समूहातच त्याच्यासारखे 'प्रतिभागनिमित्त' सिद्ध होते, हे दर्शविले आहे. “एवं” (अशा प्रकारे) म्हणजे समथसंग्रहात दहा कसिण, दहा अशुभ इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या वचनाच्या क्रमाने. “उग्gहकोसल्लं” (ग्रहणकौशल्य) म्हणजे भावनाकर्म (ध्यान) सुरू करू इच्छिणाऱ्या भिक्खूने आचार्यांच्या जवळ संपूर्ण कम्मट्ठानाच्या (कर्मस्थानाच्या) विधीचे जे ग्रहण करणे, ते 'उग्gह' (ग्रहण) होय. त्यामधील कौशल्याला 'उग्gहकोसल्लं' म्हणतात. शिवाय, येथे सर्व काही ग्रहण करण्यास असमर्थ असलेल्या व्यक्तीने जे स्वतः सुरू करायचे आहे, त्या एकाच विधीचे परिपूर्ण ग्रहण केले पाहिजे. “उग्गण्हन्तस्स” (ग्रहण करणाऱ्याचे) यामध्ये 'उ' हा कार 'वर' (वरच्या बाजूला) या अर्थाने आहे. आणि “गहणं” (ग्रहण) म्हणजे जसे चित्तात नष्ट न होता प्राप्त होते, तसे करून चित्ताने ग्रहण करणे, हे दर्शवण्यासाठी “वरोवर” (उपरूपरि) इत्यादी म्हटले आहे. “समनुपस् सन्तस्स” म्हणजे डोळ्यांनी पाहिल्याप्रमाणे वारंवार चांगल्या प्रकारे पाहणाऱ्याचे. सर्व बाजूंनी पूर्णपणे करणे म्हणजे 'परिकम्म' (परिकर्म). त्या निमित्तग्रहणाच्या कार्यात जे जे कर्तव्य विधी आहेत, ते ते परिपूर्ण करून ग्रहण करणे, असे म्हटले आहे. 'भावना' म्हणजे वाढवणे (विकास करणे), हा अर्थ दर्शवण्यासाठी “वारंवार” इत्यादी म्हटले आहे. “निरन्तरं पदहन्तस्स” म्हणजे रात्रंदिवस निरंतर प्रयत्न करणाऱ्याचे. उग्gहनिमित्त (उद्ग्रह निमित्त) मध्ये आकाराचे ग्रहण करताना देखील वर्ण (रंग) आणि रूप इत्यादी स्वभावधर्मांसहच ग्रहण करतो. प्रतिभागनिमित्तामध्ये स्वभावधर्माला सोडून, त्याच्यासारखे 'निमित्तप्रज्ञप्ती' नावाचे केवळ शुद्ध आकाराचेच ग्रहण करतो. येथे शंका असू शकते की, प्रतिभागनिमित्तात देखील वर्ण (रंग) दिसतोच. हे सत्य आहे, परंतु तो केवळ प्रतिभाग (प्रतिबिंब) मात्र असतो, एकांततः (वास्तविक) वर्ण नसतो. म्हणूनच म्हटले आहे: “त्याच्यासारखी वस्तू, जी स्वभावधर्मापासून मुक्त आहे”. “सन्निसिन्नं” म्हणजे अचल (स्थिर). “पवेसितं” (प्रवेश केलेले) म्हणजे भावनाचित्ताच्या आत टाकल्यासारखे होते, असा अभिप्राय आहे. प्रकाशित होते म्हणून 'ओभास' (अवभास/प्रकाश). प्रकाश होऊन उत्पन्न झालेला तो 'ओभासजात'. किंवा प्रकाशणे म्हणजे 'ओभास'. ज्याला प्रकाश उत्पन्न झाला आहे तो 'ओभासजात'. “पातेन्ति” म्हणजे पाडतात (नष्ट करतात). पुन्हा उत्पन्न होण्याच्या रूपाने उठू देत नाहीत. “एताय” (याच्याद्वारे) हे कर्त्याच्या अर्थात करणविभक्तीचे रूप आहे. “निमित्तरक्खणविधानं” (निमित्त रक्षणाचा विधी) म्हणजे उत्पन्न झालेल्या निमित्ताचा नाश होऊ नये म्हणून सात प्रकारच्या पलिबोध (अडथळा आणणाऱ्या) धर्मांपासून रक्षण करण्यासाठी. ते सात प्रकारचे पलिबोध धर्म कोणते आहेत? येथे आम्हाला काही सांगण्याची गरज नाही. ते 'विसुद्धिमग्g' (विशुद्धिमार्ग) मध्येच सांगितले आहेत, हे दर्शवण्यासाठी गाथा म्हटली आहे. “आवासो” म्हणजे अहितकारक (असात्त्विक) निवासस्थान. “गोचरो” म्हणजे अहितकारक भिक्षाटन करण्याचा गाव. “भस्सं” म्हणजे अहितकारक संभाषण. याचप्रमाणे पुग्गल (व्यक्ती) इत्यादींच्या बाबतीत समजावे. “सेवेथ” म्हणजे सेवन करावे. “एवं हि पटिपज्जतो” म्हणजे अशा प्रकारे वर्ज्य गोष्टींचे वर्जन करून आणि सेवन करण्यायोग्य गोष्टींचे सेवन करून आचरण करणाऱ्याचे. “कामतण्हाच्या विषयभावाचे अतिक्रमण करून” याद्वारे कामभूमी आणि कामभवाचे अतिक्रमण, आणि रूपभूमी व रूपभवात प्रवेश करणे सांगितले आहे. वश असणे म्हणजे 'वशी'. शक्ती किंवा सामर्थ्य असा याचा अर्थ आहे. वश झालेल्या अवस्थेला प्राप्त होणे म्हणजे 'वशीभूत'. वशी म्हणजेच वशिता, जसे की पारमिता. “ततो विचारं” यामध्ये 'इति' शब्द 'इत्यादी' या अर्थात आहे. त्यामुळे “त्यानंतर प्रीती” इत्यादींचा संग्रह होतो. इच्छा करणाऱ्या त्या सर्वज्ञ बुद्धांचे. “यत्थ” (जिथे) म्हणजे ज्या दोन भवांगांमध्ये. “भवङ्गचारे” म्हणजे भवांगाच्या प्रवृत्तीमध्ये. “दन्धायितत्तं” म्हणजे मंद (हळूहळू) होऊन प्रवृत्त होणे ते 'दन्धायित' (मंदता). त्याचा भाव म्हणजे 'दन्धायितत्तं' (मंदत्व). “ठपेतुं” (ठेवण्यासाठी) म्हणजे अधिष्ठान करून ठेवण्यासाठी, त्याचे उल्लंघन न करण्यासाठी. “यत्थिच्छकं” इत्यादी क्रियाविशेषण पदे आहेत. “यत्थिच्छकं” म्हणजे ज्या ज्या ठिकाणी इच्छेनुसार. “यदिच्छकं” म्हणजे ज्या ज्या क्षणी इच्छेनुसार. “यावतिच्छकं” म्हणजे जितक्या प्रमाणात इच्छेनुसार. “वितर्क इत्यादी स्थूल अंगांचा त्याग करण्यासाठी” येथे कोणाच्या बलाने त्याग होतो? त्या त्या विराग भावनेच्या बलाने त्याग होतो. आणि ती ती विराग भावना कोणती असते? विशेष आशयाने (अध्यशयाने) ग्रहण केलेली उपचार भावनाच होय, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी “प्रथम ध्यान आधी” इत्यादी म्हटले आहे. “आतापवीरियं” (आताप वीर्य/प्रयत्न) म्हणजे ज्या वीर्याने (प्रयत्नाने) योगी स्वतःला किंवा क्लेशधर्मांना तप्त करतात (दहन करतात), त्याला 'आतापवीर्य' म्हणतात. उद्घाटित केले जाणारे देखील आकाशच असते. त्याला आरंभ करून वरच्या ध्यानाच्या उत्पत्तीसाठी भावना करणाऱ्याला देखील वारंवार तेच पाचवे ध्यान उत्पन्न होते. आणि आलंबनाचे अतिक्रमण न केल्यास ध्यानाचे देखील अतिक्रमण होत नाही. “तत्थ” (तेथे) म्हणजे त्या आकाशकसिणामध्ये. “तदतिक्रमनसंभवो” म्हणजे कसिण निमित्ताच्या अतिक्रमणाचा संभव. “यथादिट्ठे” म्हणजे ध्यानचक्षूने पाहिलेल्या प्रकारे. “संभावेत्वा” म्हणजे प्रशंसा करून. चांगल्या प्रकारे अनुस्मरण करणे म्हणजे 'समनुस्मरण' (समनुस्सरणं). “इतरेसम्पि वा” म्हणजे इतर पृथग्जन पंडितांचे देखील. मरणसंज्ञा व्यवस्थापनामध्ये परिकर्म देखील समाहित होते आणि उपचार देखील प्राप्त होतो, अशी योजना आहे. तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्या पृथग्जनांच्या बाबतीत देखील बुद्धगुण इत्यादींमध्ये उपचाराचा संभव अट्ठकथेत (अट्टकथेत) सांगितलाच आहे. “समथज्झानेसु” (शमथ ध्यानांमध्ये) हे अधिकाराच्या वशाने म्हटले आहे. विपश्यना कर्म देखील ग्रहण केले पाहिजे, असे समजले पाहिजे. पूर्वी दान देऊन “या पुण्याच्या प्रभावाने भविष्यात ध्यान-अभिज्ञा किंवा मार्गफळ प्राप्त होवो” अशी प्रार्थना करून आलेला देखील 'कृताधिकार' (ज्याने पूर्वपुण्य केले आहे असा) आहे, असेही म्हणतात. कृताधिकार म्हणजे नेमके काय? हे सांगण्यासाठी “आसन्नभवे” (जवळच्या जन्मात) इत्यादी म्हटले आहे. आठ प्रकारांमध्ये चतुष्कनयाच्या वशाने, आणि नऊ प्रकारांमध्ये पंचकनयाच्या वशाने सांगितले आहे, हे त्या वाद्यांचे साधक वचन आहे. परंतु विचार करूनच ग्रहण केले पाहिजे. आकाशकसिणाशिवाय अरूप ध्याने प्राप्त करून पुन्हा अभिज्ञेसाठी परिकर्म केल्यावर आकाशकसिणामध्ये देखील कर्तव्य असल्यामुळे, त्याची 'अभिज्ञापादकता' (अभिज्ञेचा पाया असणे) संभवते, असे अर्थाच्या संभवावरून म्हटले आहे. “पूर्वी भावना न केलेला” आणि “अकृताधिकार” (ज्याने पूर्वपुण्य केले नाही) हे अर्थाने एकच आहेत. “आदिकम्मिको” म्हणजे अभिज्ञाकर्मात नवशिका (प्रारंभ करणारा). “तादिसानं” (त्यांच्यासारख्यांच्या) म्हणजे ज्यांनी पूर्वी कृताधिकार केला नाही, भावना केली नाही, आणि जे आता “मी ऋद्धिविकुर्वाण (ऋद्धीचे चमत्कार) करीन” असा आरंभ करत आहेत, अशा अभिज्ञाकर्मातील आदिकर्मिक (प्रारंभिक) कुलपुत्रांचा, असा संबंध आहे. “ऋद्धिविकुर्वाण” (इद्धिविकुब्बणं) हा उपलक्षण शब्द आहे. “दिव्य श्रोत्रधातूने शब्द ऐकेन” इत्यादी देखील ग्रहण केले पाहिजे. आणि हे आदिकर्मिक विधीच्या अधिकाराने म्हटले आहे. अभिज्ञांमध्ये वशीलता प्राप्त झालेल्यांचे देखील ते पाचवे ध्यान सहा आलंबनांमध्ये योग्यतेनुसार अर्पित (स्थिर) होतेच. “अधिट्ठातब्बं” (अधिष्ठान करावे) म्हणजे इच्छित गोष्टीच्या सिद्धीसाठी “शंभर होवोत, हजार होवोत” इत्यादी प्रकारे चित्ताने अधिष्ठान करावे. 'अभिनिहार करावा' (प्रवृत्त करावे) असे म्हटले आहे. “मी शंभर होतो, मी हजार होतो” हे स्वतःला शंभर किंवा हजार रूपांत निर्माण करण्याच्या वशाने म्हटले आहे. उर्वरित सर्व इतर प्रकारे निर्माण करण्याच्या वशाने आहे. शब्द ऐकण्यासाठी, रूप पाहण्यासाठी, परचित्त (दुसऱ्याचे मन) जाणण्यासाठी, किंवा पूर्वनिवासाचे (पूर्वजन्मांचे) अनुस्मरण करण्यासाठी, असे अट्ठकथा पाठात आहे. “अधिट्ठाति” म्हणजे अभिज्ञेने अधिष्ठान करतो. अधिष्ठान करतो किंवा उत्पन्न करतो, असे म्हटले आहे. अधिष्ठान दोन प्रकारचे असते: परिकर्माने अधिष्ठान आणि अभिज्ञेने अधिष्ठान. परंतु येथे अभिज्ञेने अधिष्ठान सांगितले आहे. “अधिष्ठानचित्ताने” म्हणजे अभिज्ञाचित्ताने, असे म्हटले आहे. “परिकर्मचित्ताचे” म्हणजे पूर्वभागातील आवर्जन, परिकर्म आणि अधिष्ठान-परिकर्म चित्ताचे. परंतु नंतरचे पादकध्यान समापत्ती होय. परिकर्मचित्ताच्या समाधानासाठी (एकाग्रतेसाठी), असे म्हटले आहे. परिकर्मचित्त समाहित झाल्यावर काय प्रयोजन असते? हे सांगण्यासाठी “तथा हि” (तसेच) इत्यादी म्हटले आहे. “उर्वरित अभिज्ञांमध्ये देखील योग्यतेनुसार सांगितले पाहिजे” म्हणजे दिव्य श्रोत्राच्या परिकर्मामध्ये त्याच परिकर्म-समाधी-ज्ञान-श्रोत्राने जवळ असलेल्या दिव्य विषयातील शब्द देखील ऐकतो, इत्यादी प्रकारे सांगितले पाहिजे. “इति कत्वा” म्हणजे असे मनात आणून (मनसिकार करून). “तं” (त्याला) म्हणजे नंतरच्या पादकध्यान समापत्तीला. “येथे ग्रहण केले नाही असे समजावे” म्हणजे थेरांच्या (स्थविरांच्या) मतानुसार समजावे, असा अभिप्राय आहे. परंतु येथे आदिकर्मिक विधीच्या प्रधानतेमुळे नंतरची पादकध्यान समापत्ती देखील सांगितलीच पाहिजे. “कायगतिक अधिष्ठान करून” म्हणजे “जसा हा काय (शरीर) आहे, तसेच हे चित्त देखील मंद गतीने चालणारे होवो”, अशा प्रकारे चित्ताला कायगतिक करण्याच्या क्रियेने अधिष्ठान करून. “दिसणाऱ्या कायाने” म्हणजे मंद गतीने जात असल्यामुळे अनेक लोकांना दिसणाऱ्या रूपकायाने. याच्या उलट शीघ्र गतीने जाणे समजावे. “केवळ आलंबन असते” हे अनिष्पन्न रूपाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. “आलंबन पुरेजात” म्हणजे निष्पन्न रूप. परंतु दुसरे हृदयवस्तू रूपाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे, असे समजावे. परचित्त जाणण्याच्या बाबतीत अट्ठकथा आणि टीकाचार्यांचे विचार आहेत, हे दर्शवण्यासाठी “येथे आणि अट्ठकथेत आधी” इत्यादी म्हटले आहे. “अट्ठकथेत” म्हणजे धम्मसंगणि अट्ठकथेत देखील आणि विसुद्धिमग्g अट्ठकथेत देखील. “क्षणिकवशाने” म्हणजे क्षणिक वर्तमानकाळाच्या वशाने. आवर्जन निरुद्ध झाल्यावर, असा संबंध आहे. “एक चित्त” म्हणजे दुसऱ्याचे चित्त. तेच अतीत (भूतकाळातील) चित्त ग्रहण करतात. “तानि” म्हणजे जवने. “तेसं” म्हणजे जवनांचे. “तेन” म्हणजे आवर्जनाने. “इतरथा” म्हणजे संतती आणि काळाच्या (अद्धा) वशाने म्हटले आहे असे ग्रहण केले असता. का? कारण संतती आणि काळाच्या वशाने वर्तमानकाळ ग्रहण केला असता, संपूर्ण एका जवनवीथीमध्ये एकच वर्तमानकाळ असल्यामुळे. “सर्व चित्ते” म्हणजे जवन चित्ते. “सहोत्पन्न” (सहुप्पन्नानि) हे सहोत्पन्नांचे देखील अस्तित्व असल्यामुळे म्हटले आहे. परंतु आवर्जन इत्यादी क्षणभेद ग्रहण करत नाहीत. दुसऱ्याचे सर्व चित्त एका चित्ताप्रमाणेच ग्रहण करतात. म्हणून कालभेद देखील नाही, असे समजावे. “आणि निर्वाण देखील” असे म्हटले आहे, तर निर्वाण पूर्वनिवास (पूर्वजन्म) कसे असू शकते? भूतकाळात परिनिर्वाण प्राप्त झालेल्यांच्या मार्गफळांचे अनुस्मरण करताना, त्यांचे आलंबन असलेले निर्वाण देखील अनुस्मरण करतोच. तेथे त्या मार्गफळांच्या अतीतत्वामुळे (भूतकाळात असल्यामुळे) निर्वाण देखील 'पूर्वनिवास' या संज्ञेस पात्र ठरते. ‘‘ยํ ยํ อธิฏฺฐาตี’’ติ ยํ ยํ สตาทิกํ สํวิธาติ. ‘‘ยถา ยถา อธิฏฺฐาตี’’ติ เยน เยน อาวิภาวาทิเกน ปกาเรน สํวิธาติ. ‘‘ปกติวณฺณํ’’ติ ปกติสณฺฐานํ. ‘‘ตสฺเสวา’’ติ ปกติวณฺณสฺเสว. เทวานํ ปสาทโสตนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อารมฺมณ สมฺปฏิจฺฉน สมตฺถํ’’ติ อารมฺมณสฺส อุปฏฺฐานํ สมฺปฏิจฺฉน สมตฺถํ. ตเทว เจโตปริยญาณนฺติปิ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘เจโต’’ติ จิตฺตํ. ‘‘ปริจฺฉิชฺชา’’ติ อิทํ สราคจิตฺตํ, อิทํ วิราคจิตฺตนฺติอาทินา [Pg.286] ปริจฺฉินฺทิตฺวา. ‘‘โคจร นิวาสวเสนา’’ติ โคจรํ กตฺวา นิวสนวเสน. สพฺพญฺญุตญฺญาณคติกํ สพฺพญฺญุพุทฺธานํ อนาคตํ สญฺญาณนฺติ อธิปฺปาโย. อนาคเต สตฺตทิวสโต โอริมา จิตฺตเจตสิก ธมฺมา เจโตปริยญฺญาณสฺส วิสโยติ กตฺวา อนาคเต สตฺตทิวสโตติ วุตฺตํ. ปฏฺฐาย ปวตฺตมานาติ ปาฐเสโส. อิมสฺมึ ทิวเส จ อนาคตปกฺเข สพฺพํปิ อารมฺมณํ ปกติญาณสฺส วิสโยติ กตฺวา ‘‘ทุตียทิวสโต ปฏฺฐายา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘เอตํ’’ติ เอตํ อนาคตํ สญฺญาณํ. ‘‘ยถา เจตํ’’ติ ยถา จ เอตํ อิมสฺมึ ภเว อนาคต ธมฺเม ชานาติ. ‘‘อสาธารณกาลวเสนา’’ติ อญฺเญนญาเณน อสาธารณ กาลวเสน. ปจฺจุปฺปนฺนภโวหิ อญฺญญฺญาณสาธารโณติ. “ज्या ज्या गोष्टींचे अधिष्ठान करतात” (यं यं अधिट्ठाति) म्हणजे ज्या ज्या शंभर इत्यादी गोष्टींची व्यवस्था करतात. “ज्या ज्या प्रकारे अधिष्ठान करतात” (यथा यथा अधिट्ठाति) म्हणजे ज्या ज्या प्रकटीकरण इत्यादी प्रकारे व्यवस्था करतात. “नैसर्गिक वर्ण” (पकतिवण्णं) म्हणजे नैसर्गिक रूप (संस्थान). “त्याचेच” (तस्सेव) म्हणजे नैसर्गिक वर्णाचेच. ‘देवांचे प्रसन्न श्रोत्र’ असा संबंध आहे. “आलंबन ग्रहण करण्यास समर्थ” (आरम्मण सम्पटिच्छन समत्थं) म्हणजे आलंबनाचे उपस्थित होणे आणि ते ग्रहण करण्यास समर्थ असणे. त्यालाच ‘चेतोपरियञाण’ (परचित्तज्ञान) असेही म्हटले जाते, असा संबंध आहे. “चेतस्” (चेतो) म्हणजे चित्त. “परिच्छेद करून” (परिच्छिज्ज) म्हणजे ‘हे सराग चित्त आहे, हे वीतराग चित्त आहे’ इत्यादी प्रकारे विभागून. “गोचर निवासवशतेने” (गोचर निवासवसेन) म्हणजे गोचर करून निवास करण्याच्या वशतेने. सर्वज्ञताज्ञानाच्या कक्षेत येणारे सर्वज्ञ बुद्धांचे अनागत (भविष्यातील) संज्ञान, असा अभिप्राय आहे. भविष्यातील सात दिवसांच्या आतील चित्त आणि चैतसिक धर्म हे चेतोपरियज्ञानाचे विषय आहेत, म्हणून ‘भविष्यातील सात दिवसांपासून’ असे म्हटले आहे. ‘तेथून सुरू होऊन प्रवृत्त होणारे’ हा पाठाचा उर्वरित भाग आहे. या दिवशी आणि भविष्यकाळात सर्वच आलंबन हे प्रकृतीज्ञानाचा विषय आहे, म्हणून “दुसऱ्या दिवसापासून सुरू करून” असे म्हटले आहे. “हे” (एतं) म्हणजे हे अनागत संज्ञान. “आणि जसे हे” (यथा चेतं) म्हणजे जसे हे या भवात अनागत धर्मांना जाणते. “असाधारण कालवशतेने” (असाधारणकालवसेन) म्हणजे इतर ज्ञानाशी असाधारण अशा काळाच्या वशतेने. कारण वर्तमान भव हा इतर ज्ञानांशी साधारण असतो। สมถกมฺมฏฺฐานานุทีปนา นิฏฺฐิตา. समथकम्मट्ठान-स्पष्टीकरण समाप्त झाले। ๑๗๑. วิปสฺสนากมฺมฏฺฐาเน. ‘‘ยถาทิฏฺฐํ’’ติ สกฺกายทิฏฺฐิยา ยถาทิฏฺฐํ. นิจฺจนิมิตฺตํ นาม สตฺตปุคฺคลาทินิมิตฺตเมว. สตฺตนิมิตฺตญฺหิ ปญฺญตฺติ ธมฺมตฺตา ขเณขเณ ขยวยเภทาภาวโต โส เอวคจฺฉติ โส เอว ติฏฺฐตีติอาทินา นิจฺจาการสณฺฐิตํ โหตีติ. ‘‘ธุวนิมิตฺตํ’’ติ ถิรนิมิตฺตํ. อิทมฺปิ โส คจฺฉนฺโตปิ นนสฺสติ, ติฏฺฐนฺโตปิ นนสฺสตีติอาทินา ถิราการสณฺฐิตํ สตฺตนิมิตฺตเมว. ‘‘สุขนิมิตฺตํ’’ติ ขเณขเณ ขยวยเภท ทุกฺขานํ อภาวโต สุขิโต นิทฺทุกฺโข นิพฺภโยติอาทินา สุขาการสณฺฐิตํ สตฺตนิมิตฺตเมว. ‘‘อตฺตนิมิตฺตํ’’ติ คนฺตุํ อิจฺฉนฺโต คจฺฉติ, ฐาตุํ อิจฺฉนฺโต ติฏฺฐตีติอาทินา วสวตฺตนาการ สณฺฐิตํ สตฺตนิมิตฺตเมว. ‘‘กิริยา’’ติ ภาวนากิริยา. १७१. विपस्सना कम्मट्ठानामध्ये (विपश्यना कर्मस्थानात). “जसे पाहिले आहे” (यथादिट्ठं) म्हणजे सक्कायदिट्ठीने (सत्कायदृष्टीने) जसे पाहिले आहे ते. ‘नित्य निमित्त’ म्हणजे सत्त्व (प्राणी), पुद्गल इत्यादींचे निमित्तच होय. कारण सत्त्व-निमित्त हे प्रज्ञप्ति धर्म असल्यामुळे, क्षणाक्षणाला होणारा क्षय, व्यय आणि भेद यांच्या अभावामुळे ‘तोच जातो, तोच थांबतो’ इत्यादी प्रकारे नित्य आकाराने स्थित असते. “ध्रुव निमित्त” (धुवनिमित्तं) म्हणजे स्थिर निमित्त. हे देखील ‘तो जात असतानाही नष्ट होत नाही, थांबत असतानाही नष्ट होत नाही’ इत्यादी प्रकारे स्थिर आकाराने स्थित असणारे सत्त्व-निमित्तच होय. “सुख निमित्त” (सुखनिमित्तं) म्हणजे क्षणाक्षणाला होणारा क्षय, व्यय आणि भेद या दुःखांच्या अभावामुळे ‘सुखी, दुःखविरहित, भयमुक्त’ इत्यादी प्रकारे सुखाच्या आकाराने स्थित असणारे सत्त्व-निमित्तच होय. “आत्म निमित्त” (अत्तनिमित्तं) म्हणजे ‘जाण्याची इच्छा करणारा जातो, थांबण्याची इच्छा करणारा थांबतो’ इत्यादी प्रकारे वशतेने चालणाऱ्या आकाराने स्थित असणारे सत्त्व-निमित्तच होय. “क्रिया” (किरिया) म्हणजे भावना-क्रिया। วิสุชฺฌตีติ วิสุทฺธิ. วิโสเธตีติ วา วิสุทฺธิ. สีลเมว วิสุทฺธิ สีลวิสุทฺธีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘นิจฺจสีลเมวา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ นิจฺจสีลเมว อุปริฌานาทิวิเสสานํ อธิฏฺฐาน กิจฺจสาธกตฺตา อิธ อธิปฺเปตนฺติ วุตฺตํ ‘‘นิจฺจสีลเมวา’’ติ. สมาธิ อธิปฺเปโต[Pg.287]. วกฺขติหิ ‘‘ทุวิโธปิ สมาธิ จิตฺตวิสุทฺธิ นามา’’ติ. เอเตน วิสุชฺฌติ เอตายาติ วิสุทฺธิ. จิตฺตสฺส วิสุทฺธิ จิตฺตวิสุทฺธิ. สมาธิ เอวาติปิ ทีเปติ. วิสุชฺฌนํ วา วิสุทฺธิ. จิตฺตสฺส วิสุทฺธิ จิตฺตวิสุทฺธิ. อตฺถโตปน วิสุทฺธจิตฺตเมว วุจฺจตีติปิ ยุชฺชติ. วิสุทฺธิสทฺท สมฺปนฺเน หิ สติ, จิตฺตวิสุทฺธิ อิจฺเจว วุจฺจติ. น สมาธิวิสุทฺธีติ. ‘‘โสฬสวิธํ กงฺขํ’’ติ อโหสึ นุ โข อห มตีตมทฺธานนฺติอาทินา สุตฺตนฺเตอาคตํ โสฬสวิธํ วิจิกิจฺฉํ. ‘‘อฏฺฐวิธํ วา กงฺขํ’’ติ สตฺถริกงฺขตีติอาทินา อภิธมฺเม อาคตํ อฏฺฐวิธํ วิจิกิจฺฉํ. วิสมเหตุทิฏฺฐิ นาม สตฺตานํ อุปฺปตฺติยา อการณเมว การณํ กตฺวา คหณทิฏฺฐิ. ‘‘มนสิการวิธี’’ติ อนิจฺจลกฺขณาทีสุ มนสิการวิธิ. อนุปายภูโต มนสิกาโร นาม นิจฺจาทิวเสน มนสิกาโร. อธิมานวตฺถุ นาม โอภาสาทีนิ. ‘‘มคฺคโต’’ติ มคฺคภาเวน. ‘‘อมคฺคโต’’ติ อมคฺคภาเวน. ‘‘ทสฺสนญฺจา’’ติ เตสํอธิมานวตฺถูนํ อนิจฺจตาทิทสฺสนญฺจ. ตเมว วิสุทฺธินามาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘สมฺโมหมลโต’’ติ จตุสจฺจปฺปฏิจฺฉาทก สมฺโมหมลโต. นนุ ทสฺสนนฺติ ญาณเมว. เอวํสติ, ญาณนฺติ วุตฺเต สิทฺเธ กตฺวา ทสฺสนสทฺเทน สห ญาณทสฺสนนฺติ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘เอตฺถจา’’ติอาทึ. ‘‘สุตมยาทิวเสนา’’ติ สุตมย จินฺตามยวเสน. ตตฺถ ยถาสุตสฺส ปาฬิธมฺมสฺส อตฺถมตฺตชานนํ สุตมยญฺญาณํ นาม. อตฺถํ ญตฺวา อตฺถานุรูปสฺส สภาวลกฺขณสฺส จินฺตนาวเสน อุปฺปนฺนํ ญาณํ จินฺตามยญฺญาณํ นาม. ‘‘อนุมานาทิญาณํปี’’ติ นามรูป ธมฺเมสุ สภาวานุมานญฺญาณ สภาวชานนญฺญาณํปิ. ‘‘อตฺตปจฺจกฺขญฺญาณเมวา’’ติ อตฺตนา ปจฺจกฺขกรณญฺญาณเมว. ‘‘สพฺพตฺถา’’ติ มคฺคามคฺคญฺญาณทสฺสนาทีสุ สพฺเพสุ ฐาเนสุ. เอตฺถ จ ทสสุ วิปสฺสนาญาเณสุปิ วิปสฺสนา วจเนน ปจฺจกฺขทสฺสนเมว อธิปฺเปตนฺติ กตฺวา สพฺพตฺถคฺคหณํ กตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. สมฺมสนญฺญาณโต ปฏฺฐาย หิ ทสฺสนเมว อธิปฺเปตํ. น สภาวชานนมตฺตํ. ยโต จกฺขุนา ปสฺสนฺตสฺเสว สุฏฺฐุ ปจฺจกฺขโต ทสฺสนตฺถาย ปุนปฺปุนํ ภาวนา กมฺมํ นาม ตตฺถ อิจฺฉิตพฺพํ โหติ. ज्याच्याद्वारे शुद्ध होते ती 'विशुद्धी' (शुद्धता). किंवा जे शुद्ध करते ती 'विशुद्धी'. 'शीलच विशुद्धी आहे ती शीलविशुद्धी' हा अर्थ दर्शवताना “नित्य शीलच” (निच्चसीलमेव) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, नित्य शीलच वरील ध्यान इत्यादी विशेषांच्या अधिष्ठान कार्याचे साधक असल्यामुळे येथे अभिप्रेत आहे, म्हणून “नित्य शीलच” असे म्हटले आहे. समाधी अभिप्रेत आहे. कारण पुढे सांगतील की, “दोन्ही प्रकारची समाधी ही चित्तविशुद्धी आहे.” याच्याद्वारे शुद्ध होते किंवा हिच्याद्वारे शुद्ध होते ती विशुद्धी. चित्ताची विशुद्धी ती चित्तविशुद्धी. ती समाधीच आहे, असेही दर्शवते. किंवा शुद्ध होणे म्हणजे विशुद्धी. चित्ताची विशुद्धी ती चित्तविशुद्धी. अर्थाच्या दृष्टीने तर 'विशुद्ध चित्त'च म्हटले जाते, हेही योग्य आहे. कारण 'विशुद्धी' शब्द संपन्न असताना 'चित्तविशुद्धी' असेच म्हटले जाते, 'समाधिविशुद्धी' असे नाही. “सोळा प्रकारची शंका” (सोळसविधं कङ्खं) म्हणजे 'मी भूतकाळात होतो काय?' इत्यादी प्रकारे सूत्रांमध्ये आलेली सोळा प्रकारची विचिकित्सा (शंका). “किंवा आठ प्रकारची शंका” (अट्ठविधं वा कङ्खं) म्हणजे 'शास्त्याविषयी शंका घेतो' इत्यादी प्रकारे अभिधम्मात आलेली आठ प्रकारची विचिकित्सा. 'विषमहेतुदृष्टी' म्हणजे प्राण्यांच्या उत्पत्तीसाठी जे कारण नाही त्यालाच कारण मानून ग्रहण केलेली दृष्टी. “मनसिकार विधी” (मनसिकारविधी) म्हणजे अनित्य लक्षण इत्यादींवर मनसिकार करण्याची पद्धत. 'अनुपायभूत मनसिकार' म्हणजे नित्य इत्यादी रूपाने केलेला मनसिकार. 'अधिमानवस्तू' म्हणजे ओभास (प्रकाश) इत्यादी. “मार्ग म्हणून” (मग्गतो) म्हणजे मार्गभावाने. “अमार्ग म्हणून” (अमग्गतो) म्हणजे अमार्गभावाने. “आणि दर्शन” (दस्सनञ्च) म्हणजे त्या अधिमानवस्तूंचे अनित्यता इत्यादी दर्शन. त्यालाच 'विशुद्धी' असे नाव आहे, असा संबंध आहे. “संमोह मलापासून” (सम्मोहमलतो) म्हणजे चार आर्यसत्यांना झाकणाऱ्या संमोह रूपी मलापासून. शंका: दर्शन म्हणजे ज्ञानच आहे ना? असे असताना, 'ज्ञान' असे म्हटले असता सिद्ध होत असूनही दर्शन शब्दासह 'ज्ञानदर्शन' असे का म्हटले आहे? यावर “येथे च” (एत्थ च) इत्यादी म्हटले आहे. “श्रुतमय इत्यादी वशतेने” (सुतमयादिवसेन) म्हणजे श्रुतमय आणि चिंतामय वशतेने. त्यामध्ये, जसा ऐकला आहे तशा पाळिधम्माचा केवळ अर्थ जाणून घेणे म्हणजे 'श्रुतमय ज्ञान' होय. अर्थ जाणून घेऊन, अर्थाला अनुरूप अशा स्वभाव-लक्षणाचा विचार करण्याच्या वशतेने उत्पन्न झालेले ज्ञान म्हणजे 'चिंतामय ज्ञान' होय. “अनुमान इत्यादी ज्ञान देखील” (अनुमानादिञाणंपी) म्हणजे नाम-रूप धर्मांमध्ये स्वभावाचे अनुमान करणारे ज्ञान आणि स्वभाव जाणणारे ज्ञान देखील. “स्वतःचे प्रत्यक्ष ज्ञानच” (अत्तपच्चक्खञाणमेव) म्हणजे स्वतः प्रत्यक्ष करण्याचे ज्ञानच. “सर्व ठिकाणी” (सब्बत्था) म्हणजे मार्गामार्गज्ञानदर्शन इत्यादी सर्व स्थानांमध्ये. आणि येथे दहा विपश्यना ज्ञानांमध्ये देखील 'विपश्यना' या शब्दाने प्रत्यक्ष दर्शनच अभिप्रेत आहे, असे मानून 'सर्व ठिकाणी' असे ग्रहण केले आहे, असे समजावे. सम्मसनज्ञानापासून सुरू करून दर्शनच अभिप्रेत आहे. केवळ स्वभावाचे जाणून घेणे नाही. कारण डोळ्यांनी पाहणाऱ्याप्रमाणेच चांगल्या प्रकारे प्रत्यक्ष पाहण्यासाठी वारंवार भावना-कर्म करणे तेथे अपेक्षित असते। ‘‘ธมฺมา’’ติ [Pg.288] สงฺขต ธมฺมา. อนิจฺจตา เอว ลกฺขณนฺติ อนิจฺจลกฺขณํ. อนิจฺจานํ วา สงฺขต ธมฺมานํ ลกฺขณนฺติ อนิจฺจลกฺขณนฺติปิ ยุชฺชติ. ‘‘อภิณฺหสมฺปฏิปฺปีฬนากาโร’’ติ ยถา สีฆโสตายํ นทิยํ นาวาย อุทฺธํ คจฺฉนฺตํ สานาวา อภิสงฺขรณทุกฺเขน อภิณฺหํ สุฏฺฐุ ปฏิปฺปีเฬติ. กสฺมา, อสติ อภิสงฺขาเร ตงฺขเณ เอว อโธวุยฺหนโต. อโธวุยฺหนญฺหิ นาวาย ปกติ กิจฺจํ. อุทฺธํ อารูหนํ อภิสงฺขาร สิทฺธํ. เอวเมวํ สีฆโสเต สํสาเร อตฺตภาเวน อุทฺธํ ขณโต ขณํ ทิวสโต ทิวสํ คจฺฉนฺตํ ปุคฺคลํ อยํ อตฺตภาโว อภิสงฺขรณ ทุกฺเขน อภิณฺหํ สุฏฺฐุ ปฏิปฺปีเฬติ. กสฺมา, อสติ อภิสงฺขาเร, ปจฺจยเวกลฺเล จ สติ, ตงฺขเณ เอว วิปริณมนโต. วิปริณมนญฺหิ อตฺตภาวสฺส ปกติ กิจฺจํ. อุทฺธํคมนํ อภิสงฺขาร สิทฺธํ. เอวํ อภิณฺห สมฺปฏิปฺปีฬนํ เวทิตพฺพํ. เอตฺถ จ สํสารสฺส สีฆโสตตา นาม อตฺตภาวปริยาปนฺนานํ นาม รูปธมฺมานํ ปวตฺตินิวตฺติ สีฆตา วุจฺจติ. เอตฺถ จ มรณํ ทุวิธํ สมฺมุติ มรณญฺจ ปรมตฺถ มรณญฺจ. ตตฺถ สมฺมุติ มรณํ นาม สมฺมุติ สจฺจภูตสฺส สตฺตสฺส มรณํ. ตํ เอกภวปริยนฺเต สนฺทิสฺสติ. ปรมตฺถ มรณํ นาม ปรมตฺถ สจฺจภูตานํ นามรูป ธมฺมานํ มรณํ. อิทเมว เอกนฺตมรณํ, สจฺจมรณํ, สภาวมรณํ โหติ. อิมสฺมึ วิปสฺสนา กมฺเม อิทํ ปรมตฺถ มรณํ เอว อนิจฺจตาติ จ วุจฺจติ. ธมฺมานํ สุสานกฺเขตฺตนฺติ จ สุสานภูมีติ จ วุจฺจตีติ. สา จ สุสานภูมินาม สตฺตานํ ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย สนฺตานํ อนุพนฺธติเยว. อนุพนฺธตฺตา จ สตฺตานํ ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย โส นาม สมโย นตฺถิ, ยตฺถ สตฺตา น มรนฺตีติ. อิทญฺจ อนุพนฺธนํ สตฺตานํ อภิณฺหสมฺปฏิปฺปีฬนเมว โหติ. เตสํ สพฺพิริยาปเถสุ ชีวิตสฺส จ องฺคปจฺจงฺคานญฺจ กายวจีมโน กมฺมานญฺจ สมฺพาธปตฺติโต. อวสวตฺตนากาโร ปน อภิสงฺขาร ทุกฺขํ อภิณฺหํ ปจฺจนุภวนฺตานํ ปากโฏเยว. วสวตฺตเนหิ สติ, อภิสงฺขรณ กิจฺจสฺส โอกาโส นตฺถิ. วสวตฺตเนเนว ยถิจฺฉิ ตสฺส กิจฺจสฺส สมฺปชฺชนโต. โลกสฺมิญฺหิ สพฺพํปิ อภิสงฺขาร กิจฺจํ นาม อนฺตมโส อสฺสาสนปสฺสาสน กิจฺจํ อุปาทาย ธมฺมานํ วสวตฺตนาภาวโต กโรนฺตีติ. “धम्मा” म्हणजे संखत (संस्कारित) धम्म. अनित्यता हेच लक्षण म्हणजे 'अनित्यलक्षण'. किंवा अनित्य अशा संखत धम्मांचे लक्षण म्हणजे 'अनित्यलक्षण' असेही म्हणणे योग्य ठरते. “सतत अत्यंत पीडित होण्याचा आकार” (अभिण्हसंपटिपीडनाकार) म्हणजे जसे वेगवान प्रवाह असलेल्या नदीत नावेने वरच्या दिशेने जाताना, ती नाव अभिसंस्करण-दुःखाने (प्रयत्नांच्या कष्टाने) सतत आणि चांगल्या प्रकारे पीडित होते (दाबली जाते). का? कारण अभिसंस्करण (प्रयत्न) नसताना त्याच क्षणी ती खाली वाहून जाते. खाली वाहून जाणे हेच नावेचे नैसर्गिक कार्य आहे. वर चढणे हे अभिसंस्करणाने (प्रयत्नाने) सिद्ध होते. अशाच प्रकारे, वेगवान प्रवाह असलेल्या संसारात आत्मभावाने (अत्तभावाने) क्षणाक्षणाला आणि दिवसागणिक वर (पुढे) जाणाऱ्या पुद्गलाला (व्यक्तीला) हा आत्मभाव अभिसंस्करण-दुःखाने सतत अत्यंत पीडित करतो. का? कारण अभिसंस्करण नसताना आणि प्रत्ययांची (कारणांची) विकलता (कमतरता) असताना, त्याच क्षणी विपरिणाम (बदल/विनाश) होतो. विपरिणाम हाच आत्मभावाचा नैसर्गिक स्वभाव आहे. वर जाणे हे अभिसंस्करणाने सिद्ध होते. अशा प्रकारे सततचे अत्यंत पीडन समजून घ्यावे. आणि येथे संसाराचा वेगवान प्रवाह म्हणजे आत्मभावात समाविष्ट असलेल्या नाम-रूप धम्मांच्या प्रवृत्ती आणि निवृत्तीची (उत्पत्ती आणि विनाशाची) शीघ्रता (वेग) म्हटली जाते. आणि येथे मरण दोन प्रकारचे आहे: संमूर्ती मरण (व्यावहारिक मृत्यू) आणि परमार्थ मरण. त्यापैकी संमूर्ती मरण म्हणजे संमूर्ती-सत्य (व्यावहारिक सत्य) असलेल्या सत्वाचा (प्राण्याचा) मृत्यू. ते एका भवाच्या (जन्माच्या) शेवटी दिसून येते. परमार्थ मरण म्हणजे परमार्थ-सत्य असलेल्या नाम-रूप धम्मांचा मृत्यू (क्षणोक्षणी होणारा विनाश). हेच एकांत-मरण (अंतिम मरण), सत्य-मरण आणि स्वभाव-मरण आहे. या विपश्यना कर्मामध्ये (साधनेत) याच परमार्थ मरणाला 'अनित्यता' असे म्हटले जाते. आणि याला 'धम्मांचे स्मशानक्षेत्र' किंवा 'स्मशानभूमी' असेही म्हटले जाते. आणि ती स्मशानभूमी म्हणजे प्राण्यांच्या प्रतिसंधीपासून (जन्मापासून) त्यांच्या संततीचा (प्रवाहाचा) पाठलागच करते. आणि पाठलाग करत असल्यामुळे, प्राण्यांच्या प्रतिसंधीपासून असा कोणताही वेळ (क्षण) नाही, जिथे प्राणी मरत नाहीत. आणि हा पाठलाग प्राण्यांचे सततचे अत्यंत पीडनच आहे. कारण त्यांच्या सर्व इरियापथांमध्ये (अवस्थांमध्ये), जीवनाचे, अंग-प्रत्यंगांचे आणि काय-वाचा-मनाच्या कर्मांचे संबाधपण (संकुचितपण/पीडा) प्राप्त होते. वश न होण्याचा आकार (अवशवर्तन-आकार - नियंत्रण नसणे) तर अभिसंस्करण-दुःखाचा सतत अनुभव घेणाऱ्यांना स्पष्टच आहे. जर वश असणे (नियंत्रण असणे) असते, तर अभिसंस्करण कार्याला वाव नसता. कारण वश असण्यानेच इच्छेनुसार ते कार्य संपन्न झाले असते. कारण जगात सर्वच अभिसंस्करण कार्य, अगदी श्वास घेणे आणि सोडण्याच्या (आश्वास-प्रश्वास) कार्यापासून घेऊन, धम्मांवर नियंत्रण नसल्यामुळेच (वशवर्तनाचा अभाव असल्यामुळेच) लोक करतात। อนิจฺจสฺส [Pg.289] ธมฺมสฺส อนุอนุปสฺสนาติ สมฺพนฺโธ. ‘‘อนุอนุปสฺสนา’’ติ จ ญาณจกฺขุนา ปุนปฺปุนํ นิชฺฌายนา โอโลกนา. ‘‘ธมฺมานํ’’ติ ปญฺจกฺขนฺธ ธมฺมานํ. ‘‘ยตฺถ ยตฺถา’’ติ ยสฺมึ ยสฺมึ สรีรงฺเค. ‘‘ปุราณ ธมฺมานํ’’ติ ปุราณานํ ปาตุพฺภูตานํ, วฑฺฒิตานญฺจ ธมฺมโกฏฺฐาสานํ อนฺตรธานํ วโย วุจฺจติ. วิปสฺสนา กมฺมํ ปตฺวา ขณิกวเสน เอเกกธมฺมวิภาควเสน จ อนุปสฺสนา กิจฺจํ นตฺถีติ อาห ‘‘สมูห สนฺตติวเสน ปนา’’ติ. เอเกกธมฺมวิภาควเสน อนุปสฺสนาปิ ปน ปกติยา สุปากเฏสุ จิตฺตเวทนาทีสุ อิจฺฉิตพฺพาเยว. ‘‘อนิจฺจตาย ปรมาโกฏี’’ติ ตโต อุตฺตริ อนิจฺจตา นาม นตฺถีติ อธิปฺปาโย. ธมฺมานํ ตถา ตถา ภายิตพฺพปฺปกาโร นาม ปญฺจกฺขนฺเธ ‘อนิจฺจโต, ทุกฺขโต, โรคโต, คณฺฑโต, สลฺลโต, อฆโต, อาพาธโต, ติอาทินา วุตฺโต ภายิตพฺพปฺปกาโร. ตสฺส สมนุปสฺสนาญาณํ ภยญาณํ. เอเตน อปายทุกฺข สํสาร ทุกฺขภีรุเกหิ ชเนหิ ภายิตพฺพนฺติ ภยํ. เต วา ภายนฺติ เอตสฺมาติ ภยํ. ภยสฺส สมนุ ปสฺสนาญาณํ ภยญาณนฺติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ. ‘‘กิญฺจิภยวตฺถุํ’’ติ สีหพฺยคฺฆาทิกํ ภยวตฺถุํ. ‘‘ปฏิสฺสรเณ’’ติ คุหาเลณาทิเก ปฏิสฺสรเณ. ‘‘เตสํ’’ติ ภิชฺชนสภาวานํ ธมฺมานํ. ‘‘เตหี’’ติ ภิชฺชนสภาเวหิ. อุกฺกณฺฐตา นาม จิตฺตสฺส วิรุทฺธตา นิกฺขมาภิมุขตา. ‘‘จตฺตาลีสาย อากาเรหี’’ติ ปญฺจกฺขนฺเธ ‘อนิจฺจโต, ทุกฺขโต, โรคโต, คณฺฑโต, สลฺลโต, อฆโต, อาพาธโต, ปรโต, ปโลกโต, อีติโต,. อุปทฺทวโต, ภยโต, อุปสคฺคโต, จลโต, ปภงฺคุโต, อทฺธุวโต, อตาณโต, อเลณโต, อสฺสรณโต, ริตฺตโต,. ตุจฺฉโต, สุญฺญโต, อนตฺตโต, อาทีนวโต, วิปริณาม ธมฺมโต, อสารกโต, อฆมูลโต, วธกโต, วิภวโต, สาสวโต,. สงฺขตโต, มารามิสโต, ชาติธมฺมโต, ชราธมฺมโต, พฺยาธิธมฺมโต, มรณธมฺมโต, โสกปริเทวธมฺมโต, ทุกฺขโทมนสฺส ธมฺมโต, อุปายาส ธมฺมโต, สํกิเลสิก ธมฺมโต, ปสฺสนฺโต สุญฺญโต โลกํ อเวกฺขตีติ เอวํ มหานิทฺเทเส [Pg.290] โมฆปญฺหนิทฺเทเส อาคเตหิ จตฺตาลีสาย อากาเรหิ. ตตฺถ ปญฺจกฺขนฺเธ อนิจฺจโต ปสฺสนฺโตติอาทินา โยเชตพฺพํ. ‘‘อนิจฺจโต’’ติ จ อนิจฺจภาเวนาติ อตฺโถ. สพฺเพปิ ปญฺจกฺขนฺธา อนิจฺจา เอวาติ ปสฺสนฺโตติ วุตฺตํ โหติ. กถํ ปน อนิจฺจโต ปสฺสนฺโต สุญฺญโต โลกํ อเวกฺขตีติ. นิจฺจคุณ สุญฺญตาย สุญฺญโต ปญฺจกฺขนฺธภูตํ โลกํ อเวกฺขติ. เสสปเทสุปิ เอเสวนโย. ตตฺถ ‘‘อนิจฺจา เอวา’’ติ ปฏิสนฺธิกฺขณโต ปฏฺฐาย ยทากทาจิ มรณ ธมฺมตฺตา อนิจฺจา เอว. ‘‘ทุกฺขา เอวา’’ติ อนิจฺจ ธมฺมตฺตาเยว ทุกฺขา เอว. ยทนิจฺจํ, ตํ ทุกฺขํติหิ วุตฺตํ. ทุกฺข สจฺจธมฺมตฺตา วา. ‘‘โรคา เอวา’’ติ โรคชาติกตฺตา โรคา เอว. เยหิ เกจิ โลเก จกฺขุ โรคาทิกา อเนกสหสฺสา โรคา นาม สนฺทิสฺสนฺติ. สพฺเพเต อิเมปญฺจกฺขนฺธา เอว. อิโต อญฺโญโกจิ โรโค นาม นตฺถิ. ตสฺมา เต เอกนฺเตน โรคชาติกา เอวาติ. อปิ จ, ทุกฺขสจฺจ ธมฺมตฺตาตีหิ ทุกฺขตาหิ จตูหิ ทุกฺขฏฺเฐหิ จ อภิณฺหสมฺปฏิปฺปีฬนโต รุชฺชนฏฺเฐน โรคา เอว. ตตฺถ ‘‘ตีหิ ทุกฺขตาหี’’ติ ทุกฺขทุกฺขตา สงฺขาร ทุกฺขตา วิปริณาม ทุกฺขตาติ อิมาหิ ตีหิทุกฺขตาหิ. ‘‘จตูหิ ทุกฺขฏฺเฐหี’’ติ ทุกฺขสฺส ปีฬนฏฺโฐ, สงฺขตฏฺโฐ, สนฺตาปฏฺโฐ, วิปริณามฏฺโฐ,ติ อิเมหิ จตูหิ ทุกฺขฏฺเฐหิ. ทุกฺข กิจฺเจหีติ อตฺโถ. เอสนโย คณฺฑาทีสุ. ตตฺถ คณฺโฑนาม ปีฬกาพาโธ. สลฺลํ นาม วิชฺฌนฏฺเฐน กิเลส สลฺลญฺจ ทุกฺขสลฺลญฺจ. อฆนฺติ นิรตฺถกํ. อิเม จ ขนฺธา วิปตฺติปริโยสานตฺตา นิรตฺถกา เอว โหนฺติ. สพฺพาสมฺปตฺติโย วิปตฺติปริโยสานาติ หิ วุตฺตํ. อวิสฺสาสิกฏฺเฐน ปเร เอว. น หิ เต เอตํ มม, เอโส หมสฺมิ, เอโส เม อตฺตาติ เอวํ วิสฺสาสํ อรหนฺติ. ตถา วิสฺสาสํ กโรนฺตสฺส นานาทุกฺเขหิ นิจฺจํ วิหึสนโต. ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย ยทากทาจิ ปลุชฺชนธมฺมตฺตา ปโลกธมฺมา เอว. ‘‘อีตี’’ติ อนฺตราโย วุจฺจติ. ขนฺธา อนฺตราย ชาติกา เอวาติ วุตฺตํ โหติ. อชฺฌตฺตภาวํ อุปคนฺตฺวา ทุตตฺตา วิพาธกตฺตา อุปทฺทวา เอว. ภายิตพฺพตฺตา ภยา เอว. อนตฺตา เอว สมานา อชฺฌตฺตภาวํ อุปคนฺตฺวา สชฺชนโต ลคฺคนโต ทุมฺโม จยโต [Pg.291] อุปสคฺคา เอว. นิจฺจกาลํ โลกธมฺเมหิ จลนตฺตา วิปฺผนฺทนตฺตา จลาเอว. นานปฺปกาเรน ภญฺชนธมฺมตฺตา ปภงฺคุโน เอว. ขณมตฺตมฺปิ อถิรตฺตา อทฺธุวา เอว. ชรามรณาทิโต อปายวินิปตนาทิโต ภยโต ตายติ รกฺขตีติ ตาณํ. เต จ ขนฺธา กสฺสจิตาณา น โหนฺติ. เตสญฺจ กิญฺจิตาณํ นาม นตฺถิ. ตสฺมา อตาณา เอว. ภยโต ภีรุกา ชนา ลียนฺติ นิลียนฺติ เอตฺถาติ เลณํ. เต จ กสฺสจิเลณา น โหนฺติ. เตสญฺจ กิญฺจิเลณํ นาม นตฺถิ. ตสฺมา อเลณา เอว. ภยํ สรติหึสตีติ สรณํ. เต จ กสฺสจิสรณํ น โหนฺติ. เตสญฺจ กิญฺจิสรณํ นาม นตฺถิ. ตสฺมา อสฺสรณา เอว. นิจฺจตาทีหิ สพฺเพหิ โสภณคุเณหิ สพฺพโส รหิตตฺตา ตุจฺฉตฺตา สุญฺญตฺตาริตฺตา เอว. ตุจฺฉา เอว. สุญฺญา เอว. อตฺตา วุจฺจติ ยสฺสกสฺสจิ โกจิ สารภูโต ปฏิสฺสรโณ. เต สยญฺจ กสฺสจิ อตฺตาน โหนฺติ. อตฺตโน จ โกจิ อตฺตานาม นตฺถิ. ตสฺมา อนตฺตา เอว. อนิจฺจตาทีหิ อาทีนเวหิ โทเสหิ สมฺปุณฺณตฺตา อาทีนวา เอว. วิปริณาม สภาวตฺตา วิปริณามา เอว. สารภูตสฺส กสฺสจิ อธิฏฺฐานสฺส อภาวา อสาราเอว. อฆสฺส สพฺพนิรตฺถกสฺส ปติฏฺฐานตฺตา อฆมูลา เอว. เต สยํ มรณ ธมฺมสมงฺคีโน หุตฺวา เตน มรณสตฺเถน มรณาวุเธน สํสาเร สตฺตานํ นิจฺจํ มารกตฺตา ชีวิตินฺทฺริยุปจฺเฉทกตฺตา วธกา เอว. นิจฺจสุขหิต วุฑฺฒิวิคตตฺตา วิภวา เอว. อาสเวหิ ปริคฺคหิตตฺตา สาสวา เอว. นิจฺจกาลํ ปจฺจยายตฺตวุตฺติกตฺตา สงฺขตา เอว. กิเลสมารมจฺจุมารานํ อามิสาหารตฺตา มารามิสา เอว. อนิจฺฉนฺตสฺเสว สโต จกฺขุโรคาทิภาเวน อปายภวาทิภาเวน ชาตสภาวตฺตา ชาติธมฺมา เอว. อนิจฺฉนฺตสฺเสว สโต หายนมรณสภาวตฺตา ชรามรณ ธมฺมา เอว. โสกาทีนํ วตฺถุภาเวน ธารณตฺตา โสกาทิ ธมฺมา เอว. ตณฺหา สํกิเลส ทิฏฺฐิสํกิเลส ทุจฺจริต สํกิเลเสหิ นิยุตฺตตฺตา สํกิเลสิก ธมฺมา เอวาติ. เตน วุตฺตํ ‘‘จตฺตาลีสาย อากาเรหี’’ติ. ‘‘ปฏิสงฺขานวเสนา’’ติ ปริวีมํสนวเสน[Pg.292].‘‘นิกนฺติยา’’ติ นิกนฺติตณฺหาย. ‘‘ปริยาทินฺนายา’’ติ สุกฺขภาวปตฺตาย. ‘‘ภยญฺจา’’ติ ภยญาณวเสน อุปฺปนฺนํ โอตฺตปฺปภยญฺจ. “अनित्याचा (अनित्य धर्माचा) वारंवार अनुदर्शन करणे” असा संबंध आहे. “अनुपस्सना” (अनुदर्शन) म्हणजे ज्ञानचक्षूने वारंवार ध्यान करणे, अवलोकन करणे. “धम्मांन” (धर्मांचे) म्हणजे पंचस्कंध धर्मांचे. “जिथे जिथे” (यत्थ यत्थ) म्हणजे शरीराच्या ज्या ज्या भागात. “जुने धर्म” (पुराण धम्मांन) म्हणजे पूर्वी उत्पन्न झालेल्या आणि वाढलेल्या धर्मांच्या घटकांचे अंतर्धान पावणे, ज्याला 'वय' (ऱ्हास/क्षय) म्हटले जाते. विपश्यना कर्माप्रत पोहोचून, क्षणिक रूपाने आणि एकेका धर्माच्या विभागणीनुसार अनुपस्सना करण्याचे कार्य नसते, म्हणून “परंतु समूह आणि संततीच्या (प्रवाहाच्या) रूपाने” असे म्हटले आहे. परंतु, एकेका धर्माच्या विभागणीनुसार अनुपस्सना देखील निसर्गतः अत्यंत स्पष्ट असणाऱ्या चित्त, वेदना इत्यादींमध्ये अपेक्षितच आहे. “अनित्यतेची परम सीमा” म्हणजे त्यापलीकडे दुसरी कोणतीही अनित्यता नाही, असा अभिप्राय आहे. धर्मांचा तशा तशा प्रकारे भय वाटण्याचा प्रकार म्हणजे पंचस्कंधांमध्ये 'अनित्य म्हणून, दुःख म्हणून, रोग म्हणून, गंड (गळू) म्हणून, शल्य (बाण) म्हणून, अघ (व्यथा) म्हणून, आबाध (व्याधी) म्हणून' इत्यादी प्रकारे सांगितलेला भय वाटण्याचा प्रकार होय. त्याचे सम्यक अनुदर्शन करणारे ज्ञान म्हणजे 'भयज्ञान' होय. याद्वारे, अपाय-दुःख आणि संसार-दुःखाला भिणाऱ्या लोकांनी ज्याला भ्यावे, ते 'भय' होय. किंवा ज्याच्यापासून ते भ्यातात, ते 'भय' होय. भयाचे सम्यक अनुदर्शन करणारे ज्ञान म्हणजे 'भयज्ञान' होय, हा अर्थ दर्शवतो. “काही भयाचे कारण” म्हणजे सिंह, वाघ इत्यादी भयाचे कारण होय. “आश्रय” म्हणजे गुहा, लेणे इत्यादी आश्रयस्थान होय. “त्यांचे” म्हणजे भंग पावण्याचा स्वभाव असणाऱ्या धर्मांचे. “त्यांच्याद्वारे” म्हणजे भंग पावण्याच्या स्वभावाच्या धर्मांद्वारे. 'उत्कंठा' (उद्वेग) म्हणजे चित्ताची विरक्तता आणि संसारातून निघून जाण्याची (निष्क्रमणाची) अभिमुखता होय. “चाळीस आकारांनी” (चाळीस प्रकारांनी) म्हणजे पंचस्कंधांना 'अनित्य म्हणून, दुःख म्हणून, रोग म्हणून, गंड म्हणून, शल्य म्हणून, अघ म्हणून, आबाध म्हणून, पर (परके) म्हणून, pralok (नाशवंत) म्हणून, ईती (उपद्रव) म्हणून, उपद्रव म्हणून, भय म्हणून, उपसर्ग (संकट) म्हणून, चल (अस्थिर) म्हणून, प्रभंगू (भंग पावणारे) म्हणून, अध्रुव (अशाश्वत) म्हणून, अत्राण (संरक्षण नसलेले) म्हणून, अलेण (आश्रय नसलेले) म्हणून, अशरण (शरण नसलेले) म्हणून, रिक्त (रिकामे) म्हणून, तुच्छ म्हणून, शून्य म्हणून, अनात्मा म्हणून, आदीनव (दोषयुक्त) म्हणून, विपरिणामधर्मी (बदलणारे) म्हणून, असारक (निःसार) म्हणून, अघमूल (दुःखाचे मूळ) म्हणून, वधक (घातक) म्हणून, विभव (विनाशशील) म्हणून, सासव (आसवांसह असलेले) म्हणून, संस्कृत (संस्कारित) म्हणून, मारामिष (माराचे आमिष) म्हणून, जातिधर्मी (जन्म घेणारे) म्हणून, जराधर्मी (वृद्ध होणारे) म्हणून, व्याधिधर्मी (आजारी पडणारे) म्हणून, मरणधर्मी म्हणून, शोक-परिदेवधर्मी (शोक आणि विलाप करणारे) म्हणून, दुःख-दौर्मनस्यधर्मी म्हणून, उपायासधर्मी (निराशाधर्मी) म्हणून, संक्लेशिकधर्मी (मलीन करणारे) म्हणून पाहत असताना 'शून्य रूपाने जगाकडे पाहतो', अशा प्रकारे 'महानिद्देस' मधील 'मोघराजप्रश्ननिद्देस' मध्ये आलेल्या चाळीस आकारांनी. तेथे “पंचस्कंधांना अनित्य म्हणून पाहणारा” इत्यादी प्रकारे योजना करावी. आणि “अनित्य म्हणून” म्हणजे अनित्य भावाने, असा अर्थ आहे. “सर्वच पंचस्कंध अनित्यच आहेत” असे पाहणारा, असे म्हटले आहे. परंतु, अनित्य म्हणून पाहणारा कशा प्रकारे जगाकडे शून्य रूपाने पाहतो? नित्य गुणाच्या शून्यतेमुळे, तो पंचस्कंध रूपी जगाकडे शून्य रूपाने पाहतो. उर्वरित पदांमध्येही हाच नियम लावावा. त्यात “अनित्यच आहेत” म्हणजे प्रतिसंधीच्या क्षणापासून घेऊन कधी ना कधी मरणधर्मी असल्यामुळे ते अनित्यच आहेत. “दुःखच आहेत” म्हणजे अनित्य धर्मी असल्यामुळेच ते दुःखच आहेत. कारण “जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे” असे म्हटले आहे. किंवा दुःखसत्य धर्मी असल्यामुळे. “रोगच आहेत” म्हणजे रोग उत्पन्न करणाऱ्या स्वभावाचे असल्यामुळे ते रोगच आहेत. जगामध्ये जे काही चक्षुरोग इत्यादी अनेक हजारो रोग दिसून येतात, ते सर्व हे पंचस्कंधच आहेत. यापेक्षा वेगळा दुसरा कोणताही रोग नाही. म्हणून ते निश्चितपणे रोग उत्पन्न करणाऱ्या स्वभावाचेच आहेत. शिवाय, दुःखसत्य धर्मी असल्यामुळे, तीन दुःखतांनी आणि चार दुःख-अर्थांनी वारंवार पीडित केल्यामुळे, वेदना देण्याच्या अर्थाने ते रोगच आहेत. त्यात “तीन दुःखतांनी” म्हणजे दुःख-दुःखता, संस्कार-दुःखता आणि विपरिणाम-दुःखता या तीन दुःखतांनी. “चार दुःख-अर्थांनी” म्हणजे दुःखाचा पीडनार्थ, संस्कृतार्थ, संतापार्थ आणि विपरिणामार्थ या चार दुःख-अर्थांनी. दुःखाच्या कार्यांनी, असा अर्थ आहे. हाच नियम गंड इत्यादींच्या बाबतीतही लावावा. त्यात 'गंड' म्हणजे पीडा देणारा आजार (गळू). 'शल्य' म्हणजे टोचण्याच्या अर्थाने क्लेश-शल्य आणि दुःख-शल्य होय. 'अघ' म्हणजे निरर्थक. आणि हे स्कंध विपत्तीमध्ये समाप्त होणारे असल्यामुळे निरर्थकच आहेत. कारण “सर्व संपत्ती विपत्तीमध्ये समाप्त होते” असे म्हटले आहे. अविश्वासू असण्याच्या अर्थाने ते 'पर' (परके) च आहेत. कारण ते “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” अशा विश्वासास पात्र नाहीत. तसा विश्वास ठेवणाऱ्याला विविध दुःखांनी ते नेहमी पीडित करतात म्हणून. प्रतिसंधीपासून घेऊन कधी ना कधी नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे असल्यामुळे ते 'प्रलोकधर्मी' च आहेत. “ईती” म्हणजे अंतराय (अडथळा) म्हटले जाते. स्कंध हे अंतराय उत्पन्न करणाऱ्या स्वभावाचेच आहेत, असे म्हटले आहे. अध्यात्मभावाला प्राप्त होऊन, प्रतिकूल असल्यामुळे आणि बाधा आणणारे असल्यामुळे ते 'उपद्रव' च आहेत. भय वाटण्याजोगे असल्यामुळे ते 'भय' च आहेत. अनात्माच असूनही, अध्यात्मभावाला प्राप्त होऊन, चिकटून राहिल्यामुळे, आसक्त झाल्यामुळे आणि सोडवणे कठीण असल्यामुळे ते 'उपसर्ग' च आहेत. नेहमी लोकधर्मांनी कंपित होत असल्यामुळे आणि थरथरत असल्यामुळे ते 'चल' च आहेत. विविध प्रकारे भंग पावण्याच्या स्वभावाचे असल्यामुळे ते 'प्रभंगू' च आहेत. क्षणभरही स्थिर नसल्यामुळे ते 'अध्रुव' च आहेत. जरामरण इत्यादींपासून, अपाय आणि विनिपात इत्यादी भयापासून जे रक्षण करते, ते 'त्राण' (रक्षण) होय. आणि ते स्कंध कोणाचेही त्राण होत नाहीत. आणि त्यांचे स्वतःचेही कोणतेही त्राण नाही. म्हणून ते 'अत्राण' च आहेत. भयामुळे घाबरलेले लोक जिथे लपतात, ते 'लेण' (आश्रयस्थान) होय. ते कोणाचेही लेण होत नाहीत. आणि त्यांचे स्वतःचेही कोणतेही लेण नाही. म्हणून ते 'अलेण' च आहेत. जे भयाचा नाश करते, ते 'शरण' होय. ते कोणाचेही शरण होत नाहीत. आणि त्यांचे स्वतःचेही कोणतेही शरण नाही. म्हणून ते 'अशरण' च आहेत. नित्यता इत्यादी सर्व शोभनीय गुणांनी सर्वथा रहित असल्यामुळे, तुच्छ असल्यामुळे आणि शून्य असल्यामुळे ते 'रिक्त' च आहेत. ते तुच्छच आहेत. शून्यच आहेत. 'आत्मा' त्याला म्हटले जाते, जो कोणाचा तरी सारभूत आश्रय असतो. ते स्वतः कोणाचेही आत्मा होत नाहीत. आणि त्यांचा स्वतःचाही कोणी आत्मा नाही. म्हणून ते 'अनात्मा' च आहेत. अनित्यता इत्यादी आदीनवांनी (दोषांनी) परिपूर्ण असल्यामुळे ते 'आदीनव' च आहेत. विपरिणाम होण्याच्या स्वभावाचे असल्यामुळे ते 'विपरिणामधर्मी' च आहेत. कोणत्याही सारभूत अधिष्ठानाचा अभाव असल्यामुळे ते 'असार' च आहेत. सर्वथा निरर्थक अशा अघाचे अधिष्ठान असल्यामुळे ते 'अघमूल' च आहेत. ते स्वतः मरणधर्माने युक्त होऊन, त्या मरणरूपी शस्त्राने, मरणरूपी आयुधाने संसारात प्राण्यांचे नेहमी मारक असल्यामुळे आणि जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करणारे असल्यामुळे 'वधक' च आहेत. नित्य सुख, हित आणि वृद्धी यांनी रहित असल्यामुळे ते 'विभव' (विनाशशील) च आहेत. आसवांनी वेढलेले असल्यामुळे ते 'सासव' च आहेत. नेहमी प्रत्ययांवर अवलंबून राहणारे असल्यामुळे ते 'संस्कृत' (संस्कारित) च आहेत. क्लेशमार आणि मृत्यूमार यांचे आमिष असल्यामुळे ते 'मारामिष' च आहेत. इच्छा नसतानाही चक्षुरोग इत्यादी रूपाने आणि अपाय-भव इत्यादी रूपाने उत्पन्न होण्याचा स्वभाव असल्यामुळे ते 'जातिधर्मी' च आहेत. इच्छा नसतानाही ऱ्हास पावण्याचा आणि मरण्याचा स्वभाव असल्यामुळे ते 'जरामरणधर्मी' च आहेत. शोक इत्यादींचे कारण म्हणून धारण करत असल्यामुळे ते 'शोकधर्मी' इत्यादीच आहेत. तृष्णा-संक्लेश, दृष्टी-संक्लेश आणि दुश्चरित-संक्लेशांनी युक्त असल्यामुळे ते 'संक्लेशिक धर्मी' च आहेत. म्हणून “चाळीस आकारांनी” असे म्हटले आहे. “प्रतिसंख्यान वशात” म्हणजे वारंवार विचार करण्याच्या (परीक्षण करण्याच्या) वशात. “निकंती” म्हणजे निकंती-तृष्णेने (आसक्तीने). “परियादिnn” म्हणजे शुष्क भाव प्राप्त झालेल्या (नष्ट झालेल्या). आणि “भय” म्हणजे भयज्ञानाच्या वशात उत्पन्न झालेले ओत्तप्प-भय होय. โลเก อตฺตชีวา นาม สตฺตานํ อชฺฌตฺต ธมฺเมสุ สารธมฺมา โหนฺติ. เตสุ วิคเตสุ เสสธมฺมา นิสฺสตฺต นิชฺชีวภาวํ ปตฺวา เผคฺคุภูตา กจวรภูตาติ โลกสฺส อภิมาโน. เต จ อตฺตชีวา นาม สพฺพโส นตฺถีติ ทิฏฺเฐ ขนฺเธสุ กจวรภาวทสฺสนํ อตฺตชีว สุญฺญตา ทสฺสนํ นาม. ‘‘วิมุจฺจมาโน’’ติ เอเตน วิมุจฺจตีติ วิโมกฺโขติ อตฺถํ ทสฺเสติ. วิมุจฺจนฺติ เอเตนาติ วิโมกฺโขติปิ ยุชฺชติ. ‘‘นิมิตฺตานี’’ติ วิปลฺลาสธมฺเมหิ นิมฺมิตานิ นิจฺจนิมิตฺต สุขนิมิตฺต อตฺตนิมิตฺต ชีวนิมิตฺตานิ. สตฺต ปุคฺคล อิตฺถิ ปุริส หตฺถ ปาท สีส คีวาทีนิ นิมิตฺตานิ จ. ตตฺถ สงฺขารานํ ขณิก ธมฺมตฺตา อนิจฺจานํเยว สตํ สนฺตติ ฆเนน ปฏิจฺฉนฺนตฺตา หิยฺโยปิ โส เอว, อชฺชปิ โส เอวาติอาทินา นิจฺจากาเรน อุปฏฺฐานํ นิจฺจนิมิตฺตํ นาม. กิเลสมเลหิ ปริคฺคหิตตฺตา อสุภานํเยว สตํ อวิชฺชาย ปฏิจฺฉนฺนตฺตา อิทํ อิฏฺฐํ, กนฺตํ, มนาปํ, ปิยรูป, นฺติอาทินา สุภากาเรน อุปฏฺฐานํ สุภนิมิตฺตํ นาม. ภยฏฺเฐน อเขมฏฺเฐน ทุกฺขานํปิ สตํ ตาเยว ปฏิจฺฉนฺนตฺตา อิทํ สุขํ, นิพฺภยํ, เขมํ, สาตรูป, นฺติอาทินา สุขากาเรน อุปฏฺฐานํ สุขนิมิตฺตํ นาม. ปจฺจยา ยตฺตวุตฺติกตฺตา ปจฺจเยน วินา เกวลํ อตฺตโน วสายตฺตวุตฺติตา ภาวโต อนตฺตานํเยว สตํ อตฺตโน อิจฺฉาวเสน กโรติ, กเถติ, จินฺเตติ, คนฺตุํ อิจฺฉนฺโต คจฺฉติ, ฐาตุํ อิจฺฉนฺโต ติฏฺฐตี, ติอาทินา วสวตฺตนากาเรน อุปฏฺฐานํ อตฺตนิมิตฺตํ นาม. ตถา สตฺโตนาม สตฺตาหํปิ ชีวติ, มาสํปิ ชีวติ, สํวจฺฉรํปิ ชีวตีติอาทินา ชีวากาเรน อุปฏฺฐานํ ชีวนิมิตฺตํ นาม. นนุ เจตฺถ อตฺตโน อิจฺฉาวเสน กโรตีติอาทีสุ อิจฺฉานาม ตณฺหาวาฉนฺโท วา. ตทุภยมฺปิ จิตฺตสมฺปยุตฺตํ. กรณญฺจ นาม กายิกกฺริยาภูตานํ จิตฺตชรูปกลาปานํ ปวตฺติวิเสโส. เอวญฺจสติ เตสํ จิตฺตวเสน ปวตฺตตฺตา อตฺตโน อิจฺฉาวเสน กโรตีติ อิทํ อภิธมฺมวิรุทฺธํ น โหตีติ. น น โหติ. อตฺตโนติ จ กโรตีติ จ [Pg.293] วุตฺตตฺตา. น หิ อตฺตานาม อตฺถิ, โย อตฺตโนติ วุจฺเจยฺย. น จ กตฺตานาม อตฺถิ, โย กโรตีติ วุจฺเจยฺย. อิธ ปน ตสฺมึ สมเย ปวตฺตํ ขนฺธปญฺจกเมว อตฺตาติ จ กตฺตาติ จ คเหตฺวา อตฺตโนติ จ กโรตีติ จ วุตฺตํ. ‘‘อวสฺสโย โหตี’’ติ ปติฏฺฐา โหติ. ‘‘วิธมิตฺวา’’ติ ญาเณน อนฺตรธาเปตฺวา. สภาวโต วิชฺชมานานิ น โหนฺตีติ ทสฺสนญาเณน วินิจฺฉยํ ปาเปตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ภาวทสฺสนํ นาม โสกทุกฺขาทีนํ อภาวทสฺสนํ. जगात 'अत्ता' (आत्मा) आणि 'जीव' हे प्राण्यांच्या अज्झत्त धम्मांमधील (अंतर्गत धर्मांमधील) सारभूत धर्म मानले जातात. ते (अत्ता आणि जीव) निघून गेल्यावर उर्वरित धर्म हे सत्त्वहीन (निस्सत्त), निर्जीव भाव प्राप्त करून फोलपट आणि कचरा बनतात, असा जगाचा अभिमान (समज) असतो. आणि ते 'अत्ता' व 'जीव' सर्वथा अस्तित्वात नाहीत असे पाहिले असता, स्कंधांमध्ये कचरा असल्यासारखे पाहणे म्हणजेच 'अत्ता-जीव शून्यता दर्शन' होय. 'विमुच्चमानो' (मुक्त होत असताना) याने 'मुक्त होतो तो विमोक्ष' असा अर्थ दर्शविला जातो. 'ज्याद्वारे मुक्त होतात तो विमोक्ष' असेही योग्य ठरते. 'निमित्तानि' म्हणजे विपल्लास (विपर्यास) धर्मांद्वारे निर्माण केलेले नित्य-निमित्त, सुख-निमित्त, अत्त-निमित्त आणि जीव-निमित्त होय. तसेच सत्त्व (प्राणी), पुद्गल, स्त्री, पुरुष, हात, पाय, डोके, मान इत्यादी निमित्त देखील. त्यामध्ये, संस्कारांच्या क्षणिक धर्मत्वामुळे ते अनित्यच असताना, संतती-घनाने (प्रवाहाच्या घनतेने) झाकलेले असल्यामुळे 'कालही तोच होता, आज देखील तोच आहे' इत्यादी नित्य रूपाने उपस्थित होणे (भासणे) म्हणजे 'नित्य-निमित्त' होय. क्लेशमलांनी वेढलेले असल्यामुळे ते अशुभच असताना, अविद्येने झाकलेले असल्यामुळे 'हे इष्ट आहे, कांत (प्रिय) आहे, मनासारखे आहे, प्रिय रूप आहे' इत्यादी शुभ रूपाने उपस्थित होणे म्हणजे 'शुभ-निमित्त' होय. भय आणि अक्षेम (असुरक्षितता) या अर्थाने ते दुःखच असताना, त्याच (अविद्येने) झाकलेले असल्यामुळे 'हे सुख आहे, निर्भय आहे, क्षेम आहे, सातरूप (मधुर) आहे' इत्यादी सुखाच्या रूपाने उपस्थित होणे म्हणजे 'सुख-निमित्त' होय. प्रत्ययांवर (कारणांवर) अवलंबून राहणारे असल्यामुळे, प्रत्ययाशिवाय केवळ स्वतःच्या वशामध्ये राहण्याचा अभाव असल्यामुळे ते अनत्ता (अनात्मा) असतानाच, 'स्वतःच्या इच्छेनुसार करतो, बोलतो, विचार करतो, जाण्याची इच्छा असेल तर जातो, थांबण्याची इच्छा असेल तर थांबतो' इत्यादी वश चालविण्याच्या रूपाने उपस्थित होणे म्हणजे 'अत्त-निमित्त' होय. तसेच, 'प्राणी सात दिवस जगतो, महिनाभर जगतो, वर्षभर जगतो' इत्यादी जीवाच्या रूपाने उपस्थित होणे म्हणजे 'जीव-निमित्त' होय. येथे शंका उपस्थित होते की, 'स्वतःच्या इच्छेनुसार करतो' इत्यादींमध्ये 'इच्छा' म्हणजे तण्हा (तृष्णा) किंवा छंद (इच्छा) होय. ते दोन्हीही चित्त-संप्रयुक्त (चित्ताशी जोडलेले) आहेत. आणि 'करणे' म्हणजे कायिक क्रिया रूप असलेल्या चित्तज-रूप-कलापांची विशिष्ट प्रवृत्ती होय. असे असताना, त्यांची चित्ताच्या वशतेने प्रवृत्ती होत असल्यामुळे 'स्वतःच्या इच्छेनुसार करतो' हे अभिधम्माच्या विरुद्ध ठरत नाही का? नाही, विरुद्ध ठरत नाही असे नाही (म्हणजे विरुद्ध ठरतेच), कारण 'स्वतःचे' आणि 'करतो' असे म्हटले गेले आहे. कारण 'अत्ता' नावाचे काही अस्तित्वातच नाही, ज्याला 'स्वतःचे' म्हटले जावे. आणि 'कर्ता' नावाचा कोणी अस्तित्वात नाही, जो 'करतो' असे म्हटले जावे. परंतु येथे, त्या वेळी प्रवृत्त होणाऱ्या पंचस्कंधांनाच 'अत्ता' आणि 'कर्ता' मानून 'स्वतःचे' आणि 'करतो' असे म्हटले गेले आहे. 'अवस्सयो होति' म्हणजे प्रतिष्ठा (आश्रय/आधार) होतो. 'विधमित्वा' म्हणजे ज्ञानाने नाहीसे करून (अंतर्धान करून). 'स्वभावाने विद्यमान असणारे अस्तित्वात राहत नाहीत' असे दर्शनज्ञानाने निश्चयाप्रत पोहोचवून, असे म्हटले आहे. 'भावदर्शन' म्हणजे शोक, दुःख इत्यादींचा अभाव पाहणे होय. ‘‘ตํ ตํ ฆนวินิพฺภุชฺชนวเสนา’’ติ สมูหสนฺตติ ฆนาทีนํ ภินฺทน ฉินฺทนวเสน. ตตฺถ สมูหฆนภินฺทนํ อาทิโต ธมฺมววตฺถานญาณกิจฺจํ. ตทา อตฺตทิฏฺฐิ วิกฺขมฺภิตา โหติ. ชีวทิฏฺฐิ จ นาม สุขุมตรา อตฺตทิฏฺฐิ เอว วุจฺจติ. มคฺคกฺขณํ ปตฺวา เอว ตทุภยํปิ สพฺพโส สมุจฺฉินฺทตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘ปณิหิตคุณสฺสา’’ติ ปตฺถิตคุณสฺส. 'तं तं घनविनिब्भुज्जनवसेन' म्हणजे समूह-संतती-घन इत्यादींचे भेदन आणि छेदन करण्याच्या वशतेने. त्यामध्ये, समूह-घनाचे भेदन करणे हे सुरुवातीला 'धम्मववत्थान ज्ञान' (धर्म-व्यवस्थान ज्ञान) चे कार्य आहे. त्यावेळी 'अत्तदिट्ठि' (आत्मदृष्टी) विष्कंभित (दडपली) जाते. आणि 'जीवदिट्ठि' (जीवदृष्टी) ही अधिक सूक्ष्म अशी अत्तदिट्ठि (आत्मदृष्टी) च म्हटली जाते. मार्गक्षण (मग्गक्खण) प्राप्त करूनच त्या दोन्हीचा सर्वथा समूळ उच्छेद (समुच्छिन्न) केला जातो, असे जाणावे. 'पणिहितगुणस्स' म्हणजे प्रार्थित (इच्छित) गुणाचे. ‘‘ปาติโมกฺข’’นฺติ เอตฺถ ‘‘ปตี’’ติ เชฏฺฐโก วุจฺจติ. ‘‘มุขํ’’ติ มูลการณํ. ปติ จ โส มุขญฺจาติ ปติมุขํ. ปติมุขเมว ปาติโมกฺขนฺติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตํ หี’’ติอาทิมาห. สพฺพโลกิยสีลานิ นาม จตุปาริสุทฺธิสีลานิ. เตสํ มชฺเฌ. ‘‘เชฏฺฐกตฺตา’’ติ เชฏฺฐกสีลตฺตา. ‘‘ตเมวา’’ติ วินยปญฺญตฺติสีลเมว +. ‘‘เยสํ ธมฺมานํ’’ติ อุทฺธจฺจ มุฏฺฐสฺสจฺจาทิ ธมฺมานํ. ‘‘วิปฺผนฺทิตานิ นามา’’ติ วิปฺปกิณฺณานิ นามาติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘โลลานิ นามา’’ติ. ‘‘ตทนุพนฺธา’’ติ ตานิวิปฺผนฺทิตานิ อินฺทฺริยานิ อนุคตา. ‘‘พุทฺธปฺปฏิกุฏฺเฐหี’’ติ พุทฺเธนภควตา ปฏิกฺโกสิเตหิ นีวาริเตหิ. ‘‘มิจฺฉาปโยเคหี’’ติ อฏฺฐกุลทูสนกมฺเมหิ เจว เอกวีสติอเนสนกมฺเมหิ จ. ‘‘ติวิธกุหนวตฺถูหี’’ติ ปจฺจยปฺปฏิเสวนญฺจ, สามนฺตชปฺปนญฺจ, อิริยา ปถ สนฺนิสฺสิตญฺจาติ อิเมหิ ติวิเธหิ กุหนวตฺถูหิ. ติวิเธหิ อจฺฉริย กมฺมวิธาเนหีติ วุตฺตํ โหติ. ปริสุชฺฌตีติ ปริสุทฺธิ. ปริสุทฺธิ เอว ปาริสุทฺธิ. ‘‘สมฺโมหสฺสา’’ติ ธาตุมนสิการาทีสุ สมฺมุยฺหนสฺส. ‘‘เคธสฺสา’’ติ สมฺโมหตฺตาเยว ปจฺจเยสุ ภตฺตนิกฺขิตฺตกา กสฺสวิย เคธสฺส, อภิกงฺขสฺส. ‘‘มทสฺสา’’ติ ลาภสกฺการา ทิมูลกสฺส [Pg.294] มานมทสฺส. ‘‘ปมาทสฺสา’’ติ กุสเลสุ ธมฺเมสุ ปมาทสฺส มุฏฺฐสฺสจฺจสฺส. ตํ ตํ ปโยชน มริยาโท นาม จีวรปจฺจเย ตาว สีตปฺปฏิฆาตาทิโก ปโยชนมริยาโท. ‘‘มริยาโท’’ติ จ ยาวเทวาติ ปเทน ทสฺสิโต สีตปฺปฏิฆาตาทิโก จีวรปฺปโยชน ปริจฺเฉโท. โส จ จีวรปจฺจเย สมฺโมหาทิเก สาวชฺชปกฺเข อปตนตฺถาย ฐปิโต. เตน วุตฺตํ ‘‘สมฺโมหสฺส เคธสฺส มทสฺส ปมาทสฺส ปหานตฺถํ’’ติ. เอสนโย ปิณฺฑปาตปจฺจยาทีสุปิ. เอเตน ปจฺจเวกฺขนาปาเฐสุ อยมตฺโถ ทสฺสิโต. อิธ ภิกฺขุ จีวรํ ปฏิเสวติ ยาวเทว สีตสฺส ปฏิฆาตาย อุณฺหสฺส ปฏิฆาตายาติอาทีสุ ยาวเทว สีตสฺส ปฏิฆาตาย ปฏิเสวติ. น ตโต อุตฺตริ สมฺโมหตฺถาย เคธตฺถาย มทตฺถาย ปมาทตฺถาย ปฏิเสวตีติอาทิ. เอวญฺจสติ, ยํ จีวรํ ปฏิเสวนฺตสฺส สมฺโมหเคธมทปฺปมาทา อุปฺปชฺชนฺติ. ตํ น เสวิตพฺพํ. อิตรํ เสวิตพฺพนฺติ ทสฺสิตํ โหตีติ. 'पातिमोक्ख' यामध्ये 'पति' म्हणजे ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) म्हटले जाते. 'मुखं' म्हणजे मूळ कारण. जो 'पति' (श्रेष्ठ) आहे आणि 'मुख' (कारण) आहे, तो 'पतिमुख' होय. 'पतिमुख' म्हणजेच 'पातिमोक्ख' हा अर्थ दर्शविताना 'तं ही' इत्यादी म्हटले आहे. सर्व लौकिक शील म्हणजे 'चतुपारिसुद्धिसील' (चार परिशुद्धी शील) होत. त्यांच्यामध्ये. 'जेठ्ठकत्ता' म्हणजे ज्येष्ठ शील असल्यामुळे. 'तमेव' म्हणजे विनयप्रज्ञप्ती शीलच. 'येसं धम्मानं' म्हणजे उद्धच्च (औद्धत्य), मुट्ठसच्च (स्मृतिभ्रंश) इत्यादी धर्मांचे. 'विप्फन्दितनि नामा' म्हणजे विखुरलेले असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच 'लोलानि नामा' (चंचल) असे म्हटले आहे. 'तदनुबंधा' म्हणजे त्या विखुरलेल्या इंद्रियांचे अनुकरण करणारे. 'बुद्धप्पटिकुट्ठेहि' म्हणजे बुद्ध भगवंतांनी धिक्कारलेल्या (प्रतिषिद्ध केलेल्या) आणि निवारण केलेल्या. 'मिच्छापयोजेहि' म्हणजे आठ प्रकारच्या कुलदूषक कर्मांनी आणि एकवीस प्रकारच्या अनेसन (अयोग्य उपजीविका) कर्मांनी. 'तिविधकुहनवत्थूहि' म्हणजे प्रत्यय-प्रतिसेवन (साधनांचा उपभोग), सामंतजल्पन (आजूबाजूला बडबड करणे) आणि इरियापथ-सन्निश्रित (चर्यापथाचा आश्रय घेणे) या तीन प्रकारच्या कुहनवस्तूंद्वारे (ढोंगबाजीच्या साधनांद्वारे). तीन प्रकारच्या आश्चर्यकारक कर्मविधींद्वारे, असे म्हटले आहे. जे पूर्णपणे शुद्ध होते ती 'परिसुद्धि' (परिशुद्धी) होय. परिशुद्धी म्हणजेच 'पारिसुद्धि' होय. 'संमोहस्स' म्हणजे धातू-मनसिकार इत्यादींमध्ये संमोहित (भ्रमित) होणे. 'गेधस्स' म्हणजे संमोहामुळेच प्रत्ययांमध्ये (साधनांमध्ये), जसे भात वाढणाऱ्या व्यक्तीची हाव असते, तशी हाव किंवा अभिलाषा असणे. 'मदस्स' म्हणजे लाभ आणि सत्कार इत्यादींमुळे उत्पन्न होणारा मान-मद (अहंकार). 'पमादस्स' म्हणजे कुशल धर्मांमध्ये प्रमाद (आळस) आणि मुट्ठसच्च (स्मृतिभ्रंश) होणे. त्या त्या प्रयोजनाची मर्यादा म्हणजे, चीवर-प्रत्ययाच्या (वस्त्राच्या) बाबतीत थंडीचे निवारण करणे इत्यादी प्रयोजनाची मर्यादा होय. आणि 'मरियादो' म्हणजे 'यावदेव' (केवळ यासाठीच) या पदाने दर्शविलेली थंडीचे निवारण करणे इत्यादी चीवर-प्रयोजनाची मर्यादा होय. आणि ती चीवर-प्रत्ययाच्या बाबतीत संमोह इत्यादी सावज्ज (दोषयुक्त) पक्षात न पडण्यासाठी स्थापित केली आहे. म्हणूनच 'संमोह, गेध (हाव), मद आणि प्रमाद यांच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी)' असे म्हटले आहे. हाच नियम पिंडपात-प्रत्यय (भोजन) इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. याद्वारे प्रत्यावेक्षण पाठांमध्ये (पच्चवेक्खण पाठांमध्ये) हा अर्थ दर्शविला आहे. 'येथे भिक्खू चीवराचे सेवन करतो, केवळ थंडीच्या निवारणासाठी, उन्हाच्या निवारणासाठी' इत्यादींमध्ये 'केवळ थंडीच्या निवारणासाठी सेवन करतो'. 'त्यापेक्षा अधिक संमोहासाठी, हावेसाठी, मदासाठी किंवा प्रमादासाठी सेवन करत नाही' इत्यादी. असे असताना, ज्या चीवराचे सेवन केल्याने संमोह, हाव, मद आणि प्रमाद उत्पन्न होतात, त्याचे सेवन करू नये. आणि दुसऱ्याचे (ज्यामुळे हे दोष उत्पन्न होत नाहीत त्याचे) सेवन करावे, असे दर्शविले आहे. ‘‘ปจฺจตฺตสภาโว’’ติ ปจฺเจกสภาโว. ‘‘การิยสงฺขาตํ’’ติ กาตพฺพํ อภินิปฺผาเทตพฺพนฺติ การิยํ. อาสนฺนปฺผลํ. เตนาห ‘‘อคฺคิสฺสธูโมวิยา’’ติ. อาสนฺนการณํ ปทฏฺฐานํ นาม อคฺคิการโก วิย. ปชฺชติ คจฺฉติ ปวตฺตติ ผลํ เอเตนาติ ปทํ. ติฏฺฐติ ผลํ เอตฺถาติ ฐานํ. อุภยํปิ การณ ปริยาโย เอว. เตน อติสฺสยตฺโถปิ สิชฺฌตีติ อาห ‘‘อาสนฺนการณํ’’ติ. ‘‘สทฺธึ สญฺญา จิตฺต วิปลฺลาเสหี’’ติ ทิฏฺฐิสมฺปยุตฺเตหีติ อธิปฺปาโย. ทิฏฺฐิวิปฺปยุตฺตา ปน สญฺญา จิตฺต วิปลฺลาสา วิกฺขมฺภิตุํ สกฺโกตีติ น วตฺตพฺพา. ‘‘สาสน ธมฺเม’’ติ อนตฺตลกฺขณ สุตฺตนฺตาทิเก สุญฺญต ธมฺมปฺปฏิสํยุตฺเต เทสนาธมฺเม. ‘‘ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส วิกฺขมฺภิโต’’ติ ตาทิสํ ธมฺมเทสนํ สุตฺวา เทสเก สตฺถริ จ เทสิเต ธมฺเม จ สทฺธํ ปฏิลภิตฺวา สจฺจเมว ภควา อาห, อหํ ปน เอตํ มม, เอโสหมสฺมิ, เอโส เม อตฺตา,ติ คณฺหามิ, มิจฺฉาวตายํ มมคาโหติ เอวํ วิกฺขมฺภิโต โหติ. ตโต ปฏฺฐาย เอโส เม อตฺตาติ วทนฺโตปิ ทิฏฺฐิสมฺปยุตฺตจิตฺเตน น วทติ. ทิฏฺฐิวิปฺปยุตฺตจิตฺเตน เอว วทตีติ อธิปฺปาโย. อิทมฺปน ทฬฺหคฺคาห วิกฺขมฺภนมตฺตํ เอว[Pg.295]. น อตฺตทสฺสน วิกฺขมฺภนํ. ตํ ปน ธมฺมววตฺถานญฺญาเณ สิทฺเธ เอว สิชฺฌตีติปิ วทนฺติ. จตุนฺนํ อาหารานํ วเสน จตุธา นามรูปํ ปริคฺคเหตพฺพเมว. กสฺมา, จตฺตาโร อาหาเร ปริคฺคเหตฺวา เตสฺเวว ลกฺขณตฺตยํ สมนุปสฺสนฺตสฺส อนฺเต โลกุตฺตรญฺญาณทสฺสนปฺปฏิลาภกิจฺจสฺส สิทฺธตฺตาติ อธิปฺปาโย. ปญฺจธาติอาทีสุ เอสนโย. อาทิกมฺมิกานํ อวิสโย, วิสุํ วิสุํ ลกฺขณ รสาทีหิ ปริคฺคเหตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา. ปริคฺคหเณ สกฺโกนฺตสฺสปิ วิปสฺสนา กมฺเม วิสุํ วิสุํ ปสฺสิตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา จ. ตถาหิ วกฺขติ ‘‘กลาปวเสน สํขิปิตฺวา’’ติ. ‘‘อญฺญสฺส กสฺสจี’’ติ อตฺตชีวาทิกสฺส. โส กโรติ กุสลากุสลํ กมฺมํ. โส ปฏิสํเวเทติ ภวนฺตรํ ปตฺวา ตพฺพิปากํ. สํสรติ ภวโต ภวํ. สนฺธาวติ กมฺมเวเคน ขิตฺโต. สุทฺเธ นาเม เอว วา รูเป เอว วา อีหาพฺยาปารานํ อภาวทสฺสนโตติ โยชนา. ปุคฺคลสตฺตานํ กฺริยาโยติ สญฺญิตาติ วิคฺคโห. ‘‘อตฺตาติ ปวตฺตา ทิฏฺฐี’’ติ การก ทิฏฺฐิ. ‘‘ตทตฺถา ภินิเวสวเสนา’’ติ สตฺโต, ปุคฺคโล, ติอาทิ โวหารสฺส สพฺภาวโต ตสฺส อตฺถภูโต สตฺตปุคฺคลาทิโกปิ สภาวโต อตฺถิเยว. โน นตฺถีติ เอวํ ทฬฺหํ หทเย สนฺนิธานกรณ วเสน. ‘‘อติธาวนญฺจา’’ติ โวหาร ปญฺญตฺติมตฺเต อฏฺฐตฺวา ตํ อติกฺกมิตฺวา ปญฺจกฺขนฺเธ สตฺตาทิภาเวน คหณญฺจาติ อธิปฺปาโย. "पच्चत्तसभावो" (पच्चत्त-स्वभाव) म्हणजे प्रत्येक (वैयक्तिक) स्वभाव (पच्चेकसभावो). "कारियसंखातं" (कार्यसंख्यात) म्हणजे जे केले पाहिजे, जे निष्पन्न केले पाहिजे, ते 'कार्य' (कारिय) होय; म्हणजेच आसन्न फल (जवळचे फळ). म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे, "अग्नीच्या धुराप्रमाणे" (अग्गिस्स धूमो विय). आसन्न कारण म्हणजेच 'पदट्ठान' (तात्कालिक कारण), जसे की अग्नी निर्माण करणारा. ज्याच्याद्वारे फळ प्राप्त होते, जाते किंवा प्रवृत्त होते, ते 'पद' होय. जिथे फळ टिकून राहते, ते 'ठान' (स्थान) होय. हे दोन्हीही कारणाचेच पर्याय आहेत. त्यामुळे अतिशय अर्थ देखील सिद्ध होतो, म्हणून "आसन्नकारण" असे म्हटले आहे. "सद्धिं सञ्ञा चित्त विपल्लासेहि" (संज्ञा आणि चित्त विपर्यासांसह) याचा अभिप्राय 'दिट्ठिसम्पयुत्त' (दृष्टी-संप्रयुक्त) असा आहे. परंतु, दृष्टी-विप्रयुक्त (दिट्ठिविप्पयुत्त) संज्ञा आणि चित्त विपर्यास हे विक्खंभित (दबून टाकले) जाऊ शकतात, असे म्हणता येत नाही. "सासन धम्मे" (शासकीय धर्म/बुद्धवचन) म्हणजे अनत्तलक्खण सुत्त इत्यादी शून्यता धर्माशी संबंधित देशना धर्म होय. "दिट्ठिविपल्लासो विक्खंभितो" (दृष्टी-विपर्यास दबला गेला) म्हणजे तशा प्रकारची धम्मदेशना ऐकून, देशना देणाऱ्या शास्त्यांवर (बुद्धांवर) आणि देशना केलेल्या धम्मावर श्रद्धा (सद्धा) प्राप्त करून, "भगवान खरोखरच सत्य बोलले; मी मात्र 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे ग्रहण करत होतो, खरोखरच माझे हे ग्रहण करणे चुकीचे होते," अशा प्रकारे तो (दृष्टी-विपर्यास) विक्खंभित (दबला) होतो. तेव्हापासून "हा माझा आत्मा आहे" असे म्हणतानाही तो दृष्टी-संप्रयुक्त चित्ताने बोलत नाही, तर तो केवळ दृष्टी-विप्रयुक्त चित्तानेच बोलतो, असा अभिप्राय आहे. परंतु हे केवळ दळ्हग्गाह (दृढ ग्रहण) विक्खंभन (दबून जाणे) मात्र आहे, आत्मदर्शनाचे विक्खंभन नव्हे. आणि ते 'धम्मववत्थानञाण' (धर्म-व्यवस्थान-ज्ञान) सिद्ध झाल्यावरच सिद्ध होते, असेही म्हणतात. चार आहारांच्या द्वारे नाम-रूपाचे चार प्रकारे ग्रहण केलेच पाहिजे. कारण काय? चार आहारांचे ग्रहण करून, त्यांच्यामध्येच तीन लक्षणांचे (लक्खणत्तय - अनित्य, दुःख, अनात्म) समनुपस्सना (अनुदर्शन) करणाऱ्याला शेवटी लोकुत्तरञाणदस्सनप्पटिलाभकिच्च (लोकोत्तर ज्ञानदर्शन प्राप्त करण्याचे कार्य) सिद्ध होते, असा अभिप्राय आहे. पाच प्रकार इत्यादींमध्येही हाच नियम (नय) आहे. हे आदिकम्मिक (नवशिक्यांच्या) कक्षेबाहेरचे आहे, कारण वेगवेगळ्या लक्षण, रस इत्यादींद्वारे ग्रहण करणे अशक्य आहे. आणि ग्रहण करण्यास समर्थ असलेल्याला देखील विपश्यना कर्मामध्ये वेगवेगळ्या प्रकारे पाहणे अशक्य असल्यामुळे. म्हणूनच पुढे म्हणतील, "कलापवसेन संखिपित्वा" (कलाप पद्धतीने संक्षेप करून). "अञ्ञस्स कस्सची" (इतर कोणाचेही) म्हणजे आत्मा, जीव इत्यादींचे. तो कुशल-अकुशल कर्म (कुसलाकुसल कम्म) करतो. तो दुसऱ्या भवात (भवन्तर) जाऊन त्याच्या विपाकाचा (तब्बिपाक - फळाचा) अनुभव घेतो. तो एका भवातून दुसऱ्या भवात संसार करतो (भ्रमण करतो). कर्माच्या वेगाने फेकला जाऊन तो धावतो (सन्धावति). केवळ शुद्ध नामामध्ये किंवा केवळ रूपामध्ये कोणतीही चेष्टा किंवा व्यापार (ईहाव्यापार - क्रियाशीलता) नसल्याचे पाहिल्यामुळे, अशी योजना आहे. "पुद्गल आणि सत्त्वांची क्रिया" अशी संज्ञा आहे, असा विग्रह आहे. "अत्ता" (आत्मा) अशी प्रवृत्त झालेली दृष्टी म्हणजे कारक-दृष्टी (कारक दिट्ठि). "तदत्थाभिनिवेस" (त्या अर्थाच्या अभिनिवेशामुळे) म्हणजे सत्त्व, पुद्गल इत्यादी व्यवहाराच्या अस्तित्वामुळे, त्याचा अर्थभूत असलेला सत्त्व-पुद्गल इत्यादी देखील स्वभावाने अस्तित्वातच आहे, "तो नाही असे नाही" अशा प्रकारे हृदयात दळ्हं (दृढ) निश्चय करण्याच्या द्वारे. "अतिधावनञ्च" (अतिधावन) म्हणजे केवळ व्यवहार प्रज्ञप्तीवर (वोहार पण्ञत्ति) न थांबता, तिचे उल्लंघन करून पाच स्कंधांना (पञ्चक्खन्ध) सत्त्व इत्यादी रूपाने ग्रहण करणे, असा अभिप्राय आहे. ‘‘กมฺมจิตฺโตตุกาหารวเสนา’’ติ เอตฺถ กกาโร สนฺธิ วเสน อาคโม. กมฺมวเสน จิตฺตวเสน อุตุวเสน อาหารวเสนาติ อตฺโถ. อนุรูปานํ ปจฺจยานํ สามคฺคีติ วิคฺคโห. ‘‘อญฺญถา ปวตฺติยา’’ติ อญฺเญน ปกาเรน ปวตฺตนสฺส. ‘‘เหตุสมฺภารปจฺจเยหี’’ติ เหตุปจฺจย สมฺภารปจฺจเยหิ. ชนก ปจฺจยา เหตุปจฺจยา นาม. ปริวารปจฺจยา สมฺภารปจฺจยา นาม. ‘‘กมฺมปฺปวตฺติยา’’ติ กมฺมปฺปวตฺติโต. ‘‘วิปากปฺปวตฺติยา’’ติ วิปากปฺปวตฺติโต. เอกสฺส สตฺตสฺส อนมตคฺเค สํสาเร สํสรนฺตสฺส รูปกาโยปิ อตฺถิ นามกาโยปิ อตฺถิ. ตโต อญฺโญ โกจิสภาโว [Pg.296] นาม นตฺถิ. ทฺเว จ กายา ปญฺจโวกาเร สํสรนฺตสฺส เอกโต ปวตฺตนฺติ. อสญฺญสตฺเต สํสรนฺตสฺส รูปกาโย เอว ปวตฺตติ. โส เอว ตตฺถ เอโกสตฺโตติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ. อรูเป สํสรนฺตสฺส นาม กาโย เอว ปวตฺตติ. โส เอว ตตฺถ เอโก สตฺโตติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ. ‘‘สงฺขฺยํ คจฺฉตี’’ติ จ ปญฺญตฺติมตฺตํ คจฺฉตีติ อธิปฺปาโย. เตสุ จ กาเยสุ รูปกาเย จุติ ปฏิสนฺธีนํ อญฺญมญฺญํ อนนฺตร ปจฺจยตา นาม นตฺถิ. เอกเมกสฺมึ ภเว เอกเมโก หุตฺวา จุติกาเล ภิชฺชติ. รูปสนฺตติ ฉิชฺชติ. ปฏิสนฺธิรูเปน สห ปจฺจย ปจฺจยุปฺปนฺนตา ปพนฺโธ นปฺปวตฺตติ. นาม กาเย ปน จุติ ปฏิสนฺธีนํ อญฺญมญฺญํ อนนฺตรปจฺจยตา อตฺถิ. จุติกาเลปิ นามสนฺตติ น ฉิชฺชติ. ปฏิสนฺธิ นาเมน สห ปจฺจย ปจฺจยุปฺปนฺนตา ปพนฺโธ ปวตฺตติเยว. ตตฺถ ปฏิจฺจสมุปฺปาท กุสโล ภิกฺขุ ปฏิจฺจสมุปฺปาทญฺญาเณ ฐตฺวา เอกสฺมึภเว เอกสฺส สตฺตสฺส ปวตฺตึ ปสฺสนฺโต สตฺตํ นาม น ปสฺสติ. ปุคฺคลํ นาม น ปสฺสติ. อหนฺติปิ น ปสฺสติ. ปโรติปิ น ปสฺสติ. อหํ อตีเตสุ ภเวสุ อโหสินฺติปิ น ปสฺสติ. อิมสฺมึภเว อสฺมีติปิ น ปสฺสติ. อนาคเตสุ ภวิสฺสามีติปิ น ปสฺสติ. อถ โข อวิชฺชา ปจฺจยา สงฺขารา ปวตฺตนฺติ. สงฺขาร ปจฺจยา ภวนฺตเร วิญฺญาณํ ปวตฺตตีติอาทินา นเยน นามรูป ธมฺมานํ เหตุผล ปรมฺปราวเสน อวิจฺเฉทปฺปวตฺติเมว ปสฺสติ. เอกสฺมึภเว ปวตฺตึ ปสฺสนฺเต สติ, อนมตคฺเคสํสาเร อนนฺเตสุ ภเวสุ ตสฺส สตฺตสฺส ปวตฺติ ทิฏฺฐา เอว โหติ ตตฺถปิ เอวเมว, ตตฺถปิ เอวเมวาติ. ตทา ตสฺส โสฬสวิธา กงฺขา ปหียตีติ อิมมตฺถํ ‘‘ทสฺเสนฺโต อนมตคฺเค สํสาเร’’ติอาทิมาห. ตตฺถ กตมา โสฬสวิธา กงฺขาติ. อโหสึ นุ โข อหํ อตีตมทฺธานํ. น นุ โข อโหสึ. กึ นุ โข อโหสึ. กถํ นุ โข อโหสึ. กึ หุตฺวา กึ อโหสึ นุ โข อหํ อตีตมทฺธานนฺติ เอวํ ปุพฺพนฺเต ปญฺจวิธา กงฺขาวุตฺตา. ภวิสฺสามิ นุ โข อหํ อนาคตมทฺธานํ. น นุ โข ภวิสฺสามิ. กึ นุ โข ภวิสฺสามิ. กถํ นุ โข ภวิสฺสามิ. กึ หุตฺวา กึ ภวิสฺสามิ นุ โข อหํ อนาคตมทฺธานนฺติ เอวํ อปรนฺเต ปญฺจวิธา กงฺขา วุตฺตา[Pg.297]. อหํ นุ โข สฺมิ. โน นุ โข สฺมิ. กินฺนุ โข สฺมิ. กถํ นุ โข สฺมิ. อหํ นุ โข สตฺโต กุโต อาคโต. โส กุหึ คามี ภวิสฺสามีติ เอวํ ปจฺจุปฺปนฺเน ฉพฺพิธา กงฺขา วุตฺตา. อิมา โสฬสวิธา กงฺขาติ. ตตฺถ อโหสึ นุ โข, น นุ โข อโหสินฺติ อิมินา ปททฺวเยน อตีตกาเล อตฺตโน อตฺถิ นตฺถิภาเว กงฺขติ. สเจ อตฺถิ, กึ นุ โข อโหสินฺติ กงฺขติ. เกนจิ เหตุนา ปจฺจเยน วา อโหสึ. เกนจิ อิทฺธิมนฺเตน วา นิมฺมิโต อโหสึ. อเหตุ อปจฺจยา วา อนิมฺมิโต วา สยํชาโต อโหสินฺติ อตฺโถ. ยทิ เตสุปกาเรสุ อญฺญตเรน อโหสึ. กถํ นุ โข อโหสึ. อปาทโกวา อโหสึ. ทฺวิปาทโก วา. จตุปฺปาทโกวา. พหุปฺปาทโกวา. รูปีวา. อรูปีวา. สญฺญีวา. อสญฺญีวา อิจฺจาทิ. อถ เตสุ อปาทกาทีสุ อญฺญตโร อหํ อโหสึ. กึ หุตฺวา กึ อโหสึ. ปถมภเว กึ หุตฺวา ทุตีย ภวาทีสุ กึ อโหสินฺติ อิทํ ภวปรมฺปราวเสน วุตฺตํ. เอสนโย อปรนฺเตปิ. ปจฺจุปฺปนฺเน ‘‘อหํ นุ โข สฺมิ, โน นุ โข สฺมี’’ติ ยถา ขุทฺทกวตฺถุ วิภงฺเค อฏฺฐสตตณฺหาวิจริเตสุ. สตสฺมีติ โหติ. สีตสฺมีติ โหตีติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘สตสฺมี’’ติ อหํ สสฺสโต วา ภวามิ. ‘‘สีตสฺมี’’ติ อหํ อุจฺฉินฺโนวา ภวามีติ อตฺโถ. ยถา จ. อตฺถีติ โข เอโก อนฺโต. นตฺถีติ โข ทุตีโย อนฺโตติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘อตฺถี’’ติ อตฺตานาม ภวาภเวสุ นิจฺจกาลํ อตฺถิ. ‘‘นตฺถี’’ติ ตถา นตฺถิ, อุจฺฉิชฺชติ. น โหติ ปรมฺมรณาติ อตฺโถ. ตถา อิธาปิ อหํ นุ โข สฺมิ. โน นุ โข สฺมีติ กงฺขติ. ตตฺถ ‘‘อหํ นุ โขสฺมี’’ติ อยํ อหํ นาม ภวาภเวสุ นิจฺจกาลํ อสฺมิ นุ โข, มม อตฺตานาม สสฺสโต หุตฺวา สพฺพกาลํ อตฺถิ นุ โขติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘โน นุ โข สฺมี’’ติ ตถา โน อสฺมิ นุ โข. มม อตฺตา ตถา นตฺถิ นุ โขติ อตฺโถ. เอตฺถ จ ‘‘ภวาภเวสู’’ติ ปวตฺเตปิ ปจฺจุปฺปนฺเน วตฺตมานํ อตฺตานํ คเหตฺวา ปวตฺตา ปจฺจุปฺปนฺเน สงฺคหิตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘กึ นุ โข สฺมี’’ติ อหํ นาม สนฺโต ชาโต กึ นุ โข อสฺมิ. เกนจิ เหตุนา ปจฺจเยน วา อสฺมิ นุ โข. เกนจิ อิทฺธิมนฺเตน วา นิมฺมิโต ภวามิ นุ โข. อุทาหุ อเหตุ อปจฺจยา วา [Pg.298] เกนจิ อนิมฺมิโต วา สยํ นุ โข ภวามิ นุ โขติ อตฺโถ. ‘‘กถํ นุ โข สฺมี’’ติ เอตฺถ ปน อปทาทีหิ อโยเชตฺวา อหํ นุ โข กึ โคตฺโต ภวามิ. โคตมโคตฺโต วา วาเสฏฺฐ โคตฺโต วา ติอาทินา โยเชตพฺพํ. อาทิ กปฺปกาเล ตานิ โคตฺตานิ เอตรหิ สมฺเภทํ คจฺฉนฺติ. ตสฺมา เตสุ กงฺขนฺโต กงฺขติเยว. ‘‘อหํ กุโต อาคโต’’ติ อหํ อตีเต กุโตภวโต อาคโต อสฺมิ. ‘‘โสกุหึคามี ภวิสฺสามี’’ติ โส อหํ อายตึ ภเว กุหึ คามิโก ภวิสฺสามีติ กงฺขติ. ‘‘กงฺขาย อติกฺกโม’’ติ โส ภิกฺขุ ปฏิจฺจสมุปฺปาเท อวิชฺชาทิกํ อตีตเหตุ ปญฺจกํ ปสฺสนฺโต ตสฺมึภเว สพฺพํปิ ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ ปสฺสติเยว. เอวํ ปสฺสนฺโต น ตตฺถ อหํ นาม โกจิ อตฺถิ, ยํ ปฏิจฺจ อตีต วิสยา ปญฺจวิธา กงฺขา อุปฺปชฺชติ. ธมฺม มตฺตเมว ตตฺถ อตฺถีติ เอวํ อตีเต กงฺขา วตฺถุสฺส อภาวทสฺสเนน ปญฺจวิธาย กงฺขาย อติกฺกโม โหติ. นนุ ตถา ปสฺสนฺตสฺสปิ กถํ นุ โข สฺมิ, กึ หุตฺวา กึ อโหสึ นุ โขติ อยํ กงฺขา อตฺถิเยว. ตถา ปสฺสนฺโตปิ หิ วินา ปุพฺเพนิวาสญฺญาเณน อตีเต ภเว อหํ ทฺวิปาทโก อโหสินฺติวา จตุปฺปาทโก อโหสินฺติ วา ตโต จุโต อสุกภเว อุปฺปนฺโนติ วา น ชานาติ น ปสฺสตีติ. วุจฺจเต. สา ปน กงฺขา ธมฺม มตฺตปฺปวตฺติ ทสฺสนโต ปฏฺฐาย อนฺตรายิก กงฺขา น โหติ. วิจิกิจฺฉา ปฏิรูปิกา เอว. สา หิ อริยานํปิ ลพฺภติ เยวาติ. ตถา อนาคเต ผลปญฺจกํ ปสฺสนฺโต อปรนฺเต ปญฺจวิธํ กงฺขํ อติกฺกมติ. ปจฺจุปฺปนฺเน ผลปญฺจกญฺจ เหตุปญฺจกญฺจ ปสฺสนฺโต ปจฺจุปฺปนฺเน กงฺขา ฉกฺกํ อติกฺกมติ. เสสํ สพฺพํ ปุพฺพนฺเต วุตฺตนยเมวาติ. อฏฺฐวิธาย กงฺขาย อติกฺกมเน ปน ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ อนุโลมปฺปฏิโลมํ ปสฺสนฺโต เทสนา ธมฺเม จ โลกุตฺตร ธมฺเมสุ จ กงฺขํ อติกฺกมติ. ธมฺเม กงฺขาติกฺกมเนน สเหว เทเสนฺเต สตฺถริ จ, ยถานุสิฏฺฐํ ปฏิปนฺเน สงฺเฆ จ, ตีสุ สิกฺขาสุ จ, ยถาวุตฺเต ปุพฺพนฺเต จ, อปรนฺเต จ, ปุพฺพนฺตา ปรนฺเตสุ จ, ปฏิจฺจสมุปฺปาเทน สห ปฏิจฺจสมุปฺปนฺเนสุ ธมฺเมสุ จ สพฺพํ กงฺขํ อติกฺกมติเยว. เตนาห ‘‘สภาว [Pg.299] ธมฺมปฺปวตฺติยา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘สภาวธมฺมปฺปวตฺติยา จา’’ติ ปจฺจยปรมฺปราวเสน สภาวธมฺมานํ ปรมฺปรปฺปวตฺติยา จ. ธมฺมสุ ธมฺมตา นาม เทสนา ธมฺมสฺส สฺวากฺขาตตาทิภาเวน สุนฺทร ธมฺมตา. อนวชฺชธมฺมตา. พุทฺธสุพุทฺธตา นาม ตํ ธมฺมํ เทเสนฺตสฺส พุทฺธสฺส สพฺพญฺญุพุทฺธตา. “कम्मचित्तोतुकाहारवसेन” (कर्म, चित्त, ऋतु आणि आहार यांच्या वशाने) येथे 'क' कार हा संधीच्या नियमाने आगम (नवीन वर्ण) म्हणून आला आहे. कर्मवश, चित्तवश, ऋतुवश आणि आहारवश असा याचा अर्थ आहे. अनुरूप प्रत्ययांची (कारणांची) सामग्री (एकत्र येणे) असा याचा विग्रह आहे. “अञ्ञथा पवत्तिया” (अन्यथा प्रवृत्तीने) म्हणजे दुसऱ्या प्रकारे प्रवृत्त होणे. “हेतुसम्भारपच्चयेहि” म्हणजे हेतूप्रत्यय आणि संभारप्रत्ययांद्वारे. जनक प्रत्ययांना (उत्पादक कारणांना) 'हेतुप्रत्यय' म्हणतात. परिवार प्रत्ययांना (सहाय्यक कारणांना) 'संभारप्रत्यय' म्हणतात. “कम्मपवत्तिया” म्हणजे कर्माच्या प्रवृत्तीने. “विपाकपवत्तिया” म्हणजे विपाकाच्या (परिणामाच्या) प्रवृत्तीने. अनादी (अनमतग्ग) संसारात भटकणाऱ्या एका प्राण्याचा (सत्त्वाचा) रूपकायही असतो आणि नामकायही असतो. त्याव्यतिरिक्त दुसरा कोणताही स्वभाव (अस्तित्व) नसतो. पंचवोकार (पाच स्कंध असलेल्या) भूमीत संसरण करणाऱ्याचे हे दोन्ही काय एकत्र प्रवृत्त होतात. असंज्ञसत्तात (केवळ रूप असलेल्या देवलोकात) संसरण करणाऱ्याचा केवळ रूपकायच प्रवृत्त होतो. त्यालाच तेथे 'एक सत्त्व' अशी संज्ञा दिली जाते. अरूपलोकात संसरण करणाऱ्याचा केवळ नामकायच प्रवृत्त होतो. त्यालाच तेथे 'एक सत्त्व' अशी संज्ञा दिली जाते. “संख्येला (संज्ञेला) प्राप्त होतो” याचा अर्थ केवळ प्रज्ञप्तीला (नावाला) प्राप्त होतो असा आहे. आणि त्या कायांपैकी रूपकायात च्युती (मृत्यू) आणि प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) यांच्यात परस्परांमध्ये 'अनन्तरप्रत्ययता' (तात्काळ लागोपाठ असणारा संबंध) नसते. प्रत्येक जन्मात तो एकटाच होऊन च्युतीसमयी नष्ट होतो. रूपसंतती खंडित होते. प्रतिसंधी रूपासोबत कार्य-कारणभावाचा (प्रत्यय-प्रत्ययोत्पन्न) प्रवाह प्रवृत्त होत नाही. परंतु नामकायात च्युती आणि प्रतिसंधी यांच्यात परस्परांमध्ये अनन्तरप्रत्ययता असते. च्युतीसमयीसुद्धा नामसंतती खंडित होत नाही. प्रतिसंधी नामासोबत कार्य-कारणभावाचा प्रवाह प्रवृत्त राहतोच. तेथे प्रतीत्यसमुत्पादात कुशल असलेला भिक्खू प्रतीत्यसमुत्पाद-ज्ञानात स्थित राहून, एका जन्मात एका प्राण्याची प्रवृत्ती पाहत असताना, 'सत्त्व' (प्राणी) नावाचे काही पाहत नाही. 'पुद्गल' (व्यक्ती) नावाचे काही पाहत नाही. 'मी' असेही पाहत नाही, 'दुसरा' असेही पाहत नाही. 'मी भूतकाळातील जन्मांमध्ये होतो' असेही पाहत नाही. 'या जन्मात मी आहे' असेही पाहत नाही. 'भविष्यात मी होईन' असेही पाहत नाही. तर केवळ 'अविद्येच्या प्रत्ययाने (कारणाने) संस्कार प्रवृत्त होतात, संस्कारांच्या प्रत्ययाने दुसऱ्या जन्मात विज्ञान प्रवृत्त होते' इत्यादी पद्धतीने नाम-रूप धर्मांच्या हेतू-फल परंपरेनुसार अखंड प्रवृत्तीच पाहतो. एका जन्मातील प्रवृत्ती पाहिली असता, अनादी संसारात अनंत जन्मांमध्ये त्या सत्त्वाची प्रवृत्ती पाहिलेलीच असते की, 'तेथेही असेच होते, तेथेही असेच होते'. तेव्हा त्याची सोळा प्रकारची शंका (कांक्षा) नष्ट होते, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी “अनादी संसारात” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे सोळा प्रकारची शंका कोणती? 'मी भूतकाळात होतो का? मी नव्हतो का? मी काय होतो? मी कसा होतो? मी काय होऊन काय झालो होतो का?' अशा प्रकारे भूतकाळाविषयी (पूर्वांताविषयी) पाच प्रकारची शंका सांगितली आहे. 'मी भविष्यकाळात होईन का? मी होणार नाही का? मी काय होईन? मी कसा होईन? मी काय होऊन काय होईन का?' अशा प्रकारे भविष्यकाळाविषयी (अपरांताविषयी) पाच प्रकारची शंका सांगितली आहे. 'मी आहे का? मी नाही का? मी काय आहे? मी कसा आहे? मी सत्त्व कोठून आलो? आणि तो मी कोठे जाणारा होईन?' अशा प्रकारे वर्तमानकाळाविषयी सहा प्रकारची शंका सांगितली आहे. या सोळा प्रकारच्या शंका आहेत. त्यामध्ये 'मी होतो का, मी नव्हतो का' या दोन पदांनी भूतकाळात स्वतःच्या असण्या-नसण्याबद्दल शंका घेतो. जर होतो, तर 'मी काय होतो' अशी शंका घेतो. 'मी कोणत्या हेतूने किंवा प्रत्ययाने (कारणाने) होतो? की कोणत्या ऋद्धीमान (चमत्कारी) पुरुषाने निर्माण केलेला होतो? की हेतू आणि प्रत्ययाशिवाय, कोणाकडूनही निर्माण न केला जाता स्वतःच उत्पन्न झालेला होतो?' असा याचा अर्थ आहे. जर त्या प्रकारांपैकी कोणत्याही एका प्रकारे मी होतो, तर 'मी कसा होतो? मी पाय नसलेला (अपादक) होतो का? द्विपद (दोन पायांचा) होतो का? चतुष्पद (चार पायांचा) होतो का? बहुपद (अनेक पायांचा) होतो का? रूपी (शरीर असलेला) होतो का? अरूपी होतो का? संज्ञी (संज्ञा असलेला) होतो का? असंज्ञी होतो का?' इत्यादी. आणि जर त्या अपादक इत्यादींपैकी मी कोणी एक होतो, तर 'मी काय होऊन काय झालो होतो? पहिल्या जन्मात काय होऊन दुसऱ्या जन्मात काय झालो होतो?' हे जन्मपरंपरेच्या वशाने सांगितले आहे. हाच नियम भविष्यकाळासाठीही (अपरांतासाठीही) लागू होतो. वर्तमानकाळात “मी आहे का, मी नाही का” हे जसे खुद्दकवत्थु विभंगात एकशे आठ तण्हा-विचरितांमध्ये (तृष्णा-विचारांमध्ये) 'सतस्मि' (मी नित्य आहे) आणि 'सीतस्मि' (मी उच्छिन्न आहे) असे म्हटले आहे. तेथे “सतस्मि” म्हणजे 'मी शाश्वत आहे' आणि “सीतस्मि” म्हणजे 'मी उच्छिन्न (नष्ट होणारा) आहे' असा अर्थ आहे. आणि जसे 'आहे' हा एक अंत (अतिरेक) आहे, 'नाही' हा दुसरा अंत आहे, असे म्हटले आहे. तेथे “आहे” म्हणजे 'आत्मा नावाचा पदार्थ विविध जन्मांमध्ये नित्यकाळ असतो'. “नाही” म्हणजे 'तसा आत्मा नसतो, तो नष्ट होतो, मृत्यूनंतर काही उरत नाही' असा अर्थ आहे. तसेच येथेही 'मी आहे का, मी नाही का' अशी शंका घेतो. तेथे “मी आहे का” म्हणजे 'हा मी नावाचा विविध जन्मांमध्ये नित्यकाळ आहे का, माझा आत्मा नावाचा पदार्थ शाश्वत होऊन सर्वकाळ अस्तित्वात आहे का' असे म्हटले आहे. “मी नाही का” म्हणजे 'तसा मी नाही का, माझा आत्मा तसा अस्तित्वात नाही का' असा अर्थ आहे. आणि येथे “भवाभवांमध्ये” (विविध जन्मांमध्ये) असे म्हटले असले तरी, वर्तमानकाळात विद्यमान असलेल्या आत्म्याला ग्रहण करून प्रवृत्त झाल्यामुळे हे वर्तमानकाळातच समाविष्ट आहे असे समजावे. “मी काय आहे?” म्हणजे 'मी नावाचा अस्तित्वात आलेला प्राणी काय आहे? मी कोणत्या हेतूने किंवा प्रत्ययाने आहे का? कोणत्या ऋद्धीमान पुरुषाने निर्माण केलेला आहे का? अथवा हेतू आणि प्रत्ययाशिवाय, कोणाकडूनही निर्माण न केला जाता स्वतःच उत्पन्न झालेला आहे का?' असा अर्थ आहे. “मी कसा आहे?” येथे मात्र अपादक इत्यादींशी संबंध न जोडता, 'मी कोणत्या गोत्राचा आहे? गौतम गोत्राचा की वासिष्ठ गोत्राचा?' इत्यादींशी संबंध जोडावा. कल्पारंभी ती गोत्रे आता संमिश्र झाली आहेत, म्हणून त्यांच्याविषयी शंका घेणारा शंकाच घेत राहतो. “मी कोठून आलो?” म्हणजे 'मी भूतकाळात कोणत्या जन्मातून आलो आहे?' “तो मी कोठे जाणारा होईन?” म्हणजे 'तो मी भविष्यातील जन्मात कोठे जाणारा होईन?' अशी शंका घेतो. “शंकेचे उल्लंघन (पार करणे)” म्हणजे तो भिक्खू प्रतीत्यसमुत्पादात अविद्या इत्यादी पाच भूतकालीन हेतूंना पाहत असताना, त्या जन्मातील संपूर्ण प्रतीत्यसमुत्पादच पाहतो. असे पाहत असताना, तेथे 'मी' नावाचे कोणीही नाही, ज्याला अनुसरून भूतकाळाविषयी पाच प्रकारची शंका उत्पन्न व्हावी. तेथे केवळ 'धर्ममात्र' (केवळ नाम-रूप धर्म) च अस्तित्वात आहे, अशा प्रकारे भूतकाळातील शंकेच्या विषयाचा अभाव पाहिल्याने पाच प्रकारच्या शंकेचे उल्लंघन होते. पण असे पाहणाऱ्यालाही 'मी कसा होतो, मी काय होऊन काय झालो होतो' अशी शंका असतेच ना? कारण असे पाहणाराही पूर्वनिवास-ज्ञानाशिवाय (पूर्वजन्मांच्या स्मृतीशिवाय) भूतकाळातील जन्मात 'मी द्विपद होतो की चतुष्पद होतो, किंवा तेथून च्युत होऊन अमुक जन्मात उत्पन्न झालो' हे जाणत नाही आणि पाहत नाही. यावर उत्तर दिले जाते: ती शंका केवळ धर्ममात्राच्या प्रवृत्तीचे दर्शन झाल्यापासून अंतरायिक (मार्गात बाधा आणणारी) शंका ठरत नाही. ती केवळ संशयासारखी (विचिकित्सा प्रतिरूपक) भासते. कारण ती आर्यांनाही (अरिहंतांशिवाय इतर आर्य पुद्गलांना) प्राप्त होतेच. तसेच भविष्यकाळातील पाच फळांना पाहत असताना तो भविष्यकाळाविषयीच्या (अपरांताविषयीच्या) पाच प्रकारच्या शंकेचे उल्लंघन करतो. वर्तमानकाळातील पाच फळे आणि पाच हेतूंना पाहत असताना तो वर्तमानकाळाविषयीच्या सहा प्रकारच्या शंकेचे उल्लंघन करतो. उर्वरित सर्व भूतकाळाविषयी (पूर्वांताविषयी) सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. आठ प्रकारच्या शंकेचे उल्लंघन करण्याबाबत सांगायचे तर, प्रतीत्यसमुत्पादाला अनुलोम-प्रतिलोम (सरळ व उलट) पद्धतीने पाहत असताना तो देशना-धर्माविषयी आणि लोकोत्तर धर्मांविषयीच्या शंकेचे उल्लंघन करतो. धर्मावरील शंकेच्या उल्लंघनासोबतच, धर्म उपदेश करणाऱ्या शास्त्यांवर (बुद्धांवर), उपदेशानुसार आचरण करणाऱ्या संघावर, तीन शिक्षांवर (शील, समाधी, प्रज्ञा), पूर्वोक्त भूतकाळावर, भविष्यकाळावर, भूत-भविष्यकाळावर, आणि प्रतीत्यसमुत्पादासह प्रतीत्यसमुत्पन्न धर्मांवर असणाऱ्या सर्व शंकांचे तो उल्लंघन करतोच. म्हणूनच “स्वभावधर्माच्या प्रवृत्तीने” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “स्वभावधर्माच्या प्रवृत्तीने” म्हणजे प्रत्यय-परंपरेच्या (कारण-परंपरेच्या) वशाने स्वभावधर्मांच्या निरंतर प्रवृत्तीने. धर्मांमधील 'धर्मता' म्हणजे देशना-धर्माच्या स्वाख्यात (सुस्पष्ट उपदेश) इत्यादी भावामुळे असणारी सुंदर धर्मता, अनवद्य (दोषरहित) धर्मता होय. 'बुद्ध-सुबुद्धता' म्हणजे त्या धर्माचा उपदेश करणाऱ्या बुद्धांची सर्वज्ञ-बुद्धता होय. ปริยุฏฺฐิตานํ ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉานํ วิกฺขมฺภนํ นาม เหฏฺฐา ธมฺมววตฺถาน วเสน ปจฺจยปริคฺคหวเสน จ สิชฺฌติ. วิปสฺสนา กมฺมํ ปน อนุสยภูตานํ ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉานํ สลฺลิขนตฺถาย กรียตีติ วุตฺตํ ‘‘อนุสย สมูหนนตฺถญฺจา’’ติอาทิ. ‘‘ตตฺถ ปนา’’ติ ตสฺมึ ปฏิสมฺภิทา มคฺเค ปน. วิภตฺเตสูติ ปาฐเสโส. ‘‘ยสฺสา’’ติ โยคี ปุคฺคลสฺส. ‘‘ยํ ทูเร สนฺติเกวา’’ติ ยํ ทูเร ปวตฺตํ รูปํ วา, สนฺติเก ปวตฺตํ รูปํวาติ ปาฐเสโส. ‘‘ตทตฺถสฺส ปนา’’ติ สมฺมสิตธมฺมุทฺธารตฺถสฺส. ‘‘ญาเณน ทฬฺหํ คเหตฺวา’’ติ ธมฺมววตฺถานญฺญาเณน สุฏฺฐุวิภูตํ กตฺวาติ อธิปฺปาโย. อิทานิ ยํ ยํ ทฬฺหํ คเหตพฺพํ. ตํ ตํ สรูปโต ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิมาห. ปุน ทฬฺหํ คหิตสฺส รูปสฺส อนิจฺจลกฺขณํ ทสฺเสตุํ ‘‘สา จ กฺริยา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘นสฺสนฺตี’’ติ ภิชฺชนฺติ. อนิจฺจตํ คจฺฉนฺติ. ‘‘วิตฺถมฺภน กฺริยา’’ติ เอตฺถ วิวิเธน ถมฺภนํ วิตฺถมฺภนํ. นานาทิสาภิมุขวเสน ถมฺภนํ วหนนฺติ อตฺโถ. ‘‘อิมาสญฺจา’’ติ จตุนฺนํ มหาภูตานญฺจ. วิสุํ วิสุนฺติ วุตฺตตฺตา ตาสํ อญฺญมญฺญญฺจ สหชาเตสุ คหณํ สมฺภวตีติ วุตฺตํ ‘‘อาปาทีนํ’’ติ. อาปาทีนํ เสสมหาภูตานญฺจาติ อตฺโถ. สนฺตติยา สรีรานิ สนฺตติ สรีรานิ. ‘‘ตถา ตถา กปฺเปตฺวา’’ติ รูปธมฺมานํ สนฺตติ ปริวตฺติ นาม อภิกฺกมนฺตสฺส เอวํ ภเวยฺย, ปฏิกฺกมนฺตสฺส เอวํ ภเวยฺย, ตถา สมิญฺชนฺตสฺส ปสาเรนฺตสฺสาติอาทินา ปริกปฺเปตฺวา. ‘‘เสสขนฺเธสุปิ ตํ ตํ สนฺตติ นานตฺตํ’’ติ เวทนากฺขนฺเธ ตาว กาเย กายิกสุขสนฺตติ ทุกฺขสนฺตตีนํ นานตฺตํ. จิตฺเต โสมนสฺส โทมนสฺส สนฺตตีนํ. อุเปกฺขา สนฺตติ ปน อวิภูตา โหติ. กปฺเปตฺวา คเหตพฺพา. ยทา จิตฺเต โสมนสฺส โทมนสฺสานิ น สนฺทิสฺสนฺติ, ตทา อิทานิ อุเปกฺขา เม เวทนา ปวตฺตตีติ วา, ยทา ตานิ สนฺทิสฺสนฺติ[Pg.300], ตทา สา นิรุชฺฌตีติ วา เอวํ ตกฺเกตฺวา สมฺมสิตพฺพาติ วุตฺตํ โหติ. สญฺญากฺขนฺเธ รูปสญฺญาสทฺทสญฺญาทีนํ วเสน. สงฺขารกฺขนฺเธ รูปสญฺเจตนา สทฺทสญฺเจตนาทีนํ วเสน, นานาวิตกฺก วิจาราทีนํ วเสน, โลภาโลภ โทสาโทส โมหาโมหาทีนํ วเสน จ. วิญฺญาณกฺขนฺเธ จกฺขุวิญฺญาณาทีนํ, กุสลา กุสลวิญฺญาณาทีนญฺจ วเสน สนฺตติ นานตฺตํ เวทิตพฺพํ. วิสฺสาสํ กโรตีติ วตฺวา ตทตฺถํ วิวรติ ‘‘เอตํ เม’’ติอาทินา. ตตฺถ ตโยวิสฺสาสา ตณฺหาวิสฺสาโส, มานวิสฺสาโส, ทิฏฺฐิวิสฺสาโส. ตตฺถ เอตํ มมาติ ตณฺหาวิสฺสาโส. เอโสหมสฺมีติ มานวิสฺสาโส. เอโส เม อตฺตาติ ทิฏฺฐิวิสฺสาโส. ‘‘ปริหรตี’’ติ ภวาภเวสุ ปริคฺคเหตฺวา หรติ วหติ. ‘‘ปรมชฺฌตฺตภาเวนา’’ติ ปธานอชฺฌตฺตภาเวน. อชฺฌตฺตสารภาเวนาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปริคฺคหิโต’’ติ เอโส เม อตฺตาติ ทิฏฺฐิปริคฺคเหน ปริคฺคหิโต. ตโย หิ ปริคฺคหา ตณฺหา ปริคฺคโห, มานปริคฺคโห, ทิฏฺฐิปริคฺคโหติ. วเส สพฺพโส วตฺตนฺโต นาม เกวลํ วสายตฺตวุตฺติโก เอว สิยา, น ปจฺจยายตฺตวุตฺติโกติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยถาวุตฺเตหี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘ยถาวุตฺเตหี’’ติ สพฺพสงฺคเห วุตฺตปฺปกาเรหิ กมฺมาภิสงฺขรณาทีหิ. ‘‘ตถาปริคฺคเหตพฺโพ’’ติ เอโส เม อตฺตาติ เอวํ ปรมชฺฌตฺตภาเวน ปริคฺคเหตพฺโพ. ตถา หิ โย อตฺตโน วเสน วตฺตติ, ตสฺมึ อตฺตโน สามิภาโว นตฺถิ. ยสฺมิญฺจ สามิภาโว นตฺถิ, ตสฺมึ รูปาทิเก ธมฺเม อตฺตานํ สามิกํ กตฺวา เอโส มม อตฺตาติ ปริคฺคโห นาม มิจฺฉา เอว. ตถา โย จ ขณิก ธมฺโม โหติ, ขเณ ขเณ ภิชฺชติ, ตํ รูปาทิกํ ขนฺธปญฺจกํ อตฺตโน สารํ กตฺวา ตถา ปริคฺคโหปิ มิจฺฉา เอว. เอตฺถ จ ‘‘มิจฺฉา เอวา’’ติ ปรมตฺถ สจฺจํ ปตฺวา มิจฺฉา เอว. วิปลฺลาโส เอวาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘สุขํ วิทฺธํเสตี’’ติ กายิกสุขญฺจ เจตสิก สุขญฺจ วิทฺธํเสติ. วินาเสติ. ‘‘นานาทุกฺขํ ชเนตี’’ติ กายิกทุกฺขญฺจ เจตสิก ทุกฺขญฺจ ชเนติ อุปฺปาเทติ. ‘‘อิทญฺจ รูปํ เอทิสเมว โหตี’’ติ กถํ โหติ. มนุสฺสตฺตภาเว ฐิตานํ สตฺตานํ ยถาปวตฺตํ [Pg.301] มนุสฺส สุขํ วิทฺธํเสติ, ชิณฺณภินฺนภาวํ ปาเปติ, นานาทุกฺขํ ชเนติ. สยํ อปายตฺตภาวํ คเหตฺวา เตสํ นานาอปาย ทุกฺขํ ชเนติ. ตถา เทวตฺตภาเว สกฺกตฺตภาเว พฺรหฺมตฺตภาเว ฐิตานนฺติอาทินา วตฺตพฺพํ. ตถา มนุสฺสตฺตภาเว ฐิตานํ นานาวิปริณาม กิจฺเจหิ ยถาปวตฺตํ สุขํ วิทฺธํเสติ, นานาปจฺจยาภิสงฺขรณกิจฺเจหิ นานาทุกฺขํ ชเนติ. เตน วุตฺตํ ‘‘อิทญฺจ รูปํ เอทิสเมวา’’ติ. ‘‘สาโรนาม ถามพลวิเสโส วุจฺจตี’’ติ เอเตน ถามพลวิเสเสน สมฺปนฺนํ วตฺถุํปิ สงฺคณฺหาติ. ‘‘อสารกฏฺเฐนา’’ติ เอตฺถ สาโร เอว สารกํ, น สารกํ อสารกนฺติ อิมมตฺถํ สนฺธาย ‘‘รูปํ ปน สยํปิ เอวรูโป สาโร น โหตี’’ติ วุตฺตํ. สตฺตานํ อตฺตสาโร ชีวสาโร น โหตีติ อตฺโถ. นตฺถิ สาโร เอตสฺสาติ อสารกนฺติ อิมมตฺถํ สนฺธาย ‘‘น จ เอวรูเปน สาเรน ยุตฺตํ’’ติ วุตฺตํ. อตฺตสาเรน ชีวสาเรน สํยุตฺตํ โหตีติ อตฺโถ. ตตฺถ ปุริโม อตฺโถ รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสตีติ อิทํ สนฺธาย วุตฺโต. ปจฺฉิโม รูปวนฺตํ วา อตฺตานํ, อตฺตนิ วา รูปํ, รูปสฺมึ วา อตฺตานํติ อิมานิ สนฺธาย วุตฺโต. เอเตน อสารกฏฺเฐนาติ อสารภาเวน, อสารยุตฺตภาเวน วาติ จ. อนตฺตาติ เอตฺถปิ น อตฺตา อนตฺตา, นตฺถิ อตฺตา เอตสฺสาติ วา อนตฺตาติ จ ทฺวิธา อตฺโถ สิชฺฌติ. ‘‘ยญฺจา’’ติ ยญฺจ รูปํ. ‘‘ปีเฬตี’’ติ ตํ สมงฺคี ปุคฺคลํ ปีเฬติ. เอเตน อนตฺตภาเว สิทฺเธ ทุกฺขภาโวปิ สิทฺโธติ ทสฺเสติ. ‘‘ติณฺณํ วยานํ วเสน อทฺธาเภโท โยเชตพฺโพ’’ติ ปถมวเย ปวตฺตํ รูปํ ทุตียวยํ น ปาปุณาติ, ปถมวเย เอว นิรุชฺฌตีติอาทินา อทฺธาปจฺจุปฺปนฺเน อนฺโตคธเภโท โยเชตพฺโพ. ‘‘สภาเคกสนฺตานวเสนา’’ติ สภาคานํ ธมฺมานํ สภาคฏฺเฐน เอกีภูตา สนฺตติ สภาเคกสนฺตติ. ‘‘สภาคานํ ธมฺมานํ’’ติ จ จิตฺตเชสุตาว นิรนฺตรปฺปวตฺเตน โลภสมฺปยุตฺตจิตฺเตน สหชาตา รูปธมฺมา สภาครูปธมฺมา นาม. ตถา นาม ธมฺมา จ. เอวํ โทสสมฺปยุตฺตาทีสุปิ. อุตุเชสุ นิรนฺตรปฺปวตฺเตน สีตอุตุนา สมุฏฺฐิตา รูปธมฺมา สภาครูป ธมฺมา นาม. ตถา อุณฺหอุตุนา สมุฏฺฐิตา. เอสนโย อาหารเชสุปีติ [Pg.302] เอวํ สภาเคกสนฺตติวเสน. ‘‘สมฺปาปุณิตุํ’’ติ ญาเณน สมฺปาปุณิตุํ. ‘‘อทฺธาสนฺตติวเสนา’’ติ เอตฺถ สนฺตติวเสน สมฺมสนํ วิเสสโต อธิปฺเปตํ. เอวญฺจ กตฺวา เหฏฺฐา อนิจฺจํ ขยฏฺเฐนาติ ปเท จตุนฺนํ มหาภูตานํ สนฺตติ วิภาคนโย สุฏฺฐุ ทสฺสิโตติ. ‘‘อนิจฺจลกฺขณ ทสฺสนเมว ปธานํ’’ติ อิมสฺมึ ญาเณปิ อุทยพฺพยญฺญาเณปิ ภงฺคญฺญาเณปิ อนิจฺจลกฺขณ ทสฺสนเมว ปธานํ. ภยญฺญาเณ จ อาทีนวญฺญาเณ จ นิพฺพิทาญาเณ จ ทุกฺขลกฺขณ ทสฺสนํ ปธานํ. อุปริ จตูสุ ญาเณสุ อนตฺตลกฺขณ ทสฺสนํ ปธานนฺติ. ‘‘สมุทิเตสู’’ติ อญฺญมญฺญํ อวินาภาวสหายภาเวน สมุปฺปนฺเนสุ. อิทญฺจ อวิชฺชาสมุทยา รูปสมุทโย. ตณฺหาสมุทยา อุปาทาน สมุทโย. อาหาร สมุทยา รูปสมุทโยติ ปาฬิวเสน วุตฺตํ. อปฺปหีน วเสนาติ ปาฬิปเท ปน อวิชฺชา ตณฺหา ทิฏฺฐานุสยานํ อปฺปหีนฏฺเฐน สนฺตาเน วิชฺชมานตา เอว ปมาณนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘สมุเทนฺตี’’ติ ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาย เอกโต อุเทนฺติ. อุปรูปริ เอนฺติ. อาคจฺฉนฺตีติ อตฺโถ. เอกภวภาเวน ปาตุพฺภวนฺตีติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘ยาวมรณกาลา’’ติอาทึ. ‘‘ปสวนฺตี’’ติ ปวฑฺฒมานา สวนฺติ, ปวตฺตนฺติ, สนฺทนฺติ. ‘‘เตสุ ปนา’’ติ อวิชฺชา ตณฺหุปาทาน กมฺเมสุ. ‘‘นิรุชฺฌนฺตี’’ติ ตสฺมึภเว เอว นิรุชฺฌนฺติ. ตสฺมึ ภเว นิโรโธ นาม ภวนฺตเร ปุน อนุปฺปาโท เยวาติ วุตฺตํ ‘‘ภวนฺตเร’’ติอาทิ. ‘‘ตํ สนฺตติยํ’’ติ ตสฺมึ ปจฺจุปฺปนฺน ภเวติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปุน อนุปฺปาทสงฺขาตํ นิโรธํ’’ติ สนฺตติ นิโรโธ นาม วุตฺโต. น นิพฺพาน นิโรโธ. เอตาหิ ปจฺจเย สติ, ภวนฺตเร อุปฺปชฺชีสฺสนฺติ เยวาติ. อิทานิ ยถาปวตฺต สนฺตตีสุ ปริยาปนฺนานํ สพฺพปจฺฉิมานํ นามรูปานํ ขณิกนิโรธวเสน อตฺถํ วทนฺโต ‘‘ยถาปวตฺต สนฺตติโย วา ฉิชฺชนฺติ ภิชฺชนฺตี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘อุทยพฺพยํ สมนุปสฺสนฺตสฺส จา’’ติ เอตฺถ กตโม อุทโย นาม, กตโม วโย นาม, กถญฺจ ตทุภยํ สมนุปสฺสตีติ อาห ‘‘อุทยพฺพยํ ปสฺสนฺตสฺสาติ เอตฺถ ยถา นามา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘ตโม ขนฺโธ’’ติ ตโมราสิ. ‘‘เวตี’’ติ วิคจฺฉติ. อนฺตร ธายติ[Pg.303].‘‘อุทโย’’ติ อุปฺปาโท เจว วฑฺฒิ จ. ‘‘วโย’’ติ วิคมนํ, อนฺตรธานํ. ‘‘นานาปโยควเสนวา’’ติ สมิญฺชนปฺปสารณาทิ นานาปโยควเสน วา. อุทยปกฺขานํ นานาสนฺตตีนํ อุทยญฺจ อุทยโต. วยปกฺขานํ นานาสนฺตตีนํ วยญฺจ วยโตติ โยชนา. प्रकट झालेल्या (किंवा सक्रिय असलेल्या) दृष्टी (चुकीची मते) आणि विचिकित्सेचे (शंकेचे) विक्खंभन (दमन) हे खाली (पूर्वी सांगितलेल्या) धम्मववत्थान (धर्मांचे निर्धारण) आणि पच्चयपरिग्गह (प्रत्यय-परिग्रह/कारणांचे आकलन) यांच्याद्वारे साध्य होते. परंतु, अनुसय (सुप्त क्लेश) रूपात असलेल्या दृष्टी आणि विचिकित्सेचे सल्लेखन (उन्मूलन/क्षय) करण्यासाठी विपश्यना कर्म केले जाते, म्हणूनच "अनुसय समूहननत्थञ्च" (अनुसयांचे समूळ उच्चाटन करण्यासाठी) इत्यादी म्हटले आहे. "तत्थ पन" म्हणजे त्या पटिसम्भिदामग्गात. "विभत्तेसु" हा उर्वरित पाठ आहे. "यस्स" म्हणजे योगी पुद्गलाचा (साधकाचा). "यं दूरे सन्तिके वा" म्हणजे जे दूर असलेले रूप किंवा जवळ असलेले रूप, हा उर्वरित पाठ आहे. "तदत्थस्स पन" म्हणजे संमसन (परीक्षण) केलेल्या धर्मांच्या उद्धारासाठी (स्पष्ट करण्यासाठी). "ञाणेन दळ्हं गहेत्वा" (ज्ञानाने घट्ट पकडून) याचा अर्थ धम्मववत्थान-ज्ञानाने (धर्मांच्या निर्धारणाच्या ज्ञानाने) ते चांगल्या प्रकारे स्पष्ट करून, असा अभिप्राय आहे. आता ज्या ज्या गोष्टी दृढतेने ग्रहण करायच्या आहेत, त्या त्या त्यांच्या मूळ रूपात दाखवण्यासाठी "तत्थ" इत्यादी म्हटले आहे. पुन्हा, दृढतेने ग्रहण केलेल्या रूपाचे अनिच्चलक्खण (अनित्य लक्षण) दाखवण्यासाठी "सा च क्रिया" इत्यादी म्हटले आहे. "नस्सन्ति" म्हणजे नष्ट होतात, अनित्यतेला प्राप्त होतात. "वित्थम्भन क्रिया" येथे विविध प्रकारे स्तंभन (थोपवणे/दृढ करणे) म्हणजे वित्थम्भन होय. वेगवेगळ्या दिशांच्या अभिमुखतेने स्तंभन करणे किंवा वहन करणे, असा याचा अर्थ आहे. "इमासञ्च" म्हणजे चार महाभूतांचे. 'वेगवेगळे' असे म्हटल्यामुळे, त्यांच्या परस्परांमध्ये आणि सहजात (एकत्र उत्पन्न होणाऱ्या) धर्मांमध्ये ग्रहण संभवते, म्हणून "आपादीनं" असे म्हटले आहे. याचा अर्थ आप-धातू (जलतत्त्व) इत्यादी आणि उर्वरित महाभूतांचा, असा आहे. संततीची (प्रवाहाची) शरीरे म्हणजे संतती-शरीरे होत. "तथा तथा कप्पेत्वा" म्हणजे रूपधर्मांच्या संततीचे परिवर्तन (बदल) हे पुढे जाणाऱ्याचे असे असेल, मागे जाणाऱ्याचे असे असेल, तसेच आकुंचन करणाऱ्याचे आणि प्रसरण करणाऱ्याचे असे असेल, इत्यादी प्रकारे कल्पून (विचार करून). "शेतखंधेषुपि तं तं सन्तति नानत्तं" (उर्वरित स्कंधांमध्येही त्या त्या संततीची विविधता असते) म्हणजे वेदनास्कंधात आधी शरीरामध्ये कायिक सुख-संतती आणि कायिक दुःख-संततीची विविधता असते; चित्तामध्ये सोमनस्य (आनंद) आणि दोमनस्य (खिन्नता) यांच्या संततीची विविधता असते. परंतु उपेक्षा-संतती ही अस्पष्ट (अविभूत) असते. ती कल्पनेने (तर्काने) ग्रहण करावी लागते. जेव्हा चित्तामध्ये सोमनस्य आणि दोमनस्य दिसत नाहीत, तेव्हा "आता माझी उपेक्षा वेदना प्रवृत्त होत आहे" असे, किंवा जेव्हा ती दिसततात, तेव्हा "ती (उपेक्षा) निरुद्ध होते" असे, या प्रकारे तर्क करून संमसन (परीक्षण) करावे, असे म्हटले आहे. संज्ञास्कंधात रूपसंज्ञा, शब्दसंज्ञा इत्यादींच्या द्वारे; संस्कारस्कंधात रूपसंचेतना, शब्दसंचेतना इत्यादींच्या द्वारे, विविध वितर्क-विचार इत्यादींच्या द्वारे, आणि लोभ-अलोभ, द्वेष-अद्वेष, मोह-अमोह इत्यादींच्या द्वारे; आणि विज्ञानस्कंधात चक्षुविज्ञान इत्यादींच्या आणि कुशल-अकुशल विज्ञानांच्या द्वारे संततीची विविधता जाणून घ्यावी. "विश्वास करतो" असे सांगून त्याचा अर्थ "एतं मे" (हे माझे आहे) इत्यादींद्वारे स्पष्ट करतात. त्यामध्ये तीन प्रकारचे विश्वास आहेत: तण्हा-विश्वास (तृष्णा-विश्वास), मान-विश्वास आणि दिट्ठि-विश्वास (दृष्टी-विश्वास). त्यापैकी "हे माझे आहे" (एतं मम) हा तण्हा-विश्वास आहे. "हा मी आहे" (एसोहमस्मि) हा मान-विश्वास आहे. "हा माझा आत्मा आहे" (एसो मे अत्ता) हा दिट्ठि-विश्वास आहे. "परिहरति" म्हणजे वेगवेगळ्या भावांमध्ये (अस्तित्वांमधे) ग्रहण करून वाहून नेतो किंवा धारण करतो. "परमज्झत्तभावेन" म्हणजे मुख्य आध्यात्मिक (अंतर्गत) भावाने. याचा अर्थ अंतर्गत साररूपाने, असा आहे. "परिग्गहितो" म्हणजे "हा माझा आत्मा आहे" अशा दृष्टी-परिग्रहाने ग्रहण केलेला. कारण परिग्रह तीन आहेत: तण्हा-परिग्रह (तृष्णा-परिग्रह), मान-परिग्रह आणि दिट्ठि-परिग्रह (दृष्टी-परिग्रह). जो पूर्णपणे स्वतःच्या नियंत्रणात चालतो, त्याची प्रवृत्ती केवळ नियंत्रणाच्या अधीन असेल, प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) अधीन नाही, हे दर्शवण्यासाठी "यथावृत्तेहि" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये "यथावृत्तेहि" म्हणजे सर्वसंग्रहात सांगितलेल्या प्रकारे कर्माभिसंस्कार इत्यादींद्वारे. "तथापरिग्गहेतब्बो" म्हणजे "हा माझा आत्मा आहे" या प्रकारे मुख्य अंतर्गत भावाने ग्रहण केले पाहिजे. कारण की, जे स्वतःच्या वशामध्ये चालते, त्यामध्ये स्वतःचे स्वामीत्व नसते. आणि ज्याच्यामध्ये स्वामीत्व नसते, त्या रूपादी धर्मांमध्ये स्वतःला स्वामी बनवून "हा माझा आत्मा आहे" असे ग्रहण करणे हे मिथ्याच (चुकीचेच) आहे. त्याचप्रमाणे, जो क्षणिक धर्म आहे, जो क्षणाक्षणाला नष्ट होतो, त्या रूपादी पंचस्कंधांना स्वतःचे सार मानून तसे ग्रहण करणे देखील मिथ्याच आहे. आणि येथे "मिथ्याच" म्हणजे परमार्थ सत्याचा विचार करता ते मिथ्याच आहे. तो विपर्यास (विपल्लासो) च आहे, असे म्हटले आहे. "सुखं विद्धंसेति" म्हणजे कायिक सुख आणि चैतसिक (मानसिक) सुख यांचा विध्वंस करते, विनाश करते. "नानादुक्खं जनेति" म्हणजे कायिक दुःख आणि चैतसिक दुःख निर्माण करते, उत्पन्न करते. "इदञ्च रूपं एदिसमेव होति" (आणि हे रूप असेच असते) - ते कसे असते? मनुष्यभावात (मनुष्य जन्मात) असलेल्या प्राण्यांच्या प्रवृत्त झालेल्या मनुष्य-सुखाचा ते विध्वंस करते, त्यांना जीर्ण व भग्न अवस्थेला पोहोचवते आणि विविध दुःखे उत्पन्न करते. स्वतः अपायभाव (दुर्गती) ग्रहण करून त्यांच्यासाठी विविध अपाय-दुःखे उत्पन्न करते. तसेच देवभाव, शक्रभाव (इंद्रपद), ब्रह्मभाव इत्यादींमध्ये असलेल्यांच्या बाबतीतही समजावे. तसेच मनुष्यभावात असलेल्यांच्या विविध विपरिणाम-कार्यांद्वारे प्रवृत्त सुखाचा विध्वंस करते आणि विविध प्रत्यय-अभिसंस्कारांच्या कार्यांद्वारे विविध दुःखे उत्पन्न करते. म्हणूनच म्हटले आहे - "इदञ्च रूपं एदिसमेव". "सार म्हणजे एक विशिष्ट स्थैर्य आणि बल म्हटले जाते." याद्वारे त्या विशिष्ट स्थैर्य आणि बलाने युक्त असलेल्या वस्तूचाही संग्रह होतो. "असारकट्ठेन" (असार अर्थाने) येथे सार म्हणजेच सारक, जे सारक नाही ते असारक, हा अभिप्राय मनात ठेवून "रूप स्वतः देखील अशा प्रकारचा सार नाही" असे म्हटले आहे. याचा अर्थ असा की, ते प्राण्यांचा आत्मसार किंवा जीवसार नाही. "याला काही सार नाही म्हणून हे असारक आहे" हा अभिप्राय मनात ठेवून "न च एवरूपेन सारेन युत्तं" (आणि अशा प्रकारच्या साराने युक्त नाही) असे म्हटले आहे. याचा अर्थ असा की, ते आत्मसार किंवा जीवसाराने युक्त नाही. त्यामध्ये पहिला अर्थ "रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो" याला अनुसरून सांगितला आहे. दुसरा अर्थ "रूपाने युक्त आत्मा, किंवा आत्म्यामध्ये रूप, किंवा रूपामध्ये आत्मा" यांना अनुसरून सांगितला आहे. याद्वारे "असारकट्ठेन" म्हणजे असारभावाने किंवा असारयुक्त भावाने असा अर्थ होतो. "अनत्ता" (अनात्मा) यामध्ये देखील "जो आत्मा नाही तो अनात्मा" किंवा "ज्याला आत्मा नाही तो अनात्मा" असा दोन प्रकारचा अर्थ सिद्ध होतो. "यञ्च" म्हणजे जे रूप. "पीळेति" म्हणजे त्या युक्त पुद्गलाला (व्यक्तीला) पीडित करते. याद्वारे अनात्मभाव सिद्ध झाला असता दुःखभाव देखील सिद्ध होतो, हे दर्शन केले आहे. "तीन वयांच्या (अवस्थांच्या) द्वारे काळाचा भेद जोडला पाहिजे" - पहिल्या वयात प्रवृत्त झालेले रूप दुसऱ्या वयाला प्राप्त होत नाही, पहिल्या वयातच निरुद्ध होते, इत्यादी प्रकारे वर्तमान काळात समाविष्ट असलेला भेद जोडला पाहिजे. "सभागएकसन्तानवसेन" म्हणजे सभाग (समान) धर्मांच्या सभागतेमुळे एक झालेली संतती म्हणजे सभाग-एकसंतती होय. आणि "सभाग धर्मांचे" म्हणजे चित्तजांमध्ये (चित्तापासून उत्पन्न होणाऱ्यांमध्ये) आधी निरंतर प्रवृत्त होणाऱ्या लोभसंप्रयुक्त चित्तासोबत सहजात असलेले रूपधर्म म्हणजे सभाग-रूपधर्म होत. तसेच नामधर्म देखील. याचप्रमाणे द्वेषसंप्रयुक्त इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. ऋतुजांमध्ये (तापमानापासून उत्पन्न होणाऱ्यांमध्ये) निरंतर प्रवृत्त होणाऱ्या शीत-ऋतूने (थंडीने) समुत्थित झालेले रूपधर्म म्हणजे सभाग-रूपधर्म होत. तसेच उष्ण-ऋतूने समुत्थित झालेले. हाच नियम आहारजांच्या (आहारापासून उत्पन्न होणाऱ्यांच्या) बाबतीतही समजावा; अशा प्रकारे सभाग-एकसंततीच्या द्वारे. "सम्पापुणितुं" म्हणजे ज्ञानाने प्राप्त करणे. "अद्धासन्तानवसेन" येथे संततीच्या द्वारे संमसन (परीक्षण) करणे विशेषतः अभिप्रेत आहे. आणि असे केल्याने, खाली "अनिच्चं खयट्ठेन" (क्षय होण्याच्या अर्थाने अनित्य) या पदात चार महाभूतांच्या संतती-विभागाचा नियम चांगल्या प्रकारे दर्शवला आहे. "अनिच्चलक्खण दस्सनमेव पधानं" (अनित्य लक्षणाचे दर्शनच प्रधान आहे) - या ज्ञानात, तसेच उदयब्बय-ज्ञानात (उत्पत्ती आणि विनाश ज्ञानात) आणि भंग-ज्ञानात देखील अनित्य लक्षणाचे दर्शनच प्रधान आहे. भय-ज्ञानात, आदीनव-ज्ञानात (दोषांच्या ज्ञानात) आणि निब्बिदा-ज्ञानात (वैराग्य ज्ञानात) दुःख लक्षणाचे दर्शन प्रधान आहे. वरील चार ज्ञानांमध्ये अनात्म लक्षणाचे दर्शन प्रधान आहे. "समुदितेसु" म्हणजे परस्परांच्या अविनाभाव (एकमेकांशिवाय न राहणे) आणि सहाय्यक भावाने एकत्र उत्पन्न झालेल्यांमध्ये. आणि हे "अविज्जासमुदया रूपसमुदयो" (अविद्येच्या उदयाने रूपाचा उदय), "तण्हासमुदया उपादान समुदयो" (तृष्णेच्या उदयाने उपादानाचा उदय), "आहारसमुदया रूपसमुदयो" (आहाराच्या उदयाने रूपाचा उदय) या पाळीच्या (वचनाच्या) द्वारे म्हटले आहे. "अप्पहीन वसेन" (प्रहीन न झाल्याच्या द्वारे) या पाळी पदात मात्र अविद्या, तृष्णा आणि दृष्टी या अनुसयांच्या प्रहीन (नष्ट) न होण्याच्या अर्थाने संततीमध्ये त्यांची विद्यमानता (असणे) हेच प्रमाण मानले पाहिजे. "समुदेन्ति" म्हणजे प्रतिसंधीपासून (पुनर्जन्माच्या क्षणापासून) घेऊन एकत्र उदित होतात. वरचेवर येतात. येतात, असा याचा अर्थ आहे. एकाच भवभावाने (अस्तित्वाने) प्रादुर्भूत होतात, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच "यावमरणकाला" (मरणाच्या वेळेपर्यंत) इत्यादी म्हटले आहे. "पसवन्ति" म्हणजे वाढत जाऊन स्रवतात, प्रवृत्त होतात, वाहतात. "तेसु पन" म्हणजे त्या अविद्या, तृष्णा, उपादान आणि कर्मांमध्ये. "निरुज्झन्ति" म्हणजे त्याच भवात (जन्मात) निरुद्ध होतात. त्या भवातील निरोध म्हणजे दुसऱ्या भवात पुन्हा उत्पन्न न होणेच होय, म्हणूनच "भवन्तरे" (दुसऱ्या भवात) इत्यादी म्हटले आहे. "तं सन्ततियं" म्हणजे त्या वर्तमान भवात, असे म्हटले आहे. "पुन अनुप्पादसंखातं निरोधं" (पुन्हा उत्पन्न न होणे या रूपातील निरोध) म्हणजे संतती-निरोध सांगितला आहे, निर्वाण-निरोध नाही. या प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) अस्तित्वात, दुसऱ्या भवात ते नक्कीच उत्पन्न होतील. आता, प्रवृत्त संततीमध्ये समाविष्ट असलेल्या सर्वात शेवटच्या नाम-रूपांच्या क्षणिक निरोधाच्या द्वारे अर्थ सांगताना "यथाप्रवृत्त संतती छिन्न होते, भग्न होते" असे म्हटले आहे. "उदयब्बयं समनुपस्सन्तस्स च" (आणि उदय-व्यय पाहणाऱ्याचे) येथे उदय म्हणजे काय, व्यय म्हणजे काय, आणि तो त्या दोन्हीचे कशा प्रकारे संमसन (अवलोकन) करतो, हे सांगण्यासाठी "उदयब्बयं पस्सन्तस्साति एत्थ यथा नामा" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये "तमो खन्धो" म्हणजे अंधाराचा समूह. "वेति" म्हणजे निघून जातो, अंतर्धान पावतो. "उदयो" म्हणजे उत्पाद (उत्पत्ती) आणि वृद्धी. "वयो" म्हणजे गमन (निघून जाणे) आणि अंतर्धान पावणे. "नानापयोगवसेन वा" म्हणजे आकुंचन-प्रसरण इत्यादी विविध प्रयोगांच्या द्वारे. उदयपक्षाच्या (उत्पत्तीच्या बाजूच्या) विविध संततींचा उदय उदय रूपाने, आणि व्ययपक्षाच्या (विनाशाच्या बाजूच्या) विविध संततींचा व्यय व्यय रूपाने (जोडला पाहिजे), अशी योजना आहे। โพชฺฌงฺค ธมฺเมหิ สมฺปนฺนตฺตา อาราเธติ อตฺตโน จิตฺตํติ อารทฺโธ. ตุฏฺฐจิตฺโตติ อตฺโถ. วิปสฺสตีติ วิปสฺสโก. อารทฺโธ หุตฺวา วิปสฺสโก อารทฺธวิปสฺสโก. ทุวิโธหิ วิปสฺสโก ตรุณ วิปสฺสโก จ อารทฺธ วิปสฺสโก จ. ตตฺถ ขนฺธานํ อุทยพฺพยํ สุฏฺฐุ อปสฺสนฺโต ทุพฺพลวิปสฺสโก ตรุณ วิปสฺสโก นาม. ขนฺธานํ อุทยพฺพยํ สุฏฺฐุ ปสฺสนฺโต วิปสฺสนา กมฺเม อาราธิต จิตฺโต พลววิปสฺสโก อารทฺธวิปสฺสโก นาม. ยํ สนฺธาย วุตฺตํ. बोझ्झंग धर्मांनी संपन्न असल्यामुळे जो आपल्या स्वतःच्या चित्ताला संतुष्ट करतो, तो 'आरद्ध' होय. 'संतुष्ट चित्त असलेला' असा याचा अर्थ आहे. जो विपश्यना करतो तो 'विपस्सक' होय. प्रयत्नशील होऊन विपश्यना करणारा तो 'आरद्धविपस्सक' होय. विपस्सक दोन प्रकारचे असतात: 'तरुण विपस्सक' आणि 'आरद्ध विपस्सक'. त्यामध्ये, स्कंधांचा उदय आणि व्यय चांगल्या प्रकारे न पाहणारा दुर्बळ विपस्सक म्हणजे 'तरुण विपस्सक' होय. स्कंधांचा उदय आणि व्यय चांगल्या प्रकारे पाहणारा, विपश्यनेच्या कर्मामध्ये चित्त संतुष्ट असलेला बलवान विपस्सक म्हणजे 'आरद्धविपस्सक' होय. ज्याच्या संदर्भात हे म्हटले आहे – [ก] [क] ‘สุญฺญาคาเร ปวิฏฺฐสฺส, สนฺตจิตฺตสฺส ภิกฺขุโน; อมานุสี รตี โหติ, สมฺม ธมฺมํ วิปสฺสโต,ติ จ. ‘शून्यागारात प्रवेश केलेल्या, शांत चित्त असलेल्या आणि धर्माची सम्यक प्रकारे विपश्यना करणाऱ्या भिक्खूला अलौकिक आनंद प्राप्त होतो,’ आणि... [ข] [ख] ‘โย จ วสฺสสตํ ชีเว, อปสฺสํ อุทยพฺพยํ; เอกาหํ ชีวิตํ เสยฺโย, ปสฺสโต อุทยพฺพยํ,ติ จ. ‘जो मनुष्य (स्कंधांचा) उदय आणि व्यय न पाहता शंभर वर्षे जगतो, त्यापेक्षा उदय आणि व्यय पाहणाऱ्याचे एका दिवसाचे जीवन अधिक श्रेष्ठ आहे,’ आणि... อยมิธ อธิปฺเปโต. วิปสฺสนํ อุเปจฺจ กิเลเสนฺติ, มลีนภาวํ คเมนฺตีติ วิปสฺสนุปกฺกิเลสา. ปริพนฺธนฺติ นีวาเรนฺตีติ ปริพนฺธกาติ เหฏฺฐา วุตฺตเมว อนฺตรายิก ธมฺมานํ นามํ. ‘‘สรีโรภาโส’’ติ สกลสรีรโต นิกฺขนฺโต โอภาโส. ‘‘ปญฺจวิธา ปีตี’’ติ ขุทฺทิกา ปีติ, ขณิกา ปีติ, โอกฺกนฺติกา ปีติ, อุพฺเพคา ปีติ, ผรณา ปีตีติ. ‘‘ทุวิธา ปสฺสทฺธี’’ติ อติพลวนฺตี กายปสฺสทฺธิเจว จิตฺตปสฺสทฺธิ จ. วิปสฺสนา กมฺเม โอกปฺปนาการปฺปวตฺตา สทฺธาเอว อธิมุจฺจนฏฺเฐน อธิโมกฺโข สทฺธาธิโมกฺโข. ‘‘วีริยํ’’ติ ตสฺมึ กมฺเม อนิกฺขิตฺตธุรํ ปคฺคหิตสีสํ วีริยํ. ‘‘สุขํ’’ติ จิตฺตสุขํ. เตนาห ‘‘โสมนสฺสํ’’ติ. ‘‘วิปสฺสนาญาณํ’’ติ อินฺทวิสฺสฏฺฐวชิรสทิสํ พลววิปสฺสนาญาณํ. ‘‘สตี’’ติ ตสฺมึ กมฺเม อปฺปมุฏฺฐา สติ. ‘‘ตตฺรมชฺฌตฺตุเปกฺขา’’ติ จิตฺตสฺส [Pg.304] ลีนุทฺธจฺจาทีหิ วิสมนฺเตหิ วิมุตฺตา ตตฺรมชฺฌตฺตตาสงฺขาตา อุเปกฺขา. ‘‘อาวชฺชนุเปกฺขา’’ติ วสิภาวปตฺตา อาวชฺชนสงฺขาตา อุเปกฺขา. ‘‘อาลยํ’’ติ ตณฺหาลยํ. ‘‘กุรุมานา’’ติ กโรนฺตี. ‘‘สุขุมา ตณฺหา’’ติ กุสเลหิ มิสฺสกตฺตา อิทํ อกุสลนฺติปิ ชานิตุํ อสกฺกุเณยฺยา สุขุมตณฺหา. ‘‘น วตเม’’ติ มม น อุปฺปนฺนปุพฺโพวตาติ โยชนา. ‘‘อสฺสาทสหิตา’’ติ โอภาสาทีสุ อสฺสาทตณฺหา สหิตา. ‘‘อธิมาน วเสนา’’ติ อธิกตรํ มญฺญนาวเสน. ‘‘ตาวเทวา’’ติ นิกนฺติยา อุปฺปตฺติกฺขเณเยว. ‘‘นิกามนากาโร’’ติ อิจฺฉนากาโร. อสฺสาทนากาโร. ‘‘นิกามนสฺสวตฺถู’’ติ นิกนฺติยา วตฺถุ. ‘‘อทฺธา’’ติ เอกนฺเตน. ‘‘หนฺทา’’ติ จิตฺตวิสฺสฏฺฐกรเณ นิปาตปทํ. อิทาเนว นํ วิโสเธมิ, น จิรํ ปวตฺติตุํ ทสฺสามีติ อิมมตฺถํ ทีเปติ. ‘‘เตสฺเววา’’ติ เตสุโอภาสาทีสุ เอว. อฏฺฐกถาย น สเมติ. อฏฺฐกถายํ นิกนฺติ วิกฺขมฺภนสฺส วิสุํ วุตฺตตฺตาติ อธิปฺปาโย. วิปสฺสนาปริปาโก นาม วิเสสนฺตรปฺปวตฺเตน ปากโฏติ ทสฺเสตุํ ‘‘สงฺขารุเปกฺขาภาวํ ปตฺตา’’ติอาทิมาห. วุฏฺฐานคามินิ วิปสฺสนาภาวปตฺเตนาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ทฺเว วิปสฺสนา จิตฺตานี’’ติ อุปจารานุโลมจิตฺตานิ. โส หิ วุฏฺฐานนฺติ วุจฺจตีติ สมฺพนฺโธ. สงฺขาร นิมิตฺตโต วา วุฏฺฐาติ. นิพฺพานํ อารพฺภ ปวตฺติโต. ยทิ เอวํ โคตฺรภุปิ วุฏฺฐานํ นาม สิยาติ. น สิยา. มคฺคสฺส อาวชฺชนมตฺเต ฐิตตฺตา. ปฏิเวธกิจฺจสฺสจ สมฺโมห สมุจฺเฉทกิจฺจสฺส อภาวโต. ‘‘สยํ’’ติ มคฺคสงฺขาโต สยํ. ‘‘ตํ สมงฺคีปุคฺคลํ วา’’ติ เตน มคฺเคน สมงฺคีปุคฺคลํ วา. ‘‘วฏฺฏปฺปวตฺตโต จา’’ติ อายตึ ภเวสุ อปายวฏฺฏปฺปวตฺตโต วา, อฏฺฐม ภวโต ปฏฺฐาย กามสุคติ วฏฺฏปฺปวตฺตโต วา. อวสฺสํ วุฏฺฐานํ คเมติ สมฺปาเปตีติ วุฏฺฐานคามินีติ วจนตฺโถ. ‘‘อวสฺสํ วุฏฺฐานํ คจฺฉนฺตี’’ติ อิธ ฐิตานํ วุฏฺฐานโต นิวตฺติ นาม นตฺถีติ อธิปฺปาโย. อิทญฺจ ปจฺเจกพุทฺธานํ พุทฺธสาวกานญฺจ วเสน ทฏฺฐพฺพํ. สพฺพญฺญุ โพธิสตฺตา ปน ปุพฺพพุทฺธานํ สาสเน ปพฺพชิตฺวา วิปสฺสนา กมฺมํ อารภนฺตา อนุโลมญฺญาณํ อาหจฺจ ฐเปนฺตีติ อฏฺฐก ถาสุ [Pg.305] วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘อาหจฺจา’’ติ อิทํ สงฺขารุเปกฺขาญาณสฺส มตฺถกปตฺติทสฺสนตฺถํ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘อาวชฺชนฏฺฐานิยํ’’ติ ตโต ปุพฺพภาเค เกนจิ จิตฺเตน อคฺคหิเต นิพฺพานา รมฺมเณ อาวชฺชนฏฺฐานิยํ. ‘‘ตํ’’ติ โคตฺรภุญฺญาณํ. โคตฺตํ ภวติ อภิภวติ ฉินฺทตีติ โคตฺรภุ. โคตฺตํ วา อภิสมฺภุณาติ ปาปุณาตีติ โคตฺรภูติ วจนตฺโถ. กถํ ปน โคตฺรภุ จิตฺตํ โคตฺรภุญฺญาณํ ปุถุชฺชนโคตฺตํ ฉินฺทติ, อริยโคตฺตํ ปาปุณาตีติ ยุชฺเชยฺย, โสหิ ปุคฺคโล ตสฺมึขเณ ปุถุชฺชนโคตฺตปริยาปนฺโนเอวาติ. สจฺจํ. อตฺตนิ ปน ฉินฺนตฺตา สยํ ฉินฺทติ นาม. นิพฺพานสฺส จ อริยโคจรตฺตา ตํ อารมฺมณ กรณวเสน อริยโคตฺตํ ปาปุณาติ นามาติ ทฏฺฐพฺพํ. ปจฺจยสตฺติวิเสเสน อตฺตโน อนนฺตเร อริยโคตฺตํ ภาเวติ, ปาตุภาเวตีติ โคตฺรภูติปิ ยุชฺชติ. ‘‘ปริจฺฉิชฺชา’’ติ ปริจฺฉินฺทิตฺวา. ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาทีหิ สพฺพวิปฺผนฺทเนหิ มุญฺจิตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. สมฺโมหสฺส ปหานเมว ทฏฺฐพฺพํ. น เต ธมฺเม อารมฺมณ กรณ วเสน ชานนํ. กถํ เต ธมฺเม อารมฺมณํ อกโรนฺโต มคฺโค เต ธมฺเม ปริชานาติ นามาติ. กิจฺจสิทฺธิ วเสน. โส หิ สมฺโมหํ ปชหนฺโต อารมฺมณํ กโรนฺตานิปิ หิ ปุพฺพภาคญฺญาณานิ ตปฺปหานกิจฺจสฺส อสาธกตฺตา ทุกฺข สจฺจํ ปริชานนฺตานีติ น วุจฺจนฺติ. มคฺโค ปน อารมฺมณํ อกโรนฺโตปิ ตปฺปหานกิจฺจสฺส สาธกตฺตาตํ สจฺจํ ปริชานาตีติ วุจฺจติ. กสฺมา. ตโต ปฏฺฐาย ตสฺสปุคฺคลสฺส สพฺพกาลํ ตสฺมึสจฺเจ ปริชานน กิจฺจสฺส สิทฺธตฺตา. ยถาหิ เอโก ปุริโส จกฺขุมฺหิ ปิตฺตเสมฺหาทิโทเสหิ ปลิพุทฺธตฺตา อนฺโธ โหติ. น กิญฺจิ ปสฺสติ. ยทา ปน โส เอกํ เตชวนฺตํ อญฺชนํ ลภิตฺวา จกฺขุํ อญฺชยนฺโต สพฺพรตฺตึ นิทฺทายติ. ตสฺส นิทฺทายนฺตสฺเสว จกฺขุมฺหิ สพฺพโทสา นสฺสนฺติ. จกฺขุ วิปฺปสนฺนํ โหติ. ตงฺขณโต ปฏฺฐาย โส นิทฺทายนฺโตปิ รูปานิ ปสฺสตีติ วุจฺจติ. กสฺมา, อนฺธภาววิคเมน ทสฺสนกิจฺจสฺส สิทฺธตฺตา. เอวเมวมิทํ ทฏฺฐพฺพนฺติ. เอกเทเสน วา เหฏฺฐิมมคฺเคสุ, อนวเสเสน วา อรหตฺตมคฺเค. ‘‘อปจฺฉาวตฺติกํ’’ติ เอตฺถ ปจฺฉโต อาวตฺตนํ ปจฺฉาวตฺตํ. นตฺถิ ปจฺฉาวตฺตํ อสฺสาติ อปจฺฉาวตฺติกนฺติ [Pg.306] วิคฺคโห. ‘‘ปุน อนุปฺปาทธมฺมตาปตฺติวเสน นิโรธสงฺขาตํ’’ติ มคฺคกฺขเณ เอว ตานิวฏฺฏานิ ปุน อนุปฺปาทสภาวํ อาปชฺชนฺติ, นิรุชฺฌนฺติ. ตถา นิโรธสงฺขาตํ. ‘‘อุปฺปาทนสงฺขาตาย ภาวนายา’’ติ เอเตน มคฺคสฺส เอกจิตฺตกฺขณิกตฺตา วฑฺฒนสงฺขาตาย ภาวนาย โอกาโส นตฺถีติ กตฺวา วุตฺตํ. อริยมคฺคํ ปฏิลาภตฺถาย ปน ปวตฺติตา ปุพฺพภาคภาวนาปิ มคฺคภาวนา เอว. สา จ อริยมคฺคํ ปตฺวา มตฺถกปตฺตา โหติ. ตสฺมา อริยมคฺโค เอว มตฺถกปตฺโต ภาวนานุตฺตโร โหตีติ อิมินาปริยาเยน วฑฺฒน สงฺขาตาย ภาวนายาติปิ ยุชฺชติเยว. อตฺตโน อนนฺตเร ปวตฺตํ อานนฺตริกํ. อานนฺตริกํ ผลํ เอตสฺสาติ วิคฺคโห. ตสฺส จ ตโตปรํ ทฺเว วา ตีณิ วา ผลจิตฺตานิ ปวตฺตนฺตีติ อิมินา สมฺพนฺโธ. อปนีโต อคฺคิ เอตสฺมาติ อปนีตคฺคิโก. ‘‘นิพฺพาเปนฺโต วิยา’’ติ เอเตน ปฏิปฺปสฺสมฺภนปฺปหานกิจฺเจน มคฺคานุกุลปฺปวตฺตึ ทสฺเสติ. ‘‘เตสํ’’ติ เตสํ จกฺขูนํ. ตํ รูปํ ตสฺส ปากฏํ น ตาว โหตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ตสฺสา’’ติ ตสฺส ปุคฺคลสฺส. ‘‘ปจฺจเวกฺขนวาเรสู’’ติ เอตฺถ ปสาทจกฺขุนา ทิฏฺเฐ ปวตฺตา อนุพนฺธก วีถิโยปิ สงฺคยฺหนฺติ. येथे हाच अभिप्राय आहे. विपश्यनेच्या (विपस्सना) जवळ जाऊन तिला क्लिष्ट करतात, मलीन करतात म्हणून ते 'विपस्सनुपक्किलेस' (विपश्यना-उपक्लेश) होत. जे अडथळा आणतात, प्रतिबंध करतात ते 'परिबंधक' (प्रतिबंधक) होत; हे खाली सांगितलेल्या 'अंतरायिक धम्मां'चेच (अंतरायिक धर्म) नाव आहे. 'शरीरोभास' (शरीराचा प्रकाश) म्हणजे संपूर्ण शरीरातून बाहेर पडणारा प्रकाश. 'पंचविध पीती' (पाच प्रकारची प्रीती) म्हणजे क्षुद्रिका पीती (लहान प्रीती), क्षणिका पीती (क्षणिक प्रीती), ओक्कंतिका पीती (लाटेसारखी येणारी प्रीती), उब्बेगा पीती (रोमांचित करणारी प्रीती) आणि फरणा पीती (व्यापक प्रीती). 'दुविधा पस्सद्धि' (दोन प्रकारची प्रश्रब्धी) म्हणजे अत्यंत बलवान असणारी काय-पस्सद्धि (शारीरिक शांतता) आणि चित्त-पस्सद्धि (मानसिक शांतता). विपस्सना कर्मामध्ये दृढ विश्वासाच्या रूपाने प्रवृत्त होणारी श्रद्धाच, अधिमुक्तीच्या (निश्चयाच्या) अर्थाने 'अधिमोक्ष' म्हणजेच 'श्रद्धाधिमोक्ष' होय. 'वीर्य' (वीरिय) म्हणजे त्या कर्मामध्ये धुरा न सोडणारे (प्रयत्न न सोडणारे) आणि दृढतेने उचलून धरलेले वीर्य होय. 'सुख' म्हणजे चित्ताचे सुख (चित्तसुख). म्हणूनच 'सोमनस्स' (सौमनस्य/आनंद) असे म्हटले आहे. 'विपस्सनाञाण' (विपश्यना ज्ञान) म्हणजे इंद्राने सोडलेल्या वज्रासारखे बलवान विपश्यना ज्ञान होय. 'सती' (स्मृती) म्हणजे त्या कर्मामध्ये विस्मरण न होणारी स्मृती होय. 'तत्रमज्झत्तुपेक्खा' (तत्रमध्यस्थोपेक्षा) म्हणजे आळस (लीन) आणि उद्धतपणा (उद्धच्च) इत्यादी विषम करणाऱ्या दोषांपासून मुक्त असलेली, चित्ताची मध्यस्थता नावाची उपेक्षा होय. 'आवर्जनुपेक्खा' (आवर्जन उपेक्षा) म्हणजे वशित्व प्राप्त झालेली, आवर्जन (चित्त वळवणे) नावाची उपेक्षा होय. 'आलय' म्हणजे तण्हा-आलय (तृष्णेचे आलय/आसक्ती). 'कुरुमाना' म्हणजे करत असताना. 'सुखुमा तण्हा' (सूक्ष्म तृष्णा) म्हणजे कुशल धर्मांशी मिश्रित असल्यामुळे 'हे अकुशल आहे' असे ओळखता न येणारी सूक्ष्म तृष्णा होय. 'न वत मे' (नक्कीच माझ्या बाबतीत नाही) याचा अर्थ 'माझ्या बाबतीत पूर्वी कधीही उत्पन्न न झालेली' असा संबंध जोडला जातो. 'अस्सादसहिता' (आस्वादसहित) म्हणजे ओभास (प्रकाश) इत्यादींमध्ये आस्वाद घेणाऱ्या तृष्णेने युक्त असणे. 'अधिमान वसेन' (अधिमानाच्या प्रभावाने) म्हणजे स्वतःला अधिक श्रेष्ठ मानण्याच्या (अति-अभिमानाच्या) भावनेने. 'तावदेव' (त्याच वेळी) म्हणजे निकंती (आसक्ती) उत्पन्न होण्याच्या क्षणीच. 'निकामनाकारो' म्हणजे इच्छेचा आकार (इच्छा करण्याची पद्धत) किंवा आस्वाद घेण्याची पद्धत. 'निकामनस्स वत्थू' म्हणजे निकंतीचे (आसक्तीचे) आलंबन (वस्तू). 'अद्धा' म्हणजे एकांताने (निश्चितपणे). 'हन्द' हे चित्ताला दृढ/उद्युक्त करण्याच्या अर्थातील निपात पद आहे. 'मी आताच याचे विशोधन करतो, याला जास्त वेळ प्रवृत्त राहू देणार नाही' हा अर्थ ते स्पष्ट करते. 'तेस्वेव' म्हणजे त्या ओभास (प्रकाश) इत्यादींमध्येच. हे अट्ठकथेसोबत जुळत नाही. कारण अट्ठकथेमध्ये निकंतीच्या (आसक्तीच्या) विष्कंभनाचा (दडपून टाकण्याचा) स्वतंत्रपणे उल्लेख केला आहे, असा येथे अभिप्राय आहे. विपश्यनेचा परिपाक (विपस्सनापरिपाको) हा एका विशिष्ट अवस्थेच्या प्रवृत्तीने प्रकट होतो, हे दर्शवण्यासाठी 'संखारुपेक्खाभावं पत्ता' (संस्कारोपेक्षा भाव प्राप्त झालेली) इत्यादी म्हटले आहे. याचा अर्थ असा की, वुट्ठानगामिनी (उत्थानगामी) विपश्यनेची अवस्था प्राप्त झाल्यामुळे. 'द्वे विपस्सना चित्तानि' (दोन विपश्यना चित्ते) म्हणजे उपचार आणि अनुलोम चित्ते. कारण त्यालाच 'वुट्ठान' (उत्थान/उदय) असे म्हटले जाते, असा संबंध आहे. किंवा ते संस्कारांच्या निमित्तापासून वर उठते (मुक्त होते), कारण ते निर्वाणाला (निब्बान) आलंबन करून प्रवृत्त होते. जर असे असेल, तर 'गोत्रभू' (गोत्रभू ज्ञान) देखील 'वुट्ठान' (उत्थान) ठरेल काय? नाही, तसे होणार नाही. कारण ते मार्गाच्या केवळ आवर्जन (चित्त वळवणे) मात्रेवर स्थित असते, आणि त्यात पटिवेध-किच्च (प्रतिवेध कार्य/साक्षात्कार) व संमोह-समुच्छेद-किच्च (मोहाचा समूळ उच्छेद करण्याचे कार्य) यांचा अभाव असतो. 'सयं' (स्वतः) म्हणजे मार्ग नावाचा तो स्वतः. 'तं समंगीपुग्गलं वा' म्हणजे त्या मार्गाने युक्त असलेला पुद्गल (व्यक्ती) किंवा. 'वट्टप्पवत्ततो चा' (आणि संसाराच्या प्रवृत्तीपासून) म्हणजे भविष्यातील भावांमध्ये अपाय-संसार प्रवृत्तीपासून (दुर्गतीपासून) किंवा आठव्या जन्मापासून कामसुगती संसार प्रवृत्तीपासून (सुगतीपासून). जे निश्चितपणे वुट्ठान (उत्थान) प्राप्त करून देते, त्याला 'वुट्ठानगामिनी' (उत्थानगामी) म्हणतात, असा या शब्दाचा अर्थ आहे. 'अवस्सं वुट्ठानं गच्छन्ती' (निश्चितपणे उत्थानाप्रत जाणारी) याचा अभिप्राय असा की, येथे स्थित असलेल्यांचे उत्थानापासून मागे फिरणे कधीही होत नाही. आणि हे प्रत्येकबुद्ध आणि बुद्धश्रावकांच्या संदर्भात समजून घेतले पाहिजे. परंतु, सर्वज्ञ बोधिसत्व पूर्व बुद्धांच्या शासनात प्रव्रजित होऊन विपश्यना कर्माचा आरंभ करतात आणि अनुलोम ज्ञानापर्यंत पोहोचून थांबतात, असे अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे. तेथे 'आहच्च' (पोहोचून) हे संखारुपेक्खाञाणाच्या (संस्कारोपेक्षा ज्ञानाच्या) शिखरावर पोहोचणे (मत्थकपट्टी) दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे, असे समजले पाहिजे. 'आवर्जनट्ठानीय' (आवर्जनाच्या स्थानावरील) म्हणजे त्यापूर्वीच्या भागात कोणत्याही चित्ताने ग्रहण न केलेल्या निर्वाणरूपी आलंबनावर आवर्जन करण्याच्या स्थानावरील. 'तं' म्हणजे गोत्रभू ज्ञान (गोत्रभूञाण). जे गोत्राचे (कुळाचे/पुद्गल गोत्राचे) अतिक्रमण करते, त्याला छेदून टाकते, ते 'गोत्रभू' होय. किंवा जे गोत्राला प्राप्त होते, त्याला 'गोत्रभू' म्हणतात, असा या शब्दाचा अर्थ आहे. परंतु, गोत्रभू चित्त किंवा गोत्रभू ज्ञान हे पृथग्जन गोत्राला (पुथुज्जनगोत्त) छेदून टाकते आणि आर्य गोत्राला (अरियगोत्त) प्राप्त होते, हे कसे योग्य ठरेल? कारण तो पुद्गल (व्यक्ती) त्या क्षणी पृथग्जन गोत्रातच समाविष्ट असतो. हे सत्य आहे. परंतु स्वतःमध्ये ते छिन्न (नष्ट) झाल्यामुळे ते स्वतःच छेदते असे म्हटले जाते. आणि निर्वाण हे आर्यांचे गोचर (विषय) असल्यामुळे, त्याला आलंबन बनवल्याने ते आर्य गोत्राला प्राप्त होते, असे समजले पाहिजे. प्रत्यय-शक्तीच्या (कारण-शक्तीच्या) विशिष्टतेमुळे आपल्या लागोपाठच्या क्षणी आर्य गोत्राला भावित करते, प्रकट करते, म्हणून देखील 'गोत्रभू' हे योग्य ठरते. 'परिच्छिज्ज' (परिच्छेद करून) म्हणजे परिच्छिन्न करून (मर्यादित करून). याचा अर्थ असा की, दृष्टी (मिच्छादिट्ठि) आणि विचिकित्सा (शंका) इत्यादी सर्व प्रकारच्या विक्षेपांपासून मुक्त होऊन. येथे केवळ संमोहाचा (मोहाचा) प्रहाण (नाश) समजला पाहिजे. त्या धर्मांना आलंबन बनवून त्यांचे ज्ञान करून घेणे नव्हे. मग तो मार्ग त्या धर्मांना आलंबन न बनवता त्या धर्मांचे परिज्ञान (पूर्ण ज्ञान) कसे करतो? तर कार्यसिद्धीच्या (किच्चसिद्धीच्या) प्रभावाने. कारण, मोहाचा प्रहाण करत असताना, पूर्वभागातील ज्ञाने जरी त्याला आलंबन बनवत असली, तरी त्या प्रहाणाचे कार्य पूर्ण न करू शकल्यामुळे ती 'दुःख सत्याचे परिज्ञान करतात' असे म्हटले जात नाही. परंतु मार्ग हा त्याला आलंबन न बनवताही, त्या प्रहाणाचे कार्य सिद्ध करत असल्यामुळे 'त्या सत्याचे परिज्ञान करतो' असे म्हटले जाते. का? कारण तेव्हापासून त्या पुद्गलासाठी (व्यक्तीसाठी) सर्व काळाकरिता त्या सत्याच्या परिज्ञानाचे कार्य सिद्ध होते. जसे एखादा मनुष्य डोळ्यांमध्ये पित्त, कफ इत्यादी दोषांमुळे अंध होतो आणि त्याला काहीही दिसत नाही. परंतु जेव्हा तो एक प्रभावी अंजन (काजळ) मिळवून डोळ्यात घालतो आणि रात्रभर झोपतो, तेव्हा तो झोपलेला असतानाच त्याच्या डोळ्यांतील सर्व दोष नष्ट होतात आणि डोळे स्वच्छ होतात. त्या क्षणापासून तो झोपलेला असतानाही 'रूपे पाहतो' असे म्हटले जाते. का? कारण अंधत्व दूर झाल्यामुळे पाहण्याचे कार्य सिद्ध झाले आहे. याचप्रमाणे हे समजून घेतले पाहिजे. खालच्या मार्गांमध्ये (हेट्ठिम मग्ग) अंशतः (एकदेशाने) किंवा अर्हत मार्गामध्ये (अरहत्त मग्ग) पूर्णपणे (निरवशेषाने). 'अपच्छाvअत्तिकं' (मागे न फिरणारे) म्हणजे येथे पाठीमागे फिरणे म्हणजे 'पच्छावत्त' होय. ज्याचे मागे फिरणे होत नाही तो 'अपच्छावत्तिक' होय, असा याचा विग्रह आहे. 'पुन्हा अनुत्पाद धर्मतेच्या प्राप्तीद्वारे निरोध संज्ञक' म्हणजे मार्गक्षणीच ती संसारे (वट्टानि) पुन्हा अनुत्पाद स्वभावाला प्राप्त होतात, निरुद्ध होतात. अशा प्रकारे ते निरोध संज्ञक आहे. 'उत्पादन संज्ञक भावनेद्वारे' - याद्वारे असे म्हटले आहे की, मार्ग हा एकाच चित्तक्षणाचा असल्यामुळे वाढीव स्वरूपाच्या भावनेला (वाढवण्याच्या अर्थाने) वाव नसतो. परंतु आर्यमार्ग प्राप्त करण्यासाठी प्रवृत्त झालेली पूर्वभागातील भावना देखील मार्गभावनाच आहे. आणि ती आर्यमार्गाला प्राप्त करून शिखरावर पोहोचते. म्हणूनच आर्यमार्गच शिखरावर पोहोचलेली सर्वोत्तम भावना (भावनानुत्तर) ठरतो, या पर्यायाने 'वाढीव स्वरूपाची भावना' असे म्हणणे देखील योग्यच ठरते. आपल्या लागोपाठच्या क्षणी प्रवृत्त होणारे ते 'आनन्तरिक' (तात्काळ) होय. ज्याचे फल तात्काळ मिळते ते 'आनन्तरिक फल' होय, असा याचा विग्रह आहे. आणि त्यानंतर दोन किंवा तीन फलचित्ते प्रवृत्त होतात, असा याचा संबंध आहे. ज्याच्यामधून अग्नी काढून घेतला आहे तो 'अपनीतग्गिक' (अग्निरहित) होय. 'शांत करत असल्याप्रमाणे' - याद्वारे प्रतिप्रस्रब्धी प्रहाण कार्याने (शांत करण्याच्या कार्याने) मार्गाला अनुकूल असणारी प्रवृत्ती दर्शवली आहे. 'तेसं' म्हणजे त्या डोळ्यांचे. ते रूप त्याला अजून स्पष्ट झालेले नसते, असा संबंध आहे. 'तस्स' म्हणजे त्या पुद्गलाचे (व्यक्तीचे). 'पच्चवेक्खणवारेसु' (प्रत्यवेक्षण वारांमध्ये/अवलोकनाच्या प्रसंगी) म्हणजे येथे प्रसादचक्षूने पाहिलेल्या रूपावर प्रवृत्त होणाऱ्या अनुगामी वीथींचाही (चित्तवीथी) संग्रह होतो। อุปริมคฺเคหิ วธิตพฺพา มาเรตพฺพาติ อุปริมคฺควชฺฌา. ‘‘กิเลสวิภาเคสู’’ติ อสุกมคฺเคน อสุกากิเลสา ปหียนฺตีติ เอวํ กิเลสวิภาเคสุ. ‘‘ปาฬิยํ’’ติ ปฏิสมฺภิทา มคฺคปาฬิยํ. วุจฺจมาเน ปน วตฺตพฺพนฺติ สมฺพนฺโธ. มคฺคงฺคโพชฺฌงฺคาทีนํ ปจฺจเวกฺขนํ นาม มคฺคปจฺจเวกฺขนเมว. ตถา ปจฺฉา วา ปวตฺตตีติ สิทฺธํ. ‘‘อวิรุทฺธา โหตี’’ติ วิสุทฺธิมคฺเคน อสเมนฺตาปิ ปจฺจเวกฺขนฺตานํ อิจฺฉานุรูปสมฺภวโตติ อธิปฺปาโย. ‘‘อธิมานนิทฺเทส อฏฺฐกถาสู’’ติ วินเย จตุตฺถปาราชิเก อธิมานปทนิทฺเทส อฏฺฐกถาสุ. ‘‘โส’’ติ อริยภูโต ภิกฺขุ. ‘‘โน ลทฺธุํ น วฏฺฏตี’’ติ อลทฺธุํ น วฏฺฏตีติ อตฺโถ. ลทฺธุํ โน น วฏฺฏตีติ วา โยชนา. จตุพฺพิธํ มคฺคญฺญาณํ คหิตํ. ญาณทสฺสนวิสุทฺธิ นามาติ วุตฺตตฺตา. उच्च मार्गांद्वारे जे नष्ट केले जावे किंवा मारले जावे, ते 'उपरिमग्गवज्झ' (उच्च मार्गांनी वध करण्यायोग्य) होत. 'किलेसविभागेसू' (क्लेशविभागांमध्ये) म्हणजे 'अमुक मार्गाने अमुक क्लेश नष्ट (प्रहीण) होतात', अशा प्रकारे क्लेशविभागांमध्ये होय. 'पाळियं' (पाळीमध्ये) म्हणजे पटिसम्भिदामग्ग पाळीमध्ये. परंतु बोलले जात असताना, ते बोलले पाहिजे, असा संबंध आहे. मार्गांग, बोज्झंग (बोध्यंग) इत्यादींचे प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) म्हणजेच मार्ग-प्रत्यवेक्षण होय. तसेच ते नंतर प्रवृत्त होते, हे सिद्ध होते. 'अविरुद्ध होते' (अविरुद्धा होती) म्हणजे विसुद्धिमग्ग (विशुद्धिमार्ग) शी सुसंगत नसले तरीही, प्रत्यवेक्षण करणाऱ्यांच्या इच्छेनुसार ते संभवते, असा अभिप्राय आहे. 'अधिमाननिद्देस अट्ठकथासू' (अधिमान निर्देश अट्ठकथांमध्ये) म्हणजे विनयातील चौथ्या पाराजिकातील 'अधिमान' (अतिमान) या पदाच्या निर्देश अट्ठकथांमध्ये होय. 'सो' (तो) म्हणजे आर्य झालेले भिक्खू. 'नो लद्धुं न वट्टती' म्हणजे 'न मिळणे योग्य नाही' असा अर्थ आहे. किंवा 'मिळवणे आमच्यासाठी अयोग्य नाही' अशी योजना आहे. येथे चार प्रकारच्या मार्गज्ञानाचा स्वीकार केला आहे, कारण याला 'ञाणदस्सनविसुद्धि' (ज्ञानदर्शनविशुद्धी) असे म्हटले गेले आहे. ‘‘อภินิวิสนํ’’ติ อชฺฌตฺตํ ทฬฺหตรํ ปติฏฺฐานํ. ‘‘นิขาตสิเนรุปา ทสฺสวิยา’’ติ [Pg.307] ตสฺส ปวตฺตนํ วิย. ‘‘เกวลํ ปจฺจยายตฺต วุตฺติตาย อทิฏฺฐตฺตา’’ติ เอเตน เอโส เม อตฺตา, น ปรสฺส อตฺตาติ เอวํ อตฺตานํ อตฺตสฺส สามิกํ กตฺวา คหณการณํ วทติ. ตตฺถ เกวลสทฺเทน ปรมตฺถ สจฺจํ ปตฺวา อตฺตสฺเสว อภาวโต ขนฺธปญฺจกสฺส อตฺตโนวสายตฺต วุตฺติตํ นิวตฺเตติ. สมฺมุติ สจฺจํ ปน ปตฺวา อตฺตสฺส วิชฺชมานตฺตา มหาชโน อตฺตโน ขนฺธปญฺจกํ อตฺตโน วสายตฺต วุตฺตึ มญฺญมาโน เอโส เม อตฺตาติ คณฺหาติ. ‘‘ขณภงฺคสฺส จ อทิฏฺฐตฺตา’’ติ เอเตน เอโส เม สารฏฺเฐน อตฺตา. เอโส มม สาโร. เอตํ มม สรีรํ. ยาว วสฺสสตํปิ วสฺสสหสฺสมฺปิ เอตํ ขนฺธปญฺจกํ น ภิชฺชติ, น วินสฺสติ. ตาว อหํ น มรามิ. ยทา เอตํ ภิชฺชติ, วินสฺสติ. ตทา อหํ มรามิ. อหญฺจ มม ขนฺธปญฺจกญฺจ อทฺวยํ อนานตฺตนฺติ เอวํ คหณการณํ วทติ. ตตฺถ ‘‘ขณภงฺคสฺสา’’ติ นามรูปธมฺมานํ ขเณ ขเณ ภญฺชนสฺส ภิชฺชนสฺส มรณสฺส. อิทมฺปนมรณํ สมฺมุติ สจฺเจ นตฺถิ. ปรมตฺถ สจฺเจ เอว อตฺถิ. ตสฺมา ตํ อปสฺสนฺโต มหาชโน อตฺตโน ขนฺธปญฺจกํ อตฺตโนสารํ มญฺญมาโน เอโส เม อตฺตาติ คณฺหาตีติ. ‘‘ตํ ทฺวยํ สุทิฏฺฐํ กตฺวา’’ติ ขนฺธปญฺจกสฺส เกวลํ ปจฺจยายตฺต วุตฺติตญฺจ ขณภงฺคญฺจ ญาณ จกฺขุนา สุฏฺฐุทิฏฺฐํ กตฺวา. ตตฺถ ปญฺจนฺนํ ขนฺธานํ ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ สุฏฺฐุปสฺสนฺโต เกวลํ ปจฺจยายตฺต วุตฺติตญฺจ อวสายตฺต วุตฺติตญฺจ สุฏฺฐุ ปสฺสติ. โย จ อตฺตโน วสายตฺตวุตฺติ น โหติ. โส ปรมตฺถสจฺจํ ปตฺวา เอโส มม สนฺตกนฺติปิ วตฺตุํ นารหติ. กุโต มม อตฺตาติ. อปิ จ, สตฺโต นาม สภาวโต นตฺถิ. ปญฺญตฺติมตฺตํ โหติ. โย ‘อหนฺติ วา, เมติ วา, มมาติ วา, คยฺเหยฺย. อสนฺเต จ อตฺตสฺมึ โก มม อตฺตา นาม ภเวยฺยาติ. ขณภงฺโค โหติ. ขเณ ขเณ ภิชฺชติ. สตฺโต จ นาม เอกสฺมึภเว อาทิมฺหิ สกึ เอว ชายติ. อนฺเต สกึ เอว มรติ. อนฺตรา วสฺสสตํปิ วสฺสสหสฺสํปิ มรณํ นาม นตฺถิ. อญฺญาหิ ขณิกธมฺมานํ คติ. อญฺญา สตฺตสฺส. เอวํสนฺเต กถํ ขณิกธมฺมา สตฺตสฺส สารฏฺเฐน อตฺตานาม ภเวยฺยุนฺติ. ตสฺมา เต อวสวตฺตนฏฺเฐน อสารกฏฺเฐน จ อนตฺตา เอว. อปิจ [Pg.308] ‘‘อวสวตฺตนฏฺเฐนา’’ติ เอตฺถ วโส นาม สตฺตสนฺตาเน เอโก ปธานธมฺโม. สเจ อตฺตานาม อตฺถิ. โส เอว ปธานภูตสฺส วสสฺสปิ อตฺตา ภเวยฺย. เอวํสติ, โย วโส, โส อตฺตา. โย อตฺตา, โส วโสติ ภเวยฺย. ตถา จ สติ, รูปํ อตฺตาติ คณฺหนฺโต รูปญฺจ วสญฺจ อตฺตานญฺจ เอกตฺตํ กตฺวา คณฺหาติ นาม. ตถา เวทนํ อตฺตาติ. สญฺญํ, สงฺขาเร, วิญฺญาณํ อตฺตาติ คณฺหนฺเตปิ. เอวญฺจสติ, สตฺโต จ ขนฺธปญฺจกญฺจ วโส จ อตฺตา จ สพฺพเมตํ เอกตฺตํ คจฺฉติ, เอโก สตฺโตติ สงฺขฺยํ คจฺฉติ. น หิ อิมสฺมึ วสวตฺตนฏฺเฐ เอกสฺสสตฺตสฺส ทฺเว อตฺตา ตโย อตฺตา พหูอตฺตาติ สกฺกา ภวิตุํ. อถ ยถา ยถา สตฺตสฺส วโส วตฺตติ, อิจฺฉา ปวตฺตติ. ตถา ตถา ขนฺธปญฺจกมฺปิ นิจฺจกาลํ สตฺตสฺสวสํ อนุคจฺเฉยฺย. กสฺมา, สตฺตสฺส จ ขนฺธปญฺจกสฺส จ วสสฺส จ นานตฺตาภาวโต. เอวํ อนุคจฺฉนฺเต สติ. รูปํ เม อตฺตา, เวทนา เม อตฺตาติอาทิคฺคหณํ วฏฺเฏยฺย. สภาวโต อวิรุทฺธํ ภเวยฺย. น ปน ตถา อนุคจฺฉติ. น หิ ทุพฺพณฺโณ ทุรูโป ปุริโส อตฺตโน รูปกายํ อตฺตโน วเสเนว สุวณฺณํ สุรูปํ กาตุํ สกฺโกติ. ตถา ทุสฺสทฺโทวา สุสทฺทํ, ทุคฺคนฺโธวา สุคนฺธํ. น จ อนฺโธวา อนนฺธํ. พธิโรวา อพธิรํ. โรคีวา อโรคํ. กุฏฺฐีวา อกุฏฺฐํ. คณฺฑีวา อคณฺฑํ. ชิณฺโณวา ตรุณํ. อชรํ วา อมรณํ วา กาตุํ สกฺโกติ. นาปิ อปาเยสุ จ อปตนฺตํ. ปติตฺวา วา ตโต วิมุตฺตํ กาตุํ สกฺโกติ. ตถา เทโว วา เทวตฺตา อจาเวตุํ. สกฺโกวา สกฺกตฺตา, มาโร วา มารตฺตา, พฺรหฺมา วา พฺรหฺมตฺตาติ. เอสนโย เสสขนฺเธสุปิ. ตถา ปน อวสานุคมนโต ปรมตฺถ สจฺจํ ปตฺวา ขนฺธปญฺจเก อตฺตโน สามิกิจฺจํ อิสฺสรกิจฺจํ นาม นตฺถิ. อสามิกเมว ตํ โหติ, อนิสฺสรํ. ตถา จ สติ, อตฺตานํ ตสฺส สามึ อิสฺสรํ กตฺวา รูปํ เม อตฺตาติ คหณํ มิจฺฉาคหณํ นาม โหตีติ. โลเก ปน มหาชโน ธมฺมานํ ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ น ชานนฺติ, น ปสฺสนฺติ, น ปฏิวิชฺฌนฺติ. เตสํ ปรมฺปร ปจฺจยวเสน ปวตฺตมาเน ขนฺธสนฺตาเน สมฺมุติ สจฺจวเสน นานาวสวตฺตนาการา นาม สนฺติ. นานาสามิ อิสฺสราธิปติโวหารา จ โลเก สนฺทิสฺสนฺติ. เต [Pg.309] สมฺมุติ สจฺจวเสน อุปฺปนฺเนสุ เตสุ สามิอิสฺสราธิปติ โวหาเรสุ โวหารมตฺเต อฐตฺวา สภาวสจฺจํ มญฺญนฺตา มิจฺฉาคหณํ คณฺหนฺติ. เอตฺถ สิยา. น นุ วโสนาม อิจฺฉา. สตฺโต จ คนฺตุํ อิจฺฉนฺโต คจฺฉติ. ฐาตุํ อิจฺฉนฺโต ติฏฺฐติ. เอวํสติ. ตสฺส ขนฺธปญฺจกํ ตสฺส วสายตฺต วุตฺติ เอว โหตีติ. น โหติ. กสฺมา, ปจฺจยายตฺต วุตฺติตฺตา เอว. ตถาหิ คนฺตุํ อิจฺฉานาม พหิทฺธา ธนเหตุวา อุปฺปชฺเชยฺย. นานาโภคเหตุ วา. อญฺเญน วา นานาการเณน. ตตฺถ เยสํ ธเน อสติ, ยํ ยํ ทุกฺขํ อาคจฺเฉยฺย กายิกํ วา เจตสิกํ วา. เตสํ ตํ ตํ ทุกฺขปจฺจยา ธนิจฺฉา นาม อุปฺปชฺชติ. ธนิจฺฉา ปจฺจยา คนฺติจฺฉาทโย อุปฺปชฺชนฺติ. ตถา นานาโภคิจฺฉา นานากมฺมิจฺฉาสุ จาติ. นานาทุกฺขภยุปทฺทวมูลิกาสุ อิจฺฉาสุ วตฺตพฺพ เมว นตฺถิ. ตถา นานารมฺมณานํ ปโลภน ทุกฺขมูลิกาสุ จ นานาวิตกฺกานํ วิปฺผนฺทนมูลิกาสุ จ อิจฺฉาสุ. เอวํ วโสปิ ปจฺจยายตฺต วุตฺติโก เอว โหติ. ‘‘คมนํ’’ติ คมนากาเรน ปวตฺตํ ขนฺธปญฺจกํ. เยนเยนธนาทิเหตุนา โส โส วโส อุปฺปชฺชติ. คมนมฺปิ เตน เตเนว อุปฺปชฺชติ อาหารุปตฺถมฺภนาทิปจฺจเยน จ. วโส ปน คมนสฺส ปจฺจเยก เทสมตฺตํ โหติ. โส หิ ตทญฺญปจฺจเยหิ วินา สยํ อุปฺปชฺชิตุํ น สกฺโกติ. กุโต คมนํ อุปฺปาเทตุํ. เอวํ ฐานาทีสุ. เอวญฺจ สติ, อิทํ ขนฺธปญฺจกํ ปจฺจยายตฺต วุตฺติกนฺติจฺเจว วตฺตุํ อรหติ. โน วสายตฺต วุตฺติกนฺติ. อปิ จ คนฺตุํ อิจฺฉนฺโต คจฺฉตีติ ปญฺญตฺติ มตฺตภูโต สตฺโต คจฺฉติ. ขนฺธปญฺจกํ ปน ขณิก ธมฺมตฺตา น คจฺฉติ. อุปฺปนฺนุปฺปนฺนํ ตตฺถ ตตฺเถว ภิชฺชติ. สนฺตติ วเสน คมนาการ นิมิตฺตํ ปญฺญายติ. เอวํ อวสวตฺตนํ โหตีติ. โหตุ ตตฺถ ตตฺเถว ภิชฺชนํ. อวิจฺเฉทปฺปวตฺติยา สติ, คมนํ สมฺปชฺชติเยว. คมเน จ สมฺปชฺชมาเน ขณิกภิชฺชเนน โทโส นตฺถีติ เจ. อตฺถิ. ขณิกมรณญฺหิ สตฺตสฺส สุสานภูมิ นาม โหติ. อนฺตราเยวา อาคเต ปกฺขลนฺเต วา สติ, คจฺฉนฺโต สตฺโต ยทา กทาจิ มรณํ วา นิคจฺฉติ มรณ มตฺตํ วา ทุกฺขนฺติ. กิเลเส นิมินาติ ปวตฺเตตีติ นิมิตฺตนฺติ วจนตฺโถ. ‘‘วิปลฺลาสนิมิตฺตํ’’ติ จ วิปลฺลาส ธมฺมานํ วเสน อุปฏฺฐิตํ กิจฺจ นิมิตฺตํ. ตณฺหา เอว ปณิธีติ [Pg.310] สมฺพนฺโธ. มหนฺตานํ อาทีนวานํ ราสิ มหาอาทีนวราสิ. ขนฺเธสุ สุญฺญตลกฺขณํ นาม อติ คมฺภีรํ โหติ. ญาณสฺเสว วิสยภูตํ. สุญฺญต ทสฺสนญฺจ ทิฏฺฐิยา อุชุปฺปฏิปกฺขนฺติ อาห ‘‘สงฺขาเรสุ สุญฺญตทสฺสนวเสนา’’ติอาทึ. ตตฺถ ‘‘อตฺถ สิทฺธิ นามา’’ติ มคฺคผลปฺปฏิลาภสงฺขาตสฺส อตฺถสฺส สิทฺธิ นาม. อตฺตาติ อภินิเวโส อตฺตาภินิเวโส. คณฺหาตีติ คาโห. อุปาทียตีติ อตฺโถ. ทิฏฺฐิสงฺขาโต คาโห ทิฏฺฐิคฺคาโห. อตฺถาภินิเวโส จ โส ทิฏฺฐิคฺคาโห จาติ วิคฺคโห. ตสฺส ปฏิปกฺขํ อนตฺตานุปสฺสนาญาณํ. อนุ อนุ ภวนํ อานุภาโว. ปรมฺปรโต วฑฺฒนนฺติ อตฺโถ. ‘‘ตถา สมนุปสฺสิตฺวา’’ติ สุญฺญตา กาเรน สมนุปสฺสิตฺวา. วิมุญฺจนฺตสฺส อริยปุคฺคลสฺส. ‘‘อนิจฺจลกฺขณํ นาม นาติ คมฺภีรํ โหติ. สทฺธายปิ วิสยภูตํ. อุนฺนติลกฺขโณ จ อหํ มาโน ขนฺเธสุ นิจฺจธุววิปลฺลาสมูลโก สทฺธาย จ ปฏิปกฺโขติ อาห ‘‘อนิจฺจทสฺสนวเสนา’’ติอาทึ. ‘‘นิมิตฺตาภินิเวสภูตสฺสา’’ติ นิจฺจธุวนิมิตฺตาภินิเวสภูตสฺส. ‘‘มานคฺคาหสฺสา’’ติ มานสงฺขาตสฺส คาหสฺส. ‘‘สทฺธาย ปี’’ติปิสทฺเทน ญาณํ สมฺปิณฺเฑติ. ทุกฺขลกฺขณํ นาม ภยสํเวค ชนกํ โหติ. อารมฺมเณสุ ตณฺหาโลลสฺส ตณฺหาวิปฺผนฺทนสฺส ปฏิปกฺขํ. วิเสสโต สมาธิสฺส อนุรูปนฺติ อาห ‘‘ทุกฺขทสฺสน วเสนา’’ติอาทึ. ‘‘ติณฺณํ ธมฺมานํ’’ติ ปญฺญินฺทฺริย สทฺธินฺทฺริย สมาธินฺทฺริย สงฺขาตานํ ติณฺณํ อินฺทฺริย ธมฺมานํ. ‘‘วิปสฺสนา คมนวเสเน วา’’ติ วุฏฺฐานคามินิ วิปสฺสนา สงฺขาตสฺส อาคมน การณสฺส วเสเนว. “अभिनिवेश” म्हणजे अध्यात्मिकदृष्ट्या (अंतर्गत) अधिक दृढपणे प्रतिष्ठित होणे. “रोवलेल्या सुमेरू पर्वताप्रमाणे” म्हणजे त्याच्या प्रवृत्तीप्रमाणे (अचल राहणे). “केवळ प्रत्ययाधीन (कारणांवर अवलंबून असणारी) प्रवृत्ती न दिसल्यामुळे” याद्वारे “हा माझा आत्मा आहे, दुसऱ्याचा आत्मा नाही” अशा प्रकारे स्वतःला आत्म्याचा स्वामी मानून ग्रहण करण्याचे (पकडून ठेवण्याचे) कारण सांगितले आहे. तेथे “केवळ” या शब्दाने परमार्थ सत्याचा विचार करता आत्म्याचाच अभाव असल्यामुळे, पंचस्कंधांची स्वतःच्या वश असणारी प्रवृत्ती नाकारली जाते. परंतु संवृत्ती (व्यावहारिक) सत्याचा विचार करता, आत्म्याचे अस्तित्व मानून सामान्य लोक आपल्या पंचस्कंधांना स्वतःच्या वश असणारे मानतात आणि “हा माझा आत्मा आहे” असे ग्रहण करतात. “आणि क्षणभंगाचे (क्षणिक विनाशाचे) दर्शन न झाल्यामुळे” याद्वारे “हा माझा सार रूपाने आत्मा आहे. हा माझा सार आहे. हे माझे शरीर आहे. जोपर्यंत शंभर वर्षे किंवा हजार वर्षे हे पंचस्कंध भंग पावत नाहीत, नष्ट होत नाहीत, तोपर्यंत मी मरणार नाही. जेव्हा हे भंग पावेल, नष्ट होईल, तेव्हा मी मरेन. मी आणि माझे पंचस्कंध हे अभिन्न (एकच) आहेत, भिन्न नाहीत” अशा प्रकारे ग्रहण करण्याचे कारण सांगितले आहे. तेथे “क्षणभंग” म्हणजे नामरूप धर्मांचे क्षणाक्षणाला भंग पावणारे, नष्ट होणारे मरण होय. परंतु हे मरण संवृत्ती सत्यात नाही, तर केवळ परमार्थ सत्यातच आहे. म्हणूनच, ते न पाहणारे सामान्य लोक आपल्या पंचस्कंधांना स्वतःचे सार मानून “हा माझा आत्मा आहे” असे ग्रहण करतात. “त्या दोन्ही गोष्टी चांगल्या प्रकारे पाहून” म्हणजे पंचस्कंधांची केवळ प्रत्ययाधीन प्रवृत्ती आणि क्षणभंग या दोन्ही गोष्टी ज्ञानचक्षूने चांगल्या प्रकारे पाहून. तेथे पाच स्कंधांच्या प्रतीत्यसमुत्पादाला चांगल्या प्रकारे पाहणारे केवळ प्रत्ययाधीन प्रवृत्ती आणि अवशायत्त (स्वतःच्या नियंत्रणात नसलेली) प्रवृत्ती चांगल्या प्रकारे पाहतात. आणि जे स्वतःच्या वश असणारे नसते, ते परमार्थ सत्याचा विचार करता “हे माझे आहे” असे म्हणण्यासही योग्य नाही, मग “माझा आत्मा” कुठून असणार? शिवाय, ‘सत्त्व’ (प्राणी) नावाचे काही स्वभावतः अस्तित्वात नाही. ते केवळ प्रज्ञप्तिमात्र (संकल्पनात्मक) आहे. जो “मी”, “माझे” किंवा “माझ्यासाठी” असे ग्रहण करतो, त्या आत्म्याचाच अभाव असताना “माझा आत्मा” नावाचे काय असणार? क्षणभंग होतो, क्षणाक्षणाला नष्ट होतो. आणि सत्त्व (प्राणी) एका जन्माच्या सुरुवातीला एकदाच जन्म घेतो आणि शेवटी एकदाच मरतो. दरम्यानच्या काळात शंभर वर्षे किंवा हजार वर्षे मरण नावाचे काही नसते. क्षणिक धर्मांची गती वेगळी आहे आणि सत्त्वाची (प्राण्याची) गती वेगळी आहे. असे असताना क्षणिक धर्म हे सत्त्वाचे सार रूपाने “आत्मा” कसे असू शकतील? म्हणूनच, ते वश न राहण्याच्या अर्थाने (अवशवर्तित्व) आणि असारतेच्या अर्थाने “अनात्मा” (अनत्ता) च आहेत. शिवाय, “अवशवर्तित्व अर्थाने” यामध्ये ‘वश’ (नियंत्रण) हा सत्त्वाच्या संतानातील (प्रवाहात) एक मुख्य धर्म आहे. जर आत्मा नावाचे काही असते, तर तोच या प्रधानभूत वशाचा (नियंत्रणाचा) देखील आत्मा झाला असता. असे झाल्यास, जे वश आहे तो आत्मा, आणि जो आत्मा आहे ते वश, असे झाले असते. आणि असे असताना, “रूप हा आत्मा आहे” असे ग्रहण करणारा रूपाला, वशाला आणि आत्म्याला एकच मानून ग्रहण करतो. तसेच वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान यांना आत्मा मानून ग्रहण करणाऱ्यांच्या बाबतीतही हेच घडते. आणि असे असताना, सत्त्व, पंचस्कंध, वश आणि आत्मा हे सर्व एकरूप होतात आणि “एक सत्त्व” अशी त्यांची गणना होते. कारण या वशवर्तित्व अर्थामध्ये एका सत्त्वाचे दोन आत्मे, तीन आत्मे किंवा अनेक आत्मे असणे शक्य नाही. आणि जशी जशी सत्त्वाची इच्छा किंवा वश चालतो, तसे तसे पंचस्कंधांनी देखील नेहमी सत्त्वाच्या इच्छेचे अनुकरण केले पाहिजे. का? कारण सत्त्व, पंचस्कंध आणि वश यांच्यात भिन्नता नसल्यामुळे. असे अनुकरण होत असताना, “रूप माझा आत्मा आहे”, “वेदना माझा आत्मा आहे” इत्यादी ग्रहण करणे योग्य ठरले असते आणि ते स्वभावतः अविरुद्ध (सुसंगत) झाले असते. परंतु तसे अनुकरण होत नाही. कारण एखादा कुरूप किंवा दुर्वर्ण मनुष्य आपल्या रूपकायाला केवळ स्वतःच्या इच्छेने (वशाने) सुवर्ण किंवा सुरूप बनवू शकत नाही. तसेच वाईट आवाज असणारा चांगला आवाज, दुर्गंधी असणारा सुगंधी, आंधळा डोळस, बहिरा ऐकू येणारा, रोगी निरोगी, कुष्ठरोगी कुष्ठमुक्त, गंडमाळा असलेला गंडमाळामुक्त, वृद्ध तरुण, किंवा स्वतःला अजर आणि अमर बनवू शकत नाही. तसेच तो स्वतःला अपायांमध्ये (नरक इत्यादी दुर्गतींमध्ये) पडण्यापासून रोखू शकत नाही किंवा पडल्यावर तिथून मुक्त करू शकत नाही. त्याचप्रमाणे देव देवत्वापासून च्युत न होण्यास, शक्र शक्रत्वापासून, मार मारत्वापासून, ब्रह्मा ब्रह्मत्वापासून स्वतःला रोखू शकत नाही. हाच नियम उर्वरित स्कंधांच्या बाबतीतही लागू होतो. अशा प्रकारे, वश न चालल्यामुळे (नियंत्रण नसल्यामुळे) परमार्थ सत्याचा विचार करता पंचस्कंधांवर स्वतःचे स्वामित्व (मालकी) किंवा ईश्वरत्व (नियंत्रण) नावाचे काही नाही. ते अस्वामिक (मालक नसलेले) आणि अनिश्वर (नियंत्रण नसलेले) आहे. आणि असे असताना, स्वतःला त्याचा स्वामी किंवा ईश्वर मानून “रूप माझा आत्मा आहे” असे ग्रहण करणे हे मिथ्या ग्रहण (चुकीची धारणा) ठरते. परंतु जगातील सामान्य लोक धर्मांच्या प्रतीत्यसमुत्पादाला जाणत नाहीत, पाहत नाहीत आणि त्याचा भेद करत नाहीत (समजून घेत नाहीत). परंपरेने कारणांच्या (प्रत्ययांच्या) प्रभावाने चालणाऱ्या त्यांच्या स्कंध-संतानामध्ये संवृत्ती सत्याच्या आधारे विविध प्रकारचे वशवर्तित्व (नियंत्रण) दिसून येते. आणि जगात विविध स्वामी, ईश्वर आणि अधिपती असे व्यवहार (शब्दप्रयोग) दिसून येतात. ते संवृत्ती सत्याच्या आधारे उत्पन्न झालेल्या स्वामी, ईश्वर, अधिपती या व्यवहारांना केवळ व्यवहार न मानता, त्यांना स्वभाव सत्य (वास्तविक सत्य) मानून मिथ्या ग्रहण करतात. येथे शंका उपस्थित होऊ शकते: “इच्छा म्हणजेच वश (नियंत्रण) नव्हे काय? आणि प्राणी जाण्याची इच्छा करतो तेव्हा जातो, थांबण्याची इच्छा करतो तेव्हा थांबतो. असे असताना, त्याचे पंचस्कंध त्याच्या वश असणारेच ठरतात.” तर असे नाही. का? कारण ते केवळ प्रत्ययाधीन (कारणांवर अवलंबून असणारे) आहे. तथापि, जाण्याची इच्छा ही बाह्य धनप्राप्तीच्या हेतूने किंवा विविध भोगांच्या हेतूने किंवा इतर विविध कारणांमुळे उत्पन्न होते. त्यात ज्यांच्याकडे धन नसते, त्यांना जे जे शारीरिक किंवा मानसिक दुःख प्राप्त होते, त्या दुःखाच्या कारणाने (प्रत्ययाने) धन मिळवण्याची इच्छा उत्पन्न होते. धनेच्छेच्या कारणाने जाण्याची इच्छा इत्यादी उत्पन्न होतात. तसेच विविध भोगांची इच्छा आणि विविध कर्मांची इच्छा यांच्या बाबतीतही हेच घडते. विविध दुःख, भय आणि उपद्रव यांवर आधारित असणाऱ्या इच्छांच्या बाबतीत तर बोलण्याची गरजच नाही. तसेच विविध आलंबनांच्या (विषयांच्या) प्रलोभन आणि दुःखावर आधारित असणाऱ्या आणि विविध वितर्कांच्या चंचलतेवर आधारित असणाऱ्या इच्छांच्या बाबतीतही हेच आहे. अशा प्रकारे, वश (नियंत्रण) देखील केवळ प्रत्ययाधीन प्रवृत्तीचेच असते. “गमन” (जाणे) म्हणजे गमनाच्या आकाराने प्रवृत्त झालेले पंचस्कंध होय. ज्या ज्या धन इत्यादी हेतूंमुळे तो तो वश (इच्छा) उत्पन्न होतो, गमन देखील त्याच कारणाने आणि आहाराचा आधार इत्यादी प्रत्ययांनी उत्पन्न होते. परंतु वश (इच्छा) हा गमनाच्या कारणाचा केवळ एक भाग आहे. तो इतर कारणांशिवाय स्वतः उत्पन्न होऊ शकत नाही, मग गमनाला कसे उत्पन्न करणार? उभे राहणे इत्यादींच्या बाबतीतही हेच समजावे. आणि असे असताना, हे पंचस्कंध केवळ प्रत्ययाधीन प्रवृत्तीचेच आहेत असे म्हणणे योग्य आहे, वशायत्त (इच्छेच्या अधीन असणारे) प्रवृत्तीचे नाही. शिवाय, “जाण्याची इच्छा करणारा जातो” असे म्हटले असता केवळ प्रज्ञप्तिमात्र असलेला सत्त्व (प्राणी) जातो. परंतु पंचस्कंध हे क्षणिक धर्म असल्यामुळे जात नाहीत. ते उत्पन्न होऊन तिथेच नष्ट होतात. संततीच्या (प्रवाहाच्या) प्रभावाने गमनाचा आकार भासतो. अशा प्रकारे अवशवर्तित्व (नियंत्रण नसणे) सिद्ध होते. “तिथेच नष्ट होणे घडू दे, परंतु अखंड प्रवृत्तीमुळे गमन तर सिद्ध होतेच. आणि गमन सिद्ध होत असताना क्षणिक विनाशाने काय फरक पडतो (दोष नाही)?” असे जर म्हटले, तर दोष आहे. कारण क्षणिक मरण हे सत्त्वासाठी स्मशानभूमीसारखे आहे. कारण मध्येच अडथळा आल्यास किंवा पाऊल घसरल्यास, जाणारा सत्त्व कधीतरी मरणाला प्राप्त होतो किंवा मरणासारख्या दुःखाला प्राप्त होतो. “क्लेश निर्माण करतो किंवा प्रवृत्त करतो ते निमित्त” असा शब्दाचा अर्थ आहे. आणि “विपर्यास निमित्त” म्हणजे विपर्यास धर्मांच्या प्रभावाने उपस्थित झालेले कार्य-निमित्त होय. “तृष्णा हीच प्रणिधी (आकांक्षा) आहे” असा संबंध आहे. मोठ्या दोषांचा (आदीनवांचा) समूह म्हणजे “महा-आदीनव-राशी” होय. स्कंधांमध्ये शून्यता-लक्षण हे अत्यंत गंभीर असते. ते केवळ ज्ञानाचाच विषय आहे. आणि शून्यता-दर्शन हे (मिथ्या) दृष्टीचे थेट विरोधी आहे, म्हणूनच “संस्कारांमध्ये शून्यता-दर्शनाच्या प्रभावाने” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “अर्थ सिद्धी” म्हणजे मार्ग आणि फल यांच्या प्राप्तीरूप अर्थाची सिद्धी होय. “आत्मा” असा अभिनिवेश म्हणजे “आत्माभिनिवेश”. ग्रहण करतो तो “ग्राह” (पकडणे). दृष्टीरूप ग्राह म्हणजे “दृष्टीग्राह”. आत्माभिनिवेश आणि दृष्टीग्राह यांचा विग्रह (समास) आहे. त्याचा विरोधी “अनात्मानुपश्यना ज्ञान” आहे. पुन्हा पुन्हा अनुभवणे म्हणजे “अनुभाव”. परंपरेने वाढणे असा याचा अर्थ आहे. “त्याच प्रकारे पाहून” म्हणजे शून्यतेच्या रूपाने पाहून मुक्त होणाऱ्या आर्य पुद्गलांचे. “अनित्य-लक्षण हे फार गंभीर नसते. ते श्रद्धेचा देखील विषय आहे. आणि उन्नत लक्षण असलेला “मी” हा मान (अहंकार) स्कंधांमध्ये नित्य आणि ध्रुव अशा विपर्यासावर आधारित असून तो श्रद्धेचा विरोधी आहे, म्हणूनच “अनित्य-दर्शनाच्या प्रभावाने” इत्यादी म्हटले आहे. “निमित्ताभिनिवेश झालेल्याचे” म्हणजे नित्य आणि ध्रुव अशा निमित्तामध्ये अभिनिवेश झालेल्याचे. “मान-ग्रहाचे” म्हणजे मान (अहंकार) रूप ग्रहाचे. “श्रद्धेने देखील” यातील ‘देखील’ (अपि) शब्दाने ज्ञानाचा समावेश होतो. दुःख-लक्षण हे भय आणि संवेग उत्पन्न करणारे असते. ते आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये) तृष्णेच्या चंचलतेचे आणि तृष्णेच्या तडफडाटाचे विरोधी आहे. विशेषतः ते समाधीला अनुकूल आहे, म्हणूनच “दुःख-दर्शनाच्या प्रभावाने” इत्यादी म्हटले आहे. “तीन धर्मांचे” म्हणजे प्रज्ञेंद्रिय, श्रद्धेंद्रिय आणि समाधींद्रिय या तीन इंद्रिय धर्मांचे. किंवा “विपश्यनेच्या गमनाच्या प्रभावाने” म्हणजे वुट्ठानगामिनी (उत्थानगामी) विपश्यना नावाच्या आगमनाच्या कारणाच्या प्रभावानेच। อิทานิ ปุพฺเพ ยํ วุตฺตํ ‘สตฺตอริย ปุคฺคลวิภาคสฺส ปจฺจยภาวปตฺติยา จา’ติ. ตตฺถ สตฺต อริยปุคฺคลวิภาคํ ทสฺเสตุํ ‘‘ตตฺถา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ธมฺมานุสารี นามาติ เอตฺถ ‘‘ธมฺโม’’ติ ปญฺญา วุจฺจติ ‘สจฺจํ, ธมฺโม, ธีติ, จาโค,ติ เอตฺถ วิย. ติกฺขตรํ ธมฺมํ อนุสฺสรตีติ ธมฺมานุสารี. ปญฺญาพลานุสาเรน อาทิมฺหิ มคฺคํ ลภตีติ วุตฺตํ โหติ. อถวา. ‘‘ธมฺโม’’ติ นิสฺสตฺตนิชฺชีวฏฺเฐน สงฺขาร ธมฺโม วุจฺจติ. สุญฺญตทสฺสนญฺจ นาม วิเสสโต สุทฺธธมฺม ทสฺสนํ นาม. อิติ สุทฺธธมฺมํ [Pg.311] อนุสฺสรติ, ญาณคติยา อนุคจฺฉตีติ ธมฺมานุสารี. ทิฏฺฐิปตฺโตติ เอตฺถ ทิฏฺฐินาม ทสฺสนญฺญาณํ วุจฺจติ. อาทิโต ปฏฺฐาย ปริสุทฺธ ทสฺสนสมฺปนฺนตฺตา ทิฏฺฐิพเลเนว สุเขน ตํ ตํ มคฺคผลํ ปตฺโตติ ทิฏฺฐิปตฺโต. เตเนว ทสฺสน ปญฺญาพเลน กิเลสพนฺธนโต วิมุตฺโตติ ปญฺญาวิมุตฺโต. สงฺขาร ธมฺมานํ ขณิก ธมฺมภาเว สุฏฺฐุ สทฺทหนํ อเวจฺจปฺปสาโท สทฺธา นาม. ตตฺถ ‘‘อเวจฺจปฺปสาโท’’ติ ญาณสมฺปยุตฺตปฺปสาโท. ‘‘ญาณํ’’ติ จ สงฺขาร ธมฺมานํ ขณิกภาวนิมิตฺตานํ ทสฺสนญฺญาณํ. ตาทิเส หิ ญาเณ สติ, ตตฺถ อเวจฺจปฺปสาโท นาม ชายติ, โน อญฺญถาติ. สทฺธํ อนุสฺสรตีติ สทฺธานุสารี. สทฺธาพเลเนว อาทิมฺหิ อริยมคฺคํ ปาปุณาตีติ วุตฺตํ โหติ. สทฺธาพเลน วิมุตฺโตติ สทฺธาวิมุตฺโต. ‘‘กายสกฺขิ นามา’’ติ เอตฺถ สกฺขํติ สนฺทิฏฺฐํ. ยํ สาธกนฺติปิ วุจฺจติ. อตฺตโน กาเย เอว ลทฺธํ สกฺขํ ยสฺสาติ กายสกฺขี. ทุกฺขานุ ปสฺสี ปุคฺคโล หิ สํเวค พหุโล โหติ. สํเวโค จ ปธาน วีริยสฺส ปทฏฺฐานํ. สํวิคฺโค โยนิโส ปทหตีติ หิ วุตฺตํ. ตสฺมา โส สํเวควเสน ภาวนํ อนุยุญฺชนฺโต ยํ ยํ ปุริสถาเมน ปตฺตพฺพํ โหติ. ตํ ตํ ปาปุณาติ. ปาปุณนฺโต จ อตฺตโน กาเย เอว สกฺขํ ลภติ. สนฺทิฏฺฐํ ฌานสุขํ วา มคฺคผลสุขํ วา ลภตีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘อุภโตภาค วิมุตฺโต’’ติ อรูปชฺฌาเนหิ รูปกายโต อรหตฺตมคฺคผเลหิ นามกายโตติ เอวํ อุโภหิ กายภาเคหิ วิมุตฺโต. เอตฺถ จ ตโย อริยปุคฺคลา ปญฺญาธิโก จ สทฺธาธิโก จ วีริยาธิโก จ. ตตฺถ ธมฺมานุสารี จ ทิฏฺฐิปตฺโต จ ปญฺญาวิมุตฺโต จ ปญฺญาธิโก นาม. สทฺธานุสารี จ สทฺธาวิมุตฺโต จ สทฺธาธิโก นาม. กายสกฺขี จ อุภโตภาควิมุตฺโต จ วีริยาธิโก นามาติ ทฏฺฐพฺพํ. อยญฺจ ปุคฺคลวิภาคนโย ปฏิสมฺภิทามคฺคนเยน วุตฺโต. อภิธมฺเม ปน ปุคฺคล ปญฺญตฺติยํ สทฺธาวิมุตฺโต จ กายสกฺขี จ ทฺเวปุคฺคลา เสกฺเขสุ เอว วุตฺตา. อรหตฺตํ ปตฺตา ปน เอเต ทฺเวปิ ปญฺญาวิมุตฺตา เอวาติ ทฏฺฐพฺพา. เอตฺถ สิยา, สงฺขาร ธมฺมานํ ขณิก ธมฺมภาเว สุฏฺฐุ สทฺทหนํ อเวจฺจปฺปสาโท สทฺธา นามาติ วุตฺตํ. กึ ปน ตาทิเสน สทฺธามตฺเตน โสตาปตฺติ มคฺคํ [Pg.312] ปาปุณาตีติ. เอตฺถ อมฺเหหิ วตฺตพฺพํ นตฺถิ. ภควตา เอว วุตฺตํ. ยถาห มหาวคฺเค โอกฺกนฺต สํยุตฺเต จกฺขุ ภิกฺขเว อนิจฺจํ วิปริณามี อญฺญถาภาวี, โย เอวํ สทฺทหติ, เอวํ อธิมุจฺจติ. อยํ วุจฺจติ สทฺธานุสารี. โอกฺกนฺโต อริยภูมึ. อติกฺกนฺโต ปุถุชฺชนภูมึ. โส เยนกมฺเมน อปายํ ทุคฺคตึ วินิปาตํ อุปฺปชฺเชยฺย. น ตํ กมฺมํ กโรตีติ. โสตํ ภิกฺขเว อนิจฺจํ. วิปริณามี อญฺญถาภาวีติอาทินา ทฺวาทสายตนานิ วิตฺถาเร ตพฺพานิ. ตตฺถ ‘‘วิปริณามี’’ติ วิปริณาโม ยสฺส อตฺถีติ วิปริณามี. วิปริณาโมติ จ ขเณ ขเณ ชีรณตา ภิชฺชนตา วุจฺจติ. ‘‘อญฺญถาภาวี’’ติ ตสฺเสว เววจนํ. ‘‘เอวํ อธิมุจฺจตี’’ติ เอเตน ญาณสมฺปยุตฺตสทฺธํ ทีเปติ. สา เอว โสตาปตฺติยงฺเคสุ พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโต, ธมฺเม, สงฺเฆ อเวจฺจปฺปสาเทน สมนฺนาคโตติ วุตฺตา. ตตฺถ ญาณสมฺปยุตฺตสทฺธา นาม จกฺขาทีนํ อนิจฺจนิมิตฺต ทสฺสนญฺญาเณน สมฺปยุตฺตา โอกปฺปนสทฺธา. อนิจฺจนิมิตฺตญฺจ นาม รูปํ อนิจฺจํ ขยฏฺเฐนาติปเท วุตฺตนเยน จกฺขาทินิสฺสยานํ มหาภูตานํ สนฺตติ ปริวตฺตนาทิกํ วุจฺจติ. ตญฺหิ ปสฺสนฺโต จกฺขาทีนํ อนิจฺจภาเว สทฺทหติ, อธิมุจฺจติ. ตานิปิ ขเณ ขเณ เอกนฺเตน ภิชฺชติ เยวาติ สทฺธาธิโมกฺขํ สทฺธาวินิจฺฉยํ ปฏิลภตีติ อตฺโถ. ‘‘พุทฺเธ อเวจฺจปฺปสาเทนา’’ติ เอตฺถ ปน อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺธตาทีนํ พุทฺธคุณาทีนํ ทสฺสนญฺญาเณน สมฺปยุตฺโต ปสาโท อเวจฺจปฺปสาโท นาม. อริยภูมิ นาม ทิฏฺฐานุสย วิจิกิจฺฉานุสเยหิ ปริสุทฺธา อวตฺถาภูมิ วุจฺจติ. เตหิ สหิตา อวตฺถาภูมิ ปุถุชฺชนภูมิ นาม. กถํ ปน ตสฺส ปุคฺคลสฺส ปุถุชฺชนภูมึ อติกฺกนฺตตา อริยภูมึ โอกฺกนฺตตา จ วิญฺญายตีติ อาห ‘‘โส เยนา’’ติอาทึ. โย อตฺตโน ชีวิตเหตุปิ กิญฺจิ กมฺมปถปตฺตํ อปายคามิ กมฺมํ น กโรติ. โส เอกนฺเตน ปุถุชฺชนภูมึ อติกฺกนฺโต, อริยภูมึ โอกฺกนฺโตติ วิญฺญายตีติ วุตฺตํ โหติ. อิทํ สทฺธานุสาริสุตฺตํ. อปรํปิ วุตฺตํ จกฺขุ ภิกฺขเว วิปริณามี อญฺญถาภาวี. ยสฺส เอวํ มตฺตโส นิชฺฌานํ ขมติ. อยํ วุจฺจติ ธมฺมานุสารี ติอาทิ. ตตฺถ ‘‘มตฺตโส [Pg.313] นิชฺฌานํ ขมตี’’ติ สทฺธานุสารีวิย สทฺทหนมตฺเต อฏฺฐตฺวา จกฺขาทีนํ ตาทิสํ อนิจฺจตํ สมนุปสฺสนฺโต โถกํ โถกํ ทสฺสนํ ลภติเยว. เอวํสติ, จกฺขาทีนิ ตสฺส ปุคฺคลสฺส นิชฺฌานํ โอโลกนํ มตฺตโส ขมนฺติ นาม. อิทํ ธมฺมานุสาริสุตฺตํ. อปรํปิ วุตฺตํ จกฺขุ ภิกฺขเว อนิจฺจํ วิปริณามี อญฺญถาภาวี. โย เอวํ ปชานาติ ปสฺสติ. อยํ วุจฺจติ โสตาปนฺโน ติอาทิ. ตตฺถ ‘‘ปชานาติ ปสฺสตี’’ติ ธมฺมานุสารีวิย มตฺตโส นิชฺฌานกฺขมมตฺเต อฏฺฐตฺวา ปญฺญาย ปชานาติ, ญาณจกฺขุโน ปจฺจกฺขโต ปสฺสตีติ อตฺโถ. อิทํ ทิฏฺฐิปตฺตาทีนํ สุตฺตํ. आता, पूर्वी जे म्हटले गेले आहे की, 'सात आर्य पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) विभागाच्या प्रत्ययभावाच्या प्राप्तीसाठी' असे. त्यात, सात आर्य पुद्गलांचा विभाग दर्शवण्यासाठी 'तथ' (त्यात) इत्यादी म्हटले आहे. 'धम्मानुसारी' (धर्माचे अनुसरण करणारा) म्हणजे, येथे 'धम्म' शब्दाने प्रज्ञा (ज्ञान) म्हटली जाते, जसे की 'सच्चं, धम्मो, धिती, चागो' (सत्य, धर्म, धैर्य, त्याग) यामध्ये. अतिशय तीक्ष्ण अशा धर्माचे (प्रज्ञेचे) अनुस्मरण करतो म्हणून तो 'धम्मानुसारी' होय. प्रज्ञाबलाच्या अनुषंगाने सुरुवातीला मार्ग प्राप्त करतो, असा याचा अर्थ आहे. अथवा, 'धम्म' म्हणजे जीव नसलेला आणि निर्जीव अशा अर्थाने 'संस्कार धर्म' (संखार धम्म) म्हटला जातो. आणि शून्यता-दर्शन म्हणजे विशेषतः शुद्ध धर्माचे दर्शन होय. अशा प्रकारे शुद्ध धर्माचे अनुस्मरण करतो, ज्ञानमार्गाने त्याचे अनुगमन करतो, म्हणून तो 'धम्मानुसारी' होय. 'दिट्ठिपत्त' (दृष्टीप्राप्त) यामध्ये 'दिट्ठि' (दृष्टी) म्हणजे दर्शनज्ञान म्हटले जाते. सुरुवातीपासूनच अत्यंत शुद्ध अशा दर्शनाने संपन्न असल्यामुळे, दृष्टीच्या बलानेच सुखाने त्या त्या मार्गफलाला प्राप्त झाला आहे, म्हणून तो 'दृष्टीप्राप्त' (दिट्ठिपत्त) होय. त्याच दर्शन-प्रज्ञाबलाने क्लेशांच्या बंधनातून मुक्त झाला आहे, म्हणून तो 'प्रज्ञाविमुक्त' (पञ्ञाविमुत्त) होय. संस्कार धर्मांच्या क्षणिक धर्मभावावर (क्षणिकतेवर) उत्तम प्रकारे श्रद्धा ठेवणे, म्हणजेच 'अवेच्चप्पसाद' (अढळ विश्वास) आणि 'श्रद्धा' होय. त्यात 'अवेच्चप्पसाद' म्हणजे ज्ञानसंप्रयुक्त (ज्ञानाने युक्त असलेला) प्रसाद (विश्वास) होय. आणि 'ज्ञान' म्हणजे संस्कार धर्मांच्या क्षणिकतेच्या निमित्ताचे दर्शनज्ञान होय. अशा प्रकारचे ज्ञान झाले असता, तिथे 'अवेच्चप्पसाद' उत्पन्न होतो, अन्यथा नाही. श्रद्धेचे अनुस्मरण करतो (श्रद्धेच्या मागे जातो) म्हणून तो 'श्रद्धानुसारी' (सद्धानुसारी) होय. श्रद्धाबलानेच सुरुवातीला आर्यमार्गाला प्राप्त करतो, असा याचा अर्थ आहे. श्रद्धाबलाने मुक्त झाला आहे, म्हणून तो 'श्रद्धाविमुक्त' (सद्धाविमुत्त) होय. 'कायसाक्षी' (कायसक्खी) यामध्ये 'सक्खं' म्हणजे प्रत्यक्ष (संदिट्ठं), ज्याला 'साधक' असेही म्हटले जाते. ज्याने स्वतःच्या कायेमध्येच (शरीरात/अस्तित्वात) प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त केला आहे, तो 'कायसाक्षी' होय. दुःखानुपस्सी (दुःखाचे अनुदर्शन करणारा) पुद्गल हा संवेगाने (तीव्र वैराग्य किंवा आवेगाने) प्रचुर असतो. आणि संवेग हा प्रधान वीर्याचे (प्रयत्नाचे) पदस्थान (कारण) आहे. कारण 'संवेग प्राप्त झालेला मनुष्य योग्य प्रकारे प्रयत्न करतो' असे म्हटले आहे. त्यामुळे तो संवेगाच्या प्रभावाने भावनेचा (ध्यानाचा) अभ्यास करत असताना, पुरुषाच्या पराक्रमाने जे जे प्राप्त करण्याजोगे असते, ते ते प्राप्त करतो. आणि ते प्राप्त करत असताना, तो स्वतःच्या कायेमध्येच प्रत्यक्ष अनुभव मिळवतो. म्हणजेच तो प्रत्यक्ष ध्यानसुख किंवा मार्गफलसुख प्राप्त करतो, असे म्हटले आहे. 'उभतोभागविमुक्त' (उभतोभागविमुत्त) म्हणजे अरूप ध्यानांद्वारे रूपकायेतून आणि अर्हतमार्गफलांद्वारे नामकायेतून, अशा दोन्ही कायभागांतून मुक्त झालेला. आणि येथे तीन आर्य पुद्गल आहेत: प्रज्ञाधिक (प्रज्ञेची अधिकता असलेला), श्रद्धाधिक (श्रद्धेची अधिकता असलेला) आणि वीर्याधिक (वीर्याची अधिकता असलेला). त्यात धम्मानुसारी, दृष्टीप्राप्त आणि प्रज्ञाविमुक्त हे 'प्रज्ञाधिक' होत. श्रद्धानुसारी आणि श्रद्धाविमुक्त हे 'श्रद्धाधिक' होत. आणि कायसाक्षी व उभतोभागविमुक्त हे 'वीर्याधिक' समजावेत. आणि हा पुद्गल-विभागाचा नियम 'पटिसम्भिदामग्ग' च्या नियमानुसार सांगितला आहे. परंतु अभिधम्मातील 'पुग्गलपञ्ञत्ति' मध्ये श्रद्धाविमुक्त आणि कायसाक्षी हे दोन पुद्गल केवळ शैक्षांमध्येच (सेक्ख) सांगितले आहेत. परंतु अर्हतपद प्राप्त झाल्यावर हे दोन्हीही 'प्रज्ञाविमुक्त'च समजावेत. येथे शंका असू शकते की, 'संस्कार धर्मांच्या क्षणिक धर्मभावावर उत्तम प्रकारे श्रद्धा ठेवणे म्हणजे अवेच्चप्पसाद आणि श्रद्धा होय' असे म्हटले आहे. तर मग काय अशा केवळ श्रद्धेच्या बळावर कोणी स्रोतापत्ती मार्गाला प्राप्त करू शकतो का? यावर आम्हाला काही सांगण्याची गरज नाही. स्वतः भगवंतांनीच हे सांगितले आहे. जसे की महावग्गातील 'ओक्कन्त संयुत्त' मध्ये भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो! चक्षु (डोळा) अनित्य आहे, विपरिणामी (बदलणारा) आहे, अन्यथाभावी (दुसऱ्या रूपात बदलणारा) आहे. जो यावर अशी श्रद्धा ठेवतो, असा निश्चय करतो, त्याला 'श्रद्धानुसारी' म्हटले जाते. त्याने आर्यभूमीत प्रवेश केला आहे. त्याने पृथग्जनभूमी ओलांडली आहे. ज्या कर्मामुळे तो अपाय (नरकात नेणारे), दुर्गती किंवा विनिपातात उत्पन्न होईल, असे कर्म तो करत नाही.' 'भिक्खूहो! श्रोत (कान) अनित्य आहे, विपरिणामी आहे, अन्यथाभावी आहे' इत्यादी प्रकारे बारा आयतनांचा विस्तार करावा. त्यात 'विपरिणामी' म्हणजे ज्याचा विपरिणाम (बदल) होतो तो विपरिणामी. आणि विपरिणाम म्हणजे क्षणाक्षणाला जीर्ण होणे (वृद्ध होणे) आणि भंग पावणे (नष्ट होणे) होय. 'अन्यथाभावी' हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. 'अशा प्रकारे निश्चय करतो' याने ज्ञानसंप्रयुक्त श्रद्धा दर्शवली जाते. तीच स्रोतापत्तीच्या अंगांमध्ये 'बुद्धावर अढळ विश्वासाने (अवेच्चप्पसादाने) युक्त असलेला, धर्मावर, संघावर अढळ विश्वासाने युक्त असलेला' अशी सांगितली आहे. त्यात ज्ञानसंप्रयुक्त श्रद्धा म्हणजे चक्षु इत्यादींच्या अनित्यतेच्या निमित्ताच्या दर्शनज्ञानाने युक्त असलेली दृढ श्रद्धा (ओकप्पनसद्धा) होय. आणि अनित्यतेचे निमित्त म्हणजे 'रूप हे क्षय होण्याच्या अर्थाने अनित्य आहे' या पदात सांगितलेल्या नियमानुसार, चक्षु इत्यादींचे आश्रय असलेल्या महाभूतांच्या संततीचे परिवर्तन इत्यादी होय. कारण ते पाहणारा चक्षु इत्यादींच्या अनित्यतेवर श्रद्धा ठेवतो, निश्चय करतो. ती देखील क्षणाक्षणाला निश्चितपणे भंग पावतातच, असा श्रद्धेचा अधिमोक्ष (निश्चय) आणि श्रद्धेचा विनिर्णय तो प्राप्त करतो, असा याचा अर्थ आहे. 'बुद्धावर अढळ विश्वासाने' यामध्ये अर्हत, सम्यक्संबुद्ध इत्यादी बुद्धगुणांच्या दर्शनज्ञानाने युक्त असलेला जो प्रसाद (विश्वास) आहे, त्याला 'अवेच्चप्पसाद' म्हणतात. आर्यभूमी म्हणजे दृष्टी-अनुशय (चुकीच्या मतांचे सुप्त संस्कार) आणि विचिकित्सा-अनुशय (संशयाचे सुप्त संस्कार) यांपासून अत्यंत शुद्ध असलेली अवस्था-भूमी होय. त्यांनी (त्या अनुशयांनी) युक्त असलेली अवस्था-भूमी म्हणजे 'पृथग्जनभूमी' (पुथुज्जनभूमी) होय. परंतु त्या पुद्गलाने पृथग्जनभूमी ओलांडली आहे आणि आर्यभूमीत प्रवेश केला आहे, हे कसे ओळखायचे? यासाठी 'सो येन' (तो ज्या कर्माने...) इत्यादी म्हटले आहे. जो स्वतःच्या जीवासाठी देखील कोणतेही अपायगामी (नरकात नेणारे) कर्म करत नाही. तो निश्चितपणे पृथग्जनभूमी ओलांडून आर्यभूमीत प्रविष्ट झाला आहे, असे समजावे, असा याचा अर्थ आहे. हे 'श्रद्धानुसारी सुत्त' (सद्धानुसारी सुत्त) होय. दुसरे देखील म्हटले आहे: 'भिक्खूहो! चक्षु विपरिणामी आहे, अन्यथाभावी आहे. ज्याला अशा प्रकारे केवळ विचार करणे (चिंतन करणे) आवडते, त्याला 'धम्मानुसारी' म्हटले जाते' इत्यादी. त्यात 'केवळ विचार करणे आवडते' म्हणजे श्रद्धानुसारीप्रमाणे केवळ श्रद्धेवरच न थांबता, चक्षु इत्यादींच्या अशा अनित्यतेचे अनुदर्शन करत तो थोडे थोडे दर्शन (ज्ञान) प्राप्त करतोच. असे असताना, चक्षु इत्यादी त्या पुद्गलाच्या चिंतनाला (अवलोकनाला) काही प्रमाणात अनुकूल वाटतात. हे 'धम्मानुसारी सुत्त' होय. दुसरे देखील म्हटले आहे: 'भिक्खूहो! चक्षु अनित्य आहे, विपरिणामी आहे, अन्यथाभावी आहे. जो हे अशा प्रकारे जाणतो, पाहतो, त्याला 'स्रोतापन्न' (सोतापन्न) म्हटले जाते' इत्यादी. त्यात 'जाणतो, पाहतो' म्हणजे धम्मानुसारीप्रमाणे केवळ चिंतनाला अनुकूल वाटण्यावरच न थांबता, प्रज्ञेने जाणतो आणि ज्ञानचक्षूने प्रत्यक्ष पाहतो, असा याचा अर्थ आहे. हे 'दृष्टीप्राप्त' (दिट्ठिपत्त) इत्यादींचे सुत्त होय. ‘‘ยถา สกํ ผลํ’’ติ เอตฺถ สสฺส อตฺตโน อิทํ สกํ. ยํ ยํ สกํ ยถาสกนฺติ อตฺถํ ทสฺเสติ โสตาปนฺนสฺสาติอาทินา. ผลสมาปตฺติ วีถิยํ ปน อนุโลมชวนานิ เอว ผลานํ อาสนฺนการณานิ, น มคฺคชวนานีติ อาห ‘‘น มคฺคาคมนวเสนา’’ติ. ‘‘โส’’ติ มคฺโค. สนฺโต สํวิชฺชมาโน สพฺภาโว. ‘‘อสฺสา’’ติ มคฺคสฺส. "यथा सकं फलं" (ज्याप्रमाणे स्वतःचे फळ) येथे 'सस्स' (त्याचे) म्हणजे स्वतःचे, हे स्वतःचे आहे. 'जे जे स्वतःचे ते ते यथासकम्' असा अर्थ 'सोतापन्नस्स' (स्रोतापन्नाचे) इत्यादी शब्दांद्वारे दर्शविला जातो. परंतु, फलसमापत्तीच्या वीथीमध्ये (चित्तवीथीमध्ये) अनुलोम जवनेच फळांचे आसन्नकारण (तात्कालिक कारण) असतात, मार्ग जवने नव्हेत; म्हणून "मार्ग आगमनाच्या वशाने नव्हे" असे म्हटले आहे. "सो" (तो) म्हणजे मार्ग. 'संतो' म्हणजे विद्यमान असलेला स्वभाव (अस्तित्व). "अस्सा" (त्याचा) म्हणजे मार्गाचा. อนิจฺจานุปสฺสนา กิจฺจโต อนิมิตฺตา โหติ. สภาวโต สนิมิตฺตาเอว. นิจฺจนิมิตฺตสหิตาเอว. ยโต สา เอโสหมสฺมีติคฺคหณํ ลภติ. อิทํปิ วิปสฺสนาญาณํ อนิจฺจํ ขยฏฺเฐนาติ สมนุปสฺสิตพฺพา จ โหตีติ. ตตฺถ จ อภิธมฺมํ ปตฺวา สภาวปฺปธานํ โหติ, น กิจฺจปฺปธานํ. ตสฺมา อภิธมฺม นเยน วิปสฺสนา อตฺตโน นิมิตฺต นามํ มคฺคสฺส ทาตุํ น สกฺโกติ. อยํ อฏฺฐกถาย อธิปฺปาโย. กิเลส ธมฺมา นาม ยสฺส อุปฺปชฺชนฺติ, ตํ ปุคฺคลํ ปลิพุนฺธนฺติ. สมฺพาธํ กโรนฺติ. ตสฺมา ปลิโพธกรานาม. ตํ ปุคฺคลํ นิจฺจนิมิตฺต สุภนิมิตฺต สุขนิมิตฺต อตฺตนิมิตฺตานิ คาเหนฺติ. ตสฺมา นิมิตฺตกรานาม. ตํ ปุคฺคลํ อารมฺมเณสุ ภุสํ นิหิตํ นิวิฏฺฐํ กโรนฺติ. ตสฺมา ปณิธิกรานาม. เต จ มคฺคผลานิ อารมฺมณํ น กโรนฺติ. มคฺคผเลหิ จ สมฺปโยคํ น คจฺฉนฺติ. เอวํ อารมฺมณกรณา ทิวเสน มคฺคผเลสุ เตสํ อภาโว. อภาวตฺตาเอว จ ตานิ มคฺคผลานิ อตฺตโน ธมฺมตาย ตีณินามานิ ลภนฺตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘อารมฺมณ กรณวเสนวา’’ติอาทิ [Pg.314] วุตฺตํ. ‘‘อตฺตโน สภาเวนา’’ติ อตฺตโน ธมฺมตาย. अनित्यानुपश्यना (अनिच्चानुपस्सना) कार्याच्या दृष्टीने 'अनिमित्त' (निमित्तरहित) असते. स्वभावाच्या दृष्टीने ती 'सनिमित्त' (निमित्तयुक्त) च असते; म्हणजेच ती नित्य-निमित्ताने युक्तच असते. कारण तिच्यामुळे "हा मी आहे" (ए सोहं अस्मि) असे ग्रहण (आसक्ती) प्राप्त होते. हे विपश्यनाज्ञान देखील क्षय होण्याच्या अर्थाने 'अनित्य' आहे, असे सम्यक प्रकारे पाहिले पाहिजे. आणि त्यामध्ये अभिधम्माचा विचार केला असता, स्वभाव-प्रधानता असते, कार्य-प्रधानता नव्हे. म्हणून, अभिधम्माच्या पद्धतीने विपश्यना आपले 'निमित्त' हे नाव मार्गाला देण्यास समर्थ नाही. हा अट्ठकथेचा अभिप्राय आहे. क्लेश धर्म ज्या व्यक्तीच्या ठिकाणी उत्पन्न होतात, त्याला ते बद्ध करतात (अडथळा निर्माण करतात), संबाध (संकुचित किंवा पीडित) करतात. म्हणून त्यांना 'पलिबोधकर' (अडथळा निर्माण करणारे) म्हटले जाते. ते त्या व्यक्तीला नित्य-निमित्त, शुभ-निमित्त, सुख-निमित्त आणि आत्म-निमित्त ग्रहण करायला लावतात. म्हणून त्यांना 'निमित्तकर' (निमित्त निर्माण करणारे) म्हटले जाते. ते त्या व्यक्तीला आलंबनांमध्ये अत्यंत आसक्त आणि प्रविष्ट करतात. म्हणून त्यांना 'पाणिधिकर' (प्रणिधान निर्माण करणारे) म्हटले जाते. आणि ते मार्ग व फळांना आलंबन (विषय) बनवत नाहीत. तसेच मार्ग व फळांशी त्यांचा संप्रयोग (संयोग) होत नाही. अशा प्रकारे, आलंबन करण्याच्या दृष्टीने मार्ग व फळांमध्ये त्यांचा अभाव असतो. आणि त्यांच्या अभावामुळेच ती मार्ग-फळे स्वतःच्या धर्मतेने (स्वभावाने) तीन नावे प्राप्त करतात, हे दर्शवण्यासाठी "आलंबन करण्याच्या वशाने किंवा..." इत्यादी म्हटले आहे. "अत्तनो सभावेन" (स्वतःच्या स्वभावाने) म्हणजे स्वतःच्या धर्मतेने. ‘‘อตฺตทิฏฺฐิยา อุปฺปนฺนาย อุปฺปชฺชนฺตี’’ติ อิทํ ตาสํ ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉานํ อตฺตทิฏฺฐิยา อวินาภาวํ ทีเปติ. น ปน อตฺตทิฏฺฐิยา ตาหิ อวินาภาวนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. วิปจฺจนฺตีติ อปาเยสุ วิปจฺจนฺติ. อปายปฏิสนฺธึ ชเนนฺติ. ทิฏฺฐสจฺจานญฺจ อริยปุคฺคลานํ. ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาสมฺปยุตฺตา อกุสลธมฺมา ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาคฺคหเณน คหิตาติ อาห ‘‘ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉา วิปฺปยุตฺตา’’ติ. ‘‘อกุสลธมฺมาเจ วา’’ติ ปจฺจุปฺปนฺนภูตา ทสากุสลกมฺมปถ ธมฺมา เจว. ‘‘สตฺตหิ ภเวหี’’ติ กฺริยาปวคฺเค กรณวจนํ. ยถา สตฺตหิ มาเสหิ วิหารํ นิฏฺฐาเปตีติ. กฺริยาปวคฺโคติจ กฺริยายสีฆตรํ นิฏฺฐาปนํ วุจฺจติ. ‘‘สตฺตกฺขตฺตุํ’’ติ สตฺตวารา. ตีณิ สํโยชนานินาม ‘สกฺกายทิฏฺฐิ, วิจิกิจฺฉา, สีลพฺพตปรามาสสํโยชนานิ,. ‘‘อวินิปาต ธมฺโม’’ติ วิรูปํ หุตฺวา ปตนํ วินิปาโต. อปายนิปาโตติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ธมฺโม’’ติ สภาโว. นตฺถิ วินิปาโต ธมฺโม ยสฺสาติ วิคฺคโห. ‘‘นิยโต’’ติ สุคติภเวสุ นิยต คติโก. สมฺมา พุชฺฌตีติ สมฺโพธิ. มคฺคญฺญาณํ. ‘‘ปรายนํ’’ติ ปรภาเค คนฺตพฺพฏฺฐานํ วุจฺจติ. สมฺโพธิสงฺขาตํ ปรายนํ อสฺสาติ สมฺโพธิปรายโน. ‘‘อนิยมตฺโถ’’ติ วาสทฺทตฺโถติ วุตฺตํ โหติ. วา สทฺทตฺเถสุ จ อนิยมตฺโถ. น วิกปฺปตฺโถ. วิกปฺปตฺเถหิ สติ ทฺเว เอว สตฺตกฺขตฺตุปรมา ลพฺภนฺติ. มิสฺสกภโวน ลพฺภติ. อนิยมตฺเถ ตโยปิ ลพฺภนฺติ. อฏฺฐกถายํ ปน สมุจฺจยตฺถสฺส คหิตตฺตา เอโก มิสฺสกภโว เอว ลพฺภติ. นนุ จ สทฺโท นาม สมุจฺจยตฺเถ ปากโฏ, น อนิยมตฺเถ. ตสฺมา สมุจฺจยตฺโถว อิธ ยุตฺโตติ เจ. น ยุตฺโต. กสฺมา. ทฺวินฺนํ อสงฺคหิตตฺตา. อฏฺฐกถายํ ปน สมุจฺจยตฺถํ คเหตฺวา เต ทฺเว ปุคฺคลา อิมสฺมึ ปาเฐ อสงฺคหิตาติ วุตฺตํ. ยทิ เต อิมสฺมึ ปาเฐ อสงฺคหิตา. กตฺถเต สงฺคหิตา ภเวยฺยุํ. น หิ โกจิ สตฺตกฺขตฺตุ ปรโม นาม อิธ อสงฺคหิโตติ ยุตฺโตติ. ‘‘อสฺสา’’ติ ตสฺสปาฬิปาฐสฺส. ‘‘เอตฺถ จ ยสฺมา. ล. ปรโม นาม วุตฺโต’’ติ อิทํ อุปริ ‘เย กามภเว เยวา’ติอาทินา [Pg.315] ‘เยทิฏฺฐ ธมฺเม วา’ติอาทินา จ โยเชตพฺพํ. โส จ สุกฺขวิปสฺสโก วา ปริหีนชฺฌาโน วา ทฏฺฐพฺโพติ สมฺพนฺโธ. ‘‘ปาฬิยํ’’ติ ปุคฺคลปญฺญตฺติ ปาฬิยํ. ‘‘อิธ นิฏฺฐา’’ติ อิมสฺมึ กามโลเก อาสวกฺขยํ ปตฺวา ขนฺธปรินิพฺพานปตฺติ วเสน นิฏฺฐา. นิฏฺฐานํ ปริโยสานนฺติ อตฺโถ. กุลโต กุลํ คจฺฉตีติ โกลํโกโล. ภวโต ภวํ คจฺฉตีติ อตฺโถ. เอกเมว ปฏิสนฺธิสงฺขาตํ ภวพีชํ อสฺส อตฺถีติ เอกพีชี. โย จ ทิฏฺเฐว ธมฺเม อรหา. ตสฺส จ อิธ นิฏฺฐาติ โยชนา. เกน ปน ติณฺณํ โสตาปนฺนานํ วิเสโส กโตติ. สตฺตกฺขตฺตุ ปรโม ตาว เกวลํ ปถมมคฺค สมฺปยุตฺเตหิ อินฺทฺริเยหิ กโต. อิตเร ทฺเว อุปริมคฺคตฺถาย ปวตฺติเตหิ วิปสฺสนินฺทฺริเยหิ กโตติ. ตตฺถ สตฺตกฺขตฺตุ ปรโม สพฺพมุทุโก โหติ. ตโต โกลํโกโล ติกฺโข. โส ปน ฉ ภวิโก, ปญฺจภวิโก, จตุภวิโก, ติภวิโก, ทฺวิภวิโกติ ปญฺจวิโธ. ตตฺถ ปญฺจภวิโก ติกฺโข. เสสา อนุกฺกเมน ติกฺขตราติ ทฏฺฐพฺพา. เอกพีชี ปน เอกภวิโก สพฺพติกฺโข. ตตฺถ สตฺตกฺขตฺตุ ปรโม เกวเลน ปถมมคฺคานุภาเวน สิทฺธตฺตา สพฺพมุทุโก โหติ. อิตเร ทฺเวปกติยา สตฺตกฺขตฺตุ ปรมภาเว ฐตฺวา อุปริมคฺคตฺถาย วิปสฺสนา กมฺมํ ปฏฺฐเปนฺติ. ตทา เตสํ อินฺทฺริยานิ ปุน วิเสส ปตฺตานิ โหนฺติ, ติกฺขานิ. ตสฺมา เต สตฺตกฺขตฺตุ ปรมโต ติกฺขานาม โหนฺตีติ. ‘‘สตฺตวารโต โอรํ วา’’ติ อิทํ โกลํโกล เอกพีชิโน สนฺธาย วุตฺตํ. ‘‘อุปริ ติณฺณํ มคฺคานํ วิปสฺสนา นิยาเมตี’’ติ อิทํ อุปริเม ทฺเวโสตาปนฺเน สนฺธาย วุตฺตํ. สตฺตกฺขตฺตุ ปรโมปน ปถมมคฺเคเนว นิยมิโตติ ทฏฺฐพฺพํ. ตถาหิ โสเยว สงฺคหปาเฐ สรูปโต อาคโต โสตาปตฺติ มคฺคํ ภาเวตฺวา ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาปหาเนน ปหีนาปายคมโน สตฺตกฺขตฺตุ ปรโม โสตาปนฺโน นาม โหตีติ. อิตเร ปน ทฺเว ปาฬิยํ โสตาปนฺน ปุคฺคลวิภาคฏฺฐาเนสฺเวว อาคตาติ. ‘‘เย ปนา’’ติ เย โสตาปนฺน ปุคฺคลาปน. คาถายํ ‘‘อิโตสตฺตา’’ติ อิมสฺมึ มนุสฺสโลเก สตฺต สํสรานิ. ‘‘ตโตสตฺตา’’ติ ตสฺมึ เทวโลเก [Pg.316] สตฺตาติ อตฺโถ. องฺคุตฺตรปาเฐ ‘‘เตนจิตฺตปฺปสาเทนา’’ติ มหาสหสฺสิโลกธาตุํ สเรน วิญฺญาเปตุํ สมตฺถสฺส สตฺถุคุเณ จิตฺตปฺปสาโท ชายติ. เตน จิตฺตปฺปสาเทน. ‘‘เตน ปริยาเยนา’’ติ สเจ โส เทเวสุ เอว สํสรติ. สตฺตกฺขตฺตุํ โอปปาติก ปฏิสนฺธิโย คณฺหิตฺวา ตตฺเถว ปรินิพฺพายิสฺสติ. ยทิ มนุสฺเสสุ เอว สํสรติ. สตฺตคพฺภเสยฺยก ปฏิสนฺธิโย คณฺหิตฺวา เอตฺเถว ปรินิพฺพายิสฺสติ. เอวํ เทสนา วาเรน จุทฺทส กตฺวา เทสิเตน ปริยาเยนาติ อตฺโถ. ‘‘ตํ วีมํสิตพฺพํ’’ติ วทนฺเตน ฏีกาจริเยน สยํ จุทฺทสปฏิสนฺธิโยว อิจฺฉตีติ ทีเปติ. อิทานิ ตํ จุทฺทสปฏิสนฺธิวาทํ ปฏิกฺขิปนฺโต ‘‘วิภงฺเค ปนา’’ติอาทิมาห. ‘‘วิภงฺเค’’ติ อภิธมฺเม ญาณวิภงฺเค. นตฺถิ ฐานมสฺสาติ อฏฺฐานํ. ‘‘ฐานํ’’ติ มูลการณํ. นตฺถิ อวกาโส อสฺสาติ อนวกาโส. ‘‘อวกาโส’’ติ ปจฺจยการณํ. ‘‘ยํ’’ติ กฺริยาปรามสนํ. ยํ นิพฺพตฺเตยฺย, ตํ นิพฺพตฺตนํ อฏฺฐานํ. โส นิพฺพตฺตน ธมฺโม อนวกาโสติ โยชนา. ‘‘อภิสงฺขาร วิญฺญาณสฺสา’’ติ สตฺตภวโต อุทฺธํ กามภเว ปฏิสนฺธิชนกสฺส กุสลา กุสลกมฺม วิญฺญาณสฺส. ‘‘นิโรเธนา’’ติ โสตาปตฺติ มคฺคกฺขเณ เอว นิโรธเนน. นิรุชฺฌนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ‘‘นามญฺจ รูปญฺจา’’ติ เย นาม รูปธมฺมา อุปฺปชฺเชยฺยุํ. เอเต นาม รูปธมฺมา เอตฺถ เอตสฺมึ อภิสงฺขาร วิญฺญาณ นิโรธกฺขเณ นิรุชฺฌนฺตีติ โยชนา. ‘‘ยถาวุตฺตนเยเนวา’’ติ เตน ปริยาเยนาติ วุตฺตปฺปการนเยเนว. ‘‘ตเทกฏฺฐโมหสฺสา’’ติ เตน ราเคน เตน โทเสน เอกสฺมึ จิตฺเต เอกโต ฐิตสฺส โมหสฺส. น ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉา สมฺปยุตฺตสฺส โมหสฺส. ตสฺส ปถมมคฺเค เอว ปหีนตฺตา. นาปิ อุทฺธจฺจจิตฺตสมฺปยุตฺตสฺส โมหสฺส. ตสฺส จตุตฺถมคฺเค เอว ปหาตพฺพตฺตา. อุปฺปชฺชนฺตา ราคโทสโมหา. ‘‘ธมฺมิเกสู’’ติ ธมฺเมน สเมน อุปฺปนฺเนสุ. ‘‘ยโต’’ติ ยํการณา. พลวนฺตการณาติ อตฺโถ. ‘‘เตสํ’’ติ โสตาปนฺนานํ. ‘‘สลฺลิขน วเสนา’’ติ พหลปกฺขํ ถูลภาคํ สุฏฺฐุลิขนวเสน. อธิจฺจุปฺปตฺติ นาม ปุพฺเพ ยถาปวตฺตํ กาลํ อธิจฺจ อติกฺกมฺม อุปฺปตฺติ[Pg.317]. อุปฺปชฺชนฺตานมฺปิ ราคโทสโมหานํ. ‘‘เตสํ ปี’’ติ สกทาคามีนมฺปิ. ‘‘เมถุนวตฺถุ สมาโยโค อิจฺฉิโต’’ติ ชายมฺปตีนํ เมถุนกมฺมสมาโยโค นาม สกทาคามีนํ อตฺถีติ อิจฺฉิโต. เถโรหิ อธิจฺจุปฺปตฺติมตฺตํ อิจฺฉติ. ปริยุฏฺฐานมนฺทตํ น อิจฺฉติ. สกทาคามีนํ ปุตฺตธีตโรปิ สนฺทิสฺสนฺตีติ วทติ. ‘‘มหาอฏฺฐกถายํ ปฏิกฺขิตฺโต’’ติ เถรสฺส มโนรถมตฺตํติ วตฺวา ปฏิกฺขิตฺโต. อิทํ สพฺพํ อฏฺฐสาลินิยํ วุตฺตํ. ‘‘ฉกฺกนิปาเต’’ติ องฺคุตฺตเร ฉกฺกนิปาเต. ‘‘มิคาสาฬวตฺถุมฺหี’’ติ มิคาสาฬนามิกาย อุปาสิกาย วตฺถุมฺหิ. เกจิ อิมํ วตฺถุํ ทิสฺวา มหาอฏฺฐกถาวาทํ น โรเจนฺติ. มหาสิวตฺเถรวาทํ โรเจนฺติ. ‘‘อพฺรหฺมจาริโน’’ติ เมถุน ธมฺมา อปฺปฏิวิรตสฺส. ‘‘สกทาคามิตฺตํ พฺยากตํ’’ติ ตสฺมึ กาลงฺกเต โส พฺราหฺมโณ อิธ สกทาคามิภาวํ ปตฺวา ตุสิตากายํ อุปปนฺโนติ เอวํ ตสฺส ยํ สกทาคามิตฺตํ ภควตา พฺยากตํ. ‘‘อธิคมวเสนา’’ติ สกทาคามิภาวํ ปฏิลาภวเสน. น ปน อพฺรหฺมจาริโน สโต อธิคมวเสนาติ อธิปฺปาโย. มรณาสนฺนกาเลปิ หิ สิกฺขาปทาธิฏฺฐาเนน สห อุปริมคฺคผลาธิคมนํ นาม ติกฺขปญฺญสฺส อริยสาวกสฺส น ทุกฺกรนฺติ. เอเตน เกสญฺจิ เถรวาทโรจนํ ปฏิกฺขิตฺตํ โหติ. ‘‘สกึเทว อิมํโลกํ อาคนฺตฺวา’’ติ เอเตน อิโต ปรโลกํ คมนสฺส จ ตโต ปุน อิธาคมนสฺส จ สิทฺธตฺตา อยํ ปุคฺคโล สุทฺเธน มคฺคนิยาเมน กามภเว ทฺวิกฺขตฺตุ ปรโมนาม โหตีติ สิทฺโธ. กถํ. อิธ ปตฺวา ตตฺถ นิพฺพตฺติตฺวา อิธ ปรินิพฺพายี, ตตฺถ ปตฺวา อิธ นิพฺพตฺติตฺวา ตตฺถ ปรินิพฺพายีติ. เสสาปน จตฺตาโร วิปสฺสนานิยาเมน สิทฺธา โหนฺตีติ วิญฺญายติ. กตเม จตฺตาโร. อิธ ปตฺวา อิธ ปรินิพฺพายี. ตตฺถ ปตฺวา ตตฺถ ปรินิพฺพายี. อิธ ปตฺวา ตตฺถ ปรินิพฺพายี. ตตฺถ ปตฺวา อิธ ปรินิพฺพายีติ. เอตฺถ จ ตีสุ โสตาปนฺเนสุ เอโกสตฺตกฺขตฺตุ ปรโม เอว มคฺคนิยาเมน สิทฺโธ. เสสา ปน ทฺเว โสตาปนฺนา วิปสฺสนานิยาเมน สิทฺธา. ฉ สกทาคามีสุ ทฺเว เอว มคฺคนิยาเมน สิทฺธา. เสสา ปน จตฺตาโร วิปสฺสนานิยาเมน สิทฺธา. ตตฺถ มคฺคสิทฺเธสุ โสตาปนฺน สกทาคามีสุ [Pg.318] สงฺกโร นตฺถิ. วิปสฺสนาสิทฺเธสุ ปน สงฺกโร อตฺถิ. อตฺถโต อวิรุทฺเธ สติ, โวหารมตฺเตน สงฺกเร โทโส นตฺถีติ ทฏฺฐพฺพํ. อาคนฺตฺวาติ ปาฐวเสน อาคมนโตติ วุตฺตํ. อาคนฺตาติ ปน ปาโฐ ยุตฺโต. อาคมนสีโล อาคมน ธมฺโม หุตฺวา สกทาคามี นามาติ อตฺโถ. อนาคนฺตฺวา อิตฺถตฺตนฺติ เอตฺถปิ เอเสวนโย. อรหโต ภาโว อรหตฺตํ. อรหตฺต มคฺคํ. ทกฺขิณาย วิปตฺติกรานาม อปฺปปฺผล อปฺปานิสํสกรา. สมฺปตฺติกรา นาม มหปฺผล มหานิสํสกรา. สีลกฺขนฺธาทิคุณา นาม สีลกฺขนฺธ สมาธิกฺขนฺธ ปญฺญากฺขนฺธ วิมุตฺติกฺขนฺธ วิมุตฺติญฺญาณ ทสฺสนกฺขนฺธคุณา. ‘‘ทกฺขิเณยฺเยสู’’ติ ทกฺขิณารห ปุคฺคเลสุ. ‘‘ธุรํ’’ติ ปธานสีสฏฺฐานิยํ วุจฺจติ. สทฺธา เอว ธุรํ อสฺสาติ สทฺธาธุโร. เอวํ ปญฺญาธุโร. กสฺมา ปเนตฺถ วีริยธุโร น คหิโตติ. ปาฬิยํ สทฺธาวาหี มคฺคํ ภาเวติ, ปญฺญาวาหี มคฺคํ ภาเวตีติ วุตฺตํ. น ปน วุตฺตํ วีริยวาหี มคฺคํ ภาเวตีติ. ตสฺมา น คหิโตติ. กสฺมา ปน วีริยวาหี มคฺคํ ภาเวตีติ น วุตฺตนฺติ. วุจฺจเต. มคฺคํ ภาเวนฺตสฺส นาม อาทิมฺหิ ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉานํ ปหานาย กมฺมํ มหนฺตํ โหติ. กสฺมา, อปายมูลกตฺตา. ตตฺถ สทฺธา จ วิจิกิจฺฉา จ ทฺเว อุชุปฺปฏิปกฺขา โหนฺติ. ยสฺมึ อารมฺมเณ สทฺธา นิวิสติ, ตสฺมึ วิจิกิจฺฉา นตฺถิ. ยสฺมึ วิจิกิจฺฉา นิวิสติ, ตสฺมึ สทฺธา นตฺถิ. ตถา ปญฺญาทิฏฺฐิโย จ อุชุปฺปฏิปกฺขา. ยตฺถ ปญฺญา, น ตตฺถ ทิฏฺฐิ. ยตฺถ ทิฏฺฐิ, น ตตฺถ ปญฺญาติ. อปิ จ สทฺธา อตฺตโน วิสเย ทิฏฺฐึ วิธมติเยว. ปญฺญาย วิจิกิจฺฉาวิธมเน วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. ตสฺมา อารทฺธ วิปสฺสโก อนิจฺจาทีสุ อเวจฺจปฺปสาทมตฺเตนปิ ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาโย ปชหิตฺวา สทฺธานุสาริภาวญฺจ สุฏฺฐุตรํ ปสีทิตฺวา สทฺธาวิมุตฺตภาวญฺจ ปาปุณาติ. ปญฺญาย อนิจฺจาทีนิ นิชฺฌานกฺขมํ กตฺวา ธมฺมานุสาริภาวญฺจ สุฏฺฐุตรํ ปสฺสิตฺวา ทิฏฺฐิปตฺตปญฺญา วิมุตฺตภาวญฺจ ปาปุณาติ. วีริยํ ปน ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉานํ ปฏิปกฺขมตฺตมฺปิ น โหติ. อถ โข ตาสํ สหาโยปิ โหติ, ธุรภูตญฺจ. ปคฺคหลกฺขณญฺหิ วีริยํ. ตํ สทฺธํปิ ปคฺคณฺหาติ, ปญฺญํปิ ปคฺคณฺหาติ, ทิฏฺฐึปิ ปคฺคณฺหาติ, วิจิกิจฺฉมฺปิ ปคฺคณฺหาติเยว. กุโตปน อตฺตโน สภาเวน ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาโย [Pg.319] ปชหิตุํ สกฺขิสฺสติ. ตสฺมา อิมสฺมึ ฐาเน วีริยวาหีติ จ วีริยธุโรติ จ น วุตฺโตติ. กายสกฺขิมฺหิ ปน สทฺธา จ ปญฺญา จ สมพลา โหนฺติ. วีริยญฺจ สยํ สมฺมปฺปธานฏฺฐาเน ฐตฺวา ตทุภยํ อุปพฺรูเหติ. โส จ ปุคฺคโล ตทุภยพเลน ทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาทโย ปชหิตฺวา กายสกฺขิภาวํ ปาปุณาติ. อฏฺฐวิโมกฺเข วา อุปฺปาเทตฺวา อุภโตภาค วิมุตฺตภาวํ ปาปุณาติ. อิเมสุ ปน ทฺวีสุ ปุคฺคเลสุ วีริยสฺส ถาโม สุฏฺฐุ ปากโฏ. ตสฺมา อิเม ทฺเว วีริยาธิกาตฺเวว วตฺตพฺพา. น วีริยธุโรติ. จตุปฺปฏิปทา นาม ทุกฺขาปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา. ทุกฺขาปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา. สุขาปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา. สุขาปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา. ติวิธวิโมกฺโข นาม สุญฺญโต วิโมกฺโข. อนิมิตฺโต วิโมกฺโข. อปฺปณิหิโต วิโมกฺโข. ‘‘ตโย อนฺตรา ปรินิพฺพายิโน’’ติ เอตฺถ อายุกปฺปสฺส ปริยนฺตํ อปตฺวา อนฺตรา เอว กิเลสปรินิพฺพานปตฺตา อนฺตราปรินิพฺพายี นาม. โส ติวิโธ. อายุกปฺปสฺส ปถมภาเค ปรินิพฺพายี, ทุตียภาเค, ตตียภาเคติ. อิเม ตโย อนฺตรา ปรินิพฺพายิโน นาม. อุปหจฺจปรินิพฺพายี นาม อายุกปฺป ปริยนฺเต ปรินิพฺพายี. อุทฺธํ มุโข วฏฺฏโสโต เอตสฺสาติ อุทฺธํโสโต. อกนิฏฺฐํ อวสฺสํ คมิสฺสตีติ อกนิฏฺฐคามี. วิปสฺสนา กมฺมํ สสงฺขารํ สปฺปโยคํ กตฺวา ปรินิพฺพายี สสงฺขาร ปรินิพฺพายี. สงฺขารรหิเตน สุเขน วิปสฺสนา กมฺเมน ปรินิพฺพายี อสงฺขาร ปรินิพฺพายี. ‘‘ทฺวาทส โสตาปนฺนา’’ติ เอกพีชิกา ตโย. เต เอว จตูหิ ปฏิปทาหิ คุณิตา ทฺวาทส. ทฺวาทส สกทาคามิโน ปุพฺเพ วุตฺตนยา เอว. ‘आत्मदृष्टी उत्पन्न झाल्यावर उत्पन्न होतात’ हे त्या दृष्टी आणि विचिकित्सेचा आत्मदृष्टीशी असलेला अविनाभाव (अविभाज्य संबंध) दर्शवते. परंतु, आत्मदृष्टीचा त्यांच्याशी अविनाभाव संबंध आहे असे समजू नये. ‘विपच्यन्ति’ (विपाक देतात) म्हणजे अपायांमध्ये (दुर्गतीमध्ये) विपाक देतात. अपाय-प्रतिसंधी उत्पन्न करतात. आणि सत्य पाहिलेल्या (दृष्टसत्य) आर्य पुद्गलांचे. दृष्टी आणि विचिकित्सेशी संप्रयुक्त असलेले अकुशल धर्म हे ‘दृष्टी-विचिकित्सा’ या ग्रहणाने ग्रहण केले जातात, म्हणून ‘दृष्टी-विचिकित्सेपासून विप्रयुक्त’ असे म्हटले आहे. ‘अकुशल धर्म किंवा’ म्हणजे वर्तमानकाळात उत्पन्न झालेले दहा अकुशल कर्मपथ धर्मच होत. ‘सात भवांद्वारे’ (सत्तहि भवेहि) हे क्रिया-अपवर्गात (क्रियेच्या समाप्तीमध्ये) तृतीया विभक्तीचे (करणवचन) रूप आहे. जसे की, ‘सात महिन्यांत विहार पूर्ण करतो.’ क्रिया-अपवर्ग म्हणजे क्रियेची अत्यंत वेगाने समाप्ती होणे होय. ‘सत्तक्खत्तुं’ म्हणजे सात वेळा. तीन संयोजने म्हणजे ‘सक्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी), विचिकित्सा आणि सीलब्बतपरामास (शीलव्रतपरामर्श) संयोजने’ होत. ‘अविनीपातधम्मो’ - विरूप होऊन पडणे म्हणजे विनीपात होय. याचा अर्थ अपाय (दुर्गती) मध्ये पडणे असा आहे. ‘धम्मो’ म्हणजे स्वभाव. ज्याचा विनीपात (अधोगती) होण्याचा स्वभाव नाही, असा तो (अविनीपातधम्मो) - असा विग्रह आहे. ‘नियतो’ म्हणजे सुगती भवांमध्ये निश्चित गती असलेला. सम्यक प्रकारे जाणतो म्हणून ‘संबोधी’ होय. संबोधी म्हणजे मार्गज्ञान. ‘परायण’ म्हणजे पुढील भागात जाण्याचे स्थान (अंतिम ध्येय) म्हटले जाते. संबोधी नावाचे परायण ज्याचे आहे, तो ‘संबोधिपरायण’ होय. ‘अनियमार्थ’ म्हणजे ‘वा’ (किंवा) या शब्दाचा अर्थ होय. ‘वा’ शब्दाच्या अर्थांमध्ये अनियमार्थ असतो, विकल्पार्थ नाही. विकल्पार्थ मानल्यास केवळ दोनच ‘सत्तक्खत्तुपरम’ (सात वेळा जन्म घेणारे) मिळतात. मिश्रक भव मिळत नाही. अनियमार्थ मानल्यास तिन्ही मिळतात. परंतु अट्ठकथेमध्ये समुच्चय अर्थ ग्रहण केल्यामुळे केवळ एकच मिश्रक भव मिळतो. जर असे म्हटले की, ‘च’ शब्द हा समुच्चय अर्थासाठी प्रसिद्ध आहे, अनियम अर्थासाठी नाही; म्हणून येथे समुच्चय अर्थच योग्य आहे. तर ते योग्य नाही. का? कारण त्यामुळे दोघांचा संग्रह होत नाही. परंतु अट्ठकथेमध्ये समुच्चय अर्थ घेऊन, ते दोन पुद्गल या पाठात समाविष्ट नाहीत असे म्हटले आहे. जर ते या पाठात समाविष्ट नसतील, तर त्यांचा संग्रह कोठे होईल? कारण कोणताही ‘सत्तक्खत्तुपरम’ येथे समाविष्ट नसावा, हे योग्य नाही. ‘अस्स’ म्हणजे त्या पालि पाठाचा. ‘येथे आणि ज्या कारणाने... पे... परम म्हटला आहे’ हे पुढे ‘ये कामभवे येव’ इत्यादी आणि ‘ये दिट्ठ धम्मे वा’ इत्यादींशी जोडले पाहिजे. आणि तो ‘शुष्कविपस्सक’ (ध्यानरहित विपश्यना करणारा) किंवा ‘परिहीनध्यान’ (ध्यानापासून भ्रष्ट झालेला) समजावा, असा संबंध आहे. ‘पाळियं’ म्हणजे पुग्गलपञ्ञत्ति पालिमध्ये. ‘इध निट्ठा’ (येथेच समाप्ती) म्हणजे याच कामलोकात आसवांचा क्षय करून स्कंध-परिनिर्वाण प्राप्तीद्वारे समाप्ती होय. निष्ठा म्हणजे समाप्ती किंवा पर्यवसान असा अर्थ आहे. कुळातून कुळात जातो तो ‘कोलङ्कोल’ होय. एका भवातून दुसऱ्या भवात जातो असा याचा अर्थ आहे. ज्याला प्रतिसंधी नावाचे एकच भवबीज उरले आहे, तो ‘एकबीजी’ होय. आणि जो याच जन्मात (दृष्टधर्मात) अर्हत होतो, त्याची येथेच समाप्ती होते, अशी योजना आहे. परंतु तीन प्रकारच्या स्रोतापन्नांमध्ये भेद कशामुळे केला गेला आहे? ‘सत्तक्खत्तुपरम’ हा केवळ पहिल्या मार्गाशी (स्रोतापत्ती मार्गाशी) संप्रयुक्त असलेल्या इंद्रियांमुळे होतो. इतर दोन (कोलङ्कोल आणि एकबीजी) हे वरील मार्गांच्या प्राप्तीसाठी प्रवृत्त केलेल्या विपश्यना-इंद्रियांमुळे होतात. त्यात ‘सत्तक्खत्तुपरम’ हा सर्वात मृदू (मंद इंद्रिय असलेला) असतो. त्यापेक्षा ‘कोलङ्कोल’ तीक्ष्ण असतो. तो (कोलङ्कोल) सहा भव असलेला, पाच भव असलेला, चार भव असलेला, three भव असलेला आणि दोन भव असलेला अशा पाच प्रकारचा असतो. त्यात पाच भव असलेला तीक्ष्ण असतो. उर्वरित अनुक्रमाने अधिक तीक्ष्ण समजावेत. परंतु ‘एकबीजी’ हा एकच भव घेणारा असून सर्वात तीक्ष्ण असतो. त्यात ‘सत्तक्खत्तुपरम’ हा केवळ पहिल्या मार्गाच्या प्रभावाने सिद्ध होत असल्यामुळे सर्वात मृदू असतो. इतर दोन (कोलङ्कोल आणि एकबीजी) हे स्वभावतः ‘सत्तक्खत्तुपरम’ अवस्थेत राहून वरील मार्गांच्या प्राप्तीसाठी विपश्यना कर्म सुरू करतात. तेव्हा त्यांची इंद्रिये पुन्हा विशेष अवस्था प्राप्त करतात आणि तीक्ष्ण होतात. म्हणून ते ‘सत्तक्खत्तुपरम’ पेक्षा तीक्ष्ण मानले जातात. ‘सात वेळांपेक्षा कमी’ हे कोलङ्कोल आणि एकबीजी यांना उद्देशून म्हटले आहे. ‘वरील तीन मार्गांची विपश्यना नियमन करते’ हे वरील दोन स्रोतापन्नांना उद्देशून म्हटले आहे. परंतु ‘सत्तक्खत्तुपरम’ हा पहिल्या मार्गानेच नियमित (मर्यादित) केला जातो, असे समजावे. तसेच, तोच संग्रहपाठात प्रत्यक्ष आला आहे की, स्रोतापत्ती मार्गाची भावना करून, दृष्टी आणि विचिकित्सेचा प्रहाण केल्यामुळे ज्याचे अपायगमन नष्ट झाले आहे, तो ‘सत्तक्खत्तुपरम स्रोतापन्न’ होतो. परंतु इतर दोन (कोलङ्कोल आणि एकबीजी) हे पालिमध्ये स्रोतापन्न पुद्गलांच्या विभागाच्या ठिकाणीच आले आहेत. ‘जे पुन्हा’ म्हणजे जे स्रोतापन्न पुद्गल आहेत. गाथेमध्ये ‘इतो सत्ता’ म्हणजे या मनुष्यलोकात सात संसार (जन्म). ‘ततो सत्ता’ म्हणजे त्या देवलोकात सात (जन्म) असा अर्थ आहे. अंगुत्तर पाठात ‘त्या चित्तप्रसादाने’ म्हणजे महासहस्री लोकधातूमध्ये आपल्या स्वराने संदेश देण्यास समर्थ असलेल्या शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) गुणांवर चित्त प्रसन्न होते, त्या चित्तप्रसादाने. ‘त्या पर्यायाने’ म्हणजे जर तो देवांमध्येच संसार करतो, तर सात वेळा औपपातिक प्रतिसंधी घेऊन तेथेच परिनिर्वाण पावेल. जर तो मनुष्यांमध्येच संसार करतो, तर सात वेळा गर्भशय्या प्रतिसंधी घेऊन येथेच परिनिर्वाण पावेल. अशा प्रकारे देशना पद्धतीने चौदा वेळा करून उपदेशिलेल्या पर्यायाने, असा अर्थ आहे. ‘त्याचा विचार केला पाहिजे’ असे म्हणणाऱ्या टीकाचार्यांनी स्वतः चौदा प्रतिसंधीच मान्य केल्या आहेत, हे दर्शवले आहे. आता त्या चौदा प्रतिसंधींच्या वादाचे खंडन करताना ‘विभंगामध्ये पुन्हा’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘विभंगामध्ये’ म्हणजे अभिधम्मातील ज्ञानविभंगामध्ये. ज्याला स्थान (कारण) नाही ते ‘अस्थान’ होय. ‘स्थान’ म्हणजे मूळ कारण. ज्याला अवकाश (संधी) नाही ते ‘अनवकाश’ होय. ‘अवकाश’ म्हणजे प्रत्यय-कारण (सहाय्यक कारण). ‘जे’ हे क्रियेचा निर्देश करते. जे उत्पन्न होईल, ते उत्पन्न होणे अस्थान आहे. तो उत्पन्न होण्याचा स्वभाव अनवकाश आहे, अशी योजना आहे. ‘अभिसंस्कार विज्ञानाचे’ म्हणजे सातव्या भवाच्या पलीकडे कामभवात प्रतिसंधी उत्पन्न करणाऱ्या कुशल-अकुशल कर्मविज्ञानाचे. ‘निरोधाने’ म्हणजे स्रोतापत्ती मार्गाच्या क्षणीच निरोध झाल्यामुळे. निरुद्ध होतात, असा संबंध आहे. ‘नाम आणि रूप’ म्हणजे जे नाम-रूप धर्म उत्पन्न होणार होते, ते नाम-रूप धर्म येथे या अभिसंस्कार विज्ञान निरोधाच्या क्षणी निरुद्ध होतात, अशी योजना आहे. ‘यथोक्त पद्धतीनेच’ म्हणजे ‘त्या पर्यायाने’ या सांगितलेल्या प्रकारच्या पद्धतीनेच. ‘त्याच्याशी एकाच ठिकाणी असलेल्या मोहाचा’ म्हणजे त्या रागाशी आणि त्या द्वेषाशी एकाच चित्तात एकत्र राहिलेल्या मोहाचा. दृष्टी आणि विचिकित्सेशी संप्रयुक्त असलेल्या मोहाचा नाही, कारण त्याचा पहिल्या मार्गातच (स्रोतापत्ती मार्गात) प्रहाण झाला आहे. आणि औद्धत्य-चित्ताशी संप्रयुक्त असलेल्या मोहाचाही नाही, कारण त्याचा चौथ्या मार्गात (अर्हत् मार्गात) प्रहाण करायचा आहे. उत्पन्न होणारे राग, द्वेष आणि मोह. ‘धार्मिकेषु’ म्हणजे धर्माने आणि समतेने उत्पन्न झालेल्यांमध्ये. ‘यतो’ म्हणजे ज्या कारणाने. बलवान कारणाने, असा अर्थ आहे. ‘त्यांच्या’ म्हणजे स्रोतापन्नांच्या. ‘सल्लेखन (घासून कमी करणे) द्वारे’ म्हणजे दाट भाग किंवा स्थूल भाग चांगल्या प्रकारे घासून कमी करण्याद्वारे. ‘अधिच्चुत्पत्ती’ (अकस्मात किंवा विशिष्ट प्रसंगी उत्पन्न होणे) म्हणजे पूर्वीच्या प्रवृत्त काळाचे उल्लंघन करून उत्पन्न होणे. उत्पन्न होणाऱ्या राग, द्वेष आणि मोहांचे देखील. ‘त्यांच्या देखील’ म्हणजे सकदागामींच्या देखील. ‘मैथुनवस्तूचा समायोग मान्य आहे’ म्हणजे पती-पत्नीचा मैथुनकर्म समायोग सकदागामींमध्ये असतो, हे मान्य केले आहे. कारण थेर (स्थवीर) केवळ अधिच्चुत्पत्तीच मान्य करतात, पर्युत्थानाची मंदता मान्य करत नाहीत. ते म्हणतात की सकदागामींना देखील पुत्र-पुत्री असल्याचे दिसून येते. ‘महाअट्ठकथेमध्ये खंडन केले आहे’ म्हणजे थेरांचे हे केवळ मनोरथ (इच्छामात्र) आहे असे सांगून त्याचे खंडन केले आहे. हे सर्व अट्ठसालिनीमध्ये सांगितले आहे. ‘छक्कनिपातामध्ये’ म्हणजे अंगुत्तर निकायाच्या छक्कनिपातामध्ये. ‘मिगासाला वस्तूंमध्ये’ म्हणजे मिगासाला नावाच्या उपासिकेच्या कथेत. काही लोक ही कथा पाहून महाअट्ठकथेचा वाद पसंत करत नाहीत, तर महाशिव थेरांचा वाद पसंत करतात. ‘अब्रह्मचाऱ्याचे’ म्हणजे मैथुन धर्मापासून अलिप्त न राहिलेल्याचे. ‘सकदागामीत्व घोषित केले’ म्हणजे तो ब्राह्मण कालवश झाल्यावर येथे सकदागामी भाव प्राप्त करून तुषित लोकामध्ये उत्पन्न झाला, अशा प्रकारे भगवंतांनी त्याचे जे सकदागामीत्व घोषित केले. ‘अधिगम (प्राप्ती) द्वारे’ म्हणजे सकदागामी भावाच्या प्राप्तीद्वारे. परंतु तो अब्रह्मचारी असतानाच त्याला अधिगम झाला, असा याचा अभिप्राय नाही. कारण मरणासन्न काळात देखील शिक्षापदांच्या अधिष्ठानासह वरील मार्ग-फलाचा अधिगम (प्राप्ती) करणे हे तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्या आर्य श्रावकासाठी कठीण नाही. याद्वारे काही लोकांचे थेरवादाला पसंत करणे खंडित होते. ‘या लोकात एकदाच येऊन’ यावरून येथून परलोकात जाणे आणि तेथून पुन्हा येथे येणे सिद्ध होत असल्यामुळे, हा पुद्गल शुद्ध मार्ग-नियमाने कामभवात जास्तीत जास्त दोन वेळा जन्म घेणारा (द्विक्खत्तुपरम) होतो, हे सिद्ध होते. कसे? येथे (मार्ग) प्राप्त करून तेथे उत्पन्न होऊन येथे परिनिर्वाण पावणारा, किंवा तेथे (मार्ग) प्राप्त करून येथे उत्पन्न होऊन तेथे परिनिर्वाण पावणारा. उर्वरित चार प्रकार हे विपश्यना-नियमाने सिद्ध होतात, असे समजले जाते. ते चार कोणते? येथे प्राप्त करून येथेच परिनिर्वाण पावणारा; तेथे प्राप्त करून तेथेच परिनिर्वाण पावणारा; येथे प्राप्त करून तेथे परिनिर्वाण पावणारा; आणि तेथे प्राप्त करून येथे परिनिर्वाण पावणारा. आणि येथे तीन स्रोतापन्नांमध्ये केवळ एक ‘सत्तक्खत्तुपरम’ हाच मार्ग-नियमाने सिद्ध होतो. उर्वरित दोन स्रोतापन्न विपश्यना-नियमाने सिद्ध होतात. सहा सकदागामींमध्ये दोनच मार्ग-नियमाने सिद्ध होतात. उर्वरित चार विपश्यना-नियमाने सिद्ध होतात. त्यात मार्ग-सिद्ध स्रोतापन्न आणि सकदागामींमध्ये संकर (मिश्रण) नाही. परंतु विपश्यना-सिद्ध असलेल्यांमध्ये संकर आहे. अर्थाच्या दृष्टीने विरोध नसताना, केवळ व्यवहारापुरत्या संकरात काही दोष नाही, असे समजावे. ‘आगन्त्वा’ (येऊन) या पाठानुसार ‘आगमनामुळे’ असे म्हटले आहे. परंतु ‘आगन्ता’ (येणारा) हा पाठ अधिक योग्य आहे. येण्याचा स्वभाव असलेला, येणारा धर्म असलेला होऊन ‘सकदागामी’ होतो, असा अर्थ आहे. ‘अनागन्त्वा इत्थत्तं’ (येथे परत न येता) यामध्ये देखील हाच नियम आहे. अर्हताचा भाव म्हणजे ‘अर्हत्व’ होय. अर्हत्व मार्ग. दक्षिणेची (दानाचा) विपत्ती आणणारे म्हणजे अल्प फल आणि अल्प शंसा (फायदा) देणारे. संपत्ती देणारे म्हणजे महाफल आणि महान शंसा देणारे. शीलस्कंधादी गुण म्हणजे शीलस्कंध, समाधिस्कंध, प्रज्ञास्कंध, विमुक्तिस्कंध आणि विमुक्तिज्ञानदर्शनस्कंध गुण होत. ‘दक्षिणेयांमध्ये’ (दक्खिणेय्येसु) म्हणजे दक्षिणेस (दानास) पात्र असलेल्या पुद्गलांमध्ये. ‘धुर’ म्हणजे प्रधान किंवा मुख्य स्थान म्हटले जाते. श्रद्धाच ज्याचे मुख्य साधन आहे, तो ‘श्रद्धाधुर’ होय. याचप्रमाणे ‘प्रज्ञाधुर’ होय. परंतु येथे ‘वीर्यधुर’ का ग्रहण केला नाही? कारण पालिमध्ये ‘श्रद्धावाही मार्गाची भावना करतो, प्रज्ञावाही मार्गाची भावना करतो’ असे म्हटले आहे. परंतु ‘वीर्यवाही मार्गाची भावना करतो’ असे म्हटलेले नाही. म्हणून तो ग्रहण केला नाही. परंतु ‘वीर्यवाही मार्गाची भावना करतो’ असे का म्हटले नाही? त्याचे कारण सांगितले जाते. मार्गाची भावना करणाऱ्यासाठी सुरुवातीला दृष्टी आणि विचिकित्सेच्या प्रहाणासाठी मोठे कार्य करावे लागते. का? कारण ते अपायाचे (दुर्गतीचे) मूळ आहे. तेथे श्रद्धा आणि विचिकित्सा हे दोन्ही एकमेकांचे थेट विरोधी आहेत. ज्या आलंबनावर श्रद्धा स्थिर होते, तेथे विचिकित्सा नसते. ज्या आलंबनावर विचिकित्सा स्थिर होते, तेथे श्रद्धा नसते. त्याचप्रमाणे प्रज्ञा आणि दृष्टी (मिथ्यादृष्टी) हे थेट विरोधी आहेत. जेथे प्रज्ञा असते, तेथे दृष्टी नसते. जेथे दृष्टी असते, तेथे प्रज्ञा नसते. शिवाय, श्रद्धा आपल्या विषयात दृष्टीचा नाश करतेच. प्रज्ञेद्वारे विचिकित्सेचा नाश करण्याबाबत तर बोलण्याचीच गरज नाही. म्हणून, विपश्यना सुरू करणारा साधक अनित्यता इत्यादींवर केवळ अचल प्रसादाने (श्रद्धेने) देखील दृष्टी आणि विचिकित्सेचा त्याग करून ‘श्रद्धानुसारी’ भाव प्राप्त करतो आणि चांगल्या प्रकारे प्रसन्न होऊन ‘श्रद्धाविमुक्त’ भाव प्राप्त करतो. प्रज्ञेद्वारे अनित्यता इत्यादींना चिंतनास योग्य करून ‘धम्मानुसारी’ भाव प्राप्त करतो आणि चांगल्या प्रकारे पाहून ‘दृष्टीप्राप्त’ व ‘प्रज्ञाविमुक्त’ भाव प्राप्त करतो. परंतु वीर्य हे दृष्टी आणि विचिकित्सेचे विरोधी देखील नाही. उलट ते त्यांचा सहाय्यक आणि मुख्य आधार देखील बनते. कारण वीर्याचे लक्षण प्रग्रह (उषा वाढवणे) आहे. ते श्रद्धेलाही वाढवते, प्रज्ञेलाही वाढवते, दृष्टीलाही वाढवते आणि विचिकित्सेलाही वाढवतेच. मग ते आपल्या स्वभावाने दृष्टी आणि विचिकित्सेचा त्याग करण्यास कसे समर्थ होईल? म्हणून या ठिकाणी ‘वीर्यवाही’ किंवा ‘वीर्यधुर’ असे म्हटले नाही. परंतु ‘कायसाक्षी’ मध्ये श्रद्धा आणि प्रज्ञा समान बलवान असतात. आणि वीर्य स्वतः सम्यक प्रधानाच्या (प्रयत्नाच्या) ठिकाणी राहून त्या दोन्हीला पुष्टी देते. आणि तो पुद्गल त्या दोन्हीच्या बळाने दृष्टी, विचिकित्सा इत्यादींचा त्याग करून ‘कायसाक्षी’ भाव प्राप्त करतो. किंवा आठ विमोक्ष उत्पन्न करून ‘उभतोभागविमुक्त’ भाव प्राप्त करतो. परंतु या दोन पुद्गलांमध्ये वीर्याचे बळ चांगल्या प्रकारे प्रकट होते. म्हणून या दोघांना ‘वीर्याधिक’ (वीर्य अधिक असलेले) म्हटले पाहिजे, ‘वीर्यधुर’ नाही. चार प्रतिपदा म्हणजे: दुःखा प्रतिपदा दंधाभिज्ञा (कठीण मार्ग, संथ ज्ञान), दुःखा प्रतिपदा खिप्पाभिज्ञा (कठीण मार्ग, जलद ज्ञान), सुखा प्रतिपदा दंधाभिज्ञा (सुकर मार्ग, संथ ज्ञान) आणि सुखा प्रतिपदा खिप्पाभिज्ञा (सुकर मार्ग, जलद ज्ञान) होत. त्रिविध विमोक्ष म्हणजे: शून्यत विमोक्ष, अनिमित्त विमोक्ष आणि अप्रणिहित विमोक्ष होत. ‘तीन अंतरा-परिनिर्वायी’ म्हणजे येथे आयुष्यकल्पाच्या समाप्तीला न पोहोचता मध्येच क्लेश-परिनिर्वाण प्राप्त करणारे ‘अंतरा-परिनिर्वायी’ होत. ते तीन प्रकारचे आहेत: आयुष्यकल्पाच्या पहिल्या भागात परिनिर्वाण पावणारे, दुसऱ्या भागात आणि तिसऱ्या भागात परिनिर्वाण पावणारे. हे तीन ‘अंतरा-परिनिर्वायी’ होत. ‘उपहच्च-परिनिर्वायी’ म्हणजे आयुष्यकल्पाच्या शेवटी परिनिर्वाण पावणारे. ज्याचा प्रवाहाचा प्रवाह वरच्या दिशेने आहे तो ‘उद्धंसोत’ (उर्ध्वस्रोत) होय. जो निश्चितपणे अकनिष्ठ लोकामध्ये जाईल तो ‘अकनिष्ठगामी’ होय. विपश्यना कर्म ससंस्कार (प्रयत्नांसह) आणि सप्रयोग करून परिनिर्वाण पावणारा तो ‘ससंस्कार-परिनिर्वायी’ होय. संस्काररहित सुलभ विपश्यना कर्माने परिनिर्वाण पावणारा तो ‘असंस्कार-परिनिर्वायी’ होय. ‘बारा स्रोतापन्न’ म्हणजे एकबीजी इत्यादी तीन. त्यांनाच चार प्रतिपदांनी गुणले असता बारा होतात. बारा सकदागामी देखील पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावेत. เอกจฺจานํ เอว อนาคามิ อรหนฺตานํ เอว. ‘‘อชฺโฌสิตสฺสา’’ติ อธิโอสิตสฺส. มเมวิทนฺติ นิฏฺฐานํ กตฺวา ฐปิตสฺส. คิลิตฺวา ฐปิตสฺสาติ วุตฺตํ โหติ. พหเลน ถูเลน กามราเคน วิมุตฺตา พหลราควิมุตฺตา. อารุปฺเปสุ จ ตสฺโส อรูปสมาปตฺติโย เอว อตฺถิ. น จตสฺโส รูปสมาปตฺติโย. ตสฺมา ตตฺถ อนุปุพฺพนิโรโธ น ลพฺภติ. ‘‘อาทิโต ปฏฺฐายา’’ติ อฏฺฐสุ สมาปตฺตีสุ ปถมชฺฌาน สมาปตฺติอาทิ. ตโต ปฏฺฐาย. อนุปุพฺพนิโรโธ นาม [Pg.320] ปถมชฺฌาเน ปฏิฆสญฺญานานตฺตสญฺญานํ นิโรโธ. ปฏิฆสญฺญา นาม ปญฺจวิญฺญาณสญฺญา. นานตฺตสญฺญา นาม กสิณ นิมิตฺตโต อญฺเญสุ นานารมฺมเณสุ ปวตฺตมโนวิญฺญาณ สญฺญา. ทุตียชฺฌาเน วิตกฺก วิจารานํ นิโรโธติอาทินา อนุปุพฺพ นิโรโธ. ‘‘ตโต ปญฺจมชฺฌานํ’’ติ ปญฺจกนเยน วุตฺตํ. อฏฺฐสมาปตฺติ วจนํ ปน จตุกฺกนเยน วุตฺตํ. ตทุภยํปิ ปุคฺคลานุรูปํ ลพฺภติเยว. ยุคนนฺธํ นาม ทฺวนฺทพนฺธนํ, สมถวิปสฺสนานํ ยุคนนฺธนฺติ วิคฺคโห. ‘‘สมาปชฺชน วุฏฺฐาน วิปสฺสนาวเสนา’’ติ เอตฺถ วสิภาวปตฺตํ สมาปชฺชนญฺจ วุฏฺฐานญฺจ คเหตพฺพํ. อตฺตโน สรีรา พทฺเธสุ ปริกฺขาเรสุ สมาปตฺติพเลเนว อนฺตรายาภาวโต วิสุํ อธิฏฺฐาตพฺพ กิจฺจํ นตฺถีติ วุตฺตํ ‘‘อตฺตโน สรีราพทฺเธ ปริกฺขาเร ฐเปตฺวา’’ติ. ‘‘นานาพทฺธานี’’ติ นานาฐาเนหิ อาพทฺธานิ. นานาฐาเนสุ ฐปิตานีติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘ปริสฺสเยนา’’ติ อนฺตราเยน. มาวินสฺสนฺตูติ วา นานาพทฺธ อวิโกปนํ อธิฏฺฐาตพฺพํ. ตทา วุฏฺฐหามีติวา สงฺฆปฺปติมานนํ อธิฏฺฐาตพฺพํ. เอวํ สตฺถุปกฺโกสนํปิ. ‘‘อทฺธานปริจฺเฉโท’’ติ อตฺตโน ชีวิตกาลสฺส อุปปริกฺขณํ. มรณญฺหิ นาม สมาปตฺติพเลนปิ ปฏิพาหิตุํ น สกฺกาโหติ. อนฺโต สมาปตฺติยญฺจ มรเณ สติ สพฺรหฺมจารีสุ กตฺตพฺพวตฺตํ น กเรยฺย. เอตญฺหิ วตฺตํ ยํ อริยสาวกานํ มรณาสนฺเน สพฺรหฺมจารีนํ วา อุปฏฺฐากานํ วา อปฺปมาทกถานุ สาสนิกมฺมํ. สมาปตฺติยํ วา อญฺญติตฺถิยานํ ครหา วิวชฺชนตฺถํ. เอวญฺหิ เต ครเหยฺยุํ. โคตมสาวกานํ นิโรธสมาปตฺติ นาม เอกํ มรณมุขํ. ยํ สมาปชฺชนฺโต อสุโก ภิกฺขุ มรณํ คจฺฉติ. อนริย กมฺมํ เหตนฺติ. केवळ काही अनागामी आणि अरहंतांचेच. ‘अज्झोसितस्स’ म्हणजे आसक्त झालेल्याचे (अधिओसितस्स). ‘हे माझेच आहे’ असा निश्चय करून ठेवलेल्याचे. गिळून ठेवलेल्याचे, असे म्हटले आहे. दाट आणि स्थूल कामरागापासून मुक्त झालेले ते ‘बहलरागविमुक्त’. आणि अरूप लोकांमध्ये (आरुप्पेषु) केवळ चार अरूप समापत्तीच असतात. चार रूप समापत्ती नसतात. त्यामुळे तिथे अनुक्रमिक निरोध (अनुपुब्ब निरोध) प्राप्त होत नाही. ‘सुरुवातीपासून’ म्हणजे आठ समापत्तींमध्ये प्रथम ध्यान समापत्ती इत्यादी. तिथून पुढे. अनुक्रमिक निरोध म्हणजे प्रथम ध्यानात प्रतिघसंज्ञा आणि नानात्वसंज्ञा यांचा निरोध. प्रतिघसंज्ञा म्हणजे पंचविज्ञानसंज्ञा. नानात्वसंज्ञा म्हणजे कसिण निमित्ताशिवाय इतर विविध आलंबनांमध्ये प्रवृत्त होणारी मनोविज्ञानसंज्ञा. द्वितीय ध्यानात वितर्क आणि विचारांचा निरोध इत्यादी प्रकारे अनुक्रमिक निरोध होतो. ‘त्यानंतर पाचवे ध्यान’ हे पंचक पद्धतीने (पंचकनय) सांगितले आहे. परंतु आठ समापत्तींचे वचन चतुष्क पद्धतीने (चतुक्कनय) सांगितले आहे. ते दोन्हीही व्यक्तीच्या अनुरूप (पुग्गलानुरूप) प्राप्त होतेच. युगनद्ध म्हणजे जोडीने बांधणे; समथ आणि विपश्यना यांचे युगनद्ध असा याचा विग्रह आहे. ‘समापज्जन (समाधीत प्रवेश करणे), वुट्ठान (समाधीतून उठणे) आणि विपश्यनेच्या वशाने’ यामध्ये वशीभाव प्राप्त झालेले समापज्जन आणि वुट्ठान ग्रहण करावे. आपल्या शरीराशी बांधलेल्या परिष्कारांच्या (वस्तूंच्या) बाबतीत समापत्तीच्या बलामुळेच अंतराय (अडथळा) नसल्याने, वेगळे अधिष्ठान करण्याचे कार्य नसते, हे दर्शवण्यासाठी ‘आपल्या शरीराशी बांधलेले परिष्कार सोडून’ असे म्हटले आहे. ‘नानाबद्धानि’ म्हणजे वेगवेगळ्या ठिकाणी बांधलेले. वेगवेगळ्या ठिकाणी ठेवलेले, असे म्हटले आहे. ‘परिस्सयेन’ म्हणजे अंतरायाने (संकटाने). ‘ते नष्ट होऊ नयेत’ म्हणून वेगवेगळ्या प्रकारे बांधलेल्या वस्तूंचे अविकोपन (सुरक्षितता) अधिष्ठित करावे. किंवा ‘त्या वेळी मी उठेन’ असे संघाच्या आदरासाठी अधिष्ठान करावे. त्याचप्रमाणे शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) बोलावण्याबाबतही करावे. ‘अद्धानपरिच्छेद’ म्हणजे स्वतःच्या जीवितकाळाचे परीक्षण करणे. कारण मृत्यू हा समापत्तीच्या बलानेही रोखता येत नाही. आणि समापत्तीच्या आत असताना मृत्यू झाल्यास, सब्रह्मचाऱ्यांविषयी करावयाचे कर्तव्य (वत्त) करता येणार नाही. कारण हे कर्तव्य असे आहे की, जे आर्यश्रावकांच्या मरणासन्न काळात सब्रह्मचाऱ्यांचे किंवा उपस्थायकांचे (सेवकांचे) अप्रमाद कथेचे आणि अनुशासनाचे कार्य असते. किंवा समापत्तीमध्ये (मृत्यू होणे) हे अन्यतीर्थिकांच्या निंदेचे निवारण करण्यासाठी टाळले जाते. कारण ते अशी निंदा करू शकतील: ‘गौतम बुद्धांच्या श्रावकांची निरोधसमापत्ती म्हणजे एक मृत्यूचे मुखच आहे. ज्या समापत्तीत प्रवेश करून अमुक भिक्खू मृत्यू पावतो. हे खरोखरच अनार्य कर्म आहे.’ ‘‘ยทตฺถํ’’ติ ปฏิปตฺติ รสสฺสาทตฺถํ. ‘‘ตทตฺเถ’’ติ ตสฺมึ อตฺเถ. นิรามิส สุขํ นาม อามิสรหิต สุขํ. ทุวิธญฺหิ สุขํ สามิสสุขญฺจ นิรามิสสุขญฺจ. ตตฺถ เย โลเก อิฏฺฐ กนฺต มนาปิยา ปญฺจกามคุณา นาม อตฺถิ. เต กิเลเสหิ อามสิตพฺพตฺตา อามิสา นาม. ยญฺจสุขํ เต อามิเส ปฏิจฺจ อุปฺปชฺชติ, ตํ สามิสสุขํ นาม. ยํ โลเก ทิพฺพํ สุขํ มานุสกํ สุขนฺติ มมายนฺติ. ยญฺจ อนุภวนฺตํ [Pg.321] มหาชนํ สพฺพานิ อปายภย วฏฺฏภยานิ สมฺปริวาเรนฺติ. ฌานสุข มคฺคสุข ผลสุข นิพฺพานสุขํ ปน นิรามิสสุขํ นาม. ยํ เนกฺขมฺมสุขนฺติ จ ปวิเวกสุขนฺติ จ อุปสมสุขนฺติ จ สมฺโพธิสุขนฺติ จ วิมุตฺติสุขนฺติ จ อริยสุขนฺติ จ อนวชฺชสุขนฺติ จ วุจฺจติ. ยญฺจ อนุภวนฺตํ อริยชนํ สพฺพานิ อปายภย วฏฺฏภยานิ สมฺปริวชฺชนฺติ. ‘‘อสฺสาทิตพฺพฏฺเฐนา’’ติ กิเลสปลิโพเธหิ วิมุตฺตตฺตา วิปุล คมฺภีร สนฺต ปณีตรสตฺตา จ อโหสุขํ อโหสุขนฺติ อุทาหรนฺเตนปิ อสฺสาทิตพฺพฏฺเฐนาติ. ‘यदत्थं’ म्हणजे प्रतिपत्तीच्या (साधनेच्या) रसाचा आस्वाद घेण्यासाठी. ‘तदत्थे’ म्हणजे त्या अर्थी (त्या हेतूने). निरामिष सुख म्हणजे आमिषरहित (भौतिक सुखांशिवायचे) सुख. कारण सुख दोन प्रकारचे असते: सामिष सुख आणि निरामिष सुख. त्यात जे जगात इष्ट, कांत (प्रिय) आणि मनाला आवडणारे पाच कामगुण आहेत. ते क्लेशांनी स्पर्श केले जाण्यायोग्य असल्याने त्यांना ‘आमिष’ म्हणतात. आणि जे सुख त्या आमिषांवर अवलंबून उत्पन्न होते, त्याला ‘सामिष सुख’ म्हणतात. ज्याला जगात दिव्य सुख किंवा मानुषी सुख म्हणून ‘माझे’ मानले जाते. आणि ज्याचा अनुभव घेणाऱ्या बहुजन समाजाला सर्व अपायभय (नरकादींचे भय) आणि वट्टभय (संसारचक्राचे भय) घेरून राहतात. परंतु ध्यानसुख, मार्गसुख, फलसुख आणि निर्वाणसुख हे ‘निरामिष सुख’ होय. ज्याला नैष्क्रम्यसुख (नेक्खम्मसुख), प्रविवेकसुख (पविवेकसुख), उपशमसुख, संबोधीसुख, विमुक्तीसुख, आर्यसुख आणि अनवद्यसुख (दोषरहित सुख) असेही म्हटले जाते. आणि ज्याचा अनुभव घेणाऱ्या आर्यजनांना सर्व अपायभय आणि वट्टभय वर्ज्य करतात (म्हणजेच ते या भयांतून मुक्त होतात). ‘अस्सादितब्बाट्ठेन’ म्हणजे क्लेश आणि परिबोधांपासून (अडथळ्यांपासून) मुक्त असल्यामुळे, विपुल, गंभीर, शांत आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) रसयुक्त असल्याने, ‘अहो सुख! अहो सुख!’ असे उद्गार काढत आस्वाद घेण्याच्या अर्थाने. กมฺมฏฺฐานสงฺคหานุทีปนา นิฏฺฐิตา. कर्मस्थानसंग्रहानुदीपनी समाप्त झाली. นิคมคาถาสุ. निगमन गाथांमध्ये. ๒๖๒. จริตพฺพนฺติ จาริตฺตํ. ทสกุสลกมฺมปถธมฺมชาตํ. ‘‘กุลาจาเรนา’’ติ กุลปรมฺปรโต อาคเตน อาจาเรน. ‘‘ญาติ มิตฺต ธน โภคสมฺปตฺติยา’’ติ เหตุอตฺเถ กรณวจนํ. ‘‘วิสาเล’’ติ วิปุเล. ‘‘เตนา’’ติ ตสฺสปทสฺส วิภตฺยนฺต ทสฺสนํ. ‘‘สทฺธายา’’ติ รตนตฺตเย อเวจฺจปฺปสาทสทฺธาวเสน. ‘‘อภิวุฑฺฒานํ’’ติ หานภาคิย ฐิติภาคิยภาวํ อติกฺกมฺมวิเสสภาคิย นิพฺเพธภาคิย ภาวปตฺติวเสน อติสฺสย วุฑฺฒานํ. ‘‘ปริสุทฺธานญฺจา’’ติ อตฺตุกฺกํสน ปรวมฺภนาทิ โทเสหิ ปริสุทฺธานญฺจ. นํ นํ ชนํ ปาติรกฺขตีติ นมฺโป. ทิฏฺฐทิฏฺเฐสุ เมตฺตาวิหารีติ วุตฺตํ โหติ. อาวฺหาตพฺโพติ อวฺหโย. นามํ. นมฺโป อิติ อวฺหโย อสฺสาติ นมฺปวฺหโยติ วจนตฺโถ. ‘‘ปณิธายา’’ติ ปตฺเถตฺวาติ อตฺถํ นิวตฺเตติ ‘‘ภุสํ นิธายา’’ติอาทินา. ‘‘อุปาทาย ปฏิจฺจา’’ติ ตสฺส ปทสฺส ปริยายทสฺสนเมตํ. ‘‘อตฺตโน มนฺทพุทฺธีนํ’’ติ ปจฺจกฺเข ธรมานานนฺติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘ปจฺฉิม ชนานํ วา’’ติ. อนุกมฺปนํ อนุกมฺโป. กถํ นุ โข อิเม ชนา อภิธมฺมตฺเถสุ สุเขน อาชาเนยฺยุนฺติ เอวํ ปวตฺโต จิตฺตพฺยาปาโร. อตฺถโต อนุทยสงฺขาตา กรุณาเยว. เตนาห ‘‘อนุทยํ [Pg.322] การุญฺญํ’’ติ. ‘‘ปตฺถิตํ’’ติ วา สาธุวตสฺส ยํ เถโร เอวรูปํ ปกรณํ กเรยฺยาติ เอวํ จิรกาลํ ปตฺถิตํ อาสึสิตนฺติ อตฺโถ. ‘‘ขุทฺทสิกฺขาฏีกายํ’’ติ โปราณฏีกํ สนฺธาย วุตฺตํ. โสมวิหาโรตฺเวว ปญฺญายิตฺถ ตสฺมึ ทีเปติ อธิปฺปาโย. คาถายํ ‘‘อถา’’ติ ตสฺมึกาเล. ‘‘เอตฺถา’’ติ เอตสฺมึ นคเร. ‘‘สทฺโท’’ติ กสฺมา ราชา เอวรูปํ มงฺคลหตฺถึ พฺราหฺมณานํ อทาสิ. เนตํ ปติรูปํ ยํ รญฺญา กตนฺติ เอวํ ปวตฺโต อมนาปสทฺโท. ‘‘เภรโว’’ติ ภีรุตาชนโก ภยานโก. ‘‘สิวีนํ’’ติ สิวิรฏฺฐวาสีนํ. ‘‘รฏฺฐวฑฺฒเน’’ติ รฏฺฐํ วฑฺเฒตีติ รฏฺฐวฑฺฒโน. หตฺถินาโค. โส หิ ลกฺขณสมฺปนฺโน อาชานิโย โหติ. ยสฺมึ รฏฺเฐ ตํ อภิมงฺคลํ กโรนฺติ, ตสฺมึ รฏฺเฐ เทโว สมฺมา วสฺสติ, นานาภยุปทฺทวา ตสฺมึ นุปฺปชฺชนฺตีติ โลกสมฺมโต มงฺคลหตฺถี โหติ. เตน วุตฺตํ ‘‘สิวีนํ รฏฺฐวฑฺฒเน’’ติ. ‘‘วิตฺถิณฺโณ’’ติ วิตฺถาริโต. อติวิตฺถาโรติ วุตฺตํ โหติ. ธนียนฺติ มหาชเนหิ ทฏฺฐุํ ปตฺถียนฺตีติ ธญฺญา. มหิทฺธิกา. อธิวสนฺติ เอตฺถาติ อธิวาโส. ธญฺญานํ อธิวาโสติ สมาโส. อชฺฌาวสึสุ เอตฺถาติ อชฺฌาวุตฺถํ. กิตฺติคุณวเสน อุเทนฺติ อุคฺคจฺฉนฺตีติ อุทิตา. อุทิตานํปิ อุทิโตติ วิคฺคโห. เตนาห ‘‘นภมชฺเฌ’’ติอาทึ. สารชฺชนํ สารโท. วิคโต สารโท ยสฺสาติ วิสารโท. วิสารทสฺส ภาโว เวสารชฺชํ. ปริยตฺติยํ เวสารชฺชํ ปริยตฺติเวสารชฺชํ. เตปิฏกปริยตฺติยํ เวยฺยตฺติยญฺญาณํ. ตํ อาทิ เอติสฺสา ปญฺญายาติ ปริยตฺติเวสารชฺชาทิ ปญฺญา. ปาปโต ลชฺชนสีลาติ ลชฺชิโนติ อาห ‘‘ปาปครหิโน’’ติ. ปาปํ ธมฺมํ ครหนฺติอาทีนวํ กถยนฺติ สีเลนาติ ปาปครหิโน. ‘‘อนุสฺสรนฺตู’’ติ ปุนปฺปุนํ สรนฺตุ. วิเสเสน ภวนฺติ เวปุลฺลํ คจฺฉนฺตีติ วิภวา. ปุญฺญานิ จ ตานิ วิภวาจาติ ปุญฺญวิภวา. วิปุลปุญฺญานีติ ทสฺเสตุํ ‘‘วิปุลานํ’’ติอาทิมาห. อนุตฺตริย ธมฺมา นาม ทสฺสนานุตฺตริย สวนานุตฺตริยาทโย. โลเก พหูสุ ทสฺสเนสุ อิโต อุตฺตรํ อญฺญํ ทสฺสนํ นาม นตฺถีติ ทสฺสนานุตฺตริยํ. รตนตฺตยทสฺสนํ. จตุสจฺจทสฺสนญฺจ. รตนตฺตยคุณกถาสวนํ[Pg.323], ขนฺธายตน ธาตุ สจฺจปฏิจฺจสมุปฺปาทกถาสวนญฺจ สวนานุตฺตริยํ นาม. เตสุ รตนตฺตยาทีสุ สทฺธา ปฏิลาโภ ลาภานุตฺตริยํ นาม. เตสเมว ปุนปฺปุนํ สรณํ อนุสฺสตานุตฺตริยํ นาม. รตนตฺตเย จตูหิ ปจฺจเยหิ วา วตฺตปฺปฏิวตฺตกรเณน วา ปริจรณํ ปาริจริยานุตฺตริยํ นาม. พุทฺธปญฺญตฺตาสุ ตีสุ สิกฺขาสุ สมาทาย สิกฺขนํ สิกฺขานุตฺตริยํ นาม. ตาทิเส ปญฺญาวทาตคุณโสภาทิเก คุเณ อวสฺสํ ภชนฺติ ปาปุณนฺตีติ ตาทิสคุณภาคิโน. ‘‘ภวิสฺสามา’’ติ ภวิตุํ อุสฺสาหํ กริสฺสามาติ วุตฺตํ โหติ. २६२. ‘चारित्तं’ (चारित्र) म्हणजे जे आचरावे ते, म्हणजेच दहा कुशल कर्मपथांचे धर्मसमूह. ‘कुलाचारेण’ म्हणजे कुलपरंपरेने चालत आलेले आचरण. ‘ज्ञाति-मित्त-धन-भोगसंपत्तिया’ हे हेतूच्या अर्थातील तृतीया विभक्तीचे रूप आहे. ‘विसाले’ म्हणजे विपुल (विस्तीर्ण). ‘तेन’ हे त्या पदाचे विभक्तीचे रूप दर्शवते. ‘सद्धाय’ (श्रद्धेने) म्हणजे त्रिरत्नावरील अचल प्रसन्नतेच्या (श्रद्धेच्या) प्रभावाने. ‘अभिवुड्ढानं’ (अभिवृद्धी) म्हणजे हानीकारक (हानभागीय) आणि स्थिर (स्थितिभागीय) अवस्था ओलांडून, विशेष (विशेषभागीय) आणि भेदक (निर्वेधभागीय) अवस्था प्राप्त करण्याच्या दृष्टीने झालेली अत्यंत वृद्धी. ‘परिसुद्धानञ्च’ म्हणजे आत्मप्रशंसा आणि परनिंदा इत्यादी दोषांपासून अत्यंत शुद्ध असलेल्यांचे. जो त्या त्या लोकांचे रक्षण करतो तो ‘नम्प’ (रक्षक). पाहिलेल्या आणि न पाहिलेल्या सर्व प्राण्यांविषयी मैत्रीभावाने राहणारा (मैत्रीविहारी), असे म्हटले आहे. ज्याला हाक मारली जाते ते ‘अव्हय’ म्हणजे नाव. ‘नम्प’ हे ज्याचे नाव आहे तो ‘नम्पव्हय’ असा या शब्दाचा अर्थ आहे. ‘पणिधाय’ म्हणजे ‘प्रार्थना करून’ (इच्छा करून) असा अर्थ ‘भुसं निधाय’ इत्यादी शब्दांनी स्पष्ट केला आहे. ‘उपादाय पटिच्च’ (आश्रय घेऊन किंवा अवलंबून) हे त्या पदाचे समानार्थी रूप दर्शवणे आहे. ‘अत्तनो मन्दबुद्धीनं’ (स्वतःच्या मंदबुद्धीच्या लोकांसाठी) म्हणजे प्रत्यक्ष हयात असलेल्यांसाठी, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - ‘पच्छिम जनानं वा’ (किंवा नंतरच्या लोकांसाठी). अनुकंपा करणे म्हणजे ‘अनुकंप’ (दया/करुणा). ‘हे लोक अभिधम्माच्या अर्थाला सहज कसे समजून घेतील?’ अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेली मनाची क्रिया (चित्तव्यापार). अर्थाच्या दृष्टीने ही अनुकंपा म्हणजेच करुणा होय. म्हणूनच म्हटले आहे - ‘अनुदयं कारुञ्ञं’ (अनुकंपा आणि कारुण्य). ‘पत्थितं’ (प्रार्थित/इच्छित) म्हणजे ‘थेरांनी (स्थविरांनी) असा ग्रंथ करावा’ अशी सज्जनांनी दीर्घकाळापासून केलेली प्रार्थना किंवा इच्छा, असा अर्थ आहे. ‘खुद्दसिक्खाटीकायं’ हे प्राचीन टीकेचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. त्या द्वीपात तो ‘सोमविहार’ म्हणूनच ओळखला जात असे, असा अभिप्राय आहे. गाथेमध्ये ‘अथ’ म्हणजे ‘त्या काळी’ (त्या वेळी). ‘एत्थ’ म्हणजे ‘या नगरात’. ‘सद्दो’ (आवाज/कोलाहल) म्हणजे ‘राजाने असा मंगल हत्ती ब्राह्मणांना का दिला? राजाने केलेले हे कृत्य योग्य नाही,’ अशा प्रकारे पसरलेला अप्रिय आवाज (लोकनिंदा). ‘भेरवो’ म्हणजे भीती निर्माण करणारा, भयानक. ‘सिवीनं’ म्हणजे शिवी राष्ट्रातील रहिवाशांचा. ‘रट्ठवड्ढने’ म्हणजे राष्ट्राची वृद्धी करणारा तो ‘रट्ठवड्ढन’ (राष्ट्रवर्धन) हत्तीश्रेष्ठ. कारण तो लक्षणांनी संपन्न आणि आजानीय (उत्कृष्ट वंशाचा) असतो. ज्या राष्ट्रात त्याचे मंगल पूजन केले जाते, त्या राष्ट्रात पर्जन्य योग्य वेळी पडतो आणि विविध प्रकारचे भय व उपद्रव निर्माण होत नाहीत, असा तो लोकमान्य मंगल हत्ती असतो. म्हणूनच म्हटले आहे - ‘सिवीनं रट्ठवड्ढने’ (शिवी राष्ट्राची वृद्धी करणाऱ्या). ‘वित्थिण्णो’ म्हणजे विस्तारित. अत्यंत विस्तृत असा अर्थ आहे. ‘धनीयन्ति’ म्हणजे लोकांद्वारे पाहण्याची इच्छा केली जाणारे ते ‘धञ्ञा’ (धन्य/भाग्यवान) किंवा महान ऋद्धी असलेले (महिद्धिका). लोक जेथे राहतात तो ‘अधिवास’. ‘धञ्ञानं अधिवासो’ (भाग्यवानांचा निवास) हा समास आहे. जेथे लोकांनी वास्तव्य केले ते ‘अज्झावुत्थं’ (अध्युषित/वस्ती केलेले). कीर्ती आणि गुणांच्या प्रभावाने जे वर येतात (उदय पावतात) ते ‘उदिता’ (उदित). ‘उदितांनाही उदित’ असा विग्रह आहे. म्हणूनच ‘नभमज्झे’ (आकाशाच्या मध्यभागी) इत्यादी म्हटले आहे. आसक्ती निर्माण होणे म्हणजे ‘सारद’. ज्याची आसक्ती निघून गेली आहे तो ‘विसारद’ (विशारद/कुशल). विशारदाचा भाव म्हणजे ‘वेसारज्ज’ (वैशारद्य/आत्मविश्वास). परियत्तीमधील (धम्मशिक्षणातील) वैशारद्य म्हणजे ‘परियत्तिवेसारज्ज’. त्रिपिटक परियत्तीमधील निपुणतेचे ज्ञान. ते ज्या प्रज्ञेच्या सुरुवातीला आहे ती ‘परियत्तिवेसारज्जादि पञ्ञा’ (परियत्ति-वैशारद्य इत्यादी प्रज्ञा). पापाची लाज बाळगणाऱ्या स्वभावाचे ते ‘लज्जी’ (लज्जाशील), म्हणून ‘पापगरहिनो’ असे म्हटले आहे. जे स्वभावाने पापधर्माची निंदा करतात आणि त्याचे दुष्परिणाम सांगतात ते ‘पापगरहिनो’ (पापनिंदक). ‘अनुस्सरन्तु’ म्हणजे पुन्हा पुन्हा स्मरण करावे. जे विशेष रूपाने वृद्धीला (विपुलतेला) प्राप्त होतात ते ‘विभव’. जे पुण्य आणि विभव (ऐश्वर्य/समृद्धी) दोन्ही आहेत ते ‘पुण्यविभव’. विपुल पुण्य दर्शवण्यासाठी ‘विपुलानं’ इत्यादी म्हटले आहे. अनुत्तरिय धर्म म्हणजे दर्शनानुत्तरिय, सवनानुत्तरिय इत्यादी. जगातील अनेक दर्शनांमध्ये (मतांमध्ये) ज्याच्यापेक्षा श्रेष्ठ दुसरे कोणतेही दर्शन नाही ते ‘दर्शनानुत्तरिय’ होय. जसे की त्रिरत्न-दर्शन आणि चतुरार्यसत्य-दर्शन. त्रिरत्नांच्या गुणांची कथा ऐकणे, तसेच स्कंध, आयतन, धातू, सत्य आणि प्रतीत्यसमुत्पाद यांची कथा ऐकणे म्हणजे ‘सवनानुत्तरिय’ (श्रवणानुत्तरिय) होय. त्या त्रिरत्न इत्यादींवर श्रद्धा प्राप्त करणे म्हणजे ‘लाभानुत्तरिय’ होय. त्यांचेच पुन्हा पुन्हा स्मरण करणे म्हणजे ‘अनुस्मृत्यनुत्तरिय’ (अनुस्सतानुत्तरिय) होय. त्रिरत्नाची चार प्रत्ययांनी (गरजांनी) किंवा कर्तव्यांचे पालन करून सेवा करणे म्हणजे ‘पारिचर्यानूत्तरिय’ (पारिचरियानुत्तरिय) होय. बुद्धांनी प्रज्ञप्त केलेल्या तीन शिक्षांचे (शील, समाधी, प्रज्ञा) ग्रहण करून शिकणे म्हणजे ‘शिक्षानुत्तरिय’ (सिक्खानुत्तरिय) होय. अशा प्रज्ञा, निर्मळता, गुणांची शोभा इत्यादी गुणांचे जे निश्चितपणे सेवन करतात किंवा ते प्राप्त करतात, ते ‘तादिसगुणभागिनो’ (तशा गुणांचे भागीदार) होत. ‘भविस्साम’ (आम्ही होऊ) म्हणजे तसे होण्यासाठी आम्ही उत्साह (प्रयत्न) करू, असे म्हटले आहे. ทีปนิยา นิคมคาถาสุ. दीपनीच्या उपसंहार गाथांमध्ये. ‘‘พสฺหฺยุสุญฺญจมฺเมกมฺหี’’ติ เอตฺถ ‘‘พสฺหฺยู’’ติ อฏฺฐสงฺขฺยาย สงฺเกต วจนํ. ‘‘จมฺมํ’’ติ ทฺวิสงฺขฺยาย. เอกญฺจ ทุกญฺจ สุญฺญญฺจ อฏฺฐจาติ คณนกฺกโม. สหสฺส ทฺวิสต อฏฺฐสงฺขาเต สาเกติ อตฺโถ. เอสนโย ปรโต ‘‘นวปญฺจ จมฺเมกมฺหี’’ติ ปเทปิ. คาถาวณฺณนาสุ. นครติ น จวตีติ นครํ. ถาวริยนฺติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘รญฺเชตี’’ติ รเมติ. เขมสุภิกฺขตาทิคุเณหิ อนาคเต ชเน คมาเปติ, อาคเต อญฺญตฺถ คนฺตุํ น เทตีติ วุตฺตํ โหติ. โรหิตมิคา นาม สุวณฺณวณฺณมิคา. ‘‘สาเก’’ติ สากนาเมน รญฺญา ปุน สงฺขตตฺตา อิมํ กลิยุคํ สากนฺติ วุจฺจติ. ยํ เอตรหิ สากฺรราชนฺติปิ โวหรนฺติ. สากราชา จ นาม อุตฺตราปเถสุ เอโก คนฺธารราชา. ยํ เชฏฺฐกํ กตฺวา ภินฺนลทฺธิกา วชฺชีภิกฺขู อิมํ ธมฺม วินยํ มหาสงฺฆีกํ นาม สงฺคหํ อาโรเปนฺติ. โส จ ธมฺมวินยสงฺคโห อุตฺตราปเถสุ วตฺตติ. เวสาลิยํ ยสตฺเถร สงฺคโห ปน ทกฺขิณาปเถสูติ. จตฺตาริยุคานิ นาม โลเก ปญฺญเปนฺติ สตฺยยุคํ, ทฺวาปรยุคํ, เตตฺรยุคํ, กลิยุค,นฺติ. ยุคนฺติ จ อายุปริมาณํ วุจฺจติ. อิทานิปน กลิยุคํ วตฺตติ. เตน วุตฺตํ ‘‘สาเกติ กลิยุเค’’ติ. ปาปยุเคติ อตฺโถ. ‘‘ล ตี’’ติ สาลิกฺเขตฺตานํ โสธนฏฺฐานตฺตา เอวํ มฺรมฺมเทสโวหาเรน ลทฺธนามํ [Pg.324] อรญฺญํ. ตํ ปน มุํรฺวานครสฺส เอสนฺเน ปญฺจธนุสติเก ปเทเส ชาตํ. ‘‘วิสฺสุเต’’ติ วิเสเสน กิตฺติเต. สารญฺจ อสารญฺจ วิเวเจนฺติ วิจาเรตฺวา ชานนฺติสีเลนาติ สาราสาร วิเวกิโนติ วจนตฺโถติ. “बश्यूसुञ्ञचम्मेकम्ही” यामध्ये “बश्यू” हा आठ या संख्येचा संकेतात्मक शब्द आहे. “चम्मं” हा दोन या संख्येचा. एक, दोन, शून्य आणि आठ असा हा मोजणीचा क्रम आहे. याचा अर्थ 'एक हजार दोनशे आठ' शके वर्षात असा आहे. हाच नियम पुढे “नवपञ्च चम्मेकम्ही” या पदालाही लागू होतो. गाथांच्या व्याख्यांमध्ये: जे नष्ट होत नाही ते 'नगर' होय. त्याला 'स्थैर्य' असे म्हटले आहे. “रञ्जेति” म्हणजे रममाण करणे. क्षेम आणि सुभिक्ष इत्यादी गुणांमुळे न आलेल्या लोकांना आकर्षित करते आणि आलेल्या लोकांना इतरत्र जाऊ देत नाही, असा याचा अर्थ आहे. 'रोहितमिगा' म्हणजे सुवर्ण रंगाचे हरिण. “शाके” म्हणजे 'शाक' नावाच्या राजाने पुन्हा स्थापित केल्यामुळे या कलियुगाला 'शाक' (शके) असे म्हटले जाते. ज्याला सध्या 'शाकराज' असेही म्हणतात. आणि शाकराज नावाचा उत्तरापथातील एक गांधारचा राजा होता. ज्याला प्रमुख करून भिन्न मतप्रणालीच्या वज्जी भिक्खूंनी या धम्म-विनयाची 'महासङ्घिक' नावाची संगीती (संग्रह) आयोजित केली होती. आणि तो धम्म-विनय संग्रह उत्तरापथात प्रचलित आहे. तर वैशाली येथील यसतथेरांनी केलेली संगीती दक्षिणापथात प्रचलित आहे. जगात चार युगे सांगितली जातात: सत्ययुग, द्वापरयुग, त्रेतायुग आणि कलियुग. आणि 'युग' म्हणजे आयुष्याची मर्यादा असे म्हटले जाते. परंतु सध्या कलियुग सुरू आहे. म्हणूनच “शाके म्हणजे कलियुगात” असे म्हटले आहे. याचा अर्थ 'पापयुग' असा आहे. “ल ती” म्हणजे भाताच्या शेतांची साफसफाई करण्याची जागा असल्यामुळे म्यानमार देशाच्या व्यवहारातून मिळालेले एका अरण्याचे नाव आहे. आणि ते मुंव्र नगराच्या ईशान्येला पाचशे धनुष्य अंतराच्या प्रदेशात स्थित आहे. “विस्सुते” म्हणजे विशेष रूपाने कीर्तिमान. जे सार आणि असार यांचा विचार करून विवेकपूर्वक जाणण्याच्या स्वभावाचे आहेत, त्यांना 'सारासार विवेकी' म्हणतात, असा या शब्दाचा अर्थ आहे. อิติ ปรมตฺถทีปนิยา อนุทีปนา นิฏฺฐิตา. अशा प्रकारे 'परमत्थदीपनी'ची अनुदीपनी समाप्त झाली. ๑. ปรมตฺถทีปนี นาม, เยน เถเรน สา กตา. १. ज्या थेरांनी ही 'परमत्थदीपनी' रचली आहे, เตเนเว สา กตา โหติ, อยํ ตสฺสานุ ทีปนี. त्यांनीच ही तिची 'अनुदीपनी' देखील रचली आहे. ๒. อฏฺฐสตฺตทฺวเยกมฺหิ, สาเก สา เชฏฺฐมาสเก. २. एक हजार दोनशे अठ्ठ्याहत्तर (१२७८) शके वर्षात, ज्येष्ठ महिन्यात, กาเฬ นวมิยํ ทิวา, มชฺฌนฺหิเก นิฏฺฐํ คตา. कृष्ण पक्षाच्या नवमीला, दुपारी ही समाप्त झाली. อนุทีปนี นิฏฺฐิตา. अनुदीपनी समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
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| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |