| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ त्या भगवंताला, अर्हंताला, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော अभिधम्मत्थसंग्रह ဂန္ထာရမ္ဘကထာ ग्रंथारंभकथा ၁. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓမတုလံ[Pg.1], သသဒ္ဓမ္မဂဏုတ္တမံ. १. अतुलनीय सम्यक्संबुद्धाला, सद्धम्माला आणि उत्तम (भिक्खू) संघाला, အဘိဝါဒိယ ဘာသိဿံ, အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟံ. अभिवादन करून, मी 'अभिधम्मत्थसंग्रह' सांगतो. စတုပရမတ္ထဓမ္မော चार परमार्थ धर्म ၂. တတ္ထ ဝုတ္တာဘိဓမ္မတ္ထာ, စတုဓာ ပရမတ္ထတော. २. त्यात (या ग्रंथात) सांगितलेले अभिधम्माचे विषय, परमार्थ दृष्टीने चार प्रकारचे आहेत. စိတ္တံ စေတသိကံ ရူပံ, နိဗ္ဗာနမိတိ သဗ္ဗထာ. चित्त, चेतसिक, रूप आणि निर्वाण - हे सर्व प्रकारे (चार परमार्थ धर्म आहेत). ၁. စိတ္တပရိစ္ဆေဒေါ १. चित्त-परिच्छेद ဘူမိဘေဒစိတ္တံ भूमीनुसार चित्ताचे भेद ၃. တတ္ထ စိတ္တံ တာဝ စတုဗ္ဗိဓံ ဟောတိ ကာမာဝစရံ ရူပါဝစရံ အရူပါဝစရံ လောကုတ္တရဉ္စေတိ. ३. त्यात चित्त प्रथम चार प्रकारचे असते: कामावचर, रूपावचर, अरूपावचर आणि लोकोत्तर. အကုသလစိတ္တံ अकुशल चित्त ၄. တတ္ထ ကတမံ ကာမာဝစရံ? သောမနဿသဟဂတံ ဒိဋ္ဌိဂတသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, သောမနဿသဟဂတံ ဒိဋ္ဌိဂတဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ[Pg.2], ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဒိဋ္ဌိဂတသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဒိဋ္ဌိဂတဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကန္တိ ဣမာနိ အဋ္ဌပိ လောဘသဟဂတစိတ္တာနိ နာမ. ४. त्यात कामावचर कोणते? (१) सोमनस्य-सहगत (आनंदाने युक्त), दिठ्ठिगत-संपयुत्त (मिथ्या दृष्टीने युक्त), असंखारिक (प्रेरणेशिवाय उत्पन्न होणारे) एक; (२) ससंखारिक (प्रेरणेने उत्पन्न होणारे) एक; (३) सोमनस्य-सहगत, दिठ्ठिगत-विप्पयुत्त (मिथ्या दृष्टीरहित), असंखारिक एक; (४) ससंखारिक एक; (५) उपेक्खा-सहगत (तटस्थतेने युक्त), दिठ्ठिगत-संपयुत्त, असंखारिक एक; (६) ससंखारिक एक; (७) उपेक्खा-सहगत, दिठ्ठिगत-विप्पयुत्त, असंखारिक एक; (८) ससंखारिक एक. याप्रमाणे हे आठ 'लोभ-सहगत' (लोभमूळ) चित्त आहेत. ၅. ဒေါမနဿသဟဂတံ ပဋိဃသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကန္တိ ဣမာနိ ဒွေပိ ပဋိဃသမ္ပယုတ္တစိတ္တာနိ နာမ. ५. (९) दोमनस्य-सहगत (दुःखाने युक्त), पटिघ-संपयुत्त (द्वेषाने युक्त), असंखारिक एक; (१०) ससंखारिक एक. याप्रमाणे हे दोन्ही 'पटिघ-संपयुत्त' (द्वेषमूळ) चित्त आहेत. ၆. ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဝိစိကိစ္ဆာသမ္ပယုတ္တမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဥဒ္ဓစ္စသမ္ပယုတ္တမေကန္တိ ဣမာနိ ဒွေပိ မောမူဟစိတ္တာနိ နာမ. ६. (११) उपेक्खा-सहगत, विचिकिच्छा-संपयुत्त (शंकेने युक्त) एक; (१२) उपेक्खा-सहगत, उद्धच्च-संपयुत्त (उद्धतपणाने/अस्वस्थतेने युक्त) एक. याप्रमाणे हे दोन्ही 'मोमूह' (मोहमूळ) चित्त आहेत. ၇. ဣစ္စေဝံ သဗ္ဗထာပိ ဒွါဒသာကုသလစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ. ७. अशा प्रकारे, सर्व मिळून बारा अकुशल चित्त समाप्त झाले. ၈. အဋ္ဌဓာ လောဘမူလာနိ, ဒေါသမူလာနိ စ ဒွိဓာ. ८. लोभमूळ आठ प्रकारचे, द्वेषमूळ दोन प्रकारचे, မောဟမူလာနိ စ ဒွေတိ, ဒွါဒသာကုသလာ သိယုံ. आणि मोहमूळ दोन प्रकारचे; असे (एकूण) बारा अकुशल चित्त होतात. အဟေတုကစိတ္တံ अहेतुक चित्त ၉. ဥပေက္ခာသဟဂတံ စက္ခုဝိညာဏံ, တထာ သောတဝိညာဏံ, ဃာနဝိညာဏံ, ဇိဝှာဝိညာဏံ, ဒုက္ခသဟဂတံ ကာယဝိညာဏံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ သမ္ပဋိစ္ဆနစိတ္တံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ သန္တီရဏစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ သတ္တပိ အကုသလဝိပါကစိတ္တာနိ နာမ. ९. उपेक्खा-सहगत चक्षु-विज्ञाण (डोळ्यांचे ज्ञान), तसेच सोत-विज्ञाण (कानांचे ज्ञान), घाण-विज्ञाण (नाकाचे ज्ञान), जिव्हा-विज्ञाण (जिभेचे ज्ञान), दुःख-सहगत काय-विज्ञाण (शरीराचे ज्ञान), उपेक्खा-सहगत संपटिच्छन-चित्त (स्वीकार करणारे चित्त), आणि उपेक्खा-सहगत संतीरण-चित्त (तपासणी करणारे चित्त) - हे सात 'अकुशल-विपाक' (अकुशल कर्माचे परिणाम) चित्त आहेत. ၁၀. ဥပေက္ခာသဟဂတံ ကုသလဝိပါကံ စက္ခုဝိညာဏံ, တထာ သောတဝိညာဏံ, ဃာနဝိညာဏံ, ဇိဝှာဝိညာဏံ, သုခသဟဂတံ ကာယဝိညာဏံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ သမ္ပဋိစ္ဆနစိတ္တံ, သောမနဿသဟဂတံ သန္တီရဏစိတ္တံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ သန္တီရဏစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ အဋ္ဌပိ ကုသလဝိပါကာဟေတုကစိတ္တာနိ နာမ. १०. उपेक्खा-सहगत कुशल-विपाक चक्षु-विज्ञाण, तसेच सोत-विज्ञाण, घाण-विज्ञाण, जिव्हा-विज्ञाण, सुख-सहगत काय-विज्ञाण, उपेक्खा-सहगत संपटिच्छन-चित्त, सोमनस्य-सहगत संतीरण-चित्त, आणि उपेक्खा-सहगत संतीरण-चित्त - हे आठ 'कुशल-विपाक अहेतुक' चित्त आहेत. ၁၁. ဥပေက္ခာသဟဂတံ [Pg.3] ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနစိတ္တံ, တထာ မနောဒွါရာဝဇ္ဇနစိတ္တံ, သောမနဿသဟဂတံ ဟသိတုပ္ပာဒစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ တီဏိပိ အဟေတုကကိရိယစိတ္တာနိ နာမ. ११. उपेक्खा-सहगत पंचद्वार-आवर्जन चित्त (पाच इंद्रियांच्या द्वारांकडे वळणारे चित्त), तसेच मनोद्वार-आवर्जन चित्त (मनाच्या द्वाराकडे वळणारे चित्त), आणि सोमनस्य-सहगत हसितुप्पाद चित्त (अर्हंतांच्या हास्याला उत्पन्न करणारे चित्त) - हे तीन 'अहेतुक क्रिया' चित्त आहेत. ၁၂. ဣစ္စေဝ သဗ္ဗထာပိ အဋ္ဌာရသာဟေတုကစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ. १२. अशा प्रकारे, सर्व मिळून अठरा अहेतुक चित्त समाप्त झाले. ၁၃. သတ္တာကုသလပါကာနိ, ပုညပါကာနိ အဋ္ဌဓာ. १३. अकुशल विपाक सात प्रकारचे, पुण्य (कुशल) विपाक आठ प्रकारचे, ကြိယစိတ္တာနိ တီဏီတိ, အဋ္ဌာရသ အဟေတုကာ. आणि क्रिया चित्त तीन प्रकारचे; असे (एकूण) अठरा अहेतुक चित्त आहेत. သောဘနစိတ္တံ शोभन चित्त ၁၄. ပါပါဟေတုကမုတ္တာနိ, သောဘနာနီတိ ဝုစ္စရေ. १४. पाप (अकुशल) आणि अहेतुक चित्तांव्यतिरिक्त इतर चित्तांना 'शोभन' (सुंदर) चित्त म्हटले जाते. ဧကူနသဋ္ဌိ စိတ္တာနိ, အထေကနဝုတီပိ ဝါ. हे (शोभन चित्त) एकोणसाठ किंवा एक्याण्णव प्रकारचे असतात. ကာမာဝစရသောဘနစိတ္တံ कामावचर शोभन चित्त ၁၅. သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ. ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကန္တိ ဣမာနိ အဋ္ဌပိ ကာမာဝစရကုသလစိတ္တာနိ နာမ. १५. (१) सोमनस्य-सहगत, ज्ञान-संपयुत्त (ज्ञानाने युक्त), असंखारिक एक; (२) ससंखारिक एक; (३) सोमनस्य-सहगत, ज्ञान-विप्पयुत्त (ज्ञानरहित), असंखारिक एक; (४) ससंखारिक एक; (५) उपेक्खा-सहगत, ज्ञान-संपयुत्त, असंखारिक एक; (६) ससंखारिक एक; (७) उपेक्खा-सहगत, ज्ञान-विप्पयुत्त, असंखारिक एक; (८) ससंखारिक एक. याप्रमाणे हे आठ 'कामावचर कुशल' चित्त आहेत. ၁၆. သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကန္တိ ဣမာနိ အဋ္ဌပိ သဟေတုကကာမာဝစရဝိပါကစိတ္တာနိ နာမ. १६. (१) सोमनस्य-सहगत, ज्ञान-संपयुत्त, असंखारिक एक; (२) ससंखारिक एक; (३) सोमनस्य-सहगत, ज्ञान-विप्पयुत्त, असंखारिक एक; (४) ससंखारिक एक; (५) उपेक्खा-सहगत, ज्ञान-संपयुत्त, असंखारिक एक; (६) ससंखारिक एक; (७) उपेक्खा-सहगत, ज्ञान-विप्पयुत्त, असंखारिक एक; (८) ससंखारिक एक. याप्रमाणे हे आठ 'सहेतुक कामावचर विपाक' चित्त आहेत. ၁၇. သောမဿသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ[Pg.4], သသင်္ခါရိကမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကံ, ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကမေကံ, သသင်္ခါရိကမေကန္တိ ဣမာနိ အဋ္ဌပိ သဟေတုကကာမာဝစရကိရိယစိတ္တာနိ နာမ. १७. (१) सोमनस्य-सहगत, ज्ञान-संपयुत्त, असंखारिक एक; (२) ससंखारिक एक; (३) सोमनस्य-सहगत, ज्ञान-विप्पयुत्त, असंखारिक एक; (४) ससंखारिक एक; (५) उपेक्खा-सहगत, ज्ञान-संपयुत्त, असंखारिक एक; (६) ससंखारिक एक; (७) उपेक्खा-सहगत, ज्ञान-विप्पयुत्त, असंखारिक एक; (८) ससंखारिक एक. याप्रमाणे हे आठ 'सहेतुक कामावचर क्रिया' चित्त आहेत. ၁၈. ဣစ္စေဝံ သဗ္ဗထာပိ စတုဝီသတိ သဟေတုကကာမာဝစရကုသလဝိပါကကိရိယစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ. १८. अशा प्रकारे, सर्व मिळून चोवीस सहेतुक कामावचर कुशल, विपाक आणि क्रिया चित्त समाप्त झाले. ၁၉. ဝေဒနာဉာဏသင်္ခါရဘေဒေန စတုဝီသတိ. १९. वेदना, ज्ञान आणि संस्कार यांच्या भेदाने चोवीस प्रकार होतात. သဟေတုကာမာဝစရပုညပါကကြိယာ မတာ. हे सहेतुक कामावचर पुण्य (कुशल), विपाक आणि क्रिया चित्त मानले जातात. ၂၀. ကာမေ တေဝီသ ပါကာနိ, ပုညာပုညာနိ ဝီသတိ. २०. कामलोकात तेवीस विपाक चित्त, आणि वीस पुण्य-अपुण्य (कुशल-अकुशल) चित्त असतात. ဧကာဒသ ကြိယာ စေတိ, စတုပညာသ သဗ္ဗထာ. आणि अकरा क्रिया चित्त असतात; अशा प्रकारे सर्व मिळून चौपन्न (५४) चित्त होतात. ရူပါဝစရစိတ္တံ रूपावचर चित्त ၂၁. ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဌမဇ္ဈာနကုသလစိတ္တံ, ဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ဒုတိယဇ္ဈာနကုသလစိတ္တံ, ပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ တတိယဇ္ဈာနကုသလစိတ္တံ, သုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ စတုတ္ထဇ္ဈာနကုသလစိတ္တံ, ဥပေက္ခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဉ္စမဇ္ဈာနကုသလစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ ပဉ္စပိ ရူပါဝစရကုသလစိတ္တာနိ နာမ. २१. (१) वितर्क, विचार, प्रीती, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त प्रथम ध्यान कुशल चित्त; (२) विचार, प्रीती, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त द्वितीय ध्यान कुशल चित्त; (३) प्रीती, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त तृतीय ध्यान कुशल चित्त; (४) सुख आणि एकाग्रतेने युक्त चतुर्थ ध्यान कुशल चित्त; (५) उपेक्षा आणि एकाग्रतेने युक्त पंचम ध्यान कुशल चित्त - याप्रमाणे हे पाच 'रूपावचर कुशल' चित्त आहेत. ၂၂. ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဌမဇ္ဈာနဝိပါကစိတ္တံ, ဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ဒုတိယဇ္ဈာနဝိပါကစိတ္တံ, ပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ တတိယဇ္ဈာနဝိပါကစိတ္တံ, သုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ စတုတ္ထဇ္ဈာနဝိပါကစိတ္တံ, ဥပေက္ခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဉ္စမဇ္ဈာနဝိပါကစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ ပဉ္စပိ ရူပါဝစရဝိပါကစိတ္တာနိ နာမ. २२. (१) वितर्क, विचार, प्रीती, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त प्रथम ध्यान विपाक चित्त; (२) विचार, प्रीती, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त द्वितीय ध्यान विपाक चित्त; (३) प्रीती, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त तृतीय ध्यान विपाक चित्त; (४) सुख आणि एकाग्रतेने युक्त चतुर्थ ध्यान विपाक चित्त; (५) उपेक्षा आणि एकाग्रतेने युक्त पंचम ध्यान विपाक चित्त - याप्रमाणे हे पाच 'रूपावचर विपाक' चित्त आहेत. ၂၃. ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဌမဇ္ဈာနကိရိယစိတ္တံ, ဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ဒုတိယဇ္ဈာနကိရိယစိတ္တံ, ပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ တတိယဇ္ဈာနကိရိယစိတ္တံ[Pg.5], သုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ စတုတ္ထဇ္ဈာနကိရိယစိတ္တံ, ဥပေက္ခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဉ္စမဇ္ဈာနကိရိယစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ ပဉ္စပိ ရူပါဝစရကိရိယစိတ္တာနိ နာမ. २३. वितर्क, विचार, पीति, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले प्रथम ध्यान क्रियाचित्त; विचार, पीति, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले द्वितीय ध्यान क्रियाचित्त; पीति, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले तृतीय ध्यान क्रियाचित्त; सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले चतुर्थ ध्यान क्रियाचित्त; आणि उपेक्षा व एकाग्रतेने युक्त असलेले पंचम ध्यान क्रियाचित्त; या पाच चित्तांना 'रूपावचर क्रियाचित्ते' असे म्हणतात. ၂၄. ဣစ္စေဝံ သဗ္ဗထာပိ ပန္နရသ ရူပါဝစရကုသလဝိပါကကိရိယစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ. २४. अशा प्रकारे, सर्व प्रकारे पंधरा रूपावचर कुशल, विपाक आणि क्रियाचित्ते पूर्ण झाली. ၂၅. ပဉ္စဓာ ဈာနဘေဒေန, ရူပါဝစရမာနသံ. २५. ध्यानाच्या पाच प्रकारच्या भेदाने रूपावचर चित्त (पाच प्रकारचे होते). ပုညပါကကြိယာဘေဒါ, တံ ပဉ္စဒသဓာ ဘဝေ. पुण्य (कुशल), विपाक आणि क्रिया यांच्या भेदाने ते (चित्त) पंधरा प्रकारचे होते. အရူပါဝစရစိတ္တံ अरूपावचर चित्त ၂၆. အာကာသာနဉ္စာယတနကုသလစိတ္တံ, ဝိညာဏဉ္စာယတနကုသလစိတ္တံ, အာကိဉ္စညာယတနကုသလစိတ္တံ, နေဝသညာနာသညာယတနကုသလစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ စတ္တာရိပိ အရူပါဝစရကုသလစိတ္တာနိ နာမ. २६. आकासानञ्चायतन कुशलचित्त, विञ्ञाणञ्चायतन कुशलचित्त, आकिञ्चञ्ञायतन कुशलचित्त आणि नेवसञ्ञानासञ्ञायतन कुशलचित्त; या चार चित्तांना 'अरूपावचर कुशलचित्ते' असे म्हणतात. ၂၇. အာကာသာနဉ္စာယတနဝိပါကစိတ္တံ, ဝိညာဏဉ္စာယတနဝိပါကစိတ္တံ, အာကိဉ္စညာယတနဝိပါကစိတ္တံ, နေဝသညာနာသညာယတနဝိပါကစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ စတ္တာရိပိ အရူပါဝစရဝိပါကစိတ္တာနိ နာမ. २७. आकासानञ्चायतन विपाकचित्त, विञ्ञाणञ्चायतन विपाकचित्त, आकिञ्चञ्ञायतन विपाकचित्त आणि नेवसञ्ञानासञ्ञायतन विपाकचित्त; या चार चित्तांना 'अरूपावचर विपाकचित्ते' असे म्हणतात. ၂၈. အာကာသာနဉ္စာယတနကိရိယစိတ္တံ, ဝိညာဏဉ္စာယတနကိရိယစိတ္တံ, အာကိဉ္စညာယတနကိရိယစိတ္တံ, နေဝသညာနာသညာယတနကိရိယစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ စတ္တာရိပိ အရူပါဝစရကိရိယစိတ္တာနိ နာမ. २८. आकासानञ्चायतन क्रियाचित्त, विञ्ञाणञ्चायतन क्रियाचित्त, आकिञ्चञ्ञायतन क्रियाचित्त आणि नेवसञ्ञानासञ्ञायतन क्रियाचित्त; या चार चित्तांना 'अरूपावचर क्रियाचित्ते' असे म्हणतात. ၂၉. ဣစ္စေဝံ သဗ္ဗထာပိ ဒွါဒသ အရူပါဝစရကုသလဝိပါကကိရိယစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ. २९. अशा प्रकारे, सर्व प्रकारे बारा अरूपावचर कुशल, विपाक आणि क्रियाचित्ते पूर्ण झाली. ၃၀. အာလမ္ဗဏပ္ပဘေဒေန, စတုဓာရုပ္ပမာနသံ. ३०. आलंबनाच्या भेदाने अरूपावचर चित्त चार प्रकारचे होते. ပုညပါကကြိယာဘေဒါ, ပုန ဒွါဒသဓာ ဌိတံ. पुन्हा पुण्य (कुशल), विपाक आणि क्रिया यांच्या भेदाने ते बारा प्रकारचे होते. လောကုတ္တရစိတ္တံ लोकोत्तर चित्त ၃၁. သောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ[Pg.6], သကဒါဂါမိမဂ္ဂစိတ္တံ, အနာဂါမိမဂ္ဂစိတ္တံ, အရဟတ္တမဂ္ဂစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ စတ္တာရိပိ လောကုတ္တရကုသလစိတ္တာနိ နာမ. ३१. सोतापत्तिमार्गचित्त, सकदागामिमार्गचित्त, अनागामिमार्गचित्त आणि अरहत्तमार्गचित्त; या चार चित्तांना 'लोकोत्तर कुशलचित्ते' असे म्हणतात. ၃၂. သောတာပတ္တိဖလစိတ္တံ, သကဒါဂါမိဖလစိတ္တံ, အနာဂါမိဖလစိတ္တံ, အရဟတ္တဖလစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ စတ္တာရိပိ လောကုတ္တရဝိပါကစိတ္တာနိ နာမ. ३२. सोतापत्तिफलचित्त, सकदागामिफलचित्त, अनागामिफलचित्त आणि अरहत्तफलचित्त; या चार चित्तांना 'लोकोत्तर विपाकचित्ते' असे म्हणतात. ၃၃. ဣစ္စေဝံ သဗ္ဗထာပိ အဋ္ဌ လောကုတ္တရကုသလဝိပါကစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ. ३३. अशा प्रकारे, सर्व प्रकारे आठ लोकोत्तर कुशल आणि विपाक चित्ते पूर्ण झाली. ၃၄. စတုမဂ္ဂပ္ပဘေဒေန, စတုဓာ ကုသလံ တထာ. ३४. चार मार्गांच्या भेदाने कुशल चित्त चार प्रकारचे होते. ပါကံ တဿ ဖလတ္တာတိ, အဋ္ဌဓာနုတ္တရံ မတံ. त्याचे फल असल्यामुळे विपाक चित्तही (चार प्रकारचे होते), अशा प्रकारे लोकोत्तर (अनुत्तर) चित्त आठ प्रकारचे मानले गेले आहे. စိတ္တဂဏနသင်္ဂဟော चित्तगणनासंग्रह ၃၅. ဒွါဒသာကုသလာနေဝံ, ကုသလာနေကဝီသတိ. ३५. अशा प्रकारे अकुशल चित्ते बारा, कुशल चित्ते एकवीस, ဆတ္တိံသေဝ ဝိပါကာနိ, ကြိယစိတ္တာနိ ဝီသတိ. विपाक चित्ते छत्तीस आणि क्रियाचित्ते वीस आहेत. ၃၆. စတုပညာသဓာ ကာမေ, ရူပေ ပန္နရသီရယေ. ३६. कामावचर भूमीत चौपन्न (५४) आणि रूपावचर भूमीत पंधरा (१५) चित्ते सांगितले आहेत. စိတ္တာနိ ဒွါဒသာရုပ္ပေ, အဋ္ဌဓာနုတ္တရေ တထာ. अरूपावचर भूमीत बारा (१२) आणि लोकोत्तर भूमीत आठ (८) चित्ते आहेत. ၃၇. ဣတ္ထမေကူနနဝုတိပဘေဒံ ပန မာနသံ. ३७. अशा प्रकारे चित्त एकूण एकोणनव्वद (८९) प्रकारचे होते. ဧကဝီသသတံ ဝါထ, ဝိဘဇန္တိ ဝိစက္ခဏာ. किंवा विद्वान लोक त्याचे एकशे एकवीस (१२१) प्रकारांत विभाजन करतात. ဝိတ္ထာရဂဏနာ विस्तृत गणना ၃၈. ကထမေကူနနဝုတိဝိဓံ စိတ္တံ ဧကဝီသသတံ ဟောတိ? ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဌမဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ, ဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ဒုတိယဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ, ပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ တတိယဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ, သုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ စတုတ္ထဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ, ဥပေက္ခေကဂ္ဂတာသဟိတံ ပဉ္စမဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တဉ္စေတိ ဣမာနိ ပဉ္စပိ သောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တာနိ နာမ. ३८. एकोननव्वद (८९) प्रकारचे चित्त एकशे एकवीस (१२१) प्रकारचे कसे होते? वितर्क, विचार, पीति, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले प्रथम ध्यान सोतापत्तिमार्गचित्त; विचार, पीति, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले द्वितीय ध्यान सोतापत्तिमार्गचित्त; पीति, सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले तृतीय ध्यान सोतापत्तिमार्गचित्त; सुख आणि एकाग्रतेने युक्त असलेले चतुर्थ ध्यान सोतापत्तिमार्गचित्त; आणि उपेक्षा व एकाग्रतेने युक्त असलेले पंचम ध्यान सोतापत्तिमार्गचित्त; या पाच चित्तांना 'सोतापत्तिमार्गचित्ते' असे म्हणतात. ၃၉. တထာ [Pg.7] သကဒါဂါမိမဂ္ဂအနာဂါမိမဂ္ဂအရဟတ္တမဂ္ဂစိတ္တဉ္စေတိ သမဝီသတိ မဂ္ဂစိတ္တာနိ. ३९. त्याचप्रमाणे सकदागामिमार्गचित्त, अनागामिमार्गचित्त आणि अरहत्तमार्गचित्त (यांचेही प्रत्येकी पाच प्रकार मिळून) एकूण वीस मार्गचित्ते होतात. ၄၀. တထာ ဖလစိတ္တာနိ စေတိ သမစတ္တာလီသ လောကုတ္တရစိတ္တာနိ ဘဝန္တီတိ. ४०. त्याचप्रमाणे फलचित्तेही (वीस होतात), अशा प्रकारे एकूण चाळीस लोकोत्तर चित्ते होतात. ၄၁. ဈာနင်္ဂယောဂဘေဒေန, ကတွေကေကန္တု ပဉ္စဓာ. ४१. ध्यान-अंगांच्या योगाच्या भेदाने प्रत्येक (लोकोत्तर चित्ताला) पाच प्रकारचे करून, ဝုစ္စတာနုတ္တရံ စိတ္တံ, စတ္တာလီသဝိဓန္တိ စ. लोकोत्तर (अनुत्तर) चित्त चाळीस प्रकारचे सांगितले जाते. ၄၂. ယထာ စ ရူပါဝစရံ, ဂယှတာနုတ္တရံ တထာ. ४२. ज्याप्रमाणे रूपावचर चित्त (पाच ध्यानांच्या भेदाने घेतले जाते), त्याचप्रमाणे लोकोत्तर चित्तही घेतले जाते. ပဌမာဒိဈာနဘေဒေ, အာရုပ္ပဉ္စာပိ ပဉ္စမေ. प्रथमादी ध्यानांच्या भेदाने आणि अरूप ध्यानही पाचव्या ध्यानात समाविष्ट होते. ဧကာဒသဝိဓံ တသ္မာ, ပဌမာဒိကမီရိတံ; ဈာနမေကေကမန္တေ တု, တေဝီသတိဝိဓံ ဘဝေ. म्हणून प्रथमादी (पहिले चार) ध्यान प्रत्येकी अकरा प्रकारचे सांगितले आहे; परंतु शेवटचे (पाचवे) ध्यान तेवीस प्रकारचे होते. ၄၃. သတ္တတိံသဝိဓံ ပုညံ, ဒွိပညာသဝိဓံ တထာ. ४३. पुण्य (कुशल) चित्त सदतीस (३७) प्रकारचे आणि त्याचप्रमाणे विपाक चित्त बावन्न (५२) प्रकारचे होते, ပါကမိစ္စာဟု စိတ္တာနိ, ဧကဝီသသတံ ဗုဓာ. असे विद्वान म्हणतात; अशा प्रकारे एकूण एकशे एकवीस (१२१) चित्ते होतात. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ စိတ္တသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंग्रहातील 'चित्तसंग्रह विभाग' नावाचा ပဌမော ပရိစ္ဆေဒေါ. पहिला परिच्छेद समाप्त. ၂. စေတသိကပရိစ္ဆေဒေါ २. चेतसिक परिच्छेद သမ္ပယောဂလက္ခဏံ संप्रयोग लक्षण ၁. ဧကုပ္ပာဒနိရောဓာ စ, ဧကာလမ္ဗဏဝတ္ထုကာ. १. एकाच वेळी उत्पन्न होणारे व एकाच वेळी निरुद्ध होणारे, आणि एकाच आलंबन (विषय) व एकाच वस्तू (आश्रय) असणारे (ते चेतसिक होय). စေတောယုတ္တာ ဒွိပညာသ, ဓမ္မာ စေတသိကာ မတာ. चित्ताशी संप्रयुक्त असणारे बावन्न धर्म 'चेतसिक' मानले जातात. အညသမာနစေတသိကံ अन्यसमान चेतसिक ၂. ကထံ? ဖဿော ဝေဒနာ သညာ စေတနာ ဧကဂ္ဂတာ ဇီဝိတိန္ဒြိယံ မနသိကာရော စေတိ သတ္တိမေ စေတသိကာ သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏာ နာမ. २. कसे? फस्स (स्पर्श), वेदना, सञ्ञा (संज्ञा), चेतना, एकग्गता (एकाग्रता), जीवितिन्द्रिय आणि मनसिकार (मनस्कार) - हे सात चेतसिक 'सब्बचित्तसाधारण' (सर्वचित्तसाधारण) म्हणून ओळखले जातात. ၃. ဝိတက္ကော [Pg.8] ဝိစာရော အဓိမောက္ခော ဝီရိယံ ပီတိ ဆန္ဒော စာတိ ဆ ဣမေ စေတသိကာ ပကိဏ္ဏကာ နာမ. ३. वितक्क (वितर्क), विचार, अधिमोक्ख (अधिमोक्ष), वीरिय (वीर्य), पीति (प्रीती) आणि छन्द (छंद) - हे सहा चेतसिक 'पकिण्णक' (प्रकीर्णक) म्हणून ओळखले जातात. ၄. ဧဝမေတေ တေရသ စေတသိကာ အညသမာနာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ४. अशा प्रकारे, हे तेरा चेतसिक 'अन्यसमान' आहेत असे जाणावे. အကုသလစေတသိကံ अकुशल चेतसिक ၅. မောဟော အဟိရိကံ အနောတ္တပ္ပံ ဥဒ္ဓစ္စံ လောဘော ဒိဋ္ဌိ မာနော ဒေါသော ဣဿာ မစ္ဆရိယံ ကုက္ကုစ္စံ ထိနံ မိဒ္ဓံ ဝိစိကိစ္ဆာ စေတိ စုဒ္ဒသိမေ စေတသိကာ အကုသလာ နာမ. ५. मोह, अहिरिक (निर्लज्जपणा), अनोत्तप्प (भयशून्यता), उद्धच्च (औद्धत्य), लोभ, दिट्ठि (मिथ्यादृष्टी), मान, दोस (द्वेष), इस्सा (ईर्ष्या), मच्छरिय (मत्सर), कुक्कुच्च (कुकृत्य-पश्चात्ताप), थिन (स्त्यान), मिद्ध (ग्लानी) आणि विचिकिच्छा (संशय) - हे चौदा चेतसिक 'अकुशल' म्हणून ओळखले जातात. သောဘနစေတသိကံ शोभन चेतसिक ၆. သဒ္ဓါ သတိ ဟိရီ ဩတ္တပ္ပံ အလောဘော အဒေါသော တတြမဇ္ဈတ္တတာ ကာယပဿဒ္ဓိ စိတ္တပဿဒ္ဓိ ကာယလဟုတာ စိတ္တလဟုတာ ကာယမုဒုတာ စိတ္တမုဒုတာ ကာယကမ္မညတာ စိတ္တကမ္မညတာ ကာယပါဂုညတာ စိတ္တပါဂုညတာ ကာယုဇုကတာ စိတ္တုဇုကတာ စေတိ ဧကူနဝီသတိမေ စေတသိကာ သောဘနသာဓာရဏာ နာမ. ६. सद्धा (श्रद्धा), सति (स्मृती), हिरी (लाज), ओत्तप्प (भय), अलोभ, अदोस (अद्वेष), तत्रमज्झत्तता (तटस्थता), कायपस्सद्धि (काय-प्रश्रब्धी), चित्तपस्सद्धि (चित्त-प्रश्रब्धी), कायलहुता (काय-लघुता), चित्तलहुता (चित्त-लघुता), कायमुदुता (काय-मृदुता), चित्तमुदुता (चित्त-मृदुता), कायकम्मञ्ञता (काय-कर्मण्यता), चित्तकम्मञ्ञता (चित्त-कर्मण्यता), कायpaगुञ्ञता (काय-प्रवीणता), चित्तपागुञ्ञता (चित्त-प्रवीणता), कायउजुकता (काय-ऋजुता) आणि चित्तउजुकता (चित्त-ऋजुता) - हे एकोणीस चेतसिक 'शोभनसाधारण' म्हणून ओळखले जातात. ၇. သမ္မာဝါစာ သမ္မာကမ္မန္တော သမ္မာအာဇီဝေါ စေတိ တိဿော ဝိရတိယော နာမ. ७. सम्मावाचा (सम्यक् वाचा), सम्माकम्मन्त (सम्यक् कर्मान्त) आणि सम्माआजीव (सम्यक् आजीव) - या तिन्हींना 'विरती' म्हणतात. ၈. ကရုဏာ မုဒိတာ အပ္ပမညာယော နာမာတိ သဗ္ဗထာပိ ပညိန္ဒြိယေန သဒ္ဓိံ ပဉ္စဝီသတိမေ စေတသိကာ သောဘနာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ८. करुणा आणि मुदिता यांना 'अप्पमञ्ञा' (अप्रमाण) म्हणतात. अशा प्रकारे, पञ्ञिन्द्रिय (प्रज्ञेंद्रिय) याच्यासह हे सर्व पंचवीस चेतसिक 'शोभन' आहेत असे जाणावे. ၉. ဧတ္တာဝတာ စ – ९. आणि येथपर्यंत - တေရသညသမာနာ စ, စုဒ္ဒသာကုသလာ တထာ; သောဘနာ ပဉ္စဝီသာတိ, ဒွိပညာသ ပဝုစ္စရေ. तेरा अन्यसमान, तसेच चौदा अकुशल आणि पंचवीस शोभन; असे एकूण बावन्न चेतसिक सांगितले जातात. သမ္ပယောဂနယော संप्रयोगनय ၁၀. တေသံ [Pg.9] စိတ္တာဝိယုတ္တာနံ, ယထာယောဂမိတော ပရံ. १०. चित्तापासून विलग न होणाऱ्या त्या चेतसिकांचा, यापुढे योग्यतेनुसार... စိတ္တုပ္ပာဒေသု ပစ္စေကံ, သမ္ပယောဂေါ ပဝုစ္စတိ. ...प्रत्येक चित्तोत्पादामध्ये होणारा संप्रयोग (संयोग) सांगितला जात आहे. ၁၁. သတ္တ သဗ္ဗတ္ထ ယုဇ္ဇန္တိ, ယထာယောဂံ ပကိဏ္ဏကာ. ११. सात (सब्बचित्तसाधारण चेतसिक) सर्व चित्तांमध्ये युक्त होतात, आणि प्रकीर्णक चेतसिक योग्यतेनुसार युक्त होतात. စုဒ္ဒသာကုသလေသွေဝ, သောဘနေသွေဝ သောဘနာ. चौदा (अकुशल चेतसिक) केवळ अकुशल चित्तांमध्येच आणि शोभन चेतसिक केवळ शोभन चित्तांमध्येच युक्त होतात. အညသမာနစေတသိကသမ္ပယောဂနယော अन्यसमान चेतसिक संप्रयोगनय ၁၂. ကထံ? သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏာ တာဝ သတ္တိမေ စေတသိကာ သဗ္ဗေသုပိ ဧကူနနဝုတိစိတ္တုပ္ပာဒေသု လဗ္ဘန္တိ. १२. कसे? सर्वप्रथम, सर्वचित्तसाधारण असणारे हे सात चेतसिक सर्व एकोणनव्वद (८९) चित्तोत्पादांमध्ये आढळतात. ၁၃. ပကိဏ္ဏကေသု ပန ဝိတက္ကော တာဝ ဒွိပဉ္စဝိညာဏဝဇ္ဇိတကာမာဝစရစိတ္တေသု စေဝ ဧကာဒသသု ပဌမဇ္ဈာနစိတ္တေသု စေတိ ပဉ္စပညာသစိတ္တေသု ဥပ္ပဇ္ဇတိ. १३. प्रकीर्णक चेतसिकांमध्ये, सर्वप्रथम 'वितक्क' (वितर्क) हा द्विपंचविज्ञान वगळून उरलेल्या कामावचर चित्तांमध्ये आणि अकरा प्रथमध्यान चित्तांमध्ये, अशा एकूण पंचावन्न (५५) चित्तांमध्ये उत्पन्न होतो. ၁၄. ဝိစာရော ပန တေသု စေဝ ဧကာဒသသု ဒုတိယဇ္ဈာနစိတ္တေသု စာတိ ဆသဋ္ဌိစိတ္တေသု. १४. 'विचार' हा त्या (पंचावन्न) चित्तांमध्ये आणि अकरा द्वितीयध्यान चित्तांमध्ये, अशा एकूण सहासष्ट (६६) चित्तांमध्ये उत्पन्न होतो. ၁၅. အဓိမောက္ခော ဒွိပဉ္စဝိညာဏဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတဝဇ္ဇိတစိတ္တေသု. १५. 'अधिमोक्ख' (अधिमोक्ष) हा द्विपंचविज्ञान आणि विचिकित्सा-सहगत (संशयाने युक्त) चित्त वगळून इतर सर्व चित्तांमध्ये उत्पन्न होतो. ၁၆. ဝီရိယံ ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနဒွိပဉ္စဝိညာဏသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝဇ္ဇိတစိတ္တေသု. १६. 'वीरिय' (वीर्य) हा पंचद्वारावर्जन, द्विपंचविज्ञान, संपटिच्छन (स्वीकृती) आणि संतीरण (तपासणी) चित्त वगळून इतर सर्व चित्तांमध्ये उत्पन्न होतो. ၁၇. ပီတိ ဒေါမနဿုပေက္ခာသဟဂတကာယဝိညာဏစတုတ္ထဇ္ဈာနဝဇ္ဇိတစိတ္တေသု. १७. 'पीति' (प्रीती) ही दोमनस्स (दौर्मनस्य), उपेक्खा (उपेक्षा) सहगत चित्त, कायविज्ञान आणि चतुर्थध्यान चित्त वगळून इतर सर्व चित्तांमध्ये उत्पन्न होते. ၁၈. ဆန္ဒော အဟေတုကမောမူဟဝဇ္ဇိတစိတ္တေသူတိ. १८. 'छन्द' (छंद) हा अहेतुक आणि मोमूह (मोहयुक्त) चित्त वगळून इतर सर्व चित्तांमध्ये उत्पन्न होतो. ၁၉. တေ ပန စိတ္တုပ္ပာဒါ ယထာက္ကမံ – १९. ते चित्तोत्पाद अनुक्रमे याप्रमाणे आहेत - ဆသဋ္ဌိ ပဉ္စပညာသ, ဧကာဒသ စ သောဠသ; သတ္တတိ ဝီသတိ စေဝ, ပကိဏ္ဏကဝိဝဇ္ဇိတာ. सहासष्ट, पंचावन्न, अकरा, सोळा, सत्तर आणि वीस (चित्तोत्पाद) हे अनुक्रमे प्रकीर्णक चेतसिकांशिवाय असतात. ပဉ္စပညာသ [Pg.10] ဆသဋ္ဌိဋ္ဌသတ္တတိ တိသတ္တတိ; ဧကပညာသ စေကူနသတ္တတိ သပကိဏ္ဏကာ. पंचावन्न, सहासष्ट, अठ्ठ्याहत्तर, त्र्याहत्तर, एकावन्न आणि एकोणसत्तर (चित्तोत्पाद) हे प्रकीर्णक चेतसिकांसह असतात. အကုသလစေတသိကသမ္ပယောဂနယော अकुशल चेतसिक संप्रयोगनय ၂၀. အကုသလေသု ပန မောဟော အဟိရိကံ အနောတ္တပ္ပံ ဥဒ္ဓစ္စဉ္စာတိ စတ္တာရောမေ စေတသိကာ သဗ္ဗာကုသလသာဓာရဏာ နာမ, သဗ္ဗေသုပိ ဒွါဒသာ ကုသလေသု လဗ္ဘန္တိ. २०. अकुशल चेतसिकांमध्ये, मोह, अहिरिक, अनोत्तप्प आणि उद्धच्च - हे चार चेतसिक 'सर्वाकुशलसाधारण' म्हणून ओळखले जातात, आणि ते सर्व बारा अकुशल चित्तांमध्ये आढळतात. ၂၁. လောဘော အဋ္ဌသု လောဘသဟဂတစိတ္တေသွေဝ လဗ္ဘတိ. २१. 'लोभ' हा केवळ आठ लोभसहगत चित्तांमध्येच आढळतो. ၂၂. ဒိဋ္ဌိ စတူသု ဒိဋ္ဌိဂတသမ္ပယုတ္တေသု. २२. 'दिट्ठि' (दृष्टी) ही चार दृष्टीगत-संप्रयुक्त चित्तांमध्ये आढळते. ၂၃. မာနော စတူသု ဒိဋ္ဌိဂတဝိပ္ပယုတ္တေသု. २३. 'मान' हा चार दृष्टीगत-विप्रयुक्त चित्तांमध्ये आढळतो. ၂၄. ဒေါသော ဣဿာ မစ္ဆရိယံ ကုက္ကုစ္စဉ္စာတိ ဒွီသု ပဋိဃသမ္ပယုတ္တစိတ္တေသု. २४. दोस (द्वेष), इस्सा (ईर्ष्या), मच्छरिय (मत्सर) आणि कुक्कुच्च (कुकृत्य-पश्चात्ताप) हे दोन प्रतिघ-संप्रयुक्त चित्तांमध्ये आढळतात. ၂၅. ထိနမိဒ္ဓံ ပဉ္စသု သသင်္ခါရိကစိတ္တေသု. २५. थिन (स्त्यान) आणि मिद्ध हे पाच ससंखारिक (ससंस्कारक) चित्तांमध्ये आढळतात. ၂၆. ဝိစိကိစ္ဆာ ဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတစိတ္တေယေဝါတိ. २६. 'विचिकिच्छा' (संशय) ही केवळ विचिकित्सा-सहगत चित्तामध्येच आढळते. ၂၇. သဗ္ဗာပုညေသု စတ္တာရော, २७. सर्व अपुण्य (अकुशल) चित्तांमध्ये चार (चेतसिक) असतात, လောဘမူလေ တယော ဂတာ; ဒေါသမူလေသု စတ္တာရော,သသင်္ခါရေ ဒွယံ တထာ. लोभमूलक चित्तांमध्ये तीन, द्वेषमूलक चित्तांमध्ये चार, आणि तसेच ससंखारिक चित्तांमध्ये दोन (चेतसिक) असतात. ဝိစိကိစ္ဆာ ဝိစိကိစ္ဆာ-စိတ္တေ စာတိ စတုဒ္ဒသ; ဒွါဒသာကုလေသွေဝ, သမ္ပယုဇ္ဇန္တိ ပဉ္စဓာ. आणि विचिकित्सा-सहगत चित्तामध्ये विचिकिच्छा असते; अशा प्रकारे हे चौदा चेतसिक बारा अकुशल चित्तांमध्ये पाच प्रकारे संप्रयुक्त होतात. သောဘနစေတသိကသမ္ပယောဂနယော शोभनचेतसिक संप्रयोगनय ၂၈. သောဘနေသု ပန သောဘနသာဓာရဏာ တာဝ ဧကူနဝီသတိမေ စေတသိကာ သဗ္ဗေသုပိ ဧကူနသဋ္ဌိသောဘနစိတ္တေသု သံဝိဇ္ဇန္တိ. २८. शोभन (चित्त व चेतसिकां) मध्ये, सर्वप्रथम हे एकोणवीस शोभनसाधारण चेतसिक सर्व एकोणसाठ शोभनचित्तांमध्ये आढळतात. ၂၉. ဝိရတိယော [Pg.11] ပန တိဿောပိ လောကုတ္တရစိတ္တေသု သဗ္ဗထာပိ နိယတာ ဧကတောဝ လဗ္ဘန္တိ, လောကိယေသု ပန ကာမာဝစရကုသလေသွေဝ ကဒါစိ သန္ဒိဿန္တိ ဝိသုံ ဝိသုံ. २९. परंतु तीन विरती लोकोत्तर चित्तांमध्ये सर्वथा नियत (निश्चित) आणि एकत्रच प्राप्त होतात; लौकिक कामावचर कुशल चित्तांमध्ये मात्र त्या कधीकधी आणि वेगवेगळ्या (स्वतंत्रपणे) दिसून येतात. ၃၀. အပ္ပမညာယော ပန ဒွါဒသသု ပဉ္စမဇ္ဈာနဝဇ္ဇိတမဟဂ္ဂတစိတ္တေသု စေဝ ကာမာဝစရကုသလေသု စ သဟေတုကကာမာဝစရကိရိယစိတ္တေသု စာတိ အဋ္ဌဝီသတိစိတ္တေသွေဝ ကဒါစိ နာနာ ဟုတွာ ဇာယန္တိ, ဥပေက္ခာသဟဂတေသု ပနေတ္ထ ကရုဏာမုဒိတာ န သန္တီတိ ကေစိ ဝဒန္တိ. ३०. परंतु अप्पमञ्ञा (अप्रमाण चेतसिक) हे पाचवे ध्यान वगळता बारा महग्गत चित्तांमध्ये, कामावचर कुशल चित्तांमध्ये आणि सहेतुक कामावचर क्रियाचित्तांमध्ये - अशा अठ्ठावीस चित्तांमध्येच कधीकधी वेगवेगळ्या प्रकारे उत्पन्न होतात. येथे काही आचार्य असे म्हणतात की, उपेक्षासहगत चित्तांमध्ये करुणा आणि मुदिता नसतात. ၃၁. ပညာ ပန ဒွါဒသသု ဉာဏသမ္ပယုတ္တကာမာဝစရစိတ္တေသု စေဝ သဗ္ဗေသုပိ ပဉ္စတိံသမဟဂ္ဂတလောကုတ္တရစိတ္တေသု စာတိ သတ္တစတ္တာလီသစိတ္တေသု သမ္ပယောဂံ ဂစ္ဆတီတိ. ३१. प्रज्ञा (पञ्ञा) मात्र बारा ज्ञानसंप्रयुक्त कामावचर चित्तांमध्ये आणि सर्व पस्तीस महग्गत व लोकोत्तर चित्तांमध्ये - अशा सत्तेचाळीस चित्तांमध्ये संप्रयुक्त होते. ၃၂. ဧကူနဝီသတိ ဓမ္မာ, ဇာယန္တေကူနသဋ္ဌိသု. ३२. एकोणवीस धर्म (चेतसिक) एकोणसाठ चित्तांमध्ये उत्पन्न होतात. တယော သောဠသစိတ္တေသု, အဋ္ဌဝီသတိယံ ဒွယံ. तीन (विरती) सोळा चित्तांमध्ये आणि दोन (अप्पमञ्ञा) अठ्ठावीस चित्तांमध्ये (उत्पन्न होतात). ပညာ ပကာသိတာ, သတ္တစတ္တာလီသဝိဓေသုပိ; သမ္ပယုတ္တာ စတုဓေဝံ, သောဘနေသွေဝ သောဘနာ. प्रज्ञा सत्तेचाळीस प्रकारच्या चित्तांमध्ये संप्रयुक्त असल्याचे सांगितले आहे. अशा प्रकारे, शोभन चेतसिक केवळ शोभन चित्तांमध्येच चार प्रकारे संप्रयुक्त होतात. ၃၃. ဣဿာမစ္ဆေရကုက္ကုစ္စ-ဝိရတိကရုဏာဒယော. ३३. ईर्ष्या (इस्सा), मात्सर्य (मच्छेर), कुकृत्य (कुकुच्च), विरती आणि करुणा इत्यादी, နာနာ ကဒါစိ မာနော စ, ထိန မိဒ္ဓံ တထာ သဟ. कधीकधी वेगवेगळ्या प्रकारे उत्पन्न होतात; तसेच मान (अभिमान) आणि थिन-मिद्ध (स्त्यान-मिद्ध) एकत्र उत्पन्न होतात. ၃၄. ယထာဝုတ္တာနုသာရေန, သေသာ နိယတယောဂိနော. ३४. पूर्वोक्त नियमांनुसार, उर्वरित चेतसिक हे नियतयोगी (निश्चितपणे संप्रयुक्त होणारे) आहेत. သင်္ဂဟဉ္စ ပဝက္ခာမိ, တေသံ ဒါနိ ယထာရဟံ. आता मी त्यांच्या योग्य अशा संग्रहाचा (संयोजनाचा) निर्देश करेन. သင်္ဂဟနယော संग्रह नय ၃၅. ဆတ္တိံသာနုတ္တရေ ဓမ္မာ, ပဉ္စတိံသ မဟဂ္ဂတေ. ३५. लोकोत्तर (अनुत्तर) चित्तांमध्ये छत्तीस धर्म आणि महग्गत चित्तांमध्ये पस्तीस धर्म प्राप्त होतात. အဋ္ဌတိံသာပိ လဗ္ဘန္တိ, ကာမာဝစရသောဘနေ. कामावचर शोभन चित्तांमध्ये अडतीस धर्म देखील प्राप्त होतात. သတ္တဝီသတိပုညမှိ, ဒွါဒသာဟေတုကေတိ စ; ယထာသမ္ဘဝယောဂေန, ပဉ္စဓာ တတ္ထ သင်္ဂဟော. अकुशल (अपुण्य) चित्तांमध्ये सत्तावीस आणि अहेतुक चित्तांमध्ये बारा धर्म; अशा प्रकारे यथासंभव योगाच्या आधारे तेथे पाच प्रकारचा संग्रह होतो. လောကုတ္တရစိတ္တသင်္ဂဟနယော लोकोत्तरचित्त संग्रह नय ၃၆. ကထံ[Pg.12]? လောကုတ္တရေသု တာဝ အဋ္ဌသု ပဌမဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု အညသမာနာ တေရသ စေတသိကာ, အပ္ပမညာဝဇ္ဇိတာ တေဝီသတိ သောဘနစေတသိကာ စေတိ ဆတ္တိံသ ဓမ္မာ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တိ, တထာ ဒုတိယဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ဝိတက္ကဝဇ္ဇာ, တတိယဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ဝိတက္ကဝိစာရဝဇ္ဇာ, စတုတ္ထဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ဝိတက္ကဝိစာရပီတိဝဇ္ဇာ, ပဉ္စမဇ္ဈာနိကစိတ္တေသုပိ ဥပေက္ခာသဟဂတာ တေ ဧဝ သင်္ဂယှန္တီတိ သဗ္ဗထာပိ အဋ္ဌသု လောကုတ္တရစိတ္တေသု ပဉ္စကဇ္ဈာနဝသေန ပဉ္စဓာဝ သင်္ဂဟော ဟောတီတိ. ३६. कसे? प्रथम, आठ लोकोत्तर प्रथमध्यान चित्तांमध्ये अञ्ञसमान तेरा चेतसिक आणि अप्पमञ्ञा वगळून तेवीस शोभन चेतसिक - असे छत्तीस धर्म संग्रहित होतात. त्याचप्रमाणे, द्वितीयध्यान चित्तांमध्ये वितक्क वगळून; तृतीयध्यान चित्तांमध्ये वितक्क व विचार वगळून; चतुर्थध्यान चित्तांमध्ये वितक्क, विचार व पीति वगळून; आणि पंचमध्यान चित्तांमध्ये उपेक्षासहगत तेच चेतसिक संग्रहित होतात. अशा प्रकारे, सर्व आठ लोकोत्तर चित्तांमध्ये पाच ध्यानांच्या आधारे पाच प्रकारचाच संग्रह होतो. ၃၇. ဆတ္တိံသ ပဉ္စတိံသ စ, စတုတ္တိံသ ယထာက္ကမံ. ३७. अनुक्रमे छत्तीस, पस्तीस आणि चौतीस, တေတ္တိံသဒွယမိစ္စေဝံ, ပဉ္စဓာနုတ္တရေ ဌိတာ. आणि दोन वेळा तेहतीस - अशा प्रकारे लोकोत्तर (अनुत्तर) चित्तांमध्ये पाच प्रकारची स्थिती असते. မဟဂ္ဂတစိတ္တသင်္ဂဟနယော महग्गतचित्त संग्रह नय ၃၈. မဟဂ္ဂတေသု ပန တီသု ပဌမဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု တာဝ အညသမာနာ တေရသ စေတသိကာ, ဝိရတိတ္တယဝဇ္ဇိတာ ဒွါဝီသတိ သောဘနစေတသိကာ စေတိ ပဉ္စတိံသ ဓမ္မာ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တိ, ကရုဏာမုဒိတာ ပနေတ္ထ ပစ္စေကမေဝ ယောဇေတဗ္ဗာ, တထာ ဒုတိယဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ဝိတက္ကဝဇ္ဇာ, တတိယဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ဝိတက္ကဝိစာရဝဇ္ဇာ, စတုတ္ထဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ဝိတက္ကဝိစာရပီတိဝဇ္ဇာ, ပဉ္စမဇ္ဈာနိကစိတ္တေသု ပန ပန္နရသသု အပ္ပမညာယော န လဗ္ဘန္တီတိ သဗ္ဗထာပိ သတ္တဝီသတိမဟဂ္ဂတစိတ္တေသု ပဉ္စကဇ္ဈာနဝသေန ပဉ္စဓာဝ သင်္ဂဟော ဟောတီတိ. ३८. महग्गत चित्तांमध्ये, प्रथम तीन प्रथमध्यान चित्तांमध्ये अञ्ञसमान तेरा चेतसिक आणि तीन विरती वगळून बावीस शोभन चेतसिक - असे पस्तीस धर्म संग्रहित होतात. येथे करुणा आणि मुदिता स्वतंत्रपणेच संप्रयुक्त कराव्यात. त्याचप्रमाणे, द्वितीयध्यान चित्तांमध्ये वितक्क वगळून; तृतीयध्यान चित्तांमध्ये वितक्क व विचार वगळून; चतुर्थध्यान चित्तांमध्ये वितक्क, विचार व पीति वगळून; परंतु पंधरा पंचमध्यान चित्तांमध्ये अप्पमञ्ञा प्राप्त होत नाहीत. अशा प्रकारे, सर्व सत्तावीस महग्गत चित्तांमध्ये पाच ध्यानांच्या आधारे पाच प्रकारचाच संग्रह होतो. ၃၉. ပဉ္စတိံသ စတုတ္တိံသ, တေတ္တိံသ စ ယထာက္ကမံ. ३९. अनुक्रमे पस्तीस, चौतीस आणि तेहतीस, ဗာတ္တိံသ စေဝ တိံသေတိ, ပဉ္စဓာဝ မဟဂ္ဂတေ. बत्तीस आणि तीस - अशा प्रकारे महग्गत चित्तांमध्ये पाच प्रकारचाच संग्रह होतो. ကာမာဝစရသောဘနစိတ္တသင်္ဂဟနယော कामावचर शोभनचित्त संग्रह नय ၄၀. ကာမာဝစရသောဘနေသု ပန ကုသလေသု တာဝ ပဌမဒွယေ အညသမာနာ တေရသ စေတသိကာ, ပဉ္စဝီသတိ သောဘနစေတသိကာ [Pg.13] စေတိ အဋ္ဌတိံသ ဓမ္မာ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တိ, အပ္ပမညာဝိရတိယော ပနေတ္ထ ပဉ္စပိ ပစ္စေကမေဝ ယောဇေတဗ္ဗာ, တထာ ဒုတိယဒွယေ ဉာဏဝဇ္ဇိတာ, တတိယဒွယေ ဉာဏသမ္ပယုတ္တာ ပီတိဝဇ္ဇိတာ, စတုတ္ထဒွယေ ဉာဏပီတိဝဇ္ဇိတာ တေ ဧဝ သင်္ဂယှန္တိ. ကိရိယစိတ္တေသုပိ ဝိရတိဝဇ္ဇိတာ တထေဝ စတူသုပိ ဒုကေသု စတုဓာဝ သင်္ဂယှန္တိ. တထာ ဝိပါကေသု စ အပ္ပမညာဝိရတိဝဇ္ဇိတာ တေ ဧဝ သင်္ဂယှန္တီတိ သဗ္ဗထာပိ စတုဝီသတိကာမာဝစရသောဘနစိတ္တေသု ဒုကဝသေန ဒွါဒသဓာဝ သင်္ဂဟော ဟောတီတိ. ४०. कामावचर शोभन चित्तांमध्ये, प्रथम कुशल चित्तांच्या पहिल्या द्विकामध्ये अञ्ञसमान तेरा चेतसिक आणि पंचवीस शोभन चेतसिक - असे अडतीस धर्म संग्रहित होतात. येथे अप्पमञ्ञा आणि विरती हे पाचही चेतसिक स्वतंत्रपणेच संप्रयुक्त करावेत. त्याचप्रमाणे, दुसऱ्या द्विकामध्ये ज्ञान वगळून; तिसऱ्या द्विकामध्ये ज्ञानसंप्रयुक्त परंतु पीति वगळून; आणि चौथ्या द्विकामध्ये ज्ञान व पीति दोन्ही वगळून तेच चेतसिक संग्रहित होतात. क्रियाचित्तांमध्ये देखील विरती वगळून त्याचप्रमाणे चारही द्विकांमध्ये चार प्रकारे संग्रह होतो. तसेच विपाक चित्तांमध्ये अप्पमञ्ञा आणि विरती वगळून तेच चेतसिक संग्रहित होतात. अशा प्रकारे, सर्व चोवीस कामावचर शोभन चित्तांमध्ये द्विकांच्या आधारे बारा प्रकारचाच संग्रह होतो. ၄၁. အဋ္ဌတိံသ သတ္တတိံသ, ဒွယံ ဆတ္တိံသကံ သုဘေ. ४१. कुशल (शुभ) चित्तांमध्ये अडतीस, सदतीस आणि दोन वेळा छत्तीस (धर्म प्राप्त होतात). ပဉ္စတိံသ စတုတ္တိံသ, ဒွယံ တေတ္တိံသကံ ကြိယေ; တေတ္တိံသ ပါကေ ဗာတ္တိံသ, ဒွယေကတိံသကံ ဘဝေ; သဟေတုကာမာဝစရပုည-ပါကကြိယာမနေ. क्रियाचित्तांमध्ये पस्तीस, चौतीस आणि दोन वेळा तेहतीस; विपाकचित्तांमध्ये तेहतीस, बत्तीस आणि दोन वेळा एकतीस धर्म प्राप्त होतात - हे सहेतुक कामावचर कुशल, विपाक आणि क्रिया चित्तांच्या बाबतीत जाणावे. ၄၂. နဝိဇ္ဇန္တေတ္ထ ဝိရတီ, ကြိယေသု စ မဟဂ္ဂတေ. ४२. येथे क्रियाचित्तांमध्ये आणि महग्गत चित्तांमध्ये विरती आढळत नाहीत. အနုတ္တရေ အပ္ပမညာ, ကာမပါကေ ဒွယံ တထာ; အနုတ္တရေ ဈာနဓမ္မာ, အပ္ပမညာ စ မဇ္ဈိမေ; ဝိရတီ ဉာဏပီတီ စ, ပရိတ္တေသု ဝိသေသကာ. लोकोत्तर (अनुत्तर) चित्तांमध्ये अप्पमञ्ञा आढळत नाहीत, तसेच कामावचर विपाक चित्तांमध्ये दोन्ही (विरती आणि अप्पमञ्ञा) आढळत नाहीत. लोकोत्तर चित्तांमध्ये ध्यानधर्म हे भेदक असतात; मध्यम (महग्गत) चित्तांमध्ये अप्पमञ्ञा; आणि परित्त (कामावचर) चित्तांमध्ये विरती, ज्ञान व पीति हे भेदक असतात. အကုသလစိတ္တသင်္ဂဟနယော अकुशलचित्त संग्रह नय ၄၃. အကုသလေသု ပန လောဘမူလေသု တာဝ ပဌမေ အသင်္ခါရိကေ အညသမာနာ တေရသ စေတသိကာ, အကုသလသာဓာရဏာ စတ္တာရော စာတိ သတ္တရသ လောဘဒိဋ္ဌီဟိ သဒ္ဓိံ ဧကူနဝီသတိ ဓမ္မာ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တိ. ४३. अकुशल चित्तांमध्ये, लोभमूलक चित्तांपैकी पहिल्या असंस्कारिक चित्तामध्ये अञ्ञसमान तेरा चेतसिक आणि अकुशलसाधारण चार चेतसिक - असे सतरा, आणि लोभ व दिट्ठि (दृष्टी) यांच्यासह एकोणवीस धर्म संग्रहित होतात. ၄၄. တထေဝ ဒုတိယေ အသင်္ခါရိကေ လောဘမာနေန. ४४. त्याचप्रमाणे, दुसऱ्या असंस्कारिक चित्तामध्ये लोभ आणि मान (अभिमान) यांच्यासह (एकोणवीस धर्म संग्रहित होतात). ၄၅. တတိယေ တထေဝ ပီတိဝဇ္ဇိတာ လောဘဒိဋ္ဌီဟိ သဟ အဋ္ဌာရသ. ४५. तिसऱ्या चित्तामध्ये त्याचप्रमाणे पीति वगळून, लोभ व दिट्ठि यांच्यासह अठरा (धर्म संग्रहित होतात). ၄၆. စတုတ္ထေ [Pg.14] တထေဝ လောဘမာနေန. ४६. चौथ्या चित्तामध्ये त्याचप्रमाणे (पीति वगळून) लोभ आणि मान यांच्यासह (अठरा धर्म संग्रहित होतात). ၄၇. ပဉ္စမေ ပန ပဋိဃသမ္ပယုတ္တေ အသင်္ခါရိကေ ဒေါသော ဣဿာ မစ္ဆရိယံ ကုက္ကုစ္စဉ္စာတိ စတူဟိ သဒ္ဓိံ ပီတိဝဇ္ဇိတာ တေ ဧဝ ဝီသတိ ဓမ္မာ သင်္ဂယှန္တိ, ဣဿာမစ္ဆရိယကုက္ကုစ္စာနိ ပနေတ္ထ ပစ္စေကမေဝ ယောဇေတဗ္ဗာနိ. ४७. पाचव्या प्रतिघसंप्रयुक्त असंस्कारिक चित्तामध्ये मात्र, पीति वगळून तेच चेतसिक आणि दोस (द्वेष), इस्सा (ईर्ष्या), मच्छेर (मात्सर्य) व कुकुच्च (कुकृत्य) या चार चेतसिकांसह - असे वीस धर्म संग्रहित होतात. येथे ईर्ष्या, मात्सर्य आणि कुकृत्य हे स्वतंत्रपणेच संप्रयुक्त करावेत. ၄၈. သသင်္ခါရိကပဉ္စကေပိ တထေဝ ထိနမိဒ္ဓေန ဝိသေသေတွာ ယောဇေတဗ္ဗာ. ४८. पाच ससंस्कारिक चित्तांमध्ये देखील त्याच प्रकारे, थिन-मिद्ध (स्त्यान-मिद्ध) यांच्या वैशिष्ट्यासह संप्रयुक्त करावेत. ၄၉. ဆန္ဒပီတိဝဇ္ဇိတာ ပန အညသမာနာ ဧကာဒသ, အကုသလသာဓာရဏာ စတ္တာရော စာတိ ပန္နရသ ဓမ္မာ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတေ သမ္ပယုဇ္ဇန္တိ. ४९. उद्धच्चसहगत (औद्धत्यसहगत) चित्तामध्ये मात्र छन्द (इच्छा) आणि पीति वगळून अञ्ञसमान अकरा चेतसिक आणि अकुशलसाधारण चार चेतसिक - असे पंधरा धर्म संप्रयुक्त होतात. ၅၀. ဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတစိတ္တေ စ အဓိမောက္ခဝိရဟိတာ ဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတာ တထေဝ ပန္နရသ ဓမ္မာ သမုပလဗ္ဘန္တီတိ သဗ္ဗထာပိ ဒွါဒသာကုသလစိတ္တုပ္ပာဒေသု ပစ္စေကံ ယောဇိယမာနာပိ ဂဏနဝသေန သတ္တဓာဝ သင်္ဂဟိတာ ဘဝန္တီတိ. ५०. आणि विचिकित्सासहगत (शंकासहगत) चित्तामध्ये अधिमोक्ख (अधिमोक्ष) वगळून आणि विचिकित्सेसह तसेच पंधरा धर्म प्राप्त होतात. अशा प्रकारे, सर्व बारा अकुशल चित्तोत्पादांमध्ये स्वतंत्रपणे संप्रयुक्त केले तरी, संख्येच्या दृष्टीने ते सात प्रकारेच संग्रहित होतात. ၅၁. ဧကူနဝီသာဋ္ဌာရသ, ဝီသေကဝီသ ဝီသတိ. ५१. एकोणवीस, अठरा, वीस, एकवीस, वीस. ဒွါဝီသ ပန္နရသေတိ, သတ္တဓာ ကုသလေဌိတာ. बावीस, पंधरा (इत्यादी) अशा सात प्रकारे कुशल चित्तांमध्ये (चेतसिक) स्थित असतात. ၅၂. သာဓာရဏာ စ စတ္တာရော, သမာနာ စ ဒသာပရေ. ५२. आणि चार (अकुशल) साधारण, आणि इतर दहा समान (अञ्ञसमान चेतसिक) असतात. စုဒ္ဒသေတေ ပဝုစ္စန္တိ, သဗ္ဗာကုသလယောဂိနော. हे चौदा (चेतसिक) सर्व अकुशल चित्तांशी जोडलेले (अकुशलयोगीन) म्हटले जातात. အဟေတုကစိတ္တသင်္ဂဟနယော अहेतुकचित्तसंग्रहनय ၅၃. အဟေတုကေသု ပန ဟသနစိတ္တေ တာဝ ဆန္ဒဝဇ္ဇိတာ အညသမာနာ ဒွါဒသ ဓမ္မာ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တိ. ५३. आता, अहेतुक चित्तांमध्ये सर्वप्रथम हसितुत्पाद चित्तात (हसविणाऱ्या चित्तात) 'छंद' (इच्छा) वगळता इतर बारा अञ्ञसमान (अन्यसमान) धर्म संग्रहित होतात. ၅၄. တထာ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနေ ဆန္ဒပီတိဝဇ္ဇိတာ. ५४. त्याचप्रमाणे, वोट्ठब्बन (निश्चय करणाऱ्या) चित्तात 'छंद' आणि 'पीति' (प्रीती) वगळून (इतर अञ्ञसमान धर्म संग्रहित होतात). ၅၅. သုခသန္တီရဏေ ဆန္ဒဝီရိယဝဇ္ဇိတာ. ५५. सुख-संतीरण चित्तात 'छंद' आणि 'वीरिय' (वीर्य/ऊर्जा) वगळून (इतर धर्म संग्रहित होतात). ၅၆. မနောဓာတုတ္တိကာဟေတုကပဋိသန္ဓိယုဂဠေ ဆန္ဒပီတိဝီရိယဝဇ္ဇိတာ. ५६. मनोधातू-त्रिक आणि अहेतुक पटिसंधि-युगळात (पुनर्जन्म जोडणाऱ्या दोन चित्तांमध्ये) 'छंद', 'पीति' आणि 'वीरिय' वगळून (इतर धर्म संग्रहित होतात). ၅၇. ဒွိပဉ္စဝိညာဏေ [Pg.15] ပကိဏ္ဏကဝဇ္ဇိတာ တေယေဝ သင်္ဂယှန္တီတိ သဗ္ဗထာပိ အဋ္ဌာရသသု အဟေတုကေသု ဂဏနဝသေန စတုဓာဝ သင်္ဂဟော ဟောတီတိ. ५७. द्विपंचविज्ञान चित्तात 'पकिण्णक' (प्रकीर्णक) वगळून तेच (सात सब्बचित्तसाधारण धर्म) संग्रहित होतात. अशा प्रकारे, सर्व अठरा अहेतुक चित्तांमध्ये गणनेच्या दृष्टीने चार प्रकारचाच संग्रह होतो. ၅၈. ဒွါဒသေကာဒသ ဒသ, သတ္တ စာတိ စတုဗ္ဗိဓော. ५८. बारा, अकरा, दहा आणि सात - असा हा चार प्रकारचा (संग्रह आहे). အဋ္ဌာရသာဟေတုကေသု, စိတ္တုပ္ပာဒေသု သင်္ဂဟော. अठरा अहेतुक चित्तोत्पादांमध्ये हा संग्रह होतो. ၅၉. အဟေတုကေသု သဗ္ဗတ္ထ, သတ္တ သေသာ ယထာရဟံ. ५९. सर्व अहेतुक चित्तांमध्ये सात (सब्बचित्तसाधारण धर्म) सर्वत्र असतात, आणि उर्वरित धर्म योग्यतेनुसार (संग्रहित होतात). ဣတိ ဝိတ္ထာရတော ဝုတ္တော, တေတ္တိံသဝိဓသင်္ဂဟော. अशा प्रकारे, सविस्तरपणे तेहतीस प्रकारचा संग्रह सांगितले आहे. ၆၀. ဣတ္ထံ စိတ္တာဝိယုတ္တာနံ, သမ္ပယောဂဉ္စ သင်္ဂဟံ. ६०. अशा प्रकारे, चित्ताशी अविभाज्य असलेल्या (चेतसिकांचा) संप्रयोग आणि संग्रह जाणून घेऊन, ဉတွာ ဘေဒံ ယထာယောဂံ, စိတ္တေန သမမုဒ္ဒိသေ. त्यांच्या भेदांना योग्यतेनुसार समजून घेऊन, चित्तासह त्यांचे निर्देश करावेत. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ စေတသိကသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंगहातील 'चेतसिकसंग्रहविभाग' नावाचा ဒုတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. दुसरा परिच्छेद (समाप्त झाला). ၃. ပကိဏ္ဏကပရိစ္ဆေဒေါ ३. प्रकीर्णक परिच्छेद ၁. သမ္ပယုတ္တာ ယထာယောဂံ, တေပညာသ သဘာဝတော. १. स्वभावतः योग्यतेनुसार संप्रयुक्त होणारे त्रेपन्न (धर्म), စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ, တေသံ ဒါနိ ယထာရဟံ. जे चित्त आणि चेतसिक धर्म आहेत, आता त्यांचा योग्यतेनुसार, ၂. ဝေဒနာဟေတုတော ကိစ္စဒွါရာလမ္ဗဏဝတ္ထုတော. २. वेदना, हेतू, कृत्य, द्वार, आलंबन (विषय) आणि वस्तू यांच्या आधारे, စိတ္တုပ္ပာဒဝသေနေဝ, သင်္ဂဟော နာမ နီယတေ. चित्तोत्पादाच्या नियमानुसारच संग्रह केला जात आहे. ဝေဒနာသင်္ဂဟော वेदनासंग्रह ၃. တတ္ထ ဝေဒနာသင်္ဂဟေ တာဝ တိဝိဓာ ဝေဒနာ သုခံ ဒုက္ခံ အဒုက္ခမသုခါ စေတိ, သုခံ ဒုက္ခံ သောမနဿံ ဒေါမနဿံ ဥပေက္ခာတိ စ ဘေဒေန ပန ပဉ္စဓာ ဟောတိ. ३. त्या वेदनासंग्रहात सर्वप्रथम वेदना तीन प्रकारची असते: सुख, दुःख आणि अदुःख-असुख (अदुक्खमसुख). परंतु, भेदानुसार ती पाच प्रकारची होते: सुख, दुःख, सोमनस्य (सौमनस्य), दोमनस्य (दौमनस्य) आणि उपेक्खा (उपेक्षा). ၄. တတ္ထ သုခသဟဂတံ ကုသလဝိပါကံ ကာယဝိညာဏမေကမေဝ, တထာ ဒုက္ခသဟဂတံ အကုသလဝိပါကံ. ४. त्यामध्ये, सुखसहगत (सुखासह उत्पन्न होणारे) कुशलविपाक कायविज्ञान केवळ एकच आहे, आणि त्याचप्रमाणे दुःखसहगत अकुशलविपाक (कायविज्ञान देखील एकच आहे). ၅. သောမနဿသဟဂတစိတ္တာနိ [Pg.16] ပန လောဘမူလာနိ စတ္တာရိ, ဒွါဒသ ကာမာဝစရသောဘနာနိ, သုခသန္တီရဏဟသနာနိ စ ဒွေတိ အဋ္ဌာရသ ကာမာဝစရသောမနဿသဟဂတစိတ္တာနိ စေဝ ပဌမဒုတိယတတိယစတုတ္ထဇ္ဈာနသင်္ခါတာနိ စတုစတ္တာလီသ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရစိတ္တာနိ စေတိ ဒွါသဋ္ဌိဝိဓာနိ ဘဝန္တိ. ५. सोमनस्यसहगत (आनंदासह उत्पन्न होणारी) चित्ते म्हणजे: लोभमूलक चार, कामावचर शोभन बारा, आणि सुख-संतीरण व हसितुत्पाद ही दोन; अशी अठरा कामावचर सोमनस्यसहगत चित्ते आणि प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ ध्यान मानली जाणारी चव्वेचाळीस महग्गत व लोकोत्तर चित्ते मिळून एकूण बासष्ट प्रकारची होतात. ၆. ဒေါမနဿသဟဂတစိတ္တာနိ ပန ဒွေ ပဋိဃသမ္ပယုတ္တစိတ္တာနေဝ. ६. दोमनस्यसहगत (द्वेषासह उत्पन्न होणारी) चित्ते केवळ दोनच आहेत, जी पटिघसंप्रयुक्त (प्रतिघसंप्रयुक्त) चित्ते आहेत. ၇. သေသာနိ သဗ္ဗာနိပိ ပဉ္စပညာသ ဥပေက္ခာသဟဂတစိတ္တာနေဝါတိ. ७. उर्वरित सर्व पंचावन्न चित्ते उपेक्खासहगत (उपेक्षासहगत) चित्तेच आहेत. ၈. သုခံ ဒုက္ခမုပေက္ခာတိ, တိဝိဓာ တတ္ထ ဝေဒနာ. ८. सुख, दुःख आणि उपेक्खा - अशा प्रकारे तेथे वेदना तीन प्रकारची आहे. သောမနဿံ ဒေါမနဿမိတိဘေဒေန ပဉ္စဓာ. सोमनस्य आणि दोमनस्य अशा भेदाने ती पाच प्रकारची होते. ၉. သုခမေကတ္ထ ဒုက္ခဉ္စ, ဒေါမနဿံ ဒွယေ ဌိတံ. ९. सुख एका चित्तात, दुःख एका चित्तात आणि दोमनस्य दोन चित्तांमध्ये स्थित आहे. ဒွါသဋ္ဌီသု သောမနဿံ, ပဉ္စပညာသကေတရာ. बासष्ट चित्तांमध्ये सोमनस्य असते, आणि इतर (उपेक्खा) पंचावन्न चित्तांमध्ये असते. ဟေတုသင်္ဂဟော हेतूसंग्रह ၁၀. ဟေတုသင်္ဂဟေ ဟေတူ နာမ လောဘော ဒေါသော မောဟော အလောဘော အဒေါသော အမောဟော စာတိ ဆဗ္ဗိဓာ ဘဝန္တိ. १०. हेतूसंग्रहात 'हेतू' हे लोभ, दोस (द्वेष), मोह, अलोभ, अदोस (अद्वेष) आणि अमोह अशा सहा प्रकारचे असतात. ၁၁. တတ္ထ ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနဒွိပဉ္စဝိညာဏသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဟသနဝသေန အဟေတုကစိတ္တာနိ နာမ. ११. त्यामध्ये, पंचद्वारावर्जन, द्विपंचविज्ञान, संपटिच्छन, संतीरण, वोट्ठब्बन आणि हसितुत्पाद यांच्या रूपाने असणारी चित्ते 'अहेतुक चित्ते' म्हणून ओळखली जातात. ၁၂. သေသာနိ သဗ္ဗာနိပိ ဧကသတ္တတိ စိတ္တာနိ သဟေတုကာနေဝ. १२. उर्वरित सर्व एकाहत्तर चित्ते सहेतुकच आहेत. ၁၃. တတ္ထာပိ ဒွေ မောမူဟစိတ္တာနိ ဧကဟေတုကာနိ. १३. त्यामध्ये देखील, दोन मोहजनक (मोमूह) चित्ते एकहेतुक असतात. ၁၄. သေသာနိ ဒသ အကုသလစိတ္တာနိ စေဝ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တာနိ ဒွါဒသ ကာမာဝစရသောဘနာနိ စေတိ ဒွါဝီသတိ ဒွိဟေတုကစိတ္တာနိ. १४. उर्वरित दहा अकुशल चित्ते आणि ज्ञानविप्रयुक्त बारा कामावचर शोभन चित्ते मिळून बावीस चित्ते द्विहेतुक असतात. ၁၅. ဒွါဒသ [Pg.17] ဉာဏသမ္ပယုတ္တကာမာဝစရသောဘနာနိ စေဝ ပဉ္စတိံသ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရစိတ္တာနိ စေတိ သတ္တစတ္တာလီသ တိဟေတုကစိတ္တာနီတိ. १५. ज्ञानसंप्रयुक्त बारा कामावचर शोभन चित्ते आणि पस्तीस महग्गत व लोकोत्तर चित्ते मिळून सत्तेचाळीस चित्ते त्रिहेतुक असतात. ၁၆. လောဘော ဒေါသော စ မောဟော စ, १६. लोभ, दोस (द्वेष) आणि मोह, ဟေတူ အကုသလာ တယော; အလောဘာဒေါသာမောဟော စ,ကုသလာဗျာကတာ တထာ. अकुशल हेतू तीन आहेत; तसेच अलोभ, अदोष आणि अमोह हे कुशल व अव्याकृत आहेत. ၁၇. အဟေတုကာဋ္ဌာရသေကဟေတုကာ ဒွေ ဒွါဝီသတိ. १७. अहेतुक चित्ते अठरा, एकहेतुक चित्ते दोन आणि द्विहेतुक चित्ते बावीस आहेत. ဒွိဟေတုကာ မတာ သတ္တစတ္တာလီသတိဟေတုကာ. द्विहेतुक चित्ते बावीस मानली जातात आणि त्रिहेतुक चित्ते सत्तेचाळीस आहेत. ကိစ္စသင်္ဂဟော कृत्यसंग्रह ၁၈. ကိစ္စသင်္ဂဟေ ကိစ္စာနိ နာမ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါဝဇ္ဇနဒဿနသဝနဃာယနသာယနဖုသနသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဇဝနတဒါရမ္မဏစုတိဝသေန စုဒ္ဒသဝိဓာနိ ဘဝန္တိ. १८. कृत्यसंग्रहामध्ये प्रतिसंधी, भवांग, आवर्जन, दर्शन, श्रवण, घ्राण, सायन, स्पर्शन, संप्रतीच्छन, संतीरण, वोट्ठब्बन, जवन, तदारंमण आणि च्युती यानुसार कृत्ये चौदा प्रकारची असतात. ၁၉. ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါဝဇ္ဇနပဉ္စဝိညာဏဌာနာဒိဝသေန ပန တေသံ ဒသဓာ ဌာနဘေဒေါ ဝေဒိတဗ္ဗော. १९. परंतु, प्रतिसंधी, भवांग, आवर्जन, पंचविज्ञान स्थान इत्यादींच्या आधारे त्यांचा दहा प्रकारचा स्थानभेद समजून घ्यावा. ၂၀. တတ္ထ ဒွေ ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏာနိ စေဝ အဋ္ဌ မဟာဝိပါကာနိ စ နဝ ရူပါရူပဝိပါကာနိ စေတိ ဧကူနဝီသတိ စိတ္တာနိ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိကိစ္စာနိ နာမ. २०. त्यामध्ये, दोन उपेक्षासहगत संतीरण चित्ते, आठ महाविपाक चित्ते आणि नऊ रूप-अरूप विपाक चित्ते अशी एकोणीस चित्ते प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती ही कृत्ये करणारी आहेत. ၂၁. အာဝဇ္ဇနကိစ္စာနိ ပန ဒွေ. २१. आवर्जन कृत्ये दोन आहेत. ၂၂. တထာ ဒဿနသဝနဃာယနသာယနဖုသနသမ္ပဋိစ္ဆနကိစ္စာနိ စ. २२. तसेच दर्शन, श्रवण, घ्राण, सायन, स्पर्शन आणि संप्रतीच्छन ही कृत्ये देखील (दोन-दोन आहेत). ၂၃. တီဏိ သန္တီရဏကိစ္စာနိ. २३. संतीरण कृत्ये तीन आहेत. ၂၄. မနောဒွါရာဝဇ္ဇနမေဝ ပဉ္စဒွါရေ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနကိစ္စံ သာဓေတိ. २४. मनोध्वारावर्जन चित्तच पंचद्वारांमध्ये वोट्ठब्बन (व्यवस्थापन) कृत्य पूर्ण करते. ၂၅. အာဝဇ္ဇနဒွယဝဇ္ဇိတာနိ ကုသလာကုသလဖလကိရိယစိတ္တာနိ ပဉ္စပညာသ ဇဝနကိစ္စာနိ. २५. दोन आवर्जन चित्ते वगळून, कुशल, अकुशल, फल आणि क्रिया अशी पंचावन्न चित्ते जवन कृत्य करणारी आहेत. ၂၆. အဋ္ဌ [Pg.18] မဟာဝိပါကာနိ စေဝ သန္တီရဏတ္တယဉ္စေတိ ဧကာဒသ တဒါရမ္မဏကိစ္စာနိ. २६. आठ महाविपाक चित्ते आणि तीन संतीरण चित्ते अशी अकरा चित्ते तदारंमण कृत्य करणारी आहेत. ၂၇. တေသု ပန ဒွေ ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏစိတ္တာနိ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိတဒါရမ္မဏသန္တီရဏဝသေန ပဉ္စကိစ္စာနိ နာမ. २७. त्यापैकी, दोन उपेक्षासहगत संतीरण चित्ते प्रतिसंधी, भवांग, च्युती, तदारंमण आणि संतीरण यानुसार पाच कृत्ये करणारी आहेत. ၂၈. မဟာဝိပါကာနိ အဋ္ဌ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိတဒါရမ္မဏဝသေန စတုကိစ္စာနိ နာမ. २८. आठ महाविपाक चित्ते प्रतिसंधी, भवांग, च्युती आणि तदारंमण यानुसार चार कृत्ये करणारी आहेत. ၂၉. မဟဂ္ဂတဝိပါကာနိ နဝ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိဝသေန တိကိစ္စာနိ နာမ. २९. नऊ महग्गत विपाक चित्ते प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती यानुसार तीन कृत्ये करणारी आहेत. ၃၀. သောမနဿသန္တီရဏံ သန္တီရဏတဒါရမ္မဏဝသေန ဒုကိစ္စံ. ३०. सोमनस्यसहगत संतीरण चित्त संतीरण आणि तदारंमण यानुसार दोन कृत्ये करणारे आहे. ၃၁. တထာ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနံ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနာဝဇ္ဇနဝသေန. ३१. तसेच वोट्ठब्बन (व्यवस्थापन) चित्त वोट्ठब्बन आणि आवर्जन यानुसार (दोन कृत्ये करणारे आहे). ၃၂. သေသာနိ ပန သဗ္ဗာနိပိ ဇဝနမနောဓာတုတ္တိကဒွိပဉ္စဝိညာဏာနိ ယထာသမ္ဘဝမေကကိစ္စာနီတိ. ३२. उर्वरित सर्व चित्ते—जवन चित्ते, तीन मनोधातू आणि द्विपंचविज्ञान चित्ते—यथासंभव केवळ एकच कृत्य करणारी आहेत. ၃၃. ပဋိသန္ဓာဒယော နာမ, ကိစ္စဘေဒေန စုဒ္ဒသ. ३३. प्रतिसंधी इत्यादी चित्तोत्पाद कृत्यांच्या भेदानुसार चौदा प्रकारचे आहेत. ဒသဓာ ဌာနဘေဒေန, စိတ္တုပ္ပာဒါ ပကာသိတာ. स्थानांच्या भेदानुसार चित्तोत्पाद दहा प्रकारचे सांगितले आहेत. ၃၄. အဋ္ဌသဋ္ဌိ တထာ ဒွေ စ, နဝါဋ္ဌ ဒွေ ယထာက္ကမံ. ३४. अनुक्रमे अडुसष्ट, दोन, नऊ, आठ आणि दोन (चित्ते), ဧကဒွိတိစတုပဉ္စကိစ္စဌာနာနိ နိဒ္ဒိသေ. एक, दोन, तीन, चार आणि पाच कृत्ये करणाऱ्या स्थानांचे निर्देश करतात. ဒွါရသင်္ဂဟော द्वारसंग्रह ၃၅. ဒွါရသင်္ဂဟေ ဒွါရာနိ နာမ စက္ခုဒွါရံ သောတဒွါရံ ဃာနဒွါရံ ဇိဝှာဒွါရံ ကာယဒွါရံ မနောဒွါရဉ္စေတိ ဆဗ္ဗိဓာနိ ဘဝန္တိ. ३५. द्वारसंग्रहामध्ये द्वारे ही चक्षुद्वार, श्रोत्रद्वार, घ्राणद्वार, जिव्हाद्वार, कायद्वार आणि मनोध्वार अशी सहा प्रकारची असतात. ၃၆. တတ္ထ စက္ခုမေဝ စက္ခုဒွါရံ. ३६. त्यामध्ये, चक्षु (डोळा) हेच चक्षुद्वार आहे. ၃၇. တထာ သောတာဒယော သောတဒွါရာဒီနိ. ३७. तसेच श्रोत्र इत्यादी हे श्रोत्रद्वार इत्यादी आहेत. ၃၈. မနောဒွါရံ [Pg.19] ပန ဘဝင်္ဂန္တိ ပဝုစ္စတိ. ३८. परंतु, मनोध्वाराला भवांग असे म्हटले जाते. ၃၉. တတ္ထ ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနစက္ခုဝိညာဏသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနကာမာဝစရဇဝနတဒါရမ္မဏဝသေန ဆစတ္တာလီသ စိတ္တာနိ စက္ခုဒွါရေ ယထာရဟံ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တထာ ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနသောတဝိညာဏာဒိဝသေန သောတဒွါရာဒီသုပိ ဆစတ္တာလီသေဝ ဘဝန္တီတိ သဗ္ဗထာပိ ပဉ္စဒွါရေ စတုပညာသ စိတ္တာနိ ကာမာဝစရာနေဝ. ३९. त्यामध्ये, पंचद्वारावर्जन, चक्षुविज्ञान, संप्रतीच्छन, संतीरण, वोट्ठब्बन, कामावचर जवन आणि तदारंमण यानुसार शेहेचाळीस चित्ते चक्षुद्वारामध्ये यथासंभव उत्पन्न होतात; तसेच पंचद्वारावर्जन, श्रोत्रविज्ञान इत्यादींनुसार श्रोत्रद्वार इत्यादींमध्ये देखील शेहेचाळीस चित्तेच उत्पन्न होतात. अशा प्रकारे, सर्व पाचही द्वारांमध्ये मिळून एकूण चोपन्न चित्ते उत्पन्न होतात, जी केवळ कामावचरच असतात. ၄၀. မနောဒွါရေ ပန မနောဒွါရာဝဇ္ဇနပဉ္စပညာသဇဝနတဒါရမ္မဏဝသေန သတ္တသဋ္ဌိ စိတ္တာနိ ဘဝန္တိ. ४०. परंतु, मनोध्वारामध्ये मनोध्वारावर्जन, पंचावन्न जवन आणि तदारंमण यानुसार सदुसष्ट चित्ते उत्पन्न होतात. ၄၁. ဧကူနဝီသတိ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိဝသေန ဒွါရဝိမုတ္တာနိ. ४१. एकोणीस चित्ते प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती यानुसार द्वारमुक्त असतात. ၄၂. တေသု ပန ပဉ္စဝိညာဏာနိ စေဝ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနာနိ စေတိ ဆတ္တိံသ ယထာရဟမေကဒွါရိကစိတ္တာနိ နာမ. ४२. त्यापैकी, पंचविज्ञान आणि महग्गत व लोकोत्तर जवन अशी छत्तीस चित्ते यथासंभव एकद्वारिक चित्ते आहेत. ၄၃. မနောဓာတုတ္တိကံ ပန ပဉ္စဒွါရိကံ. ४३. परंतु, three मनोधातू हे पंचद्वारिक आहेत. ၄၄. သုခသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနကာမာဝစရဇဝနာနိ ဆဒွါရိကစိတ္တာနိ. ४४. सुखसहगत संतीरण, वोट्ठब्बन आणि कामावचर जवन ही षड्द्वारिक चित्ते आहेत. ၄၅. ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏမဟာဝိပါကာနိ ဆဒွါရိကာနိ စေဝ ဒွါရဝိမုတ္တာနိ စ. ४५. उपेक्षासहगत संतीरण आणि महाविपाक चित्ते ही षड्द्वारिक तसेच द्वारमुक्त देखील असतात. ၄၆. မဟဂ္ဂတဝိပါကာနိ ဒွါရဝိမုတ္တာနေဝါတိ. ४६. महग्गत विपाक चित्ते केवळ द्वारमुक्तच असतात. ၄၇. ဧကဒွါရိကစိတ္တာနိ, ပဉ္စဆဒွါရိကာနိ စ. ४७. एकद्वारिक चित्ते, पंचद्वारिक चित्ते, षड्द्वारिक चित्ते, ဆဒွါရိကဝိမုတ္တာနိ, ဝိမုတ္တာနိ စ သဗ္ဗထာ. षड्द्वारिक तसेच द्वारमुक्त असणारी चित्ते, आणि सर्वथा द्वारमुक्त असणारी चित्ते. ဆတ္တိံသတိ တထာ တီဏိ, ဧကတိံသ ယထာက္ကမံ; ဒသဓာ နဝဓာ စေတိ, ပဉ္စဓာ ပရိဒီပယေ. अनुक्रमे छत्तीस, तीन, एकतीस, दहा आणि नऊ अशा पाच प्रकारे (या चित्तांचे वर्गीकरण) स्पष्ट करावे. အာလမ္ဗဏသင်္ဂဟော आलंबनसंग्रह ၄၈. အာလမ္ဗဏသင်္ဂဟေ [Pg.20] အာရမ္မဏာနိ နာမ ရူပါရမ္မဏံ သဒ္ဒါရမ္မဏံ ဂန္ဓာရမ္မဏံ ရသာရမ္မဏံ ဖောဋ္ဌဗ္ဗာရမ္မဏံ ဓမ္မာရမ္မဏဉ္စေတိ ဆဗ္ဗိဓာနိ ဘဝန္တိ. ४८. आलंबनसंग्रहात आलंबने ही रूपालंबन, सद्दालंबन, गंधालंबन, रसालंबन, फोट्ठब्बालंबन आणि धम्मालंबन अशी सहा प्रकारची असतात. ၄၉. တတ္ထ ရူပမေဝ ရူပါရမ္မဏံ, တထာ သဒ္ဒါဒယော သဒ္ဒါရမ္မဏာဒီနိ. ४९. त्यापैकी रूप हेच रूपालंबन आहे, तसेच शब्दादी हे सद्दालंबन इत्यादी आहेत. ၅၀. ဓမ္မာရမ္မဏံ ပန ပသာဒသုခုမရူပစိတ္တစေတသိကနိဗ္ဗာနပညတ္တိဝသေန ဆဓာ သင်္ဂယှတိ. ५०. परंतु धम्मालंबन हे प्रसादरूप, सूक्ष्मरूप, चित्त, चेतसिक, niब्वान आणि पण्ञत्ति यांच्या रूपाने सहा प्रकारे संग्रहित केले जाते. ၅၁. တတ္ထ စက္ခုဒွါရိကစိတ္တာနံ သဗ္ဗေသမ္ပိ ရူပမေဝ အာရမ္မဏံ, တဉ္စ ပစ္စုပ္ပန္နံ. တထာ သောတဒွါရိကစိတ္တာဒီနမ္ပိ သဒ္ဒါဒီနိ, တာနိ စ ပစ္စုပ္ပန္နာနိယေဝ. ५१. त्यापैकी सर्व चक्खुद्वारिक चित्तांचे आलंबन केवळ रूप हेच असते आणि ते वर्तमानकालीन असते. तसेच सोतद्वारिक चित्त इत्यादींचे देखील सद्द इत्यादी आलंबन असतात आणि ती केवळ वर्तमानकालीनच असतात. ၅၂. မနောဒွါရိကစိတ္တာနံ ပန ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ ပစ္စုပ္ပန္နမတီတံ အနာဂတံ ကာလဝိမုတ္တဉ္စ ယထာရဟမာရမ္မဏံ ဟောတိ. ५२. परंतु मनोद्वारिक चित्तांचे सहाही प्रकारचे आलंबन योग्यतेनुसार वर्तमान, भूत, भविष्य आणि कालमुक्त असे असते. ၅၃. ဒွါရဝိမုတ္တာနဉ္စ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိသင်္ခါတာနံ ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ ယထာသမ္ဘဝံ ယေဘုယျေန ဘဝန္တရေ ဆဒွါရဂ္ဂဟိတံ ပစ္စုပ္ပန္နမတီတံ ပညတ္တိဘူတံ ဝါ ကမ္မကမ္မနိမိတ္တဂတိနိမိတ္တသမ္မတံ အာရမ္မဏံ ဟောတိ. ५३. आणि पटिसंधि, भवंग आणि चुति संज्ञक द्वारमुक्त चित्तांचे सहाही प्रकारचे आलंबन यथासंभव, बहुतांश करून मागील जन्मात सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले वर्तमान, भूत किंवा पण्ञत्तिरूप कम्म, कम्मनिमित्त किंवा गतिनिमित्त मानलेले आलंबन असते. ၅၄. တေသု စက္ခုဝိညာဏာဒီနိ ယထာက္ကမံ ရူပါဒိဧကေကာရမ္မဏာနေဝ. ५४. त्यामध्ये चक्खुविञ्ञाण इत्यादी चित्ते अनुक्रमे रूप इत्यादींपैकी एकेकच आलंबन असणारी असतात. ၅၅. မနောဓာတုတ္တိကံ ပန ရူပါဒိပဉ္စာရမ္မဏံ. ५५. परंतु मनोधातू त्रिक हे रूप इत्यादी पाच आलंबने असणारे असते. ၅၆. သေသာနိ ကာမာဝစရဝိပါကာနိ ဟသနစိတ္တဉ္စေတိ သဗ္ဗထာပိ ကာမာဝစရာရမ္မဏာနေဝ. ५६. उर्वरित कामावचर विपाक चित्ते आणि हसितुप्पाद चित्त ही सर्व प्रकारे केवळ कामावचर आलंबने असणारीच असतात. ၅၇. အကုသလာနိ စေဝ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တကာမာဝစရဇဝနာနိ စေတိ လောကုတ္တရဝဇ္ဇိတသဗ္ဗာရမ္မဏာနိ. ५७. अकुशल चित्ते आणि ज्ञानविप्पयुत्त कामावचर जवन चित्ते ही लोकुत्तर वगळून इतर सर्व आलंबने असणारी असतात. ၅၈. ဉာဏသမ္ပယုတ္တကာမာဝစရကုသလာနိ [Pg.21] စေဝ ပဉ္စမဇ္ဈာနသင်္ခါတံ အဘိညာကုသလဉ္စေတိ အရဟတ္တမဂ္ဂဖလဝဇ္ဇိတသဗ္ဗာရမ္မဏာနိ. ५८. ज्ञानसंपयुत्त कामावचर कुशल चित्ते आणि पाचवे झान मानले गेलेले अभिञ्ञा कुशल चित्त ही अरहत्तमग्ग आणि फल वगळून इतर सर्व आलंबने असणारी असतात. ၅၉. ဉာဏသမ္ပယုတ္တကာမာဝစရကိရိယာနိ စေဝ ကိရိယာဘိညာဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဉ္စေတိ သဗ္ဗထာပိ သဗ္ဗာရမ္မဏာနိ. ५९. ज्ञानसंपयुत्त कामावचर क्रिया चित्ते, क्रिया अभिञ्ञा आणि वोट्ठब्बन चित्त ही सर्व प्रकारे सर्व आलंबने असणारी असतात. ၆၀. အာရုပ္ပေသု ဒုတိယစတုတ္ထာနိ မဟဂ္ဂတာရမ္မဏာနိ. ६०. आरुप्प चित्तांमध्ये दुसरे आणि चौथे चित्त महग्गत आलंबने असणारे असते. ၆၁. သေသာနိ မဟဂ္ဂတစိတ္တာနိ သဗ္ဗာနိပိ ပညတ္တာရမ္မဏာနိ. ६१. उर्वरित सर्व महग्गत चित्ते ही पण्ञत्ति आलंबने असणारी असतात. ၆၂. လောကုတ္တရစိတ္တာနိ နိဗ္ဗာနာရမ္မဏာနီတိ. ६२. लोकुत्तर चित्ते ही निब्बान आलंबन असणारी असतात. ၆၃. ပဉ္စဝီသ ပရိတ္တမှိ, ဆ စိတ္တာနိ မဟဂ္ဂတေ. ६३. पंचवीस चित्ते परित्त (कामावचर) आलंबनात आणि सहा चित्ते महग्गत आलंबनात प्रवृत्त होतात. ဧကဝီသတိ ဝေါဟာရေ, အဋ္ဌ နိဗ္ဗာနဂေါစရေ. एकवीस चित्ते वोहार (पण्ञत्ति) आलंबनात आणि आठ चित्ते निब्बान आलंबनात प्रवृत्त होतात. ဝီသာနုတ္တရမုတ္တမှိ, အဂ္ဂမဂ္ဂဖလုဇ္ဈိတေ; ပဉ္စ သဗ္ဗတ္ထ ဆစ္စေတိ, သတ္တဓာ တတ္ထ သင်္ဂဟော. अरहत्तमग्ग आणि फल वगळून इतर सर्व आलंबनांमध्ये वीस चित्ते, पाच चित्ते सर्व आलंबनांमध्ये आणि सहा चित्ते देखील सर्व आलंबनांमध्ये प्रवृत्त होतात; अशा प्रकारे तेथे सात प्रकारचा संग्रह आहे. ဝတ္ထုသင်္ဂဟော वस्तुसंग्रह ၆၄. ဝတ္ထုသင်္ဂဟေ ဝတ္ထူနိ နာမ စက္ခုသောတဃာနဇိဝှာကာယဟဒယဝတ္ထု စေတိ ဆဗ္ဗိဓာနိ ဘဝန္တိ. ६४. वस्तुसंग्रहात वस्तू ही चक्खुवस्तू, सोतवस्तू, घानवस्तू, जिव्हावस्तू, कायवस्तू आणि हृदयवस्तू अशी सहा प्रकारची असतात. ၆၅. တာနိ ကာမလောကေ သဗ္ဗာနိပိ လဗ္ဘန္တိ. ६५. ती कामलोकात सर्वच्या सर्व आढळतात. ၆၆. ရူပလောကေ ပန ဃာနာဒိတ္တယံ နတ္ထိ. ६६. परंतु रूपलोकात घान इत्यादी तिन्ही वस्तू नसतात. ၆၇. အရူပလောကေ ပန သဗ္ဗာနိပိ န သံဝိဇ္ဇန္တိ. ६७. परंतु अरूपलोकात कोणतीही वस्तू अस्तित्वात नसते. ၆၈. တတ္ထ ပဉ္စဝိညာဏဓာတုယော ယထာက္ကမံ ဧကန္တေန ပဉ္စ ပသာဒဝတ္ထူနိ နိဿာယေဝ ပဝတ္တန္တိ. ६८. त्यापैकी पाच विञ्ञाणधातू अनुक्रमे निश्चितपणे पाच प्रसादवस्तूंचा आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात. ၆၉. ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနသမ္ပဋိစ္ဆနသင်္ခါတာ ပန မနောဓာတု စ ဟဒယံ နိဿိတာယေဝ ပဝတ္တန္တိ. ६९. परंतु पंचद्वारावज्जन आणि संपटिच्छन संज्ञक मनोधातू देखील हृदयवस्तूचा आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात. ၇၀. အဝသေသာ [Pg.22] ပန မနောဝိညာဏဓာတုသင်္ခါတာ စ သန္တီရဏမဟာဝိပါကပဋိဃဒွယပဌမမဂ္ဂဟသနရူပါဝစရဝသေန ဟဒယံ နိဿာယေဝ ပဝတ္တန္တိ. ७०. परंतु उर्वरित मनोविञ्ञाणधातू संज्ञक चित्ते ही संतीरण, महाविपाक, दोन पटिघ (द्वेषमूलक) चित्ते, प्रथम मग्ग, हसितुप्पाद आणि रूपावचर चित्तांच्या रूपाने हृदयवस्तूचा आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात. ၇၁. အဝသေသာ ကုသလာကုသလကိရိယာနုတ္တရဝသေန ပန နိဿာယ ဝါ အနိဿာယ ဝါ. ७१. परंतु उर्वरित चित्ते कुशल, अकुशल, क्रिया आणि लोकुत्तर रूपाने (हृदयवस्तूचा) आश्रय घेऊन किंवा आश्रयाशिवाय प्रवृत्त होतात. ၇၂. အာရုပ္ပဝိပါကဝသေန ဟဒယံ အနိဿာယေဝါတိ. ७२. आरुप्प विपाक रूपाने ती हृदयवस्तूचा आश्रय न घेताच प्रवृत्त होतात. ၇၃. ဆဝတ္ထုံ နိဿိတာ ကာမေ, သတ္တ ရူပေ စတုဗ္ဗိဓာ. ७३. कामलोकात सहा वस्तूंचा आश्रय घेऊन (चित्ते प्रवृत्त होतात), रूपलोकात सात धातू चार वस्तूंचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त होतात. တိဝတ္ထုံ နိဿိတာရုပ္ပေ, ဓာတွေကာ နိဿိတာ မတာ. अरूपलोकात एकच धातू (मनोविञ्ञाणधातू) कोणत्याही वस्तूचा आश्रय न घेता प्रवृत्त होते असे मानले जाते. ၇၄. တေစတ္တာလီသ နိဿာယ, ဒွေစတ္တာလီသ ဇာယရေ. ७४. तेचाळीस चित्ते केवळ (वस्तूचा) आश्रय घेऊनच उत्पन्न होतात, बेचाळीस चित्ते (आश्रय घेऊन किंवा आश्रयाशिवाय) उत्पन्न होतात, နိဿာယ စ အနိဿာယ, ပါကာရုပ္ပာ အနိဿိတာ. आश्रय घेऊन आणि आश्रयाशिवाय (बेचाळीस चित्ते उत्पन्न होतात), तर आरुप्प विपाक चित्ते कोणत्याही आश्रयाशिवाय उत्पन्न होतात. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ ပကိဏ္ဏကသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे अभिधम्मत्थसंगहातील 'प्रकीर्णकसंग्रह विभाग' नावाचा တတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. तिसरा परिच्छेद समाप्त झाला. ၄. ဝီထိပရိစ္ဆေဒေါ ४. वीथिपरिच्छेद (चित्तवीथीचा परिच्छेद) ၁. စိတ္တုပ္ပာဒါနမိစ္စေဝံ, ကတွာသင်္ဂဟမုတ္တရံ. १. अशा प्रकारे चित्तोत्पादांचा श्रेष्ठ संग्रह करून, ဘူမိပုဂ္ဂလဘေဒေန, ပုဗ္ဗာပရနိယာမိတံ. भूमी आणि पुद्गल यांच्या भेदाने, तसेच पूर्व आणि अपर नियमांनी मर्यादित अशा, ပဝတ္တိသင်္ဂဟံ နာမ, ပဋိသန္ဓိပဝတ္တိယံ; ပဝက္ခာမိ သမာသေန, ယထာသမ္ဘဝတော ကထံ. पटिसंधि आणि प्रवृत्तीच्या काळातील 'प्रवृत्तिसंग्रह' नावाचा संग्रह, जसा संभव असेल तसा मी संक्षेपाने सांगेन. ၂.. ဝီထိမုတ္တာနံ ပန ကမ္မကမ္မနိမိတ္တဂတိနိမိတ္တဝသေန တိဝိဓာ ဟောတိ ဝိသယပ္ပဝတ္တိ. २.. परंतु वीथिमुक्त चित्तांची कम्म, कम्मनिमित्त आणि गतिनिमित्त यांच्या रूपाने विषयाची प्रवृत्ती तीन प्रकारची असते. ၄. တတ္ထ ဝတ္ထုဒွါရာရမ္မဏာနိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယာနေဝ. ४. त्यामध्ये वस्तू, द्वार आणि आलंबन हे पूर्वी सांगितलेल्या नियमांनुसारच असतात. ဝိညာဏဆက္ကံ विज्ञानषट्क ၅. စက္ခုဝိညာဏံ [Pg.23] သောတဝိညာဏံ ဃာနဝိညာဏံ ဇိဝှာဝိညာဏံ ကာယဝိညာဏံ မနောဝိညာဏဉ္စေတိ ဆ ဝိညာဏာနိ. ५. चक्षु-विज्ञान, श्रोत-विज्ञान, घ्राण-विज्ञान, जिव्हा-विज्ञान, काय-विज्ञान आणि मनो-विज्ञान ही सहा विज्ञाने आहेत. ဝီထိဆက္ကံ वीथि-षट्क ၆. ဆ ဝီထိယော ပန စက္ခုဒွါရဝီထိ သောတဒွါရဝီထိ ဃာနဒွါရဝီထိ ဇိဝှာဒွါရဝီထိ ကာယဒွါရဝီထိ မနောဒွါရဝီထိ စေတိ ဒွါရဝသေန ဝါ, စက္ခုဝိညာဏဝီထိ သောတဝိညာဏဝီထိ ဃာနဝိညာဏဝီထိ ဇိဝှာဝိညာဏဝီထိ ကာယဝိညာဏဝီထိ မနောဝိညာဏဝီထိ စေတိ ဝိညာဏဝသေန ဝါ ဒွါရပ္ပဝတ္တာ စိတ္တပ္ပဝတ္တိယော ယောဇေတဗ္ဗာ. ६. सहा वीथि (चित्तप्रवाह मार्ग) आहेत: चक्षुद्वार-वीथि, श्रोतद्वार-वीथि, घ्राणद्वार-वीथि, जिव्हाद्वार-वीथि, कायद्वार-वीथि आणि मनोद्वार-वीथि - द्वारांच्या आधारे; किंवा चक्षुविज्ञान-वीथि, श्रोतविज्ञान-वीथि, घ्राणविज्ञान-वीथि, जिव्हाविज्ञान-वीथि, कायविज्ञान-वीथि आणि मनोविज्ञान-वीथि - विज्ञानाच्या आधारे; अशा प्रकारे द्वारांच्या द्वारे प्रवृत्त होणाऱ्या चित्तप्रवृत्तींची योजना करावी. ဝီထိဘေဒေါ वीथि-भेद ၇. အတိမဟန္တံ မဟန္တံ ပရိတ္တံ အတိပရိတ္တဉ္စေတိ ပဉ္စဒွါရေ မနောဒွါရေ ပန ဝိဘူတမဝိဘူတဉ္စေတိ ဆဓာ ဝိသယပ္ပဝတ္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ७. पंचद्वारांमध्ये अति-महान, महान, परीत्त (लहान) आणि अति-परीत्त (अतिशय लहान); आणि मनोद्वारांमध्ये विभूत (स्पष्ट) आणि अविभूत (अस्पष्ट) अशा सहा प्रकारे विषयांची प्रवृत्ती (विषयप्रवृत्ती) जाणून घ्यावी. ပဉ္စဒွါရဝီထိ पंचद्वार-वीथि ၈. ကထံ? ဥပ္ပာဒဌိတိဘင်္ဂဝသေန ခဏတ္တယံ ဧကစိတ္တက္ခဏံ နာမ. ८. कसे? उत्पाद (उत्पत्ती), स्थिती आणि भंग या तीन क्षणांना मिळून एक चित्तक्षण म्हणतात. ၉. တာနိ ပန သတ္တရသ စိတ္တက္ခဏာနိ ရူပဓမ္မာနမာယူ. ९. आणि ते सतरा चित्तक्षण हे रूपधर्मांचे (भौतिक घटकांचे) आयुष्य असते. ၁၀. ဧကစိတ္တက္ခဏာတီတာနိ ဝါ ဗဟုစိတ္တက္ခဏာတီတာနိ ဝါ ဌိတိပ္ပတ္တာနေဝ ပဉ္စာရမ္မဏာနိ ပဉ္စဒွါရေ အာပါထမာဂစ္ဆန္တိ. တသ္မာ ယဒိ ဧကစိတ္တက္ခဏာတီတကံ ရူပါရမ္မဏံ စက္ခုဿ အာပါထမာဂစ္ဆတိ, တတော ဒွိက္ခတ္တုံ ဘဝင်္ဂေ စလိတေ ဘဝင်္ဂသောတံ ဝေါစ္ဆိန္ဒိတွာ တမေဝ ရူပါရမ္မဏံ အာဝဇ္ဇန္တံ ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနစိတ္တံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဇ္ဈတိ, တတော တဿာနန္တရံ တမေဝ [Pg.24] ရူပံ ပဿန္တံ စက္ခုဝိညာဏံ, သမ္ပဋိစ္ဆန္တံ သမ္ပဋိစ္ဆနစိတ္တံ, သန္တီရယမာနံ သန္တီရဏစိတ္တံ, ဝဝတ္ထပေန္တံ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနစိတ္တဉ္စေတိ ယထာက္ကမံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဇ္ဈန္တိ, တတော ပရံ ဧကူနတိံသ ကာမာဝစရဇဝနေသု ယံကိဉ္စိ လဒ္ဓပစ္စယံ ယေဘုယျေန သတ္တက္ခတ္တုံ ဇဝတိ, ဇဝနာနုဗန္ဓာနိ စ ဒွေ တဒါရမ္မဏပါကာနိ ယထာရဟံ ပဝတ္တန္တိ, တတော ပရံ ဘဝင်္ဂပါတော. १०. एक चित्तक्षण उलटून गेलेले किंवा अनेक चित्तक्षण उलटून गेलेले, स्थितीला प्राप्त झालेले पाच आरंभाचे विषय (पंच-आरंबण) पंचद्वारांच्या कक्षेत येतात. म्हणून, जर एक चित्तक्षण उलटून गेलेले रूप-आरंबण (दृश्य विषय) चक्षूच्या कक्षेत आले, तर त्यानंतर दोन वेळा भवांग कंपित होऊन भवांग-प्रवाह खंडित होतो आणि त्याच रूप-आरंबणाकडे वळणारे 'पंचद्वार-आवर्जन चित्त' उत्पन्न होऊन निरुद्ध होते. त्यानंतर लगेचच, त्याच रूपाला पाहणारे 'चक्षु-विज्ञान', त्याचा स्वीकार करणारे 'संपटिच्छन चित्त', त्याची तपासणी करणारे 'संतीरण चित्त' आणि त्याचा निश्चय करणारे 'वोट्ठब्बन चित्त' हे अनुक्रमे उत्पन्न होऊन निरुद्ध होतात. त्यानंतर, एकोणतीस कामावचर जवनांपैकी कोणतेही एक, प्रत्यय (कारण) प्राप्त झाल्यावर बहुधा सात वेळा जवन करते. जवनानंतर दोन 'तदारंमण-विपाक' योग्यतेनुसार प्रवृत्त होतात आणि त्यानंतर पुन्हा भवांगात पतन (भवांगपात) होते. ၁၁. ဧတ္တာဝတာ စုဒ္ဒသ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒါ, ဒွေ ဘဝင်္ဂစလနာနိ, ပုဗ္ဗေဝါတီတကမေကစိတ္တက္ခဏန္တိ ကတွာ သတ္တရသ စိတ္တက္ခဏာနိ ပရိပူရေန္တိ, တတော ပရံ နိရုဇ္ဈတိ, အာရမ္မဏမေတံ အတိမဟန္တံ နာမ ဂေါစရံ. ११. अशा प्रकारे, चौदा वीथि-चित्तोत्पाद, दोन भवांग-कंपन आणि सुरुवातीचा एक अतीत चित्तक्षण मिळून सतरा चित्तक्षण पूर्ण होतात. त्यानंतर तो विषय निरुद्ध होतो. या विषयाला 'अति-महान' विषय म्हणतात. ၁၂. ယာဝ တဒါရမ္မဏုပ္ပာဒါ ပန အပ္ပဟောန္တာတီတကမာပါထမာဂတံ အာရမ္မဏံ မဟန္တံ နာမ, တတ္ထ ဇဝနာဝသာနေ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ, နတ္ထိ တဒါရမ္မဏုပ္ပာဒေါ. १२. परंतु, जेव्हा एखादा विषय इतके चित्तक्षण उलटून गेल्यावर कक्षेत येतो की तो तदारंमणाच्या उत्पत्तीपर्यंत टिकू शकत नाही, तेव्हा त्याला 'महान' विषय म्हणतात. अशा वेळी, जवनाच्या समाप्तीनंतर केवळ भवांगपातच होतो, तदारंमणाची उत्पत्ती होत नाही. ၁၃. ယာဝ ဇဝနုပ္ပာဒါပိ အပ္ပဟောန္တာတီတကမာပါထမာဂတံ အာရမ္မဏံ ပရိတ္တံ နာမ, တတ္ထ ဇဝနမ္ပိ အနုပ္ပဇ္ဇိတွာ ဒွတ္တိက္ခတ္တုံ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမေဝ ပဝတ္တတိ, တတော ပရံ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ. १३. जेव्हा एखादा विषय इतके चित्तक्षण उलटून गेल्यावर कक्षेत येतो की तो जवनाच्या उत्पत्तीपर्यंतही टिकू शकत नाही, तेव्हा त्याला 'परीत्त' विषय म्हणतात. अशा वेळी, जवन देखील उत्पन्न न होता केवळ दोन किंवा तीन वेळा वोट्ठब्बनच प्रवृत्त होते आणि त्यानंतर केवळ भवांगपातच होतो. ၁၄. ယာဝ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနုပ္ပာဒါ စ ပန အပ္ပဟောန္တာတီတကမာပါထမာဂတံ နိရောဓာသန္နမာရမ္မဏံ အတိပရိတ္တံ နာမ, တတ္ထ ဘဝင်္ဂစလနမေဝ ဟောတိ, နတ္ထိ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒေါ. १४. आणि जेव्हा एखादा विषय इतके चित्तक्षण उलटून गेल्यावर कक्षेत येतो की तो वोट्ठब्बनाच्या उत्पत्तीपर्यंतही टिकू शकत नाही आणि निरोधाच्या अगदी जवळ असतो, तेव्हा त्याला 'अति-परीत्त' विषय म्हणतात. अशा वेळी, केवळ भवांग-कंपनच होते, कोणताही वीथि-चित्तोत्पाद होत नाही. ၁၅. ဣစ္စေဝံ စက္ခုဒွါရေ, တထာ သောတဒွါရာဒီသု စေတိ သဗ္ဗထာပိ ပဉ္စဒွါရေ တဒါရမ္မဏဇဝနဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမောဃဝါရသင်္ခါတာနံ စတုန္နံ ဝါရာနံ ယထာက္ကမံ အာရမ္မဏဘူတာ ဝိသယပ္ပဝတ္တိ စတုဓာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. १५. अशा प्रकारे चक्षुद्वारात, तसेच श्रोतद्वार इत्यादींमध्ये देखील, सर्व पंचद्वारांमध्ये तदारंमण-वार, जवन-वार, वोट्ठब्बन-वार आणि मोघ-वार (व्यर्थ वार) नावाच्या चार वारांच्या अनुक्रमे आरंभाचे विषय असणारी विषयप्रवृत्ती चार प्रकारे जाणून घ्यावी. ၁၆. ဝီထိစိတ္တာနိ သတ္တေဝ, စိတ္တုပ္ပာဒါ စတုဒ္ဒသ. १६. वीथि-चित्ते केवळ सातच आहेत आणि चित्तोत्पाद चौदा आहेत. စတုပညာသ ဝိတ္ထာရာ, ပဉ္စဒွါရေ ယထာရဟံ. पंचद्वारांमध्ये योग्यतेनुसार विस्ताराने ते चोपन्न (५४) होतात. အယမေတ္ထ ပဉ္စဒွါရေ ဝီထိစိတ္တပ္ပဝတ္တိနယော. हा येथे पंचद्वारातील वीथि-चित्तप्रवृत्तीचा नियम आहे. မနောဒွါရဝီထိ ပရိတ္တဇဝနဝါရော मनोद्वार-वीथि: परीत्त-जवन-वार ၁၇. မနောဒွါရေ [Pg.25] ပန ယဒိ ဝိဘူတမာရမ္မဏံ အာပါထမာဂစ္ဆတိ, တတော ပရံ ဘဝင်္ဂစလနမနောဒွါရာဝဇ္ဇနဇဝနာဝသာနေ တဒါရမ္မဏပါကာနိ ပဝတ္တန္တိ, တတော ပရံ ဘဝင်္ဂပါတော. १७. मनोद्वारात जर एखादा विभूत (स्पष्ट) विषय कक्षेत आला, तर त्यानंतर भवांग-कंपन, मनोद्वार-आवर्जन आणि जवनाच्या समाप्तीनंतर तदारंमण-विपाक प्रवृत्त होतात; आणि त्यानंतर भवांगपात होतो. ၁၈. အဝိဘူတေ ပနာရမ္မဏေ ဇဝနာဝသာနေ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ, နတ္ထိ တဒါရမ္မဏုပ္ပာဒေါတိ. १८. परंतु, विषय जर अविभूत (अस्पष्ट) असेल, तर जवनाच्या समाप्तीनंतर केवळ भवांगपातच होतो, तदारंमणाची उत्पत्ती होत नाही. ၁၉. ဝီထိစိတ္တာနိ တီဏေဝ, စိတ္တုပ္ပာဒါ ဒသေရိတာ. १९. वीथि-चित्ते केवळ तीनच आहेत आणि चित्तोत्पाद दहा सांगितले आहेत. ဝိတ္ထာရေန ပနေတ္ထေက-စတ္တာလီသ ဝိဘာဝယေ; परंतु, येथे विस्ताराने एकेचाळीस (४१) चित्ते स्पष्ट करावीत. အယမေတ္ထ ပရိတ္တဇဝနဝါရော. हा येथे परीत्त-जवन-वार आहे. အပ္ပနာဇဝနဝါရော अप्पणा-जवन-वार ၂၀. အပ္ပနာဇဝနဝါရေ ပန ဝိဘူတာဝိဘူတဘေဒေါ နတ္ထိ, တထာ တဒါရမ္မဏုပ္ပာဒေါ စ. २०. परंतु, अप्पणा-जवन-वारामध्ये विभूत आणि अविभूत असा भेद नसतो, तसेच तदारंमणाची उत्पत्ती देखील नसते. ၂၁. တတ္ထ ဟိ ဉာဏသမ္ပယုတ္တကာမာဝစရဇဝနာနမဋ္ဌန္နံ အညတရသ္မိံ ပရိကမ္မောပစာရာနုလောမဂေါတြဘုနာမေန စတုက္ခတ္တုံ တိက္ခတ္တုမေဝ ဝါ ယထာက္ကမံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဒ္ဓါနန္တရမေဝ ယထာရဟံ စတုတ္ထံ, ပဉ္စမံ ဝါ ဆဗ္ဗီသတိမဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနေသု ယထာဘိနီဟာရဝသေန ယံ ကိဉ္စိ ဇဝနံ အပ္ပနာဝီထိမောတရတိ, တတော ပရံ အပ္ပနာဝသာနေ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ. २१. कारण तेथे, ज्ञानसंप्रयुक्त आठ कामावचर जवनांपैकी कोणतेही एक जवन परिकर्म, उपचार, अनुलोम आणि गोत्रभू या नावांनी अनुक्रमे चार वेळा किंवा तीन वेळा उत्पन्न होऊन निरुद्ध झाल्यावर, लगेचच योग्यतेनुसार चौथे किंवा पाचवे जवन म्हणून, सव्वीस महग्गत आणि लोकोत्तर जवनांपैकी संकल्पानुसार कोणतेही एक जवन अप्पणा-वीथिमध्ये प्रवेश करते. त्यानंतर, अप्पणाच्या समाप्तीनंतर केवळ भवांगपातच होतो. ၂၂. တတ္ထ သောမနဿသဟဂတဇဝနာနန္တရံ အပ္ပနာပိ သောမနဿသဟဂတာဝ ပါဋိကင်္ခိတဗ္ဗာ, ဥပေက္ခာသဟဂတဇဝနာနန္တရံ ဥပေက္ခာသဟဂတာဝ, တတ္ထာပိ ကုသလဇဝနာနန္တရံ ကုသလဇဝနဉ္စေဝ ဟေဋ္ဌိမဉ္စ ဖလတ္တယမပ္ပေတိ, ကိရိယဇဝနာနန္တရံ ကိရိယဇဝနံ အရဟတ္တဖလဉ္စာတိ. २२. तेथे, सोमनस्यसहगत जवनानंतर अप्पणा देखील सोमनस्यसहगतच अपेक्षित असते; उपेक्षासहगत जवनानंतर उपेक्षासहगतच; आणि तेथेही, कुशल जवनानंतर कुशल जवन आणि खालची तीन फळे अप्पणा प्राप्त करतात; क्रिया जवनानंतर क्रिया जवन आणि अर्हत्त्वफल अप्पणा प्राप्त करतात. ၂၃. ဒွတ္တိံသ [Pg.26] သုခပုညမှာ, ဒွါဒသောပေက္ခကာ ပရံ, २३. बत्तीस (३२) सुखकारक पुण्याचा (कुशलाचा) आधार घेतात, त्यानंतर बारा (१२) उपेक्षासहगत उत्पन्न होतात. သုခိတကြိယတော အဋ္ဌ, ဆ သမ္ဘောန္တိ ဥပေက္ခကာ. सुखकारक क्रियाचित्तापासून आठ (८) आणि उपेक्षासहगत क्रियाचित्तापासून सहा (६) उत्पन्न होतात. ၂၄. ပုထုဇ္ဇနာန သေက္ခာနံ, ကာမပုညတိဟေတုတော. २४. पृथग्जन आणि शैक्षांसाठी त्रिहेतुक काम-पुण्यापासून अप्पणा होते. တိဟေတုကာမကြိယတော, ဝီတရာဂါနမပ္ပနာ. वीतरागींसाठी त्रिहेतुक काम-क्रियेपासून अप्पणा होते. အယမေတ္ထ မနောဒွါရေ ဝီထိစိတ္တပ္ပဝတ္တိနယော. हा येथे मनोद्वारातील वीथि-चित्तप्रवृत्तीचा नियम आहे. တဒါရမ္မဏနိယမော तदारंमण-नियम ၂၅. သဗ္ဗတ္ထာပိ ပနေတ္ထ အနိဋ္ဌေ အာရမ္မဏေ အကုသလဝိပါကာနေဝ ပဉ္စဝိညာဏသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏတဒါရမ္မဏာနိ. २५. येथे सर्व ठिकाणी, अनिष्ट विषयात पंचविज्ञान, संपटिच्छन, संतीरण आणि तदारंमण हे केवळ अकुशल-विपाकच असतात. ၂၆. ဣဋ္ဌေ ကုသလဝိပါကာနိ. २६. इष्ट विषयात ते कुशल-विपाक असतात. ၂၇. အတိဣဋ္ဌေ ပန သောမနဿသဟဂတာနေဝ သန္တီရဏတဒါရမ္မဏာနိ, တတ္ထာပိ သောမနဿသဟဂတကိရိယဇဝနာဝသာနေ သောမနဿသဟဂတာနေဝ တဒါရမ္မဏာနိ ဘဝန္တိ, ဥပေက္ခာသဟဂတကိရိယဇဝနာဝသာနေ စ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ ဟောန္တိ. २७. परंतु, अति-इष्ट विषयात संतीरण आणि तदारंमण हे सोमनस्यसहगतच असतात. तेथेही, सोमनस्यसहगत क्रिया-जवानाच्या समाप्तीनंतर तदारंमण देखील सोमनस्यसहगतच होतात; आणि उपेक्षासहगत क्रिया-जवानाच्या समाप्तीनंतर ते उपेक्षासहगतच होतात. ၂၈. ဒေါမနဿသဟဂတဇဝနာဝသာနေ စ ပန တဒါရမ္မဏာနိစေဝ ဘဝင်္ဂါနိ စ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ ဘဝန္တိ, တသ္မာ ယဒိ သောမနဿပဋိသန္ဓိကဿ ဒေါမနဿသဟဂတဇဝနာဝသာနေ တဒါရမ္မဏသမ္ဘဝေါ နတ္ထိ, တဒါ ယံ ကိဉ္စိ ပရိစိတပုဗ္ဗံ ပရိတ္တာရမ္မဏမာရဗ္ဘ ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တမနန္တရိတွာ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတီတိ ဝဒန္တိ အာစရိယာ. २८. आणि दोमनस्यसहगत जवनाच्या समाप्तीनंतर तदारंमण आणि भवांग हे दोन्ही उपेक्षासहगतच होतात. म्हणून, जर सोमनस्य-प्रतिसंधी असलेल्या व्यक्तीच्या बाबतीत, दोमनस्यसहगत जवनाच्या समाप्तीनंतर तदारंमणाची शक्यता नसेल, तर पूर्वी परिचित असलेल्या कोणत्याही एका परीत्त विषयाला आरंभ करून उपेक्षासहगत संतीरण उत्पन्न होते आणि त्यानंतर लगेचच भवांगपात होतो, असे आचार्य सांगतात. ၂၉. တထာ ကာမာဝစရဇဝနာဝသာနေ ကာမာဝစရသတ္တာနံ ကာမာဝစရဓမ္မေသွေဝ အာရမ္မဏဘူတေသု တဒါရမ္မဏံ ဣစ္ဆန္တီတိ. २९. त्याचप्रमाणे, कामावचर जवनाच्या शेवटी, कामावचर प्राण्यांच्या बाबतीत, कामावचर धर्मच आलंबन (विषय) असताना तदारम्मण (नोंदणी करणारे चित्त) उत्पन्न होते असे म्हणतात. ၃၀. ကာမေ ဇဝနသတ္တာလမ္ဗဏာနံ နိယမေ သတိ. ३०. कामावचर भूमीत जवन, प्राणी आणि आलंबन यांचा नियम असताना, ဝိဘူတေတိမဟန္တေ စ, တဒါရမ္မဏမီရိတံ. स्पष्ट (विभूत) आणि अति-महान आलंबन असताना तदारम्मण होते असे म्हटले आहे. အယမေတ္ထ တဒါရမ္မဏနိယမော. हा येथे 'तदारम्मण नियम' आहे. ဇဝနနိယမော जवन नियम ၃၁. ဇဝနေသု [Pg.27] စ ပရိတ္တဇဝနဝီထိယံ ကာမာဝစရဇဝနာနိ သတ္တက္ခတ္တုံ ဆက္ခတ္တုမေဝ ဝါ ဇဝန္တိ. ३१. जवनांमध्ये, परीत्त (कामावचर) जवनवीथीमध्ये कामावचर जवने सात वेळा किंवा सहा वेळाच जवतात (कार्य करतात). ၃၂. မန္ဒပ္ပဝတ္တိယံ ပန မရဏကာလာဒီသု ပဉ္စဝါရမေဝ. ३२. परंतु, मंद प्रवृत्तीमध्ये (मंद गतीने चालणाऱ्या वीथीमध्ये) जसे की मरणकाळ इत्यादी वेळी, ती केवळ पाच वेळाच जवतात. ၃၃. ဘဂဝတော ပန ယမကပါဋိဟာရိယကာလာဒီသု လဟုကပ္ပဝတ္တိယံ စတ္တာရိပဉ္စ ဝါ ပစ္စဝေက္ခဏစိတ္တာနိ ဘဝန္တီတိပိ ဝဒန္တိ. ३३. परंतु, भगवंतांच्या यमकप्रातिहार्य (यमकपाटिहारिय) इत्यादी काळातील जलद प्रवृत्तीमध्ये चार किंवा पाच प्रत्यवेक्षण चित्ते उत्पन्न होतात असेही म्हणतात. ၃၄. အာဒိကမ္မိကဿ ပန ပဌမကပ္ပနာယံ မဟဂ္ဂတဇဝနာနိအဘိညာဇဝနာနိ စ သဗ္ဗဒါပိ ဧကဝါရမေဝ ဇဝန္တိ, တတော ပရံ ဘဝင်္ဂပါတော. ३४. परंतु, आदिकर्मिकाच्या (सुरुवात करणाऱ्याच्या) पहिल्या अप्पणा (ध्यान) प्रसंगी महग्गत जवने आणि अभिज्ञा जवने नेहमी केवळ एकच वेळ जवतात, त्यानंतर भवांगपात (भवांगात जाणे) होतो. ၃၅. စတ္တာရော ပန မဂ္ဂုပ္ပာဒါ ဧကစိတ္တက္ခဏိကာ, တတော ပရံ ဒွေ တီဏိ ဖလစိတ္တာနိ ယထာရဟံ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, တတော ပရံ ဘဝင်္ဂပါတော. ३५. परंतु, चार मार्गोत्पाद (मार्गचित्तांची उत्पत्ती) हे केवळ एक चित्तक्षण टिकणारे असतात, त्यानंतर योग्यतेनुसार दोन किंवा तीन फलचित्ते उत्पन्न होतात आणि त्यानंतर भवांगपात होतो. ၃၆. နိရောဓသမာပတ္တိကာလေ ဒွိက္ခတ္တုံ စတုတ္ထာရုပ္ပဇဝနံ ဇဝတိ, တတော ပရံ နိရောဓံ ဖုသတိ. ३६. निरोधसमापत्तीच्या वेळी चौथे अरूप जवन (नेवसञ्ञानासञ्ञायतन जवन) दोन वेळा जवते, आणि त्यानंतर निरोधाचा (चित्तनिरोधाचा) स्पर्श होतो. ၃၇. ဝုဋ္ဌာနကာလေ စ အနာဂါမိဖလံ ဝါ အရဟတ္တဖလံ ဝါ ယထာရဟမေကဝါရံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဒ္ဓေ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ. ३७. आणि (निरोधसमापत्तीतून) उठण्याच्या वेळी अनागामीफल किंवा अर्हतफल योग्यतेनुसार एक वेळ उत्पन्न होऊन निरुद्ध झाल्यावर भवांगपातच होतो. ၃၈. သဗ္ဗတ္ထာပိ သမာပတ္တိဝီထိယံ ဘဝင်္ဂသောတော ဝိယ ဝီထိနိယမော နတ္ထီတိ ကတွာ ဗဟူနိပိ လဗ္ဘန္တီတိ. ३८. सर्वच समापत्ती वीथींमध्ये भवांग प्रवाहाप्रमाणे वीथीचा नियम नसतो, त्यामुळे अनेक जवने देखील प्राप्त होतात. ၃၉. သတ္တက္ခတ္တုံ ပရိတ္တာနိ, မဂ္ဂါဘိညာ သကိံ မတာ. ३९. परीत्त (कामावचर) जवने सात वेळा होतात, तर मार्ग आणि अभिज्ञा जवने केवळ एकच वेळा होतात असे मानले जाते. အဝသေသာနိ လဗ္ဘန္တိ, ဇဝနာနိ ဗဟူနိပိ. उर्वरित जवने अनेक वेळा देखील प्राप्त होतात. အယမေတ္ထ ဇဝနနိယမော. हा येथे 'जवन नियम' आहे. ပုဂ္ဂလဘေဒေါ पुद्गलभेद (व्यक्तींचे वर्गीकरण) ၄၀. ဒုဟေတုကာနမဟေတုကာနဉ္စ [Pg.28] ပနေတ္ထ ကိရိယဇဝနာနိ စေဝ အပ္ပနာဇဝနာနိ စ လဗ္ဘန္တိ. ४०. येथे द्विहेतुक आणि अहेतुक व्यक्तींच्या बाबतीत क्रिया जवने आणि अप्पणा जवने प्राप्त होतात. ၄၁. တထာ ဉာဏသမ္ပယုတ္တဝိပါကာနိ စ သုဂတိယံ. ४१. त्याचप्रमाणे, सुगतीमध्ये ज्ञानसंप्रयुक्त विपाकचित्ते देखील (प्राप्त होतात). ၄၂. ဒုဂ္ဂတိယံ ပန ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တာနိ စ မဟာဝိပါကာနိ န လဗ္ဘန္တိ. ४२. परंतु, दुर्गतीमध्ये ज्ञानविप्रयुक्त महाविपाक चित्ते देखील प्राप्त होत नाहीत. ၄၃. တိဟေတုကေသု စ ခီဏာသဝါနံ ကုသလာကုသလဇဝနာနိ န လဗ္ဘန္တိ. ४३. आणि त्रिहेतुक व्यक्तींमध्ये, क्षीणासवांना (अर्हतांना) कुशल आणि अकुशल जवने प्राप्त होत नाहीत. ၄၄. တထာ သေက္ခပုထုဇ္ဇနာနံ ကိရိယဇဝနာနိ. ४४. त्याचप्रमाणे, शैक्ष (सेक्ख) आणि पृथग्जनांना (पुथुज्जनांना) क्रिया जवने प्राप्त होत नाहीत. ၄၅. ဒိဋ္ဌိဂတသမ္ပယုတ္တဝိစိကိစ္ဆာဇဝနာနိ စ သေက္ခာနံ. ४५. तसेच, शैक्षांना दृष्टीगतसंप्रयुक्त (मिथ्यादृष्टीयुक्त) आणि विचिकित्सा (शंका) जवने प्राप्त होत नाहीत. ၄၆. အနာဂါမိပုဂ္ဂလာနံ ပန ပဋိဃဇဝနာနိ စ န လဗ္ဘန္တိ. ४६. परंतु, अनागामी पुद्गलांना (व्यक्तींना) प्रतिघ (द्वेषयुक्त) जवने प्राप्त होत नाहीत. ၄၇. လောကုတ္တရဇဝနာနိ စ ယထာရဟံ အရိယာနမေဝ သမုပ္ပဇ္ဇန္တီတိ. ४७. आणि लोकोत्तर जवने योग्यतेनुसार केवळ आर्य पुद्गलांनाच (आर्यांनाच) उत्पन्न होतात. ၄၈. အသေက္ခာနံ စတုစတ္တာလီသ သေက္ခာနမုဒ္ဒိသေ. ४८. अशैक्षांना (अर्हतांना) चव्वेचाळीस (४४) आणि शैक्षांच्या बाबतीत (चित्ते) निर्दिष्ट करावीत, ဆပ္ပညာသာဝသေသာနံ, စတုပညာသ သမ္ဘဝါ. त्यांना छप्पन्न (५६) आणि उर्वरित (पृथग्जनांना) चोपन्न (५४) चित्ते संभवतात. အယမေတ္ထ ပုဂ္ဂလဘေဒေါ. हा येथे 'पुद्गलभेद' (व्यक्तींचे वर्गीकरण) आहे. ဘူမိဝိဘာဂေါ भूमी विभाग (भूमींचे वर्गीकरण) ၄၉. ကာမာဝစရဘူမိယံ ပနေတာနိ သဗ္ဗာနိပိ ဝီထိစိတ္တာနိ ယထာရဟမုပလဗ္ဘန္တိ. ४९. कामावचर भूमीमध्ये तर ही सर्वच वीथीचित्ते योग्यतेनुसार प्राप्त होतात. ၅၀. ရူပါဝစရဘူမိယံ ပဋိဃဇဝနတဒါရမ္မဏဝဇ္ဇိတာနိ. ५०. रूपावचर भूमीमध्ये प्रतिघ जवन (द्वेषयुक्त जवन) आणि तदारम्मण वर्ज्य करून (इतर चित्ते प्राप्त होतात). ၅၁. အရူပါဝစရဘူမိယံ ပဌမမဂ္ဂရူပါဝစရဟသနဟေဋ္ဌိမာရုပ္ပဝဇ္ဇိတာနိ စ လဗ္ဘန္တိ. ५१. अरूपावचर भूमीमध्ये प्रथम मार्ग (सोतापत्ती मार्ग), रूपावचर चित्ते, हसितुप्पाद (हसविणारे चित्त) आणि खालची अरूप चित्ते वर्ज्य करून (इतर चित्ते) प्राप्त होतात. ၅၂. သဗ္ဗတ္ထာပိ [Pg.29] စ တံတံပသာဒရဟိတာနံ တံတံဒွါရိကဝီထိစိတ္တာနိ န လဗ္ဘန္တေဝ. ५२. आणि सर्वच ठिकाणी त्या त्या इंद्रियप्रसादाने (उदा. चक्षुप्रसाद इत्यादी) रहित असलेल्यांना त्या त्या द्वाराशी संबंधित वीथीचित्ते प्राप्त होतच नाहीत. ၅၃. အသညသတ္တာနံ ပန သဗ္ဗထာပိ စိတ္တပ္ပဝတ္တိ နတ္ထေဝါတိ. ५३. परंतु, असंज्ञी प्राण्यांच्या (असंञ्ञसत्त) बाबतीत कोणत्याही प्रकारे चित्तप्रवृत्ती नसतेच. ၅၄. အသီတိ ဝီထိစိတ္တာနိ, ကာမေ ရူပေ ယထာရဟံ. ५४. कामावचर भूमीत ऐंशी (८०) आणि रूपावचर भूमीत योग्यतेनुसार... စတုသဋ္ဌိ တထာရူပေ, ဒွေစတ္တာလီသ လဗ္ဘရေ. चौसष्ट (६४), तसेच अरूपावचर भूमीत बेचाळीस (४२) चित्ते प्राप्त होतात. အယမေတ္ထ ဘူမိဝိဘာဂေါ. हा येथे 'भूमी विभाग' आहे. ၅၅. ဣစ္စေဝံ ဆဒွါရိကစိတ္တပ္ပဝတ္တိ ယထာသမ္ဘဝံ ဘဝင်္ဂန္တရိတာ ယာဝတာယုကမဗ္ဗောစ္ဆိန္နာ ပဝတ္တတိ. ५५. अशा प्रकारे, सहा द्वारांमधील चित्तप्रवृत्ती योग्यतेनुसार भवांगाने अंतरित (मध्यंतरी भवांग येत राहून) होत, आयुष्य संपेपर्यंत अखंडपणे चालत राहते. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ ဝီထိသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंगहातील 'वीथिसंग्रह विभाग' नावाचा... စတုတ္ထော ပရိစ္ဆေဒေါ. चौथा परिच्छेद समाप्त. ၅. ဝီထိမုတ္တပရိစ္ဆေဒေါ ५. वीथिमुक्तपरिच्छेद (वीथिमुक्त विभाग) ၁. ဝီထိစိတ္တဝသေနေဝံ, ပဝတ္တိယမုဒီရိတော. १. अशा प्रकारे, वीथिचित्ताच्या नियमानुसार प्रवृत्तीचे (चित्तप्रवाहाचे) वर्णन केले गेले आहे. ပဝတ္တိသင်္ဂဟော နာမ, သန္ဓိယံ ဒါနိ ဝုစ္စတိ. आता 'प्रवृत्ती-संग्रह' अंतर्गत प्रतिसंधीचे (पुनर्जन्म जोडणीचे) वर्णन केले जात आहे. ၂. စတဿော ဘူမိယော, စတုဗ္ဗိဓာ ပဋိသန္ဓိ, စတ္တာရိ ကမ္မာနိ, စတုဓာ မရဏုပ္ပတ္တိ စေတိ ဝီထိမုတ္တသင်္ဂဟေ စတ္တာရိ စတုက္ကာနိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. २. वीथिमुक्त-संग्रहामध्ये चार चतुष्टये (चार गोष्टींचे चार गट) समजून घेतले पाहिजेत: चार भूमी (अस्तित्वाचे स्तर), चार प्रकारची प्रतिसंधी (पुनर्जन्म), चार प्रकारची कर्मे आणि चार प्रकारची मरणाची उत्पत्ती. ဘူမိစတုက္ကံ भूमी-चतुष्टय ၃. တတ္ထ အပါယဘူမိ ကာမသုဂတိဘူမိ ရူပါဝစရဘူမိ အရူပါဝစရဘူမိ စေတိ စတဿော ဘူမိယော နာမ. ३. त्यामध्ये अपायभूमी, कामसुगतीभूमी, रूपावचरभूमी आणि अरूपावचरभूमी अशा चार भूमी आहेत. ၄. တာသု နိရယော တိရစ္ဆာနယောနိ ပေတ္တိဝိသယော အသုရကာယော စေတိ အပါယဘူမိ စတုဗ္ဗိဓာ ဟောတိ. ४. त्यापैकी, अपायभूमी चार प्रकारची आहे: निरय (नरक), तिरश्चानयोनी (प्राणीयोनी), पेत्तिविसय (प्रेतलोक) आणि असुरकाय. ၅. မနုဿာ [Pg.30] စာတုမဟာရာဇိကာ တာဝတိံသာ ယာမာ တုသိတာ နိမ္မာနရတိ ပရနိမ္မိတဝသဝတ္တီ စေတိ ကာမသုဂတိဘူမိ သတ္တဝိဓာ ဟောတိ. ५. मनुष्य, चातुमहाराजिका, तावतिंस, याम, तुसित, निम्माणरती आणि परनिम्मितवसवत्ती अशी कामसुगतीभूमी सात प्रकारची आहे. ၆. သာ ပနာယမေကာဒသဝိဓာပိ ကာမာဝစရဘူမိစ္စေဝ သင်္ခံ ဂစ္ဆတိ. ६. ही अकरा प्रकारची भूमी मिळून 'कामावचरभूमी' म्हणूनच ओळखली जाते. ၇. ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇာ ဗြဟ္မပုရောဟိတာ မဟာဗြဟ္မာ စေတိ ပဌမဇ္ဈာနဘူမိ. ७. ब्रह्मपारिसज्जा, ब्रह्मपुरोहित आणि महाब्रह्मा ही प्रथमध्यानभूमी होय. ၈. ပရိတ္တာဘာ အပ္ပမာဏာဘာ အာဘဿရာ စေတိ ဒုတိယဇ္ဈာနဘူမိ. ८. परित्ताभा, अप्पमाणाभा आणि आभस्सरा ही द्वितीयध्यानभूमी होय. ၉. ပရိတ္တသုဘာ အပ္ပမာဏသုဘာ သုဘကိဏှာ စေတိ တတိယဇ္ဈာနဘူမိ. ९. परित्तसुभा, अप्पमाणसुभा आणि सुभकिण्हा ही तृतीयध्यानभूमी होय. ၁၀. ဝေဟပ္ဖလာ အသညသတ္တာ သုဒ္ဓါဝါသာ စေတိ စတုတ္ထဇ္ဈာနဘူမီတိ ရူပါဝစရဘူမိ သောဠသဝိဓာ ဟောတိ. १०. वेहप्फला, असंज्ञी प्राणी (असञ्ञसत्ता) आणि सुद्धावास ही चतुर्थध्यानभूमी होय; अशा प्रकारे रूपावचरभूमी सोळा प्रकारची आहे. ၁၁. အဝိဟာ အတပ္ပာ သုဒဿာ သုဒဿီ အကနိဋ္ဌာ စေတိ သုဒ္ဓါဝါသဘူမိ ပဉ္စဝိဓာ ဟောတိ. ११. अविहा, अतप्पा, सुदस्सा, सुदस्सी आणि अकनिठ्ठा अशी सुद्धावासभूमी पाच प्रकारची आहे. ၁၂. အာကာသာနဉ္စာယတနဘူမိ ဝိညာဏဉ္စာယတနဘူမိ အာကိဉ္စညာယတနဘူမိ နေဝသညာနာသညာယတနဘူမိ စေတိ အရူပဘူမိ စတုဗ္ဗိဓာ ဟောတိ. १२. आकासानञ्चायतनभूमी, विञ्ञाणञ्चायतनभूमी, आकिञ्चञ्ञायतनभूमी आणि नेवसञ्ञानासञ्ञायतनभूमी अशी अरूपभूमी चार प्रकारची आहे. ၁၃. ပုထုဇ္ဇနာ န လဗ္ဘန္တိ, သုဒ္ဓါဝါသေသု သဗ္ဗထာ. १३. शुद्धावास भूमीमध्ये पृथग्जन (सामान्य अज्ञानी लोक) कोणत्याही प्रकारे आढळत नाहीत. သောတာပန္နာ စ သကဒါဂါမိနော စာပိ ပုဂ္ဂလာ. तसेच सोतापन्न आणि सकदागामी हे पुद्गल (व्यक्ती) देखील तेथे आढळत नाहीत. ၁၄. အရိယာ နောပလဗ္ဘန္တိ, အသညာပါယဘူမိသု. १४. असंज्ञीभूमी आणि अपायभूमीमध्ये आर्य पुद्गल आढळत नाहीत. သေသဋ္ဌာနေသု လဗ္ဘန္တိ, အရိယာနရိယာပိ စ. उर्वरित स्थानांमध्ये आर्य आणि अनार्य दोन्ही प्रकारचे लोक आढळतात. ဣဒမေတ္ထ ဘူမိစတုက္ကံ. येथे भूमी-चतुष्टय समाप्त झाले. ပဋိသန္ဓိစတုက္ကံ प्रतिसंधी-चतुष्टय ၁၅. အပါယပဋိသန္ဓိ [Pg.31] ကာမသုဂတိပဋိသန္ဓိ ရူပါဝစရပဋိသန္ဓိ အရူပါဝစရပဋိသန္ဓိ စေတိ စတုဗ္ဗိဓာ ပဋိသန္ဓိ နာမ. १५. अपायप्रतिसंधी, कामसुगतीप्रतिसंधी, रूपावचरप्रतिसंधी आणि अरूपावचरप्रतिसंधी अशी प्रतिसंधी चार प्रकारची आहे. ၁၆. တတ္ထ အကုသလဝိပါကောပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏံ အပါယဘူမိယံ ဩက္ကန္တိက္ခဏေ ပဋိသန္ဓိ ဟုတွာ တတော ပရံ ဘဝင်္ဂံ ပရိယောသာနေ စဝနံ ဟုတွာ ဝေါစ္ဆိဇ္ဇတိ, အယမေကာပါယပဋိသန္ဓိ နာမ. १६. त्यामध्ये, अकुशल विपाक उपेक्षा-सहगत संतीरण चित्त हे अपायभूमीमध्ये अवतरण्याच्या क्षणी प्रतिसंधी होऊन, त्यानंतर भवांग होऊन आणि शेवटी च्युती होऊन खंडित होते. ही एक 'अपायप्रतिसंधी' होय. ၁၇. ကုသလဝိပါကောပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏံ ပန ကာမသုဂတိယံ မနုဿာနဉ္စေဝ ဇစ္စန္ဓာဒီနံ ဘုမ္မဿိတာနဉ္စ ဝိနိပါတိကာသုရာနံ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိဝသေန ပဝတ္တတိ. १७. परंतु, कुशल विपाक उपेक्षा-सहगत संतीरण चित्त हे कामसुगतीमध्ये जन्मांध इत्यादी मनुष्यांच्या आणि भूमीवर आश्रित असलेल्या विनिपातिक असुरांच्या प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती रूपाने प्रवृत्त होते. ၁၈. မဟာဝိပါကာနိ ပန အဋ္ဌ သဗ္ဗတ္ထာပိ ကာမသုဂတိယံ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိဝသေန ပဝတ္တန္တိ. १८. परंतु, आठ महाविपाक चित्ते कामसुगतीमध्ये सर्वत्र प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती रूपाने प्रवृत्त होतात. ၁၉. ဣမာ နဝ ကာမသုဂတိပဋိသန္ဓိယော နာမ. १९. या नऊ 'कामसुगतीप्रतिसंधी' म्हणून ओळखल्या जातात. ၂၀. သာ ပနာယံ ဒသဝိဓာပိ ကာမာဝစရပဋိသန္ဓိစ္စေဝ သင်္ခံ ဂစ္ဆတိ. २०. ही दहा प्रकारची प्रतिसंधी मिळून 'कामावचरप्रतिसंधी' म्हणूनच ओळखली जाते. ၂၁. တေသု စတုန္နံ အပါယာနံ မနုဿာနံ ဝိနိပါတိကာသုရာနဉ္စ အာယုပ္ပမာဏဂဏနာယ နိယမော နတ္ထိ. २१. त्यापैकी, चार अपाय, मनुष्य आणि विनिपातिक असुर यांच्या आयुष्याच्या प्रमाणाची कोणतीही निश्चित मर्यादा नाही. ၂၂. စာတုမဟာရာဇိကာနံ ပန ဒေဝါနံ ဒိဗ္ဗာနိ ပဉ္စဝဿသတာနိ အာယုပ္ပမာဏံ, မနုဿဂဏနာယ နဝုတိဝဿသတသဟဿပ္ပမာဏံ ဟောတိ, တတော စတုဂ္ဂုဏံ တာဝတိံသာနံ, တတော စတုဂ္ဂုဏံ ယာမာနံ, တတော စတုဂ္ဂုဏံ တုသိတာနံ, တတော စတုဂ္ဂုဏံ နိမ္မာနရတီနံ, တတော စတုဂ္ဂုဏံ ပရနိမ္မိတဝသဝတ္တီနံ. २२. परंतु, चातुमहाराजिका देवांचे आयुष्य पाचशे दिव्य वर्षे असते, जे मानवी गणनेनुसार नव्वद लाख (९०,००,०००) वर्षे होते. त्यापेक्षा चारपट तावतिंस देवांचे, त्यापेक्षा चारपट याम देवांचे, त्यापेक्षा चारपट तुसित देवांचे, त्यापेक्षा चारपट निम्माणरती देवांचे आणि त्यापेक्षा चारपट परनिम्मितवसवत्ती देवांचे आयुष्य असते. ၂၃. နဝသတဉ္စေကဝီသ-ဝဿာနံ ကောဋိယော တထာ. २३. तसेच नऊशे एकवीस कोटी वर्षे आणि ဝဿသတသဟဿာနိ, သဋ္ဌိ စ ဝသဝတ္တိသု. वसवत्ती देवांमध्ये साठ लाख वर्षे आयुष्य असते. ၂၄. ပဌမဇ္ဈာနဝိပါကံ [Pg.32] ပဌမဇ္ဈာနဘူမိယံ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိဝသေန ပဝတ္တတိ. २४. प्रथमध्यान विपाक चित्त हे प्रथमध्यानभूमीमध्ये प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती रूपाने प्रवृत्त होते. ၂၅. တထာ ဒုတိယဇ္ဈာနဝိပါကံ တတိယဇ္ဈာနဝိပါကဉ္စ ဒုတိယဇ္ဈာနဘူမိယံ. २५. त्याचप्रमाणे, द्वितीयध्यान विपाक आणि तृतीयध्यान विपाक चित्त हे द्वितीयध्यानभूमीमध्ये प्रवृत्त होते. ၂၆. စတုတ္ထဇ္ဈာနဝိပါကံ တတိယဇ္ဈာနဘူမိယံ. २६. चतुर्थध्यान विपाक चित्त हे तृतीयध्यानभूमीमध्ये प्रवृत्त होते. ၂၇. ပဉ္စမဇ္ဈာနဝိပါကံ စတုတ္ထဇ္ဈာနဘူမိယံ. २७. पंचमध्यान विपाक चित्त हे चतुर्थध्यानभूमीमध्ये प्रवृत्त होते. ၂၈. အသညသတ္တာနံ ပန ရူပမေဝ ပဋိသန္ဓိ ဟောတိ. တထာ တတော ပရံ ပဝတ္တိယံ စဝနကာလေ စ ရူပမေဝ ပဝတ္တိတွာ နိရုဇ္ဈတိ, ဣမာ ဆ ရူပါဝစရပဋိသန္ဓိယော နာမ. २८. परंतु, असंज्ञी प्राण्यांसाठी रूप (भौतिक शरीर) हेच प्रतिसंधी असते. त्याचप्रमाणे, त्यानंतर प्रवृत्तीकाळात आणि च्युतीकाळात केवळ रूपच प्रवृत्त होऊन निरुद्ध होते. या सहा 'रूपावचरप्रतिसंधी' म्हणून ओळखल्या जातात. ၂၉. တေသု ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇာနံ ဒေဝါနံ ကပ္ပဿ တတိယော ဘာဂေါ အာယုပ္ပမာဏံ. २९. त्यापैकी, ब्रह्मपारिसज्जा देवांचे आयुष्य कप्पाचा एक तृतीयांश भाग असते. ၃၀. ဗြဟ္မပုရောဟိတာနံ ဥပဍ္ဎကပ္ပော. ३०. ब्रह्मपुरोहित देवांचे आयुष्य अर्धा कप्प असते. ၃၁. မဟာဗြဟ္မာနံ ဧကော ကပ္ပော. ३१. महाब्रह्मा देवांचे आयुष्य एक कप्प असते. ၃၂. ပရိတ္တာဘာနံ ဒွေ ကပ္ပာနိ. ३२. परित्ताभा देवांचे आयुष्य दोन कप्प असते. ၃၃. အပ္ပမာဏာဘာနံ စတ္တာရိကပ္ပာနိ. ३३. अप्पमाणाभ देवांचे आयुष्य चार कल्प असते. ၃၄. အာဘဿရာနံ အဋ္ဌ ကပ္ပာနိ. ३४. आभस्सर देवांचे आयुष्य आठ कल्प असते. ၃၅. ပရိတ္တသုဘာနံ သောဠသ ကပ္ပာနိ. ३५. परित्तसुभ देवांचे आयुष्य सोळा कल्प असते. ၃၆. အပ္ပမာဏသုဘာနံ ဒွတ္တိံသ ကပ္ပာနိ. ३६. अप्पमाणसुभ देवांचे आयुष्य बत्तीस कल्प असते. ၃၇. သုဘကိဏှာနံ စတုသဋ္ဌိ ကပ္ပာနိ. ३७. सुभकिण्ह देवांचे आयुष्य चौसष्ट कल्प असते. ၃၈. ဝေဟပ္ဖလာနံ အသညသတ္တာနဉ္စ ပဉ္စကပ္ပသတာနိ. ३८. वेहप्फल आणि असञ्ञसत्त देवांचे आयुष्य पाचशे कल्प असते. ၃၉. အဝိဟာနံ ကပ္ပသဟဿာနိ. ३९. अविह देवांचे आयुष्य एक हजार कल्प असते. ၄၀. အတပ္ပာနံ ဒွေ ကပ္ပသဟဿာနိ. ४०. अतप्प देवांचे आयुष्य दोन हजार कल्प असते. ၄၁. သုဒဿာနံ စတ္တာရိ ကပ္ပသဟဿာနိ. ४१. सुदस्स देवांचे आयुष्य चार हजार कल्प असते. ၄၂. သုဒဿီနံ အဋ္ဌ ကပ္ပသဟဿာနိ. ४२. सुदस्सी देवांचे आयुष्य आठ हजार कल्प असते. ၄၃. အကနိဋ္ဌာနံ [Pg.33] သောဠသ ကပ္ပသဟဿာနိ. ४३. अकनिठ्ठ देवांचे आयुष्य सोळा हजार कल्प असते. ၄၄. ပဌမာရုပ္ပာဒိဝိပါကာနိ ပဌမာရုပ္ပာဒိဘူမီသု ယထာက္ကမံ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတိဝသေန ပဝတ္တန္တိ. ဣမာ စတဿော အရူပပဋိသန္ဓိယော နာမ. ४४. प्रथम अरूप विपाक चित्त इत्यादी, पहिल्या अरूप भूमी इत्यादींमध्ये अनुक्रमे प्रतिसंधी, भवंग आणि च्युती रूपाने प्रवृत्त होतात. यांना चार 'अरूप प्रतिसंधी' असे म्हणतात. ၄၅. တေသု ပန အာကာသာနဉ္စာယတနူပဂါနံ ဒေဝါနံ ဝီသတိကပ္ပသဟဿာနိ အာယုပ္ပမာဏံ. ४५. त्यांच्यामध्ये, आकासानञ्चायतन भूमीत उत्पन्न झालेल्या देवांचे आयुष्य वीस हजार कल्प असते. ၄၆. ဝိညာဏဉ္စာယတနူပဂါနံ ဒေဝါနံ စတ္တာလီသကပ္ပသဟဿာနိ. ४६. विञ्ञाणञ्चायतन भूमीत उत्पन्न झालेल्या देवांचे आयुष्य चाळीस हजार कल्प असते. ၄၇. အာကိဉ္စညာယတနူပဂါနံ ဒေဝါနံ သဋ္ဌိကပ္ပသဟဿာနိ. ४७. आकिञ्चञ्ञायतन भूमीत उत्पन्न झालेल्या देवांचे आयुष्य साठ हजार कल्प असते. ၄၈. နေဝသညာနာသညာယတနူပဂါနံ ဒေဝါနံ စတုရာသီတိကပ္ပသဟဿာနိ. ४८. नेवसञ्ञानासञ्ञायतन भूमीत उत्पन्न झालेल्या देवांचे आयुष्य चौऱ्याऐंशी हजार कल्प असते. ၄၉. ပဋိသန္ဓိ ဘဝင်္ဂဉ္စ, တထာ စဝနမာနသံ. ४९. प्रतिसंधी, भवंग आणि तसेच च्युती चित्त, ဧကမေဝ တထေဝေကဝိသယဉ္စေကဇာတိယံ. हे (एकाच जन्मात) एकच असते, तसेच त्यांचा विषयही एकच असतो आणि ते एकाच जातीचे असते. ဣဒမေတ္ထ ပဋိသန္ဓိစတုက္ကံ. येथे हे प्रतिसंधी चतुष्क समाप्त झाले. ကမ္မစတုက္ကံ कर्म चतुष्क ၅၀. ဇနကံ ဥပတ္ထမ္ဘကံ ဥပပီဠကံ ဥပဃာတကဉ္စေတိ ကိစ္စဝသေန. ५०. कार्याच्या दृष्टीने: जनक, उपस्तंभक, उपपीडक आणि उपघातक (असे कर्माचे प्रकार आहेत). ၅၁. ဂရုကံ အာသန္နံ အာစိဏ္ဏံ ကဋတ္တာကမ္မဉ္စေတိ ပါကဒါနပရိယာယေန. ५१. विपाक देण्याच्या क्रमाच्या दृष्टीने: गरुक, आसन्न, आचिर्ण आणि कटत्ता कर्म. ၅၂. ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယံ ဥပပဇ္ဇဝေဒနီယံ အပရာပရိယဝေဒနီယံ အဟောသိကမ္မဉ္စေတိ ပါကကာလဝသေန စတ္တာရိ ကမ္မာနိ နာမ. ५२. विपाकाच्या काळाच्या दृष्टीने: दृष्टधर्मवेदनीय, उपपद्यवेदनीय, अपरापरियवेदनीय आणि अहोसिकर्म अशी चार कर्मे आहेत. ၅၃. တထာ အကုသလံ ကာမာဝစရကုသလံ ရူပါဝစရကုသလံ အရူပါဝစရကုသလဉ္စေတိ ပါကဌာနဝသေန. ५३. तसेच, विपाकाच्या स्थानाच्या दृष्टीने: अकुशल, कामावचर कुशल, रूपावचर कुशल आणि अरूपावचर कुशल (असे कर्माचे प्रकार आहेत). ၅၄. တတ္ထ [Pg.34] အကုသလံ ကာယကမ္မံ ဝစီကမ္မံ မနောကမ္မဉ္စေတိ ကမ္မဒွါရဝသေန တိဝိဓံ ဟောတိ. ५४. त्यामध्ये, अकुशल कर्म हे कर्मद्वाराच्या दृष्टीने तीन प्रकारचे असते: कायकर्म, वचीकर्म आणि मनोकर्म. ၅၅. ကထံ? ပါဏာတိပါတော အဒိန္နာဒါနံ ကာမေသုမိစ္ဆာစာရော စေတိ ကာယဝိညတ္တိသင်္ခါတေ ကာယဒွါရေ ဗာဟုလ္လဝုတ္တိတော ကာယကမ္မံ နာမ. ५५. कसे? प्राणातिपात, अदिन्नादान आणि कामेसुमिच्छाचार हे 'कायविज्ञप्ती' नावाच्या कायद्वारातून प्रामुख्याने घडत असल्यामुळे त्यांना 'कायकर्म' म्हणतात. ၅၆. မုသာဝါဒေါ ပိသုဏဝါစာ ဖရုသဝါစာ သမ္ဖပ္ပလာပေါ စေတိ ဝစီဝိညတ္တိသင်္ခါတေ ဝစီဒွါရေ ဗာဟုလ္လဝုတ္တိတော ဝစီကမ္မံ နာမ. ५६. मुसावाद, पिसुणवाचा, फरुसवाचा आणि सम्फप्पलाप हे 'वचीविज्ञप्ती' नावाच्या वचीद्वारातून प्रामुख्याने घडत असल्यामुळे त्यांना 'वचीकर्म' म्हणतात. ၅၇. အဘိဇ္ဈာ ဗျာပါဒေါ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိ စေတိ အညတြာပိ ဝိညတ္တိယာ မနသ္မိံယေဝ ဗာဟုလ္လဝုတ္တိတော မနောကမ္မံ နာမ. ५७. अभिज्झा, ब्यापाद आणि मिच्छादिट्ठी हे कोणत्याही बाह्य विज्ञप्तीशिवाय केवळ मनातच प्रामुख्याने घडत असल्यामुळे त्यांना 'मनोकर्म' म्हणतात. ၅၈. တေသု ပါဏာတိပါတော ဖရုသဝါစာ ဗျာပါဒေါ စ ဒေါသမူလေန ဇာယန္တိ. ५८. त्यांच्यापैकी प्राणातिपात, फरुसवाचा आणि ब्यापाद हे दोषमूलाने उत्पन्न होतात. ၅၉. ကာမေသုမိစ္ဆာစာရော အဘိဇ္ဈာ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိ စ လောဘမူလေန. ५९. कामेसुमिच्छाचार, अभिज्झा आणि मिच्छादिट्ठी हे लोभमूलाने उत्पन्न होतात. ၆၀. သေသာနိ စတ္တာရိပိ ဒွီဟိ မူလေဟိ သမ္ဘဝန္တိ. ६०. उरलेली चारही कर्मे दोन मुळांपासून उत्पन्न होतात. ၆၁. စိတ္တုပ္ပာဒဝသေန ပနေတံ အကုသလံ သဗ္ဗထာပိ ဒွါဒသဝိဓံ ဟောတိ. ६१. चित्तोत्पादाच्या दृष्टीने मात्र हे अकुशल कर्म सर्व प्रकारे बारा प्रकारचे असते. ၆၂. ကာမာဝစရကုသလမ္ပိ ကာယဒွါရေ ပဝတ္တံ ကာယကမ္မံ, ဝစီဒွါရေ ပဝတ္တံ ဝစီကမ္မံ, မနောဒွါရေ ပဝတ္တံ မနောကမ္မဉ္စေတိ ကမ္မဒွါရဝသေန တိဝိဓံ ဟောတိ. ६२. कामावचर कुशल कर्म देखील कर्मद्वाराच्या दृष्टीने तीन प्रकारचे असते: कायद्वारातून प्रवृत्त होणारे कायकर्म, वचीद्वारातून प्रवृत्त होणारे वचीकर्म आणि मनद्वारातून प्रवृत्त होणारे मनोकर्म. ၆၃. တထာ ဒါနသီလဘာဝနာဝသေန. ६३. तसेच ते दान, शील आणि भावना यांच्या दृष्टीने (तीन प्रकारचे असते). ၆၄. စိတ္တုပ္ပာဒဝသေန ပနေတံ အဋ္ဌဝိဓံ ဟောတိ. ६४. चित्तोत्पादाच्या दृष्टीने मात्र ते आठ प्रकारचे असते. ၆၅. ဒါနသီလဘာဝနာပစာယနဝေယျာဝစ္စပတ္တိဒါနပတ္တာနုမောဒနဓမ္မဿဝနဓမ္မဒေသနာ ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မဝသေန ဒသဝိဓံ ဟောတိ. ६५. दान, शील, भावना, अपचायन, वेय्यावच्च, पत्तिदान, पत्तानुमोदन, धम्मस्सवन, धम्मदेसना आणि दिट्ठिजुकर्म यांच्या दृष्टीने ते दहा प्रकारचे असते. ၆၆. တံ [Pg.35] ပနေတံ ဝီသတိဝိဓမ္ပိ ကာမာဝစရကမ္မမိစ္စေဝ သင်္ခံ ဂစ္ဆတိ. ६६. हे सर्व वीस प्रकारचे कर्म 'कामावचर कर्म' या संज्ञेस पात्र ठरते. ၆၇. ရူပါဝစရကုသလံ ပန မနောကမ္မမေဝ, တဉ္စ ဘာဝနာမယံ အပ္ပနာပ္ပတ္တံ, ဈာနင်္ဂဘေဒေန ပဉ္စဝိဓံ ဟောတိ. ६७. परंतु रूपावचर कुशल कर्म हे केवळ मनोकर्मच असते; ते भावनामय असून अर्पणावस्थेला प्राप्त झालेले असते आणि ध्यान-अंगांच्या भेदानुसार ते पाच प्रकारचे असते. ၆၈. တထာ အရူပါဝစရကုသလဉ္စ မနောကမ္မံ, တမ္ပိ ဘာဝနာမယံ အပ္ပနာပ္ပတ္တံ. အာရမ္မဏဘေဒေန စတုဗ္ဗိဓံ ဟောတိ. ६८. तसेच अरूपावचर कुशल कर्म देखील केवळ मनोकर्मच असते; तेही भावनामय असून अर्पणावस्थेला प्राप्त झालेले असते आणि आलंबन भेदानुसार ते चार प्रकारचे असते. ၆၉. ဧတ္ထာကုသလကမ္မမုဒ္ဓစ္စရဟိတံ အပါယဘူမိယံ ပဋိသန္ဓိံ ဇနေတိ, ပဝတ္တိယံ ပန သဗ္ဗမ္ပိ ဒွါဒသဝိဓံ သတ္တာကုသလပါကာနိ သဗ္ဗတ္ထာပိ ကာမလောကေ ရူပလောကေ စ ယထာရဟံ ဝိပစ္စတိ. ६९. येथे, उद्धच्च विरहित अकुशल कर्म हे अपाय भूमीत प्रतिसंधी निर्माण करते; परंतु प्रवृत्ती काळात सर्व बारा प्रकारचे अकुशल कर्म हे सात अकुशल विपाक चित्तांच्या रूपाने कामलोकात आणि रूपलोकात योग्यतेनुसार विपाकास प्राप्त होते. ၇၀. ကာမာဝစရကုသလမ္ပိ ကာမသုဂတိယမေဝ ပဋိသန္ဓိံ ဇနေတိ, တထာ ပဝတ္တိယဉ္စ မဟာဝိပါကာနိ, အဟေတုကဝိပါကာနိ ပန အဋ္ဌပိ သဗ္ဗတ္ထာပိ ကာမလောကေ ရူပလောကေ စ ယထာရဟံ ဝိပစ္စတိ. ७०. कामावचर कुशल सुद्धा कामसुगतीमध्येच प्रतिसंधी उत्पन्न करते, तसेच प्रवृत्तीकाळात (जीवनात) महाविपाक आणि आठ अहेतुक विपाक देखील सर्वत्र कामलोकात व रूपलोकात योग्यतेनुसार विपक्व होतात। ၇၁. တတ္ထာပိ တိဟေတုကမုက္ကဋ္ဌံ ကုသလံ တိဟေတုကံ ပဋိသန္ဓိံ ဒတွာ ပဝတ္တေ သောဠသ ဝိပါကာနိ ဝိပစ္စတိ. ७१. त्यामध्ये सुद्धा, त्रिहेतुक उत्कृष्ट कुशल हे त्रिहेतुक प्रतिसंधी देऊन प्रवृत्तीकाळात सोळा विपाक विपक्व करते। ၇၂. တိဟေတုကမောမကံ ဒွိဟေတုကမုက္ကဋ္ဌဉ္စ ကုသလံ ဒွိဟေတုကံ ပဋိသန္ဓိံ ဒတွာ ပဝတ္တေ တိဟေတုကရဟိတာနိ ဒွါဒသ ဝိပါကာနိ ဝိပစ္စတိ. ७२. त्रिहेतुक निकृष्ट आणि द्विहेतुक उत्कृष्ट कुशल हे द्विहेतुक प्रतिसंधी देऊन प्रवृत्तीकाळात त्रिहेतुकविरहित बारा विपाक विपक्व करते। ၇၃. ဒွိဟေတုကမောမကံ ပန ကုသလံ အဟေတုကမေဝ ပဋိသန္ဓိံ ဒေတိ, ပဝတ္တေ စ အဟေတုကဝိပါကာနေဝ ဝိပစ္စတိ. ७३. परंतु द्विहेतुक निकृष्ट कुशल हे अहेतुकच प्रतिसंधी देते आणि प्रवृत्तीकाळात केवळ अहेतुक विपाकच विपक्व होतात। ၇၄. အသင်္ခါရံ သသင်္ခါရ-ဝိပါကာနိ န ပစ္စတိ. ७४. असंस्कारिक कुशल हे ससंस्कारिक विपाक विपक्व करत नाही। သသင်္ခါရမသင်္ခါရ-ဝိပါကာနီတိ ကေစန. ससंस्कारिक हे असंस्कारिक विपाक विपक्व करत नाही, असे काही आचार्य मानतात। တေသံ ဒွါဒသ ပါကာနိ, ဒသာဋ္ဌ စ ယထာက္ကမံ; ယထာဝုတ္တာနုသာရေန ယထာသမ္ဘဝမုဒ္ဒိသေ. त्यांच्या मते अनुक्रमे बारा, दहा आणि आठ विपाक, पूर्वोक्त नियमांनुसार जसे संभव असेल तसे निर्दिष्ट करावेत। ၇၅. ရူပါဝစရကုသလံ [Pg.36] ပန ပဌမဇ္ဈာနံ ပရိတ္တံ ဘာဝေတွာ ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇေသု ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ७५. रूपावचर कुशल कर्मामध्ये, प्रथम ध्यानाची परीत्त (मर्यादित) भावना करून मनुष्य ब्रह्मपारिसज्ज देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၇၆. တဒေဝ မဇ္ဈိမံ ဘာဝေတွာ ဗြဟ္မပုရောဟိတေသု. ७६. त्याचीच मध्यम भावना करून ब्रह्मपुरोहित देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၇၇. ပဏီတံ ဘာဝေတွာ မဟာဗြဟ္မေသု. ७७. त्याचीच प्रणीत (उत्कृष्ट) भावना करून महाब्रह्म देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၇၈. တထာ ဒုတိယဇ္ဈာနံ တတိယဇ္ဈာနဉ္စ ပရိတ္တံ ဘာဝေတွာ ပရိတ္တာဘေသု. ७८. तसेच द्वितीय आणि तृतीय ध्यानाची परीत्त भावना करून परीत्ताभ देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၇၉. မဇ္ဈိမံ ဘာဝေတွာ အပ္ပမာဏာဘေသု. ७९. मध्यम भावना करून अप्रमाणाभ देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၀. ပဏီတံ ဘာဝေတွာ အာဘဿရေသု. ८०. प्रणीत भावना करून आभास्सर देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၁. စတုတ္ထဇ္ဈာနံ ပရိတ္တံ ဘာဝေတွာ ပရိတ္တသုဘေသု. ८१. चतुर्थ ध्यानाची परीत्त भावना करून परीत्तसुभ देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၂. မဇ္ဈိမံ ဘာဝေတွာ အပ္ပမာဏသုဘေသု. ८२. मध्यम भावना करून अप्रमाणसुभ देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၃. ပဏီတံ ဘာဝေတွာ သုဘကိဏှေသု. ८३. प्रणीत भावना करून सुभकिण्ह देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၄. ပဉ္စမဇ္ဈာနံ ဘာဝေတွာ ဝေဟပ္ဖလေသု. ८४. पंचम ध्यानाची भावना करून वेहप्फल देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၅. တဒေဝ သညာဝိရာဂံ ဘာဝေတွာ အသညသတ္တေသု. ८५. त्याचीच संज्ञा-विराग (संज्ञेचा वैराग्यभाव) करून भावना केल्यास असंज्ञसत्त देवांमध्ये उत्पन्न होतो। ၈၆. အနာဂါမိနော ပန သုဒ္ဓါဝါသေသု ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ८६. परंतु अनागामी पुद्गल शुद्धावास लोकांमध्ये उत्पन्न होतात। ၈၇. အရူပါဝစရကုသလဉ္စ ယထာက္ကမံ ဘာဝေတွာ အာရုပ္ပေသု ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ. ८७. आणि अरूपावचर कुशल कर्माची अनुक्रमे भावना करून अरूप लोकांमध्ये उत्पन्न होतात। ၈၈. ဣတ္ထံ မဟဂ္ဂတံ ပုညံ, ယထာဘူမိဝဝတ္ထိတံ. ८८. अशा प्रकारे, आपापल्या भूमीनुसार निश्चित केलेले महग्गत पुण्य, ဇနေတိ သဒိသံ ပါကံ, ပဋိသန္ဓိပဝတ္တိယံ. प्रतिसंधी आणि प्रवृत्तीकाळात स्वतःसारखाच विपाक उत्पन्न करते। ဣဒမေတ္ထ ကမ္မစတုက္ကံ. हे येथे 'कर्म-चतुष्क' (कर्माचे चार प्रकार) आहे। စုတိပဋိသန္ဓိက္ကမော च्युती-प्रतिसंधी क्रम (मृत्यू आणि पुनर्जन्माचा क्रम) ၈၉. အာယုက္ခယေန ကမ္မက္ခယေန ဥဘယက္ခယေန ဥပစ္ဆေဒကကမ္မုနာ စေတိ စတုဓာ မရဏုပ္ပတ္တိ နာမ. ८९. आयुष्य संपल्याने, कर्म संपल्याने, दोन्ही संपल्याने आणि उपच्छेदक कर्माने, अशा चार प्रकारे मृत्यूची उत्पत्ती होते। ၉၀. တထာ [Pg.37] စ မရန္တာနံ ပန မရဏကာလေ ယထာရဟံ အဘိမုခီဘူတံ ဘဝန္တရေ ပဋိသန္ဓိဇနကံ ကမ္မံ ဝါ, တံကမ္မကရဏကာလေ ရူပါဒိကမုပလဒ္ဓပုဗ္ဗမုပကရဏဘူတဉ္စ ကမ္မနိမိတ္တံ ဝါ, အနန္တရမုပ္ပဇ္ဇမာနဘဝေ ဥပလဘိတဗ္ဗမုပဘောဂဘူတဉ္စ ဂတိနိမိတ္တံ ဝါ ကမ္မဗလေန ဆန္နံ ဒွါရာနံ အညတရသ္မိံ ပစ္စုပဋ္ဌာတိ, တတော ပရံ တမေဝ တထောပဋ္ဌိတံ အာရမ္မဏံ အာရဗ္ဘ ဝိပစ္စမာနကကမ္မာနုရူပံ ပရိသုဒ္ဓံ ဥပက္ကိလိဋ္ဌံ ဝါ ဥပလဘိတဗ္ဗဘဝါနုရူပံ တတ္ထောဏတံဝ စိတ္တသန္တာနံ အဘိဏှံ ပဝတ္တတိ ဗာဟုလ္လေန, တမေဝ ဝါ ပန ဇနကဘူတံ ကမ္မံ အဘိနဝကရဏဝသေန ဒွါရပ္ပတ္တံ ဟောတိ. ९०. आणि तसेच, मरणाऱ्या व्यक्तींच्या मृत्यूसमयी, योग्यतेनुसार दुसऱ्या जन्मात प्रतिसंधी उत्पन्न करणारे 'कर्म' वा, ते कर्म करताना पूर्वी अनुभवलेले रूप इत्यादी उपकरणांच्या रूपातील 'कर्मनिमित्त' वा, किंवा त्यानंतर उत्पन्न होणाऱ्या जन्मात अनुभवायला मिळणारे 'गतिनिमित्त' कर्माच्या बलाने सहा द्वारांपैकी कोणत्याही एका द्वारावर उपस्थित होते। त्यानंतर, त्याच प्रकारे उपस्थित झालेल्या आलंबनाचा आश्रय घेऊन, विपक्व होणाऱ्या कर्माच्या अनुरूप, शुद्ध किंवा क्लिष्ट, आणि प्राप्त होणाऱ्या जन्माच्या अनुरूप तिकडेच झुकलेली चित्तसंतती वारंवार बहुतांश करून प्रवृत्त होते; किंवा तेच जनकभूत कर्म नवीन करण्याच्या रूपाने द्वाराप्रत पोहोचते। ၉၁. ပစ္စာသန္နမရဏဿ တဿ ဝီထိစိတ္တာဝသာနေ ဘဝင်္ဂက္ခယေ ဝါ စဝနဝသေန ပစ္စုပ္ပန္နဘဝပရိယောသာနဘူတံ စုတိစိတ္တံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဇ္ဈတိ, တသ္မိံ နိရုဒ္ဓါဝသာနေ တဿာနန္တရမေဝ တထာဂဟိတံ အာရမ္မဏံ အာရဗ္ဘ သဝတ္ထုကံ အဝတ္ထုကမေဝ ဝါ ယထာရဟံ အဝိဇ္ဇာနုသယပရိက္ခိတ္တေန တဏှာနုသယမူလကေန သင်္ခါရေန ဇနိယမာနံ သမ္ပယုတ္တေဟိ ပရိဂ္ဂယှမာနံ သဟဇာတာနမဓိဋ္ဌာနဘာဝေန ပုဗ္ဗင်္ဂမဘူတံ ဘဝန္တရပဋိသန္ဓာနဝသေန ပဋိသန္ဓိသင်္ခါတံ မာနသံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနမေဝ ပတိဋ္ဌာတိ ဘဝန္တရေ. ९१. त्या मरणासन्न व्यक्तीच्या वीथिचित्ताच्या शेवटी किंवा भवांगाच्या क्षयानंतर, च्युती रूपाने वर्तमान जन्माचा अंत करणारे च्युतीचित्त उत्पन्न होऊन निरुद्ध होते। ते निरुद्ध झाल्यावर लगेचच, त्या प्रकारे ग्रहण केलेल्या आलंबनाचा आश्रय घेऊन, सवस्तुक किंवा अवस्तुक योग्यतेनुसार, अविद्या-अनुशयाने वेढलेल्या आणि तृष्णा-अनुशयावर आधारित संस्कारांद्वारे उत्पन्न केले जाणारे, संप्रयुक्त धर्मांनी ग्रहण केले जाणारे, सहजात धर्मांचे अधिष्ठान असल्याने पूर्वगामी असणारे, दुसऱ्या जन्माशी जोडण्याच्या रूपाने 'प्रतिसंधी' नावाचे चित्त उत्पन्न होत असतानाच दुसऱ्या जन्मात प्रतिष्ठित होते। ၉၂. မရဏာသန္နဝီထိယံ ပနေတ္ထ မန္ဒပ္ပဝတ္တာနိ ပဉ္စေဝ ဇဝနာနိ ပါဋိကင်္ခိတဗ္ဗာနိ, တသ္မာ ယဒိ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏေသု အာပါထဂတေသု ဓရန္တေသွေဝ မရဏံ ဟောတိ, တဒါ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါနမ္ပိ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏတာ လဗ္ဘတီတိ ကတွာ ကာမာဝစရပဋိသန္ဓိယာ ဆဒွါရဂ္ဂဟိတံ ကမ္မနိမိတ္တံ ဂတိနိမိတ္တဉ္စ ပစ္စုပ္ပန္နမတီတာရမ္မဏံ ဥပလဗ္ဘတိ, ကမ္မံ ပန အတီတမေဝ, တဉ္စ မနောဒွါရဂ္ဂဟိတံ, တာနိ ပန သဗ္ဗာနိပိ ပရိတ္တဓမ္မဘူတာနေဝါရမ္မဏာနိ. ९२. येथे मरणासन्न वीथीमध्ये मंद गतीने प्रवृत्त होणारे पाचच जवन अपेक्षित असतात। त्यामुळे जर वर्तमान आलंबन द्वारावर आलेले असतानाच मृत्यू झाला, तर प्रतिसंधी आणि भवांग यांना सुद्धा वर्तमान आलंबन प्राप्त होते। कामावचर प्रतिसंधीमध्ये सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले कर्मनिमित्त आणि गतिनिमित्त हे वर्तमान किंवा अतीत आलंबन म्हणून प्राप्त होते; परंतु कर्म हे केवळ अतीतच असते आणि ते मनोद्वाराने ग्रहण केले जाते। आणि ती सर्व आलंबने केवळ परीत्त (कामावचर) धर्माच्या रूपातीलच असतात। ၉၃. ရူပါဝစရပဋိသန္ဓိယာ ပန ပညတ္တိဘူတံ ကမ္မနိမိတ္တမေဝါရမ္မဏံ ဟောတိ. ९३. परंतु रूपावचर प्रतिसंधीमध्ये प्रज्ञप्तिरूप (संकल्पनात्मक) कर्मनिमित्तच आलंबन असते। ၉၄. တထာ [Pg.38] အရူပပဋိသန္ဓိယာ စ မဟဂ္ဂတဘူတံ ပညတ္တိဘူတဉ္စ ကမ္မနိမိတ္တမေဝ ယထာရဟမာရမ္မဏံ ဟောတိ. ९४. तसेच अरूप प्रतिसंधीमध्ये सुद्धा महग्गत किंवा प्रज्ञप्तिरूप कर्मनिमित्तच योग्यतेनुसार आलंबन असते। ၉၅. အသညသတ္တာနံ ပန ဇီဝိတနဝကမေဝ ပဋိသန္ဓိဘာဝေန ပတိဋ္ဌာတိ, တသ္မာ တေ ရူပပဋိသန္ဓိကာ နာမ. ९५. परंतु असंज्ञसत्त जीवांच्या बाबतीत केवळ जीवित-नवकच प्रतिसंधी रूपाने प्रतिष्ठित होते, म्हणून त्यांना 'रूपप्रतिसंधीक' म्हणतात। ၉၆. အရူပါ အရူပပဋိသန္ဓိကာ. ९६. अरूप लोकांतील जीव हे 'अरूपप्रतिसंधीक' असतात। ၉၇. သေသာ ရူပါရူပပဋိသန္ဓိကာ. ९७. उर्वरित सर्व जीव हे 'रूप-अरूपप्रतिसंधीक' असतात। ၉၈. အာရုပ္ပစုတိယာ ဟောန္တိ, ဟေဋ္ဌိမာရုပ္ပဝဇ္ဇိတာ. ९८. अरूप लोकातील च्युतीनंतर, खालचे अरूप लोक वगळून, ပရမာရုပ္ပသန္ဓီ စ, တထာ ကာမတိဟေတုကာ. उच्चतर अरूप प्रतिसंधी आणि तसेच कामावचर त्रिहेतुक प्रतिसंधी होतात। ရူပါဝစရစုတိယာ, အဟေတုရဟိတာ သိယုံ; သဗ္ဗာ ကာမတိဟေတုမှာ, ကာမေသွေဝ ပနေတရာ. रूपावचर च्युतीनंतर अहेतुकविरहित प्रतिसंधी होतात; कामावचर त्रिहेतुक च्युतीनंतर सर्व प्रकारच्या प्रतिसंधी होतात, परंतु इतरांच्या (द्विहेतुक आणि अहेतुक) च्युतीनंतर केवळ कामलोकातच प्रतिसंधी होते। အယမေတ္ထ စုတိပဋိသန္ဓိက္ကမော. हा येथे च्युती-प्रतिसंधी क्रम आहे। ၉၉. ဣစ္စေဝံ ဂဟိတပဋိသန္ဓိကာနံ ပန ပဋိသန္ဓိနိရောဓာနန္တရတော ပဘုတိ တမေဝါရမ္မဏမာရဗ္ဘ တဒေဝ စိတ္တံ ယာဝ စုတိစိတ္တုပ္ပာဒါ အသတိ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒေ ဘဝဿ အင်္ဂဘာဝေန ဘဝင်္ဂသန္တတိသင်္ခါတံ မာနသံ အဗ္ဗောစ္ဆိန္နံ နဒီသောတော ဝိယ ပဝတ္တတိ. ९९. अशा प्रकारे प्रतिसंधी ग्रहण केलेल्या जीवांच्या बाबतीत, प्रतिसंधीच्या निरोधानंतर लगेचच, त्याच आलंबनाचा आश्रय घेऊन, तेच चित्त च्युतीचित्त उत्पन्न होईपर्यंत, वीथिचित्त उत्पन्न होत नसताना, अस्तित्वाचे अंग म्हणून 'भवांगसंतती' नावाचे चित्त नदीच्या प्रवाहाप्रमाणे अखंड प्रवृत्त राहते। ၁၀၀. ပရိယောသာနေ စ စဝနဝသေန စုတိစိတ္တံ ဟုတွာ နိရုဇ္ဈတိ. १००. आणि शेवटी, च्युती रूपाने च्युतीचित्त होऊन निरुद्ध होते। ၁၀၁. တတော ပရဉ္စ ပဋိသန္ဓာဒယော ရထစက္ကမိဝ ယထာက္ကမံ ဧဝ ပရိဝတ္တန္တာ ပဝတ္တန္တိ. १०१. आणि त्यानंतर, प्रतिसंधी इत्यादी अवस्था रथाच्या चाकाप्रमाणे अनुक्रमे फिरत राहतात। ၁၀၂. ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂဝီထိယော, စုတိစေဟ တထာ ဘဝန္တရေ. १०२. प्रतिसंधी, भवंग, वीथी आणि च्युती या जन्मात तसेच दुसऱ्या जन्मात (भवांतरात) घडतात. ပုန သန္ဓိ ဘဝင်္ဂမိစ္စယံ, ပရိဝတ္တတိ စိတ္တသန္တတိ. पुन्हा प्रतिसंधी, भवंग इत्यादी रूपाने चित्तसंतती (चित्ताचा प्रवाह) फिरत राहते. ပဋိသင်္ခါယပနေတမဒ္ဓုဝံ[Pg.39], အဓိဂန္တွာ ပဒမစ္စုတံ ဗုဓာ; သုသမုစ္ဆိန္နသိနေဟဗန္ဓနာ, သမမေဿန္တိ စိရာယ သုဗ္ဗတာ. हे (सर्व) अनित्य आहे असा विचार करून, अच्युत पद (निर्वाण) प्राप्त करून, स्नेहाचे (तृष्णेचे) बंधन पूर्णपणे तोडून टाकलेले, उत्तम व्रत आचरणारे ज्ञानी लोक चिरंतन शांतता प्राप्त करतील. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ ဝီထိမုတ္တသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंगहातील 'वीथीमुक्तसंग्रह विभाग' नावाचा हा... ပဉ္စမော ပရိစ္ဆေဒေါ. पाचवा परिच्छेद. ၆. ရူပပရိစ္ဆေဒေါ ६. रूपपरिच्छेद (रूपाचे वर्गीकरण) ၁. ဧတ္တာဝတာ ဝိဘတ္တာ ဟိ, သပ္ပဘေဒပ္ပဝတ္တိကာ. १. आतापर्यंत, त्यांच्या प्रभेदांसह आणि प्रवृत्तीसह विभागणी केली गेली आहे... စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ, ရူပံ ဒါနိ ပဝုစ္စတိ. ...चित्त आणि चेतसिक धर्मांची. आता रूपाचे वर्णन केले जात आहे. ၂. သမုဒ္ဒေသာ ဝိဘာဂါ စ, သမုဋ္ဌာနာ ကလာပတော. २. समुद्देश, विभाग, समुत्थान, कलाप... ပဝတ္တိက္ကမတော စေတိ, ပဉ္စဓာ တတ္ထ သင်္ဂဟော. ...आणि प्रवृत्तीचा क्रम या पाच प्रकारे रूपाचा संग्रह केला आहे. ရူပသမုဒ္ဒေသော रूपसमुद्देश ၃. စတ္တာရိ မဟာဘူတာနိ, စတုန္နဉ္စ မဟာဘူတာနံ ဥပါဒါယရူပန္တိ ဒုဝိဓမ္ပေတံ ရူပံ ဧကာဒသဝိဓေန သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆတိ. ३. चार महाभूत आणि चार महाभूतांवर आश्रित असलेले उपादाय रूप, अशा दोन प्रकारचे हे रूप अकरा प्रकारांमध्ये वर्गीकृत केले जाते. ၄. ကထံ? ပထဝီဓာတု အာပေါဓာတု တေဇောဓာတု ဝါယောဓာတု ဘူတရူပံ နာမ. ४. कसे? पथवीधातू, आपोधातू, तेजोधातू आणि वायोधातू यांना 'भूत रूप' म्हणतात. ၅. စက္ခု သောတံ ဃာနံ ဇိဝှာ ကာယော ပသာဒရူပံ နာမ. ५. चक्षु, सोत, घान, जिव्हा आणि काय यांना 'प्रसाद रूप' म्हणतात. ၆. ရူပံ သဒ္ဒေါ ဂန္ဓော ရသော အာပေါဓာတုဝိဝဇ္ဇိတံ ဘူတတ္တယသင်္ခါတံ ဖောဋ္ဌဗ္ဗံ ဂေါစရရူပံ နာမ. ६. रूप, शब्द, गंध, रस आणि आपोधातू वगळता इतर तीन महाभूतांनी बनलेले फोट्ठब्ब यांना 'गोचर रूप' म्हणतात. ၇. ဣတ္ထတ္တံ ပုရိသတ္တံ ဘာဝရူပံ နာမ. ७. इत्थत्त आणि पुरिसत्त यांना 'भाव रूप' म्हणतात. ၈. ဟဒယဝတ္ထု ဟဒယရူပံ နာမ. ८. हृदयवत्थु याला 'हृदय रूप' म्हणतात. ၉. ဇီဝိတိန္ဒြိယံ ဇီဝိတရူပံ နာမ. ९. जीवितिंद्रिय याला 'जीवित रूप' म्हणतात. ၁၀. ကဗဠီကာရော အာဟာရော အာဟာရရူပံ နာမ. १०. कबाळीकार आहार याला 'आहार रूप' म्हणतात. ၁၁. ဣတိ [Pg.40] စ အဋ္ဌာရသဝိဓမ္ပေတံ ရူပံ သဘာဝရူပံ သလက္ခဏရူပံ နိပ္ဖန္နရူပံ ရူပရူပံ သမ္မသနရူပန္တိ စ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆတိ. ११. अशा प्रकारे, हे अठरा प्रकारचे रूप 'सभाव रूप', 'सलक्खण रूप', 'निप्फन्न रूप', 'रूप रूप' आणि 'सम्मसन रूप' या संज्ञांनी देखील संग्रहित केले जाते. ၁၂. အာကာသဓာတု ပရိစ္ဆေဒရူပံ နာမ. १२. आकाशधातू याला 'परिच्छेद रूप' म्हणतात. ၁၃. ကာယဝိညတ္တိ ဝစီဝိညတ္တိ ဝိညတ္တိရူပံ နာမ. १३. कायविज्ञप्ती आणि वचीविज्ञप्ती यांना 'विज्ञप्ती रूप' म्हणतात. ၁၄. ရူပဿ လဟုတာ မုဒုတာ ကမ္မညတာ ဝိညတ္တိဒွယံ ဝိကာရရူပံ နာမ. १४. रूपाची लहुता, मुदुता, कम्मञ्ञता आणि दोन विज्ञप्ती यांना 'विकार रूप' म्हणतात. ၁၅. ရူပဿ ဥပစယော သန္တတိ ဇရတာ အနိစ္စတာ လက္ခဏရူပံ နာမ. १५. रूपाचा उपचय, संतती, जरता आणि अनित्यता यांना 'लक्षण रूप' म्हणतात. ၁၆. ဇာတိရူပမေဝ ပနေတ္ထ ဥပစယသန္တတိနာမေန ပဝုစ္စတီတိ ဧကာဒသဝိဓမ္ပေတံ ရူပံ အဋ္ဌဝီသတိဝိဓံ ဟောတိ သရူပဝသေန. १६. येथे 'जाती रूप' हेच 'उपचय' आणि 'संतती' या नावांनी सांगितले जाते. अशा प्रकारे, हे अकरा प्रकारचे रूप स्वतःच्या स्वरूपानुसार अठ्ठावीस प्रकारचे होते. ၁၇. ကထံ – १७. कसे? ဘူတပ္ပသာဒဝိသယာ, ဘာဝေါ ဟဒယမိစ္စပိ; ဇီဝိတာဟာရရူပေဟိ, အဋ္ဌာရသဝိဓံ တထာ. महाभूत, प्रसाद, विषय, भाव, हृदय, तसेच जीवित आणि आहार रूपांसह हे अठरा प्रकारचे आहे. ပရိစ္ဆေဒေါ စ ဝိညတ္တိ, ဝိကာရော လက္ခဏန္တိ စ; အနိပ္ဖန္နာ ဒသ စေတိ, အဋ္ဌဝီသဝိဓံ ဘဝေ. परिच्छेद, विज्ञप्ती, विकार आणि लक्षण हे दहा 'अणिप्फन्न' रूप आहेत. अशा प्रकारे एकूण अठ्ठावीस प्रकारचे रूप होते. အယမေတ္ထ ရူပသမုဒ္ဒေသော. येथे हा 'रूपसमुद्देश' समाप्त झाला. ရူပဝိဘာဂေါ रूपविभाग ၁၈. သဗ္ဗဉ္စ ပနေတံ ရူပံ အဟေတုကံ သပ္ပစ္စယံ သာသဝံ သင်္ခတံ လောကိယံ ကာမာဝစရံ အနာရမ္မဏံ အပ္ပဟာတဗ္ဗမေဝါတိ ဧကဝိဓမ္ပိ အဇ္ဈတ္တိကဗာဟိရာဒိဝသေန ဗဟုဓာ ဘေဒံ ဂစ္ဆတိ. १८. हे सर्व रूप अहेतुक, सप्रत्यय, सास्रव, संस्कृत, लौकिक, कामावचर, अनारम्मण आणि अप्पहातब्ब आहे. अशा प्रकारे एकाच प्रकारचे असूनही, आध्यात्मिक, बाह्य इत्यादी भेदांमुळे त्याचे अनेक प्रकार होतात. ၁၉. ကထံ? ပသာဒသင်္ခါတံ ပဉ္စဝိဓမ္ပိ အဇ္ဈတ္တိကရူပံ နာမ, ဣတရံ ဗာဟိရရူပံ. १९. कसे? प्रसाद संज्ञक पाच प्रकारचे रूप 'अज्झत्तिक रूप' म्हणून ओळखले जाते, आणि इतर सर्व 'बाह्य रूप' आहे. ၂၀. ပသာဒဟဒယသင်္ခါတံ [Pg.41] ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ ဝတ္ထုရူပံ နာမ, ဣတရံ အဝတ္ထုရူပံ. २०. प्रसाद आणि हृदय संज्ञक सहा प्रकारचे रूप 'वत्थु रूप' म्हणून ओळखले जाते, आणि इतर सर्व 'अवत्थु रूप' आहे. ၂၁. ပသာဒဝိညတ္တိသင်္ခါတံ သတ္တဝိဓမ္ပိ ဒွါရရူပံ နာမ, ဣတရံ အဒွါရရူပံ. २१. प्रसाद आणि विज्ञप्ती संज्ञक सात प्रकारचे रूप 'द्वार रूप' म्हणून ओळखले जाते, आणि इतर सर्व 'अद्वार रूप' आहे. ၂၂. ပသာဒဘာဝဇီဝိတသင်္ခါတံ အဋ္ဌဝိဓမ္ပိ ဣန္ဒြိယရူပံ နာမ, ဣတရံ အနိန္ဒြိယရူပံ. २२. प्रसाद, भाव आणि जीवित संज्ञक आठ प्रकारचे रूप 'इंद्रिय रूप' म्हणून ओळखले जाते, आणि इतर सर्व 'अनिंद्रिय रूप' आहे. ၂၃. ပသာဒဝိသယသင်္ခါတံ ဒွါဒသဝိဓမ္ပိ ဩဠာရိကရူပံ သန္တိကေရူပံ, သပ္ပဋိဃရူပဉ္စ, ဣတရံ သုခုမရူပံ ဒူရေရူပံ အပ္ပဋိဃရူပဉ္စ. २३. प्रसाद आणि विषय संज्ञक बारा प्रकारचे रूप 'ओळारिक रूप', 'संतिके रूप' आणि 'sappaṭigha' (सप्पटिघ) रूप आहे; आणि इतर सर्व 'सुखुम रूप', 'दूरे रूप' आणि 'अप्पटिघ रूप' आहे. ၂၄. ကမ္မဇံ ဥပါဒိန္နရူပံ, ဣတရံ အနုပါဒိန္နရူပံ. २४. कर्मापासून उत्पन्न झालेले रूप 'उपादिन्न रूप' आहे, आणि इतर सर्व 'अनुपादिन्न रूप' आहे. ၂၅. ရူပါယတနံ သနိဒဿနရူပံ, ဣတရံ အနိဒဿနရူပံ. २५. रूपायतन हे 'सनिदस्सन रूप' आहे, आणि इतर सर्व 'अनिदस्सन रूप' आहे. ၂၆. စက္ခာဒိဒွယံ အသမ္ပတ္တဝသေန, ဃာနာဒိတ္တယံ သမ္ပတ္တဝသေနာတိ ပဉ္စဝိဓမ္ပိ ဂေါစရဂ္ဂါဟိကရူပံ, ဣတရံ အဂေါစရဂ္ဂါဟိကရူပံ. २६. चक्षु इत्यादी दोन असंपत्त भावाने आणि घान इत्यादी तीन संपत्त भावाने ग्रहण करतात; अशा प्रकारे हे पाच प्रकारचे रूप 'गोचरग्गाहिक रूप' आहे, आणि इतर सर्व 'अगोचरग्गाहिक रूप' आहे. ၂၇. ဝဏ္ဏော ဂန္ဓော ရသော ဩဇာ ဘူတစတုက္ကဉ္စေတိ အဋ္ဌဝိဓမ္ပိ အဝိနိဗ္ဘောဂရူပံ, ဣတရံ ဝိနိဗ္ဘောဂရူပံ. २७. वर्ण, गंध, रस, ओजा आणि चार महाभूत, असे हे आठ प्रकारचे रूप 'अविनिब्भोग रूप' आहे, आणि इतर सर्व 'विनिब्भोग रूप' आहे. ၂၈. ဣစ္စေဝမဋ္ဌဝီသတိ-ဝိဓမ္ပိ စ ဝိစက္ခဏာ. २८. अशा प्रकारे, विवेकी पुरुष अठ्ठावीस प्रकारच्या रूपांचे देखील... အဇ္ဈတ္တိကာဒိဘေဒေန, ဝိဘဇန္တိ ယထာရဟံ. अज्झत्तिक (आंतरिक) इत्यादी भेदांनुसार योग्य प्रकारे वर्गीकरण करतात. အယမေတ္ထ ရူပဝိဘာဂေါ. हा येथे रूपविभाग (रूपांचे वर्गीकरण) आहे. ရူပသမုဋ္ဌာနနယော रूपसमुत्थान नय ၂၉. ကမ္မံ စိတ္တံ ဥတု အာဟာရော စေတိ စတ္တာရိ ရူပသမုဋ္ဌာနာနိ နာမ. २९. कर्म, चित्त, उतु (तापमान) आणि आहार हे चार रूपांचे समुत्थान (उत्पादक) आहेत. ၃၀. တတ္ထ ကာမာဝစရံ ရူပါဝစရဉ္စေတိ ပဉ္စဝီသတိဝိဓမ္ပိ ကုသလာကုသလကမ္မမဘိသင်္ခတံ အဇ္ဈတ္တိကသန္တာနေ ကမ္မသမုဋ္ဌာနရူပံ ပဋိသန္ဓိမုပါဒါယ ခဏေ ခဏေ သမုဋ္ဌာပေတိ. ३०. त्यामध्ये, कामावचर आणि रूपावचर असे पंचवीस प्रकारचे कुशल आणि अकुशल कर्म, आंतरिक संतानामध्ये प्रतिसंधीपासून सुरू करून क्षणाक्षणाला कर्मसमुत्थान रूपाला उत्पन्न करतात. ၃၁. အရူပဝိပါကဒွိပဉ္စဝိညာဏဝဇ္ဇိတံ [Pg.42] ပဉ္စသတ္တတိဝိဓမ္ပိ စိတ္တံ စိတ္တသမုဋ္ဌာနရူပံ ပဌမဘဝင်္ဂမုပါဒါယ ဇာယန္တမေဝ သမုဋ္ဌာပေတိ. ३१. अरूपविपाक आणि द्विपंचविज्ञानांशिवाय इतर पंच्याहत्तर प्रकारचे चित्त, पहिल्या भवांगापासून सुरू करून, उत्पन्न होतानाच चित्तसमुत्थान रूपाला उत्पन्न करतात. ၃၂. တတ္ထ အပ္ပနာဇဝနံ ဣရိယာပထမ္ပိ သန္နာမေတိ. ३२. त्यामध्ये, अप्पना जवन शारीरिक हालचालींना (इरियापथाला) देखील नियंत्रित करते. ၃၃. ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနကာမာဝစရဇဝနာဘိညာ ပန ဝိညတ္တိမ္ပိ သမုဋ္ဌာပေန္တိ. ३३. परंतु, वोट्ठब्बन, कामावचर जवन आणि अभिज्ञा हे विज्ञाप्तीला देखील उत्पन्न करतात. ၃၄. သောမနဿဇဝနာနိ ပနေတ္ထ တေရသ ဟသနမ္ပိ ဇနေန္တိ. ३४. येथे तेरा सोमनस्य जवने हास्य देखील उत्पन्न करतात. ၃၅. သီတုဏှောတုသမညာတာ တေဇောဓာတု ဌိတိပ္ပတ္တာဝ ဥတုသမုဋ္ဌာနရူပံ အဇ္ဈတ္တဉ္စ ဗဟိဒ္ဓါ စ ယထာရဟံ သမုဋ္ဌာပေတိ. ३५. शीत आणि उष्ण अशा ऋतू (तापमान) संज्ञेने ओळखली जाणारी तेजोधातू, स्थितीला प्राप्त झाल्यावर, आंतरिक आणि बाह्य दोन्ही ठिकाणी योग्य प्रकारे उतुसमुत्थान रूपाला उत्पन्न करते. ၃၆. ဩဇာသင်္ခါတော အာဟာရော အာဟာရသမုဋ္ဌာနရူပံ အဇ္ဈောဟရဏကာလေ ဌာနပ္ပတ္တောဝ သမုဋ္ဌာပေတိ. ३६. ओजा नावाचा आहार, गिळण्याच्या वेळी स्थितीला प्राप्त झाल्यावरच आहारसमुत्थान रूपाला उत्पन्न करतो. ၃၇. တတ္ထ ဟဒယဣန္ဒြိယရူပါနိ ကမ္မဇာနေဝ. ३७. त्यामध्ये, हृदय आणि इंद्रिय रूपे केवळ कर्मजन्यच असतात. ၃၈. ဝိညတ္တိဒွယံ စိတ္တဇမေဝ. ३८. दोन्ही विज्ञाप्ती केवळ चित्तजन्यच असतात. ၃၉. သဒ္ဒေါ စိတ္တောတုဇော. ३९. शब्द हा चित्त आणि उतु यांपासून उत्पन्न होतो. ၄၀. လဟုတာဒိတ္တယံ ဥတုစိတ္တာဟာရေဟိ သမ္ဘောတိ. ४०. लघुता इत्यादींचे त्रिक हे उतु, चित्त आणि आहार यांपासून उत्पन्न होते. ၄၁. အဝိနိဗ္ဘောဂရူပါနိ စေဝ အာကာသဓာတု စ. စတူဟိ သမ္ဘူတာနိ. ४१. अविनीभोग रूपे आणि आकाशधातू हे चारही कारणांपासून उत्पन्न होतात. ၄၂. လက္ခဏရူပါနိ န ကုတောစိ ဇာယန္တိ. ४२. लक्षण रूपे कशापासूनही उत्पन्न होत नाहीत. ၄၃. အဋ္ဌာရသ ပန္နရသ, တေရသ ဒွါဒသာတိ စ. ४३. अठरा, पंधरा, तेरा आणि बारा... ကမ္မစိတ္တောတုကာဟာရ-ဇာနိ ဟောန္တိ ယထာက္ကမံ. ...हे अनुक्रमे कर्म, चित्त, उतु आणि आहार यांपासून उत्पन्न होणारे आहेत. ၄၄. ဇာယမာနာဒိရူပါနံ, သဘာဝတ္တာ ဟိ ကေဝလံ. ४४. कारण, उत्पन्न होणाऱ्या इत्यादी रूपांचे केवळ स्वभाव असल्यामुळे, လက္ခဏာနိ န ဇာယန္တိ, ကေဟိစီတိ ပကာသိတံ. लक्षणे कोणत्याही कारणाने उत्पन्न होत नाहीत, असे सांगितले गेले आहे. အယမေတ္ထ ရူပသမုဋ္ဌာနနယော. हा येथे रूपसमुत्थान नय आहे. ကလာပယောဇနာ कलाप योजना ၄၅. ဧကုပ္ပာဒါ [Pg.43] ဧကနိရောဓာ ဧကနိဿယာ သဟဝုတ္တိနော ဧကဝီသတိ ရူပကလာပါ နာမ. ४५. जे एकाच वेळी उत्पन्न होतात, एकाच वेळी निरुद्ध होतात, एकाच आश्रयावर राहतात आणि एकत्र अस्तित्वात असतात, त्यांना एकवीस रूपकलाप असे म्हणतात. ၄၆. တတ္ထ ဇီဝိတံ အဝိနိဗ္ဘောဂရူပဉ္စ စက္ခုနာ သဟ စက္ခုဒသကန္တိ ပဝုစ္စတိ. တထာ သောတာဒီဟိ သဒ္ဓိံ သောတဒသကံ ဃာနဒသကံ ဇိဝှာဒသကံ ကာယဒသကံ ဣတ္ထိဘာဝဒသကံ ပုမ္ဘာဝဒသကံ ဝတ္ထုဒသကဉ္စေတိ ယထာက္ကမံ ယောဇေတဗ္ဗံ. အဝိနိဗ္ဘောဂရူပမေဝ ဇီဝိတေန သဟ ဇီဝိတနဝကန္တိ ပဝုစ္စတိ. ဣမေ နဝ ကမ္မသမုဋ္ဌာနကလာပါ. ४६. त्यामध्ये, जीवित आणि अविनीभोग रूप चक्षूच्या सोबत मिळून 'चक्षुदशक' म्हटले जाते. त्याचप्रमाणे, श्रोत्र इत्यादींच्या सोबत अनुक्रमे श्रोत्रदशक, घ्राणदशक, जिव्हादशक, कायदशक, स्त्रीभावदशक, पुंभावदशक आणि वस्तुदशक अशी योजना करावी. केवळ अविनीभोग रूप जीवितासोबत मिळून 'जीवितनवक' म्हटले जाते. हे नऊ कर्मसमुत्थान कलाप आहेत. ၄၇. အဝိနိဗ္ဘောဂရူပံ ပန သုဒ္ဓဋ္ဌကံ, တဒေဝ ကာယဝိညတ္တိယာ သဟ ကာယဝိညတ္တိနဝကံ, ဝစီဝိညတ္တိသဒ္ဒေဟိ သဟ ဝစီဝိညတ္တိဒသကံ, လဟုတာဒီဟိ သဒ္ဓိံ လဟုတာဒေကာဒသကံ, ကာယဝိညတ္တိလဟုတာဒိဒွါဒသကံ, ဝစီဝိညတ္တိသဒ္ဒလဟုတာဒိတေရသကဉ္စေတိ ဆ စိတ္တသမုဋ္ဌာနကလာပါ. ४७. केवळ अविनीभोग रूप हे 'शुद्धष्टक' आहे; तेच कायविज्ञाप्तीसोबत मिळून 'कायविज्ञाप्तिनवक' होते; वचीविज्ञाप्ती आणि शब्दासोबत मिळून 'वचीविज्ञाप्तिदशक' होते; लघुता इत्यादींसोबत मिळून 'लघुताएकादशक' होते; कायविज्ञाप्ती आणि लघुता इत्यादींसोबत मिळून 'कायविज्ञाप्तिलघुतादिद्वादशक' होते; आणि वचीविज्ञाप्ती, शब्द व लघुता इत्यादींसोबत मिळून 'वचीविज्ञाप्तिशब्दलघुतादि त्रयोदशक' होते. हे सहा चित्तसमुत्थान कलाप आहेत. ၄၈. သုဒ္ဓဋ္ဌကံ သဒ္ဒနဝကံ လဟုတာဒေကာဒသကံ သဒ္ဒလဟုတာဒိဒွါဒသကဉ္စေတိ စတ္တာရော ဥတုသမုဋ္ဌာနကလာပါ. ४८. शुद्धष्टक, शब्दनवक, लघुताएकादशक आणि शब्दलघुतादिद्वादशक हे चार उतुसमुत्थान कलाप आहेत. ၄၉. သုဒ္ဓဋ္ဌကံ လဟုတာဒေကာဒသကဉ္စေတိ ဒွေအာဟာရသမုဋ္ဌာနကလာပါ. ४९. शुद्धष्टक आणि लघुताएकादशक हे दोन आहारसमुत्थान कलाप आहेत. ၅၀. တတ္ထ သုဒ္ဓဋ္ဌကံ သဒ္ဒနဝကဉ္စေတိ ဒွေ ဥတုသမုဋ္ဌာနကလာပါ ဗဟိဒ္ဓါပိ လဗ္ဘန္တိ, အဝသေသာ ပန သဗ္ဗေပိ အဇ္ဈတ္တိကမေဝါတိ. ५०. त्यामध्ये, शुद्धष्टक आणि शब्दनवक हे दोन उतुसमुत्थान कलाप बाह्य जगात देखील आढळतात, परंतु उर्वरित सर्व केवळ आंतरिकच असतात. ၅၁. ကမ္မစိတ္တောတုကာဟာရ-သမုဋ္ဌာနာ ယထာက္ကမံ. ५१. अनुक्रमे कर्म, चित्त, उतु आणि आहार यांपासून उत्पन्न होणारे, နဝ ဆ စတုရော ဒွေတိ, ကလာပါ ဧကဝီသတိ. नऊ, सहा, चार आणि दोन असे एकूण एकवीस कलाप आहेत. ကလာပါနံ ပရိစ္ဆေဒ-လက္ခဏတ္တာ ဝိစက္ခဏာ; န ကလာပင်္ဂမိစ္စာဟု, အာကာသံ လက္ခဏာနိ စ. आकाश आणि लक्षणे हे कलापांची सीमा आणि वैशिष्ट्ये असल्यामुळे, विवेकी पुरुष त्यांना कलापांचे अंग मानत नाहीत. အယမေတ္ထ ကလာပယောဇနာ. ही येथे कलाप योजना आहे. ရူပပဝတ္တိက္ကမော रूपप्रवृत्तीचा क्रम ၅၂. သဗ္ဗာနိပိ [Pg.44] ပနေတာနိ ရူပါနိ ကာမလောကေ ယထာရဟံ အနူနာနိ ပဝတ္တိယံ ဥပလဗ္ဘန္တိ. ५२. कामलोकात प्रवृत्तीच्या वेळी ही सर्व रूपे योग्य प्रकारे पूर्ण स्वरूपात आढळतात. ၅၃. ပဋိသန္ဓိယံ ပန သံသေဒဇာနဉ္စေဝ ဩပပါတိကာနဉ္စ စက္ခုသောတဃာနဇိဝှာကာယဘာဝဝတ္ထုဒသကသင်္ခါတာနိ သတ္တ ဒသကာနိ ပါတုဘဝန္တိ ဥက္ကဋ္ဌဝသေန, ဩမကဝသေန ပန စက္ခုသောတဃာနဘာဝဒသကာနိ ကဒါစိပိ န လဗ္ဘန္တိ, တသ္မာ တေသံ ဝသေန ကလာပဟာနိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ५३. परंतु प्रतिसंधीच्या वेळी, संसेदज आणि ओपपातिक प्राण्यांच्या बाबतीत, उत्कृष्ट रूपाने चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिव्हा, काय, भाव आणि वस्तुदशक नावाचे सात दशक प्रकट होतात. निकृष्ट रूपाने मात्र चक्षु, श्रोत्र, घ्राण आणि भावदशक कधीकधी प्राप्त होत नाहीत; म्हणून त्यांच्या बाबतीत कलापांची कमतरता समजली पाहिजे. ၅၄. ဂဗ္ဘသေယျကသတ္တာနံ ပန ကာယဘာဝဝတ္ထုဒသကသင်္ခါတာနိ တီဏိ ဒသကာနိ ပါတုဘဝန္တိ, တတ္ထာပိ ဘာဝဒသကံ ကဒါစိ န လဗ္ဘတိ, တတော ပရံ ပဝတ္တိကာလေ ကမေန စက္ခုဒသကာဒီနိ စ ပါတုဘဝန္တိ. ५४. परंतु गर्भशय्यक प्राण्यांच्या बाबतीत काय, भाव आणि वस्तुदशक नावाचे तीन दशक प्रकट होतात; तिथे देखील कधीकधी भावदशक प्राप्त होत नाही. त्यानंतर, प्रवृत्तीच्या काळात हळूहळू चक्षुदशक इत्यादी प्रकट होतात. ၅၅. ဣစ္စေဝံ ပဋိသန္ဓိမုပါဒါယ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာ, ဒုတိယစိတ္တမုပါဒါယ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာ, ဌိတိကာလမုပါဒါယ ဥတုသမုဋ္ဌာနာ, ဩဇာဖရဏမုပါဒါယ အာဟာရသမုဋ္ဌာနာ စေတိ စတုသမုဋ္ဌာနရူပကလာပသန္တတိ ကာမလောကေ ဒီပဇာလာ ဝိယ, နဒီသောတော ဝိယ စ ယာဝတာယုကမဗ္ဗောစ္ဆိန္နာ ပဝတ္တတိ. ५५. अशा प्रकारे, प्रतिसंधीपासून सुरू होणारे कर्मसमुत्थान, दुसऱ्या चित्तापासून सुरू होणारे चित्तसमुत्थान, स्थितीच्या काळापासून सुरू होणारे उतुसमुत्थान आणि ओजा पसरल्यापासून सुरू होणारे आहारसमुत्थान, अशा चार कारणांपासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपकलापांची संतती कामलोकात दिव्याच्या ज्योतीप्रमाणे आणि नदीच्या प्रवाहाप्रमाणे आयुष्यभर अखंडपणे वाहत राहते. ၅၆. မရဏကာလေ ပန စုတိစိတ္တောပရိသတ္တရသမစိတ္တဿ ဌိတိကာလမုပါဒါယ ကမ္မဇရူပါနိ န ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, ပုရေတရမုပ္ပန္နာနိ စ ကမ္မဇရူပါနိ စုတိစိတ္တသမကာလမေဝ ပဝတ္တိတွာ နိရုဇ္ဈန္တိ, တတော ပရံ စိတ္တဇာဟာရဇရူပဉ္စ ဝေါစ္ဆိဇ္ဇတိ, တတော ပရံ ဥတုသမုဋ္ဌာနရူပပရမ္ပရာ ယာဝ မတကဠေဝရသင်္ခါတာ ပဝတ္တန္တိ. ५६. परंतु मृत्यूच्या वेळी, च्युतिचित्ताच्या आधीच्या सतराव्या चित्ताच्या स्थितीच्या काळापासून सुरू करून कर्मजन्य रूपे उत्पन्न होत नाहीत; आणि आधी उत्पन्न झालेली कर्मजन्य रूपे च्युतिचित्ताच्या समकालीन काळापर्यंतच टिकून निरुद्ध होतात. त्यानंतर चित्तजन्य आणि आहारजन्य रूपे देखील खंडित होतात. त्यानंतर, केवळ उतुसमुत्थान रूपांची परंपरा मृत शरीराच्या अस्तित्वापर्यंत चालू राहते. ၅၇. ဣစ္စေဝံ မတသတ္တာနံ, ပုနဒေဝ ဘဝန္တရေ. ५७. अशा प्रकारे मृत प्राण्यांचे, पुन्हा दुसऱ्या अस्तित्वात (भवांतरात), ပဋိသန္ဓိမုပါဒါယ, တထာ ရူပံ ပဝတ္တတိ. प्रतिसंधीला (पुनर्जन्माला) अनुसरून, त्याचप्रमाणे रूप प्रवृत्त होते. ၅၈. ရူပလောကေ [Pg.45] ပန ဃာနဇိဝှာကာယဘာဝဒသကာနိ စ အာဟာရဇကလာပါနိ စ န လဗ္ဘန္တိ, တသ္မာ တေသံ ပဋိသန္ဓိကာလေ စက္ခုသောတဝတ္ထုဝသေန တီဏိ ဒသကာနိ ဇီဝိတနဝကဉ္စေတိ စတ္တာရော ကမ္မသမုဋ္ဌာနကလာပါ, ပဝတ္တိယံ စိတ္တောတုသမုဋ္ဌာနာ စ လဗ္ဘန္တိ. ५८. रूपलोकात मात्र घ्राण (नाक), जिव्हा (जीभ), काय (शरीर) आणि भाव (लिंग) हे दशक (दश-कलाप) आणि आहारज कलाप प्राप्त होत नाहीत. म्हणून, त्यांच्या प्रतिसंधीच्या वेळी चक्षु, श्रोत्र आणि वस्तूच्या वशाने तीन दशक आणि जीवित-नवक असे चार कम्मसमुट्ठाण (कर्म-समुत्थान) कलाप प्राप्त होतात; आणि प्रवृत्ती काळात (जीवनावस्थेत) चित्त आणि ऋतु-समुत्थान कलाप प्राप्त होतात. ၅၉. အသညသတ္တာနံ ပန စက္ခုသောတဝတ္ထုသဒ္ဒါပိ န လဗ္ဘန္တိ, တထာ သဗ္ဗာနိပိ စိတ္တဇရူပါနိ, တသ္မာ တေသံ ပဋိသန္ဓိကာလေ ဇီဝိတနဝကမေဝ, ပဝတ္တိယဉ္စ သဒ္ဒဝဇ္ဇိတံ ဥတုသမုဋ္ဌာနရူပံ အတိရိစ္ဆတိ. ५९. असंज्ञी प्राण्यांच्या (असंज्ञसत्त्वांच्या) बाबतीत मात्र चक्षु, श्रोत्र, वस्तू आणि शब्द देखील प्राप्त होत नाहीत, तसेच सर्व चित्तज रूपेही प्राप्त होत नाहीत. म्हणून, त्यांच्या प्रतिसंधीच्या वेळी केवळ जीवित-नवकच प्राप्त होते, आणि प्रवृत्ती काळात (जीवनावस्थेत) शब्दाशिवाय ऋतु-समुत्थान रूप शिल्लक राहते. ၆၀. ဣစ္စေဝံ ကာမရူပါသညီသင်္ခါတေသု တီသု ဌာနေသု ပဋိသန္ဓိပဝတ္တိဝသေန ဒုဝိဓာ ရူပပ္ပဝတ္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ६०. अशा प्रकारे काम, रूप आणि असंज्ञी संज्ञक या तीन स्थानांमध्ये प्रतिसंधी आणि प्रवृत्तीच्या वशाने दोन प्रकारची रूप-प्रवृत्ती समजून घ्यावी. ၆၁. အဋ္ဌဝီသတိ ကာမေသု, ဟောန္တိ တေဝီသ ရူပိသု. ६१. कामलोकात अठ्ठावीस (२८) रूपे असतात, तर रूपलोकात तेवीस (२३) रूपे असतात. သတ္တရသေဝ သညီနံ, အရူပေ နတ္ထိ ကိဉ္စိပိ. असंज्ञी (प्राण्यांच्या) बाबतीत सतरा (१७) रूपे असतात, आणि अरूपलोकात काहीही (रूप) नसते. သဒ္ဒေါ ဝိကာရော ဇရတာ, မရဏဉ္စောပပတ္တိယံ; န လဗ္ဘန္တိ ပဝတ္တေ တု, န ကိဉ္စိပိ န လဗ္ဘတိ. प्रतिसंधीच्या (उत्पत्तीच्या) वेळी शब्द, विकार, जरा आणि मरण प्राप्त होत नाहीत; परंतु प्रवृत्ती काळात (जीवनावस्थेत) असे काहीही नाही जे प्राप्त होत नाही (अर्थात सर्व प्राप्त होतात). အယမေတ္ထ ရူပပဝတ္တိက္ကမော. हा येथे रूप-प्रवृत्तीचा क्रम आहे. နိဗ္ဗာနဘေဒေါ निब्बान-भेद (निर्वाणाचे वर्गीकरण) ၆၂. နိဗ္ဗာနံ ပန လောကုတ္တရသင်္ခါတံ စတုမဂ္ဂဉာဏေန သစ္ဆိကာတဗ္ဗံ မဂ္ဂဖလာနမာရမ္မဏဘူတံ ဝါနသင်္ခါတာယ တဏှာယ နိက္ခန္တတ္တာ နိဗ္ဗာနန္တိ ပဝုစ္စတိ. ६२. निब्बान (निर्वाण) हे लोकोत्तर संज्ञक असून, चार मार्गज्ञानाने साक्षात करण्यायोग्य आहे, मार्ग आणि फळांचे ते आलंबन (विषय) आहे. 'वान' नावाच्या तण्हेपासून (तृष्णेपासून) मुक्त झाल्यामुळे त्याला 'निब्बान' असे म्हटले जाते. ၆၃. တဒေတံ သဘာဝတော ဧကဝိဓမ္ပိ သဥပါဒိသေသနိဗ္ဗာနဓာတု အနုပါဒိသေသနိဗ္ဗာနဓာတု စေတိ ဒုဝိဓံ ဟောတိ ကာရဏပရိယာယေန. ६३. ते स्वतःच्या स्वभावाने एकच प्रकारचे असले, तरी कारणाच्या पर्यायाने (अवस्थाभेदाने) 'सउपादिसिस-निब्बानधातू' (उपाधिशेष निर्वाणधातू) आणि 'अनुपादिसिस-निब्बानधातू' (अनुपाधिशेष निर्वाणधातू) असे दोन प्रकारचे असते. ၆၄. တထာ [Pg.46] သုညတံ အနိမိတ္တံ အပ္ပဏိဟိတဉ္စေတိ တိဝိဓံ ဟောတိ အာကာရဘေဒေန. ६४. तसेच, आकाराच्या भेदाने (स्वरूपाच्या दृष्टीने) ते सुञ्ञत (शून्य), अनिमित्त (निमित्तहीन) आणि अप्पणिहित (प्रणिधीहीन/इच्छाविरहित) असे तीन प्रकारचे असते. ၆၅. ပဒမစ္စုတမစ္စန္တံ, အသင်္ခတမနုတ္တရံ. ६५. जे पद अच्युत (नाशरहित), अत्यंत (अंतिम), असंस्कृत (असंखत) आणि अनुत्तर (सर्वोच्च) आहे, နိဗ္ဗာနမိတိ ဘာသန္တိ, ဝါနမုတ္တာ မဟေသယော. त्याला 'वान' (तृष्णे) पासून मुक्त झालेले महर्षी 'निब्बान' असे म्हणतात. ဣတိ စိတ္တံ စေတသိကံ, ရူပံ နိဗ္ဗာနမိစ္စပိ; ပရမတ္ထံ ပကာသေန္တိ, စတုဓာဝ တထာဂတာ. अशा प्रकारे, तथागतांनी चित्त, चेतसिक, रूप आणि निब्बान या चार प्रकारांनी परमार्थ (परम सत्य) प्रकाशित केला आहे. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ ရူပသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंगहातील 'रूपसंग्रह विभाग' नावाचा ဆဋ္ဌော ပရိစ္ဆေဒေါ. सहावा परिच्छेद (समाप्त झाला). ၇. သမုစ္စယပရိစ္ဆေဒေါ ७. समुच्चय परिच्छेद ၁. ဒွါသတ္တတိဝိဓာ ဝုတ္တာ, ဝတ္ထုဓမ္မာ သလက္ခဏာ. १. स्वतःच्या लक्षणांसह बहात्तर (७२) प्रकारचे वस्तू-धम्म (वास्तविक धर्म) सांगितले गेले आहेत. တေသံ ဒါနိ ယထာယောဂံ, ပဝက္ခာမိ သမုစ္စယံ. आता मी त्यांच्या योग्यतेनुसार त्यांचा समुच्चय (एकत्रीकरण) सांगेन. ၂. အကုသလသင်္ဂဟော မိဿကသင်္ဂဟော ဗောဓိပက္ခိယသင်္ဂဟော သဗ္ဗသင်္ဂဟော စေတိ သမုစ္စယသင်္ဂဟော စတုဗ္ဗိဓော ဝေဒိတဗ္ဗော. २. समुच्चय-संग्रह चार प्रकारचा समजून घ्यावा: अकुशल-संग्रह, मिस्सक-संग्रह (मिश्रक-संग्रह), बोधिपक्खिय-संग्रह (बोधिपाक्षिक-संग्रह) आणि सब्ब-संग्रह (सर्व-संग्रह). အကုသလသင်္ဂဟော अकुशल-संग्रह ၃. ကထံ? အကုသလသင်္ဂဟေ တာဝ စတ္တာရော အာသဝါ – ကာမာသဝေါ ဘဝါသဝေါ ဒိဋ္ဌာသဝေါ အဝိဇ္ဇာသဝေါ. ३. कसे? अकुशल-संग्रहात सर्वप्रथम चार आसव आहेत – कामासव (काम-आसव), भवासव (भव-आसव), दिट्ठिआसव (दृष्टी-आसव) आणि अविज्जासव (अविद्या-आसव). ၄. စတ္တာရော ဩဃာ – ကာမောဃော ဘဝေါဃော ဒိဋ္ဌောဃော အဝိဇ္ဇောဃော. ४. चार ओघ आहेत – कामोघ (काम-ओघ), भवोघ (भव-ओघ), दिट्ठोघ (दृष्टी-ओघ) आणि अविज्जोघ (अविद्या-ओघ). ၅. စတ္တာရော ယောဂါ – ကာမယောဂေါ ဘဝယောဂေါ ဒိဋ္ဌိယောဂေါ အဝိဇ္ဇာယောဂေါ. ५. चार योग आहेत – कामयोग, भवयोग, दिट्ठियोग (दृष्टी-योग) आणि अविज्जायोग (अविद्या-योग). ၆. စတ္တာရော ဂန္ထာ – အဘိဇ္ဈာကာယဂန္ထော, ဗျာပါဒေါ ကာယဂန္ထော, သီလဗ္ဗတပရာမာသော ကာယဂန္ထော, ဣဒံသစ္စာဘိနိဝေသော ကာယဂန္ထော. ६. चार गंथ (गाठी) आहेत – अभिज्झा-कायगंथ, ब्यापाद-कायगंथ (व्यापाद-कायग्रंथ), सीलब्बतपरामास-कायगंथ (शीलव्रतपरामर्श-कायग्रंथ) आणि इदंसच्चाभिनिवेस-कायगंथ (इदंसत्याभिनिवेश-कायग्रंथ). ၇. စတ္တာရော [Pg.47] ဥပါဒါနာ – ကာမုပါဒါနံ ဒိဋ္ဌုပါဒါနံ သီလဗ္ဗတုပါဒါနံ အတ္တဝါဒုပါဒါနံ. ७. चार उपादान आहेत – कामुपादान (काम-उपादान), दिट्ठुपादान (दृष्टी-उपादान), सीलब्बतुपादान (शीलव्रत-उपादान) आणि अत्तवादुपादान (आत्मवाद-उपादान). ၈. ဆ နီဝရဏာနိ – ကာမစ္ဆန္ဒနီဝရဏံ ဗျာပါဒနီဝရဏံ ထိနမိဒ္ဓနီဝရဏံ ဥဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စနီဝရဏံ ဝိစိကိစ္ဆာနီဝရဏံ အဝိဇ္ဇာနီဝရဏံ. ८. सहा नीवरण आहेत – कामच्छंद-नीवरण, ब्यापाद-नीवरण (व्यापाद-नीवरण), थिनमिद्ध-नीवरण (स्त्यान-मिद्ध-नीवरण), उद्धच्चकुक्कुच्च-नीवरण (औद्धत्य-कौकृत्य-नीवरण), विचिकिच्छा-नीवरण (विचिकित्सा-नीवरण) आणि अविज्जा-नीवरण (अविद्या-नीवरण). ၉. သတ္တ အနုသယာ – ကာမရာဂါနုသယော ဘဝရာဂါနုသယော ပဋိဃာနုသယော မာနာနုသယော ဒိဋ္ဌာနုသယော ဝိစိကိစ္ဆာနုသယော အဝိဇ္ဇာနုသယော. ९. सात अनुसय (अनुशय) आहेत – कामराग-अनुसय, भवराग-अनुसय, पटिघ-अनुसय (प्रतिघ-अनुशय), मान-अनुसय, दिट्ठि-अनुसय (दृष्टी-अनुशय), विचिकिच्छा-अनुसय (विचिकित्सा-अनुशय) आणि अविज्जा-अनुसय (अविद्या-अनुशय). ၁၀. ဒသ သံယောဇနာနိ – ကာမရာဂသံယောဇနံ ရူပရာဂသံယောဇနံ အရူပရာဂသံယောဇနံ ပဋိဃသံယောဇနံ မာနသံယောဇနံ ဒိဋ္ဌိသံယောဇနံ သီလဗ္ဗတပရာမာသသံယောဇနံ ဝိစိကိစ္ဆာသံယောဇနံ ဥဒ္ဓစ္စသံယောဇနံ အဝိဇ္ဇာသံယောဇနံ သုတ္တန္တေ. १०. सुत्तंत (सूत्रपिटक) नुसार दहा संयोजने आहेत – कामराग-संयोजन, रूपराग-संयोजन, अरूपराग-संयोजन, पटिघ-संयोजन (प्रतिघ-संयोजन), मान-संयोजन, दिट्ठि-संयोजन (दृष्टी-संयोजन), सीलब्बतपरामास-संयोजन (शीलव्रतपरामर्श-संयोजन), विचिकिच्छा-संयोजन (विचिकित्सा-संयोजन), उद्धच्च-संयोजन (औद्धत्य-संयोजन) आणि अविज्जा-संयोजन (अविद्या-संयोजन). ၁၁. အပရာနိပိ ဒသ သံယောဇနာနိ – ကာမရာဂသံယောဇနံ ဘဝရာဂသံယောဇနံ ပဋိဃသံယောဇနံ မာနသံယောဇနံ ဒိဋ္ဌိသံယောဇနံ သီလဗ္ဗတပရာမာသသံယောဇနံ ဝိစိကိစ္ဆာသံယောဇနံ ဣဿာသံယောဇနံ မစ္ဆရိယသံယောဇနံ အဝိဇ္ဇာသံယောဇနံ အဘိဓမ္မေ (ဝိဘ. ၉၆၉). ११. अभिधम्मानुसार इतर दहा संयोजने आहेत – कामराग-संयोजन, भवराग-संयोजन, पटिघ-संयोजन (प्रतिघ-संयोजन), मान-संयोजन, दिट्ठि-संयोजन (दृष्टी-संयोजन), सीलब्बतपरामास-संयोजन (शीलव्रतपरामर्श-संयोजन), विचिकिच्छा-संयोजन (विचिकित्सा-संयोजन), इस्सा-संयोजन (ईर्ष्या-संयोजन), मच्छरिय-संयोजन (मात्सर्य-संयोजन) आणि अविज्जा-संयोजन (अविद्या-संयोजन). ၁၂. ဒသ ကိလေသာ – လောဘော ဒေါသော မောဟော မာနော ဒိဋ္ဌိ ဝိစိကိစ္ဆာ ထိနံ ဥဒ္ဓစ္စံ အဟိရိကံ အနောတ္တပ္ပံ. १२. दहा किलेस (क्लेश) आहेत – लोभ, दोस (द्वेष), मोह, मान, दिट्ठि (दृष्टी), विचिकिच्छा (विचिकित्सा), थिन (स्त्यान), उद्धच्च (औद्धत्य), अहिरिक (अह्रीकता/निर्लज्जपणा) आणि अनोत्तप्प (अनपत्रपा/भयशून्यता). ၁၃. အာသဝါဒီသု ပနေတ္ထ ကာမဘဝနာမေန တဗ္ဗတ္ထုကာ တဏှာ အဓိပ္ပေတာ, သီလဗ္ဗတပရာမာသော ဣဒံသစ္စာဘိနိဝေသော အတ္တဝါဒုပါဒေါ စ တထာပဝတ္တံ ဒိဋ္ဌိဂတမေဝ ပဝုစ္စတိ. १३. येथे आसव इत्यादींमध्ये 'काम' आणि 'भव' या नावांनी त्यावर आधारित असणारी तण्हा (तृष्णा) अभिप्रेत आहे. सीलब्बतपरामास (शीलव्रतपरामर्श), इदंसच्चाभिनिवेस (इदंसत्याभिनिवेश) आणि अत्तवादुपादान (आत्मवाद-उपादान) हे त्या त्या प्रकारे प्रवृत्त होणारे दिट्ठिगत (दृष्टीगत) च म्हटले जाते. ၁၄. အာသဝေါဃာ စ ယောဂါ စ, १४. आसव, ओघ आणि योग, တယော ဂန္ထာ စ ဝတ္ထုတော; ဥပါဒါနာ ဒုဝေ ဝုတ္တာ,အဋ္ဌ နီဝရဏာ သိယုံ. हे वस्तूच्या (वास्तविकतेच्या) दृष्टीने तीन गंथ (गाठी) आहेत; उपादान दोन सांगितले आहेत आणि नीवरण आठ असावेत. ဆဠေဝါနုသယာ [Pg.48] ဟောန္တိ, နဝ သံယောဇနာ မတာ; ကိလေသာ ဒသ ဝုတ္တောယံ, နဝဓာ ပါပသင်္ဂဟော. अनुसय (अनुशय) केवळ सहाच आहेत, संयोजने नऊ मानली गेली आहेत आणि किलेस (क्लेश) दहा आहेत. अशा प्रकारे हा पाप-संग्रह (अकुशल-संग्रह) नऊ प्रकारांनी सांगितला आहे. မိဿကသင်္ဂဟော मिस्सक-संग्रह (मिश्रक-संग्रह) ၁၅. မိဿကသင်္ဂဟေ ဆ ဟေတူ – လောဘော ဒေါသော မောဟော အလောဘော အဒေါသော အမောဟော. १५. मिस्सक-संग्रहात सहा हेतू आहेत – लोभ, दोस (द्वेष), मोह, अलोभ, अदोस (अद्वेष) आणि अमोह. ၁၆. သတ္တ ဈာနင်္ဂါနိ – ဝိတက္ကော ဝိစာရော ပီတိ ဧကဂ္ဂတာ သောမနဿံ ဒေါမနဿံ ဥပေက္ခာ. १६. सात झानंगे (ध्यान-अंगे) आहेत – वितक्क (वितर्क), विचार, पीती (प्रीती), एकग्गता (एकाग्रता), सोमनस्स (सौमनस्य), दोमनस्स (दौर्मनस्य) आणि उपेक्खा (उपेक्षा). ၁၇. ဒွါဒသ မဂ္ဂင်္ဂါနိ – သမ္မာဒိဋ္ဌိ သမ္မာသင်္ကပ္ပော သမ္မာဝါစာ သမ္မာကမ္မန္တော သမ္မာအာဇီဝေါ သမ္မာဝါယာမော သမ္မာသတိ သမ္မာသမာဓိ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိ မိစ္ဆာသင်္ကပ္ပော မိစ္ဆာဝါယာမော မိစ္ဆာသမာဓိ. १७. बारा मार्ग-अंगे – सम्मादिट्ठि (सम्यक दृष्टी), सम्मासंकप्पो (सम्यक संकल्प), सम्मावाचा (सम्यक वाणी), सम्माकम्मंतो (सम्यक कर्मान्त), सम्माआजीवो (सम्यक उपजीविका), सम्मावायामो (सम्यक व्यायाम), सम्मासति (सम्यक स्मृती), सम्मासमाधि (सम्यक समाधी), मिच्छादिट्ठि (मिथ्या दृष्टी), मिच्छासंकप्पो (मिथ्या संकल्प), मिच्छावायामो (मिथ्या व्यायाम) आणि मिच्छासमाधि (मिथ्या समाधी). ၁၈. ဗာဝီသတိန္ဒြိယာနိ – စက္ခုန္ဒြိယံ သောတိန္ဒြိယံ ဃာနိန္ဒြိယံ ဇိဝှိန္ဒြိယံ ကာယိန္ဒြိယံ ဣတ္ထိန္ဒြိယံ ပုရိသိန္ဒြိယံ ဇီဝိတိန္ဒြိယံ မနိန္ဒြိယံ သုခိန္ဒြိယံ ဒုက္ခိန္ဒြိယံ သောမနဿိန္ဒြိယံ ဒေါမနဿိန္ဒြိယံ ဥပေက္ခိန္ဒြိယံ သဒ္ဓိန္ဒြိယံ ဝီရိယိန္ဒြိယံ သတိန္ဒြိယံ သမာဓိန္ဒြိယံ ပညိန္ဒြိယံ အနညာတညဿာမီတိန္ဒြိယံ အညိန္ဒြိယံ အညာတာဝိန္ဒြိယံ. १८. बावीस इंद्रिये – चक्खुन्द्रिय (डोळ्याचे इंद्रिय), सोतिन्द्रिय (कानाचे इंद्रिय), घानिन्द्रिय (नाकाचे इंद्रिय), जिव्हिन्द्रिय (जिभेचे इंद्रिय), कायिन्द्रिय (शरीराचे इंद्रिय), इत्थिन्द्रिय (स्त्रीत्व-इंद्रिय), पुरिसिन्द्रिय (पुरुषत्व-इंद्रिय), जीवितिन्द्रिय (जीवन-इंद्रिय), मनिन्द्रिय (मन-इंद्रिय), सुखिन्द्रिय (सुख-इंद्रिय), दुक्खिन्द्रिय (दुःख-इंद्रिय), सोमनस्सिन्द्रिय (सौमनस्य-इंद्रिय), दोमनस्सिन्द्रिय (दौर्मनस्य-इंद्रिय), उपेक्खिन्द्रिय (उपेक्षा-इंद्रिय), सद्धिन्द्रिय (श्रद्धा-इंद्रिय), वीरियिन्द्रिय (वीर्य-इंद्रिय), सतिन्द्रिय (स्मृती-इंद्रिय), समाधिन्द्रिय (समाधी-इंद्रिय), पञ्ञिन्द्रिय (प्रज्ञा-इंद्रिय), अनञ्ञातञ्ञस्सामीतिन्द्रिय ('मी अज्ञात सत्य जाणून घेईन' हे इंद्रिय), अञ्ञिन्द्रिय (आज्ञा-इंद्रिय) आणि अञ्ञाताविन्द्रिय ('ज्याने सत्य जाणले आहे त्याचे' इंद्रिय). ၁၉. နဝ ဗလာနိ – သဒ္ဓါဗလံ ဝီရိယဗလံ သတိဗလံ သမာဓိဗလံ ပညာဗလံ ဟိရိဗလံ ဩတ္တပ္ပဗလံ အဟိရိကဗလံ အနောတ္တပ္ပဗလံ. १९. नऊ बले – सद्धाबल (श्रद्धा-बल), वीरियबल (वीर्य-बल), सतिबल (स्मृती-बल), समाधिबल (समाधी-बल), पञ्ञाबल (प्रज्ञा-बल), हिरिबल (नैतिक लज्जा-बल), ओत्तप्पबल (नैतिक भय-बल), अहिरिकबल (नैतिक निर्लज्जता-बल) आणि अनोत्तप्पबल (नैतिक निर्भयता-बल). ၂၀. စတ္တာရော အဓိပတီ – ဆန္ဒာဓိပတိ ဝီရိယာဓိပတိ စိတ္တာဓိပတိ ဝီမံသာဓိပတိ. २०. चार अधिपती – छंदाधिपती (इच्छा-अधिपती), वीरियाधिपती (वीर्य-अधिपती), चित्ताधिपती (चित्त-अधिपती) आणि वीमंसाधिपती (विमंसा-अधिपती). ၂၁. စတ္တာရော အာဟာရာ – ကဗဠီကာရော အာဟာရော, ဖဿော ဒုတိယော, မနောသဉ္စေတနာ တတိယာ, ဝိညာဏံ စတုတ္ထံ. २१. चार आहार – कबाळीकार आहार (कवळ करून खाण्याचा आहार), दुसरा फस्स (स्पर्श), तिसरी मनोसंचेतना (मानसिक चेतना) आणि चौथे विञ्ञाण (विज्ञान). ၂၂. ဣန္ဒြိယေသု [Pg.49] ပနေတ္ထ သောတာပတ္တိမဂ္ဂဉာဏံ အနညာတညဿာမီတိန္ဒြိယံ. २२. या इंद्रियांमध्ये, सोतापत्तिमार्ग-ज्ञान हे 'अनञ्ञातञ्ञस्samītiन्द्रिय' (मी अज्ञात सत्य जाणून घेईन हे इंद्रिय) आहे. ၂၃. အရဟတ္တဖလဉာဏံ အညာတာဝိန္ဒြိယံ. २३. अरहत्तफल-ज्ञान हे 'अञ्ञाताविन्द्रिय' (ज्याने सत्य जाणले आहे त्याचे इंद्रिय) आहे. ၂၄. မဇ္ဈေ ဆ ဉာဏာနိ အညိန္ဒြိယာနီတိ ပဝုစ္စန္တိ. २४. मधील सहा ज्ञानांना 'अञ्ञिन्द्रिय' (आज्ञा-इंद्रिय) असे म्हटले जाते. ၂၅. ဇီဝိတိန္ဒြိယဉ္စ ရူပါရူပဝသေန ဒုဝိဓံ ဟောတိ. २५. आणि जीवितिन्द्रिय हे रूप आणि अरूप अशा दोन प्रकारचे असते. ၂၆. ပဉ္စဝိညာဏေသု ဈာနင်္ဂါနိ, အဝီရိယေသု ဗလာနိ, အဟေတုကေသု မဂ္ဂင်္ဂါနိ န လဗ္ဘန္တိ. २६. पंचविज्ञानांमध्ये ध्यान-अंगे (झानंगानी), वीर्य नसलेल्यांमध्ये बले, आणि अहेतुक चित्तांमध्ये मार्ग-अंगे आढळत नाहीत. ၂၇. တထာ ဝိစိကိစ္ဆာစိတ္တေ ဧကဂ္ဂတာ မဂ္ဂိန္ဒြိယဗလဘာဝံ န ဂစ္ဆတိ. २७. त्याचप्रमाणे, विचिकित्सा (शंका) युक्त चित्तामध्ये एकाग्रता ही मार्ग, इंद्रिय किंवा बल या अवस्थेला प्राप्त होत नाही. ၂၈. ဒွိဟေတုကတိဟေတုကဇဝနေသွေဝ ယထာသမ္ဘဝံ အဓိပတိ ဧကောဝ လဗ္ဘတီတိ. २८. द्विहेतुक आणि त्रिहेतुक जवनांमध्येच संभवते त्याप्रमाणे केवळ एकच अधिपती प्राप्त होतो. ၂၉. ဆ ဟေတူ ပဉ္စ ဈာနင်္ဂါ, မဂ္ဂင်္ဂါ နဝ ဝတ္ထုတော. २९. सहा हेतू, पाच ध्यान-अंगे आणि वस्तूच्या (वास्तविकतेच्या) दृष्टीने नऊ मार्ग-अंगे आहेत. သောဠသိန္ဒြိယဓမ္မာ စ, ဗလဓမ္မာ နဝေရိတာ. तसेच सोळा इंद्रिय-धर्म आणि नऊ बल-धर्म सांगितले आहेत. စတ္တာရောဓိပတိ ဝုတ္တာ, တထာဟာရာတိ သတ္တဓာ; ကုသလာဒိသမာကိဏ္ဏော, ဝုတ္တောမိဿကသင်္ဂဟော. चार अधिपती आणि तसेच आहार सांगितले आहेत; अशा प्रकारे सात प्रकारांनी, कुशल इत्यादींनी युक्त असलेला हा 'मिश्रक संग्रह' (मिस्सकसंगहो) सांगितला आहे. ဗောဓိပက္ခိယသင်္ဂဟော बोधिपक्खिय संग्रह (बोधिपक्षीय संग्रह) ၃၀. ဗောဓိပက္ခိယသင်္ဂဟေ စတ္တာရော သတိပဋ္ဌာနာ ကာယာနုပဿနာသတိပဋ္ဌာနံ ဝေဒနာနုပဿနာသတိပဋ္ဌာနံ စိတ္တာနုပဿနာသတိပဋ္ဌာနံ ဓမ္မာနုပဿနာသတိပဋ္ဌာနံ. ३०. बोधिपक्खिय संग्रहामध्ये चार सतिपट्ठान (स्मृतीप्रस्थान) आहेत – कायानुपस्सना सतिपट्ठान (शरीराचे अनुदर्शन), वेदनानुपस्सना सतिपट्ठान (वेदनांचे अनुदर्शन), चित्तानुपस्सना सतिपट्ठान (चित्ताचे अनुदर्शन) आणि धम्मानुपस्सना सतिपट्ठान (धम्मांचे अनुदर्शन). ၃၁. စတ္တာရော သမ္မပ္ပဓာနာ ဥပ္ပန္နာနံ ပါပကာနံ ပဟာနာယ ဝါယာမော, အနုပ္ပန္နာနံ ပါပကာနံ အနုပ္ပာဒါယ ဝါယာမော, အနုပ္ပန္နာနံ ကုသလာနံ ဥပ္ပာဒါယ ဝါယာမော, ဥပ္ပန္နာနံ ကုသလာနံ ဘိယျောဘာဝါယ ဝါယာမော. ३१. चार सम्मप्पधान (सम्यक प्रयत्न) आहेत – उत्पन्न झालेल्या पापांच्या (अकुशल धर्मांच्या) प्रहाणासाठी (नष्ट करण्यासाठी) प्रयत्न करणे, अनुत्पन्न (उत्पन्न न झालेल्या) पापांच्या अनुत्पादासाठी (उत्पन्न न होऊ देण्यासाठी) प्रयत्न करणे, अनुत्पन्न कुशलांच्या उत्पादासाठी (उत्पन्न करण्यासाठी) प्रयत्न करणे आणि उत्पन्न झालेल्या कुशलांच्या वृद्धीसाठी (वाढवण्यासाठी) प्रयत्न करणे. ၃၂. စတ္တာရော [Pg.50] ဣဒ္ဓိပါဒါ – ဆန္ဒိဒ္ဓိပါဒေါ ဝီရိယိဒ္ဓိပါဒေါ စိတ္တိဒ္ဓိပါဒေါ ဝီမံသိဒ္ဓိပါဒေါ. ३२. चार इद्धिपाद (ऋद्धिपाद) – छंदिद्धिपाद (इच्छा-ऋद्धिपाद), वीरियिद्धिपाद (वीर्य-ऋद्धिपाद), चित्तिद्धिपाद (चित्त-ऋद्धिपाद) आणि वीमंसिद्धिपाद (विमंसा-ऋद्धिपाद). ၃၃. ပဉ္စိန္ဒြိယာနိ – သဒ္ဓိန္ဒြိယံ ဝီရိယိန္ဒြိယံ သတိန္ဒြိယံ သမာဓိန္ဒြိယံ ပညိန္ဒြိယံ. ३३. पाच इंद्रिये – सद्धिन्द्रिय (श्रद्धा-इंद्रिय), वीरियिन्द्रिय (वीर्य-इंद्रिय), सतिन्द्रिय (स्मृती-इंद्रिय), समाधिन्द्रिय (समाधी-इंद्रिय) आणि पञ्ञिन्द्रिय (प्रज्ञा-इंद्रिय). ၃၄. ပဉ္စ ဗလာနိ – သဒ္ဓါဗလံ ဝီရိယဗလံ သတိဗလံ သမာဓိဗလံ ပညာဗလံ. ३४. पाच बले – सद्धाबल (श्रद्धा-बल), वीरियबल (वीर्य-बल), सतिबल (स्मृती-बल), समाधिबल (समाधी-बल) आणि पञ्ञाबल (प्रज्ञा-बल). ၃၅. သတ္တ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ – သတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ ဓမ္မဝိစယသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ ဝီရိယသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ ပီတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ ပဿဒ္ဓိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ သမာဓိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ ဥပေက္ခာသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ. ३५. सात बोज्झंग (बोध्यंग) – सतिसम्बोज्झंग (स्मृती-बोध्यंग), धम्मविचयसम्बोज्झंग (धर्मविचय-बोध्यंग), वीरियसम्बोज्झंग (वीर्य-बोध्यंग), पीतिसम्बोज्झंग (प्रीती-बोध्यंग), पस्सद्धिसम्बोज्झंग (प्रश्रब्धी-बोध्यंग), समाधिसम्बोज्झंग (समाधी-बोध्यंग) आणि उपेक्खासम्बोज्झंग (उपेक्षा-बोध्यंग). ၃၆. အဋ္ဌ မဂ္ဂင်္ဂါနိ – သမ္မာဒိဋ္ဌိ သမ္မာသင်္ကပ္ပော သမ္မာဝါစာ သမ္မာကမ္မန္တော သမ္မာအာဇီဝေါ သမ္မာဝါယာမော သမ္မာသတိ သမ္မာသမာဓိ. ३६. आठ मार्ग-अंगे – सम्मादिट्ठि (सम्यक दृष्टी), सम्मासंकप्पो (सम्यक संकल्प), सम्मावाचा (सम्यक वाणी), सम्माकम्मंतो (सम्यक कर्मान्त), सम्माआजीवो (सम्यक उपजीविका), सम्मावायामो (सम्यक व्यायाम), सम्मासति (सम्यक स्मृती) आणि सम्मासमाधि (सम्यक समाधी). ၃၇. ဧတ္ထ ပန စတ္တာရော သတိပဋ္ဌာနာတိ သမ္မာသတိ ဧကာဝ ပဝုစ္စတိ. ३७. येथे, चार सतिपट्ठान (स्मृतीप्रस्थान) म्हणजे केवळ एकच 'सम्मासति' (सम्यक स्मृती) म्हटले जाते. ၃၈. တထာ စတ္တာရော သမ္မပ္ပဓာနာတိ စ သမ္မာဝါယာမော. ३८. त्याचप्रमाणे, चार सम्मप्पधान (सम्यक प्रयत्न) म्हणजे केवळ 'सम्मावायामो' (सम्यक व्यायाम) होय. ၃၉. ဆန္ဒော စိတ္တမုပေက္ခာ စ, သဒ္ဓါပဿဒ္ဓိပီတိယော. ३९. छंद (इच्छा), चित्त, उपेक्षा, श्रद्धा, पस्सद्धि (प्रश्रब्धी) आणि पीती (प्रीती). သမ္မာဒိဋ္ဌိ စ သင်္ကပ္ပော, ဝါယာမော ဝိရတိတ္တယံ. सम्मादिट्ठि (सम्यक दृष्टी), संकल्प, व्यायाम (प्रयत्न) आणि तीन विरती (विरतित्तय). သမ္မာသတိ သမာဓီတိ, စုဒ္ဒသေတေ သဘာဝတော; သတ္တတိံသပ္ပဘေဒေန, သတ္တဓာ တတ္ထ သင်္ဂဟော. सम्मासति (सम्यक स्मृती) आणि समाधी – हे चौदा स्वभावतः आहेत; तेथे सदतीस (३७) प्रकारांनी सात विभागांत हा संग्रह केला आहे. ၄၀. သင်္ကပ္ပပဿဒ္ဓိ စ ပီတုပေက္ခာ, ४०. संकल्प, पस्सद्धि (प्रश्रब्धी), पीती (प्रीती) आणि उपेक्षा, ဆန္ဒော စ စိတ္တံ ဝိရတိတ္တယဉ္စ; နဝေကဌာနာ ဝိရိယံ နဝဋ္ဌ,သတီ သမာဓီ စတု ပဉ္စ ပညာ; သဒ္ဓါ ဒုဌာနုတ္တမသတ္တတိံသ-ဓမ္မာနမေသော ပဝရော ဝိဘာဂေါ. छंद (इच्छा), चित्त आणि तीन विरती; हे नऊ एकाच ठिकाणी असतात. वीर्य नऊ ठिकाणी, स्मृती आठ ठिकाणी, समाधी चार ठिकाणी, प्रज्ञा पाच ठिकाणी आणि श्रद्धा दोन ठिकाणी असते. हा उत्तम सदतीस (३७) श्रेष्ठ धर्मांचा विभाग आहे. ၄၁. သဗ္ဗေ [Pg.51] လောကုတ္တရေ ဟောန္တိ, န ဝါ သင်္ကပ္ပပီတိယော. ४१. हे सर्व लोकोत्तर (लोकुत्तर) चित्तामध्ये असतात, परंतु संकल्प आणि पीती (प्रीती) कधीकधी नसतात. လောကိယေပိ ယထာယောဂံ, ဆဗ္ဗိသုဒ္ဓိပဝတ္တိယံ. लौकिक भूमीमध्ये देखील, सहा विशुद्धींच्या प्रवृत्तीमध्ये योग्यतेनुसार हे असतात. သဗ္ဗသင်္ဂဟော सब्बसंग्रह (सर्व-संग्रह) ၄၂. သဗ္ဗသင်္ဂဟေ ပဉ္စက္ခန္ဓာ – ရူပက္ခန္ဓော ဝေဒနာက္ခန္ဓော သညာက္ခန္ဓော သင်္ခါရက္ခန္ဓော ဝိညာဏက္ခန္ဓော. ४२. सब्बसंग्रहामध्ये (सर्व-संग्रहामध्ये) पाच स्कंध आहेत – रूपस्कंध, वेदनास्कंध, संज्ञास्कंध, संस्कारस्कंध आणि विज्ञानस्कंध. ၄၃. ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓာ – ရူပုပါဒါနက္ခန္ဓော ဝေဒနုပါဒါနက္ခန္ဓော သညုပါဒါနက္ခန္ဓော သင်္ခါရုပါဒါနက္ခန္ဓော ဝိညာဏုပါဒါနက္ခန္ဓော. ४३. पाच उपादानस्कंध आहेत – रूपोपादानस्कंध, वेदनोपादानस्कंध, संज्ञोपादानस्कंध, संस्कारोपादानस्कंध आणि विज्ञानोपादानस्कंध. ၄၄. ဒွါဒသာယတနာနိ – စက္ခာယတနံ သောတာယတနံ ဃာနာယတနံ ဇိဝှာယတနံ ကာယာယတနံ မနာယတနံ ရူပါယတနံ သဒ္ဒါယတနံ ဂန္ဓာယတနံ ရသာယတနံ ဖောဋ္ဌဗ္ဗာယတနံ ဓမ္မာယတနံ. ४४. बारा आयतने आहेत – चक्षु-आयतन (चक्खायतन), श्रोत्र-आयतन (सोतायतन), घ्राण-आयतन (घानायतन), जिव्हा-आयतन (जिव्हायतन), काय-आयतन (कायायतन), मन-आयतन (मनायतन), रूप-आयतन (रूपायतन), शब्द-आयतन (सद्दायतन), गंध-आयतन (गंधायतन), रस-आयतन (रसायतन), स्प्रष्टव्य-आयतन (फोट्ठब्बायतन) आणि धर्म-आयतन (धम्मायतन). ၄၅. အဋ္ဌာရသ ဓာတုယော – စက္ခုဓာတု သောတဓာတု ဃာနဓာတု ဇိဝှာဓာတု ကာယဓာတု ရူပဓာတု သဒ္ဒဓာတု ဂန္ဓဓာတု ရသဓာတု ဖောဋ္ဌဗ္ဗဓာတု စက္ခုဝိညာဏဓာတု သောတဝိညာဏဓာတု ဃာနဝိညာဏဓာတု ဇိဝှာဝိညာဏဓာတု ကာယဝိညာဏဓာတု မနောဓာတု ဓမ္မဓာတု မနောဝိညာဏဓာတု. ४५. अठरा धातू आहेत – चक्षु-धातू, श्रोत्र-धातू, घ्राण-धातू, जिव्हा-धातू, काय-धातू, रूप-धातू, शब्द-धातू, गंध-धातू, रस-धातू, स्प्रष्टव्य-धातू, चक्षु-विज्ञान-धातू, श्रोत्र-विज्ञान-धातू, घ्राण-विज्ञान-धातू, जिव्हा-विज्ञान-धातू, काय-विज्ञान-धातू, मन-धातू, धर्म-धातू आणि मन-विज्ञान-धातू. ၄၆. စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနိ – ဒုက္ခံ အရိယသစ္စံ, ဒုက္ခသမုဒယော အရိယသစ္စံ, ဒုက္ခနိရောဓော အရိယသစ္စံ, ဒုက္ခနိရောဓဂါမိနီ ပဋိပဒါ အရိယသစ္စံ. ४६. चार आर्यसत्ये आहेत – दुःख आर्यसत्य, दुःखसमुदय (दुःखाचे कारण) आर्यसत्य, दुःखनिरोध (दुःखाचा अंत) आर्यसत्य आणि दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःखनिरोधाकडे नेणारा मार्ग) आर्यसत्य. ၄၇. ဧတ္ထ ပန စေတသိကသုခုမရူပနိဗ္ဗာနဝသေန ဧကူနသတ္တတိ ဓမ္မာ ဓမ္မာယတနဓမ္မဓာတူတိ သင်္ခံ ဂစ္ဆန္တိ. ४७. येथे, चेतसिक (चैतसिक), सूक्ष्म रूप आणि निब्बान (निर्वाण) यांच्या रूपाने एकोणसत्तर (६९) धर्म हे 'धम्मायतन' आणि 'धम्मधातू' या संज्ञेस प्राप्त होतात. ၄၈. မနာယတနမေဝ သတ္တဝိညာဏဓာတုဝသေန ဘိဇ္ဇတိ. ४८. मनायतनच सात विज्ञान-धातूंच्या रूपाने विभागले जाते. ၄၉. ရူပဉ္စ ဝေဒနာ သညာ, သေသစေတသိကာ တထာ. ४९. रूप, वेदना, संज्ञा आणि तसेच उर्वरित चेतसिक, ဝိညာဏမိတိ ပဉ္စေတေ, ပဉ္စက္ခန္ဓာတိ ဘာသိတာ. आणि विज्ञान, या पाचांना 'पंचस्कंध' असे म्हटले आहे. ၅၀. ပဉ္စုပါဒါနက္ခန္ဓာတိ[Pg.52], တထာ တေဘူမကာ မတာ. ५०. तसेच, ते जेव्हा तीन भूमींशी (तेभूमिक) संबंधित असतात, तेव्हा त्यांना 'पंचउपादानस्कंध' मानले जाते. ဘေဒါဘာဝေန နိဗ္ဗာနံ, ခန္ဓသင်္ဂဟနိဿဋံ. भेदाच्या (विभाजनाच्या) अभावामुळे निर्वाण हे स्कंध-संग्रहातून मुक्त (वगळलेले) आहे. ၅၁. ဒွါရာရမ္မဏဘေဒေန, ဘဝန္တာယတနာနိ စ. ५१. द्वार आणि आलंबन (विषय) यांच्या भेदाने आयतने होतात. ဒွါရာလမ္ဗတဒုပ္ပန္န-ပရိယာယေန ဓာတုယော. द्वार, आलंबन आणि त्यापासून उत्पन्न होणाऱ्या विज्ञानाच्या पर्यायाने धातू (अस्तित्वात येतात). ၅၂. ဒုက္ခံ တေဘူမကံ ဝဋ္ဋံ, တဏှာ သမုဒယော ဘဝေ. ५२. तीन भूमींमधील संसारचक्र (वर्त) हे दुःख आहे, आणि तृष्णा हा त्याचा उदय (समुदय) आहे. နိရောဓော နာမ နိဗ္ဗာနံ, မဂ္ဂေါ လောကုတ္တရော မတော. निरोध म्हणजे निर्वाण होय, आणि मार्ग हा लोकोत्तर मानला गेला आहे. ၅၃. မဂ္ဂယုတ္တာ ဖလာ စေဝ, စတုသစ္စဝိနိဿဋာ. ५३. मार्गाशी युक्त असलेली फळे ही चार आर्यसत्यांमधून मुक्त (वगळलेली) आहेत. ဣတိ ပဉ္စပ္ပဘေဒေန, ပဝုတ္တော သဗ္ဗသင်္ဂဟော. अशा प्रकारे, पाच प्रकारच्या भेदांनी हा सर्वसंग्रह सांगितले आहे. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ သမုစ္စယသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे अभिधम्मत्थसंगहातील 'समुच्चयसंग्रहविभाग' नावाचा သတ္တမော ပရိစ္ဆေဒေါ. सातवा परिच्छेद समाप्त झाला. ၈. ပစ္စယပရိစ္ဆေဒေါ ८. प्रत्यय-परिच्छेद ၁. ယေသံ သင်္ခတဓမ္မာနံ, ယေ ဓမ္မာ ပစ္စယာ ယထာ. १. ज्या संस्कृत (संस्कारित) धर्मांचे, जे धर्म ज्या प्रकारे प्रत्यय (कारण) होतात, တံ ဝိဘာဂမိဟေဒါနိ, ပဝက္ခာမိ ယထာရဟံ. तो विभाग मी आता येथे यथायोग्य रीतीने सांगेन. ၂. ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယော ပဋ္ဌာနနယော စေတိ ပစ္စယသင်္ဂဟော ဒုဝိဓော ဝေဒိတဗ္ဗော. २. प्रत्ययसंग्रह दोन प्रकारचा समजला पाहिजे: प्रतीत्यसमुत्पाद नय आणि पट्ठान नय. ၃. တတ္ထ တဗ္ဘာဝဘာဝီဘာဝါကာရမတ္တောပလက္ခိတော ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယော, ပဋ္ဌာနနယော ပန အာဟစ္စပစ္စယဋ္ဌိတိမာရဗ္ဘ ပဝုစ္စတိ, ဥဘယံ ပန ဝေါမိဿေတွာ ပပဉ္စေန္တိ အာစရိယာ. ३. त्यामध्ये, 'ते असताना हे होते' या केवळ भावावस्थेच्या लक्षणाने युक्त असलेला तो प्रतीत्यसमुत्पाद नय होय. परंतु, पट्ठान नय हा विशिष्ट प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) स्थितीला अनुसरून सांगितला जातो. आचार्य मात्र या दोन्हीचे मिश्रण करून सविस्तर स्पष्टीकरण करतात. ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယော प्रतीत्यसमुत्पाद नय ၄. တတ္ထ အဝိဇ္ဇာပစ္စယာ သင်္ခါရာ, သင်္ခါရပစ္စယာ ဝိညာဏံ, ဝိညာဏပစ္စယာ နာမရူပံ, နာမရူပပစ္စယာ သဠာယတနံ, သဠာယတနပစ္စယာ ဖဿော, ဖဿပစ္စယာ ဝေဒနာ, ဝေဒနာပစ္စယာ တဏှာ, တဏှာပစ္စယာ ဥပါဒါနံ, ဥပါဒါနပစ္စယာ ဘဝေါ[Pg.53], ဘဝပစ္စယာ ဇာတိ, ဇာတိပစ္စယာ ဇရာမရဏံ သောကပရိဒေဝဒုက္ခဒေါမနဿုပါယာသာ သမ္ဘဝန္တိ. ဧဝမေတဿ ကေဝလဿ ဒုက္ခက္ခန္ဓဿ သမုဒယော ဟောတီတိ အယမေတ္ထ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယော. ४. त्यामध्ये, अविद्येच्या प्रत्ययाने (कारणाने) संस्कार, संस्कारांच्या प्रत्ययाने विज्ञान, विज्ञानाच्या प्रत्ययाने नामरूप, नामरूपाच्या प्रत्ययाने षडायतन, षडायतनाच्या प्रत्ययाने स्पर्श, स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना, वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा, तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान, उपादानाच्या प्रत्ययाने भव, भवाच्या प्रत्ययाने जाती (जन्म), आणि जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव (आक्रोश), दुःख, दोमनस्य (मानसिक दुःख) आणि उपायास (हताशपणा) उत्पन्न होतात. अशा प्रकारे या केवळ दुःखस्कंधाचा समुदय (उत्पत्ती) होतो. हा येथे प्रतीत्यसमुत्पाद नय आहे. ၅. တတ္ထ တယော အဒ္ဓါ ဒွါဒသင်္ဂါနိ ဝီသတာကာရာ တိသန္ဓိ စတုသင်္ခေပါ တီဏိ ဝဋ္ဋာနိ ဒွေ မူလာနိ စ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ५. त्यामध्ये तीन काळ (अद्धा), बारा अंग, वीस आकार, तीन संधी, चार संक्षेप, तीन वर्ते (चक्रे) आणि दोन मुळे समजली पाहिजेत. ၆. ကထံ? အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရာ အတီတော အဒ္ဓါ, ဇာတိဇရာမရဏံ အနာဂတော အဒ္ဓါ, မဇ္ဈေ အဋ္ဌ ပစ္စုပ္ပန္နော အဒ္ဓါတိ တယော အဒ္ဓါ. ६. ते कसे? अविद्या आणि संस्कार हा भूतकाळ (अतीत अद्धा) आहे; जाती आणि जरा-मरण हा भविष्यकाळ (अनागत अद्धा) आहे; आणि मधील आठ अंग हा वर्तमानकाळ (प्रत्युत्पन्न अद्धा) आहे. हे तीन काळ आहेत. ၇. အဝိဇ္ဇာ သင်္ခါရာ ဝိညာဏံ နာမရူပံ သဠာယတနံ ဖဿော ဝေဒနာ တဏှာ ဥပါဒါနံ ဘဝေါ ဇာတိ ဇရာမရဏန္တိ ဒွါဒသင်္ဂါနိ. ७. अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाती आणि जरा-मरण ही बारा अंगे आहेत. ၈. သောကာဒိဝစနံ ပနေတ္ထ နိဿန္ဒဖလနိဒဿနံ. ८. येथे शोक इत्यादींचा उल्लेख हा केवळ (जरा-मरणाचा) स्वाभाविक परिणाम (निस्यंदफल) दर्शवण्यासाठी आहे. ၉. အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရဂ္ဂဟဏေန ပနေတ္ထ တဏှုပါဒါနဘဝါပိ ဂဟိတာ ဘဝန္တိ, တထာ တဏှုပါဒါနဘဝဂ္ဂဟဏေန စ အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရာ, ဇာတိဇရာမရဏဂ္ဂဟဏေန စ ဝိညာဏာဒိဖလပဉ္စကမေဝ ဂဟိတန္တိ ကတွာ – ९. येथे अविद्या आणि संस्कार यांच्या ग्रहणाने तृष्णा, उपादान आणि भव यांचेही ग्रहण होते; तसेच तृष्णा, उपादान आणि भव यांच्या ग्रहणाने अविद्या व संस्कार यांचे ग्रहण होते; आणि जाती व जरा-मरण यांच्या ग्रहणाने विज्ञानादी पाच फळांचेच ग्रहण होते, असे मानून – ၁၀. အတီတေ ဟေတဝေါ ပဉ္စ, ဣဒါနိ ဖလပဉ္စကံ. १०. भूतकाळात पाच हेतू होते, वर्तमानात पाच फळे आहेत. ဣဒါနိ ဟေတဝေါ ပဉ္စ, အာယတိံ ဖလပဉ္စကန္တိ; ဝီသတာကာရာ တိသန္ဓိ, စတုသင်္ခေပါ စ ဘဝန္တိ. वर्तमानात पाच हेतू आहेत, भविष्यात पाच फळे आहेत; अशा प्रकारे वीस आकार, तीन संधी आणि चार संक्षेप होतात. ၁၁. အဝိဇ္ဇာတဏှုပါဒါနာ စ ကိလေသဝဋ္ဋံ, ကမ္မဘဝသင်္ခါတော ဘဝေကဒေသော သင်္ခါရာ စ ကမ္မဝဋ္ဋံ, ဥပပတ္တိဘဝသင်္ခါတော ဘဝေကဒေသော အဝသေသာ စ ဝိပါကဝဋ္ဋန္တိ တီဏိ ဝဋ္ဋာနိ. ११. अविद्या, तृष्णा आणि उपादान हे 'क्लेशवर्त' (क्लेशांचे चक्र) आहे; कर्मभव संज्ञक भवाचा एक भाग आणि संस्कार हे 'कर्मवर्त' आहे; आणि उपपत्तिभव संज्ञक भवाचा एक भाग व उर्वरित अंगे हे 'विपाकवर्त' आहे. ही तीन वर्ते (चक्रे) आहेत. ၁၂. အဝိဇ္ဇာတဏှာဝသေန ဒွေ မူလာနိ စ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. १२. अविद्या आणि तृष्णा यांच्या रूपाने दोन मुळे समजली पाहिजेत. ၁၃. တေသမေဝ [Pg.54] စ မူလာနံ, နိရောဓေန နိရုဇ္ဈတိ. १३. आणि याच मुळांच्या निरोधाने (संसारचक्र) निरुद्ध होते. ဇရာမရဏမုစ္ဆာယ, ပီဠိတာနမဘိဏှသော; အာသဝါနံ သမုပ္ပာဒါ, အဝိဇ္ဇာ စ ပဝတ္တတိ. जरा आणि मरणाच्या मोहाने वारंवार पीडित असलेल्यांच्या आसवांच्या (आसवांच्या उत्पत्तीमुळे) अविद्या पुन्हा प्रवृत्त होते. ဝဋ္ဋမာဗန္ဓမိစ္စေဝံ, တေဘူမကမနာဒိကံ; ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒေါတိ, ပဋ္ဌပေသိ မဟာမုနိ. अशा प्रकारे, महामुनींनी (बुद्धांनी) तीन भूमींशी संबंधित आणि अनादी अशा या संसारबंधनाला 'प्रतीत्यसमुत्पाद' म्हणून प्रस्थापित केले आहे. ပဋ္ဌာနနယော पट्ठान नय ၁၄. ဟေတုပစ္စယော အာရမ္မဏပစ္စယော အဓိပတိပစ္စယော အနန္တရပစ္စယော သမနန္တရပစ္စယော သဟဇာတပစ္စယော အညမညပစ္စယော နိဿယပစ္စယော ဥပနိဿယပစ္စယော ပုရေဇာတပစ္စယော ပစ္ဆာဇာတပစ္စယော အာသေဝနပစ္စယော ကမ္မပစ္စယော ဝိပါကပစ္စယော အာဟာရပစ္စယော ဣန္ဒြိယပစ္စယော ဈာနပစ္စယော မဂ္ဂပစ္စယော သမ္ပယုတ္တပစ္စယော ဝိပ္ပယုတ္တပစ္စယော အတ္ထိပစ္စယော နတ္ထိပစ္စယော ဝိဂတပစ္စယော အဝိဂတပစ္စယောတိ အယမေတ္ထ ပဋ္ဌာနနယော. १४. हेतू-प्रत्यय, आलंबन-प्रत्यय, अधिपती-प्रत्यय, अनंतर-प्रत्यय, समनंतर-प्रत्यय, सहजात-प्रत्यय, अन्योन्य-प्रत्यय, निश्रय-प्रत्यय, उपनिश्रय-प्रत्यय, पुरेजात-प्रत्यय, पश्चातजात-प्रत्यय, आसेवन-प्रत्यय, कर्म-प्रत्यय, विपाक-प्रत्यय, आहार-प्रत्यय, इंद्रिय-प्रत्यय, ध्यान-प्रत्यय, मार्ग-प्रत्यय, संप्रयुक्त-प्रत्यय, विप्रयुक्त-प्रत्यय, अस्ती-प्रत्यय, नास्ती-प्रत्यय, विगत-प्रत्यय आणि अविगत-प्रत्यय – हा येथे पट्ठान नय आहे. ၁၅. ဆဓာ နာမံ တု နာမဿ, ပဉ္စဓာ နာမရူပိနံ. १५. नाम हे नामाचा सहा प्रकारे, आणि नाम-रूपाचा पाच प्रकारे प्रत्यय (कारण) होते. ဧကဓာ ပုန ရူပဿ, ရူပံ နာမဿ စေကဓာ. पुन्हा, (नाम हे) रूपाचा एका प्रकारे, आणि रूप हे नामाचा एका प्रकारे प्रत्यय होते. ပညတ္တိနာမရူပါနိ, နာမဿ ဒုဝိဓာ ဒွယံ; ဒွယဿ နဝဓာ စေတိ, ဆဗ္ဗိဓာ ပစ္စယာ ကထံ. प्रज्ञप्ती (संकल्पना), नाम आणि रूप हे नामाचे दोन प्रकारे, आणि या दोन्हीचे (नाम-रूपाचे) नऊ प्रकारे प्रत्यय होतात. हे सहा प्रकारचे प्रत्यय कसे आहेत? ၁၆. အနန္တရနိရုဒ္ဓါ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ ပဋုပ္ပန္နာနံ စိတ္တစေတသိကာနံ ဓမ္မာနံ အနန္တရသမနန္တရနတ္ထိဝိဂတဝသေန, ပုရိမာနိ ဇဝနာနိ ပစ္ဆိမာနံ ဇဝနာနံ အာသေဝနဝသေန, သဟဇာတာ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ အညမညံ သမ္ပယုတ္တဝသေနေတိ စ ဆဓာ နာမံ နာမဿ ပစ္စယော ဟောတိ. १६. नाम हे नामाचा सहा प्रकारे प्रत्यय होते: (१) अनंतर (लगेचच) निरुद्ध झालेले चित्त आणि चेतसिक धर्म हे वर्तमान चित्त आणि चेतसिक धर्मांचे अनंतर, समनंतर, नास्ती आणि विगत भावाने; (२) पूर्वीचे जवन हे नंतरच्या जवनांचे आसेवन भावाने; आणि (३) सहजात (एकत्र उत्पन्न झालेले) चित्त व चेतसिक धर्म हे परस्परांचे संप्रयुक्त भावाने प्रत्यय होतात. ၁၇. ဟေတုဈာနင်္ဂမဂ္ဂင်္ဂါနိ သဟဇာတာနံ နာမရူပါနံ ဟေတာဒိဝသေန, သဟဇာတာ စေတနာ သဟဇာတာနံ နာမရူပါနံ, နာနာက္ခဏိကာ စေတနာ ကမ္မာဘိနိဗ္ဗတ္တာနံ နာမရူပါနံ ကမ္မဝသေန, ဝိပါကက္ခန္ဓာ အညမညံ သဟဇာတာနံ ရူပါနံ ဝိပါကဝသေနေတိ [Pg.55] စ ပဉ္စဓာ နာမံ နာမရူပါနံ ပစ္စယော ဟောတိ. १७. नाम हे नाम-रूपाचा पाच प्रकारे प्रत्यय होते: (१) हेतू, ध्यान-अंगे आणि मार्ग-अंगे हे सहजात नाम-रूपांचे हेतू इत्यादी भावाने; (२) सहजात चेतना ही सहजात नाम-रूपांची, आणि नानाक्षणिक (वेगवेगळ्या क्षणी होणारी) चेतना ही कर्मापासून उत्पन्न होणाऱ्या नाम-रूपांची कर्म भावाने; आणि (३) विपाक स्कंध हे परस्परांचे आणि सहजात रूपांचे विपाक भावाने प्रत्यय होतात. ၁၈. ပစ္ဆာဇာတာ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ ပုရေဇာတဿ ဣမဿ ကာယဿ ပစ္ဆာဇာတဝသေနေတိ ဧကဓာဝ နာမံ ရူပဿ ပစ္စယော ဟောတိ. १८. नाम हे रूपाचा केवळ एकाच प्रकारे प्रत्यय होते: पश्चातजात (नंतर उत्पन्न झालेले) चित्त आणि चेतसिक धर्म हे पूर्वी उत्पन्न झालेल्या या कायेचे (शरीराचे) पश्चातजात भावाने प्रत्यय होतात. ၁၉. ဆ ဝတ္ထူနိ ပဝတ္တိယံ သတ္တန္နံ ဝိညာဏဓာတူနံ ပဉ္စာရမ္မဏာနိ စ ပဉ္စဝိညာဏဝီထိယာ ပုရေဇာတဝသေနေတိ ဧကဓာဝ ရူပံ နာမဿ ပစ္စယော ဟောတိ. १९. रूप हे नामाचा केवळ एकाच प्रकारे प्रत्यय होते: प्रवृत्ती काळात (जीवनात) सहा वस्तू (इंद्रियांचे आधार) हे सात विज्ञानधातूंचे, आणि पाच आलंबने (विषय) हे पंचविज्ञानवीथीचे पुरेजात (पूर्वी उत्पन्न झालेल्या) भावाने प्रत्यय होतात. ၂၀. အာရမ္မဏဝသေန ဥပနိဿယဝသေနေတိ စ ဒုဝိဓာ ပညတ္တိနာမရူပါနိ နာမဿေဝ ပစ္စယာ ဟောန္တိ. २०. आलम्बन रूपाने आणि उपनिश्रय रूपाने अशा दोन प्रकारे प्रज्ञप्ति, नाम आणि रूप हे नामाचेच प्रत्यय होतात. ၂၁. တတ္ထ ရူပါဒိဝသေန ဆဗ္ဗိဓံ ဟောတိ အာရမ္မဏံ. २१. त्यामध्ये, रूप इत्यादींच्या रूपाने आलम्बन सहा प्रकारचे असते. ၂၂. ဥပနိဿယော ပန တိဝိဓော ဟောတိ – အာရမ္မဏူပနိဿယော အနန္တရူပနိဿယော ပကတူပနိဿယော စေတိ. २२. परंतु उपनिश्रय तीन प्रकारचा असतो – आलम्बन-उपनिश्रय, अनन्तर-उपनिश्रय आणि प्रकृत-उपनिश्रय. ၂၃. တတ္ထ အာရမ္မဏမေဝ ဂရုကတံ အာရမ္မဏူပနိဿယော. २३. त्यामध्ये, आदरपूर्वक ग्रहण केलेले आलम्बन हेच 'आलम्बन-उपनिश्रय' होय. ၂၄. အနန္တရနိရုဒ္ဓါ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ အနန္တရူပနိဿယော. २४. अनन्तर निरुद्ध झालेले चित्त आणि चेतसिक धर्म हे 'अनन्तर-उपनिश्रय' होय. ၂၅. ရာဂါဒယော ပန ဓမ္မာ သဒ္ဓါဒယော စ သုခံ ဒုက္ခံ ပုဂ္ဂလော ဘောဇနံ ဥတုသေနာသနဉ္စ ယထာရဟံ အဇ္ဈတ္တဉ္စ ဗဟိဒ္ဓါ စ ကုသလာဒိဓမ္မာနံ, ကမ္မံ ဝိပါကာနန္တိ စ ဗဟုဓာ ဟောတိ ပကတူပနိဿယော. २५. राग इत्यादी धर्म, श्रद्धा इत्यादी धर्म, सुख, दुःख, पुद्गल, भोजन, ऋतु आणि शयनासन हे योग्यतेनुसार आध्यात्मिक आणि बाह्य रूपाने कुशल इत्यादी धर्मांचे, आणि कर्म हे विपाकांचे अनेक प्रकारे 'प्रकृत-उपनिश्रय' होते. ၂၆. အဓိပတိသဟဇာတအညမညနိဿယအာဟာရဣန္ဒြိယဝိပ္ပယုတ္တအတ္ထိအဝိဂတဝသေနေတိ ယထာရဟံ နဝဓာ နာမရူပါနိ နာမရူပါနံ ပစ္စယာ ဘဝန္တိ. २६. अधिपती, सहजात, अन्योन्य, निश्रय, आहार, इन्द्रिय, विप्रयुक्त, अस्ति आणि अविगत रूपाने योग्यतेनुसार नऊ प्रकारे नाम आणि रूप हे नाम आणि रूपांचे प्रत्यय होतात. ၂၇. တတ္ထ ဂရုကတမာရမ္မဏံ အာရမ္မဏာဓိပတိဝသေန နာမာနံ, သဟဇာတာဓိပတိ စတုဗ္ဗိဓောပိ သဟဇာတဝသေန သဟဇာတာနံ နာမရူပါနန္တိ စ ဒုဝိဓော ဟောတိ အဓိပတိပစ္စယော. २७. त्यामध्ये, आदरपूर्वक ग्रहण केलेले आलम्बन हे 'आलम्बनाधिपती' रूपाने नामांचे प्रत्यय होते, आणि चार प्रकारचा 'सहजाताधिपती' हा 'सहजात' रूपाने सहजात नाम-रूपांचा प्रत्यय होतो; अशा प्रकारे अधिपती-प्रत्यय दोन प्रकारचा असतो. ၂၈. စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ [Pg.56] အညမညံ သဟဇာတရူပါနဉ္စ, မဟာဘူတာ အညမညံ ဥပါဒါရူပါနဉ္စ, ပဋိသန္ဓိက္ခဏေ ဝတ္ထုဝိပါကာ အညမညန္တိ စ တိဝိဓော ဟောတိ သဟဇာတပစ္စယော. २८. चित्त आणि चेतसिक धर्म हे परस्परांचे आणि सहजात रूपांचे, महाभूत हे परस्परांचे आणि उपादाय रूपांचे, आणि प्रतिसंधीच्या क्षणी हृदयवस्तू व विपाक हे परस्परांचे प्रत्यय होतात; अशा प्रकारे 'सहजात-प्रत्यय' तीन प्रकारचा असतो. ၂၉. စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ အညမညံ, မဟာဘူတာ အညမညံ, ပဋိသန္ဓိက္ခဏေ ဝတ္ထုဝိပါကာ အညမညန္တိ စ တိဝိဓော ဟောတိ အညမညပစ္စယော. २९. चित्त आणि चेतसिक धर्म हे परस्परांचे, महाभूत हे परस्परांचे, आणि प्रतिसंधीच्या क्षणी हृदयवस्तू व विपाक हे परस्परांचे प्रत्यय होतात; अशा प्रकारे 'अन्योन्य-प्रत्यय' तीन प्रकारचा असतो. ၃၀. စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ အညမညံ သဟဇာတရူပါနဉ္စ, မဟာဘူတာ အညမညံ ဥပါဒါရူပါနဉ္စ, ဆ ဝတ္ထူနိ သတ္တန္နံ ဝိညာဏဓာတူနန္တိ စ တိဝိဓော ဟောတိ နိဿယပစ္စယော. ३०. चित्त आणि चेतसिक धर्म हे परस्परांचे आणि सहजात रूपांचे, महाभूत हे परस्परांचे आणि उपादाय रूपांचे, आणि सहा वस्तू हे सात विज्ञानधातूंचे प्रत्यय होतात; अशा प्रकारे 'निश्रय-प्रत्यय' तीन प्रकारचा असतो. ၃၁. ကဗဠီကာရော အာဟာရော ဣမဿ ကာယဿ, အရူပိနော အာဟာရာ သဟဇာတာနံ နာမရူပါနန္တိ စ ဒုဝိဓော ဟောတိ အာဟာရပစ္စယော. ३१. कवलीकार आहार हा या कायेचा आणि अरूपी आहार हे सहजात नाम-रूपांचे प्रत्यय होतात; अशा प्रकारे 'आहार-प्रत्यय' दोन प्रकारचा असतो. ၃၂. ပဉ္စ ပသာဒါ ပဉ္စန္နံ ဝိညာဏာနံ, ရူပဇီဝိတိန္ဒြိယံ ဥပါဒိန္နရူပါနံ, အရူပိနော ဣန္ဒြိယာ သဟဇာတာနံ နာမရူပါနန္တိ စ တိဝိဓော ဟောတိ ဣန္ဒြိယပစ္စယော. ३२. पाच प्रसाद हे पाच विज्ञानांचे, रूप-जीवितेन्द्रिय हे उपादिन्न रूपांचे, आणि अरूपी इन्द्रिये हे सहजात नाम-रूपांचे प्रत्यय होतात; अशा प्रकारे 'इन्द्रिय-प्रत्यय' तीन प्रकारचा असतो. ၃၃. ဩက္ကန္တိက္ခဏေ ဝတ္ထု ဝိပါကာနံ, စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ သဟဇာတရူပါနံ သဟဇာတဝသေန, ပစ္ဆာဇာတာ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ ပုရေဇာတဿ ဣမဿ ကာယဿ ပစ္ဆာဇာတဝသေန ဆ ဝတ္ထူနိ ပဝတ္တိယံ သတ္တန္နံ ဝိညာဏဓာတူနံ ပုရေဇာတဝသေနေတိ စ တိဝိဓော ဟောတိ ဝိပ္ပယုတ္တပစ္စယော. ३३. प्रतिसंधीच्या क्षणी हृदयवस्तू ही विपाकांचे आणि चित्त-चेतसिक धर्म हे सहजात रूपांचे 'सहजात' रूपाने प्रत्यय होतात; पश्चाज्जात चित्त आणि चेतसिक धर्म हे पूर्वजात या कायेचे 'पश्चाज्जात' रूपाने प्रत्यय होतात; आणि प्रवृत्तिकालत सहा वस्तू हे सात विज्ञानधातूंचे 'पूर्वजात' रूपाने प्रत्यय होतात; अशा प्रकारे 'विप्रयुक्त-प्रत्यय' तीन प्रकारचा असतो. ၃၄. သဟဇာတံ ပုရေဇာတံ, ပစ္ဆာဇာတဉ္စ သဗ္ဗထာ. ३४. सहजात, पूर्वजात आणि पश्चाज्जात सर्व प्रकारे, ကဗဠီကာရော အာဟာရော, ရူပဇီဝိတမိစ္စယန္တိ. – कवलीकार आहार आणि रूप-जीवित – ပဉ္စဝိဓော ဟောတိ အတ္ထိပစ္စယော အဝိဂတပစ္စယော စ. अशा प्रकारे 'अस्ति-प्रत्यय' आणि 'अविगत-प्रत्यय' पाच प्रकारचे असतात. ၃၅. အာရမ္မဏူပနိဿယကမ္မတ္ထိပစ္စယေသု စ သဗ္ဗေပိ ပစ္စယာ သမောဓာနံ ဂစ္ဆန္တိ. ३५. आणि आलम्बन, उपनिश्रय, कर्म आणि अस्ति या प्रत्ययांमध्ये सर्वच प्रत्ययांचा समावेश होतो. ၃၆. သဟဇာတရူပန္တိ [Pg.57] ပနေတ္ထ သဗ္ဗတ္ထာပိ ပဝတ္တေ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာနံ, ပဋိသန္ဓိယံ ကဋတ္တာရူပါနဉ္စ ဝသေန ဒုဝိဓံ ဟောတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ३६. येथे 'सहजात रूप' हे सर्व ठिकाणी प्रवृत्तिकालत चित्तसमुत्थान रूपांच्या आणि प्रतिसंधीच्या वेळी कटत्तारूपांच्या रूपाने दोन प्रकारचे असते, असे जाणावे. ၃၇. ဣတိ တေကာလိကာ ဓမ္မာ, ကာလမုတ္တာ စ သမ္ဘဝါ. ३७. अशा प्रकारे, तिन्ही काळांतील धर्म, कालमुक्त धर्म आणि प्रज्ञप्ति, အဇ္ဈတ္တဉ္စ ဗဟိဒ္ဓါ စ, သင်္ခတာသင်္ခတာ တထာ; ပညတ္တိနာမရူပါနံ, ဝသေန တိဝိဓာ ဌိတာ; ပစ္စယာ နာမ ပဋ္ဌာနေ, စတုဝီသတိ သဗ္ဗထာ. तसेच आध्यात्मिक व बाह्य, संस्कृत व असंस्कृत धर्म; प्रज्ञप्ति, नाम आणि रूप यांच्या रूपाने तीन प्रकारे स्थित आहेत. प्रस्थान ग्रंथात सर्व प्रकारे चोवीस प्रत्यय सांगितले आहेत. ၃၈. တတ္ထ ရူပဓမ္မာ ရူပက္ခန္ဓောဝ, စိတ္တစေတသိကသင်္ခါတာ စတ္တာရော အရူပိနော ခန္ဓာ, နိဗ္ဗာနဉ္စေတိ ပဉ္စဝိဓမ္ပိ အရူပန္တိ စ နာမန္တိ စ ပဝုစ္စတိ. ३८. त्यामध्ये, रूपधर्म म्हणजे केवळ रूपस्कंधच होय; चित्त आणि चेतसिक रूपाने असलेले चार अरूपी स्कंध आणि निर्वाण – या पाच प्रकारांना 'अरूप' आणि 'नाम' असे म्हटले जाते. ပညတ္တိဘေဒေါ प्रज्ञप्तिभेद ၃၉. တတော အဝသေသာ ပညတ္တိ ပန ပညာပိယတ္တာ ပညတ္တိ, ပညာပနတော ပညတ္တီတိ စ ဒုဝိဓာ ဟောတိ. ३९. त्याहून उर्वरित प्रज्ञप्ति ही 'प्रज्ञाप्यमान प्रज्ञप्ति' आणि 'प्रज्ञापक प्रज्ञप्ति' अशी दोन प्रकारची असते. ၄၀. ကထံ? တံတံဘူတဝိပရိဏာမာကာရမုပါဒါယ တထာ တထာ ပညတ္တာ ဘူမိပဗ္ဗတာဒိကာ, သမ္ဘာရသန္နိဝေသာကာရမုပါဒါယ ဂေဟရထသကဋာဒိကာ, ခန္ဓပဉ္စကမုပါဒါယ ပုရိသပုဂ္ဂလာဒိကာ, စန္ဒာဝဋ္ဋနာဒိကမုပါဒါယ ဒိသာကာလာဒိကာ, အသမ္ဖုဋ္ဌာကာရမုပါဒါယ ကူပဂုဟာဒိကာ, တံတံဘူတနိမိတ္တံ ဘာဝနာဝိသေသဉ္စ ဥပါဒါယ ကသိဏနိမိတ္တာဒိကာ စေတိ ဧဝမာဒိပ္ပဘေဒါ ပန ပရမတ္ထတော အဝိဇ္ဇမာနာပိ အတ္ထစ္ဆာယာကာရေန စိတ္တုပ္ပာဒါနမာရမ္မဏဘူတာ တံ တံ ဥပါဒါယ ဥပနိဓာယ ကာရဏံ ကတွာ တထာ တထာ ပရိကပ္ပိယမာနာ သင်္ခါယတိ သမညာယတိ ဝေါဟရီယတိ ပညာပီယတီတိ ပညတ္တီတိ ပဝုစ္စတိ. အယံ ပညတ္တိ ပညာပိယတ္တာ ပညတ္တိ နာမ. ४०. कसे? त्या-त्या भूतांच्या विकारांच्या आकाराला अनुसरून तशा तशा प्रकारे प्रज्ञप्त केलेली भूमी, पर्वत इत्यादी; सामग्रीच्या रचनेच्या आकाराला अनुसरून घर, रथ, गाडी इत्यादी; पंचस्कंधांना अनुसरून पुरुष, पुद्गल इत्यादी; चंद्राच्या परिभ्रमणाला अनुसरून दिशा, काळ इत्यादी; अस्पर्शित आकाराला अनुसरून विहीर, गुहा इत्यादी; आणि त्या-त्या भूतांच्या निमित्ताला व विशिष्ट भावनेला अनुसरून कसिण-निमित्त इत्यादी; अशा विविध भेदांनी युक्त असलेल्या गोष्टी जरी परमार्थतः अस्तित्वात नसतील, तरी अर्थाच्या छायेच्या रूपाने चित्तोत्पादांचे आलम्बन बनतात. त्या-त्या गोष्टींचा आधार घेऊन, तुलना करून, कारण मानून, तशा तशा प्रकारे कल्पिल्या गेल्यामुळे ज्यांचे संकलन केले जाते, संज्ञा दिली जाते, व्यवहार केला जातो आणि प्रज्ञापित केले जाते, म्हणून त्यांना 'प्रज्ञप्ति' असे म्हणतात. ही 'प्रज्ञाप्यमान प्रज्ञप्ति' होय. ၄၁. ပညာပနတော ပညတ္တိ ပန နာမနာမကမ္မာဒိနာမေန ပရိဒီပိတာ, သာ ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ, ဝိဇ္ဇမာနေန [Pg.58] အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ, အဝိဇ္ဇမာနေန ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ, ဝိဇ္ဇမာနေန ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ, အဝိဇ္ဇမာနေန အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ စေတိ ဆဗ္ဗိဓာ ဟောတိ. ४१. परंतु 'प्रज्ञापक प्रज्ञप्ति' ही नाम, नामकर्म इत्यादी नावांनी दर्शविली जाते. ती विद्यमान-प्रज्ञप्ति, अविद्यमान-प्रज्ञप्ति, विद्यमानाने अविद्यमान-प्रज्ञप्ति, अविद्यमानाने विद्यमान-प्रज्ञप्ति, विद्यमानाने विद्यमान-प्रज्ञप्ति आणि अविद्यमानाने अविद्यमान-प्रज्ञप्ति अशी सहा प्रकारची असते. ၄၂. တတ္ထ ယဒါ ပန ပရမတ္ထတော ဝိဇ္ဇမာနံ ရူပဝေဒနာဒိံ ဧတာယ ပညာပေန္တိ, တဒါယံ ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ. ယဒါ ပန ပရမတ္ထတော အဝိဇ္ဇမာနံ ဘူမိပဗ္ဗတာဒိံ ဧတာယ ပညာပေန္တိ, တဒါယံ အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တီတိ ပဝုစ္စတိ. ဥဘိန္နံ ပန ဝေါမိဿကဝသေန သေသာ ယထာက္ကမံ ဆဠဘိညော, ဣတ္ထိသဒ္ဒေါ, စက္ခုဝိညာဏံ, ရာဇပုတ္တောတိ စ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ४२. त्यामध्ये, जेव्हा परमार्थतः विद्यमान असलेल्या रूप, वेदना इत्यादींना या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञापित करतात, तेव्हा ती 'विद्यमान-प्रज्ञप्ति' होय. जेव्हा परमार्थतः अविद्यमान असलेल्या भूमी, पर्वत इत्यादींना या प्रज्ञप्तीने प्रज्ञापित करतात, तेव्हा ती 'अविद्यमान-प्रज्ञप्ति' म्हटली जाते. दोन्हीच्या मिश्रणाने उर्वरित प्रज्ञप्त्या अनुक्रमे 'षडभिज्ञ', 'स्त्री-शब्द', 'चक्षु-विज्ञान' आणि 'राजपुत्र' अशा जाणाव्यात. ၄၃. ဝစီဃောသာနုသာရေန, သောတဝိညာဏဝီထိယာ. ४३. वाणीच्या घोषाला अनुसरून, श्रोत्र-विज्ञान वीथीद्वारे, ပဝတ္ထာနန္တရုပ္ပန္န-မနောဒွါရဿ ဂေါစရာ. प्रवृत्त झालेल्या आणि लगेचच उत्पन्न झालेल्या मनोद्वाराचा विषय बनणारे, အတ္ထာ ယဿာနုသာရေန, ဝိညာယန္တိ တတော ပရံ; သာယံ ပညတ္တိ ဝိညေယျာ, လောကသင်္ကေတနိမ္မိတာ. ज्याच्याद्वारे त्यानंतर अर्थ समजले जातात; ती ही प्रज्ञप्ति लोकसंकेताने निर्मित आहे असे जाणावे. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ ပစ္စယသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे अभिधम्मत्थसंगहातील 'प्रत्ययसंग्रह विभाग' नावाचा အဋ္ဌမော ပရိစ္ဆေဒေါ. आठवा परिच्छेद समाप्त. ၉. ကမ္မဋ္ဌာနပရိစ္ဆေဒေါ ९. कर्मस्थान परिच्छेद ၁. သမထဝိပဿနာနံ, ဘာဝနာနမိတော ပရံ. १. यानंतर, शमथ आणि विपश्यना या भावनांच्या, ကမ္မဋ္ဌာနံ ပဝက္ခာမိ, ဒုဝိဓမ္ပိ ယထာက္ကမံ. दोन्ही प्रकारच्या कर्मस्थानांचे मी अनुक्रमे वर्णन करीन. သမထကမ္မဋ္ဌာနံ शमथ-कर्मस्थान ၂. တတ္ထ သမထသင်္ဂဟေ တာဝ ဒသ ကသိဏာနိ, ဒသ အသုဘာ, ဒသ အနုဿတိယော, စတဿော အပ္ပမညာယော, ဧကာ သညာ, ဧကံ ဝဝတ္ထာနံ, စတ္တာရော အာရုပ္ပာ စေတိ သတ္တဝိဓေန သမထကမ္မဋ္ဌာနသင်္ဂဟော. २. त्यामध्ये, शमथ-संग्रहात प्रथम – दहा कसिण, दहा अशुभा, दहा अनुस्मृती, चार अप्रमाण, एक संज्ञा, एक व्यवस्थान आणि चार आरुप्प अशा सात प्रकारे शमथ-कर्मस्थानांचा संग्रह आहे. စရိတဘေဒေါ चरितभेद ၃. ရာဂစရိတာ [Pg.59] ဒေါသစရိတာ မောဟစရိတာ သဒ္ဓါစရိတာ ဗုဒ္ဓိစရိတာ ဝိတက္ကစရိတာ စေတိ ဆဗ္ဗိဓေန စရိတသင်္ဂဟော. ३. रागचरित, द्वेषचरित, मोहचरित, श्रद्धाचरित, बुद्धीचरित आणि वितर्कचरित अशा सहा प्रकारे चरितांचा संग्रह आहे. ဘာဝနာဘေဒေါ भावनाभेद ၄. ပရိကမ္မဘာဝနာ ဥပစာရဘာဝနာ အပ္ပနာဘာဝနာ စေတိ တိဿော ဘာဝနာ. ४. परिकम्मभावना, उपचारभावना आणि अप्पनाभावना अशा तीन भावना आहेत. နိမိတ္တဘေဒေါ निमित्तभेद ၅. ပရိကမ္မနိမိတ္တံ ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တံ ပဋိဘာဂနိမိတ္တဉ္စေတိ တီဏိ နိမိတ္တာနိ စ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ५. परिकम्मनिमित्त, उग्गहनिमित्त आणि पटिभागनिमित्त अशी तीन निमित्ते जाणावीत. ၆. ကထံ? ပထဝီကသိဏံ အာပေါကသိဏံ တေဇောကသိဏံ ဝါယောကသိဏံ နီလကသိဏံ ပီတကသိဏံ လောဟိတကသိဏံ ဩဒါတကသိဏံ အာကာသကသိဏံ အာလောကကသိဏဉ္စေတိ ဣမာနိ ဒသ ကသိဏာနိ နာမ. ६. कसे? पठवीकसिण, आपोकसिण, तेजोकसिण, वायोकसिण, नीलकसिण, पीतकसिण, lohitakasiṇa (लोहितकसिण), ओदातकसिण, आकासकसिण आणि आलोककसिण अशी ही दहा कसिण आहेत. ၇. ဥဒ္ဓုမာတကံ ဝိနီလကံ ဝိပုဗ္ဗကံ ဝိစ္ဆိဒ္ဒကံ ဝိက္ခာယိတကံ ဝိက္ခိတ္တကံ ဟတဝိက္ခိတ္တကံ လောဟိတကံ ပုဠဝကံ အဋ္ဌိကဉ္စေတိ ဣမေ ဒသ အသုဘာ နာမ. ७. उद्धुमातक, विनीलक, विपुब्बक, विच्छिद्द्क, विक्खायितक, विक्खित्तक, हतविक्खित्तक, लोहितक, पुळवक आणि अट्ठिक असे हे दहा असुभ आहेत. ၈. ဗုဒ္ဓါနုဿတိ ဓမ္မာနုဿတိ သံဃာနုဿတိ သီလာနုဿတိ စာဂါနုဿတိ ဒေဝတာနုဿတိ ဥပသမာနုဿတိ မရဏာနုဿတိ ကာယဂတာသတိ အာနာပါနဿတိ စေတိ ဣမာ ဒသ အနုဿတိယော နာမ. ८. बुद्धानुस्सती, धम्मानुस्सती, संघानुस्सती, सीलानुस्सती, चागानुस्सती, देवतानुस्सती, उपसमानुस्सती, मरणानुस्सती, कायगतासती आणि आनापानस्सती अशा या दहा अनुस्सती आहेत. ၉. မေတ္တာ ကရုဏာ မုဒိတာ ဥပေက္ခာ စေတိ ဣမာ စတဿော အပ္ပမညာယော နာမ, ဗြဟ္မဝိဟာရောတိ စ ပဝုစ္စတိ. ९. मेत्ता, करुणा, मुदिता आणि उपेक्खा अशा या चार अप्पमञ्ञा आहेत, आणि यांनाच ब्रह्मविहार असेही म्हटले जाते. ၁၀. အာဟာရေပဋိကူလသညာ ဧကာ သညာ နာမ. १०. आहारेपटिकूलसञ्ञा ही एक सञ्ञा आहे. ၁၁. စတုဓာတုဝဝတ္ထာနံ ဧကံ ဝဝတ္ထာနံ နာမ. ११. चतुधातुववत्थान हे एक ववत्थान आहे. ၁၂. အာကာသာနဉ္စာယတနာဒယော [Pg.60] စတ္တာရော အာရုပ္ပာ နာမာတိ သဗ္ဗထာပိ သမထနိဒ္ဒေသေ စတ္တာလီသ ကမ္မဋ္ဌာနာနိ ဘဝန္တိ. १२. आकासानञ्चायतन इत्यादी चार आरुप्प आहेत. अशा प्रकारे, समथनिद्देसात एकूण चाळीस कम्मट्ठाने होतात. သပ္ပာယဘေဒေါ सप्पायभेद ၁၃. စရိတာသု ပန ဒသ အသုဘာ ကာယဂတာသတိသင်္ခါတာ ကောဋ္ဌာသဘာဝနာ စ ရာဂစရိတဿ သပ္ပာယာ. १३. स्वभावांमध्ये (चरित), दहा असुभ आणि कायगतासती नावाची कोट्ठासभावना ही रागचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहेत. ၁၄. စတဿော အပ္ပမညာယော နီလာဒီနိ စ စတ္တာရိ ကသိဏာနိ ဒေါသစရိတဿ. १४. चार अप्पमञ्ञा आणि नील इत्यादी चार कसिण हे दोसचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहेत. ၁၅. အာနာပါနံ မောဟစရိတဿ ဝိတက္ကစရိတဿ စ, १५. आनापान हे मोहचरित आणि वितक्कचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहे, ၁၆. ဗုဒ္ဓါနုဿတိအာဒယော ဆ သဒ္ဓါစရိတဿ. १६. बुद्धानुस्सती इत्यादी सहा अनुस्सती या सद्धाचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहेत. ၁၇. မရဏဥပသမသညာဝဝတ္ထာနာနိ ဗုဒ္ဓိစရိတဿ. १७. मरणानुस्सती, उपसमानुस्सती, आहारेपटिकूलसञ्ञा आणि चतुधातुववत्थान हे बुद्धिचरित असलेल्या व्यक्तीसाठी अनुकूल आहेत. ၁၈. သေသာနိ ပန သဗ္ဗာနိပိ ကမ္မဋ္ဌာနာနိ သဗ္ဗေသမ္ပိ သပ္ပာယာနိ, တတ္ထာပိ ကသိဏေသု ပုထုလံ မောဟစရိတဿ, ခုဒ္ဒကံ ဝိတက္ကစရိတဿေဝါတိ. १८. उर्वरित सर्व कम्मट्ठाने देखील सर्वांसाठीच अनुकूल आहेत. त्यातही कसिणांमध्ये मोठे कसिण हे मोहचरित व्यक्तीसाठी आणि लहान कसिण हे वितक्कचरित व्यक्तीसाठीच अनुकूल आहे. အယမေတ္ထ သပ္ပာယဘေဒေါ. हा येथे अनुकूलतेचा (सप्पाय) भेद आहे. ဘာဝနာဘေဒေါ भावनाभेद ၁၉. ဘာဝနာသု သဗ္ဗတ္ထာပိ ပရိကမ္မဘာဝနာ လဗ္ဘတေဝ, ဗုဒ္ဓါနုဿတိအာဒီသု အဋ္ဌသု သညာဝဝတ္ထာနေသု စာတိ ဒသသုကမ္မဋ္ဌာနေသု ဥပစာရဘာဝနာဝ သမ္ပဇ္ဇတိ, နတ္ထိ အပ္ပနာ. १९. सर्वच भावनांमध्ये परिकम्मभावना तर प्राप्त होतेच. बुद्धानुस्सती इत्यादी आठ अनुस्सती, आहारेपटिकूलसञ्ञा आणि चतुधातुववत्थान या दहा कम्मट्ठानांमध्ये केवळ उपचारभावनाच साध्य होते, अप्पनाभावना नाही. ၂၀. သေသေသု ပန သမတိံသကမ္မဋ္ဌာနေသု အပ္ပနာဘာဝနာပိ သမ္ပဇ္ဇတိ. २०. परंतु उर्वरित तीस कम्मट्ठानांमध्ये अप्पनाभावना देखील साध्य होते. ၂၁. တတ္ထာပိ ဒသ ကသိဏာနိ အာနာပါနဉ္စ ပဉ္စကဇ္ဈာနိကာနိ. २१. त्यामध्ये देखील दहा कसिण आणि आनापान हे पाचव्या ध्यानापर्यंत (पंचम ध्यान) नेणारे आहेत. ၂၂. ဒသ [Pg.61] အသုဘာ ကာယဂတာသတိ စ ပဌမဇ္ဈာနိကာ. २२. दहा असुभ आणि कायगतासती हे पहिल्या ध्यानापर्यंत (प्रथम ध्यान) नेणारे आहेत. ၂၃. မေတ္တာဒယော တယော စတုက္ကဇ္ဈာနိကာ. २३. मेत्ता इत्यादी तीन चौथ्या ध्यानापर्यंत (चतुर्थ ध्यान) नेणारे आहेत. ၂၄. ဥပေက္ခာ ပဉ္စမဇ္ဈာနိကာတိ ဆဗ္ဗီသတိ ရူပါဝစရဇ္ဈာနိကာနိ ကမ္မဋ္ဌာနာနိ. २४. उपेक्खा ही पाचव्या ध्यानापर्यंत (पंचम ध्यान) नेणारी आहे. अशा प्रकारे, सव्वीस कम्मट्ठाने हे रूपावचर ध्यानाचे आहेत. ၂၅. စတ္တာရော ပန အာရုပ္ပာ အာရုပ္ပဇ္ဈာနိကာတိ. २५. आणि चार आरुप्प हे अरूप ध्यानाचे (आरुप्पझान) आहेत. အယမေတ္ထ ဘာဝနာဘေဒေါ. हा येथे भावनेचा (भावना) भेद आहे. ဂေါစရဘေဒေါ गोचरभेद ၂၆. နိမိတ္တေသု ပန ပရိကမ္မနိမိတ္တံ ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တဉ္စ သဗ္ဗတ္ထာပိ ယထာရဟံ ပရိယာယေန လဗ္ဘန္တေဝ. २६. निमित्तांमध्ये परिकम्मनिमित्त आणि उग्गहनिमित्त हे सर्वच ठिकाणी योग्य त्या पद्धतीने क्रमाने प्राप्त होतातच. ၂၇. ပဋိဘာဂနိမိတ္တံ ပန ကသိဏာသုဘကောဋ္ဌာသအာနာပါနေသွေဝ လဗ္ဘတိ, တတ္ထ ဟိ ပဋိဘာဂနိမိတ္တမာရဗ္ဘ ဥပစာရသမာဓိ အပ္ပနာသမာဓိ စ ပဝတ္တန္တိ. २७. परंतु पटिभागनिमित्त हे केवळ कसिण, असुभ, कोट्ठास (कायगतासती) आणि आनापान यांमध्येच प्राप्त होते. कारण तेथेच पटिभागनिमित्ताला अनुसरून उपचारसमाधी आणि अप्पनासमाधी प्रवृत्त होतात. ၂၈. ကထံ? အာဒိကမ္မိကဿ ဟိ ပထဝီမဏ္ဍလာဒီသု နိမိတ္တံ ဥဂ္ဂဏှန္တဿ တမာရမ္မဏံ ပရိကမ္မနိမိတ္တန္တိ ပဝုစ္စတိ, သာ စ ဘာဝနာ ပရိကမ္မဘာဝနာ နာမ. २८. कसे? सुरुवातीला अभ्यास करणाऱ्या साधकाने (आदिकम्मिक) जेव्हा पृथ्वीमंडळ इत्यादींवर निमित्त ग्रहण केले, तेव्हा त्या आलंबनाला (विषयाला) परिकम्मनिमित्त असे म्हणतात, आणि त्या भावनेला परिकम्मभावना असे म्हणतात. ၂၉. ယဒါ ပန တံ နိမိတ္တံ စိတ္တေန သမုဂ္ဂဟိတံ ဟောတိ, စက္ခုနာ ပဿန္တဿေဝ မနောဒွါရဿ အာပါထမာဂတံ, တဒါ တမေဝါရမ္မဏံ ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တံ နာမ, သာ စ ဘာဝနာ သမာဓိယတိ. २९. परंतु जेव्हा ते निमित्त चित्ताद्वारे चांगल्या प्रकारे ग्रहण केले जाते, आणि डोळ्यांनी पाहिल्याप्रमाणेच ते मनोद्वाराच्या (मनाच्या) समोर प्रकट होते, तेव्हा त्याच आलंबनाला उग्गहनिमित्त असे म्हणतात, आणि ती भावना समाधीत स्थिर होते. ၃၀. တထာ သမာဟိတဿ ပနေတဿ တတော ပရံ တသ္မိံ ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တေ ပရိကမ္မသမာဓိနာ ဘာဝနမနုယုဉ္ဇန္တဿ ယဒါ တပ္ပဋိဘာဂံ ဝတ္ထုဓမ္မဝိမုစ္စိတံ ပညတ္တိသင်္ခါတံ ဘာဝနာမယမာရမ္မဏံ စိတ္တေ သန္နိသန္နံ သမပ္ပိတံ ဟောတိ, တဒါ တံ ပဋိဘာဂနိမိတ္တံ သမုပ္ပန္နန္တိ ပဝုစ္စတိ. ३०. अशा प्रकारे समाहित झालेल्या साधकाने, त्यानंतर त्या उग्गहनिमित्तावर परिकम्मसमाधीद्वारे भावनेचा अभ्यास करत असताना, जेव्हा त्या निमित्ताच्या समान, भौतिक वस्तूच्या दोषांपासून मुक्त, प्रज्ञप्ती संज्ञेचे आणि भावनामय असलेले आलंबन चित्तात चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित आणि समर्पित होते, तेव्हा पटिभागनिमित्त उत्पन्न झाले असे म्हटले जाते. ၃၁. တတော ပဋ္ဌာယ ပရိပန္ထဝိပ္ပဟီနာ ကာမာဝစရသမာဓိသင်္ခါတာ ဥပစာရဘာဝနာ နိပ္ဖန္နာ နာမ ဟောတိ. ३१. त्यावेळेपासून अडथळ्यांपासून (नीवरण) मुक्त झालेली आणि कामावचर समाधी नावाची उपचारभावना निष्पन्न (सिद्ध) होते. ၃၂. တတော [Pg.62] ပရံ တမေဝ ပရိဘာဂနိမိတ္တံ ဥပစာရသမာဓိနာ သမာသေဝန္တဿ ရူပါဝစရပဌမဇ္ဈာနမပ္ပေတိ. ३२. त्यानंतर, त्याच पटिभागनिमित्ताचे उपचारसमाधीद्वारे वारंवार सेवन करणाऱ्या साधकाला रूपावचर प्रथम ध्यान प्राप्त (अर्पित) होते. ၃၃. တတော ပရံ တမေဝ ပဌမဇ္ဈာနံ အာဝဇ္ဇနံ သမာပဇ္ဇနံ အဓိဋ္ဌာနံ ဝုဋ္ဌာနံ ပစ္စဝေက္ခဏာ စေတိ ဣမာဟိ ပဉ္စဟိ ဝသိတာဟိ ဝသီဘူတံ ကတွာ ဝိတက္ကာဒိကမောဠာရိကင်္ဂံ ပဟာနာယ ဝိစာရာဒိသုခုမင်္ဂုပတ္တိယာ ပဒဟတော ယထာက္ကမံ ဒုတိယဇ္ဈာနာဒယော ယထာရဟမပ္ပေန္တိ. ३३. त्यानंतर, त्याच प्रथम ध्यानाला आवज्जन (आवर्जन), समापज्जन (समापत्ती), अधिद्वान (अधिष्ठान), वुट्ठान (व्युत्थान) आणि पच्चवेक्खणा (प्रत्यवेक्षण) या पाच वशितेंनी वश करून, वितर्क इत्यादी स्थूल अंगांचा त्याग करण्यासाठी आणि विचार इत्यादी सूक्ष्म अंगांच्या प्राप्तीसाठी प्रयत्न करणाऱ्या साधकाला क्रमाने द्वितीय ध्यान इत्यादी ध्यान योग्य प्रकारे प्राप्त होतात. ၃၄. ဣစ္စေဝံ ပထဝီကသိဏာဒီသု ဒွါဝီသတိကမ္မဋ္ဌာနေသု ပဋိဘာဂနိမိတ္တမုပလဗ္ဘတိ. ३४. अशा प्रकारे, पठवीकसिण इत्यादी बावीस कम्मट्ठानांमध्ये पटिभागनिमित्त उपलब्ध होते. ၃၅. အဝသေသေသု ပန အပ္ပမညာ သတ္တပညတ္တိယံ ပဝတ္တန္တိ. ३५. परंतु उर्वरित कम्मट्ठानांमध्ये, अप्पमञ्ञा या सत्त्वप्रज्ञप्तीवर (प्राण्यांच्या कल्पनेवर) प्रवृत्त होतात. ၃၆. အာကာသဝဇ္ဇိတကသိဏေသု ပန ယံ ကိဉ္စိ ကသိဏံ ဥဂ္ဃာဋေတွာ လဒ္ဓမာကာသံ အနန္တဝသေန ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ ပဌမာရုပ္ပမပ္ပေတိ. ३६. आकाश वगळता इतर कसिणांपैकी कोणत्याही कसिणाचा विस्तार करून प्राप्त झालेल्या आकाशाला अनंत मानून परिकम्म करणाऱ्या साधकाला पहिले आरुप्प (प्रथम अरूप ध्यान) प्राप्त होते. ၃၇. တမေဝ ပဌမာရုပ္ပဝိညာဏံ အနန္တဝသေန ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ ဒုတိယာရုပ္ပမပ္ပေတိ. ३७. त्याच प्रथम आरुप्प विज्ञानाला अनंत मानून परिकम्म करणाऱ्या साधकाला दुसरे आरुप्प (द्वितीय अरूप ध्यान) प्राप्त होते. ၃၈. တမေဝ ပဌမာရုပ္ပဝိညာဏာဘာဝံ ပန ‘‘နတ္ထိ ကိဉ္စီ’’တိ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ တတိယာရုပ္ပမပ္ပေတိ. ३८. त्याच पहिल्या अरूपविज्ञानाच्या अभावाला 'काहीही नाही' (नत्थि किञ्चि) असे परिकर्म करणाऱ्याला तिसरे अरूपध्यान अर्पित होते. ၃၉. တတိယာရုပ္ပံ ‘‘သန္တမေတံ, ပဏီတမေတ’’န္တိ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ စတုတ္ထာရုပ္ပမပ္ပေတိ. ३९. तिसऱ्या अरूपध्यानाला 'हे शांत आहे, हे प्रणीत आहे' असे परिकर्म करणाऱ्याला चौथे अरूपध्यान अर्पित होते. ၄၀. အဝသေသေသု စ ဒသသု ကမ္မဋ္ဌာနေသု ဗုဒ္ဓဂုဏာဒိကမာရမ္မဏမာရဗ္ဘ ပရိကမ္မံ ကတွာ တသ္မိံ နိမိတ္တေ သာဓုကမုဂ္ဂဟိတေ တတ္ထေဝ ပရိကမ္မဉ္စ သမာဓိယတိ, ဥပစာရော စ သမ္ပဇ္ဇတိ. ४०. आणि उर्वरित दहा कर्मस्थानांमध्ये बुद्धगुणादी आलंबन घेऊन परिकर्म केल्यावर, त्या निमित्ताचे चांगल्या प्रकारे ग्रहण झाल्यावर, तेथेच परिकर्म समाधी प्राप्त होते आणि उपचार समाधी देखील प्राप्त होते. ၄၁. အဘိညာဝသေန [Pg.63] ပဝတ္တမာနံ ပန ရူပါဝစရပဉ္စမဇ္ဈာနံ အဘိညာပါဒကပဉ္စမဇ္ဈာနာ ဝုဋ္ဌဟိတွာ အဓိဋ္ဌေယျာဒိကမာဝဇ္ဇေတွာ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ ရူပါဒီသု အာရမ္မဏေသု ယထာရဟမပ္ပေတိ. ४१. अभिज्ञेच्या रूपाने प्रवृत्त होणारे रूपावचर पाचवे ध्यान, अभिज्ञेचा पाया असलेल्या पाचव्या ध्यानातून उठून, अधिष्ठान इत्यादींचे आवर्जन करून परिकर्म करणाऱ्याला, रूप इत्यादी आलंबनांवर योग्यतेनुसार अर्पित होते. ၄၂. အဘိညာ စ နာမ – ४२. आणि अभिज्ञा म्हणजे – ဣဒ္ဓိဝိဓံ ဒိဗ္ဗသောတံ, ပရစိတ္တဝိဇာနနာ; ပုဗ္ဗေနိဝါသာနုဿတိ, ဒိဗ္ဗစက္ခူတိ ပဉ္စဓာ. ऋद्धिविध, दिव्यश्रोत, परचित्तविजानन, पूर्वेनिवासानुस्मृती आणि दिव्यचक्षू – अशी ही पाच प्रकारची आहे. အယမေတ္ထ ဂေါစရဘေဒေါ. हा येथे गोचरभेद (आलंबनभेद) आहे. နိဋ္ဌိတော စ သမထကမ္မဋ္ဌာနနယော. आणि समथ-कर्मस्थान पद्धती समाप्त झाली. ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနံ विपश्यना कर्मस्थान ဝိသုဒ္ဓိဘေဒေါ विशुद्धीचे भेद ၄၃. ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနေ ပန သီလဝိသုဒ္ဓိ စိတ္တဝိသုဒ္ဓိ ဒိဋ္ဌိဝိသုဒ္ဓိ ကင်္ခါဝိတရဏဝိသုဒ္ဓိ မဂ္ဂါမဂ္ဂဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ ပဋိပဒါဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ ဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ စေတိ သတ္တဝိဓေန ဝိသုဒ္ဓိသင်္ဂဟော. ४३. विपश्यना कर्मस्थानात शीलविशुद्धी, चित्तविशुद्धी, दृष्टीविशुद्धी, कांक्षावितरणविशुद्धी, मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धी, प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धी आणि ज्ञानदर्शनविशुद्धी अशा सात प्रकारच्या विशुद्धींचा संग्रह आहे. ၄၄. အနိစ္စလက္ခဏံ ဒုက္ခလက္ခဏံ အနတ္တလက္ခဏဉ္စေတိ တီဏိ လက္ခဏာနိ. ४४. अनित्य लक्षण, दुःख लक्षण आणि अनात्म लक्षण अशी तीन लक्षणे आहेत. ၄၅. အနိစ္စာနုပဿနာ ဒုက္ခာနုပဿနာ အနတ္တာနုပဿနာ စေတိ တိဿော အနုပဿနာ. ४५. अनित्यानुपश्यना, दुःखानुपश्यना आणि अनात्मानुपश्यना अशा तीन अनुपश्यना आहेत. ၄၆. သမ္မသနဉာဏံ ဥဒယဗ္ဗယဉာဏံ ဘင်္ဂဉာဏံ ဘယဉာဏံ အာဒီနဝဉာဏံ နိဗ္ဗိဒါဉာဏံ မုစ္စိတုကမျတာဉာဏံ ပဋိသင်္ခါဉာဏံ သင်္ခါရုပေက္ခာဉာဏံ အနုလောမဉာဏဉ္စေတိ ဒသ ဝိပဿနာဉာဏာနိ. ४६. संमसनज्ञान, उदयव्ययज्ञान, भंगज्ञान, भयज्ञान, आदीनवज्ञान, निर्विदाज्ञान, मुच्चितुकम्यताज्ञान, प्रतिसंख्याज्ञान, संस्कारोपेक्षाज्ञान आणि अनुलोमज्ञान अशी दहा विपश्यना ज्ञाने आहेत. ၄၇. သုညတော ဝိမောက္ခော, အနိမိတ္တော ဝိမောက္ခော, အပ္ပဏိဟိတော ဝိမောက္ခော စေတိ တယော ဝိမောက္ခာ. ४७. शून्यत विमोक्ष, अनिमित्त विमोक्ष आणि अप्रणिहित विमोक्ष असे तीन विमोक्ष आहेत. ၄၈. သုညတာနုပဿနာ [Pg.64] အနိမိတ္တာနုပဿနာ အပ္ပဏိဟိတာနုပဿာနာ စေတိ တီဏိ ဝိမောက္ခမုခါနိ စ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. ४८. आणि शून्यतनुपश्यना, अनिमित्तनुपश्यना आणि अप्रणिहितनुपश्यना ही तीन विमोक्षमुखे समजावीत. ၄၉. ကထံ? ပါတိမောက္ခသံဝရသီလံ ဣန္ဒြိယသံဝရသီလံ အာဇီဝပါရိသုဒ္ဓိသီလံ ပစ္စယသန္နိဿိတသီလဉ္စေတိ စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလံ သီလဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ४९. कसे? प्रातिमोक्षसंवरशील, इंद्रियसंवरशील, आजीवपारिशुद्धिशील आणि प्रत्ययसन्निश्रितशील असे चार प्रकारचे परिशुद्धिशील म्हणजेच 'शीलविशुद्धी' होय. ၅၀. ဥပစာရသမာဓိ အပ္ပနာသမာဓိ စေတိ ဒုဝိဓောပိ သမာဓိ စိတ္တဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ५०. उपचार समाधी आणि अर्पणा समाधी हे दोन्ही प्रकारचे समाधी म्हणजेच 'चित्तविशुद्धी' होय. ၅၁. လက္ခဏရသပစ္စုပဋ္ဌာနပဒဋ္ဌာနဝသေန နာမရူပ ပရိဂ္ဂဟော ဒိဋ္ဌိဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ५१. लक्षण, रस, प्रत्युपस्थान आणि पदस्थान यांच्याद्वारे नाम-रूपाचे परिग्रहण करणे म्हणजेच 'दृष्टीविशुद्धी' होय. ၅၂. တေသမေဝ စ နာမရူပါနံ ပစ္စယပရိဂ္ဂဟော ကင်္ခါဝိတရဏဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ५२. आणि त्याच नाम-रूपांच्या प्रत्ययांचे (कारणांचे) परिग्रहण करणे म्हणजेच 'कांक्षावितरणविशुद्धी' होय. ၅၃. တတော ပရံ ပန တထာပရိဂ္ဂဟိတေသု သပ္ပစ္စယေသု တေဘူမကသင်္ခါရေသု အတီတာဒိဘေဒဘိန္နေသု ခန္ဓာဒိနယမာရဗ္ဘ ကလာပဝသေန သင်္ခိပိတွာ ‘‘အနိစ္စံ ခယဋ္ဌေန, ဒုက္ခံ ဘယဋ္ဌေန, အနတ္တာ အသာရကဋ္ဌေနာ’’တိ အဒ္ဓါနဝသေန သန္တတိဝသေန ခဏဝသေန ဝါ သမ္မသနဉာဏေန လက္ခဏတ္တယံ သမ္မသန္တဿ တေသွေဝ ပစ္စယဝသေန ခဏဝသေန စ ဥဒယဗ္ဗယဉာဏေန ဥဒယဗ္ဗယံ သမနုပဿန္တဿ စ – ५३. त्यानंतर, अशा प्रकारे परिग्रहित केलेल्या सप्रत्यय आणि भूतकाल इत्यादी भेदांनी भिन्न असलेल्या तिन्ही भूमींमधील संस्कारांना, स्कंध इत्यादी पद्धतीनुसार समूहाने संक्षेप करून, 'क्षय होण्याच्या अर्थाने अनित्य, भयाचा अर्थाने दुःख आणि नि:सारतेच्या अर्थाने अनात्म' असे कालावधीनुसार, संततीनुसार किंवा क्षणांनुसार संमसनज्ञानाने तीन लक्षणांचे संमसन करणाऱ्याला, आणि त्याच संस्कारांच्या प्रत्ययानुसार व क्षणानुसार उदयव्ययज्ञानाने उदय आणि व्यय पाहणाऱ्याला – ‘‘ဩဘာသော ပီတိ ပဿဒ္ဓိ, အဓိမောက္ခော စ ပဂ္ဂဟော; သုခံ ဉာဏမုပဋ္ဌာနမုပေက္ခာ စ နိကန္တိ စေ’’တိ. – 'ओभास (प्रकाश), प्रीती, प्रस्सद्धी, अधिमोक्ष, प्रग्रह, सुख, ज्ञान, उपस्थान, उपेक्षा आणि निकंती' – ဩဘာသာဒိဝိပဿနုပက္ကိလေသပရိပန္ထပရိဂ္ဂဟဝသေန မဂ္ဂါမဂ္ဂလက္ခဏဝဝတ္ထာနံ မဂ္ဂါမဂ္ဂဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ओभास इत्यादी विपश्यना-उपक्किलेसांच्या परिग्रहाद्वारे मार्ग आणि अमार्ग यांच्या लक्षणांचे निर्धारण करणे म्हणजेच 'मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धी' होय. ၅၄. တထာ ပရိပန္ထဝိမုတ္တဿ ပန တဿ ဥဒယဗ္ဗယဉာဏတော ပဋ္ဌာယ ယာ ဝါနုလောမာ တိလက္ခဏံ ဝိပဿနာပရမ္ပရာယ ပဋိပဇ္ဇန္တဿ နဝ ဝိပဿနာဉာဏာနိ ပဋိပဒါဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ५४. अशा प्रकारे अडथळ्यांपासून मुक्त झालेल्या त्या साधकाला, उदयव्ययज्ञानापासून सुरू करून अनुलोमज्ञानापर्यंत, त्रिलक्षणांवर विपश्यनेच्या परंपरेने साधना करताना प्राप्त होणारी नऊ विपश्यना ज्ञाने म्हणजेच 'प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धी' होय. ၅၅. တဿေဝံ ပဋိပဇ္ဇန္တဿ [Pg.65] ပန ဝိပဿနာပရိပါကမာဂမ္မ ‘‘ဣဒါနိ အပ္ပနာ ဥပ္ပဇ္ဇိဿတီ’’တိ ဘဝင်္ဂံ ဝေါစ္ဆိဇ္ဇိတွာ ဥပ္ပန္နမနောဒွါရာဝဇ္ဇနာနန္တရံ ဒွေ တီဏိ ဝိပဿနာစိတ္တာနိ ယံ ကိဉ္စိ အနိစ္စာဒိလက္ခဏမာရဗ္ဘ ပရိကမ္မောပစာရာနုလောမနာမေန ပဝတ္တန္တိ. ५५. अशा प्रकारे साधना करणाऱ्या त्या साधकाची विपश्यना परिपक्व झाल्यावर, 'आता अर्पणा उत्पन्न होईल' असे वाटून भवांग तुटते आणि उत्पन्न झालेल्या मनोध्वारावर्जनानंतर लगेचच, अनित्यता इत्यादींपैकी कोणत्याही एका लक्षणाला आलंबन बनवून दोन किंवा तीन विपश्यना चित्ते परिकर्म, उपचार आणि अनुलोम या नावांनी प्रवृत्त होतात. ၅၆. ယာ သိခါပ္ပတ္တာ, သာ သာနုလောမာ သင်္ခါရုပေက္ခာ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာတိ စ ပဝုစ္စတိ. ५६. जी शिखरावर पोहोचलेली असते, तिला अनुलोमयुक्त संस्कारोपेक्षा आणि 'उत्थानगामिनी विपश्यना' असेही म्हटले जाते. ၅၇. တတော ပရံ ဂေါတြဘုစိတ္တံ နိဗ္ဗာနမာလမ္ဗိတွာ ပုထုဇ္ဇနဂေါတ္တမဘိဘဝန္တံ, အရိယဂေါတ္တမဘိသမ္ဘောန္တဉ္စ ပဝတ္တတိ. ५७. त्यानंतर, निर्वाणाला आलंबन बनवून, पृथग्जन गोत्राचा पराभव करणारे आणि आर्य गोत्राला प्राप्त करून देणारे 'गोत्रभू चित्त' प्रवृत्त होते. ၅၈. တဿာနန္တရမေဝ မဂ္ဂေါ ဒုက္ခသစ္စံ ပရိဇာနန္တော သမုဒယသစ္စံ ပဇဟန္တော, နိရောဓသစ္စံ သစ္ဆိကရောန္တော, မဂ္ဂသစ္စံ ဘာဝနာဝသေန အပ္ပနာဝီထိမောတရတိ. ५८. त्याच्या लगेचच नंतर, दुःखसत्याचे परिज्ञान करणारे, समुदायसत्याचा त्याग करणारे, निरोधसत्याचा साक्षात्कार करणारे आणि मार्गसत्याची भावना करणारे 'मार्गचित्त' अर्पणावीथीमध्ये प्रवेश करते. ၅၉. တတော ပရံ ဒွေ တီဏိ ဖလစိတ္တာနိ ပဝတ္တိတွာ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ, ပုန ဘဝင်္ဂံ ဝေါစ္ဆိန္ဒိတွာ ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏာနိ ပဝတ္တန္တိ. ५९. त्यानंतर दोन किंवा तीन फलचित्ते प्रवृत्त होऊन भवांगपात होतो, आणि पुन्हा भवांग तोडून प्रत्यावेक्षण ज्ञाने प्रवृत्त होतात. ၆၀. မဂ္ဂံ ဖလဉ္စ နိဗ္ဗာနံ, ပစ္စဝေက္ခတိ ပဏ္ဍိတော. ६०. पंडित मार्ग, फल आणि निर्वाणाचे प्रत्यावेक्षण करतात. ဟီနေ ကိလေသေ သေသေ စ, ပစ္စဝေက္ခတိ ဝါန ဝါ. नष्ट झालेल्या क्लेशांचे आणि शिल्लक राहिलेल्या क्लेशांचे ते प्रत्यावेक्षण करतात किंवा करत नाहीत. ဆဗ္ဗိသုဒ္ဓိကမေနေဝံ, ဘာဝေတဗ္ဗော စတုဗ္ဗိဓော; ဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ, နာမ မဂ္ဂေါ ပဝုစ္စတိ. अशा प्रकारे सहा विशुद्धींच्या क्रमाने चार प्रकारच्या मार्गाची भावना करावी; या मार्गालाच 'ज्ञानदर्शनविशुद्धी' असे म्हटले जाते. အယမေတ္ထ ဝိသုဒ္ဓိဘေဒေါ. हा येथे विशुद्धीचा भेद आहे. ဝိမောက္ခဘေဒေါ विमोक्षाचे भेद ၆၁. တတ္ထ အနတ္တာနုပဿနာ အတ္တာဘိနိဝေသံ မုဉ္စန္တီ သုညတာနုပဿနာ နာမ ဝိမောက္ခမုခံ ဟောတိ. ६१. त्यामध्ये, अनात्मानुपश्यना ही आत्म-अभिनिवेशाचा त्याग करत असल्याने 'शून्यतनुपश्यना' नावाचे विमोक्षमुख होते. ၆၂. အနိစ္စာနုပဿနာ [Pg.66] ဝိပလ္လာသနိမိတ္တံ မုဉ္စန္တီ အနိမိတ္တာနုပဿနာ နာမ. ६२. अनित्यानुपश्यना ही विपर्यास-निमित्ताचा त्याग करत असल्याने 'अनिमित्तनुपश्यना' म्हटली जाते. ၆၃. ဒုက္ခာနုပဿနာ တဏှာပဏိဓိံ မုဉ္စန္တီ အပ္ပဏိဟိတာနုပဿနာ နာမ. ६३. दुःखानुपश्यना ही तृष्णा-प्रणिधीचा त्याग करत असल्याने 'अप्रणिहितनुपश्यना' म्हटली जाते. ၆၄. တသ္မာ ယဒိ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာ အနတ္တတော ဝိပဿတိ, သုညတော ဝိမောက္ခော နာမ ဟောတိ မဂ္ဂေါ. ६४. म्हणून, जर उत्थानगामिनी विपश्यना अनात्म रूपाने विपश्यना करते, तर तो मार्ग 'शून्यत विमोक्ष' नावाचा होतो. ၆၅. ယဒိ အနိစ္စတော ဝိပဿတိ, အနိမိတ္တော ဝိမောက္ခော နာမ. ६५. जर ती अनित्य रूपाने विपश्यना करते, तर तो 'अनिमित्त विमोक्ष' नावाचा होतो. ၆၆. ယဒိ ဒုက္ခတော ဝိပဿတိ, အပ္ပဏိဟိတော ဝိမောက္ခော နာမာတိ စ မဂ္ဂေါ ဝိပဿနာဂမနဝသေန တီဏိ နာမာနိ လဘတိ, တထာ ဖလဉ္စ မဂ္ဂါဂမနဝသေန မဂ္ဂဝီထိယံ. ६६. जर ती दुःख रूपाने विपश्यना करते, तर तो 'अप्रणिहित विमोक्ष' नावाचा होतो. अशा प्रकारे, विपश्यनेच्या प्रवृत्तीनुसार मार्ग तीन नावे प्राप्त करतो, आणि त्याचप्रमाणे मार्गवीथीमध्ये मार्गाच्या प्रवृत्तीनुसार फल देखील तीन नावे प्राप्त करते. ၆၇. ဖလသမာပတ္တိဝီထိယံ ပန ယထာဝုတ္တနယေန ဝိပဿန္တာနံ ယထာသကဖလမုပ္ပဇ္ဇမာနမ္ပိ ဝိပဿနာဂမနဝသေနေဝ သုညတာဒိဝိမောက္ခောတိ စ ပဝုစ္စတိ, အာရမ္မဏဝသေန ပန သရသဝသေန စ နာမတ္တယံ သဗ္ဗတ္ထ သဗ္ဗေသမ္ပိ သမမေဝ စ. ६७. परंतु, फलसमापत्तिवीथीमध्ये पूर्वोक्त पद्धतीने विपश्यना करणाऱ्यांना आपापले फल उत्पन्न होत असतानाही, विपश्यनेच्या मार्गाने जाण्यामुळेच त्याला 'शून्यता विमोक्ष' इत्यादी म्हटले जाते. परंतु आलंबनाच्या (विषयाच्या) दृष्टीने आणि स्वतःच्या स्वभाव-रसाच्या दृष्टीने तिन्ही नावे सर्व ठिकाणी सर्वांसाठी समानच आहेत. အယမေတ္ထ ဝိမောက္ခဘေဒေါ. हा येथे विमोक्षभेद (विमोक्षाचे वर्गीकरण) आहे. ပုဂ္ဂလဘေဒေါ पुद्गलभेद (व्यक्तींचे वर्गीकरण) ၆၈. ဧတ္ထ ပန သောတာပတ္တိမဂ္ဂံ ဘာဝေတွာ ဒိဋ္ဌိဝိစိကိစ္ဆာပဟာနေန ပဟီနာပါယဂမနော သတ္တက္ခတ္တုပရမော သောတာပန္နော နာမ ဟောတိ. ६८. येथे, जो स्रोतापत्ती मार्गाची भावना (अभ्यास) करून, दृष्टी (मिथ्यादृष्टी) आणि विचिकित्सा (शंका) नष्ट झाल्यामुळे अपायलोकात जाण्यापासून मुक्त होतो, तो जास्तीत जास्त सात वेळा जन्म घेणारा 'स्रोतापन्न' होतो. ၆၉. သကဒါဂါမိမဂ္ဂံ ဘာဝေတွာ ရာဂဒေါသမောဟာနံ တနုကရတ္တာ သကဒါဂါမီ နာမ ဟောတိ သကိဒေဝ ဣမံ လောကံ အာဂန္တွာ. ६९. सकृदागामी मार्गाची भावना करून, राग, द्वेष आणि मोह अत्यंत क्षीण केल्यामुळे, या मनुष्यलोकात केवळ एकदाच परत येऊन (निर्वाण प्राप्त करणारा) 'सकृदागामी' होतो. ၇၀. အနာဂါမိမဂ္ဂံ [Pg.67] ဘာဝေတွာ ကာမရာဂဗျာပါဒါနမနဝသေသပ္ပဟာနေန အနာဂါမီ နာမ ဟောတိ အနာဂန္တွာ ဣတ္ထတ္တံ. ७०. अनागामी मार्गाची भावना करून, कामराग आणि व्यापाद (द्वेष) यांचे पूर्णपणे निर्मूलन केल्यामुळे, या मनुष्यलोकात पुन्हा न येणारा 'अनागामी' होतो. ၇၁. အရဟတ္တမဂ္ဂံ ဘာဝေတွာ အနဝသေသကိလေသပ္ပဟာနေန အရဟာ နာမ ဟောတိ ခီဏာသဝေါ လောကေ အဂ္ဂဒက္ခိဏေယျောတိ. ७१. अर्हत् मार्गाची भावना करून, सर्व क्लेशांचे निरवशेष निर्मूलन केल्यामुळे, जो आसवमुक्त (क्षीणासव) झाला आहे आणि जगात सर्वश्रेष्ठ दक्षिणेय (दान स्वीकारण्यास योग्य) आहे, तो 'अर्हंत' होतो. အယမေတ္ထ ပုဂ္ဂလဘေဒေါ. हा येथे पुद्गलभेद आहे. သမာပတ္တိဘေဒေါ समापत्तिभेद (ध्यानावस्थेचे वर्गीकरण) ၇၂. ဖလသမာပတ္တိဝီထိယံ ပနေတ္ထ သဗ္ဗေသမ္ပိ ယထာသကဖလဝသေန သာဓာရဏာဝ. ७२. परंतु, फलसमापत्तिवीथीमध्ये सर्वांसाठी आपापल्या फलानुसार ती (समापत्ती) साधारण (समान) आहे. ၇၃. နိရောဓသမာပတ္တိသမာပဇ္ဇနံ ပန အနာဂါမီနဉ္စေဝ အရဟန္တာနဉ္စ လဗ္ဘတိ, တတ္ထ ယထာက္ကမံ ပဌမဇ္ဈာနာဒိမဟဂ္ဂတသမာပတ္တိံ သမာပဇ္ဇိတွာ ဝုဋ္ဌာယ တတ္ထ ဂတေ သင်္ခါရဓမ္မေ တတ္ထ တတ္ထေဝ ဝိပဿန္တော ယာဝ အာကိဉ္စညာယတနံ ဂန္တွာ တတော ပရံ အဓိဋ္ဌေယျာဒိကံ ပုဗ္ဗကိစ္စံ ကတွာ နေဝသညာနာသညာယတနံ သမာပဇ္ဇတိ, တဿ ဒွိန္နံ အပ္ပနာဇဝနာနံ ပရတော ဝေါစ္ဆိဇ္ဇတိ စိတ္တသန္တတိ, တတော နိရောဓသမာပန္နော နာမ ဟောတိ. ७३. परंतु निरोधसमापत्तीची प्राप्ती केवळ अनागामी आणि अर्हंतांनाच होते. त्यामध्ये, अनुक्रमे प्रथम ध्यानादी महग्गत समापत्तीमध्ये प्रवेश करून, त्यातून उठून, तेथील उत्पन्न झालेल्या संस्कार धम्मांवर तेथेच विपश्यना करत, आकिंचन्यायतन ध्यानापर्यंत जाऊन, त्यानंतर अधिष्ठान इत्यादी पूर्वकृत्ये करून, 'नैवसंज्ञानासंज्ञायतन' समापत्तीमध्ये प्रवेश करतो. त्याच्या दोन अर्पणा जवनांनंतर चित्तसंतती खंडित होते, तेव्हा तो 'निरोधसमापन्न' (निरोध समापत्तीत लीन झालेला) म्हटला जातो. ၇၄. ဝုဋ္ဌာနကာလေ ပန အနာဂါမိနော အနာဂါမိဖလစိတ္တံ, အရဟတော အရဟတ္တဖလစိတ္တံ ဧကဝါရမေဝ ပဝတ္တိတွာ ဘဝင်္ဂပါတော ဟောတိ, တတော ပရံ ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏံ ပဝတ္တတိ. ७४. परंतु समापत्तीतून उठण्याच्या वेळी, अनागामीचे अनागामीफलचित्त आणि अर्हंताचे अर्हत्फलचित्त केवळ एकदाच प्रवृत्त होऊन भवंगामध्ये विलीन होते, आणि त्यानंतर प्रत्यवेक्षण ज्ञान प्रवृत्त होते. အယမေတ္ထ သမာပတ္တိဘေဒေါ. हा येथे समापत्तिभेद आहे. နိဋ္ဌိတော စ ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနနယော. आणि अशा प्रकारे विपश्यना कर्मस्थान पद्धती समाप्त झाली. ဥယျောဇနံ उय्योजन (प्रेरणा) ၇၅. ဘာဝေတဗ္ဗံ [Pg.68] ပနိစ္စေဝံ, ဘာဝနာဒွယမုတ္တမံ. ७५. अशा प्रकारे, या दोन्ही उत्तम भावनांचा (समथ आणि विपश्यना) अभ्यास केला पाहिजे. ပဋိပတ္တိရသဿာဒံ, ပတ္ထယန္တေန သာသနေတိ. शासनातील प्रतिपत्तीच्या (साधनेच्या) रसाचा आस्वाद घेण्याची इच्छा करणाऱ्याने. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟေ ကမ္မဋ္ဌာနသင်္ဂဟဝိဘာဂေါ နာမ अशा प्रकारे अभिधम्मत्थसंगहातील 'कर्मस्थानसंग्रह विभाग' नावाचा နဝမော ပရိစ္ဆေဒေါ. नववा परिच्छेद (समाप्त). နိဂမနံ निगमन (उपसंहार) (က) စာရိတ္တသောဘိတဝိသာလကုလောဒယေန,သဒ္ဓါဘိဝုဍ္ဎပရိသုဒ္ဓဂုဏောဒယေန; နမ္ပဝှယေန ပဏိဓာယ ပရာနုကမ္ပံ,ယံ ပတ္ထိတံ ပကရဏံ ပရိနိဋ္ဌိတံ တံ. (क) चारित्राने सुशोभित अशा विशाल कुळात जन्मलेल्या, श्रद्धेने वृद्धिंगत झालेल्या आणि परिशुद्ध गुणांचा उदय झालेल्या, 'नम्प' नावाच्या (उपासकाने) इतरांबद्दलच्या अनुकंपेने (करुणेने) ज्या ग्रंथाची प्रार्थना केली होती, तो हा ग्रंथ पूर्ण झाला आहे. (ခ) ပုညေန တေန ဝိပုလေန တု မူလသောမံ; ဓညာဓိဝါသမုဒိတောဒိတမာယုကန္တံ; ပညာဝဒါတဂုဏသောဘိတလဇ္ဇိဘိက္ခူ,မညန္တု ပုညဝိဘဝေါဒယမင်္ဂလာယ. (ख) या विपुल पुण्याच्या प्रभावाने, मूळसोम विहाराचे अधिष्ठान असलेल्या, अत्यंत समृद्ध, प्रगत आणि दीर्घायुषी, प्रज्ञेने निर्मळ व गुणांनी सुशोभित असलेल्या लज्जी (शीलवान) भिक्खूंनी या पुण्याच्या वैभवाचा उदय कल्याणासाठी मानावा. ဣတိ အနုရုဒ္ဓါစရိယေန ရစိတံ अशा प्रकारे आचार्य अनुरुद्धांनी रचलेला အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟံ နာမ ပကရဏံ. अभिधम्मत्थसंगह नावाचा ग्रंथ (समाप्त झाला). နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ. त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना माझा नमस्कार असो. အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနီဋီကာ अभिधम्मत्थविभाविनी टीका ဂန္ထာရမ္ဘကထာ ग्रंथारंभ कथा (ग्रंथारंभाची प्रस्तावना) (က) ဝိသုဒ္ဓကရုဏာဉာဏံ[Pg.69], ဗုဒ္ဓံ သမ္ဗုဒ္ဓပူဇိတံ; ဓမ္မံ သဒ္ဓမ္မသမ္ဘူတံ, နတွာ သံဃံ နိရင်္ဂဏံ. (क) अत्यंत शुद्ध करुणा आणि ज्ञान असणाऱ्या, सम्यक्संबुद्धांनी पूजिलेल्या बुद्धांना, सद्धम्मापासून उत्पन्न झालेल्या धम्माला आणि रागादी क्लेशांपासून मुक्त (निरंगण) असणाऱ्या संघाला वंदन करून, (ခ) သာရိပုတ္တံ မဟာထေရံ, ပရိယတ္တိဝိသာရဒံ; ဝန္ဒိတွာ သိရသာ ဓီရံ, ဂရုံ ဂါရဝဘာဇနံ. (ख) परियत्तीमध्ये (त्रिपिटक शिकण्यात) विशारद (कुशल), धीर (स्थिर समाधी असलेले), आदरणीय आणि आदराचे स्थान असणाऱ्या माझे गुरू महाथेर सारिपुत्त यांना मस्तकाने वंदन करून, (ဂ) ဝဏ္ဏယိဿံ သမာသေန, အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟံ; အာဘိဓမ္မိကဘိက္ခူနံ, ပရံ ပီတိဝိဝဍ္ဎနံ. (ग) अभिधम्म शिकणाऱ्या भिक्खूंच्या प्रीतीमध्ये अत्यंत वाढ करणाऱ्या 'अभिधम्मत्थसंगह' या ग्रंथाचे मी संक्षेपाने स्पष्टीकरण (टीका) करीन. (ဃ) ပေါရာဏေဟိ အနေကာပိ, ကတာ ယာ ပန ဝဏ္ဏနာ; န တာဟိ သက္ကာ သဗ္ဗတ္ထ, အတ္ထော ဝိညာတဝေ ဣဓ. (घ) प्राचीन आचार्यांनी जरी अनेक व्याख्या (टीका) केल्या असल्या, तरी त्यांच्याद्वारे या ग्रंथातील सर्व ठिकाणचा गूढ अर्थ समजणे शक्य नाही. (င) တသ္မာ လီနပဒါနေတ္ထ, သာဓိပ္ပာယမဟာပယံ; ဝိဘာဝေန္တော သမာသေန, ရစယိဿာမိ ဝဏ္ဏနန္တိ. (ङ) म्हणून, या ग्रंथातील कठीण व गूढ पदांचा अर्थ न गाळता, तो स्पष्ट करत मी संक्षेपाने ही नवीन व्याख्या (टीका) रचीन. ဂန္ထာရမ္ဘကထာဝဏ္ဏနာ ग्रंथारंभकथा व्याख्या (प्रस्तावनेचे स्पष्टीकरण) ၁. ပရမဝိစိတ္တနယသမန္နာဂတံ သကသမယသမယန္တရဂဟနဝိဂ္ဂါဟဏသမတ္ထံ သုဝိမလဝိပုလပညာဝေယျတ္တိယဇနနံ ပကရဏမိဒမာရဘန္တောယမာစရိယော ပဌမံ တာဝ ရတနတ္တယပဏာမာဘိဓေယျ ကရဏပ္ပကာရပကရဏာဘိဓာနပယောဇနာနိ ဒဿေတုံ ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓ’’န္တျာဒိမာဟ. १. अत्यंत अद्भुत अशा विविध पद्धतींनी युक्त असलेल्या, स्वतःच्या सिद्धांतांच्या आणि इतर सिद्धांतांच्या गहन अरण्यात (ज्ञानाने) प्रवेश करण्यास समर्थ असलेल्या, अत्यंत निर्मळ व विशाल प्रज्ञेची प्रगल्भता उत्पन्न करणाऱ्या या ग्रंथाचा आरंभ करू इच्छिणाऱ्या या आचार्यांनी, सर्वप्रथम रत्नत्रयाला वंदन, ग्रंथाचा विषय (अभिधेय), ग्रंथ रचण्याची पद्धत (करणप्रकार), ग्रंथाचे नाव (प्रकरणाभिधान) आणि ग्रंथाचे प्रयोजन दर्शवण्यासाठी 'सम्मासम्बुद्धं' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. ဧတ္ထ [Pg.70] ဟိ ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓ…ပေ… အဘိဝါဒိယာ’’တိ ဣမိနာ ရတနတ္တယပဏာမော ဝုတ္တော, အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟ’’န္တိ ဧတေန အဘိဓေယျကရဏပ္ပကာရပကရဏာဘိဓာနာနိ အဘိဓမ္မတ္ထာနံ ဣဓ သင်္ဂဟေတဗ္ဗဘာဝဒဿနေန တေသံ ဣမိနာ သမုဒိတေန ပဋိပါဒေတဗ္ဗဘာဝဒီပနတော, ဧကတ္ထ သင်္ဂယှ ကထနာကာရဒီပနတော, အတ္ထာနုဂတသမညာပရိဒီပနတော စ. ပယောဇနံ ပန သင်္ဂဟပဒေန သာမတ္ထိယတော ဒဿိတမေဝ အဘိဓမ္မတ္ထာနံ ဧကတ္ထ သင်္ဂဟေ သတိ တဒုဂ္ဂဟပရိပုစ္ဆာဒိဝသေန တေသံ သရူပါဝဗောဓဿ, တမ္မူလိကာယ စ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကတ္ထသိဒ္ဓိယာ အနာယာသေန သံသိဇ္ဈနတော. येथे स्पष्टीकरण असे की, 'सम्मासम्बुद्धं...पे... अभिवादिय' या शब्दांनी रत्नत्रयाला केलेले वंदन सांगितले आहे. 'अभिधम्मत्थसङ्गहं' या शब्दाने ग्रंथाचा विषय, ग्रंथ रचण्याची पद्धत आणि ग्रंथाचे नाव सांगितले आहे; कारण येथे अभिधम्माच्या अर्थांचा संग्रह केला पाहिजे हे दर्शवून, या संपूर्ण ग्रंथाद्वारे ते अर्थ प्रतिपादन केले गेले आहेत हे स्पष्ट होते; एकाच ठिकाणी संग्रह करून सांगण्याच्या पद्धतीचे प्रकटीकरण होते; आणि अर्थाला अनुसरून असलेल्या नावाचे स्पष्टीकरण होते. परंतु, ग्रंथाचे प्रयोजन 'संग्रह' (सङ्गह) या शब्दाच्या सामर्थ्यानेच दर्शविले गेले आहे; कारण अभिधम्माच्या अर्थांचा एकाच ठिकाणी संग्रह केला असता, त्यांचे अध्ययन, परिपृच्छा (प्रश्न विचारणे) इत्यादींद्वारे त्यांच्या स्वरूपाचे आकलन होते, आणि त्यावर आधारित असलेल्या या जन्मातील (ऐहिक) व परलोकातील (पारलौकिक) कल्याणाची सिद्धी विनासायास प्राप्त होते. တတ္ထ ရတနတ္တယပဏာမပ္ပယောဇနံ တာဝ ဗဟုဓာ ပပဉ္စေန္တိ အာစရိယာ, ဝိသေသတော ပန အန္တရာယနိဝါရဏံ ပစ္စာသီသန္တိ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ သင်္ဂဟကာရေဟိ ‘‘တဿာနုဘာဝေန ဟတန္တရာယော’’တိ (ပါရာ. အဋ္ဌ. ၁.ဂန္ထာရမ္ဘကထာ). ရတနတ္တယပဏာမော ဟိ အတ္ထတော ပဏာမကိရိယာဘိနိပ္ဖာဒိကာ ကုသလစေတနာ, သာ စ ဝန္ဒနေယျဝန္ဒကာနံ ခေတ္တဇ္ဈာသယသမ္ပဒါဟိ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယဘူတာ ယထာလဒ္ဓသမ္ပတ္တိနိမိတ္တကဿ ကမ္မဿ အနုဗလပ္ပဒါနဝသေန တန္နိဗ္ဗတ္တိတဝိပါကသန္တတိယာ အန္တရာယကရာနိ ဥပပီဠကဥပစ္ဆေဒကကမ္မာနိ ပဋိဗာဟိတွာ တန္နိဒါနာနံ ယထာဓိပ္ပေတသိဒ္ဓိဝိဗန္ဓကာနံ ရောဂါဒိအန္တရာယာနမပ္ပဝတ္တိံ သာဓေတိ. တသ္မာ ပကရဏာရမ္ဘေ ရတနတ္တယပဏာမကရဏံ ယထာရဒ္ဓပကရဏဿ အနန္တရာယေန ပရိသမာပနတ္ထဉ္စေဝ သောတူနဉ္စ ဝန္ဒနာပုဗ္ဗင်္ဂမာယ ပဋိပတ္တိယာ အနန္တရာယေန ဥဂ္ဂဟဏဓာရဏာဒိသံသိဇ္ဈနတ္ထဉ္စ. အဘိဓေယျကထနံ ပန ဝိဒိတာဘိဓေယျဿေဝ ဂန္ထဿ ဝိညူဟိ ဥဂ္ဂဟဏာဒိဝသေန ပဋိပဇ္ဇိတဗ္ဗဘာဝတော. ကရဏပ္ပကာရပ္ပယောဇနသန္ဒဿနာနိ စ သောတုဇနသမုဿာဟဇနနတ္ထံ. အဘိဓာနကထနံ ပန ဝေါဟာရသုခတ္ထန္တိ အယမေတ္ထ သမုဒါယတ္ထော. အယံ ပန အဝယဝတ္ထော [Pg.71] – သသဒ္ဓမ္မဂဏုတ္တမံ အတုလံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓံ အဘိဝါဒိယ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟံ ဘာသိဿန္တိ သမ္ဗန္ဓော. येथे (या गाथेत), आचार्य प्रथम त्रिरत्न-वंदनाचे (रतनत्तयप्पणाम) प्रयोजन अनेक प्रकारे सविस्तर सांगतात, परंतु विशेषतः ते अंतरायांचे निवारण करण्याचीच आकांक्षा करतात. तसेच संग्रहकारांनी म्हटले आहे: 'त्याच्या (त्रिरत्नाच्या) प्रभावाने अंतराय नष्ट होतात' (तस्सानुभावेन हतन्तरायो). कारण, त्रिरत्न-वंदना ही वास्तविक अर्थाने वंदना-क्रिया घडवून आणणारी कुशल चेतना (कुसलचेतना) आहे. आणि ती वंदनीय (त्रिरत्न) आणि वंदक (ग्रंथकार) यांच्या क्षेत्र-संपत्ती आणि अध्याशय-संपत्तीमुळे (खेत्तज्झासयसम्पदा) 'दिट्ठधम्मवेदनीय' (याच जन्मात फळ देणारी) होऊन, प्राप्त झालेल्या भव-संपत्तीचे कारण असलेल्या कर्माला अनुकूल बल प्रदान करण्याच्या द्वारे, त्या कर्माने उत्पन्न केलेल्या विपाक-परंपरेला बाधा आणणाऱ्या उपपीडक आणि उपच्छेदक कर्मांना रोखून धरते; आणि त्या उपपीडक-उपच्छेदक कर्मांमुळे उद्भवणाऱ्या, इच्छित ग्रंथसमाप्तीला अडथळा आणणाऱ्या रोगादी अंतरायांचा अनुत्पाद (अभाव) साध्य करते. म्हणून, ग्रंथाच्या आरंभी त्रिरत्न-वंदना करणे हे आरंभिलेल्या ग्रंथाच्या निर्विघ्न समाप्तीसाठी आहे, आणि श्रोत्यांच्या (अभ्यासकांच्या) वंदनापूर्वक आचरणाने (प्रतिपत्तीने) निर्विघ्नपणे ग्रहण, धारण इत्यादींच्या सिद्धीसाठी आहे. परंतु अभिधेय (ग्रंथाचा विषय) सांगणे हे, विद्वानांनी ग्रंथाचा विषय जाणून घेऊनच अध्ययन इत्यादींच्या द्वारे त्याचे आचरण करावे, या हेतूने आहे. आणि ग्रंथ रचण्याची पद्धत व त्याचे प्रयोजन दाखवणे हे श्रोत्यांमध्ये उत्साह निर्माण करण्यासाठी आहे. तसेच ग्रंथाचे नाव सांगणे हे व्यवहाराच्या सुलभतेसाठी आहे; हा येथे 'समुदाय-अर्थ' (एकत्रित अर्थ) आहे. आणि हा 'अवयव-अर्थ' (प्रत्येक पदाचा अर्थ) आहे – 'ससद्धम्मगणमुत्तमं' (सद्धम्म आणि श्रेष्ठ संघासह वर्तमान असलेल्या), 'अतुलं' (अतुलनीय अशा), 'सम्मासम्बुद्धं' (सम्यक्संबुद्धांना) 'अभिवान्दिय' (वंदन करून) 'अभिधम्मत्थसंग्रहं भासिस्सं' (मी अभिधम्मत्थसंग्रह सांगेन) असा संबंध आहे. တတ္ထ သမ္မာ သာမဉ္စ သဗ္ဗဓမ္မေ အဘိသမ္ဗုဒ္ဓေါတိ သမ္မာ သမ္ဗုဒ္ဓေါ, ဘဂဝါ. သော ဟိ သင်္ခတာသင်္ခတဘေဒံ သကလမ္ပိ ဓမ္မဇာတံ ယာထာဝသရသလက္ခဏပဋိဝေဓဝသေန သမ္မာ သယံ ဝိစိတောပစိတပါရမိတာသမ္ဘူတေန သယမ္ဘူဉာဏေန သာမံ ဗုဇ္ဈိ အညာသိ. ယထာဟ ‘‘သယံ အဘိညာယ ကမုဒ္ဒိသေယျ’’န္တိ (မဟာဝ. ၁၁; မ. နိ. ၁.၂၈၅; ၂.၃၄၁; ဓ. ပ. ၃၅၃), အထ ဝါ ဗုဓဓာတုဿ ဇာဂရဏဝိကသနတ္ထေသုပိ ပဝတ္တနတော သမ္မာ သာမဉ္စ ပဋိဗုဒ္ဓေါ အနညပဋိဗောဓိတော ဟုတွာ သယမေဝ သဝါသနသမ္မောဟနိဒ္ဒါယ အစ္စန္တံ ဝိဂတော, ဒိနကရကိရဏသမာဂမေန ပရမရုစိရသိရိသောဘဂ္ဂပ္ပတ္တိယာ ဝိကသိတမိဝ ပဒုမံ အဂ္ဂမဂ္ဂဉာဏသမာဂမေန အပရိမိတဂုဏဂဏာလင်္ကတသဗ္ဗညုတညာဏပ္ပတ္တိယာ သမ္မာ သယမေဝ ဝိကသိတော ဝိကာသမနုပ္ပတ္တောတျတ္ထော. ယထာဝုတ္တဝစနတ္ထယောဂေပိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓသဒ္ဒဿ ဘဂဝတိ သမညာဝသေန ပဝတ္တတ္တာ ‘‘အတုလ’’န္တိ ဣမိနာ ဝိသေသေတိ. တုလာယ သမ္မိတော တုလျော, သောယေဝ တုလော ယကာရလောပဝသေန. အထ ဝါ သမ္မိတတ္ထေ အကာရပစ္စယဝသေန တုလာယ သမ္မိတော တုလော, န တုလော အတုလော, သီလာဒီဟိ ဂုဏေဟိ ကေနစိ အသဒိသော, နတ္ထိ ဧတဿ ဝါ တုလော သဒိသောတိ အတုလော သဒေဝကေ လောကေ အဂ္ဂပုဂ္ဂလဘာဝတော. ယထာဟ ‘‘ယာဝတာ, ဘိက္ခဝေ, သတ္တာ အပဒါ ဝါ ဒွိပဒါ ဝါ စတုပ္ပဒါ ဝါ…ပေ… တထာဂတော တေသံ အဂ္ဂမက္ခာယတီ’’တိအာဒိ (အ. နိ. ၄.၃၄; ၅.၃၂; ဣတိဝု. ၉၀). त्यामध्ये, ज्यांनी 'सम्यक' (यथार्थपणे) आणि 'स्वतःच' (कोणा दुसऱ्याच्या उपदेशाशिवाय) सर्व धर्मांना जाणले आहे, ते 'सम्यक्संबुद्ध' (सम्मासम्बुद्ध) म्हणजेच भगवान होत. कारण त्यांनी संखत (संस्कृत) आणि असंखत (असंस्कृत) अशा भेदांनी युक्त असलेल्या संपूर्ण धर्मसमूहाला, त्यांच्या यथार्थ स्वभाव आणि स्वलक्षण यांच्या साक्षात्काराद्वारे, स्वतः शोधलेल्या आणि संचय केलेल्या पारमितांमुळे उत्पन्न झालेल्या स्वयंभू ज्ञानाने (सयम्भूञाण) स्वतःच जाणले व अवगत केले. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: 'मी स्वतःच (सर्व धर्म) जाणून घेतले आहेत, तर मी कोणाला माझा गुरू म्हणून निर्देशित करू?' अथवा, 'बुध' धातूचा अर्थ 'जागे होणे' आणि 'विकसित होणे' असाही होत असल्याने, जे सम्यक प्रकारे आणि स्वतःच जागृत झाले आहेत, ज्यांना दुसऱ्या कोणी जागृत केलेले नाही, आणि जे स्वतःच वासनेसह मोह रूपी निद्रेतून पूर्णपणे मुक्त झाले आहेत; ज्याप्रमाणे सूर्यकिरणांच्या स्पर्शाने अत्यंत सुंदर शोभा व सौंदर्य प्राप्त करून कमळ विकसित होते, त्याचप्रमाणे अर्हत्-मार्गज्ञानाच्या (अग्गमग्गञाण) प्राप्तीने, अमर्याद गुणसमूहाने अलंकृत अशा सर्वज्ञता-ज्ञानाच्या (सब्बञ्ञुतञ्ञाण) प्राप्तीद्वारे जे सम्यक प्रकारे स्वतःच विकसित झाले आहेत, असा अर्थ आहे. वर सांगितलेल्या तिन्ही प्रकारच्या शब्दांच्या अर्थांशी युक्त असूनही, 'सम्यक्संबुद्ध' हा शब्द भगवंतांच्या बाबतीत संज्ञा (नाव) म्हणून रूढ झाल्यामुळे, 'अतुल' (अतुलं) या पदाने त्याचे विशेषीकरण केले आहे. तुलनेने (बुद्धीरूपी मापाने) जो मोजला जातो तो 'तुल्य' होय; 'य' कारचा लोप होऊन तोच 'तुल' असा होतो. अथवा, मोजण्याच्या अर्थात 'अ' प्रत्यय लागून तुलनेने मोजला जाणारा तो 'तुल' होय. जो 'तुल' नाही तो 'अतुल' होय, जो शील इत्यादी गुणांनी कोणासारखाही नसून अद्वितीय आहे. किंवा ज्यांच्या समान दुसरा कोणी 'तुल' (समान) नाही, म्हणून ते 'अतुल' आहेत; कारण सदेव लोकामध्ये ते सर्वश्रेष्ठ पुरुष (अग्गपुग्गल) आहेत. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, जितके काही प्राणी आहेत – मग ते अपाद (पाय नसलेले) असोत, द्विपद (दोन पायांचे) असोत, चतुष्पद (चार पायांचे) असोत... त्या सर्वांमध्ये तथागत सर्वश्रेष्ठ म्हटले जातात' इत्यादी. ဧတ္တာဝတာ စ ဟေတုဖလသတ္တူပကာရသမ္ပဒါဝသေန တီဟာကာရေဟိ ဘဂဝတော ထောမနာ ကတာ ဟောတိ. တတ္ထ ဟေတုသမ္ပဒါ နာမ မဟာကရုဏာသမာယောဂေါ ဗောဓိသမ္ဘာရသမ္ဘရဏဉ္စ[Pg.72]. ဖလသမ္ပဒါ ပန ဉာဏပဟာနအာနုဘာဝရူပကာယသမ္ပဒါဝသေန စတုဗ္ဗိဓာ. တတ္ထ သဗ္ဗညုတညာဏပဒဋ္ဌာနံ မဂ္ဂဉာဏံ, တမ္မူလကာနိ စ ဒသဗလာဒိဉာဏာနိ ဉာဏသမ္ပဒါ. သဝါသနသကလသံကိလေသာနမစ္စန္တမနုပ္ပာဒဓမ္မတာပါဒနံ ပဟာနသမ္ပဒါ. ယထိစ္ဆိတနိပ္ဖာဒနေ အာဓိပစ္စံ အာနုဘာဝသမ္ပဒါ. သကလလောကနယနာဘိသေကဘူတာ ပန လက္ခဏာနုဗျဉ္ဇနပ္ပဋိမဏ္ဍိတာ အတ္တဘာဝသမ္ပတ္တိ ရူပကာယသမ္ပဒါ နာမ. သတ္တူပကာရော ပန အာသယပယောဂဝသေန ဒုဝိဓော. တတ္ထ ဒေဝဒတ္တာဒီသု ဝိရောဓိသတ္တေသုပိ နိစ္စံ ဟိတဇ္ဈာသယတာ, အပရိပါကဂတိန္ဒြိယာနံ ဣန္ဒြိယပရိပါကကာလာဂမနဉ္စ အာသယော နာမ. တဒညသတ္တာနံ ပန လာဘသက္ကာရာဒိနိရပေက္ခစိတ္တဿ ယာနတ္တယမုခေန သဗ္ဗဒုက္ခနိယျာနိကဓမ္မဒေသနာ ပယောဂေါ နာမ. आणि एवढ्या विवेचनाने, हेतू-संपत्ती, फल-संपत्ती आणि सत्त्वोपकार-संपत्ती (प्राण्यांवर उपकार करण्याची संपत्ती) या तीन प्रकारांनी भगवंतांची स्तुती (थोमना) केली गेली आहे. त्यामध्ये, 'हेतू-संपत्ती' म्हणजे महाकरुणा-योग (महाकरुणेने युक्त असणे) आणि बोधीच्या सामग्रीचा (पारमितांचा) संचय करणे होय. परंतु 'फल-संपत्ती' ही ज्ञान-संपत्ती, प्रहाण-संपत्ती, अनुभाव-संपत्ती आणि रूपकाय-संपत्ती या भेदांनी चार प्रकारची आहे. त्यामध्ये, सर्वज्ञता-ज्ञानाचे निकटचे कारण असलेले मार्गज्ञान (अग्गमग्गञाण) आणि त्याचे मूळ असलेले दशबल इत्यादी ज्ञान म्हणजे 'ज्ञान-संपत्ती' होय. वासनेसह सर्व संक्लेशांचा (विकारांचा) अत्यंत अनुत्पाद (पुन्हा उत्पन्न न होणे) करणे म्हणजे 'प्रहाण-संपत्ती' होय. इच्छित फळ साध्य करण्यावरील प्रभुत्व (अधिपत्य) म्हणजे 'अनुभाव-संपत्ती' होय. आणि संपूर्ण जगाच्या नेत्रांसाठी अभिषेकासमान असलेली, बत्तीस महापुरुष लक्षणे आणि ऐंशी अनुव्यंजनांनी सुशोभित अशी आत्मभाव-संपत्ती (शरीर-सौष्ठव) म्हणजे 'रूपकाय-संपत्ती' होय. परंतु 'सत्त्वोपकार' (प्राण्यांचे कल्याण करणे) हा आशय आणि प्रयोग या भेदांनी दोन प्रकारचा आहे. त्यामध्ये, देवदत्त इत्यादींसारख्या विरोधी प्राण्यांच्या बाबतीतही नेहमी हिताचीच इच्छा असणे (हिताध्याशयता), आणि ज्यांच्या इंद्रियांची परिपक्वता झाली नाही अशा प्राण्यांच्या इंद्रिय-परिपक्वतेच्या काळाची प्रतीक्षा करणे, याला 'आशय' म्हणतात. परंतु त्याव्यतिरिक्त इतर (इंद्रिय परिपक्व झालेल्या) प्राण्यांना, लाभ-सत्कार इत्यादींची अपेक्षा न ठेवता, तीन यानांच्या (विपश्यना ज्ञानांच्या) द्वारे सर्व दुःखांतून मुक्त करणाऱ्या धर्माचा उपदेश करणे, याला 'प्रयोग' म्हणतात. တတ္ထ ပုရိမာ ဒွေ ဖလသမ္ပဒါ ‘‘သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓ’’န္တိ ဣမိနာ ဒဿိတာ, ဣတရာ ပန ဒွေ, တထာ သတ္တူပကာရသမ္ပဒါ စ ‘‘အတုလ’’န္တိ ဧတေန, တဒုပါယဘူတာ ပန ဟေတုသမ္ပဒါ ဒွီဟိပိ သာမတ္ထိယတော ဒဿိတာ တထာဝိဓဟေတုဗျတိရေကေန တဒုဘယသမ္ပတ္တီနမသမ္ဘဝတော, အဟေတုကတ္တေ စ သဗ္ဗတ္ထ တာသံ သမ္ဘဝပ္ပသင်္ဂတော. त्यामध्ये, पहिल्या दोन फल-संपत्ती (ज्ञान आणि प्रहाण) 'सम्यक्संबुद्ध' (सम्मासम्बुद्ध) या पदाने दर्शविल्या आहेत; परंतु इतर दोन फल-संपत्ती (अनुभाव आणि रूपकाय) तसेच सत्त्वोपकार-संपत्ती 'अतुल' (अतुलं) या पदाने दर्शविली आहे; आणि त्या दोन्ही संपत्तींचा उपाय (कारण) असलेली हेतू-संपत्ती या दोन्ही पदांच्या सामर्थ्याने दर्शविली गेली आहे. कारण तशा प्रकारच्या हेतूशिवाय त्या दोन्ही संपत्तींची (फल आणि सत्त्वोपकार) उत्पत्ती असंभव आहे, आणि जर त्या अहेतुक (कारणाशिवाय) मानल्या, तर सर्व प्राण्यांमध्ये त्या दोन्ही संपत्ती उत्पन्न होण्याचा प्रसंग येईल. တဒေဝံ တိဝိဓာဝတ္ထာသင်္ဂဟိတထောမနာပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဗုဒ္ဓရတနံ ဝန္ဒိတွာ ဣဒါနိ သေသရတနာနမ္ပိ ပဏာမမာရဘန္တော အာဟ ‘‘သသဒ္ဓမ္မဂဏုတ္တမ’’န္တိ. ဂုဏီဘူတာနမ္ပိ ဟိ ဓမ္မသံဃာနံ အဘိဝါဒေတဗ္ဗဘာဝေါ သဟယောဂေန ဝိညာယတိ ယထာ ‘‘သပုတ္တဒါရော အာဂတောတိ ပုတ္တဒါရဿာပိ အာဂမန’’န္တိ. अशा प्रकारे, three अवस्थांनी (हेतू, फल, सत्त्वोपकार) युक्त असलेल्या स्तुतीपूर्वक बुद्धरत्नाला वंदन करून, आता उर्वरित दोन रत्नांनाही (धम्म आणि संघ) वंदन करण्याचा आरंभ करताना ग्रंथकार 'ससद्धम्मगणमुत्तमं' असे म्हणतात. कारण, जरी धम्म आणि संघ हे येथे विशेषण म्हणून गौण (गुणीभूत) झाले असले, तरी सहयोगामुळे (बुद्धांसोबत जोडले गेल्यामुळे) ते देखील वंदनीय आहेत हे समजून येते; जसे की 'तो आपल्या पत्नी व मुलांसह आला आहे' (सपुत्तदारो आगतो) असे म्हटले असता, पत्नी व मुलांचेही येणे समजून येते, त्याप्रमाणे. တတ္ထ အတ္တာနံ ဓာရေန္တေ စတူသု အပါယေသု, ဝဋ္ဋဒုက္ခေသု စ အပတမာနေ ကတွာ ဓာရေတီတိ ဓမ္မော, စတုမဂ္ဂဖလနိဗ္ဗာနဝသေန နဝဝိဓော, ပရိယတ္တိယာ သဟ ဒသဝိဓော ဝါ ဓမ္မော. ဓာရဏဉ္စ ပနေတဿ အပါယာဒိနိဗ္ဗတ္တကကိလေသဝိဒ္ဓံသနံ, တံ အရိယမဂ္ဂဿ ကိလေသသမုစ္ဆေဒကဘာဝတော, နိဗ္ဗာနဿ စ [Pg.73] အာရမ္မဏဘာဝေန တဿ တဒတ္ထသိဒ္ဓိဟေတုတာယ နိပ္ပရိယာယတော လဗ္ဘတိ, ဖလဿ ပန ကိလေသာနံ ပဋိပ္ပဿမ္ဘနဝသေန မဂ္ဂါနုကူလပ္ပဝတ္တိတော, ပရိယတ္တိယာ စ တဒဓိဂမဟေတုတာယာတိ ဥဘိန္နမ္ပိ ပရိယာယတောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သတံ သပ္ပုရိသာနံ အရိယပုဂ္ဂလာနံ, သန္တော ဝါ သံဝိဇ္ဇမာနော န တိတ္ထိယပရိကပ္ပိတော အတ္တာ ဝိယ ပရမတ္ထတော အဝိဇ္ဇမာနော သန္တော ဝါ ပသတ္ထော သွာက္ခာတတာဒိဂုဏယောဂတော န ဗာဟိရကဓမ္မော ဝိယ ဧကန္တနိန္ဒိတော ဓမ္မောတိ သဒ္ဓမ္မော, ဂဏော စ သော အဋ္ဌန္နံ အရိယပုဂ္ဂလာနံ သမူဟဘာဝတော ဥတ္တမော စ သုပ္ပဋိပန္နတာဒိဂုဏဝိသေသယောဂတော, ဂဏာနံ, ဂဏေသု ဝါ ဒေဝမနုဿာဒိ သမူဟေသု ဥတ္တမော ယထာဝုတ္တဂုဏဝသေနာတိ ဂဏုတ္တမော, သဟ သဒ္ဓမ္မေန, ဂဏုတ္တမေန စာတိ သသဒ္ဓမ္မဂဏုတ္တမော, တံ သသဒ္ဓမ္မဂဏုတ္တမံ. त्यामध्ये, स्वतःचे धारण करणाऱ्यांना (म्हणजेच धर्माचे आचरण करणाऱ्यांना) चार अपाय आणि संसारदुःखात पडण्यापासून वाचवून जे धारण करते (रक्षण करते), तो 'धम्म' (धर्म) होय. तो चार मार्ग, चार फल आणि निर्वाण या भेदाने नऊ प्रकारचा आहे, किंवा परियत्तीसह (परियत्तिधम्मासह) दहा प्रकारचा धम्म आहे. आणि याचे 'धारण करणे' म्हणजे अपाय इत्यादींमध्ये जन्म देणाऱ्या क्लेशांचा विनाश करणे होय. ते (धारण करणे) आर्यमार्गाच्या बाबतीत क्लेशांचा समूळ उच्छेद करण्याच्या स्वभावामुळे आणि निर्वाणाच्या बाबतीत आलंबन (विषय) बनून त्या क्लेशांच्या उच्छेदाचे प्रयोजन सिद्ध करण्यास कारणीभूत ठरल्यामुळे मुख्य अर्थाने (निप्परियायतः) सिद्ध होते. परंतु, फलाच्या बाबतीत क्लेशांच्या शांततेच्या (प्रतिप्रस्रब्धीच्या) रूपाने मार्गाला अनुकूल प्रवृत्ती असल्यामुळे आणि परियत्तीच्या बाबतीत त्या मार्गादींच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे, या दोन्हीच्या बाबतीत ते 'धारण करणे' लाक्षणिक अर्थाने (परियायतः) आहे असे समजावे. 'सतं' म्हणजे सत्पुरुष, जे आर्यपुद्गल आहेत, त्यांचा धम्म; किंवा 'संत' म्हणजे विद्यमान असलेला, जो अन्य पंथीयांनी कल्पिलेल्या आत्म्याप्रमाणे परमार्थतः अविद्यमान (असत्य) नाही; किंवा 'संत' म्हणजे प्रशंसनीय, जो स्वाख्यात (सुविख्यात) इत्यादी गुणांनी युक्त असल्यामुळे बाह्य मतांप्रमाणे एकांततः निंदनीय नाही, असा धम्म म्हणजे 'सद्धम्म' होय. आणि तो (संघ) आठ प्रकारच्या आर्यपुद्गलांचा समूह असल्यामुळे 'गण' आहे, आणि सुप्रतिपन्नत्व इत्यादी विशेष गुणांनी युक्त असल्यामुळे 'उत्तम' आहे. किंवा देव, मनुष्य इत्यादी समूहांमध्ये (गणांमध्ये) पूर्वोक्त गुणांच्या प्रभावाने जो सर्वोत्तम आहे, म्हणून तो 'गणोत्तम' होय. जो सद्धम्म आणि गणोत्तम (उत्तम संघ) यांच्यासह विद्यमान आहे, म्हणून तो 'ससद्धम्मगणोत्तम' होय. त्या ससद्धम्मगणोत्तमाला (भगवान बुद्धांना)... အဘိဝါဒိယာတိ ဝိသေသတော ဝန္ဒိတွာ, ဘယလာဘကုလာစာရာဒိဝိရဟေန သက္ကစ္စံ အာဒရေန ကာယဝစီမနောဒွါရေဟိ ဝန္ဒိတွာတျတ္ထော. ဘာသိဿန္တိ ကထေဿာမိ. နိဗ္ဗတ္တိတပရမတ္ထဘာဝေန အဘိ ဝိသိဋ္ဌာ ဓမ္မာ ဧတ္ထာတိအာဒိနာ အဘိဓမ္မော, ဓမ္မသင်္ဂဏီအာဒိသတ္တပကရဏံ အဘိဓမ္မပိဋကံ, တတ္ထ ဝုတ္တာ အတ္ထာ အဘိဓမ္မတ္ထာ, တေ သင်္ဂယှန္တိ ဧတ္ထ, ဧတေနာတိ ဝါ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟံ. 'अभिवादिय' (अभिवादन करून) म्हणजे विशेष रूपाने वंदन करून; भय, लाभ, कुलाचार इत्यादींच्या अभावाने आदरपूर्वक काया, वाचा आणि मनाच्या द्वारांनी वंदन करून, असा अर्थ आहे. 'भासिस्सं' म्हणजे मी कथन करेन. प्रज्ञप्तीपासून वेगळे केलेल्या परमार्थ स्वभावामुळे अतिशय विशिष्ट (उत्कृष्ट) धर्म ज्यामध्ये सांगितले आहेत, म्हणून तो 'अभिधम्म' होय. धम्मसंगणी इत्यादी सात ग्रंथांचा समूह म्हणजेच 'अभिधम्मपिटक' होय. त्यामध्ये सांगितलेलेले अर्थ (विषय) म्हणजेच 'अभिधम्मत्थ' (अभिधम्मार्थ) होत. ते (अभिधम्मार्थ) ज्यामध्ये किंवा ज्याच्याद्वारे संकलित केले जातात, तो 'अभिधम्मत्थसंग्रह' होय. ပရမတ္ထဓမ္မဝဏ္ဏနာ परमार्थधम्म वर्णन ၂. ဧဝံ တာဝ ယထာဓိပ္ပေတပ္ပယောဇနနိမိတ္တံ ရတနတ္တယပဏာမာဒိကံ ဝိဓာယ ဣဒါနိ ယေသံ အဘိဓမ္မတ္ထာနံ သင်္ဂဟဏဝသေန ဣဒံ ပကရဏံ ပဋ္ဌပီယတိ, တေ တာဝ သင်္ခေပတော ဥဒ္ဒိသန္တော အာဟ ‘‘တတ္ထ ဝုတ္တာ’’တျာဒိ. တတ္ထ တသ္မိံ အဘိဓမ္မေ သဗ္ဗထာ ကုသလာဒိဝသေန, ခန္ဓာဒိဝသေန စ ဝုတ္တာ အဘိဓမ္မတ္ထာ ပရမတ္ထတော သမ္မုတိံ ဌပေတွာ နိဗ္ဗတ္တိတပရမတ္ထဝသေန စိတ္တံ ဝိညာဏက္ခန္ဓော, စေတသိကံ ဝေဒနာဒိက္ခန္ဓတ္တယံ, ရူပံ [Pg.74] ဘူတုပါဒါယဘေဒဘိန္နော ရူပက္ခန္ဓော, နိဗ္ဗာနံ မဂ္ဂဖလာနမာရမ္မဏဘူတော အသင်္ခတဓမ္မောတိ ဧဝံ စတုဓာ စတူဟာကာရေဟိ ဌိတာတိ ယောဇနာ. တတ္ထ ပရမော ဥတ္တမော အဝိပရီတော အတ္ထော, ပရမဿ ဝါ ဥတ္တမဿ ဉာဏဿ အတ္ထော ဂေါစရောတိ ပရမတ္ထော. २. अशा प्रकारे, इच्छित प्रयोजनाच्या हेतूने त्रिरत्न वंदना इत्यादी पूर्वकृत्ये करून, आता ज्या अभिधम्मार्थांच्या संकलनाच्या उद्देशाने हा ग्रंथ रचला जात आहे, त्यांना प्रथम संक्षेपाने दर्शविताना आचार्य म्हणतात: 'तत्थ वृत्ता' (त्यामध्ये सांगितलेलेले) इत्यादी. 'तत्थ' म्हणजे त्या अभिधम्मामध्ये सर्व प्रकारे कुशल इत्यादींच्या रूपाने आणि स्कंध इत्यादींच्या रूपाने सांगितलेलेले अभिधम्मार्थ, परमार्थतः संवृत्तीला (लोकव्यवहाराला) बाजूला ठेवून, प्रज्ञप्तीपासून वेगळे केलेल्या परमार्थ रूपाने—'चित्त' म्हणजे विज्ञानस्कंध, 'चेतसिक' म्हणजे वेदना इत्यादी तीन नामस्कंधांचा समूह, 'रूप' म्हणजे महाभूत आणि उपादाय रूपांच्या भेदाने विभक्त असलेला रूपस्कंध, आणि 'निर्वाण' म्हणजे मार्ग व फलांचे आलंबन असलेला असंस्कृत धर्म होय—अशा प्रकारे चार प्रकारे, चार रूपांनी स्थित आहेत, अशी ही पदयोजना आहे. त्यामध्ये 'परम' म्हणजे उत्तम, यथार्थ (अविपरीत) असा 'अर्थ' (स्वभाव), किंवा परम (उत्कृष्ट) ज्ञानाचा जो 'अर्थ' म्हणजे विषय (गोचर) आहे, तो 'परमार्थ' होय. စိန္တေတီတိ စိတ္တံ, အာရမ္မဏံ ဝိဇာနာတီတိ အတ္ထော. ယထာဟ ‘‘ဝိသယဝိဇာနနလက္ခဏံ စိတ္တ’’န္တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁ ဓမ္မုဒေသဝါရဖဿပဉ္စမကရာသိဝဏ္ဏနာ). သတိပိ ဟိ နိဿယသမနန္တရာဒိပစ္စယေန ဝိနာ အာရမ္မဏေန စိတ္တမုပ္ပဇ္ဇတီတိ တဿ တံလက္ခဏတာ ဝုတ္တာ, ဧတေန နိရာရမ္မဏဝါဒိမတံ ပဋိက္ခိတ္တံ ဟောတိ. စိန္တေန္တိ ဝါ ဧတေန ကရဏဘူတေန သမ္ပယုတ္တဓမ္မာတိ စိတ္တံ. အထ ဝါ စိန္တနမတ္တံ စိတ္တံ. ယထာပစ္စယံ ဟိ ပဝတ္တိမတ္တမေဝ ယဒိဒံ သဘာဝဓမ္မော နာမ. ဧဝဉ္စ ကတွာ သဗ္ဗေသမ္ပိ ပရမတ္ထဓမ္မာနံ ဘာဝသာဓနမေဝ နိပ္ပရိယာယတော လဗ္ဘတိ, ကတ္တုကရဏဝသေန ပန နိဗ္ဗစနံ ပရိယာယကထာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သကသကကိစ္စေသု ဟိ ဓမ္မာနံ အတ္တပ္ပဓာနတာသမာရောပနေန ကတ္တုဘာဝေါ စ, တဒနုကူလဘာဝေန သဟဇာတဓမ္မသမူဟေ ကတ္တုဘာဝသမာရောပနေန ပဋိပါဒေတဗ္ဗဓမ္မဿ ကရဏတ္တဉ္စ ပရိယာယတောဝ လဗ္ဘတိ, တထာနိဒဿနံ ပန ဓမ္မသဘာဝဝိနိမုတ္တဿ ကတ္တာဒိနော အဘာဝပရိဒီပနတ္ထန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဝိစိတ္တကရဏာဒိတောပိ စိတ္တသဒ္ဒတ္ထံ ပပဉ္စေန္တိ. အယံ ပနေတ္ထ သင်္ဂဟော – जे विचार करते (जाणते) ते 'चित्त' होय; आलंबनाला (विषयाला) विशेष रूपाने जाणते, असा याचा अर्थ आहे. जसे म्हटले आहे: 'विषयाला जाणणे हे चित्ताचे लक्षण आहे.' कारण जरी आश्रय (निश्रय), समनंतर इत्यादी प्रत्यय (कारणे) विद्यमान असले, तरी आलंबनाशिवाय चित्त उत्पन्न होऊ शकत नाही, म्हणून त्याचे ते (आलंबन जाणण्याचे) लक्षण सांगितले आहे. याने निरालंबनवादींचे मत खंडित होते. किंवा ज्या करणभूत (साधनभूत) चित्ताद्वारे संप्रयुक्त धर्म (चेतसिक) आलंबनाला जाणतात, ते 'चित्त' होय. अथवा केवळ जाणण्याची क्रिया (चिंतनमात्र) म्हणजे 'चित्त' होय. कारण ज्याला स्वभावधर्म म्हटले जाते, तो प्रत्ययानुसार (कारणानुसार) केवळ प्रवृत्तीमात्र (होणेमात्र) आहे. आणि असे मानल्याने सर्वच परमार्थधर्मांचे भावसाधन (क्रियारूप अर्थ) मुख्य रूपाने सिद्ध होते, परंतु कर्ता आणि करण यांच्या रूपाने केलेली व्युत्पत्ती ही लाक्षणिक (परियाय) कथा आहे असे समजावे. कारण आपापल्या कार्यात धर्मांच्या स्वतःच्या प्रधानतेचा आरोप केल्याने कर्तृत्वभाव सिद्ध होतो, आणि त्याच्या अनुकूलतेने सहजात धर्मसमूहावर कर्तृत्वाचा आरोप केल्याने, निष्पादित होणाऱ्या धर्माचे करणत्व (साधनत्व) लाक्षणिक रूपानेच प्राप्त होते. परंतु तसे दर्शविणे हे धर्मस्वभावाव्यतिरिक्त अन्य कोणत्याही कर्ता इत्यादींचा अभाव स्पष्ट करण्यासाठी आहे, असे जाणावे. विविध प्रकारच्या चित्रविचित्र गोष्टी करण्याच्या अर्थाने देखील 'चित्त' शब्दाच्या अर्थाचा विस्तार केला जातो. याविषयीचा संग्रह खालीलप्रमाणे आहे— ‘‘ဝိစိတ္တကရဏာ စိတ္တံ, အတ္တနော စိတ္တတာယ ဝါ; စိတံ ကမ္မကိလေသေဟိ, စိတံ တာယတိ ဝါ တထာ; စိနောတိ အတ္တသန္တာနံ, ဝိစိတ္တာရမ္မဏန္တိ စာ’’တိ. चित्रविचित्र गोष्टी निर्माण करत असल्यामुळे ते 'चित्त' होय, किंवा स्वतःच्या चित्रविचित्रतेमुळे (विविधतेमुळे) ते 'चित्त' होय; कर्म आणि क्लेशांद्वारे जे संचित (उत्पन्न) केले जाते ते 'चित्त' होय, किंवा त्या संचित केलेल्या विपाकाचे जे रक्षण करते ते 'चित्त' होय; जे स्वतःच्या प्रवाहाला (संततीला) संचित करते आणि ज्याचे आलंबन चित्रविचित्र असते, ते 'चित्त' होय. စေတသိ ဘဝံ တဒါယတ္တဝုတ္တိတာယာတိ စေတသိကံ. န ဟိ တံ စိတ္တေန ဝိနာ အာရမ္မဏဂ္ဂဟဏသမတ္ထံ အသတိ စိတ္တေ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ အနုပ္ပဇ္ဇနတော, စိတ္တံ ပန ကေနစိ စေတသိကေန ဝိနာပိ [Pg.75] အာရမ္မဏေ ပဝတ္တတီတိ တံ စေတသိကမေဝ စိတ္တာယတ္တဝုတ္တိကံ နာမ. တေနာဟ ဘဂဝါ ‘‘မနောပုဗ္ဗင်္ဂမာ ဓမ္မာ’’တိ (ဓ. ပ. ၁-၂), ဧတေန သုခါဒီနံ အစေတနတ္တနိစ္စတ္တာဒယော ဝိပ္ပဋိပတ္တိယောပိ ပဋိက္ခိတ္တာ ဟောန္တိ. စေတသိ နိယုတ္တံ ဝါ စေတသိကံ. चित्तामध्ये उत्पन्न होणारे आणि त्याच्यावर अवलंबून असणारे, म्हणून ते 'चेतसिक' होय. कारण ते (चेतसिक) चित्ताशिवाय आलंबन ग्रहण करण्यास समर्थ नाही, कारण चित्त नसताना ते सर्व प्रकारे मुळीच उत्पन्न होऊ शकत नाही; परंतु चित्त काही चेतसिकांशिवाय देखील आलंबनामध्ये प्रवृत्त होऊ शकते, म्हणून चेतसिकच 'चित्तावर अवलंबून असणारे' म्हटले जाते. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे: 'मन सर्व धर्मांमध्ये अग्रगामी आहे.' याने सुख इत्यादी धर्मांच्या अचेतनत्व आणि नित्यत्व इत्यादी चुकीच्या धारणा देखील खंडित होतात. किंवा चित्ताशी जे जोडलेले असते, ते 'चेतसिक' होय. ရုပ္ပတီတိ ရူပံ, သီတုဏှာဒိဝိရောဓိပစ္စယေဟိ ဝိကာရမာပဇ္ဇတိ, အာပါဒီယတီတိ ဝါ အတ္ထော. တေနာဟ ဘဂဝါ ‘‘သီတေနပိ ရုပ္ပတိ, ဥဏှေနပိ ရုပ္ပတီ’’တျာဒိ (သံ. နိ. ၃.၇၉), ရုပ္ပနဉ္စေတ္ထ သီတာဒိဝိရောဓိပစ္စယသမဝါယေ ဝိသဒိသုပ္ပတ္တိယေဝ. ယဒိ ဧဝံ အရူပဓမ္မာနမ္ပိ ရူပဝေါဟာရော အာပဇ္ဇတီတိ? နာပဇ္ဇတိ သီတာဒိဂ္ဂဟဏသာမတ္ထိယတော ဝိဘူတတရဿေဝ ရုပ္ပနဿာဓိပ္ပေတတ္တာ. ဣတရထာ ဟိ ‘‘ရုပ္ပတီ’’တိ အဝိသေသဝစနေနေဝ ပရိယတ္တန္တိ ကိံ သီတာဒိဂ္ဂဟဏေန, တံ ပန သီတာဒိနာ ဖုဋ္ဌဿ ရုပ္ပနံ ဝိဘူတတရံ, တသ္မာ တဒေဝေတ္ထာဓိပ္ပေတန္တိ ဉာပနတ္ထံ သီတာဒိဂ္ဂဟဏံ ကတံ. ယဒိ ဧဝံ ကထံ ဗြဟ္မလောကေ ရူပဝေါဟာရော, န ဟိ တတ္ထ ဥပဃာတကာ သီတာဒယော အတ္ထီတိ? ကိဉ္စာပိ ဥပဃာတကာ နတ္ထိ, အနုဂ္ဂါဟကာ ပန အတ္ထိ, တသ္မာ တံဝသေနေတ္ထ ရုပ္ပနံ သမ္ဘဝတီတိ, အထ ဝါ တံသဘာဝါနတိဝတ္တနတော တတ္ထ ရူပဝေါဟာရောတိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. जे बाधित (विकृत) होते, ते 'रूप' होय; म्हणजेच थंडी, उष्णता इत्यादी विरोधी कारणांमुळे जे विकाराला प्राप्त होते किंवा विकृत केले जाते, असा अर्थ आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे: 'थंडीने देखील बाधित होते, उष्णतेने देखील बाधित होते' इत्यादी. आणि येथे 'बाधित होणे' (रुप्पन) म्हणजे थंडी इत्यादी विरोधी कारणांच्या संयोगाने पूर्वीपेक्षा भिन्न (विसदृश) रूपाची उत्पत्ती होणे हेच होय. जर असे असेल, तर अरूप (नाम) धर्मांना देखील 'रूप' हा व्यवहार लागू होईल का? नाही लागू होणार, कारण थंडी इत्यादी शब्दांच्या ग्रहणाच्या सामर्थ्यामुळे अत्यंत स्पष्ट अशा बाधित होण्याचाच येथे अभिप्रेत अर्थ आहे. कारण अन्यथा 'बाधित होते' या सामान्य विधानानेच काम भागले असते, मग थंडी इत्यादी शब्दांच्या ग्रहणाची काय गरज होती? परंतु थंडी इत्यादींनी स्पर्श केलेल्या रूपाचे बाधित होणे अधिक स्पष्ट असते, म्हणून तेच येथे अभिप्रेत आहे हे दर्शविण्यासाठी थंडी इत्यादी शब्दांचे ग्रहण केले गेले आहे. जर असे असेल, तर ब्रह्मलोकात 'रूप' हा व्यवहार कसा लागू होतो? कारण तिथे तर पीडा देणारी थंडी इत्यादी नसतात? जरी तिथे पीडा देणारी थंडी इत्यादी नसली, तरी अनुकूल (अनुग्राहक) थंडी-उष्णता इत्यादी असतात, म्हणून त्यांच्या प्रभावाने तिथे बाधित होणे संभवते. अथवा त्या (बाधित होण्याच्या) स्वभावाचे उल्लंघन न केल्यामुळे तिथे 'रूप' हा व्यवहार होतो. आता अधिक विस्ताराची आवश्यकता नाही. ဘဝါဘဝံ ဝိနနတော သံသိဗ္ဗနတော ဝါနသင်္ခါတာယ တဏှာယ နိက္ခန္တံ, နိဗ္ဗာတိ ဝါ ဧတေန ရာဂဂ္ဂိအာဒိကောတိ နိဗ္ဗာနံ. लहान-मोठ्या भवांना विणत असल्यामुळे (जोडत असल्यामुळे) 'वान' म्हटल्या जाणाऱ्या तृष्णेपासून जे मुक्त आहे, किंवा ज्याच्याद्वारे रागाग्नी इत्यादी शांत होतात, ते 'निर्वाण' होय. ၁. စိတ္တပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ १. चित्त परिच्छेद वर्णन ဘူမိဘေဒစိတ္တဝဏ္ဏနာ भूमीभेद चित्त वर्णन ၃. ဣဒါနိ ယသ္မာ ဝိဘာဂဝန္တာနံ ဓမ္မာနံ သဘာဝဝိဘာဝနံ ဝိဘာဂေန ဝိနာ န ဟောတိ, တသ္မာ ယထာဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ အဘိဓမ္မတ္ထာနံ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ဝိဘာဂံ ဒဿေတုံ စိတ္တံ တာဝ ဘူမိဇာတိသမ္ပယောဂါဒိဝသေန [Pg.76] ဝိဘဇိတွာ နိဒ္ဒိသိတုမာရဘန္တော အာဟ ‘‘တတ္ထ စိတ္တံ တာဝါ’’တျာဒိ. တာဝ-သဒ္ဒေါ ပဌမန္တိ ဧတဿတ္ထေ. ယထာဥဒ္ဒိဋ္ဌေသု စတူသု အဘိဓမ္မတ္ထေသု ပဌမံ စိတ္တံ နိဒ္ဒိသီယတီတိ အယဉှေတ္ထတ္ထော. စတ္တာရော ဝိဓာ ပကာရာ အဿာတိ စတုဗ္ဗိဓံ. ယသ္မာ ပနေတေ စတုဘုမ္မကာ ဓမ္မာ အနုပုဗ္ဗပဏီတာ, တသ္မာ ဟီနုက္ကဋ္ဌုက္ကဋ္ဌတရတမာနုက္ကမေန တေသံ နိဒ္ဒေသော ကတော. တတ္ထ ကာမေတီတိ ကာမော, ကာမတဏှာ, သာ ဧတ္ထ အဝစရတိ အာရမ္မဏကရဏဝသေနာတိ ကာမာဝစရံ. ကာမီယတီတိ ဝါ ကာမော, ဧကာဒသဝိဓော ကာမဘဝေါ, တသ္မိံ ယေဘုယျေန အဝစရတီတိ ကာမာဝစရံ. ယေဘုယျေန စရဏဿ ဟိ အဓိပ္ပေတတ္တာ ရူပါရူပဘဝေသု ပဝတ္တဿာပိ ဣမဿ ကာမာဝစရဘာဝေါ ဥပပန္နော ဟောတိ. ကာမဘဝေါယေဝ ဝါ ကာမော ဧတ္ထ အဝစရတီတိ ကာမာဝစရော, တတ္ထ ပဝတ္တမ္ပိ စိတ္တံ နိဿိတေ နိဿယဝေါဟာရေန ကာမာဝစရံ ‘‘မဉ္စာ ဥက္ကုဋ္ဌိံ ကရောန္တီ’’တျာဒီသု ဝိယာတိ အလမတိဝိသာရဏိယာ ကထာယ. ဟောတိ စေတ္ထ – ३. आता ज्याअर्थी विभाग असलेल्या धर्मांचे स्वभाव-स्पष्टीकरण विस्ताराने विभाग केल्याशिवाय होऊ शकत नाही, म्हणून संक्षेपाने सांगितलेल्या अभिधम्मार्थांचा उद्देश-क्रमानुसार विभाग दाखवण्यासाठी, सर्वप्रथम चित्ताला भूमी, जाती, संप्रयोग इत्यादींच्या द्वारे विभागून सविस्तर निर्देश करण्यास आरंभ करताना आचार्य म्हणाले— 'तत्थ चित्तं ताव' (त्यात सर्वप्रथम चित्त) इत्यादी. 'ताव' हा शब्द 'प्रथम' (सर्वप्रथम) या अर्थात आहे. संक्षेपाने सांगितलेल्या चार अभिधम्मार्थांमध्ये सर्वप्रथम चित्ताचा सविस्तर निर्देश केला जातो, हाच येथे अर्थ आहे. याचे चार प्रकार (भेद) आहेत म्हणून हे 'चतुर्विध' आहे. परंतु ज्याअर्थी हे चार भूमींचे धर्म अनुक्रमाने श्रेष्ठ आहेत, म्हणून हीन, उत्कृष्ट, उत्कृष्टतर आणि उत्कृष्टतम अशा अनुक्रमाने त्यांचा सविस्तर निर्देश केला गेला आहे. त्यामध्ये, जे इच्छा करते (आकांक्षा करते) ते 'काम' म्हणजे कामतण्हा (काम-तृष्णा) होय. ती (कामतण्हा) येथे आलंबन करण्याच्या द्वारे संचार करते, म्हणून ते 'कामावचर' होय. किंवा ज्याची इच्छा केली जाते ते 'काम' म्हणजे अकरा प्रकारचा कामभव होय; त्यात जे बहुतांश करून संचार करते, ते 'कामावचर' होय. कारण बहुतांश करून संचार करणे अभिप्रेत असल्यामुळे, रूप आणि अरूप भवांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या देखील या चित्ताचे कामावचर असणे योग्य ठरते. किंवा कामभव हाच 'काम' होय, यात जे संचार करते ते 'कामावचर' होय; तेथे उत्पन्न होणाऱ्या चित्ताला देखील आश्रिताला आश्रयाच्या नावाने संबोधण्याच्या व्यवहाराने 'कामावचर' म्हटले जाते, जसे 'मंचक ओरडत आहेत' इत्यादी उदाहरणांमध्ये असते. अतिशय विस्तृत चर्चेची आता आवश्यकता नाही. आणि याविषयी संग्रह गाथा आहे— ‘‘ကာမောဝစရတီတျေတ္ထ, ကာမေဝစရတီတိ ဝါ; ဌာနူပစာရတော ဝါပိ, တံ ကာမာဝစရံ ဘဝေ’’တိ. यात काम (कामतण्हा) संचार करते म्हणून, किंवा कामात (कामभवात) संचार करते म्हणून, अथवा स्थान-उपचाराने (आश्रय-उपचाराने) देखील ते 'कामावचर' समजावे. ရူပါရူပါဝစရေသုပိ ဧသေဝ နယော ယထာရဟံ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဥပါဒါနက္ခန္ဓသင်္ခါတလောကတော ဥတ္တရတိ အနာသဝဘာဝေနာတိ လောကုတ္တရံ, မဂ္ဂစိတ္တံ. ဖလစိတ္တံ ပန တတော ဥတ္တိဏ္ဏန္တိ လောကုတ္တရံ. ဥဘယမ္ပိ ဝါ သဟ နိဗ္ဗာနေန လောကတော ဥတ္တရံ အဓိကံ ယထာဝုတ္တဂုဏဝသေနေဝါတိ လောကုတ္တရံ. रूपावचर आणि अरूपावचर या शब्दांमध्ये देखील हाच नियम योग्यतेनुसार जाणावा. उपादानस्कंध नावाच्या संखार-लोकातून जे अनासव (आसवरहित) भावाने पार जाते, ते 'लोकुत्तर' म्हणजे मग्गचित्त (मार्गचित्त) होय. परंतु फळचित्त त्यातून पार गेलेले आहे, म्हणून ते 'लोकुत्तर' होय. किंवा दोन्ही (मग्गचित्त व फळचित्त) देखील निब्बानासह, वर सांगितलेल्या गुणांच्या द्वारेच लोकापेक्षा श्रेष्ठ (अधिक) आहेत, म्हणून ते 'लोकुत्तर' होय. ဘူမိဘေဒစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. भूमी-भेदानुसार चित्ताचे वर्णन समाप्त झाले. အကုသလစိတ္တဝဏ္ဏနာ अकुशळ चित्ताचे वर्णन ၄. ဣမေသု ပန စတူသု စိတ္တေသု ကာမာဝစရစိတ္တဿ ကုသလာကုသလဝိပါကကိရိယဘေဒေန စတုဗ္ဗိဓဘာဝေပိ ပါပါဟေတုကဝဇ္ဇာနံ ဧကူနသဋ္ဌိယာ, ဧကနဝုတိယာ ဝါ စိတ္တာနံ သောဘနနာမေန ဝေါဟာရကရဏတ္ထံ ‘‘ပါပါဟေတုကမုတ္တာနိ [Pg.77] ‘သောဘနာနီ’တိ ဝုစ္စရေ’’တိ ဧဝံ ဝက္ခမာနနယဿ အနုရူပတော ပါပါဟေတုကေယေဝ ပဌမံ ဒဿေန္တော, တေသု စ ဘဝေသု ဂဟိတပဋိသန္ဓိကဿ သတ္တဿ အာဒိတော ဝီထိစိတ္တဝသေန လောဘသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါနမေဝ သမ္ဘဝတော တေယေဝ ပဌမံ ဒဿေတွာ တဒနန္တရံ ဒွိဟေတုကဘာဝသာမညေန ဒေါမနဿသဟဂတေ, တဒနန္တရံ ဧကဟေတုကေ စ ဒဿေတုံ ‘‘သောမနဿသဟဂတ’’န္တျာဒိနာ လောဘမူလံ တာဝ ဝေဒနာဒိဋ္ဌိသင်္ခါရဘေဒေန အဋ္ဌဓာ ဝိဘဇိတွာ ဒဿေတိ. ४. परंतु या張 चार प्रकारच्या चित्तांमध्ये कामावचर चित्ताचे कुशळ, अकुशळ, विपाक आणि क्रिया यांच्या भेदाने चार प्रकार होत असले, तरीही पाप (अकुशळ) आणि अहेतुक चित्ते वगळून उर्वरित एकोणसाठ (५९) किंवा एक्याण्णव (९१) चित्तांना 'शोभन' या नावाने संबोधण्याच्या व्यवहारासाठी— 'पाप आणि अहेतुक चित्तांपासून मुक्त असलेल्या चित्तांना शोभन म्हटले जाते'— अशा पुढे सांगण्यात येणाऱ्या नियमाच्या अनुरूप, पाप (अकुशळ) आणि अहेतुक चित्तांनाच सर्वप्रथम दाखवताना; आणि त्यामध्ये देखील भवांमध्ये प्रतिसंधी ग्रहण केलेल्या प्राण्याच्या सुरुवातीला वीथिचित्ताच्या रूपाने लोभसहगत चित्तोत्पादच उत्पन्न होत असल्यामुळे, त्यांनाच सर्वप्रथम दाखवून; त्यानंतर द्विहेतुक असण्याच्या समानतेमुळे दोमनस्ससहगत (द्वेषमूळक) चित्तांना, आणि त्यानंतर एकहेतुक (मोहमूळक) चित्तांना दाखवण्यासाठी, 'सोमनस्ससहगतं' इत्यादी शब्दांद्वारे सर्वप्रथम लोभमूळक चित्ताला वेदना, दृष्टी आणि संखार यांच्या भेदाने आठ प्रकारे विभागून दाखवतात. တတ္ထ သုန္ဒရံ မနော, တံ ဝါ ဧတဿ အတ္ထီတိ သုမနော, စိတ္တံ, တံသမင်္ဂိပုဂ္ဂလော ဝါ, တဿ ဘာဝေါ တသ္မိံ အဘိဓာနဗုဒ္ဓီနံ ပဝတ္တိဟေတုတာယာတိ သောမနဿံ, မာနသိကသုခဝေဒနာယေတံ အဓိဝစနံ, တေန သဟဂတံ ဧကုပ္ပာဒါဒိဝသေန သံသဋ္ဌံ, တေန သဟ ဧကုပ္ပာဒါဒိဘာဝံ ဂတန္တိ ဝါ သောမနဿသဟဂတံ. မိစ္ဆာ ပဿတီတိ ဒိဋ္ဌိ. သာမညဝစနဿပိ ဟိ အတ္ထပ္ပကရဏာဒိနာ ဝိသေသဝိသယတာ ဟောတီတိ ဣဓ မိစ္ဆာဒဿနမေဝ ‘‘ဒိဋ္ဌီ’’တိ ဝုစ္စတိ. ဒိဋ္ဌိယေဝ ဒိဋ္ဌိဂတံ ‘‘သင်္ခါရဂတံ ထာမဂတ’’န္တျာဒီသု ဝိယ ဂတ-သဒ္ဒဿ တဗ္ဘာဝဝုတ္တိတ္တာ. ဒွါသဋ္ဌိယာ ဝါ ဒိဋ္ဌီသု ဂတံ အန္တောဂတံ, ဒိဋ္ဌိယာ ဝါ ဂမနမတ္တံ န ဧတ္ထ ဂန္တဗ္ဗော အတ္တာဒိကော ကောစိ အတ္ထီတိ ဒိဋ္ဌိဂတံ, ‘‘ဣဒမေဝ သစ္စံ မောဃမည’’န္တိ ပဝတ္တော အတ္တတ္တနိယာဒိအဘိနိဝေသော, တေန သမံ ဧကုပ္ပာဒါဒီဟိ ပကာရေဟိ ယုတ္တန္တိ ဒိဋ္ဌိဂတသမ္ပယုတ္တံ. သင်္ခရောတိ စိတ္တံ တိက္ခဘာဝသင်္ခါတမဏ္ဍနဝိသေသေန သဇ္ဇေတိ, သင်္ခရီယတိ ဝါ တံ ဧတေန ယထာဝုတ္တနယေန သဇ္ဇီယတီတိ သင်္ခါရော, တတ္ထ တတ္ထ ကိစ္စေ သံသီဒမာနဿ စိတ္တဿ အနုဗလပ္ပဒါနဝသေန အတ္တနော ဝါ ပရေသံ ဝါ ပဝတ္တပုဗ္ဗပ္ပယောဂေါ, သော ပန အတ္တနော ပုဗ္ဗဘာဂပ္ပဝတ္တေ စိတ္တသန္တာနေ စေဝ ပရသန္တာနေ စ ပဝတ္တတီတိ တန္နိဗ္ဗတ္တိတော စိတ္တဿ တိက္ခဘာဝသင်္ခါတော ဝိသေသောဝိဓ သင်္ခါရော, သော ယဿ နတ္ထိ တံ အသင်္ခါရံ[Pg.78], တဒေဝ အသင်္ခါရိကံ. သင်္ခါရေန သဟိတံ သသင်္ခါရိကံ. တထာ စ ဝဒန္တိ – त्यामध्ये, सुंदर (चांगले) मन ते 'सुमन' (चित्त), किंवा ते सुंदर मन ज्याच्यापाशी आहे तो पुद्गळ 'सुमन' होय; त्याचा भाव म्हणजे 'सोमनस्स' (सौमनस्य) होय, कारण ते संज्ञा व बुद्धीच्या प्रवृत्तीचे कारण आहे. हे मानसिक सुख-वेदनेचे नाव आहे. त्याच्याशी सहगत म्हणजे एकोत्पाद (एकत्र उत्पन्न होणे) इत्यादींच्या द्वारे संसृष्ट (मिश्रित) झालेले, किंवा त्याच्यासह एकत्र उत्पन्न होण्याच्या अवस्थेला प्राप्त झालेले, म्हणून ते 'सोमनस्ससहगत' (सौमनस्य-सहगत) होय. जे मिथ्या (चुकीच्या पद्धतीने) पाहते, ती 'दिट्ठी' (दृष्टी/मिथ्यादृष्टी) होय. कारण सामान्य शब्दाची देखील अर्थ आणि प्रकरणादींच्या द्वारे विशेष विषयात प्रवृत्ती होते, म्हणून येथे मिथ्या दर्शनालाच 'दिट्ठी' म्हटले गेले आहे. दृष्टी हीच 'दिट्ठीगत' होय, जसे 'संखारगत', 'थामगत' इत्यादी शब्दांमध्ये 'गत' हा शब्द त्याच भावाचा वाचक असतो. किंवा बासष्ट (६२) मिथ्यादृष्टींमध्ये अंतर्भूत झालेले, किंवा दृष्टीची केवळ प्रवृत्ती (गमन मात्र), जेथे जाणण्याजोगा आत्मा इत्यादी कोणताही पदार्थ नाही, म्हणून ते 'दिट्ठीगत' होय. 'हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे' अशी प्रवृत्त होणारी आत्मा आणि आत्मीय (माझेपणा) इत्यादींविषयीची दृढ धारणा (अभिनिवेश) होय. त्याच्याशी समान अशा एकोत्पाद इत्यादी प्रकारांनी युक्त असलेले चित्त, म्हणून ते 'दिट्ठीगतसंपयुत्त' (दृष्टीगत-संप्रयुक्त) होय. जे चित्ताला तीक्ष्णता नावाच्या विशेष अलंकाराने सुसज्ज करते, याच्याद्वारे चित्त वर सांगितलेल्या पद्धतीने सुसज्ज केले जाते, तो 'संखार' (संस्कार) होय. त्या त्या कार्यात शिथिल (उत्साहहीन) होणाऱ्या चित्ताला अतिरिक्त बळ देण्याच्या द्वारे स्वतःचा किंवा इतरांचा प्रवृत्त झालेला पूर्व-प्रयोग (प्रयत्न) होय. परंतु तो पूर्व-प्रयोग स्वतःच्या पूर्वभागात प्रवृत्त झालेल्या चित्त-संततीमध्ये आणि दुसऱ्याच्या चित्त-संततीमध्ये देखील प्रवृत्त होतो, म्हणून त्याद्वारे उत्पन्न झालेला चित्ताचा तीक्ष्णता नावाचा विशेष गुणच येथे 'संखार' होय. तो संस्कार ज्या चित्ताला नाही, ते 'असंखार' होय, आणि तेच 'असंखारिक' (असंस्कारिक) होय. संस्काराने युक्त असलेले चित्त ते 'ससंखारिक' (ससंस्कारिक) होय. आणि असे म्हणतात— ‘‘ပုဗ္ဗပ္ပယောဂသမ္ဘူတော, ဝိသေသော စိတ္တသမ္ဘဝီ; သင်္ခါရော တံဝသေနေတ္ထ, ဟောတျာသင်္ခါရိကာဒိတာ’’တိ. पूर्व-प्रयोगापासून उत्पन्न झालेला आणि चित्तात उत्पन्न होणारा विशेष गुण म्हणजे 'संखार' होय; त्याच्या प्रभावाने येथे चित्ताला 'असंखारिक' किंवा 'ससंखारिक' इत्यादी संज्ञा प्राप्त होतात. အထ ဝါ ‘‘သသင်္ခါရိကံ အသင်္ခါရိက’’န္တိ စေတံ ကေဝလံ သင်္ခါရဿ ဘာဝါဘာဝံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ, န တဿ သဟပ္ပဝတ္တိသဗ္ဘာဝါဘာဝတောတိ ဘိန္နသန္တာနပ္ပဝတ္တိနောပိ သင်္ခါရဿ ဣဒမတ္ထိတာယ တံဝသေန နိဗ္ဗတ္တံ စိတ္တံ သင်္ခါရော အဿ အတ္ထီတိ သသင်္ခါရိကံ ‘‘သလောမကော သပက္ခကော’’တျာဒီသု ဝိယ သဟ-သဒ္ဒဿ ဝိဇ္ဇမာနတ္ထပရိဒီပနတော. တဗ္ဗိပရီတံ ပန တဒဘာဝတော ဝုတ္တနယေန အသင်္ခါရိကံ. ဒိဋ္ဌိဂတေန ဝိပ္ပယုတ္တံ ဝိသံသဋ္ဌန္တိ ဒိဋ္ဌိဂတဝိပ္ပယုတ္တံ. ဥပပတ္တိတော ယုတ္တိတော ဣက္ခတိ အနုဘဝတိ ဝေဒယမာနာပိ မဇ္ဈတ္တာကာရသဏ္ဌိတိယာတိ ဥပေက္ခာ. သုခဒုက္ခာနံ ဝါ ဥပေတာ ယုတ္တာ အဝိရုဒ္ဓါ ဣက္ခာ အနုဘဝနန္တိ ဥပေက္ခာ. သုခဒုက္ခာဝိရောဓိတာယ ဟေသာ တေသံ အနန္တရမ္ပိ ပဝတ္တတိ. ဥပေက္ခာသဟဂတန္တိ ဣဒံ ဝုတ္တနယမေဝ. किंवा 'ससंखारिक आणि असंखारिक' हे कथन केवळ संस्काराच्या असण्या-नसण्याला (अस्तित्वाला व अनस्तित्वाला) लक्षात घेऊन सांगितले आहे, त्याच्या सह-प्रवृत्तीच्या (एकत्र उत्पन्न होण्याच्या) अस्तित्वावर किंवा अनस्तित्वावर आधारित नाही. भिन्न संततीमध्ये प्रवृत्त होणाऱ्या देखील संस्काराच्या येथे असण्यामुळे, त्याच्या प्रभावाने उत्पन्न झालेल्या चित्ताला 'संस्कार याच्यापाशी आहे' या अर्थाने 'ससंखारिक' म्हटले जाते; जसे 'रोमयुक्त (केस असलेला)' किंवा 'पंखयुक्त (पंख असलेला)' इत्यादी उदाहरणांमध्ये 'सह' हा शब्द विद्यमानता (अस्तित्व) दर्शवण्यासाठी वापरला जातो. परंतु याच्या उलट असलेले चित्त, त्या संस्काराच्या अभावामुळे, वर सांगितलेल्या पद्धतीने 'असंखारिक' होय. दृष्टीगताशी विप्रयुक्त (विरहित) म्हणजे संसृष्ट (मिश्रित) नसलेले, म्हणून ते 'दिट्ठीगतविप्पयुत्त' (दृष्टीगत-विप्रयुक्त) होय. वेदन (अनुभव) करत असूनही जे योग्यतेने किंवा युक्तीने पाहते, अनुभवते आणि मध्यस्थ (तटस्थ) आकाराने स्थित राहते, ती 'उपेक्खा' (उपेक्षा) होय. किंवा सुख आणि दुःखाशी सुसंगत, युक्त आणि अविरुद्ध (अविरोधी) अशी जी पाहण्याची किंवा अनुभवण्याची क्रिया आहे, ती 'उपेक्खा' होय. सुख आणि दुःखाशी अविरोधी असल्यामुळे ती (उपेक्षा) त्यांच्या लगेच नंतर देखील प्रवृत्त होऊ शकते. 'उपेक्खासहगत' (उपेक्षा-सहगत) हा शब्द देखील वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावा. ကသ္မာ ပနေတ္ထ အညေသုပိ ဖဿာဒီသု သမ္ပယုတ္တဓမ္မေသု ဝိဇ္ဇမာနေသု သောမနဿသဟဂတာဒိဘာဝေါဝ ဝုတ္တောတိ? သောမနဿာဒီနမေဝ အသာဓာရဏဘာဝတော. ဖဿာဒယော ဟိ ကေစိ သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏာ, ကေစိ ကုသလာဒိသာဓာရဏာ, မောဟာဒယော စ သဗ္ဗာကုသလသာဓာရဏာတိ န တေဟိ သက္ကာ စိတ္တံ ဝိသေသေတုံ, သောမနဿာဒယော ပန ကတ္ထစိ စိတ္တေ ဟောန္တိ, ကတ္ထစိ န ဟောန္တီတိ ပါကဋောဝ တံဝသေန စိတ္တဿ ဝိသေသော. ကသ္မာ ပနေတေ ကတ္ထစိ ဟောန္တိ, ကတ္ထစိ န ဟောန္တီတိ? ကာရဏဿ သန္နိဟိတာသန္နိဟိတဘာဝတော. ကိံ ပန နေသံ ကာရဏန္တိ? ဝုစ္စတေသဘာဝတော, ပရိကပ္ပတော ဝါ ဟိ ဣဋ္ဌာရမ္မဏံ, သောမနဿပဋိသန္ဓိကတာ, အဂမ္ဘီရသဘာဝတာ စ ဣဓ သောမနဿဿ [Pg.79] ကာရဏံ, ဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တာရမ္မဏံ, ဥပေက္ခာပဋိသန္ဓိကတာ, ဂမ္ဘီရသဘာဝတာ စ ဥပေက္ခာယ, ဒိဋ္ဌိဝိပန္နပုဂ္ဂလသေဝနာ, သဿတုစ္ဆေဒါသယတာ စ ဒိဋ္ဌိယာ, ဗလဝဥတုဘောဇနာဒယော ပန ပစ္စယာ အသင်္ခါရိကဘာဝဿာတိ. တသ္မာ အတ္တနော အနုရူပကာရဏဝသေန နေသံ ဥပ္ပဇ္ဇနတော ကတ္ထစိ စိတ္တေယေဝ သမ္ဘဝေါတိ သက္ကာ ဧတေဟိ စိတ္တဿ ဝိသေသော ပညာပေတုန္တိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ နေသံ သတိပိ မောဟဟေတုကဘာဝေ လောဘသဟဂတဘာဝေါဝ နိဂမနေ ဝုတ္တော. येथे विचारले जाऊ शकते की, फस्स (स्पर्श) इत्यादी इतर सम्पयुक्त धर्म (सहयोगी मानसिक घटक) विद्यमान असतानाही, केवळ ‘सोमनस्यसहगत’ (आनंदाने युक्त) इत्यादी अवस्थांचाच उल्लेख का केला आहे? याचे उत्तर असे आहे की, सोमनस्य इत्यादी धर्मच असाधारण (विशिष्ट) आहेत. कारण फस्स इत्यादी काही चैतसिक सर्वचित्तसाधारण (सर्व चित्तांमध्ये असणारे) आहेत, काही कुशल-साधारण आहेत, आणि मोह इत्यादी सर्व अकुशल-साधारण आहेत; त्यामुळे त्यांच्याद्वारे चित्ताचे वर्गीकरण किंवा विशेषीकरण करणे शक्य नाही. याउलट, सोमनस्य इत्यादी धर्म काही चित्तांमध्ये असतात तर काहींमध्ये नसतात, त्यामुळे त्यांच्या आधारे चित्ताचा विशेष भेद स्पष्टपणे समजतो. परंतु, हे धर्म काही चित्तांमध्ये का असतात आणि काहींमध्ये का नसतात? याचे कारण म्हणजे कारणाची उपस्थिती किंवा अनुपस्थिती (जवळ असणे किंवा नसणे). मग त्यांचे कारण काय आहे? ते सांगितले जात आहे: स्वभावतः किंवा कल्पनेने इष्ट वाटणारे आलंबन (विषय), सोमनस्य-प्रतिसंधी असणे आणि गंभीर नसलेला (उथळ) स्वभाव असणे, हे येथे सोमनस्याचे (आनंदाचे) कारण आहे. इष्ट-मध्यम आलंबन, उपेक्षा-प्रतिसंधी असणे आणि गंभीर स्वभाव असणे, हे उपेक्षेचे कारण आहे. चुकीची दृष्टी (मिच्छादिट्ठी) असलेल्या व्यक्तींची संगत करणे आणि शाश्वत किंवा उच्छेद दृष्टीचा आशय असणे, हे दिट्ठीचे (मिथ्या दृष्टीचे) कारण आहे. तसेच, अनुकूल ऋतू, भोजन इत्यादी बलवान प्रत्यय (कारण) हे असंस्कारिक (असंखारिक) भावाचे कारण आहेत. म्हणूनच, आपापल्या अनुरूप कारणांमुळे ते विशिष्ट चित्तांमध्येच उत्पन्न होतात, आणि त्यांच्याद्वारे चित्ताचा विशेष भेद स्पष्ट करता येतो. असे असल्यामुळेच, या चित्तांमध्ये मोह हे कारण (हेतू) असूनही, निष्कर्षात त्यांना केवळ ‘लोभसहगत’ (लोभाने युक्त) असेच म्हटले गेले आहे. ဣမေသံ ပန အဋ္ဌန္နမ္ပိ အယမုပ္ပတ္တိက္ကမော ဝေဒိတဗ္ဗော. ယဒါ ဟိ ‘‘နတ္ထိ ကာမေသု အာဒီနဝေါ’’တျာဒိနာ နယေန မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိံ ပုရက္ခတွာ ဟဋ္ဌတုဋ္ဌော ကာမေ ဝါ ပရိဘုဉ္ဇတိ, ဒိဋ္ဌမင်္ဂလာဒီနိ ဝါ သာရတော ပစ္စေတိ သဘာဝတိက္ခေနေဝ အနုဿာဟိတေန စိတ္တေန, တဒါ ပဌမံ အကုသလစိတ္တမုပ္ပဇ္ဇတိ. ယဒါ ပန မန္ဒေန သမုဿာဟိတေန စိတ္တေန, တဒါ ဒုတိယံ. ယဒါ ပန မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိံ အပုရက္ခတွာ ကေဝလံ ဟဋ္ဌတုဋ္ဌော မေထုနံ ဝါ သေဝတိ, ပရသမ္ပတ္တိံ ဝါ အဘိဇ္ဈာယတိ, ပရဘဏ္ဍံ ဝါ ဟရတိ သဘာဝတိက္ခေနေဝ အနုဿာဟိတေန စိတ္တေန, တဒါ တတိယံ. ယဒါ ပန မန္ဒေန သမုဿာဟိတေန စိတ္တေန, တဒါ စတုတ္ထံ. ယဒါ ပန ကာမာနံ ဝါ အသမ္ပတ္တိံ အာဂမ္မ, အညေသံ ဝါ သောမနဿဟေတူနံ အဘာဝေန စတူသုပိ ဝိကပ္ပေသု သောမနဿရဟိတာ ဟောန္တိ, တဒါ သေသာနိ စတ္တာရိ ဥပေက္ခာသဟဂတာနိ ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ. အဋ္ဌပီတိ ပိ-သဒ္ဒေါ သမ္ပိဏ္ဍနတ္ထော, တေန ဝက္ခမာနနယေန အကုသလကမ္မပထေသု နေသံ လဗ္ဘမာနကမ္မပထာနုရူပတော ပဝတ္တိဘေဒံ ကာလဒေသသန္တာနာရမ္မဏာဒိဘေဒေန အနေကဝိဓတမ္ပိ သင်္ဂဏှာတိ. या आठही चित्तांच्या उत्पत्तीचा क्रम पुढीलप्रमाणे समजून घ्यावा. जेव्हा एखादी व्यक्ती ‘कामभोगांमध्ये कोणताही दोष नाही’ अशा चुकीच्या विचाराने मिथ्या दृष्टीला (मिच्छादिट्ठी) पुढे करून, अत्यंत हर्षित व संतुष्ट होऊन कामभोगांचा उपभोग घेते, किंवा दृष्टी-मंगळ (शुभ शकुन) इत्यादींनाच सत्य मानून त्यावर विश्वास ठेवते, आणि हे सर्व ती स्वतःच्या तीव्र व कोणाच्याही प्रेरणेशिवाय (असंखारिक) चित्ताने करते, तेव्हा पहिले अकुशल चित्त उत्पन्न होते. परंतु, जेव्हा हेच कार्य मंद आणि दुसऱ्याच्या किंवा स्वतःच्या प्रेरणेने (ससंखारिक) युक्त चित्ताने केले जाते, तेव्हा दुसरे चित्त उत्पन्न होते. जेव्हा मिथ्या दृष्टीला पुढे न करता, केवळ हर्षित व संतुष्ट होऊन मैथुनधर्माचे सेवन केले जाते, किंवा दुसऱ्याच्या संपत्तीची अभिलाषा धरली जाते, किंवा दुसऱ्याची वस्तू चोरली जाते, आणि हे स्वतःच्या तीव्र व कोणाच्याही प्रेरणेशिवाय (असंखारिक) चित्ताने केले जाते, तेव्हा तिसरे चित्त उत्पन्न होते. परंतु, जेव्हा हेच कार्य मंद आणि प्रेरणेने (ससंखारिक) युक्त चित्ताने केले जाते, तेव्हा चौथे चित्त उत्पन्न होते. जेव्हा कामभोगांची अप्राप्ती झाल्यामुळे किंवा सोमनस्याच्या (आनंदाच्या) इतर कारणांच्या अभावामुळे, वरील चारही प्रकारांमध्ये सोमनस्य राहत नाही, तेव्हा उर्वरित चार उपेक्षासहगत (तटस्थ भावनेने युक्त) चित्ते उत्पन्न होतात. ‘अठ्ठपि’ (आठही) या शब्दातील ‘पि’ हा शब्द समुच्चय दर्शवणारा आहे. त्याद्वारे, पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या पद्धतीने, अकुशल कर्मपथांमध्ये त्यांच्या प्राप्तीनुसार होणारे प्रवृत्तीचे भेद, तसेच काळ, देश, संतान (चित्तपरंपरा) आणि आलंबन (विषय) इत्यादींच्या भेदांमुळे होणारे अनेकविध प्रकार समाविष्ट केले जातात. ၅. ဒုဋ္ဌု မနော, တံ ဝါ ဧတဿာတိ ဒုမ္မနော, တဿ ဘာဝေါ ဒေါမနဿံ, မာနသိကဒုက္ခဝေဒနာယေတံ အဓိဝစနံ, တေန [Pg.80] သဟဂတန္တိ ဒေါမနဿသဟဂတံ. အာရမ္မဏေ ပဋိဟညတီတိ ပဋိဃော, ဒေါသော. စဏ္ဍိက္ကသဘာဝတာယ ဟေသ အာရမ္မဏံ ပဋိဟနန္တော ဝိယ ပဝတ္တတိ. ဒေါမနဿသဟဂတဿ ဝေဒနာဝသေန အဘေဒေပိ အသာဓာရဏဓမ္မဝသေန စိတ္တဿ ဥပလက္ခဏတ္ထံ ဒေါမနဿဂ္ဂဟဏံ, ပဋိဃသမ္ပယုတ္တဘာဝေါ ပန ဥဘိန္နံ ဧကန္တသဟစာရိတာ ဒဿနတ္ထံ ဝုတ္တောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဒေါမနဿဉ္စေတ္ထ အနိဋ္ဌာရမ္မဏာနုဘဝနလက္ခဏော ဝေဒနာက္ခန္ဓပရိယာပန္နော ဧကော ဓမ္မော, ပဋိဃော စဏ္ဍိက္ကသဘာဝေါ သင်္ခါရက္ခန္ဓပရိယာပန္နော ဧကော ဓမ္မောတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ဧတ္ထ စ ယံ ကိဉ္စိ အနိဋ္ဌာရမ္မဏံ, နဝဝိဓအာဃာတဝတ္ထူနိ စ ဒေါမနဿဿ ကာရဏံ, ပဋိဃဿ ကာရဏဉ္စာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဒွိန္နံ ပန နေသံ စိတ္တာနံ ပါဏာတိပါတာဒီသု တိက္ခမန္ဒပ္ပဝတ္တိကာလေ ဥပ္ပတ္တိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧတ္ထာပိ နိဂမနေ ပိ-သဒ္ဒဿ အတ္ထော ဝုတ္တနယာနုသာရေန ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ५. दुष्ट (अप्रिय) मन म्हणजे ‘दुम्मन’ (दुर्मन), किंवा ज्याचे मन दुष्ट झाले आहे तो ‘दुम्मन’ होय. त्याचा भाव म्हणजे ‘दौमनस्य’ (डोमनस्स) होय. हे मानसिक दुःख-वेदनेचेच नाव आहे. त्याच्याशी युक्त असणारे ते ‘दौमनस्यसहगत’ (डोमनस्ससहगत) चित्त होय. आलंबनावर (विषयावर) आदळणे किंवा प्रतिघात करणे म्हणजे ‘प्रतिघ’ (पटिघ) म्हणजेच ‘द्वेष’ (दोस) होय. क्रूर किंवा उग्र स्वभावामुळे हा द्वेष आलंबनावर आदळल्यासारखा प्रवृत्त होतो. दौमनस्यसहगत चित्तामध्ये वेदनेच्या दृष्टीने कोणताही भेद नसला, तरी इतर चित्तांमध्ये नसलेल्या असाधारण धर्माच्या आधारे या चित्ताची ओळख पटवण्यासाठी ‘दौमनस्य’ हा शब्द वापरला आहे. तर ‘प्रतिघयुक्त’ (पटिघसम्पयुत्त) ही संज्ञा या दोन्ही अवस्थांच्या (दौमनस्य आणि प्रतिघ यांच्या) अनिवार्य सहअस्तित्वाचा (एकत्र असण्याचा) नियम दर्शवण्यासाठी वापरली आहे, असे समजून घ्यावे. येथे दौमनस्य हा अनिष्ट आलंबनाचा अनुभव घेण्याच्या लक्षणाने युक्त असलेला, वेदनास्कंधात समाविष्ट असणारा एक धर्म आहे; तर प्रतिघ हा क्रूर स्वभावाचा, संस्कारस्कंधात समाविष्ट असणारा एक धर्म आहे; हाच या दोघांमधील फरक आहे. तसेच, येथे कोणतेही अनिष्ट आलंबन आणि नऊ प्रकारच्या आघातवस्तू (क्रोधाची कारणे) हे दौमनस्य आणि प्रतिघ यांचे कारण आहे, असे जाणावे. या दोन्ही चित्तांची उत्पत्ती प्राणातिपात (जीवहिंसा) इत्यादी कर्मांच्या वेळी, तीव्र किंवा मंद प्रवृत्तीच्या काळात कशी होते, हे समजून घ्यावे. येथेही निष्कर्षातील ‘पि’ या शब्दाचा अर्थ आधी सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच समजून घ्यावा. ၆. သဘာဝံ ဝိစိနန္တော တာယ ကိစ္ဆတိ ကိလမတီတိ ဝိစိကိစ္ဆာ. အထ ဝါ စိကိစ္ဆိတုံ ဒုက္ကရတာယ ဝိဂတာ စိကိစ္ဆာ ဉာဏပ္ပဋိကာရော ဣမိဿာတိ ဝိစိကိစ္ဆာ, တာယ သမ္ပယုတ္တံ ဝိစိကိစ္ဆာသမ္ပယုတ္တံ. ဥဒ္ဓတဿ ဘာဝေါ ဥဒ္ဓစ္စံ. ဥဒ္ဓစ္စဿ သဗ္ဗာကုသလသာဓာရဏဘာဝေပိ ဣဓ သမ္ပယုတ္တဓမ္မေသု ပဓာနံ ဟုတွာ ပဝတ္တတီတိ ဣဒမေဝ တေန ဝိသေသေတွာ ဝုတ္တံ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဓမ္မုဒ္ဒေသပါဠိယံ သေသာကုသလေသု ဥဒ္ဓစ္စံ ယေဝါပနကဝသေန ဝုတ္တံ, ဣဓ ပန ‘‘ဥဒ္ဓစ္စံ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’’တိ သရူပေနေဝ ဒေသိတံ. ဟောန္တိ စေတ္ထ – ६. वास्तविक स्वभावाचा शोध घेताना ज्याच्यामुळे माणूस थकून जातो किंवा क्लेश पावतो, ती ‘विचिकित्सा’ (संशय) होय. अथवा, जिचे निवारण (उपचार) करणे अत्यंत कठीण असल्यामुळे, जिच्यामध्ये ज्ञानरूपी उपचाराचा अभाव असतो, ती ‘विचिकित्सा’ होय. तिच्याशी युक्त असणारे चित्त म्हणजे ‘विचिकित्सा-सम्पयुक्त’ चित्त होय. चंचल किंवा अस्वस्थ मनाचा भाव म्हणजे ‘औद्धत्य’ (उद्धच्च - मानसिक विखुरलेपण) होय. औद्धत्य हे सर्व अकुशल चित्तांमध्ये साधारण (विद्यमान) असले, तरी या शेवटच्या अकुशल चित्तामध्ये ते सम्पयुक्त धर्मांमध्ये प्रधान (मुख्य) होऊन प्रवृत्त होते; म्हणूनच या चित्ताला औद्धत्याने विशेषित करून सांगितले आहे. असे असल्यामुळेच, धम्मुद्देस पाळीमध्ये इतर अकुशल चित्तांमध्ये औद्धत्याचा उल्लेख ‘येवापनक’ (इतर सहयोगी धर्म) म्हणून केला आहे, परंतु येथे मात्र ‘औद्धत्य उत्पन्न होते’ असे त्याच्या मूळ स्वरूपातच उपदेशिले आहे. या संदर्भात खालील गाथा आहेत – ‘‘သဗ္ဗာကုသလယုတ္တမ္ပိ, ဥဒ္ဓစ္စံ အန္တမာနသေ; ဗလဝံ ဣတိ တံယေဝ, ဝုတ္တမုဒ္ဓစ္စယောဂတော. जरी औद्धत्य (उद्धच्च) हे सर्व अकुशल चित्तांशी युक्त असते, तरीही शेवटच्या अकुशल चित्तामध्ये ते अत्यंत बलवान असते. म्हणूनच, केवळ त्याच चित्ताला ‘औद्धत्ययुक्त’ (उद्धच्चसम्पयुत्त) असे म्हटले गेले आहे. ‘‘တေနေဝ ဟိ မုနိန္ဒေန, ယေဝါပနကနာမတော; ဝတွာ သေသေသု ဧတ္ထေဝ, တံ သရူပေန ဒေသိတ’’န္တိ. याच कारणामुळे मुनींद्र (बुद्ध) यांनी इतर अकुशल चित्तांमध्ये त्याचा उल्लेख ‘येवापनक’ (इतर सहयोगी धर्म) या नावाने करून, केवळ याच चित्तामध्ये त्याचे मूळ स्वरूपात स्पष्टपणे प्रतिपादन केले आहे. ဣမာနိ [Pg.81] ပန ဒွေ စိတ္တာနိ မူလန္တရဝိရဟတော အတိသမ္မူဠှတာယ, သံသပ္ပနဝိက္ခိပနဝသေန ပဝတ္တဝိစိကိစ္ဆုဒ္ဓစ္စသမာယောဂေန စဉ္စလတာယ စ သဗ္ဗတ္ထာပိ ရဇ္ဇနဒုဿနရဟိတာနိ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ ပဝတ္တန္တိ, တတောယေဝ စ သဘာဝတိက္ခတာယ ဥဿာဟေတဗ္ဗတာယ အဘာဝတော သင်္ခါရဘေဒေါပိ နေသံ နတ္ထိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ – परंतु, ही दोन्ही (मोहमुळ) चित्ते इतर मूळ हेतूंच्या (लोभ आणि द्वेष यांच्या) अभावामुळे अत्यंत मूढ (भ्रमित) असतात. संशय (विचिकित्सा) आणि औद्धत्य (उद्धच्च) यांच्या संयोगामुळे ती चंचल व अस्थिर असतात. त्यामुळे ती सर्वच आलंबनांमध्ये राग (आसक्ती) आणि द्वेष (राग) यांपासून रहित असतात, आणि केवळ उपेक्षासहगत (तटस्थ भावनेने युक्त) म्हणूनच प्रवृत्त होतात. याच कारणामुळे, त्यांच्यामध्ये स्वाभाविक प्रखरता किंवा प्रेरणेची (उत्साहाची) शक्यता नसल्याने, त्यांच्यात संस्कारांच्या आधारे (असंखारिक किंवा ससंखारिक असा) कोणताही भेद नसतो. या संदर्भात खालील गाथा आहेत – ‘‘မူဠှတ္တာ စေဝ သံသပ္ပ-ဝိက္ခေပါ စေကဟေတုကံ; သောပေက္ခံ သဗ္ဗဒါ နော စ, ဘိန္နံ သင်္ခါရဘေဒတော. अत्यंत मूढ असल्यामुळे आणि संशय व औद्धत्यामुळे अस्थिर असल्यामुळे, हे एक-हेतुक (केवळ मोह हेच एक मूळ असलेले) चित्त नेहमी उपेक्षेने युक्त असते, आणि संस्कारांच्या भेदाने (असंखारिक-ससंखारिक रूपात) कधीही विभागले जात नाही. ‘‘န ဟိ တဿ သဘာဝေန, တိက္ခတုဿာဟနီယတာ; အတ္ထိ သံသပ္ပမာနဿ, ဝိက္ခိပန္တဿ သဗ္ဗဒါ’’တိ. कारण, जे चित्त नेहमी संशयाने डळमळीत असते आणि औद्धत्याने विखुरलेले असते, त्या चित्तामध्ये स्वाभाविकपणे प्रखरता किंवा प्रेरणा घेण्याची क्षमता कधीही नसते. မောဟေန မုယှန္တိ အတိသယေန မုယှန္တိ မူလန္တရဝိရဟတောတိ မောမူဟာနိ. इतर मूळ हेतूंच्या (लोभ व द्वेष यांच्या) अभावामुळे जे मोहाने मोहित होतात, अत्यंत भ्रमित होतात, त्यांना ‘मोमूहाने’ (अतिशय मूढ चित्ते) असे म्हणतात. ၇. ဣစ္စေဝန္တျာဒိ ယထာဝုတ္တာနံ ဒွါဒသာကုသလစိတ္တာနံ နိဂမနံ. တတ္ထ ဣတိ-သဒ္ဒေါ ဝစနဝစနီယသမုဒါယနိဒဿနတ္ထော. ဧဝံ-သဒ္ဒေါ ဝစနဝစနီယပဋိပါဋိသန္ဒဿနတ္ထော. နိပါတသမုဒါယော ဝါ ဧသ ဝစနဝစနီယနိဂမနာရမ္ဘေ. ဣစ္စေဝံ ယထာဝုတ္တနယေန သဗ္ဗထာပိ သောမနဿုပေက္ခာဒိဋ္ဌိသမ္ပယောဂါဒိနာ ပဋိဃသမ္ပယောဂါဒိနာ ဝိစိကိစ္ဆုဒ္ဓစ္စယောဂေနာတိ သဗ္ဗေနာပိ သမ္ပယောဂါဒိအာကာရေန ဒွါဒသ အကုသလစိတ္တာနိ သမတ္တာနိ ပရိနိဋ္ဌိတာနိ, သင်္ဂဟေတွာ ဝါ အတ္တာနိ ဂဟိတာနိ, ဝုတ္တာနီတျတ္ထော. တတ္ထ ကုသလပဋိပက္ခာနိ အကုသလာနိ မိတ္တပ္ပဋိပက္ခော အမိတ္တော ဝိယ, ပဋိပက္ခဘာဝေါ စ ကုသလာကုသလာနံ ယထာက္ကမံ ပဟာယကပဟာတဗ္ဗဘာဝေန ဝေဒိတဗ္ဗော. ७. "इच्चेवं" (इति + एवं) इत्यादी वाक्य हे आधी सांगितलेल्या बारा अकुशल चित्तांचा निष्कर्ष (निगमन) आहे. त्यामध्ये 'इति' हा शब्द शब्दसमूह आणि अर्थसमूह दर्शवण्यासाठी आहे. 'एवं' हा शब्द शब्दक्रम आणि अर्थक्रम चांगल्या प्रकारे दर्शवण्यासाठी आहे. किंवा हा 'इच्चेवं' शब्द शब्द आणि अर्थांच्या निष्कर्षाच्या आरंभी वापरला जाणारा निपात-समूह (अव्यय-समूह) आहे. 'इच्चेवं' म्हणजे आधी सांगितलेल्या पद्धतीने सर्व प्रकारे - सोमनस्य, उपेक्षा, दृष्टी-संप्रयुक्त इत्यादी; प्रतिघ-संप्रयुक्त इत्यादी; आणि विचिकित्सा व उद्धच्च यांच्या संयोगाने - अशा सर्व संप्रयोग इत्यादी प्रकारांनी बारा अकुशल चित्ते समाप्त (पूर्ण) झाली आहेत, किंवा एकत्रित करून ग्रहण केली आहेत, असा अर्थ आहे. त्यामध्ये, कुशलाचे जे विरोधी आहेत ते 'अकुशल' होत, जसे मित्राचा विरोधी हा 'अमित्र' (शत्रू) असतो. आणि कुशल व अकुशल यांचा हा विरोधभाव अनुक्रमे प्रहाण करणारा (नष्ट करणारा) आणि प्रहाण केला जाणारा (नष्ट होणारा) या भावाने समजून घ्यावा. ၈. အဋ္ဌဓာတျာဒိ သင်္ဂဟဂါထာ. လောဘော စ သော သုပ္ပတိဋ္ဌိတဘာဝသာဓနေန မူလသဒိသတ္တာ မူလဉ္စ, ကံ ဧတေသန္တိ လောဘမူလာနိ စိတ္တာနိ ဝေဒနာဒိဘေဒတော အဋ္ဌဓာ သိယုံ[Pg.82]. တထာ ဒေါသမူလာနိ သင်္ခါရဘေဒတော ဒွိဓာ. မောဟမူလာနိ သုဒ္ဓေါ မောဟောယေဝ မူလမေတေသန္တိ မောဟမူလသင်္ခါတာနိ သမ္ပယောဂဘေဒတော ဒွေ စာတိ အကုသလာ ဒွါဒသ သိယုန္တျတ္ထော. ८. "अट्ठधा" इत्यादी गाथा ही संग्रह-गाथा (संक्षिप्त गाथा) आहे. लोभ आणि तो (लोभ) संप्रयुक्त धर्मांना चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करत असल्यामुळे आणि मुख्य मुळासारखा (वृक्षाच्या मुळासारखा) असल्यामुळे 'मूल' (मूळ) आहे. ज्यांचे मूळ लोभ आहे, ती 'लोभमूलक' चित्ते वेदना इत्यादींच्या भेदाने आठ प्रकारची होतात. त्याचप्रमाणे, द्वेषमूलक चित्ते संस्कारांच्या भेदाने दोन प्रकारची होतात. मोहमुलांमध्ये, केवळ शुद्ध मोहच ज्यांचे मूळ आहे, ती 'मोहमूलक' म्हणून ओळखली जाणारी चित्ते संप्रयोगाच्या (संयोगाच्या) भेदाने दोन प्रकारची होतात. अशा प्रकारे अकुशल चित्ते बारा होतात, असा अर्थ आहे. အကုသလစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अकुशल चित्तांचे वर्णन समाप्त झाले. အဟေတုကစိတ္တဝဏ္ဏနာ अहेतुक चित्तांचे वर्णन. ၉. ဧဝံ မူလဘေဒတော တိဝိဓမ္ပိ အကုသလံ သမ္ပယောဂါဒိဘေဒတော ဒွါဒသဓာ ဝိဘဇိတွာ ဣဒါနိ အဟေတုကစိတ္တာနိ နိဒ္ဒိသန္တော တေသံ အကုသလဝိပါကာဒိဝသေန တိဝိဓဘာဝေပိ အကုသလာနန္တရံ အကုသလဝိပါကေယေဝ စက္ခာဒိနိဿယသမ္ပဋိစ္ဆနာဒိကိစ္စဘေဒေန သတ္တဓာ ဝိဘဇိတုံ ‘‘ဥပေက္ခာသဟဂတံ စက္ခုဝိညာဏ’’န္တျာဒိမာဟ. တတ္ထ စက္ခတိ ဝိညာဏာဓိဋ္ဌိတံ ဟုတွာ သမဝိသမံ အာစိက္ခန္တံ ဝိယ ဟောတီတိ စက္ခု. အထ ဝါ စက္ခတိ ရူပံ အဿာဒေန္တံ ဝိယ ဟောတီတိ စက္ခု. စက္ခတီတိ ဟိ အယံ သဒ္ဒေါ ‘‘မဓုံ စက္ခတိ, ဗျဉ္ဇနံ စက္ခတီ’’တျာဒီသု ဝိယ အဿာဒနတ္ထော ဟောတိ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘စက္ခုံ ခေါ ပန, မာဂဏ္ဍိယ, ရူပါရာမံ ရူပရတံ ရူပသမ္မုဒိတ’’န္တျာဒိ. ယဒိ ဧဝံ ‘‘သောတံ ခေါ, မာဂဏ္ဍိယ, သဒ္ဒါရာမံ သဒ္ဒရတံ သဒ္ဒသမ္မုဒိတ’’န္တျာဒိဝစနတော (မ. နိ. ၂.၂၀၉) သောတာဒီနမ္ပိ သဒ္ဒါဒိအဿာဒနံ အတ္ထီတိ တေသမ္ပိ စက္ခုသဒ္ဒါဘိဓေယျတာ အာပဇ္ဇေယျာတိ? နာပဇ္ဇတိ နိရုဠှတ္တာ, နိရုဠှော ဟေသ စက္ခု-သဒ္ဒေါ ဒဋ္ဌုကာမတာနိဒါနကမ္မဇဘူတပ္ပသာဒလက္ခဏေ စက္ခုပ္ပသာဒေယေဝ မယူရာဒိသဒ္ဒါ ဝိယ သကုဏဝိသေသာဒီသု, စက္ခုနာ သဟဝုတ္တိယာ ပန ဘမုကဋ္ဌိပရိစ္ဆိန္နော မံသပိဏ္ဍောပိ ‘‘စက္ခူ’’တိ ဝုစ္စတိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန အနေကတ္ထတ္တာ ဓာတူနံ စက္ခတိ-သဒ္ဒဿ ဝိဘာဝနတ္ထတာပိ သမ္ဘဝတီတိ ‘‘စက္ခတိ ရူပံ ဝိဘာဝေတီတိ စက္ခူ’’တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၅၁၀) ဝုတ္တံ. စက္ခုသ္မိံ [Pg.83] ဝိညာဏံ တန္နိဿိတတ္ထာတိ စက္ခုဝိညာဏံ. တထာ ဟေတံ ‘‘စက္ခုသန္နိဿိတရူပဝိဇာနနလက္ခဏ’’န္တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၃၁; ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၄၅၄) ဝုတ္တံ. ९. अशा प्रकारे मुळांच्या भेदाने तीन प्रकारच्या अकुशल चित्तांचे संप्रयोग इत्यादींच्या भेदाने बारा प्रकारे वर्गीकरण करून, आता अहेतुक चित्तांचे निर्देश (स्पष्टीकरण) करताना, त्यांचे अकुशल विपाक इत्यादींच्या द्वारे तीन प्रकार असूनही, अकुशल चित्तानंतर लगेचच अकुशल विपाक चित्तांनाच, चक्षु इत्यादी आश्रय (इंद्रिय) आणि संप्रतीच्छन (स्वीकारणे) इत्यादी कृत्यांच्या भेदाने सात प्रकारे विभाजित करण्यासाठी, "उपेक्षासहगत चक्षुविज्ञान" इत्यादी वाक्य आचार्यांनी म्हटले आहे. त्यामध्ये, जे विज्ञानाचे अधिष्ठान (आश्रय) होऊन सम आणि विषम (चांगल्या आणि वाईट) विषयांना जणू काही सांगते, म्हणून ते 'चक्षु' (डोळा) होय. किंवा, जे रूपाचा आस्वाद घेत असल्यासारखे होते, म्हणून ते 'चक्षु' होय. कारण 'चक्खति' हा शब्द "मधुं चक्खति" (मधाचा आस्वाद घेतो), "व्यंजनं चक्खति" (व्यंजनाचा आस्वाद घेतो) इत्यादी प्रयोगांप्रमाणे आस्वाद घेण्याच्या अर्थात वापरला जातो. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - "हे मागंडिय! चक्षु हा रूपाच्या ठिकाणी रमणारा, रूपात मग्न असणारा आणि रूपाने अत्यंत हर्षित होणारा आहे" इत्यादी. जर असे असेल, तर "हे मागंडिय! श्रोत्र (कान) हा शब्दाच्या ठिकाणी रमणारा..." इत्यादी वचनावरून श्रोत्र इत्यादींनाही शब्दादी विषयांचा आस्वाद घेणे शक्य असल्यामुळे, त्यांनाही 'चक्षु' या शब्दाने संबोधले जावे, असा प्रसंग येईल काय? असा प्रसंग येत नाही, कारण हा शब्द रूढ (निरूढ) झाला आहे. कारण हा 'चक्षु' शब्द पाहण्याच्या इच्छेमुळे (तण्हा) निर्माण झालेल्या कर्मापासून उत्पन्न झालेल्या महाभूतांच्या प्रसन्नतेचे (स्वच्छतेचे) लक्षण असलेल्या 'चक्षुप्रसादा'च्या (दृष्टी-इंद्रियाच्या) ठिकाणीच रूढ झाला आहे; जसे 'मयूर' इत्यादी शब्द विशिष्ट पक्ष्यांच्या (मोराच्या) ठिकाणी रूढ आहेत. परंतु, चक्षुप्रसादाशी सहवर्ती (एकत्र) असल्यामुळे, भुवयांच्या हाडांनी वेढलेल्या मांसाच्या गोळ्यालाही (डोळ्याला) 'चक्षु' असे म्हटले जाते. परंतु अट्ठकथेमध्ये, धातूंचे अनेक अर्थ असल्यामुळे 'चक्खति' या शब्दाचा अर्थ 'स्पष्ट करणे' (विभावन) असाही संभवतो, म्हणून "जे रूपाला स्पष्ट करते ते चक्षु होय" असे म्हटले आहे. चक्षूच्या ठिकाणी असणारे विज्ञान किंवा त्यावर आश्रित असणारे विज्ञान म्हणजे 'चक्षुविज्ञान' होय. कारण तसे (अट्ठकथेत) म्हटले आहे - "चक्षूवर आश्रित राहून रूपाचे विशेष रूपाने जाणणे हे याचे लक्षण आहे". ဧဝံ သောတဝိညာဏာဒီသုပိ ယထာရဟံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ‘‘တထာ’’တိ ဣမိနာ ဥပေက္ခာသဟဂတဘာဝံ အတိဒိသတိ. ဝိညာဏာဓိဋ္ဌိတံ ဟုတွာ သုဏာတီတိ သောတံ. ဃာယတိ ဂန္ဓောပါဒါနံ ကရောတီတိ ဃာနံ. ဇီဝိတနိမိတ္တံ ရသော ဇီဝိတံ, တံ အဝှာယတိ တသ္မိံ နိန္နတာယာတိ ဇိဝှာ နိရုတ္တိနယေန. ကုစ္ဆိတာနံ ပါပဓမ္မာနံ အာယော ပဝတ္တိဋ္ဌာနန္တိ ကာယော. ကာယိန္ဒြိယဉှိ ဖောဋ္ဌဗ္ဗဂ္ဂဟဏသဘာဝတ္တာ တဒဿာဒဝသပ္ပဝတ္တာနံ, တမ္မူလကာနဉ္စ ပါပဓမ္မာနံ ဝိသေသကာရဏန္တိ တေသံ ပဝတ္တိဋ္ဌာနံ ဝိယ ဂယှတိ. သသမ္ဘာရကာယော ဝါ ကုစ္ဆိတာနံ ကေသာဒီနံ အာယောတိ ကာယော. တံသဟစရိတတ္တာ ပန ပသာဒကာယောပိ တထာ ဝုစ္စတိ. ဒု ကုစ္ဆိတံ ဟုတွာ ခနတိ ကာယိကသုခံ, ဒုက္ခမန္တိ ဝါ ဒုက္ခံ. ဒုက္ကရမောကာသဒါနံ ဧတဿာတိ ဒုက္ခ’’န္တိပိ အပရေ. ပဉ္စဝိညာဏဂ္ဂဟိတံ ရူပါဒိအာရမ္မဏံ သမ္ပဋိစ္ဆတိ တဒါကာရပ္ပဝတ္တိယာတိ သမ္ပဋိစ္ဆနံ. သမ္မာ တီရေတိ ယထာသမ္ပဋိစ္ဆိတံ ရူပါဒိအာရမ္မဏံ ဝီမံသတီတိ သန္တီရဏံ. အညမညဝိရုဒ္ဓါနံ ကုသလာကုသလာနံ ပါကာတိ ဝိပါကာ, ဝိပက္ကဘာဝမာပန္နာနံ အရူပဓမ္မာနမေတံ အဓိဝစနံ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ကုသလာကုသလကမ္မသမုဋ္ဌာနာနမ္ပိ ကဋတ္တာရူပါနံ နတ္ထိ ဝိပါကဝေါဟာရော. အကုသလဿ ဝိပါကစိတ္တာနိ အကုသလဝိပါကစိတ္တာနိ. याचप्रमाणे श्रोत्रविज्ञान (कान) इत्यादींच्या बाबतीतही योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. "तथा" (त्याचप्रमाणे) या शब्दाने उपेक्षासहगत भावाचा अतिदेश (निर्देश) केला आहे. विज्ञानाचे अधिष्ठान होऊन जे ऐकते, ते 'श्रोत्र' (कान) होय. जे वास घेते किंवा गंधाचे ग्रहण करते, ते 'घ्राण' (नाक) होय. जीवनाचे कारण असलेला रस म्हणजे 'जीवित' होय; त्या रसाकडे झुकलेले असल्यामुळे जे त्या जीविताला जणू काही बोलावते, निरुक्ति-पद्धतीने त्याला 'जिव्हा' (जीभ) म्हणतात. निंदनीय अशा पापधर्मांचे (अकुशल धर्मांचे) जे उत्पत्तीचे स्थान (आय) आहे, तो 'काय' (शरीर) होय. कारण काय-इंद्रिय हे स्प्रष्टव्याचे (स्पर्शाचे) ग्रहण करण्याच्या स्वभावाचे असल्यामुळे, त्या स्पर्शाच्या आस्वादाच्या वशने उत्पन्न होणाऱ्या आणि त्या मूळ असलेल्या पापधर्मांचे ते विशेष कारण आहे; म्हणून ते त्यांच्या उत्पत्तीचे स्थान असल्यासारखे मानले जाते. किंवा, निंदनीय अशा केस इत्यादी अवयवांचे जे स्थान आहे, ते ससंभार शरीर म्हणजे 'काय' होय. त्याच्याशी सहचरित (एकत्र) असल्यामुळे प्रसाद-कायाला (कायप्रसादाला) देखील 'काय' असे म्हटले जाते. 'दु' म्हणजे निंदनीय होऊन जे कायिक सुखाला नष्ट करते (खणते), किंवा जे सहन करण्यास कठीण आहे, ते 'दुःख' होय. "ज्याला अवकाश (संधी) देणे अत्यंत कठीण आहे, ते दुःख होय" असे इतर आचार्य म्हणतात. पंचविज्ञानाने ग्रहण केलेल्या रूप इत्यादी विषयांचा जो त्या आकाराने स्वीकार करतो, ते 'संप्रतीच्छन' होय. स्वीकारलेल्या रूप इत्यादी विषयांची जी योग्य प्रकारे परीक्षा किंवा मीमांसा करते, ते 'संतीरण' होय. परस्परांच्या विरोधी असलेल्या कुशल आणि अकुशल कर्मांचे जे परिपक्व रूप (फळ) आहे, ते 'विपाक' होय. परिपक्वतेला प्राप्त झालेल्या अरूप (नाम) धर्मांचे हे नाव (अधिवाचन) आहे. आणि असे मानल्यामुळे, कुशल-अकुशल कर्मांपासून उत्पन्न होणाऱ्या 'कटत्ता-रूपां'ना (कर्मज रूपांना) 'विपाक' असा व्यवहार (नाव) दिला जात नाही. अकुशलाची विपाक चित्ते म्हणजे 'अकुशलविपाक चित्ते' होत. ၁၀. သုခယတိ ကာယစိတ္တံ, သုဋ္ဌု ဝါ ခနတိ ကာယစိတ္တာဗာဓံ, သုခေန ခမိတဗ္ဗန္တိ ဝါ သုခံ. ‘‘သုကရမောကာသဒါနံ ဧတဿာတိ သုခ’’န္တိ အပရေ. ကသ္မာ ပန ယထာ အကုသလဝိပါကသန္တီရဏံ ဧကမေဝ ဝုတ္တံ, ဧဝမဝတွာ ကုသလဝိပါကသန္တီရဏံ ဒွိဓာ ဝုတ္တန္တိ? ဣဋ္ဌဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တာရမ္မဏဝသေန ဝေဒနာဘေဒသမ္ဘဝတော. ယဒိ ဧဝံ တတ္ထာပိ အနိဋ္ဌအနိဋ္ဌမဇ္ဈတ္တာရမ္မဏဝသေန ဝေဒနာဘေဒေန ဘဝိတဗ္ဗန္တိ? နယိဒမေဝံ အနိဋ္ဌာရမ္မဏေ [Pg.84] ဥပ္ပဇ္ဇိတဗ္ဗဿပိ ဒေါမနဿဿ ပဋိဃေန ဝိနာ အနုပ္ပဇ္ဇနတော, ပဋိဃဿ စ ဧကန္တာကုသလသဘာဝဿ အဗျာကတေသု အသမ္ဘဝတော. န ဟိ ဘိန္နဇာတိကော ဓမ္မော ဘိန္နဇာတိကေသု ဥပလဗ္ဘတိ, တသ္မာ အတ္တနာ သမာနယောဂက္ခမဿ အသမ္ဘဝတော အကုသလဝိပါကေသု ဒေါမနဿံ န သမ္ဘဝတီတိ တဿ တံသဟဂတတာ န ဝုတ္တာ. အထ ဝါ ယထာ ကောစိ ဗလဝတာ ပေါထိယမာနော ဒုဗ္ဗလပုရိသော တဿ ပဋိပ္ပဟရိတုံ အသက္ကောန္တော တသ္မိံ ဥပေက္ခကောဝ ဟောတိ, ဧဝမေဝ အကုသလဝိပါကာနံ ပရိဒုဗ္ဗလဘာဝတော အနိဋ္ဌာရမ္မဏေပိ ဒေါမနဿုပ္ပာဒေါ နတ္ထီတိ သန္တီရဏံ ဥပေက္ခာသဟဂတမေဝ. १०. जे काय आणि चित्ताला सुखी करते, किंवा जे काय आणि चित्ताच्या रोगाला चांगल्या प्रकारे नष्ट करते, किंवा जे सुखाने सहन केले जाते, ते 'सुख' होय. "ज्याला अवकाश देणे सोपे आहे, ते सुख होय" असे इतर आचार्य म्हणतात. परंतु, ज्याप्रमाणे अकुशलविपाक संतीरण चित्त केवळ एकच सांगितले आहे, त्याप्रमाणे न सांगता कुशलविपाक संतीरण चित्त दोन प्रकारचे का सांगितले आहे? इष्ट (प्रिय) आणि इष्ट-मध्यस्थ (तटस्थ) विषयांच्या भेदाने वेदनेचा भेद (सोमनस्य आणि उपेक्षा) संभवत असल्यामुळे. जर असे असेल, तर तिथेही (अकुशलविपाकातही) अनिष्ट आणि अनिष्ट-मध्यस्थ विषयांच्या भेदाने वेदनेचा भेद (दौर्मनस्य आणि उपेक्षा) असायला हवा होता काय? असे नाही; कारण अनिष्ट विषयात उत्पन्न होणारे दौर्मनस्य (दुःखद मानसिक वेदना) हे प्रतिघाशिवाय (द्वेषाशिवाय) उत्पन्न होऊ शकत नाही, आणि अत्यंत अकुशल स्वभावाचा असलेला प्रतिघ (द्वेष) हा अव्याकृत (विपाक) धर्मांमध्ये संभवत नाही. कारण भिन्न जातीचा धर्म हा भिन्न जातीच्या धर्मांमध्ये आढळत नाही (सहअस्तित्वात नसतो), म्हणून स्वतःशी समान योगक्षेम (सहयोग) असणाऱ्या धर्माचा असंभव असल्यामुळे, अकुशलविपाकांमध्ये दौर्मनस्य संभवत नाही; म्हणूनच त्याची (अकुशलविपाक संतीरणाची) दौर्मनस्य-सहगतता सांगितलेली नाही. किंवा, ज्याप्रमाणे एखाद्या बलवान माणसाकडून मार खाणारा दुर्बळ माणूस त्याला उलट मारण्यास असमर्थ असल्यामुळे त्याच्याविषयी उपेक्षकच (उदासीन) राहतो, त्याचप्रमाणे अकुशलविपाक चित्तांच्या अत्यंत दुर्बळतेमुळे अनिष्ट विषयातही दौर्मनस्याची उत्पत्ती होत नाही; म्हणून ते संतीरण चित्त केवळ उपेक्षासहगतच असते. စက္ခုဝိညာဏာဒီနိ ပန စတ္တာရိ ဥဘယဝိပါကာနိပိ ဝတ္ထာရမ္မဏဃဋ္ဋနာယ ဒုဗ္ဗလဘာဝတော အနိဋ္ဌေ ဣဋ္ဌေပိ စ အာရမ္မဏေ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ. တေသဉှိ စတုန္နမ္ပိ ဝတ္ထုဘူတာနိ စက္ခာဒီနိ ဥပါဒါရူပါနေဝ, တထာ အာရမ္မဏဘူတာနိပိ ရူပါဒီနိ, ဥပါဒါရူပကေန စ ဥပါဒါရူပကဿ သံဃဋ္ဋနံ အတိဒုဗ္ဗလံ ပိစုပိဏ္ဍကေန ပိစုပိဏ္ဍကဿ ဖုသနံ ဝိယ, တသ္မာ တာနိ သဗ္ဗထာပိ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ. ကာယဝိညာဏဿ ပန ဖောဋ္ဌဗ္ဗသင်္ခါတဘူတတ္တယမေဝ အာရမ္မဏန္တိ တံ ကာယပ္ပသာဒေ သံဃဋ္ဋိတမ္ပိ တံ အတိက္ကမိတွာ တန္နိဿယေသု မဟာဘူတေသု ပဋိဟညတိ. ဘူတရူပေဟိ စ ဘူတရူပါနံ သံဃဋ္ဋနံ ဗလဝတရံ အဓိကရဏိမတ္ထကေ ပိစုပိဏ္ဍကံ ဌပေတွာ ကူဋေန ပဟဋကာလေ ကူဋဿ ပိစုပိဏ္ဍကံ အတိက္ကမိတွာ အဓိကရဏိဂ္ဂဟဏံ ဝိယ, တသ္မာ ဝတ္ထာရမ္မဏဃဋ္ဋနာယ ဗလဝဘာဝတော ကာယဝိညာဏံ အနိဋ္ဌေ ဒုက္ခသဟဂတံ, ဣဋ္ဌေ သုခသဟဂတန္တိ. သမ္ပဋိစ္ဆနယုဂဠှံ ပန အတ္တနာ အသမာနနိဿယာနံ စက္ခုဝိညာဏာဒီနမနန္တရံ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ သမာနနိဿယတော အလဒ္ဓါနန္တရပစ္စယတာယ သဘာဂူပတ္ထမ္ဘရဟိတော ဝိယ ပုရိသော နာတိဗလဝံ သဗ္ဗထာပိ ဝိသယရသမနုဘဝိတုံ န သက္ကောတီတိ သဗ္ဗထာပိ ဥပေက္ခာသဟဂတမေဝ. ဝုတ္တဝိပရိယာယတော ကုသလဝိပါကသန္တီရဏံ ဣဋ္ဌဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တာရမ္မဏေသု [Pg.85] သုခေါပေက္ခာသဟဂတန္တိ. ယဒိ ဧဝံ အာဝဇ္ဇနဒွယဿ ဥပေက္ခာသမ္ပယောဂံ ကသ္မာ ဝက္ခတိ, နနု တမ္ပိ သမာနနိဿယာနန္တရံ ပဝတ္တတီတိ? သစ္စံ, တတ္ထ ပန ပုရိမံ ပုဗ္ဗေ ကေနစိ အဂ္ဂဟိတေယေဝ အာရမ္မဏေ ဧကဝါရမေဝ ပဝတ္တတိ, ပစ္ဆိမမ္ပိ ဝိသဒိသစိတ္တသန္တာနပရာဝတ္တနဝသေန ဗျာပါရန္တရသာပေက္ခန္တိ န သဗ္ဗထာပိ ဝိသယရသမနုဘဝိတုံ သက္ကောတိ, တသ္မာ မဇ္ဈတ္တဝေဒနာသမ္ပယုတ္တမေဝါတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ – परंतु, चक्षुविज्ञान इत्यादी चार (चित्ते) दोन्ही प्रकारचे विपाक (कुशल आणि अकुशल) असूनही, वस्तू (इंद्रिय) आणि आलंबन (विषय) यांच्यातील संघर्षाच्या दुर्बलतेमुळे, अनिष्ट तसेच इष्ट विषयांवर देखील केवळ उपेक्षासहगतच (उदासीन वेदनेने युक्त) असतात. कारण त्या चारींचे आधार असणारे चक्षु इत्यादी (इंद्रिये) केवळ उपादाय रूपच आहेत, तसेच आलंबन असणारे रूप इत्यादी देखील (उपादाय रूपच आहेत). उपादाय रूपाचा उपादाय रूपाशी होणारा संघर्ष अत्यंत दुर्बल असतो, जसे कापसाच्या गोळ्याने कापसाच्या गोळ्याला स्पर्श करणे अत्यंत दुर्बल असते. म्हणून, ते सर्व प्रकारे उपेक्षासहगतच असतात. परंतु, कायविज्ञानाचे आलंबन केवळ 'फोट्टब्ब' (स्पर्शव्य) संज्ञक तीन महाभूतच आहेत. त्यामुळे ते कायप्रसादावर आदळले तरी, त्याला ओलांडून त्याच्या आश्रयाने राहणाऱ्या महाभूतांवर आदळते. आणि भूत रूपांचा भूत रूपांशी होणारा संघर्ष अधिक बलवान असतो; जसे ऐरणीवर कापसाचा गोळा ठेवून हातोड्याने प्रहार केला असता, हातोड्याचा प्रहार कापसाच्या गोळ्याला ओलांडून ऐरणीला लागतो, त्याप्रमाणे. म्हणून, वस्तू आणि आलंबन यांच्या संघर्षाच्या बलवानपणामुळे, कायविज्ञान हे अनिष्ट विषयावर दुःखसहगत आणि इष्ट विषयावर सुखसहगत असते, असे समजावे. परंतु, संपटिच्छन द्विक हे स्वतःपेक्षा भिन्न आश्रय असणाऱ्या चक्षुविज्ञान इत्यादींच्या नंतर उत्पन्न होते. समान आश्रयाकडून अनंतरप्रत्यय न मिळाल्यामुळे, ते एखाद्या साहाय्यक किंवा मित्राच्या पाठिंब्याशिवाय असणाऱ्या माणसाप्रमाणे फारसे बलवान नसते; त्यामुळे ते कोणत्याही प्रकारे विषयाच्या रसाचा पूर्ण आस्वाद घेण्यास असमर्थ असते. म्हणून ते सर्व प्रकारे केवळ उपेक्षासहगतच असते. पूर्वोक्त नियमाच्या विपरीत असल्यामुळे, कुशल विपाक संतीरण हे इष्ट आणि इष्ट-मध्यस्थ विषयांवर अनुक्रमे सौमनस्य आणि उपेक्षासहगत असते. जर असे आहे, तर आवर्जन द्विकाचा उपेक्षासंप्रयोग का सांगितला जाईल? ते देखील समान आश्रयाच्या नंतरच प्रवृत्त होते की नाही? हे सत्य आहे. परंतु, त्यामध्ये पहिले (पंचद्वारावर्जन) पूर्वी कोणाकडूनही ग्रहण न केलेल्या विषयावर केवळ एक वेळच प्रवृत्त होते; आणि दुसरे (मनद्वारावर्जन) देखील विजातीय चित्तसंतानाला वळविण्याच्या स्वरूपात इतर कार्याची अपेक्षा ठेवणारे असल्यामुळे, ते सर्व प्रकारे विषयाच्या रसाचा आस्वाद घेण्यास समर्थ नसते. म्हणून ते केवळ मध्यस्थ वेदनेने (उपेक्षा वेदनेने) युक्तच असते. या संदर्भात खालील गाथा आहेत – ‘‘ဝတ္ထာလမ္ဗသဘာဝါနံ, ဘူတိကာနဉှိ ဃဋ္ဋနံ; ဒုဗ္ဗလံ ဣတိ စက္ခာဒိ-စတုစိတ္တမုပေက္ခကံ. “वस्तू आणि आलंबन रूप असणाऱ्या, महाभूतांवर आश्रित (उपादाय) रूपांचा संघर्ष दुर्बल असतो; म्हणून चक्षुविज्ञान इत्यादी चार चित्ते उपेक्षा वेदनेने युक्त असतात.” ‘‘ကာယနိဿယဖောဋ္ဌဗ္ဗ-ဘူတာနံ ဃဋ္ဋနာယ တု; ဗလဝတ္တာ န ဝိညာဏံ, ကာယိက မဇ္ဈဝေဒနံ. “परंतु, कायप्रसादाचा आश्रय असणारे महाभूत आणि स्पर्शव्य (फोट्टब्ब) महाभूत यांच्या संघर्षाच्या बलवानपणामुळे, कायिक विज्ञान (कायविज्ञान) हे मध्यस्थ वेदनेने (उपेक्षा वेदनेने) युक्त नसते (तर ते सुख किंवा दुःख वेदनेने युक्त असते).” ‘‘သမာနနိဿယော ယသ္မာ, နတ္ထာနန္တရပစ္စယော; တသ္မာ ဒုဗ္ဗလမာလမ္ဗေ, သောပေက္ခံ သမ္ပဋိစ္ဆန’’န္တိ. “ज्या अर्थी (संपटिच्छनाला) समान आश्रय असणारा अनंतरप्रत्यय नसतो, त्या अर्थी आलंबन ग्रहण करण्यात दुर्बल असणारे संपटिच्छन चित्त उपेक्षा वेदनेने युक्त असते.” ကုသလဿ ဝိပါကာနိ, သမ္ပယုတ္တဟေတုဝိရဟတော အဟေတုကစိတ္တာနိ စာတိ ကုသလဝိပါကာဟေတုကစိတ္တာနိ. နိဗ္ဗတ္တကဟေတုဝသေန နိပ္ဖန္နာနိပိ ဟေတာနိ သမ္ပယုတ္တဟေတုဝသေနေဝ အဟေတုကဝေါဟာရံ လဘန္တိ, ဣတရထာ မဟာဝိပါကေဟိ ဣမေသံ နာနတ္တာသမ္ဘဝတော. ကိံ ပနေတ္ထ ကာရဏံ ယထာ ဣဓေဝံ အကုသလဝိပါကနိဂမနေ အဟေတုကဂ္ဂဟဏံ န ကတန္တိ? ဗျဘိစာရာဘာဝတော. သတိ ဟိ သမ္ဘဝေ, ဗျဘိစာရေ စ ဝိသေသနံ သာတ္ထကံ သိယာ. အကုသလဝိပါကာနံ ပန လောဘာဒိသာဝဇ္ဇဓမ္မဝိပါကဘာဝေန တဗ္ဗိဓုရေဟိ, အလောဘာဒီဟိ သမ္ပယောဂါယောဂတော, သယံ အဗျာကတနိရဝဇ္ဇသဘာဝါနံ လောဘာဒိအကုသလဓမ္မသမ္ပယောဂဝိရောဓတော စ နတ္ထိ ကဒါစိပိ သဟေတုကတာယ သမ္ဘဝေါတိ အဟေတုကဘာဝါဗျဘိစာရတော [Pg.86] န တာနိ အဟေတုကသဒ္ဒေန ဝိသေသိတဗ္ဗာနိ. कुशल कर्माचे विपाक असणारी आणि संप्रयुक्त हेतूंनी रहित असणारी अहेतुक चित्ते म्हणजे 'कुशलविपाक-अहेतुक चित्ते' होत. जरी ही चित्ते उत्पन्न करणाऱ्या (जनक) हेतूंच्या प्रभावाने निष्पन्न झाली असली, तरी संप्रयुक्त हेतूंच्या अभावामुळेच त्यांना 'अहेतुक' हा व्यवहार (नाव) प्राप्त होतो; अन्यथा महाविपाकांपासून त्यांचे वेगळेपण सिद्ध होऊ शकणार नाही. येथे हे काय कारण आहे की, ज्याप्रमाणे येथे (कुशलविपाकात 'अहेतुक' शब्द जोडला आहे), त्याप्रमाणे अकुशलविपाकाच्या समाप्तीमध्ये 'अहेतुक' हा शब्द ग्रहण केला गेला नाही? याचे कारण व्यभिचाराचा अभाव हे आहे. कारण जेव्हा (इतर अर्थाचा) संभव आणि व्यभिचार असतो, तेव्हाच विशेषण लावणे सार्थक ठरते. परंतु, अकुशल विपाक हे लोभ इत्यादी सदोष (सावज्ज) धर्मांचे विपाक असल्यामुळे, त्यांच्या विरोधी असणाऱ्या अलोभ इत्यादी (कुशल) हेतूंशी त्यांचा संप्रयोग होणे अयोग्य आहे; आणि स्वतः अव्याकृत व निर्दोष (निरवज्ज) स्वभावाचे असल्यामुळे, लोभ इत्यादी अकुशल धर्मांशी त्यांचा संप्रयोग होणे देखील विरुद्ध आहे. त्यामुळे त्यांच्यात कधीही सहेतुक असण्याचा संभव नसतो. अशा प्रकारे, अहेतुक असण्याच्या बाबतीत कोणताही व्यभिचार (अपवाद) नसल्यामुळे, त्यांना 'अहेतुक' या शब्दाने विशेषित करण्याची गरज नाही. ၁၁. ဣဒါနိ အဟေတုကာဓိကာရေ အဟေတုကကိရိယစိတ္တာနိပိ ကိစ္စဘေဒေန တိဓာ ဒဿေတုံ ‘‘ဥပေက္ခာသဟဂတ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. စက္ခာဒိပဉ္စဒွါရေ ဃဋ္ဋိတမာရမ္မဏံ အာဝဇ္ဇေတိ တတ္ထ အာဘောဂံ ကရောတိ, စိတ္တသန္တာနံ ဝါ ဘဝင်္ဂဝသေန ပဝတ္တိတုံ အဒတွာ ဝီထိစိတ္တဘာဝါယ ပရိဏာမေတီတိ ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနံ, ကိရိယာဟေတုကမနောဓာတုစိတ္တံ. အာဝဇ္ဇနဿ အနန္တရပစ္စယဘူတံ ဘဝင်္ဂစိတ္တံ မနောဒွါရံ ဝီထိစိတ္တာနံ ပဝတ္တိမုခဘာဝတော. တသ္မိံ ဒိဋ္ဌသုတမုတာဒိဝသေန အာပါထမာဂတမာရမ္မဏံ အာဝဇ္ဇေတိ, ဝုတ္တနယေန ဝါ စိတ္တသန္တာနံ ပရိဏာမေတီတိ မနောဒွါရာဝဇ္ဇနံ, ကိရိယာဟေတုကမနောဝိညာဏဓာတုဥပေက္ခာသဟဂတစိတ္တံ. ဣဒမေဝ စ ပဉ္စဒွါရေ ယထာသန္တီရိတံ အာရမ္မဏံ ဝဝတ္ထပေတီတိ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနန္တိ စ ဝုစ္စတိ. ဟသိတံ ဥပ္ပာဒေတီတိ ဟသိတုပ္ပာဒံ, ခီဏာသဝါနံ အနောဠာရိကာရမ္မဏေသု ပဟဋ္ဌာကာရမတ္တဟေတုကံ ကိရိယာဟေတုကမနောဝိညာဏဓာတုသောမနဿသဟဂတစိတ္တံ. ११. आता, अहेतुक अधिकारात अहेतुक क्रिया चित्ते देखील कार्याच्या भेदानुसार तीन प्रकारची दाखवण्यासाठी 'उपेक्षासहगत' इत्यादी म्हटले आहे. चक्षु इत्यादी पंचद्वारांवर आदळलेल्या आलंबनाचे जे आवर्जन करते, त्यावर मन एकाग्र करते, किंवा चित्तसंतानाला भवांग रूपाने प्रवृत्त होऊ न देता विथीचित्त होण्यासाठी वळविते, ते 'पंचद्वारावर्जन' होय; हे क्रिया-अहेतुक मनोधातू चित्त आहे. आवर्जनाचा अनंतरप्रत्यय असणारे भवांग चित्त हे 'मनोद्वार' आहे, कारण ते विथीचित्तांच्या प्रवृत्तीचे मुख (द्वार) आहे. त्या मनोद्वारावर दृष्ट, श्रुत, मुत इत्यादींच्या द्वारे समोर आलेल्या आलंबनाचे जे आवर्जन करते, किंवा पूर्वोक्त पद्धतीने चित्तसंतानाला वळविते, ते 'मनोद्वारावर्जन' होय; हे क्रिया-अहेतुक मनोविज्ञानधातू उपेक्षासहगत चित्त आहे. आणि हेच चित्त पंचद्वारांमध्ये संतीरण केलेल्या आलंबनाचा निश्चय (व्यवस्थान) करते, म्हणून याला 'वोट्ठपन' (व्यवस्थापन/निश्चय) असेही म्हटले जाते. जे हास्य उत्पन्न करते ते 'हसितुप्पाद' होय; हे क्षीणासवांच्या (अर्हंतांच्या) सूक्ष्म आलंबनांवर केवळ प्रसन्नतेच्या भावामुळे उत्पन्न होणारे क्रिया-अहेतुक मनोविज्ञानधातू सौमनस्यसहगत चित्त आहे. ၁၂. သဗ္ဗထာပီတိ အကုသလဝိပါကကုသလဝိပါကကိရိယဘေဒေန. အဋ္ဌာရသာတိ ဂဏနပရိစ္ဆေဒေါ. အဟေတုကစိတ္တာနီတိ ပရိစ္ဆိန္နဓမ္မနိဒဿနံ. १२. 'सब्बथापि' (सर्व प्रकारे) म्हणजे अकुशलविपाक, कुशलविपाक आणि क्रिया यांच्या भेदाने. 'अट्ठाारस' (अठरा) हा संख्येचा परिच्छेद (मर्यादा) दर्शवणारा शब्द आहे. 'अहेतुकचित्तानि' हा शब्द त्या मर्यादित केलेल्या धर्मांचे दिग्दर्शन करणारा आहे. အဟေတုကစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अहेतुक चित्तांचे वर्णन समाप्त झाले. သောဘနစိတ္တဝဏ္ဏနာ शोभन चित्तांचे वर्णन ၁၄. ဧဝံ ဒွါဒသာကုသလအဟေတုကာဋ္ဌာရသဝသေန သမတိံသ စိတ္တာနိ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တဗ္ဗိနိမုတ္တာနံ သောဘနဝေါဟာရံ ဌပေတုံ ‘‘ပါပါဟေတုကမုတ္တာနီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. အတ္တနာ အဓိသယိတဿ အပါယာဒိဒုက္ခဿ ပါပနတော ပါပေဟိ[Pg.87], ဟေတုသမ္ပယောဂါဘာဝတော အဟေတုကေဟိ စ မုတ္တာနိ စတုဝီသတိကာမာဝစရပဉ္စတိံသမဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဝသေန ဧကူနသဋ္ဌိပရိမာဏာနိ, အထ ဝါ အဋ္ဌ လောကုတ္တရာနိ ဈာနင်္ဂယောဂဘေဒေန ပစ္စေကံ ပဉ္စဓာ ကတွာ ဧကနဝုတိပိ စိတ္တာနိ သောဘနဂုဏာဝဟနတော, အလောဘာဒိအနဝဇ္ဇဟေတုသမ္ပယောဂတော စ သောဘနာနီတိ ဝုစ္စရေ ကထီယန္တိ. १४. अशा प्रकारे, बारा अकुशल आणि अठरा अहेतुक अशा एकूण तीस चित्तांना दाखवून, आता त्यांच्यापासून मुक्त असणाऱ्या चित्तांना 'शोभन' हा व्यवहार (नाव) देण्यासाठी 'पाप-अहेतुक-मुक्तानि' इत्यादी म्हटले आहे. स्वतःमध्ये वास करणाऱ्या प्राण्याला अपाय (दुर्गती) इत्यादी दुःखात पाडत असल्यामुळे ज्यांना 'पाप' म्हटले जाते अशा अकुशल चित्तांपासुन, आणि हेतूंच्या संप्रयोगाचा अभाव असल्यामुळे ज्यांना 'अहेतुक' म्हटले जाते अशा चित्तांपासुन मुक्त असणारी; चोवीस कामावचर आणि पस्तीस महग्गत व लोकोत्तर अशा भेदाने एकूण एकोणसाठ (५९) चित्ते; अथवा आठ लोकोत्तर चित्तांना ध्यानांगांच्या संप्रयोगाच्या भेदाने प्रत्येकी पाच प्रकारांत विभागून एकूण एक्याण्णव (९१) चित्ते, शोभन गुणांचे वहन करत असल्यामुळे आणि अलोभ इत्यादी निर्दोष हेतूंशी संप्रयुक्त असल्यामुळे 'शोभन' चित्ते म्हणून ओळखली जातात. ကာမာဝစရသောဘနစိတ္တဝဏ္ဏနာ कामावचर शोभन चित्तांचे वर्णन ၁၅. ဣဒါနိ သောဘနေသု ကာမာဝစရာနမေဝ ပဌမံ ဥဒ္ဒိဋ္ဌတ္တာ တေသုပိ အဗျာကတာနံ ကုသလပုဗ္ဗကတ္တာ ပဌမံ ကာမာဝစရကုသလံ, တတော တဗ္ဗိပါကံ, တဒနန္တရံ တဒေကဘူမိပရိယာပန္နံ ကိရိယစိတ္တဉ္စ ပစ္စေကံ ဝေဒနာဉာဏသင်္ခါရဘေဒေန အဋ္ဌဓာ ဒဿေတုံ ‘‘သောမနဿသဟဂတ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ဇာနာတိ ယထာသဘာဝံ ပဋိဝိဇ္ဈတီတိ ဉာဏံ. သေသံ ဝုတ္တနယမေဝ. ဧတ္ထ စ ဗလဝသဒ္ဓါယ ဒဿနသမ္ပတ္တိယာ ပစ္စယပဋိဂ္ဂါဟကာဒိသမ္ပတ္တိယာတိ ဧဝမာဒီဟိ ကာရဏေဟိ သောမနဿသဟဂတတာ, ပညာသံဝတ္တနိကကမ္မတော, အဗျာပဇ္ဇလောကူပပတ္တိတော, ဣန္ဒြိယပရိပါကတော, ကိလေသဒူရီဘာဝတော စ ဉာဏသမ္ပယုတ္တတာ, တဗ္ဗိပရိယာယေန ဥပေက္ခာသဟဂတတာ စေဝ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တတာ စ, အာဝါသသပ္ပာယာဒိဝသေန ကာယစိတ္တာနံ ကလ္လဘာဝတော, ပုဗ္ဗေ ဒါနာဒီသု ကတပရိစယတာဒီဟိ စ အသင်္ခါရိကတာ, တဗ္ဗိပရိယာယေန သသင်္ခါရိကတာ စ ဝေဒိတဗ္ဗာ. १५. आता, शोभन चित्तांमध्ये कामावचर चित्तांनाच प्रथम निर्देशित केल्यामुळे, आणि त्या कामावचर चित्तांमध्ये सुद्धा अव्याकृत चित्तांच्या पूर्वी कुशल चित्त येत असल्यामुळे, प्रथम कामावचर कुशल चित्त, त्यानंतर त्याचे विपाक चित्त, आणि त्यानंतर त्याच भूमीतील (कामावचर भूमीतील) क्रिया चित्त, प्रत्येकी वेदना, ज्ञान आणि संस्कार यांच्या भेदाने आठ प्रकारे दर्शवण्यासाठी 'सौमनस्यसहगत' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, जे यथास्वभाव जाणते, भेदून जाणते (प्रतिवेध करते), ते 'ज्ञान' होय. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. आणि येथे, बलवान श्रद्धा, दर्शनसंपत्ती (सम्यग्दृष्टी), प्रत्यय (दानवस्तू) व प्रतिग्राहक (दान स्वीकारणारा) इत्यादींच्या समृद्धीमुळे 'सौमनस्यसहगतता' (आनंदाने युक्त असणे) होते; प्रज्ञा संवर्तनीय कर्मामुळे, अव्यापाद (द्वेषरहित) लोकामध्ये उत्पन्न झाल्यामुळे, इंद्रियांच्या परिपाकामुळे (परिपक्वतेमुळे) आणि क्लेशांच्या दूर होण्यामुळे 'ज्ञानसंप्रयुक्तता' (ज्ञानाने युक्त असणे) होते; याच्या उलट कारणांमुळे 'उपेक्षासहगतता' आणि 'ज्ञानविप्रयुक्तता' (ज्ञानाविरहित असणे) होते; अनुकूल आवास (निवासस्थान) इत्यादींच्या प्रभावाने काय आणि चित्त निरोगी/सक्षम असल्यामुळे, आणि पूर्वी दान इत्यादी पुण्यकर्मांमध्ये केलेल्या सरावामुळे 'असंस्कारिकत्व' (असंखारिक असणे) होते; आणि याच्या उलट कारणांमुळे 'ससंस्कारिकत्व' (ससंखारिक असणे) समजावे. တတ္ထ ယဒါ ပန ယော ဒေယျဓမ္မပဋိဂ္ဂါဟကာဒိသမ္ပတ္တိံ, အညံ ဝါ သောမနဿဟေတုံ အာဂမ္မ ဟဋ္ဌပဟဋ္ဌော ‘‘အတ္ထိ ဒိန္န’’န္တျာဒိနယပ္ပဝတ္တံ သမ္မာဒိဋ္ဌိံ ပုရက္ခတွာ မုတ္တစာဂတာဒိဝသေန အသံသီဒန္တော အနုဿာဟိတော ပရေဟိ ဒါနာဒီနိ ပုညာနိ ကရောတိ, တဒါဿ စိတ္တံ သောမနဿသဟဂတံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တံ အသင်္ခါရိကံ ဟောတိ. ယဒါ ပန ဝုတ္တနယေနေဝ ဟဋ္ဌတုဋ္ဌော သမ္မာဒိဋ္ဌိံ [Pg.88] ပုရက္ခတွာပိ အမုတ္တစာဂတာဒိဝသေန သံသီဒမာနော ပရေဟိ ဝါ ဥဿာဟိတော ကရောတိ, တဒါဿ တဒေဝ စိတ္တံ သသင်္ခါရိကံ ဟောတိ. ယဒါ ပန ဉာတိဇနဿ ပဋိပတ္တိဒဿနေန ဇာတပရိစယာ ဗာလဒါရကာ ဘိက္ခူ ဒိသွာ သောမနဿဇာတာ သဟသာ ကိဉ္စိဒေဝ ဟတ္ထဂတံ ဒဒန္တိ ဝါ ဝန္ဒန္တိ ဝါ, တဒါ တေသံ တတိယံ စိတ္တံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ယဒါ ပန ‘‘ဒေထ, ဝန္ဒထာ’’တိ ဉာတီဟိ ဥဿာဟိတာ ဧဝံ ပဋိပဇ္ဇန္တိ, တဒါ စတုတ္ထံ စိတ္တံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ယဒါ ပန ဒေယျဓမ္မပဋိဂ္ဂါဟကာဒီနံ အသမ္ပတ္တိံ, အညေသံ ဝါ သောမနဿဟေတူနံ အဘာဝံ အာဂမ္မ စတူသုပိ ဝိကပ္ပေသု သောမနဿရဟိတာ ဟောန္တိ, တဒါ သေသာနိ စတ္တာရိ ဥပေက္ခာသဟဂတာနိ ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ. အဋ္ဌပီတိ ပိ-သဒ္ဒေန ဒသပုညကိရိယာဒိဝသေန အနေကဝိဓတံ သမ္ပိဏ္ဍေတိ. တထာ ဟိ ဝဒန္တိ – त्या चित्तांमध्ये, जेव्हा एखादी व्यक्ती देयधर्म (दानवस्तू) आणि प्रतिग्राहक (दान स्वीकारणारा) इत्यादींची समृद्धी किंवा इतर काही सौमनस्याचे (आनंदाचे) कारण मिळवून अत्यंत हर्षित होऊन, 'दिलेले दान फलदायी असते' इत्यादी प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या सम्यग्दृष्टीला समोर ठेवून, मुक्तहस्ताने दान देण्याच्या वृत्तीमुळे संकोच न बाळगता, इतरांनी प्रवृत्त न करता दान इत्यादी पुण्यकर्मे करते, तेव्हा तिचे चित्त 'सौमनस्यसहगत, ज्ञानसंप्रयुक्त, असंस्कारिक' असते. परंतु, जेव्हा पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच हर्षित झालेली असूनही, सम्यग्दृष्टीला समोर ठेवूनही, मुक्तहस्त नसण्याच्या वृत्तीमुळे संकोच बाळगून किंवा इतरांनी प्रवृत्त केल्यामुळे पुण्यकर्म करते, तेव्हा तिचे तेच चित्त 'ससंस्कारिक' असते. परंतु, जेव्हा आपल्या नातेवाईकांच्या आचरणाचे दर्शन झाल्यामुळे सवय झालेले लहान मुले भिक्खूंना पाहून आनंदित होतात आणि अचानक हातात आलेली कोणतीही वस्तू दान देतात किंवा त्यांना वंदन करतात, तेव्हा त्यांच्यामध्ये तिसरे चित्त (सौमनस्यसहगत, ज्ञानविप्रयुक्त, असंस्कारिक) उत्पन्न होते. परंतु, जेव्हा 'द्या, वंदन करा' असे नातेवाईकांनी प्रवृत्त केल्यावर ते तसे आचरण करतात, तेव्हा चौथे चित्त (सौमनस्यसहगत, ज्ञानविप्रयुक्त, ससंस्कारिक) उत्पन्न होते. परंतु, जेव्हा देयधर्म आणि प्रतिग्राहक इत्यादींची समृद्धी नसणे किंवा इतर सौमनस्याच्या कारणांचा अभाव असणे यामुळे वरील चारही पर्यायांमध्ये सौमनस्यरहित (आनंदरहित) होतात, तेव्हा उर्वरित चार 'उपेक्षासहगत' चित्ते उत्पन्न होतात. 'अट्ठपि' (आठही) यातील 'पि' (सुद्धा) या शब्दाने दहा पुण्यक्रियावस्तू इत्यादींच्या भेदाने अनेक प्रकारांचा संग्रह केला जातो. म्हणूनच प्राचीन आचार्य म्हणतात – ‘‘ကမေန ပုညဝတ္ထူဟိ, ဂေါစရာဓိပတီဟိ စ; ကမ္မဟီနာဒိတော စေဝ, ဂဏေယျ နယကောဝိဒေါ’’တိ. 'पद्धतीमध्ये निपुण असलेल्या विद्वानाने अनुक्रमाने पुण्यवस्तू, गोचर (आलंबन), अधिपती, कर्म आणि हीन-मध्यम-प्रणीत इत्यादींच्या आधारे (चित्तांची) गणना करावी.' ဣမာနိ ဟိ အဋ္ဌ စိတ္တာနိ ဒသပုညကိရိယဝတ္ထုဝသေန ပဝတ္တနတော ပစ္စေကံ ဒသ ဒသာတိ ကတွာ အသီတိ စိတ္တာနိ ဟောန္တိ, တာနိ စ ဆသု အာရမ္မဏေသု ပဝတ္တနတော ပစ္စေကံ ဆဂ္ဂုဏိတာနိ သာသီတိကာနိ စတ္တာရိ သတာနိ ဟောန္တိ, အဓိပတိဘေဒေန ပန ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တာနံ စတ္တာလီသာဓိကဒွိသတပရိမာဏာနံ ဝီမံသာဓိပတိသမ္ပယောဂါဘာဝတော တာနိ တိဏ္ဏံ အဓိပတီနံ ဝသေန တိဂုဏိတာနိ ဝီသာဓိကာနိ သတ္တသတာနိ, တထာ ဉာဏသမ္ပယုတ္တာနိ စ စတုန္နံ အဓိပတီနံ ဝသေန စတုဂ္ဂုဏိတာနိ သသဋ္ဌိကာနိ နဝ သတာနီတိ ဧဝံ အဓိပတိဝသေန သဟဿံ သာသီတိကာနိ စ ဆ သတာနိ ဟောန္တိ, တာနိ ကာယဝစီမနောကမ္မသင်္ခါတကမ္မတ္တိကဝသေန တိဂုဏိတာနိ စတ္တာလီသာဓိကာနိ ပဉ္စ သဟဿာနိ ဟောန္တိ, တာနိ စ ဟီနမဇ္ဈိမပဏီတဘေဒတော တိဂုဏိတာနိ ဝီသသတာဓိကပန္နရသသဟဿာနိ ဟောန္တိ. ယံ ပန ဝုတ္တံ အာစရိယဗုဒ္ဓဒတ္တတ္ထေရေန – कारण, ही आठ चित्ते दहा पुण्यक्रियावस्तूंच्या रूपाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे प्रत्येकी दहा-दहा याप्रमाणे ऐंशी (८०) चित्ते होतात. ती सहा आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये) प्रवृत्त होत असल्यामुळे प्रत्येकी सहाने गुणल्यास चारशे ऐंशी (४८०) चित्ते होतात. परंतु, अधिपतींच्या भेदाने विचार केल्यास, ज्ञानविप्रयुक्त असलेल्या दोनशे चाळीस (२४०) चित्तांमध्ये 'मीमांसाधिपती'चा (प्रज्ञेचा) संप्रयोग नसल्यामुळे, ती तीन अधिपतींच्या प्रभावाने तीनने गुणली असता सातशे वीस (७२०) होतात. तसेच, ज्ञानसंप्रयुक्त चित्ते चार अधिपतींच्या प्रभावाने चारने गुणली असता नऊशे साठ (९६०) होतात. अशा प्रकारे, अधिपतींच्या प्रभावाने एकूण एक हजार सहाशे ऐंशी (१६८०) चित्ते होतात. ती कायकर्म, वचीकर्म आणि मनोकर्म या तीन कर्मांच्या भेदाने तीनने गुणली असता पाच हजार चाळीस (५०४०) चित्ते होतात. आणि ती हीन, मध्यम व प्रणीत या भेदाने तीनने गुणली असता पंधरा हजार एकशे वीस (१५१२०) चित्ते होतात. आचार्य बुद्धदत्त स्थविरांनी जे म्हटले आहे की – ‘‘သတ္တရသ [Pg.89] သဟဿာနိ, ဒွေ သတာနိ အသီတိ စ; ကာမာဝစရပုညာနိ, ဘဝန္တီတိ ဝိနိဒ္ဒိသေ’’တိ. 'कामावचर पुण्य (कुशल) चित्ते सतरा हजार दोनशे ऐंशी (१७२८०) असतात, असे निर्देश करावे.' တံ အဓိပတိဝသေန ဂဏနပရိဟာနိံ အနာဒိယိတွာ သောတပတိတဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, ကာလဒေသာဒိဘေဒေန ပန နေသံ ဘေဒေါ အပ္ပမေယျောဝ. ते (कथन) अधिपतींच्या प्रभावाने होणारी गणनेची घट न धरता, संप्रयुक्त चित्तांच्या गुणाकाराच्या क्रमाने (सर्व चित्तांना चार अधिपतींनी गुणून) सांगितले आहे असे समजावे. परंतु, काल, देश इत्यादींच्या भेदाने त्यांचा भेद अमर्याद (अगणित) आहे. ကုစ္ဆိတေ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁) ပါပဓမ္မေ သလယန္တိ ကမ္ပေန္တိ ဝိဒ္ဓံသေန္တိ အပဂမေန္တီတိ ဝါ ကုသလာနိ. အထ ဝါ ကုစ္ဆိတာကာရေန သန္တာနေ သယနတော ပဝတ္တနတော ကုသသင်္ခါတေ ပါပဓမ္မေ လုနန္တိ ဆိန္ဒန္တီတိ ကုသလာနိ. အထ ဝါ ကုစ္ဆိတေ ပါပဓမ္မေ သာနတော တနုကရဏတော ဩသာနကရဏတော ဝါ ကုသသင်္ခါတေန ဉာဏေန, သဒ္ဓါဒိဓမ္မဇာတေန ဝါ လာတဗ္ဗာနိ သဟဇာတဥပနိဿယဘာဝေန ယထာရဟံ ပဝတ္တေတဗ္ဗာနီတိ ကုသလာနိ, တာနေဝ ယထာဝုတ္တတ္ထေန ကာမာဝစရာနိ ကုသလစိတ္တာနိ စာတိ ကာမာဝစရကုသလစိတ္တာနိ. जे निंद्य (कुत्सित) अशा पापधर्मांना कंपित करतात, नष्ट करतात किंवा दूर करतात, म्हणून ते 'कुशल' (कु+सल) होत. अथवा, निंद्य रूपाने चित्तसंततीमध्ये राहणाऱ्या (शयन करणाऱ्या) 'कुस' संज्ञक पापधर्मांना जे कापतात किंवा छेदतात, म्हणून ते 'कुशल' (कुस+ल) होत. अथवा, निंद्य पापधर्मांना कमी (तनु) करणाऱ्या किंवा समाप्त करणाऱ्या, 'कुस' संज्ञक ज्ञानाने किंवा श्रद्धा इत्यादी सहगामी धर्मांनी जे ग्रहण केले जातात, आणि सहजात किंवा उपनिषय भावाने योग्य प्रकारे प्रवृत्त केले जातात, म्हणून ते 'कुशल' (कुस+ल) होत. तीच चित्ते वर सांगितलेल्या अर्थाने कामावचर आणि कुशल चित्ते असल्यामुळे 'कामावचर कुशल चित्ते' म्हटली जातात. ၁၆. ယထာ ပနေတာနိ ပုညကိရိယဝသေန, ကမ္မဒွါရဝသေန, ကမ္မဝသေန, အဓိပတိဝသေန စ ပဝတ္တန္တိ, နေဝံ ဝိပါကာနိ ဒါနာဒိဝသေန အပ္ပဝတ္တနတော, ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပနာဘာဝတော, အဝိပါကသဘာဝတော, ဆန္ဒာဒီနိ ပုရက္ခတွာ အပ္ပဝတ္တိတော စ, တသ္မာ တံဝသေန ပရိဟာပေတွာ ယထာရဟံ ဂဏနဘေဒေါ ယောဇေတဗ္ဗော. ဣမာနိပိ ဣဋ္ဌဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တာရမ္မဏဝသေန ယထာက္ကမံ သောမနဿုပေက္ခာသဟိတာနိ. ပဋိသန္ဓာဒိဝသပ္ပဝတ္တိယံ ကမ္မဿ ဗလဝါဗလဝဘာဝတော, တဒါရမ္မဏပ္ပဝတ္တိယံ ယေဘုယျေန ဇဝနာနုရူပတော, ကဒါစိ တတ္ထာပိ ကမ္မာနုရူပတော စ ဉာဏသမ္ပယုတ္တာနိ, ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တာနိ စ ဟောန္တိ. ယထာပယောဂံ ဝိနာ သပ္ပယောဂဉ္စ ယထာဥပဋ္ဌိတေဟိ ကမ္မာဒိပစ္စယေဟိ ဥတုဘောဇနာဒိသပ္ပာယာသပ္ပာယဝသေန အသင်္ခါရိကသသင်္ခါရိကာနိ. १६. परंतु, ज्याप्रमाणे ही (कुशल चित्ते) पुण्यक्रियावस्तू, कर्मद्वार, कर्म आणि अधिपती यांच्या प्रभावाने प्रवृत्त होतात, त्याप्रमाणे विपाक चित्ते प्रवृत्त होत नाहीत; कारण ती दान इत्यादींच्या रूपाने प्रवृत्त होत नाहीत, कायविज्ञप्ती व वचीविज्ञप्ती उत्पन्न करत नाहीत, स्वतः विपाक (फळ) देण्याच्या स्वभावाची नसतात, आणि छंद इत्यादींना समोर ठेवून प्रवृत्त होत नाहीत. म्हणून, त्या (पुण्यक्रिया इत्यादींच्या) प्रभावाने होणारी घट लक्षात घेऊन योग्य प्रकारे गणनेचा भेद जुळवावा. ही (महाविपाक चित्ते) सुद्धा इष्ट आणि इष्ट-मध्यम आलंबनांच्या (विषयांच्या) प्रभावाने अनुक्रमाने सौमनस्य आणि उपेक्षेने युक्त असतात. प्रतिसंधी इत्यादी कर्मांच्या वेळी कर्माच्या सबळ किंवा दुर्बळ असण्यामुळे, आणि तदालंबन प्रवृत्तीच्या वेळी बहुतांश करून जवनांच्या (वेगाच्या) अनुरूप असण्यामुळे, आणि कधीकधी तेथेही कर्माच्या अनुरूप असण्यामुळे ती ज्ञानसंप्रयुक्त and ज्ञानविप्रयुक्त असतात. प्रयोगाशिवाय (अनायासाने) किंवा प्रयोगासह (प्रयत्नाने), जशी कर्म इत्यादी कारणे उपस्थित होतील त्यानुसार, आणि ऋतू, भोजन इत्यादींच्या अनुकूलतेच्या किंवा प्रतिकूलतेच्या प्रभावाने ती असंस्कारिक आणि ससंस्कारिक असतात. ၁၇. ကိရိယစိတ္တာနမ္ပိ [Pg.90] ကုသလေ ဝုတ္တနယေန ယထာရဟံ သောမနဿသဟဂတာဒိတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. १७. क्रिया चित्तांची सुद्धा कुशल चित्तांच्या संदर्भात सांगितलेल्या पद्धतीनेच योग्य प्रकारे सौमनस्यसहगतता इत्यादी समजावी. ၁၈. သဟေတုကကာမာဝစရကုသလဝိပါကကိရိယစိတ္တာနီတိ ဧတ္ထ သဟေတုကဂ္ဂဟဏံ ဝိပါကကိရိယာပေက္ခံ ဝိသေသနံ ကုသလဿ ဧကန္တသဟေတုကတ္တာ. ဟောတိ ဟိ ယထာလာဘယောဇနာ, ‘‘သက္ခရကထလမ္ပိ မစ္ဆဂုမ္ဗမ္ပိ စရန္တမ္ပိ တိဋ္ဌန္တမ္ပီ’’တျာဒီသု (ဒီ. နိ. ၁.၂၄၉) ဝိယ သက္ခရကထလဿ စရဏာယောဂတော မစ္ဆဂုမ္ဗာပေက္ခာယ စရဏကိရိယာ ယောဇီယတီတိ. १८. सहेतुककामावचरकुशलविपाकक्रियाचित्तानि यामध्ये 'सहेतुक' हा शब्द विपाक आणि क्रिया चित्तांच्या अपेक्षेने लावलेले विशेषण आहे; कारण कुशल चित्त हे एकांताने (निश्चितपणे) सहेतुकच असते. येथे 'यथालाभयोजना' (ज्याला जे लागू पडते त्यानुसार जोडणे) होते, ज्याप्रमाणे 'खडे व खापरे, माशांचा थवा, फिरणारे व स्थिर असलेले' इत्यादी वाक्यांमध्ये खडे व खापरे फिरू शकत नसल्यामुळे, फिरण्याची क्रिया केवळ माशांच्या थव्याशीच जोडली जाते, त्याप्रमाणे. ၁၉. သဟေတုကာမာဝစရပုညပါကကိရိယာ ဝေဒနာဉာဏသင်္ခါရဘေဒေန ပစ္စေကံ ဝေဒနာဘေဒတော ဒုဝိဓတ္တာ, ဉာဏဘေဒတော စတုဗ္ဗိဓတ္တာ, သင်္ခါရဘေဒတော အဋ္ဌဝိဓတ္တာ စ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ စတုဝီသတိ မတာတိ ယောဇနာ. နနု စ ဝေဒနာဘေဒေါ တာဝ ယုတ္တော တာသံ ဘိန္နသဘာဝတ္တာ. ဉာဏသင်္ခါရဘေဒေါ ပန ကထန္တိ? ဉာဏသင်္ခါရာနံ ဘာဝါဘာဝကတောပိ ဘေဒေါ ဉာဏသင်္ခါရကတောဝ ယထာ ဝဿကတော သုဘိက္ခော ဒုဗ္ဘိက္ခောတိ, တသ္မာ ဉာဏသင်္ခါရကတော ဘေဒေါ ဉာဏသင်္ခါရဘေဒေါတိ န ဧတ္ထ ကောစိ ဝိရောဓောတိ. १९. सहेतुक कामावचर कुशल, विपाक आणि क्रिया चित्ते ही वेदना, ज्ञान आणि संस्कार यांच्या भेदाने प्रत्येकी; वेदनाभेदाने दोन प्रकारची, ज्ञानभेदाने चार प्रकारची आणि संस्कारभेदाने आठ प्रकारची असल्याने, एकत्रितपणे चोवीस मानली जातात, असा हा संबंध (योजना) आहे. पण शंका अशी की, वेदनाभेद तर योग्य आहे, कारण त्या वेदनांचा स्वभाव भिन्न (सोमनस्य व उपेक्षा) आहे. परंतु ज्ञान आणि संस्कार यांच्यामुळे होणारा भेद कसा योग्य ठरू शकतो? ज्ञान आणि संस्कार यांच्या असण्या-नसण्यामुळे होणारा भेद देखील ज्ञान आणि संस्कारांमुळेच झालेला असतो; ज्याप्रमाणे पावसाच्या असण्या-नसण्यामुळे सुकाळ (सुभिक्ष) आणि दुष्काळ (दुर्भिक्ष) निर्माण होतो. म्हणून ज्ञान आणि संस्कारांमुळे होणाऱ्या भेदाला 'ज्ञान-संस्कार भेद' असे म्हणतात, यात कोणताही विरोध नाही. ၂၀. ဣဒါနိ သဗ္ဗာနိပိ ကာမာဝစရစိတ္တာနိ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ ဒဿေတုံ ‘‘ကာမေ တေဝီသာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ကာမေ ဘဝေ သတ္တ အကုသလဝိပါကာနိ, သဟေတုကာဟေတုကာနိ သောဠသ ကုသလဝိပါကာနီတိ ဧဝံ တေဝီသတိ ဝိပါကာနိ ဒွါဒသ အကုသလာနိ, အဋ္ဌ ကုသလာနီတိ ပုညာပုညာနိ ဝီသတိ အဟေတုကာ တိဿော သဟေတုကာ အဋ္ဌာတိ ဧကာဒသ ကိရိယာ စာတိ သဗ္ဗထာပိ ကုသလာကုသလဝိပါကကိရိယာနံ အန္တောဂဓဘေဒေန စတုပညာသေဝ ကာလဒေသသန္တာနာဒိဘေဒေန အနေကဝိဓဘာဝေပီတျတ္ထော. २०. आता सर्व कामावचर चित्तांना एकत्रित करून दर्शवण्यासाठी 'कामे तेवीसा' इत्यादी म्हटले आहे. कामभवात (कामावचर भूमीत) सात अकुशल विपाक चित्ते आणि सहेतुक व अहेतुक मिळून सोळा कुशल विपाक चित्ते, अशी तेवीस विपाक चित्ते असतात; बारा अकुशल चित्ते आणि आठ कुशल चित्ते मिळून वीस पुण्य-अपुण्य (कुशल-अकुशल) चित्ते असतात; तीन अहेतुक क्रिया चित्ते आणि आठ सहेतुक क्रिया चित्ते मिळून अकरा क्रिया चित्ते असतात. अशा प्रकारे, कुशल, अकुशल, विपाक आणि क्रिया चित्तांच्या अंतर्गत भेदाने ती एकूण चोपन्नच आहेत; जरी काळ, देश, संतान इत्यादींच्या भेदाने ती अनेक प्रकारची असली, तरीही (ती एकूण चोपन्नच आहेत) असा अर्थ आहे. ကာမာဝစရသောဘနစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कामावचर शोभन चित्तांचे वर्णन समाप्त झाले. ရူပါဝစရစိတ္တဝဏ္ဏနာ रूपावचर चित्तांचे वर्णन ၂၁. ဣဒါနိ [Pg.91] တဒနန္တရုဒ္ဒိဋ္ဌဿ ရူပါဝစရဿ နိဒ္ဒေသက္ကမော အနုပ္ပတ္တောတိ တဿ ဈာနင်္ဂယောဂဘေဒေန ပဉ္စဓာ ဝိဘာဂံ ဒဿေတုံ ‘‘ဝိတက္က…ပေ… သဟိတ’’န္တျာဒိမာဟ. ဝိတက္ကော စ ဝိစာရော စ ပီတိ စ သုခဉ္စ ဧကဂ္ဂတာ စာတိ ဣမေဟိ သဟိတံ ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခေကဂ္ဂတာသဟိတံ. တတ္ထ အာရမ္မဏံ ဝိတက္ကေတိ သမ္ပယုတ္တဓမ္မေ အဘိနိရောပေတီတိ ဝိတက္ကော, သော သဟဇာတာနံ အာရမ္မဏာဘိနိရောပနလက္ခဏော, ယထာ ဟိ ကောစိ ဂါမဝါသီ ပုရိသော ရာဇဝလ္လဘံ သမ္ဗန္ဓိနံ မိတ္တံ ဝါ နိဿာယ ရာဇဂေဟံ အနုပဝိသတိ, ဧဝံ ဝိတက္ကံ နိဿာယ စိတ္တံ အာရမ္မဏံ အာရောဟတိ. ယဒိ ဧဝံ ကထံ အဝိတက္ကံ စိတ္တံ အာရမ္မဏံ အာရောဟတီတိ? တမ္ပိ ဝိတက္ကဗလေနေဝ အဘိနိရောဟတိ. ယထာ ဟိ သော ပုရိသော ပရိစယေန တေန ဝိနာပိ နိရာသင်္ကော ရာဇဂေဟံ ပဝိသတိ, ဧဝံ ပရိစယေန ဝိတက္ကေန ဝိနာပိ အဝိတက္ကံ စိတ္တံ အာရမ္မဏံ အဘိနိရောဟတိ. ပရိစယောတိ စေတ္ထ သဝိတက္ကစိတ္တဿ သန္တာနေ အဘိဏှပ္ပဝတ္တိဝသေန နိဗ္ဗတ္တာ စိတ္တဘာဝနာ. အပိ စေတ္ထ ပဉ္စဝိညာဏံ အဝိတက္ကမ္ပိ ဝတ္ထာရမ္မဏသံဃဋ္ဋနဗလေန, ဒုတိယဇ္ဈာနာဒီနိ စ ဟေဋ္ဌိမဘာဝနာဗလေန အဘိရောဟန္တိ. २१. आता त्यानंतर निर्देश केलेल्या रूपावचर चित्तांच्या सविस्तर वर्णनाचा क्रम प्राप्त झाला आहे, म्हणून त्याचे ध्यान-अंगांच्या संयोगाच्या भेदाने पाच प्रकारांत होणारे विभाजन दर्शवण्यासाठी 'वितर्क...पे... सहित' इत्यादी म्हटले आहे. वितर्क, विचार, प्रीती, सुख आणि एकाग्रता यांनी युक्त असणारे ते 'वितर्क-विचार-प्रीती-सुख-एकाग्रता-सहित' होय. त्यामध्ये, जे आलंबनाचा विचार करते आणि संप्रयुक्त धर्मांना आलंबनावर प्रस्थापित करते, ते 'वितर्क' होय. तो सहजात (सोबत उत्पन्न होणाऱ्या) चित्त-चेतसिकांना आलंबनावर प्रस्थापित करण्याच्या लक्षणाचा असतो. ज्याप्रमाणे एखादा गावकरी माणूस राजाच्या जवळच्या नातेवाईकाचा किंवा मित्राचा आश्रय घेऊन राजवाड्यात प्रवेश करतो, त्याचप्रमाणे वितर्काचा आश्रय घेऊन चित्त आलंबनावर आरूढ होते. जर असे आहे, तर वितर्करहित चित्त आलंबनावर कसे आरूढ होते? ते देखील वितर्काच्याच बळाने आरूढ होते. ज्याप्रमाणे तो माणूस परिचयामुळे (सरावामुळे) त्याच्याशिवाय देखील नि:शंकपणे राजवाड्यात प्रवेश करतो, त्याचप्रमाणे परिचयामुळे वितर्काशिवाय देखील वितर्करहित चित्त आलंबनावर आरूढ होते. येथे 'परिचय' म्हणजे सवितर्क चित्ताच्या प्रवाहात वारंवार प्रवृत्त होण्यामुळे निर्माण झालेली चित्तभावना (चित्ताचा सराव) होय. शिवाय, येथे पंचविज्ञान हे वितर्करहित असूनही वस्तू आणि आलंबन यांच्या संघट्टनाच्या (स्पर्शाच्या) बळाने आलंबनावर आरूढ होते, आणि द्वितीय ध्यान इत्यादी चित्ते खालच्या भावनच्या बळाने आरूढ होतात. အာရမ္မဏေ တေန စိတ္တံ ဝိစရတီတိ ဝိစာရော. သော အာရဏနုမဇ္ဇနလက္ခဏော. တထာ ဟေသ ‘‘အနုသန္ဓာနတာ’’တိ (ဓ. သ. ၈) နိဒ္ဒိဋ္ဌော. ဧတ္ထ စ ဝိစာရတော ဩဠာရိကဋ္ဌေန, တဿေဝ ပုဗ္ဗင်္ဂမဋ္ဌေန စ ပဌမဃဏ္ဋာဘိဃာတော ဝိယ စေတသော ပဌမာဘိနိပါတော ဝိတက္ကော, အနုရဝေါ ဝိယ အနုသဉ္စရဏံ ဝိစာရော. ဝိပ္ဖာရဝါစေတ္ထ ဝိတက္ကော စိတ္တဿ ပရိပ္ဖန္ဒနဘူတော, အာကာသေ ဥပ္ပတိတုကာမဿ သကုဏဿ ပက္ခဝိက္ခေပေါ ဝိယ, ပဒုမာဘိမုခပါတော ဝိယ စ ဂန္ဓာနုဗန္ဓစေတသာ ဘမရဿ, သန္တဝုတ္တိ ဝိစာရော စိတ္တဿ နာတိပရိပ္ဖန္ဒနဘူတော, အာကာသေ ဥပ္ပတိတဿ [Pg.92] သကုဏဿ ပက္ခပ္ပသာရဏံ ဝိယ, ပဒုမဿ ဥပရိဘာဂေ ပရိဗ္ဘမနံ ဝိယ စ ပဒုမာဘိမုခပတိတဿ ဘမရဿ. ज्याच्याद्वारे चित्त आलंबनावर फिरते (अनुसरण करते), तो 'विचार' होय. तो आलंबनाला वारंवार कुरवाळण्याच्या (स्पर्श करण्याच्या) लक्षणाचा असतो. म्हणूनच त्याला 'अनुसंधानता' असे निर्देशित केले आहे. आणि येथे विचारापेक्षा स्थूल असल्यामुळे आणि त्याचाच पूर्वगामी असल्यामुळे, घंटेच्या पहिल्या टोलाप्रमाणे चित्ताचे आलंबनावर पहिले पडणे म्हणजे 'वितर्क' होय, आणि घंटेच्या घुमणाऱ्या आवाजाप्रमाणे आलंबनावर वारंवार फिरणे म्हणजे 'विचार' होय. येथे वितर्क हा चित्ताच्या स्पंदनाचा भाग असल्याने अधिक चंचल (विस्फारयुक्त) असतो, जसे आकाशात उडू इच्छिणाऱ्या पक्षाचे पंख फडफडवणे किंवा सुवासाचा मागोवा घेणाऱ्या भुंग्याचे कमळाकडे झेपावणे; तर विचार हा शांत वृत्तीचा असून चित्ताच्या अति-स्पंदनाचा भाग नसतो, जसे आकाशात उडणाऱ्या पक्षाचे पंख पसरून तरंगणे किंवा कमळाकडे झेपावलेल्या भुंग्याचे कमळाच्या वर घिरट्या घालणे. ပိနယတိ ကာယစိတ္တံ တပ္ပေတိ, ဝဍ္ဎေတီတိ ဝါ ပီတိ, သာ သမ္ပိယာယနလက္ခဏာ, အာရမ္မဏံ ကလ္လတော ဂဟဏလက္ခဏာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, သမ္ပယုတ္တဓမ္မေ သုခယတီတိ သုခံ, တံ ဣဋ္ဌာနုဘဝနလက္ခဏံ သုဘောဇနရသဿာဒကော ရာဇာ ဝိယ. တတ္ထ အာရမ္မဏပ္ပဋိလာဘေ ပီတိယာ ဝိသေသော ပါကဋော ကန္တာရခိန္နဿ ဝနန္တောဒကဒဿနေ ဝိယ, ယထာလဒ္ဓဿ အနုဘဝနေ သုခဿ ဝိသေသော ပါကဋော ယထာဒိဋ္ဌဥဒကဿ ပါနာဒီသု ဝိယာတိ. နာနာရမ္မဏဝိက္ခေပါဘာဝေန ဧကံ အာရမ္မဏံ အဂ္ဂံ ဣမဿာတိ ဧကဂ္ဂံ, စိတ္တံ, တဿ ဘာဝေါ ဧကဂ္ဂတာ, သမာဓိ. သော အဝိက္ခေပလက္ခဏော. တဿ ဟိ ဝသေန သသမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ အဝိက္ခိတ္တံ ဟောတိ. जी काय (शरीर) आणि चित्ताला तृप्त करते किंवा वाढवते, ती 'प्रीती' होय. ती अत्यंत प्रिय वाटण्याच्या (स्नेह करण्याच्या) लक्षणाची असते किंवा आलंबनाला योग्य प्रकारे ग्रहण करण्याच्या लक्षणाची असते, असे म्हटले आहे. जे संप्रयुक्त धर्मांना सुखी करते, ते 'सुख' होय. ते इष्ट आलंबनाचा उपभोग घेण्याच्या लक्षणाचे असते, जसे उत्तम भोजनाच्या रसाचा आस्वाद घेणारा राजा. त्यामध्ये, आलंबन प्राप्त झाल्यावर प्रीतीचे वैशिष्ट्य स्पष्टपणे जाणवते, जसे वाळवंटात थकलेल्या माणसाला जंगलात पाणी दिसल्यावर आनंद होतो; आणि प्राप्त झालेल्या आलंबनाचा उपभोग घेताना सुखाचे वैशिष्ट्य स्पष्टपणे जाणवते, जसे पाहिलेले पाणी पिण्याने तृप्ती मिळते. विविध आलंबनांमध्ये विखुरले न जाण्यामुळे ज्याचे एकच आलंबन मुख्य असते, ते 'एकाग्र' चित्त होय; त्याचा तो भाव म्हणजे 'एकाग्रता' किंवा 'समाधी' होय. ती विक्षेप नसण्याच्या (अवििक्षेप) लक्षणाची असते. कारण तिच्या प्रभावाने संप्रयुक्त चित्त विचलित होत नाही. ပဌမဉ္စ ဒေသနာက္ကမတော စေဝ ဥပ္ပတ္တိက္ကမတော စ အာဒိဘူတတ္တာ တံ ဈာနဉ္စ အာရမ္မဏူပနိဇ္ဈာနတော, ပစ္စနီကဈာပနတော စာတိ ပဌမဇ္ဈာနံ, ဝိတက္ကာဒိပဉ္စကံ. ဈာနင်္ဂသမုဒါယေ ယေဝ ဟိ ဈာနဝေါဟာရော နေမိအာဒိအင်္ဂသမုဒါယေ ရထဝေါဟာရော ဝိယ, တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ဝိဘင်္ဂေ ‘‘ဈာနန္တိ ဝိတက္ကော ဝိစာရော ပီတိ သုခံ စိတ္တဿေကဂ္ဂတာ’’တိ (ဝိဘ. ၅၆၉). ပဌမဇ္ဈာနေန သမ္ပယုတ္တံ ကုသလစိတ္တံ ပဌမဇ္ဈာနကုသလစိတ္တံ. उपदेशाच्या क्रमाने आणि उत्पत्तीच्या क्रमाने देखील ते पहिले (आदिभूत) असल्याने 'प्रथम' होय, आणि आलंबनाचे सूक्ष्म ध्यान करण्याच्या व विरोधी नीवरणांना जाळून टाकण्याच्या अर्थाने ते 'ध्यान' होय; म्हणून याला 'प्रथम ध्यान' म्हणतात. हे वितर्क इत्यादी पाच अंगांचा समूह आहे. कारण ध्यान-अंगांच्या समूहालाच 'ध्यान' हा व्यवहार लागू होतो, ज्याप्रमाणे चाकाची धाव (नेमी) इत्यादी अंगांच्या समूहाला 'रथ' म्हटले जाते. म्हणूनच विभंगामध्ये म्हटले आहे: 'ध्यान म्हणजे वितर्क, विचार, प्रीती, सुख आणि चित्ताची एकाग्रता होय.' प्रथम ध्यानाने युक्त असणारे कुशल चित्त म्हणजे 'प्रथमध्यान कुशल चित्त' होय. ကသ္မာ ပန အညေသု ဖဿာဒီသု သမ္ပယုတ္တဓမ္မေသု ဝိဇ္ဇမာနေသု ဣမေယေဝ ပဉ္စ ဈာနင်္ဂဝသေန ဝုတ္တာတိ? ဝုစ္စတေ – ဥပနိဇ္ဈာနကိစ္စဝန္တတာယ, ကာမစ္ဆန္ဒာဒီနံ ဥဇုပဋိပက္ခဘာဝတော စ. ဝိတက္ကော ဟိ အာရမ္မဏေ စိတ္တံ အဘိနိရောပေတိ. ဝိစာရော အနုပ္ပဗန္ဓေတိ, ပီတိ စဿ ပီနနံ, သုခဉ္စ ဥပဗြူဟနံ ကရောတိ, အထ နံ သသမ္ပယုတ္တဓမ္မံ ဧတေဟိ အဘိနိရောပနာနုပ္ပဗန္ဓနပီနနဥပဗြူဟနေဟိ အနုဂ္ဂဟိတာ ဧကဂ္ဂတာ သမာဓာနကိစ္စေန [Pg.93] အတ္တာနံ အနုဝတ္တာပေန္တီ ဧကတ္တာရမ္မဏေ သမံ, သမ္မာ စ အာဓိယတိ. ဣန္ဒြိယသမတာဝသေန သမံ ပဋိပက္ခဓမ္မာနံ ဒူရီဘာဝေန လီနုဒ္ဓစ္စာဘာဝေန သမ္မာ စ ဌပေတီတိ ဧဝမေတေ သမေဝ ဥပနိဇ္ဈာနကိစ္စံ အာဝေဏိကံ. ကာမစ္ဆန္ဒာဒိပဋိပက္ခဘာဝေ ပန သမာဓိ ကာမစ္ဆန္ဒဿ ပဋိပက္ခော ရာဂပ္ပဏိဓိယာ ဥဇုပစ္စနီကဘာဝတော. ကာမစ္ဆန္ဒဝသေန ဟိ နာနာရမ္မဏေဟိ ပလောဘိတဿ ပရိဗ္ဘမန္တဿ စိတ္တဿ သမာဓာနံ ဧကဂ္ဂတာယ ဟောတိ. ပီတိ ဗျာပါဒဿ ပါမောဇ္ဇသဘာဝတ္တာ. ဝိတက္ကော ထိနမိဒ္ဓဿ ယောနိသော သင်္ကပ္ပနဝသေန သဝိပ္ဖာရပ္ပဝတ္တိတော သုခံ အဝူပသမာနုတာပသဘာဝဿ ဥဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စဿ ဝူပသန္တသီတလသဘာဝတ္တာ. ဝိစာရော ဝိစိကိစ္ဆာယ အာရမ္မဏေ အနုမဇ္ဇနဝသေန ပညာပတိရူပသဘာဝတ္တာ. ဧဝံ ဥပနိဇ္ဈာနကိစ္စဝန္တတာယ, ကာမစ္ဆန္ဒာဒီနံ ဥဇုပဋိပက္ခဘာဝတော စ ဣမေယေဝ ပဉ္စ ဈာနင်္ဂဘာဝေန ဝဝတ္ထိတာတိ. ယထာဟု – पण इतर स्पर्श इत्यादी संप्रयुक्त धर्म विद्यमान असताना केवळ याच पाच धर्मांना ध्यान-अंगे म्हणून का म्हटले गेले आहे? उत्तर दिले जाते - कारण त्यांच्यामध्ये आलंबनाचे सूक्ष्म निरीक्षण करण्याचे कार्य (उपनिज्झानकृत्य) असते आणि ते कामच्छंद इत्यादींचे थेट विरोधी (प्रतिपक्ष) असतात. कारण वितर्क चित्ताला आलंबनावर स्थापित करतो. विचार त्याचे अनुबंधन करतो (आलंबनावर वारंवार जोडतो), प्रीती त्या चित्ताला प्रफुल्लित करते आणि सुख त्याचे संवर्धन करते. त्यानंतर, या वितर्क इत्यादींच्या स्थापन करणे, अनुबंधन करणे, प्रफुल्लित करणे आणि संवर्धन करणे या कृत्यांनी उपकृत झालेली एकाग्रता, समाधीच्या कृत्याद्वारे स्वतःला आणि संप्रयुक्त धर्मांना अनुवर्तन करायला लावून, एकाच आलंबनावर सम्यक आणि समान रीतीने स्थापित करते. इंद्रियांच्या समतेमुळे समान रीतीने, आणि प्रतिपक्षी धर्मांच्या दूर होण्यामुळे तसेच लीनता व उद्धतपणा यांच्या अभावामुळे सम्यक रीतीने स्थापित करते. अशा प्रकारे केवळ याच धर्मांचे उपनिज्झानकृत्य हे असाधारण (आवेणिक) आहे. कामच्छंद इत्यादींच्या प्रतिपक्षभावामध्ये, समाधी ही कामच्छंदाची प्रतिपक्ष आहे, कारण ती कामवासनेच्या थेट विरुद्ध आहे. कारण कामच्छंदाच्या प्रभावाने विविध आलंबनांकडे आकर्षित होऊन भटकणाऱ्या चित्ताचे एकाग्रतेमुळे समाधान (स्थिरता) होते. प्रीती ही व्यापादाची प्रतिपक्ष आहे, कारण तिचा स्वभाव प्रमोध (आनंद) देणारा आहे. वितर्क हा थिनमिद्धाचा प्रतिपक्ष आहे, कारण तो योग्य विचारांच्या संकल्पामुळे उत्साहाने प्रवृत्त होतो. सुख हे अशांतता आणि पश्चात्ताप स्वभावाच्या उद्धच्च-कुक्कुच्चाचा प्रतिपक्ष आहे, कारण त्याचा स्वभाव शांत आणि शीतल आहे. विचार हा विचिकित्सेचा प्रतिपक्ष आहे, कारण आलंबनावर वारंवार घासण्याच्या स्वभावामुळे तो प्रज्ञेसारखा भासतो. अशा प्रकारे, उपनिज्झानकृत्य असल्यामुळे आणि कामच्छंद इत्यादींचे थेट प्रतिपक्ष असल्यामुळे, केवळ याच पाच धर्मांना ध्यान-अंगे म्हणून निश्चित केले गेले आहे. जसे की प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे - ‘‘ဥပနိဇ္ဈာနကိစ္စတ္တာ, ကာမာဒိပဋိပက္ခတော; သန္တေသုပိ စ အညေသု, ပဉ္စေဝ ဈာနသညိတာ’’တိ. “उपनिज्झानकृत्य असल्यामुळे आणि कामच्छंद इत्यादींचे प्रतिपक्ष असल्यामुळे, इतर संप्रयुक्त धर्म विद्यमान असतानाही, केवळ पाच धर्मांनाच 'ध्यान' अशी संज्ञा दिली जाते.” ဥပေက္ခာ ပနေတ္တ သန္တဝုတ္တိသဘာဝတ္တာ သုခေဝ အန္တောဂဓာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တေနာဟု – परंतु येथे उपेक्षा ही शांत प्रवृत्तीच्या स्वभावाची असल्यामुळे सुखातच अंतर्भूत आहे असे समजावे. म्हणूनच आचार्यांनी म्हटले आहे - ‘‘ဥပေက္ခာ သန္တဝုတ္တိတ္တာ, သုခမိစ္စေဝ ဘာသိတာ’’တိ. (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၃၂; ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၄၄); “उपेक्षा ही शांत प्रवृत्तीची असल्यामुळे तिला सुखच म्हटले गेले आहे.” ပဟာနင်္ဂါဒိဝသေန ပနဿ ဝိသေသော ဥပရိ အာဝိ ဘဝိဿတိ, တထာ အရူပါဝစရလောကုတ္တရေသုပိ လဗ္ဘမာနကဝိသေသော. အထေတ္ထ ကာမာဝစရကုသလေသု ဝိယ သင်္ခါရဘေဒေါ ကသ္မာ န ဂဟိတော. ဣဒမ္ပိ ဟိ ကေဝလံ သမထာနုယောဂဝသေန ပဋိလဒ္ဓံ သသင်္ခါရိကံ, မဂ္ဂါဓိဂမဝသေန ပဋိလဒ္ဓံ အသင်္ခါရိကန္တိ သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ? နယိဒမေဝံ မဂ္ဂါဓိဂမဝသေနသတ္တိတော ပဋိလဒ္ဓဿာပိ အပရဘာဂေ ပရိကမ္မဝသေနေဝ ဥပ္ပဇ္ဇနတော, တသ္မာ သဗ္ဗဿပိ ဈာနဿ ပရိကမ္မသင်္ခါတပုဗ္ဗာဘိသင်္ခါရေန [Pg.94] ဝိနာ ကေဝလံ အဓိကာရဝသေန အနုပ္ပဇ္ဇနတော ‘‘အသင်္ခါရိက’’န္တိပိ, အဓိကာရေန စ ဝိနာ ကေဝလံ ပရိကမ္မာဘိသင်္ခါရေနေဝ အနုပ္ပဇ္ဇနတော ‘‘သသင်္ခါရိက’’န္တိပိ န သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ. အထ ဝါ ပုဗ္ဗာဘိသင်္ခါရဝသေနေဝ ဥပ္ပဇ္ဇမာနဿ န ကဒါစိ အသင်္ခါရိကဘာဝေါ သမ္ဘဝတီတိ ‘‘အသင်္ခါရိက’’န္တိ စ ဗျဘိစာရာဘာဝတော ‘‘သသင်္ခါရိက’’န္တိ စ န ဝုတ္တန္တိ. परंतु, प्रहाण-अंग इत्यादींच्या आधारे या रूपावचर चित्ताचा विशेष भेद पुढे स्पष्ट होईल, तसेच अरूपावचर आणि लोकोत्तर चित्तांमध्ये आढळणारा विशेष भेदही स्पष्ट होईल. आता येथे प्रश्न पडतो की, कामावचर कुशल चित्तांप्रमाणे येथे ससंखारिक आणि असंखारिक असा भेद का घेतला नाही? कारण, केवळ समथ-भावनेच्या अभ्यासाने प्राप्त झालेले ध्यान हे 'ससंखारिक' आहे आणि मार्ग-प्राप्तीद्वारे प्राप्त झालेले ध्यान हे 'असंखारिक' आहे, असे म्हणता येऊ शकत नाही का? असे नाही; कारण मार्ग-प्राप्तीद्वारे सामर्थ्य रूपाने प्राप्त झालेल्या ध्यानाचा देखील नंतरच्या काळात परिकर्माच्या (पूर्व-तयारीच्या) बळावरच उदय होतो. म्हणून, परिकर्म नावाच्या पूर्व-अभिसंस्काराशिवाय केवळ पूर्व-पुण्याच्या (अधिकार) प्रभावाने कोणत्याही ध्यानाचा उदय होत नसल्यामुळे त्याला 'असंखारिक' असेही म्हणता येत नाही; आणि पूर्व-पुण्याशिवाय केवळ परिकर्म-अभिसंस्कारानेच ध्यानाचा उदय होत नसल्यामुळे त्याला 'ससंखारिक' असेही म्हणता येत नाही. अथवा, पूर्व-अभिसंस्काराच्या बळावरच उत्पन्न होणाऱ्या ध्यानाचा कधीही असंखारिक भाव संभवत नसल्यामुळे त्याला 'असंखारिक' असे म्हटले नाही, आणि व्यभिचाराचा अभाव असल्यामुळे त्याला 'ससंखारिक' असेही म्हटले नाही. ပိ-သဒ္ဒေန စေတ္ထ စတုက္ကပဉ္စကနယဝသေန သုဒ္ဓိကနဝကော, တဉ္စ ဒုက္ခပ္ပဋိပဒါဒန္ဓာဘိညာဒုက္ခပ္ပဋိပဒါခိပ္ပာဘိညာသုခပ္ပဋိပဒါဒန္ဓာဘိညာသုခပ္ပဋိပဒါခိပ္ပာဘိညာဝသေန ပဋိပဒါစတုက္ကေန ယောဇေတွာ ဒေသိတတ္တာ စတ္တာရော နဝကာ, ပရိတ္တံ ပရိတ္တာရမ္မဏံ, ပရိတ္တံ အပ္ပမာဏာရမ္မဏံ, အပ္ပမာဏံ ပရိတ္တာရမ္မဏံ, အပ္ပမာဏံ အပ္ပမာဏာရမ္မဏန္တိ အာရမ္မဏစတုက္ကေန ယောဇိတတ္တာ စတ္တာရော နဝကာ, ‘‘ဒုက္ခပ္ပဋိပဒံ ဒန္ဓာဘိညံ ပရိတ္တံ ပရိတ္တာရမ္မဏံ, ဒုက္ခပ္ပဋိပဒံ ဒန္ဓာဘိညံ ပရိတ္တံ အပ္ပမာဏာရမ္မဏ’’န္တျာဒိနာ အာရမ္မဏပ္ပဋိပဒါမိဿကနယဝသေန သောဠသ နဝကာတိ ပဉ္စဝီသတိ နဝကာတိ ဧဝမာဒိဘေဒံ သင်္ဂဏှာတိ. आणि येथे 'पि' (सुद्धा) या शब्दाने चतुष्क आणि पंचक पद्धतीनुसार 'शुद्धिक-नवक' ग्रहण केला जातो. त्या शुद्धिक-नवकाला दुःख-प्रतिपदा दंधाभिज्ञा, दुःख-प्रतिपदा खिप्पाभिज्ञा, सुख-प्रतिपदा दंधाभिज्ञा आणि सुख-प्रतिपदा खिप्पाभिज्ञा या चार प्रतिपदांशी जोडून उपदेशिल्यामुळे चार नवक होतात. तसेच परित्त (मर्यादित) परित्त-आलंबन, परित्त अप्रमाण-आलंबन, अप्रमाण परित्त-आलंबन आणि अप्रमाण अप्रमाण-आलंबन या चार आलंबनांशी जोडल्यामुळे चार नवक होतात. आणि 'दुःख-प्रतिपदा दंधाभिज्ञा परित्त परित्त-आलंबन', 'दुःख-प्रतिपदा दंधाभिज्ञा परित्त अप्रमाण-आलंबन' इत्यादी प्रकारे आलंबन आणि प्रतिपदा यांच्या मिश्र पद्धतीनुसार सोळा नवक होतात. अशा प्रकारे एकूण पंचवीस नवक इत्यादी भेदांचा यात संग्रह होतो. ၂၂. ဈာနဝိသေသေန နိဗ္ဗတ္တိတဝိပါကော ဧကန္တတော တံတံဈာနသဒိသောဝါတိ ဝိပါကံ ဈာနသဒိသမေဝ ဝိဘတ္တံ. ဣမမေဝ ဟိ အတ္ထံ ဒီပေတုံ ဘဂဝတာ ဝိပါကနိဒ္ဒေသေပိ ကုသလံ ဥဒ္ဒိသိတွာဝ တဒနန္တရံ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဝိပါကာ ဝိဘတ္တာ. २२. ध्यान-विशेषाने उत्पन्न होणारा विपाक हा निश्चितपणे त्या-त्या ध्यानासारखाच असतो, म्हणून विपाक चित्ताचे वर्गीकरण ध्यानासारखेच केले गेले आहे. हाच अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी भगवंतांनी विपाक-निर्देशामध्ये देखील कुशल चित्ताचा उल्लेख करूनच, त्यानंतर लगेच महग्गत आणि लोकोत्तर विपाक चित्तांचे वर्गीकरण केले आहे. ၂၅. ရူပါဝစရမာနသံ ဈာနဘေဒေန ပဉ္စဟိ စတူဟိ တီဟိ ဒွီဟိ ပုန ဒွီဟိ ဈာနင်္ဂေဟိ သမ္ပယောဂဘေဒေန ပဉ္စဓာ ပဉ္စင်္ဂိကံ စတုရင်္ဂိကံ တိဝင်္ဂိကံ ဒုဝင်္ဂိကံ ပုန ဒုဝင်္ဂိကန္တိ ပဉ္စဝိဓံ ဟောတိ အဝိသေသေန, ပုန တံ ပုညပါကကိရိယာနံ ပစ္စေကံ ပဉ္စန္နံ ပဉ္စန္နံ ဘေဒါ ပဉ္စဒသဓာ ဘဝေတျတ္ထော. २५. रूपावचर चित्त हे ध्यानाच्या भेदानुसार पाच, चार, three, दोन आणि पुन्हा दोन ध्यान-अंगांच्या संप्रयोगाच्या भेदाने पंचविध होते - पंचअंगिक, चतुरअंगिक, त्रिअंगिक, द्विअंगिक आणि पुन्हा द्विअंगिक. सामान्यतः हे पाच प्रकारचे असून, पुन्हा ते पुण्य (कुशल), विपाक आणि क्रिया यांच्या प्रत्येकी पाच-पाच भेदांमुळे एकूण पंधरा प्रकारचे होते, असा अर्थ आहे. ရူပါဝစရစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रूपावचर चित्त वर्णन समाप्त झाले। အရူပါဝစရစိတ္တဝဏ္ဏနာ अरूपावचर चित्त वर्णन ၂၆. ဣဒါနိ [Pg.95] အရူပါဝစရံ အာရမ္မဏဘေဒေန စတုဓာ ဝိဘဇိတွာ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘အာကာသာနဉ္စာယတနာ’’တိအာဒိ. တတ္ထ ဥပ္ပာဒါဒိအန္တရဟိတတာယ နာဿ အန္တောတိ အနန္တံ, အာကာသဉ္စ တံ အနန္တဉ္စာတိ အာကာသာနန္တံ, ကသိဏုဂ္ဃာဋိမာကာသော. ‘‘အနန္တာကာသ’’န္တိ စ ဝတ္တဗ္ဗေ ‘‘အဂျာဟိတော’’တျာဒီသု ဝိယ ဝိသေသနဿ ပရနိပါတဝသေန ‘‘အာကာသာနန္တ’’န္တိ ဝုတ္တံ. အာကာသာနန္တမေဝ အာကာသာနဉ္စံ သကတ္ထေ ဘာဝပစ္စယဝသေန. အာကာသာနဉ္စမေဝ အာယတနံ သသမ္ပယုတ္တဓမ္မဿ ဈာနဿ အဓိဋ္ဌာနဋ္ဌေန ဒေဝါနံ ဒေဝါယတနံ ဝိယာတိ အာကာသာနဉ္စာယတနံ. တသ္မိံ အပ္ပနာပ္ပတ္တံ ပဌမာရုပ္ပဇ္ဈာနမ္ပိ ဣဓ ‘‘အာကာသာနဉ္စာယတန’’န္တိ ဝုတ္တံ ယထာ ပထဝီကသိဏာရမ္မဏံ ဈာနံ ‘‘ပထဝီကသိဏ’’န္တိ. အထ ဝါ အာကာသာနဉ္စံ အာယတနံ အဿာတိ အာကာသာနဉ္စာယတနံ, ဈာနံ, တေန သမ္ပယုတ္တံ ကုသလစိတ္တံ အာကာသာနဉ္စာယတနကုသလစိတ္တံ. २६. आता अरूपावचर चित्ताचे आलंबन-भेदानुसार चार प्रकारे वर्गीकरण करून दाखवताना भगवंत 'आकासानञ्चायतन' इत्यादी म्हणाले. त्यामध्ये, उत्पत्ती इत्यादींच्या अभावामुळे ज्याला अंत नाही ते 'अनंत' होय. ते आकाश आणि अनंत असल्यामुळे 'आकासानंत' म्हटले जाते, जे कसिण काढून घेतलेले आकाश आहे. 'अनंताकास' असे म्हणायचे असताना, 'अज्याहित' इत्यादी शब्दांप्रमाणे विशेषणाचा परनिपात (नंतर येणे) झाल्यामुळे 'आकासानंत' असे म्हटले गेले आहे. 'आकासानंत' हेच स्वार्थामध्ये भाव-प्रत्यय लागल्यामुळे 'आकासानञ्च' बनते. हे 'आकासानञ्च' हेच संप्रयुक्त धर्मांसह ध्यानाचे अधिष्ठान असल्यामुळे, जसे देवांचे अधिष्ठान 'देवालय' (देवायतन) असते, तसे 'आकासानञ्चायतन' म्हटले जाते. त्या आलंबनावर अर्पणा-प्राप्त झालेल्या पहिल्या अरूपावचर ध्यानाला देखील येथे 'आकासानञ्चायतन' म्हटले गेले आहे, ज्याप्रमाणे पृथ्वीकसिण-आलंबन असलेल्या ध्यानाला 'पृथ्वीकसिण' म्हटले जाते. अथवा, 'आकासानञ्च' हे ज्याचे आयतन (आलंबन) आहे ते 'आकासानञ्चायतन' (ध्यान) होय, आणि त्या ध्यानाने संप्रयुक्त असलेले कुशल चित्त म्हणजे 'आकासानञ्चायतनकुशलचित्त' होय. ဝိညာဏမေဝ အနန္တံ ဝိညာဏာနန္တံ, ပဌမာရုပ္ပဝိညာဏံ. တဉှိ ဥပ္ပာဒါဒိအန္တဝန္တမ္ပိ အနန္တာကာသေ ပဝတ္တနတော အတ္တာနံ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တာယ ဘာဝနာယ ဥပ္ပာဒါဒိအန္တံ အဂ္ဂဟေတွာ အနန္တတော ဖရဏဝသေန ပဝတ္တနတော စ ‘‘အနန္တ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. ဝိညာဏာနန္တမေဝ ဝိညာဏဉ္စံ အာကာရဿ ရဿတ္တံ, န-ကာရဿ လောပဉ္စ ကတွာ. ဒုတိယာရုပ္ပဝိညာဏေန ဝါ အဉ္စိတဗ္ဗံ ပါပုဏိတဗ္ဗန္တိ ဝိညာဏဉ္စံ, တဒေဝ အာယတနံ ဒုတိယာရုပ္ပဿ အဓိဋ္ဌာနတ္တာတိ ဝိညာဏဉ္စာယတနံ. သေသံ ပုရိမသမံ. विज्ञानच अनंत आहे, म्हणून 'विज्ञाणानन्त' (अनंत विज्ञान) म्हणजेच प्रथम अरूप विज्ञान होय. कारण ते (प्रथम अरूप विज्ञान) जरी उत्पाद (उत्पत्ती) इत्यादी मर्यादांनी युक्त असले, तरी मर्यादा नसलेल्या अनंत आकाशात आलंबन रूपाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे, तसेच स्वतःला आलंबन बनवून प्रवृत्त होणाऱ्या (द्वितीय अरूप) भावनेच्या उत्पाद-भंगादी मर्यादांचे ग्रहण न करता, अनंत रूपाने पसरण्याच्या (प्रसारित करण्याच्या) सामर्थ्याने प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्याला 'अनंत' असे म्हटले जाते. 'विज्ञाणानन्त' या शब्दातील 'आ' काराचा र्हस्व करून आणि 'न' काराचा लोप करून 'विज्ञाणञ्च' असा शब्द बनतो. किंवा द्वितीय अरूप विज्ञानाद्वारे आलंबन रूपाने प्राप्त होण्यायोग्य असल्यामुळे त्याला 'विज्ञाणञ्च' म्हणतात. तेच (विज्ञाणञ्च) द्वितीय अरूप ध्यानाचे अधिष्ठान (स्थान) असल्यामुळे 'विज्ञाणञ्चायतन' (विज्ञाणंचायतन) म्हटले जाते. उर्वरित स्पष्टीकरण पूर्वीप्रमाणेच आहे. နာဿ [Pg.96] ပဌမာရုပ္ပဿ ကိဉ္စနံ အပ္ပမတ္တကံ အန္တမသော ဘင်္ဂမတ္တမ္ပိ အဝသိဋ္ဌံ အတ္ထီတိ အကိဉ္စနံ, တဿ ဘာဝေါ အာကိဉ္စညံ, ပဌမာရုပ္ပဝိညာဏာဘာဝေါ. တဒေဝ အာယတနန္တျာဒိ ပုရိမသဒိသံ. त्या प्रथम अरूप विज्ञानाचा काहीही अंश, अगदी थोडासा, अगदी भंगापुरताही शिल्लक उरलेला नाही, म्हणून ते 'अकिंचन' होय. त्याचा भाव म्हणजे 'आकिंचन्य' (आकिञ्चञ्ञ), म्हणजेच प्रथम अरूप विज्ञानाचा अभाव असणारी अभाव-प्रज्ञप्ती होय. तेच आयतन (अधिष्ठान) आहे, इत्यादी स्पष्टीकरण पूर्वीप्रमाणेच आहे. ဩဠာရိကာယ သညာယ အဘာဝတော, သုခုမာယ စ သညာယ အတ္ထိတာယ နေဝဿ သသမ္ပယုတ္တဓမ္မဿ သညာ အတ္ထိ, နာပိ အသညံ အဝိဇ္ဇမာနသညန္တိ နေဝသညာနာသညံ, စတုတ္ထာရုပ္ပဇ္ဈာနံ. ဒီဃံ ကတွာ ပန ‘‘နေဝသညာနာသည’’န္တိ ဝုတ္တံ. နေဝသညာနာသညမေဝ အာယတနံ မနာယတနဓမ္မာယတနပရိယာပန္နတ္တာတိ နေဝသညာနာသညာယတနံ. အထ ဝါ သညာဝ ဝိပဿနာယ ဂေါစရဘာဝံ ဂန္တွာ နိဗ္ဗေဒဇနနသင်္ခါတဿ ပဋုသညာကိစ္စဿ အဘာဝတော နေဝသညာ စ ဥဏှောဒကေ တေဇောဓာတု ဝိယ သင်္ခါရာဝသေသသုခုမဘာဝေန ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ န အသညာတိ နေဝသညာနာသညာ, သာ ဧဝ အာယတနံ ဣမဿ သသမ္ပယုတ္တဓမ္မဿ ဈာနဿ နိဿယာဒိဘာဝတောတိ နေဝသညာနာသညာယတနံ. သညာဝသေန စေတ္ထ ဈာနူပလက္ခဏံ နိဒဿနမတ္တံ. ဝေဒနာဒယောပိ ဟိ တသ္မိံ ဈာနေ နေဝဝေဒနာနာဝေဒနာဒိကာယေဝါတိ. နေဝသညာနာသညာယတနေန သမ္ပယုတ္တံ ကုသလစိတ္တံ နေဝသညာနာသညာယတနကုသလစိတ္တံ. ပိ-သဒ္ဒေန စေတ္ထ အာရမ္မဏပ္ပဋိပဒါမိဿကနယဝသေန သောဠသက္ခတ္တုကဒေသနံ (ဓ. သ. ၂၆၅-၂၆၈), အညမ္ပိ စ ပါဠိယံ အာဂတနယဘေဒံ သင်္ဂဏှာတိ. स्थूल संज्ञेचा अभाव असल्यामुळे आणि सूक्ष्म संज्ञेचे अस्तित्व असल्यामुळे, संप्रयुक्त धर्मांसह असणाऱ्या या ध्यानात स्थूल संज्ञा नसते, आणि ती संज्ञा पूर्णपणे नसलेली (असंज्ञा) देखील नसते; म्हणून याला 'नेवसंज्ञानासंज्ञा' (नेवसञ्ञानासञ्ञा) असे चतुर्थ अरूप ध्यान म्हणतात. दीर्घ करून 'नेवसञ्ञानासञ्ञं' असे म्हटले आहे. नेवसंज्ञानासंज्ञा हेच मनायतन आणि धर्मायतन यामध्ये समाविष्ट असल्यामुळे 'आयतन' आहे, म्हणून 'नेवसंज्ञानासंज्ञायतन' म्हटले जाते. किंवा, संज्ञाच विपश्यनेचा विषय बनून निर्वेद (कंटाळा) उत्पन्न करण्याचे कार्य करणाऱ्या स्पष्ट संज्ञा-कार्याचा अभाव असल्यामुळे 'नेवसंज्ञा' आहे; आणि गरम पाण्यात तेजोधातू सूक्ष्म रूपाने विद्यमान असल्याप्रमाणे, उर्वरित सूक्ष्म संस्कारांच्या रूपाने संज्ञा विद्यमान असल्यामुळे ती 'असंज्ञा' देखील नाही, म्हणून 'नेवसंज्ञानासंज्ञा' म्हटले जाते. तीच संप्रयुक्त धर्मांसह असणाऱ्या या ध्यानाचा आश्रय इत्यादी असल्यामुळे आयतन आहे, म्हणून 'नेवसंज्ञानासंज्ञायतन' म्हटले जाते. येथे संज्ञेच्या आधारे ध्यानाचे लक्षण सांगणे हे केवळ एक उदाहरण मात्र आहे. कारण या ध्यानात वेदना इत्यादी संप्रयुक्त धर्म देखील 'नेववेदनानावेदना' इत्यादी स्वरूपाचेच असतात. नेवसंज्ञानासंज्ञायतनाशी संप्रयुक्त असणारे कुशल चित्त म्हणजे 'नेवसंज्ञानासंज्ञायतन कुशल चित्त' होय. येथे 'पि' (सुद्धा) या शब्दाने आलंबन आणि प्रतिपदेच्या मिश्र पद्धतीच्या आधारे सोळा वेळा उपदेशिलेल्या देशनेचे आणि पाळीमध्ये (पाळि ग्रंथात) आलेल्या इतर विविध पद्धतींचे ग्रहण केले जाते. ၃၀. အာရမ္မဏာနံ အတိက္ကမိတဗ္ဗာနံ, ကသိဏာကာသဝိညာဏတဒဘာဝသင်္ခါတာနံ အာလမ္ဗိတဗ္ဗာနဉ္စ အာကာသာဒိစတုန္နံ ဂေါစရာနံ ပဘေဒေန အာရုပ္ပမာနသံ စတုဗ္ဗိဓံ ဟောတိ. တဉှိ ယထာက္ကမံ ပဉ္စမဇ္ဈာနာရမ္မဏံ ကသိဏနိမိတ္တံ အတိက္ကမ္မ တဒုဂ္ဃာဋေန လဒ္ဓံ အာကာသမာလမ္ဗိတွာ တမ္ပိ အတိက္ကမ္မ တတ္ထ ပဝတ္တံ ဝိညာဏမာလမ္ဗိတွာ တမ္ပိ အတိက္ကမ္မ တဒဘာဝဘူတံ အကိဉ္စနဘာဝမာလမ္ဗိတွာ တမ္ပိ အတိက္ကမ္မ တတ္ထ ပဝတ္တံ တတိယာရုပ္ပဝိညာဏမာလမ္ဗိတွာ [Pg.97] ပဝတ္တတိ, န ပန ရူပါဝစရကုသလံ ဝိယ ပုရိမပုရိမအင်္ဂါတိက္ကမဝသေန ပုရိမပုရိမဿာပိ အာရမ္မဏံ ဂဟေတွာ. တေနာဟု အာစရိယာ – ३०. ओलांडून जाण्यायोग्य असणारी आलंबने—म्हणजे कसिण, आकाश, प्रथम अरूप विज्ञान आणि त्याचा अभाव; आणि ग्रहण करण्यायोग्य असणारी आलंबने—म्हणजे आकाश इत्यादी चार विषय; यांच्या भेदाने अरूप चित्त चार प्रकारचे असते. कारण ते (अरूप चित्त) अनुक्रमाने पाचव्या ध्यानाचे आलंबन असणाऱ्या कसिणनिमित्ताचे अतिक्रमण करून, त्या कसिणनिमित्ताला दूर केल्याने प्राप्त झालेल्या आकाशाला आलंबन बनवून प्रवृत्त होते; त्याचेही अतिक्रमण करून, त्या आकाशात प्रवृत्त झालेल्या विज्ञानाला (प्रथम अरूप विज्ञानाला) आलंबन बनवून प्रवृत्त होते; त्याचेही अतिक्रमण करून, त्या विज्ञानाचा अभाव असणाऱ्या अकिंचनभावाला आलंबन बनवून प्रवृत्त होते; आणि त्याचेही अतिक्रमण करून, त्या अभावावर प्रवृत्त झालेल्या तृतीय अरूप विज्ञानाला आलंबन बनवून प्रवृत्त होते. परंतु, रूपावचर कुशल चित्ताप्रमाणे पूर्वीच्या ध्यानांगांचे अतिक्रमण करण्याच्या पद्धतीने पूर्वीच्या ध्यानाचे आलंबन ग्रहण करून ते प्रवृत्त होत नाही. म्हणूनच आचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘အာရမ္မဏာတိက္ကမတော, စတဿောပိ ဘဝန္တိမာ; အင်္ဂါတိက္ကမမေတာသံ, န ဣစ္ဆန္တိ ဝိဘာဝိနော’’တိ; (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၂၆၈); "आलंबनाचे अतिक्रमण केल्यामुळे या चारही अरूप समापत्ती होतात. विद्वान लोक या समापत्तींमध्ये ध्यानांगांचे अतिक्रमण मानत नाहीत." အရူပါဝစရစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अरूपावचर चित्ताचे वर्णन समाप्त झाले. သောဘနစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. शोभन चित्ताचे वर्णन समाप्त झाले. လောကုတ္တရစိတ္တဝဏ္ဏနာ लोकोत्तर चित्ताचे वर्णन ၃၁. ဣဒါနိ လောကုတ္တရကုသလံ စတုမဂ္ဂယောဂတော, ဖလဉ္စ တဒနုရူပပ္ပဝတ္တိယာ စတုဓာ ဝိဘဇိတွာ ဒဿေတုံ ‘‘သောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. နိဗ္ဗာနံ ပတိသဝနတော ဥပဂမနတော, နိဗ္ဗာနမဟာသမုဒ္ဒနိန္နတာယ သောတသဒိသတ္တာ ဝါ ‘‘သောတော’’တိ ဝုစ္စတိ အရိယော အဋ္ဌင်္ဂိကော မဂ္ဂေါ, တဿ အာပတ္တိ အာဒိတော ပဇ္ဇနံ ပါပုဏနံ ပဌမသမန္နာဂမော သောတာပတ္တိ အာ-ဥပသဂ္ဂဿ အာဒိကမ္မနိ ပဝတ္တနတော. နိဗ္ဗာနံ မဂ္ဂေတိ, နိဗ္ဗာနတ္ထိကေဟိ ဝါ မဂ္ဂီယတိ, ကိလေသေ မာရေန္တော ဂစ္ဆတီတိ ဝါ မဂ္ဂေါ, တေန သမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ မဂ္ဂစိတ္တံ, သောတာပတ္တိယာ လဒ္ဓံ မဂ္ဂစိတ္တံ သောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ. အထ ဝါ အရိယမဂ္ဂသောတဿ အာဒိတော ပဇ္ဇနံ ဧတဿာတိ သောတာပတ္တိ, ပုဂ္ဂလော, တဿ မဂ္ဂေါ သောတာပတ္တိမဂ္ဂေါ, တေန သမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ သောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ. ३१. आता लोकोत्तर कुशल चित्ताला चार मार्गांच्या योगाने आणि फल चित्ताला त्याच्या अनुरूप प्रवृत्तीने चार प्रकारे विभागून दाखवण्यासाठी 'स्रोतापत्ती मार्ग चित्त' इत्यादी म्हटले आहे. निर्वाणाप्रत पोहोचवणारा असल्यामुळे, किंवा निर्वाणरूपी महासागराकडे झुकणारा असल्यामुळे पाण्याच्या प्रवाहासारखा (स्रोतासारखा) असणारा 'आर्य अष्टांगिक मार्ग' हा 'स्रोत' (सोत) म्हटला जातो. त्या स्रोताप्रत पोहोचणे, म्हणजे सुरुवातीला प्राप्त होणे, प्रथमच त्याच्याशी युक्त होणे, याला 'स्रोतापत्ती' म्हणतात; कारण 'आ' हा उपसर्ग 'सुरुवातीचे कार्य' या अर्थी प्रवृत्त होतो. जो निर्वाणाचा शोध घेतो, किंवा निर्वाणाची इच्छा करणाऱ्यांद्वारे ज्याचा शोध घेतला जातो, किंवा क्लेशांचा नाश करत जो पुढे जातो, तो 'मार्ग' होय. त्या मार्गाशी संप्रयुक्त असणारे चित्त म्हणजे 'मार्ग चित्त' होय. स्रोतापत्तीने प्राप्त झालेले मार्ग चित्त म्हणजे 'स्रोतापत्ती मार्ग चित्त' होय. किंवा, ज्याला आर्य मार्ग रूपी स्रोताची सुरुवातीला प्राप्ती होते, तो पुद्गल (व्यक्ती) 'स्रोतापन्न' होय. त्याचा मार्ग म्हणजे 'स्रोतापत्ती मार्ग' होय. त्याच्याशी संप्रयुक्त असणारे चित्त म्हणजे 'स्रोतापत्ती मार्ग चित्त' होय. သကိံ ဧကဝါရံ ပဋိသန္ဓိဝသေန ဣမံ မနုဿလောကံ အာဂစ္ဆတီတိ သကဒါဂါမီ, ဣဓ ပတွာ ဣဓ ပရိနိဗ္ဗာယီ, တတ္ထ ပတွာ တတ္ထ ပရိနိဗ္ဗာယီ, ဣဓ ပတွာ တတ္ထ ပရိနိဗ္ဗာယီ, တတ္ထ ပတွာ ဣဓ ပရိနိဗ္ဗာယီ, ဣဓ ပတွာ တတ္ထ နိဗ္ဗတ္တိတွာ ဣဓ ပရိနိဗ္ဗာယီတိ ပဉ္စသု သကဒါဂါမီသု ပဉ္စမကော ဣဓာဓိပ္ပေတော. သော ဟိ ဣတော [Pg.98] ဂန္တွာ ပုန သကိံ ဣဓ အာဂစ္ဆတီတိ. တဿ မဂ္ဂေါ သကဒါဂါမိမဂ္ဂေါ. ကိဉ္စာပိ မဂ္ဂသမင်္ဂိနော တထာဂမနာသမ္ဘဝတော ဖလဋ္ဌောယေဝ သကဒါဂါမီ နာမ, တဿ ပန ကာရဏဘူတော ပုရိမုပ္ပန္နော မဂ္ဂေါ မဂ္ဂန္တရာဝစ္ဆေဒနတ္ထံ ဖလဋ္ဌေန ဝိသေသေတွာ ဝုစ္စတိ ‘‘သကဒါဂါမိမဂ္ဂေါ’’တိ. ဧဝံ အနာဂါမိမဂ္ဂေါတိ. သကဒါဂါမိမဂ္ဂေန သမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ သကဒါဂါမိမဂ္ဂစိတ္တံ. जो प्रतिसंधीच्या (पुनर्जन्माच्या) रूपाने या मनुष्यलोकात केवळ एकदाच परत येतो, तो 'सकृदागामी' होय. १) येथे (मनुष्यलोकात) सकृदागामी पद प्राप्त करून येथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारा, २) तेथे (देवलोकात) प्राप्त करून तेथेच परिनिर्वाण प्राप्त करणारा, ३) येथे प्राप्त करून तेथे परिनिर्वाण प्राप्त करणारा, ४) तेथे प्राप्त करून येथे परिनिर्वाण प्राप्त करणारा, आणि ५) येथे प्राप्त करून तेथे जन्म घेऊन पुन्हा येथे परिनिर्वाण प्राप्त करणारा—अशा पाच प्रकारच्या सकृदागामी पुद्गलांमध्ये, पाचवा पुद्गल येथे अभिप्रेत आहे. कारण तो येथून जाऊन पुन्हा एकदा या मनुष्यलोकात परत येतो. त्याचा मार्ग म्हणजे 'सकृदागामी मार्ग' होय. जरी मार्गाने युक्त असणाऱ्या पुद्गलाचे तसे परत येणे असंभव असल्यामुळे केवळ फलस्थ (फलात स्थित असणारा) पुद्गलच खऱ्या अर्थाने 'सकृदागामी' म्हटला जातो, तरीही त्याच्या फलप्राप्तीचे कारण असणारा आणि आधी उत्पन्न झालेला मार्ग, इतर मार्गांपासून वेगळा दाखवण्यासाठी फलस्थ पुद्गलाच्या आधारे विशेषित करून 'सकृदागामी मार्ग' असा म्हटला जातो. याचप्रमाणे 'अनागामी मार्ग' असेही म्हटले जाते. सकृदागामी मार्गाशी संप्रयुक्त असणारे चित्त म्हणजे 'सकृदागामी मार्ग चित्त' होय. ပဋိသန္ဓိဝသေန ဣမံ ကာမဓာတုံ န အာဂစ္ဆတီတိ အနာဂါမီ, တဿ မဂ္ဂေါ အနာဂါမိမဂ္ဂေါ, တေန သမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ အနာဂါမိမဂ္ဂစိတ္တံ. အဂ္ဂဒက္ခိဏေယျဘာဝေန ပူဇာဝိသေသံ အရဟတီတိ အရဟာ, အထ ဝါ ကိလေသသင်္ခါတာ အရယော, သံသာရစက္ကဿ ဝါ အရာ ကိလေသာ ဟတာ အနေနာတိ အရဟာ, ပါပကရဏေ ရဟာဘာဝတော ဝါ အရဟာ, အဋ္ဌမကော အရိယပုဂ္ဂလော, တဿ ဘာဝေါ အရဟတ္တံ, စတုတ္ထဖလဿေတံ အဓိဝစနံ, တဿ အာဂမနဘူတော မဂ္ဂေါ အရဟတ္တမဂ္ဂေါ, တေန သမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ အရဟတ္တမဂ္ဂစိတ္တံ. जो प्रतिसंधीच्या रूपाने या कामधातूमध्ये परत येत नाही, तो 'अनागामी' होय. त्याचा मार्ग म्हणजे 'अनागामी मार्ग' होय. त्याच्याशी संप्रयुक्त असणारे चित्त म्हणजे 'अनागामी मार्ग चित्त' होय. जो सर्वश्रेष्ठ दक्षिणेय (दान स्वीकारण्यास योग्य) असल्यामुळे विशेष पूजेस पात्र असतो, तो 'अर्हत' होय. किंवा, ज्याने क्लेशरूपी शत्रूंचा (अरींचा) नाश केला आहे, किंवा ज्याने संसारचक्राचे आरे (अरा) असणाऱ्या क्लेशांचा नाश केला आहे, तो 'अर्हत' होय. किंवा, पापकृत्य करण्यासाठी ज्याच्याकडे कोणतीही गुप्त जागा नसते, तो 'अर्हत' होय. हा आठवा आर्य पुद्गल होय. त्याचा भाव म्हणजे 'अर्हत्व' होय. हे चौथ्या फलाचे नाव आहे. त्या अर्हत्व फलाची प्राप्ती करून देणारा मार्ग म्हणजे 'अर्हत्व मार्ग' होय. त्याच्याशी संप्रयुक्त असणारे चित्त म्हणजे 'अर्हत्व मार्ग चित्त' होय. ပိ-သဒ္ဒေန ဧကေကဿ မဂ္ဂဿ နယသဟဿဝသေန စတုန္နံ စတုသဟဿဘေဒံ သစ္စဝိဘင်္ဂေ (ဝိဘ. ၂၀၆; ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၀၆-၂၁၄) အာဂတံ သဋ္ဌိသဟဿဘေဒံ နယံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တနယေန အနေကဝိဓတ္တမ္ပိ သင်္ဂဏှာတိ. တတ္ထာယံ နယသဟဿမတ္တပရိဒီပနာ, ကထံ? သောတာပတ္တိမဂ္ဂေါ တာဝ ဈာနနာမေန ပဋိပဒါဘေဒံ အနာမသိတွာ ကေဝလံ သုညတော အပ္ပဏိဟိတောတိ ဒွိဓာ ဝိဘတ္တော, ပုန ပဋိပဒါစတုက္ကေန ယောဇေတွာ ပစ္စေကံ စတုဓာ ဝိဘတ္တောတိ ဧဝံ ဈာနနာမေန ဒသဓာ ဝိဘတ္တော. တထာ မဂ္ဂသတိပဋ္ဌာနသမ္မပ္ပဓာနဣဒ္ဓိပါဒဣန္ဒြိယဗလဗောဇ္ဈင်္ဂသစ္စသမထဓမ္မခန္ဓအာယတနဓာတုအာဟာရဖဿဝေဒနာသညာစေတနာစိတ္တနာမေဟိပိ ပစ္စေကံ ဒသဒသာကာရေဟိ ဝိဘတ္တော တထာ တထာ ဗုဇ္ဈနကာနံ ပုဂ္ဂလာနံ ဝသေန. တသ္မာ [Pg.99] ဈာနဝသေန ဒသမဂ္ဂါဒီနံ ဧကူနဝီသတိယာ ဝသေန ဒသ ဒသာတိ ဝီသတိယာ ဌာနေသု ဒွေ နယသတာနိ ဟောန္တိ. ပုန တာနိ စတူဟိ အဓိပတီဟိ ယောဇေတွာ ပစ္စေကံ စတုဓာ ဝိဘတ္တာနီတိ ဧဝံ အဓိပတီဟိ အမိဿေတွာ ဒွေ သတာနိ, မိဿေတွာ အဋ္ဌ သတာနီတိ သောတာပတ္တိမဂ္ဂေ နယသဟဿံ ဟောတိ, တထာ သကဒါဂါမိမဂ္ဂါဒီသုပိ. 'पि'-शब्दाने (अपि या शब्दाने) प्रत्येक मार्गाच्या एक हजार नयांच्या (पद्धतींच्या) आधारे चार मार्गांचे चार हजार भेद, तसेच 'सच्चविभंग' (सत्यविभंग) मध्ये आलेले साठ हजार भेद आणि खाली सांगितलेल्या पद्धतीने इतर अनेक प्रकारांचाही संग्रह (समावेश) होतो. त्यामध्ये, ही केवळ एक हजार नयांची स्पष्टता आहे, ती कशी? सर्वप्रथम, सोतापत्तिमार्ग हा ध्यानाच्या नावाने, प्रतिपदेच्या भेदाचा उल्लेख न करता, केवळ 'सुञ्ञत' (शून्यत) आणि 'अप्पणिहित' अशा दोन प्रकारे विभागला गेला आहे. पुन्हा चार प्रतिपदांशी जोडून प्रत्येक चार प्रकारे विभागला गेल्याने, अशा प्रकारे ध्यानाच्या नावाने तो दहा प्रकारे विभागला गेला आहे. त्याचप्रमाणे मार्ग, सतिपट्ठान, सम्मप्पधान, इद्धिपाद, इन्द्रिय, बल, बोज्झङ्ग, सच्च, समथ, धम्मक्खन्ध, आयतन, धातु, आहार, फस्स, वेदना, सञ्ञा, चेतना आणि चित्त या नावांनी देखील प्रत्येकी दहा-दहा प्रकारांनी, त्या त्या प्रकारे सत्य जाणणाऱ्या पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) क्षमतेनुसार विभागले गेले आहे. म्हणून, ध्यानाच्या प्रभावाने दहा, आणि मार्गादी एकोणीस स्थानांच्या प्रभावाने प्रत्येकी दहा-दहा, अशा प्रकारे वीस स्थानांमध्ये दोनशे नय होतात. पुन्हा त्यांना चार अधिपतींशी जोडून प्रत्येकी चार प्रकारे विभागले गेले आहे. अशा प्रकारे अधिपतींशी न मिसळता दोनशे आणि मिसळून आठशे मिळून सोतापत्तिमार्गात एक हजार नय होतात. याचप्रमाणे सकदागामी मार्गादींमध्येही समजावे. ၃၂. သောတာပတ္တိယာ လဒ္ဓံ, သောတာပတ္တိဿ ဝါ ဖလစိတ္တံ ဝိပါကဘူတံ စိတ္တံ သောတာပတ္တိဖလစိတ္တံ. အရဟတ္တဉ္စ တံ ဖလစိတ္တဉ္စာတိ အရဟတ္တဖလစိတ္တံ. ३२. सोतापत्तीने (प्रवाहामध्ये पहिल्यांदा प्रवेश केल्याने) प्राप्त झालेले, किंवा सोतापन्न पुद्गलाचे विपाकरूप असलेले फलचित्त म्हणजे 'सोतापत्तिfluxचित्त' (सोतापत्तिफलचित्त) होय. जे अरहंतपदही आहे आणि फलचित्तही आहे, ते 'अरहत्तफलचित्त' होय. ၃၄. စတုမဂ္ဂပ္ပဘေဒေနာတိ ဣန္ဒြိယာနံ အပါဋဝပါဋဝတရတမဘေဒေန ဘိန္နသာမတ္ထိယတာယ သက္ကာယဒိဋ္ဌိဝိစိကိစ္ဆာသီလဗ္ဗတပရာမာသာနံ နိရဝသေသပ္ပဟာနံ ကာမရာဂဗျာပါဒါနံ တနုဘာဝါပါဒနံ တေသမေဝ နိရဝသေသပ္ပဟာနံ ရူပါရူပရာဂမာနုဒ္ဓစ္စာဝိဇ္ဇာနံ အနဝသေသပ္ပဟာနန္တိ ဧဝံ သံယောဇနပ္ပဟာနဝသေန စတုဗ္ဗိဓာနံ သောတာပတ္တိမဂ္ဂါဒီနံ အဋ္ဌင်္ဂိကမဂ္ဂါနံ သမ္ပယောဂဘေဒေန စတုမဂ္ဂသင်္ခါတံ လောကုတ္တရကုသလံ စတုဓာ ဟောတိ, ဝိပါကံ ပန တဿေဝ ကုသလဿ ဖလတ္တာ တဒနုရူပတော တထာ စတုဓာတိ ဧဝံ အနုတ္တရံ အတ္တနော ဥတ္တရိတရာဘာဝေန အနုတ္တရသင်္ခါတံ လောကုတ္တရံ စိတ္တံ အဋ္ဌဓာ မတန္တိ ယောဇနာ. ३४. 'चतुग्मग्गप्पभेदेन' (चार मार्गांच्या भेदाने) म्हणजे इंद्रियांच्या मंदता, तीक्ष्णता, अधिक तीक्ष्णता आणि अत्यंत तीक्ष्णता या भेदांमुळे भिन्न सामर्थ्य असल्यामुळे, सक्कायदिट्ठि (सत्कायदृष्टी), विचिकिच्छा (शंका) आणि सीलब्बतपरामास (शीलव्रतपरामर्श) यांचे पूर्णपणे प्रहाण करणे; कामराग आणि व्यापाद यांना दुर्बल करणे; त्यांचेच पूर्णपणे प्रहाण करणे; आणि रूपराग, अरूपराग, मान, उद्धच्च (औद्धत्य) व अविद्या यांचे पूर्णपणे प्रहाण करणे; अशा प्रकारे संयोजनांच्या प्रहाणाच्या आधारे चार प्रकारच्या सोतापत्तिमार्गादी अष्टांगिक मार्गांच्या संयोगाच्या भेदाने, चार मार्ग म्हणून ओळखले जाणारे लोकोत्तर कुशल चित्त चार प्रकारचे होते. परंतु, विपाक चित्त हे त्याच कुशल चित्ताचे फल असल्यामुळे, त्याला अनुरूप असे चार प्रकारचे असते. अशा प्रकारे, स्वतःपेक्षा श्रेष्ठ इतर काहीही नसल्यामुळे 'अनुत्तर' म्हटले जाणारे लोकोत्तर चित्त आठ प्रकारचे मानले गेले आहे, अशी ही शब्दांची योजना आहे. ကိရိယာနုတ္တရဿ ပန အသမ္ဘဝတော ဒွါဒသဝိဓတာ န ဝုတ္တာ. ကသ္မာ ပန တဿ အသမ္ဘဝေါတိ? မဂ္ဂဿ ဧကစိတ္တက္ခဏိကတ္တာ. ယဒိ ဟိ မဂ္ဂစိတ္တံ ပုနပ္ပုနံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, တဒုပ္ပတ္တိယာ ကိရိယဘာဝေါ သက္ကာ ဝတ္တုံ. တံ ပန ကိလေသသမုစ္ဆေဒကဝသေနေဝ ဥပလဘိတဗ္ဗတော ဧကဝါရပ္ပဝတ္တေနေဝ စ တေန အသနိသမ္ပာတေန ဝိယ တရုအာဒီနံ သမူလဝိဒ္ဓံသနဿ တံတံကိလေသာနံ အစ္စန္တံ အပ္ပဝတ္တိယာ သာဓိတတ္တာ ပုန ဥပ္ပဇ္ဇမာနေပိ ကာတဗ္ဗာဘာဝတော ဒိဋ္ဌဓမ္မသုခဝိဟာရတ္ထဉ္စ ဖလသမာပတ္တိယာ ဧဝ [Pg.100] နိဗ္ဗာနာရမ္မဏဝသေန ပဝတ္တနတော န ကဒါစိ သေက္ခာနံ အသေက္ခာနံ ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. တသ္မာ နတ္ထိ သဗ္ဗထာပိ လောကုတ္တရကိရိယစိတ္တန္တိ. परंतु लोकोत्तर क्रिया चित्त संभवत नसल्यामुळे, बारा प्रकार सांगितले गेले नाहीत. पण त्याचा असंभव का आहे? मार्ग चित्त हे केवळ एकाच चित्तक्षणापुरते मर्यादित असल्यामुळे. कारण जर मार्ग चित्त वारंवार उत्पन्न झाले असते, तर त्याच्या उत्पत्तीमुळे क्रिया-भाव सांगता आला असता. परंतु ते क्लेशांचा समूळ उच्छेद करण्याच्या क्षमतेनेच प्राप्त होत असल्यामुळे, आणि ते केवळ एकदाच उत्पन्न होत असल्यामुळे—ज्याप्रमाणे वीज पडल्याने वृक्षादींचा मुळासकट नाश होतो, त्याप्रमाणे त्या त्या क्लेशांची अत्यंत अनुत्पत्ती साध्य होत असल्यामुळे—पुन्हा उत्पन्न झाले तरीही कोणतेही कर्तव्य उरत नसल्यामुळे, आणि दृष्टधर्मात (याच जन्मात) सुखाने विहार करण्यासाठी केवळ फलसमापत्तीच्या द्वारे निर्वाणाला आलंबन करून ते प्रवृत्त होत असल्यामुळे, ते कधीही शैक्ष किंवा अशैक्ष पुद्गलांच्या ठिकाणी उत्पन्न होत नाही. म्हणून, कोणत्याही प्रकारे लोकोत्तर क्रिया चित्त अस्तित्वात नाही. လောကုတ္တရစိတ္တဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. लोकोत्तर चित्त वर्णन समाप्त झाले. စိတ္တဂဏနသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ चित्तगणनासंग्रह वर्णन ၃၅. ‘‘ဒွါဒသာကုသလာနေဝ’’န္တျာဒိ ယထာဝုတ္တာနံ စတုဘူမိကစိတ္တာနံ ဂဏနသင်္ဂဟော. ३५. 'द्वादसाकुसलानेव' इत्यादी गाथा ही वर सांगितलेल्या चार भूमींमधील चित्तांच्या संख्येचा संक्षेप (संग्रह) आहे. ၃၆. ဧဝံ ဇာတိဝသေန သင်္ဂဟံ ဒဿေတွာ ပုန ဘူမိဝသေန ဒဿေတုံ ‘‘စတုပညာသဓာ ကာမေ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ကာမေ ဘဝေ စိတ္တာနိ စတုပညာသဓာ ဤရယေ, ရူပေ ဘဝေ ပန္နရသ ဤရယေ, အာရုပ္ပေ ဘဝေ ဒွါဒသ ဤရယေ, အနုတ္တရေ ပန နဝဝိဓေ ဓမ္မသမုဒါယေ စိတ္တာနိ အဋ္ဌဓာ ဤရယေ, ကထေယျာတျတ္ထော. ဧတ္ထ စ ကာမတဏှာဒိဝိသယဘာဝေန ကာမဘဝါဒိပရိယာပန္နာနိ စိတ္တာနိ သကသကဘူမိတော အညတ္ထ ပဝတ္တမာနာနိပိ ကာမဘဝါဒီသု စိတ္တာနီတိ ဝုတ္တာနိ, ယထာ မနုဿိတ္ထိယာ ကုစ္ဆိသ္မိံ နိဗ္ဗတ္တောပိ တိရစ္ဆာနဂတော တိရစ္ဆာနယောနိပရိယာပန္နတ္တာ တိရစ္ဆာနေသွေဝ သင်္ဂယှတိ. ကတ္ထစိ အပရိယာပန္နာနိ နဝဝိဓလောကုတ္တရဓမ္မသမူဟေကဒေသဘူတာနိ ‘‘ရုက္ခေ သာခါ’’တျာဒီသု ဝိယ အနုတ္တရေ စိတ္တာနီတိ ဝုတ္တာနိ. အထ ဝါ ‘‘ကာမေ, ရူပေ’’တိ စ ဥတ္တရပဒလောပနိဒ္ဒေသော. အရူပေ ဘဝါနိ အာရုပ္ပာနိ. နတ္ထိ ဧတေသံ ဥတ္တရံ စိတ္တန္တိ အနုတ္တရာနီတိ ဥပယောဂဗဟုဝစနဝသေန ကာမေ ကာမာဝစရာနိ စိတ္တာနိ စတုပညာသဓာ ဤရယေ, ရူပေ ရူပါဝစရာနိ စိတ္တာနိ ပန္နရသ ဤရယေ, အာရုပ္ပေ အာရုပ္ပာနိ စိတ္တာနိ ဒွါဒသ ဤရယေ. အနုတ္တရေ လောကုတ္တရာနိ စိတ္တာနိ အဋ္ဌဓာ ဤရယေတိ ဧဝမေတ္ထ သမ္ဗန္ဓော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ३६. अशा प्रकारे जातीच्या आधारे संग्रह दाखवून, पुन्हा भूमीच्या आधारे दाखवण्यासाठी 'चतुपञ्ञासधा कामे' इत्यादी म्हटले आहे. कामभवात चित्ते चोपन्न (५४) प्रकारची सांगावीत, रूपभवात पंधरा (१५) सांगावीत, अरूपभवात बारा (१२) सांगावीत, आणि नऊ प्रकारच्या अनुत्तर धर्मसमुदायात चित्ते आठ प्रकारची सांगावीत, असा अर्थ आहे. आणि येथे, कामतृष्णा इत्यादींचे विषय असल्यामुळे कामभवामध्ये समाविष्ट असलेली चित्ते, आपापल्या भूमीव्यतिरिक्त इतर भूमीत प्रवृत्त होत असली तरीही, त्यांना 'कामभवातील चित्ते' असे म्हटले गेले आहे; ज्याप्रमाणे मानवी स्त्रीच्या गर्भात जन्मलेला प्राणी देखील, तिर्यक योनीत समाविष्ट असल्यामुळे तिर्यक (प्राणी) वर्गातच गणला जातो. कोणत्याही भूमीत समाविष्ट नसलेली, नऊ प्रकारच्या लोकोत्तर धर्मसमूहाचा एक भाग असलेली चित्ते, 'वृक्षावर फांदी' याप्रमाणे 'अनुत्तर चित्ते' अशी म्हटली गेली आहेत. किंवा, 'कामे, रूपे' हे उत्तरपदलोप निर्देश आहेत. अरूप भूमीत उत्पन्न होणारी ती 'आरुप्प' (अरूप चित्ते) होत. ज्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ इतर कोणतेही चित्त नाही, ती 'अनुत्तर' होत. द्वितीया बहुवचनाच्या नियमानुसार, कामभूमीत कामावचर चित्ते चोपन्न प्रकारची सांगावीत, रूपभूमीत रूपावचर चित्ते पंधरा प्रकारची सांगावीत, अरूपभूमीत अरूप चित्ते बारा प्रकारची सांगावीत, आणि अनुत्तर भूमीत लोकोत्तर चित्ते आठ प्रकारची सांगावीत, अशा प्रकारे येथे संबंध समजून घ्यावा. ၃၇. ဣတ္ထံ [Pg.101] ယထာဝုတ္တေန ဇာတိဘေဒဘိန္နစတုဘူမိကစိတ္တဘေဒဝသေန ဧကူနနဝုတိပ္ပဘေဒံ ကတွာ မာနသံ စိတ္တံ ဝိစက္ခဏာ ဝိသေသေန အတ္ထစက္ခဏသဘာဝါ ပဏ္ဍိတာ ဝိဘဇန္တိ. အထ ဝါ ဧကဝီသသတံ ဧကုတ္တရဝီသာဓိကံ သတံ ဝိဘဇန္တိ. ३७. अशा प्रकारे वर सांगितलेल्या पद्धतीने, जातीच्या भेदाने भिन्न असलेल्या चार भूमींमधील चित्तांच्या भेदाच्या आधारे, चित्ताचे एकोणनव्वद (८९) प्रकार करून, अर्थाचे विशेष स्पष्टीकरण करण्याचा स्वभाव असलेले चतुर पंडित त्याचे वर्गीकरण करतात. किंवा, त्याचे एकशे एकवीस (१२१) प्रकारांमध्ये वर्गीकरण करतात. စိတ္တဂဏနသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. चित्तगणनासंग्रह वर्णन समाप्त झाले. ဝိတ္ထာရဂဏနဝဏ္ဏနာ विस्तृत गणना वर्णन ၃၈. ဈာနင်္ဂဝသေန ပဌမဇ္ဈာနသဒိသတ္တာ ပဌမဇ္ဈာနဉ္စ တံ သောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တဉ္စေတိ ပဌမဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တံ. ပါဒကဇ္ဈာနသမ္မသိတဇ္ဈာနပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယေသုပိ, ဟိ အညတရဝသေန တံတံဈာနသဒိသတ္တာ ဝိတက္ကာဒိအင်္ဂပါတုဘာဝေန စတ္တာရောပိ မဂ္ဂါ ပဌမဇ္ဈာနာဒိဝေါဟာရံ လဘန္တာ ပစ္စေကံ ပဉ္စဓာ ဝိဘဇန္တိ. တေနာဟ ‘‘ဈာနင်္ဂယောဂဘေဒေနာ’’တျာဒိ, တတ္ထ ပဌမဇ္ဈာနာဒီသု ယံ ယံ ဈာနံ သမာပဇ္ဇိတွာ တတော တတော ဝုဋ္ဌာယ သင်္ခါရေ သမ္မသန္တဿ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာ ပဝတ္တာ, တံ ပါဒကဇ္ဈာနံ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာယ ပဒဋ္ဌာနဘာဝတော. ယံ ယံ ဈာနံ သမ္မသန္တဿ သာ ပဝတ္တာ, တံ သမ္မသိတဇ္ဈာနံ. ‘‘အဟော ဝတ မေ ပဌမဇ္ဈာနသဒိသော မဂ္ဂေါ ပဉ္စင်္ဂိကော, ဒုတိယဇ္ဈာနာဒီသု ဝါ အညတရသဒိသော စတုရင်္ဂါဒိဘေဒေါ မဂ္ဂေါ ဘဝေယျာ’’တိ ဧဝံ ယောဂါဝစရဿ ဥပ္ပန္နဇ္ဈာသယော ပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယော နာမ. ३८. ध्यान अंगांच्या आधारे प्रथम ध्यानासारखे असल्यामुळे, जे प्रथम ध्यानही आहे आणि सोतापत्तिमार्ग चित्तही आहे, ते 'प्रथमध्यानसोतापत्तिमार्गचित्त' होय. कारण पादकध्यान (अधिष्ठान ध्यान), संमसितध्यान (परीक्षण ध्यान) आणि पुद्गल-अध्याशय (साधकाची इच्छा) यांपैकी कोणत्याही एकाच्या आधारे त्या त्या ध्यानाशी साम्य असल्यामुळे, वितर्क इत्यादी अंगांच्या प्रकटीकरणामुळे, चारही मार्ग 'प्रथमध्यान' इत्यादी संज्ञा प्राप्त करून प्रत्येकी पाच प्रकारे विभागले जातात. म्हणूनच 'झानङ्गयोगभेदेन' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, प्रथम ध्यानादींमध्ये ज्या ज्या ध्यानात समापन्न होऊन, त्या त्या ध्यानातून उठून संस्कारांचे परीक्षण करणाऱ्या साधकाच्या ठिकाणी उत्थानगामी विपश्यना (वुट्ठानगामिनी विपस्सना) प्रवृत्त होते, ते 'पादकध्यान' होय; कारण ते उत्थानगामी विपश्यनेचे निकटचे कारण असते. ज्या ज्या ध्यानाचे परीक्षण करताना ती प्रवृत्त होते, ते 'संमसितध्यान' होय. 'अहा! मला प्रथम ध्यानासारखा पाच अंगांचा मार्ग प्राप्त व्हावा, किंवा द्वितीय ध्यानादींपैकी एखाद्या ध्यानासारखा चार अंगांचा मार्ग प्राप्त व्हावा,' अशी योगावाचराच्या (साधकाच्या) मनात उत्पन्न झालेली इच्छा म्हणजे 'पुद्गल-अध्याशय' होय. တတ္ထ ယေန ပဌမဇ္ဈာနာဒီသု အညတရံ ဈာနံ သမာပဇ္ဇိတွာ တတော ဝုဋ္ဌာယ ပကိဏ္ဏကသင်္ခါရေ သမ္မသိတွာ မဂ္ဂေါ ဥပ္ပာဒိတော ဟောတိ, တဿ သော မဂ္ဂေါ ပဌမဇ္ဈာနာဒီသု တံတံပါဒကဇ္ဈာနသဒိသော ဟောတိ. သစေ ပန ဝိပဿနာပါဒကံ ကိဉ္စိ ဈာနံ နတ္ထိ, ကေဝလံ ပဌမဇ္ဈာနာဒီသု အညတရံ ဈာနံ သမ္မသိတွာ [Pg.102] မဂ္ဂေါ ဥပ္ပာဒိတော ဟောတိ, တဿ သော သမ္မသိတဇ္ဈာနသဒိသော ဟောတိ. ယဒါ ပန ယံ ကိဉ္စိ ဈာနံ သမာပဇ္ဇိတွာ တတော ဝုဋ္ဌာယ အညတရံ သမ္မသိတွာ မဂ္ဂေါ ဥပ္ပာဒိတော ဟောတိ, တဒါ ပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယဝသေန ဒွီသု အညတရသဒိသော ဟောတိ. သစေ ပန ပုဂ္ဂလဿ တထာဝိဓော အဇ္ဈာသယော နတ္ထိ, ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမဇ္ဈာနတော ဝုဋ္ဌာယ ဥပရူပရိဈာနဓမ္မေ သမ္မသိတွာ ဥပ္ပာဒိတမဂ္ဂေါ ပါဒကဇ္ဈာနံ အနပေက္ခိတွာ သမ္မသိတဇ္ဈာနသဒိသော ဟောတိ. ဥပရူပရိဈာနတော ပန ဝုဋ္ဌာယ ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမဇ္ဈာနဓမ္မေ သမ္မသိတွာ ဥပ္ပာဒိတမဂ္ဂေါ သမ္မသိတဇ္ဈာနံ အနပေက္ခိတွာ ပါဒကဇ္ဈာနသဒိသော ဟောတိ. ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမဇ္ဈာနတော ဟိ ဥပရူပရိဈာနံ ဗလဝတရန္တိ. ဝေဒနာနိယမော ပန သဗ္ဗတ္ထာပိ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာနိယမေန ဟောတိ. တထာ သုက္ခဝိပဿကဿ သကလဇ္ဈာနင်္ဂနိယမော. တဿ ဟိ ပါဒကဇ္ဈာနာဒီနံ အဘာဝေန တေသံ ဝသေန နိယမာဘာဝတော ဝိပဿနာနိယမေန ပဉ္စင်္ဂိကောဝ မဂ္ဂေါ ဟောတီတိ. အပိစ သမာပတ္တိလာဘိနောပိ ဈာနံ ပါဒကံ အကတွာ ပကိဏ္ဏကသင်္ခါရေ သမ္မသိတွာ ဥပ္ပာဒိတမဂ္ဂေါပိ ဝိပဿနာနိယမေနေဝ ပဉ္စင်္ဂိကောဝ ဟောတီတိ အယမေတ္ထ အဋ္ဌကထာဒိတော ဥဒ္ဓဋော ဝိနိစ္ဆယသာရော. ထေရဝါဒဒဿနာဒိဝသပ္ပဝတ္တော ပန ပပဉ္စော အဋ္ဌကထာဒီသု ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗော. ယထာ စေတ္ထ, ဧဝံ သဗ္ဗတ္ထာပိ ဝိတ္ထာရနယော တတ္ထ တတ္ထ ဝုတ္တနယေန ဂဟေတဗ္ဗော. ဂန္ထဘီရုကဇနာနုဂ္ဂဟတ္ထံ ပနေတ္ထ သင်္ခေပကထာ အဓိပ္ပေတာ. त्यामध्ये, ज्या व्यक्तीने प्रथम ध्यान इत्यादींपैकी एका ध्यानात समापन्न होऊन, त्यातून उठून, संकीर्ण संस्कारांचे संमर्शन (विपश्यना) करून मार्ग उत्पन्न केला आहे, त्याचा तो मार्ग प्रथम ध्यान इत्यादींमध्ये त्या त्या पादकध्यानासारखा (आधारभूत ध्यानासारखा) असतो. पण जर विपश्यनेचा आधार असणारे कोणतेही ध्यान नसेल, केवळ प्रथम ध्यान इत्यादींपैकी एका ध्यानाचे संमर्शन करून मार्ग उत्पन्न केला असेल, तर त्याचा तो मार्ग संमर्सितध्यानासारखा असतो. पण जेव्हा कोणत्याही एका ध्यानात समापन्न होऊन, त्यातून उठून, दुसऱ्या एखाद्या ध्यानाचे संमर्शन करून मार्ग उत्पन्न केला जातो, तेव्हा पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) आशयानुसार त्या दोन्हीपैकी एकासारखा तो मार्ग असतो. पण जर पुद्गलाचा तसा आशय नसेल, तर खालच्या खालच्या ध्यानातून उठून वरच्या वरच्या ध्यानधर्मांचे संमर्शन करून उत्पन्न झालेला मार्ग पादकध्यानाची अपेक्षा न करता संमर्सितध्यानासारखा असतो. परंतु वरच्या वरच्या ध्यानातून उठून खालच्या खालच्या ध्यानधर्मांचे संमर्शन करून उत्पन्न झालेला मार्ग संमर्सितध्यानाची अपेक्षा न करता पादकध्यानासारखा असतो. कारण खालच्या खालच्या ध्यानापेक्षा वरचे वरचे ध्यान अधिक बलवान असते. वेदनेचा नियम मात्र सर्व ठिकाणी व्युत्थानगामिनी विपश्यनेच्या नियमाने होतो. त्याचप्रमाणे शुष्कविपश्यकाचा संपूर्ण ध्यानांगांचा नियम असतो. कारण त्याच्या पादकध्यान इत्यादींच्या अभावामुळे, त्यांच्याद्वारे नियमन न होता, विपश्यनेच्या नियमाने पाच अंगांनी युक्त (पंचंगिक) असाच मार्ग होतो. शिवाय, समापत्ती प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचा देखील ध्यानाला पादक (आधार) न बनवता, संकीर्ण संस्कारांचे संमर्शन करून उत्पन्न झालेला मार्ग विपश्यनेच्या नियमानेच पंचंगिक होतो, हा येथे अट्ठकथा इत्यादींमधून उद्धृत केलेला निर्णयाचा सार आहे. थेरवादाचे दर्शन इत्यादींच्या प्रभावाने झालेला विस्तार मात्र अट्ठकथा इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावा. आणि जसे येथे आहे, तसेच सर्व ठिकाणी विस्तृत पद्धत त्या त्या ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीने ग्रहण करावी. परंतु येथे ग्रंथाच्या विस्ताराला घाबरणाऱ्या लोकांवर अनुग्रह करण्यासाठी संक्षिप्त कथन अभिप्रेत आहे. ၄၂. ယထာ ရူပါဝစရံ စိတ္တံ ပဌမာဒိပဉ္စဝိဓဈာနဘေဒေန ဂယှတိ ‘‘ပဌမဇ္ဈာန’’န္တျာဒိနာ ဝုစ္စတိ, တထာ အနုတ္တရမ္ပိ စိတ္တံ ‘‘ပဌမဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တ’’န္တျာဒိနာ ဂယှတိ. အာရုပ္ပဉ္စာပိ ဥပေက္ခေကဂ္ဂတာယောဂေန အင်္ဂသမတာယ ပဉ္စမဇ္ဈာနေ ဂယှတိ, ပဉ္စမဇ္ဈာနဝေါဟာရံ လဘတီတျတ္ထော. အထ ဝါ [Pg.103] ရူပါဝစရံ စိတ္တံ အနုတ္တရဉ္စ ပဌမာဒိဈာနဘေဒေ ‘‘ပဌမဇ္ဈာနကုသလစိတ္တံ, ပဌမဇ္ဈာနသောတာပတ္တိမဂ္ဂစိတ္တန္တျာဒိနာ ယထာ ဂယှတိ, တထာ အာရုပ္ပဉ္စာပိ ပဉ္စမေ ဈာနေ ဂယှတီတိ ယောဇနာ. အာစရိယဿာပိ ဟိ အယမေဝ ယောဇနာ အဓိပ္ပေတာတိ ဒိဿတိ နာမရူပပရိစ္ဆေဒေ ဥဇုကမေဝ တထာ ဝုတ္တတ္တာ. ဝုတ္တဉှိ တတ္ထ – ४२. ज्याप्रमाणे रूपावचर चित्त प्रथम इत्यादी पाच प्रकारच्या ध्यानांच्या भेदाने ग्रहण केले जाते आणि 'प्रथम ध्यान' इत्यादी शब्दांनी म्हटले जाते, तसेच अनुत्तर (लोकोत्तर) चित्त देखील 'प्रथमध्यान-सोतापत्तिमार्गचित्त' इत्यादी रूपाने ग्रहण केले जाते. अरूप ध्यान देखील उपेक्षा आणि एकाग्रतेच्या संयोगाने आणि अंगांच्या समानतेमुळे पाचव्या ध्यानात ग्रहण केले जाते, म्हणजेच ते पाचव्या ध्यानाचा व्यवहार (नाव) प्राप्त करते, असा अर्थ आहे. अथवा, रूपावचर चित्त आणि अनुत्तर चित्त प्रथम इत्यादी ध्यानभेदांमध्ये 'प्रथमध्यान-कुशलचित्त, प्रथमध्यान-सोतापत्तिमार्गचित्त' इत्यादी प्रकारे जसे ग्रहण केले जाते, तसेच अरूप ध्यान देखील पाचव्या ध्यानात ग्रहण केले जाते, अशी योजना (अन्वय) आहे. आचार्यांना देखील हीच योजना अभिप्रेत आहे असे दिसते, कारण 'नामरूपपरिच्छेद' ग्रंथात थेट तसे सांगितले आहे. तेथे म्हटले आहे की - ‘‘ရူပါဝစရစိတ္တာနိ, ဂယှန္တာနုတ္တရာနိ စ; ပဌမာဒိဈာနဘေဒေ, အာရုပ္ပဉ္စာပိ ပဉ္စမေ’’တိ. (နာမ. ပရိ. ၂၄); “रूपावचर चित्ते आणि अनुत्तर चित्ते प्रथम इत्यादी ध्यानभेदांमध्ये ग्रहण केली जातात, आणि अरूप ध्यान देखील पाचव्या ध्यानात ग्रहण केले जाते.” တသ္မာတိ ယသ္မာ ရူပါဝစရံ ဝိယ အနုတ္တရမ္ပိ ပဌမာဒိဈာနဘေဒေ ဂယှတိ, အာရုပ္ပဉ္စာပိ ပဉ္စမေ ဂယှတိ, ယသ္မာ ဝါ ဈာနင်္ဂယောဂဘေဒေန ဧကေကံ ပဉ္စဓာ ကတွာ အနုတ္တရံ စိတ္တံ စတ္တာလီသဝိဓန္တိ ဝုစ္စတိ, ရူပါဝစရလောကုတ္တရာနိ ဝိယ စ ပဌမာဒိဈာနဘေဒေ, တထာ အာရုပ္ပဉ္စာပိ ပဉ္စမေ ဂယှတိ, တသ္မာ ပဌမာဒိကမေကေကံ ဈာနံ လောကိယံ တိဝိဓံ, လောကုတ္တရံ အဋ္ဌဝိဓန္တိ ဧကာဒသဝိဓံ. အန္တေ တု ဈာနံ တေဝီသတိဝိဓံ တိဝိဓရူပါဝစရဒွါဒသဝိဓအရူပါဝစရအဋ္ဌလောကုတ္တရဝသေနာတျတ္ထော. म्हणूनच, ज्या अर्थी रूपावचर चित्ताप्रमाणे अनुत्तर चित्त देखील प्रथम इत्यादी ध्यानभेदांमध्ये ग्रहण केले जाते आणि अरूप ध्यान देखील पाचव्या ध्यानात ग्रहण केले जाते; किंवा ज्या अर्थी ध्यानांगांच्या संयोगाच्या भेदाने प्रत्येक अनुत्तर चित्ताला पाच प्रकारे विभागून ते चाळीस प्रकारचे आहे असे म्हटले जाते; आणि रूपावचर व लोकोत्तर चित्तांप्रमाणेच प्रथम इत्यादी ध्यानभेदांमध्ये, तसेच अरूप ध्यान देखील पाचव्या ध्यानात ग्रहण केले जाते; म्हणून प्रथम इत्यादी प्रत्येक ध्यान लौकिक तीन प्रकारचे आणि लोकोत्तर आठ प्रकारचे मिळून अकरा प्रकारचे होते. शेवटी मात्र ध्यान हे तेवीस प्रकारचे होते, ज्याचा अर्थ तीन रूपावचर, बारा अरूपावचर आणि आठ लोकोत्तर चित्तांच्या भेदाने असा आहे. ၄၃. ပါဒကဇ္ဈာနာဒိဝသေန ဂဏနဝုဍ္ဎိ ကုသလဝိပါကေသွေဝ သမ္ဘဝတီတိ တေသမေဝ ဂဏနံ ဧကဝီသသတဂဏနာယ အင်္ဂဘာဝေန ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘သတ္တတိံသာ’’တျာဒိ. ४३. पादकध्यान इत्यादींच्या आधारे संख्येची वाढ केवळ कुशल आणि विपाक चित्तांमध्येच संभवते, म्हणून त्यांचीच गणना १२१ चित्तांच्या गणनेचे अंग (कारण) म्हणून दर्शवताना 'सत्ततींसा' (सदतीस) इत्यादी म्हटले आहे. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंग्रहाची व्याख्या असणाऱ्या 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाच्या व्याख्येत - စိတ္တပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. चित्त-परिच्छेदाची व्याख्या समाप्त झाली. ၂. စေတသိကပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ २. चेतसिक-परिच्छेदाची व्याख्या သမ္ပယောဂလက္ခဏဝဏ္ဏနာ संप्रयोग-लक्षणाची व्याख्या ၁. ဧဝံ [Pg.104] တာဝ စိတ္တံ ဘူမိဇာတိသမ္ပယောဂသင်္ခါရဈာနာရမ္မဏမဂ္ဂဘေဒေန ယထာရဟံ ဝိဘဇိတွာ ဣဒါနိ စေတသိကဝိဘာဂဿ အနုပ္ပတ္တတ္တာ ပဌမံ တာဝ စတုဗ္ဗိဓသမ္ပယောဂလက္ခဏသန္ဒဿနဝသေန စေတသိကလက္ခဏံ ဌပေတွာ, တဒနန္တရံ အညသမာနအကုသလသောဘနဝသေန တီဟိ ရာသီဟိ စေတသိကဓမ္မေ ဥဒ္ဒိသိတွာ, တေသံ သောဠသဟာကာရေဟိ သမ္ပယောဂံ, တေတ္တိံသဝိဓေန သင်္ဂဟဉ္စ ဒဿေတုံ ‘‘ဧကုပ္ပာဒနိရောဓာ စာ’’တျာဒိ အာရဒ္ဓံ. စိတ္တေန သဟ ဧကတော ဥပ္ပာဒေါ စ နိရောဓော စ ယေသံ တေ ဧကုပ္ပာဒနိရောဓာ. ဧကံ အာလမ္ဗဏဉ္စ ဝတ္ထု စ ယေသံ တေ ဧကာလမ္ဗဏဝတ္ထုကာ. ဧဝံ စတူဟိ လက္ခဏေဟိ စေတောယုတ္တာ စိတ္တေန သမ္ပယုတ္တာ ဒွိပညာသ လက္ခဏာ ဓာရဏတော ဓမ္မာ နိယတယောဂိနော, အနိယတယောဂိနော စ စေတသိကာ မတာ. १. अशा प्रकारे, प्रथम चित्ताचे भूमी, जाती, संप्रयोग, संस्कार, ध्यान, आलंबन (विषय) आणि मार्ग यांच्या भेदाने योग्य प्रकारे वर्गीकरण करून, आता चेतसिकांच्या (मानसिक घटकांच्या) वर्गीकरणाची वेळ आल्यामुळे, सर्वप्रथम चार प्रकारच्या संप्रयोग-लक्षणांचे दर्शन घडवून चेतसिकांचे लक्षण प्रस्थापित केले आहे. त्यानंतर अन्यसमान, अकुशल आणि शोभन या तीन समूहांच्या (राशींच्या) आधारे चेतसिक धर्मांचे निर्देश करून, त्यांचा सोळा प्रकारांनी संप्रयोग आणि तेहतीस प्रकारांनी संग्रह दर्शवण्यासाठी 'एकुप्पादनिरोधा च' इत्यादी गाथा सुरू केली आहे. चित्तासोबत एकत्र उत्पन्न होणे आणि निरुद्ध (नष्ट) होणे ज्यांचे लक्षण आहे, ते 'एकुत्पाद-निरोध' (एकत्र उत्पन्न व निरुद्ध होणारे) होत. ज्यांचे आलंबन (विषय) आणि वस्तू (आश्रय) एकच आहे, ते 'एकालंबन-वस्तुक' होत. अशा प्रकारे, चार लक्षणांनी युक्त, चित्ताशी संप्रयुक्त (जोडलेले), स्वतःचे लक्षण धारण करणारे बावन्न धर्म हे नियतयोगी (नेहमी जोडलेले) आणि अनियतयोगी (कधीकधी जोडलेले) चेतसिक मानले जातात. တတ္ထ ယဒိ ဧကုပ္ပာဒမတ္တေနေဝ စေတောယုတ္တာတိ အဓိပ္ပေတာ, တဒါ စိတ္တေန သဟ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနံ ရူပဓမ္မာနမ္ပိ စေတောယုတ္တတာ အာပဇ္ဇေယျာတိ ဧကနိရောဓဂ္ဂဟဏံ. ဧဝမ္ပိ စိတ္တာနုပရိဝတ္တိနော ဝိညတ္တိဒွယဿ ပသင်္ဂေါ နသက္ကာ နိဝါရေတုံ, တထာ ‘‘ဧကတော ဥပ္ပာဒေါ ဝါ နိရောဓော ဝါ ဧတေသန္တိ ဧကုပ္ပာဒနိရောဓာ’’တိ ပရိကပ္ပေန္တဿ ပုရေတရမုပ္ပဇ္ဇိတွာ စိတ္တဿ ဘင်္ဂက္ခဏေ နိရုဇ္ဈမာနာနမ္ပိ ရူပဓမ္မာနန္တိ ဧကာလမ္ဗဏဂ္ဂဟဏံ. ယေ ဧဝံ တိဝိဓလက္ခဏာ, တေ နိယမတော ဧကဝတ္ထုယေဝါတိဒဿနတ္ထံ ဧကဝတ္ထုကဂ္ဂဟဏန္တိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. त्यामध्ये, जर केवळ एकत्र उत्पन्न होण्यानेच 'चित्ताशी संप्रयुक्त' असा अर्थ अभिप्रेत असता, तर चित्तासोबत उत्पन्न होणाऱ्या रूपधर्मांनाही चित्त-संप्रयुक्तता प्राप्त झाली असती, म्हणून 'एक-निरोध' (एकत्र निरुद्ध होणे) हा शब्द घेतला आहे. असे असूनही, चित्ताचे अनुवर्तन करणाऱ्या दोन विज्ञाप्तींचा (कायविज्ञप्ती व वचीविज्ञप्ती) संबंध टाळणे शक्य नाही; तसेच 'ज्यांचे एकत्र उत्पन्न होणे किंवा निरुद्ध होणे घडते ते एकुत्पाद-निरोध होत' अशी कल्पना करणाऱ्याच्या मते, चित्ताच्या आधी उत्पन्न होऊन चित्ताच्या भंगक्षणी निरुद्ध होणाऱ्या रूपधर्मांचाही संबंध टाळता येत नाही, म्हणून 'एक-आलंबन' (एकच विषय असणे) हा शब्द घेतला आहे. जे अशा प्रकारे तीन लक्षणांनी युक्त आहेत, ते नियमाने एकाच वस्तूवर (आश्रयावर) आधारित असतात, हे दर्शवण्यासाठी 'एक-वस्तुक' (एकच आशय असणे) हा शब्द घेतला आहे. त्यामुळे अतिशय विस्ताराची गरज नाही. သမ္ပယောဂလက္ခဏဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. संप्रयोग-लक्षणाची व्याख्या समाप्त झाली. အညသမာနစေတသိကဝဏ္ဏနာ अन्यसमान-चेतसिकांची व्याख्या ၂. ကထန္တိ [Pg.105] သရူပသမ္ပယောဂါကာရာနံ ကထေတုကမျတာပုစ္ဆာ. ဖုသတီတိ ဖဿော (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁ ဓမ္မုဒေသဝါရဖဿပဉ္စမကရာသိဝဏ္ဏနာ), သွာယံ ဖုသနလက္ခဏော. အယဉှိ အရူပဓမ္မောပိ သမာနော အာရမ္မဏေ ဖုသနာကာရေနေဝ ပဝတ္တတိ, သာ စဿ ဖုသနာကာရပ္ပဝတ္တိ အမ္ဗိလခါဒကာဒီနံ ပဿန္တဿ ပရဿ ခေဠုပ္ပာဒါဒိ ဝိယ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. ဝေဒယတိ အာရမ္မဏရသံ အနုဘဝတီတိ ဝေဒနာ, သာ ဝေဒယိတလက္ခဏာ. အာရမ္မဏရသာနုဘဝနဉှိ ပတွာ သေသသမ္ပယုတ္တဓမ္မာ ဧကဒေသမတ္တေနေဝ ရသံ အနုဘဝန္တိ, ဧကံသတော ပန ဣဿရဝတာယ ဝေဒနာဝ အနုဘဝတိ. တထာ ဟေသာ ‘‘သုဘောဇနရသာနုဘဝနကရာဇာ ဝိယာ’’တိ ဝုတ္တာ. သုခါဒိဝသေန ပနဿာ ဘေဒံ သယမေဝ ဝက္ခတိ. နီလာဒိဘေဒံ အာရမ္မဏံ သဉ္ဇာနာတိ သညံ ကတွာ ဇာနာတီတိ သညာ, သာ သဉ္ဇာနနလက္ခဏာ. သာ ဟိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ ဒါရုအာဒီသု ဝဍ္ဎကိအာဒီနံ သညာဏကရဏံ ဝိယ ပစ္ဆာ သဉ္ဇာနနဿ ကာရဏဘူတံ အာကာရံ ဂဟေတွာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. နိမိတ္တကာရိကာယ တာဝေတံ ယုဇ္ဇတိ, နိမိတ္တေန သဉ္ဇာနန္တိယာ ပန ကထန္တိ? သာပိ ပုန အပရာယ သညာယ သဉ္ဇာနနဿ နိမိတ္တံ အာကာရံ ဂဟေတွာ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ န ဧတ္ထ ကောစိ အသမ္ဘဝေါ. २. "कथं" (कसे?) हा प्रश्न पाच प्रकारच्या स्वरूप आणि संप्रयोगाच्या आकारांना सांगण्याच्या इच्छेने विचारलेला प्रश्न आहे. जो आलंबनाला स्पर्श करतो, तो 'स्पर्श' (फस्स) होय. तो स्पर्श करण्याचा स्वभाव (लक्षण) असलेला आहे. कारण हा स्पर्श अरूप धर्म (अमूर्त धर्म) असूनही आलंबनामध्ये केवळ स्पर्श करण्याच्या आकारानेच प्रवृत्त होतो. त्याची ती स्पर्श करण्याची प्रवृत्ती, आंबट खाणाऱ्या व्यक्तीला पाहणाऱ्या दुसऱ्या व्यक्तीच्या तोंडात लाळ सुटण्यासारखी समजावी. आलंबनाच्या रसाचा (विषयाच्या स्वादाचा) अनुभव घेते, म्हणून ती 'वेदना' होय. ती अनुभव घेण्याचे लक्षण असलेली आहे. कारण आलंबन रसाचा अनुभव घेण्याच्या बाबतीत इतर संप्रयुक्त धर्म केवळ एका अंशानेच रसाचा अनुभव घेतात, परंतु वेदनाच मुख्यत्वे आणि अधिपतीप्रमाणे (मालकाप्रमाणे) त्याचा अनुभव घेते. म्हणूनच तिला "उत्कृष्ट भोजनाचा आस्वाद घेणाऱ्या राजाप्रमाणे" म्हटले आहे. सुख इत्यादींच्या आधारे तिचा भेद (प्रकार) आचार्य स्वतःच पुढे सांगतील. निळे इत्यादी भेद असलेल्या आलंबनाला ओळखते, खूण करून जाणते म्हणून ती 'संज्ञा' (सञ्ञा) होय. ती ओळखण्याचे लक्षण असलेली आहे. कारण ती उत्पन्न होताना, लाकूड इत्यादींवर सुताराने केलेल्या खुणेप्रमाणे, नंतर ओळखण्याचे कारण बनणाऱ्या आकाराला ग्रहण करून उत्पन्न होते. "हे तर आधी खूण करणाऱ्या संज्ञेच्या बाबतीत योग्य ठरते, परंतु पूर्वीच्या खुणेने ओळखणाऱ्या संज्ञेच्या बाबतीत कसे योग्य ठरेल?" अशी शंका घेतली असता—ती (नंतरची संज्ञा) देखील पुन्हा दुसऱ्या संज्ञेच्या ओळखण्याचे निमित्त (खूण) असणाऱ्या आकाराला ग्रहण करून उत्पन्न होते, म्हणून येथे कोणतीही विसंगती (असंभव) नाही. စေတေတိ အတ္တနာ သမ္ပယုတ္တဓမ္မေ အာရမ္မဏေ အဘိသန္ဒဟတိ, သင်္ခတာဘိသင်္ခရဏေ ဝါ ဗျာပါရမာပဇ္ဇတီတိ စေတနာ. တထာ ဟိ အယမေဝ အဘိသင်္ခရဏေ ပဓာနတ္တာ ဝိဘင်္ဂေ သုတ္တန္တဘာဇနိယေ သင်္ခါရက္ခန္ဓံ ဝိဘဇန္တေန ‘‘သင်္ခတမဘိသင်္ခရောန္တီတိ သင်္ခါရာ’’တိ (သံ. နိ. ၃.၇၉) ဝတွာ ‘‘စက္ခုသမ္ဖဿဇာ စေတနာ’’တျာဒိနာ (ဝိဘ. ၂၁) နိဒ္ဒိဋ္ဌာ. သာ စေတယိတလက္ခဏာ, ဇေဋ္ဌသိဿမဟာဝဍ္ဎကိအာဒယော ဝိယ သကိစ္စပရကိစ္စသာဓိကာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဧကဂ္ဂတာဝိတက္ကဝိစာရပီတီနံ သရူပဝိဘာဝနံ ဟေဋ္ဌာ အာဂတမေဝ. जी स्वतःसोबतच्या संप्रयुक्त धर्मांना आलंबनामध्ये जोडते (चेतवते) किंवा संस्कृत धर्मांच्या अभिसंस्करणात (निर्मितीत) प्रयत्नशील होते, ती 'चेतना' होय. कारण ही चेतनाच अभिसंस्करणात प्रधान असल्यामुळे, विभंग पाळीतील सुत्तन्तभाजनिय पद्धतीमध्ये संस्कारस्कंधाचे विभाजन करताना भगवंतांनी "जे संस्कृत धर्मांचे अभिसंस्करण करतात, ते संस्कार होत" असे सांगून "चक्षुसंस्पर्शजन्य चेतना" इत्यादींद्वारे तिचे निर्देश केले आहे. ती चेतना प्रेरित करण्याचे (चेतवण्याचे) लक्षण असलेली आहे. ज्येष्ठ शिष्य किंवा मुख्य सुतार इत्यादींप्रमाणे ती स्वतःचे कार्य आणि इतरांचे कार्य साधून देणारी आहे, असे समजावे. एकाग्रता, वितर्क, विचार आणि प्रीती यांचे स्वरूप स्पष्ट करणे खाली (पूर्वीच) आलेले आहे. ဇီဝန္တိ [Pg.106] တေန သမ္ပယုတ္တဓမ္မာတိ ဇီဝိတံ, တဒေဝ သဟဇာတာနုပါလနေ အာဓိပစ္စယောဂေန ဣန္ဒြိယန္တိ ဇီဝိတိန္ဒြိယံ, တံ အနုပါလနလက္ခဏံ ဥပ္ပလာဒိအနုပါလကံ ဥဒကံ ဝိယ. ကရဏံ ကာရော, မနသ္မိံ ကာရော မနသိကာရော, သော စေတသော အာရမ္မဏေ သမန္နာဟာရလက္ခဏော. ဝိတက္ကော ဟိ သဟဇာတဓမ္မာနံ အာရမ္မဏေ အဘိနိရောပနသဘာဝတ္တာ တေ တတ္ထ ပက္ခိပန္တော ဝိယ ဟောတိ, စေတနာ အတ္တနာ အာရမ္မဏဂ္ဂဟဏေန ယထာရုဠှေ ဓမ္မေပိ တတ္ထ တတ္ထ နိယောဇေန္တီ ဗလနာယကော ဝိယ ဟောတိ, မနသိကာရော တေ အာရမ္မဏာဘိမုခံ ပယောဇနတော အာဇာနီယာနံ ပယောဇနကသာရထိ ဝိယာတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ဓမ္မာနဉှိ တံ တံ ယာထာဝသရသလက္ခဏံ သဘာဝတော ပဋိဝိဇ္ဈိတွာ ဘဂဝတာ တေ တေ ဓမ္မာ ဝိဘတ္တာတိ ဘဂဝတိ သဒ္ဓါယ ‘‘ဧဝံ ဝိသေသာ ဣမေ ဓမ္မာ’’တိ ဩကပ္ပေတွာ ဥဂ္ဂဟဏပရိပုစ္ဆာဒိဝသေန တေသံ သဘာဝသမဓိဂမာယ ယောဂေါ ကရဏီယော, န ပန တတ္ထ တတ္ထ ဝိပ္ပဋိပဇ္ဇန္တေဟိ သမ္မောဟော အာပဇ္ဇိတဗ္ဗောတိ အယမေတ္ထ အာစရိယာနံ အနုသာသနီ. သဗ္ဗေသမ္ပိ ဧကူနနဝုတိစိတ္တာနံ သာဓာရဏာ နိယမတော တေသု ဥပ္ပဇ္ဇနတောတိ သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏာ နာမ. ज्याच्याद्वारे संप्रयुक्त धर्म जिवंत राहतात, ते 'जीवित' होय. तेच जीवित सहजात धर्मांच्या रक्षणात अधिपती असल्यामुळे 'इंद्रिय' आहे, म्हणून त्याला 'जीवितेन्द्रिय' (जीवितिन्द्रिय) म्हणतात. ते सहजात धर्मांचे रक्षण करण्याचे लक्षण असलेले आहे, जसे कमळ इत्यादींचे रक्षण करणारे पाणी असते. मनात करणे म्हणजे 'मनसिकार' (मनसिकारो). तो मनाला आलंबनाकडे चांगल्या प्रकारे नेण्याचे (समन्नाहार) लक्षण असलेला आहे. वितर्क हा सहजात धर्मांना आलंबनावर प्रस्थापित करण्याच्या स्वभावाचा असल्यामुळे, तो त्यांना त्या आलंबनात प्रविष्ट केल्यासारखा असतो. चेतना स्वतः आलंबन ग्रहण करून, वितर्काने प्रस्थापित केलेल्या धर्मांना त्या त्या आलंबनात नियुक्त करते, जसे सैन्याचा सेनापती करतो. मनसिकार त्या सहजात धर्मांना आलंबनाभिमुख करत असल्यामुळे, तो उमद्या घोड्यांना सरळ मार्गावर नेणाऱ्या सारथ्यासारखा असतो; हा या तिन्हींमधील (वितर्क, चेतना आणि मनसिकार) विशेष (फरक) आहे. कारण भगवंतांनी त्या त्या धर्मांचे यथार्थ कार्य आणि लक्षण स्वभावाने जाणून त्यांचे सविस्तर विभाजन केले आहे. म्हणून भगवंतांवर श्रद्धा ठेवून, "हे धर्म अशा वैशिष्ट्यांचे आहेत" असा दृढ विश्वास ठेवून, अध्ययन आणि प्रश्न विचारणे इत्यादींच्या द्वारे त्यांच्या स्वभावाचे आकलन करून घेण्यासाठी प्रयत्न केला पाहिजे. परंतु त्या त्या धर्मांच्या बाबतीत विपरीत समज करून घेऊन संमोहात (भ्रमात) पडू नये, हा येथे आचार्यांचा उपदेश आहे. सर्व एकोणनव्वद (८९) चित्तांशी साधारण (समान) असल्यामुळे आणि नियमाने त्या चित्तांमध्ये उत्पन्न होत असल्यामुळे, त्यांना 'सर्वचित्तसाधारण' असे म्हणतात. ၃. အဓိမုစ္စနံ အဓိမောက္ခော, သော သန္နိဋ္ဌာနလက္ခဏော, အာရမ္မဏေ နိစ္စလဘာဝေန ဣန္ဒခီလော ဝိယ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဝီရာနံ ဘာဝေါ, ကမ္မံ, ဝိဓိနာ ဤရယိတဗ္ဗံ ပဝတ္တေတဗ္ဗန္တိ ဝါ ဝီရိယံ, ဥဿာဟော, သော သဟဇာတာနံ ဥပတ္ထမ္ဘနလက္ခဏော. ဝီရိယဝသေန ဟိ တေသံ ဩလီနဝုတ္တိတာ န ဟောတိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဣမဿ ဝိတက္ကာဒီဟိ ဝိသေသော သုပါကဋော ဟောတိ. ဆန္ဒနံ ဆန္ဒော, အာရမ္မဏေန အတ္ထိကတာ, သော ကတ္တုကာမတာလက္ခဏော. တထာ ဟေသ ‘‘အာရမ္မဏဂ္ဂဟဏေ စေတသော ဟတ္ထပ္ပသာရဏံ ဝိယာ’’တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁ ယေဝါပနကဝဏ္ဏနာ) ဝုစ္စတိ. ဒါနဝတ္ထုဝိဿဇ္ဇနဝသေန [Pg.107] ပဝတ္တကာလေပိ စေသ ဝိဿဇ္ဇိတဗ္ဗေန တေန အတ္ထိကောဝ ခိပိတဗ္ဗဥသူနံ ဂဟဏေ အတ္ထိကော ဣဿာသော ဝိယ. သောဘနေသု တဒိတရေသု စ ပကာရေန ကိဏ္ဏာ ဝိပ္ပကိဏ္ဏာတိ ပကိဏ္ဏကာ. ३. आलंबनात दृढतेने प्रविष्ट होणे किंवा निर्णय घेणे म्हणजे 'अधिमोक्ष' (अधिमोक्ख) होय. तो निर्णय घेण्याचे लक्षण असलेला आहे. आलंबनामध्ये स्थिर राहण्याच्या स्वभावामुळे तो इंद्रखिलासारखा (नगरद्वाराच्या खांबासारखा) समजावा. वीरांचा भाव, कर्म किंवा योग्य उपायाने प्रवृत्त केले जाणारे कार्य म्हणजे 'वीर्य' (वीरिय) होय, जो उत्साहस्वरूप आहे. तो सहजात धर्मांना आधार देण्याचे (उपस्तंभन) लक्षण असलेला आहे. कारण वीर्याच्या प्रभावामुळे त्या सहजात धर्मांची पीछेहाट (शिथिलता) होत नाही. असे असल्यामुळे, या वीर्याचा वितर्क इत्यादींपेक्षा असलेला फरक अत्यंत स्पष्ट होतो. इच्छा करणे म्हणजे 'छंद' (छन्द) होय, जो आलंबनाची अपेक्षा करण्याचा स्वभाव आहे. तो 'करण्याची इच्छा असणे' (कत्तुकम्यता) या लक्षणाचा आहे. तसेच, या छंदाला "आलंबन ग्रहण करताना मनाचा हात पसरण्यासारखे" म्हटले आहे. दानवस्तूचा त्याग करण्याच्या वेळी प्रवृत्त असतानाही, हा छंद त्या त्याग करावयाच्या वस्तूची इच्छा करणाराच असतो, जसे फेकावयाच्या बाणांना हातातण्याची इच्छा करणारा धनुर्धारी असतो. शोभन चित्तांमध्ये आणि त्याव्यतिरिक्त इतर चित्तांमध्ये वेगवेगळ्या प्रकारे मिसळलेले (संकीर्ण) असणारे चेतसिक म्हणजे 'प्रकीर्णक' (पकिण्णक) होत. ၄. သောဘနာပေက္ခာယ ဣတရေ, ဣတရာပေက္ခာယ သောဘနာ စ အညေ နာမ, တေသံ သမာနာ န ဥဒ္ဓစ္စသဒ္ဓါဒယော ဝိယ အကုသလာဒိသဘာဝါယေဝါတိ အညသမာနာ. ४. शोभन चित्तांच्या अपेक्षेने इतर (अशोभन चित्त) आणि इतर चित्तांच्या अपेक्षेने शोभन चित्त हे एकमेकांसाठी 'अन्य' होत. त्यांच्याशी समान असणारे (दोन्ही प्रकारच्या चित्तांत उत्पन्न होणारे) चेतसिक, उद्धच्च किंवा श्रद्धा इत्यादींप्रमाणे केवळ अकुशल किंवा केवळ कुशल स्वभावाचेच नसतात, म्हणून त्यांना 'अन्यसमान' (अञ्ञसमान) म्हणतात. အညသမာနစေတသိကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अन्यसमान चेतसिकांचे वर्णन समाप्त झाले. အကုသလစေတသိကဝဏ္ဏနာ अकुशल चेतसिकांचे वर्णन. ၅. ဧဝံ တာဝ သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏဝသေန, ပကိဏ္ဏကဝသေန စ သောဘနေတရသဘာဝေ တေရသ ဓမ္မေ ဥဒ္ဒိသိတွာ ဣဒါနိ ဟေဋ္ဌာ စိတ္တဝိဘာဂေ နိဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေန အကုသလဓမ္မပရိယာပန္နေ ပဌမံ, တတော သောဘနဓမ္မပရိယာပန္နေ စ ဒဿေတုံ ‘‘မောဟော’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. အဟေတုကာ ပန အာဝေဏိကဓမ္မာ နတ္ထီတိ န တေ ဝိသုံ ဝုတ္တာ. အာရမ္မဏေ မုယှတီတိ မောဟော, အညာဏံ, သော အာရမ္မဏသဘာဝစ္ဆာဒနလက္ခဏော. အာရမ္မဏဂ္ဂဟဏဝသပ္ပဝတ္တောပိ ဟေသ တဿ ယထာသဘာဝပ္ပဋိစ္ဆာဒနာကအာရေနေဝ ပဝတ္တတိ. န ဟိရီယတိ န လဇ္ဇတီတိ အဟိရိကော, ပုဂ္ဂလော, ဓမ္မသမူဟော ဝါ. အဟိရိကဿ ဘာဝေါ အဟိရိက္ကံ, တဒေဝ အဟိရိကံ. န ဩတ္တပ္ပတီတိ အနောတ္တပ္ပံ. တတ္ထ ဂူထတော ဂါမသူကရော ဝိယ ကာယဒုစ္စရိတာဒိတော အဇိဂုစ္ဆနလက္ခဏံ အဟိရိကံ, အဂ္ဂိတော သလဘော ဝိယ တတော အနုတ္တာသလက္ခဏံ အနောတ္တပ္ပံ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – ५. अशा प्रकारे, प्रथम सर्वचित्तसाधारण रूपाने आणि प्रकीर्णक रूपाने शोभन व अशोभन स्वभावाच्या तेरा (१३) अन्यसमान धर्मांचे निर्देश करून, आता खाली चित्तविभागात दाखवलेल्या क्रमानुसार, प्रथम अकुशल धर्मात समाविष्ट असणारे चेतसिक आणि त्यानंतर शोभन धर्मात समाविष्ट असणारे चेतसिक दाखवण्यासाठी "मोहो" इत्यादी शब्द म्हटले आहेत. परंतु अहेतुक असे स्वतंत्र (आवेणिक) चेतसिक धर्म नसल्यामुळे, त्यांचे स्वतंत्रपणे वर्णन केलेले नाही. जो आलंबनामध्ये मोहित होतो (भ्रमित होतो), तो 'मोह' होय, जो अज्ञानस्वरूप आहे. तो आलंबनाचा यथार्थ स्वभाव झाकून टाकण्याचे लक्षण असलेला आहे. आलंबन ग्रहण करण्याच्या प्रवृत्तीत असलेला असूनही, हा मोह त्या आलंबनाचा यथार्थ स्वभाव झाकून टाकण्याच्या आकारानेच प्रवृत्त होतो. जो लाज बाळगत नाही, तो 'अहिरिक' (लाज नसलेला) होय, मग तो पुद्गल असो वा धर्मसमूह असो. अहिरिकाचा भाव म्हणजे 'अहिरिक्क' (निर्लज्जपणा), त्यालाच 'अहिरिक' असेही म्हणतात. जो पाप कर्माला घाबरत नाही, ते 'अनोट्टप्प' (भय नसणे) होय. त्यामध्ये, जसा गावचा डुक्कर विष्ठेचा तिरस्कार करत नाही, तसे कायदुश्चरित (शारीरिक गैरवर्तन) इत्यादींचा तिरस्कार न करण्याचे लक्षण म्हणजे 'अहिरिक' होय. आणि जसा पतंग आगीला घाबरत नाही, तसे कायदुश्चरित इत्यादींपासून भय न बाळगण्याचे लक्षण म्हणजे 'अनोट्टप्प' होय. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘ဇိဂုစ္ဆတိ နာဟိရိကော, ပါပါ ဂူထာဝ သူကရော; န ဘာယတိ အနောတ္တပ္ပီ, သလဘော ဝိယ ပါဝကာ’’တိ. "जसा डुक्कर विष्ठेचा तिरस्कार करत नाही, तसा निर्लज्ज (अहिरिक) मनुष्य पापाचा तिरस्कार करत नाही. जसा पतंग आगीला घाबरत नाही, तसा भय नसलेला (अनोट्टप्पी) पापाला घाबरत नाही." ဥဒ္ဓတဿ [Pg.108] ဘာဝေါ ဥဒ္ဓစ္စံ, တံ စိတ္တဿ အဝူပသမလက္ခဏံ ပါသာဏာဘိဃာတသမုဒ္ဓတဘသ္မံ ဝိယ. လုဗ္ဘတီတိ လောဘော, သော အာရမ္မဏေ အဘိသင်္ဂလက္ခဏော မက္ကဋာလေပေါ ဝိယ. စိတ္တဿ အာလမ္ဗိတုကာမတာမတ္တံ ဆန္ဒော, လောဘော တတ္ထ အဘိဂိဇ္ဈနန္တိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ‘‘ဣဒမေဝ သစ္စံ, မောဃမည’’န္တိ မိစ္ဆာဘိနိဝေသလက္ခဏာ ဒိဋ္ဌိ. ဉာဏဉှိ အာရမ္မဏံ ယထာသဘာဝတော ဇာနာတိ, ဒိဋ္ဌိ ယထာသဘာဝံ ဝိဇဟိတွာ အယာထာဝတော ဂဏှာတီတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ‘‘သေယျောဟမသ္မီ’’တျာဒိနာ မညတီတိ မာနော, သော ဥဏ္ဏတိလက္ခဏော. တထာ ဟေသ ‘‘ကေတုကမျတာပစ္စုပဋ္ဌာနော’’တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၀၀) ဝုတ္တော. ဒုဿတီတိ ဒေါသော, သော စဏ္ဍိက္ကလက္ခဏော ပဟဋာသီဝိသော ဝိယ, ဣဿတီတိ ဣဿာ, သာ ပရသမ္ပတ္တိဥသူယနလက္ခဏာ. မစ္ဆရဿ ဘာဝေါ မစ္ဆရိယံ, ‘‘မာ ဣဒံ အစ္ဆရိယံ အညေသံ ဟောတု, မယှမေဝ ဟောတူ’’တိ ပဝတ္တံ ဝါ မစ္ဆရိယံ, တံ အတ္တသမ္ပတ္တိနိဂူဟနလက္ခဏံ. ကုစ္ဆိတံ ကတန္တိ ကုကတံ. ကတာကတဒုစ္စရိတသုစရိတံ. အကတမ္ပိ ဟိ ကုကတ’’န္တိ ဝေါဟရန္တိ ‘‘ယံ မယာ အကတံ. တံ ကုကတ’’န္တိ. ဣဓ ပန ကတာကတံ အာရဗ္ဘ ဥပ္ပန္နော ဝိပ္ပဋိသာရစိတ္တုပ္ပာဒေါ ကုကတံ, တဿ ဘာဝေါ ကုက္ကုစ္စံ, တံ ကတာကတဒုစ္စရိတသုစရိတာနုသောစနလက္ခဏံ. ထိနနံ ထိနံ, အနုဿာဟနာဝသံသီဒနဝသေန သံဟတဘာဝေါ. မိဒ္ဓနံ မိဒ္ဓံ, ဝိဂတသာမတ္ထိယတာ, အသတ္တိဝိဃာတော ဝါ, တတ္ထ ထိနံ စိတ္တဿ အကမ္မညတာလက္ခဏံ, မိဒ္ဓံ ဝေဒနာဒိက္ခန္ဓတ္တယဿာတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. တထာ ဟိ ပါဠိယံ (ဓ. သ. ၁၁၆၂-၁၁၆၃) ‘‘တတ္ထ ကတမံ ထိနံ? ယာ စိတ္တဿ အကလ္လတာ အကမ္မညတာ. တတ္ထ ကတမံ မိဒ္ဓံ? ယာ ကာယဿ အကလ္လတာ အကမ္မညတာ’’တျာဒိနာ ဣမေသံ နိဒ္ဒေသော ပဝတ္တော. နနု စ ‘‘ကာယဿာ’’တိ ဝစနတော ရူပကာယဿပိ အကမ္မညတာ မိဒ္ဓန္တိ တဿ ရူပဘာဝေါပိ အာပဇ္ဇတီတိ? နာပဇ္ဇတိ, တတ္ထ တတ္ထ အာစရိယေဟိ အာနီတကာရဏဝသေနေဝဿ [Pg.109] ပဋိက္ခိတ္တတ္တာ. တထာ ဟိ မိဒ္ဓဝါဒိမတပ္ပဋိက္ခေပနတ္ထံ တေသံ ဝါဒနိက္ခေပပုဗ္ဗကံ အဋ္ဌကထာဒီသု ဗဟုဓာ ဝိတ္ထာရေန္တိ အာစရိယာ. အယံ ပနေတ္ထ သင်္ဂဟော – चंचल किंवा विचलित होण्याच्या भावाला 'उद्धच्च' (चित्ताची चंचलता) म्हणतात. ते चित्ताच्या अशांततेचे लक्षण आहे, जसे की दगडाच्या आघाताने वर उडणारी राख. जे आसक्त होते, त्याला 'लोभ' म्हणतात. तो आलंबनामध्ये (विषयामध्ये) अत्यंत चिकटून राहण्याच्या लक्षणाचा असतो, जसे की माकडाला पकडणारा डिंक. चित्ताची केवळ आलंबन ग्रहण करण्याची इच्छा म्हणजे 'छंद' होय, तर लोभ म्हणजे त्या आलंबनामध्ये अत्यंत आसक्त होणे; हा या दोघांमधील फरक आहे. "हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे" अशा प्रकारच्या चुकीच्या अभिनिवेशाचे (दृढ आग्रहाचे) लक्षण म्हणजे 'दिट्ठि' (मिथ्या दृष्टी) होय. कारण ज्ञान हे आलंबनाला त्याच्या खऱ्या स्वभावानुसार जाणते, तर दृष्टी ही खऱ्या स्वभावाचा त्याग करून त्याला अवास्तव (चुकीच्या) रूपाने ग्रहण करते; हा या दोघांमधील फरक आहे. "मी श्रेष्ठ आहे" इत्यादी प्रकारे मानणे म्हणजे 'मान' होय, तो उन्नततेच्या (अहंकाराच्या) लक्षणाचा असतो. म्हणूनच त्याला "ध्वजाप्रमाणे स्वतःला उंच दाखवण्याची इच्छा असणारा" असे म्हटले आहे. जो द्वेष करतो तो 'दोस' (द्वेष) होय, तो डिवचलेल्या विषारी सापाप्रमाणे क्रूरतेच्या लक्षणाचा असतो. जी मत्सर करते ती 'इस्सा' (ईर्ष्या) होय, ती दुसऱ्याच्या संपत्तीचा हेवा करण्याच्या लक्षणाची असते. कंजूष माणसाच्या भावाला 'मच्छरिय' (मत्सर/कृपणता) म्हणतात. किंवा "हे माझे वैभव इतरांना मिळू नये, केवळ मलाच मिळावे" अशा प्रकारे प्रवृत्त होणाऱ्या भावाला 'मच्छरिय' म्हणतात; ते स्वतःच्या संपत्तीला लपवण्याच्या लक्षणाचे असते. निंद्य कृत्य म्हणजे 'कुकत' (वाईट कृत्य). केलेले दुष्कृत्य आणि न केलेले सुकृत्य. कारण न केलेल्या कृत्यालाही लोक 'कुकत' म्हणतात, जसे की "जे माझ्याकडून केले गेले नाही, ते माझे वाईट कृत्य (चूक) झाले." परंतु येथे, केलेल्या दुष्कृत्याला आणि न केलेल्या सुकृत्याला अनुसरून उत्पन्न होणारा पश्चात्तापयुक्त चित्तोत्पाद म्हणजे 'कुकत' होय, आणि त्याच्या भावाला 'कुक्कुच्च' (पश्चात्ताप) म्हणतात. ते केलेल्या दुष्कृत्याबद्दल आणि न केलेल्या सुकृत्याबद्दल सतत शोक करण्याच्या लक्षणाचे असते. चित्ताची अकर्मण्यता म्हणजे 'थीन' (आळस) होय, जे निरुत्साह आणि शिथिलतेमुळे चित्ताच्या संकुचित होण्याच्या भावाचे असते. चैतसिकांची अकर्मण्यता म्हणजे 'मिद्ध' (तंद्री) होय, जे सामर्थ्यहीनता किंवा शक्तीचा अभाव असण्याच्या स्वरूपाचे असते. त्यापैकी, 'थीन' हे चित्ताच्या अकर्मण्यतेचे लक्षण आहे, तर 'मिद्ध' हे वेदना इत्यादी तीन नामस्कंधांच्या (चैतसिकांच्या) अकर्मण्यतेचे लक्षण आहे; हा या दोघांमधील फरक आहे. म्हणूनच पाळीमध्ये (धम्मसंगणीत) "त्यात थीन कोणते? चित्ताची जी अस्वस्थता आणि अकर्मण्यता आहे, ते थीन होय. त्यात मिद्ध कोणते? कायाची (चैतसिकांची) जी अस्वस्थता आणि अकर्मण्यता आहे, ते मिद्ध होय" इत्यादी प्रकारे यांचे स्पष्टीकरण दिले आहे. येथे अशी शंका उपस्थित केली जाऊ शकते की, "कायाची" असे म्हटल्यामुळे रूपकायाची अकर्मण्यता देखील 'मिद्ध' ठरेल आणि त्यामुळे मिद्ध हे रूप (भौतिक) ठरेल का? नाही, तसे होत नाही; कारण वेगवेगळ्या ठिकाणी आचार्यांनी योग्य कारणे देऊन मिद्धाचे रूप असणे नाकारले आहे. कारण, मिद्धाला रूप मानणाऱ्यांच्या मताचे खंडन करण्यासाठी आचार्यांनी अट्ठकथा इत्यादींमध्ये त्यांचा वाद मांडून त्याचे सविस्तर खंडन केले आहे. याविषयीचा संक्षिप्त संग्रह खालीलप्रमाणे आहे – ‘‘ကေစိ မိဒ္ဓမ္ပိ ရူပန္တိ, ဝဒန္တေတံ န ယုဇ္ဇတိ; ပဟာတဗ္ဗေသု ဝုတ္တတ္တာ, ကာမစ္ဆန္ဒာဒယော ဝိယ. "काही आचार्य मिद्धाला रूप देखील म्हणतात, परंतु हे योग्य नाही; कारण कामच्छंद इत्यादींप्रमाणेच मिद्धाला देखील नष्ट करण्यायोग्य (प्रहातव्य) धर्मांमध्ये सांगितले गेले आहे." ‘‘ပဟာတဗ္ဗေသု အက္ခာတ-မေတံ နီဝရဏေသု ဟိ; ရူပန္တု န ပဟာတဗ္ဗ-မက္ခာတံ ဒဿနာဒိနာ. "कारण, हे मिद्ध नष्ट करण्यायोग्य अशा नीवरणांमध्ये सांगितले गेले आहे; परंतु रूपाला मात्र दर्शनादी (सोतापत्ती मार्ग इत्यादी) ज्ञानाद्वारे नष्ट करण्यायोग्य असे म्हटलेले नाही." ‘‘‘န တုမှံ ဘိက္ခဝေ ရူပံ, ပဇဟေထာ’တိ ပါဌတော; ပဟေယျဘာဝလေသောပိ, ယတ္ထ ရူပဿ ဒိဿတိ. "जरी 'भिक्खूहो, रूप तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा' या पाठावरून रूपाच्या त्याज्यतेचा (नष्ट करण्यायोग्य असण्याचा) थोडा आभास होत असला तरी," ‘‘တတ္ထ တဗ္ဗိသယစ္ဆန္ဒ-ရာဂဟာနိ ပကာသိတာ; ဝုတ္တဉှိ တတ္ထ ယော ဆန္ဒ-ရာဂက္ခေပေါတိအာဒိကံ. "तेथे त्या रूपाविषयीच्या छंद-रागाचा (आसक्तीचा) त्याग करणेच स्पष्ट केले आहे. कारण तेथे 'जो छंद-रागाचा त्याग आहे' इत्यादी प्रकारे सांगितले गेले आहे." ‘‘ရူပါရူပေသု မိဒ္ဓေသု, အရူပံ တတ္ထ ဒေသိတံ; ဣတိ စေ နတ္ထိ တံ တတ္ထ, အဝိသေသေန ပါဌတော. "जर असे म्हटले की, रूप-मिद्ध आणि अरूप-मिद्ध या दोन्हीमध्ये तेथे केवळ अरूप-मिद्धाचाच उपदेश केला आहे, तर ते योग्य नाही; कारण पाळीमध्ये कोणत्याही विशेषाशिवाय सामान्य रूपानेच पाठ आला आहे." ‘‘သက္ကာ ဟိ အနုမာတုံ ယံ, မိဒ္ဓံ ရူပန္တိ စိန္တိတံ; တမ္ပိ နီဝရဏံ မိဒ္ဓ-ဘာဝတော ဣတရံ ဝိယ. "कारण ज्या मिद्धाला रूप मानले गेले आहे, ते देखील मिद्धत्वामुळे इतर नाम-मिद्धाप्रमाणेच नीवरण आहे, असा अनुमान लावणे शक्य आहे." ‘‘သမ္ပယောဂါဘိဓာနာ စ, န တံ ရူပန္တိ နိစ္ဆယော; အရူပီနဉှိ ခန္ဓာနံ, သမ္ပယောဂေါ ပဝုစ္စတိ. "तसेच, संप्रयोगाचा (चैतसिकांच्या सहयोगाचा) उल्लेख असल्यामुळे ते रूप नाही, असाच निश्चय होतो; कारण संप्रयोग केवळ अरूपी (नाम) स्कंधांचाच सांगितला जातो." ‘‘တထာရုပ္ပေ သမုပ္ပတ္တိ, ပါဌတော နတ္ထိ ရူပတာ; နိဒ္ဒါ ခီဏာသဝါနန္တု, ကာယဂေလညတော သိယာ’’တိ. "त्याचप्रमाणे, अरूप भूमीमध्ये मिद्धाच्या उत्पत्तीचा पाठ असल्यामुळे त्याचे रूपत्व सिद्ध होत नाही. राहिली गोष्ट क्षीणासवांच्या (अर्हंतांच्या) निद्रेची, तर ती केवळ शरीराच्या थकव्यामुळे (कायाच्या ग्लानीमुळे) असते." အကုသလစေတသိကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अकुशल चैतसिकांचे वर्णन समाप्त झाले. သောဘနစေတသိကဝဏ္ဏနာ शोभन (कुशल) चैतसिकांचे वर्णन ၆. သဒ္ဒဟတီတိ သဒ္ဓါ, ဗုဒ္ဓါဒီသု ပသာဒေါ, သာ သမ္ပယုတ္တဓမ္မာနံ ပသာဒနလက္ခဏာ ဥဒကပ္ပသာဒကမဏိ ဝိယ. သရဏံ [Pg.110] သတိ, အသမ္မောသော, သာ သမ္ပယုတ္တဓမ္မာနံ သာရဏလက္ခဏာ. ဟိရီယတိ ကာယဒုစ္စရိတာဒီဟိ ဇိဂုစ္ဆတီတိ ဟိရီ, သာ ပါပတော ဇိဂုစ္ဆနလက္ခဏာ. ဩတ္တပ္ပတီတိ ဩတ္တပ္ပံ, တံ ပါပတော ဥတ္တာသလက္ခဏံ. အတ္တဂါရဝဝသေန ပါပတော ဇိဂုစ္ဆနတော ကုလဝဓူ ဝိယ ဟိရီ, ပရဂါရဝဝသေန ပါပတော ဥတ္တာသနတော ဝေသိယာ ဝိယ ဩတ္တပ္ပံ. လောဘပ္ပဋိပက္ခော အလောဘော, သော အာရမ္မဏေ စိတ္တဿ အလဂ္ဂတာလက္ခဏော မုတ္တဘိက္ခု ဝိယ. ဒေါသပ္ပဋိပက္ခော အဒေါသော, သော အစဏ္ဍိက္ကလက္ခဏော အနုကူလမိတ္တော ဝိယ. တေသု ဓမ္မေသု မဇ္ဈတ္တတာ တတြမဇ္ဈတ္တတာ, သာ စိတ္တစေတသိကာနံ အဇ္ဈုပေက္ခနလက္ခဏာ သမပ္ပဝတ္တာနံ အဿာနံ အဇ္ဈုပေက္ခကော သာရထိ ဝိယ. ६. जी श्रद्धा ठेवते (विश्वास ठेवते) ती 'सद्धा' (श्रद्धा) होय, बुद्ध इत्यादी आलंबनांविषयीचा तो आदरयुक्त प्रसन्न भाव आहे. ती संप्रयुक्त धर्मांना (चित्त आणि चैतसिकांना) स्वच्छ करणारी असते, जसे की गढूळ पाण्याला स्वच्छ करणारी उदकप्रसादक मणी. स्मरण करणे म्हणजे 'सति' (स्मृती) होय, जी आलंबनाला विसरू न देणारी असते. ती संप्रयुक्त धर्मांना स्मरण करून देण्याच्या लक्षणाची असते. कायदुष्कृत्य इत्यादींबद्दल लज्जा वाटणे आणि त्यांचा तिरस्कार करणे म्हणजे 'हिरी' (लज्जा) होय, ती पापाचा तिरस्कार करण्याच्या लक्षणाची असते. पापाचे भय वाटणे म्हणजे 'ओत्तप्प' (भय) होय, ते पापापासून भयभीत होण्याच्या लक्षणाचे असते. स्वतःच्या आदरामुळे (आत्मगौरवामुळे) पापाचा तिरस्कार करण्याच्या बाबतीत 'हिरी' ही कुलवधूसारखी असते, तर इतरांच्या आदरामुळे पापाचे भय वाटण्याच्या बाबतीत 'ओत्तप्प' हे वेश्येसारखे असते. लोभाचा विरोधी धर्म म्हणजे 'अलोभ' होय, तो आलंबनामध्ये चित्त आसक्त न होण्याच्या लक्षणाचा असतो, जसे की सर्व आसक्तींमधून मुक्त झालेला भिक्खू. द्वेषाचा विरोधी धर्म म्हणजे 'अदोस' (अद्वेष) होय, तो क्रूरता नसण्याच्या लक्षणाचा असतो, जसे की अनुकूल मित्र. त्या सर्व धर्मांमध्ये तटस्थ राहणे म्हणजे 'तत्रमज्झत्तता' (तत्रमध्यस्थता) होय, ती चित्त आणि चैतसिकांकडे समभावाने पाहण्याच्या लक्षणाची असते, जसे की समान गतीने धावणाऱ्या घोड्यांकडे समभावाने पाहणारा सारथी. ကာယဿ ပဿမ္ဘနံ ကာယပ္ပဿဒ္ဓိ. စိတ္တဿ ပဿမ္ဘနံ စိတ္တပ္ပဿဒ္ဓိ. ဥဘောပိ စေတာ ကာယစိတ္တဒရထဝူပသမလက္ခဏာ. ကာယဿ လဟုဘာဝေါ ကာယလဟုတာ. တထာ စိတ္တလဟုတာ. တာ ကာယစိတ္တဂရုဘာဝဝူပသမလက္ခဏာ. ကာယဿ မုဒုဘာဝေါ ကာယမုဒုတာ. တထာ စိတ္တမုဒုတာ. တာ ကာယစိတ္တထဒ္ဓဘာဝဝူပသမလက္ခဏာ. ကမ္မနိ သာဓု ကမ္မညံ, တဿ ဘာဝေါ ကမ္မညတာ, ကာယဿ ကမ္မညတာ ကာယကမ္မညတာ. တထာ စိတ္တကမ္မညတာ. တာ ကာယစိတ္တအကမ္မညဘာဝဝူပသမလက္ခဏာ. ပဂုဏဿ ဘာဝေါ ပါဂုညံ, တဒေဝ ပါဂုညတာ, ကာယဿ ပါဂုညတာ ကာယပါဂုညတာ. တထာ စိတ္တပါဂုညတာ. တာ ကာယစိတ္တာနံ ဂေလညဝူပသမလက္ခဏာ. ကာယဿ ဥဇုကဘာဝေါ ကာယုဇုကတာ. တထာ စိတ္တုဇုကတာ. တာ ကာယစိတ္တာနံ အဇ္ဇဝလက္ခဏာ. ယထာက္ကမံ ပနေတာ ကာယစိတ္တာနံ သာရမ္ဘာဒိကရဓာတုက္ခောဘပဋိပက္ခပစ္စယသမုဋ္ဌာနာ, ကာယောတိ စေတ္ထ ဝေဒနာဒိက္ခန္ဓတ္တယဿ ဂဟဏံ. ယသ္မာ စေတေ ဒွေ ဒွေ ဓမ္မာဝ ဧကတော ဟုတွာ ယထာသကံ ပဋိပက္ခဓမ္မေ ဟနန္တိ, တသ္မာ ဣဓေဝ [Pg.111] ဒုဝိဓတာ ဝုတ္တာ, န သမာဓိအာဒီသု. အပိစ စိတ္တပ္ပဿဒ္ဓိအာဒီဟိ စိတ္တဿေဝ ပဿဒ္ဓါဒိဘာဝေါ ဟောတိ, ကာယပ္ပဿဒ္ဓိအာဒီဟိ ပန ရူပကာယဿပိ တံသမုဋ္ဌာနပဏီတရူပဖရဏဝသေနာတိ တဒတ္ထသန္ဒဿနတ္ထဉ္စေတ္ထ ဒုဝိဓတာ ဝုတ္တာ. သောဘနာနံ သဗ္ဗေသမ္ပိ သာဓာရဏာ နိယမေန တေသု ဥပ္ပဇ္ဇနတောတိ သောဘနသာဓာရဏာ. कायाची (चैतसिकांची) शांतता म्हणजे 'कायपस्सद्धि' (कायप्रस्रब्धी) होय. चित्ताची शांतता म्हणजे 'चित्तपस्सद्धि' (चित्तप्रस्रब्धी) होय. या दोन्ही देखील काय आणि चित्ताच्या त्रासाचे शमन करण्याच्या लक्षणाच्या असतात. कायाचा हलकेपणा म्हणजे 'कायलहुता' (कायलघुता) होय. तसेच चित्ताचा हलकेपणा म्हणजे 'चित्तलहुता' (चित्तलघुता) होय. त्या काय आणि चित्ताचा जडपणा दूर करण्याच्या लक्षणाच्या असतात. कायाची कोमलता म्हणजे 'कायमुदुता' (कायमृदुता) होय. तसेच चित्ताची कोमलता म्हणजे 'चित्तमुदुता' (चित्तमृदुता) होय. त्या काय आणि चित्ताचा कठीणपणा दूर करण्याच्या लक्षणाच्या असतात. कार्यात कुशल असणे म्हणजे 'कम्मञ्ञ' (कर्मण्यता) होय, त्याच्या भावाला 'कम्मञ्ञता' म्हणतात. कायाची कर्मण्यता म्हणजे 'कायकम्मञ्ञता' होय. तसेच चित्ताची कर्मण्यता म्हणजे 'चित्तकम्मञ्ञता' होय. त्या काय आणि चित्ताची अकर्मण्यता दूर करण्याच्या लक्षणाच्या असतात. निपुणतेच्या भावाला 'पागुञ्ञ' (प्रागुण्य) म्हणतात, तीच 'पागुञ्ञता' होय. कायाची निपुणता म्हणजे 'कायpaगुञ्ञता' होय. तसेच चित्ताची निपुणता म्हणजे 'चित्तपागुञ्ञता' होय. त्या काय आणि चित्ताची ग्लानी (आजारपण) दूर करण्याच्या लक्षणाच्या असतात. कायाची सरळता म्हणजे 'कायुजुकता' (कायऋजुता) होय. तसेच चित्ताची सरळता म्हणजे 'चित्तuजुकता' (चित्तऋजुता) होय. त्या काय आणि चित्ताच्या सरळतेच्या (ऋजुतेच्या) लक्षणाच्या असतात. क्रमाने या कायपस्सद्धि इत्यादी धर्म काय आणि चित्ताच्या अत्यंत पीडा देणाऱ्या धातूंच्या क्षोभाच्या विरोधी कारणांमुळे उत्पन्न होतात. येथे 'काय' या शब्दाने वेदना इत्यादी तीन नामस्कंधांचे ग्रहण केले जाते. आणि ज्याअर्थी हे दोन-दोन धर्म एकत्र येऊन आपापल्या विरोधी धर्मांचा नाश करतात, म्हणूनच येथेच (या शोभन धर्मांमध्येच) त्यांची द्विविधता (दोन प्रकार) सांगितली आहे, समाधी इत्यादींमध्ये नाही. शिवाय, चित्तपस्सद्धि इत्यादींमुळे केवळ चित्ताचीच शांतता इत्यादी भाव प्राप्त होतो, परंतु कायपस्सद्धि इत्यादींमुळे रूपकायाला देखील त्यापासून उत्पन्न होणाऱ्या प्रणीत रूपाच्या प्रसाराद्वारे शांतता इत्यादी भाव प्राप्त होतो; हा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी येथे द्विविधता सांगितली आहे. सर्व शोभन चित्तांमध्ये नियमितपणे उत्पन्न होत असल्यामुळे त्यांना 'शोभनसाधारण' चैतसिक म्हणतात। ၇. သမ္မာ ဝဒန္တိ ဧတာယာတိ သမ္မာဝါစာ, ဝစီဒုစ္စရိတဝိရတိ. သာ စတုဗ္ဗိဓာ မုသာဝါဒါ ဝေရမဏိ, ပိသုဏဝါစာ ဝေရမဏိ, ဖရုသဝါစာ ဝေရမဏိ, သမ္ဖပ္ပလာပါ ဝေရမဏီတိ. ကမ္မမေဝ ကမ္မန္တော သုတ္တန္တဝနန္တာဒယော ဝိယ. သမ္မာ ပဝတ္တော ကမ္မန္တော သမ္မာကမ္မန္တော, ကာယဒုစ္စရိတဝိရတိ. သာ တိဝိဓာ ပါဏာတိပါတာ ဝေရမဏိ, အဒိန္နာဒါနာ ဝေရမဏိ, ကာမေသုမိစ္ဆာစာရာ ဝေရမဏီတိ. သမ္မာ အာဇီဝန္တိ ဧတေနာတိ သမ္မာအာဇီဝေါ, မိစ္ဆာဇီဝဝိရတိ. သော ပန အာဇီဝဟေတုကကာယဝစီဒုစ္စရိတတော ဝိရမဏဝသေန သတ္တဝိဓော, ကုဟနလပနာဒိမိစ္ဆာဇီဝဝိရမဏဝသေန ဗဟုဝိဓော ဝါ. တိဝိဓာပိ ပနေတာ ပစ္စေကံ သမ္ပတ္တသမာဒါနသမုစ္ဆေဒဝိရတိဝသေန တိဝိဓာ ဝိရတိယော နာမ ယထာဝုတ္တဒုစ္စရိတေဟိ ဝိရမဏတော. ७. ज्याद्वारे योग्य प्रकारे बोलतात ती 'सम्यक् वाचा' (सम्मावाचा) होय, जी वाणीच्या चार दुष्कृत्यांपासून विरती (दूर राहणे) आहे. ती चार प्रकारची आहे: असत्य बोलण्यापासून विरती, चहाडी करण्यापासून विरती, कठोर बोलण्यापासून विरती आणि निरर्थक बडबडीपासून विरती. 'कम्मन्त' म्हणजे कर्मच (कामच), जसे 'सुत्तन्त' किंवा 'वनन्त' इत्यादी शब्दांमध्ये होते. योग्य प्रकारे प्रवृत्त झालेले कर्म म्हणजे 'सम्यक् कर्मान्त' (सम्माकम्मन्तो) होय, जी शरीराच्या दुष्कृत्यांपासून विरती आहे. ती तीन प्रकारची आहे: जीवहिंसेपासून विरती, चोरी करण्यापासून विरती आणि कामभोगांमधील व्यभिचारापासून विरती. ज्याद्वारे योग्य प्रकारे उपजीविका केली जाते तो 'सम्यक् आजीव' (सम्माआजीवो) होय, जी चुकीच्या उपजीविकेपासून विरती आहे. तो उपजीविकेच्या कारणाने होणाऱ्या तीन शारीरिक आणि चार वाचिक दुष्कृत्यांपासून विरती घेण्याच्या स्वरूपात सात प्रकारचा आहे; किंवा ढोंग, बढाई मारणे इत्यादी मिथ्या आजीविकेपासून विरती घेण्याच्या स्वरूपात अनेक प्रकारचा आहे. या तिन्ही विरती प्रत्येकी 'सम्पत्त-विरती' (प्रसंगोपात विरती), 'समादान-विरती' (नियम स्वीकारून विरती) आणि 'समुच्छेद-विरती' (पूर्णपणे नष्ट करून विरती) या भेदाने तीन प्रकारच्या विरती मानल्या जातात, कारण त्या पूर्वोक्त दुष्कृत्यांपासून विरती देतात. ၈. ကရောတိ ပရဒုက္ခေ သတိ သာဓူနံ ဟဒယခေဒံ ဇနေတိ, ကိရတိ ဝါ ဝိက္ခိပတိ ပရဒုက္ခံ, ကိဏာတိ ဝါ တံ ဟိံသတိ, ကိရိယတိ ဝါ ဒုက္ခိတေသု ပသာရိယတီတိ ကရုဏာ, သာ ပရဒုက္ခာပနယနကာမတာလက္ခဏာ. တာယ ဟိ ပရဒုက္ခံ အပနီယတု ဝါ, မာ ဝါ, တဒါကာရေနေဝ သာ ပဝတ္တတိ. မောဒန္တိ ဧတာယာတိ မုဒိတာ, သာ ပရသမ္ပတ္တိအနုမောဒနလက္ခဏာ, အပ္ပမာဏသတ္တာရမ္မဏတ္တာ အပ္ပမာဏာ, တာ ဧဝ အပ္ပမညာ. နနု စ ‘‘စတဿော အပ္ပမညာ’’တိ ဝက္ခတိ, ကသ္မာ ပနေတ္ထ ဒွေယေဝ ဝုတ္တာတိ? အဒေါသတတြမဇ္ဈတ္တတာဟိ မေတ္တုပေက္ခာနံ ဂဟိတတ္တာ. အဒေါသောယေဝ ဟိ သတ္တေသု ဟိတဇ္ဈာသယဝသပ္ပဝတ္တော [Pg.112] မေတ္တာ နာမ. တတြမဇ္ဈတ္တတာယေဝ တေသု ပဋိဃာနုနယဝူပသမပ္ပဝတ္တာ ဥပေက္ခာ နာမ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – ८. दुसऱ्याचे दुःख पाहून सज्जनांच्या हृदयात खेद निर्माण करते, किंवा दुसऱ्याचे दुःख दूर फेकून देते, किंवा त्या दुःखाचा नाश करते, किंवा दुःखितांवर पसरवली जाते, म्हणून ती 'करुणा' होय. तिचे लक्षण दुसऱ्याचे दुःख दूर करण्याची इच्छा असणे हे आहे. कारण तिच्याद्वारे दुसऱ्याचे दुःख दूर होवो वा न होवो, ती त्याच आकाराने प्रवृत्त होते. ज्याद्वारे आनंदित होतात ती 'मुदिता' होय. तिचे लक्षण दुसऱ्याच्या समृद्धीचा आनंद घेणे हे आहे. अमर्याद प्राणी हेच तिचे आलंबन असल्यामुळे त्यांना 'अप्रमाण' म्हणतात, आणि त्यांनाच 'अप्पमञ्ञา' (अपरीमित) असेही म्हणतात. शंका: 'चार अप्पमञ्ञा आहेत' असे पुढे सांगितले जाईल, मग येथे दोनच अप्पमञ्ञा का सांगितल्या आहेत? उत्तर: कारण 'अद्वेष' आणि 'तत्रमज्झत्तता' या चैतसिकांद्वारे अनुक्रमे 'मैत्री' आणि 'उपेक्षा' यांचे ग्रहण झाले आहे. कारण प्राण्यांच्या कल्याणाची इच्छा करण्याच्या स्वरूपात प्रवृत्त होणारा 'अद्वेष' हाच 'मैत्री' होय. आणि त्या प्राण्यांच्या बाबतीत राग आणि द्वेष शांत करण्याच्या स्वरूपात प्रवृत्त होणारी 'तत्रमज्झत्तता' हीच 'उपेक्षा' होय. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे – ‘‘အဗျာပါဒေန မေတ္တာ ဟိ, တတြမဇ္ဈတ္တတာယ စ; ဥပေက္ခာ ဂဟိတာ ယသ္မာ, တသ္မာ န ဂဟိတာ ဥဘော’’တိ. (အဘိဓ. ၇၀); "कारण अव्यापाद (अद्वेष) द्वारे मैत्रीचे आणि तत्रमज्झत्तता द्वारे उपेक्षेचे ग्रहण झाले आहे, म्हणूनच त्या दोन्ही येथे स्वतंत्रपणे घेतल्या नाहीत." ပကာရေန ဇာနာတိ အနိစ္စာဒိဝသေန အဝဗုဇ္ဈတီတိ ပညာ, သာ ဧဝ ယထာသဘာဝါဝဗောဓနေ အာဓိပစ္စယောဂတော ဣန္ဒြိယန္တိ ပညိန္ဒြိယံ. အထ သညာဝိညာဏပညာနံ ကိံ နာနာကရဏန္တိ? သညာ တာဝ နီလာဒိဝသေန သဉ္ဇာနနမတ္တံ ကရောတိ, လက္ခဏပ္ပဋိဝေဓံ ကာတုံ န သက္ကောတိ. ဝိညာဏံ လက္ခဏပ္ပဋိဝေဓမ္ပိ သာဓေတိ, ဥဿက္ကိတွာ ပန မဂ္ဂံ ပါပေတုံ န သက္ကောတိ. ပညာ ပန တိဝိဓမ္ပိ ကရောတိ, ဗာလဂါမိကဟေရညိကာနံ ကဟာပဏာဝဗောဓနမေတ္ထ နိဒဿနန္တိ. ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တသညာယ စေတ္ထ အာကာရဂ္ဂဟဏဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇနကာလေ ဝိညာဏံ အဗ္ဗောဟာရိကံ, သေသကာလေ ဗလဝံ. ဉာဏသမ္ပယုတ္တာ ပန ဥဘောပိ တဒနုဂတိကာ ဟောန္တိ. သဗ္ဗထာပိ ပဉ္စဝီသတီတိ သမ္ဗန္ဓော. विविध प्रकारे (अनित्यता इत्यादी रूपाने) जाणते आणि आकलन करते ती 'प्रज्ञा' (पञ्ञा) होय. तीच प्रज्ञा वस्तूंच्या वास्तविक स्वरूपाचे आकलन करण्यात आधिपत्य धारण करत असल्यामुळे तिला इंद्रिय म्हणतात, म्हणून ती 'प्रज्ञिंद्रिय' (पञ्ञिन्द्रिय) होय. आता शंका अशी की, संज्ञा, विज्ञान आणि प्रज्ञा यांच्यातील फरक काय आहे? संज्ञा ही केवळ निळा इत्यादी रंगांच्या आधारे केवळ ओळखण्याचे (संज्ञान करण्याचे) काम करते, ती लक्षणांचा वेध घेण्यास असमर्थ असते. विज्ञान हे लक्षणांचा वेध घेण्याचे कार्यही साध्य करते, परंतु प्रयत्नपूर्वक मार्गाप्रत पोहोचवण्यास ते असमर्थ असते. प्रज्ञा मात्र ही तिन्ही कार्ये करते. येथे लहान मूल, ग्रामीण माणूस आणि सराफ यांच्या नाण्यांच्या ज्ञानाचे उदाहरण दिले जाते. ज्ञान-विप्रयुक्त संज्ञेच्या आकाराचे ग्रहण करण्याच्या वेळी उत्पन्न होणारे विज्ञान हे नाममात्र असते, तर उर्वरित वेळी ते बलवान असते. ज्ञान-संप्रयुक्त अवस्थेत मात्र संज्ञा आणि विज्ञान हे दोन्ही प्रज्ञेचे अनुकरण करणारे असतात. 'सब्बथापि पञ्चवीसति' या पदाशी याचा संबंध आहे. ၉. ‘‘တေရသညသမာနာ’’တျာဒိ တီဟိ ရာသီဟိ ဝုတ္တာနံ သင်္ဂဟော. ९. "'तेरसञ्ञसमाना' इत्यादी गाथा ही तीन समूहांद्वारे सांगितलेल्या चैतसिकांचा संक्षेप (संग्रह) आहे." သောဘနစေတသိကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. शोभन चैतसिकांचे वर्णन समाप्त झाले. သမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ संप्रयोग-नयाचे वर्णन. ၁၀. စိတ္တေန သဟ အဝိယုတ္တာ စိတ္တာဝိယုတ္တာ, စေတသိကာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ ဥပ္ပာဒေါ, စိတ္တမေဝ ဥပ္ပာဒေါ စိတ္တုပ္ပာဒေါ[Pg.113]. အညတ္ထ ပန သသမ္ပယုတ္တံ စိတ္တံ စိတ္တုပ္ပာဒေါတိ ဝုစ္စတိ ‘‘ဥပ္ပဇ္ဇတိ စိတ္တံ ဧတေနာတိ ဥပ္ပာဒေါ, ဓမ္မသမူဟော, စိတ္တဉ္စ တံ ဥပ္ပာဒေါ စာတိ စိတ္တုပ္ပာဒေါ’’တိ ကတွာ. သမာဟာရဒွန္ဒေပိ ဟိ ပုလ္လိင်္ဂံ ကတ္ထစိ သဒ္ဒဝိဒူ ဣစ္ဆန္တိ. တေသံ စိတ္တာဝိယုတ္တာနံ စိတ္တုပ္ပာဒေသု ပစ္စေကံ သမ္ပယောဂေါ ဣတော ပရံ ယထာယောဂံ ပဝုစ္စတီတိ သမ္ဗန္ဓော. १०. चित्तापासून जे कधीही विलग होत नाहीत ते 'चित्तावियुक्त' होत, म्हणजेच त्यांना 'चैतसिक' म्हटले जाते. जे उत्पन्न होते तो 'उत्पाद' होय. चित्त हेच उत्पाद असल्यामुळे त्याला 'चित्तोत्पाद' (चित्तुप्पाद) म्हणतात. परंतु इतर ठिकाणी संप्रयुक्त चैतसिकांसह असणाऱ्या चित्ताला 'चित्तोत्पाद' म्हटले जाते, कारण 'ज्याद्वारे चित्त उत्पन्न होते तो उत्पाद (चैतसिक समूह) होय, आणि चित्त व तो उत्पाद मिळून चित्तोत्पाद होतो' असा विग्रह केला जातो. कारण व्याकरणतज्ज्ञ काही ठिकाणी समाहार द्वंद्व समासातही पुल्लिंग स्वीकारतात. त्या चित्तावियुक्त चैतसिकांचा चित्तोत्पादांमध्ये असणारा प्रत्येक संप्रयोग यापुढे योग्यतेनुसार सांगितला जाईल, असा संबंध आहे. အညသမာနစေတသိကသမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ अन्यसमान चैतसिकांच्या संप्रयोग-नयाचे वर्णन. ၁၃. သဘာဝေန အဝိတက္ကတ္တာ ဒွိပဉ္စဝိညာဏာနိ ဝဇ္ဇိတာနိ ဧတေဟိ, တေဟိ ဝါ ဧတာနိ ဝဇ္ဇိတာနီတိ ဒွိပဉ္စဝိညာဏဝဇ္ဇိတာနိ, စတုစတ္တာလီသ ကာမာဝစရစိတ္တာနိ. တေသု စေဝ ဧကာဒသသု ပဌမဇ္ဈာနစိတ္တေသု စ ဝိတက္ကော ဇာယတိ သေသာနံ ဘာဝနာဗလေန အဝိတက္ကတ္တာတိ အဓိပ္ပာယော. १३. स्वभावानेच वितर्क-रहित असल्यामुळे ज्यांच्यातून द्विपंचविज्ञान (दहा विज्ञान चित्ते) वर्ज्य केली आहेत, किंवा ज्यांनी त्या दहा विज्ञानांना वर्ज्य केले आहे, ती 'द्विपंचविज्ञान-वर्जित' चव्वेचाळीस कामावचर चित्ते होत. त्या चव्वेचाळीस कामावचर चित्तांमध्ये आणि अकरा प्रथम ध्यान चित्तांमध्ये वितर्क उत्पन्न होतो; उर्वरित चित्ते ही भावनेच्या बलामुळे वितर्क-रहित असतात, असा अभिप्राय आहे. ၁၄. တေသု စေဝ ပဉ္စပညာသသဝိတက္ကစိတ္တေသု, ဧကာဒသသု ဒုတိယဇ္ဈာနစိတ္တေသု စာတိ ဆသဋ္ဌိစိတ္တေသု ဝိစာရော ဇာယတိ. १४. त्या पंचावन्न सवितर्क चित्तांमध्ये आणि अकरा द्वितीय ध्यान चित्तांमध्ये, अशा एकूण सहासष्ट चित्तांमध्ये विचार उत्पन्न होतो. ၁၅. ဒွိပဉ္စဝိညာဏေဟိ, ဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတေန စာတိ ဧကာဒသဟိ ဝဇ္ဇိတေသု အဋ္ဌသတ္တတိစိတ္တေသု အဓိမောက္ခော ဇာယတိ. १५. द्विपंचविज्ञान (१०) आणि विचिकित्सा-सहगत चित्त (१), अशा अकरा चित्तांना वर्ज्य करून उर्वरित अठ्ठ्याहत्तर चित्तांमध्ये अधिमोक्ष उत्पन्न होतो. ၁၆. ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနေန, ဒွိပဉ္စဝိညာဏေဟိ, သမ္ပဋိစ္ဆနဒွယေန, သန္တီရဏတ္တယေန စာတိ သောဠသဟိ ဝဇ္ဇိတေသု တေသတ္တတိယာ စိတ္တေသု ဝီရိယံ ဇာယတိ. १६. पंचद्वारावर्जन (१), द्विपंचविज्ञान (१०), दोन संपटिच्छन चित्ते आणि three संतीरण चित्ते, अशा सोळा चित्तांना वर्ज्य करून उर्वरित त्र्याहत्तर चित्तांमध्ये वीर्य उत्पन्न होतो. ၁၇. ဒေါမနဿသဟဂတေဟိဒွီဟိ, ဥပေက္ခာသဟဂတေဟိ ပဉ္စပညာသစိတ္တေဟိ, ကာယဝိညာဏဒွယေန, ဧကာဒသဟိ စတုတ္ထဇ္ဈာနေဟိ စာတိ သတ္တတိစိတ္တေဟိ ဝဇ္ဇိတေသု ဧကပညာသစိတ္တေသု ပီတိ ဇာယတိ. १७. दोन दोमनस्स-सहगत चित्ते, पंचावन्न उपेक्षा-सहगत चित्ते, दोन कायविज्ञान चित्ते आणि अकरा चतुर्थ ध्यान चित्ते, अशा सत्तर चित्तांना वर्ज्य करून उर्वरित एकावन्न चित्तांमध्ये प्रीती उत्पन्न होते. ၁၈. အဟေတုကေဟိ [Pg.114] အဋ္ဌာရသဟိ, မောမူဟေဟိ ဒွီဟိ စာတိ ဝီသတိယာ စိတ္တေဟိ ဝဇ္ဇိတေသု ဧကူနသတ္တတိစိတ္တေသု ဆန္ဒော ဇာယတိ. १८. अठरा अहेतुक चित्ते आणि दोन मोमूह (मोह-मूलक) चित्ते, अशा वीस चित्तांना वर्ज्य करून उर्वरित एकोणसत्तर चित्तांमध्ये छंद उत्पन्न होतो. ၁၉. တေ ပနာတိ ပကိဏ္ဏကဝိဝဇ္ဇိတာ တံသဟဂတာ စ. ယထာက္ကမန္တိ ဝိတက္ကာဒိဆပကိဏ္ဏကဝဇ္ဇိတတံသဟိတကမာနုရူပတော. ‘‘ဆသဋ္ဌိ ပဉ္စပညာသာ’’တျာဒိ ဧကဝီသသတဂဏနဝသေန, ဧကူနနဝုတိဂဏနဝသေန စ ယထာရဟံ ယောဇေတဗ္ဗံ. १९. 'ते पन' म्हणजे प्रकीर्णक चैतसिकांशिवाय असणारी आणि त्यांच्यासह असणारी चित्ते. 'यथाक्रमम्' म्हणजे वितर्क इत्यादी सहा प्रकीर्णक चैतसिकांनी वर्जित आणि त्यांच्याशी युक्त असणाऱ्या चित्तांच्या क्रमानुसार. 'सहासष्ट, पंचावन्न' इत्यादी संख्या १२१ चित्तांच्या विस्तृत गणनेनुसार आणि ८९ चित्तांच्या संक्षिप्त गणनेनुसार योग्यतेनुसार योजली पाहिजे. အညသမာနစေတသိကသမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अन्यसमान चैतसिकांच्या संप्रयोग-नयाचे वर्णन समाप्त झाले. အကုသလစေတသိကသမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ अकुशल चैतसिकांच्या संप्रयोग-नयाचे वर्णन. ၂၀. ‘‘သဗ္ဗာကုသလသာဓာရဏာ’’တိ ဝတွာ တဒေဝ သမတ္ထေတုံ ‘‘သဗ္ဗေသုပီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ယော ဟိ ကောစိ ပါဏာတိပါတာဒီသု ပဋိပဇ္ဇတိ, သော သဗ္ဗောပိ မောဟေန တတ္ထ အနာဒီနဝဒဿာဝီ အဟိရိကေန တတော အဇိဂုစ္ဆန္တော, အနောတ္တပ္ပေန အနောတ္တပ္ပန္တော, ဥဒ္ဓစ္စေန အဝူပသန္တော စ ဟောတိ, တသ္မာ တေ သဗ္ဗာကုသလေသု ဥပလဗ္ဘန္တိ. २०. 'सर्व अकुशल साधारण' असे म्हणून, त्याचेच समर्थन करण्यासाठी 'सब्बेसुपि' इत्यादी म्हटले आहे. कारण जो कोणी प्राणातिपात इत्यादी दुष्कृत्यांमध्ये प्रवृत्त होतो, तो सर्व मोहामुळे त्या दुष्कृत्यांमधील दोष न पाहणारा, अहीरिकतेमुळे त्या दुष्कृत्यांचा कंटाळा न करणारा, अनोत्तप्पतेमुळे न घाबरणारा आणि उद्धच्चतेमुळे अशांत झालेला असतो. म्हणूनच ते सर्व अकुशल चित्तांमध्ये आढळतात. ၂၁. လောဘသဟဂတစိတ္တေသွေဝါတိ ဧဝ-ကာရော အဓိကာရတ္ထာယပိ ဟောတီတိ ‘‘ဒိဋ္ဌိသဟဂတစိတ္တေသူ’’တိအာဒီသုပိ အဝဓာရဏံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သက္ကာယာဒီသု ဟိ အဘိနိဝိသန္တဿ တတ္ထ မမာယနသမ္ဘဝတော ဒိဋ္ဌိ လောဘသဟဂတစိတ္တေသွေဝ လဗ္ဘတိ. မာနောပိ အဟံမာနဝသေန ပဝတ္တနတော ဒိဋ္ဌိသဒိသောဝ ပဝတ္တတီတိ ဒိဋ္ဌိယာ သဟ ဧကစိတ္တုပ္ပာဒေန ပဝတ္တတိ ကေသရသီဟော ဝိယ အပရေန တထာဝိဓေန သဟ ဧကဂုဟာယံ, န စာပိ ဒေါသမူလာဒီသု ဥပ္ပဇ္ဇတိ အတ္တသိနေဟသန္နိဿယဘာဝေန ဧကန္တလောဘပဒဋ္ဌာနတ္တာတိ သော ဒိဋ္ဌိဝိပ္ပယုတ္တေသွေဝ လဗ္ဘတိ. २१. 'लोभसहगत चित्तांमध्येच' यातील 'एव' (च) हा शब्द पुढील वाक्यांमध्येही लागू होतो, म्हणून 'दृष्टीसहगत चित्तांमध्येच' इत्यादी ठिकाणीही त्याचा निश्चय समजला पाहिजे. कारण सत्काय इत्यादींमध्ये अभिनिवेश करणाऱ्या व्यक्तीच्या मनात 'हे माझे आहे' असा भाव उत्पन्न होत असल्यामुळे, दृष्टी केवळ लोभसहगत चित्तांमध्येच आढळते. मान देखील 'मी' अशा अहंकाराच्या स्वरूपात प्रवृत्त होत असल्यामुळे तो दृष्टीसारखाच प्रवृत्त होतो. म्हणून तो दृष्टीसह एकाच चित्तोत्पादात प्रवृत्त होत नाही; जसे एखादा केसरसिंह दुसऱ्या तशाच केसरसिंहाबरोबर एकाच गुहेत राहत नाही. तसेच, तो द्वेषमूलक इत्यादी चित्तांमध्येही उत्पन्न होत नाही, कारण त्याला स्वतःविषयीचे प्रेम हाच आश्रय असतो आणि केवळ लोभ हेच त्याचे निकटचे कारण असते. म्हणूनच तो केवळ दृष्टी-विप्रयुक्त चित्तांमध्येच आढळतो. ၂၄. တထာ [Pg.115] ပရသမ္ပတ္တိံ ဥသူယန္တဿ, အတ္တသမ္ပတ္တိယာ စ ပရေဟိ သာဓာရဏဘာဝံ အနိစ္ဆန္တဿ, ကတာကတဒုစ္စရိတသုစရိတေ အနုသောစန္တဿ စ တတ္ထ တတ္ထ ပဋိဟနနဝသေနေဝ ပဝတ္တနတော ဣဿာမစ္ဆရိယကုက္ကုစ္စာနိ ပဋိဃစိတ္တေသွေဝ. २४. त्याचप्रमाणे, दुसऱ्याच्या वैभवाचा हेवा (मत्सर) करणाऱ्याला (ईर्ष्या), स्वतःच्या वैभवात इतरांचा सहभाग नको असणाऱ्याला (मात्सर्य), आणि केलेल्या दुष्कृत्यांबद्दल व न केलेल्या सुकृत्यांबद्दल पश्चात्ताप करणाऱ्याला (कुक्कुच्च) त्या त्या आलंबनावर प्रतिघात (आघात) करण्याच्या स्वभावानेच प्रवृत्त होत असल्यामुळे, ईर्ष्या, मात्सर्य आणि कुक्कुच्च हे केवळ प्रतिघचित्तांमध्येच (द्वेषमूलक चित्तांमध्येच) आढळतात. ၂၅. အကမ္မညတာပကတိကဿ တထာ သဘာဝတိက္ခေသု အသင်္ခါရိကေသု ပဝတ္တနာယောဂတော ထိနမိဒ္ဓံ သသင်္ခါရိကေသွေဝ လဗ္ဘတိ. २५. त्याचप्रमाणे, अकर्मण्यता हा स्वभाव असलेल्या धर्माचे स्वभावाने तीक्ष्ण असलेल्या असंखारिक चित्तांमध्ये प्रवृत्त होणे अयोग्य असल्यामुळे, थीन आणि मिद्ध (स्त्यान आणि मिद्ध) हे केवळ ससंखारिक चित्तांमध्येच आढळतात. ၂၇. သဗ္ဗာပုညေသွေဝ စတ္တာရော စေတသိကာ ဂတာ, လောဘမူလေယေဝ ယထာသမ္ဘဝံ တယော ဂတာ, ဒေါသမူလေသွေဝ ဒွီသု စတ္တာရော ဂတာ, တထာ သသင်္ခါရေယေဝ ဒွယန္တိ ယောဇနာ. ဝိစိကိစ္ဆာ ဝိစိကိစ္ဆာစိတ္တေ စာတိ စ-သဒ္ဒေါ အဝဓာရဏေ. ဝိစိကိစ္ဆာ ဝိစိကိစ္ဆာစိတ္တေယေဝါတိ သမ္ဗန္ဓော. २७. सर्व अकुशल चित्तांमध्येच चार चेतसिक (मोचतुष्क) समाविष्ट होतात; लोभमूलक चित्तांमध्येच यथासंभव तीन चेतसिक समाविष्ट होतात; दोन्ही द्वेषमूलक चित्तांमध्येच चार चेतसिक समाविष्ट होतात; त्याचप्रमाणे केवळ ससंखारिक चित्तांमध्येच दोन चेतसिक (थीन आणि मिद्ध) समाविष्ट होतात, अशी ही शब्दांची योजना आहे. 'विचिकित्सा विचिकित्साचित्तातच' या वाक्यातील 'च' (ca) हा शब्द अवधारण (निश्चय) या अर्थी आहे. 'विचिकित्सा केवळ विचिकित्साचित्तातच असते' असा हा संबंध आहे. အကုသလစေတသိကသမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अकुशल चेतसिक संप्रयोग पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. သောဘနစေတသိကသမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ शोभन चेतसिक संप्रयोग पद्धतीचे वर्णन. ၂၉. လောကုတ္တရစိတ္တေသု ပါဒကဇ္ဈာနာဒိဝသေန ကဒါစိ သမ္မာသင်္ကပ္ပဝိရဟော သိယာ, န ပန ဝိရတီနံ အဘာဝေါ မဂ္ဂဿ ကာယဒုစ္စရိတာဒီနံ သမုစ္ဆေဒဝသေန, ဖလဿ စ တဒနုကူလဝသေန ပဝတ္တနတောတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဝိရတိယော ပနာ’’တျာဒိ. သဗ္ဗထာပီတိ သဗ္ဗေဟိပိ တံတံဒုစ္စရိတဒုရာဇီဝါနံ ဝိဓမနဝသပ္ပဝတ္တေဟိ အာကာရေဟိ. န ဟိ ဧတာသံ လောကိယေသု ဝိယ လောကုတ္တရေသုပိ မုသာဝါဒါဒီနံ ဝိသုံ ဝိသုံ ပဟာနဝသေန ပဝတ္တိ ဟောတိ သဗ္ဗေသမေဝ ဒုစ္စရိတဒုရာဇီဝါနံ တေန တေန မဂ္ဂေန ကေသဉ္စိ သဗ္ဗသော, ကေသဉ္စိ အပါယဂမနီယာဒိအဝတ္ထာယ ပဟာနဝသေန ဧကက္ခဏေ သမုစ္ဆိန္ဒနတော. နနု စာယမတ္ထော ‘‘ဧကတောဝါ’’တိ ဣမိနာဝ သိဒ္ဓေါတိ? တံ န, တိဿန္နံ ဧကတောဝုတ္တိပရိဒီပနမတ္တေန စတုဗ္ဗိဓဝစီဒုစ္စရိတာဒီနံ ပဋိပက္ခာကာရပ္ပဝတ္တိယာ အဒီပိတတ္တာ. ကေစိ ပန ဣမမတ္ထံ အသလ္လက္ခေတွာဝ [Pg.116] ‘‘‘သဗ္ဗထာပီ’တိ ဣဒံ အတိရိတ္တ’’န္တိ ဝဒန္တိ, တတ္ထ တေသံ အညာဏမေဝ ကာရဏံ. ‘‘နိယတာ’’တိ ဣမိနာပိ လောကိယေသု ဝိယ ကဒါစိ သမ္ဘဝံ နိဝါရေတိ. တထာ ဟေတာ လောကိယေသု ယေဝါပနကဝသေန ဒေသိတာ, ဣဓ ပန သရူပေနေဝ. ကာမာဝစရကုသလေသွေဝါတိ အဝဓာရဏေန ကာမာဝစရဝိပါကကိရိယေသု မဟဂ္ဂတေသု စ သမ္ဘဝံ နိဝါရေတိ. တထာ စေဝ ဥပရိ ဝက္ခတိ. ကဒါစီတိ မုသာဝါဒါဒိဧကေကဒုစ္စရိတေဟိ ပဋိဝိရမဏကာလေ. ကဒါစိ ဥပ္ပဇ္ဇန္တာပိ န ဧကတော ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ ဝီတိက္ကမိတဗ္ဗဝတ္ထုသင်္ခါတာနံ အတ္တနော အာရမ္မဏာနံ သမ္ဘဝါပေက္ခတ္တာတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဝိသုံ ဝိသု’’န္တိ. २९. लोकोत्तर चित्तांमध्ये पादक ध्यान इत्यादींच्या प्रभावाने कधीतरी सम्यक् संकल्पाचा विरह (अभाव) असू शकतो, परंतु विरतींचा अभाव नसतो; कारण मार्ग हा कायादुश्चरित इत्यादींचा समुच्छेद (पूर्णपणे नाश) करण्याच्या रूपाने प्रवृत्त होतो आणि फल हे त्याच्या अनुकूलतेने प्रवृत्त होते. म्हणूनच 'विरतियो पन' (परंतु विरती तर) इत्यादी म्हटले आहे. 'सर्वथा देखील' (सब्बथापि) म्हणजे सर्व प्रकारे त्या त्या दुश्चरित आणि दुराजीव यांना नष्ट करण्याच्या रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या प्रकारांनी होय. कारण या विरतींची लौकिक (महाकुशल) चित्तांप्रमाणे लोकोत्तर चित्तांमध्ये देखील मृषावाद इत्यादींचा वेगवेगळ्या प्रकारे त्याग करण्याच्या रूपाने प्रवृत्ती होत नाही; तर सर्वच दुश्चरित आणि दुराजीव यांना त्या त्या मार्गाने काहींचा पूर्णपणे, तर काहींचा अपायगामी इत्यादी अवस्थांच्या त्यागाच्या रूपाने एकाच क्षणी समुच्छेद (नाश) केला जात असल्यामुळे होय. शंका: हा अर्थ 'एकत्रच' (एकतो व) या शब्दानेच सिद्ध होत नाही का? उत्तर: तसे नाही, कारण तिन्ही विरतींच्या एकत्र प्रवृत्तीचे केवळ प्रदर्शन केल्याने चार प्रकारच्या वचीदुश्चरित इत्यादींच्या प्रतिपक्ष (विरोधी) रूपाने प्रवृत्त होणे स्पष्ट होत नाही. परंतु काही आचार्य या अर्थाचा विचार न करताच ''सब्बथापि' हा शब्द अधिक (व्यर्थ) आहे' असे म्हणतात. त्या बाबतीत त्यांचे अज्ञानच कारण आहे. 'नियत' (नियत) या शब्दाने देखील लौकिक चित्तांप्रमाणे कधीतरी उत्पन्न होणे प्रतिबंधित केले जाते. कारण या विरती लौकिक चित्तांमध्ये 'येवापनक' (इतर चेतसिक) रूपाने उपदेशिल्या आहेत, परंतु येथे (लोकोत्तर चित्तांमध्ये) त्या स्वतःच्या रूपातच (स्पष्टपणे) समाविष्ट आहेत. 'केवळ कामावचर कुशल चित्तांमध्येच' या अवधारणामुळे (निश्चयामुळे) कामावचर विपाक, क्रिया आणि mahaggat (महग्गत) चित्तांमध्ये त्यांची उत्पत्ती प्रतिबंधित केली जाते. तसेच पुढे सांगितले जाईल. 'कधीतरी' (कदाचि) म्हणजे मृषावाद इत्यादी एक-एक दुश्चरितापासून विरत होण्याच्या वेळी होय. कधीतरी उत्पन्न होत असल्या तरी त्या एकत्र उत्पन्न होत नाहीत, कारण उल्लंघन करण्यायोग्य वस्तू म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या आपल्या आलंबनांच्या अस्तित्वाची त्यांना अपेक्षा असते. म्हणूनच 'वेगवेगळ्या' (विसुं विसुं) असे म्हटले आहे. ၃၀. အပ္ပနာပ္ပတ္တာနံ အပ္ပမညာနံ န ကဒါစိ သောမနဿရဟိတာ ပဝတ္တိ အတ္ထီတိ ‘‘ပဉ္စမ…ပေ… စိတ္တေသု စာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဝိနီဝရဏာဒိတာယ မဟတ္တံ ဂတာနိ, မဟန္တေဟိ ဝါ ဈာယီဟိ ဂတာနိ ပတ္တာနီတိ မဟဂ္ဂတာနိ. နာနာ ဟုတွာတိ ဘိန္နာရမ္မဏတ္တာ အတ္တနော အာရမ္မဏဘူတာနံ ဒုက္ခိတသုခိတသတ္တာနံ အာပါထဂမနာပေက္ခတာယ ဝိသုံ ဝိသုံ ဟုတွာ. ဧတ္ထာတိ ဣမေသု ကာမာဝစရကုသလစိတ္တေသု, ကရုဏာမုဒိတာဘာဝနာကာလေ အပ္ပနာဝီထိတော ပုဗ္ဗေ ပရိစယဝသေန ဥပေက္ခာသဟဂတစိတ္တေဟိပိ ပရိကမ္မံ ဟောတိ, ယထာ တံ ပဂုဏဂန္ထံ သဇ္ဈာယန္တဿ ကဒါစိ အညဝိဟိတဿပိ သဇ္ဈာယနံ, ယထာ စ ပဂုဏဝိပဿနာယ သင်္ခါရေ သမ္မသန္တဿ ကဒါစိ ပရိစယဗလေန ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တစိတ္တေဟိပိ သမ္မသနန္တိ ဥပေက္ခာသဟဂတကာမာဝစရေသု ကရုဏာမုဒိတာနံ အသမ္ဘဝဝါဒေါ ကေစိဝါဒေါ ကတော. အပ္ပနာဝီထိယံ ပန တာသံ ဧကန္တတော သောမနဿသဟဂတေသွေဝ သမ္ဘဝေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော ဘိန္နဇာတိကဿ ဝိယ ဘိန္နဝေဒနဿပိ အာသေဝနပစ္စယာဘာဝတော. ३०. अप्पनेला (पूर्ण एकाग्रतेला) प्राप्त झालेल्या अप्पमण्यांची (करुणा आणि मुदिता यांची) कधीही सोमनस्यरहित (आनंदविरहित) प्रवृत्ती नसते, म्हणूनच 'पाचव्या ध्यानाशिवाय इतर चित्तांमध्ये' (पंचम...पे... चित्तेसु च) असे म्हटले आहे. नीवरणांपासून मुक्त असल्यामुळे महानतेला प्राप्त झालेली, किंवा महान ध्यानी पुरुषांनी प्राप्त केलेली चित्ते म्हणजे 'महग्गत' चित्ते होत. 'वेगवेगळे होऊन' (नाना हुत्वा) म्हणजे भिन्न आलंबन असल्यामुळे, आपले आलंबन असलेल्या दुःखी आणि सुखी प्राण्यांच्या समोर येण्याच्या अपेक्षेने वेगवेगळे होऊन (उत्पन्न होतात). 'येथे' (एत्थ) म्हणजे या कामावचर कुशल चित्तांमध्ये, करुणा आणि मुदिता यांच्या भावनेच्या वेळी अप्पना विथीच्या पूर्वी सरावाच्या बळावर उपेक्षासहगत चित्तांनी देखील परिकर्म भावना होते. ज्याप्रमाणे चांगल्या प्रकारे पाठ केलेल्या ग्रंथाचे पठण करणाऱ्या व्यक्तीचे चित्त कधीतरी इतरत्र असले तरी पठण चालू राहते, आणि ज्याप्रमाणे उत्कृष्ट विक्षेपाने (विपश्यनेद्वारे) संस्कारांचे मनन करणाऱ्या योग्याचे कधीतरी सरावाच्या बळावर ज्ञानविप्रयुक्त चित्तांनी देखील मनन होते; म्हणूनच उपेक्षासहगत कामावचर चित्तांमध्ये करुणा व मुदिता यांचा असंभव असल्याचा वाद हा 'केचीवाद' (काही आचार्यांचा वाद) मानला गेला आहे. परंतु अप्पना विथीमध्ये त्यांची (करुणा व मुदिता यांची) निश्चितपणे केवळ सोमनस्यसहगत चित्तांमध्येच उत्पत्ती समजावी; कारण भिन्न जातीच्या चित्ताप्रमाणेच भिन्न वेदना असलेल्या चित्ताचा देखील आसेवन प्रत्यय (वारंवार होणारा प्रभाव) नसतो. ၃၂. တယော သောဠသစိတ္တေသူတိ သမ္မာဝါစာဒယော တယော ဓမ္မာ အဋ္ဌလောကုတ္တရကာမာဝစရကုသလဝသေန သောဠသစိတ္တေသု ဇာယန္တိ. ३२. 'तीन चेतसिक सोळा चित्तांमध्ये' (तयो सोळसचित्तेसू) म्हणजे सम्यक् वाचा इत्यादी तीन चेतसिक, आठ लोकोत्तर आणि आठ कामावचर कुशल चित्तांच्या रूपाने सोळा चित्तांमध्ये उत्पन्न होतात (युक्त होतात). ၃၃. ဧဝံ [Pg.117] နိယတာနိယတသမ္ပယောဂဝသေန ဝုတ္တေသု အနိယတဓမ္မေ ဧကတော ဒဿေတွာ သေသာနံ နိယတဘာဝံ ဒီပေတုံ ‘‘ဣဿာမစ္ဆေရာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ဣဿာမစ္ဆေရကုက္ကုစ္စဝိရတိကရုဏာဒယော နာနာ ကဒါစိ ဇာယန္တိ, မာနော စ ကဒါစိ ‘‘သေယျောဟမသ္မီ’’တျာဒိဝသပ္ပဝတ္တိယံ ဇာယတိ. ထိနမိဒ္ဓံ တထာ ကဒါစိ အကမ္မညတာဝသပ္ပဝတ္တိယံ သဟ အညမညံ အဝိပ္ပယောဂိဝသေန ဇာယတီတိ ယောဇနာ. အထ ဝါ မာနော စာတိ ဧတ္ထ စ-သဒ္ဒံ ‘‘သဟာ’’တိ ဧတ္ထာပိ ယောဇေတွာ ထိနမိဒ္ဓံ တထာ ကဒါစိ သဟ စ သသင်္ခါရိကပဋိဃေ, ဒိဋ္ဌိဂတဝိပ္ပယုတ္တသသင်္ခါရိကေသု စ ဣဿာမစ္ဆရိယကုက္ကုစ္စေဟိ, မာနေန စ သဒ္ဓိံ, ကဒါစိ တဒိတရသသင်္ခါရိကစိတ္တသမ္ပယောဂကာလေ, တံသမ္ပယောဂကာလေပိ ဝါ နာနာ စ ဇာယတီတိ ယောဇနာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. အပရေ ပန အာစရိယာ ‘‘မာနော စ ထိနမိဒ္ဓဉ္စ တထာ ကဒါစိ နာနာ ကဒါစိ သဟ စ ဇာယတီ’’တိ ဧတ္တကမေဝ ယောဇေသုံ. ३३. अशा प्रकारे नियत (नेहमी युक्त असणारे) आणि अनियत (कधीतरी युक्त असणारे) संप्रयोगाच्या रूपाने सांगितलेल्या चेतसिकांमध्ये अनियत चेतसिकांना एकत्र दाखवून उर्वरित चेतसिकांचे नियतत्व (नेहमी युक्त असणे) स्पष्ट करण्यासाठी 'ईर्ष्या, मात्सर्य' (इस्सामच्छेरा) इत्यादी म्हटले आहे. ईर्ष्या, मात्सर्य, कुक्कुच्च, विरती आणि करुणा इत्यादी चेतसिक कधीतरी वेगवेगळे उत्पन्न होतात; आणि मान देखील कधीतरी 'मी श्रेष्ठ आहे' इत्यादी रूपाने प्रवृत्त होत असताना उत्पन्न होतो. थीन आणि मिद्ध हे त्याचप्रमाणे कधीतरी अकर्मण्यतेच्या रूपाने प्रवृत्त होत असताना परस्परांशी अविप्रयुक्त (एकत्र) राहून उत्पन्न होतात, अशी ही शब्दांची योजना आहे. अथवा, 'मानो च' यातील 'च' शब्द 'सह' येथे देखील जोडून, थीन आणि मिद्ध हे त्याचप्रमाणे कधीतरी एकत्र देखील - ससंखारिक प्रतिघ चित्तात ईर्ष्या, मात्सर्य व कुक्कुच्च यांच्यासोबत, आणि दृष्टिगतविप्रयुक्त ससंखारिक चित्तांमध्ये मानासोबत एकत्र - आणि कधीतरी त्याव्यतिरिक्त इतर ससंखारिक चित्तांशी संप्रयोग होण्याच्या वेळी किंवा त्याच्या संप्रयोगाच्या वेळी देखील वेगवेगळे उत्पन्न होतात, अशी योजना समजावी. परंतु इतर आचार्य 'मान आणि थीन-मिद्ध हे कधीतरी वेगवेगळे तर कधीतरी एकत्र उत्पन्न होतात' एवढीच योजना करतात. ၃၄. သေသာတိ ယထာဝုတ္တေဟိ ဧကာဒသဟိ အနိယတေဟိ ဣတရေ ဧကစတ္တာလီသ. ကေစိ ပန ‘‘ယထာဝုတ္တေဟိ အနိယတယေဝါပနကေဟိ သေသာ နိယတယေဝါပနကာ’’တိ ဝဏ္ဏေန္တိ, တံ တေသံ မတိမတ္တံ, ဣဓ ယေဝါပနကနာမေန ကေသဉ္စိ အနုဒ္ဓဋတ္တာ. ကေဝလဉှေတ္ထ နိယတာနိယတဝသေန စိတ္တုပ္ပာဒေသု ယထာရဟံ လဗ္ဘမာနစေတသိကမတ္တသန္ဒဿနံ အာစရိယေန ကတံ, န ယေဝါပနကနာမေန ကေစိ ဥဒ္ဓဋာတိ. ३४. 'उर्वरित' (सेसा) म्हणजे वर सांगितलेल्या अकरा अनियत चेतसिकांशिवाय इतर एकेचाळीस चेतसिक होत. परंतु काही आचार्य 'वर सांगितलेल्या अनियत येवापनक चेतसिकांशिवाय उर्वरित हे नियत येवापनक चेतसिक आहेत' अशी व्याख्या करतात; ते केवळ त्यांचे मत आहे, कारण येथे (या संप्रयोग पद्धतीत) 'येवापनक' या नावाने कोणत्याही चेतसिकांचा उल्लेख केलेला नाही. कारण येथे आचार्यांनी केवळ नियत आणि अनियत रूपाने चित्तोत्पादांमध्ये यथायोग्य आढळणाऱ्या चेतसिकांचेच दर्शन घडवले आहे, 'येवापनक' या नावाने कोणतेही चेतसिक उद्धृत केलेले नाहीत. ဧဝံ တာဝ ‘‘ဖဿာဒီသု အယံ ဓမ္မော ဧတ္တကေသု စိတ္တေသု ဥပလဗ္ဘတီ’’တိ စိတ္တပရိစ္ဆေဒဝသေန သမ္ပယောဂံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ‘‘ဣမသ္မိံ စိတ္တုပ္ပာဒေ ဧတ္တကာ စေတသိကာ’’တိ စေတသိကရာသိပရိစ္ဆေဒဝသေန သင်္ဂဟံ ဒဿေတုံ ‘‘သင်္ဂဟဉ္စာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. अशा प्रकारे प्रथम 'स्पर्श इत्यादी चेतसिकांमध्ये हा चेतसिक एवढ्या चित्तांमध्ये आढळतो' असे चित्ताच्या विभाजनानुसार संप्रयोग पद्धती दाखवून, आता 'या चित्तोत्पादामध्ये एवढे चेतसिक असतात' असे चेतसिकांच्या समूहाच्या विभाजनानुसार संग्रह पद्धती दाखवण्यासाठी 'आणि संग्रह' (संग्रहञ्च) इत्यादी म्हटले आहे. သောဘနစေတသိကသမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. शोभन चेतसिक संप्रयोग पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. သမ္ပယောဂနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. संप्रयोग पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. သင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ संग्रह पद्धतीचे वर्णन. ၃၅. ‘‘ဆတ္တိံသာ’’တျာဒိ [Pg.118] တတ္ထ တတ္ထ ယထာရဟံ လဗ္ဘမာနကဓမ္မဝသေန ဂဏနသင်္ဂဟော. ३५. 'छत्तीस' (छत्तिंसा) इत्यादी ही त्या त्या चित्तात यथायोग्य आढळणाऱ्या धर्मांच्या (चेतसिकांच्या) संख्येचा संग्रह करणारी गाथा आहे. ၃၆. ပဌမဇ္ဈာနေ နိယုတ္တာနိ စိတ္တာနိ, တံ ဝါ ဧတေသံ အတ္ထီတိ ပဌမဇ္ဈာနိကစိတ္တာနိ. အပ္ပမညာနံ သတ္တာရမ္မဏတ္တာ, လောကုတ္တရာနဉ္စ နိဗ္ဗာနာရမ္မဏတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အပ္ပမညာဝဇ္ဇိတာ’’တိ. ‘‘တထာ’’တိ ဣမိနာ အညသမာနာ, အပ္ပမညာဝဇ္ဇိတာ သောဘနစေတသိကာ စ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တီတိ အာကဍ္ဎတိ. ဥပေက္ခာသဟဂတာတိ ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခဝဇ္ဇာ သုခဋ္ဌာနံ ပဝိဋ္ဌဥပေက္ခာယ သဟဂတာ. ပဉ္စကဇ္ဈာနဝသေနာတိ ဝိတက္ကဝိစာရေ ဝိသုံ ဝိသုံ အတိက္ကမိတွာ ဘာဝေန္တဿ နာတိတိက္ခဉာဏဿ ဝသေန ဒေသိတဿ ဈာနပဉ္စကဿ ဝသေန. တေ ပန ဧကတော အတိက္ကမိတွာ ဘာဝေန္တဿ တိက္ခဉာဏဿ ဝသေန ဒေသိတစတုက္ကဇ္ဈာနဝသေန ဒုတိယဇ္ဈာနိကေသု ဝိတက္ကဝိစာရဝဇ္ဇိတာနံ သမ္ဘဝတော စတုဓာ ဧဝ သင်္ဂဟော ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ३६. प्रथम ध्यानात युक्त (जोडलेली) असलेली चित्ते, किंवा ज्या चित्तांमध्ये ते प्रथम ध्यान असते, म्हणून त्यांना 'प्रथमध्यानिक चित्ते' म्हणतात. अप्पमञ्ञा (अप्रमाण) चेतसिकांचे आलंबन सत्त्व (प्राणी) असल्यामुळे आणि लोकोत्तर चित्तांचे आलंबन निर्वाण असल्यामुळे 'अप्पमञ्ञा-वर्जित' (अप्पमञ्ञा वगळून) असे म्हटले आहे. 'तथा' या शब्दाने अन्यसमान आणि अप्पमञ्ञा-वर्जित शोभन चेतसिके संग्रहित होतात, असा अर्थ घेतला जातो. 'उपेक्षासहगत' म्हणजे वितक्क, विचार, पीती आणि सुख वर्जित करून सुखाच्या स्थानावर पोहोचलेल्या उपेक्षेसह उत्पन्न होणारे. 'पंचकध्यानवशात' म्हणजे वितक्क आणि विचारांचे वेगवेगळे उल्लंघन करून भावना करणाऱ्या, अतिशय तीक्ष्ण प्रज्ञा नसलेल्या योग्याच्या अपेक्षेने उपदेशिलेल्या पाच ध्यानांच्या (ध्यानपंचक) वशात होय. परंतु, त्या वितक्क आणि विचारांचे एकाच वेळी उल्लंघन करून भावना करणाऱ्या तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्या योग्याच्या अपेक्षेने उपदेशिलेल्या चतुष्क ध्यानाच्या वशात, द्वितीय ध्यानिक चित्तांमध्ये वितक्क आणि विचार वर्जित असलेल्या चेतसिकांच्या संभवतेमुळे केवळ चार प्रकारचाच संग्रह होतो, असा (आचार्य अनुरुद्धांचा) अभिप्राय आहे. ၃၇. တေတ္တိံသဒွယံ စတုတ္ထပဉ္စမဇ္ဈာနစိတ္တေသု. ३७. चतुर्थ आणि पंचम ध्यानचित्तांमध्ये तेहतीस-तेहतीस चेतसिके असतात. မဟဂ္ဂတစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ महग्गतचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन. ၃၈. တီသူတိ ကုသလဝိပါကကိရိယဝသေန တိဝိဓေသု သီလဝိသုဒ္ဓိဝသေန သုဝိသောဓိတကာယဝစီပယောဂဿ ကေဝလံ စိတ္တသမာဓာနမတ္တေန မဟဂ္ဂတဇ္ဈာနာနိ ပဝတ္တန္တိ, န ပန ကာယဝစီကမ္မာနံ ဝိသောဓနဝသေန, နာပိ ဒုစ္စရိတဒုရာဇီဝါနံ သမုစ္ဆိန္ဒနပဋိပ္ပဿမ္ဘနဝသေနာတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဝိရတိဝဇ္ဇိတာ’’တိ. ပစ္စေကမေဝါတိ ဝိသုံ ဝိသုံယေဝ. ပန္နရသသူတိ ရူပါဝစရဝသေန တီသု, အာရုပ္ပဝသေန ဒွါဒသသူတိ ပန္နရသသု. အပ္ပမညာယော န လဗ္ဘန္တီတိ ဧတ္ထ ကာရဏံ ဝုတ္တမေဝ. ३८. 'तिन्हींमध्ये' म्हणजे कुशल, विपाक आणि क्रिया यांच्या भेदाने तीन प्रकारच्या (प्रथमध्यानिक चित्तांमध्ये) शीलविशुद्धीच्या वशात जिचा कायिक आणि वाचिक व्यवहार चांगल्या प्रकारे शुद्ध केला गेला आहे अशा योग्याच्या केवळ चित्ताच्या एकाग्रतेनेच (समाधीनेच) महग्गत ध्याने प्रवृत्त होतात; परंतु कायिक आणि वाचिक कर्मांच्या शुद्धीकरणाच्या वशात प्रवृत्त होत नाहीत, तसेच दुश्चरित आणि दुर्आजीव यांच्या समूळ उच्चाटन किंवा शांत करण्याच्या वशातही प्रवृत्त होत नाहीत, म्हणून 'विरती-वर्जित' असे म्हटले आहे. 'प्रत्येकच' म्हणजे स्वतंत्रपणे (वेगवेगळेच). 'पंधरा चित्तांमध्ये' म्हणजे रूपावचर वशात तीन आणि अरूपावचर वशात बारा, अशा पंधरा चित्तांमध्ये. 'अप्पमञ्ञा प्राप्त होत नाहीत' याचे कारण आधीच सांगितले आहे. မဟဂ္ဂတစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. महग्गतचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. ကာမာဝစရသောဘနစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ कामावचर शोभनचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन. ၄၀. ပစ္စေကမေဝါတိ [Pg.119] ဧကေကာယေဝ. အပ္ပမညာနံ ဟိ သတ္တာရမ္မဏတ္တာ, ဝိရတီနဉ္စ ဝီတက္ကမိတဗ္ဗဝတ္ထုဝိသယတ္တာ နတ္ထိ တာသံ ဧကစိတ္တုပ္ပာဒေ သမ္ဘဝေါတိ လောကိယဝိရတီနံ ဧကန္တကုသလသဘာဝတ္တာ နတ္ထိ အဗျာကတေသု သမ္ဘဝေါတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဝိရတိဝဇ္ဇိတာ’’တိ. တေနာဟ ‘‘ပဉ္စ သိက္ခာပဒါ ကုသလာယေဝါ’’တိ (ဝိဘ. ၇၁၅). ဣတရထာ သဒ္ဓါသတိအာဒယော ဝိယ ‘‘သိယာ ကုသလာ, သိယာ အဗျာကတာ’’တိ ဝဒေယျ. ဖလဿ ပန မဂ္ဂပဋိဗိမ္ဗဘူတတ္တာ, ဒုစ္စရိတဒုရာဇီဝါနံ ပဋိပ္ပဿမ္ဘနတော စ န လောကုတ္တရဝိရတီနံ ဧကန္တကုသလတာ ယုတ္တာတိ တာသံ တတ္ထ အဂ္ဂဟဏံ. ကာမာဝစရဝိပါကာနမ္ပိ ဧကန္တပရိတ္တာရမ္မဏတ္တာ, အပ္ပမညာနဉ္စ သတ္တာရမ္မဏတ္တာ, ဝိရတီနမ္ပိ ဧကန္တကုသလတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အပ္ပမညာဝိရတိဝဇ္ဇိတာ’’တိ. ४०. 'प्रत्येकच' म्हणजे एक-एकच (योजना करावी). कारण अप्पमञ्ञांचे आलंबन सत्त्व (प्राणी) असल्यामुळे आणि विरतींचे आलंबन उल्लंघन करण्यायोग्य वस्तू (विषय) असल्यामुळे, एकाच चित्तोत्पादात त्यांचा एकत्र संभव नाही. लौकिक विरतींचा स्वभाव एकांततः कुशल असल्यामुळे अव्याकृत (विपाक व क्रिया) चित्तांमध्ये त्यांचा संभव नाही, म्हणून 'विरती-वर्जित' असे म्हटले आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे: 'पाच शीलपदे केवळ कुशलच आहेत' (विभंग ७१५). अन्यथा, श्रद्धा, सती इत्यादींप्रमाणे 'काही कुशल आहेत, काही अव्याकृत आहेत' असे म्हटले असते. परंतु, फलचित्त हे मार्गाचे प्रतिबिंब असल्यामुळे आणि दुश्चरित व दुर्आजीव शांत करत असल्यामुळे, लोकोत्तर विरतींचे एकांततः कुशल असणे योग्य नाही, म्हणून त्यांचा तेथे (एकांत कुशलामध्ये) संग्रह केला जात नाही. कामावचर विपाक चित्तांचे आलंबन केवळ परित्त (कामावचर) धर्म असल्यामुळे, अप्पमञ्ञांचे आलंबन सत्त्व असल्यामुळे आणि विरतींचे एकांततः कुशल स्वरूप असल्यामुळे 'अप्पमञ्ञा-विरती-वर्जित' असे म्हटले आहे. နနု စ ပညတ္တာဒိအာရမ္မဏမ္ပိ ကာမာဝစရကုသလံ ဟောတီတိ တဿ ဝိပါကေနပိ ကုသလသဒိသာရမ္မဏေန ဘဝိတဗ္ဗံ ယထာ တံ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဝိပါကေဟီတိ? နယိဒမေဝံ, ကာမတဏှာဓီနဿ ဖလဘူတတ္တာ. ယထာ ဟိ ဒါသိယာ ပုတ္တော မာတရာ ဣစ္ဆိတံ ကာတုံ အသက္ကောန္တော သာမိကေနေဝ ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတံ ကရောတိ, ဧဝံ ကာမတဏှာယတ္တတာယ ဒါသိသဒိသဿ ကာမာဝစရကမ္မဿ ဝိပါကဘူတံ စိတ္တံ တေန ဂဟိတာရမ္မဏံ အဂ္ဂဟေတွာ ကာမတဏှာရမ္မဏမေဝ ဂဏှာတီတိ. ဒွါဒသဓာတိ ကုသလဝိပါကကိရိယဘေဒေသု ပစ္စေကံ စတ္တာရော စတ္တာရော ဒုကာတိ ကတွာ တီသု ဒွါဒသဓာ. शंका: प्रज्ञप्ति इत्यादी आलंबन असणारे कामावचर कुशल चित्तही असते, म्हणून त्याच्या विपाक चित्ताचे आलंबनही कुशलासारखेच असायला हवे, जसे mahaggat आणि लोकोत्तर विपाक चित्तांमध्ये असते? उत्तर: हे असे नाही, कारण ते कामतण्हेच्या (काम-तृष्णेच्या) अधीन असलेल्या कर्माचे फल आहे. जसे दासीचा मुलगा आईने इच्छिलेले काम करण्यास असमर्थ असून मालकाने इच्छिलेलेच काम करतो, त्याचप्रमाणे कामतण्हेच्या अधीन असल्यामुळे दासीसारख्या कामावचर कुशल कर्माचे फल असणारे विपाक चित्त त्या कर्माने घेतलेले आलंबन न घेता केवळ कामतण्हेचे आलंबनच ग्रहण करते. 'बारा प्रकारे' म्हणजे कुशल, विपाक आणि क्रिया यांच्या भेदांमध्ये प्रत्येकी चार-चार द्विक (जोड्या) करून तिन्हींमध्ये बारा प्रकारे संग्रह होतो. ၄၂. ဣဒါနိ ဣမေသု ပဌမဇ္ဈာနိကာဒီဟိ ဒုတိယဇ္ဈာနိကာဒီနံ ဘေဒကရဓမ္မေ ဒဿေတုံ ‘‘အနုတ္တရေ ဈာနဓမ္မာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. အနုတ္တရေ စိတ္တေ ဝိတက္ကဝိစာရပီတိသုခဝသေန ဈာနဓမ္မာ ဝိသေသကာ ဘေဒကာ. မဇ္ဈိမေ မဟဂ္ဂတေ အပ္ပမညာ, ဈာနဓမ္မာ [Pg.120] စ. ပရိတ္တေသု ကာမာဝစရေသု ဝိရတီ, ဉာဏပီတီ စ အပ္ပမညာ စ ဝိသေသကာ, တတ္ထ ဝိရတီ ကုသလေဟိ ဝိပါကကိရိယာနံ ဝိသေသကာ, အပ္ပမညာ ကုသလကိရိယေဟိ ဝိပါကာနံ, ဉာဏပီတီ ပန တီသု ပဌမယုဂဠာဒီဟိ ဒုတိယယုဂဠာဒီနန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ४२. आता या शोभन चित्तांमध्ये प्रथमध्यानिक इत्यादी चित्तांपेक्षा द्वितीयध्यानिक इत्यादी चित्तांचे भेद करणारे धर्म दाखवण्यासाठी 'अनुत्तरे ध्यानधम्मा...' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. अनुत्तर (लोकोत्तर) चित्तामध्ये वितक्क, विचार, पीती आणि सुखाच्या वशात ध्यानधर्म हे विशेषक (भेद करणारे) आहेत. मध्यम अशा महग्गत चित्तामध्ये अप्पमञ्ञा आणि ध्यानधर्म हे विशेषक आहेत. परित्त अशा कामावचर चित्तांमध्ये विरती, ज्ञान, पीती आणि अप्पमञ्ञा हे विशेषक आहेत. त्यामध्ये विरती या कुशल चित्तांपेक्षा विपाक व क्रिया चित्तांचे भेद करणाऱ्या आहेत; अप्पमञ्ञा या कुशल व क्रिया चित्तांपेक्षा विपाक चित्तांचे भेद करणाऱ्या आहेत; आणि ज्ञान व पीती या तिन्हींमध्ये (कुशल, विपाक, क्रिया) पहिल्या जोडीपेक्षा दुसऱ्या जोडी इत्यादींचे भेद करणाऱ्या आहेत, असे समजावे. ကာမာဝစရသောဘနစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कामावचर शोभनचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. အကုသလစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ अकुशलचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन. ၄၄. ဒုတိယေ အသင်္ခါရိကေတိ ဒိဋ္ဌိဝိပ္ပယုတ္တေ အသင်္ခါရိကေ လောဘမာနေန တထေဝ အညသမာနာ, အကုသလသာဓာရဏာ စ ဧကူနဝီသတိ ဓမ္မာတိ သမ္ဗန္ဓော. ४४. 'दुसऱ्या असंस्कारिक चित्तामध्ये' म्हणजे दृष्टी-विप्रयुक्त असंस्कारिक चित्तामध्ये लोभ आणि मानासह तसेच अन्यसमान आणि अकुशलसाधारण चेतसिके मिळून एकोणीस (१९) धर्म (चेतसिके) संग्रहित होतात, असा संबंध आहे. ၄၅. တတိယေတိ ဥပေက္ခာသဟဂတဒိဋ္ဌိသမ္ပယုတ္တေ အသင်္ခါရိကေ. ४५. 'तिसऱ्या चित्तामध्ये' म्हणजे उपेक्षासहगत दृष्टी-संप्रयुक्त असंस्कारिक चित्तामध्ये. ၄၆. စတုတ္ထေတိ ဒိဋ္ဌိဝိပ္ပယုတ္တေ အသင်္ခါရိကေ. ४६. 'चौथ्या चित्तामध्ये' म्हणजे दृष्टी-विप्रयुक्त असंस्कारिक चित्तामध्ये. ၄၇. ဣဿာမစ္ဆရိယကုက္ကုစ္စာနိ ပနေတ္ထ ပစ္စေကမေဝ ယောဇေတဗ္ဗာနိ ဘိန္နာရမ္မဏတ္တာယေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. ४७. येथे इस्सा (ईर्ष्या), मच्छरिय (मत्सर) आणि कुक्कुच्च (पश्चात्ताप) यांची स्वतंत्रपणेच (एक-एक करूनच) योजना करावी, कारण त्यांचे आलंबन भिन्न-भिन्न असते, असा अभिप्राय आहे. ၅၀. အဓိမောက္ခဿ နိစ္ဆယာကာရပ္ပဝတ္တိတော ဒွေဠှကသဘာဝေ ဝိစိကိစ္ဆာစိတ္တေ သမ္ဘဝေါ နတ္ထီတိ ‘‘အဓိမောက္ခဝိရဟိတာ’’တိ ဝုတ္တံ. ५०. अधिमोक्खाची प्रवृत्ती निश्चयात्मक स्वरूपाची असल्यामुळे, दुविधा स्वभाव असलेल्या विचिकित्सा चित्तामध्ये त्याचा संभव नाही, म्हणून 'अधिमोक्ख-विरहित' असे म्हटले आहे. ၅၁. ဧကူနဝီသတိ ပဌမဒုတိယအသင်္ခါရိကေသု, အဋ္ဌာရသ တတိယစတုတ္ထအသင်္ခါရိကေသု, ဝီသ ပဉ္စမေ အသင်္ခါရိကေ, ဧကဝီသ ပဌမဒုတိယသသင်္ခါရိကေသု, ဝီသတိ တတိယစတုတ္ထသသင်္ခါရိကေသု, ဒွါဝီသ ပဉ္စမေ သသင်္ခါရိကေ, ပန္နရသ မောမူဟဒွယေတိ ဧဝံ အကုသလေ သတ္တဓာ ဌိတာတိ ယောဇနာ. ५१. पहिल्या आणि दुसऱ्या असंस्कारिक चित्तांमध्ये एकोणीस (१९), तिसऱ्या आणि चौथ्या असंस्कारिक चित्तांमध्ये अठरा (१८), पाचव्या असंस्कारिक चित्तामध्ये वीस (२०), पहिल्या आणि दुसऱ्या ससंस्कारिक चित्तांमध्ये एकवीस (२१), तिसऱ्या आणि चौथ्या ससंस्कारिक चित्तांमध्ये वीस (२०), पाचव्या ससंस्कारिक चित्तामध्ये बावीस (२२), आणि दोन मोहमुळ चित्तांमध्ये पंधरा (१५) चेतसिके असतात; अशा प्रकारे अकुशल चित्तांमध्ये सात प्रकारे चेतसिकांची योजना केली जाते. ၅၂. သာဓာရဏာတိ [Pg.121] အကုသလာနံ သဗ္ဗေသမေဝ သာဓာရဏဘူတာ စတ္တာရော သမာနာ စ ဆန္ဒပီတိအဓိမောက္ခဝဇ္ဇိတာ အညသမာနာ အပရေ ဒသာတိ ဧတေ စုဒ္ဒသ ဓမ္မာ သဗ္ဗာကုသလယောဂိနောတိ ပဝုစ္စန္တီတိ ယောဇနာ. ५२. 'साधारण' म्हणजे सर्वच अकुशल चित्तांमध्ये साधारण असणारे चार (अकुशलसाधारण चेतसिके) आणि छन्द, पीती व अधिमोक्ख वर्जित असलेले इतर दहा अन्यसमान चेतसिके; हे चौदा (१४) धर्म 'सर्व अकुशल चित्तांमध्ये युक्त असणारे' असे म्हटले जातात, अशी योजना आहे. အကုသလစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अकुशलचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. အဟေတုကစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ अहेतुकचित्त-संग्रह पद्धतीचे वर्णन. ၅၄. ‘‘တထာ’’တိ ဣမိနာ အညသမာနေ ပစ္စာမသတိ. ५४. 'तथा' या शब्दाने अन्यसमान चेतसिकांचा पुन्हा निर्देश केला जातो. ၅၆. မနောဝိညာဏဓာတုယာ ဝိယ ဝိသိဋ္ဌမနနကိစ္စာယောဂတော မနနမတ္တာ ဓာတူတိ မနောဓာတု. အဟေတုကပဋိသန္ဓိယုဂဠေတိ ဥပေက္ခာသန္တီရဏဒွယေ. ५६. मनोविज्ञानधातू प्रमाणे विशिष्ट अशा मनन (जाणण्याच्या) कृत्याशी युक्त नसल्यामुळे, केवळ मननमात्र असणारी धातू म्हणजे 'मनोधातू' होय. 'अहेतुक प्रतिसंधीच्या जोडीमध्ये' म्हणजे दोन उपेक्षा-संतीरण चित्तांमध्ये. ၅၈. ဒွါဒသ ဟသနစိတ္တေ, ဧကာဒသ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနသုခသန္တီရဏေသု, ဒသ မနောဓာတုတ္တိကာဟေတုကပဋိသန္ဓိယုဂဠဝသေန ပဉ္စသု, သတ္တ ဒွိပဉ္စဝိညာဏေသူတိ အဋ္ဌာရသာဟေတုကေသု စိတ္တုပ္ပာဒေသု သင်္ဂဟော စတုဗ္ဗိဓော ဟောတီတိ ယောဇနာ. ५८. हसितुत्पाद चित्तामध्ये बारा (१२), वोट्ठब्बन आणि सुख-संतीरण चित्तांमध्ये अकरा (११), मनोधातू त्रिक आणि अहेतुक प्रतिसंधी जोडी अशा पाच चित्तांमध्ये दहा (१०), आणि द्विपंचविज्ञानामध्ये सात (७) चेतसिके असतात; अशा प्रकारे अठरा अहेतुक चित्तोत्पादांमध्ये चार प्रकारचा संग्रह होतो, अशी योजना आहे. ၅၉. တေတ္တိံသဝိဓသင်္ဂဟောတိ အနုတ္တရေ ပဉ္စ, တထာ မဟဂ္ဂတေ, ကာမာဝစရသောဘနေ ဒွါဒသ, အကုသလေ သတ္တ, အဟေတုကေ စတ္တာရောတိ တေတ္တိံသဝိဓသင်္ဂဟော. ५९. 'तेहतीस प्रकारचा संग्रह' म्हणजे अनुत्तर (लोकोत्तर) चित्तांमध्ये पाच, तसेच महग्गत चित्तांमध्ये पाच, कामावचर शोभन चित्तांमध्ये बारा, अकुशल चित्तांमध्ये सात, आणि अहेतुक चित्तांमध्ये चार, मिळून तेहतीस प्रकारचा संग्रह होतो. ၆၀. ဣတ္ထံ ယထာဝုတ္တနယေန စိတ္တာဝိယုတ္တာနံ စေတသိကာနံ စိတ္တပရိစ္ဆေဒဝသေန ဝုတ္တံ သမ္ပယောဂဉ္စ စေတသိကရာသိပရိစ္ဆေဒဝသေန ဝုတ္တံ သင်္ဂဟဉ္စ ဉတွာ ယထာယောဂံ စိတ္တေန သမံ ဘေဒံ ဥဒ္ဒိသေ ‘‘သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏာ တာဝ သတ္တ ဧကူနနဝုတိစိတ္တေသု ဥပ္ပဇ္ဇနတော ပစ္စေကံ ဧကူနနဝုတိဝိဓာ, ပကိဏ္ဏကေသု [Pg.122] ဝိတက္ကော ပဉ္စပညာသစိတ္တေသု ဥပ္ပဇ္ဇနတော ပဉ္စပညာသဝိဓော’’တျာဒိနာ ကထေယျာတိ အတ္ထော. ६०. अशा प्रकारे, वर सांगितलेल्या पद्धतीने, चित्ताशी नित्य युक्त असणाऱ्या चेतसिकांच्या, चित्ताच्या परिच्छेदाच्या (विभागाच्या) आधारे सांगितलेल्या 'संप्रयोग' पद्धतीला आणि चेतसिक समूहाच्या परिच्छेदाच्या आधारे सांगितलेल्या 'संग्रह' पद्धतीला जाणून घेऊन, योग्यतेनुसार चित्ताशी समान असणाऱ्या चेतसिकांच्या भेदांचे निर्देश करावेत. जसे की—'सर्वचित्तसाधारण असणारे सात चेतसिक एकोणनव्वद चित्तांमध्ये उत्पन्न होत असल्यामुळे प्रत्येकी एकोणनव्वद प्रकारचे होतात; प्रकीर्णक चेतसिकांपैकी वितर्क हा पंचावन्न चित्तांमध्ये उत्पन्न होत असल्यामुळे पंचावन्न प्रकारचा होतो' इत्यादी प्रकारे सांगावे, असा अर्थ आहे. အဟေတုကစိတ္တသင်္ဂဟနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अहेतुकचित्तसंग्रह पद्धतीचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नामक अभिधम्मत्थसंग्रहाच्या स्पष्टीकरणातील (टीकेमधील)... စေတသိကပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. चेतसिक परिच्छेदाचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ၃. ပကိဏ္ဏကပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ३. प्रकीर्णक परिच्छेदाचे स्पष्टीकरण ၁. ဣဒါနိ ယထာဝုတ္တာနံ စိတ္တစေတသိကာနံ ဝေဒနာဒိဝိဘာဂတော, တံတံဝေဒနာဒိဘေဒဘိန္နစိတ္တုပ္ပာဒဝိဘာဂတော စ ပကိဏ္ဏကသင်္ဂဟံ ဒဿေတုံ ‘‘သမ္ပယုတ္တာ ယထာယောဂ’’န္တျာဒိ အာရဒ္ဓံ. ယထာယောဂံ သမ္ပယုတ္တာ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ သဘာဝတော အတ္တနော အတ္တနော သဘာဝဝသေန ဧကူနနဝုတိဝိဓမ္ပိ စိတ္တံ အာရမ္မဏဝိဇာနနသဘာဝသာမညေန ဧကဝိဓံ, သဗ္ဗစိတ္တသာဓာရဏော ဖဿော ဖုသနသဘာဝေန ဧကဝိဓောတျာဒိနာ တေပညာသ ဟောန္တိ. १. आता, वर सांगितलेल्या चित्त आणि चेतसिकांच्या वेदना इत्यादी विभागांच्या आधारे, तसेच त्या त्या वेदना इत्यादी भेदांनी भिन्न असणाऱ्या चित्तोत्पादांच्या विभागांच्या आधारे 'प्रकीर्णक संग्रह' दर्शवण्यासाठी 'संपयुत्ता यथाजोगं' (योग्यतेनुसार संप्रयुक्त) इत्यादी गाथा सुरू केली आहे. योग्यतेनुसार संप्रयुक्त असणारे चित्त आणि चेतसिक धर्म स्वभावाने आपापल्या स्वभावाच्या आधारे—एकोणनव्वद प्रकारचे असणारे चित्त देखील आलंबन (विषय) जाणण्याच्या सामान्य स्वभावामुळे एक प्रकारचे आहे, सर्वचित्तसाधारण असणारा स्पर्श हा स्पर्श करण्याच्या स्वभावामुळे एक प्रकारचा आहे—इत्यादी प्रकारे त्रेपन्न (५३) होतात. ၂. ဣဒါနိ တေသံ ဓမ္မာနံ ယထာရဟံ ဝေဒနာ…ပေ… ဝတ္ထုတော သင်္ဂဟော နာမ ဝေဒနာသင်္ဂဟာဒိနာမကော ပကိဏ္ဏကသင်္ဂဟော စိတ္တုပ္ပာဒဝသေနေဝ တံတံဝေဒနာဒိဘေဒဘိန္နစိတ္တုပ္ပာဒါနံ ဝသေနေဝ န ကတ္ထစိ တံဝိရဟေန နီယတေ ဥပနီယတေ, အာဟရီယတီတျတ္ထော. २. आता, त्या धर्मांचा योग्यतेनुसार वेदना...पे... वस्तूच्या आधारे होणारा संग्रह, ज्याला 'वेदनासंग्रह' इत्यादी नावाचा 'प्रकीर्णक संग्रह' म्हटले जाते, तो केवळ चित्तोत्पादांच्या (चित्त उत्पत्तीच्या) आधारेच, म्हणजेच त्या त्या वेदना इत्यादी भेदांनी भिन्न असणाऱ्या चित्तोत्पादांच्या आधारेच सादर केला जातो; कुठेही त्यांच्याशिवाय (चित्तोत्पादांशिवाय) तो सादर केला जात नाही, असा अर्थ आहे. ဝေဒနာသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ वेदनासंग्रहाचे स्पष्टीकरण ၃. တတ္ထာတိ တေသု ဆသု သင်္ဂဟေသု. သုခါဒိဝေဒနာနံ, တံသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါနဉ္စ ဝိဘာဂဝသေန သင်္ဂဟော ဝေဒနာသင်္ဂဟော. ဒုက္ခတော, သုခတော စ အညာ အဒုက္ခမသုခါ မ-ကာရာဂမဝသေန. နနု စ ‘‘ဒွေမာ, ဘိက္ခဝေ, ဝေဒနာ သုခါ ဒုက္ခာ’’တိ (သံ. နိ. ၄.၂၆၇) ဝစနတော ဒွေ ဧဝ ဝေဒနာတိ? သစ္စံ, တံ ပန အနဝဇ္ဇပက္ခိကံ [Pg.123] အဒုက္ခမသုခံ သုခဝေဒနာယံ, သာဝဇ္ဇပက္ခိကဉ္စ ဒုက္ခဝေဒနာယံ သင်္ဂဟေတွာ ဝုတ္တံ. ယမ္ပိ ကတ္ထစိ သုတ္တေ ‘‘ယံ ကိဉ္စိ ဝေဒယိတမိဒမေတ္ထ ဒုက္ခဿာ’’တိ (သံ. နိ. ၄.၂၅၉) ဝစနံ, တံ သင်္ခါရဒုက္ခတာယ သဗ္ဗဝေဒနာနံ ဒုက္ခသဘာဝတ္တာ ဝုတ္တံ. ယထာဟ – ‘‘သင်္ခါရာနိစ္စတံ, အာနန္ဒ, မယာ သန္ဓာယ ဘာသိတံ သင်္ခါရဝိပရိဏာမတဉ္စ ယံ ကိဉ္စိဝေဒယိတမိဒမေတ္ထ ဒုက္ခဿာ’’တိ (သံ. နိ. ၄.၂၅၉; ဣတိဝု. အဋ္ဌ. ၅၂). တသ္မာ တိဿောယေဝ ဝေဒနာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘တိဿော ဣမာ, ဘိက္ခဝေ, ဝေဒနာ သုခါ ဒုက္ခာ အဒုက္ခမသုခါ စာ’’တိ (ဣတိဝု. ၅၂-၅၃; သံ. နိ. ၄.၂၄၉-၂၅၁). ဧဝံ တိဝိဓာပိ ပနေတာ ဣန္ဒြိယဒေသနာယံ ‘‘သုခိန္ဒြိယံ ဒုက္ခိန္ဒြိယံ သောမနဿိန္ဒြိယံ ဒေါမနဿိန္ဒြိယံ ဥပေက္ခိန္ဒြိယ’’န္တိ (ဝိဘ. ၂၁၉) ပဉ္စဓာ ဒေသိတာတိ တံဝသေနပေတ္ထ ဝိဘာဂံ ဒဿေတုံ ‘‘သုခံ ဒုက္ခ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. ကာယိကမာနသိကသာတာသာတဘေဒတော ဟိ သုခံ ဒုက္ခဉ္စ ပစ္စေကံ ဒွိဓာ ဝိဘဇိတွာ ‘‘သုခိန္ဒြိယံ သောမနဿိန္ဒြိယံ ဒုက္ခိန္ဒြိယံ ဒေါမနဿိန္ဒြိယ’’န္တိ (ဝိဘ. ၂၁၉) ဒေသိတာ, ဥပေက္ခာ ပန ဘေဒါဘာဝတော ဥပေက္ခိန္ဒြိယန္တိ ဧကဓာဝ. ယထာ ဟိ သုခဒုက္ခာနိ အညထာ ကာယဿ အနုဂ္ဂဟမုပဃာတဉ္စ ကရောန္တိ, အညထာ မနသော, နေဝံ ဥပေက္ခာ, တသ္မာ သာ ဧကဓာဝ ဒေသိတာ, တေနာဟု ပေါရာဏာ – ३. त्या सहा संग्रहांमध्ये 'तत्य' म्हणजे—सुखादी वेदनांचा आणि त्यांच्याशी सहगत असणाऱ्या चित्तोत्पादांचा विभागाच्या आधारे होणारा संग्रह म्हणजे 'वेदनासंग्रह' होय. दुःखापासून आणि सुखापासून भिन्न असणारी वेदना म्हणजे 'अदुःखमसुख' वेदना होय, जी 'म' काराच्या आगमामुळे (अदुःखमसुखा) अशी बनते. 'भिक्खूहो, सुख आणि दुःख अशा दोनच वेदना आहेत' या वचनानुसार वेदना दोनच आहेत का? हे सत्य आहे, परंतु ते वचन अनवद्यपक्षातील (दोषरहित) अदुःखमसुख वेदनेला सुखवेदनेमध्ये आणि सावद्यपक्षातील (दोषयुक्त) अदुःखमसुख वेदनेला दुःखवेदनेमध्ये समाविष्ट करून सांगितले आहे. तसेच, काही सूत्तांमध्ये 'येथे जे काही वेदित (अनुभवले) जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे' असे जे वचन आहे, ते संस्कार-दुःखतेमुळे सर्व वेदनांचा स्वभाव दुःखमय असल्यामुळे सांगितले आहे. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे—'आनंदा, संस्कारांची अनित्यता आणि संस्कारांचा विपरिणाम (बदलणारा स्वभाव) लक्षात घेऊन मी असे म्हटले आहे की, येथे जे काही वेदित होते ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे.' म्हणून वेदना तीनच आहेत असे समजावे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे—'भिक्खूहो, सुख, दुःख आणि अदुःखमसुख अशा या तीन वेदना आहेत.' अशा प्रकारे तीन प्रकारच्या असणाऱ्या या वेदना इंद्रियदेशनेमध्ये (इंद्रियांच्या उपदेशात) 'सुखिंद्रिय, दुःखांद्रिय, सोमनसिंद्रिय, दोमनसिंद्रिय आणि उपेक्षिंद्रिय' अशा पाच प्रकारे उपदेशिलेल्या आहेत; म्हणून त्यांच्या आधारे देखील येथे विभाग दर्शवण्यासाठी 'सुखं दुःखं' इत्यादी म्हटले आहे. कारण शारीरिक व मानसिक, अनुकूल (साता) व प्रतिकूल (असाता) भेदांमुळे सुख आणि दुःख यांचे प्रत्येकी दोन भाग करून 'सुखिंद्रिय व सोमनसिंद्रिय' आणि 'दुःखांद्रिय व दोमनसिंद्रिय' असे उपदेशिले आहे, परंतु उपेक्षा वेदनेमध्ये असा भेद नसल्यामुळे ती 'उपेक्षिंद्रिय' म्हणून एकाच प्रकारे उपदेशिली आहे. कारण ज्याप्रमाणे सुख आणि दुःख हे शरीराला अनुकूलता (अनुग्रह) व प्रतिकूलता (उपघात) देतात आणि मनालाही वेगवेगळ्या प्रकारे प्रभावित करतात, तसे उपेक्षा वेदनेच्या बाबतीत घडत नाही. म्हणून ती एकाच प्रकारे उपदेशिली आहे. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘ကာယိကံ မာနသံ ဒုက္ခံ, သုခဉ္စောပေက္ခဝေဒနာ; ဧကံ မာနသမေဝေတိ, ပဉ္စဓိန္ဒြိယဘေဒတော’’တိ. (သ. သ. ၇၄); 'शारीरिक दुःख, मानसिक दुःख (दोमनस्य), शारीरिक सुख, मानसिक सुख (सोमनस्य) आणि उपेक्षा वेदना—जी केवळ मानसिकच आहे; अशा प्रकारे इंद्रियांच्या भेदाने वेदना पाच प्रकारची होते.' တတ္ထ ဣဋ္ဌဖောဋ္ဌဗ္ဗာနုဘဝနလက္ခဏံ သုခံ. အနိဋ္ဌဖောဋ္ဌဗ္ဗာနုဘဝနလက္ခဏံ ဒုက္ခံ. သဘာဝတော, ပရိကပ္ပတော ဝါ ဣဋ္ဌာနုဘဝနလက္ခဏံ သောမနဿံ. တထာ အနိဋ္ဌာနုဘဝနလက္ခဏံ ဒေါမနဿံ. မဇ္ဈတ္တာနုဘဝနလက္ခဏာ ဥပေက္ခာ. त्यामध्ये, इष्ट (अनुकूल) स्पर्शाचा अनुभव घेण्याचे लक्षण असणारे ते 'सुख' होय. अनिष्ट (प्रतिकूल) स्पर्शाचा अनुभव घेण्याचे लक्षण असणारे ते 'दुःख' होय. स्वभावाने किंवा कल्पनेने इष्ट वाटणाऱ्या विषयाचा अनुभव घेण्याचे लक्षण असणारे ते 'सोमनस्य' होय. त्याचप्रमाणे, अनिष्ट वाटणाऱ्या विषयाचा अनुभव घेण्याचे लक्षण असणारे ते 'दोमनस्य' होय. तटस्थ भावाने विषयाचा अनुभव घेण्याचे लक्षण असणारी ती 'उपेक्षा' होय. ၅. စတုစတ္တာလီသ ပစ္စေကံ လောကိယလောကုတ္တရဘေဒေန ဧကာဒသဝိဓတ္တာ. ५. लौकिक आणि लोकोत्तर भेदाने प्रत्येकी अकरा प्रकारची असल्यामुळे चव्वेचाळीस (४४) [सोमनस्यसहगत चित्ते होतात]. ၇. သေသာနီတိ [Pg.124] သုခဒုက္ခသောမနဿဒေါမနဿသဟဂတေဟိ အဝသေသာနိ အကုသလတော ဆ, အဟေတုကတော စုဒ္ဒသ, ကာမာဝစရသောဘနတော ဒွါဒသ, ပဉ္စမဇ္ဈာနိကာနိ တေဝီသာတိ သဗ္ဗာနိပိ ပဉ္စပညာသ. ७. 'सेसाने' (उरलेली चित्ते) म्हणजे—सुख, दुःख, सोमनस्य आणि दोमनस्य यांच्याशी सहगत असणाऱ्या चित्तांशिवाय उरलेली; अकुशलातील सहा, अहेतुकातील चौदा, कामावचर शोभनातील बारा आणि पंचम ध्यानातील तेवीस, अशी सर्व मिळून पंचावन्न (५५) [उपेक्षासहगत चित्ते आहेत]. ဝေဒနာသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वेदनासंग्रहाचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ဟေတုသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ हेतुसंग्रहाचे स्पष्टीकरण ၁၀. လောဘာဒိဟေတူနံ ဝိဘာဂဝသေန, တံသမ္ပယုတ္တဝသေန စ သင်္ဂဟော ဟေတုသင်္ဂဟော. ဟေတဝေါ နာမ ဆဗ္ဗိဓာ ဘဝန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ဟေတုဘာဝေါ ပန နေသံ သမ္ပယုတ္တာနံ သုပ္ပတိဋ္ဌိတဘာဝသာဓနသင်္ခါတော မူလဘာဝေါ. လဒ္ဓဟေတုပစ္စယာ ဟိ ဓမ္မာ ဝိရုဠှမူလာ ဝိယ ပါဒပါ ထိရာ ဟောန္တိ, န အဟေတုကာ ဝိယ ဇလတလေ သေဝါလသဒိသာ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဧတေ မူလသဒိသတာယ ‘‘မူလာနီ’’တိ စ ဝုစ္စန္တိ. အပရေ ပန ‘‘ကုသလာဒီနံ ကုသလာဒိဘာဝသာဓနံ ဟေတုဘာဝေါ’’တိ ဝဒန္တိ, ဧဝံ သတိ ဟေတူနံ အတ္တနော ကုသလာဒိဘာဝသာဓနော အညော ဟေတု မဂ္ဂိတဗ္ဗော သိယာ. အထ သေသသမ္ပယုတ္တဟေတုပဋိဗဒ္ဓေါ တေသံ ကုသလာဒိဘာဝေါ, ဧဝမ္ပိ မောမူဟစိတ္တသမ္ပယုတ္တဿ ဟေတုနော အကုသလဘာဝေါ အပ္ပဋိဗဒ္ဓေါ သိယာ. အထ တဿ သဘာဝတော အကုသလဘာဝေါပိ သိယာ, ဧဝံ သတိ သေသဟေတူနမ္ပိ သဘာဝတောဝ ကုသလာဒိဘာဝေါတိ တေသံ ဝိယ သမ္ပယုတ္တဓမ္မာနမ္ပိ သော ဟေတုပဋိဗဒ္ဓေါ န သိယာ. ယဒိ စ ဟေတုပဋိဗဒ္ဓေါ ကုသလာဒိဘာဝေါ, တဒါ အဟေတုကာနံ အဗျာကတဘာဝေါ န သိယာတိ အလမတိနိပ္ပီဠနေန. ကုသလာဒိဘာဝေါ ပန ကုသလာကုသလာနံ ယောနိသောအယောနိသောမနသိကာရပ္ပဋိဗဒ္ဓေါ. ယထာဟ – ‘‘ယောနိသော, ဘိက္ခဝေ, မနသိကရောတော အနုပ္ပန္နာ [Pg.125] စေဝ ကုသလာ ဓမ္မာ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, ဥပ္ပန္နာ စ ကုသလာ ဓမ္မာ အဘိဝဍ္ဎန္တီ’’တျာဒိ (အ. နိ. ၁.၆၇), အဗျာကတာနံ ပန အဗျာကတဘာဝေါ နိရနုသယသန္တာနပ္ပဋိဗဒ္ဓေါ ကမ္မပ္ပဋိဗဒ္ဓေါ အဝိပါကဘာဝပ္ပဋိဗဒ္ဓေါ စာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. १०. लोभ इत्यादी हेतूंच्या विभागाच्या आधारे आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त असणाऱ्या चित्तांच्या आधारे होणारा संग्रह म्हणजे 'हेतुसंग्रह' होय. 'हेतू सहा प्रकारचे असतात' असा संबंध आहे. परंतु त्यांचा हेतुभाव (हेतू असणे) म्हणजे संप्रयुक्त असणाऱ्या चित्त-चेतसिकांना चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित (स्थिर) करण्याचे साधन असणारा मूळभाव (मुळासारखा असणे) आहे. कारण ज्या धर्मांना हेतुप्रत्यय प्राप्त झाला आहे, ते खोलवर मुळे गेलेल्या वृक्षांप्रमाणे स्थिर असतात; अहेतुक चित्तांप्रमाणे पाण्याच्या पृष्ठभागावरील शेवाळासारखे अस्थिर नसतात. आणि म्हणूनच, मुळांशी साम्य असल्यामुळे यांना 'मुळे' (मूल) असेही म्हटले जाते. परंतु इतर आचार्य म्हणतात की, 'कुशल इत्यादी धर्मांना कुशल इत्यादी बनवणे हा हेतुभाव आहे.' असे मानल्यास, हेतूंच्या स्वतःच्या कुशल इत्यादी भावाला सिद्ध करण्यासाठी दुसऱ्या हेतूचा शोध घ्यावा लागेल. जर त्यांचा कुशल इत्यादी भाव उरलेल्या संप्रयुक्त हेतूंवर अवलंबून आहे असे म्हटले, तरीही मोहचित्ताशी संप्रयुक्त असणाऱ्या (केवळ एकाच) हेतूचा (मोहाचा) अकुशल भाव कोणत्याही दुसऱ्या हेतूवर अवलंबून नसलेला ठरेल. जर त्याचा अकुशल भाव स्वभावानेच आहे असे म्हटले, तर उरलेल्या हेतूंचा देखील कुशल इत्यादी भाव स्वभावानेच सिद्ध होईल आणि त्यांच्याप्रमाणेच संप्रयुक्त धर्मांचा देखील तो कुशल इत्यादी भाव हेतूंवर अवलंबून असणार नाही. आणि जर कुशल इत्यादी भाव हेतूंवर अवलंबून असेल, तर अहेतुक चित्तांचा अव्याकृत भाव सिद्ध होणार नाही; म्हणून या वादावर अधिक वाद घालणे निरर्थक आहे. कुशल आणि अकुशल धर्मांचा कुशल-अकुशल भाव हा योनिसोमनसिकार आणि अयोनिसोमनसिकारावर अवलंबून असतो. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे—'भिक्खूहो, योनिसोमनसिकार करणाऱ्या व्यक्तीच्या ठिकाणी अनुत्पन्न कुशल धर्म उत्पन्न होतात आणि उत्पन्न झालेले कुशल धर्म वृद्धिंगत होतात' इत्यादी. तर अव्याकृत धर्मांचा अव्याकृत भाव हा अनुशय-रहित (अर्हंतांच्या) संतानावर, कर्मावर आणि विपाक न देण्याच्या स्वभावावर अवलंबून असतो, असे समजावे. ၁၆. ဣဒါနိ ဟေတူနံ ဇာတိဘေဒံ ဒဿေတုံ ‘‘လောဘော ဒေါသော စာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. १६. आता हेतूंच्या जातीनुसार भेद दर्शवण्यासाठी 'लोभो दोसो च' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. ဟေတုသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. हेतू-संग्रहाचे वर्णन समाप्त झाले. ကိစ္စသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ कृत्य-संग्रहाचे वर्णन. ၁၈. ပဋိသန္ဓာဒီနံ ကိစ္စာနံ ဝိဘာဂဝသေန, တံကိစ္စဝန္တာနဉ္စ ပရိစ္ဆေဒဝသေန သင်္ဂဟော ကိစ္စသင်္ဂဟော. ဘဝတော ဘဝဿ ပဋိသန္ဓာနံ ပဋိသန္ဓိကိစ္စံ. အဝိစ္ဆေဒပ္ပဝတ္တိဟေတုဘာဝေန ဘဝဿ အင်္ဂဘာဝေါ ဘဝင်္ဂကိစ္စံ. အာဝဇ္ဇနကိစ္စာဒီနိ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တဝစနတ္ထာနုသာရေန ယထာရဟံ ယောဇေတဗ္ဗာနိ. အာရမ္မဏေ တံတံကိစ္စသာဓနဝသေန အနေကက္ခတ္တုံ, ဧကက္ခတ္တုံ ဝါ ဇဝမာနဿ ဝိယ ပဝတ္တိ ဇဝနကိစ္စံ. တံတံဇဝနဂ္ဂဟိတာရမ္မဏဿ အာရမ္မဏကရဏံ တဒါရမ္မဏကိစ္စံ. နိဗ္ဗတ္တဘဝတော ပရိဂဠှနံ စုတိကိစ္စံ. १८. प्रतिसंधी इत्यादी कृत्यांच्या विभागणीनुसार आणि त्या कृत्यांनी युक्त असलेल्या चित्तांच्या परिच्छेदानुसार (मर्यादेनुसार) केलेला संग्रह म्हणजे 'कृत्य-संग्रह' होय. एका भवातून दुसऱ्या भवाशी जोडणे म्हणजे 'प्रतिसंधी-कृत्य' होय. अखंड प्रवृत्तीचे कारण असल्यामुळे भवाचे अंग असणे म्हणजे 'भवंग-कृत्य' होय. आवर्जन इत्यादी कृत्ये खाली सांगितलेल्या शब्दांच्या अर्थानुसार योग्य प्रकारे योजावीत. आलंबनामध्ये त्या त्या कृत्यांच्या सिद्धीनुसार अनेक वेळा किंवा एक वेळा वेगाने धावल्याप्रमाणे प्रवृत्त होणे म्हणजे 'जवन-कृत्य' होय. त्या त्या जवनाने ग्रहण केलेल्या आलंबनालाच आलंबन बनवणे म्हणजे 'तदालंबन-कृत्य' होय. उत्पन्न झालेल्या भवातून च्युत होणे म्हणजे 'च्युती-कृत्य' होय. ၁၉. ဣမာနိ ပန ကိစ္စာနိ ဌာနဝသေန ပါကဋာနိ ဟောန္တီတိ တံ ဒါနိ ပဘေဒတော ဒဿေတုံ ‘‘ပဋိသန္ဓီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ, တတ္ထ ပဋိသန္ဓိယာ ဌာနံ ပဋိသန္ဓိဌာနံ. ကာမံ ပဋိသန္ဓိဝိနိမုတ္တံ ဌာနံ နာမ နတ္ထိ, သုခဂ္ဂဟဏတ္ထံ ပန ‘‘သိလာပုတ္တကဿ သရီရ’’န္တျာဒီသု ဝိယ အဘေဒေပိ ဘေဒပရိကပ္ပနာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဧဝံ သေသေသုပိ. ဒဿနာဒီနံ ပဉ္စန္နံ ဝိညာဏာနံ ဌာနံ ပဉ္စဝိညာဏဌာနံ. အာဒိ-သဒ္ဒေန သမ္ပဋိစ္ဆနဌာနာဒီနံ သင်္ဂဟော. १९. परंतु ही कृत्ये स्थानांच्या द्वारे स्पष्ट होतात, म्हणून आता त्या स्थानांचे भेद दर्शवण्यासाठी 'प्रतिसंधी' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये प्रतिसंधीचे स्थान म्हणजे 'प्रतिसंधी-स्थान' होय. वास्तविक पाहता प्रतिसंधीहून मुक्त असे कोणतेही स्थान नाही, परंतु समजण्यास सोपे जावे म्हणून 'शिलापुत्राचे शरीर' इत्यादी उदाहरणांप्रमाणे अभेद असतानाही भेदाची कल्पना केली आहे, असे समजावे. उर्वरित स्थानांच्या बाबतीतही असेच समजावे. दर्शन इत्यादी पाच विज्ञानांचे स्थान म्हणजे 'पंचविज्ञान-स्थान' होय. 'आदि' शब्दाने संपटिच्छन इत्यादी स्थानांचा संग्रह होतो. တတ္ထ [Pg.126] စုတိဘဝင်္ဂါနံ အန္တရာ ပဋိသန္ဓိဌာနံ. ပဋိသန္ဓိအာဝဇ္ဇနာနံ, ဇဝနာဝဇ္ဇနာနံ, တဒါရမ္မဏာဝဇ္ဇနာနံ, ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနာဝဇ္ဇနာနံ, ကဒါစိ ဇဝနစုတီနံ, တဒါရမ္မဏစုတီနဉ္စ အန္တရာ ဘဝင်္ဂဌာနံ. ဘဝင်္ဂပဉ္စဝိညာဏာနံ, ဘဝင်္ဂဇဝနာနဉ္စ အန္တရာ အာဝဇ္ဇနဌာနံ. ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနသမ္ပဋိစ္ဆနာနမန္တရာ ပဉ္စဝိညာဏဌာနံ. ပဉ္စဝိညာဏသန္တီရဏာနမန္တရာ သမ္ပဋိစ္ဆနဌာနံ. သမ္ပဋိစ္ဆနဝေါဋ္ဌဗ္ဗနာနမန္တရာ သန္တီရဏဌာနံ. သန္တီရဏဇဝနာနံ, သန္တီရဏဘဝင်္ဂါနဉ္စ အန္တရာ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဌာနံ. ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနတဒါရမ္မဏာနံ, ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဘဝင်္ဂါနံ, ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနစုတီနံ, မနောဒွါရာဝဇ္ဇနတဒါရမ္မဏာနံ, မနောဒွါရာဝဇ္ဇနဘဝင်္ဂါနံ, မနောဒွါရာဝဇ္ဇနစုတီနဉ္စ အန္တရာ ဇဝနဌာနံ. ဇဝနဘဝင်္ဂါနံ, ဇဝနစုတီနဉ္စ အန္တရာ တဒါရမ္မဏဌာနံ. ဇဝနပဋိသန္ဓီနံ, တဒါရမ္မဏပဋိသန္ဓီနံ, ဘဝင်္ဂပဋိသန္ဓီနံ ဝါ အန္တရာ စုတိဌာနံ နာမ. त्यामध्ये, च्युती आणि भवंग यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'प्रतिसंधी-स्थान' होय. प्रतिसंधी आणि आवर्जन, जवन आणि आवर्जन, तदालंबन आणि आवर्जन, वोठ्ठपन आणि आवर्जन, आणि कधीकधी जवन आणि च्युती, तसेच तदालंबन आणि च्युती यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'भवंग-स्थान' होय. भवंग आणि पंचविज्ञान, तसेच भवंग आणि जवन यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'आवर्जन-स्थान' होय. पंचद्वार-आवर्जन आणि संपटिच्छन यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'पंचविज्ञान-स्थान' होय. पंचविज्ञान आणि संतीरण यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'संपटिच्छन-स्थान' होय. संपटिच्छन आणि वोठ्ठपन यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'संतीरण-स्थान' होय. संतीरण आणि जवन, तसेच संतीरण आणि भवंग यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'वोठ्ठपन-स्थान' होय. वोठ्ठपन आणि तदालंबन, वोठ्ठपन आणि भवंग, वोठ्ठपन आणि च्युती, मनोध्वार-आवर्जन आणि तदालंबन, मनोध्वार-आवर्जन आणि भवंग, तसेच मनोध्वार-आवर्जन आणि च्युती यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'जवन-स्थान' होय. जवन आणि भवंग, तसेच जवन आणि च्युती यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'तदालंबन-स्थान' होय. जवन आणि प्रतिसंधी, तदालंबन आणि प्रतिसंधी, किंवा भवंग आणि प्रतिसंधी यांच्या दरम्यानचे स्थान म्हणजे 'च्युती-स्थान' होय. ၂၀. ဒွေ ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏာနိ သုခသန္တီရဏဿ ပဋိသန္ဓိဝသပ္ပဝတ္တိဘာဝါဘာဝတောတိအဓိပ္ပာယော. ဧဝဉ္စ ကတွာ ပဋ္ဌာနေ ‘‘ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဓမ္မံ ပဋိစ္စ ဥပေက္ခာသဟဂတော ဓမ္မော ဥပ္ပဇ္ဇတိ န ဟေတုပစ္စယာ’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၄.၁၃.၁၇၉) ဧဝမာဂတဿ ဥပေက္ခာသဟဂတပဒဿ ဝိဘင်္ဂေ ‘‘အဟေတုကံ ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဧကံ ခန္ဓံ ပဋိစ္စ ဒွေ ခန္ဓာ, ဒွေ ခန္ဓေ ပဋိစ္စ ဧကော ခန္ဓော, အဟေတုကပဋိသန္ဓိက္ခဏေ ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဧကံ ခန္ဓံ ပဋိစ္စ ဒွေ ခန္ဓာ, ဒွေ ခန္ဓေ ပဋိစ္စ ဧကော ခန္ဓော’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၄.၁၃.၁၇၉) ဧဝံ ပဝတ္တိပဋိသန္ဓိဝသေန ပဋိစ္စနယော ဥဒ္ဓဋော, ပီတိသဟဂတသုခသဟဂတပဒဝိဘင်္ဂေ ပန ‘‘အဟေတုကံ ပီတိသဟဂတံ ဧကံ ခန္ဓံ ပဋိစ္စတယော ခန္ဓာ…ပေ… ဒွေ ခန္ဓာ. အဟေတုကံ သုခသဟဂတံ ဧကံ ခန္ဓံ ပဋိစ္စ ဒွေ ခန္ဓာ …ပေ… ဧကော ခန္ဓော’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၄.၁၃.၁၄၄, ၁၆၇) ပဝတ္တိဝသေနေဝ ဥဒ္ဓဋော, န ပန ‘‘အဟေတုကပဋိသန္ဓိက္ခဏေ’’တျာဒိနာ ပဋိသန္ဓိဝသေန, တသ္မာ ယထာဓမ္မသာသနေ အဝစနမ္ပိ အဘာဝမေဝ ဒီပေတီတိ န တဿ ပဋိသန္ဓိဝသေန ပဝတ္တိ [Pg.127] အတ္ထိ. ယတ္ထ ပန လဗ္ဘမာနဿပိ ကဿစိ အဝစနံ, တတ္ထ ကာရဏံ ဥပရိ အာဝိ ဘဝိဿတိ. २०. दोन उपेक्षासहगत संतीरण चित्ते (प्रतिसंधी, भवंग आणि च्युतीचे कार्य करतात), कारण सुखसहगत संतीरण चित्ताची प्रतिसंधीच्या रूपाने प्रवृत्ती होण्याचा अभाव असतो, असा अभिप्राय आहे. म्हणूनच पट्ठान पाळीमध्ये 'उपेक्षासहगत धर्मावर अवलंबून उपेक्षासहगत धर्म उत्पन्न होतो, हेतू प्रत्ययाने नाही' अशा प्रकारे आलेल्या 'उपेक्षासहगत' पदाच्या विभंगामध्ये 'अहेतुक उपेक्षासहगत एका स्कंधावर अवलंबून दोन स्कंध... अहेतुक प्रतिसंधीक्षणी उपेक्षासहगत एका स्कंधावर अवलंबून दोन स्कंध...' अशा प्रकारे प्रवृत्ती काळ आणि प्रतिसंधी काळ या दोन्हीच्या आधारे प्रतीत्यसमुत्पाद पद्धती उद्धृत केली आहे. परंतु, प्रीतिसहगत आणि सुखसहगत पदांच्या विभंगामध्ये 'अहेतुक प्रीतिसहगत एका स्कंधावर अवलंबून तीन स्कंध... अहेतुक सुखसहगत एका स्कंधावर अवलंबून दोन स्कंध...' अशा प्रकारे केवळ प्रवृत्ती काळाच्या आधारेच उद्धृत केले आहे, 'अहेतुक प्रतिसंधीक्षणी' इत्यादी शब्दांद्वारे प्रतिसंधी काळाच्या आधारे नाही. म्हणून, यथाधम्म शासनात न सांगणे हे देखील त्या गोष्टीचा अभावच दर्शवते, म्हणून त्या सुखसहगत संतीरण चित्ताची प्रतिसंधीच्या रूपाने प्रवृत्ती होत नाही. परंतु, जेथे प्राप्त होण्यायोग्य असूनही एखाद्या गोष्टीचा उल्लेख केलेला नाही, त्याचे कारण पुढे स्पष्ट होईल. ၂၅. မနောဒွါရာဝဇ္ဇနဿ ပရိတ္တာရမ္မဏေ ဒွတ္တိက္ခတ္တုံ ပဝတ္တမာနဿပိ နတ္ထိ ဇဝနကိစ္စံ တဿ အာရမ္မဏရသာနုဘဝနာဘာဝတောတိ ဝုတ္တံ ‘‘အာဝဇ္ဇနဒွယဝဇ္ဇိတာနီ’’တိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝုတ္တံ အဋ္ဌကထာယံ ‘‘ဇဝနဋ္ဌာနေ ဌတွာ’’တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာ). ဣတရထာ ‘‘ဇဝနံ ဟုတွာ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာတိ. ကုသလာကုသလဖလကိရိယစိတ္တာနီတိ ဧကဝီသတိ လောကိယလောကုတ္တရကုသလာနိ, ဒွါဒသ အကုသလာနိ, စတ္တာရိ လောကုတ္တရဖလစိတ္တာနိ, အဋ္ဌာရသ တေဘူမကကိရိယစိတ္တာနိ. ဧကစိတ္တက္ခဏိကမ္ပိ ဟိ လောကုတ္တရမဂ္ဂါဒိကံ တံသဘာဝဝန္တတာယ ဇဝနကိစ္စံ နာမ, ယထာ ဧကေကဂေါစရဝိသယမ္ပိ သဗ္ဗညုတညာဏံ သကလဝိသယာဝဗောဓနသာမတ္ထိယယောဂတော န ကဒါစိ တံနာမံ ဝိဇဟတီတိ. २५. मनोद्वारावर्जन चित्त परित्त आलंबनात दोन किंवा तीन वेळा प्रवृत्त होत असूनही, त्याला जवन-कृत्य नसते, कारण ते आलंबनाच्या रसाचा आस्वाद घेऊ शकत नाही. म्हणूनच 'दोन आवर्जन चित्ते वगळून' असे म्हटले आहे. म्हणूनच अट्ठकथेमध्ये 'जवन स्थानावर राहून' असे म्हटले आहे. अन्यथा, 'जवन होऊन' असे म्हणावे लागले असते. 'कुशल, अकुशल, फल आणि क्रिया चित्ते' म्हणजे २१ लौकिक व लोकोत्तर कुशल चित्ते, १२ अकुशल चित्ते, ४ लोकोत्तर फल चित्ते आणि १८ त्रिभूमिक क्रिया चित्ते होत. कारण, केवळ एक चित्तक्षण असणारे लोकोत्तर मार्ग इत्यादी चित्त देखील त्या स्वभावामुळे 'जवन-कृत्य' असणारेच म्हटले जाते. ज्याप्रमाणे प्रत्येक विषयाचे ग्रहण करतानाही सर्वज्ञता-ज्ञान हे सर्व विषयांचे आकलन करण्याच्या सामर्थ्याशी युक्त असल्यामुळे कधीही आपले नाव सोडत नाही, त्याचप्रमाणे हे समजावे. ၂၇. ဧဝံ ကိစ္စဘေဒေန ဝုတ္တာနေဝ ယထာသကံ လဗ္ဘမာနကိစ္စဂဏနဝသေန သမ္ပိဏ္ဍေတွာ ဒဿေတုံ ‘‘တေသု ပနာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. २७. अशा प्रकारे कृत्यांच्या भेदाने सांगितलेल्या चित्तांनाच आपापल्या प्राप्त होणाऱ्या कृत्यांच्या संख्येनुसार एकत्रित करून दर्शवण्यासाठी 'तेसु पन' इत्यादी म्हटले आहे. ၃၃. ပဋိသန္ဓာဒယော စိတ္တုပ္ပာဒါ နာမကိစ္စဘေဒေန ပဋိသန္ဓာဒီနံ နာမာနံ, ကိစ္စာနဉ္စ ဘေဒေန, အထ ဝါ ပဋိသန္ဓာဒယော နာမ တန္နာမကာ စိတ္တုပ္ပာဒါ ပဋိသန္ဓာဒီနံ ကိစ္စာနံ ဘေဒေန စုဒ္ဒသ, ဌာနဘေဒေန ပဋိသန္ဓာဒီနံယေဝ ဌာနာနံ ဘေဒေန ဒသဓာ ပကာသိတာတိ ယောဇနာ. ဧကကိစ္စဌာနဒွိကိစ္စဌာနတိကိစ္စဌာနစတုကိစ္စဌာနပဉ္စကိစ္စဌာနာနိ စိတ္တာနိ ယထာက္ကမံ အဋ္ဌသဋ္ဌိ, တထာ ဒွေ စ နဝ စ အဋ္ဌ စ ဒွေ စာတိ နိဒ္ဒိသေတိ သမ္ဗန္ဓော. ३३. प्रतिसंधी इत्यादी चित्तोत्पाद हे नाव आणि कृत्यांच्या भेदाने प्रतिसंधी इत्यादी नावे आणि कृत्यांच्या भेदाने (१४ प्रकारचे आहेत); अथवा प्रतिसंधी इत्यादी नावांचे चित्तोत्पाद प्रतिसंधी इत्यादी कृत्यांच्या भेदाने चौदा प्रकारचे आणि स्थानांच्या भेदाने प्रतिसंधी इत्यादी स्थानांच्या भेदाने दहा प्रकारचे प्रकाशित केले आहेत, अशी योजना करावी. एक-कृत्य-स्थान, द्वि-कृत्य-स्थान, त्रि-कृत्य-स्थान, कनिष्ठ-कृत्य-स्थान आणि पंच-कृत्य-स्थान असणारी चित्ते अनुक्रमे ६८, तसेच २, ९, ८ आणि २ आहेत, असा संबंध जोडावा. ကိစ္စသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कृत्य-संग्रहाचे वर्णन समाप्त झाले. ဒွါရသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ द्वार-संग्रहाचे वर्णन. ၃၅. ဒွါရာနံ[Pg.128], ဒွါရပ္ပဝတ္တစိတ္တာနဉ္စ ပရိစ္ဆေဒဝသေန သင်္ဂဟော ဒွါရသင်္ဂဟော. အာဝဇ္ဇနာဒီနံ အရူပဓမ္မာနံ ပဝတ္တိမုခဘာဝတော ဒွါရာနိ ဝိယာတိ ဒွါရာနိ. ३५. द्वारांचे आणि द्वारांमध्ये प्रवृत्त होणाऱ्या चित्तांच्या परिच्छेदानुसार केलेला संग्रह म्हणजे 'द्वार-संग्रह' होय. आवर्जन इत्यादी अरूप धर्मांच्या प्रवृत्तीचे मुख असल्यामुळे ते दारासारखे आहेत, म्हणून त्यांना 'द्वारे' म्हणतात. ၃၆. စက္ခုမေဝါတိ ပသာဒစက္ခုမေဝ. ३६. 'चक्षूच' म्हणजे प्रसादचक्षूच. ၃၇. အာဝဇ္ဇနာဒီနံ မနာနံ, မနောယေဝ ဝါ ဒွါရန္တိ မနောဒွါရံ. ဘဝင်္ဂန္တိ အာဝဇ္ဇနာနန္တရံ ဘဝင်္ဂံ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – ३७. आवर्जन इत्यादी मन-चित्तांचे द्वार, किंवा मन हेच द्वार असल्यामुळे त्याला 'मनोद्वार' म्हणतात. 'भवंग' म्हणजे आवर्जनाच्या अव्यवहित आधीचे भवंग होय. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे – ‘‘သာဝဇ္ဇနံ ဘဝင်္ဂန္တု, မနောဒွါရန္တိ ဝုစ္စတီ’’တိ; 'आवर्जनासह असणाऱ्या भवंगालाच मनोद्वार असे म्हटले जाते.' ၃၉. တတ္ထာတိ တေသု စက္ခာဒိဒွါရေသု စက္ခုဒွါရေ ဆစတ္တာလီသ စိတ္တာနိ ယထာရဟမုပ္ပဇ္ဇန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနမေကံ, စက္ခုဝိညာဏာဒီနိ ဥဘယဝိပါကဝသေန သတ္တ, ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမေကံ, ကာမာဝစရဇဝနာနိ စ ကုသလာကုသလနိရာဝဇ္ဇနကိရိယဝသေန ဧကူနတိံသ, တဒါရမ္မဏာနိ စ အဂ္ဂဟိတဂ္ဂဟဏေန အဋ္ဌေဝါတိ ဆစတ္တာလီသ. ယထာရဟန္တိ ဣဋ္ဌာဒိအာရမ္မဏေ ယောနိသောအယောနိသောမနသိကာရနိရနုသယသန္တာနာဒီနံ အနုရူပဝသေန. သဗ္ဗထာပီတိ အာဝဇ္ဇနာဒိတဒါရမ္မဏပရိယောသာနေန သဗ္ဗေနပိ ပကာရေန ကာမာဝစရာနေဝါတိ ယောဇနာ. သဗ္ဗထာပိ စတုပညာသ စိတ္တာနီတိ ဝါ သမ္ဗန္ဓော. သဗ္ဗထာပိ တံတံဒွါရိကဝသေန ဌိတာနိ အဂ္ဂဟိတဂ္ဂဟဏေန စက္ခုဒွါရိကေသု ဆစတ္တာလီသစိတ္တေသု သောတဝိညာဏာဒီနံ စတုန္နံ ယုဂဠာနံ ပက္ခေပေန စတုပညာသပီတျတ္ထော. ३९. तेथे (त्या चक्षु आदि द्वारांमध्ये) चक्षुद्वारामध्ये योग्यतेनुसार ४६ चित्ते उत्पन्न होतात, असा संबंध आहे. एक पंचद्वार आवर्जन चित्त, दोन्ही विपाकांच्या (कुशल आणि अकुशल विपाक) प्रभावाने सात चक्षुविज्ञान इत्यादी चित्ते, एक वोट्ठब्बन (व्यवस्थापन) चित्त, कुशल, अकुशल आणि आवर्जन सोडून इतर क्रियांच्या प्रभावाने २९ कामावचर जवन चित्ते, आणि आधी न घेतलेल्यांना ग्रहण करण्याच्या नियमाने केवळ ८ तदारम्मण चित्ते; अशी एकूण ४६ चित्ते होतात. 'योग्यतेनुसार' म्हणजे इष्ट इत्यादी आलंबनांमध्ये योनिसोमनसिकार, अयोनिसोमनसिकार आणि अनुसय नसलेल्या (अर्हंत) संतानांच्या अनुरूपतेनुसार होय. 'सर्व प्रकारे' म्हणजे आवर्जनापासून सुरू होऊन तदारम्मणावर समाप्त होणाऱ्या सर्व प्रकारांनी ती कामावचरच आहेत, अशी योजना आहे. किंवा सर्व प्रकारे ५४ चित्ते आहेत, असा संबंध आहे. सर्व प्रकारे त्या त्या द्वारांच्या प्रभावाने राहिलेल्या, आधी न घेतलेल्यांना ग्रहण करण्याच्या नियमाने चक्षुद्वारातील ४६ चित्तांमध्ये श्रोतविज्ञान इत्यादी चार जोड्यांचा समावेश केल्याने ५४ चित्ते होतात, असा अर्थ आहे. ၄၁. စက္ခာဒိဒွါရေသု အပ္ပဝတ္တနတော, မနောဒွါရသင်္ခါတဘဝင်္ဂတော အာရမ္မဏန္တရဂ္ဂဟဏဝသေန အပ္ပဝတ္တိတော စ ပဋိသန္ဓာဒိဝသေန ပဝတ္တာနိ ဧကူနဝီသတိ ဒွါရဝိမုတ္တာနိ. ४१. चक्षु आदि द्वारांमध्ये प्रवृत्त न झाल्यामुळे, मनोद्वार म्हटल्या जाणाऱ्या भवांगापासून प्रतिसंधीच्या आलंबनापेक्षा इतर आलंबन ग्रहण करण्याच्या रूपाने प्रवृत्त न झाल्यामुळे, प्रतिसंधी इत्यादींच्या रूपाने प्रवृत्त होणारी १९ चित्ते 'द्वारविमुक्त' (द्वारांपासून मुक्त) म्हटली जातात. ၄၂. ဒွိပဉ္စဝိညာဏာနိ [Pg.129] သကသကဒွါရေ, ဆဗ္ဗီသတိ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနာနိ မနောဒွါရေယေဝ ဥပ္ပဇ္ဇနတော ဆတ္တိံသ စိတ္တာနိ ယထာရဟံ သကသကဒွါရာနုရူပံ ဧကဒွါရိကစိတ္တာနိ. ४२. द्विपंचविज्ञान (१० चित्ते) आपापल्या द्वारात उत्पन्न होत असल्यामुळे, आणि २६ महग्गत व लोकोत्तर जवन चित्ते केवळ मनोद्वारामध्येच उत्पन्न होत असल्यामुळे, ही ३६ चित्ते योग्यतेनुसार आपापल्या द्वाराच्या अनुरूप 'एकद्वारिक चित्ते' (एकाच द्वारात उत्पन्न होणारी चित्ते) म्हटली जातात. ၄၅. ပဉ္စဒွါရေသု သန္တီရဏတဒါရမ္မဏဝသေန, မနောဒွါရေ စ တဒါရမ္မဏဝသေန ပဝတ္တနတော ဆဒွါရိကာနိ စေဝ ပဋိသန္ဓာဒိဝသပ္ပဝတ္တိယာ ဒွါရဝိမုတ္တာနိ စ. ४५. पाच द्वारांमध्ये संतीरण आणि तदारम्मण रूपाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे, आणि मनोद्वारामध्ये तदारम्मण रूपाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे ती 'सद्द्वारिक' (सहा द्वारांमध्ये प्रवृत्त होणारी) देखील होतात, आणि प्रतिसंधी इत्यादींच्या रूपाने प्रवृत्त होत असताना कधी कधी सहा द्वारांपासून मुक्त (द्वारविमुक्त) देखील होतात. ၄၇. ပဉ္စဒွါရိကာနိ စ ဆဒွါရိကာနိ စ ပဉ္စဆဒွါရိကာနိ. ဆဒွါရိကာနိ စ တာနိ ကဒါစိ ဒွါရဝိမုတ္တာနိ စာတိ ဆဒွါရိကဝိမုတ္တာနိ. အထ ဝါ ဆဒွါရိကာနိ စ ဆဒွါရိကဝိမုတ္တာနိ စာတိ ဆဒွါရိကဝိမုတ္တာနီတိ ဧကဒေသသရူပေကသေသော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ४७. पंचद्वारिक आणि सद्द्वारिक चित्तांना 'पंच-सद्द्वारिक' म्हणतात. आणि ती सद्द्वारिक चित्ते कधी कधी द्वारविमुक्त देखील होतात, म्हणून त्यांना 'सद्द्वारिक-विमुक्त' म्हणतात. अथवा, सद्द्वारिक चित्ते आणि सद्द्वारिक-विमुक्त चित्ते या दोन्ही अर्थांनी 'सद्द्वारिक-विमुक्त' हा एकदेश-सरूप-एकशेष समास समजावा. ဒွါရသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. द्वारसंग्रह वर्णन समाप्त झाले. အာလမ္ဗဏသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ आरम्मणसंग्रह वर्णन ၄၈. အာရမ္မဏာနံ သရူပတော, ဝိဘာဂတော, တံဝိသယစိတ္တတော စ သင်္ဂဟော အာလမ္ဗဏသင်္ဂဟော. ဝဏ္ဏဝိကာရံ အာပဇ္ဇမာနံ ရူပယတိ ဟဒယင်္ဂတဘာဝံ ပကာသေတီတိ ရူပံ, တဒေဝ ဒုဗ္ဗလပုရိသေန ဒဏ္ဍာဒိ ဝိယ စိတ္တစေတသိကေဟိ အာလမ္ဗီယတိ, တာနိ ဝါ အာဂန္တွာ ဧတ္ထ ရမန္တီတိ အာရမ္မဏန္တိ ရူပါရမ္မဏံ. သဒ္ဒီယတီတိ သဒ္ဒေါ, သောယေဝ အာရမ္မဏန္တိ သဒ္ဒါရမ္မဏံ. ဂန္ဓယတိ အတ္တနော ဝတ္ထုံ သူစေတိ ‘‘ဣဒမေတ္ထ အတ္ထီ’’တိ ပေသုညံ ကရောန္တံ ဝိယ ဟောတီတိ ဂန္ဓော, သောယေဝ အာရမ္မဏံ ဂန္ဓာရမ္မဏံ. ရသန္တိ တံ သတ္တာ အဿာဒေန္တီတိ ရသော, သောယေဝ အာရမ္မဏံ ရသာရမ္မဏံ. ဖုသီယတီတိ ဖောဋ္ဌဗ္ဗံ, တဒေဝ အာရမ္မဏံ ဖောဋ္ဌဗ္ဗာရမ္မဏံ. ဓမ္မောယေဝ အာရမ္မဏံ ဓမ္မာရမ္မဏံ. ४८. आरम्मणांच्या (आलंबनांच्या) त्यांच्या स्वरूपानुसार, विभागानुसार आणि त्या विषयांच्या चित्तानुसार केलेला संग्रह म्हणजे 'आरम्मणसंग्रह' होय. वर्णाच्या विकाराला प्राप्त होऊन जे अंतःकरणातील भाव प्रकट करते, त्याला 'रूप' म्हणतात. तेच रूप दुर्बल मनुष्याद्वारे काठी इत्यादींचा आधार घेतला जावा त्याप्रमाणे चित्त आणि चेतसिकांद्वारे आलंबित केले जाते (आरम्मण बनवले जाते); किंवा ती चित्त-चेतसिके येऊन येथे रममाण होतात म्हणून त्याला 'आरम्मण' म्हणतात; यावरून 'रूपारम्मण' हा शब्द सिद्ध होतो. ज्याचे उच्चारण केले जाते तो 'शब्द' होय, तोच शब्द आलंबन असल्यामुळे त्याला 'सद्दारम्मण' म्हणतात. जो आपल्या आश्रयवस्तूची सूचना देतो, 'येथे ही वस्तू आहे' असे सांगून जणू चहाडी करणाऱ्यासारखा वाटतो, तो 'गंध' होय; तोच गंध आलंबन असल्यामुळे त्याला 'गंधारम्मण' म्हणतात. प्राणी ज्याची चव घेतात, आस्वाद घेतात, तो 'रस' होय; तोच रस आलंबन असल्यामुळे त्याला 'रसारम्मण' म्हणतात. ज्याला स्पर्श केला जातो ते 'फोट्ठब्ब' (स्पर्श) होय; तेच आलंबन असल्यामुळे त्याला 'फोट्ठब्बारम्मण' म्हणतात. धम्मच आलंबन असल्यामुळे त्याला 'धम्मारम्मण' म्हणतात. ၄၉. တတ္ထာတိ [Pg.130] တေသု ရူပါဒိအာရမ္မဏေသု, ရူပမေဝါတိ ဝဏ္ဏာယတနသင်္ခါတံ ရူပမေဝ. သဒ္ဒါဒယောတိ သဒ္ဒါယတနာဒိသင်္ခါတာ သဒ္ဒါဒယော, အာပေါဓာတုဝဇ္ဇိတဘူတတ္တယသင်္ခါတံ ဖောဋ္ဌဗ္ဗာယတနဉ္စ. ४९. तेथे (त्या रूप इत्यादी आलंबनांमध्ये) 'रूपच' म्हणजे वर्णायतन संज्ञक रूपच होय. 'शब्द इत्यादी' म्हणजे शब्दायतन इत्यादी संज्ञक शब्द इत्यादी, आणि आपोधातू सोडून इतर तीन महाभूतांच्या समूहाने बनलेले फोट्ठब्बायतन (स्पर्शायतन) होय. ၅၀. ပဉ္စာရမ္မဏပသာဒါနိ ဌပေတွာ သေသာနိ သောဠသ သုခုမရူပါနိ. ५०. पाच आरम्मणे आणि पाच प्रसाद रूपे सोडून उरलेली १६ रूपे 'सूक्ष्म रूपे' म्हटली जातात. ၅၁. ပစ္စုပ္ပန္နန္တိ ဝတ္တမာနံ. ५१. 'पच्चुप्पन्न' (प्रत्युत्पन्न) म्हणजे वर्तमानकाळात विद्यमान असणारे होय. ၅၂. ဆဗ္ဗိဓမ္ပီတိ ရူပါဒိဝသေန ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ. ဝိနာသာဘာဝတော အတီတာဒိကာလဝသေန နဝတ္တဗ္ဗတ္တာ နိဗ္ဗာနံ, ပညတ္တိ စ ကာလဝိမုတ္တံ နာမ. ယထာရဟန္တိ ကာမာဝစရဇဝနအဘိညာသေသမဟဂ္ဂတာဒိဇဝနာနံ အနုရူပတော. ကာမာဝစရဇဝနာနဉှိ ဟသိတုပ္ပာဒဝဇ္ဇာနံ ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ တိကာလိကံ, ကာလဝိမုတ္တဉ္စ အာရမ္မဏံ ဟောတိ. ဟသိတုပ္ပာဒဿ တိကာလိကမေဝ. တထာ ဟိဿ ဧကန္တပရိတ္တာရမ္မဏတံ ဝက္ခတိ. ဒိဗ္ဗစက္ခာဒိဝသပ္ပဝတ္တဿ ပန အဘိညာဇဝနဿ ယထာရဟံ ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ တိကာလိကံ, ကာလဝိမုတ္တဉ္စ အာရမ္မဏံ ဟောတိ. ဝိဘာဂေါ ပနေတ္ထ နဝမပရိစ္ဆေဒေ အာဝိ ဘဝိဿတိ. သေသာနံ ပန ကာလဝိမုတ္တံ, အတီတဉ္စ ယထာရဟမာရမ္မဏံ ဟောတိ. ५२. 'सहा प्रकारचे' म्हणजे रूप इत्यादींच्या भेदाने सहा प्रकारचे आलंबन होय. विनाश किंवा क्षय नसल्यामुळे आणि भूतकाळ इत्यादी काळाच्या रूपाने सांगता येत नसल्यामुळे निर्वाण आणि प्रज्ञप्ती हे 'कालविमुक्त' आलंबन म्हटले जाते. 'योग्यतेनुसार' म्हणजे कामावचर जवन, अभिज्ञा आणि उरलेली महग्गत इत्यादी जवनांच्या अनुरूपतेनुसार होय. कारण, हसितुप्पाद सोडून इतर कामावचर जवनांचे सहा प्रकारचे त्रैकालिक आणि कालविमुक्त आलंबन असते. हसितुप्पाद चित्ताचे आलंबन केवळ त्रैकालिकच असते. कारण, पुढे त्याचे केवळ परीत्त (कामावचर) आलंबन असणे सांगितले जाईल. परंतु, दिव्यचक्षु इत्यादींच्या रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या अभिज्ञा जवनाचे योग्यतेनुसार सहा प्रकारचे त्रैकालिक आणि कालविमुक्त आलंबन असते. याचा सविस्तर विभाग नवव्या परिच्छेदात स्पष्ट केला जाईल. परंतु, उरलेल्या (महग्गत इत्यादी) जवनांचे योग्यतेनुसार कालविमुक्त आणि अतीत आलंबन असते. ၅၃. ဒွါရ…ပေ… သင်္ခါတာနံ ဆဗ္ဗိဓမ္ပိ အာရမ္မဏံ ဟောတီတိ သမ္ဗန္ဓော, တံ ပန နေသံ အာရမ္မဏံ န အာဝဇ္ဇနဿ ဝိယ ကေနစိ အဂ္ဂဟိတမေဝ ဂေါစရဘာဝံ ဂစ္ဆတိ, န စ ပဉ္စဒွါရိကဇဝနာနံ ဝိယ ဧကန္တပစ္စုပ္ပန္နံ, နာပိ မနောဒွါရိကဇဝနာနံ ဝိယ တိကာလိကမေဝ, အဝိသေသေန ကာလဝိမုတ္တံ ဝါ, နာပိ မရဏာသန္နတော ပုရိမဘာဂဇဝနာနံ ဝိယ ကမ္မကမ္မနိမိတ္တာဒိဝသေန အာဂမသိဒ္ဓိဝေါဟာရဝိနိမုတ္တန္တိ အာဟ ‘‘ယထာသမ္ဘဝံ…ပေ… သမ္မတ’’န္တိ. တတ္ထ ယထာသမ္ဘဝန္တိ တံတံဘူမိကပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတီနံ တံတံဒွါရဂ္ဂဟိတာဒိဝသေန သမ္ဘဝါနုရူပတော. ကာမာဝစရာနဉှိ [Pg.131] ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါနံ တာဝ ရူပါဒိပဉ္စာရမ္မဏံ ဆဒွါရဂ္ဂဟိတံ ယထာရဟံ ပစ္စုပ္ပန္နမတီတဉ္စ ကမ္မနိမိတ္တသမ္မတမာရမ္မဏံ ဟောတိ, တထာ စုတိစိတ္တဿ အတီတမေဝ. ဓမ္မာရမ္မဏံ ပန တေသံ တိဏ္ဏန္နမ္ပိ မနောဒွါရဂ္ဂဟိတမေဝ အတီတံ ကမ္မကမ္မနိမိတ္တသမ္မတံ, တထာ ရူပါရမ္မဏံ ဧကမေဝ မနောဒွါရဂ္ဂဟိတံ ဧကန္တပစ္စုပ္ပန္နံ ဂတိနိမိတ္တသမ္မတန္တိ ဧဝံ ကာမာဝစရပဋိသန္ဓာဒီနံ ယထာသမ္ဘဝံ ဆဒွါရဂ္ဂဟိတံ ပစ္စုပ္ပန္နမတီတဉ္စ ကမ္မကမ္မနိမိတ္တဂတိနိမိတ္တသမ္မတမာရမ္မဏံ ဟောတိ. ५३. द्वारविमुक्त म्हटल्या जाणाऱ्या (प्रतिसंधी, भवांग, च्युती) चित्तांचे सहा प्रकारचे आलंबन असते, असा संबंध आहे. परंतु, त्यांचे ते आलंबन आवर्जनाप्रमाणे कोणत्याही चित्ताने आधी ग्रहण न केलेलेच आलंबन बनते असे नाही, आणि पंचद्वारिक जवनांप्रमाणे केवळ वर्तमानकालीनच असते असे नाही, तसेच मनोद्वारिक जवनांप्रमाणे केवळ त्रैकालिक किंवा सामान्यतः कालविमुक्तच असते असे नाही, आणि मरणासन्न विथीच्या आधीच्या भागातील जवनांप्रमाणे कर्म, कर्मनिमित्त इत्यादींच्या रूपाने उत्पत्तीच्या कारणाने सिद्ध होणाऱ्या संज्ञेपासून मुक्त असते असे नाही; म्हणून 'यथासंभव... संमत' असे म्हटले आहे. तेथे 'यथासंभव' म्हणजे त्या त्या भूमीतील प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती चित्तांच्या त्या त्या द्वाराने ग्रहण केलेल्या इत्यादींच्या रूपाने संभव असणाऱ्या योग्यतेनुसार होय. कारण, कामावचर प्रतिसंधी आणि भवांग चित्तांचे रूप इत्यादी पाच आलंबने सहा द्वारांनी ग्रहण केलेली, योग्यतेनुसार वर्तमान किंवा अतीत असणारे आणि कर्मनिमित्त मानलेले आलंबन असते; तसेच च्युती चित्ताचे केवळ अतीतच असते. परंतु, धम्मारम्मण तर त्या तिन्ही चित्तांचे मनोद्वाराने ग्रहण केलेले, अतीत आणि कर्म किंवा कर्मनिमित्त मानलेले असते; तसेच केवळ एक रूपारम्मण मनोद्वाराने ग्रहण केलेले, एकांततः वर्तमानकालीन आणि गतिनिमित्त मानलेले असते. अशा प्रकारे कामावचर प्रतिसंधी इत्यादी चित्तांचे यथासंभव सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले, वर्तमान किंवा अतीत असणारे आणि कर्म, कर्मनिमित्त किंवा गतिनिमित्त मानलेले आलंबन असते. မဟဂ္ဂတပဋိသန္ဓာဒီသု ပန ရူပါဝစရာနံ, ပဌမတတိယာရုပ္ပာနဉ္စ ဓမ္မာရမ္မဏမေဝ မနောဒွါရဂ္ဂဟိတံ ပညတ္တိဘူတံ ကမ္မနိမိတ္တသမ္မတံ, တထာ ဒုတိယစတုတ္ထာရုပ္ပာနံ အတီတမေဝါတိ ဧဝံ မဟဂ္ဂတပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတီနံ မနောဒွါရဂ္ဂဟိတံ ပညတ္တိဘူတံ, အတီတံ ဝါ ကမ္မနိမိတ္တသမ္မတမေဝ အာရမ္မဏံ ဟောတိ. परंतु, महग्गत प्रतिसंधी इत्यादींमध्ये रूपावचर आणि पहिल्या व तिसऱ्या आरुप्प (अरूप) चित्तांचे मनोद्वाराने ग्रहण केलेले, प्रज्ञप्तीरूप असणारे आणि कर्मनिमित्त मानलेले धम्मारम्मणच असते; तसेच दुसऱ्या आणि चौथ्या आरुप्प चित्तांचे केवळ अतीतच असते. अशा प्रकारे महग्गत प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती चित्तांचे मनोद्वाराने ग्रहण केलेले, प्रज्ञप्तीरूप किंवा अतीत असणारे आणि केवळ कर्मनिमित्त मानलेलेच आलंबन असते. ယေဘုယျေန ဘဝန္တရေ ဆဒွါရဂ္ဂဟိတန္တိ ဗာဟုလ္လေန အတီတာနန္တရဘဝေ မရဏာသန္နပ္ပဝတ္တဆဒွါရိကဇဝနေဟိ ဂဟိတံ. အသညီဘဝတော စုတာနဉှိ ပဋိသန္ဓိဝိသယဿ အနန္တရာတီတဘဝေ န ကေနစိ ဒွါရေန ဂဟဏံ အတ္ထီတိ တဒေဝေတ္ထ ယေဘုယျဂ္ဂဟဏေန ဗျဘိစာရိတံ. ကေဝလဉှိ ကမ္မဗလေနေဝ တေသံ ပဋိသန္ဓိယာ ကမ္မနိမိတ္တာဒိကမာရမ္မဏံ ဥပဋ္ဌာတိ. တထာ ဟိ သစ္စသင်္ခေပေ အသညီဘဝတော စုတဿ ပဋိသန္ဓိနိမိတ္တံ ပုစ္ဆိတွာ – ‘बहुतांश करून दुसऱ्या भवात सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले’ म्हणजे बहुतांश करून नुकत्याच संपलेल्या मागील भवामध्ये मरणासन्न काळात प्रवृत्त होणाऱ्या सहा द्वारांमधील जवनांद्वारे ग्रहण केलेले असते. कारण, असंज्ञी भवातून च्युत झालेल्या जीवांच्या प्रतिसंधीच्या आलंबनाचे लागलीच मागील असंज्ञी भवामध्ये कोणत्याही द्वाराने ग्रहण होत नाही; म्हणूनच येथे ‘बहुतांश करून’ (येभुय्येन) या शब्दाच्या ग्रहणाने त्या नियमाचा व्यभिचार (अपवाद) दर्शविला आहे. कारण केवळ कर्माच्या बलानेच त्यांच्या प्रतिसंधी चित्ताला कर्म, कर्मनिमित्त इत्यादी आलंबन प्रकट होते. म्हणूनच ‘सच्चसंक्षेप’ ग्रंथात असंज्ञी भवातून च्युत झालेल्या जीवाच्या प्रतिसंधीच्या निमित्ताविषयी विचारून असे म्हटले आहे – ‘‘ဘဝန္တရကတံ ကမ္မံ, ယမောကာသံ လဘေ တတော; ဟောတိ သာ သန္ဓိ တေနေဝ, ဥပဋ္ဌာပိတဂေါစရေ’’တိ. (သ. သ. ၁၇၁) – “दुसऱ्या भवात केलेले जे कर्म विपाक देण्याची संधी मिळवते, त्या कर्मानेच उपस्थित केलेल्या (प्रकट केलेल्या) आलंबनावर ती प्रतिसंधी होते.” ကေဝလံ ကမ္မဗလေနေဝ ပဋိသန္ဓိဂေါစရဿ ဥပဋ္ဌာနံ ဝုတ္တံ. ဣတရထာ ဟိ ဇဝနဂ္ဂဟိတဿပိ အာရမ္မဏဿ ကမ္မဗလေနေဝ ဥပဋ္ဌာပိယမာနတ္တာ ‘‘တေနေဝါ’’တိ သာဝဓာရဏဝစနဿ အဓိပ္ပာယသုညတာ [Pg.132] အာပဇ္ဇေယျာတိ. နနု စ တေသမ္ပိ ပဋိသန္ဓိဂေါစရော ကမ္မဘဝေ ကေနစိ ဒွါရေန ဇဝနဂ္ဂဟိတော သမ္ဘဝတီတိ? သစ္စံ သမ္ဘဝတိ ကမ္မကမ္မနိမိတ္တသမ္မတော, ဂတိနိမိတ္တသမ္မတော ပန သဗ္ဗေသမ္ပိ မရဏကာလေယေဝ ဥပဋ္ဌာတီတိ ကုတော တဿ ကမ္မဘဝေ ဂဟဏသမ္ဘဝေါ. အပိစေတ္ထ မရဏာသန္နပဝတ္တဇဝနေဟိ ဂဟိတမေဝ သန္ဓာယ ‘‘ဆဒွါရဂ္ဂဟိတ’’န္တိ ဝုတ္တံ, ဧဝဉ္စ ကတွာ အာစရိယေန ဣမသ္မိံယေဝ အဓိကာရေ ပရမတ္ထဝိနိစ္ဆယေ ဝုတ္တံ – येथे केवळ कर्माच्या बलानेच प्रतिसंधीच्या आलंबनाचे प्रकट होणे सांगितले आहे. अन्यथा, जवनाने ग्रहण केलेल्या आलंबनाचे सुद्धा केवळ कर्माच्या बलानेच प्रकटीकरण होत असल्यामुळे, ‘त्याच्याद्वारेच’ (तेनेव) या निश्चयवाचक शब्दाचा अर्थ निरर्थक ठरेल. शंका: पण त्यांच्या प्रतिसंधीचे आलंबन सुद्धा कर्मभवामध्ये कोणत्यातरी द्वाराने जवनाद्वारे ग्रहण केलेले असणे शक्य नाही का? उत्तर: कर्म आणि कर्मनिमित्त म्हणून मानले गेलेले आलंबन शक्य आहे, हे खरे आहे; परंतु गतिनिमित्त म्हणून मानले गेलेले आलंबन सर्वच जीवांना केवळ मरणकाळातच प्रकट होते, मग त्याचे कर्मभवामध्ये ग्रहण होणे कसे शक्य आहे? शिवाय, येथे मरणासन्न काळात प्रवृत्त होणाऱ्या जवनांनी ग्रहण केलेल्या आलंबनालाच उद्देशून ‘सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले’ असे म्हटले आहे. आणि असे मानूनच आचार्यांनी याच प्रकरणात ‘परमत्थविनिच्छय’ ग्रंथात म्हटले आहे – ‘‘မရဏာသန္နသတ္တဿ, ယထောပဋ္ဌိတဂေါစရံ; ဆဒွါရေသု တမာရဗ္ဘ, ပဋိသန္ဓိ ဘဝန္တရေ’’တိ. (ပရမ. ဝိ. ၈၉); “मरणासन्न प्राण्याच्या सहा द्वारांमध्ये जसे आलंबन प्रकट होते, त्यालाच ग्रहण करून दुसऱ्या भवात प्रतिसंधी होते.” ‘‘ပစ္စုပ္ပန္န’’န္တျာဒိနာ အနာဂတဿ ပဋိသန္ဓိဂေါစရဘာဝံ နိဝါရေတိ. န ဟိ တံ အတီတကမ္မကမ္မနိမိတ္တာနိ ဝိယ အနုဘူတံ, နာပိ ပစ္စုပ္ပန္နကမ္မနိမိတ္တဂတိနိမိတ္တာနိ ဝိယ အာပါထဂတဉ္စ ဟောတီတိ, ကမ္မကမ္မနိမိတ္တာဒီနဉ္စ သရူပံ သယမေဝ ဝက္ခတိ. ‘पच्चुप्पन्नं’ (वर्तमान) इत्यादी शब्दांद्वारे अनागत (भविष्यातील) आलंबनाचा प्रतिसंधीचा विषय असण्याचा निषेध केला जातो. कारण ते भूतकाळातील कर्म आणि कर्मनिमित्ताप्रमाणे अनुभवलेले नसते, आणि वर्तमानकाळातील कर्मनिमित्त व गतिनिमित्ताप्रमाणे समोर आलेलेही नसते. कर्म, कर्मनिमित्त इत्यादींचे स्वरूप आचार्य स्वतःच पुढे सांगतील. ၅၄. တေသူတိ ရူပါဒိပစ္စုပ္ပန္နာဒိကမ္မာဒိအာရမ္မဏေသု ဝိညာဏေသု. ရူပါဒီသု ဧကေကံ အာရမ္မဏံ ဧတေသန္တိ ရူပါဒိဧကေကာရမ္မဏာနိ. ५४. ‘त्याच्यामध्ये’ म्हणजे रूप इत्यादी वर्तमान इत्यादी कर्म इत्यादी आलंबन असणाऱ्या विज्ञानांमध्ये. रूप इत्यादींपैकी एकेकच आलंबन ज्यांचे आहे, त्यांना ‘रूपादि-एकेक-आलंबन’ (रूपादींपैकी एकेकच आलंबन असणारे विज्ञान) म्हणतात. ၅၅. ရူပါဒိကံ ပဉ္စဝိဓမ္ပိ အာရမ္မဏမေတဿာတိ ရူပါဒိပဉ္စာရမ္မဏံ. ५५. रूप इत्यादी पाचही प्रकारचे आलंबन ज्याचे आहे, त्याला ‘रूपादि-पंच-आलंबन’ (पाचही आलंबने असणारे विज्ञान) म्हणतात. ၅၆. သေသာနီတိ ဒွိပဉ္စဝိညာဏသမ္ပဋိစ္ဆနေဟိ အဝသေသာနိ ဧကာဒသ ကာမာဝစရဝိပါကာနိ. သဗ္ဗထာပိ ကာမာဝစရာရမ္မဏာနီတိ သဗ္ဗေနပိ ဆဒွါရိကဒွါရဝိမုတ္တဆဠာရမ္မဏဝသပ္ပဝတ္တာကာရေန နိဗ္ဗတ္တာနိပိ ဧကန္တကာမာဝစရသဘာဝဆဠာရမ္မဏဂေါစရာနိ. ဧတ္ထ ဟိ ဝိပါကာနိ တာဝ သန္တီရဏာဒိဝသေန ရူပါဒိပဉ္စာရမ္မဏေ, ပဋိသန္ဓာဒိဝသေန ဆဠာရမ္မဏသင်္ခါတေ ကာမာဝစရာရမ္မဏေယေဝ ပဝတ္တန္တိ. ५६. ‘उर्वरित’ म्हणजे द्विपंचविज्ञान (दहा विज्ञान) आणि संपटिच्छन (दोन) यांच्याव्यतिरिक्त उर्वरित अकरा कामावचर विपाक चित्ते. ‘सर्व प्रकारे कामावचर आलंबन असणारी’ म्हणजे सहा द्वारांमधील चित्ते आणि द्वारविमुक्त चित्ते या दोन्ही रूपाने सहा आलंबनांच्या वशाने प्रवृत्त होणारी असली तरी, ती निश्चितपणे कामावचर स्वभावाच्या सहा आलंबनांनाच विषय बनवणारी असतात. कारण येथे विपाक चित्ते तर संतीरण इत्यादी कृत्यवशाने रूप इत्यादी पाच आलंबनांमध्ये आणि प्रतिसंधी इत्यादी कृत्यवशाने सहा आलंबन रूप अशा केवळ कामावचर आलंबनांमध्येच प्रवृत्त होतात. ဟသနစိတ္တမ္ပိ [Pg.133] ပဓာနသာရုပ္ပဋ္ဌာနံ ဒိသွာ တုဿန္တဿ ရူပါရမ္မဏေ, ဘဏ္ဍဘာဇနဋ္ဌာနေ မဟာသဒ္ဒံ သုတွာ ‘‘ဧဝရူပါ လောလုပ္ပတဏှာ မေ ပဟီနာ’’တိ တုဿန္တဿ သဒ္ဒါရမ္မဏေ, ဂန္ဓာဒီဟိ စေတိယပူဇနကာလေ တုဿန္တဿ ဂန္ဓာရမ္မဏေ, ရသသမ္ပန္နံ ပိဏ္ဍပါတံ သဗြဟ္မစာရီဟိ ဘာဇေတွာ ပရိဘုဉ္ဇနကာလေ တုဿန္တဿ ရသာရမ္မဏေ, အာဘိသမာစာရိကဝတ္တပရိပူရဏကာလေ တုဿန္တဿ ဖောဋ္ဌဗ္ဗာရမ္မဏေ, ပုဗ္ဗေနိဝါသဉာဏာဒီဟိ ဂဟိတကာမာဝစရဓမ္မံ အာရဗ္ဘ တုဿန္တဿ ဓမ္မာရမ္မဏေတိ ဧဝံ ပရိတ္တဓမ္မပရိယာပန္နေသွေဝ ဆသု အာရမ္မဏေသု ပဝတ္တတိ. हसितुत्पाद चित्त (हसण्याचे चित्त) सुद्धा – साधना करण्यासाठी योग्य स्थान पाहून प्रसन्न होणाऱ्या अर्हताच्या रूपालंबनामध्ये; वस्तू वाटपाच्या ठिकाणी मोठा आवाज ऐकून ‘अशा प्रकारची माझी लोलुपता नष्ट झाली आहे’ असे विचार करून प्रसन्न होणाऱ्या अर्हताच्या शब्दालंबनामध्ये; गंध इत्यादींनी चैत्यपूजा करताना प्रसन्न होणाऱ्या अर्हताच्या गंधालंबनामध्ये; चवदार पिंडपात सब्रह्मचाऱ्यांसोबत वाटून ग्रहण करताना प्रसन्न होणाऱ्या अर्हताच्या रसालंबनामध्ये; आभिसमाचारिक कर्तव्यांचे पालन करताना प्रसन्न होणाऱ्या अर्हताच्या स्प्रष्टव्यालंबनामध्ये; आणि पूर्वेनिवासज्ञान इत्यादींनी ग्रहण केलेल्या कामावचर धर्माला उद्देशून प्रसन्न होणाऱ्या अर्हताच्या धर्मलंबनामध्ये – अशा प्रकारे केवळ परीत्त (कामावचर) धर्मात समाविष्ट असणाऱ्या सहा आलंबनांमध्येच प्रवृत्त होते. ၅၇. ဒွါဒသာကုသလအဋ္ဌဉာဏဝိပ္ပယုတ္တဇဝနဝသေန ဝီသတိ စိတ္တာနိ အတ္တနော ဇဠဘာဝတော လောကုတ္တရဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တိတုံ န သက္ကောန္တီတိ နဝဝိဓလောကုတ္တရဓမ္မေ ဝဇ္ဇေတွာ တေဘူမကာနိ, ပညတ္တိဉ္စ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တန္တီတိ အာဟ ‘‘အကုသလာနိ စေဝါ’’တျာဒိ. ဣမေသု ဟိ အကုသလတော စတ္တာရော ဒိဋ္ဌိဂတသမ္ပယုတ္တစိတ္တုပ္ပာဒါ ပရိတ္တဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ပရာမသနအဿာဒနာဘိနန္ဒနကာလေ ကာမာဝစရာရမ္မဏာ, တေနေဝါကာရေန သတ္တဝီသတိ မဟဂ္ဂတဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တိယံ မဟဂ္ဂတာရမ္မဏာ, သမ္မုတိဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တိယံ ပညတ္တာရမ္မဏာ. ဒိဋ္ဌိဝိပ္ပယုတ္တစိတ္တုပ္ပာဒါပိ တေယေဝ ဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ကေဝလံ အဿာဒနာဘိနန္ဒနဝသေန ပဝတ္တိယံ, ပဋိဃသမ္ပယုတ္တာ စ ဒုဿနဝိပ္ပဋိသာရဝသေန, ဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတော အနိဋ္ဌင်္ဂမနဝသေန, ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတော ဝိက္ခိပနဝသေန, အဝူပသမဝသေန စ ပဝတ္တိယံ ပရိတ္တမဟဂ္ဂတပညတ္တာရမ္မဏော, ကုသလတော စတ္တာရော, ကိရိယတော စတ္တာရောတိ အဋ္ဌ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တစိတ္တုပ္ပာဒါ သေက္ခပုထုဇ္ဇနခီဏာသဝါနံ အသက္ကစ္စဒါနပစ္စဝေက္ခဏဓမ္မဿဝနာဒီသု ပရိတ္တဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တိကာလေ ကာမာဝစရာရမ္မဏာ, အတိပဂုဏဇ္ဈာနပစ္စဝေက္ခဏကာလေ [Pg.134] မဟဂ္ဂတာရမ္မဏာ, ကသိဏနိမိတ္တာဒီသု ပရိကမ္မာဒိကာလေ ပညတ္တာရမ္မဏာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ५७. बारा अकुशल आणि आठ ज्ञानविप्रयुक्त जवनांच्या वशाने वीस चित्ते स्वतःच्या जडत्वामुळे (मंदत्वामुळे) लोकोत्तर धर्मांना उद्देशून प्रवृत्त होण्यास असमर्थ असतात; म्हणून नऊ प्रकारच्या लोकोत्तर धर्मांना वर्ज्य करून ते त्रिभूमिक धर्म आणि प्रज्ञप्तीला उद्देशून प्रवृत्त होतात, म्हणूनच ‘अकुसलानि चेव’ इत्यादी म्हटले आहे. कारण या चित्तांमध्ये, अकुशलांपैकी चार दृष्टीगतसंप्रयुक्त चित्तोत्पाद परीत्त (कामावचर) धर्मांना उद्देशून परामर्श, आस्वादन आणि अभिनंदन करताना कामावचर आलंबन असणारे असतात; त्याच प्रकारे सत्तावीस महग्गत धर्मांना उद्देशून प्रवृत्त होताना महग्गत आलंबन असणारे असतात; आणि संमृती धर्मांना उद्देशून प्रवृत्त होताना प्रज्ञप्ती आलंबन असणारे असतात. दृष्टीविप्रयुक्त चित्तोत्पाद सुद्धा त्याच धर्मांना उद्देशून केवळ आस्वादन आणि अभिनंदनाच्या वशाने प्रवृत्त होताना; प्रतिघसंप्रयुक्त चित्तोत्पाद द्वेष आणि पश्चात्तापाच्या वशाने; विचिकित्सासहगत चित्तोत्पाद अनिर्णयाच्या वशाने; आणि औद्धत्यसहगत चित्तोत्पाद विक्षेप व अशांततेच्या वशाने प्रवृत्त होताना परीत्त, महग्गत आणि प्रज्ञप्ती आलंबन असणारे असतात. कुशलांमधीलचार आणि क्रियांमधील चार असे आठ ज्ञानविप्रयुक्त चित्तोत्पाद शैक्ष, पृथग्जन आणि क्षीणास्रवांच्या (अर्हतांच्या) अनादराने दान देणे, प्रत्यवेक्षण करणे, धर्मश्रवण करणे इत्यादींमध्ये परीत्त धर्मांना उद्देशून प्रवृत्त होताना कामावचर आलंबन असणारे असतात; अत्यंत अभ्यस्त असलेल्या ध्यानाचे प्रत्यवेक्षण करताना महग्गत आलंबन असणारे असतात; आणि कसिणनिमित्त इत्यादींमध्ये परिकर्म इत्यादी करताना प्रज्ञप्ती आलंबन असणारे असतात, असे जाणावे. ၅၈. အရဟတ္တမဂ္ဂဖလဝဇ္ဇိတသဗ္ဗာရမ္မဏာနိ သေက္ခပုထုဇ္ဇနသန္တာနေသွေဝ ပဝတ္တနတော. သေက္ခာပိ ဟိ ဌပေတွာ လောကိယစိတ္တံ အရဟတော မဂ္ဂဖလသင်္ခါတံ ပါဋိပုဂ္ဂလိကစိတ္တံ ဇာနိတုံ န သက္ကောန္တိ အနဓိဂတတ္တာ, တထာ ပုထုဇ္ဇနာဒယောပိ သောတာပန္နာဒီနံ, သေက္ခာနံ ပန အတ္တနော အတ္တနော မဂ္ဂဖလပစ္စဝေက္ခဏေသု ပရသန္တာနဂတမဂ္ဂဖလာရမ္မဏာယ အဘိညာယ ပရိကမ္မကာလေ, အဘိညာစိတ္တေနေဝ မဂ္ဂဖလာနံ ပရိစ္ဆိန္ဒနကာလေ စ အတ္တနော အတ္တနော သမာနာနံ, ဟေဋ္ဌိမာနဉ္စ မဂ္ဂဖလဓမ္မေ အာရဗ္ဘ ကုသလဇဝနာနံ ပဝတ္တိ အတ္ထီတိ အရဟတ္တမဂ္ဂဖလဿေဝ ပဋိက္ခေပေါ ကတော. ကာမာဝစရမဟဂ္ဂတပညတ္တိနိဗ္ဗာနာနိ ပန သေက္ခပုထုဇ္ဇနာနံ သက္ကစ္စဒါနပစ္စဝေက္ခဏဓမ္မဿဝနသင်္ခါရသမ္မသနကသိဏပရိကမ္မာဒီသု တံတဒါရမ္မဏိကာဘိညာနံ ပရိကမ္မကာလေ, ဂေါတြဘုဝေါဒါနကာလေ, ဒိဗ္ဗစက္ခာဒီဟိ ရူပဝိဇာနနာဒိကာလေ စ ကုသလဇဝနာနံ ဂေါစရဘာဝံ ဂစ္ဆန္တိ. ५८. अर्हत् मार्ग आणि अर्हत् फल वगळता सर्व आलंबने असणारी चित्ते केवळ शैक्ष आणि पृथग्जनांच्या संतानामध्येच प्रवृत्त होतात. कारण शैक्ष सुद्धा, लौकिक चित्त वगळता, अर्हताचे मार्ग आणि फल रूप असे वैयक्तिक चित्त जाणण्यास असमर्थ असतात, कारण त्यांनी ते प्राप्त केलेले नसते; त्याचप्रमाणे पृथग्जन इत्यादी सुद्धा स्रोतापन्न इत्यादींचे मार्ग-फल चित्त जाणण्यास असमर्थ असतात. परंतु शैक्षांच्या बाबतीत, आपापल्या मार्ग आणि फलाचे प्रत्यवेक्षण करताना, दुसऱ्याच्या संतानातील मार्ग आणि फलाला आलंबन बनवणाऱ्या अभिज्ञेच्या परिकर्म काळात, आणि अभिज्ञा चित्तानेच मार्ग व फलांचे परिच्छेदन करताना, आपापल्या समान असणाऱ्यांच्या आणि खालच्या स्तरावरील व्यक्तींच्या मार्ग-फल धर्मांना उद्देशून कुशल जवनांची प्रवृत्ती असू शकते; म्हणूनच केवळ अर्हत् मार्ग आणि अर्हत् फलाचाच निषेध केला आहे. परंतु कामावचर, महग्गत, प्रज्ञप्ती आणि निर्वाण ही आलंबने शैक्ष आणि पृथग्जनांच्या आदराने दान देणे, प्रत्यवेक्षण करणे, धर्मश्रवण करणे, संस्कारांचे संमर्शन करणे, कसिण परिकर्म इत्यादींमध्ये; त्या त्या आलंबनांवर आधारित अभिज्ञांच्या परिकर्म काळात; गोत्रभू आणि वोदान चित्तांच्या वेळी; आणि दिव्यचक्षू इत्यादींद्वारे रूपाचे विशेष ज्ञान इत्यादी मिळवण्याच्या वेळी कुशल जवनांचे विषय बनतात. ၅၉. သဗ္ဗထာပိ သဗ္ဗာရမ္မဏာနီတိ ကာမာဝစရမဟဂ္ဂတသဗ္ဗလောကုတ္တရပညတ္တိဝသေန သဗ္ဗထာပိ သဗ္ဗာရမ္မဏာနိ, န ပန အကုသလာဒယော ဝိယ သပ္ပဒေသသဗ္ဗာရမ္မဏာနီတျတ္ထော. ကိရိယဇဝနာနဉှိ သဗ္ဗညုတညာဏာဒိဝသပ္ပဝတ္တိယံ, ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဿ စ တံတံပုရေစာရိကဝသပ္ပဝတ္တိယံ န စ ကိဉ္စိ အဂေါစရံ နာမ အတ္ထိ. ५९. "सर्वथा सर्व आलंबन असणारे" म्हणजे कामावचर, महग्गत, सर्व लोकोत्तर आणि प्रज्ञप्ति यांच्या भेदाने सर्व प्रकारे सर्व आलंबन असणारे आहेत; परंतु अकुशल इत्यादी चित्तांप्रमाणे ते एका भागासह सर्व आलंबन असणारे नाहीत, असा अर्थ आहे. कारण, क्रिया जवनांच्या सर्वज्ञताज्ञान इत्यादींच्या प्रभावाने प्रवृत्त होण्याच्या वेळी आणि वोट्ठपन चित्ताच्या त्या त्या ज्ञानाच्या पूर्वगामी असण्याच्या प्रभावाने प्रवृत्त होण्याच्या वेळी कोणतेही आलंबन अगोचर (अविषय) नसते. ၆၀. ပဌမတတိယာရုပ္ပာရမ္မဏတ္တာ အာရုပ္ပေသု ဒုတိယစတုတ္ထာနိ မဟဂ္ဂတာရမ္မဏာနိ. ६०. प्रथम आणि तृतीय आरूप्य चित्त हे आलंबन असल्यामुळे, आरूप्य चित्तांमध्ये दुसरे आणि चौथे आरूप्य चित्त हे महग्गत आलंबन असणारे आहेत. ၆၁. သေသာနိ…ပေ… ပညတ္တာရမ္မဏာနီတိ ပန္နရသ ရူပါဝစရာနိ, ပဌမတတိယာရုပ္ပာနိ စာတိ ဧကဝီသတိ ကသိဏာဒိပညတ္တီသု ပဝတ္တနတော ပညတ္တာရမ္မဏာနိ. ६१. "प्रज्ञप्ति आलंबन असणारे" म्हणजे पंधरा रूपावचर चित्ते आणि प्रथम व तृतीय आरूप्य चित्ते अशी ही एकवीस चित्ते कसिण इत्यादी प्रज्ञप्ति आलंबनांमध्ये प्रवृत्त होत असल्यामुळे प्रज्ञप्ति आलंबन असणारे आहेत. ၆၃. တေဝီသတိကာမာဝစရဝိပါကပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနဟသနဝသေန [Pg.135] ပဉ္စဝီသတိ စိတ္တာနိ ပရိတ္ထမှိ ကာမာဝစရာရမ္မဏေ ယေဝ ဘဝန္တိ. ကာမာဝစရဉှိ မဟဂ္ဂတာဒယော ဥပါဒါယ မန္ဒာနုဘာဝတာယ ပရိသမန္တတော အတ္တံ ခဏ္ဍိတံ ဝိယာတိ ပရိတ္တံ. ‘‘ဆ စိတ္တာနိ မဟဂ္ဂတေယေဝါ’’တျာဒိနာ သဗ္ဗတ္ထ သာဝဓာရဏယောဇနာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. ६३. तेवीस कामावचर विपाक, पंचद्वारावर्जन आणि हसितुप्पाद यांच्या भेदाने पंचवीस चित्ते परित्त म्हणजेच कामावचर आलंबनामध्येच होतात. कारण, कामावचर धर्म हे महग्गत इत्यादी धर्मांच्या तुलनेत मंद प्रभाव असणारे असल्यामुळे चहूबाजूंनी मर्यादित (कापलेल्या वस्तूंसारखे) असतात, म्हणून त्यांना 'परित्त' म्हणतात. "सहा चित्ते महग्गत आलंबनातच" इत्यादी प्रकारे सर्व वाक्यांमध्ये अवधारण (निश्चय) सहित योजना समजली पाहिजे. အာလမ္ဗဏသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. आलंबनसंग्रहाचे वर्णन समाप्त झाले. ဝတ္ထုသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ वत्थुसंग्रहाचे (वस्तू-संग्रहाचे) वर्णन. ၆၄. ဝတ္ထုဝိဘာဂတော, တဗ္ဗတ္ထုကစိတ္တပရိစ္ဆေဒဝသေန စ သင်္ဂဟော ဝတ္ထုသင်္ဂဟော. ဝသန္တိ ဧတေသု စိတ္တစေတသိကာ တန္နိဿယတ္တာတိ ဝတ္ထူနိ. ६४. वस्तूंच्या विभागावरून आणि त्या वस्तूंवर आश्रित असणाऱ्या चित्तांच्या परिच्छेदाच्या प्रभावाने जो संग्रह केला जातो, त्याला 'वत्थुसंग्रह' (वस्तू-संग्रह) म्हणतात. ज्यांच्यामध्ये चित्त आणि चेतसिक त्यांचा आश्रय घेऊन राहतात (प्रवृत्त होतात), त्यांना 'वस्तू' (वत्थु) म्हणतात. ၆၅. တာနိ ကာမလောကေ သဗ္ဗာနိပိ လဗ္ဘန္တိ ပရိပုဏ္ဏိန္ဒြိယဿ တတ္ထေဝ ဥပလဗ္ဘနတော. ပိ-သဒ္ဒေန ပန အန္ဓဗဓိရာဒိဝသေန ကေသဉ္စိ အသမ္ဘဝံ ဒီပေတိ. ६५. त्या सहाही वस्तू कामलोकात प्राप्त होतात, कारण परिपूर्ण इंद्रिये असणाऱ्या व्यक्तीला त्याच कामलोकात त्या प्राप्त होतात. परंतु 'पि' (सुद्धा) या शब्दाने जन्मांध, बहिरे इत्यादींच्या प्रभावाने काही व्यक्तींच्या ठिकाणी त्यांचा अभाव असणे दर्शविले आहे. ၆၆. ဃာနာဒိတ္တယံ နတ္ထိ ဗြဟ္မာနံ ကာမဝိရာဂဘာဝနာဝသေန ဂန္ဓရသဖောဋ္ဌဗ္ဗေသု ဝိရတ္တတာယ တဗ္ဗိသယပ္ပသာဒေသုပိ ဝိရာဂသဘာဝတော. ဗုဒ္ဓဒဿနဓမ္မဿဝနာဒိအတ္ထံ ပန စက္ခုသောတေသု အဝိရတ္တဘာဝတော စက္ခာဒိဒွယံ တတ္ထ ဥပလဗ္ဘတိ. ६६. ब्रह्मांच्या ठिकाणी कामविराग भावनेच्या प्रभावाने गंध, रस आणि स्प्रष्टव्य या विषयांमध्ये विरक्तता असल्यामुळे आणि त्या विषयांचे ग्रहण करणाऱ्या घ्राण, जिव्हा व काय या प्रसादांमध्ये (इंद्रियांमध्ये) सुद्धा विराग भाव स्पष्ट असल्यामुळे घ्राण इत्यादी तीन वस्तू नसतात. परंतु बुद्धदर्शन, धर्मश्रवण इत्यादींच्या हेतूने चक्षु आणि श्रोत प्रसादांमध्ये विराग नसल्यामुळे चक्षु आणि श्रोत या दोन वस्तू त्या ब्रह्मलोकात प्राप्त होतात. ၆၇. အရူပလောကေ သဗ္ဗာနိပိ ဆ ဝတ္ထူနိ န သံဝိဇ္ဇန္တိ အရူပီနံ ရူပဝိရာဂဘာဝနာဗလေန တတ္ထ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ ရူပပ္ပဝတ္တိယာ အဘာဝတော. ६७. अरूपलोकात सर्वच्या सर्व सहाही वस्तू नसतात, कारण अरूप ब्रह्मांच्या रूपविराग भावनेच्या बलामुळे त्या अरूपलोकात सर्व प्रकारे रूपाची प्रवृत्ती मुळीच नसते. ၆၈. ပဉ္စဝိညာဏာနေဝ နိဿတ္တနိဇ္ဇီဝဋ္ဌေန ဓာတုယောတိ ပဉ္စဝိညာဏဓာတုယော. ६८. पंचविज्ञानच सत्त्वरहित आणि जीवरहित असण्याच्या अर्थाने धातू आहेत, म्हणून त्यांना 'पंचविज्ञानधातू' म्हणतात. ၆၉. မနနမတ္တာ ဓာတု မနောဓာတု. ६९. केवळ जाणणे एवढीच असणारी धातू म्हणजे 'मनोधातू' होय. ၇၀. မနောယေဝ [Pg.136] ဝိသိဋ္ဌဝိဇာနနကိစ္စယောဂတော ဝိညာဏံ နိဿတ္တနိဇ္ဇီဝဋ္ဌေန ဓာတု စာတိ မနောဝိညာဏဓာတု. မနသော ဝိညာဏဓာတူတိ ဝါ မနောဝိညာဏဓာတု. သာ ဟိ မနတောယေဝ အနန္တရပစ္စယတော သမ္ဘူယမနသောယေဝ အနန္တရပစ္စယဘူတာတိ မနသော သမ္ဗန္ဓိနီ ဟောတိ. သန္တီရဏတ္တယဿ, အဋ္ဌမဟာဝိပါကာနံ, ပဋိဃဒွယဿ, ပဌမမဂ္ဂဿ, ဟသိတုပ္ပာဒဿ, ပန္နရသရူပါဝစရာနဉ္စ ဝသေန ပဝတ္တာ ယထာဝုတ္တမနောဓာတုပဉ္စဝိညာဏဓာတူဟိ အဝသေသာ မနောဝိညာဏဓာတု သင်္ခါတာ စ တိံသ ဓမ္မာ န ကေဝလံ မနောဓာတုယေဝ, တထာ ဟဒယံ နိဿာယေဝ ပဝတ္တန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ७०. मनच विशेष जाणण्याच्या कार्याच्या योगाने 'विज्ञान' आणि सत्त्वरहित व जीवरहित असण्याच्या अर्थाने 'धातू' देखील आहे, म्हणून ती 'मनोविज्ञानधातू' होय. किंवा मनाची विज्ञानधातू म्हणून ती 'मनोविज्ञानधातू' होय. कारण ती मनोविज्ञानधातू अनंतर प्रत्ययाने मनापासूनच (समान आश्रय असणाऱ्या पूर्व चित्तापासूनच) उत्पन्न होऊन मनाचाच (समान आश्रय असणाऱ्या उत्तर चित्ताचाच) अनंतर प्रत्ययरूप बनते, म्हणून ती मनाशी संबंधित असते. तीन संतीरण, आठ महाविपाक, दोन प्रतिघ (द्वेषमूलक चित्ते), प्रथम मार्ग (सोतापत्ति मार्ग), हसितुप्पाद आणि पंधरा रूपावचर चित्ते यांच्या रूपाने प्रवृत्त होणारे, आधी सांगितलेल्या मनोधातू आणि पंचविज्ञानधातू यांच्या व्यतिरिक्त उर्वरित मनोविज्ञानधातू म्हणून ओळखले जाणारे तीस धर्म (चित्ते) देखील केवळ मनोधातूच नव्हे, तर त्याचप्रमाणे हृदयवस्तूला आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात, असा संबंध आहे. သန္တီရဏမဟာဝိပါကာနိ ဟိ ဧကာဒသ ဒွါရာဘာဝတော, ကိစ္စာဘာဝတော စ အာရုပ္ပေ န ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ပဋိဃဿ အနီဝရဏာဝတ္ထဿ အဘာဝတော တံသဟဂတံ စိတ္တဒွယံ ရူပလောကေပိ နတ္ထိ, ပဂေဝ အာရုပ္ပေ. ပဌမမဂ္ဂေါပိ ပရတောဃောသပစ္စယာဘာဝေ သာဝကာနံ အနုပ္ပဇ္ဇနတော, ဗုဒ္ဓပစ္စေကဗုဒ္ဓါနဉ္စ မနုဿလောကတော အညတ္ထ အနိဗ္ဗတ္တနတော, ဟသနစိတ္တဉ္စ ကာယာဘာဝတော, ရူပါဝစရာနိ အရူပီနံ ရူပဝိရာဂဘာဝနာဝသေန တဒါရမ္မဏေသု ဈာနေသုပိ ဝိရတ္တဘာဝတော အရူပဘဝေ န ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ သဗ္ဗာနိပိ ဧတာနိ တေတ္တိံသ စိတ္တာနိ ဟဒယံ နိဿာယေဝ ပဝတ္တန္တိ. कारण, अकरा संतीरण आणि महाविपाक चित्ते द्वाराचा अभाव असल्यामुळे आणि कार्याचा अभाव असल्यामुळे अरूपलोकात उत्पन्न होत नाहीत. नीवरणरहित अवस्थेत नसलेल्या प्रतिघाचा (द्वेषाचा) अभाव असल्यामुळे त्या प्रतिघासह उत्पन्न होणारे दोन चित्त (द्वेषमूलक चित्ते) रूपलोकात सुद्धा नसतात, मग अरूपलोकात तर मुळीच नसणार. प्रथम मार्ग (सोतापत्ति मार्ग) देखील परतोघोष प्रत्ययाचा (दुसऱ्याकडून धर्म ऐकण्याचा) अभाव असल्यामुळे श्रावकांच्या संतानात उत्पन्न होत नसल्यामुळे, आणि बुद्ध व प्रत्येकबुद्धांचा मनुष्यलोकाव्यतिरिक्त इतर लोकात जन्म होत नसल्यामुळे (अरूपलोकात उत्पन्न होत नाही). आणि हसितुप्पाद चित्त देखील शरीराचा अभाव असल्यामुळे, आणि रूपावचर चित्ते अरूप ब्रह्मांच्या रूपविराग भावनेच्या प्रभावाने त्या रूपाचे आलंबन असणाऱ्या ध्यानांमध्ये देखील विरक्त असल्यामुळे अरूपलोकात उत्पन्न होत नाहीत. म्हणून ही सर्व तेहतीस चित्ते हृदयवस्तूला आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात. ၇၁. ပဉ္စရူပါဝစရကုသလတော အဝသေသာနိ ဒွါဒသ လောကိယကုသလာနိ, ပဋိဃဒွယတော အဝသေသာနိ ဒသ အကုသလာနိ, ပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနဟသနရူပါဝစရကိရိယေဟိ အဝသေသာနိ တေရသ ကိရိယစိတ္တာနိ, ပဌမမဂ္ဂတော အဝသေသာနိ သတ္တ အနုတ္တရာနိ စာတိ ဣမေသံ ဝသေန ဒွေစတ္တာလီသဝိဓာ မနောဝိညာဏဓာတုသင်္ခါတာ ဓမ္မာ ပဉ္စဝေါကာရဘဝဝသေန ဟဒယံ နိဿာယ ဝါ, စတုဝေါကာရဘဝဝသေန အနိဿာယဝါ ပဝတ္တန္တိ. ७१. पाच रूपावचर कुशल चित्तांशिवाय उर्वरित बारा लौकिक कुशल चित्ते, दोन प्रतिघ चित्तांशिवाय उर्वरित दहा अकुशल चित्ते, पंचद्वारावर्जन, हसितुप्पाद आणि रूपावचर क्रिया चित्तांशिवाय उर्वरित तेरा क्रिया चित्ते, आणि प्रथम मार्गाशिवाय (सोतापत्ति मार्गाशिवाय) उर्वरित सात लोकोत्तर चित्ते अशा यांच्या प्रभावाने बेचाळीस प्रकारच्या मनोविज्ञानधातू म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या चित्त-धर्मांची प्रवृत्ती पंचवोकार भवाच्या प्रभावाने हृदयवस्तूचा आश्रय घेऊन किंवा चतुवोकार भवाच्या प्रभावाने आश्रय न घेता होते. ၇၃. ကာမေ [Pg.137] ဘဝေ ဆဝတ္ထုံ နိဿိတာ သတ္တ ဝိညာဏဓာတုယော, ရူပေ ဘဝေ တိဝတ္ထုံ နိဿိတာ ဃာနဝိညာဏာဒိတ္တယဝဇ္ဇိတာ စတုဗ္ဗိဓာ ဝိညာဏဓာတုယော, အာရုပ္ပေ ဘဝေ အနိဿိတာ ဧကာ မနောဝိညာဏဓာတု မတာတိ ယောဇနာ. ७३. कामभवात (कामलोकात) सहा वस्तूंवर आश्रित असणाऱ्या सात विज्ञानधातू आहेत; रूपभवात (रूपलोकात) तीन वस्तूंवर आश्रित असणाऱ्या, घ्राणविज्ञान इत्यादी तीन धातू वगळून चार प्रकारच्या विज्ञानधातू आहेत; आणि अरूपभवात (अरूपलोकात) आश्रयरहित असणारी एकच मनोविज्ञानधातू मानली जाते, अशी योजना आहे. ၇၄. ကာမာဝစရဝိပါကပဉ္စဒွါရာဝဇ္ဇနပဋိဃဒွယဟသနဝသေန သတ္တဝီသတိ ကာမာဝစရာနိ, ပန္နရသ ရူပါဝစရာနိ, ပဌမမဂ္ဂေါတိ တေစတ္တာလီသ နိဿာယေဝ ဇာယရေ, တတောယေဝ အဝသေသာ အာရုပ္ပဝိပါကဝဇ္ဇိတာ ဒွေစတ္တာလီသ နိဿာယ စ အနိဿာယ စ ဇာယရေ, ပါကာရုပ္ပာ စတ္တာရော အနိဿိတာယေဝါတိ သမ္ဗန္ဓော. ७४. कामावचर विपाक, पंचद्वारावर्जन, दोन प्रतिघ आणि हसितुप्पाद यांच्या भेदाने सत्तावीस कामावचर चित्ते, पंधरा रूपावचर चित्ते आणि प्रथम मार्ग (सोतापत्ति मार्ग) अशी ही त्रेचाळीस चित्ते आश्रय घेऊनच उत्पन्न होतात. त्या त्रेचाळीस चित्तांशिवाय उर्वरित, अरूप विपाक वगळून बेचाळीस चित्ते (पंचवोकार भवात) आश्रय घेऊन आणि (चतुवोकार भवात) आश्रय न घेता उत्पन्न होतात. चार अरूप विपाक चित्ते आश्रयरहित होऊनच उत्पन्न होतात, असा संबंध आहे. ဝတ္ထုသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वत्थुसंग्रहाचे (वस्तू-संग्रहाचे) वर्णन समाप्त झाले. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाच्या 'अभिधम्मत्थसंग्रह' वर्णनातील... ပကိဏ္ဏကပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. प्रकीर्णक परिच्छेदाचे वर्णन समाप्त झाले. ၄. ဝီထိပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ४. वीथि परिच्छेदाचे वर्णन. ၁. ဣစ္စေဝံ ယထာဝုတ္တနယေန စိတ္တုပ္ပာဒါနံ စတုန္နံ ခန္ဓာနံ ဥတ္တရံ ဝေဒနာသင်္ဂဟာဒိဝိဘာဂတော ဥတ္တမံ ပဘေဒသင်္ဂဟံ ကတွာ ပုန ကာမာဝစရာဒီနံ တိဏ္ဏံ ဘူမီနံ, ဒွိဟေတုကာဒိပုဂ္ဂလာနဉ္စ ဘေဒေန လက္ခိတံ ‘‘ဣဒံ ဧတ္တကေဟိ ပရံ, ဣမဿ အနန္တရံ ဧတ္တကာနိ စိတ္တာနီ’’တိ ဧဝံ ပုဗ္ဗာပရစိတ္တေဟိ နိယာမိတံ ပဋိသန္ဓိပဝတ္တီသု စိတ္တုပ္ပာဒါနံ ပဝတ္တိသင်္ဂဟံ နာမ တန္နာမကံ သင်္ဂဟံ ယထာသမ္ဘဝတော သမာသေန ပဝက္ခာမီတိ ယောဇနာ. १. अशा प्रकारे, आधी सांगितलेल्या पद्धतीने चित्त आणि चेतसिक रूप असणाऱ्या चार नामस्कंधांचा श्रेष्ठ असा वेदनासंग्रह इत्यादींच्या विभागाने उत्तम असा प्रकीर्णक संग्रह करून, पुन्हा कामावचर इत्यादी तीन भूमींच्या आणि द्विहेतुक इत्यादी पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) भेदाने लक्षित केलेले "हे चित्त एवढ्या चित्तांनंतर होते, याच्या लगेच नंतर एवढी चित्ते होतात" अशा प्रकारे पूर्व आणि उत्तर चित्तांद्वारे नियमन केलेले, प्रतिसंधी आणि प्रवृत्ती काळात चित्त-चेतसिकांच्या प्रवृत्तीचा संग्रह असणारा 'प्रवृत्तीसंग्रह' नावाचा संग्रह यथासंभव संक्षेपाने मी सांगेन, अशी योजना आहे. ၂. ဝတ္ထုဒွါရာရမ္မဏသင်္ဂဟာ ဟေဋ္ဌာ ကထိတာပိ ပရိပုဏ္ဏံ ကတွာ ပဝတ္တိသင်္ဂဟံ ဒဿေတုံ ပုန နိက္ခိတ္တာ. २. वत्थुसंग्रह, द्वारसंग्रह आणि आलंबनसंग्रह हे मागील परिच्छेदात सांगितले गेले असले तरी, प्रवृत्तीसंग्रह परिपूर्ण करून दर्शविण्यासाठी ते पुन्हा येथे मांडले आहेत. ၃. ဝိသယာနံ ဒွါရေသု, ဝိသယေသု စ စိတ္တာနံ ပဝတ္တိ ဝိသယပ္ပဝတ္တိ. ३. विषयांची द्वारांमध्ये आणि विषयांमध्ये चित्तांची जी प्रवृत्ती होते, तिला 'विषयप्रवृत्ती' म्हणतात. ၄. တတ္ထာတိ တေသု ဆသု ဆက္ကေသု. ४. "तेथे" म्हणजे त्या सहा षटकांमध्ये. ဝီထိဆက္ကဝဏ္ဏနာ वीथि षटकाचे वर्णन. ၆. ‘‘စက္ခုဒွါရေ [Pg.138] ပဝတ္တာ ဝီထိ စိတ္တပရမ္ပရာ စက္ခုဒွါရဝီထီ’’တျာဒိနာ ဒွါရဝသေန, ‘‘စက္ခုဝိညာဏသမ္ဗန္ဓိနီ ဝီထိ တေန သဟ ဧကာရမ္မဏဧကဒွါရိကတာယ သဟစရဏဘာဝတော စက္ခုဝိညာဏဝီထီ’’တျာဒိနာ ဝိညာဏဝသေန ဝါ ဝီထီနံ နာမ ယောဇနာ ကာတဗ္ဗာတိ ဒဿေတုံ ‘‘စက္ခုဒွါရဝီထီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ६. चक्षुद्वारावर प्रवृत्त झालेली चित्तपरंपरा म्हणजे 'चक्खुद्वारवीथी' इत्यादी प्रकारे द्वाराच्या आधारे, किंवा 'त्या चक्षुविज्ञानाशी संबंधित असलेली वीथी, त्याच्याशी एकाच आलंबन व एकाच द्वाराच्या सहचरभावामुळे (एकत्र प्रवृत्त होण्यामुळे) 'चक्खुविज्ञानवीथी' होय' इत्यादी प्रकारे विज्ञानाच्या आधारे वीथींचे नामकरण केले पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी 'चक्खुद्वारवीथी' इत्यादी म्हटले आहे. ဝီထိဆက္ကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. सहा वीथींचे वर्णन (वीथीषट्क वर्णन) समाप्त झाले. ဝီထိဘေဒဝဏ္ဏနာ वीथीभेद वर्णन ၇. ‘‘အတိမဟန္တ’’န္တျာဒီသု ဧကစိတ္တက္ခဏာတီတံ ဟုတွာ အာပါထာဂတံ သောဠသစိတ္တက္ခဏာယုကံ အတိမဟန္တံ နာမ. ဒွိတိစိတ္တက္ခဏာတီတံ ဟုတွာ ပန္နရသစုဒ္ဒသစိတ္တက္ခဏာယုကံ မဟန္တံ နာမ. စတုစိတ္တက္ခဏတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ နဝစိတ္တက္ခဏာတီတံ ဟုတွာ တေရသစိတ္တက္ခဏတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ အဋ္ဌစိတ္တက္ခဏာယုတံ ပရိတ္တံ နာမ. ဒသစိတ္တက္ခဏတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ပန္နရသစိတ္တက္ခဏာတီတံ ဟုတွာ သတ္တစိတ္တက္ခဏတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ဒွိစိတ္တက္ခဏာယုကံ အတိပရိတ္တံ နာမ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝက္ခတိ ‘‘ဧကစိတ္တက္ခဏာတီတာနီ’’တျာဒိ. ဝိဘူတံ ပါကဋံ. အဝိဘူတံ အပါကဋံ. ७. 'अतिमहंत' इत्यादींमध्ये—एक चित्तक्षण व्यतीत होऊन गोचर झालेले आणि सोळा चित्तक्षणांचे आयुष्य असलेले आलंबन 'अतिमहंत' (अतिशय मोठे) नावाचे आहे. दोन किंवा तीन चित्तक्षण व्यतीत होऊन गोचर झालेले आणि पंधरा किंवा चौदा चित्तक्षणांचे आयुष्य असलेले आलंबन 'महंत' (मोठे) नावाचे आहे. चार चित्तक्षणांपासून नऊ चित्तक्षणांपर्यंत व्यतीत होऊन गोचर झालेले आणि तेरा चित्तक्षणांपासून आठ चित्तक्षणांपर्यंत आयुष्य असलेले आलंबन 'परित्त' (लहान) नावाचे आहे. दहा चित्तक्षणांपासून पंधरा चित्तक्षणांपर्यंत व्यतीत होऊन गोचर झालेले आणि सात चित्तक्षणांपासून दोन चित्तक्षणांपर्यंत आयुष्य असलेले आलंबन 'अतिपरित्त' (अतिशय लहान) नावाचे आहे. असे असल्यामुळेच आचार्य पुढे 'एकचित्तक्षणव्यतीत' इत्यादी सांगतील. 'विभूत' म्हणजे स्पष्ट (प्रकट) आणि 'अविभूत' म्हणजे अस्पष्ट (अप्रकट) होय. ဝီထိဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वीथीभेद वर्णन समाप्त झाले. ပဉ္စဒွါရဝီထိဝဏ္ဏနာ पंचद्वारवीथी वर्णन ၈. ကထန္တိ ကေန ပကာရေန အတိမဟန္တာဒိဝသေန ဝိသယဝဝတ္ထာနန္တိ ပုစ္ဆိတွာ စိတ္တက္ခဏဝသေန တံ ပကာသေတုံ ‘‘ဥပ္ပာဒဌိတီ’’တျာဒိ အာရဒ္ဓံ. ဥပ္ပဇ္ဇနံ ဥပ္ပာဒေါ, အတ္တပဋိလာဘော. ဘဉ္ဇနံ ဘင်္ဂေါ, သရူပဝိနာသော. ဥဘိန္နံ ဝေမဇ္ဈေ ဘင်္ဂါဘိမုခပ္ပဝတ္တိ ဌိတိ နာမ. ကေစိ ပန စိတ္တဿ ဌိတိက္ခဏံ ပဋိသေဓေန္တိ. အယဉှိ နေသံ အဓိပ္ပာယော – စိတ္တယမကေ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၂၀ ပကိဏ္ဏကကထာဝဏ္ဏနာ; ယမ. ၂.စိတ္တယမက.၈၁, ၁၀၂) ‘‘ဥပ္ပန္နံ ဥပ္ပဇ္ဇမာန’’န္တိ ဧဝမာဒိပဒါနံ ဝိဘင်္ဂေ ‘‘ဘင်္ဂက္ခဏေ ဥပ္ပန္နံ[Pg.139], နော စ ဥပ္ပဇ္ဇမာနံ, ဥပ္ပာဒက္ခဏေ ဥပ္ပန္နဉ္စေဝ ဥပ္ပဇ္ဇမာနဉ္စာ’’တျာဒိနာ (ယမ. ၂.စိတ္တယမက.၈၁, ၁၀၂) ဘင်္ဂုပ္ပာဒါဝ ကထိတာ, န ဌိတိက္ခဏော. ယဒိ စ စိတ္တဿ ဌိတိက္ခဏောပိ အတ္ထိ, ‘‘ဌိတိက္ခဏေ ဘင်္ဂက္ခဏေ စာ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာ. အထ မတံ ‘‘ဥပ္ပာဒေါ ပညာယတိ, ဝယော ပညာယတိ, ဌိတဿ အညထတ္တံ ပညာယတီတိ (အ. နိ. ၃.၄၇) သုတ္တန္တပါဌတော ဌိတိက္ခဏော အတ္ထီ’’တိ, တတ္ထပိ ဧကသ္မိံ ဓမ္မေ အညထတ္တဿ အနုပ္ပဇ္ဇနတော, ပညာဏဝစနတော စ ပဗန္ဓဌိတိယေဝ အဓိပ္ပေတာ, န စ ခဏဌိတိ, န စ အဘိဓမ္မေ လဗ္ဘမာနဿ အဝစနေ ကာရဏံ အတ္ထိ, တသ္မာ ယထာဓမ္မသာသနေ အဝစနမ္ပိ အဘာဝမေဝ ဒီပေတီတိ. တတ္ထ ဝုစ္စတေ ယထေဝ ဟိ ဧကဓမ္မာဓာရဘာဝေပိ ဥပ္ပာဒဘင်္ဂါနံ အညော ဥပ္ပာဒက္ခဏော, အညော ဘင်္ဂက္ခဏောတိ ဥပ္ပာဒါဝတ္ထာယ ဘိန္နာ ဘင်္ဂါဝတ္ထာ ဣစ္ဆိတာ. ဣတရထာ ဟိ ‘‘အညောယေဝ ဓမ္မော ဥပ္ပဇ္ဇတိ, အညော နိရုဇ္ဈတီ’’တိ အာပဇ္ဇေယျ, ဧဝမေဝ ဥပ္ပာဒဘင်္ဂါဝတ္ထာဟိ ဘိန္နာ ဘင်္ဂါဘိမုခါဝတ္ထာပိ ဣစ္ဆိတဗ္ဗာ, သာ ဌိတိ နာမ. ပါဠိယံ ပန ဝေနေယျဇ္ဈာသယာနုရောဓတော နယဒဿနဝသေန သာ န ဝုတ္တာ. အဘိဓမ္မဒေသနာပိ ဟိ ကဒါစိ ဝေနေယျဇ္ဈာသယာနုရောဓေန ပဝတ္တတိ, ယထာ ရူပဿ ဥပ္ပာဒေါ ဥပစယော သန္တတီတိ ဒွိဓာ ဘိန္ဒိတွာ ဒေသိတော, သုတ္တေ စ ‘‘တီဏိမာနိ, ဘိက္ခဝေ, သင်္ခတဿ သင်္ခတလက္ခဏာနိ. ကတမာနိ တီဏိ? ဥပ္ပာဒေါ ပညာယတိ, ဝယော ပညာယတိ, ဌိတဿ အညထတ္တံ ပညာယတီ’’တိ ဧဝံ သင်္ခတဓမ္မဿေဝ လက္ခဏဒဿနတ္ထံ ဥပ္ပာဒါဒီနံ ဝုတ္တတ္တာ န သက္ကာ ပဗန္ဓဿ ပညတ္တိသဘာဝဿ အသင်္ခတဿ ဌိတိ တတ္ထ ဝုတ္တာတိ ဝိညာတုံ. ဥပသဂ္ဂဿ စ ဓာတွတ္ထေယေဝ ပဝတ္တနတော ‘‘ပညာယတီ’’တိ ဧတဿ ဝိညာယတီတိ အတ္ထော. တသ္မာ န ဧတ္တာဝတာ စိတ္တဿ ဌိတိက္ခဏော ပဋိဗာဟိတုံ ယုတ္တောတိ သုဝုတ္တမေတံ ‘‘ဥပ္ပာဒဌိတိဘင်္ဂဝသေနာ’’တိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝုတ္တံ အဋ္ဌကထာယမ္ပိ ‘‘ဧကေကဿ [Pg.140] ဥပ္ပာဒဌိတိဘင်္ဂဝသေန တယော တယော ခဏာ’’တိ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၆ ပကိဏ္ဏကကထာ). ८. आलंबनांचे निर्धारण 'कसे' म्हणजे कोणत्या प्रकारे अतिमहंत इत्यादींच्या आधारे होते? असा प्रश्न विचारून चित्तक्षणाच्या आधारे ते निर्धारण स्पष्ट करण्यासाठी 'उत्पाद, स्थिती...' इत्यादी ग्रंथारंभ केला आहे. उत्पन्न होणे म्हणजे 'उत्पाद' (आत्मप्रतिलाभ/स्वभावप्राप्ती) होय. नष्ट होणे म्हणजे 'भंग' (स्वरूपाचा विनाश) होय. या दोन्हीच्या मध्यभागी भंगाकडे उन्मुख असणारी प्रवृत्ती म्हणजे 'स्थिती' होय. परंतु काही आचार्य चित्ताच्या स्थितीक्षणाचा निषेध करतात. कारण त्यांचा असा अभिप्राय आहे की— चित्तयमक ग्रंथात 'उत्पन्न, उत्पद्यमान' इत्यादी पदांच्या विश्लेषणात 'भंगक्षणी उत्पन्न आहे, पण उत्पद्यमान नाही; उत्पादक्षणी उत्पन्नही आहे आणि उत्पद्यमानही आहे' इत्यादी प्रकारे केवळ भंग आणि उत्पाद हे दोनच सांगितले आहेत, स्थितीक्षण सांगितलेला नाही. आणि जर चित्ताचा स्थितीक्षणही असता, तर 'स्थितीक्षणी आणि भंगक्षणी' असे म्हणावे लागले असते. जर असे मानले की, 'उत्पाद प्रज्ञायमान (ज्ञात) होतो, व्यय प्रज्ञायमान होतो, आणि स्थिती असलेल्याची अन्यथावस्था प्रज्ञायमान होते' या सुत्तंत पाठावरून स्थितीक्षण अस्तित्वात आहे, तर तिथेही एकाच धर्मामध्ये अन्यथावस्थेची उत्पत्ती न होऊ शकल्यामुळे आणि 'प्रज्ञायमान' या शब्दाच्या अर्थामुळे संततीची (प्रवाहाची) स्थितीच अभिप्रेत आहे, क्षणस्थिती नाही. आणि अभिधम्मात प्राप्त होणाऱ्या तत्त्वाचे कथन न करण्याचे काही कारण नाही; म्हणून यथार्थ धर्मशासनात (अभिधम्मात) कथन न करणे देखील त्याचा अभावच दर्शवते, असा त्यांचा अभिप्राय आहे. त्यावर आम्ही उत्तर देतो— ज्याप्रमाणे एकाच धर्माचा आधार असूनही उत्पाद आणि भंग यांचा उत्पादक्षण वेगळा आहे आणि भंगक्षण वेगळा आहे, म्हणून उत्पाद अवस्थेपेक्षा भिन्न असलेली भंग अवस्था मान्य केली जाते; अन्यथा 'एक धर्म उत्पन्न होतो आणि दुसराच नष्ट होतो' असा दोष प्राप्त होईल; त्याचप्रमाणे उत्पाद आणि भंग या दोन्ही अवस्थांपेक्षा भिन्न असलेली, भंगाकडे उन्मुख असणारी अवस्था देखील मान्य केली पाहिजे, तीच 'स्थिती' होय. परंतु पाळी (यमक) ग्रंथात विनेय जनांच्या आशयाला अनुसरून नय दर्शवण्याच्या हेतूने ती सांगितलेली नाही. कारण अभिधम्म देशना देखील कधीकधी विनेय जनांच्या आशयानुसार प्रवृत्त होते, जसे की रूपाचा उत्पाद 'उपचय' आणि 'संतती' अशा दोन प्रकारे विभागून उपदेशिला आहे. आणि सुत्तात देखील 'भिक्खूहो, संस्कृत (संस्कारित) धर्माची ही तीन संस्कृत लक्षणे आहेत. कोणती तीन? उत्पाद प्रज्ञायमान होतो, व्यय प्रज्ञायमान होतो, आणि स्थिती असलेल्याची अन्यथावस्था प्रज्ञायमान होते' अशा प्रकारे केवळ संस्कृत धर्माचेच लक्षण दर्शवण्यासाठी उत्पाद इत्यादींचे कथन केल्यामुळे, तिथे प्रज्ञप्ती स्वभावाच्या आणि असंस्कृत अशा संततीची स्थिती सांगितली आहे असे समजणे शक्य नाही. आणि 'प्र' या उपसर्गाचा धातूच्या अर्थातच प्रवृत्त होत असल्यामुळे 'प्रज्ञायते' (प्रज्ञायमान होते) या पदाचा 'ज्ञात होते' (जाणले जाते) असा अर्थ आहे. म्हणून एवढ्यावरून चित्ताच्या स्थितीक्षणाचा निषेध करणे योग्य नाही; म्हणून 'उत्पाद, स्थिती आणि भंग यांच्या आधारे' असे हे (अभिधम्मत्थसंगहातील वचन) योग्य प्रकारे म्हटले आहे. आणि असे मानूनच अट्ठकथेत देखील म्हटले आहे की— 'प्रत्येक चित्ताचे उत्पाद, स्थिती आणि भंग या आधारे तीन-तीन क्षण असतात.' ၉. အရူပံ လဟုပရိဏာမံ, ရူပံ ဂရုပရိဏာမံ ဂါဟကဂါဟေတဗ္ဗဘာဝဿ တံတံခဏဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇနတောတိ အာဟ ‘‘တာနီ’’တျာဒိ. တာနီတိ တာဒိသာနိ. သတ္တရသန္နံ စိတ္တာနံ ခဏာနိ ဝိယ ခဏာနိ သတ္တရသစိတ္တက္ခဏာနိ, တာနိ စိတ္တက္ခဏာနိ သတ္တရသာတိ ဝါ သမ္ဗန္ဓော. ဝိသုံ ဝိသုံ ပန ဧကပညာသ စိတ္တက္ခဏာနိ ဟောန္တိ. ရူပဓမ္မာနန္တိ ဝိညတ္တိလက္ခဏရူပဝဇ္ဇာနံ ရူပဓမ္မာနံ. ဝိညတ္တိဒွယဉှိ ဧကစိတ္တက္ခဏာယုကံ. တထာ ဟိ တံ စိတ္တာနုပရိဝတ္တိဓမ္မေသု ဝုတ္တံ. လက္ခဏရူပေသု စ ဇာတိ စေဝ အနိစ္စတာ စ စိတ္တဿ ဥပ္ပာဒဘင်္ဂက္ခဏေဟိ သမာနာယုကာ, ဇရတာ ပန ဧကူနပညာသစိတ္တက္ခဏာယုကာ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝဒန္တိ – ९. अरूप (नामधर्म) हा शीघ्र परिवर्तनशील आहे आणि रूपधर्म हा मंद परिवर्तनशील आहे; कारण आलंबन ग्रहण करणाऱ्याचा (चित्ताचा) आणि ग्रहण केल्या जाणाऱ्याचा (रूपाचा) स्वभाव त्या त्या क्षणाच्या आधारे उत्पन्न होतो; म्हणून 'तानि' इत्यादी म्हटले आहे. 'तानि' म्हणजे तशाच प्रकारचे (चित्तक्षणांसारखे). सतरा चित्तांच्या क्षणांसारखे क्षण असणारे 'सतरा चित्तक्षण' होय, किंवा 'ते चित्तक्षण सतरा आहेत' असा संबंध आहे. परंतु (उत्पाद, स्थिती आणि भंग या तिन्ही उपक्षणांना स्वतंत्रपणे मोजल्यास) स्वतंत्रपणे एकावन्न (५१) उपक्षण होतात. 'रूपधर्मांचे' म्हणजे विज्ञप्तिद्वय आणि लक्षणरूपे वगळता इतर रूपधर्मांचे (आयुष्य होय). कारण विज्ञप्तिद्वय हे केवळ एक चित्तक्षण आयुष्य असलेले असते. म्हणूनच ते चित्तानुपरिवर्ती धर्मांमध्ये सांगितले आहे. आणि लक्षणरूपांमध्ये 'जाती' (उत्पत्ती) आणि 'अनित्यता' (नाश) हे चित्ताच्या उत्पादक्षण आणि भंगक्षणाशी समान आयुष्य असलेले असतात; परंतु 'जरा' (जीर्णता) ही एकोणपन्नास (४९) उपक्षणांचे आयुष्य असलेली असते. ‘‘တံ သတ္တရသစိတ္တာယု, ဝိနာ ဝိညတ္တိလက္ခဏ’’န္တိ (သ. သ. ၆၀); 'विज्ञप्ति आणि लक्षणरूपे वगळता, त्या रूपाचे आयुष्य सतरा चित्तक्षणांचे असते.' ကေစိ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၂၀) ပန ‘‘ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒဋ္ဌကထာယံ ‘ဧတ္တာဝတာ ဧကာဒသ စိတ္တက္ခဏာ အတီတာ ဟောန္တိ, အထာဝသေသပဉ္စစိတ္တက္ခဏာယုကေ’တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၂၃; ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၂၇) ဝစနတော သောဠသစိတ္တက္ခဏာနိ ရူပဓမ္မာနမာယူ. ဥပ္ပဇ္ဇမာနမေဝ ဟိ ရူပံ ဘဝင်္ဂစလနဿ ပစ္စယော ဟောတီ’’တိ ဝဒန္တိ, တယိဒမသာရံ ‘‘ပဋိသန္ဓိစိတ္တေန သဟုပ္ပန္နံ ကမ္မဇရူပံ တတော ပဋ္ဌာယ သတ္တရသမေန သဒ္ဓိံ နိရုဇ္ဈတိ, ပဋိသန္ဓိစိတ္တဿ ဌိတိက္ခဏေ ဥပ္ပန္နံ အဋ္ဌာရသမဿ ဥပ္ပာဒက္ခဏေ နိရုဇ္ဈတီ’’တျာဒိနာ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၆ ပကိဏ္ဏကကထာ) အဋ္ဌကထာယမေဝ သတ္တရသစိတ္တက္ခဏဿ အာဂတတ္တာ. ယတ္ထ ပန သောဠသစိတ္တက္ခဏာနေဝ ပညာယန္တိ, တတ္ထ စိတ္တပ္ပဝတ္တိယာ ပစ္စယဘာဝယောဂျက္ခဏဝသေန နယော နီတော. ဟေဋ္ဌိမကောဋိယာ ဟိ ဧကစိတ္တက္ခဏမ္ပိ [Pg.141] အတိက္ကန္တဿေဝ ရူပဿ အာပါထာဂမနသာမတ္ထိယန္တိ အလမတိဝိတ္ထာရေန. परंतु काही आचार्य, प्रतीत्यसमुत्पाद अट्ठकथेतील 'एवढ्या वेळाने अकरा चित्तक्षण व्यतीत होतात, आणि आता उर्वरित पाच चित्तक्षणांचे आयुष्य असताना...' या वचनावरून, 'सोळा चित्तक्षण हेच रूपधर्मांचे आयुष्य आहे; कारण उत्पन्न होत असलेलेच रूप भवांगचलनाचे कारण बनते' असे म्हणतात. परंतु त्यांचे हे म्हणणे निस्सार आहे; कारण 'प्रतिसंधी चित्तासोबत उत्पन्न झालेले कर्मज रूप तिथून पुढे सतराव्या चित्तासोबत एकत्र निरुद्ध होते, आणि प्रतिसंधी चित्ताच्या स्थितीक्षणी उत्पन्न झालेले रूप अठराव्या चित्ताच्या उत्पादक्षणी निरुद्ध होते' इत्यादी प्रकारे अट्ठकथेतच सतरा चित्तक्षणांचे आयुष्य स्पष्टपणे आलेले आहे. परंतु ज्या ठिकाणी केवळ सोळा चित्तक्षणच दिसून येतात, तिथे चित्तप्रवृत्तीच्या कारणभाव होण्यास योग्य असलेल्या क्षणाच्या आधारे तो नय मांडला गेला आहे. कारण किमान मर्यादेनुसार, एक चित्तक्षण व्यतीत झालेल्या रूपाचेच गोचर होण्याचे सामर्थ्य असते; म्हणून अतिविस्ताराची आवश्यकता नाही. ၁၀. ဧကစိတ္တဿ ခဏံ ဝိယ ခဏံ ဧကစိတ္တက္ခဏံ, တံ အတီတံ ဧတေသံ, ဧတာနိ ဝါ တံ အတီတာနီတိ ဧကစိတ္တက္ခဏာတီတာနိ. အာပါထမာဂစ္ဆန္တီတိ ရူပသဒ္ဒါရမ္မဏာနိ သကသကဋ္ဌာနေ ဌတွာဝ ဂေါစရဘာဝံ ဂစ္ဆန္တီတိ အာဘောဂါနုရူပံ အနေကကလာပဂတာနိ အာပါထံ အာဂစ္ဆန္တိ, သေသာနိ ပန ဃာနာဒိနိဿယေသု အလ္လီနာနေဝ ဝိညာဏုပ္ပတ္တိကာရဏာနီတိ ဧကေကကလာပဂတာနိပိ. ဧကေကကလာပဂတာပိ ဟိ ပသာဒါ ဝိညာဏဿ အာဓာရဘာဝံ ဂစ္ဆန္တိ, တေ ပန ဘဝင်္ဂစလနဿ အနန္တရပစ္စယဘူတေန ဘဝင်္ဂေန သဒ္ဓိံ ဥပ္ပန္နာ. ‘‘အာဝဇ္ဇနေန သဒ္ဓိံ ဥပ္ပန္နာ’’တိ အပရေ. १०. एका चित्ताच्या क्षणासारखा क्षण म्हणजे 'एकचित्तक्षण' होय. तो (क्षण) ज्यांच्या बाबतीत अतीत (व्यतीत) झाला आहे, किंवा जे त्या एका चित्तक्षणाला ओलांडून गेले आहेत, त्यांना 'एकचित्तक्षणातीत' म्हणतात. 'आपाथमागच्छन्ति' (कक्षेमध्ये येतात) म्हणजे रूप आणि शब्द हे आलंबन आपापल्या ठिकाणी राहूनच गोचरभावाला (विषयभावाला) प्राप्त होतात, म्हणून मनस्कराच्या (आभोग) अनुरूप अनेक कलापांमध्ये (रूपसमूहांमध्ये) राहिलेले ते आपाथाला (कक्षेला) प्राप्त होतात. परंतु उर्वरित (गंध, रस, स्प्रष्टव्य) हे घ्राण इत्यादींच्या आश्रयभूत महाभूतांना चिकटूनच विज्ञानाच्या उत्पत्तीचे कारण बनतात, म्हणून ते एका एका कलापात राहिलेले असूनही (आपाथाला प्राप्त होतात). कारण एका एका कलापात राहिलेले प्रसाद रूप देखील विज्ञानाचा आधार बनतात. आणि ते (प्रसाद रूप) भवांगचलनाचा अनंतरप्रत्यय असलेल्या भवांगासोबतच उत्पन्न होतात. 'ते आवर्तनासोबत (आवर्जन) उत्पन्न होतात' असे इतर आचार्य म्हणतात. ဒွိက္ခတ္တုံ ဘဝင်္ဂေ စလိတေတိ ဝိသဒိသဝိညာဏုပ္ပတ္တိဟေတုဘာဝသင်္ခါတဘဝင်္ဂစလနဝသေန ပုရိမဂ္ဂဟိတာရမ္မဏသ္မိံယေဝ ဒွိက္ခတ္တုံ ဘဝင်္ဂေ ပဝတ္တေ. ပဉ္စသု ဟိ ပသာဒေသု ယောဂျဒေသာဝတ္ထာနဝသေန အာရမ္မဏေ ဃဋ္ဋိတေ ပသာဒဃဋ္ဋနာနုဘာဝေန ဘဝင်္ဂသန္တတိ ဝေါစ္ဆိဇ္ဇမာနာ သဟသာ အနောစ္ဆိဇ္ဇိတွာ ယထာ ဝေဂေန ဓာဝန္တော ဌာတုကာမောပိ ပုရိသော ဧကဒွိပဒဝါရေ အတိက္ကမိတွာဝ တိဋ္ဌတိ, ဧဝံ ဒွိက္ခတ္တုံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာဝ ဩစ္ဆိဇ္ဇတိ. တတ္ထ ပဌမစိတ္တံ ဘဝင်္ဂသန္တတိံ စာလေန္တံ ဝိယ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ ဘဝင်္ဂစလနံ, ဒုတိယံ တဿ ဩစ္ဆိဇ္ဇနာကာရေန ဥပ္ပဇ္ဇနတော ဘဝင်္ဂုပစ္ဆေဒေါတိ ဝေါဟရန္တိ. ဣဓ ပန အဝိသေသေန ဝုတ္တံ ‘‘ဒွိက္ခတ္တုံ ဘဝင်္ဂေ စလိတေ’’တိ. 'दोनदा भवांग कंपित झाले असता' (द्विक्खत्तुं भवंंगे चलिते) म्हणजे विसदृश विज्ञानाच्या उत्पत्तीचे कारण असणाऱ्या भवांगचलनाच्या द्वारे, पूर्वी ग्रहण केलेल्या आलंबनावरच दोनदा भवांग प्रवृत्त झाले असता. कारण पाच प्रसादांपैकी योग्य ठिकाणी असलेल्या प्रसादावर आलंबनाचा आघात झाला असता, प्रसादावरील आघाताच्या प्रभावाने भवांगसंतती खंडित होत असताना, ती अचानक न थांबता, ज्याप्रमाणे वेगाने धावणारा माणूस थांबू इच्छित असला तरी एक-दोन पावले पुढे जाऊनच थांबतो, त्याचप्रमाणे भवांग दोनदा उत्पन्न होऊनच खंडित होते. त्यापैकी पहिले चित्त भवांगसंततीला कंपित केल्यासारखे उत्पन्न होते, म्हणून त्याला 'भवांगचलन' म्हणतात; आणि दुसरे चित्त त्या भवांगसंततीच्या खंडित होण्याच्या रूपाने उत्पन्न होत असल्यामुळे त्याला 'भवांगोपच्छेद' असे म्हणतात. परंतु येथे विशेष भेद न करता सामान्य रूपाने 'दोनदा भवांग कंपित झाले असता' असे म्हटले आहे. နနု စ ရူပါဒိနာ ပသာဒေ ဃဋ္ဋိတေ တန္နိဿိတဿေဝ စလနံ ယုတ္တံ, ကထံ ပန ဟဒယဝတ္ထုနိဿိတဿ ဘဝင်္ဂဿာတိ? သန္တတိဝသေန ဧကာဗဒ္ဓတ္တာ. ယထာ ဟိ ဘေရိယာ ဧကသ္မိံ တလေ ဌိတသက္ခရာယ မက္ခိကာယ နိသိန္နာယ အပရသ္မိံ တလေ ဒဏ္ဍာဒိနာ ပဟဋေ အနုက္ကမေန ဘေရိစမ္မဝရတ္တာဒီနံ စလနေန သက္ခရာယ [Pg.142] စလိတာယ မက္ခိကာယ ဥပ္ပတိတွာ ဂမနံ ဟောတိ, ဧဝမေဝ ရူပါဒိနာ ပသာဒေ ဃဋ္ဋိတေ တန္နိဿယေသု မဟာဘူတေသု စလိတေသု အနုက္ကမေန တံသမ္ဗန္ဓာနံ သေသရူပါနမ္ပိ စလနေန ဟဒယဝတ္ထုမှိ စလိတေ တန္နိဿိတဿ ဘဝင်္ဂဿ စလနာကာရေန ပဝတ္တိ ဟောတိ. ဝုတ္တဉ္စ – शंका: रूप इत्यादींनी प्रसादावर आघात केला असता, त्या प्रसादावर आश्रित असलेल्याचेच कंपन होणे योग्य आहे; मग हृदयवस्तूला आश्रित असलेल्या भवांगाचे कंपन कसे काय योग्य ठरेल? उत्तर: संततीच्या रूपाने ते एकमेकांशी जोडलेले (एकाबद्ध) असल्यामुळे. ज्याप्रमाणे ढोलाच्या एका बाजूवर ठेवलेल्या खड्यावर माशी बसलेली असताना, दुसऱ्या बाजूवर काठीने आघात केला असता, अनुक्रमाने ढोलाचे चामडे, दोऱ्या इत्यादींच्या कंपनामुळे तो खडा हलतो आणि माशी उडून जाते; त्याचप्रमाणे रूप इत्यादींनी प्रसादावर आघात केला असता, त्याच्या आश्रयभूत महाभूतांमध्ये कंपन होते, आणि अनुक्रमाने त्यांच्याशी संबंधित असलेल्या इतर रूपांमध्येही कंपन होऊन हृदयवस्तू कंपित होते, तेव्हा त्यावर आश्रित असलेल्या भवांगाची प्रवृत्ती कंपनाच्या रूपाने होते. आणि म्हटले देखील आहे - ‘‘ဃဋ္ဋိတေ အညဝတ္ထုမှိ, အညနိဿိတကမ္ပနံ; ဧကာဗဒ္ဓေန ဟောတီတိ, သက္ခရောပမယာ ဝဒေ’’တိ. (သ. သ. ၁၇၆); 'एका वस्तूवर आघात झाला असता, दुसऱ्या वस्तूवर आश्रित असलेल्याचे कंपन होते, कारण ते एकमेकांशी जोडलेले असतात, हे खड्याच्या उपमेने सांगावे.' ဘဝင်္ဂသောတန္တိ ဘဝင်္ဂပ္ပဝါဟံ. အာဝဇ္ဇန္တန္တိ ‘‘ကိံ နာမေတ’’န္တိ ဝဒန္တံ ဝိယ အာဘောဂံ ကုရုမာနံ. ပဿန္တန္တိ ပစ္စက္ခတော ပေက္ခန္တံ. နနု စ ‘‘စက္ခုနာ ရူပံ ဒိသွာ’’တိ (ဒီ. နိ. ၁.၂၁၃; အ. နိ. ၃.၆၂; ဝိဘ. ၅၁၇) ဝစနတော စက္ခုန္ဒြိယမေဝ ဒဿနကိစ္စံ သာဒေတိ, န ဝိညာဏန္တိ? နယိဒမေဝံ, ရူပဿ အန္ဓဘာဝေန ရူပဒဿနေ အသမတ္ထဘာဝတော. ယဒိ စ တံ ရူပံ ပဿတိ, တထာ သတိ အညဝိညာဏသမင်္ဂိနောပိ ရူပဒဿနပ္ပသင်္ဂေါ သိယာ. ယဒိ ဧဝံ ဝိညာဏဿ တံ ကိစ္စံ သာဓေတိ, ဝိညာဏဿ အပ္ပဋိဗန္ဓတ္တာ အန္တရိတရူပဿပိ ဒဿနံ သိယာ. ဟောတု အန္တရိတဿပိ ဒဿနံ, ယဿ ဖလိကာဒိတိရောဟိတဿ အာလောကပဋိဗန္ဓော နတ္ထိ, ယဿ ပန ကုဋ္ဋာဒိအန္တရိတဿ အလောကပဋိဗန္ဓော အတ္ထိ. တတ္ထ ပစ္စယာဘာဝတော ဝိညာဏံ နုပ္ပဇ္ဇတီတိ န တဿ စက္ခုဝိညာဏေန ဂဟဏံ ဟောတိ. ‘‘စက္ခုနာ’’တိ ပနေတ္ထ တေန ဒွါရေန ကရဏဘူတေနာတိ အဓိပ္ပာယော. အထ ဝါ နိဿိတကိရိယာ နိဿယပ္ပဋိဗဒ္ဓါ ဝုတ္တာ ယထာ ‘‘မဉ္စာ ဥက္ကုဋ္ဌိံ ကရောန္တီ’’တိ. 'भवांगसोत' म्हणजे भवांगाचा प्रवाह. 'आवर्जन करणारे' (आवज्जन्तं) म्हणजे 'हे काय आहे?' असे विचारल्यासारखा मनस्कार (आभोग) करणारे. 'पाहणारे' (पस्सन्तं) म्हणजे प्रत्यक्ष पाहणारे. शंका: 'डोळ्याने रूप पाहून' (चक्खुना रूपं दिस्वा) या वचनावरून चक्षुरिंद्रियच दर्शनाचे (पाहण्याचे) कार्य पूर्ण करते, चक्षुविज्ञान नाही, असे होत नाही का? उत्तर: असे नाही; कारण रूप (प्रसाद रूप) हे अचेतन (अंध) असल्यामुळे रूप पाहण्यास असमर्थ असते. आणि जर ते (चक्षुरिंद्रिय) रूप पाहत असेल, तर इतर विज्ञानाने युक्त असलेल्या व्यक्तीलाही रूप दिसण्याचा प्रसंग येईल. शंका: जर विज्ञान हे कार्य पूर्ण करत असेल, तर विज्ञानाला कोणताही अडथळा नसल्यामुळे भिंतीआड असलेल्या रूपाचेही दर्शन झाले पाहिजे? उत्तर: स्फटिक (काच) इत्यादींनी झाकलेल्या ज्या रूपाचा प्रकाश अडवला जात नाही, अशा आडून असलेल्या रूपाचे दर्शन होऊ द्या; परंतु भिंत इत्यादींनी झाकलेल्या ज्या रूपाचा प्रकाश अडवला जातो, तिथे प्रत्ययाचा (कारणाचा, म्हणजे प्रकाशाचा) अभाव असल्यामुळे विज्ञान उत्पन्न होत नाही, म्हणून चक्षुविज्ञानाद्वारे त्याचे ग्रहण होत नाही. आणि 'डोळ्याने' (चक्खुना) यातील अभिप्राय असा आहे की, त्या चक्षुद्वाराने जे की कारणभूत आहे. किंवा आश्रित असलेली क्रिया ही आश्रयाशी संबंधित करून सांगितली जाते, ज्याप्रमाणे 'मंचक ओरडत आहेत' (म्हणजे मंचकावर बसलेले लोक ओरडत आहेत) असे म्हटले जाते. သမ္ပဋိစ္ဆန္တန္တိ တမေဝ ရူပံ ပဋိဂ္ဂဏှန္တံ ဝိယ. သန္တီရယမာနန္တိ တမေဝ ရူပံ ဝီမံသန္တံ ဝိယ. ဝဝတ္ထပေန္တန္တိ တမေဝ ရူပံ သုဋ္ဌု သလ္လက္ခေန္တံ ဝိယ. ယောနိသောမနသိကာရာဒိဝသေန လဒ္ဓေါ ပစ္စယော ဧတေနာတိ လဒ္ဓပစ္စယံ. ယံ ကိဉ္စိ ဇဝနန္တိ သမ္ဗန္ဓော. မုစ္ဆာမရဏာသန္နကာလေသု စ ဆပ္ပဉ္စပိ ဇဝနာနိ ပဝတ္တန္တီတိ အာဟ [Pg.143] ‘‘ယေဘုယျေနာ’’တိ. ဇဝနာနုဗန္ဓာနီတိ ပဋိသောတဂါမိနာဝံ နဒီသောတော ဝိယ ကိဉ္စိ ကာလံ ဇဝနံ အနုဂတာနိ. တဿ ဇဝနဿ အာရမ္မဏံ အာရမ္မဏမေတေသန္တိ တဒါရမ္မဏာနိ ‘‘ဗြဟ္မဿရော’’တျာဒီသု ဝိယ မဇ္ဈေပဒလောပဝသေန, တဒါရမ္မဏာနိ စ တာနိ ပါကာနိ စာတိ တဒါရမ္မဏပါကာနိ. ယထာရဟန္တိ အာရမ္မဏဇဝနသတ္တာနုရူပံ. တထာ ပဝတ္တိံ ပန သယမေဝ ပကာသယိဿတိ, ဘဝင်္ဂပါတောတိ ဝီထိစိတ္တဝသေန အပ္ပဝတ္တိတွာ စိတ္တဿ ဘဝင်္ဂပါတော ဝိယ, ဘဝင်္ဂဝသေန ဥပ္ပတ္တီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဧတ္ထ စ ဝီထိစိတ္တပ္ပဝတ္တိယာ သုခဂ္ဂဟဏတ္ထံ အမ္ဗောပမာဒိကံ အာဟရန္တိ, တတြိဒံ အမ္ဗောပမာမတ္တံ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာ) – ဧကော ကိရ ပုရိသော ဖလိတမ္ဗရုက္ခမူလေ သသီသံ ပါရုပိတွာ နိဒ္ဒါယန္တော အာသန္နေ ပတိတဿ ဧကဿ အမ္ဗဖလဿ သဒ္ဒေန ပဗုဇ္ဈိတွာ သီသတော ဝတ္ထံ အပနေတွာ စက္ခုံ ဥမ္မီလေတွာ ဒိသွာ စ တံ ဂဟေတွာ မဒ္ဒိတွာ ဥပသိင်္ဃိတွာ ပက္ကဘာဝံ ဉတွာ ပရိဘုဉ္ဇိတွာ မုခဂတံ သဟ သေမှေန အဇ္ဈောဟရိတွာ ပုန တတ္ထေဝ နိဒ္ဒါယတိ. တတ္ထ ပုရိသဿ နိဒ္ဒါယနကာလော ဝိယ ဘဝင်္ဂကာလော, ဖလဿ ပတိတကာလော ဝိယ အာရမ္မဏဿ ပသာဒဃဋ္ဋနကာလော, တဿ သဒ္ဒေန ပဗုဒ္ဓကာလော ဝိယ အာဝဇ္ဇနကာလော, ဥမ္မီလေတွာ ဩလောကိတကာလော ဝိယ စက္ခုဝိညာဏပ္ပဝတ္တိကာလော, ဂဟိတကာလော ဝိယ သမ္ပဋိစ္ဆနကာလော, မဒ္ဒနကာလော ဝိယ သန္တီရဏကာလော, ဥပသိင်္ဃနကာလော ဝိယ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနကာလော, ပရိဘောဂကာလော ဝိယ ဇဝနကာလော, မုခဂတံ သဟ သေမှေန အဇ္ဈောဟရဏကာလော ဝိယ တဒါရမ္မဏကာလော, ပုန နိဒ္ဒါယနကာလော ဝိယ ပုန ဘဝင်္ဂကာလော. 'संप्रतीच्छन' (संपटिच्छन्तं) म्हणजे त्याच रूपाचा स्वीकार केल्यासारखे. 'संतीरण' (संतीरयमानं) म्हणजे त्याच रूपाची परीक्षा केल्यासारखे. 'व्यवस्थापन' (ववत्थापेन्तं) म्हणजे त्याच रूपाचे चांगल्या प्रकारे निर्धारण केल्यासारखे. योनिसोमनसिकार इत्यादींच्या द्वारे ज्याने प्रत्यय (कारण) प्राप्त केला आहे, ते 'लब्धप्रत्यय' (लद्धपच्चयं) होय. 'काहीही जवन' (यं किंचि जवनं) हा संबंध आहे. मूर्च्छा आणि मरणासन्न काळात सहा किंवा पाच जवने देखील प्रवृत्त होतात, म्हणून 'प्रायः' (येभुय्येन) असे म्हटले आहे. 'जवनानुबंधी' (जवनानुबन्धनि) म्हणजे प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणाऱ्या नौकेच्या मागे नदीचा प्रवाह ज्याप्रमाणे काही काळ जातो, त्याप्रमाणे काही काळ जवनाचा पाठलाग करणारे. त्या जवनाचे आलंबन हेच ज्यांचे आलंबन आहे, ते 'तदालंबन' (तदारम्मणानि); 'ब्रह्मस्सर' इत्यादी शब्दांप्रमाणे येथे मध्यमपदलोप समासाने हा शब्द बनला आहे. ते तदालंबन देखील आहेत आणि विपाक देखील आहेत, म्हणून त्यांना 'तदालंबनविपाक' (तदारम्मणपाकानि) म्हणतात. 'यथायोग्य' (यथारहं) म्हणजे आलंबन, जवन आणि प्राणी यांच्या अनुरूप. त्याची प्रवृत्ती स्वतः ग्रंथकारच पुढे स्पष्ट करतील. 'भवांगपात' म्हणजे वीथिचित्ताच्या रूपाने प्रवृत्त न होता, चित्ताचे भवांगात पडणे; म्हणजेच भवांगाच्या रूपाने उत्पन्न होणे, असा अर्थ आहे. आणि येथे वीथिचित्ताची प्रवृत्ती सहज समजण्यासाठी आंब्याची उपमा इत्यादी दिली जाते. त्यापैकी आंब्याची उपमा खालीलप्रमाणे आहे - असे म्हणतात की, एक माणूस फळांनी बहरलेल्या आंब्याच्या झाडाखाली डोक्यासह पांघरूण घेऊन झोपला होता. जवळच पडलेल्या एका आंब्याच्या फळाच्या आवाजाने तो जागा झाला. त्याने डोक्यावरून कापड बाजूला केले, डोळे उघडले आणि पाहिले. त्याने तो आंबा हातात घेतला, दाबून पाहिला, त्याचा वास घेतला आणि तो पिकलेला आहे हे जाणून तो खाल्ला आणि तोंडात आलेला घास लाळेसह गिळून पुन्हा तिथेच झोपी गेला. त्या उपमेमध्ये, माणसाचा झोपण्याचा काळ हा 'भवांगकाळा'सारखा आहे; फळ पडण्याचा काळ हा आलंबनाचा प्रसादावर आघात होण्याच्या काळासारखा आहे; त्याच्या आवाजाने जागा होण्याचा काळ हा 'आवर्जनकाळा'सारखा आहे; डोळे उघडून पाहण्याचा काळ हा 'चक्षुविज्ञान प्रवृत्तीच्या काळा'सारखा आहे; फळ हातात घेण्याचा काळ हा 'संप्रतीच्छनकाळा'सारखा आहे; दाबून पाहण्याचा काळ हा 'संतीरणकाळा'सारखा आहे; वास घेण्याचा काळ हा 'व्यवस्थापनकाळा'सारखा आहे; खाण्याचा काळ हा 'जवनकाळा'सारखा आहे; तोंडात आलेला घास लाळेसह गिळण्याचा काळ हा 'तदालंबनकाळा'सारखा आहे; आणि पुन्हा झोपण्याचा काळ हा पुन्हा 'भवांगकाळा'सारखा आहे. ဣမာယ စ ဥပမာယ ကိံ ဒီပိတံ ဟောတိ? အာရမ္မဏဿ ပသာဒဃဋ္ဋနမေဝ ကိစ္စံ, အာဝဇ္ဇနဿ ဝိသယာဘုဇနမေဝ, စက္ခုဝိညာဏဿ ဒဿနမတ္တမေဝ, သမ္ပဋိစ္ဆနာဒီနဉ္စ ပဋိဂ္ဂဏှနာဒိမတ္တမေဝ[Pg.144], ဇဝနဿေဝ ပန အာရမ္မဏရသာနုဘဝနံ, တဒါရမ္မဏဿ စ တေန အနုဘူတဿေဝ အနုဘဝနန္တိ ဧဝံ ကိစ္စဝသေန ဓမ္မာနံ အညမညံ အသံကိဏ္ဏတာ ဒီပိတာ ဟောတိ. ဧဝံ ပဝတ္တမာနံ ပန စိတ္တံ ‘‘အာဝဇ္ဇနံ နာမ ဟုတွာ ဘဝင်္ဂါနန္တရံ ဟောတိ, တွံ ဒဿနာဒီသု အညတရံ ဟုတွာ အာဝဇ္ဇနာနန္တရ’’န္တျာဒိနာ နိယုဉ္ဇကေ ကာရကေ အသတိပိ ဥတုဗီဇနိယာမာဒိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာ) ဝိယ စိတ္တနိယာမဝသေနေဝ ပဝတ္တတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. आणि या उपमेद्वारे काय स्पष्ट केले जाते? आलंबनाचे (विषयाचे) केवळ प्रसादाला (इंद्रिय-संवेदनशीलतेला) स्पर्श करणे हेच कार्य आहे, आवज्जनाचे केवळ विषयाभिमुख होणे (विषयाकडे वळणे) हेच कार्य आहे, चक्षुविज्ञानाचे केवळ पाहणे एवढेच कार्य आहे, आणि संपटिच्छन (स्वीकार) इत्यादींचे केवळ स्वीकार करणे इत्यादीच कार्य आहे; परंतु केवळ जवनाचेच आलंबनाच्या रसाचा आस्वाद घेणे हे कार्य आहे, आणि तदालंबनाचे त्याने (जवनाने) अनुभवलेल्या विषयाचाच पुन्हा अनुभव घेणे हे कार्य आहे. अशा प्रकारे कार्याच्या अनुषंगाने चित्तधर्मांची परस्परांमध्ये असंकीर्णता (असंमिश्रता) स्पष्ट केली जाते. परंतु अशा प्रकारे प्रवृत्त होणारे चित्त 'तू आवज्जन होऊन भवांगाच्या लगेच नंतर उत्पन्न हो, तू दर्शनादींपैकी (पाहणे इत्यादींपैकी) एक होऊन आवज्जनाच्या लगेच नंतर उत्पन्न हो' इत्यादी प्रकारे प्रेरणा देणारा किंवा नियंत्रण करणारा कोणताही कर्ता नसतानाही, ऋतुनियम, बीजनियम इत्यादींप्रमाणे केवळ चित्तनियमाच्या प्रभावानेच प्रवृत्त होते, असे जाणावे। ၁၁. ဧတ္တာဝတာ သတ္တရသ စိတ္တက္ခဏာနိ ပရိပူရေန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ११. या मर्यादेपर्यंत सतरा चित्तक्षण पूर्ण होतात, असा संबंध आहे। ၁၂. အပ္ပဟောန္တာတီတကန္တိ အပ္ပဟောန္တံ ဟုတွာ အတီတံ. နတ္ထိ တဒါရမ္မဏုပ္ပာဒေါတိ စုဒ္ဒသစိတ္တက္ခဏာယုကေ တာဝ အာရမ္မဏဿ နိရုဒ္ဓတ္တာဝ တဒါရမ္မဏံ နုပ္ပဇ္ဇတိ. န ဟိ ဧကဝီထိယံ ကေသုစိ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏေသု ကာနိစိ အတီတာရမ္မဏာနိ ဟောန္တိ. ပန္နရသစိတ္တက္ခဏာယုကေသုပိ ဇဝနုပ္ပတ္တိတော ပရံ ဧကမေဝ စိတ္တက္ခဏံ အဝသိဋ္ဌန္တိ ဒွိက္ခတ္တုံ တဒါရမ္မဏုပ္ပတ္တိယာ အပ္ပဟောနကဘာဝတော နတ္ထိ ဒုတိယတဒါရမ္မဏဿ ဥပ္ပတ္တီတိ ပဌမမ္ပိ နုပ္ပဇ္ဇတိ. ဒွိက္ခတ္တုမေဝ ဟိ တဒါရမ္မဏုပ္ပတ္တိ ပါဠိယံ နိယမိတာ စိတ္တပ္ပဝတ္တိဂဏနာယံ သဗ္ဗဝါရေသု ‘‘တဒါရမ္မဏာနိ ဒွေ’’တိ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၂၇) ဒွိန္နမေဝ စိတ္တဝါရာနံ အာဂတတ္တာ. ယံ ပန ပရမတ္ထဝိနိစ္ဆယေ ဝုတ္တံ – १२. 'अप्पहोन्त अतीत' (अप्पहोन्त अतीतं) म्हणजे अपुरे पडून (तदालंबन उत्पन्न होण्यास असमर्थ ठरून) अतीत झालेले. 'तदालंबनाची उत्पत्ती होत नाही' (नत्थि तदारम्मणुप्पादो) याचा अर्थ असा की, चौदा चित्तक्षणांचे आयुष्य उरलेल्या आलंबनाच्या बाबतीत, आलंबन निरुद्ध (नष्ट) झाल्यामुळेच तदालंबन उत्पन्न होत नाही. कारण एकाच वीथीमध्ये काही चित्ते वर्तमान आलंबन ग्रहण करणारी आणि काही चित्ते अतीत आलंबन ग्रहण करणारी अशी असू शकत नाहीत. पंधरा चित्तक्षणांचे आयुष्य उरलेल्या आलंबनाच्या बाबतीतही, जवनाच्या उत्पत्तीनंतर केवळ एकच चित्तक्षण शिल्लक राहतो; त्यामुळे दोन वेळा तदालंबन उत्पन्न होण्यास तो काळ अपुरा असल्यामुळे दुसऱ्या तदालंबनाची उत्पत्ती होत नाही, म्हणून पहिले तदालंबन देखील उत्पन्न होत नाही. कारण पाळीमध्ये (अभिधम्म ग्रंथात) तदालंबनाची उत्पत्ती दोन वेळाच होईल असा नियम निश्चित केला आहे, कारण चित्तप्रवृत्तीच्या गणनेमध्ये सर्व वारांमध्ये 'दोन तदालंबने' (तदारम्मणानि द्वे) अशा दोन चित्तवारांचाच उल्लेख आलेला आहे. परंतु 'परमत्थविनिच्छय' ग्रंथात जे म्हटले आहे की – ‘‘သကိံ ဒွေ ဝါ တဒါလမ္ဗံ, သကိမာဝဇ္ဇနာဒယော’’တိ (ပရမ. ဝိ. ၁၁၆), တံ မဇ္ဈိမဘာဏကမတာနုသာရေန ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ယသ္မာ ပန မဇ္ဈိမဘာဏကာနံ ဝါဒေါ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တပါဠိယာ အသံသန္ဒနတော သမ္မောဟဝိနောဒနီယံ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၂၇) ပဋိက္ခိတ္တောဝ, တသ္မာ အာစရိယေနပိ အတ္တနာ အနဓိပ္ပေတတ္တာယေဝ ဣဓ စေဝ နာမရူပပရိစ္ဆေဒေ စ သကိံ တဒါရမ္မဏုပ္ပတ္တိ န ဝုတ္တာ. ‘तदालंबन एक किंवा दोन वेळा होते, आणि आवज्जनादी चित्ते एक वेळा होतात’ (सकिं द्वे वा तदालम्बं, सकिमावज्जनादयो), ते मज्झिमभाणक (मज्झिमनिकाय पाठ करणाऱ्या) थेरांच्या मतानुसार म्हटले गेले आहे, असे जाणावे. परंतु ज्याअर्थी मज्झिमभाणकांचे मत वर उल्लेखिलेल्या पाळीशी सुसंगत नसल्यामुळे ‘सम्मोहविनोदनी’ अट्ठकथेमध्ये नाकारलेच गेले आहे, म्हणून आचार्यांनी देखील स्वतःला ते मत संमत नसल्यामुळेच या ग्रंथात आणि ‘नामरूपपरिच्छेद’ ग्रंथात देखील तदालंबनाची एक वेळ उत्पत्ती होते असे म्हटले नाही। ၁၃. ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနုပ္ပာဒတော [Pg.145] ပရံ ဆစိတ္တက္ခဏာဝသိဋ္ဌာယုကမ္ပိ အာရမ္မဏံ အပ္ပာယုကဘာဝေန ပရိဒုဗ္ဗလတ္တာ ဇဝနုပ္ပတ္တိယာ ပစ္စယော န ဟောတိ. ဇဝနဉှိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနံ နိယမေန သတ္တစိတ္တက္ခဏာယုကေယေဝ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ အဓိပ္ပာယေနာဟ ‘‘ဇဝနမ္ပိ အနုပ္ပဇ္ဇိတွာ’’တိ. ဟေတုမှိ စာယံ တွာပစ္စယော, ဇဝနဿပိ အနုပ္ပတ္တိယာတိ အတ္ထော. ဣတရထာ ဟိ အပရကာလကိရိယာယ သမာနကတ္တုကတာ န လဗ္ဘတီတိ. ဒွတ္တိက္ခတ္တုန္တိ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝါ တိက္ခတ္တုံ ဝါ. ကေစိ ပန ‘‘တိက္ခတ္တု’န္တိ ဣဒံ ဝစနသိလိဋ္ဌတာမတ္တပ္ပယောဇန’’န္တိ ဝဒန္တိ, တံ ပန တေသံ အဘိနိဝေသမတ္တံ. န ဟိ ‘‘ဒွိက္ခတ္တုံ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမေဝ ပရိဝတ္တတီ’’တိ ဝုတ္တေပိ ဝစနဿ အသိလိဋ္ဌဘာဝေါ အတ္ထိ, န စ တိက္ခတ္တုံ ပဝတ္တိယာ ဗာဓကံ ကိဉ္စိ ဝစနံ အဋ္ဌကထာဒီသု အတ္ထိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ တတ္ထ တတ္ထ သီဟဠသံဝဏ္ဏနာကာရာပိ ‘‘ဒွိက္ခတ္တုံ ဝါ တိက္ခတ္တုံ ဝါ’’ဣစ္စေဝ ဝဏ္ဏေန္တိ. ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမေဝ ပရိဝတ္တတီတိ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမေဝ ပုနပ္ပုနံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. တံ ပန အပ္ပတွာ အန္တရာ စက္ခုဝိညာဏာဒီသု ဌတွာ စိတ္တပ္ပဝတ္တိယာ နိဝတ္တနံ နတ္ထိ. १३. वोट्ठब्बन (व्यवस्थापन) उत्पन्न झाल्यानंतर केवळ सहा चित्तक्षणांचे आयुष्य शिल्लक राहिलेले आलंबन देखील अल्पायुषी असल्यामुळे अत्यंत दुर्बळ असल्याने जवनाच्या उत्पत्तीसाठी प्रत्यय (कारण) बनू शकत नाही. कारण उत्पन्न होणारे जवन नियमाने सात चित्तक्षणांचे आयुष्य असलेल्या आलंबनाच्या बाबतीतच उत्पन्न होते, या अभिप्रायाने 'जवन देखील उत्पन्न न होता' (जवनम्पि अनुप्पज्जित्वा) असे म्हटले आहे. आणि येथे 'त्वा' प्रत्यय हेतूच्या (कारणाच्या) अर्थात आहे, म्हणजेच 'जवनाची उत्पत्ती न झाल्यामुळे' असा याचा अर्थ आहे. कारण तसे नसले तर, नंतरच्या काळातील क्रियेशी समानकर्तृकता प्राप्त होत नाही. 'द्वत्तिक्खत्तुं' म्हणजे दोन वेळा किंवा तीन वेळा. परंतु काही आचार्य म्हणतात की, 'तीन वेळा' (तिक्खत्तुं) हा शब्द केवळ वाक्यरचना सुटसुटीत करण्यासाठी वापरला आहे; परंतु ते केवळ त्यांचे अभिनिवेशमात्र (हट्टाग्रहाचे मत) आहे. कारण 'दोन वेळा वोट्ठब्बनच फिरते' असे म्हटले तरी वाक्यरचनेत कोणताही असुबकपणा येत नाही, आणि अट्ठकथा इत्यादींमध्ये तीन वेळा प्रवृत्ती होण्यास विरोध करणारे कोणतेही वचन नाही. आणि म्हणूनच त्या त्या ठिकाणी सिंहली भाष्यकार देखील 'दोन वेळा किंवा तीन वेळा' असेच वर्णन करतात. 'वोट्ठब्बनच फिरते' म्हणजे वोट्ठब्बनच पुन्हा पुन्हा उत्पन्न होते. परंतु त्या (वोट्ठब्बन) अवस्थेपर्यंत न पोहोचता, मध्येच चक्षुविज्ञानादींवर थांबून चित्तप्रवृत्ती मागे फिरणे शक्य नाही। အာနန္ဒာစရိယော ပနေတ္ထ (ဓ. သ. မူလဋီ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာဝဏ္ဏနာ) ‘‘အာဝဇ္ဇနာ ကုသလာကုသလာနံ ခန္ဓာနံ အနန္တရပစ္စယေန ပစ္စယော’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၄၁၇) အာဝဇ္ဇနာယ ကုသလာကုသလာနံ အနန္တရပစ္စယဘာဝဿ ဝုတ္တတ္တာ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနာဝဇ္ဇနာနဉ္စ အတ္ထန္တရာဘာဝတော သတိ ဥပ္ပတ္တိယံ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနံ ကာမာဝစရကုသလာကုသလကိရိယဇဝနာနံ ဧကန္တတော အနန္တရပစ္စယဘာဝေနေဝ ပဝတ္တေယျ, နော အညထာတိ မုစ္ဆာကာလာဒီသု မန္ဒီဘူတဝေဂတာယ ဇဝနပါရိပူရိယာ ပရိတ္တာရမ္မဏံ နိယမိတဗ္ဗံ, န ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဿ ဒွတ္တိက္ခတ္တုံ ပဝတ္တိယာတိ ဒီပေတိ. ကိဉ္စာပိ ဧဝံ ဒီပေတိ, တိဟေတုကဝိပါကာနိ ပန အနန္တရပစ္စယဘာဝေန ဝုတ္တာနေဝ. ခီဏာသဝါနံ စုတိဝသေန ပဝတ္တာနိ န ကဿစိ အနန္တရပစ္စယဘာဝံ ဂစ္ဆန္တီတိ တာနိ ဝိယ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနမ္ပိ ပစ္စယဝေကလ္လတော ကုသလာကုသလာဒီနံ အနန္တရပစ္စယော [Pg.146] န ဟောတီတိ န န သက္ကာ ဝတ္တုံ, တသ္မာ အဋ္ဌကထာသု အာဂတနယေနေဝေတ္ထ ပရိတ္တာရမ္မဏံ နိယမိတန္တိ. या संदर्भात आचार्य आनंदांनी ‘आवज्जन हे कुशल-अकुशल स्कंधांना अनंतरप्रत्ययाने प्रत्यय (कारण) होते’ असे आवज्जनाचे कुशल-अकुशलांशी अनंतरप्रत्ययत्व सांगितले असल्यामुळे, आणि वोट्ठब्बन व आवज्जन यांच्यात अर्थाचा (स्वरूपाचा) भेद नसल्यामुळे, उत्पत्ती झाली असता वोट्ठब्बन हे कामावचर कुशल, अकुशल आणि क्रिया जवनांचे निश्चितपणे अनंतरप्रत्यय म्हणूनच प्रवृत्त होईल, अन्य प्रकारे नाही; म्हणून मूर्च्छा (बेशुद्धी) इत्यादी काळात वेग मंदावल्यामुळे जवनाची पूर्तता न झाल्याने परीत्तालंबन (अतिशय लहान आलंबन) निश्चित केले पाहिजे, वोट्ठब्बनाच्या दोन किंवा three वेळा प्रवृत्तीने नाही, असे स्पष्ट केले आहे. जरी त्यांनी असे स्पष्ट केले असले तरी, तिहेतुक विपाक चित्ते अनंतरप्रत्यय रूपाने सांगितलेलीच आहेत. क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) च्युती (मृत्यू) रूपाने प्रवृत्त होणारी ती चित्ते जशी कोणत्याही पुढील चित्ताचे अनंतरप्रत्यय बनत नाहीत, त्यांच्याप्रमाणेच वोट्ठब्बन देखील प्रत्ययाच्या (कारणाच्या) विकलतेमुळे (अभावामुळे) कुशल-अकुशलादींचे अनंतरप्रत्यय होत नाही, असे म्हणणे अशक्य नाही (म्हणजेच असे म्हणता येतेच). म्हणून अट्ठकथांमध्ये आलेल्या पद्धतीनुसारच येथे परीत्तालंबन निश्चित केले गेले आहे, असे जाणावे। ၁၄. နတ္ထိ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒေါ ဥပရိမကောဋိယာ သတ္တစိတ္တက္ခဏာယုကဿပိ ဒွတ္တိက္ခတ္တုံ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနုပ္ပတ္တိယာ အပ္ပဟောနကဘာဝတော ဝီထိစိတ္တာနံ ဥပ္ပာဒေါ နတ္ထိ, ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ဘဝင်္ဂစလနမေဝါတိ အဝဓာရဏဖလံ ဒဿေတုံ ‘‘နတ္ထိ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒေါ’’တိ ဝုတ္တံ. အပရေ ပန ‘‘နတ္ထိ ဘဝင်္ဂုပစ္ဆေဒေါ’’တိ အဝဓာရဏဖလံ ဒဿေန္တိ, တံ ပန ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒါဘာဝဝစနေနေဝ သိဒ္ဓံ. သတိ ဟိ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒေ ဘဝင်္ဂံ ဥပစ္ဆိဇ္ဇတိ. ဘဝင်္ဂုပစ္ဆေဒနာမေန ပန ဟေဋ္ဌာပိ ဝိသုံ အဝုတ္တတ္တာ ဣဓ အဝိသေသေန ဝုတ္တံ. १४. ‘वीथीचित्तांची उत्पत्ती होत नाही’ (नत्थि वीथिचित्तुप्पादो) याचा अभिप्राय असा आहे की, जास्तीत जास्त मर्यादेनुसार सात चित्तक्षणांचे आयुष्य उरलेल्या आलंबनाच्या बाबतीतही, दोन किंवा तीन वेळा वोट्ठब्बनाची उत्पत्ती होण्यास तो काळ अपुरा असल्यामुळे वीथीचित्तांची उत्पत्ती होत नाही, केवळ भवांगपातच (भवांगात जाणेच) होते. ‘केवळ भवांगचलनच’ (भवांगचलनमेव) यातील ‘एव’ (केवळ) या अवधारण शब्दाचे फळ दर्शवण्यासाठी ‘वीथीचित्तांची उत्पत्ती होत नाही’ असे म्हटले आहे. परंतु इतर काही आचार्य ‘भवांगविच्छेद होत नाही’ असे अवधारण फळ दर्शवतात; परंतु ते तर ‘वीथीचित्तांची उत्पत्ती होत नाही’ या वचनानेच सिद्ध होते. कारण वीथीचित्तांची उत्पत्ती झाली तरच भवांग विच्छिन्न (खंडित) होते. परंतु ‘भवांगविच्छेद’ या नावाने पूर्वी देखील स्वतंत्रपणे उल्लेख न केल्यामुळे येथे सामान्य रूपाने (अविशेष रूपाने) म्हटले आहे। ၁၅. သဗ္ဗသော ဝီထိစိတ္တုပ္ပတ္တိယာ အဘာဝတော ပစ္ဆိမဝါရောဝိဓမောဃဝါရဝသေန ဝုတ္တော, အညတ္ထ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာ) ပန ဒုတိယတတိယဝါရာပိ တဒါရမ္မဏဇဝနေဟိ သုညတ္တာ ‘‘မောဃဝါရာ’’တိ ဝုတ္တာ. အာရမ္မဏဘူတာတိ ဝိသယဘူတာ, ပစ္စယဘူတာ စ. ပစ္စယောပိ ဟိ ‘‘အာရမ္မဏ’’န္တိ ဝုစ္စတိ ‘‘န လစ္ဆတိ မာရော ဩတာရံ, န လစ္ဆတိ မာရော အာရမ္မဏ’’န္တျာဒီသု (ဒီ. နိ. ၃.၈၀) ဝိယ. တေနေဝေတ္ထ မောဃဝါရဿပိ အာရမ္မဏဘူတာ ဝိသယပ္ပဝတ္တီတိ သိဒ္ဓံ. အတိပရိတ္တာရမ္မဏဉှိ မောဃဝါရပညာပနဿ ပစ္စယော ဟောတိ. ဣတရထာ ဟိ ဘဝင်္ဂစလနဿ သကသကဂေါစရေယေဝ ပဝတ္တနတော ပစ္ဆိမဝါရဿ အတိပရိတ္တာရမ္မဏေ ပဝတ္တိ နတ္ထီတိ ‘‘စတုန္နံ ဝါရာနံ အာရမ္မဏဘူတာ’’တိ ဝစနံ ဒုရုပပါဒနံ သိယာတိ. १५. सर्वथा वीथिचित्ताच्या उत्पत्तीचा अभाव असल्यामुळे शेवटचाच वार या ग्रंथात 'मोघवार' या नावाने सांगितला गेला आहे. परंतु इतरत्र (अट्ठसालिनीमध्ये) द्वितीय आणि तृतीय वार देखील तदारंमण व जवन यांच्यापासून रहित असल्यामुळे 'मोघवार' असे म्हटले गेले आहेत. 'आरम्मणभूत' म्हणजे विषयभूत आणि प्रत्ययभूत (कारणभूत) देखील. कारण 'मार प्रवेशाची संधी मिळवतो, मार आलंबन (कारण) मिळवतो' इत्यादी पाठांप्रमाणे प्रत्ययाला (कारणाला) देखील 'आरम्मण' असे म्हटले जाते. म्हणूनच येथे मोघवारासाठी देखील कारणभूत असणारी विषयाची प्रवृत्ती सिद्ध होते. कारण अतिपरित्त आलंबन हे मोघवार अशी संज्ञा देण्याचे कारण असते. अन्यथा, भवांगचलनाची प्रवृत्ती आपापल्या विषयातच होत असल्यामुळे शेवटच्या वाराची अतिपरित्त आलंबनामध्ये प्रवृत्ती होत नाही, म्हणून 'चारही वारांचे आलंबनभूत' हे वचन अयुक्तियुक्त ठरेल. ၁၆. ပဉ္စဒွါရေ ယထာရဟံ တံတံဒွါရာနုရူပံ, တံတံပစ္စယာနုရူပံ, တံတံအာရမ္မဏာဒိအနုရူပဉ္စ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနိ ဝီထိစိတ္တာနိ အာဝဇ္ဇနဒဿနာဒိသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဇဝနတဒါရမ္မဏဝသေန အဝိသေသတော သတ္တေဝ ဟောန္တိ. စိတ္တုပ္ပာဒါ စိတ္တာနံ [Pg.147] ဝိသုံ ဝိသုံ ဥပ္ပတ္တိဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇမာနစိတ္တာနိယေဝ ဝါ စတုဒ္ဒသ အာဝဇ္ဇနာဒိပဉ္စကသတ္တဇဝနတဒါရမ္မဏဒွယဝသေန. ဝိတ္ထာရာ ပန စတုပညာသ သဗ္ဗေသမေဝ ကာမာဝစရာနံ ယထာသမ္ဘဝံ တတ္ထ ဥပ္ပဇ္ဇနတော, १६. पंचद्वारांमध्ये यथायोग्य त्या त्या द्वाराच्या अनुरूप, त्या त्या प्रत्ययाच्या अनुरूप आणि त्या त्या आलंबन इत्यादींच्या अनुरूप उत्पन्न होणारी वीथिचित्ते आवर्जन, दर्शन इत्यादी, संपटिच्छन, संतीरण, वोट्ठपन, जवन आणि तदारंमणाच्या रूपाने सामान्यतः सातच असतात. चित्तोत्पाद किंवा चित्तांच्या वेगवेगळ्या उत्पत्तीच्या रूपाने उत्पन्न होणारी चित्तेच आवर्जन इत्यादी पाच, जवन सात आणि तदारंमण दोन या रूपाने चौदा (१४) असतात. विस्ताराने पाहिल्यास, सर्वच कामावचर चित्ते संभवतेनुसार तेथे उत्पन्न होत असल्यामुळे ती चौपन्न (५४) असतात. ဧတ္ထာတိ ဝိသယပ္ပဝတ္တိသင်္ဂဟေ. 'येथे' म्हणजे विषयप्रवृत्तीच्या संग्रहामध्ये. ပဉ္စဒွါရဝီထိဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. पंचद्वारवीथीचे वर्णन समाप्त झाले. မနောဒွါရဝီထိ मनोद्वारवीथी. ပရိတ္တဇဝနဝါရဝဏ္ဏနာ परित्तजवनवाराचे वर्णन. ၁၇. မနောဒွါရိကစိတ္တာနံ အတီတာနာဂတမ္ပိ အာရမ္မဏံ ဟောတီတိ တေသံ အတိမဟန္တာဒိဝသေန ဝိသယဝဝတ္ထာနံ ကာတုံ န သက္ကာတိ ဝိဘူတာဝိဘူတဝသေနေဝေတံ နိယမေတုံ ‘‘ယဒိ ဝိဘူတမာရမ္မဏ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. १७. मनोद्वारिक चित्तांचे अतीत आणि अनागत देखील आलंबन असते, म्हणून त्यांचे अतिमहंत इत्यादींच्या रूपाने विषयाचे निर्धारण करणे शक्य नाही. म्हणून केवळ विभूत (स्पष्ट) आणि अविभूत (अस्पष्ट) या रूपानेच त्याचे नियमन करण्यासाठी 'जर आलंबन विभूत असेल तर' इत्यादी म्हटले गेले आहे. ၁၉. ဧတ္ထာတိ မနောဒွါရေ. ဧကစတ္တာလီသ ပဉ္စဒွါရာဝေဏိကာနံ ဒွိပဉ္စဝိညာဏမနောဓာတုတ္တယဝသေန တေရသစိတ္တာနံ တတ္ထ အပ္ပဝတ္တနတော. १९. 'येथे' म्हणजे मनोद्वारावर. (येथे) एकेचाळीस (४१ चित्ते उत्पन्न होतात), कारण पंचद्वारासाठीच विशिष्ट असणाऱ्या द्विपंचविज्ञान (१०) आणि मनोधातूत्रय (३) या रूपाने तेरा चित्तांची तेथे प्रवृत्ती होत नसल्यामुळे. ပရိတ္တဇဝနဝါရဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. परित्तजवनवाराचे वर्णन समाप्त झाले. အပ္ပနာဇဝနဝါရဝဏ္ဏနာ अप्पनाजवनवाराचे वर्णन. ၂၀. ဝိဘူတာဝိဘူတဘေဒေါ နတ္ထိ အာရမ္မဏဿ ဝိဘူတကာလေယေဝ အပ္ပနာသမ္ဘဝတော. २०. येथे विभूत आणि अविभूत असा भेद नसतो, कारण आलंबन स्पष्ट (विभूत) असतानाच अप्पना जवनाची उत्पत्ती संभवते. ၂၁. တတ္ထ ဟိ ဆဗ္ဗီသတိမဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနေသု ယံ ကိဉ္စိ ဇဝနံ အပ္ပနာဝီထိမောတရတီတိ သမ္ဗန္ဓော. ပရိကမ္မောပစာရာနုလောမဂေါတြဘုနာမေန ယထာက္ကမံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဒ္ဒေတိ [Pg.148] ယောဇနာ. ပဌမစိတ္တဉှိ အပ္ပနာယ ပရိကမ္မတ္တာ ပဋိသင်္ခါရကဘူတတ္တာ ပရိကမ္မံ. ဒုတိယံ သမီပစာရိတ္တာ ဥပစာရံ. နာစ္စာသန္နောပိ ဟိ နာတိဒူရပ္ပဝတ္တိ သမီပစာရီ နာမ ဟောတိ, အပ္ပနံ ဥပေစ္စ စရတီတိ ဝါ ဥပစာရံ. တတိယံ ပုဗ္ဗဘာဂေ ပရိကမ္မာနံ, ဥပရိအပ္ပနာယ စ အနုကူလတ္တာ အနုလောမံ. စတုတ္ထံ ပရိတ္တဂေါတ္တဿ, ပုထုဇ္ဇနဂေါတ္တဿ စ အဘိဘဝနတော, မဟဂ္ဂတဂေါတ္တဿ, လောကုတ္တရဂေါတ္တဿ စ ဘာဝနတော ဝဍ္ဎနတော ဂေါတြဘု, ဣမာနိ စတ္တာရိ နာမာနိ စတုက္ခတ္တုံ ပဝတ္တိယံ အနဝသေသတော လဗ္ဘန္တိ, တိက္ခတ္တုံ ပဝတ္တိယံ ပန ဥပစာရာနုလောမဂေါတြဘုနာမေနေဝ လဗ္ဘန္တိ. အဋ္ဌကထာယံ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၈၀၄) ပန ပုရိမာနံ တိဏ္ဏံ, ဒွိန္နံ ဝါ အဝိသေသေနပိ ပရိကမ္မာဒိနာမံ ဝုတ္တံ, စတုက္ခတ္တုံ, တိက္ခတ္တုမေဝ ဝါ ပဉ္စမံ, စတုတ္ထံ ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇိတဗ္ဗအပ္ပနာနုရူပတောတိ အဓိပ္ပာယော. ပရိကမ္မာဒိနာမာနံ အနဝသေသတော လဗ္ဘမာနဝါရဒဿနတ္ထံ ‘‘စတုက္ခတ္တု’’န္တိ အာဒိတော ဝုတ္တံ, ဂဏနပဋိပါဋိဝသေန ပန ‘‘ပဉ္စမံ ဝါ’’တိ ဩသာနေ ဝုတ္တံ. २१. कारण तेथे (अप्पना जवन वारात) सव्वीस महग्गत आणि लोकोत्तर जवनांपैकी कोणतेही एक जवन अप्पनावीथीमध्ये प्रवेश करते, असा संबंध आहे. परिकर्म, उपचार, अनुलोम आणि गोत्रभू या नावांनी अनुक्रमे उत्पन्न होऊन निरुद्ध होते, अशी योजना आहे. कारण पहिले चित्त अप्पनेची तयारी (परिकर्म) करणारे आणि संस्कार करणारे असल्यामुळे 'परिकर्म' म्हटले जाते. दुसरे चित्त (अप्पनेच्या) समीप प्रवृत्त होत असल्यामुळे 'उपचार' म्हटले जाते. कारण जे अत्यंत जवळही नाही आणि अत्यंत दूरही प्रवृत्त होत नाही, त्याला 'समीपचारी' म्हटले जाते, किंवा अप्पनेच्या जवळ जाऊन प्रवृत्त होते म्हणून 'उपचार' म्हटले जाते. तिसरे चित्त पूर्वभागातील परिकर्माला आणि पुढील अप्पनेला अनुकूल असल्यामुळे 'अनुलोम' म्हटले जाते. चौथे चित्त परित्त (कामावचर) गोत्राचा आणि पृथग्जन गोत्राचा पराभव करत असल्यामुळे, आणि महग्गत गोत्राला व लोकोत्तर गोत्राला वाढवत असल्यामुळे 'गोत्रभू' म्हटले जाते. ही चार नावे चार वेळा प्रवृत्ती होत असताना पूर्णपणे प्राप्त होतात, परंतु तीन वेळा प्रवृत्ती होत असताना केवळ उपचार, अनुलोम आणि गोत्रभू हीच नावे प्राप्त होतात. परंतु अट्ठकथेमध्ये पहिल्या तीन किंवा दोन चित्तांना सामान्यतः देखील 'परिकर्म' इत्यादी नाव दिले गेले आहे; चार वेळा किंवा तीन वेळाच प्रवृत्ती होते आणि पाचवे किंवा चौथे चित्त उत्पन्न होणाऱ्या अप्पनेच्या अनुरूप असते, असा अभिप्राय आहे. परिकर्म इत्यादी नावांची पूर्णपणे प्राप्ती होणारा वार दाखवण्यासाठी सुरुवातीला 'चार वेळा' असे म्हटले आहे, परंतु संख्येच्या क्रमानुसार शेवटी 'किंवा पाचवे' असे म्हटले आहे. ယထာရဟန္တိ ခိပ္ပာဘိညဒန္ဓာဘိညာနုရူပံ. ခိပ္ပာဘိညဿ ဟိ တိက္ခတ္တုံ ပဝတ္တကာမာဝစရဇဝနာနန္တရံ စတုတ္ထံ အပ္ပနာစိတ္တမုပ္ပဇ္ဇတိ. ဒန္ဓာဘိညဿ စတုက္ခတ္တုံ ပဝတ္တဇဝနာနန္တရံ ပဉ္စမံ အပ္ပနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ယသ္မာ ပန အလဒ္ဓါသေဝနံ အနုလောမံ ဂေါတြဘုံ ဥပ္ပာဒေတုံ န သက္ကောတိ, လဒ္ဓါသေဝနမ္ပိ စ ဆဋ္ဌံ သတ္တမံ ဘဝင်္ဂဿ အာသန္နဘာဝေန ပပါတာသန္နပုရိသော ဝိယ အပ္ပနာဝသေန ပတိဋ္ဌာတုံ န သက္ကောတိ, တသ္မာ စတုတ္ထတော ဩရံ, ပဉ္စမတော ပရံ ဝါ အပ္ပနာ န ဟောတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ယထာဘိနီဟာရဝသေနာတိ ရူပါရူပလောကုတ္တရမဂ္ဂဖလာနုရူပသမထဝိပဿနာဘာဝနာစိတ္တာဘိနီဟရဏာနုရူပတော, အပ္ပနာယ ဝီထိ အပ္ပနာဝီထိ. ‘‘တတော ပရံ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတီ’’တိ ဧတ္တကေယေဝ ဝုတ္တေ စတုတ္ထံ, ပဉ္စမံ ဝါ ဩတိဏ္ဏအပ္ပနာတော [Pg.149] ပရံ ဘဝင်္ဂပါတောဝ ဟောတိ, န မဂ္ဂါနန္တရံ ဖလစိတ္တံ, သမာပတ္တိဝီထိယဉ္စ ဈာနဖလစိတ္တာနိ ပုနပ္ပုနန္တိ ဂဏှေယျုန္တိ ပုန ‘‘အပ္ပနာဝသာနေ’’တိ ဝုတ္တံ. နိကာယန္တရိယာ ကိရ လောကိယပ္ပနာသု ပဌမကပ္ပနာတော ပရံ သတ္တမဇဝနပူရဏတ္ထံ ဒွတ္တိက္ခတ္တုံ ကာမာဝစရဇဝနာနမ္ပိ ပဝတ္တိံ ဝဏ္ဏေန္တီတိ တေသံ မတိနိသေဓနတ္ထံ ‘‘ဘဝင်္ဂပါတောဝါ’’တိ သာဝဓာရဏံ ဝုတ္တံ. 'यथायोग्य' म्हणजे क्षिप्र-अभिज्ञ आणि दंध-अभिज्ञ यांच्या अनुरूप. कारण क्षिप्र-अभिज्ञ व्यक्तीच्या बाबतीत तीन वेळा प्रवृत्त होणाऱ्या कामावचर जवनानंतर चौथे अप्पना चित्त उत्पन्न होते. दंध-अभिज्ञ व्यक्तीच्या बाबतीत चार वेळा प्रवृत्त होणाऱ्या जवनानंतर पाचवी अप्पना उत्पन्न होते. कारण आसेवन प्रत्यय न मिळालेले अनुलोम चित्त गोत्रभू चित्त उत्पन्न करू शकत नाही, आणि आसेवन प्रत्यय मिळालेले असले तरी सहावे किंवा सातवे चित्त भवांगाच्या समीपतेमुळे, दरीच्या काठावर उभा असलेल्या माणसाप्रमाणे, अप्पना रूपाने स्थिर राहू शकत नाही. म्हणून चौथ्यापेक्षा आधी किंवा पाचव्यानंतर अप्पना होत नाही, असे समजावे. 'यथाअभिनीहारवशात' म्हणजे रूप, अरूप आणि लोकोत्तर मार्ग-फलांच्या अनुरूप समथ-विपश्यना भावना चित्ताला सन्मुख नेण्याच्या अनुरूप; अप्पनेची वीथी म्हणजे अप्पनावीथी. 'त्यानंतर केवळ भवांगपातच होतो' एवढेच म्हटले असता, चौथ्या किंवा पाचव्या अप्पनेत प्रवेश केल्यानंतर केवळ भवांगपातच होतो, मार्गाच्या लगेच नंतर फलचित्त उत्पन्न होत नाही, आणि समापत्ती वीथीमध्ये ध्यान व फलचित्ते पुन्हा पुन्हा उत्पन्न होत नाहीत, असा गैरसमज होऊ नये म्हणून पुन्हा 'अप्पनेच्या समाप्तीनंतर' असे म्हटले आहे. इतर संप्रदायांचे (निकायंतरीय) आचार्य असे म्हणतात की, लौकिक अप्पनांमध्ये पहिल्यांदा प्राप्त झालेल्या अप्पनेनंतर सात जवने पूर्ण करण्यासाठी दोन किंवा तीन वेळा कामावचर जवनांची देखील प्रवृत्ती होते; त्यांच्या या मताचे खंडन करण्यासाठी 'केवळ भवांगपातच होतो' असे अवधारण करणारे वचन म्हटले आहे. ၂၂. တတ္ထာတိ တေသု အဋ္ဌဉာဏသမ္ပယုတ္တကာမာဝစရဇဝနေသု, တေသု စ ဆဗ္ဗီသတိမဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနေသု. တတ္ထာတိ ဝါ တသ္မိံ အပ္ပနာဝါရေ. သောမနဿသဟဂတဇဝနာနန္တရန္တိ သောမနဿသဟဂတာနံ စတုန္နံ ကုသလကိရိယဇဝနာနံ အနန္တရံ. သောမနဿသဟဂတာဝါတိ စတုက္ကဇ္ဈာနဿ, သုက္ခဝိပဿကာဒီနံ မဂ္ဂဖလဿ စ ဝသေန သောမနဿသဟဂတာဝ, န ပန ဥပေက္ခာသဟဂတာ ဘိန္နဝေဒနာနံ အညမညံ အာသေဝနပစ္စယဘာဝဿ အနုဒ္ဓဋတ္တာ. ပါဋိကင်္ခိတဗ္ဗာတိ ပသံသိတဗ္ဗာ, ဣစ္ဆိတဗ္ဗာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. တတ္ထာပီတိ တသ္မိံ ဧကဝေဒနဇဝနဝါရေပိ. ကုသလဇဝနာနန္တရန္တိ စတုဗ္ဗိဓဉာဏသမ္ပယုတ္တကုသလဇဝနာနန္တရံ ကုသလဇဝနမပ္ပေတိ, န ကိရိယဇဝနံ ဘိန္နသန္တာနေ နိဗ္ဗတ္တနတော. ဟေဋ္ဌိမဉ္စ ဖလတ္တယမပ္ပေတိ သမာပတ္တိဝီထိယန္တျဓိပ္ပာယော. २२. 'तेथे' म्हणजे त्या आठ ज्ञानसंप्रयुक्त कामावचर जवनांमध्ये आणि त्या सव्वीस महग्गत व लोकोत्तर जवनांमध्ये. किंवा 'तेथे' म्हणजे त्या अप्पना वारात. 'सोमनस्ससहगत जवनानंतर' म्हणजे सोमनस्ससहगत चार कुशल आणि क्रिया जवनांच्या नंतर. 'सोमनस्ससहगतच' म्हणजे पहिल्या चार ध्यानांच्या रूपाने आणि शुष्कविपश्यक इत्यादींच्या मार्ग व फलाच्या रूपाने सोमनस्ससहगतच (अप्पना अपेक्षित आहे), उपेक्षासहगत नाही; कारण भिन्न वेदना असणाऱ्या चित्तांचा परस्परांशी आसेवन प्रत्ययभाव नसतो. 'अपेक्षित आहे' म्हणजे प्रशंसनीय आहे किंवा इच्छित आहे, असे म्हटले आहे. 'तेथे देखील' म्हणजे त्या एकाच वेदनेच्या जवन वारात देखील. 'कुशल जवनानंतर' म्हणजे चार प्रकारच्या ज्ञानसंप्रयुक्त कुशल जवनानंतर कुशल जवनच अप्पना प्राप्त करते, क्रिया जवन नाही; कारण ते भिन्न संतानामध्ये उत्पन्न होते. आणि समापत्ती वीथीमध्ये खालील तीन फले अप्पना प्राप्त करतात, असा अभिप्राय आहे. ၂၃. သုခပုညမှာ သောမနဿသဟဂတတိဟေတုကကုသလဒွယတော ပရံ အဂ္ဂဖလဝိပါကကိရိယဝဇ္ဇိတလောကိယလောကုတ္တရစတုက္ကဇ္ဈာနဇဝနဝသေန ဒွတ္တိံသ, ဥပေက္ခကာ တိဟေတုကကုသလဒွယတော ပရံ တထေဝ ပဉ္စမဇ္ဈာနာနိ ဒွါဒသ, သုခိတကြိယတော တိဟေတုကဒွယတော ပရံ ကိရိယဇ္ဈာနစတုက္ကဿ, အဂ္ဂဖလစတုက္ကဿ စ ဝသေန အဋ္ဌ, ဥပေက္ခကာ တိဟေတုကဒွယတော ပရံ ဥပေက္ခာသဟဂတရူပါရူပကိရိယပဉ္စကဿ, အဂ္ဂဖလဿ စ ဝသေန ဆ အပ္ပနာ သမ္ဘောန္တိ. २३. सुखकारक पुण्याचा म्हणजेच सोमनस्यसहगत त्रिहेतुक कुशल दोन चित्तांच्या नंतर, अर्हत्त्वफल, विपाक आणि क्रिया ध्यान वगळून लौकिक व लोकोत्तर चतुर्थ ध्यानाच्या जवनांच्या प्रभावाने बत्तीस (३२) अप्पना जवन उत्पन्न होतात. उपेक्षासहगत त्रिहेतुक कुशल दोन चित्तांच्या नंतर त्याचप्रमाणे बारा (१२) पंचम ध्यान अप्पना जवन उत्पन्न होतात. सुखकारक (सोमनस्यसहगत) त्रिहेतुक क्रिया दोन चित्तांच्या नंतर, चार क्रिया ध्यान आणि चार अर्हत्त्वफल ध्यानांच्या प्रभावाने आठ (८) अप्पना जवन उत्पन्न होतात. उपेक्षासहगत त्रिहेतुक क्रिया दोन चित्तांच्या नंतर, उपेक्षासहगत रूप व अरूप क्रिया पाच ध्यान आणि अर्हत्त्वफलाच्या प्रभावाने सहा (६) अप्पना जवन उत्पन्न होतात. ၂၄. ဧတ္ထာတိ ဝီထိသင်္ဂဟာဓိကာရေ. २४. 'एत्थ' (येथे) म्हणजे 'वीथि-संग्रह' या अधिकारात होय. အပ္ပနာဇဝနဝါရဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अप्पना-जवन-वाराचे वर्णन समाप्त झाले. မနောဒွါရဝီထိဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. मनोद्वार-वीथीचे वर्णन समाप्त झाले. အပ္ပနာဇဝနဝါရဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अप्पना-जवन-वाराचे वर्णन समाप्त झाले. တဒါရမ္မဏနိယမဝဏ္ဏနာ तदारम्मण-नियमाचे वर्णन. ၂၅. သဗ္ဗတ္ထာပီတိ [Pg.150] ပဉ္စဒွါရမနောဒွါရေပိ. २५. 'सब्बत्थापि' (सर्व ठिकाणीही) म्हणजे पंचद्वार आणि मनोद्वार या दोन्हीमध्येही. ၂၆. ဣဋ္ဌေတိ ဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တေ. အတိဣဋ္ဌာရမ္မဏဉှိ ဝိသုံ ဝက္ခတိ. ကုသလဝိပါကာနိ ပဉ္စဝိညာဏသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏတဒါရမ္မဏာနီတိ သမ္ဗန္ဓော. ဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တေ သန္တီရဏတဒါရမ္မဏာနိ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝါတိ အာဟ ‘‘အတိဣဋ္ဌေ ပန သောမနဿသဟဂတာနေဝါ’’တိ. ဝိပါကဿ ဟိ ကမ္မာနုဘာဝတော ပဝတ္တမာနဿ အာဒါသေ မုခနိမိတ္တံ ဝိယ နိဗ္ဗိကပ္ပတာယ ပကပ္ပေတွာ ဂဟဏာဘာဝတော ယထာရမ္မဏမေဝ ဝေဒနာယောဂေါ ဟောတိ, ကုသလာကုသလာနံ ပန အပ္ပဟီနဝိပလ္လာသေသု သန္တာနေသု ပဝတ္တိယာ အတိဣဋ္ဌေပိ ဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တအနိဋ္ဌာကာရတော, အနိဋ္ဌေပိ ဣဋ္ဌဣဋ္ဌမဇ္ဈတ္တာကာရတော ဂဟဏံ ဟောတိ. တထာ ဟိ အဿဒ္ဓါဒီနံ ဗုဒ္ဓါဒီသု အတိဣဋ္ဌာရမ္မဏေသုပိ ဥပေက္ခာဇဝနံ ဟောတိ, တိတ္ထိယာဒီနဉ္စ ဒေါမနဿဇဝနံ, ဂမ္ဘီရပကတိကာဒီနဉ္စ ပဋိက္ကူလာရမ္မဏေ ဥပေက္ခာဇဝနံ, သုနခါဒီနဉ္စ တတ္ထ သောမနဿဇဝနံ, ပုရိမပစ္ဆာဘာဂပ္ပဝတ္တာနိ ပန ဝိပါကာနိ ယထာဝတ္ထုကာနေဝ. အပိစ အသုစိဒဿနေ သုမနာယမာနာနံ သုနခါဒီနန္တိ. စက္ခုဝိညာဏာဒီနံ ပန အတိဣဋ္ဌာနိဋ္ဌေသု ပဝတ္တမာနာနမ္ပိ ဥပေက္ခာသဟဂတဘာဝေ ကာရဏံ ဟေဋ္ဌာ ကထိတမေဝ. २६. 'इट्ठ' (इष्ट) म्हणजे इष्ट-मध्यस्थ आलंबनात होय. कारण अति-इष्ट आलंबनाचे स्वतंत्रपणे पुढे वर्णन केले जाईल. 'कुशलविपाक पंचविज्ञान, संपटिच्छन, संतीरण आणि तदारम्मण चित्ते होतात' असा येथे संबंध आहे. इष्ट-मध्यस्थ आलंबनात संतीरण आणि तदारम्मण चित्ते केवळ उपेक्षासहगतच असतात, म्हणूनच 'परंतु अति-इष्ट आलंबनात ती सोमनस्यसहगतच असतात' असे म्हटले आहे. कर्माच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणाऱ्या विपाक चित्ताचे ग्रहण, आरशातील मुखबिंबाप्रमाणे, कोणत्याही विकल्पाशिवाय (कल्पनेशिवाय) होत असल्यामुळे, आलंबनानुसारच वेदनेचा संयोग होतो. परंतु कुशल आणि अकुशल जवनांची प्रवृत्ती ज्यांच्या संतानामध्ये विपर्यास (विपल्लास) नष्ट झालेला नाही अशा व्यक्तींमध्ये होत असल्यामुळे, अति-इष्ट आलंबनातही इष्ट-मध्यस्थ किंवा अनिष्ट रूपाने, आणि अनिष्ट आलंबनातही इष्ट किंवा इष्ट-मध्यस्थ रूपाने ग्रहण होते. तसेच, श्रद्धा नसलेल्या लोकांचे बुद्ध इत्यादी अति-इष्ट आलंबनांमध्येही उपेक्षा जवन होते, आणि तीर्थिकांचे दोमनस्य जवन होते. गंभीर स्वभाव असलेल्या लोकांचे प्रतिकूल आलंबनात उपेक्षा जवन होते, आणि कुत्र्यांचे त्या प्रतिकूल आलंबनात सोमनस्य जवन होते. परंतु जवनाच्या पूर्व आणि उत्तर भागात प्रवृत्त होणारे विपाक चित्त मात्र आलंबनाच्या वास्तविक स्वरूपानुसारच असतात. तसेच, अशुची (विष्ठा) पाहिल्यावर आनंदित होणाऱ्या कुत्र्यांच्या बाबतीतही हेच घडते. चक्षुविज्ञान इत्यादी चित्ते अति-इष्ट किंवा अनिष्ट आलंबनांमध्ये प्रवृत्त होत असतानाही उपेक्षासहगत असण्याचे कारण आधीच सांगितले गेले आहे. ၂၇. တတ္ထာပီတိ တဒါရမ္မဏေသုပိ. သောမနဿသဟဂတကိရိယဇဝနာဝသာနေတိ သဟေတုကာဟေတုကသုခသဟဂတကိရိယပဉ္စကာဝသာနေ. ခီဏာသဝါနံ စိတ္တဝိပလ္လာသာဘာဝေန ကိရိယဇဝနာနိပိ ယထာရမ္မဏမေဝ ပဝတ္တန္တီတိ ဝုတ္တံ ‘‘သောမနဿသဟဂတကိရိယဇဝနာဝသာနေ’’တျာဒိ. ကေစိ ပန အာစရိယာ ‘‘ပဋ္ဌာနေ (ဓ. သ. မူလဋီ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာဝဏ္ဏနာ) ‘ကုသလာကုသလေ နိရုဒ္ဓေ ဝိပါကော [Pg.151] တဒါရမ္မဏတာ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’တိ (ပဋ္ဌာ. ၃.၁.၉၈) ကုသလာကုသလာနမေဝါနန္တရံ တဒါရမ္မဏံ ဝုတ္တန္တိ နတ္ထိ ကိရိယဇဝနာနန္တရံ တဒါရမ္မဏုပ္ပာဒေါ’’တိ ဝဒန္တိ. တတ္ထ ဝုစ္စတေ – ယဒိ အဗျာကတာနန္တရမ္ပိ တဒါရမ္မဏံ ဝုစ္စေယျ. ပရိတ္တာရမ္မဏေ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနာနန္တရမ္ပိ တဿ ပဝတ္တိံ မညေယျုန္တိ ကိရိယဇဝနာနန္တရံ တဒါရမ္မဏံ န ဝုတ္တံ, န ပန အလဗ္ဘနတော. လဗ္ဘမာနဿပိ ဟိ ကေနစိ အဓိပ္ပာယေန ကတ္ထစိ အဝစနံ ဒိဿတိ, ယထာ တံ ဓမ္မသင်္ဂဟေ လဗ္ဘမာနမ္ပိ ဟဒယဝတ္ထု ဒေသနာဘေဒပရိဟာရတ္ထံ န ဝုတ္တန္တိ. २७. 'तत्थापि' म्हणजे तदारम्मण चित्तांमध्येही. 'सोमनस्यसहगत क्रिया जवनाच्या शेवटी' म्हणजे सहेतुक आणि अहेतुक सुखसहगत क्रिया पाच जवनांच्या शेवटी होय. क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) चित्तामध्ये विपर्यास नसल्यामुळे क्रिया जवने देखील आलंबनानुसारच प्रवृत्त होतात, म्हणूनच 'सोमनस्यसहगत क्रिया जवनाच्या शेवटी' इत्यादी म्हटले आहे. परंतु काही आचार्य म्हणतात की, 'पट्ठान पाठात कुशल आणि अकुशल निरुद्ध झाल्यावर विपाक तदारम्मण रूपाने उत्पन्न होतो असे म्हटल्यामुळे केवळ कुशल आणि अकुशलाच्या नंतरच तदारम्मण सांगितले आहे, म्हणून क्रिया जवनानंतर तदारम्मणाची उत्पत्ती होत नाही.' त्यावर उत्तर दिले जाते – जर अव्याकृत चित्तानंतरही तदारम्मण सांगितले असते, तर परीत्त आलंबनात वोट्ठब्बनानंतरही त्याची प्रवृत्ती मानली गेली असती. म्हणूनच क्रिया जवनानंतर तदारम्मण सांगितले गेले नाही, ते प्राप्त होत नाही म्हणून नव्हे. कारण प्राप्त होणाऱ्या गोष्टीचेही एखाद्या विशिष्ट हेतूने काही ठिकाणी कथन न करणे दिसून येते, जसे की धम्मसंगणीमध्ये प्राप्त होणारे 'हदयवत्थु' (हृदयवस्तू) देशनेचा भेद टाळण्यासाठी सांगितले गेले नाही. ၂၈. ဒေါမနဿ…ပေ… ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ ဘဝန္တိ, န သောမနဿသဟဂတာနိ အညမညံ ဝိရုဒ္ဓသဘာဝတ္တာ. တေနေဝ ဟိ ပဋ္ဌာနေ ဒေါမနဿာနန္တရံ သောမနဿံ, တဒနန္တရဉ္စ ဒေါမနဿံ အနုဒ္ဓဋံ. တထာ ဟိ ‘‘သုခါယ ဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တော ဓမ္မော သုခါယ ဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တဿ ဓမ္မဿ အနန္တရပစ္စယေန ပစ္စယော’’တျာဒိနာ (ပဋ္ဌာ. ၁.၂.၄၅) သုခဒုက္ခဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တာ ဓမ္မာ အတ္တနော အတ္တနော သမာနဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာနံ အဒုက္ခမသုခဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တကာနဉ္စ အနန္တရပစ္စယဘာဝေန ဒွီသု ဒွီသု ဝါရေသု ဝုတ္တာ, အဒုက္ခမသုခဝေဒနာယ သမ္ပယုတ္တကာ ပန သမာနဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာနံ, ဣတရဝေဒနာဒွယသမ္ပယုတ္တာနဉ္စ ဓမ္မာနံ အနန္တရပစ္စယဘာဝေန တီသု ဝါရေသူတိ ဧဝံ ဝေဒနာတ္တိကေ သတ္တေဝ အနန္တရပစ္စယဝါရာ ဝုတ္တာ. ယဒိ စ ဒေါမနဿာနန္တရံ သောမနဿံ, သောမနဿာနန္တရံ ဝါ ဒေါမနဿံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, သုခဒုက္ခဝေဒနာသမ္ပယုတ္တာနမ္ပိ အညမညံ အနန္တရပစ္စယဝသေန ဒွေ ဝါရေ ဝဍ္ဎေတွာ နဝ ဝါရာ ဝတ္တဗ္ဗာ သိယုံ, န ပနေဝံ ဝုတ္တာ. တသ္မာ န တေသံ တဒနန္တရံ ဥပ္ပတ္တိ အတ္ထိ. ဧတ္ထ စ ‘‘သောမနဿသဟဂတကိရိယဇဝနာဝသာနေ’’တျာဒိနာ အယမ္ပိ နိယမော အနုညာတော – २८. दोमनस्य जवनाच्या शेवटी तदारम्मण आणि भवांग केवळ उपेक्षासहगतच असतात, सोमनस्यसहगत नसतात; कारण ते परस्परांच्या विरुद्ध स्वभावाचे आहेत. म्हणूनच पट्ठान पाठात दोमनस्यानंतर सोमनस्य आणि सोमनस्यानंतर दोमनस्य सांगितले गेलेले नाही. तसेच, 'सुख वेदनेने संप्रयुक्त धर्म हा सुख वेदनेने संप्रयुक्त धर्माचा अनंतरप्रत्ययाने प्रत्यय होतो' इत्यादीद्वारे सुख आणि दुःख वेदनेने संप्रयुक्त धर्म आपापल्या समान वेदनेने संप्रयुक्त आणि अदुःखमसुख (उपेक्षा) वेदनेने संप्रयुक्त धर्मांचे अनंतरप्रत्यय म्हणून दोन-दोन वारांमध्ये सांगितले आहेत. परंतु अदुःखमसुख वेदनेने संप्रयुक्त धर्म समान वेदनेने संप्रयुक्त आणि इतर दोन वेदनेने संप्रयुक्त धर्मांचे अनंतरप्रत्यय म्हणून तीन वारांमध्ये सांगितले आहेत. अशा प्रकारे वेदना-तिकामध्ये केवळ सातच अनंतरप्रत्ययवार सांगितले आहेत. आणि जर दोमनस्यानंतर सोमनस्य किंवा सोमनस्यानंतर दोमनस्य उत्पन्न झाले असते, तर सुख आणि दुःख वेदनेने संप्रयुक्त धर्मांचेही परस्परांच्या अनंतरप्रत्यय रूपाने दोन वार वाढवून नऊ वार सांगावे लागले असते, परंतु तसे सांगितले गेले नाही. म्हणून त्यांच्या नंतर त्यांची उत्पत्ती होत नाही. आणि येथे 'सोमनस्यसहगत क्रिया जवनाच्या शेवटी' इत्यादीद्वारे हा नियम देखील मान्य केला गेला आहे – ‘‘ပရိတ္တကုသလာဒေါသ-ပါပသာတကြိယာဇဝါ; ပဉ္စသွေကံ တဒါလမ္ဗံ, သုခိတေသု ယထာရဟံ. 'कामावचर कुशल (८), द्वेषमूल दोन वगळून अकुशल (१०) आणि सोमनस्यसहगत क्रिया (५) जवनांच्या नंतर, पाच सुखसहगत तदारम्मणांपैकी योग्यतेनुसार एक तदारम्मण होते.' ‘‘ပါပါကာမသုဘာ [Pg.152] စေဝ, သောပေက္ခာ စ ကြိယာဇဝါ; သောပေက္ခေသု တဒါလမ္ဗံ, ဆသွေကမနုရူပတော’’တိ. 'अकुशल जवन (१२), कामावचर कुशल जवन (८) आणि उपेक्षासहगत क्रिया जवन (४) यांच्या नंतर, सहा उपेक्षासहगत तदारम्मणांपैकी योग्यतेनुसार एक तदारम्मण होते.' အယဉှိ ဇဝနေန တဒါရမ္မဏနိယမော အဗျဘိစာရီ. ‘‘ဉာဏသမ္ပယုတ္တဇဝနတော ဉာဏသမ္ပယုတ္တတဒါရမ္မဏ’’န္တျာဒိနယပ္ပဝတ္တော ပန အနေကန္တိကော. ယေဘုယျေန ဟိ အကုသလဇဝနေသု ပရိစိတဿ ကဒါစိ ကုသလဇဝနေသု ဇဝိတေသု, ကုသလဇဝနေသု ဝါ ပရိစိတဿ ကဒါစိ အကုသလဇဝနေသု ဇဝိတေသု အကုသလာနန္တရံ ပဝတ္တပရိစယေန တိဟေတုကဇဝနတောပိ ပရံ အဟေတုကတဒါရမ္မဏံ ဟောတိ, တထာ ကုသလာနန္တရံ ပဝတ္တပရိစယေန အကုသလဇဝနတော ပရံ တိဟေတုကတဒါရမ္မဏမ္ပိ, ပဋိသန္ဓိနိဗ္ဗတ္တကကမ္မတော ပန အညကမ္မေန တဒါရမ္မဏပ္ပဝတ္တိယံ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. တထာ စ ဝုတ္တံ ပဋ္ဌာနေ ‘‘အဟေတုကေ ခန္ဓေ အနိစ္စတော ဒုက္ခတော အနတ္တတော ဝိပဿန္တိ, ကုသလာကုသလေ နိရုဒ္ဓေ အဟေတုကော ဝိပါကော တဒါရမ္မဏတာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ကုသလာကုသလေ နိရုဒ္ဓေ သဟေတုကော ဝိပါကော တဒါရမ္မဏတာ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၃.၁.၉၈). कारण जवनाद्वारे असलेला हा तदारम्मणाचा नियम निश्चित (अव्यभिचारी) आहे. परंतु 'ज्ञानसंप्रयुक्त जवनानंतर ज्ञानसंप्रयुक्त तदारम्मण होते' इत्यादी पद्धतीने चालणारा नियम अनैकांतिक (अनिश्चित) आहे. कारण बहुतांश वेळा अकुशल जवनांचा सराव असलेल्या व्यक्तीचे कधीतरी कुशल जवन प्रवृत्त झाल्यावर, किंवा कुशल जवनांचा सराव असलेल्या व्यक्तीचे कधीतरी अकुशल जवन प्रवृत्त झाल्यावर, अकुशलाच्या नंतर प्रवृत्त होणाऱ्या सरावामुळे त्रिहेतुक जवनानंतरही अहेतुक तदारम्मण होते. त्याचप्रमाणे, कुशलाच्या नंतर प्रवृत्त होणाऱ्या सरावामुळे अकुशल जवनानंतरही त्रिहेतुक तदारम्मण होते. प्रतिसंधी उत्पन्न करणाऱ्या कर्मापेक्षा वेगळ्या कर्मामुळे तदारम्मणाच्या प्रवृत्तीमध्ये काही शंकाच उरत नाही. म्हणूनच पट्ठान पाठात म्हटले आहे – 'अहेतुक स्कंधांना अनित्य, दुःख आणि अनत्ता रूपाने विपश्यना करतात. कुशल आणि अकुशल निरुद्ध झाल्यावर अहेतुक विपाक तदारम्मण रूपाने उत्पन्न होतो, कुशल आणि अकुशल निरुद्ध झाल्यावर सहेतुक विपाक तदारम्मण रूपाने उत्पन्न होतो.' တသ္မာတိ ယသ္မာ ဒေါမနဿဇဝနာဝသာနေ ဥပေက္ခာသဟဂတာနေဝ ဟောန္တိ. တသ္မာ ဒေါမနဿသဟဂတဇဝနာဝသာနေ ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏံ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ သမ္ဗန္ဓော. ‘သောမနဿပဋိသန္ဓိကဿာ’တိ ဣမိနာဝ ဘဝင်္ဂပါတာဘာဝေါ ဒီပိတောဝ ဟောတိ ဒေါမနဿာနန္တရံ သောမနဿာဘာဝတောတိ တံ အဝတွာ တဒါရမ္မဏာဘာဝမေဝ ပရိကပ္ပေန္တော အာဟ ‘‘ယဒိ တဒါရမ္မဏသမ္ဘဝေါ နတ္ထီ’’တိ. သောမနဿပဋိသန္ဓိကဿ တိတ္ထိယာဒိနော ဗုဒ္ဓါဒိအတိဣဋ္ဌာရမ္မဏေ ပိ ပဋိဟတစိတ္တဿ ဒေါမနဿဇဝနေ ဇဝိတေ ဝုတ္တနယေန သောမနဿတဒါရမ္မဏဿ အတိဣဋ္ဌာရမ္မဏေ စ ဥပေက္ခာသဟဂတတဒါရမ္မဏဿ အနုပ္ပဇ္ဇနတော, ကေနစိ ဝါ အသပ္ပာယေန ပရိဟီနလောကိယဇ္ဈာနံ အာရဗ္ဘ ‘‘ပဏီတဓမ္မော မေ နဋ္ဌော’’တိ ဝိပ္ပဋိသာရံ [Pg.153] ဇနေန္တဿ ဒေါမနဿဇဝနေ သတိ အကာမာဝစရာရမ္မဏေ တဒါရမ္မဏာဘာဝတော ယဒိ တဒါရမ္မဏဿ ဥပ္ပတ္တိသမ္ဘဝေါ နတ္ထီတိ အဓိပ္ပာယော. तस्मात् (त्यामुळे) म्हणजे यस्मा (ज्या अर्थी) दौर्मनस्य जवनाच्या शेवटी उपेक्षासहगतच चित्त असतात. म्हणून दौर्मनस्यसहगत जवनाच्या शेवटी उपेक्षासहगत संतीरण उत्पन्न होते, असा संबंध आहे. 'सोमनस्य प्रतिसंधी असलेल्याच्या' या पदानेच दौर्मनस्यानंतर सोमनस्याचा अभाव असल्यामुळे भवंगपात न होणे (भवंगात न पडणे) दर्शविलेच गेले आहे; म्हणून ते न सांगता केवळ तदारंमणाचा अभावच गृहीत धरून 'जर तदारंमणाची उत्पत्ती संभवत नसेल तर' असे म्हटले आहे. सोमनस्य प्रतिसंधी असलेल्या तीर्थिकादी व्यक्तीचे बुद्धादी अति-इष्ट आलंबनामध्ये सुद्धा चित्त प्रतिहत (द्वेषयुक्त) झाल्यावर दौर्मनस्य जवन जवित होते, तेव्हा सांगितलेल्या नियमानुसार सोमनस्य तदारंमणाचा आणि अति-इष्ट आलंबनामध्ये उपेक्षासहगत तदारंमणाचा उत्पाद होत नाही. किंवा, एखाद्या अहितकारक कारणामुळे ऱ्हास पावलेल्या लौकिक ध्यानाला आलंबन करून 'माझा प्रणीत धर्म नष्ट झाला' असा पश्चात्ताप उत्पन्न करणाऱ्याच्या ठिकाणी दौर्मनस्य जवन चालू असताना, अ-कामावचर आलंबनामध्ये तदारंमणाचा अभाव असल्यामुळे 'जर तदारंमणाची उत्पत्ती संभवत नसेल तर' असा (आचार्य अनुरुद्धांचा) अभिप्राय आहे. ပရိစိတပုဗ္ဗန္တိ ပုဗ္ဗေ ပရိစိတံ, တသ္မိံ ဘဝေ ယေဘုယျေန ဂဟိတပုဗ္ဗံ. ဥပေက္ခာသဟဂတသန္တီရဏံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ နိရာဝဇ္ဇနမ္ပိ. ယထာ တံ နိရောဓာ ဝုဋ္ဌဟန္တဿ ဖလစိတ္တန္တျဓိပ္ပာယော. ယထာဟု – 'परिचितपुब्बं' म्हणजे पूर्वी परिचित असलेले, किंवा त्या भवात बहुतांश करून पूर्वी ग्रहण केलेले. उपेक्षासहगत संतीरण आवर्जनाशिवाय (मनोद्वारावर्जनाशिवाय) सुद्धा उत्पन्न होते. ज्याप्रमाणे निरोध समापत्तीतून उठणाऱ्या पुद्गलाचे फलचित्त आवर्जनाशिवाय उत्पन्न होते, असा अभिप्राय आहे. जसे की प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे – ‘‘နိရာဝဇ္ဇံ ကထံ စိတ္တံ, ဟောတိ နေတဉှိ သမ္မတံ; နိယမော န ဝိနာဝဇ္ဇံ, နိရောဓာ ဖလဒဿနာ’’တိ. “आवर्जनाशिवाय चित्त कसे उत्पन्न होऊ शकते? हे तर मान्य नाही. (उत्तर:) आवर्जनाशिवाय चित्त उत्पन्न होऊ शकत नाही असा कोणताही नियम नाही, कारण निरोध समापत्तीतून उठताना फलचित्ताचे दर्शन (उत्पत्ती) होते.” ကေန ပန ကိစ္စေန ဣဒံ စိတ္တံ ပဝတ္တတီတိ? တဒါရမ္မဏကိစ္စေန တာဝ န ပဝတ္တတိ ဇဝနာရမ္မဏဿ အဂ္ဂဟဏတော, နာပိ သန္တီရဏကိစ္စေန ယထာသမ္ပဋိစ္ဆိတဿ သန္တီရဏဝသေန အပ္ပဝတ္တနတော, ပဋိသန္ဓိစုတီသု ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ, ပါရိသေသတော ပန ဘဝဿ အင်္ဂဘာဝတော ဘဝင်္ဂကိစ္စေနာတိ ယုတ္တံ သိယာ. အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရေနပိ (ဓ. သ. အနုဋီ. ၄၉၈ ဝိပါကုဒ္ဓါရကထာဝဏ္ဏနာ) ဟိ အယမတ္ထော ဒဿိတောဝ. ယံ ပန ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါနံ ဓမ္မတော, အာရမ္မဏတော စ သမာနတံ ဝက္ခတိ, တံ ယေဘုယျတောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. န ဟိ ဣဒမေကံ ဌာနံ ဝဇ္ဇေတွာ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါနံ ဝိသဒိသတာ အတ္ထိ. တမနန္တရိတွာတိ တံ အတ္တနော အနန္တရံ အဗျဝဟိတံ ကတွာ, တဒနန္တရန္တျတ္ထော. पण हे चित्त कोणत्या कृत्याने (कार्याने) प्रवृत्त होते? पहिल्यांदा तर ते तदारंमण कृत्याने प्रवृत्त होत नाही, कारण ते जवनाच्या आलंबनाला ग्रहण करत नाही. संतीरण कृत्याने सुद्धा प्रवृत्त होत नाही, कारण संपटिच्छनाने ग्रहण केलेल्या आलंबनाचे संतीरण करण्याच्या रूपाने ते प्रवृत्त होत नाही. प्रतिसंधी आणि च्युती कृत्यांमध्ये तर ते प्रवृत्त होत नाही हे सांगण्याची गरजच नाही. म्हणून परिशेष न्यायाने (उरलेल्या पर्यायानुसार), भवाचे अंग असल्यामुळे ते भवंग कृत्याने प्रवृत्त होते, हेच म्हणणे योग्य ठरेल. आचार्य धम्मपाल थेरांनी सुद्धा हाच अर्थ दर्शविला आहे. पुढे प्रतिसंधी आणि भवंग यांचे स्वभावतः आणि आलंबनतः जे समानत्व सांगितले जाईल, ते प्रामुख्याने (बहुतांश करून) सांगितले आहे असे समजावे. कारण हे एक स्थान वगळता प्रतिसंधी आणि भवंग यांच्यात कोणतीही भिन्नता नाही. 'तमन्तरित्वा' म्हणजे त्याला आपल्या लगेचच नंतर कोणतेही व्यवधान न ठेवता (अव्यवहित करून), म्हणजेच त्याच्या अव्यवहित नंतर, असा अर्थ आहे. ၂၉. ကာမာဝစရ…ပေ… ဣစ္ဆန္တီတိ ဧတ္ထ ကာမာဝစရဇဝနာဝသာနေယေဝ တဒါရမ္မဏံ ဣစ္ဆန္တိ ကာမတဏှာနိဒါနကမ္မနိဗ္ဗတ္တတ္တာ. န ဟိ တံ ကာမတဏှာဟေတုကေန ကမ္မုနာ ဇနိတံ အတံသဘာဝဿ ရူပါရူပါဝစရလောကုတ္တရဇဝနဿ အနန္တရံ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ကိံကာရဏာ? အဇနကတ္တာ, ဇနကသမာနတ္တာဘာဝတော စ. ယထာ ဟိ ဂေဟတော ဗဟိ နိက္ခမိတုကာမော ဗာလကော ဇနကံ, တံသဒိသံ ဝါ အင်္ဂုလိယံ ဂဟေတွာ နိက္ခမတိ, နာညံ ရာဇပုရိသာဒိံ, ဧဝံ ဘဝင်္ဂဝိသယတော [Pg.154] အညတ္ထ ပဝတ္တမာနံ တဒါရမ္မဏံ ဇနကံ ကာမာဝစရကုသလာကုသလံ, တံသဒိသံ ဝါ ကာမာဝစရကိရိယဇဝနံ အနုဗန္ဓတိ, န ပန တဿ ဝိသဒိသာနိ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနာနိ. တထာ ကာမာဝစရသတ္တာနမေဝ တဒါရမ္မဏံ ဣစ္ဆန္တိ, န ဗြဟ္မာနံ တဒါရမ္မဏူပနိဿယဿ ကာမာဝစရပဋိသန္ဓိဗီဇဿာဘာဝတော. တထာ ကာမာဝစရဓမ္မေသွေဝ အာရမ္မဏဘူတေသု ဣစ္ဆန္တိ. န ဣတရေသု အပရိစိတတ္တာ. ယထာ ဟိ သော ဗာလကော ဇနကံ, တံသဒိသံ ဝါ အနုဂစ္ဆန္တောပိ အရညာဒိအပရိစိတဋ္ဌာနံ ဂစ္ဆန္တံ အနနုဗန္ဓိတွာ ပမုခင်္ဂဏာဒိမှိ ပရိစိတဋ္ဌာနေယေဝ အနုဗန္ဓတိ, ဧဝမိဒမ္ပိ ရူပါဝစရာဒိအပရိစိတာရမ္မဏံ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တန္တံ နာနုဗန္ဓတိ. အပိစ ကာမတဏှာယတ္တကမ္မဇနိတတ္တာပိ ဧတံ ကာမတဏှာရမ္မဏေသု ပရိတ္တဓမ္မေသွေဝ ပဝတ္တတီတိ ဝုတ္တောဝါယမတ္ထော. ဟောန္တိ စေတ္ထ – २९. 'कामावचर...पे... इच्छन्ति' यामध्ये कामावचर जवनाच्या शेवटीच तदारंमणाची इच्छा करतात (तदारंमण होते असे मानतात), कारण ते कामतृष्णा-मूलक कर्मापासून उत्पन्न झालेले असते. कारण कामतृष्णा-हेतुक कर्माने उत्पन्न केलेले ते (तदारंमण विपाक चित्त), त्या स्वभावाचे नसलेल्या रूपावचर, अरूपावचर आणि लोकोत्तर जवनांच्या अव्यवहित नंतर उत्पन्न होत नाही. याचे कारण काय? ते जवन तदारंमणाला उत्पन्न करणारे नसल्यामुळे (अजनकत्वामुळे), आणि जनक कर्माशी त्याचे समानत्व नसल्यामुळे. ज्याप्रमाणे घरातून बाहेर पडू इच्छिणारा लहान मुलगा आपल्या जनकाला (वडिलांना) किंवा त्यांच्यासारख्या कोणाला बोटाला धरून बाहेर पडतो, इतर कोणा राजपुरुषादीला धरून नाही; त्याचप्रमाणे भवंगाच्या विषयापेक्षा अन्य विषयामध्ये प्रवृत्त होणारे तदारंमण आपल्या जनक अशा कामावचर कुशल-अकुशल जवनाचा किंवा त्याच्यासारख्या कामावचर क्रिया जवनाचा अनुबंध (अनुसरण) करते, परंतु त्याच्याशी विसदृश असलेल्या महग्गत आणि लोकोत्तर जवनांचे अनुसरण करत नाही. तसेच, कामावचर सत्त्वांच्याच संतानामध्ये तदारंमणाची इच्छा करतात, ब्रह्मांच्या संतानामध्ये नाही; कारण तदारंमणाचा बलवान आश्रय (उपनिश्रय) असलेल्या कामावचर प्रतिसंधी-बीजाचा तिथे अभाव असतो. तसेच, कामावचर धर्मच आलंबन असताना तदारंमणाची इच्छा करतात, इतर (महग्गत, लोकोत्तर, प्रज्ञप्ती) आलंबनांमध्ये नाही, कारण ते अपरिचित असतात. ज्याप्रमाणे तो लहान मुलगा आपल्या जनकाचे किंवा त्यांच्यासारख्याचे अनुसरण करत असताना सुद्धा, अरण्यासारख्या अपरिचित ठिकाणी जाणाऱ्याच्या मागे न जाता, घरासमोरील अंगणासारख्या परिचित ठिकाणीच अनुसरण करतो; त्याचप्रमाणे हे तदारंमण सुद्धा रूपावचरादी अपरिचित आलंबनाला घेऊन प्रवृत्त होणाऱ्या जवनाचे अनुसरण करत नाही. शिवाय, कामतृष्णेच्या अधीन असलेल्या कर्माने उत्पन्न झाल्यामुळे सुद्धा हे तदारंमण कामतृष्णेचे आलंबन असलेल्या परीत्त (कामावचर) धर्मांमध्येच प्रवृत्त होते, हा अर्थ पूर्वी सांगितलाच आहे. याविषयी खालील गाथा आहेत – ‘‘ဇနကံ တံသမာနံ ဝါ, ဇဝနံ အနုဗန္ဓတိ; န တု အညံ တဒါလမ္ဗံ, ဗာလဒါရကလီလယာ. “लहान मुलाच्या लीलेप्रमाणे (खेळाप्रमाणे), तदारंमण आपल्या जनक (उत्पन्न करणाऱ्या) किंवा त्याच्या समान असलेल्या जवनाचा अनुबंध (अनुसरण) करते, परंतु इतर जवनांचे अनुसरण करत नाही.” ‘‘ဗီဇဿာဘာဝတော နတ္ထိ, ဗြဟ္မာနမ္ပိ ဣမဿ ဟိ; ပဋိသန္ဓိမနော ဗီဇံ, ကာမာဝစရသညိတံ. “बीजाचा अभाव असल्यामुळे ब्रह्मांच्या ठिकाणी सुद्धा हे तदारंमण नसते. कारण कामावचर नावाने ओळखले जाणारे प्रतिसंधी-चित्त हेच या तदारंमणाचे बीज आहे.” ‘‘ဌာနေ ပရိစိတေယေဝ, တံ ဣဒံ ဗာလကော ဝိယ; အနုယာတီတိ နာညတ္ထ, ဟောတိ တဏှာဝသေန ဝါ’’တိ. “ज्याप्रमाणे तो लहान मुलगा केवळ परिचित ठिकाणीच अनुसरण करतो, त्याचप्रमाणे हे तदारंमण सुद्धा केवळ परिचित अशा कामावचर आलंबनामध्येच त्या जवनाचे अनुसरण करते, इतरत्र नाही; किंवा ते कामतृष्णेच्या वशाने प्रवृत्त होते.” နနု စ ‘‘ကာမာဝစရပဋိသန္ဓိဗီဇာဘာဝတော’’တိ ဝုတ္တံ, တထာ စ စက္ခုဝိညာဏာဒီနမ္ပိ အဘာဝေါ အာပဇ္ဇတီတိ? နာပဇ္ဇတိ ဣန္ဒြိယပ္ပဝတ္တိအာနုဘာဝတော, ဒွါရဝီထိဘေဒေ စိတ္တနိယမတော စ. शंका: 'कामावचर प्रतिसंधी-बीजाचा अभाव असल्यामुळे' (ब्रह्मांच्या ठिकाणी तदारंमण होत नाही) असे म्हटले आहे, तर मग त्यांच्या ठिकाणी चक्षुविज्ञानादी विपाक चित्तांचा सुद्धा अभाव प्राप्त होईल ना? उत्तर: नाही, प्राप्त होत नाही; कारण इंद्रियांच्या प्रवृत्तीच्या सामर्थ्यामुळे आणि द्वार-वीथीच्या भेदांमध्ये चित्ताच्या नियमामुळे. တဒါရမ္မဏနိယမဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. तदारंमण-नियम वर्णन समाप्त झाले. ဇဝနနိယမဝဏ္ဏနာ जवन-नियम वर्णन. ၃၂. မန္ဒပ္ပဝတ္တိယန္တိ [Pg.155] မရဏာသန္နကာလေ ဝတ္ထုဒုဗ္ဗလတာယ မန္ဒီဘူတဝေဂတ္တာ မန္ဒံ ဟုတွာ ပဝတ္တိယံ. မရဏကာလာဒီသူတိ အာဒိ-သဒ္ဒေန မုစ္ဆာကာလံ သင်္ဂဏှာတိ. ३२. 'मंदप्पवत्तियं' म्हणजे मरणासन्न काळी (हृदय) वस्तूच्या दुर्बलतेमुळे जवनाचा वेग मंद झाल्याने मंद गतीने प्रवृत्त होण्याच्या अवस्थेत. 'मरणकालादीसू' यामधील 'आदी' शब्दाने मूर्च्छेचा काळ (बेहोशीचा काळ) ग्रहण केला जातो. ၃၃. ဘဂဝတော…ပေ… ဝဒန္တီတိ ဘဂဝတော ယမကပါဋိဟာရိယကာလာဒီသု ဥဒကက္ခန္ဓအဂ္ဂိက္ခန္ဓပ္ပဝတ္တနာဒိအတ္ထံ ဝိသုံ ဝိသုံ ပါဒကဇ္ဈာနံ သမာပဇ္ဇိတွာ တတော ဝုဋ္ဌာယ ဈာနဓမ္မေ ဝိသုံ ဝိသုံ အာဝဇ္ဇေန္တဿ အာဝဇ္ဇနဝသိတာယ မတ္ထကပ္ပတ္တိယာ အာဝဇ္ဇနတပ္ပရောဝ စိတ္တာဘိနီဟာရော ဟောတီတိ ယထာဝဇ္ဇိတဈာနင်္ဂါရမ္မဏာနိ စတ္တာရိ, ပဉ္စဝါ ပစ္စဝေက္ခဏဇဝနစိတ္တာနိ ပဝတ္တန္တီတိ ဝဒန္တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၇၈) အဋ္ဌကထာစရိယာ. ‘‘ဘဂဝတော’’တိ စ ဣဒံ နိဒဿနမတ္တံ အညေသမ္ပိ ဓမ္မသေနာပတိအာဒီနံ ဧဝရူပေ အစ္စာယိကကာလေ အပရိပုဏ္ဏဇဝနာနံ ပဝတ္တနတော. တထာ စ ဝုတ္တံ အဋ္ဌကထာယံ ‘‘အယဉ္စ မတ္ထကပ္ပတ္တာ ဝသိတာ ဘဂဝတော ယမကပါဋိဟာရိယကာလေ အညေသံ ဝါ ဧဝရူပေ ကာလေ’’တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၇၈). ‘‘စတ္တာရိ ပဉ္စ ဝါ’’တိ စ ပနေတံ တိက္ခိန္ဒြိယမုဒိန္ဒြိယဝသေန ဂဟေတဗ္ဗန္တိ အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရေန (ဝိသုဒ္ဓိ. မဟာ. ၁.၇၈) ဝုတ္တံ, တသ္မာ ဘဂဝတော စတ္တာရိ, အညေသံ ပဉ္စပီတိ ယုတ္တံ ဝိယ ဒိဿတိ. ३३. 'भगवतो...पे... वदन्ति' म्हणजे भगवंतांनी यमकप्रातिहार्य (जोड चमत्कार) दाखवण्याच्या काळी जलस्कंध आणि अग्निसंध प्रवृत्त करणे इत्यादी कार्यासाठी वेगवेगळ्या पादक ध्यानांची समापत्ती प्राप्त करून, त्यातून उठून ध्यानधर्मांचे (ध्यान अंगांचे) वेगवेगळ्या प्रकारे आवर्जन (चिंतन) करत असताना, आवर्जन वशितेच्या (आवर्जनावरील प्रभुत्वाच्या) शिखरावर पोहोचल्यामुळे, केवळ आवर्जन-प्रधान असाच चित्ताचा अभिनिहार (चित्त वळवणे) होतो. त्यामुळे ज्या ज्या ध्यान अंगांचे आवर्जन केले आहे, ते आलंबन असलेली चार किंवा पाच वेळा प्रत्यवेक्षण जवन चित्ते प्रवृत्त होतात, असे अट्ठकथाचार्य म्हणतात. 'भगवतो' (भगवंतांचे) हे केवळ एक उदाहरण आहे, कारण इतर धर्मसेनापती (सारिपुत्त) आदींच्या ठिकाणी सुद्धा अशा अत्यंत तातडीच्या प्रसंगी अपूर्ण (७ पेक्षा कमी) जवने प्रवृत्त होतात. तसेच अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे: 'आणि ही शिखरावर पोहोचलेली वशिता भगवंतांच्या यमकप्रातिहार्य काळी किंवा इतरांच्या अशाच तातडीच्या प्रसंगी असते.' 'चार किंवा पाच' हे तीक्ष्णेंद्रिय (तीव्र प्रज्ञा असलेले) आणि मृदुइंद्रिय (मंद प्रज्ञा असलेले) यांच्या वशाने ग्रहण करावे, असे आचार्य धम्मपाल थेरांनी म्हटले आहे. म्हणून भगवंतांच्या संतानामध्ये चार आणि इतरांच्या संतानामध्ये पाच (प्रत्यवेक्षण जवने) होतात, हेच योग्य वाटते. ၃၄. အာဒိကမ္မိကဿာတိ အာဒိတော ကတယောဂကမ္မဿ. ပဌမံ နိဗ္ဗတ္တာ အပ္ပနာ ပဌမကပ္ပနာ. အဘိညာဇဝနာနမ္ပိ ‘‘ပဌမကပ္ပနာယာ’’တိ အဓိကာရော သိယာတိ အာဟ ‘‘သဗ္ဗဒါပီ’’တိ, ပဌမုပ္ပတ္တိကာလေ, စိဏ္ဏဝသီကာလေ စ ပဉ္စာဘိညာဇဝနာနိ ဧကဝါရမေဝ ဇဝန္တီတျတ္ထော. ३४. आदिकम्मिकस्स म्हणजे सुरुवातीला ज्याने योगाभ्यास (कर्मस्थान भावना) सुरू केला आहे अशा योगी पुरुषाची. पहिल्यांदा उत्पन्न झालेली अप्पना म्हणजे 'प्रथम कल्पनेने उत्पन्न झालेली अप्पना' (प्रथम कल्पनावस्था) होय. अभिज्ञा जवनांच्या बाबतीत सुद्धा 'प्रथम कल्पनेने' या शब्दाचा अधिकार (अनुवृत्ती) असावा, म्हणून 'नेहमीच' (सब्बदापि) असे म्हटले आहे. याचा अर्थ असा की, पहिल्यांदा उत्पन्न होण्याच्या वेळी आणि वशीभाव (सराव) प्राप्त झालेल्या वेळी सुद्धा पाच लौकिक अभिज्ञा जवने केवळ एकच वेळ जवतात (प्रवृत्त होतात). ၃၅. မဂ္ဂါယေဝ ဥပ္ပဇ္ဇနတော မဂ္ဂုပ္ပာဒါ. ယထာရဟန္တိ ပဉ္စမံ ဝါ စတုတ္ထံ ဝါ ဥပ္ပန္နမဂ္ဂါနုရူပံ. သတ္တဇဝနပရမတ္တာ ဟိ ဧကာဝဇ္ဇနဝီထိယာ [Pg.156] စတုတ္ထံ ဥပ္ပန္နမဂ္ဂတော ပရံ တီတိ ဖလစိတ္တာနိ, ပဉ္စမံ ဥပ္ပန္နမဂ္ဂတော ပရံ ဒွေ ဝါ ဟောန္တိ. ३५. केवळ मार्गच उत्पन्न होत असल्यामुळे त्यांना 'मग्गुप्पाद' (मार्ग उत्पाद) म्हणतात. 'यथारहं' (योग्यतेनुसार) म्हणजे उत्पन्न झालेल्या मार्गाच्या अनुरूप चौथे किंवा पाचवे जवन होय. कारण, एका आवर्जन विथीमध्ये जास्तीत जास्त सात जवनेच मर्यादा असल्यामुळे, चौथ्या वेळी मार्ग उत्पन्न झाल्यास त्यानंतर तीन फलचित्ते उत्पन्न होतात आणि पाचव्या वेळी मार्ग उत्पन्न झाल्यास त्यानंतर दोनच फलचित्ते उत्पन्न होतात. ၃၆. နိရောဓသမာပတ္တိကာလေတိ နိရောဓဿ ပုဗ္ဗဘာဂေ. စတုတ္ထာရုပ္ပဇဝနန္တိ ကုသလကိရိယာနံ အညတရံ နေဝသညာနာသညာယတနဇဝနံ. အနာဂါမိခီဏာသဝါယေဝ နိရောဓသမာပတ္တိံ သမာပဇ္ဇန္တိ, န သောတာပန္နသကဒါမိနောတိ ဝုတ္တံ ‘‘အနာဂါမိဖလံ ဝါ အရဟတ္တဖလံ ဝါ’’တိ. ဝိဘတ္တိဝိပလ္လာသော စေတ္ထ ဒဋ္ဌဗ္ဗော ‘‘အနာဂါမိဖလေ ဝါ အရဟတ္တဖလေ ဝါ’’တိ. တေနာဟ ‘‘နိရုဒ္ဓေ’’တိ. ယထာရဟန္တိ တံတံပုဂ္ဂလာနုရူပံ. ३६. निरोध समापत्तीच्या वेळी म्हणजे निरोधाच्या पूर्वभागात (सुरुवातीला). 'चौथे अरूप जवन' म्हणजे कुशल किंवा क्रिया चित्तांपैकी कोणतेतरी एक 'नेवसञ्ञानासञ्ञायतन जवन' होय. केवळ अनागामी आणि क्षीणास्रव (अर्हत) व्यक्तीच निरोध समापत्तीमध्ये समापन्न होऊ शकतात, स्रोतापन्न आणि सकदागामी व्यक्ती समापन्न होऊ शकत नाहीत; म्हणूनच 'अनागामी फल किंवा अर्हत फल' असे म्हटले आहे. येथे विभक्तीचा विपर्यास (बदल) समजावा, म्हणजेच 'अनागामी फलामध्ये किंवा अर्हत फलामध्ये' असा अर्थ घ्यावा. म्हणूनच 'निरुद्धे' (निरोध झाल्यावर) असे म्हटले आहे. 'यथारहं' म्हणजे त्या त्या व्यक्तीच्या (अनागामी किंवा अर्हत) अनुरूप. ၃၈. သဗ္ဗတ္ထာပိ သမာပတ္တိဝီထိယန္တိ သကလာယပိ ဈာနသမာပတ္တိဝီထိယံ, ဖလသမာပတ္တိဝီထိယဉ္စ. ३८. 'सर्व ठिकाणी समापत्ती विथीमध्ये' म्हणजे संपूर्ण ध्यान समापत्ती विथीमध्ये आणि फल समापत्ती विथीमध्ये सुद्धा. ၃၉. ပရိတ္တာနိ ဇဝနာနိ သတ္တက္ခတ္တုံ မတာနိ ဥက္ကံသကောဋိယာ. မဂ္ဂါဘိညာ ပန သကိံ ဧကဝါရမေဝ မတာ. အဝသေသာနိ အဘိညာမဂ္ဂဝဇ္ဇိတာနိ မဟဂ္ဂတလောကုတ္တရဇဝနာနိ ဗဟူနိပိ လဗ္ဘန္တိ သမာပတ္တိဝီထိယံ အဟောရတ္တမ္ပိ ပဝတ္တနတော. အပိ-သဒ္ဒေန လောကိယဇ္ဈာနာနိ ပဌမကပ္ပနာယံ, အန္တိမဖလဒွယဉ္စ နိရောဓာနန္တရံ ဧကဝါရံ, ဖလစိတ္တာနိ မဂ္ဂါနန္တရံ ဒွတ္တိက္ခတ္တုမ္ပီတိ သမ္ပိဏ္ဍေတိ. ३९. परीत्त (कामावचर) जवने उत्कृष्ट मर्यादेने (जास्तीत जास्त) सात वेळा मानली जातात. परंतु मार्ग जवने आणि अभिज्ञा जवने केवळ एकदाच (एकच वेळ) मानली जातात. उर्वरित, म्हणजे अभिज्ञा आणि मार्ग जवने वगळून इतर महग्गत आणि लोकोत्तर जवने समापत्ती विथीमध्ये अहोरात्र (दिवस-रात्र) सुद्धा प्रवृत्त होत असल्यामुळे अनेक वेळा प्राप्त होतात. 'अपि' (सुद्धा) या शब्दाने—लौकिक ध्यान जवने पहिल्या अप्पनावस्थेत एक वेळ, अंतिम दोन फले (अनागामी फल व अर्हत फल) निरोध समापत्तीच्या लगेच नंतर एक वेळ, आणि फलचित्ते मार्गाच्या लगेच नंतर दोन किंवा तीन वेळा सुद्धा प्राप्त होतात—हा सर्व अर्थ एकत्रित केला आहे. ဇဝနနိယမဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. जवन नियमाचे वर्णन समाप्त झाले. ပုဂ္ဂလဘေဒဝဏ္ဏနာ पुद्गल भेद वर्णन (व्यक्तींच्या वर्गीकरणाचे वर्णन) ၄၀. ဣဒါနိ ဒုဟေတုကာဟေတုကာပါယိကာဟေတုကတိဟေတုကဝသေန စတုဗ္ဗိဓာနံ ပုထုဇ္ဇနာနံ, မဂ္ဂဋ္ဌဖလဋ္ဌဝသေန အဋ္ဌဝိဓာနံ အရိယာနန္တိ ဒွါဒသန္နံ ပုဂ္ဂလာနံ ဥပ္ပဇ္ဇနကဝီထိစိတ္တပရိစ္ဆေဒဒဿနတ္ထံ ပဌမံ တာဝ တေသံ ဝဇ္ဇိတဗ္ဗစိတ္တာနိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ဒုဟေတုကာနမဟေတုကာနဉ္စာ’’တျာဒိ. ပဋိသန္ဓိဝိညာဏသဟဂတာလောဘာဒေါသဝသေန ဒွေ ဟေတူ [Pg.157] ဣမေသန္တိ ဒွိဟေတုကာ. တာဒိသာနံ ဟေတူနံ အဘာဝတော အဟေတုကာ. မ-ကာရော ပဒသန္ဓိကရော. အပ္ပနာဇဝနာနိ န လဗ္ဘန္တိ ဝိပါကာဝရဏသဗ္ဘာဝတော. ဒွိဟေတုကာဟေတုကပဋိသန္ဓိ ဟိ ‘‘ဝိပါကာဝရဏ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. အပ္ပနာဇဝနာဘာဝတောယေဝ အရဟတ္တံ နတ္ထီတိ ကိရိယဇဝနာနိ န လဗ္ဘန္တိ. ४०. आता, द्विहेतुक, सुगती अहेतुक, अपायभूमीतील दुर्गती अहेतुक आणि त्रिहेतुक अशा चार प्रकारच्या पृथग्जनांच्या (सामान्य लोकांच्या), तसेच मार्गस्थ आणि फलस्थ अशा आठ प्रकारच्या आर्य व्यक्तींच्या—अशा एकूण बारा प्रकारच्या व्यक्तींच्या संतानात उत्पन्न होणाऱ्या विथीचित्तांचा विभाग दाखवण्यासाठी, सर्वात आधी त्यांच्यासाठी वर्ज्य असणारी (न मिळणारी) चित्ते दाखवण्यासाठी 'दुहेतुकानमहेतुकानञ्च' (द्विहेतुक आणि अहेतुक व्यक्तींना) इत्यादी म्हटले आहे. प्रतिसंधी विज्ञानासोबत उत्पन्न होणाऱ्या अलोभ आणि अद्वेष या दोन हेतूंच्या योगाने ज्यांच्यामध्ये दोन हेतू असतात, त्यांना 'द्विहेतुक' म्हणतात. तशा प्रकारच्या हेतूंच्या अभावामुळे त्यांना 'अहेतुक' म्हणतात. 'म' हा वर्ण पदसंधी करणारा आहे. विपाकावरण (विपाक रूपी अडथळा) विद्यमान असल्यामुळे त्यांना अप्पना जवने प्राप्त होत नाहीत. कारण, द्विहेतुक प्रतिसंधी आणि अहेतुक प्रतिसंधीला 'विपाकावरण' असे म्हटले जाते. अप्पना जवनांच्या अभावामुळेच त्यांच्यामध्ये अर्हत्त्व नसते, म्हणून त्यांना क्रिया जवने प्राप्त होत नाहीत. ၄၁. ‘‘သဟေတုကံ (ပဋ္ဌာ. ၃.၁.၁၀၂) ဘဝင်္ဂံ အဟေတုကဿ ဘဝင်္ဂဿ အနန္တရပစ္စယေန ပစ္စယော’’တိ ပါဌတော အဟေတုကာနမ္ပိ နာနာကမ္မေန ဒွိဟေတုကတဒါရမ္မဏံ သမ္ဘဝတိ, ဒွိဟေတုကာနံ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. မူလသန္ဓိယာ ပန ဇဠဘာဝတော ဥဘိန္နမ္ပိ နတ္ထိ တိဟေတုကတဒါရမ္မဏန္တိ အာဟ ‘‘တထာ ဉာဏသမ္ပယုတ္တဝိပါကာနိ စာ’’တိ. အာစရိယဇောတိပါလတ္ထေရေန ပန ‘‘သဟေတုကံ ဘဝင်္ဂ’’န္တိ အဝိသေသေန ဝုတ္တတ္တာ အဟေတုကာနမ္ပိ တိဟေတုကတဒါရမ္မဏံ ဝတွာ ဣဓ ဉာဏသမ္ပယုတ္တဝိပါကာဘာဝဝစနဿ ပရိဟာသဝသေန ‘‘သော ဧဝ ပုစ္ဆိတဗ္ဗော, ယော တဿ ကတ္တာ’’တိ ဝုတ္တံ, တံ ပန ပရိဟာသဝသေန ဝုတ္တမ္ပိ အာစရိယံ ပုစ္ဆိတွာဝ ဝိဇာနနတ္ထံ ဝုတ္တဝစနံ ဝိယ ဌိတံ. တထာ ဟိ အာစရိယေနေဝေတ္ထ ကာရဏံ ပရမတ္ထဝိနိစ္ဆယေ ဝုတ္တံ – ४१. 'सहेतुक भवांग हे अहेतुक भवांगाला अनंतर प्रत्ययाने प्रत्यय (कारण) होते' या पट्ठान पाठावरून अहेतुक व्यक्तींच्या संतानात सुद्धा विविध कर्मांमुळे द्विहेतुक तदारंमण संभवते; मग द्विहेतुक व्यक्तींच्या संतानात ते संभवते याबद्दल तर बोलण्याची गरजच नाही. परंतु मूळ प्रतिसंधीच्या मंदत्वामुळे (दुर्बलतेमुळे) दोन्ही (अहेतुक व द्विहेतुक) व्यक्तींच्या संतानात त्रिहेतुक तदारंमण संभवत नाही; म्हणूनच 'तसेच ज्ञानसंप्रयुक्त विपाक चित्ते सुद्धा' (प्राप्त होत नाहीत) असे म्हटले आहे. परंतु आचार्य जोतिपाल थेरांनी 'सहेतुक भवांग' असे सामान्यपणे म्हटलेले असल्यामुळे अहेतुक व्यक्तींच्या संतानात सुद्धा त्रिहेतुक तदारंमण संभवते असे सांगून, या ग्रंथातील ज्ञानसंप्रयुक्त विपाक चित्तांच्या अभावाच्या वचनाला उपहासाने 'ज्याने हे रचले आहे, त्यालाच विचारले पाहिजे' असे म्हटले आहे. परंतु ते उपहासाने म्हटलेले असले तरी, आचार्य अनुरुद्धांना विचारूनच सर्वांना समजण्यासाठी म्हटलेल्या वचनाप्रमाणे ते प्रमाणभूत राहते. कारण आचार्यांनीच येथे याचे कारण 'परमत्थविनिच्छय' ग्रंथात सांगितले आहे – ‘‘ဉာဏပါကာ န ဝတ္တန္တိ, ဇဠတ္တာ မူလသန္ဓိယာ’’တိ; (ပရမ. ဝိ. ၂၇၁); 'मूळ प्रतिसंधीच्या मंदत्वामुळे (दुर्बलतेमुळे) ज्ञानसंप्रयुक्त विपाक चित्ते प्रवृत्त होत नाहीत.' အပရေ ပန ‘‘ယထာ အဟေတုကာနံ သဟေတုကတဒါရမ္မဏံ ဟောတိ, ဧဝံ ဒွိဟေတုကာနံ တိဟေတုကတဒါရမ္မဏမ္ပီ’’တိ ဝဏ္ဏေန္တိ, တေသံ မတာနုရောဓေန စ ဣဓာပိ ဉာဏသမ္ပယုတ္တဝိပါကပဋိက္ခေပေါ အဟေတုကေယေဝ သန္ဓာယာတိ ဝဒန္တိ. တတ္ထ ပန ပမာဏပါဌာဘာဝတော အာစရိယေန ဥဘိန္နမ္ပိ သာဓာရဏဝသေန ဉာဏသမ္ပယုတ္တဝိပါကာဘာဝေ ကာရဏံ ဝတွာ သမကမေဝ စိတ္တပရိစ္ဆေဒဿ ဒဿိတတ္တာ တေသံ ဝစနံ ဝီမံသိတွာ သမ္ပဋိစ္ဆိတဗ္ဗံ. အဟေတုကာပေက္ခာယ စေတ္ထ [Pg.158] ‘‘သုဂတိယ’’န္တိ ဝစနံ, တံ ပန အတ္ထတော အနုညာတဒွိဟေတုကဝိပါကာနံ တတ္ထေဝ သမ္ဘဝဒဿနပရံ. တေနာဟ ‘‘ဒုဂ္ဂတိယံ ပနာ’’တျာဒိ. परंतु इतर आचार्य असे वर्णन करतात की, 'जसे अहेतुक व्यक्तींच्या संतानात सहेतुक तदारंमण होते, तसेच द्विहेतुक व्यक्तींच्या संतानात त्रिहेतुक तदारंमण सुद्धा होते.' आणि त्यांच्या मतानुसार, या ग्रंथात सुद्धा ज्ञानसंप्रयुक्त विपाक चित्तांचा निषेध केवळ अहेतुक व्यक्तींनाच उद्देशून केला आहे, असे ते म्हणतात. परंतु त्या बाबतीत कोणताही प्रमाणभूत पाठ उपलब्ध नसल्यामुळे, आणि आचार्यांनी दोन्ही व्यक्तींच्या संतानात सामायिक रूपाने ज्ञानसंप्रयुक्त विपाक चित्तांच्या अभावाचे कारण सांगून समान रूपानेच चित्त विभागाचे दर्शन घडवले असल्यामुळे, त्यांचे ते वचन विचारपूर्वक तपासूनच स्वीकारले पाहिजे. येथे अहेतुक व्यक्तीच्या अपेक्षेने 'सुगतीमध्ये' (सुगतियं) असे म्हटले आहे, परंतु अर्थाच्या दृष्टीने ते केवळ मान्य केलेल्या द्विहेतुक विपाक चित्तांचा त्याच सुगती भूमीत संभव दाखवण्यापुरतेच मर्यादित आहे. म्हणूनच 'दुर्गतीमध्ये तर' (दुग्गतियं पन) इत्यादी म्हटले आहे. ၄၃. တိဟေတုကေသူတိ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏသဟဂတာလောဘာဒေါသာမောဟဝသေန တိဟေတုကေသု ပုထုဇ္ဇာဒီသူ နဝဝိဓပုဂ္ဂလေသု. ४३. 'त्रिहेतुकेषु' (त्रिहेतुक व्यक्तींमध्ये) म्हणजे प्रतिसंधी विज्ञानासोबत उत्पन्न होणाऱ्या अलोभ, अद्वेष आणि अमोह या तीन हेतूंच्या योगाने त्रिहेतुक असणाऱ्या पृथग्जन इत्यादी नऊ प्रकारच्या व्यक्तींमध्ये. ၄၅. ဒိဋ္ဌီ…ပေ… သေက္ခာနန္တိ သိက္ခာယ အပရိပူရကာရိတာယ သိက္ခနသီလတာယ ‘‘သေက္ခာ’’တိ လဒ္ဓနာမာနံ သောတာပန္နသကဒါဂါမီနံ ပုဂ္ဂလာနံ ပဌမမဂ္ဂေနေဝ သက္ကာယဒိဋ္ဌိဝိစိကိစ္ဆာနံ ပဟီနတ္တာ တံသဟဂတဇဝနာနိ စေဝ စ-သဒ္ဒေန အာကဍ္ဎိတာနိ ခီဏာသဝါဝေဏိကာနိ ကိရိယဇဝနာနိ စ န လဗ္ဘန္တိ. ४५. 'दिट्ठी...पे... सेक्खानं' (दृष्टी... इत्यादी शैक्षांच्या संतानात) म्हणजे तीन शिक्षांचे (शील, समाधी, प्रज्ञा) पूर्णपणे आचरण न केल्यामुळे आणि अजूनही अभ्यास करण्याच्या स्वभावामुळे 'शैक्ष' (सेक्ख) असे नाव मिळालेल्या स्रोतापन्न आणि सकदागामी व्यक्तींच्या संतानात, पहिल्या मार्गानेच (स्रोतापत्ती मार्गानेच) सत्कायदृष्टी आणि विचिकित्सा यांचे प्रहाण (नाश) झाले असल्यामुळे, त्यांच्याशी संप्रयुक्त असणारी जवने आणि 'च' (आणि) या शब्दाने ग्रहण केलेली, केवळ क्षीणास्रव (अर्हत) व्यक्तींमध्येच असणारी क्रिया जवने सुद्धा प्राप्त होत नाहीत. ၄၆. ပဋိဃဇဝနာနိ စာတိ ဒေါမနဿဇဝနာနိ စေဝ ဒိဋ္ဌိသမ္ပယုတ္တဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတကိရိယဇဝနာနိ စ. ४६. 'प्रतिघ जवने सुद्धा' म्हणजे दौर्मनस्य (द्वेषमूलक) जवने, तसेच दृष्टीसंप्रयुक्त जवने, विचिकित्सासहगत जवने आणि क्रिया जवने सुद्धा (प्राप्त होत नाहीत). ၄၇. လောကုတ္တရ…ပေ… သမုပ္ပဇ္ဇန္တီတိ စတုန္နံ မဂ္ဂါနံ ဧကစိတ္တက္ခဏိကဘာဝေန ပုဂ္ဂလန္တရေသု အသမ္ဘဝတော, ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမာနဉ္စ ဥပရူပရိသမာပတ္တိယာ အနဓိဂတတ္တာ, ဥပရူပရိပုဂ္ဂလာနဉ္စ အသမုဂ္ဃာဋိတကမ္မကိလေသနိရောဓေန ပုထုဇ္ဇနေဟိ ဝိယ သောတာပန္နာနံ သောတာပန္နာဒီဟိ ပုဂ္ဂလန္တရဘာဝူပဂမနေန ပဋိပ္ပဿဒ္ဓတ္တာ စ အဋ္ဌပိ လောကုတ္တရဇဝနာနိ ယထာသကံ မဂ္ဂဖလဋ္ဌာနံ အရိယာနမေဝ သမုပ္ပဇ္ဇန္တိ. ४७. 'लोकोत्तर...पे... समुपज्जन्ति' (लोकोत्तर जवने उत्पन्न होतात) म्हणजे चार मार्ग केवळ एक चित्तक्षण मात्र असण्याच्या स्वभावामुळे इतर व्यक्तींमध्ये संभवत नसल्यामुळे; खालच्या स्तरावरील व्यक्तींनी उच्च स्तरावरील समापत्ती प्राप्त न केल्यामुळे; आणि उच्च स्तरावरील व्यक्तींच्या संतानात नष्ट न झालेल्या कर्म व क्लेशांच्या निरोधाने (अभावाने), पृथग्जनांकडून स्रोतापन्न अवस्थेत किंवा स्रोतापन्न इत्यादींकडून दुसऱ्या उच्च आर्य अवस्थेत प्रवेश केल्यामुळे (खालची क्लेशयुक्त जवने) शांत (नष्ट) झाल्यामुळे, आठही लोकोत्तर जवने आपापल्या मार्ग आणि फल अवस्थेत स्थित असलेल्या आर्य व्यक्तींच्या संतानातच उत्पन्न होतात. ၄၈. ဣဒါနိ တေသံ တေသံ ပုဂ္ဂလာနံ ယထာပဋိက္ခိတ္တဇဝနာနိ ဝဇ္ဇေတွာ ပါရိသေသတော လဗ္ဘမာနဇဝနာနိ သမ္ပိဏ္ဍေတွာ ဒဿေတုံ ‘‘အသေက္ခာန’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. တိဝိဓသိက္ခာယ ပရိပူရကာရိဘာဝတော အသေက္ခာနံ ခီဏာသဝါနံ တေတ္တိံသဝိဓကုသလာကုသလဿ, ဟေဋ္ဌိမဖလတ္တယဿ, ဝီထိမုတ္တာနဉ္စ နဝမဟဂ္ဂတဝိပါကာနံ ဝသေန ပဉ္စစတ္တာလီသဝဇ္ဇိတာနိ သေသာနိ [Pg.159] တေဝီသတိကအာမာဝစရဝိပါကဝီသတိကိရိယအရဟတ္တဖလဝသေန စတုစတ္တာလီသ ဝီထိစိတ္တာနိ သမ္ဘဝါ ယထာလာဘံ ကာမဘဝေ ဌိတာနံ ဝသေန ဥဒ္ဒိသေ. ४८. आता त्या त्या पुद्गलांच्या बाबतीत, ज्या ज्या वर्ज्य केलेल्या जवनांना वगळून, उर्वरित रूपाने प्राप्त होणाऱ्या जवनांना एकत्रित करून दर्शवण्यासाठी 'असेक्खानं' इत्यादी म्हटले आहे. त्रिविध शिक्षेचे परिपूर्ण पालन करणारे असल्यामुळे 'असेक्ख' म्हटल्या जाणाऱ्या क्षीणासवांच्या (अर्हंतांच्या) बाबतीत, ३३ प्रकारची कुशल-अकुशल चित्ते, खालील तीन फलचित्ते आणि वीथीमुक्त असलेली ९ महग्गत विपाक चित्ते या द्वारे ४५ चित्ते वगळून; उर्वरित २३ कामावचर विपाक, २० क्रिया आणि अर्हत्त्वफल चित्तांच्या रूपाने ४४ वीथीचित्ते संभवतात. हे वीथीचित्ते यथालाभ कामभवात स्थित असलेल्या पुद्गलांच्या द्वारे निर्देशित करावेत. သေက္ခာနံ အဋ္ဌာရသကိရိယဇဝနဒိဋ္ဌိဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတပဉ္စကအဂ္ဂဖလမဟဂ္ဂတဝိပါကဝသေန တေတ္တိံသ ဝဇ္ဇေတွာ တေဝီသတိကာမာဝစရဝိပါကအာဝဇ္ဇနဒွယဧကဝီသတိကုသလသတ္တာကုသလဟေဋ္ဌိမဖလတ္တယဝသေန ဆပ္ပညာသ ဝီထိစိတ္တာနိ ယထာသမ္ဘဝံ ဥဒ္ဒိသေ အဝိသေသတော. ဝိသေသတော ပန သောတာပန္နသကဒါဂါမီနံ ဧကပညာသ, အနာဂါမီနံ ဧကူနပညာသ, အဝသေသာနံ စတုန္နံ ပုထုဇ္ဇနာနံ အဋ္ဌာရသကိရိယဇဝနသဗ္ဗလောကုတ္တရမဟဂ္ဂတဝိပါကဝသေန ပဉ္စတိံသ ဝဇ္ဇေတွာ အဝသေသာနိ ကာမာဝစရဝိပါကအာဝဇ္ဇနဒွယလောကိယကုသလာကုသလဝသေန စတုပညာသ ဝီထိစိတ္တာနိ ယထာသမ္ဘဝတော ဥဒ္ဒိသေ အဝိသေသတော. ဝိသေသတော ပန တိဟေတုကာနံ စတုပညာသေဝ လဗ္ဘန္တိ, ဒွိဟေတုကာဟေတုကာနံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တဝိပါကအပ္ပနာဇဝနဝဇ္ဇိတာနိ ဧကစတ္တာလီသ, အာပါယိကာနံ တာနေဝ ဒွိဟေတုကဝိပါကဝဇ္ဇိတာနိ သတ္တတိံသ ဝီထိစိတ္တာနီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. सेक्ख (शैक्ष) पुद्गलांच्या बाबतीत, १८ क्रिया जवन, दृष्टी व विचिकित्सा संप्रयुक्त ५ चित्ते, अग्रफल (अर्हत्त्वफल) आणि महग्गत विपाक या द्वारे ३३ चित्ते वगळून; २३ कामावचर विपाक, २ आवर्जन, २१ कुशल, ७ अकुशल आणि खालील ३ फलचित्ते या द्वारे ५६ वीथीचित्ते सामान्यतः यथासंभव निर्देशित करावेत. विशेषतः तर, स्रोतापन्न आणि सकदागामी यांच्यासाठी ५१, अनागामींसाठी ४९, आणि उर्वरित चार पृथग्जनांच्या बाबतीत १८ क्रिया जवन, सर्व लोकोत्तर चित्ते आणि महग्गत विपाक या द्वारे ३५ चित्ते वगळून; उर्वरित कामावचर विपाक, २ आवर्जन, लौकिक कुशल आणि अकुशल या द्वारे ५४ वीथीचित्ते सामान्यतः यथासंभव निर्देशित करावेत. विशेषतः तर, तिहेतुक पुद्गलांना ५४ चित्तेच प्राप्त होतात; द्विहेतुक आणि अहेतुक पुद्गलांना ज्ञानसंप्रयुक्त विपाक आणि अप्पना जवन वगळून ४१ चित्ते प्राप्त होतात; आणि अपायिक (नरक इत्यादी अपाय भूमीतील) पुद्गलांना तेच द्विहेतुक विपाक वगळून ३७ वीथीचित्ते प्राप्त होतात, असे जाणावे. ပုဂ္ဂလာနံ ဝသေန စိတ္တပ္ပဝတ္တိဘေဒေါ ပုဂ္ဂလဘေဒေါ. पुद्गलांच्या द्वारे चित्तप्रवृत्तीचा भेद म्हणजेच 'पुद्गलभेद' होय. ပုဂ္ဂလဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. पुद्गलभेद वर्णन समाप्त झाले. ဘူမိဝိဘာဂဝဏ္ဏနာ भूमीविभाग वर्णन ၄၉. သဗ္ဗာနိပိ ဝီထိစိတ္တာနိ ဥပလဗ္ဘန္တိ ဆန္နံ ဒွါရာနံ, သဗ္ဗေသဉ္စ ပုဂ္ဂလာနံ တတ္ထ သမ္ဘဝတော. ယထာရဟန္တိ တံတံဘဝါနုရူပံ, တံတံပုဂ္ဂလာနုရူပဉ္စ. ४९. सर्वच वीथीचित्ते प्राप्त होतात, कारण तिथे (कामभवात) सहाही द्वारे आणि सर्व पुद्गल संभवतात. 'यथार्ह' म्हणजे त्या त्या भवानुसार आणि त्या त्या पुद्गलानुसार. ၅၂. တျာဒိနာ [Pg.160] ဃာနဝိညာဏာဒီနမ္ပိ ပဋိက္ခေပေါ ဟေဿတီတိ ရူပါဝစရဘူမိယံ ပဋိဃဇဝနတဒါရမ္မဏာနေဝ ပဋိက္ခိတ္တာနိ. သဗ္ဗတ္ထာပီတိ ကာမဘဝေ, ရူပဘဝေ, အရူပဘဝေ စ. ५२. इत्यादींद्वारे घ्राणविज्ञानादींचाही निषेध होईल, म्हणून रूपावचर भूमीत केवळ प्रतिघजवन (द्वेषमूलक जवन) आणि तदारंमण चित्तेच वर्ज्य केली आहेत. 'सब्बत्थापि' (सर्वत्रही) म्हणजे कामभव, रूपभव आणि अरूपभवात. ၅၄. ကာမဘဝေ ယထာရဟံ ဝီထိမုတ္တဝဇ္ဇာနိ အသီတိ ဝီထိစိတ္တာနိ, ရူပဘဝေ ပဋိဃဒွယအဋ္ဌတဒါရမ္မဏဃာနာဒိဝိညာဏဆက္ကဝီထိမုတ္တကဝသေန ပဉ္စဝီသတိ ဝဇ္ဇေတွာ သေသာနိ အာဝဇ္ဇနဒွယနဝအဟေတုကဝိပါကတေပညာသဇဝနဝသေန စတုသဋ္ဌိ, အရူပေ ဘဝေ တေဝီသတိကာမာဝစရဝိပါကပဌမမဂ္ဂပဉ္စဒသရူပါဝစရပဋိဃဒွယအာရုပ္ပဝိပါကကိရိယမနောဓာတုဟသနဝသေန သတ္တစတ္တာလီသ ဝဇ္ဇေတွာ သေသာနိ ဆဗ္ဗီသတိ ပရိတ္တဇဝနအဋ္ဌအာရုပ္ပဇဝနသတ္တလောကုတ္တရဇဝနမနောဒွါရာဝဇ္ဇနဝသေန ဒွေစတ္တာလီသ စိတ္တာနိ လဗ္ဘရေ ဥပလဗ္ဘန္တိ. ५४. कामभवात यथायोग्य वीथीमुक्त चित्ते वगळून ८० वीथीचित्ते प्राप्त होतात. रूपभवात दोन प्रतिघ चित्ते, आठ तदारंमण चित्ते, घ्राणविज्ञानादी ६ चित्ते आणि वीथीमुक्त चित्ते या द्वारे २५ चित्ते वगळून; उर्वरित दोन आवर्जन, नऊ अहेतुक विपाक आणि ५३ जवन चित्ते या द्वारे ६४ वीथीचित्ते प्राप्त होतात. अरूपभवात २३ कामावचर विपाक, प्रथम मार्ग (स्रोतापत्ती मार्ग), १५ रूपावचर चित्ते, २ प्रतिघ चित्ते, अरूप विपाक, क्रिया मनोधातू (पंचद्वारावर्जन) आणि हसितुत्पाद चित्त या द्वारे ४७ चित्ते वगळून; उर्वरित २६ परीत्त जवन, ८ अरूप जवन, ७ लोकोत्तर जवन आणि मनद्वारावर्जन या द्वारे ४२ चित्ते प्राप्त होतात. ကေစိ ပန ‘‘ရူပဘဝေ အနိဋ္ဌာရမ္မဏာဘာဝတော ဣဓာဂတာနံယေဝ ဗြဟ္မာနံ အကုသလဝိပါကသမ္ဘဝေါတိ တာနိ ပရိဟာပေတွာ ပဉ္စပရိတ္တဝိပါကေဟိ သဒ္ဓိံ ရူပဘဝေ သဋ္ဌိယေဝ ဝီထိစိတ္တာနီ’’တိ ဝဒန္တိ. ဣဓ ပန တတ္ထ ဌတွာပိ ဣမံ လောကံ ပဿန္တာနံ အနိဋ္ဌာရမ္မဏဿ အသမ္ဘဝေါ န သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ တေဟိ သဒ္ဓိံယေဝ တတ္ထ စတုသဋ္ဌိ ဝုတ္တာနိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝုတ္တံ ဓမ္မာနုသာရဏိယံ ‘‘ယဒါ ဗြဟ္မာနော ကာမာဝစရံ အနိဋ္ဌာရမ္မဏံ အာလမ္ဗန္တိ, တဒါ တံ သုဂတိယမ္ပိ အကုသလဝိပါကစက္ခုသောတဝိညာဏမနောဓာတုသန္တီရဏာနံ ဥပ္ပတ္တိ သမ္ဘဝတီ’’တိ. काही आचार्य मात्र असे म्हणतात की, 'रूपभवात अनिष्ट आलंबन (अप्रिय विषय) नसल्यामुळे, केवळ या मनुष्यलोकात आलेल्या ब्रह्मांच्या बाबतीतच अकुशल विपाकाचा संभव असतो; म्हणून ती चित्ते वगळून, पाच परीत्त विपाकांसह रूपभवात ६० वीथीचित्तेच असतात.' परंतु, या ग्रंथात तर, तिथे (ब्रह्मलोकात) राहूनही या मनुष्यलोकाकडे पाहणाऱ्या ब्रह्मांच्या बाबतीत अनिष्ट आलंबनाचा असंभव आहे असे म्हणता येत नाही, म्हणून त्या अकुशल विपाकांसह तिथे ६४ वीथीचित्ते सांगितले आहेत. म्हणूनच 'धम्मानुसारणी' ग्रंथात म्हटले आहे की—'जेव्हा ब्रह्मदेव कामावचर अनिष्ट आलंबन ग्रहण करतात, तेव्हा त्या सुगतीमध्येही अकुशल विपाक चक्षुविज्ञान, श्रोत्रविज्ञान, मनोधातू आणि संतीरण चित्तांची उत्पत्ती संभवते.' ဘူမိဝသေန ဝိဘာဂေါ ဘူမိဝိဘာဂေါ. भूमीच्या द्वारे विभाग म्हणजेच 'भूमीविभाग' होय. ဘူမိဝိဘာဂဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. भूमीविभाग वर्णन समाप्त झाले. ၅၅. ယထာသမ္ဘဝန္တိ တံတံဒွါရေသု, တံတံဘဝေသု ဝါ သမ္ဘဝါနုရူပတော. ယာဝတာယုကန္တိ ပဋိသန္ဓိတော ပရံ ဘဝနိကန္တိဝသေန ပဝတ္တမနောဒွါရိကစိတ္တဝီထိတော ပဋ္ဌာယ စုတိစိတ္တာဝသာနံ[Pg.161], တတော ပုဗ္ဗေ ပဝတ္တဘဝင်္ဂါဝသာနံ ဝါ အဗ္ဗောစ္ဆိန္နာ အသတိ နိရောဓသမာပတ္တိယန္တိ အဓိပ္ပာယော. ५५. 'यथासंभव' म्हणजे त्या त्या द्वारांमध्ये किंवा त्या त्या भवांमध्ये संभवाच्या अनुरूपतेनुसार. 'यावतायुकं' (आयुष्य असेपर्यंत) म्हणजे प्रतिसंधीनंतर लगेचच भवनिकंतीच्या (भवाच्या तृष्णेच्या) रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या मनद्वाराच्या चित्तवीथीपासून सुरू होऊन च्युतिचित्ताच्या समाप्तीपर्यंत, किंवा त्या च्युतिचित्ताच्या आधी प्रवृत्त होणाऱ्या भवांगाच्या समाप्तीपर्यंत, निरोधसमापत्ती नसताना अखंडपणे (चित्तप्रवृत्ती) चालते, असा अभिप्राय आहे. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाच्या अभिधम्मत्थसंगहाच्या टीनेमध्ये— ဝီထိပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वीथीपरिच्छेद वर्णन समाप्त झाले. ၅. ဝီထိမုတ္တပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ५. वीथीमुक्तपरिच्छेद वर्णन ၁. ဧတ္တာဝတာ ဝီထိသင်္ဂဟံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဝီထိမုတ္တသင်္ဂဟံ ဒဿေတုမာရဘန္တော အာဟ ‘‘ဝီထိစိတ္တဝသေနေဝ’’န္တျာဒိ. ဧဝံ ယထာဝုတ္တနယေန ဝီထိစိတ္တဝသေန ပဝတ္တိယံ ပဋိသန္ဓိတော အပရဘာဂေ စုတိပရိယောသာနံ ပဝတ္တိသင်္ဂဟော နာမ သင်္ဂဟော ဥဒီရိတော, ဣဒါနိ တဒနန္တရံ သန္ဓိယံ ပဋိသန္ဓိကာလေ, တဒါသန္နတာယ တံဂဟဏေနေဝ ဂဟိတစုတိကာလေ စ ပဝတ္တိသင်္ဂဟော ဝုစ္စတီတိ ယောဇနာ. १. इथपर्यंत वीथीसंग्रह दर्शवून, आता वीथीमुक्तसंग्रह दर्शवण्यास प्रारंभ करताना 'वीथीचित्तवसेनेव' इत्यादी म्हटले आहे. अशा प्रकारे, पूर्वोक्त नियमानुसार वीथीचित्तांच्या द्वारे प्रवृत्तीकाळात प्रतिसंधीनंतर च्युतीपर्यंतच्या प्रवृत्तीसंग्रह नावाच्या संग्रहाचे कथन केले गेले आहे. आता त्यानंतर, संधीकाळात म्हणजे प्रतिसंधीच्या वेळी, आणि त्याच्या निकटतेमुळे प्रतिसंधीच्या ग्रहणानेच ग्रहण केलेल्या च्युतीकाळातही प्रवृत्तीसंग्रह सांगितला जात आहे, असा संबंध (योजना) आहे. ဘူမိစတုက္ကဝဏ္ဏနာ भूमीचतुष्क वर्णन ၃. ပုညသမ္မတာ အယာ ယေဘုယျေန အပဂတောတိ အပါယော, သောယေဝ ဘူမိ ဘဝန္တိ ဧတ္ထ သတ္တာတိ အပါယဘူမိ. အနေကဝိဓသမ္ပတ္တိအဓိဋ္ဌာနတာယ သောဘနာ ဂန္တဗ္ဗတော ဥပပဇ္ဇိတဗ္ဗတော ဂတီတိ သုဂတိ, ကာမတဏှာသဟစရိတာ သုဂတိ ကာမသုဂတိ, သာယေဝ ဘူမီတိ ကာမသုဂတိဘူမိ. ဧဝံ သေသေသုပိ. ३. पुण्य म्हणून मानल्या गेलेल्या कल्याणापासून (अयापासून) जो बहुतांशी दूर गेला आहे तो 'अपाय' होय. तीच भूमी (कारण तिथे प्राणी उत्पन्न होतात) म्हणून 'अपायभूमी' होय. अनेक प्रकारच्या संपत्तीचे अधिष्ठान असल्यामुळे जी शोभनीय आहे आणि जिथे जाणे किंवा उत्पन्न होणे योग्य आहे अशी गती म्हणजे 'सुगती' होय. कामतृष्णेने युक्त असलेली सुगती म्हणजे 'कामसुगती' होय, आणि तीच भूमी म्हणून 'कामसुगतीभूमी' होय. याचप्रमाणे उर्वरित भूमींच्या बाबतीतही जाणावे. ၄. အယတော သုခတော နိဂ္ဂတောတိ နိရယော. တိရော အဉ္စိတာတိ တိရစ္ဆာနာ, တေသံ ယောနိ တိရစ္ဆာနယောနိ. ယဝန္တိ တာယ သတ္တာ အမိဿိတာပိ သမာနဇာတိတာယ မိဿိတာ ဝိယ ဟောန္တီတိ ယောနိ. သာ ပန အတ္ထတော ခန္ဓာနံ ပဝတ္တိဝိသေသော. ပကဋ္ဌေန သုခတော ဣတာ ဂတာတိ ပေတာ, နိဇ္ဈာမတဏှိကာဒိဘေဒါနံ ပေတာနံ ဝိသယော ပေတ္တိဝိသယော[Pg.162]. ဧတ္ထ ပန တိရစ္ဆာနယောနိပေတ္တိဝိသယဂ္ဂဟဏေန ခန္ဓာနံယေဝ ဂဟဏံ တေသံ တာဒိသဿ ပရိစ္ဆိန္နောကာသဿ အဘာဝတော. ယတ္ထ ဝါ တေ အရညပဗ္ဗတပါဒါဒိကေ နိဗဒ္ဓဝါသံ ဝသန္တိ, တာဒိသဿ ဌာနဿ ဝသေန ဩကာသောပိ ဂဟေတဗ္ဗော. န သုရန္တိ ဣဿရိယကီဠာဒီဟိ န ဒိဗ္ဗန္တီတိ အသုရာ, ပေတာသုရာ. ဣတရေ ပန န သုရာ သုရပ္ပဋိပက္ခာတိ အသုရာ, ဣဓ စ ပေတာသုရာနမေဝ ဂဟဏံ ဣတရေသံ တာဝတိံသေသု ဂဟဏဿ ဣစ္ဆိတတ္တာ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ အာစရိယေန – ४. सुखापासून (अयापासून) जो पूर्णपणे बाहेर पडला आहे (निर्गत झाला आहे) तो 'निरय' (नरक) होय. जे आडवे चालतात ते 'तिरच्छान' (तिर्यंच/प्राणी) होत, आणि त्यांची योनी म्हणजे 'तिरच्छानयोनी' होय. ज्या योनीद्वारे प्राणी मूळचे भिन्न असूनही समान जातीचे असल्यामुळे मिश्रित झाल्यासारखे वाटतात ती 'योनी' होय. ती वास्तविक पाहता स्कंधांची विशिष्ट प्रवृत्तीच आहे. सुखापासून अत्यंत दूर गेलेले ते 'पेत' (प्रेत/पितर) होत. निज्झामतण्हिक (तृष्णेने जळणारे) इत्यादी भेद असलेल्या प्रेतांचे निवासस्थान म्हणजे 'पेत्तिविसय' (प्रेतविषय) होय. येथे 'तिरच्छानयोनी' आणि 'पेत्तिविसय' या शब्दांच्या ग्रहणाने केवळ स्कंधांचेच ग्रहण होते, कारण त्यांच्यासाठी तशा प्रकारची कोणतीही निश्चित सीमांकित जागा (अवकाश) नसते. किंवा, ते ज्या अरण्य, पर्वत पायथा इत्यादी ठिकाणी निरंतर निवास करतात, त्या स्थानांच्या आधारे त्यांचा निवासप्रदेश (अवकाश) देखील गृहीत धरला पाहिजे. जे ऐश्वर्य, क्रीडा इत्यादींनी शोभत नाहीत किंवा प्रकाशत नाहीत ते 'असुर' (प्रेत-असुर) होत. इतर जे देव नाहीत आणि देवांचे शत्रू आहेत ते 'असुर' (कालकंजिक इत्यादी देव-असुर) होत; परंतु येथे केवळ प्रेत-असुरांचेच ग्रहण केले आहे, कारण इतरांचे (देव-असुरांचे) तावतिंस देवांमध्ये ग्रहण करणे अभिप्रेत आहे. म्हणूनच आचार्यांनी म्हटले आहे की— ‘‘တာဝတိံသေသု ဒေဝေသု, ဝေပစိတ္တာသုရာ ဂတာ’’တိ; (နာမ. ပရိ. ၄၃၈); “वेपचित्ती असुर तावतिंस देवांमध्ये गेले (किंवा समाविष्ट झाले) आहेत.” ၅. သတိသူရဘာဝဗြဟ္မစရိယယောဂျတာဒိဂုဏေဟိ ဥက္ကဋ္ဌမနတာယ မနော ဥဿန္နံ ဧတေသန္တိ မနုဿာ. တထာ ဟိ ပရမသတိနေပက္ကာဒိပ္ပတ္တာ ဗုဒ္ဓါဒယောပိ မနုဿဘူတာယေဝ. ဇမ္ဗုဒီပဝါသိနော စေတ္ထ နိပ္ပရိယာယတော မနုဿာ. တေဟိ ပန သမာနရူပါဒိတာယ သဒ္ဓိံ ပရိတ္တဒီပဝါသီဟိ ဣတရမဟာဒီပဝါသိနောပိ ‘‘မနုဿာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. လောကိယာ ပန ‘‘မနုနော အာဒိခတ္တိယဿ အပစ္စံ ပုတ္တာတိ မနုဿာ’’တိ ဝဒန္တိ. မနုဿာနံ နိဝါသဘူတာ ဘူမိ ဣဓ မနုဿာ. ဧဝံ သေသေသုပိ. ५. स्मृती (जागरूकता), शूरता (धैर्य) आणि ब्रह्मचर्य-योग्यता इत्यादी गुणांमुळे ज्यांचे मन उत्कृष्ट व उन्नत (तीव्र) झाले आहे, त्यांना 'मनुष्य' म्हणतात. म्हणूनच, परम स्मृती व प्रज्ञा इत्यादींना प्राप्त झालेले बुद्ध भगवान इत्यादी देखील मनुष्य म्हणूनच जन्मास आले. आणि येथे जम्बुदीपातील (जंबूद्वीपातील) रहिवासी हेच मुख्य अर्थाने 'मनुष्य' आहेत. परंतु, त्यांच्याशी असलेल्या समान रूप इत्यादी साधर्म्यामुळे, लहान बेटांवरील रहिवाशांसह इतर तीन महाद्वीपांतील रहिवाशांनाही 'मनुष्य' असे म्हटले जाते. लौकिक व्याकरणकार (किंवा लोक) मात्र असे म्हणतात की, 'आदिराजन्य मनूचे अपत्य किंवा पुत्र म्हणजेच मनुष्य होत.' मनुष्यांची निवासभूमी असलेली भूमी येथे 'मनुष्य' (मनुष्यलोक) या नावाने ओळखली जाते. उर्वरित (चातुमहाराजिका इत्यादी) पदांच्या बाबतीतही याचप्रमाणे अर्थ लावावा. စတူသု မဟာရာဇေသု ဘတ္တိ ဧတေသံ, စတုန္နံ ဝါ မဟာရာဇာနံ နိဝါသဋ္ဌာနဘူတေ စာတုမဟာရာဇေ ဘဝါတိ စာတုမဟာရာဇိကာ. မာဃေန မာဏဝေန သဒ္ဓိံ တေတ္တိံသ သဟပုညကာရိနော ဧတ္ထ နိဗ္ဗတ္တာတိ တံသဟစရိတဋ္ဌာနံ တေတ္တိံသံ, တဒေဝ တာဝတိံသံ, တံနိဝါသော ဧတေသန္တိ တာဝတိံသာတိ ဝဒန္တိ. ယသ္မာ ပန ‘‘သဟဿံ စာတုမဟာရာဇိကာနံ သဟဿံ တာဝတိံသာန’’န္တိ (အ. နိ. ၃.၈၁) ဝစနတော သေသစက္ကဝါဠေသုပိ ဆကာမာဝစရဒေဝလောကာ အတ္ထိ, တသ္မာ နာမမတ္တမေဝ ဧတံ တဿ ဒေဝလောကဿာတိ ဂဟေတဗ္ဗံ. ဒုက္ခတော ယာတာ အပယာတာတိ [Pg.163] ယာမာ. အတ္တနော သိရိသမ္ပတ္တိယာ တုသံ ပီတိံ ဣတာ ဂတာတိ တုသိတာ. နိမ္မာနေ ရတိ ဧတေသန္တိ နိမ္မာနရတိနော. ပရနိမ္မိတေသု ဘောဂေသု အတ္တနော ဝသံ ဝတ္တေန္တီတိ ပရနိမ္မိတဝသဝတ္တိနော. चार महाराज देवांवर ज्यांची भक्ती (सेवाभाव) आहे, किंवा चार महाराजांचे निवासस्थान असलेल्या चातुमहाराजिका भूमीत जे उत्पन्न होतात, ते 'चातुमहाराजिका' देव होत. मघ नावाच्या माणवा (तरुणा) सोबत तेहतीस (३३) पुण्यकर्म करणारे येथे उत्पन्न झाले, म्हणून त्यांच्या सहवासाचे स्थान 'तेत्तींस' (तेहतीस) म्हटले गेले; तेच 'तावतींस' होय. त्यांचा निवास येथे आहे म्हणून त्यांना 'तावतींस' देव म्हणतात, असे लोक म्हणतात. परंतु, 'हजार चातुमहाराजिका देवलोक आणि हजार तावतींस देवलोक' या वचनानुसार इतर चक्रवाळांमध्येही सहा कामावचर देवलोक अस्तित्वात आहेत; म्हणून 'तावतींस' हे त्या दुसऱ्या देवलोकाचे केवळ एक नावच आहे, असे समजले पाहिजे. दुःखापासून दूर गेलेले देव म्हणजे 'याम' देव होत. आपल्या वैभव-संपत्तीने संतोष (प्रीती) प्राप्त झालेले देव म्हणजे 'तुसित' देव होत. स्वतः निर्माण केलेल्या विलासात रममाण होणारे देव म्हणजे 'निम्माणरती' देव होत. इतरांनी निर्माण केलेल्या भोगांवर आपले नियंत्रण ठेवणारे देव म्हणजे 'परनिम्मितवसवत्ती' देव होत. ၇. မဟာဗြဟ္မာနံ ပရိစာရိကတ္တာ တေသံ ပရိသတိ ဘဝါတိ ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇာ. တေသံ ပုရောဟိတဋ္ဌာနေ ဌိတတ္တာ ဗြဟ္မပုရောဟိတာ. တေဟိ တေဟိ ဈာနာဒီဟိ ဂုဏဝိသေသေဟိ ဗြူဟိတာ ပရိဝုဒ္ဓါတိ ဗြဟ္မာနော, ဝဏ္ဏဝန္တတာယ စေဝ ဒီဃာယုကတာဒီဟိ စ ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇာဒီဟိ မဟန္တာ ဗြဟ္မာနောတိ မဟာဗြဟ္မာနော. တယောပေတေ ပဏီတရတနပဘာဝဘာသိတသမာနတလဝါသိနော. ७. महाब्रह्मांचे सेवक (परिचारक) असल्यामुळे आणि त्यांच्या परिषदेत उत्पन्न होत असल्यामुळे ते 'ब्रह्मपारिसज्जा' देव होत. त्यांच्या पुरोहित स्थानी (सल्लागार म्हणून) राहत असल्यामुळे ते 'ब्रह्मपुरोहिता' देव होत. त्या त्या ध्यान इत्यादी विशिष्ट गुणांनी जे वृद्धिंगत (विकसित) झाले आहेत, ते 'ब्रह्मा' होत. रूपवान असण्यामुळे आणि दीर्घायुष्य इत्यादी गुणांमुळे जे ब्रह्मपारिसज्जा इत्यादींपेक्षा श्रेष्ठ (महान) आहेत, ते 'महाब्रह्मा' होत. हे तिन्ही प्रकारचे देव अनुक्रमे प्रणीत (उत्कृष्ट), प्रणीततर (अधिक उत्कृष्ट) आणि प्रणीततम (सर्वात उत्कृष्ट) अशा शरीराच्या व विमानांच्या प्रभेने प्रकाशित होऊन एकाच पातळीवर (समान आकाशात) राहणारे आहेत. ၈. ဥပရိမေဟိ ပရိတ္တာ အာဘာ ဧတေသန္တိ ပရိတ္တာဘာ. အပ္ပမာဏာ အာဘာ ဧတေသန္တိ အပ္ပမာဏာဘာ. ဝလာဟကတော ဝိဇ္ဇု ဝိယ ဣတော စိတော စ အာဘာ သရတိ နိဿရတိ ဧတေသံ သပ္ပီတိကဇ္ဈာနနိဗ္ဗတ္တက္ခန္ဓသန္တာနတ္တာတိ အာဘဿရာ. ဒဏ္ဍဒီပိကာယ ဝါ အစ္စိ ဝိယ ဧတေသံ သရီရတော အာဘာ ဆိဇ္ဇိတွာ ဆိဇ္ဇိတွာ ပတန္တီ ဝိယ သရတိ နိဿရတီတိ အာဘဿရာ. ယထာဝုတ္တာယ ဝါ ပဘာယ အာဘာသနသီလာတိ အာဘဿရာ. ဧတေပိ တယော ပဏီတရတနပဘာဝဘာသိတေကတလဝါသိနော. ८. वरच्या ब्रह्मांपेक्षा ज्यांची प्रभा (प्रकाश) कमी (परित्त) आहे, ते 'परित्ताभा' देव होत. ज्यांची प्रभा अमर्याद (अप्पमाण) आहे, ते 'अप्पमाणाभा' देव होत. ढगांमधून विजेप्रमाणे ज्यांची प्रभा इकडून तिकडे पसरते (निघते), कारण त्यांचे स्कंध-संतान सप्रीतिक ध्यानामुळे उत्पन्न झालेले असते, ते 'आभस्सरा' देव होत. किंवा मशालीच्या (दिव्याच्या) ज्योतीप्रमाणे ज्यांच्या शरीरातून प्रभा तुटून-तुटून पडल्यासारखी बाहेर पडते, ते 'आभस्सरा' देव होत. किंवा पूर्वोक्त दोन प्रकारच्या प्रभेने प्रकाशित होण्याचा ज्यांचा स्वभाव आहे, ते 'आभस्सरा' देव होत. हे तिन्ही प्रकारचे देव देखील प्रणीत, प्रणीततर आणि प्रणीततम प्रभेने प्रकाशित होऊन एकाच पातळीवर (समान आकाशात) राहणारे आहेत. ၉. သုဘာတိ ဧကဂ္ဃနာ အစလာ သရီရာဘာ ဝုစ္စတိ, သာ ဥပရိဗြဟ္မေဟိ ပရိတ္တာ ဧတေသန္တိ ပရိတ္တသုဘာ. အပ္ပမာဏာ သုဘာ ဧတေသန္တိ အပ္ပမာဏသုဘာ. ပဘာသမုဒယသင်္ခါတေဟိ သုဘေဟိ ကိဏ္ဏာ အာကိဏ္ဏာတိ သုဘကိဏှာ. ‘‘သုဘာကိဏ္ဏာ’’တိ စ ဝတ္တဗ္ဗေ အာ-သဒ္ဒဿ ရဿတ္တံ, အန္တိမဏ-ကာရဿ စ ဟ-ကာရံ ကတွာ ‘‘သုဘကိဏှာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဧတေပိ ပဏီတရတနပဘာဝဘာသိတေကတလဝါသိနော. ९. 'सुभ' म्हणजे शरीराची एकाग्र (दाट) व अचल अशी प्रभा होय. ती प्रभा वरच्या ब्रह्मांपेक्षा कमी आहे ज्यांची, ते 'परित्तसुभा' देव होत. ज्यांची सुभ (प्रभा) अमर्याद आहे, ते 'अप्पमाणसुभा' देव होत. प्रभा-समूहाने युक्त असलेल्या सुभ (प्रभांनी) जे संकीर्ण (व्याप्त/मिश्रित) आहेत, ते 'सुभकिण्ह' देव होत. वास्तविक 'सुभाकिण्ण' असे म्हणायला हवे होते, परंतु 'आ' स्वराचा र्हस्व करून आणि अंतिम 'ण' चा 'ह' करून 'सुभकिण्ह' असे म्हटले गेले आहे. हे देखील प्रणीत, प्रणीततर आणि प्रणीततम प्रभेने प्रकाशित होऊन एकाच पातळीवर राहणारे आहेत. ၁၀. ဈာနပ္ပဘာဝနိဗ္ဗတ္တံ [Pg.164] ဝိပုလံ ဖလမေတေသန္တိ ဝေဟပ္ဖလာ. သညာဝိရာဂဘာဝနာနိဗ္ဗတ္တရူပသန္တတိမတ္တတ္တာ နတ္ထိ သညာ, တံမုခေန ဝုတ္တာဝသေသာ အရူပက္ခန္ဓာ စ ဧတေသန္တိ အသညာ. တေယေဝ သတ္တာတိ အသညသတ္တာ. ဧတေပိ ပဏီတရတနပဘာဝဘာသိတေကတလဝါသိနော. သုဒ္ဓါနံ အနာဂါမိအရဟန္တာနမေဝ အာဝါသာတိ သုဒ္ဓါဝါသာ. အနုနယပဋိဃာဘာဝတော ဝါ သုဒ္ဓေါ အာဝါသော ဧတေသန္တိ သုဒ္ဓါဝါသာ, တေသံ နိဝါသဘူမိပိ သုဒ္ဓါဝါသာ. १०. ध्यानाच्या प्रभावाने उत्पन्न झालेले विपुल (विस्तीर्ण) फल ज्यांचे आहे, ते 'वेहप्फला' देव होत. संज्ञा-विराग भावनेमुळे उत्पन्न झालेल्या केवळ रूप-संतानामुळे ज्यांच्यामध्ये संज्ञा (चेतना/संवेदना) नाही, आणि संज्ञेच्या अभावामुळे उर्वरित अरूप स्कंध (नाम स्कंध) देखील ज्यांच्यात नाहीत, ते 'असंज्ञ' होत. तेच प्राणी (सत्त्व) असल्यामुळे त्यांना 'असंज्ञसत्त्व' (असंञ्ञसत्त) म्हणतात. हे देखील प्रणीततर आणि प्रणीततम प्रभेने प्रकाशित होऊन एकाच पातळीवर राहणारे आहेत. केवळ शुद्ध अशा अनागामी व अर्हत व्यक्तींचेच जे निवासस्थान आहे, ते 'शुद्धावास' (सुद्धावास) देवलोक होत. किंवा अनुनय (राग/आसक्ती) आणि प्रतिघ (द्वेष) नसल्यामुळे ज्यांचा निवास शुद्ध आहे, ते 'शुद्धावास' देव होत; आणि त्यांची निवासभूमी देखील 'शुद्धावास' म्हटली जाते. ၁၁. ဣမေသု ပန ပဌမတလဝါသိနော အပ္ပကေန ကာလေန အတ္တနော ဌာနံ န ဝိဇဟန္တီတိ အဝိဟာ. ဒုတိယတလဝါသိနော န ကေနစိ တပ္ပန္တီတိ အတပ္ပာ. တတိယတလဝါသိနော ပရမသုန္ဒရရူပတ္တာ သုခေန ဒိဿန္တီတိ သုဒဿာ. စတုတ္ထတလဝါသိနော သုပရိသုဒ္ဓဒဿနတ္တာ သုခေန ပဿန္တီတိ သုဒဿိနော. ပဉ္စမတလဝါသိနော ပန ဥက္ကဋ္ဌသမ္ပတ္တိကတ္တာ နတ္ထိ ဧတေသံ ကနိဋ္ဌဘာဝေါတိ အကနိဋ္ဌာ. ११. या शुद्धावास देवांमध्ये, पहिल्या पातळीवर राहणारे देव अल्प काळाने आपले स्थान सोडत नाहीत, म्हणून ते 'अविहा' होत. दुसऱ्या पातळीवर राहणारे देव कशानेही संतप्त (दुःखी) होत नाहीत, म्हणून ते 'अतप्पा' होत. तिसऱ्या पातळीवर राहणारे देव अत्यंत सुंदर रूप असल्यामुळे सुखाने (सहजपणे) पाहिले जाऊ शकतात, म्हणून ते 'सुदस्सा' होत. चौथ्या पातळीवर राहणारे देव अत्यंत शुद्ध दृष्टी असल्यामुळे सुखाने (स्पष्टपणे) पाहतात, म्हणून ते 'सुदस्सी' होत. पाचव्या पातळीवर राहणारे देव उत्कृष्ट संपत्तीने (वैभवाने) युक्त असल्यामुळे त्यांच्यात कनिष्ठ भाव (लहान असणे) नाही, म्हणून ते 'अकनिठ्ठ' (अकनिष्ठा) होत. ၁၂. အာကာသာနဉ္စာယတနေ ပဝတ္တာ ပဌမာရုပ္ပဝိပါကဘူတစတုက္ခန္ဓာ ဧဝ, တေဟိ ပရိစ္ဆိန္နဩကာသော ဝါ အာကာသာနဉ္စာယတနဘူမိ. ဧဝံ သေသေသုပိ. १२. आकासानञ्चायतनात प्रवृत्त होणारे पहिल्या आरुप्प विपाकाचे चार नामस्कंध म्हणजेच 'आकासानञ्चायतनभूमी' होय; किंवा त्यांच्याद्वारे मर्यादित (परिच्छिन्न) झालेली जागा म्हणजे 'आकासानञ्चायतनभूमी' होय. उर्वरित (विञ्ञाणञ्चायतन इत्यादी) पदांच्या बाबतीतही याचप्रमाणे समजावे. ၁၃. ပုထုဇ္ဇနာ, သောတာပန္နာ စ သကဒါဂါမိနော စာပိ ပုဂ္ဂလာ သုဒ္ဓါဝါသေသု သဗ္ဗထာ န လဗ္ဘန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ပုထုဇ္ဇနာဒီနဉ္စ ပဋိက္ခေပေန အနာဂါမိအရဟန္တာနမေဝ တတ္ထ လာဘော ဝုတ္တော ဟောတိ. १३. पुथुज्जन (पृथग्जन), सोतापन्न (श्रोतापन्न) आणि सकदागामी हे पुद्गल (व्यक्ती) शुद्धावास लोकांमध्ये कोणत्याही प्रकारे कधीही आढळत नाहीत, असा हा संबंध (अन्वय) आहे. पुथुज्जन इत्यादींचा निषेध केल्यामुळे, तेथे केवळ अनागामी आणि अर्हत व्यक्तींचाच लाभ (उत्पत्ती) होतो, असे सांगितले गेले आहे. ၁၄. သေသဋ္ဌာနေသူတိ သုဒ္ဓါဝါသအပါယအသညိဝဇ္ဇိတေသု သေသဋ္ဌာနေသု အရိယာ, အနရိယာပိ စ လဗ္ဘန္တိ. १४. 'उर्वरित स्थानांमध्ये' म्हणजे शुद्धावास, अपाय (नरक इत्यादी) आणि असंज्ञ लोक वगळता उर्वरित स्थानांमध्ये आर्य आणि अनार्य (पुथुज्जन) दोन्ही प्रकारचे पुद्गल आढळतात. ဘူမိစတုက္ကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. भूमी-चतुष्काचे वर्णन समाप्त झाले. ပဋိသန္ဓိစတုက္ကဝဏ္ဏနာ प्रतिसंधी-चतुष्काचे वर्णन ၁၆. ဩက္ကန္တိက္ခဏေတိ [Pg.165] ပဋိသန္ဓိက္ခဏေ. १६. 'ओक्कंतिक्खणे' म्हणजे प्रतिसंधीच्या क्षणी (गर्भधारणेच्या क्षणी). ၁၇. ဇာတိယာ အန္ဓော ဇစ္စန္ဓော. ကိဉ္စာပိ ဇာတိက္ခဏေ အဏ္ဍဇဇလာဗုဇာ သဗ္ဗေပိ အစက္ခုကာဝ. တထာပိ စက္ခာဒိဥပ္ပဇ္ဇနာရဟကာလေပိ စက္ခုပ္ပတ္တိဝိဗန္ဓကကမ္မပ္ပဋိဗာဟိတသာမတ္ထိယေန ဒိန္နပဋိသန္ဓိနာ, ဣတရေနပိ ဝါ ကမ္မေန အနုပ္ပာဒေတဗ္ဗစက္ခုကော သတ္တော ဇစ္စန္ဓော နာမ. အပရေ ပန ‘‘ဇစ္စန္ဓောတိ ပသူတိယံယေဝ အန္ဓော, မာတုကုစ္ဆိယံ အန္ဓော ဟုတွာ နိက္ခန္တောတိ အတ္ထော, တေန ဒုဟေတုကတိဟေတုကာနံ မာတုကုစ္ဆိယံ စက္ခုဿ အဝိပဇ္ဇနံ သိဒ္ဓ’’န္တိ ဝဒန္တိ. ဇစ္စန္ဓာဒီနန္တိ ဧတ္ထ အာဒိဂ္ဂဟဏေန ဇစ္စဗဓိရဇစ္စမူဂဇစ္စဇဠဇစ္စုမ္မတ္တကပဏ္ဍကဥဘတောဗျဉ္ဇနကနပုံသကမမ္မာဒီနံ သင်္ဂဟော. အပရေ ပန ‘‘ဧကစ္စေ အဟေတုကပဋိသန္ဓိကာ အဝိကလိန္ဒြိယာ ဟုတွာ ထောကံ ဝိစာရဏပကတိကာ ဟောန္တိ, တာဒိသာနမ္ပိ အာဒိသဒ္ဒေန သင်္ဂဟော’’တိ ဝဒန္တိ. ဘုမ္မဒေဝေ သိတာ နိဿိတာ တဂ္ဂတိကတ္တာတိ ဘုမ္မဿိတာ. သုခသမုဿယတော ဝိနိပါတာတိ ဝိနိပါတိကာ. १७. जन्मापासून आंधळा तो 'जच्चंध' (जन्मांध). जरी जन्मक्षणी (प्रतिसंधीच्या क्षणी) अंडज आणि जरायुज हे सर्वच प्राणी चक्षुरहित (डोळे नसलेले) असतात, तरीही डोळे इत्यादी उत्पन्न होण्याच्या योग्य वेळी देखील, चक्षूच्या उत्पत्तीला अडथळा आणणाऱ्या कर्माने ज्याची शक्ती रोखली गेली आहे अशा प्रतिसंधी देणाऱ्या कर्मामुळे किंवा इतर कर्मामुळे ज्याचे चक्षू उत्पन्न होऊ शकत नाहीत, अशा प्राण्याला 'जच्चंध' (जन्मांध) म्हणतात. परंतु इतर आचार्य म्हणतात की, 'जच्चंध' म्हणजे जन्माच्या वेळीच आंधळा असणारा, म्हणजेच आईच्या गर्भात आंधळा होऊन बाहेर पडलेला असा अर्थ आहे; यामुळे द्विहेतुक आणि त्रिहेतुक व्यक्तींच्या आईच्या गर्भात असताना चक्षूचा नाश होत नाही, हे सिद्ध होते. 'जच्चंधादीनं' या पदातील 'आदी' (इत्यादी) शब्दाने जन्मापासून बहिरे, जन्मापासून मुके, जन्मापासून जड (मतिमंद), जन्मापासून वेडे, पंडक (नपुंसक), उभतोब्यंजनक (उभयलिंगी), नपुंसक, तोतरे इत्यादींचा संग्रह होतो. इतर आचार्य म्हणतात की, काही अहेतुक प्रतिसंधी असणारे प्राणी इंद्रियांनी परिपूर्ण असूनही थोडे विचार करण्याची प्रवृत्ती असणारे असतात, अशा व्यक्तींचाही 'आदी' शब्दाने संग्रह होतो. भूम्यवस्थित (भूमिकाश्रित) देवांना आश्रित असणारे आणि त्यांच्यासारखीच गती असणारे देव म्हणजे 'भुम्मस्सित' (भूम्याश्रित) देव होत. सुखाच्या समूहातून (देवलोकातून) भ्रष्ट होऊन पडलेले ते 'विनिपातिक' होत. ၁၈. သဗ္ဗတ္ထာပိ ကာမသုဂတိယန္တိ ဒေဝမနုဿဝသေန သတ္တဝိဓာယပိ ကာမသုဂတိယံ. १८. 'सर्वत्र कामसुगतीमध्ये' म्हणजे देव आणि मनुष्य यांच्या भेदाने सात प्रकारच्या कामसुगती भूमीमध्ये. ၂၁. တေသူတိ ယထာဝုတ္တပဋိသန္ဓိယုတ္တေသု ပုဂ္ဂလေသု, အပါယာဒီသု ဝါ. အာယုပ္ပမာဏဂဏနာယ နိယမော နတ္ထိ ကေသဉ္စိ စိရာယုကတ္တာ, ကေသဉ္စိ စိရတရာယုကတ္တာ စ. တထာစာဟု – २१. 'त्यांच्यामध्ये' म्हणजे पूर्वोक्त प्रतिसंधीने युक्त असलेल्या पुद्गलांमध्ये किंवा अपाय इत्यादी भूमींमध्ये. आयुष्याच्या प्रमाणाची गणना करण्याचा कोणताही निश्चित नियम नाही; कारण काही प्राणी दीर्घायुषी असतात, तर काही अत्यंत दीर्घायुषी असतात. म्हणूनच असे म्हटले आहे – ‘‘အာပါယိကမနုဿာယု-ပရိစ္ဆေဒေါ န ဝိဇ္ဇတိ; တထာ ဟိ ကာလော မန္ဓာတာ,ယက္ခာ ကေစိ စိရာယုနော’’တိ. – “अपाय (नरक, तिर्यंच इत्यादी दुर्गती) आणि मनुष्यांच्या आयुष्याची निश्चित मर्यादा नसते; कारण काल नागराज, मान्धाता चक्रवर्ती राजा आणि काही यक्ष (भूम्यदेव) दीर्घायुषी असतात,” असे (प्राचीन आचार्यांनी) म्हटले आहे. အပါယေသု [Pg.166] ဟိ ကမ္မမေဝ ပမာဏံ, တတ္ထ နိဗ္ဗတ္တာနံ ယာဝ ကမ္မံ နခီယတိ. တာဝ စဝနာဘာဝတော, တထာ ဘုမ္မဒေဝါနံ. တေသုပိ ဟိ နိဗ္ဗတ္တာ ကေစိ သတ္တာဟာဒိကာလံ တိဋ္ဌန္တိ, ကေစိ ကပ္ပမတ္တမ္ပိ, တထာ မနုဿာနမ္ပိ ကဒါစိ တေသမ္ပိ အသင်္ချေယျာယုကတ္တာ ကဒါစိ ဒသဝဿာယုကတ္တာ. ‘‘ယော စိရံ ဇီဝတိ, သော ဝဿသတံ ဇီဝတိ, အပ္ပံ ဝါ ဘိယျော (ဒီ. နိ. ၂.၇; သံ. နိ. ၁.၁၄၅; အ. နိ. ၇.၇၄), ဒုတိယံ ဝဿသတံ န ပါပုဏာတီ’’တိ ဣဒံ ပန အဇ္ဇတနကာလိကေ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. कारण अपायांमध्ये (दुर्गतींमध्ये) कर्म हेच प्रमाण (मर्यादा ठरवणारे) असते. तेथे उत्पन्न झालेल्या प्राण्यांचे जोपर्यंत (अकुशल) कर्म संपत नाही, तोपर्यंत त्यांची च्युती (मृत्यू) होत नसल्यामुळे (आयुष्याची निश्चित मर्यादा नसते). भूम्यदेवांच्या बाबतीतही तसेच आहे. त्यांच्यामध्ये उत्पन्न झालेल्यांपैकी काही जण केवळ सात दिवस इत्यादी काळापर्यंत जगतात, तर काही जण संपूर्ण कल्पभरही जगतात. तसेच मनुष्यांच्या बाबतीतही (कर्मच प्रमाण आहे); कारण कधी त्यांचे आयुष्य असंख्येय वर्षांचे असते, तर कधी केवळ दहा वर्षांचे असते. “जो दीर्घकाळ जगतो, तो शंभर वर्षे किंवा त्यापेक्षा थोडे अधिक किंवा कमी जगतो, परंतु तो दुसऱ्या शतकापर्यंत (दोनशे वर्षांपर्यंत) पोहोचू शकत नाही,” हे वचन आजच्या काळातील (मनुष्यांच्या) संदर्भात उद्देशून म्हटले आहे. ၂၂. ဒိဗ္ဗာနိ ပဉ္စဝဿသတာနီတိ မနုဿာနံ ပညာသ ဝဿာနိ ဧကဒိနံ, တဒနုရူပတော မာသသံဝစ္ဆရေ ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ ဒိဗ္ဗပ္ပမာဏာနိ ပဉ္စဝဿသတာနိ အာယုပ္ပမာဏံ ဟောတိ. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ – २२. “दिव्य पाचशे वर्षे” म्हणजे मनुष्यांची पन्नास वर्षे म्हणजे (चातुम्महाराजिका देवलोकातील) एक दिवस होतो. त्या दिवसाच्या हिशोबाने महिने आणि वर्षे मोजून, दिव्य प्रमाणाने पाचशे वर्षे हे (त्यांचे) आयुष्याचे प्रमाण होते. याविषयी असेही म्हटले आहे – ‘‘ယာနိ ပညာသ ဝဿာနိ, မနုဿာနံ ဒိနော တဟိံ; တိံသရတ္တိဒိဝေါ မာသော, မာသာ ဒွါဒသ သံဝစ္ဆရံ; တေန သံဝစ္ဆရေနာယု, ဒိဗ္ဗံ ပဉ္စသတံ မတ’’န္တိ. “मनुष्यांची जी पन्नास वर्षे आहेत, तो तेथील (चातुम्महाराजिका देवलोकातील) एक दिवस होय. तीस दिवस-रात्रींचा एक महिना आणि बारा महिन्यांचे एक वर्ष होते. त्या वर्षाच्या हिशोबाने दिव्य पाचशे वर्षे हे (त्यांचे) आयुष्य मानले गेले आहे.” မနုဿဂဏနာယာတိ မနုဿာနံ သံဝစ္ဆရဂဏနာယ. တတော စတုဂ္ဂုဏန္တိ စာတုမဟာရာဇိကာနံ ပညာသမာနုဿကဝဿပရိမိတံ ဒိဝသံ, ဒိဗ္ဗာနိ စ ပဉ္စဝဿသတာနိ ဒိဂုဏံ ကတွာ ဒိဗ္ဗဝဿသဟဿာနိ တာဝတိံသာနံ သမ္ဘဝတီတိ ဧဝံ ဒိဝသသံဝစ္ဆရဒိဂုဏဝသေန စတုဂ္ဂုဏံ, တံ ပန ဒိဗ္ဗဂဏနာယ ဝဿသဟဿံ, မနုဿဂဏနာယ သဋ္ဌိဝဿသတသဟဿာဓိကတိကောဋိပ္ပမာဏံ ဟောတိ. တတော စတုဂ္ဂုဏံ ယာမာနန္တိ တာဝတိံသာနမာယုပ္ပမာဏတော ဝုတ္တနယေန စတုဂ္ဂုဏံ, ဒိဗ္ဗဂဏနာယ ဒွိသဟဿံ, မနုဿဂဏနာယ စတ္တာလီသဝဿသတသဟဿာဓိကာ စုဒ္ဒသ ဝဿကောဋိယော ဟောန္တိ. တတော စတုဂ္ဂုဏံ တုသိတာနန္တိ ဒိဗ္ဗာနိ စတ္တာရိ ဝဿသဟဿာနိ, မနုဿဂဏနာယ သဋ္ဌိဝဿသတသဟဿာဓိကာ သတ္တပညာသ [Pg.167] ဝဿကောဋိယော. တတော စတုဂ္ဂုဏံ နိမ္မာနရတီနန္တိ ဒိဗ္ဗာနိ အဋ္ဌဝဿသဟဿာနိ, မနုဿဂဏနာယ ဒွေ ဝဿကောဋိသတာနိ စတ္တာလီသဝဿသတသဟဿာဓိကာ တိံသ ဝဿကောဋိယော စ. တတော စတုဂ္ဂုဏံ ပရနိမ္မိတဝသဝတ္တီနန္တိ ဒိဗ္ဗာနိ သောဠသ ဝဿသဟဿာနိ. “मनुष्यगणनेनुसार” म्हणजे मनुष्यांच्या वर्षांच्या गणनेनुसार. “त्यापेक्षा चौपट” म्हणजे चातुम्महाराजिका देवांच्या (मनुष्यांच्या पन्नास वर्षांच्या बरोबर असलेल्या) दिवसाला आणि दिव्य पाचशे वर्षांना दुप्पट करून, तावतिंस देवांचे आयुष्य दिव्य एक हजार वर्षे होते. अशा प्रकारे दिवस आणि वर्ष दुप्पट करण्याच्या पद्धतीने ते चौपट होते. ते दिव्य गणनेनुसार एक हजार वर्षे होते, तर मनुष्यगणनेनुसार ते तीन कोटी साठ लाख (३,६०,००,०००) वर्षे होते. “त्यापेक्षा चौपट यामा देवांचे” म्हणजे तावतिंस देवांच्या आयुष्यापेक्षा पूर्वोक्त पद्धतीने चौपट, जे दिव्य गणनेनुसार दोन हजार वर्षे आणि मनुष्यगणनेनुसार चौदा कोटी चाळीस लाख (१४,४०,००,०००) वर्षे होते. “त्यापेक्षा चौपट तुसित देवांचे” म्हणजे दिव्य चार हजार वर्षे, जे मनुष्यगणनेनुसार सत्तावन्न कोटी साठ लाख (५७,६०,००,०००) वर्षे होते. “त्यापेक्षा चौपट निम्माणरती देवांचे” म्हणजे दिव्य आठ हजार वर्षे, जे मनुष्यगणनेनुसार दोन अब्ज तीस कोटी चाळीस लाख (२,३०,४०,००,०००) वर्षे होते. “त्यापेक्षा चौपट परनिम्मितवसवत्ती देवांचे” म्हणजे दिव्य सोळा हजार वर्षे होते. ၂၃. မနုဿဂဏနံ ပန သယမေဝ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘နဝသတဉ္စာ’’တျာဒိ. ဝဿာနံ သမ္ဗန္ဓိ နဝသတံ ဧကဝီသ ကောဋိယော, တထာ သဋ္ဌိ စ ဝဿသတသဟဿာနိ ဝသဝတ္တီသု အာယုပ္ပမာဏန္တိ သမ္ဗန္ဓော. २३. परंतु मनुष्यगणनेनुसार स्वतःच दर्शवताना (आचार्य अनुरुद्धांनी) “नवसतञ्च” इत्यादी म्हटले आहे. वर्षांशी संबंधित नऊशे एकवीस कोटी आणि साठ लाख (९,२१,६०,००,०००) वर्षे हे वसवत्ती देवांच्या आयुष्याचे प्रमाण आहे, असा संबंध आहे. ၂၅. ဒုတိယဇ္ဈာနဘူမိယန္တိ စတုက္ကနယဝသေန ဝုတ္တံ. တတော ပရံ ပဝတ္တိယံ, စဝနကာလေ စ တထာရူပမေဝ ဘဝင်္ဂစုတိဝသေန ပဝတ္တိတွာ နိရုဇ္ဈတီတိ ယောဇနာ. २५. “द्वितीयध्यानभूमीत” हे चतुष्क-नयाच्या (चार प्रकारच्या ध्यानांच्या पद्धतीच्या) आधारे म्हटले आहे. त्यानंतर प्रवृत्ती काळात (जीवनाच्या प्रवाहात) आणि च्युती काळात (मृत्यूच्या वेळी) केवळ तसेच रूप (भौतिक शरीर) भवंग आणि च्युती रूपाने प्रवृत्त होऊन निरुद्ध होते (नष्ट होते), अशी योजना (अर्थसंगती) आहे. ၂၉. တေသူတိ တာဟိ ဂဟိတပဋိသန္ဓိကေသု ဗြဟ္မေသု. ကပ္ပဿာတိ အသင်္ချေယျကပ္ပဿ. န ဟိ ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇာဒီနံ တိဏ္ဏံ မဟာကပ္ပဝသေန အာယုပရိစ္ဆေဒေါ သမ္ဘဝတိ ဧကကပ္ပေပိ တေသံ အဝိနာသာဘာဝေန ပရိပုဏ္ဏကပ္ပေ အသမ္ဘဝတော. တထာ ဟေသ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၄၀၉) လောကော သတ္တဝါရေသု အဂ္ဂိနာ ဝိနဿတိ, အဋ္ဌမေ ဝါရေ ဥဒကေန, ပုန သတ္တဝါရေသု အဂ္ဂိနာ, အဋ္ဌမေ ဝါရေ ဥဒကေနာတိ ဧဝံ အဋ္ဌသု အဋ္ဌကေသု ပရိပုဏ္ဏေသု ပစ္ဆိမေ ဝါရေ ဝါတေန ဝိနဿတိ. တတ္ထ ပဌမဇ္ဈာနတလံ ဥပါဒါယ အဂ္ဂိနာ, ဒုတိယတတိယဇ္ဈာနတလံ ဥပါဒါယ ဥဒကေန, စတုတ္ထဇ္ဈာနတလံ ဥပါဒါယ ဝါတေန ဝိနဿတိ. ဝုတ္တမ္ပိ စေတံ – २९. “त्यांच्यामध्ये” म्हणजे त्या (प्रतिसंधी) ग्रहण केलेल्या ब्रह्मांमध्ये. “कल्पाचे” म्हणजे असंख्येय कल्पाचे. कारण ब्रह्मपारिसज्ज इत्यादी तीन प्रकारच्या ब्रह्मांच्या आयुष्याची मर्यादा महाकल्पाच्या आधारे संभवत नाही; कारण एका कल्पामध्येही त्यांचा विनाश होत असल्यामुळे, पूर्ण महाकल्पापर्यंत त्यांचे अस्तित्व असणे अशक्य आहे. कारण हा लोक सात वेळा अग्नीने नष्ट होतो आणि आठव्या वेळी पाण्याने नष्ट होतो; पुन्हा सात वेळा अग्नीने आणि आठव्या वेळी पाण्याने नष्ट होतो. अशा प्रकारे आठ वेळा आठ आवर्तने (एकूण ६४ वेळा) पूर्ण झाल्यावर, शेवटच्या वेळी वाऱ्याने (वादळाने) नष्ट होतो. त्या विनाशात, प्रथमध्यानभूमीपर्यंतचा भाग अग्नीने, द्वितीय व तृतीयध्यानभूमीपर्यंतचा भाग पाण्याने आणि चतुर्थध्यानभूमीपर्यंतचा भाग वाऱ्याने नष्ट होतो. याविषयी असेही म्हटले आहे – ‘‘သတ္တ သတ္တဂ္ဂိနာ ဝါရာ, အဋ္ဌမေ အဋ္ဌမေ ဒကာ; စတုသဋ္ဌိ ယဒါ ပုဏ္ဏာ, ဧကော ဝါယုဝရော သိယာ. “सात-सात वेळा अग्नीने आणि प्रत्येक आठव्या वेळी पाण्याने विनाश होतो. जेव्हा चौसष्ट वेळा हे पूर्ण होते, तेव्हा एकदा वाऱ्याने (महाविनाश) होतो. ‘‘အဂ္ဂိနာဘဿရာ [Pg.168] ဟေဋ္ဌာ, အာပေန သုဘကိဏှတော; ဝေဟပ္ဖလတော ဝါတေန, ဧဝံ လောကော ဝိနဿတီ’’တိ. – “अग्नीने आभास्सर लोकाच्या खालील भाग, पाण्याने सुभकिण्ह लोकाच्या खालील भाग आणि वाऱ्याने वेहप्फल लोकाच्या खालील भाग नष्ट होतो. अशा प्रकारे जगाचा विनाश होतो.” တသ္မာ တိဏ္ဏမ္ပိ ပဌမဇ္ဈာနတလာနံ ဧကကပ္ပေပိ အဝိနာသာဘာဝတော သကလကပ္ပေ တေသံ သမ္ဘဝေါ နတ္ထီတိ အသင်္ချေယျကပ္ပဝသေန တေသံ အာယုပရိစ္ဆေဒေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဒုတိယဇ္ဈာနာဒိတလတော ပဋ္ဌာယ ပန ပရိပုဏ္ဏဿ မဟာကပ္ပဿ ဝသေန, န အသင်္ချေယျကပ္ပဝသေန. အသင်္ချေယျကပ္ပောတိ စ ယောဇနာယာမဝိတ္ထာရတော သေတသာသပရာသိတော ဝဿသတဝဿသတစ္စယေန ဧကေကဗီဇဿ ဟရဏေန သာသပရာသိနော ပရိက္ခယေပိ အက္ခယသဘာဝဿ မဟာကပ္ပဿ စတုတ္ထဘာဂေါ. သော ပန သတ္ထရောဂဒုဗ္ဘိက္ခာနံ အညတရသံဝဋ္ဋေန ဗဟူသု ဝိနာသမုပဂတေသု အဝသိဋ္ဌသတ္တသန္တာနပ္ပဝတ္တကုသလကမ္မာနုဘာဝေန ဒသဝဿတော ပဋ္ဌာယ အနုက္ကမေန အသင်္ချေယျာယုကပ္ပမာဏေသု သတ္တေသု ပုန အသဒ္ဓမ္မသမာဒါနဝသေန ကမေန ပရိဟာယိတွာ ဒသဝဿာယုကေသု ဇာတေသု ရောဂါဒီနံ အညတရသံဝဋ္ဋေန သတ္တာနံ ဝိနာသပ္ပတ္တိယာဝ ‘‘အယမေကော အန္တရကပ္ပော’’တိ ဧဝံ ပရိစ္ဆိန္နဿ အန္တရကပ္ပဿ ဝသေန စတုသဋ္ဌိအန္တရကပ္ပပ္ပမာဏော ဟောတိ, ‘‘ဝီသတိအန္တရကပ္ပပ္ပမာဏော’’တိ စ ဝဒန္တိ. त्यामुळे, तिन्ही प्रथमध्यानभूमींचा एका कल्पामध्येही विनाश होत असल्यामुळे, संपूर्ण महाकल्पापर्यंत त्यांचे अस्तित्व राहू शकत नाही; म्हणून त्यांच्या आयुष्याची मर्यादा “असंख्येय कल्पाच्या” आधारे समजली पाहिजे. परंतु द्वितीयध्यानभूमीपासून पुढील भूमींच्या बाबतीत मात्र ती मर्यादा पूर्ण “महाकल्पाच्या” आधारे समजली पाहिजे, असंख्येय कल्पाच्या आधारे नाही. “असंख्येय कल्प” म्हणजे – एक योजन लांब आणि रुंद असलेल्या पांढऱ्या मोहरीच्या दाण्यांच्या ढिगाऱ्यातून दर शंभर वर्षांनी एक-एक दाणा काढून तो ढीग संपला, तरीही न संपणाऱ्या स्वभावाच्या महाकल्पाचा चौथा भाग होय. तो असंख्येय कल्प – शस्त्र, रोग किंवा दुष्काळ यांपैकी एखाद्या आपत्तीमुळे (कप्पविनाशामुळे) अनेक प्राण्यांचा विनाश झाल्यावर, उरलेल्या प्राण्यांच्या संततीमध्ये प्रवृत्त होणाऱ्या कुशल कर्माच्या प्रभावाने, दहा वर्षांच्या आयुष्यापासून क्रमशः वाढून प्राण्यांचे आयुष्य असंख्येय वर्षांचे होते; पुन्हा अधर्माच्या आचरणामुळे क्रमशः घटून ते दहा वर्षांचे होते, आणि रोग इत्यादींपैकी एखाद्या आपत्तीमुळे प्राण्यांचा विनाश होईपर्यंतचा काळ म्हणजे “एक अंतरकल्प” होय. अशा प्रकारे निश्चित केलेल्या अंतरकल्पाच्या हिशोबाने तो (असंख्येय कल्प) चौसष्ट अंतरकल्पांच्या प्रमाणाचा असतो, आणि काही आचार्य तो “वीस अंतरकल्पांच्या प्रमाणाचा” असतो असेही म्हणतात. ၄၅. အာကာသာနဉ္စာယတနံ ဥပဂစ္ဆန္တီတိ အာကာသာနဉ္စာယတနူပဂါ. ४५. जे आकासानञ्चायतन (आकाशानंत्यायतण) भूमीमध्ये उत्पन्न होतात, त्यांना “आकासानञ्चायतनूपग” (आकाशानंत्यायतनोपग) म्हणतात. ၄၉. ဧကမေဝါတိ ဘူမိတော, ဇာတိတော, သမ္ပယုတ္တဓမ္မတော, သင်္ခါရတော စ သမာနမေဝ. ဧကဇာတိယန္တိ ဧကသ္မိံ ဘဝေ. ४९. “एकच” म्हणजे भूमी (भूमीच्या दृष्टीने), जाती (उत्पत्तीच्या दृष्टीने), संप्रयुक्त धर्म (सहयोगी मानसिक घटकांच्या दृष्टीने) आणि संस्कार (ससंस्कारक-असंस्कारक असण्याच्या दृष्टीने) समानच असणे. “एकाच जन्मात” म्हणजे एकाच अस्तित्वात (भवात). ပဋိသန္ဓိစတုက္ကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. प्रतिसंधी-चतुष्क वर्णन समाप्त झाले. ကမ္မစတုက္ကဝဏ္ဏနာ कर्म-चतुष्क वर्णन ၅၀. ဣဒါနိ [Pg.169] ကမ္မစတုက္ကံ စတူဟာကာရေဟိ ဒဿေတုံ ‘‘ဇနက’’န္တျာဒိ အာရဒ္ဓံ, ဇနယတီတိ ဇနကံ. ဥပတ္ထမ္ဘေတီတိ ဥပတ္ထမ္ဘကံ. ဥပဂန္တွာ ပီဠေတီတိ ဥပပီဠကံ. ဥပဂန္တွာ ဃာတေတီတိ ဥပဃာတကံ. ५०. आता कर्म-चतुष्क चार प्रकारांनी दर्शवण्यासाठी “जनकं” इत्यादी (ग्रंथ) सुरू केला आहे. जे (विपाक) उत्पन्न करते, ते “जनक” (जनक कर्म) होय. जे (उत्पन्न झालेल्या विपाकाला) आधार देते, ते “उपत्थंभक” (उपस्तंभक कर्म) होय. जे पीडा देते (बाधा आणते), ते “उपपीळक” (उपपीडक कर्म) होय. जे पूर्णपणे नष्ट करते (घात करते), ते “उपघातक” (उपघातक कर्म) होय. တတ္ထ ပဋိသန္ဓိပဝတ္တီသု ဝိပါကကဋတ္တာရူပါနံ နိဗ္ဗတ္တကာ ကုသလာကုသလစေတနာ ဇနကံ နာမ. သယံ ဝိပါကံ နိဗ္ဗတ္တေတုံ အသက္ကောန္တမ္ပိ ကမ္မန္တရဿ စိရတရဝိပါကနိဗ္ဗတ္တနေ ပစ္စယဘူတံ, ဝိပါကဿေဝ ဝါ သုခဒုက္ခဘူတဿ ဝိစ္ဆေဒပစ္စယာနုပ္ပတ္တိယာ, ဥပဗြူဟနပစ္စယုပ္ပတ္တိယာ စ ဇနကသာမတ္ထိယာနုရူပံ စိရတရပ္ပဝတ္တိပစ္စယဘူတံ ကုသလာကုသလကမ္မံ ဥပတ္ထမ္ဘကံ နာမ. ကမ္မန္တရဇနိတဝိပါကဿ ဗျာဓိဓာတုသမတာဒိနိမိတ္တဝိဗာဓနေန စိရတရပ္ပဝတ္တိဝိနိဗန္ဓကံ ယံ ကိဉ္စိ ကမ္မံ ဥပပီဠကံ နာမ. ဒုဗ္ဗလဿ ပန ကမ္မဿ ဇနကသာမတ္ထိယံ ဥပဟစ္စ ဝိစ္ဆေဒကပစ္စယုပ္ပာဒနေန တဿ ဝိပါကံ ပဋိဗာဟိတွာ သယံ ဝိပါကနိဗ္ဗတ္တကကမ္မံ ဥပဃာတကံ နာမ. त्या (चार कर्मां) मध्ये, प्रतिसंधी आणि प्रवृत्ती काळात विपाक आणि कटत्तारूप (कर्मज रूप) यांना उत्पन्न करणारी कुशल-अकुशल चेतना 'जनक कर्म' नावाचे आहे. स्वतः विपाक उत्पन्न करण्यास असमर्थ असूनही, दुसऱ्या जनक कर्माच्या दीर्घकाळ विपाक उत्पन्न करण्यामध्ये जे साहाय्यक कारण बनते; किंवा सुख-दुःखरूप असणाऱ्या विपाकाच्याच खंडित होण्याच्या कारणांना उत्पन्न न होऊ देण्यासाठी आणि वृद्धीच्या कारणांना उत्पन्न करण्यासाठी, जनक कर्माच्या सामर्थ्यानुसार दीर्घकाळ प्रवृत्तीचे कारण बनणारे कुशल-अकुशल कर्म 'उपस्तंभक कर्म' नावाचे आहे. दुसऱ्या जनक कर्माने उत्पन्न केलेल्या विपाकाला व्याधी (रोग) आणि धातूंची विषमता इत्यादी कारणांनी पीडा देऊन, त्याच्या दीर्घकाळ चालणाऱ्या प्रवृत्तीला अडथळा आणणारे जे कोणतेही कर्म आहे, ते 'उपपीडक कर्म' नावाचे आहे. परंतु दुर्बल कर्माच्या जनक सामर्थ्याला बाधा आणून, विच्छेदक (खंडित करणाऱ्या) कारणांना उत्पन्न करून त्याच्या विपाकाला रोखणारे आणि स्वतः विपाक उत्पन्न करणारे कर्म 'उपघातक कर्म' नावाचे आहे. ဇနကောပဃာတကာနဉှိ အယံ ဝိသေသော – ဇနကံ ကမ္မန္တရဿ ဝိပါကံ အနုပစ္ဆိန္ဒိတွာဝ ဝိပါကံ ဇနေတိ, ဥပဃာတကံ ဥပစ္ဆေဒနပုဗ္ဗကန္တိ ဣဒံ တာဝ အဋ္ဌကထာသု (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၈၇; အ. နိ. အဋ္ဌ. ၂.၃.၃၄) သန္နိဋ္ဌာနံ. အပရေ ပန အာစရိယာ ‘‘ဥပပီဠကကမ္မံ ဗဟွာဗာဓတာဒိပစ္စယောပသံဟာရေန ကမ္မန္တရဿ ဝိပါကံ အန္တရန္တရာ ဝိဗာဓတိ. ဥပဃာတကံ ပန တံ သဗ္ဗသော ဥပစ္ဆိန္ဒိတွာ အညဿ ဩကာသံ ဒေတိ, န ပန သယံ ဝိပါကနိဗ္ဗတ္တကံ. ဧဝဉှိ ဇနကတော ဣမဿ ဝိသေသော သုပါကဋော’’တိ ဝဒန္တိ. ကိစ္စဝသေနာတိ ဇနနဥပတ္ထမ္ဘနဥပပီဠနဥပစ္ဆေဒနကိစ္စဝသေန. जनक आणि उपघातक कर्मांमध्ये हा विशेष (भेद) आहे – जनक कर्म दुसऱ्या कर्माच्या विपाकाला खंडित न करताच विपाक उत्पन्न करते, तर उपघातक कर्म (दुसऱ्या कर्माच्या विपाकाचा) उच्छेद (नाश) करूनच विपाक उत्पन्न करते. हा निर्णय अट्ठकथांमध्ये दिला आहे. परंतु इतर आचार्य म्हणतात – 'उपपीडक कर्म अनेक प्रकारचे आजार इत्यादी कारणांना उपस्थित करून दुसऱ्या जनक कर्माच्या विपाकाला वेळोवेळी पीडा देते. परंतु उपघातक कर्म त्या विपाकाला पूर्णपणे नष्ट करून दुसऱ्या कर्माला (विपाक देण्याची) संधी देते, पण स्वतः विपाक उत्पन्न करत नाही. अशा प्रकारे जनक कर्मापेक्षा या उपघातक कर्माचा भेद स्पष्टपणे दिसून येतो.' 'कृत्यवशाने' (किच्चवसेन) म्हणजे – जनन (उत्पन्न करणे), उपस्तंभन (साहाय्य करणे), उपपीडन (पीडा देणे) आणि उपच्छेद (नाश करणे) या कृत्यांच्या आधारे. ၅၁. ဂရုကန္တိ မဟာသာဝဇ္ဇံ, မဟာနုဘာဝဉ္စ အညေန ကမ္မေန ပဋိဗာဟိတုံ အသက္ကုဏေယျကမ္မံ. အာသန္နန္တိ မရဏကာလေ အနုဿရိတံ, တဒါ ကတဉ္စ. အာစိဏ္ဏန္တိ အဘိဏှသော ကတံ[Pg.170], ဧကဝါရံ ကတွာပိ ဝါ အဘိဏှသော သမာသေဝိတံ. ကဋတ္တာကမ္မန္တိ ဂရုကာဒိဘာဝံ အသမ္ပတ္တံ ကတမတ္တတောယေဝ ကမ္မန္တိ ဝတ္တဗ္ဗကမ္မံ. ५१. 'गरुक कर्म' म्हणजे अत्यंत दोषयुक्त (अकुशल पक्षातील) किंवा महान सामर्थ्य असणारे (कुशल पक्षातील), ज्याला इतर कोणत्याही कर्माने रोखणे अशक्य असते. 'आसन्न कर्म' म्हणजे मृत्यूच्या वेळी स्मरण केलेले किंवा त्या वेळी केलेले कर्म. 'आचिण्ण कर्म' म्हणजे वारंवार केलेले, किंवा एकदाच करूनही वारंवार त्याचे स्मरण केलेले कर्म. 'कटत्ता कर्म' म्हणजे जे गरुक इत्यादी अवस्थेला प्राप्त न झालेले, केवळ केले गेले असल्यामुळेच 'कर्म' असे म्हटले जाणारे कर्म होय. တတ္ထ ကုသလံ ဝါ ဟောတု အကုသလံ ဝါ, ဂရုကာဂရုကေသု ယံ ဂရုကံ အကုသလပက္ခေ မာတုဃာတကာဒိကမ္မံ, ကုသလပက္ခေ မဟဂ္ဂတကမ္မံ ဝါ, တဒေဝ ပဌမံ ဝိပစ္စတိ သတိပိ အာသန္နာဒိကမ္မေ ပရိတ္တံ ဥဒကံ ဩတ္ထရိတွာ ဂစ္ဆန္တော မဟောဃော ဝိယ. တထာ ဟိ တံ ‘‘ဂရုက’’န္တိ ဝုစ္စတိ. တသ္မိံ အသတိ ဒူရာသန္နေသု ယံ အာသန္နံ မရဏကာလေ အနုဿရိတံ, တဒေဝ ပဌမံ ဝိပစ္စတိ, အာသန္နကာလေ ကတေ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. တသ္မိမ္ပိ အသတိ အာစိဏ္ဏာနာစိဏ္ဏေသု စ ယံ အာစိဏ္ဏံ သုသီလျံ ဝါ, ဒုဿီလျံ ဝါ, တဒေဝ ပဌမံ ဝိပစ္စတိ. ကဋတ္တာကမ္မံ ပန လဒ္ဓါသေဝနံ ပုရိမာနံ အဘာဝေန ပဋိသန္ဓိံ အာကဍ္ဎတီတိ ဂရုကံ သဗ္ဗပဌမံ ဝိပစ္စတိ. ဂရုကေ အသတိ အာသန္နံ, တသ္မိမ္ပိ အသတိ အာစိဏ္ဏံ, တသ္မိမ္ပိ အသတိ ကဋတ္တာကမ္မံ. တေနာဟ ‘‘ပါကဒါနပရိယာယေနာ’’တိ, ဝိပါကဒါနာနုက္ကမေနာတျတ္ထော. အဘိဓမ္မာဝတာရာဒီသု ပန အာသန္နတော အာစိဏ္ဏံ ပဌမံ ဝိပစ္စန္တံ ကတွာ ဝုတ္တံ. ယထာ ပန ဂေါဂဏပရိပုဏ္ဏဿ ဝဇဿ ဒွါရေ ဝိဝဋေ အပရဘာဂေ ဒမ္မဂဝဗလဝဂဝေသု သန္တေသုပိ ယော ဝဇဒွါရဿ အာသန္နော ဟောတိ, အန္တမသော ဒုဗ္ဗလဇရဂ္ဂဝေါပိ, သောယေဝ ပဌမတရံ နိက္ခမတိ, ဧဝံ ဂရုကတော အညေသု ကုသလာကုသလေသု သန္တေသုပိ မရဏကာလဿ အာသန္နတ္တာ အာသန္နမေဝ ပဌမံ ဝိပါကံ ဒေတီတိ ဣဓ တံ ပဌမံ ဝုတ္တံ. त्यामध्ये कुशल असो वा अकुशल, गरुक आणि अ-गरुक कर्मांमध्ये जे गरुक असते – जसे की अकुशल पक्षात मातृघात इत्यादी कर्म, आणि कुशल पक्षात महग्गत (ध्यान) कर्म – तेच आसन्न इत्यादी कर्मे विद्यमान असतानाही सर्वात आधी विपाकाला प्राप्त होते; ज्याप्रमाणे थोड्या पाण्याला वाहून नेणारा मोठा पूर येतो, त्याप्रमाणे. म्हणूनच त्याला 'गरुक' असे म्हटले जाते. ते (गरुक कर्म) नसताना, दूर आणि जवळच्या कर्मांमध्ये जे आसन्न (जवळचे) असते, म्हणजेच मृत्यूच्या वेळी स्मरण केले जाते, तेच सर्वात आधी विपाकाला प्राप्त होते. मृत्यूच्या वेळी प्रत्यक्ष केलेल्या कर्माबद्दल तर सांगायलाच नको. ते (आसन्न कर्म) देखील नसताना, आचिण्ण (नेहमी केलेले) आणि अन-आचिण्ण कर्मांमध्ये जे आचिण्ण असते – मग ते सुशीलता असो वा दुशीलता – तेच सर्वात आधी विपाकाला प्राप्त होते. परंतु कटत्ता कर्म हे पूर्वीच्या तीन कर्मांच्या अभावी, आसेवन प्राप्त करून प्रतिसंधीला खेचून आणते. अशा प्रकारे गरुक कर्म सर्वात आधी विपाकाला प्राप्त होते. गरुक नसताना आसन्न, तेही नसताना आचिण्ण, आणि तेही नसताना कटत्ता कर्म विपाकाला प्राप्त होते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'पाकदानपर्यायाने' (पाकदानपरियायेन), याचा अर्थ विपाक देण्याच्या क्रमानुसार असा आहे. परंतु अभिधम्मावतार इत्यादी ग्रंथांमध्ये आसन्न कर्मापेक्षा आचिण्ण कर्म आधी विपाकाला प्राप्त होते असे सांगितले आहे. परंतु ज्याप्रमाणे गाईंनी भरलेल्या गोठ्याचा दरवाजा उघडला असता, पाठीमागे तरुण आणि बलवान बैल उभे असले तरीही, जो गोठ्याच्या दरवाजाच्या अगदी जवळ असतो – मग तो अगदी दुर्बल आणि म्हातारा बैल का असेना – तोच सर्वात आधी बाहेर पडतो; त्याचप्रमाणे गरुक कर्माव्यतिरिक्त इतर कुशल-अकुशल कर्मे विद्यमान असतानाही, मृत्यूच्या वेळेच्या निकटतेमुळे आसन्न कर्मच सर्वात आधी विपाक देते, म्हणून या ग्रंथात त्याला आधी सांगितले आहे. ၅၂. ဒိဋ္ဌဓမ္မော ပစ္စက္ခဘူတော ပစ္စုပ္ပန္နော အတ္တဘာဝေါ, တတ္ထ ဝေဒိတဗ္ဗံ ဝိပါကာနုဘဝနဝသေနာတိ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယံ. ဒိဋ္ဌဓမ္မတော အနန္တရံ ဥပပဇ္ဇိတွာ ဝေဒိတဗ္ဗံ ဥပပဇ္ဇဝေဒနီယံ. အပရေ အပရေ ဒိဋ္ဌဓမ္မတော အညသ္မိံ ယတ္ထ ကတ္ထစိ အတ္တဘာဝေ ဝေဒိတဗ္ဗံ ကမ္မံ အပရာပရိယဝေဒနီယံ. အဟောသိ ဧဝ ကမ္မံ[Pg.171], န တဿ ဝိပါကော အဟောသိ, အတ္ထိ, ဘဝိဿတိ စာတိ ဧဝံ ဝတ္တဗ္ဗကမ္မံ အဟောသိကမ္မံ. ५२. 'दिट्ठधम्म' म्हणजे प्रत्यक्ष असणारा वर्तमान अत्तभाव (शरीर/जन्म). त्यामध्ये विपाकाचा अनुभव घेण्याच्या रूपाने जे अनुभवले जाते, ते 'दिट्ठधम्मवेदनीय कर्म' होय. दिट्ठधम्म (वर्तमान जन्म) नंतरच्या लगेचच्या जन्मात उत्पन्न होऊन जे अनुभवले जाते, ते 'उपपज्जवेदनीय कर्म' होय. वर्तमान जन्मानंतरच्या इतर कोणत्याही पुढील जन्मात जे अनुभवले जाते, ते 'अपरापरियवेदनीय कर्म' होय. जे केवळ कर्म होऊन गेले, पण ज्याचा विपाक भूतकाळात झाला नाही, वर्तमानकाळात होत नाही आणि भविष्यकाळातही होणार नाही, अशा कर्माला 'अहोसिकर्म' म्हटले जाते. တတ္ထ ပဋိပက္ခေဟိ အနဘိဘူတတာယ, ပစ္စယဝိသေသေန ပဋိလဒ္ဓဝိသေသတာယ စ ဗလဝဘာဝပ္ပတ္တာ တာဒိသဿ ပုဗ္ဗာဘိသင်္ခါရဿ ဝသေန သာတိသယာ ဟုတွာ တသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ ဖလဒါယိနီ ပဌမဇဝနစေတနာ ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယံ နာမ. သာ ဟိ ဝုတ္တပ္ပကာရေန ဗလဝဇနသန္တာနေ ဂုဏဝိသေသယုတ္တေသု ဥပကာရာနုပကာရဝသပ္ပဝတ္တိယာ, အာသေဝနာလာဘေန အပ္ပဝိပါကတာယ စ ဣတရဒွယံ ဝိယ ပဝတ္တသန္တာနုပရမာပေက္ခံ, ဩကာသလာဘာပေက္ခဉ္စ ကမ္မံ န ဟောတီတိ ဣဓေဝ ပုပ္ဖမတ္တံ ဝိယ ပဝတ္တိဝိပါကမတ္တံ အဟေတုကဖလံ ဒေတိ. အတ္ထသာဓိကာ ပန သတ္တမဇဝနစေတနာ သန္နိဋ္ဌာပကစေတနာဘူတာ ဝုတ္တနယေန ပဋိလဒ္ဓဝိသေသာ အနန္တရတ္တဘာဝေ ဝိပါကဒါယိနီ ဥပပဇ္ဇဝေဒနီယံ နာမ. သာ စ ပဋိသန္ဓိံ ဒတွာဝ ပဝတ္တိဝိပါကံ ဒေတိ. ပဋိသန္ဓိယာ ပန အဒိန္နာယ ပဝတ္တိဝိပါကံ ဒေတီတိ နတ္ထိ. စုတိ အနန္တရဉှိ ဥပပဇ္ဇဝေဒနီယဿ ဩကာသော. ပဋိသန္ဓိယာ ပန ဒိန္နာယ ဇာတိသတေပိ ပဝတ္တိဝိပါကံ ဒေတီတိ အာစရိယာ. ယထာဝုတ္တကအာရဏဝိရဟတော ဒိဋ္ဌဓမ္မဝေဒနီယာဒိဘာဝံ အသမ္ပတ္တာ အာဒိပရိယောသာနစေတနာနံ မဇ္ဈေ ပဝတ္တာ ပဉ္စ စေတနာ ဝိပါကဒါနသဘာဝဿ အနုပစ္ဆိန္နတ္တာ ယဒါ ကဒါစိ ဩကာသလာဘေ သတိ ပဋိသန္ဓိပဝတ္တီသု ဝိပါကံ အဘိနိပ္ဖာဒေန္တီ အပရာပရိယဝေဒနိယံ နာမ. သကသကကာလာတီတံ ပန ပုရိမကမ္မဒွယံ, တတိယမ္ပိ စ သံသာရပ္ပဝတ္တိယာ ဝေါစ္ဆိန္နာယ အဟောသိကမ္မံ နာမ. त्यामध्ये, विरोधी धर्मांनी पराभूत न झाल्यामुळे आणि विशिष्ट प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) साहाय्याने विशिष्ट सामर्थ्य प्राप्त झाल्यामुळे बलवान बनलेल्या, आणि पूर्व-अभिसंस्काराच्या (पूर्व तयारीच्या) प्रभावाने अत्यंत तीव्र होऊन त्याच अत्तभावात (जन्मात) फळ देणारी पहिली जवन-चेतना 'दिट्ठधम्मवेदनीय कर्म' नावाचे आहे. कारण ती (पहिली जवन-चेतना) वर सांगितलेल्या प्रकारे बलवान जवन-प्रवाहात, गुणविशिष्ट व्यक्तींच्या प्रति उपकार किंवा अपकार करण्याच्या प्रवृत्तीने, आणि आसेवन (पुनरावृत्ती) न मिळाल्यामुळे अल्प विपाक देणारी असल्यामुळे, इतर दोन कर्मांप्रमाणे वर्तमान अत्तभावाच्या समाप्तीची किंवा विपाक देण्याची संधी मिळण्याची वाट पाहत नाही; तर याच जन्मात केवळ फुलाप्रमाणे प्रवृत्ती-विपाकरूप अहेतुक फळ देते. परंतु कार्य सिद्ध करणारी सातवी जवन-चेतना, जी अंतिम निर्णय घेणारी चेतना असते, ती वर सांगितलेल्या पद्धतीने विशिष्ट सामर्थ्य प्राप्त करून पुढील लगेचच्या जन्मात विपाक देणारी 'उपपज्जवेदनीय कर्म' नावाचे आहे. ती प्रतिसंधी देऊनच प्रवृत्ती-विपाक देते. प्रतिसंधी न देता ती प्रवृत्ती-विपाक देते असे घडत नाही. कारण मृत्यूच्या लगेच नंतरचा काळ हाच उपपज्जवेदनीय कर्माची संधी असतो. परंतु आचार्यांचे म्हणणे आहे की, प्रतिसंधी दिली गेल्यास शेकडो जन्मांनंतरही ती प्रवृत्ती-विपाक देते. वर सांगितलेल्या कारणांच्या अभावामुळे दिट्ठधम्मवेदनीय इत्यादी अवस्थेला प्राप्त न झालेल्या, पहिल्या आणि शेवटच्या जवन-चेतनेच्या मध्ये प्रवृत्त होणाऱ्या पाच चेतना, विपाक देण्याचा स्वभाव खंडित न झाल्यामुळे, जेव्हा कधी संधी मिळेल तेव्हा प्रतिसंधी आणि प्रवृत्ती काळात विपाक उत्पन्न करतात; त्यांना 'अपरापरियवेदनीय कर्म' म्हणतात. परंतु आपापला काळ निघून गेलेली पहिली दोन कर्मे (दिट्ठधम्मवेदनीय आणि उपपज्जवेदनीय), आणि संसार-प्रवृत्ती खंडित (मुक्त) झाल्यावर तिसरे कर्म (अपरापरियवेदनीय) देखील 'अहोसिकर्म' नावाचे होते. ပါကကာလဝသေနာတိ ပစ္စုပ္ပန္နေ, တဒနန္တရေ, ယဒါ ကဒါစီတိ ဧဝံ ပုရိမာနံ တိဏ္ဏံ ယထာပရိစ္ဆိန္နကာလဝသေန, ဣတရဿ တံကာလာဘာဝဝသေန စ. အဟောသိကမ္မဿ ဟိ ကာလာတိက္ကမတောဝ တံ ဝေါဟာရော. 'पाककालवशाने' (विपाक देण्याच्या काळाच्या आधारे) म्हणजे – वर्तमानकाळात, त्याच्या लगेच नंतरच्या काळात, आणि जेव्हा कधी (तिसऱ्या जन्मापासून पुढे) अशा प्रकारे पहिल्या तीन कर्मांच्या निश्चित केलेल्या काळानुसार, आणि इतर (अहोसि) कर्माच्या बाबतीत त्या काळाचा अभाव असल्यामुळे. कारण अहोसिकर्माचा व्यवहार (नाव) हा विपाक देण्याचा काळ निघून गेल्यामुळेच होतो. ၅၃. ပါကဌာနဝသေနာတိ [Pg.172] ပဋိသန္ဓိယာ ဝိပစ္စနဘူမိဝသေန. ५३. 'पाकस्थानवशाने' (विपाक देण्याच्या स्थानाच्या आधारे) म्हणजे – प्रतिसंधीच्या विपाकाच्या भूमीच्या (लोकाच्या) आधारे. ၅၄. ဣဒါနိ အကုသလာဒိကမ္မာနံ ကာယကမ္မဒွါရာဒိဝသေန ပဝတ္တိံ, တံနိဒ္ဒေသမုခေန စ တေသံ ပါဏာတိပါတာဒိဝသေန ဒသဝိဓာဒိဘေဒဉ္စ ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထ အကုသလ’’န္တျာဒိ အာရဒ္ဓံ. ကာယဒွါရေ ပဝတ္တံ ကမ္မံ ကာယကမ္မံ. ဧဝံ ဝစီကမ္မာဒီနိ. ५४. आता, अकुशल इत्यादी कर्मांची कायकर्म-द्वार इत्यादींच्या द्वारे होणारी प्रवृत्ती आणि त्या प्रवृत्तीच्या निर्देशपूर्वक प्राणातिपात इत्यादींच्या रूपाने त्यांचे दहा प्रकारांचे भेद दर्शवण्यासाठी 'तत्थ अकुसलं' (तेथे अकुशल) इत्यादी ग्रंथाचा आरंभ केला आहे. कायद्वारात (शरीराच्या द्वारे) प्रवृत्त होणारे कर्म म्हणजे 'कायकर्म' होय. याचप्रमाणे वचीकर्म (वाणीचे कर्म) इत्यादींचेही स्पष्टीकरण समजावे। ၅၅. ပါဏဿ သဏိကံ ပတိတုံ အဒတွာ အတီဝ ပါတနံ ပါဏာတိပါတော. ကာယဝါစာဟိ အဒိန္နဿ အာဒါနံ အဒိန္နာဒါနံ. မေထုနဝီတိက္ကမသင်္ခါတေသု ကာမေသု မိစ္ဆာ စရဏံ ကာမေသု မိစ္ဆာစာရော. ५५. प्राण्याला (जीवाला) हळूहळू मरू न देता, अत्यंत वेगाने त्याचा प्राण हरण करणे म्हणजे 'प्राणातिपात' (जीवहत्या) होय. काया आणि वाणीच्या द्वारे न दिलेल्या (चोरीच्या) वस्तूचे ग्रहण करणे म्हणजे 'अदिन्नादान' (चोरी) होय. मैथुन-अतिचार म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या कामभोगांमध्ये चुकीचे (मिथ्या) आचरण करणे म्हणजे 'कामेसू मिच्छाचार' (व्यभिचार) होय। တတ္ထ ပါဏောတိ ဝေါဟာရတော သတ္တော, ပရမတ္ထတော ဇီဝိတိန္ဒြိယံ. တသ္မိံ ပါဏေ ပါဏသညိနော ဇီဝိတိန္ဒြိယုပစ္ဆေဒကပ္ပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ ဝဓကစေတနာ ပါဏာတိပါတော. ပရဘဏ္ဍေ တထာသညိနော တဒါဒါယကပ္ပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ ထေယျစေတနာ အဒိန္နာဒါနံ. အသဒ္ဓမ္မသေဝနဝသေန ကာယဒွါရပ္ပဝတ္တာ အဂန္တဗ္ဗဋ္ဌာနဝီတိက္ကမစေတနာ ကာမေသုမိစ္ဆာစာရော နာမ. သုရာပါနမ္ပိ ဧတ္ထေဝ သင်္ဂယှတီတိ ဝဒန္တိ ရသသင်္ခါတေသု ကာမေသု မိစ္ဆာစာရဘာဝတော. ကာယဝိညတ္တိသင်္ခါတေ ကာယဒွါရေတိ ကာယေန အဓိပ္ပာယဝိညာပနတော, သယဉ္စ ကာယေန ဝိညေယျတ္တာ ကာယဝိညတ္တိသင်္ခါတေ အဘိက္ကမာဒိဇနကစိတ္တဇဝါယောဓာတွာဓိကကလာပဿ ဝိကာရဘူတေ သန္ထမ္ဘနာဒီနံ သဟကာရီကာရဏဘူတေ စောပနကာယဘာဝတော, ကမ္မာနံ ပဝတ္တိမုခဘာဝတော စ ကာယဒွါရသင်္ခါတေ ကမ္မဒွါရေ. त्यामध्ये, 'प्राण' म्हणजे व्यावहारिक दृष्टीने 'प्राणी' (सत्त्व) आणि परमार्थ दृष्टीने 'जीवितेंद्रिय' होय. त्या प्राण्याविषयी 'हा प्राणी आहे' अशी संज्ञा असणाऱ्या व्यक्तीची, त्याच्या जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करणाऱ्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणारी मारण्याची चेतना म्हणजे 'प्राणातिपात' होय. दुसऱ्याच्या मालकीच्या वस्तूविषयी 'ही दुसऱ्याची वस्तू आहे' अशी संज्ञा असणाऱ्या व्यक्तीची, ती वस्तू चोरून घेण्याच्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणारी चोरीची चेतना म्हणजे 'अदिन्नादान' होय. असद्धर्माच्या (मैथुनधर्माच्या) सेवनाद्वारे कायद्वारात प्रवृत्त होणारी, अगम्य व्यक्तींचे उल्लंघन करण्याची चेतना म्हणजे 'कामेसू मिच्छाचार' होय. रस संज्ञक कामभोगांमध्ये मिथ्या आचरण असल्यामुळे सुरापान (मद्यपान) देखील यातच समाविष्ट होते असे आचार्य म्हणतात. 'कायविज्ञप्ती' नावाच्या कायद्वारात म्हणजे—शरीराच्या द्वारे अभिप्राय प्रकट केला जात असल्यामुळे आणि स्वतः शरीराच्या द्वारेच ती जाणून घेण्यायोग्य असल्यामुळे, पुढे जाणे इत्यादी क्रिया उत्पन्न करणाऱ्या चित्तज वायूधातूचे प्राबल्य असणाऱ्या रूपकलापाच्या विकाररूप असलेल्या, शरीराला आधार देणे इत्यादी क्रियांमध्ये सहकारी कारण असणाऱ्या आणि शरीराच्या हालचालीच्या स्वरूपात असल्यामुळे, तसेच कर्मांच्या प्रवृत्तीचे मुख्य द्वार असल्यामुळे, कायद्वार संज्ञक कर्मद्वारात होय। ကိဉ္စာပိ ဟိ တံတံကမ္မသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒေနေဝ သာ ဝိညတ္တိ ဇနီယတိ. တထာပိ တဿာ တထာ ပဝတ္တမာနာယ တံသမုဋ္ဌာပကကမ္မဿ ကာယကမ္မာဒိဝေါဟာရော ဟောတီတိ သာ တဿေဝ ပဝတ္တိမုခဘာဝေန ဝတ္တုံ လဗ္ဘတိ. ‘‘ကာယဒွါရေ ဝုတ္တိတော’’တိ [Pg.173] ဧတ္တကေယေဝ ဝုတ္တေ ‘‘ယဒိ ဧဝံ ကမ္မဒွါရဝဝတ္ထာနံ န သိယာ. ကာယဒွါရေ ဟိ ပဝတ္တံ ‘ကာယကမ္မ’န္တိ ဝုစ္စတိ, ကာယကမ္မဿ စ ပဝတ္တိမုခဘူတံ ‘ကာယဒွါရ’န္တိ. ပါဏာတိပါတာဒိကံ ပန ဝါစာယ အာဏာပေန္တဿ ကာယကမ္မံ ဝစီဒွါရေပိ ပဝတ္တတီတိ ဒွါရေန ကမ္မဝဝတ္ထာနံ န သိယာ, တထာ မုသာဝါဒါဒိံ ကာယဝိကာရေန ကရောန္တဿ ဝစီကမ္မံ ကာယဒွါရေပိ ပဝတ္တတီတိ ကမ္မေန ဒွါရဝဝတ္ထာနမ္ပိ န သိယာ’’တိ အယံ စောဒနာ ပစ္စုပဋ္ဌေယျာတိ ဗာဟုလ္လဝုတ္တိယာ ဝဝတ္ထာနံ ဒဿေတုံ ‘‘ဗာဟုလ္လဝုတ္တိတော’’တိ ဝုတ္တံ. ကာယကမ္မဉှိ ကာယဒွါရေယေဝ ဗဟုလံ ပဝတ္တတိ, အပ္ပံ ဝစီဒွါရေ, တသ္မာ ကာယဒွါရေယေဝ ဗဟုလံ ပဝတ္တနတော ကာယကမ္မဘာဝေါ သိဒ္ဓေါ ဝနစရကာဒီနံ ဝနစရကာဒိဘာဝေါ ဝိယ. တထာ ကာယကမ္မမေဝ ယေဘုယျေန ကာယဒွါရေ ပဝတ္တတိ, န ဣတရာနိ, တသ္မာ ကာယကမ္မဿ ယေဘုယျေန ဧတ္ထေဝ ပဝတ္တနတော ကာယကမ္မဒွါရဘာဝေါ သိဒ္ဓေါ ဗြာဟ္မဏဂါမာဒီနံ ဗြာဟ္မဏဂါမာဒိဘာဝေါ ဝိယာတိ နတ္ထိ ကမ္မဒွါရဝဝတ္ထာနေ ကောစိ ဝိဗန္ဓောတိ အယမေတ္ထာဓိပ္ပာယော. जरी खरोखर ती विज्ञप्ती त्या त्या कर्मासोबत उत्पन्न होणाऱ्या चित्तोत्पादानेच निर्माण केली जात असली, तरी देखील ती विज्ञप्ती त्या प्रकारे प्रवृत्त होत असताना, तिला उत्पन्न करणाऱ्या कर्माला 'कायकर्म' इत्यादी संज्ञा प्राप्त होते; म्हणून ती विज्ञप्तीच त्या कर्माच्या प्रवृत्तीचे मुख्य कारण मानणे योग्य ठरते. जर केवळ 'कायद्वारात प्रवृत्त झाल्यामुळे' एवढेच म्हटले, तर 'अशा वेळी कर्म आणि द्वारांचे निर्धारण योग्य प्रकारे होणार नाही. कारण कायद्वारात प्रवृत्त होणाऱ्या कर्माला 'कायकर्म' म्हटले जाते आणि कायकर्माच्या प्रवृत्तीचे मुख्य कारण असणाऱ्याला 'कायद्वार' म्हटले जाते. परंतु, प्राणातिपात इत्यादी कर्मांची वाणीने आज्ञा देणाऱ्याचे कायकर्म वचीद्वारात देखील प्रवृत्त होते, त्यामुळे द्वाराच्या आधारे कर्माचे निर्धारण होणार नाही. त्याचप्रमाणे, मृषावाद (असत्य बोलणे) इत्यादी कर्म शरीराच्या हालचालीने (इशाऱ्याने) करणाऱ्याचे वचीकर्म कायद्वारात देखील प्रवृत्त होते, त्यामुळे कर्माच्या आधारे द्वाराचे निर्धारण देखील होणार नाही'—हा आक्षेप उपस्थित होऊ शकतो. म्हणून, बहुतांश प्रवृत्तीच्या (बाहुल्यवृत्तीच्या) आधारे हे निर्धारण दर्शवण्यासाठी 'बाहुल्लवुत्तितो' (बहुतांश प्रवृत्तीमुळे) असे म्हटले आहे. कारण कायकर्म हे कायद्वारातच प्रामुख्याने प्रवृत्त होते, वचीद्वारात फार कमी; म्हणून कायद्वारातच प्रामुख्याने प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्याचे 'कायकर्म' असणे सिद्ध होते, जसे वनात फिरणाऱ्यांचे 'वनचर' असणे सिद्ध होते. त्याचप्रमाणे, कायकर्मच प्रामुख्याने कायद्वारात प्रवृत्त होते, इतर कर्मे नाही; म्हणून कायकर्माची प्रामुख्याने याच द्वारात प्रवृत्ती होत असल्यामुळे त्याचे 'कायकर्मद्वार' असणे सिद्ध होते, जसे ब्राह्मणांची वस्ती असणाऱ्या गावाचे 'ब्राह्मणग्राम' असणे सिद्ध होते. अशा प्रकारे कर्म आणि द्वाराच्या निर्धारणात कोणतीही बाधा येत नाही, हा येथे अभिप्राय आहे। ၅၆. မုသာတိ အဘူတံ ဝတ္ထု, တံ တစ္ဆတော ဝဒန္တိ ဧတေနာတိ မုသာဝါဒေါ. ပိသတိ သာမဂ္ဂိံ သဉ္စုဏ္ဏေတိ ဝိက္ခိပတိ, ပိယဘာဝံ သုညံ ကရောတီတိ ဝါ ပိသုဏာ. အတ္တာနမ္ပိ ပရမ္ပိ ဖရုသံ ကရောတိ, ကကစော ဝိယ ခရသမ္ဖဿာတိ ဝါ ဖရုသာ. သံ သုခံ, ဟိတဉ္စ ဖလတိ ဝိသရတိ ဝိနာသေတီတိ သမ္ဖံ, အတ္တနော, ပရေသဉ္စ အနုပကာရံ ယံ ကိဉ္စိ, တံ ပလပတိ ဧတေနာတိ သမ္ဖပ္ပလာပေါ. ५६. 'मृषा' म्हणजे असत्य किंवा काल्पनिक गोष्ट; ती असत्य गोष्ट ज्या चेतनेच्या द्वारे सत्य म्हणून बोलली जाते, तिला 'मृषावाद' (असत्य बोलणे) म्हणतात. जी एकता नष्ट करते, चूर्ण करते, विखुरते किंवा मैत्रीचा भाव शून्य करते, तिला 'पिशुना' (चहाडी) म्हणतात. जी स्वतःला आणि दुसऱ्यालाही कठोर बनवते, किंवा करवतीप्रमाणे जिचा स्पर्श अत्यंत कठोर असतो, तिला 'परुषा' (कठोर वाणी) म्हणतात. जी कल्याण, सुख आणि हित नष्ट करते, विखुरते किंवा त्यांचा नाश करते, तिला 'संफ' म्हणतात; स्वतःसाठी आणि इतरांसाठी निरुपयोगी असणारी जी काही निरर्थक बडबड ज्या चेतनेच्या द्वारे केली जाते, तिला 'संफप्पलाप' (व्यर्थ बडबड) म्हणतात। တတ္ထ အဘူတံ ဝတ္ထုံ ဘူတတော ပရံ ဝိညာပေတုကာမဿ တထာ ဝိညာပနပ္ပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ စေတနာ မုသာဝါဒေါ. သော ပရဿ အတ္ထဘေဒကရောဝ ကမ္မပထော ဟောတိ, ဣတရော [Pg.174] ကမ္မမေဝ. ပရေသံ ဘေဒကာမတာယ, အတ္တပ္ပိယကာမတာယ ဝါ ပရဘေဒကရဝစီပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ သံကိလိဋ္ဌစေတနာ ပိသုဏဝါစာ, သာပိ ဒွီသု ဘိန္နေသုယေဝ ကမ္မပထော. ပရဿ မမ္မစ္ဆေဒကရဝစီပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ ဧကန္တဖရုသစေတနာ ဖရုသဝါစာ. န ဟိ စိတ္တသဏှတာယ သတိ ဖရုသဝါစာ နာမ ဟောတိ. သီတာဟရဏာဒိအနတ္ထဝိညာပနပ္ပယောဂသမုဋ္ဌာပိကာ သံကိလိဋ္ဌစေတနာ သမ္ဖပ္ပလာပေါ, သော ပန ပရေဟိ တသ္မိံ အနတ္ထေ ဂဟိတေယေဝ ကမ္မပထော. ဝစီဝိညတ္တိသင်္ခါတေ ဝစီဒွါရေတိ ဝါစာယ အဓိပ္ပာယံ ဝိညာပေတိ, သယဉ္စ ဝါစာယ ဝိညာယတီတိ ဝစီဝိညတ္တိသင်္ခါတေ ဝစီဘေဒကရပ္ပယောဂသမုဋ္ဌာပကစိတ္တသမုဋ္ဌာနပထဝီဓာတွာဓိကကလာပဿ ဝိကာရဘူတေ စောပနဝါစာဘာဝတော, ကမ္မာနံ ပဝတ္တိမုခဘာဝတော စ ဝစီဒွါရသင်္ခါတေ ကမ္မဒွါရေ. ဗာဟုလ္လဝုတ္တိတောတိ ဣဒံ ဝုတ္တနယမေဝ. त्यामध्ये, असत्य गोष्टीला सत्य म्हणून दुसऱ्याला पटवून देण्याची इच्छा असणाऱ्या व्यक्तीची, त्या प्रकारे पटवून देण्याच्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणारी चेतना म्हणजे 'मृषावाद' होय. तो मृषावाद जर दुसऱ्याच्या हिताचा नाश करणारा असेल, तरच तो 'कर्मपथ' ठरतो; अन्यथा तो केवळ 'कर्म'च राहतो. इतरांमध्ये फूट पाडण्याच्या इच्छेने किंवा स्वतःला इतरांचा प्रिय बनवण्याच्या इच्छेने, दुसऱ्यांमध्ये भेद निर्माण करणाऱ्या वाणीच्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणारी मलिन चेतना म्हणजे 'पिशुनवाचा' (चहाडी) होय; ती देखील दोघांमध्ये प्रत्यक्ष फूट पडल्यावरच 'कर्मपथ' ठरते. दुसऱ्याच्या मर्मावर आघात करणाऱ्या वाणीच्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणारी अत्यंत कठोर चेतना म्हणजे 'परुषवाचा' (कठोर वाणी) होय. चित्त कोमल असताना कठोर वाणी कधीही निर्माण होत नाही. सीताहरण इत्यादी निरर्थक गोष्टींचे ज्ञान करून देणाऱ्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणारी मलिन चेतना म्हणजे 'संफप्पलाप' (व्यर्थ बडबड) होय; परंतु तो संफप्पलाप ऐकणाऱ्यांनी त्या निरर्थक गोष्टीवर विश्वास ठेवल्यावरच 'कर्मपथ' ठरतो. 'वचीविज्ञप्ती' नावाच्या वचीद्वारात म्हणजे—वाणीच्या द्वारे अभिप्राय प्रकट केला जात असल्यामुळे आणि स्वतः वाणीच्या द्वारेच ती जाणून घेण्यायोग्य असल्यामुळे, वाणीचे भेद करणाऱ्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणाऱ्या चित्तसमुत्थान पृथ्वीधातूचे प्राबल्य असणाऱ्या रूपकलापाच्या विकाररूप असलेल्या, वाणीच्या हालचालीच्या स्वरूपात असल्यामुळे, तसेच कर्मांच्या प्रवृत्तीचे मुख्य द्वार असल्यामुळे, वचीद्वार संज्ञक कर्मद्वारात होय. 'बाहुल्लवुत्तितो' (बहुतांश प्रवृत्तीमुळे) हे पद पूर्वी सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच स्पष्ट होते। ၅၇. ပရသမ္ပတ္တိံ အဘိမုခံ ဈာယတိ လောဘဝသေန စိန္တေတီတိ အဘိဇ္ဈာ. ဗျာပဇ္ဇတိ ဟိတသုခံ ဧတေနာတိ ဗျာပါဒေါ. မိစ္ဆာ ဝိပရီတတော ပဿတီတိ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိ. ५७. दुसऱ्याच्या संपत्तीवर लोभाने लक्ष केंद्रित करून, लोभाच्या आहारी जाऊन विचार करणे म्हणजे 'अभिध्या' (लोभ) होय. ज्याच्या द्वारे हित आणि सुख नष्ट होते, तो 'व्यापाद' (द्वेष/क्रोध) होय. चुकीच्या आणि विपरीत पद्धतीने पाहणे किंवा समजणे म्हणजे 'मिथ्यादृष्टी' होय। တတ္ထ ‘‘အဟော ဝတ ဣဒံ မမ သိယာ’’တိ ဧဝံ ပရဘဏ္ဍာဘိဇ္ဈာယနံ အဘိဇ္ဈာ, သာ ပရဘဏ္ဍဿ အတ္တနော နာမနေနေဝ ကမ္မပထော ဟောတိ. ‘‘အဟော ဝတာယံ သတ္တော ဝိနဿေယျာ’’တိ ဧဝံ မနောပဒေါသော ဗျာပါဒေါ. ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တျာဒိနာ နယေန ဝိပရီတဒဿနံ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိ. ဧတ္ထ ပန နတ္ထိကအဟေတုကအကိရိယဒိဋ္ဌီဟိယေဝ ကမ္မပထဘေဒေါ. ဣမေသံ ပန အင်္ဂါဒိဝဝတ္ထာနဝသေန ပပဉ္စော တတ္ထ တတ္ထ (ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၈; ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁ အကုသလကမ္မပထကထာ; ပါရာ. အဋ္ဌ. ၂.၁၇၂) အာဂတနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အညတြာပိ ဝိညတ္တိယာတိ ကာယဝစီဝိညတ္တိံ ဝိနာပိ, တံ အသမုဋ္ဌာပေတွာပီတျတ္ထော. ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကစိတ္တသမ္ပယုတ္တာ စေတ္ထ အဘိဇ္ဈာဒယော စေတနာပက္ခိကာဝ ဟောန္တိ. त्यामध्ये, 'किती चांगले होईल जर ही (दुसऱ्याची) वस्तू माझी झाली तर!' अशा प्रकारे दुसऱ्याच्या संपत्तीचे चिंतन करणे म्हणजे 'अभिध्या' होय; ती अभिध्या दुसऱ्याची वस्तू स्वतःकडे वळवण्याच्या (हडप करण्याच्या) विचारानेच 'कर्मपथ' ठरते. 'किती चांगले होईल जर हा प्राणी नष्ट झाला तर!' अशा प्रकारचा मनाचा प्रद्वेष म्हणजे 'व्यापाद' होय. 'दिलेल्या दानाचे कोणतेही फळ नाही' इत्यादी प्रकारे विपरीत पाहणे म्हणजे 'मिथ्यादृष्टी' होय. परंतु येथे नास्तिकदृष्टी (नत्थिकदिट्ठि), अहेतुकदृष्टी (अहेतुकदिट्ठि) आणि अक्रियदृष्टी (अक्रियदिट्ठि) यांच्या द्वारेच कर्मपथाचा भेद होतो. यांच्या अंग इत्यादींच्या निर्धारणाचा सविस्तर विस्तार त्या त्या ठिकाणी (अठ्ठसालिनी इत्यादी ग्रंथांमध्ये) आलेल्या नियमांनुसार पहावा. 'विज्ञप्तीशिवाय देखील' म्हणजे कायविज्ञप्ती आणि वचीविज्ञप्तीशिवाय देखील, म्हणजेच ती उत्पन्न न करता देखील, असा अर्थ आहे. आणि येथे विज्ञप्ती उत्पन्न करणाऱ्या चित्ताशी संप्रयुक्त असणारे अभिध्या इत्यादी तीन धर्म चेतनेच्या पक्षातच (चेतनेच्या स्वरूपातच) समाविष्ट होतात। ၅၈. ဒေါသမူလေန [Pg.175] ဇာယန္တီတိ သဟဇာတာဒိပစ္စယေန ဒေါသသင်္ခါတမူလေန, ဒေါသမူလကစိတ္တေန ဝါ ဇာယန္တိ, န လောဘမူလာဒီဟိ. ဟသမာနာပိ ဟိ ရာဇာနော ဒေါသစိတ္တေနေဝ ပါဏဝဓံ အာဏာပေန္တိ, တထာ ဖရုသဝါစာဗျာပါဒေသုပိ ယထာရဟံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. မိစ္ဆာဒဿနဿ အဘိနိဝိသိတဗ္ဗဝတ္ထူသု လောဘပုဗ္ဗင်္ဂမမေဝ အဘိနိဝိသနတော အာဟ ‘‘မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိ စ လောဘမူလေနာ’’တိ. သေသာနိ စတ္တာရိပိ ဒွီဟိ မူလေဟိ သမ္ဘဝန္တီတိ ယော တာဝ အဘိမတံ ဝတ္ထုံ, အနဘိမတံ ဝါ အတ္တဗန္ဓုပရိတ္တာဏာဒိပ္ပယောဇနံ သန္ဓာယ ဟရတိ, တဿ အဒိန္နာဒါနံ လောဘမူလေန ဟောတိ. ဝေရနိယျာတနတ္ထံ ဟရန္တဿ ဒေါသမူလေန. နီတိပါဌကပ္ပမာဏတော ဒုဋ္ဌနိဂ္ဂဟဏတ္ထံ ပရသန္တကံ ဟရန္တာနံ ရာဇူနံ, ဗြာဟ္မဏာနဉ္စ ‘‘သဗ္ဗမိဒံ ဗြာဟ္မဏာနံ ရာဇူဟိ ဒိန္နံ, တေသံ ပန သဗ္ဗဒုဗ္ဗလဘာဝေန အညေ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, အတ္တသန္တကမေဝ ဗြာဟ္မဏာ ပရိဘုဉ္ဇန္တီ’’တျာဒီနိ ဝတွာ သကသညာယ ဧဝံ ယံ ကိဉ္စိ ဟရန္တာနံ, ကမ္မဖလသမ္ဗန္ဓာပဝါဒီနဉ္စ မောဟမူလေန. ဧဝံ မုသာဝါဒါဒီသုပိ ယထာရဟံ ယောဇေတဗ္ဗံ. ५८. "द्वेषमुळाने उत्पन्न होतात" (दोससूलेन जायन्तीति) म्हणजे सहजात इत्यादी प्रत्ययांद्वारे द्वेष नावाच्या मुळामुळे किंवा द्वेषमूलक चित्तामुळे उत्पन्न होतात, लोभमुळामुळे इत्यादी नाही. कारण, राजे हसत असतानाही द्वेषयुक्त चित्तानेच प्राणिहत्येची आज्ञा देतात. त्याचप्रमाणे परुषवचन (कठोर बोलणे) आणि व्यापाद (द्रोह) यांच्या बाबतीतही योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. मिथ्यादृष्टी ही चुकीच्या पद्धतीने विचार करण्याच्या वस्तूंमध्ये लोभाला अग्रभागी ठेवूनच प्रवृत्त होत असल्यामुळे आचार्यांनी म्हटले आहे की, "मिथ्यादृष्टी ही लोभमुळामुळे उत्पन्न होते." उर्वरित चारही (अकुशल कर्मपथ) दोन मुळांमुळे संभवतात; जसे की, जो कोणी स्वतःच्या किंवा आपल्या नातेवाईकांच्या रक्षणाच्या उद्देशाने एखादी प्रिय किंवा अप्रिय वस्तू चोरतो, त्याचे ते अदित्नादान (चोरी) लोभमुळामुळे होते. सूड घेण्याच्या उद्देशाने चोरी करणाऱ्याचे अदित्नादान द्वेषमुळामुळे होते. नीतीशास्त्राला प्रमाण मानून दुष्टांचे दमन करण्यासाठी दुसऱ्यांचे धन हिरावून घेणाऱ्या राजांचे; आणि "हे सर्व राजाने ब्राह्मणांना दिले आहे, परंतु त्यांच्या अत्यंत दुर्बलतेमुळे इतर लोक त्याचा उपभोग घेतात, ब्राह्मण तर केवळ स्वतःच्याच मालकीच्या वस्तूचा उपभोग घेतात" असे म्हणून स्वतःच्या मालकीच्या कल्पनेने जे काही हिरावून घेतात अशा ब्राह्मणांचे; तसेच कर्म आणि त्याच्या फळाचा संबंध नाकारणाऱ्यांचे (अदित्नादान) मोहमुळामुळे होते. याचप्रमाणे मृषावाद (असत्य बोलणे) इत्यादींच्या बाबतीतही योग्यतेनुसार योजना करावी। ၆၃. ဆသု အာရမ္မဏေသု တိဝိဓကမ္မဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇမာနမ္ပေတံ တိဝိဓနိယမေန ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ အာဟ ‘‘တထာ ဒါနသီလဘာဝနာဝသေနာ’’တိ. ဒသဓာ နိဒ္ဒိသိယမာနာနံ ဟိ ဒွိန္နံ, ပုန ဒွိန္နံ, တိဏ္ဏဉ္စ ယထာက္ကမံ ဒါနာဒီသု တီသွေဝ သင်္ဂဟော. ကာရဏံ ပနေတ္ထ ပရတော ဝက္ခာမ. ဆဠာရမ္မဏေသု ပန တိဝိဓကမ္မဒွါရေသု စ နေသံ ပဝတ္တိယောဇနာ အဋ္ဌကထာဒီသု (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁၅၆-၁၅၉) အာဂတနယေန ဂဟေတဗ္ဗာ. ६३. सहा आलंबनांमध्ये (विषयांमध्ये) तीन प्रकारच्या कर्मांच्या द्वारे उत्पन्न होणारे हे (कामावचर कुशल कर्म) तीन प्रकारच्या नियमांनुसारच उत्पन्न होते, म्हणून म्हटले आहे: "त्याचप्रमाणे दान, शील आणि भावना यांच्याद्वारे." कारण, दहा प्रकारे सविस्तर सांगितलेल्या पुण्यक्रियावस्तूंपैकी दोन, पुन्हा दोन आणि तीन यांचा अनुक्रमे दान इत्यादी तीन प्रकारांमध्येच संग्रह होतो. या संग्रहाचे कारण आम्ही पुढे सांगू. सहा आलंबनांमध्ये आणि तीन कर्मद्वारांमध्ये त्यांच्या प्रवृत्तीची योजना अट्ठकथा (टीका) इत्यादींमध्ये आलेल्या पद्धतीनुसार ग्रहण करावी। ၆၅. ဒီယတိ ဧတေနာတိ ဒါနံ, ပရိစ္စာဂစေတနာ. ဧဝံ သေသေသုပိ. သီလတီတိ သီလံ, ကာယဝစီကမ္မာနိ သမာဒဟတိ, သမ္မာ ဌပေတီတျတ္ထော, သီလယတိ ဝါ ဥပဓာရေတီတိ သီလံ[Pg.176], ဥပဓာရဏံ ပနေတ္ထ ကုသလာနံ အဓိဋ္ဌာနဘာဝေါ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ‘‘သီလေ ပတိဋ္ဌာယာ’’တျာဒိ (သံ. နိ. ၁.၂၃, ၁၉၂). ဘာဝေတိ ကုသလေ ဓမ္မေ အာသေဝတိ ဝဍ္ဎေတိ ဧတာယာတိ ဘာဝနာ. အပစာယတိ ပူဇာဝသေန သာမီစိံ ကရောတိ ဧတေနာတိ အပစာယနံ. တံတံကိစ္စကရဏေ ဗျာဝဋဿ ဘာဝေါ ဝေယျာဝစ္စံ. အတ္တနော သန္တာနေ နိဗ္ဗတ္တာ ပတ္တိ ဒီယတိ ဧတေနာတိ ပတ္တိဒါနံ. ပတ္တိံ အနုမောဒတိ ဧတာယာတိ ပတ္တာနုမောဒနာ. ဓမ္မံ သုဏန္တိ ဧတေနာတိ ဓမ္မဿဝနံ. ဓမ္မံ ဒေသေန္တိ ဧတာယာတိ ဓမ္မဒေသနာ. ဒိဋ္ဌိယာ ဥဇုကရဏံ ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မံ. ६५. ज्याद्वारे दिले जाते ते 'दान' होय; ती त्याग करण्याची चेतना (परित्यागचेतना) आहे. उर्वरित शील इत्यादींच्या बाबतीतही असेच समजावे. जे सुव्यवस्थित ठेवते ते 'शील' होय; याचा अर्थ असा की, जे कायिक आणि वाचिक कर्मांना सुव्यवस्थित ठेवते, योग्य प्रकारे स्थापित करते. किंवा जे धारण करते (आधार देते) ते 'शील' होय. येथे 'धारण करणे' म्हणजे कुशल धर्मांचा अधिष्ठानभाव (पाया) असणे होय. म्हणूनच म्हटले आहे: "शीलावर प्रतिष्ठित होऊन..." इत्यादी. ज्याद्वारे कुशल धर्मांची भावना केली जाते, वारंवार सराव केला जातो आणि वाढ केली जाते, ती 'भावना' होय. ज्याद्वारे पूजेच्या भावनेने आदर किंवा योग्य आचरण केले जाते, ते 'अपचायन' (आदरभाव) होय. वेगवेगळ्या कर्तव्यांच्या पालनामध्ये व्यस्त असणे म्हणजे 'वैय्यावच्च' (सेवा) होय. स्वतःच्या संतानामध्ये (चित्तप्रवाहात) उत्पन्न झालेले पुण्य ज्याद्वारे दिले जाते, ते 'पत्तिदान' (पुण्यदान) होय. ज्याद्वारे पुण्याचा स्वीकार करून आनंद व्यक्त केला जातो, ती 'पत्तानुमोदना' (पुण्यानुमोदन) होय. ज्याद्वारे धम्म ऐकला जातो, ते 'धम्मस्सवन' (धम्मश्रवण) होय. ज्याद्वारे धम्म उपदेशिला जातो, ती 'धम्मदेसना' (धम्मोपदेश) होय. दृष्टी सरळ करणे (सम्यक् करणे) म्हणजे 'दिट्ठिजुकम्म' (दृष्टी सरळ करणे) होय। တတ္ထ သာနုသယသန္တာနဝတော ပရေသံ ပူဇာနုဂ္ဂဟကာမတာယ အတ္တနော ဝိဇ္ဇမာနဝတ္ထုပရိစ္စဇနဝသပ္ပဝတ္တစေတနာ ဒါနံ နာမ, ဒါနဝတ္ထုပရိယေသနဝသေန, ဒိန္နဿ သောမနဿစိတ္တေန အနုဿရဏဝသေန စ ပဝတ္တာ ပုဗ္ဗပစ္ဆာဘာဂစေတနာ ဧတ္ထေဝ သမောဓာနံ ဂစ္ဆန္တိ. ဧဝံ သေသေသုပိ ယထာရဟံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. နိစ္စသီလာဒိဝသေန ပဉ္စ, အဋ္ဌ, ဒသ ဝါ သီလာနိ သမာဒိယန္တဿ, ပရိပူရေန္တဿ, အသမာဒိယိတွာပိ သမ္ပတ္တကာယဝစီဒုစ္စရိတတော ဝိရမန္တဿ, ပဗ္ဗဇန္တဿ, ဥပသမ္ပဒမာဠကေ သံဝရံ သမာဒိယန္တဿ, စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလံ ပရိပူရေန္တဿ စ ပဝတ္တစေတနာ သီလံ နာမ. စတ္တာလီသာယ ကမ္မဋ္ဌာနေသု, ခန္ဓာဒီသု စ ဘူမီသု ပရိကမ္မသမ္မသနဝသပ္ပဝတ္တာ အပ္ပနံ အပ္ပတ္တာ ဂေါတြဘုပရိယောသာနစေတနာ ဘာဝနာ နာမ, နိရဝဇ္ဇဝိဇ္ဇာဒိပရိယာပုဏနစေတနာပိ ဧတ္ထေဝ သမောဓာနံ ဂစ္ဆတိ. त्यामध्ये, अनुशययुक्त (सुप्त क्लेशांसह) चित्तप्रवाह असणाऱ्या व्यक्तीच्या (पुथुज्जन किंवा शैक्षकाच्या) मनात इतरांचा आदर करण्याची किंवा त्यांना साहाय्य करण्याची इच्छा असल्यामुळे, स्वतःजवळ असलेल्या वस्तूचा त्याग करण्याच्या स्वरूपात जी चेतना प्रवृत्त होते, तिला 'दान' असे म्हणतात. दानाच्या वस्तू शोधण्याच्या स्वरूपात आणि दिलेल्या दानाचे सोमनस्ययुक्त (आनंदी) चित्ताने वारंवार स्मरण करण्याच्या स्वरूपात उत्पन्न होणाऱ्या पूर्व आणि पश्चात् भागातील चेतना (पूर्व-पश्चात् चेतना) याच दानामध्ये समाविष्ट होतात. उर्वरित शील इत्यादींच्या बाबतीतही योग्यतेनुसार असेच समजून घ्यावे. नित्यशील इत्यादींच्या रूपाने पाच, आठ किंवा दहा शीलांचे ग्रहण करणाऱ्या आणि त्यांचे परिपालन करणाऱ्या; किंवा शील ग्रहण न करताही समोर आलेल्या कायिक व वाचिक दुश्चरित्रांपासून अलिप्त राहणाऱ्या; प्रव्रजित होणाऱ्या; उपसंपदा मंडपात संवर (संयम) ग्रहण करणाऱ्या; आणि चतुपारिसुद्धिशीलाचे परिपालन करणाऱ्या व्यक्तीच्या चित्तप्रवाहात उत्पन्न होणारी चेतना म्हणजे 'शील' होय. चाळीस कर्मास्थानांवर (ध्यानविषयांवर) आणि स्कंध इत्यादी भूमींवर परिकर्म (पूर्वतयारी) व संमसन (चिंतन) करण्याच्या स्वरूपात प्रवृत्त होणारी, परंतु अद्याप अप्पनावस्थेला (ध्यानावस्थेला) प्राप्त न झालेली आणि गोत्रभू क्षणापर्यंत समाप्त होणारी चेतना म्हणजे 'भावना' होय. निर्दोष विद्या इत्यादी शिकण्याची चेतना देखील याच भावनेमध्ये समाविष्ट होते। ဝယသာ, ဂုဏေဟိ စ ဇေဋ္ဌာနံ စီဝရာဒီသု ပစ္စာသာရဟိတေန အသံကိလိဋ္ဌဇ္ဈာသယေန ပစ္စုဋ္ဌာနအာသနာဘိနီဟာရာဒိဝိဓိနာ ဗဟုမာနကရဏစေတနာ အပစာယနံ နာမ. တေသမေဝ, ဂိလာနာနဉ္စ ယထာဝုတ္တဇ္ဈာသယေန တံတံကိစ္စကရဏစေတနာ ဝေယျာဝစ္စံ နာမ. အတ္တနော သန္တာနေ နိဗ္ဗတ္တဿ ပုညဿ ပရေဟိ [Pg.177] သာဓာရဏဘာဝံ ပစ္စာသီသနစေတနာ ပတ္တိဒါနံ နာမ. ပရေဟိ ဒိန္နဿ, အဒိန္နဿပိ ဝါ ပုညဿ မစ္ဆေရမလဝိနိဿဋေန စိတ္တေန အဗ္ဘာနုမောဒနစေတနာ ပတ္တာနုမောဒနာ နာမ. ဧဝမိမံ ဓမ္မံ သုတွာ တတ္ထ ဝုတ္တနယေန ပဋိပဇ္ဇန္တော ‘‘လောကိယလောကုတ္တရဂုဏဝိသေသဿ ဘာဂီ ဘဝိဿာမိ, ဗဟုဿုတော ဝါ ဟုတွာ ပရေသံ ဓမ္မဒေသနာဒီဟိ အနုဂ္ဂဏှိဿာမီ’’တိ ဧဝံ အတ္တနော, ပရေသံ ဝါ ဟိတဖရဏဝသပ္ပဝတ္တေန အသံကိလိဋ္ဌဇ္ဈာသယေန ဟိတူပဒေသသဝနစေတနာ ဓမ္မဿဝနံ နာမ, နိရဝဇ္ဇဝိဇ္ဇာဒိသဝနစေတနာပိ ဧတ္ထေဝ သင်္ဂယှတိ. လာဘသက္ကာရာဒိနိရပေက္ခတာယ ယောနိသော မနသိ ကရောတော ဟိတူပဒေသစေတနာ ဓမ္မဒေသနာ နာမ, နိရဝဇ္ဇဝိဇ္ဇာဒိဥပဒိသနစေတနာပိ ဧတ္ထေဝ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆတိ. ‘‘အတ္ထိ ဒိန္န’’န္တျာဒိနယပ္ပဝတ္တသမ္မာဒဿနဝသေန ဒိဋ္ဌိယာ ဥဇုကရဏံ ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မံ နာမ. वय आणि गुणांनी ज्येष्ठ असणाऱ्यांचा, चीवर इत्यादी लाभांची अपेक्षा न ठेवता, निष्कलंक आशयाने (शुद्ध हेतूने), सामोरे जाणे (प्रत्युत्थान), आसन देणे इत्यादी विधींद्वारे आदर करण्याची चेतना म्हणजे 'अपचायन' (आदरभाव) होय. त्याच ज्येष्ठांची आणि आजारी लोकांची, वर सांगितलेल्या शुद्ध हेतूने विविध सेवा करण्याची चेतना म्हणजे 'वैय्यावच्च' (सेवा) होय. स्वतःच्या चित्तप्रवाहात उत्पन्न झालेले पुण्य इतरांसोबत सामायिक करण्याची इच्छा असणारी चेतना म्हणजे 'पत्तिदान' (पुण्यदान) होय. इतरांनी दिलेल्या किंवा न दिलेल्या पुण्याचा, मत्सराच्या मळापासून मुक्त असलेल्या चित्ताने वारंवार स्वीकार करून आनंद व्यक्त करण्याची चेतना म्हणजे 'पत्तानुमोदना' (पुण्यानुमोदन) होय. अशा प्रकारे हा धम्म ऐकून आणि त्यामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने आचरण करत असताना, "मी लौकिक आणि लोकोत्तर विशेष गुणांचा वाटेकरी होईन, किंवा बहुश्रुत होऊन धम्मोपदेश इत्यादींद्वारे इतरांवर अनुग्रह करेन" अशा प्रकारे स्वतःच्या किंवा इतरांच्या कल्याणाचा विस्तार करण्याच्या स्वरूपात प्रवृत्त होणाऱ्या निष्कलंक आशयाने हितकारक उपदेश ऐकण्याची चेतना म्हणजे 'धम्मस्सवन' (धम्मश्रवण) होय. निर्दोष विद्या इत्यादी ऐकण्याची चेतना देखील याच धम्मश्रवणामध्ये समाविष्ट होते. लाभ, सत्कार इत्यादींची अपेक्षा न ठेवता, योग्य प्रकारे (योनिशः) मनन करणाऱ्या व्यक्तीची हितकारक उपदेश देण्याची चेतना म्हणजे 'धम्मदेसना' (धम्मोपदेश) होय. निर्दोष विद्या इत्यादी शिकवण्याची चेतना देखील याच धम्मोपदेशामध्ये समाविष्ट होते. "दान दिल्याने फळ मिळते (अत्थि दिन्नं)" इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त होणाऱ्या सम्यक् दृष्टीच्या द्वारे आपली दृष्टी सरळ करणे म्हणजे 'दिट्ठिजुकम्म' (दृष्टी सरळ करणे) होय। ယဒိ ဧဝံ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တစိတ္တုပ္ပာဒဿ ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မပုညကိရိယဘာဝေါ န လဗ္ဘတီတိ? နော န လဗ္ဘတိ ပုရိမပစ္ဆိမစေတနာနမ္ပိ တံတံပုညကိရိယာသွေဝ သင်္ဂဏှနတော. ကိဉ္စာပိ ဟိ ဥဇုကရဏဝေလာယံ ဉာဏသမ္ပယုတ္တမေဝ စိတ္တံ ဟောတိ, ပုရိမပစ္ဆာဘာဂေ ပန ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တမ္ပိ သမ္ဘဝတီတိ တဿပိ ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မဘာဝေါ ဥပပဇ္ဇတီတိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. जर असे असेल, तर ज्ञानविप्रयुक्त (ज्ञानाविरहित) चित्तोत्पादाला 'दिट्ठिजुकम्म' ही पुण्यक्रिया संज्ञा प्राप्त होणार नाही का? नाही, असे नाही (ती प्राप्त होतेच). कारण पूर्व आणि पश्चात् भागातील चेतनांचा देखील त्या त्या पुण्यक्रिया वस्तूंमध्येच संग्रह केला जातो. कारण, जरी दृष्टी सरळ करण्याच्या वेळी चित्त ज्ञानसंप्रयुक्त (ज्ञानयुक्त) च असते, तरी पूर्व आणि पश्चात् भागात ज्ञानविप्रयुक्त चित्त देखील संभवू शकते. त्यामुळे त्यालाही 'दिट्ठिजुकम्म' भाव प्राप्त होणे योग्यच आहे. आता अधिक विस्ताराची आवश्यकता नाही। ဣမေသု ပန ဒသသု ပတ္တိဒါနာနုမောဒနာ ဒါနေ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တိ တံသဘာဝတ္တာ. ဒါနမ္ပိ ဟိ ဣဿာမစ္ဆေရာနံ ပဋိပက္ခံ, ဧတေပိ. တသ္မာ သမာနပ္ပဋိပက္ခတာယ ဧကလက္ခဏတ္တာ တေ ဒါနမယပုညကိရိယဝတ္ထုမှိ သင်္ဂယှန္တိ. အပစာယနဝေယျာဝစ္စာသီလမယပုညေဝ သင်္ဂယှန္တိ စာရိတ္တသီလဘာဝတော. ဒေသနာသဝနဒိဋ္ဌိဇုကာ ပန ကုသလဓမ္မာသေဝနဘာဝတော ဘာဝနာမယေ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တီတိ (ဒီ. နိ. ဋီ. ၃.၃၀၅) အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရေန ဝုတ္တံ. အပရေ ပန ‘‘ဒေသေန္တော, သုဏန္တော စ ဒေသနာနုသာရေန ဉာဏံ [Pg.178] ပေသေတွာ လက္ခဏာနိ ပဋိဝိဇ္ဈ ပဋိဝိဇ္ဈ ဒေသေတိ, သုဏာတိ စ, တာနိ စ ဒေသနာသဝနာနိ ပဋိဝေဓမေဝါဟရန္တီတိ ဒေသနာသဝနာဘာဝနာမယေ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆန္တီ’’တိ ဝဒန္တိ. ဓမ္မဒါနသဘာဝတော ဒေသနာ ဒါနမယေ သင်္ဂဟံ ဂစ္ဆတီတိပိ သက္ကာ ဝတ္တုံ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ‘‘သဗ္ဗဒါနံ ဓမ္မဒါနံ ဇိနာတီ’’တိ (ဓ. ပ. ၃၅၄). တထာ ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မံ သဗ္ဗတ္ထာပိ သဗ္ဗေသံ နိယမနလက္ခဏတ္တာ. ဒါနာဒီသု ဟိ ယံ ကိဉ္စိ ‘‘အတ္ထိ ဒိန္န’’န္တျာဒိနယပ္ပဝတ္တာယ သမ္မာဒိဋ္ဌိယာ ဝိသောဓိတံ မဟပ္ဖလံ ဟောတိ မဟာနိသံသံ, ဧဝဉ္စ ကတွာ ဒီဃနိကာယဋ္ဌကထာယံ (ဒီ. နိ. အဋ္ဌ. ၃.၃၀၅; ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁၅၆-၁၅၉ ပုညာကိရိယဝတ္ထာဒိကထာ) ‘‘ဒိဋ္ဌိဇုကမ္မံ သဗ္ဗေသံ နိယမလက္ခဏ’’န္တိ ဝုတ္တံ. ဧဝံ ဒါနသီလဘာဝနာဝသေန တီသု ဣတရေသံ သင်္ဂဏှနတော သင်္ခေပတော တိဝိဓမေဝ ပုညကိရိယဝတ္ထု ဟောတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, တထာ စေဝ အာစရိယေန ဟေဋ္ဌာ ဒဿိတံ. या दहा (पुण्यक्रियावस्तूं) मध्ये पत्तिदान (पुण्यदान) आणि पत्तानुमोदना (पुण्याचा स्वीकार/आनंद व्यक्त करणे) यांचा दानामध्ये समावेश होतो, कारण त्यांचा स्वभाव तसाच आहे. दान हे देखील ईर्ष्या आणि मत्सराचे विरोधी आहे, आणि हे (पत्तिदान व पत्तानुमोदना) देखील (ईर्ष्या व मत्सराचे विरोधी आहेत). म्हणून, समान विरोधी स्वभाव आणि समान लक्षण असल्यामुळे, त्यांचा दानमय पुण्यक्रियावस्तूमध्ये समावेश केला जातो. अपचायन (आदर दाखवणे) आणि वेय्यावच्च (सेवा करणे) हे चारित्र्यशील स्वभावाचे (चारित्तशील) असल्यामुळे शीलमय पुण्यक्रियावस्तूमध्येच समाविष्ट होतात. परंतु धम्मदेसना (धर्मापदेश), धम्मस्सवन (धर्मश्रवण) आणि दिट्ठिजुकम्म (दृष्टी सरळ करणे) हे कुशल धर्मांचे वारंवार सेवन करण्याच्या स्वभावामुळे भावनामय पुण्यक्रियावस्तूमध्ये समाविष्ट होतात, असे आचार्य धम्मपाल थेरांनी म्हटले आहे. परंतु इतर (आचार्य) म्हणतात की, 'धर्मापदेश देणारा आणि ऐकणारा, उपदेशानुसार आपले ज्ञान प्रवृत्त करून, लक्षणांचे वारंवार प्रतिवेध (पूर्ण आकलन) करून उपदेश देतो आणि ऐकतो; आणि ते उपदेश देणे व ऐकणे प्रतिवेध (ज्ञान) घडवून आणतात, म्हणून धम्मदेसना आणि धम्मस्सवन भावनामय पुण्यक्रियावस्तूमध्ये समाविष्ट होतात.' धम्मदानाचा स्वभाव असल्यामुळे धम्मदेसनाचा दानमय पुण्यक्रियावस्तूमध्ये समावेश होतो, असेही म्हणता येऊ शकते. कारण असे म्हटले आहे की, 'सर्व दानांमध्ये धम्मदान श्रेष्ठ आहे (जिंकते).' त्याचप्रमाणे, दिट्ठिजुकम्म (दृष्टी सरळ करणे) हे सर्व पुण्यक्रियावस्तूंमध्ये समाविष्ट होते, कारण ते सर्वांचे नियमन करणारे लक्षण आहे. कारण दानादींमध्ये जे काही 'दान दिले आहे त्याचे फळ असते' इत्यादी प्रकारे प्रवृत्त होणाऱ्या सम्यक दृष्टीने विशुद्ध केले जाते, तेच महाफळ देणारे आणि महा-अनुशंस (मोठा लाभ देणारे) ठरते. आणि म्हणूनच दीघनिकाय अट्ठकथेमध्ये 'दिट्ठिजुकम्म हे सर्वांचे नियमन करणारे लक्षण आहे' असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे, दान, शील आणि भावना या तिन्हींमध्ये इतर पुण्यक्रियावस्तूंचा समावेश होत असल्यामुळे, संक्षेपाने पुण्यक्रियावस्तू तीन प्रकारच्याच आहेत असे समजावे, आणि आचार्यांनी खाली तसेच दर्शविले आहे. ၆၇. မနောကမ္မမေဝ ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကတ္တာဘာဝေန ကာယဒွါရာဒီသု အပ္ပဝတ္တနတော. တဉ္စ ရူပါဝစရကုသလံ ဘာဝနာမယံ ဒါနာဒိဝသေန အပ္ပဝတ္တနတော. အပ္ပနာပ္ပတ္တံ ပုဗ္ဗဘာဂပ္ပဝတ္တာနံ ကာမာဝစရဘာဝတော. ဈာနင်္ဂဘေဒေနာတိ ပဋိပဒါဒိဘေဒတော အနေကဝိဓတ္တေပိ အင်္ဂါတိက္ကမဝသေန နိဗ္ဗတ္တဇ္ဈာနင်္ဂဘေဒတော ပဉ္စဝိဓံ ဟောတိ. ६७. (रूपावचर कुशल कर्म हे) केवळ मनोकर्मच आहे, कारण त्यात विज्ञाप्ती (कायविज्ञाप्ती व वचीविज्ञाप्ती) उत्पन्न करण्याची क्षमता नसल्यामुळे ते कायद्वार इत्यादींमध्ये प्रवृत्त होत नाही. आणि ते रूपावचर कुशल कर्म केवळ भावनामयच आहे, कारण ते दानादी रूपाने प्रवृत्त होत नाही. ते अप्पना (अर्पणा समाधी) अवस्थेला प्राप्त झालेले असते, कारण त्याच्या पूर्वभागात (तयारीच्या काळात) प्रवृत्त होणाऱ्या भावना कामावचर स्वरूपाच्या असतात. 'झानंगभेदेन' (ध्यान-अंगांच्या भेदाने) म्हणजे प्रतिपदा (मार्ग) इत्यादींच्या भेदाने ते अनेक प्रकारचे असले, तरी खालच्या ध्यान-अंगांचे अतिक्रमण करण्याच्या प्रक्रियेने उत्पन्न होणाऱ्या ध्यान-अंगांच्या भेदाने ते पाच प्रकारचे (पंचविध) असते. ၆၈. အာရမ္မဏဘေဒေနာတိ ကသိဏုဂ္ဃာဋိမာကာသံ, အာကာသဝိသယံ မနော, တဒဘာဝေါ, တဒါလမ္ဗံ ဝိညာဏန္တိ စတုဗ္ဗိဓန္တိ ဣမေသံ စတုန္နံ အာရမ္မဏာနံ ဘေဒေန. ६८. 'आरामणभेदाने' (आलंबन किंवा विषयाच्या भेदाने) म्हणजे: कसिण (कृत्स्न) काढून टाकल्याने प्राप्त होणारे आकाश (आकाशप्रज्ञप्ती), त्या आकाशाला विषय करणारे मन (प्रथम आरूप विज्ञाण), त्याचा अभाव (नास्तीभाव प्रज्ञप्ती), आणि त्या अभावाला आलंबन करणारे विज्ञान (तृतीय आरूप विज्ञाण), अशा चार प्रकारच्या आलंबनांच्या भेदाने (ते चार प्रकारचे होते). ၆၉. ဧတ္ထာတိ ဣမေသု ပါကဋ္ဌာနဝသေန စတုဗ္ဗိဓေသု ကမ္မေသု. ဥဒ္ဓစ္စရဟိတန္တိ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတစေတနာရဟိတံ ဧကာဒသဝိဓံ အကုသလကမ္မံ. ကိံ ပနေတ္ထ ကာရဏံ အဓိမောက္ခဝိရဟေန သဗ္ဗဒုဗ္ဗလမ္ပိ ဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတံ ပဋိသန္ဓိံ အာကဍ္ဎတိ, အဓိမောက္ခသမ္ပယောဂေန တတော ဗလဝန္တမ္ပိ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတံ နာကဍ္ဎတီတိ[Pg.179]? ပဋိသန္ဓိဒါနသဘာဝါဘာဝတော. ဗလဝံ အာကဍ္ဎတိ, ဒုဗ္ဗလံ နာကဍ္ဎတီတိ ဟိ အယံ ဝိစာရဏာ ပဋိသန္ဓိဒါနသဘာဝေသုယေဝ. ယဿ ပန ပဋိသန္ဓိဒါနသဘာဝေါယေဝ နတ္ထိ, န တဿ ဗလဝဘာဝေါ ပဋိသန္ဓိအာကဍ္ဎနေ ကာရဏံ. ६९. 'एत्थ' (येथे) म्हणजे स्पष्टपणे मांडलेल्या या चार प्रकारच्या कर्मांमध्ये. 'उद्धच्चरहित' (उद्धच्च विरहित) म्हणजे उद्धच्च-सहगत (औद्धत्ययुक्त) चेतनेने विरहित असलेले अकरा प्रकारचे अकुशल कर्म. येथे काय कारण आहे की, अधिमोक्ख (निश्चय) नसल्यामुळे अत्यंत दुर्बळ असलेले देखील विचिकित्सा-सहगत (संशयाने युक्त) चित्त प्रतिसंधीला खेचून आणते (पुनर्जन्म घडवून आणते), परंतु अधिमोक्खाच्या संयोगामुळे त्यापेक्षा बलवान असलेले देखील उद्धच्च-सहगत चित्त प्रतिसंधीला खेचून आणत नाही? कारण (उद्धच्च-सहगत चित्तामध्ये) प्रतिसंधी देण्याचा स्वभाव नसतो. 'बलवान खेचून आणते आणि दुर्बळ खेचून आणत नाही' हा विचार केवळ प्रतिसंधी देण्याचा स्वभाव असलेल्या चित्तांच्या बाबतीतच योग्य ठरतो. परंतु ज्या चित्ताचा प्रतिसंधी देण्याचा स्वभावच नाही, त्याचे बलवान असणे प्रतिसंधी खेचून आणण्यासाठी कारण ठरू शकत नाही. ကထံ ပနေတံ ဝိညာတဗ္ဗံ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတဿ ပဋိသန္ဓိဒါနသဘာဝေါ နတ္ထီတိ? ဒဿနေနပဟာတဗ္ဗေသု အနာဂတတ္တာ. တိဝိဓာ ဟိ အကုသလာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ, ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗာ, သိယာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ, သိယာ ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗာတိ. တတ္ထ ဒိဋ္ဌိသဟဂတဝိစိကိစ္ဆာသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ နာမ ပဌမံ နိဗ္ဗာနဒဿနဝသေန ‘‘ဒဿန’’န္တိ လဒ္ဓနာမေန သောတာပတ္တိမဂ္ဂေန ပဟာတဗ္ဗတ္တာ. ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒေါ ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗော နာမ အဂ္ဂမဂ္ဂေန ပဟာတဗ္ဗတ္တာ. ဥပရိမဂ္ဂတ္တယဉှိ ပဌမမဂ္ဂေန ဒိဋ္ဌနိဗ္ဗာနေ ဘာဝနာဝသေန ပဝတ္တနတော ‘‘ဘာဝနာ’’တိ ဝုစ္စတိ. ဒိဋ္ဌိဝိပ္ပယုတ္တဒေါမနဿသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒါ ပန သိယာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ, သိယာ ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗာ တေသံ အပါယနိဗ္ဗတ္တကာဝတ္ထာယ ပဌမမဂ္ဂေန, သေသဗဟလာဗဟလာဝတ္ထာယ ဥပရိမဂ္ဂေဟိ ပဟီယမာနတ္တာ. တတ္ထ သိယာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗမ္ပိ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗသာမညေန ဣဓ ‘‘ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗ’’န္တိ ဝေါဟရန္တိ. पण उद्धच्च-सहगत चित्तामध्ये प्रतिसंधी देण्याचा स्वभाव नाही, हे कशावरून समजावे? कारण 'दस्सनेन पहातब्ब' (दर्शनाने नष्ट होणाऱ्या) धर्मांमध्ये त्याचा समावेश होत नाही. कारण अकुशल धर्म तीन प्रकारचे आहेत: दर्शनाने नष्ट होणारे (दस्सनेन पहातब्ब), भावनेने नष्ट होणारे (भावनेन पहातब्ब), आणि काही दर्शनाने नष्ट होणारे तर काही भावनेने नष्ट होणारे (सिया दस्सनेन पहातब्ब, सिया भावनेन पहातब्ब). त्यापैकी, दिठ्ठिसहगत (दृष्टियुक्त) आणि विचिकित्सासहगत चित्तोत्पाद हे 'दर्शनाने नष्ट होणारे' म्हटले जातात, कारण पहिल्यांदा निर्वाणाचे दर्शन घडवून आणणाऱ्या आणि 'दर्शन' असे नाव प्राप्त झालेल्या सोतापत्तिमार्गाने ते नष्ट केले जातात. उद्धच्च-सहगत चित्तोत्पाद हा 'भावनेने नष्ट होणारा' आहे, कारण तो अग्र मार्गाने (अरहत्तमार्गाने) नष्ट केला जातो. कारण वरचे तीन मार्ग (सकदागामी, अनागामी, अरहत्त) हे पहिल्या मार्गाने पाहिलेल्या निर्वाणामध्ये भावनाच्या (अभ्यासाच्या) रूपाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्यांना 'भावना' म्हटले जाते. परंतु दिठ्ठिविप्पयुत्त (दृष्टिविरहित) आणि दोमनस्ससहगत (द्वेषयुक्त) चित्तोत्पाद हे काही दर्शनाने तर काही भावनेने नष्ट होणारे आहेत; कारण त्यांची अपाय (दुर्गती) मध्ये जन्म घडवून आणण्याची अवस्था पहिल्या मार्गाने नष्ट केली जाते, आणि उरलेली स्थूल व सूक्ष्म अवस्था वरील मार्गांनी नष्ट केली जाते. त्यापैकी, 'काही दर्शनाने नष्ट होणारे' याला देखील दर्शनाने नष्ट होण्याच्या समानतेमुळे येथे 'दर्शनाने नष्ट होणारे' असेच म्हटले जाते. ယဒိ စ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတံ ပဋိသန္ဓိံ ဒဒေယျ, တဒါ အကုသလပဋိသန္ဓိယာ သုဂတိယံ အသမ္ဘဝတော အပါယေသွေဝ ဒဒေယျ. အပါယဂမနီယဉ္စ အဝဿံ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗံ သိယာ. ဣတရထာ အပါယဂမနီယဿ အပ္ပဟီနတ္တာ သေက္ခာနံ အပါယုပ္ပတ္တိ အာပဇ္ဇတိ, န စ ပနေတံ ယုတ္တံ ‘‘စတူဟပါယေဟိ စ ဝိပ္ပမုတ္တော (ခု. ပါ. ၆.၁၁; သု. နိ. ၂၃၄), အဝိနိပါတဓမ္မော’’တိ (ပါရာ. ၂၁; သံ. နိ. ၅.၉၉၈) အာဒိဝစနေဟိ သဟ ဝိရုဇ္ဈနတော. သတိ စ ပနေတဿ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗဘာဝေ ‘‘သိယာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ’’တိ ဣမဿ ဝိဘင်္ဂေ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာ, န စ ပနေတံ ဝုတ္တန္တိ[Pg.180]. အထ သိယာ ‘‘အပါယဂါမိနိယော ရာဂေါ ဒေါသော မောဟော တဒေကဋ္ဌာ စ ကိလေသာ’’တိ ဧဝံ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗေသု ဝုတ္တတ္တာ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတစေတနာယ တတ္ထ သင်္ဂဟော သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ. တံ န, တဿ ဧကန္တတော ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗဘာဝေန ဝုတ္တတ္တာ. ဝုတ္တဉှေတံ – ‘‘ကတမေ ဓမ္မာ ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗာ? ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတော စိတ္တုပ္ပာဒေါ’’တိ (ဓ. သ. ၁၄၀၆), တသ္မာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗေသု အဝစနံ ဣမဿ ပဋိသန္ဓိဒါနာဘာဝံ သာဓေတိ. နနု စ ပဋိသမ္ဘိဒါဝိဘင်္ဂေ – आणि जर उद्धच्च-सहगत चित्त प्रतिसंधी देत असते, तर अकुशल प्रतिसंधी सुगतीमध्ये संभवत नसल्यामुळे ते केवळ अपाय (दुर्गती) मध्येच प्रतिसंधी देऊ शकले असते. आणि अपायगामी (दुर्गतीकडे नेणारे) कर्म हे निश्चितपणे दर्शनाने (सोतापत्तिमार्गाने) नष्ट होणारे असावे लागते. अन्यथा, अपायगामी कर्म नष्ट न झाल्यामुळे सेक्ख (शैक्य - सोतापन्न इत्यादी आर्य) पुद्गलांचा अपाय (दुर्गती) मध्ये जन्म होण्याचा प्रसंग येईल. परंतु हे योग्य नाही, कारण 'चार अपायांपासून मुक्त' आणि 'अविनिपातधम्मा' (दुर्गतीला न जाणारा स्वभाव असलेला) इत्यादी बुद्धवचनांशी ते विरुद्ध ठरते. आणि जर त्याचा दर्शनाने नष्ट होणाऱ्या धर्मांमध्ये समावेश असता, तर 'काही दर्शनाने नष्ट होणारे' याच्या विभंगामध्ये (विभागामध्ये) त्याचे वर्णन करावे लागले असते, परंतु तसे वर्णन केलेले नाही. जर असे मानले की, 'अपायगामी राग, द्वेष, मोह आणि त्यांच्याशी एकाच चित्तात राहणारे क्लेश' अशा प्रकारे दर्शनाने नष्ट होणाऱ्या धर्मांमध्ये वर्णन केल्यामुळे उद्धच्च-सहगत चेतनेचा त्यात समावेश होतो असे म्हणता येईल. तर ते योग्य नाही, कारण त्याचा निश्चितपणे भावनेने नष्ट होणाऱ्या धर्मांमध्ये उल्लेख केला आहे. कारण असे म्हटले आहे की - 'कोणते धर्म भावनेने नष्ट होणारे आहेत? उद्धच्च-सहगत चित्तोत्पाद.' म्हणून, दर्शनाने नष्ट होणाऱ्या धर्मांमध्ये त्याचा उल्लेख न करणे हे सिद्ध करते की यात प्रतिसंधी देण्याचा स्वभाव नाही. परंतु पटिसम्भिदामग्ग विभंगामध्ये (किंवा प्रतिसंभिदा विभंगामध्ये) - ‘‘ယသ္မိံ သမယေ အကုသလံ စိတ္တံ ဥပ္ပန္နံ ဟောတိ ဥပေက္ခာသဟဂတံ ဥဒ္ဓစ္စသမ္ပယုတ္တံ ရူပါရမ္မဏံ ဝါ…ပေ… ဓမ္မာရမ္မဏံ ဝါ, ယံ ယံ ဝါ ပနာရဗ္ဘ တသ္မိံ သမယေ ဖဿော ဟောတိ…ပေ… အဝိက္ခေပေါ ဟောတိ, ဣမေ ဓမ္မာ အကုသလာ. ဣမေသု ဓမ္မေသု ဉာဏံ ဓမ္မပဋိသမ္ဘိဒါ, တေသံ ဝိပါကေ ဉာဏံ အတ္ထပဋိသမ္ဘိဒါ’’တိ (ဝိဘ. ၇၃၀-၇၃၁) – ‘ज्या वेळी उपेक्षा-सहगत आणि उद्धच्च-संप्रयुक्त (औद्धत्ययुक्त) अकुशल चित्त उत्पन्न होते, जे रूपाला आलंबन करणारे असते... किंवा... धर्माला आलंबन करणारे असते, किंवा ज्या ज्या विषयाला आरंभ करून त्या वेळी स्पर्श होतो... अविक्खेप (एकाग्रता) होते, हे धर्म अकुशल आहेत. या धर्मांमधील ज्ञानाला धम्मपटिसम्भिदा (धर्मप्रतिसंभिदा) म्हणतात, आणि त्यांच्या विपाकातील (फळातील) ज्ञानाला अत्थपटिसम्भिदा (अर्थप्रतिसंभिदा) म्हणतात.’ ဧဝံ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတစိတ္တုပ္ပာဒံ ဥဒ္ဓရိတွာ တဿ ဝိပါကောပိ ဥဒ္ဓဋောတိ ကထမဿ ပဋိသန္ဓိဒါနာဘာဝေါ သမ္ပဋိစ္ဆိတဗ္ဗောတိ? နာယံ ပဋိသန္ဓိဒါနံ သန္ဓာယ ဥဒ္ဓဋော. အထ ခေါ ပဝတ္တိဝိပါကံ သန္ဓာယ. ပဋ္ဌာနေ ပန – अशा प्रकारे उद्धच्च-सहगत चित्तोत्पाद (औद्धत्ययुक्त चित्ताची उत्पत्ती) वेगळा करून त्याचा विपाक देखील दर्शविला आहे, तर मग त्याचे प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) न देण्याचे कशा प्रकारे स्वीकारले जाऊ शकते? हा (विपाक) प्रतिसंधी देण्याच्या उद्देशाने दर्शविलेला नाही, तर केवळ प्रवृत्ती-विपाक (जीवनातील विपाक) लक्षात घेऊन दर्शविला आहे. पण पट्ठानमध्ये - ‘‘သဟဇာတာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ စေတနာ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာနံ ရူပါနံ ကမ္မပစ္စယေန ပစ္စယော, နာနာက္ခဏိကာ ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗာ စေတနာ ဝိပါကာနံ ခန္ဓာနံ, ကဋတ္တာ စ ရူပါနံ ကမ္မပစ္စယေန ပစ္စယော’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၂.၈.၈၉) – “सहजात, दर्शनाने प्रहातव्य (नष्ट करण्यायोग्य) चेतना ही चित्तसमुत्थान रूपांसाठी कर्मप्रत्ययाने प्रत्यय आहे; नानाक्षणिक, दर्शनाने प्रहातव्य चेतना ही विपाक स्कंधांसाठी आणि कटत्ता (कर्मज) रूपांसाठी कर्मप्रत्ययाने प्रत्यय आहे” - ဒဿနေန ပဟာတဗ္ဗစေတနာယ ဧဝ သဟဇာတနာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယဘာဝံ ဥဒ္ဓရိတွာ ‘‘သဟဇာတာ ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗာ စေတနာ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာနံ ရူပါနံ ကမ္မပစ္စယေန ပစ္စယော’’တိ [Pg.181] (ပဋ္ဌာ. ၂.၈.၈၉) ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗစေတနာယ သဟဇာတကမ္မပစ္စယဘာဝေါဝ ဥဒ္ဓဋော, န ပန နာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယဘာဝေါ, န စ နာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယံ ဝိနာ ပဋိသန္ဓိအာကဍ္ဎနံ အတ္ထိ, တသ္မာ နတ္ထိ တဿ သဗ္ဗထာပိ ပဋိသန္ဓိဒါနန္တိ. ယံ ပနေကေ ဝဒန္တိ ‘‘ဥဒ္ဓစ္စစေတနာ ဥဘယဝိပါကမ္ပိ န ဒေတိ ပဋ္ဌာနေ နာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယဘာဝဿ အနုဒ္ဓဋတ္တာ’’တိ, တံ တေသံ မတိမတ္တံ ပဋိသမ္ဘိဒါဝိဘင်္ဂေ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတာနမ္ပိ ပဝတ္တိဝိပါကဿ ဥဒ္ဓဋတ္တာ, ပဋ္ဌာနေ စ ပဋိသန္ဓိဝိပါကဘာဝမေဝ သန္ဓာယ နာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယဘာဝဿ အနုဒ္ဓဋတ္တာ. ယဒိ ဟိ ပဝတ္တိဝိပါကံ သန္ဓာယ နာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယဘာဝေါ ဝုစ္စေယျ, တဒါ ပဋိသန္ဓိဝိပါကမ္ပိဿ မညေယျုန္တိ လဗ္ဘမာနဿပိ ပဝတ္တိဝိပါကဿ ဝသေန နာနာက္ခဏိကကမ္မပစ္စယဘာဝေါ န ဝုတ္တော, တသ္မာ န သက္ကာ တဿ ပဝတ္တိဝိပါကံ နိဝါရေတုံ. တေနာဟ ‘‘ပဝတ္တိယံ ပနာ’’တျာဒိ. အာစရိယဗုဒ္ဓမိတ္တာဒယော ပန အတ္ထိ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတံ ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗမ္ပိ. အတ္ထိ န ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗမ္ပိ, တေသု ဘာဝနာယ ပဟာတဗ္ဗံ သေက္ခသန္တာနပ္ပဝတ္တံ, ဣတရံ ပုထုဇ္ဇနသန္တာနပ္ပဝတ္တံ, ဖလဒါနဉ္စ ပုထုဇ္ဇနသန္တာနပ္ပဝတ္တဿေဝ န ဣတရဿာတိ ဧဝံ ဥဒ္ဓစ္စသဟဂတံ ဒွိဓာ ဝိဘဇိတွာ ဧကဿ ဥဘယဝိပါကဒါနံ, ဧကဿ သဗ္ဗထာပိ ဝိပါကာဘာဝံ ဝဏ္ဏေန္တိ. ယော ပနေတ္ထ တေသံ ဝိနိစ္ဆယော, ယဉ္စ တဿ နိရာကရဏံ, ယဉ္စ သဗ္ဗထာပိ ဝိပါကာဘာဝဝါဒီနံ မတပဋိက္ခေပနံ ဣဓ အဝုတ္တံ, တံ သဗ္ဗံ ပရမတ္ထမဉ္ဇူသာဒီသု, ဝိသေသတော စ အဘိဓမ္မတ္ထဝိကာသိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မာဝတာရသံဝဏ္ဏနာယံ ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. दर्शनाने प्रहातव्य चेतनेचाच सहजात आणि नानाक्षणिक कर्मप्रत्ययभाव दर्शवून, “भावना-प्रहातव्य सहजात चेतना ही चित्तसमुत्थान रूपांसाठी कर्मप्रत्ययाने प्रत्यय आहे” इत्यादीद्वारे भावना-प्रहातव्य चेतनेचा केवळ सहजात-कर्मप्रत्ययभावच दर्शविला आहे, नानाक्षणिक-कर्मप्रत्ययभाव मात्र दर्शविलेला नाही. आणि नानाक्षणिक-कर्मप्रत्ययाशिवाय प्रतिसंधीचे आकर्षण (पुनर्जन्म घडवून आणणे) शक्य नाही, म्हणून त्या (उद्धच्च-सहगत चित्ताला) कोणत्याही प्रकारे प्रतिसंधी देणे शक्य नाही. परंतु काही आचार्य जे म्हणतात की, “पट्ठानमध्ये नानाक्षणिक-कर्मप्रत्ययभाव न दर्शविल्यामुळे उद्धच्च-चेतना दोन्ही प्रकारचे विपाक (प्रतिसंधी आणि प्रवृत्ती) देत नाही”, ते केवळ त्यांचे वैयक्तिक मत आहे. कारण पटिसंभिदा-विभंगामध्ये उद्धच्च-सहगत चित्ताचा प्रवृत्ती-विपाक दर्शविला आहे, आणि पट्ठानमध्ये प्रतिसंधी-विपाकाचा अभाव दर्शविण्याच्या उद्देशानेच नानाक्षणिक-कर्मप्रत्ययभाव दर्शविलेला नाही. जर प्रवृत्ती-विपाकाचा उद्देश ठेवून नानाक्षणिक-कर्मप्रत्ययभाव सांगितला असता, तर लोक त्याचा प्रतिसंधी-विपाक देखील मानू लागले असते. म्हणून प्राप्त होणाऱ्या प्रवृत्ती-विपाकाच्या दृष्टीने देखील नानाक्षणिक-कर्मप्रत्ययभाव सांगितलेला नाही. म्हणूनच त्याचा प्रवृत्ती-विपाक नाकारता येत नाही. म्हणूनच “प्रवृत्तीमध्ये तर” इत्यादी म्हटले आहे. आचार्य बुद्धमित्त इत्यादींचे मत आहे की, भावना-प्रहातव्य असेही उद्धच्च-सहगत चित्त असते आणि भावना-प्रहातव्य नसलेले देखील असते. त्यापैकी, भावना-प्रहातव्य हे शैक्ष (सेक्ख) व्यक्तींच्या संतानामध्ये (चित्तप्रवाहात) उत्पन्न होते, आणि दुसरे पृथग्जन (पुथुज्जन) व्यक्तींच्या संतानामध्ये उत्पन्न होते. आणि फळ देणे हे केवळ पृथग्जनांच्या संतानामध्ये उत्पन्न होणाऱ्या उद्धच्च-सहगत चित्ताचेच असते, इतरांचे नाही. अशा प्रकारे उद्धच्च-सहगत चित्ताचे दोन भाग करून, एकाचे दोन्ही विपाक देणे आणि दुसऱ्याचा सर्वथा विपाकाचा अभाव असणे, असे ते वर्णन करतात. येथे त्यांचा जो निर्णय आहे, त्याचे जे खंडन आहे, आणि सर्वथा विपाक-अभाव मानणाऱ्यांच्या मताचे जे निराकरण आहे, जे येथे सांगितले नाही, ते सर्व 'परमत्थमंजूषा' इत्यादी ग्रंथांमध्ये आणि विशेषतः 'अभिधम्मत्थविकासिनी' नावाच्या 'अभिधम्मावतार' संवर्णनेमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावे. သဗ္ဗတ္ထာပိ ကာမလောကေတိ သုဂတိဒုဂ္ဂတိဝသေန သဗ္ဗသ္မိမ္ပိ ကာမလောကေ. ယထာရဟန္တိ ဒွါရာရမ္မဏာနုရူပံ. အပါယေသုပိ ယံ နာဂသုပဏ္ဏာဒီနံ မဟာသမ္ပတ္တိဝိသယံ ဝိပါကဝိညာဏံ, ယဉ္စ နိရယဝါသီနံ မဟာမောဂ္ဂလ္လာနတ္ထေရဒဿနာဒီသု ဥပ္ပဇ္ဇတိ ဝိပါကဝိညာဏံ[Pg.182], တံ ကုသလကမ္မဿေဝ ဖလံ. န ဟိ အကုသလဿ ဣဋ္ဌဝိပါကော သမ္ဘဝတိ. ဝုတ္တဉှေတံ ‘‘အဋ္ဌာနမေတံ, ဘိက္ခဝေ, အနဝကာသော, ယံ အကုသလဿ ကမ္မဿ ဣဋ္ဌော ကန္တော ဝိပါကော သံဝိဇ္ဇတီ’’တိ (မ. နိ. ၃.၁၃၁; အ. နိ. ၁.၂၈၄-၂၈၆; ဝိဘ. ၈၀၉), တသ္မာ ကုသလကမ္မံ အပါယေသုပိ အဟေတုကဝိပါကာနိ ဇနေတိ. အညဘူမိကဿ စ ကမ္မဿ အညဘူမိကဝိပါကာဘာဝတော ကာမဝိရာဂဘာဝနာယ ကာမတဏှာဝိသယဝိညာဏုပ္ပာဒနာယောဂတော ဧကန္တသဒိသဝိပါကတ္တာ စ မဟဂ္ဂတာနုတ္တရကုသလာနံ ရူပါဝစရကမ္မေန အဟေတုကဝိပါကုပ္ပတ္တိယာ အဘာဝတော ရူပလောကေပိ ယထာရဟံ ရူပါဒိဝိသယာနိ တာနိ အဘိနိပ္ဖာဒေတီတိ ဝုတ္တံ ‘‘သဗ္ဗတ္ထာပိ ကာမလောကေ’’တျာဒိ. “सर्वत्र कामलोकात” म्हणजे सुगती आणि दुर्गतीच्या रूपाने संपूर्ण कामलोकात. “यथायोग्य” म्हणजे द्वार आणि आलंबन (विषय) यांच्या अनुरूप. अपाय (दुर्गती) मध्ये देखील नाग, गरुड इत्यादी प्राण्यांचे जे महासंपत्तीशी संबंधित विपाक-विज्ञान उत्पन्न होते, आणि नरकवासीयांना महामौद्गल्यायन स्थविरांच्या दर्शनादी प्रसंगी जे विपाक-विज्ञान उत्पन्न होते, ते केवळ कुशल कर्माचेच फळ आहे. कारण अकुशल कर्माचा इष्ट (चांगला) विपाक असणे शक्य नाही. कारण असे म्हटले आहे की, “भिक्खूहो! हे अशक्य आहे, असा कोणताही प्रसंग नाही की अकुशल कर्माचा इष्ट, प्रिय विपाक प्राप्त होईल.” म्हणून कुशल कर्म अपाय (दुर्गती) मध्ये देखील अहेतुक विपाक उत्पन्न करते. आणि दुसऱ्या भूमीतील कर्माचा दुसऱ्या भूमीतील विपाक होत नसल्यामुळे, काम-विराग भावनेमुळे काम-तृष्णेच्या विषयांचे विज्ञान उत्पन्न होणे अयोग्य असल्यामुळे, आणि महग्गत व लोकोत्तर कुशल कर्मांचे फळ एकांततः सदृश (सारखेच) असल्यामुळे, रूपावचर कर्माने अहेतुक विपाकाची उत्पत्ती होत नसल्यामुळे, रूपलोकात देखील यथायोग्य रूपादी विषयांचे ते (अहेतुक विपाक) उत्पन्न होतात, म्हणूनच “सर्वत्र कामलोकात” इत्यादी म्हटले आहे. ၇၁. ဧဝံ ပန ဝိပစ္စန္တံ ကမ္မံ သောဠသကဒွါဒသကအဋ္ဌကဝသေန တိဓာ ဝိပစ္စတီတိ ဒဿေတုံ ‘‘တတ္ထာပိ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထာပီတိ ဧဝံ ဝိပစ္စမာနေပိ ကုသလကမ္မေ. ဥက္ကဋ္ဌန္တိ ကုသလပရိဝါရလာဘတော, ပစ္ဆာ အာသေဝနပ္ပဝတ္တိယာ ဝါ ဝိသိဋ္ဌံ. ယဉှိ ကမ္မံ အတ္တနော ပဝတ္တိကာလေ ပုရိမပစ္ဆာဘာဂပ္ပဝတ္တေဟိ ကုသလကမ္မေဟိ ပရိဝါရိတံ, ပစ္ဆာ ဝါ အာသေဝနလာဘေန သမုဒါစိဏ္ဏံ. တံ ဥက္ကဋ္ဌံ. ယံ ပန ကရဏကာလေ အကုသလကမ္မေဟိ ပရိဝါရိတံ, ပစ္ဆာ ဝါ ‘‘ဒုက္ကဋမေတံ မယာ’’တိ ဝိပ္ပဋိသာရုပ္ပာဒနေန ပရိဘာဝိတံ, တံ ဩမကန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ७१. अशा प्रकारे विपाक देणारे कर्म सोळा, बारा आणि आठ विपाकांच्या समूहाच्या रूपाने तीन प्रकारे विपाक देते, हे दर्शविण्यासाठी “तेथेही” इत्यादी म्हटले आहे. “तेथेही” म्हणजे अशा प्रकारे विपाक देणाऱ्या कुशल कर्मामध्ये देखील. “उत्कृष्ट” म्हणजे कुशल परिवाराच्या प्राप्तीमुळे किंवा नंतरच्या आसेवनाच्या प्रवृत्तीमुळे विशिष्ट (श्रेष्ठ) झालेले. कारण जे कर्म स्वतःच्या उत्पत्तीच्या वेळी पूर्व आणि पश्चात् भागात उत्पन्न होणाऱ्या कुशल कर्मांनी वेढलेले असते, किंवा नंतर आसेवनाच्या प्राप्तीने वारंवार अभ्यासले जाते, ते 'उत्कृष्ट' होय. परंतु जे कर्म करण्याच्या वेळी अकुशल कर्मांनी वेढलेले असते, किंवा नंतर “हे माझ्याकडून वाईट कृत्य झाले” अशा पश्चात्तापाच्या उत्पत्तीने युक्त असते, ते 'ओमक' (हीन) समजावे. ပဋိသန္ဓိန္တိ ဧကမေဝ ပဋိသန္ဓိံ. န ဟိ ဧကေန ကမ္မေန အနေကာသု ဇာတီသု ပဋိသန္ဓိ ဟောတိ, ပဝတ္တိဝိပါကော ပန ဇာတိသတေပိ ဇာတိသဟဿေပိ ဟောတိ. ယထာဟ ‘‘တိရစ္ဆာနဂတေ ဒါနံ ဒတွာ သတဂုဏာ ဒက္ခိဏာ ပါဋိကင်္ခိတဗ္ဗာ’’တိ (မ. နိ. ၃.၃၇၉). ယသ္မာ ပနေတ္ထ ဉာဏံ ဇစ္စန္ဓာဒိဝိပတ္တိနိမိတ္တဿ မောဟဿ, သဗ္ဗာကုသလဿေဝ ဝါ ပဋိပက္ခံ, တသ္မာ တံသမ္ပယုတ္တံ ကမ္မံ ဇစ္စန္ဓာဒိဝိပတ္တိပစ္စယံ န ဟောတီတိ တိဟေတုကံ အတိဒုဗ္ဗလမ္ပိ သမာနံ [Pg.183] ဒုဟေတုကပဋိသန္ဓိမေဝ အာကဍ္ဎတိ, နာဟေတုကံ. ဒုဟေတုကဉ္စ ကမ္မံ ဉာဏသမ္ပယောဂါဘာဝတော ဉာဏဖလုပ္ပာဒနေ အသမတ္ထံ, ယထာ တံ အလောဘသမ္ပယောဂါဘာဝတော အလောဘဖလုပ္ပာဒနေ အသမတ္ထံ အကုသလကမ္မန္တိ တံ အတိဥက္ကဋ္ဌမ္ပိ သမာနံ ဒုဟေတုကမေဝ ပဋိသန္ဓိံ အာကဍ္ဎတိ, န တိဟေတုကန္တိ ဝုတ္တံ ‘‘တိဟေတုကမောမကံ ဒုဟေတုကမုက္ကဋ္ဌဉ္စာ’’တျာဒိ. “प्रतिसंधी” म्हणजे एकच प्रतिसंधी. कारण एका कर्माने अनेक जन्मांमध्ये प्रतिसंधी होत नाही, परंतु प्रवृत्ती-विपाक शंभर जन्मांत किंवा हजार जन्मांत देखील होतो. जसे म्हटले आहे की, “तिर्यक योनीतील (प्राण्याला) दान देऊन शंभर पटीने फळाची अपेक्षा करावी.” कारण येथे ज्ञान हे जन्मांधत्व इत्यादी विपत्तीचे कारण असणाऱ्या मोहाचे किंवा संपूर्ण अकुशल कर्माचेच विरोधी आहे, म्हणून त्या ज्ञानाने युक्त असणारे तिहेतुक कर्म जन्मांधत्व इत्यादी विपत्तीचे कारण बनत नाही. म्हणून ते तिहेतुक कर्म अत्यंत दुर्बळ असले तरी देखील द्विहेतुक प्रतिसंधीच खेचून आणते, अहेतुक नाही. आणि द्विहेतुक कर्म ज्ञानाच्या संप्रयोगाच्या (योगाच्या) अभावामुळे ज्ञानाचे फळ उत्पन्न करण्यास असमर्थ असते, जसे अलोभाच्या संप्रयोगाच्या अभावामुळे अलोभाचे फळ उत्पन्न करण्यास असमर्थ असणारे अकुशल कर्म असते. म्हणून ते द्विहेतुक कर्म अत्यंत उत्कृष्ट असले तरी देखील द्विहेतुक प्रतिसंधीच खेचून आणते, तिहेतुक नाही, म्हणूनच “तिहेतुक ओमक आणि द्विहेतुक उत्कृष्ट” इत्यादी म्हटले आहे. ဧတ္ထ သိယာ – ယထာ ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂေ ‘‘ဂတိသမ္ပတ္တိယာ ဉာဏသမ္ပယုတ္တေ အဋ္ဌန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာ ဥပပတ္တိ ဟောတီ’’တိ (ပဋိ. မ. ၁.၂၃၁) ကုသလဿ ကမ္မဿ ဇဝနက္ခဏေ တိဏ္ဏံ, နိကန္တိက္ခဏေ ဒွိန္နံ, ပဋိသန္ဓိက္ခဏေ တိဏ္ဏဉ္စ ဟေတူနံ ဝသေန အဋ္ဌန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာ ဉာဏသမ္ပယုတ္တူပပတ္တိ, တထာ ‘‘ဂတိသမ္ပတ္တိယာ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တေ ဆန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာ ဥပပတ္တိ ဟောတီ’’တိ (ပဋိ. မ. ၁.၂၃၃) ဇဝနက္ခဏေ ဒွိန္နံ, နိကန္တိက္ခဏေ ဒွိန္နံ, ပဋိသန္ဓိက္ခဏေ ဒွိန္နဉ္စ ဟေတူနံ ဝသေန ဆန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တူပပတ္တိ ဝုတ္တာ, ဧဝံ ‘‘ဂတိသမ္ပတ္တိယာ ဉာဏဝိပ္ပယုတ္တေ သတ္တန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာ ဥပပတ္တိ ဟောတီ’’တိ တိဟေတုကကမ္မေန ဒုဟေတုကပဋိသန္ဓိယာ အဝုတ္တတ္တာ နတ္ထိ တိဟေတုကဿ ဒုဟေတုကပဋိသန္ဓိအာကဍ္ဎနန္တိ? နယိဒမေဝံ ဒုဟေတုကောမကကမ္မေန အဟေတုကပဋိသန္ဓိယာ ဝိယ တိဟေတုကောမကကမ္မေန သာမတ္ထိယာနုရူပတော ဒုဟေတုကပဋိသန္ဓိယာဝ ဒါတဗ္ဗတ္တာ, ကမ္မသရိက္ခကဝိပါကဒဿတ္ထံ ပန မဟာထေရေန သာဝသေသော ပါဌော ကတော. ဣတရထာ ‘‘စတုန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာ’’တိ ဝစနာဘာဝတော ဒုဟေတုကကမ္မေန အဟေတုကူပပတ္တိယာပိအဘာဝေါ အာပဇ္ဇတိ, တသ္မာ ယထာ သုဂတိယံ ဇစ္စန္ဓဗဓိရာဒိဝိပတ္တိယာ အဟေတုကူပပတ္တိံ ဝဇ္ဇေတွာ ဂတိသမ္ပတ္တိယာ သဟေတုကူပပတ္တိဒဿနတ္ထံ ဒုဟေတုကူပပတ္တိ ဧဝ ဥဒ္ဓဋာ, န အဟေတုကူပပတ္တိ, ဧဝံ ကမ္မသရိက္ခကဝိပါကဒဿနတ္ထံ တိဟေတုကကမ္မေန [Pg.184] တိဟေတုကူပပတ္တိ ဧဝ ဥဒ္ဓဋာ, န ဒုဟေတုကူပပတ္တိ, န ပန အလဗ္ဘနတောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. येथे अशी शंका उपस्थित होऊ शकते – ज्याप्रमाणे पटिसम्भिदामग्गमध्ये 'गतीची संपत्ती (सुगती) असताना, ज्ञानसंप्रयुक्त चित्तात आठ हेतूंच्या प्रत्ययाने (कारणाने) उत्पत्ती (प्रतिसंधी) होते' या वचनानुसार कुशल कर्माच्या जवनक्षणात तीन, निकंतीच्या (तृष्णेच्या) क्षणात दोन आणि प्रतिसंधीच्या क्षणात तीन अशा आठ हेतूंच्या प्रभावाने ज्ञानसंप्रयुक्त प्रतिसंधी होते; तसेच 'गतीची संपत्ती असताना, ज्ञानविप्रयुक्त चित्तात सहा हेतूंच्या प्रत्ययाने उत्पत्ती होते' या वचनानुसार जवनक्षणात दोन, निकंतीच्या क्षणात दोन आणि प्रतिसंधीच्या क्षणात दोन अशा सहा हेतूंच्या प्रभावाने ज्ञानविप्रयुक्त प्रतिसंधी सांगितली आहे; मग या प्रकारे 'गतीची संपत्ती असताना, ज्ञानविप्रयुक्त चित्तात सात हेतूंच्या प्रत्ययाने उत्पत्ती होते' असे न म्हटल्यामुळे, तिहेतुक कर्माद्वारे द्विहेतुक प्रतिसंधीचे आकर्षण (प्राप्ती) होत नाही काय? हे असे नाही. ज्याप्रमाणे द्विहेतुक ओमक कर्माद्वारे अहेतुक प्रतिसंधी दिली जाते, त्याचप्रमाणे तिहेतुक ओमक कर्माद्वारे त्याच्या सामर्थ्यानुसार द्विहेतुक प्रतिसंधीच दिली जाणे योग्य आहे. परंतु कर्माच्या समान विपाकाचे दर्शन घडवण्यासाठी महाथेरांनी हा पाठ अपूर्ण (काही भाग शिल्लक ठेवून) केला आहे. अन्यथा, 'चार हेतूंच्या प्रत्ययाने' असे वचन नसल्यामुळे, द्विहेतुक कर्माद्वारे अहेतुक उत्पत्तीचाही अभाव सिद्ध होईल. म्हणून, ज्याप्रमाणे सुगतीमध्ये जन्मांध, बहिरेपण इत्यादी विपरिततेमुळे होणारी अहेतुक उत्पत्ती वर्ज्य करून, गती संपत्तीमध्ये सहेतुक उत्पत्ती दाखवण्यासाठी केवळ द्विहेतुक उत्पत्तीच उद्धृत केली आहे, अहेतुक उत्पत्ती नाही; त्याचप्रमाणे कर्माच्या समान विपाकाचे दर्शन घडवण्यासाठी तिहेतुक कर्माद्वारे केवळ तिहेतुक उत्पत्तीच उद्धृत केली आहे, द्विहेतुक उत्पत्ती नाही. परंतु ती प्राप्त होत नाही असे मानू नये। ၇၄. ဧဝံ ဧကာယ စေတနာယ သောဠသ ဝိပါကာနိ ဧတ္ထေဝ ဒွါဒသကမဂ္ဂေါ အဟေတုကဋ္ဌကမ္ပီတိ ပဝတ္တဿ တိပိဋကစူဠနာဂတ္ထေရဝါဒဿ ဝသေန ဝိပါကပ္ပဝတ္တိံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဧကာယ စေတနာယ ဒွါဒသ ဝိပါကာနိ ဧတ္ထေဝ ဒသကမဂ္ဂေါ အဟေတုကဋ္ဌကမ္ပီတိ အာဂတဿ မောရဝါပီဝါသီမဟာဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရဝါဒဿပိ ဝသေန ဒဿေတုံ အသင်္ခါရံ သသင်္ခါရဝိပါကာနီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ယထာ မုခေ စလိတေ အာဒါသတလေ မုခနိမိတ္တံ စလတိ, ဧဝံ အသင်္ခါရကုသလဿ အသင်္ခါရဝိပါကောဝ ဟောတိ, န သသင်္ခါရောတိ ဧဝံ အာဂမနတောဝ သင်္ခါရဘေဒေါတိ အယမေတ္ထာဓိပ္ပာယော. ယသ္မာ ပန ဝိပါကဿ သင်္ခါရဘေဒေါ ပစ္စယဝသေန ဣစ္ဆိတော, န ကမ္မဝသေန, တသ္မာ ဧသ ကေစိဝါဒေါ ကတော. ७४. अशा प्रकारे, 'एकाच चेतनेने सोळा विपाक होतात, आणि याच चेतनेने बारा विपाक आणि आठ अहेतुक विपाक देखील होतात' या तिपिटकचूळनाग थेरांच्या मतानुसार विपाकाची प्रवृत्ती दर्शवून, आता 'एका चेतनेने बारा विपाक होतात, आणि याच चेतनेने दहा विपाक आणि आठ अहेतुक विपाक देखील होतात' या मोरवापीवासी महाधम्मरक्खित थेरांच्या मतानुसार विपाकाची प्रवृत्ती दर्शवण्यासाठी 'असंखारं ससंखारविपाकानि' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. ज्याप्रमाणे चेहरा हलल्यावर आरशातील चेहऱ्याचे प्रतिबिंब हलते, त्याचप्रमाणे असंखारिक कुशल कर्माचा विपाक केवळ असंखारिकच होतो, ससंखारिक नाही; अशा प्रकारे कर्माच्या प्रवृत्तीनुसारच संस्कारांचा भेद होतो, हा येथे अभिप्राय आहे. परंतु विपाकाचा संस्कारभेद हा प्रत्ययाच्या (नजीकच्या कारणाच्या) प्रभावाने मानला गेला आहे, कर्माच्या प्रभावाने नाही; म्हणून याला 'केचिव्वाद' (काहींचे मत) असे म्हटले गेले आहे। တေသန္တိ တေသံ ဧဝံဝါဒီနံ. ယထာက္ကမန္တိ တိဟေတုကုက္ကဋ္ဌာဒီနံ အနုက္ကမေန. ဒွါဒသ ဝိပါကာနီတိ တိဟေတုကုက္ကဋ္ဌအသင်္ခါရိကသသင်္ခါရိကကမ္မဿ ဝသေန ယထာက္ကမံ သသင်္ခါရိကစတုက္ကဝဇ္ဇိတာနိ, အသင်္ခါရိကစတုက္ကဝဇ္ဇိတာနိ စ ဒွါဒသ ဝိပါကာနိ, တထာ တိဟေတုကောမကဿ, ဒုဟေတုကုက္ကဋ္ဌဿ စ ကမ္မဿ ဝသေန ဒုဟေတုကသသင်္ခါရဒွယဝဇ္ဇိတာနိ, ဒုဟေတုကာသင်္ခါရဒွယဝဇ္ဇိတာနိ စ ဒသ ဝိပါကာနိ, ဒုဟေတုကောမကဿ ဝသေန ဒုဟေတုကဒွယဝဇ္ဇိတာနိ စ အဋ္ဌ ဝိပါကာနိ ယထာဝုတ္တဿ ‘‘တိဟေတုကမုက္ကဋ္ဌ’’န္တျာဒိနာ ဝုတ္တနယဿ အနုသာရေန အနုဿရဏေန ယထာသမ္ဘဝံ တဿ တဿ သမ္ဘဝါနုရူပတော ဥဒ္ဒိသေ. 'तेसं' म्हणजे त्या प्रकारे बोलणाऱ्या थेरांचे. 'यथाक्कमं' म्हणजे तिहेतुक उत्कृष्ट इत्यादी कर्मांच्या अनुक्रमाने. 'बारा विपाक' म्हणजे तिहेतुक उत्कृष्ट असंखारिक आणि ससंखारिक कर्माच्या प्रभावाने अनुक्रमे ससंखारिक चार विपाक वर्ज्य करून आणि असंखारिक चार विपाक वर्ज्य करून मिळणारे बारा विपाक होत. तसेच तिहेतुक ओमक आणि द्विहेतुक उत्कृष्ट कर्माच्या प्रभावाने द्विहेतुक ससंखारिक दोन विपाक वर्ज्य करून आणि द्विहेतुक असंखारिक दोन विपाक वर्ज्य करून मिळणारे दहा विपाक होत. आणि द्विहेतुक ओमक कर्माच्या प्रभावाने द्विहेतुक दोन विपाक वर्ज्य करून मिळणारे आठ विपाक होत. पूर्वी सांगितलेल्या 'तिहेतुकमुक्कठ्ठं' इत्यादी पद्धतीचा अनुसरून, त्या त्या विपाकाच्या संभवतेनुसार ते स्पष्ट करावेत। ၇၅. ပရိတော အတ္တံ ခဏ္ဍိတံ ဝိယ အပ္ပာနုဘာဝန္တိ ပရိတ္တံ. ပကဋ္ဌဘာဝံ နီတန္တိ ပဏီတံ, ဥဘိန္နံ မဇ္ဈေ ဘဝံ မဇ္ဈိမံ. တတ္ထ ‘‘ပဋိလဒ္ဓမတ္တံ [Pg.185] အနာသေဝိတံ ပရိတ္တ’’န္တိ အဝိသေသတောဝ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တံ, တထာ ‘‘နာတိသုဘာဝိတံ အပရိပုဏ္ဏဝသီဘာဝံ မဇ္ဈိမံ. အတိဝိယ သုဘာဝိတံ ပန သဗ္ဗသော ပရိပုဏ္ဏဝသီဘာဝံ ပဏီတ’’န္တိ. အာစရိယေန ပနေတ္ထ ပရိတ္တမ္ပိ ဤသကံ လဒ္ဓါသေဝနမေဝါဓိပ္ပေတန္တိ ဒိဿတိ. တထာ ဟာနေန နာမရူပပရိစ္ဆေဒေ – ७५. चहूबाजूंनी कापलेल्या वस्तू प्रमाणे अल्प सामर्थ्य असलेले ध्यान म्हणजे 'परित्त' (अल्प) होय. उत्कृष्ट अवस्थेला पोहोचलेले ध्यान म्हणजे 'पणीत' (उत्कृष्ट) होय, आणि या दोन्हीच्या मध्ये असणारे ध्यान म्हणजे 'मज्झिम' (मध्यम) होय. त्यामध्ये, 'केवळ प्राप्त झालेले परंतु वारंवार सराव न केलेले ध्यान म्हणजे परित्त होय' असे सामान्यपणे अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे. तसेच, 'जे फारसे विकसित केलेले नाही आणि ज्याचे वशीभाव (नियंत्रण) अपूर्ण आहे ते मध्यम होय. परंतु जे अत्यंत चांगल्या प्रकारे विकसित केले आहे आणि ज्याचे वशीभाव सर्व प्रकारे पूर्ण आहे ते प्रणीत होय.' येथे आचार्यांना परित्त ध्यानामध्ये देखील थोडेफार आसेवन (सराव) प्राप्त झालेलेच अभिप्रेत आहे असे दिसते. तसेच त्यांनी नामरूपपरिच्छेद ग्रंथात म्हटले आहे – ‘‘သမာနာသေဝနေ လဒ္ဓေ, ဝိဇ္ဇမာနေ မဟဗ္ဗလေ; အလဒ္ဓါ တာဒိသံ ဟေတုံ, အဘိညာ န ဝိပစ္စတီ’’တိ. (နာမ. ပရိ. ၄၇၄); 'समान आसेवन प्राप्त झाल्यावर आणि मोठे सामर्थ्य विद्यमान असताना (महग्गत कुशल विपाक देतो); परंतु तसे कारण न मिळाल्यामुळे अभिज्ञा विपाक देत नाही।' သမာနဘူမိကတောဝ အာသေဝနလာဘေန ဗလဝဘာဝတော မဟဂ္ဂတဓမ္မာနံ ဝိပါကဒါနံ ဝတွာ တဒဘာဝတော အဘိညာယ အဝိပစ္စနံ ဝုတ္တံ. ဟီနေဟိ ဆန္ဒစိတ္တဝီရိယဝီမံသာဟိ နိဗ္ဗတ္တိတံ ဝါ ပရိတ္တံ. မဇ္ဈိမေဟိ ဆန္ဒာဒီဟိ မဇ္ဈိမံ. ပဏီတေဟိ ပဏီတန္တိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. समान भूमीवरूनच आसेवनाचा लाभ झाल्यामुळे बलवान बनल्याने महग्गत धर्मांचा विपाक मिळतो असे सांगून, त्याचा अभाव असल्यामुळे अभिज्ञेचा विपाक होत नाही असे म्हटले आहे. किंवा, हीन (कनिष्ठ) छंद, चित्त, वीर्य आणि विमंसा यांच्याद्वारे उत्पन्न झालेले ध्यान म्हणजे 'परित्त' होय; मध्यम छंद इत्यादींद्वारे उत्पन्न झालेले ध्यान म्हणजे 'मज्झिम' होय; आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) छंद इत्यादींद्वारे उत्पन्न झालेले ध्यान म्हणजे 'पणीत' होय. आता या विषयाचा फार विस्तार करण्याची आवश्यकता नाही। ၈၄. ပဉ္စမဇ္ဈာနံ ဘာဝေတွာတိ အဘိညာဘာဝံ အသမ္ပတ္တံ ပဉ္စမဇ္ဈာနံ တိဝိဓမ္ပိ ဘာဝေတွာ. အဘိညာဘာဝပ္ပတ္တဿ ပန အဝိပါကဘာဝေါ ‘‘အလဒ္ဓါ တာဒိသ’’န္တျာဒိနာ (နာမ. ပရိ. ၄၇၄) အာစရိယေန သာဓိတော. မူလဋီကာကာရာဒယော ပန အညထာပိ တံ သာဓေန္တိ. တံ ပန သင်္ခေပတော, တတ္ထ တတ္ထ ဝိတ္ထာရတော စ အဘိဓမ္မတ္ထဝိကာသိနိယံ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သညာဝိရာဂံ ဘာဝေတွာတိ ‘‘သညာ ရောဂေါ, သညာ ဂဏ္ဍော’’တျာဒိနာ, ‘‘ဓီ စိတ္တံ ဓိဗ္ဗတံ စိတ္တ’’န္တျာဒိနာ ဝါ နယေန အရူပပ္ပဝတ္တိယာ အာဒီနဝဒဿနေန တဒဘာဝေ စ ပဏီတဘာဝသန္နိဋ္ဌာနေန ဝါယောကသိဏေ ကေသဉ္စိ မတေန ပရိစ္ဆိန္နာကာသကသိဏေ ဝါ ဘာဝနာဗလေန တေန ပဋိလဘိတဗ္ဗဘာဝေ အရူပဿ အနိဗ္ဗတ္တိသဘာဝါပါဒနဝသေန အရူပဝိရာဂဘာဝနံ ဘာဝေတွာ အညသတ္တေသု ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ ကမ္မကိရိယဝါဒိနော တိတ္ထိယာ ဧဝါတျဓိပ္ပာယော[Pg.186]. တေ ပန ယေန ဣရိယာပထေန ဣဓ မရန္တိ. တေနေဝ တတ္ထ နိဗ္ဗတ္တန္တီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ८४. 'पंचम ध्यान विकसित करून' म्हणजे अभिज्ञा अवस्थेला न पोहोचलेले पंचम ध्यान तिन्ही प्रकारे विकसित करून. परंतु अभिज्ञा अवस्थेला पोहोचलेल्या ध्यानाचा विपाक न होणे हे 'अलद्धा तादिसं' इत्यादी गाथेद्वारे आचार्यांनी सिद्ध केले आहे. मूळटीकाकार इत्यादी आचार्य इतर प्रकारेही हे सिद्ध करतात. ते संक्षेपाने त्या त्या ठिकाणी आणि विस्ताराने 'अभिधम्मत्थविकासिनी' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावे. 'संज्ञाविराग विकसित करून' म्हणजे 'संज्ञा हा रोग आहे, संज्ञा हा गळू आहे' इत्यादी प्रकारे, किंवा 'चित्ताचा धिक्कार असो, चित्त हे घृणास्पद वर्तनाचे कारण आहे' इत्यादी पद्धतीने अरूप प्रवृत्तीतील (नामधर्मांमधील) दोष पाहून, आणि त्याच्या अभावामध्ये प्रणीत भाव (उत्कृष्ट अवस्था) निश्चित करून, वायू कसिणमध्ये किंवा काही आचार्यांच्या मते आकाश कसिणमध्ये भावनेच्या बलाने, त्या साधकाला प्राप्त होणाऱ्या भावी जन्मात अरूपाचा (नामधर्मांचा) अनुत्पाद घडवून आणण्याच्या उद्देशाने अरूपविराग भावनेचा अभ्यास करून, असंज्ञी लोकांमध्ये केवळ कर्माचे अस्तित्व मानणारे (कर्मक्रियावादी) तीर्थकच उत्पन्न होतात, असा आचार्यांचा अभिप्राय आहे. ते ज्या शारीरिक मुद्रेत (इरियापथात) येथे मृत्यू पावतात, त्याच मुद्रेत तेथे उत्पन्न होतात, असे समजावे। ၈၆. အနာဂါမိနော ပန သုဒ္ဓါဝါသေသု ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ အနာဂါမိနောယေဝ အရိယာ ပုထုဇ္ဇနာဒိကာလေ, ပစ္ဆာပိ ဝါ ပဉ္စမဇ္ဈာနံ တိဝိဓမ္ပိ ဘာဝေတွာ သဒ္ဓါဒိဣန္ဒြိယဝေမတ္တတာနုက္ကမေန ပဉ္စသု သုဒ္ဓါဝါသေသု ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ. ८६. 'परंतु अनागामी शुद्धवास लोकांमध्ये उत्पन्न होतात' म्हणजे अनागामी असलेले आर्यच, पृथग्जन असताना किंवा नंतर अनागामी झाल्यावर, पंचम ध्यान तिन्ही प्रकारे विकसित करून, श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांच्या तीव्रतेच्या फरकानुसार अनुक्रमे पाच शुद्धवास लोकांमध्ये उत्पन्न होतात। ၈၇. ယထာက္ကမံ ဘာဝေတွာ ယထာက္ကမံ အာရုပ္ပေသု ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတိ ယောဇနာ ယထာက္ကမန္တိ စ ပဌမာရုပ္ပာဒိအနုက္ကမေန. သဗ္ဗမ္ပိ စေတံ တဿ တဿေဝ ဈာနဿ အာဝေဏိကဘူမိဝသေန ဝုတ္တံ. နိကန္တိယာ ပန သတိ ပုထုဇ္ဇနာဒယော ယထာလဒ္ဓဇ္ဈာနဿ ဘူမိဘူတေသု သုဒ္ဓါဝါသဝဇ္ဇိတေသု ယတ္ထ ကတ္ထစိ နိဗ္ဗတ္တန္တိ, တထာ ကာမဘဝေပိ ကာမာဝစရကမ္မဗလေန. ‘ဣဇ္ဈတိ, ဘိက္ခဝေ, သီလဝတော စေတောပဏိဓိ ဝိသုဒ္ဓတ္တာ’တိ (အ. နိ. ၈.၃၅) ဟိ ဝုတ္တံ. အနာဂါမိနော ပန ကာမရာဂဿ သဗ္ဗသော ပဟီနတ္တာ ကာမဘဝေသု နိကန္တိံ န ဥပ္ပာဒေန္တီတိ ကာမလောကဝဇ္ဇိတေ ယထာလဒ္ဓဇ္ဈာနဘူမိဘူတေ ယတ္ထ ကတ္ထစိ နိဗ္ဗတ္တန္တိ. သုဒ္ဓါဝါသေသု ဟိ အနာဂါမိနောယေဝ နိဗ္ဗတ္တန္တီတိ နိယမော အတ္ထိ. တေ ပန အညတ္ထ န နိဗ္ဗတ္တန္တီတိ နိယမော နတ္ထိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝုတ္တံ အာစရိယေန – ८७. क्रमाने भावना करून क्रमाने अरूप भूमींमध्ये उत्पन्न होतात, अशी शब्दांची जोडणी (योजना) करावी. 'यथाक्कमं' (क्रमाने) म्हणजे पहिल्या अरूप ध्यानादींच्या अनुक्रमाने होय. हे सर्व त्या त्या ध्यानाच्या विशिष्ट (आवेणिक) भूमीच्या प्रभावाने सांगितले आहे. परंतु, आसक्ती (निकन्ति) असताना, पृथग्जन इत्यादी लोक त्यांनी प्राप्त केलेल्या ध्यानाच्या भूमी असलेल्या, शुद्धवास भूमी वगळता इतर कोणत्याही भूमीत उत्पन्न होतात. तसेच कामभवातही कामावचर कर्माच्या बलाने उत्पन्न होतात. कारण असे म्हटले आहे की, 'हे भिक्खूहो, शीलवानाचा मनो-संकल्प (चेतोपणिधि) त्याच्या शुद्धतेमुळे पूर्ण होतो.' परंतु, अनागामी पुद्गल कामरागाचा पूर्णपणे प्रहाण (नाश) झाल्यामुळे कामभवांमध्ये आसक्ती उत्पन्न करत नाहीत, म्हणून ते कामलोक वगळता, त्यांनी प्राप्त केलेल्या ध्यानाच्या भूमी असलेल्या कोणत्याही भूमीत उत्पन्न होतात. कारण शुद्धवास भूमींमध्ये केवळ अनागामीच उत्पन्न होतात, असा नियम आहे. परंतु ते (अनागामी) इतरत्र उत्पन्न होत नाहीत, असा नियम नाही. असे लक्षात घेऊन आचार्यांनी म्हटले आहे— ‘‘သုဒ္ဓါဝါသေသွနာဂါမိ-ပုဂ္ဂလာဝေါပပဇ္ဇရေ; ကာမဓာတုမှိ ဇာယန္တိ, အနာဂါမိဝိဝဇ္ဇိတာ’’တိ. (ပရမ. ဝိ. ၂၀၅); “शुद्धवास भूमींमध्ये केवळ अनागामी पुद्गलच उत्पन्न होतात; आणि कामधातूमध्ये अनागामींशिवाय इतर (सर्व प्राणी) उत्पन्न होतात.” သုက္ခဝိပဿကာပိ ပနေတေ မရဏကာလေ ဧကန္တေနေဝ သမာပတ္တိံ နိဗ္ဗတ္တေန္တိ သမာဓိမှိ ပရိပူရကာရီဘာဝတောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ‘‘ဣတ္ထိယောပိ ပန အရိယာ ဝါ အနရိယာ ဝါ အဋ္ဌသမာပတ္တိလာဘိနိယော ဗြဟ္မပါရိသဇ္ဇေသုယေဝ နိဗ္ဗတ္တန္တီ’’တိ အဋ္ဌကထာယံ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၈၀၉; အ. နိ. အဋ္ဌ. ၁.၁.၂၇၉ အာဒယော; မ. နိ. အဋ္ဌ. ၃.၁၃၀) ဝုတ္တံ. အပိစေတ္ထ ဝေဟပ္ဖလအကနိဋ္ဌစတုတ္ထာရုပ္ပဘဝါနံ သေဋ္ဌဘဝဘာဝတော [Pg.187] တတ္ထ နိဗ္ဗတ္တာ အရိယာ အညတ္ထ နုပ္ပဇ္ဇန္တိ, တထာ အဝသေသေသု ဥပရူပရိ ဗြဟ္မလောကေသု နိဗ္ဗတ္တာ ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမေသု. ဝုတ္တဉှေတံ အာစရိယေန – परंतु हे शुष्कविपश्यक (अनागामी) देखील मरणकाळी निश्चितपणे समापत्ती (ध्यान) उत्पन्न करतात, कारण ते समाधीमध्ये परिपूर्ण कार्य करणारे असतात, असे समजावे. 'परंतु स्त्रिया, मग त्या आर्या असोत वा अनार्या, जर त्या अष्टसमापत्ती प्राप्त करणाऱ्या असतील, तर त्या केवळ ब्रह्मपारिसज्ज भूमीतच उत्पन्न होतात,' असे अट्ठकथेत म्हटले आहे. शिवाय, येथे वेहप्फल, अकनिठ्ठ आणि चौथी अरूप भूमी (नेवसञ्ञानासञ्ञायतन) या श्रेष्ठ भूमी असल्यामुळे, तेथे उत्पन्न झालेले आर्य पुद्गल इतरत्र उत्पन्न होत नाहीत. तसेच, उर्वरित वरवरच्या ब्रह्मलोकांमध्ये उत्पन्न झालेले आर्य पुद्गल खालील भूमींमध्ये उत्पन्न होत नाहीत. कारण आचार्यांनी असे म्हटले आहे— ‘‘ဝေဟပ္ဖလေ အကနိဋ္ဌေ, ဘဝဂ္ဂေ စ ပတိဋ္ဌိတာ; န ပုနာညတ္ထ ဇာယန္တိ, သဗ္ဗေ အရိယပုဂ္ဂလာ; ဗြဟ္မလောကဂတာ ဟေဋ္ဌာ, အရိယာ နောပပဇ္ဇရေ’’တိ. (နာမ. ပရိ. ၄၅၂-၄၅၃); “वेहप्फल, अकनिठ्ठ आणि भवाग्र (नेवसञ्ञानासञ्ञायतन) येथे प्रतिष्ठित झालेले सर्व आर्य पुद्गल पुन्हा इतरत्र उत्पन्न होत नाहीत; आणि ब्रह्मलोकात गेलेले आर्य पुद्गल खालील भूमींमध्ये उत्पन्न होत नाहीत.” ကမ္မစတုက္ကဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कर्म-चतुष्क वर्णन समाप्त झाले। စုတိပဋိသန္ဓိက္ကမဝဏ္ဏနာ च्युती-प्रतिसंधी क्रम वर्णन ၈၉. ‘‘အာယုက္ခယေနာ’’တျာဒီသု သတိပိ ကမ္မာနုဘာဝေ တံတံဂတီသု ယထာပရိစ္ဆိန္နဿ အာယုနော ပရိက္ခယေန မရဏံ အာယုက္ခယမရဏံ. သတိပိ တတ္ထ တတ္ထ ပရိစ္ဆိန္နာယုသေသေ ဂတိကာလာဒိပစ္စယသာမဂ္ဂိယဉ္စ တံတံဘဝသာဓကဿ ကမ္မုနော ပရိနိဋ္ဌိတဝိပါကတ္တာ မရဏံ ကမ္မက္ခယမရဏံ. အာယုကမ္မာနံ သမကမေဝ ပရိက္ခီဏတ္တာ မရဏံ ဥဘယက္ခယမရဏံ. သတိပိ တသ္မိံ ဒုဝိမေ ပုရိမဘဝသိဒ္ဓဿ ကဿစိ ဥပစ္ဆေဒကကမ္မုနော ဗလေန သတ္ထဟရဏာဒီဟိ ဥပက္ကမေဟိ ဥပစ္ဆိဇ္ဇမာနသန္တာနာနံ, ဂုဏမဟန္တေသု ဝါ ကတေန ကေနစိ ဥပက္ကမေန အာယူဟိတဥပစ္ဆေဒကကမ္မုနာ ပဋိဗာဟိတသာမတ္ထိယဿ ကမ္မဿ တံတံအတ္တဘာဝပ္ပဝတ္တနေ အသမတ္ထဘာဝတော ဒုသိမာရကလာဗုရာဇာဒီနံ ဝိယ တင်္ခဏေယေဝ ဌာနာစာဝနဝသေန ပဝတ္တမရဏံ ဥပစ္ဆေဒကမရဏံ နာမ. ဣဒံ ပန နေရယိကာနံ ဥတ္တရကုရုဝါသီနံ ကေသဉ္စိ ဒေဝါနဉ္စ န ဟောတိ. တေနာဟု – ८९. 'आयुष्याच्या क्षयाने' इत्यादी वाक्यांमध्ये, कर्माचा प्रभाव शिल्लक असतानाही, त्या त्या गतींमध्ये निश्चित केलेल्या आयुष्याच्या संपण्याने जे मरण येते, त्याला 'आयुःक्षय मरण' म्हणतात. त्या त्या गतींमध्ये निश्चित केलेले आयुष्य शिल्लक असताना आणि गती, काळ इत्यादी कारणांची अनुकूलता असतानाही, त्या त्या भवाला सिद्ध करणाऱ्या कर्माचा विपाक पूर्ण झाल्यामुळे जे मरण येते, त्याला 'कर्मक्षय मरण' म्हणतात. आयुष्य आणि कर्म या दोन्हीचा एकाच वेळी क्षय झाल्यामुळे जे मरण येते, त्याला 'उभयक्षय मरण' म्हणतात. हे दोन्ही शिल्लक असतानाही, पूर्वभवात संचित केलेल्या एखाद्या उपच्छेदक कर्माच्या बलाने, शस्त्रप्रहार इत्यादी उपक्रमांमुळे ज्यांचा जीवनप्रवाह खंडित होतो त्यांचे मरण; किंवा गुणांनी थोर असलेल्या व्यक्तींच्या बाबतीत केलेल्या एखाद्या उपद्रवामुळे उत्पन्न झालेल्या उपच्छेदक कर्माने, ज्या कर्माचे सामर्थ्य रोखले गेले आहे ते कर्म त्या त्या अस्तित्वाचे सातत्य राखण्यास असमर्थ ठरल्यामुळे, दुसी मार किंवा कलाबू राजा इत्यादींप्रमाणे, त्याच क्षणी च्युत होण्याच्या रूपाने जे मरण ओढवते, त्याला 'उपच्छेदक मरण' म्हणतात. परंतु हे (उपच्छेदक मरण) नारकीय प्राण्यांना, उत्तरकुरुतील रहिवाशांना आणि काही देवांना होत नाही. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे— ‘‘ဥပက္ကမေန ဝါ ကေသဉ္စုပစ္ဆေဒကကမ္မုနာ’’တိ. (သ. သ. ၆၂); “काहींचे मरण उपक्रमाने किंवा उपच्छेदक कर्माने होते.” မရဏဿ ဥပ္ပတ္တိ ပဝတ္တိ မရဏုပ္ပတ္တိ. मरणाची उत्पत्ती आणि प्रवृत्ती म्हणजे 'मरणोत्पत्ती' (मरणुप्पत्ति) होय। ၉၀. မရဏကာလေတိ [Pg.188] မရဏာသန္နကာလေ. ယထာရဟန္တိ တံတံဂတီသု ဥပ္ပဇ္ဇနကသတ္တာနုရူပံ, ကတ္ထစိ ပန အနုပ္ပဇ္ဇမာနဿ ခီဏာသဝဿ ယထောပဋ္ဌိတံ နာမရူပဓမ္မာဒိကမေဝ စုတိပရိယောသာနာနံ ဂေါစရဘာဝံ ဂစ္ဆတိ, န ကမ္မကမ္မနိမိတ္တာဒယော. ဥပလဒ္ဓပုဗ္ဗန္တိ စေတိယဒဿနာဒိဝသေန ပုဗ္ဗေ ဥပလဒ္ဓံ. ဥပကရဏဘူတန္တိ ပုပ္ဖာဒိဝသေန ဥပကရဏဘူတံ. ဥပလဘိတဗ္ဗန္တိ အနုဘဝိတဗ္ဗံ. ဥပဘောဂဘူတန္တိ အစ္ဆရာဝိမာနကပ္ပရုက္ခနိရယဂ္ဂိအာဒိကံ ဥပဘုဉ္ဇိတဗ္ဗံ. အစ္ဆရာဝိမာနကပ္ပရုက္ခမာတုကုစ္ဆိအာဒိဂတံ ဟိ ရူပါယတနံ သုဂတိနိမိတ္တံ. နိရယဂ္ဂိနိရယပါလာဒိဂတံ ဒုဂ္ဂတိနိမိတ္တံ. ဂတိယာ နိမိတ္တံ ဂတိနိမိတ္တံ. ९०. 'मरणकाली' म्हणजे मरणासन्न काळी (मरणाच्या वेळी). 'यथायोग्य' म्हणजे त्या त्या गतींमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या प्राण्यांच्या अनुरूप; परंतु कुठेही पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या क्षीणासवाच्या (अर्हताच्या) बाबतीत, जसे उपस्थित होईल तसे नाम-रूप धर्म इत्यादीच च्युतीपर्यंतच्या (मरणासन्न विथीच्या) चित्ताचा विषय बनतात, कर्म किंवा कर्मनिमित्त इत्यादी नव्हे. 'पूर्वी अनुभवलेले' म्हणजे चैत्य-दर्शन इत्यादींच्या रूपाने पूर्वी प्राप्त केलेले. 'साधनभूत' म्हणजे पुष्प इत्यादींच्या रूपाने साधन बनलेले. 'अनुभवण्यास योग्य' म्हणजे अनुभवायचे असलेले. 'उपभोग्य' म्हणजे अप्सरा, विमान, कल्पवृक्ष, नरकाग्नी इत्यादी उपभोग घेण्यास योग्य गोष्टी. कारण अप्सरा, विमान, कल्पवृक्ष, मातेचे गर्भाशय इत्यादींमध्ये असलेले रूपायतन हे 'सुगतिनिमित्त' आहे. नरकाग्नी, यमदूत इत्यादींमध्ये असलेले रूपायतन हे 'दुर्गतिनिमित्त' आहे. गतीचे चिन्ह म्हणजे 'गतिनिमित्त' होय। ကမ္မဗလေနာတိ ပဋိသန္ဓိနိဗ္ဗတ္တကဿ ကုသလာကုသလကမ္မဿ အာနုဘာဝေန. ဆန္နံ ဒွါရာနန္တိ ဝက္ခမာနနယေန ယထာသမ္ဘဝံ ဆန္နံ ဥပပတ္တိဒွါရာနံ, ယဒိ ကုသလကမ္မံ ဝိပစ္စတိ, တဒါ ပရိသုဒ္ဓံ ကုသလစိတ္တံ ပဝတ္တတိ, အထ အကုသလကမ္မံ, တဒါ ဥပက္ကိလိဋ္ဌံ အကုသလစိတ္တန္တိ အာဟ ‘‘ဝိပစ္စမာနက…ပေ… ကိလိဋ္ဌံ ဝါ’’တိ. တေနာဟ ဘဂဝါ ‘‘နိမိတ္တဿာဒဂဓိတံ ဝါ, ဘိက္ခဝေ, ဝိညာဏံ တိဋ္ဌမာနံ တိဋ္ဌတိ, အနုဗျဉ္ဇနဿာဒဂဓိတံ ဝါ, တသ္မိံ စေ သမယေ ကာလံ ကရောတိ, ဌာနမေတံ ဝိဇ္ဇတိ, ယံ ဒွိန္နံ ဂတီနံ အညတရံ ဂတိံ ဥပပဇ္ဇေယျ နိရယံ ဝါ တိရစ္ဆာနယောနိံ ဝါ’’တိ (သံ. နိ. ၄.၂၃၅). တတ္ထောဏတံ ဝါတိ တသ္မိံ ဥပပဇ္ဇိတဗ္ဗဘဝေ ဩဏတံ ဝိယ, တတ္ထောဏတံ ဧဝါတိ ဝါ ပဒစ္ဆေဒေါ. ‘‘ဗာဟုလ္လေနာ’’တိ ဧတ္ထ အဓိပ္ပာယော ‘‘ယေဘုယျေန ဘဝန္တရေ’’တိ ဧတ္ထ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အထ ဝါ ‘‘ယထာရဟ’’န္တိ ဣမိနာဝ သော သက္ကာ သင်္ဂဟေတုန္တိ ‘‘ဗာဟုလ္လေနာ’’တိ ဣမိနာ သဟသာ ဩစ္ဆိဇ္ဇမာနဇီဝိတာနံ သဏိကံ မရန္တာနံ ဝိယ န အဘိက္ခဏမေဝါတိ ဒီပိတန္တိ ဝိညာယတိ. အဘိနဝကရဏဝသေနာတိ တင်္ခဏေ ကရိယမာနံ ဝိယ အတ္တာနံ အဘိနဝကရဏဝသေန. 'कर्माच्या बलाने' म्हणजे प्रतिसंधी उत्पन्न करणाऱ्या कुशल किंवा अकुशल कर्माच्या प्रभावाने होय. 'सहा द्वारांपैकी' म्हणजे पुढे सांगण्यात येणाऱ्या पद्धतीने यथासंभव सहा उत्पत्ती-द्वारांपैकी एका द्वारात. जर कुशल कर्म विपाकाला प्राप्त होत असेल, तर अत्यंत शुद्ध कुशल चित्त प्रवृत्त होते; आणि जर अकुशल कर्म असेल, तर क्लिष्ट (मलीन) अकुशल चित्त प्रवृत्त होते, म्हणूनच आचार्यांनी 'विपच्चमानक... पे... किलिट्ठं वा' (विपाक देणारे... किंवा मलीन) असे म्हटले आहे. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे— 'हे भिक्खूहो, जर (स्त्री-पुरुषांच्या रूपाच्या) निमित्ताच्या आस्वादात अडकलेले किंवा त्यांच्या अवयवांच्या (अनुव्यंजनांच्या) आस्वादात अडकलेले विज्ञान प्रतिष्ठित राहते, आणि जर तो त्या वेळी मरण पावतो, तर हे शक्य आहे की तो नरक किंवा तिर्यक योनी या दोन गतींपैकी एका गतीत उत्पन्न होईल.' 'तेथे झुकलेले' म्हणजे त्या उत्पन्न होणाऱ्या भवाकडे झुकल्यासारखे; किंवा 'तत्थोणतं एव' असा पदच्छेद करावा. 'बहुधा' (बाहुल्लेन) या शब्दाचा अभिप्राय 'ye bhuyyena bhavantare' (बहुतांश करून दुसऱ्या भवात) या सूत्रात सांगितलेल्या पद्धतीने समजावा. अथवा, 'यथायोग्य' या शब्दानेच तो अर्थ ग्रहण करता येत असल्यामुळे, 'बाहुल्लेन' या शब्दाने असे दर्शवले आहे की, ज्यांचे जीवित अचानक खंडित होते त्यांच्या बाबतीत, हळूहळू मरण पावणाऱ्यांप्रमाणे हे वारंवार घडत नाही, असे समजावे. 'नवीन करण्याच्या रूपाने' म्हणजे त्या मरणसमयी जणू काही स्वतःला नवीन कर्म करण्याच्या रूपाने (मनोद्वारावर प्राप्त होते). ၉၁. ပစ္စာသန္နမရဏဿာတိ [Pg.189] ဧကဝီထိပ္ပမာဏာယုကဝသေန, တတော ဝါ ကိဉ္စိ အဓိကာယုကဝသေန သမာသန္နမရဏဿ. ဝီထိစိတ္တာဝသာနေတိ တဒါရမ္မဏပရိယောသာနာနံ, ဇဝနပရိယောသာနာနံ ဝါ ဝီထိစိတ္တာနံ အဝသာနေ. တတ္ထ ‘‘ကာမဘဝတော စဝိတွာ တတ္ထေဝ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနံ တဒါရမ္မဏပရိယောသာနာနိ, သေသာနံ ဇဝနပရိယောသာနာနီ’’တိ ဓမ္မာနုသာရဏိယံ ဝုတ္တံ. ဘဝင်္ဂက္ခယေဝါတိ ယဒိ ဧကဇဝနဝီထိတော အဓိကတရာယုသေသော သိယာ, တဒါ ဘဝင်္ဂါဝသာနေ ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ နိရုဇ္ဈတိ. အထ ဧကစိတ္တက္ခဏာယုသေသော သိယာ, တဒါ ဝီထိစိတ္တာဝသာနေ, တဉ္စ အတီတကမ္မာဒိဝိသယမေဝ. ‘‘တဿာနန္တရမေဝါ’’တိ ဣမိနာ အန္တရာဘဝဝါဒိမတံ ပဋိက္ခိပတိ. ९१. ‘प्रत्यासन्नमरणाचे’ म्हणजे एका वीथिप्रमाण आयुष्याच्या बळावर किंवा त्यापेक्षा काहीसे अधिक आयुष्याच्या बळावर अतिशय जवळ आलेला मृत्यू असलेल्याचे. ‘वीथिचित्ताच्या शेवटी’ म्हणजे तदारमण-पर्यवसान असलेल्या किंवा जवन-पर्यवसान असलेल्या वीथिचित्तांच्या समाप्तीनंतर. त्याविषयी, ‘कामभवातून च्युत होऊन तिथेच उत्पन्न होणाऱ्यांचे तदारमण-पर्यवसान वीथिचित्त असतात आणि इतरांचे जवन-पर्यवसान वीथिचित्त असतात’ असे ‘धम्मानुसारणी’ ग्रंथात म्हटले आहे. ‘भवांगक्षयाच्या वेळी’ म्हणजे जर एका जवनवीथीपेक्षा अधिक आयुष्य शिल्लक असेल, तर भवांगाच्या शेवटी (च्युतिचित्त) उत्पन्न होऊन निरुद्ध होते. आणि जर केवळ एक चित्तक्षण आयुष्य शिल्लक असेल, तर वीथिचित्ताच्या शेवटी (च्युतिचित्त उत्पन्न होते), आणि ते भूतकाळातील कर्मादींनाच आलंबन बनवणारे असते. ‘त्याच्या लगेचच नंतर’ या विधानाने अंतराभववाद्यांचे (मध्यवर्ती अस्तित्वाची संकल्पना मानणाऱ्यांचे) मत नाकारले जाते. ယထာရဟန္တိ ကမ္မကရဏကာလဿ, ဝိပါကဒါနကာလဿ စ အနုရူပဝသေန. အထ ဝါ ဝိပစ္စမာနကကမ္မာနုရူပံ အနုသယဝသေန, ဇဝနသဟဇာတဝသေန ဝါ ပဝတ္တိအနုရူပတောတျတ္ထော. နနု စ ‘‘အဝိဇ္ဇာနုသယပရိက္ခိတ္တေနာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ဇဝနသဟဇာတာနဉ္စ ကထံ အနုသယဘာဝေါတိ? နာယံ ဒေါသော အနုသယသဒိသတာယ တာသမ္ပိ အနုသယဝေါဟာရဘာဝတော. ဣတရထာ အကုသလကမ္မသဟဇာတာနံ ဘဝတဏှာသဟဇာတာနံ ဝါ စုတိအာသန္နဇဝနသဟဇာတာနဉ္စ သင်္ဂဟော န သိယာ. အဝိဇ္ဇာဝ အပ္ပဟီနဋ္ဌေန အနုသယနတော ပဝတ္တနတော အနုသယော, တေန ပရိက္ခိတ္တေန ပရိဝါရိတေန. တဏှာနုသယောဝ မူလံ ပဓာနံ သဟကာရီကာရဏဘူတံ ဣမဿာတိ တဏှာနုသယမူလကော. သင်္ခါရေနာတိ ကုသလာကုသလကမ္မေန ကမ္မသဟဇာတဖဿာဒိဓမ္မသမုဒါယေန စုတိအာသန္နဇဝနသဟဇာတေန ဝါ, တေန ဇနိယမာနံ. အဝိဇ္ဇာယ ဟိ ပဋိစ္ဆန္နာဒီနဝဝိသယေ တဏှာ နာမေတိ, ခိပနကသင်္ခါရသမ္မတာ ယထာဝုတ္တသင်္ခါရာ ခိပန္တိ, ယထာဟု – ‘योग्यतेनुसार’ म्हणजे कर्म करण्याच्या काळाच्या आणि विपाक देण्याच्या काळाच्या अनुरूपतेनुसार. अथवा, विपाक देणाऱ्या कर्माच्या अनुरूप, अनुशय रूपाने किंवा जवन-सहजात रूपाने प्रवृत्तीच्या अनुरूप असा अर्थ आहे. शंका अशी की, ‘अविद्या-अनुशयाने वेढलेले’ इत्यादी म्हटले आहे. मग जवन-सहजात (अविद्या व तृष्णा) यांना अनुशय कसे म्हणता येईल? हा दोष नाही, कारण अनुशयाशी सादृश्य असल्यामुळे त्यांनाही ‘अनुशय’ असे म्हटले जाते. अन्यथा, अकुशलकर्म-सहजात, भवतृष्णा-सहजात किंवा च्युतीजवळच्या जवन-सहजात (अविद्या व तृष्णा) यांचा संग्रह होणार नाही. अविद्याच (मार्गाने) प्रहीन न झाल्यामुळे, सतत अनुशयित राहिल्यामुळे आणि प्रवृत्त राहिल्यामुळे ‘अनुशय’ म्हटली जाते; तिच्याद्वारे वेढलेली (परिक्षिप्त). तृष्णा-अनुशयच याचे मूळ, प्रधान आणि सहकारी कारण आहे, म्हणून ‘तृष्णा-अनुशयमूलक’ म्हटले आहे. ‘संस्काराद्वारे’ म्हणजे कुशल-अकुशल कर्माद्वारे, किंवा कर्मासोबत उत्पन्न होणाऱ्या स्पर्श इत्यादी धर्मांच्या समूहाद्वारे, किंवा च्युतीजवळच्या जवन-सहजाताद्वारे; त्याच्याद्वारे उत्पन्न केले जाणारे. कारण अविद्येने आलंबनाचा दोष झाकलेला असताना, तृष्णा (चित्ताला) नमवते (आकृष्ट करते), आणि नवीन भवात फेकणारे मानले गेलेले पूर्वोक्त संस्कार (नवीन भवात) फेकतात, जसे म्हटले आहे - ‘‘အဝိဇ္ဇာတဏှာသင်္ခါရ-သဟဇေဟိ အပါယိနံ; ဝိသယာဒီနဝစ္ဆာဒိနမနက္ခိပကေဟိ တု. “अविद्या, तृष्णा आणि संस्कार यांच्या सहयोगाने अपायगामी (नरकात जाणाऱ्या) प्राण्यांच्या बाबतीत, आलंबनाचा दोष झाकणे, (चित्ताला) नमवणे आणि (नवीन भवात) फेकणे हे घडते. ‘‘အပ္ပဟီနေဟိ [Pg.190] သေသာနံ, ဆာဒနံ နမနမ္ပိ စ; ခိပကာ ပန သင်္ခါရာ, ကုသလာဝ ဘဝန္တိဟာ’’တိ. (သ. သ. ၁၆၄-၁၆၅); परंतु इतर (सुगतीला जाणाऱ्या) प्राण्यांच्या बाबतीत, प्रहीन न झालेल्या (अविद्या व तृष्णा अनुशयांद्वारे) केवळ आच्छादन (दोष झाकणे) आणि नमन (आकृष्ट करणे) होते; परंतु (नवीन भवात) फेकणारे संस्कार मात्र कुशलच असतात.” သမ္ပယုတ္တေဟိ ပရိဂ္ဂယှမာနန္တိ အတ္တနာ သမ္ပယုတ္တေဟိ ဖဿာဒီဟိ ဓမ္မေဟိ သမ္ပယုတ္တပစ္စယာဒိနာ ပရိဝါရေတွာ ဂယှမာနံ, သဟဇာတာနမဓိဋ္ဌာနဘာဝေန ပုဗ္ဗင်္ဂမဘူတန္တိ အတ္တနာ သဟဇာတာနံ ပတိဋ္ဌာနဘာဝေန ပဓာနဘူတံ. ‘‘မနောပုဗ္ဗင်္ဂမာ ဓမ္မာ’’တိ (ဓ. ပ. ၁-၂) ဟိ ဝုတ္တံ. ဘဝန္တရပဋိသန္ဓာနဝသေနာတိ ပုရိမဘဝန္တရဿ, ပစ္ဆိမဘဝန္တရဿ စ အညမညံ ဧကာဗဒ္ဓံ ဝိယ ပဋိသန္ဒဟနဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇမာနမေဝ ပတိဋ္ဌာတိ, န ဣတော ဂန္တွာတျဓိပ္ပာယော. န ဟိ ပုရိမဘဝပရိယာပန္နော ကောစိ ဓမ္မော ဘဝန္တရံ သင်္ကမတိ, နာပိ ပုရိမဘဝပရိယာပန္နဟေတူဟိ ဝိနာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ ပဋိဃောသပဒီပမုဒ္ဒါ ဝိယာတိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. ‘संप्रयुक्त धर्मांनी ग्रहण केले जाणारे’ म्हणजे स्वतःशी संप्रयुक्त असलेल्या स्पर्श इत्यादी धर्मांद्वारे संप्रयुक्त-प्रत्यय इत्यादींनी वेढून ग्रहण केले जाणारे. ‘सहजातांचे अधिष्ठान असल्यामुळे पूर्वगामी असलेले’ म्हणजे स्वतःसोबत उत्पन्न होणाऱ्या (सहजात) धर्मांचे आश्रयस्थान (प्रतिष्ठा) असल्यामुळे प्रधान असलेले. कारण “मनोपुब्बङ्गमा धम्मा” (सर्व धर्म मनाच्या पूर्वगामी आहेत) असे म्हटले आहे. ‘दुसऱ्या भवाशी प्रतिसंधी जोडण्याच्या द्वारे’ म्हणजे पूर्व भव आणि नंतरचा भव यांना परस्परांशी एका साखळीप्रमाणे जोडण्याच्या द्वारे उत्पन्न होऊनच (नवीन भवात) प्रतिष्ठित होते, येथून जाऊन प्रतिष्ठित होत नाही, असा अभिप्राय आहे. कारण पूर्व भवात समाविष्ट असलेला कोणताही धर्म दुसऱ्या भवात संक्रमित होत नाही, आणि पूर्व भवातील कारणांशिवाय उत्पन्नही होत नाही - जसे की प्रतिध्वनी, दिवा आणि मुद्रा (शिक्का) यांच्याप्रमाणे. त्यामुळे अतिविस्ताराची गरज नाही. ၉၂. မန္ဒံ ဟုတွာ ပဝတ္တာနိ မန္ဒပ္ပဝတ္တာနိ. ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏေသု အာပါထဂတေသု မနောဒွါရေ ဂတိနိမိတ္တဝသေန, ပဉ္စဒွါရေ ကမ္မနိမိတ္တဝသေနာတျဓိပ္ပာယော. ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂါနမ္ပိ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏတာ လဗ္ဘတီတိ မနောဒွါရေ တာဝ ပဋိသန္ဓိယာ စတုန္နံ ဘဝင်္ဂါနဉ္စ, ပဉ္စဒွါရေ ပန ပဋိသန္ဓိယာဝ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏဘာဝေါ လဗ္ဘတိ. တထာ ဟိ ကဿစိ မနောဒွါရေ အာပါထမာဂတံ ပစ္စုပ္ပန္နံ ဂတိနိမိတ္တံ အာရဗ္ဘ ဥပ္ပန္နာယ တဒါရမ္မဏပရိယောသာနာယ စိတ္တဝီထိယာ အနန္တရံ စုတိစိတ္တေ ဥပ္ပန္နေ တဒနန္တရံ ပဉ္စစိတ္တက္ခဏာယုကေ အာရမ္မဏေ ပဝတ္တာယ ပဋိသန္ဓိယာ စတုန္နံ ဘဝင်္ဂါနံ, ပဉ္စဒွါရေ စ ဉာတကာဒီဟိ ဥပဋ္ဌာပိတေသု ဒေယျဓမ္မေသု ဝဏ္ဏာဒိကေ အာရဗ္ဘ ယထာရဟံ ပဝတ္တာယ စိတ္တဝီထိယာ စုတိစိတ္တဿ စ အနန္တရံ ဧကစိတ္တက္ခဏာယုကေ အာရမ္မဏေ ပဝတ္တာယ ပဋိသန္ဓိယာ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏေ ပဝတ္တိ ဥပလဗ္ဘတီတိ အယမေတ္ထ သင်္ခေပေါ, ဝိတ္ထာရော [Pg.191] ပန ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ(ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၂၀ အာဒယော) ဝိဘင်္ဂဋ္ဌကထာယံ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၂၇) ဝါ သင်္ခါရပစ္စယာဝိညာဏပဒဝဏ္ဏနာယံ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဆဒွါရဂ္ဂဟိတန္တိ ကမ္မနိမိတ္တံ ဆဒွါရဂ္ဂဟိတံ, ဂတိနိမိတ္တံ ဆဋ္ဌဒွါရဂ္ဂဟိတန္တိ ယထာသမ္ဘဝံ ယောဇေတဗ္ဗံ. အပရေ ပန အဝိသေသတော ဝဏ္ဏေန္တိ. သစ္စသင်္ခေပေပိ တေနေဝါဓိပ္ပာယေန ဣဒံ ဝုတ္တံ – ९२. मंद होऊन प्रवृत्त होणारे ते ‘मंदप्रवृत्त’ होय. वर्तमान आलंबन गोचर (आपातगत) झाले असता, मनोद्वारात गतिनिमित्ताच्या द्वारे आणि पंचद्वारात कर्मनिमित्ताच्या द्वारे, असा अभिप्राय आहे. प्रतिसंधी आणि भवांग यांनाही वर्तमान आलंबनत्व प्राप्त होते; त्यापैकी मनोद्वारात प्रतिसंधीला आणि चार भवांगांना, तर पंचद्वारात केवळ प्रतिसंधीलाच वर्तमान आलंबनत्व प्राप्त होते. तसेच, एखाद्याच्या मनोद्वारात गोचर झालेल्या वर्तमान गतिनिमित्ताला आलंबन बनवून उत्पन्न झालेल्या, तदारमण-पर्यवसान असलेल्या चित्तवीथीच्या लगेचच नंतर च्युतिचित्त उत्पन्न झाले असता, त्याच्या लगेचच नंतर पाच चित्तक्षण आयुष्य असलेल्या आलंबनात प्रवृत्त होणाऱ्या प्रतिसंधीची आणि चार भवांगांची (वर्तमान आलंबनात प्रवृत्ती आढळते). आणि पंचद्वारात नातेवाईक इत्यादींनी उपस्थित केलेल्या देयधर्मांमधील (दानाच्या वस्तूंमधील) वर्ण (रूप) इत्यादींना आलंबन बनवून योग्यतेनुसार प्रवृत्त झालेल्या चित्तवीथीच्या आणि च्युतिचित्ताच्या नंतर, एक चित्तक्षण आयुष्य असलेल्या आलंबनात प्रवृत्त होणाऱ्या प्रतिसंधीची वर्तमान आलंबनात प्रवृत्ती आढळते. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात अर्थ) आहे. परंतु याचा सविस्तर अर्थ विसुद्धिमग्गात किंवा विभंग-अट्ठकथेत ‘संस्कारप्रत्यया विज्ञाण’ (सङ्खारपच्चया विञ्ञाण) या पदाच्या वर्णनात सांगितलेल्या पद्धतीने पाहावा. ‘सहा द्वारांनी ग्रहण केलेले’ म्हणजे कर्मनिमित्त सहा द्वारांनी ग्रहण केले जाते आणि गतिनिमित्त सहाव्या मनोद्वाराने ग्रहण केले जाते, असे यथासंभव जाणावे. इतर आचार्य मात्र विशेष भेद न करता सामान्यपणे याचे वर्णन करतात. सच्चसंखेप ग्रंथातही याच अभिप्रायाने हे म्हटले आहे - ‘‘ပဉ္စဒွါရေ သိယာ သန္ဓိ, ဝိနာ ကမ္မံ ဒွိဂေါစရေ’’တိ; (သ. သ. ၁၇၃); “पंचद्वारात कर्माशिवाय इतर दोन आलंबनांमध्ये (कर्मनिमित्त आणि गतिनिमित्त) प्रतिसंधी होऊ शकते.” အဋ္ဌကထာယံ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၂၄-၆၂၅; ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၂၇) ပန ‘‘ဂတိနိမိတ္တံ မနောဒွါရေ အာပါထမာဂစ္ဆတီ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ, တဒါရမ္မဏာယ စ ပဉ္စဒွါရိကပဋိသန္ဓိယာ အဒဿိတတ္တာ, မူလဋီကာဒီသု စ ‘‘ကမ္မဗလေန ဥပဋ္ဌာပိတံ ဝဏ္ဏာယတနံ သုပိနံ ပဿန္တဿ ဝိယ ဒိဗ္ဗစက္ခုဿ ဝိယ စ မနောဒွါရေယေဝ ဂေါစရဘာဝံ ဂစ္ဆတီ’’တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. မဟာ. ၂.၆၂၃) နိယမေတွာ ဝုတ္တတ္တာ တေသံ ဝစနံ န သမ္ပဋိစ္ဆန္တိ အာစရိယာ. ‘‘ပစ္စုပ္ပန္နဉ္စာ’’တိ ဧတ္ထ ဂတိနိမိတ္တံ တာဝ ပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏံ ယုဇ္ဇတိ, ကမ္မနိမိတ္တံ ပန ပဋိသန္ဓိဇနကကမ္မဿေဝ နိမိတ္တဘူတံ အဓိပ္ပေတန္တိ ကထံ တဿ စုတိအာသန္နဇဝနေဟိ ဂဟိတဿ ပစ္စုပ္ပန္နဘာဝေါ သမ္ဘဝတိ. န ဟိ တဒေဝ အာရမ္မဏုပဋ္ဌာပကံ, တဒေဝ ပဋိသန္ဓိဇနကံ ဘဝေယျ ဥပစိတဘာဝါဘာဝတော အနဿာဒိတတ္တာ စ. ‘‘ကတတ္တာ ဥပစိတတ္တာ’’တိ (ဓ. သ. ၄၃၁) ဟိ ဝစနတော ပုနပ္ပုနံ လဒ္ဓါသေဝနမေဝ ကမ္မံ ပဋိသန္ဓိံ အာကဍ္ဎတိ. ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂေ (ပဋိ. မ. ၁.၂၃၂) စ နိကန္တိက္ခဏေ ဒွိန္နံ ဟေတူနံ ပစ္စယာပိ သဟေတုကပဋိသန္ဓိယာ ဝုတ္တတ္တာကတူပစိတမ္ပိ ကမ္မံ တဏှာယ အဿာဒိတမေဝ ဝိပါကံ အဘိနိပ္ဖာဒေတိ, တဒါ စ ပဋိသန္ဓိယာ သမာနဝီထိယံ ဝိယ ပဝတ္တမာနာနိ စုတိအာသန္နဇဝနာနိ ကထံ ပုနပ္ပုနံ လဒ္ဓါသေဝနာနိ သိယုံ, ကထဉ္စ တာနိ တဒါ ကဏှာယ ပရာမဋ္ဌာနိ. အပိစ ပစ္စုပ္ပန္နံ ကမ္မနိမိတ္တံ စုတိအာသန္နပ္ပဝတ္တာနံ ပဉ္စဒွါရိကဇဝနာနံ အာရမ္မဏံ ဟောတိ. ‘‘ပဉ္စဒွါရိကကမ္မဉ္စ ပဋိသန္ဓိနိမိတ္တကံ န [Pg.192] ဟောတိ ပရိဒုဗ္ဗလဘာဝတော’’တိ အဋ္ဌကထာယံ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၂၀; ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၂၇) ဝုတ္တန္တိ သစ္စမေတံ. ဉာတကာဒီဟိ ဥပဋ္ဌာပိတေသု ပန ပုပ္ဖာဒီသု သန္နိဟိတေသွေဝ မရဏသမ္ဘဝတော တတ္ထ ဝဏ္ဏာဒိကံ အာရဗ္ဘ စုတိအာသန္နဝီထိတော ပုရိမဘာဂပ္ပဝတ္တာနံ ပဋိသန္ဓိဇနနသမတ္ထာနံ မနောဒွါရိကဇဝနာနံ အာရမ္မဏဘူတေန သဟ သမာနတ္တာ တဒေကသန္တတိပတိတံ စုတိအာသန္နဇဝနဂ္ဂဟိတမ္ပိ ပစ္စုပ္ပန္နံ ဝဏ္ဏာဒိကံ ကမ္မနိမိတ္တဘာဝေန ဝုတ္တံ. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝုတ္တံ အာနန္ဒာစရိယေန ‘‘ပဉ္စဒွါရေ စ အာပါထမာဂစ္ဆန္တံ ပစ္စုပ္ပန္နံ ကမ္မနိမိတ္တံ အာသန္နကတကမ္မာရမ္မဏသန္တတိယံ ဥပ္ပန္နံ, တံသဒိသဉ္စ ဒဋ္ဌဗ္ဗ’’န္တိ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၂၂၇; ဝိသုဒ္ဓိ. မဟာ. ၂.၆၂၃). परंतु अट्ठकथेमध्ये 'गतिनिमित्त मनोद्वाराच्या कक्षेत येते' असे म्हटल्यामुळे, आणि त्या गतिनिमित्ताला आलंबन करणाऱ्या पंचद्वारिक प्रतिसंधीचे अदर्शन असल्यामुळे (ती दाखवली नसल्यामुळे), तसेच मूलटीका इत्यादींमध्ये 'कर्माच्या बळाने उपस्थित झालेले रूपायातन (वर्णायतन) हे स्वप्न पाहणाऱ्याप्रमाणे किंवा दिव्यचक्षू असलेल्याप्रमाणे मनोद्वाराच्या ठिकाणीच आलंबन भाव प्राप्त करते' असे निश्चित करून म्हटल्यामुळे, आमचे आचार्य त्या (इतर आचार्यांचे) मत स्वीकारत नाहीत. 'आणि वर्तमान...' या ठिकाणी गतिनिमित्त तर वर्तमान आलंबन म्हणून योग्य ठरते, परंतु कर्मनिमित्त हे प्रतिसंधी उत्पन्न करणाऱ्या कर्माचेच निमित्तभूत म्हणून अभिप्रेत असल्यामुळे, च्युतीच्या जवळ असलेल्या जवनांनी ग्रहण केलेल्या त्या कर्मनिमित्ताचे वर्तमानत्व कसे संभवू शकेल? कारण तेच (मरणसन्न जवन) आलंबन उपस्थित करणारे आणि तेच प्रतिसंधी उत्पन्न करणारे असू शकत नाही; कारण त्याच्या ठिकाणी उपचितभावाचा (पुनरावृत्तीचा) अभाव असतो आणि आस्वादन केले गेलेले नसते. कारण 'केल्यामुळे व उपचित केल्यामुळे' या वचनानुसार, वारंवार आसेवन प्राप्त झालेले कर्मच प्रतिसंधीला खेचून आणते. आणि पटिसम्भिदामग्ग मध्ये देखील निकंतीच्या (तृष्णेच्या) क्षणी दोन हेतूंच्या प्रत्ययाने सहेतुक प्रतिसंधी सांगितली असल्यामुळे, केलेले व उपचित केलेले कर्म देखील तृष्णेने आस्वादित झाल्यावरच विपाकाला उत्पन्न करू शकते. आणि त्या मरणसन्न वेळी प्रतिसंधीच्या समान वीथीप्रमाणे प्रवृत्त होणारी च्युती-सन्न जवने कशी बरे वारंवार आसेवन प्राप्त असणार? आणि ती त्या वेळी तृष्णेने कशी बरे स्पर्शित असणार? शिवाय, वर्तमान कर्मनिमित्त हे च्युतीच्या जवळ प्रवृत्त होणाऱ्या पंचद्वारिक जवनांचे आलंबन असते. 'आणि पंचद्वारिक कर्म हे अत्यंत दुर्बल असल्यामुळे प्रतिसंधीचे निमित्त होत नाही' असे अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे, हे सत्य आहे. परंतु नातेवाईक इत्यादींनी आणून ठेवलेल्या पुष्पादी वस्तू जवळ असतानाच मरण संभवत असल्यामुळे, तेथे वर्णादी आलंबनाला आरंभ करून च्युती-सन्न वीथीच्या पूर्वभागात प्रवृत्त होणाऱ्या आणि प्रतिसंधी उत्पन्न करण्यास समर्थ असणाऱ्या मनोद्वारिक जवनांच्या आलंबनभूत असलेल्या कर्मनिमित्ताशी समान असल्यामुळे, त्याच एका संततीमध्ये पडलेले आणि च्युती-सन्न जवनाने ग्रहण केलेले देखील वर्तमान वर्णादी आलंबन 'कर्मनिमित्त' या भावाने म्हटले गेले आहे. आणि असे मानूनच आचार्य आनंदांनी म्हटले आहे: 'पंचद्वाराच्या ठिकाणी समोर येणारे वर्तमान कर्मनिमित्त हे मरणसन्न वेळी केलेल्या कर्माच्या आलंबन-संततीमध्ये उत्पन्न होते, आणि ते त्याच्यासारखेच समजले पाहिजे।' ၉၄. ယထာရဟန္တိ ဒုတိယစတုတ္ထပဌမတတိယာနံ ပဋိသန္ဓီနံ အနုရူပတော. ९४. 'यथार्ह' म्हणजे दुसऱ्या, चौथ्या, पहिल्या आणि तिसऱ्या (अरूप) प्रतिसंधींच्या अनुरूपतेनुसार। ၉၈. အာရုပ္ပစုတိယာ ပရံ ဟေဋ္ဌိမာရုပ္ပဝဇ္ဇိတာ အာရုပ္ပပဋိသန္ဓိယော ဟောန္တိ ဥပရူပရိအရူပီနံ ဟေဋ္ဌိမဟေဋ္ဌိမကမ္မဿ အနာယူဟနတော, ဥပစာရဇ္ဈာနဿ ပန ဗလဝဘာဝတော တဿ ဝိပါကဘူတာ ကာမတိဟေတုကာ ပဋိသန္ဓိယော ဟောန္တိ. ရူပါဝစရစုတိယာ ပရံ အဟေတုကရဟိတာ ဥပစာရဇ္ဈာနာနုဘာဝေနေဝ ဒုဟေတုကတိဟေတုကပဋိသန္ဓိယော သိယုံ, ကာမတိဟေတုမှာ စုတိတော ပရံ သဗ္ဗာ ဧဝ ကာမရူပါရူပဘဝပရိယာပန္နာ ယထာရဟံ အဟေတုကာဒိပဋိသန္ဓိယော သိယုံ. ဣတရော ဒုဟေတုကာဟေတုကစုတိတော ပရံ ကာမေသွေဝ ဘဝေသု တိဟေတုကာဒိပဋိသန္ဓိယော သိယုံ. ९८. अरूप च्युतीनंतर, खालच्या अरूप भूमी वगळून (वरच्या) अरूप प्रतिसंधी होतात; कारण वरवरच्या अरूप ब्रह्मांनी खालखालच्या कर्माचा उद्योग केलेला नसतो. परंतु उपचार ध्यानाच्या बलवानपणामुळे त्याचे विपाक असणाऱ्या काम-तिहेतुक प्रतिसंधी होतात. रूपावचर च्युतीनंतर, अहेतुक प्रतिसंधी वगळून, उपचार ध्यानाच्या प्रभावानेच द्विहेतुक आणि तिहेतुक प्रतिसंधी होतात. काम-तिहेतुक च्युतीनंतर, काम, रूप आणि अरूप भवांमध्ये समाविष्ट असणाऱ्या सर्वच यथायोग्य अहेतुक इत्यादी प्रतिसंधी होतात. इतर द्विहेतुक आणि अहेतुक च्युतीनंतर केवळ कामभवांमध्येच तिहेतुक इत्यादी प्रतिसंधी होतात। စုတိပဋိသန္ဓိက္ကမဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. च्युती-प्रतिसंधी क्रमाचे वर्णन समाप्त झाले। ၉၉. ပဋိသန္ဓိယာ [Pg.193] နိရောဓဿ အနန္တရတော ပဋိသန္ဓိနိရောဓာနန္တရတော. တဒေဝ စိတ္တန္တိ တံသဒိသတာယ တဗ္ဗောဟာရပ္ပဝတ္တတ္တာ တဒေဝ စိတ္တံ ယထာ ‘‘တာနိယေဝ ဩသဓာနီ’’တိ. အသတိ ဝီထိစိတ္တုပ္ပာဒေတိ အန္တရန္တရာ ဝီထိစိတ္တာနံ ဥပ္ပာဒေ အသတိ, စုတိစိတ္တံ ဟုတွာ နိရုဇ္ဈတိ တဒေဝ စိတ္တန္တိ သမ္ဗန္ဓော. ९९. 'प्रतिसंधीच्या निरोधानंतर' म्हणजे प्रतिसंधीच्या निरोधाच्या (लय पावण्याच्या) अव्यवहित नंतर. 'तेच चित्त' म्हणजे त्याच्याशी सादृश्य असल्यामुळे आणि तसा व्यवहार प्रवृत्त होत असल्यामुळे 'तेच चित्त' म्हटले जाते, जसे 'तीच औषधे' असे म्हणतात. 'वीथीचित्त उत्पन्न होत नसताना' म्हणजे मध्ये-मध्ये वीथीचित्तांची उत्पत्ती होत नसताना, तेच चित्त च्युतीचित्त होऊन निरुद्ध होते, असा संबंध आहे। ၁၀၁. ပရိဝတ္တန္တာ ပဝတ္တန္တိ ယာဝ ဝဋ္ဋမူလသမုစ္ဆေဒါတျဓိပ္ပာယော. १०१. जोपर्यंत संसाराच्या (वट्टाच्या) मुळाचा समूळ उच्छेद होत नाही, तोपर्यंत ते चक्राकार फिरत प्रवृत्त राहतात, असा अभिप्राय आहे। ၁၀၂. ယထာ ဣဟ ဘဝေပဋိသန္ဓိ စေဝ ဘဝင်္ဂဉ္စ ဝီထိယော စ စုတိ စ, တထာ ပုန ဘဝန္တရေ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂန္တိ ဧဝမာဒိကာ အယံ စိတ္တသန္တတိ ပရိဝတ္တတီတိ ယောဇနာ. ကေစိ ပန ဣမသ္မိံ ပရိစ္ဆေဒေ ဝီထိမုတ္တသင်္ဂဟဿေဝ ဒဿိတတ္တာ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂစုတီနမေဝ ဣဓ ဂဟဏံ ယုတ္တန္တျာဓိပ္ပာယေန ‘‘ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂဝီထိယော’’တိ ဣမဿ ပဋိသန္ဓိဘဝင်္ဂပ္ပဝါဟာတိ အတ္ထံ ဝဒန္တိ, တံ တေသံ မတိမတ္တံ ပဝတ္တိသင်္ဂဟဒဿနာဝသာနေ တတ္ထ သင်္ဂဟိတာနံ သဗ္ဗေသမေဝ နိဂမနဿ အဓိပ္ပေတတ္တာ. ဧဝဉှိ သတိ ‘‘ပဋိသင်္ခါယ ပနေတမဒ္ဓုဝ’’န္တိ ဧတ္ထ သဗ္ဗေသမေဝ ဧတ-သဒ္ဒေန ပရာမသနံ သုဋ္ဌု ဥပပန္နံ ဟောတိ. ဧတံ ယထာဝုတ္တံ ဝဋ္ဋပဝတ္တံ အဒ္ဓုဝံ အနိစ္စံ ပလောကဓမ္မံ ပဋိသင်္ခါယ ပစ္စဝေက္ခိတွာ ဗုဓာ ပဏ္ဍိတာ စိရာယ စိရကာလံ သုဗ္ဗတာ ဟုတွာ အစ္စုတံ ဓုဝံ အစဝနဓမ္မံ ပဒံ နိဗ္ဗာနံ အဓိဂန္တွာ မဂ္ဂဖလဉာဏေန သစ္ဆိကတွာ တတောယေဝ သုဋ္ဌု သမုစ္ဆိန္နသိနေဟဗန္ဓနာ သမံ နိရုပဓိသေသနိဗ္ဗာနဓာတုံ ဧဿန္တိ ပါပုဏိဿန္တိ. १०२. ज्याप्रमाणे या भवामध्ये प्रतिसंधी, भवांग, वीथी आणि च्युती प्रवृत्त होतात, त्याचप्रमाणे पुन्हा दुसऱ्या भवामध्ये प्रतिसंधी, भवांग इत्यादी रूपाने ही चित्तसंतती चक्राकार फिरते (प्रवृत्त होते), अशी योजना आहे. परंतु काही आचार्य या परिच्छेदामध्ये केवळ वीथीमुक्त संग्रहाचेच दर्शन करविले असल्यामुळे, येथे केवळ प्रतिसंधी, भवांग आणि च्युती यांचेच ग्रहण करणे योग्य आहे, अशा अभिप्रायाने 'प्रतिसंधी-भवांग-वीथी' या पदाचा अर्थ 'प्रतिसंधी आणि भवांग यांचा प्रवाह' असा करतात. परंतु ते त्यांचे केवळ वैयक्तिक मत आहे; कारण प्रवृत्ती-संग्रहाच्या दर्शनाच्या शेवटी, तेथे समाविष्ट असलेल्या सर्वांचाच उपसंहार करणे अभिप्रेत आहे. कारण असे मानले असता 'परंतु या अनित्याला ओळखून...' या गाथेत 'एत' (या) शब्दाने सर्वांचाच निर्देश करणे चांगल्या प्रकारे सुसंगत ठरते. या पूर्वोक्त संसार-प्रवृत्तीला अध्रुव (अस्थिर), अनित्य आणि विनाशशील धर्म म्हणून प्रज्ञेने विचार करून व त्याचे प्रत्यवेक्षण करून, सुव्रत (उत्तम शील पाळणारे) झालेले ज्ञानी पंडित अच्युत, ध्रुव आणि अचवनधर्मी अशा निर्वाण पदाला प्राप्त करून, मार्गज्ञान व फलज्ञानाने त्याचा साक्षात्कार करून, आणि त्याच साक्षात्काराने तृष्णारूपी स्नेहाचे बंधन समूळ नष्ट करून, शांत अशा निरुपधिशेष निर्वाणधातूमध्ये प्रवेश करतील। ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थविभाविनी नावाच्या अभिधम्मत्थसंग्रहाच्या वर्णनेमध्ये (टीकेमध्ये) ဝီထိမုတ္တပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वीथीमुक्त परिच्छेदाचे वर्णन समाप्त झाले। ၆. ရူပပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ६. रूप परिच्छेदाचे वर्णन ၁. ဧဝံ [Pg.194] တာဝ စိတ္တစေတသိကဝသေန ဒုဝိဓံ အဘိဓမ္မတ္ထံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ရူပံ, တဒနန္တရဉ္စ နိဗ္ဗာနံ ဒဿေတုမာရဘန္တော အာဟ ‘‘ဧတ္တာဝတာ’’တျာဒိ. သပ္ပဘေဒပ္ပဝတ္တိကာ ဥဒ္ဒေသနိဒ္ဒေသပဋိနိဒ္ဒေသဝသေန တီဟိ ပရိစ္ဆေဒေဟိ ဝုတ္တပ္ပဘေဒဝန္တော, ပဝတ္တိပဋိသန္ဓိဝသေန ဒွီဟိ ပရိစ္ဆေဒေဟိ ဝုတ္တပ္ပဝတ္တိဝန္တော စ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ ဧတ္တာဝတာ ပဉ္စဟိ ပရိစ္ဆေဒေဟိ ဝိဘတ္တာ ဟိ ယသ္မာ, ဣဒါနိ ယထာနုပ္ပတ္တံ ရူပံ ပဝုစ္စတီတိ ယောဇနာ. १. अशा प्रकारे प्रथम चित्त आणि चेतसिकांच्या रूपाने दोन प्रकारचा अभिधम्मत्थ दाखवून, आता रूपाचे आणि त्यानंतर निर्वाणाचे दर्शन घडविण्यास आरंभ करताना आचार्यांनी 'एत्तावता' इत्यादी म्हटले आहे. उद्देश, निर्देश आणि प्रतिनिर्देश यांच्याद्वारे तीन परिच्छेदांमध्ये ज्यांचे प्रभेद सांगितले गेले आहेत असे, आणि प्रवृत्ती व प्रतिसंधीच्या द्वारे दोन परिच्छेदांमध्ये ज्यांची प्रवृत्ती सांगितली गेली आहे असे, चित्त आणि चेतसिक धर्म आतापर्यंत पाच परिच्छेदांमध्ये विभागले गेले असल्यामुळे, आता क्रमाने प्राप्त झालेल्या रूपाचे वर्णन केले जात आहे, अशी योजना आहे। ၂. ဣဒါနိ ယထာပဋိညာတရူပဝိဘာဂတ္ထံ မာတိကံ ဌပေတုံ ‘‘သမုဒ္ဒေသာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. သင်္ခေပတော ဥဒ္ဒိသနံ သမုဒ္ဒေသော. ဧကဝိဓာဒိဝသေန ဝိဘဇနံ ဝိဘာဂေါ, သမုဋ္ဌာတိ ဧတသ္မာ ဖလန္တိ သမုဋ္ဌာနံ, ကမ္မာဒယော ရူပဇနကပစ္စယာ. စက္ခုဒသကာဒယော ကလာပါ. ပဝတ္တိက္ကမတော စေတိ ဘဝကာလသတ္တဘေဒေန ရူပါနံ ဥပ္ပတ္တိက္ကမတော. २. आता, प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे रूपाचे वर्गीकरण करण्यासाठी मातृका मांडण्याकरिता "समुद्देसो" (निर्देश) इत्यादी म्हटले आहे. संक्षेपाने निर्देश करणे म्हणजे 'समुद्देश' होय. एकविध इत्यादी प्रकारे विभागणी करणे म्हणजे 'विभाग' होय. ज्याच्यापासून फल उत्पन्न होते ते 'समुत्थान' होय; कर्म इत्यादी रूप उत्पन्न करणारे प्रत्यय (हेतू) आहेत. चक्षु-दशक इत्यादी 'कलाप' (समूह) आहेत. आणि 'प्रवृत्तिक्रमाने' म्हणजे भव, काळ आणि सत्त्व यांच्या भेदाने रूपांच्या उत्पत्तीच्या क्रमाने होय. ရူပသမုဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ रूपसमुद्देश वर्णन ၃. ဥပါဒိန္နာနုပါဒိန္နသန္တာနေသု သသမ္ဘာရဓာတုဝသေန မဟန္တာ ဟုတွာ ဘူတာ ပါတုဘူတာတိ မဟာဘူတာ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၅၈၄). အထဝါ အနေကဝိဓအဗ္ဘုတဝိသေသဒဿနေန, အနေကာဘူတဒဿနေန ဝါ မဟန္တာနိ အဗ္ဘုတာနိ, အဘူတာနိ ဝါ ဧတေသူတိ မဟာဘူတာ, မာယာကာရာဒယော. တေဟိ သမာနာ သယံ အနီလာဒိသဘာဝါနေဝ နီလာဒိဥပါဒါယရူပဒဿနာဒိတောတိ မဟာဘူတာ. မနာပဝဏ္ဏသဏ္ဌာနာဒီဟိ ဝါ သတ္တာနံ ဝဉ္စိကာ ယက္ခိနိအာဒယော ဝိယ မနာပဣတ္ထိပုရိသရူပဒဿနာဒိနာ သတ္တာနံ ဝဉ္စကတ္တာ မဟန္တာနိ အဘူတာနိ ဧတေသူတိ မဟာဘူတာ. ဝုတ္တမ္ပိ ဟေတံ – ३. उपादिन्न (सजीव) आणि अनुपादिन्न (निर्जीव) संतानांमध्ये ससंभार धातूंच्या प्रभावाने मोठे होऊन प्रकट झालेले किंवा अस्तित्वात आलेले म्हणून ते 'महाभूत' म्हटले जातात. किंवा, अनेक प्रकारच्या अद्भुत विशेषांचे दर्शन घडविल्यामुळे, किंवा अनेक असत्य (काल्पनिक) गोष्टींचे दर्शन घडविल्यामुळे ज्यांच्यामध्ये मोठी अद्भुते किंवा असत्ये असतात ते 'महाभूत' होत, जसे की जादूगार इत्यादी. त्यांच्याशी समान असणारे, स्वतः नील (निळा) इत्यादी स्वभाव नसलेलेच असूनही नील इत्यादी उपादाय रूपांचे दर्शन घडवितात म्हणून ते 'महाभूत' होत. किंवा, मनवेधक वर्ण (रंग) आणि संस्थानांद्वारे (आकार) प्राण्यांना फसवणाऱ्या यक्षिणी इत्यादींप्रमाणे, मनवेधक स्त्री किंवा पुरुष रूपाचे दर्शन घडवून प्राण्यांना फसवणारे असल्यामुळे ज्यांच्यामध्ये मोठी असत्ये असतात ते 'महाभूत' होत. याविषयी असेही म्हटले आहे - ‘‘မဟန္တာ [Pg.195] ပါတုဘူတာတိ, မဟာဘူတသမာတိ ဝါ; ဝဉ္စကတ္တာ အဘူတေန, ‘မဟာဘူတာ’တိ သမ္မတာ’’တိ. (အဘိဓ. ၆၂၆); "मोठे होऊन प्रकट झाल्यामुळे, किंवा महाभूतांसारखे (जादूगारांसारखे) असल्यामुळे; असत्याने फसवणारे असल्यामुळे त्यांना 'महाभूत' असे मानले जाते." အထ ဝါ မဟန္တပါတုဘာဝတော မဟန္တာနိ ဘဝန္တိ ဧတေသု ဥပါဒါရူပါနိ, ဘူတာနိ စာတိ မဟာဘူတာနိ. မဟာဘူတေ ဥပါဒါယ ပဝတ္တံ ရူပံ ဥပါဒါယရူပံ. ယဒိ ဧဝံ ‘‘ဧကံ မဟာဘူတံ ပဋိစ္စ တတော မဟာဘူတာ’’တျာဒိဝစနတော (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၅၃) ဧကေကမဟာဘူတာ သေသမဟာဘူတာနံ နိဿယာ ဟောန္တီတိ တေသမ္ပိ ဥပါဒါယရူပတာပသင်္ဂေါတိ? နယိဒမေဝံ ဥပါဒါယေဝ ပဝတ္တရူပါနံ တံသမညာသိဒ္ဓိတော. ယဉှိ မဟာဘူတေ ဥပါဒိယတိ, သယဉ္စ အညေဟိ ဥပါဒီယတိ. န တံ ဥပါဒါယရူပံ. ယံ ပန ဥပါဒီယတေဝ, န ကေနစိ ဥပါဒီယတိ, တဒေဝ ဥပါဒါယရူပန္တိ နတ္ထိ ဘူတာနံ တဗ္ဗောဟာရပ္ပသင်္ဂေါ. အပိစ စတုန္နံ မဟာဘူတာနံ ဥပါဒါယရူပန္တိ ဥပါဒါယရူပလက္ခဏန္တိ နတ္ထိ တယော ဥပါဒါယ ပဝတ္တာနံ ဥပါဒါယရူပတာတိ. किंवा, मोठ्या प्रमाणावर प्रकट होत असल्यामुळे ज्यांच्यामध्ये उपादाय रूपे मोठी होतात आणि ती स्वतः भूत (विद्यमान) आहेत म्हणून ती 'महाभूत' होत. महाभूतांना आश्रय करून (त्यांच्यावर अवलंबून) प्रवृत्त होणारे रूप म्हणजे 'उपादाय रूप' होय. जर असे असेल तर, "एका महाभूतावर अवलंबून इतर महाभूते उत्पन्न होतात" इत्यादी वचनानुसार प्रत्येक महाभूत हे उरलेल्या महाभूतांचा आश्रय बनते, तर मग त्यांनाही उपादाय रूप म्हणण्याचा प्रसंग येईल का? असे नाही; कारण केवळ आश्रित राहूनच प्रवृत्त होणाऱ्या रूपांनाच ती संज्ञा (उपादाय रूप) सिद्ध होते. कारण जे महाभूतांना आश्रय करते आणि स्वतः इतरांकडूनही आश्रित केले जाते, ते उपादाय रूप नव्हे. परंतु जे केवळ आश्रितच असते आणि ज्याच्यावर इतर कोणीही आश्रित नसते, तेच केवळ 'उपादाय रूप' होय; म्हणून महाभूतांना ती संज्ञा (उपादाय रूप हा व्यवहार) लागू होण्याचा प्रसंग येत नाही. शिवाय, "चार महाभूतांचे उपादाय रूप" हे उपादाय रूपाचे लक्षण आहे, म्हणून तीन महाभूतांना आश्रय करून प्रवृत्त होणाऱ्या (इतर महाभूतांना) उपादाय रूपत्व प्राप्त होत नाही. ၄. ပထနဋ္ဌေန ပထဝီ, တရုပဗ္ဗတာဒီနံ ပကတိပထဝီ ဝိယ သဟဇာတရူပါနံ ပတိဋ္ဌာနဘာဝေန ပက္ခာယတိ, ဥပဋ္ဌာတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, ပထဝီ ဧဝ ဓာတု သလက္ခဏဓာရဏာဒိတော နိဿတ္တနိဇ္ဇီဝဋ္ဌေန သရီရသေလာဝယဝဓာတုသဒိသတ္တာ စာတိ ပထဝီဓာတု. အာပေတိ သဟဇာတရူပါနိ ပတ္ထရတိ, အာပါယတိ ဝါ ဗြူဟေတိ ဝဍ္ဎေတီတိ အာပေါ. တေဇေတိ ပရိပါစေတိ, နိသေတိ ဝါ တိက္ခဘာဝေန သေသဘူတတ္တယံ ဥသ္မာပေတီတိ တေဇော. ဝါယတိ ဒေသန္တရုပ္ပတ္တိဟေတုဘာဝေန ဘူတသံဃာတံ ပါပေတီတိ ဝါယော. စတဿောပိ ပနေတာ ယထာက္ကမံ ကထိနတ္တဒဝတ္တဥဏှတ္တဝိတ္ထမ္ဘနတ္တလက္ခဏာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ४. पसरण्याच्या किंवा विस्तारण्याच्या अर्थाने 'पठवी' (पृथ्वी) होय; जशी वृक्ष, पर्वत इत्यादींसाठी नैसर्गिक पृथ्वी आधार असते, तशी ती सहजात (सोबत उत्पन्न होणाऱ्या) रूपांचा आधार म्हणून प्रकट होते किंवा उपस्थित होते, असे म्हटले आहे. स्वतःचे लक्षण धारण करणे इत्यादींमुळे, सत्त्वरहित आणि जीवरहित असल्याच्या अर्थाने, आणि शरीराचे अवयव व पर्वतांचे अवयव असलेल्या धातूंसारखी असल्यामुळे ती 'पठवीधातू' (पृथ्वीधातू) होय. सहजात रूपांना व्यापते, पसरवते किंवा त्यांचे पोषण करते, त्यांना वाढवते म्हणून 'आपो' (जलधातू) होय. उष्णता देते, परिपक्व करते, किंवा तीक्ष्णतेने उरलेल्या तीन महाभूतांना उष्ण करते म्हणून 'तेजो' (तेजधातू) होय. दुसऱ्या ठिकाणी उत्पत्तीचे कारण बनून महाभूतांच्या समूहाला गती देते (पोहचवते) म्हणून 'वायो' (वायुधातू) होय. आणि या चारही धातू अनुक्रमे काठिण्य (कठोरपणा), द्रवत्व (वाहणे), उष्णत्व (गरमपणा) आणि विष्टंभनत्व (स्तंभन/आधार देणे) या लक्षणांच्या आहेत, असे जाणावे. ၅. စက္ခာဒီနံ ဝစနတ္ထော ဟေဋ္ဌာ ကထိတောဝ. ပသာဒရူပံ နာမ စတုန္နံ မဟာဘူတာနံ ပသန္နဘာဝဟေတုကတ္တာ. တံ [Pg.196] ပန ယထာက္ကမံ ဒဋ္ဌုကာမတာသောတုကာမတာဃာယိတုကာမတာသာယိတုကာမတာဖုသိတုကာမတာနိဒါနကမ္မသမုဋ္ဌာနဘူတပ္ပသာဒလက္ခဏံ. တတ္ထ စက္ခု တာဝ မဇ္ဈေ ကဏှမဏ္ဍလဿ ဦကာသိရပ္ပမာဏေ အဘိမုခေ ဌိတာနံ သရီရသဏ္ဌာနုပ္ပတ္တိပဒေသေ တေလမိဝ ပိစုပဋလာနိ သတ္တက္ခိပဋလာနိ ဗျာပေတွာ ဓာရဏနဟာပနမဏ္ဍနဗီဇနကိစ္စာဟိ စတူဟိ ဓာတီဟိ ဝိယ ခတ္တိယကုမာရော သန္ဓာရဏဗန္ဓနပရိပါစနသမုဒီရဏကိစ္စာဟိ စတူဟိ ဓာတူဟိ ကတူပကာရံ ဥတုစိတ္တာဟာရေဟိ ဥပတ္ထမ္ဘိယမာနံ အာယုနာ ပရိပါလိယမာနံ ဝဏ္ဏာဒီဟိ ပရိဝါရိတံ ယထာယောဂံ စက္ခုဝိညာဏာဒီနံ ဝတ္ထုဒွါရဘာဝံ သဓေန္တံ ပဝတ္တတိ, ဣတရံ ‘‘သသမ္ဘာရစက္ခူ’’တိ ဝုစ္စတိ. ဧဝံ သောတာဒယောပိ ယထာက္ကမံ သောတဗိလဗ္ဘန္တရေ အင်္ဂုလိဝေဓနာကာရံ ဥပစိတတနုတမ္ဗလောမံ, နာသိကဗ္ဘန္တရေ အဇပဒသဏ္ဌာနံ, ဇိဝှာမဇ္ဈေ ဥပ္ပလဒလဂ္ဂသဏ္ဌာနံ ပဒေသံ အဘိဗျာပေတွာ ပဝတ္တန္တိ, ဣတရံ ပန ဌပေတွာ ကမ္မဇတေဇဿ ပတိဋ္ဌာနဋ္ဌာနံ ကေသဂ္ဂလောမဂ္ဂနခဂ္ဂသုက္ခစမ္မာနိ စ အဝသေသံ သကလသရီရံ ဖရိတွာ ပဝတ္တတိ. ဧဝံ သန္တေပိ ဣတရေဟိ တဿ သင်္ကရော န ဟောတိ ဘိန္နနိဿယလက္ခဏတ္တာ. ဧကနိဿယာနိပိ ဟိ ရူပရသာဒီနိ လက္ခဏဘေဒတော အသံကိဏ္ဏာတိ ကိံ ပန ဘိန္နနိဿယာ ပသာဒါ. ५. चक्षु इत्यादींचा वचनार्थ (शब्दाचा अर्थ) खाली (पूर्वीच) सांगितला आहे. चार महाभूतांच्या प्रसन्नभावामुळे (पारदर्शकतेमुळे) उत्पन्न होणारे रूप म्हणजे 'प्रसाद रूप' होय. आणि ते अनुक्रमे पाहण्याची इच्छा, ऐकण्याची इच्छा, वास घेण्याची इच्छा, चव घेण्याची इच्छा आणि स्पर्श करण्याची इच्छा या मूळ कारणांमुळे झालेल्या कर्माने उत्पन्न झालेल्या महाभूतांना प्रसन्न (स्वच्छ) करण्याचे लक्षण असणारे आहे. त्यामध्ये चक्षु (डोळा) प्रथम, काळ्या बुबुळाच्या मध्यभारी, उवाच्या डोक्याच्या आकाराएवढ्या, समोर उभ्या असलेल्यांच्या शरीराचा आकार जिथे प्रतिबिंबित होतो त्या ठिकाणी, कापसाच्या सात थरांमध्ये तेल जसे पसरते, तसे डोळ्याच्या सात थरांना व्यापून; धारण करणे, स्नान घालणे, अलंकृत करणे आणि वारा घालणे ही कामे करणाऱ्या चार दाईंनी सांभाळलेल्या क्षत्रिय कुमाराप्रमाणे; धारण करणे, बांधणे, परिपक्व करणे आणि गती देणे ही कामे करणाऱ्या चार धातूंद्वारे उपकृत झालेले; ऋतू, चित्त आणि आहाराद्वारे उपस्तंभित (पोषित) केले जाणारे; आयुष्याने (जीवितेंद्रियाने) रक्षण केले जाणारे; वर्ण इत्यादींनी वेढलेले; योग्यतेनुसार चक्षुविज्ञान इत्यादींचे वस्तू (आश्रय) आणि द्वार बनण्याचे कार्य साध्य करत प्रवृत्त होते; आणि इतर (भौतिक डोळ्याला) 'ससंभार चक्षु' असे म्हटले जाते. याचप्रमाणे श्रोत्र (कान) इत्यादी देखील अनुक्रमे कानाच्या छिद्रामध्ये अंगठीच्या आकाराच्या, दाट, मऊ आणि तांबड्या केसांच्या प्रदेशाला व्यापून; नाकाच्या आत शेळीच्या खुराच्या आकाराच्या प्रदेशाला व्यापून; जिभेच्या मध्यभागी कमळाच्या पाकळीच्या टोकाच्या आकाराच्या प्रदेशाला व्यापून प्रवृत्त होतात. परंतु इतर (कायप्रसादाच्या बाबतीत) कर्मज तेजाचे स्थान, केसांचे टोक, रोमांचे टोक, नखांचे टोक आणि कोरडी त्वचा यांना वगळून उरलेल्या संपूर्ण शरीराला व्यापून प्रवृत्त होते. असे असले तरी, इतरांशी त्याचा संकर (मिसळणे) होत नाही, कारण त्यांचे आश्रय (महाभूत) आणि लक्षणे भिन्न आहेत. कारण एकाच आश्रयावर असणारे रूप, रस इत्यादी देखील लक्षणाच्या भेदाने अमिश्रित राहतात, मग भिन्न आश्रय असणारे प्रसाद रूप मिसळतीलच कसे? ၆. အာပေါဓာတုယာ သုခုမဘာဝေန ဖုသိတုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အာပေါဓာတု ဝိဝဇ္ဇိတံ ဘူတတ္တယသင်္ခါတ’’န္တိ. ကိဉ္စာပိ ဟိ သီတတာ ဖုသိတွာ ဂယှတိ, သာ ပန တေဇောယေဝ. မန္ဒေ ဟိ ဥဏှတ္တေ သီတဗုဒ္ဓိ သီတတာသင်္ခါတဿ ကဿစိ ဂုဏဿ အဘာဝတော. တယိဒံ သီတဗုဒ္ဓိယာ အနဝဋ္ဌိတဘာဝတော ဝိညာယတိ ပါရာပါရေ ဝိယ. တထာ ဟိ ဃမ္မကာလေ အာတပေ ဌတွာ ဆာယံ ပဝိဋ္ဌာနံ သီတဗုဒ္ဓိ ဟောတိ, တတ္ထေဝ စိရကာလံ ဌိတာနံ ဥဏှဗုဒ္ဓိ. ယဒိ စ အာပေါဓာတု သီတတာ သိယာ, ဥဏှဘာဝေန သဟ ဧကသ္မိံ ကလာပေ [Pg.197] ဥပလဗ္ဘေယျ, န စေဝံ ဥပလဗ္ဘတိ, တသ္မာ ဝိညာယတိ ‘‘န အာပေါဓာတု သီတတာ’’တိ. ယေ ပန ‘‘ဒဝတာ အာပေါဓာတု, သာ စ ဖုသိတွာ ဂယှတီ’’တိ ဝဒန္တိ, တေ ဝတ္တဗ္ဗာ ‘‘ဒဝတာ နာမ ဖုသိတွာ ဂယှတီတိ ဣဒံ အာယသ္မန္တာနံ အဘိမာနမတ္တံ သဏ္ဌာနေ ဝိယာ’’တိ. ဝုတ္တဉှေတံ ပေါရာဏေဟိ – ६. आपधातूच्या सूक्ष्मतेमुळे तिला स्पर्श करणे अशक्य असल्यामुळे "आपधातू वगळता इतर तीन महाभूतांचा समूह (स्पर्शव्य आहे)" असे म्हटले आहे. जरी थंडपणा स्पर्शाने ग्रहण केला जात असला, तरी तो तेजधातूच आहे. कारण उष्णता मंद (कमी) झाल्यावर थंडपणाची जाणीव होते, थंडपणा नावाचा कोणताही स्वतंत्र गुण अस्तित्वात नसल्यामुळे. हे थंडपणाच्या जाणिवेच्या अस्थिरतेमुळे समजते, जसे पलीकडचा काठ आणि अलीकडचा काठ यांच्या बाबतीत होते. कारण उन्हाळ्यात उन्हात उभे राहून सावलीत येणाऱ्यांना थंडपणाची जाणीव होते, आणि तिथेच दीर्घकाळ राहणाऱ्यांना उष्णतेची जाणीव होते. आणि जर आपधातू म्हणजे थंडपणा असता, तर तो उष्णतेसोबत एकाच कलापात आढळला असता, पण तसे आढळत नाही; म्हणून "थंडपणा ही आपधातू नव्हे" हे सिद्ध होते. परंतु जे म्हणतात की "द्रवता ही आपधातू आहे आणि ती स्पर्शाने ग्रहण केली जाते", त्यांना सांगितले पाहिजे की, "द्रवता स्पर्शाने ग्रहण केली जाते, हा केवळ आपणा आयुष्मंतांचा आकाराप्रमाणेच भ्रम आहे." याविषयी प्राचीन आचार्यांनी असे म्हटले आहे - ‘‘ဒဝတာသဟဝုတ္တီနိ, တီဏိ ဘူတာနိ သမ္ဖုသံ; ဒဝတံ သမ္ဖုသာမီတိ, လောကောယမဘိမညတိ. "द्रवतेसोबत राहणाऱ्या तीन महाभूतांना स्पर्श करताना, हा लोक 'मी द्रवतेला स्पर्श करत आहे' असा भ्रम करून घेतो." ‘‘ဘူတေ ဖုသိတွာ သဏ္ဌာနံ, မနသာ ဂဏှတော ယထာ; ပစ္စက္ခတော ဖုသာမီတိ, ဝိညေယျာ ဒဝတာ တထာ’’တိ. "ज्याप्रमाणे महाभूतांना स्पर्श करून आकाराचे (संस्थानाचे) मनाने ग्रहण करताना 'मी प्रत्यक्ष स्पर्श करत आहे' असे वाटते, त्याचप्रमाणे द्रवतेच्या बाबतीतही जाणावे." ဂေါစရရူပံ နာမ ပဉ္စဝိညာဏဝိသယဘာဝတော. ဂါဝေါ ဣန္ဒြိယာနိ စရန္တိ ဧတ္ထာတိ ဂေါစရန္တိ ဟိ အာရမ္မဏဿေတံ နာမံ. တံ ပနေတံ ပဉ္စဝိဓမ္ပိ ယထာက္ကမံ စက္ခုဝိညာဏာဒီနံ ဂေါစရဘာဝလက္ခဏံ, စက္ခာဒိပဋိဟနနလက္ခဏံ ဝါ. पंचविज्ञानांचा विषय असल्यामुळे याला 'गोचर रूप' म्हणतात. 'गावो' म्हणजे इंद्रिये ज्याच्यामध्ये 'चरन्ति' (प्रवृत्त) होतात ते 'गोचर' होय, हे आलंबनाचे (विषयाचे) नाव आहे. आणि ते पाच प्रकारचे गोचर रूप अनुक्रमे चक्षुविज्ञान इत्यादींचे गोचर (विषय) होण्याचे लक्षण असणारे आहे, किंवा चक्षु इत्यादींवर आघात करण्याचे (धडकण्याचे) लक्षण असणारे आहे. ၇. ဣတ္ထိယာ ဘာဝေါ ဣတ္ထတ္တံ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၆၃၂). ပုရိသဿ ဘာဝေါ ပုရိသတ္တံ. တတ္ထ ဣတ္ထိလိင်္ဂနိမိတ္တကုတ္တာကပ္ပဟေတုဘာဝလက္ခဏံ ဣတ္ထတ္တံ, ပုရိသလိင်္ဂါဒိဟေတုဘာဝလက္ခဏံ ပုရိသတ္တံ. တတ္ထ ဣတ္ထီနံ အင်္ဂဇာတံ ဣတ္ထိလိင်္ဂံ. သရာဓိပ္ပာယာ ဣတ္ထိနိမိတ္တံ ‘‘ဣတ္ထီ’’တိ သဉ္ဇာနနဿ ပစ္စယဘာဝတော. အဝိသဒဌာနဂမနနိသဇ္ဇာဒိ ဣတ္ထိကုတ္တံ. ဣတ္ထိသဏ္ဌာနံ ဣတ္ထာကပ္ပော. ပုရိသလိင်္ဂါဒီနိပိ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗာနိ. အဋ္ဌကထာယံ ပန အညထာ ဣတ္ထိလိင်္ဂါဒီနိ ဝဏ္ဏိတာနိ. တံ ပန ဧဝံ သင်္ဂဟေတွာ ဝဒန္တိ – ७. स्त्रीचा भाव (अस्तित्व) म्हणजे 'इत्थत्तं' (स्त्रीत्व) होय. पुरुषाचा भाव म्हणजे 'पुरिसत्तं' (पुरुषत्व) होय. त्यामध्ये, स्त्री-लिंग (स्त्रीचे जननेंद्रिय), स्त्री-निमित्त (स्वर व अभिप्राय), स्त्री-कुत्त (हावभाव) आणि स्त्री-आकप्प (शारीरिक ठेवण) यांचे कारण असणे हे स्त्रीत्वाचे (इत्थत्त) लक्षण आहे; आणि पुरुष-लिंग इत्यादींचे कारण असणे हे पुरुषत्वाचे (पुरिसत्त) लक्षण आहे. त्यामध्ये, स्त्रियांचे जननेंद्रिय हे 'स्त्री-लिंग' होय. स्वर (आवाज) आणि अभिप्राय (इच्छा) हे 'स्त्री-निमित्त' होय, कारण ते 'ही स्त्री आहे' अशा प्रकारे ओळखण्याचे कारण ठरतात. अस्वाभाविक किंवा अस्पष्टपणे उभे राहणे, चालणे, बसणे इत्यादी क्रिया 'स्त्री-कुत्त' (हावभाव) होय. स्त्रीची शारीरिक आकृती (संस्थान) म्हणजे 'स्त्री-आकप्प' (शारीरिक ठेवण) होय. पुरुष-लिंग इत्यादी देखील याच पद्धतीने समजून घ्यावेत. परंतु अट्ठकथेमध्ये स्त्री-लिंग इत्यादींचे वर्णन इतर प्रकारे केले गेले आहे. प्राचीन आचार्य ते अशा प्रकारे संकलित करून सांगतात - ‘‘လိင်္ဂံ ဟတ္ထာဒိသဏ္ဌာနံ, နိမိတ္တံ မိဟိတာဒိကံ; ကုတ္တံ သုပ္ပာဒိနာ ကီဠာ, အာကပ္ပော ဂမနာဒိက’’န္တိ. 'हात इत्यादींची शारीरिक आकृती म्हणजे लिंग होय, मंदस्मित इत्यादी चिन्हे म्हणजे निमित्त होय, लहानपणी सूप इत्यादी खेळण्यांनी खेळणे म्हणजे कुत्त होय, आणि चालणे इत्यादी हालचाली म्हणजे आकप्प होय.' ဘာဝရူပံ နာမ ဘဝတိ ဧတေန ဣတ္ထာဒိအဘိဓာနံ, ဗုဒ္ဓိ စာတိ ကတွာ. တံ ပနေတံ ကာယိန္ဒြိယံ ဝိယ သကလသရီရံ ဖရိတွာ တိဋ္ဌတိ. या रूपाद्वारे 'स्त्री' इत्यादी संज्ञा आणि त्याविषयीचे ज्ञान उत्पन्न होते, म्हणून याला 'भावरूप' असे म्हणतात. आणि ते हे भावरूप कायेंद्रियाप्रमाणे (कायाप्रसादाप्रमाणे) संपूर्ण शरीराला व्यापून राहते. ၈. ဟဒယမေဝ [Pg.198] မနောဓာတုမနောဝိညာဏဓာတူနံ နိဿယတ္တာ ဝတ္ထု စာတိ ဟဒယဝတ္ထု. တထာ ဟိ တံ ဓာတုဒွယနိဿယဘာဝလက္ခဏံ, တဉ္စ ဟဒယကောသဗ္ဘန္တရေ အဍ္ဎပသတမတ္တံ လောဟိတံ နိဿာယ ပဝတ္တတိ. ရူပကဏ္ဍေ အဝုတ္တဿပိ ပနေတဿ အာဂမတော, ယုတ္တိတော စ အတ္ထိဘာဝေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တတ္ထ, တံ ရူပံ နိဿာယ မနောဓာတု စ မနောဝိညာဏဓာတု စ ဝတ္တန္တိ ‘‘ယံ ရူပံ မနောဓာတုယာ စ မနောဝိညာဏဓာတုယာ စ တံသမ္ပယုတ္တကာနဉ္စ ဓမ္မာနံ နိဿယပစ္စယေန ပစ္စယော’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၈) ဧဝမာဂတံ ပဋ္ဌာနဝစနံ အာဂမော. ယုတ္တိ ပနေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ – ८. हृदय हेच मनोधातू आणि मनोविज्ञाणधातू यांचे आश्रयस्थान असल्यामुळे 'वस्तू' (आधार) देखील आहे, म्हणून याला 'हदयवत्थु' (हृदयवस्तू) म्हणतात. कारण ते या दोन्ही धातूंचे आश्रयस्थान असणे हे लक्षण असणारे आहे, आणि ते हृदयकोशाच्या आत अर्धा पसाभर रक्ताचा आश्रय घेऊन प्रवर्तित होते. जरी रूपकांडात याचा उल्लेख केलेला नसला, तरी आगम (शास्त्रवचन) आणि युक्ती (तर्क) या दोन्हीवरून त्याचे अस्तित्व जाणून घ्यावे. त्यामध्ये, 'ज्या रूपाचा आश्रय घेऊन मनोधातू आणि मनोविज्ञाणधातू प्रवर्तित होतात, जे रूप मनोधातू, मनोविज्ञाणधातू आणि त्यांच्याशी संप्रयुक्त असणाऱ्या धर्मांना निश्रयप्रत्ययाने प्रत्यय ठरते' असे आलेले पट्ठानवचन हा 'आगम' आहे. आणि युक्ती या प्रकारे समजून घ्यावी - ‘‘နိပ္ဖန္နဘူတိကာဓာရာ, ဒွေ ဓာတူ ကာမရူပိနံ; ရူပါနုဗန္ဓဝုတ္တိတ္တာ, စက္ခုဝိညာဏာဒယော ဝိယ. 'कामभूमी आणि रूपभूमीतील प्राण्यांचे हे दोन धातू (मनोधातू आणि मनोविज्ञाणधातू), चक्षुविज्ञाण इत्यादींप्रमाणे रूपाच्या अनुषंगाने प्रवर्तित होणारे असल्यामुळे, निष्पन्न उपादाय रूपाचा आधार असणारे आहेत.' ‘‘စက္ခာဒိနိဿိတာနေတာ, တဿညာဓာရဘာဝတော; နာပိ ရူပါဒိကေ တေသံ, ဗဟိဒ္ဓါပိ ပဝတ္တိတော. 'हे दोन धातू चक्षु इत्यादी प्रसादांचा आश्रय घेत नाहीत, कारण ते (चक्षुप्रसाद इत्यादी) इतर चक्षुविज्ञाण इत्यादींचे आधार आहेत; आणि ते रूप इत्यादी विषयांचाही आश्रय घेत नाहीत, कारण ते शरीराच्या बाहेर देखील प्रवर्तित होतात.' ‘‘န စာပိ ဇီဝိတံ တဿ, ကိစ္စန္တရနိယုတ္တိတော; န စ ဘာဝဒွယံ တသ္မိံ, အသန္တေပိ ပဝတ္တိတော. 'आणि ते जीवितरूपाचाही आश्रय घेत नाहीत, कारण ते सहजात रूपांचे रक्षण करण्याच्या इतर कार्यात गुंतलेले असते; आणि ते दोन्ही भावरूपांचाही आश्रय घेत नाहीत, कारण ते (भावरूप) नसतानाही हे धातू प्रवर्तित होतात.' ‘‘တသ္မာ တဒညံ ဝတ္ထု တံ, ဘူတိကန္တိ ဝိဇာနိယံ; ဝတ္ထာလမ္ဗဒုကာနန္တု, ဒေသနာဘေဒတော ဣဒံ; ဓမ္မသင်္ဂဏိပါဌသ္မိံ, န အက္ခာတံ မဟေသိနာ’’တိ. 'म्हणून, त्या रूपांपेक्षा भिन्न असलेले जे काही आश्रयस्थान आहे, ते महाभूतांवर आश्रित असलेले उपादाय रूप आहे असे जाणावे. परंतु वस्तू-दुका आणि आलंबन-दुका यांच्या देशनाक्रमाचा भंग होऊ नये म्हणून, हे हृदयवस्तू रूप धम्मसंगणीच्या पाठात महर्षींनी (भगवान बुद्धांनी) स्पष्टपणे सांगितले नाही.' ၉. ဇီဝန္တိ တေနာတိ ဇီဝိတံ, တဒေဝ ကမ္မဇရူပပရိပါလနေ အာဓိပစ္စယောဂတော ဣန္ဒြိယန္တိ ဇီဝိတိန္ဒြိယံ. တထာ ဟေတံ ကမ္မဇရူပပရိပါလနလက္ခဏံ. ယထာသကံ ခဏမတ္တဋ္ဌာယီနမ္ပိ ဟိ သဟဇာတာနံ ပဝတ္တိဟေတုဘာဝေနေဝ အနုပါလကံ. န ဟိ တေသံ ကမ္မံယေဝ ဌိတိကာရဏံ ဟောတိ အာဟာရဇာဒီနံ အာဟာရာဒိ ဝိယ ကမ္မဿ တင်္ခဏာဘာဝတော. ဣဒံ ပန သဟ ပါစနဂ္ဂိနာ အနဝသေသဥပါဒိန္နကာယံ ဗျာပေတွာ ပဝတ္တတိ. ९. ज्याच्याद्वारे सहजात रूपे जगतात, ते 'जीवित' होय. तेच कर्मज रूपांचे रक्षण करण्यामध्ये अधिपती असल्यामुळे 'इंद्रिय' आहे, म्हणून त्याला 'जीवितेंद्रिय' म्हणतात. कारण, कर्मज रूपांचे रक्षण करणे हे याचे लक्षण आहे. आपापल्या क्षणमात्र काळापुरते टिकणाऱ्या सहजात रूपांच्या प्रवृत्तीचे कारण बनूनच ते त्यांचे रक्षण करते. केवळ कर्म हेच त्यांच्या टिकून राहण्याचे कारण असू शकत नाही, कारण जसे आहारज इत्यादी रूपांच्या वेळी आहार इत्यादी कारणे उपस्थित असतात, तसे कर्माचे त्या क्षणी प्रत्यक्ष अस्तित्व नसते. आणि हे जीवितेंद्रिय पाचक अग्नीसह संपूर्ण उपादिन्न शरीराला व्यापून प्रवर्तित होते. ၁၀. ကဗဠံ [Pg.199] ကတွာ အဇ္ဈောဟရီယတီတိ ကဗဠီကာရော အာဟာရော, ဣဒဉ္စ သဝတ္ထုကံ ကတွာ အာဟာရံ ဒဿေတုံ ဝုတ္တံ. သေန္ဒြိယကာယောပတ္ထမ္ဘနဟေတုဘူတာ ပန အင်္ဂမင်္ဂါနုသာရီ ရသဟရသင်္ခါတာ အဇ္ဈောဟရိတဗ္ဗာဟာရသိနေဟဘူတာ ဩဇာ ဣဓ အာဟာရရူပံ နာမ. တထာ ဟေတံ သေန္ဒြိယကာယောပတ္ထမ္ဘနဟေတုဘာဝလက္ခဏံ, ဩဇဋ္ဌမကရူပါဟရဏလက္ခဏံ ဝါ. १०. घास करून जो गिळला जातो, तो 'कवळीकार आहार' होय. आणि हे वचन सवस्तुक आहाराला (परमार्थ आहाराला) दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे. परंतु, सेंद्रिय शरीराला आधार देण्याचे कारण असणारी, लहान-मोठ्या अवयवांमध्ये पसरणाऱ्या रसवाहिन्यांद्वारे वाहून नेली जाणारी आणि गिळलेल्या आहारातील स्नेह असणारी जी 'ओजा' (ऊर्जा) आहे, ती येथे 'आहाररूप' म्हणून ओळखली जाते. कारण, सेंद्रिय शरीराला आधार देण्याचे कारण असणे हे याचे लक्षण आहे, किंवा ओजा-अष्टमक रूपांना धारण करणे हे याचे लक्षण आहे. ၁၁. ကက္ခဠတ္တာဒိနာ အတ္တနော အတ္တနော သဘာဝေန ဥပလဗ္ဘနတော သဘာဝရူပံ နာမ. ဥပ္ပာဒါဒီဟိ, အနိစ္စတာဒီဟိ ဝါ လက္ခဏေဟိ သဟိတန္တိ သလက္ခဏံ. ပရိစ္ဆေဒါဒိဘာဝံ ဝိနာ အတ္တနော သဘာဝေနေဝ ကမ္မာဒီဟိ ပစ္စယေဟိ နိပ္ဖန္နတ္တာ နိပ္ဖရူပံ နာမ. ရုပ္ပနသဘာဝေါ ရူပံ, တေန ယုတ္တမ္ပိ ရူပံ, ယထာ ‘‘အရိသသော, နီလုပ္ပလ’’န္တိ, သွာယံ ရူပ-သဒ္ဒေါ ရုဠှိယာ အတံသဘာဝေပိ ပဝတ္တတီတိ အပရေန ရူပ-သဒ္ဒေန ဝိသေသေတွာ ‘‘ရူပရူပ’’န္တိ ဝုတ္တံ ယထာ ‘‘ဒုက္ခဒုက္ခ’’န္တိ. ပရိစ္ဆေဒါဒိဘာဝံ အတိက္ကမိတွာ သဘာဝေနေဝ ဥပလဗ္ဘနတော လက္ခဏတ္တယာရောပနေန သမ္မသိတုံ အရဟတ္တာ သမ္မသနရူပံ. ११. कठीणपणा इत्यादी आपापल्या स्वभावाने उपलब्ध होत असल्यामुळे याला 'स्वभावरूप' म्हणतात. उत्पाद इत्यादी किंवा अनित्यता इत्यादी लक्षणांनी युक्त असल्यामुळे याला 'सलक्षण रूप' म्हणतात. परिच्छेद इत्यादी भाव नसतानाही, आपापल्या स्वभावाने कर्म इत्यादी प्रत्ययांद्वारे निष्पन्न होत असल्यामुळे याला 'निष्पन्न रूप' म्हणतात. विकार पावणे हा ज्याचा स्वभाव आहे ते 'रूप' होय, आणि त्या स्वभावाने युक्त असणारे देखील 'रूप' होय, जसे 'अरीस' किंवा 'नीलोत्पल' या शब्दांमध्ये असते. हा 'रूप' शब्द रूढीने त्या स्वभावाचा अभाव असणाऱ्या अनिष्पन्न रूपांमध्ये देखील वापरला जातो, म्हणून दुसऱ्या 'रूप' शब्दाने विशेषित करून याला 'रूपरूप' असे म्हटले आहे, जसे 'दुःखदुःख' असे म्हटले जाते. परिच्छेद इत्यादी भावांचे उल्लंघन करून केवळ स्वभावानेच उपलब्ध होत असल्यामुळे आणि तीन लक्षणांच्या (अनित्य, दुःख, अनात्म) आरोपाने मनन करण्यास योग्य असल्यामुळे याला 'सम्मासन रूप' (मननयोग्य रूप) म्हणतात. ၁၂. န ကဿတီတိ အကာသော. အကာသောယေဝ အာကာသော, နိဇ္ဇီဝဋ္ဌေန ဓာတု စာတိ အာကာသဓာတု. စက္ခုဒသကာဒိဧကေကကလာပဂတရူပါနံ ကလာပန္တရေဟိ အသံကိဏ္ဏဘာဝါပါဒနဝသေန ပရိစ္ဆေဒကံ, တေဟိ ဝါ ပရိစ္ဆိဇ္ဇမာနံ, တေသံ ပရိစ္ဆေဒမတ္တံ ဝါ ရူပံ ပရိစ္ဆေဒရူပံ. တဉှိ တံ တံ ရူပကလာပံ ပရိစ္ဆိန္ဒန္တံ ဝိယ ဟောတိ. ဝိဇ္ဇမာနေပိ စ ကလာပန္တရဘူတေဟိ ကလာပန္တရဘူတာနံ သမ္ဖုဋ္ဌဘာဝေ တံတံရူပဝိဝိတ္တတာ ရူပပရိယန္တော အာကာသော. ယေသဉ္စ သော ပရိစ္ဆေဒေါ, တေဟိ သယံ အသမ္ဖုဋ္ဌောယေဝ. အညထာ ပရိစ္ဆိန္နတာ န သိယာ တေသံ ရူပါနံ ဗျာပီဘာဝါပတ္တိတော. အဗျာပိတာ [Pg.200] ဟိ အသမ္ဖုဋ္ဌတာ. တေနာဟ ဘဂဝါ ‘‘အသမ္ဖုဋ္ဌံ စတူဟိ မဟာဘူတေဟီ’’တိ (ဓ. သ. ၆၃၇). १२. जे रेखले (किंवा नांगरले) जात नाही, ते 'अकास' (आकाश) होय. अकास हेच 'आकाश' होय. निर्जीव असल्यामुळे ते 'धातू' देखील आहे, म्हणून त्याला 'आकाशधातू' म्हणतात. चक्षु-दशक इत्यादी प्रत्येक कलापामध्ये असणाऱ्या रूपांना इतर कलापांशी मिश्रित न होऊ देण्याच्या दृष्टीने जे मर्यादित करते, किंवा त्यांच्याद्वारे जे मर्यादित केले जाते, किंवा त्यांच्या केवळ मर्यादेचे स्वरूप असणारे जे रूप आहे, ते 'परिच्छेदरूप' होय. कारण ते त्या त्या रूपकलापाला मर्यादित करत असल्यासारखे असते. जरी वेगवेगळ्या कलापांमधील महाभूतांचा परस्परांशी संपर्क स्पष्टपणे जाणवत असला, तरी त्या त्या रूपांची जी विविक्तता (भिन्नता) आहे, ती रूपांची सीमा म्हणजेच 'आकाश' होय. आणि ज्या रूपकलापांची ती मर्यादा आहे, त्यांच्याशी ते स्वतः कधीही स्पर्श पावत नाही. अन्यथा, त्यांची मर्यादा सिद्ध होणार नाही, कारण ती रूपे परस्परांमध्ये मिसळून जातील. कारण न मिसळणे म्हणजेच अस्पृष्ट राहणे होय. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे - 'चार महाभूतांनी अस्पृष्ट असलेले (ते आकाश होय)'. ၁၃. စလမာနကာယေန အဓိပ္ပာယံ ဝိညာပေတိ, သယဉ္စ တေန ဝိညာယတီတိ ကာယဝိညတ္တိ. သဝိညာဏကသဒ္ဒသင်္ခါတဝါစာယ အဓိပ္ပာယံ ဝိညာပေတိ, သယဉ္စ တာယ ဝိညာယတီတိ ဝစီဝိညတ္တိ. တတ္ထ အဘိက္ကမာဒိဇနကစိတ္တသမုဋ္ဌာနဝါယောဓာတုယာ သဟဇာတရူပသန္ထမ္ဘနသန္ဓာရဏစလိတေသု သဟကာရီကာရဏဘူတော ဖန္ဒမာနကာယဖန္ဒနတံဟေတုကဝါယောဓာတုဝိနိမုတ္တော မဟန္တံ ပါသာဏံ ဥက္ခိပန္တဿ သဗ္ဗထာမေန ဂဟဏကာလေ ဥဿာဟနဝိကာရော ဝိယ ရူပကာယဿ ပရိဖန္ဒနပစ္စယဘာဝေန ဥပလဗ္ဘမာနော ဝိကာရော ကာယဝိညတ္တိ. သာ ဟိ ဖန္ဒမာနကာယေန အဓိပ္ပာယံ ဝိညာပေတိ. န ဟိ ဝိညတ္တိဝိကာရရဟိတေသု ရုက္ခစလနာဒီသု ‘‘ဣဒမေသ ကာရေတီ’’တိ အဓိပ္ပာယဂ္ဂဟဏံ ဒိဋ္ဌန္တိ. ဟတ္ထစလနာဒီသု စ ဖန္ဒမာနကာယဂ္ဂဟဏာနန္တရံ အဝိညာယမာနန္တရေဟိ မနောဒွါရဇဝနေဟိ ဂယှမာနတ္တာ သယဉ္စ ကာယေန ဝိညာယတိ. १३. हालचाल करणाऱ्या शरीराद्वारे जो अभिप्राय प्रकट करतो आणि स्वतः देखील त्या शरीराद्वारे ओळखला जातो, म्हणून त्याला 'कायविज्ञप्ती' म्हणतात. सविज्ञाणक शब्दाने युक्त अशा वाणीद्वारे जो अभिप्राय प्रकट करतो आणि स्वतः देखील त्या वाणीद्वारे ओळखला जातो, म्हणून त्याला 'वचीविज्ञप्ती' म्हणतात. त्यामध्ये, पुढे जाणे इत्यादी क्रिया उत्पन्न करणाऱ्या चित्तसमुत्थान वायूधातूच्या, सहजात रूपांना आधार देणे, धारण करणे आणि हालचाल करणे या क्रियांमध्ये सहकारी कारण बनणारे; हालचाल करणारे शरीर, हालचाल आणि त्या हालचालीचे कारण असणारा वायूधातू यांपासून मुक्त असणारे; एखादा मोठा दगड उचलणाऱ्या व्यक्तीने पूर्ण शक्तीने तो पकडण्याच्या वेळी केलेल्या प्रयत्नांच्या विशेष हावभावाप्रमाणे, रूपकायाच्या हालचालीचे कारण म्हणून उपलब्ध होणारा जो विशेष विकार (हावभाव) आहे, तो 'कायविज्ञप्ती' होय. कारण ती हालचाल करणाऱ्या शरीराद्वारे अभिप्राय प्रकट करते. विज्ञप्ती-विकाराने रहित असणाऱ्या झाडांच्या हालचाली इत्यादींमध्ये 'हा हे कार्य करू इच्छितो' अशा प्रकारचा अभिप्राय ग्रहण केलेला दिसत नाही. आणि हात हलवणे इत्यादी क्रियांमध्ये, हालचाल करणाऱ्या शरीराचे ग्रहण केल्यानंतर लगेचच, न समजणाऱ्या अशा मनोद्वार जवनांद्वारे ग्रहण केले जात असल्यामुळे ती स्वतः देखील शरीराद्वारे ओळखली जाते. ကထံ ပန ဝိညတ္တိဝသေန ဟတ္ထစလနာဒယော ဟောန္တီတိ? ဝုစ္စတေ – ဧကာဝဇ္ဇနဝီထိယံ သတ္တသု ဇဝနေသု သတ္တမဇဝနသမုဋ္ဌာနဝါယောဓာတု ဝိညတ္တိဝိကာရသဟိတာဝ ပဌမဇဝနာဒိသမုဋ္ဌာနာဟိ ဝါယောဓာတူဟိ လဒ္ဓေါပတ္ထမ္ဘာ ဒေသန္တရုပ္ပတ္တိဟေတုဘာဝေန စလယတိ စိတ္တဇံ, ပုရိမဇဝနာဒိသမ္ဘူတာ ပန သန္ထမ္ဘနသန္ဓာရဏမတ္တကရာ တဿ ဥပကာရာယ ဟောန္တီတိ. ယထာ ဟိ သတ္တဟိ ယုဂေဟိ အာကဍ္ဎိတဗ္ဗသကဋေ သတ္တမယုဂယုတ္တာယေဝ ဂေါဏာ ဟေဋ္ဌာ ဆသု ယုဂေသု ယုတ္တဂေါဏေဟိ လဒ္ဓူပတ္ထမ္ဘာ သကဋံ စာလေန္တိ, ပဌမယုဂါဒိယုတ္တာ ပန ဥပတ္ထမ္ဘနသန္ဓာရဏမတ္တမေဝ သာဓေန္တာ တေသံ ဥပကာရာယ ဟောန္တိ, ဧဝံသမ္ပဒမိဒံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. पण विज्ञाप्तीच्या (viññatti) प्रभावाने हात हलवणे इत्यादी क्रिया कशा होतात? उत्तर दिले जाते – एकाच आवर्जन वीथीमध्ये (ekāvajjanavīthi) सात जवनांपैकी (javana) सातव्या जवनापासून उत्पन्न होणारा वायूधातू हा विज्ञाप्ती-विकारासह (viññatti-vikāra) युक्त होऊन, पहिल्या जवनादींपासून उत्पन्न झालेल्या वायूधातूंचे साहाय्य मिळवून, दुसऱ्या ठिकाणी उत्पन्न होण्याच्या कारणाने चित्तज रूपाला (cittaja rūpa) गतिमान करतो. परंतु, पूर्व जवनांपासून उत्पन्न झालेले वायूधातू केवळ ताठरता आणि आधार देण्याचे कार्य करून त्याला साहाय्यभूत ठरतात. ज्याप्रमाणे सात जू (yokes) लावून ओढायच्या गाडीमध्ये, सातव्या जुवाला जुंपलेले बैलच केवळ, खालील सहा जुवांना जुंपलेल्या बैलांचे साहाय्य मिळवून गाडी गतिमान करतात; आणि पहिल्या जुवांना जुंपलेले बैल केवळ आधार आणि तोल सांभाळण्याचे कार्य करून त्यांना साहाय्य करतात, त्याचप्रमाणे हे देखील समजले पाहिजे। ဒေသန္တရုပ္ပတ္တိယေဝ [Pg.201] စေတ္ထ စလနံ ဥပ္ပန္နဒေသတော ကေသဂ္ဂမတ္တမ္ပိ ဓမ္မာနံ သင်္ကမနာဘာဝတော. ဣတရထာ နေသံ အဗျာပါရကတာ, ခဏိကတာ စ န သိယာ. ဒေသန္တရုပ္ပတ္တိဟေတုဘာဝေါတိ စ ယထာ အတ္တနာ သဟဇရူပါနိ ဟေဋ္ဌိမဇဝနသမုဋ္ဌိတရူပေဟိ ပတိဋ္ဌိတဋ္ဌာနတော အညတ္ထ ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ, ဧဝံ တေဟိ သဟ တတ္ထ ဥပ္ပတ္တိယေဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ, ဧတ္ထ ပန စိတ္တဇေ စလိတေ တံသမ္ဗန္ဓေန ဣတရမ္ပိ စလတိ နဒီသောတေ ပက္ခိတ္တသုက္ခဂေါမယပိဏ္ဍံ ဝိယ. တထာ စလယိတုံ အသက္ကောန္တိ ယောပိ ပဌမဇဝနာဒိသမုဋ္ဌာနဝါယောဓာတုယော ဝိညတ္တိဝိကာရသဟိတာယေဝ ယေန ဒိသာဘာဂေန အယံ အဘိက္ကမာဒီနိ ပဝတ္တေတုကာမော, တဒဘိမုခဘာဝဝိကာရသမ္ဘဝတော. ဧဝဉ္စ ကတွာ မနောဒွါရာဝဇ္ဇနဿပိ ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကတ္တံ ဝက္ခတိ. ဝစီဘေဒကရစိတ္တသမုဋ္ဌာနပထဝီဓာတုယာ အက္ခရုပ္ပတ္တိဋ္ဌာနဂတဥပါဒိန္နရူပေဟိ သဟ ဃဋ္ဋနပစ္စယဘူတော ဧကော ဝိကာရော ဝစီဝိညတ္တိ. ယံ ပနေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ ကာယဝိညတ္တိယံ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. येथे 'हालचाल' (calana) म्हणजे केवळ दुसऱ्या ठिकाणी उत्पन्न होणेच होय; कारण परमार्थ धर्मांचे मूळ उत्पन्न झालेल्या ठिकाणाहून केसाच्या अग्राएवढेही विस्थापन (संक्रमण) होत नाही. अन्यथा, त्यांचे निष्क्रियत्व (abyāpārakatā) आणि क्षणिकत्व (khaṇikatā) सिद्ध होणार नाही. 'दुसऱ्या ठिकाणी उत्पन्न होण्याचे कारण' म्हणजे – ज्याप्रमाणे स्वतःसह उत्पन्न होणारी सहजात रूपे (sahaja-rūpa), खालच्या जवनांपासून उत्पन्न झालेल्या रूपांमुळे, मूळ प्रस्थापित स्थानाऐवजी दुसऱ्या ठिकाणी उत्पन्न होतात; त्याचप्रमाणे त्यांच्यासोबत तेथे उत्पन्न होणे, असेच समजले पाहिजे. येथे चित्तज रूप गतिमान झाले असता, त्याच्याशी संबंधित असलेले इतर (कर्मज, ऋतुज, आहारज) रूप देखील गतिमान होते; जसे नदीच्या प्रवाहात टाकलेला सुक्या शेणाचा गोळा वाहू लागतो. त्याप्रमाणे गतिमान करण्यास असमर्थ असले तरी, पहिल्या जवनादींपासून उत्पन्न झालेले वायूधातू देखील विज्ञाप्ती-विकाराने युक्तच असतात; कारण ज्या देशाच्या (दिशेच्या) भागाने हा मनुष्य पुढे जाणे इत्यादी क्रिया करू इच्छितो, त्या दिशेकडे अभिमुख होण्याचा विकार उत्पन्न होतो. असे मानल्यानेच, पुढे मनोध्वारावर्जनालाही (manodvārāvajjana) विज्ञाप्ती उत्पन्न करणारे म्हटले जाईल. वाणीचा भेद करणाऱ्या (शब्दांचे उच्चारण करणाऱ्या) चित्तापासून उत्पन्न झालेल्या पृथ्वीधातूचा, अक्षरांच्या उत्पत्तीच्या ठिकाणी असलेल्या उपादिन्न रूपांशी (upādinna-rūpa) जो परस्पर आघात होतो, त्या आघाताला कारणीभूत असणारा एक विशिष्ट विकार म्हणजे 'वाक्-विज्ञाप्ती' (vacīviññatti) होय. या संदर्भात जे काही सांगायचे आहे, ते काय-विज्ञाप्तीमध्ये (kāyaviññatti) सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे। အယံ ပန ဝိသေသော – ယထာ တတ္ထ ‘‘ဖန္ဒမာနကာယဂ္ဂဟဏာနန္တရ’’န္တိ ဝုတ္တံ, ဧဝမိဓ ‘‘သုယျမာနသဒ္ဒသဝနာနန္တရ’’န္တိ ယောဇေတဗ္ဗံ. ဣဓ စ သန္ထမ္ဘနာဒီနံ အဘာဝတော သတ္တမဇဝနသမုဋ္ဌိတာတျာဒိနယော န လဗ္ဘတိ. ဃဋ္ဋနေန ဟိ သဒ္ဓိံယေဝ သဒ္ဒေါ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ဃဋ္ဋနဉ္စ ပဌမဇဝနာဒီသုပိ လဗ္ဘတေဝ. ဧတ္ထ စ ယထာ ဥဿာပေတွာ ဗဒ္ဓဂေါသီသတာလပဏ္ဏာဒိရူပါနိ ဒိသွာ တဒနန္တရပ္ပဝတ္တာယ အဝိညာယမာနန္တရာယ မနောဒွါရဝီထိယာ ဂေါသီသာဒီနံ ဥဒကသဟစာရိတပ္ပကာရံ သညာဏံ ဂဟေတွာ ဥဒကဂ္ဂဟဏံ ဟောတိ, ဧဝံ ဝိပ္ဖန္ဒမာနသမုစ္စာရိယမာနကာယသဒ္ဒေ ဂဟေတွာ တဒနန္တရပ္ပဝတ္တာယ အဝိညာယမာနန္တရာယ မနောဒွါရဝီထိယာ ပုရိမသိဒ္ဓသမ္ဗန္ဓူပနိဿယာယ သာဓိပ္ပာယဝိကာရဂ္ဂဟဏံ ဟောတီတိ အယံ ဒွိန္နံ သာဓာရဏာ ဥပမာ. परंतु हा विशेष फरक आहे – ज्याप्रमाणे तेथे (काय-विज्ञाप्तीमध्ये) 'कंपायमान शरीराचे ग्रहण केल्यानंतर लगेचच' असे म्हटले आहे, त्याचप्रमाणे येथे 'ऐकू येणाऱ्या शब्दाचे श्रवण केल्यानंतर लगेचच' असे योजावे. आणि येथे (वाक्-विज्ञाप्तीमध्ये) ताठरता इत्यादींचा अभाव असल्यामुळे, 'सातव्या जवनापासून उत्पन्न होणारा' इत्यादी नियम लागू होत नाही. कारण आघाताबरोबरच लगेच शब्द उत्पन्न होतो. आणि आघात हा पहिल्या जवनादींमध्ये देखील प्राप्त होतोच. आणि येथे ज्याप्रमाणे, उंचावून बांधलेले बैलाचे डोके किंवा ताडाचे पान इत्यादी रूपे पाहून, त्यानंतर लगेचच उत्पन्न होणाऱ्या आणि न समजणाऱ्या अंतराच्या मनोध्वार वीथीद्वारे (manodvāravīthi), बैलाचे डोके इत्यादींचा पाण्याशी असलेला संबंध ओळखून पाण्याचे ग्रहण (ज्ञान) होते; त्याचप्रमाणे, हलणारे शरीर आणि उच्चारले जाणारे शब्द यांचे ग्रहण करून, त्यानंतर लगेचच उत्पन्न होणाऱ्या आणि न समजणाऱ्या अंतराच्या मनोध्वार वीथीद्वारे, पूर्वी प्रस्थापित झालेल्या संबंधाच्या उपनिष्रयाने (upanissaya - प्रबळ कारणाने) अभिप्रायासह विकाराचे ग्रहण होते. ही दोन्ही (काय-विज्ञाप्ती व वाक्-विज्ञाप्ती) विज्ञाप्तींची सामायिक उपमा आहे। ၁၄. လဟုဘာဝေါ [Pg.202] လဟုတာ. မုဒုဘာဝေါ မုဒုတာ. ကမ္မညဘာဝေါ ကမ္မညတာ. ယထာက္ကမဉ္စေတာ အရောဂိနော ဝိယ ရူပါနံ အဂရုတာ သုပရိမဒ္ဒိတစမ္မဿ ဝိယ အကထိနတာ သုဓန္တသုဝဏ္ဏဿ ဝိယ သရီရကိရိယာနံ အနုကူလဘာဝေါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. အညမညံ အဝိဇဟန္တဿပိ ဟိ လဟုတာဒိတ္တယဿ တံတံဝိကာရာဓိကရူပေဟိ နာနတ္တံ ဝုစ္စတိ, ဒန္ဓတ္တကရဓာတုက္ခောဘပ္ပဋိပက္ခပစ္စယသမုဋ္ဌာနော ဟိ ရူပဝိကာရော လဟုတာ. ထဒ္ဓတ္တကရဓာတုက္ခောဘပ္ပဋိပက္ခပစ္စယသမုဋ္ဌာနော မုဒုတာ. သရီရကိရိယာနံ အနနုကူလဘာဝကရဓာတုက္ခောဘပ္ပဋိပက္ခပစ္စယသမုဋ္ဌာနော ကမ္မညတာတိ. १४. हलकेपणा म्हणजे 'लघुता' (lahutā). मऊपणा म्हणजे 'मृदुता' (mudutā). कर्मक्षम असणे म्हणजे 'कर्मण्यता' (kammaññatā). अनुक्रमे या तिन्हींना – निरोगी माणसाप्रमाणे रूपांचा अ-जडपणा (हलकेपणा), चांगल्या प्रकारे मळलेल्या चामड्याप्रमाणे कठीणपणाचा अभाव (मऊपणा), आणि शुद्ध केलेल्या सोन्याप्रमाणे शारीरिक क्रियांसाठी अनुकूल असणे, असे समजले पाहिजे. जरी हे लघुतादी तीन धर्म एकमेकांना सोडून राहत नसले, तरी त्या त्या विकारांच्या अधिकतेमुळे त्यांच्यात भिन्नता सांगितली जाते. जडत्व निर्माण करणाऱ्या धातूंच्या क्षोभाच्या (बिघाडाच्या) विरोधी कारणांमुळे उत्पन्न होणारा रूपाचा विकार म्हणजे 'लघुता' होय. कठीणपणा निर्माण करणाऱ्या धातूंच्या क्षोभाच्या विरोधी कारणांमुळे उत्पन्न होणारा रूपाचा विकार म्हणजे 'मृदुता' होय. शारीरिक क्रियांना प्रतिकूलता निर्माण करणाऱ्या धातूंच्या क्षोभाच्या विरोधी कारणांमुळे उत्पन्न होणारा रूपाचा विकार म्हणजे 'कर्मण्यता' होय। ၁၅. ဥပစယနံ ဥပစယော, ပဌမစယောတျတ္ထော ‘‘ဥပညတ္တ’’န္တျာဒီသု ဝိယ ဥပ-သဒ္ဒဿ ပဌမတ္ထဇောတနတော. သန္တာနော သန္တတိ, ပဗန္ဓောတျတ္ထော. တတ္ထ ပဋိသန္ဓိတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ စက္ခာဒိဒသကာနံ ဥပ္ပတ္တိ, ဧတ္ထန္တရေ ရူပုပ္ပာဒေါ ဥပစယော နာမ. တတော ပရံ သန္တတိ နာမ. ယထာသကံ ခဏမတ္တဋ္ဌာယီနံ ရူပါနံ နိရောဓာဘိမုခဘာဝဝသေန ဇီရဏံ ဇရာ, သာယေဝ ဇရတာ, နိစ္စဓုဝဘာဝေန န ဣစ္စံ အနုပဂန္တဗ္ဗန္တိ အနိစ္စံ, တဿ ဘာဝေါ အနိစ္စတာ, ရူပပရိဘေဒေါ. လက္ခဏရူပံ နာမ ဓမ္မာနံ တံတံအဝတ္ထာဝသေန လက္ခဏဟေတုတ္တာ. १५. एकत्र येणे किंवा प्रथम उत्पन्न होणे म्हणजे 'उपचय' (upacaya). 'उपज्ञत्त' (upaññatta) इत्यादी शब्दांप्रमाणे येथे 'उप' हा उपसर्ग 'प्रथम' हा अर्थ दर्शवतो म्हणून याचा अर्थ 'प्रथम उत्पत्ती' असा आहे. विस्तार किंवा सातत्य म्हणजे 'संतती' (santati), ज्याचा अर्थ अखंड प्रवाह असा आहे. त्यामध्ये, प्रतिसंधीपासून (paṭisandhi) घेऊन जोपर्यंत चक्षु-दशक (cakkhu-dasaka) इत्यादी रूपांची उत्पत्ती होते, त्या दरम्यानच्या काळातील रूपांच्या उत्पत्तीला 'उपचय' म्हणतात. त्यानंतरच्या रूपांच्या उत्पत्तीला 'संतती' म्हणतात. आपापल्या क्षणापुरतीच टिकणाऱ्या रूपांच्या, निरोधाकडे (नाशाकडे) जाण्याच्या प्रवृत्तीमुळे होणारे क्षीण होणे म्हणजे 'जरा' (jarā) होय, तिलाच 'जरता' (jaratā) म्हणतात. नित्य व ध्रुव नसल्यामुळे जे नित्य मानले जाऊ शकत नाही ते 'अनित्य' (anicca) होय, आणि त्याचा भाव म्हणजे 'अनित्यता' (aniccatā) होय, ज्याचा अर्थ रूपांचा विनाश असा आहे. धर्मांच्या त्या त्या अवस्थेनुसार त्यांच्या लक्षणांचे कारण असल्यामुळे याला 'लक्षणरूप' (lakkhaṇa-rūpa) म्हणतात। ၁၆. ဇာတိရူပမေဝါတိ ပဋိသန္ဓိတော ပဋ္ဌာယ ရူပါနံ ခဏေ ခဏေ ဥပ္ပတ္တိဘာဝတော ဇာတိသင်္ခါတံ ရူပုပ္ပတ္တိဘာဝေန စတုသန္တတိရူပပ္ပဋိဗဒ္ဓဝုတ္တိတ္တာ ရူပသမ္မတဉ္စ ဇာတိရူပမေဝ ဥပစယသန္တတိဘာဝေန ပဝုစ္စတိ ပဌမုပရိနိစ္စတ္တသင်္ခါတပ္ပဝတ္တိအာကာရဘေဒတော ဝေနေယျဝသေန ‘‘ဥပစယော သန္တတီ’’တိ (ဓ. သ. ၆၄၂) ဝိဘဇိတွာ ဝုတ္တတ္တာ. ဧဝဉ္စ ကတွာ တာသံ နိဒ္ဒေသေ အတ္ထတော အဘေဒံ ဒဿေတုံ ‘‘ယော အာယတနာနံ အာစယော, သော ရူပဿ ဥပစယော. ယော ရူပဿ ဥပစယော, သာ [Pg.203] ရူပဿ သန္တတီ’’တိ (ဓ. သ. ၆၄၁-၆၄၂) ဝုတ္တံ. ဧကာဒသဝိဓမ္ပီတိ သဘာဂသင်္ဂဟဝသေန ဧကာဒသပ္ပကာရမ္ပိ. १६. 'जातिरूपच' (jātirūpa) – प्रतिसंधीपासून घेऊन रूपांच्या प्रत्येक क्षणी उत्पन्न होण्याच्या स्वभावामुळे, 'जाती' संज्ञेने ओळखल्या जाणाऱ्या रूपाच्या उत्पत्तीच्या रूपाने, चार प्रकारच्या संतती रूपांशी (catusantati-rūpa) संबंधित असल्यामुळे आणि रूप म्हणून संमत असल्यामुळे, जातिरूपालाच 'उपचय' आणि 'संतती' या रूपाने म्हटले जाते. प्रथम उत्पत्ती, त्यानंतरची उत्पत्ती आणि पूर्णता या प्रवृत्तीच्या आकारातील भेदांमुळे, विनेय जनांच्या (veneyya - उपदेशास पात्र व्यक्तींच्या) आधारे 'उपचय आणि संतती' असे विभागून सांगितले गेले आहे. असे करून, त्यांच्या निर्देशात अर्थाच्या दृष्टीने अभेद (एकता) दर्शवण्यासाठी – 'जो आयतनांचा उपचय (आचय) आहे, तो रूपाचा उपचय आहे. जो रूपाचा उपचय आहे, ती रूपाची संतती आहे' असे म्हटले आहे. 'अकरा प्रकारचे देखील' म्हणजे – समान भागांच्या संग्रहाच्या दृष्टीने अकरा प्रकारांचे असले तरी। ၁၇. စတ္တာရော ဘူတာ, ပဉ္စ ပသာဒါ, စတ္တာရော ဝိသယာ, ဒုဝိဓော ဘာဝေါ, ဟဒယရူပမိစ္စပိ ဣဒံ ဇီဝိတာဟာရရူပေဟိ ဒွီဟိ သဟ အဋ္ဌာရသဝိဓံ, တထာ ပရိစ္ဆေဒေါ စ ဒုဝိဓာ ဝိညတ္တိ, တိဝိဓော ဝိကာရော, စတုဗ္ဗိဓံ လက္ခဏန္တိ ရူပါနံ ပရိစ္ဆေဒဝိကာရာဒိဘာဝံ ဝိနာ ဝိသုံ ပစ္စယေဟိ အနိဗ္ဗတ္တတ္တာ ဣမေ အနိပ္ဖန္နာ ဒသ စေတိ အဋ္ဌဝီသတိဝိဓံ ဘဝေ. १७. चार महाभूत (cattāro bhūtā), पाच प्रसाद रूप (pañca pasādā), चार विषय रूप (cattāro visayā), दोन प्रकारचे भाव रूप (duvidho bhāvo), आणि हृदय रूप (hadayarūpa) – हे जीवित रूप आणि आहार रूप या दोन्हींसह अठरा प्रकारचे (निष्पन्न रूप) होतात. तसेच, परिच्छेद रूप (आकाश धातू), दोन प्रकारची विज्ञाप्ती रूपे, तीन प्रकारचे विकार रूप, आणि चार प्रकारचे लक्षण रूप – हे रूपांच्या परिच्छेद, विकार इत्यादी भावाव्यतिरिक्त स्वतंत्रपणे प्रत्ययांद्वारे (paccaya - कारणांद्वारे) उत्पन्न होत नसल्यामुळे, हे दहा 'अनिष्पन्न' (anipphanna) रूप मिळून एकूण अठ्ठावीस प्रकारचे रूप अस्तित्वात असतात। ရူပသမုဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रूपसमुद्देश वर्णन समाप्त झाले। ရူပဝိဘာဂဝဏ္ဏနာ रूपविभाग वर्णन ၁၈. ဣဒါနိ ယထာဥဒ္ဒိဋ္ဌရူပါနံ ဧကဝိဓာဒိနယဒဿနတ္ထံ ‘‘သဗ္ဗဉ္စ ပနေတ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. သမ္ပယုတ္တဿ အလောဘာဒိဟေတုနော အဘာဝါ အဟေတုကံ. ယထာသကံ ပစ္စယဝန္တတာယ သပ္ပစ္စယံ. အတ္တာနံ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တေဟိ ကာမာသဝါဒီဟိ သဟိတတ္တာ သာသဝံ. ပစ္စယေဟိ အဘိသင်္ခတတ္တာ သင်္ခတံ. ဥပါဒါနက္ခန္ဓသင်္ခါတေ လောကေ နိယုတ္တတာယ လောကိယံ. ကာမတဏှာယ အဝစရိတတ္တာ ကာမာဝစရံ. အရူပဓမ္မာနံ ဝိယ ကဿစိ အာရမ္မဏဿ အဂ္ဂဟဏတော နာဿ အာရမ္မဏန္တိ အနာရမ္မဏံ. တဒင်္ဂါဒိဝသေန ပဟာတဗ္ဗတာဘာဝတော အပ္ပဟာတဗ္ဗံ. ဣတိ-သဒ္ဒေါ ပကာရတ္ထော, တေန ‘‘အဗျာကတ’’န္တျာဒိကံ သဗ္ဗံ ဧကဝိဓနယံ သင်္ဂဏှာတိ. १८. आता, वर निर्दिष्ट केलेल्या रूपांच्या एकविध (एक प्रकारच्या) इत्यादी पद्धती दाखवण्यासाठी 'सब्बञ्च पनेतं' (आणि हे सर्व) इत्यादी वाक्य म्हटले आहे. संप्रयुक्त (सहगामी) असलेल्या अलोभ इत्यादी हेतूंच्या अभावामुळे हे रूप 'अहेतुक' आहे. आपापल्या प्रत्ययांनी (कारणांनी) युक्त असल्यामुळे ते 'सप्रत्यय' आहे. स्वतःला अनुसरून उत्पन्न होणाऱ्या कामासव इत्यादी आसवांनी युक्त असल्यामुळे ते 'सास्रव' आहे. प्रत्ययांद्वारे अभिसंस्कृत (निर्मित) असल्यामुळे ते 'संस्कृत' आहे. उपादानस्कंध नावाच्या लोकात समाविष्ट असल्यामुळे ते 'लौकिक' आहे. कामतृष्णेचे विचरण्याचे स्थान असल्यामुळे ते 'कामावचर' आहे. अरूप धर्मांप्रमाणे कोणत्याही आलंबनाचे (विषयाचे) ग्रहण न करत असल्यामुळे, याचे कोणतेही आलंबन नाही, म्हणून याला 'अनालंबन' म्हटले जाते. तदंग इत्यादी प्रहाणाने नष्ट करण्याजोगे नसल्यामुळे याला 'अप्रहातव्य' म्हटले जाते. येथे 'इति' शब्द प्रकारवाचक आहे, ज्यामुळे 'अव्याकृत' इत्यादी सर्व एकविध पद्धतींचा यात संग्रह होतो. ၁၉. အဇ္ဈတ္တိကရူပံ အတ္တဘာဝသင်္ခါတံ အတ္တာနံ အဓိကိစ္စ ဥဒ္ဒိဿ ပဝတ္တတ္တာ. ကာမံ အညေပိ ဟိ အဇ္ဈတ္တသမ္ဘူတာ အတ္ထိ, ရုဠှီဝသေန ပန စက္ခာဒိကံယေဝ အဇ္ဈတ္တိကံ. အထ ဝါ ‘‘ယဒိ မယံ န ဟောမ, တွံ ကဋ္ဌကလိင်္ဂရူပမော ဘဝိဿသီ’’တိ ဝဒန္တာ ဝိယ အတ္တဘာဝဿ [Pg.204] သာတိသယံ ဥပကာရတ္တာ စက္ခာဒီနေဝ ဝိသေသတော အဇ္ဈတ္တိကာနိ နာမ. အတ္တသင်္ခါတံ ဝါ စိတ္တံ အဓိကိစ္စ တဿ ဒွါရဘာဝေန ပဝတ္တတီတိ အဇ္ဈတ္တံ, တဒေဝ အဇ္ဈတ္တိကံ. တတော ဗဟိဘူတတ္တာ ဣတရံ တေဝီသတိဝိဓံ ဗာဟိရရူပံ. १९. आत्मभाव (शरीर) नावाच्या आत्म्याला अधिकृत करून (त्याच्याशी संबंधित होऊन) प्रवृत्त होत असल्यामुळे याला 'आध्यात्मिक रूप' म्हणतात. जरी इतरही आध्यात्मिक (शरीरात उत्पन्न होणारे) धर्म आहेत, तरी रूढीने केवळ चक्षु इत्यादींनाच 'आध्यात्मिक' म्हटले जाते. किंवा, 'जर आम्ही नसतो, तर तू लाकडाच्या ओंडक्यासारखा झाला असतास' असे जणू काही म्हणत असल्यासारखे, आत्मभावाला (शरीराला) अत्यंत उपकारक असल्यामुळे चक्षु इत्यादींनाच विशेषतः 'आध्यात्मिक' म्हटले जाते. किंवा 'आत्मा' नावाच्या चित्ताला अधिकृत करून, त्याचे द्वार म्हणून प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्याला 'आध्यात्मिक' म्हटले जाते, आणि तेच 'आध्यात्मिक' आहे. त्या व्यतिरिक्त बाह्य असल्यामुळे, इतर तेवीस प्रकारचे रूप 'बाह्य रूप' म्हटले जाते. ၂၀. ဣတရံ ဗာဝီသတိဝိဓံ အဝတ္ထုရူပံ. २०. इतर बावीस प्रकारचे रूप 'अवस्तू रूप' (वस्तू नसलेले रूप) आहे. ၂၂. အဋ္ဌဝိဓမ္ပိ ဣန္ဒြိယရူပံ ပဉ္စဝိညာဏေသု လိင်္ဂါဒီသု သဟဇရူပပရိပါလနေ စ အာဓိပစ္စယောဂတော. ပသာဒရူပဿ ဟိ ပဉ္စဝိဓဿ စက္ခုဝိညာဏာဒီသု အာဓိပစ္စံ အတ္တနော ပဋုမန္ဒာဒိဘာဝေန တေသမ္ပိ ပဋုမန္ဒာဒိဘာဝါပါဒနတော. ဘာဝဒွယဿာပိ ဣတ္ထိလိင်္ဂါဒီသု အာဓိပစ္စံ ယထာသကံ ပစ္စယေဟိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနမ္ပိ တေသံ ယေဘုယျေန သဘာဝကသန္တာနေယေဝ တံတဒါကာရေန ဥပ္ပဇ္ဇနတော, န ပန ဣန္ဒြိယပစ္စယဘာဝတော. ဇီဝိတဿ စ ကမ္မဇပရိပါလနေ အာဓိပစ္စံ တေသံ ယထာသကံ ခဏဋ္ဌာနဿ ဇီဝိတိန္ဒြိယပ္ပဋိဗဒ္ဓတ္တာ. သယဉ္စ အတ္တနာ ဌပိတဓမ္မသမ္ဗန္ဓေနေဝ ပဝတ္တတိ နာဝိကော ဝိယ. २२. आठ प्रकारचे रूप 'इंद्रिय रूप' म्हटले जाते, कारण पाच विज्ञानांमध्ये, लिंग (स्त्री-पुरुष भाव) इत्यादींमध्ये आणि सहजात रूपांच्या संरक्षणात त्यांचे अधिपत्य (प्रभुत्व) असते. कारण पाच प्रकारच्या प्रसादरूपांचे चक्षुविज्ञान इत्यादींवर अधिपत्य असते; स्वतःच्या तीक्ष्ण किंवा मंद असण्याने ते त्या विज्ञानांनाही तीक्ष्ण किंवा मंद बनवतात. दोन्ही भावरूपांचेही स्त्रीलिंग इत्यादींवर अधिपत्य असते; जरी ते आपापल्या प्रत्ययांनी उत्पन्न होत असले, तरी बहुधा ते स्वतःच्या स्वभावाच्या संततीमध्येच त्या त्या आकाराने उत्पन्न होतात, परंतु इंद्रियप्रत्ययभावामुळे नाही. आणि जीवितरूपाचे कर्मज रूपांच्या संरक्षणावर अधिपत्य असते, कारण त्या कर्मज रूपांचे आपापल्या क्षणापुरते टिकून राहणे हे जीवितेंद्रियावर अवलंबून असते. आणि ते स्वतः आपल्याद्वारे प्रस्थापित केलेल्या धर्मांच्या संबंधानेच प्रवृत्त होते, जसे एखादा नावाडी (नाव चालवतो). ၂၃. ဝိသယဝိသယိဘာဝပ္ပတ္တိဝသေန ထူလတ္တာ ဩဠာရိကရူပံ. တတောယေဝ ဂဟဏဿ သုကရတ္တာ သန္တိကေရူပံ အာသန္နရူပံ နာမ. ယော သယံ, နိဿယဝသေန စ သမ္ပတ္တာနံ, အသမ္ပတ္တာနဉ္စ ပဋိမုခဘာဝေါ အညမညပတနံ, သော ပဋိဃော ဝိယာတိ ပဋိဃော. ယထာ ဟိ ပဋိဃာတေ သတိ ဒုဗ္ဗလဿ စလနံ ဟောတိ, ဧဝံ အညမညံ ပဋိမုခဘာဝေ သတိ အရူပသဘာဝတ္တာ ဒုဗ္ဗလဿ ဘဝင်္ဂဿ စလနံ ဟောတိ. ပဋိဃော ယဿ အတ္ထိ တံ သပ္ပဋိဃံ. တတ္ထ သယံ သမ္ပတ္တိ ဖောဋ္ဌဗ္ဗဿ, နိဿယဝသေန သမ္ပတ္တိ ဃာနဇိဝှာကာယဂန္ဓရသာနံ, ဥဘယထာပိ အသမ္ပတ္တိ စက္ခုသောတရူပသဒ္ဒါနန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဣတရံ သောဠသဝိဓံ ဩဠာရိကတာဒိသဘာဝါဘာဝတော သုခုမရူပါဒိကံ. २३. विषय-विषयी भावाच्या प्राप्तीमुळे स्थूल (स्पष्ट) असल्यामुळे याला 'औदारिक रूप' म्हणतात. त्याच स्पष्टतेमुळे ग्रहण करणे सोपे असल्यामुळे याला 'अंतिक रूप' किंवा 'आसन्न रूप' म्हणतात. स्वतः किंवा आश्रयाच्या (महाभूतांच्या) बळाने प्राप्त झालेल्या आणि अप्राप्त असलेल्या रूपांचा जो समोरासमोर येण्याचा भाव किंवा परस्परांवर आदळणे आहे, तो आघातासारखा असल्यामुळे त्याला 'प्रतिघ' म्हणतात. कारण जसे आघात झाल्यावर दुर्बल वस्तूचे कंपन होते, तसेच परस्परांच्या संमुखतेमध्ये अरूप स्वभाव असल्यामुळे दुर्बल असलेल्या भवांगाचे कंपन होते. ज्याला प्रतिघ आहे, ते 'सप्रतिघ' होय. त्यामध्ये, स्वतः प्राप्त होणे हे स्प्रष्टव्याचे आहे; आश्रयाच्या बळाने प्राप्त होणे हे घ्राण, जिव्हा, काय, गंध आणि रसांचे आहे; आणि दोन्ही प्रकारे अप्राप्त असणे हे चक्षु, श्रोत्र, रूप आणि शब्दांचे आहे, असे समजावे. इतर सोळा प्रकारचे रूप औदारिकता इत्यादी स्वभावाचा अभाव असल्यामुळे 'सूक्ष्म रूप' इत्यादी म्हटले जाते. ၂၄. ကမ္မတော [Pg.205] ဇာတံ အဋ္ဌာရသဝိဓံ ဥပါဒိန္နရူပံ တဏှာဒိဋ္ဌီဟိ ဥပေတေန ကမ္မုနာ အတ္တနော ဖလဘာဝေန အာဒိန္နတ္တာ ဂဟိတတ္တာ. ဣတရံ အဂ္ဂဟိတဂ္ဂဟဏေနဒသဝိဓံ အနုပါဒိန္နရူပံ. २४. कर्मापासून उत्पन्न झालेले अठरा प्रकारचे रूप 'उपादिन्न रूप' म्हटले जाते, कारण तृष्णा आणि दृष्टी यांनी युक्त असलेल्या कर्माने स्वतःचे फल म्हणून ते ग्रहण केलेले असते. इतर दहा प्रकारचे रूप 'अनुपादिन्न रूप' म्हटले जाते. ၂၅. ဒဋ္ဌဗ္ဗဘာဝသင်္ခါတေန နိဒဿနေန သဟ ဝတ္တတီတိ သနိဒဿနံ. စက္ခုဝိညာဏဂေါစရဘာဝေါ ဟိ နိဒဿနန္တိ ဝုစ္စတိ တဿ စ ရူပါယတနတော အနညတ္တေပိ အညေဟိ ဓမ္မေဟိ တံ ဝိသေသေတုံ အညံ ဝိယ ကတွာ ဝတ္တုံ ဝဋ္ဋတီတိ သဟ နိဒဿနေန သနိဒဿနန္တိ. ဓမ္မဘာဝသာမညေန ဟိ ဧကီဘူတေသု ဓမ္မေသု ယော နာနတ္တကရော ဝိသေသော, သော အညော ဝိယ ကတွာ ဥပစရိတုံ ယုတ္တော. ဧဝဉှိ အတ္ထဝိသေသာဝဗောဓော ဟောတိ. २५. दर्शनयोग्य भाव असलेल्या 'निदर्शना'सह (दिसण्यासह) जे प्रवृत्त होते, त्याला 'सनिदर्शन' म्हणतात. कारण चक्षुविज्ञानाचा विषय असण्याला 'निदर्शन' असे म्हटले जाते. आणि ते रूपायतनापेक्षा भिन्न नसले तरी, इतर धर्मांपेक्षा त्याला विशेष दर्शवण्यासाठी, ते भिन्न असल्यासारखे करून बोलणे योग्य ठरते, म्हणून निदर्शनासह असण्याला 'सनिदर्शन' म्हणतात. कारण धर्मस्वभावाच्या समानतेमुळे एकरूप झालेल्या धर्मांमध्ये जो भेद निर्माण करणारा विशेष गुण असतो, त्याला भिन्न असल्यासारखे मानून उपचार (लाक्षणिक प्रयोग) करणे योग्य आहे. कारण अशा प्रकारे अर्थाच्या विशेषाचे आकलन होते. ၂၆. အသမ္ပတ္တဝသေနာတိ အတ္တာနံ အသမ္ပတ္တဿ ဂေါစရဿ ဝသေန, အတ္တနာ ဝိသယပ္ပဒေသံ ဝါ အသမ္ပတ္တဝသေန. စက္ခုသောတာနိ ဟိ ရူပသဒ္ဒေဟိ အသမ္ပတ္တာနိ, သယံ ဝါ တာနိ အသမ္ပတ္တာနေဝ အာရမ္မဏံ ဂဏှန္တိ. တေနေတံ ဝုစ္စတိ – २६. 'अप्राप्त वशाने' म्हणजे स्वतःकडे न आलेल्या विषयाच्या प्रभावाने, किंवा स्वतः विषयाच्या ठिकाणी न पोहोचण्याच्या प्रभावाने. कारण चक्षु आणि श्रोत्र हे रूप व शब्दांपर्यंत न पोहोचता, किंवा ते स्वतः अप्राप्त राहूनच आलंबनाचे ग्रहण करतात. म्हणूनच असे म्हटले आहे – ‘‘စက္ခုသောတံ ပနေတေသု, ဟောတာသမ္ပတ္တဂါဟကံ; ဝိညာဏုပ္ပတ္တိဟေတုတ္တာ, သန္တရာဓိကဂေါစရေ. “परंतु या (इंद्रियां) मध्ये चक्षु आणि श्रोत्र हे अप्राप्त विषयाचे ग्रहण करणारे आहेत; कारण अडथळा असलेल्या आणि दूर असलेल्या किंवा मोठ्या विषयांमध्ये विज्ञान उत्पन्न होण्यास ते कारणीभूत ठरतात. ‘‘တထာ ဟိ ဒူရဒေသဋ္ဌံ, ဖလိကာဒိတိရောဟိတံ; မဟန္တဉ္စ နဂါဒီနံ, ဝဏ္ဏံ စက္ခု ဥဒိက္ခတိ. “तसेच, चक्षु हे दूरच्या ठिकाणी असलेले, स्फटिक (काच) इत्यादींनी झाकलेले आणि पर्वतांचे मोठे रूप (वर्ण) पाहू शकते. ‘‘အာကာသာဒိဂတော ကုစ္ဆိ-စမ္မာနန္တရိကောပိ စ; မဟန္တော စ ဃဏ္ဋာဒီနံ, သဒ္ဒေါ သောတဿ ဂေါစရော. “आकाशात इत्यादी दूर अंतरावर असलेला, तसेच पोटाच्या त्वचेच्या आत असलेला, आणि घंटा इत्यादींचा मोठा आवाज श्रोत्राचा विषय बनतो. ‘‘ဂန္တွာ ဝိသယဒေသံ တံ, ဖရိတွာ ဂဏှတီတိ စေ; အဓိဋ္ဌာနဝိဓာနေပိ, တဿ သော ဂေါစရော သိယာ. “जर असे म्हटले की ते (इंद्रिय) त्या विषयाच्या ठिकाणी जाऊन, त्यावर पसरून त्याचे ग्रहण करते, तर अधिष्ठान विधीमध्येही (दिव्य चक्षु-श्रोत्राच्या प्रयोगात) तो त्याचा विषय होईल. ‘‘ဘူတပ္ပဗန္ဓတော သော စေ, ယာတိ ဣန္ဒြိယသန္နိဓိံ; ကမ္မစိတ္တောဇသမ္ဘူတော, ဝဏ္ဏော သဒ္ဒေါ စ စိတ္တဇော. “जर तो विषय महाभूतांच्या परंपरेने इंद्रियांच्या जवळ येतो असे मानले, तर कर्म, चित्त आणि आहारापासून उत्पन्न झालेला वर्ण (रूप) आणि चित्तापासून उत्पन्न झालेला शब्द, ‘‘န တေသံ ဂေါစရာ ဟောန္တိ, န ဟိ သမ္ဘောန္တိ တေ ဗဟိ; ဝုတ္တာ စ အဝိသေသေန, ပါဌေ တံဝိသယာဝ တေ. “हे त्यांचे विषय होणार नाहीत, कारण ते शरीराच्या बाहेर उत्पन्न होत नाहीत. परंतु पाठात (पट्ठान पाळीमध्ये) सामान्यतः त्यांना त्यांचेच विषय म्हटले आहे. ‘‘ယဒိ [Pg.206] စေတံ ဒွယံ အတ္တသမီပံယေဝ ဂဏှတိ; အက္ခိဝဏ္ဏံ တထာ မူလံ, ပဿေယျ ဘမုကဿ စ. “आणि जर हे दोन्ही (चक्षु व श्रोत्र) केवळ स्वतःच्या अगदी जवळ असलेल्या विषयाचेच ग्रहण करत असते, तर डोळ्याचा रंग आणि भुवयांचे मूळ देखील दिसले असते. ‘‘ဒိသာဒေသဝဝတ္ထာနံ, သဒ္ဒဿ န ဘဝေယျ စ; သိယာ စ သရဝေဓိဿ, သကဏ္ဏေ သရပါတန’’န္တိ. “आणि शब्दाच्या दिशा व स्थानाचा निश्चय करता आला नसता; तसेच शब्दवेधी (केवळ आवाज ऐकून बाण मारणाऱ्या) धनुर्धराचा बाण स्वतःच्याच कानात पडला असता.” ဂေါစရဂ္ဂါဟိကရူပံ ဝိညာဏာဓိဋ္ဌိတံ ဟုတွာ တံတံဂေါစရဂ္ဂဟဏသဘာဝတ္တာ. ဣတရံ တေဝီသတိဝိဓံ အဂေါစရဂ္ဂါဟိကရူပံ ဂေါစရဂ္ဂဟဏာဘာဝတော. विज्ञानाचा आश्रय बनून त्या त्या विषयाचे ग्रहण करण्याचा स्वभाव असल्यामुळे याला 'गोचरग्राहक रूप' म्हणतात. इतर तेवीस प्रकारचे रूप विषयाचे ग्रहण न करत असल्यामुळे 'अगोचरग्राहक रूप' म्हटले जाते. ၂၇. ဝဏ္ဏိတဗ္ဗော ဒဋ္ဌဗ္ဗောတိ ဝဏ္ဏော. အတ္တနော ဥဒယာနန္တရံ ရူပံ ဇနေတီတိ ဩဇာ. အဝိနိဗ္ဘောဂရူပံ ကတ္ထစိပိ အညမညံ ဝိနိဘုဉ္ဇနဿ ဝိသုံ ဝိသုံ ပဝတ္တိယာ အဘာဝတော. ရူပလောကေ ဂန္ဓာဒီနံ အဘာဝဝါဒိမတမ္ပိ ဟိ တတ္ထ တတ္ထ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၂၂၇; ဝိဘ. အနုဋီ. ၂၂၇) အာစရိယေဟိ ပဋိက္ခိတ္တမေဝ. २७. जो पाहिला जाऊ शकतो, तो 'वर्ण' (रंग/रूप) होय. स्वतःच्या उत्पत्तीनंतर लगेचच जे रूप उत्पन्न करते, ती 'ओजा' (आहार) होय. कोणत्याही ठिकाणी परस्परांपासून वेगळे होऊन स्वतंत्रपणे प्रवृत्त न होण्याच्या स्वभावामुळे याला 'अविनिर्भोग रूप' म्हणतात. कारण रूपलोकात गंध इत्यादींचा अभाव मानणाऱ्यांचा मतप्रवाह देखील आचार्यांनी त्या त्या ठिकाणी खोडून काढला आहे. ၂၈. ဣစ္စေဝန္တိ ဧတ္ထပိ ဣတိ-သဒ္ဒေါ ပကာရတ္ထော, တေန ဣဓ အနာဂတမ္ပိ သဗ္ဗံ ဒုကတိကာဒိဘေဒံ သင်္ဂဏှာတိ. २८. 'इच्चेवं' (अशा प्रकारे) या पाठात देखील 'इति' शब्द प्रकारवाचक आहे, ज्यामुळे येथे न आलेल्या देखील सर्व द्विक, त्रिक इत्यादी भेदांचा संग्रह होतो. ရူပဝိဘာဂဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रूपविभागवर्णन समाप्त झाले. ရူပသမုဋ္ဌာနနယဝဏ္ဏနာ रूपसमुत्थाननयवर्णन (रूप उत्पत्तीच्या पद्धतीचे वर्णन). ၂၉. ကာနိ ပန တာနိ ကမ္မာဒီနိ, ကထံ, ကတ္ထ, ကဒါ စ ရူပသမုဋ္ဌာနာနီတိ အာဟ ‘‘တတ္ထာ’’တျာဒိ. ပဋိသန္ဓိမုပါဒါယာတိ ပဋိသန္ဓိစိတ္တဿ ဥပ္ပာဒက္ခဏံ ဥပါဒါယ. ခဏေ ခဏေတိ ဧကေကဿ စိတ္တဿ တီသု တီသု ခဏေသု, နိရန္တရမေဝါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အပရေ ပန စိတ္တဿ ဌိတိက္ခဏံ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၂၀ ပကိဏ္ဏကကထာဝဏ္ဏနာ), ဘင်္ဂက္ခဏေ စ ရူပုပ္ပာဒံ (ဝိဘ. မူလဋီ. ၂၀ ပကိဏ္ဏကကထာဝဏ္ဏနာ) ပဋိသေဓေန္တိ. တတ္ထ ကိဉ္စာပိ ဌိတိက္ခဏာဘာဝေ တေသံ ဥပပတ္တိ စေဝ တတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗဉ္စ ဟေဋ္ဌာ ကထိတမေဝ, ဣဓာပိ [Pg.207] ပန ဘင်္ဂက္ခဏေ ရူပုပ္ပာဒါဘာဝေ ဥပပတ္တိယာ တတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗေန စ သဟ သုခဂ္ဂဟဏတ္ထံ သင်္ဂဟေတွာ ဝုစ္စတိ – २९. पण ती कर्मादी कारणे कोणती आहेत? कशा प्रकारे, कोठे आणि केव्हा ती रूपाला उत्पन्न करतात? हे सांगण्यासाठी (आचार्यांनी) 'तथ' इत्यादी म्हटले आहे. 'पटिसन्धिमुपादाय' (प्रतिसंधीला आरंभ करून) म्हणजे प्रतिसंधी चित्ताच्या उत्पादक्षणाला (उत्पत्तीच्या क्षणाला) आरंभ करून. 'क्षणे क्षणे' म्हणजे प्रत्येक चित्ताच्या तिन्ही क्षणांमध्ये, निरंतरच (रूपाला उत्पन्न करते) असे म्हटले आहे. परंतु इतर आचार्य चित्ताचा स्थितीक्षण आणि भंगक्षणी रूपाची उत्पत्ती यांचा निषेध करतात. त्यामध्ये, जरी स्थितीक्षणाचा अभाव असण्याबाबत त्यांची युक्ती आणि त्यावर द्यायचे उत्तर खाली (वीथीविभागात) सांगितलेच आहे, तरीही येथे रूपविभागात भंगक्षणी रूपाच्या उत्पत्तीचा अभाव असण्याबाबतच्या युक्तीसह आणि त्यावर द्यायच्या उत्तरासह सहज समजण्यासाठी (संग्रह गाथेने) संकलित करून सांगितले जात आहे - ‘‘ဥပ္ပန္နုပ္ပဇ္ဇမာနန္တိ, ဝိဘင်္ဂေ ဧဝမာဒိနံ; ဘင်္ဂက္ခဏသ္မိံ ဥပ္ပန္နံ, နော စ ဥပ္ပဇ္ဇမာနကံ. विभंगात 'उप्पन्नं उप्पज्जमानं' (उत्पन्न आणि उत्पद्यमान) इत्यादी पदांच्या विश्लेषणात, भंगक्षणामध्ये (चित्त) 'उत्पन्न' म्हटले जाते, पण 'उत्पद्यमान' म्हटले जात नाही. ‘‘ဥပ္ပဇ္ဇမာနမုပ္ပာဒေ, ဥပ္ပန္နဉ္စာတိအာဒိနာ; ဘင်္ဂုပ္ပာဒါဝ အက္ခာတာ, န စိတ္တဿ ဌိတိက္ခဏော. उत्पादक्षणात (चित्त) 'उत्पद्यमान' आणि 'उत्पन्न' देखील म्हटले जाते. या प्रकारे (भगवंतांनी) केवळ भंग आणि उत्पाद हेच सांगितले आहेत, चित्ताचा स्थितीक्षण सांगितलेला नाही. ‘‘‘ဥပ္ပာဒေါ စ ဝယော စေဝ, အညထတ္တံ ဌိတဿ စ; ပညာယတီ’တိ (အ. နိ. ၃.၄၇) ဝုတ္တတ္တာ, ဌိတိ အတ္ထီတိ စေ မတံ. 'उत्पाद, व्यय आणि स्थिती असलेल्या (संस्कृत धर्माचा) अन्यथाभाव (बदल) दिसून येतो' असे सुत्तामध्ये म्हटलेले असल्यामुळे, जर स्थिती (चित्ताचा स्थितीक्षण) अस्तित्वात आहे असे मानले तर - ‘‘အညထတ္တဿ ဧကသ္မိံ, ဓမ္မေ အနုပလဒ္ဓိတော; ပညာဏဝစနာ စေဝ, ပဗန္ဓဋ္ဌိတိ တတ္ထပိ. एकाच धर्मामध्ये अन्यथाभाव (बदल) आढळत नसल्यामुळे आणि 'प्रकट होणे' (पञ्ञायति) या शब्दावरून, त्या सुत्तात देखील केवळ (रूप-नामाच्या) प्रवाहाची स्थिती (प्रबंधस्थिती) सांगितली आहे. ‘‘ဝုတ္တာ တသ္မာ န စိတ္တဿ, ဌိတိ ဒိဿတိ ပါဠိယံ; အဘိဓမ္မေ အဘာဝေါပိ, နိသေဓောယေဝ သဗ္ဗထာ. म्हणून पाळीमध्ये चित्ताची स्थिती दिसून येत नाही. अभिधम्मात तिचा अभाव असणे हा सर्व प्रकारे (स्थितीक्षणाचा) निषेधच आहे. ‘‘ယဒါ သမုဒယော ယဿ, နိရုဇ္ဈတိ တဒါဿ ကိံ; ဒုက္ခမုပ္ပဇ္ဇတီတျေတ္ထ, ပဉှေ နောတိ နိသေဓတော. 'ज्या वेळी ज्याचा समुदय निरुद्ध होतो, त्या वेळी त्याला दुःख उत्पन्न होते काय?' या प्रश्नाचे उत्तर 'नाही' असे देऊन निषेध केल्यामुळे - ‘‘ရူပုပ္ပာဒေါ န ဘင်္ဂသ္မိံ, တသ္မာ သဗ္ဗေပိ ပစ္စယာ; ဥပ္ပာဒေယေဝ စိတ္တဿ, ရူပဟေတူတိ ကေစန. भंगक्षणात रूपाची उत्पत्ती होत नाही. म्हणून सर्वच (कर्म, चित्त, ऋतु, आहार हे) प्रत्यय चित्ताच्या उत्पादक्षणातच रूपाचे हेतू (उत्पादक) होतात, असे काही आचार्य म्हणतात. ‘‘ဝုစ္စတေ တတ္ထ ဧကသ္မိံ, ဓမ္မေယေဝ ယထာ မတာ; ဥပ္ပာဒါဝတ္ထတော ဘိန္နာ, ဘင်္ဂါဝတ္ထာ တထေဝ တု. त्यावर उत्तर दिले जाते - ज्याप्रमाणे एकाच धर्मामध्ये उत्पाद-अवस्थेपेक्षा भिन्न अशी भंग-अवस्था मानली जाते, त्याचप्रमाणे - ‘‘ဘင်္ဂဿာဘိမုခါဝတ္ထာ, ဣစ္ဆိတဗ္ဗာ အယံ ဌိတိ; နယဒဿနတော ဧသာ, ဝိဘင်္ဂေ န တု ဒေသိတာ. भंगोन्मुख अवस्था (भंगक्षणाकडे झुकलेली अवस्था) हीच स्थिती मानली पाहिजे. परंतु विभंगात केवळ नय दाखवण्यासाठी (मिगपद्वलञ्चन न्यायाने) ती सांगितलेली नाही. ‘‘လက္ခဏံ သင်္ခတဿေဝ, ဝတ္တုမုပ္ပာဒအာဒိနံ; ဒေသိတတ္တာ န တတ္ထာပိ, ပဗန္ဓဿ ဌိတီရိတာ. केवळ संस्कृत धर्माचे लक्षण सांगण्यासाठी उत्पाद इत्यादी पदांचा उपदेश केला असल्यामुळे, त्या सुत्तात देखील प्रवाहाची स्थिती सांगितलेली नाही असे नाही (म्हणजे प्रवाहाची स्थिती सांगितलीच आहे). ‘‘ဥပသဂ္ဂဿ ဓာတူနမတ္ထေယေဝ ပဝတ္တိတော; ပညာယတီတိ စေတဿ, အတ္ထော ဝိညာယတေ ဣတိ. 'पञ्ञायति' या पदातील 'प' हा उपसर्ग धातूच्या अर्थाचाच बोध करत असल्यामुळे, 'पञ्ञायति' या शब्दाचा अर्थ 'जाणले जाते' (विञ्ञायति) असाच होतो. ‘‘ဘင်္ဂေ [Pg.208] ရူပဿ နုပ္ပာဒေါ, စိတ္တဇာနံ ဝသေန ဝါ; အာရုပ္ပံဝါဘိသန္ဓာယ, ဘာသိတော ယမကဿ ဟိ. भंगक्षणात रूपाची उत्पत्ती न होणे हे एकतर चित्तज रूपांच्या अपेक्षेने सांगितले आहे, किंवा अरूप भूमीला उद्देशून सांगितले आहे. कारण यमकाचा - ‘‘သဘာဝေါယံ ယထာလာဘ-ယောဇနာတိ တတော နဟိ; န စိတ္တဋ္ဌိတိ ဘင်္ဂေ စ, န ရူပဿ အသမ္ဘဝေါ’’တိ. हा स्वभावच आहे की तेथे यथालाभयोजना (मिळेल त्या अर्थाची जुळणी) केली जाते. म्हणून चित्ताची स्थिती नाही असे नाही (ती आहेच) आणि भंगक्षणात रूपाची उत्पत्ती अशक्य आहे असेही नाही (ती शक्यच आहे). ၃၁. ရူပဝိရာဂဘာဝနာနိဗ္ဗတ္တတ္တာ ဟေတုနော တဗ္ဗိဓုရတာယ, အနောကာသတာယ စ အရူပဝိပါကာ, ရူပဇနနေ ဝိသေသပစ္စယေဟိ ဈာနင်္ဂေဟိ သမ္ပယောဂါဘာဝတော ဒွိပဉ္စဝိညာဏာနိ စာတိ စုဒ္ဒသ စိတ္တာနိ ရူပံ န သမုဋ္ဌာပေန္တီတိ ဝုတ္တံ ‘‘အာရုပ္ပဝိပါကဒွိပဉ္စဝိညာဏဝဇ္ဇိတ’’န္တိ. ပဋိသန္ဓိစိတ္တံ, ပန စုတိစိတ္တဉ္စ ဧကူနဝီသတိ ဘဝင်္ဂဿေဝ အန္တောဂဓတ္တာ စိတ္တန္တရံ န ဟောတီတိ န တဿ ဝဇ္ဇနံ ကတံ. ကိဉ္စာပိ န ကတံ, ပစ္ဆာဇာတပစ္စယရဟိတံ, ပန အာဟာရာဒီဟိ စ အနုပတ္ထဒ္ဓံ ဒုဗ္ဗလဝတ္ထုံ နိဿာယ ပဝတ္တတ္တာ, အတ္တနော စ အာဂန္တုကတာယ ကမ္မဇရူပေဟိ စိတ္တသမုဋ္ဌာနရူပါနံ ဌာနံ ဂဟေတွာ ဌိတတ္တာ စ ပဋိသန္ဓိစိတ္တံ ရူပသမုဋ္ဌာပကံ န ဟောတိ. စုတိစိတ္တေ ပန အဋ္ဌကထာယံ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၆၃၆; ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၆ ပကိဏ္ဏကကထာ) တာဝ ‘‘ဝူပသန္တဝဋ္ဋမူလသ္မိံ သန္တာနေ သာတိသယံ သန္တဝုတ္တိတာယ ခီဏာသဝဿေဝ စုတိစိတ္တံ ရူပံ န သမုဋ္ဌာပေတီ’’တိ (ဓ. သ. မူလဋီ. ၆၃၆) ဝုတ္တံ. အာနန္ဒာစရိယာဒယော ပန ‘‘သဗ္ဗေသမ္ပိ စုတိစိတ္တံ ရူပံ န သမုဋ္ဌာပေတီ’’တိ ဝဒန္တိ. ဝိနိစ္ဆယော ပန နေသံ သင်္ခေပတော မူလဋီကာဒီသု, ဝိတ္ထာရတော စ အဘိဓမ္မတ္ထဝိကာသိနိယံ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပဌမဘဝင်္ဂမုပါဒါယာတိ ပဋိသန္ဓိယာ အနန္တရနိဗ္ဗတ္တပဌမဘဝင်္ဂတော ပဋ္ဌာယ. ဇာယန္တမေဝ သမုဋ္ဌာပေတိ, န ပန ဌိတံ, ဘိဇ္ဇမာနံ ဝါ အနန္တရာဒိပစ္စယလာဘေန ဥပ္ပာဒက္ခဏေယေဝ ဇနကသာမတ္ထိယယောဂတော. ३१. अरूप विपाक चित्त हे रूपाविषयीच्या विराग भावनेमुळे (अरूप ध्यानामुळे) उत्पन्न होत असल्यामुळे, त्याचा हेतू रूपाच्या विरुद्ध असल्यामुळे आणि अरूप भूमीत रूपाला अवकाश नसल्यामुळे ते रूपाला उत्पन्न करत नाही. तसेच, द्विपंचविज्ञान (१० विज्ञान चित्ते) हे रूप उत्पत्तीसाठी विशेष प्रत्यय असणाऱ्या ध्यान-अंगांनी विरहित असल्यामुळे रूपाला उत्पन्न करत नाहीत. या प्रकारे ही चौदा चित्ते रूपाला उत्पन्न करत नाहीत, म्हणून 'आरुप्पविपाकद्विपञ्चविञ्ञाणवज्जितं' (अरूप विपाक आणि द्विपंचविज्ञान वगळून) असे म्हटले आहे. प्रतिसंधी चित्त आणि च्युती चित्त हे एकोणीस भवांग चित्तांमध्येच समाविष्ट असल्यामुळे, ते वेगळे चित्त ठरत नाही, म्हणून त्यांचा वेगळा निषेध केला नाही. जरी निषेध केला नसला, तरी प्रतिसंधी चित्त हे पश्चाज्जात प्रत्ययाने विरहित असल्यामुळे, आहारादी प्रत्ययांचे साहाय्य नसलेल्या दुर्बळ वस्तूचा (हृदयवस्तूचा) आश्रय घेऊन प्रवृत्त होत असल्यामुळे, नवीन भवात नुकतेच आलेले असल्यामुळे आणि कर्मज रूपांनी चित्तज रूपांचे स्थान आधीच घेतलेले असल्यामुळे, प्रतिसंधी चित्त रूपाला उत्पन्न करू शकत नाही. च्युती चित्ताच्या बाबतीत, अट्ठकथेत आधी असे म्हटले आहे की - 'ज्यांचा संसार-चक्ररूपी मूळ शांत झाले आहे अशा अर्हंतांच्या संतानामध्ये अत्यंत शांत प्रवृत्ती असल्यामुळे, केवळ अर्हंतांचेच च्युती चित्त रूपाला उत्पन्न करत नाही.' परंतु आनंदाचार्य इत्यादी इतर आचार्य म्हणतात की - 'सर्वच प्राण्यांचे च्युती चित्त रूपाला उत्पन्न करत नाही.' त्यांचा हा निर्णय संक्षेपाने मूलटीका इत्यादींमध्ये आणि विस्ताराने अभिधम्मत्थविकासिनी नावाच्या ग्रंथात सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावा. 'पठमभवङ्गमुपादाय' म्हणजे प्रतिसंधीच्या लगेच नंतर उत्पन्न होणाऱ्या पहिल्या भवांगापासून आरंभ करून. चित्त केवळ उत्पन्न होत असतानाच (उत्पादक्षणीच) रूपाला उत्पन्न करते, स्थिती किंवा भंगक्षणी नाही. कारण अनंतर इत्यादी प्रत्ययांच्या प्राप्तीमुळे उत्पादक्षणीच रूपाला उत्पन्न करण्याचे सामर्थ्य चित्तामध्ये असते. ၃၂. ဣရိယာယ ကာယိကကိရိယာယ ပဝတ္တိပထဘာဝတော ဣရိယာပထော, ဂမနာဒိ, အတ္ထတော တဒဝတ္ထာ ရူပပ္ပဝတ္တိ. တမ္ပိ [Pg.209] သန္ဓာရေတိ ယထာပဝတ္တံ ဥပတ္ထမ္ဘေတိ. ယထာ ဟိ ဝီထိစိတ္တေဟိ အဗ္ဗောကိဏ္ဏေ ဘဝင်္ဂေ ပဝတ္တမာနေ အင်္ဂါနိ ဩသီဒန္တိ, န ဧဝမေတေသု ဒွတ္တိံသဝိဓေသု, ဝက္ခမာနေသု စ ဆဗ္ဗီသတိယာ ဇာဂရဏစိတ္တေသု ပဝတ္တမာနေသု. တဒါ ပန အင်္ဂါနိ ဥပတ္ထဒ္ဓါနိ ယထာပဝတ္တဣရိယာပထဘာဝေနေဝ ပဝတ္တန္တိ. ३२. शरीराच्या क्रियेच्या प्रवृत्तीचा मार्ग असल्यामुळे गमनादी (चालणे इत्यादी) चार प्रकारच्या शारीरिक हालचालींना 'इरियापथ' (शारीरिक मुद्रा/अवस्था) म्हणतात. परमार्थतः त्या त्या अवस्थेतील रूपांची प्रवृत्ती म्हणजेच इरियापथ होय. चित्त त्या इरियापथाला धारण करते आणि जसा प्रवृत्त आहे तसा त्याला आधार देते. ज्याप्रमाणे वीथीचित्तांनी विरहित केवळ भवांग प्रवृत्त होत असताना (झोपेत) हात-पाय इत्यादी अवयव गळून पडतात (शिथिल होतात), त्याप्रमाणे पुढे सांगण्यात येणाऱ्या बत्तीस प्रकारच्या आणि सव्वीस प्रकारच्या जागृत चित्तांच्या प्रवृत्तीच्या वेळी अवयव गळून पडत नाहीत. त्या वेळी अवयवांना आधार मिळाल्यामुळे ते प्रवृत्त असलेल्या इरियापथाच्या रूपानेच कार्य करतात. ၃၃. ဝိညတ္တိမ္ပိ သမုဋ္ဌာပေန္တိ, န ကေဝလံ ရူပိရိယာပထာနေဝ. အဝိသေသဝစနေပိ ပနေတ္ထ မနောဒွါရပ္ပဝတ္တာနေဝ ဝေါဋ္ဌဗ္ဗနဇဝနာနိ ဝိညတ္တိသမုဋ္ဌာပကာနိ, တထာ ဟာသဇနကာနိ စ ပဉ္စဒွါရပ္ပဝတ္တာနံ ပရိဒုဗ္ဗလဘာဝတောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ကာမဉ္စေတ္ထ ရူပဝိနိမုတ္တော ဣရိယာပထော, ဝိညတ္တိ ဝါ နတ္ထိ, တထာပိ န သဗ္ဗံ ရူပသမုဋ္ဌာပကံ စိတ္တံ ဣရိယာပထူပတ္ထမ္ဘကံ, ဝိညတ္တိဝိကာရဇနကဉ္စ ဟောတိ. ယံ ပန စိတ္တံ ဝိညတ္တိဇနကံ, တံ ဧကံသတော ဣရိယာပထူပတ္ထမ္ဘကံ ဣရိယာပထဿ ဝိညတ္တိယာ သဟ အဝိနာဘာဝတော. ဣရိယာပထူပတ္ထမ္ဘကဉ္စ ရူပဇနကန္တိ ဣမဿ ဝိသေသဒဿနတ္ထံ ရူပတော ဣရိယာပထဝိညတ္တီနံ ဝိသုံ ဂဟဏံ. ३३. ती चित्ते केवळ सामान्य रूप आणि इरियापथालाच उत्पन्न करतात असे नाही, तर विज्ञाप्तीला (शारीरिक व वाचिक संकेतांना) देखील उत्पन्न करतात. येथे सामान्यपणे सांगितले असले तरी, मनोद्वारातील वोट्ठपन आणि जवन चित्तेच विज्ञाप्तीला उत्पन्न करतात, तसेच तीच हास्य उत्पन्न करतात; कारण पंचद्वारातील चित्ते अत्यंत दुर्बळ असतात, असे समजले पाहिजे. जरी येथे रूपापासून वेगळा असा कोणताही इरियापथ किंवा विज्ञाप्ती अस्तित्वात नाही, तरीही रूपाला उत्पन्न करणारे प्रत्येक चित्त इरियापथाला आधार देणारे आणि विज्ञाप्तीरूपी विकाराला उत्पन्न करणारे नसते. परंतु जे चित्त विज्ञाप्तीला उत्पन्न करते, ते निश्चितपणे इरियापथाला आधार देणारे असतेच; कारण इरियापथाचा विज्ञाप्तीशी अविनाभाव संबंध (एकमेकांशिवाय न राहण्याचा संबंध) असतो. इरियापथाला आधार देणारे चित्त हे सामान्य रूपाला देखील उत्पन्न करणारे असते, हा विशेष फरक दाखवण्यासाठी सामान्य रूपापेक्षा इरियापथ आणि विज्ञाप्ती यांचे वेगळे ग्रहण केले आहे. ၃၄. တေရသာတိ ကုသလတော စတ္တာရိ, အကုသလတော စတ္တာရိ, ကိရိယတော ပဉ္စာတိ တေရသ. တေသု ဟိ ပုထုဇ္ဇနာ အဋ္ဌဟိ ကုသလာကုသလေဟိ ဟသန္တိ, သေက္ခာ ဒိဋ္ဌိသဟဂတဝဇ္ဇိတေဟိ, အသေက္ခာ ပန ပဉ္စဟိ ကိရိယစိတ္တေဟိ, တတ္ထာပိ ဗုဒ္ဓါ စတူဟိ သဟေတုကကိရိယစိတ္တေဟေဝ ဟသန္တိ, န အဟေတုကေန ‘‘အတီတံသာဒီသု အပ္ပဋိဟတဉာဏံ ပတွာ ဣမေဟိ တီဟိ ဓမ္မေဟိ သမန္နာဂတဿ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သဗ္ဗံ ကာယကမ္မံ ဉာဏပုဗ္ဗင်္ဂမံ ဉာဏာနုပရိဝတ္တီ’’တိ ဝစနတော (မဟာနိ. ၆၉; စူဠနိ. မောဃရာဇမာဏဝပုစ္ဆာနိဒ္ဒေသ ၈၅; ပဋိ. မ. ၃.၅). န ဟိ ဝိစာရဏပညာရဟိတဿ ဟသိတုပ္ပာဒဿ ဗုဒ္ဓါနံ ပဝတ္တိ ယုတ္တာတိ ဝဒန္တိ. ဟသိတုပ္ပာဒစိတ္တေန ပန ပဝတ္တိယမာနမ္ပိ တေသံ သိတကရဏံ ပုဗ္ဗေနိဝါသအနာဂတံသသဗ္ဗညုတညာဏာနံ အနုဝတ္တကတ္တာ ဉာဏာနုပရိဝတ္တိယေဝါတိ. ဧဝဉ္စ ကတွာ အဋ္ဌကထာယံ [Pg.210] (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၅၆၈) ‘‘တေသံ ဉာဏာနံ စိဏ္ဏပရိယန္တေ ဣဒံ စိတ္တံ ဟာသယမာနံ ဥပ္ပဇ္ဇတီ’’တိ ဝုတ္တံ, တသ္မာ န တဿ ဗုဒ္ဓါနံ ပဝတ္တိ သက္ကာ နိဝါရေတုံ. ३४. ‘तेरा’ म्हणजे कुशल चित्तांपैकी चार (सोमनस्यसहगत चित्ते), अकुशल चित्तांपैकी चार (लोभमूल सोमनस्यसहगत चित्ते) आणि क्रिया चित्तांपैकी पाच (हसितुप्पाद आणि चार महाक्रिया सोमनस्यसहगत चित्ते) मिळून तेरा (सोमनस्य जवन चित्ते हसणे उत्पन्न करतात). त्यांपैकी पृथग्जन आठ कुशल व अकुशल चित्तांनी हसतात; शैक्ष पुद्गल दृष्टीसहगत वर्जित (सहा कुशल व अकुशल) चित्तांनी हसतात; परंतु अशैक्ष (अर्हत) पुद्गल पाच क्रियाचित्तांनी हसतात. त्यामध्येही बुद्ध भगवंत केवळ चार सहेतुक महाक्रिया सोमनस्यसहगत चित्तांनीच हसतात (स्मित करतात), अहेतुक (हसितुप्पाद) चित्ताने नाही. कारण, 'अतीत (भूतकाळ) इत्यादी विषयांमध्ये अप्रतिहत (अबाधित) ज्ञान प्राप्त करून, या तीन गुणांनी युक्त असलेल्या बुद्ध भगवंतांचे सर्व कायकर्म ज्ञानपूर्वंगम (ज्ञानाच्या नेतृत्वाखाली असणारे) आणि ज्ञानाचे अनुवर्तन करणारे असते' अशा वचनामुळे होय. कारण, विचारणा प्रज्ञेपासून रहित असलेल्या हसितुप्पाद चित्ताची प्रवृत्ती बुद्धांच्या ठिकाणी होणे योग्य नाही, असे (काही आचार्य) म्हणतात. परंतु, हसितुप्पाद चित्ताने प्रवृत्त केले जात असले तरी, त्या बुद्धांचे स्मित करणे हे पूर्वेनिवासज्ञान, अनागतंशज्ञान आणि सर्वज्ञताज्ञान यांचे अनुवर्तन करणारे असल्यामुळे ज्ञानाचे अनुवर्तन करणारेच आहे, असे समजावे. आणि असे मानूनच अट्ठकथेमध्ये 'त्या ज्ञानांच्या अभ्यासाच्या शेवटी हे (हसितुप्पाद) चित्त स्मित उत्पन्न करत उत्पन्न होते' असे म्हटले आहे. म्हणून, बुद्धांच्या ठिकाणी त्या हसितुप्पाद चित्ताची प्रवृत्ती रोखणे शक्य नाही. ၃၅. ပစ္ဆာဇာတာဒိပစ္စယူပတ္ထမ္ဘလာဘေန ဌိတိက္ခဏေယေဝ ဥတုဩဇာနံ ဗလဝဘာဝေါတိ ဝုတ္တံ ‘‘တေဇောဓာတု ဌိတိပ္ပတ္တာ’’တျာဒိ. ३५. पश्चाज्जात इत्यादी प्रत्ययांच्या उपष्टंभाचा (आधाराचा) लाभ झाल्यामुळे स्थिती क्षणामध्येच ऋतू आणि ओजा यांचा बलवानपणा (सामर्थ्य) होतो, म्हणूनच 'तेजोधातू स्थितीला प्राप्त झाली असता' इत्यादी म्हटले आहे. ၃၇. တတ္ထ ဟဒယဣန္ဒြိယရူပါနိ နဝ ကမ္မတောယေဝ ဇာတတ္တာ ကမ္မဇာနေဝ. ယဉှိ ဇာတံ, ဇာယတိ, ဇာယိဿတိ စ, တံ ‘‘ကမ္မဇ’’န္တိ ဝုစ္စတိ ယထာ ဒုဒ္ဓန္တိ. ३७. त्या रूपांमध्ये, हृदय आणि इंद्रियरूपे मिळून नऊ रूपे केवळ कर्मापासूनच उत्पन्न होत असल्यामुळे कर्मजच आहेत. कारण जे रूप उत्पन्न झाले आहे, उत्पन्न होत आहे आणि उत्पन्न होईल, त्याला 'कर्मज' असे म्हटले जाते; जसे 'दुग्ध' (दूध) म्हटले जाते. ၄၀. ပစ္စုပ္ပန္နပစ္စယာပေက္ခတ္တာ လဟုတာဒိတ္တယံ ကမ္မဇံ န ဟောတိ, ဣတရထာ သဗ္ဗဒါဘာဝီဟိ ဘဝိတဗ္ဗန္တိ ဝုတ္တံ ‘‘လဟုတာဒိတ္တယံ ဥတုစိတ္တာဟာရေဟိ သမ္ဘောတီ’’တိ. ४०. प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) प्रत्ययांची अपेक्षा ठेवणारे असल्यामुळे लहुता इत्यादी तीन रूपे कर्मज नसतात; अन्यथा ती नेहमी उत्पन्न होणारी झाली असती. म्हणूनच 'लहुता इत्यादी तीन रूपे ऋतू, चित्त आणि आहारापासून उत्पन्न होतात' असे म्हटले आहे. ၄၃. ဧကန္တကမ္မဇာနိ နဝ, စတုဇေသု ကမ္မဇာနိ နဝါတိ အဋ္ဌာရသ ကမ္မဇာနိ, ပဉ္စဝိကာရရူပသဒ္ဒအဝိနိဗ္ဘောဂရူပအာကာသဝသေန ပန္နရသ စိတ္တဇာနိ, သဒ္ဒေါ, လဟုတာဒိတ္တယံ, အဝိနိဗ္ဘောဂါကာသရူပါနိ နဝါတိ တေရသ ဥတုဇာနိ, လဟုတာဒိတ္တယအဝိနိဗ္ဘောဂါကာသဝသေန ဒွါဒသ အာဟာရဇာနိ. ४३. एकांत कर्मज नऊ रूपे आणि चतुर्ज रूपांपैकी कर्मज नऊ रूपे मिळून अठरा कर्मज रूपे आहेत. पाच विकाररूपे, शब्दरूप, अविणिब्भोगरूप आणि आकाशधातू यांच्या भेदाने पंधरा चित्तज रूपे आहेत. शब्दरूप, लहुता इत्यादी तीन रूपे, आणि अविणिब्भोग व आकाशरूप मिळून नऊ रूपे अशी तेरा ऋतूज रूपे आहेत. लहुता इत्यादी तीन रूपे, अविणिब्भोग आणि आकाशधातू यांच्या भेदाने बारा आहारज रूपे आहेत. ၄၄. ကေဝလံ ဇာယမာနာဒိရူပါနံ ဇာယမာနပရိပစ္စမာနဘိဇ္ဇမာနရူပါနံ သဘာဝတ္တာ သဘာဝမတ္တံ ဝိနာ အတ္တနော ဇာတိအာဒိလက္ခဏာဘာဝတော လက္ခဏာနိ ကေဟိစိ ပစ္စယေဟိ န ဇာယန္တီတိ ပကာသိတံ. ဥပ္ပာဒါဒိယုတ္တာနဉှိ စက္ခာဒီနံ ဇာတိအာဒီနိ လက္ခဏာနိ ဝိဇ္ဇန္တိ, န ဧဝံ ဇာတိအာဒီနံ. ယဒိ တေသမ္ပိ ဇာတိအာဒီနိ သိယုံ, ဧဝံ အနဝတ္ထာနမေဝ အာပဇ္ဇေယျ. ယံ ပန ‘‘ရူပါယတနံ…ပေ… ကဗဠီကာရော အာဟာရော. ဣမေ ဓမ္မာ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာ’’တျာဒီသု (ဓ. သ. ၁၂၀၁) ဇာတိယာ ကုတောစိဇာတတ္တံ အနုညာတံ[Pg.211], တမ္ပိ ရူပဇနကပစ္စယာနံ ရူပုပ္ပာဒနံ ပတိ အနုပရတဗျာပါရာနံ ပစ္စယဘာဝူပဂမနက္ခဏေ ဇာယမာနဓမ္မဝိကာရဘာဝေန ဥပလဗ္ဘမာနတံ သန္ဓာယာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ယမ္ပိ ‘‘ဇာတိ, ဘိက္ခဝေ, အနိစ္စာ သင်္ခတာ ပဋိစ္စသမုပ္ပန္နာ. ဇရာမရဏံ, ဘိက္ခဝေ, အနိစ္စံ သင်္ခတံ ပဋိစ္စသမုပ္ပန္န’’န္တိ ဝစနံ (သံ. နိ. ၂.၂၀), တတ္ထာပိ ပဋိစ္စသမုပ္ပန္နာနံ လက္ခဏဘာဝတောတိ အယမေတ္ထာဘိသန္ဓိ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – ४४. केवळ उत्पन्न होत असलेल्या, परिपक्व होत असलेल्या आणि नष्ट होत असलेल्या रूपकलापांचा स्वभाव असल्यामुळे, केवळ स्वभाव असण्याव्यतिरिक्त स्वतःच्या जाती इत्यादी लक्षणांचा अभाव असल्यामुळे, लक्षणरूपे कोणत्याही प्रत्ययांनी (कारणांनी) उत्पन्न होत नाहीत, असे स्पष्ट केले आहे. कारण, उत्पाद इत्यादींनी युक्त असलेल्या चक्षू इत्यादींची जाती इत्यादी लक्षणे विद्यमान असतात, परंतु जाती इत्यादींची (पुन्हा जाती इत्यादी लक्षणे) नसतात. जर त्यांचीही जाती इत्यादी लक्षणे असती, तर अशा प्रकारे अनवस्था प्रसंगच (अनंत साखळी) प्राप्त झाला असता. परंतु, 'रूपायतन... पे... कवळिकार आहार. हे धर्म चित्तसमुत्थान आहेत' इत्यादींमध्ये जातीचे कोणत्यातरी कारणाने उत्पन्न होणे जे मान्य केले आहे, ते देखील रूप उत्पन्न करणाऱ्या प्रत्ययांच्या रूप उत्पन्न करण्याच्या बाबतीत अविरत व्यापार करणाऱ्या रूपांच्या प्रत्ययभावाला प्राप्त होण्याच्या क्षणी उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांच्या विकाराच्या रूपाने उपलब्ध होण्याला उद्देशून आहे, असे जाणावे. आणि 'भिक्खूहो, जाती अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. जरा-मरण अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे' हे जे वचन आहे, तिथे देखील प्रतीत्यसमुत्पन्न धर्मांच्या लक्षणरूप असल्यामुळेच (असे म्हटले आहे), हाच येथे अभिप्राय आहे. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे - ‘‘ပါဌေ ကုတောစိ ဇာတတ္တံ, ဇာတိယာ ပရိယာယတော; သင်္ခတာနံ သဘာဝတ္တာ, တီသု သင်္ခတတောဒိတာ’’တိ. "पाठात कोणत्यातरी कारणाने जातीचे उत्पन्न होणे पर्यायाने सांगितले आहे; संस्कृत रूपांचा स्वभाव असल्यामुळे (जाती, जरता, अनित्यता या) तिन्हींमध्ये संस्कृतत्व सांगितले आहे." ရူပသမုဋ္ဌာနနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रूपसमुत्थान पद्धतीचे वर्णन समाप्त झाले. ကလာပယောဇနာဝဏ္ဏနာ कलापयोजना वर्णन ၄၅. ယသ္မာ ပနေတာနိ ရူပါနိ ကမ္မာဒိတော ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနိပိ န ဧကေကံ သမုဋ္ဌဟန္တိ, အထ ခေါ ပိဏ္ဍတောဝ. တသ္မာ ပိဏ္ဍာနံ ဂဏနပရိစ္ဆေဒံ, သရူပဉ္စ ဒဿေတုံ ‘‘ဧကုပ္ပာဒါ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. သဟဝုတ္တိနောတိ ဝိသုံ ဝိသုံ ကလာပဂတရူပဝသေန သဟဝုတ္တိနော, န သဗ္ဗကလာပါနံ အညမညံ သဟုပ္ပတ္တိဝသေန. ४५. परंतु ज्याअर्थी ही रूपे कर्मादी कारणांपासून उत्पन्न होत असली तरी एकेकटी उत्पन्न होत नाहीत, तर उलट समूहानेच (कलाप रूपानेच) उत्पन्न होतात; म्हणून समूहांच्या (रूपकलापांच्या) संख्येची मर्यादा आणि त्यांचे स्वरूप दर्शवण्यासाठी 'एक उत्पाद' इत्यादी म्हटले आहे. 'सहवृत्ती' म्हणजे वेगवेगळ्या कलापामध्ये असलेल्या रूपांच्या द्वारे एकत्र राहणारे, सर्व कलापांच्या परस्परांच्या सह-उत्पत्तीच्या द्वारे सहवृत्ती नसलेले. ၄၆. ဒသ ပရိမာဏာ အဿာတိ ဒသကံ, သမုဒါယဿေတံ နာမံ, စက္ခုနာ ဥပလက္ခိတံ, တပ္ပဓာနံ ဝါ ဒသကံ စက္ခုဒသကံ. ဧဝံ သေသေသုပိ. ४६. ज्याचे दहा प्रमाण (अवयव) आहेत ते 'दशक' होय, हे समूहाचे नाव आहे. चक्षूने (चक्षुप्रसादाने) लक्षित केलेले दशक किंवा चक्षुप्रसाद प्रधान असलेले दशक म्हणजे 'चक्षुदशक' होय. याचप्रमाणे उर्वरित पदांमध्येही जाणावे. ၄၇. ဝစီဝိညတ္တိဂ္ဂဟဏေန သဒ္ဒေါပိ သင်္ဂဟိတော ဟောတိ တဿာ တဒဝိနာဘာဝတောတိ ဝုတ္တံ ‘‘ဝစီဝိညတ္တိဒသက’’န္တိ. ४७. वचीविज्ञप्तीच्या ग्रहणाने शब्दाचा देखील संग्रह होतो, कारण तिचे (वचीविज्ञप्तीचे) त्या शब्दाशिवाय अस्तित्व नसते; म्हणूनच 'वचीविज्ञप्तिदशक' असे म्हटले आहे. ၅၀. ကိံ [Pg.212] ပနေတေ ဧကဝီသတိ ကလာပါ သဗ္ဗေပိ သဗ္ဗတ္ထ ဟောန္တိ, ဥဒါဟု ကေစိ ကတ္ထစီတိ အာဟ ‘‘တတ္ထာ’’တျာဒိ. ५०. पण काय हे एकवीस कलाप सर्वच्या सर्व सर्व ठिकाणी असतात, की काही काही ठिकाणीच असतात? असा प्रश्न उद्भवत असल्यामुळे आचार्यांनी 'तथ' इत्यादी म्हटले आहे. ကလာပယောဇနာဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कलापयोजना वर्णन समाप्त झाले. ရူပပဝတ္တိက္ကမဝဏ္ဏနာ रूपप्रवृत्तीक्रम वर्णन ၅၂. ဣဒါနိ နေသံ သမ္ဘဝဝသေန, ပဝတ္တိပဋိသန္ဓိဝသေန, ယောနိဝသေန စ ပဝတ္တိံ ဒဿေတုံ ‘‘သဗ္ဗာနိပိ ပနေတာနီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. ယထာရဟန္တိ သဘာဝကပရိပုဏ္ဏာယတနာနံ အနုရူပတော. ५२. आता त्यांच्या संभवण्याच्या (उत्पत्तीच्या) अनुसार, प्रवृत्तीकाळ व प्रतिसंधीकाळाच्या अनुसार आणि योनीच्या अनुसार प्रवृत्ती (उत्पत्तीची प्रक्रिया) दर्शवण्यासाठी 'परंतु ही सर्व देखील' इत्यादी म्हटले आहे. 'यथायोग्य' म्हणजे भाव रूपाने युक्त अशा परिपूर्ण आयतन असलेल्या पुद्गलांच्या अनुरूपतेने. ၅၃. ကမလကုဟရဂဗ္ဘမလာဒိသံသေဒဋ္ဌာနေသု ဇာတာ သံသေဒဇာ. ဥပပါတော နေသံ အတ္ထီတိ ဩပပါတိကာ, ဥက္ကံသဂတိပရိစ္ဆေဒဝသေန စေတ္ထ ဝိသိဋ္ဌဥပပါတော ဂဟိတော ယထာ ‘‘အဘိရူပဿ ကညာ ဒါတဗ္ဗာ’’တိ. သတ္တ ဒသကာနိ ပါတုဘဝန္တိ ပရိပုဏ္ဏာယတနဘာဝေန ဥပလဗ္ဘနတော. ကဒါစိ န လဗ္ဘန္တိ ဇစ္စန္ဓဇစ္စဗဓိရဇစ္စာဃာနနပုံသကအာဒိကပ္ပိကာနံ ဝသေန. တတ္ထ သုဂတိယံ မဟာနုဘာဝေန ကမ္မုနာ နိဗ္ဗတ္တမာနာနံ ဩပပါတိကာနံ ဣန္ဒြိယဝေကလ္လာယောဂတော စက္ခုသောတဃာနာလာဘော သံသေဒဇာနံ, ဘာဝါလာဘော ပဌမကပ္ပိကဩပပါတိကာနံ ဝသေနပိ. ဒုဂ္ဂတိယံ ပန စက္ခုသောတဘာဝါလာဘော ဒွိန္နမ္ပိ ဝသေန, ဃာနာလာဘော သံသေဒဇာနမေဝ ဝသေန, န ဩပပါတိကာနံ ဝသေနာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တထာ ဟိ ဓမ္မဟဒယဝိဘင်္ဂေ ‘‘ကာမဓာတုယာ ဥပပတ္တိက္ခဏေ ကဿစိ ဧကာဒသာယတနာနိ ပါတုဘဝန္တိ, ကဿစိ ဒသ, ကဿစိ အပရာနိပိ ဒသ, ကဿစိ နဝ, ကဿစိ သတ္တာ’’တိ (ဝိဘ. ၁၀၀၇) ဝစနတော ပရိပုဏ္ဏိန္ဒြိယဿ ဩပပါတိကဿ သဒ္ဒါယတနဝဇ္ဇိတာနိ ဧကာဒသာယတနာနိ ဝုတ္တာနိ. အန္ဓဿ စက္ခာယတနဝဇ္ဇိတာနိ [Pg.213] ဒသ, တထာ ဗဓိရဿ သောတာယတနဝဇ္ဇိတာနိ, အန္ဓဗဓိရဿ တဒုဘယဝဇ္ဇိတာနိ နဝ, ဂဗ္ဘသေယျကဿ စက္ခုသောတဃာနဇိဝှာသဒ္ဒါယတနဝဇ္ဇိတာနိသတ္တာယတနာနိ ဝုတ္တာနိ. ယဒိ ပန အဃာနကောပိ ဩပပါတိကော သိယာ, အန္ဓဗဓိရာဃာနကာနံ ဝသေန တိက္ခတ္တုံ ဒသ, အန္ဓဗဓိရအန္ဓာဃာနကဗဓိရာဃာနကာနံ ဝသေန တိက္ခတ္တုံ နဝ, အန္ဓဗဓိရာဃာနကဿ ဝသေန စ အဋ္ဌ အာယတနာနိ ဝတ္တဗ္ဗာနိ သိယုံ, န ပနေဝံ ဝုတ္တာနိ. တသ္မာ နတ္ထိ ဩပပါတိကဿ ဃာနဝေကလ္လန္တိ. တထာ စ ဝုတ္တံ ယမကဋ္ဌကထာယံ ‘‘အဃာနကော ဩပပါတိကော နတ္ထိ. ယဒိ ဘဝေယျ, ကဿစိ အဋ္ဌာယတနာနီတိ ဝဒေယျာ’’တိ (ယမ. အဋ္ဌ. အာယတနယမက. ၁၈-၂၁). ५३. कमळकोश (कमळाचे गर्भाशय), गर्भातील मळ इत्यादी ओलसर व चिकट ठिकाणी उत्पन्न होणाऱ्या प्राण्यांना 'संसेदज' (स्वेदज) म्हणतात. ज्यांचा उपपात (मागील अस्तित्वातून अचानक प्रकट होणे) होतो, ते 'ओपपातिक' (औपपातिक) होत. येथे उत्कृष्ट गतीच्या मर्यादेच्या प्रभावाने विशिष्ट उपपात ग्रहण केला आहे, जसे की "अतिशय रूपवान पुरुषाला कन्या द्यावी" (येथे केवळ रूपवान नव्हे, तर कुळ, संपत्ती इत्यादींनी श्रेष्ठ असा पुरुष अभिप्रेत आहे). परिपूर्ण आयतनांच्या भावाने उपलब्ध होत असल्यामुळे सात दशके प्रादुर्भूत होतात. जन्मांध, जन्मबधिर, जन्म-अघ्राणक (घ्राणेंद्रिय नसलेले), नपुंसक आणि आदिकल्पिक (सृष्टीच्या सुरुवातीचे मानव) यांच्यामुळे कधीकधी हे प्राप्त होत नाहीत. त्यामध्ये, सुगतीमध्ये महान सामर्थ्यशाली कर्मामुळे उत्पन्न होणाऱ्या ओपपातिक देव व मनुष्यांच्या इंद्रियांची विकलता अयोग्य असल्यामुळे, चक्षु, श्रोत्र व घ्राणेंद्रियांचा अलाभ (न मिळणे) हा संसेदज प्राण्यांच्या बाबतीत होतो, आणि भावरूपाचा अलाभ पहिल्या कल्पामधील (आदिकल्पिक) ओपपातिक मनुष्यांच्या बाबतीतही होतो. परंतु दुर्गतीमध्ये चक्षु, श्रोत्र आणि भावरूपाचा अलाभ हा संसेदज आणि ओपपातिक या दोन्ही प्रकारच्या प्राण्यांच्या बाबतीत होतो; घ्राणेंद्रियाचा अलाभ केवळ संसेदज प्राण्यांच्याच बाबतीत होतो, ओपपातिक प्राण्यांच्या बाबतीत नाही, असे समजावे. कारण 'धम्महदयविभंग' मध्ये असे म्हटले आहे की: "कामधातूमध्ये उपपत्तीच्या (उत्पत्तीच्या) क्षणी कोणा एकाला अकरा आयतने प्रादुर्भूत होतात, कोणाला दहा, कोणाला इतर दहा, कोणाला नऊ, तर कोणाला सात." या वचनावरून परिपूर्ण इंद्रिये असलेल्या ओपपातिक प्राण्याला शब्दायातनाशिवाय अकरा आयतने सांगितली आहेत. जन्मांधाला चक्षुआयतन वगळून दहा; त्याचप्रमाणे जन्मबधिराला श्रोत्रआयतन वगळून दहा; जन्मांध व जन्मबधिराला ती दोन्ही वगळून नऊ; आणि गर्भशय्यक (गर्भाशयात वाढणाऱ्या) प्राण्याला चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिव्हा आणि शब्दायतन वगळून सात आयतने सांगितली आहेत. जर घ्राणेंद्रिय नसलेला (अघ्राणक) देखील ओपपातिक प्राणी असता, तर जन्मांध-जन्मबधिर-अघ्राणक यांच्यामुळे तीन वेळा दहा आयतने; जन्मांध-जन्मबधिर, जन्मांध-अघ्राणक, जन्मबधिर-अघ्राणक यांच्यामुळे तीन वेळा नऊ आयतने; आणि जन्मांध-जन्मबधिर-अघ्राणक असलेल्या एकाच व्यक्तीच्या बाबतीत आठ आयतने सांगावी लागली असती. परंतु असे सांगितलेले नाही. म्हणून ओपपातिक प्राण्याला घ्राणेंद्रियाची विकलता नसते, असे समजावे. आणि तसेच यमक-अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे: "अघ्राणक ओपपातिक प्राणी नसतो. जर असता, तर कोणाला आठ आयतने असतात असे म्हटले असते." သံသေဒဇာနံ ပန ဃာနာဘာဝေါ န သက္ကာ နိဝါရေတုံ ‘‘ကာမဓာတုယာ ဥပပတ္တိက္ခဏေ’’တျာဒိပါဠိယာ (ဝိဘ. ၁၀၀၇) ဩပပါတိကယောနိမေဝ သန္ဓာယ, သတ္တာယတနဂ္ဂဟဏဿ စ အညေသံ အသမ္ဘဝတော ဂဗ္ဘသေယျကမေဝ သန္ဓာယ ဝုတ္တတ္တာ. ယံ ပန ‘‘သံသေဒဇယောနိကာ ပရိပုဏ္ဏာယတနဘာဝေန ဩပပါတိကသင်္ဂဟံ ကတွာ ဝုတ္တာ’’တိ အဋ္ဌကထာဝစနံ, တမ္ပိ ပရိပုဏ္ဏာယတနံယေဝ သံသေဒဇာနံ ဩပပါတိကေသု သင်္ဂဟဝသေန ဝုတ္တံ. အပရေ ပန ယမကေ ဃာနဇိဝှာနံ သဟစာရိတာ ဝုတ္တာတိ အဇိဝှဿ အသမ္ဘဝတော အဃာနကဿပိ အဘာဝမေဝ ဝဏ္ဏေန္တိ, တတ္ထာပိ ယထာ စက္ခုသောတာနိ ရူပဘဝေ ဃာနဇိဝှာဟိ ဝိနာ ပဝတ္တန္တိ, န ဧဝံ ဃာနဇိဝှာ အညမညံ ဝိနာ ပဝတ္တန္တိ ဒွိန္နမ္ပိ ရူပဘဝေ အနုပ္ပဇ္ဇနတောတိ ဧဝံ ဝိသုံ ဝိသုံ ကာမဘဝေ အပ္ပဝတ္တိဝသေန တေသံ သဟစာရိတာ ဝုတ္တာတိ န န သက္ကာ ဝတ္တုန္တိ. परंतु संसेदज प्राण्यांमध्ये घ्राणेंद्रियाचा अभाव नाकारता येत नाही; कारण "कामधातूमध्ये उपपत्तीच्या क्षणी" इत्यादी पाळी वचन केवळ ओपपातिक योनीला उद्देशून आहे, आणि सात आयतनांचे ग्रहण इतरांच्या बाबतीत असंभव असल्यामुळे केवळ गर्भशय्यक योनीलाच उद्देशून म्हटले आहे. परंतु "संसेदज योनीचे प्राणी परिपूर्ण आयतन असल्यामुळे ओपपातिक वर्गात समाविष्ट करून सांगितले आहेत" हे जे अट्ठकथेचे वचन आहे, ते देखील परिपूर्ण आयतने असलेल्या संसेदज प्राण्यांना ओपपातिक प्राण्यांमध्ये समाविष्ट करण्याच्या उद्देशानेच म्हटले आहे. इतर आचार्य मात्र यमकामध्ये घ्राण आणि जिव्हा यांची सहचारिता (एकत्र असणे) सांगितली असल्यामुळे, जिव्हा नसलेला प्राणी असंभव असल्याने घ्राणेंद्रिय नसलेल्या प्राण्याचा देखील अभावच प्रतिपादन करतात. तेथे देखील, ज्याप्रमाणे चक्षु आणि श्रोत्र हे रूपभवामध्ये घ्राण व जिव्हा यांच्याशिवाय अस्तित्वात असतात, त्याप्रमाणे घ्राण आणि जिव्हा हे एकमेकांशिवाय अस्तित्वात राहत नाहीत; कारण हे दोन्ही रूपभवामध्ये उत्पन्न होत नाहीत. अशा प्रकारे कामभवामध्ये वेगवेगळ्या प्रकारे अस्तित्वात न राहण्याच्या अर्थाने त्यांची सहचारिता सांगितली आहे, असे म्हणणे अशक्य नाही. ၅၄. ဂဗ္ဘေ မာတုကုစ္ဆိယံ သေန္တီတိ ဂဗ္ဘသေယျကာ, တေယေဝ ရူပါဒီသု သတ္တတာယ သတ္တာတိ ဂဗ္ဘသေယျကသတ္တာ. ဧတေ [Pg.214] အဏ္ဍဇဇလာဗုဇာ. တီဏိ ဒသကာနိ ပါတုဘဝန္တိ, ယာနိ ‘‘ကလလရူပ’’န္တိ ဝုစ္စန္တိ, ပရိပိဏ္ဍိတာနိ စ တာနိ ဇာတိဥဏ္ဏာယ ဧကဿ အံသုနော ပသန္နတိလတေလေ ပက္ခိပိတွာ ဥဒ္ဓဋဿ ပဂ္ဃရိတွာ အဂ္ဂေ ဌိတဗိန္ဒုမတ္တာနိ အစ္ဆာနိ ဝိပ္ပသန္နာနိ. ကဒါစိ န လဗ္ဘတိ အဘာဝကသတ္တာနံ ဝသေန. တတော ပရန္တိ ပဋိသန္ဓိတော ပရံ. ပဝတ္တိကာလေတိ သတ္တမေ သတ္တာဟေ, ဋီကာကာရမတေန ဧကာဒသမေ သတ္တာဟေ ဝါ. ကမေနာတိ စက္ခုဒသကပါတုဘာဝတော သတ္တာဟာတိက္ကမေန သောတဒသကံ, တတော သတ္တာဟာတိက္ကမေန ဃာနဒသကံ, တတော သတ္တာဟာတိက္ကမေန ဇိဝှာဒသကန္တိ ဧဝံ အနုက္ကမေန. အဋ္ဌကထာယမ္ပိ ဟိ အယမတ္ထော ဒဿိတောဝ. ५४. जे गर्भात म्हणजे मातेच्या उदरात शयन करतात (राहतात), ते 'गर्भशय्यक' होत. तेच रूप इत्यादी विषयांमध्ये आसक्त असल्यामुळे 'sattā' (प्राणी) होत, म्हणून त्यांना 'गर्भशय्यक प्राणी' म्हणतात. हे अंडज (अंड्यातून जन्माला येणारे) आणि जलाबुज (जरायुज - वारेतून जन्माला येणारे) असतात. तीन दशके प्रादुर्भूत होतात, ज्यांना 'कललरूप' असे म्हणतात. ती एकत्र मिळून, नुकत्याच जन्मलेल्या कोकराच्या लोकरीचा एक धागा स्वच्छ तीळ तेलात बुडवून बाहेर काढल्यावर, त्यातून गळणाऱ्या आणि टोकावर राहिलेल्या थेंबाच्या आकाराची, अत्यंत स्वच्छ व पारदर्शक असतात. भावरूप नसलेल्या प्राण्यांच्या बाबतीत कधीकधी हे (तिसरे दशक) प्राप्त होत नाही. 'त्यानंतर' म्हणजे प्रतिसंधीनंतर (गर्भधारणेनंतर). 'प्रवृत्तीच्या काळात' म्हणजे सातव्या आठवड्यात, किंवा टीकाकारांच्या मते अकराव्या आठवड्यात. 'क्रमाने' म्हणजे चक्षु-दशकाच्या प्रादुर्भावानंतर सात दिवसांनी श्रोत्र-दशक, त्यानंतर सात दिवसांनी घ्राण-दशक, त्यानंतर सात दिवसांनी जिव्हा-दशक, अशा अनुक्रमाने उत्पन्न होतात. कारण अट्ठकथेमध्ये देखील हाच अर्थ दर्शविला आहे. ၅၅. ဌိတိကာလန္တိ ပဋိသန္ဓိစိတ္တဿ ဌိတိကာလံ. ပဋိသန္ဓိစိတ္တသဟဇာတာ ဟိ ဥတု ဌာနပ္ပတ္တာ တဿ ဌိတိက္ခဏေ သုဒ္ဓဋ္ဌကံ သမုဋ္ဌာပေတိ, တဒါ ဥပ္ပန္နာ ဘင်္ဂက္ခဏေတျာဒိနာ အနုက္ကမေန ဥတု ရူပံ ဇနေတိ. ဩဇာဖရဏမုပါဒါယာတိ ဂဗ္ဘသေယျကဿ မာတု အဇ္ဈောဟဋာဟာရတော သံသေဒဇောပပါတိကာနဉ္စ မုခဂတသေမှာဒိတော ဩဇာယ ရသဟရဏီအနုသာရေန သရီရေ ဖရဏကာလတော ပဋ္ဌာယ. ५५. 'स्थितीकाळ' म्हणजे प्रतिसंधी चित्ताचा स्थितीक्षण (काळ). कारण प्रतिसंधी चित्तासोबत उत्पन्न झालेली ऋतू (तेजोधातू) जेव्हा स्थितीक्षणाला पोहोचते, तेव्हा ती त्या प्रतिसंधी चित्ताच्या स्थितीक्षणी 'शुद्धष्टक' (आठ रूपांचा समूह) उत्थापित करते. त्या स्थितीक्षणी उत्पन्न झालेली ऋतू भंगाच्या क्षणी (चित्ताच्या विनाशाच्या क्षणी) शुद्धष्टक उत्थापित करते, अशा अनुक्रमाने ऋतू रूपाला उत्पन्न करते. 'ओजाच्या प्रसाराला आरंभ करून' म्हणजे गर्भशय्यक प्राण्याच्या मातेने खाल्लेल्या आहारापासून, आणि संसेदज व ओपपातिक प्राण्यांच्या मुखातील लाळ/श्लेष्मा इत्यादींमधील ओजेपासून, रसवाहिन्यांच्या द्वारे शरीरात ओजा पसरण्याच्या काळापासून आरंभ करून. ၅၆. စုတိစိတ္တံ ဥပရိမံ ဧတဿာတိ စုတိစိတ္တောပရိ. ကမ္မဇရူပါနိ န ဥပ္ပဇ္ဇန္တိ တဒုပ္ပတ္တိယံ မရဏာဘာဝတော. ကမ္မဇရူပဝိစ္ဆေဒေ ဟိ ‘‘မတော’’တိ ဝုစ္စတိ. ယထာဟ – ५६. या (१७ व्या) चित्ताच्या वरचे चित्त च्युती चित्त असते, म्हणून याला 'च्युती चित्ताच्या वरील' (चित्त) म्हणतात. (या काळात) कर्मज रूपे उत्पन्न होत नाहीत, कारण ती उत्पन्न झाल्यास मृत्यू होणार नाही. कारण कर्मज रूपांचा विच्छेद (थांबणे) झाल्यावरच 'मृत' (मरण पावला) असे म्हटले जाते. जसे की म्हटले आहे - ‘‘အာယု ဥသ္မာ စ ဝိညာဏံ, ယဒါ ကာယံ ဇဟန္တိမံ; အပဝိဒ္ဓေါ တဒါ သေတိ, နိရတ္ထံဝ ကလိင်္ဂရ’’န္တိ. (သံ. နိ. ၃.၉၅ ထောကံ ဝိသဒိသံ); "जेव्हा आयुष्य (जीवितेंद्रिय), उष्मा (शारीरिक उष्णता) आणि विज्ञाण (चित्त) या शरीराला सोडून जातात, तेव्हा हे शरीर निरुपयोगी लाकडाच्या ओंडक्याप्रमाणे टाकून दिलेले होऊन (स्मशानात) पडून राहते." ပုရေတရန္တိ သတ္တရသမဿ ဥပ္ပာဒက္ခဏေ. တတောပရံ စိတ္တဇာဟာရဇရူပဉ္စ ဝေါစ္ဆိဇ္ဇတီတိ အဇီဝကသန္တာနေ တေသံ ဥပ္ပတ္တိယာ [Pg.215] အဘာဝတော ယထာနိဗ္ဗတ္တံ စိတ္တဇံ, အာဟာရဇဉ္စ တတော ပရံ ကိဉ္စိ ကာလံ ပဝတ္တိတွာ နိရုဇ္ဈတိ. အပရေ ပန အာစရိယာ ‘‘စိတ္တဇရူပံ စုတိစိတ္တတော ပုရေတရမေဝ ဝေါစ္ဆိဇ္ဇတီ’’တိ ဝဏ္ဏေန္တိ. 'त्यापूर्वीच' म्हणजे सतराव्या चित्ताच्या उत्पादक्षणी (उत्पत्तीच्या क्षणी). 'त्यानंतर चित्तज आणि आहारज रूपे देखील खंडित होतात' कारण निर्जीव शरीरात त्यांची उत्पत्ती होत नसल्यामुळे, पूर्वी उत्पन्न झालेले चित्तज आणि आहारज रूप च्युतीच्या भंगाच्या क्षणानंतर काही काळ टिकून नष्ट होते. परंतु इतर आचार्य असे प्रतिपादन करतात की, 'चित्तज रूप च्युती चित्ताच्या आधीच खंडित होते.' ၅၈. ရူပလောကေ ဃာနဇိဝှာကာယာနံ အဘာဝေ ကာရဏံ ဝုတ္တမေဝ. ဘာဝဒွယံ ပန ဗဟလကာမရာဂူပနိဿယတ္တာ ဗြဟ္မာနဉ္စ တဒဘာဝတော တတ္ထ န ပဝတ္တတိ. အာဟာရဇကလာပါနိ စ န လဗ္ဘန္တိ အဇ္ဈောဟဋာဟာရာဘာဝေန သရီရဂတဿပိ အာဟာရဿ ရူပသမုဋ္ဌာပနာဘာဝတော. ဗာဟိရဉှိ ဥတုံ, အာဟာရဉ္စ ဥပနိဿယံ လဘိတွာ ဥတုအာဟာရာ ရူပံ သမုဋ္ဌာပေန္တိ. ဇီဝိတနဝကန္တိ ကာယာဘာဝတော ကာယဒသကဋ္ဌာနိယံ ဇီဝိတနဝကံ. ५८. रूपलोकात घ्राण, जिव्हा आणि काय (त्वचा/स्पर्शेंद्रिय) यांच्या अभावाचे कारण आधीच सांगितले आहे. परंतु दोन्ही भावरूपे (स्त्रीभाव व पुरुषभाव) ही तीव्र कामरागाचा आश्रय असल्यामुळे आणि ब्रह्मांमध्ये त्याचा अभाव असल्यामुळे तेथे (रूपलोकात) अस्तित्वात नसतात. आणि आहारज कलाप देखील प्राप्त होत नाहीत; कारण तेथे गिळल्या जाणाऱ्या बाह्य आहाराचा अभाव असतो आणि शरीरातील अंतर्गत आहाराची रूप उत्पन्न करण्याची क्षमता नसते. कारण बाह्य ऋतू आणि बाह्य आहाराचा उपनिष्रय (आश्रय) मिळाल्यावरच अंतर्गत ऋतू आणि अंतर्गत आहार रूपाला उत्पन्न करतात. 'जीवितनवक' म्हणजे कायेंद्रियाच्या अभावामुळे कायदशकाच्या जागी असणारे जीवितनवक होय. ၅၉. အတိရိစ္ဆတိ သေသဗြဟ္မာနံ ပဋိသန္ဓိယံ, ပဝတ္တေ စ ဥပလဘိတဗ္ဗရူပတော အဝသိဋ္ဌံ ဟောတိ, မရဏကာလေ ပန ဗြဟ္မာနံ သရီရနိက္ခေပါဘာဝတော သဗ္ဗေသမ္ပိ တိသမုဋ္ဌာနာနိ, ဒွိသမုဋ္ဌာနာနိ စ သဟေဝ နိရုဇ္ဈန္တိ. ५९. 'शिल्लक राहते' म्हणजे असत्यसत्त्व (असंज्ञसत्त्व) वगळता इतर ब्रह्मांच्या प्रतिसंधीच्या वेळी आणि प्रवृत्तीच्या वेळी प्राप्त होणाऱ्या रूपांपेक्षा जे उरते ते शिल्लक राहते. परंतु मृत्यूच्या वेळी ब्रह्मांचे मृत शरीर टाकून देण्याची गरज नसल्यामुळे (कारण त्यांचे शरीर पूर्णपणे नाहीसे होते), सर्व ब्रह्मांची त्रिसमुत्थानिक (तीन कारणांनी उत्पन्न होणारी) आणि द्विसमुत्थानिक (दोन कारणांनी उत्पन्न होणारी) रूपे एकाच वेळी नष्ट होतात. ၆၁. ရူပေသု တေဝီသတိ ဃာနဇိဝှာကာယဘာဝဒွယဝသေန ပဉ္စန္နံ အဘာဝတော. ကေစိ ပန ‘‘လဟုတာဒိတ္တယမ္ပိ တေသု နတ္ထိ ဒန္ဓတ္တကရာဒိဓာတုက္ခောဘာဘာဝတော’’တိ ဝဒန္တိ, တံ အကာရဏံ. န ဟိ ဝူပသမေတဗ္ဗာပေက္ခာ တဗ္ဗိရောဓိဓမ္မပ္ပဝတ္တိ တထာ သတိ သဟေတုကကိရိယစိတ္တေသု လဟုတာဒီနံ အဘာဝပ္ပသင်္ဂတော. ‘‘သဒ္ဒေါ ဝိကာရော’’တျာဒိ သဗ္ဗေသမ္ပိ သာဓာရဏဝသေန ဝုတ္တံ. ६१. असंज्ञसत्त वगळता इतर पंधरा रूपभूमींमध्ये घ्राणप्रसाद, जिव्हाप्रसाद, कायप्रसाद आणि दोन भावरूप या पाच रूपांच्या अभावामुळे तेवीस रूपे असतात. परंतु काही आचार्य म्हणतात की, 'त्या रूपभूमींमध्ये जडत्व निर्माण करणाऱ्या धातूंच्या क्षोभाचा अभाव असल्यामुळे लहुता इत्यादी तीन रूपे देखील नसतात'; परंतु ते कारणरहित (अयोग्य) आहे. कारण शांत करण्यायोग्य अशा धातूंच्या क्षोभाची अपेक्षा करून त्याच्या विरोधी धर्मांची (लहुता इत्यादींची) प्रवृत्ती होत नाही. जर असे मानले, तर अर्हंतांच्या सहेतुक क्रियाचित्तांमध्ये लहुता इत्यादी चेतसिकांच्या अभावाचा प्रसंग येईल. 'शब्द, विकार' इत्यादी गाथा सर्वांच्याच साधारणतेच्या अपेक्षेने सांगितली आहे. ရူပပဝတ္တိက္ကမဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रूपप्रवृत्तीच्या क्रमाचे वर्णन समाप्त झाले. နိဗ္ဗာနဘေဒဝဏ္ဏနာ निर्वाणभेदाचे वर्णन ၆၂. ဧတ္တာဝတာ [Pg.216] စိတ္တစေတသိကရူပါနိ ဝိဘာဂတော နိဒ္ဒိသိတွာ ဣဒါနိ နိဗ္ဗာနံ နိဒ္ဒိသန္တော အာဟ ‘‘နိဗ္ဗာနံ ပနာ’’တျာဒိ. ‘‘စတုမဂ္ဂဉာဏေန သစ္ဆိကာတဗ္ဗ’’န္တိ ဣမိနာ နိဗ္ဗာနဿ တံတံအရိယပုဂ္ဂလာနံ ပစ္စက္ခသိဒ္ဓတံ ဒဿေတိ. ‘‘မဂ္ဂဖလာနမာရမ္မဏဘူတ’’န္တိ ဣမိနာ ကလျာဏပုထုဇ္ဇနာနံ အနုမာနသိဒ္ဓတံ. သင်္ခတဓမ္မာရမ္မဏဉှိ, ပညတ္တာရမ္မဏံ ဝါ ဉာဏံ ကိလေသာနံ သမုစ္ဆေဒပဋိပ္ပဿမ္ဘနေ အသမတ္ထံ, အတ္ထိ စ လောကေ ကိလေသသမုစ္ဆေဒါဒိ. တသ္မာ အတ္ထိ သင်္ခတသမ္မုတိဓမ္မဝိပရီတော ကိလေသာနံ သမုစ္ဆေဒပဋိပ္ပဿဒ္ဓိကရာနံ မဂ္ဂဖလာနံ အာရမ္မဏဘူတော နိဗ္ဗာနံ နာမ ဧကော ဓမ္မောတိ သိဒ္ဓံ. ပစ္စက္ခာနုမာနသိဒ္ဓတာသန္ဒဿနေန စ အဘာဝမတ္တံ နိဗ္ဗာနန္တိ ဝိပ္ပဋိပန္နာနံ ဝါဒံ နိသေဓေတီတိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. ခန္ဓာဒိဘေဒေ တေဘူမကဓမ္မေ ဟေဋ္ဌုပရိယဝသေန ဝိနနတော သံသိဗ္ဗနတော ဝါနသင်္ခါတာယ တဏှာယ နိက္ခန္တတ္တာ ဝိသယာတိက္ကမဝသေန အတီတတ္တာ. ६२. इथपर्यंत चित्त, चेतसिक आणि रूपांचे सविस्तर वर्गीकरण करून, आता निर्वाणाचा निर्देश करताना ग्रंथकार 'निर्वाण पण...' इत्यादी म्हणतात. 'चार मार्गज्ञानाद्वारे साक्षात करण्यायोग्य' या विधानाने निर्वाणाची त्या त्या आर्यपुद्गलांच्या ज्ञानातील प्रत्यक्ष सिद्धता (पच्चक्खसिद्धता) दर्शविली आहे. 'मार्ग आणि फलांचे आलंबन असलेले' या विधानाने कल्याणक पृथग्जनांच्या अनुमानसिद्धतेचे (अनुमानसिद्धता) दर्शन घडविले आहे. कारण संस्कृत धर्म किंवा प्रज्ञप्ती आलंबन असणारे ज्ञान क्लेशांचा समूलोच्छेद (पूर्ण नाश) आणि प्रतिप्रश्रब्धी (पुन्हा उत्पन्न न होऊ देणे) करण्यात असमर्थ असते; आणि लोकात क्लेशांचा समूलोच्छेद इत्यादी अवस्था अस्तित्वात आहे. म्हणून, संस्कृत आणि संमूर्ती (प्रज्ञप्ती) धर्मांच्या विपरीत असलेला, क्लेशांचा समूलोच्छेद व प्रतिप्रश्रब्धी करणाऱ्या मार्ग-फलांचे आलंबन असलेला 'निर्वाण' नावाचा एक अद्वितीय धर्म अस्तित्वात आहे, हे सिद्ध होते. प्रत्यक्ष आणि अनुमान सिद्धतेच्या प्रदर्शनाने 'निर्वाण म्हणजे केवळ अभाव आहे' अशा चुकीच्या मार्गाने जाणाऱ्यांच्या (विप्रतिपन्नांच्या) वादाचा निषेध होतो, म्हणून अधिक विस्ताराची आवश्यकता नाही. स्कंध इत्यादी भेद असलेल्या त्रिभूमिक धर्मांना खाली आणि वर अशा प्रकारे विणण्याचे किंवा बांधण्याचे काम करत असल्यामुळे 'वान' नावाच्या तृष्णेपासून मुक्त झाल्यामुळे आणि विषयांचे अतिक्रमण करून पलीकडे गेल्यामुळे याला 'निर्वाण' म्हटले जाते. ၆၃. သဘာဝတောတိ အတ္တနော သန္တိလက္ခဏေန. ဥပါဒီယတိ ကာမုပါဒါဒီဟီတိ ဥပါဒိ, ပဉ္စက္ခန္ဓဿေတံ အဓိဝစနံ, ဥပါဒိယေဝ သေသော ကိလေသေဟီတိ ဥပါဒိသေသော, တေန သဟ ဝတ္တတီတိ သဥပါဒိသေသာ, သာ ဧဝ နိဗ္ဗာနဓာတူတိ သဥပါဒိသေသနိဗ္ဗာနဓာတု. ကာရဏပရိယာယေနာတိ သဥပါဒိသေသာဒိဝသေန ပညာပနေ ကာရဏဘူတဿ ဥပါဒိသေသ ဘာဝါဘာဝဿ လေသေန. ६३. स्वभावाच्या दृष्टीने विचार केला तर निर्वाण हे स्वतःच्या शांतता या लक्षणाने युक्त आहे. कामोपादान इत्यादींद्वारे जे ग्रहण केले जाते, ते 'उपादि' होय; हे पाच लौकिक स्कंधांचे नाव आहे. क्लेशांच्या नाशानंतर केवळ उपादि (पाच स्कंध) शिल्लक राहते, म्हणून त्याला 'उपादिशेष' म्हणतात. त्या उपादिशेषासह जे विद्यमान असते, ते 'सउपादिशेष' होय आणि तीच निर्वाणधातू म्हणजे 'सउपादिशेष निर्वाणधातू' होय. 'कारणपर्यायाच्या दृष्टीने' म्हणजे सउपादिशेष इत्यादी रूपाने प्रज्ञप्ती (नाव) देण्यामध्ये कारणभूत असलेल्या उपादिशेषाच्या असण्या-नसण्याच्या अंशाने होय. ၆၄. အာရမ္မဏတော, သမ္ပယောဂတော စ ရာဂဒေါသမောဟေဟိ သုညတ္တာ သုညံ, သုညမေဝ သုညတံ, တထာ ရာဂါဒိနိမိတ္တရဟိတတ္တာ အနိမိတ္တံ. ရာဂါဒိပဏိဓိရဟိတတ္တာ အပ္ပဏိဟိတံ. သဗ္ဗသင်္ခါရေဟိ ဝါ သုညတ္တာ သုညတံ. သဗ္ဗသင်္ခါရနိမိတ္တာဘာဝတော [Pg.217] အနိမိတ္တံ. တဏှာပဏိဓိယာ အဘာဝတော အပ္ပဏိဟိတံ. ६४. आलंबन आणि संप्रयोग या दोन्ही दृष्टींनी राग, द्वेष आणि मोहापासून शून्य (रहित) असल्यामुळे याला 'शून्य' म्हटले जाते, आणि शून्य म्हणजेच 'शून्यता' होय. तसेच, राग इत्यादी चिन्हांपासून (निमित्तांपासून) रहित असल्यामुळे याला 'अनिमित्त' म्हटले जाते. राग इत्यादी प्रणिधींपासून (इच्छा/आकांक्षांपासून) रहित असल्यामुळे याला 'अप्रणिहित' म्हटले जाते. किंवा, सर्व संस्कारांपासून शून्य असल्यामुळे याला 'शून्यता' म्हटले जाते. सर्व संस्कारांच्या निमित्तांचा (आकारांचा) अभाव असल्यामुळे याला 'अनिमित्त' म्हटले जाते. आणि तृष्णारूपी प्रणिधीचा (इच्छेचा) अभाव असल्यामुळे याला 'अप्रणिहित' म्हटले जाते. ၆၅. စဝနာဘာဝတော အစ္စုတံ. အန္တဿ ပရိယောသာနဿ အတိက္ကန္တတ္တာ အစ္စန္တံ. ပစ္စယေဟိ အသင်္ခတတ္တာ အသင်္ခတံ. အတ္တနော ဥတ္တရိတရဿ အဘာဝတော, သဟဓမ္မေန ဝတ္တဗ္ဗဿ ဥတ္တရဿ ဝါ အဘာဝတော အနုတ္တရံ. ဝါနတော တဏှာတော မုတ္တတ္တာ သဗ္ဗသော အပဂတတ္တာ ဝါနမုတ္တာ. မဟန္တေ သီလက္ခန္ဓာဒိကေ ဧသန္တိ ဂဝေသန္တီတိ မဟေသယော. ‘‘ဣတိ စိတ္တ’’န္တျာဒိ ဆဟိ ပရိစ္ဆေဒေဟိ ဝိဘတ္တာနံ စိတ္တာဒီနံ နိဂမနံ. ६५. च्युतीचा (नाशाचा) अभाव असल्यामुळे याला 'अच्युत' म्हटले जाते. अंत किंवा समाप्तीचे अतिक्रमण केल्यामुळे याला 'अत्यंत' म्हटले जाते. प्रत्ययांद्वारे (कारणांद्वारे) असंस्कृत (अवनिर्मित) असल्यामुळे याला 'असंस्कृत' म्हटले जाते. स्वतःपेक्षा श्रेष्ठ असा दुसरा कोणताही धर्म नसल्यामुळे, किंवा सयुक्तिकपणे सांगता येईल अशा श्रेष्ठ धर्माचा अभाव असल्यामुळे याला 'अनुत्तर' म्हटले जाते. 'वान' नावाच्या तृष्णेपासून मुक्त आणि सर्वथा विलग झाल्यामुळे याला 'वानमुक्त' म्हटले जाते. जे महान शीलस्कंध इत्यादी गुणांचा शोध घेतात, त्यांना 'महर्षी' (महेसयो) म्हणतात. 'इति चित्तं...' इत्यादी गाथा सहा परिच्छेदांमध्ये विभागलेल्या चित्त इत्यादी परमार्थ धर्मांचा उपसंहार (निगमन) आहे. နိဗ္ဗာနဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. निर्वाणभेदाचे वर्णन समाप्त झाले. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंग्रहाची टीका असलेल्या 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाच्या ग्रंथातील... ရူပပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. रूपपरिच्छेदाचे वर्णन समाप्त झाले. ၇. သမုစ္စယပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ७. समुच्चयपरिच्छेदाचे वर्णन ၁. သလက္ခဏာ စိန္တနာဒိသလက္ခဏာ စိတ္တစေတသိကနိပ္ဖန္နရူပနိဗ္ဗာနဝသေန ဒွါသတ္တတိပဘေဒါ ဝတ္ထုဓမ္မာ သဘာဝဓမ္မာ ဝုတ္တာ, ဣဒါနိ တေသံ ယထာယောဂံ သဘာဝဓမ္မာနံ ဧကေကသမုစ္စယဝသေန ယောဂါနုရူပတော အကုသလသင်္ဂဟာဒိဘေဒံ သမုစ္စယံ ရာသိံ ပဝက္ခာမီတိ ယောဇနာ. १. स्वतःचे लक्षण (जसे की आलंबन जाणणे इत्यादी) असणारे चित्त, चेतसिक, निष्पन्न रूप आणि निर्वाण यांच्या भेदाने बहात्तर (७२) प्रकारचे वस्तूधर्म किंवा स्वभावधर्म सांगितले गेले आहेत. आता त्या स्वभावधर्मांच्या योग्यतेनुसार, एकेक समुच्चय करण्याच्या दृष्टीने आणि त्यांच्या परस्पर संबंधानुसार, अकुशलसंग्रह इत्यादी भेद असलेल्या समुच्चयाचा (समूहाचा) मी निर्देश करीन, असा संबंध (योजना) आहे. ၂. အကုသလာနမေဝ သဘာဂဓမ္မဝသေန သင်္ဂဟော အကုသလသင်္ဂဟော. ကုသလာဒိဝသေန မိဿကာနံ သင်္ဂဟော မိဿကသင်္ဂဟော, သစ္စာဘိသမ္ဗောဓိသင်္ခါတဿ အရိယမဂ္ဂဿ ပက္ခေ ဘဝါနံ ဗောဓိပက္ခိယာနံ ဓမ္မာနံ သတိပဋ္ဌာနာဒိဘေဒါနံ သဘာဂဝတ္ထုဝသေန သင်္ဂဟော ဗောဓိပက္ခိယသင်္ဂဟော. ခန္ဓာဒိဝသေန သဗ္ဗေသံ သင်္ဂဟော သဗ္ဗသင်္ဂဟော. २. केवळ अकुशल धर्मांचाच त्यांच्या समान स्वभावाच्या आधारे केलेला संग्रह म्हणजे 'अकुशलसंग्रह' होय. कुशल इत्यादींच्या रूपाने संमिश्र धर्मांचा केलेला संग्रह म्हणजे 'मिश्रकसंग्रह' होय. सत्यज्ञानाचा साक्षात्कार करून देणाऱ्या आर्यमार्गाच्या पक्षात (अंगात) असणाऱ्या, सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादी भेद असलेल्या बोधिपक्षीय धर्मांचा समान वस्तूच्या आधारे केलेला संग्रह म्हणजे 'बोधिपक्षीयसंग्रह' होय. स्कंध इत्यादींच्या रूपाने सर्व धर्मांचा केलेला संग्रह म्हणजे 'सर्वसंग्रह' होय. အကုသလသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ अकुशलसंग्रहाचे वर्णन ၃. ပုဗ္ဗကောဋိယာ [Pg.218] အပညာယနတော စိရပါရိဝါသိယဋ္ဌေန, ဝဏတော ဝါ ဝိဿန္ဒမာနယူသာ ဝိယ စက္ခာဒိတော ဝိသယေသု ဝိဿန္ဒနတော အာသဝါ. အထ ဝါ ဘဝတော အာဘဝဂ္ဂံ ဓမ္မတော အာဂေါတြဘုံ သဝန္တိ ပဝတ္တန္တီတိ အာသဝါ. အဝဓိအတ္ထော စေတ္ထ အာ-ကာရော, အဝဓိ စ မရိယာဒါဘိဝိဓိဝသေန ဒုဝိဓော. တတ္ထ ‘‘အာပါဋလိပုတ္တံ ဝုဋ္ဌော ဒေဝေါ’’တျာဒီသု ဝိယ ကိရိယံ ဗဟိ ကတွာ ပဝတ္တော မရိယာဒေါ. ‘‘အာဘဝဂ္ဂံ သဒ္ဒေါ အဗ္ဘုဂ္ဂတော’’တျာဒီသု ဝိယ ကိရိယံ ဗျာပေတွာ ပဝတ္တော အဘိဝိဓိ. ဣဓ ပန အဘိဝိဓိမှိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တထာ ဟေတေ နိဗ္ဗတ္တိဋ္ဌာနဘူတေ စ ဘဝဂ္ဂေ, ဂေါတြဘုမှိ စ အာရမ္မဏဘူတေ ပဝတ္တန္တိ. ဝိဇ္ဇမာနေသု စ အညေသု အာဘဝဂ္ဂံ, အာဂေါတြဘုဉ္စ သဝန္တေသု မာနာဒီသု အတ္တတ္တနိယဂ္ဂဟဏဝသေန အဘိဗျာပနတော မဒကရဏဋ္ဌေန အာသဝသဒိသတာယ စ ဧတေယေဝ အာသဝဘာဝေန နိရုဠှာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ကာမောယေဝ အာသဝေါ ကာမာသဝေါ, ကာမရာဂေါ. ရူပါရူပဘဝေသု ဆန္ဒရာဂေါ ဘဝါသဝေါ. ဈာနနိကန္တိသဿတဒိဋ္ဌိသဟဂတော စ ရာဂေါ ဧတ္ထေဝ သင်္ဂယှတိ. တတ္ထ ပဌမော ဥပပတ္တိဘဝေသု ရာဂေါ, ဒုတိယော ကမ္မဘဝေ, တတိယော ဘဝဒိဋ္ဌိသဟဂတော. ဒွါသဋ္ဌိဝိဓာ ဒိဋ္ဌိ ဒိဋ္ဌာသဝေါ. ဒုက္ခာဒီသု စတူသု သစ္စေသု, ပုဗ္ဗန္တေ, အပရန္တေ, ပုဗ္ဗာပရန္တေ, ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒေသု စာတိ အဋ္ဌသု ဌာနေသု အညာဏံ အဝိဇ္ဇာသဝေါ. ३. संसाराची पूर्वमर्यादा (पूर्वकोटी) माहीत नसल्यामुळे दीर्घकाळ वासना म्हणून राहण्याच्या अर्थाने, किंवा जखमेतून वाहणाऱ्या रसाप्रमाणे चक्षू इत्यादी इंद्रियांद्वारे विषयांमध्ये पाझरण्यामुळे (वाहण्यामुळे) यांना 'आसव' म्हणतात. किंवा, भवाच्या दृष्टीने भवाग्रापर्यंत आणि धर्माच्या दृष्टीने गोत्रभूपर्यंत जे वाहतात (प्रवृत्त होतात), म्हणून त्यांना 'आसव' म्हणतात. येथे 'आ' हा शब्द मर्यादेच्या (अवधीच्या) अर्थाने आहे, आणि मर्यादा ही 'मरियाद' आणि 'अभिविधी' अशा दोन प्रकारची असते. त्यापैकी, 'पाटलिपुत्रापर्यंत पाऊस पडला' इत्यादी उदाहरणांप्रमाणे क्रियेला बाहेर ठेवून प्रवृत्त होणारी मर्यादा म्हणजे 'मरियाद' होय. 'भवाग्रापर्यंत आवाज पसरला' इत्यादी उदाहरणांप्रमाणे क्रियेला व्यापून प्रवृत्त होणारी मर्यादा म्हणजे 'अभिविधी' होय. येथे मात्र 'अभिविधी' अर्थ ग्रहण केला पाहिजे. कारण हे आसव उत्पत्तीचे स्थान असलेल्या भवाग्रात आणि आलंबन असलेल्या गोत्रभूपर्यंत प्रवृत्त होतात. भवाग्रापर्यंत आणि गोत्रभूपर्यंत वाहणारे मान इत्यादी इतर धर्म विद्यमान असताना देखील, 'मी' आणि 'माझे' अशा ग्रहणाच्या रूपाने अत्यंत व्याप्त असल्यामुळे आणि मद (नशा) निर्माण करण्याच्या अर्थाने मद्यासारखे (आसवासारखे) असल्यामुळे हेच धर्म 'आसव' या नावाने रूढ झाले आहेत, असे जाणावे. काम हाच आसव म्हणजे 'कामासव' (कामराग) होय. रूप आणि अरूप भवांमधील छंदराग म्हणजे 'भवासव' होय. ध्यानाची आसक्ती (ध्याननिकंती) आणि शाश्वतदृष्टीसहगत असलेला राग यांचा यातच समावेश होतो. त्यापैकी, पहिला (छंदराग) उपपत्ती भवांमधील राग आहे, दुसरा (ध्याननिकंती) कर्मभवातील राग आहे, आणि तिसरा (शाश्वतदृष्टीसहगत) भवदृष्टीसहगत राग आहे. बासष्ट (६२) प्रकारची दृष्टी म्हणजे 'दृष्ट्यासव' होय. दुःख इत्यादी चार आर्यसत्ये, पूर्वान्त (भूतकाळ), अपरान्त (भविष्यकाळ), पूर्वान्तापरान्त (भूत-भविष्यकाळ) आणि प्रतीत्यसमुत्पाद या आठ स्थानांमधील अज्ञान म्हणजे 'अविद्यासव' होय. ၄. ဩတ္ထရိတွာ ဟရဏတော, ဩဟနနတော ဝါ ဟေဋ္ဌာ ကတွာ ဟနနတော ဩသီဒါပနတော ‘‘ဩဃော’’တိ ဝုစ္စတိ ဇလပ္ပဝါဟော, ဧတေ စ သတ္တေ ဩတ္ထရိတွာ ဟနန္တာ ဝဋ္ဋသ္မိံ သတ္တေ ဩသီဒါပေန္တာ ဝိယ ဟောန္တီတိ ဩဃသဒိသတာယ ဩဃာ[Pg.219], အာသဝါယေဝ ပနေတ္ထ ယထာဝုတ္တဋ္ဌေန ‘‘ဩဃာ’’တိ စ ဝုစ္စန္တိ. ४. व्यापून वाहून नेण्याच्या अर्थाने, किंवा खाली दाबून नष्ट करण्याच्या आणि बुडविण्याच्या अर्थाने पाण्याच्या प्रवाहाला 'ओघ' (पूर) म्हटले जाते. हे अकुशल धर्म प्राण्यांना व्यापून नष्ट करतात आणि संसारात त्यांना बुडविण्यासारखे कार्य करतात, म्हणून ओघासारखे (पुरासारखे) असल्यामुळे यांना 'ओघ' म्हणतात. येथे पूर्वी सांगितलेल्या आसवांनाच वर नमूद केलेल्या अर्थाने 'ओघ' असेही म्हटले जाते. ၅. ဝဋ္ဋသ္မိံ, ဘဝယန္တကေ ဝါ သတ္တေ ကမ္မဝိပါကေန ဘဝန္တရာဒီဟိ, ဒုက္ခေန ဝါ သတ္တေ ယောဇေန္တီတိ ယောဂါ, ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တဓမ္မာဝ. ५. संसारात किंवा भवरूपी यंत्रात प्राण्यांना कर्माच्या विपाकाशी, दुसऱ्या भवाशी किंवा दुःखाशी जे जोडतात (बांधतात), म्हणून त्यांना 'योग' म्हणतात. हे पूर्वी सांगितलेले (लोभ, दृष्टी, मोह) हेच धर्म आहेत. ၆. နာမကာယေန ရူပကာယံ, ပစ္စုပ္ပန္နကာယေန ဝါ အနာဂတကာယံ ဂန္ထေန္တိ ဒုပ္ပမုဉ္စံ ဝေဌေန္တီတိ ကာယဂန္ထာ. ဂေါသီလာဒိနာ သီလေန, ဝတေန, တဒုဘယေန စ သုဒ္ဓီတိ ဧဝံ ပရတော အသဘာဝတော အာမသနံ ပရာမာသော. ‘‘ဣဒမေဝ သစ္စံ, မောဃမည’’န္တိ အဘိနိဝိသနံ ဒဠှဂ္ဂါဟော ဣဒံ သစ္စာဘိနိဝေသော. ६. नामसमूहाने रूपसमूहाला, किंवा वर्तमानकालीन नाम-रूप समूहाने भविष्यकालीन नाम-रूप समूहाला जे बांधतात आणि सोडवण्यास कठीण अशा प्रकारे वेढून टाकतात, त्यांना 'कायग्रंथ' (कायरूपी बंधने) म्हणतात. गाईसारखे आचरण इत्यादी शीलाने, व्रताने किंवा त्या दोन्हीच्या पालनाने शुद्धी (क्लेशमुक्ती) होते, अशा प्रकारे यथार्थापेक्षा विपरीत आणि असत्य रूपाने ग्रहण करणे म्हणजे 'परामर्श' (शीलव्रतपरामर्श) होय. 'हेच सत्य आहे, इतर सर्व व्यर्थ आहे' अशा प्रकारे दृढ अभिनिवेश करणे आणि हट्टाग्रहाने धरून ठेवणे म्हणजे 'इदंसच्चाभिनिवेश' होय. ၇. မဏ္ဍူကံ ပန္နဂေါ ဝိယ ဘုသံ ဒဠှံ အာရမ္မဏံ အာဒိယန္တီတိ ဥပါဒါနာနိ. ကာမောယေဝ ဥပါဒါနံ, ကာမေ ဥပါဒိယတီတိ ဝါ ကာမုပါဒါနံ. ‘‘ဣမိနာ မေ သီလဝတာဒိနာ သံသာရသုဒ္ဓီ’’တိ ဧဝံ သီလဝတာဒီနံ ဂဟဏံ သီလဗ္ဗတုပါဒါနံ. ဝဒန္တိ ဧတေနာတိ ဝါဒေါ, ခန္ဓေဟိ ဗျတိရိတ္တာဗျတိရိတ္တဝသေန ဝီသတိ ပရိကပ္ပိတဿ အတ္တနော ဝါဒေါ အတ္တဝါဒေါ. သောယေဝ ဥပါဒါနန္တိ အတ္တဝါဒုပါဒါနံ. ७. ज्याप्रमाणे सर्प बेडकाला घट्ट पकडतो, त्याप्रमाणे जे विषयाला (आलंबनाला) अत्यंत दृढतेने ग्रहण करतात, त्यांना 'उपादान' म्हणतात. काम (वासना) हेच उपादान आहे, किंवा कामविषयांना दृढतेने ग्रहण करणे म्हणजे 'कामुपादान' होय. 'माझ्या या शील आणि व्रताने संसारातून शुद्धी होईल' अशा प्रकारे शील व व्रतांचे ग्रहण करणे म्हणजे 'शीलव्रतोपादान' होय. ज्याद्वारे प्रतिपादन केले जाते तो 'वाद' होय. स्कंधांपेक्षा भिन्न किंवा अभिन्न रूपाने वीस प्रकारे कल्पिलेल्या आत्म्याचे प्रतिपादन करणे म्हणजे 'आत्मवाद' होय. तोच आत्मवाद जेव्हा उपादान बनतो, तेव्हा त्याला 'आत्मवादोपादान' म्हणतात. ၈. ဈာနာဒိဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇနကကုသလစိတ္တံ နိသေဓေန္တိ တထာ တဿ ဥပ္ပဇ္ဇိတုံ န ဒေန္တီတိ နီဝရဏာနိ, ပညာစက္ခုနော ဝါ အာဝရဏဋ္ဌေန နီဝရဏာ. ပဉ္စသု ကာမဂုဏေသု အဓိမတ္တရာဂသင်္ခါတော ကာမောယေဝ ဆန္ဒနဋ္ဌေန ဆန္ဒော စာတိ ကာမစ္ဆန္ဒော. သောယေဝ နီဝရဏန္တိ ကာမစ္ဆန္ဒနီဝရဏံ. ဗျာပဇ္ဇတိ ဝိနဿတိ ဧတေန စိတ္တန္တိ ဗျာပါဒေါ, ‘‘အနတ္ထံ မေ အစရီ’’တျာဒိနယပ္ပဝတ္တနဝဝိဓအာဃာတဝတ္ထုပဒဋ္ဌာနတာယ နဝဝိဓော, အဋ္ဌာနကောပေန သဟ ဒသဝိဓော ဝါ ဒေါသော, သောယေဝ [Pg.220] နီဝရဏန္တိ ဗျာပါဒနီဝရဏံ. ထိနမိဒ္ဓမေဝ နီဝရဏံ ထိနမိဒ္ဓနီဝရဏံ. တထာ ဥဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စနီဝရဏံ. ကသ္မာ ပနေတေ ဘိန္နဓမ္မာ ဒွေ ဒွေ ဧကနီဝရဏဘာဝေန ဝုတ္တာတိ? ကိစ္စာဟာရပဋိပက္ခာနံ သမာနဘာဝတော. ထိနမိဒ္ဓါနဉှိ စိတ္တုပ္ပာဒဿ လယာပါဒနကိစ္စံ သမာနံ, ဥဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စာနံ အဝူပသန္တဘာဝကာရဏံ. တထာ ပုရိမာနံ ဒွိန္နံ တန္ဒီဝိဇမ္ဘိတာ အာဟာရော, ဟေတူတျတ္ထော, ပစ္ဆိမာနံ ဉာတိဗျသနာဒိဝိတက္ကနံ. ပုရိမာနဉ္စ ဒွိန္နံ ဝီရိယံ ပဋိပက္ခဘူတံ, ပစ္ဆိမာနံ သမထောတိ, တေနာဟု ပေါရာဏာ – ८. जे ध्यानादींच्या द्वारे उत्पन्न होणाऱ्या कुशल चित्ताला प्रतिबंधित करतात, तसेच त्याला उत्पन्न होऊ देत नाहीत, त्यांना 'नीवरण' म्हणतात; किंवा प्रज्ञाचक्षूला झाकून टाकण्याच्या (अडथळा आणण्याच्या) अर्थाने त्यांना 'नीवरण' म्हणतात. पाच कामगुणांमध्ये अतिशय तीव्र राग नावाचा काम हाच इच्छिण्याच्या अर्थाने 'छंद' देखील आहे, म्हणून त्याला 'कामच्छंद' म्हणतात. तोच कामच्छंद जेव्हा नीवरण बनतो, तेव्हा त्याला 'कामच्छंदनीवरण' म्हणतात. ज्याच्यामुळे चित्त विकृत होते आणि नष्ट होते, तो 'व्यापाद' (द्वेष) होय. 'त्याने माझे अहित केले' इत्यादी नऊ प्रकारच्या आघातवस्तूंच्या (क्रोधाच्या कारणांच्या) आधारावर तो नऊ प्रकारचा असतो, किंवा अयोग्य ठिकाणी राग येण्यासह तो दहा प्रकारचा द्वेष असतो. तोच व्यापाद जेव्हा नीवरण बनतो, तेव्हा त्याला 'व्यापादनीवरण' म्हणतात. स्त्यान (मानसिक आळस) आणि मिद्ध (शारीरिक आळस) हेच नीवरण असल्याने त्याला 'स्त्यानमिद्धनीवरण' म्हणतात. त्याचप्रमाणे औद्धत्य (चित्ताची चंचलता) आणि कौकृत्य (पश्चात्ताप) हे नीवरण असल्याने त्याला 'औद्धत्यकौकृत्यनीवरण' म्हणतात. परंतु, हे भिन्न धर्म असूनही दोन-दोन मिळून एकच नीवरण म्हणून का सांगितले आहेत? कार्य (कृती), आहार (कारण) आणि प्रतिपक्ष (विरोधी धर्म) यांच्या समानतेमुळे. कारण, स्त्यान आणि मिद्ध यांचे चित्ताला सुस्त करण्याचे कार्य समान आहे; आणि औद्धत्य व कौकृत्य यांचे चित्ताला अशांत ठेवण्याचे कार्य समान आहे. तसेच, पहिल्या दोन्हींचा (स्त्यान-मिद्धचा) आहार (कारण) आळस आणि जांभई देणे इत्यादी आहे; तर नंतरच्या दोन्हींचा (औद्धत्य-कौकृत्याचा) आहार नातेवाईकांचे नुकसान इत्यादींचे चिंतन करणे हा आहे. पहिल्या दोन्हींचा प्रतिपक्ष 'वीर्य' (प्रयत्न) आहे, तर नंतरच्या दोन्हींचा प्रतिपक्ष 'शम' (समाधी) आहे. म्हणूनच प्राचीन आचार्यांनी म्हटले आहे – ‘‘ကိစ္စာဟာရဝိပက္ခာနံ, ဧကတ္တာ ဧကမေတ္ထ ဟိ; ကတမုဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စံ, ထိနမိဒ္ဓဉ္စ တာဒိနာ. कार्य, आहार आणि प्रतिपक्ष यांच्या समानतेमुळे, तादिगुणांनी युक्त अशा भगवंतांनी येथे औद्धत्य-कौकृत्य आणि स्त्यान-मिद्ध यांना प्रत्येकी एकच नीवरण मानले आहे. ‘‘လီနတာသန္တတာ ကိစ္စံ, တန္ဒီ ဉာတိဝိတက္ကနံ; ဟေတု ဝီရိယသမထာ, ဣမေ တေသံ ဝိရောဓိနော’’တိ. सुस्ती (मंदावणे) आणि अशांतता हे त्यांचे कार्य आहे; आळस आणि नातेवाईकांचे चिंतन हे त्यांचे कारण (हेतू) आहे; आणि वीर्य (प्रयत्न) व शम (समाधी) हे त्यांचे विरोधी (प्रतिपक्ष) आहेत. ၉. အပ္ပဟီနဋ္ဌေန အနု အနု သန္တာနေ သေန္တီတိ အနုသယာ, အနုရူပံ ကာရဏံ လဘိတွာ ဥပ္ပဇ္ဇန္တီတျတ္ထော. အပ္ပဟီနာ ဟိ ကိလေသာ ကာရဏလာဘေ သတိ ဥပဇ္ဇနာရဟာ သန္တာနေ အနု အနု သယိတာ ဝိယ ဟောန္တီတိ တဒဝတ္ထာ ‘‘အနုသယာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. တေ ပန နိပ္ပရိယာယတော အနာဂတာ ကိလေသာ, အတီတပစ္စုပ္ပန္နာပိ တံသဘာဝတ္တာ တထာ ဝုစ္စန္တိ. န ဟိ ကာလဘေဒေန ဓမ္မာနံ သဘာဝဘေဒေါ အတ္ထိ, ယဒိ အပ္ပဟီနဋ္ဌေန အနုသယာ, နနု သဗ္ဗေပိ ကိလေသာ အပ္ပဟီနာ အနုသယာ ဘဝေယျုန္တိ? န မယံ အပ္ပဟီနတာမတ္တေန ‘‘အနုသယာ’’တိ ဝဒါမ, အထ ခေါ အပ္ပဟီနဋ္ဌေန ထာမဂတာ ကိလေသာ အနုသယာတိ. ထာမဂမနဉ္စ အနညသာဓာရဏော ကာမရာဂါဒီနမေဝ အာဝေဏိကော သဘာဝေါတိ အလံ ဝိဝါဒေန. ကာမရာဂေါယေဝ အနုသယော ကာမရာဂါနုသယော. ९. मार्गज्ञानाने नष्ट न केल्यामुळे जे चित्तसंततीमध्ये अनुगामी होऊन सुप्त राहतात, त्यांना 'अनुशय' म्हणतात; योग्य कारण मिळताच ते उत्पन्न होतात, असा याचा अर्थ आहे. कारण, नष्ट न झालेले क्लेश योग्य कारण मिळताच उत्पन्न होण्यास पात्र होऊन चित्तसंततीमध्ये सुप्त राहिल्यासारखे असतात, म्हणून त्या अवस्थेतील क्लेशांना 'अनुशय' म्हटले जाते. ते मुख्यत्वे भविष्यातील क्लेश आहेत, परंतु भूतकाळ आणि वर्तमानकाळातील क्लेश देखील तशाच स्वभावाचे असल्यामुळे त्यांना अनुशय म्हटले जाते. काळाच्या भेदाने धर्मांच्या मूळ स्वभावात भेद होत नाही. जर नष्ट न झाल्यामुळे त्यांना अनुशय म्हणतात, तर मग सर्वच नष्ट न झालेले क्लेश अनुशय असायला हवेत की नाही? आम्ही केवळ नष्ट न झाल्यामुळेच त्यांना 'अनुशय' म्हणत नाही, तर नष्ट न झाल्यामुळे जे अत्यंत बलवान झाले आहेत, अशा क्लेशांना 'अनुशय' म्हणतो. आणि बलवान होणे हा इतर क्लेशांमध्ये नसलेला, केवळ कामराग इत्यादींचाच असा विशिष्ट स्वभाव आहे, त्यामुळे या वादाची काही गरज नाही. कामराग हाच अनुशय म्हणजे 'कामरागानुशय' होय. ၁၀. သံယောဇေန္တိ ဗန္ဓန္တီတိ သံယောဇနာနိ. १०. जे संसाराशी बांधतात आणि जखडून ठेवतात, त्यांना 'संयोजन' (बंधने) म्हणतात. ၁၂. စိတ္တံ [Pg.221] ကိလိဿတိ ဥပတပ္ပတိ, ဗာဓီယတိ ဝါ ဧတေဟီတိ ကိလေသာ. १२. ज्यांच्याद्वारे चित्त मलीन होते, तप्त होते किंवा पीडित होते, त्यांना 'क्लेश' म्हणतात. ၁၃. ကာမဘဝနာမေနာတိ ကာမဘဝသင်္ခါတာနံ အာရမ္မဏာနံ နာမေန. တထာပဝတ္တန္တိ သီလဗ္ဗတာဒီနံ ပရတော အာမသနာဒိဝသေန ပဝတ္တံ. १३. 'कामभव' या नावाने म्हणजे कामभव संज्ञक आलंबनांच्या नावाने होय. 'तथाप्रवृत्त' म्हणजे शील व व्रत इत्यादींना विपरीत रूपाने ग्रहण करण्याच्या प्रवृत्तीने होय. ၁၄. အာသဝါ စ ဩဃာ စ ယောဂါ စ ဂန္ထာ စ ဝတ္ထုတော ဓမ္မတော ဝုတ္တနယေန တယော. တထာ ဥပါဒါနာ ဒုဝေ ဝုတ္တာ တဏှာဒိဋ္ဌိဝသေန. နီဝရဏာ အဋ္ဌ သိယုံ ထိနမိဒ္ဓဥဒ္ဓစ္စကုက္ကုစ္စာနံ ဝိသုံ ဂဟဏတော. အနုသယာ ဆဠေဝ ဟောန္တိ ကာမရာဂဘဝရာဂါနုသယာနံ တဏှာသဘာဝေန ဧကတော ဂဟိတတ္တာ. နဝ သံယောဇနာ မတာ ဥဘယတ္ထ ဝုတ္တာနံ တဏှာသဘာဝါနံ, ဒိဋ္ဌိသဘာဝါနဉ္စ ဧကေကံ သင်္ဂဟိတတ္တာ. ကိလေသာ ပန သုတ္တန္တဝသေန, အဘိဓမ္မဝသေနပိ ဒသ. ဣတိ ဧဝံ ပါပါနံ အကုသလာနံ သင်္ဂဟော နဝဓာ ဝုတ္တော. ဧတ္ထ စ – १४. आसव, ओघ, योग आणि ग्रंथ हे वास्तविक रूपाने (वस्तू व धर्म रूपाने) पूर्वोक्त नियमानुसार प्रत्येकी तीन-तीन आहेत. त्याचप्रमाणे, उपादान हे तृष्णा आणि दृष्टी यांच्या भेदाने दोन सांगितले आहेत. स्त्यान-मिद्ध आणि औद्धत्य-कौकृत्य यांना स्वतंत्रपणे ग्रहण केल्यामुळे नीवरण आठ होतात. अनुशय केवळ सहाच आहेत, कारण कामरागानुशय आणि भवरागानुशय यांना तृष्णा स्वभावामुळे एकत्र घेतले गेले आहे. संयोजन नऊ मानले गेले आहेत, कारण दोन्ही पद्धतींमध्ये (सुत्त आणि अभिधम्म) सांगितलेल्या तृष्णा स्वभावाच्या आणि दृष्टी स्वभावाच्या संयोजनांना प्रत्येकी एक-एक करून समाविष्ट केले आहे. परंतु, क्लेश सुत्त पद्धतीनुसार आणि अभिधम्म पद्धतीनुसार देखील दहाच आहेत. अशा प्रकारे, पापी अकुशल धर्मांचा संग्रह नऊ प्रकारे सांगितला आहे. आणि येथे – နဝါဋ္ဌသင်္ဂဟာ လောဘ-ဒိဋ္ဌိယော သတ္တသင်္ဂဟာ; အဝိဇ္ဇာ ပဋိဃော ပဉ္စ-သင်္ဂဟော စတုသင်္ဂဟာ; ကင်္ခါ တိသင်္ဂဟာ မာနုဒ္ဓစ္စာ ထိနံ ဒွိသင်္ဂဟံ. लोभ आणि दृष्टी हे अनुक्रमे नऊ आणि आठ संग्रहांमध्ये समाविष्ट आहेत; अविद्या सात संग्रहांमध्ये, प्रतिघ (द्वेष) पाच संग्रहांमध्ये, विचिकित्सा चार संग्रहांमध्ये, मान आणि औद्धत्य तीन संग्रहांमध्ये, आणि स्त्यान दोन संग्रहांमध्ये समाविष्ट आहे. ကုက္ကုစ္စမိဒ္ဓါဟိရိကာ-နောတ္တပ္ပိဿာ နိဂူဟနာ; ဧကသင်္ဂဟိတာ ပါပါ, ဣစ္စေဝံ နဝသင်္ဂဟာ. कौकृत्य, मिद्ध, अह्रीकता (निर्लज्जपणा), अनोत्तप्प (भयहीनता), ईर्ष्या, मात्सर्य आणि माया (दंभ) हे एका संग्रहात समाविष्ट आहेत. अशा प्रकारे पापी (अकुशल) धर्म नऊ संग्रहांमध्ये समाविष्ट आहेत. အကုသလသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. अकुशलसंग्रहाचे वर्णन पूर्ण झाले. မိဿကသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ मिश्रकसंग्रहाचे वर्णन ၁၅. ဟေတူသု ဝတ္တဗ္ဗံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမေဝ. १५. हेतूंविषयी जे सांगायचे आहे, ते पूर्वीच सांगितले आहे. ၁၆. အာရမ္မဏံ ဥပဂန္တွာ စိန္တနသင်္ခါတေန ဥပနိဇ္ဈာယနဋ္ဌေန ယထာရဟံ ပစ္စနီကဓမ္မဈာပနဋ္ဌေန စ ဈာနာနိ စ တာနိ အင်္ဂါနိ စ သမုဒိတာနံ [Pg.222] အဝယဝဘာဝေန အင်္ဂီယန္တိ ဉာယန္တီတိ ဈာနင်္ဂါနိ. အဝယဝဝိနိမုတ္တဿ စ သမုဒါယဿ အဘာဝေပိ သေနင်္ဂရထင်္ဂါဒယော ဝိယ ဝိသုံ ဝိသုံ အင်္ဂဘာဝေန ဝုစ္စန္တိ ဧကတော ဟုတွာ ဈာနဘာဝေန. ဒေါမနဿဉ္စေတ္ထ အကုသလဈာနင်္ဂံ, သေသာနိ ကုသလာကုသလာဗျာကတဈာနင်္ဂါနိ. १६. आलंबनाजवळ जाऊन चिंतन करण्याच्या रूपाने ध्यान करण्याच्या अर्थाने आणि योग्यतेनुसार विरोधी नीवरण धर्मांना जाळण्याच्या अर्थाने जे ध्यान केले जाते, ते 'ध्यान' होय. आणि ते ध्यानाचे अंग असल्यामुळे, एकत्रित झालेल्या अवयवांच्या रूपाने जाणले जातात म्हणून त्यांना 'ध्यानांगे' म्हणतात. अवयवांशिवाय समुदायाचे स्वतंत्र अस्तित्व नसले तरी, सेनेचे अवयव किंवा रथाचे अवयव यांच्याप्रमाणे ते स्वतंत्रपणे 'अंग' म्हणून आणि एकत्रितपणे 'ध्यान' म्हणून सांगितले जातात. येथे दौर्मनस्य (दुःखद मानसिक वेदना) हे अकुशल ध्यानांग आहे, आणि उर्वरित (वितर्क इत्यादी) कुशल, अकुशल व अव्याकृत ध्यानांगे आहेत. ၁၇. သုဂတိဒုဂ္ဂတီနံ, နိဗ္ဗာနဿ စ အဘိမုခံ ပါပနတော မဂ္ဂါ, တေသံ ပထဘူတာနိ အင်္ဂါနိ, မဂ္ဂဿ ဝါ အဋ္ဌင်္ဂိကဿ အင်္ဂါနိ မဂ္ဂင်္ဂါနိ. သမ္မာ အဝိပရီတတော ပဿတီတိ သမ္မာဒိဋ္ဌိ. သာ ပန ‘‘အတ္ထိ ဒိန္န’’န္တျာဒိဝသေန ဒသဝိဓာ, ပရိညာဒိကိစ္စဝသေန စတုဗ္ဗိဓာ ဝါ. သမ္မာ သင်္ကပ္ပေန္တိ ဧတေနာတိ သမ္မာသင်္ကပ္ပော. သော နေက္ခမ္မသင်္ကပ္ပအဗျာပါဒသင်္ကပ္ပအဝိဟိံသာသင်္ကပ္ပဝသေန တိဝိဓော. သမ္မာဝါစာဒယော ဟေဋ္ဌာ ဝိဘာဝိတာဝ. သမ္မာ ဝါယမန္တိ ဧတေနာတိ သမ္မာဝါယာမော. သမ္မာ သရန္တိ ဧတာယာတိ သမ္မာသတိ. ဣမေသံ ပန ဘေဒံ ဥပရိ ဝက္ခတိ. သမ္မာ သာမဉ္စ အာဓီယတိ ဧတေန စိတ္တန္တိ သမ္မာသမာဓိ, ပဌမဇ္ဈာနာဒိဝသေန ပဉ္စဝိဓာ ဧကဂ္ဂတာ. မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိအာဒယော ဒုဂ္ဂတိမဂ္ဂတ္တာ မဂ္ဂင်္ဂါနိ. १७. सुगती, दुर्गती आणि निर्वाणाकडे सन्मुख घेऊन जाण्याच्या अर्थाने त्यांना 'मार्ग' म्हणतात. त्यांचे मार्ग बनलेले जे भाग आहेत, किंवा अष्टांगिक मार्गाचे जे अवयव आहेत, त्यांना 'मार्गांगे' म्हणतात. यथार्थपणे आणि विपरीत न करता जे पाहते, ती 'सम्यक् दृष्टी' होय. ती 'दान देणे फलदायी आहे' इत्यादी रूपाने दहा प्रकारची आहे, किंवा परिज्ञा इत्यादी कार्याच्या भेदाने चार प्रकारची आहे. ज्याच्याद्वारे योग्य प्रकारे संकल्प केला जातो, तो 'सम्यक् संकल्प' होय. तो नैष्क्रम्य संकल्प, अव्यापाद संकल्प आणि अविहिंसा संकल्प यांच्या भेदाने तीन प्रकारचा आहे. सम्यक् वाचा इत्यादींचे स्पष्टीकरण खाली दिलेच आहे. ज्याच्याद्वारे योग्य प्रकारे प्रयत्न केला जातो, तो 'सम्यक् व्यायाम' होय. ज्याच्याद्वारे योग्य प्रकारे स्मरण केले जाते, ती 'सम्यक् स्मृती' होय. यांचा सविस्तर भेद पुढे सांगितला जाईल. ज्याच्याद्वारे चित्त योग्य प्रकारे आणि स्वतःच एकाग्र केले जाते, ती 'सम्यक् समाधी' होय. ती प्रथम ध्यानादींच्या भेदाने पाच प्रकारची एकाग्रता (चित्ताची एकाग्रता) आहे. मिथ्या दृष्टी इत्यादी दुर्गतीचे मार्ग असल्यामुळे त्यांना देखील (अकुशल) 'मार्गांगे' म्हटले जाते. ၁၈. ဒဿနာဒီသု စက္ခုဝိညာဏာဒီဟိ, ယေဘုယျေန တံသဟိတသန္တာနပ္ပဝတ္တိယံ လိင်္ဂါဒီဟိ, ဇီဝနေ ဇီဝန္တေဟိ ကမ္မဇရူပသမ္ပယုတ္တဓမ္မေဟိ, မနနေ ဇာနနေ သမ္ပယုတ္တဓမ္မေဟိ, သုခိတာဒိဘာဝေ သုခိတာဒီဟိ သဟဇာတေဟိ, သဒ္ဒဟနာဒီသု သဒ္ဒဟနာဒိဝသပ္ပဝတ္တေဟိ တေဟေဝ, ‘‘အနညာတံ ဉဿာမီ’’တိ ပဝတ္တိယံ တထာပဝတ္တေဟိ သဟဇာတေဟိ, အာဇာနနေ အညဘာဝိဘာဝေ စ အာဇာနနာဒိဝသပ္ပဝတ္တေဟိ သဟဇာတေဟိ အတ္တာနံ အနုဝတ္တာပေန္တာ ဓမ္မာ ဣဿရဋ္ဌေန ဣန္ဒြိယာနိ နာမာတိ အာဟ ‘‘စက္ခုန္ဒြိယ’’န္တျာဒိ. အဋ္ဌကထာယံ (ဝိဘ. အဋ္ဌ. ၂၁၉; ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၅၂၅) ပန အပရေပိ ဣန္ဒလိင်္ဂဋ္ဌာဒယော ဣန္ဒြိယဋ္ဌာ ဝုတ္တာ. ဇီဝိတိန္ဒြိယန္တိ ရူပါရူပဝသေန ဒုဝိဓံ ဇီဝိတိန္ဒြိယံ. ‘‘အနမတဂ္ဂေ သံသာရေ အနညာတံ [Pg.223] အမတံ ပဒံ, စတုသစ္စဓမ္မမေဝ ဝါ ဉဿာမီ’’တိ ဧဝမဇ္ဈာသယေန ပဋိပန္နဿ ဣန္ဒြိယံ အနညာတညဿာမီတိန္ဒြိယံ. အာဇာနာတိ ပဌမမဂ္ဂေန ဒိဋ္ဌမရိယာဒံ အနတိက္ကမိတွာ ဇာနာတိ ဣန္ဒြိယဉ္စာတိ အညိန္ဒြိယံ. အညာတာဝိနော စတ္တာရိ သစ္စာနိ ပဋိဝိဇ္ဈိတွာ ဌိတဿ အရဟတော ဣန္ဒြိယံ အညာတာဝိန္ဒြိယံ. ဓမ္မသရူပဝိဘာဝနတ္ထဉ္စေတ္ထ ပညိန္ဒြိယဂ္ဂဟဏံ, ပုဂ္ဂလဇ္ဈာသယကိစ္စဝိသေသဝိဘာဝနတ္ထံ အနညာတညဿာမီတိန္ဒြိယာဒီနံ ဂဟဏံ. १८. पाहणे इत्यादी कार्यांमध्ये चक्षुविज्ञान इत्यादींद्वारे; प्रामुख्याने त्या (भाव रूपाने युक्त) संततीच्या प्रवृत्तीमध्ये लिंग इत्यादींद्वारे; जगण्यामध्ये (अस्तित्वात असताना) जिवंत असणाऱ्या कर्मज रूप आणि संप्रयुक्त धर्मांद्वारे; मनन किंवा जाणण्यामध्ये संप्रयुक्त धर्मांद्वारे; सुखी इत्यादी अवस्थेमध्ये सुखी इत्यादी सहजात धर्मांद्वारे; श्रद्धा ठेवणे इत्यादींमध्ये श्रद्धा ठेवणे इत्यादींच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणाऱ्या त्याच सहजात धर्मांद्वारे; "न जाणलेले मी जाणीन" अशा प्रवृत्तीमध्ये त्या प्रकारे प्रवृत्त होणाऱ्या सहजात धर्मांद्वारे; जाणण्यामध्ये (खालच्या तीन मार्गांनी जाणलेल्या मर्यादेनुसार जाणण्यामध्ये) आणि जाणलेल्याच्या अवस्थेमध्ये (अर्हत्त्वामध्ये) जाणणे इत्यादींच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणाऱ्या सहजात धर्मांद्वारे स्वतःच्या (चक्षुप्रसाद इत्यादींच्या) अनुषंगाने प्रवृत्त करवणारे धर्म हे 'ऐश्वर्य' (प्रभुत्व) या अर्थाने 'इंद्रिये' (इन्द्रिय) म्हटले जातात, म्हणून आचार्यांनी "चक्षुन्द्रिय" इत्यादी म्हटले आहे. परंतु अट्ठकथेमध्ये इतरही 'इंद्रलिंग' (इंद्राचे चिन्ह) इत्यादी इंद्रियांचे अर्थ सांगितले आहेत. 'जीवितेंद्रिय' म्हणजे रूप आणि अरूप (नाम) च्या भेदाने दोन प्रकारचे जीवितेंद्रिय होय. "अनादी संसारात न जाणलेले अमृत पद (निर्वाण) किंवा चार आर्यसत्य धर्म मी जाणीन" अशा आशयाने प्रतिपन्न (साधना करणाऱ्या) पुद्गलाचे इंद्रिय म्हणजे 'अनज्ञातञ्ञस्सामीतिन्द्रिय' (न जाणलेले जाणण्याची इच्छा असणाऱ्याचे इंद्रिय) होय. 'आजानाति' म्हणजे पहिल्या मार्गाने (सोतापत्ती मार्गाने) पाहिलेल्या मर्यादेचे उल्लंघन न करता जाणतो, आणि ते इंद्रिय देखील आहे म्हणून 'अञ्ञिन्द्रिय' (आज्ञा-इंद्रिय) होय. चार आर्यसत्यांचा भेद करून (साक्षात्कार करून) स्थित असलेल्या 'अज्ञातवी' (अर्हंत) पुद्गलाचे इंद्रिय म्हणजे 'अज्ञातविन्द्रिय' होय. आणि येथे प्रज्ञेचे वास्तविक स्वरूप स्पष्ट करण्यासाठी 'प्रज्ञेंद्रिय' ग्रहण केले आहे, तर पुद्गलाचा आशय आणि कार्यातील विशेष स्पष्ट करण्यासाठी 'अनज्ञातञ्ञस्सामीतिन्द्रिय' इत्यादींचे ग्रहण केले आहे. ဧတ္ထ စ သတ္တပညတ္တိယာ ဝိသေသနိဿယတ္တာ အဇ္ဈတ္တိကာယတနာနိ အာဒိတော ဝုတ္တာနိ, မနိန္ဒြိယံ ပန အဇ္ဈတ္တိကာယတနဘာဝသာမညေန ဧတ္ထေဝ ဝတ္တဗ္ဗမ္ပိ အရူပိန္ဒြိယေဟိ သဟ ဧကတော ဒဿနတ္ထံ ဇီဝိတိန္ဒြိယာနန္တရံ ဝုတ္တံ, သာယံ ပညတ္တိ ဣမေသံ ဝသေန ‘‘ဣတ္ထီ ပုရိသော’’တိ ဝိဘာဂံ ဂစ္ဆတီတိ ဒဿနတ္ထံ တဒနန္တရံ ဘာဝဒွယံ, တယိမေ ဥပါဒိန္နဓမ္မာ ဣမဿ ဝသေန တိဋ္ဌန္တီတိ ဒဿနတ္ထံ တတော ပရံ ဇီဝိတိန္ဒြိယံ, သတ္တသညိတော ဓမ္မပုဉ္ဇော ပဗန္ဓဝသေန ပဝတ္တမာနော ဣမာဟိ ဝေဒနာဟိ သံကိလိဿတီတိ ဒဿနတ္ထံ တတော ဝေဒနာပဉ္စကံ, တာဟိ ပန ဝိသုဒ္ဓိကာမာနံ ဝေါဒါနသမ္ဘာရဒဿနတ္ထံ တတော သဒ္ဓါဒိပဉ္စကံ, သမ္ဘူတဝေါဒါနသမ္ဘာရာ စ ဣမေဟိ ဝိသုဇ္ဈန္တီတိ ဝိသုဒ္ဓိပ္ပတ္တာ, နိဋ္ဌိတကိစ္စာ စ ဟောန္တီတိ ဒဿနတ္ထံ အန္တေ တီဏိ ဝုတ္တာနိ. ဧတ္တာဝတာ အဓိပ္ပေတတ္ထသိဒ္ဓီတိ အညေသံ အဂ္ဂဟဏန္တိ ဣဒမေတေသံ အနုက္ကမေန ဒေသနာယ ကာရဏန္တိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. आणि येथे 'सत्त्व' (प्राणी) या संज्ञेचे विशेष आश्रयस्थान असल्यामुळे अध्यात्मिक आयतने सुरुवातीला सांगितली आहेत. परंतु मनेंद्रिय हे अध्यात्मिक आयतन असण्याच्या समानतेमुळे येथेच सांगणे योग्य असतानाही, इतर अरूप इंद्रियांसोबत एकत्र दाखवण्यासाठी जीवितेंद्रियाच्या लगेच नंतर सांगितले आहे. ती 'सत्त्व' ही संज्ञा यांच्या (भाव रूपांच्या) प्रभावाने "स्त्री, पुरुष" अशा विभागात विभागली जाते, हे दाखवण्यासाठी त्याच्या लगेच नंतर दोन भाव-इंद्रिये सांगितली आहेत. हे उपादिन्न (कर्मज) धर्म या जीवितेंद्रियाच्या प्रभावाने टिकून राहतात, हे दाखवण्यासाठी त्यानंतर जीवितेंद्रिय सांगितले आहे. 'सत्त्व' म्हणून ओळखला जाणारा धर्मांचा समूह संतती रूपाने प्रवृत्त होत असताना या वेदनांमुळे क्लेशयुक्त होतो, हे दाखवण्यासाठी त्यानंतर पाच वेदना-इंद्रिये सांगितली आहेत. परंतु त्या वेदनांपासून शुद्धीची इच्छा असणाऱ्यांसाठी शुद्धीचे साधन (संभार) दाखवण्यासाठी त्यानंतर श्रद्धा इत्यादी पाच इंद्रिये सांगितली आहेत. आणि ज्यांनी शुद्धीचे साधन गोळा केले आहे, ते या (लोकोत्तर इंद्रियांद्वारे) शुद्ध होतात, शुद्धीला प्राप्त होतात आणि कृतकृत्य (ज्यांचे कार्य पूर्ण झाले आहे असे) होतात, हे दाखवण्यासाठी शेवटी तीन लोकोत्तर इंद्रिये सांगितली आहेत. एवढ्या (२२) इंद्रियांनीच अपेक्षित अर्थाची सिद्धी होत असल्यामुळे इतर धर्मांचे ग्रहण न करणे, हेच या इंद्रियांच्या अनुक्रमाने उपदेश करण्याचे कारण आहे. त्यामुळे अधिक विस्ताराची आवश्यकता नाही. ၁၉. အသဒ္ဓိယကောသဇ္ဇပမာဒဥဒ္ဓစ္စအဝိဇ္ဇာအဟိရိကအနောတ္တပ္ပသင်္ခါတေဟိ ပဋိပက္ခဓမ္မေဟိ အကမ္ပိယဋ္ဌေန, သမ္ပယုတ္တဓမ္မေသု ထိရဘာဝေန စ သဒ္ဓါဒီနိ သတ္တ ဗလာနိ, အဟိရိကာနောတ္တပ္ပဒွယံ ပန သမ္ပယုတ္တဓမ္မေသု ထိရဘာဝေနေဝ. १९. अश्रद्धा, आळस, प्रमाद (दुर्लक्ष), उद्धच्च (अस्वस्थता), अविद्या, अहीरिक (निर्लज्जपणा) आणि अनोत्तप्प (भयहीनता) म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या विरोधी धर्मांद्वारे अकंपित (न डगमगणाऱ्या) असण्याच्या अर्थाने, आणि संप्रयुक्त धर्मांमध्ये स्थिर राहण्याच्या भावामुळे श्रद्धा इत्यादी सात धर्म हे 'बल' (बळे) म्हटले जातात. परंतु अहीरिक आणि अनोत्तप्प हे दोन धर्म केवळ संप्रयुक्त धर्मांमध्ये स्थिर राहण्याच्या भावामुळेच (बल म्हटले जातात). ၂၀. အတ္တာဓီနပ္ပဝတ္တီနံ ပတိဘူတာ ဓမ္မာ အဓိပတီ. ‘‘ဆန္ဒဝတော ကိံနာမ န သိဇ္ဈတီ’’တျာဒိကံ ဟိ ပုဗ္ဗာဘိသင်္ခါရူပနိဿယံ လဘိတွာ [Pg.224] ဥပ္ပဇ္ဇမာနေ စိတ္တေ ဆန္ဒာဒယော ဓုရဘူတာ သယံ သမ္ပယုတ္တဓမ္မေ သာဓယမာနာ ဟုတွာ ပဝတ္တန္တိ, တေ စ တေသံ ဝသေန ပဝတ္တန္တိ, တေန တေ အတ္တာဓီနာနံ ပတိဘာဝေန ပဝတ္တန္တိ. အညေသံ အဓိပတိဓမ္မာနံ အဓိပတိဘာဝနိဝါရဏဝသေန ဣဿရိယံ အဓိပတိတာ. သန္တေသုပိ ဣန္ဒြိယန္တရေသု ကေဝလံ ဒဿနာဒီသု စက္ခုဝိညာဏာဒီဟိ အနုဝတ္တာပနမတ္တံ ဣန္ဒြိယတာတိ အယံ အဓိပတိဣန္ဒြိယာနံ ဝိသေသော. २०. स्वतःच्या अधीन प्रवृत्ती असणाऱ्या संप्रयुक्त धर्मांचे जे स्वामी (अधिपती) होऊन प्रवृत्त होतात, ते धर्म 'अधिपती' (अधिपति) होत. कारण "इच्छा (छंद) असणाऱ्याचे काय बरं साध्य होणार नाही?" इत्यादी पूर्व-अभिसंस्कार रूप उपनिषय (आश्रय) मिळवून उत्पन्न होणाऱ्या चित्तामध्ये छंद इत्यादी धर्म हे प्रधान (धुरभूत) होऊन स्वतः संप्रयुक्त धर्मांना साध्य करत प्रवृत्त होतात, आणि ते संप्रयुक्त धर्म देखील त्यांच्या (छंद इत्यादींच्या) प्रभावाने प्रवृत्त होतात, म्हणून ते स्वतःच्या अधीन असणाऱ्यांच्या स्वामी भावाने प्रवृत्त होतात. स्वतःव्यतिरिक्त इतर अधिपती होऊ शकणाऱ्या धर्मांच्या अधिपती भावाला रोखण्याच्या सामर्थ्याने जे ऐश्वर्य (प्रभुत्व) असते, त्याला 'अधिपती-भाव' (अधिपतिता) म्हणतात. इतर इंद्रिये विद्यमान असतानाही, केवळ पाहणे इत्यादी कार्यांमध्ये चक्षुविज्ञान इत्यादींना स्वतःच्या अनुषंगाने प्रवृत्त करवणे एवढेच 'इंद्रियत्व' आहे; हा अधिपती आणि इंद्रिये यांमधील फरक आहे. ၂၁. ဩဇဋ္ဌမကရူပါဒယော အာဟရန္တီတိ အာဟာရာ. ကဗဠီကာရာဟာရော ဟိ ဩဇဋ္ဌမကရူပံ အာဟရတိ, ဖဿာဟာရော တိဿော ဝေဒနာ, မနောသဉ္စေတနာဟာရသင်္ခါတံ ကုသလာကုသလကမ္မံ တီသု ဘဝေသု ပဋိသန္ဓိံ. ဝိညာဏာဟာရသင်္ခါတံ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏံ သဟဇာတနာမရူပေအာဟရတိ, ကိဉ္စာပိ သကသကပစ္စယုပ္ပန္နေ အာဟရန္တာ အညေပိ အတ္ထိ. အဇ္ဈတ္တိကသန္တတိယာ ပန ဝိသေသပစ္စယတ္တာ ဣမေယေဝ စတ္တာရော ‘‘အာဟာရာ’’တိ ဝုတ္တာ. २१. जे ओज-अष्टमक रूप (ज्या रूपात ओज आठवे आहे असे रूप) इत्यादींना आणतात (धारण करतात), म्हणून ते 'आहार' (आहारा) म्हटले जातात. कारण कवलिकार आहार (कवळा कवळ करून खाल्ला जाणारा आहार) हा ओज-अष्टमक रूपाला आणतो. स्पर्श-आहार हा तीन प्रकारच्या वेदनांना (आणतो). मनोसंचेतना-आहार म्हणून ओळखले जाणारे कुशल-अकुशल कर्म हे three भावांमध्ये (लोकांमध्ये) प्रतिसंधीला (पुनर्जन्माला) आणते. विज्ञान-आहार म्हणून ओळखले जाणारे प्रतिसंधी-विज्ञान हे सहजात नाम-रूपांना आणते. जरी स्वतःच्या कार्य-धर्मांना (प्रत्ययोत्पन्नांना) आणणारे इतरही धर्म अस्तित्वात असले, तरीही अध्यात्मिक संततीचे विशेष कारण असल्यामुळे केवळ या चार धर्मांनाच 'आहार' असे म्हटले आहे. ကဗဠီကာရာဟာရဘက္ခာနဉှိ သတ္တာနံ ရူပကာယဿ ကဗဠီကာရာဟာရော ဝိသေသပစ္စယော ကမ္မာဒိဇနိတဿပိ တဿ ကဗဠီကာရာဟာရူပတ္ထမ္ဘဗလေနေဝ ဒသဝဿာဒိပ္ပဝတ္တိသမ္ဘဝတော. တထာ ဟေသ ‘‘ဓာတိ ဝိယ ကုမာရဿ, ဥပတ္ထမ္ဘနကယန္တံ ဝိယ ဂေဟဿာ’’တိ ဝုတ္တော. ဖဿောပိ သုခါဒိဝတ္ထုဘူတံ အာရမ္မဏံ ဖုသန္တောယေဝ သုခါဒိဝေဒနာပဝတ္တနေန သတ္တာနံ ဌိတိယာ ပစ္စယော ဟောတိ. မနောသဉ္စေတနာ ကုသလာကုသလကမ္မဝသေန အာယူဟမာနာယေဝ ဘဝမူလနိပ္ဖာဒနတော သတ္တာနံ ဌိတိယာ ပစ္စယော ဟောတိ. ဝိညာဏံ ဝိဇာနန္တမေဝ နာမရူပပ္ပဝတ္တနေန သတ္တာနံ ဌိတိယာ ပစ္စယော ဟောတီတိ ဧဝမေတေယေဝ အဇ္ဈတ္တသန္တာနဿ ဝိသေသပစ္စယတ္တာ ‘‘အာဟာရာ’’တိ ဝုတ္တာ, ဖဿာဒီနံ ဒုတိယာဒိဘာဝေါ ဒေသနာက္ကမတော, န ဥပ္ပတ္တိက္ကမတော. कारण कवलिकार आहाराचे भक्षण करणाऱ्या प्राण्यांच्या रूपकायासाठी कवलिकार आहार हा विशेष प्रत्यय (कारण) आहे. कारण कर्मादींद्वारे उत्पन्न झालेल्या देखील त्या रूपकायाचे कवलिकार आहाराच्या उपष्टंभन (टेकू देण्याच्या) शक्तीमुळेच दहा वर्षे इत्यादी काळापर्यंत टिकून राहणे शक्य होते. तसेच या आहाराला "बालकासाठी दाईप्रमाणे" किंवा "पडणाऱ्या घरासाठी टेकू देणाऱ्या यंत्राप्रमाणे" म्हटले गेले आहे. स्पर्श देखील सुखादी वेदनांचे अधिष्ठान असणाऱ्या आलंबनाला स्पर्श करतच सुखादी वेदना उत्पन्न करून प्राण्यांच्या स्थितीसाठी (अस्तित्वासाठी) प्रत्यय (कारण) होतो. मनोसंचेतना कुशल-अकुशल कर्माच्या रूपाने प्रयत्न करतच भवाचे मूळ असणाऱ्या प्रतिसंधी-विज्ञानाला निष्पन्न करून प्राण्यांच्या स्थितीसाठी प्रत्यय होते. विज्ञान जाणतच नाम-रूपांना प्रवृत्त करून प्राण्यांच्या स्थितीसाठी प्रत्यय होते. अशा प्रकारे केवळ हेच अध्यात्मिक संततीचे विशेष कारण असल्यामुळे 'आहार' म्हणून सांगितले गेले आहेत. स्पर्श इत्यादींचा दुसरा इत्यादी क्रम हा उपदेशाच्या क्रमानुसार (देशनाक्रम) आहे, उत्पत्तीच्या क्रमानुसार नाही. ၂၆. ပဉ္စဝိညာဏာနံ [Pg.225] ဝိတက္ကဝိရဟေန အာရမ္မဏေသု အဘိနိပါတမတ္တတ္တာ တေသု ဝိဇ္ဇမာနာနိပိ ဥပေက္ခာသုခဒုက္ခာနိ ဥပနိဇ္ဈာနာကာရဿ အဘာဝတော ဈာနင်္ဂဘာဝေန န ဥဒ္ဓဋာနိ. ‘‘ဝိတက္ကပစ္ဆိမကံ ဟိ ဈာနင်္ဂ’’န္တိ ဝုတ္တံ. ဒွိပဉ္စဝိညာဏမနောဓာတုတ္တိကသန္တီရဏတ္တိကဝသေန သောဠသစိတ္တေသု ဝီရိယာဘာဝတော တတ္ထ ဝိဇ္ဇမာနောပိ သမာဓိ ဗလဘာဝံ န ဂစ္ဆတိ. ‘‘ဝီရိယပစ္ဆိမကံ ဗလ’’န္တိ ဟိ ဝုတ္တံ. တထာ အဋ္ဌာရသာဟေတုကေသု ဟေတုဝိရဟတော မဂ္ဂင်္ဂါနိ န လဗ္ဘန္တိ. ‘‘ဟေတုပစ္ဆိမကံ မဂ္ဂင်္ဂ’’န္တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၄၃၈) ဟိ ဝုတ္တန္တိ ဣမမတ္ထံ မနသိ နိဓာယာဟ ‘‘ဒွိပဉ္စဝိညာဏေသူ’’တျာဒိ. ဈာနင်္ဂါနိ န လဗ္ဘန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. २६. पंचविज्ञानांमध्ये वितर्क नसल्यामुळे आलंबनांवर केवळ पडणे (अभिपात) एवढेच होत असल्यामुळे, त्यांच्यामध्ये विद्यमान असणारे उपेक्षा, सुख आणि दुःख हे धर्म सूक्ष्म चिंतनाच्या (उपनिध्यान) आकाराच्या अभावामुळे ध्यान-अंग म्हणून उद्धृत (निवडले) केलेले नाहीत. कारण "ध्यान-अंग हे वितर्कावर आधारित (वितर्क ज्याच्या शेवटी आहे असे) असते" असे म्हटले आहे. द्विपंचविज्ञान (१०), मनोधातू त्रिक (३) आणि संतीरण त्रिक (३) या भेदाने सोळा चित्तांमध्ये वीर्याचा (प्रयत्नाचा) अभाव असल्यामुळे, तेथे विद्यमान असलेली समाधी देखील बल-भावाला (बलाच्या अवस्थेला) प्राप्त होत नाही. कारण "बल हे वीर्यावर आधारित असते" असे म्हटले आहे. त्याचप्रमाणे अठरा अहेतुक चित्तांमध्ये हेतूचा अभाव असल्यामुळे मार्ग-अंगे प्राप्त होत नाहीत. कारण "मार्ग-अंग हे हेतूवर आधारित असते" असे म्हटले आहे; हा अर्थ मनात ठेवून आचार्यांनी "द्विपंचविज्ञानेषु" इत्यादी म्हटले आहे. "ध्यान-अंगे प्राप्त होत नाहीत" असा संबंध जोडला पाहिजे. ၂၇. အဓိမောက္ခဝိရဟတော ဝိစိကိစ္ဆာစိတ္တေ ဧကဂ္ဂတာ စိတ္တဋ္ဌိတိမတ္တံ, န ပန မိစ္ဆာသမာဓိသမာဓိန္ဒြိယသမာဓိဗလဝေါဟာရံ ဂစ္ဆတီတိ အာဟ ‘‘တထာ ဝိစိကိစ္ဆာစိတ္တေ’’တျာဒိ. २७. अधिमोक्षाचा (निश्चयाचा) अभाव असल्यामुळे विचिकित्सा-चित्तातील एकाग्रता ही केवळ चित्ताची स्थिरता मात्र आहे. परंतु ती मिथ्या-समाधी, समाधी-इंद्रिय किंवा समाधी-बल या संज्ञेला प्राप्त होत नाही, म्हणून आचार्यांनी "तथा विचिकित्साचित्ते" इत्यादी म्हटले आहे. ၂၈. ဒွိဟေတုကတိဟေတုကဂ္ဂဟဏေန ဧကဟေတုကေသု အဓိပတီနံ အဘာဝံ ဒဿေတိ. ဇဝနေသွေဝါတိ အဝဓာရဏံ လောကိယဝိပါကေသု အဓိပတီနံ အသမ္ဘဝဒဿနတ္ထံ. န ဟိ တေ ဆန္ဒာဒီနိ ပုရက္ခတွာ ပဝတ္တန္တိ. ဝီမံသာဓိပတိနော ဒွိဟေတုကဇဝနေသု အသမ္ဘဝတော စိတ္တာဘိသင်္ခါရူပနိဿယဿ စ သမ္ဘဝါနုရူပတော လဗ္ဘမာနတံ သန္ဓာယာဟ ‘‘ယထာသမ္ဘဝ’’န္တိ. ဧကောဝ လဗ္ဘတိ, ဣတရထာ အဓိပတိဘာဝါယောဂတော, တေနေဝ ဟိ ဘဂဝတာ ‘‘ဟေတူ ဟေတုသမ္ပယုတ္တကာနံ ဓမ္မာနံ ဟေတုပစ္စယေန ပစ္စယော’’တျာဒိနာ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၁) ဟေတုပစ္စယနိဒ္ဒေသေ ဝိယ ‘‘အဓိပတီ အဓိပတိသမ္ပယုတ္တကာန’’န္တျာဒိနာ အဝတွာ ‘‘ဆန္ဒာဓိပတိ ဆန္ဒသမ္ပယုတ္တကာန’’န္တျာဒိနာ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၃) ဧကေကာဓိပတိဝသေနေဝ အဓိပတိပစ္စယော ဥဒ္ဓဋော. २८. ‘द्विहेतुक’ आणि ‘तिहेतुक’ या शब्दांच्या ग्रहणाने एकहेतुक जवनांमध्ये अधिपतींचा अभाव दर्शविला आहे. ‘जवनेष्वेव’ (जवनांमध्येच) यातील ‘एव’ हा अवधारण (निश्चय) वाचक शब्द लौकिक विपाक चित्तांमध्ये अधिपतींचा असंभव (अस्तित्व नसणे) दर्शवण्यासाठी आहे. कारण ते (लौकिक विपाक चित्त) छन्द इत्यादींना प्रमुख करून प्रवृत्त होत नाहीत. द्विहेतुक जवनांमध्ये वीमंसाधिपतीचा असंभव असल्यामुळे आणि चित्त-अभिसंस्कार रूप उपनिस्सयाच्या संभवाच्या अनुरूपतेने प्राप्त होण्याच्या अवस्थेला लक्षात घेऊन "यथासंभव" असे म्हटले आहे. एकच अधिपती प्राप्त होतो, अन्यथा अधिपती असणे अयोग्य ठरेल. म्हणूनच भगवंतांनी "हेतू हेतूसंप्रयुक्तकानाम..." इत्यादी हेतूपच्चय निर्देशात सांगितल्याप्रमाणे "अधिपती अधिपतीसंप्रयुक्तकानाम..." इत्यादी न सांगता, "छन्दाधिपती छन्दसंप्रयुक्तकानाम..." इत्यादींद्वारे एकेका अधिपतीच्या प्रभावानेच अधिपती प्रत्यय उद्धृत केला आहे. ၂၉. ဝတ္ထုတော [Pg.226] ဓမ္မဝသေန ဟေတုဓမ္မာ ဆ, ဈာနင်္ဂါနိ ပဉ္စ သောမနဿဒေါမနဿုပေက္ခာနံ ဝေဒနာဝသေန ဧကတော ဂဟိတတ္တာ, မဂ္ဂင်္ဂါ နဝ မိစ္ဆာသင်္ကပ္ပဝါယာမသမာဓီနံ ဝိတက္ကဝီရိယစိတ္တေကဂ္ဂတာသဘာဝေန သမ္မာသင်္ကပ္ပာဒီဟိ ဧကတော ဂဟိတတ္တာ. ဣန္ဒြိယဓမ္မာ သောဠသ ပဉ္စန္နံ ဝေဒနိန္ဒြိယာနံ ဝေဒနာသာမညေန, တိဏ္ဏံ လောကုတ္တရိန္ဒြိယာနံ ပညိန္ဒြိယဿ စ ဉာဏသာမညေန ဧကတော ဂဟိတတ္တာ, ရူပါရူပဇီဝိတိန္ဒြိယာနဉ္စ ဝိသုံ ဂဟိတတ္တာ, ဗလဓမ္မာ ပန ယထာဝုတ္တနယေနေဝ နဝ ဤရိတာ, အဓိပတိဓမ္မာ စတ္တာရော ဝုတ္တာ, အာဟာရာ တထာ စတ္တာရော ဝုတ္တာတိ ကုသလာဒီဟိ တီဟိ သမာကိဏ္ဏော တတောယေဝ မိဿကသင်္ဂဟော ဧဝံနာမကော သင်္ဂဟော သတ္တဓာ ဝုတ္တော. ဧတ္ထ စ – २९. वस्तूच्या (परमार्थ) दृष्टीने हेतू धर्म सहा आहेत; ध्यान अंगे पाच आहेत, कारण सोमनस्य, दोमनस्य आणि उपेक्षा यांना वेदनेच्या रूपाने एकत्र घेतले गेले आहे; मार्ग अंगे नऊ आहेत, कारण मिच्छासंकप्प (मिथ्या संकल्प), मिच्छावायाम (मिथ्या व्यायाम) आणि मिच्छासमाधी (मिथ्या समाधी) यांना वितक्क (वितर्क), वीरिय (वीर्य) आणि चित्तेकग्गता (चित्तैकाग्रता) या स्वभावाने सम्मासंकप्प (सम्यक् संकल्प) इत्यादींसोबत एकत्र घेतले गेले आहे. इंद्रिय धर्म सोळा आहेत, कारण पाच वेदनेंद्रियांना वेदनेच्या समानतेमुळे आणि तीन लोकोत्तर इंद्रियांना व प्रज्ञेंद्रियाला ज्ञानाच्या समानतेमुळे एकत्र घेतले गेले आहे, तसेच रूप व अरूप जीवितेंद्रियांना स्वतंत्रपणे घेतले गेले आहे. बल धर्म तर पूर्वोक्त नियमानेच नऊ सांगितले आहेत, अधिपती धर्म चार सांगितले आहेत, आणि आहार देखील तसेच चार सांगितले आहेत. अशा प्रकारे कुशल इत्यादी तीन धर्मांनी मिश्रित असल्यामुळेच 'मिस्सकसंग्रह' (मिश्रक संग्रह) नावाचा हा संग्रह सात प्रकारचा सांगितला आहे. आणि येथे - ပဉ္စသင်္ဂဟိတာ ပညာ, ဝါယာမေကဂ္ဂတာ ပန; စတုသင်္ဂဟိတာ စိတ္တံ, သတိ စေဝ တိသင်္ဂဟာ. प्रज्ञा पाच ठिकाणी समाविष्ट आहे, तर वीर्य आणि एकाग्रता चार ठिकाणी समाविष्ट आहेत; चित्त आणि स्मृती (सती) हे तीन ठिकाणी समाविष्ट आहेत. သင်္ကပ္ပော ဝေဒနာ သဒ္ဓါ, ဒုကသင်္ဂဟိတာ မတာ; ဧကေကသင်္ဂဟာ သေသာ, အဋ္ဌဝီသတိ ဘာသိတာ. संकल्प, वेदना आणि श्रद्धा हे दोन ठिकाणी समाविष्ट मानले गेले आहेत; उर्वरित अठ्ठावीस धर्म प्रत्येकी एकाच ठिकाणी समाविष्ट सांगितले आहेत. မိဿကသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. मिस्सकसंग्रह (मिश्रक संग्रह) वर्णन समाप्त झाले. ဗောဓိပက္ခိယသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ बोधिपक्खियसंग्रह (बोधिपाक्षिक संग्रह) वर्णन. ၃၀. ပဋ္ဌာတီတိ ပဋ္ဌာနံ, အသုဘဂ္ဂဟဏာဒိဝသေန အနုပဝိသိတွာ ကာယာဒိအာရမ္မဏေ ပဝတ္တတီတျတ္ထော, သတိယေဝ ပဋ္ဌာနံ သတိပဋ္ဌာနံ. တံ ပန ကာယဝေဒနာစိတ္တဓမ္မေသု အသုဘဒုက္ခာနိစ္စာနတ္တာကာရဂ္ဂဟဏဝသေန, သုဘသုခနိစ္စအတ္တသညာဝိပလ္လာသပ္ပဟာနဝသေန စ စတုဗ္ဗိဓန္တိ ဝုတ္တံ ‘‘စတ္တာရော သတိပဋ္ဌာနာ’’တိ. ကုစ္ဆိတာနံ ကေသာဒီနံ အာယောတိ ကာယော, သရီရံ, အဿာသပဿာသာနံ ဝါ သမူဟော ကာယော[Pg.227], တဿ အနုပဿနာ ပရိကမ္မဝသေန, ဝိပဿနာဝသေန စ သရဏံ ကာယာနုပဿနာ. ဒုက္ခဒုက္ခဝိပရိဏာမဒုက္ခသင်္ခါရဒုက္ခဘူတာနံ ဝေဒနာနံ ဝသေန အနုပဿနာ ဝေဒနာနုပဿနာ. တထာ သရာဂမဟဂ္ဂတာဒိဝသေန သမ္ပယောဂဘူမိဘေဒေန ဘိန္နဿေဝ စိတ္တဿ အနုပဿနာ စိတ္တာနုပဿနာ. သညာသင်္ခါရာနံ ဓမ္မာနံ ဘိန္နလက္ခဏာနမေဝ အနုပဿနာ ဓမ္မာနုပဿနာ. ३०. जे आलंबनात दृढपणे प्रविष्ट होऊन राहते ते 'पट्ठान' (प्रतिष्ठान) होय. अशुभाचे ग्रहण इत्यादींच्या प्रभावाने अनुप्रविष्ट होऊन काया इत्यादी आलंबनांमध्ये प्रवृत्त होते, असा अर्थ आहे. स्मृती (सती) हेच प्रतिष्ठान असल्याने ते 'सतिपट्ठान' (स्मृतिप्रस्थान) होय. ते काया, वेदना, चित्त आणि धर्म या आलंबनांमध्ये अनुक्रमे अशुभ, दुःख, अनित्य आणि अनात्म या आकारांच्या ग्रहणाच्या प्रभावाने, आणि शुभ, सुख, नित्य व आत्म अशा संज्ञा-विपर्लासांच्या (विपर्यास) प्रहाणाच्या (त्याग करण्याच्या) प्रभावाने चार प्रकारचे आहे, म्हणून "चार सतिपट्ठान" असे म्हटले आहे. निंदनीय अशा केस इत्यादी ३२ भागांचे जे उत्पत्तीस्थान आहे ती 'काया' (शरीर) होय; किंवा श्वास-प्रश्वासांचा समूह म्हणजे 'काया' होय. तिचे परिकर्म भावनेच्या आणि विपश्यना भावनेच्या प्रभावाने वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'कायानुपस्सना' होय. दुःख-दुःखता, विपरिणाम-दुःखता आणि संस्कार-दुःखता रूप असलेल्या वेदनांचे वारंवार अवलोकन करणे म्हणजे 'वेदनानुपस्सना' होय. त्याचप्रमाणे सराग, महग्गत इत्यादींच्या प्रभावाने आणि संप्रयोग व भूमीच्या भेदाने भिन्न असलेल्या चित्ताचे वारंवार अवलोकन करणे म्हणजे 'चित्तानुपस्सना' होय. संज्ञा आणि संस्कार रूप असलेल्या, भिन्न लक्षणे असलेल्या धर्मांचे वारंवार अवलोकन करणे म्हणजे 'धम्मानुपस्सना' होय. ၃၁. သမ္မာ ပဒဟန္တိ ဧတေနာတိ သမ္မပ္ပဓာနံ, ဝါယာမော. သော စ ကိစ္စဘေဒေန စတုဗ္ဗိဓောတိ အာဟ ‘‘စတ္တာရော သမ္မပ္ပဓာနာ’’တျာဒိ. အသုဘမနသိကာရကမ္မဋ္ဌာနာနုယုဉ္ဇနာဒိဝသေန ဝါယမနံ ဝါယာမော. ဘိယျောဘာဝါယာတိ အဘိဝုဒ္ဓိယာ. ३१. याच्याद्वारे सम्यक् प्रकारे प्रयत्न करतात म्हणून ते 'सम्माप्पधान' (सम्यक् प्रधान) म्हणजेच 'वायाम' (प्रयत्न) होय. आणि ते कार्याच्या भेदाने चार प्रकारचे आहे, म्हणून "चार सम्माप्पधान" इत्यादी म्हटले आहे. अशुभाचे मनसिकार करणे रूप कर्मस्थानाचा अभ्यास करणे इत्यादींच्या प्रभावाने प्रयत्न करणे म्हणजे 'वायाम' होय. 'भिय्योभावाय' म्हणजे अभिवृद्धीसाठी. ၃၂. ဣဇ္ဈတိ အဓိဋ္ဌာနာဒိကံ ဧတာယာဟိ ဣဒ္ဓိ, ဣဒ္ဓိဝိဓဉာဏံ ဣဒ္ဓိယာ ပါဒေါ ဣဒ္ဓိပါဒေါ, ဆန္ဒောယေဝ ဣဒ္ဓိပါဒေါ ဆန္ဒိဒ္ဓိပါဒေါ. ३२. जिच्याद्वारे अधिष्ठान इत्यादी ऋद्धी पूर्ण होते ती 'इद्धी' (ऋद्धी) होय, म्हणजेच इद्धिविध ज्ञान. ऋद्धीचा आधार (पाय) म्हणजे 'इद्धिपाद' होय. छन्द हाच इद्धिपाद असल्याने तो 'छन्दिद्धिपाद' होय. ၃၅. ဗုဇ္ဈတီတိ ဗောဓိ, အာရဒ္ဓဝိပဿကတော ပဋ္ဌာယ ယောဂါဝစရော. ယာယ ဝါ သော သတိအာဒိကာယ ဓမ္မသာမဂ္ဂိယာ ဗုဇ္ဈတိ သစ္စာနိ ပဋိဝိဇ္ဈတိ, ကိလေသနိဒ္ဒါတော ဝါ ဝုဋ္ဌာတိ, ကိလေသသင်္ကောစာဘာဝတော ဝါ မဂ္ဂဖလပ္ပတ္တိယာ ဝိကသတိ, သာ ဓမ္မသာမဂ္ဂီ ဗောဓိ, တဿ ဗောဓိဿ, တဿာ ဝါ ဗောဓိယာ အင်္ဂဘူတာ ကာရဏဘူတာတိ ဗောဇ္ဈင်္ဂါ, တေ ပန ဓမ္မဝသေန သတ္တဝိဓာတိ အာဟ ‘‘သတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ’’တျာဒိ. သတိယေဝ သုန္ဒရော ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ, သုန္ဒရဿ ဝါ ဗောဓိဿ, သုန္ဒရာယ ဝါ ဗောဓိယာ အင်္ဂေါတိ သတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂေါ. ဓမ္မေ ဝိစိနာတိ ဥပပရိက္ခတီတိ ဓမ္မဝိစယော, ဝိပဿနာပညာ. ဥပေက္ခာတိ ဣဓ တတြမဇ္ဈတ္တုပေက္ခာ. ३५. जो जाणतो तो 'बोधी' होय, म्हणजेच विपश्यनेचा आरंभ करणाऱ्या साधकापासून घेऊन तो 'योगावचर' (साधक) होय. किंवा ज्या स्मृती इत्यादी धर्म-सामग्रीने तो सत्य जाणतो आणि सत्याचा प्रतिवेध करतो, किंवा क्लेशांच्या निद्रेतून जागा होतो, किंवा क्लेशांच्या संकोचाचा अभाव असल्यामुळे मार्ग आणि फळाच्या प्राप्तीने विकसित होतो, ती धर्म-सामग्री म्हणजे 'बोधी' होय. त्या बोधी प्राप्त करणाऱ्या योगावचराचे किंवा त्या बोधीचे जे अंगभूत आणि कारणभूत आहेत ते 'बोज्झंग' (बोध्यंग) होत. ते धर्मनुसार सात प्रकारचे आहेत, म्हणून "सतिसम्बोज्झंग" इत्यादी म्हटले आहे. स्मृती हीच सुंदर बोज्झंग आहे, किंवा सुंदर बोधी प्राप्त करणाऱ्याचा अथवा सुंदर बोधीचा अंग असल्याने ती 'सतिसम्बोज्झंग' होय. धर्मांचे जे विचयन आणि परीक्षण करते ते 'धम्मविचय' होय, म्हणजेच विपश्यना प्रज्ञा. येथे 'उपेक्षा' म्हणजे 'तत्रमज्झत्तुपेक्षा' होय. ၄၀. ‘‘သတ္တဓာ [Pg.228] တတ္ထ သင်္ဂဟော’’တိ ဝတွာန ပုန တံ ဒဿေတုံ ‘‘သင်္ကပ္ပပဿဒ္ဓိ စာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ဝီရိယံ နဝဋ္ဌာနံ သမ္မပ္ပဓာနစတုက္ကဝီရိယိဒ္ဓိပါဒဝီရိယိန္ဒြိယဝီရိယဗလသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂသမ္မာဝါယာမဝသေန နဝကိစ္စတ္တာ, သတိ အဋ္ဌဋ္ဌာနာ သတိပဋ္ဌာနစတုက္ကသတိန္ဒြိယသတိဗလသတိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂသမ္မာသတိဝသေန အဋ္ဌကိစ္စတ္တာ. သမာဓိ စတုဋ္ဌာနော သမာဓိန္ဒြိယသမာဓိဗလသမာဓိသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂသမ္မာသမာဓိဝသေန စတုကိစ္စတ္တာ, ပညာ ပဉ္စဋ္ဌာနာ ဝီမံသိဒ္ဓိပါဒပညိန္ဒြိယပညာဗလဓမ္မဝိစယသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂသမ္မာဒိဋ္ဌိဝသေန ပဉ္စကိစ္စတ္တာ, သဒ္ဓါ ဒွိဋ္ဌာနာ သဒ္ဓိန္ဒြိယသဒ္ဓါဗလဝသေန ဒွိကိစ္စတ္တာ. ဧသော ဥတ္တမာနံ ဗောဓိပက္ခိယဘာဝေန ဝိသိဋ္ဌာနံ သတ္တတိံသ ဓမ္မာနံ ပဝရော ဥတ္တမော ဝိဘာဂေါ. ४०. "तेथे सात प्रकारचा संग्रह आहे" असे सांगून पुन्हा तो दर्शवण्यासाठी "संकल्पपस्सद्धि च..." इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये वीर्य नऊ ठिकाणी समाविष्ट आहे, कारण चार सम्माप्पधान, वीर्य-इद्धिपाद, वीर्येंद्रिय, वीर्यबल, वीर्य-सम्बोज्झंग आणि सम्मावायाम यांच्या प्रभावाने त्याची नऊ कार्ये आहेत. स्मृती आठ ठिकाणी समाविष्ट आहे, कारण चार सतिपट्ठान, स्मृतींद्रिय, स्मृतिबल, सतिसम्बोज्झंग आणि सम्मासती यांच्या प्रभावाने तिची आठ कार्ये आहेत. समाधी चार ठिकाणी समाविष्ट आहे, कारण समाधींद्रिय, समाधीबल, समाधिसम्बोज्झंग आणि सम्मासमाधी यांच्या प्रभावाने तिची चार कार्ये आहेत. प्रज्ञा पाच ठिकाणी समाविष्ट आहे, कारण वीमंसिद्धिपाद, प्रज्ञेंद्रिय, प्रज्ञाबल, धम्मविचयसम्बोज्झंग आणि सम्मादिट्ठी यांच्या प्रभावाने तिची पाच कार्ये आहेत. श्रद्धा दोन ठिकाणी समाविष्ट आहे, कारण श्रद्धेंद्रिय आणि श्रद्धाबल यांच्या प्रभावाने तिची दोन कार्ये आहेत. हा श्रेष्ठ अशा बोधिपाक्षिक भावाने विशिष्ट असलेल्या सदतीस (३७) धर्मांचा श्रेष्ठ आणि उत्तम विभाग आहे. ၄၁. လောကုတ္တရေ အဋ္ဌဝိဓေပိ သဗ္ဗေ သတ္တတိံသ ဓမ္မာ ဟောန္တိ, သင်္ကပ္ပပီတိယော န ဝါ ဟောန္တိ, ဒုတိယဇ္ဈာနိကေ သင်္ကပ္ပဿ, စတုတ္ထပဉ္စမဇ္ဈာနိကေ ပီတိယာ စ အသမ္ဘဝတော န ဟောန္တိ ဝါ, လောကိယေပိ စိတ္တေ သီလဝိသုဒ္ဓါဒိ ဆဗ္ဗိသုဒ္ဓိပဝတ္တိယံ ယထာယောဂံ တံတံကိစ္စဿ အနုရူပဝသေန ကေစိ ကတ္ထစိ ဝိသုံ ဝိသုံ ဟောန္တိ, ကတ္ထစိ န ဝါ ဟောန္တိ. ४१. आठ प्रकारच्या लोकोत्तर चित्तांमध्ये सर्व सदतीस धर्म असतात; परंतु संकल्प आणि प्रीती हे काही चित्तांमध्ये नसतात देखील. द्वितीय ध्यानाशी संप्रयुक्त चित्तात संकल्पाचा असंभव असल्यामुळे आणि चतुर्थ व पाचव्या ध्यानाशी संप्रयुक्त चित्तात प्रीतीचा असंभव असल्यामुळे ते नसतात. लौकिक चित्तांमध्ये देखील शीलविशुद्धी इत्यादी सहा विशुद्धींच्या प्रवृत्तीच्या वेळी योग्यतेनुसार त्या त्या कार्याच्या अनुरूपतेने काही बोधिपाक्षिक धर्म काही लौकिक चित्तांमध्ये स्वतंत्रपणे असतात, तर काही ठिकाणी ते नसतात देखील. ဗောဓိပက္ခိယသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. बोधिपक्खियसंग्रह (बोधिपाक्षिक संग्रह) वर्णन समाप्त झाले. သဗ္ဗသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ सर्वसंग्रह वर्णन. ၄၂. အတီတာနာဂတပစ္စုပ္ပန္နာဒိဘေဒဘိန္နာ တေ တေ သဘာဂဓမ္မာ ဧကဇ္ဈံ ရာသဋ္ဌေန ခန္ဓာ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘တဒေကဇ္ဈံ အဘိသံယူဟိတွာ အဘိသင်္ခိပိတွာ အယံ ဝုစ္စတိ ရူပက္ခန္ဓော’’တျာဒိ (ဝိဘ. ၂), တေ ပနေတေ ခန္ဓာ ဘာဇနဘောဇနဗျဉ္ဇနဘတ္တကာရကဘုဉ္ဇကဝိကပ္ပဝသေန ပဉ္စေဝ ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘ရူပက္ခန္ဓော’’တျာဒိ[Pg.229]. ရူပဉှိ ဝေဒနာနိဿယတ္တာ ဘာဇနဋ္ဌာနိယံ, ဝေဒနာ ဘုဉ္ဇိတဗ္ဗတ္တာ ဘောဇနဋ္ဌာနိယာ, သညာ ဝေဒနာဿာဒလာဘဟေတုတ္တာ ဗျဉ္ဇနဋ္ဌာနိယာ, သင်္ခါရာ အဘိသင်္ခရဏတော ဘတ္တကာရကဋ္ဌာနိယာ, ဝိညာဏံ ဥပဘုဉ္ဇကတ္တာ ဘုဉ္ဇကဋ္ဌာနိယံ. ဧတ္တာဝတာ စ အဓိပ္ပေတတ္ထသိဒ္ဓီတိ ပဉ္စေဝ ဝုတ္တာ. ဒေသနာက္ကမေပိ ဣဒမေဝ ကာရဏံ ယတ္ထ ဘုဉ္ဇတိ, ယဉ္စ ဘုဉ္ဇတိ, ယေန စ ဘုဉ္ဇတိ, ယော စ ဘောဇကော, ယော စ ဘုဉ္ဇိတာ, တေသံ အနုက္ကမေန ဒဿေတုကာမတ္တာ. ४२. भूत, भविष्य आणि वर्तमान इत्यादी भेदांनी भिन्न असलेले ते ते समान स्वभावाचे धर्म (सभागधर्म) एकत्रितपणे समूहाच्या (राशीच्या) अर्थाने 'स्कंध' (खंध) म्हटले जातात. म्हणूनच भगवान म्हणाले – “त्याला एकत्रित करून, संकुचित करून, याला 'रूपस्कंध' म्हटले जाते” इत्यादी. परंतु ते हे स्कंध पात्र (भांडे), भोजन (अन्न), व्यंजन (भाजी/चटणी), आचारी (भात शिजवणारा) आणि भोक्ता (जेवणारा) यांच्या कल्पनेच्या आधारे पाचच सांगितले आहेत, म्हणून “रूपस्कंध” इत्यादी म्हणाले. कारण रूप हे वेदनेचा आश्रय असल्यामुळे पात्राच्या स्थानी आहे; वेदना ही अनुभवण्याजोगी असल्यामुळे भोजनाच्या स्थानी आहे; संज्ञा ही वेदनेच्या आस्वादाच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे व्यंजनाच्या स्थानी आहे; संस्कार हे अभिसंस्कार (रचना) करत असल्यामुळे आचाऱ्याच्या स्थानी आहेत; आणि विज्ञान हे उपभोग घेणारे असल्यामुळे भोक्त्याच्या स्थानी आहे. आणि एवढ्यानेच अपेक्षित अर्थाची सिद्धी होत असल्यामुळे पाचच स्कंध सांगितले आहेत. देशनेच्या (उपदेशाच्या) क्रमामध्ये देखील हेच कारण आहे; कारण ज्या पात्रात जेवले जाते, जे भोजन जेवले जाते, ज्या व्यंजनासह जेवले जाते, जो आचारी आहे आणि जो भोक्ता आहे, त्यांना अनुक्रमाने दाखवण्याची इच्छा असल्यामुळे होय. ၄၃. ဥပါဒါနာနံ ဂေါစရာ ခန္ဓာ ဥပါဒါနက္ခန္ဓာ, တေ ပန ဥပါဒါနဝိသယဘာဝေန ဂဟိတာ ရူပါဒယော ပဉ္စေဝါတိ ဝုတ္တံ ‘‘ရူပုပါဒါနက္ခန္ဓော’’တျာဒိ. သဗ္ဗသဘာဂဓမ္မသင်္ဂဟတ္ထံ ဟိ သာသဝါ, အနာသဝါပိ ဓမ္မာ အဝိသေသတော ‘‘ပဉ္စက္ခန္ဓာ’’တိ ဒေသိတာ. ဝိပဿနာဘူမိသန္ဒဿနတ္ထံ ပန သာသဝါဝ ‘‘ဥပါဒါနက္ခန္ဓာ’’တိ. ယထာ ပနေတ္ထ ဝေဒနာဒယော သာသဝါ, အနာသဝါ စ, န ဧဝံ ရူပံ, ဧကန္တကာမာဝစရတ္တာ. သဘာဂရာသိဝသေန ပန တံ ခန္ဓေသု ဒေသိတံ, ဥပါဒါနိယဘာဝေန, ပန ရာသိဝသေန စ ဥပါဒါနက္ခန္ဓေသူတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ४३. उपादानांचे जे गोचर (विषय) आहेत ते स्कंध म्हणजे 'उपादानस्कंध' होत. आणि ते उपादानाचा विषय या रूपाने ग्रहण केलेले रूप इत्यादी पाचच आहेत, म्हणून “रूपोपादानस्कंध” इत्यादी म्हटले आहे. कारण सर्व सभागधर्मांचा संग्रह करण्यासाठी सास्रव (आसवांसह असलेले) आणि अनास्रव (आसवरहित) धर्म देखील विशेष भेद न करता सामान्यतः 'पंचस्कंध' म्हणून उपदेशिले आहेत. परंतु विपश्यनेची भूमी (विषय) दाखवण्यासाठी केवळ सास्रव धर्मांनाच 'उपादानस्कंध' म्हटले आहे. आणि जसे येथे वेदना इत्यादी सास्रव आणि अनास्रव दोन्ही असतात, तसे रूप नसते; कारण ते एकांताने (केवळ) कामावचरच असते. परंतु समान स्वभावाच्या समूहाच्या (राशीच्या) रूपाने ते स्कंधदेशनेमध्ये उपदेशिले आहे, आणि उपादानयोग्य असण्याच्या भावाने तसेच समूहाच्या रूपाने ते उपादानस्कंधांमध्ये उपदेशिले आहे, असे समजावे. ၄၄. အာယတန္တိ ဧတ္ထ တံတံဒွါရာရမ္မဏာ စိတ္တစေတသိကာ တေန တေန ကိစ္စေန ဃဋ္ဋေန္တိ ဝါယမန္တိ, အာယဘူတေ ဝါ တေ ဓမ္မေ ဧတာနိ တနောန္တိ ဝိတ္ထာရေန္တိ, အာယတံ ဝါ သံသာရဒုက္ခံ နယန္တိ ပဝတ္တေန္တိ, စက္ခုဝိညာဏာဒီနံ ကာရဏဘူတာနီတိ ဝါ အာယတနာနိ. အပိစ လောကေ နိဝါသအာကရသမောသရဏသဉ္ဇာတိဋ္ဌာနံ ‘‘အာယတန’’န္တိ ဝုစ္စတိ, တသ္မာ ဧတေပိ တံတံဒွါရိကာနံ, တံတဒါရမ္မဏာနဉ္စ စက္ခုဝိညာဏာဒီနံ နိဝါသဋ္ဌာနတာယ, တေသမေဝ အာကိဏ္ဏဘာဝေန ပဝတ္တာနံ အာကရဋ္ဌာနတာယ, ဒွါရာရမ္မဏတော သမောသရန္တာနံ သမောသရဏဋ္ဌာနတာယ, တတ္ထေဝ ဥပ္ပဇ္ဇန္တာနံ သဉ္ဇာတိဋ္ဌာနတာယ စ အာယတနာနိ. တာနိ ပန ဒွါရဘူတာနိ အဇ္ဈတ္တိကာယတနာနိ [Pg.230] ဆ, အာရမ္မဏဘူတာနိ စ ဗာဟိရာယတနာနိ ဆာတိ ဒွါဒသဝိဓာနီတိ အာဟ ‘‘စက္ခာယတန’’န္တျာဒိ. စက္ခု စ တံ အာယတနဉ္စာတိ စက္ခာယတနံ. ဧဝံ သေသေသုပိ. ४४. येथे त्या त्या द्वारात आणि आलंबनात (विषयात) असलेले चित्त आणि चैतसिक त्या त्या कार्याने प्रयत्न करतात, उद्योग करतात, म्हणून (त्यांना आयतन म्हणतात); किंवा 'आय' (उत्पत्ती) स्वरूप असलेल्या त्या चित्त-चैतसिक धर्मांना हे (चक्षु इत्यादी) विस्तारतात, वाढवतात, म्हणून (आयतन म्हणतात); किंवा दीर्घकाळ चालणाऱ्या संसारदुःखाला वाहून नेतात, प्रवृत्त करतात, म्हणून (आयतन म्हणतात); किंवा चक्षुविज्ञानादींचे कारणभूत असल्यामुळे त्यांना 'आयतन' म्हटले जाते. शिवाय, लोकामध्ये निवासस्थान, खाण (उत्पत्तीचे ठिकाण), संमेलनस्थान (एकत्र येण्याचे ठिकाण) आणि जन्मस्थान याला 'आयतन' म्हटले जाते; म्हणून हे (चक्षुप्रसाद, रूपादी विषय) देखील त्या त्या द्वारात उत्पन्न होणाऱ्या आणि त्या त्या आलंबनाचे ग्रहण करणाऱ्या चक्षुविज्ञानादींचे निवासस्थान असल्यामुळे, संमिश्र रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या त्यांच्यासाठीच खाणीसारखे स्थान असल्यामुळे, द्वार आणि आलंबनाच्या द्वारे एकत्र येणाऱ्या त्यांच्यासाठी संमेलनस्थान असल्यामुळे, आणि तेथेच उत्पन्न होणाऱ्या त्यांच्यासाठी जन्मस्थान असल्यामुळे 'आयतन' म्हटले जातात. आणि ते द्वारभूत असलेले सहा आध्यात्मिक आयतने (अज्झत्तिकायतन) आणि आलंबनभूत असलेले सहा बाह्य आयतने (बाहिरायतन) मिळून बारा प्रकारचे आहेत, म्हणून “चक्षुरायतन” इत्यादी म्हटले आहे. जे चक्षु आहे आणि आयतनही आहे ते 'चक्षुरायतन' होय. याचप्रमाणे उर्वरित आयतनांच्या बाबतीतही समजावे. ဧတ္ထ အဇ္ဈတ္တိကာယတနေသု သနိဒဿနသပ္ပဋိဃာရမ္မဏတ္တာ စက္ခာယတနံ ဝိဘူတန္တိ တံ ပဌမံ ဝုတ္တံ, တဒနန္တရံ အနိဒဿနသပ္ပဋိဃာရမ္မဏာနိ ဣတရာနိ, တတ္ထာပိ အသမ္ပတ္တဂ္ဂါဟကသာမညေန စက္ခာယတနာနန္တရံ သောတာယတနံ ဝုတ္တံ, ဣတရေသု သီဃတရံ အာရမ္မဏဂ္ဂဟဏသမတ္ထတ္တာ ဃာနာယတနံ ပဌမံ ဝုတ္တံ. ပုရတော ဌပိတမတ္တဿ ဟိ ဘောဇနာဒိကဿ ဂန္ဓော ဝါတာနုသာရေန ဃာနေ ပဋိဟညတိ, တဒနန္တရံ ပန ပဒေသဝုတ္တိသာမညေန ဇိဝှာယတနံ ဝုတ္တံ, တတော သဗ္ဗဋ္ဌာနိကံ ကာယာယတနံ, တတော ပဉ္စန္နမ္ပိ ဂေါစရဂ္ဂဟဏသမတ္ထံ မနာယတနံ, ယထာဝုတ္တာနံ ပန အနုက္ကမေန တေသံ တေသံ အာရမ္မဏာနိ ရူပါယတနာဒီနိ ဝုတ္တာနိ. येथे आध्यात्मिक आयतनांमध्ये, सनिदर्शन (दिसणारे) आणि सप्रतिघ (आघात करणारे) आलंबन असण्याच्या भावामुळे चक्षुरायतन हे स्पष्ट (प्रकट) आहे, म्हणून ते प्रथम सांगितले आहे. त्यानंतर अनिदर्शन (न दिसणारे) परंतु सप्रतिघ आलंबन असणारे इतर (श्रोत्रायतन इत्यादी) सांगितले आहेत. त्यामध्ये देखील अप्राप्त विषयाचे ग्रहण करण्याच्या समानतेमुळे (असंपत्तग्गाहक) चक्षुरायतनानंतर श्रोत्रायतन सांगितले आहे. उर्वरित (घ्राण, जिव्हा, काय) आयतनांमध्ये वेगाने आलंबनाचे ग्रहण करण्यास समर्थ असल्यामुळे घ्राणायतन प्रथम सांगितले आहे. कारण समोर ठेवलेल्या भोजनादी वस्तूंचा गंध वाऱ्याच्या प्रवाहाने घ्राणेंद्रियावर आदळतो. त्यानंतर शरीराच्या एका विशिष्ट भागात राहण्याच्या समानतेमुळे जिव्हायतन सांगितले आहे. त्यानंतर सर्व शरीरात पसरलेले कायायतन सांगितले आहे. त्यानंतर पाचही इंद्रियांच्या विषयांचे ग्रहण करण्यास समर्थ असलेले मनायतन सांगितले आहे. आणि वर सांगितलेल्या आध्यात्मिक आयतनांच्या अनुक्रमाने त्या त्या आयतनांचे आलंबन असलेले रूपायतन इत्यादी बाह्य आयतने सांगितले आहेत. ၄၅. အတ္တနော သဘာဝံ ဓာရေန္တီတိ ဓာတုယော. အထ ဝါ ယထာသမ္ဘဝံ အနေကပ္ပကာရံ သံသာရဒုက္ခံ ဝိဒဟန္တိ, ဘာရဟာရေဟိ ဝိယ စ ဘာရော သတ္တေဟိ ဓီယန္တိ ဓာရိယန္တိ, အဝသဝတ္တနတော ဒုက္ခဝိဓာနမတ္တမေဝ စေတာ, သတ္တေဟိ စ သံသာရဒုက္ခံ အနုဝိဓီယတိ ဧတာဟိ, တထာဝိဟိတဉ္စ ဧတာသွေဝ မီယတိ ဌပိယတိ, ရသသောဏိတာဒိသရီရာဝယဝဓာတုယော ဝိယ, ဟရိတာလမနောသိလာဒိသေလာဝယဝဓာတုယော ဝိယ စ ဉေယျာဝယဝဘူတာ စာတိ ဓာတုယော. ယထာဟု – ४५. स्वतःचा स्वभाव धारण करतात म्हणून 'धातू' होत. किंवा योग्यतेनुसार अनेक प्रकारच्या संसारदुःखाची रचना करतात; आणि जसे भार वाहून नेणाऱ्यांकडून भार वाहिला जातो, तसे प्राण्यांकडून हे धारण केले जातात (वाहिले जातात); आपल्या इच्छेनुसार न चालणारे असल्यामुळे हे केवळ दुःखाची रचना करणारेच आहेत; आणि प्राण्यांकडून यांच्याद्वारे संसारदुःखाची रचना केली जाते; आणि त्या प्रकारे रचलेले संसारदुःख यांच्यामध्येच ठेवले जाते; रस, रक्त इत्यादी शरीराच्या अवयवरूप धातूंप्रमाणे आणि हरताळ, मनशिल इत्यादी पर्वताच्या अवयवरूप धातूंप्रमाणे जाणण्यायोग्य वस्तूंचे अवयवभूत असल्यामुळे 'धातू' म्हटले जातात. जसे म्हटले आहे – ‘‘ဝိဒဟတိ ဝိဓာနဉ္စ, ဓီယတေ စ ဝိဓီယတေ; ဧတာယ ဓီယတေ ဧတ္ထ, ဣတိ ဝါ ဓာတုသမ္မတာ; သရီရသေလာဝယဝ-ဓာတုယော ဝိယ ဓာတုယော’’တိ. “संसारदुःखाची रचना करते म्हणून, किंवा केवळ दुःखाची रचनाच आहे म्हणून, प्राण्यांकडून धारण केले जाते म्हणून, याच्याद्वारे संसारदुःखाची रचना केली जाते म्हणून, किंवा याच्यामध्ये संसारदुःख ठेवले जाते म्हणून 'धातू' मानले गेले आहेत; शरीराच्या आणि पर्वताच्या अवयवरूप धातूंप्रमाणे हे 'धातू' आहेत.” တာ ပန မနာယတနံ သတ္တဝိညာဏဓာတုဝသေန သတ္တဓာ ဘိန္ဒိတွာ အဝသေသေဟိ ဧကာဒသာယတနေဟိ သဟ အဋ္ဌာရသဓာတူ [Pg.231] ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘စက္ခုဓာတူ’’တျာဒိ. ကမကာရဏံ ဝုတ္တနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. आणि त्या मनायतनाला सात विज्ञानधातूंच्या रूपाने सात प्रकारे विभागून, उर्वरित अकरा आयतनांसह अठरा धातू सांगितले आहेत, म्हणून “चक्षुधातू” इत्यादी म्हटले आहे. क्रमाचे कारण पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. ၄၆. အရိယကရတ္တာ အရိယာနိ, တစ္ဆဘာဝတော သစ္စာနီတိ အရိယသစ္စာနိ. ဣမာနိ ဟိ စတ္တာရော ပဋိပန္နကေ, စတ္တာရော ဖလဋ္ဌေတိ အဋ္ဌအရိယပုဂ္ဂလေ သာဓေန္တိ အသတိ သစ္စပ္ပဋိဝေဓေ တေသံ အရိယဘာဝါနုပဂမနတော, သတိ စ တသ္မိံ ဧကန္တေန တဗ္ဘာဝူပဂမနတော စ. ဒုက္ခသမုဒယနိရောဓမဂ္ဂါနမေဝ ပန ယထာက္ကမံ ဗာဓကတ္တံ ပဘဝတ္တံ နိဿရဏတ္တံ နိယျာနိကတ္တံ, နာညေသံ, ဗာဓကာဒိဘာဝေါယေဝ စ ဒုက္ခာဒီနံ, န အဗာဓကာဒိဘာဝေါ, တသ္မာ အညတ္ထာဘာဝတတ္ထဗျာပိတာသင်္ခါတေန လက္ခဏေန ဧတာနိ တစ္ဆာနိ. တေနာဟု ပေါရာဏာ – ४६. आर्य (श्रेष्ठ) बनवणारे असल्यामुळे 'आर्य' आणि सत्य (यथार्थ) स्वभावाचे असल्यामुळे 'सत्य', म्हणून 'आर्यसत्य' होत. कारण हे चार मार्गस्थ आणि चार फलस्थ अशा आठ आर्यपुद्गलांना (आर्य व्यक्तींना) सिद्ध करतात; कारण सत्याचा साक्षात्कार (प्रतिवेध) न झाल्यास त्यांना आर्यत्व प्राप्त होत नाही, आणि तो साक्षात्कार झाल्यावर निश्चितपणे त्यांना आर्यत्व प्राप्त होते. आणि दुःख, समुदाय, निरोध आणि मार्ग यांचेच अनुक्रमाने बाधकत्व (पीडा देणे), प्रभवत्व (उत्पत्तीचे कारण असणे), निःसरणत्व (मुक्त होणे) आणि नैर्याणिकत्व (संसारातून बाहेर नेणे) हे स्वभाव आहेत, इतरांचे नाहीत; आणि दुःख इत्यादींचे बाधकत्व इत्यादीच असते, अबाधकत्व इत्यादी नसते. म्हणून अन्यथाभाव नसणे (अपरिवर्तनीय असणे) आणि त्यामध्येच व्याप्त असणे या लक्षणांमुळे हे सत्य (यथार्थ) आहेत. म्हणूनच पूर्वाचार्यांनी म्हटले आहे – ‘‘ဗောဓာနုရူပံ စတ္တာရော, ဆိန္ဒန္တေ စတုရော မလေ; ခီဏဒေါသေ စ စတ္တာရော, သာဓေန္တာရိယပုဂ္ဂလေ. “ज्ञानाच्या अनुरूप चार मार्ग चार प्रकारच्या मळांना (क्लेशांना) नष्ट करतात, आणि क्षीणदोष असलेल्या चार फलस्थ आर्यपुद्गलांना सिद्ध करतात. ‘‘အညတ္ထ ဗာဓကတ္တာဒိ, န ဟိ ဧတေဟိ လဗ္ဘတိ; နာဗာဓကတ္တမေတေသံ, တစ္ဆာနေတာနိဝေတတော’’တိ. यांच्याशिवाय इतर धर्मांमध्ये बाधकत्व इत्यादी प्राप्त होत नाही, आणि यांचे अबाधकत्व इत्यादी नसते; म्हणून हे निश्चितपणे सत्य (यथार्थ) आहेत.” အရိယာနံ ဝါ သစ္စာနိ တေဟိ ပဋိဝိဇ္ဈိတဗ္ဗတ္တာ, အရိယဿ ဝါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သစ္စာနိ တေန ဒေသိတတ္တာတိ အရိယသစ္စာနိ. တာနိ ပန သံကိလိဋ္ဌာသံကိလိဋ္ဌဖလဟေတုဝသေန စတုဗ္ဗိဓာနီတိ အာဟ ‘‘စတ္တာရိ အရိယသစ္စာနီ’’တျာဒိ. တတ္ထ ကုစ္ဆိတတ္တာ, တုစ္ဆတ္တာ စ ဒုက္ခံ. ကမ္မာဒိပစ္စယသန္နိဋ္ဌာနေ ဒုက္ခုပ္ပတ္တိနိမိတ္တတာယ သမုဒယော သမုဒေတိ ဧတသ္မာ ဒုက္ခန္တိ ကတွာ, ဒုက္ခဿ သမုဒယော ဒုက္ခသမုဒယော. ဒုက္ခဿ အနုပ္ပာဒနိရောဓော ဧတ္ထ, ဧတေနာတိ ဝါ ဒုက္ခနိရောဓော. ဒုက္ခနိရောဓံ ဂစ္ဆတိ, ပဋိပဇ္ဇန္တိ စ တံ ဧတာယာတိ ဒုက္ခနိရောဓဂါမိနိပဋိပဒါ. किंवा आर्यांची सत्ये, कारण त्यांच्याद्वारे ती साक्षात्कृत केली जातात; किंवा आर्य असलेल्या सम्यक्संबुद्धांची सत्ये, कारण त्यांच्याद्वारे ती उपदेशिली गेली आहेत, म्हणून 'आर्यसत्य' होत. आणि ती संक्लिष्ट (मलीन) आणि असंक्लिष्ट (शुद्ध) फल व हेतूच्या रूपाने चार प्रकारची आहेत, म्हणून “चार आर्यसत्ये” इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, निंदनीय (कुत्सित) असल्यामुळे आणि तुच्छ (असार) असल्यामुळे 'दुःख' म्हटले जाते. कर्म इत्यादी प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) सान्निध्यात दुःखाच्या उत्पत्तीचे निमित्त असल्यामुळे 'समुदय' म्हटले जाते; “याच्यापासून दुःख उत्पन्न होते” असा विग्रह करून, दुःखाचा समुदय म्हणजे 'दुःखसमुदय' होय. याच्यामध्ये किंवा याच्याद्वारे दुःखाचा अनुत्पाद निरोध (पुन्हा उत्पन्न न होणारा नाश) होतो, म्हणून 'दुःखनिरोध' होय. याच्याद्वारे दुःखनिरोधाप्रत (निर्वाणाप्रत) जातात आणि त्याला प्राप्त करतात, म्हणून 'दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा' होय. ၄၇. စေတသိကာနံ, သောဠသသုခုမရူပါနံ, နိဗ္ဗာနဿ စ ဝသေန ဧကူနသတ္တတိ ဓမ္မာ အာယတနေသု ဓမ္မာယတနံ, ဓာတူသု ဓမ္မဓာတူတိ စ သင်္ခံ ဂစ္ဆန္တိ. ४७. चेतसिक, सोळा सूक्ष्म रूपे आणि निर्वाण यांच्याद्वारे एकोणसत्तर धर्म आयतनांमध्ये 'धम्मायतन' आणि धातूंमध्ये 'धम्मधातू' अशी संज्ञा प्राप्त करतात. ၄၉. သေသာ [Pg.232] စေတသိကာတိ ဝေဒနာသညာဟိ သေသာ ပညာသ စေတသိကာ. ကသ္မာ ပန ဝေဒနာသညာ ဝိသုံ ကတာတိ? ဝဋ္ဋဓမ္မေသု အဿာဒတဒုပကရဏဘာဝတော. တေဘူမကဓမ္မေသု ဟိ အဿာဒဝသပ္ပဝတ္တာ ဝေဒနာ, အသုဘေ သုဘာဒိသညာဝိပလ္လာသဝသေန စ တဿာ တဒါကာရပ္ပဝတ္တီတိ တဒုပကရဏဘူတာ သညာ, တသ္မာ သံသာရဿ ပဓာနဟေတုတာယ ဧတာ ဝိနိဘုဇ္ဇိတွာ ဒေသိတာတိ. ဝုတ္တဉှေတံ အာစရိယေန – ४९. 'उरलेले चेतसिक' म्हणजे वेदना आणि संज्ञा यांच्याव्यतिरिक्त उरलेले पन्नास चेतसिक होत. पण वेदना आणि संज्ञा यांना वेगळे का केले गेले आहे? संसारधर्मांमध्ये आस्वाद आणि त्याचे साधन असण्याच्या भावामुळे. कारण त्रिभूमिक धर्मांमध्ये वेदना ही आस्वादाच्या प्रभावाने प्रवृत्त होते, आणि अशुभादींमध्ये शुभ इत्यादी संज्ञा-विपर्यासामुळे तिची तशा प्रकारची प्रवृत्ती होते, म्हणून संज्ञा ही तिची साहाय्यक बनते. म्हणूनच संसाराचे प्रधान कारण असल्यामुळे यांना वेगळे करून उपदेशिले गेले आहे. आचार्यांनी असे म्हटलेच आहे - ‘‘ဝဋ္ဋဓမ္မေသု အဿာဒံ, တဒဿာဒုပသေဝနံ; ဝိနိဘုဇ္ဇ နိဒဿေတုံ, ခန္ဓဒွယမုဒါဟဋ’’န္တိ. (နာမ. ပရိ. ၆၄၉); "संसारधर्मांमधील आस्वाद आणि त्या आस्वादाचे सेवन (साहाय्य) यांना वेगळे करून दाखवण्यासाठी या दोन स्कंधांचे प्रतिपादन केले आहे." ၅၀. နနု စ အာယတနဓာတူသု နိဗ္ဗာနံ သင်္ဂဟိတံ, ခန္ဓေသု ကသ္မာ န သင်္ဂဟိတန္တိ အာဟ ‘‘ဘေဒါဘာဝေနာ’’တျာဒိ. အတီတာဒိဘေဒဘိန္နာနဉှိ ရာသဋ္ဌေန ခန္ဓဝေါဟာရောတိ နိဗ္ဗာနံ ဘေဒါဘာဝတော ခန္ဓသင်္ဂဟတော နိဿဋံ, ဝိနိမုတ္တန္တျတ္ထော. ५०. शंका अशी आहे की, आयतन आणि धातूंमध्ये निर्वाणाचा संग्रह केला गेला आहे, तर स्कंधांमध्ये त्याचा संग्रह का केला गेला नाही? यावर 'भेदाच्या अभावामुळे' इत्यादी म्हटले आहे. कारण भूतकाळ इत्यादी भेदांनी भिन्न असलेल्या धर्मांच्या समूहाच्या अर्थाने 'स्कंध' हा व्यवहार होतो. निर्वाणामध्ये अशा भेदांचा अभाव असल्यामुळे ते स्कंधसंग्रहातून मुक्त (वगळलेले) आहे, असा याचा अर्थ आहे. ၅၁. ဆန္နံ ဒွါရာနံ, ဆန္နံ အာရမ္မဏာနဉ္စ ဘေဒေန အာယတနာနိ ဒွါဒသ ဘဝန္တိ, ဆန္နံ ဒွါရာနံ ဆန္နံ အာရမ္မဏာနံ တဒုဘယံ နိဿာယ ဥပ္ပန္နာနံ တတ္တကာနမေဝ ဝိညာဏာနံ ပရိယာယေန ကမေန ဓာတုယော အဋ္ဌာရသ ဘဝန္တိ. ५१. सहा द्वारांच्या आणि सहा आलंबनांच्या भेदाने आयतने बारा होतात. सहा द्वारे आणि सहा आलंबने या दोन्हीचा आश्रय घेऊन उत्पन्न होणाऱ्या तितक्याच विज्ञानांच्या पर्यायाने आणि क्रमाने धातू अठरा होतात. ၅၂. တိဿော ဘူမိယော ဣမဿာတိ တိဘူမံ, တိဘူမံယေဝ တေဘူမကံ. ဝတ္တတိ ဧတ္ထ ကမ္မံ, တဗ္ဗိပါကော စာတိ ဝဋ္ဋံ. တဏှာတိ ကာမတဏှာဒိဝသေန တိဝိဓာ, ပုန ဆဠာရမ္မဏဝသေန အဋ္ဌာရသဝိဓာ, အတီတာနာဂတပစ္စုပ္ပန္နဝသေန စတုပညာသဝိဓာ, အဇ္ဈတ္တိကဗာဟိရဝသေန အဋ္ဌသတပ္ပဘေဒါ တဏှာ. ကသ္မာ ပန အညေသုပိ ဒုက္ခဟေတူသု သန္တေသု တဏှာယေဝ သမုဒယောတိ ဝုတ္တာတိ? ပဓာနကာရဏတ္တာ. ကမ္မဝိစိတ္တတာဟေတုဘာဝေန, ဟိ ကမ္မသဟာယဘာဝူပဂမနေန စ ဒုက္ခဝိစိတ္တတာကာရဏတ္တာ တဏှာ ဒုက္ခဿ ဝိသေသကာရဏန္တိ[Pg.233]. မဂ္ဂေါ ဒုက္ခနိရောဓဂါမိနိပဋိပဒါနာမေန ဝုတ္တော မဂ္ဂေါ လောကုတ္တရော မတောတိ မဂ္ဂေါတိ ပုန မဂ္ဂဂ္ဂဟဏံ ယောဇေတဗ္ဗံ. ५२. याच्या तीन भूमी आहेत म्हणून ते 'तिभूम' (त्रिभूमी), तिभूम म्हणजेच 'तेभूमिक' (त्रिभूमिक) होय. ज्यामध्ये कर्म आणि त्याचा विपाक फिरत राहतो, ते 'वट्ट' (संसारचक्र) होय. 'तण्हा' (तृष्णा) म्हणजे कामतृष्णा इत्यादींच्या भेदाने तीन प्रकारची, पुन्हा सहा आलंबनांच्या भेदाने अठरा प्रकारची, भूत, भविष्य आणि वर्तमान काळाच्या भेदाने चोपन्न प्रकारची, आणि आध्यात्मिक व बाह्य भेदाने एकशे आठ प्रकारची तृष्णा होय. पण इतरही दुःखाची कारणे असताना केवळ तृष्णेलाच 'समुदय' असे का म्हटले आहे? कारण ते प्रधान कारण आहे. कर्माच्या विविधतेचे कारण असल्यामुळे आणि कर्माची साहाय्यक बनल्यामुळे दुःखाच्या विविधतेचे कारण असणारी तृष्णा ही दुःखाचे विशेष कारण आहे. 'मार्ग' हा 'दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा' या नावाने सांगितला आहे, तो लोकोत्तर मार्ग मानला जातो; येथे 'मग्गो' (मार्ग) या शब्दाचे पुन्हा ग्रहण करून योजना करावी. ၅၃. မဂ္ဂယုတ္တာ အဋ္ဌင်္ဂိကဝိနိမုတ္တာ သေသာ မဂ္ဂသမ္ပယုတ္တာ ဖဿာဒယော ဖလဉ္စေဝ သသမ္ပယုတ္တန္တိ ဧတေ စတူဟိ သစ္စေဟိ ဝိနိဿဋာ ဝိနိဂ္ဂတာ နိပ္ပရိယာယတော, ပရိယာယတော ပန အညာတာဝိန္ဒြိယနိဒ္ဒေသေပိ ‘‘မဂ္ဂင်္ဂံ မဂ္ဂပရိယာပန္န’’န္တိ (ဓ. သ. ၅၅၅) ဝုတ္တတ္တာ ဖလဓမ္မေသု သမ္မာဒိဋ္ဌာဒီနံ မဂ္ဂသစ္စေ, ဣတရေသဉ္စ မဂ္ဂဖလသမ္ပယုတ္တာနံ သင်္ခါရဒုက္ခသာမညေန ဒုက္ခသစ္စေ သင်္ဂဟော သက္ကာ ကာတုံ. ဧဝဉှိ သတိ သစ္စဒေသနာယပိ သဗ္ဗသင်္ဂါဟိကတာ ဥပပန္နာ ဟောတိ. ကသ္မာ ပနေတေ ခန္ဓာဒယော ဗဟူ ဓမ္မာ ဝုတ္တာတိ? ဘဂဝတာပိ တထေဝ ဒေသိတတ္တာ. ဘဂဝတာပိ ကသ္မာ တထာ ဒေသိတာတိ? တိဝိဓသတ္တာနုဂ္ဂဟဿ အဓိပ္ပေတတ္တာ. နာမရူပတဒုဘယသမ္မုဠှဝသေန ဟိ တိက္ခနာဘိတိက္ခမုဒိန္ဒြိယဝသေန, သင်္ခိတ္တမဇ္ဈိမဝိတ္ထာရရုစိဝသေန စ တိဝိဓာ သတ္တာ. တေသု နာမသမ္မုဠှာနံ ခန္ဓဂ္ဂဟဏံ နာမဿ တတ္ထ စတုဓာ ဝိဘတ္တတ္တာ, ရူပသမ္မုဠှာနံ အာယတနဂ္ဂဟဏံ ရူပဿ တတ္ထ အဍ္ဎေကာဒသဓာ ဝိဘတ္တတ္တာ, ဥဘယမုဠှာနံ ဓာတုဂ္ဂဟဏံ ဥဘယေသမ္ပိ တတ္ထ ဝိတ္ထာရတော ဝိဘတ္တတ္တာ, တထာ တိက္ခိန္ဒြိယာနံ, သင်္ခိတ္တရုစိကာနဉ္စ ခန္ဓာဂ္ဂဟဏန္တျာဒိ ယောဇေတဗ္ဗံ. တံ ပနေတံ တိဝိဓမ္ပိ ပဝတ္တိနိဝတ္တိတဒုဘယဟေတုဝသေန ဒိဋ္ဌမေဝ ဥပကာရာဝဟံ. နော အညထာတိ သစ္စဂ္ဂဟဏန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ५३. मार्गाशी संप्रयुक्त असलेले पण अष्टांगिक मार्गातून मुक्त उरलेले मार्गसंप्रयुक्त स्पर्श इत्यादी धर्म आणि संप्रयुक्त धर्मांसह फल हे चार सत्यांमधून मुख्य रूपाने बाहेर राहिलेले आहेत. परंतु पर्यायाने 'अञ्ञाताविन्द्रिय' निर्देशात 'मार्गांग हे मार्गात समाविष्ट आहे' असे म्हटल्यामुळे, फलधर्मांमधील सम्यक् दृष्टी इत्यादींचा मार्गसत्यामध्ये, आणि इतर मार्ग-फल संप्रयुक्त धर्मांचा संस्कार-दुःखाच्या समानतेमुळे दुःखसत्यामध्ये संग्रह करणे शक्य आहे. असे मानल्यास सत्य-देशनेची सर्वसंग्राहकता देखील सिद्ध होते. पण हे स्कंध इत्यादी अनेक धर्म का सांगितले आहेत? कारण भगवंतांनी देखील तसेच उपदेशिले आहे. भगवंतांनी देखील तसे का उपदेशिले आहे? कारण तीन प्रकारच्या प्राण्यांवर अनुग्रह करणे अभिप्रेत होते. कारण नाम, रूप आणि या दोन्हीविषयी संमोहित असण्याच्या भेदाने, तीक्ष्ण, मध्यम व मृदू इंद्रिय असण्याच्या भेदाने, आणि संक्षिप्त, मध्यम व विस्तृत रुची असण्याच्या भेदाने प्राणी तीन प्रकारचे असतात. त्यापैकी नामाविषयी संमोहित असलेल्यांसाठी स्कंधांचे ग्रहण केले आहे, कारण तेथे नामाचे चार प्रकारे विभाजन केले आहे. रूपाविषयी संमोहित असलेल्यांसाठी आयतनांचे ग्रहण केले आहे, कारण तेथे रूपाचे साडेअकरा प्रकारे विभाजन केले आहे. दोन्हीविषयी संमोहित असलेल्यांसाठी धातूंचे ग्रहण केले आहे, कारण तेथे दोन्हीचे विस्तृतपणे विभाजन केले आहे. तसेच तीक्ष्णेंद्रिय आणि संक्षिप्त रुची असलेल्यांसाठी स्कंधांचे ग्रहण इत्यादी योजना करावी. आणि हे तिन्ही प्रवृत्ती, निवृत्ती आणि या दोन्हीच्या कारणांच्या रूपाने पाहिले असता तरच उपकारक ठरतात, अन्यथा नाही; म्हणूनच सत्यांचे ग्रहण केले आहे असे समजावे. သဗ္ဗသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. सर्वसंग्रह वर्णन समाप्त झाले. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नामक 'अभिधम्मत्थसंग्रह' च्या वर्णनामध्ये - သမုစ္စယပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. समच्चयपरिच्छेद वर्णन समाप्त झाले. ၈. ပစ္စယပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ८. प्रत्ययपरिच्छेद वर्णन ၁. ဣဒါနိ [Pg.234] ယထာဝုတ္တနာမရူပဓမ္မာနံ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒပဋ္ဌာနနယဝသေန ပစ္စယေ ဒဿေတုံ ‘‘ယေသ’’န္တျာဒိ အာရဒ္ဓံ. ယေသံ ပစ္စယေဟိ သင်္ခတတ္တာ သင်္ခတာနံ ပစ္စယုပ္ပန္နဓမ္မာနံ ယေ ပစ္စယဓမ္မာ ယထာ ယေနာကာရေန ပစ္စယာ ဌိတိယာ, ဥပ္ပတ္တိယာ စ ဥပကာရကာ, တံ ဝိဘာဂံ တေသံ ပစ္စယုပ္ပန္နာနံ, တေသံ ပစ္စယာနံ, တဿ စ ပစ္စယာကာရဿ ပဘေဒံ ဣဟ ဣမသ္မိံ သမုစ္စယသင်္ဂဟာနန္တရေ ဌာနေ ယထာရဟံ တံတံပစ္စယုပ္ပန္နဓမ္မေ သတိ တံတံပစ္စယာနံ တံတံပစ္စယဘာဝါကာရာနုရူပံ ဣဒါနိ ပဝက္ခာမီတိ ယောဇနာ. १. आता, पूर्वोक्त नाम-रूप धर्मांचे प्रतीत्यसमुत्पाद आणि प्रस्थान नयाच्या द्वारे प्रत्यय दाखवण्यासाठी 'येसं' इत्यादी गाथा सुरू केली आहे. ज्या प्रत्ययांद्वारे संस्कृत असल्यामुळे 'संस्कृत' म्हटल्या जाणाऱ्या प्रत्ययोत्पन्न धर्मांचे, जे प्रत्ययधर्म ज्या प्रकारे आणि ज्या रूपाने स्थितीसाठी व उत्पत्तीसाठी उपकारक ठरतात, त्या प्रत्ययोत्पन्न धर्मांचा, त्या प्रत्ययांचा आणि त्या प्रत्ययभावाच्या आकाराचा तो विभाग व भेद, येथे या समच्चयसंग्रहानंतरच्या स्थानामध्ये, योग्यतेनुसार त्या त्या प्रत्ययोत्पन्न धर्मांच्या अस्तित्वात त्या त्या प्रत्ययांच्या त्या त्या प्रत्ययभावाच्या आकाराला अनुरूप आता सांगेन, अशी योजना करावी. ၂. တတ္ထ ပစ္စယသာမဂ္ဂိံ ပဋိစ္စ သမံ ဂန္တွာ ဖလာနံ ဥပ္ပာဒေါ ဧတသ္မာတိ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒေါ, ပစ္စယာကာရော. နာနပ္ပကာရာနိ ဌာနာနိ ပစ္စယာ ဧတ္ထာတျာဒိနာ ပဋ္ဌာနံ, အနန္တနယသမန္တပဋ္ဌာနမဟာပကရဏံ, တတ္ထ ဒေသိတနယော ပဋ္ဌာနနယော. २. त्यामध्ये, प्रत्ययसामग्रीला आश्रय करून एकत्र येऊन ज्याच्यापासून फलांची उत्पत्ती होते, तो 'प्रतीत्यसमुत्पाद' म्हणजेच प्रत्ययाकार होय. 'ज्यामध्ये विविध प्रकारचे स्थान प्रत्यय असतात' इत्यादी व्युत्पत्तीने 'प्रस्थान' म्हणजे अनंत नय असणारा महाग्रंथ होय. त्यामध्ये उपदेशिलेला नय म्हणजे 'प्रस्थाननय' होय. ၃. တတ္ထာတိ တေသု ဒွီသု နယေသု. တဿ ပစ္စယဓမ္မဿ ဘာဝေန ဘဝနသီလဿ ဘာဝေါ တဗ္ဘာဝဘာဝီဘာဝေါ, သောယေဝ အာကာရမတ္တံ, တေန ဥပလက္ခိတော တဗ္ဘာဝဘာဝီဘာဝါကာရမတ္တောပလက္ခိတော. ဧတေနေဝ တဒဘာဝါဘာဝါကာရမတ္တောပလက္ခိတတာပိ အတ္ထတော ဒဿိတာ ဟောတိ. အနွယဗျတိရေကဝသေန ဟိ ပစ္စယလက္ခဏံ ဒဿေတဗ္ဗံ. တေနာဟ ဘဂဝါ – ‘‘ဣမသ္မိံ သတိ ဣဒံ ဟောတိ, ဣမဿုပ္ပာဒါ ဣဒမုပ္ပဇ္ဇတိ. ဣမသ္မိံ အသတိ ဣဒံ န ဟောတိ, ဣမဿ နိရောဓာ ဣဒံ နိရုဇ္ဈတီ’’တိ (မ. နိ. ၁.၄၀၄, ၄၀၆; သံ. နိ. ၂.၂၁; ဥဒါ. ၁, ၂). ပဋိစ္စ ဖလံ ဧတိ ဧတသ္မာတိ ပစ္စယော. တိဋ္ဌတိ ဖလံ ဧတ္ထ တဒါယတ္တဝုတ္တိတာယာတိ ဌိတိ, အာဟစ္စ ဝိသေသေတွာ ပဝတ္တာ ပစ္စယသင်္ခါတာ ဌိတိ အာဟစ္စပစ္စယဋ္ဌိတိ. ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယော ဟိ တဗ္ဘာဝဘာဝီဘာဝါကာရမတ္တံ ဥပါဒါယ ပဝတ္တတ္တာ ဟေတာဒိပစ္စယနိယမဝိသေသံ အနပေက္ခိတွာ [Pg.235] အဝိသေသတောဝ ပဝတ္တတိ, အယံ ပန ဟေတာဒိတံတံပစ္စယာနံ တဿ တဿ ဓမ္မန္တရဿ တံတံပစ္စယဘာဝသာမတ္ထိယာကာရဝိသေသံ ဥပါဒါယ ဝိသေသေတွာ ပဝတ္တောတိ အာဟစ္စပစ္စယဋ္ဌိတိမာရဗ္ဘ ပဝုစ္စတီတိ. ကေစိ ပန ‘‘အာဟစ္စ ကဏ္ဌတာလုအာဒီသု ပဟရိတွာ ဝုတ္တာ ဌိတိ အာဟစ္စပစ္စယဋ္ဌိတီ’’တိ ဝဏ္ဏေန္တိ. တံ ပန သဝနမတ္တေနေဝ တေသံ အဝဟသိတဗ္ဗဝစနတံ ပကာသေတိ. န ဟိ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယော, အညော ဝါ ကောစိ နယော ကဏ္ဌတာလုအာဒီသု အနာဟစ္စ ဒေသေတုံ သက္ကာတိ. ဝေါမိဿေတွာတိ ပဋ္ဌာနနယမ္ပိ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒေယေဝ ပက္ခိပိတွာ တဗ္ဘာဝဘာဝီဘာဝေန ဟေတာဒိပစ္စယဝသေန စ မိဿေတွာ အာစရိယာ သင်္ဂဟကာရာဒယော ပပဉ္စေန္တိ ဝိတ္ထာရေန္တိ, မယံ ပန ဝိသုံ ဝိသုံယေဝ ဒဿယိဿာမာတျဓိပ္ပာယော. ३. "त्यात" म्हणजे त्या दोन नयूंमध्ये (पद्धतींमध्ये). त्या प्रत्ययधर्माच्या (कारणाच्या) अस्तित्वामुळे स्वभावतः उत्पन्न होणाऱ्या (कार्याच्या) अस्तित्वाची उत्पत्ती म्हणजे "तद्भावभावीभाव" होय. तो केवळ एक आकारमात्र (अवस्थामात्र) आहे, आणि त्याद्वारे लक्षित केलेला तो "तद्भावभावीभावाकारमात्रोपलक्षित" होय. याद्वारेच, त्याच्या अभावामुळे (कारणाच्या अभावामुळे) अभावाच्या (कार्याच्या अभावाच्या) आकारमात्राची लक्षितता देखील अर्थतः दर्शविली जाते. कारण अन्वय आणि व्यतिरेक पद्धतीद्वारे प्रत्ययाचे (कारणाचे) लक्षण दर्शविले पाहिजे. म्हणूनच भगवान म्हणाले – "याच्या अस्तित्वाने हे होते, याच्या उत्पत्तीने हे उत्पन्न होते. हे नसताना हे होत नाही, याच्या निरोधाने (नाशाने) हे निरुद्ध होते." ज्याला अनुसरून (आश्रय करून) यापासून फल उत्पन्न होते, म्हणून तो "प्रत्यय" (पच्चय) होय. ज्यावर अवलंबून राहिल्यामुळे फल येथे टिकून राहते, म्हणून ती "स्थिति" होय. विशेष रूपाने प्रवृत्त झालेली प्रत्ययसंज्ञक स्थिती म्हणजे "आहच्चप्रत्ययस्थिती" (आहच्चपच्चयट्ठिति) होय. कारण प्रतीत्यसमुत्पाद नय हा "तद्भावभावीभाव" आकारमात्राचा आश्रय करून प्रवृत्त होत असल्यामुळे, हेतू इत्यादी प्रत्ययांच्या नियमांच्या विशेषाची अपेक्षा न करता सामान्य रूपानेच प्रवृत्त होतो; परंतु हा (पट्ठान नय) हेतू इत्यादी त्या त्या प्रत्ययांच्या, त्या त्या इतर धर्मांच्या प्रति त्या त्या प्रत्ययभावाच्या सामर्थ्य-आकार-विशेषाचा आश्रय करून, विशेष रूपाने प्रवृत्त होतो, म्हणून याला "आहच्चप्रत्ययस्थिती" असे म्हटले जाते. परंतु काही आचार्य "कंठ, टाळू इत्यादींवर आघात करून (उच्चारून) सांगितलेली स्थिती म्हणजे आहच्चप्रत्ययस्थिती होय" असे वर्णन करतात. परंतु त्यांचे ते बोलणे केवळ ऐकण्यानेच उपहासास्पद असल्याचे स्पष्ट करते. कारण प्रतीत्यसमुत्पाद नय असो किंवा इतर कोणताही नय असो, कंठ, टाळू इत्यादींवर आघात न करता (स्पर्श न करता) उपदेश करणे शक्य नाही. "मिश्रित करून" म्हणजे पट्ठान नय देखील प्रतीत्यसमुत्पादामध्येच समाविष्ट करून, तद्भावभावीभावाने आणि हेतू इत्यादी प्रत्ययांच्या वशाने मिश्रित करून, संग्रहकार इत्यादी आचार्यांनी विस्तारपूर्वक स्पष्ट केले आहे; परंतु आम्ही मात्र ते वेगवेगळेच दर्शवू, असा अभिप्राय आहे. ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယဝဏ္ဏနာ प्रतीत्यसमुत्पाद नय वर्णन ၄. န ဝိဇာနာတီတိ အဝိဇ္ဇာ, အဝိန္ဒိယံ ဝါ ကာယဒုစ္စရိတာဒိံ ဝိန္ဒတိ ပဋိလဘတိ, ဝိန္ဒိယံ ဝါ ကာယသုစရိတာဒိံ န ဝိန္ဒတိ, ဝေဒိတဗ္ဗံ ဝါ စတုသစ္စာဒိကံ န ဝိဒိတံ ကရောတိ, အဝိဇ္ဇမာနေ ဝါ ဇဝါပေတိ, ဝိဇ္ဇမာနေ ဝါ န ဇဝါပေတီတိ အဝိဇ္ဇာ, စတူသု အရိယသစ္စေသု ပုဗ္ဗန္တာဒီသု စတူသု အညာဏဿေတံ နာမံ. အဝိဇ္ဇာ ဧဝ ပစ္စယော အဝိဇ္ဇာပစ္စယော. တတော အဝိဇ္ဇာပစ္စယာ သင်္ခတမဘိသင်္ခရောန္တီတိ သင်္ခါရာ, ကုသလာကုသလကမ္မာနိ. တေ တိဝိဓာ ပုညာဘိသင်္ခါရော အပုညာဘိသင်္ခါရော အာနေဉ္ဇာဘိသင်္ခါရောတိ. တတ္ထကာမရူပါဝစရာ တေရသ ကုသလစေတနာ ပုညာဘိသင်္ခါရော, ဒွါဒသ အကုသလစေတနာ အပုညာဘိသင်္ခါရော, စတဿော အာရုပ္ပစေတနာ အာနေဉ္ဇာဘိသင်္ခါရောတိ ဧဝမေတာ ဧကူနတိံသ စေတနာ သင်္ခါရာ နာမ. ပဋိသန္ဓိဝသေန ဧကူနဝီသတိဝိဓံ, ပဝတ္တိဝသေန ဒွတ္တိံသဝိဓံ ဝိပါကစိတ္တံ ဝိညာဏံ နာမ. နာမဉ္စ ရူပဉ္စ နာမရူပံ. တတ္ထ နာမံ ဣဓ ဝေဒနာဒိက္ခန္ဓတ္တယံ, ရူပံ ပန ဘူတုပါဒါယဘေဒတော ဒုဝိဓံ [Pg.236] ကမ္မသမုဋ္ဌာနရူပံ, တဒုဘယမ္ပိ ဣဓ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏသဟဂတန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. နာမရူပပစ္စယာတိ ဧတ္ထ နာမဉ္စ ရူပဉ္စ နာမရူပဉ္စ နာမရူပန္တိ သရူပေကသေသော ဝေဒိတဗ္ဗော. စက္ခာဒီနိ ဆ အဇ္ဈတ္တိကာယတနာနိ, ကေသဉ္စိ မတေန ရူပါဒီနိ ဆ ဗာဟိရာယတနာနိပိ ဝါ အာယတနံ နာမ. ဆ အာယတနာနိ စ ဆဋ္ဌာယတနဉ္စ သဠာယတနံ. စက္ခုသမ္ဖဿာဒိဝသေန ဆဒွါရိကော ဖဿော ဖဿော နာမ. သုခဒုက္ခုပေက္ခာဝသေန တိဝိဓာ ဝေဒနာ. ४. जाणत नाही म्हणून "अविद्या" (अविज्जा) होय. अथवा न मिळवण्याजोगे जे कायदुश्चरित (शारीरिक दुष्कृत्य) इत्यादी आहे, ते मिळवते (प्राप्त करते) म्हणून अविद्या; अथवा मिळवण्याजोगे जे कायसुचरित (शारीरिक सुकृत्य) इत्यादी आहे, ते मिळवत नाही म्हणून अविद्या; अथवा जाणण्याजोगे जे चतुरार्यसत्य इत्यादी आहे, ते जाणलेले करत नाही (जाणून घेत नाही) म्हणून अविद्या; अथवा जे परमार्थतः अस्तित्वात नाही (स्त्री, पुरुष इत्यादी), त्यामध्ये प्राण्यांना वेगाने प्रवृत्त करते म्हणून अविद्या; अथवा जे परमार्थतः अस्तित्वात आहे (स्कंध इत्यादी), त्यामध्ये प्राण्यांना प्रवृत्त करत नाही म्हणून अविद्या होय. चार आर्यसत्यांविषयी आणि पूर्वान्त (भूतकाल) इत्यादी चार स्थानांविषयीच्या अज्ञानाचे हे नाव आहे. अविद्याच प्रत्यय (कारण) आहे, म्हणून "अविद्याप्रत्यय" होय. त्या अविद्येच्या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) जे संस्कृत (संस्कारित) धर्मांना अभिसंस्कृत (उत्पन्न) करतात, ते "संस्कार" (संखारा) होत; म्हणजेच कुशल आणि अकुशल कर्मे. ते तीन प्रकारचे आहेत: पुण्याभिसंस्कार, अपुण्याभिसंस्कार आणि आनेञ्जाभिसंस्कार. त्यात कामावचर आणि रूपावचर अशा तेरा कुशल चेतना म्हणजे "पुण्याभिसंस्कार" होय; बारा अकुशल चेतना म्हणजे "अपुण्याभिसंस्कार" होय; चार आरूप्य चेतना म्हणजे "आनेञ्जाभिसंस्कार" होय. अशा प्रकारे या एकोणतीस चेतना म्हणजे "संस्कार" होत. प्रतिसंधीच्या वशाने एकोणवीस प्रकारचे आणि प्रवृत्तीच्या वशाने बत्तीस प्रकारचे विपाकचित्त म्हणजे "विज्ञान" (विञ्ञाण) होय. नाम आणि रूप म्हणजे "नामरूप" होय. त्यात "नाम" म्हणजे येथे वेदना इत्यादी तीन स्कंध होत. "रूप" म्हणजे महाभूत आणि उपादाय रूपांच्या भेदाने दोन प्रकारचे कर्मसमुत्थान रूप (कर्मामुळे उत्पन्न होणारे रूप) होय. हे दोन्ही येथे प्रतिसंधी विज्ञानासोबत उत्पन्न होतात, असे समजावे. "नामरूपप्रत्यया" यामध्ये नाम आणि रूप, नामरूप आणि नामरूप असा सरूपैकशेष समजावा. चक्षू इत्यादी सहा आध्यात्मिक आयतने, आणि काहींच्या मते रूप इत्यादी सहा बाह्य आयतने देखील "आयतन" होत. सहा आयतने आणि सहावे आयतन (मनायतन) मिळून "सळायतन" (षडायतन) होते. चक्षुसंस्पर्श इत्यादींच्या वशाने सहा द्वारांमध्ये होणारा स्पर्श म्हणजे "स्पर्श" (फस्स) होय. सुख, दुःख आणि उपेक्षा यांच्या वशाने तीन प्रकारची "वेदना" असते. ကာမတဏှာ ဘဝတဏှာ ဝိဘဝတဏှာတိ တိဝိဓာ တဏှာ. ဆဠာရမ္မဏာဒိဝသေန ပန အဋ္ဌသတပ္ပဘေဒါ ဟောန္တိ ကာမုပါဒါနာဒိဝသေန စတ္တာရိ ဥပါဒါနာနိ. ဧတ္ထ စ ဒုဗ္ဗလာ တဏှာ တဏှာ နာမ, ဗလဝတီ ဥပါဒါနံ. အသမ္ပတ္တဝိသယပတ္ထနာ ဝါ တဏှာ တမသိ စောရာနံ ဟတ္ထပ္ပသာရဏံ ဝိယ, သမ္ပတ္တဝိသယဂ္ဂဟဏံ ဥပါဒါနံ စောရာနံ ဟတ္ထပ္ပတ္တဿ ဂဟဏံ ဝိယ. အပ္ပိစ္ဆတာပဋိပက္ခာ တဏှာ, သန္တောသပ္ပဋိပက္ခံ ဥပါဒါနံ. ပရိယေသနဒုက္ခမူလံ တဏှာ, အာရက္ခဒုက္ခမူလံ ဥပါဒါနန္တိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. ကမ္မဘဝေါ ဥပပတ္တိဘဝေါတိ ဒုဝိဓော ဘဝေါ. တတ္ထ ပဌမော ဘဝတိ ဧတသ္မာ ဖလန္တိ ဘဝေါ, သော ကာမာဝစရကုသလာကုသလာဒိဝသေန ဧကူနတိံသဝိဓော. ဒုတိယော ပန ဘဝတီတိ ဘဝေါ, သော ကာမဘဝါဒိဝသေန နဝဝိဓော. ဥပါဒါနပစ္စယာ ဘဝေါတိ စေတ္ထ ဥပပတ္တိဘဝေါပိ အဓိပ္ပေတော. ဘဝပစ္စယာ ဇာတီတိ ကမ္မဘဝေါဝ. သော ဟိ ဇာတိယာ ပစ္စယော ဟောတိ, န ဣတရော. သော ဟိ ပဌမာဘိနိဗ္ဗတ္တက္ခန္ဓသဘာဝေါ ဇာတိယေဝ, န စ တဒေဝ တဿ ကာရဏံ ယုတ္တံ. တေသံ တေသံ သတ္တာနံ တံတံဂတိအာဒီသု အတ္တဘာဝပဋိလာဘော ဇာတိ. တထာနိဗ္ဗတ္တဿ စ အတ္တဘာဝဿ ပုရာဏဘာဝေါ ဇရာ. ဧတဿေဝ ဧကဘဝပရိစ္ဆိန္နဿ ပရိယောသာနံ မရဏံ. ဉာတိဗျသနာဒီဟိ ဖုဋ္ဌဿ စိတ္တသန္တာပေါ သောကော. တဿေဝ ဝစီပလာပေါ ပရိဒေဝေါ. ကာယိကဒုက္ခဝေဒနာ [Pg.237] ဒုက္ခံ. မာနသိကဒုက္ခဝေဒနာ ဒေါမနဿံ. ဉာတိဗျသနာဒီဟိ ဖုဋ္ဌဿ အဓိမတ္တစေတောဒုက္ခပ္ပဘာဝိတော ဘုသော အာယာသော ဥပါယာသော. कामतृष्णा, भवतृष्णा आणि विभवतृष्णा अशी तीन प्रकारची "तृष्णा" (तण्हा) असते. सहा आळंबन (विषय) इत्यादींच्या वशाने तिचे एकशे आठ प्रकार होतात. कामोपादान इत्यादींच्या वशाने चार "उपादान" असतात. आणि यात दुर्बल तृष्णा म्हणजे "तृष्णा" होय, आणि बलवान तृष्णा म्हणजे "उपादान" होय. अथवा अप्राप्त विषयाची इच्छा करणे म्हणजे तृष्णा होय, जसे अंधारात चोरांनी हात पसरणे; आणि प्राप्त विषयाचे ग्रहण करणे म्हणजे उपादान होय, जसे चोरांनी हातात आलेल्या वस्तूचे ग्रहण करणे (पकडून ठेवणे). तृष्णा ही अल्पेच्छतेच्या (अप्पिच्छता) विरुद्ध आहे, आणि उपादान हे संतोषाच्या विरुद्ध आहे. शोध घेण्याच्या (मिळवण्याच्या) दुःखाचे मूळ तृष्णा आहे, आणि रक्षण करण्याच्या दुःखाचे मूळ उपादान आहे - हा या दोघांमधील फरक (विशेष) आहे. कर्मभव आणि उपपत्तिभव असा दोन प्रकारचा "भव" असतो. त्यात पहिला (कर्मभव) - "यापासून फल उत्पन्न होते" म्हणून भव होय; तो कामावचर कुशल-अकुशल इत्यादींच्या वशाने एकोणतीस प्रकारचा आहे. परंतु दुसरा (उपपत्तिभव) - "उत्पन्न होतो" म्हणून भव होय; तो कामभव इत्यादींच्या वशाने नऊ प्रकारचा आहे. "उपादानप्रत्यया भव" यामध्ये उपपत्तिभव देखील अभिप्रेत आहे. "भवप्रत्यया जाती" यामध्ये केवळ कर्मभवच अभिप्रेत आहे. कारण तोच जातीचा प्रत्यय (कारण) होतो, इतर (उपपत्तिभव) नाही. कारण तो (उपपत्तिभव) तर पहिल्यांदा उत्पन्न होणाऱ्या स्कंधांचा स्वभाव म्हणजेच "जाती"च आहे, आणि तीच (जातीच) स्वतःचे कारण असणे योग्य नाही. त्या त्या प्राण्यांना त्या त्या गती इत्यादींमध्ये आत्मभाव (शरीर व मन) प्राप्त होणे म्हणजे "जाती" होय. आणि अशा प्रकारे उत्पन्न झालेल्या आत्मभावाचे जीर्ण होणे (वृद्ध होणे) म्हणजे "जरा" होय. एकाच भवाने मर्यादित असलेल्या याच आत्मभावाचा अंत होणे म्हणजे "मरण" होय. नातेवाईकांचा नाश (व्यसन) इत्यादींनी ग्रस्त झालेल्या व्यक्तीच्या चित्ताचा संताप म्हणजे "शोक" होय. त्याच व्यक्तीचे वाणीने विलाप करणे म्हणजे "परिदेव" (क्रंदन) होय. शारीरिक दुःखद वेदना म्हणजे "दुःख" होय. मानसिक दुःखद वेदना म्हणजे "दौर्मनस्य" (डोमनस्स) होय. नातेवाईकांचा नाश इत्यादींनी ग्रस्त झालेल्या व्यक्तीच्या तीव्र मानसिक दुःखातून उत्पन्न होणारा अत्यंत क्लेश म्हणजे "उपायास" (उपायासो) होय. ဧတ္ထ စ သတိပိ ဝတ္ထာရမ္မဏာဒိကေ ပစ္စယန္တရေ အဝိဇ္ဇာဒိဧကေကပစ္စယဂ္ဂဟဏံ ပဓာနဘာဝတော, ပါကဋဘာဝတော စာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဧတ္ထ စ အဝိဇ္ဇာနုသယိတေယေဝ သန္တာနေ သင်္ခါရာနံ ဝိပါကဓမ္မဘာဝေန ပဝတ္တနတော အဝိဇ္ဇာပစ္စယာသင်္ခါရာသမ္ဘဝန္တိ, ဝိညာဏဉ္စ သင်္ခါရဇနိတံ ဟုတွာ ဘဝန္တရေ ပတိဋ္ဌာတိ. န ဟိ ဇနကာဘာဝေ တဿုပ္ပတ္တိ သိယာ, တသ္မာ သင်္ခါရပစ္စယာ ဝိညာဏံ. နာမရူပဉ္စ ပုဗ္ဗင်္ဂမာဓိဋ္ဌာနဘူတဝိညာဏုပတ္ထဒ္ဓံ ပဋိသန္ဓိပဝတ္တီသု ပတိဋ္ဌဟတီတိ ဝိညာဏပစ္စယာနာမရူပံ, သဠာယတနဉ္စ နာမရူပနိဿယမေဝ ဆဗ္ဗိဓဖဿဿ ဒွါရဘာဝေန ယထာရဟံ ပဝတ္တတိ, နော အညထာတိ နာမရူပပစ္စယာ သဠာယတနံ. ဖဿော စ သဠာယတနသမ္ဘဝေယေဝ အာရမ္မဏံ ဖုသတိ. န ဟိ ဒွါရာဘာဝေ တဿုပ္ပတ္တိ သိယာတိ သဠာယတနပစ္စယာ ဖဿော. ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌမဇ္ဈတ္တဉ္စ အာရမ္မဏံ ဖုသန္တောယေဝ ဝေဒနံ ဝေဒယတိ, နော အညထာတိ ဖဿပစ္စယာ ဝေဒနာ. ဝေဒနီယေသု စ ဓမ္မေသု အဿာဒါနုပဿိနော ဝေဒနာဟေတုကာ တဏှာ သမုဋ္ဌာတီတိ ဝေဒနာပစ္စယာ တဏှာ. တဏှာသိနေဟပိပါသိတာယေဝ စ ဥပါဒါနိယေသု ဓမ္မေသု ဥပါဒါယ ဒဠှဘာဝါယ သံဝတ္တန္တိ. တဏှာယ ဟိ ရူပါဒီနိ အဿာဒေတွာ အဿာဒေတွာ ကာမေသု ပါတဗျတံ အာပဇ္ဇန္တီတိ တဏှာ ကာမုပါဒါနဿ ပစ္စယော. တထာ ရူပါဒိဘေဒေဂဓိတော ‘‘နတ္ထိ ဒိန္န’’န္တျာဒိနာ မိစ္ဆာဒဿနံ သံသာရတော မုစ္စိတုကာမော အသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ သုဒ္ဓိမဂ္ဂပရာမာသံ ခန္ဓေသု အတ္တတ္တနိယဂါဟဘူတံ အတ္တဝါဒဒဿနဒွယဉ္စ ဂဏှာတိ, တသ္မာ ဒိဋ္ဌုပါဒါဒီနမ္ပိ ပစ္စယောတိ တဏှာပစ္စယာ ဥပါဒါနံ. ယထာရဟံ သမ္ပယောဂါနုသယဝသေန ဥပါဒါနပတိဋ္ဌိတာယေဝ သတ္တာ ကမ္မာယူဟနာယ သံဝတ္တန္တီတိ ဥပါဒါနံ ဘဝဿ ပစ္စယော. ဥပပတ္တိဘဝသင်္ခါတာ စ ဇာတိ ကမ္မဘဝဟေတုကာယေဝ[Pg.238]. ဗီဇတော အင်္ကုရော ဝိယ တတ္ထ တတ္ထ သမုပလဗ္ဘတီတိ ဘဝေါ ဇာတိယာ ပစ္စယော နာမ. သတိ စ ဇာတိယာ ဧဝ ဇရာမရဏသမ္ဘဝေါ. န ဟိ အဇာတာနံ ဇရာမရဏသမ္ဘဝေါ ဟောတီတိ ဇာတိ ဇရာမရဏာနံ ပစ္စယောတိ ဧဝမေတေသံ တဗ္ဘာဝဘာဝီဘာဝေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. येथे (या प्रतीत्यसमुत्पाद पद्धतीमध्ये) वस्तू, आलंबन इत्यादी इतर प्रत्यय (कारणे) विद्यमान असतानाही, अविद्या इत्यादी प्रत्येक प्रत्ययाचे ग्रहण हे त्यांच्या मुख्यत्वामुळे आणि स्पष्टतेमुळे केले आहे, असे समजावे. आणि येथे, अविद्येचा अनुशय (सुप्त वासना) असलेल्या संततीमध्येच संस्कारांची विपाक देण्याच्या स्वभावाने प्रवृत्ती होत असल्यामुळे 'अविद्याप्रत्ययाने संस्कार' उत्पन्न होतात; आणि संस्कारांमुळे उत्पन्न झालेले विज्ञान दुसऱ्या भवात (पुढील जन्मात) प्रतिष्ठित होते. कारण, जनक (उत्पादक कारण) नसताना त्याची उत्पत्ती होऊ शकत नाही, म्हणून 'संस्कारप्रत्ययाने विज्ञान' होते. नाम आणि रूप हे पूर्वगामी व अधिष्ठानभूत अशा विज्ञानाद्वारे उपस्तब्ध (समर्थित) होऊन प्रतिसंधी आणि प्रवृत्ती काळात प्रतिष्ठित होतात, म्हणून 'विज्ञानप्रत्ययाने नामरूप' होते. आणि षडायतन हे नामरूपाच्याच आश्रयाने सहा प्रकारच्या स्पर्शाचे द्वार म्हणून यथायोग्य प्रवृत्त होते, इतर प्रकारे नाही; म्हणून 'नामरूपप्रत्ययाने षडायतन' होते. स्पर्श हा षडायतन उत्पन्न झाल्यावरच आलंबनाला स्पर्श करतो. कारण, द्वार नसताना त्याची उत्पत्ती होऊ शकत नाही, म्हणून 'षडायतनप्रत्ययाने स्पर्श' होतो. आणि इष्ट, अनिष्ट किंवा तटस्थ आलंबनाला स्पर्श करतानाच सत्त्व वेदनेचा अनुभव घेतो, इतर प्रकारे नाही; म्हणून 'स्पर्शप्रत्ययाने वेदना' होते. आणि वेदनिय (अनुभव घेण्याजोग्या) धर्मांमध्ये आस्वादाचे वारंवार दर्शन घेणाऱ्या (आसक्त असणाऱ्या) व्यक्तीच्या ठिकाणी वेदनेमुळे तृष्णा उत्पन्न होते, म्हणून 'वेदनाप्रत्ययाने तृष्णा' होते. तृष्णेच्या स्नेहाने (चिकटपणाने) आणि पिपासेने (तहानलेल्या अवस्थेने) युक्त असलेलेच सत्त्व उपादानयोग्य धर्मांमध्ये दृढतेने धरून ठेवण्यासाठी (उपादानासाठी) प्रवृत्त होतात. कारण, तृष्णेमुळे रूपादी विषयांचा वारंवार आस्वाद घेऊन ते कामांमध्ये (भोगांमध्ये) बुडून जातात, म्हणून तृष्णा ही कामोपादानाचे कारण आहे. तसेच, रूपादी भेदांमध्ये आसक्त झालेला मनुष्य 'दिलेले काही नाही (दान निरर्थक आहे)' इत्यादी मिथ्या दृष्टी ग्रहण करतो; संसारातून मुक्त होण्याची इच्छा असणारा अशुद्ध मार्गाला शुद्ध मार्ग समजून त्याचा चुकीचा परामर्श (शीलब्रतपरामर्श) करतो; आणि स्कंधांमध्ये 'हा आत्मा आहे, हे आत्म्याचे आहे' असे ग्रहण करून दोन प्रकारच्या आत्मवाद दृष्टींचे ग्रहण करतो. म्हणून, दृष्टी-उपादान इत्यादींचेही ते कारण आहे; म्हणून 'तृष्णाप्रत्ययाने उपादान' होते. यथायोग्य संप्रयोग आणि अनुशय यांच्या बलाने उपादानात प्रतिष्ठित झालेलेच सत्त्व कर्माचा संचय करण्यासाठी प्रवृत्त होतात, म्हणून 'उपादान हे भवाचे कारण' आहे. आणि उपपत्ती-भव संज्ञक असणारी जाती (जन्म) ही कर्मभवाच्याच कारणामुळे होते. ज्याप्रमाणे बीजापासून अंकुर निघतो, त्याप्रमाणे त्या त्या भवात ती प्राप्त होते; म्हणून 'भव हा जातीचे कारण' आहे. आणि जाती (जन्म) असतानाच जरा-मरण संभवते. कारण, जन्म न घेतलेल्यांना जरा-मरण संभवत नाही; म्हणून 'जाती ही जरा-मरणाचे कारण' आहे. अशा प्रकारे, या (अविद्या इत्यादी) धर्मांचा 'तद्भावभावीभाव' (त्यांच्या असण्याने पुढील गोष्टींचे असणे) समजावा. ဧဝမေတဿ ကေဝလဿ ဒုက္ခက္ခန္ဓဿ သမုဒယော ဟောတီတိ ယထာဝုတ္တေန ပစ္စယပရမ္ပရဝိဓိနာ, န ပန ဣဿရနိမ္မာနာဒီဟိ ဧတဿ ဝဋ္ဋသင်္ခါတဿ ကေဝလဿ သုခါဒီဟိ အသမ္မိဿဿ, သကလဿ ဝါ ဒုက္ခက္ခန္ဓဿ ဒုက္ခရာသိဿ န သုခသုဘာဒီနံ သမုဒယော နိဗ္ဗတ္တိ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဣမသ္မိံ ပစ္စယသင်္ဂဟာဓိကာရေ. अशा प्रकारे, या केवळ (संपूर्ण) दुःखस्कंधाचा उदय (उत्पत्ती) वर सांगितलेल्या प्रत्यय-परंपरेच्या नियमाने होतो; ईश्वर-निर्मिती इत्यादींमुळे नाही. या संसाररूप, सुखादी गोष्टींनी अमिश्रित अशा केवळ किंवा संपूर्ण दुःखस्कंधाचा (दुःखराशीचा) उदय किंवा उत्पत्ती होते, सुख आणि शुभ इत्यादींची नाही. येथे, या प्रत्ययसंग्रह अधिकारात... ၅. အတတိ သတတံ ဂစ္ဆတိ ပဝတ္တတီတိ အဒ္ဓါ, ကာလော. ५. जो सतत चालतो, प्रवृत्त होतो, तो 'अद्धा' म्हणजे काळ (वेळ) होय. ၆. အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရာ အတီတော အဒ္ဓါ အတီတဘဝပရိယာပန္နဟေတူနမေဝေတ္ထ အဓိပ္ပေတတ္တာ, အဒ္ဓါဂ္ဂဟဏေန စ အဝိဇ္ဇာဒီနံ ဓမ္မာနမေဝ ဂဟဏံ တဗ္ဗိနိမုတ္တဿ ကဿစိ ကာလဿ အနုပလဗ္ဘနတော. နိရုဒ္ဓါနုပ္ပာဒါ ဧဝ ဟိ ဓမ္မာ အတီတာနာဂတကာလဝသေန ဥပ္ပာဒါဒိက္ခဏတ္တယပရိယာပန္နာ စ ပစ္စုပ္ပန္နကာလဝသေန ဝေါဟရီယန္တိ. ဇာတိဇရာမရဏံ အနာဂတော အဒ္ဓါ ပစ္စုပ္ပန္နဟေတုတော အနာဂတေ နိဗ္ဗတ္တနတော. မဇ္ဈေ ပစ္စုပ္ပန္နော အဒ္ဓါ အတီတဟေတုတော ဣဓ နိဗ္ဗတ္တနကဖလသဘာဝတ္တာ, အနာဂတဖလဿ ဣဓ ဟေတုသဘာဝတ္တာ စ မဇ္ဈေ ဝိညာဏာဒီနိ အဋ္ဌင်္ဂါနိ ပစ္စုပ္ပန္နော အဒ္ဓါ. ६. अविद्या आणि संस्कार हा 'अतीत अद्धा' (भूतकाळ) आहे; कारण येथे भूतकाळातील भवामध्ये समाविष्ट असलेल्या कारणांचेच ग्रहण अभिप्रेत आहे. आणि 'अद्धा' या शब्दाच्या ग्रहणाने अविद्या इत्यादी धर्मांचेच ग्रहण होते, कारण त्याव्यतिरिक्त इतर कोणताही काळ परमार्थतः उपलब्ध होत नाही. कारण, जे निरुद्ध (नष्ट) झाले आहेत आणि जे अद्याप उत्पन्न झाले नाहीत, अशा धर्मांना अनुक्रमे भूतकाळ आणि भविष्यकाळ या संज्ञेने संबोधले जाते; आणि जे उत्पाद-व्यय-स्थिती या तीन क्षणांमध्ये समाविष्ट आहेत, त्यांना वर्तमानकाळ या संज्ञेने संबोधले जाते. जाती आणि जरा-मरण हा 'अनागत अद्धा' (भविष्यकाळ) आहे; कारण वर्तमानकाळातील कारणामुळे भविष्यात त्यांची उत्पत्ती होते. मध्यभागी असलेले आठ अंग हे 'प्रत्युत्पन्न अद्धा' (वर्तमानकाळ) आहेत; कारण भूतकाळातील कारणामुळे या जन्मात उत्पन्न होणारा विपाक (फळ) हा त्यांचा स्वभाव आहे, आणि भविष्यकाळातील फळाचे या जन्मात कारण असणे हाही त्यांचा स्वभाव आहे; म्हणून मध्यभागी असलेले विज्ञान इत्यादी आठ अंगे वर्तमानकाळ आहेत. ၈. နနု သောကပရိဒေဝါဒယောပိ အင်္ဂဘာဝေန ဝတ္တဗ္ဗာတိ အာဟ ‘‘သောကာဒိဝစန’’န္တျာဒိ. သောကာဒိဝစနံ ဇာတိယာ နိဿန္ဒဿ အမုချဖလမတ္တဿ နိဒဿနံ, န ပန ဝိသုံ အင်္ဂဒဿနန္တျတ္ထော. ८. शंका: शोक, परिदेव इत्यादींना देखील (प्रतीत्यसमुत्पादाचे) अंग म्हणून सांगायला हवे होते की नाही? यावर उत्तर म्हणून 'शोकादी वचन' इत्यादी म्हटले आहे. शोक इत्यादी शब्दांचा उल्लेख हा जातीच्या (जन्माच्या) प्रवाहाचा (परिणामाचा) केवळ एक अमुख्य (गौण) परिणाम दर्शवण्यासाठी आहे, स्वतंत्र अंग दाखवण्यासाठी नाही, असा याचा अर्थ आहे. ၉. တဏှုပါဒါနဘဝါပိ [Pg.239] ဂဟိတာ ဟောန္တီတိ ကိလေသဘာဝသာမညတော အဝိဇ္ဇာဂ္ဂဟဏေန တဏှုပါဒါနာနိ, ကမ္မဘဝသာမညတော သင်္ခါရဂ္ဂဟဏေန ကမ္မဘဝေါ ဂဟိတော. တထာ တဏှုပါဒါနဘဝဂ္ဂဟဏေန စ အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရာ ဂဟိတာတိ သမ္ဗန္ဓော. ဧတ္ထာပိ ဝုတ္တနယေန တေသံ ဂဟဏေန တေသံ သင်္ဂဟော ဒဋ္ဌဗ္ဗော, ဝိညာဏနာမရူပသဠာယတနဖဿဝေဒနာနံ ဇာတိဇရာဘင်္ဂါဝ ဇာတိဇရာမရဏန္တိ စ ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘ဇာတိဇရာမရဏဂ္ဂဟဏေနာ’’တျာဒိ. ९. तृष्णा, उपादान आणि भव यांचेही ग्रहण होते; कारण क्लेशभावाच्या समानतेमुळे 'अविद्या' ग्रहणाने तृष्णा व उपादान यांचे ग्रहण होते, आणि कर्मभावाच्या समानतेमुळे 'संस्कार' ग्रहणाने कर्मभव गृहीत धरला जातो. त्याचप्रमाणे, तृष्णा, उपादान आणि भव यांच्या ग्रहणाने अविद्या व संस्कार यांचे ग्रहण होते, असा संबंध आहे. येथेही सांगितलेल्या पद्धतीने त्यांच्या ग्रहणाने इतरांचा संग्रह समजावा. विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श आणि वेदना यांची उत्पत्ती, जीर्णता आणि विनाश म्हणजेच 'जाती' आणि 'जरा-मरण' असे म्हटले आहे, म्हणून 'जाती-जरा-मरण ग्रहणाने' इत्यादी म्हटले आहे. ၁၀. အတီတေ ဟေတဝေါ ပဉ္စာတိ သရူပတော ဝုတ္တာနံ ဒွိန္နံ အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရာနံ, သင်္ဂဟဝသေန ဂဟိတာနံ တိဏ္ဏံ တဏှုပါဒါနဘဝါနဉ္စ ဝသေန ပစ္စုပ္ပန္နဖလဿ ပစ္စယာ အတီတဘဝေ နိဗ္ဗတ္တာ ဟေတဝေါ ပဉ္စ, ဣဒါနိ ဖလပဉ္စကန္တိ အတီတဟေတုပစ္စယာ ဣဓ ပစ္စုပ္ပန္နေ နိဗ္ဗတ္တံ ဝိညာဏာဒိဖလပဉ္စကံ. ဣဒါနိ ဟေတဝေါ ပဉ္စာတိ သရူပတော ဝုတ္တာနံ တဏှာဒီနံ တိဏ္ဏံ, သင်္ဂဟတော လဒ္ဓါနံ အဝိဇ္ဇာသင်္ခါရာနံ ဒွိန္နဉ္စ ဝသေန အာယတိံ ဖလဿ ပစ္စယာ ဣဒါနိ ဟေတဝေါ ပဉ္စ. အာယတိံ ဖလပဉ္စကန္တိ ဇာတိဇရာမရဏဂ္ဂဟဏေန ဝုတ္တံ ပစ္စုပ္ပန္နဟေတုပစ္စယာ အနာဂတေ နိဗ္ဗတ္တနကဝိညာဏာဒိဖလပဉ္စကန္တိ ဧဝံ ဝီသတိ အတီတာဒီသု တတ္ထ တတ္ထ အာကိရိယန္တီတိ အာကာရာ. १०. 'भूतकाळातील पाच हेतू' म्हणजे प्रत्यक्ष रूपाने सांगितलेले अविद्या व संस्कार हे दोन, आणि संग्रहाच्या नियमाने घेतलेले तृष्णा, उपादान व कर्मभव हे तीन; अशा प्रकारे वर्तमानकाळातील फळाचे प्रत्यय (कारणे) असणारे भूतकाळात उत्पन्न झालेले पाच हेतू होत. 'आता पाच फळे' म्हणजे भूतकाळातील हेतूंच्या प्रत्ययाने या वर्तमान जन्मात उत्पन्न झालेले विज्ञान इत्यादी पाच फळांचा समूह होय. 'आता पाच हेतू' म्हणजे प्रत्यक्ष रूपाने सांगितलेले तृष्णा इत्यादी तीन, आणि संग्रहाने प्राप्त झालेले अविद्या व संस्कार हे दोन; अशा प्रकारे भविष्यातील फळाचे प्रत्यय असणारे या वर्तमान जन्मातील पाच हेतू होत. 'भविष्यातील पाच फळे' म्हणजे जाती आणि जरा-मरण यांच्या ग्रहणाने सांगितलेले, वर्तमानकाळातील हेतूंच्या प्रत्ययाने भविष्यात उत्पन्न होणारे विज्ञान इत्यादी पाच फळांचा समूह होय. अशा प्रकारे, भूतकाळ इत्यादींमध्ये त्या त्या काळी स्पष्ट केलेले हे वीस प्रकार 'आकार' (प्रकार) म्हणून ओळखले जातात. အတီတဟေတူနံ, ဣဒါနိ ဖလပဉ္စကဿ စ အန္တရာ ဧကော သန္ဓိ, ဣဒါနိ ဖလပဉ္စကဿ, ဣဒါနိ ဟေတူနဉ္စ အန္တရာ ဧကော, ဣဒါနိ ဟေတူနံ, အာယတိံ ဖလဿ စ အန္တရာ ဧကောတိ ဧဝံ တိသန္ဓိ. ဝုတ္တဉှေတံ – ‘‘သင်္ခါရဝိညာဏာနမန္တရာ ဧကော, ဝေဒနာတဏှာနမန္တရာ ဧကော, ဘဝဇာတီနမန္တရာ ဧကော သန္ဓီ’’တိ. ဧတ္ထ ဟိ ဟေတုတောဖလဿ အဝိစ္ဆေဒပ္ပဝတ္တိဘာဝတော ဟေတုဖလသမ္ဗန္ဓဘူတော ပဌမော သန္ဓိ, တထာ တတိယော, ဒုတိယော ပန ဖလတော ဟေတုနော အဝိစ္ဆေဒပ္ပဝတ္တိဘာဝတော ဖလဟေတုသမ္ဗန္ဓဘူတော. ဖလဘူတောပိ ဟိ [Pg.240] ဓမ္မော အညဿ ဟေတုသဘာဝဿ ဓမ္မဿ ပစ္စယောတိ. သင်္ခိပီယန္တိ ဧတ္ထ အဝိဇ္ဇာဒယော, ဝိညာဏာဒယော စာတိ သင်္ခေပေါ, အတီတဟေတု, ဧတရဟိ ဝိပါကော, ဧတရဟိ ဟေတု အာယတိံ ဝိပါကောတိ စတ္တာရော သင်္ခေပါတိ စတုသင်္ခေပါ. भूतकाळातील हेतू आणि वर्तमानकाळातील पाच फळे यांच्या दरम्यान एक संधी (सांधा) आहे; वर्तमानकाळातील पाच फळे आणि वर्तमानकाळातील पाच हेतू यांच्या दरम्यान एक संधी आहे; आणि वर्तमानकाळातील पाच हेतू व भविष्यातील फळ यांच्या दरम्यान एक संधी आहे; अशा प्रकारे तीन संधी आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे – 'संस्कार आणि विज्ञान यांच्या दरम्यान एक, वेदना आणि तृष्णा यांच्या दरम्यान एक, आणि भव व जाती यांच्या दरम्यान एक संधी आहे.' येथे, हेतूपासून फळाची अखंड प्रवृत्ती होत असल्यामुळे पहिली संधी ही 'हेतू-फल संबंध' रूपाने आहे, त्याचप्रमाणे तिसरी संधी देखील आहे. परंतु दुसरी संधी ही फळापासून हेतूची अखंड प्रवृत्ती होत असल्यामुळे 'फल-हेतू संबंध' रूपाने आहे. कारण, फळ असणारा धर्म देखील दुसऱ्या हेतूस्वभाव असणाऱ्या धर्माचा प्रत्यय (कारण) बनतो. येथे अविद्या इत्यादी आणि विज्ञान इत्यादी संक्षेपाने (एकत्रित) केले जातात म्हणून त्यांना 'संक्षेप' म्हणतात. भूतकाळातील हेतू, वर्तमानकाळातील विपाक, वर्तमानकाळातील हेतू आणि भविष्यातील विपाक असे चार संक्षेप आहेत; म्हणून यांना 'चतुःसंक्षेप' (चार संक्षेप) म्हणतात. ၁၁. ကမ္မဘဝသင်္ခါတော ဘဝေကဒေသောတိ ဧတ္ထ အာယတိံ ပဋိသန္ဓိယာ ပစ္စယစေတနာ ဘဝေါ နာမ, ပုရိမကမ္မဘဝသ္မိံ ဣဓ ပဋိသန္ဓိယာ ပစ္စယစေတနာ သင်္ခါရာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. အဝသေသာ စာတိ ဝိညာဏာဒိပဉ္စကဇာတိဇရာမရဏဝသေန သတ္တဝိဓာ ပစ္စုပ္ပန္နဖလဝသေန ဝုတ္တဓမ္မာ. ဥပပတ္တိဘဝသင်္ခါတော ဘဝေကဒေသောတိ ပန အနာဂတပရိယာပန္နာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဘဝ-သဒ္ဒေန ကမ္မဘဝဿပိ ဝုစ္စမာနတ္တာ ဘဝေကဒေသ-သဒ္ဒေါ ဝုတ္တော. ११. येथे, 'कर्मभव' नावाच्या भवाच्या एका भागात, पुढील जन्मातील प्रतिसंधीला कारणीभूत असणारी चेतना म्हणजे 'भव' होय; आणि पूर्वीच्या कर्मभवात, या (वर्तमान) जन्मातील प्रतिसंधीला कारणीभूत असणारी चेतना म्हणजे 'संस्कार' (संखार) होय, असे जाणावे. 'उर्वरित' म्हणजे विज्ञान इत्यादी पाच (स्कंध), जाती, जरा आणि मरण या रूपाने सात प्रकारचे वर्तमानकालीन फळ म्हणून सांगितलेले धर्म होत. परंतु, 'उपपत्तीभव' नावाच्या भवाच्या एका भागात, अनागत (भविष्यात) समाविष्ट असणारे (विज्ञान इत्यादी पाच, जाती, जरा, मरण) जाणावे. 'भव' या शब्दाने कर्मभवाचा देखील निर्देश केला जात असल्यामुळे 'भवेकदेस' (भवाचा एक भाग) हा शब्द वापरला आहे. ၁၂. ပုဗ္ဗန္တဿ အဝိဇ္ဇာ မူလံ. အပရန္တဿ တဏှာ မူလန္တိ အာဟ အဝိဇ္ဇာတဏှာဝသေန ဒွေ မူလာနီ’’တိ. १२. पूर्वान्ताचे (अतीताचे) मूळ अविद्या आहे आणि अपरान्ताचे (अनागताचे) मूळ तण्हा (तृष्णा) आहे; म्हणून अविद्या आणि तण्हा यांच्या रूपाने 'दोन मुळे' आहेत, असे (भगवंतांनी) म्हटले आहे. ၁၃. တေသမေဝ အဝိဇ္ဇာတဏှာသင်္ခါတာနံ ဝဋ္ဋမူလာနံ နိရောဓေန အနုပ္ပာဒဓမ္မတာပတ္တိယာ သစ္စပ္ပဋိဝေဓတော သိဒ္ဓါယ အပ္ပဝတ္တိယာ ဝဋ္ဋံ နိရုဇ္ဈတိ. အဘိဏှသော အဘိက္ခဏံ ဇရာမရဏသင်္ခါတာယ မုစ္ဆာယ ပီဠိတာနံ သတ္တာနံ သောကာဒိသမပ္ပိတာနံ ကာမာသဝါဒိအာသဝါနံ သမုပ္ပာဒတော ပုန အဝိဇ္ဇာ စ ပဝတ္တတိ. ‘‘အာသဝသမုဒယာ အဝိဇ္ဇာသမုဒယော’’တိ (မ. နိ. ၁.၁၀၃) ဟိ ဝုတ္တံ. ဧတေန အဝိဇ္ဇာယပိ ပစ္စယော ဒဿိတော ဟောတိ, ဣတရထာ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒစက္ကံ အဗဒ္ဓံ သိယာတိ. ဣစ္စေဝံ ဝုတ္တနယေန အာဗဒ္ဓံ အဝိစ္ဆိန္နံ အနာဒိကံ အာဒိရဟိတံ တိဘူမကပရိယာပန္နတ္တာ တေဘူမကံ ကိလေသကမ္မဝိပါကဝသေန တိဝဋ္ဋဘူတံ ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒေါတိ ပဋ္ဌပေသိ ပညပေသိ မဟာမုနိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. १३. अविद्या आणि तण्हा म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या त्या संसार-मुळांच्याच (वट्ट-मुळांच्याच) निरोधाने, पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाला प्राप्त झाल्यामुळे, चार आर्यसत्यांच्या साक्षात्काराने सिद्ध झालेल्या अनुत्पत्तीमुळे संसारचक्र (वट्ट) निरुद्ध होते. जरा आणि मरण नावाच्या मोहाने निरंतर पीडित झालेल्या आणि शोक इत्यादींनी ग्रासलेल्या प्राण्यांच्या संतानामध्ये कामासव इत्यादी आसवांच्या उत्पत्तीमुळे पुन्हा अविद्या प्रवृत्त होते. कारण, 'आसवांच्या समुदयाने अविद्येचा समुदय होतो' असे म्हटले आहे. याने अविद्येचे देखील कारण (प्रत्यय) दर्शविले आहे; अन्यथा पटिच्चसमुप्पाद-चक्र असंबद्ध (अखंडित न राहणारे) होईल. अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने, अखंडित जोडलेले, निरंतर, अनादी, आरंभरहित, तीन भूमींमध्ये समाविष्ट असल्यामुळे त्रिभूमिक आणि क्लेश, कर्म व विपाक यांच्या रूपाने त्रिवट्ट स्वरूप असणाऱ्या या धर्माला 'पटिच्चसमुप्पाद' असे महामुनी सम्यक्संबुद्धांनी प्रस्थापित व प्रज्ञप्त केले आहे. ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. पटिच्चसमुप्पाद-नयाचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ပဋ္ဌာနနယဝဏ္ဏနာ पट्ठान-नयाचे स्पष्टीकरण ၁၄. ဧဝံ [Pg.241] ပဋိစ္စသမုပ္ပာဒနယံ ဝိဘာဂတော ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ပဋ္ဌာနနယံ ဒဿေတုံ ‘‘ဟေတုပစ္စယော’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ဟိနောတိ ပတိဋ္ဌာတိ ဧတေနာတိ ဟေတု. အနေကတ္ထတ္တာ ဓာတုသဒ္ဒါနံ ဟိ-သဒ္ဒေါ ဣဓ ပတိဋ္ဌတ္ထောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဟိနောတိ ဝါ ဧတေန ကမ္မနိဒါနဘူတေန ဥဒ္ဓံ ဩဇံ အဘိဟရန္တေန မူလေန ဝိယ ပါဒပေါ တပ္ပစ္စယံ ဖလံ ဂစ္ဆတိ ပဝတ္တတိ ဝုဒ္ဓိံ ဝိရူဠှိံ အာပဇ္ဇတီတိ ဟေတု. ဟေတု စ သော ပစ္စယော စာတိ ဟေတုပစ္စယော. ဟေတု ဟုတွာ ပစ္စယော, ဟေတုဘာဝေန ပစ္စယောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. မူလဋ္ဌေန ဟေတု, ဥပကာရဋ္ဌေန ပစ္စယောတိ သင်္ခေပတော မူလဋ္ဌေန ဥပကာရကော ဓမ္မော ဟေတုပစ္စယော. သော ပန ပဝတ္တေ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာနံ, ပဋိသန္ဓိယံ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာနဉ္စ ရူပါနံ ဥဘယတ္ထ သမ္ပယုတ္တာနံ နာမဓမ္မာနဉ္စ ရုက္ခဿ မူလာနိ ဝိယ သုပ္ပတိဋ္ဌိတဘာဝသာဓနသင်္ခါတမူလဋ္ဌေန ဥပကာရကာ ဆ ဓမ္မာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. १४. अशा प्रकारे पटिच्चसमुप्पाद-नय विश्लेषणात्मक रीतीने दर्शवून, आता पट्ठान-नय दर्शवण्यासाठी 'हेतुपच्चयो' (हेतुप्रत्यय) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, ज्याच्याद्वारे फळ प्रतिष्ठित होते (टिकून राहते), तो 'हेतू' होय. धातूंच्या शब्दांचे अनेक अर्थ असल्यामुळे, येथे 'हि' हा शब्द 'प्रतिष्ठा' (टिकून राहणे) या अर्थाचा आहे, असे जाणावे. किंवा, कर्माचे मूळ कारण असणाऱ्या या हेतूमुळे, वरच्या दिशेने रस (ओज) वाहून नेणाऱ्या मुळांमुळे जसा वृक्ष वाढतो, तसेच त्या कारणावर आधारित असणारे फळ प्रवृत्त होते आणि वृद्धी व समृद्धीला प्राप्त होते, म्हणून तो 'हेतू' होय. तो हेतू देखील आहे आणि प्रत्यय (पच्चय) देखील आहे, म्हणून 'हेतुपच्चय' होय. हेतू होऊन उपकार करणारा प्रत्यय, म्हणजेच हेतूभावाने उपकार करणारा प्रत्यय, असे म्हटले आहे. मूळ (पाया) असण्याच्या अर्थाने 'हेतू' आणि उपकार करण्याच्या अर्थाने 'प्रत्यय' (पच्चय); संक्षेपाने सांगायचे तर, मूळ असण्याच्या अर्थाने उपकार करणारा धर्म म्हणजे 'हेतुपच्चय' होय. आणि तो (हेतुप्रत्यय) प्रवृत्ती काळात चित्तापासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपांना, प्रतिसंधीच्या वेळी कर्मापासून उत्पन्न होणाऱ्या रूपांना आणि दोन्ही काळात संप्रयुक्त असणाऱ्या नामधर्मांना, वृक्षाच्या मुळांप्रमाणे सुप्रतिष्ठित (स्थिर) भाव साध्य करण्याच्या मूळ अर्थाने उपकार करणारे सहा धर्म (लोभ, दोस, मोह, अलोभ, अदोस, अमोह) आहेत, असे जाणावे. အာလမ္ဗီယတိ ဒုဗ္ဗလေန ဝိယ ဒဏ္ဍာဒိကံ စိတ္တစေတသိကေဟိ ဂယှတီတိ အာရမ္မဏံ. စိတ္တစေတသိကာ ဟိ ယံ ယံ ဓမ္မံ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တန္တိ, တေ တေ ဓမ္မာ တေသံ တေသံ ဓမ္မာနံ အာရမ္မဏပစ္စယော နာမ. န ဟိ သော ဓမ္မော အတ္ထိ, ယော စိတ္တစေတသိကာနံ အာရမ္မဏပစ္စယဘာဝံ န ဂစ္ဆေယျ. အတ္တာဓီနပ္ပဝတ္တီနံ ပတိဘူတော ပစ္စယော အဓိပတိပစ္စယော. ज्याप्रमाणे एखादा दुर्बल माणूस काठी इत्यादींचा आधार घेतो, त्याचप्रमाणे चित्त आणि चेतसिकांद्वारे ज्याचे अवलंबन करून ग्रहण केले जाते, ते 'आरम्मण' (आलंबन/विषय) होय. कारण, चित्त आणि चेतसिक ज्या ज्या धर्माचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त होतात, ते ते धर्म त्या त्या चित्त-चेतसिक धर्मांचे 'आरम्मणpच्चय' (आलंबनप्रत्यय) नावाचे कारण असतात. असा कोणताही धर्म अस्तित्वात नाही, जो चित्त आणि चेतसिकांच्या आरम्मणपच्चय-भावाला प्राप्त होणार नाही. स्वतःच्या अधीन असणाऱ्या प्रवृत्तींचा स्वामी (अधिपती) होऊन उपकार करणारा प्रत्यय म्हणजे 'अधिपतिपच्चय' (अधिपतिप्रत्यय) होय. န ဝိဇ္ဇတိ ပစ္စယုပ္ပန္နေန သဟ အန္တရံ ဧတဿ ပစ္စယဿာတိ အနန္တရပစ္စယော. သဏ္ဌာနာဘာဝေန သုဋ္ဌု အနန္တရပစ္စယော သမနန္တရပစ္စယော. အတ္တနော အတ္တနော အနန္တရံ အနုရူပစိတ္တုပ္ပာဒဇနနသမတ္ထော ပုရိမပုရိမနိရုဒ္ဓေါ ဓမ္မော ‘‘အနန္တရပစ္စယော’’, ‘‘သမနန္တရပစ္စယော’’တိ စ ဝုစ္စတိ. ဗျဉ္ဇနမတ္တေနေဝ ဟိ နေသံ ဝိသေသော. အတ္ထတော ပန ဥဘယမ္ပိ သမနန္တရနိရုဒ္ဓဿေဝါဓိဝစနံ. န ဟိ တေသံ အတ္ထတော ဘေဒေါ ဥပလဗ္ဘတိ[Pg.242]. ယံ ပန ကေစိ ဝဒန္တိ ‘‘အတ္ထာနန္တရတာယ အနန္တရပစ္စယော, ကာလာနန္တရတာယ သမနန္တရပစ္စယော’’တိ, တံ ‘‘နိရောဓာ ဝုဋ္ဌဟန္တဿ နေဝသညာနာသညာယတနံ ဖလသမာပတ္တိယာ သမနန္တရပစ္စယေန ပစ္စယော’’တျာဒီဟိ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၄၁၇) ဝိရုဇ္ဈတိ. နေဝသညာနာသညာယတနံ ဟိ သတ္တာဟာဒိကာလံ နိရုဒ္ဓံ ဖလသမာပတ္တိယာ သမနန္တရပစ္စယော, တသ္မာ အဘိနိဝေသံ အကတွာ ဗျဉ္ဇနမတ္တတောဝေတ္ထ နာနာကရဏံ ပစ္စေတဗ္ဗံ, န အတ္ထတော. ပုဗ္ဗဓမ္မနိရောဓဿ ဟိ ပစ္ဆာဇာတဓမ္မုပ္ပာဒနဿ စ အန္တရာဘာဝေန ဥပ္ပာဒနသမတ္ထတာယ နိရောဓော အနန္တရပစ္စယတာ, ‘‘ဣဒမိတော ဥဒ္ဓံ, ဣဒံ ဟေဋ္ဌာ, ဣဒံ သမန္တတော’’တိ အတ္တနာ ဧကတ္တံ ဥပနေတွာ ဝိယ သုဋ္ဌု အနန္တရဘာဝေန ဥပ္ပာဒေတုံ သမတ္ထံ ဟုတွာ နိရောဓော သမနန္တရပစ္စယတာတိ ဧဝံ ဗျဉ္ဇနမတ္တတောဝ ဘေဒေါ. နိရောဓပစ္စယဿပိ ဟိ နေဝသညာနာသညာယတနဿ အသညုပ္ပတ္တိယာ ပုရိမဿ စ စုတိစိတ္တဿ ကာလန္တရေပိ ဥပ္ပဇ္ဇန္တာနံ ဖလပဋိသန္ဓီနံ အန္တရာ သမာနဇာတိယေန အရူပဓမ္မေန ဗျဝဓာနာဘာဝတော ဘိန္နဇာတိကာနဉ္စ ရူပဓမ္မာနံ ဗျဝဓာနကရဏေ အသမတ္ထတာယ နိရန္တရုပ္ပာဒနေ ဧကတ္တံ ဥပနေတွာ ဝိယ ဥပ္ပာဒနေ စ သမတ္ထတာ အတ္ထီတိ တေသမ္ပိ အနန္တရသမနန္တရပစ္စယတာ လဗ္ဘတိ, တသ္မာ ဓမ္မတော အဝိသေသေပိ တထာ တထာ ဗုဇ္ဈနကာနံ ဝေနေယျာနံ ဝသေန ဥပသဂ္ဂတ္ထဝိသေသမတ္တတောဝ ဘေဒေါ ပစ္စေတဗ္ဗောတိ. या प्रत्ययाचा (कारणाचा) त्याच्या कार्यधर्माशी (पच्चयुप्पन्न धर्माशी) कोणताही मध्यंतरीचा काळ किंवा अंतर अस्तित्वात नसते, म्हणून तो 'अनन्तरपच्चय' (अनन्तरप्रत्यय) होय. आकार किंवा रूप नसल्यामुळे अत्यंत अंतररहित होऊन उपकार करणारा प्रत्यय म्हणजे 'समनन्तरपच्चय' (समनन्तरप्रत्यय) होय. आपापल्या लगेचच नंतर अनुरूप चित्तोत्पाद उत्पन्न करण्यास समर्थ असणारा आणि पूर्वी पूर्वी निरुद्ध झालेला धर्म म्हणजे 'अनन्तरपच्चय' आणि 'समनन्तरपच्चय' असे म्हटले जाते. कारण त्यांच्यातील भेद केवळ शब्दापुरताच (व्यंजनमात्र) आहे. परंतु अर्थाच्या दृष्टीने दोन्ही शब्द अत्यंत जवळ निरुद्ध झालेल्या धर्माचेच समानार्थी शब्द आहेत. त्यांच्यात अर्थाच्या दृष्टीने कोणताही भेद आढळत नाही. परंतु जे काही लोग म्हणतात की, 'विषयाच्या (अर्थाच्या) अंतररहिततेमुळे अनन्तरप्रत्यय होतो आणि काळाच्या अंतररहिततेमुळे समनन्तरप्रत्यय होतो', ते मत 'निरोध समापत्तीमधून उठणाऱ्या व्यक्तीचे नेवसंज्ञानासंज्ञायतन चित्त फलसमापत्तीसाठी समनन्तरप्रत्ययाने प्रत्यय (कारण) होते' इत्यादी पाठांशी विरुद्ध ठरते. कारण नेवसंज्ञानासंज्ञायतन चित्त सात दिवस इत्यादी काळ निरुद्ध राहून देखील फलसमापत्तीसाठी समनन्तरप्रत्यय होते. म्हणून चुकीचा अभिनिवेश (हट्ट) न धरता, या दोन्ही प्रत्ययांमध्ये केवळ शब्दाच्या (व्यंजनाच्या) फरकामुळेच भेद मानला पाहिजे, अर्थाच्या दृष्टीने नाही. कारण पूर्वीच्या धर्माच्या निरोधाचा आणि नंतर उत्पन्न होणाऱ्या धर्माच्या उत्पत्तीचा मध्यंतरी अभाव असल्यामुळे, उत्पन्न करण्याच्या सामर्थ्यामुळे निरोध हा 'अनन्तरप्रत्यय-भाव' होय. आणि 'हे याच्या वर आहे, हे खाली आहे, हे सभोवताली आहे' अशा प्रकारच्या विभागणीचा अभाव असल्यामुळे, स्वतःशी (पूर्वीच्या चित्ताशी) एकत्व प्राप्त करून दिल्याप्रमाणे अत्यंत अंतररहित भावाने उत्पन्न करण्यास समर्थ होऊन निरोध हा 'समनन्तरप्रत्यय-भाव' होय; अशा प्रकारे केवळ शब्दाच्या पातळीवरच भेद आहे. कारण निरोध समापत्तीचे कारण असणाऱ्या नेवसंज्ञानासंज्ञायतन चित्ताचे देखील आणि असंज्ञ भूमीत उत्पन्न होण्यापूर्वीच्या च्युतीचित्ताचे देखील, काळाचे अंतर असताना देखील उत्पन्न होणाऱ्या फल आणि प्रतिसंधीच्या मध्यंतरी समान जातीच्या अरूप (नाम) धर्माचे व्यवधान (अडथळा) नसल्यामुळे आणि भिन्न जातीच्या रूपधर्मांचे व्यवधान निर्माण करण्याचे सामर्थ्य नसल्यामुळे, निरंतर उत्पन्न करण्यामध्ये एकत्व प्राप्त करून दिल्याप्रमाणे उत्पन्न करण्याचे सामर्थ्य असते, म्हणून त्यांचे देखील अनन्तर आणि समनन्तरप्रत्यय-भाव प्राप्त होतात. म्हणून तत्वाच्या (धर्माच्या) दृष्टीने भेद नसला तरी, त्या त्या प्रकारे समजून घेणाऱ्या विनेय (शिष्य) जनांच्या क्षमतेनुसार 'सम्' या उपसर्गाच्या अर्थाच्या विशेष फरकामुळेच भेद मानला पाहिजे, असे जाणावे. အတ္တနော အနုပ္ပတ္တိယာ သဟုပ္ပန္နာနမ္ပိ အနုပ္ပတ္တိတော ပကာသဿ ပဒီပေါ ဝိယ သဟုပ္ပန္နာနံ သဟုပ္ပာဒဘာဝေန ပစ္စယော သဟဇာတပစ္စယော, အရူပိနော စတုက္ခန္ဓာ, စတ္တာရော မဟာဘူတာ, ပဋိသန္ဓိက္ခဏေ ဝတ္ထုဝိပါကာ စ ဓမ္မာ. स्वतःच्या उत्पत्तीच्या अभावामुळे सोबत उत्पन्न होणाऱ्या (सहजात) धर्मांची देखील उत्पत्ती होत नसल्यामुळे, प्रकाशासाठी दिवा ज्याप्रमाणे उपकारक असतो, त्याचप्रमाणे सोबत उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांना सोबत उत्पन्न होण्याच्या भावाने (सह-उत्पत्तीच्या रूपाने) उपकार करणारा प्रत्यय म्हणजे 'सहजातपच्चय' (सहजातप्रत्यय) होय. अरूप (नाम) असणारे चार स्कंध, चार महाभूत आणि प्रतिसंधीच्या क्षणी हृदयवस्तू व प्रतिसंधी विपाक असणारे धर्म हे याचे उदाहरण आहेत. အညမညံ ဥပတ္ထမ္ဘယမာနံ တိဒဏ္ဍံ ဝိယ အတ္တနော ဥပကာရကဓမ္မာနံ ဥပတ္ထမ္ဘကဘာဝေန ပစ္စယော အညမညပစ္စယော. အညမညတာဝသေနေဝ [Pg.243] စ ဥပကာရကတာ အညမညပစ္စယတာ, န သဟဇာတမတ္တေနာတိ အယမေတေသံ ဒွိန္နံ ဝိသေသော. တထာ ဟိ သဟဇာတပစ္စယဘာဝီယေဝ ကောစိ အညမညပစ္စယော န ဟောတိ စိတ္တဇရူပါနံ သဟဇာတပစ္စယဘာဝိနော နာမဿ ဥပါဒါရူပါနံ သဟဇာတပစ္စယဘာဝီနံ မဟာဘူတာနဉ္စ အညမညပစ္စယဘာဝဿ အနုဒ္ဓဋတ္တာ. ယဒိ ဟိ သဟဇာတဘာဝေနေဝ အတ္တနော ဥပကာရကာနံ ဥပကာရကတာ အညမညပစ္စယတာ သိယာ, တဒါ သဟဇာတအညမညပစ္စယေဟိ သမာနေဟိ ဘဝိတဗ္ဗန္တိ. एकमेकांना आधार देणाऱ्या तीन काठ्यांप्रमाणे, स्वतःला साहाय्य करणाऱ्या धर्मांना आधार देण्याच्या भावाने उपकार करणे म्हणजे 'अन्योन्यप्रत्यय' (अञ्ञमञ्ञपच्चयो) होय. आणि परस्परांच्या भावामुळेच (अन्योन्यभावानेच) उपकारक असणे म्हणजे 'अन्योन्यप्रत्ययता' होय, केवळ सहजात (एकत्र उत्पन्न) असण्याने नव्हे; हा या दोन्हीमधील (सहजात आणि अन्योन्य प्रत्ययांमधील) फरक आहे. तसेच, सहजातप्रत्यय असणारा प्रत्येकच धर्म अन्योन्यप्रत्यय होत नाही; कारण चित्तज रूपांसाठी सहजातप्रत्यय असणाऱ्या नामाचा (चित्त-चेतसिकांचा) आणि उपादाय रूपांसाठी सहजातप्रत्यय असणाऱ्या महाभूतांचा अन्योन्यप्रत्ययभाव (पठ्ठान पाठात) उद्धृत केलेला नाही. जर केवळ सहजातभावानेच स्वतःच्या उपकारकांना उपकारक असणे ही अन्योन्यप्रत्ययता असती, तर सहजातप्रत्यय आणि अन्योन्यप्रत्यय हे दोन्ही समानच झाले असते. စိတ္တကမ္မဿ ပဋော ဝိယ သဟဇာတနာမရူပါနံ နိဿယဘူတာ စတုက္ခန္ဓာ, တရုပဗ္ဗတာဒီနံ ပထဝီ ဝိယ အာဓာရဏတောယေဝ သဟဇာတရူပသတ္တဝိညာဏဓာတူနံ ယထာက္ကမံ နိဿယာ ဘူတရူပံ, ဝတ္ထု စာတိ ဣမေ နိဿယပစ္စယော နာမ နိဿီယတိ နိဿိတကေဟီတိ ကတွာ, ဗလဝဘာဝေန နိဿယော ပစ္စယော ဥပနိဿယပစ္စယော ဥပ-သဒ္ဒဿ အတိသယဇောတကတ္တာ, တဿ ပန ဘေဒံ ဝက္ခတိ. चित्रकलेसाठी कापड (कॅनव्हास) ज्याप्रमाणे आश्रय असते, त्याप्रमाणे सहजात नाम-रूपांचे आश्रय असणारे चार (नाम) स्कंध; आणि वृक्ष, पर्वत इत्यादींसाठी पृथ्वी ज्याप्रमाणे आधार असते, त्याप्रमाणे केवळ धारण करण्याच्या भावानेच सहजात रूप आणि सात विज्ञानधातूंचे अनुक्रमे आश्रय असणारे भूत रूप (महाभूत) आणि वस्तू (षडायतन वस्तू) - हे सर्व 'निश्रयप्रत्यय' (निस्सयपच्चयो) होत. 'आश्रितांद्वारे ज्याचा आश्रय घेतला जातो' असा विग्रह करून याला निश्रयप्रत्यय म्हणतात. बलवान भावाने (सामर्थ्यशाली रूपाने) आश्रय असणारा प्रत्यय म्हणजे 'उपनिष्रयप्रत्यय' (उपनिस्सयपच्चयो) होय, कारण 'उप' हा उपसर्ग अतिशय (अधिकता) दर्शवणारा आहे. त्याचे भेद पुढे सांगितले जातील. ဆ ဝတ္ထူနိ, ဆ အာရမ္မဏာနိ စာတိ ဣမေ ပစ္စယုပ္ပန္နတော ပဌမံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ ပဝတ္တမာနဘာဝေန ဥပကာရကော ပုရေဇာတပစ္စယော. ပစ္ဆာဇာတပစ္စယေ အသတိ သန္တာနဋ္ဌိတိဟေတုဘာဝံ အာဂစ္ဆန္တဿ ကာယဿ ဥပတ္ထမ္ဘနဘာဝေန ဥပကာရကာ ပစ္ဆာဇာတာ စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ ပစ္ဆာဇာတပစ္စယော. သော ဂိဇ္ဈပေါတကသရီရာနံ အာဟာရာသာ စေတနာ ဝိယ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. सहा वस्तू (इंद्रियांचे आधार) आणि सहा आलंबने (विषय) हे प्रत्ययोत्पन्न (कार्यात्मक) धर्मांच्या आधी उत्पन्न होऊन, विद्यमान राहून उपकार करत असल्यामुळे 'पुरेजातप्रत्यय' (पुरेजातापच्चयो) होत. पश्चातजातप्रत्यय नसता संतती टिकून राहण्याच्या कारणाप्रत न पोहोचणाऱ्या शरीराला आधार देण्याच्या भावाने उपकार करणारे, नंतर उत्पन्न होणारे चित्त आणि चेतसिक धर्म म्हणजे 'पश्चातजातप्रत्यय' (पच्छाजातापच्चयो) होय. तो (पश्चातजातप्रत्यय) गिधाडाच्या पिल्लांच्या शरीरासाठी आहाराची इच्छा करणाऱ्या चेतनेप्रमाणे समजावा. ပုရိမပုရိမပရိစိတဂန္ထော ဝိယ ဥတ္တရဥတ္တရဂန္ထဿ ကုသလာဒိဘာဝေန အတ္တသဒိသဿ ပဂုဏဗလဝဘာဝဝိသိဋ္ဌအတ္တသမာနဇာတိယတာဂါဟဏံ အာသေဝနံ, တေန ပစ္စယာ သဇာတိယဓမ္မာနံ သဇာတိယဓမ္မာဝ အာသေဝနပစ္စယော. ဘိန္နဇာတိကာ ဟိ ဘိန္နဇာတိကေဟိ အာသေဝနပဂုဏေန ပဂုဏဗလဝဘာဝဝိသိဋ္ဌံ ကုသလာဒိဘာဝသင်္ခါတံ အတ္တနော ဂတိံ [Pg.244] ဂါဟာပေတုံ န သက္ကောန္တိ, န စ သယံ တတော ဂဏှန္တိ, တေ ပန အနန္တရာတီတာနိ လောကိယကုသလာကုသလာနိ စေဝ အနာဝဇ္ဇနကိရိယဇဝနာနိ စာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. စိတ္တပ္ပယောဂသင်္ခါတကိရိယာဘာဝေန သဟဇာတာနံ နာနာက္ခဏိကာနံ ဝိပါကာနံ, ကဋတ္တာရူပါနဉ္စ ဥပကာရိကာ စေတနာ ကမ္မပစ္စယော. पूर्वी अभ्यासलेला ग्रंथ ज्याप्रमाणे नंतरच्या ग्रंथाच्या अभ्यासाला सराव and बळकटपणाच्या विशेषाने साहाय्य करतो, त्याप्रमाणे कुशल इत्यादी भावाने स्वतःसारख्याच धर्माला सराव आणि बळकटपणाच्या विशेषाने स्वतःसारख्याच जातीचे ग्रहण करवून घेणे म्हणजे 'आसेवन' होय. त्या प्रत्ययाने समान जातीच्या धर्मांसाठी समान जातीचेच धर्म उपकारक असणे म्हणजे 'आसेवनप्रत्यय' (आसेवनपच्चयो) होय. कारण भिन्न जातीचे धर्म हे भिन्न जातीच्या धर्मांना आसेवनाच्या सरावाने, सराव व बळकटपणाच्या विशेषाने युक्त अशा कुशल इत्यादी भावरूप स्वतःच्या गतीचे ग्रहण करवून देण्यास असमर्थ असतात, आणि ते स्वतःही त्यांच्याकडून ती गती ग्रहण करू शकत नाहीत. ते (आसेवनप्रत्यय धर्म) म्हणजे लागोपाठ अतीत झालेले लौकिक कुशल-अकुशल आणि आवर्जनाशिवाय इतर क्रियाजवन धर्म आहेत असे समजावे. चित्तप्रयोगात्मक क्रियाभावाने सहजात धर्मांना (चित्त, चेतसिक, चित्तज रूप), तसेच वेगवेगळ्या क्षणी उत्पन्न होणाऱ्या विपाकांना आणि कटत्ता-रूपांना उपकारक असणारी चेतना म्हणजे 'कर्मप्रत्यय' (कम्मपच्चयो) होय. အတ္တနော နိရုဿာဟသန္တဘာဝေန သဟဇာတနာမရူပါနံ နိရုဿာဟသန္တဘာဝါယ ဥပကာရကာ ဝိပါကစိတ္တစေတသိကာ ဝိပါကပစ္စယော. တေ ဟိ ပယောဂေန အသာဓေတဗ္ဗတာယ ကမ္မဿ ကဋတ္တာ နိပ္ဖဇ္ဇမာနမတ္တတော နိရုဿာဟသန္တဘာဝါ ဟောန္တိ, န ကိလေသဝူပသမသန္တဘာဝါ. တထာ သန္တဘာဝတောယေဝ ဟိ ဘဝင်္ဂါဒယော ဒုဗ္ဗိညေယျာ. အဘိနိပါတသမ္ပဋိစ္ဆနသန္တီရဏမတ္တာ ပန ဝိပါကာ ဒုဗ္ဗိညေယျာဝ. ဇဝနပ္ပဝတ္တိယာဝ နေသံ ရူပါဒိဂ္ဂဟိတတာ ဝိညာယတိ. स्वतःच्या निरुत्साह-शांतभावाने (निष्क्रिय व शांत स्वभावाने) सहजात नाम-रूपांना निरुत्साह-शांतभावाप्रत नेण्यासाठी उपकारक असणारे विपाक चित्त आणि चेतसिक म्हणजे 'विपाकप्रत्यय' (विपाकपच्चयो) होय. कारण ते (विपाक धर्म) प्रयोगाने (प्रयत्नाने) साध्य करायचे नसल्यामुळे आणि कर्माच्या कटत्ताभावामुळे केवळ निष्पन्न होणारे फल असल्यामुळे निरुत्साह-शांतभावाचे असतात, क्लेश शांत झाल्यामुळे होणाऱ्या शांतभावाचे नव्हेत. अशा शांतभावामुळेच भवांग इत्यादी चित्त जाणण्यास कठीण असतात. केवळ पंचविज्ञान (अभिणिपात), संप्रतीच्छन आणि संतीरण रूप असणारे विपाक तर जाणण्यास कठीणच असतात. जवनाच्या प्रवृत्तीमुळेच त्यांनी रूप इत्यादी विषयांचे ग्रहण केले आहे हे समजते. ရူပါရူပါနံ ဥပတ္ထမ္ဘကတ္တေန ဥပကာရကာ စတ္တာရော အာဟာရာ အာဟာရပစ္စယော. သတိပိ ဟိ ဇနကဘာဝေ ဥပတ္ထမ္ဘကတ္တမေဝ အာဟာရဿ ပဓာနကိစ္စံ. ဇနယန္တောပိ အာဟာရော အဝိစ္ဆေဒဝသေန ဥပတ္ထမ္ဘေန္တော ဝ ဇနေတီတိ ဥပတ္ထမ္ဘကဘာဝေါ ဝ အာဟာရဘာဝေါ. တေသု တေသု ကိစ္စေသု ပစ္စယုပ္ပန္နဓမ္မေဟိ အတ္တာနံ အနုဝတ္တာပနသင်္ခါတာဓိပတိယဋ္ဌေန ပစ္စယော ဣန္ဒြိယပစ္စယော. रूप आणि अरूप धर्मांना आधार देण्याच्या भावाने उपकारक असणारे चार आहार म्हणजे 'आहारप्रत्यय' (आहारपच्चयो) होय. जरी जनकभाव (उत्पन्न करण्याचा भाव) असला तरी आधार देणे हेच आहाराचे मुख्य कार्य आहे. उत्पन्न करत असतानाही आहार निरंतरपणे आधार देतच उत्पन्न करतो, म्हणून आधार देण्याचा भाव हाच आहाराचा स्वभाव (आहारभाव) आहे. त्या त्या कार्यांमध्ये प्रत्ययोत्पन्न धर्मांना स्वतःच्या पाठीमागे चालवण्याच्या (अनुवर्तन करवण्याच्या) आधिपत्य अर्थाने उपकारक असणारा प्रत्यय म्हणजे 'इंद्रियप्रत्यय' (इन्द्रियपच्चयो) होय. အာရမ္မဏူပနိဇ္ဈာနလက္ခဏူပနိဇ္ဈာနဝသေန ဥပဂန္တွာ အာရမ္မဏနိဇ္ဈာနကာ ဝိတက္ကာဒယော ဈာနပစ္စယော. သုဂတိတော ပုညတော, ဒုဂ္ဂဟိတော ပါပတော ဝါ နိယျာနဋ္ဌေန ဥပကာရကာ သမ္မာဒိဋ္ဌာဒယော မဂ္ဂပစ္စယော. आलंबनोपनिध्यान (विषयाचे ध्यान) आणि लक्षणोपनिध्यान (लक्षणांचे ध्यान) यांच्याद्वारे जवळ जाऊन आलंबनाचे ध्यान करणारे वितर्क इत्यादी चेतसिक म्हणजे 'ध्यानप्रत्यय' (झानपच्चयो) होय. सुगतीपासून किंवा पुण्यापासून, अथवा दुर्गतीपासून किंवा पापापासून बाहेर काढण्याच्या (मुक्त करण्याच्या) अर्थाने उपकारक असणारे सम्यक् दृष्टी इत्यादी धर्म म्हणजे 'मार्गप्रत्यय' (मग्गपच्चयो) होय. ပရမတ္ထတော ဘိန္နာပိ ဧကီဘာဝဂတာ ဝိယ ဧကုပ္ပာဒါဒိဘာဝသင်္ခါတသမ္ပယောဂလက္ခဏေန ဥပကာရကာ နာမဓမ္မာ ဝ သမ္ပယုတ္တပစ္စယော. အညမညသမ္ဗန္ဓတာယ ယုတ္တာပိ သမာနာ ဝိပ္ပယုတ္တဘာဝေန [Pg.245] ဝိသံသဋ္ဌတာယ နာနတ္တုပဂမနေန ဥပကာရကာ ဝတ္ထုစိတ္တစေတသိကာ ဝိပ္ပယုတ္တပစ္စယော. परमार्थतः भिन्न असूनही जणू काही एकरूप झालेले असल्याप्रमाणे, एकोत्पाद (एकत्र उत्पन्न होणे) इत्यादी भावरूप संप्रयोग लक्षणाने उपकार करणारे नामधर्मच 'संप्रयुक्तप्रत्यय' (संपयुत्तपच्चयो) होत. परस्परांच्या संबंधाने युक्त असूनही, विप्रयुक्तभावामुळे (असंयुक्त असल्यामुळे), अमिश्रित असल्यामुळे आणि वेगवेगळ्या स्वभावाप्रत पोहोचल्यामुळे उपकारक असणारे वस्तू (षडायतन रूप) आणि चित्त-चेतसिक हे 'विप्रयुक्तप्रत्यय' (विप्पयुत्तपच्चयो) होत. ပစ္စုပ္ပန္နသဘာဝသင်္ခါတေန အတ္ထိဘာဝေန တာဒိသဿေဝ ဓမ္မဿ ဥပတ္ထမ္ဘကတ္တေန ဥပကာရကာ ‘‘သဟဇာတံ ပုရေဇာတ’’န္တျာဒိနာ ဝက္ခမာနဓမ္မာ အတ္ထိပစ္စယော. သတိပိ ဟိ ဇနကတ္တေ ဌိတိယံယေဝ သာတိသယော အတ္ထိပစ္စယာနံ ဗျာပါရောတိ ဥပတ္ထမ္ဘကတာဝ တေသံ ဂဟိတာ. ဧကသ္မိံ ဖဿာဒိသမုဒါယေ ပဝတ္တမာနေ ဒုတိယဿ အဘာဝတော အတ္တနော ဌိတိယာ ဩကာသံ အလဘန္တာနံ အနန္တရမုပ္ပဇ္ဇမာနကစိတ္တစေတသိကာနံ ဩကာသဒါနဝသေန ဥပကာရကာ အနန္တရနိရုဒ္ဓါ စိတ္တစေတသိကာ နတ္ထိပစ္စယော. वर्तमान स्वभाव रूप अशा अस्तित्वभावाने (अत्थिभावेन) तशाच प्रकारच्या धर्माला आधार देण्याच्या भावाने उपकारक असणारे, 'सहजात, पुरेजात' इत्यादी रूपाने पुढे सांगितले जाणारे धर्म म्हणजे 'अस्तिप्रत्यय' (अत्थिपच्चयो) होय. जरी जनकत्व (उत्पन्न करण्याचे सामर्थ्य) असले तरी स्थितीच्या क्षणीच (विद्यमानतेच्या क्षणीच) अस्तिप्रत्ययांचा व्यापार प्रबळ असतो, म्हणून त्यांचा केवळ आधार देण्याचा भावच येथे ग्रहण केला आहे. एका स्पर्श इत्यादी धर्मांच्या समूहाची प्रवृत्ती होत असताना दुसऱ्या समूहाचा अभाव असल्यामुळे, स्वतःच्या स्थितीमुळे उत्पत्तीसाठी जागा न मिळणाऱ्या, लागोपाठ नंतर उत्पन्न होणाऱ्या चित्त आणि चेतसिकांना जागा करून देण्याच्या (अवकाश देण्याच्या) भावाने उपकारक असणारे, लागोपाठ आधी निरुद्ध झालेले (नष्ट झालेले) चित्त आणि चेतसिक म्हणजे 'नास्तिप्रत्यय' (नत्थिपच्चयो) होय. အတ္တနော သဘာဝါဝိဂမနေန အပ္ပဝတ္တမာနာနံ ဝိဂတဘာဝေန ဥပကာရကာယေဝ ဓမ္မာ ဝိဂတပစ္စယော. နိရောဓာနုပဂမနဝသေန ဥပကာရကာ အတ္ထိပစ္စယာ ဝ အဝိဂတပစ္စယော. သသဘာဝတာမတ္တေန ဥပကာရကတာ အတ္ထိပစ္စယတာ, နိရောဓာနုပဂမနဝသေန ဥပကာရကတာ အဝိဂတပစ္စယတာတိ ပစ္စယတာဝိသေသော နေသံ ဓမ္မာဝိသေသေပိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဓမ္မာနဉှိ သမတ္ထတာဝိသေသံ သဗ္ဗာကာရေန ဉတွာ ဘဂဝတာ စတုဝီသတိပစ္စယာ ဒေသိတာတိ ဘဂဝတိ သဒ္ဓါယ ‘‘ဧဝံ ဝိသေသာ ဧတေ ဓမ္မာ’’တိ သုတမယဉာဏံ ဥပ္ပာဒေတွာ စိန္တာဘာဝနာမယဉာဏေဟိ တဒဘိသမယာယ ယောဂေါ ကရဏီယော. အဝိသေသေပိ ဟိ ဓမ္မသာမဂ္ဂိယဿ တထာ တထာ ဝိနေတဗ္ဗပုဂ္ဂလာနံ ဝသေန ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တောပိ ပစ္စယော ပုန ပကာရန္တေန ဝုစ္စတိ အဟေတုကဒုကံ ဝတွာပိ ဟေတုဝိပ္ပယုတ္တဒုကံ ဝိယာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. स्वतःचा स्वभाव न गेल्यामुळे (नष्ट न झाल्यामुळे) प्रवृत्त न होऊ शकणाऱ्या नंतरच्या धर्मांना स्वतःच्या विगतभावाने (विगत होण्याने/दूर होण्याने) उपकारक असणारे धर्म म्हणजे 'विगतप्रत्यय' (विगतपच्चयो) होय. निरोधाप्रत न पोहोचण्याच्या (नष्ट न होण्याच्या) भावाने उपकारक असणारे अस्तिप्रत्ययच 'अविगतप्रत्यय' (अविगतपच्चयो) होत. केवळ स्वतःचा स्वभाव विद्यमान असण्याने उपकारक असणे म्हणजे 'अस्तिप्रत्ययता' होय आणि निरोधाप्रत न पोहोचण्याच्या भावाने उपकारक असणे म्हणजे 'अविगतप्रत्ययता' होय; अशा प्रकारे, या दोन्ही प्रत्ययांमध्ये धर्मतः कोणताही भेद नसला तरी, प्रत्यय-शक्तीच्या दृष्टीने असणारा हा भेद समजून घ्यावा. कारण धर्मांच्या सामर्थ्याचा हा विशेष सर्व प्रकारे जाणून भगवंतांनी चोवीस प्रत्ययांचा उपदेश केला आहे. म्हणून भगवंतांवर श्रद्धा ठेवून, 'हे धर्म अशा प्रकारे विशिष्ट आहेत' असे श्रुतमय ज्ञान उत्पन्न करून, चिंतामय (चिंतनशील) आणि भावनामय ज्ञानाद्वारे त्या प्रत्यय-शक्तीचा अभिसमय (साक्षात्कार) करण्यासाठी प्रयत्न केला पाहिजे. कारण धर्मसामग्रीमध्ये (धर्मांच्या समूहात) कोणताही भेद नसला तरी, त्या त्या विनेय पुद्गलांच्या (उपदेश देण्यास योग्य व्यक्तींच्या) योग्यतेनुसार, आधी सांगितलेलाच प्रत्यय पुन्हा दुसऱ्या प्रकारे सांगितला जातो; ज्याप्रमाणे 'अहेतुक दुक' सांगितल्यानंतरही पुन्हा 'हेतुविप्रयुक्त दुक' सांगितले जाते, त्याप्रमाणे हे समजावे. ၁၅. နာမံ စတုက္ခန္ဓသင်္ခါတံ နာမံ တာဒိသဿေဝ နာမဿ ဆဓာ ဆဟာကာရေဟိ ပစ္စယော ဟောတိ, တဒေဝ နာမရူပီနံ သမုဒိတာနံ [Pg.246] ပဉ္စဓာ ပစ္စယော ဟောတိ, ရူပဿ ပုန ဘူတုပါဒါယဘေဒဿ ဧကဓာ ပစ္စယော ဟောတိ, ရူပဉ္စ နာမဿ ဧကဓာ ပစ္စယော, ပညတ္တိနာမရူပါနိ နာမဿ ဒွိဓာ ဒွိပ္ပကာရာ ပစ္စယာ ဟောန္တိ, ဒွယံ ပန နာမရူပဒွယံ သမုဒိတံ ဒွယဿ တာဒိသဿေဝ နာမရူပဒွယဿ နဝဓာ ပစ္စယော စေတိ ဧဝံ ပစ္စယာ ဆဗ္ဗိဓာ ဌိတာ. १५. चार स्कंधात्मक नाम (नामस्कंध) तशाच प्रकारच्या नामस्कंधाला सहा प्रकारांनी प्रत्यय (कारण) होतो. तेच नाम एकत्रित झालेल्या नाम-रूपांना पाच प्रकारांनी प्रत्यय होते. पुन्हा, भूत आणि उपादाय रूपांच्या भेदाने युक्त असलेल्या रूपाला ते एका प्रकारे प्रत्यय होते. आणि रूप नामाला एका प्रकारे प्रत्यय होते. प्रज्ञप्ति आणि नाम-रूप नामाला दोन प्रकारे प्रत्यय होतात. आणि एकत्रित झालेले नाम-रूप हे द्वय तशाच प्रकारच्या नाम-रूप द्वयाला नऊ प्रकारांनी प्रत्यय होते. अशा प्रकारे प्रत्यय सहा प्रकारांनी स्थित आहेत. ၁၆. ဝိပါကဗျာကတံ ကမ္မဝသေန ဝိပါကဘာဝပ္ပတ္တံ ကမ္မဝေဂက္ခိတ္တပတိတံ ဝိယ ဟုတွာ ပဝတ္တမာနံ အတ္တနော သဘာဝံ ဂါဟေတွာ ပရိဘာဝေတွာ နေဝ အညံ ပဝတ္တေတိ, န စ ပုရိမဝိပါကာနုဘာဝံ ဂဟေတွာ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ‘‘န မဂ္ဂပစ္စယာ အာသေဝနေ ဧက’’န္တိ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၂၂၁) ဝစနတော စ အဟေတုကကိရိယေသု ဟသိတုပ္ပာဒဿေဝ အာသေဝနတာဥဒ္ဓရဏေန အာဝဇ္ဇနဒွယံ အာသေဝနပစ္စယော န ဟောတိ, တသ္မာ ဇဝနာနေဝ အာသေဝနပစ္စယဘာဝံ ဂစ္ဆန္တီတိ အာဟ ‘‘ပုရိမာနိ ဇဝနာနီ’’တျာဒိ. အဝိသေသဝစနေပေတ္ထ လောကိယကုသလာကုသလာဗျာကတဇဝနာနေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗာနိ လောကုတ္တရဇဝနာနံ အာသေဝနဘာဝဿ အနုဒ္ဓဋတ္တာ. १६. विपाक अव्याकृत हे कर्माच्या प्रभावाने विपाकभावाला प्राप्त झालेले असते. कर्माच्या वेगाने फेकल्या गेलेल्या वस्तूच्या पडण्याप्रमाणे प्रवृत्त होत असताना, ते स्वतःच्या स्वभावाला ग्रहण करून आणि प्रभावित करून दुसऱ्या चित्ताला प्रवृत्त करत नाही, आणि पूर्वीच्या विपाकाच्या प्रभावाला ग्रहण करून उत्पन्नही होत नाही. आणि "मार्गप्रत्ययामुळे आसेवनात एक" या वचनावरून, तसेच अहेतुक क्रियाचित्तांमध्ये केवळ हसितुत्पाद चित्तालाच आसेवनभावाने उद्धृत केल्यामुळे, आवर्जनद्वय (पंचद्वारावर्जन आणि मनोद्वारावर्जन) हे आसेवनप्रत्यय होत नाही. म्हणून केवळ जवनचित्तच आसेवनप्रत्ययभावाला प्राप्त होतात, असे "पूर्वीचे जवन" इत्यादीद्वारे म्हटले आहे. येथे सामान्य विधानामध्ये केवळ लौकिक कुशल, अकुशल आणि अव्याकृत जवनेच ग्रहण करावीत, कारण लोकोत्तर जवनांच्या आसेवनभावाचा उल्लेख केलेला नाही. ဧဝဉ္စ ကတွာ ဝုတ္တံ ပဋ္ဌာနဋ္ဌကထာယံ (ပဋ္ဌာ. အဋ္ဌ. ၁.၁၂) ‘‘လောကုတ္တရော ပန အာသေဝနပစ္စယော နာမ နတ္ထီ’’တိ. တတ္ထ ဟိ ကုသလံ ဘိန္နဇာတိကဿ ပုရေစရတ္တာ န တေန အာသေဝနဂုဏံ ဂဏှာပေတိ, ဖလစိတ္တာနိ စ ဇဝနဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနိပိ ဝိပါကာဗျာကတေ ဝုတ္တနယေန အာသေဝနံ န ဂဏှန္တိ, န စ အညံ ဂါဟာပေန္တိ. ယမ္ပိ ‘‘အာသေဝနဝိနိမုတ္တံ ဇဝနံ နတ္ထီ’’တိ အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရေန ဝုတ္တံ, တမ္ပိ ယေဘုယျဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဝိညာယတိ. ဣတရထာ အာစရိယဿ အသမပေက္ခိတာဘိဓာယကတ္တပ္ပသင်္ဂေါ သိယာ. မဂ္ဂေါ ပန ဂေါတြဘုတော အာသေဝနံ န ဂဏှာတီတိ နတ္ထိ ဘူမိအာဒိဝသေန နာနာဇာတိတာယ အနဓိပ္ပေတတ္တာ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ပဋ္ဌာနေ ‘‘ဂေါတြဘု [Pg.247] မဂ္ဂဿ အာသေဝနပစ္စယေန ပစ္စယော, ဝေါဒါနံ မဂ္ဂဿ အာသေဝနပစ္စယေန ပစ္စယော’’တိ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၄၂၆). ဧကုပ္ပာဒါဒိစတုဗ္ဗိဓသမ္ပယောဂလက္ခဏာဘာဝတော သဟုပ္ပန္နာနမ္ပိ ရူပဓမ္မာနံ သမ္ပယုတ္တပစ္စယတာ နတ္ထီတိ ဝုတ္တံ ‘‘စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ အညမည’’န္တိ. आणि असे मानूनच पट्ठान अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे की, "लोकोत्तर आसेवनप्रत्यय नावाचा प्रत्यय नाही." कारण त्या लोकोत्तर जवनांमध्ये, कुशल (मार्गचित्त) हे भिन्न जातीच्या (अव्याकृत असलेल्या फलचित्ताच्या) पूर्वी होणारे असल्यामुळे, ते त्या फलचित्ताला आसेवनगुण ग्रहण करू देत नाही. आणि फलचित्ते जवनरूपाने उत्पन्न होत असली तरी, विपाक अव्याकृताच्या संदर्भात सांगितलेल्या नियमानुसार आसेवन ग्रहण करत नाहीत आणि दुसऱ्याला ग्रहण करू देत नाहीत. आचार्य धम्मपाल थेरांनी जे म्हटले आहे की "आसेवनमुक्त जवन नाही", ते देखील बहुतांश प्रकरणांच्या अपेक्षेने (सामान्यतः) म्हटले आहे असे समजले पाहिजे. अन्यथा, आचार्यांवर विचार न करता बोलण्याचा प्रसंग येईल. "मार्ग गोत्रभूहून आसेवन ग्रहण करत नाही" असे नाही, कारण भूमी इत्यादींच्या भेदाने भिन्न जाती असणे येथे अनपेक्षित आहे. कारण पट्ठामध्ये असे म्हटले आहे की, "गोत्रभू मार्गाला आसेवनप्रत्ययाने प्रत्यय होतो, वोदान मार्गाला आसेवनप्रत्ययाने प्रत्यय होतो." एकोत्पाद इत्यादी चार प्रकारच्या संप्रयोग लक्षणांचा अभाव असल्यामुळे, सोबत उत्पन्न झालेल्या रूपधर्मांना देखील संप्रयुक्तप्रत्ययता नसते, म्हणून "चित्त आणि चैतसिक धर्म एकमेकांना (संप्रयुक्तप्रत्ययाने प्रत्यय होतात)" असे म्हटले आहे. ၁၇. ဟေတုဈာနင်္ဂမဂ္ဂင်္ဂါနိ သဟဇာတာနံ နာမ ရူပါနန္တိ တယောပေတေ ပဋိသန္ဓိယံ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာနံ, ပဝတ္တိယံ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာနဉ္စ ရူပါနံ, ဥဘယတ္ထ သဟဇာတာနံ နာမာနဉ္စ ဟေတာဒိပစ္စယေန ပစ္စယာ ဟောန္တိ. ‘‘သဟဇာတရူပန္တိ ဟိ သဗ္ဗတ္ထ ပဋိသန္ဓိယံ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာနံ, ပဝတ္တိယံ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာန’’န္တိ ဝက္ခတိ. သဟဇာတာ စေတနာတိ အန္တမသော စက္ခုဝိညာဏာဒီဟိပိ သဟဇာတစေတနာ. သဟဇာတာနံ နာမ ရူပါနန္တိ သဗ္ဗာပိ စေတနာ နာမာနံ, ပဋိသန္ဓိသဟဂတာ စေတနာ ကမ္မသမုဋ္ဌာနရူပါနံ, ပဝတ္တိယံ ရူပသမုဋ္ဌာပကစိတ္တသဟဂတာ စေတနာ စိတ္တသမုဋ္ဌာနရူပါနဉ္စ. နာနာက္ခဏိကာ စေတနာတိ ဝိပါကက္ခဏတော နာနာက္ခဏေ အတီတဘဝါဒီသု နိဗ္ဗတ္တာ ကုသလာကုသလစေတနာ. နာမရူပါနန္တိ ဥဘယတ္ထာပိ နာမရူပါနံ. ဝိပါကက္ခန္ဓာတိ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏာဒိကာ ဝိပါကာ အရူပက္ခန္ဓာ. ကမ္မသမုဋ္ဌာနမ္ပိ ဟိ ရူပံ ဝိပါကဝေါဟာရံ န လဘတိ အရူပဓမ္မဘာဝေန, သာရမ္မဏဘာဝေန စ ကမ္မသဒိသေသု အရူပဓမ္မေသွေဝ ဝိပါက-သဒ္ဒဿ နိရုဠှတ္တာ. १७. "हेतू, ध्यानांग आणि मार्गांग हे सहजात नाम-रूपांना प्रत्यय होतात" - हे तिन्ही प्रतिसंधीच्या वेळी कर्मसमुत्थान रूपांना, प्रवृत्तीच्या वेळी चित्तसमुत्थान रूपांना आणि दोन्ही वेळी सहजात नामांना हेतू इत्यादी प्रत्यय शक्तीने प्रत्यय होतात. कारण "सहजात रूप म्हणजे सर्वत्र प्रतिसंधीच्या वेळी कर्मसमुत्थान आणि प्रवृत्तीच्या वेळी चित्तसमुत्थान रूप" असे पुढे सांगितले जाईल. "सहजात चेतना" म्हणजे अगदी चक्षुविज्ञानादी चित्तांसोबत उत्पन्न होणारी चेतना देखील होय. "सहजात नाम-रूपांना" म्हणजे सर्वच चेतना सहजात नामांना, प्रतिसंधी चित्तासोबत असलेली चेतना कर्मसमुत्थान रूपांना आणि प्रवृत्तीच्या वेळी रूपाला उत्पन्न करणाऱ्या चित्तासोबत असलेली चेतना चित्तसमुत्थान रूपांना प्रत्यय होते. "नानाक्षणिक चेतना" म्हणजे विपाक क्षणापेक्षा भिन्न क्षणी, भूतकाळातील भवांमध्ये उत्पन्न झालेली कुशल-अकुशल चेतना होय. "नाम-रूपांना" म्हणजे दोन्ही वेळी नाम-रूपांना. "विपाक स्कंध" म्हणजे प्रतिसंधी विज्ञानादी विपाक अरूप स्कंध (नामस्कंध) होत. कारण कर्मसमुत्थान रूप देखील 'विपाक' हे नाव प्राप्त करत नाही, कारण अरूपधर्मत्वामुळे आणि सालंबनत्वामुळे (आलंबन ग्रहण करण्याच्या स्वभावामुळे) कर्मासारख्या असणाऱ्या केवळ अरूपधर्मांमध्येच 'विपाक' हा शब्द रूढ आहे. ၁၈. ပုရေဇာတဿ ဣမဿ ကာယဿာတိ ပစ္စယဓမ္မတော ပုရေ ဥပ္ပန္နဿ ဣမဿ ရူပကာယဿ. ကထံ ပန ပစ္စယုပ္ပန္နဿ ပုရေ နိဗ္ဗတ္တိယံ ပစ္ဆာဇာတဿ ပစ္စယတာတိ? နနု ဝုတ္တံ ‘‘ပစ္ဆာဇာတပစ္စယေ အသတိ သန္တာနဋ္ဌိတိဟေတုကဘာဝံ အာဂစ္ဆန္တဿာ’’တိ, တသ္မာ သန္တာနပ္ပဝတ္တဿ ဟေတုဘာဝုပတ္ထမ္ဘနေ ဣမဿ ဗျာပါရောတိ န ကောစိ ဝိရောဓော. १८. "पूर्वी उत्पन्न झालेल्या या कायाला" म्हणजे प्रत्ययधर्माच्या (पश्चातजात प्रत्ययाच्या) पूर्वी उत्पन्न झालेल्या या रूपकायाला. पण प्रत्ययोत्पन्न (पश्चातजात) धर्माच्या पूर्वीच उत्पत्ती झाली असताना, नंतर उत्पन्न होणारा धर्म त्याला कसा प्रत्यय (कारण) होऊ शकतो? "पश्चातजात प्रत्यय नसताना संततीच्या स्थितीला कारणीभूत होणाऱ्याला" असे म्हटले आहे की नाही? म्हणून प्रवृत्त होत असलेल्या संततीला कारणीभूत होऊन आधार देण्यामध्ये या पश्चातजात प्रत्ययाचा व्यापार असतो, त्यामुळे यात कोणताही विरोध नाही. ၁၉. ပဋိသန္ဓိယံ [Pg.248] စက္ခာဒိဝတ္ထူနံ အသမ္ဘဝတော, သတိ စ သမ္ဘဝေ တံတံဝိညာဏာနံ ပစ္စယဘာဝါနုပဂမနတော, ဟဒယဝတ္ထုနော စ ပဋိသန္ဓိဝိညာဏေန သဟုပ္ပန္နဿ ပုရေဇာတကတာဘာဝတော ဝုတ္တံ ‘‘ဆဝတ္ထူနိ ပဝတ္တိယ’’န္တိ. ‘‘ပဉ္စာရမ္မဏာနိ ပဉ္စဝိညာဏဝီထိယာ’’တိ စ ဣဒံ အာရမ္မဏပုရေဇာတနိဒ္ဒေသေ အာဂတံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ. ပဉှာဝါရေ ပန ‘‘သေက္ခာ ဝါ ပုထုဇ္ဇနာ ဝါ စက္ခုံ အနိစ္စတော ဒုက္ခတော အနတ္တတော ဝိပဿန္တီ’’တျာဒိနာ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၄၂၄) အဝိသေသေန ပစ္စုပ္ပန္နစက္ခာဒီနမ္ပိ ဂဟိတတ္တာ ဓမ္မာရမ္မဏမ္ပိ အာရမ္မဏပုရေဇာတံ မနောဝိညာဏဝီထိယာ လဗ္ဘတိ. အတ္ထတော ဟေတံ သိဒ္ဓံ, ယံ ပစ္စုပ္ပန္နဓမ္မာရမ္မဏံ ဂဟေတွာ မနောဒွါရိကဝီထိ ပဝတ္တတိ, တံ တဿ အာရမ္မဏပုရေဇာတံ ဟောတီတိ. १९. प्रतिसंधीच्या वेळी चक्षु इत्यादी वस्तू रूपांचा असंभव असल्यामुळे, आणि ती असली तरी, त्या त्या विज्ञानांना प्रत्ययभाव प्राप्त होत नसल्यामुळे, तसेच प्रतिसंधी विज्ञानासोबत सहजात असलेल्या हृदयवस्तूचा पुरेजातभाव नसल्यामुळे "सहा वस्तू प्रवृत्तीच्या वेळी (प्रत्यय होतात)" असे म्हटले आहे. आणि "पाच आलंबने पंचविज्ञानवीथीला (प्रत्यय होतात)" हे आलंबनपुरेजात निर्देशात आलेल्या वचनाला अनुसरून म्हटले आहे. पण प्रश्नवारामध्ये "शैक्ष किंवा पृथग्जन चक्षूला अनित्य, दुःख, अनात्म रूपाने विपश्यना करतात" इत्यादी वचनांद्वारे सामान्यतः वर्तमान चक्षु इत्यादींना देखील ग्रहण केल्यामुळे, मनोविज्ञानवीथीसाठी धर्मारंभ असलेले आलंबनपुरेजात देखील प्राप्त होते. अर्थाच्या दृष्टीने हे सिद्धच आहे की, जे वर्तमान धर्मारंभ ग्रहण करून मनोद्वारवीथी प्रवृत्त होते, ते त्या मनोद्वारवीथीचे आलंबनपुरेजात होते. ၂၂. ပကတိယာ ဧဝ ပစ္စယန္တရရဟိတေန အတ္တနော သဘာဝေနေဝ ဥပနိဿယော ပကတူပနိဿယော. အာရမ္မဏာနန္တရေဟိ အသံမိဿော ပုထဂေဝ ကောစိ ဥပနိဿယောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အထ ဝါ ပကတော ဥပနိဿယော ပကတူပနိဿယော. ပကတောတိ စေတ္ထ ပ-ကာရော ဥပသဂ္ဂေါ, သော အတ္တနော ဖလဿ ဥပ္ပာဒနသမတ္ထဘာဝေန သန္တာနေ နိပ္ဖာဒိတဘာဝံ, အာသေဝိတဘာဝဉ္စ ဒီပေတိ, တသ္မာ အတ္တနော သန္တာနေ နိပ္ဖန္နော ရာဂါဒိ, သဒ္ဓါဒိ, ဥပသေဝိတော ဝါ ဥတုဘောဇနာဒိ ပကတူပနိဿယော. တထာ စေဝ နိဒ္ဒိသတိ. २२. स्वभावतःच, इतर प्रत्ययांशिवाय, स्वतःच्या स्वभावानेच जो उपनिष्रय (बलवान कारण) होतो, तो 'प्रकृतोपनिष्रय' (पकतूपनिस्सय) होय. आलंबन आणि अनंतर प्रत्ययांनी अमिश्रित असलेला, स्वतंत्र असा जो उपनिष्रय आहे, त्याला प्रकृतोपनिष्रय म्हटले आहे, असे दर्शवले आहे. किंवा, प्रकृष्टपणे केलेला (सेवलेला) उपनिष्रय म्हणजे प्रकृतोपनिष्रय होय. येथे 'पकत' मधील 'प' हा उपसर्ग आहे; तो स्वतःचे फल उत्पन्न करण्याच्या सामर्थ्याने संततीमध्ये निष्पादित (उत्पन्न) झालेला भाव आणि आसेवित (सेवलेला) भाव दर्शवतो. म्हणून स्वतःच्या संततीमध्ये उत्पन्न झालेला राग इत्यादी, श्रद्धा इत्यादी, किंवा सेवन केलेले ऋतू, भोजन इत्यादी 'प्रकृतोपनिष्रय' आहेत. तसेच त्याचे स्पष्टीकरण केले जाते. ၂၃. ဂရုကတန္တိ ဂရုံ ကတွာ ပစ္စဝေက္ခိတံ. တထာ ဟိ ‘‘ဒါနံ ဒတွာ သီလံ သမာဒိယိတွာ ဥပေါသထကမ္မံ ကတွာ တံ ဂရုံ ကတွာ ပစ္စဝေက္ခတီ’’တျာဒိနာ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၄၁၃) ဒါနသီလဥပေါသထကမ္မပုဗ္ဗေကတသုစိဏ္ဏဈာနဂေါတြဘုဝေါဒါနမဂ္ဂါဒီနိ ဂရုံ ကတွာ ပစ္စဝေက္ခဏဝသေန အဿ နိဒ္ဒေသော ပဝတ္တော. २३. "गुरूकृत" म्हणजे आदरपूर्वक (महत्त्व देऊन) केलेले प्रत्यवेक्षण (चिंतन). कारण "दान देऊन, शील समादान करून, उपोसथ कर्म करून, त्याला महत्त्व देऊन प्रत्यवेक्षण करतो" इत्यादी वचनांद्वारे दान, शील, उपोसथ कर्म, पूर्वी केलेले सुचरित, ध्यान, गोत्रभू, वोदान, मार्ग इत्यादींचे आदरपूर्वक प्रत्यवेक्षण करण्याच्या रूपाने याचे स्पष्टीकरण प्रवृत्त झाले आहे. ၂၄. ‘‘ပုရိမာ [Pg.249] ပုရိမာ ကုသလာ ခန္ဓာ ပစ္ဆိမာနံ ပစ္ဆိမာနံ ကုသလာနံ ခန္ဓာနံ ဥပနိဿယပစ္စယေန ပစ္စယော’’တျာဒိနာ (ပဋ္ဌာ. ၁.၁.၄၂၃) နယေန အနန္တရပစ္စယေန သဒ္ဓိံ နာနတ္တံ အကတွာ အနန္တရူပနိဿယဿ အာဂတတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အနန္တရနိရုဒ္ဓါ’’တျာဒိ. ဧဝံ သန္တေပိ အတ္တနော အနန္တရံ အနုရူပစိတ္တုပ္ပာဒဝသေန အနန္တရပစ္စယော, ဗလဝကာရဏဝသေန အနန္တရူပနိဿယပစ္စယောတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. २४. "पूर्वीचे पूर्वीचे कुशल स्कंध नंतरच्या नंतरच्या कुशल स्कंधांना उपनिस्सय प्रत्ययाने प्रत्यय (कारण) होतात" इत्यादी (पट्ठान १.१.४२३) पद्धतीने अनन्तर प्रत्ययासोबत भेद न करता, अनन्तरूपनिस्सय प्रत्ययाच्या अंतर्गत आल्यामुळे "अनन्तरनिरुद्धा" (लगेचच निरुद्ध झालेले) इत्यादी म्हटले आहे. असे असले तरी, स्वतःच्या लगेचच नंतर अनुरूप चित्त उत्पन्न करण्याच्या सामर्थ्याने 'अनन्तर प्रत्यय' होतो आणि बलवान कारणाच्या सामर्थ्याने 'अनन्तरूपनिस्सय प्रत्यय' होतो, हा या दोघांमधील विशेष (फरक) आहे. ၂၅. ယထာရဟံ အဇ္ဈတ္တဉ္စ ဗဟိဒ္ဓါ စ ရာဂါဒယော…ပေ… သေနာသနဉ္စာတိ ယောဇနာ. ရာဂါဒယော ဟိ အဇ္ဈတ္တံ နိပ္ဖာဒိတာ, ပုဂ္ဂလာဒယော ဗဟိဒ္ဓါ သေဝိတာ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ အာစရိယေန – २५. "यथायोग्य रीतीने अध्यात्म (स्वतःच्या संतानात) आणि बहिर्धा (बाहेर) राग इत्यादी... तसेच सेनासन (निवासस्थान)" अशी योजना आहे. कारण राग इत्यादी स्वतःच्या संतानात उत्पन्न होतात आणि पुद्गल इत्यादींचे बाहेर सेवन केले जाते. म्हणूनच आचार्यांनी म्हटले आहे - ‘‘ရာဂသဒ္ဓါဒယော ဓမ္မာ, အဇ္ဈတ္တမနုဝါသိတာ; သတ္တသင်္ခါရဓမ္မာ စ, ဗဟိဒ္ဓေါပနိသေဝိတာ’’တိ. (နာမ. ပရိ. ၈၂၇); "राग, श्रद्धा इत्यादी धर्म अध्यात्मात (स्वतःच्या संतानात) दृढ केलेले असतात; आणि प्राणी (सत्त्व) व संस्कार धर्म बाहेरून सेवन केले जातात." (नामरूपपरिच्छेद ८२७) အထ ဝါ အဇ္ဈတ္တဉ္စ ဗဟိဒ္ဓါ စ ကုသလာဒိဓမ္မာနန္တိ ယထာဌိတဝသေနေဝ ယောဇနာ အတ္တနော ဟိ ရာဂါဒယော စ အတ္တနော ကုသလာဒိဓမ္မာနံ ကလျာဏမိတ္တဿ သဒ္ဓါဒိကေ နိဿာယ ကုသလံ ကရောန္တာနံ ပရေသဉ္စ နိဿယာ ဟောန္တိ. "किंवा दुसऱ्या प्रकारे, 'अध्यात्म आणि बहिर्धा कुशल इत्यादी धर्मांना' अशी जशाच्या तशा पाठाच्या आधारेच योजना करावी. कारण स्वतःचे राग इत्यादी स्वतःच्या कुशल इत्यादी धर्मांना आणि कल्याणमित्राच्या श्रद्धा इत्यादींवर अवलंबून राहून कुशल कर्म करणाऱ्या इतरांच्या (कुशल इत्यादी धर्मांना) बलवान आश्रय होतात." တတ္ထ ကာမရာဂါဒယော နိဿာယ ကာမဘဝါဒီသု နိဗ္ဗတ္တနတ္ထံ, ရာဂါဒိဝူပသမတ္ထဉ္စ ဒါနသီလဥပေါသထဇ္ဈာနာဘိညာဝိပဿနာမဂ္ဂဘာဝနာ, ရာဂါဒိဟေတုကာ စ ဥပရူပရိရာဂါဒယော ဟောန္တီတိ ယထာရဟံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ယံ ယဉှိ နိဿာယ ယဿ ယဿ သမ္ဘဝေါ, တံ တံ တဿ တဿ ပကတူပနိဿယော ဟောတိ. ပစ္စယမဟာပဒေသော ဟေသ, ယဒိဒံ ‘‘ဥပနိဿယပစ္စယော’’တိ ဝုတ္တံ. တထာ စာဟ ‘‘ဗဟုဓာ ဟောတိ ပကတူပနိဿယော’’တိ. သဒ္ဓါဒယောတိ သီလသုတစာဂပညာ. အတ္တနော သဒ္ဓါဒိကဉှိ ဥပနိဿာယ အတ္တနော ဒါနသီလာဒယော, တထာ ကလျာဏမိတ္တာနံ သဒ္ဓါဒယော ဥပနိဿာယ ပရေသဉ္စ ဒါနသီလာဒယော [Pg.250] ဟောန္တီတိ ပါကဋမေတံ. သုခံ ဒုက္ခန္တိ ကာယိကံ သုခံ ဒုက္ခံ. ပုဂ္ဂလောတိ ကလျာဏမိတ္တာဒိပုဂ္ဂလော. ဘောဇနန္တိ သပ္ပာယာဒိဘောဇနံ, ဥတုပိ တာဒိသောဝ. "त्यामध्ये, कामराग इत्यादींवर अवलंबून राहून कामभव इत्यादींमध्ये उत्पन्न होण्यासाठी आणि राग इत्यादींच्या उपशमनासाठी दान, शील, उपोसथ, ध्यान, अभिज्ञा, विपश्यना आणि मार्ग यांची भावना करणे, तसेच राग इत्यादींच्या कारणाने उत्तरोत्तर राग इत्यादी उत्पन्न होतात, हे यथायोग्य रीतीने जाणावे. कारण ज्या ज्या गोष्टीवर अवलंबून ज्या ज्या गोष्टीची उत्पत्ती होते, ती ती गोष्ट त्या त्या गोष्टीचा 'पकतूपनिस्सय' (नैसर्गिक बलवान आश्रय) होते. ज्याला 'उपनिस्सय प्रत्यय' म्हटले आहे, तो प्रत्ययांचा महाप्रदेश (विस्तृत क्षेत्र असलेला प्रत्यय) आहे. म्हणूनच म्हटले आहे: 'पकतूपनिस्सय अनेक प्रकारचा असतो.' 'श्रद्धा इत्यादी' म्हणजे शील, श्रुत, त्याग आणि प्रज्ञा. कारण स्वतःच्या श्रद्धा इत्यादींवर अवलंबून स्वतःचे दान, शील इत्यादी होतात, तसेच कल्याणमित्रांच्या श्रद्धा इत्यादींवर अवलंबून इतरांचे दान, शील इत्यादी होतात, हे स्पष्टच आहे. 'सुख आणि दुःख' म्हणजे शारीरिक सुख आणि दुःख. 'पुद्गल' म्हणजे कल्याणमित्र इत्यादी व्यक्ती. 'भोजन' म्हणजे अनुकूल (सप्पाय) भोजन आणि 'ऋतू' देखील तसाच अनुकूल ऋतू समजावा." ၂၇. ‘‘အဓိပတိ…ပေ… ပစ္စယာ ဟောန္တီ’’တိ သင်္ခေပေန ဝုတ္တမတ္ထံ ဝိတ္ထာရေတုံ ‘‘တတ္ထ ဂရုကတမာရမ္မဏ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. ဂရုကတမာရမ္မဏန္တိ ပစ္စဝေက္ခဏအဿာဒါဒိနာ ဂရုကတံ အာရမ္မဏံ. တဉှိ ဈာနမဂ္ဂဖလဝိပဿနာနိဗ္ဗာနာဒိဘေဒံ ပစ္စဝေက္ခဏအဿာဒါဒိမဂ္ဂဖလာဒိဓမ္မေ အတ္တာဓီနေ ကရောတီတိ အာရမ္မဏာဓိပတိ နာမ. ဂရုကာတဗ္ဗတာမတ္တေန အာရမ္မဏာဓိပတိ. ဂရုကတောပိ ဗလဝကာရဏဋ္ဌေန အာရမ္မဏူပနိဿယောတိ အယမေတေသံ ဝိသေသော. သဟဇာတာ…ပေ… နာမရူပါနန္တိ ဆန္ဒစိတ္တဝီရိယဝီမံသာနံ, ဝသေန စတုဗ္ဗိဓောပိ သဟဇာတာဓိပတိ ယထာရဟံ သဟဇာတနာမရူပါနံ ပဝတ္တိယံယေဝ သဟဇာတာဓိပတိဝသေန ပစ္စယော. २७. " 'अधिपती...पे... प्रत्यय होतात' या संक्षेपाने सांगितलेल्या अर्थाचा विस्तार करण्यासाठी 'त्यात आदरपूर्वक ग्रहण केलेले आलंबन (गरुकत आलंबन)' इत्यादी म्हटले आहे. 'गरुकत आलंबन' म्हणजे प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन), आस्वाद इत्यादींद्वारे आदरपूर्वक ग्रहण केलेले आलंबन. कारण ते ध्यान, मार्ग, फल, विपश्यना, निर्वाण इत्यादी भेद असलेले आलंबन, प्रत्यवेक्षण आणि आस्वाद घेणारे मार्ग, फल इत्यादी धर्मांना स्वतःच्या अधीन करते, म्हणून त्याला 'आलंबनाधिपती' (आरम्मणाधिपति) म्हणतात. केवळ आदरणीय असण्यानेच ते 'आलंबनाधिपती' होते. आदरपूर्वक ग्रहण केलेले असूनही, बलवान कारण असल्यामुळे ते 'आलंबनोपनिस्सय' (आरम्मणूपनिस्सय) होते; हा या दोघांमधील विशेष फरक आहे. 'सहजात...पे... नामरूपांना' म्हणजे छंद, चित्त, वीर्य आणि विमंसा यांच्या भेदाने चार प्रकारचा असलेला 'सहजाताधिपती' यथायोग्य रीतीने सहजात नाम-रूपांच्या केवळ प्रवृत्तीकाळातच सहजाताधिपतीच्या रूपाने प्रत्यय (कारण) होतो." ၂၈. ရူပဓမ္မဿ အရူပဓမ္မံ ပတိ သဟဇာတပစ္စယတာ ပဋိသန္ဓိယံ ဝတ္ထုဝသေန ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘ဝတ္ထုဝိပါကာ အညမည’’န္တိ – २८. "रूप धर्माचा नाम धर्माशी (अरूप धर्माशी) असलेला सहजात प्रत्ययभाव प्रतिसंधी काळात हृदयवस्तूच्या रूपाने सांगितला आहे, म्हणून 'वस्तू आणि विपाक एकमेकांना (अन्योन्य प्रत्यय होतात)' असे म्हटले आहे -" ၃၀. ယသ္မာ ပန အညမညုပတ္ထမ္ဘနဝသေနေဝ အညမညပစ္စယတာ, န သဟဇာတမတ္တတောတိ ပဝတ္တိယံ ရူပံ နာမာနံ အညမညပစ္စယော န ဟောတိ, တသ္မာ ဝုတ္တံ ‘‘စိတ္တစေတသိကာ ဓမ္မာ အညမည’’န္တိ. တထာ ဥပါဒါရူပါနိ စ ဘူတရူပါနံ အညမညပစ္စယာ န ဟောန္တီတိ ဝုတ္တံ ‘‘မဟာဘူတာ အညမည’’န္တိ. ३०. "परंतु ज्या कारणाने परस्पर उपस्तंभन (परस्परांना आधार देणे) करण्याच्या सामर्थ्यानेच 'अन्योन्य प्रत्ययभाव' होतो, केवळ सहजात असण्यानेच नाही, म्हणून प्रवृत्तीकाळात रूप हे नामाचा अन्योन्य प्रत्यय होत नाही; म्हणूनच 'चित्त आणि चैतसिक धर्म एकमेकांना (अन्योन्य प्रत्यय होतात)' असे म्हटले आहे. तसेच उपादाय रूपे ही महाभूतांचे अन्योन्य प्रत्यय होत नाहीत, म्हणून 'महाभूते एकमेकांना (अन्योन्य प्रत्यय होतात)' असे म्हटले आहे." ၃၁. နနု စ ‘‘အရူပိနော အာဟာရာ သဟဇာတာနံ နာမရူပါန’’န္တိ ဝုတ္တံ, ဧဝဉ္စ သတိ အသညီနံ သဟဇာတာဟာရဿ အသမ္ဘဝတော ‘‘သဗ္ဗေ သတ္တာ အာဟာရဋ္ဌိတိကာ’’တိ ကထမိဒံ နီယတီတိ? ဝုစ္စတေ – မနောသဉ္စေတနာဟာရဝသပ္ပဝတ္တဿ ကမ္မဿ[Pg.251], တံသဟဂတာနမ္ပိ ဝါ သေသာဟာရာနံ ကမ္မူပနိဿယပစ္စယေဟိ ပစ္စယတ္တပရိယာယံ ဂဟေတွာ သဗ္ဗသတ္တာနံ အာဟာရဋ္ဌိတိကတာ ဝုတ္တာ, န အာဟာရပစ္စယဘာဝတောတိ. ३१. "शंका अशी आहे की, 'अरूपी (नाम) आहार हे सहजात नाम-रूपांना प्रत्यय होतात' असे म्हटले आहे; असे असताना, असंज्ञी प्राण्यांमध्ये सहजात आहाराचा असंभव असल्यामुळे 'सर्व प्राणी आहारावर टिकून राहतात' हे वचन कसे सुसंगत ठरते? यावर उत्तर दिले जाते - मनोसंचेतना आहाराच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त होणाऱ्या कर्माच्या, किंवा त्या कर्मासोबत असणाऱ्या उर्वरित आहारांच्या देखील कर्म आणि उपनिस्सय प्रत्ययांच्या रूपाने उपकार करण्याच्या पर्यायाला ग्रहण करून सर्व प्राण्यांची 'आहारस्थितिकता' सांगितली आहे, केवळ आहार प्रत्ययाच्या रूपाने नाही." ၃၂. ‘‘ပဉ္စ ပသာဒါ’’တျာဒီသု နနု ဣတ္ထိန္ဒြိယပုရိသိန္ဒြိယာ န ဂဟိတာတိ? သစ္စံ န ဂဟိတာ. ယဒိပိ တေသံ လိင်္ဂါဒီဟိ အနုဝတ္တနီယတာ အတ္ထိ, သာ ပန န ပစ္စယဘာဝတော. ယထာ ဟိ ဇီဝိတာဟာရာ ယေသံ ပစ္စယာ ဟောန္တိ, တေသံ အနုပါလကာ ဥပတ္ထမ္ဘကာ အတ္ထိ, အဝိဂတပစ္စယဘူတာ စ ဟောန္တိ, န ဧဝံ ဣတ္ထိပုရိသဘာဝါ လိင်္ဂါဒီနံ ကေနစိ ဥပကာရေန ဥပကာရာ ဟောန္တိ. ကေဝလံ ပန ယထာသကေဟေဝ ကမ္မာဒိပစ္စယေဟိ ပဝတ္တမာနံ လိင်္ဂါဒီနံ ယထာ ဣတ္ထာဒိဂ္ဂဟဏဿ ပစ္စယဘာဝေါ ဟောတိ, တတော အညေနာကာရေန တံ-သဟိတသန္တာနေ အပ္ပဝတ္တိတော လိင်္ဂါဒီဟိ အနုဝတ္တနီယတာ, ဣန္ဒြိယတာ စ နေသံ ဝုစ္စတိ, တသ္မာ န တေသံ ဣန္ဒြိယပစ္စယဘာဝေါ ဝုတ္တော. ३२. " 'पाच प्रसाद (इंद्रिये)' इत्यादींमध्ये स्त्री-इंद्रिय आणि पुरुष-इंद्रिय ग्रहण केलेले नाही काय? हे खरे आहे की ते ग्रहण केलेले नाही. जरी त्यांचे लिंग (चिन्हे) इत्यादींद्वारे अनुवर्तन होत असले, तरी ते प्रत्ययभावामुळे नाही. कारण ज्याप्रमाणे जीवितेंद्रिय आणि आहार हे ज्यांचे प्रत्यय होतात, त्यांचे रक्षण करणारे, उपस्तंभन करणारे आणि अत्थी-अविगत प्रत्यय रूपाने असतात; त्याप्रमाणे स्त्रीभाव आणि पुरुषभाव हे लिंग इत्यादींना कोणत्याही उपकाराने उपकारक होत नाहीत. केवळ आपापल्या कर्म इत्यादी प्रत्ययांनी प्रवृत्त होणाऱ्या लिंग इत्यादींच्या ज्या प्रकारे 'स्त्री' इत्यादी संज्ञा ग्रहण करण्याचे ते कारण होतात, त्यापेक्षा वेगळ्या प्रकारे त्या भावासह असलेल्या संतानात ते प्रवृत्त होत नसल्यामुळे, लिंग इत्यादींद्वारे त्यांचे अनुवर्तन आणि त्यांची 'इंद्रियता' म्हटले जाते; म्हणूनच त्यांचा 'इंद्रिय प्रत्ययभाव' सांगितलेला नाही." ၃၃. ယေသံ နာမာနံ စက္ခာဒီနံ အဗ္ဘန္တရတော နိက္ခမန္တာနံ ဝိယ ပဝတ္တာနံ, ယေသဉ္စ ရူပါနံ နာမသန္နိဿယေနေဝ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာနံ သမ္ပယောဂါသင်္ကာ ဟောတိ, တေသမေဝ ဝိပ္ပယုတ္တပစ္စယတာ. ရူပါနံ ပန ရူပေဟိ သာသင်္ကာ နတ္ထိ. ဝတ္ထုသန္နိဿယေနေဝ ဇာယန္တာနံ ဝိသယဘာဝမတ္တံ အာရမ္မဏန္တိ တေနာပိ တေသံ သမ္ပယောဂါသင်္ကာ နတ္ထီတိ ယေသံ သမ္ပယောဂါသင်္ကာ အတ္ထိ, တေသမေဝ ဝိပ္ပယုတ္တပစ္စယတာပိ ဝုတ္တာတိ အာဟ ‘‘ဩက္ကန္တိက္ခဏေ ဝတ္ထူ’’တျာဒိ. ३३. "ज्या नाम धर्मांचा चक्षू इत्यादींच्या आतून बाहेर पडल्यासारखे प्रवृत्त होणाऱ्या, आणि ज्या रूप धर्मांचा नामाच्या आश्रयानेच उत्पन्न होणाऱ्या संप्रयोग (एकत्र असणे) होण्याची शंका असते, त्यांचाच 'विप्पयुत्त प्रत्ययभाव' (विप्रयुक्त प्रत्यय) होतो. परंतु रूपांचा रूपांशी संप्रयोगाची शंका नसते. वस्तूच्या (हृदयवस्तूच्या) आश्रयानेच उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांचा केवळ विषयभाव असणे हेच आलंबन आहे, त्यामुळे देखील त्यांच्या संप्रयोगाची शंका नसते. म्हणून ज्यांच्या संप्रयोगाची शंका असते, त्यांचाच 'विप्पयुत्त प्रत्ययभाव' देखील सांगितला आहे, म्हणूनच 'ओक्कंतिक क्षणी वस्तू (हृदयवस्तू)' इत्यादी म्हटले आहे." ၃၄. သဗ္ဗထာ သဗ္ဗာကာရေန ယထာရဟံ နာမဝသေန ဝုတ္တံ တိဝိဓံ သဟဇာတံ, ဒုဝိဓံ ပုရေဇာတံ, ဧကဝိဓံ ပစ္ဆာဇာတဉ္စ ပစ္စယဇာတံ, အာဟာရေသု ကဗဠီကာရော အာဟာရော, ရူပဇီဝိတိန္ဒြိယန္တိ အယံ ပဉ္စဝိဓောပိ အတ္ထိပစ္စယော, အဝိဂတပစ္စယော စ ဟောတိ. ပစ္စုပ္ပန္နသဘာဝေန အတ္ထိဘာဝေန တာဒိသဿေဝ ဓမ္မဿ [Pg.252] ဥပတ္ထမ္ဘကတ္တာ အတ္ထိဘာဝါဘာဝေန အနုပကာရကာနမေဝ အတ္ထိဘာဝေန ဥပကာရကတာ အတ္ထိပစ္စယဘာဝေါတိ နတ္ထိ နိဗ္ဗာနဿ သဗ္ဗဒါ ဘာဝိနော အတ္ထိပစ္စယတာ, အဝိဂတပစ္စယတာ စ. ဥပ္ပာဒါဒိယုတ္တာနံ ဝါ နတ္ထိဘာဝေါပကာရကတာဝိရုဒ္ဓေါ, ဝိဂတဘာဝေါပကာရကတာဝိရုဒ္ဓေါ စ ဥပကာရကဘာဝေါ အတ္ထိပစ္စယတာဒိကာတိ န တဿ တပ္ပစ္စယတ္တပ္ပသင်္ဂေါ. ရူပဇီဝိတိန္ဒြိယဉ္စေတ္ထ ဩဇာ ဝိယ ဌိတိက္ခဏေဝ ဥပကာရကတ္တာ သဟဇာတပစ္စယေသု န ဂယှတီတိ ဝိသုံ ဝုတ္တံ. ३४. सर्वथा, सर्व प्रकारे, योग्यतेनुसार नावाच्या सामर्थ्याने सांगितलेला तीन प्रकारचा सहजात, दोन प्रकारचा पुरेजात आणि एक प्रकारचा पश्चाजात असा प्रत्ययसमूह; आहारांमध्ये कवळिकार आहार आणि रूपजीवितेंद्रिय; हा पाच प्रकारचा प्रत्यय सुद्धा अत्थिप्रत्यय आणि अविगतप्रत्यय होतो. वर्तमान स्वभावाने आणि विद्यमानतेने तशाच प्रकारच्या धर्माला उपस्तंभक (पुष्टी देणारा) असल्यामुळे, विद्यमानतेच्या अभावाने उपकार न करणाऱ्यांच्याच विद्यमानतेने उपकारक असणे हा अत्थिप्रत्ययभाव आहे. म्हणून नेहमी विद्यमान असणाऱ्या निर्वाणाची अत्थिप्रत्ययता आणि अविगतप्रत्ययता नाही. किंवा उत्पाद इत्यादींनी युक्त असलेल्या (रूप-नामांच्या) अविद्यमानतेने उपकार करण्याच्या विरोधी आणि विगतेने उपकार करण्याच्या विरोधी असा जो उपकारकभाव आहे, तो अत्थिप्रत्ययता इत्यादी आहे; म्हणून त्या निर्वाणाला तो प्रत्यय असण्याचा प्रसंग येत नाही. आणि येथे रूपजीवितेंद्रिय हे ओजेप्रमाणे केवळ स्थितीक्षणातच उपकारक असल्यामुळे सहजात प्रत्ययांमध्ये घेतले जात नाही, म्हणून ते स्वतंत्रपणे सांगितले आहे। ၃၅. ဣဒါနိ သဗ္ဗေပိ ပစ္စယာ သင်္ခေပတောပိ စတုဓာယေဝါတိ ဒဿေတုံ ‘‘အာရမ္မဏူ…ပေ… ဂစ္ဆန္တီ’’တိ ဝုတ္တံ. န ဟိ သော ကောစိ ပစ္စယော အတ္ထိ, ယော စိတ္တစေတသိကာနံ အာရမ္မဏဘာဝံ န ဂစ္ဆေယျ, သကသကပစ္စယုပ္ပန္နဿ စ ဥပနိဿယဘာဝံ န ဂစ္ဆတိ, ကမ္မဟေတုကတ္တာ စ လောကပ္ပဝတ္တိယာ ဖလဟေတူပစာရဝသေန သဗ္ဗေပိ ကမ္မသဘာဝံ နာတိဝတ္တန္တိ, တေ စ ပရမတ္ထတော လောကသမ္မုတိဝသေန စ ဝိဇ္ဇမာနာယေဝါတိ သဗ္ဗေပိ စတူသု သမောဓာနံ ဂစ္ဆန္တိ. ३५. आता सर्वच प्रत्यय संक्षेपाने सुद्धा चारच प्रकारचे आहेत, हे दर्शवण्यासाठी 'आरम्मणू...पे... गच्छन्ति' असे म्हटले आहे. कारण असा कोणताही प्रत्यय नाही, जो चित्त आणि चैतसिकांच्या आलंबनभावाला प्राप्त होणार नाही, आणि आपल्या स्वतःच्या प्रत्ययोत्पन्न धर्माच्या उपनिशयभावाला प्राप्त होत नाही; आणि जगाची प्रवृत्ती कर्महेतुक असल्यामुळे, फल-हेतूच्या उपचाराच्या (औपचारिक प्रयोगाच्या) सामर्थ्याने सर्वच प्रत्यय कर्माच्या स्वभावाचे उल्लंघन करत नाहीत; आणि ते परमार्थतः व लोकसंमूर्ती (लोकसंकेत) च्या सामर्थ्याने विद्यमानच आहेत, म्हणून सर्वच प्रत्यय चार प्रत्ययांमध्ये समाविष्ट होतात। ၃၆. ဣဒါနိ ယံ ဝုတ္တံ တတ္ထ တတ္ထ ‘‘သဟဇာတရူပ’’န္တိ, တံ သဗ္ဗံ န အဝိသေသတော ဒဋ္ဌဗ္ဗန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘သဟဇာတရူပ’’န္တျာဒိ ဝုတ္တံ. ပဋိသန္ဓိယဉှိ စိတ္တသမုဋ္ဌာနရူပါဘာဝတော ပဝတ္တိယံ ကမ္မသမုဋ္ဌာနာနဉ္စ စိတ္တစေတသိကေဟိ သဟုပ္ပတ္တိနိယမာဘာဝတော သဟဇာတရူပန္တိ သဗ္ဗတ္ထာပိ ပဝတ္တေ စိတ္တသမုဋ္ဌာနာနံ ရူပါနံ, ပဋိသန္ဓိယံ ကဋတ္တာရူပသင်္ခါတကမ္မဇရူပါနဉ္စ ဝသေန ဒုဝိဓံ ဟောတိ. ကမ္မဿ ကတတ္တာ နိဗ္ဗတ္တမာနာနိ ရူပါနိ ကဋတ္တာရူပါနိ. ३६. आता जे तिथे तिथे 'सहजातरूप' असे म्हटले आहे, ते सर्व विशेष भेद न करता (सामान्यतः) पाहू नये, हे दर्शवण्यासाठी 'सहजातरूपं' इत्यादी म्हटले आहे. कारण प्रतिसंधीमध्ये चित्तसमुत्थान रूपांचा अभाव असल्यामुळे आणि प्रवृत्तीकाळात (जीवनात) कर्मसमुत्थान रूपांचा चित्त-चैतसिकांसोबत सह-उत्पत्तीचा नियम नसल्यामुळे, 'सहजातरूप' हे सर्व ठिकाणी प्रवृत्तीकाळात चित्तसमुत्थान रूपांच्या आणि प्रतिसंधीकाळात कटत्तारूप नावाच्या कर्मज रूपांच्या सामर्थ्याने दोन प्रकारचे असते. कर्माच्या कृतत्वामुळे (केल्यामुळे) उत्पन्न होणारी रूपे म्हणजे 'कटत्तारूपे' (कर्मजरूपे) होत। ၃၇. ဣတိ ဧဝံ ဝုတ္တနယေန သမ္ဘဝါ ယထာသမ္ဘဝံ တေကာလိကာ အနန္တရသမနန္တရအာသေဝနနတ္ထိဝိဂတဝသေန ပဉ္စန္နံ အတီတကာလိကာနံ, ကမ္မပစ္စယဿ အတီတဝတ္တမာနဝသေန ဒွိကာလိကဿ, အာရမ္မဏအဓိပတိဥပနိဿယပစ္စယာနံ တိကာလိကာနံ[Pg.253], ဣတရေသံ ပန္နရသန္နံ ပစ္စုပ္ပန္နကာလိကာနဉ္စ ဝသေန ကာလတ္တယဝန္တော, နိဗ္ဗာနပညတ္တိဝသေန ကာလဝိမုတ္တာ စ, စက္ခာဒိရာဂါဒိသဒ္ဓါဒိဝသေန အဇ္ဈတ္တိကာ စ, ပုဂ္ဂလဥတုဘောဇနာဒိဝသေန တတော ဗဟိဒ္ဓါ စ, ပစ္စယုပ္ပန္နဘာဝေန သင်္ခတာ စ, ကထာ တပ္ပဋိပက္ခဘာဝေန အသင်္ခတာ စ ဓမ္မာ ပညတ္တိနာမရူပါနံ ဝသေန သင်္ခေပတော တိဝိဓာ ဌိတာ သဗ္ဗထာ ပဋ္ဌာနေ အနန္တနယသမန္တပဋ္ဌာနေ ပကရဏေ စတုဝီသတိသင်္ခါတာ ပစ္စယာ နာမာတိ ယောဇနာ. ३७. अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने, संभवतेनुसार (यथासंभव) त्रैकालिक असलेले; अनंतर, समनंतर, आसेवन, नत्थि आणि विगताच्या सामर्थ्याने पाच अतीतकालिक (भूतकाळातील) प्रत्ययांच्या; अतीत आणि वर्तमान अशा दोन काळांच्या सामर्थ्याने द्विकालिक असलेल्या कर्मप्रत्ययाच्या; आलंबन, अधिपती आणि उपनिषय या त्रैकालिक प्रत्ययांच्या; आणि इतर पंधरा वर्तमानकालिक प्रत्ययांच्या सामर्थ्याने तीन काळ असणारे (त्रैकालिक); निर्वाण व प्रज्ञप्तीच्या सामर्थ्याने कालविमुक्त (काळाच्या पलीकडील); चक्षु इत्यादी, राग इत्यादी आणि श्रद्धा इत्यादींच्या सामर्थ्याने आध्यात्मिक (अंतर्गत) केलेले; पुद्गल, ऋतू, भोजन इत्यादींच्या सामर्थ्याने त्याहून बाह्य (बाह्यगत) केलेले; प्रत्ययोत्पन्न भावामुळे संस्कृत (संस्कारित) केलेले; तसेच त्याच्या विरोधी भावामुळे असंस्कृत असलेले धर्म प्रज्ञप्ती, नाम आणि रूपाच्या सामर्थ्याने संक्षेपाने तीन प्रकारे स्थित आहेत. सर्व प्रकारे प्रस्थान (पट्ठान) ग्रंथात, अनंतनयसमंतपट्ठान नावाच्या ग्रंथात चोवीस प्रकारचे प्रत्यय म्हटले आहेत, अशी ही योजना (जोडणी) आहे। ၃၈. တတ္ထာတိ တေသု ပညတ္တိနာမရူပေသု. ३८. ‘तेथे’ म्हणजे त्या प्रज्ञप्ती, नाम आणि रूपांमध्ये। ပဋ္ဌာနနယဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. प्रस्थाननय-वर्णन समाप्त झाले। ပညတ္တိဘေဒဝဏ္ဏနာ प्रज्ञप्तिभेद-वर्णन। ၃၉. ဝစနီယဝါစကဘေဒါ ဒုဝိဓာ ပညတ္တီတိ ဝုတ္တံ ‘‘ပညာပိယတ္တာ’’တျာဒိ. ပညာပိယတ္တာတိ တေန တေန ပကာရေန ဉာပေတဗ္ဗတ္တာ, ဣမိနာ ရူပါဒိဓမ္မာနံ သမူဟသန္တာနာဒိအဝတ္ထာဝိသေသာဒိဘေဒါ သမ္မုတိသစ္စဘူတာ ဥပါဒါပညတ္တိသင်္ခါတာ အတ္ထပညတ္တိ ဝုတ္တာ. သာ ဟိ နာမပညတ္တိယာ ပညာပီယတိ. ပညာပနတောတိ ပကာရေဟိ အတ္ထပညတ္တိယာ ဉာပနတော. ဣမိနာ ဟိ ပညာပေတီတိ ‘‘ပညတ္တီ’’တိ လဒ္ဓနာမာနံ အတ္ထာနံ အဘိဓာနသင်္ခါတာ နာမပညတ္တိ ဝုတ္တာ. ३९. सांगण्यायोग्य (वचनीय - अर्थप्रज्ञप्ती) आणि सांगणारा (वाचक - नामप्रज्ञप्ती) या भेदाने प्रज्ञप्ती दोन प्रकारची आहे, हे सांगण्यासाठी 'पञ्ञापियत्ता' इत्यादी म्हटले आहे. 'पञ्ञापियत्ता' म्हणजे त्या त्या प्रकारे (भूमी, पर्वत इत्यादी रूपाने) जाणवून देण्यायोग्य असल्यामुळे; याने रूप इत्यादी धर्मांच्या समूह, संतान, अवस्था-विशेष इत्यादी भेदांनी युक्त असलेली, संमूर्ती-सत्य (संकेत सत्य) रूप असलेली, उपादा-प्रज्ञप्ती नावाची 'अर्थप्रज्ञप्ती' (अत्थपञ्ञत्ति) सांगितली आहे. कारण ती नामप्रज्ञप्तीने जाणवून दिली जाते. 'पञ्ञापनतो' म्हणजे विविध प्रकारांनी अर्थप्रज्ञप्तीचे ज्ञान करून देणारी असल्यामुळे; कारण याने 'जाणवून देते म्हणून प्रज्ञप्ती' असे नाव मिळवलेल्या अर्थांच्या अभिधान (नाव) नावाची 'नामप्रज्ञप्ती' (नामपञ्ञत्ति) सांगितली आहे। ၄၀. ဘူတပရိဏာမာကာရမုပါဒါယာတိ ပထဝါဒိကာနံ မဟာဘူတာနံ ပဗန္ဓဝသေန ပဝတ္တမာနာနံ ပတ္ထဋသင်္ဂဟတာဒိအာကာရေန ပရိဏာမာကာရံ ပရိဏတဘာဝသင်္ခါတံ အာကာရံ ဥပါဒါယ နိဿယံ ကတွာ. တထာ တထာတိ ဘူမာဒိဝသေန. ဘူမိပဗ္ဗတာဒိကာတိ ဘူမိပဗ္ဗတရုက္ခာဒိကာ သန္တာနပညတ္တိ. သမ္ဘာရသန္နိဝေသာကာရန္တိ ဒါရုမတ္တိကာတန္တာဒီနံ သမ္ဘာရာနံ ဥပကရဏာနံ [Pg.254] သန္နိဝေသာကာရံ ရစနာဒိဝိသိဋ္ဌတံတံသဏ္ဌာနာဒိအာကာရံ. ရထသကဋာဒိကာတိ ရထသကဋဂါမဃဋပဋာဒိကာ သမူဟပညတ္တိ. စန္ဒာဝဋ္ဋနာဒိကန္တိ စန္ဒိမသူရိယနက္ခတ္တာနံ သိနေရုံ ပဒက္ခိဏဝသေန ဥဒယာဒိအာဝဋ္ဋနာကာရံ. ဒိသာကာလာဒိကာတိ ပုရတ္ထိမဒိသာဒိကာ ဒိသာပညတ္တိ, ပုဗ္ဗဏှာဒိကာ ကာလပညတ္တိ, မာသောတုဝေသာခမာသာဒိကာ တံတံနာမဝိသိဋ္ဌာ မာသာဒိပညတ္တိ စ. အသမ္ဖုဋ္ဌာကာရန္တိ တံတံရူပကလာပေဟိ အသမ္ဖုဋ္ဌံ သုသိရာဒိအာကာရံ. ကူပဂုဟာဒိကာ တိ ကူပဂုဟဆိဒ္ဒါဒိကာ အာကာသပညတ္တိ. တံတံဘူတနိမိတ္တန္တိ ပထဝီကသိဏာဒိတံတံဘူတနိမိတ္တံ. ဘာဝနာဝိသေသန္တိ ပရိကမ္မာဒိဘေဒံ ဘာဝနာယ ပဗန္ဓဝိသေသံ. ကသိဏနိမိတ္တာဒိကာတိ ကသိဏာသုဘနိမိတ္တာဒိဘေဒါ ယောဂီနံ ဥပဋ္ဌိတာ ဥဂ္ဂဟပဋိဘာဂါဒိဘေဒါ နိမိတ္တပညတ္တိ. ဧဝမာဒိပ္ပဘေဒါတိ ကသိဏုဂ္ဃာဋိမာကာသနိရောဓကသိဏာဒိဘေဒါ စ. အတ္ထစ္ဆာယာကာရေနာတိ ပရမတ္ထဓမ္မဿ ဆာယာကာရေန ပဋိဘာဂါကာရေန. ४०. ‘भूतपरिणामाकारमुपादाय’ म्हणजे पृथ्वी इत्यादी महाभूतांच्या प्रवाहाच्या (संततीच्या) रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या, पसरणे, एकत्र येणे इत्यादी आकाराने परिणामाचा आकार, जो परिणत भाव नावाचा आकार आहे, त्याला ग्रहण करून आश्रय करून. ‘तथा तथा’ म्हणजे भूमी इत्यादींच्या रूपाने. ‘भूमिपर्वतादिका’ म्हणजे भूमी, पर्वत, वृक्ष इत्यादी 'संतानप्रज्ञप्ती'. ‘संभारसन्निवेशाकारं’ म्हणजे लाकूड, माती, धागा इत्यादी संभारांच्या (साहित्यांच्या) सन्निवेश-आकार (रचना-आकार), जो रचना इत्यादींनी विशिष्ट असा त्या त्या आकृतीचा आकार आहे. ‘रथशकटदिका’ म्हणजे रथ, गाडी, गाव, घडा, वस्त्र इत्यादी 'समूहप्रज्ञप्ती'. ‘चंदावट्टनादिकं’ म्हणजे चंद्र, सूर्य आणि नक्षत्रांच्या सुमेरू पर्वताला प्रदक्षिणा घालण्याच्या रूपाने उदय इत्यादी आवर्तन (फिरण्याचा) आकार. ‘दिशाकालादिका’ म्हणजे पूर्व दिशा इत्यादी 'दिशाप्रज्ञप्ती', पूर्वाह्न (सकाळ) इत्यादी 'कालप्रज्ञप्ती' आणि महिना, ऋतू, वैशाख महिना इत्यादी त्या त्या नावाने विशिष्ट असलेली 'मासप्रज्ञप्ती' इत्यादी. ‘असंफुट्टाकारं’ म्हणजे त्या त्या रूपकलापांनी स्पर्श न केलेला छिद्र (पोकळी) इत्यादी आकार. ‘कूपगुहादिका’ म्हणजे विहीर, गुहा, छिद्र इत्यादी 'आकाशप्रज्ञप्ती'. ‘तंतंभूतनिमित्तं’ म्हणजे पृथ्वीकसिण इत्यादी त्या त्या महाभूतांचे निमित्त. ‘भावनाविसेसं’ म्हणजे परिकर्म इत्यादी भेदांनी युक्त असलेला भावनेचा प्रवाह-विशेष. ‘कसिणनिमित्तादिका’ म्हणजे कसिणनिमित्त, अशुभनिमित्त इत्यादी भेदांनी युक्त, योग्यांना भासणारे उद्ग्रहनिमित्त, प्रतिभागनिमित्त इत्यादी भेदांनी युक्त असलेली 'निमित्तप्रज्ञप्ती'. ‘एवमादिप्पभेदा’ म्हणजे कसिण-उद्घाटित आकाशप्रज्ञप्ती, निरोधप्रज्ञप्ती, कसिणप्रज्ञप्ती इत्यादी भेद. ‘अत्थच्छायाकारेण’ म्हणजे परमार्थ धर्माच्या छायेच्या (प्रतिबिंबाच्या) आकाराने, प्रतिभाग आकाराने। ၄၁. နာမနာမကမ္မာဒိနာမေနာတိ နာမံ နာမကမ္မံ နာမဓေယျံ နိရုတ္တိ ဗျဉ္ဇနံ အဘိလာပေါတိ ဣမေဟိ ဆဟိ နာမေဟိ. တတ္ထ အတ္ထေသု နမတီတိ နာမံ. တံ အနွတ္ထရုဠှီဝသေန ဒုဝိဓံ, သာမညဂုဏကိရိယာယဒိစ္ဆာဝသေန စတုဗ္ဗိဓံ. နာမမေဝ နာမကမ္မံ. တထာ နာမဓေယျံ. အက္ခရဒွါရေန အတ္ထံ နီဟရိတွာ ဥတ္တိ ကထနံ နိရုတ္တိ, အတ္ထံ ဗျဉ္ဇယတီတိ ဗျဉ္ဇနံ. အဘိလပတီတိ အဘိလာပေါ, သဒ္ဒဂတအက္ခရသန္နိဝေသက္ကမော. သာ ပနာယံ နာမပညတ္တိ ဝိဇ္ဇမာနအဝိဇ္ဇမာနတဒုဘယသံယောဂဝသေန ဆဗ္ဗိဓာ ဟောတီတိ ဒဿေတုံ ‘‘ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တီ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ, ဧတာယ ပညာပေန္တီတိ ‘‘ရူပဝေဒနာ’’တျာဒိနာ ပကာသေန္တိ. ४१. ‘नामनामकम्मादिनामेन’ म्हणजे नाम, नामकर्म, नामधेय, निरुक्ती, व्यंजन आणि अभिलाप या सहा नावांनी. त्यामध्ये, जे अर्थांकडे झुकते (नमते) ते 'नाम' होय. ते अन्वर्थ (सार्थक) आणि रूढी या भेदाने दोन प्रकारचे आहे; सामान्य, गुण, क्रिया आणि यदृच्छा (इच्छाधीन) या भेदाने चार प्रकारचे आहे. नाम हेच नामकर्म आहे. तसेच ते नामधेय आहे. अक्षरांच्या द्वारे अर्थ बाहेर काढून जे बोलणे (कथन) केले जाते, ती 'निरुक्ती' होय; जे अर्थ प्रकट करते, ते 'व्यंजन' होय. जे अर्थाचे अभिभाषण (कथन) करते, तो 'अभिलाप' होय, जो शब्दांमधील अक्षरांच्या मांडणीचा क्रम आहे. आणि ती ही नामप्रज्ञप्ती विद्यमान, अविद्यमान आणि त्या दोन्हीच्या संयोगाच्या सामर्थ्याने सहा प्रकारची होते, हे दर्शवण्यासाठी 'विज्जमानपञ्ञत्ति' इत्यादी म्हटले आहे; याच्याद्वारे प्रज्ञापित (स्पष्ट) करतात, म्हणून 'रूप, वेदना' इत्यादींद्वारे प्रकाशित करतात। ၄၂. ဥဘိန္နန္တိ ဝိဇ္ဇမာနာဝိဇ္ဇမာနာနံ ဒွိန္နံ. ပဉ္စာဘိညာ, အာသဝက္ခယဉာဏန္တိ ဆ အဘိညာ အဿာတိ ဆဠဘိညော. ဧတ္ထ [Pg.255] စ အဘိညာနံ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ, တပ္ပဋိလာဘိနော ပုဂ္ဂလဿ အဝိဇ္ဇမာနတ္တာ စ အယံ ဝိဇ္ဇမာနေန အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ နာမ. တထာ ဣတ္ထိယာ အဝိဇ္ဇမာနတ္တာ, သဒ္ဒဿ စ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ ဣတ္ထိသဒ္ဒေါတိ အဝိဇ္ဇမာနေန ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ. ပသာဒစက္ခုနော, တန္နိဿိတဝိညာဏဿ စ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ စက္ခုဝိညာဏန္တိ ဝိဇ္ဇမာနေန ဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ. ရညော စ ပုတ္တဿ စ သမ္မုတိသစ္စဘူတတ္တာ ရာဇပုတ္တောတိ အဝိဇ္ဇမာနေန အဝိဇ္ဇမာနပညတ္တိ. ४२. दोन्हींचे म्हणजे विद्यमान आणि अविद्यमान या दोन्ही प्रज्ञप्तींचे. त्या अर्हत पुद्गलाचे पाच (लौकिक) अभिज्ञा आणि आस्रवक्षयज्ञान नावाचे लोकोत्तर अभिज्ञा, असे सहा अभिज्ञा आहेत म्हणून तो 'छळभिज्ञ' (सहा अभिज्ञा असलेला) म्हटला जातो. आणि येथे, अभिज्ञा विद्यमान (परमार्थतः सत्य) असल्यामुळे आणि त्या प्राप्त करणाऱ्या पुद्गलाचे (परमार्थतः) अविद्यमानत्व असल्यामुळे, ही 'विद्यमानाने अविद्यमान प्रज्ञप्ती' होय. तसेच, स्त्रीचे अविद्यमानत्व असल्यामुळे आणि शब्दाचे विद्यमानत्व असल्यामुळे, 'इत्थिसद्द' (स्त्री-शब्द) ही 'अविद्यमानाने विद्यमान प्रज्ञप्ती' होय. चक्षुप्रसाद आणि त्यावर आश्रित असलेले विज्ञान हे दोन्ही विद्यमान असल्यामुळे, 'चक्खुविञ्ञाण' (चक्षुविज्ञान) ही 'विद्यमानाने विद्यमान प्रज्ञप्ती' होय. राजा आणि पुत्र हे दोन्ही संमृति-सत्य (लोकव्यवहार सत्य) असल्यामुळे, 'राजपुत्त' (राजपुत्र) ही 'अविद्यमानाने अविद्यमान प्रज्ञप्ती' होय. ၄၃. ဝစီဃောသာနုသာရေနာတိ ဘူမိပဗ္ဗတရူပဝေဒနာဒိဝစီမယသဒ္ဒဿ အနုသာရေန အနုဂမနေန အနုဿရဏေန အာရမ္မဏကရဏေန ပဝတ္တာယ သောတဝိညာဏဝီထိယာ ပဝတ္တိတော အနန္တရံ ဥပ္ပန္နဿ မနောဒွါရဿ နာမစိန္တနာကာရပ္ပဝတ္တဿ မနောဒွါရိကဝိညာဏသန္တာနဿ ‘‘ဣဒမီဒိသဿ အတ္ထဿ နာမ’’န္တိ ပုဗ္ဗေယေဝ ဂဟိတသင်္ကေတောပနိဿယဿ ဂေါစရာ အာရမ္မဏဘူတာ တတော နာမဂ္ဂဟဏတော ပရံ ယဿာ သမ္မုတိပရမတ္ထဝိသယာယ နာမပညတ္တိယာ အနုသာရေန အနုဂမနေန အတ္ထာ သမ္မုတိပရမတ္ထဘေဒါ ဝိညာယန္တိ, သာယံ ဘူမိပဗ္ဗတရူပဝေဒနာဒိကာ ပညာပေတဗ္ဗတ္ထပညာပိကာ လောကသင်္ကေတေန နိမ္မိတာ လောကဝေါဟာရေန သိဒ္ဓါ, မနောဒွါရဂ္ဂဟိတာ အက္ခရာဝလိဘူတာ ပညတ္တိ ဝိညေယျာ ပညာပနတော ပညတ္တိသင်္ခါတာ နာမပညတ္တီတိ ဝိညေယျာ. ४३. 'वचीघोषानुसारेण' म्हणजे भूमी, पर्वत, रूप, वेदना इत्यादी शब्दांच्या उच्चारणाचा (अवाजाचा) मागोवा घेत, त्याचे स्मरण करत आणि त्याला आलंबन बनवत प्रवृत्त होणाऱ्या श्रोत्रविज्ञानवीथीच्या प्रवृत्तीनंतर लगेचच उत्पन्न होणाऱ्या, नावाचे चिंतन करणाऱ्या मनोद्वाराच्या मनोद्वारिक विज्ञानसंतानाचा (ज्याला 'हे अशा प्रकारच्या अर्थाचे नाव आहे' असा आधीच घेतलेल्या संकेताचा प्रबळ आश्रय आहे) जो गोचर (आलंबन) बनतो; आणि त्या नामग्रहणाच्या वीथीनंतर, ज्या संमृति व परमार्थ विषयाच्या 'नामप्रज्ञप्ती'च्या अनुसरणाने संमृति व परमार्थ रूपाने भिन्न असलेले अर्थ जाणले जातात; ती भूमी, पर्वत, रूप, वेदना इत्यादी प्रज्ञापनीय (जाणून घेण्यास योग्य) अर्थांना प्रज्ञापित करणारी (जाणवून देणारी), लोकसंकेताने निर्माण केलेली, लोकव्यवहाराने सिद्ध झालेली, मनोद्वाराने ग्रहण केलेली आणि अक्षरांच्या समूहाने बनलेली प्रज्ञप्ती होय. प्रज्ञापित करत असल्यामुळे हिला 'नामप्रज्ञप्ती' असे जाणावे. ဧတ္ထ စ သောတဝိညာဏဝီထိယာ အနန္တရဘာဝိနိံ မနောဒွါရိကဝီထိမ္ပိ သောတဝိညာဏဝီထိဂ္ဂဟဏေနေဝ သင်္ဂဟေတွာ ‘‘သောတဝိညာဏဝီထိယာ’’တိ ဝုတ္တံ. ဃဋာဒိသဒ္ဒဉှိ သုဏန္တဿ ဧကမေကံ သဒ္ဒံ အာရဗ္ဘ ပစ္စုပ္ပန္နာတီတာရမ္မဏဝသေန ဒွေ ဒွေ ဇဝနဝါရာ, ဗုဒ္ဓိယာ ဂဟိတနာမပဏ္ဏတ္တိဘူတံ အက္ခရာဝလိမာရဗ္ဘ ဧကောတိ ဧဝံ သောတဝိညာဏဝီထိယာ အနန္တရာယ အတီတသဒ္ဒါရမ္မဏာယ [Pg.256] ဇဝနဝီထိယာ အနန္တရံ နာမပညတ္တိယာ ဂဟဏံ, တတော ပရံ အတ္ထာဝဗောဓောတိ အာစရိယာ. आणि येथे, श्रोत्रविज्ञानवीथीच्या लगेचच नंतर उत्पन्न होणाऱ्या मनोद्वारिक वीथीला देखील श्रोत्रविज्ञानवीथीच्या ग्रहणानेच समाविष्ट करून 'श्रोत्रविज्ञानवीथीने' असे म्हटले आहे. कारण, घट इत्यादी शब्द ऐकणाऱ्या पुद्गलाच्या, प्रत्येक शब्दाला आलंबन करून वर्तमान व भूत आलंबनाच्या वशाने दोन-दोन जवनवार होतात; आणि बुद्धीने ग्रहण केलेल्या नामप्रज्ञप्तीरूप अक्षरसमूहाला आलंबन करून एक जवनवार होतो. अशा प्रकारे, श्रोत्रविज्ञानवीथीच्या लगेचच नंतर येणाऱ्या, भूत शब्दाला आलंबन करणाऱ्या जवनवीथीच्या नंतर नामप्रज्ञप्तीचे ग्रहण होते आणि त्यानंतर अर्थाचा बोध होतो, असे आचार्य म्हणतात. ပညတ္တိဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. प्रज्ञप्तीभेदवर्णन समाप्त झाले. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, अभिधम्मत्थसंग्रहाची टीका असलेल्या 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाच्या ग्रंथातील ပစ္စယပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. प्रत्ययपरिच्छेदवर्णन समाप्त झाले. ၉. ကမ္မဋ္ဌာနပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ ९. कर्मस्थानपरिच्छेदवर्णन ၁. ဣတော ပစ္စယနိဒ္ဒေသတော ပရံ နီဝရဏာနံ သမနဋ္ဌေန သမထသင်္ခါတာနံ, အနိစ္စာဒိဝိဝိဓာကာရတော ဒဿနဋ္ဌေန ဝိပဿနာသင်္ခါတာနဉ္စ ဒွိန္နံ ဘာဝနာနံ ဒုဝိဓမ္ပိ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဒုဝိဓဘာဝနာကမ္မဿ ပဝတ္တိဋ္ဌာနတာယ ကမ္မဋ္ဌာနဘူတမာရမ္မဏံ ဥတ္တရုတ္တရယောဂကမ္မဿ ပဒဋ္ဌာနတာယ ကမ္မဋ္ဌာနဘူတံ ဘာဝနာဝီထိဉ္စ ယထာက္ကမံ သမထဝိပဿနာနုက္ကမေန ပဝက္ခာမီတိ ယောဇနာ. १. या प्रत्ययनिर्देशानंतर, नीवरणांना शांत करण्याच्या अर्थाने 'शमथ' म्हटल्या जाणाऱ्या आणि अनित्य इत्यादी विविध आकारांनी पाहण्याच्या अर्थाने 'विपश्यना' म्हटल्या जाणाऱ्या या दोन्ही भावनांच्या दोन्ही प्रकारच्या कर्मस्थानांना; दोन्ही प्रकारच्या भावनाकर्माच्या प्रवृत्तीचे स्थान असल्यामुळे कर्मस्थानरूप बनलेल्या आलंबनाला आणि उत्तरोत्तर योगाभ्यासाचे निकटचे कारण असल्यामुळे कर्मस्थानरूप बनलेल्या भावनावीथीला यथाक्रम शमथ आणि विपश्यनेच्या अनुक्रमाने सांगेन, अशी शब्दांची जुळणी (योजना) आहे. သမထကမ္မဋ္ဌာနံ शमथकर्मस्थान စရိတဘေဒဝဏ္ဏနာ चरितभेदवर्णन ၃. ရာဂေါ ဝ စရိတာ ပကတီတိ ရာဂစရိတာ. ဧဝံ ဒေါသစရိတာဒယောပိ. စရိတသင်္ဂဟောတိ မူလစရိတဝသေန ပုဂ္ဂလသင်္ဂဟော, သံသဂ္ဂဝသေန ပန တေသဋ္ဌိ စရိတာ ဟောန္တိ. ဝုတ္တဉှိ – ३. राग (आसक्ती) हाच ज्यांचा स्वभाव किंवा मूळ प्रवृत्ती आहे, ते 'रागचरित' होत. याचप्रमाणे द्वेषचरित इत्यादी देखील जाणावे. 'चरितसंग्रह' म्हणजे मूळ सहा चरितांच्या वशाने पुद्गलांचा संग्रह होय; परंतु, त्यांच्या परस्पर मिश्रणाने (संसर्गाने) त्रेसष्ट (६३) चरित होतात. जसे की म्हटले आहे - ‘‘ရာဂါဒိကေ တိကေ သတ္တ, သတ္တ သဒ္ဓါဒိကေ တိကေ; ဧကဒွိတိကမူလမှိ, မိဿတော သတ္တသတ္တက’’န္တိ. 'राग इत्यादी त्रिकामध्ये सात, श्रद्धा इत्यादी त्रिकामध्ये सात; आणि एक-मूळ, द्विमूळ व त्रिमूळ यांच्या मिश्रणाने सात वेळा सात (४९) चरित होतात.' ဧတ္ထ ဟိ ရာဂစရိတာ ဒေါသစရိတာ မောဟစရိတာ ရာဂဒေါသစရိတာ ရာဂမောဟစရိတာ ဒေါသမောဟစရိတာ ရာဂဒေါသမောဟစရိတာတိ [Pg.257] ဧဝံ ရာဂါဒိကေ တိကေ သတ္တကမေကံ. တထာ သဒ္ဓါစရိတာ ဗုဒ္ဓိစရိတာ ဝိတက္ကစရိတာ သဒ္ဓါဗုဒ္ဓိစရိတာ သဒ္ဓါဗုဒ္ဓိဝိတက္ကစရိတာ ဗုဒ္ဓိဝိတက္ကစရိတာ သဒ္ဓါဗုဒ္ဓိဝိတက္ကစရိတာတိ သဒ္ဓါဒိကေပိ တိကေ ဧကန္တိ ဧဝံ ဒွေ တိကေ အမိဿေတွာ စုဒ္ဒသ စရိတာ ဟောန္တိ. ရာဂါဒိတိကေ ပန ဧကဒွိတိကမူလဝသေန သဒ္ဓါဒိတိကေန သဟ ယောဇိတေ ရာဂသဒ္ဓါစရိတာ ရာဂဗုဒ္ဓိစရိတာ ရာဂဝိတက္ကစရိတာ ရာဂသဒ္ဓါဗုဒ္ဓိစရိတာ ရာဂသဒ္ဓါဝိတက္ကစရိတာ ရာဂဗုဒ္ဓိဝိတက္ကစရိတာ ရာဂသဒ္ဓါဗုဒ္ဓိဝိတက္ကစရိတာတိ ရာဂမူလနယေ ဧကံ သတ္တကံ, တထာ ‘‘ဒေါသသဒ္ဓါစရိတာ ဒေါသဗုဒ္ဓိစရိတာ ဒေါသဝိတက္ကစရိတာ’’တျာဒိနာ ဒေါသမူလနယေပိ ဧကံ, ‘‘မောဟသဒ္ဓါစရိတာ’’တျာဒိနာ မောဟမူလနယေပိ ဧကန္တိ ဧဝံ ဧကမူလနယေ သတ္တကတ္တယံ ဟောတိ. ယထာ စေတ္ထ, ဧဝံ ဒွိမူလကနယေပိ ‘‘ရာဂဒေါသသဒ္ဓါစရိတာ ရာဂဒေါသဗုဒ္ဓိစရိတာ ရာဂဒေါသဝိတက္ကစရိတာ’’တျာဒိနာ သတ္တကတ္တယံ. တိမူလကနယေ ပန ‘‘ရာဂဒေါသမောဟသဒ္ဓါစရိတာ’’တျာဒိနာ ဧကံ သတ္တကန္တိ ဧဝံ မိဿတော သတ္တသတ္တကဝသေန ဧကူနပညာသ စရိတာ ဟောန္တိ. ဣတိ ဣမာ ဧကူနပညာသ, ပုရိမာ စ စုဒ္ဒသာတိ တေသဋ္ဌိ စရိတာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. ကေစိ ပန ဒိဋ္ဌိယာ သဒ္ဓိံ ‘‘စတုသဋ္ဌီ’’တိ ဝဏ္ဏေန္တိ. येथे, रागचरित, द्वेषचरित, मोहचरित, रागद्वेषचरित, रागमोहचरित, द्वेषमोहचरित आणि रागद्वेषमोहचरित - अशा प्रकारे राग इत्यादी त्रिकामध्ये एक सप्तक (सात चरित) होते. तसेच, श्रद्धाचरित, बुद्धीचरित, वितर्कचरित, श्रद्धाबुद्धीचरित, श्रद्धावितर्कचरित, बुद्धीवितर्कचरित आणि श्रद्धाबुद्धीवितर्कचरित - अशा प्रकारे श्रद्धा इत्यादी त्रिकामध्ये देखील एक सप्तक होते. अशा प्रकारे या दोन्ही त्रिकांचे मिश्रण न करता चौदा (१४) चरित होतात. परंतु, राग इत्यादी त्रिकाला एक-मूळ, द्विमूळ व त्रिमूळ यांच्या वशाने श्रद्धा इत्यादी त्रिकासोबत जोडले असता: राग-श्रद्धाचरित, राग-बुद्धीचरित, राग-वितर्कचरित, राग-श्रद्धा-बुद्धीचरित, राग-श्रद्धा-वितर्कचरित, राग-बुद्धी-वितर्कचरित आणि राग-श्रद्धा-बुद्धी-वितर्कचरित - अशा प्रकारे राग-मूळ पद्धतीमध्ये एक सप्तक होते. तसेच, 'द्वेष-श्रद्धाचरित, द्वेष-बुद्धीचरित, द्वेष-वितर्कचरित' इत्यादी प्रकारे द्वेष-मूळ पद्धतीमध्ये देखील एक सप्तक होते. आणि 'मोह-श्रद्धाचरित' इत्यादी प्रकारे मोह-मूळ पद्धतीमध्ये देखील एक सप्तक होते. अशा प्रकारे एक-मूळ पद्धतीमध्ये तीन सप्तके (२१ चरित) होतात. आणि ज्याप्रमाणे येथे, त्याचप्रमाणे द्विमूळ पद्धतीमध्ये देखील 'राग-द्वेष-श्रद्धाचरित, राग-द्वेष-बुद्धीचरित, राग-द्वेष-वितर्कचरित' इत्यादी प्रकारे तीन सप्तके होतात. त्रिमूळ पद्धतीमध्ये मात्र 'राग-द्वेष-मोह-श्रद्धाचरित' इत्यादी प्रकारे एक सप्तक होते. अशा प्रकारे मिश्रणाच्या वशाने सात वेळा सात (४९) चरित होतात. अशा प्रकारे हे एकोणपन्नास (४९) आणि आधीचे चौदा (१४) मिळून त्रेसष्ट (६३) चरित जाणावेत. परंतु, काही आचार्य दृष्टीचरितासह 'चौसष्ट' (६४) चरित असल्याचे सांगतात. စရိတဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. चरितभेदवर्णन समाप्त झाले. ဘာဝနာဘေဒဝဏ္ဏနာ भावनाभेदवर्णन ၄. ဘာဝနာယ ပဋိသင်္ခါရကမ္မဘူတာ, အာဒိကမ္မဘူတာ ဝါ ပုဗ္ဗဘာဂဘာဝနာ ပရိကမ္မဘာဝနာ နာမ. နီဝရဏဝိက္ခမ္ဘနတော ပဋ္ဌာယ ဂေါတြဘူပရိယောသာနာ ကာမာဝစရဘာဝနာ ဥပစာရဘာဝနာ နာမ. အပ္ပနာယ သမီပစာရိတ္တာ ဂါမူပစာရာဒယော ဝိယ. မဟဂ္ဂတဘာဝပ္ပတ္တာ အပ္ပနာဘာဝနာ နာမ အပ္ပနာသင်္ခါတဝိတက္ကပမုခတ္တာ[Pg.258]. သမ္ပယုတ္တဓမ္မေဟိ အာရမ္မဏေ အပ္ပေန္တော ဝိယ ပဝတ္တတီတိ ဝိတက္ကော အပ္ပနာ. တထာ ဟိ သော ‘‘အပ္ပနာ ဗျပ္ပနာ’’တိ (ဓ. သ. ၇) နိဒ္ဒိဋ္ဌော. တပ္ပမုခတာဝသေန ပန သဗ္ဗေပိ မဟဂ္ဂတာနုတ္တရဈာနဓမ္မာ ‘‘အပ္ပနာ’’တိ ဝုစ္စန္တိ. ४. भावनेची (अर्पणा भावनेची) पूर्वतयारी करणारी किंवा सुरुवातीचे कार्य असणारी पूर्वभाग-भावना म्हणजे 'परिकर्मभावना' होय. नीवरणांच्या विष्कंभनापासून (दूर करण्यापासून) सुरू होऊन गोत्रभू-ज्ञानापर्यंत समाप्त होणारी कामावचर भावना म्हणजे 'उपचारभावना' होय. गावाच्या सीमेप्रमाणे ही अर्पणा भावनेच्या अगदी जवळ प्रवृत्त होत असल्यामुळे हिला उपचारभावना म्हणतात. महद्गत अवस्थेला प्राप्त झालेली भावना म्हणजे 'अर्पणाभावना' होय, कारण ती अर्पणा नावाच्या वितर्काने युक्त असते. संप्रयुक्त धर्मांना आलंबनामध्ये जणू काही खिळवून ठेवत असल्यासारखा प्रवृत्त होतो, म्हणून वितर्काला 'अर्पणा' म्हणतात. म्हणूनच तो 'अर्पणा व्यर्पणा' असा निर्दिष्ट केला आहे. परंतु, त्या वितर्काच्या प्रमुखत्वामुळे सर्वच महद्गत आणि लोकोत्तर ध्यानधर्मांना 'अर्पणा' असे म्हटले जाते. ဘာဝနာဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. भावनाभेदवर्णन समाप्त झाले. နိမိတ္တဘေဒဝဏ္ဏနာ निमित्तभेदवर्णन ၅. ပရိကမ္မဿ နိမိတ္တံ အာရမ္မဏတ္တာတိ ပရိကမ္မနိမိတ္တံ, ကသိဏမဏ္ဍလာဒိ. တဒေဝ စက္ခုနာ ဒိဋ္ဌံ ဝိယ မနသာ ဥဂ္ဂဟေတဗ္ဗံ နိမိတ္တံ, ဥဂ္ဂဏှန္တဿ ဝါ နိမိတ္တန္တိ ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တံ. တပ္ပဋိဘာဂံ ဝဏ္ဏာဒိကသိဏဒေါသရဟိတံ နိမိတ္တံ ဥပစာရပ္ပနာနံ အာရမ္မဏတ္တာတိ ပဋိဘာဂနိမိတ္တံ. ५. परिकर्म भावनेचे आलंबन असणारे निमित्त म्हणजे 'परिकर्मनिमित्त' होय, जसे की कसिणमंडल (कसिण-वर्तुळ) इत्यादी. तेच कसिणमंडल डोळ्यांनी पाहिल्याप्रमाणे मनाने ग्रहण करण्याजोगे निमित्त किंवा ग्रहण करणाऱ्याचे निमित्त म्हणजे 'उद्ग्रहनिमित्त' होय. त्या उद्ग्रहनिमित्तासारखेच असणारे, परंतु वर्ण इत्यादी कसिणदोषांनी रहित असलेले आणि उपचार व अर्पणा भावनांचे आलंबन असणारे निमित्त म्हणजे 'प्रतिभागनिमित्त' होय. ၆. ပထဝီယေဝ ကသိဏံ ဧကဒေသေ အဋ္ဌတွာ အနန္တဿ ဖရိတဗ္ဗတာယ သကလဋ္ဌေနာတိ ပထဝီကသိဏံ, ကသိဏမဏ္ဍလံ. ပဋိဘာဂနိမိတ္တံ, တဒါရမ္မဏဉ္စ ဈာနံ ‘ပထဝီကသိဏ’န္တိ ဝုစ္စတိ. တထာ အာပေါကသိဏာဒီသုပိ. တတ္ထ ပထဝါဒီနိ စတ္တာရိ ဘူတကသိဏာနိ. နီလာဒီနိ စတ္တာရိ ဝဏ္ဏကသိဏာနိ, ပရိစ္ဆိန္နာကာသော အာကာသကသိဏံ, စန္ဒာဒိအာလောကော အာလောကကသိဏန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ६. एकाच भागात मर्यादित न राहता, अनंत अवकाशात पसरवण्यायोग्य असल्यामुळे आणि संपूर्ण (अखंड) या अर्थाने पृथ्वीलाच 'कसिण' म्हटले जाते, म्हणून याला 'पथवीकसिण' (पृथ्वी कसिण) म्हणतात. कसिण मंडल, प्रतिभाग निमित्त आणि त्या प्रतिभाग निमित्ताचे आलंबन असणारे ध्यान या सर्वांना 'पथवीकसिण' असे म्हटले जाते. याचप्रमाणे आपोकसिण (जल कसिण) इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. त्या दहा कसिणांमध्ये, पृथ्वी इत्यादी चार 'भूतकसिण' (महाभूत कसिण) आहेत. नील (निळा) इत्यादी चार 'वण्णकसिण' (वर्ण कसिण) आहेत. मर्यादित आकाश हे 'आकासकसिण' (आकाश कसिण) आहे आणि चंद्र इत्यादींचा प्रकाश हा 'आलोककसिण' (प्रकाश कसिण) आहे, असे जाणावे. ၇. ဥဒ္ဓံ ဓုမာတံ သူနံ ဆဝသရီရံ ဥဒ္ဓုမာတံ, တဒေဝ ကုစ္ဆိတဋ္ဌေနဥဒ္ဓုမာတကံ. ဧဝံ သေသေသုပိ. သေတရတ္တာဒိနာ ဝိမိဿိတံ ယေဘုယျေန နီလဝဏ္ဏံ ဆဝသရီရံ ဝိနီလကံ ဝိသေသတော နီလကန္တိ ကတွာ. ဝိဿဝန္တပုဗ္ဗကံ ဝိပုဗ္ဗကံ. မဇ္ဈေ ဒွိဓာ ဆိန္နံ ဝိစ္ဆိဒ္ဒကံ. သောဏသိင်္ဂါလာဒီဟိ ဝိဝိဓာကာရေန ခါယိတံ [Pg.259] ဝိက္ခာယိတကံ. သောဏသိင်္ဂါလာဒီဟိ ဝိဝိဓေနာကာရေန ခဏ္ဍိတွာ တတ္ထ တတ္ထ ခိတ္တံ ဝိက္ခိတ္တကံ. ကာကပဒါဒိအာကာရေန သတ္ထေန ဟနိတွာ ဝိဝိဓံ ခိတ္တံ ဟတဝိက္ခိတ္တကံ. လောဟိတပဂ္ဃရဏကံ လောဟိတကံ. ကိမိကုလပဂ္ဃရဏကံ ပုဠဝကံ. အန္တမသော ဧကမ္ပိ အဋ္ဌိ အဋ္ဌိကံ. ७. मृत्यूनंतर फुगलेले (सुजलेले) प्रेत म्हणजे 'उद्धुमात' होय; आणि तेच प्रेत घृणास्पद अर्थाने 'उद्धुमातक' म्हटले जाते. उर्वरित (विनीलक इत्यादी) शब्दांच्या बाबतीतही असेच समजावे. पांढऱ्या, लाल इत्यादी रंगांनी संमिश्रित आणि प्रामुख्याने निळसर रंगाचे झालेले प्रेत, जे विशेषतः निळे पडलेले असते, त्याला 'विनीलक' म्हणतात. पू वाहणाऱ्या प्रेताला 'विपुब्बक' म्हणतात. मधोमध दोन तुकड्यांत कापलेल्या प्रेताला 'विच्छिद्द्क' म्हणतात. कुत्रे, कोल्हे इत्यादी प्राण्यांनी विविध प्रकारे खाल्लेल्या प्रेताला 'विक्खायितक' म्हणतात. कुत्रे, कोल्हे इत्यादींनी वेगवेगळ्या प्रकारे तोडून इकडेतिकडे फेकून दिलेल्या प्रेताला 'विक्खित्तक' म्हणतात. कावळ्याच्या पावलांच्या आकारासारखे शस्त्राने वार करून छिन्नविच्छिन्न करून टाकलेल्या प्रेताला 'हतविक्खित्तक' म्हणतात. रक्त वाहणाऱ्या प्रेताला 'लोहितक' म्हणतात. किडे आणि अळ्यांनी भरलेल्या प्रेताला 'पुळुवक' म्हणतात. अगदी शेवटी उरलेल्या एका हाडालाही 'अट्ठिक' (अस्थी) म्हणतात. ၈. အနု အနု သရဏံ အနုဿတိ, အရဟတာဒိဗုဒ္ဓဂုဏာရမ္မဏာ အနုဿတိ ဗုဒ္ဓါနုဿတိ. သွာက္ခာတတာဒိဓမ္မဂုဏာရမ္မဏာ အနုဿတိ ဓမ္မာနုဿတိ. သုပ္ပဋိပန္နတာဒိသံဃဂုဏာရမ္မဏာ အနုဿတိ သံဃာနုဿတိ. အခဏ္ဍတာဒိနာ သုပရိသုဒ္ဓဿ အတ္တနော သီလဂုဏဿ အနုဿရဏံ သီလာနုဿတိ. ဝိဂတမလမစ္ဆေရတာဒိဝသေန အတ္တနော စာဂါနုဿရဏံ စာဂါနုဿတိ. ‘‘ယေဟိ သဒ္ဓါဒီဟိ သမန္နာဂတာ ဒေဝါ ဒေဝတ္တံ ဂတာ, တာဒိသာ ဂုဏာ မယိ သန္တီ’’တိ ဧဝံ ဒေဝတာ သက္ခိဋ္ဌာနေ ဌပေတွာ အတ္တနော သဒ္ဓါဒိဂုဏာနုဿရဏံ ဒေဝတာနုဿတိ. သဗ္ဗဒုက္ခူပသမဘူတဿ နိဗ္ဗာနဿ ဂုဏာနုဿရဏံ ဥပသမာနုဿတိ. ဇီဝိတိန္ဒြိယုပစ္ဆေဒဘူတဿ မရဏဿ အနုဿရဏံ မရဏာနုဿတိ. ကေသာဒိကာယကောဋ္ဌာသေ ဂတာ ပဝတ္တာ သတိ ကာယဂတာသတိ. အာနဉ္စ အပါနဉ္စ အာနာပါနံ, အဿာသပဿာသာ, တဒါရမ္မဏာ သတိ အာနာပါနဿတိ. ८. वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'अनुस्सति' (अनुस्मृती) होय. अर्हत्त्व इत्यादी बुद्धांच्या गुणांचे आलंबन करून वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'बुद्धानुस्सति' (बुद्धानुस्मृती) होय. स्वाख्यातत्व इत्यादी धर्माच्या गुणांचे आलंबन करून वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'धम्मानुस्सति' (धर्मानुस्मृती) होय. सुप्रतिपन्नत्व इत्यादी संघाच्या गुणांचे आलंबन करून वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'संघानुस्सति' (संघानुस्मृती) होय. अखंडत्व इत्यादी गुणांनी अत्यंत शुद्ध असलेल्या स्वतःच्या शील गुणांचे वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'शीलानुस्सति' (शीलानुस्मृती) होय. लोभ आणि मत्सराचा मळ दूर झाल्यामुळे स्वतःच्या त्याग (दान) गुणाचे वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'चागानुस्सति' (त्यागानुस्मृती) होय. 'ज्या श्रद्धा इत्यादी गुणांनी युक्त होऊन देव देवलोकाला प्राप्त झाले, तसे गुण माझ्यातही विद्यमान आहेत,' अशा प्रकारे देवांना साक्षी ठेवून स्वतःच्या श्रद्धा इत्यादी गुणांचे वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'देवतानुस्सति' (देवतानुस्मृती) होय. सर्व दुःखांच्या उपशम स्वरूप असणाऱ्या निर्वाणाच्या गुणांचे वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'उपसमानुस्सति' (उपशमानुस्मृती) होय. जीवितेंद्रियाचा नाश करणाऱ्या मृत्यूचे वारंवार स्मरण करणे म्हणजे 'मरणानुस्सति' (मरणानुस्मृती) होय. केस इत्यादी शरीराच्या ३२ भागांवर केंद्रित असणारी स्मृती म्हणजे 'कायगतासति' (कायगतास्मृती) होय. बाहेर जाणारा श्वास आणि आत येणारा श्वास म्हणजे आनापान (उच्छ्वास-निःश्वास) होय; त्याचे आलंबन असणारी स्मृती म्हणजे 'आनापानस्सति' (आनापानस्मृती) होय. ၉. မိဇ္ဇတိ သိနိယှတီတိ မေတ္တာ, မိတ္တေသု ဘဝါတိ ဝါ မေတ္တာ, သာ သတ္တာနံ ဟိတသုခူပသံဟရဏလက္ခဏာ. ပရဒုက္ခာပနယနကာမတာလက္ခဏာ ကရုဏာ. ပရသမ္ပတ္တိပမောဒလက္ခဏာ မုဒိတာ. ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌေသု မဇ္ဈတ္တာကာရပ္ပဝတ္တိလက္ခဏာ ဥပေက္ခာ. အပ္ပမာဏသတ္တာရမ္မဏတ္တာ အပ္ပမညာ. ဥတ္တမဝိဟာရဘာဝတော, ဥတ္တမာနံ ဝါ ဝိဟာရဘာဝတော ဗြဟ္မဝိဟာရော. ९. जी स्नेह करते किंवा जिच्यामुळे मन स्निग्ध होते, ती 'मेत्ता' (मैत्री) होय; किंवा जी मित्रांच्या प्रति निर्माण होते, ती 'मेत्ता' होय. ती प्राण्यांच्या हित आणि सुखाची इच्छा करण्याचे लक्षण असणारी आहे. दुसऱ्यांचे दुःख दूर करण्याची इच्छा असणे हे 'करुणा' चे लक्षण आहे. दुसऱ्यांच्या समृद्धीवर आनंदित होणे हे 'मुदिता' चे लक्षण आहे. इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये तटस्थ राहणे हे 'उपेक्षा' चे लक्षण आहे. अमर्याद प्राण्यांचे आलंबन असल्यामुळे याला 'अप्पमञ्ञा' (अप्रमाण) म्हणतात. श्रेष्ठ विहार असल्यामुळे किंवा श्रेष्ठ व्यक्तींचा विहार असल्यामुळे याला 'ब्रह्मविहार' म्हणतात. ၁၀. ဂမနပရိယေသနပရိဘောဂါဒိပစ္စဝေက္ခဏဝသေန [Pg.260] ကဗဠီကာရာဟာရေ ပဋိကူလန္တိ ပဝတ္တာ သညာ အာဟာရေ ပဋိကူလသညာ. १०. अन्न शोधण्यासाठी जाणे, ते मिळवणे, त्याचे सेवन करणे इत्यादींच्या चिंतनाद्वारे कवलीकार आहाराच्या (अन्नाच्या) प्रति 'हा प्रतिकूल आहे' अशी निर्माण होणारी संज्ञा म्हणजे 'आहारे पटिकूलसञ्ञा' (आहारातील प्रतिकूल संज्ञा) होय. ၁၁. ပထဝီဓာတုအာဒီနံ စတုန္နံ ဓာတူနံ သလက္ခဏတော ကေသာဒိသသမ္ဘာရာဒိတော စ ဝဝတ္ထာနံ စတုဓာတုဝဝတ္ထာနံ. ११. पृथ्वीधातू इत्यादी चार धातूंचे त्यांच्या स्वतःच्या लक्षणांवरून आणि केस इत्यादी अवयवांच्या रचनेवरून विश्लेषण (निश्चिती) करणे म्हणजे 'चतुधातुववत्थान' (चार धातूंचे विश्लेषण) होय. ၁၂. အရူပေ အာရမ္မဏေ ပဝတ္တာ အာရုပ္ပာ. १२. अरूप आलंबनावर प्रवृत्त होणारे ध्यान म्हणजे 'आरुप्प' (अरूप ध्यान) होय. နိမိတ္တဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. निमित्त-भेदाचे वर्णन समाप्त झाले. သပ္ပာယဘေဒဝဏ္ဏနာ सप्पाय (अनुकूलता) भेदाचे वर्णन ၁၃. ဣဒါနိ တဿ တဿ ပုဂ္ဂလဿ စရိတာနုကူလကမ္မဋ္ဌာနံ ဒဿေတုံ ‘‘စရိတာသု ပနာ’’တျာဒိမာဟ. ရာဂေါ ဝ စရိတံ ပကတိ ဧတဿာတိ ရာဂစရိတော, ရာဂဗဟုလော ပုဂ္ဂလော, ရာဂဿ ဥဇုဝိပစ္စနီကဘာဝတော အသုဘကမ္မဋ္ဌာနံ တဿ သပ္ပာယံ. အာနာပါနံ မောဟစရိတဿ, ဝိတက္ကစရိတဿ စ သပ္ပာယံ ဗုဒ္ဓိဝိသယဘာဝေန မောဟပ္ပဋိပက္ခတ္တာ, ဝိတက္ကသန္ဓာဝနဿ နိဝါရကတ္တာ စ. ဆ ဗုဒ္ဓါနုဿတိအာဒယော သဒ္ဓါစရိတဿ သပ္ပာယာ သဒ္ဓါဝုဒ္ဓိဟေတုဘာဝတော. १३. आता त्या त्या व्यक्तीच्या स्वभावाला (चरित्राला) अनुकूल असणारे कर्मस्थान दाखवण्यासाठी 'चरितासु पन' इत्यादी म्हटले आहे. राग (आसक्ती) हाच ज्याचा स्वभाव किंवा प्रकृती आहे, तो 'रागचरित' (अत्यंत आसक्त व्यक्ती) होय. रागाचा थेट विरोधी असल्यामुळे अशुभाचे कर्मस्थान त्याच्यासाठी अनुकूल आहे. आनापान हे मोहचरित (अज्ञानी स्वभाव) आणि वितर्कचरित (चंचल विचार असणारा स्वभाव) असणाऱ्यांसाठी अनुकूल आहे; कारण ते बुद्धीचा विषय असल्यामुळे मोहाचे विरोधी आहे आणि वितर्कांच्या चंचलतेला रोखणारे आहे. बुद्धानुस्मृती इत्यादी सहा कर्मस्थाने श्रद्धाचरित (श्रद्धाळू स्वभाव) असणाऱ्यांसाठी अनुकूल आहेत, कारण ती श्रद्धेच्या वृद्धीला कारणीभूत ठरतात. ၁၇. မရဏဥပသမသညာဝဝတ္ထာနာနိ ဗုဒ္ဓိစရိတဿ သပ္ပာယာနိ ဂမ္ဘီရဘာဝတော ဗုဒ္ဓိယာ ဧဝ ဝိသယတ္တာ. १७. मरणानुस्मृती, उपशमानुस्मृती, आहारातील प्रतिकूल संज्ञा आणि चार धातूंचे विश्लेषण ही कर्मस्थाने बुद्धीचरित (बुद्धिमान स्वभाव) असणाऱ्यांसाठी अनुकूल आहेत; कारण ती गहन असल्यामुळे केवळ बुद्धीचाच विषय आहेत. ၁၈. သေသာနီတိ စတုဗ္ဗိဓဘူတကသိဏအာကာသအာလောကကသိဏအာရုပ္ပစတုက္ကဝသေန ဒသဝိဓာနိ. တတ္ထာပီတိ တေသု ဒသသု ကမ္မဋ္ဌာနေသု. ပုထုလံ မောဟစရိတဿ သပ္ပာယံ သမ္ဗာဓေ ဩကာသေ စိတ္တဿ ဘိယျောသောမတ္တာယ သမ္မုယှနတော. ခုဒ္ဒကံ ဝိတက္ကစရိတဿ သပ္ပာယံ မဟန္တာရမ္မဏဿ ဝိတက္ကသန္ဓာဝနပစ္စယတ္တာ. ဥဇုဝိပစ္စနီကတော စေဝ အတိသပ္ပာယတာယ [Pg.261] စေတံ ဝုတ္တံ. ရာဂါဒီနံ ပန အဝိက္ခမ္ဘိကာ, သဒ္ဓါဒီနံ ဝါ အနုပကာရိကာ ကသိဏာဒိဘာဝနာ နာမ နတ္ထိ. १८. 'उर्वरित' म्हणजे चार प्रकारचे भूतकसिण, आकाशकसिण, आलोककसिण आणि चार अरूप ध्यानांच्या स्वरूपातील दहा प्रकारची कर्मस्थाने होत. 'त्यामध्येही' म्हणजे त्या दहा कर्मस्थानांमध्ये, विस्तीर्ण (मोठे) कसिण मंडल हे मोहचरित असणाऱ्यांसाठी अनुकूल आहे; कारण अरुंद जागेत चित्त अधिक प्रमाणात गोंधळात पडते. लहान कसिण मंडल हे वितर्कचरित असणाऱ्यांसाठी अनुकूल आहे; कारण मोठे आलंबन हे वितर्कांच्या चंचलतेला कारणीभूत ठरते. हे थेट विरोधी असल्यामुळे आणि अत्यंत अनुकूल असल्यामुळे सांगितले आहे. परंतु, राग इत्यादी क्लेशांचे दमन न करणारी किंवा श्रद्धा इत्यादी गुणांना उपकारक न ठरणारी अशी कोणतीही कसिण इत्यादी भावना नाही. သပ္ပာယဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. सप्पाय (अनुकूलता) भेदाचे वर्णन समाप्त झाले. ဘာဝနာဘေဒဝဏ္ဏနာ भावना-भेदाचे वर्णन ၁၉. သဗ္ဗတ္ထာပီတိ စတ္တာလီသကမ္မဋ္ဌာနေသုပိ နတ္ထိ အပ္ပနာ, ဗုဒ္ဓဂုဏာဒီနံ ပရမတ္ထဘာဝတော, အနေကဝိဓတ္တာ, ဧကဿပိ ဂမ္ဘီရဘာဝတော စ. ဗုဒ္ဓါနုဿတိအာဒီသု ဒသသု ကမ္မဋ္ဌာနေသု အပ္ပနာဝသေန သမာဓိဿ ပတိဋ္ဌာတုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ အပ္ပနာဘာဝံ အပ္ပတွာ သမာဓိ ဥပစာရဘာဝေန ပတိဋ္ဌာတိ. လောကုတ္တရသမာဓိ, ပန ဒုတိယစတုတ္ထာရုပ္ပသမာဓိ စ သဘာဝဓမ္မေပိ ဘာဝနာဝိသေသဝသေန အပ္ပနံ ပါပုဏာတိ. ဝိသုဒ္ဓိဘာဝနာနုက္ကမဝသေန ဟိ လောကုတ္တရော အပ္ပနံ ပါပုဏာတိ. အာရမ္မဏသမတိက္ကမဘာဝနာဝသေန အာရုပ္ပသမာဓိ. အပ္ပနာပ္ပတ္တဿေဝ ဟိ စတုတ္ထဇ္ဈာနသမာဓိနော အာရမ္မဏသမတိက္ကမနမတ္တံ ဟောတိ. १९. 'सर्व ठिकाणीही' म्हणजे चाळीसही कर्मस्थानांमध्ये अप्पणा (अर्पणा) समाधी नसते; कारण बुद्धांचे गुण इत्यादी परमार्थ स्वरूपाचे असल्यामुळे, अनेक प्रकारचे असल्यामुळे आणि एकाच गुणाच्या गहनतेमुळे देखील. बुद्धानुस्मृती इत्यादी दहा कर्मस्थानांमध्ये अप्पणाच्या स्वरूपात समाधी प्रस्थापित होणे अशक्य असल्यामुळे, अप्पणा अवस्थेला प्राप्त न होता समाधी केवळ उपचार समाधीच्या स्वरूपात प्रस्थापित होते. परंतु, लोकोत्तर समाधी आणि द्वितीय व चतुर्थ अरूप समाधी स्वभावधर्माच्या (परमार्थ सत्याच्या) आलंबनावर देखील विशेष भावनेच्या बळावर अप्पणा अवस्थेला प्राप्त होतात. कारण विशुद्धी आणि भावनेच्या क्रमाने लोकोत्तर समाधी अप्पणाला प्राप्त होते. आलंबनाचे अतिक्रमण करण्याच्या भावनेमुळे अरूप समाधी अप्पणाला प्राप्त होते. कारण अप्पणा प्राप्त झालेल्या चतुर्थ ध्यान समाधीचे केवळ आलंबनाचे अतिक्रमण करणे एवढेच कार्य असते. ၂၁. ပဉ္စပိ ဈာနာနိ ဧတေသမတ္ထိ, တတ္ထ နိယုတ္တာနီတိ ဝါ ပဉ္စကဇ္ဈာနိကာနိ. २१. ज्यांच्यामध्ये पाचही ध्याने असतात किंवा जे त्या पाच ध्यानांशी जोडलेले असतात, त्यांना 'पंचकज्झानिक' (पाच ध्यानांचे विषय असणारे) म्हणतात. ၂၂. အသုဘဘာဝနာယ ပဋိကူလာရမ္မဏတ္တာ စဏ္ဍသောတာယ နဒိယာ အရိတ္တဗလေန နာဝါ ဝိယ ဝိတက္ကဗလေနေဝ တတ္ထ စိတ္တံ ပဝတ္တတီတိ အသုဘကမ္မဋ္ဌာနေ အဝိတက္ကဇ္ဈာနာသမ္ဘဝတော ‘‘ပဌမဇ္ဈာနိကာ’’တိ ဝုတ္တံ. २२. अशुभाची भावना ही प्रतिकूल आलंबन असणारी असल्यामुळे, वेगवान प्रवाह असणाऱ्या नदीत वल्ह्याच्या बळावर नाव चालते त्याप्रमाणे, केवळ वितर्काच्या बळावरच तिथे चित्त प्रवृत्त होते. म्हणून अशुभाच्या कर्मस्थानात वितर्करहित ध्यान संभवत नसल्यामुळे याला 'प्रथमध्यानिक' (केवळ प्रथम ध्यानाचे विषय असणारे) म्हटले आहे. ၂၃. မေတ္တာကရုဏာမုဒိတာနံ ဒေါမနဿသဟဂတဗျာပါဒဝိဟိံသာနဘိရတီနံ ပဟာယကတ္တာ ဒေါမနဿပ္ပဋိပက္ခေန သောမနဿေနေဝ သဟဂတတာ ယုတ္တာတိ ‘‘မေတ္တာဒယော တယော စတုက္ကဇ္ဈာနိကာ’’တိ ဝုတ္တာ. २३. मैत्री, करुणा आणि मुदिता हे दौर्मनस्याने युक्त असणारे व्यापाद (द्वेष), विहिंसा (हिंसा) आणि अनभिरती (अरुची) यांचे नाश करणारे असल्यामुळे, दौर्मनस्याच्या विरोधी असणाऱ्या सौमनस्यानेच (आनंदानेच) युक्त असणे योग्य आहे. म्हणून 'मैत्री इत्यादी तीन भावना चतुर्थ ध्यानापर्यंतच्या (चतुक्कज्झानिक) आहेत' असे म्हटले आहे. ၂၄. ‘‘သဗ္ဗေ [Pg.262] သတ္တာ သုခိတာ ဟောန္တု, ဒုက္ခာ မုစ္စန္တု, လဒ္ဓသုခသမ္ပတ္တိတော မာ ဝိဂစ္ဆန္တူ’’တိ မေတ္တာဒိဝသပ္ပဝတ္တဗျာပါရတ္တယံ ပဟာယ ကမ္မဿကတာဒဿနေန သတ္တေသု မဇ္ဈတ္တာကာရပ္ပဝတ္တဘာဝနာနိဗ္ဗတ္တာယ တတြမဇ္ဈတ္တုပေက္ခာယ ဗလဝတရတ္တာ ဥပေက္ခာဗြဟ္မဝိဟာရဿ သုခသဟဂတာသမ္ဘဝတော ‘‘ဥပေက္ခာ ပဉ္စမဇ္ဈာနိကာ’’တိ ဝုတ္တာ. २४. "सर्व प्राणी सुखी होवोत, दुःखातून मुक्त होवोत, प्राप्त झालेल्या सुख-संपत्तीपासून वंचित न होवोत" अशा प्रकारे मैत्री इत्यादींच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणाऱ्या तीन प्रकारच्या व्यापारांचा (चिंतेचा) त्याग करून, 'कर्म हेच स्वतःचे धन आहे' (कम्मस्सकता) अशा दृष्टीने प्राण्यांविषयी तटस्थ भाव (मध्यस्थ आकार) प्रवृत्त करणाऱ्या भावनेतून उत्पन्न झालेल्या 'तत्रमज्झत्तुपेक्खा' (तटस्थता) च्या अत्यंत बलवानपणामुळे, उपेक्षा ब्रह्मविहाराचा सुखाशी सहभाव असणे असंभव असल्यामुळे, "उपेक्षा ही पाचव्या ध्यानाची आहे" असे म्हटले आहे. ဘာဝနာဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. भावना-भेदाचे वर्णन समाप्त झाले. ဂေါစရဘေဒဝဏ္ဏနာ गोचर-भेदाचे वर्णन. ၂၆. ယထာရဟန္တိ တံတံအာရမ္မဏာနုရူပတော. ကဿစိ အာရမ္မဏဿ အပရိဗျတ္တတာယ ‘‘ပရိယာယေနာ’’တိ ဝုတ္တံ. २६. 'यथारहं' (यथायोग्य) म्हणजे त्या त्या आलंबनाच्या अनुरूपतेने. काही आलंबन स्पष्ट न झाल्यामुळे (अस्पष्टतेमुळे) "पर्यायाने" (परियायेन) असे म्हटले आहे. ၂၇. ကသိဏာသုဘကောဋ္ဌာသာနာပါနဿတီသွေဝ ဟိ ပရိဗျတ္တနိမိတ္တသမ္ဘဝေါတိ. २७. कारण, दहा कसिण, दहा अशुभा, कोठ्ठास (द्वात्रिंशाकार) आणि आनापानस्मृती यांमध्येच स्पष्ट निमित्ताचा संभव होतो, असे जाणावे. ၂၈. ပထဝီမဏ္ဍလာဒီသု နိမိတ္တံ ဥဂ္ဂဏှန္တဿာတိ အာဒိမှိ တာဝ စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလံ ဝိသောဓေတွာ ဒသဝိဓံ ပလိဗောဓံ ဥပစ္ဆိန္ဒိတွာ ပိယဂရုဘာဝနီယာဒိဂုဏသမန္နာဂတံ ကလျာဏမိတ္တံ ဥပသင်္ကမိတွာ အတ္တနော စရိယာနုကူလံ ကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာ အဋ္ဌာရသဝိဓံ အနနုရူပဝိဟာရံ ပဟာယ ပဉ္စင်္ဂသမန္နာဂတေ အနုရူပဝိဟာရေ ဝိဟရန္တဿ ကေသနခဟရဏာဒိခုဒ္ဒကပလိဗောဓုပစ္ဆေဒံ ကတွာ ကသိဏမဏ္ဍလာဒီနိ ပုရတော ကတွာ အာနာပါနကောဋ္ဌာသာဒီသု စိတ္တံ ဌပေတွာ နိသီဒိတွာ ‘‘ပထဝီ ပထဝီ’’တျာဒိနာ တံတံဘာဝနာနုက္ကမေန ပထဝီကသိဏာဒီသု တံတဒါရမ္မဏေသု နိမိတ္တံ ဥဂ္ဂဏှန္တဿ. အယမေတ္ထ သင်္ခေပေါ. ဝိတ္ထာရတော ပန ဘာဝနာ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂတော (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၅၄ အာဒယော) ဂဟေတဗ္ဗာ. ဒုဝိဓမ္ပိ ဟိ ဘာဝနာဝိဓာနံ ဣဓ အာစရိယေန [Pg.263] အတိသင်္ခေပတော ဝုတ္တံ, တဒတ္ထဒဿနတ္ထဉ္စ ဝိတ္ထာရနယေ အာဟရိယမာနေ အတိပ္ပပဉ္စော သိယာတိ မယမ္ပိ တံ န ဝိတ္ထာရေဿာမ. ယဒါ ပန တံ နိမိတ္တံ စိတ္တေန သမုဂ္ဂဟိတန္တိ ဧဝံ ပဝတ္တာနုပုဗ္ဗဘာဝနာဝသေန ယဒါ တံ ပရိကမ္မနိမိတ္တံ စိတ္တေန သမ္မာ ဥဂ္ဂဟိတံ ဟောတိ. မနောဒွါရဿ အာပါထမာဂတန္တိ စက္ခုံ နိမ္မီလေတွာ, အညတ္ထ ဂန္တွာ ဝါ မနသိ ကရောန္တဿ ကသိဏမဏ္ဍလသဒိသမေဝ ဟုတွာ မနောဒွါရိကဇဝနာနံ အာပါထံ အာဂတံ ဟောတိ. २८. "पठवीमंडळ इत्यादींमध्ये निमित्त ग्रहण करणाऱ्याच्या..." इत्यादी वाक्यात: प्रथम चतुपारिसुद्धिशील शुद्ध करून, दहा प्रकारच्या परिबोधांचा (अधथळ्यांचा) छेद करून, प्रिय, आदरणीय व पूजनीय इत्यादी गुणांनी युक्त अशा कल्याणमित्राकडे (गुरूंकडे) जाऊन, आपल्या चरित्राला (स्वभावाला) अनुकूल असे कर्मस्थान ग्रहण करून, अठरा प्रकारच्या अयोग्य विहारांचा (वास्तव्याचा) त्याग करून, पाच अंगांनी युक्त अशा योग्य विहारात राहत असताना, केस व नखे कापणे इत्यादी लहान अडथळ्यांचे निवारण करून, कसिणमंडळ इत्यादी समोर ठेवून, आनापान किंवा कोठ्ठास इत्यादी आलंबनांवर चित्त स्थिर करून, बसून, "पठवी, पठवी" इत्यादी त्या त्या भावनेच्या क्रमाने पठवीकसिण इत्यादी त्या त्या आलंबनांमध्ये निमित्त ग्रहण करणाऱ्या (योग्याचे हे वर्णन आहे). हा येथे संक्षेप आहे. विस्ताराने भावना विसुद्धिमग्ग मधून ग्रहण करावी. कारण दोन्ही प्रकारच्या भावनांची पद्धत येथे आचार्यांनी अत्यंत संक्षेपाने सांगितली आहे. त्याचा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी जर सविस्तर पद्धत आणली, तर अतिशय विस्तार होईल, म्हणून आम्ही देखील त्याचा विस्तार करणार नाही. "जेव्हा ते निमित्त चित्ताने ग्रहण केले जाते" (समूग्गहीतं) म्हणजे अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेल्या अनुक्रमिक भावनेच्या बळावर जेव्हा ते परिकम्म-निमित्त चित्ताने चांगल्या प्रकारे ग्रहण केले जाते. "मनोद्वाराच्या कक्षेत आलेले" (मनोद्वारस्स आपाथमागतं) म्हणजे डोळे मिटून किंवा दुसऱ्या ठिकाणी जाऊन मनन करणाऱ्या योग्याला ते कसिणमंडळासारखेच भासून मनोद्वारिक जवनांच्या कक्षेत आलेले असते. ၂၉. သမာဓိယတီတိ ဝိသေသတော စိတ္တေကဂ္ဂတာပတ္တိယာ သမာဟိတာ ဟောတိ. २९. 'समाधियति' म्हणजे विशेषतः चित्ताच्या एकाग्रतेची प्राप्ती झाल्यामुळे ते चांगल्या प्रकारे स्थिर (समाहित) होते. ၃၀. စိတ္တသမာဓာနဝသေန ပုဂ္ဂလောပိ သမာဟိတောယေဝါတိ ဝုတ္တံ ‘‘တထာ သမာဟိတဿာ’’တိ. တပ္ပဋိဘာဂန္တိ ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တသဒိသံ, တတောယေဝ ဟိ တံ ‘‘ပဋိဘာဂနိမိတ္တ’’န္တိ ဝုစ္စတိ. တံ ပန ဥဂ္ဂဟနိမိတ္တတော အတိပရိသုဒ္ဓံ ဟောတိ. ဝတ္ထုဓမ္မဝိမုစ္စိတန္တိ ပရမတ္ထဓမ္မတော ဝိမုတ္တံ, ဝတ္ထုဓမ္မတော ဝါ ကသိဏမဏ္ဍလဂတကသိဏဒေါသတော ဝိနိမုတ္တံ. ဘာဝနာယ နိဗ္ဗတ္တတ္တာ ဘာဝနာမယံ. သမပ္ပိတန္တိ သုဋ္ဌု အပ္ပိတံ. ३०. चित्त समाधानाच्या (एकाग्रतेच्या) बळावर पुद्गल (योगी) देखील समाहितच (स्थिरचित्तच) असतो, म्हणून "तशा समाहित झालेल्याचे" (तथा समाहितस्स) असे म्हटले आहे. 'तप्पटिभागं' म्हणजे उद्ग्रह-निमित्तासारखे (उग्गहनिमित्तसदिसं). त्याच कारणाने त्याला "प्रतिभाग-निमित्त" (पटिभागनिमित्त) असे म्हणतात. परंतु ते प्रतिभाग-निमित्त उद्ग्रह-निमित्तापेक्षा अत्यंत शुद्ध असते. 'वत्थुधम्मविमुच्चितं' म्हणजे परमार्थ धर्मापासून मुक्त, किंवा वस्तू-धर्मापासून म्हणजेच कसिणमंडळातील कसिणदोषांपासून पूर्णपणे मुक्त असलेले. भावनेमुळे उत्पन्न झाल्यामुळे ते 'भावनामेय' आहे. 'समप्पितं' म्हणजे चांगल्या प्रकारे अर्पित (प्रविष्ट) झालेले. ၃၁. တတော ပဋ္ဌာယာတိ ပဋိဘာဂနိမိတ္တုပ္ပတ္တိတော ပဋ္ဌာယ. ३१. 'ततो पट्ठाय' म्हणजे प्रतिभाग-निमित्ताच्या उत्पत्तीपासून आरंभ करून. ၃၃. ပဉ္စသု ဈာနင်္ဂေသု ဧကေကာရမ္မဏေ ဥပ္ပန္နာဝဇ္ဇနာနန္တရံ စတုပဉ္စဇဝနကတိပယဘဝင်္ဂတော ပရံ အဂန္တွာ အပရာပရံ ဈာနင်္ဂါဝဇ္ဇနသမတ္ထတာ အာဝဇ္ဇနဝသိတာ နာမ. သမာပဇ္ဇိတုကာမတာနန္တရံ ကတိပယဘဝင်္ဂတော ပရံ အဂန္တွာ ဥပ္ပန္နာဝဇ္ဇနာနန္တရံ သမာပဇ္ဇိတုံ သမတ္ထတာ သမာပဇ္ဇနဝသိတာ နာမ. သေတု ဝိယ သီဃသောတာယ နဒိယာ ဩဃံ ဘဝင်္ဂဝေဂံ ဥပစ္ဆိန္ဒိတွာ ယထာပရိစ္ဆိန္နကာလံ ဈာနံ ဌပေတုံ သမတ္ထတာ ဘဝင်္ဂပါတတော ရက္ခဏယောဂျတာ အဓိဋ္ဌာနဝသိတာ နာမ. ယထာ ပရိစ္ဆိန္နကာလံ အနတိက္ကမိတွာ ဈာနတော ဝုဋ္ဌာနသမတ္ထတာ ဝုဋ္ဌာနဝသိတာ နာမ. အထ ဝါ ယထာပရိစ္ဆိန္နကာလတော ဥဒ္ဓံ ဂန္တုံ အဒတွာ ဌပနသမတ္ထတာ အဓိဋ္ဌာနဝသိတာ [Pg.264] နာမ. ယထာပရိစ္ဆိန္နကာလတော အန္တော အဝုဋ္ဌဟိတွာ ယထာကာလဝသေနေဝ ဝုဋ္ဌာနသမတ္ထတာ ဝုဋ္ဌာနဝသိတာ နာမာတိ အလမတိပ္ပပဉ္စေန. ပစ္စဝေက္ခဏဝသိတာ ပန အာဝဇ္ဇနဝသိတာယ ဧဝ သိဒ္ဓါ. အာဝဇ္ဇနာနန္တရဇဝနာနေဝ ဟိ ပစ္စဝေက္ခဏဇဝနာနိ နာမ. ဝိတက္ကာဒိဩဠာရိကင်္ဂံ ပဟာနာယာတိ ဒုတိယဇ္ဈာနာဒီဟိ ဝိတက္ကာဒိဩဠာရိကင်္ဂါနံ ဈာနက္ခဏေ အနုပ္ပာဒါယ. ပဒဟတောတိ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ. တဿ ပန ဥပစာရဘာဝနာ နိပ္ဖန္နာ နာမ ဟောတိ ဝိတက္ကာဒီသု နိကန္တိဝိက္ခမ္ဘနတော ပဋ္ဌာယာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ယထာရဟန္တိ တံတံဈာနိကကသိဏာဒိအာရမ္မဏာနုရူပံ. ३३. पाच ध्यान-अंगांपैकी एकेका आलंबनावर उत्पन्न झालेल्या आवर्जनानंतर, चार-पाच जवन आणि काही भवांगांच्या पलीकडे न जाता, वारंवार ध्यान-अंगांचे आवर्जन करण्याची जी क्षमता, तिला 'आवर्जन-वशीलता' (आवर्जनवसिता) म्हणतात. ध्यान समापन्न होण्याच्या (प्रवेश करण्याच्या) इच्छेनंतर, काही भवांगांच्या पलीकडे न जाता, उत्पन्न झालेल्या आवर्जनानंतर लगेचच ध्यानात समापन्न होण्याची (प्रवेश करण्याची) जी क्षमता, तिला 'समापत्ती-वशीलता' (समापज्जनवसिता) म्हणतात. वेगवान प्रवाहाच्या नदीचा पूर धरणाने अडवावा त्याप्रमाणे, भवांगाचा वेग रोखून धरून, निश्चित केलेल्या वेळेपर्यंत ध्यान टिकवून ठेवण्याची जी क्षमता, म्हणजेच भवांगात पडण्यापासून चित्ताचे रक्षण करण्याची योग्यता, तिला 'अधिष्ठान-वशीलता' (अधिट्ठानवसिता) म्हणतात. निश्चित केलेली वेळ न ओलांडता ध्यानातून उठण्याची (बाहेर पडण्याची) जी क्षमता, तिला 'उत्थान-वशीलता' (वुट्ठानवसिता) म्हणतात. अथवा, निश्चित केलेल्या वेळेच्या पलीकडे ध्यान जाऊ न देता ते थांबवून ठेवण्याची क्षमता म्हणजे 'अधिष्ठान-वशीलता' होय. निश्चित केलेल्या वेळेच्या आधी बाहेर न पडता, ठरवलेल्या वेळेनुसारच बाहेर पडण्याची क्षमता म्हणजे 'उत्थान-वशीलता' होय. आता अतिविस्ताराची गरज नाही. परंतु, 'प्रत्यवेक्षण-वशीलता' (पच्चवेक्खणवसिता) ही आवर्जन-वशीलतेमुळेच सिद्ध होते. कारण आवर्जनानंतर लगेचच उत्पन्न होणारी जवने हीच प्रत्यवेक्षण-जवने होत. 'वितर्क इत्यादी स्थूल अंगांच्या प्रहाणासाठी' (वितक्कादिओळारिकङ्गं पहानाय) म्हणजे द्वितीय ध्यान इत्यादींद्वारे वितर्क इत्यादी स्थूल ध्यान-अंगांची ध्यानाच्या क्षणी अनुत्पत्ती होण्यासाठी. 'प्रयत्न करणाऱ्याच्या' (पदहतो) म्हणजे परिकर्म करणाऱ्याच्या. परंतु, वितर्क इत्यादींमधील आसक्ती दूर केल्यापासून आरंभ करून त्या योग्याची 'उपचार-भावना' निष्पन्न होते, असे समजावे. 'यथारहं' म्हणजे त्या त्या ध्यानाच्या कसिण इत्यादी आलंबनांच्या अनुरूप. ၃၆. အာကာသကသိဏဿ ဥဂ္ဃာဋေတုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ ဝုတ္တံ ‘‘အာကာသဝဇ္ဇိတေသူ’’တိ. ကသိဏန္တိ ကသိဏပဋိဘာဂနိမိတ္တံ. ဥဂ္ဃာဋေတွာတိ အမနသိကာရဝသေန ဥဒ္ဓရိတွာ. အနန္တဝသေန ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿာတိ ‘‘အနန္တံ အာကာသံ, အနန္တံ အာကာသ’’န္တိ အာကာသံ အာရဗ္ဘ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ, န ပန ကေဝလံ ‘‘အနန္တံ အနန္တ’’န္တိ. ဧဝံ ဝိညာဏဉ္စာယတနေပိ. ‘‘အနန္တ’’န္တိ အဝတွာပိ ‘‘အာကာသော အာကာသော (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၂၇၆), ဝိညာဏံ ဝိညာဏ’’န္တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၂၈၁) မနသိ ကာတုံ ဝဋ္ဋတီတိ အာစရိယာ. ३६. आकाशकसिण बाजूला सारणे (हटावणे) अशक्य असल्यामुळे "आकाश वगळता इतर कसिणांमध्ये" (आकासवज्जितकसिणेसु) असे म्हटले आहे. 'कसिणं' म्हणजे कसिण-प्रतिभाग-निमित्त. 'उग्घाटेतवा' म्हणजे मनसिकार न करण्याच्या (लक्ष न देण्याच्या) द्वारे बाजूला सारून. 'अनंत रूपाने परिकर्म करणाऱ्याच्या' म्हणजे "अनंत आकाश, अनंत आकाश" अशा प्रकारे आकाशाला आलंबन करून परिकर्म करणाऱ्याच्या; केवळ "अनंत, अनंत" असे नव्हे. अशाच प्रकारे विज्ञानांचायतनात देखील समजावे. "अनंत" असे न म्हणता देखील "आकाश, आकाश", "विज्ञान, विज्ञान" असे मनसिकार करणे योग्य आहे, असे आचार्य म्हणतात. ၃၉. ‘‘သန္တမေတံ, ပဏီတမေတ’’န္တိ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿာတိ အဘာဝမတ္တာရမ္မဏတာယ ‘‘ဧတံ သန္တံ, ဧတံ ပဏီတ’’န္တိ ဘာဝေန္တဿ. ३९. "हे शांत आहे, हे प्रणीत (उत्कृष्ट) आहे" अशा प्रकारे परिकर्म करणाऱ्याच्या म्हणजे केवळ अभावरूप आलंबन असल्यामुळे "हे शांत आहे, हे प्रणीत आहे" अशी भावना करणाऱ्या योग्याच्या. ၄၀. အဝသေသေသု စာတိ ကသိဏာဒီဟိ သဟ အပ္ပနာဝဟကမ္မဋ္ဌာနတော အဝသေသေသု ဗုဒ္ဓါနုဿတိအာဒီသု အဋ္ဌသု[Pg.265], သညာဝဝတ္ထာနေသု စာတိ ဒသသု ကမ္မဋ္ဌာနေသု. ပရိကမ္မံ ကတွာတိ ‘‘သော ဘဂဝါ ဣတိပိ အရဟံ, ဣတိပိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ’’တျာဒိနာ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၁.၁၂၄) ဝုတ္တဝိဓာနေန ပရိကမ္မံ ကတွာ. သာဓုကမုဂ္ဂဟိတေတိ ဗုဒ္ဓါဒိဂုဏနိန္နပေါဏပဗ္ဘာရစိတ္တတာဝသေန သုဋ္ဌု ဥဂ္ဂဟိတေ. ပရိကမ္မဉ္စ သမာဓိယတီတိ ပရိကမ္မဘာဝနာ သမာဟိတာ နိပ္ဖဇ္ဇတိ. ဥပစာရော စ သမ္ပဇ္ဇတီတိ နီဝရဏာနိ ဝိက္ခမ္ဘေန္တော ဥပစာရသမာဓိ စ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. ४०. "उरलेल्यांमध्ये" (अवसेसेसु च) म्हणजे कसिण इत्यादींसह अप्पना (अर्पणा समाधी) प्राप्त करून देणाऱ्या कर्मस्थानांशिवाय उरलेल्या बुद्धानुस्मृती इत्यादी आठ कर्मस्थानांमध्ये, आणि संज्ञा (आहारे पटिकूलसञ्ञा) व व्यवस्थान (चतुधातुववत्थान) या दोन कर्मस्थानांमध्ये, अशा एकूण दहा कर्मस्थानांमध्ये. "परिकर्म करून" (परिकम्मं कत्वा) म्हणजे "ते भगवान असेही अर्हत आहेत, असेही सम्यक्संबुद्ध आहेत" इत्यादी विसुद्धिमग्ग मध्ये सांगितलेल्या विधीनुसार परिकर्म करून. "चांगल्या प्रकारे ग्रहण केल्यावर" (साधुकमुग्गहिते) म्हणजे बुद्ध इत्यादींच्या गुणांकडे झुकलेल्या चित्ताच्या अवस्थेमुळे चांगल्या प्रकारे ग्रहण केल्यावर. "परिकर्म समाहित होते" (परिकम्मञ्च समाधियति) म्हणजे परिकर्म-भावना चांगल्या प्रकारे एकाग्र (निष्पन्न) होते. "आणि उपचार समाधी प्राप्त होते" (उपचारो च सम्पज्जति) म्हणजे नीवरणांचे दमन (विक्षंभन) करत उपचार समाधी देखील उत्पन्न होते. ၄၁. အဘိညာဝသေန ပဝတ္တမာနန္တိ အဘိဝိသေသတော ဇာနနဋ္ဌေန အဘိညာသင်္ခါတံ ဣဒ္ဓိဝိဓာဒိပဉ္စလောကိယာဘိညာဝသေန ပဝတ္တမာနံ, အဘိညာပါဒကပဉ္စမဇ္ဈာနာ ဝုဋ္ဌဟိတွာတိ ကသိဏာနုလောမာဒီဟိ စုဒ္ဒသဟာကာရေဟိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၃၆၅) စိတ္တံ ပရိဒမေတွာ အဘိနီဟာရက္ခမံ ကတွာ ဥပေက္ခေကဂ္ဂတာယောဂတော အနုရူပတ္တာ စ ရူပါဝစရပဉ္စမဇ္ဈာနမေဝ အဘိညာနံ ပါဒကံ ပတိဋ္ဌာဘူတံ ပထဝါဒိကသိဏာရမ္မဏံ ပဉ္စမဇ္ဈာနံ, တံ သမာပဇ္ဇိတွာ တတော ဝုဋ္ဌာယ. အဓိဋ္ဌေယျာဒိကမာဝဇ္ဇေတွာတိ ဣဒ္ဓိဝိဓဉာဏဿ ပရိကမ္မကာလေ အဓိဋ္ဌာတဗ္ဗံ ဝိကုဗ္ဗနီယံ သတာဒိကံ ကောမာရရူပါဒိကံ, ဒိဗ္ဗသောတဿ ပရိကမ္မကာလေ ထူလသုခုမဘေဒံ သဒ္ဒံ, စေတောပရိယဉာဏဿ ပရိကမ္မကာလေ ပရဿ ဟဒယင်္ဂတဝဏ္ဏဒဿနေန သရာဂါဒိဘေဒံ စိတ္တံ, ပုဗ္ဗေနိဝါသာနုဿတိဉာဏဿ ပရိကမ္မသမယေ ပုရိမဘဝေသု စုတိစိတ္တာဒိဘေဒံ ပုဗ္ဗေ နိဝုတ္ထက္ခန္ဓံ, ဒိဗ္ဗစက္ခုဿ ပရိကမ္မသမယေ ဩဘာသဖရိတဋ္ဌာနဂတံ ရူပံ ဝါ အာဝဇ္ဇေတွာ. ४१. ‘अभिज्ञावशेन प्रवर्त्तमानम्’ म्हणजे विशेष रूपाने जाणण्याच्या अर्थाने ‘अभिज्ञा’ म्हटल्या जाणाऱ्या इद्धिविध इत्यादी पाच लौकिक अभिज्ञांच्या प्रभावाने प्रवृत्त होणारे. ‘अभिज्ञापादक पंचमध्यानातून उठून’ म्हणजे कसिण अनुलोम इत्यादी चौदा प्रकारांनी चित्ताला वश करून, चित्ताला अभिज्ञेकडे वळवण्यास सक्षम करून, उपेक्षा व एकाग्रतेच्या योगामुळे आणि अभिज्ञेच्या अनुरूप असल्यामुळे रूपावचर पंचम ध्यानच, जे अभिज्ञांचे पादक (पाया) व अधिष्ठान आहे आणि पृथ्वी इत्यादी कसिण हेच ज्याचे आलंबन आहे अशा पंचम ध्यानात समापन्न होऊन व त्यातून उठून. ‘अधिष्ठेय इत्यादींचे आवर्जन करून’ म्हणजे इद्धिविध ज्ञानाच्या परिकर्म काळात अधिष्ठान करण्यास योग्य, विकुर्वण करण्यास योग्य असे शंभर इत्यादी रूपे किंवा कुमार इत्यादींचे रूप; दिव्यश्रोताच्या परिकर्म काळात स्थूल व सूक्ष्म भेद असलेल्या शब्दांचे; चेतोपरिय ज्ञानाच्या परिकर्म काळात दुसऱ्याच्या हृदयातील रक्ताच्या रंगाचे दर्शन घेऊन सराग इत्यादी भेद असलेल्या चित्ताचे; पूर्वेनिवासानुस्मृती ज्ञानाच्या परिकर्म समयात पूर्व जन्मांमधील च्युती चित्त इत्यादी भेद असलेल्या पूर्वी निवास केलेल्या स्कंधांचे; किंवा दिव्यचक्षूच्या परिकर्म समयात प्रकाशाने व्यापलेल्या ठिकाणी असलेल्या रूपाचे आवर्जन करून. ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿာတိ ‘‘သတံ ဟောမိ, သဟဿံ ဟောမီ’’တျာဒိနာ ပရိကမ္မံ ကရောန္တဿ. ရူပါဒီသူတိ ပရိကမ္မဝိသယဘူတေသု ရူပပါဒကဇ္ဈာနသဒ္ဒပရစိတ္တပုဗ္ဗေနိဝုတ္ထက္ခန္ဓာဒိဘေဒေသု အာရမ္မဏေသု. ဧတ္ထ ဟိ ဣဒ္ဓိဝိဓဉာဏဿ တာဝ ပါဒကဇ္ဈာနံ, ကာယော, ရူပါဒိအဓိဋ္ဌာနေ ရူပါဒီနိ စာတိ ဆ အာရမ္မဏာနိ[Pg.266]. တတ္ထ ပါဒကဇ္ဈာနံ အတီတမေဝ, ကာယော ပစ္စုပ္ပန္နော, ဣတရံ ပစ္စုပ္ပန္နမနာဂတံ ဝါ. ဒိဗ္ဗသောတဿ ပန သဒ္ဒေါယေဝ, သော စ ခေါ ပစ္စုပ္ပန္နော. ပရစိတ္တဝိဇာနနာယ ပန အတီတေ သတ္တဒိဝသေသု, အနာဂတေ သတ္တဒိဝသေသု စ ပဝတ္တံ ပရိတ္တာဒီသု ယံ ကိဉ္စိ တိကာလိကံ စိတ္တမေဝ အာရမ္မဏံ ဟောတီတိ မဟာအဋ္ဌကထာစရိယာ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၄၁၆; ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁၄၃၄). ‘परिकर्म करणाऱ्याचे’ म्हणजे ‘मी शंभर व्हावे, मी हजार व्हावे’ इत्यादी प्रकारे परिकर्म करणाऱ्या योगी व्यक्तीच्या बाबतीत. ‘रूपादींमध्ये’ म्हणजे परिकर्माचे विषय झालेल्या रूप, पादक ध्यान, शब्द, दुसऱ्याचे चित्त, पूर्वी निवास केलेले स्कंध इत्यादी भेद असलेल्या आलंबनांमध्ये. येथे इद्धिविध ज्ञानाचे प्रथम पादक ध्यान, शरीर, आणि रूपादींच्या अधिष्ठानात रूपादी - अशी सहा आलंबने आहेत. त्यामध्ये पादक ध्यान हे केवळ अतीत (भूतकाळ) असते, शरीर हे प्रत्युत्पन्न (वर्तमानकाळ) असते, आणि इतर (रूपादी) हे प्रत्युत्पन्न किंवा अनागत (भविष्यकाळ) असते. दिव्यश्रोताचे आलंबन तर केवळ शब्दच असते, आणि तो शब्द प्रत्युत्पन्नच असतो. परंतु परचित्तविजानन (चेतोपरिय ज्ञान) चे आलंबन हे अतीत सात दिवसांत आणि अनागत सात दिवसांत प्रवृत्त होणारे, परीत्त (कामावचर) इत्यादी चित्तांपैकी कोणतेही त्रैकालिक चित्तच आलंबन असते, असे महाअट्ठकथाचार्यांचे मत आहे. သင်္ဂဟကာရာ ပန ‘‘စတ္တာရောပိ ခန္ဓာ’’တိ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁၄၃၄) ဝဒန္တိ, ကထံ ပနဿာ ပစ္စုပ္ပန္နစိတ္တာရမ္မဏတာ, နနု စ အာဝဇ္ဇနာယ ဂဟိတမေဝ ဣဒ္ဓိစိတ္တဿ အာရမ္မဏံ ဟောတိ, အာဝဇ္ဇနာယ စ ပစ္စုပ္ပန္နစိတ္တမာရမ္မဏံ ကတွာ နိရုဇ္ဈမာနာယ တံသမကာလမေဝ ပရဿ စိတ္တမ္ပိ နိရုဇ္ဈတီတိ အာဝဇ္ဇနဇဝနာနံ ကာလဝသေန ဧကာရမ္မဏတာ န သိယာ, မဂ္ဂဖလဝီထိတော အညတ္ထ အာဝဇ္ဇနဇဝနာနံ ကထဉ္စ နာနာရမ္မဏတာ န အဓိပ္ပေတာတိ? အဋ္ဌကထာယံ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၄၁၆; ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁၄၃၄) တာဝ သန္တတိအဒ္ဓါပစ္စုပ္ပန္နာရမ္မဏတာ ယောဇိတာ. အာနန္ဒာစရိယော (ဓ. သ. မူလဋီ. ၁၄၃၄ ထောက ဝိသဒိသံ) ပန ဘဏတိ ‘‘ပါဒကဇ္ဈာနတော ဝုဋ္ဌာယ ပစ္စုပ္ပန္နာဒိဝိဘာဂံ အကတွာ ကေဝလံ ‘ဣမဿ စိတ္တံ ဇာနာမိ’စ္စေဝ ပရိကမ္မံ ကတွာ ပုနပိ ပါဒကဇ္ဈာနံ သမာပဇ္ဇိတွာ ဝုဋ္ဌာယ အဝိသေသေနေဝ စိတ္တံ အာဝဇ္ဇေတွာ တိဏ္ဏံ, စတုန္နံ ဝါ ပရိကမ္မာနံ အနန္တရံ စေတောပရိယဉာဏေန ပရဿ စိတ္တံ ပဋိဝိဇ္ဈတိ ရူပံ ဝိယ ဒိဗ္ဗစက္ခုနာ. ပစ္ဆာ ကာမာဝစရစိတ္တေန သရာဂါဒိဝဝတ္ထာနမ္ပိ ကရောတိ နီလာဒိဝဝတ္ထာနံ ဝိယ. တာနိ စ သဗ္ဗာနိ အဘိမုခီဘူတစိတ္တာရမ္မဏာနေဝ, အနိဋ္ဌေ စ ဌာနေ နာနာရမ္မဏတာဒေါသော နတ္ထိ အဘိန္နာကာရပ္ပဝတ္တိတော’’တိ. ပုဗ္ဗေနိဝါသာနုဿတိဉာဏဿ ပုဗ္ဗေ နိဝုတ္ထက္ခန္ဓာ, ခန္ဓပ္ပဋိဗဒ္ဓါနိ စ နာမဂေါတ္တာနိ, နိဗ္ဗာနဉ္စ အာရမ္မဏံ ဟောတိ, ဒိဗ္ဗစက္ခုဿ ပန ရူပမေဝ [Pg.267] ပစ္စုပ္ပန္နန္တိ အယမေတေသံ အာရမ္မဏဝိဘာဂေါ. ယထာရဟမပ္ပေတီတိ တံတံပရိကမ္မာနုရူပတော အပ္ပေတိ. परंतु संग्रहकार तर ‘चारही स्कंध (आलंबन असतात)’ असे म्हणतात. पण मग या ज्ञानाची प्रत्युत्पन्न चित्त आलंबन असण्याची स्थिती कशी शक्य आहे? आवर्जनाने ग्रहण केलेलेच इद्धीचित्ताचे आलंबन असते ना? आणि आवर्जनाने प्रत्युत्पन्न चित्ताला आलंबन करून ते निरुद्ध होत असताना, त्याच समकाली दुसऱ्याचे चित्तही निरुद्ध होते, त्यामुळे आवर्जन आणि जवन यांच्या कालानुसार एकच आलंबन असणे शक्य होणार नाही. मार्गवीथी व फलवीथी व्यतिरिक्त इतर वीथींमध्ये आवर्जन आणि जवन यांचे वेगवेगळ्या प्रकारचे आलंबन असणे कसे काय अभिप्रेत नाही? अट्ठकथेमध्ये तर संतती-प्रत्युत्पन्न आणि अद्धा-प्रत्युत्पन्न आलंबन असण्याची योजना केली आहे. परंतु आनंदाचार्य म्हणतात— ‘पादक ध्यानातून उठून, प्रत्युत्पन्न इत्यादी विभाग न करता, केवळ ‘मी याच्या चित्ताला जाणतो’ असेच परिकर्म करून, पुन्हा पादक ध्यानात समापन्न होऊन व त्यातून उठून, विशेष भेद न करता सामान्य रूपाने चित्ताचे आवर्जन करून, तीन किंवा चार परिकर्म जवनांनंतर चेतोपरिय ज्ञानाने दुसऱ्याच्या चित्ताचा वेध घेतो (जाणतो), ज्याप्रमाणे दिव्यचक्षूने रूपाला पाहिले जाते. नंतर कामावचर चित्ताने सराग इत्यादींचे व्यवस्थान (निश्चितीकरण) करतो, ज्याप्रमाणे निळे इत्यादी रंगांचे व्यवस्थान केले जाते. आणि ती सर्व चित्ते संमुख झालेल्या चित्तालाच आलंबन करणारी असतात, आणि अनिष्ट ठिकाणी नाना-आलंबन असण्याचा दोष येत नाही, कारण चित्ताची प्रवृत्ती अभिन्न आकाराने होते.’ पूर्वेनिवासानुस्मृती ज्ञानाचे आलंबन पूर्वी निवास केलेले स्कंध, स्कंधांशी संबंधित नाव व गोत्र, आणि निर्वाण हे असते. दिव्यचक्षूचे आलंबन तर केवळ प्रत्युत्पन्न रूपच असते. हा या अभिज्ञांच्या आलंबनांचा विभाग आहे. ‘यथायोग्य अर्पण करतो’ म्हणजे त्या त्या परिकर्माच्या अनुरूप अप्पना प्राप्त करतो. ၄၂. ဣဒါနိ အာရမ္မဏာနံ ဘေဒေန အဘိညာဘေဒံ ဒဿေတုံ ‘‘ဣဒ္ဓိဝိဓာ’’တျာဒိမာဟ. အဓိဋ္ဌာနာဒိ ဣဒ္ဓိပ္ပဘေဒေါ ဧတိဿာတိ ဣဒ္ဓိဝိဓာ. ဒိဗ္ဗာနံ သောတသဒိသတာယ, ဒိဗ္ဗဝိဟာရသန္နိဿိတတာယ စ ဒိဗ္ဗဉ္စ တံ သောတဉ္စာတိ ဒိဗ္ဗသောတံ. ပရေသံ စိတ္တံ ဝိညာယတိ ဧတာယာတိ ပရစိတ္တဝိဇာနနာ. အတ္တနော သန္တာနေ နိဝုတ္ထဝသေန စေဝ ဂေါစရနိဝါသဝသေန စ ပုဗ္ဗေ အတီတဘဝေသု ခန္ဓာဒီနံ အနုဿရဏံ ပုဗ္ဗေနိဝါသာနုဿတိ. ဝုတ္တနယေန ဒိဗ္ဗဉ္စ တံ စက္ခု စာတိ ဒိဗ္ဗစက္ခု. ‘စုတူပပါတဉာဏ’န္တိ ပန ဒိဗ္ဗစက္ခုမေဝ ဝုစ္စတိ. ယထာကမ္မူပဂဉာဏအနာဂတံသဉာဏာနိပိ ဒိဗ္ဗစက္ခုဝသေနေဝ ဣဇ္ဈန္တိ. န ဟိ တေသံ ဝိသုံ ပရိကမ္မံ အတ္ထိ. တတ္ထ အနာဂတံသဉာဏဿ တာဝ အနာဂတေ သတ္တဒိဝသတော ပရံ ပဝတ္တနကံ စိတ္တစေတသိကံ ဒုတိယဒိဝသတော ပဋ္ဌာယ ပဝတ္တနကဉ္စ ယံ ကိဉ္စိ အာရမ္မဏံ ဟောတိ. တဉှိ သဝိသယေ သဗ္ဗညုတညာဏဂတိကန္တိ. ယထာ ကမ္မူပဂဉာဏဿ ပန ကုသလာကုသလသင်္ခါတာ စေတနာ, စတ္တာရောပိ ဝါ ခန္ဓာ အာရမ္မဏန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ४२. आता आलंबनांच्या भेदाने अभिज्ञांचा भेद दर्शवण्यासाठी ‘इद्धिविधा’ इत्यादी गाथा म्हटली आहे. अधिष्ठान इत्यादी ऋद्धींचे प्रकार जिच्यात आहेत ती ‘इद्धिविधा’ होय. देवांच्या कानासारखे असल्यामुळे आणि दिव्य विहारावर आश्रित असल्यामुळे जे दिव्य आहे आणि श्रोत (कान) आहे ते ‘दिव्यश्रोत’ होय. जिच्याद्वारे दुसऱ्यांचे चित्त जाणले जाते ती ‘परचित्तविजानना’ होय. स्वतःच्या संतानामध्ये (चित्तपरंपरेत) निवास केल्याच्या प्रभावाने आणि आलंबनरूपी निवासाच्या प्रभावाने पूर्वीच्या अतीत जन्मांमधील स्कंध इत्यादींचे अनुस्मरण करणे म्हणजे ‘पूर्वेनिवासानुस्मृती’ होय. सांगितलेल्या पद्धतीने जे दिव्य आहे आणि चक्षू आहे ते ‘दिव्यचक्षू’ होय. ‘च्युतूपपात ज्ञान’ हे दिव्यचक्षूलाच म्हटले जाते. यथाकम्मूपग ज्ञान आणि अनागतंस ज्ञान हे देखील दिव्यचक्षूच्या प्रभावानेच सिद्ध होतात. कारण त्यांच्यासाठी स्वतंत्र परिकर्म नसते. त्यामध्ये अनागतंस ज्ञानाचे आलंबन हे भविष्यकाळात सात दिवसांनंतर प्रवृत्त होणारे चित्त-चेतसिक आणि दुसऱ्या दिवसापासून सुरू होऊन प्रवृत्त होणारे जे काही असेल ते आलंबन असते. कारण ते ज्ञान आपल्या विषयात सर्वज्ञता ज्ञानासारखी गती असणारे असते. परंतु यथाकम्मूपग ज्ञानाचे आलंबन कुशल-अकुशल संज्ञक चेतना किंवा चारही स्कंध हे आलंबन असते असे समजावे. ဂေါစရဝသေန ဘေဒေါ ဂေါစရဘေဒေါ. गोचराच्या (आलंबनाच्या) प्रभावाने होणारा भेद म्हणजे ‘गोचरभेद’ होय. ဂေါစရဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. गोचरभेदाचे वर्णन समाप्त झाले. သမထကမ္မဋ္ဌာနဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. समथ कम्मट्ठानाचे (कर्मस्थानाचे) वर्णन समाप्त झाले. ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနံ विपश्यना कम्मट्ठान (विपश्यना कर्मस्थान) ဝိသုဒ္ဓိဘေဒဝဏ္ဏနာ विशुद्धीच्या भेदांचे वर्णन ၄၃. အနိစ္စာဒိဝသေန ဝိဝိဓာကာရေန ပဿတီတိ ဝိပဿနာ, အနိစ္စာနုပဿနာဒိကာ ဘာဝနာပညာ. တဿာ ကမ္မဋ္ဌာနံ, သာယေဝ ဝါ ကမ္မဋ္ဌာနန္တိ ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနံ. တသ္မိံ ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနေ သတ္တဝိဓေန ဝိသုဒ္ဓိသင်္ဂဟောတိ သမ္ဗန္ဓော. ४३. अनित्य इत्यादींच्या प्रभावाने विविध प्रकारांनी पाहते ती ‘विपश्यना’ होय, जी अनित्यानुपश्यना इत्यादी स्वरूपाची भावनामयी प्रज्ञा आहे. तिचे कम्मट्ठान (कर्मस्थान), किंवा ती स्वतःच कम्मट्ठान आहे म्हणून ‘विपश्यना कम्मट्ठान’ होय. त्या विपश्यना कम्मट्ठानामध्ये सात प्रकारच्या विशुद्धींचा संग्रह होतो, असा संबंध आहे. ၄၄. အနိစ္စတာယေဝ [Pg.268] လက္ခဏံ လက္ခိတဗ္ဗံ, လက္ခီယတိ အနေနာတိ ဝါ အနိစ္စလက္ခဏံ. ဥဒယဝယပဋိပီဠနသင်္ခါတဒုက္ခဘာဝေါ ဝ လက္ခဏန္တိ ဒုက္ခလက္ခဏံ. ပရပရိကပ္ပိတဿ အတ္တနော အဘာဝေါ အနတ္တတာ, တဒေဝ လက္ခဏန္တိ အနတ္တလက္ခဏံ. ४४. अनित्यता हेच लक्षण (लक्षित करण्यायोग्य स्वभाव) आहे, किंवा ज्याच्याद्वारे लक्षित केले जाते ते ‘अनित्यलक्षण’ होय. उदय आणि व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) यांच्या पीडेने युक्त असलेला दुःखभाव हेच लक्षण आहे म्हणून ते ‘दुःखलक्षण’ होय. इतरांनी कल्पिलेल्या आत्म्याचा अभाव म्हणजे ‘अनात्मता’ होय, आणि तेच लक्षण आहे म्हणून ते ‘अनात्मलक्षण’ होय. ၄၅. တိဏ္ဏံ လက္ခဏာနံ အနု အနု ပဿနာ အနိစ္စာနုပဿနာဒိကာ. ४५. तीन लक्षणांचे वारंवार अनुदर्शन करणे म्हणजे ‘अनित्यानुपश्यना’ इत्यादी होय. ၄၆. ခန္ဓာဒီနံ ကလာပတော သမ္မသနဝသပ္ပဝတ္တံ ဉာဏံ သမ္မသနဉာဏံ. ဥပ္ပာဒဘင်္ဂါနုပဿနာဝသပ္ပဝတ္တဉာဏံ ဥဒယဗ္ဗယဉာဏံ. ဥဒယံ မုစ္စိတွာ ဝယေ ပဝတ္တံ ဉာဏံ ဘင်္ဂဉာဏံ. သင်္ခါရာနံ ဘယတော အနုပဿနာဝသေန ပဝတ္တံ ဉာဏံ ဘယဉာဏံ, ဒိဋ္ဌဘယာနံ အာဒီနဝတော ပေက္ခဏဝသေန ပဝတ္တံ ဉာဏံ အာဒီနဝဉာဏံ, ဒိဋ္ဌာဒီနဝေသု နိဗ္ဗိန္ဒနဝသပ္ပဝတ္တံ ဉာဏံ နိဗ္ဗိဒါဉာဏံ. နိဗ္ဗိန္ဒိတွာ သင်္ခါရေဟိ မုစ္စိတုကမျတာဝသေန ပဝတ္တံ ဉာဏံ မုစ္စိတုကမျတာဉာဏံ. မုစ္စနဿ ဥပါယသမ္ပဋိပါဒနတ္ထံ ပုန သင်္ခါရာနံ ပရိဂ္ဂဟဝသပ္ပဝတ္တံ ဉာဏံ ပဋိသင်္ခါဉာဏံ. ပဋိသင်္ခါတဓမ္မေသု ဘယနန္ဒီဝိဝဇ္ဇနဝသေန အဇ္ဈုပေက္ခိတွာ ပဝတ္တံ ဉာဏံ သင်္ခါရုပေက္ခာဉာဏံ. ပုရိမာနံ နဝန္နံ ကိစ္စနိပ္ဖတ္တိယာ, ဥပရိ စ သတ္တတိံသာယ ဗောဓိပက္ခိယဓမ္မာနံ အနုကူလံ ဉာဏံ အနုလောမဉာဏံ. ४६. स्कंध इत्यादींचे समूहाने (एकत्र करून) मनन करण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'संमसनज्ञान' (चिंतनज्ञान) होय. उत्पाद (उत्पत्ती) आणि भंग (विनाश) यांच्या वारंवार अनुदर्शनाच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'उदयव्ययज्ञान' होय. उत्पत्तीकडे दुर्लक्ष करून केवळ विनाशावर (भंगावर) प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'भंगज्ञान' होय. संस्कारांना भयकारक रूपाने वारंवार पाहण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'भयज्ञान' होय. ज्यांचे भय पाहिले गेले आहे अशा संस्कारांना दोष रूपाने पाहण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'आदीनवज्ञान' (दोषदर्शनज्ञान) होय. ज्यांचे दोष पाहिले गेले आहेत अशा संस्कारांविषयी निर्वेदाच्या (वैराग्याच्या) सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'निर्वेदज्ञान' (निब्बिदाज्ञान) होय. निर्वेद प्राप्त करून संस्कारांमधून मुक्त होण्याची इच्छा असण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'मुच्चितुकम्यताज्ञान' (मुक्तीची इच्छा असणारे ज्ञान) होय. मुक्तीचा उपाय सिद्ध करण्यासाठी पुन्हा संस्कारांचे ग्रहण (परीक्षण) करण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'प्रतिसंख्याज्ञान' (पटिसंखाज्ञान) होय. पुन्हा विचार केलेल्या संस्कार धर्मांविषयी भय आणि आनंद या दोन्हींचा त्याग करून तटस्थ राहून (उपेक्षा करून) प्रवृत्त झालेले ज्ञान म्हणजे 'संखारुपेक्षाज्ञान' (संस्कारोपेक्षाज्ञान) होय. पूर्वीच्या नऊ ज्ञानांच्या कार्याची पूर्तता करण्यासाठी आणि पुढील मार्गक्षणातील सदतीस बोधिपाक्षिक धर्मांना अनुकूल असणारे ज्ञान म्हणजे 'अनुलोमज्ञान' होय। ၄၇. အတ္တသုညတာယ သုညတော. သံယောဇနာဒီဟိ ဝိမုစ္စနဋ္ဌေန ဝိမောက္ခော. နိစ္စနိမိတ္တာဒိနော အဘာဝတော အနိမိတ္တော. ပဏိဟိတဿ တဏှာပဏိဓိဿ အဘာဝတော အပ္ပဏိဟိတော. ४७. आत्म्यापासून शून्य (रहित) असल्यामुळे ते 'शून्य' (सुञ्ञत) होय. संयोजनादी क्लेशांपासून मुक्त होण्याच्या अर्थाने ते 'विमोक्ष' होय. नित्यतेचे निमित्त इत्यादींच्या अभावामुळे ते 'अनिमित्त' होय. तृष्णारूपी प्रणिधीच्या (इच्छेच्या) अभावामुळे ते 'अप्रणिहित' होय। ၄၉. ယော နံ ပါတိ, တံ မောက္ခေတိ အပါယာဒီဟိ ဒုက္ခေဟီတိ ပါတိမောက္ခံ, တဒေဝ ကာယဒုစ္စရိတာဒီဟိ သံဝရဏတော သံဝရော, သမာဓာနောပဓာရဏဋ္ဌေန သီလဉ္စာတိ ပါတိမောက္ခသံဝရသီလံ. မနစ္ဆဋ္ဌာနံ ဣန္ဒြိယာနံ ရူပါဒီသု သံဝရဏဝသေန [Pg.269] ပဝတ္တံ သီလံ ဣန္ဒြိယသံဝရသီလံ. မိစ္ဆာဇီဝ ဝိဝဇ္ဇနေန အာဇီဝဿ ပရိသုဒ္ဓိဝသပ္ပဝတ္တံ အာဇီဝပါရိသုဒ္ဓိသီလံ. ပစ္စယေ သန္နိဿိတံ တေသံ ဣဒမတ္ထိကတာယ ပစ္စဝေက္ခဏသီလံ ပစ္စယသန္နိဿိတသီလံ. စတုဗ္ဗိဓတ္တာ ဒေသနာသံဝရပရိယေဋ္ဌိပစ္စဝေက္ခဏဝသေန, ပရိသုဒ္ဓတ္တာ စ စတုပါရိသုဒ္ဓိသီလံ နာမ. ४९. जो पुरुष त्याचे (शीलाचे) रक्षण करतो, त्याला ते अपायादी दुःखांपासून मुक्त करते, म्हणून ते 'पातिमोक्ख' (प्रातिमोक्ष) होय. तेच पातिमोक्ख काय-दुश्चरित इत्यादींपासून रक्षण करत असल्यामुळे 'संवर' होय, आणि काय-वाचा यांना सुव्यवस्थित ठेवणे व कुशल धर्मांना धारण करणे या अर्थाने 'शील' देखील होय; म्हणून याला 'पातिमोक्खसंवरशील' म्हटले जाते. मन हे सहावे आहे अशा चक्षू इत्यादी इंद्रियांचे रूप इत्यादी विषयांमध्ये संयम राखण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले शील म्हणजे 'इंद्रियसंवरशील' होय. मिथ्या आजीविकेचा (चुकीच्या उपजीविकेचा) त्याग करून आजीविकेच्या पूर्ण शुद्धतेच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेले शील म्हणजे 'आजीवपारिसुद्धिशील' (आजीविकापरिशुद्धिशील) होय. चार प्रत्ययांवर (भिक्षूंच्या चार गरजांवर) आश्रित असलेले आणि त्या प्रत्ययांच्या उपयोगाचे योग्य प्रत्यावेक्षण (चिंतन) करणारे शील म्हणजे 'प्रत्ययसन्निश्रितशील' (पच्चयसन्निसितशील) होय. चार प्रकारांचे असल्यामुळे आणि देशना, संवर, योग्य मार्गाने शोधणे (पर्येषण) व प्रत्यावेक्षण यांच्या सामर्थ्याने पूर्णपणे शुद्ध असल्यामुळे याला 'चतुपारिसुद्धिशील' (चतुष्परिशुद्धिशील) म्हटले जाते। ၅၀. စိတ္တဝိသုဒ္ဓိ နာမ စိတ္တဿ ဝိနီဝရဏဘာဝါပါဒနဝသေန ဝိသောဓနတော, စိတ္တသီသေန နိဒ္ဒိဋ္ဌတ္တာ, ဝိသုဒ္ဓတ္တာ စာတိ ဝါ ကတွာ. ५०. चित्ताला नीवरणरहित (अडथळामुक्त) अवस्थेला प्राप्त करून देण्याच्या सामर्थ्याने शुद्ध करणे म्हणजे 'चित्तविशुद्धी' होय; किंवा चित्ताला मुख्य करून निर्देशित केल्यामुळे आणि नीवरणांपासून शुद्ध असल्यामुळे या कारणाने याला 'चित्तविशुद्धी' म्हटले जाते। ၅၁. ‘‘ဓမ္မာနံ သာမညသဘာဝေါ လက္ခဏံ, ကိစ္စသမ္ပတ္တိယော ရသော, ဥပဋ္ဌာနာကာရော, ဖလဉ္စ ပစ္စုပဋ္ဌာန’’န္တိ ဧဝံ ဝုတ္တာနံ လက္ခဏာဒီနံ ‘‘ဖုသနလက္ခဏော ဖဿော, ကက္ခဠလက္ခဏာ ပထဝီ’’တျာဒိနာ ဝိတ္ထာရတော, ‘‘နမနလက္ခဏံ နာမံ, ရုပ္ပနလက္ခဏံ ရူပ’’န္တျာဒိနာ သင်္ခေပတော စ ပရိဂ္ဂဟော ပစ္စတ္တလက္ခဏာဒိဝသေန ပရိစ္ဆိဇ္ဇ ဂဟဏံ ဒုက္ခသစ္စဝဝတ္ထာနံ ဒိဋ္ဌိဝိသုဒ္ဓိ နာမ ‘‘နာမရူပတော အတ္တာ နတ္ထီ’’တိ ဒဿနတော ဒိဋ္ဌိ စ အတ္တဒိဋ္ဌိမလဝိသောဓနတော ဝိသုဒ္ဓိ စာတိ ကတွာ. ५१. “धर्मांचा सामान्य स्वभाव आणि स्वतःचा विशिष्ट स्वभाव हे 'लक्षण' होय; कार्य आणि संपत्ती हे 'रस' होय; आणि ज्ञानात प्रकट होणारी अवस्था व फळ हे 'पच्चुपट्ठान' (प्रकटीकरण) होय” अशा प्रकारे सांगितलेल्या लक्षणादींच्या आधारे, “स्पर्श हा स्पर्श करण्याचे लक्षण असलेला आहे, पृथ्वी धातू हा कठीणपणाचे लक्षण असलेली आहे” इत्यादी रूपाने विस्ताराने, आणि “नाम हे वाकण्याचे (प्रवृत्त होण्याचे) लक्षण असलेले आहे, रूप हे विकार पावण्याचे (बदलण्याचे) लक्षण असलेले आहे” इत्यादी रूपाने संक्षेपाने, प्रत्येकाच्या स्वतःच्या लक्षणादींच्या सामर्थ्याने विभक्त करून ग्रहण करणे (जाणणे) म्हणजेच दुःखसत्य असलेल्या नाम-रूपांचे निर्धारण करणारे ज्ञान होय; याला 'दृष्टिविशुद्धी' (दिट्ठिविसुद्धि) म्हटले जाते. “नाम-रूपाव्यतिरिक्त दुसरा कोणताही आत्मा नाही” असे पाहिल्यामुळे ती 'दृष्टी' देखील आहे आणि आत्मदृष्टीरूपी मळाला शुद्ध करत असल्यामुळे ती 'विशुद्धी' देखील आहे, या कारणाने याला दृष्टिविशुद्धी म्हणतात। ၅၂. ပစ္စယပရိဂ္ဂဟောတိ နာမဉ္စ ရူပဉ္စ ပဋိသန္ဓိယံ တာဝ အဝိဇ္ဇာတဏှာဥပါဒါနကမ္မဟေတုဝသေန နိဗ္ဗတ္တတိ. ပဝတ္တိယဉ္စ ရူပံ ကမ္မစိတ္တဥတုအာဟာရပစ္စယဝသေန, နာမဉ္စ စက္ခုရူပါဒိနိဿယာရမ္မဏာဒိပစ္စယဝသေန, ဝိသေသတော စ ယောနိသောမနသိကာရာဒိစတုစက္ကသမ္ပတ္တိယာ ကုသလံ, တဗ္ဗိပရိယာယေန အကုသလံ, ကုသလာကုသလဝသေန ဝိပါကော ဘဝင်္ဂါဒိဝသေန အာဝဇ္ဇနံ, ခီဏာသဝသန္တာနဝသေန ကိရိယဇဝနံ, အာဝဇ္ဇနဉ္စ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ ဧဝံ သာဓာရဏာသာဓာရဏဝသေန တီသု အဒ္ဓါသု နာမရူပပ္ပဝတ္တိယာ ပစ္စက္ခာဒိသိဒ္ဓဿ ကမ္မာဒိပစ္စယဿ ပရိဂ္ဂဏှနံ သမုဒယသစ္စဿ ဝဝတ္ထာနံ ကင်္ခါဝိတရဏဝိသုဒ္ဓိ နာမ ‘‘အဟောသိံ နု ခေါ အဟမတီတမဒ္ဓါန’’န္တျာဒိကာယ [Pg.270] (မ. နိ. ၁.၁၈; သံ. နိ. ၂.၂၀) သောဠသဝိဓာယ, ‘‘သတ္ထရိကင်္ခတီ’’တျာဒိကာယ (ဓ. သ. ၁၁၂၃; ဝိဘ. ၉၁၅) အဋ္ဌဝိဓာယ စ ကင်္ခါယ ဝိတရဏတော အတိက္ကမနတော ကင်္ခါဝိတရဏာ, အဟေတုကဝိသမဟေတုဒိဋ္ဌိမလဝိသောဓနတော ဝိသုဒ္ဓိ စာတိ ကတွာ. ५२. प्रत्ययपरिग्रह म्हणजे: नाम आणि रूप हे दोन्ही सर्वप्रथम प्रतिसंधीच्या वेळी (पुनर्जन्माच्या वेळी) अविद्या, तृष्णा, उपादान आणि कर्म या कारणांच्या सामर्थ्याने उत्पन्न होतात. आणि प्रवृत्तीच्या काळात (जीवनात) रूप हे कर्म, चित्त, ऋतू आणि आहार या प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) सामर्थ्याने उत्पन्न होते; आणि नाम हे चक्षू, रूप इत्यादी निश्रयप्रत्यय, आलंबनप्रत्यय इत्यादी कारणांच्या सामर्थ्याने उत्पन्न होते. विशेषतः योनिशोमनसिकार इत्यादी चार चक्रांच्या समृद्धीमुळे कुशल नाम उत्पन्न होते, आणि त्याच्या उलट (विपत्ती चक्रामुळे) अकुशल नाम उत्पन्न होते. कुशल आणि अकुशल कर्मांच्या सामर्थ्याने विपाक नाम उत्पन्न होते, भवंग इत्यादींच्या सामर्थ्याने आवर्जन उत्पन्न होते, आणि क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) संतानाच्या सामर्थ्याने क्रियाजवन व आवर्जन उत्पन्न होते. अशा प्रकारे साधारण आणि असाधारण कारणांच्या सामर्थ्याने तिन्ही काळात नाम-रूपाच्या प्रवृत्तीसाठी प्रत्यक्ष इत्यादी प्रमाणांनी सिद्ध असलेल्या कर्मादी कारणांचे ग्रहण करणे (जाणणे) म्हणजेच समुदायसत्याचे निर्धारण करणारे ज्ञान होय; याला 'कांक्षावितरणविशुद्धी' (कंखාවිතरणविसुद्धि) म्हटले जाते. कारण, “मी भूतकाळात होतो काय?” इत्यादी प्रकारच्या सोळा प्रकारच्या शंकांचे आणि “शास्त्याविषयी (बुद्धांविषयी) शंका घेतो” इत्यादी प्रकारच्या आठ प्रकारच्या शंकांचे निवारण करून पलीकडे जात असल्यामुळे ती 'कांक्षावितरण' आहे, आणि अहेतुक दृष्टी व विषमहेतुक दृष्टी यांसारख्या मळांना शुद्ध करत असल्यामुळे ती 'विशुद्धी' देखील आहे, या कारणाने याला कांक्षावितरणविशुद्धी म्हणतात। ၅၃. တတော ပစ္စယပရိဂ္ဂဟတော ပရံ တထာပရိဂ္ဂဟိတေသု ပစ္စတ္တလက္ခဏာဒိဝဝတ္ထာနဝသေန, ပစ္စယဝဝတ္ထာနဝသေန စ ပရိဂ္ဂဟိတေသု လောကုတ္တရဝဇ္ဇေသု တိဘူမိပရိယာပန္နေသု နာမရူပေသု အတီတာဒိဘေဒဘိန္နေသု ခန္ဓာဒိနယမာရဗ္ဘ ပဉ္စက္ခန္ဓဆဒွါရဆဠာရမ္မဏဆဒွါရပ္ပဝတ္တဓမ္မာဒိဝသေန အာဂတံ ခန္ဓာဒိနယံ အာရဗ္ဘ ကလာပဝသေန ပိဏ္ဍဝသေန သင်္ခိပိတွာ ယံ အတီတေ ဇာတံ ရူပံ, တံ အတီတေဝ နိရုဒ္ဓံ. ယံ အနာဂတေ ဘာဝိ ရူပံ, တမ္ပိ တတ္ထေဝ နိရုဇ္ဈိဿတိ. ယံ ပစ္စုပ္ပန္နံ, တံ အနာဂတံ အပ္ပတွာ ဧတ္ထေဝ နိရုဇ္ဈတိ, တထာ အဇ္ဈတ္တဗဟိဒ္ဓသုခုမဩဠာရိကဟီနပဏီတရူပါဒယော. တသ္မာ ‘‘အနိစ္စံ အတ္တာဒိဝသေန န ဣစ္စံ အနုပဂန္တဗ္ဗံ ခယဋ္ဌေန ခယဂမနတော, ဒုက္ခံ ဘယဋ္ဌေန ဘယကရတ္တာ, အနတ္တာ အသာရကဋ္ဌေန အတ္တသာရာဒိအဘာဝေနာ’’တိ စ ‘‘စက္ခုံ အနိစ္စံ…ပေ… မနော. ရူပံ…ပေ… ဓမ္မာ. စက္ခုဝိညာဏံ…ပေ… မနောဝိညာဏံ အနိစ္စံ ဒုက္ခံ အနတ္တာ’’တျာဒိနာ (ပဋိ. မ. ၁.၄၈) အတီတာဒိအဒ္ဓါဝသေန, အတီတာဒိသန္တာနဝသေန, အတီတာဒိခဏဝသေန စ သမ္မသနဉာဏေန ဟုတွာအဘာဝဥဒယဗ္ဗယပဋိပီဠနအဝသဝတ္တနာကာရသင်္ခါတလက္ခဏတ္တယသမ္မသနဝသပ္ပဝတ္တေန ကလာပသမ္မသနဉာဏေန လက္ခဏတ္တယံ သမ္မသန္တဿ ပရိမဇ္ဇန္တဿ. ५३. त्या प्रत्ययपरिग्रह ज्ञानानंतर, पूर्वोक्त प्रकारे ग्रहण केलेल्या स्वतःच्या लक्षणादींच्या निर्धारणाच्या सामर्थ्याने आणि कारणांच्या (प्रत्ययांच्या) निर्धारणाच्या सामर्थ्याने ग्रहण केलेल्या, लोकोत्तर वगळून तिन्ही भूमींमध्ये समाविष्ट असलेल्या आणि भूतकाळ इत्यादी भेदांनी भिन्न असलेल्या नाम-रूपांमध्ये स्कंध इत्यादी पद्धतीचा आश्रय घेऊन, पाच स्कंध, सहा द्वारे, सहा आलंबने (विषय), सहा द्वारांमध्ये प्रवृत्त होणारे सहा विज्ञान इत्यादी धर्मांच्या सामर्थ्याने आलेल्या स्कंधादी पद्धतीचा आश्रय घेऊन, समूहाने (पिंडाने) संक्षिप्त करून— जे भूतकाळात उत्पन्न झालेले रूप होते, ते भूतकाळातच निरुद्ध (नष्ट) झाले; जे भविष्यकाळात उत्पन्न होणारे रूप आहे, ते देखील भविष्यकाळातच निरुद्ध होईल; जे वर्तमानकालीन रूप आहे, ते भविष्यकाळापर्यंत न पोहोचता येथेच निरुद्ध होते; त्याचप्रमाणे आध्यात्मिक, बाह्य, सूक्ष्म, स्थूल, हीन, प्रणीत रूप इत्यादी देखील तसेच आहेत. म्हणून, “ते अनित्य आहे, कारण आत्मभावाने ते नित्य मानले जाऊ शकत नाही आणि क्षय होण्याच्या स्वभावामुळे ते विनाशाप्रत जाते; ते दुःख आहे, कारण भयकारक स्वभावामुळे ते भय निर्माण करते; ते अनात्मा आहे, कारण निस्सार स्वभावामुळे त्यात आत्म्यासारखा कोणताही सारभाग नाही” अशा प्रकारे, आणि “चक्षू अनित्य आहे...पे... मन; रूप...पे... धर्म; चक्षूविज्ञान...पे... मनोविज्ञान अनित्य, दुःख, अनात्मा आहे” इत्यादी प्रकारे, भूतकाळ इत्यादी काळाच्या सामर्थ्याने, भूतकाळ इत्यादी संतानाच्या (प्रवाहाच्या) सामर्थ्याने आणि भूतकाळ इत्यादी क्षणांच्या सामर्थ्याने संमसनज्ञानाने— उत्पन्न होऊन नष्ट होणे, उदय-व्ययाने पीडित होणे आणि स्वतःच्या नियंत्रणात नसणे या स्वरूपातील तीन लक्षणांचे मनन करण्याच्या सामर्थ्याने प्रवृत्त झालेल्या कलापसंमसनज्ञानाने तीन लक्षणांचे मनन करणाऱ्या आणि ज्ञानाने वारंवार घासून पाहणाऱ्या (साधकाचे)... သမ္မသနဉာဏေ ပန ဥပ္ပန္နေ ပုန တေသွေဝ သင်္ခါရေသု ‘‘အဝိဇ္ဇာသမုဒယာ ရူပသမုဒယော, တဏှာကမ္မအာဟာရသမုဒယာ ရူပသမုဒယော, တထာ အဝိဇ္ဇာနိရောဓာ ရူပနိရောဓော, တဏှာကမ္မအာဟာရနိရောဓာ ရူပနိရောဓော’’တိ [Pg.271] (ပဋိ. မ. ၁.၅၀) ဧဝံ ရူပက္ခန္ဓေ ဝေဒနာသညာသင်္ခါရက္ခန္ဓေသုပိ အာဟာရံ အပနေတွာ ‘‘ဖဿသမုဒယာ ဖဿနိရောဓာ’’တိ စ ဧဝံ ဖဿံ ပက္ခိပိတွာ, ဝိညာဏက္ခန္ဓေ ‘‘နာမရူပသမုဒယာ နာမရူပနိရောဓာ’’တိ နာမရူပံ ပက္ခိပိတွာ ပစ္စယသမုဒယဝသေန, ပစ္စယနိရောဓဝသေန စ, ပစ္စယေ အနာမသိတွာ ပစ္စုပ္ပန္နက္ခန္ဓေသု နိဗ္ဗတ္တိလက္ခဏမတ္တဿ, ဝိပရိဏာမလက္ခဏမတ္တဿ စ ဒဿနေန ခဏဝသေန စာတိ ဧကေကသ္မိံ ခန္ဓေ ပစ္စယဝသေန စတုဓာ, ခဏဝသေန ဧကဓာ စာတိ ပဉ္စဓာ ဥဒယံ, ပဉ္စဓာ ဝယန္တိ ဒသဒသဥဒယဗ္ဗယဒဿနဝသေန သမပညာသာကာရေဟိ ဥဒယဗ္ဗယဉာဏေန ဥဒယဗ္ဗယံ သမနုပဿန္တဿ အာရဒ္ဓဝိပဿကဿ ယောဂိနော ဝိပဿနာစိတ္တသမုဋ္ဌာနော သရီရတော နိစ္ဆရဏကအာလောကသင်္ခါတော ဩဘာသော, ဝိပဿနာစိတ္တသဟဇာတာ ခုဒ္ဒိကာဒိပဉ္စဝိဓာ (ဓ. သ. အဋ္ဌ. ၁ ဓမ္မုဒ္ဒေသဝါရ ဈာနင်္ဂရာသိဝဏ္ဏနာ) ပီတိ, တထာ ကာယစိတ္တဒရထဝူပသမလက္ခဏာ ကာယစိတ္တဝသေန ဒုဝိဓာ ပဿဒ္ဓိ, ဗလဝသဒ္ဓိန္ဒြိယသင်္ခါတော အဓိမောက္ခော, သမ္မပ္ပဓာနကိစ္စသာဓကော ဝီရိယသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂသင်္ခါတော ပဂ္ဂဟော, အတိပဏီတံ သုခံ, ဣန္ဒဝိဿဋ္ဌဝဇိရသဒိသံ တိလက္ခဏဝိပဿနာဘူတံ ဉာဏံ, သတိပဋ္ဌာနဘူတာ စိရကတာဒိအနုဿရဏသမတ္ထာ ဥပဋ္ဌာနသင်္ခါတာ သတိ, သမပ္ပဝတ္တဝိပဿနာသဟဇာတာ ဥပေက္ခာသမ္ဗောဇ္ဈင်္ဂဘူတာ တတြမဇ္ဈတ္တုပေက္ခာ, မနောဒွါရေ အာဝဇ္ဈနုပေက္ခာ စာတိ ဒုဝိဓာပိ ဥပေက္ခာ, ဩဘာသာဒီသု ဥပ္ပန္နေသု ‘‘န ဝတ မေ ဣတော ပုဗ္ဗေ ဧဝရူပေါ ဩဘာသော ဥပ္ပန္နပုဗ္ဗော’’တျာဒိနာ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၇၃၃) နယေန တတ္ထ အာလယံ ကုရုမာနာ သုခုမတဏှာ ရူပနိကန္တိစာတိ ဩဘာသာဒီသု ဒသသု ဝိပဿနုပက္ကိလေသေသု ဥပ္ပန္နေသု ‘‘န ဝတ မေ ဣတော ပုဗ္ဗေ ဧဝရူပါ ဩဘာသာဒယော ဥပ္ပန္နပုဗ္ဗာ အဒ္ဓါ မဂ္ဂပ္ပတ္တောသ္မိ, ဖလပ္ပတ္တောသ္မီ’’တိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၇၃၃) အဂ္ဂဟေတွာ ‘‘ဣမေ ဩဘာသာဒယော [Pg.272] တဏှာဒိဋ္ဌိမာနဝတ္ထုတာယ န မဂ္ဂေါ, အထ ခေါ ဝိပဿနုပက္ကိလေသာ ဧဝ, တဗ္ဗိနိမုတ္တံ ပန ဝီထိပဋိပန္နံ ဝိပဿနာဉာဏံ မဂ္ဂေါ’’တိ ဧဝံ မဂ္ဂါမဂ္ဂလက္ခဏဿ ဝဝတ္ထာနံ နိစ္ဆယနံ မဂ္ဂါမဂ္ဂဿ ဇာနနတော, ဒဿနတော, အမဂ္ဂေ မဂ္ဂသညာယ ဝိသောဓနတော စ မဂ္ဂါမဂ္ဂဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ နာမ. परंतु, सम्मसनज्ञान (संस्कारांचे परीक्षण करण्याचे ज्ञान) उत्पन्न झाल्यावर, पुन्हा त्याच त्रिभूमक संस्कारांमध्ये 'अविद्येच्या उत्पत्तीमुळे रूपाची उत्पत्ती होते, तृष्णा, कर्म आणि आहाराच्या उत्पत्तीमुळे रूपाची उत्पत्ती होते; तसेच अविद्येच्या निरोधाने रूपाचा निरोध होतो, तृष्णा, कर्म आणि आहाराच्या निरोधाने रूपाचा निरोध होतो' या प्रकारे रूपस्कंधात, आणि वेदनास्कंध, संज्ञास्कंध व संस्कारस्कंधांमध्ये देखील आहाराला वगळून 'स्पर्शाच्या उत्पत्तीमुळे आणि स्पर्शाच्या निरोधाने' असे स्पर्शाला समाविष्ट करून, तसेच विज्ञानस्कंधात 'नामरूपाच्या उत्पत्तीमुळे आणि नामरूपाच्या निरोधाने' असे नामरूपाला समाविष्ट करून; प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) उत्पत्तीच्या द्वारे आणि प्रत्ययांच्या निरोधाच्या द्वारे, प्रत्ययांचा विचार न करता, वर्तमानकालीन स्कंधांमध्ये केवळ उत्पत्तीच्या लक्षणाचे आणि केवळ विपरिणामाच्या (बदलाच्या) लक्षणाचे दर्शन घेतल्याने क्षणाच्या द्वारे; अशा प्रकारे प्रत्येक स्कंधात प्रत्ययाच्या द्वारे चार प्रकारे आणि क्षणाच्या द्वारे एका प्रकारे, अशा पाच प्रकारे उदय (उत्पत्ती) आणि पाच प्रकारे व्यय (विनाश) पाहण्याच्या द्वारे, एकूण पन्नास आकारांनी उदयव्ययज्ञानाने उदय आणि व्ययाचे वारंवार दर्शन घेणाऱ्या, आरब्धविपस्सक (विपश्यना सुरू केलेल्या) योगी पुरुषाच्या शरीरातून बाहेर पडणारा आणि विपश्यना-चित्तापासून उत्पन्न झालेला प्रकाशरूप असा 'ओभास' (प्रभा), विपश्यना-चित्तासोबत उत्पन्न होणारी खुद्दिका इत्यादी पाच प्रकारची 'पीती' (प्रीती), तसेच काय आणि चित्ताचा दाह शांत करण्याचे लक्षण असणारी, काय व चित्ताच्या भेदाने दोन प्रकारची 'पस्सद्धि' (प्रस्रब्धी), बलवान श्रद्धा-इंद्रियरूप असा 'अधिमोक्ष' (दृढ निश्चय), सम्यक्प्रधानाच्या कार्याला सिद्ध करणारा आणि वीर्य-संबोध्यंगरूप असा 'पग्गह' (प्रग्रह/प्रयत्न), अत्यंत प्रणीत (उत्कृष्ट) असे 'सुख', इंद्राने सोडलेल्या वज्रासारखे आणि त्रिलक्षणाचे दर्शन घडवणारे 'ज्ञान', स्मृतिप्रस्थानरूप असणारी, दीर्घकाळापूर्वी केलेल्या गोष्टींचे स्मरण करण्यास समर्थ असणारी आणि उपस्थानरूप अशी 'सती' (स्मृती), समान रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या विपश्यनेसोबत उत्पन्न होणारी आणि उपेक्षा-संबोध्यंगरूप अशी 'तत्रमज्झत्तुपेक्षा' (तत्रमध्यस्थोपेक्षा) व मनोध्वारातील 'आवर्जन-उपेक्षा' अशी दोन्ही प्रकारची 'उपेक्षा' उत्पन्न झाल्यावर; 'माझ्यामध्ये यापूर्वी कधीही असा प्रकाश उत्पन्न झाला नव्हता' इत्यादी पद्धतीने त्या प्रकाशाविषयी आसक्ती निर्माण करणारी सूक्ष्म तृष्णारूप अशी 'निकंती' (आसक्ती) उत्पन्न होते. अशा प्रकारे ओभास इत्यादी दहा विपश्यना-उपक्लेशांमध्ये (विपश्यनेतील विघ्नांमध्ये) उत्पन्न झाल्यावर, 'माझ्यामध्ये यापूर्वी कधीही असे ओभास इत्यादी उत्पन्न झाले नव्हते, मी नक्कीच मार्ग प्राप्त केला आहे, फल प्राप्त केले आहे' असे न मानता, 'हे ओभास इत्यादी तृष्णा, दृष्टी आणि मानाचे अधिष्ठान असल्यामुळे मार्ग नव्हेत, तर हे केवळ विपश्यनेचे उपक्लेशच आहेत; परंतु या उपक्लेशांपासून मुक्त असणारे आणि विपश्यनेच्या मार्गावर चालणारे विपश्यनाज्ञान हाच मार्ग आहे' अशा प्रकारे मार्ग आणि अमार्गाच्या लक्षणाचे जे व्यवस्थान (निश्चिती) व निश्चय आहे, त्याला मार्ग आणि अमार्गाला जाणण्यामुळे, पाहण्यामुळे आणि अमार्गामध्ये 'हा मार्ग आहे' या संज्ञेचे विशोधन (निवारण) करण्यामुळे 'मार्गामार्गज्ञानदर्शनविशुद्धी' असे म्हटले जाते। ၅၄. ယာဝါနုလောမာတိ ယာဝ သစ္စာနုလောမဉာဏာ. နဝ ဝိပဿနာဉာဏာနီတိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၇၃၇ အာဒယော) ခန္ဓာနံ ဥဒယဉ္စ ဝယဉ္စ ဇာနနကံ ဥဒယဗ္ဗယဉာဏံ, ဥဒယံ မုဉ္စိတွာ ဘင်္ဂမတ္တာနုပေက္ခကံ ဘင်္ဂဉာဏံ, ဘင်္ဂဝသေန ဥပဋ္ဌိတာနံ သီဟာဒီနံ ဝိယ ဘာယိတဗ္ဗာကာရာနုပေက္ခကံ ဘယဉာဏံ, တထာနုပေက္ခိတာနံ အာဒိတ္တဃရဿ ဝိယ အာဒီနဝါကာရာနုပေက္ခကံ အာဒီနဝဉာဏံ, ဒိဋ္ဌာဒီနဝေသု နိဗ္ဗိန္ဒနဝသေန ပဝတ္တံ နိဗ္ဗိဒါဉာဏံ, ဇာလာဒိတော မစ္ဆာဒိကာ ဝိယ တေဟိ တေဘူမကဓမ္မေဟိ မုစ္စိတုကာမတာဝသေန ပဝတ္တံ မုစ္စိတုကမျတာဉာဏံ, မုစ္စနုပါယသမ္ပာဒနတ္ထံ ဒိဋ္ဌာဒီနဝေသုပိ သမုဒ္ဒသကုဏီ ဝိယ ပုနပ္ပုနံ သမ္မသနဝသပ္ပတ္တံ ပဋိသင်္ခါနုပဿနာဉာဏံ, စတ္တဘရိယော ပုရိသော ဝိယ ဒိဋ္ဌာဒီနဝေသု တေသု သင်္ခါရေသု ဥပေက္ခနာကာရပ္ပဝတ္တံ သင်္ခါရုပေက္ခာဉာဏံ, အနိစ္စာဒိလက္ခဏဝိပဿနတာယ ဟေဋ္ဌာ ပဝတ္တာနံ အဋ္ဌန္နံ ဝိပဿနာဉာဏာနံ, ဥဒ္ဓံ မဂ္ဂက္ခဏေ အဓိဂန္တဗ္ဗာနံ သတ္တတိံသဗောဓိပက္ခိယဓမ္မာနဉ္စ အနုလောမတော မဂ္ဂဝီထိယံ ဂေါတြဘုတော ပုဗ္ဗေ ပဝတ္တံ သစ္စာနုလောမိကဉာဏသင်္ခါတံ နဝမံ အနုလောမဉာဏန္တိ ဣမာနိ နဝ ဉာဏာနိ ဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိယာ ပဋိပဒါဘာဝတော တိလက္ခဏဇာနနဋ္ဌေန, ပစ္စက္ခတော ဒဿနဋ္ဌေန, ပဋိပက္ခတော ဝိသုဒ္ဓတ္တာ စ ပဋိပဒါဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ နာမ. ५४. 'यावानुलोमा' म्हणजे सच्चानुलोमज्ञानापर्यंत (सत्यानुलोम ज्ञानापर्यंत). 'नऊ विपश्यना ज्ञाने' म्हणजे: स्कंधांचा उदय आणि व्यय जाणणारे 'उदयव्ययज्ञान'; उदय सोडून केवळ भंगाचे (विनाशाचे) दर्शन घेणारे 'भंगज्ञान'; भंगाच्या द्वारे सिंहादिकांप्रमाणे भयकारक रूपाने समोर येणाऱ्या संस्कारांचे भयकारक रूपाने दर्शन घेणारे 'भयज्ञान'; त्या भयकारक रूपाने वारंवार पाहिलेल्या संस्कारांचे, पेटलेल्या घराप्रमाणे दोषयुक्त रूपाने दर्शन घेणारे 'आदीनवज्ञान'; पाहिलेल्या दोषांविषयी कंटाळा/उद्वेग येण्याच्या रूपाने प्रवृत्त होणारे 'निब्बिदाज्ञान'; जाळ्यातून मासे इत्यादी सुटू इच्छितात त्याप्रमाणे, त्या त्रिभूमक धर्मांमधून मुक्त होण्याच्या इच्छेने प्रवृत्त होणारे 'मुच्चितुकम्यताज्ञान'; मुक्त होण्याचा उपाय शोधण्यासाठी, पाहिलेल्या दोषांविषयी देखील समुद्रातील पक्ष्याप्रमाणे वारंवार परीक्षण करण्याच्या रूपाने प्राप्त झालेले 'पटिसंखानुपेक्खनाज्ञान' (प्रतिसंख्यानुपश्यनाज्ञान); पत्नीचा त्याग केलेल्या पुरुषाप्रमाणे, पाहिलेल्या दोषांविषयी आणि त्या संस्कारांविषयी उपेक्षेच्या (तटस्थतेच्या) रूपाने प्रवृत्त होणारे 'संखारुपेक्षाज्ञान'; आणि अनित्यादी लक्षणांच्या विपश्यनेमुळे खाली प्रवृत्त झालेल्या आठ विपश्यना ज्ञानांना आणि वर मार्गक्षणात प्राप्त होणाऱ्या सदतीस बोधिपाक्षिक धर्मांना अनुकूल असल्यामुळे, मार्गवीथीमध्ये गोत्रभूच्या आधी प्रवृत्त होणारे, 'सच्चानुलोगिकज्ञान' (सत्यानुलोमिक ज्ञान) असे म्हटलेले नववे 'अनुलोमज्ञान'. ही नऊ ज्ञाने, ज्ञानदर्शनविशुद्धीचा मार्ग (प्रतिपदा) असल्यामुळे, त्रिलक्षणाला जाणण्याच्या अर्थाने, प्रत्यक्ष पाहण्याच्या अर्थाने आणि प्रतिपक्षापासून (विरोधी क्लेशांपासून) विशुद्ध असल्यामुळे 'प्रतिपदाज्ञानदर्शनविशुद्धी' असे म्हटले जाते। ၅၅. ဝိပဿနာယ ပရိပါကော ဝိပဿနာပရိပါကော, သင်္ခါရုပေက္ခာဉာဏံ. တံ အာဂမ္မ ပဋိစ္စ. ဣဒါနိ အပ္ပနာ ဥပ္ပဇ္ဇိဿတီတိ [Pg.273] ‘‘ဣဒါနိ အပ္ပနာသင်္ခါတော လောကုတ္တရမဂ္ဂေါ ဥပ္ပဇ္ဇိဿတီ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗက္ခဏေ. ယံ ကိဉ္စီတိ သင်္ခါရုပေက္ခာယ ဂဟိတေသု တီသု ဧကံ ယံ ကိဉ္စိ. ५५. विपश्यनेचा परिपाक म्हणजे 'विपश्यनापरिपाक', जो 'संखारुपेक्षाज्ञान' आहे. 'त्याला प्राप्त करून' म्हणजे त्याचा आश्रय घेऊन. 'आता अर्पणा उत्पन्न होईल' म्हणजे 'आता अर्पणा नावाचा लोकोत्तर मार्ग उत्पन्न होईल' असे म्हणण्याच्या क्षणी. 'जे काही' म्हणजे संखारुपेक्षाज्ञानाने ग्रहण केलेल्या तीन लक्षणांपैकी कोणतेही एक लक्षण। ၅၆. ဝိပဿနာယ မတ္ထကပ္ပတ္တိယာ သိခါပ္ပတ္တာ. အနုလောမဉာဏသဟိတတာယ သာနုလောမာ. သာ ဧဝ သင်္ခါရေသု ဥဒါသီနတ္တာ သင်္ခါရုပေက္ခာ. ယထာနုရူပံ အပါယာဒိတော, သင်္ခါရနိမိတ္တတော စ ဝုဋ္ဌဟနတော ဝုဋ္ဌာနသင်္ခါတံ မဂ္ဂံ ဂစ္ဆတီတိ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနီ. ५६. विपश्यनेच्या शिखरावर पोहोचल्यामुळे ती 'शिखाप्राप्त' (शिखर गाठलेली) आहे. अनुलोमज्ञानाने युक्त असल्यामुळे ती 'सानुलोम' आहे. तीच संस्कारांविषयी उदासीन (तटस्थ) असल्यामुळे 'संखारुपेक्षा' म्हटली जाते. योग्यतेनुसार अपाय इत्यादींपासून आणि संस्कारांच्या निमित्तापासून वर उठत असल्यामुळे, ती 'वुत्थान' (वर उठणे) नावाच्या मार्गाप्रत जाते, म्हणून तिला 'वुत्थानगामिनी' (व्युत्थानगामिनी) म्हणतात। ၅၇. အဘိသမ္ဘောန္တန္တိ ပါပုဏန္တံ. ५७. 'अभिसम्भोन्तं' म्हणजे प्राप्त होणारा (पोहोचणारा)। ၅၈. ပရိဇာနန္တောတိ ‘‘ဧတ္တကံ ဒုက္ခံ, န ဣတော ဦနာဓိက’’န္တိ ပရိစ္ဆိဇ္ဇ ဇာနန္တော. သစ္ဆိကရောန္တောတိ အာရမ္မဏကရဏဝသေန ပစ္စက္ခံ ကရောန္တော. မဂ္ဂသစ္စံ ဘာဝနာဝသေနာတိ မဂ္ဂသစ္စသင်္ခါတဿ သမ္ပယုတ္တမဂ္ဂသင်္ခါတဿ စတုတ္ထသစ္စဿ သဟဇာတာဒိပစ္စယော ဟုတွာ ဝဍ္ဎနဝသေန. ဧကဿေဝ ဉာဏဿ စတုကိစ္စသာဓနံ ပဒီပါဒီနံ ဝဋ္ဋိဒါဟာဒိစတုကိစ္စဒဿနတော, ‘‘ယော, ဘိက္ခဝေ, ဒုက္ခံ ပဿတီ’’တျာဒိ (သံ. နိ. ၅.၁၁၀၀; ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၈၃၉) အာဂမတော စ သမ္ပဋိစ္ဆိတဗ္ဗံ. ५८. 'परिजाणन्तो' (परिज्ञान करणारा) म्हणजे 'एवढेच दुःख आहे, यापेक्षा कमी किंवा जास्त नाही' असे निश्चित करून जाणणारा. 'सच्छिकरोन्तो' (साक्षात करणारा) म्हणजे आलंबन (विषय) करण्याच्या द्वारे प्रत्यक्ष करणारा. 'मार्गसत्य भावनेच्या द्वारे' म्हणजे मार्गसत्य म्हटलेल्या आणि संप्रयुक्त मार्गांगरूप अशा चौथ्या सत्याला सहजात इत्यादी प्रत्यय (कारण) होऊन वाढवण्याच्या द्वारे. एकाच ज्ञानाद्वारे चार कार्ये सिद्ध करणे हे दिव्याच्या वात जळणे इत्यादी चार कार्यांच्या दर्शनाप्रमाणे आणि 'हे भिक्खूहो, जो दुःखाला पाहतो...' इत्यादी आगम सूत्रांच्या आधारे देखील स्वीकारले पाहिजे। ၅၉. ဒွေ တီဏိ ဖလစိတ္တာနိ ပဝတ္တိတွာတိ မဂ္ဂုပ္ပတ္တိယာ အနုရူပတော ဒွေ ဝါ တီဏိ ဝါ ဖလစိတ္တာနိ အပနီတဂ္ဂိမှိ ဌာနေ ဥဏှတ္တနိဗ္ဗာပနတ္ထာယ ဃဋေဟိ အဘိသိဉ္စမာနမုဒကံ ဝိယ သမုစ္ဆိန္နကိလေသေပိ သန္တာနေ ဒရထပဋိပ္ပဿမ္ဘကာနိ ဟုတွာ ပဝတ္တိတွာ, တေသံ ပဝတ္တိယာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏာနီတိ မဂ္ဂဖလာဒိဝိသယာနိ ကာမာဝစရဉာဏာနိ, ယာနိ သန္ဓာယ ‘‘ဝိမုတ္တသ္မိံ ဝိမုတ္တမိတိ ဉာဏံ ဟောတီ’’တိ (မဟာဝ. ၂၃) ဝုတ္တံ. ५९. दोन किंवा तीन फलचित्ते उत्पन्न होऊन म्हणजे मार्गाच्या उत्पत्तीच्या अनुरूपतेने दोन किंवा तीन फलचित्ते, विझवलेल्या अग्नीच्या ठिकाणी उष्णता शांत करण्यासाठी घागरींनी ओतलेल्या पाण्याप्रमाणे, पूर्णपणे नष्ट केलेल्या क्लेशांच्या संतानामध्ये (प्रवाहामध्ये) देखील दाह शांत करणारे होऊन प्रवृत्त झाल्यामुळे, 'त्यांच्या प्रवृत्तीमुळे' असे म्हटले आहे. 'प्रत्यवेक्षण ज्ञाने' म्हणजे मार्ग, फल इत्यादींना विषय करणारी कामावचर ज्ञाने होत, ज्यांच्या संदर्भात 'मुक्त झाल्यावर, मुक्त झाले आहे असे ज्ञान होते' असे म्हटले आहे. ၆၀. ဣဒါနိ ပစ္စဝေက္ခဏာယ ဘူမိံ ဒဿေတုံ ‘‘မဂ္ဂံ ဖလဉ္စာ’’တျာဒိ ဝုတ္တံ. တတ္ထ ‘‘ဣမိနာဝ ဝတာဟံ မဂ္ဂေန အာဂတော’’တိ [Pg.274] မဂ္ဂံ ပစ္စဝေက္ခတိ. တတော ‘‘အယံ နာမ မေ အာနိသံသော လဒ္ဓေါ’’တိ တဿ ဖလံ, တတော ‘‘အယံ နာမ မေ ဓမ္မော အာရမ္မဏတော သစ္ဆိကတော’’တိ နိဗ္ဗာနဉ္စ ပဏ္ဍိတော ပစ္စဝေက္ခတိ. တတော ‘‘ဣမေ နာမ မေ ကိလေသာ ပဟီနာ’’တိ ပဟီနေ ကိလေသေ, ‘‘ဣမေ နာမ အဝသိဋ္ဌာ’’တိ အဝသိဋ္ဌကိလေသေ ပစ္စဝေက္ခတိ ဝါ, န ဝါ. ကောစိ သေက္ခော ပစ္စဝေက္ခတိ, ကောစိ န ပစ္စဝေက္ခတိ. တတ္ထ ကာမစာရောတျဓိပ္ပာယော. တထာ ဟိ မဟာနာမော သက္ကော ‘‘ကော သု နာမ မေ ဓမ္မော အဇ္ဈတ္တံ အပ္ပဟီနော’’တိ (မ. နိ. ၁.၁၇၅; ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၈၁၂) အပ္ပဟီနေ ကိလေသေ ပုစ္ဆိ. အရဟတော ပန အဝသိဋ္ဌကိလေသပစ္စဝေက္ခဏံ နတ္ထိ သဗ္ဗကိလေသာနံ ပဟီနတ္တာ, တသ္မာ တိဏ္ဏံ သေက္ခာနံ ပန္နရသ အရဟတော စတ္တာရီတိ ဧကူနဝီသတိ ပစ္စဝေက္ခဏဉာဏာနီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ६०. आता प्रत्यवेक्षण ज्ञानाची भूमी (विषय) दर्शवण्यासाठी 'मग्गं फलञ्च' इत्यादी म्हटले आहे. त्यात, 'मी खरोखर याच मार्गाने आलो आहे' असे मार्गाचे प्रत्यवेक्षण करतो. त्यानंतर, 'मला हा असा लाभ (आणिषंस) मिळाला आहे' असे त्याच्या फलाचे, आणि त्यानंतर 'मी या अशा धर्माचा (निर्वाणाचा) आलंबन रूपाने साक्षात्कार केला आहे' असे तो पंडित निर्वाणाचे प्रत्यवेक्षण करतो. त्यानंतर, 'माझे हे असे क्लेश नष्ट झाले आहेत' असे नष्ट झालेल्या क्लेशांचे, आणि 'हे असे क्लेश शिल्लक राहिले आहेत' असे शिल्लक राहिलेल्या क्लेशांचे प्रत्यवेक्षण करतो किंवा करत नाही. काही शैक्ष (सेक्ख) पुद्गल प्रत्यवेक्षण करतो, तर काही करत नाही. त्यात स्वेच्छेनुसार प्रवृत्ती (कामचार) हा अभिप्राय आहे. तसेच महानम शाक्याने 'माझ्या अंतःकरणात कोणता धर्म नष्ट झालेला नाही?' असे नष्ट न झालेल्या क्लेशांविषयी विचारले होते. परंतु अर्हंताला शिल्लक राहिलेल्या क्लेशांचे प्रत्यवेक्षण नसते, कारण त्यांचे सर्व क्लेश नष्ट झालेले असतात; म्हणून तीन शैक्षांचे पंधरा आणि अर्हंताचे चार, असे एकूण एकोणीस प्रत्यवेक्षण ज्ञाने आहेत असे समजावे. ဆဗ္ဗိသုဒ္ဓိကမေနာတိ (ဝိသုဒ္ဓိ. ၂.၆၆၂ အာဒယော) သီလစိတ္တဝိသုဒ္ဓီနံ ဝသေန မူလဘူတာနံ ဒွိန္နံ, ဒိဋ္ဌိဝိသုဒ္ဓိအာဒီနံ ဝသေန သရီရဘူတာနံ စတုန္နန္တိ ဧတာသံ ဆန္နံ ဝိသုဒ္ဓီနံ ကမေန. စတုန္နံ သစ္စာနံ ဇာနနတာ, ပစ္စက္ခကရဏတော, ကိလေသမလေဟိ ဝိသုဒ္ဓတ္တာ စ ဉာဏဒဿနဝိသုဒ္ဓိ နာမ. 'सहा विशुद्धींच्या क्रमाने' म्हणजे मूळभूत असलेल्या शीलविशुद्धी आणि चित्तविशुद्धी या दोन विशुद्धींच्या द्वारे, आणि शरीरभूत असलेल्या दृष्टिविशुद्धी इत्यादी चार विशुद्धींच्या द्वारे, अशा या सहा विशुद्धींच्या क्रमाने. चार आर्या सत्यांचे ज्ञान झाल्यामुळे, त्यांचा प्रत्यक्ष साक्षात्कार केल्यामुळे आणि क्लेशांच्या मलापासून विशुद्ध झाल्यामुळे याला 'ज्ञानदर्शनविशुद्धी' असे म्हणतात. ဧတ္ထာတိ ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနေ. 'येथे' म्हणजे विपश्यना कर्मस्थानामध्ये. ဝိသုဒ္ဓိဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. विशुद्धी-भेद वर्णन समाप्त झाले. ဝိမောက္ခဘေဒဝဏ္ဏနာ विमोक्ष-भेद वर्णन ၆၁. တတ္ထ တသ္မိံ ဥဒ္ဒေသေ. သင်္ခါရေသု ‘‘ယော အတ္တာဘိနိဝေသော ကမ္မဿ ကာရကော ဖလဿ စ ဝေဒကော ဧသော မေ အတ္တာ’’တိ ဧဝံ အဘိနိဝေသော ဒဠှဂ္ဂါဟော, တံ မုဉ္စန္တီ [Pg.275] ‘‘အနတ္တာ’’တိ ပဝတ္တာ အနုပဿနာဝ အတ္တသုညတာကာရာနုပဿနတော သုညတာနုပဿနာ နာမ ဝိမောက္ခမုခံ ပဋိပက္ခတော ဝိမုတ္တိဝသေန ဝိမောက္ခသင်္ခါတဿ လောကုတ္တရံ မဂ္ဂဖလဿ ဒွါရံ ဟောတိ. ६१. त्यात (त्या उद्देशात), संस्कारांमध्ये 'हा कर्माचा कर्ता आणि फलाचा भोक्ता असलेला माझा आत्मा आहे' असा जो अभिनिवेश म्हणजे दृढ पकड आहे, त्याला सोडणारी 'अनात्मा' अशी प्रवृत्त झालेली अनुपश्यनाच, आत्म्यापासून शून्य असण्याच्या आकाराने वारंवार पाहण्यामुळे 'शून्यतानुपश्यना' नावाचे विमोक्षमुख (मुक्तीचे द्वार) होते; जे विरोधी क्लेशांपासून मुक्त होण्याच्या सामर्थ्याने 'विमोक्ष' संज्ञक लोकोत्तर मार्ग आणि फलाचे द्वार होते. ၆၂. သင်္ခါရေသု ‘‘အနိစ္စ’’န္တိ ပဝတ္တာ အနုပဿနာ အနိစ္စေ ‘‘နိစ္စ’’န္တိ (အ. နိ. ၄.၄၉; ပဋိ. မ. ၁.၂၃၆; ဝိဘ. ၉၃၉) ပဝတ္တံ သညာစိတ္တဒိဋ္ဌိဝိပလ္လာသသင်္ခါတံ ဝိပလ္လာသနိမိတ္တံ မုဉ္စန္တီ ပဇဟန္တီ ဝိပလ္လာသနိမိတ္တရဟိတာကာရာနုပဿနတော အနိမိတ္တာနုပဿနာ နာမ ဝိမောက္ခမုခံ ဟောတီတိ သမ္ဗန္ဓော. ६२. संस्कारांमध्ये 'अनित्य' अशी प्रवृत्त झालेली अनुपश्यना, अनित्य असलेल्या संस्कारांमध्ये 'नित्य' अशी प्रवृत्त झालेली आणि संज्ञा-चित्त-दृष्टी-विपर्यास संज्ञक अशा विपर्यास निमित्ताला सोडणारी व त्याग करणारी असल्यामुळे, विपर्यास निमित्ताने रहित असण्याच्या आकाराने वारंवार पाहण्यामुळे 'अनिमित्तानुपश्यना' नावाचे विमोक्षमुख होते, असा संबंध आहे. ၆၃. ‘‘ဒုက္ခ’’န္တိ ပဝတ္တာနုပဿနာ သင်္ခါရေသု ‘‘ဧတံ မမ, ဧတံ သုခ’’န္တျာဒိနာ နယေန ပဝတ္တံ ကာမဘဝတဏှာသင်္ခါတံ တဏှာပဏိဓိံ တဏှာပတ္ထနံ မုဉ္စန္တီ ဒုက္ခာကာရဒဿနေန ပရိစ္စဇန္တီ ပဏိဓိရဟိတာကာရာနုပဿနတော အပ္ပဏိဟိတာနုပဿနာ နာမ. ६३. 'दुःख' अशी प्रवृत्त झालेली अनुपश्यना, संस्कारांमध्ये 'हे माझे आहे, हे सुख आहे' इत्यादी पद्धतीने प्रवृत्त झालेल्या आणि कामतृष्णा व भवतृष्णा संज्ञक अशा तृष्णा-प्रणिधीचा (तळमळीचा) त्याग करणारी असल्यामुळे, दुःखाच्या आकाराचे दर्शन घडवून तिचा त्याग करत असल्यामुळे, प्रणिधीने (तळमळीने) रहित असण्याच्या आकाराने वारंवार पाहण्यामुळे 'अप्रणिहितानुपश्यना' नावाचे विमोक्षमुख होते. ၆၄. တသ္မာတိ ယသ္မာ ဧတာသံ တိဿန္နံ ဧတာနိ တီဏိ နာမာနိ, တသ္မာ ယဒိ ဝုဋ္ဌာနဂါမိနိဝိပဿနာ အနတ္တတော ဝိပဿတိ. မဂ္ဂေါ သုညတော နာမ ဝိမောက္ခော ဟောတိ အာဂမနဝသေန လဒ္ဓနာမတ္တာ. ६४. म्हणून, ज्या अर्थी या तीन अनुपश्यनांची ही तीन नावे आहेत, म्हणून जर वुट्ठानगामिनी विपश्यना अनात्म रूपाने विपश्यना करते, तर मार्ग हा 'शून्यता' नावाचा विमोक्ष होतो, कारण त्याला विपश्यनेच्या आगमनाच्या (उत्पत्तीच्या) सामर्थ्याने हे नाव प्राप्त झाले आहे. ၆၆. ဝိပဿနာဂမနဝသေနာတိ ဝိပဿနာသင်္ခါတာဂမနဝသေန. အာဂစ္ဆတိ ဧတေန မဂ္ဂေါ, ဖလဉ္စာတိ ဝိပဿနာမဂ္ဂေါ ဣဓ အာဂမနံ နာမ. ६६. 'विपश्यनेच्या आगमनाच्या सामर्थ्याने' म्हणजे विपश्यना संज्ञक आगमनाच्या सामर्थ्याने. याच्याद्वारे मार्ग आणि फल प्राप्त होतात, म्हणून विपश्यना आणि मार्ग यांना येथे 'आगमन' असे म्हटले आहे. ၆၇. ယထာဝုတ္တနယေနာတိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တအနတ္တာနုပဿနာဒိဝသေန. ယထာသကံ ဖလမုပ္ပဇ္ဇမာနမ္ပီတိ ယထာလဒ္ဓမဂ္ဂဿ ဖလဘူတံ အတ္တနော အတ္တနော ဖလံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနမ္ပိ မဂ္ဂါဂမနဝသေန အလဘိတွာ ဝိပဿနာဂမနဝသေနေဝ တီဏိ နာမာနိ လဘတိ [Pg.276] ဖလသမာပတ္တိကာလေ တဒါ မဂ္ဂပ္ပဝတ္တာဘာဝေန တဿ ဒွါရဘာဝါယောဂတော. အာရမ္မဏဝသေနာတိ သဗ္ဗသင်္ခါရသုညတတ္တာ, သင်္ခါရနိမိတ္တရဟိတတ္တာ, တဏှာပဏိဓိရဟိတတ္တာ စ သုညတအနိမိတ္တအပ္ပဏိဟိတနာမဝန္တံ နိဗ္ဗာနံ အာရဗ္ဘ ပဝတ္တတ္တာ တဿ ဝသေန. သရသဝသေနာတိ ရာဂါဒိသုညတတ္တာ, ရူပနိမိတ္တာဒိအာရမ္မဏရဟိတတ္တာ, ကိလေသပဏိဓိရဟိတတ္တာ အတ္တနော ဂုဏဝသေန. သဗ္ဗတ္ထာတိ မဂ္ဂဝီထိယံ, ဖလသမာပတ္တိဝီထိယဉ္စ. သဗ္ဗေသမ္ပီတိ မဂ္ဂဿ, ဖလဿပိ. ६७. 'पूर्वोक्त पद्धतीने' म्हणजे पूर्वी सांगितलेल्या अनात्मानुपश्यना इत्यादींच्या सामर्थ्याने. 'आपले स्वतःचे फल उत्पन्न होत असताना देखील' म्हणजे ज्या ज्या मार्गाचे फल म्हणून उत्पन्न होणारे स्वतःचे फल उत्पन्न होत असताना देखील, मार्गाच्या आगमनाच्या सामर्थ्याने नाव न मिळवता, केवळ विपश्यनेच्या आगमनाच्या सामर्थ्यानेच फलसमापत्तीच्या वेळी ती तीन नावे प्राप्त करते; कारण त्या वेळी मार्गाची प्रवृत्ती नसल्यामुळे त्याचे द्वार असणे अयोग्य ठरते. 'आलंबनाच्या सामर्थ्याने' म्हणजे सर्व संस्कारांपासून शून्य असल्यामुळे, संस्कारांच्या निमित्ताने रहित असल्यामुळे आणि तृष्णेच्या प्रणिधीने रहित असल्यामुळे, शून्य, अनिमित्त आणि अप्रणिहित अशी नावे असलेल्या निर्वाणाला आलंबन करून प्रवृत्त झाल्यामुळे, त्या आलंबनाच्या सामर्थ्याने. 'स्वतःच्या रसाच्या (स्वभावाच्या) सामर्थ्याने' म्हणजे रागादी क्लेशांपासून शून्य असल्यामुळे, रूपादी निमित्ताने रहित असल्यामुळे आणि क्लेशांच्या प्रणिधीने रहित असल्यामुळे, स्वतःच्या गुणांच्या सामर्थ्याने. 'सर्व ठिकाणी' म्हणजे मार्गवीथीमध्ये आणि फलसमापत्तीवीथीमध्ये देखील. 'सर्वांचेच' म्हणजे मार्गाचे आणि फलाचे देखील (तिन्ही नावे समानच आहेत). ဝိမောက္ခဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. विमोक्ष-भेद वर्णन समाप्त झाले. ပုဂ္ဂလဘေဒဝဏ္ဏနာ पुद्गल-भेद वर्णन ၆၈. သတ္တက္ခတ္တုံ သတ္တသု ဝါရေသု ကာမသုဂတိယံ ပဋိသန္ဓိဂ္ဂဟဏံ ပရမံ ဧတဿာတိ သတ္တက္ခတ္တုပရမော န ပန အဋ္ဌမာဒိကာမဘဝဂါမီတျဓိပ္ပာယော. ယံ သန္ဓာယ ဝုတ္တံ ‘‘န တေ ဘဝံ အဋ္ဌမမာဒိယန္တီ’’တိ (ခု. ပါ. ၆.၉; သု. နိ. ၂၃၂; နေတ္တိ. ၁၁၅). ရူပါရူပသုဂတိဘဝံ ပန သတ္တဝါရတော ပရမ္ပိ ဂစ္ဆတီတိ အာစရိယာ. ६८. ज्या या स्रोतापन्न पुद्गलाचे कामसुगतीमध्ये जास्तीत जास्त सात वेळा प्रतिसंधी ग्रहण करणे होते, त्याला 'सत्तक्खत्तुपरम' (सात वेळा जन्म घेणारा) असे म्हणतात; परंतु तो आठव्या कामभवात जात नाही, असा अभिप्राय आहे. ज्याच्या संदर्भात 'ते आठवा भव ग्रहण करत नाहीत' असे म्हटले आहे. परंतु रूप आणि अरूप सुगती भवामध्ये तो सात वेळापेक्षा अधिक वेळा देखील जातो, असे आचार्य म्हणतात. ၆၉. ရာဂဒေါသမောဟာနန္တိ မောဟဂ္ဂဟဏံ ရာဂဒေါသေကဋ္ဌမောဟံ သန္ဓာယာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ६९. 'राग, द्वेष आणि मोहाचा' या वाक्यात, 'मोह' शब्दाचे ग्रहण हे राग आणि द्वेषासोबत एकाच चित्तात राहणाऱ्या मोहाच्या संदर्भात केले आहे, असे समजावे. ၇၀. ခီဏာ စတ္တာရော အာသဝါ ဧတဿာတိ ခီဏာသဝေါ. ဒက္ခိဏာရဟေသု အဂ္ဂတ္တာ အဂ္ဂဒက္ခိဏေယျော. ७०. ज्याचे चारही आसव नष्ट झाले आहेत, त्याला 'क्षीणासव' (अर्हंत) असे म्हणतात. दान देण्यास योग्य असलेल्या पुद्गलांमध्ये सर्वश्रेष्ठ असल्यामुळे त्यांना 'अग्रदक्षिणेय्य' असे म्हणतात. ပုဂ္ဂလဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. पुद्गल-भेद वर्णन समाप्त झाले. သမာပတ္တိဘေဒဝဏ္ဏနာ समापत्ती-भेद वर्णन ၇၂. သဗ္ဗေသမ္ပီတိ စတုန္နမ္ပိ အရိယပုဂ္ဂလာနံ. ७२. 'सर्वांचेच' म्हणजे चारही आर्य पुद्गलांचे. ၇၃. စိတ္တစေတသိကာနံ [Pg.277] အပ္ပဝတ္တိသင်္ခါတဿ နိရောဓဿ သမာပတ္တိ နိရောဓသမာပတ္တိ, ဒိဋ္ဌေဝ ဓမ္မေ စိတ္တနိရောဓံ ပတွာ ဝိဟရဏံ. အနာဂါမီနဉ္စာတိ ကာမရူပဘဝဋ္ဌာနံ အဋ္ဌသမာပတ္တိလာဘီနမေဝ အနာဂါမီနံ, တထာ ခီဏာသဝါနဉ္စ. တတ္ထာတိ နိရောဓသမာပတ္တိယံ. ယာဝ အာကိဉ္စညာယတနံ ဂန္တွာတိ ဧဝံ သမထဝိပဿနာနံ ယုဂနဒ္ဓဘာဝါပါဒနဝသေန ယာဝ အာကိဉ္စညာယတနံ, တာဝ ဂန္တွာ. အဓိဋ္ဌေယျာဒိကန္တိ ကာယပဋိဗဒ္ဓံ ဌပေတွာ ဝိသုံ ဝိသုံ ဌပိတစီဝရာဒိပရိက္ခာရဂေဟာဒီနံ အဂ္ဂိအာဒိနာ အဝိနာသနာဓိဋ္ဌာနံ, သံဃပဋိမာနနသတ္ထုပက္ကောသနာနံ ပုရေတရံ ဝုဋ္ဌာနံ, သတ္တာဟဗ္ဘန္တရေ အာယုသင်္ခါရပ္ပဝတ္တိဩလောကနန္တိ စတုဗ္ဗိဓံ အဓိဋ္ဌာနာဒိကံ ပုဗ္ဗကိစ္စံ ကတွာ. ७३. चित्त आणि चेतसिकांच्या अनुत्पत्ती (मप्रवृत्ती) नावाच्या निरोधाची प्राप्ती म्हणजे 'निरोधसमापत्ती' होय; किंवा याच जन्मात (दृष्टधर्मात) चित्ताच्या निरोधाला प्राप्त करून विहार करणे होय. 'अनागामींच्या' म्हणजे कामभव आणि रूपभवात स्थित असलेल्या, आठ समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या अनागामींचेच, तसेच क्षीणासवांचे (अर्हतांचे) सुद्धा (निरोधसमापत्ती प्राप्त करणे होय). 'तेथे' म्हणजे निरोधसमापत्तीमध्ये. 'आकिंचन्यायतन समाधीपर्यंत जाऊन' म्हणजे अशा प्रकारे शमथ आणि विपश्यनेला युगबद्ध (एकत्रित) करण्याच्या सामर्थ्याने आकिंचन्यायतन भूमीपर्यंत जाऊन. 'अधिष्ठान इत्यादी' म्हणजे शरीराशी संबंधित वस्तू सोडून, वेगवेगळ्या ठेवलेल्या चीवर इत्यादी परिष्कार आणि विहार इत्यादींचा अग्नी इत्यादींद्वारे विनाश न होण्याचे अधिष्ठान करणे, संघाची प्रतीक्षा किंवा शास्त्यांच्या पाचारणापूर्वीच समाधीतून उठणे, आणि सात दिवसांच्या आत आयुष्यसंस्काराच्या प्रवृत्तीचे अवलोकन करणे, असे चार प्रकारचे अधिष्ठान इत्यादी पूर्वकृत्य करून. သမာပတ္တိဘေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. समापत्ती-भेद वर्णन समाप्त झाले. ဝိပဿနာကမ္မဋ္ဌာနဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. विपश्यना कर्मस्थान वर्णन समाप्त झाले. ဥယျောဇနဝဏ္ဏနာ उय्योजन वर्णन (प्रेरणात्मक उपसंहार वर्णन) ၇၅. ပဋိပတ္တိရသဿာဒန္တိ ဈာနသုခဖလသုခါဒိဘေဒံ သမထဝိပဿနာပဋိပတ္တိရသဿာဒံ. ७५. 'प्रतिपत्तीच्या रसाचा आस्वाद' म्हणजे ध्यानसुख, फलसुख इत्यादी भेद असलेल्या शमथ आणि विपश्यना रूपी प्रतिपत्तीच्या आस्वाद्य रसाचा आस्वाद घेणे. ဣတိ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ နာမ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဝဏ္ဏနာယ अशा प्रकारे, 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाच्या अभिधम्मत्थसंग्रहाच्या व्याख्येत (टीकेत), ကမ္မဋ္ဌာနပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. कर्मस्थान परिच्छेद वर्णन समाप्त झाले. နိဂမနဝဏ္ဏနာ निगमन वर्णन (उपसंहार वर्णन) (က) စာရိတ္တေန ကုလာစာရေန သောဘိတေ ဝိသာလကုလေ ဥဒယော နိဗ္ဗတ္တိ ယဿ, တေန, ကမ္မာဒိဝိသယာယ သဒ္ဓါယ အဘိဝုဒ္ဓေါ ပရိသုဒ္ဓေါ စ ဒါနသီလာဒိဂုဏာနံ ဥဒယော ယဿ, တေန, နမ္ပဝှယေန နမ္ပနာမကေန, ပရာနုကမ္ပံ သာသနေ သုခေါတရဏပရိပါစနလက္ခဏံ ပရာနုဂ္ဂဟံ, ပဏိဓာယ ပတ္ထေတွာ ယံ ပကရဏံ ပတ္ထိတံ အဘိယာစိတံ, တံ ဧတ္တာဝတာ ပရိနိဋ္ဌိတန္တိ ယောဇနာ. (क) सदाचार आणि कुळाच्या आचाराने सुशोभित अशा विशाळ कुळात ज्यांचा जन्म झाला आहे, अशा त्यांच्याद्वारे; कर्म इत्यादी विषयांवरील श्रद्धा वृद्धिंगत झाली आहे आणि दान, शील इत्यादी परिशुद्ध गुणांचा उदय झाला आहे, अशा त्यांच्याद्वारे; 'नम्प' नावाच्या दायकाने, इतरांबद्दलची अनुकंपा आणि शासनात (धम्मात) सुलभतेने प्रवेश व परिपक्वता मिळवून देण्याच्या लक्षणाने युक्त असा परोपकार मनात धरून ज्या ग्रंथाची प्रार्थना (याचना) केली होती, तो ग्रंथ एवढ्या विस्तृत विवेचनाने पूर्ण झाला आहे, अशी ही योजना आहे. (ခ) တေန [Pg.278] ပကရဏပ္ပသုတေန ဝိပုလေန ပုညေန ပညာဝဒါတေန အရိယမဂ္ဂပညာပရိသုဒ္ဓေန သီလာဒိဂုဏေန သောဘိတာ. တတောယေဝ လဇ္ဇိနော ဘိက္ခူ, ဓညာနံ အဓိဝါသဘူတံ, ဥဒိတောဒိတံ အစ္စန္တပ္ပသိဒ္ဓံ, မူလသောမံ နာမ ဝိဟာရံ, ပုညဝိဘဝဿ ဥဒယသင်္ခါတာယ မင်္ဂလတ္ထာယ အာယုကန္တံ မညန္တု, တတ္ထ နိဝါသိနော ဘိက္ခူ ဤဒိသာ ဟောန္တူတျဓိပ္ပာယော. (ख) ग्रंथ रचनेच्या प्रयत्नाने अर्जित केलेल्या त्या विपुल पुण्याच्या प्रभावाने, आर्यमार्गाच्या प्रज्ञेने अत्यंत शुद्ध आणि प्रज्ञेने निर्मळ अशा शील इत्यादी गुणांनी सुशोभित असलेले, आणि म्हणूनच पापभीरू (लज्जावान) असलेले भिक्खू, पुण्यवानांचे निवासस्थान असलेल्या आणि अत्यंत प्रसिद्ध अशा 'मूलसोम' नावाच्या महाविहाराला, पुण्य-वैभवाच्या वृद्धीरूप मंगल कल्याणासाठी कल्प संपेपर्यंत नेहमी स्मरणात ठेवोत; आणि तेथे राहणारे भिक्खू असेच गुणसंपन्न होवोत, असा हा अभिप्राय आहे. နိဂမနဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. निगमन वर्णन समाप्त झाले. နိဋ္ဌိတာ စာယံ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနီ နာမ. आणि ही 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाची व्याख्या समाप्त झाली. အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဋီကာ. अभिधम्मत्थसंग्रह-टीका. နိဂမနကထာ निगमन कथा (उपसंहार वचन) ၁. ရမ္မေ ပုလတ္ထိနဂရေ နဂရာဓိရာဇေ,ရညာ ပရက္ကမဘုဇေန မဟာဘုဇေန; ကာရာပိတေ ဝသတိ ဇေတဝနေ ဝိဟာရေ; ယော ရမ္မဟမ္မိယဝရူပဝနာဘိရာမေ. १. रमणीय आणि नगरांमध्ये श्रेष्ठ अशा पुलत्थि नगरात, महापराक्रमी राजा पराक्रमबाहू यांनी बांधलेल्या आणि सुंदर प्रासाद व उद्यानांनी अत्यंत नयनरम्य असलेल्या 'जेतवन' नावाच्या महाविहारात जे वास्तव्य करतात; ၂. သမ္ပန္နသီလဒမသံယမတောသိတေဟိ,သမ္မာနိတော ဝသိဂဏေဟိ ဂုဏာကရေဟိ; ပတ္တော မုနိန္ဒဝစနာဒိသု နေကဂန္ထ-ဇာတေသု စာစရိယတံ မဟိတံ ဝိဒူဟိ. २. जे शील, इंद्रियदमन आणि संयमाने परिपूर्ण व संतुष्ट असलेल्या, गुणांचे भांडार असलेल्या अर्हत भिक्खूंच्या समूहाद्वारे अत्यंत सन्मानित आहेत; आणि बुद्धवचन इत्यादी अनेक प्रकारच्या ग्रंथांमध्ये विद्वानांद्वारे पूजनीय अशा आचार्यपदाला प्राप्त झाले आहेत; ၃. ဉာဏာနုဘာဝမိဟ ယဿ စ သူစယန္တီ,သံဝဏ္ဏနာ စ ဝိနယဋ္ဌကထာဒိကာနံ; သာရတ္ထဒီပနိမုခါ မဓုရတ္ထသာရ-သန္ဒီပနေန သုဇနံ ပရိတောသယန္တီ. ३. आणि या शासनात ज्यांच्या प्रज्ञेचा प्रभाव दर्शविणारी, विनय-अट्ठकथा इत्यादींची व्याख्या करणारी 'सारत्थदीपनी' इत्यादी मुख्य टीका मधुर आणि श्रेष्ठ अर्थांचे प्रकटीकरण करून सज्जनांना सर्वतोपरी आनंदित करते; ၄. တဿာနုကမ္ပမဝလမ္ဗိယ [Pg.279] သာရိပုတ္တ-တ္ထေရဿ ထာမဂတသာရဂုဏာကရဿ; ယော နေကဂန္ထဝိသယံ ပဋုတံ အလတ္ထံ,တဿေသ ဉာဏဝိဘဝေါ ဝိဘဝေကဟေတု. ४. दृढ आणि श्रेष्ठ गुणांचे भांडार असलेल्या त्या आचार्य सारिपुत्त महाथेरांच्या अनुकंपेचा आश्रय घेऊन, ज्या मी अनेक ग्रंथांच्या विषयात नैपुण्य प्राप्त केले आहे, माझ्या प्रज्ञेचा हा विकास (ऐहिक आणि पारलौकिक अशा) दोन्ही प्रकारच्या समृद्धीचे एकमेव कारण आहे. ၅. သောဟမေတဿ သံသုဒ္ဓ-ဝါယာမဿာနုဘာဝတော.အဒ္ဓါသာသနဒါယာဒေါ, ဟေဿံ မေတ္တေယျသတ္ထုနော. ५. तो मी, या अत्यंत शुद्ध अशा प्रयत्नांच्या प्रभावाने, निश्चितच भावी मैत्रेय बुद्ध शासनाचा धम्मवारसदार होईन. ၆. ဇောတယန္တံ တဒါ တဿ, သာသနံ သုဒ္ဓမာနသံ.ပဿေယျံ သက္ကရေယျဉ္စ, ဂရုံ မေ သာရိသမ္ဘဝံ. ६. त्या वेळी मैत्रेय बुद्धांच्या शासनाला प्रकाशित करणाऱ्या, शुद्ध मनाचे धारक असलेल्या माझ्या पूजनीय गुरु सारिपुत्त महाथेरांचे मला दर्शन घडो आणि मला त्यांचा आदर-सत्कार करण्याची संधी लाभो. ၇. ဒိနေဟိ စတုဝီသေဟိ, ဋီကာယံ နိဋ္ဌိတာ ယထာ.တထာ ကလျာဏသင်္ကပ္ပာ, သီဃံ သိဇ္ဈန္တု ပါဏိနန္တိ. ७. चोवीस दिवसांत ही टीका जशी पूर्ण झाली आहे, त्याचप्रमाणे सर्व प्राण्यांचे कल्याणकारी संकल्प त्वरित पूर्ण होवोत. ဣတိ ဘဒန္တသာရိပုတ္တမဟာထေရဿ သိဿေန ရစိတာ अशा प्रकारे, भदंत सारिपुत्त महाथेरांचे शिष्य (भदंत सुमंगलसामी) यांनी रचलेली, အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနီ နာမ 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नावाची အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဋီကာ နိဋ္ဌိတာ. अभिधम्मत्थसंग्रह-टीका समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |