| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना माझा नमस्कार असो. ขุทฺทกนิกาเย खुद्दकनिकाय เนตฺติปฺปกรณ-ฏีกา नेत्तिप्पकरण-टीका คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา ग्रंथारंभकथावर्णन สํวณฺณนารมฺเภ [Pg.1] (ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; ม. นิ. ฏี. ๑.๑ คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; สํ. นิ. ฏี. ๑.๑.๑ คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา) รตนตฺตยวนฺทนา สํวณฺเณตพฺพสฺส ธมฺมสฺส ปภวนิสฺสยวิสุทฺธิปฏิเวทนตฺถํ, ตํ ปน ธมฺมสํวณฺณนาสุ วิญฺญูนํ พหุมานุปฺปาทนตฺถํ, ตํ สมฺมเทว เตสํ อุคฺคหณธารณาทิกฺกมลทฺธพฺพาย สมฺมาปฏิปตฺติยา สพฺพหิตสุขนิปฺผาทนตฺถํ. อถ วา มงฺคลภาวโต, สพฺพกิริยาสุ ปุพฺพกิจฺจภาวโต, ปณฺฑิเตหิ สมฺมาจริตภาวโต, อายตึ ปเรสํ ทิฏฺฐานุคติอาปชฺชนโต จ สํวณฺณนายํ รตนตฺตยปณามกิริยา. อถ วา รตนตฺตยปณามกรณํ ปูชนียปูชาปุญฺญวิเสสนิพฺพตฺตนตฺถํ, ตํ อตฺตโน ยถาลทฺธสมฺปตฺตินิมิตฺตสฺส กมฺมสฺส พลานุปฺปทานตฺถํ, อนฺตรา จ ตสฺส อสงฺโกจนตฺถํ, ตทุภยํ อนนฺตราเยน อฏฺฐกถาย ปริสมาปนตฺถํ. อิทเมว จ ปโยชนํ อาจริเยน อิธาธิปฺเปตํ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘วนฺทนาชนิตํ…เป… ตสฺส เตชสา’’ติ. วตฺถุตฺตยปูชา หิ นิรติสยปุญฺญกฺเขตฺตสมฺพุทฺธิยา อปริเมยฺยปฺปภาโว ปุญฺญาติสโยติ พหุวิธนฺตราเยปิ โลกสนฺนิวาเส อนฺตรายนิพนฺธนสกลสํกิเลสวิทฺธํสนาย ปโหติ, ภยาทิอุปทฺทวญฺจ นิวาเรติ. ยถาห – वर्णनाच्या आरंभी (दी. नि. टी. १. ग्रंथारंभकथावर्णन; म. नि. टी. १.१ ग्रंथारंभकथावर्णन; सं. नि. टी. १.१.१ ग्रंथारंभकथावर्णन) त्रिरत्नवंदना ही ज्या धर्माचे वर्णन करायचे आहे, त्याच्या उत्पत्तीचा आधार, विशुद्धता आणि साक्षात्कार दर्शवण्यासाठी आहे, आणि त्या धर्मवर्णनामध्ये विद्वानांच्या मनात आदर निर्माण करण्यासाठी आहे, तसेच त्यांच्याद्वारे त्याचे योग्य प्रकारे ग्रहण, धारण इत्यादी क्रमाने प्राप्त होणाऱ्या सम्यक् प्रतिपत्तीने (योग्य आचरणाने) सर्वांचे हित आणि सुख साध्य करण्यासाठी आहे. किंवा, मंगलकारक असल्यामुळे, सर्व क्रियांमध्ये पूर्वकृत्य (आरंभीचे कर्तव्य) असल्यामुळे, पंडितांनी योग्य प्रकारे आचरणात आणल्यामुळे आणि भविष्यात इतरांनी त्याचे अनुकरण करावे म्हणून वर्णनाच्या आरंभी त्रिरत्नाला नमन करण्याची क्रिया केली जाते. किंवा, त्रिरत्नाला नमन करणे हे पूजनीय व्यक्तींच्या पूजेने मिळणाऱ्या विशेष पुण्याची प्राप्ती करण्यासाठी आहे, आणि ते स्वतःला मिळालेल्या संपत्तीचे कारण असलेल्या कर्माला बळ देण्यासाठी आहे, तसेच त्या कर्मामध्ये कोणताही संकोच (अडथळा) न येण्यासाठी आहे; आणि या दोन्ही गोष्टी अट्ठकथा (टीका) विनाअडथळा पूर्ण करण्यासाठी आहेत. आचार्यांना येथे हेच प्रयोजन अभिप्रेत आहे. म्हणूनच ते पुढे म्हणतील, “वंदनेने उत्पन्न झालेल्या... पे... त्याच्या तेजाने.” कारण त्रिरत्नाची पूजा ही सर्वोत्तम पुण्यक्षेत्राच्या ज्ञानामुळे अपरिमित प्रभाव असणारा अतिशय मोठा पुण्यसंचय आहे, जो अनेक प्रकारच्या अडथळ्यांनी युक्त असलेल्या या जगात अडथळ्यांचे कारण बनणाऱ्या सर्व संक्लेशांचा (मळ, क्लेश) नाश करण्यास समर्थ ठरतो आणि भय इत्यादी उपद्रवांचे निवारण करतो. जसे म्हटले आहे – ‘‘ปูชารเห ปูชยโต, พุทฺเธ ยทิ ว สาวเก’’ติ. (ธ. ป. ๑๙๕; อป. เถร ๑.๑๐.๑) จ, “पूजेस योग्य असणाऱ्या बुद्धांची किंवा त्यांच्या श्रावकांची पूजा करणाऱ्या...” (धम्मपद १९५; अपदान थेर १.१०.१) आणि, ตถา [Pg.2] – तसेच – ‘‘เย, ภิกฺขเว, พุทฺเธ ปสนฺนา, อคฺเค เต ปสนฺนา, อคฺเค โข ปน ปสนฺนานํ อคฺโค วิปาโก โหตี’’ติ (อ. นิ. ๔.๓๔; อิติวุ. ๙๐) จ, “भिक्खूहो, जे बुद्धांवर प्रसन्न (श्रद्धावान) आहेत, ते सर्वश्रेष्ठ गोष्टीवर प्रसन्न आहेत; आणि सर्वश्रेष्ठ गोष्टीवर प्रसन्न असणाऱ्यांना सर्वश्रेष्ठच विपाक (फळ) प्राप्त होतो.” (अं. नि. ४.३४; इतिवृत्तक ९०) आणि, ตถา – तसेच – ‘‘‘พุทฺโธ’ติ กิตฺตยนฺตสฺส, กาเย ภวติ ยา ปีติ; วรเมว หิ สา ปีติ, กสิเณนปิ ชมฺพุทีปสฺส; ‘‘‘ธมฺโม’ติ…เป… ‘สงฺโฆ’ติ…เป… ทีปสฺสา’’ติ. (ที. นิ. อฏฺฐ. ๑.๖; อิติวุ. อฏฺฐ ๙๐; ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; ม. นิ. ฏี. ๑.๑; อ. นิ. ฏี. ๒.๔.๓๔) จ, “‘बुद्ध’ असे कीर्तन करणाऱ्याच्या (गुणगान करणाऱ्याच्या) शरीरात जी प्रीती (आनंद) उत्पन्न होते; ती प्रीती संपूर्ण जंबुद्वीपाच्या राज्यापेक्षाही श्रेष्ठ आहे; ‘धम्म’... पे... ‘संघ’... पे... द्वीपाच्या...” (दी. नि. अट्ठ. १.६; इतिवृ. अट्ठ. ९०; दी. नि. टी. १. ग्रंथारंभकथावर्णन; म. नि. टी. १.१; अं. नि. टी. २.४.३४) आणि, ตถา – तसेच – ‘‘ยสฺมึ, มหานาม, สมเย อริยสาวโก ตถาคตํ อนุสฺสรติ, เนวสฺส ตสฺมึ สมเย ราคปริยุฏฺฐิตํ จิตฺตํ โหติ, น โทส…เป… น โมหปริยุฏฺฐิตํ จิตฺตํ โหตี’’ติ (อ. นิ. ๖.๑๐; ๑๑.๑๑) จ, “महानाम, ज्या वेळी आर्यश्रावक तथागतांचे अनुस्मरण करतो, त्या वेळी त्याचे चित्त रागाने वेढलेले नसते, द्वेषाने... पे... मोहाने वेढलेले नसते.” (अं. नि. ६.१०; ११.११) आणि, ตถา – तसेच – ‘‘อรญฺเญ รุกฺขมูเล วา…เป…; ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา, โลมหํโส น เหสฺสตี’’ติ. (สํ. นิ. ๑.๒๔๙) จ; “अरण्यात किंवा वृक्षाच्या मुळाशी... पे...; भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा (रोमहर्ष) होणार नाही.” (सं. नि. १.२४९) आणि; ตตฺถ ยสฺส รตนตฺตยสฺส วนฺทนํ กตฺตุกาโม, ตสฺส คุณาติสยโยคสนฺทสฺสนตฺถํ ‘‘มหาการุณิก’’นฺติอาทินา คาถาตฺตยมาห. คุณาติสยโยเคน หิ วนฺทนารหภาโว, วนฺทนารเห จ กตา วนฺทนา ยถาธิปฺเปตปฺปโยชนํ สาเธตีติ. ตตฺถ ยสฺสา สํวณฺณนํ กตฺตุกาโม, สา เนตฺติ วิเสสโต ยถานุโลมสาสนสนฺนิสฺสยา, ตสฺส จ วิจิตฺตาการปฺปวตฺติวิภาวินี. ตถา หิ สุตฺตนฺตเทสนา น วินยเทสนา วิย กรุณาปฺปธานา, นาปิ อภิธมฺมเทสนา วิย ปญฺญาปฺปธานา, อถ โข กรุณาปญฺญาปฺปธานาติ ตทุภยปฺปธานเทสนาวิเสสวิภาวนํ ตาว สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส โถมนํ กาตุํ ตมฺมูลกตฺตา เสสรตนานํ ‘‘มหาการุณิกํ นาถ’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. तेथे ज्या त्रिरत्नाची वंदना करण्याची इच्छा आहे, त्याचे गुणाधिक्य दर्शवण्यासाठी “महाकारुणिक” इत्यादी तीन गाथा म्हटल्या आहेत. गुणाधिक्यामुळेच वंदनीयत्व प्राप्त होते, आणि वंदनीय व्यक्तीला केलेली वंदना इच्छित प्रयोजन साध्य करते. तेथे ज्याचे वर्णन करण्याची इच्छा आहे, ते ‘नेत्ति’ विशेषतः अनुलोम शासनाचा (बुद्धांच्या शिकवणुकीचा) आश्रय घेणारे आहे आणि त्याच्या विविध प्रकारच्या प्रवृत्ती स्पष्ट करणारे आहे. कारण सुत्तंत देशना ही विनय देशनेप्रमाणे केवळ करुणाप्रधान नाही, आणि अभिधम्म देशनेप्रमाणे केवळ प्रज्ञाप्रधान नाही, तर ती करुणा आणि प्रज्ञा या दोन्ही गोष्टींनी प्रधान आहे. म्हणून या दोन्ही प्रधान देशनांचे विशेष स्पष्टीकरण करण्यासाठी, प्रथम सम्यक्संबुद्धांची स्तुती करण्यासाठी आणि इतर रत्नांचे मूळ तेच असल्यामुळे “महाकारुणिकं नाथं” (महाकारुणिक नाथ) इत्यादी म्हटले आहे. ตตฺถ กิรตีติ (ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; ม. นิ. ฏี. ๑.๑; สํ. นิ. ฏี. ๑.๑.๑; อ. นิ. ฏี. ๑.๑.๑) กรุณา, ปรทุกฺขํ วิกฺขิปติ อปเนตีติ อตฺโถ. อถ วา กิณาตีติ กรุณา, ปรทุกฺเข สติ การุณิกํ หึสติ วิพาธตีติ อตฺโถ[Pg.3]. กมฺปนํ กโรตีติ วา กรุณา, ปรทุกฺเข สติ สาธูนํ หทยเขทํ กโรตีติ อตฺโถ. กมิติ วา สุขํ, ตํ รุนฺธตีติ กรุณา. เอสา หิ ปรทุกฺขาปนยนกามตาลกฺขณา, อตฺตสุขนิรเปกฺขตาย การุณิกานํ สุขํ รุนฺธติ วิพนฺธตีติ อตฺโถ. กิริยติ ทุกฺขิเตสุ ปสาริยตีติ วา กรุณา, กรุณาย นิยุตฺโตติ การุณิโก ยถา ‘‘โทวาริโก’’ติ (อ. นิ. ๗.๖๗). ยถา หิ ทฺวารฏฺฐานโต อญฺญตฺถ วตฺตมาโนปิ ทฺวารปฏิพทฺธชีวิโก ปุริโส ทฺวารานติวตฺตวุตฺติตาย ทฺวาเร นิยุตฺโตติ ‘‘โทวาริโก’’ติ วุจฺจติ, เอวํ ภควา เมตฺตาทิวเสน กรุณาวิหารโต อญฺญตฺถ วตฺตมาโนปิ กรุณานติวตฺตวุตฺติตาย กรุณาย นิยุตฺโตติ ‘‘การุณิโก’’ติ วุจฺจติ. มหาภินีหารโต ปฏฺฐาย หิ ยาว มหาปรินิพฺพานา โลกหิตตฺถเมว โลกนาถา ติฏฺฐนฺตีติ. มหนฺโต การุณิโกติ มหาการุณิโก. สติปิ ภควโต ตทญฺญคุณานมฺปิ วเสน มหนฺตภาเว การุณิกสทฺทสนฺนิธาเนน วุตฺตตฺตา กรุณาวเสเนเวตฺถ มหนฺตภาโว เวทิตพฺโพ ยถา ‘‘มหาเวยฺยากรโณ’’ติ. เอวญฺจ กตฺวา ‘‘มหาการุณิโก’’ติ อิมินา ปเทน ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน สตฺถุ มหากรุณา วุตฺตา โหติ. तेथे ‘किरती’ (विखुरणे/दूर करणे) म्हणजे करुणा (दी. नि. टी. १. ग्रंथारंभकथावर्णन; म. नि. टी. १.१; सं. नि. टी. १.१.१; अं. नि. टी. १.१.१), जी दुसऱ्यांचे दुःख दूर करते, असा अर्थ आहे. किंवा ‘किणाती’ (दुःख देणे) म्हणजे करुणा, कारण दुसऱ्यांचे दुःख पाहून ती कारुणिक व्यक्तीला व्याकुळ करते, असा अर्थ आहे. किंवा जी कंपन निर्माण करते ती करुणा, कारण दुसऱ्यांचे दुःख पाहून ती सज्जनांच्या हृदयात खेद निर्माण करते, असा अर्थ आहे. किंवा ‘कम्’ म्हणजे सुख, त्याला जी रोखते ती करुणा. कारण ही करुणा दुसऱ्यांचे दुःख दूर करण्याच्या इच्छेचे लक्षण असलेली असून, स्वतःच्या सुखाची पर्वा न करता कारुणिक व्यक्तींच्या वैयक्तिक सुखाला रोखते (बाधित करते), असा अर्थ आहे. किंवा जी दुःखी लोकांवर पसरवली जाते ती करुणा. करुणेमध्ये नियुक्त असलेला तो ‘कारुणिक’, जसे ‘दोवारिक’ (द्वारपाल) (अं. नि. ७.६७). कारण ज्याप्रमाणे दाराच्या जागेव्यतिरिक्त इतर ठिकाणी राहत असला तरी, दाराशी संबंधित उपजीविका असणारा माणूस दाराचे उल्लंघन न करता काम करत असल्यामुळे दारावर नियुक्त असलेला ‘दोवारिक’ (द्वारपाल) म्हटला जातो; त्याचप्रमाणे भगवान मैत्री इत्यादींच्या प्रभावाने करुणाविहाराव्यतिरिक्त इतर विहारात राहत असले तरी, करुणेचे उल्लंघन न करता वागत असल्यामुळे करुणेमध्ये नियुक्त असलेले ‘कारुणिक’ म्हटले जातात. कारण महाअभिनिहारापासून (महान संकल्पापासून) सुरू करून महापरिनिर्वाणापर्यंत लोककल्याणासाठीच लोकनाथ (भगवान) कार्यरत राहतात. महान कारुणिक तो ‘महाकारुणिक’. भगवंतांचे इतर गुणांमुळेही मोठेपण असले, तरी येथे ‘कारुणिक’ शब्दाच्या सान्निध्यामुळे करुणेच्या संदर्भातच त्यांचे मोठेपण समजले पाहिजे, जसे ‘महावेय्याकरण’ (महान व्याकरणकार). आणि अशा प्रकारे ‘महाकारुणिक’ या पदाने पुद्गलाधिष्ठानाने (व्यक्तीच्या माध्यमातून) शास्त्यांची (बुद्धांची) महाकरुणा सांगितली आहे. อปโร นโย – อตฺถสาธนโต กรุณํ กรุณายนํ กรุณาสมฺปวตฺตนํ อรหตีติ การุณิโก. ภควโต หิ สพฺพญฺญุตาย อนวเสสโต สตฺตานํ หิตํ, หิตุปายญฺจ ชานโต, ตตฺถ จ อกิลาสุโน หิเตสิตา สตฺถิกา, น ตถา อญฺเญสนฺติ. อถ วา กรุณา กรุณายนํ สีลํ ปกติ สภาโว เอตสฺสาติ การุณิโก. ภควา หิ ปถวีผสฺสาทโย วิย กกฺขฬผุสนาทิสภาวา กรุณาสภาโว สภาวภูตกรุโณติ อตฺโถ. เสสํ ปุริมสทิสเมว. อถ วา มหาวิสยตาย, มหานุภาวตาย, มหปฺผลตาย จ มหตี กรุณาติ มหากรุณา. ภควโต หิ กรุณา นิรวเสเสสุ สตฺเตสุ ปวตฺตติ, ปวตฺตมานา จ อนญฺญสาธารณา ปวตฺตติ, ทิฏฺฐธมฺมิกาทิเภทญฺจ มหนฺตเมว สตฺตานํ หิตสุขํ เอกนฺตโต นิปฺผาเทติ, มหากรุณาย นิยุตฺโตติ มหาการุณิโก, ตํ มหาการุณิกํ. เสสํ สพฺพํ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. สุมาคธาทิปทานํ วิย เจตฺถ สทฺทสิทฺธิ เวทิตพฺพา. दुसरा प्रकार – अर्थसाधनामुळे (कल्याणाच्या साधनेमुळे) करुणा, कारुण्य आणि करुणेचे प्रवर्तन करण्यास जे योग्य आहेत, ते 'कारुणिक' होत. कारण, भगवंतांच्या सर्वज्ञतेमुळे त्यांना प्राण्यांचे हित आणि हिताचा उपाय पूर्णपणे ज्ञात आहे, आणि त्याविषयी आळस न करता त्यांचे हित इच्छिणे हे सार्थ आहे, इतरांचे तसे नाही. अथवा, करुणा किंवा कारुण्य हा ज्यांचा स्वभाव, प्रकृती किंवा शील आहे, ते 'कारुणिक' होत. कारण, ज्याप्रमाणे पृथ्वीचा स्पर्श हा कठीण स्पर्शादी स्वभावाचा असतो, त्याचप्रमाणे भगवंत हे करुणास्वभावी आहेत, म्हणजेच ते स्वभावतःच करुणामय आहेत, असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग पूर्वीप्रमाणेच समजावा. अथवा, महाविषयत्वामुळे (विस्तृत क्षेत्रामुळे), महानुभावत्वामुळे (महान प्रभावामुळे) आणि महाफलत्वामुळे जी महान करुणा आहे, ती 'महाकरुणा' होय. कारण, भगवंतांची करुणा सर्व प्राण्यांवर निरपवादपणे प्रवर्तित होते, आणि प्रवर्तित होताना ती असाधारण (अनन्यसाधारण) असते, तसेच ती प्राण्यांचे ऐहिक (दृष्टधार्मिक) इत्यादी भेदांनी युक्त असे मोठे हित व सुख निश्चितपणे निष्पन्न करते. अशा महाकरुणेने युक्त असल्यामुळे ते 'महाकारुणिक' होत, त्या महाकारुणिकाला (मी वंदन करतो). उर्वरित सर्व पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. आणि येथे 'सुमागधा' इत्यादी पदांप्रमाणे शब्दसिद्धी जाणावी. นาถตีติ [Pg.4] นาโถ, เวเนยฺยานํ หิตสุขํ อาสีสติ ปตฺเถตีติ อตฺโถ, เมตฺตายนวเสน เจตฺถ หิตสุขาสีสนํ เวทิตพฺพํ, น กรุณายนวเสน ปฐมปเทน วุตฺตตฺตา. อถ วา นาถติ เวเนยฺยคตํ กิเลสพฺยสนํ อุปตาเปตีติ นาโถ, นาถตีติ วา นาโถ, ยาจตีติ อตฺโถ. ภควา หิ ‘‘สาธุ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเลน กาลํ อตฺตสมฺปตฺตึ ปจฺจเวกฺขิตา’’ติอาทินา (อ. นิ. ๘.๗, ๘) สตฺตานํ ตํ ตํ หิตปฺปฏิปตฺตึ ยาจิตฺวาปิ มหากรุณาย สมุสฺสาหิโต เต ตตฺถ นิโยเชติ. ปรเมน วา จิตฺติสฺสริเยน สมนฺนาคโต, สพฺพสตฺเต วา สีลาทิคุเณหิ อีสติ อภิภวตีติ ปรมิสฺสโร ภควา ‘‘นาโถ’’ติ วุจฺจติ, ตํ นาถํ. जो कल्याण इच्छितो तो 'नाथ' होय, म्हणजेच विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) लोकांच्या हित आणि सुखाची आकांक्षा करतो, प्रार्थना करतो असा अर्थ आहे. येथे हित आणि सुखाची आकांक्षा करणे हे मैत्रीभावाच्या (मेत्ता) दृष्टीने जाणावे, करुणेच्या दृष्टीने नाही, कारण पहिल्या पदात (कारुणिक या पदात) करुणेचा उल्लेख आधीच झाला आहे. अथवा, जो विनेय लोकांच्या क्लेशरूपी संकटाचे निवारण करतो, तो 'नाथ' होय. किंवा 'नाथति' म्हणजे 'नाथ' होय, ज्याचा अर्थ 'याचना करतो' असा आहे. कारण, भगवंत 'हे भिक्खूहो, भिक्खूने वेळोवेळी स्वतःच्या गुणांचे (आत्मसंपत्तीचे) प्रत्यवेक्षण करणे चांगले आहे' इत्यादी उपदेशांद्वारे प्राण्यांना त्या त्या हितकारक आचरणाची याचना करूनही, महाकरुणेने प्रेरित होऊन त्यांना त्यामध्ये नियोजित करतात. अथवा, जे परम चित्त-ऐश्वर्याने (चित्ताच्या प्रभुत्वाने) युक्त आहेत, किंवा जे शील इत्यादी गुणांनी सर्व प्राण्यांवर शासन करतात (त्यांना प्रभावित करतात), अशा परमेश्वर (परम प्रभू) असलेल्या भगवंतांना 'नाथ' म्हटले जाते, त्या नाथाला (मी वंदन करतो). ญาตพฺพนฺติ เญยฺยํ, อตีตาทิเภทภินฺนํ สพฺพํ สงฺขตํ, อสงฺขตญฺจ. สงฺครณฏฺเฐน สาคโร, ปติตปติตานํ อตฺตโน ปุถุลคมฺภีรภาเวหิ สํสีทนํ นิมฺมุชฺชนํ กโรตีติ อตฺโถ. สํ-สทฺทสฺส เจตฺถ ‘‘สาภาโว, สาราโค’’ติอาทีสุ (ธ. ส. ๓๘๙, ๓๙๑) วิย นิรุตฺตินเยน ทฏฺฐพฺโพ. สงฺครณฏฺเฐนาติ วา สงฺครกรณฏฺเฐน, ฐิตธมฺมตาย ‘‘อยํ เม มริยาทา, อิมํ เวลํ นาติกฺกมามี’’ติ โลเกน สงฺครํ สงฺเกตํ กโรนฺโต วิย โหตีติ อตฺโถ. สงฺครณํ วา สมนฺตโต คลนํ สนฺทนํ อุทเกน กโรตีติ สาคโร. กปฺปวุฏฺฐานกาเล หิ มหาสมุทฺโท อิโต จิโต จ ปคฺฆริตฺวา สกลํ โลกธาตุํ เอโกฆํ กโรตีติ. โลกิยา ปน วทนฺติ ‘‘สาครสฺส รญฺโญ ปุตฺเตหิ สาคเรหิ นิพฺพตฺติโต ขโตติ สาคโร, ปุรตฺถิโม สมุทฺทปฺปเทโส, ตํสมฺพนฺธตาย รุฬฺหิวเสน สพฺโพปิ สมุทฺโท ตถา โวหรียตี’’ติ. สาครสทิสตฺตา สาคโร, เญยฺยเมว สาคโรติ เญยฺยสาคโร. สทิสตา เจตฺถ ปุถุลทุตฺตรคมฺภีรานาทิกาลิกตาหิ เวทิตพฺพา, นิหีนํ เจตโมปมฺมํ. ตถา หิ เญยฺยสฺเสว สาติสยา ปุถุลตา อปริมาณโลกธาตุพฺยาปนโต, สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺเสว ตรณียตาย ทุตฺตรตา, คมฺภีรตา, อาทิโกฏิรหิตา จ ปวตฺติ, น อิตรสฺส ปริจฺฉินฺนเทสตฺตา พาหิรกวีตราเคหิปิ อิตฺตเรน ขเณน อติกฺกมิตพฺพตฺตา, ปริมิตคมฺภีรตฺตา, ปริมิตกาลตฺตา จ. เญยฺยสาครสฺส ปารํ ปริยนฺตํ คโตติ เญยฺยสาครปารคู, ตํ เญยฺยสาครปารคุํ. जे जाणण्यायोग्य आहे ते 'ज्ञेय' (ञेय्य) होय, जे भूतकाळ इत्यादी भेदांनी भिन्न असलेले सर्व संखत (संस्कृत) आणि असंखत (असंस्कृत) आहे. 'संगरण' (एकत्र करणे किंवा गिळंकृत करणे) या अर्थाने 'सागर' होय, जो आपल्या विशाल व गंभीर स्वरूपामुळे त्यात पडणाऱ्यांना बुडवून टाकतो (निमज्जन करतो), असा अर्थ आहे. येथे 'सं' या शब्दाचा अर्थ 'साभावो' (स्वभाव), 'सारागो' (सराग) इत्यादींप्रमाणे निरुक्तीच्या नियमाने पाहावा. अथवा, 'संगरण' म्हणजे प्रतिज्ञा (करार) करणे या अर्थाने, स्थिर स्वभावामुळे 'ही माझी मर्यादा आहे, मी या मर्यादेचे उल्लंघन करणार नाही' असा जगाशी जणू काही संकेत (करार) करत असल्यासारखा तो असतो, असा अर्थ आहे. किंवा पाण्याने चहूबाजूने पाझरणे किंवा वाहणे (संगरण) करतो म्हणून तो 'सागर' होय. कारण, कल्पविनाश (कल्पवुत्थान) काळात महासमुद्र इकडेतिकडे पसरून संपूर्ण लोकधातूचा एकच महापूर करतो. परंतु लौकिक लोक म्हणतात की, 'सागर राजाच्या पुत्रांनी (सगरांनी) खणून निर्माण केला म्हणून तो सागर होय, जो पूर्वेकडील समुद्राचा प्रदेश आहे; त्याच्या संबंधामुळे रूढीने संपूर्ण समुद्रालाच तसे म्हटले जाते.' सागरासारखा असल्यामुळे तो सागर होय, आणि ज्ञेय (जाणण्यायोग्य विषय) हाच सागर असल्यामुळे तो 'ज्ञेयसागर' (ञेय्यसागर) होय. येथील सादृश्यता ही विशालता, दुस्तरता (पार करण्यास कठीण असणे), गंभीरपणा आणि अनादिकालीनता यांमुळे जाणावी; परंतु ही उपमा (सागराची) ज्ञेयाच्या तुलनेत अपुरीच (हीन) आहे. कारण, अपरिमित लोकधातूमध्ये व्यापून राहिल्यामुळे ज्ञेयाचीच विशालता अत्यंत श्रेष्ठ आहे, आणि सर्वज्ञता-ज्ञानानेच तो पार केला जाऊ शकत असल्यामुळे तो दुस्तर, गंभीर आणि आदि-कोटीरहित (सुरुवात नसलेला) असा आहे; इतर (भौतिक) सागर तसा नाही, कारण तो मर्यादित क्षेत्राचा असल्यामुळे बाह्य वीतरागी (ऋषीं) द्वारेही क्षणभरात पार केला जाऊ शकतो, आणि तो मर्यादित खोलीचा व मर्यादित काळाचा असतो. अशा ज्ञेयसागराच्या पार म्हणजे मर्यादेपर्यंत जे गेले आहेत, ते 'ज्ञेयसागरपारगू' (ञेय्यसागरपारगू) होत, त्या ज्ञेयसागरपारगूला (मी वंदन करतो). คมนญฺเจตฺถ [Pg.5] ญาณคมนเมว, น อิตรํ เญยฺยคฺคหณโต, ตํ ปน ญาณํ ทุวิธํ สมฺมสนปฏิเวธเภทโต, ตถา เหตุผลเภทโต. ตตฺถ ‘‘กิจฺฉํ วตายํ โลโก อาปนฺโน’’ติอาทินา (ที. นิ. ๒.๕๗; สํ. นิ. ๒.๔, ๑๐; เปฏโก. ๒๓) กรุณายนวเสเนว อภินิวิสิตฺวา อเนกาการโวกาเร สงฺขาเร สมฺมสนฺตํ ภควโต สมฺมสนญาณํ ฉตฺตึสโกฏิสตสหสฺสมุเขน เญยฺยสาครํ อชฺโฌคาเหตฺวา ตสฺส ปารํ ปริยนฺตํ อคมาสิ, ยํ ‘‘มหาวชิรญาณ’’นฺติ วุจฺจติ. ปฏิเวธญาณํ ปน สพฺพญฺญุตญฺญาณปทฏฺฐานํ อาสวกฺขยญาณํ, อาสวกฺขยญาณปทฏฺฐานญฺจ สพฺพญฺญุตญฺญาณํ, ยํ ‘‘มหาโพธี’’ติ วุจฺจติ. ปารคมนญฺจ ตสฺส กิจฺจสิทฺธิยา, สมตฺถตาย จ เวทิตพฺพํ. ตถา ยถาวุตฺตํ สมฺมสนญาณํ เหตุ, อิตรํ ผลํ. สห สมฺมสนญาเณน วา อาสวกฺขยญาณํ เหตุ, สพฺพญฺญุตญฺญาณํ ผลํ ตทานิสํสภาวโตติ เวทิตพฺพํ. आणि येथे 'गमन' म्हणजे ज्ञान-गमनच (ज्ञानाने जाणे) होय, ज्ञेयाचे ग्रहण केल्यामुळे दुसरे काही नाही. ते ज्ञान संमर्शन (समसन) आणि प्रतिवेध (पाटीवेध) या भेदाने, तसेच हेतू आणि फल या भेदाने दोन प्रकारचे आहे. त्यामध्ये, 'हा लोक खरोखरच संकटात सापडला आहे' इत्यादी सूत्रांनुसार करुणेच्या भावनेनेच प्रवृत्त होऊन, अनेक प्रकारच्या विकारांनी युक्त असलेल्या संस्कारांचे संमर्शन करणाऱ्या भगवंतांचे 'संमर्शन-ज्ञान' (समसनञाण) छत्तीस कोटी शंभर हजार (३६,००,००,००,०००) मुखांनी ज्ञेयसागरात प्रवेश करून त्याच्या पार म्हणजे मर्यादेपर्यंत गेले, ज्याला 'महावज्रज्ञान' (महावजिरञाण) असे म्हटले जाते. आणि प्रतिवेध-ज्ञान म्हणजे सर्वज्ञता-ज्ञानाचे पदस्थान (कारण) असलेले 'आसवक्षय-ज्ञान' (आसवांचा क्षय करणारे ज्ञान) होय, आणि आसवक्षय-ज्ञानाचे पदस्थान असलेले 'सर्वज्ञता-ज्ञान' होय, ज्याला 'महाबोधी' असे म्हटले जाते. आणि त्याचे पार जाणे हे कार्यसिद्धीने आणि सामर्थ्याने जाणावे. तसेच, वर सांगितल्याप्रमाणे संमर्शन-ज्ञान हा हेतू आहे आणि दुसरे (प्रतिवेध-ज्ञान) हे त्याचे फल आहे. अथवा, संमर्शन-ज्ञानासह आसवक्षय-ज्ञान हा हेतू आहे आणि सर्वज्ञता-ज्ञान हे त्याचे फल आहे, कारण ते त्याच्या आनृशंसाच्या (फायद्याच्या) स्वभावाचे आहे, असे जाणावे. วนฺเทติ นมามิ, อภิตฺถวามิ วา. สณฺหฏฺเฐน นิปุณา, อนุปจิตญาณสมฺภารานํ อคาธฏฺเฐน คมฺภีรา, เอกตฺตาทิเภทโต นนฺทิยาวฏฺฏาทิวิภาคโต จ วิจิตฺรา วิสิฏฺฐา นานาวิธา นยา เอติสฺสาติ นิปุณคมฺภีรวิจิตฺรนยา, นิปุณคมฺภีรวิจิตฺรนยา เทสนา อสฺสาติ นิปุณคมฺภีรวิจิตฺรนยเทสโน, ตํ นิปุณ…เป… เทสนํ. นยตีติ วา นโย, ปาฬิคติ, สา จ วุตฺตนเยน อตฺถโต นิปุณา, อตฺถโต พฺยญฺชนโต จ คมฺภีรา, สงฺเขปวิตฺถารานุโลมาทิปฺปวตฺติยา นานาวิธตาย วิจิตฺรา. ตถา หิ ปญฺญตฺติอนุปญฺญตฺติอาทิวเสน, สํกิเลสภาคิยาทิโลกิยาทิตทุภยโวมิสฺสตาทิวเสน, กุสลาทิขนฺธาทิสงฺคหาทิสมยวิมุตฺตาทิฐปนาทิกุสลมูลาทิติกปฏฺฐานาทิวเสน จ อเนกวิธา ปาฬิคตีติ. 'वंदे' म्हणजे मी नमस्कार करतो किंवा मी स्तुती करतो. सूक्ष्म अर्थाने जी 'निपुण' (कुशल) आहे, ज्यांनी ज्ञानसंभाराचा संचय केला नाही त्यांच्यासाठी अगाध अर्थाने जी 'गंभीर' आहे, आणि एकत्व इत्यादी भेदांमुळे तसेच नंद्यावर्त इत्यादी विभागांमुळे जी 'विचित्र' (विविध प्रकारची), विशिष्ट आणि नानाविध नयांनी (पद्धतींनी) युक्त आहे, ती 'निपुण-गंभीर-विचित्र-नया' होय. अशी निपुण, गंभीर आणि विचित्र नयांनी युक्त जिची देशना (उपदेश) आहे, ती 'निपुण-गंभीर-विचित्र-नय-देशना' होय, त्या निपुण... पे... देशनेला (मी वंदन करतो). अथवा, जो नेतो (मार्गदर्शन करतो) तो 'नय' होय, म्हणजेच पाळीची गती (पाळी-परंपरा); आणि ती सांगितलेल्या पद्धतीने अर्थाच्या दृष्टीने निपुण आहे, अर्थ व व्यंजनाच्या (शब्दांच्या) दृष्टीने गंभीर आहे, आणि संक्षेप, विस्तार, अनुलोम इत्यादी प्रवृत्तींच्या नानाविधतेमुळे विचित्र (विविध) आहे. कारण, प्रज्ञप्ती (पण्णत्ती) व अनुप्रज्ञप्ती इत्यादींच्या द्वारे, संक्लेशभागीय (संकिलेसभागिय) व लौकिक इत्यादी आणि त्या दोन्हीच्या मिश्रतेच्या द्वारे, तसेच कुशल इत्यादी स्कंधांचा संग्रह इत्यादी, समयविमुक्त इत्यादींची स्थापना इत्यादी, आणि कुशलमूल इत्यादी त्रिक-प्रस्थान (तिकपट्ठान) इत्यादींच्या द्वारे पाळीची गती अनेक प्रकारची आहे. ตตฺถ (ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา) ทฺวีหากาเรหิ ภควโต โถมนา เวทิตพฺพา อตฺตหิตสมฺปตฺติโต, ปรหิตปฺปฏิปตฺติโต จ. เตสุ อตฺตหิตสมฺปตฺติ อนาวรณญาณาธิคมโต, สวาสนานํ สพฺเพสํ กิเลสานํ อจฺจนฺตปฺปหานโต จ เวทิตพฺพา, ปรหิตปฺปฏิปตฺติ ลาภสกฺการาทินิรเปกฺขจิตฺตสฺส สพฺพทุกฺขนิยฺยานิกธมฺมเทสนโต, ปฏิวิรุทฺเธสุปิ นิจฺจํ หิตชฺฌาสยญาณปริปากกาลาคมนโต จ เวทิตพฺพา. สา ปเนตฺถ ปโยคโต, อาสยโต จ ทุวิธา, ปรหิตปฺปฏิปตฺติ, ยถาวุตฺตเภทา ทุวิธา จ อตฺตหิตสมฺปตฺติ ปกาสิตา โหติ. กถํ? ‘‘มหาการุณิก’’นฺติ อิมินา อาสยโต[Pg.6], ‘‘นิปุณ…เป… เทสน’’นฺติ อิมินา ปโยคโต, ‘‘นาถ’’นฺติ อิมินา ปน อุภยถาปิ ภควโต ปรหิตปฺปฏิปตฺติ ปกาสิตา กรุณากิจฺจทีปนโต, ‘‘เญยฺยสาครปารคุ’’นฺติ อิมินา สาติสยํ อตฺตหิตสมฺปตฺติ ปรมุกฺกํสคตญาณกิจฺจทีปนโต. त्यामध्ये (दीघनिकाय-टीका, ग्रंथारंभकथा-वर्णन) भगवंतांची स्तुती दोन प्रकारे समजली पाहिजे: आत्महित-संपत्तीमुळे आणि परहित-प्रतिपत्तीमुळे. त्यापैकी, आत्महित-संपत्ती ही अनावरण-ज्ञानाच्या (अनावृत ज्ञानाच्या) प्राप्तीमुळे आणि वासनांसह सर्व क्लेशांच्या अत्यंत प्रहाणामुळे (पूर्ण नाशामुळे) समजली पाहिजे. परहित-प्रतिपत्ती ही लाभ, सत्कार इत्यादींविषयी निरपेक्ष चित्त ठेवून, सर्व दुःखांतून मुक्त करणाऱ्या धम्माचा उपदेश केल्यामुळे आणि विरोधकांवरही नेहमी हितकारक आशय ठेवून, त्यांच्या ज्ञानपरिपाकाची (ज्ञानाच्या परिपक्वतेची) वेळ येण्याची वाट पाहिल्यामुळे समजली पाहिजे. ती परहित-प्रतिपत्ती येथे प्रयोगावरून (कृतीवरून) आणि आशयावरून (हेतूवरून) दोन प्रकारची आहे, आणि वर सांगितलेल्या भेदांनुसार दोन प्रकारची आत्महित-संपत्ती देखील प्रकाशित होते. कसे? "महाकारुणिक" या शब्दाने आशयावरून, "निपुण...पे... देसनं" (निपुण... उपदेश) या शब्दाने प्रयोगावरून, आणि "नाथ" या शब्दाने तर दोन्ही प्रकारे भगवंतांची परहित-प्रतिपत्ती प्रकाशित होते, कारण तो करुणेच्या कार्याला दर्शवितो. "ज्ञेयसागरपारगू" या शब्दाने भगवंतांची अतिशय श्रेष्ठ अशी आत्महित-संपत्ती, त्यांच्या परम उत्कर्षाला पोहोचलेल्या ज्ञानकार्याला दर्शवून प्रकाशित केली आहे। อถ วา ตีหากาเรหิ ภควโต โถมนา เวทิตพฺพา เหตุโต, ผลโต, อุปการโต จ. ตตฺถ เหตุ มหากรุณา, สา ปน ปฐมปเทน สรูเปเนว ทสฺสิตา. ผลํ จตุพฺพิธํ ญาณสมฺปทา ปหานสมฺปทา อานุภาวสมฺปทา รูปกายสมฺปทา จาติ. ตาสุ ปธานภูตา ญาณปหานสมฺปทา ‘‘เญยฺยสาครปารคุ’’นฺติ อิมินา ปเทน ปกาสิตา. ปธาเน หิ ทสฺสิเต อวินาภาวโต อิตรมฺปิ ทฺวยํ ทสฺสิตเมว โหติ. น หิ พุทฺธานํ อานุภาวรูปกายสมฺปตฺตีหิ วินา กทาจิปิ ธมฺมกายสิรี วตฺตตีติ. อุปกาโร อนนฺตรํ อพาหิรํ กตฺวา ติวิธยานมุเขน วิมุตฺติธมฺมเทสนา, สา ‘‘นาถํ, นิปุณ…เป… เทสน’’นฺติ ปททฺวเยน ปกาสิตาติ เวทิตพฺพํ. अथवा, भगवंतांची स्तुती तीन प्रकारे समजली पाहिजे: हेतूमुळे, फलामुळे आणि उपकारामुळे. त्यामध्ये हेतू म्हणजे 'महाकरुणा' होय, आणि ती पहिल्या पदाने स्वतःच्या स्वरूपातच दर्शविली आहे. फल चार प्रकारचे आहे: ज्ञानसंपदा, प्रहाणसंपदा, अनुभावसंपदा आणि रूपकायसंपदा. त्यापैकी, प्रधान असलेली ज्ञान-प्रहाणसंपदा "ज्ञेयसागरपारगू" या पदाने प्रकाशित केली आहे. कारण प्रधान दर्शविले असता, अविनाभाव संबंधामुळे इतर दोन्ही (अनुभावसंपदा आणि रूपकायसंपदा) देखील दर्शविलेच जातात. कारण बुद्धांची धम्मकाय-श्री कधीही अनुभावसंपदा आणि रूपकायसंपदा यांच्याशिवाय असू शकत नाही. उपकार म्हणजे कोणताही भेद न करता (अनंतर आणि अबाहीर करून) त्रिविध यानांच्या माध्यमातून विमुक्तीच्या धम्माचा उपदेश करणे होय; आणि तो "नाथं, निपुण...पे... देसनं" या दोन पदांद्वारे प्रकाशित केला आहे, असे समजले पाहिजे। ตตฺถ (ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา) ‘‘มหาการุณิก’’นฺติ เอเตน สมฺมาสมฺโพธิยา มูลํ ทสฺเสติ. มหากรุณาสญฺโจทิตมานโส หิ ภควา สํสารปงฺกโต สตฺตานํ สมุทฺธรณตฺถํ กตาภินีหาโร อนุปุพฺเพน ปารมิโย ปูเรตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อธิคโตติ กรุณา สมฺมาสมฺโพธิยา มูลํ. ‘‘เญยฺยสาครปารคุ’’นฺติ เอเตน ปุพฺพภาคปฺปฏิปตฺติยา สทฺธึ สมฺมาสมฺโพธึ ทสฺเสติ. อนาวรณญาณปทฏฺฐานญฺหิ มคฺคญาณํ, มคฺคญาณปทฏฺฐานญฺจ อนาวรณญาณํ ‘‘สมฺมาสมฺโพธี’’ติ วุจฺจติ. วุตฺตปฺปเภทํ ปน สมฺมสนญาณํ สห ปญฺญาปารมิยา ตสฺสา ปุพฺพภาคปฏิปทา. ตสฺสา หิ อานุภาเวน ลีนุทฺธจฺจปติฏฺฐานายูหนกามสุขลฺลิกตฺตกิลมถานุโยคสสฺสตุจฺเฉทาทิอนฺตทฺวยวิรหิตา อุกฺกํสปารมิปฺปตฺตา มชฺฌิมา ปฏิปทา ภาวนาปาริปูรึ คตา. ‘‘นาถ’’นฺติ อิมินา สมฺมาสมฺโพธิยา ผลํ ทสฺเสติ โลกตฺตยนายกภาวทีปนโต. ตถา หิ สพฺพานตฺถปริหารปุพฺพงฺคมาย นิรวเสสหิตสุขวิธานตปฺปราย นิรติสยาย ปโยคสมฺปตฺติยา, สเทวมนุสฺสาย ปชาย อจฺจนฺตุปการิตาย อปริมิตนิรุปมภาวคุณวิเสสสมงฺคิตาย จ สพฺพสตฺตุตฺตโม ภควา อปริมาณาสุ โลกธาตูสุ อปริมาณานํ สตฺตานํ อนุตฺตรคารวฏฺฐานภูตตาย จ ‘‘นาโถ’’ติ วุจฺจตีติ. ‘‘นิปุณ…เป… เทสน’’นฺติ อิมินา สมฺมาสมฺโพธิยา ปโยชนํ [Pg.7] ทสฺเสติ. สํสารมโหฆโต สตฺตสนฺตารณตฺถญฺหิ ภควตา สมฺมาสมฺโพธิ อภิปตฺถิตา, ตญฺจ สตฺตสนฺตารณํ ยถาวุตฺตเทสนาสมฺปตฺติยา สมิชฺฌติ ตทวินาภาวโต. อิมินา ภควโต สาติสยา ปรหิตปฺปฏิปตฺติ ทสฺสิตา, อิตเรหิ อตฺตหิตสมฺปตฺตีติ ตทุภเยน อตฺตหิตาย ปฏิปนฺนาทีสุ จตูสุ ปุคฺคเลสุ ภควโต จตุตฺถปุคฺคลภาวํ ทีเปติ, เตน จ อนุตฺตรทกฺขิเณยฺยภาวํ, อุตฺตมวนฺทนียภาวํ, อตฺตโน จ วนฺทนกิริยาย เขตฺตงฺคตภาวํ ทีเปติ. त्यामध्ये (दीघनिकाय-टीका, ग्रंथारंभकथा-वर्णन) "महाकारुणिक" या शब्दाने सम्यक्संबोधीचे मूळ दर्शविले आहे. कारण महाकरुणेने प्रेरित चित्त असलेल्या भगवंतांनी संसाराच्या चिखलातून प्राण्यांचा उद्धार करण्यासाठी महासंकल्प (अभिनिहार) करून, अनुक्रमाने पारमिता पूर्ण केल्या आणि अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली; म्हणून करुणा हे सम्यक्संबोधीचे मूळ आहे. "ज्ञेयसागरपारगू" या शब्दाने पूर्वभागाच्या प्रतिपदेसह (पूर्व तयारीच्या आचरणासह) सम्यक्संबोधी दर्शविली आहे. कारण अनावरण-ज्ञानाचे (अनावृत ज्ञानाचे) निकटचे कारण मार्गज्ञान आहे, आणि मार्गज्ञानाचे निकटचे कारण असलेले अनावरण-ज्ञान "सम्यक्संबोधी" म्हटले जाते. आणि वर सांगितलेल्या प्रकारांचे संमसन-ज्ञान (चिंतन-ज्ञान) प्रज्ञापारमितेसह तिची पूर्वभागाची प्रतिपदा आहे. कारण तिच्याच प्रभावाने लीनता (आळस), उद्धच्च (चंचलता), प्रतिष्ठा (आसक्ती), आयूहन (कर्मसंचय), तसेच कामसुखल्लिकानुयोग आणि अत्तकिलमथानुयोग (कामोपभोग आणि आत्मक्लेश) आणि शाश्वतवाद-उच्छेदवाद इत्यादी दोन्ही टोकांपासून विरहित असलेली, उत्कृष्ट पारमितेला प्राप्त झालेली 'मज्झिमा पटिपदा' (मध्यम मार्ग) भावना-परिपूरतेला प्राप्त झाली. "नाथ" या शब्दाने सम्यक्संबोधीचे फल दर्शविले आहे, कारण तो तिन्ही लोकांचे नायकत्व दर्शवितो. कारण सर्व अनर्थांचे निवारण करण्यात अग्रेसर असलेल्या, संपूर्ण हित आणि सुखाच्या विधानात तत्पर असलेल्या, निरतिशय प्रयोगसंपदेने युक्त, देव आणि मनुष्यांसह सर्व प्रजेसाठी अत्यंत उपकारक, अपरिमित व निरुपम अशा सद्गुणांच्या विशेषांनी संपन्न आणि सर्व प्राण्यांमध्ये उत्तम असलेले भगवान, अपरिमित लोकधातूंमध्ये अपरिमित प्राण्यांच्या अनुत्तर आदर-स्थानाचे केंद्र बनल्यामुळे "नाथ" म्हटले जातात. "निपुण...पे... देसनं" या शब्दाने सम्यक्संबोधीचे प्रयोजन दर्शविले आहे. कारण संसाराच्या महापुरातून प्राण्यांना तारण्यासाठी भगवंतांनी सम्यक्संबोधीची आकांक्षा केली होती, आणि ते प्राण्यांचे तारण वर सांगितलेल्या उपदेश-संपत्तीनेच सिद्ध होते, कारण ते तिच्याशी अविनाभावाने जोडलेले आहे. याने भगवंतांची अतिशय श्रेष्ठ अशी परहित-प्रतिपत्ती दर्शविली आहे, आणि इतर पदांनी आत्महित-संपत्ती दर्शविली आहे. या दोन्हीद्वारे, आत्महितासाठी प्रवृत्त होणाऱ्या इत्यादी चार प्रकारच्या पुद्गलांमध्ये (व्यक्तींमध्ये) भगवंतांचे 'चौथे पुद्गल' असणे (जे स्वतःचेही हित करतात आणि इतरांचेही हित करतात) स्पष्ट होते; आणि त्याद्वारे त्यांचे अनुत्तर दक्षिणय्यत्व (दान देण्यास अत्यंत योग्य असणे), उत्तम वंदनीयत्व आणि स्वतःच्या वंदन-क्रियेसाठी ते 'उत्तम क्षेत्र' (पुण्यक्षेत्र) बनल्याचे स्पष्ट होते। เอตฺถ จ ยถา ‘‘มหาการุณิก’’นฺติ อิมินา ปเทน ภควโต มหากรุณา ทสฺสิตา, เอวํ ‘‘เญยฺยสาครปารคุ’’นฺติ เอเตน มหาปญฺญา ทสฺสิตา. เตสุ กรุณาคฺคหเณน โลกิเยสุ มหคฺคตภาวปฺปตฺตาสาธารณคุณทีปนโต ภควโต สพฺพโลกิยคุณสมฺปตฺติ ทสฺสิตา โหติ, ปญฺญาคฺคหเณน สพฺพญฺญุตญฺญาณปทฏฺฐานมคฺคญาณทีปนโต สพฺพโลกุตฺตรคุณสมฺปตฺติ. ตทุภยคฺคหณสิทฺโธ เอว จตฺโถ นาถสทฺเทน ปกาสียติ. กรุณาวจเนน อุปคมนํ นิรุปกฺกิเลสํ ทสฺเสติ, ปญฺญาวจเนน อปคมนํ. ตถา กรุณาคฺคหเณน โลกสมญฺญานุรูปํ ภควโต ปวตฺตึ ทสฺเสติ โลกโวหารวิสยตฺตา กรุณาย, ปญฺญาคฺคหเณน สมญฺญาย อนติธาวนํ. สภาวานวโพเธน หิ ธมฺมานํ สมญฺญํ อติธาวิตฺวา สตฺตาทิสมฺมสนํ โหตีติ. ตถา กรุณาคฺคหเณน มหากรุณาสมาปตฺติวิหารํ ทสฺเสติ, ปญฺญาคฺคหเณน ตีสุ กาเลสุ อปฺปฏิหตญาณํ, จตุสจฺจญาณํ, จตุปฏิสมฺภิทาญาณํ, จตุเวสารชฺชญาณํ. กรุณาคฺคหเณน มหากรุณาสมาปตฺติญาณสฺส คหิตตฺตา เสสาสาธารณญาณานิ, ฉ อภิญฺญา, อฏฺฐสุ ปริสาสุ (ม. นิ. ๑.๑๕๑, ๑๗๘) อกมฺปนญาณานิ, ทส พลานิ, จุทฺทส พุทฺธญาณานิ, โสฬส ญาณจริยา, อฏฺฐารส พุทฺธธมฺมา (มหานิ. ๖๙, ๑๕๖; จูฬนิ. โมฆราชมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๘๕; ปฏิ. ม. ๓.๕; ที. นิ. อฏฺฐ. ๓.๓๐๕; วิภ. มูลฏี. สุตฺตนฺตภาชนียวณฺณนา; ที. นิ. ฏี. ๓.๑๔๑), จตุจตฺตาลีส ญาณวตฺถูนิ สตฺตสตฺตติ ญาณวตฺถูนีติ (สํ. นิ. ๒.๓๔) เอวมาทีนํ อเนเกสํ ปญฺญาปฺปเภทานํ วเสน ญาณจารํ ทสฺเสติ. आणि येथे ज्याप्रमाणे "महाकारुणिक" या पदाने भगवंतांची महाकरुणा दर्शविली आहे, त्याचप्रमाणे "ज्ञेयसागरपारगू" या पदाने त्यांची महाप्रज्ञा दर्शविली आहे. त्यापैकी, करुणेच्या ग्रहणाने लौकिक गोष्टींमध्ये महद्गतभावाला (महानतेला) प्राप्त झालेल्या असाधारण गुणांचे प्रकटीकरण होत असल्यामुळे भगवंतांची सर्व लौकिक गुणसंपत्ती दर्शविली जाते; आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने सर्वज्ञता-ज्ञानाचे निकटचे कारण असलेल्या मार्गज्ञानाचे प्रकटीकरण होत असल्यामुळे सर्व लोकोत्तर गुणसंपत्ती दर्शविली जाते. त्या दोन्हीच्या ग्रहणाने सिद्ध होणारा अर्थच "नाथ" या शब्दाने प्रकाशित केला जातो. करुणेच्या वचनाने प्राण्यांच्या जवळ जाणे हे निष्क्लेश (क्लेशरहित) असल्याचे दर्शविले जाते, आणि प्रज्ञेच्या वचनाने संसारापासून अलिप्त होणे दर्शविले जाते. तसेच, करुणेच्या ग्रहणाने लोकसंज्ञेच्या (लोकव्यवहाराच्या) अनुरूप भगवंतांची प्रवृत्ती दर्शविली जाते, कारण करुणा ही लोकव्यवहाराचा विषय आहे; आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने लोकसंज्ञेच्या पलीकडे न जाणे दर्शविले जाते. कारण स्वभावाचा बोध न झाल्यामुळेच धर्मांच्या संज्ञेच्या पलीकडे जाऊन 'प्राणी' इत्यादींचे चिंतन होते. तसेच, करुणेच्या ग्रहणाने महाकरुणा-समापत्तीचा विहार दर्शविला जातो; आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने तिन्ही काळांतील अप्रतिहत ज्ञान, चतुःसत्य ज्ञान, चतुःप्रतिसंविदा ज्ञान आणि चतुर्वैशारद्य ज्ञान दर्शविले जाते. करुणेच्या ग्रहणाने महाकरुणा-समापत्तीचे ज्ञान ग्रहण केले गेल्यामुळे, उर्वरित असाधारण ज्ञाने, सहा अभिज्ञा, आठ परिषदांमध्ये अकंप राहण्याचे ज्ञान, दहा बले, चौदा बुद्धज्ञाने, सोळा ज्ञानचर्या, अठरा बुद्धधम्म, चव्वेचाळीस ज्ञानवस्तू, सत्याहत्तर ज्ञानवस्तू इत्यादी अनेक प्रज्ञाभेदांच्या आधारे ज्ञानाचा संचार दर्शविला जातो। ตถา กรุณาคฺคหเณน จรณสมฺปตฺติ, ปญฺญาคฺคหเณน วิชฺชาสมฺปตฺติ. กรุณาคฺคหเณน สตฺตาธิปติตา, ปญฺญาคฺคหเณน ธมฺมาธิปติตา. กรุณาคฺคหเณน [Pg.8] โลกนาถภาโว, ปญฺญาคฺคหเณน อตฺตนาถภาโว. ตถา กรุณาคฺคหเณน ปุพฺพการิภาโว, ปญฺญาคฺคหเณน กตญฺญุตา. กรุณาคฺคหเณน อปรนฺตปตา, ปญฺญาคฺคหเณน อนตฺตนฺตปตา. กรุณาคฺคหเณน วา พุทฺธกรธมฺมสิทฺธิ, ปญฺญาคฺคหเณน พุทฺธภาวสิทฺธิ. ตถา กรุณาคฺคหเณน ปเรสํ ตารณํ, ปญฺญาคฺคหเณน สยํ ตารณํ. ตถา กรุณาคฺคหเณน สพฺพสตฺเตสุ อนุคฺคหจิตฺตตา, ปญฺญาคฺคหเณน สพฺพธมฺเมสุ วิรตฺตจิตฺตตา ทสฺสิตา โหติ. สพฺเพสญฺจ พุทฺธคุณานํ กรุณา อาทิ ตํนิทานภาวโต, ปญฺญา ปริโยสานํ ตโต อุตฺตริ กรณียาภาวโต, อิติ อาทิปริโยสานทสฺสเนน สพฺเพ พุทฺธคุณา ทสฺสิตา โหนฺติ. ตถา กรุณาวจเนน สีลกฺขนฺธปุพฺพงฺคโม สมาธิกฺขนฺโธ ทสฺสิโต โหติ. กรุณานิทานญฺหิ สีลํ ตโต ปาณาติปาตาทิวิรติปฺปวตฺติโต, สา จ ฌานตฺตยสมฺปโยคินีติ. ปญฺญาวจเนน ปญฺญากฺขนฺโธ. สีลญฺจ สพฺพพุทฺธคุณานํ อาทิ, สมาธิ มชฺเฌ, ปญฺญา ปริโยสานนฺติ เอวมฺปิ อาทิมชฺฌปริโยสานกลฺยาณา สพฺเพ พุทฺธคุณา ทสฺสิตา โหนฺติ นยโต ทสฺสิตตฺตา. เอโส เอว หิ นิรวเสสโต พุทฺธคุณานํ ทสฺสนุปาโย, ยทิทํ นยคฺคาหณํ, อญฺญถา โก นาม สมตฺโถ ภควโต คุเณ อนุปทํ นิรวเสสโต ทสฺเสตุํ. เตเนวาห – तसेच, करुणेच्या ग्रहणाने चरणसंपत्ती (आचरणसंपत्ती) आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने विद्यासंपत्ती दर्शविली जाते. करुणेच्या ग्रहणाने सत्त्वाधिपतिता (प्राण्यांवर अधिपतिभाव) आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने धम्माधिपतिता दर्शविली जाते. करुणेच्या ग्रहणाने लोकनाथभाव (जगाचे रक्षक असणे) आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने आत्मनाथभाव (स्वतःचे रक्षक असणे) दर्शविला जातो. तसेच, करुणेच्या ग्रहणाने पूर्वकारीभाव (आधी उपकार करण्याचा भाव) आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने कृतज्ञता दर्शविली जाते. करुणेच्या ग्रहणाने अपरंतपता (इतरांना संताप न देणे) आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने अनत्तंतपता (स्वतःला संताप न देणे) दर्शविली जाते. किंवा करुणेच्या ग्रहणाने बुद्धकारकधम्मांची सिद्धी आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने बुद्धभावाची सिद्धी होते. तसेच, करुणेच्या ग्रहणाने इतरांचे तारण आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने स्वतःचे तारण दर्शविले जाते. तसेच, करुणेच्या ग्रहणाने सर्व प्राण्यांविषयी अनुग्रहचित्तता आणि प्रज्ञेच्या ग्रहणाने सर्व धम्मांविषयी विरक्तचित्तता दर्शविली जाते. आणि सर्व बुद्धगुणांचे मूळ करुणा आहे, कारण ती त्यांचे कारण आहे; आणि प्रज्ञा हा त्यांचा शेवट (पर्यवसान) आहे, कारण त्यानंतर अधिक काही करणे उरत नाही. अशा प्रकारे, आदि आणि पर्यवसान दर्शवून सर्व बुद्धगुण दर्शविले जातात. तसेच, 'करुणा' या शब्दाने शीलस्कंधाला अग्रभागी ठेवणारा समाधिस्कंध दर्शविला जातो. कारण करुणा हेच शीलाचे कारण आहे, ज्यातून प्राणातिपातादींपासून (हिंसेपासून) विरती प्रवृत्त होते, आणि ती (करुणा) तीन ध्यानांशी (झान) संपयुक्त असते. 'प्रज्ञा' या शब्दाने प्रज्ञास्कंध दर्शविला जातो. शील हे सर्व बुद्धगुणांचे आदि (सुरुवात) आहे, समाधी हा मध्य आहे आणि प्रज्ञा हे पर्यवसान (शेवट) आहे; अशा प्रकारे आदि, मध्य आणि पर्यवसान कल्याणकारी असणारे सर्व बुद्धगुण नय (पद्धती) द्वारे दर्शविले गेल्यामुळे दर्शविले जातात. बुद्धगुणांचे पूर्णपणे दर्शन घडविण्याचा हाच एकमेव उपाय आहे, ज्याला 'नयग्रहण' (पद्धतीचे ग्रहण) म्हणतात. अन्यथा, भगवंतांच्या गुणांचे एकामागून एक पूर्णपणे वर्णन करण्यास कोण समर्थ असू शकेल? म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘พุทฺโธปิ พุทฺธสฺส ภเณยฺย วณฺณํ, กปฺปมฺปิ เจ อญฺญมภาสมาโน; ขีเยถ กปฺโป จิรทีฆมนฺตเร, วณฺโณ น ขีเยถ ตถาคตสฺสา’’ติ. (ที. นิ. อฏฺฐ. ๑.๓๐๔; ๓.๑๔๑; ม. นิ. อฏฺฐ. ๓.๔๒๕; อุทา. อฏฺฐ. ๕๓; อป. อฏฺฐ. ๒.๗.๒๐; พุ. วํ. อฏฺฐ. ๔.๔; จริยา. อฏฺฐ. นิทานกถา, ปกิณฺณกกถา; ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา; ม. นิ. ฏี. ๑.๑; สํ. นิ. ฏี. ๑.๑.๑; อ. นิ. ฏี. ๑.๑.๑; วชิร. ฏี. คนฺถารมฺภกถา; สารตฺถ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา); "जरी एका बुद्धाने दुसऱ्या बुद्धाचे गुणगान केले, आणि कल्पभर इतर काहीही न बोलता केवळ तेच गुणगान चालू ठेवले, तरीही तो दीर्घ काळ चालणारा कल्प संपून जाईल, परंतु तथागतांचे गुणगान संपणार नाही." (दी. नि. अट्ठ. १.३०४; ३.१४१; म. नि. अट्ठ. ३.४२५; उदा. अट्ठ. ५३; अप. अट्ठ. २.७.२०; बु. वं. अट्ठ. ४.४; चरिया. अट्ठ. निदानकथा, पकिण्णककथा; दी. नि. टी. १. गंथारंभकथावण्णना; म. नि. टी. १.१; सं. नि. टी. १.१.१; अ. नि. टी. १.१.१; वजिर. टी. गंथारंभकथा; सारत्थ. टी. १. गंथारंभकथावण्णना); เตเนว จ อายสฺมตา สาริปุตฺตตฺเถเรนาปิ พุทฺธคุณปริจฺเฉทนํ ปติ อนุยุตฺเตน ‘‘โน เหตํ, ภนฺเต’’ติ (ที. นิ. ๒.๑๔๕) ปฏิกฺขิปิตฺวา ‘‘อปิจ เม, ภนฺเต, ธมฺมนฺวโย วิทิโต’’ติ (ที. นิ. ๒.๑๔๖) วุตฺตํ. त्याच कारणाने, आयुष्यमान सारिपुत्त थेरांनी सुद्धा बुद्धगुणांच्या मोजमापाविषयी विचारले असता, "भंते, असे नाही" असे म्हणून नकार दिला आणि "परंतु भंते, मला धम्मान्वय (धम्माचा मार्ग) ज्ञात आहे" असे म्हटले. เอวํ สงฺเขเปน สกลสพฺพญฺญุคุเณหิ ภควนฺตํ อภิตฺถวิตฺวา อิทานิ สทฺธมฺมํ โถเมตุํ ‘‘วิชฺชาจรณสมฺปนฺนา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ วิชฺชาจรณสมฺปนฺนา หุตฺวาติ วจนเสโส. วินฺทิยํ ธมฺมานํ สลกฺขณํ, สามญฺญลกฺขณญฺจ [Pg.9] วินฺทตีติ วิชฺชา, โลภกฺขนฺธาทีนิ วา วิชฺฌนฏฺเฐน วิชฺชา, จตุนฺนํ วา อริยสจฺจานํ วิทิตกรณฏฺเฐน วิชฺชาติ เอวํ ตาเวตฺถ วจนตฺถโต วิชฺชา เวทิตพฺพา. ปเภทโต ปน ติสฺโสปิ วิชฺชา วิชฺชา ภยเภรวสุตฺเต อาคตนิยาเมเนว, อฏฺฐปิ วิชฺชา วิชฺชา อมฺพฏฺฐสุตฺตาทีสุ (ที. นิ. ๑.๒๗๘ อาทโย) อาคตนิยาเมเนว. จรนฺติ เตหีติ จรณานิ, สีลสํวราทโย ปญฺจทส ธมฺมา, อิติ อิมาหิ วิชฺชาหิ, อิเมหิ จ จรเณหิ สมฺปนฺนา สมฺปนฺนาคตาติ วิชฺชาจรณสมฺปนฺนา. अशा प्रकारे संक्षेपाने सर्व सर्वज्ञगुणांनी भगवंतांची स्तुती करून, आता सद्धम्माची प्रशंसा करण्यासाठी "विद्याचरणसंपन्न" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे "विद्याचरणसंपन्न होऊन" असा वाक्याचा उर्वरित भाग (वचनशेष) समजावा. धम्मांचे स्वलक्षण आणि सामान्यलक्षण जाणते (विन्दति) म्हणून ती 'विद्या' (विज्जा) होय; किंवा लोभस्कंध इत्यादींचा वेध घेण्याच्या (नाश करण्याच्या) अर्थाने ती 'विद्या' होय; किंवा चार आर्यसत्यांना ज्ञात करण्याच्या अर्थाने ती 'विद्या' होय; अशा प्रकारे येथे शब्दाच्या अर्थावरून 'विद्या' समजली पाहिजे. प्रकारांच्या दृष्टीने, 'भयभैरव सुत्ता'मध्ये आलेल्या नियमानुसार तीन विद्या या 'विद्या' आहेत, आणि 'अम्बट्ठ सुत्ता'मध्ये (दी. नि. १.२७८ इत्यादी) आलेल्या नियमानुसार आठ विद्या या 'विद्या' आहेत. ज्यांच्याद्वारे आचरण केले जाते ते 'चरण' (चरणानि) होय, जसे की शीलसंवर इत्यादी पंधरा धम्म. अशा प्रकारे, या विद्यांनी आणि या चरणांनी युक्त (संपन्न) असणे म्हणजेच 'विद्याचरणसंपन्न' होय. เยนาติ เยน ธมฺเมน กรณภูเตน, เหตุภูเตน จ. ตตฺถ มคฺคธมฺมสฺส กรณตฺโถ เวทิตพฺโพ นิยฺยานกิริยาสาธกตมภาวโต, นิพฺพานธมฺมสฺส เหตุอตฺโถ อารมฺมณปจฺจยภาวโต. ปจฺจยตฺโถ หิ อยํ เหตฺวตฺโถ. ปริยตฺติธมฺมสฺสปิ เหตุอตฺโถ ยุชฺชเตว ปรมฺปราย เหตุภาวโต. ผลธมฺเม ปน อุภยมฺปิ สมฺภวติ. กถํ? ‘‘ตาย สทฺธาย อวูปสนฺตายา’’ติ วจนโต มคฺเคน สมุจฺฉินฺนานํ กิเลสานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิปฺปหานกิจฺจตาย ผลสฺส นิยฺยานานุคุณตา, นิยฺยานปริโยสานตา จาติ อิมินา ปริยาเยน สิยา กรณตฺโถ นิยฺยานกิริยาย. สกทาคามิมคฺควิปสฺสนาทีนํ ปน อุปนิสฺสยปจฺจยภาวโต สิยา เหตุอตฺโถ. เอวญฺจ กตฺวา อคฺคปฺปสาทสุตฺตาทีสุ (อิติวุ. ๙๐) อคฺคาทิภาเวน อคฺคหิตาปิ ผลปริยตฺติธมฺมา ฉตฺตมาณวกวิมานาทีสุ (วิ. ว. ๘๘๖ อาทโย) สรณียภาเวน คหิตาติ เตสํ มคฺคนิพฺพานานํ วิย มหาอฏฺฐกถายํ สรณภาโว อุทฺธโฏ. วิเสสโต เจตฺถ มคฺคปริยาปนฺนา เอว วิชฺชาจรณธมฺมา เวทิตพฺพา. เต หิ นิปฺปริยาเยน นิยฺยานกิริยาย สาธกตมภูตา, น อิตเร. อิตเรสํ ปน นิยฺยานตฺถตาย นิยฺยานตา. ยทิ เอวํ กสฺมา ‘‘วิชฺชาจรณสมฺปนฺนา หุตฺวา’’ติ วุตฺตํ, นิยฺยานสมกาลเมว หิ ยถาวุตฺตวิชฺชาจรณสมฺปตฺติสมธิคโมติ? นายํ วิโรโธ สมานกาลตาย เอว อธิปฺเปตตฺตา ยถา ‘‘จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณ’’นฺติ (ม. นิ. ๑.๒๐๔, ๔๐๐; ๓.๔๒๑, ๔๒๕, ๔๒๖; สํ. นิ. ๒.๔๓-๔๕; ๔.๖๐; กถา. ๔๖๕, ๔๖๗). สมฺปนฺนาติ วา ปทสฺส วตฺตมานกาลตฺถตา เวทิตพฺพา ‘‘อุปฺปนฺนา ธมฺมา’’ติ (ธ. ส. ติกมาติกา ๑๗) เอตฺถ อุปฺปนฺนสทฺทสฺส วิย. เอวญฺจ กตฺวา วจนเสสมนฺตเรเนว ปทโยชนา สิทฺธา โหติ. ‘‘เยนา’’ติ [Pg.10] จ ปทํ อุภยตฺถ สมฺพนฺธิตพฺพํ ‘‘เยน ธมฺเมน วิชฺชาจรณสมฺปนฺนา, เยน ธมฺเมน นิยฺยนฺตี’’ติ. "येन" (ज्याद्वारे) म्हणजे ज्या करणभूत आणि हेतुभूत धम्माद्वारे. तेथे मार्गधम्माचा 'करण' अर्थ समजला पाहिजे, कारण तो निर्याण (मुक्ती) क्रियेचा सर्वोत्तम साधक आहे; आणि निर्वाणधम्माचा 'हेतू' अर्थ समजला पाहिजे, कारण तो आलंबनप्रत्यय (आलम्बनपच्चय) स्वरूपात असतो. कारण प्रत्ययाचा अर्थ हाच हेतूचा अर्थ आहे. परंपरेने हेतुभाव असल्यामुळे परियत्तिधम्माचा (प्रवचन/अभ्यास) देखील हेतू अर्थ योग्यच ठरतो. फलधम्मामध्ये मात्र दोन्ही संभवतात. ते कसे? "त्या श्रद्धेने शांत न झालेल्या..." या वचनानुसार, मार्गाने समूळ नष्ट केलेल्या क्लेशांच्या प्रतिप्रश्रब्धी-प्रहाण (शांत करणे व नष्ट करणे) कार्यात फलाची निर्याणानुकूलता आणि निर्याणपर्यवसानता असते; या पर्यायाने निर्याणक्रियेमध्ये 'करण' अर्थ असू शकतो. परंतु सकदागामी-मार्ग-विपश्यना इत्यादींच्या उपनिषयप्रत्ययभावामुळे (उपनिसयपच्चयभाव) 'हेतू' अर्थ असू शकतो. आणि असे असल्यामुळेच, 'अग्गप्रसाद सुत्ता'मध्ये (इतिवु. ९०) अग्रभावाने ग्रहण न केलेले देखील फल आणि परियत्तिधम्म 'छत्तमाणवकविमान' इत्यादींमध्ये (वि. व. ८८६ इत्यादी) शरणीयभावाने ग्रहण केले गेले आहेत, म्हणून महाअट्ठकथेमध्ये मार्ग आणि निर्वाणाप्रमाणेच त्यांचाही शरणभाव उद्धृत केला आहे. विशेषतः येथे मार्ग-पर्यापन्न (मार्गात समाविष्ट असलेले) विद्याचरणधम्मच समजले पाहिजेत. कारण तेच मुख्यत्वे निर्याणक्रियेचे सर्वोत्तम साधक आहेत, इतर नाहीत. इतरांचे निर्याणत्व हे निर्याणार्थानेच आहे. जर असे असेल, तर "विद्याचरणसंपन्न होऊन" असे का म्हटले आहे, कारण निर्याणाच्या समकाळातच पूर्वोक्त विद्याचरणसंपत्तीची प्राप्ती होते? हा काही विरोध नाही, कारण समकालीनता हाच येथे अभिप्रेत अर्थ आहे, जसे की "चक्षू आणि रूपाचा आश्रय घेऊन चक्षूविज्ञान उत्पन्न होते" (म. नि. १.२०४, ४००; ३.४२१, ४२५, ४२६; सं. नि. २.४३-४५; ४.६०; कथा. ४६५, ४६७). किंवा 'संपन्न' या शब्दाचा वर्तमानकाळ अर्थ समजला पाहिजे, जसे की "उत्पन्न धम्म" (ध. सं. तिकमातिका १७) यातील 'उत्पन्न' शब्दाचा आहे. आणि असे केल्याने वचनशेषाशिवायच पदयोजना सिद्ध होते. आणि "येन" (ज्याद्वारे) हे पद दोन्ही ठिकाणी जोडले पाहिजे – "ज्या धम्माद्वारे विद्याचरणसंपन्न (झाले), आणि ज्या धम्माद्वारे निर्याण (मुक्ती) प्राप्त करतात." โลกโตติ ขนฺธาทิโลกโต, วฏฺฏโตติ อตฺโถ. นฺติ ตํ มคฺคนิพฺพานผลปริยตฺติเภทํ ธมฺมํ. อุตฺตมนฺติ เสฏฺฐํ. ตถา เหส อตฺตนา อุตฺตริตรสฺส อภาเวน ‘‘อนุตฺตโร’’ติ วุจฺจติ. ตตฺถ มคฺคสฺส นิยฺยานเหตุอาทิอตฺเถน, นิพฺพานสฺส นิสฺสรณวิเวกาทิอตฺเถน, ผลสฺส อริยสนฺตภาวาทิอตฺเถน จ เสฏฺฐตา เวทิตพฺพา. สฺวายมตฺโถ ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา สงฺขตา, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติ (อิติวุ. ๙๐; อ. นิ. ๔.๓๔) อาทิสุตฺตปทานุสาเรน วิภาเวตพฺโพ. "लोकतः" म्हणजे स्कंधादी लोकांपासून, संसारचक्रापासून असा अर्थ आहे. "तं" (त्या) म्हणजे मार्ग, निर्वाण, फल आणि परियत्ति (अध्ययन) अशा भेदांनी युक्त असलेल्या धम्माला. "उत्तम" म्हणजे श्रेष्ठ. कारण तो स्वतःपेक्षा अधिक श्रेष्ठ काही नसल्यामुळे "अनुत्तर" (सर्वश्रेष्ठ) म्हटला जातो. त्यामध्ये मार्गाची श्रेष्ठता संसारातून बाहेर पडण्याचे कारण इत्यादी अर्थाने, निर्वाणाची श्रेष्ठता सुटका आणि विवेक (अलिप्तता) इत्यादी अर्थाने, आणि फलाची श्रेष्ठता आर्य व शांत भाव इत्यादी अर्थाने समजली पाहिजे. हाच अर्थ "भिक्खूहो, जितके काही संस्कृत (संस्कारित) धम्म आहेत, त्यांमध्ये आर्य अष्टांगिक मार्ग हा सर्वश्रेष्ठ सांगितला आहे" इत्यादी सुत्तपदांच्या अनुषंगाने स्पष्ट केला पाहिजे. ธมฺมนฺติ ยถานุสิฏฺฐํ ปฏิปชฺชมาเน อปายโต, สํสารโต จ อปตมาเน กตฺวา ธาเรตีติ ธมฺโม. สมฺมา, สามญฺจ สพฺพธมฺมานํ พุทฺธตฺตา สมฺมาสมฺพุทฺโธ, สพฺพญฺญุตาอนาวรณญาโณ สมนฺตจกฺขุ ภควา, เตน ยถา สมฺมาสมฺโพธิสมธิคเมเนว สพฺเพ พุทฺธคุณา สมฺปาปุณียนฺติ, เอวํ สมฺมเทว อาเสวนาย ภาวนาย พหุลีกิริยาย สมฺมาปฏิปตฺติยา สมฺมเทว ปจฺจเวกฺขณาย สกฺกจฺจํ ธมฺมเทสนาย เวเนยฺยสนฺตาเนสุ ปติฏฺฐาปเนน – "धम्म" म्हणजे उपदेशिल्याप्रमाणे आचरण करणाऱ्यांना अपाय (दुर्गती) आणि संसारातून खाली पडण्यापासून वाचवून धारण करतो तो धम्म होय. सम्यक (योग्य प्रकारे) आणि स्वतःच सर्व धम्मांचे आकलन केल्यामुळे जे "सम्यक्संबुद्ध" आहेत, सर्वज्ञता आणि अनावरण ज्ञान असणारे जे समंतचक्षू (सर्वद्रष्टे) भगवान आहेत, त्यांनी ज्याप्रमाणे सम्यक्संबोधीच्या प्राप्तीनेच सर्व बुद्धगुणां ची प्राप्ती केली, त्याचप्रमाणे योग्य प्रकारेच आसेवन (सेवन), भावना (विकास), बहुलीकरण (पुनःपुन्हा सराव), सम्यक प्रतिपत्ती (योग्य आचरण), योग्य प्रकारेच प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) आणि आदरपूर्वक धम्मदेशनेद्वारे विनेय (उपदेश देण्यास योग्य अशा) व्यक्तींच्या संतानामध्ये (चित्तप्रवाहात) प्रस्थापित केल्याने – ‘‘อริยํ, โว ภิกฺขเว, สมฺมาสมาธึ เทเสสฺสามิ (ม. นิ. ๓.๑๓๖; เปฏโก. ๒๔). มคฺคานฏฺฐงฺคิโก เสฏฺโฐ (ธ. ป. ๒๗๓; เนตฺติ. ๑๗๐; เปฏโก. ๓๐). ยาวตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา สงฺขตา วา อสงฺขตา วา, วิราโค เตสํ อคฺคมกฺขายติ (อิติวุ. ๙๐; อ. นิ. ๔.๓๔). เอกายโน อยํ, ภิกฺขเว, มคฺโค สตฺตานํ วิสุทฺธิยา (ที. นิ. ๒.๓๗๓; ม. นิ. ๑.๑๐๖; สํ. นิ. ๕.๓๖๗, ๓๘๔). ธมฺมํ, โว ภิกฺขเว, เทเสสฺสามิ อาทิกลฺยาณ’’นฺติ (ม. นิ. ๓.๔๒๐; เนตฺติ. ๕) – “भिक्खूहो, मी तुम्हांला आर्य सम्यक समाधीची देशना करीन. मार्गांमध्ये अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ आहे. भिक्खूहो, जितके काही संस्कृत (संस्कारित) किंवा असंस्कृत धम्म आहेत, त्यांमध्ये विराग (वैराग्य/निर्वाण) हा सर्वश्रेष्ठ सांगितला आहे. भिक्खूहो, प्राण्यांच्या विशुद्धीसाठी हा एकच मार्ग (एकयान मार्ग) आहे. भिक्खूहो, मी तुम्हांला आदि-कल्याणकारी धम्माची देशना करीन” – อาทิวจเนหิ, อภิตฺถวเนน จ ปูชิโต มานิโต อปจิโตติ สมฺมาสมฺพุทฺธปูชิโต, ตํ สมฺมาสมฺพุทฺธปูชิตํ ธมฺมํ วนฺเทติ สมฺพนฺโธ. इत्यादी वचनांद्वारे आणि स्तुतीद्वारे पूजलेला, मानलेला आणि आदरलेला म्हणजेच "सम्यक्संबुद्धपूजित" होय; अशा त्या सम्यक्संबुद्धपूजित धम्माला वंदन करतो, असा संबंध आहे. อยํ ปเนตฺถ สงฺเขปตฺโถ – ยสฺส ธมฺมสฺส อธิคมเน วิชฺชาสมฺปนฺนา เจว โหนฺติ จรณสมฺปนฺนา จ, สพฺพวฏฺฏทุกฺขโต จ นิยฺยนฺติ, ตเมว อริยานํ สกลคุณสมงฺคิภาวนิมิตฺตํ, อนวเสสทุกฺขนิสฺสรณเหตุภูตญฺจ อุตฺตมํ [Pg.11] ปวรํ สทฺธึ ปริยตฺติธมฺเมน นววิธํ โลกุตฺตรธมฺมํ ภควตาปิ สมฺมาปฏิปตฺติอาทิวิธินา ปูชิตํ นมามิ, อภิตฺถวามิ วาติ. येथे हा संक्षिप्त अर्थ आहे – ज्या धम्माच्या प्राप्तीने (साधक) विद्यासंपन्न आणि चरणसंपन्न होतात, आणि सर्व संसारचक्राच्या दुःखातून मुक्त होतात, त्याच आर्यांच्या सर्व गुणांनी युक्त होण्याचे निमित्त असलेल्या, संपूर्ण दुःखातून सुटकेचे कारण असलेल्या, उत्तम व श्रेष्ठ अशा परियत्तिधम्मासह नऊ प्रकारच्या लोकोत्तर धम्माला, जो भगवंतांद्वारे देखील सम्यक प्रतिपत्ती इत्यादी विधीने पूजला गेला आहे, मी नमस्कार करतो आणि त्याची स्तुती करतो. เอตฺถ จ ‘‘เยน โลกโต นิยฺยนฺติ, วิชฺชาจรณสมฺปนฺนา จ โหนฺตี’’ติ ปททฺวเยน ยถากฺกมํ ธมฺมสฺส ภาเวตพฺพภาโว, สจฺฉิกาตพฺพภาโว จ วุตฺโต. เตสุ ปฐเมน วิชฺชาสมฺปตฺติยา ธมฺมํ โถเมติ, ทุติเยน วิมุตฺติสมฺปตฺติยา. ตถา ปฐเมน ฌานสมฺปทาย, ทุติเยน วิโมกฺขสมฺปทาย. ปฐเมน วา สมาธิสมฺปทาย, ทุติเยน สมาปตฺติสมฺปทาย. ปฐเมน วา ขยญาณภาเวน, ทุติเยน อนุปฺปาทญาณภาเวน. อถ วา ปุริเมน วิชฺชูปมตาย, ทุติเยน วชิรูปมตาย. ปุริเมน วา วิราคสมฺปตฺติยา, ทุติเยน นิโรธสมฺปตฺติยา. ตถา ปฐเมน นิยฺยานภาเวน, ทุติเยน นิสฺสรณภาเวน. ปฐเมน วา เหตุภาเวน, ทุติเยน อสงฺขตภาเวน. ปฐเมน วา ทสฺสนภาเวน, ทุติเยน วิเวกภาเวน. ปฐเมน วา อธิปติภาเวน, ทุติเยน อมตภาเวน ธมฺมํ โถเมติ. อถ วา ปฐเมน นิยฺยานิกภาวทสฺสนโต สฺวากฺขาตตาย ธมฺมํ โถเมติ, ทุติเยน สจฺฉิกาตพฺพภาวโต สนฺทิฏฺฐิกตาย. ตถา ปุริเมน อกาลิกตาย, ปจฺฉิเมน เอหิปสฺสิกตาย. ปุริเมน วา โอปเนยฺยิกตาย, ปจฺฉิเมน ปจฺจตฺตํ เวทิตพฺพตาย ธมฺมํ โถเมติ. आणि येथे "ज्याद्वारे संसारातून बाहेर पडतात आणि विद्याचरणसंपन्न होतात" या दोन पदांद्वारे अनुक्रमे धम्माचा 'भावितव्य भाव' (भावना करण्यास योग्य भाव) आणि 'साक्षात्करणीय भाव' (साक्षात्कार करण्यास योग्य भाव) सांगितला आहे. त्यांपैकी पहिल्याने विद्यासंपत्तीद्वारे धम्माची स्तुती केली जाते, आणि दुसऱ्याने विमुक्तीसंपत्तीद्वारे. तसेच पहिल्याने ध्यानसंपदेद्वारे, आणि दुसऱ्याने विमोक्षसंपदेद्वारे. किंवा पहिल्याने समाधीसंपदेद्वारे, आणि दुसऱ्याने समापत्तीसंपदेद्वारे. किंवा पहिल्याने क्षयज्ञानभावाने, आणि दुसऱ्याने अनुत्पादज्ञानभावाने. अथवा पहिल्याने विद्युत्-उपमेने, आणि दुसऱ्याने वज्र-उपमेने. किंवा पहिल्याने विरागसंपत्तीद्वारे, आणि दुसऱ्याने निरोधसंपत्तीद्वारे. तसेच पहिल्याने निर्याणभावाने, आणि दुसऱ्याने निसरणभावाने. किंवा पहिल्याने हेतुभावाने, आणि दुसऱ्याने असंस्कृतभावाने. किंवा पहिल्याने दर्शनभावाने, आणि दुसऱ्याने विवेकभावाने. किंवा पहिल्याने अधिपतीभावाने, आणि दुसऱ्याने अमृतभावाने धम्माची स्तुती केली जाते. अथवा पहिल्याने निर्याणिकभाव दर्शविल्यामुळे 'स्वाख्यात' गुणाने धम्माची स्तुती केली जाते, आणि दुसऱ्याने साक्षात्करणीय भावामुळे 'संदिट्ठिक' गुणाने. तसेच पहिल्याने 'अकालिक' गुणाने, आणि दुसऱ्याने 'एहिपस्सिक' गुणाने. किंवा पहिल्याने 'ओपनेय्यिक' गुणाने, आणि दुसऱ्याने 'पच्चत्तं वेदितब्ब' गुणाने धम्माची स्तुती केली जाते. ‘‘อุตฺตม’’นฺติ จ เอเตน อญฺญสฺส วิสิฏฺฐสฺส อภาวทีปเนน ปริปุณฺณตาย ธมฺมํ โถเมติ, ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺธปูชิต’’นฺติ เอเตน ปริสุทฺธตาย. สพฺพโทสาปคเมน หิสฺส ปูชนียตา. ปริสุทฺธตาย จสฺส ปหานสมฺปทา, ปริปุณฺณตาย ปภวสมฺปทา. ปหานสมฺปตฺติยา จ ภาวนาปาริปูรี อนวเสสโทสสมุคฺฆาฏนโต, ปภวสมฺปตฺติยา สจฺฉิกิริยนิพฺพตฺติ ตตุตฺตริ กรณียาภาวโต. อนญฺญสาธารณตาย หิ อุตฺตโมติ. ตถา ภาเวตพฺพภาเวนสฺส สห ปุพฺพภาคสีลาทีหิ เสกฺขา สีลสมาธิปญฺญากฺขนฺธา, สจฺฉิกาตพฺพภาเวน สห อสงฺขตาย ธาตุยา อเสกฺขา สีลสมาธิปญฺญากฺขนฺธา ทสฺสิตา โหนฺตีติ. आणि "उत्तम" या शब्दाने, इतर कोणत्याही विशिष्ट गोष्टीचा अभाव दर्शवून धम्माच्या परिपूर्णतेची स्तुती केली जाते, "सम्यक्संबुद्धपूजित" या शब्दाने त्याच्या परिशुद्धतेची. कारण सर्व दोषांचा नाश झाल्यामुळेच त्याची पूजनीयता आहे. परिशुद्धतेमुळे त्याची प्रहाणसंपदा आणि परिपूर्णतेमुळे त्याची प्रभवसंपदा सिद्ध होते. प्रहाणसंपत्तीमुळे भावनेची परिपूर्णता होते कारण सर्व दोषांचे समूळ उच्चाटन होते, आणि प्रभवसंपत्तीमुळे साक्षात्काराची निष्पत्ती होते कारण त्यानंतर अधिक काही करणे उरत नाही. कारण इतरांमध्ये साधारण नसलेल्या वैशिष्ट्यामुळे तो "उत्तम" आहे. तसेच, भावितव्य भावामुळे पूर्वभागातील शील इत्यादींसह शैक्ष शील-समाधी-प्रज्ञा स्कंध दर्शविले जातात, आणि साक्षात्करणीय भावामुळे असंस्कृत धातूसह अशैक्ष शील-समाधी-प्रज्ञा स्कंध दर्शविले जातात. เอวํ สงฺเขเปน สพฺพสทฺธมฺมคุเณหิ สทฺธมฺมํ โถเมตฺวา อิทานิ อริยสงฺฆํ โถเมตุํ ‘‘สีลาทิคุณสมฺปนฺโน’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ สีลาทิคุณสมฺปนฺโนติ สีลสมาธิปญฺญาวิมุตฺติยาทิคุเณหิ สมฺปนฺโน สมนฺนาคโต, สมฺปนฺนสีลาทิคุโณ วา. อริยานญฺหิ ตํตํมคฺควชฺฌกิเลสปฺปหาเนน หตปฏิปกฺขา สุวิสุทฺธา สีลาทโย ‘‘สมฺปนฺนา’’ติ วตฺตพฺพตํ อรหนฺติ[Pg.12], น ปุถูชฺชนานํ, ยโต ‘‘สุปฺปฏิปนฺโน’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๗๔; อ. นิ. ๖.๑๐; อุทา. ๑๘) อริยสงฺโฆ โถมียติ. อถ วา สีลาทิคุณสมฺปนฺโนติ ปริปุณฺณสีลาทิคุโณ. อริยปุคฺคลานญฺหิ อริยสจฺจปฺปฏิเวเธน สเหว ยถารหํ เสกฺขาเสกฺขา สีลาทิธมฺมกฺขนฺธา ปาริปูรึ คจฺฉนฺตีติ. ฐิโต มคฺคผเลสูติ มคฺเคสุ, ผเลสุ จ ฐิโต, มคฺคฏฺโฐ, ผลฏฺโฐ จาติ อตฺโถ. โยติ อนิยมโต อริยสงฺฆํ นิทฺทิสติ, ตสฺส ‘‘ต’’นฺติ อิมินา นิยมํ เวทิตพฺพํ. अशा प्रकारे संक्षेपाने सर्व सद्धम्मगुणांनी सद्धम्माची स्तुती करून, आता आर्यसंघाची स्तुती करण्यासाठी "शीलादी गुणसंपन्न" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'शीलादी गुणसंपन्न' म्हणजे शील, समाधी, प्रज्ञा, विमुक्ती इत्यादी गुणांनी संपन्न असलेला, किंवा संपन्न आहेत शीलादी गुण ज्याचे असा. कारण आर्यांचेच, त्या त्या मार्गाने नष्ट होणाऱ्या क्लेशांच्या प्रहाणामुळे विरोधी घटकांचा नाश झालेले अत्यंत विशुद्ध शील इत्यादी गुण 'संपन्न' म्हणण्यास पात्र ठरतात, पृथग्जनांचे नाही; म्हणूनच "सुप्रतिपन्न" इत्यादी शब्दांनी आर्यसंघाची स्तुती केली जाते. अथवा 'शीलादी गुणसंपन्न' म्हणजे परिपूर्ण शीलादी गुणांनी युक्त असलेला. कारण आर्य पुद्गलांचे आर्यसत्यांच्या साक्षात्कारासोबतच योग्यतेनुसार शैक्ष आणि अशैक्ष शील इत्यादी धम्मस्कंध परिपूर्णतेला प्राप्त होतात. 'मार्गफलांमध्ये स्थित' म्हणजे मार्गांमध्ये आणि फलांमध्ये स्थित असलेला, म्हणजेच मार्गस्थ आणि फलस्थ असा अर्थ आहे. 'जो' या अनिश्चित शब्दाने आर्यसंघाचा निर्देश केला आहे, त्याचा 'तो' या शब्दाने निश्चित अर्थ समजला पाहिजे. นนุ จ อริยสงฺเฆ น สพฺเพ อริยปุคฺคลา มคฺคฏฺฐา, นาปิ สพฺเพ ผลฏฺฐาติ? สจฺจเมตํ, อวยวธมฺเมน ปน สมุทายํ นิทฺทิสนฺโต เอวมาห ยถา ‘‘สมํ จุณฺณ’’นฺติ. ยถา หิ โยคจุณฺณสฺส อวยเวสุ ลพฺภมาโน สมภาโว สมุทาเย อปทิสียติ ‘‘สมํ จุณฺณ’’นฺติ, เอวํ อริยสงฺฆสฺส อวยวภูเตสุ อริยปุคฺคเลสุ ลพฺภมาโน มคฺคฏฺฐผลฏฺฐภาโว สมุทายภูเต อริยสงฺเฆ ฐิโต ‘‘มคฺคผเลสู’’ติ อปทิฏฺโฐติ เวทิตพฺพํ. पण आर्यसंघात सर्वच आर्यपुद्गल मार्गस्थ नसतात आणि सर्वच फलस्थ नसतात, असे नाही का? हे सत्य आहे, परंतु अवयवांच्या धर्माने समुदायाचा निर्देश करताना असे म्हटले आहे, जसे की 'सम चूर्ण' (समान चूर्ण). ज्याप्रमाणे औषधी चूर्णाच्या अवयवांमध्ये आढळणारा समभाव संपूर्ण समुदायाला 'सम चूर्ण' असे संबोधून दर्शविला जातो, त्याचप्रमाणे आर्यसंघाचे अवयव असलेल्या आर्यपुद्गलांमध्ये आढळणारी मार्गस्थ आणि फलस्थ अवस्था, समुदाय स्वरूप असलेल्या आर्यसंघाच्या बाबतीत 'मार्ग आणि फलांमध्ये प्रतिष्ठित' (मग्गफलेसु ठितो) अशी दर्शविली आहे, असे समजावे. อารกตฺตา กิเลเสหิ, อนเย น อิริยนโต, อเย จ อิริยนโต, สเทวเกน จ โลเกน ‘‘สรณ’’นฺติ อรณียโต อริโย, ทิฏฺฐิสีลสามญฺเญน สํหตตฺตา สงฺโฆ, อริโย จ โส สงฺโฆ จาติ อริยสงฺโฆ, ตํ อริยสงฺฆํ. ปุชฺชภวผลนิพฺพตฺตนโต อตฺตโน สนฺตานํ ปุนาตีติ วา ปุญฺญํ, ขิตฺตํ วุตฺตํ พีชํ วิรุหนฏฺฐานตาย ตายติ รกฺขตีติ เขตฺตํ เกทาราทิ, เขตฺตํ วิยาติ เขตฺตํ, สตฺตานํ ปุญฺญสฺส มหปฺผลภาวกรเณน วิรุหนฏฺฐานตาย เขตฺตนฺติ ปุญฺญกฺเขตฺตํ. อนุตฺตรํ วนฺเทติ สมฺพนฺโธ. क्लेशांपासून दूर असल्यामुळे, अहितकारक मार्गाने न चालल्यामुळे आणि हितकारक मार्गाने चालल्यामुळे, तसेच देवलोकासह संपूर्ण जगाद्वारे 'शरण' म्हणून प्राप्त करण्यायोग्य असल्यामुळे 'आर्य' म्हटले जाते. दृष्टी आणि शील यांच्या समानतेने संघटित असल्यामुळे 'संघ' म्हटले जाते. तो आर्यही आहे आणि संघही आहे, म्हणून 'आर्यसंघ'; त्या आर्यसंघाला. पूजनीय अवस्था आणि फळ उत्पन्न करून स्वतःच्या प्रवाहाला पवित्र करतो म्हणून 'पुण्य', किंवा पेरलेले बीज उगवण्याचे स्थान असल्यामुळे जे रक्षण करते, ते शेत (शेती इत्यादी) म्हणजेच 'क्षेत्र' होय. क्षेत्राप्रमाणे असल्यामुळे 'क्षेत्र' होय. प्राण्यांच्या पुण्याचे महाफलदायी रूपात वाढ करण्याचे स्थान असल्यामुळे ते क्षेत्र म्हणजेच 'पुण्यक्षेत्र' होय. 'अनुत्तर' (सर्वश्रेष्ठ) आणि 'वंदन करतो' असा संबंध आहे. เอตฺถ จ ‘‘สีลาทิคุณสมฺปนฺโน’’ติ เอเตน อริยสงฺฆสฺส ภควโต อนุชาตปุตฺตตํ ทสฺเสติ, เตนสฺส ปภวสมฺปทา ทีปิตา โหติ. ‘‘ฐิโต มคฺคผเลสู’’ติ เอเตน ปหานสมฺปทํ, ญาณสมฺปทญฺจ ทสฺเสติ กิเลสานํ สมุจฺเฉทปฺปฏิปฺปสฺสทฺธิปฺปหานทีปนโต, มคฺคผลญาณาธิคมทีปนโต จ. ‘‘อริยสงฺฆ’’นฺติ เอเตน ปภวสมฺปทํ สพฺพสงฺฆานํ อคฺคภาวทีปนโต, สเทวเกน จ โลเกน อรณียภาวทีปนโต. ‘‘ปุญฺญกฺเขตฺตํ อนุตฺตร’’นฺติ เอเตน โลกสฺส พหูปการตํ ทสฺเสติ อคฺคทกฺขิเณยฺยภาวทีปนโต. येथे 'शील आदी गुणांनी संपन्न' याने आर्यसंघाचे भगवंतांचे अनुजात पुत्रत्व (योग्य वारसदार असणे) दर्शविले आहे, त्याद्वारे त्याची प्रभव-संपदा (उत्पत्तीची समृद्धी) प्रकाशित होते. 'मार्ग आणि फलांमध्ये प्रतिष्ठित' याने प्रहाण-संपदा (त्याग-समृद्धी) आणि ज्ञान-संपदा दर्शविली आहे; कारण याद्वारे क्लेशांचे समूळ उच्छेदन व उपशमन करून केलेला त्याग आणि मार्ग-फल ज्ञानाची प्राप्ती प्रकाशित होते. 'आर्यसंघ' याने सर्व संघांमध्ये त्याचे श्रेष्ठत्व प्रकाशित करून आणि देवलोकासह संपूर्ण जगाद्वारे तो शरण जाण्यास योग्य असल्याचे दर्शवून प्रभव-संपदा दर्शविली आहे. 'अनुत्तर पुण्यक्षेत्र' याने तो सर्वश्रेष्ठ दक्षिणेय (दान स्वीकारण्यास योग्य) असल्याचे दर्शवून जगासाठी त्याची अत्यंत उपकारकता दर्शविली आहे. ตถา [Pg.13] ‘‘สีลาทิคุณสมฺปนฺโน’’ติ อิทํ อริยสงฺฆสฺส สมฺมาอุชุญายสามีจิปฺปฏิปนฺนภาวทีปนํ. ‘‘ฐิโต มคฺคผเลสู’’ติ อิทํ สติปิ สนฺตานวิภาเคน อเนกภาเว จตุปุริสยุคอฏฺฐปุริสปุคฺคลภาวทีปนํ. ‘‘อริยสงฺฆ’’นฺติ อิทํ อาหุเนยฺยาทิภาวทีปนํ. ‘‘ปุญฺญกฺเขตฺตํ อนุตฺตร’’นฺติ อิทํ โลกสฺส หิตสุขาย ปฏิปนฺนตาทีปนํ. ตถา ‘‘ฐิโต มคฺคผเลสู’’ติ อิทํ อริยสงฺฆสฺส โลกุตฺตรสรณคมนสพฺภาวทีปนํ, เตนสฺส ภควโต โอรสปุตฺตภาโว ทสฺสิโต โหติ. ‘‘สีลาทิคุณสมฺปนฺโน’’ติ อิมินา ปนสฺส วิหตวิธสฺตกิเลสา อนวเสสา เสกฺขาเสกฺขา สีลาทิธมฺมกฺขนฺธา ทสฺสิตา. ‘‘อริยสงฺฆํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ อนุตฺตร’’นฺติ อิมินา เตสํ เตสญฺเญว ยถาวุตฺตคุณวิเสสานํ สุปริสุทฺธตํ ทีเปติ. เตนสฺส มหานุภาวตํ, อนุตฺตรทกฺขิเณยฺยภาวํ, วนฺทนารหภาวํ, อตฺตโน จ วนฺทนากิริยาย เขตฺตงฺคตภาวํ ทีเปติ. สรณคมนญฺจ สาวกานํ สพฺพคุณานํ อาทิ, สปุพฺพภาคปฺปฏิปทา เสกฺขา สีลกฺขนฺธาทโย มชฺเฌ, อเสกฺขา สีลกฺขนฺธาทโย ปริโยสานนฺติ อาทิมชฺฌปริโยสานกลฺยาณา สพฺเพ อริยสงฺฆคุณา อิมาย คาถาย ปกาสิตาติ เวทิตพฺพํ. त्याचप्रमाणे, 'शील आदी गुणांनी संपन्न' हे आर्यसंघाच्या सुप्रतिपन्न, ऋजुप्रतिपन्न, न्यायप्रतिपन्न आणि सामीचीप्रतिपन्न असण्याचे प्रकाशन आहे. 'मार्ग आणि फलांमध्ये प्रतिष्ठित' हे वैयक्तिक प्रवाहांच्या विभागाने अनेकत्व असूनही, 'चार पुरुषयुग आणि आठ पुरुषपुद्गल' असण्याचे प्रकाशन आहे. 'आर्यसंघ' हे आहुनेय इत्यादी असण्याचे प्रकाशन आहे. 'अनुत्तर पुण्यक्षेत्र' हे जगाच्या हित आणि सुखासाठी प्रवृत्त असण्याचे प्रकाशन आहे. त्याचप्रमाणे, 'मार्ग आणि फलांमध्ये प्रतिष्ठित' हे आर्यसंघाच्या लोकोत्तर शरणगमनाच्या अस्तित्वाचे प्रकाशन आहे, त्याद्वारे त्याचे भगवंतांचे औरस पुत्रत्व दर्शविले गेले आहे. तर 'शील आदी गुणांनी संपन्न' याने त्याचे नष्ट आणि विध्वस्त झालेल्या क्लेशांचे, संपूर्ण शैक्ष आणि अशैक्ष शील आदी धर्मस्कंध दर्शविले आहेत. 'आर्यसंघ, अनुत्तर पुण्यक्षेत्र' याने त्या त्या वर सांगितलेल्या विशिष्ट गुणांची अत्यंत शुद्धता प्रकाशित होते. त्याद्वारे त्याचे महानुभावत्व, अनुत्तर दक्षिणेयत्व, वंदनीयत्व आणि स्वतःच्या वंदन क्रियेसाठी क्षेत्रत्व प्राप्त झाल्याचे प्रकाशित होते. आणि शरणगमन हे श्रावकांच्या सर्व गुणांचा प्रारंभ आहे, पूर्वभागाची प्रतिपदा आणि शैक्ष शीलस्कंध इत्यादी मध्यभागी आहेत, आणि अशैक्ष शीलस्कंध इत्यादी शेवटी आहेत; अशा प्रकारे आदी, मध्य आणि समाप्ती कल्याणकारी असलेले आर्यसंघाचे सर्व गुण या गाथेमध्ये प्रकाशित केले आहेत, असे समजावे. เอวํ คาถาตฺตเยน สงฺเขปโต สกลคุณสํกิตฺตนมุเขน รตนตฺตยสฺส ปณามํ กตฺวา อิทานิ ตํ นิปจฺจการํ ยถาธิปฺเปเต ปโยชเน ปริณาเมนฺโต ‘‘วนฺทนาชนิต’’นฺติ คาถมาห. ตตฺถ วนฺทนาชนิตนฺติ วนฺทนากาเรน นิพฺพตฺติตํ, รตนตฺตยคุณาภิตฺถวนวเสน, นิปจฺจการวเสน วา อุปฺปาทิตนฺติ อตฺโถ. อิตีติ เอวํ ‘‘มหาการุณิก’’นฺติอาทิปฺปกาเรน. รติชนนฏฺเฐน รตนํ, พุทฺธธมฺมสงฺฆา, จิตฺตีกตาทิภาโว วา รตนฏฺโฐ. วุตฺตญฺเหตํ – अशा प्रकारे तीन गाथांद्वारे संक्षेपाने सर्व गुणांचे संकीर्तन करण्याच्या माध्यमातून त्रिरत्नाला प्रणाम करून, आता त्या नम्रतेला इच्छित प्रयोजनात परिणत करत 'वंदनाजनित' ही गाथा म्हणतात. तेथे 'वंदनाजनित' म्हणजे वंदनेच्या रूपाने उत्पन्न झालेले, त्रिरत्नाच्या गुणांच्या स्तुतीमुळे किंवा नम्रतेमुळे उत्पन्न झालेले, असा अर्थ आहे. 'इति' म्हणजे अशा प्रकारे 'महाकारुणिक' इत्यादी प्रकारे. आनंद उत्पन्न करण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हणजे बुद्ध, धम्म आणि संघ; किंवा आदरणीय असणे इत्यादी रत्नाचा अर्थ आहे. कारण असे म्हटले आहे की - ‘‘จิตฺตีกตํ มหคฺฆญฺจ, อตุลํ ทุลฺลภทสฺสนํ; อโนมสตฺตปริโภคํ, รตนํ เตน วุจฺจตี’’ติ. (ขุ. ปา. อฏฺฐ. ๖.๓; ที. นิ. อฏฺฐ. ๒.๓๓; สํ. นิ. ๕.๒๒๓; สุ. นิ. อฏฺฐ. ๑.๒๒๖; มหานิ. อฏฺฐ. ๕๐; ที. นิ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถา; ม. นิ. ฏี. ๑.๔; สํ. นิ. ฏี. ๑.๑.๔; อ. นิ. ฏี. ๑.๑.๔; สารตฺถ. ฏี. ๑.คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา); “जे आदरणीय आणि बहुमूल्य आहे, अतुलनीय आणि ज्याचे दर्शन दुर्लभ आहे, जे श्रेष्ठ सत्त्वांद्वारे उपभोगले जाते, त्यामुळे त्याला 'रत्न' म्हटले जाते।” จิตฺตีกตภาวาทโย จ อนญฺญสาธารณา พุทฺธาทีสุ เอว ลพฺภนฺติ, รตนานํ ตยํ รตนตฺตยํ, ตสฺมึ รตนตฺตเย. หตนฺตราโยติ วิธสฺตอุปทฺทโว หุตฺวาติ สมฺพนฺโธ, เอเตน อตฺตโน ปสาทสมฺปตฺติยา, รตนตฺตยสฺส จ เขตฺตภาวสมฺปตฺติยา ตสฺส ปุญฺญสฺส อตฺถสํวณฺณนาย อุปฆาตกอุปทฺทวานํ [Pg.14] วิหนเน สมตฺถตํ ทสฺเสติ. สพฺพตฺถาติ สพฺพสฺมึ อนฺโต เจว พหิ จ, อชฺฌตฺติกพาหิรวตฺถูสูติ อตฺโถ. สพฺพตฺถาติ วา สพฺพสฺมึ กาเล, สํวณฺณนาย อาทิมชฺฌปริโยสานกาเลสูติ วุตฺตํ โหติ. หุตฺวาติ ปุพฺพกาลกิริยา, ตสฺส ‘‘กริสฺสามตฺถวณฺณน’’นฺติ เอเตน สมฺพนฺโธ. ตสฺสาติ ยํ รตนตฺตเย วนฺทนาชนิตํ ปุญฺญํ, ตสฺส. เตชสาติ อานุภาเวน พเลน. आणि आदरणीय असणे इत्यादी भाव जे इतरांमध्ये साधारण नसून केवळ बुद्ध इत्यादींमध्येच आढळतात, रत्नांचे त्रय म्हणजे 'त्रिरत्न', त्या त्रिरत्नामध्ये. 'हतांतराय' म्हणजे उपद्रव नष्ट झालेला होऊन, असा संबंध आहे. याद्वारे स्वतःच्या प्रसन्नतेच्या समृद्धीने आणि त्रिरत्नाच्या क्षेत्रभावाच्या समृद्धीने, त्या पुण्याच्या अर्थ-वर्णनामध्ये येणाऱ्या बाधक उपद्रवांचा नाश करण्याचे सामर्थ्य दर्शविले आहे. 'सर्वत्र' म्हणजे सर्व ठिकाणी, आत आणि बाहेर, म्हणजेच आध्यात्मिक आणि बाह्य वस्तूंमध्ये, असा अर्थ आहे. किंवा 'सर्वत्र' म्हणजे सर्व काळी, वर्णनाच्या प्रारंभ, मध्य आणि समाप्तीच्या काळात, असे म्हटले आहे. 'होऊन' ही पूर्वकालवाचक क्रिया आहे, तिचा 'अर्थवर्णन करीन' याच्याशी संबंध आहे. 'त्याच्या' म्हणजे जे त्रिरत्नाच्या वंदनेने उत्पन्न झालेले पुण्य आहे, त्याचे. 'तेजाने' म्हणजे प्रभावाने, बलाने. เอวํ รตนตฺตยวนฺทนาย ปโยชนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ เนตฺติปฺปกรณสฺส คมฺภีรตฺถตฺตา อตฺถสํวณฺณนาย ทุกฺกรภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘ฐิติ’’นฺติอาทิมาห. ตตฺถ ฐิตินฺติ ฐานํ อนนฺตรธานํ อวิจฺเฉทปฺปวตฺตึ. อากงฺขมาเนนาติ อิจฺฉมาเนน ปตฺถยนฺเตน, ‘‘อโหวตายํ สทฺธมฺมเนตฺติ จิรํ ติฏฺเฐยฺยา’’ติ เอวํ ปตฺถยนฺเตนาติ วุตฺตํ โหติ. จิรนฺติ ทีฆกาลํ, ปญฺจวสฺสสหสฺสปริมาณํ กาลนฺติ อตฺโถ. สทฺธมฺมเนตฺติยาติ สทฺธมฺมสงฺขาตาย เนตฺติยา. สทฺธมฺโม หิ เวเนยฺยสนฺตาเนสุ อริยคุณานํ นยนโต เนตฺติ, สทฺธมฺมสฺส วา เนตฺติ สทฺธมฺมเนตฺติ, ตสฺสา สทฺธมฺมเนตฺติยา, สฺวายมตฺโถ อฏฺฐกถายํ วิจาริโต เอว. เถเรนาติ ถิรคุณยุตฺเตน. อภิยาจิโตติ อาทรคารเวน ยาจิโต. อภิมุขํ วา ยาจิโต, อนุตฺตรํ กตฺวา ยาจิโตติ อตฺโถ. อุทฺทิสฺส วา ยาจิโต, ครุตรํ กตฺวา ยาจิโตติ อตฺโถ, ‘‘กโรตุ อายสฺมา เนตฺติปฺปกรณสฺส กญฺจิ อตฺถสํวณฺณน’’นฺติ เอวํ เนตฺติยา อตฺถสํวณฺณนํ ปติ อชฺเฌสิโตติ วุตฺตํ โหติ. เอตฺถ จ สทฺธมฺมสฺส จิรํ ฐิติกาเมน อชฺฌาสยสมฺปนฺเนน สาสเน ถิรคุณยุตฺเตน สพฺรหฺมจารินา อาทรคารเวน, อภิมุขํ วา ยาจิเตน เม น สกฺกา ตสฺส อภิยาจนํ ปฏิกฺขิปิตุนฺติ ทสฺเสติ ‘‘ฐิตึ อากงฺขมาเนนา’’ติ คาถาย. अशा प्रकारे त्रिरत्नवंदनेचे प्रयोजन दाखवून, आता 'नेत्तिप्पकरण' ग्रंथाच्या गंभीर अर्थामुळे त्याच्या अर्थ-विवरणाची (अत्थसंवण्णना) कठीणता दर्शवण्यासाठी 'ठितिं' (स्थिती) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'ठितिं' म्हणजे स्थान, अंतर्धान न पावणे, अखंड प्रवृत्ती. 'आकङ्खमानेन' म्हणजे इच्छा करणाऱ्याने, प्रार्थना करणाऱ्याने; 'अहो! ही सद्धम्मनेत्ति दीर्घकाळ टिकावी' अशी प्रार्थना करणाऱ्याने, असा याचा अर्थ आहे. 'चिरं' म्हणजे दीर्घकाळ, पाच हजार वर्षांच्या कालावधीपर्यंत, असा अर्थ आहे. 'सद्धम्मनेत्तिया' म्हणजे सद्धम्म नावाच्या नेत्तीची (मार्गदर्शिकेची). कारण सद्धम्म हा विनेय (शिष्य) जनांच्या संतानामध्ये (चित्तपरंपरेत) आर्यगुणांचे नयन (मार्गदर्शन) करत असल्यामुळे 'नेत्ति' आहे, किंवा सद्धम्माची नेत्ति ती 'सद्धम्मनेत्ति', त्या सद्धम्मनेत्तीची; हाच अर्थ अट्ठकथेमध्ये चर्चिला गेला आहे. 'थेरेन' म्हणजे स्थिर गुणांनी युक्त असलेल्या (स्थविराने). 'अभियाचितो' म्हणजे आदर-गौरवाने याचना (विनंती) केलेला. किंवा सन्मुख येऊन याचना केलेला, सर्वश्रेष्ठ मानून याचना केलेला, असा अर्थ आहे. किंवा उद्देशून याचना केलेला, अत्यंत आदरपूर्वक याचना केलेला, असा अर्थ आहे; 'आयुष्यमानांनी नेत्तिप्पकरणाचे काही अर्थ-विवरण करावे' अशा प्रकारे नेत्तीच्या अर्थ-विवरणासाठी विनंती केली गेली आहे, असे म्हटले आहे. आणि येथे, सद्धम्माच्या दीर्घकालीन स्थितीची इच्छा करणाऱ्या, उत्तम आशय असलेल्या, शासनात स्थिर गुणांनी युक्त असलेल्या सब्रह्मचाऱ्याने आदर-गौरवाने किंवा सन्मुख येऊन केलेल्या याचनेचा माझ्याकडून अव्हेर करणे शक्य नाही, हे 'ठितिं आकङ्खमानेन' या गाथेने दर्शवले आहे. ปทุมุตฺตรนาถสฺสาติ ปทุมุตฺตรสฺส สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. ปสฺสตาติ ปุพฺเพนิวาสจกฺขุนา, สมนฺตจกฺขุนา เอว วา หตฺถตเล ฐปิตอามลกํ วิย อภินีหารํ ปสฺสนฺเตน. ตาทินาติ ตาทิภาวยุตฺเตน, สพฺพตฺถ วา นิพฺพิกาเรน, ‘‘อมฺหากํ ภควตา’’ติ วจนเสโส. ยสฺสาติ อายสฺมโต มหากจฺจานตฺเถรสฺส. ฐปิโตติ – 'पदुमुत्तरनाथस्स' म्हणजे पदुमुत्तर सम्यक्संबुद्धांचे. 'पस्सता' म्हणजे पूर्वनिवासज्ञानाच्या चक्षूने (पुब्बेनिवासचक्खुना) किंवा समंतचक्षूने (समन्तचक्खुना) हातावर ठेवलेल्या आवळ्याप्रमाणे अभिनिहाराला (प्रणिधानाला) पाहणाऱ्याने. 'तादिना' म्हणजे तादि-भावाने (समतेने) युक्त असलेल्याने, किंवा सर्वत्र निर्विकार असलेल्याने; 'आमच्या भगवंतांनी' हा शब्द येथे अध्याहृत आहे. 'यस्स' म्हणजे आयुष्यमान महाकच्चायन स्थविरांचे. 'ठपितो' म्हणजे स्थापित केले गेले – ‘‘เอตทคฺคํ, ภิกฺขเว, มม สาวกานํ ภิกฺขูนํ สํขิตฺเตน ภาสิตสฺส วิตฺถาเรน อตฺถํ วิภชนฺตานํ ยทิทํ มหากจฺจาโน’’ติ (อ. นิ. ๑.๑๘๘, ๑๙๗) – 'भिक्खूहो, संक्षेपाने सांगितलेल्या भाषणाचा विस्ताराने अर्थ विभागून सांगणाऱ्या माझ्या श्रावक भिक्खूंमध्ये महाकच्चायन हा अग्र (सर्वश्रेष्ठ) आहे.' (अं. नि. १.१८८, १९७) – เอวํ [Pg.15] ฐปิโต. สีลาทิคุณวิเสเสหิ มหนฺตา สาวกาติ มหาสาวกา (เถรคา. อฏฺฐ. ๒.๑๒๘๘; อ. นิ. ฏี. ๒.๓.๕๙), มหากสฺสปาทโย, เตสุ อยมายสฺมา อญฺญตโรติ, มหาสาวโก จ โส คุณวิเสสโยคโต อุตฺตโม จาติ มหาสาวกุตฺตโม. अशा प्रकारे स्थापित केले गेले. शीलादी विशेष गुणांमुळे जे महान आहेत ते श्रावक म्हणजे 'महाश्रावक' (थेरगाथा अट्ठकथा २.१२८८; अंगुत्तरनिकाय टीका २.३.५९), जसे की महाकस्सप इत्यादी; त्यांच्यामध्ये हे आयुष्यमान एक आहेत, आणि ते महाश्रावक असून विशेष गुणांच्या योगाने उत्तम आहेत, म्हणून 'महाश्रावकोत्तम' आहेत. ฌานาทีสุ สาติสยานํ อาวชฺชนาทิวสีภาวานํ, อริยิทฺธิวเสน ปรมสฺส จ เจโตวสีภาวสฺส อธิคตตฺตา วสิปฺปตฺโต. อตฺถาทีสุ สวิเสสเภทคตปฏิสมฺภิทาญาณตฺตา ปภินฺนปฏิสมฺภิโท. ‘‘ปณฺฑิโต, ภิกฺขเว, มหากจฺจาโน, มหาปญฺโญ, ภิกฺขเว, มหากจฺจาโน’’ติอาทินา (ม. นิ. ๑.๒๐๕) อเนเกสุ ฐาเนสุ ภควตา ปสํสิตตฺตา สมฺพุทฺเธน ปสํสิโต. เตน วุตฺตํ ‘‘สตฺถุ เจว สํวณฺณิโต สํภาวิโต, วิญฺญูนญฺจ สพฺรหฺมจาริน’’นฺติ. ध्यानादींमध्ये अतिशय श्रेष्ठ अशा आवर्जन (चित्त एकाग्र करणे) इत्यादी वशीभावांना प्राप्त केल्यामुळे, आणि आर्य ऋद्धीच्या प्रभावाने परम चेतोवशीभावाला प्राप्त केल्यामुळे ते 'वशीप्राप्त' (वसिप्पत्तो) आहेत. अर्थ इत्यादींमध्ये विशेष भेद असलेल्या प्रतिसंभिदा ज्ञानाने युक्त असल्यामुळे ते 'प्रभिन्नप्रतिसंभिद' (पभिन्नपटिसंभिदो) आहेत. 'भिक्खूहो, महाकच्चायन पंडित आहेत; भिक्खूहो, महाकच्चायन महाप्रज्ञावान आहेत' (म. नि. १.२०५) इत्यादी अनेक ठिकाणी भगवंतांनी त्यांची प्रशंसा केल्यामुळे ते सम्यक्संबुद्धांद्वारे प्रशंसित आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे – 'शास्त्यांद्वारे (बुद्धांद्वारे) प्रशंसित आणि सन्मानित, तसेच सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारेही.' อนุโมทิตาติ ‘‘สาธุ สาธุ, กจฺจาน, สาธุ โข, ตฺวํ กจฺจาน, อิมํ ธมฺมสํวณฺณนํ อภาสี’’ติ เอวํ อนุโมทิตา. เอกสฺมึ กิร สมเย อยํ มหาเถโร ชมฺพุวนสณฺเฑ วิหรนฺโต อตฺตโน สนฺติกาวจรานํ ภิกฺขูนํ อิมํ หารนยปฏิมณฺฑิตํ ปกรณํ อภาสิ. ภาสิตฺวา จ ภควโต สนฺติกํ อุปสงฺกมิตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ นิสินฺโน ยถาภาสิตํ อิมํ ปกรณํ ภควโต นิเวเทสิ. ตํ สุตฺวา ภควา ‘‘สาธุ สาธู’’ติอาทินา อนุโมทิตฺวา ‘‘ตสฺมาติห, ตฺวํ กจฺจาน, อิมํ ธมฺมสํวณฺณนํ ธมฺมเนตฺติตฺเวว ธาเรหี’’ติ นามคฺคหณํ อกาสีติ วทนฺติ. เทสนาหาราทินนฺทิยาวฏฺฏนยาทิหารนยานุสาเรเนว สพฺพธมฺมสํวณฺณนานํ คติโยติ อาห ‘‘สาสนสฺส สทายตฺตา, นวงฺคสฺสตฺถวณฺณนา’’ติ. 'अनुमोदिता' म्हणजे 'साधू, साधू, कच्चायन! हे कच्चायन, तू हे धम्म-विवरण उत्तम प्रकारे सांगितले आहेस' अशा प्रकारे अनुमोदित केलेले. असे ऐकिवात आहे की, एका समयाला हे महास्थवीर जंबूवन खंडात विहार करत असताना त्यांनी आपल्या जवळ राहणाऱ्या भिक्खूंना हार-नयाने (पद्धतीने) सुशोभित असलेला हा ग्रंथ सांगितला. तो सांगितल्यानंतर ते भगवंतांच्या सन्मुख गेले आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले, आणि त्यांनी जसा सांगितला होता तसा हा ग्रंथ भगवंतांना निवेदित केला. ते ऐकून भगवंतांनी 'साधू, साधू' इत्यादी शब्दांनी अनुमोदन देऊन, 'त्यामुळे, हे कच्चायन! तू या धम्म-विवरणाला धम्मनेत्ति म्हणूनच धारण कर' असे त्याचे नामकरण केले, असे म्हणतात. देशना-हार इत्यादी आणि नंदियावट्ट-नय इत्यादी हार-नयांच्या अनुसरणानेच सर्व धम्म-विवरणांची गती (प्रवृत्ती) होते, म्हणूनच म्हटले आहे – 'शासनाच्या (बुद्धशासनाच्या) सदा अधीन असलेली, नवअंग (नवांग) बुद्धवचनाची अर्थ-विवरणी आहे.' คมฺภีรญาเณหีหิ คมฺภีเรหิ ญาเณหิ, น สทฺธามตฺตเกน, คมฺภีรญาเณหิ วา มหาปญฺเญหิ อริเยหิ. ปกรณสฺส คมฺภีรตฺถตํ, อตฺตโน จ ญาณสฺส นาติวิสยตํ วิทิตฺวา สํวณฺณนารมฺเภ สํสีทนฺตมฺปิ มํ สาสนคุณาทิอุปนิสฺสยสมฺปทา อุสฺสาเหสีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘กิญฺจาปี’’ติอาทินา. 'गंभीरज्ञानेहि' म्हणजे गंभीर ज्ञानाने, केवळ श्रद्धेने नव्हे; किंवा गंभीर ज्ञान असलेल्या महाप्रज्ञावान आर्य जनांद्वारे. ग्रंथाची गंभीर अर्थता आणि स्वतःच्या ज्ञानाची मर्यादितता जाणून, विवरणाच्या आरंभी खचून जाणाऱ्या मला शासन-गुणादी उपनिषय-संपदेने (सहाय्यक कारणांनी) प्रोत्साहित केले, हा अर्थ 'किञ्चापि' (जरी) इत्यादींनी दर्शवला आहे. ‘‘ปญฺจปิ นิกาเย โอคาเหตฺวา’’ติ อิมินา เนตฺติยา ปญฺจปิ มหานิกาเย อนุปวิสิตฺวา อวฏฺฐานํ, เตสํ สํวณฺณนาภาวญฺจ ทีเปติ. ตตฺถ [Pg.16] ‘‘กตโม อสฺสาโท จ อาทีนโว จา’’ติอาทิเปฏโกปเทสปาฬึ (เปฏโก. ๒๓) อาเนตฺวา อิธ เทสนาหาราทีนํ ปทตฺถวินิจฺฉโย เปฏเกน สํสนฺทนํ นาม. ‘‘ยถาพล’’นฺติ อิมินา สพฺพถา สพฺพภาเคนาปิ เนตฺติยา สํวณฺณนา มยา น สุกรา กาตุํ, อตฺตโน ปน ญาณพลานุรูปํ กริสฺสามีติ นิรติมานตํ ทีเปติ. 'पाचही निकायांमध्ये अवगाहन करून' (पञ्चपि निकाये ओगाहेत्वा) याद्वारे नेत्तीने पाचही महानिकायांमध्ये प्रवेश करून राहणे आणि त्यांचे विवरण करणे स्पष्ट होते. तेथे 'आस्वाद कोणता आणि आदीनव (दोष) कोणता' इत्यादी पेटकोपदेश पाळी (पेटको. २३) आणून, येथे देशना-हार इत्यादींच्या पदार्थ-विनिश्चयाची पेटकाशी तुलना करणे म्हणजे 'संसंदन' (मेळ घालणे) होय. 'यथाबलं' (यथाबल) याद्वारे सर्व प्रकारे आणि सर्व भागांनी नेत्तीचे विवरण करणे माझ्यासाठी सोपे नाही, परंतु मी माझ्या ज्ञानबलानुसार ते करेन, अशी निरभिमानता दर्शवली आहे. สุวิสุทฺธนฺติ สุฏฺฐุ วิสุทฺธํ, นิกายนฺตรลทฺธิโทเสหิ อนฺตรนฺตรา อนุปฺปเวสิเตหิ อสมฺมิสฺสนฺติ อธิปฺปาโย. อสํกิณฺณนฺติ สนิกาเยปิ ปทตฺถนฺตรปริกปฺปนาทินา อสํกิณฺณํ ตาทิสสงฺกรรหิตํ อนากุลํ สุปริจฺฉินฺนํ. วิวิเธหิ อากาเรหิ นิจฺฉิโนตีติ วินิจฺฉโย. อตฺถานํ วินิจฺฉโย อตฺถวินิจฺฉโย. คณฺฐิฏฺฐานภูเตสุ อตฺเถสุ ขิลมทฺทนากาเรน ปวตฺตา วิมติจฺเฉทกถา, นิปุโณ สุขุโม สณฺโห อตฺถวินิจฺฉโย เอตสฺสาติ นิปุณตฺถวินิจฺฉโย. อถ วา อตฺเถ วินิจฺฉิโนตีติ อตฺถวินิจฺฉโย, ยถาวุตฺตอตฺถวิสยญาณํ, นิปุโณ เฉโก อตฺถวินิจฺฉโย เอตสฺสาติ นิปุณตฺถวินิจฺฉโย, ตํ นิปุณตฺถวินิจฺฉยํ. สมยนฺติ สิทฺธนฺตํ. อิทํ วุตฺตํ โหติ – มหาวิหารวาสีนํ สิทฺธนฺโต วุตฺตนเยน สุปริสุทฺโธ, อนากุโล, สณฺหสุขุมวินิจฺฉโย จ, สิทฺธนฺตํ ตํ อวิโลเมนฺโต อนุกูลโต ตตฺถ สิทฺธํเยว ธมฺมเนตฺตึ ปกาสยนฺโต เนตฺติปฺปกรณสฺส อตฺถสํวณฺณนํ กริสฺสามีติ. 'सुविशुद्धं' म्हणजे अत्यंत विशुद्ध, इतर निकायांच्या (मतांच्या) सिद्धांतांमधील दोषांच्या वेळोवेळी होणाऱ्या प्रवेशापासून अमिश्रित, असा अभिप्राय आहे. 'असंकिण्णं' म्हणजे स्वतःच्या निकायातही इतर पदार्थांच्या कल्पनेने अमिश्रित, अशा संकरापासून रहित, अनाकुल (गोंधळ नसलेले) आणि सुस्पष्टपणे परिच्छिन्न (मर्यादित). विविध प्रकारांनी निश्चय करतो तो 'विनिश्चय'. अर्थांचा निश्चय तो 'अर्थविनिश्चय'. कठीण (गाठ असलेल्या) स्थानांसारख्या अर्थांमध्ये संशयाचे मर्दन करणाऱ्या स्वरूपात चाललेली संशयच्छेदक चर्चा, ज्याचा अर्थविनिश्चय निपुण, सूक्ष्म आणि स्पष्ट आहे तो 'निपुणार्थविनिश्चय'. अथवा, अर्थांचा निश्चय करतो तो 'अर्थविनिश्चय' म्हणजे पूर्वोक्त अर्थविषयक ज्ञान; ज्याचा अर्थविनिश्चय निपुण आणि चतुर आहे तो 'निपुणार्थविनिश्चय', त्या निपुणार्थविनिश्चयाला. 'समयं' म्हणजे सिद्धांत. येथे हे सांगितले आहे – महाविहारवासीयांचा सिद्धांत सांगितलेल्या पद्धतीने अत्यंत शुद्ध, अनाकुल आणि सूक्ष्म-स्पष्ट विनिश्चयाने युक्त आहे; त्या सिद्धांताचा विरोध न करता, अनुकूलतेने तेथे सिद्ध झालेल्या धम्मनेत्तीलाच प्रकाशित करत मी 'नेत्तिप्पकरण' ग्रंथाचे अर्थ-विवरण करेन. ปมาทเลขนฺติ อปรภาเค โปตฺถการุฬฺหกาเล ปมชฺชิตฺวา ลิขนวเสน ปวตฺตปฺปมาทปาฐํ. วชฺเชตฺวาติ อปเนตฺวา. ปาฬึ สมฺมา นิโยชยนฺติ ตํ ตํ เนตฺติปาฬึ ตตฺถ ตตฺถ อุทาหรณภาเวน อานีตสุตฺเต สมฺมเทว นิโยเชนฺโต, อตฺถสํวณฺณนาย วา ตํ ตํ อุทาหรณสุตฺตสงฺขาตํ ปาฬึ ตสฺมึ ตสฺมึ ลกฺขณภูเต เนตฺติคนฺเถ สมฺมเทว นิโยเชนฺโต. อุปเทสนฺติ เนตฺติอุปนิสํ เนตฺติหทยํ. ยฺวายํ สปฏฺฐานวิภาคสฺส เตตฺตึสวิธสฺส เนตฺติปทตฺถสฺส สห นิมิตฺตวิภาเคน อสงฺกรโต ววตฺถิโต วิสโย, ตํ. วิภาเวนฺโต ปกาเสนฺโต. ตสฺสา เนตฺติยา กริสฺสามิ อตฺถวณฺณนนฺติ สมฺพนฺโธ. ‘प्रमादलेख’ म्हणजे नंतरच्या काळात ग्रंथ पुस्तकारूढ करताना प्रमादामुळे (दुर्लक्षामुळे) लिहिलेला चुकीचा पाठ. ‘वज्जेत्वा’ (वर्ज्य करून) म्हणजे दूर करून. ‘पाळि सम्यक रीतीने योजित करतो’ म्हणजे त्या त्या नेत्तिपाळीला तिथे तिथे उदाहरणादाखल आणलेल्या सूत्तांमध्ये चांगल्या प्रकारे योजित करत, किंवा अर्थवर्णनेमध्ये त्या त्या उदाहरण-सूत्तसंज्ञक पाळीला त्या त्या लक्षणभूत नेत्तिग्रंथात चांगल्या प्रकारे योजित करत. ‘उपदेश’ म्हणजे नेत्ति-उपनिषद (रहस्य) किंवा नेत्ति-हृदय. जो हा सपट्ठानविभागासह तेहेतीस प्रकारच्या नेत्तिपदार्थाचा निमित्तविभागासह असंकीर्ण रूपाने निश्चित केलेला विषय आहे, त्याला. ‘विभावन्तो’ म्हणजे प्रकाशित करत (स्पष्ट करत). ‘त्या नेत्तीची मी अर्थवर्णना करीन’ असा (येथे) संबंध आहे. เอตฺถ จ ‘‘อภิยาจิโต’’ติ อิมินา อตฺถสํวณฺณนาย นิมิตฺตํ ทสฺเสติ, ‘‘ฐิตึ อากงฺขมาเนน จิรํ สทฺธมฺมเนตฺติยา’’ติ อิมินา ปโยชนํ, ‘‘กริสฺสามตฺถวณฺณน’’นฺติ [Pg.17] อิมินา ปิณฺฑตฺถํ. สํวณฺณิยมานา หิ ปกรณตฺถา สํวณฺณนาย ปิณฺฑตฺโถ. ‘‘ตมุปนิสฺสายา’’ติอาทินา กรณปฺปการํ. आणि येथे ‘अभियाचितो’ (याचना केल्यामुळे) या शब्दाने अर्थवर्णनेचे निमित्त (कारण) दर्शविले आहे, ‘सद्धम्मनेत्तीची दीर्घकाळ स्थिती इच्छिणाऱ्याने’ (ठितिं आकङ्खमानेन चिरं सद्धम्मनेत्तिया) याने प्रयोजन दर्शविले आहे, ‘अर्थवर्णना करीन’ (करिस्सामत्थवण्णनं) याने पिण्डार्थ (सार) दर्शविला आहे. कारण वर्णिल्या जाणाऱ्या प्रकरणाचे अर्थ हेच वर्णनेचा पिण्डार्थ असतात. ‘त्याचा आश्रय घेऊन’ (तमुपनिस्साय) इत्यादीने करण्याची पद्धत (करणप्रकार) दर्शविली आहे. อิทานิ สํวณฺณนาย สวเน นิโยเชนฺโต ‘‘อิติ อตฺถ’’นฺติ โอสานคาถมาห. ตตฺถ ‘‘สกฺกจฺจ’’นฺติ ปทํ อุภยตฺถ โยเชตพฺพํ ‘‘สกฺกจฺจํ วิภชนฺตสฺส, สกฺกจฺจํ นิสามยถา’’ติ. आता वर्णनेच्या श्रवणामध्ये प्रवृत्त करत ‘इति अत्थं’ अशी समाप्तीची गाथा (ओसानगाथा) म्हणतात. तिथे ‘सक्कच्चं’ (आदरपूर्वक) हा शब्द दोन्ही ठिकाणी जोडला पाहिजे - ‘आदरपूर्वक विभागणी करणाऱ्याचे’ (सक्कच्चं विभजन्तस्स) आणि ‘आदरपूर्वक ऐका’ (सक्कच्चं निसामयथ) असे. คนฺถารมฺภกถาวณฺณนา นิฏฺฐิตา. ग्रंथारंभकथावर्णना समाप्त झाली. นิทานกถาวณฺณนา निदानकथावर्णना วจนตฺถชานเนน วิทิตปฺปกรณตฺถสามญฺญตฺถสฺส ปกรณกถา วุจฺจมานา โสเภยฺยาติ เนตฺติปทตฺถปริชานนเมว อาทิมฺหิ ยุตฺตรูปนฺติ ตทตฺถํ ปุจฺฉติ ‘‘ตตฺถ เกนฏฺเฐน เนตฺตี’’ติ. ตตฺถ ตตฺถาติ ‘‘ตสฺสา เนตฺติยา กริสฺสามตฺถวณฺณน’’นฺติ ยทิทํ วุตฺตํ, ตสฺมึ; ยสฺสา กริสฺสามตฺถวณฺณนนฺติ ปฏิญฺญาตํ, สา เนตฺติ เกนฏฺเฐน เนตฺตีติ อตฺโถ. ตตฺถาติ วา ‘‘เนตฺติปฺปกรณสฺสา’’ติ เอตสฺมึ วจเน ยา เนตฺติ วุตฺตา, สา เกนฏฺเฐน เนตฺตีติ อตฺโถ. ‘‘นยนฏฺเฐนา’’ติ อิทํ กตฺตุกรณาธิกรณสาธนานํ สาธารณวจนนฺติ ‘‘อริยธมฺมํ นยตี’’ติ กตฺตุสาธนวเสน ตาว เนตฺติสทฺทสฺส อตฺถํ วตฺวา อิทานิ กรณาธิกรณสาธนวเสน วตฺตุํ ‘‘นยนฺติ ตายา’’ติอาทิ วุตฺตํ. शब्दाचा अर्थ जाणल्याने प्रकरणाचा सामान्य अर्थ समजलेल्या व्यक्तीला सांगितलेली प्रकरणकथा शोभून दिसेल, म्हणून सुरुवातीला नेत्तिपदार्थाचे परिज्ञान करून घेणेच योग्य आहे, यासाठी त्याचा अर्थ विचारतात— ‘तिथे कोणत्या अर्थाने नेत्ति?’ ‘तिथे’ म्हणजे ‘त्या नेत्तीची मी अर्थवर्णना करीन’ असे जे म्हटले आहे, त्यामध्ये; जिची अर्थवर्णना करण्याची प्रतिज्ञा केली आहे, ती ‘नेत्ति’ कोणत्या अर्थाने ‘नेत्ति’ आहे, असा अर्थ आहे. किंवा ‘तिथे’ म्हणजे ‘नेत्तिप्पकरणस्स’ (नेत्तिप्रकरणाचे) या वचनात जी ‘नेत्ति’ सांगितली आहे, ती कोणत्या अर्थाने ‘नेत्ति’ आहे, असा अर्थ आहे. ‘नयन अर्थाने’ (नेण्याच्या अर्थाने) हे कर्तृ, करण आणि अधिकरण साधनांचे साधारण वचन आहे, म्हणून ‘आर्यधर्माकडे नेते’ (अरियधम्मं नयति) अशा कर्तृसाधनाच्या दृष्टीने आधी ‘नेत्ति’ शब्दाचा अर्थ सांगून, आता करण आणि अधिकरण साधनाच्या दृष्टीने सांगण्यासाठी ‘तिच्याद्वारे नेतात’ (नयन्ति ताय) इत्यादी म्हटले आहे. ตถา หิ วุตฺตนฺติ เนตฺติอุปเทสาธีนตฺตา เอว สุตฺตาวโพธสฺส วุตฺตํ. เปฏเก ‘‘ตสฺมา นิพฺพายิตุกาเมน สุตมเยน อตฺถา ปริเยสิตพฺพา, ตตฺถ ปริเยสนาย อยํ อนุปุพฺพี ภวติ โสฬส หารา ปญฺจ นยา อฏฺฐารส มูลปทานี’’ติอาทิ (เปฏโก. ๓). หารนยวิจารณา วินิมุตฺโต อตฺถสํวณฺณนาวิเสโส นตฺถีติ อาห ‘‘สุตฺตสฺส อตฺถสํวณฺณนา เนตฺติอุปเทสายตฺตา’’ติ. สฺวายมตฺโถ ปรโต ปกิณฺณกกถายํ อาวิ ภวิสฺสติ. เอวํ มหาวิสยา จายํ เนตฺติ กุโต ปภวาติ อาห ‘‘สุตฺตปฺปภวา’’ติ, เอเตน เนตฺติยา ปมาณภูตตํ ทสฺเสติ. อิทญฺจ สุตฺตสฺส เนตฺติสนฺนิสฺสยตาปริทีปนปรํ, น เถรปฺปภวตาปฏิกฺเขปปรํ. เถโร หิ ปญฺจ มหานิกาเย โอคาเหตฺวา ตํสนฺนิสฺสเยเนว [Pg.18] เตสํ สํวณฺณนาภูตํ อิมํ ปกรณํ อภาสิ, ตสฺมา อยเมว สํวณฺณนาธมฺโม, ยทิทํ สํวณฺเณตพฺพธมฺมสนฺนิสฺสยตา. तसेच म्हटले आहे, कारण सूत्ताचे आकलन हे नेत्ति-उपदेशाच्या अधीन असल्यामुळेच असे म्हटले आहे. पेटकोपदेशात (म्हटले आहे)— ‘म्हणून निर्वाण प्राप्त करू इच्छिणाऱ्याने श्रुतमय ज्ञानाने अर्थाचा शोध घेतला पाहिजे, तिथे शोधाचा हा अनुक्रम असतो— सोळा हार, पाच नय आणि अठरा मूळपदे’ इत्यादी. हार आणि नयांच्या विचारापासून मुक्त असा कोणताही विशेष अर्थवर्णनेचा प्रकार नाही, म्हणून म्हटले आहे— ‘सूत्ताची अर्थवर्णना नेत्ति-उपदेशाच्या अधीन आहे.’ हाच अर्थ पुढे प्रकीर्णक कथेमध्ये स्पष्ट होईल. अशा प्रकारे विशाल विषय असलेली ही ‘नेत्ति’ कुठून उत्पन्न होते? तर म्हणतात— ‘सूत्तप्रभवा’ (सूत्तापासून उत्पन्न झालेली), याद्वारे नेत्तीची प्रमाणभूतता दर्शविली आहे. आणि हे सूत्ताच्या नेत्ति-सन्निश्रिततेचे (सूत्तावर आधारित असण्याचे) प्रकटीकरण करणारे आहे, थेरांपासून उत्पन्न होण्याच्या गोष्टीचे खंडन करणारे नाही. कारण थेरांनी पाच महानिकायांचे अवगाहन करून, त्यांच्याच आश्रयाने त्यांची वर्णना असणारे हे प्रकरण सांगितले, म्हणून हाच वर्णनेचा नियम (संवण्णनाधम्म) आहे, जो की वर्णनीय धर्माचा आश्रय घेणे होय. ปกรณปริจฺเฉทโตติ ปกรณสฺส วิภาคโต. หารวิจาราทโย หิ ตโย เนตฺติปฺปกรณสฺส วิภาคา, ปกรณภูตปริจฺเฉทโต วา. ตีณิ หิ เอตานิ ปกรณานิ ตโย อธิการา, ยทิทํ หารวิจาราทโย. ปาฬิววตฺถานโตติ ปาฐสนฺนิเวสโต. ‘प्रकरणपरिच्छेदाने’ म्हणजे प्रकरणाच्या विभागावरून. कारण हारविचार इत्यादी हे तीन नेत्तिप्रकरणाचे विभाग आहेत, किंवा प्रकरणरूप परिच्छेदावरून. कारण हे तीन प्रकरणे म्हणजेच तीन अधिकार आहेत, जे की हारविचार इत्यादी होत. ‘पाळिववत्थाना’ (पाळीच्या व्यवस्थेवरून) म्हणजे पाठाच्या रचनेवरून. ‘‘สพฺโพ หิ ปกรณตฺโถ’’ติอาทินา สงฺคหวารสฺส อนฺวตฺถสญฺญตํ ทสฺเสติ. ‘‘นนุ เจตฺถ ปฏฺฐานํ อสงฺคหิต’’นฺติ โจทโก พฺยภิจารมาห. อิตโร ยทิปิ สรูปโต อสงฺคหิตํ, อตฺถโต ปน สงฺคหิตนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘นยิทเมว’’ติอาทินา ปริหรติ. ปุน ‘‘ตถา หี’’ติอาทินา ตเมวตฺถํ ปาฬิยา ปากฏตรํ กโรติ. อตฺถนยา นนฺทิยาวฏฺฏาทโย. สงฺขารตฺติกา ปุญฺญาภิสงฺขาราทโย, กายสงฺขาราทโย จ. เตสุ อตฺถนยานํ อญฺญมญฺญสงฺคโห ปรโต อาวิ ภวิสฺสติ. อิตเร ปน กามาวจรา, รูปาวจรา จ กุสลา เจตนา ปุญฺญาภิสงฺขาโร, อกุสลา เจตนา อปุญฺญาภิสงฺขาโร, อรูปาวจรา กุสลา เจตนา อาเนญฺชาภิสงฺขาโร. ปุญฺญาภิสงฺขาโร จ อปุญฺญาภิสงฺขาโร จ กายทฺวารปฺปวตฺโต กายสงฺขาโร, โส เอว วจีทฺวารปฺปวตฺโต วจีสงฺขาโร, มโนทฺวารปฺปวตฺโต ปน ติวิโธปิ จิตฺตสงฺขาโร. อิติ ชาติวเสน ปุริมตฺติเก วุตฺตา เอว ธมฺมา ทฺวารวเสน ทุติยตฺติเก วุตฺตา, เต เอว จ ปุริมตฺติเกติ อญฺญมญฺญสงฺคโห เวทิตพฺโพ. ‘कारण सर्व प्रकरणाचा अर्थ’ इत्यादीने संग्रहवाराची सान्वर्थ संज्ञा (अर्थपूर्ण नाव) दर्शविली आहे. ‘परंतु येथे पट्ठान (प्रस्थान) समाविष्ट नाही ना?’ असे आक्षेप घेणारा (चोदक) विसंगती सांगतो. दुसरा (उत्तर देणारा), जरी ते स्वरूपाने समाविष्ट नसले तरी अर्थाने समाविष्ट आहे, हे दर्शवत ‘असे नाही’ (नयिदमेव) इत्यादीने परिहार (उत्तर) करतो. पुन्हा ‘तसेच’ (तथा हि) इत्यादीने तोच अर्थ पाळीच्या आधारे अधिक स्पष्ट करतो. अर्थनय म्हणजे नंदियावट्ट इत्यादी. संस्कारत्रिक म्हणजे पुण्याभिसंस्कार इत्यादी, आणि कायसंस्कार इत्यादी. त्यामध्ये अर्थनयांचा परस्परांमध्ये होणारा संग्रह पुढे स्पष्ट होईल. इतर म्हणजे कामावचर आणि रूपावचर कुशल चेतना म्हणजे पुण्याभिसंस्कार, अकुशल चेतना म्हणजे अपुण्याभिसंस्कार, आणि अरूपावचर कुशल चेतना म्हणजे आनेजाभिसंस्कार होय. पुण्याभिसंस्कार आणि अपुण्याभिसंस्कार हे कायद्वाराने प्रवृत्त झाल्यास कायसंस्कार, तेच वचीद्वाराने प्रवृत्त झाल्यास वचीसंस्कार, आणि मनद्वाराने प्रवृत्त झाल्यास तिन्ही प्रकारचे चित्तसंस्कार होतात. अशा प्रकारे जातीच्या (स्वभावाच्या) दृष्टीने पहिल्या त्रिकामध्ये सांगितलेलेच धर्म द्वाराच्या दृष्टीने दुसऱ्या त्रिकामध्ये सांगितले आहेत, आणि तेच पहिल्या त्रिकामध्ये आहेत, असा परस्परांमध्ये संग्रह समजला पाहिजे. ยตฺถาติ ยสฺมึ วาเร. เปฏเกติ เปฏโกปเทเส. สมฺปตมานาติ สํวณฺณนาวเสน สนฺนิปตนฺตา. ‘‘พฺยญฺชนวิธิปุถุตฺตา’’ติ อิทํ เอกสฺมึ สุตฺเต อเนเกสํ หารานํ สนฺนิปตนสฺส การณวจนํ. ตถา หิ ‘‘อเนกสามตฺถิยนิจิตา สทฺทา’’ติ อกฺขรจินฺตกา วทนฺติ. ‘जिथे’ (यत्थ) म्हणजे ज्या वारात (विभागात). ‘पेटकात’ (पेटके) म्हणजे पेटकोपदेशात. ‘संपतमान’ म्हणजे वर्णनेच्या रूपाने एकत्र येणारे. ‘व्यंजनविधीच्या पृथक्त्वामुळे’ (व्यंजनविधीच्या विविधतेमुळे) हे एकाच सूत्तात अनेक हारांच्या एकत्र येण्याचे कारण सांगणारे वचन आहे. कारण ‘शब्द हे अनेक सामर्थ्यांनी युक्त असतात’ असे व्याकरणकार (अक्षरचिंतक) म्हणतात. ‘‘น สรูปโต’’ติ อิมินา สงฺคหวาเร วิย อุทฺเทสนิทฺเทสวาเรสุปิ ปฏฺฐานสฺส อตฺถโต อุทฺธฏตํ ทสฺเสติ. มูลปทคฺคหเณเนว คหิตตฺตา อุทฺเทสวาเร ตาว เอวํ โหตุ, นิทฺเทสวาเร ปน กถนฺติ? ตตฺถาปิ นยคฺคหเณเนว มูลปทานิปิ คหิตานีติ เวทิตพฺพํ. น หิ มูลปเทหิ วินา กาจิ นยโยชนา สมฺภวติ. อปเร ปน ‘‘หารนยา วิย ปฏฺฐานํ น [Pg.19] สุตฺตสฺส สํวณฺณนาวิเสโส, อถ โข ตสฺมึ ตสฺมึ สุตฺเต สํกิเลสภาคิยตาทิลพฺภมานวิเสสมตฺตนฺติ น ตสฺส ปกรณสฺส ปทตฺถสงฺคโห. เอวญฺจ กตฺวา เตตฺตึสาย เนตฺติปทตฺเถสุ ปฏฺฐานํ อสงฺคหิตํ, อุทฺเทสนิทฺเทสวาเรสุ จ อนุทฺธฏเมวา’’ติ วทนฺติ. ‘स्वरूपाने नाही’ (न सरूपतो) याद्वारे संग्रहवाराप्रमाणेच उद्देश आणि निर्देशवारांमध्येही पट्ठानाचा अर्थतः समावेश केला असल्याचे दर्शविले आहे. मूळपदांच्या ग्रहणानेच ग्रहण केले गेल्यामुळे उद्देशवारात तर असे असू द्या, पण निर्देशवारात कसे? तिथेही नयांच्या ग्रहणानेच मूळपदेही ग्रहण केली गेली आहेत, असे समजले पाहिजे. कारण मूळपदांशिवाय कोणतीही नययोजना संभवत नाही. इतर काही आचार्य मात्र म्हणतात— ‘हार आणि नयांप्रमाणे पट्ठान हा सूत्ताचा विशेष अर्थवर्णनेचा प्रकार नाही, तर त्या त्या सूत्तात संकिलेसभागियता (संक्लेशभागीयता) इत्यादी प्राप्त होणारा केवळ विशेष आहे, म्हणून त्या प्रकरणाच्या पदार्थांमध्ये त्याचा संग्रह होत नाही. आणि असे मानल्यास, तेहेतीस नेत्तिपदार्थांमध्ये पट्ठान समाविष्ट नाही, आणि उद्देश व निर्देशवारांमध्येही त्याचा समावेश केलेला नाही.’ ‘‘ปาฬิโต เอว วิญฺญายตี’’ติ วุตฺตมตฺถํ สมตฺเถนฺโต ‘‘ตถา หิ…เป… อาภต’’นฺติ อาห, เตน เถเรน ภาสิตภาโว วิย ภควตา อนุโมทิตภาโวปิ ปาฬิอนุคโต เอวาติ ทสฺเสติ. สาวกภาสิตตฺตา นิทานํ น วุตฺตนฺติ น สกฺกา วตฺตุนฺติ โจเทนฺโต ‘‘สาวก…เป… ภาสิต’’นฺติ อาห. นยิทํ เอกนฺติกนฺติ จ สาวกภาสิตพุทฺธภาสิตภาโว นิทานาวจนสฺส, นิทานวจนสฺส จ อการณํ อุภยตฺถาปิ อุภยสฺส ทสฺสนโต. ตสฺมา นิทานาวจเนน เนตฺติยา อสาวกภาสิตตา น สิชฺฌตีติ ทสฺเสติ. เตนาห ‘‘น จ ตาวตา ตานิ อปฺปมาณํ, เอวมิธาปิ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ. “पाळितो एव विञ्ञायती” (पाळीवरूनच समजते) या सांगितलेल्या अर्थाचे समर्थन करताना “तथा हि...पे... आभतं” असे म्हटले आहे. याद्वारे त्या थेरांनी (स्थविरांनी) भाष्य केल्याप्रमाणेच भगवंतांनी देखील त्याला अनुमती दिली आहे, हे पाळीला अनुसरूनच आहे असे दर्शविले आहे. “श्रावकाने भाष्य केल्यामुळे निदान (प्रस्तावना) सांगितले गेले नाही” असे म्हणता येत नाही, अशी शंका घेत “सावक...पे... भासितं” असे म्हटले आहे. हे एकांतिक (निश्चित) नाही, कारण श्रावक-भाषित आणि बुद्ध-भाषित असणे हे निदान न सांगण्याचे कारण नाही, आणि निदान न सांगणे हे दोन्ही ठिकाणी दोन्हीचे कारण नाही, कारण दोन्ही ठिकाणी दोन्हीचे दर्शन घडते. म्हणून, निदानाच्या अभावामुळे 'नेत्ति' हे श्रावक-भाषित नाही हे सिद्ध होत नाही, असे दर्शविले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - “न च तावता तानि अप्पमाणं, एवमिधापि दट्ठब्बं” (आणि तेवढ्यावरूनच ते अप्रमाण ठरत नाही, येथेही असेच समजावे). เยเนว การเณน นิทานาวจนสฺส ปมาณภาวสาธนตา, เตเนว การเณน อิมสฺส ปกรณสฺส ปมาณภาวสิทฺธีติ ทสฺเสติ ‘‘นิทานญฺจ นามา’’ติอาทินา. อิทานิ ‘‘อถ วา’’ติอาทินา เนตฺติยา นิทานาวจเนน อพฺยภิจารเหตุมาห. อยญฺเหตฺถ ปโยโค น เนตฺติยา นิทานํ วตฺตพฺพํ ปาฬิยา อตฺถสํวณฺณนาภาวโต. ยา หิ ปาฬิยา อตฺถสํวณฺณนา น ตสฺสา นิทานวจนํ ทิฏฺฐํ ยถา ปฏิสมฺภิทามคฺคสฺส, นิทฺเทสาทีนญฺจาติ. ज्या कारणाने निदान-वचनाची प्रमाणता सिद्ध होते, त्याच कारणाने या प्रकरणाची (ग्रंथाची) प्रमाणता सिद्ध होते, हे “निदानञ्च नामा” इत्यादींद्वारे दर्शविले आहे. आता “अथ वा” इत्यादींद्वारे 'नेत्ति' च्या निदान-वचनाचा अव्यभिचारी हेतू सांगितला आहे. येथे हा युक्तिवाद आहे की, 'नेत्ति' चे निदान सांगण्याची आवश्यकता नाही, कारण ते पाळीचे (मूळ पाठाचे) अर्थ-वर्णन (टीका) आहे. कारण जे पाळीचे अर्थ-वर्णन असते, त्याचे निदान-वचन आढळत नाही, जसे की 'पटिसम्भिदामग्ग' आणि 'निद्देस' इत्यादींचे. ‘‘อยํ วิภาโค’’ติอาทินา เอกวิธโต ปฏฺฐาย ยาว จตุราสีติสหสฺสปฺปเภทา, ตาว ยถาทสฺสิตสฺส ปกรณวิภาคสฺส ปุน ‘‘อาทินา นเยน ปกรณวิภาโค เวทิตพฺโพ’’ติ อิทํ นิคมนํ. ตตฺถ อาทินา นเยนาติ อาทิสทฺเทน อภิญฺเญยฺยธมฺมนิทฺเทสโต ปญฺญตฺติปญฺญเปตพฺพธมฺมวิภชนโต ติยทฺธปริยาปนฺนธมฺมวิจารโต จตุโรฆนิตฺถรณตฺถโต ปญฺจาภินนฺทนาทิปฺปหานโต ฉตณฺหากายุปสมนโต สงฺคหวาราทิสตฺตวารสงฺคหโต อฏฺฐมิจฺฉตฺตสมุคฺฆาตทีปนโตติ เอวมาทีนํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. “अयं विभागो” इत्यादींद्वारे एकविध (एका प्रकारच्या) विभागापासून सुरू करून चौऱ्याऐंशी हजार प्रकारांपर्यंत, दर्शविलेल्या प्रकरणाच्या विभागाचा पुन्हा “आदिना नयेन पकरणविभागो वेदितब्बो” (इत्यादी पद्धतीने प्रकरणाचा विभाग समजावा) असा हा निष्कर्ष आहे. तेथे “आदिना नयेन” यातील 'आदि' शब्दाने अभिज्ञेय धर्मांचे निर्देश करणे, प्रज्ञप्ति आणि प्रज्ञापनीय धर्मांचे विभाजन करणे, त्र्यध्व-पर्यापन्न (तिन्ही काळांत समाविष्ट) धर्मांचा विचार करणे, चार ओघांच्या (प्रवाहांच्या) पार जाण्याच्या उद्देशाने, पाच अभिनंदनादींचा प्रहाण (त्याग) करणे, सहा तृष्णा-कायांचे उपशमन करणे, संग्रहवार इत्यादी सात वारांचा संग्रह करणे, आठ मिथ्यात्वांचे समूळ उच्चाटन स्पष्ट करणे, इत्यादींचा संग्रह समजावा. ๑. สงฺคหวารวณฺณนา १. संग्रहवार-वर्णन ยนฺติ อนิยมตฺโถ สพฺพนามสทฺโท กมฺมสาธนวเสน วุตฺโต. อตฺถาวโพธนตฺโถ สทฺทปฺปโยโค อตฺถปราธีโน เกวโล อตฺถปทตฺถโก[Pg.20], โส ปทตฺถวิปริเยสการินา อิติ-สทฺเทน ปรภูเตน สทฺทปทตฺถโก ชายตีติ อาห ‘‘ยนฺติ อนิยมโต อุปโยคนิทฺเทโส’’ติ. โลโกติ กตฺตุนิทฺเทโสติอาทีสุปิ เอเสว นโย. 'यं' हा अनियम-अर्थाचा सर्वनाम शब्द कर्मसाधनाच्या अर्थाने वापरला आहे. अर्थाचे आकलन करून देणारा शब्दाचा प्रयोग हा अर्थावर अवलंबून असतो आणि तो केवळ अर्थाचा वाचक असतो; परंतु तोच शब्द, अर्थाचा विपर्यास करणाऱ्या 'इति' शब्दाच्या नंतर आल्यावर शब्दार्थाचा वाचक बनतो, म्हणूनच “यन्ति अनियमतो उपयोगनिद्देसो” (यं हा अनियमाने द्वितीया विभक्तीचा निर्देश आहे) असे म्हटले आहे. “लोको” हा कर्त्याचा निर्देश आहे, इत्यादींमध्येही हाच नियम लागू होतो. เอวํ ‘‘ย’’นฺติอาทีนํ คาถาปทานํ กมฺมกตฺตุกิริยากตฺตุวิเสสนาทิทสฺสนวเสน อตฺถํ วตฺวา อิทานิ อวยวโชตนวเสน ปทตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘โลกิยนฺติ เอตฺถา’’ติอาทิมาห. โลกสทฺโท อิธ สามตฺถิยโต สตฺตโลกวจโน ทฏฺฐพฺโพ. เตนาห ‘‘ปูชนกิริยาโยคฺยภูตตาวเสนา’’ติ. สาสนนฺตรธานโต ปรํ ปูชนา อญฺญพุทฺธุปฺปาเทน เวทิตพฺพา, ยเถตรหิ วิปสฺสีอาทิสมฺมาสมฺพุทฺธานํ. ‘‘ทีปงฺกโร’’ติอาทินา ยทิปิ พุทฺธวํสเทสนายํ (พุ. วํ. ๒.๗๕) ภควตาว วุตฺตํ, สุเมธปณฺฑิตตฺตภาเวน ปน ปวตฺตึ สนฺธาย วุตฺตนฺติ อาห ‘‘ยถาห ภควา สุเมธภูโต’’ติ. अशा प्रकारे 'यं' इत्यादी गाथापदांचा कर्म, कर्ता, क्रिया आणि कर्त्याचे विशेषण इत्यादी दर्शविण्याच्या दृष्टीने अर्थ सांगून, आता अवयवांचे प्रकटीकरण करण्याच्या दृष्टीने पदांचा अर्थ दर्शविण्यासाठी “लोकियन्ति एत्था” इत्यादी म्हटले आहे. येथे 'लोक' हा शब्द सामर्थ्यामुळे 'सत्तलोक' (सत्त्वलोक - प्राणिमात्रांचा लोक) या अर्थाने समजावा. म्हणूनच म्हटले आहे - “पूजनकियायोग्यभूततावसेना” (पूजन क्रियेच्या योग्यतेच्या दृष्टीने). शासनाच्या (बुद्धशासनाच्या) अंतर्धानानंतरची पूजा ही दुसऱ्या बुद्धांच्या उत्पत्तीने समजली पाहिजे, जसे की सध्या विपस्सी इत्यादी सम्यक्संबुद्धांच्या बाबतीत आहे. जरी “दीपङ्करो” इत्यादींद्वारे बुद्धवंश देशनेमध्ये (बु. वं. २.७५) भगवंतांनीच हे सांगितले आहे, तरी सुमेध पंडिताच्या अस्तित्वाच्या संदर्भाने हे म्हटले आहे, म्हणूनच “यथाह भगवा सुमेधभूतो” (जसे सुमेध असताना भगवंतांनी म्हटले होते) असे म्हटले आहे. ปริญฺญากฺกเมนาติ ญาตปริญฺญาทิปฏิปาฏิยา. ลกฺขณาวโพธปฺปฏิปตฺติยาติ วิปสฺสนาย. เตน วุตฺตํ ‘‘สุญฺญตมุขาทีหี’’ติ. ตถา จ วุตฺตนฺติ วิญฺญูหิ เวทนียตาย เอว สาสนวรสฺส วุตฺตํ ภควตา – “परिञ्ञाक्कमेना” (परिज्ञा क्रमाने) म्हणजे ज्ञातपरिज्ञा इत्यादींच्या अनुक्रमाने. “लक्खणावबोधप्पटिपत्तिया” (लक्षणांच्या अवबोधाच्या प्रतिपत्तीने) म्हणजे विपश्यनेने. म्हणूनच म्हटले आहे - “सुञ्ञतमुखादीही” (शून्यतामुख इत्यादींद्वारे). आणि तसेच विद्वानांना (सुज्ञांना) समजण्याजोगे असल्यामुळेच भगवंतांनी या श्रेष्ठ शासनाविषयी म्हटले आहे – ‘‘เอตุ วิญฺญู ปุริโส อสโฐ อมายาวี อุชุชาติโก, อหมนุสาสามิ, อหํ ธมฺมํ เทเสมิ, ยถานุสิฏฺฐํ ตถา ปฏิปชฺชมาโน น จิรสฺเสว สามญฺเญว อุสฺสติ, สามํ ทกฺขิตี’’ติอาทิ (ม. นิ. ๒.๒๘๑). “असा शठ नसलेला (प्रामाणिक), मायावी नसलेला, सरळ स्वभावाचा सुज्ञ मनुष्य येवो; मी त्याला उपदेश करीन, मी त्याला धम्म देशना करीन. उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करत तो लवकरच स्वतःच (धम्माला) जाणेल, स्वतःच पाहील” इत्यादी (म. नि. २.२८१). ยํ-สทฺโท สาสนวิสโย, โลกปาลสทฺโท สตฺถุวิสโยปิ โลกํ ปติ คุณีภูโตติ ‘‘ตสฺสา’’ติ ปฏินิทฺเทสสฺส กถํ สตฺถุวิสยตาติ โจทนํ มนสิกตฺวา อาห ‘‘สโลกปาโลติ เจตฺถา’’ติอาทิ, คุณีภูโตปิ โลกปาลสทฺโท ปธานภูโต วิย ปฏินิทฺเทสํ อรหติ. อญฺโญ หิ สทฺทกฺกโม, อญฺโญ อตฺถกฺกโมติ. 'यं' हा शब्द शासनाच्या (बुद्धशासनाच्या) संदर्भात आहे, आणि 'लोकपाल' हा शब्द शास्त्याच्या (बुद्धांच्या) संदर्भात असला तरी तो लोकाच्या प्रति गौण झाला आहे; म्हणून “तस्सा” (तिची/त्याची) या प्रति-निर्देशाचा शास्त्याशी कसा संबंध आहे, या शंकेचा विचार करून “सलोकपालोति चेत्था” इत्यादी म्हटले आहे. गौण असलेला देखील 'लोकपाल' शब्द मुख्य शब्दाप्रमाणे प्रति-निर्देशास पात्र ठरतो. कारण शब्दाचा क्रम वेगळा असतो आणि अर्थाचा क्रम वेगळा असतो. ธมฺมคารเวน ภควา ธมฺมํ ปูเชนฺโต เวเนยฺยพนฺธเว อจินฺเตตฺวา สมาปตฺติสมาปชฺชนธมฺมปจฺจเวกฺขณาหิ สตฺตสตฺตาหํ วีตินาเมสีติ อาห ‘‘ภควโต…เป… ทีเปตพฺพา’’ติ. ตตฺถ อาทิสทฺเทน สาวเกหิ ธมฺมสฺสวนสฺส, เตสํ ปจฺจุคฺคมนาทีนญฺจ สงฺคโห เวทิตพฺโพ. धम्मावरील आदरामुळे भगवंतांनी धम्माची पूजा करत, विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) बांधवांचा विचार न करता, समापत्तीची प्राप्ती आणि धम्माचे प्रत्यवेक्षण (चिंतन) करत सात आठवडे (सत्तसप्ताह) व्यतीत केले, म्हणूनच “भगवतो...पे... दीपेतब्बा” असे म्हटले आहे. तेथे 'आदि' शब्दाने श्रावकांद्वारे धम्मश्रवण करणे, त्यांचे स्वागत करणे इत्यादींचा संग्रह समजावा. อิจฺจสฺสาติ [Pg.21] อิติ อสฺส, เอวํ ภควโต อวิปรีตอนนฺตรายิกนิยฺยานิกธมฺมเทสนาย สพฺพญฺญุตานาวรณภาวทีปเนนาติ อตฺโถ. เตนาติ จตุเวสารชฺชโยเคน. ตทวินาภาวินา ทสพล…เป… ปกาสิตา โหติ. อาเวณิกพุทฺธธมฺมาทีติ เอตฺถ อาทิสทฺเทน ตีสุ กาเลสุ อปฺปฏิหตญาณานิ, จตุสจฺจญาณานิ, จตุปฏิสมฺภิทาญาณานิ, ปญฺจคติปริจฺเฉทกญาณานิ, ฉ อภิญฺญาญาณานิ, สตฺต อริยธนานิ, สตฺต โพชฺฌงฺคา, อฏฺฐ วิชฺชา, อฏฺฐสุ ปริสาสุ อกมฺปนญาณานิ, อฏฺฐ วิโมกฺขา, นว สมาธิจริยา, นว อนุปุพฺพวิหารา, ทส นาถกรณา ธมฺมา, ทส อริยวาสา, ทฺวาทส ธมฺมจกฺกาการา, เตรส ธุตธมฺมา, จุทฺทส พุทฺธญาณานิ, ปนฺนรส จรณธมฺมา, โสฬส ญาณจริยา, โสฬส อานาปานสฺสตี, เอกูนวีสติ ปจฺจเวกฺขณญาณานิ, จตุวีสติ ปจฺจยวิภาวนญาณานิ, จตุจตฺตารีส ญาณวตฺถูนิ, สตฺตสตฺตติ ญาณวตฺถูนิ, จตุวีสติโกฏิสตสหสฺสสมาปตฺติสญฺจาริมหาวชิรญาณํ, อนนฺตนยสมนฺตปฏฺฐานปวิจยเทสนาการปฺปวตฺตญาณานิ จาติ เอวมาทีนํ ภควโต คุณวิเสสานํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. “इच्चस्सा” म्हणजे 'इति अस्स' (असे याचे), म्हणजेच भगवंतांच्या अविपरीत (यथार्थ), अनन्तरायिक (अखंड) आणि नैर्याणिक (मुक्ती देणाऱ्या) धम्मदेशनेद्वारे सर्वज्ञतेच्या अनावरणभावाचे (अप्रतिहत ज्ञानाचे) प्रकटीकरण करणे असा अर्थ आहे. “तेन” म्हणजे चार वैशारद्यांच्या योगाने. त्याच्याशी अविनाभाव संबंध असलेल्या दसबल...पे... प्रकाशित होतात. “आवेणिकबुद्धधम्मादी” येथील 'आदि' शब्दाने - तिन्ही काळांतील अप्रतिहत ज्ञान, चार आर्यसत्यांचे ज्ञान, चार प्रतिसंभिदा ज्ञान, पाच गतींचे परिच्छेदक ज्ञान, सहा अभिज्ञा ज्ञान, सात आर्यधन, सात बोध्यंग, आठ विद्या, आठ प्रकारच्या परिषदांमध्ये अकंप राहण्याचे ज्ञान, आठ विमोक्ष, नऊ समाधीचर्या, नऊ अनुपूर्वविहार, दहा नाथकरण धम्म, दहा आर्यवास, बारा धम्मचक्राकार, तेरा धुतधम्म, चौदा बुद्धज्ञान, पंधरा चरणधम्म, सोळा ज्ञानचर्या, सोळा आनापानस्मृती, एकूणवीस प्रत्यवेक्षण ज्ञान, चोवीस प्रत्ययविभावन ज्ञान, चव्वेचाळीस ज्ञानवस्तू, सत्याहत्तर ज्ञानवस्तू, चोवीस कोटी शतसहस्र समापत्तींमध्ये संचार करणारे महावज्रज्ञान, आणि अनंत नय असलेल्या समंतपठ्ठानाच्या प्रविचय देशनेच्या रूपाने प्रवृत्त झालेले ज्ञान इत्यादी भगवंतांच्या विशेष गुणांचा संग्रह समजावा. อปโร นโย – คุณวิสิฏฺฐตํ ทีเปติ, สา จ คุณวิสิฏฺฐตา มหากรุณามหาปญฺญาหิ เวทิตพฺพา ตาหิ สตฺถุสมฺปตฺติสิทฺธิโต. ตตฺถ มหากรุณาย ปวตฺติเภโท ‘‘พหุเกหิ อากาเรหิ ปสฺสนฺตานํ พุทฺธานํ ภควนฺตานํ สตฺเตสุ มหากรุณา โอกฺกมตี’’ติอาทินา ปฏิสมฺภิทามคฺเค (ปฏิ. ม. ๑.๑๑๗) วุตฺตนเยน เวทิตพฺโพ. มหาปญฺญาย ปน ปวตฺติเภโท วุตฺโต เอว. ตตฺถ กรุณาย ภควโต จรณสมฺปตฺติ, ปญฺญาย วิชฺชาสมฺปตฺติ. กรุณาย สตฺตาธิปติตา, ปญฺญาย ธมฺมาธิปติตา. กรุณาย โลกนาถตา, ปญฺญาย อตฺตนาถตา. กรุณาย ปุพฺพการิตา, ปญฺญาย กตญฺญุตา. กรุณาย อปรนฺตปตา, ปญฺญาย อนตฺตนฺตปตา. กรุณาย พุทฺธกรธมฺมสิทฺธิ, ปญฺญาย พุทฺธภาวสิทฺธิ. กรุณาย ปเรสํ ตารณํ, ปญฺญาย สยํ ตารณํ. กรุณาย สพฺพสตฺเตสุ อนุคฺคหจิตฺตตา, ปญฺญาย สพฺพธมฺเมสุ วิรตฺตจิตฺตตา ปกาสิตา โหตีติ อนวเสสโต ปรหิตปฏิปตฺติยา, อตฺตหิตสมฺปตฺติยา จ ปาริปูรี เวทิตพฺพา. ตีสุปิ อวตฺถาสูติ เหตุผลสตฺตูปการาวตฺถาสุ. दुसरी पद्धत (नय) – गुणांची विशिष्टता दर्शवते, आणि ती गुणांची विशिष्टता महाकरुणा व महाप्रज्ञा यांच्याद्वारे जाणली पाहिजे, कारण त्यांच्याद्वारे शास्त्यांची (बुद्धांची) संपत्ती सिद्ध होते. तेथे महाकरुणेचा प्रवृत्ती-भेद 'अनेक प्रकारांनी पाहणाऱ्या बुद्ध भगवंतांच्या मनात प्राण्यांविषयी महाकरुणा उत्पन्न होते' इत्यादी प्रकारे पटिसम्भिदामग्गात (पटि. म. १.११७) सांगितलेल्या पद्धतीने जाणला पाहिजे. महाप्रज्ञेचा प्रवृत्ती-भेद तर सांगितलाच आहे. तेथे करुणेमुळे भगवंतांची 'चरणसंपत्ती' (आचरणसंपदा) आणि प्रज्ञेमुळे 'विद्यासंपत्ती' (ज्ञानसंपदा) सिद्ध होते. करुणेमुळे सत्त्वाधिपतिता (प्राण्यांवर अधिपतिभाव) आणि प्रज्ञेमुळे धम्माधिपतिता (धम्मावर अधिपतिभाव) होते. करुणेमुळे लोकनाथता (जगाचे रक्षक असणे) आणि प्रज्ञेमुळे आत्मनाथता (स्वतःचे रक्षक असणे) होते. करुणेमुळे पूर्वकारिता (आधी उपकार करणे) आणि प्रज्ञेमुळे कृतज्ञता होते. करुणेमुळे अपरान्तपता (इतरांना संताप न देणे) आणि प्रज्ञेमुळे अनत्तन्तपता (स्वतःला संताप न देणे) होते. करुणेमुळे बुद्धकारक धम्मांची सिद्धी आणि प्रज्ञेमुळे बुद्धभावाची सिद्धी होते. करुणेमुळे इतरांचे तारण (मुक्त करणे) आणि प्रज्ञेमुळे स्वतःचे तारण होते. करुणेमुळे सर्व प्राण्यांविषयी अनुग्रहचित्तता (दयेची भावना) आणि प्रज्ञेमुळे सर्व धम्मांविषयी विरक्तचित्तता (अनासक्ती) प्रकट होते, अशा प्रकारे पूर्णपणे परहितप्रतिपत्तीची (इतरांच्या हिताची साधना) आणि आत्महितसंपत्तीची (स्वतःच्या हिताची प्राप्ती) परिपूर्णता जाणली पाहिजे. 'तिन्ही अवस्थांमध्ये' म्हणजे हेतू, फल आणि सत्त्वोपकार (प्राण्यांवर उपकार करण्याची) अवस्थांमध्ये. อภิสมโย [Pg.22] ปฏิเวธสาสนสฺส, มนสิกรณํ ปฏิปตฺติสาสนสฺส, สวนาทีหิ ปริจยกรณํ ปริยตฺติสาสนสฺสาติ ติณฺณมฺปิ วเสน โยเชตพฺโพ. เตนาห ‘‘ยถารห’’นฺติ. ‘‘สกฺกจฺจํ ธมฺมเทสเนนา’’ติ อิมินา อิธ ‘‘สาสน’’นฺติ วุตฺตสฺส ติวิธสฺสาปิ สทฺธมฺมสฺส อวิเสเสน เทสนาปูชํ วตฺวา โถมนาปูชนสฺส วเสน ตํ วิภชิตฺวา ทสฺเสนฺโต ‘‘อริยํ, โว ภิกฺขเว’’ติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘โถมเนนา’’ติ ปเทนาปิ ‘‘สกฺกจฺจ’’นฺติ ปทํ โยเชตพฺพํ. ปูชนาทฺวยสฺสาปิ วา วเสน อิธาปิ ปทโยชนา เวทิตพฺพา. อริยภาวาทโยติ อริยเสฏฺฐอคฺคภาวาทโย. นิยฺยานาทโยติ นิยฺยานเหตุทสฺสนาทโย. สฺวากฺขาตตาทโยติ สฺวากฺขาตสนฺทิฏฺฐิกตาทโย. अभिसमय (साक्षात्कार) हा प्रतिवेध-शासनाचा (अनुभवाच्या शासनाचा), मनसिकार (मनन) हा प्रतिपत्ती-शासनाचा (आचरणाच्या शासनाचा), आणि श्रवण इत्यादींद्वारे परिचय करणे हा परियत्ती-शासनाचा (अभ्यासाच्या शासनाचा) - अशा तिन्हींच्या अनुषंगाने योजना केली पाहिजे. म्हणूनच 'यथायोग्य' (यथारहं) असे म्हटले आहे. 'आदरपूर्वक धम्मदेशनेने' याद्वारे येथे 'शासन' म्हटलेल्या त्रिविध सद्धम्माची सामान्यपणे देशना-पूजा सांगून, स्तुती-पूजेच्या अनुषंगाने तिचे विभाजन करून दाखवताना 'अरियं, वो भिक्खवे' (हे भिक्खूंनो, आर्य...) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'स्तुतीने' (थोमनेन) या पदाशी देखील 'आदरपूर्वक' (सक्कच्चं) हे पद जोडले पाहिजे. किंवा दोन्ही प्रकारच्या पूजेच्या अनुषंगाने येथेही पदयोजना जाणली पाहिजे. 'आर्यभाव इत्यादी' म्हणजे आर्य, श्रेष्ठ, अग्रभाव इत्यादी. 'निय्यान (मुक्ती) इत्यादी' म्हणजे मुक्तीच्या हेतूचे दर्शन इत्यादी. 'स्वाक्खातता (सुव्याख्यात असणे) इत्यादी' म्हणजे स्वाक्खात, संदिट्ठिक (प्रत्यक्ष फलदायी) असणे इत्यादी. อิทานิ อริยสงฺฆคุณานมฺปิ อิมาย คาถาย ปกาสิตภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยสฺมา ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. พาลฺยาทิสมติกฺกมนโตติ พาลอพฺยตฺตภาวาทิสมติกฺกมนโต. आता आर्यसंघाच्या गुणांचेही या गाथेद्वारे प्रकट होणे दाखवण्यासाठी 'परंतु ज्याअर्थी' (यस्मा पना) इत्यादी म्हटले आहे. 'बाल्य इत्यादींचे उल्लंघन केल्यामुळे' म्हणजे बाल (अज्ञानी) आणि अव्यक्त (अकुशल) भाव इत्यादींचे उल्लंघन केल्यामुळे. ญาณวิเสโส สุตจินฺตาภาวนามยญาณานิ. โสตพฺพมนสิกาตพฺพปฏิวิชฺฌิตพฺพาวตฺถา อวตฺถาเภโท. อุภยนฺติ พฺยญฺชนปทํ, อตฺถปทญฺจ. อุภยถาติ กรณกมฺมสาธนวเสน ปจฺเจกํ โยเชตพฺพํ. ปฏิปชฺชิตพฺพตฺตาติ ญาตพฺพตฺตา. ज्ञानविशेष म्हणजे श्रुतमय, चिंतामय आणि भावनामय ज्ञान होय. ऐकण्याची, मनन करण्याची आणि प्रतिवेध (साक्षात्कार) करण्याची अवस्था हा 'अवस्थाभेद' आहे. 'दोन्ही' म्हणजे व्यंजनपद (शब्द) आणि अर्थपद. 'दोन्ही प्रकारे' म्हणजे करण आणि कर्म साधनाच्या अनुषंगाने प्रत्येकाशी जोडले पाहिजे. 'प्रतिपादन करण्यायोग्य असल्यामुळे' म्हणजे जाणण्यायोग्य असल्यामुळे. ‘‘อยญฺจ คาถา’’ติอาทิ เกสญฺจิ วาโท. ตถา หิ อปเร ‘‘เถเรเนวายํ คาถา ภาสิตา’’ติ วทนฺติ. อตฺตูปนายิกาปิ หิ กทาจิ ธมฺมเทสนา โหติ เอว ยถา ‘‘ทสพลสมนฺนาคโต, ภิกฺขเว, ตถาคโต จตุเวสารชฺชวิสารโท’’ติอาทิ (สํ. นิ. ๒.๒๑-๒๒). เอวญฺจ กตฺวา ‘‘กตเม โสฬส หารา’’ติอาทิวจนํ สมตฺถิตํ โหติ. 'आणि ही गाथा' इत्यादी काहींचा वाद (मत) आहे. तसेच इतर काही म्हणतात की, 'ही गाथा थेरांनीच (स्थविरांनीच) भाषिली आहे'. कारण कधीकधी स्वतःला उद्देशूनही धम्मदेशना असतेच, जसे की 'भिक्खूंनो, तथागत दहा बलांनी युक्त आणि चार वैशारद्यांमध्ये विशारद आहेत' इत्यादी (सं. नि. २.२१-२२). आणि असे मानल्याने 'सोळा हार कोणते आहेत' इत्यादी वचनाचे समर्थन होते. ยถาวุตฺตอตฺถมุเขเนวาติ มูลปทสงฺขาตอตฺถุทฺธาเรเนว. ปรโต อาคมิสฺสตีติ นิทฺเทสวารสฺส ปริโยสาเน อาคมิสฺสติ ‘‘ตีณิ จ นยา อนูนา’’ติอาทินา (เนตฺติ. ๔ ทฺวาทสปท). 'यथोक्त अर्थमुखानेच' म्हणजे मूळ पदांच्या रूपात सांगितलेल्या अर्थाच्या उद्धारानेच. 'पुढे येईल' म्हणजे निर्देशवाराच्या शेवटी 'आणि तीन नय पूर्ण आहेत' इत्यादींद्वारे (नेत्ति. ४, द्वादशपद) येईल. วุจฺจตีติ กตฺตริ กมฺมนิทฺเทโสติ อาห ‘‘วทตี’’ติ. อถ วา วุจฺจตีติ กมฺมกตฺตุนิทฺเทโสยํ. อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – หารา, นยา จาติ อุภยํ ปริคฺคหิตํ สํวณฺณเกน สพฺพถา คหิตญฺเจ, วุจฺจติ สุตฺตํ, สยเมว สุตฺตํ สํวณฺเณตีติ[Pg.23], เอเตน หารนเยสุ วสีภาเวน สุตฺตสํวณฺณนาย สุกรตํ ทสฺเสติ. 'म्हटले जाते' (वुच्चति) हा कर्तरी प्रयोगात कर्माचा निर्देश आहे, म्हणून 'म्हणतात' (वदति) असे म्हटले आहे. किंवा 'म्हटले जाते' हा कर्मकर्तरी निर्देश आहे. येथे हा अर्थ आहे – जर हार आणि नय या दोन्ही गोष्टींचे वर्णन करणाऱ्याने सर्व प्रकारे ग्रहण केले असेल, तर 'सुत्त म्हटले जाते', ते स्वतःच सुत्ताचे वर्णन करते. याद्वारे हार आणि नय यांच्यावरील प्रभुत्वामुळे सुत्ताचे वर्णन करणे किती सुलभ होते, हे दर्शवले आहे. ปการนฺตเรนาติ ปุพฺเพ ‘‘สาสน’’นฺติ วุตฺตมตฺถํ ‘‘เทสนา, เทสิต’’นฺติ ตโต อญฺเญน ปกาเรน. นิยเมตฺวาติ ตสฺส เอกนฺตโต วิญฺเญยฺยตํ อวธาเรตฺวา. วิญฺเญยฺยตา วิสิฏฺเฐสุ เทสนาเทสิเตสุ วิญฺเญยฺยปเท ลพฺภมานา วิชานนกิริยา. 'दुसऱ्या प्रकारे' म्हणजे पूर्वी 'शासन' म्हटलेल्या अर्थाला 'देशना, देशित' अशा त्याहून वेगळ्या प्रकारे. 'नियमन करून' म्हणजे त्याची निश्चितपणे जाणण्यायोग्यता निश्चित करून. 'जाणण्यायोग्यता' म्हणजे विशिष्ट अशा देशना-देशितांमध्ये जाणण्यायोग्य पदांमध्ये प्राप्त होणारी जाणण्याची क्रिया. เทสนาเทสิตานิ จ ยาวเทว วิชานนตฺถานีติ วิชานนํ ปธานนฺติ ตเมว นิทฺธาเรนฺโต ‘‘ตตฺราติ ตสฺมึ วิชานเน’’ติ อาห. आणि देशना व देशित हे केवळ जाणण्याच्या हेतूनेच असतात, म्हणून 'जाणणे' हेच प्रधान आहे, हे निश्चित करत 'तेथे म्हणजे त्या जाणण्यामध्ये' असे म्हटले आहे. เอตฺถาหาติ นวงฺคสาสนนววิธสุตฺตนฺตาติ เอตสฺมึ อตฺถวจเน อาห โจทโก. ตสฺสายํ อธิปฺปาโย – นวหิ องฺเคหิ ววตฺถิเตหิ อญฺญมญฺญสงฺกรรหิเตหิ ภวิตพฺพํ, ตถา จ สติ อสุตฺตสภาวาเนว เคยฺยงฺคาทีนีติ นววิธสุตฺตนฺตวจนํ วิรุชฺเฌยฺย. อถ สุตฺตสภาวานิ เคยฺยงฺคาทีนิ, เอวํ สติ ‘‘สุตฺต’’นฺติ วิสุํ สุตฺตงฺคํ น สิยา, เอวํ สนฺเต อฏฺฐงฺคสาสนํ อาปชฺชตีติ. เตนาห ‘‘กถํ ปนา’’ติอาทิ. เคยฺยงฺคาทีสุ กติปยานมฺปิ สุตฺตภาเว ยถาวุตฺตโทสานติวตฺติ, ปเคว สพฺเพสนฺติ ทสฺเสติ ‘‘ยญฺจา’’ติอาทินา. สงฺคเหสูติ อฏฺฐกถาสุ. โปราณฏฺฐกถานญฺหิ สงฺเขปภูตา อิทานิ อฏฺฐกถา ‘‘สงฺคหา’’ติ วุตฺตา. สุตฺตํ นาม สคาถกํ วา สิยา, นิคฺคาถกํ วาติ องฺคทฺวเยเนว ตทุภยงฺคํ กตนฺติ วิสุํ สุตฺตงฺคสฺส อสมฺภโว ตทุภยวินิมุตฺตสฺส สุตฺตสฺส อภาวโต. เตน วุตฺตํ ‘‘สุตฺตงฺคเมว น สิยา’’ติ. อถาปิ กถญฺจิ. สิยาติ วกฺขมานํ สามญฺญวิธึ สนฺธายาห. เอวมฺปิ อยํ โทโสติ ทสฺเสนฺโต ‘‘มงฺคลสุตฺตาทีน’’นฺติอาทิมาห. येथे आक्षेप घेणारा (चोदक) म्हणतो – 'नवांग शासन आणि नऊ प्रकारचे सुत्तंत' या अर्थाच्या वचनात आक्षेप घेणाऱ्याने म्हटले आहे. त्याचा अभिप्राय असा आहे – नऊ अंगे व्यवस्थित आणि परस्परांमध्ये संकर नसलेली (मिसळलेली नसलेली) असावीत, आणि जर असे असेल तर गेय्य इत्यादी अंगे सुत्त-स्वभावाची नसतील, त्यामुळे 'नऊ प्रकारचे सुत्तंत' या वचनाशी विरोध होईल. जर गेय्य इत्यादी अंगे सुत्त-स्वभावाची असतील, तर 'सुत्त' नावाचे स्वतंत्र सुत्त-अंग असणार नाही, आणि असे झाल्यास 'अष्टांग शासन' प्राप्त होईल. म्हणूनच 'परंतु कसे' इत्यादी म्हटले आहे. गेय्य इत्यादींपैकी काहींचा जरी सुत्तभाव मानला, तरी यथोक्त दोषांचे उल्लंघन होत नाही, मग सर्वांचा मानल्यास काय सांगावे! हे 'जे काही' इत्यादींद्वारे दर्शवले आहे. 'संग्रहांमध्ये' म्हणजे अट्ठकथांमध्ये. कारण जुन्या अट्ठकथांचा संक्षेप असलेल्या सध्याच्या अट्ठकथांना 'संग्रह' म्हटले आहे. सुत्त हे गाथांसहित असू शकते किंवा गाथांशिवाय असू शकते, अशा प्रकारे या दोन्ही अंगांनीच ते दोन्ही अंगीभूत केले असल्याने, त्या दोन्हीहून मुक्त असे सुत्त नसल्यामुळे स्वतंत्र सुत्त-अंग असणे असंभव आहे. म्हणूनच 'सुत्त-अंगच असणार नाही' असे म्हटले आहे. तरीही कसेतरी असू शकते, असे पुढे सांगण्यात येणाऱ्या सामान्य नियमाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. असे असूनही हा दोष येतोच, हे दर्शवण्यासाठी 'मंगलसुत्त इत्यादींचे' इत्यादी म्हटले आहे. ตพฺภาวนิมิตฺตนฺติ เคยฺยงฺคภาวนิมิตฺตํ. เวยฺยากรณสฺส ตพฺภาวนิมิตฺตนฺติ สมฺพนฺโธ. โจทโก ‘‘คาถาวิรเห’’ติ วจนํ อคฺคณฺหนฺโต ‘‘ปุจฺฉาวิสฺสชฺชนํ พฺยากรณ’’นฺติ วจนมตฺตเมว คเหตฺวา ‘‘เอวํ สนฺเต’’ติอาทินา โจเทติ. อิตโร ปน โอกาสวิธิโต อโนกาโส วิธิ พลวาติ ญายํ คาถาวิรหิตํเยว เวยฺยากรณนฺติ, อิธาธิปฺเปตนฺติ จ ทสฺเสนฺโต ‘‘นาปชฺชตี’’ติอาทินา ปริหรติ. ตถา หีติ เตเนว การเณน, สติปิ สญฺญนฺตรนิมิตฺตโยเค อโนกาสสญฺญานํ พลวภาเวเนวาติ อตฺโถ. 'त्या भावाचे निमित्त' म्हणजे गेय्य-अंग भावाचे निमित्त. 'वेय्याकरणाच्या त्या भावाचे निमित्त' असा संबंध आहे. आक्षेप घेणारा 'गाथाविरहित' या वचनाचा स्वीकार न करता, 'प्रश्न आणि उत्तर म्हणजे व्याकरण' एवढेच वचन घेऊन 'असे असल्यास' इत्यादींद्वारे आक्षेप घेतो. परंतु दुसरा (उत्तर देणारा) 'अवकाश-विधीपेक्षा अनवकाश-विधी बलवान असतो' या न्यायाने गाथाविरहित असणे हेच वेय्याकरण (व्याकरण) आहे, आणि येथे हेच अभिप्रेत आहे, असे दर्शवत 'प्राप्त होत नाही' इत्यादींद्वारे परिहार (उत्तर) करतो. 'तसेच' म्हणजे त्याच कारणाने, इतर संज्ञेच्या निमित्ताचा योग असतानाही अनवकाश संज्ञांच्या बलवानपणामुळेच, असा अर्थ आहे. สงฺคหวารวณฺณนา นิฏฺฐิตา. संग्रहवार-वर्णन समाप्त झाले. ๒. อุทฺเทสวารวณฺณนา २. उद्देशवार-वर्णन ๑. วิภาเคนาติ [Pg.24] สรูปวิภาเคน. อทิฏฺฐํ โชตียติ เอตายาติ อทิฏฺฐโชตนา. ทิฏฺฐํ สํสนฺทียติ เอตายาติ ทิฏฺฐสํสนฺทนา, สํสนฺทนํ เจตฺถ สากจฺฉาวเสน วินิจฺฉยกรณํ. วิมติ ฉิชฺชติ เอตายาติ วิมติจฺเฉทนา. อนุมติยา ปุจฺฉา อนุมติปุจฺฉา. ‘‘ตํ กึ มญฺญถา’’ติ หิ กา ตุมฺหากํ อนุมตีติ อนุมติ ปุจฺฉิตา. กเถตุกมฺยตาติ กเถตุกมฺยตาย. १. ‘विभागेन’ म्हणजे स्वरूपाच्या विभागाने. जिच्याद्वारे न पाहिलेले (अदृष्ट) प्रकाशित केले जाते, ती ‘अदिट्ठजोतना’ (अदृष्टप्रकाशना) होय. जिच्याद्वारे पाहिलेल्याची (दृष्टाची) तुलना केली जाते, ती ‘दिट्ठसंसंदना’ (दृष्टपडताळणी) होय; आणि येथे ‘संसंदन’ म्हणजे चर्चेच्या माध्यमातून निर्णय करणे होय. जिच्याद्वारे शंका (विमति) नष्ट केली जाते, ती ‘विमतिच्छेदना’ (शंकाच्छेदना) होय. संमतीसाठी विचारणे म्हणजे ‘अनुमतिपुच्छा’ होय. “त्याबद्दल तुम्हाला काय वाटते?” (तं किं मञ्ञथ) याद्वारे “तुमचे काय मत (संमती) आहे?” अशी संमती विचारली जाते. ‘कथेतुकाम्यता’ म्हणजे बोलण्याच्या इच्छेने. ‘‘หรียนฺติ เอเตหี’’ติอาทินา กรณาธิกรณกตฺตุภาวกมฺมสาธนานํ วเสน หาร-สทฺทสฺส อตฺถํ วตฺวา สทิสกปฺปนาวเสน ทสฺเสตุํ ‘‘หารา วิยา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ปุน คนฺถกรณาทิอตฺเถน คนฺถาทิสทฺทานํ วิย หารกรณาทิอตฺเถน หารสทฺทสิทฺธึ ทสฺเสตุํ ‘‘หารยนฺตี’’ติอาทิมาห. ‘‘หรณโต, รมณโต จา’’ติ อิมินา มโนหรา มโนรมา เจเต สํวณฺณนาวิเสสาติ ทสฺเสติ. “यांच्याद्वारे हरण केले जाते” इत्यादींद्वारे करण, अधिकरण, कर्ता, भाव आणि कर्म या साधनांच्या आधारे ‘हार’ शब्दाचा अर्थ सांगून, सादृश्याच्या कल्पनेने दर्शवण्यासाठी “हाराप्रमाणे” इत्यादी म्हटले आहे. पुन्हा, ग्रंथ तयार करणे इत्यादी अर्थाने ‘ग्रंथ’ इत्यादी शब्दांप्रमाणेच, हार तयार करणे इत्यादी अर्थाने ‘हार’ शब्दाची सिद्धी दर्शवण्यासाठी “हारयन्ति” इत्यादी म्हटले आहे. “हरण करण्यामुळे आणि रममाण करण्यामुळे” याद्वारे हे स्पष्टीकरणविशेष मनोहर आणि मनोरम आहेत, असे दर्शवले आहे. อุปปตฺติสาธนยุตฺตีติ ลกฺขณเหตุ. วุตฺตนเยนาติ ‘‘นนุ จ อญฺเญปิ หารา ยุตฺติสหิตา เอวา’’ติอาทินา เทสนาหาเร วุตฺตนยานุสาเรน. ‘उपपत्तिसाधनयुत्ती’ म्हणजे लक्षणहेतू होय. ‘वृत्त नयेन’ (सांगितलेल्या पद्धतीने) म्हणजे “इतरही हार युक्तीने युक्त आहेतच की नाही?” इत्यादींद्वारे देसनाहारामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनुसार. จตุนฺนํ พฺยูโห เอตฺถาติ ภินฺนาธิกรณานมฺปิ ปทานํ อญฺญปทตฺถสมาโส ลพฺภติ ‘‘อุรสิโลโม’’ติอาทีนํ (ที. นิ. ฏี. ๓.๕๔, ๓๐๓) วิยาติ วุตฺตํ. “येथे चार घटकांचा समूह (व्यूह) आहे” या अर्थी भिन्न विभक्ती असलेल्या (भिन्नाधिकरण) पदांचा देखील अन्यपदार्थ समास प्राप्त होतो, जसे की “उरसिलोमो” (छातीवर केस असलेला) इत्यादींच्या बाबतीत, असे म्हटले आहे. เสสนฺติ ‘‘วิวจนเมว เววจน’’นฺติ เอวมาทิ. ‘सेस’ (उर्वरित) म्हणजे “विवचन हेच वेवचन (समानार्थी शब्द) आहे” इत्यादी. อนุปฺปเวสียนฺตีติ อวคาหียนฺติ. สมาธียนฺตีติ ปริหรียนฺติ. วินา วิกปฺเปนาติ ชาติ สามญฺญํ, เภโท สามญฺญํ, สมฺพนฺโธ สามญฺญนฺติอาทินา ปทตฺถนฺตรภาววิกปฺปนมนฺตเรน. ‘अनुप्पवेसीयन्ति’ म्हणजे प्रवेश करतात (अवगाहन करतात). ‘समाधीयन्ति’ म्हणजे परिहार केले जातात. ‘विना विकप्पेन’ (विकल्पाशिवाय) म्हणजे जाती सामान्य, भेद सामान्य, संबंध सामान्य इत्यादींद्वारे इतर पदार्थांच्या भावाच्या विकल्पाशिवाय. ปทฏฺฐานาทิมุเขนาติ ปทฏฺฐานเววจนภาวนาปหานมุเขน. เกจีติ ปทฏฺฐานปริกฺขารอาวฏฺฏปริวตฺตนปญฺญตฺติโอตรเณ สนฺธาย วทติ. ‘पदट्ठानादिमुखेन’ म्हणजे पदट्ठाण (सन्निकट कारण), वेवचन (समानार्थी), भावना आणि पहाण (त्याग) यांच्या माध्यमातून. ‘केचि’ (काही आचार्य) हे पदट्ठाण, परिक्खार (साधन), आवट्ट (आवर्तन), परिवर्तन, पण्ञत्ति (प्रज्ञप्ती) आणि ओतरण (अवतरण) यांना उद्देशून म्हणतात. ๒. สมฺพนฺโธติ เหตุผลภาวโยโค. ตถาภูตานญฺหิ ธมฺมานํ เอกสนฺตานสิทฺธตา เอกตฺตนโย. วิภาโค สติปิ เนสํ เหตุผลภาเว วิภตฺตสภาวตา. อญฺโญ เอว หิ เหตุ, อญฺญํ ผลนฺติ. พฺยาปารวิรโห นิรีหตา. น หิ เหตุผลานํ เอวํ โหติ ‘‘อหํ อิมํ นิพฺพตฺเตมิ, อิมินาหํ นิพฺพตฺโต’’ติ. อนุรูปผลตา ปจฺจยุปฺปนฺนานํ ปจฺจยานุกูลตา. สมูหาทึ [Pg.25] อุปาทาย โลกสงฺเกตสิทฺธา โวหารมตฺตตา สมฺมุติสภาโว. ปถวีผสฺสาทีนํ กกฺขฬผุสนาทิลกฺขณํ ปรมตฺถสภาโว. อยญฺเหตฺถ สงฺเขโป – ยสฺมึ ภินฺเน, อิตราโปเห วา จิตฺเตน กเตน ตถา พุทฺธิ, อิทํ สมฺมุติสจฺจํ ยถา ฆเฏ, สสมฺภารชเล จ, ตพฺพิปริยาเยน ปรมตฺถสจฺจนฺติ. ปรมตฺถสจฺจปฺปฏิเวธายาติ นิพฺพานาธิคมาย. २. ‘संबंध’ म्हणजे हेतू आणि फळ यांच्या भावाचा संयोग. कारण तशा प्रकारे अस्तित्वात असलेल्या धर्मांची एकाच संततीमध्ये सिद्धी असणे म्हणजे ‘एकत्तनय’ (एकत्वनय) होय. ‘विभाग’ म्हणजे त्यांच्यात हेतू-फळ भाव असतानाही त्यांचा विभक्त स्वभाव असणे; कारण हेतू वेगळाच असतो आणि फळ वेगळेच असते. ‘व्यापारविरह’ म्हणजे निष्क्रियता (निरीहता). कारण हेतू आणि फळ यांच्यामध्ये असा विचार नसतो की, “मी याला उत्पन्न करतो” किंवा “याच्याद्वारे मी उत्पन्न झालो आहे”. ‘अनुरूपफलता’ म्हणजे प्रत्ययोत्पन्न धर्मांची प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) अनुकूल असणे. समूहादींचा आधार घेऊन लोकसंकेताने सिद्ध झालेली केवळ व्यावहारिक संज्ञा म्हणजे ‘संमुतिस्वभाव’ होय. पृथ्वी, स्पर्श इत्यादींचे कठीणपणा, स्पर्श इत्यादी लक्षण असणे म्हणजे ‘परमत्थस्वभाव’ होय. येथे हा संक्षेप आहे – ज्या वस्तूचे विभाजन केल्यावर किंवा तिच्या इतर भागांना मनाने वेगळे केल्यावर तिच्याविषयीची ती बुद्धी (संकल्पना) राहत नाही, ते ‘संमुतिसच्च’ (संवृत्तिसत्य) होय; जसे की घट आणि अवयवांसह असलेले पाणी. याच्या उलट असणारे ते ‘परमत्थसच्च’ (परमार्थसत्य) होय. ‘परमत्थसच्चप्पटिवेधाय’ म्हणजे निर्वाणाची प्राप्ती करण्यासाठी. อนฺโตติ อพฺภนฺตโร. ปธานาวยเวนาติ มูลภาเวน. ‘‘นนฺที ทุกฺขสฺส มูล’’นฺติอาทีสุ (ม. นิ. ๑.๑๓) ตณฺหา ‘‘นนฺที’’ติ วุตฺตา. ‘‘สงฺคาเม จ นนฺทึ จรตี’’ติอาทีสุ ปโมโทติ อาห ‘‘ตณฺหาย, ปโมทสฺส วา’’ติ. ‘अंत’ म्हणजे अभ्यंतर (आतला). ‘प्रधान अवयवाने’ म्हणजे मूळ भावाने. “नंदी (आसक्ती) हे दुःखाचे मूळ आहे” इत्यादींमध्ये तृष्णेला ‘नंदी’ म्हटले आहे. “आणि संग्रामात नंदी (आनंद) मिळवतो” इत्यादींमध्ये प्रमोद (आनंद) या अर्थाने “तृष्णेचा किंवा प्रमदाचा (आनंदाचा)” असे म्हटले आहे. ๓. ชาติเภทโตติ กุสลา, อกุสลาติ อิมสฺมา วิเสสา. ยุชฺชนฺตีติ เอตฺถ เหตุอตฺโถ อนฺโตนีโต เวทิตพฺโพติ อาห ‘‘โยชียนฺตี’’ติ. เกหิ โยชียนฺติ? สํวณฺณนเกหีติ อธิปฺปาโย. ยุชฺชนฺตีติ วา ยุตฺตา โหนฺติ, เตหิ สมานโยคกฺขมา ตคฺคหเณเนว คหิตา โหนฺตีติ อตฺโถ ตเทกฏฺฐภาวโต. อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘นวหิ ปเทหี’’ติ สหโยเค กรณวจนํ, ปุริมสฺมึ กรเณ. ‘‘เอเต โข’’ติ จ ปาโฐ. ตตฺถ โข-สทฺทสฺส ปทปูรณตา, อวธารณตฺถตา วา เวทิตพฺพา. เอเต เอวาติ เอเต ตณฺหาทโย เอว, น อิโต อญฺเญติ อตฺโถ. อฏฺฐารเสว น ตโต อุทฺธํ, อโธ วาติ. ปุริมสฺมึ ปกฺเข มูลปทนฺตราภาโว, ทุติยสฺมึ เตสํ อนูนาธิกตา ทีปิตา โหติ. ३. ‘जातिभेदतः’ म्हणजे कुशल, अकुशल या भेदावरून. ‘युज्जन्ति’ (जोडले जातात) यामध्ये हेतूचा अर्थ अंतर्भूत आहे असे समजावे, म्हणून “योजियन्ति” (योजले जातात) असे म्हटले आहे. कोणाद्वारे योजले जातात? स्पष्टीकरण करणाऱ्यांद्वारे, असा अभिप्राय आहे. किंवा ‘युज्जन्ति’ म्हणजे ते युक्त असतात, त्यांच्याशी समान योग असणारे त्याच्या ग्रहणानेच ग्रहण केले जातात, कारण त्यांचा अर्थ एकच असतो. या अर्थामध्ये “नवहि पदेहि” (नऊ पदांद्वारे) हे सहयोगात तृतीया विभक्ती आहे, आणि पूर्वीच्या अर्थात ते साधन (करण) अर्थी आहे. “एते खो” असाही पाठ आहे. तेथे ‘खो’ हा शब्द पदपूरक किंवा निश्चय (अवधारण) अर्थी समजावा. ‘एते एव’ म्हणजे हे तृष्णा इत्यादीच, यापेक्षा इतर नाहीत, असा अर्थ आहे. अठराच, त्यापेक्षा जास्तही नाही आणि कमीही नाही. पहिल्या पक्षामध्ये इतर मूळ पदांचा अभाव दर्शवला आहे, तर दुसऱ्या पक्षामध्ये त्यांची उणीव किंवा अधिकता नसणे (अन्यूनाधिकता) स्पष्ट केली आहे. อุทฺเทสวารวณฺณนา นิฏฺฐิตา. उद्देसवार-वर्णन समाप्त झाले. ๓. นิทฺเทสวารวณฺณนา ३. निद्देसवार-वर्णन. ๔. นิทฺเทสวาเร สามญฺญโตติ สาธารณโต. วิเสเสนาติ อสาธารณโต. ปทตฺโถติ สทฺทตฺโถ. ลกฺขณนฺติ สภาโว. กโมติ อนุปุพฺพี. เอตฺตาวตาติ เอตฺตกปฺปมาณภาโว. เหตฺวาทีติ เหตุผลภูมิอุปนิสาสภาควิสภาคลกฺขณนยา. วิเสสโต ปน ลกฺขณนฺติ สมฺพนฺโธ. ४. निद्देसवारमध्ये ‘सामञ्ञतो’ म्हणजे साधारणपणे. ‘विसेसेन’ म्हणजे असाधारणपणे (विशेषतः). ‘पदत्थ’ म्हणजे शब्दाचा अर्थ. ‘लक्खण’ म्हणजे स्वभाव. ‘कम’ म्हणजे अनुक्रम. ‘एत्तावता’ म्हणजे एवढ्या प्रमाणाचा भाव. ‘हेत्वादि’ म्हणजे हेतू, फळ, भूमी, उपनिसा (उपनिश्रय), सभाग, विसभाग आणि लक्षण हे नय होत. विशेषतः ‘लक्षण’ म्हणजे संबंध होय. หารสงฺเขปวณฺณนา हारसंक्षेप-वर्णन. ๑. ยํ, ภิกฺขเวติ เอตฺถ ยนฺติ ปจฺจตฺตวจนํ, ตญฺจ สุขํ, โสมนสฺสนฺติ ทฺวเยน สมานาธิกรณนฺติ กตฺวา ‘‘อสฺสาทียตีติ อสฺสาโท, สุขํ, โสมนสฺสญฺจา’’ติ [Pg.26] วุตฺตํ. สุขาทิเวทนา วิย มนาปิยรูปาทิปิ อวีตราคสฺส อสฺสาเทตพฺพนฺติ อาห ‘‘เอวํ อิฏฺฐารมฺมณมฺปี’’ติ. ‘‘อสฺสาเทติ เอตายาติ วา อสฺสาโท, ตณฺหา’’ติ เอเตน ‘‘ย’’นฺติ เหตุอตฺเถ นิปาโตติ ทสฺเสติ. ตตฺรายมตฺโถ – เยน เหตุนา ปญฺจุปาทานกฺขนฺเธ ปฏิจฺจ อสฺสาทนียภาเวน อุปฺปชฺชติ สุขํ โสมนสฺสํ, อยํ ตณฺหาสงฺขาโต อสฺสาโท อสฺสาทนกิริยาย การณนฺติ. อิติ กตฺวา อยมตฺโถ ทิฏฺฐาภินนฺทนาทิภาวโต วิปลฺลาเสสุปิ สมฺภวตีติ อาห ‘‘เอวํ วิปลฺลาสาปี’’ติ. อนิฏฺฐมฺปีติ ปิ-สทฺเทน อิฏฺฐมฺปีติ โยเชตพฺพํ, อนวเสสา สาสวา ธมฺมา อิธ อารมฺมณคฺคหเณน คหิตาติ อาห ‘‘สพฺเพสํ เตภูมกสงฺขาราน’’นฺติ. १. “यम्, भिक्खवे” (जे, भिक्खूहो) येथे ‘यम्’ हे प्रथमा विभक्तीचे रूप आहे, आणि ते ‘सुखम्’ व ‘सोमनस्सम्’ या दोन्हींशी सामानाधिकरण्य ठेवून “ज्याचा आस्वाद घेतला जातो तो आस्वाद होय, आणि तो सुख व सोमनस्य (प्रसन्नता) आहे” असे म्हटले आहे. सुख इत्यादी वेदनांप्रमाणेच, मनाला आवडणारे रूप इत्यादींचाही वीतराग नसलेल्या (रागयुक्त) व्यक्तीने आस्वाद घ्यावा, म्हणून “तसेच इष्ट आलंबनही” असे म्हटले आहे. “किंवा जिच्याद्वारे आस्वाद घेतला जातो तो आस्वाद म्हणजे तृष्णा होय” याद्वारे ‘यम्’ हा हेतू अर्थातील निपात आहे, असे दर्शवले आहे. तेथे हा अर्थ आहे – ज्या हेतूने पाच उपादानस्कंधांवर अवलंबून आस्वाद घेण्याच्या भावाने सुख आणि सोमनस्य उत्पन्न होते, तो तृष्णा नावाचा आस्वाद हा आस्वाद घेण्याच्या क्रियेचे कारण आहे. असे असल्यामुळे हा अर्थ दृष्टीचे अभिनंदन इत्यादी भावांमुळे विपर्यासांमध्येही संभवतो, म्हणून “तसेच विपर्यासही” असे म्हटले आहे. ‘अनिट्ठम्पि’ (अनिष्टही) यातील ‘पि’ शब्दाने ‘इष्टही’ असे जोडले पाहिजे; सर्व उर्वरित सास्रव (आस्रवयुक्त) धर्म येथे आलंबन ग्रहणाने ग्रहण केले आहेत, म्हणून “सर्व त्रिभूमिक संस्कारांचे” असे म्हटले आहे. ทุกฺขาทุกฺขมสุขเวทนานนฺติ เอตฺถ ทุกฺขสภาวา เอว อทุกฺขมสุขา เวทนา คหิตา อนิฏฺฐารมฺมณสฺส อธิปฺเปตตฺตา, น สุขสภาวา. ยํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘ยายํ, ภนฺเต, อทุกฺขมสุขา เวทนา, สนฺตสฺมึ เอสา ปณีเต สุเข วุตฺตา ภควตา’’ติ (ม. นิ. ๒.๘๘; สํ. นิ. ๔.๒๖๗). ‘‘สุขปริยายสพฺภาวโต’’ติ อิมินา อิฏฺฐตามตฺตโตปิ เลเสน สตฺตานํ อารมฺมณสฺส อสฺสาทนียตา สมฺภวตีติ ทสฺเสติ. ‘दुक्खादुक्खमसुखवेदनानाम्’ येथे दुःखस्वभावाचीच अदुःख-असुख वेदना ग्रहण केली आहे, कारण अनिष्ट आलंबन अभिप्रेत आहे, सुखस्वभावाची नाही. ज्याला उद्देशून म्हटले आहे – “भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखामध्ये सांगितली आहे.” “सुखपर्यायसद्भावामुळे” याद्वारे केवळ इष्टतेमुळेही प्राण्यांना आलंबनाचा आस्वाद घेण्याची शक्यता थोड्या प्रमाणात का होईना संभवते, असे दर्शवले आहे. อาทีนโว โทสนิสฺสนฺทนตาย โทโส, สฺวายํ ปีฬนวุตฺติยา เวทิตพฺโพติ อาห ‘‘อาทีนโว ทุกฺขา เวทนา, ติสฺโสปิ วา ทุกฺขตา’’ติ. เอวํ โทสตฺถตํ อาทีนวสฺส ทสฺเสตฺวา อิทานิ กปณตฺถตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อถ วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ยโตติ ยสฺมา โทสกปณสภาวตฺตาติ วุตฺตํ โหติ. आदीनव (दोष) हा दोषाच्या प्रवाहामुळे दोष आहे, आणि तो पीडा देण्याच्या वृत्तीने समजावा, म्हणून “आदीनव म्हणजे दुःखद वेदना किंवा तिन्ही प्रकारची दुःखता होय” असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे आदीनवाचा दोषरूप अर्थ दर्शवून, आता त्याचा दीनता (कृपणता) रूप अर्थ दर्शवण्यासाठी “अथवा” इत्यादी म्हटले आहे. ‘यतो’ म्हणजे ज्या दोष आणि दीनतेच्या स्वभावामुळे, असे म्हटले आहे. นิสฺสรตีติ วิวิตฺติ, สพฺพสงฺขารวิเวโกติ อตฺโถ. สามญฺญนิทฺเทเสนาติ นิสฺสรณสทฺทวจนียตาสามญฺเญน. ปุริมานนฺติ อสฺสาทาทีนวตานํ. อุปาโย จาติอาทีสุ จ-สทฺโท ปทปูรณมตฺตนฺติ กตฺวา อาห ‘‘ปจฺฉิมานญฺจา’’ติ, ผลาทีนนฺติ อตฺโถ. ตทนฺโตคธเภทานนฺติ อริยมคฺคปริยาปนฺนวิเสสานํ. 'निसरती' (बाहेर पडणे/मुक्त होणे) म्हणजे 'विवित्ती' (विविक्तता/अलिप्तता), सर्व संस्कारांपासून अलिप्त होणे (सब्बसंखारविवेक) असा अर्थ आहे. 'सामान्यनिद्देसेन' म्हणजे 'निसरण' (मुक्तता/निःसरण) या शब्दाच्या वाचकतेच्या सामान्यतेने. 'पुरिमानं' (पूर्वीच्यांचे) म्हणजे अस्साद (आस्वाद) आणि आदीनव (दोष) यांचे. 'उपायो च' इत्यादींमध्ये 'च' हा शब्द केवळ पदपूरक मानून 'पच्छिमानञ्च' (आणि नंतरच्यांचे) असे म्हटले आहे, ज्याचा अर्थ फल इत्यादींचा असा आहे. 'तदन्तोगधभेदानं' म्हणजे आर्यमार्गात समाविष्ट असलेल्या विशेषांचे (भेदांचे). กามภวาทีนนฺติ อาทิ-สทฺเทน น รูปารูปภวา เอว คหิตา, อถ โข เต จ สญฺญีภวาทโย จ เอกโวการภวาทโย จ คหิตา. เตนาห ‘‘ติณฺณํ ติณฺณํ ภวาน’’นฺติ. 'कामभव आदीं' मधील 'आदि' शब्दाने केवळ रूप आणि अरूप भवच घेतले जात नाहीत, तर ते संज्ञीभव इत्यादी आणि एकवोकारभव इत्यादी देखील घेतले जातात. म्हणूनच म्हटले आहे - 'तिन्ही तिन्ही भवांचे' (तिण्णं तिण्णं भवानं). ยาวเทว [Pg.27] อนุปาทาปรินิพฺพานตฺถา ภควโต เทสนาติ อาห ‘‘นนุ จ…เป… นิปฺผาทียตี’’ติ. ‘‘วุตฺตเมวา’’ติ อิมินา ปุนรุตฺติโทสํ โจเทติ. อิตโร ‘‘สจฺจเมต’’นฺติ อนุชานิตฺวา ‘‘ตญฺจ โข’’ติอาทินา ปริหรติ. ‘‘ปรมฺปรายา’’ติ เอเตน อชฺฌตฺตํ โยนิโสมนสิกาโร วิย น ปรโตโฆโส อาสนฺนการณํ ธมฺมาธิคมสฺส ธมฺมสฺส ปจฺจตฺตํ เวทนียตฺตาติ ทสฺเสติ. ตถา หิ ‘‘อกฺขาตาโร ตถาคตา, ปฏิปนฺนา ปโมกฺขนฺติ, ฌายิโน มารพนฺธนา’’ติ (ธ. ป. ๒๗๖) วุตฺตํ. ตทธิคมการณํ อริยมคฺคาธิคมการณํ สิยา. กึ ปน ตนฺติ อาห ‘‘สมฺปตฺติภวเหตู’’ติ, เตน จริมตฺตภาวเหตุภูตํ ปุญฺญสมฺปตฺตึ วทติ. भगवंतांचा उपदेश केवळ अनुपादापरिनिर्वाणाच्या (अनुपादापरिनिब्बान) उद्देशानेच आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'ननु च... पे... निष्पादित केले जाते'. 'वुत्तमेव' (आधीच सांगितले आहे) याद्वारे पुनरुक्तीच्या दोषाची शंका घेतली आहे. दुसऱ्याने 'हे सत्य आहे' असे मान्य करून 'तञ्च खो' (आणि ते देखील) इत्यादींद्वारे त्याचे समाधान केले आहे. 'परंपरेने' याद्वारे हे दर्शविले आहे की, आध्यात्मिक (अज्झत्त) योनिसोमनसिकाराप्रमाणे 'परतघोष' (दुसऱ्याचा उपदेश) हा धम्माच्या प्राप्तीचे (धम्माधिगम) निकटचे कारण नाही, कारण धम्म हा स्वतःच अनुभवण्याचा (पच्चत्तं वेदनिय) विषय आहे. तसेच म्हटले आहे - 'तथागत केवळ मार्ग दाखवणारे आहेत, मार्गावर चालणारे ध्यानी मारबंधनातून मुक्त होतील' (धम्मपद २७६). त्याच्या प्राप्तीचे कारण म्हणजे आर्यमार्गाच्या प्राप्तीचे कारण असावे. ते काय आहे? तर म्हटले आहे - 'संपत्तिभवहेतू', याद्वारे अंतिम आत्मभावाचे (चरिमत्तभाव) कारण असणारी पुण्यसंपत्ती सांगितली आहे. ‘‘อตฺตานุทิฏฺฐึ อูหจฺจ, เอวํ มจฺจุตโร สิยา’’ติ อิทํ อริยมคฺคสฺส ปุพฺพภาคปฏิปทาย ผลภาวสาธนํ. เยน หิ วิธินา อตฺตานุทิฏฺฐิสมุคฺฆาโต, มจฺจุตรณญฺจ สิยา, โส ‘‘เอว’’นฺติ อิมินา ปกาสิโตติ. อตฺตานุทิฏฺฐิสมุคฺฆาตมจฺจุตรณานํ ผลภาเว วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. 'आत्मदृष्टीचे (अत्तानुदिट्ठि) उच्चाटन करून अशा प्रकारे मृत्यू पार करावा' हे आर्यमार्गाच्या पूर्वभागाच्या प्रतिपदेचे (पूर्वगामी आचरणाचे) फल सिद्ध करणारे आहे. कारण ज्या विधीने आत्मदृष्टीचे समूळ उच्चाटन आणि मृत्यू पार करणे शक्य होते, तो विधी 'एवं' (अशा प्रकारे) याद्वारे प्रकाशित केला आहे. आत्मदृष्टीचे समूळ उच्चाटन आणि मृत्यू पार करणे यांच्या फलभावाविषयी काही सांगण्याची गरजच नाही. ‘‘ธมฺโม หเว’’ติ ปน คาถายํ โลกิยสฺส ปุญฺญผลสฺส วุตฺตตฺตา อาห ‘‘อิทํ ผล’’นฺติ. ยํ นิพฺพตฺเตตพฺพํ, ตํ ผลํ. ยํ นิพฺพตฺตกํ, โส อุปาโย. อยเมตฺถ วินิจฺฉโย. เตนาห ‘‘เอเตน นเยนา’’ติอาทิ. อุปธิสมฺปตฺตีติ อตฺตภาวโสภา. परंतु 'धम्मो हवे' या गाथेमध्ये लौकिक पुण्यफलाचे वर्णन केले असल्याने 'हे फल आहे' असे म्हटले आहे. जे उत्पन्न करायचे आहे, ते फल आहे. जे उत्पन्न करणारे आहे, तो उपाय आहे. हा येथे निर्णय आहे. म्हणूनच 'या नयाने' इत्यादी म्हटले आहे. 'उपधिसंपत्ती' म्हणजे आत्मभावाची शोभा (शरीराचे सौंदर्य). วิสุทฺธีติ ญาณทสฺสนวิสุทฺธิ อธิปฺเปตาติ อาห – ‘‘เอตฺถาปิ…เป… วิญฺญาตุ’’นฺติ. ‘‘ยสฺมา ปนา’’ติอาทินาปิ ตเมวตฺถํ วจนนฺตเร ปากฏตรํ กโรติ. 'विशुद्धी' म्हणजे 'ज्ञानदर्शनविशुद्धी' अभिप्रेत आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'येथेही... पे... जाणण्यासाठी'. 'यस्मा पना' (परंतु ज्या कारणाने) इत्यादींद्वारे देखील तोच अर्थ दुसऱ्या शब्दांत अधिक स्पष्ट केला आहे. สรูปโต อาคตานิ ‘‘ยโต โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ปญฺจนฺนํ อุปาทานกฺขนฺธานํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ ปชานาตี’’ติอาทีสุ (สํ. นิ. ๓.๒๖-๒๘). เอกเทเสน อาคตานิ ‘‘สํโยชนิเยสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ อสฺสาทานุปสฺสิโน วิหรโต (สํ. นิ. ๒.๕๓), พหุทุกฺขา พหุปายาสา, อาทีนโว เอตฺถ ภิยฺโย (ม. นิ. ๑.๑๑๗), สงฺขารานเมตํ นิสฺสรณํ, ยทิทํ นิพฺพาน’’นฺติอาทีสุ (ปฏิ. ม. ๑.๒๔; ๓.๔๑). น สรูเปน อาคตานิ ยถา สามญฺญผลสุตฺตาทีสุ. อตฺถวเสนาติ อสฺสาเทตพฺพาทิอตฺถวเสน. น ปปญฺจิโตติ น วิตฺถาริโต. मूळ रूपात आलेले (सरूपतो आगतानि) जसे - 'भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू पाच उपादानस्कंधांचा उदय, अस्त, आस्वाद (अस्साद), दोष (आदीनव) आणि निःसरण (निसरण) यथाभूत जाणतो...' इत्यादींमध्ये (संयुत्त निकाय ३.२६-२८). अंशतः आलेले (एकदेसेन आगतानि) जसे - 'भिक्खूहो, संयोजनीय धम्मांमध्ये आस्वादाचे अनुदर्शन करत विहरणाऱ्या...' (संयुत्त निकाय २.५३), 'पुष्कळ दुःख, पुष्कळ त्रास, येथे दोषच अधिक आहे' (मज्झिम निकाय १.११७), 'संस्कारांचे हेच निःसरण आहे, जे हे निर्वाण आहे' इत्यादींमध्ये (पटिसंभिदामग्ग १.२४; ३.४१). मूळ रूपात न आलेले जसे सामञ्ञफलसुत्त (सामण्यफल सुत्त) इत्यादींमध्ये. 'अत्थवसेन' (अर्थाच्या वशाने) म्हणजे आस्वाद घेण्यायोग्य इत्यादी अर्थाच्या वशाने. 'न प्रपंचितो' म्हणजे विस्तार न केलेला. ๒. เอเสว [Pg.28] นโยติ อติเทเสน วิจิยมานวจนเสโส อติทิฏฺโฐ. ภาวตฺเถ โตหิ อาห ‘‘วิสฺสชฺชิตนฺติ วิสฺสชฺชนา’’ติ. สุตฺเต อาคตํ น อตฺถสํวณฺณนาวเสน อฏฺฐกถายํ อาคตนฺติ อธิปฺปาโย. ปุจฺฉานุรูปตา อิธ ปุพฺพาปรนฺติ จตุพฺยูหปุพฺพาปรโต อิมํ วิเสเสตฺวา ทสฺเสติ. ปุจฺฉานุสนฺธีติ ปุจฺฉาย วิสฺสชฺชเนน อนุสนฺธานํ. อฏฺฐกถายํ ปน เหฏฺฐิมเทสนาย ปุจฺฉานิมิตฺตปวตฺตอุปริเทสนาย สมฺพนฺโธ ‘‘ปุจฺฉานุสนฺธี’’ติ วุตฺตํ. ปุพฺพาเปกฺขนฺติ ปุจฺฉิตวิสฺสชฺชิตปทาเปกฺขํ. ‘‘สุตฺตสฺสา’’ติ วา อิมินา ปุจฺฉาวิสฺสชฺชนาอนุคีติโย ฐเปตฺวา เสโส วิจยหารปทตฺโถ สงฺคหิโตติ ปทสฺสาปิ สงฺคโห เวทิตพฺโพ. อิมสฺมึ ปกฺเข คาถายํ จ-สทฺโท ปทปูรณมตฺเต ทฏฺฐพฺโพ. २. 'हाच नय आहे' (एसेव नयो) याद्वारे अतिदेशाने विचार केल्या जाणाऱ्या उर्वरित वचनाचा अतिदेश केला आहे. भावार्थामध्ये 'त' प्रत्ययाने म्हटले आहे - 'विसर्जित केले ते विसर्जन' (विस्सज्जितन्ति विस्सज्जना). सुत्तात आलेले, अर्थवर्णनाच्या (अत्थसंवण्णना) वशाने अट्ठकथेत आलेले नाही, असा अभिप्राय आहे. येथे 'पुच्छानुरूपता' (प्रश्नानुसार असणे) आणि 'पुब्बापरं' (पूर्वापर) याद्वारे चतुर्व्यूह पूर्वापरापेक्षा याला विशेष करून दाखवले आहे. 'पुच्छानुसंधी' म्हणजे प्रश्नाचे विसर्जनाशी (उत्तराशी) अनुसंधान. परंतु अट्ठकथेत खालील उपदेशाचा (हेट्ठिमदेसना) प्रश्नाच्या निमित्ताने प्रवृत्त झालेल्या वरील उपदेशाशी (उपरिदेसना) असलेला संबंध 'पुच्छानुसंधी' असा म्हटला आहे. 'पुब्बापेक्खं' म्हणजे विचारलेल्या आणि विसर्जित केलेल्या (उत्तर दिलेल्या) पदांची अपेक्षा असणारे. किंवा 'सुत्तस्स' याद्वारे प्रश्न, विसर्जन आणि अनुगीती बाजूला ठेवून उर्वरित 'विचयहार' पदाचा अर्थ संग्रहित केला आहे, म्हणून पदाचा देखील संग्रह समजला पाहिजे. या पक्षात गाथेतील 'च' शब्द केवळ पदपूरक मानला पाहिजे. ‘‘จกฺขุ อนิจฺจ’’นฺติ ปุฏฺเฐ ‘‘อาม, จกฺขุ อนิจฺจเมวา’’ติ เอกนฺตโต วิสฺสชฺชนํ เอกํสพฺยากรณํ. ‘‘อญฺญินฺทฺริยํ ภาเวตพฺพํ, สจฺฉิกาตพฺพญฺจา’’ติ ปุฏฺเฐ ‘‘มคฺคปริยาปนฺนํ ภาเวตพฺพํ, ผลปริยาปนฺนํ สจฺฉิกาตพฺพ’’นฺติ วิภชิตฺวา วิสฺสชฺชนํ วิภชฺชพฺยากรณํ. ‘‘อญฺญินฺทฺริยํ กุสล’’นฺติ ปุฏฺเฐ ‘‘กึ อนวชฺชฏฺโฐ กุสลฏฺโฐ, อุทาหุ สุขวิปากฏฺโฐ’’ติ ปฏิปุจฺฉิตฺวา วิสฺสชฺชนํ ปฏิปุจฺฉาพฺยากรณํ. ‘‘สสฺสโต อตฺตา, อสสฺสโต วา’’ติ วุตฺเต ‘‘อพฺยากตเมต’’นฺติอาทินา อวิสฺสชฺชนํ ฐปนํ. ‘‘กึ ปเนเต กุสลาติ วา ธมฺมาติ วา เอกตฺถา, อุทาหุ นานตฺถา’’ติ อิทํ ปุจฺฉนํ สาวเสสํ. วิสฺสชฺชนสฺส ปน สาวเสสตา เวเนยฺยชฺฌาสยวเสน เทสนายํ เวทิตพฺพา. อปฺปาฏิหีรกํ สอุตฺตรํ. สปฺปาฏิหีรกํ นิรุตฺตรํ. เสสํ วิจยหารนิทฺเทเส สุวิญฺเญยฺยเมว. 'चक्षू अनित्य आहे का?' असे विचारले असता, 'होय, चक्षू अनित्यच आहे' असे एकांताने (निश्चितपणे) उत्तर देणे म्हणजे 'एकंसव्याकरण' (एकान्त उत्तर) होय. 'अज्ञिंद्रिय (अञ्ञिन्द्रिय) भावित करावे की साक्षात करावे?' असे विचारले असता, 'मार्गपर्यापन्न भावित करावे आणि फलपर्यापन्न साक्षात करावे' असे विभागून उत्तर देणे म्हणजे 'विभज्जव्याकरण' (विभक्त करून उत्तर देणे) होय. 'अज्ञिंद्रिय कुशल आहे का?' असे विचारले असता, 'ते अनवद्य (दोषरहित) अर्थाने कुशल आहे की सुखविपाक अर्थाने?' असा प्रतिप्रश्न विचारून उत्तर देणे म्हणजे 'पटiपुच्छाव्याकरण' (प्रतिप्रश्न करून उत्तर देणे) होय. 'आत्मा शाश्वत आहे की अशाश्वत?' असे विचारले असता, 'हे अव्याकृत (अव्याकत) आहे' इत्यादींद्वारे उत्तर न देता बाजूला ठेवणे म्हणजे 'ठपन' (स्थापना/मौन राखणे) होय. 'हे कुशल किंवा धम्म एकाच अर्थाचे आहेत की वेगवेगळ्या अर्थाचे?' हा प्रश्न सावशेष (अपूर्ण) आहे. परंतु उत्तराची सावशेषता विनेय (शिष्य/श्रोते) यांच्या आशयाच्या वशाने उपदेशात समजली पाहिजे. अप्रातिहार्य (अप्पाटिहीरक) हे सोत्तर (उत्तर देण्याजोगे) असते. सप्रातिहार्य (सप्पाटिहीरक) हे निरुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) असते. उर्वरित भाग विचयहारनिद्देस मध्ये सहज समजण्याजोगा आहे. เอตฺถ จ อสฺสาโท อสฺสาทเหตุ ยาว อาณตฺติเหตูติ เอวํ เหตูนมฺปิ อสฺสาทาทโย เวทิตพฺพา. ตตฺถ สงฺเขปโต สุขสุขปจฺจยลกฺขโณ อสฺสาโท, โส วิเสสโต สคฺคสมฺปตฺติยา ทีเปตพฺโพ. สา หิ ตสฺส อุกฺกํโส, เสสา ปเนตฺถ ภวสมฺปตฺติ ตทนฺวายิกา เวทิตพฺพา. ตสฺส เหตุ ทานมยํ, สีลมยญฺจ ปุญฺญกิริยวตฺถุ. ทุกฺขทุกฺขปจฺจยลกฺขโณ อาทีนโว. วิปริณามสงฺขารทุกฺขตานํ ตทวโรธโต วฏฺฏทุกฺขสฺสาปิ เอตฺถ สงฺคโห. วิเสสโต ปน กามานํ โอกาโรติ ทฏฺฐพฺโพ, สฺวายํ สํกิเลสวตฺถุนา, อิตฺตรปจฺจุปฏฺฐานตาทีหิ จ วิภาเวตพฺโพ, ตสฺส เหตุ ทส อกุสลกมฺมปถา. เนกฺขมฺมํ นิสฺสรณํ, ตสฺส เหตุ ยถารหํ ตทนุจฺฉวิกา ปุพฺพภาคปฺปฏิปทา. ผลํ เทสนาผลเมว, ตสฺส [Pg.29] เหตุ เทสนา. อุปาโย ยถาวุตฺตอุปาโยว, ตสฺส เหตุ จตฺตาริ จกฺกานิ. อาณตฺติ อุปเทโส, ตสฺส ราคคฺคิอาทีหิ โลกสฺส อาทิตฺตตา, สตฺถุ มหากรุณาโยโค จ เหตุ. आणि येथे आस्वाद (अस्साद), आस्वादहेतू इथपासून ते आज्ञाहेतू (आणत्तिहेतू) पर्यंत अशा प्रकारे हेतूंचे देखील आस्वाद इत्यादी समजले पाहिजेत. त्यामध्ये संक्षेपाने सुख आणि सुखप्रत्यय (सुखाचे कारण) हे ज्याचे लक्षण आहे तो आस्वाद होय, तो विशेषतः स्वर्गसंपत्तीने (सग्गसंपत्ती) प्रकाशित केला पाहिजे. कारण ती त्याची उत्कृष्ठता (उक्कंस) आहे, आणि येथील उर्वरित भवसंपत्ती तिच्या अनुषंगाने येणारी समजली पाहिजे. त्याचे कारण दानमय आणि शीलमय पुण्यक्रियावस्तू (पुञ्ञकिरियवत्थु) आहे. दुःख आणि दुःखप्रत्यय (दुःखाचे कारण) हे ज्याचे लक्षण आहे तो दोष (आदीनव) होय. विपरिणामदुःखता आणि संस्कारदुःखता यांचा त्यात समावेश होत असल्याने संसारदुःखाचा (वट्टदुःख) देखील येथे संग्रह होतो. विशेषतः कामांचा अपकर्ष (ओकार) असे समजले पाहिजे, तो संक्लेशवस्तूने (संकिलेसवत्थु) आणि क्षणभंगुर उपस्थिती (इत्तरपच्चुपट्ठानता) इत्यादींद्वारे स्पष्ट केला पाहिजे, त्याचे कारण दहा अकुशलकर्मपथ (अकुसलकम्मपथ) आहेत. नैष्क्रम्य (नेक्खम्म) हे निःसरण आहे, त्याचे कारण योग्य अशी तदनुरूप पूर्वभागप्रतिपदा (पुब्बभागप्पटिपदा) आहे. फल हे उपदेशाचे फलच (देसनाफल) आहे, त्याचे कारण उपदेश (देसना) आहे. उपाय हा वर सांगितलेला उपायच आहे, त्याचे कारण चार चक्रे (चत्तारी चक्कानी) आहेत. आज्ञा (आणत्ति) म्हणजे उपदेश आहे, त्याचे कारण रागाग्नी इत्यादींनी जगाचे प्रज्वलित असणे (आदित्तता) आणि शास्त्यांचा (बुद्धांचा) महाकरुणाभाव (महाकरुणायोग) हे आहे. ตถา จตูสุ อริยสจฺเจสุ สมุทเยน อสฺสาโท, ทุกฺเขน อาทีนโว, มคฺคนิโรเธหิ นิสฺสรณํ, มคฺโค วา อุปาโย, ตทุปเทโส อาณตฺติ, อนุปาทิเสสา นิพฺพานธาตุ ผลํ. อิติ อนุปุพฺพกถาย สทฺธึ พุทฺธานํ สามุกฺกํสิกาย ธมฺมเทสนาย นิทฺธารณภาเวน วิจโย เวทิตพฺโพ. ปทสฺส ปทตฺถสมฺพนฺโธ เหตุ. โส หิ ตสฺส ปวตฺตินิมิตฺตํ, ปญฺหสฺส ญาตุกามตา, กเถกุกามตา จ. อทิฏฺฐโชตนาทีนญฺหิ จตุนฺนํ ญาตุกามตา, อิตรสฺส อิตรา. วิสฺสชฺชนสฺส ปญฺโห เหตุ. เอวํ เสสานมฺปิ ยถารหํ วตฺตพฺพํ. त्याचप्रमाणे चार आर्यसत्यांमध्ये समुदयाद्वारे आस्वाद (आनंद), दुःखाद्वारे आदीनव (दोष/धोका), मार्ग आणि निरोधाद्वारे निस्सरण (मुक्ती), किंवा मार्ग हा उपाय आहे, त्याचा उपदेश ही आज्ञा आहे, आणि अनुपादिशेष निर्वाणधातू हे फल आहे. अशा प्रकारे, आनुपूर्वी कथेसह बुद्धांच्या सामुकंसिका (सर्वोत्कृष्ट) धम्मदेशनेच्या निर्धारणभावाने 'विचय' (परीक्षण) समजून घ्यावा. पदाचा पदार्थाशी (शब्दाचा अर्थाशी) संबंध हा हेतू आहे. कारण तो त्याच्या प्रवृत्तीचे निमित्त आहे, आणि प्रश्नाची जाणून घेण्याची इच्छा (ज्ञातुकामता) व बोलण्याची इच्छा (कथेतुकामता) आहे. कारण न पाहिलेल्याला प्रकाशित करणे इत्यादी चारांची जाणून घेण्याची इच्छा असते, आणि इतरांची इतर असते. उत्तराचा (विसर्जनाचा) प्रश्न हा हेतू आहे. अशा प्रकारे उर्वरितांचेही योग्यतेनुसार कथन करावे. ๓. พฺยญฺชนตฺถานํ ยุตฺตายุตฺตปริกฺขาติ พฺยญฺชนคฺคหเณน ปทํ คหิตํ, อตฺถคฺคหเณน ปญฺหาทีหิ สทฺธึ อสฺสาทาทโย คหิตา. วิจยหารปทตฺถา เอว หิ ยุตฺตายุตฺตาทิวิเสสสหิตา ยุตฺติหาราทีนํ ปทตฺถา. ตถา หิ ปทฏฺฐานปทฏฺฐานิกภาววิสิฏฺฐา เตเยว ปทฏฺฐานหารสฺส ปทตฺถา. ลกฺขณลกฺขิตพฺพตาวิสิฏฺฐา, นิทฺธาริตา จ ลกฺขณหารสฺส, นิพฺพจนาทิวิภาวนาวิสิฏฺฐา จตุพฺยูหหารสฺส, สภาคธมฺมวเสน, วิสภาคธมฺมวเสน จ อาวฏฺฏนวิสิฏฺฐา อาวฏฺฏหารสฺส, ภูมิวิภาคาทิวิสิฏฺฐา วิภตฺติหารสฺส, ปฏิปกฺขโต ปริวตฺตนวิสิฏฺฐา ปริวตฺตนหารสฺส, ปริยายเววจนวิสิฏฺฐา เววจนหารสฺส, ปภวาทิปญฺญาปนวิสิฏฺฐา ปญฺญตฺติหารสฺส, ขนฺธาทิมุเขหิ โอตรณวิสิฏฺฐา โอตรณหารสฺส, ปทปทตฺถปญฺหารมฺภโสธนวิสิฏฺฐา โสธนหารสฺส, สามญฺญวิเสสนิทฺธารณวิสิฏฺฐา อธิฏฺฐานหารสฺส, ปจฺจยธมฺเมหิ ปริกฺขรณวิสิฏฺฐา ปริกฺขารหารสฺส, ปหาตพฺพภาเวตพฺพตานิทฺธารณวิสิฏฺฐา สมาโรปนหารสฺส ปทตฺถา. ‘‘พฺยญฺชนสฺส สภาวนิรุตฺติตา, อตฺถสฺส สุตฺตาทีหิ อวิโลมนํ ยุตฺตภาโว’’ติ อิมินา อสภาวนิรุตฺติตา, สุตฺตาทีหิ วิโลมนญฺจ อยุตฺตภาโวติ ทีเปติ, เตน ยุตฺตายุตฺตีนํ เหตุํ ทสฺเสติ. ३. ‘व्यंजन आणि अर्थांच्या योग्य-अयोग्यतेची परीक्षा’ यामध्ये ‘व्यंजन’ ग्रहणाने पद (शब्द) ग्रहण केले आहे, आणि ‘अर्थ’ ग्रहणाने प्रश्नादींसह आस्वाद इत्यादी ग्रहण केले आहेत. कारण विचयहाराचे पदार्थच योग्य-अयोग्यतेच्या विशेषासह युक्तिहार इत्यादींचे पदार्थ आहेत. तसेच, पदस्थान आणि पदस्थानिक भावाने विशिष्ट असलेले तेच पदस्थानहाराचे पदार्थ आहेत. लक्षण आणि लक्षितव्यतेने विशिष्ट व निर्धारित केलेले लक्षणहाराचे, निरुक्ति इत्यादींच्या स्पष्टीकरणाने विशिष्ट चतुर्व्यूहहाराचे, सभागधम्म (समान धर्म) आणि विसभागधम्म (असमान धर्म) यांच्या वशाने आवर्तनाने विशिष्ट आवर्तहाराचे, भूमी-विभागादींनी विशिष्ट विभक्तीहाराचे, प्रतिपक्षाकडून परिवर्तनाने विशिष्ट परिवर्तनहाराचे, पर्यायी वेवचनांनी (समानार्थी शब्दांनी) विशिष्ट वेवचनहाराचे, प्रभव (उत्पत्ती) इत्यादींच्या प्रज्ञप्तीने विशिष्ट प्रज्ञप्तीहाराचे, स्कंध इत्यादी मुखांनी (द्वारांनी) अवतरणाने विशिष्ट अवतरणहाराचे, पद, पदार्थ, प्रश्न आणि आरंभाच्या शोधनाने विशिष्ट शोधनहाराचे, सामान्य आणि विशेषाच्या निर्धारणाने विशिष्ट अधिष्ठानहाराचे, प्रत्ययधर्मांनी परिष्करणाने विशिष्ट परिष्कारहाराचे, आणि प्रहातव्य (त्याग करण्यायोग्य) व भावितव्य (भावना करण्यायोग्य) यांच्या निर्धारणाने विशिष्ट समारोपहाराचे पदार्थ आहेत. ‘व्यंजनाची स्वभाव-निरुक्ती असणे आणि अर्थाचे सूत्रादींशी अविरोध (अनुकूलता) असणे हा योग्य भाव (युक्तभाव) आहे’ याने अस्वभाव-निरुक्ती असणे आणि सूत्रादींशी विरोध असणे हा अयोग्य भाव (अयुक्तभाव) आहे हे स्पष्ट होते, त्याद्वारे योग्य आणि अयोग्यतेचा हेतू दर्शविला जातो. ๔. โยนิโสมนสิการาทีติ อาทิสทฺเทน สทฺธมฺมสฺสวนสปฺปุริสูปนิสฺสยาทิสาธารณํ, อสาธารณญฺจ เทยฺยปฏิคฺคาหกาทึ สงฺคณฺหาติ. สมฺภวโตติ ยถารหํ ตสฺส ธมฺมสฺส อนุรูปํ. ยาว สพฺพธมฺมาติ [Pg.30] เอตฺถ สพฺพํ นาม ปเทสสพฺพํ, น สพฺพสพฺพนฺติ. อยญฺหิ สพฺพสทฺโท ยถา ปฐมวิกปฺเป สุตฺเต อาคตธมฺมวเสน ปเทสวิสโย, เอวํ ทุติยวิกปฺเป ปทฏฺฐานปทฏฺฐานิกนิทฺธารเณน ตํตํปกรณปริจฺฉินฺนธมฺมคฺคหณโต ปเทสวิสโย เอว, น อนวเสสธมฺมวิสโยติ. สุตฺตาคตธมฺมานํ ยานิ ปทฏฺฐานานิ, เตสญฺจ ยานีติ เอวํ การณปรมฺปรานิทฺธารณลกฺขโณ ปทฏฺฐานหาโร, ปริกฺขารหาโร ปน สุตฺตาคตธมฺมานํ ตํตํปจฺจยุปฺปนฺนานํ ปฏิเหตุปจฺจยตาวิเสสวิภาวนลกฺขโณติ สติปิ การณวิจารณภาเว อยํ ปทฏฺฐานหารปริกฺขารหารานํ วิเสโส. ४. ‘योनिसोमनसिकार’ (योग्य विचार) इत्यादी मधील ‘इत्यादी’ शब्दाने सद्धम्मश्रवण, सत्पुरुषसंश्रय इत्यादी साधारण, आणि देय्य (दान देण्यायोग्य वस्तू) व प्रतिग्राहक (दान स्वीकारणारा) इत्यादी असाधारण गोष्टींचा संग्रह होतो. ‘संभवतः’ म्हणजे योग्यतेनुसार त्या धम्माच्या अनुरूप. ‘सर्व धम्मांपर्यंत’ यामध्ये ‘सर्व’ म्हणजे प्रदेश-सर्व (अंशतः सर्व) होय, सर्व-सर्व (पूर्णपणे सर्व) नाही. कारण हा ‘सर्व’ शब्द जसा पहिल्या विकल्पात सूत्रात आलेल्या धम्मांच्या वशाने प्रदेशविषयक (मर्यादित क्षेत्राचा) आहे, तसाच दुसऱ्या विकल्पात पदस्थान आणि पदस्थानिकाच्या निर्धारणाने त्या-त्या प्रकरणाने परिच्छिन्न (मर्यादित) धम्मांच्या ग्रहणामुळे प्रदेशविषयकच आहे, अनवशेष (पूर्ण) धम्मविषयक नाही. सूत्रात आलेल्या धम्मांची जी पदस्थाने (निकटची कारणे) आहेत, आणि त्यांचीही जी कारणे आहेत, अशा प्रकारे कारणपरंपरेचे निर्धारण करणे हे लक्षण असलेला ‘पदस्थानहार’ आहे; तर ‘परिष्कारहार’ हा सूत्रात आलेल्या आणि त्या-त्या प्रत्ययांनी उत्पन्न झालेल्या धम्मांच्या प्रतिहेतू आणि प्रत्ययभावाच्या विशेषाचे स्पष्टीकरण करणे हे लक्षण असलेला आहे; म्हणून कारणाचा विचार करण्याचा भाव दोन्हीमध्ये असला तरी, हा पदस्थानहार आणि परिष्कारहार यांमधील विशेष (फरक) आहे. ๕. ยถา ‘‘สมานาธิกรณสมานปเท’’ติอาทีสุ เอกสทฺทสฺส อตฺโถ สมานสทฺโท, เอวํ เอกรสฏฺเฐน ภาวนา ‘‘เอกุปฺปาทา’’ติอาทีสุ (กถา. ๔๗๓) วิย เอกลกฺขณาติ เอตฺถ เอกสทฺโท สมานตฺโถติ อาห ‘‘สมานลกฺขณา’’ติ. สํวณฺณนาวเสนาติ เอตฺถ กมฺมตฺเถ อน-สทฺโท, สํวณฺเณตพฺพตาวเสนาติ อตฺโถ. ลกฺขณาติ อุปลกฺขณา. ‘‘นานตฺตกายนานตฺตสญฺญิโน (ที. นิ. ๓.๓๔๑, ๓๕๗, ๓๕๙; อ. นิ. ๙.๒๔), นานตฺตสญฺญานํ อมนสิการา’’ติอาทีสุ สหจาริตา ทฏฺฐพฺพา. สญฺญาสหคตา หิ ธมฺมา ตตฺถ สญฺญาคฺคหเณน คหิตา. ‘‘ททํ มิตฺตานิ คนฺถตี’’ติอาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๒๔๖; สุ. นิ. ๑๘๙) สมานกิจฺจตา. ปิยวจนตฺถจริยา สมานตฺตตาปิ หิ ตตฺถ มิตฺตคนฺถนกิจฺเจน สมานกิจฺจา คยฺหนฺติ สงฺคหวตฺถุภาวโต. ‘‘ผสฺสปจฺจยา เวทนา’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๓.๑๒๖; สํ. นิ. ๒.๑, ๓๙; มหาว. ๑; วิภ. ๒๒๕; อุทา. ๑; เนตฺติ. ๒๔) สมานเหตุตา. ยถา หิ ผสฺโส เวทนาย, เอวํ สญฺญาทีนมฺปิ สหชาตาทินา ปจฺจโย โหติ เอวาติ เตปิ สมานเหตุตาย วุตฺตา เอว โหนฺติ. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘ตชฺชามโนวิญฺญาณธาตุสมฺผสฺสชา เจตนา’’ติ (ธ. ส. ๕), ‘‘ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ, ผุฏฺโฐ เจเตตี’’ติอาทิ (สํ. นิ. ๔.๙๓). เอวํ ‘‘ตณฺหาปจฺจยา อุปาทาน’’นฺติ (ม. นิ. ๓.๑๒๖; สํ. นิ. ๒.๑, ๓๙; มหาว. ๑; วิภ. ๒๒๕; อุทา. ๑; เนตฺติ. ๒๔) เอวมาทิปิ อุทาหริตพฺพํ. ‘‘อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๓.๑๒๖; สํ. นิ. ๒.๑, ๓๙; มหาว. ๑; วิภ. ๒๒๕; อุทา. ๑; เนตฺติ. ๒๔) สมานผลตา ทฏฺฐพฺพา. ยถา หิ สงฺขารา อวิชฺชาย ผลํ, เอวํ ตณฺหุปาทาทีนมฺปีติ เตปิ ตตฺถ คหิตาว โหนฺติ. เตนาห ‘‘ปุริมกมฺมภวสฺมึ โมโห อวิชฺชา อายูหนา สงฺขารา นิกนฺติ ตณฺหา อุปคมนํ อุปาทาน’’นฺติ. ‘‘รูปํ อสฺสาเทติ อภินนฺทติ[Pg.31], ตํ อารพฺภ ราโค อุปฺปชฺชตี’’ติ (ปฏฺฐา. ๑.๑.๔๒๔) วุตฺเต ตํสมฺปยุตฺตา เวทนาทโย วุตฺตา เอว โหนฺติ สมานารมฺมณภาวโต. น หิ เตหิ วินา ตสฺส อุปฺปตฺติ อตฺถิ. เอวมาทีหีติ เอตฺถ อาทิสทฺเทน อตฺถปฺปกรณลิงฺคสทฺทนฺตรสนฺนิธานสามตฺถิยาทีนมฺปิ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. อตฺถาทิวเสนปิ หิ สุตฺเต อวุตฺตานมฺปิ วุตฺตานํ วิย นิทฺธารณํ สมฺภวตีติ. วุตฺตปฺปกาเรนาติ ‘‘วธกฏฺเฐน เอกลกฺขณานี’’ติอาทินา ปาฬิยํ, ‘‘สหจาริตา’’ติอาทินา อฏฺฐกถายญฺจ วุตฺเตน ปกาเรน. ५. ज्याप्रमाणे ‘समानाधिकरणसमानपदे’ इत्यादींमध्ये ‘एक’ या शब्दाचा अर्थ ‘समान’ असा शब्द आहे, त्याचप्रमाणे एकरस अर्थाने भावना ही ‘एकूत्पाद’ (एकत्र उत्पन्न होणारे) इत्यादींप्रमाणे ‘एकलक्षण’ आहे, येथे ‘एक’ शब्द समान अर्थाचा आहे, म्हणून ‘समानलक्षणा’ असे म्हटले आहे. ‘संवर्णनावशाने’ (वर्णनाच्या वशाने) येथे कर्म अर्थामध्ये ‘अन’ प्रत्यय आहे, म्हणून ‘संवर्णन करण्याच्या (वर्णन करण्याच्या) वशाने’ असा अर्थ आहे. ‘लक्षण’ म्हणजे उपलक्षण होय. ‘नानात्वकाय-नानात्वसंज्ञी (विविध शरीर व विविध संज्ञा असलेले), नानात्वसंज्ञांच्या अमनसिकाराने’ इत्यादींमध्ये सहचारिता (एकत्र असणे) पाहावी. कारण तेथे संज्ञेच्या ग्रहणाने संज्ञेसोबत असणारे धम्म ग्रहण केले जातात. ‘देणारा मित्रांना बांधतो (जोडतो)’ इत्यादींमध्ये समानकार्यता (समान कार्य असणे) आहे. कारण तेथे प्रियवचन, अर्थचर्या आणि समानार्थता देखील मित्र जोडण्याच्या कार्याने समान कार्य असणारे म्हणून ग्रहण केले जातात, कारण ते संग्रहवस्तू आहेत. ‘स्पर्शप्रत्ययाने वेदना’ इत्यादींमध्ये समानहेतुता (समान कारण असणे) आहे. कारण ज्याप्रमाणे स्पर्श हा वेदनेचा प्रत्यय (कारण) आहे, त्याचप्रमाणे तो संज्ञा इत्यादींचाही सहजात इत्यादी रूपाने प्रत्यय असतोच, म्हणून ते देखील समानहेतुतेने सांगितलेच गेले आहेत. तसेच म्हटले आहे: ‘तज्जन्य मनोविज्ञानधातूच्या संस्पर्शाने उत्पन्न झालेली चेतना’ आणि ‘स्पर्श झाल्यावर संज्ञान होते, स्पर्श झाल्यावर चेतना होते’ इत्यादी. याचप्रमाणे ‘तृष्णाप्रत्ययाने उपादान’ इत्यादींचेही उदाहरण घ्यावे. ‘अविद्याप्रत्ययाने संस्कार’ इत्यादींमध्ये समानफलता (समान फल असणे) पाहावी. कारण ज्याप्रमाणे संस्कार हे अविद्येचे फल आहेत, त्याचप्रमाणे तृष्णा, उपादान इत्यादींचेही फल आहेत, म्हणून ते देखील तेथे ग्रहण केलेच गेले आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे: ‘पूर्वीच्या कर्मभवामध्ये मोह ही अविद्या आहे, चेष्टा (प्रवृत्ती) हे संस्कार आहेत, निकंती (आसक्ती) ही तृष्णा आहे, आणि उपगमन (जवळ जाणे) हे उपादान आहे.’ ‘रूपाचा आस्वाद घेतो, त्याचे अभिनंदन करतो, त्याला आरंभ करून (आलंबन करून) राग उत्पन्न होतो’ असे म्हटले असता, समान आलंबन भाव असल्यामुळे त्याच्याशी संप्रयुक्त असणारे वेदना इत्यादी सांगितलेच गेले आहेत. कारण त्यांच्याशिवाय त्याची उत्पत्ती शक्य नाही. ‘इत्यादी’ यामध्ये ‘इत्यादी’ शब्दाने अर्थप्रकरण, लिंग, अन्य शब्दांचे संनिधान (जवळ असणे) आणि सामर्थ्य इत्यादींचाही संग्रह समजावा. कारण अर्थ इत्यादींच्या वशाने सूत्रात न सांगितलेल्या गोष्टींचेही सांगितलेल्या गोष्टींप्रमाणे निर्धारण करणे शक्य होते. ‘सांगितलेल्या प्रकारे’ म्हणजे पाळीमध्ये ‘वधक अर्थाने एकलक्षण आहेत’ इत्यादी प्रकारे, आणि अट्ठकथेमध्ये ‘सहचारिता’ इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या रीतीने. ๖. ‘‘ผุสนฏฺเฐน ผสฺโส’’ติอาทินา นิทฺธาเรตฺวา วจนํ นิพฺพจนํ, ตํ ปน ปทสฺเสว, น วากฺยสฺสาติ อาห ‘‘ปทนิพฺพจน’’นฺติ. อธิปฺปายนิทานานิเปตฺถ พฺยญฺชนมุเขเนว นิทฺธาเรตพฺพานิ. นิพฺพจนปุพฺพาปรสนฺธีสุ วตฺตพฺพเมว นตฺถีติ อาห ‘‘วิเสสโต พฺยญฺชนทฺวาเรเนว อตฺถปริเยสนา’’ติ. ปวตฺตินิมิตฺตํ อชฺฌาสยาทิ. ६. “स्पर्श करण्याच्या अर्थाने 'फस्स' (स्पर्श)” इत्यादीद्वारे निश्चित केलेले वचन म्हणजे 'निब्बचन' (व्युत्पत्ती) होय. परंतु ते केवळ पदाचेच असते, वाक्याचे नाही, म्हणून “पदनिब्बचन” (पदाची व्युत्पत्ती) असे म्हटले आहे. येथे अभिप्रेत असलेले कारण (निदान) देखील व्यंजनाच्या (शब्दाच्या) माध्यमातूनच निश्चित केले पाहिजे. व्युत्पत्तीच्या पूर्व आणि उत्तर संबंधांमध्ये काही सांगण्यासारखे उरतच नाही, म्हणून “विशेषतः व्यंजनद्वारानेच (शब्दाच्या माध्यमातूनच) अर्थाचा शोध घेणे” असे म्हटले आहे. प्रवृत्तीचे निमित्त म्हणजे आशय इत्यादी होय. ๗. ‘‘ปทฏฺฐาเน’’ติ อิทํ สุตฺเต อาคตธมฺมานํ การณภูเตปิ ธมฺเม นิทฺธาเรตฺวา สภาคโต, วิสภาคโต จ อาวฏฺฏนํ กาตพฺพนฺติ ทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ, น ตนฺติวเสน. ตสฺมา ปทฏฺฐานนิทฺธารณาย วินาปิ อาวฏฺฏนํ ยุตฺตเมวาติ สิทฺธํ โหติ. ปทสฺส วา สทฺทปวตฺติฏฺฐานํ ปทฏฺฐานํ ปทตฺโถ. เอตสฺมึ ปกฺเข ‘‘อารมฺภถ นิกฺกมถาติ (สํ. นิ. ๑.๑๘๕; เนตฺติ. ๒๙; เปฏโก. ๓๘; มิ. ป. ๕.๑.๔) วีริยสฺส ปทฏฺฐาน’’นฺติ (เนตฺติ. ๒๙) เอตฺถ ยฺวายมารมฺภธาตุอาทิโก อตฺโถ วุตฺโต, ตํ วีริยสทฺทสฺส ปวตฺติฏฺฐานํ วีริยสทฺทาภิเธยฺโย อตฺโถติ เอวมตฺโถ เวทิตพฺโพ. เสเสสุปิ เอเสว นโย. เสสกํ นามคหิตโต อิตรํ, ตํ ปน ตสฺส ปฏิปกฺขภูตํ วา สิยา, อญฺญํ วาติ อาห ‘‘วิสภาคตาย อคฺคหเณน วา’’ติ. สํวณฺณนาย โยเชนฺโตติ ยถาวุตฺตวิสภาคธมฺมนิทฺธารณภูเตน อตฺถกถเนน ปาฬิยํ โยเชนฺโต. เตนาห ‘‘เทสน’’นฺติ. ‘‘ปฏิปกฺเข’’ติ อิทํ นิทสฺสนมตฺตํ ทฏฺฐพฺพํ สภาคธมฺมวเสนปิ อาวฏฺฏนสฺส อิจฺฉิตตฺตา. ७. “पदट्ठाने” (पदासन्न कारण/जवळचे कारण) हे सूत्तात आलेल्या धर्मांच्या कारणभूत असलेल्या धर्मांना देखील निश्चित करून, समान (सभाग) आणि असमान (विसभाग) रूपाने आवर्तन (पुनरावृत्ती) केले पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे, तंत्राच्या (सिद्धांताच्या) वशने नाही. म्हणून, पदट्ठानाच्या निर्धारणाशिवाय देखील आवर्तन करणे योग्यच आहे, हे सिद्ध होते. किंवा पदाच्या शब्दप्रवृत्तीचे स्थान म्हणजे 'पदट्ठाण' (पदाचा अर्थ) होय. या पक्षात, “आरंभ करा, निष्क्रमण करा... हे वीर्याचे पदट्ठाण आहे” येथे जो आरंभधातू इत्यादी अर्थ सांगितला आहे, तो 'वीर्य' या शब्दाच्या प्रवृत्तीचे स्थान आहे, म्हणजेच 'वीर्य' या शब्दाने अभिहित केलेला अर्थ आहे, असा अर्थ समजला पाहिजे. इतर बाबतीतही हाच नियम आहे. 'उर्वरित' (सेसक) म्हणजे नावाने घेतलेल्या व्यतिरिक्त इतर, परंतु ते त्याचे प्रतिपक्ष (विरोधी) असू शकते किंवा अन्य असू शकते, म्हणून “विसभागतेच्या अग्रहणाने (न स्वीकारण्याने) किंवा” असे म्हटले आहे. संवर्णनेत (टीकेत) जोडणारा म्हणजे वर सांगितलेल्या विसभागधर्माच्या निर्धारणात्मक अर्थकथनाने पाळीमध्ये जोडणारा. म्हणूनच “देसना” (देशना) असे म्हटले आहे. “प्रतिपक्षात” हे केवळ उदाहरण म्हणून पाहिले पाहिजे, कारण सभागधर्माच्या आधारे देखील आवर्तन इच्छित आहे. ๘. นามวเสนาติ สาธารณนามวเสน. ปาฬิยํ ปน ‘‘มิจฺฉตฺตนิยตานํ สตฺตานํ, อนิยตานญฺจ สตฺตานํ ทสฺสนปหาตพฺพา กิเลสา สาธารณา’’ติอาคตตฺตา (เนตฺติ. ๓๔) ‘‘ทสฺสนปหาตพฺพาทินามวเสนา’’ติ วุตฺตํ. วตฺถุวเสนาติ [Pg.32] สตฺตสนฺตานวเสน. โส หิ ธมฺมานํ ปวตฺติฏฺฐานตาย อิธ ‘‘วตฺถู’’ติ อธิปฺเปโต. เตนาห – ‘‘ปุถุชฺชนสฺส, โสตาปนฺนสฺส จ กามราคพฺยาปาทา สาธารณา’’ติอาทิ (เนตฺติ. ๓๔). วุตฺตวิปริยาเยนาติ นามโต, วตฺถุโต จ อาเวณิกตาย. ตํตํมคฺคผลฏฺฐานญฺหิ ตํตํมคฺคผลฏฺฐตา, ภพฺพานํ ภพฺพตา, อภพฺพานํ อภพฺพตา อสาธารณา. ८. “नामाच्या वशने” म्हणजे साधारण (सामान्य) नामाच्या वशने. पाळीमध्ये तर “मिथ्यात्वात नियत असलेल्या प्राण्यांचे आणि अनियत असलेल्या प्राण्यांचे दर्शन-प्रहातव्य (दर्शनाने नष्ट होणारे) क्लेश साधारण आहेत” असे आल्यामुळे “दर्शन-प्रहातव्य इत्यादी नामाच्या वशने” असे म्हटले आहे. “वस्तूच्या वशने” म्हणजे प्राण्यांच्या संतानाच्या (प्रवाहाच्या) वशने. कारण तो (प्राणीसंतान) धर्मांच्या प्रवृत्तीचे स्थान असल्यामुळे येथे 'वस्तू' म्हणून अभिप्रेत आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – “पृथग्जनाचे आणि स्रोतापन्नाचे कामराग व व्यापाद साधारण आहेत” इत्यादी. “सांगितलेल्याच्या विपर्यायाने (उलट)” म्हणजे नामाच्या आणि वस्तूच्या दृष्टीने आवेणिकतेने (असाधारणतेने). कारण त्या त्या मार्ग-फलाच्या स्थानावर असणे, भव्यांची भव्यता (पात्रता) आणि अभव्यांची अभव्यता (अपात्रता) ही असाधारण आहे. ๙. ‘‘ภาวิเต’’ติ อิทํ ภาวนากิริยาย อุปลกฺขณํ, น เอตฺถ กาลวจนิจฺฉาติ อาห ‘‘ภาเวตพฺเพติ อตฺโถ’’ติ. ภาวนา เจตฺถ อาเสวนาติ, กุสลสทฺโทปิ อนวชฺชฏฺโฐติ เวทิตพฺโพ. ปฏิปกฺขโตติ วิปกฺขโต. วิสทิสูทาหรเณน พฺยติเรกโต ยถาธิปฺเปตธมฺมปฺปติฏฺฐานา เหสา. ९. “भाविते” (भाविले असता) हे भावना-क्रियेचे उपलक्षण आहे, येथे काळ दर्शवण्याची इच्छा नाही, म्हणून “भावित केले पाहिजे असा अर्थ आहे” असे म्हटले आहे. आणि येथे 'भावना' म्हणजे आसेवन (पुनःपुन्हा सराव करणे) आणि 'कुशल' हा शब्द देखील अनवद्य (दोषरहित) या अर्थाने समजला पाहिजे. “प्रतिपक्षाकडून” म्हणजे विपक्ष (विरोधी) कडून. विसदृश उदाहरणाद्वारे व्यतिरेकाने (नकारात्मकतेने) अभिप्रेत असलेल्या धर्माची स्थापना करणे हेच याचे स्वरूप आहे. ๑๐. ปทตฺถสฺสาติ ปทาภิเธยฺยสฺส อตฺถสฺส, สภาวธมฺมสฺส วา. १०. “पदत्थस्स” (पदाच्या अर्थाचा) म्हणजे पदाने अभिहित केलेल्या अर्थाचा किंवा स्वभावधर्माचा. ๑๑. ११. นิกฺเขโป เทสนา. ปภโว สมุทโย. “निक्खेप” म्हणजे देशना. “प्रभव” म्हणजे समुदय (उत्पत्ती). ๑๒. ‘‘อวุตฺตานมฺปิ สงฺคโห’’ติ อิมินา อวุตฺตสมุจฺจยตฺโถ จ-สทฺโทติ ทสฺเสติ. १२. “न सांगितलेल्यांचा देखील संग्रह” याने 'च' हा शब्द न सांगितलेल्यांच्या समुच्चयाचा अर्थ दर्शवतो, हे स्पष्ट होते. ๑๓. ‘‘คาถารุฬฺเห’’ติ อิมินา ปาฬิอาคโตว ปญฺโห เวทิตพฺโพ, น อิตโรติ ทสฺเสติ. เตนาห ‘‘พุทฺธาทีหิ พฺยากเต’’ติ. ตสฺส อตฺถสฺสาติ อารทฺธสฺส อตฺถสฺส, เตน อารมฺภโสธนสฺส วิสยมาห. เอตฺถ จ อตฺถทฺวาเรเนว ปทปุจฺฉาโสธนมฺปิ กรียตีติ ปุน ‘‘ตสฺส อตฺถสฺสา’’ติ วุตฺตํ. อถ วา วิสฺสชฺชิตมฺหีติ วิสฺสชฺชเน. วิสฺสชฺชนโสธเนน หิ ปญฺหาโสธนํ. ปญฺเหติ ปุจฺฉายํ. คาถายนฺติ อุปลกฺขณํ, เตน คาถายํ, สุตฺตเคยฺยาทีสุ จาติ วุตฺตํ โหติ. ยมารพฺภาติ ยํ สีลาทิมารพฺภ คาถาทีสุ เทสิตํ, ตสฺมึ อารมฺเภติ อตฺโถ. ปุจฺฉิตาติ ปุจฺฉาการินี, ‘‘กา เอตฺถ ปทสุทฺธิ, กา ปญฺหาสุทฺธิ, กา อารมฺภสุทฺธี’’ติ เอวํ ปุจฺฉาการินี ปุจฺฉํ กตฺวา ปวตฺติตา สุทฺธาสุทฺธปริกฺขาติ โยชนา. १३. “गाथारूढ” याने पाळीमध्ये आलेलाच प्रश्न समजला पाहिजे, इतर नाही, हे दर्शवले आहे. म्हणूनच “बुद्ध इत्यादींनी व्याकृत (स्पष्ट) केलेल्या” असे म्हटले आहे. “त्या अर्थाचा” म्हणजे आरंभ केलेल्या अर्थाचा, याद्वारे आरंभ-शोधनाचा विषय सांगितला आहे. आणि येथे अर्थाच्या माध्यमातूनच पदाच्या प्रश्नाचे शोधन देखील केले जाते, म्हणून पुन्हा “त्या अर्थाचा” असे म्हटले आहे. किंवा “विसज्जितम्ही” म्हणजे विसर्जनात (उत्तरामध्ये). कारण उत्तराच्या शोधनानेच प्रश्नाचे शोधन होते. “प्रश्न” म्हणजे विचारणे. “गाथेत” हे उपलक्षण आहे, याने गाथेत, सूत्त, गेय इत्यादींमध्ये देखील असा अर्थ होतो. “ज्याला आरंभ करून” म्हणजे ज्या शील इत्यादींना आरंभ करून गाथा इत्यादींमध्ये उपदेश केला आहे, त्या आरंभात असा अर्थ आहे. “पुच्छिता” म्हणजे विचारणारी, “येथे पदशुद्धी कोणती, प्रश्नशुद्धी कोणती, आरंभशुद्धी कोणती” अशा प्रकारे विचारणाऱ्याने प्रश्न विचारून केलेली शुद्ध-अशुद्ध परीक्षा, असा संबंध जोडला पाहिजे. ๑๔. น วิกปฺปยิตพฺพาติ ยถา โลเก ‘‘ชาติ สามญฺญํ, เภโท สามญฺญํ, สมฺพนฺโธ สามญฺญ’’นฺติอาทินา สามญฺญํ ชาติอาทึ, ตพฺพิธุรญฺจ วิเสสํ [Pg.33] วิกปฺเปนฺติ ปริกปฺเปนฺติ, เอวํ น วิกปฺปยิตพฺพาติ อตฺโถ. ยทา โย กาลวิเสโส ‘‘สฺเว’’ติ ลทฺธโวหาโร, ตทา โส ตํทิวสาติกฺกเม ‘‘อชฺชา’’ติ, ปุน ตํทิวสาติกฺกเม ‘‘หิยฺโย’’ติ โวหรียตีติ อนวฏฺฐิตสภาวา เอเต กาลวิเสสา. ทิสายปิ ‘‘เอกํ อวธึ อเปกฺขิตฺวา ปุรตฺถิมา ทิสา, ตโต อญฺญํ อเปกฺขิตฺวา ปจฺฉิมา นาม โหตี’’ติอาทินา อนวฏฺฐิตสภาวตา เวทิตพฺพา. ชาติอาทิอเปกฺขายาติ ชาติอาทิทุกฺขวิเสสาเปกฺขาย. สจฺจาเปกฺขายาติ สจฺจสามญฺญาเปกฺขาย. ‘‘ตณฺหา’’ติ วุจฺจมานํ กามตณฺหาทิอเปกฺขาย สามญฺญมฺปิ สมานํ สจฺจาเปกฺขาย วิเสโส โหตีติ เอวมาทึ สนฺธายาห ‘‘เอส นโย สมุทยาทีสุปี’’ติ. १४. “विकल्प करू नये” (भेद करू नये) म्हणजे ज्याप्रमाणे लोकव्यवहारात “जाती सामान्य आहे, भेद सामान्य आहे, संबंध सामान्य आहे” इत्यादींद्वारे सामान्य जाती इत्यादींचा आणि त्याहून भिन्न असलेल्या विशेषाचा विकल्प (कल्पना) करतात, तसा विकल्प करू नये, असा अर्थ आहे. जेव्हा जो विशिष्ट काळ 'उद्या' (स्वे) या व्यवहाराला प्राप्त होतो, तेव्हा तो दिवस निघून गेल्यावर त्याला 'आज' (अज्ज) आणि पुन्हा तो दिवस निघून गेल्यावर 'काल' (हिय्यो) असे म्हटले जाते, म्हणून हे विशिष्ट काळ अनवस्थित (अस्थिर) स्वभावाचे आहेत. दिशेच्या बाबतीतही “एका मर्यादेची अपेक्षा ठेवून पूर्व दिशा, आणि दुसऱ्या मर्यादेची अपेक्षा ठेवून पश्चिम दिशा होते” इत्यादींद्वारे अनवस्थित स्वभाव समजला पाहिजे. “जाती इत्यादींच्या अपेक्षेने” म्हणजे जाती इत्यादी दुःखविशेषांच्या अपेक्षेने. “सत्याच्या अपेक्षेने” म्हणजे सत्यसामान्याच्या अपेक्षेने. “तण्हा” (तृष्णा) असे म्हटले जाणारे कामतृष्णा इत्यादींच्या अपेक्षेने सामान्य असले तरी, सत्याच्या अपेक्षेने ते विशेष ठरते, या सर्व गोष्टींचा विचार करून “हाच नियम समुदय इत्यादींच्या बाबतीतही आहे” असे म्हटले आहे. ๑๖. เอตฺถาติ เอตสฺมึ พุทฺธวจเน. เตนาห ‘‘สิกฺขตฺตยสงฺขาตสฺสา’’ติอาทิ. ยถารุตํ ยถากถิตํ สทฺทโต อธิคตํ นิทฺธาริตํ, น อตฺถปฺปกรณลิงฺคสทฺทนฺตรสนฺนิธานาทิปฺปมาณนฺตราธิคตํ. ‘‘อตฺถโต ทสฺสิตา’’ติ อิทํ ยสฺมึ สุตฺเต ภาวนาว กถิตา, น ปหานํ, ตํ สนฺธาย วุตฺตํ. १६. “येथे” म्हणजे या बुद्धवचनात. म्हणूनच “त्रिशिक्षा म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या...” इत्यादी म्हटले आहे. “यथारुत” म्हणजे जसे सांगितले आहे तसे शब्दावरून प्राप्त झालेले आणि निश्चित केलेले, अर्थ, प्रकरण, लिंग, इतर शब्दांचे सान्निध्य इत्यादी इतर प्रमाणांवरून प्राप्त झालेले नाही. “अर्थाच्या दृष्टीने दर्शविले आहे” हे ज्या सूत्तात केवळ भावनाच सांगितली आहे, प्रहाण (त्याग) नाही, त्याचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. นยสงฺเขปวณฺณนา नयसंक्षेपवर्णना (नयांच्या संक्षेपाचे वर्णन) ๑๗. ตณฺหาวิชฺชาหิ กรณภูตาหิ. สํกิเลโส ปกฺโข เอตสฺสาติ สํกิเลสปกฺโข, สํกิเลสปกฺขิโก สุตฺตตฺโถ, ตสฺส นยนลกฺขโณติ โยชนา. โวทานปกฺขสฺส สุตฺตตฺถสฺสาติ สมฺพนฺโธ. วุฏฺฐานคามินิยา, พลววิปสฺสนาย จ ทุกฺขาทีสุ ปริญฺเญยฺยตาทีนิ มคฺคานุคุโณ คหณากาโร อนุคาหณนโย. ยทิ เอวํ กถํ นโยติ อาห ‘‘ตสฺส ปนา’’ติอาทิ. ตตฺถ ‘‘นยโวหาโร’’ติ อิมินา นยาธิฏฺฐานํ นโยติ วุตฺตนฺติ ทสฺเสติ. १७. कारणभूत असलेल्या 'तण्हा' (तृष्णा) आणि 'अविज्जा' (अविद्या) यांच्याद्वारे. संक्लेश हा ज्याचा पक्ष आहे तो 'संक्लेशपक्ष' (मलीनतेचा पक्ष), संक्लेशपक्षाशी संबंधित सूत्ताचा अर्थ, त्याचे नयनलक्षण (मार्गदर्शन करण्याचे लक्षण) असा संबंध जोडला पाहिजे. 'वोदानपक्ष' (शुद्धीचा पक्ष) असलेल्या सूत्ताच्या अर्थाशी संबंध आहे. वुट्ठानगामी (उत्थानगामी) आणि प्रबळ विपश्यनेद्वारे दुःखादींमध्ये परिज्ञेयता (जाणून घेण्याची योग्यता) इत्यादी मार्गाला अनुकूल असलेला ग्रहण करण्याचा प्रकार म्हणजे 'अनुगाहननय' होय. जर असे असेल तर नय कसा? म्हणून “त्याचा तर...” इत्यादी म्हटले आहे. तेथे “नयव्यवहार” याने नयाचे अधिष्ठान म्हणजेच नय आहे, असे सांगितले आहे हे दर्शवते. ๑๘. พาธกาทิภาวโตติ พาธกปภวสนฺตินิยฺยานภาวโต. อญฺญถาภาวาภาเวนาติ อพาธกอปฺปภวอสนฺติ อนิยฺยานภาวาภาเวน. สจฺจสภาวตฺตาติ อมุสาสภาวตฺตา. อวิสํวาทนโตติ อริยสภาวาทิภาวสฺส น วิสํวาทนโต เอกนฺติกตฺตาติ อตฺโถ. १८. “बाधक इत्यादी भावामुळे” म्हणजे बाधकत्व, प्रभवत्व (उत्पत्ती), शांतत्व आणि निर्याणत्व (मुक्ती) या भावांमुळे. “अन्यथाभावाच्या अभावामुळे” म्हणजे अबाधकत्व, अप्रभवत्व, अशांतत्व आणि अनिर्याणत्व यांचा अभाव असल्यामुळे. “सत्यस्वभाव असल्यामुळे” म्हणजे अमृषा (असत्य नसलेला) स्वभाव असल्यामुळे. “अविसंवादाने” म्हणजे आर्यस्वभाव इत्यादी भावाचा विसंवाद न झाल्यामुळे तो एकांतिक (निश्चित) आहे, असा अर्थ आहे. ๑๙. สํกิลิฏฺฐธมฺมาติ สํกิเลสสมนฺนาคตา ธมฺมา สทฺธมฺมนยโกวิทาติ สจฺจปฏิจฺจสมุปฺปาทาทิธมฺมนยกุสลา, เอกตฺตาทินยกุสลา วา. १९. संकिलिट्ठधम्मा (संक्लिष्ट धर्म) म्हणजे संकिलेसाने (संक्लेशाने) युक्त असलेले धर्म. 'सद्धम्मनयकोविदा' (सद्धम्माच्या पद्धतीत कुशल) म्हणजे सच्च (सत्य), पटिच्चसमुत्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) इत्यादी धर्मनयांमध्ये कुशल असलेले, किंवा एकत्व इत्यादी नयांमध्ये कुशल असलेले होय. ๒๐. อตฺถวิสฺสชฺชเนสูติ [Pg.34] ‘‘อิเม ธมฺมา กุสลา’’ติอาทินา (ธ. ส. ๑) สุตฺเต กตปญฺหวิสฺสชฺชเนสุ เจว อฏฺฐกถาย กตอตฺถสํวณฺณนาสุ จ. ‘‘โวทานิยา’’ติ อิมินา อนวชฺชธมฺมา อิธ กุสลาติ อธิปฺเปตา, น สุขวิปากาติ ทสฺเสติ. ตสฺส ตสฺส อตฺถนยสฺส โยชนตฺถํ มนสา โวโลกยเตติ โยชนา. २०. 'अत्थविस्सज्जनेसु' (अर्थाच्या स्पष्टीकरणात) म्हणजे 'इमे धम्मा कुसला' (हे धर्म कुशल आहेत) इत्यादीद्वारे (धम्मसंगणि १) सुत्तात केलेल्या प्रश्नांच्या उत्तरांमध्ये आणि अट्ठकथेत केलेल्या अर्थ-स्पष्टीकरणामध्ये सुद्धा. 'वोदानिया' (शुद्धीकरणास योग्य) या शब्दाने येथे अनवद्य (दोषरहित) धर्म 'कुशल' म्हणून अभिप्रेत आहेत, सुखविपाक (सुखद परिणाम देणारे) नाही, असे दर्शविते. त्या त्या अर्थनयाच्या योजनेसाठी मनाने अवलोकन करतो, अशी येथे योजना आहे. ๒๑. ยทิ กรณภูตํ, กถํ ตสฺส อตฺถนฺตราภาโวติ อาห ‘‘เยน หี’’ติอาทิ. ทิสาภูตธมฺมานํ โวโลกยนสมานยนภาวโต โวหารภูโต, กมฺมภูโต จ นโย, น นนฺทิยาวฏฺฏาทโย วิย อตฺถภูโตติ ‘‘โวหารนโย, กมฺมนโย’’ติ จ วุจฺจติ. २१. जर ते करणभूत (साधनरूप) असेल, तर त्याचा अर्थांतरभाव (वेगळा अर्थ असणे) कसा होईल? म्हणून 'येन ही' (ज्याद्वारे खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. दिशाभूत (मार्गदर्शक) धर्मांचे अवलोकन आणि समानीकरण करण्याच्या भावामुळे हा नय व्यावहारिक (वोहारभूत) आणि कर्मभूत आहे, नंदियावट्ट इत्यादींसारखा अर्थभूत नाही; म्हणूनच याला 'वोहारनय' आणि 'कमनय' असे म्हटले जाते. ทฺวาทสปทวณฺณนา द्वादशपदवर्णना (बारा पदांचे वर्णन) ๒๓. อปริโยสิเต ปเทติ อุจฺจารณเวลายํ ปเท อสมตฺเต, วิปฺปกเตติ อตฺโถ. ปริโยสิเต หิ ‘‘ปท’’นฺตฺเว สมญฺญา สิยา, น ‘‘อกฺขร’’นฺติ อธิปฺปาโย. ปทสฺส เววจนตาย อตฺถวเสน ปริยายํ ขรนฺตํ สญฺจรนฺตํ วิย โหติ, น เอวํ วณฺโณ อเววจนตฺตาติ อาห ปริยายวเสน อกฺขรณโต’’ติ. น หิ วณฺณสฺส ปริยาโย วิชฺชตี’’ติ อิทํ อการาทิวณฺณวิเสสํ สนฺธาย วทติ, น วณฺณสามญฺญํ. ตสฺส หิ วณฺโณ อกฺขรนฺติ ปริยาโย วุตฺโต เอวาติ. २३. 'अपलियोसिते पदे' (अपूर्ण पदात) म्हणजे उच्चारणाच्या वेळी पद असमाप्त (अपूर्ण) असताना, म्हणजेच अपूर्ण राहिलेले असा अर्थ आहे. कारण पद पूर्ण झाल्यावर त्याला 'पद' अशीच संज्ञा प्राप्त होईल, 'अक्खर' (अक्षर) नाही, असा अभिप्राय आहे. पदाच्या पर्यायवाचकतेमुळे (वेवचनता) अर्थाच्या वशाने पर्यायामध्ये संचार केल्यासारखे होते, परंतु वर्ण हा अपर्यायवाचक असल्यामुळे तसा होत नाही; म्हणूनच 'पर्यायवशाने क्षरण न होण्यामुळे (अक्खरणतो)' असे म्हटले आहे. 'वर्णाचा पर्याय नसतो' हे जे म्हटले आहे, ते 'अ'कार इत्यादी वर्णविशेषांना उद्देशून म्हटले आहे, सामान्य वर्णाला उद्देशून नाही. कारण त्याचा 'वर्ण' आणि 'अक्षर' असा पर्याय सांगितलेलाच आहे. อกฺขรสทฺทสฺส อตฺถํ วตฺวา ตปฺปสงฺเคน วณฺณสทฺทสฺสปิ วตฺตุํ ‘‘เกนฏฺเฐน วณฺโณ’’ติอาทิมาห. ตตฺถ นนุ ปเทน, วากฺเยน วา อตฺโถ สํวณฺณียติ, น อกฺขเรนาติ โจทนํ มนสิ กตฺวา อาห ‘‘วณฺโณ เอว หี’’ติอาทิ. ปทาทิภาเวนาติ ปทวากฺยภาเวน. ยถาสมฺพนฺธนฺติ ยถาสงฺเกตํ. อยํ-สทฺโท อิมสฺสตฺถสฺส วาจโก, อยํ อตฺโถ อิมสฺส สทฺทสฺส วจนีโยติ ยถาคหิตสงฺเกตานุรูปํ สทฺทตฺถานํ วาจกวจนียภาโว. อถ วา ยฺวายํ สทฺทตฺถานํ อญฺญมญฺญํ อวินาภาโว, โส สมฺพนฺโธ. ตทนุรูปํ เอกกฺขรํ นามปทํ ‘‘มา เอวํ มญฺญสี’’ติอาทีสุ มา-การาทิ. เกจีติ อภยคิริวาสิโน. เต หิ อภิธมฺมเทสนํ ‘‘มนสาเทสนา’’ติ วทนฺติ, ยโต ราหุลาจริโย ‘‘วิสุทฺธกรุณานํ มนสาเทสนา วาจาย อกฺขรณโต อกฺขรสญฺญิตา’’ติ อาห. 'अक्खर' (अक्षर) शब्दाचा अर्थ सांगून, त्या प्रसंगाने 'वण्ण' (वर्ण) शब्दाचाही अर्थ सांगण्यासाठी 'केनट्ठेन वण्णो' (कोणत्या अर्थाने वर्ण?) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे, 'पदाने किंवा वाक्याने अर्थाचे वर्णन केले जाते, अक्षराने नाही' अशी शंका मनात घेऊन 'वण्णो एव ही' (वर्णच खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. 'पदादिभावाने' म्हणजे पद आणि वाक्य रूपाने. 'यथासंबंध' म्हणजे संकेतानुसार. 'हा शब्द या अर्थाचा वाचक आहे, आणि हा अर्थ या शब्दाचा वाच्य आहे', अशा स्वीकारलेल्या संकेतानुसार शब्द आणि अर्थाचा वाचक-वाच्य भाव असतो. किंवा शब्द आणि अर्थाचा जो हा परस्परांशी अविनाभाव संबंध आहे, तोच संबंध होय. त्यानुसार एक अक्षरी नामपद म्हणजे 'मा एवं मञ्ञसि' (असे मानू नकोस) इत्यादींमधील 'मा' कार इत्यादी होय. 'केची' (काही आचार्य) म्हणजे अभयगिरिवासी भिक्खू. कारण ते अभिधम्मदेशनेला 'मनसादेशना' (मनाची देशना) म्हणतात, ज्यावरून राहुल आचार्यांनी म्हटले आहे की, 'विशुद्ध करुणावंतांची मनसादेशना ही वाणीने क्षरित (उच्चारित) न झाल्यामुळे अक्षर संज्ञेने ओळखली जाते.' สตฺวปฺปธานนฺติ [Pg.35] ทฺรพฺยปฺปธานํ. นามปเท หิ ทฺรพฺยมาวิภูตรูปํ, กิริยา อนาวิภูตรูปา ยถา ‘‘ผสฺโส’’ติ (ม. นิ. ๓.๑๒๖; สํ. นิ. ๒.๑, ๓๙; มหาว. ๑; วิภ. ๒๒๕; อุทา. ๑; เนตฺติ. ๒๔). อาขฺยาตปเท ปน กิริยา อาวิภูตรูปา, ทฺรพฺยมนาวิภูตรูปํ ยถา ‘‘ผุสตี’’ติ. เตน เนสํ สตฺวกิริยาปฺปธานตา วุตฺตา. กิริยาวิเสสคฺคหณนิมิตฺตนฺติ กิริยาวิเสสาวโพธเหตุ กิริยาวิเสสทีปนโต, ยถา ‘‘จิรปฺปวาสิ’’นฺติ (ธ. ป. ๒๑๙) เอตฺถ ป-สทฺโท วสนกิริยาย วิโยควิสิฏฺฐตํ ทีเปติ. ‘‘เอวํ มนสิ กโรถ, มา เอวํ มนสากตฺถา’’ติอาทีสุ กิริยาวิเสสสฺส โชตโก เอวํ-สทฺโท. ‘‘เอวํสีลา (ที. นิ. ๓.๑๔๒) เอวํธมฺมา’’ติอาทีสุ (ที. นิ. ๒.๑๓; ม. นิ. ๓. ๑๙๘; สํ. นิ. ๕.๓๗๘) สตฺววิเสสสฺส. เอวํ เสสนิปาตปทานมฺปีติ อธิปฺปาโย. เตนาห ‘‘กิริยาย…เป… นิปาตปท’’นฺติ. 'सत्त्वप्रधान' म्हणजे द्रव्यप्रधान (वस्तू किंवा अस्तित्वाला प्राधान्य देणारे). कारण नामपदामध्ये द्रव्य प्रकट रूपात असते आणि क्रिया अप्रकट रूपात असते, जसे की 'फस्सो' (स्पर्श). परंतु आख्यातपदामध्ये (क्रियापदामध्ये) क्रिया प्रकट रूपात असते आणि द्रव्य अप्रकट रूपात असते, जसे की 'फुसति' (स्पर्श करतो). त्यामुळे त्यांची अनुक्रमे सत्त्वप्रधानता आणि क्रियाप्रधानता सांगितली आहे. 'क्रियाविशेषग्रहणाचे निमित्त' म्हणजे क्रियाविशेषाचे प्रकटीकरण केल्यामुळे क्रियाविशेषाच्या आकलनाचे कारण होणे; जसे की 'चिरप्पवासिं' (धम्मपद २१९) यामध्ये 'प' हा शब्द राहण्याच्या क्रियेच्या वियोगाची विशिष्टता दर्शवितो. 'एवं मनसि करोथ, मा एवं मनसाकत्था' (असे मनात आणा, असे मनात आणू नका) इत्यादींमध्ये 'एवं' हा शब्द क्रियाविशेषाचा द्योतक आहे. 'एवंसीला एवंधम्मा' इत्यादींमध्ये तो सत्त्वविशेषाचा (व्यक्तीच्या वैशिष्ट्याचा) द्योतक आहे. इतर निपातपदांच्या बाबतीतही असाच अभिप्राय आहे. म्हणूनच 'क्रियेच्या... पे... निपातपद' असे म्हटले आहे. สงฺเขปโต วุตฺตํ, กึ ปน ตนฺติ อาห ‘‘ปทาภิหิต’’นฺติ. อถ วา สงฺเขปโต วุตฺตํ, โย อกฺขเรหิ สงฺกาสิโตติ วุจฺจติ. ปทาภิหิตํ ปเทหิ กถิตํ, โย ปเทหิ ปกาสิโตติ วุจฺจติ. ตทุภยํ, ยทิ ปทสมุทาโย วากฺยํ, ตสฺส โก ปริจฺเฉโท. ยาวตา อธิปฺเปตตฺถปริโยสานํ, ตาวตา เอกวากฺยนฺติปิ วทนฺติ, พหูเปตฺถ ปกาเร วณฺเณนฺติ. กึ เตหิ, สาขฺยาตํ สาพฺยยํ สการกํ สวิเสสนํ ‘‘วากฺย’’นฺติ ทฏฺฐพฺพํ. นนุ จ ปเทนปิ อตฺโถ พฺยญฺชียตีติ โจทนํ มนสิ กตฺวา อาห ‘‘ปทมตฺตสวเนปิ หี’’ติอาทิ. อากาเรสุ วากฺยวิภาเคสุ อภิหิตํ กถิตํ นิพฺพจนํ อาการาภิหิตํ นิพฺพจนํ. ‘‘อภิหิตนฺติ จ ปาฬิอาคต’’นฺติ วทนฺติ. संक्षेपाने सांगितले आहे, पण ते काय आहे? म्हणून 'पदाभिहित' (पदाने सांगितलेले) असे म्हटले आहे. किंवा संक्षेपाने सांगितले आहे की, जे अक्षरांद्वारे संकाशित (प्रकट) केले जाते त्याला 'अक्षर' म्हणतात. 'पदाभिहित' म्हणजे पदांनी कथित केलेले, जे पदांद्वारे प्रकाशित केले जाते त्याला 'पद' म्हणतात. जर पदांचा समूह म्हणजे वाक्य असेल, तर त्याची मर्यादा (परिच्छेद) काय? जोपर्यंत अभिप्रेत अर्थाची समाप्ती होत नाही, तोपर्यंत त्याला 'एक वाक्य' असेही म्हणतात, आणि येथे अनेक प्रकारे त्याचे वर्णन करतात. त्या सर्वांचे काय प्रयोजन? आख्यात (क्रियापद), अव्यय, कारक आणि विशेषणासह असलेल्या रचनेला 'वाक्य' समजावे. 'केवळ पदाने सुद्धा अर्थ व्यक्त होतोच की' अशी शंका मनात घेऊन 'पदत्तसवणेपि ही' (केवळ पद ऐकल्यावरही खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. आकारांमध्ये (वाक्याच्या विभागांमध्ये) जे अभिहित (कथित) केले जाते ते निर्वचन (निब्बचन) होय, त्याला 'आकाराभिहित निर्वचन' म्हणतात. 'अभिहित हे पाळीमध्ये आलेले आहे' असे ते म्हणतात. ‘‘นิพฺพานํ มคฺคติ, นิพฺพานตฺถิเกหิ วา มคฺคียติ, กิเลเส วา มาเรนฺโต คจฺฉตีติ มคฺโค’’ติอาทินา (ธ. ส. อฏฺฐ. ๑๖) นิพฺพจนานํ วิตฺถาโร. ตํนิทฺเทสกถนตฺตา นิทฺเทโสติ อิมมตฺถมาห ‘‘นิพฺพจนวิตฺถาโร นิรวเสสเทสนตฺตา นิทฺเทโส’’ติ. ปเทหีติ วากฺยาวยวภูเตหิ, วากฺยโต วิภชฺชมาเนหิ วา อาขฺยาตาทิปเทหิ. เตนาห ‘‘วากฺยสฺส วิภาโค’’ติ, ตถา จาห ‘‘อปริโยสิเต’’ติอาทิ. อปเร ปน ‘‘ปกติปจฺจยโลปาเทสาทิวเสน อกฺขรวิภาโค อากาโร, นิรุตฺตินเยน ปทวิภาโค นิพฺพจนํ, วากฺยวิภาโค นิทฺเทโส. วณฺณปทวากฺยานิ หิ อวิภตฺตานิ, วิภตฺตานิ จ ฉ พฺยญฺชนปทานี’’ติ วทนฺติ. ฉฏฺฐํ วจนนฺติ ฉฏฺฐํ ปทํ. กาตพฺพนฺติ ‘‘อกฺขรํ [Pg.36] ปทํ พฺยญฺชนํ อากาโร ตเถว นิรุตฺติ นิทฺเทโส ฉฏฺฐวจน’’นฺติ คาถายํ เอวํ กตฺตพฺพํ, สํวณฺณนาวเสน วา อาการปทํ จตุตฺถํ กาตพฺพนฺติ อตฺโถ. สพฺโพ สทฺทโวหาโร วิภตฺเตหิ, อวิภตฺเตหิ จ อกฺขรปทวากฺเยเหว, ตทญฺญปฺปกาโร นตฺถีติ อาห ‘‘ยานิมานี’’ติอาทิ. 'जो निर्वाणाचा शोध घेतो, किंवा निर्वाण इच्छिणाऱ्यांद्वारे शोधला जातो, किंवा क्लेशांना मारत जातो तो मग्ग (मार्ग) होय' इत्यादीद्वारे (धम्मसंगणि अट्ठकथा १६) निर्वचनांचा विस्तार आहे. त्याचे निर्देश कथन असल्यामुळे तो 'निर्देश' होय, हा अर्थ सांगण्यासाठी 'निर्वचनाचा विस्तार आणि निरवशेष (पूर्ण) देशना असल्यामुळे तो निर्देश होय' असे म्हटले आहे. 'पदांद्वारे' म्हणजे वाक्याचे अवयव असलेल्या, किंवा वाक्यापासून विभक्त होणाऱ्या आख्यात इत्यादी पदांद्वारे. म्हणूनच 'वाक्याचा विभाग' असे म्हटले आहे, आणि तसेच 'अपलियोसिते' इत्यादी म्हटले आहे. इतर आचार्य म्हणतात की, 'प्रकृती, प्रत्यय, लोप, आदेश इत्यादींच्या वशाने होणारा अक्षरांचा विभाग म्हणजे आकार होय, निरुक्तिनयाने होणारा पदांचा विभाग म्हणजे निर्वचन होय, आणि वाक्याचा विभाग म्हणजे निर्देश होय. कारण वर्ण, पद आणि वाक्य हे अविभक्त आणि विभक्त असे सहा व्यंजनपदे आहेत.' 'सहावे वचन' म्हणजे सहावे पद. 'अक्षर, पद, व्यंजन, आकार तसेच निरुक्ति आणि निर्देश हे सहावे वचन' या गाथेमध्ये असे केले पाहिजे, किंवा वर्णनाच्या वशाने 'आकार' हे पद चौथे केले पाहिजे, असा अर्थ आहे. सर्व शब्दव्यवहार हा विभक्त आणि अविभक्त अशा अक्षर, पद आणि वाक्यांद्वारेच होतो, त्याव्यतिरिक्त दुसरा कोणताही प्रकार नाही, हे सांगण्यासाठी 'यानिमानि' इत्यादी म्हटले आहे. ๒๔. กาสนาสทฺโท กมฺมตฺโถติ ทสฺเสตุํ ‘‘กาสียตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ปเทหิ ตาว อตฺถสฺส สงฺกาสนา, ปกาสนา จ โหตุ, ปทาวธิกาปิ สํวณฺณนา อิจฺฉิตาติ อกฺขเรหิ ปน กถนฺติ อาห ‘‘อกฺขเรหิ สุยฺยมาเนหี’’ติอาทิ. ปทตฺถสมฺปฏิปตฺตีติ ปทาภิเธยฺยอตฺถาวโพโธ. ‘‘อกฺขเรหิ สงฺกาเสตี’’ติอาทินา อกฺขรกรณํ สงฺกาสนภูตํ อุคฺฆฏนกิริยํ วทนฺเตน ยถาวุตฺโต อตฺโถ สาธิโตติ ทสฺเสตุํ ‘‘ตถา หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. २४. 'कासना' शब्द कर्मार्थात आहे हे दर्शविण्यासाठी 'कासीयति' (प्रकाशित केले जाते) इत्यादी म्हटले आहे. पदांद्वारे तर अर्थाचे संकाशन (प्रकटीकरण) आणि प्रकाशन होवो, पदापर्यंत मर्यादित असलेले स्पष्टीकरणही इष्ट आहे, परंतु अक्षरांद्वारे कसे होते? हे सांगण्यासाठी 'अक्षरांद्वारे ऐकले जात असताना' इत्यादी म्हटले आहे. 'पदार्थसंप्रतिपत्ती' म्हणजे पदाने अभिहित केलेल्या अर्थाचे आकलन (बोध). 'अक्षरांद्वारे संकाशित करतो' इत्यादींद्वारे अक्षरांचे उच्चारण हे संकाशनरूप (प्रकटीकरणरूप) उद्धाटनक्रिया आहे असे सांगून, वर सांगितलेला अर्थ सिद्ध होतो हे दर्शविण्यासाठी 'तथा ही' (तसेच खरोखर) इत्यादी म्हटले आहे. วิภชนุตฺตานีกมฺมปญฺญตฺตีติ เอกตฺตนิทฺเทโส สมาหาโรติ อยํ ทฺวนฺทสมาโส. อุภเยนาติ ‘‘วิวรณา, วิภชนา’’ติ อิมินา ทฺวเยน. เอเตหีติ เอตฺถ เอว-กาโร ลุตฺตนิทฺทิฏฺโฐติ อาห ‘‘เอเตหิ เอวา’’ติ. ‘‘สงฺกาสนา…เป… อภาวโต’’ติ อิมินา ยถาธิปฺเปตอนูนาวธารณผลํ ทสฺเสติ. อุคฺฆฏนาทีติ อาทิสทฺเทน วิปญฺจนนยานิ สงฺคณฺหาติ. ‘विभजन-उत्तानीकम्म-पण्णत्ति’ हा एकत्वनिर्देश असलेला समाहार द्वंद्व समास आहे. ‘उभयेन’ (दोन्हींद्वारे) म्हणजे ‘विवरण’ आणि ‘विभजन’ या दोन्हीद्वारे. ‘एतेहि’ यामध्ये ‘एव’ हा शब्द लुप्त झालेला आहे, म्हणून “एतेहि एव” (यांच्याद्वारेच) असे म्हटले आहे. “संकासना...पे... अभावातो” याद्वारे अभिप्रेत असलेल्या संपूर्ण अवधारण-फळ दर्शविले आहे. ‘उग्घटन’ इत्यादींमधील ‘आदि’ शब्दाने ‘विपञ्चन-नय’ समाविष्ट केले जातात. ๒๕. สมฺมา ยุตฺโตติ สมฺมา อวิปรีตํ, อนวเสสโต จ ยุตฺโต สหิโต. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘อนูนา’’ติ. สพฺโพ หิ ปาฬิอตฺโถ อตฺถปทอตฺถนเยหิ อนวเสสโต สงฺคหิโต. เตนาห ‘‘สพฺพสฺส หี’’ติอาทิ. २५. ‘सम्मा युत्तो’ (सम्यक् युक्त) म्हणजे सम्यक्, अविपरीत आणि पूर्णपणे युक्त किंवा सहित. म्हणूनच “अनूना” (पूर्ण) असे म्हटले आहे. कारण संपूर्ण पाळि-अर्थ हा अर्थपद आणि अर्थनयांद्वारे पूर्णपणे समाविष्ट केला आहे. म्हणूनच “सब्बस्स हि” इत्यादी म्हटले आहे. ๒๖. กสฺมา ปเนตฺถ มูลปทปทฏฺฐานานิ อสงฺคหิตานีติ? ปทตฺถนฺตราภาวโต. มูลปทานิ หิ นยานํ สมุฏฺฐานมตฺตตฺตา ปทฏฺฐานานีติ ทสฺสิโตยํ นโย. เตน วุตฺตํ ‘‘อิโต วินิมุตฺโต โกจิ เนตฺติปทตฺโถ นตฺถี’’ติ. २६. परंतु येथे मूळपदे आणि पदस्थाने का समाविष्ट केलेली नाहीत? कारण इतर कोणत्याही स्वतंत्र पदाचा अर्थसत्व शिल्लक राहत नाही (पदार्थान्तराच्या अभावामुळे). कारण मूळपदे ही नयांच्या केवळ समुत्थानामुळे (उत्पत्तीमुळे) पदस्थाने आहेत, असा हा नय दर्शविला आहे. म्हणूनच म्हटले आहे की, “यापासून मुक्त असा कोणताही नेत्ति-पदार्थ नाही.” เนตฺติยา การณภูตาย. หารา สํวณฺเณตพฺพาติ สุตฺตสฺส อตฺถสํวณฺณนาวเสน หารา วิตฺถาเรตพฺพา. สฺวายนฺติ โส อยํ สํวณฺณนากฺกโม. เยน อนุกฺกเมน เนตฺติยํ เทสิตา, เตเนว สุตฺเต อตฺถสํวณฺณนาวเสน โยเชตพฺพาติ. เอวํ สิทฺเธติ เทสนากฺกเมเนว สิทฺเธ. อยํ อารมฺโภติ ‘‘โสฬส หารา ปฐม’’นฺติ เอวํ ปวตฺโต อารมฺโภ. อิมมตฺถนฺติ อิมํ วุจฺจมานนิยมสงฺขาตํ อตฺถํ. कारणभूत असलेल्या नेत्तिद्वारे. ‘हारा संवण्णेतब्बा’ (हारांचे वर्णन करावे) म्हणजे सुत्ताच्या अर्थ-वर्णनाच्या द्वारे हारांचा विस्तार करावा. ‘स्वायं’ म्हणजे तो हा वर्णनाचा क्रम. ज्या अनुक्रमाने नेत्तिमध्ये उपदेश केला आहे, त्याच अनुक्रमाने सुत्तामध्ये अर्थ-वर्णनाच्या द्वारे योजना करावी. ‘एवं सिद्धे’ म्हणजे देशना-क्रमानेच सिद्ध झाल्यावर. ‘अयं आरम्भो’ म्हणजे “सोळा हार पहिले” अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेला आरंभ. ‘इममत्थं’ म्हणजे या सांगितले जाणाऱ्या नियमाच्या स्वरूपातील अर्थाला. ยทิ [Pg.37] เทสิตกฺกเมเนว หารนยา สุตฺเต โยเชตพฺพา สิยุํ, กึ โส กโม การณนิรเปกฺโข, อุทาหุ การณสาเปกฺโขติ? กิญฺเจตฺถ – ยทิ ตาว การณนิรเปกฺโข หารนยานํ อนุกฺกโม, อเนเก อตฺถา วุจฺจมานา อวสฺสํ เอเกน กเมน วุจฺจนฺตีติ. เอวํ สนฺเต เยน เกนจิ กเมน สุตฺเต โยเชตพฺพา สิยุํ, ตถา สติ นิยโม นิรตฺถโก สิยา. อถ การณสาเปกฺโข, กึ ตํ การณนฺติ? อิตโร การณคเวสนํ อกตฺวา อตฺโถ เอเวตฺถ คเวสิตพฺโพติ อธิปฺปาเยน ‘‘นายมนุโยโค น กตฺถจิ อนุกฺกเม นิวิสตี’’ติ วตฺวา ‘‘น ปน มยํ เทวานํปิยสฺส มโนรถวิฆาตาย เจเตมา’’ติ กมการณํ วิจาเรนฺโต ‘‘อปิจา’’ติอาทินา เทสนาหารสฺส ตาว อาทิโต เทสนาย การณํ ปติฏฺฐเปติ. ตตฺถ ธมฺมเทสนาย นิสฺสโย อสฺสาทาทีนวนิสฺสรณานิ, สรีรํ อาณตฺติ. ปกติยา สภาเวน. นิทฺธารเณน วินาปิ ปติฏฺฐาภาวโต นิสฺสยภาวโต. जर उपदेशिलेल्या क्रमानेच हार आणि नय सुत्तामध्ये योजायचे असतील, तर तो क्रम कारण-निरपेक्ष आहे की कारण-सापेक्ष? आणि येथे काय - जर हार आणि नयांचा अनुक्रम कारण-निरपेक्ष असेल, तर सांगितले जाणारे अनेक अर्थ निश्चितच एका क्रमाने सांगितले जातात. असे असल्यास, सुत्तामध्ये कोणत्याही क्रमाने त्यांची योजना केली जाऊ शकते, आणि तसे झाल्यास नियम निरर्थक ठरेल. आणि जर तो कारण-सापेक्ष असेल, तर ते कारण काय आहे? दुसऱ्याने कारणाचा शोध न घेता येथे केवळ अर्थाचाच शोध घेतला पाहिजे, या अभिप्रायाने “हा प्रश्न कोणत्याही अनुक्रमात बसत नाही” असे म्हणून, “परंतु आम्ही देवानंप्रियाच्या मनोरथाचा भंग करण्यासाठी विचार करत नाही” असे सांगून, क्रमाच्या कारणाचा विचार करताना “अपि च” इत्यादींद्वारे देशना-हाराच्या सुरुवातीलाच देशनेचे कारण प्रस्थापित केले आहे. त्यामध्ये धम्मदेशनेचा आश्रय म्हणजे आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे आहेत, आणि शरीर म्हणजे आज्ञा होय. ‘पकतिया’ म्हणजे स्वभावाने. निर्धारणाशिवाय देखील प्रतिष्ठा असल्यामुळे आणि आश्रय असल्यामुळे. ‘‘ตถา หิ วกฺขตี’’ติอาทินา ยถาวุตฺตํ อตฺถํ ปากฏตรํ กโรติ. เอส นโย อิตเรสุปิ. “तथा हि वक्खति” (तसेच पुढे सांगतील) इत्यादींद्वारे पूर्वोक्त अर्थ अधिक स्पष्ट केला आहे. हाच नय इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो. วิจยานนฺตรนฺติ วิจยหารานนฺตรํ. เสเสสุปิ เอเสว นโย. ตถา หีติ ลกฺขณหารวิภงฺเค ยุตฺตายุตฺตานํ การณปรมฺปราย ปริคฺคหิตสภาวานํ อวุตฺตานมฺปิ เอกลกฺขณตาย คหณํ วุตฺตํ. ‘विचयानन्तरं’ म्हणजे विचय-हारानंतर. उर्वरित हारांच्या बाबतीतही हाच नय आहे. कारण ‘लक्खणहार-विभंग’ मध्ये युक्त आणि अयुक्त गोष्टींच्या कारण-परंपरेने ग्रहण केलेल्या स्वभावांचे, जे सांगितले गेले नसले तरीही, एकाच लक्षणाचे असल्यामुळे ग्रहण करणे सांगितले आहे. อตฺถโต นิทฺธาริตานนฺติ อตฺถุทฺธารปุพฺพาปรานุสนฺธิอาทิอตฺถโต สุตฺตนฺตรโต อุทฺธฏานํ สํวณฺณิยมานสุตฺเต อานีตานํ ปาฬิธมฺมานํ. สทฺทโต, ปมาณนฺตรโต จ ลทฺธานํ อิธ วิจาเรตพฺพตฺตา อาห ‘‘นิรวเสสโต’’ติ. อตฺถสฺสาติ อภิเธยฺยตฺถสฺส. ธมฺมสฺสาติ สภาวธมฺมสฺส. ตตฺถ ตตฺถ ตํ อภินิโรเปตีติ ตสฺมึ ตสฺมึ อตฺเถ, ธมฺเม จ ตํ นามํ อภินิโรเปติ, ‘‘อยเมวํนาโม’’ติ โวหรติ. ‘‘อตฺถสฺส, ธมฺมสฺสา’’ติ ปททฺวเยน สามญฺญโต อตฺโถ, ธมฺโม จ อนวเสเสตฺวา คหิโตติ อาห ‘‘อนวเสสปริยาทาน’’นฺติ, ยโต วุตฺตํ ‘‘ตตฺถ ตตฺถา’’ติ. ตถาติ ยถา อนวเสสตฺถาวโพธทีปกํ อนวเสสปริยาทานํ กตํ จตุพฺยูหปาฬิยํ, เอวํ ปุนปฺปุนํ คพฺภมุเปตีติ เอตฺถ อสทฺทวตี อตฺถา ปวตฺติวเสน ลพฺภมานา สมฺมาปฏิปตฺติ อุทฺธฏาติ อุปสํหารตฺโถ ตถา-สทฺโท. ‘अत्थतो निद्धारितानं’ (अर्थतः निर्धारित केलेल्या) म्हणजे अर्थाचा उद्धार, पूर्वापर संबंध इत्यादी अर्थांच्या दृष्टीने इतर सुत्तांमधून उद्धृत केलेल्या आणि ज्या सुत्ताचे वर्णन केले जात आहे त्यात आणलेल्या पाळि-धम्मांचे. शब्दाच्या दृष्टीने आणि इतर प्रमाणांच्या दृष्टीने प्राप्त झालेल्या गोष्टींचा येथे विचार करायचा असल्यामुळे “निरवसेसतो” (पूर्णपणे) असे म्हटले आहे. ‘अत्थस्स’ म्हणजे अभिधेय अर्थाचा. ‘धम्मस्स’ म्हणजे स्वभाव-धम्माचा. ‘तत्थ तत्थ तं अभिनिरोपेति’ म्हणजे त्या त्या अर्थामध्ये आणि धम्मामध्ये ते नाव आरोपित करतो, “हा या नावाचा आहे” असा व्यवहार करतो. “अत्थस्स, धम्मस्स” या दोन पदांद्वारे सामान्यतः अर्थ आणि धम्म पूर्णपणे ग्रहण केले आहेत, म्हणून “अनवसेसपरियादानं” (पूर्णपणे ग्रहण करणे) असे म्हटले आहे, कारण “तत्थ तत्थ” असे म्हटले आहे. ‘तथा’ म्हणजे ज्याप्रमाणे संपूर्ण अर्थाचा बोध करून देणारे पूर्ण ग्रहण ‘चतुब्यूह-पाळि’ मध्ये केले आहे, त्याचप्रमाणे “पुन्हा पुन्हा गर्भात प्रवेश करतो” यामध्ये अश्रद्धाळू लोकांसाठी अर्थाच्या प्रवृत्तीनुसार प्राप्त होणारी सम्यक्-प्रतिपत्ती उद्धृत केली आहे, असा उपसंहाराचा अर्थ ‘तथा’ या शब्दाचा आहे. เตเนวาติ [Pg.38] สุตฺตนฺตรสํสนฺทนสฺส สภาควิสภาคธมฺมนฺตราวฏฺฏนูปายภาวโต เอว. ยโตติ สภาควิสภาคธมฺมาวฏฺฏนสฺส สาธารณาทิธมฺมวิภชนูปายตฺตา. ปฏิวิภตฺตสภาเวติ ปฏิภาคภาเวน วิภตฺตสภาเว. ‘तेनेv’ (त्यामुळेच) म्हणजे इतर सुत्तांच्या तुलनेचे सभाग (समान) आणि विसभाग (असमान) इतर धम्मांना आवर्तित करण्याचे साधन असल्यामुळेच. ‘यतो’ (ज्यामुळे) म्हणजे सभाग आणि विसभाग धम्मांच्या आवर्तनाचे साधारण इत्यादी धम्मांच्या विभाजनाचे साधन असल्यामुळे. ‘पटिविभत्तसभावे’ म्हणजे प्रतिभागभावाने विभक्त स्वभाव असलेल्या. เต ธมฺมาติ ปฏิปกฺขโต ปริวตฺติตธมฺมา. น ปริยายวิภาวนา ปญฺญตฺติวิภาคปริคฺคาหิกาติ อาห ‘‘ปริยา…เป… สุโพธนญฺจา’’ติ. ‘ते धम्मा’ म्हणजे प्रतिपक्षाकडून परिवर्तित केलेले धम्म. पर्याय-विभावना ही प्रज्ञप्ति-विभागाचे ग्रहण करणारी नाही, म्हणून “परिया...पे... सुबोधनञ्च” असे म्हटले आहे. ปุจฺฉาวิโสธนํ วิสฺสชฺชนํ. อารมฺภวิโสธนํ เทสนาย อตฺถกถนํ. ตทุภยวิจาโร ธาตาทีสุ อสมฺมุยฺหนฺตสฺเสว สมฺภวตีติ อาห ‘‘ธาตายตนา…เป… สมฺปาเทตุ’’นฺติ. สุทฺโธ อารมฺโภติอาทิปาฬินิทสฺสเนนปิ อยเมวตฺโถ อุทาหโฏติ เวทิตพฺพํ. ‘पुच्छाविसोधनं’ (प्रश्नाचे विशोधन) म्हणजे विसर्जन (उत्तर देणे). ‘आरम्भविसोधनं’ (आरंभाचे विशोधन) म्हणजे देशनेचे अर्थकथन (स्पष्टीकरण). त्या दोन्हीचा विचार धातू इत्यादींच्या बाबतीत संभ्रमित न होणाऱ्या व्यक्तीलाच शक्य आहे, म्हणून “धातायतना...पे... संपादेतुं” असे म्हटले आहे. “सुद्धो आरम्भो” इत्यादी पाळि-उदाहरणाने देखील हाच अर्थ दर्शविला आहे, असे समजावे. ‘‘การณากาโร’’ติ ปทฏฺฐานํ สนฺธาย วทติ. ปเภทโต เทสนากาโรติ เววจนํ. นิทฺธาเรตฺวา วุจฺจมานานีติ อุทฺธริตฺวา สมาโรปิยมานานีติ อธิปฺปาโย. สุตฺตสฺส อตฺถํ ตถตฺตาวโพธายาติ สุตฺตสฺส ปทตฺถาวคมมุเขน จตุสจฺจาภิสมยาย. “कारणाकारो” हे पदस्थान लक्षात घेऊन म्हटले आहे. प्रभेदाच्या दृष्टीने ‘देशनाकार’ हा त्याचा समानार्थी शब्द आहे. ‘निद्धारेत्वा वुच्चमानानि’ (निर्धारित करून सांगितले जाणारे) म्हणजे उद्धृत करून आरोपित केले जाणारे, असा अभिप्राय आहे. ‘सुत्तस्स अत्थं तथत्तावबोधाय’ (सुत्ताचा अर्थ यथार्थपणे समजण्यासाठी) म्हणजे सुत्ताच्या पदांच्या अर्थाच्या आकलनाद्वारे चतुरार्य सत्यांच्या अभिसमयासाठी (साक्षात्कारासाठी). เวเนยฺยตฺตยยุตฺโต อตฺถนยตฺตยูปเทโส ‘‘เวเนยฺยตฺตยปฺปโยชิโต’’ติ วุตฺโต. เวเนยฺยตฺตยญฺหิ ปจฺจยสมวาเย ตทุปเทสผลํ อธิคจฺฉนฺตํ อตฺถํ ปโยเชติ นามาติ. ตทนุกฺกเมเนวาติ เตสํ อุคฺฆฏิตญฺญุอาทีนํ เทสนานุกฺกเมเนว. เตติ ตโย อตฺถนยา. เตสนฺติ อุคฺฆฏิตญฺญุอาทีนํ. ยถา อุทฺเทสาทีนํ สงฺเขปมชฺฌิมวิตฺถารวุตฺติยา ติณฺณํ ปุคฺคลานํ อุปการตา, เอวํ เตสํ อตฺถนยานํ. ตสฺสาติ อตฺถนยตฺถสฺส. ตตฺถาติ ตสฺสํ ตสฺสํ ภูมิยํ. तीन प्रकारच्या विनेय (शिष्य) लोकांशी युक्त असलेला तीन अर्थनयांचा उपदेश “विनेयत्रय-प्रयोजित” असा म्हटला आहे. कारण तीन प्रकारचे विनेय लोक प्रत्यय-सामग्री असताना त्या उपदेशाचे फळ प्राप्त करून अर्थाचे प्रयोजन साधतात. ‘tadanukkamenev’ म्हणजे त्या उग्घटितञ्ञू (शीघ्र बुद्धीचे) इत्यादींच्या देशनेच्या अनुक्रमानेच. ‘ते’ म्हणजे ते तीन अर्थनय. ‘तेसं’ म्हणजे त्या उग्घटितञ्ञू इत्यादींचे. ज्याप्रमाणे उद्देश इत्यादींच्या संक्षेप, मध्यम आणि विस्तार वृत्तीने तीन प्रकारच्या पुद्गलांना (व्यक्तींना) उपकारकता होते, त्याचप्रमाणे त्या अर्थनयांची होते. ‘तस्स’ म्हणजे त्या अर्थनयाच्या अर्थाची. ‘तत्थ’ म्हणजे त्या त्या भूमीमध्ये. สมุฏฺฐานํ นิทานํ. อเนกธา สทฺทนยโต, นิรุตฺตินยโต จาติ อเนกปฺปการํ. ปทตฺโถ สทฺทตฺโถ. วิธิ อนุวาโทติ อิทเมตฺถ วิธิวจนํ, อยมนุวาโทติ อยํ วิภาโค เวทิตพฺโพ. สมาธาตพฺโพติ ปริหริตพฺโพ. อนุสนฺธียา อนุรูปํ นิคเมตพฺพนฺติ ยาย อนุสนฺธิยา สุตฺเต อุปริ เทสนา ปวตฺตา, ตทนุรูปํ สํวณฺณนา นิคเมตพฺพา. ปโยชนนฺติ ผลํ. ปิณฺฑตฺโถติ สงฺเขปตฺโถ. อนุสนฺธีติ ปุจฺฉานุสนฺธิอาทิอนุสนฺธิ. อุโปคฺฆาโฏติ นิทสฺสนํ. จาลนาติ โจทนา. ปจฺจุปฏฺฐานํ ปริหาโร. समुत्थान म्हणजे निदान (कारण). अनेक प्रकारे शब्दांच्या नियमाने (शब्दनय) आणि निरुक्तीच्या नियमाने (निरुक्तिनय) असे अनेक प्रकारांचे होणे. पदाचा अर्थ म्हणजे शब्दाचा अर्थ. 'विधी' आणि 'अनुवाद' यातील, हे विधीचे वचन आहे आणि हा अनुवाद आहे, असा हा विभाग समजला पाहिजे. 'समाधान केले पाहिजे' म्हणजे परिहार (शंकेचे निरसन) केला पाहिजे. 'अनुसंधीच्या अनुरूप निष्कर्ष काढावा' म्हणजे ज्या अनुसंधीने सुत्तात पुढे देशना प्रवृत्त झाली आहे, त्यानुसारच संवर्णना (स्पष्टीकरण) समाप्त करावी. प्रयोजन म्हणजे फल. पिंडार्थ म्हणजे संक्षेपार्थ. अनुसंधी म्हणजे पृच्छा-अनुसंधी इत्यादी अनुसंधी. उपोद्घात म्हणजे निदर्शन. चालना म्हणजे चोदना. प्रत्युपस्थान म्हणजे परिहार. ปกติอาทิปทาวยวํ [Pg.39] ภินฺทิตฺวา กถนํ เภทกถา ยถา ‘‘ทิพฺพนฺตีติ เทวา’’ติ (ม. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑๕๓). ปทสฺส อตฺถกถนํ ตตฺวกถา ยถา ‘‘พุทฺโธติ โย โส ภควา สยมฺภู อนาจริยโก’’ติ (มหานิ. ๑๙๒; จูฬนิ. ปารายนตฺถุติคาถานิทฺเทส ๙๗; ปฏิ. ม. ๑.๑๖๑). ปริยายวจนํ เววจนคฺคหณํ ยถา ‘‘ปญฺญา ปชานนา’’ติ (ธ. ส. ๑๖). วิจยยุตฺติจตุพฺยูหปริวตฺตนหาเรกเทสสงฺคหิตา, เววจนหารสงฺคหิตา จาติ อาห ‘‘เต อิธ กติปยหารสงฺคหิตา’’ติ. प्रकृती इत्यादी पदांच्या अवयवांचे विभाजन करून सांगणे म्हणजे 'भेदकथा' होय, जसे की 'जे क्रीडा करतात (किंवा प्रकाशतात) ते देव' (दिब्बन्तीति देवा). पदाच्या अर्थाचे कथन करणे म्हणजे 'तत्त्वकथा' होय, जसे की 'बुद्ध म्हणजे ते जे भगवान स्वयंभू आणि विना-आचार्य (स्वतः ज्ञान प्राप्त केलेले) आहेत'. पर्यायी शब्दांचे ग्रहण करणे म्हणजे 'वेवचन' (समानार्थी शब्द) होय, जसे की 'प्रज्ञा म्हणजे प्रजानन (विशेष रूपाने जाणणे)'. विचय, युत्ती, चतुब्यूह, परिवर्तन या हारांच्या एका अंशाने संग्रहित आणि वेवचनहाराने संग्रहित असल्यामुळे म्हटले आहे की, 'ते येथे काही हारांमध्ये संग्रहित आहेत'. อตฺตโน ผลํ ธาเรตีติ ธมฺโมติ เหตุโน ธมฺมภาโว เวทิตพฺโพ. ญาปกเหตูปิ ญาณกรณฏฺเฐน การเก ปกฺขิปิตฺวา อาห ‘‘การโก สมฺปาปโกติ ทุวิโธ’’ติ. ปุน จกฺขุพีชาทินิพฺพตฺตกเมว การณํ กตฺวา ทสฺเสนฺโต ‘‘ปุน…เป… ติวิโธ’’ติอาทิมาห. ‘‘ตโย กุสลเหตู’’ติอาทินา (ธ. ส. ๑๐๕๙-๑๐๖๐) อาคตา อโลภาทโย, โลภาทโย จ เหตุเหตุ นาม. ‘‘จตฺตาโร โข, ภิกฺขเว, มหาภูตา เหตุ, จตฺตาโร มหาภูตา ปจฺจโย รูปกฺขนฺธสฺส ปญฺญาปนายา’’ติอาทินา (ม. นิ. ๓.๘๖) อาคโต ปจฺจยเหตุ นาม. กุสลากุสลํ กมฺมํ อตฺตโน วิปากํ ปติ อุตฺตมเหตุ นาม. จกฺขาทิพีชาทิ จกฺขุวิญฺญาณองฺกุราทีนํ อสาธารณเหตุ นาม. กุสลากุสลานํ สติปิ ปจฺจยธมฺมภาเว อิฏฺฐานิฏฺฐผลวิเสสเหตุภาวทสฺสนตฺถํ วิสุํ คหณํ, สทฺทมคฺคานํ ปน ญาปกสมฺปาปกเหตุภาวทสฺสนตฺถนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. องฺกุราทิกสฺส อสาธารณเหตุ พีชาทิสมานชาติยเหตุตาย สภาคเหตุ. สาธารณเหตุ ภุสสลิลาทิอสมานชาติยตาย อสภาคเหตุ. อินฺทฺริยพทฺธสนฺตานิโก อชฺฌตฺติกเหตุ, อิตโร พาหิรเหตุ. เกจิ ปน ‘‘สสนฺตานิโก อชฺฌตฺติกเหตุ, อิตโร พาหิรเหตู’’ติ วทนฺติ. ปริคฺคาหโก อุปตฺถมฺภโก. ปรมฺปรเหตุ อุปนิสฺสยปจฺจโย. 'स्वतःच्या फलाला धारण करतो तो धम्म' यावरून हेतूचा धम्मभाव समजला पाहिजे. ज्ञापक हेतूला देखील ज्ञान करवून देण्याच्या अर्थाने कारकामध्ये समाविष्ट करून म्हटले आहे की, 'कारक आणि संपापक असे दोन प्रकार आहेत'. पुन्हा चक्षू, बीज इत्यादी उत्पन्न करणाऱ्यांनाच कारण मानून दाखवताना 'पुन्हा...पे... तीन प्रकारचा' इत्यादी म्हटले आहे. 'तीन कुशल हेतू' इत्यादी सूत्रांत आलेले अलोभ इत्यादी आणि लोभ इत्यादी हे 'हेतूहेतू' होत. 'भिक्खूहो, चार महाभूत हे हेतू आहेत, चार महाभूत हे रूपस्कंधाच्या प्रज्ञप्तीसाठी प्रत्यय आहेत' इत्यादी सूत्रांत आलेला 'प्रत्ययहेतू' होय. कुशल-अकुशल कर्म हे स्वतःच्या विपाकासाठी 'उत्तमहेतू' होय. चक्षू, बीज इत्यादी हे चक्षुविज्ञानाचा अंकुर इत्यादींसाठी 'असाधारणहेतू' होत. कुशल आणि अकुशल धर्मांचा प्रत्ययधम्मभाव असतानाही, इष्ट आणि अनिष्ट फलांच्या विशेष हेतूभावाचे दर्शन घडवण्यासाठी त्यांचे स्वतंत्र ग्रहण केले आहे; आणि शब्द व मार्गांच्या ज्ञापक-संपापक हेतूभावाचे दर्शन घडवण्यासाठी असे केले आहे, हे समजले पाहिजे. अंकुर इत्यादींचा असाधारण हेतू हा बीज इत्यादी समान जातीय हेतू असल्यामुळे 'सभागहेतू' होय. साधारण हेतू हा कोंडा, पाणी इत्यादी असमान जातीय असल्यामुळे 'असभागहेतू' होय. इंद्रियांशी बद्ध असलेल्या संततीशी संबंधित असलेला 'आारीरिक हेतू' (आध्यात्मिक हेतू) होय आणि इतर 'बाह्य हेतू' होय. काही आचार्य मात्र 'स्वतःच्या संततीशी संबंधित असलेला आध्यात्मिक हेतू आणि इतर बाह्य हेतू' असे म्हणतात. परिग्राहक म्हणजे उपस्तंभक. परंपराहेतू म्हणजे उपनिषयप्रत्यय. นิพฺพานสฺส อนิพฺพตฺตนิเยปิ สมุทยปฺปหานสมุทยนิโรธานํ อธิคมาธิคนฺตพฺพภาวโต นิพฺพานํ ปติ มคฺคสฺส เหตุภาโว วิย มคฺคํ ปติ นิพฺพานสฺส ผลภาโว อุปจารสิทฺโธติ อาห ‘‘ผลปริยาโย ลพฺภตี’’ติ. जरी निर्वाण हे अनुत्पन्न (उत्पन्न न होणारे) असले, तरी समुदयाचा प्रहाण (नाश) आणि समुदयाचा निरोध यांच्या अधिगम (प्राप्ती) आणि अधिगतव्य (प्राप्त करण्यायोग्य) भावामुळे, निर्वाणाप्रती मार्गाचा हेतूभाव असल्याप्रमाणे, मार्गाप्रती निर्वाणाचा फलभाव उपचाराने सिद्ध होतो, म्हणूनच म्हटले आहे की 'फलपर्याय प्राप्त होतो'. ปฏิปชฺชมานภูมิ มคฺคธมฺมา. ปฏิปนฺนภูมิ ผลธมฺมา. प्रतिपद्यमान भूमी म्हणजे मार्गधम्म होत. प्रतिपन्न भूमी म्हणजे फलधम्म होत. กิจฺจโตติ [Pg.40] สรสโต. ลกฺขณโตติ อุปลกฺขณโต. สามญฺญโตติ สมานภาวโต. เตน สมานเหตุตา, สมานผลตา, สมานารมฺมณตา จ คหิตา โหตีติ. ตตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ เหฏฺฐา ลกฺขณหารนิทฺเทสวณฺณนายํ วุตฺตเมว. कृत्यावरून म्हणजे स्वभावावरून. लक्षणावरून म्हणजे उपलक्षणावरून. सामान्यावरून म्हणजे समानभावावरून. त्याने समानहेतुता, समानफलता आणि समानआरंमणता (समान आलंबन) ग्रहण केली जाते. त्याविषयी जे काही सांगायचे आहे, ते खाली लक्षणहारनिर्देशाच्या वर्णनात सांगितलेच आहे. อปิเจตฺถ สมฺปโยควิปฺปโยควิโรธปกรณลิงฺคสทฺทนฺตรสนฺนิธานสามตฺถิยาทีนมฺปิ วเสน นยวิภาโค เวทิตพฺโพ. ตตฺถ สมฺปโยคโต ตาวนยวิภาโค – ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, อญฺญํ เอกธมฺมมฺปิ สมนุปสฺสามิ, ยํ เอวํ ลหุปริวตฺตํ, ยถยิทํ จิตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑.๔๘) จิตฺตสฺส ลหุปริวตฺติตา คหิตา, ตํสมฺปโยคโต เจตสิกานมฺปิ คหิตาว โหติ อญฺญตฺถ เนสํ จิตฺเตน สมฺปโยคทีปนโต. อถ วา ‘‘สญฺญิโน’’ติ. สญฺญาสหิตตาวจเนน หิ เนสํ เวทนาเจตนาทิวนฺตตาปิ สมฺปโยคโต ทีปิตา โหติ. शिवाय, येथे संप्रयोग, विप्रयोग, विरोध, प्रकरण, लिंग, शब्दांतरसंनिधान आणि सामर्थ्य इत्यादींच्या आधारे देखील नयाचा विभाग समजून घेतला पाहिजे. त्यापैकी संप्रयोगाच्या आधारे नयाचा विभाग असा आहे – 'भिक्खूहो, मी असा दुसरा एकही धम्म पाहत नाही, जो या चित्ताप्रमाणे इतक्या वेगाने बदलणारा असेल.' येथे चित्ताची वेगाने बदलण्याची प्रवृत्ती ग्रहण केली आहे, तिच्या संप्रयोगामुळे चेतसिकांचेही ग्रहण होतेच, कारण इतर ठिकाणी त्यांचा चित्ताशी संप्रयोग दर्शवला आहे. किंवा 'संज्ञी' असे म्हटल्याने. संज्ञासहित असण्याच्या वचनाने त्यांची वेदना, चेतना इत्यादींनी युक्त असण्याची अवस्था देखील संप्रयोगावरून स्पष्ट होते. วิปฺปโยคโต – ‘‘อเหตุกา’’ติ. เหตุสมฺปยุตฺตา หิ ธมฺมา ‘‘สเหตุกา’’ติ วุตฺตาติ ตพฺพิธุรา ธมฺมา วิปฺปโยคโต ‘‘อเหตุกา’’ติ วุตฺตาติ วิญฺญายติ. อถ วา ‘‘อสญฺญิโน’’ติ. สญฺญาวิปฺปยุตฺตา หิ ธมฺมปวตฺติ อิธาธิปฺเปตา, น สญฺญาย อภาวมตฺตนฺติ วิญฺญายติ. विप्रयोगावरून – 'अहेतुक' असे म्हटल्याने. हेतूंशी संप्रयुक्त असणारे धम्म 'सहेतुक' म्हटले जातात, म्हणून त्यांच्याशी विप्रयुक्त असणारे धम्म विप्रयोगामुळे 'अहेतुक' म्हटले जातात, असे समजते. किंवा 'असंज्ञी' असे म्हटल्याने. येथे संज्ञेपासून विप्रयुक्त असणारी धम्मप्रवृत्ती अभिप्रेत आहे, केवळ संज्ञेचा अभावच नाही, असे समजते. วิโรธโต – ‘‘อฏฺฐมโก (ยม. ๓.อินฺทฺริยยมกปาฬิ.๔๓๙), สทฺธานุสารี’’ติ (ปุ. ป. มาติกา ๗.๓๖) จ วุตฺเต ตํ สนฺตติยํ สํโยชนตฺตยปฺปหานํ วิญฺญายติ, ตถา ‘‘สติ วา อุปาทิเสเส อนาคามิตา’’ติ (ที. นิ. ๒.๔๐๔; ม. นิ. ๑.๑๓๗) วุตฺเต ปญฺโจรมฺภาคิยสํโยชนปฺปหานํ, ‘‘ทิฏฺเฐว ธมฺเม อญฺญา’’ติ (ที. นิ. ๒.๔๐๔; ม. นิ. ๑.๑๓๗) วุตฺเต อนวเสสสํโยชนปฺปหานํ วิญฺญายติ. विरोधावरून – 'अष्टमक' आणि 'श्रद्धानुसारी' असे म्हटले असता, त्या संततीमध्ये तीन संयोजनांचा प्रहाण झाला आहे, असे समजते. तसेच 'उपाधिशेष शिल्लक असताना अनागामी अवस्था प्राप्त होते' असे म्हटले असता, पाच ओरंभागीय संयोजनांचा प्रहाण झाला आहे, असे समजते. 'याच जन्मात आज्ञा प्राप्त होते' असे म्हटले असता, सर्व संयोजनांचा पूर्णपणे प्रहाण झाला आहे, असे समजते. ปกรณโต – ‘‘อพฺยากตา ธมฺมา’’ติ (ธ. ส. มาติกา). อธิการโต หิ กุสลากุสลภาเวน น กถิตาติ ญายติ. ‘‘อุปธี หิ นรสฺส โสจนา’’ติ (สํ. นิ. ๑.๑๒, ๑๔๔) จ. พาหิรา หิ ธมฺมา อิธ ‘‘อุปธี’’ติ อธิปฺเปตาติ วิญฺญายติ. प्रकरणावरून – 'अव्याकृत धम्म' असे म्हटल्याने. प्रसंगानुसार ते कुशल किंवा अकुशल भावाने सांगितले गेलेले नाहीत, असे समजते. आणि 'उपाधीच मनुष्याच्या शोकाचे कारण आहे' असे म्हटल्याने. येथे बाह्य धम्म हेच 'उपाधी' म्हणून अभिप्रेत आहेत, असे समजते. ลิงฺคโต – ‘‘สีเตนปิ รุปฺปติ, อุณฺเหนปิ รุปฺปตี’’ติอาทิ (สํ. นิ. ๓.๗๙). สีตาทิคฺคหเณน หิ ลิงฺเคน ภูตุปาทายปฺปการสฺเสว ธมฺมสฺส รูปภาโว, น อิตรสฺส. लिंगावरून (चिन्हावरून) – 'थंडीनेही पीडित होतो, उष्णतेनेही पीडित होतो' इत्यादी. थंडी इत्यादींच्या ग्रहणाने या चिन्हावरून महाभूत आणि उपादाय रूपांच्या प्रकारच्या धम्माचाच 'रूपभाव' सिद्ध होतो, इतरांचा नाही. สทฺทนฺตรสนฺนิธานโต – ‘‘กายปสฺสทฺธิ, กายายตน’’นฺติ. ‘‘ยา เวทนากฺขนฺธสฺสา’’ติอาทิวจนโต หิ ปุริโม กายสทฺโท สมูหวาจี, อิตโร อายตนสทฺทสนฺนิธานโต ปสาทวาจี. शब्दांतरसंनिधानाने (दुसऱ्या शब्दाच्या सान्निध्याने) – 'कायप्रस्रब्धी, कायायतन' असे म्हटल्याने. 'जी वेदनास्कंधाची...' इत्यादी वचनांमुळे पहिला 'काय' शब्द हा समूहवाचक आहे, तर दुसरा 'काय' शब्द हा आयतन शब्दाच्या सान्निध्यामुळे प्रसादवाचक (इंद्रियवाचक) आहे. สามตฺถิยโต [Pg.41] – ‘‘สพฺพํ, ภิกฺขเว, อาทิตฺตํ (สํ. นิ. ๔.๒๘; มหาว. ๕๔), สพฺเพ ตสนฺติ ทณฺฑสฺสา’’ติ (ธ. ป. ๑๒๙) จ, ตถา ‘‘สพฺพาวนฺตํ โลกํ เมตฺตาสหคเตน เจตสา…เป… ผริตฺวา วิหรตี’’ติอาทิ (ที. นิ. ๑.๕๕๖; ๓.๓๐๘; ม. นิ. ๑.๗๗, ๒๓๒, ๔๕๙, ๕๐๙; ๒.๓๐๙; ๓.๒๓๐; วิภ. ๖๔๒). เอตฺถ หิ สติปิ สพฺพสทฺทสฺส อนวเสสสตฺตวาจกตฺเต อาทิตฺตตา สาเปกฺขสฺเสว อตฺถสฺส วาจกตฺตา ปเทสวาจี สพฺพสทฺโท, โลกสทฺโทปิ สตฺตวาจี. สตฺตารมฺมณา หิ อปฺปมญฺญาติ. ตถา ‘‘มาตรํ ปิตรํ หนฺตฺวา’’ติ (ธ. ป. ๒๙๔-๒๙๕) สพฺเพน สพฺพํ หิ สปฏิกฺเขปโต, มาตุปิตุฆาตกมฺมสฺส จ มหาสาวชฺชตาปเวทนโต, อิธ จ ตทนุญฺญาย กตาย มาตุปิตุฏฺฐานิยา ตาทิสา เกจิ ปาปธมฺมา เวเนยฺยวเสน คหิตา วิญฺญายติ. เก ปน เตติ? ตณฺหามานา. ตณฺหา หิ ชนนี สตฺตานํ. ‘‘ตณฺหา ชเนติ ปุริส’’นฺติ (สํ. นิ. ๑.๕๕-๕๗) หิ วุตฺตํ. ปิตุฏฺฐานิโย มาโน ตํ นิสฺสาย อตฺตสมฺปคฺคณฺหโต ‘‘อหํ อสุกสฺส รุญฺโญ, ราชมหามตฺตสฺส วา ปุตฺโต’’ติ ยถา. สามตฺถิยาทีนนฺติ อาทิสทฺเทน เทสปกติอาทโย สงฺคยฺหนฺติ. सामर्थ्यावरून – 'भिक्खूहो, सर्व काही प्रदीप्त (आदित्त) आहे' आणि 'सर्व प्राणी दंडाला घाबरतात', तसेच 'सर्व जगाला मैत्रीपूर्ण चित्ताने... व्यापून विहरतो' इत्यादी. येथे 'सब्ब' (सर्व) हा शब्द संपूर्ण प्राण्यांचा वाचक असला तरी, प्रदीप्तता ही सापेक्ष अर्थाची वाचक असल्यामुळे 'सब्ब' हा शब्द एका भागाचा (प्रदेशाचा) वाचक आहे, आणि 'लोक' हा शब्द देखील प्राण्यांचा वाचक आहे. कारण अप्पमञ्ञा (अप्रमाण) हे प्राण्यांनाच आलंबन बनवणारे असतात. तसेच 'माता आणि पित्याचा वध करून' यामध्ये सर्व प्रकारे निषेध असल्यामुळे, आणि माता-पित्याच्या वधाचे कर्म हे महा-सावज्ज (मोठे दोषयुक्त) असल्याचे प्रतिपादन केल्यामुळे, येथे त्यांच्या अनुज्ञेने केलेल्या माता-पित्यांच्या स्थानी असलेल्या अशा काही पापी धर्मांचे (क्लेशांचे) विनेय (शिष्य) जनांच्या क्षमतेनुसार ग्रहण केले आहे असे समजले जाते. पण ते कोणते आहेत? तण्हा (तृष्णा) आणि मान (अहंकार). कारण तण्हा ही प्राण्यांची जननी आहे. 'तण्हा माणसाला जन्म देते' असे म्हटले आहे. पित्याच्या स्थानी 'मान' आहे, कारण त्याचा आश्रय घेऊन मनुष्य स्वतःला श्रेष्ठ समजतो, जसे की 'मी अमुक राजाचा किंवा राजमहामात्राचा मुलगा आहे'. 'सामर्थ्यादी' मधील 'आदी' या शब्दाने देशप्रकृती इत्यादींचा संग्रह होतो. ลพฺภมานปทตฺถนิทฺธารณมุเขนาติ ตสฺมึ ตสฺมึ สุตฺเต ลพฺภมานอสฺสาทาทิหารปทตฺถนิทฺธารณทฺวาเรน. ยถาลกฺขณนฺติ ยํ ยํ ลกฺขณํ, ลกฺขณานุรูปํ วา ยถาลกฺขณํ. เหตุผลาทีนิ อุปธาเรตฺวา โยเชตพฺพานิ เตสํ วเสนาติ อธิปฺปาโย. อิทานิ เหตุผลาทโย เย ยสฺมึ หาเร สวิเสสํ อิจฺฉิตพฺพา, เต ทสฺเสตุํ ‘‘วิเสสโต ปนา’’ติอาทิมาห. ตํ สุวิญฺเญยฺยเมว. 'लभ्यमानपदार्थनिर्धारणमुखाने' म्हणजे त्या त्या सुत्तात प्राप्त होणाऱ्या अस्साद (आस्वाद) इत्यादी हारांच्या पदार्थांच्या निर्धारणाच्या द्वारे. 'यथालक्षण' म्हणजे जे जे लक्षण आहे, किंवा लक्षणांच्या अनुरूप ते यथालक्षण होय. हेतू, फळ इत्यादींचा विचार करून त्यांच्याद्वारे योजना करावी, असा अभिप्राय आहे. आता हेतू, फळ इत्यादी ज्या हारामध्ये विशेष रूपाने अपेक्षित आहेत, ते दर्शवण्यासाठी 'विशेषतः पण...' इत्यादी म्हटले आहे. ते सहज समजण्यासारखेच आहे. นิทฺเทสวารวณฺณนา นิฏฺฐิตา. निद्देसवारवर्णना समाप्त झाली. ๔. ปฏินิทฺเทสวารวณฺณนา ४. पटिनiद्देसवारवर्णना ๑. เทสนาหารวิภงฺควณฺณนา १. देसनाहारविभंगवर्णना ๕. อนฺวตฺถสญฺญตนฺติ อตฺถานุคตสญฺญภาวํ, ‘‘เทสนาหาโร’’ติ อยํ สญฺญา อนฺวตฺถา อตฺถานุคตาติ อตฺโถ. ५. 'अन्वर्थसंज्ञा' म्हणजे अर्थाला अनुसरून असणारा संज्ञाभाव; 'देसनाहार' ही संज्ञा अन्वर्थक (अर्थाला अनुसरून असणारी) आहे, असा अर्थ आहे. อวุตฺตเมวาติ [Pg.42] ปุพฺเพ อสํวณฺณิตปทเมว. ‘‘ธมฺมํ โว’’ติอาทิ (ม. นิ. ๓.๔๒๐) วจนสฺส สมฺพนฺธํ ทสฺเสตุํ ‘‘กตฺถ ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. เตปิฏกสฺส หิ พุทฺธวจนสฺส สํวณฺณนาลกฺขณํ เนตฺติปฺปกรณํ, ตญฺจ ปริยตฺติธมฺมสงฺคาหเก สุตฺตปเท สํวณฺเณตพฺพภาเวน คหิเต คหิตเมว โหติ. เตนาห ‘‘เทสนาหาเรน…เป… ทสฺเสตี’’ติ. 'न म्हटलेलेच' म्हणजे पूर्वी वर्णन न केलेले पदच. 'धम्मं वो' (तुम्हाला धम्म...) इत्यादी वचनाचा संबंध दर्शवण्यासाठी 'कुठे बरं...' इत्यादी म्हटले आहे. कारण तिपिटकातील बुद्धवचनाचे वर्णन करण्याचे लक्षण म्हणजे 'नेत्तिप्पकरण' होय, आणि ते परियत्तिधम्माचा संग्रह करणाऱ्या सुत्तपदांमध्ये वर्णन करण्याच्या भावाने ग्रहण केले असता ग्रहण केलेलेच असते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'देसनाहाराने... दर्शवतो'. เยสํ อสฺสาทาทีนํ วิภชนลกฺขโณ เทสนาหาโร, เต คาถาย, อิธาปิ จ อาคเต ‘‘อสฺสาทํ อาทีนว’’นฺติอาทินา อุทาหรณวเสน วิภชิตุํ ‘‘ตตฺถ กตโม อสฺสาโท’’ติอาทิ อารทฺธํ. ตตฺถ ตตฺถาติ ตสฺสํ ‘‘อสฺสาทาทีนวตา’’ติ คาถายํ วุตฺโต กตโม อสฺสาโท. อถ วา ‘‘อสฺสาทํ อาทีนว’’นฺติอาทินา โย อิธ อสฺสาทาทีนํ อุทฺเทโส, ตตฺถ กตโม อสฺสาโทติ เจติ อตฺโถ. เอส นโย เสเสสุปิ. กมฺมกรณตฺถภินฺนสฺส วิสยวิสยิตาลกฺขณสฺส อสฺสาททฺวยสฺส นิทสฺสนตฺถํ คาถาทฺวยุทาหรณํ, ตถา กามวิปริณามลกฺขณสฺส, วฏฺฏทุกฺขลกฺขณสฺส จาติ ทุวิธสฺสาปิ อาทีนวสฺส นิทสฺสนตฺถํ ‘‘อริยมคฺโค นิพฺพาน’’นฺติ ทุวิธสฺสาปิ นิสฺสรณสฺส นิทสฺสนนิทสฺสนตฺถญฺจ ทฺเว ทฺเว คาถา อุทาหฏา. ज्या अस्साद (आस्वाद) इत्यादींचे विभाजन करण्याचे लक्षण असलेला देसनाहार आहे, त्यांना गाथेमध्ये आणि येथेही आलेल्या 'अस्साद, आदीनव...' इत्यादी उदाहरणांच्या द्वारे विभाजित करण्यासाठी 'त्यात अस्साद कोणता?' इत्यादी सुरू केले आहे. 'त्यात' म्हणजे त्या 'अस्साद-आदीनवत' या गाथेत सांगितलेला अस्साद कोणता? किंवा 'अस्साद, आदीनव' इत्यादींद्वारे जो येथे अस्साद इत्यादींचा निर्देश आहे, त्यात अस्साद कोणता, असा अर्थ आहे. हाच नियम उर्वरित पदांच्या बाबतीतही लागू होतो. कर्म आणि करण या अर्थांनी भिन्न असलेल्या, विषय आणि विषयी लक्षण असलेल्या दोन प्रकारच्या अस्सादांचे दर्शन घडवण्यासाठी दोन गाथांचे उदाहरण दिले आहे, तसेच कामाचा विपरिणाम हे लक्षण असलेल्या आणि वट्टदुक्ख (संसार दुःख) हे लक्षण असलेल्या अशा दोन्ही प्रकारच्या आदीनवांचे (दोषांचे) दर्शन घडवण्यासाठी, आणि 'अरियमग्ग' (आर्यमार्ग) व 'निब्बान' (निर्वाण) या दोन्ही प्रकारच्या निस्सरणांचे (मुक्तीचे) दर्शन घडवण्यासाठी दोन-दोन गाथा उद्धृत केल्या आहेत. ธมฺโม หเว รกฺขติ ธมฺมจารินฺติ (ชา. ๑.๑๐.๑๐๒-๑๐๓; เนตฺติ. ๕, ๒๖, ๓๑; เปฏโก. ๒๒) เอตฺถ ธมฺมจาริโน มคฺคผลนิพฺพาเนหิ สาติสยารกฺขา สมฺภวติ, สมฺปตฺติภวสฺสาปิ วิปริณามสงฺขารทุกฺขตาหิ ทุคฺคติภาโว อิจฺฉิโตวาติ อธิปฺปาเยนาห ‘‘นิสฺสรณํ อนามสิตฺวา’’ติ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘นิพฺพานํ วา อุปนิธาย สพฺพา อุปปตฺติโย ทุคฺคตี’’ติ. 'धम्म खरोखर धम्माचे आचरण करणाऱ्याचे रक्षण करतो' येथे धम्माचे आचरण करणाऱ्याचे मार्ग, फळ आणि निब्बान (निर्वाण) यांच्याद्वारे अतिशय श्रेष्ठ रक्षण संभवते, संपत्ती आणि भवाचा देखील विपरिणाम-दुःख व संखारा-दुःख यांच्यामुळे दुर्गतीभावच अपेक्षित आहे, या अभिप्रायाने 'निस्सरणाचा (मुक्तीचा) उल्लेख न करता' असे म्हटले आहे. कारण पुढे असे म्हटले जाईल की, 'निब्बान (निर्वाण) लक्षात घेता सर्व उत्पत्ती (पुनर्जन्म) ही दुर्गतीच आहे.' อเวกฺขสฺสูติ วิธานํ. ตสฺสา ปน อเวกฺขาย ปวตฺติอากาโร, วิสโย, กตฺตา จ ‘‘สุญฺญโต, โลกํ, โมฆราชา’’ติ ปทตฺตเยน วุตฺตาติ อาห – ‘‘สุญฺญโต…เป… อาณตฺตี’’ติ. ตตฺถ สงฺขารานํ สุญฺญตา อนตฺตสภาวตาย, อตฺตสุญฺญตาย จ สิยา. ยโต เต น วสวตฺติโน, อตฺตสารวิรหิตา จ, ยโต เต อนตฺตา, ริตฺตา, ตุจฺฉา จ อตฺตนา, ตทุภยํ ทสฺเสติ ‘‘อวสวตฺติตา’’ติอาทินา. เอวํ มจฺจุตโร สิยาติ เอวํ ปฏิปตฺติยา มจฺจุตโร ภเวยฺยาติ อตฺโถ. ปริกปฺเปตฺวา วิธิยมานสฺส มจฺจุตรณสฺส ปุพฺพภาคปฏิปทา เทสนาย ปจฺจกฺขโต สิชฺฌมานํ สาติสยํ ผลนฺติ อาห ‘‘ตสฺส ยํ…เป… ผล’’นฺติ. 'अवलोकन कर' (अवेक्खस्सु) हे विधान आहे. पण त्या अवलोकनाचा प्रवृत्तीचा प्रकार, विषय आणि कर्ता हे 'शून्यतः', 'लोक' आणि 'मोघराज' या तीन पदांनी सांगितले आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'शून्यतः... आज्ञा'. त्यात संखांराची (संस्कारांची) शून्यता ही अनत्त-स्वभावामुळे (अनात्म-स्वभावामुळे) आणि आत्म-शून्यतेमुळे असते. कारण ते वशामध्ये नसणारे (अवशवर्ती) आणि आत्मसाराने विरहित आहेत, कारण ते स्वतः अनत्त (अनात्मा), रिक्त आणि तुच्छ आहेत, हे दोन्ही 'अवशवर्तित्व' इत्यादींद्वारे दर्शवले आहे. 'अशा प्रकारे मृत्यूला पार करणारा व्हावा' म्हणजे अशा प्रतिपदेने (आचरणाने) मृत्यूला पार करणारा व्हावा, असा अर्थ आहे. कल्पनेने विहित केलेल्या मृत्यू-तरणाच्या पूर्वभागाची प्रतिपदा ही देशनेच्या प्रत्यक्ष रूपाने सिद्ध होणारे अतिशय श्रेष्ठ फळ आहे, म्हणून म्हटले आहे – 'त्याचे जे... फळ'. ๖. อุทาหรณวเสนาติ [Pg.43] นิทสฺสนวเสน. ตตฺถ ‘‘ปุคฺคลวิภาเคนา’’ติ อิมินา อุคฺฆฏิตญฺญุอาทิปุคฺคลปโยชิโต อสฺสาทาทีสุ ภควโต เทสนาวิเสโสติ ทสฺเสติ. ६. 'उदाहरणाच्या वशाने' म्हणजे निदर्शनाच्या (उदाहरणाच्या) वशाने. त्यात 'पुद्गल-विभागाने' याने उग्घटितञ्ञू (तीव्र बुद्धीचे) इत्यादी पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) निमित्ताने अस्साद इत्यादींमध्ये भगवंतांचा विशिष्ट उपदेश (देसनाविशेष) दर्शवला आहे. ฆฏิตมตฺตนฺติ โสตทฺวารานุสาเรน มโนทฺวาริกวิญฺญาณสนฺตาเนน อาลมฺพิตมตฺตํ. สสฺสตาทิอาการสฺสาติ สสฺสตุจฺเฉทาการสฺส. อิทญฺหิ ทฺวยํ ธมฺมเทสนาย จาเลตพฺพํ, น อนุโลมิกขนฺติ, ยถาภูตญาณํ วา. เอตสฺมิญฺหิ จตุกฺเก อาสยสามญฺญตา. วุตฺตญฺเหตํ – 'घटितमात्र' म्हणजे श्रोत्रद्वाराच्या (कानाच्या) अनुषंगाने मनद्वाराच्या विञ्ञाण-संतानाने (विज्ञान-प्रवाहाने) केवळ आलंबन केलेले. 'शाश्वत-इत्यादी आकाराचे' म्हणजे शाश्वत आणि उच्छेद आकाराचे. कारण हे दोन्ही धम्मदेसनेने दूर केले पाहिजेत, अनुलोमिक-खंती (अनुकूल क्षमा) किंवा यथाभूत-ञाण (यथार्थ ज्ञान) नव्हे. कारण या चतुष्कामध्ये आशयाची समानता आहे. म्हणूनच हे म्हटले आहे – ‘‘สสฺสตุจฺเฉททิฏฺฐี จ, ขนฺติ เจวานุโลมิกา; ยถาภูตญฺจ ยํ ญาณํ, เอตํ อาสยสญฺญิต’’นฺติ. (วิสุทฺธิ. มหาฏี. ๑.๑๓๖; ที. นิ. ฏี. ๑.ปฐมมหาสงฺคีติกถาวณฺณนา; สารตฺถ. ฏี. ๑.ปฐมมหาสงฺคีติกถาวณฺณนา, เวรญฺชกณฺฑวณฺณนา; วิ. วิ. ฏี. ๑.เวรญฺชกณฺฑวณฺณนา); “शाश्वत आणि उच्छेद दृष्टी, तसेच अनुलोमिक खंती (अनुकूल क्षमा), आणि जे यथाभूत ज्ञान आहे, याला आशय अशी संज्ञा दिली आहे.” จลนายาติ วิกฺขมฺภนาย. ปรานุวตฺติยาติ สมุจฺเฉทนาย. อุคฺฆฏิเต ชานาตีติ อุคฺฆฏิตญฺญูติ มูลวิภุชาทิปกฺเขเปน สทฺทสิทฺธิ เวทิตพฺพา. วิปญฺจิตนฺติ ‘‘วิสมํ จนฺทิมสูริยา ปริวตฺตนฺตี’’ติอาทีสุ (อ. นิ. ๔.๗๐) วิย ภาวนปุํสกนิทฺเทโสติ อาห ‘‘มนฺทํ สณิก’’นฺติ. นิสฺสรณอาทีนวนิสฺสรณอสฺสาทาทีนวนิสฺสรณานํ วิภาวนา เวเนยฺยตฺตยวินยนสมตฺถา. 'चलनासाठी' म्हणजे विक्खंभनासाठी (दडपून टाकण्यासाठी). 'परानुवृत्तीसाठी' म्हणजे समूळ नष्ट करण्यासाठी (समुच्छेदासाठी). 'उद्घाटित केल्यावर जाणतो तो उग्घटितञ्ञू' अशी मूळ-विभुज इत्यादींच्या प्रक्षेपणाने शब्दाची सिद्धी समजावी. 'विपञ्चित' म्हणजे 'चंद्र आणि सूर्य विषम रीतीने फिरतात' इत्यादींप्रमाणे भावनपुंसकाचा निर्देश असल्यामुळे 'हळूहळू, सावकाश' असे म्हटले आहे. निस्सरण (मुक्ती), आदीनव-निस्सरण, आणि अस्साद-आदीनव-निस्सरण यांचे स्पष्टीकरण हे तीन प्रकारच्या विनेय (शिष्य) जनांचे विनय (मार्गदर्शन) करण्यास समर्थ आहे. จตฺตาโรติ อสฺสาโท จ อาทีนโว จ อสฺสาโท อาทีนโว จ อสฺสาโท นิสฺสรณญฺจาติ เอเต จตฺตาโร. ยทิ นิสฺสรณวิภาวนา เวเนยฺยวินยนสมตฺถา, กสฺมา ปญฺจโม น คหิโตติ อาห ‘‘อาทีนวาวจนโต’’ติ. ยทิ หิ อุคฺฆฏิตญฺญุํ สนฺธาย อยํ นโย วุจฺจติ, นิสฺสรณมตฺเตน สิทฺธํ สิยา. อถ วิปญฺจิตญฺญุํ, เนยฺยํ วา, อาทีนโว จ นิสฺสรณญฺจ อสฺสาโท จ อาทีนโว นิสฺสรณญฺจ วตฺตพฺโพ สิยา? ตถา อปฺปวตฺตตฺตา น คหิโต. เตนาห ‘‘อาทีนวาวจนโต’’ติอาทิ. เทสนนฺติ สามญฺญโต คหิตํ ‘‘สุตฺเตกเทสํ คาถํ วา’’ติ วิเสเสติ. ปทปรมอคฺคหณญฺเจตฺถ สอุปายสฺส นิสฺสรณสฺส อนามฏฺฐตฺตา. 'चार' म्हणजे अस्साद (आस्वाद), आदीनव (दोष), अस्साद-आदीनव आणि अस्साद-निस्सरण (सुटका) हे चार होत. जर निस्सरणाचे स्पष्टीकरण विनेय (विनीत करावयाच्या व्यक्तींना) सन्मार्गावर आणण्यास समर्थ आहे, तर पाचवा का घेतला नाही? म्हणून म्हटले आहे - 'आदीनवाच्या वचनामुळे' (आदीनवावचनतो). जर हा नय 'उग्घटितञ्ञू' (शीघ्र बुद्धीच्या) व्यक्तीला उद्देशून सांगितला असेल, तर केवळ निस्सरणानेच कार्य सिद्ध होईल. पण जर 'विपञ्चितञ्ञू' (सविस्तर स्पष्टीकरणाने समजणारा) किंवा 'नेय्य' (मार्गदर्शनाने समजणारा) व्यक्ती असेल, तर आदीनव आणि निस्सरण, तसेच अस्साद, आदीनव आणि निस्सरण सांगावे लागेल का? तसे न घडल्यामुळे तो घेतला नाही. म्हणूनच 'आदीनवाच्या वचनामुळे' इत्यादी म्हटले आहे. 'देसना' (देशना) हे सामान्यपणे घेतले आहे, त्याला 'सुत्ताचा एक भाग किंवा गाथा' असे विशेषित केले आहे. आणि येथे 'पदपरम' (केवळ शब्दांवरच अवलंबून राहणारा) व्यक्तीचे ग्रहण न करणे हे उपायांसह निस्सरणाचा स्पर्श न केल्यामुळे आहे. ‘‘กลฺยาณ’’นฺติ อิมินา อิฏฺฐวิปาโก, ‘‘ปาปก’’นฺติ อนิฏฺฐวิปาโก อธิปฺเปโตติ อาห ‘‘อยํ อสฺสาโท, อยํ อาทีนโว’’ติ. ลาภาทีนํ ปุญฺญผลตฺตา ตทนุโรธํ วา สนฺธาย ‘‘อยํ อสฺสาโท’’ติ วุตฺตํ. ตพฺพิปริยาเยน อลาภาทีนํ อาทีนวตา เวทิตพฺพา. 'कल्याण' याने इष्ट विपाक (इच्छित फळ) आणि 'पापक' याने अनिष्ट विपाक अभिप्रेत आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'हा अस्साद (आस्वाद) आहे, हा आदीनव (दोष) आहे'. लाभ इत्यादी हे पुण्याचे फळ असल्यामुळे किंवा त्याला अनुसरून 'हा अस्साद आहे' असे म्हटले आहे. त्याच्या उलट अ लाभ (तोटा) इत्यादींची आदीनवतत्ता (दोषयुक्तता) समजावी. กามาติ [Pg.44] กิเลสกามสหิตา วตฺถุกามา. วิรูปรูเปนาติ อปฺปติรูปากาเรน. มเถนฺตีติ มทฺทนฺติ. ปพฺพชิโตมฺหีติ ปพฺพชฺชํ อุปคโต อมฺหิ. อปณฺณกนฺติ อวิรชฺฌนกํ. สามญฺญนฺติ สมณภาโว. สมิตปาปภาโวเยว เสยฺโย สุนฺทรตโร. 'काम' म्हणजे क्लेशकामासह वत्थुकाम (वस्तुरूप काम) होय. 'विरूपरूपाने' म्हणजे अयोग्य आकाराने. 'मथतात' म्हणजे चिरडतात (मर्दन करतात). 'पब्बजितोम्ही' म्हणजे मी प्रव्रज्येला प्राप्त झालो आहे. 'अपण्णक' म्हणजे अचूक (न चुकणारे). 'सामञ्ञ' म्हणजे श्रमणभाव (श्रमणत्व) होय. शमितपापभाव (पाप शांत करण्याचा भाव) हाच श्रेयस्कर आणि अधिक सुंदर आहे. ตตฺถ ‘‘กามา หิ จิตฺรา มธุรา มโนรมา’’ติ อยํ อสฺสาโท, ‘‘วิรูปรูเปน มเถนฺติ จิตฺต’’นฺติ อยํ อาทีนโว, ‘‘อปณฺณกํ สามญฺญ’’นฺติ อิทํ นิสฺสรณนฺติ อาห ‘‘อยํ…เป… นิสฺสรณญฺจา’’ติ. त्यामध्ये, 'काम हे चित्रविचित्र, मधुर आणि मनोरम असतात' हा अस्साद (आस्वाद) आहे, 'ते विरूपरूपाने चित्ताला मथतात' हा आदीनव (दोष) आहे, 'अपण्णक सामञ्ञ' (अचूक श्रमणत्व) हे निस्सरण (सुटका) आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'हा...पे... आणि निस्सरण'. ผลาทีนํ เอกกวเสน จ ติกวเสน จ ปาฬิยํ อุทาหฏตฺตา วุตฺตํ ‘‘ทุกวเสนปี’’ติ. फळ इत्यादींचे एकक रूपाने (एक-एक करून) आणि तिक रूपाने (तीन-तीन करून) पाळीमध्ये उदाहरण दिले असल्यामुळे 'दुक रूपाने (दोन-दोन करून) सुद्धा' असे म्हटले आहे. สุขา ปฏิปทา, ทุกฺขา ปฏิปทาติ ยา ทฺเว ปฏิปทา, ตาสุ เอเกกา ทนฺธขิปฺปาภิญฺญตาย ทฺเว ทฺเว โหนฺตีติ อาห ‘‘ปฏิปทาภิญฺญากโต วิภาโค ปฏิปทากโต โหตี’’ติ. กตปุพฺพกิจฺจสฺส ปถวีกสิณาทีสุ สพฺพปฐมํ ‘‘ปถวี’’ติอาทินา ปวตฺตมนสิกาโร ปฐมสมนฺนาหาโร. อุปจารนฺติ อุปจารชฺฌานํ. ปฏิปชฺชิตพฺพตาย ฌานมฺปิ ‘‘ปฏิปทา’’ติ วุจฺจติ. ตทญฺญา เหฏฺฐิมปญฺญโต อธิกา ปญฺญาติ กตฺวา ‘‘อภิญฺญา’’ติ วุจฺจติ. सुखा प्रतिपदा (सुखकर मार्ग) आणि दुःखा प्रतिपदा (दुःखकर मार्ग) हे जे दोन मार्ग आहेत, त्यातील प्रत्येक मार्ग मंद आणि क्षिप्र अभिज्ञतेमुळे दोन-दोन होतात, म्हणून म्हटले आहे - 'प्रतिपदा आणि अभिज्ञेनुसार केलेला विभाग प्रतिपदेनुसार होतो'. पूर्वकृत्य केलेल्या साधकाचा पथवीकसिण (पृथ्वीकृत्स्न) इत्यादींमध्ये सर्वप्रथम 'पृथ्वी' इत्यादी रूपाने प्रवृत्त होणारा मनसिकार हा 'प्रथम समन्नाहार' (पहिला मनोयोग) आहे. 'उपचार' म्हणजे उपचारध्यान (उपचारज्झान) होय. आचरणीय असल्यामुळे ध्यानालाही 'प्रतिपदा' म्हटले जाते. त्याहून भिन्न, खालच्या प्रज्ञेपेक्षा अधिक असणाऱ्या प्रज्ञेला 'अभिज्ञा' (अभिञ्ञा) म्हटले जाते. กิเลเสติ นีวรณปฺปกาเร, ตํสหคตกิเลเส จ. องฺคปาตุภาวนฺติ วิตกฺกาทิฌานงฺคปฏิลาภํ. 'क्लेशांमध्ये' म्हणजे नीवरण प्रकारच्या आणि त्यांच्याशी संबंधित क्लेशांमध्ये. 'अंग प्रादुर्भाव' म्हणजे वितर्क इत्यादी ध्यान-अंगांची प्राप्ती होय. อภินิวิสนฺโตติ ปฏฺฐเปนฺโต. รูปารูปํ ปริคฺคณฺหนฺโตติ รูปารูปธมฺเม ลกฺขณาทีหิ ปริจฺฉินฺทิตฺวา คณฺหนฺโต. ปริคฺคหิตรูปารูปสฺส มคฺคปาตุภาวทนฺธตา จ นามรูปววตฺถานาทีนํ กิจฺฉสิทฺธิยา สิยาติ น รูปารูปปริคฺคหกิจฺฉตาย เอว ทุกฺขาปฏิปทตา วตฺตพฺพาติ เจ? น, นามรูปววตฺถาปนาทีนํ ปจฺจนีกกิเลสมนฺทตาย สุขสิทฺธิยมฺปิ ตถาสิทฺธวิปสฺสนาสหคตานํ อินฺทฺริยานํ มนฺทตาย มคฺคปาตุภาวโต. รูปารูปํ ปริคฺคเหตฺวาติ อกิจฺเฉนปิ ปริคฺคเหตฺวา, กิจฺเฉน ปริคฺคหิเต วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. เอวํ เสเสสุปิ. นามรูปํ ววตฺถาเปนฺโตติ ‘‘นามรูปมตฺตเมตํ, น อญฺโญ โกจิ สตฺตาทิโก’’ติ ววตฺถาปนํ กโรนฺโต. กตโร ปเนตฺถ วาโร ยุตฺตรูโปติ? โย โกจิ สกึ, ทฺวิกฺขตฺตุํ, อเนกสตกฺขตฺตุนฺติ เอวมาทีสุ หิ วิกฺขมฺภนวาเรสุ สกึ, ทฺวิกฺขตฺตุญฺจ วิกฺขมฺภนวาโร สุขา ปฏิปทา เอว, น ตโต อุทฺธํ สุขา ปฏิปทา โหติ, ตสฺมา ติกฺขตฺตุํ วิกฺขมฺภนวารโต [Pg.45] ปฏฺฐาย ทุกฺขา ปฏิปทา เวทิตพฺพา. อปิจ กลาปสมฺมสนาวสาเน อุทยพฺพยานุปสฺสนาย อุปฺปนฺนสฺส วิปสฺสนุปกฺกิเลสสฺส ติกฺขตฺตุํ วิกฺขมฺภเนน กิจฺฉตาวาโร ทุกฺขา ปฏิปทา เวทิตพฺพา. เอตฺถ ทนฺธตฺตา ปฏิปทาย เอตสฺส อกิจฺฉตฺเตปิ ปุริมานํ กิจฺฉตฺเต ทุกฺขาปฏิปทตา วุตฺตนยาว. ยสฺส ปน สพฺพตฺถ อกิจฺฉตา, ตสฺส ปรมุกฺกํสคตา สุขา ปฏิปทา เวทิตพฺพา. 'अभिनिविसंतो' म्हणजे प्रस्थापित करणारा. 'रूप-अरूपाचे ग्रहण करणारा' म्हणजे रूप आणि अरूप धर्मांना लक्षण इत्यादींद्वारे परिच्छिन्न करून ग्रहण करणारा. ग्रहण केलेल्या रूप-अरूपाच्या मार्ग-प्रादुर्भावाची मंदता ही नाम-रूप व्यवस्थापना इत्यादींच्या कठीणतेने सिद्ध होत असल्यामुळे, केवळ रूप-अरूप ग्रहणाच्या कठीणतेमुळेच 'दुःखा प्रतिपदा' म्हणावी का? असे विचारल्यास - नाही, नाम-रूप व्यवस्थापना इत्यादींची विरोधी क्लेशांच्या मंदतेमुळे सुखपूर्वक सिद्धी होत असतानाही, तशा प्रकारे सिद्ध झालेल्या विपश्यना-सहगत इंद्रियांच्या मंदतेमुळे मार्गाचा प्रादुर्भाव होतो. 'रूप-अरूपाचे ग्रहण करून' म्हणजे विनासायास ग्रहण करून; कष्टाने ग्रहण केल्यास तर सांगण्याची गरजच नाही. इतर बाबतीतही असेच समजावे. 'नाम-रूपाचे व्यवस्थापन करणारा' म्हणजे 'नाम-रूपाचे व्यवस्थापन करणारा' म्हणजे 'हे केवळ नाम-रूपच आहे, दुसरा कोणी सत्त्व (प्राणी) इत्यादी नाही' असे व्यवस्थापन करणारा. येथे कोणता पर्याय योग्य वाटतो? एकदा, दोनदा, अनेक शतवेळा इत्यादी विक्खंभन (दडपून टाकणे) पर्यायांमध्ये एकदा आणि दोनदा विक्खंभन पर्याय हा 'सुखा प्रतिपदा'च आहे, त्यानंतर सुखा प्रतिपदा होत नाही. म्हणून तीन वेळा विक्खंभन पर्यायापासून पुढे 'दुःखा प्रतिपदा' समजावी. शिवाय, कलाप-संमसन (समूहाचे परीक्षण) च्या शेवटी उदय-व्यय अनुपश्यनेमुळे उत्पन्न झालेल्या विपश्यना-उपक्लेशांच्या तीन वेळा विक्खंभनाने कठीणतेचा पर्याय हा 'दुःखा प्रतिपदा' समजावा. येथे प्रतिपदेच्या मंदतेमुळे, याच्या सुलभतेतही पूर्वीच्या कठीणतेमध्ये दुःखा प्रतिपदेचे स्वरूप सांगितल्याप्रमाणेच आहे. परंतु ज्याला सर्वत्र सुलभता आहे, त्याची 'सुखा प्रतिपदा' ही परम उत्कृष्टतेस पोहोचलेली समजावी. ยถา นามรูปปริคฺคหกิจฺฉตาย มคฺคปาตุภาวทนฺธตาย ทุกฺขา ปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญา วุตฺตา, ตถา ตพฺพิปริยาเยน จตุตฺถี, ตทุภยโวมิสฺสตาวเสน ทุติยา, ตติยา จ ญาตพฺพาติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘อิมินา…เป… เวทิตพฺพา’’ติ. วฏฺฏทุกฺขโต นิยฺยานสฺส อธิปฺเปตตฺตา ‘‘วิปสฺสนาปกฺขิกา เอวา’’ติ วุตฺตํ. ज्याप्रमाणे नाम-रूप ग्रहणाच्या कठीणतेमुळे आणि मार्ग-प्रादुर्भावाच्या मंदतेमुळे 'दुःखा प्रतिपदा मंदाभिज्ञा' म्हटली आहे, त्याचप्रमाणे त्याच्या उलट चौथी, आणि त्या दोन्हीच्या मिश्रणामुळे दुसरी व तिसरी समजावी, हे दर्शवताना म्हटले आहे - 'याने...पे... समजावी'. संसारदुःखातून सुटका (निर्याण) अभिप्रेत असल्यामुळे 'विपश्यना-पक्षीयच' असे म्हटले आहे. เหตุปายผเลหีติ เอตฺถ ตณฺหาจริตตา, มนฺทปญฺญตา จ ปฐมาย ปฏิปทาย เหตุ, ตณฺหาจริตตา, อุทตฺถปญฺญตา จ ทุติยาย, ทิฏฺฐิจริตตา, มนฺทปญฺญตา จ ตติยาย, ทิฏฺฐิจริตตา, อุทตฺถปญฺญตา จ จตุตฺถิยา. อุปาโย ปน ยถากฺกมํ สติสมาธิวีริยปญฺญินฺทฺริยานิ, สติปฏฺฐานฌานสมฺมปฺปธานสจฺจานิ จ อุปนิสฺสยภูตานิ. ผลํ วฏฺฏทุกฺขโต นิยฺยานํ. 'हेतू, उपाय आणि फळ' यांमध्ये - तृष्णाचरितता (तृष्णेचा स्वभाव) आणि मंदप्रज्ञता हा पहिल्या प्रतिपदेचा हेतू आहे; तृष्णाचरितता आणि तीव्रप्रज्ञता हा दुसऱ्या प्रतिपदेचा; दृष्टीचरितता (दृष्टीचा स्वभाव) आणि मंदप्रज्ञता हा तिसऱ्या प्रतिपदेचा; दृष्टीचरितता आणि तीव्रप्रज्ञता हा चौथ्या प्रतिपदेचा हेतू आहे. उपाय म्हणजे अनुक्रमे स्मृती, समाधी, वीर्य आणि प्रज्ञा हे इंद्रिय, आणि उपनिषयभूत (सहायक) असणारे स्मृतिप्रस्थान, ध्यान, सम्यक्प्रधान व सत्य हे होत. फळ म्हणजे संसारदुःखातून सुटका (निर्याण) होय. สมาธิมุเขนาติ สมาธิมุเขน ภาวนานุโยเคน. เตเนวาห ‘‘สมถปุพฺพงฺคมาย วิปสฺสนายา’’ติ. อิธาติ อิมสฺมึ เนตฺติปฺปกรเณ. วกฺขติ ‘‘ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ เสกฺขผล’’นฺติ, ‘‘ราควิราคา เจโตวิมุตฺติกามธาตุสมติกฺกม’’นฺติ จ. โสติ อนาคามี. 'समाधीच्या मुखाने' म्हणजे समाधीच्या मुखाने केलेल्या भावनेच्या अभ्यासाने (भावनानुयोग). म्हणूनच म्हटले आहे - 'शमथपूर्वंगम विपश्यनेने'. 'येथे' म्हणजे या नेत्तिप्पकरणामध्ये. पुढे सांगतील - 'रागविरागा चेतोविमुत्ती हे शैक्षफळ आहे' आणि 'रागविरागा चेतोविमुत्ती हा कामधातूचा अतिक्रम आहे'. 'तो' म्हणजे अनागामी होय. เตนาติ ปฏิปกฺเขน. ตโตติ ปฏิปกฺขโต. สมานาธิกรณวเสน จ เจโตวิมุตฺติสทฺทานํ สมาสํ กตฺวา ภินฺนาธิกรณวเสน วตฺตุํ ‘‘อถ วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ปุน ‘‘เจตโส วา’’ติอาทินา อญฺญปทตฺถวเสน เจโตวิมุตฺติปทานํ สมาสํ ทสฺเสติ. วิญฺญาณปริยาเยน เจโต-สทฺเทน วุตฺตโยชนา น สมฺภวตีติ อาห ‘‘ยถาสมฺภว’’นฺติ. 'त्याने' म्हणजे प्रतिपक्षाने (विरोधी घटकाने). 'त्यापासून' म्हणजे प्रतिपक्षापासून. समानाधिकरण रूपाने 'चेतोविमुत्ती' शब्दांचा समास करून, भिन्नाधिकरण रूपाने सांगण्यासाठी 'अथवा' इत्यादी म्हटले आहे. पुन्हा 'चित्ताची किंवा' इत्यादींद्वारे अन्यपदार्थ रूपाने 'चेतोविमुत्ती' पदांचा समास दर्शवला आहे. विज्ञान-पर्याय असलेल्या 'चेतो' शब्दाने सांगितलेली योजना संभवत नाही, म्हणून म्हटले आहे - 'यथासंभव'. หา-สทฺโท คติอตฺโถ, คติ เจตฺถ ญาณคติ อธิปฺเปตาติ อาห ‘‘หาตพฺพาติ คเมตพฺพา’’ติ. เนตพฺพาติ ญาเปตพฺพา. 'हा' शब्द गत्यर्थक (गती दर्शवणारा) आहे, आणि येथे गती म्हणजे ज्ञानगती अभिप्रेत आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'हातब्बा म्हणजे जाणावी (गमनायोग्य)'. 'नेतब्बा' म्हणजे ज्ञापित करावी (जाणून घ्यावी). ๗. ตนฺติ [Pg.46] ปุคฺคลวิภาคํ. ญาณวิภาเคนาติ สุตมยาทิญาณปฺปเภเทน. นิพฺพตฺตนนฺติ อุปฺปาทนํ. ตตฺถาติ ตสฺมึ อุคฺฆฏิตญฺญุตาติอาทิปุคฺคลวิภาคภูเต เทสนาภาชเน. เทสนายนฺติ สุตฺเต. ตํ ทสฺเสตุนฺติ ตํ ปุคฺคลวิภาคํ ทสฺเสตุํ. ‘‘สฺวายํ หาโร กถํ สมฺภวตี’’ติ เกจิ ปฐนฺติ. ७. 'तन्ति' म्हणजे पुद्गलविभाग (व्यक्तींचे वर्गीकरण). 'ज्ञानविभागाने' म्हणजे श्रुतमय इत्यादी ज्ञानाच्या प्रकारांनी. 'निब्बत्तनं' म्हणजे उत्पन्न करणे. 'तेथे' (तत्थ) म्हणजे त्या 'उग्घटितञ्ञू' (शीघ्र बुद्धीचे) इत्यादी पुद्गलविभागाने युक्त अशा देशनेच्या पात्रात. 'देशनेमध्ये' म्हणजे सुत्तात. 'ते दर्शविण्यासाठी' म्हणजे तो पुद्गलविभाग दर्शविण्यासाठी. काही लोक “स्वायं हारो कथं सम्भवती” (तो हा हार कसा संभवतो?) असा पाठ वाचतात. สาติ วุตฺตปฺปการธมฺมตฺถานํ วีมํสนปญฺญา. อธิการโตติ ‘‘สตฺถา วา ธมฺมํ เทสยตี’’ติอาทิอธิการโต. สามตฺถิยโต อุคฺฆฏิตญฺญุอาทิเวเนยฺยวินยนสมตฺถภาวโต. ปริยตฺติธมฺมสฺส อุปธารณนฺติ เอตฺถาปิ ‘‘อธิการโต สามตฺถิยโต วา’’ติ อาเนตฺวา โยเชตพฺพํ. 'ती' (सा) म्हणजे वर सांगितलेल्या धर्म आणि अर्थांचे परीक्षण करणारी प्रज्ञा होय. 'अधिकाराने' (अधिकारतो) म्हणजे “शास्ता (बुद्ध) किंवा धर्म उपदेशितात” इत्यादी अधिकाराने. 'सामर्थ्याने' (सामत्थियतो) म्हणजे 'उग्घटितञ्ञू' (शीघ्र बुद्धीचे) इत्यादी विनेय (शिष्य) जनांना प्रशिक्षित करण्याच्या सामर्थ्यामुळे. 'परियत्तिधम्माचे धारण करणे' (परियत्तिधम्मस्स उपधारणं) यामध्ये सुद्धा “अधिकाराने किंवा सामर्थ्याने” हे आणून जोडले पाहिजे. ‘‘วีมํสาทิปริยายวตี ปฐมวิกปฺปวเสน, วีมํสาทิวิภาควตี ทุติยวิกปฺปวเสน, จินฺตาย เหตุภูตาย นิพฺพตฺตา จินฺตามยี’’ติ เอวมาทิวุตฺตนยานุสาเรน สกฺกา โยเชตุนฺติ อาห ‘‘เสสํ วุตฺตนยเมวา’’ติ. “पहिल्या विकल्पाच्या (पर्यायाच्या) नियमाने ती मीमांसा (परीक्षण) इत्यादी पर्यायांनी युक्त आहे, दुसऱ्या विकल्पाच्या नियमाने ती मीमांसा इत्यादी विभागांनी युक्त आहे, आणि चिंतेच्या (विचाराच्या) कारणाने उत्पन्न झालेली ती 'चिंतामयी' (चिंतामय प्रज्ञा) आहे” अशा प्रकारे वर सांगितलेल्या पद्धतीनुसार जोडणे शक्य आहे, म्हणून म्हटले आहे - “उर्वरित भाग सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे” (सेसं वुत्तनयमेवाति). สุตจินฺตามยญาเณสูติ สุตมยญาเณ จ จินฺตามยญาเณ จ สุตจินฺตามยญาเณสุ จ สุตจินฺตามยญาเณสูติ เอกเทสสรูเปกเสโส เวทิตพฺโพ. จินฺตามยญาเณเยว หิ ปติฏฺฐิตา มหาโพธิสตฺตา จริมภเว วิปสฺสนํ อารภนฺติ, อิตเร สุตจินฺตามยญาเณสูติ. เตหีติ ตถา ปฐนฺเตหิ. วุตฺตนเยนาติ ‘‘อุปาทารูปํ ปริคฺคณฺหาติ, อรูปํ ปริคฺคณฺหาตี’’ติอาทินา ปฏิปทากถายํ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๕) วุตฺตนเยน. 'श्रुतचिंतामयज्ञानांमध्ये' (सुतचिन्तामयञाणेसू) म्हणजे श्रुतमय ज्ञानात आणि चिंतामय ज्ञानात; येथे 'श्रुतचिंतामयज्ञानांमध्ये' आणि 'श्रुतचिंतामयज्ञानांमध्ये' असा एकदेशसरूपैकशेष (व्याकरण नियम) समजावा. कारण चिंतामय ज्ञानातच प्रतिष्ठित असलेले महाबोधिसत्व अंतिम जन्मात विपश्यनेला आरंभ करतात, आणि इतर लोक श्रुतचिंतामय ज्ञानांमध्ये (आरंभ करतात). 'त्यांच्याद्वारे' (तेही) म्हणजे तसा पाठ वाचणाऱ्यांद्वारे. 'सांगितलेल्या पद्धतीने' (वुत्तनयेना) म्हणजे “उपादारूपाचे ग्रहण करतो, अरूपाचे ग्रहण करतो” इत्यादी प्रकारे प्रतिपदाकथेमध्ये (नेत्ति-अट्ठकथा ५) सांगितलेल्या पद्धतीने. ๘. ปรโต โฆโส ปจฺจยภูโต เอติสฺสาติ อธิปฺปาโย. ‘‘ปจฺจตฺตสมุฏฺฐิเตน จ โยนิโสมนสิกาเรนา’’ติ อิทํ อาวุตฺตินเยน ทุติยํ อาวฏฺฏตีติ เวทิตพฺพํ. เตน สาวกานํ ภาวนามยญาณุปฺปตฺติ สงฺคหิตา โหติ. สาวกานเมว วา ญาณุปฺปตฺติ อิธาธิปฺเปตา อุคฺฆฏิตญฺญุอาทิวิภาคกถนโต. เอตสฺมึ ปกฺเข ปุพฺเพ วุตฺตเอกเสสนโยปิ ปฏิกฺขิตฺโต ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘อาสยปโยคปโพธสฺส นิปฺผาทิตตฺตา’’ติ เอเตน ปจฺฉิมจกฺกทฺวยปริยาปนฺนานิ ปุพฺพเหตุสงฺคหานิ สุตจินฺตามยญาณานิ สนฺธาย ‘‘อิมา ทฺเว ปญฺญา อตฺถี’’ติ วุตฺตนฺติ ทสฺเสติ. อตฺถิภาโว เจตาสํ ปฏิปกฺเขน อนุปทฺทุตตา เวทิตพฺพา. อปริกฺขตตฺตา อนภิสงฺขตตฺตา. สุตมยญาณสฺสาปิ ปุริมสิทฺธสฺส. ८. 'दुसऱ्याचा घोष (उपदेश) हिच्यासाठी प्रत्यय (कारण) बनतो' हा याचा अभिप्राय आहे. “स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेल्या योनिसोमनसिकाराने (योग्य मनन-चिंतनाने)” हे आवृत्तीच्या नियमाने दुसऱ्यांदा पुनरावृत्त होते असे समजावे. त्यामुळे श्रावकांच्या भावनामय ज्ञानाची उत्पत्ती समाविष्ट होते. किंवा 'उग्घटितञ्ञू' (शीघ्र बुद्धीचे) इत्यादी विभागांच्या कथनावरून येथे केवळ श्रावकांच्याच ज्ञानाची उत्पत्ती अभिप्रेत आहे. या पक्षात पूर्वी सांगितलेला एकशेष नियम देखील नाकारलेला समजावा. “आशय आणि प्रयोगाच्या प्रबोधाची निष्पत्ती झाल्यामुळे” याद्वारे अंतिम दोन चक्रांमध्ये समाविष्ट असलेल्या आणि पूर्वहेतूंनी युक्त असलेल्या श्रुतचिंतामय ज्ञानांचा संदर्भ देऊन “या दोन प्रज्ञा आहेत” असे म्हटले आहे, हे दर्शविले जाते. आणि त्यांचे अस्तित्व हे प्रतिपक्षाद्वारे (विरोधी घटकांद्वारे) उपद्रव न होणे असे समजावे. 'अपरिक्खतत्ता' म्हणजे अनभिसंस्कृत असल्यामुळे. पूर्वी सिद्ध झालेल्या श्रुतमय ज्ञानाचे देखील. ๙. เทสนาปฏิปทาญาณวิภาเคหีติ [Pg.47] นิสฺสรณเทสนาทิเทสนาวิภาเคหิ, ทุกฺขาปฏิปทาทิปฏิปทาวิภาเคหิ, สุตมยญาณาทิญาณวิภาเคหิ. ९. 'देशना, प्रतिपदा आणि ज्ञान यांच्या विभागांनी' म्हणजे निस्सरण-देशना (मुक्तीची देशना) इत्यादी देशनाविभागांनी, दुःखा प्रतिपदा (कठीण मार्ग) इत्यादी प्रतिपदाविभागांनी, आणि श्रुतमय ज्ञान इत्यादी ज्ञानविभागांनी. อวสิฏฺฐปาริสชฺเชนาติ ขตฺติยคหปติปริสปริยาปนฺเนน. อฏฺฐนฺนนฺติ ขตฺติยปริสา พฺราหฺมณคหปติสมณจาตุมหาราชิกตาวตึสมารพฺรหฺมปริสาติ อิมาสํ อฏฺฐนฺนํ. 'अवशिष्ट पारिषदांद्वारे' (अवसिट्ठपारिसज्जेन) म्हणजे क्षत्रिय आणि गृहपतींच्या परिषदेत समाविष्ट असलेल्यांद्वारे. 'आठ' (अट्ठन्नं) म्हणजे क्षत्रिय परिषद, ब्राह्मण परिषद, गृहपती परिषद, श्रमण परिषद, चातुर्महाराजिक परिषद, तावतिंस परिषद, मार परिषद आणि ब्रह्म परिषद या आठ परिषदांचे. สมตฺเถตีติ สมตฺถํ สมฺพนฺธตฺถํ กโรติ. 'समत्थेति' म्हणजे समर्थ किंवा सुसंगत संबंध प्रस्थापित करतो. ตเมว ทฺวาทสปทภาวํ ทีเปตฺวาติ สมฺพนฺโธ. ตทตฺถสฺสาติ ฉฉกฺกปริยายตฺถสฺส (ม. นิ. ๓.๔๒๐ อาทโย). สพฺพปริยตฺติธมฺมสงฺคาหกตฺตา ฉฉกฺกปริยายสฺส, ตทตฺถสฺส จ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺเตน สุตฺเตน (สํ. นิ. ๕.๑๐๘๑; มหาว. ๑๓; ปฏิ. ม. ๒.๓๐) สงฺคหิตตฺตา วุตฺตํ ‘‘สพฺพสฺสาปิ…เป… วิภาเวนฺโต’’ติ. วิสยิภาเวน พฺยญฺชนปทานํ, วิสยภาเวน อตฺถปทานํ สมฺพนฺธํ สนฺธายาห ‘‘เตสํ…เป… สมฺพนฺธภาว’’นฺติ. 'त्याच द्वादशपदभावाला स्पष्ट करून' हा संबंध आहे. 'त्याच्या अर्थाचा' म्हणजे षट्षट्क पर्यायाच्या अर्थाचा (मज्झिम निकाय ३.४२० इत्यादी). षट्षट्क पर्याय हा सर्व परियत्तिधर्माचा संग्रह करणारा असल्यामुळे आणि त्याचा अर्थ धम्मचक्कपवत्तन सुत्तामध्ये समाविष्ट असल्यामुळे “सर्व...पे... विभाग करत” असे म्हटले आहे. विषयीभावाने व्यंजनपदांचा आणि विषयभावाने अर्थपदांचा संबंध लक्षात घेऊन “त्यांचा...पे... संबंधभाव” असे म्हटले आहे. ปทาวยโว อกฺขรานิ. ปทตฺโถติ ปทตฺถาวยโว. ปทตฺถคฺคหณสฺสาติ ปทตฺถาวโพธสฺส. วิเสสาธานํ วิเสสุปฺปตฺติ. วากฺยเภเทติ วากฺยวิเสเส. จิตฺตปริโตสนํ จิตฺตาราธนํ. พุทฺธินิสานํ ปญฺญาย เตชนํ ติกฺขภาวกรณํ. นานาวากฺยวิสยตาปิ สิทฺธา โหติ ปทาทีหิปิ สงฺกาสนสฺส สิทฺธตฺตา. เอกวากฺยวิสยตาย หิ อตฺถปทานํ สงฺกาสนาทโย ยถากฺกมํ อกฺขราทิวิสยา เอวาติ นิยโม สิยา. เอเตนาติ อตฺถปทานํ นานาวากฺยวิสยตฺเถน. पदाचा अवयव म्हणजे अक्षरे. 'पदत्थो' म्हणजे पदाच्या अर्थाचा अवयव. 'पदत्थग्गहणस्स' म्हणजे पदाच्या अर्थाचे आकलन होणे. 'विसेसाधानं' म्हणजे विशेष उत्पत्ती. 'वाक्यभेदे' म्हणजे वाक्यविशेषात. 'चित्तपरितोसनं' म्हणजे चित्ताचे समाधान (चित्ताराधन). 'बुद्धिनisानं' म्हणजे प्रज्ञेला धार लावणे, ती तीक्ष्ण करणे. पदांद्वारे देखील संकासन (प्रकटीकरण) सिद्ध होत असल्यामुळे नानावाक्यविषयता देखील सिद्ध होते. कारण एकाच वाक्याच्या विषयतेमध्ये अर्थपदांचे संकासन इत्यादी अनुक्रमाने अक्षरादींचेच विषय असतात, असा नियम होईल. 'याद्वारे' म्हणजे अर्थपदांच्या नानावाक्यविषयत्वामुळे. อุคฺฆฏนาทิอตฺถานีติ อุคฺฆฏนวิปญฺจนนยนปฺปโยชนานิ. 'उग्घटनादी अर्थ' म्हणजे उग्घटन (संक्षिप्त स्पष्टीकरण), विपञ्चन (विस्तृत स्पष्टीकरण) आणि नयन (मार्गदर्शन) यांचे प्रयोजन. ๑๐. อุปติฏฺฐติ เอตฺถาติ อุปฏฺฐิตนฺติ อุปฏฺฐิตสทฺทสฺส อธิกรณตฺถตํ ทสฺเสตุํ ‘‘อุปติฏฺฐนฏฺฐาน’’นฺติ วุตฺตํ ยถา ‘‘ปทกฺกนฺต’’นฺติ. เตนาห ‘‘อิทํ เนส’’นฺติอาทิ. ปฏิปตฺติเทสนาคมเนหีติ ปฏิปตฺติคมนเทสนาคมเนหิ. ‘‘กิจฺฉํ วตายํ โลโก อาปนฺโน ชายติ จ…เป… ชรามรณสฺสา’’ติอาทินา ชรามรณโต ปฏฺฐาย ปฏิจฺจสมุปฺปาทมุเขน วิปสฺสนํ อภินิวิสิตฺวา มหาคหนํ ฉินฺทิตุํ นิสานสิลายํ ผรสุํ นิเสนฺโต วิย กิเลสคหนํ ฉินฺทิตุํ โลกนาโถ ญาณผรสุํ เตเชนฺโต พุทฺธภาวาย เหตุสมฺปตฺติยา ปริปากคตตฺตา สพฺพญฺญุตญฺญาณาธิคมาย วิปสฺสนาคพฺภํ [Pg.48] คณฺหาเปนฺโต อนฺตรนฺตรา นานาสมาปตฺติโย สมาปชฺชิตฺวา อนุปทธมฺมวิปสฺสนาวเสน อเนกาการโวการสงฺขาเร สมฺมสนฺโต ฉตฺตึสโกฏิสตสหสฺสมุเขน ยํ ญาณํ ปวตฺเตสิ, ตํ ‘‘มหาวชิรญาณ’’นฺติ วทนฺติ. อฏฺฐกถายํ ปน ‘‘จตุวีสติโกฏิสตสหสฺสสมาปตฺติสญฺจาริมหาวชิรญาณ’’นฺติ (ที. นิ. อฏฺฐ. ๓.๑๔๑) อาคตํ, ตํ เทวสิกํ วฬญฺชนกสมาปตฺตีนํ ปุเรจรานุจรญาณํ สนฺธาย วุตฺตํ. ยํ ปน วกฺขติ ‘‘ญาณวชิรโมหชาลปทาลน’’นฺติ, ตํ สห วิปสฺสนาย มคฺคญาณํ เวทิตพฺพํ. เอตํ พฺรหฺมจริยนฺติ สาสนพฺรหฺมจริยํ อธิปฺเปตนฺติ ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘พฺรหฺมุโน’’ติอาทิมาห. १०. 'येथे उपस्थित राहतो' म्हणून 'उपस्थित' (उपट्टितं); 'उपट्टित' शब्दाचा अधिकरण अर्थ दर्शविण्यासाठी “उपस्थित राहण्याचे स्थान” (उपतिट्ठनट्ठानं) असे म्हटले आहे, जसे की “पदक्कतं” (पाऊल ठेवलेले स्थान). म्हणूनच “इदं नेसं...” इत्यादी म्हटले आहे. 'प्रतिपत्ति-देशना-गमनांनी' म्हणजे प्रतिपत्तीच्या गमनाने आणि देशनेच्या गमनाने. “हा लोक खरोखरच कष्टाला प्राप्त झाला आहे, जन्म घेतो...पे... जरामरणाचा” इत्यादी प्रकारे जरामरणापासून सुरुवात करून प्रतीत्यसमुत्पाद द्वारे विपश्यनेमध्ये प्रवेश करून, महाअरण्य तोडण्यासाठी सान दगडावर कुऱ्हाड घासून तीक्ष्ण करावी, त्याप्रमाणे क्लेशरूपी अरण्य तोडण्यासाठी लोकनाथांनी (बुद्धांनी) ज्ञानरूपी कुऱ्हाड तीक्ष्ण केली. बुद्धत्वासाठी हेतूंची संपत्ती परिपक्व झाली असल्यामुळे, सर्वज्ञता-ज्ञानाच्या प्राप्तीसाठी विपश्यनेचा गर्भ धारण करवून, वेळोवेळी विविध समापत्तींमध्ये समापन्न होऊन, अनुपद-धम्म-विपश्यनेच्या द्वारे अनेक प्रकारच्या संस्कारांचे संमसन (परीक्षण) करत छत्तीस लाख कोटी मुखांनी जे ज्ञान प्रवृत्त केले, त्याला “महावजिरज्ञान” (महावज्रज्ञान) असे म्हणतात. परंतु अट्ठकथेमध्ये “चोवीस लाख कोटी समापत्तींमध्ये संचार करणारे महावजिरज्ञान” असे आले आहे, ते दररोजच्या उपयोगातील समापत्तींच्या पूर्वगामी आणि अनुगामी ज्ञानाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. पुढे जे “ज्ञानवज्राने मोहजालाचे विदारण करणे” असे म्हटले जाईल, ते विपश्यनेसह मार्गज्ञान समजावे. 'हे ब्रह्मचर्य' म्हणजे शासन-ब्रह्मचर्य अभिप्रेत आहे, हे दर्शविण्यासाठी “ब्रह्मदेवाचे...” इत्यादी म्हटले आहे. เทสนายาติ กรณตฺเถ อิทํ กรณวจนํ. นิยุตฺโตติ เอตฺถ เหตุอตฺโถ อนฺโตนีโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘นิทฺธาเรตฺวา โยชิโต’’ติ อาห. 'देशनाया' (देशनेने) हे करण अर्थातील तृतीया विभक्तीचे रूप आहे. 'नियुक्त' (नियुत्तो) यामध्ये हेतूचा अर्थ अंतर्भूत आहे, हे दर्शविण्यासाठी “निश्चित करून जोडलेला” असे म्हटले आहे. เทสนาหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. देशनाहारविभंगवर्णन समाप्त झाले. ๒. วิจยหารวิภงฺควณฺณนา २. विचयहारविभंगवर्णन. ๑๑. ชาติลิงฺคกาลสาธนวิภตฺติสงฺขฺยาวิเสสาทิโต สทฺทโต ปทวิจโย กาตพฺโพ. ตตฺถ กริยมาโน จ ยถาสภาวนิรุตฺติยา เอว กโต สุกโต โหตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิทํ นามปทํ …เป… อยํ สทฺทโต ปทวิจโย’’ติ วตฺวา ‘‘โส ปนาย’’นฺติอาทิมาห. วตฺตพฺพอตฺถสํวณฺณนาติ ตํตํปทวจนียสฺส อตฺถสฺส เภทํ วตฺวา ปริยาเยหิ วิวริตฺวา กถนํ. ११. जाती (उत्पत्ती), लिंग, काळ, साधन (कारक), विभक्ती, संख्या आणि विशेष इत्यादी शब्दांच्या आधारे पदांचा शोध (पदविचय) केला पाहिजे. तेथे केला जाणारा (पदविचय) स्वभाव-निरुक्तीनुसार (नैसर्गिक भाषेनुसार) केला असता तो सुकृत (योग्य प्रकारे केलेला) होतो, हे दर्शविताना "हे नामपद... पे... हा शब्दांच्या आधारे पदविचय आहे" असे सांगून "सो पनायं" (तो हा) इत्यादी म्हटले आहे. "वत्तब्बअत्थसंवण्णना" (सांगावयाच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण) म्हणजे त्या त्या पदांद्वारे व्यक्त होणाऱ्या अर्थाचा भेद सांगून पर्यायांनी (विविध प्रकारे) त्याचे विवरण करून सांगणे होय। วิจิยมานสฺส สุตฺตปทสฺสาติ ปุจฺฉาวเสน ปวตฺตสุตฺตปทสฺส. ‘‘สุตฺตนฺตรปทานิปิ ปุจฺฉาวเสเนว ปวตฺตานี’’ติ วทนฺติ ‘‘น สพฺพมฺปิ สุตฺตปท’’นฺติ. เอกสฺเสว ปทสฺส สมฺภวนฺตานํ อเนเกสํ อตฺถานํ อุทฺธาโร อตฺถุทฺธาโร. เอกสฺเสว ปน อตฺถสฺส สมฺภวนฺตานํ อเนเกสํ ปทานํ อุทฺธาโร ปทุทฺธาโร. สพฺเพ หิ สํวณฺณิยมาเน สุตฺเต ลพฺภมาเน สพฺเพ ปทตฺเถ. นว สุตฺตนฺเตติ สุตฺตเคยฺยาทิวเสน นวปฺปกาเร สุตฺตสฺมึ อาเนตฺวา วิจินตีติ [Pg.49] โยชนา. อถ วา ‘‘สพฺเพ นว สุตฺตนฺเต’’ติ อิมินา ปวิจยลกฺขเณน หาเรน สุตฺตเคยฺยาทีนิ สพฺพานิปิ นวปฺปการานิ สุตฺตานิ วิจินตีติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘สุตฺตเคยฺยาทิเก’’ติอาทิ. "विचीयमानस्स सुत्तपदस्स" (शोधल्या जाणाऱ्या सुत्तपदाचे) म्हणजे प्रश्नाच्या स्वरूपात प्रवृत्त झालेल्या सुत्तपदाचे. "इतर सुत्तांमधील पदे देखील प्रश्नांच्या स्वरूपातच प्रवृत्त झाली आहेत" असे म्हणतात, "सर्वच सुत्तपदे नव्हे". एकाच पदाच्या संभवणाऱ्या अनेक अर्थांचा उद्धार (निवड) करणे म्हणजे "अत्थउद्धार" (अर्थोद्धार) होय. परंतु, एकाच अर्थासाठी संभवणाऱ्या अनेक पदांचा उद्धार करणे म्हणजे "पदुद्धार" (पदोद्धार) होय. कारण स्पष्टीकरण केल्या जाणाऱ्या सुत्तात सर्वच पदांचे अर्थ प्राप्त होतात. "नव सुत्तंते" म्हणजे सुत्त, गेय इत्यादी नऊ प्रकारच्या सुत्तांमध्ये आणून शोध घेतो, असा संबंध आहे. अथवा "सब्बे नव सुत्तंते" या प्रविचय-लक्षण हाराने (पद्धतीने) सुत्त, गेय इत्यादी सर्व नऊ प्रकारच्या सुत्तांचा शोध घेतो, असा अर्थ आहे. म्हणूनच "सुत्तगेय्यादिके" इत्यादी म्हटले आहे। ‘‘โกสลานํ ปุรา รมฺมา’’ติอาทิกา (สุ. นิ. ๙๘๒) ฉปญฺญาส คาถา วตฺถุคาถา. ‘‘ปารายนมนุคายิสฺส’’นฺติ (สุ. นิ. ๑๑๓๗ อาทโย) ปน อาทิกา เอกูนวีสติ คาถา อนุคีติคาถา. อิทํ นามํ กตนฺติ อิทํ ‘‘ปารายน’’นฺติ นามํ กตํ. เตนาห ‘‘ปารํ คมนียา อิเม ธมฺมา, ตสฺมา อิมสฺส ธมฺมปริยายสฺส ‘ปารายนนฺตฺเวว อธิวจน’’’นฺติ (สุ. นิ. ปารายนตฺถุติคาถา; จูฬนิ. ปารายนตฺถุติคาถา ๑๔๙ อาทโย). พุทฺธิยํ วิปริวตฺตมานนฺติ อิมสฺส วิจยหารวิภงฺคสฺส เทสนากาเล อายสฺมา มหากจฺจาโน อตฺตโน พุทฺธิยํ วตฺตมานํ กตฺวา เอวมาหาติ โยชนา. "कोसलांनं पुरा रम्मा" (सुत्तनिपात ९८२) इत्यादी छपन्न गाथा या "वत्थुगाथा" (प्रस्तावना गाथा) आहेत. "पारायनमनुगायिस्सं" (सुत्तनिपात ११३७ इत्यादी) या सुरुवातीच्या एकोणीस गाथा "अनुगीतिगाथा" आहेत. "हे नाव दिले" म्हणजे हे "पारायन" असे नाव दिले. म्हणूनच म्हटले आहे - "हे धम्म पार जाण्यासाठी (निर्वाण प्राप्तीसाठी) आहेत, म्हणून या धम्मपर्यायाचे 'पारायन' असेच नाव आहे." "बुद्धियं विपरिवत्तमानं" (बुद्धीमध्ये फिरत असलेले) म्हणजे या विचयहार-विभंगाच्या देशनेच्या वेळी आयुष्यमान महाकच्चायनांनी आपल्या बुद्धीमध्ये ते उपस्थित करून असे म्हटले, असा संबंध आहे। เอกํสพฺยากรณสฺส อยนฺติ เอกํสพฺยากรณียา, เอกํเสน วา พฺยากาตพฺพตฺตา เอกํสพฺยากรณียา, เอกํสพฺยากรณโยคฺคาติ อตฺโถ. เสสปททฺวเยปิ เอเสว นโย. ฐปนียาติ ฐเปตพฺพตฺตา อพฺยากรณียาติ อตฺโถ. สมยนฺตรปริจเยน นิวารณธมฺมํ ปติ สํสยปกฺขนฺโท ปุจฺฉตีติ อธิปฺปาเยนาห ‘‘วิมติจฺเฉทน’’นฺติ. ปกติยา ปน นิวารณธมฺมํ อชานนฺโต ญาตุกามตาย ปุจฺฉตีติ อทิฏฺฐโชตนาย ปุจฺฉาปิ สิยา. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘โลกสฺส นิวารณาทีนิ อชานนฺเตนา’’ติ. "एकंसब्याकरणस्स अयं" (एकांताने/निश्चितपणे उत्तर देण्यायोग्य) म्हणजे "एकंसब्याकरणीय" (निश्चितपणे उत्तर देण्यास योग्य), किंवा निश्चितपणे स्पष्टीकरण करण्यायोग्य असल्यामुळे "एकंसब्याकरणीय", म्हणजेच निश्चित उत्तरासाठी योग्य असा अर्थ आहे. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम लागू होतो. "ठपनीय" म्हणजे बाजूला ठेवण्यायोग्य असल्यामुळे "अब्याकरणीय" (उत्तर न देण्यायोग्य) असा अर्थ आहे. इतर दर्शनांच्या परिचयामुळे नीवरण-धम्माविषयी संशयात पडलेला मनुष्य विचारतो, या अभिप्रायाने "विमतिच्छेदनं" (संशयाचे निवारण) असे म्हटले आहे. परंतु, स्वभावानेच नीवरण-धम्माला न जाणणारा मनुष्य जाणून घेण्याच्या इच्छेने विचारतो, म्हणून ही न पाहिलेल्या गोष्टीला प्रकट करणारी (अदिट्ठजोतना) विचारणा देखील असू शकते. म्हणूनच पुढे म्हणतील - "जगाचे नीवरण इत्यादी न जाणणाऱ्याने..." เอกวตฺถุปริคฺคหาติ เอกสฺส อภิเธยฺยตฺถสฺส คหณโต. "एकवत्थुपरिग्गहा" (एकाच वस्तूचे ग्रहण करणे) म्हणजे एकाच अभिधेय (वाच्य) अर्थाचे ग्रहण केल्यामुळे। วิมุตฺติปริปาจกอินฺทฺริยานิ วิวฏฺฏปกฺเข ฐิตสฺส สทฺธาทโย ธมฺมา, กึ ปเนตฺถ อริยานมฺปิ อินฺทฺริยโลเกน สงฺคโห โหตีติ อาห ‘‘ปริยาปนฺนธมฺมวเสนา’’ติอาทิ. विमुक्तीला परिपक्व करणारी इंद्रिये म्हणजे विवर्त-पक्षात (संसारमुक्तीच्या मार्गात) स्थित असलेल्या व्यक्तीचे श्रद्धा इत्यादी धम्म होत. येथे काय आर्यांचाही इंद्रियलोकात समावेश होतो? म्हणून "परियापन्नधम्मवसेन" (अंतर्भूत धम्मांच्या आधारे) इत्यादी म्हटले आहे। กาฬปกฺขจาตุทฺทสีฆนวนสณฺฑเมฆปฏลจฺฉาทนอฑฺฒรตฺตีนํ วเสน จตุรงฺคสมนฺนาคเตน. วิวิจฺฉาติ วิจิกิจฺฉาย. เตนาห ‘‘วิจิกิจฺฉาเหตู’’ติ. ทุกฺขมสฺส มหพฺภยนฺติ เอตฺถ วุตฺตํ ‘‘อสฺสา’’ติ ปทํ ‘‘ชปฺปาภิเลปนํ อสฺส พฺรูมี’’ติ อาเนตฺวา สมฺพนฺธิตพฺพนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ชปฺปา ตณฺหา อสฺส โลกสฺสา’’ติ อาห. ‘‘สพฺพสตฺตาน’’นฺติอาทินา, ‘‘สพฺพโสวา’’ติอาทินา จ อนฺวยโต, พฺยติเรกโต จ สาติสยํ อวิชฺชาย นีวรณภาวํ [Pg.50] ทสฺเสติ. ‘‘ทูเร สนฺโต ปกาสนฺติ (ธ. ป. ๓๐๔; เนตฺติ. ๑๑), รตฺโต อตฺถํ น ชานาตี’’ติ (เนตฺติ. ๑๑, ๒๗) คาถาทฺวเยนาปิ อนุคีติวิจยํ ทสฺเสตีติ โยเชตพฺพํ. कृष्णपक्षातील चतुर्दशी, घनदाट वनराई आणि ढगांच्या थरांनी झाकलेली मध्यरात्र यांच्या योगाने चार अंगांनी युक्त (अंधकाराने). "विविच्छा" म्हणजे विचिकित्सेमुळे (संशयामुळे). म्हणूनच "विचिकित्साहेतू" असे म्हटले आहे. "दुक्खमस्स महब्भयं" (याचे दुःख हे मोठे भय आहे) येथे वापरलेले "अस्स" (याचे) हे पद "जप्पाभिलेपनं अस्स ब्रूमि" येथून आणून जोडले पाहिजे, हे दर्शविताना "जप्पा (तृष्णा) ही या जगाची आहे" असे म्हटले आहे. "सब्बसत्तानां" इत्यादींद्वारे आणि "सब्बसोवा" इत्यादींद्वारे अन्वय आणि व्यतिरेक या दोन्ही प्रकारे अविज्जेचा (अविद्येचा) नीवरणभाव (अडथळा असणे) अत्यंत प्रकर्षाने दर्शविला आहे. "दूरे संतो पकासेंति" आणि "रत्तो अत्थं न जानाति" या दोन गाथांद्वारे देखील अनुगीति-विचय दर्शविला आहे, असा संबंध जोडला पाहिजे। รูปาวจราติ รูปาวจรสตฺตา. วิปริณามทุกฺขตาย มุจฺจนสฺส การณวจนนฺติ สมฺพนฺโธ. ยโต วฏฺฏทุกฺขโต มุจฺจนํ. ตํ วฏฺฏทุกฺขํ อนวเสสปริยาทานวเสน สงฺขารทุกฺขตาคหเณน. "रूपावचरा" म्हणजे रूपावचर सत्त (प्राणी). विपरिणाम-दुःखापासून मुक्त होण्याच्या कारणाचे वचन, असा संबंध आहे. ज्या संसाराच्या दुःखापासून मुक्ती मिळते, ते संसार-दुःख संपूर्णपणे नष्ट करण्याच्या उद्देशाने संस्कार-दुःखतेच्या ग्रहणाने (समजून घेतल्याने) होते। เอกาธารนฺติ เอกวตฺถุ อธิฏฺฐานํ. นิวารณํ วิกฺขมฺภนํ ปิธานํ สมุจฺเฉโทติ อตฺถทฺวยสฺส ปุจฺฉิตตฺตา ‘‘อเนกาธารํ ทสฺเสตุ’’นฺติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘นิวารณสงฺขาตํ สํวรํ…เป… ปิธิยฺยนฺติ ปจฺฉิชฺชนฺตี’’ติ (สุ. นิ. อฏฺฐ. ๒.๑๐๔๑; จูฬนิ. อฏฺฐ. ๓). ตสฺสตฺโถ ‘‘นิวารณสงฺขาตํ วิกฺขมฺภนํ, สํวรํ, ปิธานญฺจ กเถหี’’ติ. "एकाधारं" म्हणजे एकच वस्तू किंवा अधिष्ठान. नीवरण (अडथळा), विष्कंभन (दडपून टाकणे), पिधान (झाकणे) आणि समुच्छेद (पूर्णपणे नष्ट करणे) या दोन अर्थांविषयी विचारले गेल्यामुळे "अनेकाधार दर्शवावे" असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "नीवरण नावाचा संवर... पे... झाकले जातात, कापले जातात." त्याचा अर्थ असा आहे - "नीवरण नावाचे विष्कंभन, संवर आणि पिधान सांग." ‘‘โวทาน’’นฺติ อิมินา โสตานํ วิกฺขมฺภนวิสุทฺธิ, ‘‘วุฏฺฐาน’’นฺติ อิมินา สมุจฺเฉทวิสุทฺธิ อธิปฺเปตาติ อาห ‘‘ปุจฺฉาย ทุวิธตฺถวิสยตํ วิวริตุํ ‘เอว’นฺติอาทิ วุตฺต’’นฺติ. ตถา จาห ‘‘โวทายติ…เป… อริยมคฺโค’’ติ. "वोदानं" (परिशुद्धी) याद्वारे स्रोतांची (प्रवाहांची) विष्कंभन-विशुद्धी आणि "वुट्ठानं" (उत्थान) याद्वारे समुच्छेद-विशुद्धी अभिप्रेत आहे, म्हणून "प्रश्नाच्या द्विविध अर्थविषयाचे विवरण करण्यासाठी 'एवं' इत्यादी म्हटले आहे" असे सांगितले आहे. तसेच म्हटले आहे - "वोदायति... पे... अरियमग्गो" (आर्यमार्ग)। ทิฏฺฐิมานาวิชฺชาโสตาปิ ตณฺหาโสตานุคาติ อาห ‘‘เยภุยฺเยน อนุโรธวเสนา’’ติ. อุปจารวเสนาติ นิสฺสิตุปจารวเสน. สพฺพสฺมาติ จกฺขุโต ยาว มนโตติ สพฺพสฺมา ทฺวารโต. สพฺพปฺปกาเรนาตฺติ ตณฺหายนมิจฺฉาภินิเวสนอุนฺนมนาทิปฺปกาเรน. दिट्ठि (दृष्टी), मान आणि अविज्जा (अविद्या) हे स्रोत देखील तण्हा-स्रोताचेच (तृष्णा-प्रवाहाचेच) अनुकरण करणारे आहेत, म्हणून "बहुतांश करून अनुनयाच्या (अनुरोधाच्या) वशाने" असे म्हटले आहे. "उपचारवसेन" म्हणजे आश्रित उपचाराच्या वशाने. "सब्बस्मा" (सर्वांपासून) म्हणजे चक्षूपासून (डोळ्यापासून) मनापर्यंत सर्व द्वारांपासून. "सब्बप्पकारेण" (सर्व प्रकारे) म्हणजे तृष्णा बाळगणे, इच्छा करणे, अभिनिवेश (आग्रह धरून बसणे) आणि गर्व करणे इत्यादी सर्व प्रकारांनी। ตเมว สตินฺติ ยายํ สติ ปุพฺพภาเค โสตานํ วิกฺขมฺภนวเสน วุตฺตา, ตเมว สตึ. มคฺคกฺขเณ โสตานํ สํวรํ ปิธานํ พฺรูมิ. ยสฺมา ปน ปิธายิกาปิ สติ มคฺคกฺขเณ ปญฺญานุคา, ปญฺญากิจฺจเมเวตฺถ อธิกํ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ปญฺญาเยเต ปิธียเร’’ติ. "तमेव सतिं" (त्याच सतीला/स्मृतीला) म्हणजे जी सती पूर्वभागात स्रोतांच्या विष्कंभनाच्या (दडपून टाकण्याच्या) संदर्भात सांगितली आहे, त्याच सतीला. मार्गक्षणी (मार्गाच्या क्षणी) स्रोतांचा संवर आणि पिधान (झाकणे) असे मी सांगतो. परंतु, झाकणारी सती देखील मार्गक्षणी प्रज्ञेचे अनुकरण करणारी असते आणि येथे प्रज्ञेचेच कार्य अधिक असते, म्हणून "पञ्ञायेते पिधीयरे" (प्रज्ञेने ते झाकले जातात) असे म्हटले आहे। สํวรปิธานานนฺติ เอตฺถ สํวรสทฺเทน นิวารณํ วุตฺตํ. "संवरपिधानानां" येथे संवर शब्दाने नीवरण (अडथळा) सांगितले आहे। ยสฺมึ ยสฺมึ อริยมคฺเค อนธิคเต ยํ ยํ อภิสงฺขารวิญฺญาณํ อุปฺปชฺชนารหํ, ตสฺมึ ตสฺมึ อธิคเต ตํ ตํ วิญฺญาณํ อนุปฺปาทนิโรเธน นิรุชฺฌติ สทฺธึ อตฺตนา สมฺปยุตฺตนามรูเปนาติ อาห ‘‘ตสฺส ตสฺส วิญฺญาณสฺส นิโรเธน สเหวา’’ติ. อนุปฺปาทนิโรโธ หิ เอตฺถ ‘‘นิโรโธ’’ติ อธิปฺเปโต อนุปาทิเสสนิพฺพานสฺส อธิปฺเปตตฺตาติ. อนุสนฺธียติ เอเตนาติ อนุสนฺธิ, อิธ ปุจฺฉิยมาโน อตฺโถ. ज्या ज्या आर्यमार्गाची प्राप्ती न झाल्यामुळे जे जे अभिसंस्कार-विञ्ञाण (अभिसंस्कार-विज्ञान) उत्पन्न होण्यास योग्य असते, त्या त्या आर्यमार्गाची प्राप्ती झाल्यावर ते ते विञ्ञाण आपल्याशी संप्रयुक्त असलेल्या नाम-रूपासह अनुत्पाद-निरोधाने निरुद्ध होते (नष्ट होते), म्हणून "तस्स तस्स विञ्ञाणस्स निरोधेन सहेव" (त्या त्या विज्ञानाच्या निरोधासोबतच) असे म्हटले आहे. कारण येथे "निरोध" या शब्दाने अनुत्पाद-निरोध अभिप्रेत आहे, कारण अनुपदिशेष-निब्बाण (अनुपाधिशेष निर्वाण) अभिप्रेत आहे. ज्याच्याद्वारे सांधा जोडला जातो तो अनुसंधी होय, येथे विचारलेला अर्थ (अनुसंधी) आहे। สห [Pg.51] วิสเยน ทสฺเสตุนฺติ เอตฺถ สจฺจานิ เอว วิสโย. ปหาตพฺพสภาวํ สมุทยสจฺจํ, ตสฺส วิสโย ทุกฺขสจฺจํ. ‘‘สํโยชนิเยสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ อสฺสาทานุปสฺสิโน วิหรโต ตณฺหา ปวฑฺฒตี’’ติ (สํ. นิ. ๒.๕๓, ๕๗) หิ วุตฺตํ. ปหายกสภาวํ มคฺคสจฺจํ, ตสฺส วิสโย นิโรธสจฺจนฺติ อาห ‘‘สห วิสเยน…เป… สจฺเจสู’’ติ. กามญฺเจตฺถ ‘‘สมุทโย ทฺวีสุ ภูมีสุ ปหียตี’’ติ อารทฺธํ, ‘‘ทสฺสเนน ตีณิ สํโยชนานิ ปหียนฺติ, ภาวนาย สตฺต สํโยชนานิ ปหียนฺตี’’ติ ปน วิภาควจนเมว วตฺตนฺติ อาห ‘‘ปหายกวิภาคมุเขน ปหาตพฺพวิภาคํ ทสฺเสตุ’’นฺติ. विषयासह दाखविणे म्हणजे येथे 'सत्य' (सच्च) हाच विषय आहे. प्रहाण (त्याग) करण्यायोग्य स्वभाव म्हणजे 'समुदयसत्य' होय, आणि त्याचा विषय 'दुःखसत्य' आहे. कारण, 'भिक्खूहो, संयोजनिय (बंधनात टाकणाऱ्या) धर्मांमध्ये आस्वादाचे अनुदर्शन करत राहणाऱ्या व्यक्तीची तृष्णा वाढते' (सं. नि. २.५३, ५७) असे म्हटले आहे. प्रहाण (नष्ट) करणारा स्वभाव म्हणजे 'मार्गसत्य' होय, आणि त्याचा विषय 'निरोधसत्य' आहे, म्हणूनच 'विषयासह... पे... सत्यांमध्ये' असे म्हटले आहे. जरी येथे 'समुदय दोन भूमींमध्ये प्रहीण (नष्ट) होतो' असे सुरू केले असले, तरी 'दर्शनाने तीन संयोजने प्रहीण होतात, भावनेने सात संयोजने प्रहीण होतात' हे विभागवचनच सांगण्यासाठी 'प्रहाण करणाऱ्याच्या विभागाद्वारे प्रहाण करण्यायोग्य विभागाला दर्शविण्यासाठी' असे म्हटले आहे. นิรวเสสกามราคพฺยาปาทา ตติยมคฺเคน ปหียนฺติ, อิตเร จตุตฺถมคฺเคนาติ วุตฺตํ ‘‘อิตเรหิ ปน นิรวเสส’’นฺติ. ตตฺถาติ กมฺมวิปากวฏฺฏปฺปเภเทน เตธาตุเก ภวตฺตเย. สํโยชนวเสนาติ สพฺพทา โยชนวเสน พนฺธนวเสน. कामराग आणि व्यापाद हे पूर्णपणे (निरवशेष) तिसऱ्या मार्गाने (अनागामी मार्गाने) प्रहीण होतात, आणि इतर (संयोजने) चौथ्या मार्गाने (अर्हत मार्गाने) प्रहीण होतात, म्हणून 'इतरांद्वारे पूर्णपणे' असे म्हटले आहे. 'तेथे' म्हणजे कर्म-विपाक-वट्ट (कर्म-विपाक-चक्र) च्या भेदाने तीन धातूंमधील (कामधातु, रूपधातु, अरूपधातु) तीन भवांमध्ये. 'संयोजनवश' म्हणजे नेहमी जोडण्याच्या वशने, बंधनाच्या वशने. ๑๒. อคฺคผลญาณตาย เอกมฺปิ สมานํ ตนฺนิมิตฺตสฺส ขยานุปฺปาทารมฺมณสฺส ปจฺจเวกฺขณญาณสฺส วเสน ผลโวหาเรน ทฺเว นามานิ ลภติ. १२. अग्रफळज्ञान (अर्हतफळज्ञान) एकच असूनही, त्याच्या निमित्ताने होणाऱ्या क्षय आणि अनुत्पाद रूप आलंबन असणाऱ्या प्रत्यवेक्षणज्ञानाच्या वशने, फळव्यवहाराने (फळाच्या संज्ञेने) दोन नावे प्राप्त करतो. โสมนสฺสนามลาโภ อิมินา อารมฺมณสงฺเกเตนาติ ตทตฺถํ วิวรนฺโต ‘‘ขเย…เป… สมญฺญายา’’ติ อาห. सौमनस्य हे नाव मिळणे या आलंबन-संकेतामुळे आहे, हाच अर्थ स्पष्ट करताना 'क्षयामध्ये... पे... संज्ञेमुळे' असे म्हटले आहे. ๑๓. ตคฺคหเณเนวาติ ผสฺสปญฺจมกปญฺจรูปินฺทฺริยคฺคหเณเนว. สหจรณาทินาติ สหชาตาทิอนนฺตราทิปจฺจยภาเวน เจว นิสฺสยารมฺมณาทินา จ. ‘‘สมฺปยุตฺต’’นฺติ อิมินา สหิตตา อวิสิฏฺฐตา อิธาธิปฺเปตาติ อาห ‘‘อวิภาเคน คหณียภาวํ สนฺธายา’’ติ. १३. त्याच्या ग्रहणानेच म्हणजे 'फस्सपंचमक' (स्पर्श-पंचमक) आणि पाच रूपेंद्रियांच्या ग्रहणानेच. 'सहचरणादीने' म्हणजे सहजात, अनंतरादी प्रत्ययभावाने आणि निश्रय-आलंबनादीने. 'संप्रयुक्त' या शब्दाने सहत्व (एकत्र असणे) आणि अविशिष्टत्व येथे अभिप्रेत आहे, म्हणूनच 'अविभागाने ग्रहण करण्यायोग्य भावाला उद्देशून' असे म्हटले आहे. กถํ สมาธินฺทฺริยํ อุปฺปาเทตีติ อาห ‘‘สติคฺคหเณน เจตฺถ ปริยุฏฺฐานปฺปหานํ อิธาธิปฺเปต’’นฺติ. น หิ สมาธินา ปริยุฏฺฐานปฺปหานํ สมฺภวติ. समाधींद्रिय कसे उत्पन्न होते? म्हणून म्हटले आहे - 'स्मृतीच्या ग्रहणाने येथे पर्युत्थान-प्रहाण (उद्भवलेल्या क्लेशांचे प्रहाण) अभिप्रेत आहे'. कारण समाधीने पर्युत्थान-प्रहाण संभवत नाही. ปทหติ เอเตนาติ ปธานํ, วีริยํ. เตติ วีริยสงฺขารา. เอกรเสนาติ ยถา อินฺทฺริยานิ เอกรสานิ โหนฺติ, เอวํ เอกรสภาเวน สรณโต ปวตฺตนโต. ตถา ปวตฺติยา เอว สุฏฺฐุ วต วีริยํ วาเหสีติ โยคินา สงฺกปฺเปตพฺพโต ตทุปควีริยวาหนฏฺเฐน ‘‘สมฺปหํสนา’’ติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘เอวํ เม…เป… เหตุภาวโต’’ติ. ज्याद्वारे प्रयत्न केला जातो ते 'प्रधान' म्हणजे वीर्य (ऊर्जा/प्रयत्न) होय. 'ते' म्हणजे वीर्यसंस्कार. 'एकरसाने' म्हणजे जशी इंद्रिये एकरस असतात, तसे एकरस भावाने शरण जाण्याने आणि प्रवृत्त होण्याने. तशा प्रवृत्तीनेच 'खरोखरच उत्तम प्रकारे वीर्य वहन केले' असा योग्याने संकल्प करायचा असल्यामुळे, त्याप्रत पोहोचणाऱ्या वीर्यवहनाच्या अर्थाने 'संप्रहंसन' (अत्यंत आनंदित करणे) असे म्हटले आहे. म्हणूनच 'अशा प्रकारे माझे... पे... हेतूभावामुळे' असे म्हटले आहे. อิทฺธิสทฺทสฺส [Pg.52] ปฐโม กตฺตุอตฺโถ, ทุติโย กรณตฺโถ วุตฺโต, ปาทสทฺทสฺส เอโก กรณตฺโถ เอว. ปชฺชิตพฺพา จ อิทฺธี วุตฺตา, น จ อิชฺฌนฺติ. ปชฺชิตพฺพา จ อิทฺธี ปชฺชนกรเณน ปาเทน สมานาธิกรณา น โหนฺตีติ ‘‘ปฐเมน อตฺเถน อิทฺธิ เอว ปาโท’’ติ กถํ สกฺกา วตฺตุํ, ตถา อิทฺธิกิริยากรเณน สาเธตพฺพา พุทฺธิสงฺขาตา อิทฺธิ ปชฺชนกิริยากรเณน ปชฺชิตพฺพาติ ทฺวินฺนํ กรณานํ น สมานาธิกรณตา สมฺภวตีติ ‘‘ทุติเยน อตฺเถน อิทฺธิยา ปาโท’’ติ กถํ สกฺกา วตฺตุนฺติ เจ? สกฺกา, ปาทสฺส อิชฺฌมานโกฏฺฐาส อิชฺฌนกรณูปายภาวโต. อถ วา ‘‘ปฐเมน อตฺเถน อิทฺธิยา ปาโท, ทุติเยน อตฺเถน อิทฺธิ เอว ปาโท อิทฺธิปาโท’’ติ เอวํ โยชนโต. กถํ? อนนฺตรตฺโถ ปจฺจาสตฺติญาเยน อิธ ปฐโมติ อธิปฺเปโต, ตโต ปุริโม ทุติโยติ. 'ऋद्धी' (इद्धि) शब्दाचा पहिला अर्थ कर्तृ-अर्थ (कर्ता) आणि दुसरा करण-अर्थ (साधन) सांगितला आहे, तर 'पाद' शब्दाचा केवळ एकच करण-अर्थ आहे. प्राप्त करण्यायोग्य ऋद्धी सांगितली आहे, आणि ती स्वतः सिद्ध होत नाही. प्राप्त करण्यायोग्य ऋद्धी ही प्राप्तीचे साधन असणाऱ्या पादाशी समानाधिकरण होत नाही, तर मग 'पहिल्या अर्थाने ऋद्धी हाच पाद आहे' असे कसे म्हणता येईल? तसेच, ऋद्धी-क्रिया करण्याने साध्य होणारी बुद्धी नावाची ऋद्धी ही प्राप्तीची क्रिया करण्याने प्राप्त करण्यायोग्य आहे, अशा प्रकारे दोन करणांचे समानाधिकरण संभवत नाही, तर मग 'दुसऱ्या अर्थाने ऋद्धीचा पाद' असे कसे म्हणता येईल? जर असे विचारले, तर (उत्तर आहे की) म्हणता येते; कारण पाद हा सिद्ध होणाऱ्या भागाच्या सिद्धीचे साधन आणि उपाय आहे. अथवा 'पहिल्या अर्थाने ऋद्धीचा पाद, दुसऱ्या अर्थाने ऋद्धी हाच पाद म्हणजे ऋद्धिपाद' अशी योजना केल्याने. कसे? अनंतर अर्थ (लगतचा अर्थ) प्रत्यासत्ती-न्यायाने येथे पहिला अभिप्रेत आहे, आणि त्याच्या आधीचा दुसरा. ‘‘ฉนฺทํ เจ ภิกฺขุ อธิปตึ กริตฺวา ลภติ สมาธิ’’นฺติอาทิ (วิภ. ๔๓๒) วจนโต ฉนฺทสมาธิปฺปธานสงฺขารสมนฺนาคตํ อิทฺธิปาทํ ภาเวตีติ เอตฺถาปิ ฉนฺทาธิปติ สมาธิ ฉนฺทสมาธีติ อธิปติสทฺทโลปํ กตฺวา สมาโส วุตฺโตติ วิญฺญายติ. อธิปติสทฺทตฺถทสฺสนวเสเนว ปน ‘‘ฉนฺทเหตุโก, ฉนฺทาธิโก วา สมาธี’’ติ สมฺโมหวิโนทนิยํ (วิภ. อฏฺฐ. ๔๓๑) วุตฺตํ, ตสฺมา อิธาปิ ฉนฺทาธิปติ สมาธิ ฉนฺทสมาธีติ เวทิตพฺโพ. ตํ ปน ฉนฺทํ วุตฺตนเยน สทฺธาสีเสน ทสฺเสนฺโต ‘‘สทฺธาธิปเตยฺยา จิตฺเตกคฺคตา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘อิทํ ปธาน’’นฺติ วา วีริยํ วุตฺตํ. วีริยสทฺทาเปกฺขาสหิตํ เอกวจเนน วตฺวา จตุพฺพิธสฺสปิ วีริยสฺส อธิปฺเปตตฺตา นิพฺพตฺเตตพฺพธมฺมวิภาเคน จ ‘‘อิเม สงฺขารา’’ติ วุตฺตํ. เตน ปธานภูตา สงฺขาราติ เอวํ สมาโส เวทิตพฺโพ. สงฺขตสงฺขาราทินิวตฺตนตฺถญฺเจตฺถ ปธานคฺคหณํ. อถ วา ตํ ตํ วิเสสํ สงฺขโรตีติ สงฺขาโร, สพฺพมฺปิ วีริยํ. ตตฺถ จตุกิจฺจสาธกโต อญฺญสฺส นิวตฺตนตฺถํ ปธานคฺคหณนฺติ ปธานภูตา เสฏฺฐภูตาติ อตฺโถ. 'जर भिक्खू छंदाला (इच्छेला) अधिपती करून समाधी प्राप्त करतो...' इत्यादी (विभंग ४३२) वचनावरून 'छंदसमाधी-प्रधानसंस्कारांनी युक्त ऋद्धिपादाची भावना करतो' येथे देखील 'छंदाधिपती समाधी म्हणजे छंदसमाधी' असा 'अधिपती' शब्दाचा लोप करून समास सांगितला आहे, असे समजते. केवळ 'अधिपती' शब्दाचा अर्थ दर्शविण्याच्या वशनेच 'छंदहेतुक किंवा छंदाधिक समाधी' असे संमोहविनोदनीमध्ये (विभंग-अट्ठकथा ४३१) म्हटले आहे, म्हणून येथेही 'छंदाधिपती समाधी म्हणजे छंदसमाधी' असे जाणावे. त्या छंदाला सांगितलेल्या पद्धतीने श्रद्धा-शीर्षाने दर्शविताना 'श्रद्धाधिपत्य चित्ताची एकाग्रता' असे म्हटले आहे. 'हे प्रधान' असे वीर्याला म्हटले आहे. वीर्य शब्दाच्या अपेक्षेसह एकवचनात सांगून, चारही प्रकारच्या वीर्याचा अभिप्राय असल्यामुळे आणि उत्पन्न होणाऱ्या धर्मांच्या विभागाने 'हे संस्कार' असे म्हटले आहे. त्यामुळे 'प्रधानभूत संस्कार' असा समास जाणावा. संस्कृत-संस्कार इत्यादींच्या निवृत्तीसाठी येथे 'प्रधान' शब्दाचे ग्रहण केले आहे. अथवा त्या-त्या विशेषाला जो संस्कारित करतो तो 'संस्कार' म्हणजे सर्व वीर्य होय. त्यामध्ये चार कर्तव्यांचे साधक असणाऱ्या व्यतिरिक्त इतरांच्या निवृत्तीसाठी 'प्रधान' शब्दाचे ग्रहण केले आहे, म्हणून 'प्रधानभूत म्हणजे श्रेष्ठभूत' असा अर्थ आहे. วีริยิทฺธิปาทนิทฺเทเส ‘‘วีริยสมาธิปฺปธานสงฺขารสมนฺนาคต’’นฺติ (วิภ. ๔๓๕) ทฺวิกฺขตฺตุํ วีริยํ อาคตํ. ตตฺถ ปุริมํ สมาธิวิเสสนํ ‘‘วีริยาธิปติ สมาธิ วีริยสมาธี’’ติ, ทุติยํ สมนฺนาคมงฺคทสฺสนตฺถํ. ทฺเว เอว หิ สพฺพตฺถ สมนฺนาคมงฺคานิ สมาธิ, ปธานสงฺขาโร จ. ฉนฺทาทโย สมาธิวิเสสนานิ. ปธานสงฺขาโร ปน ปธานวจเนเนว วิเสสิโต, น ฉนฺทาทีหีติ น อิธ วีริยาธิปติตา ปธานสงฺขารสฺส วุตฺตา โหติ. วีริยญฺจ สมาธึ วิเสเสตฺวา ฐิตเมว สมนฺนาคมงฺควเสน [Pg.53] ปธานสงฺขารวจเนน วุตฺตนฺติ นาปิ ทฺวีหิ วีริเยหิ สมนฺนาคโม วุตฺโต โหติ. ยสฺมา ปน ฉนฺทาทีหิ วิสิฏฺโฐ สมาธิ ตถา วิสิฏฺเฐเนว เตน สมฺปยุตฺโต ปธานสงฺขาโร, เสสธมฺมา จ, ตสฺมา สมาธิวิเสสนานํ วเสน ‘‘จตฺตาโร อิทฺธิปาทา’’ติ วุตฺตา. วิเสสนภาโว จ ฉนฺทาทีนํ ตํตํอปสฺสยนวเสน โหตีติ ฉนฺทสมาธิ…เป… อิทฺธิปาทนฺติ เอตฺถ นิสฺสยตฺเถปิ ปาทสทฺเทน อุปายตฺเถน ฉนฺทาทีนํ อิทฺธิปาทตา วุตฺตา โหติ. ตถา หิ อภิธมฺเม อุตฺตรจูฬภาชนีเย ‘‘จตฺตาโร อิทฺธิปาทา ฉนฺทิทฺธิปาโท’’ติอาทินา (วิภ. ๔๕๗) ฉนฺทาทีนเมว อิทฺธิปาทตา วุตฺตา. ปญฺหาปุจฺฉเก จ ‘‘จตฺตาโร อิทฺธิปาทา – อิธ ภิกฺขุ ฉนฺทสมาธี’’ติ (วิภ. ๔๖๒) อารภิตฺวาปิ ปุน ฉนฺทาทีนํเยว กุสลาทิภาโว วิภตฺโต. อุปายิทฺธิปาททสฺสนตฺถเมว หิ นิสฺสยิทฺธิปาททสฺสนํ กตํ. อญฺญถา จตุพฺพิธตาว น โหตีติ. อยเมตฺถ ปาฬิวเสน อตฺถวินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. वीरियिद्धिपादनिद्देसात (वीर्य-ऋद्धिपाद निर्देशात) "वीरियसमाधिप्पधानसङ्खारसमन्नागत" (विभङ्ग ४३५) असे दोन वेळा 'वीरिय' (वीर्य) आले आहे. तेथे पहिले समाधीचे विशेषण "वीरियाधिपति समाधि वीरियसमाधि" (वीर्याधिपती समाधी म्हणजे वीर्यसमाधी) असे आहे, आणि दुसरे समन्नागम-अंग (समन्वागम अंग) दर्शवण्यासाठी आहे. कारण सर्वत्र समाधी आणि प्रधानसंस्कार (पधानसङ्खार) हे दोनच समन्नागम-अंग आहेत. छंदादी (छंद इत्यादी) हे समाधीचे विशेषण आहेत. परंतु प्रधानसंस्कार हा 'प्रधान' शब्दानेच विशेषित केला आहे, छंदादींनी नाही; म्हणून येथे प्रधानसंस्काराची वीर्याधिपतिता सांगितलेली नाही. आणि वीर्याला समाधीचे विशेषण करून राहिलेलेच समन्नागम-अंगाच्या वशाने 'प्रधानसंस्कार' शब्दाने सांगितले आहे, म्हणून दोन वीर्यांशी समन्वागम सांगितलेला नाही. परंतु ज्या अर्थी छंदादींनी विशिष्ट समाधी आणि त्याचप्रमाणे विशिष्ट अशा त्याच्याशी संप्रयुक्त असलेला प्रधानसंस्कार व उर्वरित धर्म आहेत, म्हणून समाधीच्या विशेषणांच्या वशाने "चार इद्धिपाद" (ऋद्धिपाद) असे म्हटले आहे. आणि छंदादींचा विशेषणभाव त्या त्या आश्रयाच्या वशाने होतो, म्हणून 'छंदसमाधि...पे... इद्धिपाद' येथे आश्रय अर्थातही 'पाद' शब्दाने उपाय अर्थाने छंदादींची इद्धिपादता (ऋद्धिपादत्व) सांगितली आहे. तसेच अभिधम्मात उत्तरचूळभाजनीयात "चत्तारो इद्धिपादा छन्दिद्धिपादो" इत्यादीने (विभङ्ग ४५७) छंदादींचीच इद्धिपादता सांगितली आहे. आणि पन्हापुच्छकात (प्रश्नपुच्छकात) "चत्तारो इद्धिपादा - इध भिक्खु छन्दसमाधि" (विभङ्ग ४६२) असे सुरू करूनही पुन्हा छंदादींचाच कुशलादिभाव विभक्त (स्पष्ट) केला आहे. उपाय-इद्धिपाद दर्शवण्यासाठीच आश्रय-इद्धिपाद दर्शवणे केले आहे. अन्यथा चार प्रकारत्वच होणार नाही. हा येथे पाळीच्या (पाळि) वशाने अर्थनिश्चय समजावा. ตทงฺคสมุจฺเฉทนิสฺสรณวิเวกนิสฺสิตตฺตํ วตฺวา ปฏิปฺปสฺสทฺธิวิเวกนิสฺสิตสฺส อวจนํ ‘‘ฉนฺทสมาธิ…เป… อิทฺธิปาทํ ภาเวตี’’ติ (วิภ. ๔๓๒) ภาเวตพฺพานํ อิทฺธิปาทานํ วุตฺตตฺตา. ภาวิติทฺธิปาทสฺส หิ สจฺฉิกาตพฺพา ผลปริยาปนฺนา อิทฺธิปาทาติ. तदङ्ग, समुच्छेद, निस्सरण आणि विवेक यांच्यावर आश्रित असल्याचे सांगून, प्रतिप्रश्रब्धि-विवेक (पटिप्पस्सद्धिविवेक) आश्रिताचे न सांगणे हे "छन्दसमाधि...पे... इद्धिपादं भावेति" (विभङ्ग ४३२) असे भावावयाच्या (भावना करावयाच्या) इद्धिपादांचे सांगितल्यामुळे आहे. कारण भावित (भावना केलेल्या) इद्धिपादाचे साक्षात्करणीय फलपर्यापन्न इद्धिपाद असतात. โวสฺสคฺคสทฺโท ปริจฺจาคตฺโถ, ปกฺขนฺทนตฺโถ จาติ โวสฺสคฺคสฺส ทุวิธตา วุตฺตา. ยถาวุตฺเตน ปกาเรนาติ ตทงฺคสมุจฺเฉทปฺปกาเรน, ตนฺนินฺนภาวารมฺมณปฺปกาเรน จ. ปริณมนฺตํ วิปสฺสนกฺขเณ. 'वोस्सग्ग' (त्याग) हा शब्द परित्याग अर्थाचा आणि प्रस्कंदन (पक्खन्दन - झेप घेणे) अर्थाचा आहे, अशा प्रकारे वोस्सग्गची द्विविधता सांगितली आहे. 'यथावृत्त प्रकारे' म्हणजे तदङ्ग आणि समुच्छेद प्रकारे, आणि त्याच्याकडे प्रवण असण्याच्या आलंबन प्रकारे. विपश्यनाक्षणी (विपस्सनाक्खणे) परिणत होणारे. ๑๔. ปุพฺพภาคปญฺญายาติ เอกาวชฺชนนานาวชฺชนวีถีสุ ปวตฺตอุปจารปญฺญาย. อธิคมปญฺญายาติ อปฺปนาปญฺญาย. ปุน ปุพฺพภาคปญฺญายาติ นานาวชฺชนุปจารปญฺญาย, ปฏิสนฺธิปญฺญาย วา. อุปจารปญฺญายาติ เอกาวชฺชเน, สพฺพตฺถ วา ปวตฺตอุปจารปญฺญาย. १४. 'पूर्वभागप्रज्ञेने' (पुब्बभागपञ्ञाय) म्हणजे एका आवर्जन व नाना आवर्जन वीथींमध्ये प्रवृत्त होणाऱ्या उपचारप्रज्ञेने. 'अधिगमप्रज्ञेने' (अधिगमपञ्ञाय) म्हणजे अर्पणाप्रज्ञेने (अप्पनापञ्ञाय). पुन्हा 'पूर्वभागप्रज्ञेने' म्हणजे नाना आवर्जन उपचारप्रज्ञेने किंवा प्रतिसंधीप्रज्ञेने (पटिसन्धिपञ्ञाय). 'उपचारप्रज्ञेने' म्हणजे एका आवर्जनात किंवा सर्वत्र प्रवृत्त होणाऱ्या उपचारप्रज्ञेने. ปุจฺฉาวิสฺสชฺชนวิจโยปีติ ยถาวุตฺตาย ปุจฺฉาย วิสฺสชฺชนวิจโยปิ. วุตฺตนยานุสาเรนาติ อทิฏฺฐโชตนา, วิมติจฺเฉทนา จาติ เหฏฺฐา วุตฺตนยานุคมเนน. 'प्रश्न-विसर्जन-विचय सुद्धा' (पुच्छाविस्सज्जनविचयोपि) म्हणजे यथावृत्त प्रश्नाचा विसर्जन-विचय (उत्तर शोधणे) सुद्धा. 'सांगितलेल्या नयाच्या अनुसार' (वृत्तनयानुसार) म्हणजे अदृष्टजोतना (न पाहिलेले प्रकाशित करणे) आणि विमतिच्छेदना (शंकेचे निरसन करणे) या खाली सांगितलेल्या नयाच्या अनुगमनाने. ๑๕. เสเข [Pg.54] อเสเขติ เสกฺเข อริยปุคฺคเล, อเสกฺเข อริยปุคฺคเล. วิปสฺสนาปุพฺพงฺคมปฺปหาเนติ วิปสฺสนํ ปุเรจาริกํ กตฺวา ปวตฺตกิเลสปฺปหาเน, ปหานาภิสมเยติ อตฺโถ. १५. 'शैक्ष आणि अशैक्ष' (सेखे असेखे) म्हणजे शैक्ष आर्यपुद्गल आणि अशैक्ष आर्यपुद्गल. 'विपश्यना-पूर्वांगम प्रहाण' (विपस्सनापुब्बङ्गमप्पहाने) म्हणजे विपश्यनेला पुरोगामी करून प्रवृत्त होणाऱ्या क्लेशप्रहाणात, प्रहाण-अभिसमयात असा अर्थ आहे. ‘‘ยํ อนิจฺจํ ทุกฺขํ อนตฺตา’’ติ ปาฬึ ทสฺเสตฺวา ปุน ‘‘ยํ อนิจฺเจ ทุกฺเข อนตฺตนี’’ติ วจนํ เอวมฺเปตฺถ ปฐนฺตีติ ทสฺเสตุํ. "यं अनिच्चं दुक्खं अनत्ता" ही पाळि दाखवून पुन्हा "यं अनिच्चे दुक्खे अनत्तनि" हे वचन येथे असेही वाचतात, हे दर्शवण्यासाठी आहे. เสสสํกิเลสโวทานธมฺมาติ เคธโต อวสิฏฺฐสํกิเลสธมฺมา จ สพฺพโวทานธมฺมา จ. อภาเวนาติ อภาวเนน อภาวกรเณน. 'उर्वरित संक्लेश व वोदान धर्म' (सेससङ्किलेसवोदानधम्मा) म्हणजे लोभापासून (गेध) अवशिष्ट राहिलेले संक्लेश धर्म आणि सर्व वोदान (विशुद्धी) धर्म. 'अभावाने' (अभावेन) म्हणजे अभावनने (भावना न केल्याने), अभाव करण्याने. ปโยคปรกฺกมนฺติ ภุสํ โยโค ปโยโค, ปโยโคว ปรกฺกโม ปโยคปรกฺกโม, จิตฺตํ. อุกฺขิปตีติ โกสชฺชปกฺเข ปติตุํ อเทนฺโต กุสลปกฺเข อุทฺธํ ขิเปนฺโต วิย ปวตฺตติ. ปธานวีริยนฺติ อกุสลานํ อนุปฺปาทนฏฺเฐน อุตฺตมวีริยํ. โยเชตพฺพานีติ ‘‘อาเสวมาโน วายมตี’’ติอาทินา โยเชตพฺพานิ. อนุปฺปนฺนาติ อวตฺตพฺพตํ อาปนฺนานนฺติ ภูมิลทฺธารมฺมณาธิคฺคหิตาวิกฺขมฺภิตาสมุคฺฆาฏิตุปฺปนฺนานํ. 'प्रयोगपराक्रम' (प्योगपरक्कम) म्हणजे अत्यंत योग तो प्रयोग, प्रयोगच पराक्रम तो प्रयोगपराक्रम, चित्त. 'उत्तेजित करतो' (उक्खिपति) म्हणजे आळसाच्या (कोसज्ज) पक्षात पडू न देता, कुशल पक्षात वर फेकल्यासारखा प्रवृत्त होतो. 'प्रधानवीर्य' (पधानवीरिय) म्हणजे अकुशलांच्या अनुत्पादनाच्या अर्थाने उत्तम वीर्य. 'योजित करावेत' (योजेतब्बानि) म्हणजे "आसेvअमानो वायमति" (सेवन करत प्रयत्न करतो) इत्यादींनी योजित करावेत. 'अनुत्पन्न' (अनुप्पन्ना) म्हणजे अवक्तव्यतेला प्राप्त झालेल्यांचे, म्हणजेच भूमी प्राप्त झालेल्या, आलंबनाने अधिग्रहित झालेल्या, विष्कंभित न झालेल्या आणि समुद्घाटित न झालेल्या उत्पन्नांचे. ๑๖. ‘‘อฏฺฐมกสฺส อินฺทฺริยานี’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘ปฐมมคฺเค สทฺธาทโย’’ติอาทิ วุตฺตํ. อินฺทฺริยคฺคหณญฺจ ปาฬิยํ นิทสฺสนมตฺตํ ทฏฺฐพฺพํ. १६. "अष्टमकाची इंद्रिये" (अट्ठमकस्स इन्द्रियानि) असे म्हटल्यामुळे "प्रथम मार्गात श्रद्धादी" इत्यादी म्हटले आहे. आणि पाळिमध्ये इंद्रियग्रहण हे केवळ निदर्शन (उदाहरण) समजावे. อสุภานุปสฺสนา กายานุปสฺสนาสติปฏฺฐานนฺติ อาห ‘‘สติปฏฺฐานภาวนาย สุนิคฺคหิโต กามวิตกฺโก’’ติ. สมาธิ อุปฺปชฺชมาโน กามวิตกฺกมฺปิ นิคฺคเหตฺวา เอว อุปฺปชฺชตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อนวชฺชสุขปทฏฺฐาเนนา’’ติอาทิมาห. ‘‘กุสเลสุ ธมฺเมสุ อารทฺธวีริโย’’ติอาทินา ธมฺมจฺฉนฺทโต อุปฺปชฺชมาโน วีริยจฺฉนฺโท ขนฺตึ ปริพฺรูเหตีติ ทสฺเสติ. อนวชฺชธมฺมานํ อุปการกธมฺมาเสวนํ วิย อนุปการกธมฺมปริวชฺชนมฺปิ ปญฺญานิเสวเนเนว โหตีติ อาห ‘‘สมาธิอาทีน’’นฺติอาทิ. अशुभानुपश्यना ही कायानुपश्यना स्मृतिप्रस्थान आहे, म्हणून "स्मृतिप्रस्थान भावनेने कामवितर्क चांगल्या प्रकारे निग्रहित केला जातो" असे म्हटले आहे. समाधी उत्पन्न होताना कामवितर्काचा निग्रह करूनच उत्पन्न होतो, हे दर्शवताना "अनवद्यसुखपदस्थानाने" (अनवज्जसुखपदट्ठानेन) इत्यादी म्हटले आहे. "कुशल धर्मांमध्ये आरब्धवीर्य" इत्यादीने धर्मच्छंदापासून उत्पन्न होणारा वीर्यछंद क्षमा/शांतीला (खन्ति) परिपुष्ट करतो, हे दर्शवले आहे. अनवद्य (दोषरहित) धर्मांच्या उपकारक धर्मांच्या सेवनाप्रमाणे अनुपकारक धर्मांचे वर्जन करणे देखील प्रज्ञेच्या सेवनानेच होते, म्हणून "समाधी इत्यादींचे" इत्यादी म्हटले आहे. ๑๗. สพฺพธมฺมาธิฏฺฐานํ เทสนํ ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน วิภชิตุํ ‘‘โลโก นามา’’ติอาทิ วุตฺตนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สพฺพธมฺมานนฺติ…เป… ทสฺเสตุ’’นฺติ อาห. มหคฺคตธมฺเมสุ ฐานํ ตํสมฺปาทนาว. ตถา เสเสสุ. วฑฺฒิยมาเนสูติ ยถา วิมุตฺตึ ปริปาจยนฺติ, เอวํ พฺรูหิยมาเนสุ. १७. सर्वधर्म-अधिष्ठान देशनेला पुद्गल-अधिष्ठानाने विभक्त करण्यासाठी "लोको नाम" (लोक म्हणजे) इत्यादी म्हटले आहे, हे दर्शवताना "सब्बधम्मानं...पे... दस्सेतुं" असे म्हटले आहे. महग्गत (महतगत) धर्मांमध्ये स्थान म्हणजे त्याचे संपादनच होय. तसेच उर्वरित धर्मांमध्ये. 'वर्धित केले जात असताना' (वड्ढियमानेsu) म्हणजे जसे विमुक्तीला परिपक्व करतात, तसे वाढवले जात असताना. ทสฺสนปริญฺญาติ รูปารูปธมฺมานํ สลกฺขณโต, ปจฺจยโต จ ปริชานนา. เตนาห ‘‘ญาตปริญฺญา’’ติ. ปฏิปกฺขวิธมเนน สทฺธึ ลกฺขณตฺตยวิภาวนา อิธ ‘‘ภาวนาปริญฺญา’’ติ อธิปฺเปตาติ อาห ‘‘ภาวนา…เป… ปริญฺญา จา’’ติ[Pg.55]. ทสฺสนตฺถา ปริญฺญา ทสฺสนปริญฺญา, ภาวนตฺถา ปริญฺญา ภาวนาปริญฺญาติ เอวํ วา เอตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. 'दर्शनपरिज्ञा' (दस्सनपरिञ्ञा) म्हणजे रूप-अरूप धर्मांची स्वलक्षणाने आणि प्रत्ययाने (कारणाने) परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान). म्हणूनच "ज्ञातपरिज्ञा" (ञातपरिञ्ञा) असे म्हटले आहे. प्रतिपक्षाच्या विध्वंसासह तीन लक्षणांची (लक्षणत्रयाची) विभावना येथे "भावनापरिज्ञा" म्हणून अभिप्रेत आहे, म्हणून "भावना...पे... परिज्ञा च" असे म्हटले आहे. दर्शनासाठी असलेली परिज्ञा ती दर्शनपरिज्ञा, भावनेसाठी असलेली परिज्ञा ती भावनापरिज्ञा, असाही येथे अर्थ समजावा. กกฺขฬผุสนาทีติ กกฺขฬาทิผุสนาทิ. อภิชานิตฺวาติ อภิญฺญาย ปญฺญาย ชานิตฺวา, ฐิตสฺส อภิชานนเหตุ วาติ อตฺโถ. อตฺโถติ ผลํ. นโยติ วุตฺตนโย. 'कठोर स्पर्श इत्यादी' (कक्खळफुसनादि) म्हणजे काठिण्य इत्यादींचा स्पर्श इत्यादी. 'अभिज्ञा करून' (अभिज्ञानित्वा) म्हणजे अभिज्ञेने, प्रज्ञेने जाणून घेऊन, राहिलेल्याच्या अभिज्ञान हेतूने असा अर्थ आहे. 'अर्थ' म्हणजे फल. 'नय' म्हणजे सांगितलेलेला नय. ‘‘ยํ อสงฺขต’’นฺติปิ ปฐนฺติ. จตุนยโกวิโทติ เอกตฺตนานตฺตาทินยจตุกฺเก นิปุโณ. เทสนายุตฺติกุสโลติ ธมฺมานํ เทสนาวิธิมฺหิ กุสโล. "यं असङ्खतं" (जे असंस्कृत) असेही वाचतात. 'चतुर्नयकोविद' (चतुर्नयकुशल) म्हणजे एकत्व-नानात्व इत्यादी चार नयांमध्ये निपुण. 'देशनायुक्तिकुशल' म्हणजे धर्मांच्या देशनाविधीमध्ये कुशल. สทิสี กาตพฺพา สํสนฺทนวเสนาติ อธิปฺปาโย. อาเนตพฺพา ‘‘อยํ เทสนา อิมาย เทสนาย เอวํ สํสนฺทตี’’ติ. อตฺถโต อเปตนฺติ อยุตฺตตฺถํ. อสมฺพนฺธตฺถนฺติ อญฺญมญฺญํ อสมฺพนฺธปทตฺถํ. นนุ ปฏฺฐานวิจาโร นยวิจาโร วิย หาเรหิ อสมฺมิสฺโส วิจารณนฺตโรติ โจทนํ มนสิ กตฺวา อาห ‘‘ยสฺมา ปนา’’ติอาทิ. อิธ นิกฺขิตฺโตติ อิธ สุตฺตวิจเย สุตฺตตฺถวิจารภาวโต นิกฺขิตฺโต, เอเตน วา ปฏฺฐานสฺส หารนฺโตคธภาวทสฺสเนเนว มูลปทานํ วิย ปฏฺฐานสฺส ปทตฺถนฺตราภาโว ทสฺสิโตติ เวทิตพฺพํ. "तुलना करण्याच्या दृष्टीने समानता केली पाहिजे" असा अभिप्राय आहे. "हा उपदेश (देसना) या उपदेशाशी अशा प्रकारे जुळतो" असे आणले पाहिजे. 'अत्थतो अपेतं' म्हणजे अयोग्य अर्थ. 'असंबंधत्थं' म्हणजे परस्परांशी संबंध नसलेला पदांचा अर्थ. 'पठ्ठानविचार' हा 'नयविचारा'प्रमाणे हारांशी (पद्धतींशी) अमिश्रित असलेला दुसरा विचार आहे की काय? अशी शंका मनात ठेवून "यस्मा पना" (परंतु ज्या कारणाने) इत्यादी म्हटले आहे. 'इध निक्खित्तो' म्हणजे येथे सुत्तविचारात सुत्ताच्या अर्थाचा विचार असल्यामुळे ठेवलेला आहे. याने किंवा पठ्ठानाचा हारांमध्ये अंतर्भाव दाखवण्यानेच, मूळ पदांप्रमाणे पठ्ठानाचा दुसरा कोणताही पदार्थ (पदाचा अर्थ) नाही, हे दर्शविले आहे असे जाणावे. อิมสฺส สุตฺตสฺสาติ สํวณฺณิยมานสุตฺตํ สนฺธายาห. กสฺมึ วา ปเทติ สํวณฺณิยมานํ คาถํ สนฺธายาห. ตพฺพิจเยนาติ ปุจฺฉาทิวิจเยน, อสฺสาทาทิวิจเยน จ. 'इमस्स सुत्तस्स' (या सूत्राचे) म्हणजे ज्या सूत्राचे स्पष्टीकरण केले जात आहे, त्या सूत्राला उद्देशून म्हटले आहे. 'कस्मिं वा पदे' (किंवा कोणत्या पदात) म्हणजे स्पष्टीकरण केल्या जाणाऱ्या गाथेला उद्देशून म्हटले आहे. 'तब्बिचयेन' (त्याच्या विचाराने) म्हणजे प्रश्न इत्यादींच्या विचाराने आणि आस्वाद (अस्साद) इत्यादींच्या विचाराने. วิจยหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. विचयहारविभंगवर्णना समाप्त झाली. ๓. ยุตฺติหารวิภงฺควณฺณนา ३. युत्तिहारविभंगवर्णना ๑๘. เอวเมตสฺส สุตฺตสฺส อตฺโถ น คเหตพฺโพ, เอวํ ปน คเหตพฺโพติ อคฺคเหตพฺพคเหตพฺพานํ อตฺถานํ วิชหนคฺคหณตฺถาย ยุตฺตายุตฺติวิจารณายํ วชฺเชตพฺเพสุ ตาว ปฐมํ ปฏิปตฺตีติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘อตถากาเรน คยฺหมานา สุตฺตตฺถา วิสโย’’ติ ยถา ‘‘วามํ มุญฺจ, ทกฺขิณํ คณฺหา’’ติ (ธ. ส. อฏฺฐ. ๔๙๘; วิสุทฺธิ. มหาฏี. ๑.๑๔; สํ. นิ. ฏี. ๑.๑.๒๑๓). วชฺเชตพฺพภาวโต หิ สุตฺตปเทหิ สุตฺตตฺเถ [Pg.56] วิเวจิเต คเหตพฺพภาโว จ อวสิฏฺโฐ โหติ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘เมตฺตาวิหารสฺส สโต พฺยาปาโท จิตฺตํ ปริยาทาย ฐสฺสตี’ติ น ยุชฺชติ เทสนา, ‘พฺยาปาโท ปหานํ อพฺภตฺถํ คจฺฉตี’ติ ยุชฺชติ เทสนา’’ติ (เนตฺติ. ๒๑). १८. "या सूत्राचा अर्थ असा ग्रहण करू नये, तर असा ग्रहण करावा" अशा प्रकारे ग्रहण न करण्यायोग्य आणि ग्रहण करण्यायोग्य अर्थांचा त्याग व स्वीकार करण्यासाठी, योग्य-अयोग्यतेच्या विचारात सर्वप्रथम वर्ज्य गोष्टींविषयीची प्रतिपत्ती (आचरण) दर्शविताना म्हणतात— "अयथार्थ रूपाने ग्रहण केले जाणारे सूत्रांचे अर्थ हा विषय आहे", जसे की "डावे सोडा, उजवे ग्रहण करा". कारण वर्ज्य करण्यायोग्य गोष्टींचा त्याग केल्यामुळे सूत्राच्या पदांद्वारे सूत्राच्या अर्थाचे विवेचन केले असता, ग्रहण करण्यायोग्य भागच शिल्लक राहतो. तसेच पुढे सांगतील— "मैत्रीविहार करणाऱ्या (सतो) व्यक्तीचा व्यापाद (द्वेष) चित्ताला व्यापून राहील, हा उपदेश योग्य ठरत नाही; व्यापाद नष्ट होऊन नाहीसा होतो, हा उपदेश योग्य ठरतो." ยุตฺตินิทฺธารเณน อยถาสภาวโต วิเวจิตฺวา ยถาสภาวโต ธมฺมสฺส คหณการณานิ กเถนฺโต ‘‘มหนฺตา อปทิสิตพฺพา เอเตสนฺติ มหาปเทสา’’ติ อิมมตฺถมาห ‘‘พุทฺธาทโย’’ติอาทินา. ปติฏฺฐานานีติ ปติฏฺฐานสาธนานิ. เสเสสูติ สงฺฆาปเทสาทีสุ. ปฐมตฺโถ เอว หิ อิธ ปาฬิ อาคโต, วินิจฺฉยเน การณํ มหาปเทโสติ อธิปฺปาโย. สุตฺโตตรณาทีติ อาทิสทฺเทน สุตฺตาโนตรณาทิปิ สงฺคยฺหติ. สุตฺโตตรณวินยสนฺทสฺสนานิ หิ เกนจิ ยถาภตสฺส คนฺถสฺส ‘‘ธมฺโม’’ติ วินิจฺฉยเน การณํ. สุตฺตาโนตรณวินยาสนฺทสฺสนานิ ‘‘อธมฺโม’’ติ. ยทิ เอวนฺติ ยทิ ยถาภตสฺส คนฺถสฺส สุตฺตวินเยหิ สํสนฺทนํ ‘‘ธมฺโม’’ติ, อสํสนฺทนํ ‘‘อธมฺโม’’ติ วินิจฺฉยการณํ, เอวํ สนฺเตติ อตฺโถ. สมฺปทียติ ญาปียติ ธมฺโม เอเตหีติ สมฺปทายา, อกฺขาตาโร. युक्तीच्या निश्चितीद्वारे अयथार्थ स्वभावापासून वेगळे करून, यथार्थ स्वभावाने धर्माचे ग्रहण करण्याची कारणे सांगताना, "जे मोठे आहेत आणि ज्यांचा निर्देश केला जातो ते महापदेश होत" हा अर्थ "बुद्ध इत्यादी" या शब्दांनी स्पष्ट केला आहे. 'पतिट्ठानानि' म्हणजे प्रतिष्ठेची साधने (आधार). 'सेसेसु' म्हणजे संघ-अपदेश इत्यादींमध्ये. येथे पाळीमध्ये पहिलाच अर्थ आला आहे, निर्णयाचे कारण म्हणजे 'महापदेश' असा अभिप्राय आहे. 'सुत्तोतरणादि' यातील 'आदि' शब्दाने सूत्रात न उतरणे इत्यादींचाही संग्रह होतो. कारण एखाद्याने आणलेल्या ग्रंथाचा "हा धर्म आहे" असा निर्णय लावण्यासाठी सूत्रात उतरणे आणि विनयात दिसणे ही कारणे आहेत. सूत्रात न उतरणे आणि विनयात न दिसणे हे "हा अधर्म आहे" याचे कारण आहे. "जर असे असेल तर" म्हणजे जर आणलेल्या ग्रंथाचे सूत्र आणि विनयाशी जुळणे हे "धर्म" आणि न जुळणे हे "अधर्म" अशा निर्णयाचे कारण असेल, तर असा अर्थ होतो. ज्यांच्याद्वारे धर्म प्रदान केला जातो, जाणवला जातो ते 'संपदाया' म्हणजे सांगणारे (व्याख्याते) होत. วินียนฺติ ราคาทโย เอเตนาติ วินโย, การณํ. เตนาห ‘‘ราคาทิวูปสมนิมิตฺต’’นฺติ. กึ ปน ตํ? สาธิฏฺฐานสมถวิปสฺสนาทิธมฺมา. เย ปรโต ‘‘เตจตฺตาลีสํ โพธงฺคมา ธมฺมา’’ติ (เนตฺติ. ๒๔) วกฺขติ. ज्याच्याद्वारे राग (आसक्ती) इत्यादींचे नियंत्रण केले जाते तो 'विनय' म्हणजे कारण होय. म्हणूनच म्हटले आहे— "राग इत्यादींच्या उपशमनाचे निमित्त". पण ते काय आहे? अधिष्ठानासह असलेले समथ आणि विपश्यना इत्यादी धर्म. ज्यांना पुढे "त्रेचाळीस बोधंगम धर्म" असे म्हटले जाईल. วินยมหาปเทสา กปฺปิยานุโลมโต อนุโลมกปฺปิยํ นาม, ตํสทิสตาย สุตฺตนฺตมหาปเทสาปิ อนุโลมกปฺปิยนฺติ อฏฺฐกถาโวหาโร. เตน วุตฺตํ ‘‘ยํ อนุโลมกปฺปิยนฺติ วุจฺจตี’’ติ. विनय-महापदेशाच्या कल्प्य-अनुलोमतेमुळे (योग्यतेच्या अनुकूलतेमुळे) त्याला 'अनुलोमकल्प्य' असे म्हणतात, आणि त्याच्याशी साधर्म्य असल्यामुळे सुत्तंत-महापदेशालाही 'अनुलोमकल्प्य' असे म्हणतात, असा अट्ठकथेचा व्यवहार आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— "ज्याला अनुलोमकल्प्य असे म्हटले जाते". ยทิปิ ตตฺถ ตตฺถ ปวตฺตา ภควโต ปกิณฺณกเทสนา อฏฺฐกถา, สา ปน ธมฺมสงฺคาหเกหิ เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ สงฺคายิตฺวา ตสฺส อตฺถสํวณฺณนานุรูเปน วาจนามคฺคํ อาโรปิตตฺตา อาจริยวาโท นาม. เตน วุตฺตํ ‘‘อาจริยวาโท นาม อฏฺฐกถา’’ติ. ติสฺโสปิ สงฺคีติโย อารุฬฺโห เอว หิ พุทฺธวจนสฺส อตฺถสํวณฺณนาภูโต กถามคฺโค ปจฺฉา ตมฺพปณฺณิเยหิ มหาเถเรหิ สีหฬภาสาย ฐปิโต. อตฺตโนมติ เถรวาโท. สเมนฺตเมว คเหตพฺพนฺติ ยถา ปาฬิยา สํสนฺทติ[Pg.57], เอวํ มหาปเทสโต อตฺถา อุทฺธริตพฺพาติ ทสฺเสติ. ปมาทปาฐวเสน อาจริยวาทสฺส กทาจิ ปาฬิยา อสํสนฺทนาปิ สิยา, โส น คเหตพฺโพติ ทสฺเสนฺโต อาห – ‘‘สุตฺเตน สเมนฺโต เอว คเหตพฺโพ’’ติ. जरी ठिकठिकाणी आलेली भगवंतांची प्रकीर्णक देसना (विविध उपदेश) ही अट्ठकथा असली, तरी धर्मसंग्राहकांनी त्रिपिटक बुद्धवचनाची संगीती करून, त्याच्या अर्थाच्या स्पष्टीकरणाला अनुरूप अशा वाचनमार्गावर ती चढवल्यामुळे तिला 'आचार्यवाद' असे म्हणतात. म्हणूनच म्हटले आहे— "आचार्यवाद म्हणजेच अट्ठकथा". तिन्ही संगीतींमध्ये चढवलेला बुद्धवचनाचा अर्थ स्पष्ट करणारा हा कथामार्गच नंतर तांबपण्णीय (श्रीलंकेतील) महाथेरांनी सिंहली भाषेत जतन करून ठेवला. 'अत्तनोमति' म्हणजे स्वतःचे मत. 'जुळणारेच ग्रहण करावे' याने हे दर्शविले आहे की, जसे पाळीशी जुळते, तसेच महापदेशातून अर्थ उद्धृत केले पाहिजेत. प्रमादामुळे (चुकीच्या पाठामुळे) आचार्यवादाचे कधी पाळीशी विसंगती असू शकते, ती ग्रहण करू नये हे दर्शविताना म्हणतात— "सूत्राशी जुळणारेच ग्रहण करावे". จตูหิ มหาปเทเสหิ ยุชฺชตีติ จตูหิ มหาปเทเสหิ น วิรุชฺฌติ. อิทานิ ตํ อวิรุชฺฌนาการํ ทสฺเสนฺโต ‘‘เยน เยนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. สุตฺโตตรณาทิ เอว เหตฺถ การณํ. ตสฺส จ อเนกาการตาย ‘‘ปกาเรนา’’ติ วุตฺโต. สํวณฺณิยมาเน สุตฺเต สํวณฺณนาวเสน คเหตพฺพนฺติ สมฺพนฺโธ. อาภเตนาติ อานีเตน. สุตฺตโตติ สุตฺตนฺตรโต. อยญฺเหตฺถ อตฺโถ – เกนจิ ปสงฺเคน สุตฺตนฺตรโต อุทฺธริตฺวา อานีเตน สุตฺตปเทน สุตฺโตตรณาทินา, การณปฺปกาเรน จ จตุมหาปเทสาวิโรเธน สํวณฺณิยมาเน สุตฺเต สํวณฺณนาวเสน อตฺถชาตํ คเหตพฺพนฺติ. เตนาห ‘‘เตน…เป… กาตพฺพา’’ติ. ตตฺถ ยุตฺติหารโยชนา กาตพฺพาติ ยุตฺตินิทฺธารณวเสน อยํ ยุตฺติหาโร โยเชตพฺโพ. อถ วา ยุตฺติหารโยชนา กาตพฺพาติ อิมินา หาเรน วกฺขมานนเยน ยุตฺติคเวสนํ กตฺวา ตาย ยุตฺติยา สพฺพหารโยชนา กาตพฺพาติ อตฺโถ. ลกฺขณญฺเหตํ ยุตฺติคเวสนาย, ยทิทํ ยุตฺติหาโร. เตนาห ‘‘สพฺเพสํ หารานํ, ยา ภูมี, โย จ โคจโร เตสํ. ‘‘ยุตฺตายุตฺตปริกฺขา’’ติ (เนตฺติ. ๔), ‘‘อิมาย ยุตฺติยา อญฺญมญฺเญหิ การเณหิ คเวสิตพฺพ’’นฺติ (เนตฺติ. ๒๐) จ. 'चार महापदेशांशी जुळते' म्हणजे चार महापदेशांशी विरोध करत नाही. आता ती अविरोध असण्याची पद्धत दर्शविताना "येन येन" इत्यादी म्हटले आहे. येथे सूत्रात उतरणे इत्यादीच कारण आहे. आणि त्याचे अनेक प्रकार असल्यामुळे "प्रकाराने" असे म्हटले आहे. स्पष्टीकरण केल्या जाणाऱ्या सूत्रात स्पष्टीकरणाच्या स्वरूपात ग्रहण करावे, असा संबंध आहे. 'आभतेन' म्हणजे आणलेल्या. 'सुत्ततो' म्हणजे दुसऱ्या सूत्रातून. येथे हा अर्थ आहे— कोणत्या तरी प्रसंगाने दुसऱ्या सूत्रातून उद्धृत करून आणलेल्या सूत्रपदाने, सूत्रात उतरणे इत्यादींद्वारे आणि कारणाच्या प्रकाराने चार महापदेशांच्या अविरोधाने स्पष्टीकरण केल्या जाणाऱ्या सूत्रात स्पष्टीकरणाच्या स्वरूपात अर्थसमूह ग्रहण करावा. म्हणूनच म्हटले आहे— "त्याद्वारे...पे... केली पाहिजे". तेथे 'युत्तिहारयोजना केली पाहिजे' म्हणजे युक्तीच्या निश्चितीनुसार हा युत्तिहार योजला पाहिजे. किंवा 'युत्तिहारयोजना केली पाहिजे' याचा अर्थ असा की, या हाराने पुढे सांगण्यात येणाऱ्या पद्धतीने युक्तीचा शोध घेऊन, त्या युक्तीने सर्व हारांची योजना केली पाहिजे. कारण युक्तीच्या शोधाचे हेच लक्षण आहे, जे हा युत्तिहार आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— "सर्व हारांची जी भूमी आणि जो गोचर (विषय) आहे, त्यांची योग्य-अयोग्यतेची परीक्षा करावी" आणि "या युक्तीने परस्परांच्या कारणांनी शोध घेतला पाहिजे". ๑๙. ยทิ วา สพฺพานิ ปทานิ เอกํ อตฺถํ อภิวทนฺตีติ โยชนา. १९. किंवा "सर्व पदे एकाच अर्थाचे प्रतिपादन करतात" अशी योजना करावी. ๒๐. ชรายํ ฐิตสฺส อญฺญถตฺตนฺติ ฐิตสฺส ยํ อญฺญถตฺตํ อญฺญถาภาโว, อยํ ชรา นาม. ขณิกมรณํ ขณิกนิโรโธ. สมุจฺเฉทมรณํ ขีณาสวานํ ขนฺธปรินิพฺพานํ. २०. 'जरेमध्ये असलेल्याचे अन्यथात्व' म्हणजे जे स्थित आहे त्याचे जे अन्यथात्व (बदलणे) किंवा अन्यथाभाव आहे, ती 'जरा' (वृद्धत्व) होय. 'क्षणिक मरण' म्हणजे क्षणिक निरोध. 'समुच्छेद मरण' म्हणजे क्षीणासवांचे (अर्हंतांचे) स्कंधपरिनिर्वाण. เกวลสฺสาติ ชราย อมิสฺสสฺส. อญฺญาว ชรา, อญฺญํ มรณนฺติ ‘‘ปฏิญฺญาตสฺส เกวลสฺส มรณสฺส ทิฏฺฐตฺตา’’ติ เหตุ. ยถา ตํ เทวานนฺติ สทิสูทาหรณํ, วิสทิสูทาหรณํ ปน อิทฺธิปาทาทโย, อนฺวยพฺยติเรกา คเหตฺวา โยเชตพฺพา. 'केवलस्स' (केवळचे) म्हणजे जरेने अमिश्रित असलेल्याचे. जरा वेगळीच आहे आणि मरण वेगळेच आहे, कारण "प्रतिज्ञा केलेल्या केवळ मरणाचा प्रत्यक्ष अनुभव आल्यामुळे" हा हेतू आहे. "जसे ते देवांचे" हे समान उदाहरण (सदृश उदाहरण) आहे, आणि असमान उदाहरण (विसदृश उदाहरण) म्हणजे ऋद्धिपाद इत्यादी होय; अन्वय आणि व्यतिरेक ग्रहण करून योजना करावी. เตหีติ [Pg.58] ชรามรเณหิ. 'तेहि' म्हणजे जरा आणि मरणाने. ‘‘ชีรณภิชฺชนสภาวา’’ติ อิมินา เลเสน ตณฺหาชรามรณานํ อนญฺญตฺตํ โยเชติ. ยทิปิ ‘‘อญฺญา ตณฺหา, อญฺญา ชรา, อญฺญํ มรณ’’นฺติ สิทฺโธวายมตฺโถ, ยํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘น อิท’’นฺติอาทิ, ตถาปิ สกฺกุเณยฺยปริหารายํ โจทนาติ อชฺฌารุฬฺหํ ตตฺถ โทสํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยทิ จ ยถา ชรามรณ’’นฺติ ปาฬิปวตฺตานิ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยทิ…เป… ทสฺเสตี’’ติ อาห. ภาโวติ อธิปฺปาโย. เอเตสนฺติ ตณฺหาชรามรณานํ. “जीर्ण होणे आणि नष्ट होणे हा स्वभाव असणे” या निमित्ताने तृष्णा, जरा आणि मरण यांचे अभिन्नत्व जोडले जाते. जरी “तृष्णा वेगळी आहे, जरा वेगळी आहे, मरण वेगळे आहे” हा अर्थ सिद्धच आहे, ज्याला उद्देशून “हे नाही” इत्यादी म्हटले आहे, तरीही शक्य असलेल्या परिहारासाठी हा आक्षेप आहे, असे मानून तेथील दोष दाखवण्यासाठी “जर आणि जसे जरा-मरण...” या पाळीच्या प्रवृत्तीला दाखवताना “जर... पे... दाखवतो” असे म्हटले आहे. ‘भाव’ म्हणजे अभिप्राय. ‘यांचे’ म्हणजे तृष्णा, जरा आणि मरण यांचे. ‘‘อิมาย ยุตฺติยา อญฺญมญฺเญหิ การเณหิ คเวสิตพฺพ’’นฺติ จ เกจิ ปฐนฺติ, พฺยญฺชนโตปิ คเวสิตพฺพํ, อญฺญตฺถ อตฺถโต อญฺญตฺถมฺปีติ อธิปฺปาโย. ตเมว พฺยญฺชนโต อญฺญตฺถํ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘สลฺโลติ วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อิเมสนฺติ สลฺลธูปายนานํ. อิจฺฉาวิปริยาเยติ อิจฺฉิตาลาเภ, อปฺปจฺจยสมวาเย วา. อิทมฺปิ สมตฺถนํ โหติ ยถาธิปฺเปตสฺส อญฺญตฺถสฺส พฺยติเรกทสฺสนภาวโต. ชรามรณวิปริยาเยติ ชรามรเณ อสติ. น หิ ยถาธิปฺเปตชรามรณาภาเว ตณฺหา น โหตีติ. “या युक्तीने परस्पर कारणांनी शोध घ्यावा” असे काही जण वाचतात; व्यंजनाने (शब्दाने) देखील शोध घ्यावा, अन्य ठिकाणी अर्थाने आणि अन्य ठिकाणी देखील (शोध घ्यावा) असा अभिप्राय आहे. तोच व्यंजनाने अन्य अर्थ दाखवण्यासाठी पाळीमध्ये “शल्य किंवा...” इत्यादी म्हटले आहे. ‘यांचे’ म्हणजे शल्य आणि धूपायानांचे. ‘इच्छाविपर्याय’ म्हणजे इच्छित वस्तूचा अलाभ (न मिळणे) किंवा अप्रत्यय-समवाय (प्रतिकूल कारणांचा संयोग) होय. हे देखील समर्थन होते, कारण अभिप्रेत असलेल्या अन्य अर्थाचा व्यतिरेक (अभाव) दाखवला जातो. ‘जरामरणविपर्याय’ म्हणजे जरा-मरण नसताना. कारण अभिप्रेत असलेल्या जरा-मरणाच्या अभावी तृष्णा होत नाही असे नाही. ทฺวิธา วุตฺตาติ ทฺวิปฺปกาเรน วุตฺตา, ทฺวิกฺขตฺตุํ วา วุตฺตา. ยํ อิทํ…เป… อารมฺมณกรณวเสน วา อภิลปนนฺติ เอวํ กิริยาปรามสนํ โยเชตพฺพนฺติ เวทิตพฺพํ. วิเสโสติ อยํ เอตาสํ อิจฺฉาตณฺหานํ ปกติสงฺขาโต วิเสโส. ‘‘ทฺวีหิ นาเมหี’’ติปิ ปาฬิ. ยทิปิ เอวนฺติ กามํ วิสยวิเสเสสุ เอวํ ยถาวุตฺตอวตฺถาวิเสเสน อิจฺฉาตณฺหานํ อตฺถิ กาจิ เภทมตฺตาติ อตฺโถ. สภาวโต ปน เภโท นตฺถีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตถาปี’’ติ อาห. ‘दोन प्रकारे म्हटले आहे’ म्हणजे दोन प्रकारांनी म्हटले आहे, किंवा दोनदा म्हटले आहे. “जे हे... पे... किंवा आलंबन करण्याच्या वशाने अभिभाषण” अशा प्रकारे क्रिया-परामर्श जोडला पाहिजे, असे जाणावे. ‘विशेष’ म्हणजे हा या इच्छा आणि तृष्णा यांचा प्रकृती-संख्येने (स्वभावाने) असलेला विशेष (भेद) होय. “दोन नावांनी” अशीही पाळी आहे. जरी असे असले तरी, विषय-विशेषांमध्ये अशा प्रकारे यथावृत्त अवस्था-विशेषाने इच्छा आणि तृष्णा यांच्यात काही भेदमात्र आहे, असा अर्थ आहे. परंतु स्वभावाने कोणताही भेद नाही, हे दाखवताना “तरीही” असे म्हटले आहे. อิจฺฉนฺตีติ กาเมนฺติ. ตณฺหายนา ปาตุกามตา. สนฺตาปนฏฺเฐนาติ ปริทหนภาเวน. อากฑฺฒนฏฺเฐนาติ อวหรณฏฺเฐน. สริตานีติ ราควเสน อลฺลานิ. ตํสมฺปยุตฺตปีติวเสน สินิทฺธานิ สิเนหิตานิ. วิสตฺติกาติ วิตฺถตา รูปาทีสุ เตภูมกธมฺเมสุ พฺยาปนวเสน. วิสฏาติ ปุริมเววจนเมว ต-การสฺส ฏ-การํ กตฺวา วุตฺตํ. วิสาลาติ วิปุลา. วิสกฺกตีติ ปริสกฺกติ สหติ. รตฺโต หิ ราควตฺถุนา ปาเทน ตาฬิยมาโนปิ สหติ. ‘‘โอสกฺกนํ, วิปฺผนฺทนํ วา วิสกฺกน’’นฺติ วทนฺติ. อนิจฺจาทิกํ นิจฺจาทิโต [Pg.59] คณฺหนฺตี วิสํวาทิกา โหติ. วิสํหรตีติ ตถา ตถา กาเมสุ อานิสํสํ ทสฺเสนฺตี วิวิเธหิ อากาเรหิ เนกฺขมฺมาภิมุขปฺปวตฺติโต จิตฺตํ สํหรติ สํขิปติ. วิสํ วา ทุกฺขํ, ตํ หรติ, วหตีติ อตฺโถ. ทุกฺขนิพฺพตฺตกสฺส กมฺมสฺส เหตุภาวโต วิสมูลา, วิสํ วา ทุกฺขาทิเภทา เวทนา มูลํ เอตายาติ วิสมูลา, ทุกฺขสมุทยตฺตา วิสํ ผลํ เอติสฺสาติ วิสผลา. รูปาทิทุกฺขสฺเสว ปริโภโค เอตาย, น อมตสฺสาติ วิสปริโภคา. สพฺพตฺถ นิรุตฺติวเสน ปทสิทฺธิ เวทิตพฺพา. โย ปเนตฺถ ปธาโน อตฺโถ, ตํ ทสฺเสตุํ ปุน ‘‘วิสตา วา ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘इच्छितात’ म्हणजे कामना करतात. ‘तण्हायाना’ (तृष्णा उत्पन्न होणे) म्हणजे प्रकट होण्याची इच्छा. ‘संतापन अर्थाने’ म्हणजे परिदाह (दाहक) भावाने. ‘आकर्षण अर्थाने’ म्हणजे अपहरण (ओढून नेणे) अर्थाने. ‘सरिता’ (प्रवाहित झालेल्या) म्हणजे रागाच्या वशाने ओल्या झालेल्या. त्याच्याशी संप्रयुक्त असलेल्या प्रीतीच्या वशाने स्निग्ध झालेल्या, स्नेहयुक्त झालेल्या. ‘विसत्तिका’ (विषक्तता) म्हणजे रूप इत्यादी त्रिभूमिक धर्मांमध्ये व्यापून राहिल्यामुळे विस्तृत झालेली. ‘विसटा’ (विस्तृत) हे पूर्वीचेच समानार्थी रूप आहे, जेथे ‘त’ काराचा ‘ट’ कार करून म्हटले आहे. ‘विसाला’ म्हणजे विपुला (विशाल). ‘विसक्कती’ म्हणजे चोहोबाजूने पसरते किंवा सहन करते. कारण रागाने आसक्त झालेला मनुष्य आसक्तीच्या विषयाने पायाने तुडवला गेला तरीही सहन करतो. “मागे हटणे किंवा तडफडणे म्हणजे विसक्कन” असे म्हणतात. अनित्य इत्यादींना नित्य इत्यादी रूपाने ग्रहण करणारी ही ‘विसंवादिका’ (भ्रमित करणारी) असते. ‘विसंहरती’ म्हणजे त्या त्या भोगांमध्ये आस्वाद दाखवून, विविध आकारांनी नैष्क्रम्याभिमुख प्रवृत्तीपासून चित्ताला संकुचित करते, संक्षेप करते. किंवा ‘विष’ म्हणजे दुःख, त्याला वाहून आणते असा अर्थ आहे. दुःखाची उत्पत्ती करणाऱ्या कर्माचे हेतू असल्यामुळे ती ‘विषमूला’ आहे; किंवा ‘विष’ म्हणजे दुःख इत्यादी भेदांची वेदना जिचे मूळ आहे, म्हणून ती ‘विषमूला’ आहे; दुःखसमुदय असल्यामुळे ‘विष’ हे जिचे फल आहे, म्हणून ती ‘विषफला’ आहे. हिच्याद्वारे रूप इत्यादी दुःखाचाच उपभोग घेतला जातो, अमृताचा (निर्वाणाचा) नाही, म्हणून ती ‘विषपरिभोगा’ आहे. सर्वत्र निरुक्तीच्या (व्युत्पत्तीच्या) वशाने पदसिद्धी जाणावी. येथे जो मुख्य अर्थ आहे, तो दाखवण्यासाठी पुन्हा “किंवा विस्तृत झालेली...” इत्यादी म्हटले आहे. สิเนหนํ เปมกรณํ. พนฺธนฏฺเฐนาติ สํโยชนฏฺเฐน. อาสีสนฏฺเฐนาติ อิจฺฉนฏฺเฐน. อภินนฺทนฏฺเฐนาติ อสฺสาทนฏฺเฐน, สมฺปฏิจฺฉนฏฺเฐน วา. ‘स्नेहन’ म्हणजे प्रेम करणे. ‘बंधन अर्थाने’ म्हणजे संयोजन (बांधून ठेवणे) अर्थाने. ‘आशीसन अर्थाने’ म्हणजे इच्छा करण्याच्या अर्थाने. ‘अभिनंदन अर्थाने’ म्हणजे आस्वादन करण्याच्या अर्थाने, किंवा स्वीकार करण्याच्या अर्थाने. ๒๑. อนภิรตีติ อุกฺกณฺฐา. ญาณนิพฺพิทาติ นิพฺพิทานุปสฺสนา. ยถา จ ทุกฺขู…เป… จาเรสุ ยุตฺติ วุตฺตาติ โยชนา. २१. ‘अनभिरती’ म्हणजे उत्कंठा (उदासीनता). ‘ज्ञाननिर्वेद’ म्हणजे निर्वेदानुपश्यना. आणि जसे दुःखात... पे... विचारांमध्ये युक्ती सांगितली आहे, अशी योजना करावी. สุขาปฏิปทาทนฺธาภิญฺญา สุขาปฏิปทาขิปฺปาภิญฺญา สุขาปฏิปทาทโย. โย ทุกฺขาย ปฏิปทาย วิเสสํ อธิคนฺตุํ ภพฺโพ, ตสฺส สุขาปฏิปทาโยคฺยสฺส วิย กริยมานา ธมฺมเทสนา วิเสสาวหา น โหติ, ตสฺมา สา น ยุตฺตาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘ราคจริโต’’ติอาทินา. ราคจริตสฺส ตถา ตถา กามานํ อาทีนวํ, โอการํ, สํกิเลสํ, เนกฺขมฺเม อานิสํสญฺจ อวิภาเวตฺวา อาทิโต วิปสฺสนากถาว กริยมานา น วิเสสาวหา โหติ อาสยสฺส อโสธิตตฺตาติ เอตมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ปาฬิยํ ‘‘วิปสฺสนา…เป… เทสนา’’ติ อาหาติ เวทิตพฺพํ. เสสปเทสุปีติ ยถา ‘‘ราคจริตสฺสา’’ติอาทินา ราคจริตโกฏฺฐาสวเสน ปาฬิยํ เทสนาย อยุตฺติ วุตฺตา, อิมินา นเยน เสสปเทสุปิ โทสจริตโกฏฺฐาสาทีสุปิ ‘‘โทสจริตสฺส ปุคฺคลสฺส อสุภํ เทเสยฺยา’’ติอาทินา ปาฬิยํ อวุตฺโตปิ ยถาสมฺภวมตฺโถ นิทฺธาเรตฺวา วตฺตพฺโพ. กสฺมา ปน ยุตฺติหาเร อยุตฺตินิทฺธารณา กตาติ โจทนํ มนสิ กตฺวา อาห ‘‘เอตฺถ จา’’ติอาทิ. เสเสสุปิ เอเสว นโยติ เสเสสุปิ โทสจริตาทิวเสน นิทฺธาริเตสุ อยุตฺติคเวสเนสุ อยเมว อุปาโย. อนุโลมปฺปหาน’’นฺติปิ ปาฬิ, โส เอวตฺโถ. सुखा प्रतिपदा मंदाभिज्ञा, सुखा प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञा, सुखा प्रतिपदा इत्यादी. जो दुःखा प्रतिपदेने विशेष प्राप्त करण्यास योग्य आहे, त्याला सुखा प्रतिपदेला योग्य असलेल्या व्यक्तीप्रमाणे केली जाणारी धम्मदेशना विशेष फलदायी ठरत नाही, म्हणून ती योग्य नाही, हा अर्थ “रागचरित” इत्यादींद्वारे दाखवला आहे. रागचरित व्यक्तीला त्या त्या भोगांचे आदीनव (दोष), हीनत्व, संक्लेश आणि नैष्क्रम्यातील फायदे स्पष्ट न करता, सुरुवातीलाच केवळ विपश्यना-कथा केली तर ती विशेष फलदायी ठरत नाही, कारण त्याचा आशय शुद्ध झालेला नसतो; हा अर्थ दाखवताना पाळीमध्ये “विपश्यना... पे... देशना” असे म्हटले आहे, असे जाणावे. ‘इतर पदांमध्येही’ म्हणजे जसे “रागचरिताला...” इत्यादींद्वारे रागचरित वर्गाच्या वशाने पाळीमध्ये देशनेची अयोग्यता सांगितली आहे, याच न्यायाने इतर पदांमध्येही, द्वेषचरित वर्गादींमध्येही “द्वेषचरित व्यक्तीला अशुभाची देशना करावी” इत्यादी प्रकारे पाळीमध्ये न म्हटलेले असले तरी यथासंभव अर्थ निश्चित करून सांगावा. परंतु युक्तिहारामध्ये अयोग्यतेचे निर्धारण का केले आहे? हा आक्षेप मनात ठेवून “आणि येथे...” इत्यादी म्हटले आहे. ‘इतरांमध्येही हाच न्याय आहे’ म्हणजे इतरांमध्येही द्वेषचरितादींच्या वशाने निश्चित केलेल्या अयोग्यतेच्या शोधात हाच उपाय आहे. “अनुलोमप्रहाण” अशीही पाळी आहे, त्याचाही तोच अर्थ आहे. ‘‘ยาวติกา [Pg.60] ญาณสฺส ภูมี’’ติ เอเตน ยุตฺติหารสฺส มหาวิสยตํ ทสฺเสติ. กสฺมา ปนายํ มหาวิสโยติ? ยุตฺติวิจารภาวโต, สํวณฺเณตพฺพสฺส จ ธมฺมสฺส นานานยนิปุณาทิคุณวิเสสโยคโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตํ กิสฺส เหตู’’ติ อาห. “ज्ञानाची जेवढी भूमी आहे” याद्वारे युक्तिहाराची महाविषयता (विशाल क्षेत्र) दाखवली आहे. परंतु हा महाविषय का आहे? युक्तीच्या विचाराचा भाव असल्यामुळे, आणि वर्णन करावयाच्या धम्माच्या नाना-नय-निपुणता इत्यादी गुणविशेषांच्या योगामुळे हा महाविषय आहे, हे दाखवताना “ते कोणत्या कारणाने?” असे म्हटले आहे. อปรภาเคติ ปจฺฉาภาเค. เมตฺตาวิหาริภาคสฺส อปริหีนตาวจนโต อโยโค วุตฺโต. เตนาห ‘‘สโต’’ติ. ยถาวุตฺตการณโต เอวาติ ปฏิปกฺขตฺตา เอว. ‘अपरभागात’ म्हणजे नंतरच्या भागात. मैत्रीविहार भागाच्या अपरिहीनतेच्या (ऱ्हास न होण्याच्या) वचनामुळे अयोग (असंगती) सांगितला आहे. म्हणूनच “स्मृतिमान” असे म्हटले आहे. ‘यथावृत्त कारणानेच’ म्हणजे प्रतिपक्ष (विरोधी) असल्यामुळेच. ปหาเนกฏฺฐภาวโต ทิฏฺฐิมญฺญิตสฺส. อาทีนวทสฺสเนน วิตกฺกํ ชิคุจฺฉนฺตา ทุติยชฺฌานสฺส อาสนฺนอุปจารชฺฌานธมฺมาปิ วิตกฺการมฺมณา น โหนฺติ, ปเคว ทุติยชฺฌานธมฺมาติ อธิปฺปาเยนาห ‘‘อารมฺมณกรณตฺโถ เหตฺถ สหคตสทฺโท’’ติ. दृष्टीच्या कल्पनेचा (दृष्टि-मन्यनाचा) प्रहाण हाच एक उद्देश असल्यामुळे. दोषांचे दर्शन झाल्यामुळे वितर्काचा तिरस्कार करणारे द्वितीय ध्यानाच्या जवळ असलेल्या उपचार-ध्यान-धर्मांमध्येही वितर्काला आलंबन करत नाहीत, मग द्वितीय ध्यानाच्या धर्मांबद्दल काय सांगावे! या अभिप्रायाने म्हटले आहे की, “येथे ‘सहगत’ शब्दाचा अर्थ आलंबन करणे हा आहे.” เอวํ ยุตฺติหารลกฺขณํ อาคมโต ยุตฺตายุตฺตวิจารํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อาคมานุคตาย ยุตฺติยาปิ ตํ ทสฺเสตุํ คุณมุเขน โทสวิภชนํ วิภชนฺโต ‘‘อปิเจตฺถา’’ติอาทิมาห. ตํ อุตฺตานตฺถเมว. अशा प्रकारे आगमावरून युक्तिहाराचे लक्षण आणि योग्य-अयोग्य विचार दाखवून, आता आगमानुगामी युक्तीने देखील ते दाखवण्यासाठी गुणांच्या मुखाने दोषांचे विभाजन करताना “आणि येथे देखील...” इत्यादी म्हटले आहे. ते स्पष्ट अर्थाचेच आहे. ยุตฺติหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. युक्तिहार-विभंग-वर्णन समाप्त झाले. ๔. ปทฏฺฐานหารวิภงฺควณฺณนา ४. पदस्थानहार-विभंग-वर्णन. ๒๒. เตสํ เตสนฺติ อนวเสสปริยาทานํ, เตน เย สุตฺเต วุตฺตา จ ธมฺมา, เย จ เตสํ การณภูตํ, เตสํ สพฺเพสมฺปีติ วุตฺตํ โหติ. สพฺพธมฺมยาถาวอสมฺปฏิเวโธติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘กตฺถ ปน โส’’ติอาทิ วุตฺตํ. २२. "तेसं तेसं" (त्यांच्या त्यांच्या) म्हणजे पूर्णपणे शेष न ठेवता ग्रहण करणे; त्यामुळे सूत्तात जे धम्म सांगितले आहेत आणि जे त्यांचे कारणभूत आहेत, त्या सर्वांचेच (ग्रहण) असे म्हटले आहे. "सर्व धम्मांच्या यथार्थ स्वरूपाचा अप्रतिवेध (न समजणे)" हा अर्थ दर्शवण्यासाठी "कत्थ पन सो" (परंतु तो कोठे आहे?) इत्यादी म्हटले आहे. ปิยายิตพฺพชาติยนฺติ เปมนียสภาวํ. มิจฺฉาปฏิปทาติ ปมาทาปตฺติ, มิจฺฉาภินิเวโส วา. เอกวารํ อุปฺปนฺนาปิ ปาณาติปาตเจตนา เวรปฺปสวนโต โทสสฺส, เอกวารํ อุปฺปนฺนาปิ ปมาทาปตฺติ, มิจฺฉาภินิเวโส วา โมหสฺส อุปฺปตฺติการณนฺติ ปาฬิยํ อวุตฺตมฺปิ นยโต นิทฺธาเรตพฺพนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘โทสสฺส…เป… อิมินาว นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ’’ติ อาห. นิมิตฺตตฺถคฺคหณลกฺขณํ วณฺณสณฺฐานํ, อนุพฺยญฺชนตฺถคฺคหณลกฺขณํ อนุพฺยญฺชนนฺติ ‘‘นิมิตฺตานุพฺยญฺชนคฺคหณลกฺขณา’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ตตฺถ นิมิตฺตํ อิตฺถิปุริสนิมิตฺตํ. อนุพฺยญฺชนํ หตฺถปาทหสิตกถิตาทิ. ผสฺโส ปจฺจโย เอติสฺสาติ [Pg.61] ผสฺสปจฺจยา, ตํภาโว ผสฺสปจฺจยตา. อสฺสาเทติ เอตายาติ อสฺสาโท, ตณฺหา. "पियायितब्बजातियं" म्हणजे प्रेमळ स्वभाव असणारे. "मिच्छापटिपदा" म्हणजे प्रमाद-आपत्ती (चुकीचे वर्तन) किंवा मिथ्याभिनिवेश (चुकीचा आग्रह). एकदा उत्पन्न झालेली देखील प्राणातिपात-चेतना (हिंसेची चेतना) ही वैराच्या उत्पत्तीमुळे द्वेषाचे कारण बनते, आणि एकदा उत्पन्न झालेली प्रमाद-आपत्ती किंवा मिथ्याभिनिवेश हा मोहाच्या उत्पत्तीचे कारण बनतो, हे पाळीमध्ये थेट न सांगितले असले तरीही न्यायाने (पद्धतीने) निश्चित केले पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी "दोसस्स...पे... इमिनाव नयेन अत्थो वेदितब्बो" (द्वेषाचे... या न्यायानेच अर्थ समजून घ्यावा) असे म्हटले आहे. निमित्ताचा अर्थ ग्रहण करण्याचे लक्षण म्हणजे वर्ण आणि संस्थान (आकार), आणि अनुव्यंजनाचा अर्थ ग्रहण करण्याचे लक्षण म्हणजे अनुव्यंजन; म्हणूनच "निमित्तानुब्यंजनग्गहणलक्खणा" असे म्हटले आहे. त्या त्या ठिकाणी 'निमित्त' म्हणजे स्त्री-पुरुष निमित्त होय. 'अनुव्यंजन' म्हणजे हात, पाय, हास्य, संभाषण इत्यादी. स्पर्श हा जिचा प्रत्यय (कारण) आहे ती "फस्सपच्चया" (स्पर्शप्रत्यया), आणि तिचा भाव म्हणजे "फस्सपच्चयाता" (स्पर्शप्रत्ययता) होय. जिच्याद्वारे आस्वाद घेतला जातो तो "अस्सादो" (आस्वाद) म्हणजेच तण्हा (तृष्णा) होय. วตฺถูนิ เญยฺยธมฺโมติ อาห ‘‘วตฺถุอวิปฺปฏิปตฺติ วิสยสภาวปฏิเวโธ’’ติ. อิธาธิปฺเปตํ สมฺมาปฏิปตฺตึ ทสฺเสตุํ ‘‘สีลสมาธิสมฺปทาน’’นฺติ วุตฺตํ. เอกเทสุปลกฺขณวเสน, วณฺณคนฺธราคิสปฺปายวเสน วา ปาฬิยํ ‘‘วินีลกวิปุพฺพกคฺคหณลกฺขณา อสุภสญฺญา’’ติ วตฺวา ‘‘ตสฺสา นิพฺพิทาปทฏฺฐาน’’นฺติ วุตฺตํ นิพฺพิทํ ทสฺเสนฺโต ‘‘นิพฺพิทา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ปริตสฺสนโต วิเสเสตุํ ‘‘ญาเณนา’’ติ วิเสสิตํ. ตถา ปวตฺตนฺติ นิพฺพิทนากาเรน ปวตฺตนํ. "वत्थूनि" (वस्तू) म्हणजे ज्ञेय धम्म आहेत, म्हणून "वत्थुअविप्पटिपत्ति विसयसभावपटिवेधो" (वस्तूविषयीची अविप्रतिपत्ती म्हणजे विषयाच्या स्वभावाचा प्रतिवेध होय) असे म्हटले आहे. येथे अभिप्रेत असलेली सम्यक् प्रतिपत्ती दर्शवण्यासाठी "सीलसमाधिसम्पदानं" (शील आणि समाधीची संपदा) असे म्हटले आहे. एका भागाच्या लक्षणावरून किंवा वर्ण, गंध व रागाच्या अनुकूलतेवरून पाळीमध्ये "विनीलक-विपुब्बक-ग्रहण-लक्षणाची असुभसंज्ञा" असे सांगून, "तिचे पदस्थान निर्वेद (वैराग्य) आहे" असे निर्वेद दर्शवण्यासाठी "निब्बिदा" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे परित्रासापासून (भयापासून) विशेष करण्यासाठी "ञाणेन" (ज्ञानाने) असे विशेषित केले आहे. "तथा पवत्तं" म्हणजे निर्वेदाच्या आकाराने प्रवृत्त होणे. โยนิโส อุมฺมุชฺชนฺติยา วิเทหรญฺโญ ธีตาย รุจาย ชาติสฺสรญาณํ กมฺมสฺสกตญฺญาณสฺส การณํ อโหสิ, น ปน อสปฺปุริสูปนิสฺสยโต, อโยนิโส อุมฺมุชฺชนฺตสฺส ตสฺเสว รญฺโญ เสนาปติโน อลาตสฺส พีชกสฺส ทาสสฺสาติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิมสฺส จ…เป… อุทาหริตพฺโพ’’ติ อาห. โสติ ปสาโท. อวตฺถาวิเสโสติ สมฺปยุตฺตธมฺมานํ อนาวิลภาวลกฺขิโต อวตฺถาเภโท. อายตนคโตติ ฐานคโต, รตนตฺตยวิสโยติ อตฺโถ. ‘‘กาโย’’ติอาทินา อวตฺถาวิเสเสน วินา สภาวสิทฺธเมว ปทฏฺฐานํ ทสฺเสติ. योनीशो (योग्य प्रकारे) वर येणाऱ्या विदेह राजाची कन्या रुचा हिचे जातिस्मर ज्ञान हे कम्मस्सकता ज्ञानाचे (कर्मस्वकीयता ज्ञानाचे) कारण झाले, परंतु असत्पुरुषाच्या उपनिश्रयामुळे (वाईट संगतीमुळे) अयोनीशो वर येणाऱ्या त्याच राजाचा सेनापती अळात, बीजाक आणि दास यांच्या बाबतीत तसे झाले नाही, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी "इमस्स च...पे... उदाहरितब्बो" (आणि याचे... उदाहरण दिले पाहिजे) असे म्हटले आहे. "सो" म्हणजे प्रसाद (चित्ताची प्रसन्नता/श्रद्धा). "अवत्थाविसेसो" म्हणजे संप्रयुक्त धम्मांच्या अनावीलभावाने (स्वच्छतेने) लक्षित झालेला अवस्थाभेद होय. "आयतनगतो" म्हणजे स्थानगत, म्हणजेच त्रिरत्नविषयक असा अर्थ आहे. "कायो" इत्यादी अवस्थाभेदाशिवाय स्वभावसिद्ध असलेलेच पदस्थान दर्शवते. อิมสฺมึ จ ฐาเน ปาฬิยํ ปุพฺเพ เยสํ ธมฺมานํ ปทฏฺฐานํ นิทฺธาริตํ, เต ธมฺมา เยสํ ธมฺมานํ ปทฏฺฐานานิ โหนฺติ, เต ทสฺเสตุํ ‘‘อปโร นโย’’ติอาทิ อารทฺธนฺติ เวทิตพฺพํ. อสฺสาทมนสิกาโร อโยนิโสมนสิการลกฺขโณ วุตฺโต นิทสฺสนมตฺตอตฺโถติ เวทิตพฺโพ, เยภุยฺเยน สตฺตานํ โลภวเสน อโยนิโสมนสิการา สํวตฺตนฺตีตฺติ ทสฺสนตฺถํ วา เอวํ วุตฺตํ. อุปปตฺติ เอว โอปปจฺจยํ, ตสฺส ภาโว โอปปจฺจยิกนฺติ อาห ‘‘อุปปตฺติภวภาเวนา’’ติ. ววตฺถิตภาโวติ ววตฺถิตภาโว รูปสฺส ทสฺสนาทิปฏินิยตารมฺมณกิจฺจตา. ภวสฺส องฺคานีติ ภวสฺส การณานิ. ทุติเย องฺคานีติ อวยวา, กมฺมวฏฺฏมฺปิ วา การณงฺคภาเวน โยเชตพฺพํ. आणि या ठिकाणी पाळीमध्ये पूर्वी ज्या धम्मांचे पदस्थान निश्चित केले आहे, ते धम्म ज्या धम्मांचे पदस्थान होतात, ते दर्शवण्यासाठी "अपरो नयो" (दुसरी पद्धत) इत्यादी सुरू केले आहे, असे समजावे. आस्वाद-मनसिकार हा अयोनीशोमनसिकार-लक्षण असलेला सांगितला आहे, तो केवळ निदर्शनार्थ (उदाहरणादाखल) आहे असे समजावे; किंवा बहुतांश प्राण्यांचे लोभामुळे अयोनीशोमनसिकार प्रवृत्त होतात, हे दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. उपपत्ती (जन्म) म्हणजेच 'ओपपच्चय', आणि त्याचा भाव म्हणजे 'ओपपच्चयिक' होय, म्हणून "उपपत्तिभवभावेन" (उपपत्तीच्या भावाने) असे म्हटले आहे. "ववत्थितभावो" (व्यवस्थितभाव) म्हणजे रूपाचे दर्शनादी प्रतिनियत आलंबन कार्य होय. "भवस्स अङ्गानि" म्हणजे भवाचे कारणे. दुसऱ्या (पक्षात) "अङ्गानि" म्हणजे अवयव, किंवा कम्मवट्ट (कर्मवर्त) देखील कारणांगभावाने जोडले पाहिजे. กมฺมฏฺฐานสฺสาติ ภาวนาย พฺรูหนา วฑฺฒนา. เตสูติ ติตฺถญฺญุตาทีสุ. กลฺยาณมิตฺตสฺส สมฺมเทว ปยิรุปาสนายปีติ ตํ นิสฺสาย ลทฺเธน สพฺพาย ธมฺมสฺสวเนน ธมฺมุปสํหิตํ ปาโมชฺชํ โหตีติ ติตฺถญฺญุตา ปีตญฺญุตาย ปทฏฺฐานํ. เอวํ ยาย วิมุตฺติยา สติ วิมุตฺติญาณทสฺสนํ โหตีติ [Pg.62] สา ตสฺส ปทฏฺฐานนฺติ อยมตฺโถ ปากโฏติ อาห ‘‘ปุริมานํ…เป… สุวิญฺเญยฺโย เอวา’’ติ. สห อธิฏฺฐาเนนาติ ญาตปริญฺญาย สทฺธึ. ญาตปริญฺญา หิ ตีรณปริญฺญาย อธิฏฺฐานํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. "कम्मट्ठानस्स" (कर्मस्थानाचे) म्हणजे भावनेची वृद्धी व वाढ होय. "तेसू" म्हणजे तीर्थज्ञता इत्यादींमध्ये. कल्याणमित्राची चांगल्या प्रकारे उपासना केल्याने देखील, त्याच्या आश्रयाने मिळालेल्या सर्व धम्मश्रवणामुळे धम्मोपसंहित प्रामोज्य (आनंद) होतो, म्हणून तीर्थज्ञता ही प्रीतज्ञतेचे पदस्थान आहे. अशा प्रकारे ज्या विमुक्तीमुळे विमुक्तीज्ञानदर्शन होते, ती विमुक्ती त्याचे पदस्थान आहे, हा अर्थ स्पष्ट आहे, म्हणून "पुरिमानं...पे... सुविञ्ञेय्यो एवा" (पूर्वीच्या... सहज समजण्यासारखेच आहे) असे म्हटले आहे. "सह अधिट्ठानेन" म्हणजे ज्ञातपरिज्ञेच्या सोबत. कारण ज्ञातपरिज्ञा ही तीरणपरिज्ञेचे अधिष्ठान आहे. उर्वरित सर्व सहज समजण्यासारखेच आहे. ปทฏฺฐานหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. पदस्थानहारविभंगवर्णना समाप्त झाली. ๕. ลกฺขณหารวิภงฺควณฺณนา ५. लक्षणहारविभंगवर्णना ๒๓. ‘‘ลกฺขณหารสฺส วิสยํ ปุจฺฉตี’’ติ วุตฺตํ, ‘‘โก ปน ตสฺส วิสโย’’ติ วุตฺเต สมานลกฺขณา อวุตฺตธมฺมา. กายานุปสฺสนาย สมารทฺธาย เวทนานุปสฺสนาทโย สุเขเนว สิชฺฌนฺตีติ ตพฺพจเนน เวทนาคตาสติอาทีนํ วุตฺตภาโว ทสฺสิโต สติปฏฺฐานภาเวน เอกลกฺขณตฺตาติ กายานุปสฺสนาสติปฏฺฐานสฺส สทฺธานุคฺคหิตานิ วีริยสติสมาธิปญฺญินฺทฺริยานิ สาธนํ, เอวํ อิตเรสมฺปีติ กตฺวา วุตฺตํ. อยํ อตฺโถ อฏฺฐกถายเมว (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๕๑) ปรโต อาคมิสฺสติ. อิมินา นเยน เสเสสุปิ เอกลกฺขณตานิทฺเทเสสุ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ปรโตติ จตุพฺยูหหารวณฺณนายํ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๒๐). २३. "लक्षणहाराचा विषय विचारतात" असे म्हटले आहे, "परंतु त्याचा विषय कोणता?" असे विचारले असता, समान लक्षण असलेले न सांगितलेले धम्म (हा त्याचा विषय आहे). कायानुपस्सना सुरू केली असता वेदनानुपस्सना इत्यादी सहज साध्य होतात, या वचनाने वेदनागतस्मृती इत्यादींचा कथित भाव दर्शवला आहे, कारण सतिपट्ठानभावाने (स्मृतिप्रस्थानभावाने) ते एक-लक्षण आहेत; म्हणून कायानुपस्सना-सतिपट्ठानाचे श्रद्धा-अनुगृहीत वीर्य, स्मृती, समाधी आणि प्रज्ञेंद्रिय हे साधन आहेत, आणि इतर बाबतीतही असेच आहे, असे मानून म्हटले आहे. हा अर्थ अट्ठकथेमध्येच (नेत्ति. अट्ठ. ५१) पुढे येईल. या न्यायाने उर्वरित एक-लक्षण निर्देशातही अर्थ समजून घ्यावा. "परतो" (पुढे) म्हणजे चतुर्व्यूहहारवर्णनेमध्ये (नेत्ति. अट्ठ. २०). อสมฺมิสฺสโตติ เวทนาทโยปิ เอตฺถ สิตา เอตฺถ ปฏิสนฺธาติ กาเย เวทนาทิอนุปสฺสนาปสงฺเคปิ อาปนฺเน ตทสมฺมิสฺสโตติ อตฺโถ. "असंमिश्रतेने" म्हणजे वेदना इत्यादी देखील येथे आश्रित आहेत, येथे प्रतिसंधी घेतात, अशा प्रकारे कायेमध्ये वेदनादी अनुपस्सनेचा प्रसंग प्राप्त झाला तरीही, त्यांच्या असंमिश्रतेने असा अर्थ आहे। อวยวิคาหสมญฺญาติธาวนสาราทานาภินิเวสนิเสธนตฺถํ กายํ องฺคปจฺจงฺเคหิ, ตานิ จ เกสาทีหิ, เกสาทิเก จ ภูตุปาทายรูเปหิ วินิพฺภุชิตุํ ‘‘ตถา น กาเย’’ติอาทิมาห. ปาสาทาทินคราวยวสมูเห อวยวิวาทิโนปิ อวยวิคาหณํ กโรนฺติ. นครํ นาม โกจิ อตฺโถ อตฺถีติ ปน เกสญฺจิ สมญฺญาติธาวนํ สิยาติ อิตฺถิปุริสาทิสมญฺญาติธาวเน นครนิทสฺสนํ วุตฺตํ. อญฺโญ โกจิ สตฺตาทิโก. ยํ ปสฺสติ อิตฺถึ, ปุริสํ วา. นนุ จกฺขุนา อิตฺถิปุริสทสฺสนํ นตฺถีติ? สจฺจํ นตฺถิ, ‘‘อิตฺถึ ปสฺสามิ, ปุริสํ ปสฺสามี’’ติ ปน ปวตฺตสมญฺญาวเสน ‘‘ยํ ปสฺสตี’’ติ วุตฺตํ. มิจฺฉาทสฺสเนน วา ทิฏฺฐิยา ยํ ปสฺสติ, น ตํ ทิฏฺฐํ รูปายตนํ โหติ, รูปายตนํ วา ตํ น โหตีติ อตฺโถ. อถ วา ตํ โกสาทิภูตุปาทายสมูหสงฺขาตํ [Pg.63] ทิฏฺฐํ น โหติ, ทิฏฺฐํ วา ยถาวุตฺตํ น โหตีติ อตฺโถ. ยํ ทิฏฺฐํ ตํ น ปสฺสตีติ ยํ รูปายตนํ, เกสาทิภูตุปาทายสมูหสงฺขาตํ วา ทิฏฺฐํ, ตํ ปญฺญาจกฺขุนา ภูตโต น ปสฺสตีติ อตฺโถ. अवयवीचे ग्रहण (अवयविग्राह), संज्ञेच्या मागे धावणे (संज्ञातिधावन), साराचे ग्रहण (सारादान) आणि अभिनिवेश (आग्रह) यांचा निषेध करण्यासाठी, कायेला अंग-प्रत्यंगांपासून, त्यांना केसादींपासून आणि केसादींना भूत-उपादाय रूपांपासून विभक्त करण्यासाठी 'तथा न काये' (त्याचप्रमाणे कायेमध्ये नाही) इत्यादी म्हटले आहे. प्रासाद (वाडे) इत्यादी नगरांच्या अवयवांच्या समूहामध्ये अवयववादी देखील अवयवीचे ग्रहण करतात. 'नगर' नावाचा काहीतरी अर्थ (अस्तित्व) आहे, अशी काहींची संज्ञेच्या मागे धावणारी प्रवृत्ती असू शकते, म्हणून स्त्री-पुरुष इत्यादी संज्ञेच्या मागे धावण्याच्या संदर्भात नगराचे उदाहरण दिले आहे. 'अन्य कोणी' म्हणजे सत्त्व (प्राणी) इत्यादी. 'ज्याला पाहतो' म्हणजे स्त्री किंवा पुरुषाला. 'पण डोळ्यांनी स्त्री-पुरुषाचे दर्शन होत नाही ना?' हे सत्य आहे की होत नाही, परंतु 'मी स्त्रीला पाहतो, पुरुषाला पाहतो' या प्रचलित संज्ञेच्या प्रभावामुळे 'ज्याला पाहतो' असे म्हटले आहे. किंवा मिथ्यादर्शनाने (चुकीच्या दृष्टीने) जे पाहिले जाते, ते पाहिलेले रूपायतन नसते, किंवा ते रूपायतन नसते असा अर्थ आहे. अथवा, ते केसादी भूत-उपादाय समूहाने बनलेले पाहिलेले नसते, किंवा पाहिलेले हे वर सांगितल्याप्रमाणे नसते असा अर्थ आहे. 'जे पाहिले आहे ते पाहत नाही' म्हणजे जे रूपायतन किंवा केसादी भूत-उपादाय समूहाने बनलेले पाहिले आहे, त्याला प्रज्ञाचक्षूने यथार्थपणे (भूततः) पाहत नाही असा अर्थ आहे. น อญฺญธมฺมานุปสฺสีติ น อญฺญสภาวานุปสฺสี, อสุภาทิโต อญฺญาการานุปสฺสี น โหตีติ วุตฺตํ โหติ. 'न अन्यधम्मानुपस्सी' म्हणजे अन्य स्वभावाचे अनुदर्शन न करणारा, अशुभादींपेक्षा अन्य आकाराचे अनुदर्शन न करणारा असा होत नाही, असे म्हटले आहे. ปถวีกายนฺติ เกสาทึ ปถวีธมฺมสมูหตฺตา ‘‘กาโย’’ติ วทติ, ลกฺขณปถวิเมว วา อเนกเภทภินฺนํ สกลสรีรคตํ ปุพฺพาปริยภาเวน ปวตฺตมานํ สมูหวเสน คเหตฺวา ‘‘กาโย’’ติ วทติ. เอวํ อญฺญตฺถาปิ. 'पठवीकाय' म्हणजे केसादी हे पठवीधम्माचा (पृथ्वीतत्त्वाचा) समूह असल्यामुळे त्याला 'काय' असे म्हणतात, किंवा अनेक भेदांनी भिन्न असलेल्या, संपूर्ण शरीरात पसरलेल्या आणि पूर्व-अपर भावाने (क्रमशः) प्रवृत्त होणाऱ्या लक्षण-पठवीलाच समूहाच्या रूपाने ग्रहण करून 'काय' असे म्हणतात. इतर ठिकाणीही असेच समजावे. อาการสมูหสงฺขาตสฺสาติ อนิจฺจตาทิอาการสมุทายปริยายสฺส. 'आकारसमूहसंखातस्स' म्हणजे अनित्यता इत्यादी आकारांच्या समुदायाचा पर्याय. ตีสุ ภเวสุ กิเลเสติ ภวตฺตยวิสยกิเลเส. สพฺพตฺถิกนฺติ สพฺพตฺถ ลีเน, อุทฺธเต จ จิตฺเต อิจฺฉิตพฺพตฺถา, สพฺเพ วา ลีเน, อุทฺธเต จ ภาเวตพฺพา โพชฺฌงฺคา อตฺถิกา เอตายาติ สพฺพตฺถิกา. อนฺโต สงฺโกโจติ อนฺโต โอลียนา, โกสชฺชนฺติ อตฺโถ. 'तीसु भवेसु किलेसे' म्हणजे तीन भवांशी संबंधित क्लेश. 'सब्बत्थिकं' म्हणजे सर्व ठिकाणी लीन (आळशी) आणि उद्धत (चंचल) चित्तामध्ये इच्छिण्यायोग्य अर्थ असलेली, किंवा लीन आणि उद्धत चित्तामध्ये भावना करण्यास योग्य असलेले सर्व बोज्झंग (बोध्यंग) जिच्यामध्ये विद्यमान असतात ती 'सब्बत्थिका' होय. 'अन्तो संकोचो' म्हणजे आत आकुंचन पावणे, म्हणजेच आळस (कोसज्ज) असा अर्थ आहे. ๒๔. คหิเตสูติ ภาวนาคฺคหเณน คหิเตสุ, ภาวิเตสูติ อตฺโถ, วจเนน วา คหิเตสุ. ภาวนาคฺคหณทีปนตฺถตฺตา ปน วจเนน คหณสฺส ภาวนาคฺคหณเมตฺถ ปธานํ. ยสฺส สติปฏฺฐานา ภาวิตา, ตสฺส สมฺมปฺปธานาทโย โพธิปกฺขิยธมฺมา น ภาวิตาติ เนตํ ฐานํ วิชฺชตีติ จ สมานลกฺขณตาปเทเสน อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ ภาวิยมาเนสุ จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา ภาวนาปาริปูรึ คจฺฉนฺตี’’ติอาทิ วุตฺตํ. २४. 'गहितेसू' म्हणजे भावनेच्या ग्रहणाने ग्रहण केलेल्या, म्हणजेच 'भावित केलेल्या' असा अर्थ आहे, किंवा वचनाने ग्रहण केलेल्या. परंतु भावनेचे ग्रहण स्पष्ट करण्यासाठी वचनाने ग्रहण करण्यापेक्षा येथे भावनेचे ग्रहणच मुख्य आहे. 'ज्याचे सतिपट्ठान भावित झाले आहे, त्याचे सम्मप्पधान इत्यादी बोधिपक्खिय धम्म भावित झाले नाहीत, असे घडणे शक्य नाही' हे समान लक्षणांच्या निर्देशाने दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये 'चार सतिपट्ठानांची भावना केली जात असताना चार सम्मप्पधान भावनेच्या परिपूर्तीला प्राप्त होतात' इत्यादी म्हटले आहे. วิปลฺลาสา ปหียนฺติ อุชุวิปจฺจนีกภาวโต. ‘‘อาหารสมุทยา กายสฺส สมุทโย, ผสฺสสมุทยา เวทนานํ สมุทโย (สํ. นิ. ๕.๔๐๘), สงฺขารปจฺจยา วิญฺญาณํ, วิญฺญาณปจฺจยา นามรูป’’นฺติ (สํ. นิ. ๑.๑, ๓๙; ม. นิ. ๓.๑๒๖; มหาว. ๑; อุทา. ๑; วิภ. ๒๒๕) วจนโต กายาทีนํ สมุทยภูตา กพฬีการาหารผสฺสมโนสญฺเจตนาวิญฺญาณาหารากายาทีนํ ปริชานเนน ปริญฺญาตา โหนฺติ ตปฺปฏิปกฺขปฺปหานโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘จตฺตาโร [Pg.64] อาหารา’’ติอาทิมาห. สพฺพตฺถาติ ‘‘อุปาทาเนหิ อนุปาทาโน ภวตี’’ติ เอวมาทีสุ. थेट विरोधी (ऋजू-विपच्चनीक) भाव असल्यामुळे विपल्लास (विपर्यास) नष्ट होतात. 'आहाराच्या समुदयाने कायेचा समुदय होतो, फस्साच्या (स्पर्शाच्या) समुदयाने वेदनांचा समुदय होतो, संखाराच्या प्रत्ययाने विञ्ञाण होते, विञ्ञाणाच्या प्रत्ययाने नामरूप होते' या वचनानुसार कायेदींच्या समुदयभूत असलेल्या कवळिकाराहार, फस्स, मनोसंचेतना आणि विञ्ञाण या आहारांचे आणि कायेदींचे परिज्ञान झाल्यामुळे, त्यांच्या प्रतिपक्षाचा (विरोधी घटकांचा) त्याग केल्याने ते परिज्ञात होतात, हे दर्शवण्यासाठी 'चार आहार' इत्यादी म्हटले आहे. 'सब्बत्था' म्हणजे 'उपादानांपासून उपादानरहित होतो' इत्यादी ठिकाणी. ตตฺถ ยสฺมา ปญฺจ กามคุณา สวิเสสา กาเย ลพฺภนฺตีติ วิเสเสน กาโย กามุปาทานสฺส วตฺถุ, สุขเวทนสฺสาทวเสน ปรโลกนิรเปกฺโข ‘‘นตฺถิ ทินฺน’’นฺติอาทิ (ที. นิ. ๑.๑๗๑; ม. นิ. ๑.๔๔๕; ๒.๙๔-๙๕, ๒๒๕; ๓.๙๑, ๑๑๖; สํ. นิ. ๓.๒๑๐; ธ. ส. ๑๒๒๑; วิภ. ๙๓๘) ปรามาสํ อุปฺปาเทตีติ ทิฏฺฐุปาทานสฺส เวทนา, จิตฺเต นิจฺจคฺคหณวเสน สสฺสตสฺส ‘‘อตฺตโน สีลาทิวเสน ปริสุทฺธปรามสนํ โหตี’’ติ สีลพฺพตุปาทานสฺส จิตฺตํ, นามรูปปริจฺเฉเทน ภูตํ ภูตโต อปสฺสนฺตสฺส ‘‘อตฺตาภินิเวโส โหตี’’ติ อตฺตวาทุปาทานสฺส ธมฺมา วตฺถุ, ตสฺมา ‘‘จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ ภาวิยมาเนสุ อุปาทาเนหิ อนุปาทาโน ภวตี’’ติ วุตฺตํ. त्यात, ज्याअर्थी पाच कामगुण विशेष रूपाने कायेमध्ये प्राप्त होतात, म्हणून विशेषतः काया ही कामुपादानाचे वस्तू (आलंबन) आहे; सुखवेदनेच्या आस्वादाच्या वशतेमुळे परलोकाची पर्वा न करता 'दिलेले काही नाही' इत्यादी परामर्शाला (मिथ्या विचाराला) उत्पन्न करते म्हणून वेदना ही दिट्ठुपादानाचे वस्तू आहे; चित्तामध्ये नित्यतेचे ग्रहण असल्यामुळे शाश्वत मानणाऱ्याचे 'आपल्या शीलादींच्या प्रभावाने परिशुद्ध परामर्श होतो' म्हणून चित्त हे सीलब्बतुपादानाचे वस्तू आहे; आणि नामरूपाच्या परिच्छेदाने यथार्थ गोष्टीला यथार्थपणे न पाहणाऱ्याचा 'आत्म-अभिनिवेश (मी-पणाचा आग्रह) होतो' म्हणून धम्म हे अत्तवादुपादानाचे वस्तू आहेत; म्हणूनच 'चार सतिपट्ठानांची भावना केली जात असताना उपादानांपासून उपादानरहित होतो' असे म्हटले आहे. ยสฺมา ปน วุตฺตนเยเนว กาโย กามโยคสฺส วตฺถุ, ภเวสุ สุขคฺคหณวเสน ภวสฺสาโท โหตีติ ภวโยคสฺส เวทนา, สนฺตติฆนคฺคหณวเสน จิตฺเต อตฺตาภินิเวโส โหตีติ ทิฏฺฐิโยคสฺสจิตฺตํ, ธมฺมวินิพฺโภคสฺส ทุกฺกรตฺตา, ธมฺมานํ ธมฺมมตฺตตาย จ ทุปฺปฏิวิชฺฌตฺตา สมฺโมโห โหตีติ อวิชฺชาโยคสฺส ธมฺมา, วตฺถุ, ตสฺมา จตุสติปฏฺฐานภาวนาย เตสุ เตสํ ปหานสิทฺธิโต โยเคหิ วิสํยุตฺตตา วุตฺตา. เอเตเนว อาสเวหิ อนาสวตา, โอเฆหิ นิตฺติณฺณตา จ สํวณฺณิตา โหติ กามราคาทีนํ เอว กามโยคกามาสวกาโมฆาทิภาวโต. परंतु, ज्याअर्थी वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच काया ही कामयोगाचे वस्तू आहे; भवांमध्ये सुखाचे ग्रहण केल्यामुळे भवास्वाद होतो म्हणून वेदना ही भवयोगाचे वस्तू आहे; संतती आणि घन (समूह) यांचे ग्रहण केल्यामुळे चित्तामध्ये आत्म-अभिनिवेश होतो म्हणून चित्त हे दिट्ठियोगाचे वस्तू आहे; आणि धम्मांचे पृथक्करण करणे कठीण असल्यामुळे तसेच धम्मांचे केवळ धम्मपण समजणे कठीण असल्यामुळे संमोह होतो म्हणून धम्म हे अविज्जायोगाचे वस्तू आहेत; म्हणूनच चार सतिपट्ठानांच्या भावनेने त्या त्या योगांचा प्रहाण (त्याग) सिद्ध होत असल्यामुळे योगांपासून विसंयोग (मुक्तता) सांगितली आहे. यानेच आसवांच्या अभावाने अनासवता (अनास्रवता) आणि ओघांमधून पार पडणे (नित्तिण्णता) यांचे वर्णन केले जाते, कारण कामराग इत्यादीच कामयोग, कामासव आणि कामोध इत्यादी रूपाने अस्तित्वात असतात. วุตฺตนเยเนว กาโย อภิชฺฌากายคนฺถสฺส วตฺถุ, ‘‘ทุกฺขาย เวทนาย ปฏิฆานุสโย อนุเสตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๔๖๕) ทุกฺขทุกฺขวิปริณามทุกฺขสงฺขารทุกฺขภูตา เวทนา วิเสเสน พฺยาปาทกายคนฺถสฺส วตฺถุ, จิตฺเต นิจฺจาภินิเวสวเสน สสฺสตสฺส ‘‘อตฺตโน สีเลน สุทฺธี’’ติอาทิปรามสนํ โหตีติ สีลพฺพตปรามาสสฺส จิตฺตํ วตฺถุ, สปฺปจฺจยนามรูปทสฺสนาภาวโต ภววิภวทิฏฺฐิสงฺขาโต อิทํสจฺจาภินิเวโส โหตีติ ตสฺส ธมฺมา วตฺถูติ จตุสติปฏฺฐานาติ โยเชตพฺพํ. वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच काया ही अभिज्झाकायगंथाचे (अभिव्याप्त आसक्तीच्या कायग्रंथाचे) वस्तू आहे; 'दुःखद वेदनेमध्ये प्रतिघानुशय सुप्त राहतो' या वचनानुसार दुःखदुःखता, विपरिणामदुःखता आणि संखारादुःखता रूप असलेली वेदना विशेषतः ब्यापादकायगंथाचे (व्यापाद कायग्रंथाचे) वस्तू आहे; चित्तामध्ये नित्यतेच्या अभिनिवेशामुळे शाश्वत मानणाऱ्याचे 'आपल्या शीलाने शुद्धी होते' इत्यादी परामर्श होतो म्हणून चित्त हे सीलब्बतपरामासाचे वस्तू आहे; आणि सप्रत्यय (हेतूसहित) नामरूपाचे दर्शन न झाल्यामुळे भव-विभव दृष्टीरूप असलेला 'हेच सत्य आहे' असा अभिनिवेश (इदंसच्चाभिनिवेश) होतो म्हणून धम्म हे त्याचे वस्तू आहेत; अशा प्रकारे चार सतिपट्ठानांशी योजना करावी. วุตฺตนเยเนว [Pg.65] วิเสสโต กาโย ราคสลฺลสฺส วตฺถุ, เวทนา โทสสลฺลสฺส, ‘‘จิตฺตํ นิจฺจคฺคหณวเสน อตฺตาภินิเวสํ อตฺตานํ เสยฺยาทิโต ทหตี’’ติ จิตฺตํ มานสลฺลสฺส, วุตฺตนเยเนว ธมฺมา โมหสลฺลสฺส วตฺถูติ จตุสติปฏฺฐานาติ โยเชตพฺพํ. वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच विशेषतः काया ही रागशल्याचे (रागसल्लाचे) वस्तू आहे, वेदना ही दोषशल्याचे (दोससल्लाचे) वस्तू आहे; 'चित्त नित्यतेच्या ग्रहणामुळे आत्म-अभिनिवेश करून स्वतःला श्रेष्ठ इत्यादी मानू लागते' म्हणून चित्त हे मानशल्याचे (मानसल्लाचे) वस्तू आहे; आणि वर सांगितलेल्या पद्धतीनेच धम्म हे मोहशल्याचे (मोहसल्लाचे) वस्तू आहेत; अशा प्रकारे चार सतिपट्ठानांशी योजना करावी. ยสฺมา ปน กายานุปสฺสนาทีหิ กายเวทนาจิตฺตธมฺเมสุ ปริญฺญาเตสุ รูปเวทนาสญฺญาสงฺขารกฺขนฺธา ปริญฺญาตา โหนฺติ, จิตฺเต หิ ปริญฺญาเต สญฺญาปิ ปริญฺญาตาว โหติ, ตสฺมา ‘‘วิญฺญาณฏฺฐิติโย จสฺส ปริญฺญํ คจฺฉนฺตี’’ติ วุตฺตํ. परंतु, ज्याअर्थी कायानुपस्सना इत्यादींद्वारे काया, वेदना, चित्त आणि धम्म यांचे परिज्ञान झाले असता रूप, वेदना, सञ्ञा आणि संखारा हे खंध (स्कंध) परिज्ञात होतात, कारण चित्ताचे परिज्ञान झाले असता सञ्ञा देखील परिज्ञातच होते; म्हणूनच 'त्याच्या विञ्ञाणट्ठिती (विज्ञानस्थिती) देखील परिज्ञानाला प्राप्त होतात' असे म्हटले आहे. ตถา วิเสสโต กาเย สาเปกฺขา ฉนฺทาคตึ คจฺฉตีติ กาโย ฉนฺทาคติยา วตฺถุ, วุตฺตนเยเนว เวทนา พฺยาปาทสฺส นิมิตฺตนฺติ สา โทสาคติยา วตฺถุ, สนฺตติฆนคฺคหณวเสน สราคาทิจิตฺเต สมฺโมโห โหตีติ โมหาคติยา จิตฺตํ, ธมฺมสภาวานวโพเธน ภยํ โหตีติ ภยาคติยา ธมฺมา วตฺถูติ จตุสติปฏฺฐานภาวนาย อคติคมนปฺปหานํ โหตีติ อาห ‘‘อคติคมเนหิ จ น อคตึ คจฺฉตี’’ติ. तसेच विशेषतः कायेमध्ये (शरीरात) सापेक्ष राहून छंदागतीला (इच्छेच्या मार्गाला) प्राप्त होते, म्हणून काय (शरीर) हे छंदागतीचे वस्तू (कारण) आहे. पूर्वोक्त पद्धतीनेच वेदना ही व्यापादाचे (द्वेषाचे) निमित्त आहे, म्हणून ती दोषागतीचे (द्वेषाच्या मार्गाचे) वस्तू आहे. संतती आणि घन यांच्या ग्रहणामुळे सरागादी (रागासहित) चित्तामध्ये संमोह (भ्रम) होतो, म्हणून चित्त हे मोहागतीचे वस्तू आहे. धम्माच्या स्वभावाचे आकलन न झाल्यामुळे भय निर्माण होते, म्हणून धम्म हे भयागतीचे वस्तू आहे. अशा प्रकारे चतुसतिपट्ठान (चार स्मृतिप्रस्थान) भावनेने अगतीगमनाचा (अयोग्य मार्गाने जाण्याचा) प्रहाण (नाश) होतो, म्हणून म्हटले आहे - 'अगतीगमनांनी तो अगतीला (अयोग्य मार्गाला) जात नाही'. ‘‘อกุสลสฺส โสมนสฺสสฺส วเสนา’’ติ อิทํ ‘‘อยมฺปิ อตฺโถ สมฺภวตี’’ติ กตฺวา วุตฺตํ. ‘‘สุขาย เวทนาย ราคานุสโย อนุเสตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๔๖๕) ปน วจนโต สุขเวทนาคฺคหเณน ตตฺถานุสยเนน สมุทยสจฺจํ เทสิตนฺติ เวทิตพฺพํ. เทสิตํ ทุกฺขํ อริยสจฺจนฺติ ทุกฺขทุกฺขคฺคหเณน สาติสยํ ทุกฺขํ อริยสจฺจํ ปกาสิตํ โหตีติ ปาฬิยํ ‘‘ทุกฺขํ อริยสจฺจํ เทสิต’’นฺติ วุตฺตํ. สหจรณาทีสุ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ เหฏฺฐา นิทฺเทสวารวณฺณนายํ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๕ อาทโย) วุตฺตํ. ‘अकुशल सोमनस्याच्या वशाने’ हे ‘हा देखील अर्थ संभवतो’ असे मानून म्हटले आहे. परंतु ‘सुखकारक वेदनेमध्ये रागानुशय सुप्त राहतो’ (म. नि. १.४६५) या वचनानुसार सुखवेदनेच्या ग्रहणाने आणि तेथे अनुशयित राहण्याने समुदयसच्च (समुदय आर्यसत्य) देशित केले आहे, असे जाणावे. देशित केलेले दुक्ख अरियसच्च (दुःख आर्यसत्य) हे दुःखदुःखाच्या ग्रहणाने अतिशय दुःखकारक असे अरियसच्च प्रकाशित करते, म्हणून पाळीमध्ये ‘दुक्ख अरियसच्च देशित केले आहे’ असे म्हटले आहे. सहचरण इत्यादींच्या बाबतीत जे सांगायचे आहे, ते खाली निर्देशवारवर्णनेमध्ये (नेत्ति. अट्ठ. ५ इत्यादी) सांगितले आहे. ลกฺขณหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. लक्खणहारविभंगवर्णना समाप्त झाली. ๖. จตุพฺยูหหารวิภงฺควณฺณนา ६. चतुब्यूहहारविभंगवर्णना ๒๕. หารานนฺติ นิทฺธารเณ สามิวจนํ. หาเรสุ อิมสฺส จตุพฺยูหหารสฺส วิเสสโต สุตฺตสฺส พฺยญฺชนวิจยภาวโตติ โยชนา. เตน วุตฺตํ ‘‘พฺยญฺชน…เป… ทสฺเสตี’’ติ. ยายาติ นิรุตฺติยา. २५. ‘हाराणं’ (हारांचे) हे निर्धारण अर्थातील षष्ठी विभक्तीचे रूप आहे. हारांमध्ये या चतुब्यूहहाराची विशेषतः सुत्ताच्या व्यंजनविचयभावामुळे (शब्दांच्या विश्लेषणाच्या स्वरूपामुळे) योजना आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - ‘व्यंजन...पे... दर्शवितो’. ‘याया’ म्हणजे निरुक्तीने. ยถารหนฺติ [Pg.66] สํวณฺณิยมาเน สุตฺเต ยํ ยํ อรหติ นิพฺพจนํ วตฺตุํ, ตํตํโลกสมญฺญานุโรเธเนว. ปุพฺพภาคปฏิปทา สมฺปาเทตฺวา ปจฺฉา สจฺจาภิสมยํ ปาปุณาตีติ อาห ‘‘สมฺมุติ…เป… โหตี’’ติ, ตํตํปญฺญตฺติคฺคหณมุเขน ปรมตฺถคฺคหณํ โหตีติ เอวํ วา อิมินา สมฺพนฺโธ. ‘यथारहं’ (योग्यतेनुसार) म्हणजे वर्णन केल्या जाणाऱ्या सुत्तामध्ये ज्या ज्या शब्दाचे निर्वचन (व्युत्पत्ती) सांगणे योग्य आहे, ते ते लोकसंज्ञेच्या (लोकव्यवहाराच्या) अनुरोधानेच होय. पूर्वभागप्रतिपदेचे संपादन करून नंतर सच्चअभिसमयाला (सत्याच्या साक्षात्काराला) प्राप्त होतो, म्हणून म्हटले आहे - ‘संमुति...पे... होते’, किंवा त्या त्या पण्णत्तीच्या (प्रज्ञप्तीच्या) ग्रहणाद्वारे परमत्थाचे (परमार्थ सत्याचे) ग्रहण होते, असा याच्याशी संबंध आहे. ยมิทํ อนินฺทฺริยพทฺธรูปสนฺตานํ สนฺธาย ‘‘อุภยมนฺตเรนา’’ติ อิธ วุตฺตํ. โอตรณหาเร (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๔๒ อาทโย) ปนสฺส ทฺวารปฺปวตฺตผสฺสาทิธมฺเม สนฺธาย วุตฺตภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘อุภยมนฺตเรนาติ ผสฺสสมุทิเตสุ ธมฺเมสู’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. อฏฺฐกถาจริยา ปนาหุ ‘‘อนฺตเรนาติ วจนํ ปน วิกปฺปนฺตรทีปน’’นฺติ. ตสฺมา อยเมตฺถ อตฺโถ – น อิมํ โลกํ, น หุรํ โลกํ, อถ โข อุภยมนฺตเรนาติ. อปโร วิกปฺโป – อุภยมนฺตเรนาติ วา วจนํ วิกปฺปนฺตราภาวทีปนํ. ตสฺสตฺโถ – น อิมํ โลกํ, น หุรํ โลกํ นิสฺสาย ฌายติ ฌายี, อุภยมนฺตเรน ปน อญฺญํ ฐานํ อตฺถีติ. जे हे अनिन्द्रियबद्ध रूपसंतानाला (अचेतन रूपाच्या प्रवाहाला) उद्देशून येथे ‘दोन्हींच्या मध्ये’ असे म्हटले आहे. परंतु ओतरणहारामध्ये (नेत्ति. अट्ठ. ४२ इत्यादी) याच्या द्वारांमध्ये उत्पन्न होणाऱ्या फस्स (स्पर्श) इत्यादी धम्मांना उद्देशून म्हटलेले स्वरूप दर्शविण्यासाठी ‘दोन्हींच्या मध्ये म्हणजे फस्सापासून उत्पन्न झालेल्या धम्मांमध्ये’ असा अर्थ सांगितला आहे. परंतु अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे - ‘अन्तरेण’ हा शब्द पर्यायांतराचे (दुसऱ्या विकल्पाचे) द्योतक आहे. म्हणून येथे हा अर्थ आहे - हा लोक नाही, परलोक नाही, तर दोन्हींच्या मध्ये. दुसरा पर्याय - ‘उभयमन्तरेण’ हा शब्द पर्यायांतराचा अभाव दर्शविणारा आहे. त्याचा अर्थ असा - ध्यानी (साधक) या लोकाचा किंवा परलोकाचा आश्रय घेऊन ध्यान करत नाही, तर दोन्हींच्या मध्ये दुसरे स्थान आहे. เยปิ จ ‘‘อนฺตราปรินิพฺพายี, สมฺภเวสี’’ติ จ อิเมสํ สุตฺตปทานํ อตฺถํ มิจฺฉา คเหตฺวา อตฺถิ เอว อนฺตราภโวติ วทนฺติ, เตปิ ยสฺมา อวิหาทีสุ ตตฺถ ตตฺถ อายุเวมชฺฌํ อนติกฺกมิตฺวา อนฺตรา อคฺคมคฺคาธิคเมน อนวเสสกิเลสปรินิพฺพาเนน ปรินิพฺพายนฺตีติ อนฺตราปรินิพฺพายี, น อนฺตราภวภูโตติ ปุริมสฺส สุตฺตปทสฺส อตฺโถ. ปจฺฉิมสฺส จ เย ภูตา เอว, น ปุน ภวิสฺสนฺติ, เต หิ (กถา. อนุฏี. ๕๐๗) ขีณาสวา, ปุริมปเทหิ ‘‘ภูตา’’ติ วุตฺตา. ตพฺพิปรีตตาย สมฺภวํ เอสนฺตีติ สมฺภเวสิโน. อปฺปหีนภวสํโยชนตฺตา เสกฺขา, ปุถุชฺชนา จ. จตูสุ วา โยนีสุ อณฺฑชชลาพุชสตฺตา ยาว อณฺฑโกสํ, วตฺถิโกสญฺจ น ภินฺทนฺติ, ตาว สมฺภเวสี นาม. อณฺฑโกสโต, วตฺถิโกสโต จ พหิ นิกฺขนฺตา ภูตา นาม. สํเสทชโอปปาติกา จ ปฐมจิตฺตกฺขเณ สมฺภเวสี นาม, ทุติยจิตฺตกฺขณโต ปฏฺฐาย ภูตา นาม. เยน วา อิริยาปเถน ชายนฺติ, ยาว ตโต อญฺญํ น ปาปุณนฺติ, ตาว สมฺภเวสี, ตโต ปรํ ภูตาติ อตฺโถ, ตสฺมา นตฺถีติ ปฏิกฺขิปิตพฺพํ. สติ หิ อุชุเก ปาฬิอนุคเต อตฺเถ กึ อนิทฺธาริตสามตฺถิเยน อนฺตราภเวน อตฺตภาวปริกปฺปิเตน ปโยชนนฺติ. आणि जे लोक ‘अन्तरापरिनिब्बायी’ आणि ‘संभवेसी’ या सुत्तपदांचा चुकीचा अर्थ लावून ‘अन्तराभव (मध्यवर्ती अस्तित्व) असतोच’ असे म्हणतात, त्यांच्या बाबतीतही - कारण अविहा इत्यादी देवलोकांमध्ये त्या त्या ठिकाणी आयुष्याचा मध्य ओलांडण्यापूर्वीच, मध्येच अग्रमागाच्या (अर्हतमार्गाच्या) प्राप्तीने आणि संपूर्ण क्लेशांच्या परिनिर्वाणाने जे परिनिर्वाण प्राप्त करतात ते ‘अन्तरापरिनिब्बायी’ होत, अन्तराभवामध्ये उत्पन्न झालेले नव्हे, असा पहिल्या सुत्तपदाचा अर्थ आहे. आणि दुसऱ्या पदाचा अर्थ - जे केवळ ‘भूत’ (उत्पन्न झालेले) आहेत, जे पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत, ते (कथा. अनुटी. ५०७) खीणासव (अर्हत) पूर्वपदांमध्ये ‘भूत’ असे म्हटले आहेत. त्याच्या उलट जे उत्पत्तीचा शोध घेतात ते ‘संभवेसी’ होत. भवसंयोजनांचा प्रहाण न झाल्यामुळे सेक्ख (शैक्ष) आणि पुथुज्जन (पृथग्जन) हे संभवेसी आहेत. किंवा चार योनींमध्ये अंडज आणि जलाबुज प्राणी जोपर्यंत अंडकोश आणि गर्भाशय भेदून बाहेर पडत नाहीत, तोपर्यंत त्यांना ‘संभवेसी’ म्हटले जाते. अंडकोश आणि गर्भाशयातून बाहेर पडलेले प्राणी ‘भूत’ म्हटले जातात. संसेदज आणि ओपपातिक प्राणी पहिल्या चित्तक्षणात ‘संभवेसी’ म्हटले जातात आणि दुसऱ्या चित्तक्षणापासून पुढे ‘भूत’ म्हटले जातात. किंवा ज्या इरियापथाने (शारीरिक स्थितीने) ते उत्पन्न होतात, जोपर्यंत ते त्याहून दुसरी स्थिती प्राप्त करत नाहीत, तोपर्यंत ‘संभवेसी’ आणि त्यानंतर ‘भूत’ असा अर्थ आहे, म्हणून ‘अन्तराभव नाही’ असेच नाकारले पाहिजे. कारण पाळीला अनुसरून सरळ अर्थ उपलब्ध असताना, स्वतःच्या कल्पनेने निर्माण केलेल्या आणि सिद्ध न झालेल्या सामर्थ्य असणाऱ्या अन्तराभवाची काय गरज? ยํ [Pg.67] ปน เย ‘‘สนฺตานวเสน ปวตฺตมานานํ ธมฺมานํ อวิจฺเฉเทน เทสนฺตเรสุ ปาตุภาโว ทิฏฺโฐ. ยถา ตํ วีหิอาทิอวิญฺญาณกสนฺตาเน, เอวํ สวิญฺญาณกสนฺตาเนปิ อวิจฺเฉเทน เทสนฺตเรสุ ปาตุภาเวน ภวิตพฺพํ. อยญฺจ นโย สติ อนฺตราภเว ยุชฺชติ, นาญฺญถา’’ติ ยุตฺตึ วทนฺติ. เตหิ อิทฺธิมโต เจโตวสิปฺปตฺตสฺส จิตฺตานุคติกํ กายํ อธิฏฺฐหนฺตสฺส ขเณน พฺรหฺมโลกโต อิธูปสงฺกมเน, อิโต วา พฺรหฺมโลกคมเน ยุตฺติ วตฺตพฺพา. ยทิ สพฺพตฺเถว วิจฺฉินฺนเทเส ธมฺมานํ ปวตฺติ น อิจฺฉิตา, ยทิปิ สิยา ‘‘อิทฺธิวิสโย อจินฺเตยฺโย’’ติ, ตํ อิธาปิ สมานํ ‘‘กมฺมวิปาโก อจินฺเตยฺโย’’ติ วจนโต, ตสฺมา ตํ เตสํ มติมตฺตเมว. อจินฺเตยฺยสภาวา หิ สภาวธมฺมา, เต กตฺถจิ ปจฺจยวิเสเสน วิจฺฉินฺนเทเส ปาตุภวนฺติ, กตฺถจิ อวิจฺฉินฺนเทเส จ. ตถา หิ มุขโฆสาทีหิ อญฺญสฺมึ เทเส อาทาสปพฺพตปฺปเทสาทิเก ปฏิพิมฺพปฏิโฆสาทิกํ ปจฺจยุปฺปนฺนํ นิพฺพตฺตมานํ ทิสฺสติ, ตสฺมา น สพฺพํ สพฺพตฺถ อุปเนตพฺพนฺติ อยเมตฺถ สงฺเขโป. วิตฺถารโต ปน ปฏิพิมฺพสฺส อุทาหรณภาวสาธนาทิโก อนฺตราภววิจาโร กถาวตฺถุปฺปกรณสฺสฏีกายํ (กถา. อนุฏี. ๕๐๗) คเหตพฺโพ. परंतु जे लोक अशी युक्ती मांडतात की - ‘संतान रूपाने (प्रवाहाने) प्रवृत्त होणाऱ्या धम्मांचा अखंडपणे दुसऱ्या देशांमध्ये (ठिकाणी) प्रादुर्भाव दिसून येतो. जसे की भात इत्यादी अचेतन संतानामध्ये होते, तसेच सचेतन संतानामध्येही अखंडपणे दुसऱ्या देशांमध्ये प्रादुर्भाव झाला पाहिजे. आणि हा नियम अन्तराभव असल्यासच योग्य ठरतो, अन्यथा नाही.’ त्यांनी ऋद्धिवान, चित्तावर वशित्व मिळविलेल्या आणि चित्ताचे अनुकरण करणाऱ्या शरीराचे अधिष्ठान करणाऱ्या व्यक्तीच्या एका क्षणात ब्रह्मलोकातून येथे येण्याच्या किंवा येथून ब्रह्मलोकात जाण्याच्या युक्तीचे स्पष्टीकरण दिले पाहिजे. जर सर्वच ठिकाणी विच्छिन्न देशात (खंडित अंतरावर) धम्मांची प्रवृत्ती मान्य नसेल, आणि जरी ‘ऋद्धिविषय अचिंत्य आहे’ असे म्हटले तरी, ते येथेही ‘कर्मविपाक अचिंत्य आहे’ या वचनानुसार समानच आहे, म्हणून ते केवळ त्यांचे मतच आहे. कारण स्वभावधम्म हे अचिंत्य स्वभावाचे असतात, ते काही ठिकाणी विशिष्ट प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) विच्छिन्न देशात प्रादुर्भूत होतात, तर काही ठिकाणी अविच्छिन्न देशात. तसेच मुखघोष (आवाज) इत्यादींमुळे दुसऱ्या ठिकाणी आरसा, पर्वत इत्यादी प्रदेशांमध्ये प्रतिबिंब, प्रतिध्वनी इत्यादी प्रत्ययोत्पन्न (कारणाने उत्पन्न झालेले) निर्माण होताना दिसतात, म्हणून सर्व गोष्टी सर्व ठिकाणी लागू करू नयेत, हा येथे संक्षेप आहे. विस्ताराने मात्र प्रतिबिंबाच्या उदाहरणाद्वारे सिद्ध केलेला अन्तराभवाचा विचार कथावत्थु-प्रकरणाच्या टीकेमध्ये (कथा. अनुटी. ५०७) घ्यावा. อปเร ปน ‘‘อิธาติ กามภโว, หุรนฺติ อรูปภโว, อุภยมนฺตเรนาติ รูปภโว วุตฺโต’’ติ วทนฺติ, ‘‘อิธาติ ปจฺจยธมฺมา, หุรนฺติ ปจฺจยุปฺปนฺนธมฺมา, อุภยมนฺตเรนาติ ปณฺณตฺติธมฺมา วุตฺตา’’ติ จ วทนฺติ, ตํ สพฺพอฏฺฐกถาสุ นตฺถิ, ตสฺมา วุตฺตนเยเนว อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อวสิฏฺฐํ รูปนฺติ อาโปธาตุอากาสธาตูหิ สทฺธึ ลกฺขณรูปานิ, โอชญฺจ สนฺธายาห อนินฺทฺริยพทฺธรูปสฺส อธิปฺเปตตฺตา. ตสฺส ขีณาสวสฺส ตํ นิพฺพานารมฺมณํ จิตฺตํ น ชานนฺติ น ญายนฺติ ‘‘ฌายมานา’’ติ วุตฺตตฺตา. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. इतर काही लोक म्हणतात की, "इथे" (इध) म्हणजे कामभव, "परलोकात" (हुरं) म्हणजे अरूपभव आणि "दोन्हींच्या दरम्यान" (उभयमन्तरेण) म्हणजे रूपभव असे म्हटले आहे. ते असेही म्हणतात की, "इथे" म्हणजे प्रत्ययधर्म (पच्चयधम्मा), "परलोकात" म्हणजे प्रत्ययोत्पन्नधर्म (पच्चयउप्पन्नधम्मा) आणि "दोन्हींच्या दरम्यान" म्हणजे प्रज्ञप्तिधर्म (पण्णत्तिधम्मा) म्हटले आहे. हे सर्व अट्ठकथांमध्ये आढळत नाही, म्हणून आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच याचा अर्थ समजून घेतला पाहिजे. "उर्वरित रूप" (अवसिट्ठं रूपं) म्हणजे आपोधातू आणि आकाशधातू यांच्यासह लक्षणरूपे आणि ओज (पोषक द्रव्य) यांना उद्देशून म्हटले आहे, कारण येथे अनिन्द्रियबद्ध रूपाचा (सजीव नसलेल्या रूपाचा) अभिप्राय आहे. त्या क्षीणासवाचे (अर्हताचे) ते निर्वाण-आरंभी (निर्वाणावर आधारित) चित्त जाणत नाहीत किंवा ओळखत नाहीत, कारण "ध्यान करणारे" (झायमाना) असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. จตุพฺยูหหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. चतुब्यूहहारविभंगवण्णना समाप्त झाली. ๗. อาวฏฺฏหารวิภงฺควณฺณนา ७. आवट्टहारविभंगवण्णना ๒๙. อกุสลานํ ธมฺมานํ วิทฺธํสนสภาวตฺตา, อกุสลานํ วา ปชหเน กุสลานํ สมฺปาทเน ปฏฺฐปนสภาวตฺตา อารมฺภธาตุ. ตถาภูตาติ สีลาทีหิ [Pg.68] สมงฺคีภูตา. กามธาตุอาทิกา ติธาตุโยว เตธาตุ. ตสฺส อภิภวนโต เตธาตุอิสฺสโร มจฺจุราชา. อนาทิมติสํสาเร จิรกาลํ ลทฺธปติฏฺฐาปิ อจิรกาลํ ภาวิเตหิ กุสเลหิ ธมฺเมหิ สมุจฺฉินฺทนียตฺตา อพลา กิเลสาติ วุตฺตํ ‘‘อพลํ ทุพฺพล’’นฺติ. เตนาห ‘‘อพลา นํ พลียนฺตี’’ติ. २९. अकुशल धर्मांचा विध्वंस करण्याचा स्वभाव असल्यामुळे, किंवा अकुशल धर्मांचा त्याग करून कुशल धर्मांच्या संपादनात प्रवृत्त करण्याचा स्वभाव असल्यामुळे ती 'आरंभधातू' (आरम्भधातु) होय. 'तथाभूता' म्हणजे शील इत्यादींनी युक्त झालेली. कामधातू इत्यादी तीन धातू म्हणजेच 'तेधातू' (त्रिधातू) होत. त्याचा पराभव करणारा असल्यामुळे मृत्यूराज (मार) हा 'तेधातूचा ईश्वर' (तेधातुइस्सर) आहे. अनादी संसारात दीर्घकाळ प्रतिष्ठा मिळवूनही, अल्पकाळातच भावना केलेल्या (अभ्यासलेल्या) कुशल धर्मांद्वारे समूळ नष्ट केले जाऊ शकत असल्यामुळे क्लेश हे दुर्बळ आहेत, म्हणून 'अबलं दुब्बलं' (अबल, दुर्बळ) असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'दुर्बळ असलेले क्लेश त्याला पराभूत करतात' (अवला नं बलीयन्ति). อิทํ วจนํ อยํ คาถาปาโท. สมาธิสฺส ปทฏฺฐานนฺติ เอตฺถ สมาธิสฺส การณํ สมตานุโยเค นิโยชนโตติ โยเชตพฺพํ. เอส นโย เสเสสุปิ. ปปญฺจาติ ราคาทโยว. ตถา เจว สํวณฺณิตนฺติ เทสนาย ปทฏฺฐานภาเวเนว อตฺถสํวณฺณนา กตาติ อตฺโถ. हे वचन म्हणजे हा गाथापाद (गाथेचा चरण) होय. 'समाधीचे पदस्थान' (समाधिस्स पदट्ठानं) यामध्ये समाधीचे कारण म्हणजे समतेच्या अभ्यासात (समतानुयोगे) प्रवृत्त करणे, असा संबंध जोडला पाहिजे. हाच नियम उर्वरित पदांच्या बाबतीतही लागू होतो. 'प्रपंच' (पपञ्च) म्हणजे राग (आसक्ती) इत्यादीच होत. 'तसेच वर्णन केले आहे' (तथा चेव संवण्णितं) याचा अर्थ असा की, देशनेचे पदस्थान म्हणूनच अर्थाचे स्पष्टीकरण (वर्णन) केले आहे. นฺติ ตํ เทสนํ. ตสฺสาติ สภาคาทิวเสน อาวฏฺฏนสฺส. ปริปกฺกญาณานํ วิเสสาธิคมาย. ลาภวินิจฺฉยปริคฺคหมจฺฉริยานีติอาทีสุ ลาโภติ รูปาทิอารมฺมณปฺปฏิลาโภ. โส ปริเยสนาย สติ โหตีติ ปริเยสนาคฺคหเณน คหิโต. วินิจฺฉโยติ ‘‘เอตฺตกํ เม รูปารมฺมณตฺถาย ภวิสฺสติ, เอตฺตกํ สทฺทาทิอารมฺมณตฺถาย, เอตฺตกํ มยฺหํ, เอตฺตกํ ปรสฺส, เอตฺตกํ ปริภุญฺชิสฺสามิ, เอตฺตกํ นิทหิสฺสามี’’ติ เอวํ ปวตฺโต วิตกฺโก วินิจฺฉโย. โส ลาปิตเหตุกตฺตา ปริเยสนมูลกตาย ปริเยสนาคฺคหเณเนว คหิโต, ตถา ปริคฺคหมจฺฉริยานิ. ตตฺถ ปริคฺคโห ‘‘มม อิท’’นฺติ ปริคฺคณฺหนํ. มจฺฉริยํ ‘‘มยฺเหว โหตู’’ติ ปเรหิ สาธารณภาวาสหนํ. เตเนวสฺส โปราณา เอวํ วจนตฺถํ วทนฺติ ‘‘มยฺเหวิทมจฺฉริยํ โหตุ, มา อญฺเญสํ อจฺฉริยํ โหตูติ ปวตฺตตฺตา มจฺฉริยนฺติ วุจฺจตี’’ติ (ที. นิ. อฏฺฐ. ๒.๑๐๓; อ. นิ. อฏฺฐ. ๓.๙.๒๓). ปริโภคตฺถานํ ปน วินิจฺฉยาทีนํ ปริโภคนฺโตคธตา เวทิตพฺพา. ฉนฺทราโค ทุพฺพลราโค. อชฺโฌสานํ ‘‘มม อิท’’นฺติ ตณฺหาวเสน พลวสนฺนิฏฺฐานนฺติ อาห ‘‘ฉนฺทราคอชฺโฌสานา ตณฺหา เอวา’’ติ. อารกฺขนิมิตฺตํ ทฺวารปิทหนมญฺชูสาโคปนาทินา สุฏฺฐุ รกฺขณนิมิตฺตํ. ปาปานิ กโรนฺโต ปริโภคนิมิตฺตํ รตฺโต คิทฺโธ คธิโต มุจฺฉิโต หุตฺวา มิโคว ปริภุญฺชนนิมิตฺตํ ปมาทํ อาปชฺชตีติ เอวํ ปริเยนารกฺขา ปริโภคนิมิตฺตํ. ปมาโท ติวิโธ ตณฺหาย วเสน กถิโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ติวิโธ ตณฺหายาติ วุตฺต’’นฺติ อาห. 'न्ति' म्हणजे ती देशना. 'त्याचे' (तस्स) म्हणजे सभाग (समान) इत्यादींच्या द्वारे आवर्तन करण्याचे. परिपक्व ज्ञान असलेल्यांच्या विशेष अधिगमनासाठी. 'लाभ, विनिच्चय (निश्चय), परिग्रह, मात्सर्य' इत्यादींमध्ये 'लाभ' म्हणजे रूप इत्यादी आलंबनांची प्राप्ती होय. तो शोध (परियेसना) असल्यावरच होतो, म्हणून 'शोध' या शब्दाच्या ग्रहणानेच तो गृहीत धरला आहे. 'विनिच्चय' म्हणजे - 'एवढे माझ्या रूप-आलंबनासाठी होईल, एवढे शब्द इत्यादी आलंबनासाठी, एवढे माझ्यासाठी, एवढे दुसऱ्यासाठी, एवढ्याचा मी उपभोग घेईन, एवढे मी साठवून ठेवीन' अशा प्रकारे प्रवृत्त झालेला वितर्क म्हणजेच विनिच्चय होय. तो लाभाच्या हेतूने आणि शोधमूलक असल्यामुळे 'शोध' या शब्दाच्या ग्रहणानेच गृहीत धरला आहे; त्याचप्रमाणे परिग्रह आणि मात्सर्य देखील. त्यामध्ये 'परिग्रह' म्हणजे 'हे माझे आहे' असे ग्रहण करणे. 'मात्सर्य' (मच्छरिय) म्हणजे 'हे केवळ माझेच असावे' अशा प्रकारे इतरांसोबत भागीदारी सहन न करणे. म्हणूनच प्राचीन आचार्य याचा असा अर्थ सांगतात - 'हे माझेच आश्चर्य (वैशिष्ट्य) असो, इतरांचे आश्चर्य नसो, अशा प्रकारे प्रवृत्त झाल्यामुळे याला मच्छरिय म्हटले जाते.' उपभोगाच्या हेतूने असणाऱ्या विनिच्चय इत्यादींचा उपभोगातच अंतर्भाव होतो, असे समजले पाहिजे. 'छंदराग' म्हणजे दुर्बळ राग. 'अज्झोसान' (अध्यवसान) म्हणजे 'हे माझे आहे' अशा प्रकारे तृष्णेच्या प्रभावाने झालेला दृढ निश्चय; म्हणूनच म्हटले आहे - 'छंदराग आणि अध्यवसान ही तृष्णाच आहे.' 'आरक्षण-निमित्त' (संरक्षणासाठी) म्हणजे दरवाजा बंद करणे, पेटीत सुरक्षित ठेवणे इत्यादींद्वारे चांगल्या प्रकारे रक्षण करण्यासाठी. पापे करत असताना, उपभोगाच्या निमित्ताने आसक्त, लोभी, गुंतलेला आणि मोहित होऊन, हरिणाप्रमाणे उपभोगाच्या निमित्ताने जो प्रमादाला प्राप्त होतो, अशा प्रकारे शोध आणि रक्षण हे उपभोगाच्या निमित्ताने होते. तृष्णेच्या प्रभावाने प्रमाद तीन प्रकारचा सांगितला आहे, हे दर्शवताना 'तृष्णेमुळे तीन प्रकारचा' असे म्हटले आहे. อวิเสเสน วุตฺตนฺติ ‘‘กตเมน อุปาทาเนน สอุปาทานา’’ติ วิภาเคน ปุจฺฉิตฺวาปิ ‘‘อวิชฺชาย จ ตณฺหาย จา’’ติ อวินิพฺภุชิตฺวา วุตฺตํ. ตณฺหญฺจ อวิชฺชญฺจ จตุรุปาทานํ [Pg.69] วเสนาติ กามุปาทานาทีนํ จตุนฺนํ อุปาทานานํ วเสน วิภชิตฺวา ขนฺธานํ ทุกฺขภาเวน ทุกฺขสจฺจภาเวน สห ปริญฺเญยฺยภาวํ, อุปาทานานํ สมุทยภาเวน สมุทยสจฺจภาเวน สห ปหาตพฺพภาวํ ทสฺเสตีติ โยชนา. 'विशेष फरक न करता म्हटले आहे' म्हणजे 'कोणत्या उपादानाने ते सोपादान (उपादानासह) आहेत?' असा विभाग करून विचारले असतानाही, 'अविद्या आणि तृष्णेमुळे' असे भेद न करता म्हटले आहे. तृष्णा आणि अविद्या यांना चार उपादानांच्या द्वारे - म्हणजे कामोपादान इत्यादी चार उपादानांच्या द्वारे विभागून, स्कंधांच्या दुःखभावासह (दुःखसत्यभावासह) परिज्ञेयभाव (जाणून घेण्याजोगा भाव) आणि उपादानांच्या समुदायभावासह (समुदयसत्यभावासह) प्रहातव्यभाव (त्याग करण्याजोगा भाव) दर्शविला आहे, असा संबंध जोडला पाहिजे. ๓๐. ‘‘โย’’ติอาทินา วุตฺโต ติวิโธ ปมาโท ปริเยสติ, อารกฺขณญฺจ กโรติ, ปริโภคนิมิตฺตญฺจาติ สมฺพนฺโธ. ปมาโท หิ ปมชฺชนฺตสฺส ปุคฺคลสฺส โภคานํ ปริเยสนาย, อารกฺขณาย จ เหตุภูโต กตฺตุภาเวน อุปจริโต, ปริโภคสฺส ปน นิมิตฺตํ. ‘‘ตปฺปฏิปกฺเขนา’’ติ ปทสฺส อตฺถํ วิวรติ ‘‘อปฺปมาทานุโยเคนา’’ติ, เตน สมถภาวํ ทสฺเสติ. เขปนาติ ขยปาปนา. โวทานปกฺขวิสภาคธมฺมวเสนาติ โวทานปกฺโข จ โส ปมาทสฺส วิสภาคธมฺโม จาติ โวทาน…เป… ธมฺโม, สมโถ, ตสฺส วเสน. ३०. 'जो' (यो) इत्यादी शब्दांनी सांगितलेला तीन प्रकारचा प्रमाद शोध घेतो, रक्षण करतो आणि उपभोगाचे निमित्त बनतो, असा संबंध आहे. कारण प्रमाद हा प्रमाद करणाऱ्या व्यक्तीच्या भोगांच्या शोधासाठी आणि रक्षणासाठी कारणीभूत ठरतो, जो कर्ता म्हणून उपचारित केला आहे, परंतु उपभोगाचे तो केवळ निमित्त आहे. 'त्याच्या विरुद्ध' (तप्पटिपक्खेन) या पदाचा अर्थ 'अप्रमादाच्या अभ्यासाने' (अप्पमादानुयोगेन) असा स्पष्ट केला आहे, त्याद्वारे समथभाव दर्शविला आहे. 'खेपना' म्हणजे क्षयाला (नाशाला) पोहोचवणे. 'वोदानपक्ष-विसभागधर्म-वशामुळे' म्हणजे जो वोदानपक्ष (शुद्धीचा पक्ष) आहे आणि जो प्रमादाचा विसभाग (विरुद्ध) धर्म आहे, तो वोदान...पे... धर्म म्हणजेच समथ होय, त्याच्या वशामुळे. สมเถ สตีติ อธิฏฺฐานภูเต ฌาเน สติ, ตํ ปาทกํ กตฺวาติ อตฺโถ. ยา ปญฺญาติ นามรูปปริจฺเฉทาทิวเสน ปวตฺตปญฺญา. เตนาห ‘‘อยํ วิปสฺสนา’’ติ. ปหีเนสูติ ปหียมาเนสุ. 'समथ असताना' (समथे सति) म्हणजे अधिष्ठानभूत ध्यान असताना, त्याला आधार बनवून, असा अर्थ आहे. 'जी प्रज्ञा' (या पञ्ञा) म्हणजे नाम-रूप परिच्छेद इत्यादींच्या द्वारे प्रवृत्त झालेली प्रज्ञा होय. म्हणूनच म्हटले आहे - 'ही विपश्यना (विपस्सना) आहे.' 'नष्ट झाल्यावर' (पहीनेसु) म्हणजे नष्ट होत असताना. โวทานปกฺขนฺติ อารมฺภธาตุอาทิโวทานปกฺขํ นิกฺขิปิตฺวา. วิสภาคธมฺมวเสนาติ ปมาทวเสเนว. สภาคธมฺมวเสนาติ ปุพฺเพ นิกฺขิตฺตสฺส อารมฺภธาตุอาทิโวทานธมฺมสฺส สมถาทิสภาคธมฺมวเสน. 'वोदानपक्ष' (वोदानपक्खं) म्हणजे आरंभधातू इत्यादी वोदानपक्षाची स्थापना करून. 'विसभागधर्माच्या वशामुळे' म्हणजे प्रमादाच्या वशामुळेच. 'सभागधर्माच्या वशामुळे' म्हणजे पूर्वी स्थापित केलेल्या आरंभधातू इत्यादी वोदानधर्माच्या समथ इत्यादी सभागधर्माच्या वशामुळे. ปุน อปริโยทาปนิยํ สิขาปฺปตฺตปริโยทาปนํ อิธาธิปฺเปตนฺติ อาห ‘‘ตํ ปน อรหตฺเตน โหตี’’ติ. पुन्हा, जे अपर्योदापनीय (पुन्हा मलीन न होणारे) आणि शिखाप्राप्त पर्योदापन (परम शुद्धी) येथे अभिप्रेत आहे, म्हणून म्हटले आहे - 'ते तर अर्हत्त्वाने (अरहत्तेन) होते.' โมหสมุฏฺฐานตา วุตฺตา ‘‘โมโห เอว สมุฏฺฐาน’’นฺติ กตฺวา. อญฺญถา ปิสุณาวาจาย โทสสมุฏฺฐานตา มุสาวาทสฺส วิย โมหสมุฏฺฐานภาวา วตฺตพฺพา สิยา. 'मोहच समुत्थान (कारण) आहे' असे मानून मोहसमुत्थानता (मोहापासून उत्पन्न होणे) सांगितली आहे. अन्यथा, चुगलीच्या (पिसुणावाचा) द्वेषसमुत्थानतेप्रमाणेच मृषावादाची (मुसावाद) देखील मोहसमुत्थानता सांगावी लागली असती. กมฺมปถภาวํ ปตฺตานํ, อปฺปตฺตานญฺจ อกุสลธมฺมานํ ‘‘สพฺพปาป’’นฺติ ปเทน ปริคฺคหิตตฺตา วุตฺตํ ‘‘กมฺมปถกมฺมวิภาเคนา’’ติ. कर्मपथभावाला प्राप्त झालेल्या आणि प्राप्त न झालेल्या अकुशल धर्मांचे 'सब्बपापं' (सर्व पाप) या पदाने ग्रहण केले असल्यामुळे 'कर्मपथ-कर्म-विभागाने' असे म्हटले आहे. ๓๑. เสสปทานนฺติ ‘‘กุสลสฺส อุปสมฺปทา’’ติอาทีนํ (ที. นิ. ๒.๙๐; ธ. ป. ๑๘๓; เนตฺติ. ๓๐, ๕๐, ๑๑๖, ๑๒๔; เปฏโก. ๒๙) คาถาย อวสิฏฺฐปทานํ. ยถาธิคตนฺติ อตฺตนา อธิคตปฺปการํ, ปจฺฉา ภูมิทิสา. ३१. 'उर्वरित पदांचे' (सेसपदानं) म्हणजे 'कुशलस्स उपसंपदा' (कुशलाची उपसंपदा) इत्यादी गाथेतील उर्वरित पदांचे होय. 'यथाधिगत' म्हणजे स्वतः प्राप्त केलेल्या प्रकारानुसार, नंतर भूमीची दिशा. อุปริ [Pg.70] ยาเปนฺตีติ มนุสฺสโลกโต อุปริฏฺฐิมํ เทวโลกํ คเมนฺติ. 'वर घेऊन जातात' (उपरि यापेन्ति) म्हणजे मनुष्यलोकापेक्षा वरच्या देवलोकात घेऊन जातात. ๓๒. ยถาวุตฺตสฺส ธมฺมสฺสาติ สีลสฺส จ มคฺคสฺส จ. ตณฺหาวิชฺชาทีนนฺติ อาทิสทฺเทน ตเทกฏฺฐกิเลสา คยฺหนฺติ, เตสํ ปทฏฺฐานธมฺมา จ. สมถวิปสฺสนาทีนนฺติ อาทิสทฺเทน สามญฺญผลานํ สงฺคโห. ยทคฺเคน เจตฺถ ‘‘นิโรโธ รกฺขตี’’ติ วุตฺโต, ตทคฺเคน มคฺโค รกฺขณกิริยาย กรณํ วุตฺตํ ‘‘เยน รกฺขตี’’ติ. วิสภาคธมฺมวเสน ปุริมานิ สภาคธมฺมาวฏฺฏนวเสน ปจฺฉิมานิ สจฺจานิ นิทฺธาริตานีติ โยเชตพฺพํ. ३२. 'यथावृत्त धम्मास्स' (यथाकथित धर्माचे) म्हणजे शीलाचे आणि मार्गाचे. 'तण्हाविज्जादीनं' (तृष्णा-अविद्या इत्यादी) यातील 'आदि' शब्दाने त्यांच्याशी संबंधित असणारे क्लेश आणि त्यांचे पदस्थान असणारे धर्म ग्रहण केले जातात. 'समथविपस्सनादीनं' (शमथ-विपश्यना इत्यादी) यातील 'आदि' शब्दाने श्रामण्यफलांचा संग्रह होतो. आणि येथे ज्या अर्थाने "निरोध रक्षण करतो" असे म्हटले आहे, त्याच अर्थाने मार्ग हा रक्षण करण्याच्या क्रियेचे साधन म्हणून "ज्याद्वारे रक्षण केले जाते" असे म्हटले आहे. विसभागाच्या (भिन्न स्वभावाच्या) धर्मांच्या वशने पूर्ववर्ती सत्ये आणि सभागाच्या (समान स्वभावाच्या) धर्मांच्या आवर्तनाच्या वशने उत्तरवर्ती सत्ये निर्धारित केली आहेत, असे जोडले पाहिजे। อาวฏฺฏหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. आवर्तहारविभंगवर्णना (आवट्टहारविभंगवण्णना) समाप्त झाली। ๘. วิภตฺติหารวิภงฺควณฺณนา ८. विभक्तिहारविभंगवर्णना (विभत्तिहारविभंगवण्णना)। ๓๓. ธมฺเมสูติ ปุญฺญาทิทานาทิเภทภินฺเนสุ สภาวธมฺเมสุ. ตตฺถ ลพฺภมาโนติ เตสุ ยถาวุตฺเตสุ ธมฺเมสุ ลพฺภมาโน. ภูมิวิภาโคติ กามาวจราทิทสฺสนาทิภูมิปฺปเภโท. ปทฏฺฐานวิภาโคติ เต ปุญฺญาทิธมฺมา เยสํ ปทฏฺฐานํ, เตสํ วา เย ธมฺมา ปทฏฺฐานํ, ตพฺพิภาโค. เยสํ สุตฺตานนฺติ มูลปทฏฺฐานภูตานํ สํกิเลสภาคิยาทีนํ จตุนฺนํ สุตฺตานํ วเสน. อสงฺกรววตฺถาเนน หิ เอเตสุ สุตฺเตสุ สาติสยํ ธมฺมา วิภตฺตา นาม โหนฺติ. เตนาห ‘‘วิเสสโต’’ติ. ยทิ เอวํ กสฺมา วาสนาภาคิยนิพฺเพธภาคิยสุตฺตานิ เอเวตฺถ คหิตานีติ? นยิทเมวํ นิกฺขมนปริโยสานภาเวน อิตเรสมฺปิ คหิตตฺตา. ยโต หิ นิสฺสฏา วาสนาภาคิยา ธมฺมา, เต สํกิเลสภาคิยา. ยํปริโยสานา นิพฺเพธภาคิยา ธมฺมา, เต อเสกฺขภาคิยาติ ทฺวยคฺคหเณเนว อิตรมฺปิ ทฺวยํ คหิตเมว โหติ. เตนาห ‘‘อิเมสํ จตุนฺนํ สุตฺตานํ เทสนายา’’ติ. อิมานิ จตฺตาริ สุตฺตานีติ ปาฬิยา, วกฺขมานาย เทสนาย วา อิตรทฺวยสงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ, น ปฏิกฺเขโป. ३३. 'धम्मेसु' (धर्मांमध्ये) म्हणजे पुण्य, दान इत्यादी भेदांनी भिन्न असलेल्या स्वभावधर्मांमध्ये. तेथे 'लब्भमानो' (प्राप्त होणारा) म्हणजे त्या यथाकथित धर्मांमध्ये प्राप्त होणारा. 'भूमिविभागो' (भूमिविभाग) म्हणजे कामावचर इत्यादी आणि दर्शन इत्यादी भूमींचे प्रभेद. 'पदट्ठानविभागो' (पदस्थानविभाग) म्हणजे ते पुण्यादी धर्म ज्यांचे पदस्थान (कारण) आहेत, किंवा जे धर्म त्यांचे पदस्थान आहेत, त्यांचा विभाग. 'येसं सुत्तानं' (ज्या सूत्रांच्या) म्हणजे मूळ पदस्थान स्वरूप असलेल्या संक्लेशभागीय (संकिलेसभागिय) इत्यादी चार सूत्रांच्या वशने. कारण असंकर व्यवस्थेने (मिश्रण न करता केलेल्या निश्चितीने) या सूत्रांमध्ये धर्म अतिशय चांगल्या प्रकारे विभक्त (वर्गीकृत) केलेले असतात. म्हणूनच "विशेषतः" (विसेसतो) असे म्हटले आहे. जर असे आहे, तर मग येथे वासनाभागीय आणि निर्वेधभागीय सूत्रांचेच ग्रहण का केले आहे? असे नाही, कारण निष्क्रमण (बाहेर पडणे) आणि पर्यवसान (शेवट) या भावाने इतरांचेही ग्रहण झाले आहे. कारण ज्यांच्यापासून वासनाभागीय धर्म निष्क्रांत (मुक्त) होतात, ते संक्लेशभागीय धर्म आहेत. आणि ज्यांच्यामध्ये निर्वेधभागीय धर्म पर्यवसित होतात, ते अशैक्षभागीय (असेक्खभागीय) धर्म आहेत; अशा प्रकारे या दोघांच्या ग्रहणानेच इतर दोघांचेही ग्रहण होते. म्हणूनच "या चार सूत्रांच्या देशनेने" (इमेसं चतुन्नं सुत्तानं देसनाया) असे म्हटले आहे. "ही चार सूत्रे" या पाळीद्वारे किंवा पुढे सांगण्यात येणाऱ्या देशनेद्वारे इतर दोघांचा संग्रह समजला पाहिजे, त्यांचा निषेध नाही। เตเนวาติ นิยมสฺส อกตตฺตา, ตโต จ เตน ตนฺนิสฺสิเตน จ พฺรหฺมจารี ภวตีติ สิทฺธํ โหติ. เอว-สทฺโท วา สมุจฺจยตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. สิยา ตสฺส ปฏิกฺเขโปติ ตสฺส อฏฺฐสมาปตฺติพฺรหฺมจริยสฺส สิยา ปฏิกฺเขโป. เอวํ สติ สาวเสสา เทสนา สิยา. 'तेनेव' (त्यामुळेच) म्हणजे नियमाचा अभाव असल्यामुळे, आणि त्यावरून त्याच्याद्वारे आणि त्यावर आश्रित असलेल्याद्वारे मनुष्य ब्रह्मचारी होतो, हे सिद्ध होते. किंवा 'एव' हा शब्द समुच्चय अर्थाने समजला पाहिजे. 'सिया तस्स पटिक्खेपो' (त्याचा निषेध असू शकतो) म्हणजे त्या अष्टसमापत्तिरूप ब्रह्मचर्याचा निषेध असू शकतो. असे असल्यास देशना सावशेष (अपूर्ण) ठरेल। ตทงฺคาทิปฺปหานทฺวยํ [Pg.71] ปทฏฺฐานภูตํ อิธ คณนูปคํ น โหตีติ ‘‘สมุจฺเฉทปฏิปฺปสฺสทฺธิปฺปหานานํ วเสนา’’ติ วุตฺตํ. ตถา เหตฺถ เกจิ ‘‘เตเนวา’’ติ ปฐนฺติ. ‘‘เตเนว พฺรหฺมจริเยนาติ ปฐนฺตี’’ติ อิทํ ‘‘สํวรสีเล ฐิโต’’ติ (เนตฺติ. ๓๓) เอตฺถ วุตฺตํ ปาฬิวิกปฺปํ สนฺธาย วทติ. ‘‘ยสฺมา…เป… วกฺขตี’’ติ อิทํ ปจฺฉิมปาฐสฺเสว ยุตฺตตาย การณวจนํ. तदंग इत्यादी दोन प्रहाण (त्याग) जे पदस्थान स्वरूप आहेत, ते येथे गणनेत येत नाहीत, म्हणून "समुच्छेद आणि प्रतिप्रश्रब्धि प्रहाणांच्या वशने" (समुच्छेदपटिप्पस्सद्धिप्पहानानं वसेन) असे म्हटले आहे. तसेच येथे काही जण "तेनेव" (त्यामुळेच) असा पाठ वाचतात. "तेनेव ब्रह्मचरियेन" (त्याच ब्रह्मचर्याने) असा पाठ वाचतात, हे "संवरशीलात स्थित असलेला" (संवरसीले ठितो - नेत्ति. ३३) येथे सांगितलेल्या पाळी-विकल्पाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. "ज्या अर्थी...पे... सांगेल" हे नंतरच्या पाठाच्याच योग्यतेचे कारण सांगणारे वचन आहे। กถํ มนฺตาติ? อนิพฺเพธสภาวตฺตา มหคฺคตปุญฺญานํ น นิพฺเพธภาคิยสุตฺเตน สงฺคโห, วาสนาภาคิยตฺตา ปน วาสนาภาคิยสุตฺเตเนว สงฺคโหติ. ตทุปสงฺคา หิ ปจฺฉิโม เอว ปาโฐ ยุตฺตตโร. อิตรถา สาวเสสา เทสนา ภเวยฺย. เตนาห ‘‘น หิ…เป… เทเสตี’’ติ. "कथं मन्ता" (मंत्र कसे आहेत)? महद्गत (महत) पुण्याचा स्वभाव अनिर्वेध (भेद न करणारा) असल्यामुळे निर्वेधभागीय सूत्रात त्याचा संग्रह होत नाही, परंतु वासनाभागीय असल्यामुळे वासनाभागीय सूत्रातच त्याचा संग्रह होतो. त्याच्या उपसंग्रहामुळे नंतरचाच पाठ अधिक योग्य आहे. अन्यथा देशना सावशेष (अपूर्ण) होईल. म्हणूनच "नाही...पे... उपदेश करतात" असे म्हटले आहे। สํกิเลสภาคิยอเสกฺขภาคิยานํ ปรโต วกฺขมานตฺตา วุตฺตํ ‘‘วกฺขมานานํ…เป… วเสนา’’ติ. ‘‘สพฺพโต’’ติ อิทํ ปุพฺพปราเปกฺขํ. ตสฺส ปราเปกฺขตาย ‘‘สพฺพโตภาเคน เอกาทสสุ ฐาเนสุ ปกฺขิปิตฺวา’’ติ อฏฺฐกถายํ โยชิตํ. ตตฺถ ปทาทิเก วิจยหารปทตฺเถ สนฺธาย ‘‘เอกาทสสุ ฐาเนสู’’ติ วุตฺตํ. ปุพฺพเปกฺขตาย ปน ‘‘สพฺพโตภาเคน เทสนาย ผเลนา’’ติอาทินา โยเชตพฺพํ. संक्लेशभागीय आणि अशैक्षभागीय धर्मांचे पुढे वर्णन केले जाणार असल्यामुळे "सांगण्यात येणाऱ्या...पे... वशने" असे म्हटले आहे. "सब्बतो" (सर्व बाजूंनी) हे पूर्व आणि पर (मागील व पुढील) संदर्भांवर अपेक्षित आहे. त्याच्या पर-अपेक्षेमुळे (पुढील संदर्भाच्या अपेक्षेमुळे) "सर्व बाजूंनी अकरा स्थानांमध्ये टाकून" असे अट्ठकथेत जोडले आहे. तेथे पदादी विचयहार पदांच्या अर्थाचा संदर्भ देऊन "अकरा स्थानांमध्ये" असे म्हटले आहे. पूर्व-अपेक्षेमुळे (मागील संदर्भाच्या अपेक्षेमुळे) "सर्व बाजूंनी देशनेच्या फलाने" इत्यादी प्रकारे जोडले पाहिजे। สํกิเลสภาคิยานํ ตณฺหาสํกิเลสาทินา เทสนานโย เวทิตพฺโพ. ผลํ อปายทุกฺเขน มนุสฺเสสุ โทภคฺคิเยน. อเสกฺขภาคิยานํ อเสกฺเขหิ สีลกฺขนฺธาทีหิ เทสนานโย. ผลํ อคฺคผเลน จ อนุปาทิเสสาย จ นิพฺพานธาตุยา เวทิตพฺพํ. อิตเรสํ ปาฬิยํ วุตฺตเมว. กามราคพฺยาปาทอุทฺธมฺภาคิยสํโยชนคฺคหเณน สํกิเลสภาคิยานํ, วิราคคฺคหเณน อเสกฺขคฺคหเณเนว จ อเสกฺขภาคิยานํ วกฺขมานตฺตา วุตฺตํ ‘‘วกฺขมานานํ…เป… วเสนา’’ติ. ปทปทตฺถวิจารยุตฺตินิทฺธารณมุเขน ธมฺมวิภตฺติอาทิวิจาโร กาตพฺโพติ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘วิจเยน…เป… ตพฺพานี’’ติ วุตฺตนฺติ อฏฺฐกถายํ ‘‘วิจเยน…เป… ทสฺเสตี’’ติ วุตฺตํ. संक्लेशभागीय धर्मांचा देशना-नय तृष्णा-संक्लेश इत्यादींद्वारे समजून घेतला पाहिजे. त्याचे फल अपाय-दुःख आणि मनुष्यांमधील दुर्भाग्याने (दौर्भाग्याने) होते. अशैक्षभागीय धर्मांचा देशना-नय अशैक्ष शीलस्कंध इत्यादींद्वारे होतो. त्याचे फल अग्रफल (अर्हत्त्व फल) आणि अनुपधिशेष निर्वाणधातूने समजून घेतले पाहिजे. इतरांचे पाळीमध्ये सांगितलेच आहे. कामराग, व्यापाद आणि उर्ध्वभागीय संयोजनांच्या ग्रहणाने संक्लेशभागीय धर्मांचे, आणि विरागाच्या ग्रहणाने व अशैक्ष ग्रहणानेच अशैक्षभागीय धर्मांचे पुढे वर्णन केले जाणार असल्यामुळे "सांगण्यात येणाऱ्या...पे... वशने" असे म्हटले आहे. पद आणि पदार्थाच्या विचाराच्या युक्तीच्या निर्धारणाद्वारे धर्मविभक्ति इत्यादींचा विचार केला पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये "विचयाने...पे... केले पाहिजेत" असे म्हटले आहे, म्हणून अट्ठकथेत "विचयाने...पे... दर्शवतो" असे म्हटले आहे। ๓๔. เอวนฺติ อิติ. ธมฺเมติ วุตฺตสภาคธมฺเม. สาธารณาสาธารณภาเวหีติ สามญฺญวิเสเสน วิสิฏฺเฐหิ. ทฺเว ธมฺมา สาธารณาติ ทฺเว อิเม ธมฺมา เยหิ สภาคธมฺมา สาธารณา นาม โหนฺติ. กตเม ทฺเว? นามํ, วตฺถุ จ. ตตฺถ นามํ นามปญฺญตฺติ, ตํมุเขเนว สทฺทโต ตทตฺถาวคโม. สทฺเทน จ สามญฺญรูเปเนว ตถารูปสฺส อตฺถสฺส [Pg.72] คหณํ, น วิเสสรูเปน, ตสฺมา สทฺทวจนียา อตฺถา สาธารณรูปนามายตฺตคหณียตาย นามสาธารณา วุตฺตา. วตฺถูติ ปวตฺติฏฺฐานํ. ยตฺถ หิ เย ธมฺมา ปวตฺตนฺติ, เตสํ สพฺเพสํ เต ธมฺมา สาธารณาติ ปวตฺติฏฺฐานสงฺขาตานํ วตฺถูนํ สาธารณา. ยสฺมา ปนิทํ ทฺวยํ เตสํ ธมฺมานํ สาธารณภาเว ปกติภูตํ สภาวภูตํ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘ทฺเว ธมฺมาติ ทุเว ปกติโย’’ติ. เอกสนฺตติปติตตายาติ สมานสนฺตติปวตฺติยา. เตนาห ‘‘สมานวตฺถุกา’’ติ. ทสฺสนปหาตพฺพานญฺหิ ยถา มิจฺฉตฺตนิยตสตฺตา ปวตฺติฏฺฐานํ, เอวํ อนิยตาปีติ อุภเย หิ เต สมานวตฺถุกา. เอส นโย อิตเรสุปิ. สกฺกายทิฏฺฐิวิจิกิจฺฉาสีลพฺพตปรามาสา หิ ภินฺนสภาวาเปเต ธมฺมา ทสฺสเนน ปหาตพฺพตํ นาติวตฺตนฺตีติ เต นามสามญฺญตํ ปตฺตา, รูปราคาทโย จ ภาวนาย ปหาตพฺพตนฺติ อาห ‘‘ปหาเนกฏฺฐา นามสาธารณา’’ติ. ยถา ปน ‘‘วตฺถูนํ สาธารณา วตฺถุสาธารณา’’ติ อยมตฺโถ ลพฺภติ, เอวํ ‘‘วตฺถุนา สาธารณา วตฺถุสาธารณา’’ติ อยมฺปิ อตฺโถ ลพฺภตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สหเชกฏฺฐา วตฺถุสาธารณา’’ติ อาห. เต หิ อญฺญมญฺญํ ผุสนาทิสภาวโต ภินฺนาปิ ยสฺมึ ปวตฺตนฺติ, เตน วตฺถุนา สาธารณา นาม โหนฺติ. เอตฺถ จ ลพฺภมานมฺปิ กุสลาทินามสาธารณํ อนามสิตฺวา วตฺถุสาธารณา ตาว โยชิตาติ เวทิตพฺพา. ปฏิปกฺขาทีหีติ อาทิสทฺเทน สมานผลตาสหพฺยตาทิเก สงฺคณฺหาติ. เสสปเทสูติ ‘‘ปุถุชฺชนสฺสา’’ติอาทิวากฺเยสุ. กถํ? ตตฺถ หิ ปุถุชฺชนสฺส, โสตาปนฺนสฺส จ สมฺภวโต อนาคามิโน, อรหโต จ อสมฺภวโตติอาทินา โยเชตพฺพํ. ३४. ‘एवम्’ म्हणजे ‘इति’ (असे). ‘धम्मा’ म्हणजे सांगितलेले सभागधम्म (समान स्वभाव असलेले धर्म). ‘साधारण-असाधारणभावेहि’ म्हणजे सामान्य आणि विशेष रूपाने विशिष्ट असलेल्या. ‘द्वे धम्मा साधारणा’ म्हणजे हे दोन धर्म आहेत ज्यांच्याद्वारे सभागधम्म ‘साधारण’ (समान) ठरतात. ते दोन कोणते? नाम आणि वस्तू (वत्थु). त्यामध्ये ‘नाम’ म्हणजे नामप्रज्ञप्ती, ज्याच्याद्वारे शब्दावरून त्या अर्थाचे आकलन होते. आणि शब्दाद्वारे सामान्य रूपानेच तशा प्रकारच्या अर्थाचे ग्रहण होते, विशेष रूपाने नाही; म्हणून शब्दाने सांगता येणारे अर्थ हे साधारण रूप असलेल्या नामाच्या अधीन राहून ग्रहण केले जात असल्यामुळे त्यांना ‘नामसाधारण’ म्हटले आहे. ‘वस्तू’ (वत्थु) म्हणजे प्रवृत्तीचे स्थान. कारण जे धर्म जेथे प्रवृत्त होतात, त्या सर्वांसाठी ते धर्म साधारण असतात, म्हणून प्रवृत्तीचे स्थान म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या वस्तूंच्या बाबतीत ते ‘साधारण’ आहेत. आणि ज्या अर्थी हे दोन्ही त्या धर्मांच्या साधारणभावामध्ये प्रकृतीभूत व स्वभावभूत आहेत, म्हणून म्हटले आहे - “द्वे धम्मा म्हणजे दोन प्रकृती”. ‘एकसंततिपतितताय’ म्हणजे समान संततीमध्ये प्रवृत्त होण्यामुळे. म्हणूनच म्हटले आहे - “समानवत्थुका” (समान वस्तू असलेले). कारण दर्शनाने प्रहातव्य (नष्ट करण्यायोग्य) असलेल्या धर्मांचे जसे मिथ्यात्व-नियत सत्त्वांचे प्रवृत्तीचे स्थान असते, तसेच अनियतांचेही असते, म्हणून ते दोन्ही समानवस्तू असलेले आहेत. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो. कारण सत्कायदृष्टी, विचिकित्सा आणि शीलव्रतपरामर्श हे भिन्न स्वभाव असलेले धर्म असूनही दर्शनाने प्रहातव्य असण्याच्या मर्यादेचे उल्लंघन करत नाहीत, म्हणून ते ‘नामसामान्यते’ला प्राप्त होतात; आणि रूपराग इत्यादी भावनेने प्रहातव्य आहेत, म्हणून म्हटले आहे - “प्रहाण-एकत्वामुळे नामसाधारण”. आणि ज्याप्रमाणे “वस्तूंचे साधारण ते वस्तुसाधारण” असा अर्थ मिळतो, त्याचप्रमाणे “वस्तूशी साधारण ते वस्तुसाधारण” असाही अर्थ मिळतो, हे दर्शवताना “सहजात-एकत्वामुळे वस्तुसाधारण” असे म्हटले आहे. कारण ते परस्पर स्पर्श इत्यादी स्वभावामुळे भिन्न असूनही ज्या वस्तूमध्ये प्रवृत्त होतात, त्या वस्तूशी ते साधारण ठरतात. आणि येथे प्राप्त होणाऱ्या कुशल इत्यादी नामसाधारणाचा उल्लेख न करता, आधी वस्तुसाधारणाची योजना केली आहे, असे समजावे. ‘प्रतिपक्षादीहि’ यातील ‘आदि’ शब्दाने समानफलता, सहभाव इत्यादींचा संग्रह होतो. ‘शेषपदेषु’ म्हणजे “पुथुज्जनस्स” (पृथग्जनाचे) इत्यादी वाक्यांमध्ये. कसे? कारण तेथे पृथग्जन आणि स्रोतआपन्नांच्या बाबतीत संभव असल्यामुळे, आणि अनागामी व अर्हतांच्या बाबतीत असंभव असल्यामुळे, इत्यादी प्रकारे योजना करावी. กถํ เต โอธิโส คหิตาติ เกนากาเรน เต ‘‘สาธารณา’’ติ วุตฺตธมฺมา ภาคโส คหิตา. ‘‘อมุกสฺส, อมุกสฺส จา’’ติ อยญฺเหตฺถ อตฺโถ. สามญฺญภูตา ธมฺมา สาธารณา นาม, เอวํ สนฺเต กถํ เตสํ มิจฺฉตฺตนิยตานิยตาทิวเสน วิภาเคน ปวตฺติฏฺฐานตา วุจฺจติ, น วตฺตพฺพนฺติ อธิปฺปาโย. อถ วิภาเคน ตํ วตฺตพฺพํ, นนุ เต สาธารณาติ น วตฺตพฺพเมวาติ? เอวํ สาธารณาติ มิจฺฉตฺตนิยตานํ, อนิยตานนฺติ อิเมสํ อุภเยสํเยว เต ธมฺมา สาธารณา. เตนาห – ‘‘น สพฺพสตฺตานํ สาธารณตาย สาธารณา’’ติ. ‘‘ยสฺมา’’ติอาทินา ตตฺถ การณมาห, เตเนตํ ทสฺเสติ ‘‘เกจิ ธมฺมา เกสญฺจิเทว ธมฺมานํ สาธารณา [Pg.73] โหนฺติ, อญฺเญสํ อสาธารณา’’ติ. เตนาห ‘‘ปฏินิยตญฺหิ เตสํ ปวตฺติฏฺฐาน’’นฺติ. ‘कथं ते ओधिसो गहिता’ म्हणजे कोणत्या प्रकारे ते ‘साधारण’ म्हणून सांगितलेले धर्म अंशतः (भागांमध्ये) ग्रहण केले आहेत? “अमुकाचे आणि अमुकाचे” असा येथे अर्थ आहे. सामान्यभूत धर्म हे ‘साधारण’ असतात; असे असताना, मिथ्यात्व-नियत आणि अनियत इत्यादींच्या विभागाने त्यांच्या प्रवृत्तीचे स्थान कसे सांगितले जाते? ते सांगता कामा नये, असा अभिप्राय आहे. जर ते विभागाने सांगायचे असेल, तर मग ते ‘साधारण’ आहेत असे म्हणूच नये की काय? अशा प्रकारे ‘साधारण’ म्हणजे मिथ्यात्व-नियत आणि अनियत या दोन्ही प्रकारच्या धर्मांसाठी ते धर्म साधारण आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे - “सर्व सत्त्वांच्या साधारणतेमुळे ते साधारण नाहीत”. “यस्मा” (ज्या अर्थी) इत्यादी शब्दांनी तेथे कारण सांगितले आहे, त्याद्वारे हे दर्शवले आहे की - “काही धर्म काही विशिष्ट धर्मांसाठीच साधारण असतात, इतरांसाठी असाधारण असतात”. म्हणूनच म्हटले आहे - “कारण त्यांच्या प्रवृत्तीचे स्थान प्रतिनियत (विशिष्ट) असते”. อิตรถาติ อนิยตปวตฺติฏฺฐานตาย สพฺเพสํ สาธารณา, อสาธารณา วา สิยุํ, ตถา สติ. ตถา โวหาโรติ ‘‘สาธารณา, อสาธารณา’’ติ จ อยํ โวหาโร สามญฺญา เอว น ภเวยฺย. เอเต เอว ธมฺมาติ ‘‘สาธารณา’’ติ วุตฺตธมฺมา เอว. เอวนฺติ ‘‘มิจฺฉตฺตนิยตาน’’นฺติอาทินา วุตฺตปฺปกาเรน. นิยตวิสยา ปริจฺฉินฺนปฺปวตฺติฏฺฐานา. ‘‘โยปี’’ติอาทิ ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน วุตฺตสฺเสวตฺถสฺส ปากฏกรณํ. ‘‘น หี’’ติอาทินา อนฺวยโต, พฺยติเรกโต จ ตเมวตฺถํ วิภาเวติ. เสเสปีติ ‘‘ภาวนาปหาตพฺพา’’ติ เอวมาทิมฺหิปิ. ‘इतरथा’ म्हणजे प्रवृत्तीचे स्थान अनियत असल्यामुळे ते सर्वांसाठी साधारण किंवा असाधारण ठरतील, तसे झाले असता. ‘तथा वोहारो’ म्हणजे “साधारण आणि असाधारण” असा हा व्यवहार सामान्यच राहणार नाही. ‘एते एव धम्मा’ म्हणजे ‘साधारण’ म्हणून सांगितलेले धर्मच. ‘एवम्’ म्हणजे “मिथ्यात्व-नियतांचे” इत्यादी प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने. नियतविषय म्हणजे परिच्छिन्न (मर्यादित) प्रवृत्तीचे स्थान असलेले. “यो पि” (जो कोणी) इत्यादी पुद्गलाधिष्ठानाने (व्यक्तीच्या संदर्भाने) सांगितलेल्या अर्थाचेच स्पष्टीकरण आहे. “न हि” (नाहीच) इत्यादी शब्दांनी अन्वय आणि व्यतिरेक या दोन्ही प्रकारे त्याच अर्थाचे स्पष्टीकरण केले आहे. ‘सेसेपि’ म्हणजे “भावनाप्रहातव्य” इत्यादी इतर पदांच्या बाबतीतही. ปจฺจตฺตนิยโตติ ปาฏิปุคฺคลิโก. อิตรสฺสาติ อปจฺจตฺตนิยตสฺส. ตถาติ อสาธารณภาเวน. โกจิ ธมฺโม กญฺจิ ธมฺมํ อุปาทาย สาธารโณปิ สมาโน ตทญฺญํ อุปาทาย อสาธารโณปิ โหตีติ อาห ‘‘สาธารณาวิธุรตายา’’ติ. เตนาห ‘‘ตํ ตํ อุปาทายา’’ติอาทิ. ตถา หิ ‘‘ธมฺมตา’’ติ วุตฺตปฐมมคฺคฏฺฐตา ทีปิตา, ตาทิสานํ เอว อเนเกสํ อริยานํ วเสน สาธารณาติ. ปฐมสฺสาติ อฏฺฐมกสฺส. ทุติยสฺสาติ โสตาปนฺนสฺส. ปุน อฏฺฐมกสฺสาติ ‘‘อฏฺฐมกสฺส, อนาคามิสฺส จา’’ติ เอตฺถ วุตฺตอฏฺฐมกสฺส. เตนาห ‘‘อนาคามิมคฺคฏฺฐสฺสา’’ติ. อคฺคผลฏฺฐโต ปฏฺฐาย ปฏิโลมโต คณิยมาโน ปฐมมคฺคฏฺโฐ อฏฺฐมโก, มคฺคฏฺฐตาย, ปหียมานกิเลสตาย จ สพฺเพปิ มคฺคฏฺฐา อฏฺฐมกา วิยาติ อฏฺฐมกา, ‘‘เอกจิตฺตกฺขณโต อุทฺธํ น ติฏฺฐตีติ อฏฺฐมโก’’ติ อปเร นิรุตฺตินเยน. ‘‘เสกฺขา’’ติ นามํ สาธารณนฺติ สมฺพนฺโธ. อิตเรสูติ ‘‘ภพฺพาภพฺพา’’ติ วุตฺเตสุ อนริเยสุ. เตนาห ปาฬิยํ ‘‘หีนุกฺกฏฺฐมชฺฌิมํ อุปาทายา’’ติ. ‘पच्चत्तनियतो’ म्हणजे प्रतिपुद्गलिक (प्रत्येक व्यक्तीशी संबंधित). ‘इतरस्स’ म्हणजे जो प्रतिपुद्गलिक नाही त्याचा. ‘तथा’ म्हणजे असाधारणभावाने. एखादा धर्म एखाद्या धर्माच्या अपेक्षेने साधारण असूनही, दुसऱ्या धर्माच्या अपेक्षेने असाधारणही असतो, म्हणून “साधारण-अविधुरतेमुळे” असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - “त्या त्या अपेक्षेने” इत्यादी. कारण “धम्मता” या शब्दाने पहिल्या मार्गस्थाची (प्रथम मार्गस्थ अवस्था) स्थिती स्पष्ट केली आहे, तशाच प्रकारच्या अनेक आर्यांच्या अपेक्षेने ती साधारण आहे. ‘प्रथमस्य’ (पहिल्याचा) म्हणजे अष्टमकाचा (आठव्याचा). ‘द्वितीयस्य’ (दुसऱ्याचा) म्हणजे स्रोतआपन्नांचा. पुन्हा ‘अष्टमकाचा’ म्हणजे “अष्टमकाचा आणि अनागामींच्या” यामध्ये सांगितलेल्या अष्टमकाचा. म्हणूनच म्हटले आहे - “अनागामी मार्गस्थांचा”. अग्रफलस्थापासून (अर्हत्-फलापासून) सुरुवात करून उलट क्रमाने मोजल्यास पहिला मार्गस्थ हा आठवा (अष्टमक) ठरतो; मार्गस्थ असल्यामुळे आणि क्लेश नष्ट होत असल्यामुळे सर्वच मार्गस्थ हे अष्टमकासारखेच आहेत म्हणून त्यांना ‘अष्टमक’ म्हणतात; किंवा “एका चित्तक्षणानंतर जो टिकत नाही तो अष्टमक” असे इतर निरुक्तीच्या नियमाने मानतात. “सेक्खा” (शैक्ष) हे नाव साधारण आहे, असा संबंध आहे. ‘इतरांमध्ये’ म्हणजे “भव्य आणि अभव्य” असे म्हटलेल्या अनार्यांमध्ये. म्हणूनच पाळीमध्ये म्हटले आहे - “हीन, उत्कृष्ट आणि मध्यम यांच्या अपेक्षेने”. นิยามาวกฺกนฺติยาติ อวกฺกนฺตนิยามตาย. ญาณุตฺถรสฺสาติ ญาณาธิกสฺส. ตถาวิธปจฺจยสมาโยเคติ ญาณวิเสสปจฺจยสมวาเย. ยถา หิ ญาณพเลน ทนฺธาภิญฺญตา น โหติ, เอวํ ปฏิปทาปฏิปนฺโนปิ สุเขน วิโสสียตีติ. สา หิ สุขาปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญา ตํสมงฺคิโน ญาณุตฺตรตฺตา วิปสฺสนาย ปทฏฺฐานนฺติ วุตฺตา. ‘नियामावक्कन्तिया’ म्हणजे नियमामध्ये (सम्यक्त्व-नियमामध्ये) अवक्रांत (प्रवेश) झाल्यामुळे. ‘ञाणुत्तरस्स’ म्हणजे ज्ञानाने अधिक असलेल्याचे (ज्ञानाधिक व्यक्तीचे). ‘तथाविधप्रत्ययसमायोगे’ म्हणजे ज्ञानविशेष प्रत्ययांच्या संयोगामध्ये. कारण ज्याप्रमाणे ज्ञानबलामुळे मंदाभिज्ञता (ज्ञानाची संथ गती) होत नाही, त्याचप्रमाणे प्रतिपदेचे आचरण करणारा देखील सुखाने (क्लेश) सुकवून टाकतो (नष्ट करतो). कारण ती ‘सुखा प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञा’ (सुखकारक मार्ग आणि जलद ज्ञान) तिच्याशी युक्त असलेल्या व्यक्तीच्या ज्ञानाधिकतेमुळे विपश्यनेचे पदस्थान (कारण) आहे, असे म्हटले आहे. ธมฺมโต [Pg.74] อนเปตา จินฺตา ธมฺมจินฺตา, โยนิโสมนสิกาเรน ปวตฺติตตฺตา ธมฺเมสุ จินฺตา, ธมฺโม วา ญาณํ, ตสฺมา ธมฺมาวหา จินฺตา ธมฺมจินฺตา, จินฺตามยญาณสฺส เหตุภูตา จินฺตาติ อตฺโถ. धर्मापासून दूर न गेलेली चिंता (विचार) म्हणजे ‘धम्मचिंता’ (धर्मचिंता). योनिशोमनसिकारामुळे (योग्य विचार पद्धतीमुळे) प्रवृत्त झाल्यामुळे धर्मांविषयीचा विचार, किंवा ‘धम्म’ म्हणजे ज्ञान, म्हणून धर्माला (ज्ञानाला) वाहून आणणारा विचार म्हणजे ‘धम्मचिंता’, चिंतामय ज्ञानाला कारणीभूत असणारा विचार, असा याचा अर्थ आहे. ปาฬิยํ สุตมยปญฺญาคฺคหเณน ‘‘เย เต ธมฺมา อาทิกลฺยาณา…เป… ตถารูปาสฺส ธมฺมา พหุสฺสุตา โหนฺตี’’ติอาทิ (อ. นิ. ๘.๒) สุตฺตปทสงฺคโห อตฺโถ ปริคฺคหิโต, ตถา โยนิโสมนสิการคฺคหเณน ‘‘โส ‘อนิจฺจ’นฺติ โยนิโส มนสิ กโรตี’’ติอาทินา วุตฺโต อุปายมนสิกาโร ปริคฺคหิโต. สมฺมาทิฏฺฐิคฺคหเณน ‘‘สมฺมาทิฏฺฐึ ภาเวติ วิเวกนิสฺสิต’’นฺติอาทินา วุตฺตา สมฺมาทิฏฺฐิ ปริคฺคหิตาติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘อถ โข…เป… ทสฺเสตุ’’นฺติ. เสสนฺติ ‘‘ธมฺมสฺวากฺขาตตา’’ติ เอวมาทิ. पाळीमध्ये श्रुतमय प्रज्ञेच्या ग्रहणाने "जे ते धम्म आदीकल्याण...पे... तशा प्रकारचे धम्म बहुश्रुत असतात" इत्यादी (अं. नि. ८.२) सुत्तपदांचा संग्रह असलेला अर्थ ग्रहण केला आहे, तसेच योनिसोमनसिकाराच्या ग्रहणाने "तो अनित्य असा योनिसो मनसिकार करतो" इत्यादींद्वारे सांगितलेला उपायमनसिकार ग्रहण केला आहे। सम्मादिट्ठिच्या ग्रहणाने "विवेकावर आश्रित असलेल्या सम्मादिट्ठिची भावना करतो" इत्यादींद्वारे सांगितलेली सम्मादिट्ठि ग्रहण केली आहे, हे दर्शविताना म्हणाले - "अथ खो...पे... दस्सेतुं" (तर मग... दर्शविण्यासाठी)। उर्वरित म्हणजे "धम्मस्वाक्खातता" इत्यादी होय। ยสฺส จ ปุพฺเพ อตฺโถ น สํวณฺณิโต, ตตฺถ กลฺยาณมิตฺตตาย อายตนคโต ปสาโท, จิตฺตวูปสโม จ ผลนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สปฺปุริส…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ อาห. อตฺตสมฺมาปณิหิตตฺตา ปาปเชคุจฺฉินิพฺพิทาทิพหุโลว โหตีติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘อตฺถ…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ. ธมฺโม สฺวากฺขาโต อาทิโต ปฏฺฐาย ยาว ปริโยสานา สพฺพสมฺปตฺติปาริปูริเหตูติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ธมฺมสฺวากฺขาตตา…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ อาห. กุสลมูลโรปนา หิ สมาปตฺติปริโยสานาติ. สงฺฆสุฏฺฐุตาย สงฺฆสฺส สุฏฺฐุภาวาย สงฺฆสฺส สปฺปติสฺสตาย ‘‘สุฏฺฐุ, ภนฺเต’’ติ วจนสมฺปฏิจฺฉนภาวาย. อิตรํ สุวิญฺเญยฺยเมว. आणि ज्याचा पूर्वी अर्थ वर्णन केला गेला नाही, तेथे कल्याणमित्रतेमुळे आयतनगत प्रसाद आणि चित्ताचा उपशम हे फल आहे, हे दर्शविताना "सप्पुरिस...पे... पदट्ठानं" असे म्हणाले। स्वतःला योग्य मार्गावर प्रस्थापित केल्यामुळे मनुष्य पापजुगुप्सा आणि निर्वेद इत्यादींनी युक्त असाच होतो, हे दर्शविताना "अत्थ...पे... पदट्ठानं" असे म्हणाले। धम्म सुव्याख्यात आहे, जो सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत सर्व संपत्तीच्या परिपूर्तीचा हेतू आहे, हे दर्शविताना "धम्मस्वाक्खातता...पे... पदट्ठानं" असे म्हणाले। कारण कुशलमुळांचे रोपण हे समापत्तीच्या समाप्तीपर्यंत असते। संघाच्या सुष्ठुतेसाठी म्हणजे संघाच्या चांगुलपणासाठी, संघाच्या आदरभावासाठी, "सुठू, भन्ते" असे वचन स्वीकारण्याच्या भावासाठी। इतर सर्व सहज समजण्यासारखेच आहे। วิภตฺติหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. विभत्तीहारविभंगवण्णना समाप्त झाली। ๙. ปริวตฺตนหารวิภงฺควณฺณนา ९. परिवत्तनहारविभंगवण्णना ๓๕. สมฺมาทิฏฺฐิสฺส…เป… นิชฺชิณฺณา ภวตีติ เอตฺถ ยถา มคฺคสมฺมาทิฏฺฐิวเสนตฺโถ วุตฺโต, เอวํ กมฺมสฺสกตากมฺมปถสมฺมาทิฏฺฐีนมฺปิ วเสน อตฺโถ ลพฺภเตว. กมฺมปถกถา เหสา. ยถาวุตฺเตนากาเรนาติ ‘‘อวิมุตฺตาว สมานา’’ติ, ‘‘อวิมุตฺติย’’นฺติ จ วุตฺตปฺปกาเรน. มิจฺฉาภินิเวสวเสนาติ อสมฺมาสมฺพุทฺธํ เอว สมฺมาสมฺพุทฺโธติ, อนิยฺยานิกํ เอว นิยฺยานิโกติ, อสนฺตํ เอว ปน สนฺตนฺติ, อนริยํ เอว อริโยติ วิปรีตาภินิเวสวเสน[Pg.75]. มิจฺฉาธิโมกฺโขติ อยาถาวปสาโท, อยาถาวสนฺนิฏฺฐานํ วา. อุปฺปนฺนโมโห มิจฺฉาวิมุตฺติญาณทสฺสนนฺติ สมฺพนฺโธ. ३५. "सम्मादिट्ठिस्स...पे... निज्जिण्णा भवती" येथे ज्याप्रमाणे मार्ग-सम्मादिट्ठिच्या वशाने अर्थ सांगितला आहे, त्याचप्रमाणे कम्मस्सकता आणि कम्मपथ-सम्मादिट्ठिच्या वशाने देखील अर्थ प्राप्त होतोच। कारण ही कर्मपथाची कथा आहे। "यथावृत्त आकाराने" म्हणजे "अविमुक्त असतानाच" आणि "अविमुक्तीमध्ये" अशा सांगितलेल्या प्रकारे। "मिथ्या अभिनिवेशाच्या वशाने" म्हणजे जे असम्यक्संबुद्ध आहेत त्यांनाच सम्यक्संबुद्ध मानणे, जे अनैर्याणिक आहे त्यालाच नैर्याणिक मानणे, जे असत्य आहे त्यालाच सत्य मानणे, आणि जे अनार्य आहे त्यालाच आर्य मानणे अशा विपरीत अभिनिवेशाच्या वशाने। "मिच्छाधिमोक्खो" म्हणजे अयथार्थ श्रद्धा किंवा अयथार्थ निश्चय होय। "उत्पन्न झालेला मोह हा मिच्छाविमुत्ती ज्ञानदर्शन आहे" असा संबंध आहे। ๓๖. วาทานํ วา อนุวาทา วาทานุวาทา, เตสํ วาทานํ อุปาทาติ อตฺโถ. วาทานุปวตฺติโยติ วาทานํ โทสานํ อนุปวตฺติโย. ३६. वादांचे किंवा अनुवादांचे जे वाद आहेत ते "वादानुवाद" होत, त्या वादांचे ग्रहण करणे असा अर्थ आहे। "वादानुपवत्तियो" म्हणजे वादांच्या दोषांचे अनुवर्तन होय। อนฺตทฺวยปริวตฺตนนฺติ กามสุขอตฺตกิลมถานุโยคสงฺขาตสฺส อนฺตทฺวยสฺส ปฏิปกฺขวเสน ปริวตฺตนํ. "अंतद्वयपरिवत्तन" म्हणजे कामसुखल्लिकानुयोग आणि अत्तकिलमथानुयोग म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या दोन्ही टोकांच्या प्रतिपक्षाच्या वशाने परिवर्तन करणे होय। เอเตสุปิ วาเรสูติ ‘‘นิยฺยานิโก ธมฺโม เตสํ อธมฺโม, สุโข เตสํ อธมฺโม’’ติ จ อิเมสุ วาเรสุ. วุตฺตนเยนาติ ยทิ อตฺตปริตาปนํ อตฺตโน ทุกฺขาปนํ ธมฺโม, ธมฺมสฺส ปฏิวิรุทฺโธ อธมฺโม สิยา, ทุกฺขสฺส จ สุขปฏิวิรุทฺธนฺติ ฌานมคฺคผลสุขสฺส, อนวชฺชปจฺจยปริโภคสุขสฺส จ เตสํ อธมฺมภาโว อาปชฺชตีติ เอวํ วตฺตพฺพา. ‘‘ยํ ยํ วา ปนาติอาทินา’’ติ อิทํ อวเสสปาฐามสนํ. เอตฺถ ยํ ยํ วา ปน ธมฺมนฺติ ยํ วา ตํ วา ธมฺมํ, กุสลํ วา อกุสลํ วา อิฏฺฐํ วา อนิฏฺฐํ วาติ วุตฺตํ โหติ. โรจยติ วา อุปคจฺฉติ วาติ จิตฺเตน โรจติ, ทิฏฺฐิยา อุปคจฺฉตีติ. ตสฺส ตสฺส ธมฺมสฺส โย ปฏิปกฺโขติ ตสฺส ตสฺส รุจิตสฺส, อุปคตสฺส วา ธมฺมสฺส โย ปฏิปกฺโข นาม. สฺวสฺส อนิฏฺฐโต อชฺฌาปนฺโน ภวตีติ โย ธมฺโม อสฺส รุจิตสฺส, อุปคตสฺส วา ธมฺมสฺส อนิฏฺฐโต ปจฺจนีกโต อพฺภุปคโต โหติ, เตน ปฏิปกฺเขน เทสนาย ปริวตฺตนํ ปริวตฺตโน หาโรติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘ปฏิปกฺขสฺส ลกฺขณํ วิภาเวตี’’ติ. "या वारांमध्ये देखील" म्हणजे "नैर्याणिक धम्म हा त्यांचा अधम्म आहे, सुख हा त्यांचा अधम्म आहे" या वारांमध्ये। "सांगितलेल्या न्यायाने" म्हणजे जर स्वतःला ताप देणे, स्वतःला दुःख देणे हा धम्म असेल, तर धम्माच्या विरुद्ध असलेला अधम्म होईल, आणि दुःखाच्या विरुद्ध सुख असल्याने ध्यान-मार्ग-फल सुखाचा आणि अनवद्य प्रत्यय-परिभोग सुखाचा त्यांचा अधम्मभाव प्राप्त होईल, असे म्हणावे। "यं यं वा पना" इत्यादींद्वारे हे उर्वरित पाठाचे ग्रहण आहे। येथे "यं यं वा पन धम्मं" म्हणजे जो किंवा तो धम्म, कुशल किंवा अकुशल, इष्ट किंवा अनिष्ट असा अर्थ सांगितला आहे। "रोचयति वा उपगच्छति वा" म्हणजे चित्ताने आवडतो, दृष्टीने स्वीकारतो। "तस्स तस्स धम्मस्स यो पटिपक्खो" म्हणजे त्या त्या आवडलेल्या किंवा स्वीकारलेल्या धम्माचा जो प्रतिपक्ष आहे। "स्वस्स अनिट्ठतो अज्झापन्नो होति" म्हणजे जो धम्म त्याच्या आवडलेल्या किंवा स्वीकारलेल्या धम्माच्या अनिष्टतेने, प्रतिकूलतेने स्वीकारला जातो, त्या प्रतिपक्षाद्वारे देशनेचे परिवर्तन करणे म्हणजे "परिवत्तन हार" होय असा अर्थ आहे। म्हणूनच म्हटले आहे - "प्रतिपक्षाचे लक्षण स्पष्ट करतो"। ปริวตฺตนหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. परिवत्तनहारविभंगवण्णना समाप्त झाली। ๑๐. เววจนหารวิภงฺควณฺณนา १०. वेवचनहारविभंगवण्णना ๓๗. อญฺญมญฺเญหีติ อญฺเญหิ อญฺเญหิ. อายตินฺติ ปจฺจเวกฺขณกาเล. กถญฺจีติ เยน เกนจิ ปกาเรน, ปฐมํ วุตฺเตน ปริยาเยน อปฺปฏิวิชฺฌนฺโต อปเรน ปริยาเยน ปฏิวิชฺเฌยฺยาติ อธิปฺปาโย. ปริยายวจนํ นิทฺทิสตีติ สมฺพนฺโธ. เอวํ สพฺพตฺถ. ตสฺมึ ขเณติ ปริยายวจนสฺส วุตฺตกฺขเณ. วิกฺขิตฺตจิตฺตานนฺติ อารมฺมณนฺตเรหิ วิวิธขิตฺตจิตฺตานํ[Pg.76]. อญฺญวิหิตานนฺติ อญฺญํ จินฺเตนฺตานํ. กสฺมา ปน อญฺเญน ปริยาเยน ตทตฺถาวโพธนํ, นนุ เตน วุตฺเต ทฬฺหีกรณํ โหตีติ โจทนํ สนฺธายาห ‘‘เตเนวา’’ติอาทิ. ตตฺถ ตทญฺเญสนฺติ เตหิ วิกฺขิตฺตจิตฺตาทีหิ อญฺเญสํ, เยหิ ปฐมํ วจนํ สมฺมเทว คหิตํ. ตตฺถาติ วุตฺตวจเนเนว ปุนปฺปุนํ วจเน. อธิคตอนฺวตฺถตาย ปุนรุตฺติ ปริวชฺชนตฺถํ วิเสสนภาเวน ตาหิ ตาหิ สญฺญาหิปิ อยมฺปิ สทฺโท อิมสฺสตฺถสฺส วาจโก, อยมฺปิ สทฺโท อิมสฺสตฺถสฺส วาจโกติ ปญฺญาปเนหิ. เทเสตพฺพสฺส ตสฺส ตสฺส อตฺถสฺส อตฺตโน จิตฺเต อุปนิพนฺธนํ ฐปนํ. ตตฺถาติ ธมฺมนิรุตฺติปฏิสมฺภิทายํ. พีชาวาปนํ เหตุสมฺปาทนํ. ३७. "अञ्ञमञ्ञेहि" म्हणजे वेगवेगळ्यांनी। "आयतिं" म्हणजे प्रत्यवेक्षण काळात। "कथंचि" म्हणजे ज्या कोणत्या प्रकारे, पहिल्यांदा सांगितलेल्या पर्यायाने आकलन न होता दुसऱ्या पर्यायाने आकलन व्हावे, असा अभिप्राय आहे। "पर्यायवचन निर्देशित करतो" असा संबंध आहे। सर्वत्र असेच समजावे। "त्या क्षणी" म्हणजे पर्यायवचन सांगितलेल्या क्षणी। "विक्खित्तचित्तानं" म्हणजे इतर आलंबनांमुळे विविध प्रकारे विक्षिप्त चित्त झालेल्यांच्या। "अञ्ञविहितानं" म्हणजे इतर गोष्टींचा विचार करणाऱ्यांच्या। परंतु दुसऱ्या पर्यायाने त्या अर्थाचे आकलन कशासाठी? त्याने सांगितल्याने दृढीकरण होते की नाही? या शंकेचे निरसन करण्यासाठी "तेनेव" इत्यादी म्हटले आहे। तेथे "तदञ्ञेसं" म्हणजे त्या विक्षिप्त चित्त इत्यादींच्या व्यतिरिक्त इतरांना, ज्यांनी पहिले वचन चांगल्या प्रकारे ग्रहण केले आहे। "तेथे" म्हणजे सांगितलेल्या वचनानेच वारंवार सांगण्यात। प्राप्त झालेल्या अर्थाच्या अनुगामीपणामुळे पुनरुक्ती टाळण्यासाठी, विशेषण रूपाने त्या त्या संज्ञांद्वारे देखील "हा देखील शब्द या अर्थाचा वाचक आहे, हा देखील शब्द या अर्थाचा वाचक आहे" अशा प्रकारे प्रज्ञापनांद्वारे। उपदेश करावयाच्या त्या त्या अर्थाचे आपल्या चित्तात उपनिबंधन ठेवणे। "तेथे" म्हणजे धम्म-निरुत्ति-पटिसंभिदेमध्ये। "बीजावापन" म्हणजे हेतूचे संपादन करणे। เอวํ ภควโต ปริยายเทสนายํ อเนกานิ ปโยชนานิ วตฺวา อิทานิ อตฺตโน สมฺมาสมฺพุทฺธตาย เอวํ ตถาคตา พุทฺธลีลาย อเนเกหิ ปริยาเยหิ ธมฺมํ เทเสนฺตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘กึ พหุนา’’ติอาทิมาห. अशा प्रकारे भगवंतांच्या पर्यायदेशनेचे अनेक प्रयोजन सांगून, आता स्वतःच्या सम्यक्संबुद्धत्वामुळे अशा प्रकारे तथागत बुद्धलीलेने अनेक पर्यायांनी धम्माचा उपदेश करतात, हे दर्शविताना "किं बहुना" इत्यादी म्हणाले। ปาฬิยํ ‘‘ปิหา นาม ยา วตฺตมานสฺส อตฺถสฺส ปตฺถนา’’ติ ปจฺจุปฺปนฺนวิสยตํ ทสฺเสตฺวา ปุน อนาคตวิสยตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เสยฺยตรํ วา’’ติอาทิ วุตฺตนฺติ ‘‘อนาคตปจฺจุปฺปนฺนตฺถวิสยา ตณฺหา ปิหา’’ติ อาห. पाळीमध्ये "पिहा म्हणजे जी वर्तमान अर्थाची प्रार्थना आहे" असे वर्तमानविषयकत्व दर्शवून, पुन्हा अनागतविषयकत्व दर्शविण्यासाठी "सेय्यतरं वा" इत्यादी म्हटले आहे, म्हणून "अनागत आणि वर्तमान अर्थाला विषय करणारी तण्हा म्हणजे पिहा होय" असे म्हणाले। อตฺถนิปฺผตฺติปฏิปาลนาติ อิมสฺมึ วา ปเท ปิหาย เอวตฺถวเสน อนาคตปจฺจุปฺปนฺนตฺถวิสยภาวทีปนโต. "अत्थनिप्फत्तिपटिपालना" या पदात देखील पिहाच्याच अर्थाच्या वशाने अनागत आणि वर्तमान अर्थाच्या विषयभावाचे प्रकटीकरण होत असल्यामुळे। ธมฺมารมฺมเณเนว สงฺคหิตา ‘‘ธมฺมารมฺมณ’’นฺตฺเวว คหณํ คตา. จตุวีสติ ปทานีติ เอตฺถ เคหสิตโทมนสฺสูปวิจาราทีนํ จตุนฺนํ ฉกฺกานํ วเสน จตุวีส โกฏฺฐาสา. धम्मारंमणानेच संग्रहित झाल्यामुळे "धम्मारंमण" असेच ग्रहण केले गेले आहे। "चोवीस पदे" म्हणजे येथे गेहसित दोमनस्स-उपविचार इत्यादी चार षटकांच्या वशाने चोवीस भाग आहेत। ๓๘. สาเยว ปตฺถนากาเรน ธมฺมนนฺทีติอาทิมาหาติ เอตฺถ อยมตฺโถ – สา เอว ปตฺถนากาเรน ปวตฺติยา อาสาทิปริยาเยน วุตฺตา ตณฺหา รูปาทิธมฺเมสุ นนฺทนฏฺเฐน ธมฺมนนฺที. เตสํ เอว ปิยายนฏฺเฐน ธมฺมเปมํ. คิลิตฺวา ปรินิฏฺฐเปตฺวา ฐานโต ธมฺมชฺโฌสานนฺติ. ३८. तीच (तृष्णा) प्रार्थनेच्या (इच्छेच्या) रूपाने 'धम्मनंदी' इत्यादी म्हटली आहे, येथे हा अर्थ आहे – तीच प्रार्थनेच्या रूपाने प्रवृत्त होणारी, आशा इत्यादी पर्यायाने म्हटलेली तृष्णा, रूप इत्यादी धर्मांमध्ये (विषयांमध्ये) आनंद घेण्याच्या अर्थाने 'धम्मनंदी' (धम्मात आनंद घेणारी) आहे. त्यांच्याच प्रति प्रिय वाटण्याच्या अर्थाने 'धम्मपेम' (धम्मप्रेम) आहे. गिळंकृत करून आणि प्रस्थापित करून राहण्याच्या अर्थाने 'धम्मज्झोसान' (धम्मात आसक्ती) आहे. อิมินาปีติ น เกวลํ ‘‘ปญฺญา ปชานนา’’ติอาทิอาเวณิกปริยาเยเนว เววจนํ วตฺตพฺพํ, อถ โข อิมินา อาธิปเตยฺยาทิสาธารณปริยาเยนปิ เววจนํ วตฺตพฺพนฺติ อตฺโถ. อิมินาว นเยนาติ เอเตน ปริยายวจเนน[Pg.77]. น หิ เทสนตฺถสาธนํ ‘‘อิติปิ โส ภควา’’ติอาทิปาฬินยทสฺสนนฺติ ทสฺเสติ. พลนิปฺผตฺติคโตติอาทีสุ ทสสุ ตถาคตพเลสุ นิปฺผตฺตึ ปาริปูรึ คโต. สมฺโพธิปหานนฺตรายเทสนา วิเสสโจทนาสุ วิสารทภาวสงฺขาตานิ จตฺตาริ ญาณานิ ปตฺโต อธิคโตติ เวสารชฺชปฺปตฺโต. 'याच्याद्वारे सुद्धा' म्हणजे केवळ 'प्रज्ञा प्रजानना' इत्यादी असाधारण पर्यायानेच समानार्थी शब्द सांगायला हवेत असे नाही, तर या आधिपत्य इत्यादी साधारण पर्यायाने देखील समानार्थी शब्द सांगायला हवेत, असा अर्थ आहे. 'याच नयाने' म्हणजे या पर्यायवचनाने. कारण देशनेचा अर्थ सिद्ध करणे हे 'इतिपि सो भगवा' इत्यादी पाळी नयाचे दर्शन आहे, असे दर्शविते. 'बलनिष्पत्तिगत' इत्यादींमध्ये, दहा तथागत बलांमध्ये निष्पत्तीला (सिद्धीला) म्हणजेच परिपूर्णतेला प्राप्त झालेले. संबोधी, प्रहाण, अंतराय आणि देशना यांच्या विशेष चोदनांमध्ये विशारदभावाने युक्त अशा चार ज्ञानांना प्राप्त झालेले, अधिगत झालेले म्हणजे 'वेसारज्जप्पत्त' (वैशारद्यप्राप्त) होत. โลภชฺฌาสยาทิอชฺฌาสยํ วิเสเสน อติวตฺโตติ อชฺฌาสยวีติวตฺโต. อตีตเหตุสงฺเขปาทิสงฺเขปวิรหิตตาย อสงฺเขปสงฺขาตํ นิพฺพานํ, อกุปฺปธมฺมตาย คุเณหิ วา อสงฺเขปํ อสงฺขฺเยยฺยํ คโต อุปคโตติ อสงฺเขปคโต. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. อุทฺเธยฺยนฺติ อุทฺธริตพฺพํ. लोभ-अध्याशय इत्यादी अध्याशयांचे विशेष रूपाने उल्लंघन केलेले ते 'अज्झासयवीतिवत्त' (अध्याशय-व्यतिवृत्त) होत. अतीत हेतूच्या संक्षेपादी संक्षेपाने विरहित असल्यामुळे 'असंक्षेप' संज्ञक असणारे निर्वाण, अकुप्पधम्मतेमुळे (अक्षोभ्यतेमुळे) किंवा गुणांमुळे असंक्षेपाला (असंख्येयतेला) प्राप्त झालेले, उपगत झालेले ते 'असंखेपगत' (असंख्येयगत) होय. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. 'उद्धेय्य' म्हणजे उद्धृत करण्यायोग्य. ธมฺมานุสฺสติยํ เอวํ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพติ สมฺพนฺโธ. สํสารทุกฺขโต ปาติ, สนฺเตน สุเขน รเมติ จาติ วา ปารํ. धम्मानुस्मृतीमध्ये अशा प्रकारे अर्थ पाहावा, हा संबंध आहे. संसारदुःखापासून रक्षण करतो आणि शांत सुखाने रममाण करतो, म्हणून ते 'पार' (पलीकडचा तीर) आहे. อภูตปุพฺพตฺตาติ อนุปฺปนฺนปุพฺพตฺตา, เตนสฺส นิจฺจตํว วิภาเวติ เกนจิ เทวโตปสคฺคาทินา อนุปสชฺชนียตฺตา อนุปสฏฺฐตฺตา. 'अभूतपुब्बत्ता' म्हणजे पूर्वी कधीही उत्पन्न न झालेले असणे, त्याद्वारे त्याचे नित्यत्वच स्पष्ट होते; कारण कोणत्याही देवतेच्या उपसर्गादींनी (विघ्नांनी) ते आक्रमित न होणारे आणि उपद्रव न होणारे आहे. ‘‘ทุปฺปสฺส’’นฺติปิ ปาฬิ, ทุรธิคมนฺติ อตฺโถ. คุณโสภาสุรภิภาเวนาติ คุเณหิ โสภาย, สุคนฺธิภาเวน จ. 'दुप्पस्स' (दुर्दर्श) असाही पाळी पाठ आहे, त्याचा अर्थ 'दुर्अधिगम' (मिळवण्यास कठीण) असा आहे. 'गुणशोभासुरभिभावेन' म्हणजे गुणांच्या शोभेने आणि सुगंधी भावाने. ยถา อกฺขณเวธี ปุคฺคโล สิปฺปนิปฺผตฺติยา รตฺตนฺธการติมิสาย อจิรกฺขณาโลเกน อติสุขุมมฺปิ ทูรคตํ ลกฺขํ วิชฺฌติ, เอวํ อริยสาวโก สีลสมฺปตฺติยา อติสุขุมํ นิพฺพานํ จตุสจฺจธมฺมํ เอกปฏิเวเธเนว ปฏิวิชฺฌตีติ อาห ‘‘สิปฺปญฺจ สีลํ อกฺขณเวธิตายา’’ติ. โลกิกนฺติ นิทสฺสนมตฺตํ ทฏฺฐพฺพํ โลกุตฺตรธมฺมโอโลกนสฺสาปิ อธิฏฺฐานภาวโต. ज्याप्रमाणे एखादा अचूक नेमबाज (अक्खणवेधी) आपल्या कलेच्या कौशल्याने रात्रीच्या घनदाट अंधारात विजेच्या क्षणिक प्रकाशात देखील अत्यंत सूक्ष्म आणि दूरवर असलेले लक्ष्य भेदतो, त्याचप्रमाणे आर्यश्रावक शीलसंपत्तीच्या बळावर अत्यंत सूक्ष्म अशा निर्वाणाला आणि चतुरार्यसत्याला एकाच प्रतिवेधाने (साक्षात्काराने) भेदतो (जाणून घेतो), म्हणूनच म्हटले आहे – 'शिल्प आणि शील हे अचूक नेमबाजीसारखे आहे'. 'लौकिक' हे केवळ उदाहरणादाखल पाहावे, कारण ते लोकोत्तर धर्माच्या अवलोकनाचे (साक्षात्काराचे) देखील अधिष्ठान आहे. เววจนหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. वेवचनहारविभंगवर्णना समाप्त झाली. ๑๑. ปญฺญตฺติหารวิภงฺควณฺณนา ११. पण्णत्तिहारविभंगवर्णना ๓๙. ภควโต สาภาวิกธมฺมกถายาติ อตฺตโน ภาโว สภาโว, สภาเวน นิพฺพตฺตา, ตโต วา อาคตาติ สาภาวิกา, สา เอว ธมฺมกถาติ สาภาวิกธมฺมกถา, พุทฺธานํ สามุกฺกํสิกธมฺมกถาติ อตฺโถ[Pg.78], ตาย กรณภูตาย ธมฺมเทสนาย อนญฺญตฺเตปิ กถาเทสนานํ อุปจารสิทฺเธน เภเทเนวํ วุตฺตํ, อวยวสมุทายวิภาเคน วา. เตนาห ‘‘กา จ ปกติกถาย เทสนา? จตฺตาริ สจฺจานี’’ติ. อิทญฺหิ อตฺถสฺส เทสนาย อเภโทปจารํ กตฺวา วุตฺตํ. ตสฺสา เทสนาย ปญฺญาปนา. อยํ ปญฺญตฺติหาโรติ สงฺเขเปเนว ปญฺญตฺติหารสฺส สรูปมาห. สาติ ยถาวุตฺตเทสนา. ตถา ตถาติ ยถา ยถา สจฺจานิ เทเสตพฺพานิ, ตถา ตถา. กถญฺเจตานิ เทเสตพฺพานิ? ปริญฺเญยฺยาทิปฺปกาเรน. ยถาธิปฺเปตนฺติ อธิปฺเปตานุรูปํ, โพธเนยฺยพนฺธวานํ โพธนาธิปฺปายานุกูลนฺติ อตฺโถ. อตฺถนฺติ เทเสตพฺพตฺถํ, ทุกฺขาทิอตฺถเมว วา. นิกฺขิปตีติ ปติฏฺฐาเปติ. ยโต ‘‘จตฺตาโร สุตฺตนิกฺเขปา’’ติอาทิ (ม. นิ. อฏฺฐ. ๑.มูลปริยายสุตฺตวณฺณนา) อฏฺฐกถาสุ วุจฺจติ. ३९. भगवंतांच्या स्वाभाविक धम्मकथेने – स्वतःचा भाव म्हणजे स्वभाव, स्वभावाने उत्पन्न झालेली किंवा त्यापासून आलेली ती स्वाभाविक, तीच धम्मकथा म्हणजे स्वाभाविक धम्मकथा, बुद्ध भगवंतांची सर्वोत्कृष्ट धम्मकथा असा अर्थ आहे. त्या कारणीभूत धम्मदेशनेने, जरी ती अभिन्न असली तरी, कथेच्या आणि देशनेच्या उपचाराने सिद्ध होणाऱ्या भेदाने असे म्हटले आहे, किंवा अवयव आणि समुदाय यांच्या विभागाने म्हटले आहे. म्हणूनच त्यांनी विचारले, 'आणि नैसर्गिक कथेची देशना कोणती? चार आर्यसत्ये.' हे देशनेच्या अर्थाचा अभेदोपचार करून म्हटले आहे. त्या देशनेचे प्रज्ञापन (स्पष्टीकरण). 'हा पण्णत्तिहार आहे' असे संक्षेपाने पण्णत्तिहाराचे स्वरूप सांगितले आहे. 'ती' म्हणजे पूर्वोक्त देशना. 'तशा तशा प्रकारे' म्हणजे ज्या ज्या प्रकारे सत्यांची देशना करायची आहे, त्या त्या प्रकारे. आणि ही कशा प्रकारे देशना करायची आहे? परिज्ञेय इत्यादी प्रकारे. 'यथाभिप्रेत' म्हणजे अभिप्रायानुसार, बोध प्राप्त करण्यास योग्य असलेल्या बांधवांच्या बोधप्राप्तीच्या अभिप्रायाला अनुकूल, असा अर्थ आहे. 'अर्थ' म्हणजे देशना करण्याचा विषय, किंवा दुःख इत्यादी अर्थच. 'निक्खिपति' म्हणजे प्रस्थापित करतो. म्हणूनच अट्ठकथांमध्ये 'चत्तारो सुत्त निक्खेपा' (चार सूत्रांचे निक्षेप) इत्यादी म्हटले आहे. ตตฺถาติ นิกฺเขปเทสนายนฺติ อตฺโถ. มคฺคปกฺขิยาติ ทุกฺขสจฺจโต พหิกตาติ อธิปฺปาโย. तेथे – म्हणजे निक्षेप देशनेमध्ये, असा अर्थ आहे. 'मग्गपक्खिया' (मार्गपक्षीय) म्हणजे दुःखसत्याच्या बाहेर ठेवलेले, असा अभिप्राय आहे. ยสฺมึ ฐาเนติ ยสฺมึ ภวาทิสงฺขาเต ฐาเน. ยถาวุตฺตา เทสนาติ จตุราหารปฏิพทฺธราคาทิมุเขน วฏฺฏทีปนี วุตฺตปฺปการา เทสนา. 'ज्या ठिकाणी' म्हणजे ज्या भवादि संज्ञक ठिकाणी. 'यथावत्त देशना' म्हणजे चार आहारांशी बद्ध असलेल्या रागादींच्या मुखाने संसारचक्राचे स्पष्टीकरण करणारी पूर्वोक्त देशना. ๔๑. เตปริวฏฺฏวเสนาติ เอตฺถาปิ ‘‘สจฺเจสู’’ติ โยเชตพฺพํ. ปริญฺญาปญฺญตฺตีติ อาหาติ สมฺพนฺโธ. อชฺฌตฺตรโต, สมาหิโตติ ปททฺวเยน สมาธานวิสิฏฺฐํ อชฺฌตฺตรตตาภาวนํ ทีเปติ โคจรชฺฌตฺตตาทีปนโต. เกวโล หิ อชฺฌตฺตสทฺโท อชฺฌตฺตชฺฌตฺตโคจรชฺฌตฺเตสุปิ วตฺตติ. อชฺฌตฺตรตตาวิสิฏฺฐญฺจ สมาธานํ สาติสยํ จิตฺตฏฺฐิตึ ทีเปตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘สมาธานวิสิฏฺฐสฺสา’’ติอาทินา. ४१. 'तेपरिवट्टवसेन' (तीन आवर्तनांच्या वशाने) येथे देखील 'सत्यांमध्ये' असे जोडले पाहिजे. 'परिज्ञापण्णत्ति' (परिज्ञा प्रज्ञप्ती) असे म्हटले आहे, हा संबंध आहे. 'अज्झत्तरतो' (अध्यात्मरत) आणि 'समाहितो' (समाहित) या दोन पदांद्वारे समाधानाने (एकाग्रतेने) विशिष्ट अशी अध्यात्मरततेची भावना दर्शविली आहे, कारण ती गोचर-अध्यात्मता दर्शविते. केवळ 'अध्यात्म' हा शब्द अध्यात्म आणि गोचर-अध्यात्म या दोन्ही अर्थांमध्ये वापरला जातो. आणि अध्यात्मरततेने विशिष्ट असलेले समाधान हे चित्ताची उत्कृष्ट स्थिरता दर्शविते, हा अर्थ 'समाधानावशिष्टस्य' इत्यादींद्वारे दर्शविला आहे. อาสชฺชนฏฺเฐนาติ อาสงฺคนฏฺเฐน. ตถา ทสฺสนนฺติ อตถาภูตสฺสาปิ ภพฺพรูปสฺส วิย อตฺตโน วิทํสนํ. อลกฺขิโกติ วิลกฺขิโก. 'आसज्जनद्वेन' म्हणजे आसक्तीच्या अर्थाने. 'तथा दस्सनं' म्हणजे जे तसे नाही, ते देखील योग्य रूपासारखे स्वतःला दाखवणे. 'अलक्खिको' म्हणजे लक्षणहीन (विलक्षण). กามานนฺติ กามาวจรธมฺมานํ. รูปานนฺติ รูปาวจรธมฺมานํ. นิสฺสรณนฺติ กามานํ รูปาวจรธมฺมา นิสฺสรณํ, เตสํ อรูปาวจรธมฺมา นิสฺสรณํ. เอวํ ตํสภาวานนฺติ สอุตฺตรสภาวานํ. ตถาติ ยถา สงฺขตธมฺมานํ นิสฺสรณภาวโต, กิเลสสมุจฺเฉทกสฺส อริยมคฺคสฺส อารมฺมณภาวโต จ [Pg.79] อตฺเถว อสงฺขตา ธาตุ, ตถา วุจฺจมาเนนาปิ การเณน อตฺเถว อสงฺขตา ธาตูติ ทสฺเสติ. กตฺถจิ วิสเยติ อสงฺขตธาตุํ สนฺธาย วทติ. อวิปรีตตฺโถติ ภูตตฺโถ. ‘‘ยโต โข โภ อยํ อตฺตา ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ, เอตฺตาวตา โข โภ อยํ อตฺตา ปรมทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานปฺปตฺโต โหติ (ที. นิ. ๑.๙๔), สปกฏฺฐนิพฺพานภาวิโน’’ติ จ เอวมาทีสุ อุปจารวุตฺติสพฺภาวโต. ยถา ตํ สีหสทฺโทติ ยถา ‘‘สีโห มาณวโก’’ติอาทินา มาณวกาทีสุ อุปจารวุตฺตินา วตฺตมาโน มิคราเช ภูตตฺถวิสเย ทิฏฺโฐ, เอวํ นิพฺพานสทฺโทปิ กามคุณรูปชฺฌานสมงฺคิตาสุ อุปจารวุตฺติยา วตฺตมาโน กตฺถจิ วิสเย อวิปรีตตฺโถ. ยตฺถ จ วิสเย อวิปรีตตฺโถ, สา อสงฺขตา ธาตุ. หตฺถตเล สอามลกํ วิย เญยฺยํ ปจฺจกฺขโต ปสฺสนฺตสฺส เอกปฺปมาณสฺส สตฺถุวจนเมเวตฺถ ปมาณนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘กึ วา เอตาย ยุตฺติจินฺตายา’’ติอาทิมาห. ‘‘ปฏิญฺญาตสฺส อตฺถสฺส สิทฺธิยา ปกาสนาปญฺญตฺตี’’ติ นิคมํ สนฺธายาหาติ. ‘कामानानं’ (कामांचे) म्हणजे कामावचर धर्मांचे. ‘रूपानानं’ (रूपांचे) म्हणजे रूपावचर धर्मांचे. ‘निस्सरण’ (निःसरण/मुक्ती) म्हणजे कामांपासून रूपावचर धर्म हे निस्सरण आहे, आणि त्यांच्यापासून अरूपावचर धर्म हे निस्सरण आहे. याचप्रमाणे ‘तंसभावामं’ (त्यांच्या स्वभावांचे) म्हणजे सोत्तर (स-उत्तर) स्वभावांचे. ‘तथा’ (तसेच) म्हणजे ज्याप्रमाणे संखत धर्मांच्या निस्सरणभावामुळे आणि क्लेशांचा समूळ उच्छेद करणाऱ्या अरियमग्गाच्या (आर्यमार्गाच्या) आलंबनभावामुळे असंखत धातू अस्तित्वात आहेच, त्याचप्रमाणे सांगितल्या जाणाऱ्या कारणानेही असंखत धातू अस्तित्वात आहेच, असे दर्शवितात. ‘कत्थचि विसये’ (काही विषयात) हे असंखत धातूला उद्देशून म्हणतात. ‘अविपरीतत्थ’ म्हणजे यथार्थ अर्थ (भूतार्थ). "जेव्हा, हे महाशया, हा आत्मा पाच कामगुणांनी युक्त व समंगिभूत होऊन क्रीडा करतो, तेवढ्यानेच, हे महाशया, हा आत्मा परम दिठ्ठधम्मनिब्बान (दृष्टधम्मनिर्वाण) प्राप्त झालेला असतो" (दी. नि. १.९४) इत्यादींमध्ये उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) प्रवृत्ती असल्यामुळे. ज्याप्रमाणे ‘सिंह शब्द’ हा "सिंह माणवक (तरुण)" इत्यादींमध्ये माणवकादींच्या बाबतीत लाक्षणिक अर्थाने वापरला जात असला, तरी मृगराजाच्या (सिंहाच्या) बाबतीत तो यथार्थ विषयात पाहिला जातो; त्याचप्रमाणे ‘निब्बान’ (निर्वाण) शब्द देखील कामगुण आणि रूपध्यानाने युक्त असलेल्यांच्या बाबतीत लाक्षणिक अर्थाने वापरला जात असला, तरी काही विषयात तो अविपरीत (यथार्थ) अर्थाचा असतो. आणि ज्या विषयात तो अविपरीत (यथार्थ) अर्थाचा असतो, ती ‘असंखत धातू’ (असंस्कृत धातू) होय. हातावर ठेवलेल्या आवळ्याप्रमाणे ज्ञेय गोष्टीला प्रत्यक्ष पाहणाऱ्या आणि एकमेव प्रमाण असणाऱ्या शास्त्यांचे (बुद्धांचे) वचनच येथे प्रमाण आहे, हे दर्शविताना "या युक्तिचिंतनाने काय लाभ?" इत्यादी म्हणतात. "प्रतिज्ञा केलेल्या अर्थाच्या सिद्धीसाठी प्रकाशना प्रज्ञप्ती आहे" या निष्कर्षाला उद्देशून म्हणतात. ปญฺญตฺติหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. पञ्ञत्तिहारविभंगवण्णना समाप्त झाली. ๑๒. โอตรณหารวิภงฺควณฺณนา १२. ओतरणहारविभंगवण्णना ๔๒. อินฺทฺริเยหีติ กรเณ กรณวจนํ ‘‘มคฺเคน คจฺฉตี’’ติอาทีสุ วิย, ‘‘ผรสุนา ฉินฺทตี’’ติ เอวมาทีสุ วิย จ. โอตรณาติ อนุปฺปเวสนา. ४२. ‘इन्द्रियेहि’ (इंद्रियांनी) हे कारकामध्ये तृतीया विभक्तीचे (करणवाचक) वचन आहे, जसे "मार्गाने जातो" इत्यादींमध्ये किंवा "कुऱ्हाडीने कापतो" इत्यादींमध्ये असते. ‘ओतरणा’ म्हणजे अनुप्रवेश (प्रवेश करणे). ปญฺญากฺขนฺเธ สงฺคณฺหนวเสน สมฺมาสงฺกปฺโป วิยาติ โยชนา. อธิจิตฺตอนุยุตฺตานํ สทฺทหนุสฺสหนุปฏฺฐานสมาทหเนหิ สทฺธาทีสุ อุปกโรนฺเตสุ เอว ปญฺญา ทสฺสนกิจฺจํ สาเธตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สทฺธา..เป… วุตฺตานี’’ติ อาห. โน จ ภวงฺคาติ เตสํ สงฺขารานํ ปวตฺติการณตาภาวํ ทสฺเสติ. प्रज्ञास्कंधात (पञ्ञाक्खन्ध) संग्रह करण्याच्या दृष्टीने ‘सम्मासंकप्प’ (सम्यक् संकल्प) प्रमाणे, अशी योजना आहे. अधिचित्ताचा अभ्यास करणाऱ्यांना श्रद्धा, उत्साह (वीर्य), उपस्थान (स्मृती) आणि समाधान (समाधी) यांच्याद्वारे श्रद्धा इत्यादी उपकार करत असतानाच प्रज्ञा दर्शनाचे कार्य साधते, हे दर्शविताना "श्रद्धा...पे०... म्हटले आहे" असे म्हणतात. ‘नो च भवंगा’ (आणि भवंग नाही) याद्वारे त्या संस्कारांच्या प्रवृत्तीचे कारण नसणे दर्शवितात. ๔๓. ตถา วุตฺโตติ ‘‘นิสฺสโย’’ติ วุตฺโต. เจตนาสีเสน ตณฺหํ เอว วทติ เจตนาสหจรณโต. ४३. ‘तथा वुत्तो’ म्हणजे "निस्सय" (आश्रय) असे म्हटले आहे. चेतनेच्या प्राधान्याने तण्हा (तृष्णा) चेतनेच्या सहचरत्वामुळे तण्हाच म्हटली आहे. รตฺตสฺสาติ [Pg.80] มคฺเคน อสมุจฺฉินฺนราคสฺส. เยน ปุคฺคโล ‘‘รตฺโต’’ติ วุจฺจติ, ตสฺส ราคสฺส สมฺพนฺธินี สุขา เวทนา วุตฺตา ตตฺถ ตสฺส อนุสยนโต. เตนาห ‘‘สุขาย…เป… วุตฺต’’นฺติ. เอส นโย เสเสสุปิ. เตนาห ‘‘ตถา’’ติอาทิ. ‘रत्तस्स’ (रक्ताचा/आसक्ताचा) म्हणजे मार्गाने ज्याचा राग (आसक्ती) समूळ नष्ट झालेला नाही अशाचा. ज्याच्यामुळे पुद्गल (व्यक्ती) ‘रक्त’ (आसक्त) म्हटला जातो, त्या रागाशी संबंधित ‘सुखा वेदना’ म्हटली आहे, कारण तिथे त्याचा अनुशय (सुप्त वासना) असतो. म्हणूनच "सुखा...पे०... म्हटले आहे" असे म्हटले आहे. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो. म्हणूनच "तथा" इत्यादी म्हटले आहे. ตานิ เอว อินฺทฺริยานีติ สุขโสมนสฺสุเปกฺขินฺทฺริยานิ. ‘‘สงฺขารปริยาปนฺนานี’’ติ วจนํ สนฺธายาห ‘‘อิธ เวทนาสีเสน เจตนา วุตฺตา’’ติ. น หิ เวทนา สงฺขารกฺขนฺธปริยาปนฺนา โหติ. ตณฺหาย, ทิฏฺฐิยาติ จ อุปโยเค กรณวจนนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตณฺหายา’’ติอาทิมาห. อิทานิ อุปโยควเสเนว ‘‘ตณฺหายา’’ติอาทีนํ อตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยถา วา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ เสสธมฺมานนฺติ ตณฺหาวชฺชิตอวิสิฏฺฐธมฺมานํ. ตณฺหาย นิสฺสยภาเวติ ยทา ตณฺหา เตสํ นิสฺสโย โหติ. ‘तीच इंद्रिये’ म्हणजे सुख, सोमनस्य आणि उपेक्खा इंद्रिये (सुखसोमनस्सुपेक्खिन्द्रियाणि). "संस्कारांतर्गत" (संखारपरियापन्नानि) या वचनाला उद्देशून "येथे वेदनेच्या प्राधान्याने चेतना म्हटली आहे" असे म्हणतात. कारण वेदना ही संस्कारस्कंधात समाविष्ट नसते. ‘तण्हा’ (तृष्णा) आणि ‘दिट्ठि’ (दृष्टी) यांच्या उपयोगात तृतीया विभक्ती (करणवाचक) आहे, हे दर्शविताना "तण्हाया" इत्यादी म्हणतात. आता उपयोगाच्या आधारेच "तण्हाया" इत्यादींचा अर्थ दर्शविण्यासाठी "यथा वा" इत्यादी म्हणतात. त्यामध्ये ‘सेसधम्मानं’ (उर्वरित धर्मांचे) म्हणजे तृष्णा वगळता इतर विशिष्ट धर्मांचे. ‘तण्हाया निस्सयभावे’ म्हणजे जेव्हा तृष्णा त्यांचा आश्रय (निस्सय) असते. ตณฺหาย เสสธมฺมานํ ปจฺจยภาเวติ ยทา เสสธมฺมา ตณฺหาปจฺจยา โหนฺติ. ‘‘กรชกายสนฺนิสฺสิตา’’ติ อิมินา เวทนาทิกฺขนฺธตฺตยนิสฺสิตาปิ คหิตา กายปฺปสฺสทฺธิภาวโต. การณภาวนฺติ ปรมฺปรเหตุภาวํ. ตณฺหาทิฏฺฐิอุปเยนาติ ทิฏฺฐิอุปเยน จ ทิฏฺฐิสหคตตณฺหาอุปเยน จ. ‘तण्हाया सेसधम्मानं पच्चयभावे’ म्हणजे जेव्हा उर्वरित धर्म हे तृष्णा-प्रत्ययाने (तृष्णेमुळे) उत्पन्न होतात. "करजकायसंनिश्रित" (करजकायसन्निसिता) याद्वारे वेदना इत्यादी तीन स्कंधांवर आश्रित असलेले देखील ग्रहण केले आहे, कारण ती कायप्रस्रब्धी (कायपस्सद्धि) अवस्था आहे. ‘कारणभाव’ म्हणजे परंपरा-हेतुभाव. ‘तण्हादिट्ठिउपयेन’ म्हणजे दृष्टीच्या उपायाने आणि दृष्टीसहगत तृष्णेच्या उपायाने. ‘‘อาคตีติ อิธาคติ, คตีติ เปจฺจภโว’’ติ ปททฺวเยน วุตฺตเมวตฺถํ ปากฏตรํ กาตุํ ปาฬิยํ ‘‘อาคติคตีปิ น ภวนฺตี’’ติ วุตฺตํ. อิธ หุรนฺติ ทฺวารารมฺมณธมฺมา ทสฺสิตา อาสนฺนทูรภาเวหิ ทฺวารารมฺมเณหิ วินิวตฺเตตฺวา คหิตตฺตา. อิธ ทฺวารปฺปวตฺตธมฺมา ‘‘อุภยมนฺตเรนา’’ติ ปทสฺส อตฺถภาเวน วุตฺตา. จตุพฺยูหหาเร ปน อนินฺทฺริยพทฺธรูปธมฺมา ตถา วุตฺตา. การณภูเตน อนนฺตรปจฺจยภูเตน, อุปนิสฺสยปจฺจยภูเตน จ. เย ธมฺมา อุปาทาย ‘‘อตฺตา’’ติ สมญฺญา, เตสํ วิญฺญาณาทิธมฺมานํ อภาเวน อนุปฺปาทธมฺมตํ อาปาทิตตฺตาติ อตฺโถ. ‘‘อนิสฺสิตสฺส จลิตํ นตฺถี’’ติอาทินา ปฏิโลมโต ปจฺจยภาโว ทสฺสิโตติ ทสฺเสนฺโต ปาฬิยํ ‘‘เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺสาติ ปฏิจฺจสมุปฺปาโท’’ติ วตฺวา นนุ ‘‘อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา’’ติอาทิโก ปฏิจฺจสมุปฺปาโทติ โจทนํ สนฺธาย ยถาวุตฺตสฺส ปฏิจฺจสมุปฺปาทภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘โส ทุวิโธ’’ติอาทินา โลกิยโลกุตฺตรวเสน ปฏิจฺจสมุปฺปาโท วิภตฺโต. ตทตฺถตายาติ วีตราควิมุตฺติอตฺถตาย. ตพฺภาวนฺติ โลกุตฺตรปฏิจฺจสมุปฺปาทภาวํ. "आगति म्हणजे येथे येणे, गती म्हणजे परलोकातील जन्म" या दोन पदांद्वारे सांगितलेलाच अर्थ अधिक स्पष्ट करण्यासाठी पाळीमध्ये (पालिपाठात) "आगति-गती देखील होत नाही" असे म्हटले आहे. येथे ‘हुरं’ (परलोकात) याद्वारे द्वार आणि आलंबन धर्म दर्शविले आहेत, कारण जवळ आणि दूर असणाऱ्या द्वार-आलंबनांपासून परावृत्त करून ते ग्रहण केले आहेत. येथे द्वारात प्रवृत्त होणारे धर्म ‘उभय मंतरेण’ (दोन्हींच्या मध्ये) या पदाचा अर्थ म्हणून सांगितले आहेत. परंतु चतुर्व्यूहहारामध्ये (चतुब्यूहहारे) अनिंद्रियबद्ध रूपधर्म तसे सांगितले आहेत. कारणभूत असणाऱ्या अनंतरप्रत्ययभूत आणि उपनिश्रयप्रत्ययभूत (उपनिसयपच्चयभूत) द्वारे. ज्या धर्मांना उपादान करून ‘आत्मा’ अशी संज्ञा दिली जाते, त्या विज्ञानादी धर्मांच्या अभावामुळे अनुत्पादधर्मत्व प्राप्त झाले आहे, असा अर्थ आहे. "अनाश्रिताला (अनिस्सितस्स) चलन नसते" इत्यादींद्वारे प्रतिलोम पद्धतीने प्रत्ययभाव दर्शविला आहे, हे स्पष्ट करताना पाळीमध्ये "हाच दुःखाचा अंत आहे, हाच पटिच्चसमुप्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) होय" असे म्हणून, "अविद्याप्रत्ययाने संस्कार होतात" इत्यादी प्रतीत्यसमुत्पाद आहे ना? अशा शंकेला उद्देशून, सांगितलेल्या प्रतीत्यसमुत्पादभावाला दर्शविण्यासाठी "तो दोन प्रकारचा आहे" इत्यादींद्वारे लौकिक आणि लोकोत्तर भेदाने प्रतीत्यसमुत्पाद विभागला आहे. ‘तदत्थताय’ म्हणजे वीतराग विमुक्तीच्या अर्थासाठी. ‘तब्भावं’ म्हणजे लोकोत्तर प्रतीत्यसमुत्पादभाव. โอตรณหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. ओतरणहारविभंगवण्णना समाप्त झाली. ๑๓. โสธนหารวิภงฺควณฺณนา १३. सोधनहारविभंगवण्णना ๔๕. โสเธติ [Pg.81] นามาติ ปุจฺฉิตมตฺถํ หตฺถตเล ฐปิตอามลกํ วิย ปจฺจกฺขโต ทสฺเสนฺโต นิคฺคุมฺพํ นิชฺชฏํ กตฺวา วิวรนฺโต ตพฺพิสยอญฺญาณสํสยาทิมลาปนยเนน โสเธติ, เอวํ โสเธนฺโต จ ปทสฺส อตฺเถน อเภโทปจารํ กตฺวา ‘‘ปทํ โสเธติ’’จฺเจว วุจฺจติ. เตนาห ‘‘ปทํ โสเธติ นามา’’ติ. ปุจฺฉาย วิสฺสชฺชนเมเวตฺถ โสธนนฺติ อาห ‘‘ตทตฺถสฺส วิสฺสชฺชนโต’’ติ. อารภียตีติ อารมฺโภ, เทสนาย ปกาสิยมาโน อตฺโถ. เตนาห ‘‘น ตาว…เป… ปโพธิตตฺตา’’ติ. อิธ โสธนํ นาม ปฏิจฺฉนฺนรูปสฺส อตฺถสฺส เทสนานุภาเวน วิวฏภาวกรณนฺติ ตมตฺถํ อุปมาย วิภาเวตุํ ‘‘อญฺญาณปกฺขนฺทาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ४५. ‘सोधेति’ (शोधन करतो) म्हणजे विचारलेल्या अर्थाला हातावर ठेवलेल्या आवळ्याप्रमाणे प्रत्यक्ष दाखवून, त्याला गुंतागुंत नसलेले व स्पष्ट करून उघड करत, त्या विषयासंबंधीचे अज्ञान, संशय इत्यादी मळ दूर करून शुद्ध करतो; आणि अशा प्रकारे शुद्ध करत असताना पदाच्या अर्थाशी अभेदोपचार करून "पद शुद्ध करतो" असेच म्हटले जाते. म्हणूनच "पद शुद्ध करतो असे म्हणतात" असे म्हटले आहे. प्रश्नाचे विसर्जन (उत्तर देणे) हेच येथे शोधन आहे, हे सांगताना "त्या अर्थाच्या विसर्जनामुळे" असे म्हटले आहे. ‘आरभीयती’ म्हणजे आरंभ, देशनेद्वारे प्रकाशित केला जाणारा अर्थ. म्हणूनच "तोपर्यंत...पे०... प्रबोधित झाल्यामुळे" असे म्हटले आहे. येथे शोधन म्हणजे झाकलेल्या रूपातील अर्थाला देशनेच्या प्रभावाने प्रकट करणे होय, हाच अर्थ उपमेद्वारे स्पष्ट करण्यासाठी "अज्ञानात पडलेल्यांना" इत्यादी म्हटले आहे. โสธนหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. सोधनहारविभंगवण्णना समाप्त झाली. ๑๔. อธิฏฺฐานหารวิภงฺควณฺณนา १४. अधिट्ठानहारविभंगवण्णना ๔๖. ธารยิตพฺพาติ อุปธาเรตพฺพา, อุปลกฺขิตพฺพาติ อตฺโถ. วุตฺตเมว ‘‘สามญฺญวิเสสกปฺปนาย โวหารภาเวน อนวฏฺฐานโต’’ติอาทินา (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๑๔). ४६. ‘धारयितब्बा’ म्हणजे धारण करावी, उपलक्षित करावी असा अर्थ आहे. "सामान्य-विशेष कल्पनेने व्यवहारभावामध्ये अनवस्थान असल्यामुळे" इत्यादींद्वारे (नेत्ति. अट्ठ. १४) हे आधीच म्हटले आहे. ตํ ตํ ผลนฺติ นิรยาทึ ตํ ตํ ผลํ. อญฺจิตาติ คตา. โยนีติ เอกชาติ. สมานวเสน มิสฺสีภวติ เอตายาติ หิ โยนิ, อุปปตฺติ. เปจฺจาติ มริตฺวา. อุสฺสนฺนตายาติ วิตกฺกพหุลตาย. ‘‘อุสฺสนฺนตฺตา’’ติปิ วทนฺติ. สสฺสตาทีหิ วา อุสฺสนฺนตฺตา. อสุรชาติยา นิพฺพตฺตาปนโก อสุรชาตินิพฺพตฺตนโก. त्या त्या (कर्माचे) फळ म्हणजे नरक इत्यादी ते ते फळ होय. 'अञ्चिता' म्हणजे गेलेली. 'योनी' म्हणजे एक जात (उत्पत्ती). जिच्याद्वारे समानतेने मिश्रण होते ती 'योनी' म्हणजेच उत्पत्ती होय. 'पेच्च' म्हणजे मृत्यूनंतर (मरून). 'उस्सन्नतया' म्हणजे वितर्कांच्या बहुलतेमुळे. 'उस्सन्नत्ता' असेही म्हणतात. किंवा शाश्वत इत्यादी (दृष्टींच्या) प्रबळतेमुळे. असुर जातीमध्ये उत्पन्न करणारा तो 'असुरजातिनिब्बत्तनको' (असुरजाती-उत्पादक) होय. สงฺขาติ ปญฺญา. ปญฺญาปธานา จ ภาวนาติ อาห ‘‘ปฏิสงฺขาย ปฏิปกฺขภาวนายา’’ติ. 'सङ्खा' म्हणजे प्रज्ञा. प्रज्ञाप्रधान असलेली भावना म्हणून 'पटिसङ्खाय पटिपक्खभावनाय' (प्रतिसंख्यान करून प्रतिपक्ष भावना करणे) असे म्हटले आहे. ๔๗. ปตฺถฏภาเวน ปถวี. สภาวธารณฏฺเฐน, นิสฺสตฺตนิชฺชีวฏฺเฐน จ ธาตุ. อาปียติ, อปฺปายตีติ วา อาโป. เตชนวเสน ติกฺขตาวเสน, ทหนวเสน วา เตโช. วายนวเสน เวคคมนวเสน, สมุทีรณวเสน [Pg.82] วา วาโย. วีสติ อาการาติ เกสาทโย วีสติ โกฏฺฐาสา, ปการา วา. กกฺขฬลกฺขณาธิกตาย เกสาที กกฺขฬลกฺขณา วุตฺตา. ४७. विस्तृत भावामुळे (पसरलेल्या स्वरूपामुळे) ती 'पठवी' (पृथ्वी). स्वभावाचे धारण करण्याच्या अर्थाने आणि निस्सत्त्व-निर्जीव अर्थाने ती 'धातू' होय. जे तृप्त करते किंवा वाढवते ते 'आपो' (जल). तेज देण्याच्या स्वरूपाने, तीक्ष्णतेने किंवा दहनाने ते 'तेजो' (अग्नी). वाहण्याच्या स्वरूपाने, वेगाने जाण्याच्या स्वरूपाने किंवा हालचालीने ते 'वायो' (वायू). 'वीस आकार' म्हणजे केसादी वीस भाग किंवा प्रकार. कठीण लक्षणाच्या अधिकतेमुळे केसादींना कठीण लक्षणाचे म्हटले आहे. ปาฏิเยกฺโก ปถวีธาตุโกฏฺฐาโสติ ปถวีโกฏฺฐาสมตฺโต, อตฺตสุญฺญธมฺมมตฺโตติ อตฺโถ. สนฺตปฺปตีติ เอตฺถ สรีรปกติมติกฺกมิตฺวา อุณฺหภาโว สนฺตาโป, สรีรทหนวเสน ปวตฺโต มหาทาโห, อยเมเตสํ วิเสโส. เยน จ ชีรียตีติ เอกาหิกาทิชราโรเคน ชรียตีติ จ อตฺโถ ยุชฺชติ. ‘‘สตวารํ ตาเปตฺวา ตาเปตฺวา อุทเก ปกฺขิปิตฺวา อุทฺธฏสปฺปิ สตโธตสปฺปี’’ติ วทนฺติ. รสรุธิรมํสเมทนฺหารุอฏฺฐิอฏฺฐิมิญฺชา รสาทโย. เกจิ นฺหารุํ อปเนตฺวา สุกฺกํ สตฺตมํ ธาตุํ วทนฺติ. วิเวกนฺติ วิสุํภาวํ, วิสทิสภาวนฺติ อตฺโถ. วตฺถุสงฺขาโต หิ อาหาโร ปริณามํ คจฺฉนฺโต ปาณภกฺขคหณิปทนิย มุตฺตกรีสภาเวหิ วิย อตฺตนาปิ วิสทิสรสสงฺขาตํ วิสุํภาวํ นิพฺพตฺเตนฺโต ตพฺภาวํ คจฺฉตีติ วุจฺจติ, ตถา รสาทโยปิ รุธิราทิโกฏฺฐาสํ. เตนาห ‘‘รสาทิภาเวน วิเวกํ คจฺฉตี’’ติ. प्रत्येक स्वतंत्र पृथ्वीधातूचा भाग म्हणजे केवळ पृथ्वीचा भाग, म्हणजेच आत्मा-शून्य धर्ममात्र असा अर्थ आहे. 'संतप्पति' (संतप्त होतो) यामध्ये शरीराच्या सामान्य स्थितीचे उल्लंघन करून उष्ण होणे म्हणजे 'संताप' होय, आणि शरीराच्या जळण्याने प्रवृत्त होणारा 'महादाह' होय, हा या दोघांमधील फरक आहे. 'yeन च जीरियति' (ज्याद्वारे जीर्ण होतो) याचा अर्थ एकाएकी येणाऱ्या तापासारख्या रोगाने किंवा वृद्धत्वाने जीर्ण होतो असाही अर्थ योग्य ठरतो. 'शंभर वेळा तापवून तापवून पाण्यात टाकून काढलेले तूप म्हणजे शतधौतघृत (सतधोतसप्पी)' असे म्हणतात. रस, रक्त, मांस, मेद, स्नायू, अस्थी आणि अस्थिमज्जा हे 'रसादी' होत. काही लोक स्नायूंना वगळून शुक्राला सातवी धातू म्हणतात. 'विवेक' म्हणजे पृथक भाव (वेगळेपण), विसदृश भाव असा अर्थ आहे. कारण वस्तू रूपाने घेतलेला आहार पचन होत असताना, प्राण्याने खाल्लेल्या अन्नाच्या ग्रहण आणि विसर्जन करणाऱ्या मूत्र-विष्ठेच्या रूपाप्रमाणे स्वतः देखील विसदृश रस नावाचा पृथक भाव निर्माण करत त्या भावाला प्राप्त होतो असे म्हटले जाते, तसेच रसादी देखील रक्तादी भागाला प्राप्त होतात. म्हणूनच म्हटले आहे - 'रसादी भावाने विवेकाला (पृथक भावाला) प्राप्त होतो'. สภาวลกฺขณโตติ อสุจิภาเวน ลกฺขิตพฺพโต. स्वभावलक्षणाने म्हणजे अशुची (अपवित्र) भावाने लक्षित होण्यामुळे. ๔๘. ยาถาวสรสลกฺขณนฺติ รสิตพฺโพติ รโส, ปฏิวิชฺฌิตพฺโพ สภาโว, อตฺตโน รโส สรโส, ยาถาโว สรโส, ยาถาวสรโส ยาถาวสรโส เอว ลกฺขิตพฺพตฺตา ลกฺขณนฺติ ยาถาวสรสลกฺขณํ. อถ วา ยาถาวสรสลกฺขณนฺติ อวิปรีตํ อตฺตโน ปวตฺติสงฺขาตํ กิจฺจญฺเจว ปีฬนสงฺขาตํ ลกฺขณญฺจ. ‘‘อิทํ กิจฺจํ, อิทํ ลกฺขณ’’นฺติ อวิชฺชาเหตุ ญาตุํ น สกฺโกติ, ตพฺพิสยญาณุปฺปตฺตึ นิวาเรนฺตี ฉาเทตฺวา ปริโยนนฺธิตฺวา ติฏฺฐตีติ วุตฺตา. เตน วุตฺตํ ‘‘ชานิตุํ ปฏิวิชฺฌิตุํ น เทตี’’ติ. ตยิทมสฺสา กิจฺจนฺติ กิจฺจโต กถิตา. กถิตาติ จ วุตฺตา, ยโต จ อวิชฺชา อสมฺปฏิเวธรสาติ วุจฺจติ. ชายติ เอตฺถาติ ชาติ, อุปฺปตฺติฏฺฐานํ. ยทิปิ นิโรธมคฺเค อวิชฺชา อารมฺมณํ น กโรติ, เต ปน ชานิตุกามสฺส ตปฺปฏิจฺฉาทนวเสน อนิโรธมคฺเคสุ นิโรธมคฺคคฺคหณสฺส การณภาเวน ปวตฺตมานา ตตฺถ อุปฺปชฺชตีติ วุจฺจติ, เตสมฺปิ อวิชฺชาย อุปฺปตฺติฏฺฐานตา โหติ, อิตเรสํ อารมฺมณภาเวน จาติ. ४८. 'याथावसरसलक्खण' म्हणजे आस्वाद घेण्याजोगा तो रस, प्रतिवेध (साक्षात्कार) करण्याजोगा स्वभाव, स्वतःचा रस म्हणजे सरस, यथार्थ तो सरस, यथार्थ सरस हाच लक्षित होण्याजोगा असल्याने लक्षण म्हणजे 'याथावसरसलक्षण' होय. किंवा 'याथावसरसलक्षण' म्हणजे स्वतःच्या प्रवृत्तीचे अविपरीत कार्य आणि पीडा देणारे लक्षण होय. 'हे कार्य आहे, हे लक्षण आहे' हे अविद्येमुळे जाणता येत नाही, त्या विषयाच्या ज्ञानाच्या उत्पत्तीला रोखत, झाकून आणि वेढून ती राहते असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'जाणून घेण्यास व प्रतिवेध करण्यास देत नाही'. हे तिचे कार्य आहे म्हणून कार्याच्या दृष्टीने सांगितले आहे. सांगितले आहे असे म्हटले आहे, कारण अविद्या ही असंप्रतिवेध-रसा (न समजण्याचा स्वभाव असलेली) म्हटली जाते. जिथे उत्पन्न होते ती 'जाती' म्हणजे उत्पत्तीचे स्थान होय. जरी निरोधमार्गात अविद्या आलंबन (विषय) बनत नाही, तरीही ते जाणू इच्छिणाऱ्याला झाकण्याच्या स्वरूपात अनिरोधमार्गांमध्ये निरोधमार्गाच्या ग्रहणाचे कारण बनून प्रवृत्त होत असल्याने तिथे उत्पन्न होते असे म्हटले जाते, त्यांचेही अविद्येमुळे उत्पत्तीचे स्थान होते, आणि इतरांचे आलंबन भावाने होते. อตฺถานตฺถนฺติ [Pg.83] หิตาหิตํ. สมฺโมหวิโนทนิยํ ปน ‘‘อตฺถตฺถ’’นฺติ (วิภ. อฏฺฐ. ๒๒๖) วุตฺตํ, ตตฺถ อตฺโถ เอว อตฺถตฺโถติ อตฺถสฺส อวิปรีตตาทสฺสนตฺถํ ทุติเยน อตฺถสทฺเทน วิเสสนํ. น หิ ญาณํ อนตฺเถ ‘‘อตฺโถ’’ติ คณฺหาตีติ. การณาการณนฺติ เอตฺถาปิ เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. อตฺถตฺถนฺติ วา อาเมฑิตวจนํ สพฺเพสํ อตฺถานํ ปากฏกรณภาวปฺปกาสนตฺถํ, ผลํ ผลนฺติ อตฺโถ, หิตปริยาเยปิ เอเสว นโย. นฺติ อตฺถานตฺถาทิกํ. อาการนฺติ อตฺถาทิการณเมว. 'अत्थानत्थ' म्हणजे हित आणि अहित. संमोहविनोदनीमध्ये मात्र 'अत्थत्थ' (विभङ्ग अट्ठकथा २२६) असे म्हटले आहे, तिथे अर्थ हाच 'अत्थत्थ' आहे, अर्थाची अविपरीतता दाखवण्यासाठी दुसऱ्या 'अत्थ' शब्दाने विशेषण दिले आहे. कारण ज्ञान हे अनर्थाला 'अर्थ' म्हणून ग्रहण करत नाही. 'कारणाकारण' यामध्येही असेच समजले पाहिजे. किंवा 'अत्थत्थ' हे द्विरुक्तीचे वचन सर्व अर्थांचे प्रकटीकरण स्पष्ट करण्यासाठी आहे, फळ हेच फळ असा अर्थ आहे, हिताच्या पर्यायातही हाच नियम आहे. 'इति' म्हणजे हित-अहित इत्यादी. 'आकार' म्हणजे अर्थाचे कारणच होय. ปฏิวิทฺธสฺส ปุน อเวกฺขนา ปจฺจเวกฺขณา. ทุจินฺติตจินฺติตาทิลกฺขณสฺส พาลสฺส ภาโว พาลฺยํ. สมฺปชานาตีติ สมํ ปกาเรหิ ชานาติ. พลวโมโห ปโมโห. สมนฺตโต โมหนํ สมฺโมโห. ทุคฺคติคามิกมฺมสฺส วิเสสปจฺจยตฺตา อวินฺทิยํ. วินฺทตีติ ลภติ. อนวชฺชธมฺมานํ วิชฺชา วิย วิเสสปจฺจโย น โหตีติ วินฺทิยํ น วินฺทติ. อยํ อวิชฺชาย เวมตฺตตาติ อยํ ‘‘ทุกฺเข อญฺญาณ’’นฺติอาทินา กิจฺจชาติลกฺขเณหิ วุตฺโต อวิชฺชาย อวิเสโส. วิชฺชาติอาทีนํ วุตฺตนยานสาเรน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. प्रतिवेध (साक्षात्कार) केलेल्या गोष्टीचे पुन्हा अवलोकन करणे म्हणजे 'पच्चवेक्खणा' (प्रत्यवेक्षण) होय. वाईट विचार करणे इत्यादी लक्षणांनी युक्त असलेल्या मूर्खाचा भाव म्हणजे 'बाल्य' (मूर्खपणा) होय. 'सम्पजानाति' म्हणजे योग्य प्रकारे जाणतो. प्रबळ मोह म्हणजे 'पमोह' (प्रमोह). सर्व बाजूंनी मोहित करणे म्हणजे 'सम्मोह' (संमोह). दुर्गतीला नेणाऱ्या कर्माचा विशेष प्रत्यय (कारण) असल्याने ते 'अविन्दिय' (न मिळवण्याजोगे) होय. 'विन्दति' म्हणजे प्राप्त करतो. अनवद्य (दोषरहित) धर्मांचा विद्येप्रमाणे विशेष प्रत्यय होत नाही, म्हणून 'विन्दिय' (मिळवण्याजोगे) प्राप्त करत नाही. 'ही अविद्येची भिन्नता आहे' म्हणजे ही 'दुःखात अज्ञान' इत्यादी कार्य, जाती आणि लक्षणांद्वारे सांगितलेली अविद्येची सामान्यता (अविशेष) होय. 'विज्जा' (विद्या) इत्यादींचा अर्थ सांगितलेल्या पद्धतीनुसार समजून घ्यावा. ปาสาณสกฺขรวาลิกาวิรหิตา ภูมิ สณฺหาติ ‘‘สณฺหฏฺเฐนา’’ติ วุตฺตํ. दगड, गोटे आणि वाळू यांनी रहित असलेली भूमी मऊ (सुळसुळीत) असते, म्हणून 'सण्हट्ठेन' (मऊ असण्याच्या अर्थाने) असे म्हटले आहे. ตตฺตกเมว กาลนฺติ ปญฺจกปฺปสตานิ. วิภูตํ สมตฺติกฺกนฺตํ รูปสญฺญาสงฺขาตํ รูปํ เอตายาติ วิภูตรูปํ, สมาปตฺตินฺติ ปทตฺโถ. น หิ กาจิ อรูปสมาปตฺติ รูปสญฺญาสหคตา ปวตฺตีติ. นิโรธสมาปตฺติยํ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ, ตตฺถ เนวสญฺญานาสญฺญายตนสมาปตฺติยา วิสุํ คหิตตฺตา วุตฺตํ ‘‘เสสารุปฺปสมาปตฺติโย’’ติ. तेवढाच काळ म्हणजे पाचशे कल्प. जिच्याद्वारे रूपसंज्ञा नावाचे रूप नष्ट झाले आहे, ओलांडले गेले आहे, ती 'विभूतरूप' समापत्ती असा पदाचा अर्थ आहे. कारण कोणतीही अरूप समापत्ती रूपसंज्ञेसह प्रवृत्त होत नाही. निरोधसमापत्तीबद्दल तर बोलण्याची गरजच नाही, तिथे नैवसंज्ञानासंज्ञायतन समापत्तीला स्वतंत्रपणे ग्रहण केल्यामुळे 'उर्वरित अरूप समापत्ती' असे म्हटले आहे. ทมถํ อนุปคจฺฉนฺโต ทุฏฺฐสฺโส ขลุงฺกสฺโส. อุตฺตริทมถายาติ อริยมคฺคทมถาย. दमनाला (नियंत्रणाला) प्राप्त न होणारा दुष्ट घोडा म्हणजे 'खळुङ्क' (खळुंग अश्व) होय. 'उत्तरीदमथाय' म्हणजे आर्यमार्गाच्या दमनासाठी. อิตโรติ ทุกฺขาปฏิปโท ขิปฺปาภิญฺโญ, สุขาปฏิปโท จ ขิปฺปาภิญฺโญ. อุภยโตภาเคหีติ รูปกายนามกายภาเคหิ. อุภยโตติ วิกฺขมฺภนสมุจฺเฉทวิมุตฺติวเสน. इतर म्हणजे दुःख-प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञ आणि सुख-प्रतिपदा क्षिप्राभिज्ञ होय. 'उभयतोभागेहि' म्हणजे रूपकाय आणि नामकाय या दोन्ही भागांनी. 'उभयतो' म्हणजे विष्कंभन आणि समुच्छेद विमुक्तीच्या द्वारे. อเนโกปีติ [Pg.84] สภาเวน อเนโกปิ. เอกสทฺทาภิเธยฺยตายาติ สามญฺญสทฺทาภิเธยฺยตาย. 'अनेकोपि' म्हणजे स्वभावाने अनेक असूनही. 'एकसद्दाभिधेय्यताय' म्हणजे सामान्य शब्दाने अभिहित (निर्देशित) होण्यामुळे. อธิฏฺฐานหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. अधिष्ठानहारविभंगवर्णन समाप्त झाले. ๑๕. ปริกฺขารหารวิภงฺควณฺณนา १५. परिक्खारहारविभंगवर्णन ๔๙. ‘‘หิโนตี’’ติ ปทสฺส อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘การณภาวํ คจฺฉตี’’ติ อาห อเนกตฺถตฺตา ธาตูนํ. เอตีติ อาคจฺฉติ, อุปฺปชฺชตีติ อตฺโถ. ४९. 'हिनोति' या पदाचा अर्थ दाखवताना, धातूंचे अनेक अर्थ असल्यामुळे 'कारणभावाला प्राप्त होतो' असे म्हटले आहे. 'एति' म्हणजे येतो, उत्पन्न होतो असा अर्थ आहे. อวิชฺชายปิ เหตุภาเวติ เอตฺถ อวิชฺชา อนนฺตราย อวิชฺชาย อนนฺตรสมนนฺตรูปนิสฺสยนตฺถิวิคตาเสวนปจฺจเยหิ, อนนฺตราย ปน สหชาตาย สหชาตอญฺญมญฺญนิสฺสยสมฺปยุตฺตอตฺถิอวิคตเหตุปจฺจเยหิ, อสหชาตาย อุปนิสฺสยโกฏิยา เอว ปจฺจโย โหตีติ เวทิตพฺพํ. อตฺตโน ผลํ กโรตีติ การณนฺติ อาห ‘‘การณภาโว จ ผลาเปกฺขายา’’ติ. ‘अविज्जेचा (अविद्येचा) देखील हेतुभाव’ यामध्ये अविज्जा ही अनंतर (लगेचच येणाऱ्या) अविज्जेसाठी अनन्तर, समनन्तर, उपनिस्सय, नत्थि, विगत् आणि आसेवन प्रत्ययांद्वारे; आणि सहजात (सोबत उत्पन्न होणाऱ्या) अविज्जेसाठी सहजात, अञ्ञमञ्ञ (परस्पर), निस्सय (आश्रय), सम्पयुत्त (संप्रयुक्त), अत्थि (अस्ति), अविगत आणि हेतु प्रत्ययांद्वारे प्रत्यय (कारण) बनते; तर जी सहजात नाही तिच्यासाठी केवळ उपनिस्सय कोटीनेच प्रत्यय बनते, असे जाणावे. ‘स्वतःचे फळ निर्माण करते ते कारण’ या अर्थाने म्हटले आहे— ‘आणि कारणभाव हा फळाच्या अपेक्षेने असतो.’ นิพฺพตฺติอตฺโถ ผลตฺโถ ผลสงฺขาโต อตฺโถ. निष्पत्तीचा (उत्पत्तीचा) अर्थ म्हणजेच फळाचा अर्थ, जो फळ म्हणून ओळखला जाणारा अर्थ आहे. โย สภาโวติ ปุญฺญาทิอภิสงฺขารานํ โย อภิสงฺขรณสภาโว, โส เหตุ. เสสปเทสูติ วิญฺญาณาทิปเทสุ. ยถาวุตฺตปฺปเภโทติ ‘‘อสาธารณลกฺขโณ เหตู’’ติอาทินา วุตฺตปฺปเภโท. โย โกจิ ปจฺจโยติ ชนกาทิเภทํ ยํ กิญฺจิ การณํ. อภิสงฺขรณโตติ ปจฺจกฺขโต, ปรมฺปราย จ นิพฺพตฺตนโต. ‘जो स्वभाव’ म्हणजे पुण्याचा (पुण्यादी) अभिसंस्कारांचा जो अभिसंस्करण करण्याचा स्वभाव आहे, तो हेतू होय. ‘उर्वरित पदांमध्ये’ म्हणजे विञ्ञाण (विज्ञान) इत्यादी पदांमध्ये. ‘यथावृत्तप्रभेद’ (वर सांगितलेला भेद) म्हणजे ‘असाधारण लक्षण असलेला हेतू’ इत्यादींद्वारे सांगितलेला भेद होय. ‘जो कोणताही प्रत्यय’ म्हणजे जनक (उत्पादक) इत्यादी भेदांचे जे काही कारण आहे ते. ‘अभिसंस्करण करण्यामुळे’ म्हणजे प्रत्यक्षपणे आणि परंपरेने उत्पन्न करण्यामुळे होय. ปริกฺขารหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. परिक्खारहारविभंगवर्णना समाप्त झाली. ๑๖. สมาโรปนหารวิภงฺควณฺณนา १६. समारोपनहारविभंगवर्णना ๕๐. สุตฺเตน คหิเตติ สุตฺเต วุตฺเต. ปทฏฺฐานคฺคหณํ อธิฏฺฐานวิสยทสฺสนตฺถํ, เววจนคฺคหณํ อธิวจนวิภาคทสฺสนตฺถนฺติ โยชนา. วิสยาธิฏฺฐานภาวโตติ วิสยสงฺขาตปวตฺติฏฺฐานภาวโต. วนียตีติ ภชียติ. วนตีติ ภชติ เสวติ. วนุเตติ ยาจติ, ปตฺเถตีติ อตฺโถ[Pg.85]. ปญฺจ กามคุณา กามตณฺหาย การณํ โหติ อารมฺมณปจฺจยตาย. นิมิตฺตคฺคาโห อนุพฺยญฺชนคฺคาหสฺส การณํ โหติ อุปนิสฺสยตายาติ เอวํ เสเสสุปิ ยถารหํ การณตา วตฺตพฺพา. ५०. ‘सुत्ताने ग्रहण केले’ म्हणजे सुत्तात (सूत्रात) सांगितले असता. ‘पदस्थान ग्रहण करणे हे अधिष्ठान विषयाचे दर्शन घडवण्यासाठी आहे, आणि वेवचन (पर्यायवाची शब्द) ग्रहण करणे हे अधिवचन विभागाचे दर्शन घडवण्यासाठी आहे’ अशी योजना आहे. ‘विषयाधिष्ठानभावामुळे’ म्हणजे विषय म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या प्रवृत्तीच्या स्थानाच्या भावामुळे. ‘वनीयति’ म्हणजे सेवन केले जाते. ‘वनति’ म्हणजे भजतो, सेवन करतो. ‘वनुते’ म्हणजे याचना करतो, इच्छा करतो, असा अर्थ आहे. पाच कामगुण हे आरम्मण (आलंबन) प्रत्ययभावाने कामतण्हेचे (कामतृष्णेचे) कारण असतात. निमित्तग्रहण हे उपनिस्सय (उपनिषय) भावाने अनुव्यंजनग्रहणाचे कारण असते; अशा प्रकारे उर्वरित गोष्टींमध्येही योग्यतेनुसार कारणभाव सांगावा. ๕๑. ‘‘กาเย กายานุปสฺสี วิหราหี’’ติอาทีสุ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ เหฏฺฐา ลกฺขณหารวิภงฺควณฺณนายํ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๒๓) วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อยํ ปน วิเสโส – รูปธมฺมปริญฺญายาติ รูปูปิกวิญฺญาณฏฺฐิติปริญฺญาย. ५१. ‘कायात कायानुपश्यी होऊन विहारावे’ इत्यादींमध्ये जे सांगायचे आहे, ते खाली लक्षणहारविभंगवर्णनेमध्ये (नेत्ति. अट्ठ. २३) सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावे. परंतु हा विशेष आहे— ‘रूपधम्माच्या परिज्ञेसाठी’ म्हणजे रूपाशी संबंधित विञ्ञाणस्थितीच्या (विज्ञानस्थितीच्या) परिज्ञेसाठी होय. ‘‘ทุกฺข’’นฺติ ปสฺสนฺตี สา เวทนานุปสฺสนาติ โยเชตพฺพํ. เวทนาเหตุปริญฺญายาติ ผสฺสปริญฺญาย. ‘‘เวทนาวเสนา’’ติ ปเทน อตฺตนา อุปฺปาทิตทุกฺขวเสน. เวทนาปริญฺญายาติ เวทนูปิกวิญฺญาณฏฺฐิติปริญฺญาย. นิจฺจาภินิเวสปฏิปกฺขโต อนิจฺจานุปสฺสนายาติ อธิปฺปาโย. นิจฺจสญฺญานิมิตฺตสฺสาติ นิจฺจสญฺญาเหตุกสฺส. สญฺญาปริญฺญายาติ สญฺญูปิกวิญฺญาณฏฺฐิติปริญฺญาย. ปฐมมคฺควชฺฌตฺตา อคติคมนสฺส วุตฺตํ ‘‘ทิฏฺฐาภินิเวสสฺส…เป… อคติคมนสฺส จา’’ติ. ‘दुःख’ असे पाहणारी ती वेदनानुपश्यना आहे, अशी योजना करावी. ‘वेदनेच्या हेतूच्या परिज्ञेसाठी’ म्हणजे फस्साच्या (स्पर्शाच्या) परिज्ञेसाठी. ‘वेदनेच्या वशाने’ या पदाने स्वतः उत्पन्न केलेल्या दुःखाच्या वशाने. ‘वेदनेच्या परिज्ञेसाठी’ म्हणजे वेदनेशी संबंधित विञ्ञाणस्थितीच्या परिज्ञेसाठी. नित्य अभिनिवेशाच्या (नित्याच्या आग्रहाच्या) प्रतिपक्षाने अनित्यानुपश्यना होते, असा अभिप्राय आहे. ‘नित्यसंज्ञा निमित्ताचे’ म्हणजे नित्यसंज्ञा हेतू असलेल्याचे. ‘संज्ञेच्या परिज्ञेसाठी’ म्हणजे संज्ञेशी संबंधित विञ्ञाणस्थितीच्या परिज्ञेसाठी. पहिल्या मार्गाने वर्ज्य असल्यामुळे अगतिकतेच्या गमनाविषयी म्हटले आहे— ‘दृष्टीच्या अभिनिवेशाचे...पे... आणि अगतिकतेच्या गमनाचे’. สงฺขารปริญฺญายาติ สงฺขารูปิกวิญฺญาณฏฺฐิติปริญฺญาย. ‘संस्कारांच्या परिज्ञेसाठी’ म्हणजे संस्कारांशी संबंधित विञ्ञाणस्थितीच्या परिज्ञेसाठी होय. สมาโรปนหารวิภงฺควณฺณนา นิฏฺฐิตา. समारोपनहारविभंगवर्णना समाप्त झाली. นิฏฺฐิตา จ หารวิภงฺควณฺณนา. आणि हारविभंगवर्णना समाप्त झाली. ๑. เทสนาหารสมฺปาตวณฺณนา १. देसनाहारसंपातवर्णना ‘‘เอว’’นฺติอาทิ หารสมฺปาตเทสนาย สมฺพนฺธทสฺสนํ. ตตฺถ ปุริเมน อุปมาทฺวเยน สุปริกมฺมกตมณิโกฏฺฏิมสทิสี, สุวิรจิตชมฺพุนทาภรณสทิสี จ ปาฬิ. ตตฺถ กตนานาวณฺณปุปฺผูปหารสทิสี, วิวิธรํสิชาลาสมุชฺชลพทฺธนานารตนาวลิสทิสี จ หารวิภงฺคเทสนาติ ทสฺเสติ. ปจฺฉิเมน ตสฺส ปณีตมหารเห ชฏาหิ สทฺธึ ทุกฺกรตรตํ ทีเปติ. ยายํ คาถา วุตฺตาติ โยชนา. ‘अशा प्रकारे’ इत्यादी हारसंपातदेशनेचा संबंध दर्शवणे आहे. त्यामध्ये पहिल्या दोन उपमांद्वारे पाळी (पाठाची रचना) ही उत्तम प्रकारे संस्कारित केलेल्या मणिकुट्टिमासारखी (रत्नजडित जमिनीसारखी) आणि सुनिर्मित सुवर्णालंकारासारखी आहे. त्यामध्ये हारविभंगदेशना ही विविध रंगांच्या फुलांच्या उपहारासारखी आणि विविध किरणजालांनी प्रज्वलित अशा विविध रत्नांच्या माळेसारखी आहे, असे दर्शवले आहे. नंतरच्या उपमेने त्या प्रणीत आणि मौल्यवान अशा जटांसह (गुंतागुंतीसह) अधिक कठीणता स्पष्ट केली आहे. ‘जी ही गाथा म्हटली आहे’ अशी योजना आहे. ๕๒. ยสฺมายํ หารวิภงฺควาโร นปฺปโยเชติ ยถาวุตฺเตน การเณน, ตสฺมา สา หารวิภงฺควารสฺส อาทิมฺหิ น ปจฺจามฏฺฐาติ อธิปฺปาโย[Pg.86]. หารสมฺปาตวาโร ปน ตํ ปโยเชตีติ ยสฺมา ปน หารสมฺปาตวาโร ตํ คาถํ ปโยเชติ ยถาวุตฺเตเนว การเณน, ตสฺมา ‘‘โสฬส…เป… อาหา’’ติ อาห. โยชนานยทสฺสนนฺติ โยชนาย นยทสฺสนํ. ५२. ज्या कारणाने हा हारविभंगवार वर सांगितलेल्या कारणाने प्रवृत्त होत नाही, म्हणून ती हारविभंगवाराच्या सुरुवातीला स्पर्शली गेली नाही, असा अभिप्राय आहे. परंतु हारसंपातवार तिला प्रवृत्त करतो, कारण हारसंपातवार त्या गाथेला वर सांगितलेल्या कारणानेच प्रवृत्त करतो, म्हणून ‘सोळा...पे... म्हणाले’ असे म्हटले आहे. ‘योजनानयदर्शन’ म्हणजे योजनेच्या पद्धतीचे दर्शन होय. เตนาติ ‘‘ตํ มจฺจุโน ปท’’นฺติ วจเนน. สพฺพํ วิปลฺลาสนฺติ ทฺวาทสวิธมฺปิ วิปลฺลาสํ. สามญฺญสฺส…เป… โวหรียติ ยตฺถ ปติฏฺฐิตํ สามญฺญํ, โส วิเสโส. อตฺถโต ปน สญฺญาทโย เอว รูปาทิวิสยํ วิปรีตากาเรน คณฺหนฺเต วิปลฺลาโสติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สญฺญาวิปลฺลาโส’’ติอาทิมาห. ‘त्याद्वारे’ म्हणजे ‘ते मृत्यूचे पद आहे’ या वचनाद्वारे. ‘सर्व विपर्यास’ म्हणजे बारा प्रकारचा विपर्यास. सामान्याचे...पे... व्यवहार केला जातो, जिथे सामान्य प्रतिष्ठित आहे, तो विशेष होय. अर्थाच्या दृष्टीने तर संज्ञा इत्यादीच रूपादी विषयांना विपरीत आकाराने ग्रहण करतात, तो विपर्यास आहे, असे दर्शवताना ‘संज्ञाविपर्यास’ इत्यादी म्हटले आहे. อินฺทชาลาทิวเสน มณิอาทิอากาเรน อุปฏฺฐหนฺเต อุปาทานกฺขนฺธปญฺจเก อหํมมาทิการณตาย นิรุตฺตินเยน ‘‘อตฺตา’’ติ วุจฺจมาโน ตํพุทฺธิโวหารปฺปวตฺตินิมิตฺตตาย อตฺตภาโว สุขาทีนํ วตฺถุตาย ‘‘อตฺตภาววตฺถู’’ติ ปวุจฺจตีติ อาห ‘‘เตหี’’ติอาทิ. เตสนฺติ อุปาทานกฺขนฺธานํ. วิปลฺลาสานํ ปวตฺติอากาโร ‘‘อสุเภ สุภ’’นฺติอาทิ. วิสโย กายเวทนาจิตฺตธมฺมา. อวิชฺชา จ…เป… เอว สมฺโมหปุพฺพกตฺตา สพฺพวิปลฺลาสานํ. จ-สทฺโท สุภสุขสญฺญานนฺติ เอตฺถาปิ อาเนตฺวา โยเชตพฺโพ. इंद्रजालादी (जादूच्या खेळादी) वशाने मणी इत्यादी आकाराने उपस्थित होणाऱ्या पाच उपादानस्कंधांमध्ये ‘मी आणि माझे’ इत्यादी कारणांमुळे निरुक्तीच्या पद्धतीने ‘आत्मा’ असे म्हटले जाणारे, त्या बुद्धीच्या आणि व्यवहाराच्या प्रवृत्तीचे निमित्त असल्यामुळे ‘अत्तभाव’ (आत्मभाव) हा सुखादींचे वस्तू (अधिष्ठान) असल्यामुळे ‘अत्तभाववस्तू’ असे म्हटले जाते, म्हणून ‘त्यांच्याद्वारे’ इत्यादी म्हटले आहे. ‘त्यांचे’ म्हणजे उपादानस्कंधांचे. विपर्यासांच्या प्रवृत्तीचा आकार ‘अशुभात शुभ’ इत्यादी आहे. विषय म्हणजे काय, वेदना, चित्त आणि धम्म (धर्म) हे आहेत. आणि अविज्जा (अविद्या)...पे... हीच सर्व विपर्यासांचे संमोहपूर्वक (अज्ञानाधारित) कारण असल्यामुळे. ‘च’ हा शब्द ‘शुभ आणि सुख संज्ञांचे’ येथेही आणून योजावा. ตตฺถายํ โยชนา – ‘‘อวิชฺชา จ สุภสุขสญฺญานํ ปจฺจโย เอว, น ตณฺหา เอว, อวิชฺชา สุภสุขสญฺญานญฺจ ปจฺจโย, น นิจฺจอตฺตสญฺญานํ เอวา’’ติ. เอวํ สนฺเตปิ ปุริมานํ ทฺวินฺนํ วิปรีตสญฺญานํ ตณฺหา, ปจฺฉิมานํ อวิชฺชา วิเสสปจฺจโยติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ตถาปี’’ติอาทิ. อวิชฺชาสีเสน เจตฺถ ทิฏฺฐิยา คหณํ เวทิตพฺพํ. เตนาห ‘‘ทิฏฺฐินิวุตํ จิตฺต’’นฺติ, ‘‘โย ทิฏฺฐิวิปลฺลาโส’’ติ จ อาทิ, ยถา จ อวิชฺชาสีเสน ทิฏฺฐิยา คหณํ, เอวํ ทิฏฺฐิสีเสน อวิชฺชายปิ คหณํ สิยาติ อาห ‘‘ทิฏฺฐิสีเสน อวิชฺชา วุตฺตา’’ติ. ตณฺหาวิชฺชาสุ สุภสุขสญฺญานํ ยถา ตณฺหา วิเสสปจฺจโย, น เอวํ อวิชฺชา. นิจฺจอตฺตสญฺญานํ ปน ยถา อวิชฺชา วิเสสปจฺจโย, น ตถา ตณฺหาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘โมโห วิเสสปจฺจโย’’ติ อาห. त्यामध्ये ही योजना आहे— ‘अविज्जा देखील शुभ आणि सुख संज्ञांचा प्रत्यय (कारण) आहेच, केवळ तण्हा (तृष्णा) नव्हे; अविज्जा ही शुभ आणि सुख संज्ञांचा देखील प्रत्यय आहे, केवळ नित्य आणि आत्म संज्ञांचाच नव्हे.’ असे असले तरी, पहिल्या दोन विपरीत संज्ञांचा तण्हा हा, आणि नंतरच्या दोन विपरीत संज्ञांचा अविज्जा हा विशेष प्रत्यय आहे, असे दर्शवताना ‘तरी देखील’ इत्यादी म्हटले आहे. आणि येथे अविज्जेच्या शीर्षकाखाली (नावाने) दृष्टीचे ग्रहण जाणावे. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘दृष्टीने झाकलेले चित्त’, आणि ‘जो दृष्टीविपर्यास’ इत्यादी. आणि ज्याप्रमाणे अविज्जेच्या शीर्षकाखाली दृष्टीचे ग्रहण होते, त्याचप्रमाणे दृष्टीच्या शीर्षकाखाली अविज्जेचे देखील ग्रहण व्हावे, म्हणून म्हटले आहे— ‘दृष्टीच्या शीर्षकाखाली अविज्जा सांगितली आहे.’ तण्हा आणि अविज्जेमध्ये, शुभ आणि सुख संज्ञांचा ज्याप्रमाणे तण्हा हा विशेष प्रत्यय आहे, त्याप्रमाणे अविज्जा नाही. परंतु नित्य आणि आत्म संज्ञांचा ज्याप्रमाणे अविज्जा हा विशेष प्रत्यय आहे, त्याप्रमाणे तण्हा नाही, हे दर्शवताना ‘मोह हा विशेष प्रत्यय आहे’ असे म्हटले आहे. ปจฺฉิมานํ ทฺวินฺนํ…เป… โหตีติ อตีตํเส ตณฺหาภินิเวสสฺส พลวภาวาภาวโต. เตเนว หิ ‘‘โส อตีตํ รูปํ อตฺตโต สมนุปสฺสติ’’จฺเจว [Pg.87] วุตฺตํ, น ‘‘อภินนฺทตี’’ติ. ตณฺหาวิปลฺลาโสติ ตณฺหํ อุปนิสฺสาย ปวตฺโต วิปลฺลาโส, น หิ ตณฺหา สยํ วิปลฺลาโส. เตนาห ‘‘ตณฺหามูลโก วิปลฺลาโส’’ติ. ทิฏฺฐาภินนฺทนวเสนาติ ตณฺหุปนิสฺสยทิฏฺฐาภินนฺทนวเสน, ยโต โส ‘‘ตณฺหาวิปลฺลาโส’’ติ วุตฺโต. เอเตนาติ ‘‘โย ตณฺหาวิปลฺลาโส’’ติอาทิปาเฐน. โสฬส สญฺญีวาทา, อฏฺฐ อสญฺญีวาทา, อฏฺฐ เนวสญฺญีนาสญฺญีวาทา, ปญฺจ ปรมทิฏฺฐธมฺมนิพฺพานวาทา จ, ยถา อตฺตโน คตาย, นิพฺพานปฺปตฺติยา จ ปริกปฺปวเสน สุภสุขาการคฺคาหิโน, น เอวํ สตฺต อุจฺเฉทวาทาติ อาห ‘‘เยภุยฺเยนา’’ติ. ปฏิปกฺขวเสนปีติ วิสุทฺธิวเสนปิ. ยาว หิ อุปกฺกิเลสา, ตาว จิตฺตํ น วิสุชฺฌเตว. ยทา จ เต ปหีนา, ตทา วิสุทฺธเมว. เตนาห ‘‘น หี’’ติอาทิ. ‘‘อรกฺขิเตน จิตฺเตนา’’ติ ปาฬึ นิกฺขิปิตฺวา วิปลฺลาสมุเขเนว เทสนาย นิทฺธาริยมานตฺตา วุตฺตํ ‘‘ยถานุสนฺธินาว คาถํ นิฏฺฐเปตุ’’นฺติ. शेवटच्या दोन... इत्यादी... होते, कारण भूतकाळात तण्हा-अभिनिवेशाचा (तृष्णेच्या आग्रहाचा) प्रबळ भाव नसतो. म्हणूनच, 'तो भूतकाळातील रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो' असेच म्हटले आहे, 'त्याचे अभिनंदन करतो' असे नाही. 'तण्हाविपल्लासो' (तृष्णा-विपर्यास) म्हणजे तृष्णेचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त झालेला विपर्यास, कारण तृष्णा स्वतः विपर्यास नाही. म्हणूनच म्हटले आहे - 'तृष्णामूलक विपर्यास'. 'दिट्ठामिनंदनवसेन' (दृष्टी-अभिनंदनाच्या वशाने) म्हणजे तृष्णेचा आश्रय घेतलेल्या दृष्टीच्या अभिनंदनाच्या वशाने, ज्यावरून त्याला 'तण्हाविपल्लासो' (तृष्णा-विपर्यास) म्हटले गेले आहे. 'एतेन' (याद्वारे) म्हणजे 'जो तृष्णा-विपर्यास आहे' इत्यादी पाठाद्वारे. सोळा सञ्ञीवाद (संज्ञीवाद), आठ असञ्ञीवाद (असंज्ञीवाद), आठ नेवसञ्ञीनासञ्ञीवाद (नैवसंज्ञीनासंज्ञीवाद), आणि पाच परमदिट्ठधम्मनिब्बानवाद (परमदृष्टधर्मनिर्वाणवाद) हे जसे स्वतःच्या गतीनुसार आणि निर्वाणप्राप्तीच्या कल्पनेनुसार शुभ व सुखकारक स्वरूपाचे ग्रहण करणारे आहेत, तसे सात उच्छेदवादी नाहीत, म्हणून 'बहुतांश करून' (येभुय्येन) असे म्हटले आहे. 'पटिपक्खवसेनपि' (प्रतिपक्षाच्या वशानेही) म्हणजे विशुद्धीच्या वशानेही. जोपर्यंत उपक्किलेस (उपक्लेश) आहेत, तोपर्यंत चित्त विशुद्ध होतच नाही. आणि जेव्हा ते प्रहीण (नष्ट) होतात, तेव्हा ते विशुद्धच होते. म्हणूनच 'न ही' (नाही तर) इत्यादी म्हटले आहे. 'अरक्खितेन चित्तेन' (अरक्षित चित्ताने) हा पाळी पाठ ठेवून विपर्यासाच्या माध्यमातूनच देशनेचे स्पष्टीकरण केले जात असल्यामुळे 'अनुसंधानानुसारच गाथा समाप्त करावी' असे म्हटले आहे. มารสฺสาติ กิเลสมารสฺส. ตสฺส หิ วเส ฐิโต เสสมารานํ หตฺถคโต เอวาติ. เตนาห ‘‘กิเลสมารคฺคหเณเนวา’’ติอาทิ. 'मारस्स' (माराचा) म्हणजे क्लेशमाराचा. कारण त्याच्या वशात (नियंत्रणात) असलेला मनुष्य इतर मारांच्या हातात गेलेलाच असतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'क्लेशमाराच्या ग्रहणानेच' इत्यादी. มารพนฺธนนฺติ สตฺตมารปกฺเข มารสฺส พนฺธนนฺติ มารพนฺธนํ. โส หิ กิเลสพนฺธนภูเต อตฺตโน สมารกปริเส มญฺญติ. เตน วุตฺตํ ‘‘อนฺตลิ…เป… โมกฺขสี’’ติ (มหาว. ๓๓). อิตรมารปกฺเข มาโรว พนฺธนนฺติ มารพนฺธนํ. วิสงฺขาโร นิพฺพานํ. 'मारबंधन' म्हणजे सत्त्व-मार पक्षातील माराचे बंधन ते मारबंधन होय. कारण तो क्लेशबंधन रूप असलेल्या स्वतःच्या स-मारक परिवाराला (आपला) मानतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'अंतरिक्षात... इत्यादी... मुक्त होशील' (महावग्ग ३३). इतर मार पक्षाच्या बाबतीत मार स्वतःच बंधन आहे म्हणून 'मारबंधन' होय. विसंखार (विसंस्कार) म्हणजे निब्बान (निर्वाण) होय. โมหสมฺปโยคโต จิตฺตํ ‘‘มูฬฺห’’นฺติ วุตฺตนฺติ รตฺตทุฏฺฐานมฺปิ มูฬฺหตาย สพฺภาเว ‘‘มูฬฺห’’นฺติ วิสุํ วจนํ อาเวณิกโมหวเสน วุตฺตนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ทฺวินฺนํ โมมูหจิตฺตุปฺปาทานํ วเสนา’’ติ อาห. เอวนฺติ เอวํ ราคาทิอกุสลปฺปตฺติยา กุสลภณฺฑจฺเฉทนโต อรกฺขิตํ จิตฺตํ โหติ, สพฺโพปิ มิจฺฉาภินิเวโส เอตฺเถว สงฺคหํ สโมสรณํ คจฺฉตีติ อาห ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิ …เป… เวทิตพฺพ’’นฺติ. สพฺเพปีติ ‘‘อรกฺขิตํ, มิจฺฉาทิฏฺฐิหตํ, ถินมิทฺธาภิภูต’’นฺติ ตีหิปิ ปเทหิ วุตฺตธมฺมา. मोहाच्या संप्रयोगामुळे (संयोगामुळे) चित्ताला 'मूळ्ह' (मूढ/भ्रमित) म्हटले आहे. राग आणि द्वेष असलेल्यांमध्येही मूढतेचे अस्तित्व असतेच, तरीही 'मूळ्ह' हा स्वतंत्र शब्द केवळ आवेणिक (असाधारण/विशिष्ट) मोहाच्या वशाने वापरला आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'दोन मोमुह-चित्तोत्पादांच्या वशाने' असे म्हटले आहे. 'एवं' (अशा प्रकारे) म्हणजे अशा प्रकारे रागादी अकुशलांच्या प्राप्तीमुळे कुशल-भांडाचा (कुशल गुणांचा) छेद होत असल्यामुळे चित्त अरक्षित होते, आणि सर्वच मिथ्या-अभिनिवेश (चुकीचे आग्रह) यातच समाविष्ट व एकत्रित होतात, हे सांगण्यासाठी 'मिच्छादिट्ठि... इत्यादी... जाणावे' असे म्हटले आहे. 'सब्बेपि' (सर्वही) म्हणजे 'अरक्षित, मिथ्यादृष्टीने हत झालेले, थिनमिद्ध (स्त्यान-मृद्ध) ने अभिभूत झालेले' या तिन्ही पदांनी सांगितलेले धर्म होत. จกฺขุนาติ ทฺวาเรน. รูปนฺติ วิสภาควตฺถุสนฺนิสฺสิตํ รูปายตนํ. นิมิตฺตคฺคาหีติ ‘‘อิตฺถี’’ติ วา ปุริโส’’ติ วา ‘‘สุภ’’นฺติ วา ‘‘อสุภ’’นฺติ วา ปริกปฺปิตนิมิตฺตํ [Pg.88] คณฺหาติ, ตสฺส วา คหณสีโล. อนุพฺยญฺชนคฺคาหีติ หตฺถปาทหสิตกถิตาทิปฺปเภเท กิเลสานํ อนุ อนุ พฺยญฺชนโต อนุพฺยญฺชนสญฺญิเต อากาเร คณฺหาติ, เตสํ วา คหณสีโล. ยตฺวาธิกรณนฺติ ยํ นิมิตฺตํ, นิมิตฺตานุพฺยญฺชนคฺคหณนิมิตฺตนฺติ อตฺโถ. เอวํ ‘‘จกฺขุนฺทฺริยํ อสํวุตํ วิหรนฺต’’นฺติ, โย ‘‘นิมิตฺตคฺคาหี, อนุพฺยญฺชนคฺคาหี’’ติ จ วุตฺโต ปุคฺคโล, ตเมนํ จกฺขุนฺทฺริยํ จกฺขุทฺวารํ อสํวุตํ สติกวาเฏน อปิหิตํ กตฺวา วตฺตนฺตํ, ตสฺส จ รูปสฺส อิฏฺฐาการคฺคหเณ อภิชฺฌา, อนิฏฺฐาการคฺคหเณ โทมนสฺสํ, อสมเปกฺขเน โมโห มิจฺฉาภินิเวเส มิจฺฉาทิฏฺฐีติ เอวํ อภิชฺฌาพฺยาปาทา, อญฺเญ จ ลามกฏฺเฐน ปาปกา อโกสลฺลสมฺภูตฏฺเฐน อกุสลา ธมฺมา อนฺวาสฺสเวยฺยุํ อนุ อนุ ปวตฺเตยฺยุํ. 'चक्खुना' (डोळ्याने) म्हणजे द्वाराने. 'रूपं' म्हणजे विसभागात्मक (भिन्न) वस्तूवर आश्रित असलेले रूपायतन. 'निमित्तग्गाही' (निमित्त ग्रहण करणारा) म्हणजे 'स्त्री' किंवा 'पुरुष' किंवा 'शुभ' किंवा 'अशुभ' अशा कल्पित निमित्ताचे ग्रहण करतो, किंवा त्याचे ग्रहण करण्याचा स्वभाव असलेला. 'अनुब्यंजनग्गाही' (अनुव्यंजन ग्रहण करणारा) म्हणजे हात, पाय, हास्य, संभाषण इत्यादी भेदांमध्ये क्लेशांना अनुसरून प्रकट होणाऱ्या 'अनुव्यंजन' संज्ञक आकारांचे ग्रहण करतो, किंवा त्यांची ग्रहण करण्याची प्रवृत्ती असलेला. 'यत्वाधिकरणं' म्हणजे ज्या निमित्ताने, म्हणजेच निमित्त आणि अनुव्यंजन ग्रहण करण्याच्या कारणाने, असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे 'चक्खुन्द्रियं असंवुतं विहरन्तं' (चक्षुरिंद्रिय असंवृत ठेवून विहार करणाऱ्या), ज्याला 'निमित्तग्गाही, अनुब्यंजनग्गाही' असे म्हटले आहे, त्या व्यक्तीचे हे चक्षुरिंद्रिय किंवा चक्षुद्वार असंवृत म्हणजे स्मृतीच्या कवाडाने बंद न करता राहते; आणि त्या रूपाच्या इष्ट आकाराच्या ग्रहणात अभिज्झा (लोभ), अनिष्ट आकाराच्या ग्रहणात दोमनस्स (दौर्मनस्य/द्वेष), सम्यक् प्रकारे न पाहण्यात मोह, आणि मिथ्या अभिनिवेशात मिच्छादिट्ठि (मिथ्यादृष्टी) - अशा प्रकारे अभिज्झा, व्यापाद आणि इतर हलक्या दर्जाचे असल्यामुळे पापक (पापमय) व अकुशलतेतून उत्पन्न झाल्यामुळे अकुशल असलेले धर्म अनुसरून पाझरू लागतात (प्रवृत्त होतात). ตสฺส สํวราย น ปฏิปชฺชตีติ ตสฺส จกฺขุทฺวารสฺส สํวราย สติกวาเฏน ปิทหนตฺถํ น ปฏิปชฺชติ. สา ปน อปฺปฏิปตฺติ จกฺขุนฺทฺริยสฺส อนารกฺขาสํวรสฺส อนุปฺปาโทติ ทสฺเสนฺโต ‘‘น รกฺขติ…เป… อาปชฺชตี’’ติ อาห. ชวเน อุปฺปชฺชมาโนปิ หิ อสํวโร เตน ทฺวาเรน ปวตฺตนโต ‘‘จกฺขุนฺทฺริยาสํวโร’’ตฺเวว วุจฺจตีติ. เสสทฺวาเรสุปิ วุตฺตนเยเนว อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ‘‘ปุพฺพนฺตกปฺปนวเสน จา’’ติอาทินา สงฺเขปโต วุตฺตมตฺถํ วิตฺถารโต ทสฺเสนฺโต ‘‘สงฺเขปโต จ วิตฺถาโร อญฺโญ’’ติ กตฺวา ตํ สมุจฺจินนฺโต ‘‘ยา จ โข อิมา’’ติอาทิมาห. 'तस्स संवराय न पटिपज्जति' (त्याच्या संवरासाठी प्रतिपन्न होत नाही) म्हणजे त्या चक्षुद्वाराच्या संवरासाठी, स्मृतीच्या कवाडाने ते बंद करण्यासाठी तो प्रतिपन्न होत नाही (प्रयत्न करत नाही). ती अप्रतिपत्ती (प्रयत्नाचा अभाव) म्हणजेच चक्षुरिंद्रियाचे अरक्षण आणि संवराचा अनुत्पाद (उत्पन्न न होणे) आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'रक्षण करत नाही... इत्यादी... प्राप्त होतो' असे म्हटले आहे. कारण जवनात (जवन चित्तात) उत्पन्न होणारा असंवर देखील त्या द्वाराने प्रवृत्त होत असल्यामुळे त्याला 'चक्खुन्द्रियासंवर' (चक्षुरिंद्रिय-असंवर) असेच म्हटले जाते. इतर द्वारांच्या बाबतीतही याच पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. 'पुब्बन्तकप्पनवसेन च' (पूर्व कल्पनेच्या वशाने) इत्यादींद्वारे संक्षेपाने सांगितलेला अर्थ विस्ताराने दर्शवण्यासाठी 'संक्षेपाने आणि विस्ताराने दुसरा' असे करून, त्याचा संग्रह करत 'या ज्या खरोखर' इत्यादी म्हटले आहे. ยถาวุตฺตา อกุสลา ธมฺมาติ ทฺวาทส อกุสลจิตฺตุปฺปาทธมฺมา, เตสํ วตฺถูนิ วา. เต หิ สมุทยวชฺชา ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา. ‘‘เอว’’นฺติ อิมินา เนตฺติปาฬิยํ, อฏฺฐกถายญฺจ นิทฺธาริตปฺปกาเรน. อิธาติ อิมิสฺสํ ‘‘อรกฺขิเตน จิตฺเตนา’’ติ คาถายํ. 'यथावृत्त अकुशल धर्म' म्हणजे बारा अकुशल चित्तोत्पाद धर्म किंवा त्यांचे विषय (वस्तू) होत. कारण ते समुदय वगळता पाच उपादानस्कंध आहेत. 'एवं' (अशा प्रकारे) या शब्दाने नेत्तिपाळीमध्ये आणि अट्ठकथेमध्ये निर्धारित केलेल्या प्रकारे. 'इध' (येथे) म्हणजे या 'अरक्खितेन चित्तेन' (अरक्षित चित्ताने) या गाथेत. ยทิปิ เทสนาหารสมฺปาตปาฬิยํ ‘‘ตสฺมา รกฺขิตจิตฺตสฺสา’’ติ คาถา สรูปโต น คหิตา, อตฺถโต ปน ‘‘เตสํ ภควา ปริญฺญายา’’ติอาทินา คหิตา เอวาติ ตสฺสา คหิตภาวํ วิภาเวตุํ ‘‘กถํ เทเสตี’’ติ ปุจฺฉิตฺวา ‘‘ตสฺมา รกฺขิตจิตฺตสฺสา’’ติ คาถํ อุทฺธริ. जरी देसनाहारसंपातपाळीमध्ये 'तस्मा रक्खितचित्तस्स' (म्हणून रक्षित चित्त असलेल्याचे) ही गाथा प्रत्यक्ष रूपाने घेतलेली नाही, तरी अर्थाच्या दृष्टीने 'ते भगवंतांनी परिपूर्णपणे जाणून' इत्यादींद्वारे ती घेतलेलीच आहे, म्हणून तिचा घेतलेला भाव स्पष्ट करण्यासाठी 'कशी देशना करतात?' असा प्रश्न विचारून 'तस्मा रक्खितचित्तस्स' ही गाथा उद्धृत केली आहे. โยนิโสมนสิกาเรน กมฺมํ กโรนฺโตติ ‘‘โส ‘อิทํ ทุกฺข’นฺติ โยนิโส มนสิ กโรตี’’ติอาทินา นเยน วิปสฺสนาสงฺขาเตน โยนิโสมนสิกาเรน ภาวนากมฺมํ กโรนฺโต, ภาเวนฺโตติ อตฺโถ[Pg.89]. ยถาภูตญาณนฺติ ญาตปริญฺญาย ปุพฺพภาควิปสฺสนาย ‘‘อวิชฺชาสมุทยา รูปสมุทโย, อวิชฺชานิโรธา รูปนิโรโธ’’ติอาทินา (ปฏิ. ม. ๑.๕๐) สมปญฺญาสาย อากาเรหิ. นิรยคติยํ ทุกฺขทุกฺขตา, สุคติวิเสเส พฺรหฺมโลเกกเทเส สงฺขารทุกฺขตา, อิตรตฺถ ทฺเว ติสฺโสปีติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ยถาสมฺภวํ ติวิธทุกฺขตาโยเคนา’’ติ. 'योनिसोमनसिकारेन कम्मं करोन्तो' (योनिशोमनसिकाराने कर्म करणारा) म्हणजे 'तो हे दुःख आहे असे योनिशोमनसिकार करतो' इत्यादी पद्धतीने विपश्यना संज्ञक योनिशोमनसिकाराने भावना-कर्म करणारा, म्हणजेच भावना करणारा असा अर्थ आहे. 'यथाभूतज्ञान' म्हणजे ज्ञातपरिज्ञेच्या पूर्वभाग-विपश्यनेद्वारे 'अविद्येच्या समुदयाने रूपाचा समुदय होतो, अविद्येच्या निरोधाने रूपाचा nirodho होतो' इत्यादी (पटिसंभिदामग्ग १.५०) पन्नास प्रकारांनी होणारे ज्ञान. निरयगतीमध्ये (नरकात) दुःखदुःखता असते, सुगती विशेषामध्ये म्हणजेच ब्रह्मलोकाच्या एका भागात संस्कारदुःखता असते, आणि इतर ठिकाणी दोन्ही किंवा तिन्ही असतात, हे दर्शवण्यासाठी 'यथासंभव त्रिविध दुःखतेच्या योगाने' असे म्हटले आहे. เทสนาหารสมฺปาตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. देसनाहारसंपातवर्णन समाप्त झाले. ๒. วิจยหารสมฺปาตวณฺณนา २. विचयहारसंपातवर्णन ๕๓. กุสลธมฺมารมฺมณาติ กุสลธมฺเม อุทฺทิสฺส ปวตฺติมตฺตํ สนฺธาย วุตฺตํ, น เตสํ อารมฺมณปจฺจยตํ อิธ ‘‘กุสลา ธมฺมา’’ติ โลกุตฺตรธมฺมานํ อธิปฺเปตตฺตา. น หิ กทาจิ อนุปาทานิยา ธมฺมา อุปาทานารมฺมณา โหนฺติ. ผลธมฺเม อุทฺทิสฺส ปวตฺตาย ตณฺหาย คหิตตฺตา ‘‘กุสล…เป… ทฏฺฐพฺโพ’’ติ วุตฺตํ. เทสนาหาเรติ เทสนาหารสมฺปาเต. กถํ ปน กุสลภาโวติ ‘‘กุสลา’’ติ วจนมตฺตํ คเหตฺวา โจเทติ, ตญฺจ นิทสฺสนมตฺตํ ทฏฺฐพฺพํ, ปหานเหตุภาโวปิสฺสา สิยา โจทเกน สมฺปฏิจฺฉิโตว. ‘‘มาโนปิ ทุวิโธ’’ติอาทินา มานสฺส จ ตสฺสา ตณฺหาย จ เสวิตพฺพภาโว อกุสลานํ ปหานาย, กุสลานํ อุปฺปตฺติยา จ ปจฺจยภาวโต. ५३. 'कुसलधम्मारम्मणा' (कुशलधम्म-आरम्मण) म्हणजे कुशल धम्मांना उद्देशून केवळ प्रवृत्तीच्या संदर्भात म्हटले आहे, त्यांच्या आरम्मणप्रत्ययतेच्या (आलंबन प्रत्यय) संदर्भात नाही; कारण येथे 'कुसला धम्मा' (कुशल धम्म) याने लोकोत्तर धम्म अभिप्रेत आहेत. कारण अनुपादानिय (उपादान न होणारे) धम्म कधीही उपादानाचे आरम्मण (आलंबन) होत नाहीत. फलधम्मांना उद्देशून प्रवृत्त होणाऱ्या तण्हेने (तृष्णेने) ग्रहण केल्यामुळे "कुशल...पे... पाहावे" असे म्हटले आहे. 'देसनाहारे' म्हणजे देसनाहार संपातात (उपदेशाच्या पद्धतीत). "पण कुशलभाव कसा?" असे केवळ 'कुसला' या शब्दाला धरून आक्षेप घेतला जातो, आणि तो केवळ निदर्शन (उदाहरण) म्हणून पाहावा. प्रहाणाचा (त्यागाचा) हेतू असणे हे देखील आक्षेप घेणाऱ्याने स्वीकारलेलेच असावे. "मान देखील द्विविध आहे" इत्यादीद्वारे मानाचा आणि त्या तण्हेचा (तृष्णेचा) सेवन करण्याचा भाव हा अकुशलांच्या प्रहाणासाठी आणि कुशलांच्या उत्पत्तीसाठी प्रत्यय (कारण) असल्यामुळे आहे. เนกฺขมฺมสฺสิตํ โทมนสฺสํ นาม ‘‘อริยภูมึ ปาปุณิตุํ นาสกฺขิ’’นฺติ อนุโสจโต อุปฺปนฺนํ โทมนสฺสนฺติ สมฺพนฺโธ. เอวนฺติ อิมินา ปาฬิยํ วุตฺตปฺปกาเรน, ปิหํ อุปฏฺฐเปตฺวา ฉสุ ทฺวาเรสุ อิฏฺฐารมฺมเณ อาปาถคเต อนิจฺจาทิวเสน วิปสฺสนํ ปฏฺฐเปตฺวาติ โยชนา. อิฏฺฐารมฺมณญฺเจตฺถ ยถาวุตฺตอนุโสจนโทมนสฺสุปฺปตฺตีนํ ยถาภินิวิฏฺฐสฺส อารมฺมณสฺส อนิฏฺฐตายาติ ทสฺสนตฺถํ. ‘‘กถํ เนกฺขมฺมวเสนา’’ติ ปทสฺส อตฺถํ วิวริตุํ ‘‘วิปสฺสนาวเสนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. วิปสฺสนาทิวินิมุตฺตา วา ปฐมชฺฌานาทิวเสน วุตฺตา กุสลา ธมฺมา อิธ เนกฺขมฺมํ. อนุสฺสติคฺคหเณน อุปจารชฺฌานเมว คหิตนฺติ ‘‘ปฐมชฺฌานาทิวเสนา’’ติ วุตฺตํ. อาทิสทฺเทน ทุติยชฺฌานโต ปฏฺฐาย ยาว อคฺคผลา อุปริวิเสสา สงฺคหิตา. ยาย ปญฺญาวิมุตฺติยา. 'नेक्खम्मस्सितं दोमनस्सं' (नैष्क्रम्य-आश्रित दौर्मनस्य) म्हणजे "मी आर्यभूमी प्राप्त करू शकलो नाही" अशा अनुशोचनामुळे (शोकामुळे) उत्पन्न झालेले दौर्मनस्य, असा संबंध आहे. 'एवं' (अशा प्रकारे) याने पाळीमध्ये सांगितलेल्या प्रकारे, इच्छा (पिहा) प्रस्थापित करून, सहा द्वारांमध्ये इष्ट आरम्मण (आलंबन) समोर आले असता अनित्यता इत्यादीद्वारे विपस्सना (विपश्यना) प्रस्थापित करावी, अशी योजना आहे. आणि येथे इष्ट आरम्मण हे वर सांगितलेल्या अनुशोचन-दौर्मनस्याच्या उत्पत्तीसाठी, जसे अभिनिविष्ट (दृढपणे ग्रहण केलेले) आरम्मण आहे त्याच्या अनिष्टतेचे दर्शन घडवण्यासाठी आहे. "नेक्खम्म (नैष्क्रम्य) वशाने कसे?" या पदाचा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी "विपस्सना वशाने" इत्यादी म्हटले आहे. विपस्सना इत्यादींपासून विमुक्त किंवा प्रथमज्झान (प्रथम ध्यान) इत्यादींच्या वशाने सांगितलेले कुशल धम्म येथे 'नेक्खम्म' (नैष्क्रम्य) आहेत. अनुस्सती (अनुस्मृती) ग्रहण केल्याने उपचारज्झान (उपचार ध्यान) च ग्रहण केले आहे, म्हणून "प्रथमज्झान इत्यादींच्या वशाने" असे म्हटले आहे. 'आदि' शब्दाने द्वितीयज्झान (द्वितीय ध्यान) पासून सुरू करून अग्रफलापर्यंतच्या (अर्हत्त्वापर्यंतच्या) वरील विशेषांचा संग्रह केला आहे. ज्या पञ्ञाविमुत्तीने (प्रज्ञाविमुक्तीने). อุเปกฺขาสติปาริสุทฺธิภาเวนาติ [Pg.90] อุเปกฺขาชนิตสติปาริสุทฺธิสพฺภาเวน. กมฺมโยคฺคนฺติ วิปสฺสนาภาวนาทิกมฺมสฺส โยคฺคํ อนุรูปํ อนุจฺฉวิกํ. อสฺสทฺธิเยติ อสฺสทฺธิยเหตุ, ‘‘อสฺสทฺธิเยนา’’ติปิ ปฐนฺติ, โส เอวตฺโถ. โอภาสคตนฺติ ญาโณภาสคตํ. กามํ ปุพฺเพปิ ปญฺญา วุตฺตา, อสฺสทฺธิยาทีหิ ปน อญฺเญสํ กิเลสานํ วิธมนมฺปิ ปญฺญาย เอว โหติ, สา จ เอวํภูตาติ ทสฺสนตฺถํ ‘‘โอภาสคตํ กิเลสนฺธกาเร น อิญฺชตี’’ติ วุตฺตํ. 'उपेक्खासतिपारिसुद्धिभावेन' (उपेक्षा-स्मृती-पारिशुद्धी भावाने) म्हणजे उपेक्षेमुळे निर्माण झालेल्या स्मृतीच्या पारिशुद्धीच्या अस्तित्वाने. 'कम्मयोग्गं' (कर्मयोग्य) म्हणजे विपस्सना-भावना (विपश्यना भावना) इत्यादी कर्मासाठी योग्य, अनुरूप आणि अनुकूल. 'अस्सद्धिये' म्हणजे अश्रद्धेच्या हेतूने, काही ठिकाणी "अस्सद्धियेन" (अश्रद्धेने) असाही पाठ आहे, त्याचाही अर्थ तोच आहे. 'ओभासगतं' म्हणजे ज्ञान-ओभासगत (ज्ञानाच्या प्रकाशात गेलेले). जरी पूर्वी प्रज्ञा (पञ्ञा) सांगितली असली, तरी अश्रद्धा इत्यादी इतर किलेसांचे (क्लेशांचे) विध्वंसन देखील प्रज्ञेनेच होते, आणि ती प्रज्ञा अशी आहे हे दर्शवण्यासाठी "ओभासगत (प्रकाशमान) प्रज्ञा क्लेशांच्या अंधकारात डळमळीत होत नाही" असे म्हटले आहे. โกโป โกโธ. อปฺปจฺจโย โทมนสฺสํ. อิทฺธิวิธญาณาทิกา ฉ อภิญฺญา ปากฏา เอวาติ ‘‘ทฺเว จ วิเสเส’’ติ วุตฺตธมฺเม ทสฺเสตุํ ‘‘มโนมยิทฺธิ, วิปสฺสนาญาณญฺจา’’ติ อาห. องฺคณานิ ราคาทโย. อุปกฺกิเลสา อภิชฺฌาวิสมโลภาทโย. อนุโลมนํ ตเทกฏฺฐตา. ผนฺทนา ทุพฺพลา วิกฺเขปปฺปวตฺติ. พลวตี อนวฏฺฐานํ. สพฺโพ มิจฺฉาภินิเวโส อโยนิโสมนสิกาเรน โหติ, มิจฺฉาวิตกฺเกน จ. ตตฺถ อโยนิโสมนสิกาโร อกุสลจิตฺตุปฺปาโท ตปฺปริยาปนฺโน มิจฺฉาวิตกฺโก วิกฺเขปสหิโต เอวาติ วุตฺตํ ‘‘มิจฺฉาภินิเวสเหตุตาย ทิฏฺฐิปกฺโข’’ติ วุตฺตญฺเหตํ ‘‘วิตกฺโกปิ ทิฏฺฐิฏฺฐานํ, อโยนิโส มนสิกาโรปิ ทิฏฺฐิฏฺฐาน’’นฺติ (ปฏิ. ม. ๑.๑๒๔). 'कोपो' म्हणजे क्रोध. 'अप्पच्चयो' म्हणजे दौर्मनस्य (नाराजी). इद्धिविधज्ञान (ऋद्धिविध ज्ञान) इत्यादी सहा अभिञ्ञा (अभिज्ञा) प्रसिद्धच आहेत, म्हणून "दोन विशेष" या सांगितलेल्या धम्मांना दर्शवण्यासाठी "मनोमय इद्धि (मनोमय ऋद्धी) आणि विपस्सनाज्ञान" असे म्हटले आहे. 'अंगणानी' म्हणजे रागादी (दोष/मळ). 'उपक किलेसा' (उपक्किलेस) म्हणजे अभिध्या (लोभ), विषमलोभ इत्यादी. 'अनुलोमनं' म्हणजे त्याच्याशी एकरूपता. 'फंदना' (कंपन) म्हणजे दुर्बळ विक्षेप-प्रवृत्ती. 'बलवती' म्हणजे अनवस्थान (अस्थिरता). सर्व मिच्छाभिनिवेस (मिथ्या अभिनिवेश) हा अयोनिसोमनसिकार (अयोनिशः मनस्कार) आणि मिच्छाvitakkena (मिथ्या वितर्क) यामुळे होतो. तेथे अयोनिसोमनसिकार हा अकुशल चित्तोत्पाद आहे, आणि त्यात समाविष्ट असलेला मिच्छावितक्क हा विक्षेपयुक्तच असतो, म्हणूनच "मिथ्या अभिनिवेशाचा हेतू असल्यामुळे तो दीठ्ठिपक्ख (दृष्टीपक्ष) आहे" असे म्हटले आहे. कारण असे म्हटले आहे की - "वितर्क देखील दृष्टीचे स्थान आहे, आणि अयोनिसोमनसिकार देखील दृष्टीचे स्थान आहे" (पटिसंभिदामग्ग १.१२४). อถ วา อิญฺชนาติ ผนฺทนา, ทิฏฺฐปริตฺตาโส. ยถาห ‘‘ตทปิ เตสํ ภวตํ สมณพฺราหฺมณานํ อชานตํ อปสฺสตํ เวทยิตํ ตณฺหาคตานํ ปริตสฺสิตวิปฺผนฺทิตเมวา’’ติ (ที. นิ. ๑.๑๐๕ อาทโย). อฏฺฐิตีติ อนวฏฺฐานํ, ทิฏฺฐิวิตกฺโก. เตน หิ ปุถุชฺชโน กาเล สสฺสตํ, กาเล อุจฺเฉทนฺติ ตํ ตํ ทิฏฺฐิคฺคหณํ ปกฺขนฺทนฺโต สตฺตโต ปริพฺภฏฺฐอนฺโธ วิย, สมุทฺเท วิสฺสฏฺฐวาหนิกา วิย, ยนฺเต ยุตฺตโคโณ วิย จ ตถา ตถา ปริพฺภมติ. เตนาห ‘‘ทิฏฺฐิโยปิ ทิฏฺฐิฏฺฐานํ, วิตกฺโกปิ ทิฏฺฐิฏฺฐาน’’นฺติ (ปฏิ. ม. ๑.๑๒๔) จ. เอตสฺมิญฺจ ปกฺเข มิจฺฉาภินิเวสตาย, มิจฺฉาภินิเวสเหตุตาย จ ตสฺสา ทฺเว ปกฺขาติ เอกเทสสรูเปกเสโส กโตติ เวทิตพฺพํ. अथवा 'इंजना' (कंपन/चंचलता) म्हणजे फंदना (थरथराट), दृष्टीचा त्रास (दीठ्ठिपरित्तास). जसे म्हटले आहे - "ते देखील त्या पूजनीय श्रमण-ब्राह्मणांचे, जे जाणत नाहीत, पाहत नाहीत, त्यांचे वेदयित (अनुभव) आहे, जे तण्हागत (तृष्णेच्या आहारी गेलेले) आहेत, त्यांचे ते केवळ परितास (भय) आणि विप्फंदित (थरथराट) आहे" (दीघनिकाय १.१०५ इत्यादी). 'अट्ठिती' म्हणजे अनवस्थान (अस्थिरता), दृष्टीचा वितर्क (दीठ्ठिवितक्क). कारण त्यामुळे पुथुज्जन (पृथग्जन/सामान्य माणूस) कधी 'सस्सत' (शाश्वत), तर कधी 'उच्छेद' (उच्छेदवाद) अशा त्या त्या दृष्टीचे ग्रहण करून, मार्गावरून भरकटलेल्या अंधाप्रमाणे, समुद्रात सोडलेल्या जहाजाप्रमाणे आणि घाण्याला जुंपलेल्या बैलाप्रमाणे तसा तसा भटकत राहतो. म्हणूनच म्हटले आहे - "दृष्टी देखील दृष्टीचे स्थान आहे, आणि वितर्क देखील दृष्टीचे स्थान आहे" (पटिसंभिदामग्ग १.१२४). आणि या पक्षात, मिथ्या अभिनिवेश असल्यामुळे आणि मिथ्या अभिनिवेशाचा हेतू असल्यामुळे त्याचे दोन पक्ष आहेत, असा एकदेशसरूपैकशेष केला आहे, असे जाणावे. ‘‘เอว’’นฺติอาทินา ‘‘โส อุปริม’’นฺติอาทิปาฬิยํ สมฺพนฺธํ ทสฺเสติ. ปฏิฆสญฺญาติ ภุมฺมตฺเถ ปจฺจตฺตวจนนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปฏิฆ…เป… สญฺญาสู’’ติ อาห. รูปาวจรสญฺญาติ สญฺญาสีเสน รูปาวจรชฺฌานานิ วทติ. นานตฺตสญฺญาติ [Pg.91] นานาสภาวา, นานาสภาเว วา อารมฺมเณ สญฺญา. ฐเปตฺวา ปฏิฆสญฺญา อวสิฏฺฐกามาวจรสญฺญา เหตา. ตา สมติกฺกมตีติ ตา รูปสญฺญานานตฺตสญฺญาโย อารมฺมเณหิ สทฺธึ สมฺมเทว อติกฺกมติ. "एवं" इत्यादींद्वारे "तो वरील" इत्यादी पाळीमधील संबंध दर्शवतो. 'पटिघसञ्ञा' (प्रतिघसंज्ञा) हे सप्तमी विभक्तीच्या अर्थात प्रथमा विभक्तीचे वचन आहे, हे दर्शवण्यासाठी "पटिघ...पे... सञ्ञासू" (प्रतिघसंज्ञांमध्ये) असे म्हटले आहे. 'रूपावचरसञ्ञा' (रूपावचर संज्ञा) याने संज्ञेच्या मुख्यतेने रूपावचर ध्यान (रूपावचरज्झान) सांगितले आहे. 'नानत्तसञ्ञा' (नानात्व संज्ञा) म्हणजे नाना स्वभाव असणारी, किंवा नाना स्वभावाच्या आरम्मणावर (आलंबनावर) असणारी संज्ञा. प्रतिघसंज्ञा वगळता उरलेल्या या कामावचर संज्ञा आहेत. "त्यांचे समतिक्रमण करतो" म्हणजे त्या रूपसंज्ञा आणि नानात्वसंज्ञा यांचे आरम्मणांसह चांगल्या प्रकारे अतिक्रमण करतो. รูปาวจรชฺฌาโนภาโสปิ กสิณารมฺมณา. กสิณนิสฺสนฺโท หิ อารุปฺปชฺฌานุปฺปตฺติ. ทสฺสนนฺติ กสิณรูปานํ ทสฺสนํ. อภิชฺฌาพฺยาปาทปฺปหาเนน สทฺธึ วีริยารมฺโภ อุปการโก สมโถ สติปสฺสทฺธิโย ปริกฺขารงฺคตา วุตฺตา เอว. สติรหิตํ สมฺมสนํ นาม นตฺถีติ ‘‘ยา อุปฏฺฐิตา สติ อสมฺมุฏฺฐา, อยํ วิปสฺสนา’’ติ วุตฺตํ. เตน สติสีเสน วิปสฺสนา คหิตาติ ทสฺเสติ. สมฺโมสานํ ปหานมาหาติ สมฺพนฺโธ. रूपावचर ध्यानाचा ओभास (प्रकाश) देखील कसिण-आरम्मणातून (कृत्स्न-आलंबनातून) होतो. कारण कसिणाचा निस्यंद (परिणाम) हाच आरुप्पज्झान (आरूप्य ध्यान) ची उत्पत्ती आहे. 'दस्सनं' म्हणजे कसिण-रूपांचे दर्शन. अभिध्या (लोभ) आणि व्यापाद (द्वेष) यांच्या प्रहाणासोबत वीर्यारंभ (प्रयत्न), उपकारक समथ (शमथ), स्मृती आणि पस्सद्धि (प्रश्रब्धी) हे परिकार अंग (साधने) म्हणून सांगितलेच आहेत. स्मृतीशिवाय संमसन (परीक्षण) नसते, म्हणून "जी उपस्थित स्मृती आहे, जी असंमुष्ट (न विसरलेली) आहे, ती विपस्सना आहे" असे म्हटले आहे. त्याद्वारे स्मृतीच्या मुख्यतेने विपस्सना ग्रहण केली आहे, हे दर्शवतो. "संमोसाचे (भ्रमाचे) प्रहाण सांगतो" असा संबंध आहे. ๕๔. ปจฺจุปฺปนฺนสุขอายติสุขวิปากกิริยนิรามิสอกาปุริสเสวิตภาเวหิ เอว เสสา ปาฬิยํ เอตสฺส สมาธิสฺส สนฺตปณีตตาทิวิเสสา วุตฺตา, เตปิ อิธ สงฺคหิตาติ เตสํ ปทานํ อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘องฺคสนฺตตายา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ องฺคสนฺตตายาติ ผลฌานงฺคานํ อุปสนฺตตาย. กิเลสทรถสนฺตตายาติ กิเลสทรถปฏิปฺปสฺสทฺธิยา. ปณีโตติ อุฬาโร. เอโกทิภาเวนาติ มคฺคสมาธิสงฺขาเตน เอโกทิภาเวน. เอโกทิภาวนฺติ สมาธานํ. โลกิยสมาธิสฺส ปจฺจนีกนีวรณปฐมชฺฌานนิกนฺติอาทีนิ นิคฺคเหตพฺพานิ, อญฺเญ จ กิเลสา วาเรตพฺพา. อิมสฺส ปน อรหตฺตสมาธิสฺส ปฏิปฺปสฺสทฺธกิเลสตฺตา น นิคฺคเหตพฺพํ, วาเรตพฺพญฺจ อตฺถีติ โส มคฺคานนฺตรํ สมาปตฺติกฺขเณว อปฺปโยเคเนว อธิคตตฺตา, ฐิตตฺตา จ อปริหานิวเสน วา อธิคตตฺตา นสสงฺขารนิคฺคยฺหวาริตคโต. ५४. प्रत्युत्पन्न सुख (वर्तमान सुख), आयति सुख (भविष्यातील सुख), विपाक, क्रिया, निरामिश आणि अकापुरुषसेवित (उत्तम पुरुषांद्वारे सेवित) भावांद्वारेच पाळीमध्ये या समाधीचे उर्वरित शांत-प्रणीतत्व इत्यादी विशेष सांगितले आहेत, ते देखील येथे संग्रहित आहेत, हे त्या पदांचा अर्थ दर्शवण्यासाठी "अंगसंतताय" इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'अंगसंतताय' म्हणजे फलध्यानाच्या अंगांच्या शांततेमुळे. 'किलेसदरथसंतताय' म्हणजे क्लेश आणि दराथ (थकवा/त्रास) यांच्या प्रतिप्रश्रब्धीमुळे (शांत होण्यामुळे). 'पणीतो' म्हणजे उदार (उत्कृष्ट). 'एकोदिभावेन' म्हणजे मार्गसमाधी नावाच्या एकोदिभावाने. 'एकोदिभाव' म्हणजे समाधान (चित्ताची एकाग्रता). लौकिक समाधीमध्ये विरोधी नीवरण, प्रथम ध्यान निकंती (आसक्ती) इत्यादींचे निग्रह करावे लागते, आणि इतर क्लेश रोखावे लागतात. परंतु, या अर्हत्त्व-समाधीमध्ये क्लेश शांत झालेले असल्यामुळे, निग्रह करण्याचे किंवा रोखण्याचे काही उरत नाही; कारण तो मार्गानंतर समापत्तीच्या क्षणीच अल्प प्रयत्नाने प्राप्त झाल्यामुळे, आणि स्थिर राहिल्यामुळे किंवा अपरिहाणीच्या (ऱ्हास न होण्याच्या) रूपाने प्राप्त झाल्यामुळे, तो ससंस्कार निग्रह आणि रोखण्याला प्राप्त होत नाही. ‘‘สติเวปุลฺลปฺปตฺโต’’ติ เอเตน อปฺปวตฺตมานายปิ สติยา สติพหุลตาย สโต เอว นามาติ ทสฺเสติ. ‘‘ยถาปริจฺฉินฺนกาลวเสนา’’ติ เอเตน ปริจฺฉินฺนสติยา สโตติ ทสฺเสติ. "सतिवेपुल्लापत्तो" (स्मृतीच्या विपुलतेला प्राप्त झालेला) याद्वारे स्मृती कार्यरत नसतानाही, स्मृतीच्या बहुलतेमुळे (विपुलतेमुळे) तो 'स्मृतिमान' (सतो) च आहे, असे दर्शविले जाते. "यथापरिच्छिन्नकालवसेन" (निश्चित केलेल्या वेळेनुसार) याद्वारे मर्यादित स्मृतीमुळे तो 'स्मृतिमान' आहे, असे दर्शविले जाते. วกฺขมาเนนาติ ‘‘ปีติผรณา’’ติอาทินา อนนฺตรํ วกฺขมาเนน. ‘‘ปีติผรณตา’’ติ ปน ปาฬิ อาคตา. ตํ ‘‘ปญฺจงฺคิโก สมฺมาสมาธี’’ติ (ที. นิ. ๓.๓๕๕) สมาธิองฺคภาเวน ปญฺญา อุทฺทิฏฺฐาติ กตฺวา วุตฺตํ. ตโต เอว อฏฺฐกถายํ ‘‘ปีติผรณตา’’ติอาทีนญฺจ อตฺถสํวณฺณนา กตา. ตตฺถ ‘‘โส อิมเมว กายํ [Pg.92] วิเวกเชน ปีติสุเขน อภิสนฺเทตี’’ติอาทินา (ที. นิ. ๑.๒๒๖) นเยน ปีติยา, สุขสฺส จ ผรณํ เวทิตพฺพํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. "वक्खमानेन" (पुढे सांगण्यात येणाऱ्याद्वारे) म्हणजे "पीतिफरणा" (प्रीति-स्फुरण) इत्यादींद्वारे त्यानंतर सांगण्यात येणाऱ्याद्वारे. पाळीमध्ये "पीतिफरणता" (प्रीति-स्फुरणता) असा शब्द आला आहे. ते "पंचङ्गिको सम्मासमाधि" (पाच अंगांचा सम्यक समाधी) यामध्ये समाधीचे अंग म्हणून प्रज्ञा दर्शविली आहे, असे मानून म्हटले आहे. म्हणूनच अट्ठकथेत "पीतिफरणता" इत्यादींच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण केले आहे. तेथे "तो याच शरीराला विवेकजन्य प्रीति-सुखाने न्हाऊ घालतो (व्याप्त करतो)" इत्यादी पद्धतीने प्रीतीचे आणि सुखाचे स्फुरण (पसरणे) जाणून घ्यावे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. สมาธิวเสน สมโถ อุทฺธโฏติ สภาววเสน สมโถ อุทฺธโฏ, น อุปการกธมฺมวเสนาติ อธิปฺปาโย. "समाधीच्या रूपाने शमथ उद्धृत केला आहे" म्हणजे स्वभावाच्या रूपाने शमथ उद्धृत केला आहे, उपकारक धर्माच्या रूपाने नाही, असा अभिप्राय आहे. ๕๕. ราคปฏิปกฺขตฺตา สมาธิสฺส ‘‘อธิจิตฺตสิกฺขาย สิกฺขนฺโต’’ติ วุตฺตํ. วุตฺตนยานุสาเรนาติ ‘‘สุขปณิธิอาทิสมุคฺฆาฏเนน อปฺปณิหิโต’’ติอาทินา. เอตฺถ จ สงฺขารานํ ขณภงฺคุรตํ สมฺมเทว ปสฺสนฺตสฺส น ราโค ปติฏฺฐํ ลภตีติ อนิจฺจานุปสฺสนา ราคจริตสฺส สปฺปายา วุตฺตา, ตถา สงฺขารานํ สภาวทุกฺขตํ สมฺมเทว ปสฺสนฺตสฺส ปกติยาปิ ทุกฺขิเตสุ ทุกฺขุปฺปาทนํ วเณ ขาโรทกเสกสทิสนฺติ น โทโส ปติฏฺฐํ ลภตีติ ทุกฺขานุปสฺสนา โทสจริตสฺส สปฺปายา วุตฺตา, ตถา สงฺขาเรสุ สมฺมเทว ฆนวินิพฺโภเค กเต อตฺตสุญฺญตาย อุปฏฺฐหมานาย น โมโห ปติฏฺฐํ ลภตีติ อนตฺตานุปสฺสนา โมหจริตสฺส สปฺปายา วุตฺตาติ เวทิตพฺพํ. ราคปฏิปกฺขตฺตา สมาธิสฺส ‘‘อธิจิตฺตสิกฺขาย สิกฺขนฺโต’’ติ วุตฺตํ. เอส นโย อิตเรสุ. เสสเมตฺถ สุวิญฺเญยฺยํ. ५५. रागाचा प्रतिपक्ष (विरोधी) असल्यामुळे समाधीला "अधिचित्तशिक्षेत शिकणारा" (अधिचित्तसिक्खाय सिक्खन्तो) असे म्हटले आहे. सांगितलेल्या पद्धतीनुसार म्हणजे "सुख-प्रणिधी इत्यादींच्या समूळ उच्चाटनाने अप्रणिहित" इत्यादींद्वारे. आणि येथे संस्कारांची क्षणभंगुरता सम्यक प्रकारे पाहणाऱ्याला राग स्थान मिळवू शकत नाही, म्हणून 'अनित्यानुपश्यना' ही रागचरित (रागाचा स्वभाव असलेल्या) व्यक्तीसाठी अनुकूल सांगितली आहे; तसेच संस्कारांची स्वभाव-दुःखता सम्यक प्रकारे पाहणाऱ्याला, आधीच दुःखी असलेल्यांमध्ये दुःख उत्पन्न करणे हे जखमेवर खारट पाणी शिंपडण्यासारखे वाटत असल्यामुळे द्वेष स्थान मिळवू शकत नाही, म्हणून 'दुःखानुपश्यना' ही द्वेषचरित व्यक्तीसाठी अनुकूल सांगितली आहे; तसेच संस्कारांमध्ये सम्यक प्रकारे घन-विनिर्भोग (संहत रूपाचे पृथक्करण) केल्यावर आत्म-शून्यता उपस्थित होत असल्यामुळे मोह स्थान मिळवू शकत नाही, म्हणून 'अनात्मानुपश्यना' ही मोहचरित व्यक्तीसाठी अनुकूल सांगितली आहे, असे जाणून घ्यावे. रागाचा प्रतिपक्ष असल्यामुळे समाधीला "अधिचित्तशिक्षेत शिकणारा" म्हटले आहे. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो. येथील उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. ขนฺติพหุโล อุปฺปนฺนํ อรตึ อนภิรตึ อภิภุยฺย วิหรนฺโต สุเขน สมาธึ อธิคจฺฉตีติ ขนฺติปฺปธานตาปิ สมถปกฺขภชนสฺส การณํ วุตฺตา. อุฏฺฐานํ สมฺปชฺชตีติ สมฺปนฺนกายิกวีริยํ. สมฺมากมฺมนฺตวายามานํ โย กายิกาทิวิกปฺโป วุตฺโต ปาฬิยํ, โส เนสํ กายิกสฺส ปโยคสฺส สมุฏฺฐานวเสน เวทิตพฺโพ. "सहनशीलता बहुल असलेला मनुष्य उत्पन्न झालेल्या अरती (असंतोष) आणि अनभिरती (अनासक्ती) यांवर मात करून विहार करत असताना सुखाने समाधी प्राप्त करतो", म्हणून सहनशीलता-प्रधानता सुद्धा शमथ पक्षाचे सेवन करण्याचे कारण म्हटले आहे. "उत्थान संपन्न होते" म्हणजे शारीरिक वीर्य (प्रयत्न) संपन्न असणे होय. सम्यक कर्मांत आणि सम्यक व्यायामाचा जो कायिक इत्यादी भेद पाळीमध्ये सांगितला आहे, तो त्यांच्या कायिक प्रयोगाच्या उत्पत्तीच्या (समुत्थान) रूपाने जाणून घ्यावा. ‘‘ขิปฺปาธิคโม’’ติ อิมินา มคฺคาเสวนภาวํ ทสฺเสติ. ‘‘วิปสฺสนาย วิมุตฺตาธิคโม’’ติ อิมินา วิปสฺสนานุภาเวน สมุจฺเฉทวิมุตฺติ วิกฺขมฺภนวิมุตฺติ วิย สมถานุภาเวนาติ ทสฺเสติ. โลกิเยหีติ นิสฺสกฺกวจนํ. มหนฺตานนฺติ อุฬารานํ, ปณีตานนฺติ อตฺโถ. "क्षिप्र-अधिगम" (जलद प्राप्ती) याद्वारे मार्गाच्या सेवनाचा भाव दर्शविला जातो. "विपश्यनेद्वारे विमुक्तीची प्राप्ती" याद्वारे विपश्यनेच्या प्रभावाने 'समुच्छेद-विमुक्ती' होते, जशी शमथाच्या प्रभावाने 'विक्खंभन-विमुक्ती' होते, असे दर्शविले जाते. "लोकीयेहि" (लौकिकांद्वारे) हे पंचमी विभक्तीचे (अपादान कारक) रूप आहे. "महंतानं" (महान लोकांचे) म्हणजे उदार (श्रेष्ठ) आणि प्रणीत (उत्तम) लोकांचे, असा अर्थ आहे. ๕๖. ตนฺติ วิจยหารํ. วิสํวาทนเหตูนํ โลภาทีนํ ปาปธมฺมานํ. โสเธนฺโตติ ยถา สรณาทิวิสยา อญฺญาณาทิสํกิเลสา น ปวตฺตนฺติ, เอวํ โสเธนฺโต. ปริปูเรนฺตาติ ยถา สีลํ อขณฺฑาทิภาเวน ปริปุณฺณํ โหติ อนูนํ, เอวํ ปริปูเรนฺตา. ५६. त्याला "विचयहार" म्हणतात. विसंवादाचे कारण असलेल्या लोभ इत्यादी पापधर्मांचे. "शोधन करणारा" म्हणजे ज्याप्रमाणे शरण इत्यादी विषयांचे अज्ञान इत्यादी संक्लेश प्रवृत्त होत नाहीत, त्याप्रमाणे शुद्ध करणारा. "परिपूर्ण करणारे" म्हणजे ज्याप्रमाणे शील अखंड इत्यादी भावाने परिपूर्ण आणि उणे न राहता (अखंडित) होते, त्याप्रमाणे परिपूर्ण करणारे. ‘‘ตถา [Pg.93] ปฏิปชฺชนฺโต’’ติ อิมินา สตฺถุ มหาปติการภาโว ปริปุณฺโณ ทสฺสิโตติ ปฐมวาเท ‘‘ทสฺสนาภูมิญฺจ ภาวนาภูมิญฺจา’’ติ วุตฺตํ. "त्याप्रमाणे आचरण करणारा" (तथा पटिपज्जन्तो) याद्वारे शास्त्यांचा (बुद्धांचा) महान उपकार-परतफेड भाव परिपूर्णपणे दर्शविला आहे, म्हणून पहिल्या कथनात "दर्शनभूमी आणि भावनाभूमी" असे म्हटले आहे. ยสฺส อตฺถายาติ ยสฺส ยสฺส ปหานตฺถาย. ตถา ปฏิปนฺนสฺสาติ ยถา อสุภชฺฌานาทึ ปาทกํ กตฺวา อนาคามิมคฺคาทิอธิคโม โหติ, ตถา ปฏิปนฺนสฺส. "ज्या अर्थासाठी" म्हणजे ज्या ज्या गोष्टीच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी). "त्याप्रमाणे आचरण करणाऱ्याचे" म्हणजे ज्याप्रमाणे अशुभ ध्यान इत्यादींना पाया बनवून अनागामी मार्ग इत्यादींची प्राप्ती होते, त्याप्रमाणे आचरण करणाऱ्याचे. วธิตนฺติ ฆาติตํ. "वधित" म्हणजे मारलेला (घातलेला). ‘‘มนุสฺสภูโต’’ติ อิทํ ปุพฺพาปราเปกฺขํ กตฺวา ‘‘ปิตา มนุสฺสภูโต ขีณาสโว’’ติ จ ตถา ‘‘มาตา มนุสฺสภูตา’’ติ โยเชตพฺพํ. เภทานุรูปสฺส สาวนํ อนุสฺสาวนํ, เภทานุรูเปน วา วจเนน วิญฺญาปนํ. "मनुष्य झालेला" (मनुस्सभूतो) हे पूर्वापार संदर्भ लक्षात घेऊन "पिता मनुष्य झालेला क्षीणासव (अर्हत) आहे" आणि तसेच "माता मनुष्य झालेली आहे" असे जोडावे. भेदाला अनुरूप अशा गोष्टीचे ऐकवणे (घोषित करणे) म्हणजे 'अनुश्रावण' होय, किंवा भेदाला अनुरूप अशा वचनाने विज्ञापित करणे (समजावून सांगणे) होय. ๕๗. มนุสฺสตฺตนฺติ มนุสฺสชาติตา. ลิงฺคสมฺปตฺตีติ ปุริสภาโว. เหตูติ มโนวจีปณิธานสิทฺธิยา สทฺธึ ปุพฺพเหตุสมฺปทา. สตฺถารทสฺสนนฺติ สตฺถุ สมฺมุขีภาโว. คุณสมฺปตฺตีติ อภิญฺญาสมาปตฺติลาโภ. อธิกาโรติ อตฺตโน สรีรนิรเปกฺขํ สตฺถุ อุปการกรณํ. ฉนฺทตาติ พุทฺธภาวาย ทฬฺหจฺฉนฺทตา อนิวตฺติธมฺมตา. ५७. "मनुष्यत्व" म्हणजे मनुष्य जात असणे. "लिंगसंपत्ती" म्हणजे पुरुषभाव असणे. "हेतू" म्हणजे मन आणि वाणीच्या प्रणिधानाच्या सिद्धीसह पूर्वहेतूची संपत्ती (पूर्वपुण्य). "शास्त्यांचे दर्शन" म्हणजे शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) सन्मुख असणे. "गुणसंपत्ती" म्हणजे अभिज्ञा आणि समापत्तीचा लाभ होय. "अधिकार" म्हणजे आपल्या शरीराची पर्वा न करता शास्त्यांची सेवा करणे. "छंदता" म्हणजे बुद्धत्वासाठी दृढ इच्छा असणे आणि मागे न हटण्याचा स्वभाव असणे. น อุปฺปชฺชนฺตีติ ปน อตฺถีติ ‘‘น เม อาจริโย อตฺถิ, สทิโส เม น วิชฺชตี’’ติอาทิ (ม. นิ. ๑.๒๘๕; ๒.๓๔๑; กถา. ๔๐๕; มหาว. ๑๑; มิ. ป. ๔.๕.๑๑) อิมิสฺสา โลกธาตุยา ฐตฺวา วทนฺเตน ภควตา ‘‘กึ ปนาวุโส สาริปุตฺต, อตฺเถตรหิ อญฺโญ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา ภควโต สมสโม สมฺโพธิยนฺติ เอวํ ปุฏฺโฐ อหํ, ภนฺเต, ‘โน’ติ วเทยฺย’’นฺติ (ที. นิ. ๓.๑๖๑) วตฺวา ตสฺส การณํ ทสฺเสตุํ ‘‘อฏฺฐานเมตํ อนวกาโส, ยํ เอกิสฺสา โลกธาตุยา ทฺเว อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา’’ติ (ที. นิ. ๓.๑๖๑; อ. นิ. ๑.๒๗๗) อิมํ สุตฺตํ ทสฺเสนฺเตน ธมฺมเสนาปตินาว พุทฺธเขตฺตภูตํ อิมํ โลกธาตุํ ฐเปตฺวา อญฺญตฺถ อนุปฺปตฺติ วุตฺตา โหตีติ อธิปฺปาโย. "उत्पन्न होत नाहीत" याचा अर्थ असा आहे की, "माझा कोणी आचार्य नाही, माझ्या समान कोणी अस्तित्वात नाही" इत्यादी या लोकधातूमध्ये राहून बोलणाऱ्या भगवंतांनी, "हे आवुसो सारिपुत्त, सध्या भगवंतांच्या समान संबोधी प्राप्त केलेला दुसरा कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण आहे का? असे विचारले असता, भन्ते, मी 'नाही' असे उत्तर देईन" असे म्हणून, त्याचे कारण दर्शवण्यासाठी "हे अशक्य आहे, असा कोणताही वाव नाही की एकाच लोकधातूमध्ये दोन अर्हत सम्यक संबुद्ध (एकाच वेळी उत्पन्न होतील)" हे सुत्त दर्शविणाऱ्या धम्मसेनापतींनीच (सारिपुत्तांनीच) बुद्धक्षेत्र असलेल्या या लोकधातूचा अपवाद वगळता इतरत्र अनुत्पत्ती सांगितली आहे, असा अभिप्राय आहे. เขตฺตปริคฺคโห กโต นาม โหติ ‘‘อิทํ พุทฺธเขตฺตํ นามา’’ติ. "याला 'बुद्धक्षेत्र' म्हणतात" असे म्हणून क्षेत्राचा स्वीकार (परिग्रह) केला जातो. เอวํ ฐานาฏฺฐานภาวํ คตาติ วุตฺตปฺปกาเรน ฐานภูตา, วุตฺตนเยน วา อญฺเญปิ ยถารหํ ฐานาฏฺฐานภาเวน ปวตฺตา. สตฺตปญฺญตฺติยา อุปาทานภูตาติ อินฺทฺริยพทฺเธ ขนฺเธ สนฺธาย วทติ. अशा प्रकारे "स्थान-अस्थान भावाला प्राप्त झालेले" म्हणजे सांगितलेल्या प्रकारे स्थानभूत झालेले, किंवा सांगितलेल्या पद्धतीने इतरही योग्यतेनुसार स्थान-अस्थान भावाने प्रवृत्त झालेले. "सत्त्व-प्रज्ञप्तीचे उपादानभूत असलेले" हे इंद्रियबद्ध स्कंधांना उद्देशून म्हटले आहे. ๕๘. ผลสฺส [Pg.94] ปจฺจกฺขการิตาติ ‘‘อิมสฺส กมฺมสฺส อิทํ ผล’’นฺติ ตํตํกมฺมผลาวโพโธ. อปฺปทานาภาโวติ ปจฺจยสมวาเย กมฺมสฺส เอกนฺตโต ผลุปฺปาทนํ. เตนาห ‘‘กตูปจิตาน’’นฺติ. ५८. "फलाचे प्रत्यक्ष करणे" म्हणजे "या कर्माचे हे फल आहे" असा त्या त्या कर्माच्या फलाचा बोध होणे. "फल न देण्याचा अभाव" (अप्पदानावभावो) म्हणजे कारणांच्या एकत्र येण्यात कर्माचे निश्चितपणे फल उत्पन्न करणे. म्हणूनच "कृत-उपचित कर्मांचे" (कतुपचितानं) असे म्हटले आहे. ๕๙. อชฺโฌสิตวตฺถุนาติ ตณฺหาภินิเวสวเสน อภินิวิฏฺฐวตฺถุนา. รูปภวอรูปภวาทินาติ ภวตณฺหา วิย สยํ ทสฺเสติ. ५९. "अध्यवसित वस्तूने" म्हणजे तृष्णा आणि अभिनिवेशाच्या वशतेने आसक्त झालेल्या वस्तूने. "रूपभव, अरूपभव" इत्यादींद्वारे भवतृष्णेप्रमाणे स्वतः दर्शविते. ขนฺธตฺตยวเสนาติ สีลาทิกฺขนฺธตฺตยวเสน. ปฏิปทาวิภาเคนาติ ‘‘สพฺพตฺถคามินี’’ติ อาทิปฏิปทาย เภเทน. "तीन स्कंधांच्या रूपाने" म्हणजे शील इत्यादी तीन स्कंधांच्या रूपाने. "प्रतिपदेच्या विभागाने" म्हणजे "सर्वत्रगामिनी" इत्यादी प्रतिपदेच्या भेदाने. ตตฺถตตฺถคามินีติ นิรยาทินิพฺพานนฺติ ทฺวีสุ คนฺธพฺพฏฺฐาเนสุ ตตฺถ ตตฺเถว คมนสีลา. สพฺพตฺถคามินีติ ยถาวุตฺเตสุ สพฺพฏฺฐาเนสุ จ คมนสีลา. "तत्र-तत्रगामिनी" (तेथे तेथे जाणारी) म्हणजे नरक इत्यादी आणि निर्वाण या दोन्ही गंतव्य स्थानांमध्ये तेथे तेथेच जाण्याचा स्वभाव असलेली. "सर्वत्रगामिनी" म्हणजे सांगितलेल्या सर्व स्थानांमध्ये जाण्याचा स्वभाव असलेली. สญฺชีโว กาฬสุตฺตํ สงฺฆาโต โรรุโว มหาโรรุโว ตาปโน มหาตาปโน อวีจีติ เอเต อฏฺฐ มหานิรยา. เอเกกสฺส จตฺตาริ จตฺตาริ ทฺวารานิ, เอเกกสฺมึ ทฺวาเร จตฺตาโร จตฺตาโร คูถนิรยาทโยติ เอวํ โสฬส อุสฺสทนิรเย วณฺเณนฺติ. संजीव, काळसुत्त, संघात, रोरुव, महारोरुव, तापन, महातापन आणि अवीची हे आठ महानिरय (महानरक) आहेत. प्रत्येकाला चार-चार द्वारे आहेत आणि प्रत्येक द्वारावर चार-चार गूथनरक (मलमूत्राचे नरक) इत्यादी आहेत, अशा प्रकारे सोळा उस्सद निरयांचे वर्णन केले जाते. สกฺกสุยามาทิโก เชฏฺฐกเทวราชา. ปชาปติวรุณอีสานาทโย วิย ทุติยาทิฏฺฐานนฺตรการโก ปริจารโก. शक्र (सक्क), सुयाम इत्यादी ज्येष्ठ देवराजे आहेत. प्रजापती, वरुण, ईसान (ईशान्य) इत्यादींप्रमाणे ते दुसऱ्या इत्यादी स्थानांवर काम करणारे परिचारक (सेवक) आहेत. กิเลสกามปกฺเขติ ‘‘สงฺกปฺโป กาโม, ราโค กาโม, สงฺกปฺปราโค กาโมติ (มหานิ. ๑) เอตฺถ วุตฺตสงฺกปฺปวเสน วุตฺตํ. โสปิ หิ วิพาธติ, อุปตาเปติ จาติ กิเลสตฺตสมฺภวโต กิเลสกาโม วุตฺโต, น กิเลสวตฺถุภาวโต. กามปฏิสํยุตฺโตติ กามราคสงฺขาเตน กาเมน สมฺปยุตฺโต, กามปฏิพทฺโธ วา. อญฺเญสุ จ กามปฏิสํยุตฺเตสุ ธมฺเมสุ วิชฺชมาเนสุ วิตกฺเก เอว กามสทฺโท ธาตุสทฺโท นิรุฬฺโหติ เวทิตพฺโพ วิตกฺกสฺส กามสงฺกปฺปวุตฺติยา สาติสยตฺตา. เอส นโย พฺยาปาทธาตุอาทีสุ. ปรสฺส, อตฺตโน จ ทุกฺขาปนํ วิหึสา. ตํ ตุ มิจฺฉาหิ วิหึสา. क्लेशकाम पक्षाच्या संदर्भात 'संकल्प हा काम आहे, राग हा काम आहे, संकल्प-राग हा काम आहे' (महानिद्देस १) येथे सांगितलेल्या संकल्पाच्या संदर्भाने म्हटले आहे. कारण तो देखील बाधा आणतो, पीडा देतो, म्हणून क्लेशत्वाच्या संभवतेमुळे त्याला 'क्लेशकाम' म्हटले आहे, क्लेशाचे वस्तू (विषय) असल्यामुळे नाही. 'कामप्रतिसंयुक्त' म्हणजे कामरागाच्या रूपातील कामाशी युक्त किंवा कामाशी बद्ध असलेला. इतर कामप्रतिसंयुक्त धर्म विद्यमान असतानाही, वितर्कामध्येच 'काम' शब्द आणि 'धातू' शब्द रूढ झाला आहे असे समजावे, कारण वितर्काची कामसंकल्पवृत्ती अतिशय प्रबळ असते. हाच नियम व्यापादधातू इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. दुसऱ्याला आणि स्वतःला दुःख देणे म्हणजे 'विहिंसा' (हिंसा) होय. आणि ती मिथ्या रूपानेच हिंसा असते. พีชาทิธาตุนานตฺตวเสน ขนฺธาทินานตฺตํ เวทิตพฺพํ. ขนฺโธติ ทฺวิธาภูตคฺโค. बीजादी धातूंच्या विविधतेमुळे (नानात्वामुळे) स्कंध इत्यादींची विविधता समजून घ्यावी. स्कंध म्हणजे दोन भागांत विभागलेला अग्रभाग होय. ๖๐. อชฺฌาสยธาตูติ [Pg.95] อชฺฌาสยสภาโว. ยถา คูถาทีนํ สภาโว เอโส ยํ คูถาทีเหว สํสนฺทติ, เอวํ ปุคฺคลานํ อชฺฌาสยสฺเสเวส สภาโว, ยํ ทุสฺสีลาทโย ทุสฺสีลาทิเกเหว สํสนฺทนฺติ. ६०. 'अध्याशयधातू' म्हणजे अध्याशयाचा स्वभाव होय. ज्याप्रमाणे विष्ठा इत्यादींचा हा स्वभाव असतो की ते विष्ठा इत्यादींशीच मिळून मिसळून राहतात, त्याचप्रमाणे पुद्गलांच्या (व्यक्तींच्या) अध्याशयाचाही हाच स्वभाव असतो की दुःशील (शीलहीन) इत्यादी लोक दुःशीलांशीच मिळून मिसळून राहतात. สทฺธามูลกตฺตา กุสลกิริยาย วุตฺตํ ‘‘ยํ สทฺธาวเสนา’’ติอาทิ. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘สทฺธา พีช’’นฺติ (สุ. นิ. ๗๗). ยํ โลภวเสน, สทฺธาวเสน จ โทสวเสน, สทฺธาวเสน จ โมหวเสน, สทฺธาวเสน จาติ โยเชตพฺพํ. วีริยวเสนาติ สมฺมปฺปธานวีริยวเสน. ปญฺญาวเสนาติ มคฺคสมฺมาทิฏฺฐิวเสน. कुशल कर्माचे मूळ श्रद्धा असल्यामुळे 'जे श्रद्धेच्या वशतेने' इत्यादी म्हटले आहे. कारण असे म्हटले आहे की, 'श्रद्धा हे बीज आहे' (सुत्तनिपात ७७). 'जे लोभाच्या वशतेने आणि श्रद्धेच्या वशतेने, द्वेषाच्या वशतेने आणि श्रद्धेच्या वशतेने, मोहाच्या वशतेने आणि श्रद्धेच्या वशतेने' असे जोडले पाहिजे. 'वीर्याच्या वशतेने' म्हणजे सम्यक्प्रधान वीर्याच्या वशतेने होय. 'प्रज्ञेच्या वशतेने' म्हणजे मार्ग-सम्यक् दृष्टीच्या वशतेने होय. อกุสลสฺส กมฺมสฺส กโตกาสตาย ปาฬิยํ วุตฺตตฺตา ‘‘วิปากาวรเณน นิวุต’’นฺติ วุตฺตํ. ตํ ปน นิทสฺสนมตฺตํ ทฏฺฐพฺพํ กมฺมาวรณาทีหิปิ นิวุตตาย อิจฺฉิตตฺตา. ตถา หิ ยถา เทวทตฺตํ โกกาลิกํ สุนกฺขตฺตํ ลิจฺฉวิปุตฺตนฺติ อุทาหฏํ, ยทิปิ ภควา ปฏิเวธสฺส อฏฺฐานตํ ทิสฺวา นิพฺเพธภาคิยเทสนํ น เทเสติ, วาสนาภาคิยํ ปน ตถารูปสฺส เทเสติ เอวาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘สจฺจปฺปฏิเวธ’’นฺติอาทิมาห. อชาตสตฺตุอาทีนนฺติ อาทิสทฺเทน สจฺจกาทีนํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. ตสฺสาปิ ภควา อนาคเต วาสนตฺถาย ธมฺมํ เทเสสิ. สตฺถา หิ ‘‘อนาคเต ตมฺพปณฺณิทีเป สาสนํ ปติฏฺฐหิสฺสตี’’ติ ตตฺถายํ กุลฆเร นิพฺพตฺโต ปพฺพชิตฺวา กาฬพุทฺธรกฺขิตตฺเถโร นาม ปภินฺนปฏิสมฺภิโท มหาขีณาสโว ภวิสฺสตีติ อิทํ ทิสฺวา ธมฺมํ เทเสสิ, โส จ ตถา อโหสีติ. अकुशल कर्माला वाव मिळाल्यामुळे पाळीमध्ये 'विपाकावरणाने झाकलेले (निवृत)' असे म्हटले आहे. परंतु ते केवळ उदाहरण म्हणून पाहावे, कारण कर्मावरण इत्यादींनी देखील झाकलेले असणे अभिप्रेत आहे. कारण जसे देवदत्त, कोकालिक, सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र यांचे उदाहरण दिले आहे, जरी भगवान प्रतिवेधाची (ज्ञानाची) असंभाव्यता पाहून निर्वेधभागीय देशना देत नसले, तरी अशा व्यक्तीला वासनाभागीय देशना देतातच, हे दर्शवण्यासाठी 'सत्यप्रतिवेध' इत्यादी म्हटले आहे. 'अजातशत्रू इत्यादींच्या' यातील 'इत्यादी' शब्दाने सच्चक इत्यादींचा संग्रह समजावा. त्यांच्यासाठी देखील भगवंतांनी भविष्यात वासनेसाठी (संस्कारासाठी) धम्मदेशना दिली. कारण शास्त्यांनी 'भविष्यात तांबपन्नी द्वीपात शासन प्रस्थापित होईल, तेथे हा एका कुळात जन्माला येऊन, प्रव्रजित होऊन काळबुद्धरक्खित थेर नावाचा प्रभिन्नपटिसंभिदा प्राप्त महाक्षीणासव होईल' हे पाहून धम्मदेशना दिली आणि ते तसेच घडले. อสมฺปุณฺเณติ เอกนฺตโต วิปากทานสมตฺถตาวเสน ปาริปูรึ อนุปคเต. ทิฏฺฐุปนิสฺสยทิฏฺฐิสหคตสฺส กมฺมํ สนฺธาย ‘‘กมฺเม อสมฺปุณฺเณ’’ติ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘กิเลสนฺตราย มิสฺสกํ กมฺมนฺตรายํ ทสฺเสตฺวา’’ติ. 'असंपूर्ण' म्हणजे निश्चितपणे विपाक देण्याच्या समर्थतेच्या दृष्टीने परिपूर्णतेला प्राप्त न झालेले. दृष्टीचा उपनिष्रय असलेल्या आणि दृष्टीसहगत असलेल्या कर्माचा संदर्भ देऊन 'कर्म असंपूर्ण असताना' असे म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे की, 'क्लेश-अंतरायाने मिश्रित असलेला कर्म-अंतराय दर्शवून'. ๖๑. ทิฏฺฐิ ปเนตฺถ ปธานภาเวน ปาฬิยํ คหิตา สีลพฺพตปรามาสสฺส อธิปฺเปตตฺตา. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘ยถา ปุณฺณญฺจ โควติกํ, อเจลญฺจ กุกฺกุรวติก’’นฺติ. อสมฺปุณฺณตฺตา เอว หิ ตสฺส มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานสฺส เตสํ ภควา ‘‘จตฺตาริมานิ, ปุณฺณ, กมฺมานี’’ติอาทินา (ม. นิ. ๒.๘๑) ธมฺมํ เทเสสิ. ตาย จ เทสนาย เต ตํ ทิฏฺฐึ ปฏินิสฺสชฺชิตฺวา สมฺมตฺเต ปติฏฺฐหึสุ. ६१. येथे पाळीमध्ये 'दृष्टी' मुख्य रूपाने घेतली आहे, कारण शीलव्रतपरामर्श अभिप्रेत आहे. कारण असे म्हटले आहे की, 'जसे गोव्रत पाळणारा पुण्ण आणि कुक्कुरव्रत पाळणारा अचेल'. त्या मिथ्यादृष्टी कर्म-समादानाच्या असंपूर्णतेमुळेच भगवंतांनी त्यांना 'हे पुण्ण, ही चार कर्मे आहेत' इत्यादी प्रकारे (मज्झिमनिकाय २.८१) धम्मदेशना दिली. आणि त्या देशनेमुळे त्यांनी त्या दृष्टीचा त्याग करून सम्यक्त्वमध्ये प्रतिष्ठा मिळवली. ๖๒. ปคุณตาย [Pg.96] โวทานํ ปคุณโวทานํ. ตเทว ปฐมชฺฌานาทีหิ วุฏฺฐหิตฺวา ทุติยชฺฌานาทิอธิคมสฺส ปจฺจยตฺตา วุฏฺฐานํ นาม โหตีติ อาห ‘‘วุฏฺฐานํ ปคุณโวทาน’’นฺติ. ภวงฺควุฏฺฐานํ ภวงฺคุปฺปตฺติ. ภวงฺคจิตฺเต หิ อุปฺปนฺเน ตํสมงฺคิสมาปตฺติโต วุฏฺฐิโต นาม โหติ. สญฺญาเวทยิตอปคโม เอว อปคมวิโมกฺโข. ६२. प्रगुणतेमुळे (अभ्यासामुळे) होणारे व्यवदान (शुद्धीकरण) म्हणजे 'प्रगुणव्यवदान' होय. तेच प्रथम ध्यानातून उठून (व्युत्थान करून) द्वितीय ध्यान इत्यादींच्या प्राप्तीचे कारण बनत असल्यामुळे त्याला 'व्युत्थान' म्हटले जाते, म्हणून 'व्युत्थान म्हणजे प्रगुणव्यवदान' असे म्हटले आहे. भवांग-व्युत्थान म्हणजे भवांगाची उत्पत्ती होय. कारण भवांगचित्त उत्पन्न झाल्यावर, त्या समापत्तीशी युक्त असलेला पुरुष उठला (व्युत्थित झाला) असे म्हटले जाते. संज्ञा आणि वेदयित (वेदना) यांचा अपगम (लोप) म्हणजेच 'अपगमविमोक्ष' होय. อิทํ วุฏฺฐานนฺติ อิทํ ยถาวุตฺตํ โกสลฺลํ วุฏฺฐานเหตุภาวโต วุฏฺฐานํ. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘โวทานมฺปิ ตมฺหา ตมฺหา สมาธิมฺหา วุฏฺฐาน’’นฺติ (วิภ. ๘๒๘). อิมาย ปน วุฏฺฐานปาฬิยา อสงฺคหิตตฺตา ‘‘นิโรธสมาปตฺติยา วุฏฺฐานํ ปาฬิมุตฺตกวุฏฺฐานํ นามา’’ติ สมฺโมหวิโนทนิยํ (วิภ. อฏฺฐ. ๘๒๘) วุตฺตํ. เย ปน ‘‘นิโรธโต ผลสมาปตฺติยา วุฏฺฐาน’’นฺติ ปาฬิยํ นตฺถีติ วเทยฺยุํ, เต ‘‘นิโรธา วุฏฺฐหนฺตสฺส เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ ผลสมาปตฺติยา อนนฺตรปจฺจเยน ปจฺจโย’’ติ (ปฏฺฐา. ๑.๑.๔๑๗) อิมาย ปาฬิยา ปฏิเสเธตพฺพา. 'हे व्युत्थान' म्हणजे हे वर सांगितलेले कौशल्य व्युत्थानाचे हेतू असल्यामुळे 'व्युत्थान' आहे. कारण असे म्हटले आहे की, 'व्यवदान देखील त्या-त्या समाधीतून उठणे (व्युत्थान) आहे' (विभंग ८२८). परंतु या व्युत्थान-पाळीमध्ये समाविष्ट न केल्यामुळे 'निरोधसमापत्तीतून उठणे हे पाळीमुक्तक व्युत्थान म्हटले जाते' असे सम्मोहविनोदनीमध्ये (विभंग-अट्ठकथा ८२८) म्हटले आहे. जे लोक असे म्हणतात की, 'निरोधातून फलसमापत्तीचे व्युत्थान' हे पाळीमध्ये नाही, त्यांचे 'निरोधातून उठणाऱ्या व्यक्तीचे नैवसंज्ञानासंज्ञायतन हे फलसमापत्तीसाठी अनंतरप्रत्ययाने प्रत्यय बनते' (पट्ठान १.१.४१७) या पाळीद्वारे खंडन केले पाहिजे. ๖๓. อยํ จสฺส อาสโยติ เอตฺถ อาสยชานนาทินา เยหิ อินฺทฺริเยหิ เยหิ ปโรปเรหิ สตฺตา กลฺยาณปาปาสยาทิกา โหนฺติ, เตสํ ปชานนํ วิภาเวตีติ เวทิตพฺพํ. เอวญฺจ กตฺวา อินฺทฺริยปโรปริยตฺตอาสยานุสยญาณานํ วิสุํ อสาธารณตา, อินฺทฺริยปโรปริยตฺตนานาธิมุตฺติกตาญาณานํ วิสุํ พลตา จ สิทฺธา โหติ. ६३. 'आणि हा त्याचा आशय आहे' येथे आशय जाणून घेणे इत्यादींद्वारे ज्या इंद्रियांद्वारे आणि ज्या श्रेष्ठ-कनिष्ठतेमुळे प्राणी कल्याणकारी किंवा पापी आशयाचे होतात, त्यांचे विशेष ज्ञान स्पष्ट होते असे समजावे. आणि असे केल्याने इंद्रियपरोपरियत्त-आशयानुशय ज्ञानाची स्वतंत्र असाधारणता आणि इंद्रियपरोपरियत्त-नानाधिमुक्तिकता ज्ञानाचे स्वतंत्र बल सिद्ध होते. ถามคโตติ เอตฺถ ถามคมนํ นาม อญฺเญสํ อสาธารโณ กามราคาทีนํ เอว อาเวณิโก สภาโว เวทิตพฺโพ, ยโต ‘‘ถามคโต อนุสยํ ปชหตี’’ติ (ปฏิ. ม. ๓.๒๑) วุตฺตํ. 'स्थामगत' (दृढ झालेला) यामध्ये स्थामगमन म्हणजे इतरांसाठी असाधारण असलेला कामराग इत्यादींचाच आवेणिक (विशिष्ट) स्वभाव समजावा, ज्यावरून 'स्थामगत अनुशायाचा त्याग करतो' (पटिसम्भिदामग्ग ३.२१) असे म्हटले आहे. อาวชฺชนมตฺเตเนว สรติ อากงฺขายตฺตวุตฺติกตฺตา. วุตฺตญฺหิ ‘‘อากงฺขปฏิพทฺธํ พุทฺธสฺส ภควโต ญาณํ, มนสิการปฏิพทฺธํ พุทฺธสฺส ภควโต ญาณ’’นฺติอาทิ (มหานิ. ๑๕๖; จูฬนิ. โมฆราชมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๘๕; ปฏิ. ม. ๓.๕). สพฺพญฺญุตญฺญาณํ วิย หิ สพฺพํ ภควโต ญาณํ ปริกมฺมนิรเปกฺขนฺติ. केवळ आवर्जन (मन एकाग्र) केल्यानेच स्मरण होते, कारण त्याची वृत्ती आकांक्षेवर (इच्छेवर) अवलंबून असते. कारण असे म्हटले आहे की, 'बुद्ध भगवंतांचे ज्ञान आकांक्षेशी बद्ध आहे, बुद्ध भगवंतांचे ज्ञान मनसिकाराशी बद्ध आहे' इत्यादी (महानिद्देस १५६; चुळ्ळनिद्देस ८५; पटिसम्भिदामग्ग ३.५). कारण सर्वज्ञता ज्ञानाप्रमाणेच भगवंतांचे सर्व ज्ञान परिकर्माची (पूर्व तयारीची) अपेक्षा न ठेवणारे असते. ๖๔. อุปกฺกิเลสวิมุตฺตตฺตาติ เอตฺถ จิตฺตาทิ เอว อุปกฺกิเลสา, นิพฺพตฺตกสฺส วา กมฺมสฺส ปาริพนฺธกิเลสา. กสิณกมฺมปริกมฺมฌานนิพฺพตฺตนกสิณภาโว จุทฺทสวิเธน จิตฺตปริทมนํ อภิญฺญาภินีหาโรติ สพฺพตฺถาปิ [Pg.97] วีริยพลสฺส พหูปการตฺตา วุตฺตํ ‘‘วีริยภาวนาพลนิพฺพตฺต’’นฺติ. ทิพฺพสทิสตฺตาติ ทิพฺเพ ภวนฺติ ทิพฺพํ, ยถาวุตฺตํ ปสาทจกฺขุ, ทิพฺพํ วิยาติ ทิพฺพํ, อคฺคตํ อภิญฺญาณํ. ทิพฺพวิหาโร จตฺตาริ รูปาวจรชฺฌานานิ. เตสํ วเสน นิพฺพตฺติตฺวา ปฏิลทฺธพฺพตฺตา ทิพฺพํ, เตน ทิพฺพเหตุกตฺตา ทิพฺพนฺติ วุตฺตนฺติ ทสฺเสติ. ทิพฺพวิหารสนฺนิสฺสิตตฺตาติ รูปาวจรจตุตฺถชฺฌาเนน นิสฺสยปจฺจเยน นิพฺพตฺตตฺตา, เตน ทิพฺพนิสฺสิตํ ทิพฺพนฺติ ทสฺเสติ. ทิวุสทฺทํ อกฺขรจินฺตกา กีฬาทีสุ ปฐนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ตํ สพฺพํ สทฺทสตฺถานุสาเรน เวทิตพฺพ’’นฺติ. ปุริมา หิ ตโย อตฺถา กีฬตฺถสฺส วเสน, อิตเร ชุติคติอตฺถวเสเนว ทสฺสิตาติ. ६४. “उपकिक्लेसविमुत्तत्ता” (उपकिक्लेसांपासून मुक्त असल्यामुळे) येथे चित्त इत्यादीच उपकिक्लेस (उपक्लेश) आहेत, किंवा उत्पन्न करणाऱ्या कर्माचे अडथळा आणणारे किलेस (क्लेश) आहेत. कसिण-कर्म-परिकम्म (कृत्स्न-कर्म-परिकर्म) आणि झानांच्या (ध्यानांच्या) उत्पत्तीमुळे होणारी कसिण-अवस्था, चौदा प्रकारांनी चित्ताचे दमन करणे आणि अभिञ्ञा-अभिनीहार (अभिज्ञा-अभिनिहार) या सर्व ठिकाणी वीरिय-बलाचे (वीर्य-बलाचे) मोठे साहाय्य असल्यामुळे “वीरियभावनाबलनिब्बत्तं” (वीर्यभावनाबलाने उत्पन्न झालेले) असे म्हटले आहे. “दिब्बसदिसत्ता” (दिव्यसदृश असल्यामुळे) म्हणजे दिव्यांमध्ये जे असते ते दिव्य, जसे की आधी सांगितलेले प्रसादचक्षू; दिव्यासारखे ते दिव्य, म्हणजेच श्रेष्ठ अभिञ्ञा. दिब्बविहार (दिव्यविहार) म्हणजे चार रूपावचर झाने. त्यांच्या प्रभावाने उत्पन्न होऊन प्राप्त करण्यायोग्य असल्यामुळे ते 'दिव्य' आहे, म्हणून दिव्य हेच त्याचे कारण असल्यामुळे त्याला 'दिव्य' म्हटले आहे, असे दर्शविते. “दिब्बविहारसन्निस्सितत्ता” (दिव्यविहारावर आश्रित असल्यामुळे) म्हणजे रूपावचर चौथ्या झानाच्या निस्सय-पच्चयाने (आश्रय-प्रत्ययाने) उत्पन्न झाल्यामुळे, त्या दिव्य-आश्रित गोष्टीला 'दिव्य' असे दर्शविते. व्याकरणकार 'दिवु' (divu) हा धातू कीळा (क्रीडा) इत्यादी अर्थांमध्ये वाचतात, म्हणून “ते सर्व व्याकरणशास्त्रानुसार जाणावे” असे म्हटले आहे. कारण पहिले तीन अर्थ कीळा (क्रीडा) या अर्थाने दर्शविले आहेत, तर इतर अर्थ दीप्ती (जुति) आणि गती (गति) या अर्थांनीच दर्शविले आहेत. มนุสฺสูปจารนฺติ มนุสฺสโคจรํ. ทฏฺฐุํ น สกฺกา อิตฺตรขณตฺตา ขณปจฺจุปฺปนฺนสฺส. ‘‘อาสนฺนจุติกา’’ติอาทินา สนฺตติปจฺจุปฺปนฺนวเสน ‘‘จวมาเน อุปปชฺชมาเน’’ติ วุตฺตนฺติ ทสฺเสติ. ‘‘โมหนิสฺสนฺทยุตฺตตฺตา’’ติอาทินา สตฺตานํ หีนปณีตตฺตาทิภาวสฺส โมหาทิกมฺมนิทานเหตุกตํ, นิสฺสนฺทผลตญฺจ ทสฺเสติ. ทิพฺพจกฺขุสฺส ปาทกํ เอเตสนฺติ ทิพฺพจกฺขุปาทกานิ. เตน วุตฺตํ ‘‘ทิพฺพจกฺขุนา สเหว อิชฺฌนฺตี’’ติ. ตานิ หิสฺส ปริภณฺฑญาณานิ. “मनुस्सूपचार” म्हणजे मनुष्यांचा गोचर (विषय/क्षेत्र). क्षण-प्रत्युत्पन्नाचा (क्षण-वर्तमानकाळाचा) काळ अत्यंत अल्प असल्यामुळे तो पाहणे शक्य नाही. “आसन्नचुतिका” (मृत्यूच्या जवळ आलेले) इत्यादींद्वारे संतती-प्रत्युत्पन्नाच्या (प्रवाहाच्या वर्तमानकाळाच्या) दृष्टीने “च्युत पावणारे (मरणारे) आणि उत्पन्न होणारे” असे म्हटले आहे, हे दर्शविते. “मोहनिस्संदयुत्तत्ता” (मोहाच्या प्रवाहाशी युक्त असल्यामुळे) इत्यादींद्वारे प्राण्यांच्या हीन, प्रणीत (श्रेष्ठ) इत्यादी अवस्थेचे कारण मोह इत्यादी कर्म-निदान आहे आणि ते त्याचे निस्संद-फल (प्रवाह-फळ) आहे, हे दर्शविते. दिव्यचक्षूचा जो आधार (पादक) आहे, त्यांना 'दिब्बचक्खुपादक' (दिव्यचक्षू-पादक) म्हणतात. म्हणूनच म्हटले आहे - “ते दिव्यचक्षूसोबतच सिद्ध होतात.” कारण ती त्याची परिभांड-ज्ञाने (पूर्वसिद्धता-ज्ञाने) आहेत. สมาทียนฺตีติ สมาทานานิ, กมฺมานิ สมาทานานิ เอเตสนฺติ กมฺมสมาทานา. สมาทาตพฺพนานาวิธกมฺมาติ อตฺโถ ปุริเม อตฺเถ, ทุติเย ปน กมฺมานิ สมาทาเปนฺตีติ กมฺมสมาทานา, มิจฺฉาทิฏฺฐิยา กมฺมสมาทานา มิจฺฉาทิฏฺฐิกมฺมสมาทานา, เหตุอตฺเถ เจตํ กรณวจนํ. जे स्वीकारले जातात ते 'समादान' (स्वीकार/समादान) होत. ज्यांची कर्मांची समादाने आहेत ते 'कम्मसमादान' (कर्म-समादान) होत. पहिल्या अर्थामध्ये 'स्वीकारण्यायोग्य विविध प्रकारची कर्मे' असा अर्थ आहे; परंतु दुसऱ्या अर्थात जे कर्मांचा स्वीकार करायला लावतात ते 'कम्मसमादान' होत. मिथ्यादृष्टीने कर्मांचा स्वीकार करणे म्हणजे 'मिच्छादिट्ठिकम्मसमादान' (मिथ्यादृष्टी-कर्म-समादान) होय. आणि हे करण-वचन (तृतीया विभक्ती) हे हेतूच्या अर्थामध्ये आहे. ตํ วาจนฺติ ตํ อริยานํ อุปวทนวาจํ. ตํ จิตฺตนฺติ สมุฏฺฐาปกจิตฺตํ. ตํ ทิฏฺฐินฺติ เยน มิจฺฉาคาเหน อริเย อนุทฺธํเสติ, มิจฺฉาภินิเวสํ. อยมฺเปตฺถ อตฺโถ – ยถา นาม เหตุสมฺปนฺนสฺส ภิกฺขุโน วิสุทฺธํ สีลํ, สมาธิญฺจ สมฺปาเทตฺวา ฐิตสฺส ทนฺโธ สตุปฺปาโท ขิปฺปาภิญฺญาย ทิฏฺเฐว ธมฺเม อญฺญา, สติ วา อุปาทิเสเส อนาคามิตา. เอวเมวํ โย อริยูปวาที ยถาวุตฺตจิตฺตทิฏฺฐีหิ อปกฺกมิตฺวา อปฺปติรูปํ สภาวํ ‘‘มยา, ภนฺเต, ตุมฺหากํ อุปริ วุตฺต’นฺติ อจฺจยเทสนาย เต น ขมาเปติ, โส กายสฺส เภทา นิรเย เอวาติ. เตสุ ปสนฺนจิตฺตสฺส ขมาปนญฺเหตฺถ เตสํ วาจาทีนํ ปหานํ ปฏินิสฺสคฺโคว. อิโต สาวชฺชตรํ นาม อญฺญํ นตฺถิ สพฺพานตฺถวิธานโต, สพฺพหิตสุขปริธํสนโต จ. “ती वाणी” म्हणजे आर्यांची (उत्तम पुरुषांची) निंदा करणारी ती वाणी. “ते चित्त” म्हणजे ती वाणी उत्पन्न करणारे चित्त. “ती दृष्टी” म्हणजे ज्या मिथ्या ग्रहाने (चुकीच्या समजुतीने) आर्यांचा नाश/निंदा केली जाते, तो मिथ्याभिनिवेश (मिथ्या आग्रह). येथे हा देखील अर्थ आहे - ज्याप्रमाणे हेतूंनी संपन्न असलेल्या, विशुद्ध शील आणि समाधी संपादन करून राहिलेल्या भिक्खूची स्मृतीची उत्पत्ती जरी मंद असली, तरी शीघ्र अभिञ्ञा (अभिज्ञा) प्राप्त झाल्यामुळे याच जन्मात (दिट्ठेव धम्मे) अर्हतपद (अञ्ञा) प्राप्त होते, किंवा उपादिशेष (उपाधीचा अंश) शिल्लक असताना अनागामी अवस्था प्राप्त होते. त्याचप्रमाणे, जो आर्यांची निंदा करणारा (अरियूपवादी) वर सांगितलेल्या चित्त आणि दृष्टीने युक्त होऊन, आपल्या अयोग्य वर्तनाबद्दल “भंते, माझ्याकडून आपल्याविरुद्ध असे बोलले गेले” अशी अपराध-देशना (क्षमायाचना) करून त्यांची क्षमा मागत नाही, तो शरीराच्या भेदानंतर (मृत्य्यूनंतर) नरकातच जातो. त्यांच्याविषयी प्रसन्न चित्त ठेवून क्षमा मागणे म्हणजेच त्या वाणी इत्यादींचा त्याग व परित्याग करणे होय. यापेक्षा अधिक दोषयुक्त (सावज्ज) दुसरे काहीही नाही, कारण यामुळे सर्व अनर्थ घडतात आणि सर्व हित व सुखाचा नाश होतो. กายสฺส [Pg.98] เภทาติ อิธ กายสทฺโท อตฺตภาวปริยาโยติ อาห ‘‘อุปาทินฺนกฺขนฺธปริจฺจาคา’’ติ. ตทนนฺตรนฺติ ตสฺส มรณสงฺขาตสฺส ขนฺธปริจฺจาคสฺส อนนฺตรํ. อภินิพฺพตฺตกฺขนฺธตฺโถ ปรสทฺโท, อโนริมภูตวตฺถุวิสโย วา สิยา, อวธิวิเสสนมตฺตํ วา. เตสุ ปุริมํ สนฺธายาห ‘‘อภินิพฺพตฺตกฺขนฺธคฺคหเณ’’ติ, ปจฺฉิมสฺส ปน วเสน ‘‘จุติโต อุทฺธ’’นฺติ. “कायाच्या भेदानंतर” (शरीर नष्ट झाल्यावर) येथे 'काय' हा शब्द आत्मभाव (अस्तित्व) या अर्थाने वापरला आहे, म्हणून “उपादिन्न-खंधांचा (उपात्त स्कंधांचा) परित्याग केल्यामुळे” असे म्हटले आहे. “त्यानंतर” म्हणजे मरण नावाच्या त्या स्कंध-परित्यागानंतर लगेचच. 'पर' या शब्दाचा अर्थ 'उत्पन्न झालेले नवीन स्कंध' असा आहे, किंवा तो अलीकडची नसलेली वस्तू या विषयाशी संबंधित असू शकतो, किंवा ती केवळ मर्यादेची विशेषता आहे. त्यांपैकी पहिल्याचा संदर्भ देऊन “उत्पन्न झालेल्या स्कंधांच्या ग्रहणात” असे म्हटले आहे, तर नंतरच्या संदर्भाने “च्युतीनंतर (मृत्य्यूनंतर) वर” असे म्हटले आहे. วุตฺตวิปริยาเยนาติ ‘‘สุฏฺฐุ จริตํ, โสภนํ วา จริต’’นฺติอาทินา. หนนนฺติ ฆาตนํ. “सांगितलेल्याच्या उलट” म्हणजे “चांगले आचरण किंवा शोभनीय आचरण” इत्यादींद्वारे. “हनन” म्हणजे घात (मारणे). การณาการณนฺติ ฐานาฏฺฐานํ. เจตนาเจตนาสมฺปยุตฺตธมฺเม นิรยาทินิพฺพานคามิปฏิปทาภูเต กมฺมนฺติ คเหตฺวา อาห ‘‘กมฺมปริจฺเฉทเมวา’’ติ. กมฺมวิปากนฺตรํ กมฺมวิปากวิเสโส กมฺมวิปากสฺส วิภาโค. อปฺเปตุํ น สกฺโกติ อฏฺฐมนวมพลานิ วิย, ตํสทิสํ อิทฺธิวิธญาณํ วิย วิกุพฺพิตุํ, เอเตนสฺส พลสทิสตญฺจ นิวาเรติ. ฌานาทิญาณํ วิย วา อปฺเปตุํ, วิกุพฺพิตุญฺจ. ยทิปิ หิ ฌานาทิปจฺจเวกฺขณาญาณํ อิธ ฉฏฺฐํ พลนฺติ ตสฺส สวิตกฺกสวิจารตา วุตฺตา, ตถาปิ ฌานาทีหิ วินา ปจฺจเวกฺขณา นตฺถีติ ฌานาทิสหคตํ ญาณํ ตทนฺโตคธํ กตฺวา เอวํ วุตฺตํ. อถ วา สพฺพญฺญุตญฺญาณํ ฌานาทิกิจฺจํ วิย น สพฺพํ พลกิจฺจํ กาตุํ สกฺโกตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ฌานํ หุตฺวา อปฺเปตุํ, อิทฺธิ หุตฺวา วิกุพฺพิตุญฺจ น สกฺโกตี’’ติ (วิภ. มูลฏี. ๘๓๑) วุตฺตํ, น ปน กสฺสจิ พลสฺส ฌานอิทฺธิภาโวติ ทฏฺฐพฺพํ. “कारण आणि अकारण” म्हणजे स्थान आणि अस्थान (योग्य आणि अयोग्य स्थान). चेतना आणि अचेतना यांनी युक्त असलेल्या, नरक इत्यादींपासून निर्वाणापर्यंत नेणाऱ्या प्रतिपदेच्या (मार्गाच्या) रूपात असलेल्या धर्मांना 'कर्म' मानून “कर्म-परिच्छेदच” (कर्माचे निर्धारणच) असे म्हटले आहे. “कम्मविपाकांतर” म्हणजे कर्म-विपाकाचा विशेष (भेद), कर्म-विपाकाचा विभाग. आठव्या आणि नवव्या बलाप्रमाणे ते अर्पित (समाहित) करू शकत नाही, किंवा त्याच्यासारख्या ऋद्धिविध-ज्ञानाप्रमाणे रूप बदलू (विकुर्वण करू) शकत नाही; याद्वारे त्याचे बलाशी असलेले सादृश्य नाकारले आहे. किंवा झान (ध्यान) इत्यादी ज्ञानाप्रमाणे अर्पित आणि विकुर्वण करू शकत नाही. जरी येथे झान इत्यादींचे प्रत्यवेक्षण-ज्ञान हे सहावे बल आहे आणि त्याचे सवितर्क-सविचार असणे सांगितले आहे, तरीही झानांशिवाय प्रत्यवेक्षण होत नसल्यामुळे, झान-सहगत ज्ञानाला त्यातच समाविष्ट करून असे म्हटले आहे. अथवा, सर्वज्ञता-ज्ञान हे झानादींच्या कार्याप्रमाणे बलाचे सर्व कार्य करू शकत नाही, हे दर्शविण्यासाठी “झान होऊन अर्पित करणे आणि ऋद्धी होऊन विकुर्वण करणे शक्य नाही” असे म्हटले आहे; परंतु कोणत्याही बलामध्ये झान किंवा ऋद्धीचा भाव असतो असे समजू नये. วิจยหารสมฺปาตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. विचयहार-संपात-वर्णन समाप्त झाले. ๓. ยุตฺติหารสมฺปาตวณฺณนา ३. युत्तिहार-संपात-वर्णन ๖๕. ปฏิปกฺขปฏิพาฬฺหา กุสลา ธมฺมา อุปฺปชฺชิตุเมว น สกฺโกนฺติ, อุปฺปนฺนาปิ สมฺมเทว อตฺตโน กิจฺจํ กาตุํ อสมตฺถตาย อนุปฺปนฺนสทิสาติ ปฏิปกฺขนิวารเณน กุสลานํ ธมฺมานํ กิจฺจกรณภาวํ ทสฺเสตุํ ‘‘มนจฺฉฏฺฐานิ…เป… ภวิสฺสตี’’ติ วุตฺตํ. วิหรนฺตสฺสาติ วิหรณเหตุ. วิหรนฺโตติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย, เตน รกฺขิตจิตฺตตา วุตฺตนเยน เอกนฺตโต สมฺมาสงฺกปฺปโคจรตาย จ สํวตฺตตีติ ทสฺเสติ. วุตฺตนเยนาติ [Pg.99] มิจฺฉาสงฺกปฺปานํ อวสรํ อทตฺวา วิโสธิตเนกฺขมฺมาทิวิตกฺกตาย. อวิปรีตเมวาติ กายาทิอสุภาทิโต อาทานํ. วินิปาตภยนฺติ ทุคฺคติภยํ. สพฺโพปิ จายมตฺโถติ ‘‘สมฺมาสงฺกปฺปโคจโร สมฺมาทิฏฺฐิ ภวิสฺสตี’’ติอาทีสุ อตฺโถ ยุตฺติยา ยุตฺโต เอว อนรูปการณภาวโต. ६५. प्रतिपक्षाने (विरोधी गोष्टींनी) अडविलेले कुशल धर्म उत्पन्नच होऊ शकत नाहीत, आणि उत्पन्न झाले तरी योग्य प्रकारे आपले कार्य करण्यास असमर्थ असल्यामुळे ते उत्पन्न न झाल्यासारखेच असतात. प्रतिपक्षाचे निवारण करून कुशल धर्मांच्या कार्य करण्याच्या अवस्थेला दर्शविण्यासाठी “मन-सहावे... पे... होईल” असे म्हटले आहे. “विहरत असलेल्याचे” म्हणजे विहरण्याच्या हेतूने. “विहरत असलेला” यामध्ये देखील हाच नियम आहे; याद्वारे हे दर्शविले आहे की, रक्षित-चित्तता (सुरक्षित मन) सांगितलेल्या पद्धतीने पूर्णपणे सम्यक्-संकल्पाच्या गोचरतेसाठी (विषयासाठी) कारणीभूत ठरते. “सांगितलेल्या पद्धतीने” म्हणजे मिथ्या-संकल्पांना वाव न देता विशुद्ध केलेल्या नैष्क्रम्य (नेक्खम्म) इत्यादी वितर्कांमुळे. “अविपरीतच” म्हणजे शरीरादींच्या अशुचितेवरून ग्रहण करणे. “विनिपात-भय” म्हणजे दुर्गतीचे भय. “हा सर्व देखील अर्थ” म्हणजे “सम्यक्-संकल्पाचा गोचर सम्यक्-दृष्टी होईल” इत्यादींमधील अर्थ युक्तीने युक्तच आहे, कारण यात अयोग्य कारणाचा अभाव आहे. ยุตฺติหารสมฺปาตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. युत्तिहार-संपात-वर्णन समाप्त झाले. ๔. ปทฏฺฐานหารสมฺปาตาทิวณฺณนา ४. पदट्ठानहार-संपात-आदींचे वर्णन ๖๖. ยสฺมา วา สํกิเลสโต รกฺขิตจิตฺตสฺส ตีณิ สุจริตานิ ปาริปูรึ คจฺฉนฺติ, ตสฺมา รกฺขิตจิตฺตสฺสาติ เอตฺถ ยายํ รกฺขิตจิตฺตตา, สา กายสุจริตาทีนํ ติณฺณํ สุจริตานํ ปทฏฺฐานนฺติ เอวเมตฺถ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อตฺตาธีนนฺติ อตฺตปราธีนํ. ६६. अथवा, ज्याअर्थी संक्लेशापासून (मलिनातेपासून) रक्षित चित्त असलेल्याचे तीन सुचरित परिपूर्णतेला प्राप्त होतात, त्याअर्थी “रक्षित चित्त असलेल्याचे” यामध्ये जी ही रक्षित-चित्तता आहे, ती काय-सुचरित इत्यादी तिन्ही सुचरितांचे पदट्ठान (पदस्थान/निकटचे कारण) आहे, असा येथे अर्थ समजला पाहिजे. “अत्ताधीन” (स्वतःच्या अधीन) म्हणजे स्वतःच्या पराधीन (स्वतःवर अवलंबून असणारे). ตโต เอวาติ การณคฺคหเณน ผลสฺส คหิตตฺตา เอว. “त्यामुळेच” म्हणजे कारणाच्या ग्रहणाने फळाचे ग्रहण झाल्यामुळेच। ๖๘. ตตฺถ อิติสทฺโทติ ‘‘ปริปาลียตี’’ติ อิติสทฺโท. ६८. तेथे 'इति' हा शब्द 'परिपालीयति' (रक्षण केले जाते) या अर्थाचा 'इति' शब्द आहे. ๗๓-๔. ปาฬิยํ ปญฺจินฺทฺริยานิ ตีหิ ขนฺเธหิ สงฺคหิตานีติ เอตฺถ สทฺธาวีริยสตินฺทฺริเยหิ ปาติโมกฺขาทิ ติวิธํ สีลํ คหิตํ โสเธตพฺพตฺตา. เตสนฺติ เตหิ สีลกฺขนฺโธ สงฺคหิโต. สมาธิปญฺญินฺทฺริเยหิ สมาธิปญฺญากฺขนฺธา คหิตาติ ปากโฏยมตฺโถ, ตถา เสสมฺปีติ อาห ‘‘อิโต ปเรสุ…เป… วุตฺตนยเมวา’’ติ. ७३-४. पाळीमध्ये (पाळिपाठात) 'पाच इंद्रिये तीन स्कंधांमध्ये समाविष्ट आहेत' येथे श्रद्धा, वीर्य आणि सती (स्मृती) या इंद्रियांद्वारे प्रातिमोक्ष इत्यादी त्रिविध शील ग्रहण केले आहे, कारण ते शुद्ध करायचे असते. 'त्यांचे' म्हणजे त्यांच्याद्वारे शीलस्कंध समाविष्ट केला आहे. समाधी आणि प्रज्ञा या इंद्रियांद्वारे समाधीस्कंध व प्रज्ञास्कंध ग्रहण केले आहेत, हा अर्थ स्पष्टच आहे. त्याचप्रमाणे उर्वरित देखील, म्हणून म्हटले आहे - 'यापुढील इतरांमध्ये... पे... सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे.' ๗๖. เหตุเหตุสมุปฺปนฺนปจฺจยปจฺจยุปฺปนฺนสงฺขาตสฺสาติ เอตฺถ เหตุปจฺจยวิภาโค เหฏฺฐา วุตฺโตเยว. ७६. 'हेतू, हेतूपासून उत्पन्न झालेले, प्रत्यय (कारण) आणि प्रत्ययापासून उत्पन्न झालेले' या संज्ञेबाबत, येथे हेतू आणि प्रत्यय यांचा विभाग खाली (पूर्वीच) सांगितला आहे. ปทฏฺฐานหารสมฺปาตาทิวณฺณนา นิฏฺฐิตา. पदट्ठानहारसंपात (पदस्थानहारसंपात) इत्यादींचे वर्णन समाप्त झाले. มิสฺสกหารสมฺปาตวณฺณนา मिस्सकहारसंपात वर्णन (मिश्रकहारसंपात वर्णन). อิทานิ ยสฺมา สุตฺเตสุ หารานํ โยชนานยทสฺสนตฺตา หารสมฺปาตเทสนา หารวิภงฺคเทสนา วิย น หารสรูปมตฺตทสฺสนตฺตา, ตสฺมา เปฏโกปเทเส [Pg.100] อาคตนยานุสาเรน อปเรหิ วิปริยาเยหิ หารสมฺปาตโยชนาวิธึ ทสฺเสนฺโต ‘‘อปิจา’’ติอาทิมาห. ตตฺถ วิชฺชาวิชฺชาย กุสลากุสลจิตฺตปฺปวตฺติยา อโลภาโทสโลภโทสาปิ ปรมฺปรภาเวน ปวตฺตนฺติ นิทานภาวโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ฉ ธมฺมา…เป… มูลานี’’ติ อาห. ยถา จ นิทานภาเวน ปุพฺพงฺคมตา, เอวํ อตฺตโน วเสวตฺตเนนาปิ ปุพฺพงฺคมตา ลพฺภเตวาติ วุตฺตํ ‘‘สาธิปติกานํ อธิปติ, สพฺพจิตฺตุปฺปาทานํ อินฺทฺริยานี’’ติ. อโลภสฺสาติ อโลภยุตฺตสฺส จิตฺตุปฺปาทสฺส. เนกฺขมฺมจฺฉนฺเทนาติ กุสลจฺฉนฺเทน. เนกฺขมฺมสทฺโท ปพฺพชฺชาทีสุ นิรุฬฺโห. วุตฺตญฺหิ – आता, ज्याअर्थी सुत्तांमध्ये हारांची (वाहकांची) योजना करण्याची पद्धत दाखवण्यासाठी 'हारसंपातदेसना' आहे, केवळ हारांचे स्वरूप दाखवण्यासाठी 'हारविभंगदेसना' सारखी नाही; म्हणून पेटकोपदेसामध्ये आलेल्या पद्धतीनुसार इतर विपर्यायांद्वारे (उलट क्रमाने) हारसंपात योजनेची पद्धत दाखवताना 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे, विद्या आणि अविद्या यांच्याद्वारे, तसेच कुशल व अकुशल चित्ताच्या प्रवृत्तीद्वारे अलोभ, अद्वेष, लोभ आणि द्वेष हे देखील कारणभावामुळे (निदानभावामुळे) परंपरेने प्रवृत्त होतात, हे दाखवताना 'सहा धर्म... पे... मूळ आहेत' असे म्हटले आहे. आणि ज्याप्रमाणे कारणभावामुळे पूर्वगामीत्व (अग्रगामीत्व) असते, त्याचप्रमाणे स्वतःच्या वशामध्ये ठेवण्याने देखील पूर्वगामीत्व प्राप्त होतेच, म्हणून म्हटले आहे - 'अधिपती असणाऱ्यांचे अधिपती, सर्व चित्तोत्पादांचे इंद्रिय आहेत.' 'अलोभाचे' म्हणजे अलोभाने युक्त असलेल्या चित्तोत्पादाचे. 'नेक्खम्मच्छंदाने' (नैष्क्रम्यच्छंदाने) म्हणजे कुशल छंदाने (कुशल इच्छेने). 'नेक्खम्म' (नैष्क्रम्य) हा शब्द प्रव्रज्या (दीक्षा) इत्यादींमध्ये रूढ आहे. कारण असे म्हटले आहे - ‘‘ปพฺพชฺชา ปฐมํ ฌานํ, นิพฺพานญฺจ วิปสฺสนา; สพฺเพปิ กุสลา ธมฺมา, ‘เนกฺขมฺม’นฺติ ปวุจฺจเร’’ติ. (อิติวุ. อฏฺฐ. ๑๐๙; ที. นิ. ฏี. ๒.๓๕๙; อ. นิ. ฏี. ๒.๒.๖๖) – 'प्रव्रज्या (दीक्षा), प्रथम ध्यान, निब्बान (निर्वाण) आणि विपस्सना; तसेच सर्व कुशल धर्म देखील 'नेक्खम्म' (नैष्क्रम्य) म्हटले जातात.' เตสุ อิธ กุสลา ธมฺมา อธิปฺเปตา. เตน วุตฺตํ ‘‘กุสลจฺฉนฺเทนา’’ติ. เนกฺขมฺมจฺฉนฺเทน อุปนิสฺสยภูเตน, น อธิปติภูเตน. อิทํ วุตฺตํ โหติ – อโลภปฺปธาโน เจ จิตฺตุปฺปาโท โหติ, เนกฺขมฺมจฺฉนฺเทน อุปนิสฺสยภูเตน มโน ตสฺส ปุพฺพงฺคโม โหติ. เสสปททฺวเยปิ เอเสว นโย. त्यांपैकी येथे कुशल धर्म अभिप्रेत आहेत. म्हणूनच 'कुशलच्छंदाने' असे म्हटले आहे. उपनिस्सयभूत (प्रबळ आधारभूत) असलेल्या नेक्खम्मच्छंदाने, अधिपतीभूत असलेल्या नाही. हे असे म्हटले आहे - जर चित्तोत्पाद अलोभप्रधान असेल, तर उपनिस्सयभूत असलेल्या नेक्खम्मच्छंदाने मन त्याचे पूर्वगामी (अग्रगामी) होते. उर्वरित दोन पदांमध्येही हाच नियम लागू होतो. ยทคฺเคน เตสํ ธมฺมานํ มโน ปุพฺพงฺคมํ, ตทคฺเคน เตสํ เชฏฺฐํ, ปธานญฺจาติ วุตฺตํ ‘‘มโนเสฏฺฐาติ มโน เตสํ ธมฺมาน’’นฺติอาทิ. มโนมยตา มเนน กตาทิภาโว, โส จ มนสฺส เตสํ สหชาตาทินา ปจฺจยภาโว เอวาติ วุตฺตํ ‘‘มโนมยาติ…เป… ปจฺจโย’’ติ. เต ปนาติ เอตฺถ ปน-สทฺโท วิเสสตฺถทีปโก, เตเนตํ ทสฺเสติ – ยทิปิ เตสํ ธมฺมานํ ฉนฺทาทโยปิ ปจฺจยา เอว, อินฺทฺริยาทิปจฺจเยน ปน สวิเสสํ ปจฺจยภูตสฺส มนสฺเสว วเสเนว วุตฺตํ ‘‘มโนมยา’’ติ. ตตฺถ ฉนฺทสมุทานีตาติ ยถาวุตฺตเนกฺขมฺมาทิฉนฺเทน สมฺมา อุทฺธมุทฺธํ นีตา, ตโต สมุทาคตาติ อตฺโถ. ตโต เอว เนกฺขมฺมวิตกฺกาทิโต สมุปฺปนฺนตฺตา อนาวิลสงฺกปฺปสมุฏฺฐานา. ตชฺชามโนวิญฺญาณธาตุสมฺผสฺเสน สหาธิฏฺฐานโต ผสฺสสโมธานา. ‘‘ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ, ผุฏฺโฐ เจเตตี’’ติ (สํ. นิ. ๔.๙๓) หิ วุตฺตํ. อิทํ มโนกมฺมนฺติ กายงฺควาจงฺคโจปนํ อกตฺวา สทฺธาสมนฺนาคเตน ปสนฺเนน มนสา ปวตฺตํ อิทํ กุสลํ มโนกมฺมํ. ตํ ปน [Pg.101] อนภิชฺฌาสหคตํ, อพฺยาปาทสหคตํ, สมฺมาทิฏฺฐิสหคตนฺติ ติวิธํ โหติ. ज्या अर्थाने मन त्या धर्मांचे पूर्वगामी आहे, त्याच अर्थाने ते त्यांचे ज्येष्ठ आणि प्रधान आहे, म्हणूनच 'मनोसेट्ठा म्हणजे मन त्या धर्मांचे...' इत्यादी म्हटले आहे. 'मनोमयता' म्हणजे मनाने बनविलेले असणे इत्यादी भाव, आणि तो मनाचा त्यांच्याशी सहजात इत्यादींद्वारे असलेला प्रत्ययभाव (कारणभाव) च आहे, म्हणूनच 'मनोमया... पे... प्रत्यय (कारण)' असे म्हटले आहे. 'पण ते' (ते पन) - येथे 'पन' हा शब्द विशेष अर्थ दर्शवणारा आहे, त्याद्वारे हे दाखवले आहे की - जरी त्या धर्मांचे छंद इत्यादी देखील प्रत्यय (कारण) आहेत, तरीही इंद्रिय इत्यादी प्रत्ययांद्वारे विशेष रूपाने प्रत्ययभूत असलेल्या मनाच्याच वशामुळे 'मनोमया' असे म्हटले आहे. तेथे 'छंदसमुदानीता' म्हणजे वर सांगितलेल्या नेक्खम्म इत्यादी छंदाने योग्य प्रकारे वरच्या वर नेलेले, म्हणजेच त्यापासून उत्पन्न झालेले असा अर्थ आहे. त्याच कारणाने, नेक्खम्मवितक्क (नैष्क्रम्यवितर्क) इत्यादींपासून उत्पन्न झाल्यामुळे ते 'अनाविलसंकप्पसमुट्ठाना' (अनाविल संकल्पातून उत्पन्न झालेले) आहेत. त्यापासून उत्पन्न झालेल्या मनोविज्ञाणधातूच्या संस्पर्शाने एकत्र अधिष्ठित झाल्यामुळे ते 'फस्ससमोधाना' (स्पर्शसंयुत) आहेत. कारण भगवान म्हणाले आहेत - 'भिक्खूहो, स्पर्श झालेलाच वेदन करतो (अनुभवतो), स्पर्श झालेलाच संज्ञा करतो (जाणतो), स्पर्श झालेलाच चेतना करतो (इच्छा करतो).' हे 'मनोकम्म' (मानसिक कर्म) म्हणजे कायिक आणि वाचिक हालचाल न करता, श्रद्धेने युक्त अशा प्रसन्न मनाने प्रवृत्त झालेले हे कुशल मनोकम्म होय. ते अनभिध्यासहगत (लोभरहित), अब्यापादसहगत (द्वेषरहित) आणि सम्मादिट्ठिसहगत (सम्यक् दृष्टीयुक्त) असे त्रिविध असते. ภาสตีติ อวิสํวาทนาทินา วาจงฺคโจปนาวเสน ปวตฺเตนฺติยา วจีวิญฺญตฺติยา สาเธตพฺพํ สาเธตีติ อตฺโถ, เตน กายทฺวารโต ปวตฺตกุสลวจีกมฺมมฺปิ สงฺคหิตํ โหติ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘วจีวิญฺญตฺติวิปฺผารโต, ตถา สาทิยนโต จ ภาสตี’’ติ. สพฺพมฺปิ วจีกมฺมํ สจฺจาทิวเสน จตุพฺพิธํ. กโรตีติ อตฺตโน, ปเรสญฺจ หิตาหิตานิ การณาการเณหิ กายงฺคโจปนาวเสน ปวตฺเตนฺติยา กายวิญฺญตฺติยา สาเธตพฺพํ สาเธตีติ อตฺโถ, เตน วจีทฺวารโต ปวตฺตกุสลกายกมฺมมฺปิ สงฺคหิตํ โหติ. ตถา จ วกฺขติ ‘‘กายวิญฺญตฺติวิปฺผารโต, ตถา สาทิยนโต จ กโรตี’’ติ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๗๖ มิสฺสกหารสมฺปาตวณฺณนา). กมฺมปถวเสน คยฺหมาเน ปาณาติปาตาทิวเสน ตํ ติวิธํ โหติ. เตนาห ‘‘อิติ ทสกุสลกมฺมปถาทสฺสิตา’’ติ. ทสปุญฺญกิริยวตฺถุวเสนาปิ คาถาย อตฺโถ ยุชฺชติ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘โส ปสนฺนจิตฺโต’’ติอาทิ. ภาสติ วา กโรติ วา เกวลํ มนสา ปวตฺตตีติ อนิยมตฺโถ วา-สทฺโท. ตถา เจว สํวณฺณิตํ. 'भासति' (बोलतो) म्हणजे अविसंवादन (सत्य बोलणे) इत्यादींद्वारे, वाचिक हालचालीच्या रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या वचीविञ्ञत्तीद्वारे (वाचिक विज्ञापनाद्वारे) जे साध्य करायचे आहे ते साध्य करतो असा अर्थ आहे; याद्वारे कायद्वारातून प्रवृत्त होणारे कुशल वचीकम्म (वाचिक कर्म) देखील समाविष्ट होते. कारण पुढे म्हटले जाईल - 'वचीविञ्ञत्तीच्या विस्ताराने, तसेच संमतीने तो बोलतो.' सर्वच वचीकम्म सत्यादींच्या आधारे चार प्रकारचे असते. 'करोति' (करतो) म्हणजे स्वतःच्या आणि इतरांच्या हिताहिताला कारणा-अकारणाने कायिक हालचालीच्या रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या कायविञ्ञत्तीद्वारे (कायिक विज्ञापनाद्वारे) जे साध्य करायचे आहे ते साध्य करतो असा अर्थ आहे; याद्वारे वाग्द्वारातून प्रवृत्त होणारे कुशल कायकम्म (कायिक कर्म) देखील समाविष्ट होते. आणि म्हणूनच पुढे म्हटले जाईल - 'कायविञ्ञत्तीच्या विस्ताराने, तसेच संमतीने तो करतो.' कर्मपथाच्या दृष्टीने विचार केला असता, प्राणातिपात (जीवहिंसा) इत्यादींच्या अभावाच्या रूपाने ते त्रिविध असते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'अशा प्रकारे दहा कुशल कर्मपथ दर्शवले आहेत.' दहा पुण्यक्रियावस्तूंच्या आधारे देखील गाथेचा अर्थ योग्य ठरतो. कारण पुढे म्हटले जाईल - 'तो प्रसन्नचित्त असलेला...' इत्यादी. 'बोलतो किंवा करतो' किंवा केवळ मनाने प्रवृत्त होतो, या अर्थाने 'वा' (किंवा) हा शब्द अनिश्चित अर्थ दर्शवणारा आहे. त्याचे स्पष्टीकरण तसेच केले गेले आहे. ทสวิธสฺส กุสลกมฺมสฺสาติ ทสวิธสฺส กุสลกมฺมปถกมฺมสฺส, วกฺขมานนเยน วา ทสปุญฺญกิริยวตฺถุสงฺขาตสฺส กุสลกมฺมสฺส. นนุ ตตฺถ ทานาทิมยํ ติวิธเมว ปุญฺญกิริยวตฺถุ วุตฺตนฺติ? สจฺจํ, ตํ ปน อิตเรสํ ตทนฺโตคธตฺตา. 'दहा प्रकारच्या कुशल कर्माचे' म्हणजे दहा प्रकारच्या कुशल कर्मपथ कर्माचे, किंवा पुढे सांगण्यात येणाऱ्या पद्धतीने दहा पुण्यक्रियावस्तू म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या कुशल कर्माचे. शंका अशी की - तेथे दान इत्यादींनी युक्त तीनच पुण्यक्रियावस्तू सांगितल्या आहेत ना? सत्य आहे, परंतु इतर गोष्टींचा त्यातच अंतर्भाव होत असल्यामुळे तसे म्हटले आहे. ‘‘สุขมนฺเวตี’’ติ สงฺเขเปน วุตฺตํ สุขานุคมํ วิตฺถาเรน ทสฺเสนฺโต ‘‘อิธสฺสุ ปุริโส’’ติอาทิมาห. ตตฺถ เอวํ สนฺตนฺติ เอวํ ภูตํ, อปฺปหีนานุสโย หุตฺวา สุขเวทนียผสฺสสมฺภูตนฺติ อตฺโถ. 'सुख पाठीमागे येते' (सुखमन्वेति) असे संक्षेपाने सांगितलेल्या सुखाच्या अनुगमनाला विस्ताराने दाखवताना 'येथे एखादा मनुष्य...' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'असे असताना' (एवं संतं) म्हणजे अशी स्थिती असताना, अनुशय नष्ट न झाल्यामुळे सुखवेधनीय स्पर्शापासून उत्पन्न झालेले, असा अर्थ आहे. ตตฺถ ‘‘ยํ มโน’’ติอาทินา คาถาตฺถวเสน จตุสจฺจํ นิทฺธาเรติ. อาทิโต ววตฺถาปิเตสุ ขนฺธาทีสุ ขนฺธมุเขน สจฺจานํ กถิตตฺตา สตฺตานํ ภินฺนรุจิภาวโต นานานเยหิ วิปสฺสนาภูมิโกสลฺลตฺถํ, ปุพฺพาปรสมฺพนฺธทสฺสนตฺถญฺจ เอวํ วุตฺตํ ‘‘เอวํ…เป… นิทฺธาเรตพฺพานี’’ติ. สจฺจมุเขน อสฺสาทาทิเก นิทฺธาเรตฺวา เทสนาหารสมฺปาตํ โยเชตุํ ‘‘ตตฺถ สมุทเยนา’’ติอาทิมาห, ตํ วุตฺตนยเมว. ยญฺเหตฺถ อญฺญมฺปิ อตฺถโต น วิภตฺตํ, ตํ เหฏฺฐา วุตฺตนยตฺตา, อุตฺตานตฺถตฺตา จาติ เวทิตพฺพํ. तेथे 'जे मन' (यं मनो) इत्यादी गाथेच्या अर्थाच्या आधारे चार आर्यसत्यांचे निर्धारण केले आहे. सुरुवातीला निश्चित केलेल्या स्कंध इत्यादींमध्ये स्कंधांच्या माध्यमातून सत्यांचे कथन केले असल्यामुळे, प्राण्यांच्या भिन्न आवडीनुसार विविध पद्धतींनी विपस्सनाभूमीमध्ये कौशल्य प्राप्त करण्यासाठी आणि पूर्व-पर संबंध दाखवण्यासाठी 'अशा प्रकारे... पे... निर्धारित केले पाहिजेत' असे म्हटले आहे. सत्याच्या माध्यमातून आस्वाद इत्यादींचे निर्धारण करून देसनाहारसंपात (देशनाहारसंपात) जोडण्यासाठी 'तेथे समुदयाने...' इत्यादी म्हटले आहे, ते आधी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. येथे जे काही इतर गोष्टींचे अर्थाच्या दृष्टीने वर्गीकरण केलेले नाही, ते खाली सांगितलेल्या पद्धतीनुसार आणि स्पष्ट अर्थाचे असल्यामुळे समजून घ्यावे. มนนลกฺขเณติ [Pg.102] มนนลกฺขณเหตุ. ‘‘มนนลกฺขเณนา’’ติ วา ปาโฐ. อีหาภาวโต พฺยาปาราภาวโต. เยน ปสาเทน สมนฺนาคตตฺตา มโน ‘‘ปสนฺโน’’ติ วุตฺโต, ตสฺส ปสาทสฺส กิจฺจํ มเน อาโรเปตฺวา อาห ‘‘อกาลุสิยโต, อารมฺมณสฺส โอกปฺปนโต จ ปสนฺเนนา’’ติ. ตถา สาทิยนโตติ วาจาย วตฺตพฺพํ อวตฺวาว ผสฺสสาทิยนโต อนุชานโต. ทุติเย ตถา สาทิยนโตติ กาเยน กาตพฺพํ ยถา กตํ โหติ, ตถา วาจาย สํวิธานโต. ตถา ปสุตตฺตาติ ยถา สุขมนฺเวติ, ตถา อุปจิตตฺตา เอวาติ อตฺโถ. ตโตติ ตโต การณา, มนสา ปสนฺเนน, ภาสเนน, กรเณน จ เหตุนาติ วุตฺตํ โหติ. อนญฺญตฺถาติ เอตสฺมึ ปน อตฺเถ. ตโตติ ตโต เอว. โย หิ ปสนฺนมโน เตน ยํ ภาสนํ, กรณญฺจ, ตโต เอว นํ สุขมนฺเวตีติ วุตฺตํ โหติ. สาตภาวโตติ สาตเวทนาภาวโต. อิฏฺฐภาวโตติ มนาปภาวโต. กมฺมโต วิปากุปฺปตฺติผลทานสมตฺถภาเวน กมฺมสฺส นิพฺพตฺตตฺตา วิปากสฺเสว อนิพฺพตฺตตฺตาติ อาห ‘‘กตู…เป… อนฺเวตีติ วุตฺต’’นฺติ การณายตฺต วุตฺติโตติ กตภาวเหตุกตฺตา กมฺมสฺสาติ อธิปฺปาโย. อสงฺกนฺติโตติ ยสฺมึ สนฺตาเน กมฺมํ นิพฺพตฺตํ, ตทญฺญสนฺตานา สงฺกมนโต. 'मननलक्षणेति' म्हणजे मनन करण्याच्या लक्षणाच्या कारणाने. किंवा 'मननलक्षणेन' असा पाठ आहे. चेष्टा (ईहा) नसणे आणि व्यापाराचा अभाव असणे या अर्थाने. ज्या प्रसन्नतेने युक्त असल्यामुळे मनाला 'प्रसन्न' म्हटले आहे, त्या प्रसन्नतेचे कार्य मनावर आरोपित करून 'अकालुष्यतेमुळे (मळभ नसणे) आणि आलंबनाचा स्वीकार केल्यामुळे प्रसन्न झालेल्या' असे म्हटले आहे. तसेच 'साधियन्तो' (स्वीकार करणे) म्हणजे वाणीने बोलण्यायोग्य न बोलताच स्पर्शाचा स्वीकार करून अनुमती देणे. दुसऱ्यामध्ये 'तथा साधियन्तो' म्हणजे शरीराने जे करायचे आहे ते जसे केले जाते, तसेच वाणीने त्याचे आयोजन करणे. 'तथा पसुतत्ता' म्हणजे जसे सुख पाठीमागे येते, तसेच ते संचित झाल्यामुळेच, असा अर्थ आहे. 'ततो' म्हणजे त्या कारणाने, प्रसन्न मनाने बोलणे आणि करणे या हेतूने, असे म्हटले आहे. 'अनञ्ञत्था' म्हणजे याच अर्थामध्ये. 'ततो' म्हणजे त्यापासूनच. कारण जो प्रसन्न मनाचा असतो, त्याने जे बोलणे आणि करणे केले आहे, त्यापासूनच सुख त्याच्या पाठीमागे येते, असे म्हटले आहे. 'सातभावतो' म्हणजे सुखद वेदनेच्या भावामुळे. 'इट्ठभावतो' म्हणजे मनाला अनुकूल (प्रिय) असण्याच्या भावामुळे. कर्मापासून विपाकाची उत्पत्ती आणि फल देण्याच्या सामर्थ्यामुळे कर्माची उत्पत्ती होते, विपाकाची स्वतःहून उत्पत्ती होत नाही, म्हणून 'कतू...पे... अन्वेतीति वृत्तं' (केलेल्या... सुख पाठीमागे येते) असे म्हटले आहे, कारण ते कर्माच्या केलेल्या भावाच्या हेतूवर अवलंबून असते, असा अभिप्राय आहे. 'असं कन्ति' म्हणजे ज्या संतानमध्ये (प्रवाहामध्ये) कर्म उत्पन्न झाले आहे, त्यातून दुसऱ्या संतानमध्ये संक्रमण न होणे. อาธิปจฺจโยคโตติ สหชาตาธิปติวเสน อาธิปจฺจยุตฺตตฺตา. สหชาตธมฺมานญฺหิ ตํสมฺปยุตฺตสฺส มนสฺส วเสน ปุพฺพงฺคมตา อิธาธิปฺเปตา. ตโต เอวาติ อาธิปจฺจโยคโต เอว. มนสฺสาติ อุปโยคตฺเถ สามิวจนํ. เตสํ ธมฺมานนฺติ สมฺพนฺโธ. กุสลภาโว ยุชฺชติ ปสาทสฺส โยนิโสมนสิการเหตุกตฺตา. นนุ วิภชฺชพฺยากรเณสุ เตสํ สาวกานํ สทฺธา อุปฺปชฺชตีติ? นายํ สทฺธา, ตทาการา ปน อกุสลา ธมฺมา ตถา วุจฺจนฺตีติ เวทิตพฺพํ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘นายํ ปสาโท’’ติอาทิ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๗๖ มิสฺสกหารสมฺปาตวณฺณนา). สุขํ อนฺเวตีติ ยุชฺชติ กมฺมสฺส ผลทาเน สมตฺถภาวโต. ยถา หิ กตํ กมฺมํ ผลทานสมตฺถํ โหติ, ตถา กตํ อุปจิตนฺติ วุจฺจตีติ. 'आधिपच्चयोगतो' म्हणजे सहजात अधिपतीच्या प्रभावाने आधिपत्य युक्त असल्यामुळे. कारण सहजात धर्मांमध्ये त्या संप्रयुक्त मनाच्या प्रभावाने 'पूर्वांगमत्व' (अग्रगामी असणे) येथे अभिप्रेत आहे. 'ततो एव' म्हणजे आधिपत्य योगामुळेच. 'मनस्स' ही द्वितीयेच्या अर्थात षष्ठी विभक्ती आहे. 'तेसां धम्मानं' (त्या धर्मांचा) असा संबंध आहे. प्रसन्नतेचे कारण योनिसोमनसिकार (योग्य विचार) असल्यामुळे कुशलभाव योग्य ठरतो. प्रश्न पडतो की, विभज्जव्याकरणांमध्ये (विश्लेषणात्मक स्पष्टीकरणात) त्या श्रावकांमध्ये श्रद्धा उत्पन्न होते का? ही श्रद्धा नाही, तर त्या आकाराचे अकुशल धर्म तसे म्हटले जातात, असे जाणावे. कारण पुढे म्हटले जाईल की 'नायं पसादो' (ही प्रसन्नता नाही) इत्यादी (नेत्ति. अट्ठ. ७६ मिस्सकहारसंपातवण्णना). 'सुखं अन्वेति' (सुख पाठीमागे येते) हे योग्य आहे, कारण कर्मामध्ये फल देण्याचे सामर्थ्य असते. कारण जसे केलेले कर्म फल देण्यास समर्थ असते, तसेच केलेले कर्म 'उपचित' (संचित) म्हटले जाते. มโนปวิจารา อิธ เนกฺขมฺมสิตา โสมนสฺสูปวิจารา, อุเปกฺขูปวิจารา จ เวทิตพฺพา กุสลาธิการตฺตา. เต ปน ยสฺมา จิตฺตํ นิสฺสาเยว ปวตฺตนฺติ, นานิสฺสาย, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘มโน มโนปวิจารานํ ปทฏฺฐาน’’นฺติ. กุสลปกฺขสฺส ปทฏฺฐานนฺติ เอตฺถ กุสโล ตาว ผสฺโส กุสลสฺส เวทนากฺขนฺธสฺส [Pg.103] สญฺญากฺขนฺธสฺส สงฺขารกฺขนฺธสฺส สหชาตาทินา ปจฺจโย โหติ. ‘‘ผุฏฺโฐ, ภิกฺขเว, เวเทติ, ผุฏฺโฐ สญฺชานาติ, ผุฏฺโฐ เจเตตี’’ติ (สํ. นิ. ๔.๙๓) วุตฺตํ. เอวํ เวทนาทีนมฺปิ เวทิตพฺพํ. สทฺธาทีนมฺปิ ปจฺจยภาเว วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. สพฺพสฺสาติ จตุภูมกสฺส. กามาวจรา หิ กุสลา ธมฺมา ยถารหํ จตุภูมกสฺสาปิ กุสลสฺส ปจฺจยา โหนฺติ, เอวํ อิตรภูมกาปิ. येथे 'मनोपविचार' हे नैष्क्रम्य-आश्रित (नेक्खम्मसित) सौमनस्योपविचार आणि उपेक्षोपविचार म्हणून जाणावेत, कारण हा कुशल अधिकार आहे. परंतु ते ज्याअर्थी चित्ताचा आश्रय घेऊनच प्रवृत्त होतात, आश्रयाशिवाय नाही, म्हणून 'मन हे मनोपविचारांचे पदस्थान (जवळचे कारण) आहे' असे म्हटले आहे. 'कुशलपक्षाचे पदस्थान' यामध्ये प्रथम कुशल स्पर्श हा कुशल वेदनास्कंध, संज्ञास्कंध आणि संस्कारस्कंधाचा सहजात इत्यादी प्रत्ययाने (कारणाने) प्रत्यय होतो. 'भिक्खूहो, स्पर्श झाल्यावरच वेदन होते (अनुभव येतो), स्पर्श झाल्यावरच संज्ञा होते (ओळख होते), स्पर्श झाल्यावरच चेतना होते' (सं. नि. ४.९३) असे म्हटले आहे. याचप्रमाणे वेदना इत्यादींचेही जाणावे. श्रद्धा इत्यादींच्या प्रत्ययभावाविषयी (कारण असण्याविषयी) तर बोलण्याची गरजच नाही. 'सब्बस्स' म्हणजे चारही भूमींच्या (चित्तभूमींच्या). कारण कामावचर कुशल धर्म योग्यतेनुसार चारही भूमींच्या कुशल धर्मांचे प्रत्यय होतात, तसेच इतर भूमींचेही होतात. ‘‘ปสนฺเนน มนสา ภาสตี’’ติ วุตฺตตฺตา วิเสสโต สมฺมาวาจาปจฺจยํ ภาสนํ อิธาธิปฺเปตนฺติ วุตฺตํ ‘‘ภาสตีติ สมฺมาวาจา’’ติ. ตตฺถายมธิปฺปาโย ‘‘ภาสตีติ ยมิทํ ปทํ, อิมินา สมฺมาวาจา คหิตา โหตี’’ติ. กโรตีติ สมฺมากมฺมนฺโตติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. สุปริสุทฺเธ กายวจีกมฺเม ฐิตสฺส อาชีวปาริสุทฺธิ, น อิตรสฺสาติ วุตฺตํ ‘‘เต สมฺมาอาชีวสฺส ปทฏฺฐาน’’นฺติ. ตตฺถ เตติ สมฺมาวาจากมฺมนฺตา. ยสฺมา ปน อาชีวฏฺฐมเก สีเล ปติฏฺฐิตสฺส อุปฺปนฺนานุปฺปนฺนานํ อกุสลธมฺมานํ ปหานานุปฺปาทนานิ, อนุปฺปนฺนุปฺปนฺนานํ กุสลธมฺมานํ อุปฺปาทนปาริปูริยา จ สมฺภวนฺติ, ตถา สมฺมาวายาเม ฐิตสฺเสว กายาทีสุ สุภสญฺญาทิวิทฺธํสินี สมฺมาสติ สมฺภวติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘สมฺมาอาชีโว…เป…ปทฏฺฐาน’’นฺติ. เชฏฺฐกสีลํ ปาติโมกฺขสํวโร, สทฺธาสาธโน จ โสติ อาห ‘‘ตํ สีลสฺส ปทฏฺฐาน’’นฺติ. 'प्रसन्न मनाने बोलतो' असे म्हटल्यामुळे विशेषतः सम्यक्-वाचेचा प्रत्यय (कारण) असलेले बोलणे येथे अभिप्रेत आहे, म्हणून 'भासतीति सम्मावाचा' (बोलतो म्हणजे सम्यक्-वाचा) असे म्हटले आहे. त्यामध्ये हा अभिप्राय आहे की 'भासति' (बोलतो) या पदाने सम्यक्-वाचा ग्रहण केली जाते. 'करोति' (करतो) म्हणजे सम्यक्-कर्मान्त, यामध्येही हाच नियम आहे. अत्यंत शुद्ध अशा कायिक आणि वाचिक कर्मामध्ये स्थित असलेल्या व्यक्तीचीच आजीविका शुद्ध (आजीवपारिसुद्धि) होते, इतरांची नाही, म्हणून 'ते सम्यक्-आजीविकेचे पदस्थान आहेत' असे म्हटले आहे. तेथे 'ते' म्हणजे सम्यक्-वाचा आणि सम्यक्-कर्मान्त. परंतु ज्याअर्थी आजीव-अष्टमक शीलामध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या व्यक्तीला उत्पन्न झालेल्या आणि न झालेल्या अकुशल धर्मांचे प्रहाण (त्याग) व अनुत्पाद, आणि न उत्पन्न झालेल्या व उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांची उत्पत्ती व परिपूर्ती शक्य होते, तसेच सम्यक्-व्यायामामध्ये स्थित असलेल्यालाच काया इत्यादींमध्ये शुभसंज्ञा इत्यादींचा नाश करणारी सम्यक्-स्मृती संभवते, म्हणून 'सम्यक्-आजीव...पे... पदस्थान' असे म्हटले आहे. ज्येष्ठ शील म्हणजे प्रातिमोक्ष-संवर शील होय, आणि ते श्रद्धेने साध्य होते, म्हणून 'ते शीलाचे पदस्थान आहे' असे म्हटले आहे. เตสนฺติ กายวจีกมฺมานํ. กมฺมปจฺจยตายาติ กุสลกมฺมเหตุกตาย. 'तेसं' म्हणजे कायिक आणि वाचिक कर्मांचे. 'कम्मपच्चायताया' म्हणजे कुशल कर्माच्या हेतूपणामुळे. ปทตฺโถ จ วุตฺตนเยนาติ ‘‘มนนโต อารมฺมณวิชานนโต’’ติอาทินา. आणि 'पदार्थो च वृत्तनयेन' म्हणजे 'मनन करण्यामुळे, आलंबन जाणण्यामुळे' इत्यादी सांगितलेल्या पद्धतीने. อยํ อาวฏฺโฏติ อยํ สภาควิสภาคธมฺมาวฏฺฏนวเสน อาวฏฺโฏ. เอตฺถ หิ กุสลมูลสมฺมตฺตมคฺคาทินิทฺธารณา สภาคธมฺมาวฏฺฏนา. อวิชฺชาภวตณฺหานํ นิทฺธารณา วิสภาคธมฺมาวฏฺฏนา. 'अयं आवट्टो' (हा आवर्त आहे) म्हणजे हा सभाग (समान) आणि विसभाग (असमान) धर्मांच्या आवर्तनाच्या (फिरण्याच्या) वशाने आवर्त आहे. येथे कुशलमूळ, सम्यक्त्वमार्ग इत्यादींचे निर्धारण करणे हे सभाग-धर्मांचे आवर्तन आहे. अविद्या, भव आणि तृष्णा यांचे निर्धारण करणे हे विसभाग-धर्मांचे आवर्तन आहे. วิภตฺติหาเร ปทฏฺฐานภูมิวิภาคา วุตฺตนยา, สุวิญฺเญยฺยา จาติ ธมฺมวิภาคเมว ทสฺเสนฺโต ‘‘นยิท’’นฺติอาทิมาห. ตตฺถ ‘‘นยิทํ ยถารุตวเสน คเหตพฺพ’’นฺติ สุตฺตสฺส เนยฺยตฺถตํ วตฺวา ‘‘โยหี’’ติอาทินา ตํ วิวรติ. ‘‘ทุกฺขเมว อนฺเวตี’’ติ กสฺมา วุตฺตํ, นนุ ยตฺถ กตฺถจิ หิเตสิตา กุสลเมวาติ? นยิทมีทิสํ สนฺธาย วุตฺตํ, อธมฺมํ ปน ธมฺโมติ, ธมฺมญฺจ ปน [Pg.104] อธมฺโมติ ทีปเนน โลกสฺส สพฺพานตฺถพีชภูเตสุ สกลหิตสุขุปายปฏิกฺเขปเกสุ ติตฺถกเรสุ อสนฺตคุณสมฺภาวนวเสน ปวตฺตมิจฺฉาธิโมกฺขํ สนฺธาย วุตฺตํ. โย หิ โลเก อปฺปมตฺตกมฺปิ ปุญฺญํ กาตุกามํ ปาปิกํ ทิฏฺฐึ นิสฺสาย ปฏิพาหติ, โสปิ คารยฺโห, กิมงฺคํ ปน อริยวินเย สมฺมาปฏิปตฺตึ ปฏิพาหนฺเตสูติ ทุกฺขผลาว ตตฺถ สมฺภาวนาปสํสา ปยิรุปาสนา. ตถา หิ วุตฺตํ – ‘‘น โข อหํ, โมฆปุริส, อรหตฺตสฺส มจฺฉรายามิ, อปิจ ตุยฺเหเวตํ ปาปกํ ทิฏฺฐิคตํ…เป… ทีฆรตฺตํ อหิตาย ทุกฺขาย สํวตฺตตี’’ติ (ที. นิ. ๓.๗), ‘‘โย นินฺทิยํ ปสํสติ (สุ. นิ. ๖๖๓; สํ. นิ. ๑.๑๘๐, ๑๘๑; อ. นิ. ๔.๓; เนตฺติ. ๙๒), สพฺพสฺสาปิ อนตฺถสฺส มูลํ พาลูปเสวนา’’ติ จ. विभत्तिहारामध्ये पदस्थान आणि भूमींचे विभाग सांगितलेल्या पद्धतीने सहज समजण्यासारखे आहेत, म्हणून धर्मांचा विभागच दर्शवताना 'नयिदं' (हे असे नाही) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'नयिदं यथारुतवसेन गहेतब्बं' (हे शब्दांच्या केवळ बाह्य अर्थानुसार ग्रहण करू नये) असे सूत्राचे नेय्यार्थत्व (अप्रत्यक्ष अर्थ) सांगून 'यो ही' इत्यादींनी त्याचे विवरण केले आहे. 'दुःखच पाठीमागे येते' असे का म्हटले आहे? कोणत्याही ठिकाणी हित इच्छिणे हे कुशलच असते ना? हे अशा प्रकारचा उद्देश ठेवून म्हटलेले नाही, तर अधर्माला धर्म आणि धर्माला अधर्म असे दाखवून जगातील सर्व अनर्थांचे बीज असलेल्या, सर्व हित व सुखाच्या उपायांचा निषेध करणाऱ्या तीर्थकरांविषयी (पाखंडी गुरू) असत्य गुणांच्या कल्पनेमुळे प्रवृत्त होणाऱ्या मिथ्या-अधिमोक्षाला (चुकीच्या विश्वासाला) उद्देशून म्हटले आहे. कारण जो जगात थोडेसेही पुण्य करू इच्छिणाऱ्याला पापी दृष्टीचा आश्रय घेऊन रोखतो, तो देखील निंदनीय आहे, मग आर्यविनयातील सम्यक्-प्रतिपत्तीला (योग्य आचरणाला) रोखणाऱ्यांविषयी काय बोलावे! तेथे तर आदर, प्रशंसा आणि सेवा यांचे फल दुःखच असते. कारण असे म्हटले आहे - 'हे मोघपुरुषा, मी अर्हत्त्वाचा मत्सर करत नाही, परंतु तुझी ही पापी दृष्टी...पे... दीर्घकाळापर्यंत अहितासाठी आणि दुःखासाठी कारणीभूत ठरेल' (दी. नि. ३.७), 'जो निंदनीयाची प्रशंसा करतो' (सु. नि. ६६३; सं. नि. १.१८०, १८१; अ. नि. ४.३; नेत्ति. ९२), आणि 'सर्व अनर्थांचे मूळ मूर्खांची संगत (बालोपसेवना) आहे' असे। อิทญฺหิ สุตฺตนฺติ ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา…เป…ปท’’นฺติ (ธ. ป. ๑, ๒) ปฐมํ คาถํ สนฺธาย วทติ. เอตสฺสาติ สํวณฺณิยมานสุตฺตสฺส. कारण हे सूत्र ‘मनोपुब्बङ्गमा...पे...पदं’ (धम्मपद १, २) या पहिल्या गाथेचा संदर्भ देऊन बोलते. ‘एतस्स’ (याचे) म्हणजे स्पष्टीकरण केल्या जाणाऱ्या सूत्राचे. กิจฺจปญฺญตฺตีติ อธิปติปจฺจยสงฺขาตสฺส กิจฺจสฺส ปญฺญาปนํ. ปธานปญฺญตฺตีติ ปธานภาวสฺส ปญฺญาปนา. สหชาตปญฺญตฺตีติ เตสํ ธมฺมานํ มนสา สหภาวปญฺญาปนา. ‘किच्चपञ्ञत्ति’ (कृत्यप्रज्ञप्ती) म्हणजे अधिपती-प्रत्यय म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या कृत्याचे प्रज्ञापन (स्पष्टीकरण). ‘पधानपञ्ञत्ति’ (प्रधानप्रज्ञप्ती) म्हणजे प्रधानभावाचे प्रज्ञापन. ‘सहजातपञ्ञत्ति’ (सहजातप्रज्ञप्ती) म्हणजे त्या धर्मांचे मनासोबत सहअस्तित्व (सहभाव) प्रज्ञापित करणे. มหาภูตาตีติ อิติสทฺโท อาทิอตฺโถ, เตน มหาภูตาวินาภาวี สพฺโพ รูปธมฺโม สงฺคยฺหติ. ‘महाभूताति’ मधील ‘इति’ हा शब्द ‘इत्यादी’ या अर्थाने आहे, ज्याद्वारे महाभूतांपासून अविनाभावी (वेगळे न होऊ शकणारे) सर्व रूपधर्म समाविष्ट केले जातात. ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา’’ติ สมาสปเท ‘‘มโน’’ติ ปทํ ตทวยวมตฺตนฺติ อาห ‘‘เนว ปทสุทฺธี’’ติ. เตเนวาห ‘‘มโนปุพฺพงฺคมาติ ปทสุทฺธี’’ติ. ‘‘ฉายาว อนปายินี’’ติ อิทํ สุขานุคมสฺส อุทาหรณมตฺตํ, น ยถาธิปฺเปตตฺถปริสมาปนํ. ‘‘สุขมนฺเวตี’’ติ ปน ยถาธิปฺเปตตฺถปริสมาปนนฺติ วุตฺตํ ‘‘ปทสุทฺธิ เจว อารมฺภสุทฺธิ จา’’ติ. ‘मनोपुब्बङ्गमा’ या सामासिक पदात ‘मनो’ हे पद केवळ त्याचा एक अवयव (भाग) आहे, म्हणून ‘नेव पदसुद्धी’ (केवळ पदशुद्धी नाही) असे म्हटले आहे. म्हणूनच ‘मनोपुब्बङ्गमा इति पदसुद्धी’ असे म्हटले आहे. ‘छायाव अनपायिनी’ (कधीही सोडून न जाणारी सावली) हे केवळ सुखाच्या अनुगमनाचे (मागोव्याचे) उदाहरण आहे, अभिप्रेत असलेल्या अर्थाची पूर्णता नाही. परंतु ‘सुखमन्वेति’ (सुख पाठीमागे येते) हे अभिप्रेत असलेल्या अर्थाची पूर्णता आहे, म्हणून ‘पदसुद्धी चेव आरम्भसुद्धी चा’ (पदशुद्धी आणि आरंभशुद्धी दोन्ही) असे म्हटले आहे. เอกตฺตตาติ มโนปุพฺพงฺคมาทิสามญฺญํ สนฺธาย วทติ. เอวํ เสเสสุปิ. เวมตฺตตา ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา’’ติอาทินา สามญฺญโต วุตฺตธมฺเม ปสาโท ธารณาย นิวตฺเตตฺวา ปสนฺนสงฺขาเต วิเสเส อวฏฺฐาปนโต. เสเสสุปิ เอเสว นโย. ปสาโท สิเนหสภาโว, อสฺสทฺธิยํ วิย ลูขสภาวํ โทสํ วิโนเทตีติ อาห ‘‘พฺยาปาทวิกฺขมฺภนโต’’ติ. พหิทฺธาติ สทฺเธยฺยวตฺถุํ สนฺธายาห. โอกปฺปนโตติ อารมฺมณํ อนุปวิสิตฺวา อนุปกฺขนฺทิตฺวา สทฺทหนโต. ‘एकत्तता’ (एकत्व) हे ‘मनोपुब्बङ्गमा’ इत्यादींच्या सामान्य भावाला अनुसरून बोलते. इतर बाबतीतही असेच आहे. ‘वेमत्तता’ (विविधता) म्हणजे ‘मनोपुब्बङ्गमा’ इत्यादींद्वारे सामान्यपणे सांगितलेल्या धर्मांमध्ये, धारणा करण्यापासून चित्ताला निवृत्त करून, प्रसन्नतेच्या विशिष्ट अवस्थेत प्रस्थापित करणे. इतरांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ‘पसादो’ (प्रसन्नता) हा स्नेहाचा स्वभाव आहे, जो अश्रद्धेप्रमाणेच रूक्ष स्वभावाच्या दोषाला दूर करतो, म्हणून ‘ब्यापादविक्खम्भनतो’ (व्यापाद-विक्षोभ दूर केल्यामुळे) असे म्हटले आहे. ‘बहिद्धा’ (बाहेर) हे श्रद्धेय वस्तूच्या संदर्भात म्हटले आहे. ‘ओकप्पनतो’ म्हणजे आलंबनात प्रवेश करून आणि त्यात झेप घेऊन श्रद्धा ठेवणे. เทยฺยธมฺมาทโยติ [Pg.105] เอตฺถ อาทิสทฺเทน สํเวคหิโรตฺตปฺปกสิณมณฺฑลาทโย สงฺคยฺหนฺติ. อิฏฺฐารมฺมณาทโยติ อาทิสทฺเทน อิฏฺฐมชฺฌตฺตารมฺมณา, ทฺวารธมฺมา, มนสิกาโรติ เอวมาทีนํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. ตถา ผสฺโสติ ยถา เวทนาทีนํ อิฏฺฐารมฺมณาทโย ปจฺจโย, เอวํ ผสฺโสปีติ ปจฺจยตาสามญฺญเมว อุปสํหรติ ตถา-สทฺโท. เวทนาทีนนฺติ หิ เวทนาทโย ตโย ขนฺธา คหิตา. วิญฺญาณสฺส เวทนาทโยติ นามรูปํ สนฺธาย วทติ. ‘देय्यधम्मादयो’ (देयधर्म इत्यादी) यामध्ये ‘आदि’ शब्दाने संवेग, ह्री-ओत्तप्प (लाज व भीती), कसिण-मंडल इत्यादींचा संग्रह होतो. ‘इट्ठारम्मणादयो’ (इष्ट आलंबन इत्यादी) यामध्ये ‘आदि’ शब्दाने इष्ट-मध्यस्थ आलंबन, द्वारधर्म, मनसिकार इत्यादींचा संग्रह समजला पाहिजे. ‘तथा फस्सो’ (तसेच स्पर्श) म्हणजे ज्याप्रमाणे वेदना इत्यादींना इष्ट आलंबन इत्यादी प्रत्यय (कारण) आहेत, त्याचप्रमाणे स्पर्श देखील आहे, अशा प्रकारे ‘तथा’ हा शब्द प्रत्ययत्वाचे सामान्यत्व दर्शवतो. ‘वेदनादीनं’ यामध्ये वेदना इत्यादी तीन स्कंध घेतले आहेत. ‘विञ्ञाणस्स वेदनादयो’ (विज्ञानाचे वेदना इत्यादी) हे नामरूपाच्या संदर्भात बोलले आहे. ‘‘สีลมยสฺส อโทโส ปทฏฺฐาน’’นฺติ วุตฺตํ ขนฺติปธานตฺตา สีลสฺส. อธิฏฺฐาตีติ อนุยุญฺชติ อุปฺปาเทติ. โสติ เอวํ กุสลจิตฺตํ ภาเวนฺโต. ‘‘อนุปฺปนฺนาน’’นฺติอาทินา ภาวนาปหานสมาโรปนานิ ทสฺเสนฺโต นิพฺเพธภาคิยวเสน คาถาย อตฺถํ วิจินิตฺวา สมาโรเปติ, เอวมฺปิ สกฺกา โยเชตุนฺติ วาสนาภาคิยวเสน ปทฏฺฐานนิทฺเทเส อุทาหรียติ. ‘शीलमयाचा अद्वेष हा पदस्थान (जवळचे कारण) आहे’ असे म्हटले आहे, कारण शील हे क्षमाप्रधान (खंतीप्रधान) असते. ‘अधिट्ठाति’ म्हणजे अनुयोग करतो (अभ्यास करतो), उत्पन्न करतो. ‘सो’ म्हणजे अशा प्रकारे कुशल चित्ताची भावना करणारा. ‘अनुप्पन्नानं’ (अनुत्पन्न) इत्यादींद्वारे भावना, प्रहाण आणि समारोपण दर्शवत, निर्वेधभागीय (भेद पाडणाऱ्या) दृष्टीने गाथेचा अर्थ निवडून समारोपित करतो; किंवा ‘अशा प्रकारेही जोडणे शक्य आहे’ म्हणून वासनाभागीय दृष्टीने पदस्थान-निर्देशात उदाहरण दिले जाते. เอวํ ‘‘มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา’’ติ คาถาย วเสน หารสมฺปาตโยชนาวิธึ ทสฺเสตฺวา อิทานิ คาถานฺตเรน ทสฺเสตุํ ‘‘ตถา ททโต ปุญฺญ’’นฺติอาทิมาห. ตตฺถ ภาวนามยนฺติ ปญฺญาภาวนามยํ. अशा प्रकारे ‘मनोपुब्बङ्गमा धम्मा’ या गाथेच्या आधारे हार-संपात योजनेची पद्धत दाखवून, आता दुसऱ्या गाथेद्वारे दाखवण्यासाठी ‘तथा ददतो पुञ्ञं’ (तसेच दान देणाऱ्याचे पुण्य) इत्यादी म्हटले आहे. तेथे ‘भावना मयं’ म्हणजे प्रज्ञाभावना-मय. ‘‘อโลโภ กุสลมูล’’นฺติอาทิ ทานาทีนํ อโลภาทิปธานตฺตา วุตฺตํ, สพฺพตฺถ จ ‘‘วุตฺต’’นฺติ ปทํ อาเนตฺวา โยเชตพฺพํ. เตสนฺติ ราคาทีนํ. นิสฺสรณนฺติ จ ปรินิพฺพานเมว สนฺธาย วทติ. ‘अलोभ हे कुशलमूळ आहे’ इत्यादी दान इत्यादींमध्ये अलोभ इत्यादींच्या प्रधानतेमुळे म्हटले आहे, आणि सर्वत्र ‘वृत्तं’ (म्हटले आहे) हे पद आणून जोडले पाहिजे. ‘तेसं’ म्हणजे राग इत्यादींचे. ‘निस्सरणं’ (निःसरण/मुक्ती) हे परिनिर्वाणाच्या संदर्भातच बोलले आहे. ปริจฺจาคสีโล อโลภชฺฌาสโย กาเมสุ อาทีนวทสฺสาวี สมฺมเทว สีลํ ปริปูเรตีติ อาห ‘‘ททโต…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ. อิธ โอฬาริกา นาม กิเลสา วีติกฺกมาวตฺถานํ, ตปฺปหานํ ตทงฺคปฺปหาเนน เวทิตพฺพํ. มชฺฌิมานนฺติ ปริยุฏฺฐานาวตฺถานํ. สุขุมานนฺติ อนุสยาวตฺถานํ. กตาวีภูมิ นฺติ ขีณาสวภูมึ. परित्याग करणारा, अलोभ-आशयाचा आणि कामांमधील (भोगांमधील) दोष पाहणारा शीलाचे चांगल्या प्रकारे परिपालन करतो, म्हणून ‘ददतो...पे... पदट्ठानं’ असे म्हटले आहे. येथे ‘ओळारिका’ (स्थूल) नावाचे क्लेश हे वीतिक्कम-अवस्था (उल्लंघन अवस्था) आहेत, त्यांचे प्रहाण तदंग-प्रहाणाने समजले पाहिजे. ‘मज्झिमानं’ (मध्यम) म्हणजे परियुठ्ठान-अवस्था (उद्भव अवस्था). ‘सुखुमानं’ (सूक्ष्म) म्हणजे अनुसय-अवस्था (सुप्त अवस्था). ‘कतावीभूमी’ म्हणजे क्षीणासव-भूमी (अर्हत भूमी). ททโตติ มคฺคสหคเตน อโลเภน สเทวกสฺส โลกสฺส อภยทานํ ททโต. ปุญฺญนฺติ โลกุตฺตรกุสลํ. สํยมโตติ มคฺคปริยาปนฺเนหิ สมฺมาวาจากมฺมนฺตาชีเวหิ ทิฏฺเฐกฏฺฐาทิสํกิเลสโต มคฺคสํยเมน สํยมนฺตสฺส. เวรนฺติ ปาณาติปาตาทิปาปํ. กุสโลติ มคฺคสมฺมาทิฏฺฐิยา กุสโล วิจกฺขโณ. ชหาติ ปาปกนฺติ เตหิ เตหิ มคฺเคหิ ตํ ตํ ปหาตพฺพํ ปาปธมฺมํ โอธิโส ชหาติ สมุจฺฉินฺทติ. เตนาห ‘‘มคฺโค วุตฺโต’’ติ. ‘ददतो’ (देणाऱ्याचे) म्हणजे मार्गसहगत अलोभाने देवलोकासहित सर्व जगाला अभयदान देणाऱ्याचे. ‘पुञ्ञं’ (पुण्य) म्हणजे लोकोत्तर कुशल. ‘संयमतो’ (संयम राखणाऱ्याचे) म्हणजे मार्गात समाविष्ट असलेल्या सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मांत आणि सम्यक् आजीविका यांच्याद्वारे, दृष्ट-एकत्व इत्यादी संक्लेशांपासून मार्ग-संयमाने स्वतःला संयमित राखणाऱ्याचे. ‘वेरं’ (वैर/पाप) म्हणजे प्राणातिपात (हिंसा) इत्यादी पाप. ‘कुसलो’ (कुशल) म्हणजे मार्ग-सम्यक् दृष्टीने कुशल, विचक्षण. ‘जहाति पापकं’ (पाप सोडतो) म्हणजे त्या त्या मार्गांनी त्या त्या प्रहातव्य (त्याग करण्यायोग्य) पापधर्माचा अंशतः त्याग करतो आणि समूळ उच्चाटन करतो. म्हणूनच ‘मग्गो वुत्तो’ (मार्ग सांगितला आहे) असे म्हटले आहे. ‘‘ททโต’’ติอาทินา [Pg.106] ปุพฺเพ อวิภาเคน กุสลมูลานิ อุทฺธฏานีติ อิทานิ วิภาเคน ตานิ อุทฺธรนฺโต ‘‘โลกิยกุสลมูล’’นฺติอาทิมาห. ‘ददतो’ इत्यादींद्वारे पूर्वी अविभागाने (एकत्रितपणे) कुशलमुळे उद्धृत केली होती, आता विभागाद्वारे (विशिष्ट वर्गीकरणाने) ती उद्धृत करताना ‘लोकियकुसलमूलं’ (लौकिक कुशलमूळ) इत्यादी म्हटले आहे. ปุถุชฺชนภูมิ เสกฺขภูมิ ทสฺสิตา ปหานสฺส วิปฺปกตภาวทีปนโต. อเสกฺขภูมิ ทสฺสิตา อนุปาทาปรินิพฺพานทีปนโต. प्रहाणाच्या अपूर्णतेचे (विप्रकृतभावाचे) प्रकटीकरण केल्यामुळे पृथग्जन-भूमी आणि शैक्ष-भूमी दर्शविली आहे. अनुपादा-परिनिर्वाणाचे प्रकटीकरण केल्यामुळे अशैक्ष-भूमी दर्शविली आहे. สคฺคคามินี ปฏิปทา ปุพฺพภาคปฺปฏิปตฺติ. ‘सग्गगामिनी पटिपदा’ (स्वर्गगामी प्रतिपदा) म्हणजे पूर्वभाग-प्रतिपत्ती (प्रारंभिक सराव). ปุญฺเญ กถิเต ปุญฺญผลมฺปิ กถิตเมว โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ททโต…เป… เทสนมาหา’’ติ. สจฺจกมฺมฏฺฐาเนน วินา สํกิเลสปฺปหานํ นตฺถีติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘กุสโล…เป… เทสนมาหา’’ติ. पुण्य सांगितले असता पुण्याचे फळही सांगितलेच जाते, म्हणून ‘ददतो...पे... देसनमाहा’ (उपदेश केला आहे) असे म्हटले आहे. सत्य-कर्मस्थानाशिवाय संक्लेशांचे प्रहाण होत नाही, हे दर्शवताना ‘कुसलो...पे... देसनमाहा’ असे म्हटले आहे. เวรสทฺโท อทินฺนาทานาทิปาปธมฺเมสุปิ นิรุฬฺโหติ วุตฺตํ ‘‘เอวํ สพฺพานิปิ สิกฺขาปทานิ วิตฺถาเรตพฺพานี’’ติ. ทฺเวปิ วิมุตฺติโย เสกฺขาเสกฺขวิมุตฺติโย, สอุปาทิเสสอนุปาทิเสสวิมุตฺติโย จ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘นิพฺพุโตติ ทฺเว นิพฺพานธาตุโย’’ติอาทิ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๗๖). ‘वेर’ (वैर) हा शब्द अदत्तादान (चोरी) इत्यादी पापधर्मांमध्येही रूढ आहे, म्हणून ‘अशा प्रकारे सर्वच शिक्षापदांचा विस्तार केला पाहिजे’ असे म्हटले आहे. दोन्ही विमुक्ती म्हणजे शैक्ष-अशैक्ष विमुक्ती आणि सोपाधिशेष-अनुपाधिशेष विमुक्ती होत. कारण पुढे ‘निब्बुतोति द्वे निब्बानधातुयो’ (मुक्त म्हणजे दोन निर्वाणधातू) इत्यादी म्हटले जाईल (नेत्तिपकरण-अट्ठकथा ७६). การณูปจาเรน, การณคฺคหเณน วา ผลํ คหิตนฺติ อาห ‘‘ทฺเว สุคติโย’’ติอาทิ. วฏฺฏวิวฏฺฏสมฺปตฺติโย อิมิสฺสา เทสนาย ผลํ, ตสฺส ทานํ สีลํ ภาวนา อุปาโย, ‘‘สมฺปตฺติทฺวยํ อิจฺฉนฺเตน ทานาทีสุ อปฺปมตฺเตน ภวิตพฺพ’’นฺติ อยเมตฺถ ภควโต อาณตฺตีติ อิมมตฺถํ สนฺธายาห ‘‘ผลาทีนิ ยถารหํ เวทิตพฺพานี’’ติ. कारणाच्या उपचाराने किंवा कारणाच्या ग्रहणाने फळ ग्रहण केले जाते, म्हणून ‘द्वे सुगतियो’ (दोन सुगती) इत्यादी म्हटले आहे. संसार आणि निर्वाण (वट्ट-विवट्ट) यांची संपत्ती हे या देशनेचे फळ आहे, आणि दान, शील व भावना हा त्याचा उपाय आहे. ‘दोन्ही संपत्तींची इच्छा करणाऱ्याने दान इत्यादींमध्ये अप्रमत्त राहिले पाहिजे’ ही येथे भगवंतांची आज्ञा आहे, हा अर्थ लक्षात घेऊन ‘फलादीनि यथारहं वेदितब्बानि’ (फळ इत्यादी योग्यतेनुसार समजले पाहिजेत) असे म्हटले आहे. วิจโยติ วิจยหารสมฺปาโต, โส วุจฺจตีติ อตฺโถ. เอส นโย อิโต ปเรสุปิ. ‘‘ติวิธมฺปิ ทานมย’’นฺติอาทินา ปทตฺถวิจยํ ทสฺเสติ, เตน อสฺสาทาทโย, อิตเร จ วิจยหารปทตฺถา อตฺถโต วิจิตา เอว โหนฺตีติ. รูปาทิอารมฺมณสฺส ปริจฺจาโค วุตฺโตติ สมฺพนฺโธ. สพฺโพติ สกโล อนวเสสโต กิจฺจสฺส วุตฺตตฺตา. ‘विचयो’ म्हणजे विचय-हार-संपात, तो सांगितला जात आहे असा अर्थ आहे. यापुढील प्रकरणांमध्येही हाच नियम आहे. ‘तिविधम्पि दानमयं’ (तिन्ही प्रकारचे दानमय) इत्यादींद्वारे पदार्थांचा विचय (विश्लेषण) दर्शवला आहे, ज्याद्वारे आस्वाद इत्यादी आणि विचय-हाराचे इतर पदार्थ अर्थाच्या दृष्टीने विश्लेषितच होतात. रूप इत्यादी आलंबनांचा परित्याग सांगितला आहे, असा संबंध आहे. ‘सब्बो’ म्हणजे संपूर्ण, निरवशेषपणे कृत्याचा उल्लेख केल्यामुळे. ทานาภิรตสฺส จาคาธิฏฺฐานํ ปาริปูรึ คจฺฉตีติ วุตฺตํ ‘‘ททโต…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ. วิรติสจฺเจ, วจีสจฺเจ จ ติฏฺฐโต สจฺจาธิฏฺฐานํ ปาริปูรึ คจฺฉตีติ วุตฺตํ ‘‘สํยม…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ. โกสลฺลโยคโต จ ปาปปฺปหานโต จ ปญฺญาปาริปูรึ คจฺฉตีติ วุตฺตํ ‘‘กุสโล…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ. อนวเสสราคาทีสุ ปหีเนสุ อุปสโม อุปฏฺฐิโต นาม โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ราค…เป… ปทฏฺฐาน’’นฺติ. दानामध्ये रममाण असलेल्याचे त्यागाचे अधिष्ठान (चागाधिट्ठान) परिपूर्णतेला जाते, असे 'देणाऱ्याचे... पे... पदस्थान' याद्वारे म्हटले आहे. विरती-सत्य आणि वचन-सत्य यामध्ये स्थित असलेल्याचे सत्याचे अधिष्ठान (सच्चाधिट्ठान) परिपूर्णतेला जाते, असे 'संयम... पे... पदस्थान' याद्वारे म्हटले आहे. कौशल्याच्या योगाने आणि पापाच्या प्रहाणाने प्रज्ञेची परिपूर्णता होते, असे 'कुशल... पे... पदस्थान' याद्वारे म्हटले आहे. संपूर्ण राग इत्यादींचा नाश (प्रहाण) झाल्यावर उपशम (शांती) प्रस्थापित होतो, असे 'राग... पे... पदस्थान' याद्वारे म्हटले आहे. กุสโลติ [Pg.107] ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน โกสลฺลสมฺมาทิฏฺฐิ วุตฺตาติ อาห ‘‘กุสโล…เป… มคฺคงฺคาทิภาเวน เอกลกฺขณตฺตา’’ติ. อาทิสทฺเทน โพธิปกฺขิยภาวาทึ สงฺคณฺหาติ. เขเปตพฺพภาเวนาติ ปหาตพฺพภาเวน. 'कुशल' म्हणजे पुद्गलाच्या अधिष्ठानाने (पुग्गलाधिट्ठान) कौशल्याची सम्यक् दृष्टी (कोसल्लसम्मादिट्ठि) सांगितली आहे, म्हणून 'कुशल... पे... मार्गांग इत्यादी भावाने एक लक्षण असल्यामुळे' असे म्हटले आहे. 'आदि' शब्दाने बोधिपक्षीय भाव इत्यादींचा संग्रह होतो. 'खेपेतब्बभावेन' (क्षय करण्याच्या भावाने) म्हणजे 'पहातब्बभावेन' (प्रहाण करण्याच्या भावाने) होय. อเวรตนฺติ อสปตฺตตํ. กุสลธมฺเมหีติ อนวชฺชธมฺเมหิ, ผลนิพฺพาเนหีติ อธิปฺปาโย. ทานสฺส มหปฺผลตา, สีลาทิคุเณหิ สตฺถุ อนุตฺตรทกฺขิเณยฺยภาโว, อนุปาทาปรินิพฺพานนฺติ อิเมสํ ปจฺจเวกฺขณา อิมสฺส ทานสฺส นิทานนฺติ อยมตฺโถ ปาฬิยํ นิรุฬฺโหว. นิพฺพจนนิทานสนฺธโย สุวิญฺเญยฺยาวาติ อาห ‘‘นิพฺพจนนิทานสนฺธโย วตฺตพฺพา’’ติ. 'अवेरता' (वैर नसणे) म्हणजे शत्रू नसणे (असपत्तता). 'कुशल धर्मांनी' म्हणजे अनवद्य (दोषरहित) धर्मांनी, फळ आणि निर्वाणाने असा अभिप्राय आहे. दानाचे महाफल असणे, शील इत्यादी गुणांमुळे शास्त्यांचे (बुद्धांचे) अनुत्तर दक्षिणायोग्य असणे (अणुत्तरदक्खिणेय्यभाव), आणि अनुपादापरिनिर्वाण (अनुपादापरिनिब्बान) - यांचे प्रत्यवेक्षण (पच्चवेक्खणा) या दानाचे निदान (कारण) आहे, हा अर्थ पाळीमध्ये रूढच आहे. निर्वचन, निदान आणि संधी सहज समजण्यासारखे आहेत, म्हणून 'निर्वचन, निदान आणि संधी सांगाव्यात' असे म्हटले आहे. ปฏิปกฺขนิทฺเทเสน สมุทโยติ เทสนตฺถํ ปฏิปกฺขนิทฺเทสเนน นิทฺธาริโต อยํ มจฺฉริยาทิสํกิเลสปกฺขิโก สมุทโย. อโลเภน…เป… ทานาทีหีติ เยหิ อโลภาทีหิ ทานาทโย ธมฺมา สมฺภวนฺติ, ตานิ ทานาทิคฺคหเณเนว คหิตานีติ กุสลมูลานิ นิทฺธาเรติ ‘‘อิมานิ ตีณิ กุสลานี’’ติ. เตสนฺติ กุสลมูลานํ. 'प्रतिपक्ष निर्देशाने समुदय' म्हणजे उपदेशासाठी प्रतिपक्षाच्या निर्देशाने निश्चित केलेला हा मात्सर्य इत्यादी संक्लेशपक्षाचा समुदय होय. 'अलोभाने... पे... दानादींनी' म्हणजे ज्या अलोभ इत्यादींमुळे दान इत्यादी धर्म संभवतात, ते दानादींच्या ग्रहणानेच ग्रहण केले जातात, म्हणून 'ही तीन कुशलमुळे' असे कुशलमुळांचे निर्धारण केले आहे. 'त्यांचे' म्हणजे कुशलमुळांचे. ภยเหตุ เทติ ปณฺณาการาทิวเสน. ราคเหตุ เทติ สภาควตฺถุสฺส. อามิสกิญฺจิกฺขเหตุ เทติ ลญฺชาทิวเสน. อนุกมฺปนฺโต วา กรุณาเขตฺเต. อปจยมาโน คุณเขตฺเต, อุปการเขตฺเต วา. ภยูปรโตติ ภเยน โอรโต. เตน ตถารูเปน สํยเมน เวรํ น จิยเตว. เอวํ สพฺพสฺส อกุสลสฺส ปาปโก วิปาโกติ โยชนา. भयामुळे देतो, जसे की नजराणा (भेटवस्तू) इत्यादींच्या रूपाने. रागामुळे (आसक्तीमुळे) देतो, समान वस्तूच्या बाबतीत. थोड्याशा आमिषाच्या हेतूने देतो, लाच इत्यादींच्या रूपाने. किंवा करुणाक्षेत्रात अनुकंपा (दया) करून देतो. गुणक्षेत्रात किंवा उपकारक्षेत्रात आदर दाखवून देतो. 'भयोपरत' म्हणजे भयामुळे निवृत्त झालेला. त्या प्रकारच्या संयमाने वैर साठवले जात नाही. अशा प्रकारे सर्व अकुशलाचा विपाक (परिणाम) पापरूप (वाईट) असतो, अशी योजना आहे. ‘‘ททโต’’ติอาทินา ยถา ทานปฏิกฺเขเปน ปริวตฺตนํ ทสฺสิตํ, เอวํ ปหานปฏิกฺเขเปนปิ ปริวตฺตนํ ทสฺเสตพฺพนฺติ วุตฺตํ ‘‘อกุสโล ปน น ชหาตี’’ติ. 'ददतो' (देणाऱ्याचे) इत्यादींद्वारे ज्याप्रमाणे दानाच्या प्रतिषेधाने (नकार देण्याने) परिवर्तन दाखवले आहे, त्याचप्रमाणे प्रहाणाच्या प्रतिषेधाने देखील परिवर्तन दाखवले पाहिजे, म्हणून 'अकुशल मनुष्य मात्र त्याग करत नाही' असे म्हटले आहे. กมฺมผลํ สทฺทหนฺโต ทานกิริยายํ ปทหนฺโต เยน วิธินา ทานํ ทาตพฺพํ, ตตฺถ สตึ อุปฏฺฐเปนฺโต จิตฺตํ สมาทหนฺโต สมฺมาทิฏฺฐึ ปุรกฺขโรนฺโต ทาเน สมฺมาปฏิปนฺโน โหตีติ อาห ‘‘ทานํ นาม…เป… โหตี’’ติ. कर्मफलावर श्रद्धा ठेवणारा, दानक्रियेमध्ये प्रयत्न करणारा, ज्या विधीने दान दिले पाहिजे, त्यामध्ये स्मृती (सति) प्रस्थापित करणारा, चित्त समाहित करणारा, सम्यक् दृष्टीला पुढे ठेवणारा दानामध्ये सम्यक् प्रतिपन्न (योग्य प्रकारे प्रवृत्त) होतो, म्हणून 'दान म्हणजे... पे... होतो' असे म्हटले आहे. ภาวนาปหานสมาโรปนานิ ปาฬิยํ สรูปโต วิญฺญายนฺตีติ ปทฏฺฐานเววจนสมาโรปนานิ ทสฺเสตุํ ‘‘ตํ สีลสฺส ปทฏฺฐาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ, ตํ สุวิญฺเญยฺยํ. อญฺญญฺจ ยเทตฺถ อตฺถโต น วิภตฺตํ, ตํ วุตฺตนยตฺตา, อุตฺตานตฺถตฺตา จาติ เวทิตพฺพํ. भावना, प्रहाण आणि समारोपण हे पाळीमध्ये स्वतःच्या रूपाने समजतात, म्हणून पदस्थान (पदट्ठान), वेवचन (पर्यायवाची शब्द) आणि समारोपण दाखवण्यासाठी 'ते शीलाचे पदस्थान आहे' इत्यादी म्हटले आहे, ते सहज समजण्यासारखे आहे. आणि इतर जे काही येथे अर्थाच्या दृष्टीने स्पष्ट केलेले नाही, ते सांगितलेल्या पद्धतीनेच आणि स्पष्ट अर्थाचे असल्यामुळे समजून घ्यावे. หารสมฺปาตวารวณฺณนา นิฏฺฐิตา. हारसंपातवारवर्णना समाप्त झाली. นยสมุฏฺฐานวารวณฺณนา नयसमुत्थानवारवर्णना ๗๙. ‘‘วิสยเภทโต’’ติ [Pg.108] สงฺเขเปน วุตฺตมตฺถํ วิตฺถารโต วิวริตุํ ‘‘ยถา หี’’ติอาทิมาห. ตตฺถ นยโตติ นยคฺคาหโต. น หิ ปฏิเวธญาณํ วิย วิปสฺสนาญาณํ ปจฺจกฺขโต ปวตฺตตีติ. อนุพุชฺฌิยมาโนติ อภิสมยญาณสฺส อนุรูปํ พุชฺฌิยมาโน. ยถา เอกปฏิเวเธเนว มคฺคญาณํ ปวตฺตติ, เอวํ ตทนุจฺฉวิกํ วิปสฺสนาญาเณน คยฺหมาโนติ อตฺโถ. เอวญฺจ กตฺวา นนฺทิยาวฏฺฏาทีนํ ติณฺณํ อตฺถนยภาโว สมตฺถิโต โหตีติ. ตถา หิ อตฺถวิเสสสรูปตาย ตโย นยา ‘‘สุตฺตตฺโถ’’ติ วุตฺตา, ปทตฺถวิจารภาเวปิ ปน หารา ‘‘พฺยญฺชนวิจโย’’ติ. ยทิ เอวํ กถํ ตโยติ โจทนํ สนฺธายาห ‘‘ปฏิวิชฺฌนฺตานํ ปนา’’ติอาทิ. ตตฺถ เอกเมโก สํกิเลสโวทานานํ วิภาคโต ทฺวิสงฺคโหติ โยชนา. จตุฉอฏฺฐทิโส จาติ น ปจฺเจกํ เต นนฺทิยาวฏฺฏาทโย จตุฉอฏฺฐทิสา, อถ โข ยถากฺกมนฺติ. ‘‘เอว’’นฺติอาทิ ยถาวุตฺตสฺส อตฺถสฺส นิคมนํ. ७९. 'विषयभेदाने' या संक्षेपाने सांगितलेल्या अर्थाचे विस्ताराने विवरण करण्यासाठी 'जसे की' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'नयाने' म्हणजे नयाच्या ग्रहणाने (नयग्गाहतो). कारण प्रतिवेधज्ञानाप्रमाणे (पटिवेधञाण) विपश्यनाज्ञान (विपस्सनाञाण) प्रत्यक्षपणे प्रवृत्त होत नाही. 'अनुबुज्झियमानो' (अनुबोध केला जाणारा) म्हणजे अभिसमयज्ञानाच्या (अभिसमयञाण) अनुरूप जाणला जाणारा. ज्याप्रमाणे एकाच प्रतिवेधाने मार्गज्ञान (मग्गञाण) प्रवृत्त होते, त्याचप्रमाणे त्याच्या योग्य असे विपश्यनाज्ञानाने ग्रहण केले जाणारे, असा अर्थ आहे. आणि असे केल्याने नंदियावट्ट इत्यादी तिन्हींचा अर्थनयभाव समर्थित होतो. कारण अर्थविशेषाच्या स्वरूपामुळे तीन नय 'सूत्रार्थ' (सुत्तत्थो) असे म्हटले आहेत, आणि पदांच्या अर्थाचा विचार करण्याच्या भावात देखील हार हे 'व्यंजनविचय' (ब्यञ्जनविचयो) आहेत. जर असे आहे, तर तीन कसे? या शंकेचे निरसन करण्यासाठी 'प्रतिवेध करणाऱ्यांचे मात्र' इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये संक्लेश आणि वोदान (शुद्धी) यांच्या विभागामुळे प्रत्येकाचा दोन प्रकारे संग्रह होतो, अशी योजना आहे. 'चार, सहा आणि आठ दिशांचे' म्हणजे ते नंदियावट्ट इत्यादी प्रत्येक चार, सहा आणि आठ दिशांचे नसून, उलट अनुक्रमे आहेत. 'अशा प्रकारे' इत्यादी सांगितलेल्या अर्थाचा निष्कर्ष (निगमन) आहे. ตถา จาติ ยถาวุตฺตสฺส อตฺถสฺส อุปจเยน สมตฺถนา. ปุพฺพา โกฏิ น ปญฺญายตีติ เอตฺถ ยํ วตฺตพฺพํ, ตํ ปรโต ปฏฺฐานกถายํ อาวิ ภวิสฺสติ. ‘‘อนฺธํ ตมํ ตทา โหติ, ยํ โลโภ สหเต นร’’นฺติอาทิ (จูฬนิ. ขคฺควิสาณสุตฺตนิทฺเทส ๑๒๘) วจนโต กามตณฺหาปิ ปฏิจฺฉาทนสภาวา, ยโต กามจฺฉนฺทํ ‘‘นีวรณ’’นฺติ วุตฺตํ. อวิชฺชาย ปน ภเวสุ อาทีนวปฺปฏิจฺฉาทนํ สาติสยนฺติ. ตถา อวิชฺชาปิ สํโยชนสภาวา, ยโต สา พหิทฺธา สํโยชนภาเวน วุตฺตา. เอวํ สนฺเตปิ ตณฺหาย พนฺธนฏฺโฐ สาติสโย อเปกฺขิตภาวโตติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตถาปิ…เป… วุตฺต’’นฺติ อาห. 'तसेच' म्हणजे सांगितलेल्या अर्थाचे पुष्टीकरणाने समर्थन करणे होय. 'पूर्व कोटी (सुरुवात) समजत नाही' याविषयी जे सांगायचे आहे, ते पुढे प्रस्थानकथेमध्ये (पट्ठानकथा) स्पष्ट होईल. 'जेव्हा लोभ मनुष्याला पराभूत करतो, तेव्हा अंधकारमय अंधार होतो' इत्यादी वचनावरून कामतण्हा (कामतृष्णा) देखील झाकण्याच्या स्वभावाची (प्रतिच्छादनस्वभावाची) आहे, म्हणूनच कामच्छंदाला 'नीवरण' (अडथळा) म्हटले आहे. परंतु अविद्येचे भवांमध्ये (अस्तित्वामध्ये) आदीनव (दोष) झाकणे हे अतिशय तीव्र असते. तसेच अविद्या देखील संयोजन स्वभावाची आहे, कारण ती बाह्य संयोजनाच्या भावाने सांगितली आहे. असे असूनही तृष्णेचा बंधनाचा अर्थ (बंधनाचा स्वभाव) अतिशय अपेक्षित असल्यामुळे, हा अर्थ दाखवण्यासाठी 'तरीही... पे... म्हटले आहे' असे म्हटले आहे. ‘‘สํยุตฺตา’’ติ ปทสฺส สมฺปยุตฺตาติ อตฺโถติ อาห ‘‘มิสฺสิตา’’ติ. ‘‘อวิชฺชาภิภูตา…เป… อภินิวิสนฺตา’’ติ เอเตน อวิชฺชาย อยาถาวคหณเหตุตํ ทสฺเสติ, ตโต โส อวินฺทิยํ วินฺทตีติ อวิชฺชาติ วุจฺจติ. กิลิสฺสนํ อุปตาปนนฺติ อาห ‘‘กิลิสฺสนปฺปโยคํ อตฺตปริตาปนปฏิปตฺติ’’นฺติ. อลฺลียนํ เสวนํ. 'संयुत्ता' या शब्दाचा अर्थ 'संपयुत्ता' (संप्रयुक्त) असा आहे, म्हणून 'मिश्रित' असे म्हटले आहे. 'अविद्येने अभिभूत झालेले... पे... अभिनिवेश करणारे' याद्वारे अविद्येचे अयथातथ्य (चुकीचे) ग्रहण करण्याचे कारण दाखवले आहे, ज्यायोगे तो न मिळवण्याजोगे मिळवतो, म्हणून तिला 'अविद्या' म्हटले जाते. क्लेश देणे म्हणजे संताप देणे होय, म्हणून 'क्लेश देणारा प्रयोग, स्वतःला संताप देणारी प्रतिपत्ती (आचरण)' असे म्हटले आहे. 'अल्लीयना' (चिकटणे) म्हणजे सेवन करणे होय. ทุกฺขนฺติ [Pg.109] …เป… ชานนฺตีติ อตฺตนา อนุภูยมานํ ตถา ตถา อุปฏฺฐิตํ กายิกเจตสิกทุกฺขํ, อิตรมฺปิ วา เอกเทสํ ชานนฺติ. ตณฺหายปิ เอเสว นโย. สภาควิสภาคปฏิปชฺชิตพฺพาการโต ตตฺถ เตสํ ญาณํ นตฺเถวาติทสฺเสนฺโต ‘‘อิทํ ทุกฺข’’นฺติอาทิมาห. ปวตฺติปวตฺติเหตุมตฺตมฺปีติ ‘‘ปวตฺติ ปวตฺติเหตู’’ติ เอตฺตกมฺปิ. กา ปน กถาติ ปจุรชนสาธารเณ โลกิเยปิ นาม อตฺเถ เยสํ ญาณสฺส ปฏิฆาโต, ปรมคมฺภีเร อริยานํ เอว วิสยภูเต โลกุตฺตเร นิวตฺตินิวตฺติเหตุสงฺขาเต อตฺเถ กา นาม กถา, ฉินฺนา กถาติ อตฺโถ. อฏฺฐสมาปตฺติปเภทสฺส เกวลสฺส สมถสฺส ตาทิเส กาเล พาหิรกานญฺจ อิชฺฌนโต ‘‘วิปสฺสนาธิฏฺฐาน’’นฺติ วิเสสิตํ. วูปสโม สมุจฺเฉโท, ปฏิปฺปสฺสทฺธิ จ. 'दुःख... पे... जाणतात' म्हणजे स्वतः अनुभवले जाणारे, त्या त्या प्रकारे उपस्थित झालेले कायिक आणि चैतसिक दुःख, किंवा इतरही एका भागाला जाणतात. तृष्णेच्या बाबतीत देखील हाच नियम (नय) आहे. सभाग (समान) आणि विसभाग (भिन्न) प्रतिपत्तीच्या (आचरणाच्या) आकाराने तेथे त्यांचे ज्ञान मुळीच नाही, हे दाखवण्यासाठी 'हे दुःख आहे' इत्यादी म्हटले आहे. 'प्रवृत्ती आणि प्रवृत्तीचा हेतू एवढेच' म्हणजे 'प्रवृत्ती आणि प्रवृत्तीचा हेतू' एवढेच. 'मग काय सांगावे' (का पना कथा) म्हणजे सामान्य लोकांसाठी सामायिक असलेल्या लौकिक अर्थामध्ये देखील ज्यांच्या ज्ञानाला अडथळा येतो, त्या परमगंभीर, केवळ आर्यांचाच विषय असलेल्या, निवृत्ती आणि निवृत्तीचा हेतू म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या लोकोत्तर अर्थाविषयी काय सांगावे? काहीच सांगण्याची गरज नाही (छिन्न कथा), असा अर्थ आहे. आठ समापत्तींच्या भेदाने युक्त असलेल्या केवळ शमथाची (समथ) तशा काळात बाह्य लोकांची देखील सिद्धी होत असल्यामुळे, 'विपश्यनाधिष्ठान' (विपस्सनाधिट्ठान) असे विशेषित केले आहे. 'वूपशम' (वूपसमो) म्हणजे समुच्छेद (पूर्ण उच्छेद) आणि प्रतिप्रश्रब्धी (शांत होणे) होय. ‘‘สํสารสฺส อนุปจฺเฉทนโต’’ติ อิทํ ทิฏฺฐิคตานํ ทิฏฺฐิคติกมตทสฺสนํ. โส หิ ปุตฺตมุขทสฺสเน อสติ สํสาโร อุจฺฉิชฺเชยฺยาติ ภายติ. ยโต วุตฺตํ – "संसाराचा उच्छेद न होण्यासाठी" (संसारस्स अनुपेच्छेदनतो) हे दृष्टी बाळगणाऱ्यांचे (दृष्टीगतांचे) मतदर्शन आहे. कारण, मुलाचे मुख न पाहिल्यास संसार खंडित (उच्छिन्न) होईल, अशी त्याला भीती वाटते. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘คณฺฑุปฺปาโท กิกี เจว, กุนฺตี พฺราหฺมณธมฺมิโก; เอเต อภยํ ภายนฺติ, สมฺมูฬฺหา จตุโร ชนา’’ติ. (สุ. นิ. อฏฺฐ. ๒.๒๙๓; อ. นิ. ฏี. ๓.๕.๑๙๒); "गांडूळ, किकी पक्षी, कुंती पक्षी आणि ब्राह्मणधम्मिक (एक प्रकारचा पक्षी किंवा प्राणी); हे चार संमोहित (मूर्ख) जीव अभयाला (ज्याला भ्यायचे कारण नाही त्याला) भ्यातात." (सु. नि. अट्ठ. २.२९३; अ. नि. टी. ३.५.१९२); ตทภิญฺญาติ ตํ ยถาวุตฺตอนฺตทฺวยํ อภิชานนฺติ คุณํ อาโรเปตฺวา ชานนฺตีติ ตทภิญฺญา. อตฺถภญฺชนโต, โรคคณฺฑสลฺลสทิสตาย อตฺตภาวสํกิเลสานญฺจ โรคคณฺฑสลฺลตา. 'तदभिज्ञा' (तदभिञ्ञा) म्हणजे वर सांगितलेल्या दोन्ही टोकांना (अंतांना) विशेष रूपाने जाणणे, गुणाचा आरोप करून जाणणे म्हणजे 'तदभिज्ञा' होय. अर्थाचा (कल्याणाचा) नाश करण्यामुळे, आणि रोग, गंड (गळू) व शल्य (बाण) यांच्याशी साम्य असल्यामुळे आत्मभावाचे (अस्तित्वाचे) संक्लेश हे रोग, गंड आणि शल्य रूप आहेत. สกฺกายทสฺสเนติ เอตฺถ ทิฏฺฐิทสฺสนํ, สกฺกาโยว ทสฺสนํ สกฺกายทสฺสนนฺติ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. เตสนฺติ ทิฏฺฐิจริตานํ. อตฺตาภินิเวโส พลวา. ตสฺมา ยถาอุปฏฺฐิตํ รูปํ ‘‘อตฺตา’’อิจฺเจว คณฺหนฺตีติ อธิปฺปาโย. ตถา เวทนาทึ. ตณฺหาจริโต ปน ยถาอุปฏฺฐิตํ รูปํ ตณฺหาวตฺถุํ กตฺวา อตฺตนิยาภินิเวเสน อภินิวิสนฺตา ตทญฺญเมว อตฺตโต สมนุปสฺสนฺติ. เอวํ เวทนาทีสุ. เตนาห ‘‘ตณฺหาจริตา’’ติอาทิ. วิชฺชมาเนติ ปรมตฺถโต อุปลพฺภมาเน. กาเยติ สมูเห. ทิฏฺฐิยา ปริกปฺปิโต อตฺตาทิ เอว ปรมตฺถโต นุปลพฺภติ, ทิฏฺฐิ ปน ลพฺภเตวาติ อาห ‘‘สตี วา วิชฺชมานา’’ติ. 'सक्कायदस्सन' (सत्कायदर्शन) यामध्ये दृष्टीचे दर्शन, सक्काय (सत्काय) हेच दर्शन म्हणजे 'सक्कायदस्सन' असा अर्थ समजावा. 'तेसं' (त्यांच्या) म्हणजे दृष्टीचरित (दृष्टीप्रधान स्वभाव असलेल्या) लोकांचे. त्यांचा आत्म-अभिनिवेश (आत्म्याचा आग्रह) बलवान असतो. म्हणून, जसे रूप समोर उपस्थित होते त्यालाच ते 'आत्मा' म्हणून ग्रहण करतात, असा अभिप्राय आहे. त्याचप्रमाणे वेदना इत्यादींनाही. परंतु, तण्हाचरित (तृष्णाप्रधान स्वभाव असलेला) मनुष्य समोर उपस्थित झालेल्या रूपाला तृष्णेचा विषय बनवून, 'माझे' (आत्मीय) या अभिनिवेशाने त्यात अभिनिविष्ट होऊन, त्याहून भिन्न गोष्टीला आत्मा म्हणून पाहतो. वेदना इत्यादींच्या बाबतीतही असेच आहे. म्हणूनच 'तण्हाचरिता' इत्यादी म्हटले आहे. 'विज्जमाने' (विद्यमान) म्हणजे परमार्थतः उपलब्ध असणारे. 'काये' म्हणजे समूहामध्ये. दृष्टीने कल्पिलेला आत्मा इत्यादी परमार्थतः उपलब्ध होत नाही, परंतु दृष्टी तर उपलब्ध होतेच; म्हणूनच 'सती वा विज्जमाना' (असलेली किंवा विद्यमान) असे म्हटले आहे. สกฺกายทสฺสนมุเขนาติ สกฺกายทิฏฺฐิมุเขน. 'सक्कायदस्सनमुखेन' म्हणजे सक्कायदिट्ठीच्या (सत्कायदृष्टीच्या) मुखाने (द्वारे). อุจฺเฉทสสฺสตนฺติ [Pg.110] ตํสหจรณโต อุจฺเฉทสสฺสตทิฏฺฐิ วุตฺตา. ‘‘อุจฺเฉทสสฺสตวาทา’’ติปิ ปาโฐ. 'उच्छेदसस्सतं' (उच्छेद-शाश्वत) म्हणजे त्याच्या सहचर्यामुळे उच्छेद आणि शाश्वत दृष्टी म्हटली आहे. 'उच्छेदसस्सतवादा' असाही पाठ आहे. กสิณายตนานีติ กสิณชฺฌานานิ. 'कसिणायतनानि' म्हणजे कसिणझान (कृत्स्न ध्यान). เตเชตฺวาติ นิสาเนตฺวา. 'तेजेत्वा' म्हणजे तीक्ष्ण करून (निसानित्वा / घासून-पुसून स्पष्ट करून). ๘๑. เอตฺตาวตา นนฺทิยาวฏฺฏสฺส ภูมิรจนวเสน สํกิเลสปกฺโข ทสฺสิโตติ อาห ‘‘ตตฺถ ทิฏฺฐิจริโตติอาทินา โวทานปกฺขํ ทสฺเสตี’’ติ. ‘‘ยสฺมา สลฺเลเข ติพฺพคารโว’’ติ อิมินา ตตฺถ ติพฺพคารวตฺตา สํเลขานุสนฺตตวุตฺตินา ภวตีติ ทสฺเสติ. เสเสสุปิ เอเสว นโย. มิจฺฉาธิโมกฺโข สทฺธาปติรูปโก อวตฺถุสฺมึ ปสาโท. ८१. एवढ्याने नंदियावट्टाच्या (नंद्यावर्त नयाच्या) भूमी-रचनेच्या आधारे संक्लेशपक्ष (मलीन पक्ष) दर्शविला आहे, म्हणूनच 'तेथे दृष्टीचरित...' इत्यादींद्वारे वोदानपक्ष (विशुद्धीचा पक्ष) दर्शविला आहे, असे म्हटले आहे. "ज्या अर्थी संलेखात (सल्लेखात) तीव्र आदर आहे" यावरून तेथे तीव्र आदर असल्यामुळे संलेख-अनुसंततीमध्ये (संलेखाच्या सातत्यात) प्रवृत्ती होते, हे दर्शविले आहे. उर्वरित गोष्टींमध्येही हाच नियम (नय) समजावा. 'मिच्छाधिमोक्खो' (मिथ्या अधिमोक्ष) म्हणजे श्रद्धेसारखा भासणारा (पण चुकीचा) अयोग्य वस्तूवरील विश्वास (प्रसाद) होय. ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน ธมฺมเมว วิภชตีติ อาห ‘‘สตฺตาปิ…เป… ทสฺเสตี’’ติ. पुद्गलाधिष्ठानाने (व्यक्तीच्या माध्यमातून) धर्माचीच विभागणी केली जाते, म्हणूनच 'सत्त अपि... पे... दस्सेति' (प्राणी देखील... पे... दर्शवितो) असे म्हटले आहे. เย หิ เกจีติ เอตฺถ หิ-สทฺโท นิปาตมตฺตํ. ‘‘อิมาหิ เอว จตูหิ ปฏิปทาหี’’ติปิ ปาฬิ. ทุกฺขาปฏิปทาทิวิภาเคน มคฺโค เอว อิธ วุตฺโตติ อาห ‘‘ปฏิปทา หิ มคฺโค’’ติ จตุทฺทิสาสงฺขาตํ มคฺคนฺติ จตุทฺทิสาสงฺขาตํ ปวตฺตนุปายํ. ทฺเว ทิสา เอติสฺสาติ ทฺวิทิสา. นนฺทิยาวฏฺฏสฺสาติ นนฺทิยาวฏฺฏนยสฺส. 'ये हि केचि' यामध्ये 'हि' हा शब्द केवळ निपात (अव्यय) आहे. 'इमाहि एव चतूहि पटिपदाहि' असाही पाठांतर आहे. दुःखा प्रतिपदा (कठीण मार्ग) इत्यादींच्या विभागाने येथे मार्गच सांगितला आहे, म्हणूनच 'पटिपदा हि मग्गो' (प्रतिपदा म्हणजेच मार्ग होय) असे म्हटले आहे. 'चतुद्दिसासंखातं मग्गं' म्हणजे चार दिशांनी युक्त असलेला मार्ग, म्हणजेच चार दिशांनी युक्त असलेला प्रवृत्तीचा उपाय. 'द्वे दिसा एतिस्सा' (याच्या दोन दिशा आहेत) म्हणून 'द्विदिसा'. 'नंदियावट्टस्स' म्हणजे नंदियावट्ट नयाचे. ๘๒. วิวตฺตติ วฏฺฏํ เอตฺถาติ วิวตฺตํ, วิวตฺตํ เอว วิวฏฺฏํ, อสงฺขตธาตุ, นิพฺพุติ เอว วา. เตน วุตฺตํ ‘‘นิพฺพาน’’นฺติ. ८२. 'विवत्तति वट्टं एत्थ' (येथे संसारचक्र फिरणे थांबते/माघारे फिरते) म्हणून ते 'विवत्त' (विवर्त) होय. विवत्त म्हणजेच विवट्ट (विवृत्त), जे असंस्कृत धातू (असंखतधातु) किंवा निवृत्ती (निब्बुति) आहे. म्हणूनच त्याला 'निब्बान' (निर्वाण) असे म्हटले आहे. ‘‘กตฺถ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ วา ปาฬิ. อุปจเยติ อุปจยาวตฺถายนฺติ อตฺโถ. ทสนฺนนฺติ โลภาทิกิเลสวตฺถูนํ. วิปลฺลาสเหตุภาวโตติ สุภสญฺญาทิวิปลฺลาสเหตุกภาวโต. วิปริเยสคฺคาหวเสน หิ อาทีนเวสุ เอว สํโยชนิเยสุ ธมฺเมสุ อสฺสาทานุปสฺสิตา. น หิ ยถาภูตญาเณ สติ ตถา สมฺภโว. เตน วุตฺตํ ‘‘ทสนฺนํ…เป… ภาวโต’’ติ. ทสวิธการเณติ ทสวิเธ การเณ, ทสวิธสฺส วา การเณ. อโยนิโสมนสิการปริกฺขตา ธมฺมา สุภารมฺมณาทโย. 'कत्थ दट्ठब्बं' (कोठे पाहावे) असाही पाठांतर आहे. 'उपचये' म्हणजे उपचय अवस्थेत (संचय अवस्थेत) असा अर्थ आहे. 'दसन्नं' म्हणजे लोभ इत्यादी दहा क्लेशवस्तूंचे. 'विपल्लासहेतुभावतो' म्हणजे शुभसंज्ञा इत्यादी विपर्यासांचे (भ्रमांचे) कारण असल्यामुळे. कारण, विपरीत ग्रहणामुळे (विपरियेसग्गाहवसेन) संयोजनीय (बंधनात टाकणाऱ्या) धर्मांमध्ये, जे की खरोखर आदीनव (दोषयुक्त) आहेत, आस्वाद पाहिला जातो (अस्सादानुपस्सिता). कारण यथाभूत ज्ञान (गोष्टी जशा आहेत तशा जाणणे) असताना तसे घडणे शक्य नाही. म्हणूनच 'दसन्नं... पे... भावतो' असे म्हटले आहे. 'दसविधकारणे' म्हणजे दहा प्रकारच्या कारणांमध्ये किंवा दहा प्रकारच्या कारणांचे. 'अयोनिसोमनसिकारपरिक्खता धम्मा' म्हणजे अयोनिशोमनसिकाराने दूषित झालेले शुभ-आलंबन (सुंदर विषय) इत्यादी धर्म होत. ตพฺพิสยา กิเลสาติ อาหารปริญฺญาปริพนฺธภูตา กิเลสา. วิญฺญาณฏฺฐิตีสุปิ เอเสว นโย. กาเย ปวตฺตมาโน ปฐโม วิปลฺลาโส กายสมุทาเย, กาเยกเทเส จ กพฬีกาเร อาหาเร ปวตฺโต เอว โหตีติ วุตฺตํ ‘‘ปฐเม อาหาเร วิสยภูเต ปฐโม วิปลฺลาโส [Pg.111] ปวตฺตตี’’ติ. ตถา เวทนายํ ปวตฺตมาโน ทุติยวิปลฺลาโส ตปฺปจฺจเย ผสฺสาหาเร, จิตฺเต ปวตฺตมาโน ตติยวิปลฺลาโส ตปฺปจฺจเย มโนสญฺเจตนาหาเร, ธมฺเมสุ ปวตฺตมาโน จตุตฺถวิปลฺลาโส ตปฺปจฺจเย วิญฺญาณาหาเร ปวตฺโต เอว โหตีติ วุตฺตํ ‘‘จตุตฺเถ อาหาเร จตุตฺโถ วิปลฺลาโส’’ติ. เตนาห ‘‘เสสาหาเรสุปิ เอเสว นโย’’ติ. อาหารสีเสน วา อาหารปฏิพทฺโธ ฉนฺทราโค คหิโต. วิญฺญาณฏฺฐิตีสุปิ เอเสว นโย. เตเนวาห ‘‘อาหารสีเสน ตพฺพิสยา กิเลสา อธิปฺเปตา’’ติ. ปฐเม อาหาเร วิสยภูเตติ จ ปฐเม อาหาเร ฉนฺทราคสฺส วิสยภาวํ ปตฺเต, ตพฺภาวํ อนติกฺกนฺเตติ อตฺโถ. อปฺปหีนจฺฉนฺทราคสฺส หิ ตตฺถ วิปลฺลาสา สมฺภวนฺติ, น อิตรสฺส. ตถา ทุติยวิปลฺลาสาทีสุ อปฺปหีเนสุ. อิตเร อุปาทานานิ ปวตฺตนฺเตว อปฺปหีนตฺตาติ อาห ‘‘เสสปเทสุปิ เอเสว นโย’’ติ. ยสฺมา จ อุปาทานาทีสุ อปฺปหีเนสุปิ โยคาทโย ปวตฺตนฺเตว ยถารหํ ตํสภาวตฺตา, ตเทกฏฺฐสภาวโต จ, ตสฺมา วุตฺตํ ปาฬิยํ ‘‘ปฐเม อุปาทาเน ปฐโม โยโค’’ติอาทิ. เตนาห ‘‘เสสปเทสุปิ เอเสว นโย’’ติ. 'तब्बिसया किलेसा' (त्या विषयाचे क्लेश) म्हणजे आहार-परिज्ञेमध्ये अडथळा ठरणारे क्लेश होत. विज्ञाणट्ठितींमध्ये (विज्ञानस्थितींमध्ये) देखील हाच नियम आहे. शरीरात प्रवृत्त होणारा पहिला विपर्यास (भ्रम) हा शरीर-समूहात, शरीराच्या एका भागात आणि कबाळीकार आहारात (कवळ स्वरूपातील आहारात) प्रवृत्त होतोच, म्हणूनच म्हटले आहे – "पहिल्या आहारात, जो की विषय बनला आहे, पहिला विपर्यास प्रवृत्त होतो." त्याचप्रमाणे, वेदनेमध्ये प्रवृत्त होणारा दुसरा विपर्यास हा त्याचा प्रत्यय (कारण) असलेल्या स्पर्श-आहारात (फस्साहारात), चित्तात प्रवृत्त होणारा तिसरा विपर्यास हा त्याचा प्रत्यय असलेल्या मनोसंचेतना-आहारात, आणि धर्मांमध्ये प्रवृत्त होणारा चौथा विपर्यास हा त्याचा प्रत्यय असलेल्या विज्ञान-आहारात प्रवृत्त होतोच, म्हणूनच म्हटले आहे – "चौथ्या आहारात चौथा विपर्यास." म्हणूनच म्हटले आहे – "इतर आहारांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे." किंवा आहाराच्या मुख्यतेने (आहारसीसेन) आहाराशी संबंधित असलेला छंदराग (इच्छा-आसक्ती) ग्रहण केला आहे. विज्ञानस्थितींमध्येही हाच नियम आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – "आहाराच्या मुख्यतेने त्या विषयाचे क्लेश अभिप्रेत आहेत." 'पहिल्या आहारात विषय बनलेल्या' याचा अर्थ पहिल्या आहारात छंदरागाची विषय-अवस्था प्राप्त झाल्यावर, त्या अवस्थेचे उल्लंघन न करता, असा अर्थ आहे. कारण ज्याचा छंदराग नष्ट झालेला नाही (अप्पहीनच्छंदरागस्स), त्यालाच तेथे विपर्यास संभवतात, इतरांना नाही. त्याचप्रमाणे दुसरा विपर्यास इत्यादी नष्ट न झाल्यावर. इतर उपादाने (आसक्ती) नष्ट न झाल्यामुळे प्रवृत्त होतातच, म्हणूनच म्हटले आहे – "इतर पदांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे." आणि ज्या अर्थी उपादान इत्यादी नष्ट न झाल्यावरही योग इत्यादी योग्यतेनुसार त्यांच्या स्वभावामुळे आणि एकाच स्वरूपाचे असल्यामुळे प्रवृत्त होतातच, म्हणूनच पाळीमध्ये (पालिमध्ये) म्हटले आहे – "पहिल्या उपादानात पहिला योग" इत्यादी. म्हणूनच म्हटले आहे – "इतर पदांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. ๘๓. อปริชานนฺตสฺสาติ ญาตปริญฺญาย, ตีรณปริญฺญาย, ปหานปริญฺญายาติ ตีหิ ปริญฺญาหิ ปริจฺฉินฺทิตฺวา อชานนฺตสฺส, เตสํ สมุทยญฺจ อตฺถงฺคมญฺจ อสฺสาทญฺจ อาทีนวญฺจ นิสฺสรณญฺจ ยถาภูตํ อนวพุชฺฌนฺตสฺสาติ อตฺโถ. ติพฺโพ พหโล ฉนฺทราโค โหติ ตณฺหาจริตภาวโตติ อธิปฺปาโย. อิติ อุปกฺกิเลสสฺส ทิฏฺฐาภินิเวสสฺส เหตุภาวโตติ อิมมตฺถํ สนฺธายาห ‘‘วุตฺตนเยเนวา’’ติ. สุภสุขสญฺญากามุปาทานกามภวโยคอภิชฺฌากายคนฺถกามภวาสว- กามภโวฆราคสลฺลฉนฺทาคติคมนานิ ตณฺหาปกฺขิกตาย, ตณฺหาสภาวตาย จ ตณฺหาปธานานิ. สีลพฺพตุปาทานพฺยาปาทกายคนฺถโทสสลฺลโทสาคติคมนานิ ปน ตณฺหาภาเว ภาวโต, วิญฺญาณฏฺฐิติโย ตณฺหาวิสยโต, สพฺเพสํ วา ตณฺหาวิสยโต ตณฺหาปธานตา ลพฺภเตว. ปจฺฉิมกานํ ทิฏฺฐิปธานตา วุตฺตนยานุสาเรน เวทิตพฺพา. ८३. 'अपरीजानन्तस्स' (पूर्णपणे न जाणणाऱ्याचे) म्हणजे ज्ञातपरिज्ञा, तीरणपरिज्ञा आणि प्रहाणपरिज्ञा या तीन परिज्ञांद्वारे निश्चित करून न जाणणाऱ्याचे; तसेच त्यांचा उदय (समुदय), अस्त (अत्थंगम), आस्वाद, आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) हे जसे आहे तसे (यथाभूत) न समजणाऱ्याचे, असा अर्थ आहे. तृष्णाप्रधान स्वभाव असल्यामुळे तीव्र आणि दाट छंदराग (आसक्ती) असतो, असा अभिप्राय आहे. अशा प्रकारे, उपक्लेश आणि दृष्टी-अभिनिवेश यांचे कारण असल्यामुळे – हा अर्थ मनात ठेवून 'वृत्त नयेनेव' (सांगितलेल्या पद्धतीनेच) असे म्हटले आहे. शुभसंज्ञा, सुखसंज्ञा, कामुपादान, कामभवयोग, अभिध्या-कायग्रंथ, कामभवासव, कामभवओघ, रागशल्य आणि छंदागतिगमन (छंदाने चुकीच्या मार्गाने जाणे) हे तृष्णापक्षाचे असल्यामुळे आणि तृष्णास्वभावाचे असल्यामुळे तृष्णाप्रधान आहेत. परंतु, शीलव्रत-उपादान, व्यापाद-कायग्रंथ, द्वेषशल्य आणि द्वेषागतिगमन हे तृष्णेच्या अस्तित्वातच अस्तित्वात असल्यामुळे, विज्ञानस्थिती या तृष्णेचा विषय असल्यामुळे, किंवा सर्वांच्याच तृष्णेचा विषय असल्यामुळे तृष्णाप्रधानता प्राप्त होतेच. नंतरच्या (शेवटच्या) गोष्टींची दृष्टीप्रधानता सांगितलेल्या पद्धतीनुसार समजून घ्यावी। ๘๔. กพฬีกาเร อาหาเรติ กพฬีการาหารวิสเย ฉนฺทราเค. ‘‘อปฺปหีเน’’ติอาทิกํ ปริยายกถํ มุญฺจิตฺวา นิปฺปริยายเมว ทสฺเสนฺโต กพฬีการาหารสฺส [Pg.112] ‘‘อสุภสภาวตฺตา, อสุภสมุฏฺฐานตฺตา จา’’ติ วุตฺตํ. ลพฺภมาเน หิ อุชุเก อตฺเถ กึ ปริยายกถายาติ. ฉนฺทราโค วา ตตฺถ อตฺถสิทฺโธติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ วุตฺโต. น หิ ตตฺถ อสติ ฉนฺทราเค วิปลฺลาโส สมฺภวติ. ทุกฺขสภาวตฺตาติ สงฺขารทุกฺขตาย ทุกฺขสภาวตฺตา. ทุกฺขปจฺจยตฺตาติ ติวิธทุกฺขตาลกฺขณสฺส ทุกฺขสฺส การณโต. วิญฺญาเณ นิจฺจสญฺญิโน. ตถา หิ สาติ นาม ภิกฺขุ เกวฏฺฏปุตฺโต ‘‘ตํเยว วิญฺญาณํ สนฺธาวติ สํสรตี’’ติ ตตฺถ นิจฺจาภินิเวสํ สํเวเทสิ. เยภุยฺเยน สงฺขาเรสุ อตฺตสญฺญิตา ทิฏฺฐิคติกานํ ‘‘เจตนา อตฺตา’’ติอาทิทิฏฺฐิปริทีปเนสุ เวทิตพฺพา. ‘‘ภววิสุทฺธี’’ติ ปทสฺส อตฺถวจนํ ‘‘นิพฺพุติสุข’’นฺติ. ‘‘สีลพฺพเตหิ…เป… สุขนฺติ ทฬฺหํ คณฺหาตี’’ติ อิมินา สีลพฺพตุปาทานํ อิธ ภวุปาทานนฺติ ทสฺเสติ. ตถา หิ วกฺขติ ‘‘สีลพฺพตุปาทานสงฺขาเตน ภวุปาทาเนนา’’ติ. ८४. कवळीकार आहारात म्हणजे कवळीकार आहाराच्या विषयातील छंदरागामध्ये (आसक्तीमध्ये). 'अप्पहीने' (नष्ट न झालेले) इत्यादी पर्यायकथा (अप्रत्यक्ष कथन) सोडून थेट (निप्परियाय) दर्शवताना कवळीकार आहाराच्या 'अशुभस्वभावत्वामुळे आणि अशुभसमुत्थानत्वामुळे' (अशुभातून उत्पन्न होण्यामुळे) असे म्हटले आहे. कारण सरळ अर्थ मिळत असताना पर्यायकथेची काय गरज? किंवा तेथे छंदराग हाच अर्थ सिद्ध होतो, असाही येथे अर्थ सांगितला आहे. कारण तेथे छंदराग नसताना विपल्लास (विपर्यास) संभवत नाही. 'दुःखस्वभावत्वामुळे' म्हणजे संस्कारदुःखतेमुळे दुःखस्वभाव असणे. 'दुःखप्रत्ययत्वामुळे' म्हणजे त्रिविध दुःखता लक्षण असलेल्या दुःखाचे कारण असल्यामुळे. विज्ञानात नित्य संज्ञा असणारे. तसेच 'साती' नावाचे कोळीपुत्र (केवट्टपुत्त) भिक्खू 'तेच विज्ञान धावते, संसरण करते' अशा प्रकारे तेथे नित्य अभिनिवेश (दृढ विश्वास) व्यक्त करत होते. बहुतांश संस्कारांमध्ये आत्मसंज्ञा असणे हे दृष्टीगतांच्या (चुकीच्या धारणा बाळगणाऱ्यांच्या) 'चेतना हाच आत्मा आहे' इत्यादी दृष्टी-प्रकाशन (स्पष्टीकरण) मध्ये समजून घ्यावे. 'भवविसुद्धि' या पदाचा अर्थ 'निब्बुतिसुख' (निर्वाणसुख) असा आहे. 'शीलव्रतांनी...पे... सुख असे दृढपणे ग्रहण करतो' याने शीलव्रत-उपादान हे येथे भव-उपादान आहे असे दर्शवतो. कारण पुढे सांगतील की 'शीलव्रत-उपादान संज्ञेच्या भव-उपादानाने'. ปจฺจยา โหนฺติ อุปนิสฺสยปจฺจยาทินา. ปฐเม โยเค ฐิโตติ ปฐเม โยเค ปติฏฺฐิโต. อปฺปหีนา หิ กิเลสา กมฺมวฏฺฏาทีนํ การณภูตา ตํสมงฺคิโน สตฺตสฺส ปติฏฺฐาติ วุจฺจนฺติ. ปรสฺส อภิชฺฌายนํ ปราภิชฺฌายนํ. ภวปตฺถนาย ภวทิฏฺฐิภวราควเสน ปิยายิตสฺส วตฺถุโน วิปริณามญฺญถาภาเว โทมนสฺสุปฺปตฺตึ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘ภวราค…เป… ปทูเสนฺตี’’ติ. प्रत्यय (कारण) होतात उपनिस्सयप्रत्यय इत्यादींद्वारे. 'पहिल्या योगात स्थित' म्हणजे पहिल्या योगात प्रतिष्ठित. कारण नष्ट न झालेले क्लेश हे कर्मवट्टा (कर्मचक्र) इत्यादींचे कारण बनून, त्या क्लेशांनी युक्त असलेल्या प्राण्याची 'प्रतिष्ठा' (आधार) म्हटले जातात. दुसऱ्याचे अभिज्झायन (लोभ करणे) म्हणजे पराभिज्झायन होय. भवप्रार्थनेसाठी (भवाच्या इच्छेसाठी) भवदृष्टी आणि भवरागाच्या वशतेमुळे प्रिय वाटणाऱ्या वस्तूच्या विपरिणाम (बदल) आणि अन्यथाभावामुळे (नाशामुळे) दौर्मनस्य (दुःख) उत्पन्न होण्याच्या संदर्भात 'भवराग...पे... दूषित करतात' असे म्हटले आहे. คนฺถิตฺวาติ คนฺถึ กตฺวา. ทฺวิธาภูตํ รชฺชุอาทิเก วิย คนฺถิกรณญฺหิ คนฺถนํ. จิตฺตํ ปริยาทาย ติฏฺฐนฺตา อาสวานํ อุปฺปตฺติเหตุ โหนฺตีติ สมฺพนฺโธ. ปริยุฏฺฐานปฺปตฺตา เอกจฺเจ กิเลสา วิเสสโต อาสวุปฺปตฺติเหตุ โหนฺตีติ ทสฺสนตฺถํ อฏฺฐกถายํ อุปฺปฏิปาฏิวจนํ. ตปฺปฏิปกฺเข วิสเย ปตฺเถตีติ โยชนา. ตพฺพิสยพหุเล ภเว ปตฺเถตีติ ยถา มานุสเกหิ กาเมหิ นิพฺพินฺนรูปา เทวูปปตฺติ. ตํสภาวตฺตาติ ทิฏฺฐิสภาวตฺตา. อปราปรนฺติ อญฺญมญฺญํ. เอกจฺจา หิ ทิฏฺฐิ เอกจฺจสฺส ทิฏฺฐาภินิเวสสฺส การณํ โหติ, ยถา สกฺกายทิฏฺฐิ อิตราสํ. อภินิวิสนฺตสฺสาติ อภินิเวสนเหตุ. ‘‘อโยนิโสมนสิการโต…เป… อวิชฺชาสโว อุปฺปชฺชตี’’ติ อิทํ สจฺจาภินิเวสสฺส ผลภูตํ อวิชฺชาสวํ ทสฺเสติ เอกนฺตวสฺสิเมฆวุฏฺฐาเนน วิย มโหฆปฺปวตฺติ. อวิชฺชาสโว สิทฺโธ โหติ วุฏฺฐิเหตุกมโหฆสิทฺธิยา อุปริเมฆวุฏฺฐานํ วิย. 'गंथित्वा' म्हणजे गाठ मारून. दोरी इत्यादींप्रमाणे दोन भागांना एकत्र करून गाठ मारणे म्हणजेच गंथन (गाठणे) होय. चित्ताला व्यापून राहणारे आसवांच्या उत्पत्तीचे कारण होतात, असा संबंध आहे. परियुत्थान (तीव्रतेने प्रकट) झालेले काही क्लेश विशेषतः आसवांच्या उत्पत्तीचे कारण होतात, हे दर्शवण्यासाठी अट्ठकथेत उलट क्रमाने (उप्पटिपार्टिवचन) सांगितले आहे. 'त्याच्या प्रतिपक्षी (विरोधी) विषयात प्रार्थना करतो' अशी योजना आहे. 'त्या विषयाने बहुल असलेल्या भवाची प्रार्थना करतो' जसे मानवी कामांविषयी विरक्त झालेल्यांची देवलोकात उत्पत्ती (देवूपपत्ती) होते. 'त्याच्या स्वभावत्वामुळे' म्हणजे दृष्टीस्वभावत्वामुळे. 'अपरापर' म्हणजे एकमेक. कारण काही दृष्टी ही काही दृष्टी-अभिनिवेशाचे कारण असते, जसे सक्कायdिट्ठी (सत्कायदृष्टी) ही इतरांचे कारण असते. 'अभिनिवेश करणाऱ्याचे' म्हणजे अभिनिवेशाच्या कारणाने. 'अयोनिसोमनसिकाराने...पे... अविद्यासव उत्पन्न होतो' हे सच्च-अभिनिवेशाचे (सत्य-अभिनिवेशाचे) फलभूत असलेल्या अविद्यासवाला दर्शवते, जसे मुसळधार पावसाच्या पडण्याने महापुराचा प्रवाह सुरू होतो. पावसाच्या कारणाने महापूर सिद्ध होतो, त्याप्रमाणे वरील ढगांच्या पावसाने अविद्यासव सिद्ध होतो. ‘‘นนฺทีราคสหคตา’’ติอาทีสุ [Pg.113] (มหาว. ๑๔) วิย ตพฺภาวตฺโถ สหคตสทฺโทติ อาห ‘‘อนุสย…เป… ภูตา วา’’ติ. จิตฺตสฺส อพฺภนฺตรสงฺขาตํ หทยนฺติ วิปากจิตฺตปฺปวตฺตึ สนฺธาย วทติ. วิปากวฏฺเฏปิ กิเลสวาสนาหิตา อตฺถิ กาจิ วิเสสมตฺตา. 'नंदीरागसहगता' (नंदी आणि रागाने युक्त) इत्यादींमध्ये (महाव. १४) असल्याप्रमाणे 'सहगत' शब्दाचा अर्थ 'त्या भावाने युक्त असणे' असा आहे, म्हणून 'अनुशय...पे... किंवा झालेले' असे म्हटले आहे. चित्ताचा अभ्यंतर (अंतर्भाग) म्हटलेल्या 'हृदय' या शब्दाने विपाकचित्ताच्या प्रवृत्तीच्या संदर्भात बोलत आहेत. विपाकवट्टात (विपाकचक्रात) देखील क्लेशवासनेने युक्त असलेली काही विशेष मात्रा असते. โลภสหคตสฺส วิญฺญาณสฺส. อิตรสฺส โทสสหคตาทิกสฺส. พฺยญฺชเนน วิย โภชนสฺส อารมฺมณสฺส อภิสงฺขรณํ วิเสสาปาทนํ อุปเสจนํ, นนฺที สปฺปีติกตณฺหา อุปเสจนํ เอตสฺสาติ นนฺทูปเสจนํ อุปเสจนภูตายปิ นนฺทิยา ราคสลฺลอุปนิสโต. อุปสิตฺเต ปน วตฺตพฺพเมว นตฺถีติ ทสฺเสตุํ ปาฬิยา ‘‘ราคสลฺเลน นนฺทูปเสจเนน วิญฺญาเณนา’’ติ วุตฺตนฺติ ตมตฺถํ ปากฏํ กาตุํ ‘‘เกน ปน ตํ นนฺทูปเสจน’’นฺติ ปุจฺฉติ. लोभसहगत विज्ञानाचे. इतर द्वेषसहगत इत्यादींचे. जसे व्यंजनाने (चटणी/मसाल्याने) भोजनाचे अभिसंस्करण (विशेष चव आणणे) किंवा उपसेचन (सिंचन) होते, तसे आलंबनाचे अभिसंस्करण, विशेषीकरण किंवा उपसेचन म्हणजे नंदी (प्रीतीयुक्त तृष्णा) होय. या नंदीचे उपसेचन असणे म्हणजेच 'नंदूपसेचन' होय. उपसेचनरूप असलेल्या नंदीमध्ये देखील रागशल्य (रागरूपी बाण) उपनिषद् (कारण) आहे. सिंचन केल्यावर तर काही बोलण्याची गरजच उरत नाही, हे दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये 'रागशल्याने, नंदूपसेचनाने युक्त विज्ञानाने' असे म्हटले आहे. तो अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी 'पण ते नंदूपसेचन कशाने होते?' असा प्रश्न विचारतात. ราคสลฺเลนาติ เหตุมฺหิ กรณวจนนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ราคสลฺเลน เหตุภูเตนา’’ติ อาห. อุปนิสฺสยปจฺจยตฺโถ เจตฺถ เหตฺวตฺโถ. อุปคนฺตพฺพโต วิญฺญาเณนาติ วิภตฺตึ ปริณาเมตฺวา โยเชตพฺพํ. ‘‘ปติฏฺฐาภาวโต’’ติ อิมินา วิญฺญาณสฺส นิสฺสยาทิปจฺจยตํ วทติ. เตนาห ‘‘รูปกฺขนฺธํ นิสฺสาย ติฏฺฐตี’’ติ. เอวํ ทุติยาทิวิญฺญาณฏฺฐิตีสุปิ นิสฺสยาทิปจฺจยตา วตฺตพฺพา ปติฏฺฐาวจนโต. 'रागशल्याने' यामध्ये हेतू अर्थी करण विभक्ती आहे हे दर्शवताना 'रागशल्य हेतू असल्यामुळे' असे म्हटले आहे. येथे हेतूचा अर्थ उपनिस्सयप्रत्यय (उपनिश्रय प्रत्यय) असा आहे. 'प्राप्त करण्यायोग्य असल्यामुळे विज्ञानाने' अशी विभक्ती बदलून योजना करावी. 'प्रतिष्ठाभाव असल्यामुळे' याने विज्ञानाचा निस्सय (आश्रय) इत्यादी प्रत्ययभाव सांगतात. म्हणूनच त्यांनी म्हटले आहे 'रूपस्कंधाचा आश्रय घेऊन राहते'. अशा प्रकारे दुसऱ्या इत्यादी विज्ञानस्थितींमध्ये देखील प्रतिष्ठावचनावरून निस्सय इत्यादी प्रत्ययभाव सांगावा. ๘๕. ยทิปิ อกุสลมูลาทิเก ติปุกฺขลสฺส, ตณฺหาทิเก นนฺทิยาวฏฺฏสฺส ทิสาภาเวน วกฺขติ, ตถาปิ อญฺญมญฺญานุปฺปเวสโต เอกสฺมึ นเย สิทฺเธ อิตเรปิ สิทฺธา เอว โหนฺตีติ อิมสฺส วิเสสสฺส ทสฺสนตฺถํ ‘‘อาหาราทโย…เป… ววตฺถเปตุ’’นฺติ วุตฺตํ. วกฺขมาเน วา อกุสลมูลตณฺหาทิเก อาทิสทฺเทน สงฺคเหตฺวา ‘‘อาหาราทโย’’ติ วทนฺโต ‘‘นยาน’’นฺติ พหุวจนมาห. เอกสฺส อตฺถสฺสาติ ราคจริตสฺส อุปกฺกิเลสตาสงฺขาตสฺส เอกสฺส ปโยชนสฺส. พฺยญฺชนตฺโถปิ คหิโต, น พฺยญฺชนเมว คหิตนฺติ สุตฺตปทานิ อญฺญมญฺญปริยายวจนานิ ยถารหํ ตณฺหาวตฺถูนํ ตตฺถ กถิตตฺตา วุตฺตํ ‘‘สวตฺถุกา ตณฺหา วุตฺตา’’ติ. โทสวตฺถูนํ, ทิฏฺฐิวตฺถูนญฺจ ตตฺถ กถิตตฺตา ‘‘สวตฺถุโก โทโส, สวตฺถุกา ทิฏฺฐิ จ วุตฺตา’’ติ อิมมตฺถํ สนฺธายาห ‘‘วุตฺตนยานุสาเรนา’’ติ. ८५. जरी अकुशलमूल इत्यादींमध्ये त्रिकुशलाचे, तृष्णा इत्यादींमध्ये नंदीवर्ताचे direction (दिशाभावाने/मार्गदर्शनाने) सांगतील, तरीही एकमेकांमध्ये प्रवेश करण्यामुळे एका नयामध्ये (पद्धतीमध्ये) सिद्ध झाल्यावर इतरही सिद्धच होतात, हा विशेष दर्शवण्यासाठी 'आहार इत्यादी...पे... व्यवस्थापित करावे' असे म्हटले आहे. किंवा पुढे सांगण्यात येणाऱ्या अकुशलमूल, तृष्णा इत्यादींना 'आदि' शब्दाने समाविष्ट करून 'आहार इत्यादी' असे म्हणताना 'नयांचे' असे बहुवचन वापरले आहे. 'एका अर्थाचे' म्हणजे रागचरिताच्या उपक्लेशात्मक अशा एका प्रयोजनाचे. व्यंजनाचा अर्थ देखील घेतला आहे, केवळ व्यंजनच घेतले नाही, कारण सूत्रातील पदे एकमेकांचे पर्यायवाचक शब्द आहेत. तेथे योग्यतेनुसार तृष्णेच्या वस्तूंचे कथन केल्यामुळे 'सवत्थुका तण्हा वुत्ता' (सवस्तुक तृष्णा सांगितली आहे) असे म्हटले आहे. द्वेषाच्या वस्तूंचे आणि दृष्टीच्या वस्तूंचे तेथे कथन केल्यामुळे 'सवस्तुको दोष आणि सवस्तुकी दृष्टी सांगितली आहे' हा अर्थ लक्षात घेऊन 'सांगितलेल्या नयानुसार' असे म्हटले आहे. ทุกฺขากาเรน [Pg.114] สห ทุกฺขาการํ คเหตฺวาติ อตฺโถ. เอวญฺเจตนฺติ ยทิ ตํตํอนุปสฺสนาพหุลสฺส วเสน ปุริมาหารทฺวยาทีสุ วิโมกฺขมุขวิเสสนิทฺธารณํ กตํ, เอตํ เอวเมว เวทิตพฺพํ, น อญฺญถา. ตตฺถ การณํ วทนฺโต ‘‘น หี’’ติอาทิมาห. ตสฺสตฺโถ – ยถา อริยมคฺคานํ โอธิโส กิเลสปฺปชหนโต ปหาตพฺเพสุ ธมฺเมสุ นิยโม อตฺถิ, น เอวํ วิปสฺสนาย ปริญฺญาปหานานํ อนิจฺจนฺติกตฺตาติ. दुःखाच्या आकारासह दुःखाचा आकार ग्रहण करून, असा अर्थ आहे. 'असे असेल तर' म्हणजे जर त्या त्या अनुपश्यनेच्या (अनुपस्सना) बहुलतेमुळे पूर्वीच्या दोन आहारांमध्ये विमोक्षमुख-विशेष निश्चित केले गेले असेल, तर हे असेच समजून घ्यावे, अन्यथा नाही. तेथे कारण सांगताना त्यांनी 'न ही' (कारण नाही) इत्यादी म्हटले आहे. त्याचा अर्थ असा - ज्याप्रमाणे आर्यमार्गांच्या (अरियामग्ग) मर्यादित क्लेशप्रहाणामुळे प्रहातव्य (त्याग करण्यायोग्य) धर्मांमध्ये नियम असतो, तसा विपश्यनेच्या (विपस्सना) परिज्ञा आणि प्रहाणांच्या अनैकांतिकतेमुळे (अनित्यतेमुळे) नियम नसतो. อปเร ปนาหุ – ปุริเม อาหารทฺวเย ปริกิเลสภาเวน, ทุกฺขปจฺจยตฺตา จ ทุกฺขลกฺขณํ สุปากฏํ. ตตฺถ ปุริเม วิญฺญาณฏฺฐิติทฺวยวิญฺญาณาหาเร ตติยวิญฺญาณฏฺฐิติยํ อนิจฺจลกฺขณํ, มโนสญฺเจตนาหาเร จตุตฺถวิญฺญาณฏฺฐิติยํ อนตฺตลกฺขณํ สุปากฏนฺติ ติสฺสนฺนํ อนุปสฺสนานํ ปวตฺติมุขตาย เตหิ อปฺปณิหิตาทิวิโมกฺขมุเขหิ ปริญฺญํ คจฺฉนฺตีติ. ตถา วิปลฺลาสาทีสุ ปุริมทฺวยํ ทุกฺขานุปสฺสนาย อุชุวิปจฺจนีกํ, อิตรทฺวยํ อนิจฺจานตฺตานุปสฺสนานํ. อิติ ปวตฺติมุขตาย จ อุชุวิปจฺจนีกตาย จ อิเม ธมฺมา ยถารหํ อปฺปณิหิตาทิวิโมกฺขมุเขหิ ปริญฺเญยฺยา, ปหาตพฺพา จ วุตฺตา. ตตฺถ สุภสุขสญฺญากามุปาทานสีลพฺพตุปาทานกามโยคภวโยคอภิชฺฌากาย คนฺถกามาสวกาโมฆ ภโวฆ ราคสลฺลฉนฺทอคติคมนานิ สุขสฺสาทวเสน ปวตฺตนโต ทุกฺขานุปสฺสนาย ปฏิปกฺขภาวโต พฺยาปาทกายคนฺถโทสสลฺลโทสอคติคมนานิ ปวตฺติมุขตาย อปฺปณิหิตวิโมกฺขมุเขน ปหาตพฺพานิ. ตติยสญฺญาทโย นิจฺจาภินิเวสตนฺนิมิตฺตาหิ อนิจฺจานุปสฺสนาย ปฏิปกฺขภาวโต อนิมิตฺตวิโมกฺขมุเขน ปหาตพฺพา. จตุตฺถสญฺญาทโย อตฺตาภินิเวสตนฺนิตฺตาหิ อนตฺตานุปสฺสนาย ปฏิปกฺขภาวโต สุญฺญตวิโมกฺขมุเขน ปหาตพฺพา. ตตฺถ มานสลฺลภยอคติคมนานํ นิจฺจาภินิเวสนิมิตฺตตา เวทิตพฺพา. น หิ อนิจฺจโต ปสฺสโต มานชปฺปนํ, ภยํ วา สมฺภวติ. อวิชฺชาโยคาทีนํ อตฺตาภินิเวสนิมิตฺตตา ปากฏา เอวาติ. इतर आचार्य म्हणतात – पहिल्या दोन आहारांमध्ये क्लेशकारकतेमुळे आणि दुःखाचे कारण असल्यामुळे 'दुःखलक्षण' स्पष्टपणे प्रकट होते. तेथे पहिल्या दोन विज्ञानस्थिती आणि विज्ञानाहारामध्ये, तिसऱ्या विज्ञानस्थितीत 'अनित्यलक्षण' आणि मनोसंचेतनाहारामध्ये चौथ्या विज्ञानस्थितीत 'अनात्मलक्षण' स्पष्टपणे प्रकट होते. अशा प्रकारे तीन अनुपश्यनांच्या प्रवृत्तीच्या मार्गाने ते अप्रणिहित इत्यादी विमोक्षमुखांद्वारे परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त करतात. तसेच विपर्यासांमध्ये (विपल्लास) पहिले दोन दुःखानुपश्यनेचे थेट विरोधी आहेत, आणि इतर दोन अनित्य व अनात्मानुपश्यनेचे विरोधी आहेत. अशा प्रकारे प्रवृत्तीच्या मार्गाने आणि थेट विरोधी असण्याने हे धर्म योग्य प्रकारे अप्रणिहित इत्यादी विमोक्षमुखांद्वारे परिज्ञेय (जाणून घेण्याजोगे) आणि प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगे) सांगितले आहेत. तेथे शुभ आणि सुख संज्ञा, कामोपादान, शीलव्रतोपादान, कामयोग, भवयोग, अभिज्झाकायग्रंथ, कामासव, कामौघ, भवौघ, रागशल्य, छंद आणि अगतीगमन हे सुखाच्या आस्वादाच्या रूपाने प्रवृत्त होत असल्यामुळे दुःखानुपश्यनेचे प्रतिपक्ष (विरोधी) आहेत; म्हणून व्यापादकायग्रंथ, दोषशल्य आणि अगतीगमन हे प्रवृत्तीच्या मार्गाने अप्रणिहित विमोक्षमुखाद्वारे त्याग करण्याजोगे आहेत. तिसरी संज्ञा इत्यादी नित्य अभिनिवेश आणि त्याच्या निमित्ताने अनित्यतेच्या अनुपश्यनेचे प्रतिपक्ष असल्यामुळे अनिमित्त विमोक्षमुखाद्वारे त्याग करण्याजोगे आहेत. चौथी संज्ञा इत्यादी आत्म-अभिनिवेश आणि त्याच्या निमित्ताने अनात्मानुपश्यनेचे प्रतिपक्ष असल्यामुळे शून्यता विमोक्षमुखाद्वारे त्याग करण्याजोगे आहेत. तेथे मानशल्य, भय आणि अगतीगमन यांचे नित्य अभिनिवेश हे निमित्त आहे असे समजावे. कारण अनित्यतेचे दर्शन घेणाऱ्याला मानाची जल्पना किंवा भय निर्माण होत नाही. अविद्यायोग इत्यादींचे आत्म-अभिनिवेश हे निमित्त असणे स्पष्टच आहे. ๘๖. อปฺปมญฺญาวชฺชา รูปาวจรสมาปตฺติโย ทิพฺพวิหารา ‘‘เทวูปปตฺติสํวตฺตนิกกุสลสมาปตฺติโย จา’’ติ กตฺวา, สติปิ ตพฺภาเว ปรหิตปฏิปตฺติโต, นิทฺโทสตาย จ เสฏฺฐา วิหาราติ จตสฺโส อปฺปมญฺญา พฺรหฺมวิหารา, จตสฺโส ผลสมาปตฺติโย อริยวิหารา ‘‘อารกา กิเลเสหิ อริยานํ วิหารา’’ติ. จตสฺโส อารุปฺปสมาปตฺติโย อาเนญฺชวิหารา[Pg.115], สติปิ เทวูปปตฺติสํวตฺตนิกกุสลสมาปตฺติภาเว อาเนญฺชสนฺตตาหิ โลกิเยสุ สิขาปฺปตฺติโต. ८६. अप्पमञ्ञा (अप्रमाण) वगळून इतर रूपावचर समापत्ती या 'दिव्यविहार' आहेत, कारण त्या 'देवांच्या उत्पत्तीला कारणीभूत असणाऱ्या कुशल समापत्ती' आहेत. असे असले तरी, परहित प्रतिपत्तीमुळे (इतरांच्या कल्याणासाठी आचरण केल्यामुळे) आणि निर्दोष असल्यामुळे श्रेष्ठ विहार म्हणजे चार 'अप्पमञ्ञा' (अप्रमाण) हे 'ब्रह्मविहार' आहेत. चार फलसमापत्ती हे 'अरियविहार' (आर्यविहार) आहेत, कारण ते 'क्लेशांपासून दूर असणाऱ्या अरियांचे (आर्यांचे) विहार' आहेत. चार आरूप्य समापत्ती हे 'आनेञ्जविहार' (अकंपित विहार) आहेत, जरी त्या देवांच्या उत्पत्तीला कारणीभूत असणाऱ्या कुशल समापत्ती असल्या, तरी अकंपित संततीमुळे लौकिक विहारांमध्ये त्या शिखरावर पोहोचलेल्या आहेत. อธิกรณเภเทนาติ วตฺถุเภเทน. 'अधिकरणभेदाने' म्हणजे 'वस्तूच्या भेदाने'. ยํ อภิณฺหํ น ปวตฺตติ, ตํ อจฺฉริยนฺติ ทสฺเสตุํ ‘‘อนฺธสฺส…เป… อุปฺปชฺชนก’’นฺติ วุตฺตํ. อธิติฏฺฐติ สีลาทิ เอเตน สจฺเจน, เอตฺถ วา สจฺเจ นิมิตฺตภูเต, อธิฏฺฐานมตฺตเมว วา ตํ สจฺจนฺติ เอวํ กรณาธิกรณภาวตฺถา ปจฺจยวเสน เวทิตพฺพา สมานาธิกรณสมาสปกฺเข. ตถา อญฺญปทตฺถสมาสปกฺเข. อิตรสฺมึ ปน สมาเส กรณาธิกรณตฺถา เอว, เต จ โข สีลาทิวเสน จ เวทิตพฺพา. สุขนฺติ ฌานวิปสฺสนามคฺคผลนิพฺพานสุขํ. โลกิยวิปากสุขมฺปิ ลพฺภเตว. ‘‘นาญฺญตฺร โพชฺฌา…เป… ปาณิน’’นฺติ (สํ. นิ. ๑. ๙๘) หิ อิมาย คาถาย สงฺคหิตา อนตฺตปริหารมุเขน สตฺตานํ อภยา นิพฺพานสมฺปตฺติสุขาวหา จตฺตาโร ธมฺมา อิธ ‘‘สุขภาคิยา’’ติ วุตฺตาติ. อนวเสสปริยาทานโตติ ผรณวเสน อนวเสสคฺคหณโต. जे वारंवार घडत नाही, ते 'आश्चर्यकारक' आहे हे दर्शवण्यासाठी 'अंधाला...पे... उत्पन्न होणारे' असे म्हटले आहे. या सत्याने शील इत्यादींचे अधिष्ठान होते, किंवा या सत्याच्या निमित्ताने, किंवा ते सत्य केवळ अधिष्ठानच आहे, अशा प्रकारे समानाधिकरण समास पक्षातील प्रत्ययांच्या आधारे करण आणि अधिकरण भावाचे अर्थ समजून घ्यावेत. तसेच अन्यपदार्थ समास पक्षामध्येही समजावे. परंतु इतर समासामध्ये करण आणि अधिकरण अर्थच असतात, आणि ते शील इत्यादींच्या आधारे समजून घ्यावेत. 'सुख' म्हणजे ध्यान, विपश्यना, मार्ग, फल आणि निर्वाण यांचे सुख होय. लौकिक विपाक सुख देखील यात प्राप्त होतेच. 'नाञ्ञत्र बोज्झा...पे... पाणिनां' (सं. नि. १.९८) या गाथेमध्ये समाविष्ट केलेले, अनात्म-परिहार मार्गाने प्राण्यांना अभय आणि निर्वाण संपत्तीचे सुख देणारे चार धर्म येथे 'सुखभागीय' (सुखाचे वाटेकरी) असे म्हटले आहेत. 'अनवसेसपरियादानतो' म्हणजे व्यापून घेण्याच्या (प्रसरण पावण्याच्या) कारणाने संपूर्णपणे ग्रहण करणे. ปฐมสฺส สติปฏฺฐานสฺส ปฐมปฏิปทาวเสน ปวตฺตสฺสาติ อธิปฺปาโย. เอวํ เสเสสุปิ. ‘‘ยถา หี’’ติอาทินา ยถาวุตฺตปฏิปทาสติปฏฺฐานานํ นานนฺตริยกตํ อุปมาย วิภาเวติ. สติปิ จ สพฺพาหิ ปฏิปทาหิ สพฺเพสํ สติปฏฺฐานานํ นิยมาภาเว นานนฺตริกภาเวน เทสนากฺกเมเนเวตฺถ เนสํ อยมนุกฺกโม กโตติ เวทิตพฺโพ. อถ วา กายเวทนาสุ สุภสุขสญฺญานํ ทุพฺพินิเวฐิยตาย อสุภทุกฺขานุปสฺสนานํ กิจฺจสิทฺธิโต ปุริเมน ปฏิปทาทฺวเยน ปุริมํ สติปฏฺฐานทฺวยํ โยชิตํ ตทภาวโต. อิตเรน อิตรํ. ตานิ หิ ปุริเมสุ สติปฏฺฐาเนสุ กตกมฺมสฺส อิจฺฉิตพฺพานิ. อถ วา ยถา ตณฺหาจริตทิฏฺฐิจริตานํ มนฺทติกฺขปญฺญานํ วเสน จตสฺโส ปฏิปทา โยชิตา, เอวํ จตฺตาริ สติปฏฺฐานานิ สมฺภวนฺตีติ ทสฺเสตุํ ปฏิปทาสติปฏฺฐานานํ อยมนุกฺกโม กโต. पहिल्या सतिपट्ठानाची (स्मृतिप्रस्थानाची) पहिल्या प्रतिपदेच्या (मार्गाच्या) रूपाने प्रवृत्ती होते, असा अभिप्राय आहे. इतर सतिपट्ठानांच्या बाबतीतही असेच समजावे. 'यथा ही' इत्यादींद्वारे वर सांगितलेल्या प्रतिपदा आणि सतिपट्ठानांचा अव्यवहित संबंध उपमेद्वारे स्पष्ट केला आहे. सर्व प्रतिपदांद्वारे सर्व सतिपट्ठानांचा कोणताही निश्चित नियम नसला तरी, अव्यवहित संबंधामुळे देशनाक्रमाच्या (उपदेशाच्या क्रमाच्या) आधारेच येथे त्यांचा हा अनुक्रम केला आहे, असे समजावे. अथवा, काय आणि वेदना यांमध्ये शुभ आणि सुख संज्ञांचे निवारण करणे कठीण असल्यामुळे, अशुभ आणि दुःख अनुपश्यनेचे कार्य सिद्ध करण्यासाठी पहिल्या दोन प्रतिपदांद्वारे पहिले दोन सतिपट्ठान जोडले गेले आहेत, कारण त्यांच्याशिवाय ते शक्य नाही. दुसऱ्या प्रतिपदेने दुसरे सतिपट्ठान जोडले गेले आहे. कारण पहिल्या सतिपट्ठानांमध्ये ज्यांनी कर्म केले आहे त्यांच्यासाठी ती इष्ट आहेत. अथवा, ज्याप्रमाणे तृष्णाचरित आणि दृष्टीचरित असणाऱ्या मंद व तीक्ष्ण प्रज्ञेच्या व्यक्तींच्या आधारेच चार प्रतिपदा जोडल्या गेल्या आहेत, त्याचप्रमाणे चार सतिपट्ठान संभवतात हे दर्शवण्यासाठी प्रतिपदा आणि सतिपट्ठानांचा हा अनुक्रम केला गेला आहे. ‘‘ตถา’’ติ อิมินา ยถา สมานปฏิปกฺขตาย ปฐมสฺส สติปฏฺฐานสฺส ภาวนา ปฐมสฺส ฌานสฺส วิเสสาวหา, เอวํ ปีติสหคตาทิสมานตาย ทุติยสติปฏฺฐานาทิภาวนา ทุติยชฺฌานาทีนํ วิเสสาวหาติ อิมมตฺถํ อุปสํหรติ. ปีติปฏิสํเวทนาทีติ อาทิสทฺเทน สุขปฏิสํเวทนํ, จิตฺตสงฺขารปฏิสํเวทนํ, ปสฺสมฺภนญฺจ สงฺคณฺหาติ. จิตฺตสฺส อภิปฺปโมทนคฺคหณญฺเจตฺถ [Pg.116] นิทสฺสนมตฺตํ ทฏฺฐพฺพํ ปฏิสํเวทนสมาทหนวิโมจนานมฺปิ วเสน ปวตฺติยา อิจฺฉิตพฺพตฺตา. อนิจฺจวิราคาทีติ อาทิสทฺเทน นิโรธปฏินิสฺสคฺคา สงฺคยฺหนฺติ. 'तथा' (त्याचप्रमाणे) या शब्दाने – ज्याप्रमाणे समान प्रतिपक्ष असल्यामुळे पहिल्या सतिपट्ठानाची भावना पहिल्या ध्यानाला विशेष लाभ मिळवून देणारी ठरते, त्याचप्रमाणे प्रीतीसहगत इत्यादी समानतेमुळे दुसऱ्या सतिपट्ठानादींची भावना दुसऱ्या ध्यानादींना विशेष लाभ मिळवून देणारी ठरते, या अर्थाचा उपसंहार केला आहे. 'प्रीतिपटिसंवेदनादी' (प्रीतीचा अनुभव घेणे इत्यादी) यातील 'आदि' शब्दाने सुखाचा अनुभव घेणे (सुखपटिसंवेदन), चित्तसंस्काराचा अनुभव घेणे (चित्तसंखारपटिसंवेदन) आणि शांत करणे (पस्सम्भन) यांचा समावेश होतो. येथे चित्ताचे 'अभिप्रमोदन' (अभिप्पमोदन) ग्रहण करणे हे केवळ उदाहरण म्हणून पाहावे, कारण अनुभव घेणे, समाधी लावणे आणि विमुक्त करणे यांच्या रूपाने प्रवृत्ती देखील इष्ट आहे. 'अनित्यविरागादी' यातील 'आदि' शब्दाने निरोध आणि प्रतिनिसर्ग (त्याग) यांचा संग्रह होतो. รูปาวจรสมาปตฺตีนนฺติ เอตฺถ ปฏิลทฺธมตฺตํ ปฐมชฺฌานํ ปฐมชฺฌานสมาปตฺติยา ปคุณวสีภาวาปาทนสฺส ปจฺจโย โหติ, น อิตราสํ. อิตราสํ ปน อธิฏฺฐานภาเวน ปรมฺปราย ปจฺจโย โหตีติ เวทิตพฺพํ. พฺยาปาทวิหึสาวิตกฺกอรติราคา พฺยาปาทวิตกฺกาทโย. สุเขนาติ อกิจฺเฉน, อกสิเรนาติ อตฺโถ. 'रूपावचर समापत्तींचे' यामध्ये केवळ प्राप्त झालेले पहिले ध्यान (प्रथमज्झान) हे पहिल्या ध्यानाच्या समापत्तीच्या अभ्यासाने वश करण्याच्या (प्रवीण होण्याच्या) प्रक्रियेला प्रत्यय (कारण) ठरते, इतरांना नाही. परंतु इतरांना ते अधिष्ठान रूपाने परंपरेने प्रत्यय ठरते, असे समजावे. व्यापाद, विहिंसा वितर्क, अरती आणि राग हे 'व्यापादवितर्क' इत्यादी आहेत. 'सुखाने' म्हणजे विनासायास, कष्ट न पडता, असा अर्थ आहे. ทิพฺพวิหาราทิเก จตฺตาโร วิหาเร ปทฏฺฐานํ กตฺวา นานาสนฺตาเนสุ อุปฺปนฺนาย วุฏฺฐานคามินิวิปสฺสนาย ยถากฺกมํ อนุปฺปนฺนากุสลานุปฺปาทนาทิวเสน ปวตฺตวิสยํ สนฺธาย ปาฬิยํ ‘‘ปฐโม วิหาโร ภาวิโต พหุลีกโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. สมฺมปฺปธานสทิสญฺเหตฺถ สมฺมปฺปธานํ วุตฺตํ. อริยวิหาเร จ เหฏฺฐิเม นิสฺสาย อุปริมคฺคาธิคมาย วายมนฺตสฺส อยํ นโย ลพฺภติ. มคฺคปริยาปนฺนสฺเสว วา สมฺมปฺปธานสฺส นานาสนฺตานิกสฺส ยถาวุตฺตวิปสฺสนาคมเนน ตํตํกิจฺจาทิกสฺส วเสเนตํ วุตฺตํ. สกฺกา หิ วิปสฺสนาคมเนน สทฺธินฺทฺริยาทิติกฺขตาวิเสโส วิย วีริยสฺส กิจฺจวิเสสวิสโย มคฺโค วิญฺญาตุํ. दिव्यविहारादी चार विहारांना अधिष्ठान (पदस्थान) करून, विविध संतानांमध्ये (चित्तप्रवाहांमध्ये) उत्पन्न झालेल्या वुट्ठानगामिनी विपस्सनेच्या (उत्थानगामी विपश्यनेच्या) यथाक्रमाने अनुत्पन्न अकुशलांच्या अनुत्पादनादी वशाने प्रवृत्त होणाऱ्या विषयाला उद्देशून पाळिमध्ये (पालिपाठात) 'पहिला विहार भावित केला, बहुलीकृत केला' इत्यादी म्हटले आहे. येथे सम्माप्पधानासारखेच (सम्यक्प्रधानासारखेच) सम्माप्पधान म्हटले आहे. आणि कनिष्ठ अरियविहाराचा (आर्यविहाराचा) आश्रय घेऊन उच्च मार्गाच्या अधिगमनासाठी (प्राप्तीसाठी) प्रयत्न करणाऱ्याच्या बाबतीत हा नय (नियम) प्राप्त होतो. किंवा मार्गपरियापन्न (मार्गात समाविष्ट) असलेल्याच सम्माप्पधानाच्या, विविध संतानांमधील यथोक्त विपस्सनेच्या आगमनाने (प्राप्तीने) त्या त्या कृत्यादींच्या प्रभावाने हे म्हटले आहे. कारण विपस्सनेच्या आगमनाने, सद्धिन्द्रियादींच्या (श्रद्धेन्द्रियादींच्या) तीक्ष्णतेच्या विशेषाप्रमाणे, वीरियाच्या (वीर्याच्या) कृत्यविशेषाचा विषय असलेला मार्ग जाणणे शक्य आहे. ตถา สิขาปฺปตฺตอุเปกฺขาสติปาริสุทฺธิทิพฺพวิหารํ นิสฺสาย อุปฺปนฺนํ ปฐมํ สมฺมปฺปธานํ มานปฺปหานํ อุกฺกํเสติ, พฺรหฺมวิหารสนฺนิสฺสเย อุปฺปนฺนํ ทุติยํ สมฺมปฺปธานํ กามาลยสมุคฺฆาตํ, อริยวิหารสนฺนิสฺสเยน อุปฺปนฺนํ ตติยํ สมฺมปฺปธานํ อวิชฺชาปหานํ, สนฺตวิโมกฺขสนฺนิสฺสเยน อุปฺปนฺนํ จตุตฺถํ สมฺมปฺปธานํ ภวูปสมํ อุกฺกํเสตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘ปฐมํ สมฺมปฺปธาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. त्याचप्रमाणे, शिखाप्राप्त उपेक्खा-सति-पारिसुद्धि (उपेक्षा-स्मृति-पारिशुद्धी) दिव्यविहाराचा आश्रय घेऊन उत्पन्न झालेले पहिले सम्माप्पधान मान-प्रहाणाला (अभिमान नष्ट करण्याला) उत्कर्षाला पोहोचवते; ब्रह्मविहाराच्या आश्रयाने उत्पन्न झालेले दुसरे सम्माप्पधान कामालय-समुद्घाताला (काम-आसक्तीच्या समूळ उच्चाटनाला) उत्कर्षाला पोहोचवते; अरियविहाराच्या आश्रयाने उत्पन्न झालेले तिसरे सम्माप्पधान अविज्जा-प्रहाणाला (अविद्या-प्रहाणाला) उत्कर्षाला पोहोचवते; आणि शांत विमोक्षाच्या आश्रयाने उत्पन्न झालेले चौथे सम्माप्पधान भवोपाशमाला (भव-उपशमाला) उत्कर्षाला पोहोचवते, हे दर्शवण्यासाठी 'पहिले सम्माप्पधान' इत्यादी म्हटले आहे. ปหีนมาโน น วิสํวาเทยฺยาติ มานปฺปหานํ สจฺจาธิฏฺฐานํ วฑฺเฒติ วิสํวาทนนิมิตฺตสฺเสว อภาวโต. อปฺปหีนมาโน หิ มานนิสฺสเยน กิญฺจิ วิสํวาเทยฺย. กามาลเย, ทิฏฺฐาลเย จ สมุคฺฆาฏิเต จาคปฏิปกฺขสฺส อวสโร เอว นตฺถีติ อาลยสมุคฺฆาโต จาคาธิฏฺฐานํ วฑฺเฒติ. อวิชฺชาย สมุจฺฉินฺนาย ปญฺญาพุทฺธิยา ปริพนฺโธว นตฺถิ, ภวสงฺขาเรสุ โอสฺสฏฺเฐสุ อภวูปสมสฺส โอกาโสว นตฺถีติ มานปฺปหานาทโย สจฺจาธิฏฺฐานาทิเก สํวฑฺเฒนฺตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘มานปฺปหาน’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. ज्याचा मान (अभिमान) प्रहीण झाला आहे तो विसंवाद करत नाही, म्हणून मान-प्रहाण हे सच्च-अधिष्ठानाला (सत्य-अधिष्ठानाला) वाढवते, कारण विसंवादाच्या कारणाचाच अभाव असतो. कारण ज्याचा मान प्रहीण झालेला नाही, तो मानाच्या आश्रयाने काहीतरी विसंवाद करू शकतो. कामालय (कामासक्तीचे स्थान) आणि दिट्ठालय (दृष्टीचे स्थान) यांचे समूळ उच्चाटन झाले असता, त्यागाच्या विरोधी भावाला (चाग-प्रतिपक्षाला) वावच उरत नाही, म्हणून आलय-समुद्घात हा चाग-अधिष्ठानाला (त्याग-अधिष्ठानाला) वाढवतो. अविज्जा (अविद्या) समूळ नष्ट झाली असता, प्रज्ञा-बुद्धीला कोणताही अडथळा उरत नाही; आणि भवसंस्कारांचा त्याग केला असता, भव-उपशम न होण्याला वावच उरत नाही. अशा प्रकारे मान-प्रहाण इत्यादी हे सच्च-अधिष्ठानादींना संवर्धित करतात, हे दर्शवण्यासाठी 'मान-प्रहाण' इत्यादी म्हटले आहे. อวิสํวาทนสีโล [Pg.117] ธมฺมจฺฉนฺทพหุโล ฉนฺทาธิปเตยฺยํ สมาธึ นิพฺพตฺเตติ. จาคาธิมุตฺโต เนกฺขมฺมชฺฌาสโย อโกสชฺชพหุลตาย วีริยาธิปเตยฺยํ, ญาณุตฺตโร จิตฺตํ อตฺตโน วเส วตฺเตนฺโต จิตฺตาธิปเตยฺยํ, วูปสนฺตสภาโว อุปสมเหตุภูตาย วีมํสาย วีมํสยโต วีมํสาธิปเตยฺยํ สมาธึ นิพฺพตฺเตตีติ สจฺจาธิฏฺฐานาทิปาริสุทฺธิฉนฺทสมาธิอาทีนํ ปาริปูริยา สํวตฺตตีติ ทสฺเสตุํ ‘‘สจฺจาธิฏฺฐานํ ภาวิต’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. विसंवाद न करण्याचा स्वभाव असलेला आणि धम्मच्छंद (धर्माची तीव्र इच्छा) बहुल असलेला साधक छंदाधिपतेय्य (छंदाधिपत्य) समाधी उत्पन्न करतो. त्यागामध्ये अधिमुक्त (समर्पित) असलेला आणि नेक्खम्म-आशय (नैष्क्रम्य-आशय) असलेला साधक, अकोसज्ज-बहुलतेमुळे (उद्योगीपणामुळे) वीरियाधिपतेय्य (वीर्याधिपत्य) समाधी उत्पन्न करतो. ज्ञानामध्येष श्रेष्ठ असलेला आणि चित्ताला स्वतःच्या वशामध्ये ठेवणारा साधक चित्ताधिपतेय्य (चित्ताधिपत्य) समाधी उत्पन्न करतो. शांत स्वभाव असलेला आणि उपशमाचे कारण असलेल्या विमंसेद्वारे (मीमांसेद्वारे) विचार करणारा साधक विमंसाधिपतेय्य (मीमांशाधिपत्य) समाधी उत्पन्न करतो. अशा प्रकारे सच्च-अधिष्ठानादींच्या परिशुद्धीमुळे छंद-समाधी इत्यादींची परिपूर्ती होते, हे दर्शवण्यासाठी 'सच्च-अधिष्ठान भावित केले' इत्यादी म्हटले आहे. ธมฺมจฺฉนฺทพหุโล ฉนฺทสมาธิมฺหิ ฐิโต อิฏฺฐานิฏฺฐฉฬารมฺมณาปาเต อนวชฺชเสวี โหติ. อารทฺธวีริโย วีริยสมาธิมฺหิ ฐิโต สํกิเลสปกฺขสฺส สนฺตปนวเสเนว ปุญฺญํ ปริปูเรติ. จิตฺตํ อตฺตโน วเส วตฺเตนฺโต จิตฺตสมาธิมฺหิ ฐิโต ปญฺญาย อุปการานุปการเก ธมฺเม ปริคฺคณฺหนฺโต พุทฺธึ ผาตึ คมิสฺสติ. วีมํสาสมาธิมฺหิ ฐิโต ธมฺมวิจยพหุโล อุปธิปฏินิสฺสคฺคาวหเมว ปฏิปตฺตึ พฺรูเหตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘ฉนฺทสมาธิ ภาวิโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. धम्मच्छंदबहुल असलेला आणि छंद-समाधीमध्ये स्थित असलेला साधक इष्ट आणि अनिष्ट अशा सहा प्रकारच्या आरंमणांच्या (आलंबनांच्या) संपर्कात आला असता अनवद्य-सेवी (दोषरहित गोष्टींचे सेवन करणारा) होतो. आरब्ध-वीर्य (प्रयत्नशील) असलेला आणि वीर्य-समाधीमध्ये स्थित असलेला साधक संक्लेश-पक्षाच्या (अशुद्ध भावांच्या) संतापनाच्या (दहनाच्या) वशानेच पुण्याची परिपूर्ती करतो. चित्ताला स्वतःच्या वशामध्ये ठेवणारा आणि चित्त-समाधीमध्ये स्थित असलेला साधक प्रज्ञेला उपकारक आणि अनुपकारक असलेल्या धर्मांचे ग्रहण करत बुद्धीला वृद्धिंगत करतो. विमंसा-समाधीमध्ये (मीमांसा-समाधीमध्ये) स्थित असलेला आणि धम्मविचयबहुल असलेला साधक उपधीच्या प्रतिनिसर्गाला (त्यागाला) कारणीभूत असणाऱ्या प्रतिपत्तीचीच (साधनेचीच) वृद्धी करतो, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'छंद-समाधी भावित केली' इत्यादी म्हटले आहे. ทูราทูรปจฺจตฺถิกนิวารเณ พหูปกาโร อินฺทฺริยสํวโร เมตฺตาย วิเสสุปฺปตฺติเหตุโต เมตฺตํ วฑฺเฒติ. ตเปน สํกิเลสธมฺเม วิกฺขมฺเภนฺโต วีริยาธิโก ปรทุกฺขาปนยนกามตํ สาหตฺถิกํ กโรตีติ ตโป กรุณํ สํวฑฺเฒติ. ปญฺญา ปริโยทาปิตา สาวชฺชานวชฺชธมฺเม ปริคฺคณฺหนฺตี ปหาสนิปาตโต มุทิตํ รกฺขนฺตี ปริพฺรูเหติ. อุปธินิสฺสคฺโค ปกฺขนฺโท นินฺนโปณปพฺภาโรว สมฺมเทว สตฺตสงฺขาเรสุ อุทาสิโน โหตีติ โส อุเปกฺขาวิหารํ ปริวฑฺเฒตีติ อิมมตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘‘อินฺทฺริยสํวโร ภาวิโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. เตนาห ‘‘โย ยสฺส วิเสสปจฺจโย, โส ตํ ปริปูเรตีติ วุตฺโต’’ติ. दूर आणि जवळच्या शत्रूंचे निवारण करण्यात अत्यंत उपकारक असलेला इन्द्रिय-संवर हा मेत्तेच्या (मैत्रीच्या) विशेष उत्पत्तीचे कारण असल्यामुळे मेत्तेला वाढवतो. तपाने संक्लेश-धर्मांना दाबून टाकणारा, वीर्याधिक असलेला साधक दुसऱ्यांचे दुःख दूर करण्याची इच्छा प्रत्यक्षात आणतो, म्हणून तप करुणेला संवर्धित करतो. परिशुद्ध झालेली प्रज्ञा सावद्य (दोषयुक्त) आणि अनवद्य (दोषरहित) धर्मांचे ग्रहण करत, प्रसन्नतेच्या प्रभावाने मुदितेला सुरक्षित ठेवून तिची वृद्धी करते. उपधीचा त्याग करणारा, त्याकडे झुकलेला, प्रवण आणि प्रभार असलेला साधक सत्त्वसंस्कारांच्या बाबतीत योग्य प्रकारे उदासीन (तटस्थ) होतो, म्हणून तो उपेक्खा-विहाराला (उपेक्षा-विहाराला) वाढवतो, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'इन्द्रिय-संवर भावित केला' इत्यादी म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'जो ज्याचा विशेष प्रत्यय (कारण) आहे, तो त्याची परिपूर्ती करतो, असे म्हटले आहे.' ๘๗. ทิสาภาเวนาติ นยานํ ทิสาภาเวนาติ โยเชตพฺพํ. อตฺโถปิสฺส ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. เยน จตุกฺเกน ยสฺส ราคจริตาทิปุคฺคลสฺส โวทานํ วิสุทฺธิ. ยถา อปริญฺญาตา, อปฺปหีนา จ ปฐมาหารวิปลฺลาสาทโย ราคจริตาทีนํ ปุคฺคลานํ อุปกฺกิเลสา, เอวํ ปฐมปฏิปทาทโย ภาวิตา พหุลีกตา เนสํ วิสุทฺธิโย โหนฺตีติ วุตฺตนยานุสาเรน สกฺกา วิญฺญาตุนฺติ อาห ‘‘เหฏฺฐา วุตฺตนยเมวา’’ติ. ८७. ‘दिशाभावाने’ म्हणजे ‘नयांच्या दिशाभावाने’ असे जोडावे. याचा अर्थही पूर्वी सांगितलेल्या नयानेच (पद्धतीनेच) समजावा. ज्या चतुष्काने ज्या रागचरित इत्यादी पुद्गलाची (व्यक्तीची) वोदान (परिशुद्धी) होते. ज्याप्रमाणे अपरिज्ञात आणि अप्रहीण असलेले पहिले आहारादी विपर्यास हे रागचरित इत्यादी पुद्गलांचे उपक्क्लेश आहेत, त्याचप्रमाणे पहिली प्रतिपदा इत्यादी भावित आणि बहुलीकृत केल्या असता त्यांची विशुद्धी होते, हे पूर्वोक्त नयानुसार जाणणे शक्य आहे, म्हणून ‘खाली सांगितलेल्या नयाप्रमाणेच’ असे म्हटले आहे. อถ [Pg.118] วา ปุริมาหิ ทฺวีหิ ปฏิปทาหิ สิชฺฌมานา วิปสฺสนา อตฺตโน กิจฺจวุตฺติสงฺขาตํ ปวตฺติทุกฺขมฺปิ สงฺคณฺหนฺตี ทุกฺขานุปสฺสนาพาหุลฺลวิเสสโต ทุกฺขลกฺขณํ ปฏิวิชฺฌนฺตี ‘‘อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. ตติยาย ปฏิปทาย สิชฺฌมานา สุขปฺปวตฺติกตาย สมฺมเทว สนฺตติฆนํ ภินฺทิตฺวา อนิจฺจลกฺขณํ วิภาเวนฺตี ‘‘อนิมิตฺตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. จตุตฺถาย ปน ปฏิปทาย สิชฺฌมานา สุขปฺปวตฺติกตาย, วิสทญาณตาย จ สมูหกิจฺจารมฺมณฆนํ ภินฺทิตฺวา สมฺมเทว อนตฺตลกฺขณํ วิภาเวนฺตี ‘‘สุญฺญตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. किंवा, पहिल्या दोन प्रतिपदांनी सिद्ध होणारी विपस्सना स्वतःच्या कृत्यवृत्ती नावाच्या प्रवृत्ती-दुःखालाही ग्रहण करत, दुःखानुपस्सेनेच्या बाहुल्यविशेषाने दुःखलक्षणाचा वेध घेत (ते जाणून घेत) ‘अप्पणिहित विमोक्षमुख’ (अप्रणिहित विमोक्षमुख) अशी म्हटली आहे. तिसऱ्या प्रतिपदेने सिद्ध होणारी विपस्सना, सुखप्रवृत्तीमुळे योग्य प्रकारे संतती-घनाला (प्रवाहाच्या घनतेला) भेदून अनित्यलक्षणाला स्पष्ट करत ‘अनिमित्त विमोक्षमुख’ अशी म्हटली आहे. तर चौथ्या प्रतिपदेने सिद्ध होणारी विपस्सना, सुखप्रवृत्तीमुळे आणि विशद ज्ञानामुळे समूह-कृत्य-आरंमण-घनाला (समूह-कृत्य-आलंबन-घनतेला) भेदून योग्य प्रकारे अनात्मलक्षणाला स्पष्ट करत ‘सुञ्ञत विमोक्षमुख’ (शून्यत विमोक्षमुख) अशी म्हटली आहे. ตถา กายเวทนานุปสฺสนา วิเสสโต ทุกฺขลกฺขณํ วิภาเวนฺตี, จิตฺตานุปสฺสนา อนิจฺจลกฺขณํ, ธมฺมานุปสฺสนา อนตฺตลกฺขณนฺติ ตา ยถากฺกมํ ‘‘อปฺปณิหิตาทิวิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. त्याचप्रमाणे, काय-अनुपस्सना आणि वेदना-अनुपस्सना विशेषतः दुःखलक्षणाला स्पष्ट करत, चित्त-अनुपस्सना अनित्यलक्षणाला स्पष्ट करत, आणि धम्म-अनुपस्सना अनात्मलक्षणाला स्पष्ट करते; म्हणून त्यांना यथाक्रमाने ‘अप्पणिहितादी विमोक्षमुख’ असे म्हटले आहे. สปฺปีติกตาย อสฺสาทานิ ปฐมทุติยชฺฌานานิ วิรชฺชนวเสน วิเสสโต ทุกฺขโต ปสฺสนฺติยา วิปสฺสนาย วเสน ‘‘อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตานิ. ตติยํ สนฺตสุขตาย พาหิรกานํ นิจฺจาภินิเวสวตฺถุภูตํ สภาวโต ‘‘อนิจฺจ’’นฺติ ปสฺสนฺติยา วิปสฺสนาย วเสน ‘‘อนิมิตฺตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตํ. จตุตฺถํ อุปกฺกิเลสวิคมาทีหิ ปริสุทฺธํ สุสมาหิตํ ยถา ปเรสํ, เอวํ อตฺตโน จ ยถาภูตสภาวาวโพธเหตุตาย สมฺมเทว ‘‘สุญฺญ’’นฺติ ปสฺสนฺติยา วิปสฺสนาย วเสน ‘‘สุญฺญตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตํ. सप्रीतिक (प्रीतीसह) असल्यामुळे आस्वाद्य असणारी पहिली आणि दुसरी ध्याने, विरागतेच्या वशाने विशेषतः दुःख रूपाने पाहणाऱ्या विपस्सनेच्या वशाने ‘अप्पणिहित विमोक्षमुख’ अशी म्हटली आहेत. तिसरे ध्यान हे शांत सुख असल्यामुळे, बाह्य लोकांच्या नित्यत्वाच्या आग्रहाचे कारण असणारे असून, स्वभावाने ‘अनित्य’ आहे असे पाहणाऱ्या विपस्सनेच्या वशाने ‘अनिमित्त विमोक्षमुख’ असे म्हटले आहे. चौथे ध्यान हे उपक्क्लेशांच्या विगमादींमुळे परिशुद्ध आणि सुसमाहित असून, ज्याप्रमाणे इतरांच्या, त्याचप्रमाणे स्वतःच्या यथाभूत स्वभावाच्या यथार्थ ज्ञानाचे कारण असल्यामुळे, योग्य प्रकारे ‘शून्य’ आहे असे पाहणाऱ्या विपस्सनेच्या वशाने ‘सुञ्ञत विमोक्षमुख’ (शून्यत विमोक्षमुख) असे म्हटले आहे. เอวํ วิหารานํ วิปสฺสนาวเสเนว วิโมกฺขมุขตา, ตตฺถ ‘‘ทิพฺพพฺรหฺมวิหารานํ สนฺตสุขตาย อสฺสาทนียตา’’ติอาทินา อปฺปณิหิตวิโมกฺขมุขตา โยเชตพฺพา. อริยวิหารสฺส ปญฺญาธิกตฺตา วิเสสโต อนตฺตานุปสฺสนาสนฺนิสฺสยตาย สุญฺญตวิโมกฺขตา. อาเนญฺชวิหารสฺส สนฺตวิโมกฺขตาย อนิจฺจลกฺขณปฺปฏิเวธสฺส วิเสสปจฺจยสภาวโต อนิมิตฺตวิโมกฺขมุขตา โยเชตพฺพา. अशा प्रकारे विहारांच्या विपश्यनेच्या वशामुळेच विमोक्षमुखता होते. त्यामध्ये "दिव्य ब्रह्मविहारांच्या शांत सुखाच्या आस्वाद्यतेमुळे" इत्यादींद्वारे अप्पणिहित-विमोक्षमुखता जोडली पाहिजे. आर्यविहाराच्या प्रज्ञाधिक्यामुळे विशेषतः अनत्तानुपस्सना-संश्रयामुळे सुञ्ञत-विमोक्षता होते. आनेञ्जविहाराच्या शांत विमोक्षतेमुळे अनित्यलक्षणाच्या प्रतिवेधाचा विशेष प्रत्यय स्वभाव असल्यामुळे अनिमित्त-विमोक्षमुखता जोडली पाहिजे. ตถา ปุริมานํ ทฺวินฺนํ สมฺมปฺปธานานํ สํกิเลสวิสยตฺตา กิเลสทุกฺขวีติกฺกมสฺส ทุกฺขานุปสฺสนาพาหุลฺลตฺตา อปฺปณิหิตวิโมกฺขมุขตา. ตติยสฺส อนุปฺปนฺนกุสลุปฺปาทเนน ธมฺมานํ อุทยวยวนฺตตาวิภาวนโต อนิจฺจลกฺขณํ ปากฏนฺติ อนิมิตฺตวิโมกฺขมุขตา. จตุตฺถสฺส อุปฺปนฺนานํ ฐิตตฺตํ พฺยาปาราปชฺชเนน ธมฺมานํ อวสวตฺติตาทีปนโต อนตฺตลกฺขณํ สุปากฏนฺติ สุญฺญตวิโมกฺขมุขตา. तसेच, पहिल्या दोन सम्मप्पधानांच्या संक्लेशविषयत्वामुळे, क्लेशदुःखाच्या अतिक्रमासाठी दुःखानुपस्सना बहुल असल्यामुळे अप्पणिहित-विमोक्षमुखता होते. तिसऱ्याच्या अनुत्पन्न कुशलाच्या उत्पादनाने धर्मांच्या उदय-व्ययशीलतेचे प्रकटीकरण होत असल्यामुळे अनित्यलक्षण स्पष्ट होते, म्हणून अनिमित्त-विमोक्षमुखता होते. चौथ्याच्या उत्पन्न झालेल्यांच्या स्थितीसाठी प्रयत्न करण्याद्वारे धर्मांच्या अवशवर्तित्वाचे प्रकटीकरण होत असल्यामुळे अनत्तालक्षण सुस्पष्ट होते, म्हणून सुञ्ञत-विमोक्षमुखता होते. มานปฺปหานาลยสมุคฺฆาตานํ [Pg.119] สหายตณฺหาปหานตาย ตณฺหาปณิธิวิโสธนโต อปฺปณิหิตวิโมกฺขมุขตา. อวิชฺชาปหานสฺส ปญฺญากิจฺจาธิกตาย สุญฺญตวิโมกฺขมุขตา. ภวูปสมสฺส สงฺขารนิมิตฺตปฏิปกฺขตาย อนิมิตฺตวิโมกฺขมุขตา. मान-प्रहाण आणि आलय-समुद्घाताच्या सहगामी असणाऱ्या तण्हा-प्रहाणामुळे तृष्णा-प्रणिधीच्या विशोधनामुळे अप्पणिहित-विमोक्षमुखता होते. अविज्जा-प्रहाणाच्या प्रज्ञाकार्याच्या अधिक्यामुळे सुञ्ञत-विमोक्षमुखता होते. भव-उपशमाच्या संखाराच्या निमित्ताच्या प्रतिपक्षतेमुळे अनिमित्त-विमोक्षमुखता होते. ปกติยา ทุกฺขสภาเว สงฺขาเร ญาณสจฺเจน อวิสํวาเทนฺโต ทุกฺขโต เอว ปสฺสติ, จาคาธิวิมุตฺตตาย ตณฺหํ วิทูรีกโรนฺโต ราคปฺปณิธึ วิโสเสตีติ ปุริมํ อธิฏฺฐานทฺวยํ ‘‘อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตํ. อิตรสฺส ปน อธิฏฺฐานทฺวยสฺส สุญฺญตานิมิตฺตวิโมกฺขมุขตา วุตฺตนยา เอว. स्वभावाने दुःखस्वरूप असणाऱ्या संखारांना ज्ञानसत्याद्वारे विसंवाद न करता दुःखरूपानेच पाहणारा, त्यागाच्या अधिमुक्तीमुळे तृष्णेला दूर सारत रागप्रणिधीला सुकवतो, म्हणून पहिल्या दोन अधिष्ठानांना "अप्पणिहित विमोक्षमुख" असे म्हटले आहे. परंतु इतर दोन अधिष्ठानांची सुञ्ञत आणि अनिमित्त विमोक्षमुखता सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावी. ฉนฺทาธิปเตยฺยา จิตฺเตกคฺคตา วิเสสโต ธมฺมจฺฉนฺทวโต เนกฺขมฺมวิตกฺกพหุลสฺส โหติ, วีริยาธิปเตยฺยา ปน กามวิตกฺกาทิเก วิโนเทนฺตสฺสาติ ตทุภยํ นิสฺสาย ปวตฺตา วิปสฺสนา วิเสสโต ราคาทิปฺปณิธีนํ วิโสสนโต ‘‘อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. จิตฺตาธิปเตยฺยํ, วีมํสาธิปเตยฺยญฺจ นิสฺสาย ปวตฺตา ยถากฺกมํ อนิจฺจานตฺตานุปสฺสนาพาหุลฺลโต ‘‘อนิมิตฺตํ วิโมกฺขมุขํ, อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ จ วุตฺตา. छंदाधिपत्य असलेली चित्तैकाग्रता विशेषतः धम्मच्छंद असणाऱ्या आणि नेक्खम्मवितक्क बहुल असणाऱ्या व्यक्तीला होते; वीर्याधिपत्य असलेली चित्तैकाग्रता कामवितर्क इत्यादींना दूर करणाऱ्याला होते. म्हणून या दोन्हीवर अवलंबून प्रवर्तित झालेली विपश्यना विशेषतः रागादी प्रणिधींना सुकवत असल्यामुळे "अप्पणिहित विमोक्षमुख" म्हटली आहे. चित्ताधिपत्य आणि वीमंसाधिपत्य यांवर अवलंबून प्रवर्तित झालेली विपश्यना अनुक्रमे अनित्य आणि अनत्तानुपस्सना बहुल असल्यामुळे "अनिमित्त विमोक्षमुख" आणि "अप्पणिहित विमोक्षमुख" अशी म्हटली आहे. อภิชฺฌาวินยโน อินฺทฺริยสํวโร, กามสงฺกปฺปาทิวิโนทโน ตโป จ วุตฺตนเยเนว ปณิธิปฏิปกฺขโต อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุขํ, พุทฺธิ อนตฺตานุปสฺสนานิมิตฺตํ, อุปธิปฏินิสฺสคฺโค นิมิตฺตคฺคาหปฏิปกฺโขติ ตทุภยสนฺนิสฺสยา วิปสฺสนา ยถากฺกมํ ‘‘สุญฺญตํ, อนิมิตฺตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. अभिज्झेचा विनय करणारा इंद्रियसंवर आणि कामसंकल्प इत्यादींना दूर करणारे तप हे सांगितलेल्या पद्धतीनेच प्रणिधीच्या प्रतिपक्ष असल्यामुळे "अप्पणिहित विमोक्षमुख" आहे. बुद्धी ही अनत्तानुपस्सना-निमित्त आहे आणि उपधीचा प्रतिनिसर्ग हा निमित्तग्रहाचा प्रतिपक्ष आहे, म्हणून या दोन्हीवर संश्रित असलेली विपश्यना अनुक्रमे "सुञ्ञत" आणि "अनिमित्त विमोक्षमुख" म्हटली आहे. อาสนฺนปจฺจตฺถิกราคํ ปฏิพาหนฺตี เมตฺตา ราคปณิธิยา ปฏิปกฺโข, กรุณา ปรทุกฺขาปนยนาการวุตฺติกา ทุกฺขสหคตาย ทุกฺขานุปสฺสนาย วิเสสปจฺจโยติ ตทุภยสนฺนิสฺสยา วิปสฺสนา ‘‘อปฺปณิหิตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตา. มุทิตา สตฺตานํ โมทคฺคหณพหุลา ตทนิจฺจตาทสฺสนโต อนิจฺจานุปสฺสนาย วิเสสปจฺจโยติ ตนฺนิสฺสยา วิปสฺสนา อนิมิตฺตํ วิโมกฺขมุขํ. อุเปกฺขา ญาณกิจฺจาธิกตาย อนตฺตานุปสฺสนาย วิเสสปจฺจโยติ ตนฺนิสฺสยา วิปสฺสนา ‘‘สุญฺญตํ วิโมกฺขมุข’’นฺติ วุตฺตาติ เอวเมตฺถ ปวตฺติอาการโต วิปสฺสโต นิสฺสยโต, กิจฺจโต จ ภินฺทิตฺวา วิโมกฺขมุขานิ โยชิตานีติ. जवळचा शत्रू असणाऱ्या रागाला रोखणारी मेत्ता ही रागप्रणिधीची प्रतिपक्ष आहे. करुणा ही दुसऱ्यांचे दुःख दूर करण्याच्या आकाराची वृत्ती असणारी असल्यामुळे, दुःखसहगत दुःखानुपस्सनेचा विशेष प्रत्यय आहे. म्हणून या दोन्हीवर संश्रित असलेली विपश्यना "अप्पणिहित विमोक्षमुख" म्हटली आहे. मुदिता ही प्राण्यांच्या आनंदाचे ग्रहण करणारी असून, त्यांच्या अनित्यतेच्या दर्शनामुळे अनित्यानुपस्सनेचा विशेष प्रत्यय आहे, म्हणून त्यावर संश्रित असलेली विपश्यना "अनिमित्त विमोक्षमुख" आहे. उपेक्खा ही ज्ञानकार्याच्या अधिक्यामुळे अनत्तानुपस्सनेचा विशेष प्रत्यय आहे, म्हणून त्यावर संश्रित असलेली विपश्यना "सुञ्ञत विमोक्षमुख" म्हटली आहे. अशा प्रकारे, येथे प्रवृत्तीच्या आकारावरून, विपश्यना करणाऱ्याच्या आश्रयावरून आणि कार्यावरून विभागून विमोक्षमुखे जोडली गेली आहेत. สมติกฺกมนํ [Pg.120] ปริญฺญาปหานญฺจ. สปรสนฺตาเนติ อตฺตโน, ปเรสญฺจ สนฺตาเน, เตน กายิโก, วาจสิโก จ วิหาโร ‘‘วิกฺกีฬิต’’นฺติ วุตฺโตติ ทสฺเสติ ‘‘วิวิโธ หาโร’’ติ กตฺวา. ตสฺส ปน วิภาวนา อิธ อธิปฺเปตา นยสฺส ภูมิภาวโต. เยน ปฏิปกฺขภาเวน. เตสํ ปฏิปกฺขภาโวติ เตสํ อาหาราทีนํ ปฏิปกฺขภาโว ปหาตพฺพภาโว ปฏิปทาทีนํ ปฏิปกฺขภาโว ปหายกภาโวติ โยเชตพฺพํ. ตตฺถ ปฏิปทาคฺคหเณน วิปสฺสนา กถิตา. วิปสฺสนา จ จตฺตาโร อาหาเร ปริชานนฺตี ตปฺปฏิพทฺธฉนฺทราคํ ปชหตีติ อุชุกเมว เตสํ ปฏิปกฺขตา, เอวํ ฌานาทีนมฺปิ อุปาทานาทิปฏิปกฺขตา เวทิตพฺพา ตทุปเทเสน วิปสฺสนาย กถิตตฺตา. วิปลฺลาสสติปฏฺฐานานํ ปฏิปกฺขภาโว ปากโฏ เอว. นฺติ สีหวิกฺกีฬิตํ. วีสติยา จตุกฺเกหิ วิสภาคโต วิตฺถาเรน วิภตฺตนฺติ ตีหิ ปเทหิ สงฺคเหตฺวา กถิกตฺตา วุตฺตํ ‘‘สงฺเขเปน ทสฺเสนฺโต’’ติ. "समतिक्कमन" म्हणजे परिज्ञा आणि प्रहाण होय. "सपरसंताने" म्हणजे स्वतःच्या आणि इतरांच्या संतानामध्ये, त्यामुळे कायिक आणि वाचिक विहाराला "विक्कीलित" म्हटले आहे, हे "विविध हार" असे करून दर्शविले आहे. परंतु त्याचे स्पष्टीकरण येथे नयाच्या भूमीभावामुळे अभिप्रेत आहे. "ज्या प्रतिपक्षभावाने". "त्यांचा प्रतिपक्षभाव" म्हणजे त्या आहारादींचा प्रतिपक्षभाव हा प्रहातव्यभाव आहे आणि प्रतिपदादींचा प्रतिपक्षभाव हा प्रहाकभाव आहे, असे जोडले पाहिजे. त्यामध्ये "प्रतिपदा" ग्रहणाने विपश्यना सांगितली आहे. आणि विपश्यना चार आहारांना परिज्ञात करून त्यांच्याशी संबंधित छंदरागाचा प्रहाण करते, म्हणून थेटपणे त्यांची प्रतिपक्षता आहे. अशा प्रकारे ध्यानादींची देखील उपादानादी प्रतिपक्षता समजली पाहिजे, कारण त्यांच्या उपदेशाने विपश्यना सांगितली गेली आहे. विपल्लास आणि सतिपट्ठानांचा प्रतिपक्षभाव स्पष्टच आहे. "सीहविक्कीलित" हे वीस चतुष्कांद्वारे विसदृश रूपाने विस्ताराने विभागले गेले आहे, हे तीन पदांनी संक्षेपाने सांगितले असल्यामुळे "संक्षेपाने दर्शविताना" असे म्हटले आहे. อินฺทฺริยานนฺติ สทฺธาทิอินฺทฺริยานํ. ทสนฺนํ จตุกฺกานํ นิทฺธารณาติ โยชนา. "इंद्रियाणाम्" म्हणजे श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांचे. "दहा चतुष्कांचे निर्धारण" अशी योजना आहे. ๘๘. นิคฺคจฺฉตีติ นิกฺขมติ. ตโต นิทฺธาเรตฺวา วุจฺจมาโน หิ นิคฺคจฺฉนฺโต วิย โหตีติ. จตฺตาโร ปุคฺคเลติ ‘‘ตณฺหาจริโต มนฺโท’’ติอาทินา (เนตฺติ. ๖) วุตฺเต จตฺตาโร ปุคฺคเล. ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนน เจตฺถ ธมฺโม วุตฺโตติ อาห ‘‘ภูมึ นิทฺทิสิตฺวา’’ติ. ตโต เอวาติ ยถาวุตฺตปุคฺคลจตุกฺกโต เอว. อิตรตฺถาปีติ ‘‘สุขาย…เป… ปุคฺคลา’’ติ เอตฺถาปิ. สาธารณายาติ ปฐมจตุตฺถาหิปิ วิมิสฺสาย. ยถาวุตฺตาสูติ ทุติยตติยาสุ. ८८. "निग्गच्छति" म्हणजे बाहेर पडतो. कारण त्यातून निवडून सांगितले जात असताना तो बाहेर पडल्यासारखाच होतो. "चार पुद्गल" म्हणजे "तण्हाचरित मंद" इत्यादींद्वारे (नेत्ति. ६) सांगितलेले चार पुद्गल. येथे पुद्गलाधिष्ठानाने धर्म सांगितला आहे, म्हणून "भूमीचा निर्देश करून" असे म्हटले आहे. "त्यातूनच" म्हणजे यथावक्त पुद्गलचतुष्कातूनच. "इतर ठिकाणीही" म्हणजे "सुखाय...पे... पुद्गलाः" येथेही. "साधारणाने" म्हणजे पहिल्या आणि चौथ्याशी देखील मिश्रित करून. "यथावक्त" म्हणजे दुसऱ्या आणि तिसऱ्यामध्ये. เหฏฺฐาติ เทสนาหารวิภงฺควิจยหารสมฺปาตวณฺณนาสุ. "हेट्ठा" म्हणजे देसनाहार-विभंग, विचयहार-संपात यांच्या वर्णनामध्ये. เอเสว นโยติ กุสลมูลาทิทฺวาทสติกสงฺคโห อนวชฺชปกฺโข. ‘‘โวทายติ สุชฺฌติ เอเตนาติ โวทาน’’นฺติ (เนตฺติ. อฏฺฐ. ๑๑) วํ เนตพฺพตํ สนฺธายาห. "हाच नय आहे" म्हणजे कुशलमूल इत्यादी बारा त्रिकांचा संग्रह असलेला अनवद्यपक्ष होय. "ज्याद्वारे शुद्ध होते, पवित्र होते ते वोदान होय" (नेत्ति. अट्ठ. ११) अशा प्रकारे नेयता लक्षात घेऊन म्हटले आहे. ยถา หารอุทฺเทโส กโต, เอวํ นยานํ อกรเณ การณํ, ปโยชนญฺจ วิภาเวตุกาโม ‘‘กสฺมา ปนา’’ติอาทิมาห. นเยหิ นยนฺตเรหิ. สมฺภวทสฺสนตฺถนฺติ อุปปตฺติทสฺสนตฺถํ. ตตฺถ สมฺภโว อนุทฺเทสกฺกเมน นิทฺทิสเน กรณํ ทสฺสนํ ปโยชนํ. ยทิ หิ อิเม นยา อุปฺปตฺติฏฺฐานวเสน อสํกิณฺณา ภเวยฺยุํ, หารา วิย อุทฺเทสานุกฺกเมเนว นิทฺทิสิตพฺพา [Pg.121] สิยุํ. ตถา หิ วุตฺตํ หารานํ อุทฺเทสาวสาเน ‘‘เอเต โสฬส หารา ปกิตฺติตา อตฺถโต อสํกิณฺณา’’ติ (เนตฺติ. ๑). ज्याप्रमाणे हारांचा उद्देश केला आहे, त्याप्रमाणे नयांचे न करण्याचे कारण आणि प्रयोजन स्पष्ट करण्याची इच्छा असणारे "कस्मा पना" इत्यादी म्हणाले. "नयांद्वारे" म्हणजे इतर नयांद्वारे. "संभवदर्शनासाठी" म्हणजे उत्पत्ती दर्शवण्यासाठी. त्यामध्ये संभव हा अनुदेशक्रमाने निर्देश करण्याचे कारण आहे आणि दर्शन हे प्रयोजन आहे. जर हे नय उत्पत्तीच्या स्थानानुसार असंकीर्ण असते, तर हारांप्रमाणे उद्देशाच्या अनुक्रमानेच निर्देशित केले गेले असते. म्हणूनच हारांच्या उद्देशाच्या शेवटी म्हटले आहे - "हे सोळा हार अर्थतः असंकीर्ण सांगितले आहेत" (नेत्ति. १). ยสฺมา ปเนเต มูลปเทหิ มูลปทนฺตรนิทฺธารเณน อญฺญมญฺญํ เต นิคฺคจฺฉนฺติ, ตสฺมา เอกสฺมึ นิทฺทิฏฺเฐ อิตโรปิ อตฺถโต นิทฺทิฏฺโฐเยว นาม โหตีติ อิมสฺส อตฺถสฺส ทสฺสนตฺถํ ‘‘อุทฺเทสานุกฺกเมน นิทฺเทโส น กโต’’ติ. परंतु ज्याअर्थी हे मूळ पदांद्वारे आणि इतर मूळ पदांच्या निर्धारणाने परस्परांपासून निष्पन्न होतात, म्हणून एकाचा निर्देश केला असता दुसराही अर्थतः निर्दिष्टच होतो, हा अर्थ दर्शवण्यासाठी 'उद्देशाच्या अनुक्रमाने निर्देश केला नाही' असे म्हटले आहे। อิทานิ ตเมว สงฺเขเปน วุตฺตมตฺถํ วิตฺถาเรน ทสฺเสตุํ ‘‘ปฐมนยโต หี’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ ตณฺหาทิฏฺฐิจริตวเสน ทฺวิธา ปุคฺคเล วิภชิตฺวา เตสํ วเสน นนฺทิยาวฏฺฏนยํ นีหริตฺวา ปุน เต เอว ตณฺหาทิฏฺฐิจริเต จตุปฺปฏิปทาวิภาเคน วิภชิตฺวา สีหวิกฺกีฬิตสฺส นยสฺส สมฺภโว ทสฺสิโต, เต เอว จตุปฺปฏิปทาเภทภินฺเน ปุคฺคเล ปุน อุคฺฆฏิตญฺญุอาทิวิภาเคน ติธา วิภชิตฺวา ติปุกฺขลสฺส นยสฺส สมฺภโว ทสฺสิโต. ตํ สนฺธายาห ‘‘ปฐมนยโต…เป… นิทฺทิฏฺโฐ’’ติ. आता तोच संक्षेपाने सांगितलेला अर्थ विस्ताराने दर्शवण्यासाठी 'पहिल्या नयापासून ही' इत्यादी म्हटले आहे। तेथे तृष्णा-चरित आणि दृष्टी-चरित या आधारे पुद्गलांचे दोन प्रकारे विभाजन करून, त्यांच्या आधारे 'नन्दियावट्ट' नयाला निष्पन्न करून, पुन्हा त्याच तृष्णा-दृष्टी चरित पुद्गलांना चार प्रतिपदेच्या विभागाने विभाजित करून 'सीहविक्कीळित' नयाची उत्पत्ती दर्शवली आहे; आणि त्याच चार प्रतिपदेच्या भेदाने भिन्न असलेल्या पुद्गलांना पुन्हा 'उग्घटितञ्ञू' (उद्घटितज्ञ) इत्यादी विभागाने तीन प्रकारे विभाजित करून 'तिपुक्खल' नयाची उत्पत्ती दर्शवली आहे। त्याचा संदर्भ देऊन 'पहिल्या नयापासून...पे... निर्दिष्ट केला आहे' असे म्हटले आहे। ยสฺมา สุภสุขสญฺญาหิ โลโภ, นิจฺจสญฺญาย โทโส ‘‘อิมินา เม อนตฺโถ กโต’’ติ อาฆาตุปฺปตฺติโต, อตฺตสญฺญาย โมโห คหิโต โหติ. ตถา อสุภสญฺญาทีหิ อโลภาทโย, ตสฺมา ธมฺมาธิฏฺฐานวเสน ตติยนยโต ทุติยนยสฺส สมฺภโว. ยสฺมา ปน โลเภ สติ สมฺภวโต โลภคฺคหเณเนว โทโส คยฺหติ. โลโภ จ ตณฺหา, โมโห อวิชฺชา, ตปฺปฏิปกฺขโต อโลภาโทเสหิ สมโถ คยฺหติ, อโมเหน วิปสฺสนา, ตสฺมา ธมฺมาธิฏฺฐานวเสเนว ทุติยนยโต ปฐมนยสฺส สมฺภโวติ อิมํ วิเสสํ ทีเปตุํ อุทฺเทสานุกฺกเมน นิทฺเทโส น กโตติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ธมฺมาธิฏฺฐานวเสน ปนา’’ติอาทิมาห. ज्याअर्थी शुभ आणि सुख संज्ञेमुळे लोभ, 'याने माझे अनहित केले' अशा आघाताच्या (द्वेषाच्या) उत्पत्तीमुळे नित्य संज्ञेमुळे द्वेष, आणि आत्म संज्ञेमुळे मोह ग्रहण केला जातो; तसेच अशुभ संज्ञेमुळे अलोभ इत्यादी ग्रहण केले जातात; म्हणून धम्माधिष्ठान वशाने तिसऱ्या नयापासून दुसऱ्या नयाची उत्पत्ती होते। परंतु ज्याअर्थी लोभ असताना संभव असल्यामुळे लोभाच्या ग्रहणानेच द्वेष ग्रहण केला जातो, लोभ म्हणजेच तृष्णा आणि मोह म्हणजेच अविद्या आहे, आणि त्याच्या प्रतिपक्षाने अलोभ व अद्वेषाने समथ ग्रहण केला जातो आणि अमोहाने विपस्सना ग्रहण केली जाते; म्हणून धम्माधिष्ठान वशानेच दुसऱ्या नयापासून पहिल्या नयाची उत्पत्ती होते। हे वैशिष्ट्य स्पष्ट करण्यासाठी 'उद्देशाच्या अनुक्रमाने निर्देश केला नाही' हे दर्शवताना 'परंतु धम्माधिष्ठान वशाने' इत्यादी म्हटले आहे। เตเนวาติ ตติยนยโต ทุติยนยสฺส วิย ทุติยนยโต ปฐมนยสฺสปิ สมฺภวโต. เอวํ ปาฬิยํ ปุคฺคลาธิฏฺฐานวเสน อาคตํ นิสฺสาย อฏฺฐกถายํ ธมฺมาธิฏฺฐานวเสเนว นยนิคฺคโม นิทฺธาริโตติ อยเมว วิเสโส. ยทิ เอวนฺติ ปาฬิยํ อาคตปฺปการโต อญฺเญนปิ ปกาเรน นยา นิทฺธาเรตพฺพา, เอวํ สนฺเต ยถา ปุคฺคลาธิฏฺฐานวเสน ปฐมนยโต ตติยนยสฺส, ตติยนยโต ทุติยนยสฺส [Pg.122] สมฺภโว ทสฺสิโต, เอวํ ธมฺมาธิฏฺฐานวเสเนว ปฐมนยโต ตติยนยทุติยนยานํ, ธมฺมาธิฏฺฐานวเสเนว ทุติยนยโต ตติยนยสฺส สมฺภโว ทีเปตพฺโพติ อิมมตฺถมาห ‘‘ทฺเว หุตฺวา…เป… สิยา’’ติ. 'त्यामुळेच' म्हणजे तिसऱ्या नयापासून दुसऱ्या नयाच्या उत्पत्तीप्रमाणेच दुसऱ्या नयापासून पहिल्या नयाचीही उत्पत्ती होत असल्यामुळे। अशा प्रकारे पाळीमध्ये पुग्गलाधिष्ठान वशाने आलेल्याचा आश्रय घेऊन अट्ठकथेमध्ये धम्माधिष्ठान वशानेच नयाचा निष्कर्ष निर्धारित केला आहे, हेच वैशिष्ट्य आहे। 'जर असे असेल तर' म्हणजे पाळीमध्ये आलेल्या प्रकाराव्यतिरिक्त इतरही प्रकारे नय निर्धारित केले पाहिजेत। असे असताना, ज्याप्रमाणे पुग्गलाधिष्ठान वशाने पहिल्या नयापासून तिसऱ्या नयाची आणि तिसऱ्या नयापासून दुसऱ्या नयाची उत्पत्ती दर्शवली आहे, त्याचप्रमाणे धम्माधिष्ठान वशानेच पहिल्या नयापासून तिसऱ्या व दुसऱ्या नयाची, आणि धम्माधिष्ठान वशानेच दुसऱ्या नयापासून तिसऱ्या नयाची उत्पत्ती स्पष्ट केली पाहिजे, हा अर्थ सांगण्यासाठी 'दोन होऊन...पे... असावे' असे म्हटले आहे। ตตฺถ นโยติ ปจฺฉา วุตฺตทุติยนโย. อตฺถโตติ อตฺถาปตฺติโต, อตฺถโต ลพฺภมานตฺตา เอว สรูเปน น กถิโตติ อตฺโถ. อิทานิ ตํ อตฺถาปตฺตึ เอกนฺติกํ กตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘ยสฺมา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อนุปฺปเวโส อิจฺฉิโต ตํตํนยมูลปทานํ นยนฺตรมูลปเทสุ สมวรุชฺฌนโต. ตถา หิ ‘‘ยตฺถ สพฺโพ อกุสลปกฺโข สงฺคหํ สโมสรณํ คจฺฉติ, ยตฺถ สพฺโพ กุสลปกฺโข สงฺคหํ สโมสรณํ คจฺฉตี’’ติ (เนตฺติ. ๓) จ วุตฺตํ. อยญฺจ อตฺโถติ ‘‘นยานํ อญฺญมญฺญอนุปฺปเวโส นิคฺคโม’’ติ อยํ ทุวิโธ อตฺโถ. ปิฏกานํ อตฺถกถนํ เปฏกํ, โส เอว อุปเทโสติ เปฏโกปเทโส, อุปเทสภูตา ปริยตฺติสํวณฺณนาติ อตฺโถ. तेथे 'नय' म्हणजे नंतर सांगितलेला दुसरा नय। 'अर्थतः' म्हणजे अर्थापत्तीने (तात्पर्याने), अर्थतः प्राप्त होत असल्यामुळेच स्पष्टपणे सांगितले नाही, असा अर्थ आहे। आता त्या अर्थापत्तीला निश्चित करून दर्शवण्यासाठी 'ज्याअर्थी' इत्यादी म्हटले आहे। त्या त्या नयाच्या मूळ पदांचा इतर नयांच्या मूळ पदांमध्ये अंतर्भाव होत असल्यामुळे 'अनुप्रवेश' (समावेश) अपेक्षित आहे। तसेच, 'जिथे सर्व अकुशल पक्ष संग्रह आणि समवसरणाला प्राप्त होतो, जिथे सर्व कुशल पक्ष संग्रह आणि समवसरणाला प्राप्त होतो' (नेत्ति. ३) असेही म्हटले आहे। आणि 'हा अर्थ' म्हणजे 'नयांचा परस्परांमध्ये अनुप्रवेश आणि निर्गमन' हा दोन प्रकारचा अर्थ आहे। पिटकांचे अर्थकथन म्हणजे 'पेटक', तोच उपदेश म्हणजे 'पेटकोपदेस' (पेटक-उपदेश), म्हणजेच उपदेशरूप असलेली परियत्ति-वर्णना (परियत्तीचे स्पष्टीकरण), असा अर्थ आहे। อาทิโต ปฏฺฐายาติ นยานํ อญฺญมญฺญอนุปฺปเวสนิคฺคมมตฺตเมว อวิภาเวตฺวา นยวิจารสฺส ปฐมาวยวโต ปภุติ วิภาวนา ทีปนา ปกาสนา. 'सुरुवातीपासून' म्हणजे नयांचा केवळ परस्परांमधील अनुप्रवेश आणि निर्गमन स्पष्ट न करता, नय-विचाराच्या पहिल्या भागापासून घेऊन स्पष्टीकरण, प्रदीपन आणि प्रकाशन करणे होय। โทสทิฏฺฐีติ อปฺปสฺสาทตาทิโทสคาหิกทิฏฺฐี, โทสทสฺสิโนติ อตฺโถ. เต หิ อสมูหตานุสยา, กาเมสุ จ อาทีนวทสฺสิโน. อิทญฺหิ เนสํ องฺคทฺวยํ อตฺตกิลมถานุโยคสฺส การณํ วุตฺตํ. นตฺถิ อตฺโถติ โย ราคาภิภูเตหิ อนฺธพาเลหิ ปริกปฺปิโต ทิฏฺฐธมฺมิโก กาเมหิ อตฺโถ, โส มธุพินฺทุคิทฺธสฺส มธุลิตฺตสตฺถธาราวเลหนสทิโส อปฺปสฺสาโท พหุทุกฺโข พหุปายาโส พหุอาทีนโว สวิฆาโต สปริฬาโห สมฺปรายิโก ตเถวาติ สพฺพทาปิ วิญฺญูชาติกสฺส กาเมหิ ปโยชนํ น วิชฺชติ. อนชฺโฌสิตาติ อนภิภูตา วิหรนฺติ. เตน วุจฺจติ สุขา ปฏิปทาติ เตน มนฺทกิเลสภาเวน เตสํ ปุคฺคลานํ อกิจฺเฉน สิชฺฌมานา วิปสฺสนา ปฏิปทา ‘‘สุขา ปฏิปทา’’ติ วุจฺจติ. อชฺโฌสิตาติ อภินิวิฏฺฐา. อิเม สพฺเพ สตฺตาติ อิเม ตณฺหาทิฏฺฐิจริตภาเวน ทฺวิธา วุตฺตา อปริมาณปฺปเภทา สพฺเพปิ ปฏิปชฺชนฺตา สตฺตา. 'दोषदृष्टी' म्हणजे अल्प आस्वाद इत्यादी दोषांचे ग्रहण करणारी दृष्टी, म्हणजेच दोष पाहणारे असा अर्थ आहे। कारण ते नष्ट न झालेले अनुशय असलेले आणि कामभोगांमध्ये आदीनव (दोष) पाहणारे असतात। कारण त्यांचे हे दोन अंग आत्मक्लेश-अनुयोगाचे (स्वतःला त्रास देण्याच्या मार्गाचे) कारण म्हटले आहे। 'अर्थ नाही' म्हणजे जो रागाने अभिभूत झालेल्या अज्ञानी लोकांनी कल्पिलेला कामभोगांपासून मिळणारा ऐहिक फायदा आहे, तो मधाच्या थेंबाने मोहित झालेल्या माणसाने मध लावलेल्या तलवारीची धार चाटण्यासारखा अल्प आस्वाद देणारा, बहुदुःख देणारा, बहुआयास देणारा, बहुआदीनव असलेला, विनाशासह, दाहासह आणि पारलौकिक हानी करणारा असाच आहे; म्हणून सुज्ञ माणसाला कामभोगांपासून कधीही काही प्रयोजन नसते। 'अनज्झोसित' (अनासक्त) म्हणजे आहारी न जाता विहरतात। 'त्यामुळे सुखा प्रतिपदा म्हटले जाते' म्हणजे त्या मंद-क्लेश भावामुळे त्या पुद्गलांची विनासायास सिद्ध होणारी विपस्सना प्रतिपदा 'सुखा प्रतिपदा' म्हटली जाते। 'अज्झोसित' म्हणजे अभिनिविष्ट (आसक्त)। 'हे सर्व सत्त्व' म्हणजे हे तृष्णा-चरित आणि दृष्टी-चरित भावाने दोन प्रकारे सांगितलेले, अपरिमित भेद असलेले, सर्वच मार्गावर चालणारे सत्त्व (प्राणी) होत। สุเขน [Pg.123] ปฏินิสฺสชฺชนฺตีติ กิเลเส อกิจฺเฉน ปชหนฺติ. ‘‘อิมา จตสฺโส ปฏิปทา’’ติอาทิ ปฏิปทานํ เอตฺตาวตายํ, วิสยภาวกิจฺเจสุ จ พฺยภิจาราภาวทสฺสนํ. อยํ ปฏิปทาติ นิคมนํ, อยํ ปฏิปทา ยาย วเสน สีหวิกฺกีฬิตสฺส นยสฺส ภูมิทสฺสนตฺถํ จตฺตาโร ปุคฺคลา นิทฺธาริตาติ อธิปฺปาโย. จตุกฺกมคฺเคน กิเลเส นิทฺทิสตีติ อนนฺตรํ วกฺขมาเนน อาหาราทิจตุกฺกมคฺเคน ทสวตฺถุเก กิเลสสมูเห นิทฺทิสติ. จตุกฺกมคฺเคน อริยธมฺเมสุ นิทฺทิสิตพฺพาติ ตปฺปฏิปกฺเขน ปฏิปทาทิจตุกฺกมคฺเคน อริยธมฺเมสุ โพธิปกฺขิเยสุ วิสยภูเตสุ นิทฺธาเรตฺวา กเถตพฺพา. 'सुखाने त्याग करतात' म्हणजे क्लेशांचा विनासायास त्याग करतात। 'या चार प्रतिपदा आहेत' इत्यादीद्वारे प्रतिपदांची एवढीच मर्यादा आणि त्यांच्या विषयभाव व कृत्यांमध्ये विसंगतीचा अभाव दर्शवणे आहे। 'ही प्रतिपदा' हे निगमन (निष्कर्ष) आहे; ही प्रतिपदा जिच्या आधारे 'सीहविक्कीळित' नयाची भूमी दर्शवण्यासाठी चार पुद्गल निर्धारित केले आहेत, असा अभिप्राय आहे। 'चतुष्क मार्गाने क्लेशांचा निर्देश करतो' म्हणजे यानंतर सांगण्यात येणाऱ्या आहारादी चतुष्क मार्गाने दहा वस्तूंवर आधारित क्लेशसमूहाचा निर्देश करतो। 'चतुष्क मार्गाने आर्यधम्मांमध्ये निर्देश केला पाहिजे' म्हणजे त्याच्या प्रतिपक्षाने प्रतिपदादी चतुष्क मार्गाने विषयभूत असलेल्या आर्यधम्मांमध्ये आणि बोधिपक्खिय धम्मांमध्ये निर्धारित करून सांगितले पाहिजे। อิทญฺจ ปมาณํ จตฺตาโร อาหาราติ อิเมสํ วิปลฺลาสานํ ปวตฺติยา ปมาณํ, ยทิทํ จตฺตาโร อาหารา. อิทํ วุตฺตํ โหติ – ยาวเทว จตฺตาโร อาหารา ปริญฺญํ น คจฺฉนฺติ, ตาวเทว จตฺตาโร วิปลฺลาเส วิภชนฺติ. ยาวเทว จตฺตาโร วิปลฺลาสา อปฺปหีนา, ตาวเทว จตฺตาริ อุปาทานานิ ปริพฺรูหนฺตีติ. เอวํ สพฺพตฺถ ยถารหํ วตฺตพฺพํ. เตนาห ‘‘เอวํ อิมานิ สพฺพานิ ทส ปทานี’’ติ. ‘‘โยเชตพฺพานี’’ติ จ วจนเสโส. 'आणि हे प्रमाण चार आहार आहेत' म्हणजे या विपल्लासांच्या प्रवृत्तीचे प्रमाण जे हे चार आहार आहेत। हे सांगितले आहे – जोपर्यंत चार आहार परिज्ञेला (पूर्ण ज्ञानाला) प्राप्त होत नाहीत, तोपर्यंत ते चार विपल्लासांचे विभाजन करतात। जोपर्यंत चार विपल्लास प्रहीण होत नाहीत, तोपर्यंत ते चार उपादानांना वाढवतात। अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी योग्यतेनुसार सांगितले पाहिजे। म्हणून 'अशा प्रकारे हे सर्व दहा पदे' असे म्हटले आहे, आणि 'योजित केली पाहिजेत' हा वाक्याचा उर्वरित भाग आहे। ‘‘อภิชฺฌาย คนฺถตี’’ติ อิมินา อภิชฺฌายนเมว คนฺถนนฺติ ทสฺเสติ. เอส นโย เสเสสุปิ. ปปญฺเจนฺโตติ ทิฏฺฐาภินิเวสํ วิตฺถาเรนฺโต. 'अभिज्झेने बांधतो' याद्वारे अभिज्झायन (लोभ करणे) हेच बंधन आहे, हे दर्शवले आहे। हाच नय उर्वरितांमध्येही लागू होतो। 'प्रपंच करतो' म्हणजे दृष्टीच्या अभिनिवेशाचा (आग्रहाचा) विस्तार करणे होय। วิปฺปฏิสารุปฺปตฺติเหตุภาโว กิเลสานํ อาสวนนฺติ อาห ‘‘อาสวนฺตี’’ติ. กึ วิปฺปฏิสาราติ เตน กิเลสานํ วีติกฺกมวตฺถุํ วทติ. ยสฺมา อปฺปหีนานุสยสฺเสว วิปฺปฏิสารา, น อิตรสฺส, ตสฺมา ‘‘เย วิปฺปฏิสารา, เต อนุสยา’’ติ วุตฺตํ. ปททฺวเยนปิ ผลูปจาเรน การณํ วุตฺตํ. पश्चात्ताप (विप्पटिसार) उत्पन्न होण्याचे कारण असणे हे क्लेशांचे पाझरणे (आसवन) आहे, म्हणून 'आसवन्ति' (पाझरतात) असे म्हटले आहे. 'विप्पटिसार' म्हणजे काय? याद्वारे ते क्लेशांच्या उल्लंघनाचे (वीतिक्कम) कारण सांगतात. ज्याअर्थी ज्याचे अनुशय नष्ट झालेले नाहीत त्यालाच पश्चात्ताप होतो, इतरांना नाही, म्हणून 'जे पश्चात्ताप आहेत, ते अनुशय आहेत' असे म्हटले आहे. दोन्ही पदांद्वारे फलोपचाराने कारण सांगितले आहे. ปฐเมน ปเทนาติ ยถาวุตฺเตสุ ทสสุ สุตฺตปเทสุ ปฐเมน ปเทน. ปฐมาย ทิสายาติ ตทตฺถสงฺขาตาย สีหวิกฺกีฬิตสฺส สํกิเลสปกฺเข ปฐมาย ทิสาย. 'पहिल्या पदाने' म्हणजे वर सांगितलेल्या दहा सुत्तपदांमधील पहिल्या पदाने. 'पहिल्या दिशेने' म्हणजे त्या अर्थाने युक्त असलेल्या सीहविक्कीळित (सिंहविक्रीडित) च्या संकिलेस (संक्लेश) पक्षात पहिल्या दिशेने. อิตีติ เอวํ, วุตฺตนเยนาติ อตฺโถ. กุสลากุสลานนฺติ ยถาวุตฺตอนวชฺชสาวชฺชธมฺมานํ. ปกฺขปฏิปกฺขวเสนาติ โวทานปกฺขตปฺปฏิปกฺขวเสน. โยชนาติ ปฐมทิสาทิภาเวน ยุตฺเต กตฺวา มนสานุเปกฺขนา. ‘‘มนสา โวโลกยเต’’ติ (เนตฺติ. ๔) หิ วุตฺตํ. 'इति' म्हणजे अशा प्रकारे, सांगितलेल्या पद्धतीने असा अर्थ आहे. 'कुशल-अकुशलांचे' म्हणजे वर सांगितलेल्या अनवद्य (दोषरहित) आणि सावद्य (दोषयुक्त) धर्मांचे. 'पक्ष आणि प्रतिपक्षाच्या वशाने' म्हणजे वोदान (विशुद्धी) पक्ष आणि त्याच्या प्रतिपक्षाच्या वशाने. 'योजना' म्हणजे पहिल्या दिशेच्या भावाने युक्त करून मनाने अनुप्रेक्षण (चिंतन) करणे. कारण 'मनाने अवलोकन करतो' असे म्हटले आहे. ตสฺสาติ [Pg.124] ทิสาโลกนสฺส. โสตาปตฺติผลาทีนํ ปริโยสานตา อินฺทฺริยวเสน เวทิตพฺพา. เยสญฺหิ สทฺธาทีนํ อินฺทฺริยานํ วเสน สติปฏฺฐานาทีนิ สิชฺฌนฺติ, เตสํ วเสน โสตาปตฺติผลาทีนํ ปริโยสานตา. ตตฺถ โสตาปตฺติผเล สทฺธินฺทฺริยํ ปาริปูรึ คจฺฉติ. โสตาปนฺโน หิ สทฺธาย ปริปูริการี. สกทาคามิผเล วีริยินฺทฺริยํ ปาริปูรึ คจฺฉติ. สกทาคามี หิ อารทฺธวีริโย อุปริมคฺคาธิคมาย. อนาคามิผเล สมาธินฺทฺริยํ ปาริปูรึ คจฺฉติ. อนาคามี สมาธิสฺมึ ปริปูริการี. อคฺคผเล อรหตฺเต สตินฺทฺริยญฺจ ปญฺญินฺทฺริยญฺจ ปาริปูรึ คจฺฉติ. อรหา หิ สติเวปุลฺลปฺปตฺโต, ปญฺญาเวปุลฺลปฺปตฺโต จาติ. 'त्याचे' म्हणजे दिशा-अवलोकनाचे. सोतापत्तिफल इत्यादींची समाप्ती (परियोसानता) इंद्रियांच्या वशाने समजून घ्यावी. कारण ज्या श्रद्धा इत्यादी इंद्रियांच्या वशाने सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान) इत्यादी सिद्ध होतात, त्यांच्या वशाने सोतापत्तिफल इत्यादींची समाप्ती होते. त्यामध्ये, सोतापत्तिफलात सद्धिन्द्रिय (श्रद्धेंद्रिय) परिपूर्णतेला प्राप्त होते. कारण सोतापन्न हा श्रद्धेमध्ये परिपूर्णता आणणारा असतो. सकदागामीफलात वीरियिन्द्रिय (वीर्येन्द्रिय) परिपूर्णतेला प्राप्त होते. कारण सकदागामी हा वरील मार्गाच्या प्राप्तीसाठी आरब्धवीर्य (प्रयत्नशील) असतो. अनागामीफलात समाधिन्द्रिय परिपूर्णतेला प्राप्त होते. कारण अनागामी हा समाधीमध्ये परिपूर्णता आणणारा असतो. अग्रफल असलेल्या अरहत्त्वात सतिन्द्रिय (स्मृतीन्द्रिय) आणि पञ्ञिन्द्रिय (प्रज्ञेन्द्रिय) परिपूर्णतेला प्राप्त होतात. कारण अरहंत हे स्मृतीच्या विपुलतेला आणि प्रज्ञेच्या विपुलतेला प्राप्त झालेले असतात. อปเร ปนาหุ – สทฺธาพเลน สุภสญฺญาย ปหานํ. สทฺทหนฺโต หิ ปฏิกฺกูลมนสิกาเร กมฺมํ กโรติ. วีริยพเลน สุขสญฺญาย ปหานํ. วีริยวา หิ สุขสฺสาทํ อภิภวิตฺวา โยนิโสมนสิการมนุยุญฺชติ. สมาธิพเลน นิจฺจสญฺญาย ปหานํ. สมาหิโต หิ สงฺขารานํ อุทยพฺพยํ ปริคฺคณฺหนฺโต อนิจฺจสญฺญํ ปฏิลภติ. ปญฺญาพเลน อตฺตสญฺญาย ปหานํ. ปญฺญวา หิ สงฺขารานํ อวสวตฺติตํ สลฺลกฺเขนฺโต อตฺตสุญฺญตํ ปฏิวิชฺฌติ. สติ ปน สพฺพตฺถาปิ อิจฺฉิตพฺพา. เตนาห ‘‘สตึ จ ขฺวาหํ, ภิกฺขเว, สพฺพตฺถิกํ วทามี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๒๓๔; มิ. ป. ๒.๑.๑๓). เอวํ จตุวิปลฺลาสปฺปหายีนํ จตุนฺนํ อินฺทฺริยานํ ปาริปูริฏฺฐานํ จตฺตาริ สามญฺญผลานิ จตุวิปลฺลาสมุขานํ จตุนฺนํ ทิสานํ ปริโยสานานิ วุตฺตานีติ. इतर आचार्य म्हणतात – श्रद्धाबलाने शुभसंज्ञेचा (सुभसञ्ञा) प्रहाण (नाश) होतो. कारण श्रद्धा ठेवणारा मनुष्य प्रतिकूलमनसिकारात कर्म करतो. वीर्यबलाने सुखसंज्ञेचा प्रहाण होतो. कारण वीर्यवान मनुष्य सुखाच्या आस्वादाला पराभूत करून योनिशोमनसिकारात युक्त होतो. समाधीबलाने नित्यसंज्ञेचा (निच्चसञ्ञा) प्रहाण होतो. कारण समाहित मनुष्य संस्कारांच्या उदय आणि व्ययाचे ग्रहण करत अनित्यसंज्ञा प्राप्त करतो. प्रज्ञाबलाने आत्मसंज्ञेचा (अत्तसञ्ञा) प्रहाण होतो. कारण प्रज्ञावान मनुष्य संस्कारांच्या अवशवर्तीपणाला ओळखून आत्मशून्यतेचा (अत्तसुञ्ञता) प्रतिवेध करतो. परंतु स्मृती (सति) तर सर्व ठिकाणीच आवश्यक आहे. म्हणूनच भगवान म्हणाले, 'भिक्खूहो, मी स्मृतीला सर्व ठिकाणी उपयोगी म्हणतो.' अशा प्रकारे, चार विपर्यासांचा प्रहाण करणाऱ्या चार इंद्रियांच्या परिपूर्णतेचे स्थान असलेली चार सामञ्ञफले (श्रामण्यफले) ही चार विपर्यास-मुख असलेल्या चार दिशांची समाप्ती म्हणून सांगितली आहेत. ‘‘โลโภ อกุสลมูล’’นฺติอาทิ โลภาทีนํ เหตุผลภาเวน สมฺปยุตฺตตาย ทสฺสนํ. 'लोभ हे अकुशलमूळ आहे' इत्यादीद्वारे लोभ इत्यादींच्या हेतू-फल भावाने युक्त असण्याचे दर्शन आहे. ตตฺถ มนาปิเกนาติ เยภุยฺยวเสน วุตฺตํ. อมนาปิเกนาปิ หิ อารมฺมเณน วิปริเยสวเสน โลโภ อุปฺปชฺชติ. มนาปิเกนาติ วา มนาปิกากาเรน. ผสฺสเวทนูปวิจารราควิตกฺกปริฬาหา สหชาตาปิ ลพฺภนฺติ, อสหชาตาปิ. ‘‘อุปฺปาโท’’ติ เอเตน อุปฺปชฺชมานสงฺขารคฺคหณนฺติ ‘‘อุปฺปชฺชตี’’ติ วุตฺตํ. อุปฺปาทลกฺขณสฺเสว ปน คหเณ ‘‘อุปฺปชฺชตี’’ติ น วตฺตพฺพํ สิยา. น หิ อุปฺปาโท อุปฺปชฺชติ, ราคชปริฬาหเหตุกตา จ เตสํ ราคสฺส ตณฺหาสภาวตฺตา. ตณฺหา หิ ทุกฺขสฺส สมุทโย, ยํ กิญฺจิ สมุทยธมฺมํ, สพฺพํ ตํ ทุกฺขนฺติ. ตถา จ วุตฺตํ ‘‘ตณฺหาสหชาตเวทนาย [Pg.125] ปน โลโภ สหชาตาทิปจฺจเยหิ จ ปจฺจโย’’ติ. เอวํ อิฏฺฐารมฺมเณ อุปฺปนฺนโลภสหคตสุขเวทนาย อุทโย อิธ ‘‘อุปฺปาโท สงฺขตลกฺขณ’’นฺติ วุตฺโต, ตสฺสา วิปริณาโม ‘‘วิปริณามทุกฺขตา’’ติ. วิปริณามาวตฺถา จ อุทยาวตฺถํ วินา น โหตีติ สา ตํ นิสฺสาย อุปฺปชฺชนฺตี วิย วุตฺตา ‘‘อุปฺปาทํ…เป… ทุกฺขตา’’ติ. त्यामध्ये, 'मनपसंत (मनापिक) द्वारे' हे बहुतांश वशाने म्हटले आहे. कारण नापसंत (अमनापिक) आलंबनाने देखील विपर्यासाच्या वशाने लोभ उत्पन्न होतो. किंवा 'मनापिक द्वारे' म्हणजे मनपसंत आकाराने. फस्स (स्पर्श), वेदना, उपविचार, राग, वितक्क (वितर्क) आणि परिळाह (दाह) हे सहजात (एकत्र उत्पन्न होणारे) देखील आढळतात आणि असहजात देखील. 'उत्पाद' (उत्पत्ती) याद्वारे उत्पन्न होणाऱ्या संस्कारांचे ग्रहण होते, म्हणून 'उत्पन्न होतो' असे म्हटले आहे. परंतु केवळ उत्पाद-लक्षणाचेच ग्रहण केल्यास 'उत्पन्न होतो' असे म्हणता येणार नाही. कारण उत्पाद स्वतः उत्पन्न होत नाही, आणि त्यांचा रागजन्य परिळाह (दाह) हा हेतू असणे हे रागाच्या तृष्णास्वभावामुळे आहे. कारण तृष्णा ही दुःखाचा समुदय (उत्पत्ती) आहे, जे काही समुदयधर्मी आहे, ते सर्व दुःख आहे. आणि तसेच म्हटले आहे – 'तृष्णेसह सहजात असलेल्या वेदनेसाठी लोभ हा सहजात इत्यादी प्रत्ययांनी प्रत्यय (कारण) आहे.' अशा प्रकारे, इष्ट आलंबनात उत्पन्न झालेल्या लोभयुक्त सुखवेदनेचा उदय येथे 'उत्पाद हा संस्कृतलक्षण आहे' असा सांगितला आहे, आणि तिचा विपरिणाम (बदल) ही 'विपरिणामदुःखता' आहे. आणि विपरिणाम-अवस्था ही उदय-अवस्थेशिवाय होत नाही, म्हणून ती तिच्यावर आश्रित राहून उत्पन्न होत असल्यासारखी 'उत्पाद...पे... दुःखता' अशी म्हटली आहे. โทโส อกุสลมูลนฺติอาทีสุปิ วุตฺตนยานุสาเรน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อยํ ปน วิเสโส – ฐิตสฺส อญฺญถตฺตํ นาม ชรา, ตํ นิสฺสาย โทมนสฺสสฺส อุปฺปชฺชนโต วุตฺตํ ‘‘ฐิตสฺส…เป… ทุกฺขทุกฺขตา’’ติ. โทสชปริฬาหเหตุกตา ชราย โทสพหุลสฺส ปุคฺคลสฺส นจิเรน ชีรณโต เวทิตพฺพา. 'द्वेष हे अकुशलमूळ आहे' इत्यादींमध्ये देखील सांगितलेल्या पद्धतीनुसार अर्थ समजून घ्यावा. परंतु हा विशेष आहे – स्थितीचा अन्यथाभाव (बदल) म्हणजे 'जरा' (वृद्धत्व) होय, तिचा आश्रय घेऊन दोमनस्स (दौर्मनस्य) उत्पन्न होत असल्यामुळे 'स्थितीचा...पे... दुःखदुःखता' असे म्हटले आहे. द्वेषजन्य परिळाह (दाह) हा जरेचा हेतू असणे हे द्वेषबहुल व्यक्तीच्या लवकर वृद्ध होण्यावरून समजून घ्यावे. วโยติ สงฺขารานํ นิโรโธ. อนิจฺจตาวเสน จ สงฺขตธมฺมานํ สงฺขารทุกฺขตาติ วุตฺตํ ‘‘วย…เป… สงฺขารทุกฺขตา’’ติ. เตนาห ภควา ‘‘ยทนิจฺจํ ตํ ทุกฺข’’นฺติ (สํ. นิ. ๓.๑๕, ๔๕, ๗๖; ปฏิ. ม. ๒.๑๐). โมหชปริฬาหเหตุกตา วยลกฺขณสฺส เยภุยฺเยน สมฺโมหนิมิตฺตตฺตา, มรณสฺส อวิชฺชาปจฺจยตฺตา จ สํสารปฺปวตฺติยา เวทิตพฺพา. 'वय' म्हणजे संस्कारांचा निरोध (नाश). आणि अनित्यतावशाने संस्कृत धर्मांची 'संस्कारदुःखता' आहे, म्हणून 'वय...पे... संस्कारदुःखता' असे म्हटले आहे. म्हणूनच भगवान म्हणाले, 'जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे.' मोहजन्य परिळाह (दाह) हा व्यय-लक्षणाचा हेतू असणे हे बहुतांश करून संमोह (भ्रम) निमित्त असल्यामुळे आणि संसाराच्या प्रवृत्तीमध्ये मरण हे अविद्या-प्रत्ययामुळे (अविद्येच्या कारणाने) असल्यामुळे समजून घ्यावे. อโลภาทีนํ ปญฺญาทิปาริปูริเหตุกตา ยถารหํ อุปนิสฺสยโกฏิสหชาตโกฏิยา จ ปจฺจยภาเวน เวทิตพฺพา. สพฺเพ หิ กุสลา ธมฺมา สพฺเพสํ กุสลานํ ธมฺมานํ ยถาสมฺภวํ ปจฺจยวิเสสา โหนฺติ เอวาติ. อพฺยาปาทวิตกฺกสนฺนิสฺสโย อุปวิจาโร อพฺยาปาทูปวิจาโร. อวิหึสูปจาเรปิ เอเสว นโย. अलोभ इत्यादींची प्रज्ञा इत्यादींच्या परिपूर्णतेचे हेतू असणे हे योग्यतेनुसार उपनिश्रय-कोटी आणि सहजात-कोटीच्या प्रत्ययभावाने (कारणभावाने) समजून घ्यावे. कारण सर्व कुशल धर्म हे सर्व कुशल धर्मांचे यथासंभव विशेष प्रत्यय (कारण) असतातच. अव्यापाद-वितर्कावर आश्रित असलेला उपविचार म्हणजे 'अव्यापाद-उपविचार' होय. अविहिंसा-उपविचारात देखील हाच नियम आहे. อยํ ติปุกฺขโล นาม ทุติโย นโย สทฺธึ ทิสาโลกนนเยน นิทฺทิฏฺโฐติ วจนเสโส. ‘‘อิเม จตฺตาโร’’ติอาทิ ปุคฺคลาธิฏฺฐาเนเนว นนฺทิยาวฏฺฏสฺส นยสฺส ภูมิทสฺสนตฺถํ อารทฺธํ. อิเม ยถาวุตฺตปฏิปทาจตุกฺกสฺส วเสน จตุพฺพิธา. วิเสเสนาติ ทิฏฺฐิตณฺหาสนฺนิสฺสยตาวิเสเสน. ทิฏฺฐิจริโต หิ ติกฺขปญฺโญ, มนฺทปญฺโญ จ สุขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย จ ทนฺธาภิญฺญาย จ นิยฺยาตีติ ทฺวิธา วุตฺโตติ. ตถา ตณฺหาจริโต ทุกฺขาย ปฏิปทาย ขิปฺปาภิญฺญาย จ ทนฺธาภิญฺญาย จ นิยฺยาตีติ ทฺวิธา วุตฺโตติ ทสฺสิโต จายมตฺโถ. เตนาห ‘‘ทฺเว โหนฺติ ทิฏฺฐิจริโต จ ตณฺหาจริโต จา’’ติ. 'हा तिपुक्खल (त्रिपद्गल) नावाचा दुसरा नय दिशा-अवलोकन नयासोबत निर्दिष्ट केला आहे' हा वाक्याचा उर्वरित भाग आहे. 'हे चार' इत्यादी पुद्गलाधिष्ठानानेच नंदियावट्ट (नंद्यावर्त) नयाची भूमी दाखवण्यासाठी सुरू केले आहे. हे वर सांगितलेल्या चार प्रतिपदांच्या वशाने चार प्रकारचे आहेत. 'विशेषतः' म्हणजे दृष्टी आणि तृष्णेच्या आश्रयाच्या विशेषतेने. कारण दृष्टीचरित (दृष्टीप्रधान) असलेला तीक्ष्णप्रज्ञ आणि मंदप्रज्ञ मनुष्य सुखकारक प्रतिपदेने क्षिप्राभिज्ञ (लवकर जाणणारा) आणि दंधाभिज्ञ (हळूहळू जाणणारा) होऊन मुक्त होतो, असे दोन प्रकारे सांगितले आहे. तसेच तृष्णाचरित (तृष्णाप्रधान) मनुष्य दुःखकारक प्रतिपदेने क्षिप्राभिज्ञ आणि दंधाभिज्ञ होऊन मुक्त होतो, असे दोन प्रकारे सांगितले आहे आणि हाच अर्थ दर्शवला आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'दृष्टीचरित आणि तृष्णाचरित असे दोन असतात.' จตฺตาโร [Pg.126] หุตฺวาติ สีหวิกฺกีฬิตสฺส นยสฺส ภูมิทสฺสเน จตฺตาโร หุตฺวา ฐิตา, จตุปฺปฏิปทาวเสน จตฺตาโร กตฺวา วุตฺตาติ อตฺโถ. ตโย โหนฺตีติ ติปุกฺขลสฺส นยสฺส ภูมิทสฺสเน อุคฺฆฏิตญฺญุอาทิวเสน ตโย ภวนฺติ. ตโย หุตฺวาติ ตถา ตโย หุตฺวา ฐิตา ตโย กตฺวา กถิตา. ทฺเว โหนฺตีติ อิทานิ นนฺทิยาวฏฺฏสฺส นยสฺส ภูมิทสฺสเน ทฺเว ภวนฺติ. อชฺโฌสานนฺติ ทิฏฺฐิอชฺโฌสานํ. อภินิเวโสติ ตณฺหาภินิเวโส. อหํกาโรติ อหํมาโน ‘‘อห’’นฺติ วา กรณํ อหํกาโร. ทิฏฺฐิมานมญฺญนานํ วเสน ‘‘อหมสฺมี’’ติ สมนุปสฺสนา มมํกาโร, มมายนํ ตณฺหาคฺคาโห. चार होऊन (चत्तारो हुत्वा) म्हणजे सीहविक्कीळित (सिंहविक्रीडित) नयाच्या भूमीच्या दर्शनात चार होऊन राहिलेले, चार प्रतिपदेच्या (चतुप्पटिपदा) वशाने चार करून सांगितले आहेत असा अर्थ आहे. तीन होतात (तयो होन्ति) म्हणजे तिपुक्खल नयाच्या भूमीच्या दर्शनात उग्घटितञ्ञू (उद्घाटितज्ञ) इत्यादींच्या वशाने तीन होतात. तीन होऊन (तयो हुत्वा) म्हणजे तसेच तीन होऊन राहिलेले, तीन करून सांगितले आहेत. दोन होतात (द्वे होन्ति) म्हणजे आता नन्दियावट्ट नयाच्या भूमीच्या दर्शनात दोन होतात. अज्झोसान (अध्यवसान) म्हणजे दिट्ठि-अज्झोसान (दृष्टीचे अध्यवसान). अभिनिवेस (अभिनिवेश) म्हणजे तण्हा-अभिनिवेस (तृष्णा-अभिनिवेश). अहङ्कार म्हणजे अहम्-मान किंवा 'मी' असे करणे म्हणजे अहङ्कार होय. दिट्ठि (दृष्टी), मान आणि मञ्ञना (मन्यना) यांच्या वशाने 'मी आहे' (अहमस्मि) असे समनुपस्सना (समनुपश्यना) करणे म्हणजे ममङ्कार (ममकार) होय, ममत्व करणे म्हणजे तण्हाग्गाह (तृष्णा-ग्राह) होय. ทสปทานิ ‘‘ปฐมา ทิสา’’ติ กาตพฺพานีติ นนฺทิยาวฏฺฏสฺส นยสฺส ‘‘ปฐมา ทิสา’’ติ กรณียานิ, ‘‘ปฐมา ทิสา’’ติ ววตฺถเปตพฺพานีติ อตฺโถ. สํขิตฺเตน…เป… ปกฺขสฺสาติ อเนกปฺปเภทสฺสปิ กณฺหปกฺขสฺส สํกิเลสปกฺขสฺส อตฺถํ สํขิตฺเตน สงฺเขเปน ปฏิปกฺเข วตฺตมาเน โวทานธมฺเม อุทฺทิสฺส ญาเปนฺติ ปกาเสนฺติ, ปฐมา กาตพฺพาติ โยชนา. ทส ปทานิ ทุติยกานีติ ตณฺหาทิกา ทส โกฏฺฐาสา ‘‘ทุติยา ทิสา’’ติ กาตพฺพา. ‘‘สํขิตฺเตน…เป… กณฺหปกฺขสฺสา’’ติ อาเนตฺวา โยเชตพฺพํ. दहा पदे 'पहिली दिशा' (पठमा दिसा) अशी करावीत म्हणजे नन्दियावट्ट नयाच्या 'पहिली दिशा' अशी करावीत, 'पहिली दिशा' अशी व्यवस्थापित करावीत असा अर्थ आहे. संक्षेपाने...पे... पक्षाचा म्हणजे अनेक प्रकारच्या भेद असलेल्या देखील कण्हपक्षाचा (कृष्णपक्षाचा), संकिलेसपक्षाचा (संक्लेशपक्षाचा) अर्थ संक्षेपाने, प्रतिपक्षात (विरुद्ध पक्षात) वर्तमान असलेल्या वोदानधम्माला (व्यवदानधर्माला) उद्देशून जाणवून देतात, प्रकाशित करतात, 'पहिली करावी' अशी योजना आहे. दहा पदे दुसरी म्हणजे तण्हा (तृष्णा) इत्यादी दहा भाग 'दुसरी दिशा' (दुतिया दिसा) अशी करावीत. 'संक्षेपाने...पे... कण्हपक्षाचा' हे आणून जोडावे. โยนิโสติ อุปายโส. โยนิโส มนสิกาโร อนิจฺจาทิวเสน ปฐมมนสิกาโร. ปญฺญาติ สุตจินฺตามยี ปญฺญา, ฌานาภิญฺญา จ. นิพฺพิทาติ นิพฺเพธญาณํ. โสมนสฺสธมฺมูปสญฺหิตํ ปโมทาทิสหคตํ เจตสิกสุขํ. योनिसो (योनिशः) म्हणजे उपायाने (योग्य रीतीने). योनिसो मनसिकार (योनिशो मनस्कार) म्हणजे अनित्य इत्यादींच्या वशाने पहिला मनसिकार होय. पञ्ञा (प्रज्ञा) म्हणजे सुतमयी (श्रुतमयी) व चिन्तामयी प्रज्ञा आणि झान-अभिञ्ञा (ध्यान-अभिज्ञा) होय. निब्बिदा (निर्वेद) म्हणजे निब्बेधञाण (निर्वेधज्ञान) होय. सोमनस्सधम्मूपसञ्हितं (सौमनस्यधर्मोपसंहित) म्हणजे प्रमोद इत्यादींनी युक्त असलेले चेतसिक सुख (मानसिक सुख) होय. กุสลปกฺเข จาติ จ-สทฺโท สมุจฺจยตฺโถ, เตน อุภยปกฺขโต สมุจฺจยวเสน จตสฺโส ทิสา, น ปจฺเจกนฺติ ทสฺเสติ. कुसलपक्खे च (कुशलपक्षातही) यातील 'च' हा शब्द समुच्चय अर्थाचा आहे, त्याने दोन्ही पक्षांकडून समुच्चयाच्या वशाने चार दिशा होतात, प्रत्येक स्वतंत्र नाही, असे दर्शवितात. เตสนฺติ ตณฺหาทีนํ, ตณฺหาย, ตณฺหาปกฺขิกานญฺจาติ อตฺโถ. สติปิ อนวเสสโต ราเค ปหียมาเน อนวเสสโต อวิชฺชาปิ ปหียเตว, ราคสฺส ปน เจโตวิมุตฺติ อุชุปฏิปกฺโขติ ทสฺสนตฺถํ ‘‘ราควิราคา’’ติ วุตฺตํ. อวิชฺชาวิราคาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อยญฺจ อตฺโถ ‘‘อาสวานํ ขยา อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺติ’’นฺติอาทินา (ม. นิ. ๑.๔๓๘) อาคตปาฬิยา อตฺถวณฺณนาวเสน วุตฺตา, อิธ ปน ‘‘ราควิราคา เจโตวิมุตฺติ เสกฺขผลํ, อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺติ อเสกฺขผล’’นฺติอาทินา (เนตฺติ. ๕๑) เววจนสมาโรปเน [Pg.127] อาคตตฺตา ปุริมา อนาคามิผลํ. ตญฺหิ กามราคสฺส อุชุวิปจฺจนีกโต สมาธิปาริปูริยาว วิเสสโต ‘‘ราควิราคา เจโตวิมุตฺตี’’ติ วุจฺจติ, ปจฺฉิมา อรหตฺตผลํ ตณฺหาย, อวิชฺชาย จ อนวเสสปฺปหานโต, ปญฺญาปาริปูริยา จ ‘‘อวิชฺชาวิราคา ปญฺญาวิมุตฺตี’’ติ วุจฺจติ. त्यांचे (तेसं) म्हणजे तण्हा (तृष्णा) इत्यादींचे, तृष्णेचे आणि तृष्णापक्षीय धर्मांचे असा अर्थ आहे. राग (आसक्ती) पूर्णपणे नष्ट झाला असता अविद्या देखील पूर्णपणे नष्ट होतेच, परंतु रागाचा चेतोविमुत्ती (चेतोविमुक्ती) हा थेट प्रतिपक्ष आहे हे दर्शविण्यासाठी 'रागविरागा' (रागाच्या विरागामुळे) असे म्हटले आहे. 'अविज्जाविरागा' (अविद्येच्या विरागामुळे) यातही हाच नियम आहे. आणि हा अर्थ 'आसवांच्या क्षयामुळे अनासव (अनाश्रव) चेतोविमुत्ती आणि पञ्ञाविमुत्ती (प्रज्ञाविमुक्ती)' इत्यादी (म. नि. १.४३८) आलेल्या पाळीच्या (पालि ग्रंथाच्या) अर्थवर्णनाच्या वशाने सांगितला आहे, परंतु येथे 'रागविरागा चेतोविमुत्ती सेक्खफलं (शैक्ष्यफल), अविज्जाविरागा पञ्ञाविमुत्ती असेक्खफलं (अशैक्ष्यफल)' इत्यादी (नेत्ति. ५१) वेवचन-समारोपणात (पर्यायवाचक अध्यारोपात) आल्यामुळे पहिली अनागामी-फल (अनागामी फल) आहे. कारण ती कामरागाची थेट विरोधी असल्यामुळे आणि समाधीच्या परिपूर्णतेमुळे विशेषतः 'रागविरागा चेतोविमुत्ती' अशी म्हटली जाते, आणि दुसरी अरहत्त-फल (अर्हत्-फल) आहे, जी तृष्णा व अविद्या यांच्या पूर्ण प्रहाणामुळे (नष्ट होण्यामुळे) आणि प्रज्ञेच्या परिपूर्णतेमुळे 'अविज्जाविरागा पञ्ञाविमुत्ती' अशी म्हटली जाते. ตตฺถาติ นนฺทิยาวฏฺฏนเย. เตสูติ ‘‘จตฺตาริ ปทานี’’ติ วุตฺเตสุ ตณฺหาทีสุ จตูสุ มูลปเทสุ. อิธ สโมสรณนฺติ สงฺคโห วุตฺโต, โส จ สภาวโต, สภาคโต จ โหตีติ ตณฺหาทีนิ จตฺตาริ ทสฺเสตฺวา ‘‘เตสุ อฏฺฐารส มูลปทานิ สโมสรนฺตี’’ติ วุตฺตํ. สมถํ ภชนฺติ สภาวโต, สภาคโต จาติ อธิปฺปาโย. วิปสฺสนํ ภชนฺตีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. นยาธิฏฺฐานานํ นยาธิฏฺฐาเน อนุปฺปเวโส นยานํ นเยสุ อนุปฺปเวโส เอว นาม โหตีติ อาห ‘‘ติปุกฺขโล…เป… อนุปฺปวิสนฺตี’’ติ. तेथे (तत्थ) म्हणजे नन्दियावट्ट नयामध्ये. त्यांमध्ये (तेसु) म्हणजे 'चार पदे' असे म्हटलेल्या तण्हा (तृष्णा) इत्यादी चार मूळ पदांमध्ये. येथे समोसरण (समोसरण/समावेश) म्हणजे संग्रह सांगितला आहे, आणि तो स्वभावाने व सभागतेने (समानतेने) होतो, म्हणून तण्हा इत्यादी चार दर्शवून 'त्यांच्यामध्ये अठरा मूळ पदे समाविष्ट होतात' असे म्हटले आहे. स्वभावाने व सभागतेने समथाचे (शमथाचे) भजन करतात (अनुसरण करतात) असा अभिप्राय आहे. विपस्सना (विपश्यना) भजन करतात यातही हाच नियम आहे. नयाधिष्ठानांचा नयाधिष्ठानात अनुप्रवेश (समावेश) म्हणजेच नयांचा नयांमध्ये अनुप्रवेश होय, म्हणून 'तिपुक्खलो...पे... अनुप्रवेश करतात' असे म्हटले आहे. อโลภาโมหปกฺขํ อภชาเปตฺวา อโทสปกฺขํ ภชาเปตพฺพสฺส นนฺทิยาวฏฺฏสีหวิกฺกีฬิตมูลปทสฺส อภาวโต อโทโส เอกสุตฺตโกฏิยา เอกโกว โหตีติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘อโทโส อโทโส เอวา’’ติ. โทโส โทโส เอวาติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. สโมสรนฺติ สภาคโต จ สภาวโต จ สงฺคหํ คจฺฉนฺตีติ อตฺโถ. अलोभ आणि अमोह पक्षाचे भजन न करवता, अद्वेष (अदोस) पक्षाचे भजन करवण्यायोग्य अशा नन्दियावट्ट-सीहविक्कीळित मूळ पदाचा अभाव असल्यामुळे, अदोस (अद्वेष) हा एकाच सूत्राच्या कोटीने एकच होतो, हे दर्शविताना 'अदोस हा अदोस (अद्वेष) च आहे' असे म्हटले आहे. 'दोस (द्वेष) हा दोस (द्वेष) च आहे' यातही हाच नियम आहे. समोसरन्ति (समाविष्ट होतात) म्हणजे सभागतेने आणि स्वभावाने संग्रहित होतात असा अर्थ आहे. ภูมิ โคจโรติ จ มูลปทานิ เอว สนฺธาย วทติ. เอเกกํ นยํ อนุปฺปวิสติ ตํตํมูลปทานุปฺปเวสโต. กุสเล วา วิญฺญาเต อกุสโล ปฏิปกฺโข, อกุสเล วา กุสโล ปฏิปกฺโข อนฺเวสิตพฺโพ สํวณฺณิยมานสุตฺตปทานุรูปโต อุปปริกฺขิตพฺโพ. อนฺเวสนา อุปปริกฺขา ‘‘ทิสาโลกน’’นฺติ วุจฺจติ. โส นโย นิทฺทิสิตพฺโพติ ตถา อนฺเวสิตฺวา เตหิ ธมฺเมหิ ทิสา ววตฺถเปตฺวา โส โส นโย นิทฺธาเรตฺวา โยเชตพฺโพ. ยถา มูลปเทสุ มูลปทานํ อนุปฺปเวโส สํวณฺณิโต, อิมินาว นเยน มูลปทโต มูลปทานํ นิทฺธารณาติ เวทิตพฺพาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ยถา เอกมฺหิ…เป… นิทฺทิสิตพฺพานี’’ติ อาห. ‘‘เอเกกสฺมิญฺหี’’ติอาทิ การณวจนํ. भूमी आणि गोचर हे मूळ पदांनाच उद्देशून म्हटले आहे. त्या त्या मूळ पदांच्या अनुप्रवेशामुळे प्रत्येक नयामध्ये अनुप्रवेश होतो. कुशल जाणले असता अकुशल हा प्रतिपक्ष, किंवा अकुशल जाणले असता कुशल हा प्रतिपक्ष शोधला पाहिजे, वर्णन केल्या जाणाऱ्या सूत्रपदाच्या अनुरूप त्याची उपपरीक्षा (परीक्षण) केली पाहिजे. अन्वेषण (शोध) आणि उपपरीक्षा याला 'दिसालोकन' (दिशावलोकन) असे म्हटले जाते. तो नय निर्दिष्ट केला पाहिजे म्हणजे तसे अन्वेषण करून त्या धर्मांद्वारे दिशा निश्चित करून तो तो नय निर्धारित करून जोडला पाहिजे. ज्याप्रमाणे मूळ पदांमध्ये मूळ पदांचा अनुप्रवेश वर्णित केला आहे, याच नयाने मूळ पदापासून मूळ पदांचे निर्धारण होते असे जाणावे, हे दर्शविताना 'ज्याप्रमाणे एका...पे... निर्दिष्ट करावेत' असे म्हटले आहे. 'प्रत्येकामध्येच' (एके कस्मिञ्हि) इत्यादी कारण सांगणारे वचन आहे. ตตฺถ ตตฺถาติ เอเกกสฺมึ นเย. เอกสฺมึ ธมฺเม วิญฺญาเตติ ตณฺหาทิเก เอกสฺมึ มูลปทธมฺเม สรูปโต, นิทฺธารณวเสน วา วิญฺญาเต. สพฺเพ [Pg.128] ธมฺมา วิญฺญาตา โหนฺตีติ ตทญฺญมูลปทภูตา สพฺเพ โลภาทโย วิญฺญาตา นยสฺส ภูมิจรณาโยคฺยตาย ปกาสา ปากฏา โหนฺติ. ‘‘อิเมส’’นฺติอาทิ นยตฺตยทิสาภูตธมฺมานํ มตฺถกปาปเนน ติณฺณํ นยานํ กูฏคฺคหณํ, ตํ เหฏฺฐา วุตฺตนยเมว. तेथे तेथे (तत्थ तत्थ) म्हणजे प्रत्येक नयामध्ये. एका धर्माचे ज्ञान झाले असता (एकस्मिं धम्मे विञ्ञाते) म्हणजे तण्हा (तृष्णा) इत्यादी एका मूळ पद धर्माचे स्वरूपाने किंवा निर्धारणाच्या वशाने ज्ञान झाले असता. सर्व धर्म ज्ञात होतात (सब्बे धम्मा विञ्ञाता होन्ति) म्हणजे त्याव्यतिरिक्त मूळ पद असलेले सर्व लोभ इत्यादी ज्ञात होऊन नयाच्या भूमीवर चालण्याच्या योग्यतेमुळे प्रकाशित व स्पष्ट होतात. 'यांच्या' (इमेसं) इत्यादी तीन नयांच्या दिशाभूत धर्मांना शिखरावर पोहोचवण्याद्वारे three नयांचे कूटग्रहण (शिखर ग्रहण) आहे, ते खाली सांगितलेल्या नयाप्रमाणेच आहे. ปุน ‘‘อิเมสู’’ติอาทิ กมฺมนยทฺวยสฺส วิภาควิภาวนํ, ตํ วิญฺเญยฺยเมว. पुन्हा 'यांच्यामध्ये' (इमेसु) इत्यादी दोन कर्मनयांचे विभाग स्पष्ट करणे आहे, ते समजून घेण्यासारखेच आहे. นยสมุฏฺฐานวารวณฺณนา นิฏฺฐิตา. नयसमुत्थानवार-वर्णन समाप्त झाले. สาสนปฏฺฐานวารวณฺณนา शासनपट्ठानवार-वर्णन (शासनप्रस्थानवार-वर्णन) ๘๙. สงฺคหวาราทีสูติ สงฺคหวารอุทฺเทสนิทฺเทสวาเรสุ. สรูปโต น ทสฺสิตํ, อตฺถโต ปน ทสฺสิตเมวาติ อธิปฺปาโย. ตเมว หิ อตฺถโต ทสฺสนตฺถํ อุทาหรณภาเวน นิกฺขิปติ, ยถา มูลปเทหิ ปฏฺฐานํ นิทฺธาเรตพฺพนฺติ. ‘‘อญฺญมญฺญสงฺคโห’’ติ อิทํ มูลปทปฏฺฐานานํ อญฺญมญฺญโต นิทฺธาเรตพฺพตาย การณวจนํ ‘‘สติ อนุปฺปเวเส ตโต วินิคฺคาโม สิยา’’ติ. ปฏฺฐานนฺติ เอตฺถ ป-อิติ อุปสคฺคปทํ, ตํ ปน ‘‘วิภตฺเตสุ ธมฺเมสุ ยํ เสฏฺฐํ, ตทุปาคมุ’’นฺติอาทีสุ วิย ปการตฺถโชตกนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปกาเรหิ ฐาน’’นฺติอาทีสุ วิย ปการตฺถโชตกนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปกาเรหิ ฐาน’’นฺติ อาห. อิธาติ อิมสฺมึ เนตฺติปฺปกรเณ. ตสฺสาติ เทสนาสงฺขาตสฺส ปริยตฺติสาสนสฺส. ตถาภาวทีปนนฺติ เวเนยฺยชฺฌาสยานุรูเปน ปวตฺติตตฺตา สํกิเลสภาคิยตาทิปฺปกาเรหิ ฐิตภาเวน ทีเปตพฺพตฺตา ‘‘ทีปิสฺสตีติ ทีปน’’นฺติ กตฺวา. ปติฏฺฐหนฺติ อธิสีลสิกฺขาทโย สมุทายรูเปน คหิตา. เอเตหิ สํกิเลสธมฺมาทีหิ, สํกิเลสธมฺมาทีนํ อธิสีลสิกฺขาทีนํ ปวตฺตนุปายตา อนุปุพฺพิกถาย สามุกฺกํสิกาย ธมฺมเทสนาย ทีเปตพฺพา. เตสนฺติ สํกิเลสธมฺมาทีนํ. ปุน เตสนฺติ สุตฺตานิ สนฺธายาห. ८९. संग्रहवारादीसूती म्हणजे संग्रहवार, उद्देसवार आणि निद्देसवारांमध्ये. स्वरूपाने (स्पष्टपणे) दर्शविलेले नाही, परंतु अर्थाने दर्शविलेलेच आहे, असा अभिप्राय आहे. तोच अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी उदाहरणादाखल मांडले आहे, जसे की मूळ पदांद्वारे पट्ठान (प्रस्थान) निश्चित केले पाहिजे. 'अञ्ञमञ्ञसंगहो' (परस्पर संग्रह) हे मूळ पदांच्या पट्ठानांचे परस्परांकडून निश्चित करण्याच्या कारणाचे वचन आहे, 'प्रवेश झाल्यावर त्यातून बाहेर पडणे होईल' या अर्थाने. 'पट्ठान' यामध्ये 'प' हा उपसर्ग आहे, तो 'विभत्तेसु धम्मेसु यं सेट्ठं, तदुपागमुं' इत्यादींप्रमाणे प्रकार-अर्थाचा द्योतक आहे, हे दर्शविताना 'प्रकारांनी स्थान' असे म्हटले आहे. 'इध' (येथे) म्हणजे या नेत्तिप्पकरणामध्ये. 'तस्स' (त्याचे) म्हणजे देसना (देशना) म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या परियत्ति शासनाचे. 'तथाभावदीपनं' म्हणजे विनेय जनांच्या आशयानुसार प्रवृत्त झाल्यामुळे संकिलेसभागियता (संक्लेशभागीयता) इत्यादी प्रकारांनी स्थित असलेला भाव प्रकाशित करायचा असल्यामुळे 'जे प्रकाशित करेल ते दीपन' असे म्हटले आहे. 'पतिट्ठहन्ति' (प्रतिष्ठित होतात) म्हणजे अधिशील-शिक्षा इत्यादींचा समूह रूपाने स्वीकार केला आहे. या संकिलेसधम्म (संक्लेशधर्म) इत्यादींद्वारे, संकिलेसधम्म इत्यादींच्या अधिशील-शिक्षा इत्यादींच्या प्रवृत्तीचा उपाय अनुपुब्बिकथा (अनुक्रमिक कथा) आणि सामुक्कंसिका धम्मदेसनेने (सामुत्कर्षिका धर्मदेशनेने) प्रकाशित केला पाहिजे. 'तेसं' (त्यांचे) म्हणजे संकिलेसधम्म इत्यादींचे. 'पुन्हा तेसं' हे सुत्तांच्या संदर्भात म्हटले आहे. โคฏฺฐาติ วชา. ปฏฺฐิตคาโวติ คตคาโว. อาคตฏฺฐานสฺมินฺติ สีหนาทสุตฺตํ (ม. นิ. ๑.๑๕๖) วทติ. ปวตฺตคมนตฺตา เอตฺถาติ วจนเสโส. อถ วา คจฺฉติ เอตฺถาติ คมนํ, เทสนาญาณสฺส นิสฺสงฺควเสน ปวตฺตคมนเทสภาวโต ปฏฺฐานํ นามาติ อตฺโถ. โวมิสฺสาติ ‘‘สํกิเลสภาคิยญฺจ วาสนาภาคิยญฺจา’’ติอาทินา ทุกติกจตุกฺกภาเวน มิสฺสิตา. 'गोट्ठा' म्हणजे गोठा. 'पट्ठितगावो' म्हणजे गेलेल्या गाई. 'आगतट्ठानस्मिं' (आलेल्या ठिकाणी) हे सीहनादसुत्ताला (म. नि. १.१५६) उद्देशून म्हटले आहे. 'येथे प्रवृत्त गमन असल्यामुळे' हा वाक्याचा उर्वरित भाग आहे. अथवा, 'यात गमन होते' म्हणून ते गमन आहे; देसना-ञाणाच्या (देशना-ज्ञानाच्या) निःसंग प्रवृत्तीमुळे गमन देशभाव असल्यामुळे त्याला 'पट्ठान' असे म्हणतात, असा अर्थ आहे. 'वोमिस्सा' म्हणजे 'संकिलेसभागिय आणि वासनाभागिय' इत्यादी दुक (द्विक), तिक (त्रिक) आणि चतुष्क भावाने मिश्रित असलेले. สํกิเลสภาเว [Pg.129] ญาเปตพฺเพ ปวตฺตํ, ตํ วิสยํ กตฺวา เทสิตนฺติ อตฺโถ, อตฺถมตฺตวจนญฺเจตํ, สํกิเลสภาเค ภวนฺติ สทฺทนเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ‘‘สํกิเลสภาคิก’’นฺติปิ ปาโฐ, ตสฺส สํกิเลสภาโค เอตสฺส อตฺถิ, สํกิเลสภาเค วา นิยุตฺตํ, สํกิเลสภาคสฺส วา ปโพธนสีลํ สํกิเลสภาคิกํ, ตเทว สํกิเลสภาคิยนฺติ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ปทาลนํ สมุจฺฉินฺทนํ, ปทาลนสนฺนิสฺสยตา เจตฺถ ปทาลนคฺคหเณน คหิตาติ ทฏฺฐพฺพํ. อเสกฺเขติ อเสกฺขธมฺเม. เตสํ โวมิสฺสกนยวเสนาติ เตสํ สํกิเลสภาคิยาทีนํ จตุนฺนํ ปฏิกฺเขปาปฏิกฺเขปโวมิสฺสกนยวเสน. संकिलेसभावात (संक्लेशभावात) जाणवून देण्यासाठी प्रवृत्त झालेले, त्याला विषय बनवून उपदेशिलेले, असा अर्थ आहे. आणि हे केवळ अर्थाचे वचन आहे; शब्दपद्धतीनुसार 'संकिलेसभागात होतात' असा अर्थ समजला पाहिजे. 'संकिलेसभागिकं' असाही पाठ आहे, ज्याचा संकिलेसभाग आहे, किंवा जो संकिलेसभागात नियुक्त आहे, किंवा संकिलेसभागाचे प्रबोधन करण्याचा स्वभाव असलेला तो 'संकिलेसभागिक', त्याचाच अर्थ 'संकिलेसभागिय' असा समजला पाहिजे. 'पदालन' म्हणजे समूळ नष्ट करणे (समुच्छेदन), आणि येथे 'पदालन' या शब्दाच्या ग्रहणाने 'पदालन-सन्निश्रयता' घेतली आहे, असे समजावे. 'असेक्खे' म्हणजे असेक्खधम्म (अशैक्ष धर्म). 'तेसं वोमिस्सकनयवसेन' म्हणजे त्या संकिलेसभागिय इत्यादी चार प्रकारांच्या प्रतिक्षेप (निषेध), अप्रतिक्षेप आणि मिश्रित पद्धतीनुसार. ‘‘ตานิ ปน ฉ ทุกา’’ติอาทินา ปทานํ คหณปริจฺเฉทโต ววตฺถาปนตํ วตฺวา ปรโต ‘‘สาธารณานิ กตานี’’ติ ปทสฺส อตฺถสํวณฺณนาย สยเมว สรูปโต ทสฺเสสฺสติ. ‘‘อนุทฺธรเณ การณํ นตฺถี’ติ วตฺวา อุทฺธรเณ ปน การณํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ตถา หิ วกฺขตี’’ติอาทินา ปาฬิมาหริ. โวทานํ นาม สํกิเลสโต โหติ สํกิลิฏฺฐสฺเสว โวทานสฺส อิจฺฉิตตฺตา. ยสฺมา โวทานํ ตทงฺคาทิวเสน สํกิเลสโต วิสุชฺฌนํ, ตสฺมา ‘‘ตํ ปน อตฺถโต วาสนาภาคิยาทิ เอว โหตี’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ตทงฺควิกฺขมฺภเนหิ โวทานํ วาสนาภาคิยาทิวเสน โหติ, สมุจฺเฉทปฏิปฺปสฺสทฺธีหิ โวทานํ นิพฺเพธภาคิยวเสน, อเสกฺขภาคิยวเสน โวทานํ ปฏิปฺปสฺสทฺธิยา เอว เวทิตพฺพํ. ยายํ เทสนา ราคาทิภาคินี สิยา, สา สํกิเลสภาคิยา. ยายํ เทสนา จาคาทิภาคินี สิยา, สา วาสนาภาคิยา. ยา ปน อาปตฺติวิจฺเฉทนี สาวเสสํ, อนวเสสญฺจ, สา นิพฺเพธภาคิยา, อเสกฺขภาคิยา จ. 'ती सहा द्विके आहेत' इत्यादींद्वारे पदांच्या ग्रहण आणि परिच्छेदावरून व्यवस्थापना सांगून, पुढे 'साधारण केली आहेत' या पदाच्या अर्थवर्णनात स्वतःच स्वरूपाने दर्शविले जाईल. 'उद्धृत न करण्याचे काही कारण नाही' असे सांगून, उद्धृत करण्याचे कारण दर्शविताना 'तथा हि वक्खति' (कारण असे म्हटले जाईल) इत्यादींद्वारे पाळि वचन उद्धृत केले आहे. 'वोदान' (परिशुद्धी) हे संक्लेशापासून होते, कारण संक्लिष्ट (मलीन) असलेल्याचीच परिशुद्धी इच्छित असते. ज्याअर्थी परिशुद्धी ही तदंग इत्यादींच्या द्वारे संक्लेशापासून विशुद्ध होणे आहे, त्याअर्थी 'ती अर्थतः वासनाभागिय इत्यादीच असते' असे म्हटले आहे. तेथे तदंग आणि विष्कंभन (दडपून टाकणे) द्वारे परिशुद्धी वासनाभागिय इत्यादी रूपाने होते; समुच्छेद आणि प्रतिप्रश्रब्धी (शांत होणे) द्वारे परिशुद्धी निब्बेधभागिय (निर्वेधभागीय) रूपाने होते; आणि असेक्खभागिय (अशैक्षभागीय) रूपाने परिशुद्धी केवळ प्रतिप्रश्रब्धीनेच समजली पाहिजे. जी देसना रागादींशी संबंधित असते, ती 'संकिलेसभागिय' होय. जी देसना त्यागादींशी संबंधित असते, ती 'वासनाभागिय' होय. परंतु जी आपत्तीचा उच्छेद करणारी, सावशेष आणि अनवशेष आहे, ती 'निब्बेधभागिय' आणि 'असेक्खभागिय' होय. ‘‘ตณฺหาสํกิเลสภาคิยํ สุตฺต’’นฺติอาทินา ปฐมเมว สํกิเลสภาคสฺส ทสฺสิตตฺตา วุตฺตํ ‘‘สํกิเลโส ติวิโธ…เป… วิสยทสฺสนตฺถํ อารทฺธ’’นฺติ. ภวราโค ภวปตฺถนา. อุปฺปชฺชตีติ น วิคจฺฉติ. ตตฺร ตตฺร ภเวติ ยทิ วา กามภเว, ยทิ วา รูปภเว, ยทิ วา อรูปภเว. ปทนฺตรสํโยชนวเสนาติ ทุกนเยเนว ปทนฺตเรน โยชนวเสน. มิสฺสิตานิ กตานีติ สํสฏฺฐานิ กตานิ. 'तण्हासांकिलेसभागियं सुत्तं' (तृष्णा-संक्लेशभागीय सूत्र) इत्यादींद्वारे सुरुवातीलाच संकिलेसभागाचे दर्शन घडविले असल्यामुळे 'संकिलेस तीन प्रकारचा आहे...पे... विषयाचे दर्शन घडविण्यासाठी आरंभ केला आहे' असे म्हटले आहे. 'भवरागो' म्हणजे भवप्रार्थना (भवाची इच्छा). 'उप्पज्जति' (उत्पन्न होतो) म्हणजे नष्ट होत नाही. 'तत्र तत्र भवे' म्हणजे मग ते कामभवात असो, रूपभवात असो, किंवा अरूपभवात असो. 'पadanतरसंयोजनवसेन' म्हणजे दुक पद्धतीनेच इतर पदांशी जोडण्याच्या कारणाने. 'मिस्सितानि कतानि' म्हणजे संसृष्ट (एकत्र) केली आहेत. เอกกจตุกฺกวเสน ทสฺสิตพฺพานิ ปทานิ เอว คเหตฺวา อาวุตฺตินยทสฺสนวเสน มิสฺเสตฺวา อวสิฏฺฐทุกวเสน, ติกจตุกฺกวเสน จ อิตเร อฏฺฐ ปฏฺฐานภาคา ทสฺสิตาติ อาห ‘‘ตานิเยว ยถาวุตฺตานิ อฏฺฐ สุตฺตานี’’ติอาทิ[Pg.130]. จตฺตาโร เอกกาเยว ปาฬิยํ อาทิโต ทสฺสิตา. ฉทุกา ปาฬิยํ อาคตา จตฺตาโร, อฏฺฐกถายํ ทฺเวติ. จตฺตาโร ติกา ปาฬิยํ อาคตา ทฺเว, อฏฺฐกถายํ ทฺเวติ. ทฺเว จตุกฺกา ปน อฏฺฐกถายเมว อาคตา. ‘‘ปาฬิยํ อนาคตา’’ติ อิทํ สรูปโต อนาคมนํ สนฺธาย วุตฺตํ, นยโต ปน อาคตภาโว ทสฺสิโต เอว. เย ปเนตฺถ ปาฬิยํ อนาคตา, เตสํ อุทาหรณานิ ปรโต ทสฺสยิสฺสาม. एकक आणि चतुष्क रूपाने दर्शविण्याजोगी पदेच घेऊन, आवृत्ती पद्धती दर्शविण्याच्या हेतूने मिश्रित करून, उर्वरित दुक रूपाने आणि तिक-चतुष्क रूपाने इतर आठ पट्ठानभाग दर्शविले आहेत, म्हणून 'तीच पूर्वोक्त आठ सुत्ते' इत्यादी म्हटले आहे. पाळिमध्ये सुरुवातीला चार एककच दर्शविले आहेत. पाळिमध्ये आलेली सहा द्विके चार आहेत, आणि अट्ठकथेमध्ये दोन आहेत. पाळिमध्ये आलेले चार तिक दोन आहेत, आणि अट्ठकथेमध्ये दोन आहेत. दोन चतुष्क तर केवळ अट्ठकथेमध्येच आले आहेत. 'पालिमध्ये आलेले नाहीत' हे स्वरूपाने न येण्याच्या संदर्भात म्हटले आहे, परंतु पद्धतीनुसार (नयतः) त्यांचे येणे दर्शविलेच आहे. जे येथे पाळिमध्ये आलेले नाहीत, त्यांची उदाहरणे आम्ही पुढे दर्शवू. โสฬสหีติ โสฬสวิเธหิ. น หิ ตานิ สุตฺตานิ โสฬเสว, อถ โข โสฬสปฺปการานีติ มูลคณนํ ฐเปตฺวา การณสุตฺตลทฺเธน สงฺขารคพฺเภน ตทนุรูโป โย คณนวิตฺถาโร, ตสฺส ปตฺถรณวิธิ ปฏฺฐานนโย. อิมินา…เป… นตฺถีติ ยถาวุตฺตปฏฺฐานวินิมุตฺโต ปริยตฺติสาสนปฺปเทโส น วิชฺชติ ยถารหํ ตํตํปฏฺฐานภาเวน ปวตฺตตฺตาติ ทสฺเสติ. ยทิ สุตฺตเคยฺยาทิ นววิธํ ปริยตฺติสาสนํ ยถาวุตฺตปฏฺฐานวเสเนว ปวตฺตํ, ตตฺถ กถมิธ อนิทสฺสิตานํ คาถาทีนํ สํกิเลสภาคิยาทิภาโว คเหตพฺโพติ ปญฺหํ สนฺธาย ‘‘คาถาย คาถา อนุมินิตพฺพา’’ติอาทิปาฬิ ปวตฺตาติ ทสฺเสตุํ ‘‘กถํ ปนา’’ติอาทิ วุตฺตํ. 'सोळसहि' म्हणजे सोळा प्रकारांनी. ती सुत्ते केवळ सोळाच नाहीत, तर सोळा प्रकारची आहेत. मूळ गणना बाजूला ठेवून, कारण-सुत्ताद्वारे प्राप्त झालेल्या संख्यागर्भाने तदनुरूप जो गणनेचा विस्तार आहे, त्याची प्रस्तार पद्धती म्हणजे 'पट्ठाननय' (पट्ठान पद्धती) होय. 'इमिना...पे... नत्थि' याद्वारे पूर्वोक्त पट्ठानापासून मुक्त असलेला परियत्ति शासनाचा कोणताही भाग अस्तित्वात नाही, कारण तो योग्यतेनुसार त्या त्या पट्ठानभावाने प्रवृत्त झाला आहे, हे दर्शविले आहे. जर सुत्त, गेय्य इत्यादी नऊ प्रकारचे परियत्ति शासन पूर्वोक्त पट्ठान पद्धतीनेच प्रवृत्त झाले आहे, तर मग येथे न दर्शविलेल्या गाथा इत्यादींचा संकिलेसभागियता इत्यादी भाव कसा ग्रहण करावा, या प्रश्नाचा संदर्भ घेऊन 'गाथेने गाथेचे अनुमान करावे' इत्यादी पाळि वचन प्रवृत्त झाले आहे, हे दर्शविण्यासाठी 'कथं पना' (परंतु कसे) इत्यादी म्हटले आहे. ตตฺถ อยํ คาถา วิยาติ ‘‘กามนฺธา ชาลสญฺฉนฺนา, มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา, อุทฺธํ อโธ สพฺพธิ วิปฺปมุตฺโต, ยสฺส เสลูปมํ จิตฺต’’นฺติอาทินา อิธ อุทาหฏคาถา วิย. คาถาติ อญฺญาปิ เตปิฏเก พุทฺธวจเน อาคตา อิธ อนุทาหฏา. สํวณฺณนากาเล สมฺมุขีภาเวน ‘‘อยํ คาถา วิยา’’ติ วุตฺตา ยา กาจิ คาถา ‘‘สํกิเลสภาคิยา’’ติ วา ‘‘สํกิเลสวาสนานิพฺเพธอเสกฺขภาคิยา’’ติ วา อนุมินิตพฺพา นยคฺคาเหน ญาเปตพฺพาติ ทสฺเสตุํ วุตฺตํ ‘‘สํกิเลส…เป… ชานิตพฺพาติ อตฺโถ’’ติ. วา-สทฺโท หิ อิธ อวุตฺตวิกปฺปนตฺโถ. เสสปเทสูติ เวยฺยากรณสุตฺตปเทสุ. तेथे 'ही गाथा जशी' म्हणजे 'कामान्धा जालसञ्छन्ना' (कामांध जाळ्याने वेढलेले), 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' (सर्व धर्म मनाच्या पूर्वगामी आहेत), 'उद्धं अधो सब्बधि विप्पमुत्तो' (वर, खाली आणि सर्वत्र मुक्त झालेला), 'यस्स सेलूपमं चित्तं' (ज्याचे चित्त पर्वतासारखे अचल आहे) इत्यादींद्वारे येथे उदाहरणादाखल घेतलेल्या गाथेप्रमाणे. 'गाथा' म्हणजे त्रिपिटकातील बुद्धवचनात आलेल्या इतर गाथा ज्या येथे उदाहरणादाखल घेतलेल्या नाहीत. स्पष्टीकरणाच्या वेळी प्रत्यक्ष समोर असल्यामुळे 'ही गाथा जशी' असे म्हटले आहे, कोणतीही गाथा 'संकिलेसभागिया' (संक्लेशभागीय) किंवा 'संकिलेसवासनानिब्बेधअसेक्खभागिया' (संक्लेश-वासना-निर्वेध-अशैक्ष्यभागीय) अशी अनुमानाने जाणावी, नयाच्या ग्रहणाने समजून घ्यावी, हे दर्शवण्यासाठी 'संकिलेस...पे... जाणावे असा अर्थ आहे' असे म्हटले आहे. कारण येथे 'वा' (किंवा) हा शब्द न सांगितलेल्या विकल्पाच्या अर्थात आहे. 'उर्वरित पदांमध्ये' म्हणजे वेय्याकरण (व्याकरण/स्पष्टीकरण) सूत्रांच्या पदांमध्ये. ๙๐. อริยานํ ธมฺมนฺติ จาริตฺตวาริตฺตเภทํ สีลาจารํ. เอกนฺตกรณียสฺส อกรณมฺปิ วีติกฺกโม เอว. ९०. 'अरियानं धम्मं' (आर्यांचा धर्म) म्हणजे चारित्र आणि वारित्र रूपाने विभागलेले शीलाचरण होय. जे एकांताने (निश्चितपणे) करणीय आहे, ते न करणे देखील उल्लंघन (वीतिक्कम) च आहे. อวิชฺชาทิเก สํกิเลสธมฺเม ตทงฺคาทิวเสน ธุนาตีติ โธนา วุจฺจติ ปญฺญา. ปจฺจเวกฺขิตฺวา ปริภุญฺชนปญฺญาติ ปน ปกรเณน อวจฺฉินฺนตฺตา วุตฺตํ. ตํ อติกฺกมิตฺวา จรนฺโตติ ปจฺจยานํ อปจฺจเวกฺขิตฺวา ปจฺจยปริโภเค อาทีนวํ อปสฺสนฺโต อิณปริโภควเสน ปริภุญฺชนฺโต น ปริมุจฺจติ นิรยาทิทุกฺขโต, วฏฺฏทุกฺขโต จ. अविद्या इत्यादी संक्लेश धर्मांना तदंग इत्यादींच्या द्वारे जी नष्ट करते (धुवून टाकते), तिला 'धोना' म्हणजेच प्रज्ञा म्हटले जाते. परंतु प्रकरणाच्या मर्यादेमुळे 'प्रत्यवेक्षण करून (विचारपूर्वक) उपभोग घेण्याची प्रज्ञा' असे म्हटले आहे. 'त्याचे उल्लंघन करून आचरण करणारा' म्हणजे प्रत्ययांचे (साधनांचे) प्रत्यवेक्षण न करता, प्रत्ययांच्या उपभोगातील दोष न पाहता, ऋणाच्या (कर्जाच्या) उपभोगाप्रमाणे उपभोग घेणारा नरक इत्यादी दुःखातून आणि संसारदुःखातून (वट्टदुःखातून) मुक्त होत नाही. กุกฺกุชนกํ [Pg.131] นาม กทลิยา ปุปฺผนาฬิ. ปราภวายาติ วินาสาย. ตถาติ ยถา ผลปากนฺตา กทลี, เอวํ เวฬุนฬาปิ โอสธิชาติกตฺตาติ อุปสํหารตฺโถ ตถา-สทฺโท. เตนาห ‘‘ผลํ เวฬุํ ผลํ นฬ’’นฺติ. 'कुक्कुजनक' म्हणजे केळीच्या फुलाचा दांडा (केळफूल). 'पराभवाय' म्हणजे विनाशासाठी. 'तथा' (त्याचप्रमाणे) म्हणजे ज्याप्रमाणे फळ पिकल्यानंतर केळीचा नाश होतो, त्याचप्रमाणे बांबू आणि नळ (एक प्रकारचा वेणू) देखील औषधी वनस्पतींच्या जातीचे असल्यामुळे त्यांचाही नाश होतो, या उपसंहाराच्या अर्थात 'तथा' हा शब्द आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'फळ बांबूला आणि फळ नळाला (नष्ट करते)'. สุเขตฺเตปีติ ปิ-สทฺเทน โก ปน วาโท อูสราทิโทสทุฏฺเฐสุ เขตฺเตสูติ ทสฺเสติ. ‘‘ฉกณ…เป… อตฺโถ’’ติ เอเตน ยถาวุตฺตอภิสงฺขรณาภาเวน พีชโทสทุฏฺฐนฺติ ทสฺเสติ. 'सुक्षेत्रातही' यातील 'अपि' (ही) शब्दाने मग नापीक (ऊषर) इत्यादी दोषांनी दूषित असलेल्या शेतांबद्दल काय सांगावे? हे दर्शवले आहे. 'छकण...पे... अर्थ आहे' याद्वारे योग्य संस्कारांच्या अभावामुळे बीजाच्या दोषाने दूषित असल्याचे दर्शवले आहे. ๙๑. สชฺชิตนฺติ สญฺชิตํ. อปริกฺขเตติ ปฏิปกฺเขหิ ธมฺเมหิ อวิกฺขมฺภิเต อโรเค. ९१. 'सज्जित' म्हणजे संचित (एकत्र केलेले). 'अपरिक्खत' म्हणजे प्रतिपक्षी (विरोधी) धर्मांनी न दबलेले, निरोगी. ยาย สมนฺนาคโต ปุคฺคโล ‘‘กึ สุตํ มยา, กึ วา สุณามี’’ติ กุสลํ คเวสี จรติ, สา ธมฺโมชปญฺญา กิสฺสวา นาม. ทุพฺภาสิตาติ ทุฏฺฐุ ภาสิตา, อิสฺสามจฺฉริยโทสาทีหิ ทุฏฺฐา วา ภาสิตา. ज्या प्रज्ञेने युक्त असलेला पुद्गल (व्यक्ती) 'मी काय ऐकले आहे, यापुढे काय ऐकू?' अशा प्रकारे कुशलाचा शोध घेत फिरतो, ती 'धम्मोजप्रज्ञा' (धर्माचा रस असणारी प्रज्ञा) होय, तिला 'किस्सवा' म्हणतात. 'दुब्भासिता' म्हणजे वाईट रीतीने बोललेली, किंवा ईर्ष्या, मत्सर इत्यादी दोषांनी दूषित होऊन बोललेली. ๙๒. วิจินาตีติ วิเสสโต จินาติ ปสวติ. ९२. 'विचिनाति' म्हणजे विशेष रूपाने संचय करतो, उत्पन्न करतो. วิคตภูตาติ วิคตสจฺจ. เตนาห ‘‘อลีกวาที’’ติ. 'विगतभूता' म्हणजे सत्यापासून दूर गेलेला. म्हणूनच म्हटले आहे - 'अलीकवादी' (असत्य बोलणारा). อวชาตปุตฺตาติ ลามกปุตฺต. ภควโต สาสเน ปพฺพชิตฺวา นิหีนวุตฺติตํ สนฺธาย วทติ. เนรยิโกติ นิรเย นิพฺพตฺตนโก. ปาปกมฺมิโน ปปตนฺติ เอตฺถาติ ปปตํ, นรกํ. 'अवजातपुत्त' म्हणजे हीन पुत्र. भगवंतांच्या शासनात प्रवज्जित होऊन हीन आचरण करण्याच्या संदर्भाने हे म्हटले आहे. 'नेरयिक' म्हणजे निरयात (नरकात) उत्पन्न होणारा. जेथे पापकर्म करणारे पडतात ते 'प्रपात' म्हणजे नरक होय. ตณฺหาทีนํ สภาวเภทโตติ ตณฺหาทิฏฺฐิทุจฺจริตานํ ตณฺหายนวิปรีตทสฺสนทุฏฺฐจริตตาสงฺขาตสภาววิภาคโต. อวตฺถาเภทโตติ ตณฺหาย ฉนฺทเปมโลภราคนนฺทีปิปาสามุจฺฉาทโย, ทิฏฺฐิยา คาหปรามาสมิจฺฉาภินิเวสวิสุกวิปฺผนฺทิตวิปรีตทสฺสนาทโย, ทุจฺจริตสฺส ติรจฺฉานเปตฺติวิสยอสุรโยนิคามิตาทโย อวตฺถาวิเสสา. จ-สทฺเทน เตสํ กามตณฺหาทิรูปตณฺหาทิอตฺตานุทิฏฺฐาทิสสฺสตคาหาทิกายทุจฺจริตาทิ- ปาณาติปาตาทิปฺปการเภโท สงฺคยฺหติ. 'तण्हा' (तृष्णा) इत्यादींच्या स्वभावभेदावरून म्हणजे तृष्णा, दृष्टी आणि दुश्चरित यांच्या अनुक्रमे तृष्णा बाळगणे, विपरीत दर्शन आणि दुष्ट आचरण या नावाच्या स्वभावाच्या विभागावरून. 'अवस्थाभेदावरून' म्हणजे तृष्णेच्या छंद, प्रेम, लोभ, राग, नंदी (अभिनंदन), पिपासा, मूर्च्छा इत्यादी अवस्था; दृष्टीच्या ग्राह, परामास, मिथ्याभिनिवेश, विसूक (दृष्टिजाल), विप्फंदित (तगमग), विपरीत दर्शन इत्यादी अवस्था; दुश्चरिताच्या तिर्यंच, प्रेतविषय, असुरयोनीमध्ये नेणाऱ्या इत्यादी अवस्थांचे विशेष होत. 'च' (आणि) या शब्दाने त्यांचा कामतृष्णा इत्यादी, रूपतृष्णा इत्यादी, आत्मानुदृष्टी इत्यादी, शाश्वतग्राह इत्यादी, कायदुश्चरित इत्यादी आणि प्राणातिपात इत्यादी प्रकारांचा भेद समाविष्ट होतो. ๙๓. วิปุลนฺติ อุฬารํ, เตลาทีหิ เจว ธนธญฺญาทีหิ จ ปหูตสนฺนิจยนฺติ อตฺโถ. สมฺพาธาติ ชนสํมทฺทสงฺฆฏา. ९३. 'विपुल' म्हणजे उदार (विशाल), तेल इत्यादींनी तसेच धनधान्य इत्यादींनी भरपूर संचय केलेला असा अर्थ आहे. 'संबाध' म्हणजे लोकांची गर्दी आणि दाटी. ทณฺเฑน น หึสตีติ เอตฺถ วุตฺตํ ยํ ทณฺฑนิธานํ, ตํ วฏฺฏวิวฏฺฏนิสฺสิตํ. ตทุภยสฺสาปิ ผลํ ทสฺเสนฺโต ‘‘โส ปุคฺคโล’’ติอาทิมาห. 'दंडाने हिंसा करत नाही' येथे जे दंडाचे त्याग करणे (दंडनिधान) म्हटले आहे, ते संसार (वट्ट) आणि निर्वाण (विवट्ट) यांच्याशी संबंधित आहे. त्या दोन्हीचे फळ दर्शवताना 'तो पुद्गल' इत्यादी म्हटले आहे. ๙๔. กิญฺจติ [Pg.132] ตํสมงฺคินํ วิมทฺทตีติ กิญฺจนํ, ราคาทิ, ปลิพุนฺธติ กุสลปฺปวตฺตึ นิวาเรตีติ ปลิโพโธ, ราคาทิเยว, กิญฺจนเมว ปลิโพโธ กิญฺจนปลิโพโธ. อถ วา กิญฺจนญฺจ ปลิโพโธ จ กิญฺจนปลิโพโธ, อามิสกิญฺจิกฺขญฺจ ราคาทิสํกิเลโส จาติ อตฺโถ. ९४. जे त्याशी युक्त असलेल्याला पीडित करते ते 'किंचन' म्हणजे राग इत्यादी होय. जे कुशल प्रवृत्तीला रोखते (अडथळा आणते) तो 'पलिबोध' (अडथळा) म्हणजे राग इत्यादीच होय. किंचन हेच पलिबोध म्हणजे 'किंचनपलिबोध' होय. अथवा किंचन आणि पलिबोध म्हणजे 'किंचनपलिबोध' होय, म्हणजेच आमिष-किंचिक्ख (भौतिक आसक्ती) आणि राग इत्यादी संक्लेश असा अर्थ आहे. วิเสสิตนฺติ วิโลมํ, วิสมํ กิริยนฺติ อตฺโถ. ราชภณฺฑนฺติ โอโรเธ สนฺธาย วทนฺติ. 'विसेसित' म्हणजे विलोम (उलटे), विषम क्रिया असा अर्थ आहे. 'राजभंड' हे अंतःपुराच्या (राणीवशाच्या) संदर्भाने म्हणतात. ยาจโยโคติ ยาจนโยโค, ยาจกานํ มโนรถปริปูรณโต. เตนาห ‘‘ยาจิตพฺพยุตฺโต’’ติ. ทานยุตฺโตติ สตตํ ทานกิริยาสมงฺคี. ทานสํวิภาครโตติ เอตฺถ ทานํ นาม อตฺถิกานํ ยถาธิปฺปายปฏิยตฺตปริจฺจาโค, สํวิภาโค อตฺตนา ปริภุญฺชิตพฺพโต อปฺปมตฺตกโตปิ สํวิภชนํ. อิเมหิ โข…เป… โหตีติ เอตฺถ โหติสทฺเทน ‘‘สมนฺนาคโต’’ติ ปทํ สมฺพนฺธิตพฺพํ, น ‘‘โสตาปนฺโน’’ติ ทสฺเสตุํ ‘‘โสตาปนฺโน…เป… โหตี’’ติ วุตฺตํ. เตหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโม หิ อิธ วิธียติ, น โสตาปนฺนภาโว, เตน โสตาปนฺนลกฺขณเมเต ธมฺมา, น โสตาปนฺนภาวลกฺขณนฺติ ทสฺเสติ. ตถา หิ ‘‘โสตาปนฺเนน…เป… ลพฺภมานตํ ทสฺเสตี’’ติ วุตฺตํ. 'याचयोगो' म्हणजे याचनेला योग्य, कारण तो याचकांच्या मनोरथांची पूर्तता करतो. म्हणूनच म्हटले आहे - 'याचितब्बयुत्तो' (याचना करण्यास योग्य). 'दानयुत्तो' म्हणजे सतत दानक्रियेत मग्न असणारा. 'दानसंविभागरतो' यामध्ये 'दान' म्हणजे गरजूंच्या इच्छेनुसार तयार केलेल्या वस्तूंचा त्याग करणे, आणि 'संविभाग' म्हणजे स्वतः उपभोग घेण्याच्या वस्तूंमधून अगदी थोडा भाग असला तरी त्याचे वाटप करणे. 'इमेहि खो...पे... होती' येथे 'होति' या शब्दाशी 'समन्नागतो' (युक्त असलेला) हे पद जोडले जावे, 'सोतापन्नो' (स्रोतापन्न) हे नाही, हे दर्शवण्यासाठी 'सोतापन्नो...पे... होति' असे म्हटले आहे. कारण येथे त्या धर्मांनी युक्त असणे विहित केले आहे, स्रोतापन्न भाव नाही. त्यामुळे हे धर्म स्रोतापन्नाची लक्षणे आहेत, स्रोतापन्न भावाची लक्षणे नाहीत, असे दर्शवले आहे. म्हणूनच 'स्रोतापन्नाद्वारे...पे... प्राप्त होणे दर्शवते' असे म्हटले आहे. ๙๕. ลปติ กเถติ เอเตนาติ ลปนํ, โอฏฺฐํ. ९५. ज्याद्वारे तो बोलतो, संभाषण करतो ते 'लपन' म्हणजे ओठ होय. ๙๗. มุทิโตติ ทิพฺพสมฺปตฺติยา ปมุทิโต. ९७. 'मुदितो' म्हणजे दिव्य संपत्तीने प्रमुदित (आनंदित) झालेला. ๙๙. กิญฺจาปิ อุทตารีติ ตรณกิริยา อตีตภาเวน วุตฺตา, ตรณเมว ปน คเหตฺวา อาห ‘‘โอฆตรณสฺส อริยมคฺคกิจฺจตฺตา’’ติ. เอวํ วิปฺปมุตฺโต, วิมุตฺโตติ จ เอตฺถ มุจฺจนกิริยายปิ วตฺตพฺพํ. ९९. जरी 'उदतारी' (पार केला) असे म्हणून पार करण्याची क्रिया भूतकाळात सांगितली असली, तरी पार करणे याच अर्थाने घेऊन 'ओघ पार करणे हे आर्यमार्गाचे कार्य असल्यामुळे' असे म्हटले आहे. याचप्रमाणे 'विप्पमुत्तो' (विशेष मुक्त झालेला) आणि 'विमुत्तो' (मुक्त झालेला) येथे मुक्त होण्याच्या क्रियेबद्दलही समजावे. ๑๐๐. ปาตุ-สทฺทปุพฺพโก ภวนฺติ-สทฺโท สิยา อุปฺปาทปริยาโย สิยา อาวิภาวปริยาโยติ ‘‘ปาตุภวนฺตี’’ติ ปทสฺส ‘‘อุปฺปชฺชนฺติ, ปกาเสนฺติ จา’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. ปาตุภูตธมฺมสฺสาติ อุปฺปนฺนโพธิปกฺขิยธมฺมสฺส, วิภูตจตุสจฺจธมฺมสฺส วา. โน กลฺโลติ น ยุตฺโต. สเหตุธมฺมนฺติ เอตฺถ ปจฺจยุปฺปนฺนธมฺมาว คหิตา, น ปจฺจยธมฺมาติ? นยิทเมวํ ทฏฺฐพฺพํ ปจฺจยธมฺมานมฺปิ ปจฺจยุปฺปนฺนภาวานติวตฺตนโต. อถ วา สเหตุธมฺมนฺติ ปจฺจยุปฺปนฺนธมฺโม ปธานภาเวน วุตฺโต, ปจฺจยธมฺโม ปน คุณภาเวนาติ เอวเมตฺถ อุภเยสํ วุตฺตภาโว เวทิตพฺโพ. १००. 'पातु' शब्दाच्या पूर्वी असलेला 'भवन्ति' शब्द हा उत्पत्तीचा पर्याय असू शकतो किंवा प्रकटीकरणाचा पर्याय असू शकतो, म्हणून 'पातुभवन्ति' या पदाचा अर्थ 'उत्पन्न होतात आणि प्रकाशित होतात' असा सांगितला आहे. 'पातुभूतधम्मस्स' म्हणजे उत्पन्न झालेल्या बोधिपाक्षिक धर्मांचे किंवा स्पष्ट झालेल्या चतुरार्यसत्य धर्मांचे. 'नो कलो' म्हणजे योग्य नाही. 'सहेतुधम्मं' येथे केवळ प्रत्ययोत्पन्न (कारणाने उत्पन्न झालेले) धर्मच घेतले आहेत, प्रत्यय धर्म (कारण धर्म) नाही काय? असे समजू नये, कारण प्रत्यय धर्म देखील प्रत्ययोत्पन्न भावाचे उल्लंघन करत नाहीत. अथवा 'सहेतुधम्मं' यामध्ये प्रत्ययोत्पन्न धर्म मुख्य रूपाने सांगितले आहेत, तर प्रत्यय धर्म गौण रूपाने सांगितले आहेत, अशा प्रकारे येथे दोन्हीचा उल्लेख केलेला भाव समजून घ्यावा. อารญฺญกนฺติ [Pg.133] อารญฺญกงฺคสมนฺนาคตํ. อญฺญาโตติ ปริจยวเสน น ญาโต, อสํสฏฺโฐติ อตฺโถ. เตนาห ‘‘นิจฺจนโว’’ติ. 'आरञ्ञकं' (आरण्यक) म्हणजे आरण्यक अंगाने युक्त असलेला. 'अञ्ञातो' (अज्ञात) म्हणजे परिचयाच्या अभावामुळे न ओळखलेला, असंसृष्ट (अलिप्त) असा अर्थ आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - 'निच्चनवो' (नेहमि नवीन). พฺยาปาทวิหึสาวิตกฺกวิรเห เวริปริสงฺกาย อภาเว อกิตฺติปริมุตฺตีติ เอวมาทีหิปิ การเณหิ โกธปฺปหาเนน สุขํ สุปติ. โกธปริฬาหาภาโว ปน ปากฏตโรติ อาห ‘‘โกธ…เป… สยตี’’ติ. วิสมูลสฺสาติ เอตฺถ วิสสริกฺขตาย ‘‘วิส’’นฺติ ทุกฺขํ อธิปฺเปตนฺติ อาห ‘‘ทุกฺขวิปากสฺสา’’ติ. สุขนฺติ เจตสิกสุขํ. อกฺกุฏฺฐสฺส ปจฺจกฺโกสิตฺวา จ ปจฺจกฺโกสนเหตุ อุปฺปชฺชตีติ โยชนา. व्यापाद (द्वेष) आणि विहिंसा (हिंसा) च्या वितर्कांपासून विरहित असल्यामुळे, वैऱ्याच्या शंकेचा अभाव असल्यामुळे आणि अपकीर्तीपासून मुक्त असल्यामुळे इत्यादी कारणांनी क्रोधाच्या प्रहाणाने (त्यागाने) मनुष्य सुखाने झोपतो. क्रोधाच्या परिदाहाचा (दाहाचा) अभाव अधिक स्पष्ट आहे, म्हणून 'क्रोध...पे... झोपतो' असे म्हटले आहे. 'विषमूला' (विषारी मूळ असलेल्या) यामध्ये विषाच्या समानतेमुळे 'विष' या शब्दाने 'दुःख' अभिप्रेत आहे, म्हणून 'दुःखद विपाकाचे' असे म्हटले आहे. 'सुख' म्हणजे चैतसिक (मानसिक) सुख. शिवीगाळ करणाऱ्याला उलट शिवीगाळ केल्याने आणि उलट शिवीगाळ करण्याच्या कारणामुळे (क्रोध) उत्पन्न होतो, अशी येथे योजना आहे. ๑๐๑. สลฺลุพฺพาหนํ สลฺลุทฺธรณํ. १०१. 'सल्लुब्बाहनं' म्हणजे शल्य बाहेर काढणे (शल्योद्धरण). วิสยเภเทน, ปวตฺติอาการเภเทน จ อเนกเภทตฺตา กามสญฺญาย วุตฺตํ ‘‘ยาย กายจี’’ติ. विषयांच्या भेदाने आणि प्रवृत्तीच्या स्वरूपाच्या भेदाने कामसंज्ञेचे अनेक प्रकार (भेद) असल्यामुळे 'ज्या कोणत्याही' (याय कायचि) असे म्हटले आहे. ทานมุเขนาติ ทาเนน มุขภูเตน, ทานํ ปมุขํ กตฺวาติ อตฺโถ. 'दानमुखेने' म्हणजे दानाला मुख्य करून, दानाला प्रमुख करून, असा अर्थ आहे. ‘‘อริยมคฺคสมฺปาปนวเสนา’’ติ อิมินา อนุกมฺปานุทฺทยานํ เอกนฺตานวชฺชตเมว วิภาเวติ. ‘‘อนุกมฺปา’’ติ ปทสฺสตฺถวิวรณํ ‘‘กรุณายนา’’ติ, อิตรสฺส ‘‘เมตฺตายนา’’ติ. 'आर्यमार्गाची प्राप्ती करून देण्याच्या दृष्टीने' याद्वारे अनुकंपा आणि दया यांचे पूर्णपणे निर्दोषत्वच स्पष्ट केले आहे. 'अनुकंपा' या पदाच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण 'करुणायना' (करुणा करणे) असे आहे, आणि दुसऱ्याचे (अनुदयाचे) 'मेत्तायना' (मैत्री करणे) असे आहे. ๑๐๒. ปกติอาทีติ อาทิสทฺเทน อณุอิสฺสรปชาปติปุริสกาลาธิฏฺฐายการิอาทิเก สงฺคณฺหาติ. १०२. 'प्रकृती इत्यादी' यामधील 'इत्यादी' शब्दाने अणु (परमाणू), ईश्वर, प्रजापती, पुरुष, काळ आणि अधिष्ठाता इत्यादींचा संग्रह होतो. กาเมสูติ กามคุเณสุ รูปาทิวิสเยสุ. 'कामेसू' (कामांमध्ये) म्हणजे कामगुणांमध्ये, म्हणजेच रूप इत्यादी विषयांमध्ये. พหลกิเลสตายาติ พหุลกิเลสภาเวน. ปุพฺพเหตุมนฺทตายาติ วิวฏฺฏูปนิสฺสยสฺส กุสลสฺส อกตตฺตา. 'बहलकिलेसतया' म्हणजे क्लेशांच्या प्रचुरतेमुळे (अतिशय क्लेश असल्यामुळे). 'पूर्वहेतूच्या मंदतेमुळे' म्हणजे विवर्त-उपनिषय (संसारमुक्तीला कारणीभूत असणाऱ्या) कुशल कर्माचे आचरण न केल्यामुळे. จิตฺตวูปสมภาวนายาติ จิตฺตวูปสมกรภาวนาย สมถวิปสฺสนาย. 'चित्तवूपसमभावनेने' म्हणजे चित्ताचा उपशम (शांतता) करणाऱ्या भावनेने, म्हणजेच समथ आणि विपश्यनेने. ปริสฺสยา สีลาทิปริปูรณสฺส ปริพนฺธภูตา กิเลสา เอว. อนริยา ปญฺญาสีสํ อุกฺขิปิตฺวา ฐาตุเมว น สกฺโกนฺตีติ วุตฺตํ ‘‘ญาณสิเรน อโธสิรา หุตฺวา’’ติ. 'परिस्सय' (उपद्रव) म्हणजे शील इत्यादींच्या परिपूर्तीमध्ये अडथळा ठरणारे क्लेशच होत. अनार्य लोक प्रज्ञारूपी मस्तक वर करून उभे राहूच शकत नाहीत, म्हणून 'ज्ञानरूपी मस्तकाने अधोमुख (खाली मस्तक करून) होऊन' असे म्हटले आहे. ๑๐๓. ภควโต, ภิกฺขุสงฺฆสฺส จ วสนโยคฺยภาโว, เตหิ นิวุตฺถภาโว จ ตสฺส สาติสโย วณฺโณติ วุตฺตํ ‘‘ปฐมคาถาย เชตวนสฺส วณฺณํ กเถตฺวา’’ติ. วุตฺตญฺเหตํ – १०३. भगवान आणि भिक्खू संघाच्या राहण्यास योग्य असणे आणि त्यांच्याद्वारे तेथे निवास केला जाणे, हे त्याचे अतिशय श्रेष्ठ वर्णन आहे, म्हणून 'पहिल्या गाथेमध्ये जेतवनाचे वर्णन करून' असे म्हटले आहे. कारण असे म्हटले आहे की - ‘‘คาเม [Pg.134] วา ยทิ วารญฺเญ, นินฺเน วา ยทิ วา ถเล; ยตฺถ อรหนฺโต วิหรนฺติ, ตํ ภูมิรามเณยฺยก’’นฺติ. (ธ. ป. ๙๘; เถรคา. ๙๙๑); 'गावात असो वा अरण्यात, सखल भागात असो वा मैदानावर; जेथे अरहंत निवास करतात, ती भूमी रमणीय असते.' อิธ ธมฺมสทฺโท สมาธิปริยาโย ‘‘เอวํธมฺมา เต ภควนฺโต’’ติอาทีสุ (ที. นิ. ๒.๑๓; ม. นิ. ๓.๑๙๘; สํ. นิ. ๕.๓๗๘) วิยาติ อาห ‘‘ธมฺโมติ สมาธี’’ติ สมาธิปกฺขิกา ธมฺมา สติวายามา. येथे 'धम्म' शब्द समाधीचा पर्याय आहे, जसे 'अशा धर्माचे ते भगवान होते' इत्यादींमध्ये आहे. म्हणून 'धम्म म्हणजे समाधी' असे म्हटले आहे. समाधीच्या पक्षातील धर्म म्हणजे स्मृती (सती) आणि व्यायाम (प्रयत्न) होत. นานุคจฺเฉยฺยาติ นานุตเสยฺย. อนุตสนเมว หิ ตณฺหาทิฏฺฐีหิ อนุคมนํ. ปฏิวิปสฺเสยฺยาติ วิปสฺสนาสมฺมสนมาห. ยมกโต, หิ ขณิกโต, ปฏิปาฏิโต จ สมฺมสนํ วิปสฺสนายปิ สมฺมสนโต ปฏิวิปสฺสนา นาม. สา หิ วิปสฺสนาย ทิฏฺฐิอุคฺฆาฏนมานสมุคฺฆาฏนนิกนฺติปริยาทานเหตุตาย วิเสสโต ปฏิปกฺเขน อสํหีรอสํกุปฺปนเหตุภูตา ปริพฺรูหนา โหติ. ‘‘ปุนปฺปุนํ…เป… อปฺเปนฺโต’’ติ เอเตน นิพฺพานารมฺมณธมฺมานุพฺรูหนํ ยถา ‘‘พฺรูเหตา สุญฺญาคาราน’’นฺติ (ม. นิ. ๑.๖๔) ทสฺเสติ. 'नानुगच्छेय्य' म्हणजे अनुगमन करू नये (मागे धावू नये). कारण तृष्णा आणि दृष्टी यांच्याद्वारे अनुगमन करणे म्हणजेच अनुतसन (मागे धावणे) होय. 'पटिविपस्सेय्य' याद्वारे विपश्यनेच्या संमर्शाचे (चिंतनाचे) कथन केले आहे. कारण यमक (जोडीने), क्षणिक आणि अनुक्रमाने केलेले संमर्शन हे विपश्यनेचे संमर्शन असल्यामुळे त्याला 'प्रति-विपश्यना' म्हणतात. कारण ती विपश्यनेद्वारे दृष्टीचे उच्चाटन, मानाचे समूळ उच्चाटन आणि निकंतीचा (आसक्तीचा) क्षय करण्याचे कारण असल्यामुळे, विशेषतः प्रतिपक्षाद्वारे पराभूत न होणारी आणि अकोपित राहणारी संवर्धन (परिवृंहण) ठरणारी असते. 'पुन्हा पुन्हा...पे... अर्पित करत' याद्वारे निर्वाण हेच आलंबन असणाऱ्या धर्मांचे संवर्धन करणे दर्शविले आहे, जसे 'शून्यागारांचे संवर्धन करणारे' यामध्ये दर्शविले आहे. ยํ กิญฺจิ อปทิสิตฺวา ปฏิญฺญาทานํ สงฺคโร. โส ปน อตฺตโน กิจฺจวิเสสํ อปทิสิตฺวา มิตฺตสนฺถววเสน วา กาลาคมนํ อปทิสิตฺวา กิญฺจิกฺขานุปฺปทาเนน วา ปฏิพาหกรณํ อปทิสิตฺวา พลคฺคโพธวเสน วา สิยาติ ตสฺส มิตฺตกรณาทิปริยายตํ สนฺธายาห ‘‘สงฺคโรติ…เป… นาม’’นฺติ. เอวํ ปฏิปนฺนตฺตาติ เอวํ อนิจฺจสญฺญามุเขน ติยทฺธเกสุ สงฺขาเรสุ อปฺปมาทปฺปฏิปตฺติยา ปฏิปนฺนตฺตา. काहीतरी निमित्त सांगून प्रतिज्ञा करणे म्हणजे 'संगर' (करार) होय. तो आपल्या विशिष्ट कार्याचे निमित्त सांगून, किंवा मित्राच्या परिचयाने, किंवा वेळेच्या आगमनाचे निमित्त सांगून, किंवा काहीतरी अल्प वस्तू देण्याच्या निमित्ताने, किंवा अडथळा आणण्याच्या निमित्ताने, किंवा सैन्याच्या बलाच्या ज्ञानाने असू शकतो. त्याच्या मित्रत्व इत्यादी पर्यायांना लक्षात घेऊन 'संगर...पे... नाव आहे' असे म्हटले आहे. 'अशा प्रकारे प्रतिपन्न (आचरण करणारे) असल्यामुळे' म्हणजे अशा प्रकारे अनित्यसंज्ञेच्या माध्यमातून तिन्ही काळांतील संस्कारांमध्ये अप्रमादाच्या प्रतिपत्तीने (आचरणाने) युक्त असल्यामुळे. ทิพฺพจกฺขุ สุวิสุทฺธนฺติ สาวเสสา เทสนาติ อาห ‘‘ยํ สจฺฉิกโรตี’’ติ. รูปายตนญฺเหตฺถ อธิปฺเปตํ. 'दिव्यचक्षू सुविशुद्ध आहे' ही सविशेष देशना आहे, म्हणून 'ज्याचा साक्षात्कार करतो' असे म्हटले आहे. कारण येथे रूपायतन अभिप्रेत आहे. ๑๐๔. อนฺตนฺติ สงฺขารานํ ปาริมนฺตภูตํ. เวทานนฺติ มคฺคญาณเวทานเมว. อรหตฺตาธิคเมน อนฺตํ ปริโยสานํ คตตฺตา. กมฺมวิปากวฏฺฏานํ, กิเลสวฏฺฏสฺสาปิ จ อุสฺสเทน อุปจเยน อุสฺสทา, ราคาทโย. १०४. 'अंत' म्हणजे संस्कारांची अंतिम सीमा. 'वेदांचे' म्हणजे मार्गज्ञानरूपी वेदांचेच, कारण अरहंतपदाच्या प्राप्तीने ते अंताला (शेवटाला) पोहोचले आहेत. कर्मविपाकवर्त आणि क्लेशवर्ताच्या सुद्धा उत्सदाने (वाढीने) किंवा उपचयाने (संचयाने) जे उत्सद आहेत, ते राग इत्यादी होत. สุกฺโกภาสตาย สุกฺกา, อภิวิสิฏฺฐคฺคหา. สพฺพานิ วา ตารกรูปานิ สุกฺกา. วินฺทตีติ อุปลภติ, ปฏิวิชฺฌตีติ อตฺโถ. शुभ्र प्रकाशाने युक्त असल्यामुळे 'शुक्र' (तेजस्वी), जे अतिशय विशिष्ट ग्रहण करणारे आहेत. किंवा सर्व तारांचे रूप म्हणजे 'शुक्र' होय. 'विंदती' म्हणजे प्राप्त करतो, म्हणजेच प्रतिवेध करतो (जाणून घेतो), असा अर्थ आहे. ‘‘อชฺฌตฺตํ วิปสฺสนาภินิเวโส โหตี’’ติ อิทํ ‘‘สเกสุ ธมฺเมสู’’ติ ปารคุภาวสฺส วิเสสิตตฺตา วุตฺตํ, ตญฺจ โข อภินิเวเสเนว เทสิตํ. ‘‘สพฺพํ[Pg.135], ภิกฺขเว, อภิญฺเญยฺย’’นฺติ (สํ. นิ. ๔.๔๖; ปฏิ. ม. ๑.๓) วุตฺตํ. ปารคุตา จ เตสํ ขนฺธานํ ปริญฺญาภิสมยวเสน โหติ. ตโต จ เนสํ เหตุภูตสมุทเย, ตทปฺปวตฺติลกฺขเณ นิโรเธ, นิโรธคามินิยา ปฏิปทาย จ ปหานสจฺฉิกิริยาภาวนาภิสมยปาริปูริวเสน อิตรสจฺเจสุปิ ปารคุภาโว วุตฺโต เอว โหติ. สพฺพโส หิ สกอตฺตภาวโพเธนปิ จตุสจฺจาภิสมโย โหติเยว. วุตฺตญฺเหตํ ‘‘อิมสฺมึเยว พฺยามมตฺเต กเฬวเร สสญฺญิมฺหิ สมนเก โลกญฺจ ปญฺญเปมิ, โลกสมุทยญฺจา’’ติอาทิ (สํ. นิ. ๑.๑๐๗; อ. นิ. ๔.๔๕). อถ วา สเกสุ ธมฺเมสูติ อตฺตโน ธมฺเมสุ. อตฺตธมฺมา นาม อตฺถกามสฺส กุลปุตฺตสฺส สีลาทิธมฺมา. สีลสมาธิปญฺญาทโย หิ โวทานธมฺมา เอกนฺตหิตสุขสมฺปาทนโต ปุริสสฺส สกธมฺมา นาม, น อนตฺถาวหา สํกิเลสธมฺมา วิย ปรธมฺมา. เตสํ สีลาทีนํ ปาริปูริยา ปารํ ปริยนฺตํ คโตติ ปารคู. ‘‘อกฺกุล ปกฺกุล’’อิติ เอวํ วิหึสนกปโยคํ. อชกลาเปน (อุทา. ๗) หิ ตทา ภควนฺตํ ภีสาเปตุกาเมน กตํ ยกฺขคชฺชิตํ ‘‘อกฺกุล ปกฺกุล’’ อิติ อิมินา อากาเรน สตฺตานํ โสตปถํ อคมาสิ, ตสฺมา ตํ ‘‘อกฺกุลํ ปกฺกุลกรณ’’นฺติ วุตฺตํ. 'अध्यात्म (स्वतःच्या आत) विपश्यनेचा अभिनिवेश होतो' हे 'आपल्या स्वतःच्या धर्मांमध्ये' या पारंगततेच्या वैशिष्ट्यामुळे म्हटले आहे, आणि ते अभिनिवेशानेच उपदेशिले आहे. 'भिक्खूंनो, सर्व काही अभिज्ञेय (जाणून घेण्यायोग्य) आहे' असे म्हटले आहे. आणि पारंगतता ही त्या स्कंधांच्या परिज्ञा-अभिसमयाच्या (पूर्ण ज्ञानाच्या) दृष्टीने होते. आणि त्यामुळे त्यांच्या हेतूभूत समुदायात, त्यांच्या अप्रवृत्ती-लक्षण निरोधात, आणि निरोधगामी प्रतिपदेत (मार्गात) प्रहाण, साक्षात्कार आणि भावना-अभिसमयाच्या परिपूर्तीमुळे इतर सत्यांमध्येही पारंगतता सांगितलेलीच असते. कारण सर्व प्रकारे स्वतःच्या अस्तित्वाच्या बोधाने सुद्धा चतुरार्यसत्यांचा अभिसमय होतोच. कारण असे म्हटले आहे - 'याच व्याममात्र (हातभर लांबीच्या), ससंज्ञक आणि समनस्क शरीरात मी लोक आणि लोकसमुदय प्रज्ञापित करतो' इत्यादी. अथवा 'सकेसु धम्मेसू' म्हणजे स्वतःच्या धर्मांमध्ये. स्वतःचे धर्म म्हणजे कल्याणाची इच्छा करणाऱ्या कुलपुत्राचे शील इत्यादी धर्म होत. कारण शील, समाधी, प्रज्ञा इत्यादी विशुद्धीचे धर्म हे एकांत हित आणि सुख देणारे असल्यामुळे मनुष्याचे स्वतःचे धर्म आहेत, अनर्थ घडवून आणणाऱ्या संक्लेशधर्मांप्रमाणे परधर्म नाहीत. त्या शील इत्यादींच्या परिपूर्तीने जो पार (शेवटाला) गेला आहे, तो 'पारगू' (पारंगत) होय. 'अक्कुल पक्कुल' हा अशा प्रकारचा हिंसेचा प्रयोग आहे. कारण त्यावेळी भगवंतांना घाबरवण्याची इच्छा करणाऱ्या अजकलाप यक्षाने केलेली यक्षगर्जना 'अक्कुल पक्कुल' या स्वरूपात प्राण्यांच्या कानावर पडली, म्हणून त्याला 'अक्कुल पक्कुल करणे' असे म्हटले आहे. นาภินนฺทตีติ ‘‘อยํ มํ ทฏฺฐุํ อาคตา’’ติ น ตุสฺสติ. ยสฺมา ปน ‘‘ภควโต ภาสิตํ อภินนฺที’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๑.๘๘) วิย สมฺปฏิจฺฉนตฺโถปิ อภินนฺทสทฺโท โหติ, ตสฺมา วุตฺตํ ‘‘จิตฺเตน น สมฺปฏิจฺฉตี’’ติ. น โสจตีติ ‘‘มยา อสมฺโมทิตา คจฺฉตี’’ติ น จิตฺตสนฺตาปํ อาปชฺชติ. ‘‘สงฺคา สงฺคามชึ มุตฺต’’นฺติ อิทํ อภินนฺทโสจนานํ อภาวสฺส การณวจนํ. 'नाभिनंदती' (आनंद मानत नाही) म्हणजे 'ही मला पाहण्यासाठी आली आहे' म्हणून आनंदित होत नाही. परंतु ज्या अर्थी 'भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन केले' इत्यादींप्रमाणे स्वीकार करण्याच्या अर्थाने सुद्धा 'अभिनंद' शब्द वापरला जातो, म्हणून 'चित्ताने स्वीकार करत नाही' असे म्हटले आहे. 'न सोचती' (शोक करत नाही) म्हणजे 'माझ्याशी न बोलता जात आहे' म्हणून मनाला संताप (दुःख) करून घेत नाही. 'संगातून मुक्त झालेल्या संग्रामजिताला' हे अभिनंदन आणि शोक यांच्या अभावाचे कारण सांगणारे वचन आहे. เตนาติ อุทเก นฺหาเนน. เตเนวาห ‘‘น อุทเกน สุจี โหตี’’ติ. ตสฺสตฺโถ – อุทกุมฺมุชฺชนาทินา เนว สตฺตานํ สุจิ ปาปโต สุทฺธิ นาม โหตีติ. อุทกุมฺมุชฺชนาทีนิ หิ อิธ อุตฺตรปทโลเปน ‘‘อุทก’’นฺติ วุตฺตํ. อุทเกนาติ วา อุมฺมุชฺชนาทิกิริยาสาธนภูเตน อุทเกน สตฺตานํ สุจิ ปาปสุทฺธิ น โหตีติ. อถ วา สุจิเตน ยถาวุตฺเตน อุทเกน ปาปมลโต สุทฺโธ นาม สตฺโต น โหตีติ. ยทิ สิยา, สพฺเพสเมว มจฺฉพนฺธานํ ปาปสุทฺธิ สิยา. เตนาห ‘‘พหฺเวตฺถ นฺหายตี ชโน’’ติ. มาตุฆาตาทิปาปกมฺมการีนํ, อญฺเญสญฺจ โคมหึสาทีนํ อุทกํ โอโรหนฺตานํ อนฺตมโส มจฺฉกจฺฉเป อุปาทาย สพฺเพสมฺปิ ปาปสุทฺธิ สิยา[Pg.136], น ปเนวํ โหติ. กสฺมา? นฺหานียปาปเหตูนํ อปฺปฏิปกฺขภาวโต. ยญฺหิ ยํ วินาเสติ, โส ตสฺส ปฏิปกฺโข. ยถา อาโลโก อนฺธการสฺส, วิชฺชา อวิชฺชาย, น เอวํ นฺหานํ ปาปสฺส, ตสฺมา นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ ‘‘น อุทเกน สุจี โหตี’’ติ. เยน ปน สุจิ โหติ, ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘ยมฺหิ สจฺจญฺจา’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตตฺถ สจฺจนฺติ วจีสจฺจญฺจ วิรติสจฺจญฺจ. อถ วา สจฺจนฺติ ญาณสจฺจญฺเจว ปรมตฺถสจฺจญฺจ. ธมฺโมติ เสโส อริยธมฺโม. สจฺจสฺส ปเนตฺถ วิสุํ คหณํ ตสฺส พหุการตาทสฺสนตฺถํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมว. "तेनाति" म्हणजे पाण्यात स्नान केल्याने. म्हणूनच म्हटले आहे - "पाण्याने (मनुष्य) शुद्ध होत नाही." त्याचा अर्थ असा - पाण्यात बुडी मारणे इत्यादींनी प्राण्यांची पापापासून शुद्धी (शुचित्व) होत नाही. कारण येथे उत्तरपदलोप करून 'पाण्यात बुडी मारणे' इत्यादींना 'पाणी' असे म्हटले आहे. किंवा 'पाण्याने' म्हणजे बुडी मारणे इत्यादी क्रियेचे साधन असलेल्या पाण्याने प्राण्यांची पापापासून शुद्धी होत नाही. अथवा वर सांगितलेल्या पवित्र पाण्याने प्राणी पापरूपी मळापासून शुद्ध होत नाही. जर असे झाले असते, तर सर्वच कोळ्यांची (मासे पकडणाऱ्यांची) पापापासून शुद्धी झाली असती. म्हणूनच म्हटले आहे - "येथे पुष्कळ लोक स्नान करतात." मातृघात इत्यादी पापकर्मे करणाऱ्यांची, आणि गायी व म्हशी इत्यादींची हत्या करणाऱ्यांची, पाण्यात उतरणाऱ्यांची, अगदी मासे आणि कासवांपर्यंत सर्वांचीच पापापासून शुद्धी झाली असती, पण असे होत नाही. का? कारण स्नानाचा पापाच्या कारणांशी कोणताही विरोध (प्रतिपक्षभाव) नाही. कारण जे ज्याचा नाश करते, ते त्याचे प्रतिपक्ष (विरोधी) असते. जसा प्रकाश अंधाराचा, विद्या अविद्येचा, तसे स्नान पापाचा नाश करत नाही. म्हणून येथे हाच निष्कर्ष काढला पाहिजे की "पाण्याने मनुष्य शुद्ध होत नाही." परंतु ज्याच्यामुळे मनुष्य शुद्ध होतो, ते दर्शवण्यासाठी "ज्याच्यामध्ये सत्य आणि..." इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'सत्य' म्हणजे वाणीचे सत्य आणि विरतीचे सत्य. अथवा 'सत्य' म्हणजे ज्ञानसत्य आणि परमार्थसत्य. 'धम्म' म्हणजे उर्वरित आर्यधम्म. येथे सत्याचे स्वतंत्रपणे ग्रहण करणे हे त्याचे बहुउपकारित्व दर्शवण्यासाठी आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. ชาติพลนิเสธกนฺติ ชาติมตฺตพฺราหฺมณานํ โภวาทิกานํ ปฏิเสธกํ. ชาติวาทสฺส วา นิเสธกํ, ‘‘น ชจฺจา พฺราหฺมโณ โหตี’’ติ (สุ. นิ. ๖๕๕) หิ วุตฺตํ. เถโร หิ ตถาวาเทน เต อนิคฺคณฺหนฺโตปิ นิคฺคณฺหนฺโต วิย โหตีติ กตฺวา วุตฺตํ. 'जातिबलनिषेधकं' म्हणजे केवळ जन्माने ब्राह्मण असलेल्या आणि स्वतःला 'भो-वादी' म्हणवणाऱ्यांचा निषेध करणारे. किंवा जातिवादाचा निषेध करणारे, कारण "जन्माने कोणी ब्राह्मण होत नाही" असे म्हटले आहे. कारण थेरांनी तसे बोलून त्यांचा थेट निग्रह न करताही जणू काही त्यांचा निग्रह केल्यासारखेच केले आहे, म्हणून असे म्हटले आहे. ๑๐๕. วิมุตฺติยนฺติ อนุปาทิเสสนิพฺพานธาตุยํ. १०५. 'विमुत्तियं' म्हणजे अनुपादिशेष निर्वाणधातूमध्ये. สวาสนนฺติ เอตฺถ ขีณาสวสฺสาปิ อขีณาสวสทิสกายวจีปโยคเหตุภูตา สนฺตาเน กิเลสภาวนา วาสนา นาม อายสฺมโต ปิลินฺทวจฺฉสฺส (อ. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑.๒๑๕; ธ. ป. อฏฺฐ. ๒.ปิลินฺทวจฺฉตฺเถรวตฺถุ) วสลโวหาโร วิย, สห วาสนายาติ สวาสนํ, ภาวนปุํสกญฺเจตํ ‘‘วิสมํ จนฺทิมสูริยา ปริวตฺตนฺตี’’ติอาทีสุ (อ. นิ. ๔.๗๐) วิย. ยถาวุตฺตวาสนมฺปิ อเสเสตฺวาติ อตฺโถ. กุมฺมคฺคปริหรณวเสน มคฺคสมฺปฏิปตฺตีติ มคฺเค กุสโล อมคฺเคปิ กุสโล เอว โหติ. ภควา ปน สพฺพญฺญุตาย สพฺพตฺเถว กุสโลติ อาห ‘‘มคฺเค จ อมคฺเค จ โกวิโท’’ติ. 'सवासनं' यामध्ये, क्षीणासवांच्या ठिकाणी देखील अ-क्षीणासवांसारख्या कायिक आणि वाचिक व्यवहाराला कारणीभूत असणारी त्यांच्या चित्तसंततीतील क्लेशांची भावना म्हणजे 'वासना' होय, जसे की आयुष्यमान पिलिंदवच्छांचा 'वसल' (शूद्र) असा संबोधण्याचा व्यवहार होता. वासनेसह असणे म्हणजे 'सवासन'. आणि हे "चंद्र आणि सूर्य विषम गतीने फिरतात" इत्यादींप्रमाणे भावनपुंसकलिंगी रूप आहे. वर सांगितलेली वासना देखील पूर्णपणे नष्ट करून, असा याचा अर्थ आहे. कुमार्गाचा त्याग करून सन्मार्गाचे आचरण केल्याने तो मार्गामध्ये कुशल आणि अमार्गामध्येही कुशलच असतो. परंतु भगवान आपल्या सर्वज्ञतेमुळे सर्वच बाबतीत कुशल आहेत, म्हणून म्हटले आहे - "मार्गात आणि अमार्गात कोविद (कुशल) असणारे." ๑๐๖. ตเมน ยุตฺโตติ ยถาวุตฺตตโม ตสฺส อตฺถีติ ตโม, ปุคฺคโล. อปฺปกาสภาเวน ฐิตา ขนฺธาว ตโม. อาโลกภูโตติ ชาติคุณาโลโก, ปากฏคุโณติ อตฺโถ. १०६. 'तमेन युत्तो' (तमाने युक्त) म्हणजे वर सांगितलेला तम (अंधकार) ज्याच्याकडे आहे तो 'तमो' म्हणजे पुद्गल (व्यक्ती). अप्रकाशित अवस्थेत असलेले स्कंध हेच 'तम' (अंधकार) आहे. 'आलोकभूतो' म्हणजे जन्मजात गुणांचा प्रकाश, प्रकट गुण असलेला, असा याचा अर्थ आहे. กิเลสมยํ พนฺธนํ ‘‘ทฬฺห’’นฺติ วทนฺติ. ยโต สจฺจานิ ปฏิวิชฺฌนฺตา พุทฺธาว นํ ฉินฺทนฺติ, น อญฺเญ. क्लेशमय बंधनाला 'दृढ' (मजबूत) म्हणतात. कारण सत्याचा (चार आर्य सत्यांचा) साक्षात्कार करणारे बुद्धच त्याला छेदून टाकतात, इतर कोणी नाही. ทุจฺเฉทนตฺเถน [Pg.137] สติปิ ทฬฺหภาเว สิถิลวุตฺติตํ ตสฺส ทีเปตุํ ‘‘พนฺธนภาวมฺปี’’ติอาทิมาห. เตน ‘‘อโห สุขุมตรํ โข, ภิกฺขเว, มารพนฺธน’’นฺติ วุตฺตํ. तो छेदण्यास कठीण असल्यामुळे दृढ असूनही, त्याचे शिथिल स्वरूप दर्शवण्यासाठी "बंधनभाव देखील..." इत्यादी म्हटले आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "भिक्खूहो, माराचे बंधन किती अत्यंत सूक्ष्म आहे!" ๑๐๗. ยทิปิ เจตนา กุสลากุสลสาธารณา, อปุญฺญาภิสงฺขาโร อิธาธิปฺเปโตติ ตสฺส วเสน อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อกุสลเจตนาวเสน เจเตตี’’ติ อาห. เจตนํ อภิสนฺทหนํ, จิตฺตสฺส พฺยาปาราปตฺติภาเวน ปวตฺตีติ อตฺโถ. ยสฺมา ปน เจตนา ยทา วิญฺญตฺตึ สมุฏฺฐาเปติ, ตทา ทิคุณุสฺสาหาทิคุณวายามา วิย หุตฺวา ปากฏํ ปโยคํ นิปฺผาเทติ, ตสฺมา ‘‘ปกปฺเปตี’’ติ วุตฺตา. ปากฏปฺปโยคกปฺปนญฺเหตฺถ ปกปฺปนํ อธิปฺเปตํ. เตนาห ‘‘ตเมว ปกปฺเปตี’’ติ. ปจฺจยฏฺโฐ อิธ อารมฺมณตฺโถติ วุตฺตํ ‘‘ปวตฺติยา ปจฺจโย โหตี’’ติ. १०७. जरी चेतना ही कुशल आणि अकुशल दोन्हीसाठी सामायिक असली, तरी येथे 'अपुण्याभिसंस्कार' अभिप्रेत आहे, त्याच्या आधारे अर्थ स्पष्ट करताना "अकुशल चेतनेच्या वश होऊन विचार करतो" असे म्हटले आहे. चेतना म्हणजे चित्ताचे संधान करणे, चित्ताच्या व्यापाराच्या रूपात प्रवृत्त होणे, असा याचा अर्थ आहे. परंतु जेव्हा चेतना विज्ञाप्तीला (प्रकटीकरणाला) जागृत करते, तेव्हा ती दुप्पट उत्साह आणि प्रयत्नांसारखी होऊन प्रकट प्रयोग साध्य करते, म्हणून तिला 'पकप्पेति' (कल्पना करतो) असे म्हटले आहे. येथे प्रकट प्रयोगाची कल्पना करणे म्हणजेच 'पकप्पन' (कल्पना) अभिप्रेत आहे. म्हणूनच म्हटले आहे - "त्याचीच कल्पना करतो." येथे प्रत्ययाचा (कारणाचा) अर्थ आलंबनाचा अर्थ आहे, म्हणून म्हटले आहे - "प्रवृत्तीसाठी प्रत्यय (कारण) होतो." ๑๐๘. ยถา ชลสมุทฺทสฺส วีจิสมุฏฺฐานวเสน ลพฺภมาโน เวโค ‘‘วีจิมโย’’ติ วุจฺจติ, เอวํ จกฺขุสมุทฺทสฺสาปิ รูปาวภาสนวเสน ลพฺภมาโน เวโค ‘‘รูปมโย’’ติ วุตฺโต. เอเสว นโย เสเสสุปิ. อาวิญฺฉนโตติ อากฑฺฒนโต, อากฑฺฒนญฺเจตฺถ สนฺตานสฺส ตนฺนินฺนภาวเหตุตาย ทฏฺฐพฺพํ. १०८. ज्याप्रमाणे जलसमुद्रात लाटांच्या निर्मितीमुळे प्राप्त होणाऱ्या वेगाला 'वीचिमय' (लाटांमय) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे चक्षुसमुद्रातही रूपाच्या आभासामुळे प्राप्त होणाऱ्या वेगाला 'रूपमय' म्हटले आहे. हाच नियम उर्वरित इंद्रियांच्या बाबतीतही लागू होतो. 'आविंच्छनतो' म्हणजे ओढले जाण्यामुळे, आणि येथे ओढले जाणे हे चित्तसंततीच्या त्याकडे झुकण्याच्या कारणावरून समजून घेतले पाहिजे. สมุทนํ กิเลสเตมนํ, อวสฺสวเหตุตา, กิเลสานํ อูมิอาทิสทิสตา สมาวฏฺฏเนน สตฺตานํ อนตฺถาวหตาย เวทิตพฺพา. อุปรูปริเวคุปฺปตฺติยา อุปคตสฺส อุฏฺฐาตุํ อปฺปทาเนน, คุณสารวินาสเนน จ โกธุปนาหาทีนํ อูมิอาทิสทิสตา ทฏฺฐพฺพา. क्लेशांनी ओले होणे, आसवांचे (पाझरण्याचे) कारण असणे, आणि क्लेशांचे लाटांसारखे असणे हे प्राण्यांना संसारात फिरवून अनर्थ घडवून आणणारे आहे, असे समजले पाहिजे. एकामागून एक वेगाने उत्पन्न होणाऱ्या लाटांमुळे बुडणाऱ्याला वर उठू न देणे आणि गुणांच्या साराचा विनाश करणे, यावरून क्रोध आणि उपनाह (वैर) इत्यादींचे लाटांसारखे असणे समजून घेतले पाहिजे. อภิมุโข นนฺทตีติ ตทารมฺมณํ สุขํ โสมนสฺสํ สาทิยนฺโต สมฺปฏิจฺฉติ. อภิวทตีติ ตณฺหาภินิเวสวเสน อภินิวิสฺส วทติ. ตญฺหิสฺส อภินิเวสํ ทีเปตุํ ‘‘อโห สุข’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. อชฺโฌสานํ อธิมุจฺจนภูตาย ตณฺหาย ตณฺหาวตฺถุกสฺส อนุปวิสิตฺวา อาเวณิกตากรณนฺติ อาห ‘‘อชฺโฌสาย ติฏฺฐตีติ คิลิตฺวา ปรินิฏฺฐเปตฺวา’’ติ. 'अभिमुखो नन्दति' म्हणजे त्या आलंबनापासून मिळणारे सुख आणि सोमनस्य स्वीकारून आनंदित होतो. 'अभिवदति' म्हणजे तृष्णेच्या अभिनिवेशामुळे अभिनिविष्ट होऊन बोलतो. त्याचा तो अभिनिवेश दर्शवण्यासाठी "अहो सुख!" इत्यादी म्हटले आहे. आसक्ती ही अधिमुक्ती स्वरूप असलेल्या तृष्णेमुळे तृष्णेच्या विषयात प्रवेश करून त्याला आपलेसे करणे आहे, म्हणून म्हटले आहे - "'अज्झोसाय तिट्ठति' म्हणजे गिळून टाकून पूर्णपणे समाप्त करून." ๑๐๙. ‘‘กสฺมา’’ติอาทินา สนฺตาปทุกฺขานํ อสุปฺปติการตํ อาห ‘‘เยน วา ปกาเรนา’’ติ. เยนาติ เยน วา กามชฺโฌสานทิฏฺฐิชฺโฌสานภูเตน มิจฺฉาภินิเวสปฺปกาเรน. คหฏฺฐปพฺพชิตา ตถารูปํ กตฺวา [Pg.138] อตฺตโน วฑฺฒิญฺจ มญฺญนฺติ. อวฑฺฒิ เอว ปน โหติ ตสฺส ปการสฺส วฑฺฒิยํ อนุปายภาวโต จ อุปายภาวโต จ อวฑฺฒิยํ. ตถาปีติ ตตฺถ ตตฺถ อิจฺฉาวิฆาตํ ปาปุณนฺโตปิ. ยสฺมา อิโต พาหิรกา สพฺเพน สพฺพํ ภวนิสฺสรณํ อปฺปชานนฺโต มนฺทกิเลสํ ทีฆายุกํ สุขพหุลํ เอกจฺจํ ภวํ เตเนว มนฺทกิเลสาทิภาเวน ‘‘นิพฺพาน’’นฺติ สมนุปสฺสนฺติ, ตสฺมา ภเวน ภววิปฺปโมกฺขํ วทนฺตีติ. १०९. "का?" इत्यादींद्वारे संताप आणि दुःखांचे निवारण करणे कठीण असल्याचे सांगताना "ज्या प्रकारे..." इत्यादी म्हटले आहे. 'येन' म्हणजे ज्या काम-आसक्ती आणि दृष्टी-आसक्ती रूप मिथ्या अभिनिवेशाच्या प्रकाराने. गृहस्थ आणि प्रव्रजित तसे करून स्वतःची प्रगती मानतात. परंतु ती केवळ अधोगतीच असते, कारण तो प्रकार प्रगतीचा उपाय नसून अधोगतीचाच उपाय आहे. 'तथापि' म्हणजे जागोजागी इच्छेचा भंग पावूनही. कारण या शासनाबाहेरील लोक संसारातून पूर्णपणे मुक्त होण्याचा मार्ग न जाणल्यामुळे, मंद क्लेश असलेल्या, दीर्घायुषी आणि अत्यंत सुखी अशा एखाद्या अस्तित्वाला (भवाला) त्या मंद क्लेशादी भावामुळेच "निर्वाण" मानतात, म्हणूनच ते भवाद्वारे भवापासून मुक्ती मिळवण्याची गोष्ट बोलतात. ภวทิฏฺฐิสหคตา ตณฺหา ปุริมปเท อุตฺตรปทโลเปน ภวตณฺหาติ วุตฺตาติ อาห ‘‘ภวตณฺหาติอาทีสุ วิยา’’ติ. भवदृष्टीने युक्त असलेल्या तृष्णेला पूर्वपदामध्ये उत्तरपदाचा लोप करून 'भवतृष्णा' म्हटले आहे, म्हणून "भवतृष्णा इत्यादींप्रमाणे" असे म्हटले आहे. ยตฺถาติ ยสฺมึ ภเว. 'यत्थ' म्हणजे ज्या भवामध्ये (अस्तित्वामध्ये). ตโต เอวาติ ภูตรติยา เอว. อญฺญมญฺญญฺหิ สตฺตานํ ฉนฺทราโค พลวา โหติ. อนวเสสโตติ อนวเสเสน, น กิญฺจิ เสเสตฺวา. 'ततो एव' म्हणजे अस्तित्वातील (भवातील) रतीमुळेच (आनंदामुळेच). कारण प्राण्यांचा परस्परांबद्दलचा छंदराग (आसक्ती) बलवान असतो. 'अनवसेसतो' म्हणजे पूर्णपणे (निरवशेष), काहीही शिल्लक न ठेवता. สํสารโสตสฺส อนุกูลภาเวน คจฺฉตีติ อนุโสตคามี. ตสฺเสว ปฏิกฺกูลวเสน นิพฺพิทานุปสฺสนาทีหิ ปวตฺตตีติ ปฏิโสตคามี, อจลปฺปสาทาทิสมนฺนาคเมน ฐิตสภาโวติ อตฺโถ. संसारप्रवाहाच्या (संसारसोताच्या) अनुकूलतेने वाहतो तो 'अनुसोतगामी' (प्रवाहाच्या दिशेने जाणारा) होय. त्याच प्रवाहाच्या विरुद्ध दिशेने (प्रतिकूलतेने) निर्वेदानुपश्यना (nibbidānupassanā) इत्यादींद्वारे जो प्रवृत्त होतो तो 'पटिसोतगामी' (प्रवाहाच्या विरुद्ध जाणारा) होय; अचल श्रद्धा (अचलप्पसाद) इत्यादींनी युक्त असलेला स्थिर स्वभाव, असा याचा अर्थ आहे. ๑๑๐. ‘‘ปลพฺภติ, นิขชฺชตี’’ติอาทีสุ วิย อุปสคฺโค ปทวฑฺฒนมตฺตนฺติ อาห ‘‘อภิชาติโกติ ชาติโย’’ติ. กณฺหธมฺมสมนฺนาคตตฺตา วา กณฺโห. ปฐมวเยปิ มชฺฌิมวเยปิ ปาปสมงฺคี หุตฺวา ฐิโต กณฺหธมฺเม อภิชายติ, ปจฺฉาปิ ปาปํ ปสวตีติ อตฺโถ. สุกฺโกติ วา เอตฺถ วุตฺตวิปริยาเยเนว อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ११०. “पलब्भति, निखज्जति” इत्यादींप्रमाणे उपसर्ग हा केवळ शब्दाची वृद्धी करण्यासाठीच आहे, म्हणून “अभिजातिको म्हणजे जाती (जन्म)” असे म्हटले आहे. किंवा कृष्णधर्माने (अकुशल धर्माने) युक्त असल्यामुळे तो 'कृष्ण' (काळा) होय. पहिल्या वयात (तरुणपणात) किंवा मध्यम वयातही पापाने युक्त होऊन राहिलेला मनुष्य कृष्णधर्मात जन्म घेतो आणि नंतरही पापच प्रसवतो (उत्पन्न करतो), असा याचा अर्थ आहे. 'शुक्ल' (पांढरा/कुशल) याचा अर्थ येथे सांगितलेल्याच्या अगदी उलट (विपरीत) समजला पाहिजे. ๑๑๑. ปุริมสฺมินฺติ ปุริมสฺมึ ปเท. วิสเย ภุมฺมํ ตตฺถ เทยฺยธมฺมสฺส ปติฏฺฐาปนโต. ทุติเย อธิกรเณ, ตทธิกรณญฺหิ นิพฺพานนฺติ. คหฏฺฐปพฺพชิตกิจฺเจสุ วา วิสิฏฺฐธมฺมทสฺสนตฺถํ ปจฺจยทานารหตฺตานํ สมธุรตานิทฺเทโส. อถ วา เยน เยน ปน วตฺถุนาติ รูปารูปนิโรธาทินา ตณฺหาวตฺถุนา. อมราวิกฺเขปวตฺถุอาทินาติ เอตฺถ อาทิ-สทฺเทน สุภสุขาทิมิจฺฉาภินิเวสวตฺถุํ สงฺคณฺหาติ. ยถา วา ตณฺหาทิฏฺฐิทุจฺจริตานํ วเสน สํกิเลสภาคิยสฺส สุตฺตสฺส วิภาโค, เอวํ สมถวิปสฺสนาสุจริตวเสน ตณฺหาโวทานภาคิยาทิสุตฺตวิภาโคติ ทสฺเสตุํ ปาฬิยํ ‘‘ตณฺหา…เป… นิทฺทิสิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. १११. 'पुरिमस्मिं' (पहिल्यामध्ये) म्हणजे पहिल्या पदात. विषयाच्या अर्थी सप्तमी विभक्ती आहे, कारण तिथे देयधर्माची (दानाच्या वस्तूची) स्थापना केली जाते. दुसऱ्यामध्ये अधिकरण अर्थी सप्तमी आहे, कारण ते अधिकरण म्हणजे निर्वाण होय. किंवा गृहस्थ आणि प्रव्रजितांच्या कर्तव्यांमध्ये विशिष्ट धर्म दाखवण्यासाठी प्रत्ययदान (दान देणे) आणि अर्हत्त्व यांच्या समान भाराचा (समान महत्त्वाचा) हा निर्देश आहे. अथवा 'ज्या ज्या वस्तूने' म्हणजे रूप-अरूप निरोध इत्यादी तृष्णेच्या वस्तूने (तण्हावत्थु). 'अमराविक्षेपवस्तू' (अमराविक्खेपvatthu) इत्यादींमध्ये 'आदि' शब्दाने शुभ, सुख इत्यादी मिथ्या अभिनिवेशाच्या (चुकीच्या आग्रहाच्या) वस्तूंचा संग्रह होतो. किंवा ज्याप्रमाणे तृष्णा, दृष्टी आणि दुश्चरिताच्या आधारे संक्लेशभागीय (मलीनतेशी संबंधित) सूत्राचे वर्गीकरण होते, त्याचप्रमाणे शम, विपश्यना आणि सुचरिताच्या आधारे तृष्णा-वोदानभागीय (तृष्णेच्या शुद्धीशी संबंधित) इत्यादी सूत्रांचे वर्गीकरण होते, हे दर्शवण्यासाठी पाळीमध्ये “तृष्णा...पे... निर्देश करावा” असे म्हटले आहे. อิทํ [Pg.139] เอวํ ปวตฺตนฺติ ยถา ทุจินฺติตาทิวเสน พาโล โหติ ปุคฺคโล, เอวํ ตสฺส ทุจินฺติตจินฺติตาทิภาวนาวเสน ปวตฺตํ อิทํ สํกิเลสภาคิยํ นาม สุตฺตนฺติ ปุพฺเพ สํกิเลสธมฺมวิภาเคน วุตฺตํ อิทานิ สามญฺญโต สงฺคเหตฺวา วทติ. อิทํ วาสนาภาคิยํ สุตฺตนฺติ เอตฺถาปิ อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. “हे अशा प्रकारे प्रवृत्त होते” म्हणजे ज्याप्रमाणे दुर्विंतित (वाईट विचार) इत्यादींमुळे व्यक्ती (पुद्गल) अज्ञानी (बाल) बनते, त्याचप्रमाणे त्याच्या दुर्विंतित-चिंतित इत्यादींच्या भावनेमुळे प्रवृत्त झालेले हे 'संक्लेशभागीय' नावाचे सूत्र आहे, असे पूर्वी संक्लेशधर्माच्या वर्गीकरणाने सांगितले होते; आता सामान्य रूपाने संग्रह करून सांगत आहे. “हे वासनाभागीय सूत्र आहे” येथेही याच पद्धतीने अर्थ समजून घेतला पाहिजे. กิเลสฏฺฐาเนหีติ กิเลสานํ ปวตฺติฏฺฐาเนหิ. กิเลสาวตฺถาหีติ กิเลสานํ ปวตฺติอาการวิเสเสหิ. กามราคาทีหิ สํยุชฺชติ กามราคาทิเหตุ กมฺมวิปากาทินา. สติปิ เตสํ กาลนฺตรวุตฺติยํ สํยุตฺโต นาม โหติ, ยโต กามราคาทโย ‘‘สํโยชน’’นฺติ วุจฺจนฺติ. อุปาทิยตีติ ทฬฺหํ คณฺหาติ ปวตฺเตติ. เสสํ วุตฺตนยตฺตา, อุตฺตานตฺตา จ สํวณฺณิตํ. ‘किलेसट्ठानेहि’ (क्लेशस्थानांनी) म्हणजे क्लेशांच्या प्रवृत्तीच्या स्थानांनी. ‘किलेसावस्थाही’ (क्लेशावस्थांनी) म्हणजे क्लेशांच्या प्रवृत्तीच्या विशिष्ट अवस्थांनी. कामराग इत्यादींनी संयुक्त होतो म्हणजे कामराग इत्यादींच्या हेतूने होणाऱ्या कर्मविपाकादींद्वारे. जरी त्यांची प्रवृत्ती वेगवेगळ्या वेळी (कालांतराने) होत असली, तरी तो संयुक्तच म्हटला जातो, कारण कामराग इत्यादींना ‘संयोजन’ (बंधन) म्हटले जाते. ‘उपादियति’ (उपादान करतो) म्हणजे दृढतेने ग्रहण करतो, प्रवृत्त करतो. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीने आणि स्पष्ट असल्यामुळे स्पष्ट केला आहे. ๑๑๒. อุทาหรณวเสนาติ นิทสฺสนวเสน, เอกเทสทสฺสนวเสนาติ อตฺโถ. สกลสฺส หิ ปริยตฺติสาสนสฺส โสฬสหิ ปฏฺฐานภาเคหิ คหิตตฺตา. ยถา ตเทกเทสานํ โสฬสนฺนมฺปิ ปฏฺฐานภาคานํ คหณํ อุทาหรณมตฺตํ, เตสํ ปน โสฬสนฺนํ เอกเทสคฺคหณํ อุทาหรณนฺติ กิเมตฺถ วตฺตพฺพํ. เตน วุตฺตํ ‘‘เอกเทสทสฺสนวเสนาติ อตฺโถ’’ติ. กสฺมา ปเนตฺถ ปาฬิยํ ปฏฺฐานสฺส เอกเทโสว อุทาหโฏ, น อวเสโสติ? นยนิทสฺสนตฺถํ. อิมินา นเยน อวเสโสปิ ปฏฺฐานภาโว เวทิตพฺโพติ. ११२. ‘उदाहरणवशेने’ म्हणजे निदर्शनवशेने (उदाheraṇavasena), एका अंशाच्या दर्शनाच्या वशेने, असा अर्थ आहे. कारण संपूर्ण परियत्ति शासनाचा (बुद्धवचनाचा) सोळा प्रस्थानभागांमध्ये संग्रह केला गेला आहे. ज्याप्रमाणे त्यांच्या एका अंशाचे, सोळाही प्रस्थानभागांचे ग्रहण करणे हे केवळ उदाहरणमात्र आहे, तर मग त्या सोळांच्या एका अंशाचे ग्रहण करणे हे उदाहरण आहे, याविषयी काय सांगावे? म्हणूनच म्हटले आहे “एका अंशाच्या दर्शनाच्या वशेने, असा अर्थ आहे”. पण मग येथे पाळीमध्ये प्रस्थानाचा एकच अंश का उदाहरणादाखल दिला आहे, उर्वरित का नाही? पद्धतीचे (नयाचे) निदर्शन करण्यासाठी. या पद्धतीने उर्वरित प्रस्थानभाग देखील समजून घेतला पाहिजे. ตตฺถ ‘‘อปฺปมฺปิ เจ สํหิต ภาสมาโน…เป… ส ภาควา สามญฺญสฺส โหตี’’ติ (ธ. ป. ๒๐) อิทํ วาสนาภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ. เอตฺถ หิ ‘‘อปฺปมฺปิ เจ สํหิต ภาสมาโน’’ติ อิทํ วาสนาภาคิยํ, ‘‘ส ภาควา สามญฺญสฺส โหตี’’ติ อิทํ อเสกฺขภาคิยํ. त्यामध्ये, “जरी थोडीच संहिता (बुद्धवचन) बोलणारा असला तरी...पे... तो श्रामण्यफलाचा भागीदार होतो” (धम्मपद २०) हे वासनाभागीय आणि असेक्खभागीय (अशैक्षभागीय) आहे. कारण येथे “जरी थोडीच संहिता बोलणारा असला तरी” हे वासनाभागीय आहे, आणि “तो श्रामण्यफलाचा भागीदार होतो” हे असेक्खभागीय आहे. ตถา มฆเทวสุตฺตํ. ตตฺถ หิ ‘‘ภูตปุพฺพํ, อานนฺท, อิมิสฺสาเยว มิถิลายํ มฆเทโว นาม ราชา อโหสิ ธมฺมิโก ธมฺมราชา ธมฺเม ฐิโต มหาธมฺมราชา, ธมฺมํ จรติ พฺราหฺมณคหปติเกสุ เนคเมสุ เจว ชนปเทสุ จ, อุโปสถญฺจ อุปวสติ จาตุทฺทสึ, ปญฺจทสึ, อฏฺฐมิญฺจ ปกฺขสฺสา’’ติอาทิ (ม. นิ. ๒.๓๐๘), อิทํ วาสนาภาคิยํ. ‘‘อิทํ โข ปนานนฺท, เอตรหิ มยา กลฺยาณํ วตฺตํ นีหริตํ เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย [Pg.140] อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตตี’’ติ (ม. นิ. ๓.๑๘๙) อิทํ อเสกฺขภาคิยํ. ‘‘ปมาทํ อปฺปมาเทน, ยทา นุทติ ปณฺฑิโต’’ติ (ธ. ป. ๒๘) อิทํ นิพฺเพธภาคิยํ. ‘‘ปญฺญาปาสาท…เป… อเวกฺขตี’’ติ (ธ. ป. ๒๘) อิทํ อเสกฺขภาคิยนฺติ อิทํ นิพฺเพธภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ. त्याचप्रमाणे मघदेवसुत्त (Maghadeva Sutta). कारण त्यामध्ये, “हे आनंदा, पूर्वी याच मिथिला नगरीत मघदेव नावाचा राजा होता, जो धार्मिक, धर्मराजा, धर्मात स्थित असलेला महाधर्मराजा होता. तो ब्राह्मण, गृहपती, नगरातील आणि जनपदातील लोकांमध्ये धर्माचे आचरण करत असे, आणि पक्षाच्या चतुर्दशी, पंचदशी व अष्टमीला उपोसथ व्रत पाळत असे” इत्यादी (मज्झिम निकाय २.३०८), हे वासनाभागीय आहे. “हे आनंदा, हे जे कल्याणकारी व्रत मी आता प्रस्थापित केले आहे, ते एकांत निर्वेदासाठी (निब्बिदा), विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरते” (मज्झिम निकाय ३.१८९) हे असेक्खभागीय (अशैक्षभागीय) आहे. “जेव्हा पंडित मनुष्य अप्रमादाने प्रमादाला दूर करतो” (धम्मपद २८) हे निब्बेधभागीय (निर्वेधभागीय) आहे. “प्रज्ञा रूपी प्रासादावर...पे... पाहतो” (धम्मपद २८) हे असेक्खभागीय आहे; अशा प्रकारे हे निब्बेधभागीय आणि असेक्खभागीय आहे. ตถา ‘‘ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, อินฺทฺริยานี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๔๙๓) สุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, อินฺทฺริยานิ. กตมานิ ตีณีติ? อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ อญฺญินฺทฺริย’’นฺติ อิทํ นิพฺเพธภาคิยํ, ‘‘อญฺญาตาวินฺทฺริย’’นฺติ (สํ. นิ. ๕.๔๙๓) อิทํ อเสกฺขภาคิยํ. त्याचप्रमाणे “भिक्खूंनो, ही तीन इंद्रिये आहेत” (संयुत्त निकाय ५.४९३) हे सूत्र. त्यामध्ये, “भिक्खूंनो, ही तीन इंद्रिये आहेत. कोणती तीन? अनंन्यातन्यास्सामीतिंद्रिय (अज्ञात गोष्टी जाणून घेण्याची इच्छा असणाऱ्याचे इंद्रिय) आणि अंनिंद्रिय (ज्ञानेंद्रिय)” हे निब्बेधभागीय (निर्वेधभागीय) आहे, आणि “अन्याताविंद्रिय (पूर्ण ज्ञान प्राप्त झालेल्याचे इंद्रिय)” हे असेक्खभागीय (अशैक्षभागीय) आहे. รฏฺฐปาลสุตฺตํ (ม. นิ. ๒.๒๙๓ อาทโย) สํกิเลสภาคิยญฺจ วาสนาภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ. ตตฺถ หิ ‘‘อูโน โลโก อติตฺโต ตณฺหาทาโส’’ติอาทินา (ม. นิ. ๒.๓๐๖) สํกิเลโส วิภตฺโต, ‘‘เอโก วูปกฏฺโฐ’’ติอาทินา (ม. นิ. ๒.๒๙๙) อเสกฺขธมฺมา, อิตเรน วาสนาธมฺมาติ. राष्ट्रपालसुत्त (मज्झिम निकाय २.२९३ इत्यादी) हे संक्लेशभागीय, वासनाभागीय आणि असेक्खभागीय (अशैक्षभागीय) आहे. कारण त्यामध्ये, “हा लोक अपूर्ण आहे, अतृप्त आहे आणि तृष्णेचा दास आहे” इत्यादींद्वारे संक्लेशाचे (मलीनतेचे) वर्गीकरण केले आहे, “एकटा, एकांतात राहणारा” इत्यादींद्वारे असेक्खधर्मांचे वर्गीकरण केले आहे, आणि इतर भागाद्वारे वासनाधर्मांचे वर्गीकरण केले आहे. ‘‘ธมฺเม จ เย อริยปเวทิเต รตา, อนุตฺตโร เต วจสา มนสา กมฺมุนา จ; เต สนฺติโสรจฺจสมาธิสณฺฐิตา, สุตสฺส ปญฺญาย จ สารมชฺฌคู’’ติ. (สุ. นิ. ๓๓๒); “आणि जे आर्यांनी प्रवेदिलेल्या (सांगितलेल्या) धर्मात रममाण आहेत, ते वाणीने, मनाने आणि कर्माने अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) आहेत; ते शांती, सौजन्य (सोरच्च) आणि समाधीमध्ये स्थित आहेत, त्यांनी श्रुत (ज्ञान) आणि प्रज्ञेचा सार प्राप्त केला आहे.” (सुत्तनिपात ३३२); อิทํ วาสนาภาคิยญฺจ นิพฺเพธภาคิยญฺจ อเสกฺขภาคิยญฺจ. เอตฺถ หิ ‘‘ธมฺเม จ เย อริยปเวทิเต รตา’’ติ อยํ วาสนา, ‘‘อนุตฺตรา…เป… สณฺฐิตา’’ติ อยํ นิพฺเพโธ, ‘‘สุตสฺส ปญฺญาย จ สารมชฺฌคู’’ติ อเสกฺขธมฺมา. हे वासनाभागीय, निब्बेधभागीय (निर्वेधभागीय) आणि असेक्खभागीय (अशैक्षभागीय) आहे. कारण येथे, “आणि जे आर्यांनी प्रवेदिलेल्या धर्मात रममाण आहेत” ही वासना आहे, “अनुत्तर...पे... स्थित आहेत” हा निब्बेध (निर्वेध) आहे, आणि “त्यांनी श्रुत आणि प्रज्ञेचा सार प्राप्त केला आहे” हे असेक्खधर्म आहेत. ตถา ‘‘สทฺโธ สุตวา นิยามทสฺสี’’ติ คาถา (สุ. นิ. ๓๗๓). ตตฺถ หิ ‘‘สทฺโธ สุตวา’’ติ วาสนา, ‘‘นิยามทสฺสี วคฺคคเตสุ น วคฺคสาริ ธีโร, โลภํ โทสํ วิเนยฺย ปฏิฆ’’นฺติ นิพฺเพโธ, ‘‘สมฺมา โส โลเก ปริพฺพเชยฺยา’’ติ อเสกฺขธมฺมา. त्याचप्रमाणे “श्रद्धाळू, बहुश्रुत आणि नियमाचे (सत्याचे) दर्शन घेणारा” ही गाथा (सुत्तनिपात ३७३). कारण त्यामध्ये, “श्रद्धाळू, बहुश्रुत” ही वासना आहे, “नियमाचे दर्शन घेणारा, गटात विभागलेल्यांमध्ये गटाच्या मागे न जाणारा धीर पुरुष, लोभ, द्वेष आणि प्रतिघाचा (क्रोधाचा) त्याग करून” हा निब्बेध (निर्वेध) आहे, आणि “तो जगात सम्यकपणे परिभ्रमण करतो (प्रव्रजित होतो)” हे असेक्खधर्म (अशैक्षधर्म) आहेत. สพฺพาสวสํวโร ปริสฺสยาทีนํ วเสน สพฺพภาคิยํ เวทิตพฺพํ. ตตฺถ หิ สํกิเลสธมฺมา, โลกิยสุจริตธมฺมา, เสกฺขธมฺมา, อเสกฺขธมฺมา จ วิภตฺตา. อสพฺพภาคิยํ ปน ‘‘ปสฺสํ ปสฺสตี’’ติอาทิกํ (ม. นิ. ๑.๒๐๓) อุทกาทิอนุวาทนวจนํ [Pg.141] เวทิตพฺพํ. เอวเมตสฺมึ โสฬสวิเธ สาสนปฏฺฐาเน เอเต ตณฺหาทิวเสน ตโย สํกิเลสภาคา, โวทานาทิวเสน ตโย วาสนาภาคา, เสกฺขานํ สีลกฺขนฺธาทีนํ วเสน ตโย นิพฺเพธภาคา, อเสกฺขานํ สีลกฺขนฺธาทีนํ เอว วเสน ตโย อเสกฺขภาคา, เตสํ วเสน มูลปฏฺฐานานิ เอว ทฺวาทส โหนฺติ. ตานิ ปน วิตฺถารนเยน วิภชิยมานานิ ฉนฺนวุตาธิกานิ จตฺตาริ สหสฺสานิ โหนฺติ. ยถาทสฺสนํ ปเนตานิ อุทฺธริตพฺพานิ. ตานิ ปน ยสฺมา สงฺคหโต กามตณฺหาทิวเสน ตโย ตณฺหาสํกิเลสภาคา, สสฺสตุจฺเฉทวเสน ทฺเว ทิฏฺฐิสํกิเลสภาคา, กายทุจฺจริตาทิวเสน ตโย ทุจฺจริตสํกิเลสภาคาติ อฏฺฐ สํกิเลสภาคา. ธมฺมามิสาภยทานวเสน ติวิธํ ทานมยํ ปุญฺญกิริยวตฺถุ, กายสุจริตาทิวเสน ติวิธํ สีลมยํ ปุญฺญกิริยวตฺถุ, สมถวิปสฺสนาวเสน ทุวิธํ ภาวนามยํ ปุญฺญกิริยวตฺถูติ อฏฺเฐว วาสนาภาคา. 'सब्बासवसंवर' (सर्व आसवांचा संवर) हा उपद्रव इत्यादींच्या वशने 'सब्बभागीय' (सर्व-भागी) समजावा. कारण त्यात संकिलेस धम्म (क्लेशकारक धर्म), लोकिय सुचरित धम्म (लौकिक सुचरित धर्म), सेक्ख धम्म (शैक्ष धर्म) आणि असेक्ख धम्म (अशैक्ष धर्म) विभागलेले आहेत. परंतु, 'असब्बभागीय' (अ-सर्व-भागी) म्हणजे 'पस्सं पस्सति' (पाहणारा पाहतो) इत्यादी (म. नि. १.२०३) पाण्यासारख्या अनुवादाचे वचन समजावे. अशा प्रकारे या सोळा प्रकारच्या 'सासनपट्ठान' (शासनप्रस्थान) मध्ये, हे तण्हा (तृष्णा) इत्यादींच्या वशने तीन संकिलेसभाग (संक्लेशभाग), वोदान (व्यवदान/शुद्धी) इत्यादींच्या वशने तीन वासनाभाग, सेक्खांच्या (शैक्षांच्या) सीलक्खंध (शीलस्कंध) इत्यादींच्या वशने तीन निब्बेधभाग (निर्वेधभाग), आणि असेक्खांच्या (अशैक्षांच्या) सीलक्खंध इत्यादींच्याच वशने तीन असेक्खभाग (अशैक्षभाग) असतात; त्यांच्या वशने मूळ प्रस्थाने (मूळपट्ठान) बाराच होतात. ती विस्ताराने विभागली असता चार हजार शहाण्णव (४०९६) होतात. दर्शनानुसार ती उद्धृत केली पाहिजेत. संक्षेपाने (संग्रहाने) कामतण्हा (कामतृष्णा) इत्यादींच्या वशने तीन तण्हा-संकिलेसभाग, सास्सत (शाश्वत) आणि उच्छेद (उच्छेदवाद) च्या वशने दोन दिट्ठि-संकिलेसभाग (दृष्टी-संक्लेशभाग), आणि कायदुच्चरित (कायदुश्चरित) इत्यादींच्या वशने तीन दुच्चरित-संकिलेसभाग मिळून आठ संकिलेसभाग होतात. धम्मदान, आमिसदान आणि अभयदान यांच्या वशने तीन प्रकारचे दानमय पुञ्ञकिरियवत्थु (पुण्यक्रियावस्तू), कायसुचरित इत्यादींच्या वशने तीन प्रकारचे सीलमय पुञ्ञकिरियवत्थु, आणि समथ-विपस्सना (शमथ-विपश्यना) च्या वशने दोन प्रकारचे भावनामय पुञ्ञकिरियवत्थु मिळून आठच वासनाभाग होतात. สทฺธานุสารี สทฺธาวิมุตฺโต ธมฺมานุสารี ทิฏฺฐิปฺปตฺโต กายสกฺขีติ (ปุ. ป. มาติกา ๗.๓๒-๓๖; ปุ. ป. ๒๖-๓๐) ปญฺจนฺนํ เสกฺขานํ ปจฺเจกํ ตโย สีลาทิกฺขนฺธาติ ปนฺนรส นิพฺเพธภาคา, สุญฺญตานิมิตฺตาปณิหิตเภทา ปญฺญาวิมุตฺตานํ ตโย อคฺคผลธมฺมา, เตสุ ปจฺเจกํ ตโย ตโย สีลาทิกฺขนฺธา, ตถา อุภโตภาควิมุตฺตานนฺติ อฏฺฐารส, สิกฺขิตพฺพาภาวสามญฺเญน อสงฺขตธาตุํ ปกฺขิปิตฺวา เอกูนวีสติ อเสกฺขภาคา, อิติ ปุริมานิ เอกตึส, อิมานิ เอกูนวีสตีติ สมปญฺญาส สํกิเลสภาคิยาทิธมฺมา โหนฺติ. ตสฺมา อิเมสํ สมปญฺญาสาย สํกิเลสภาคิยาทิธมฺมานํ วเสน สมปญฺญาส สุตฺตานิ โหนฺติ. सद्धानुसारी (श्रद्धानुसारी), सद्धाविमुत्त (श्रद्धाविमुक्त), धम्मानुसारी (धर्मानुसारी), दिट्ठिप्पत्त (दृष्टिप्राप्त) आणि कायसक्खी (कायसाक्षी) (पु. प. मातिका ७.३२-३६; पु. प. २६-३०) या पाच सेक्खांचे (शैक्षांचे) प्रत्येकी तीन सीलादी स्कंध (शीलस्कंध इत्यादी) मिळून पंधरा निब्बेधभाग (निर्वेधभाग) होतात. सुञ्ञता (शून्यता), अनिमित्त आणि अपणिहित या भेदांनी पञ्ञाविमुत्तांचे (प्रज्ञाविमुक्तांचे) तीन अग्रफलधर्म (अग्गफलधम्म), त्यांच्यात प्रत्येकी तीन-तीन सीलादी स्कंध, तसेच उभतोभागविमुत्तांचे (उभयतोभागविमुक्तांचे) मिळून अठरा, आणि शिकण्यासारखे काही उरले नसल्याच्या समानतेमुळे असंखतधातूचा (असंस्कृतधातूचा) समावेश करून एकोणीस असेक्खभाग (अशैक्षभाग) होतात. अशा प्रकारे पूर्वीचे एकतीस आणि हे एकोणीस मिळून पन्नास संकिलेसभागीय इत्यादी धर्म होतात. म्हणून, या पन्नास संकिलेसभागीय इत्यादी धर्मांच्या वशने पन्नास सुत्ते होतात. ยสฺมา จ เต ปญฺญาวิมุตฺตา อุภโตภาควิมุตฺตวิภาคํ อกตฺวา อสงฺขตาย ธาตุยา อคฺคหเณน นิปฺปริยาเยน อเสกฺขภาคาภาวโต นเวว อเสกฺขภาคาติ สมจตฺตาลีส โหนฺติ, ตสฺมา เปฏเก ‘‘จตฺตารีสาย อากาเรหิ ปริเยสิตพฺพํ, ปญฺญาสาย อากาเรหิ สาสนปฏฺฐานํ นิทฺทิฏฺฐ’’นฺติ (เปฏโก. ๒๑) จ วุตฺตํ. สงฺคหโต เอว ปน ปุพฺเพ วุตฺตวิตฺถารนเยน โสฬส โหนฺติ, ปุน ติวิธสํกิเลสภาคิยาทิวเสน ทฺวาทส โหนฺติ, ปุน ตณฺหาทิฏฺฐิทุจฺจริตสํกิเลสตณฺหาทิฏฺฐิทุจฺจริตโวทานภาเวน ฉ โหนฺติ, ปุน สํกิเลสภาคิยํ วาสนาภาคิยํ ทสฺสนภาคิยํ [Pg.142] วาสนาภาคิยํ อเสกฺขภาคิยนฺติ ปญฺจ โหนฺติ, ปุน มูลปฏฺฐานวเสน จตฺตาริ โหนฺติ, ปุถุชฺชนภาคิยเสกฺขภาคิยอเสกฺขภาคิยภาเวน ตีณิ โหนฺติ, ปุน สํกิเลสภาคิยโวทานภาคิยภาเวน ทฺเว เอว โหนฺติ. ปฏฺฐานภาเวน ปน เอกวิธเมว, อิติ ปฏฺฐานภาเวน เอกวิธมฺปิ สํกิเลสโวทานภาคิยภาเวน ทุวิธนฺติ วิภาคโต ยาว ฉนฺนวุตาธิกํ จตุสหสฺสปฺปเภทํ โหติ, ตาว เนตพฺพํ. เอวเมตํ ปฏฺฐานํ สงฺคหโต, วิภาคโต จ เวทิตพฺพํ. आणि ज्याअर्थी ते पञ्ञाविमुत्त (प्रज्ञाविमुक्त) आणि उभतोभागविमुत्त (उभयतोभागविमुक्त) असा विभाग न करता, असंखत धातूचे ग्रहण न केल्याने, निष्पर्यायाने असेक्खभागाचा अभाव असल्यामुळे नऊच असेक्खभाग होतात, ज्याने एकूण चाळीस होतात; म्हणूनच पेटकात (पेटकोपदेसात) म्हटले आहे की— 'चाळीस आकारांनी शोध घ्यावा, पन्नास आकारांनी सासनपट्ठान (शासनप्रस्थान) निर्दिष्ट केले आहे' (पेटको. २१). संक्षेपाने (संग्रहाने) पूर्वी सांगितलेल्या विस्तारानुसार सोळा होतात, पुन्हा त्रिविध संकिलेसभागीय इत्यादी धर्मांच्या वशने बारा होतात, पुन्हा तण्हा-दिट्ठि-दुच्चरित संकिलेस आणि तण्हा-दिट्ठि-दुच्चरित वोदान भावाने सहा होतात, पुन्हा संकिलेसभागीय, वासनाभागीय, दस्सनभागीय (दर्शनभागीय), वासनाभागीय आणि असेक्खभागीय या रूपाने पाच होतात, पुन्हा मूळ प्रस्थानाच्या (मूळपट्ठान) वशने चार होतात, पुथुज्जनभागीय (पृथग्जनभागीय), सेक्खभागीय आणि असेक्खभागीय भावाने तीन होतात, पुन्हा संकिलेसभागीय आणि वोदानभागीय भावाने दोनच होतात. प्रस्थानभावाने (पट्ठानभावाने) तर एकच प्रकारचे आहे. अशा प्रकारे प्रस्थानभावाने एक प्रकारचे असूनही संकिलेस-वोदानभागीय भावाने दोन प्रकारचे होते, या विभागाने चार हजार शहाण्णव (४०९६) भेदांपर्यंत न्यावे. अशा प्रकारे हे प्रस्थान (पट्ठान) संक्षेपाने आणि विभागाने समजावे. อิมสฺสาปิ ปฏฺฐานวิภาคสฺส, น ปุริมสฺเสวาติ อธิปฺปาโย. โลกิกํ อสฺสตฺถีติ, โลกิกสหจรณโต วา โลกิยํ, สุตฺตํ ปเทเสนาติ เอกเทเสน. สพฺพปเทสูติ ตํตํติกานํ ตติยปเทสุ. พุทฺธาทีนนฺติ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธพุทฺธสาวกานํ. ธมฺโม ปเนตฺถ พุทฺธาทิคฺคหเณน เวทิตพฺโพ, อาทิสทฺเทน วา. हा देखील प्रस्थानविभाग (पट्ठानविभाग) याच प्रस्थानाचा आहे, पूर्वीच्याचा नाही, असा अभिप्राय आहे. 'लोकिकं अस्सत्थि' (लौकिक आहे) म्हणजे लौकिकाच्या सहचर्यामुळे किंवा लौकिक, 'सुत्तं पदेसेन' म्हणजे एका अंशाने (एकदेशाने). 'सब्बपदेसू' म्हणजे त्या त्या त्रिकांच्या तिसऱ्या पदांमध्ये. 'बुद्धादीनं' म्हणजे बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि बुद्धश्रावकांचे. येथे 'धम्म' हा बुद्ध इत्यादींच्या ग्रहणाने किंवा 'आदि' शब्दाने समजावा. ปริณมตีติ ปริปจฺจติ. ธรนฺตีติ ปพนฺธวเสน ปวตฺตนฺติ. นฺติ ปาปกมฺมํ. เตติ กุสลาภินิพฺพตฺตกฺขนฺธา. รกฺขนฺติ วิปากทานโต วิปจฺจิตุํ โอกาสํ น เทนฺตีติ อตฺโถ. อยญฺจ อตฺโถ อุปปชฺชเวทนีเยสุ ยุชฺชติ, อิตรสฺมิมฺปิ ยถารหํ ลพฺภเตว. เตนาห ‘‘ทุติเย วา ตติเย วา อตฺตภาเว’’ติ. 'परिणमति' म्हणजे परिपक्व होतो. 'धरन्ति' म्हणजे प्रवाहाच्या (प्रबंधाच्या) वशने प्रवृत्त राहतात. 'न्ति' म्हणजे पापकर्म. 'ते' म्हणजे कुशलाने उत्पन्न झालेले स्कंध (कुसलाभिनिब्बत्तक्खंधा). 'रक्खन्ति' (रक्षण करतात) म्हणजे विपाक देण्यापासून परिपक्व होण्यास वाव (अवकाश) देत नाहीत, असा अर्थ आहे. आणि हा अर्थ उपपज्जवेदनीय (उपपद्यवेदनीय) कर्मांमध्ये योग्य ठरतो, इतरांमध्येही योग्यतेनुसार मिळतोच. म्हणूनच म्हटले आहे— 'दुसऱ्या किंवा तिसऱ्या आत्मभावात (अत्तभावात)'. ๑๑๓. อตฺตโน อนวชฺชสุขาวหํ ปฏิปตฺตึ ปฏิปชฺชนฺโต ปรมตฺถโต อตฺตกาโม นามาติ อาห ‘‘อตฺตโน สุขกาโม’’ติ. สุขานุพนฺธญฺหิ สุขํ กาเมนฺโต สุขเมว กาเมตีติ จ สุขกาโมติ. ११३. स्वतःसाठी अनवद्य (दोषरहित) सुख देणाऱ्या प्रतिपदेचे (आचरणाचे) पालन करणारा परमार्थतः 'अत्तकामो' (स्वतःचे कल्याण इच्छिणारा) असतो, म्हणून म्हटले आहे— 'अत्तनो सुखकामो' (स्वतःच्या सुखाची इच्छा करणारा). सुखाशी संबंधित सुखाची इच्छा करणारा सुखाचीच इच्छा करतो, म्हणून त्याला 'सुखकामो' (सुखकाम) म्हटले आहे. วิตฺถตฏฺเฐนาติ สุวิปฺผารทิฏฺฐีนํ ปวตฺตนฏฺฐานตาสงฺขาเตน วิตฺถารฏฺเฐน. 'वित्थतट्ठेन' (विस्तृत अर्थाने) म्हणजे सुविस्तृत दृष्टींच्या प्रवृत्तीचे स्थान असण्याच्या संख्येने विस्तृत अर्थाने. ๑๑๔. ทิฏฺเฐ ทุกฺขาทิธมฺเมติ ภาเวนภาวลกฺขเณ ภุมฺมํ, ทุกฺขาทิธมฺเม ทิฏฺเฐ ญาเตติ อตฺโถ. ११४. 'दिट्ठे दुक्खादिधम्मे' (दुःख इत्यादी धर्म पाहिले असता) यामध्ये भावेन भाव लक्षणामध्ये सप्तमी विभक्ती (भुम्मं) आहे; दुःख इत्यादी धर्म पाहिले असता, जाणले असता, असा अर्थ आहे. ‘‘อุทฺธ’’นฺติอาทิ กาลเทสานํ อนวเสสปริยาทานนฺติ อาห ‘‘อุทฺธนฺติ อนาคตํ, อุปริ จา’’ติอาทิ. คมเนนาติ จุตูปปาตคมเนน. 'उद्धं' (वर) इत्यादी काळ आणि दिशांचे पूर्णपणे ग्रहण (अनवशेषपर्यादान) दर्शवण्यासाठी म्हटले आहे— 'उद्धं म्हणजे अनागत (भविष्यकाळ) आणि वर' इत्यादी. 'गमनेन' म्हणजे च्युती आणि उत्पत्तीच्या (चुतूपपात) गमनाने. ๑๑๕. นครทฺวารถิรกรณตฺถนฺติ นครสฺส ทฺวารพาหถิรกรณตฺถํ. คมฺภีรเนมตายาติ ‘‘เนมํ’’วุจฺจติ นิขาตถมฺภาทีนํ ปถวึ อนุปวิสิตฺวา ฐิตปฺปเทโส[Pg.143], คมฺภีรํ เนมํ เอตสฺสาติ คมฺภีรเนโม, ตสฺส ภาโว คมฺภีรเนมตา, ตาย. กมฺปนํ ยถาฐิตสฺส อิโต จิโต จ สญฺโจปนํ, จาลนํ ฐิตฏฺฐานโต จาวนํ. อชฺโฌคาเหตฺวาติ อวิปรีตสภาวาภิสมยวเสน อนุปวิสิตฺวา, อนุปวิฏฺโฐ วิย หุตฺวาติ อตฺโถ. ११५. 'नगरद्वारthirakaranattham' म्हणजे नगराच्या द्वाराचे खांब (द्वारबाह) स्थिर करण्यासाठी. 'गंभीरनेमताय' म्हणजे— 'नेमं' (पाया) त्याला म्हणतात जो पुरलेल्या खांबांचा इत्यादींचा पृथ्वीत प्रवेश करून राहिलेला भाग असतो; ज्याचा पाया खोल आहे तो 'गंभीरनेम' होय, त्याचा भाव म्हणजे 'गंभीरनेमता', तिच्यामुळे. 'कंपन' म्हणजे जसे आहे तसे इकडे तिकडे हलणे (संचोपन), 'चालन' म्हणजे राहिलेल्या स्थानावरून ढळणे (च्यवन). 'अज्झोगाहेत्वा' (अवगाहन करून) म्हणजे अविपरीत (यथार्थ) स्वभाव-अभिसमयाच्या वशने प्रवेश करून, प्रवेश केल्यासारखे होऊन, असा अर्थ आहे. สํโยชนานํ ปชหนวเสนาติ คาถาย วจนเสสํ อาเนตฺวา ทสฺเสติ. อถ วา ปหาตพฺพสฺส ปหาเนน วินา น ภาวนาสิทฺธีติ อตฺถสิทฺธํ ปหาตพฺพปหานํ อชฺฌตฺตํ, พหิทฺธาติ ปททฺวเยน โยเชตฺวา ทสฺเสตุํ อชฺฌตฺตํ พหิทฺธาติ โอรมฺภาคิยอุทฺธมฺภาคิยสํโยชนานํ วิสํโยคคหิโตติ อิมมตฺถํ ปาฬิยา สมตฺเถตุํ ‘‘เตนาห สพฺพโลเก’’ติ วุตฺตํ. 'संयोजनांच्या प्रहाणाच्या (त्यागाच्या) वशने' असे गाथेतील उरलेले वचन आणून दाखवले आहे. अथवा, प्रहातव्य (त्याग करण्यायोग्य) गोष्टींच्या प्रहाणाशिवाय भावना सिद्ध होत नाही, म्हणून अर्थसिद्ध असलेले प्रहातव्यप्रहाण 'अज्झत्तं' (अध्यात्म/अंतर्गत) आणि 'बहिद्धा' (बहिर्धा/बाह्य) या दोन पदांशी जोडून दाखवण्यासाठी— 'अज्झत्तं बहिद्धा' म्हणजे ओरंभागीय (अधोभागीय) आणि उद्धंभागीय (ऊर्ध्वभागीय) संयोजनांच्या विसंयोगाने ग्रहण केलेले आहे, या अर्थाचे पाळीद्वारे समर्थन करण्यासाठी 'तेनाह सब्बलोके' (म्हणून सर्व लोकात म्हटले आहे) असे म्हटले आहे. อโลภสีเสนาติ อโลเภน ปุพฺพงฺคเมน, ยโต โยคาวจโร ‘‘เนกฺขมฺมจฺฉนฺโท’’ติ วุจฺจติ. อสุภสญฺญา ราคปฺปฏิปกฺขตาย ‘‘วิเสสโต อโลภปฺปธานา’’ติ วุตฺตา, ทสาสุภวเสน วา. อธิคตชฺฌานาทีนีติ อาทิสทฺเทน วิปสฺสนาทีนิ สงฺคณฺหาติ. วิหึสารติราคานํ พฺยาปาทเหตุกโต จตฺตาโรปิ พฺรหฺมวิหารา อพฺยาปาทปธานาติ อาห ‘‘จตุ…เป… อพฺยาปาโท ธมฺมปท’’นฺติ. อธิคตานิ ฌานาทีนีติ โยชนา. ทสานุสฺสติ…เป… อธิคตานิ สมฺมาสติ ธมฺมปทํ สติสีเสน เตสํ อธิคนฺตพฺพตฺตาติ อธิปฺปาโย. อานาปานภาวนายํ สมาธิปิ ปธาโน, น สติ เอวาติ ทสฺสนตฺถํ ‘‘ทสกสิณ…เป… สมฺมาสมาธิ ธมฺมปท’’นฺติ วุตฺตํ. จตุธาตุววตฺถานวเสน อธิคตานมฺปิ เอตฺเถว สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. "अलोभसीसेनाति" म्हणजे अलोभाला अग्रभागी ठेवून, ज्यायोगे योगावाचराला (योगसाधकाला) "नेक्खम्मच्छन्द" (नैष्क्रम्य-छंद/निष्कामतेची इच्छा) असे म्हटले जाते. अशुभाची संज्ञा ही रागाची विरोधी असल्यामुळे "विशेषतः अलोभप्रधान" अशी म्हटली गेली आहे, किंवा दहा अशुभांच्या वशाने. "अधिगतज्झानादीनि" यातील 'आदि' शब्दाने विपश्यना इत्यादींचा संग्रह होतो. हिंसा, रती (आसक्ती) आणि राग हे व्यापादाचे (द्वेषाचे) कारण असल्यामुळे चारही ब्रह्मविहार हे अव्यापादप्रधान (द्वेषरहितताप्रधान) आहेत, म्हणून "चतु...पे... अव्यापादो धम्मपदं" असे म्हटले आहे. प्राप्त झालेले ध्यान इत्यादी, असा याचा संबंध (योजना) आहे. दहा अनुस्मृती...पे... प्राप्त झालेली सम्यक्-स्मृती हे धम्मपद आहे, कारण स्मृतीला अग्रभागी ठेवून ती प्राप्त केली जाते, असा अभिप्राय आहे. आनापानभावनेमध्ये समाधी देखील प्रधान आहे, केवळ स्मृतीच नाही, हे दर्शवण्यासाठी "दसकसिण...पे... सम्मासमाधि धम्मपदं" असे म्हटले आहे. चार धातूंच्या व्यवस्थापनाच्या वशाने प्राप्त झालेल्यांचाही येथेच संग्रह समजावा. ๑๑๖. อุปลกฺขณการณานีติ สญฺชานนนิมิตฺตานิ. ११६. "उपलक्खणकारणानि" म्हणजे ओळखण्याची (संज्ञा मिळवण्याची) निमित्ते (कारणे). ปาปเมว ปาปิโยติ อาห ‘‘ปาปํ โหตี’’ติ, ‘‘ปาปิโย’’ติ จ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตํ. เอกวจเน พหุวจนนฺติ เอกวจเน วตฺตพฺเพ พหุวจนํ วุตฺตํ. पापच अधिक पापी (वाईट) असते, म्हणून "पापं होति" असे म्हटले आहे, आणि "पापियो" हे लिंगविपर्यासामुळे (लिंगबदलामुळे) म्हटले आहे. "एकवचने बहुवचनं" म्हणजे एकवचन वापरायचे असताना बहुवचन वापरले गेले आहे. ๑๑๗. โอลียนตณฺหาภินิเวสวเสนาติ ภวตณฺหาภวทิฏฺฐิวเสน. ตา หิ ภเวสุ สตฺเต อลฺลียาเปนฺติ. อติธาวนาภินิเวสวเสนาติ อุจฺเฉททิฏฺฐิวเสน. สา หิ อวฏฺฏุปจฺเฉทเมว วฏฺฏุปจฺเฉทํ กตฺวา อภินิวิสนโต อติธาวนาภินิเวโส นาม. โอลียนฺตีติ สมฺมาปฏิปตฺติโต สงฺโกจํ อาปชฺชนฺติ. อภิธาวนฺตีติ สมฺมาปฏิปตฺตึ อติกฺกมนฺติ. ११७. "ओलीयणतण्हाभिनिवेसवसेन" म्हणजे भवतण्हा (भवतृष्णा) आणि भवदिट्ठि (भवदृष्टी) यांच्या वशाने. कारण त्या प्राण्यांना भवांमध्ये (अस्तित्वात) चिकटवून ठेवतात. "अतिधावनाभिनिवेसवसेन" म्हणजे उच्छेददिट्ठि (उच्छेददृष्टी) च्या वशाने. कारण ती संसाराच्या उच्छेदालाच (अवाट्टुपच्छेद) संसाराचा अंत मानून अभिनिवेश करत असल्यामुळे तिला 'अतिधावनाभिनिवेश' असे म्हणतात. "ओलीयन्ति" म्हणजे सम्यक् प्रतिपत्तीपासून (योग्य आचरणापासून) संकोच पावतात (मागे हटतात). "अभिधावन्ति" म्हणजे सम्यक् प्रतिपत्तीचे उल्लंघन करतात (पुढे धावतात). เตสญฺจาติ [Pg.144] เตสํ อุภินฺนํ อภินิเวสานํ, ตทญฺเญสญฺจ สพฺพมญฺญิตานํ. "तेसञ्च" म्हणजे त्या दोन्ही अभिनिवेशांचे, आणि त्याव्यतिरिक्त इतर सर्व कल्पनांचे (मन्नितांचे). ๑๑๘. อิทํ อิฏฺฐวิปากํ อนิฏฺฐวิปากนฺติ อิทํ อิฏฺฐวิปากสงฺขาตํ อนิฏฺฐวิปากสงฺขาตํ ผลํ. ११८. "इदं इट्ठविपाकं अनिट्ठविपाकं" म्हणजे हे इष्टविपाक (अनुकूल विपाक) संज्ञक आणि अनिष्टविपाक (प्रतिकूल विपाक) संज्ञक फल होय. ‘‘อกงฺขโต น ชาเนยฺยุ’’นฺติ เอเตน ‘‘อากงฺขโต’’ติ อิมินา ปเทน สทฺธึ สมฺพนฺธทสฺสนมุเขน ‘‘น ชญฺญา’’ติ ปทสฺส อตฺถํ ทสฺเสติ. "आकङ्खतो न जानेय्युं" याद्वारे "आकङ्खतो" या पदासोबत संबंध दर्शवण्याच्या माध्यमातून "न जञ्ञा" या पदाचा अर्थ दर्शवला आहे. น อุปลพฺภตีติ นตฺถีติ อตฺโถ. "न उपलब्भति" म्हणजे 'नाही' (अस्तित्वात नाही) असा अर्थ आहे. ๑๒๐. ตานีติ กมฺมกมฺมนิมิตฺตคตินิมิตฺตานิ. ปตฺถรณากาโรเยว เหส, ยทิทํ ฉายานํ โวลมฺพนํ. เอวํ โหตีติ ‘‘อกตํ วต เม กลฺยาณ’’นฺติอาทิปฺปกาเรน วิปฺปฏิสาโร โหติ. १२०. "तानि" म्हणजे कर्म, कर्मनिमित्त आणि गतिनिमित्त. हा पसरण्याचाच एक प्रकार आहे, जो सावल्यांचे लोंबकळणे आहे. "एवं होति" म्हणजे "मी खरोखर कल्याणकारी (चांगले) कर्म केले नाही" इत्यादी प्रकारे पश्चात्ताप होतो. ๑๒๒. เอสเกหีติ คเวสเกหิ สปรสนฺตาเน สมฺปาทเกหิ. ทุกฺขุทฺรยนฺติ ทุกฺขผลํ. ตีหิ การเณหีติ กายวาจาจิตฺเตหิ. ตานิ หิ ตํตํสํวรานํ ทฺวารภาเวน การณานีติ วุตฺตานิ. ตีหิ ฐาเนหีติ วา ตีหิ อุปฺปตฺติฏฺฐาเนหิ. ปิหิตนฺติ ปิธายกํ. १२२. "एसकेहि" म्हणजे शोध घेणाऱ्यांनी, स्वतःच्या आणि इतरांच्या संतानामध्ये (चित्तसंततीमध्ये) गुणांचे संपादन करणाऱ्यांनी. "दुक्खुद्रयं" म्हणजे दुःखदायक फल. "तीहि कारणेहि" म्हणजे काय, वाचा आणि चित्ताने. कारण ती त्या-त्या संवरांचे (संयमाचे) द्वार असल्यामुळे त्यांना 'कारणे' म्हटले आहे. किंवा "तीहि ठानेहि" म्हणजे तीन उत्पत्तीच्या स्थानांनी. "पिहितं" म्हणजे झाकलेले (बंद केलेले). ‘‘อุฏฺฐานฏฺฐานสงฺขาต’’นฺติ อิทํ ปาสาณภาวสามญฺญํ คเหตฺวา วุตฺตํ. "उट्ठानट्ठानसङ्खातं" हे पाषाणभावाचे (दगडाच्या स्वरूपाचे) सामान्यत्व गृहीत धरून म्हटले आहे. ๑๒๓. รชมิสฺสกนฺติ ปุปฺผรชมิสฺสกํ. ตสฺสาติ ตสฺส เสกฺขาเสกฺขมุนิโน. มหิจฺฉาทีนํ วิย คาเม จรณปฺปจฺจยา คามวาสีนํ สทฺธาหานิ วา โภคหานิ วา น โหติ, อถ โข อุปรูปริ วุทฺธิเยว โหตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปากติกเมว โหตี’’ติ อาห. อชฺฌตฺติกกมฺมฏฺฐานนฺติ จตุสจฺจกมฺมฏฺฐานํ. १२३. "रजमिस्सकं" म्हणजे फुलांच्या परागकणांनी (धुळीने) मिश्रित. "तस्स" म्हणजे त्या शैक्ष आणि अशैक्ष मुनींचे. महाइच्छा (लोभ) असणाऱ्यांप्रमाणे गावात फिरण्याच्या कारणामुळे गावकऱ्यांच्या श्रद्धेची हानी किंवा भोगांची हानी होत नाही, उलट उत्तरोत्तर वृद्धीच होते, हे दर्शवताना "पाकृतिकमेव होति" (ते नैसर्गिकच राहते) असे म्हटले आहे. "अज्झत्तिककम्मट्ठानं" म्हणजे चतुःसत्य कर्मस्थान. เตนาติ กุสเลน กายวจีกมฺเมน. ถิรภาโว ถามํ นามาติ ตสฺส อตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ถามวาติ ฐิติมา’’ติ อาห. "तेन" म्हणजे कुशल कायिक आणि वाचिक कर्माने. स्थिरभाव म्हणजेच 'थाम' (सामर्थ्य/बळ) होय, त्याचा अर्थ दर्शवताना "थामवाति ठितिमा" (सामर्थ्यवान म्हणजे स्थिर राहणारा) असे म्हटले आहे. อตฺตสํนิสฺสยํ เปมํ อตฺตาติ คเหตฺวา ‘‘อตฺตสม’’นฺติ วุตฺตนฺติ อาห ‘‘อตฺตเปเมน สมํ เปมํ นตฺถี’’ติ. ภควโต วิปสฺสนาญาโณภาสปฺปวตฺตึ สนฺธายาห ‘‘ปญฺญา ปน…เป… สกฺโกตี’’ติ. สพฺพญฺญุตญฺญาณํ, ปน อภิญฺญาญาณานิ จ อนนฺตาปริมาณํ โลกธาตุํ โอภาเสนฺติ. आत्म्याला (स्वतःला) आश्रय करून असणारे प्रेम हे 'आत्मा' असे गृहीत धरून "अत्तसमं" असे म्हटले आहे, म्हणून "स्वतःवरील प्रेमासारखे दुसरे प्रेम नाही" असे म्हटले आहे. भगवंतांच्या विपश्यना-ज्ञान-प्रकाशाच्या प्रवृत्तीला उद्देशून "पञ्ञा पन...पे... सक्कोति" असे म्हटले आहे. परंतु, सर्वज्ञता-ज्ञान आणि अभिज्ञा-ज्ञान हे अनंत आणि अपार लोकधातूंना प्रकाशित करतात. ๑๒๔. กิสฺส ภีตาติ เกน การเณน ภีตา. १२४. "किस्स भीता" म्हणजे कोणत्या कारणाने घाबरलेले. ฐเปตฺวาติ [Pg.145] ปวตฺเตตฺวา. วจนีโย ยาจกานนฺติ โยชนา, ยาจิตพฺพยุตฺโตติ อตฺโถ. ยญฺญอุปกฺขโรติ ยญฺโญปกรณํ. ‘‘เอเตสุ ธมฺเมสุ ฐิโต จตูสู’’ติ วุตฺตํ จตุกฺกํ ววตฺถเปตุํ ‘‘สทฺโธติ เอกํ องฺค’’นฺติอาทิ วุตฺตํ. "ठपेत्वा" म्हणजे प्रवृत्त करून (प्रस्थापित करून). "वचनीयो याचकानं" असा संबंध आहे, म्हणजे याचना करण्यास योग्य असा अर्थ आहे. "यञ्ञउपक्खरो" म्हणजे यज्ञाचे साहित्य (यज्ञोपकरण). "एतेसु धम्मेसु ठितो चतूसु" यामध्ये सांगितलेल्या चतुष्टयाचे (चार धर्मांचे) व्यवस्थापन करण्यासाठी "सद्धोति एकं अङ्गं" (श्रद्धा हे एक अंग आहे) इत्यादी म्हटले आहे. คาถายํ วุตฺตธมฺเม ทฺเว ทฺเว เอกํ กตฺวา องฺคกรณํ ทุกนโย. गाथेमध्ये सांगितलेल्या धर्मांपैकी दोन-दोन धर्मांना एकत्र करून अंग बनवणे हा 'दुकनय' (द्विक-नय) आहे. ชาติธมฺมนฺติ ปวตฺติธมฺมํ สนฺธาย วทติ. "जातिधम्मं" हे प्रवृत्ती-धर्माला (उत्पत्तीच्या धर्माला) उद्देशून म्हटले आहे. ๑๒๕. สจฺเจกเทสโต สจฺจสมุทาโย อนวเสสปริยาทานโต วิสิฏฺโฐติ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปรมตฺถสจฺจํ วา โหตู’’ติ อาห. จตุโร ปทาติ จตฺตาริ ปทานิ, ลิงฺควิปลฺลาเสน วุตฺตํ, จตฺตาโร ธมฺมโกฏฺฐาสาติ อตฺโถ. เกวลํ สตฺตวิภาคทสฺสนตฺถเมว จตุปทคฺคหณํ, น อธิคตธมฺมานุรูปตาย. १२५. सत्याच्या एका भागापेक्षा संपूर्ण सत्य हे पूर्णपणे ग्रहण केल्यामुळे विशिष्ट (श्रेष्ठ) असते, हे दर्शवताना "परमत्थसच्चं वा होतु" (परमार्थ सत्य असो) असे म्हटले आहे. "चतुरो पदा" म्हणजे चार पदे, हे लिंगविपर्यासामुळे म्हटले आहे, याचा अर्थ चार धर्म-विभाग असा आहे. केवळ सत्त्वांच्या वर्गीकरणाचे दर्शन घडवण्यासाठीच 'चतुष्पद' ग्रहण केले आहे, प्राप्त झालेल्या धर्माच्या अनुरूपतेने नाही. นิมฺมทาติ น มทา. "निम्मदा" म्हणजे मद नसलेले (मदरहित). ‘‘สจฺจวาที ชิโน โรโม’’ติปิ ปาโฐ. ตตฺถ โรโมติ ทิฏฺฐิราครตฺตานํ ติตฺถิยานํ, ติตฺถกรานญฺจ อธมฺมวาทีนํ ราควิปรีตธมฺมเทสนโต ภยชนโก, อธมฺมวาทีนํ วา ตตฺถ อาทีนวทสฺสเนน ภายิตพฺโพ, อปฺปหีนาสํวรานํ วา ทุรุปสงฺกมนโต ทุราสโทติ อตฺโถ. "सच्चवादी जिनो रोमो" असाही पाठ आहे. तेथे "रोमो" म्हणजे दृष्टी आणि रागाने रंजलेल्या (आसक्त) तीर्थिकांच्या आणि अधर्मवादी तीर्थकरांच्या रागाच्या विपरीत धर्माचा उपदेश करत असल्यामुळे भय निर्माण करणारा, किंवा अधर्मवाद्यांना त्यामध्ये दोष (आदीनव) दाखवून घाबरवणारा, अथवा ज्यांचा असंवर (असंयम) नष्ट झालेला नाही अशांना जवळ जाण्यास कठीण असल्यामुळे दुर्धर (दुर्धर्ष) असा अर्थ आहे. สจฺโจ จ โส ธมฺโม จาติ สจฺจธมฺโม. เตนาห ‘‘เอกนฺตนิสฺสรณภาเวนา’’ติอาทิ. जे सत्य आहे आणि तोच धर्म आहे, तो 'सत्यधर्म' होय. म्हणूनच "एकान्त-निस्सरण-भावाने" (पूर्णपणे संसारातून मुक्त होण्याच्या स्वरूपाने) इत्यादी म्हटले आहे. เอกายนภาวนฺติ เอกมคฺคภาวํ, อญฺญมคฺคภาวนฺติ อตฺโถ. "एकायनभावं" म्हणजे एकमार्ग-भाव (एकच मार्ग असणे), इतर मार्गांचा अभाव असा अर्थ आहे. ทสฺสนภาคิยํ ภาวนาภาคิยนฺติ นิพฺเพธภาคิยเมว ทฺวิธา วิภชิตฺวา วุตฺตนฺติ อาห ‘‘สํกิเลสภาคิยาทีหิ จตูหิ ปเทหี’’ติ. เสสตฺติกานนฺติ สตฺตาธิฏฺฐานตฺติกาทีนํ อฏฺฐนฺนํ ติกานํ. เสสปทานญฺจาติ สํกิเลสภาคิยญฺจ วาสนาภาคิยญฺจาติอาทิมิสฺสกปทานญฺจ. จ-สทฺเทน สํกิเลสภาคิยาทิปทานิ จ สงฺคณฺหาติ. โลกิยตฺติกสฺเสว หิ ‘‘เสสปทานี’’ติ วุตฺเตหิ มิสฺสกปเทหิ เอวํ สํสนฺทเน นยทสฺสนํ, อิตเรสํ ปน ติกานํ สํกิเลสภาคิยาทิปเทหิ เจว เสสปเทหิ จ สํสนฺทเน อิทํ นยทสฺสนนฺติ ‘‘วุตฺตนยานุสาเรน สุวิญฺเญยฺย’’นฺติ วุตฺตํ. สมติกฺกมนนฺติ ปหานํ. สติปิ วาสนาภาคิยสํกิเลสภาคิยธมฺมานํ โลกิยภาเว [Pg.146] ปุริเมหิ ปน ปจฺฉิมา ปหาตพฺพา ตทงฺควเสน, วิกฺขมฺภนวเสน จ. เอวํ ปชหนสมตฺถตาย ปหานนฺติ วุตฺตํ ‘‘วาสนาภาคิยํ สุตฺตํ สํกิเลสภาคิยสฺส สมติกฺกมาย โหตี’’ติ. สํกิเลสธมฺมานํ สมติกฺกเมน อธิคนฺตพฺพา โวทานธมฺมา วิยาติ โยชนา. ภาวนา นาม ติวิธา ฌานภาวนา, วิปสฺสนาภาวนา, มคฺคภาวนาติ. ตาสุ มคฺคภาวนาย คหิตาย วิปสฺสนาภาวนา คหิตา เอว โหตีติ ตํ อนามสิตฺวา อิตรา ทฺเว เอว คหิตา. ตถาปิ ‘‘ภาวนาภาคิยสฺส สุตฺตสฺส ปฏินิสฺสคฺคายา’’ติ วุตฺเต กึ สพฺเพน สพฺพํ อเสกฺขสฺส ฌานภาวนาปิ ปฏินิสฺสฏฺฐาติ โจทนํ มนสิ กตฺวา ปาฬิยํ ‘‘อเสกฺขภาคิยํ สุตฺตํ ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหารตฺถ’’นฺติ วุตฺตนฺติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อเสกฺขธมฺเมสุ อุปฺปนฺเนสุ มคฺคภาวนากิจฺจํ นาม นตฺถี’’ติ วตฺวา ‘‘ฌานภาวนาปิ ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหารตฺถา เอวา’’ติ อาห. दस्सनभागिय (दर्शनभागीय) आणि भावनाभागिय (भावनाभागीय) हे निब्बेधभागियचेच (निर्वेधभागीय) दोन भाग करून सांगितले आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'संकिलेसभागियादी चार पदांद्वारे' असे म्हटले आहे. उर्वरित त्रिकांचे म्हणजे सत्ताधिष्ठानत्रिक इत्यादी आठ त्रिकांचे. आणि उर्वरित पदांचे म्हणजे संकिलेसभागिय आणि वासनाभागिय इत्यादी मिश्र पदांचे. 'च' (आणि) या शब्दाने संकिलेसभागिय इत्यादी पदांचा संग्रह होतो. कारण लौकिक त्रिकाचाच 'उर्वरित पदे' या शब्दाने घेतलेल्या मिश्र पदांशी अशा प्रकारे संबंध जोडताना नय-दर्शन (पद्धतीचे स्पष्टीकरण) होते, परंतु इतर त्रिकांचा संकिलेसभागिय इत्यादी पदांशी आणि उर्वरित पदांशी संबंध जोडताना हे नय-दर्शन होते, म्हणून 'सांगितलेल्या पद्धतीनुसार सहज समजण्यासारखे आहे' असे म्हटले आहे. समतिक्कमन म्हणजे प्रहाण (नष्ट करणे). वासनाभागीय आणि संकिलेसभागीय धर्मांच्या लौकिक अवस्थेतही, पूर्वीच्या (धर्मांद्वारे) नंतरचे (धर्म) तदंग आणि विक्खंभन (विष्कंभन - दाबून टाकणे) द्वारे प्रहाण केले जावे. अशा प्रकारे प्रहाण करण्याच्या समर्थतेमुळे प्रहाण असे म्हटले आहे की, 'वासनाभागीय सुत्त हे संकिलेसभागीय सुत्ताच्या समतिक्क्रमणासाठी (पार करण्यासाठी) असते.' संकिलेसधर्मांच्या समतिक्क्रमणाने (अतिक्रमणाने) प्राप्त होणारे वोदानधम्म (व्यवदानधर्म - शुद्धीचे धर्म) यांच्याप्रमाणे, अशी योजना आहे. भावना तीन प्रकारची आहे - ध्यानभावना, विपस्सनाभावना आणि मार्गभावना. त्यापैकी मार्गभावना ग्रहण केली असता विपस्सनाभावना ग्रहण केलीच जाते, म्हणून तिचा उल्लेख न करता इतर दोनच ग्रहण केल्या आहेत. तरीही 'भावनाभागीय सुत्ताच्या पटिनिस्सग्ग (प्रतिनिसर्ग - त्यागासाठी)' असे म्हटले असता, 'काय पूर्णपणे असेक्खाची (अशैक्षाची) ध्यानभावना देखील प्रतिनिसृष्ट (त्यागलेली) असते?' अशी शंका मनात घेऊन पाळीमध्ये 'असेक्खभागीय सुत्त हे दिठ्ठधम्मसुखविहारासाठी (याच जन्मात सुखाने राहण्यासाठी) आहे' असे सांगितले आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'असेक्खधम्म उत्पन्न झाले असता मार्गभावनेचे कार्य नसते' असे सांगून 'ध्यानभावना देखील दिठ्ठधम्मसुखविहारासाठीच आहे' असे म्हटले आहे. เอกํ เอว ภวพีชํ ปฏิสนฺธิวิญฺญาณํ เอกพีชํ, ตํ อสฺส อตฺถีติ เอกพีชี. สนฺธาวิตฺวา สมาคนฺตฺวา, นิพฺพตฺตนวเสน อุปคนฺตฺวาติ อตฺโถ. สํสริตฺวาติ ตสฺเสว เววจนํ. กุลํ กุลํ คจฺฉตีติ โกลํโกโล. ปุริมปเท อนุนาสิกโลปํ อกตฺวา นิทฺเทโส. एकच भवबीज असलेले पटिसंधिविञ्ञाण (प्रतिसंधी विज्ञान) म्हणजे 'एकबीज' होय, ते ज्याच्याजवळ आहे तो 'एकबीजी' (एकच जन्म घेणारा) होय. 'संधावित्वा' म्हणजे एकत्र येऊन, उत्पत्तीच्या रूपाने प्राप्त होऊन असा अर्थ आहे. 'संसरित्वा' (संसार करून) हा त्याचाच समानार्थी शब्द आहे. कुलातून कुलात जातो तो 'कोलंकुल' होय. पूर्व पदात अनुनासिकाचा लोप न करता हा निर्देश केला आहे. เตสํ โสตาปนฺนานํ. เอตํ ปเภทนฺติ เอกพีชิอาทิวิภาคํ. ปุริมภวสิทฺธํ วิวฏฺฏูปนิสฺสยปุญฺญกมฺมํ อิธ ปุพฺพเหตุ นาม. โย ‘‘กตปุญฺญตา’’ติ วุจฺจติ, โส ปฐมมคฺเค สาธิเต จริตตฺถตาย วิปกฺกวิปากํ วิย กมฺมํ อุปริมมคฺคานํ อุปนิสฺสโย น สิยาติ อธิปฺปาเยนาห ‘‘อุปริ…เป… อาปชฺชตี’’ติ. ติณฺณํ มคฺคานํ นิรตฺถกตา อาปชฺชติ ปฐมมคฺเคเนว เตหิ กาตพฺพกิจฺจสฺส สาธิตตฺตา. ปฐมมคฺเค…เป… อาปชฺชตีติ อนุปฺปนฺนสฺส อตฺถกิริยาสมฺภวโต. เอวํ ติณฺณํ วาทานํ ยุตฺติอภาวํ ทสฺเสตฺวา จตุตฺถวาโท เอเวตฺถ ยุตฺโตติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘วิปสฺสนา…เป… ยุชฺชตี’’ติ. ‘‘สเจ หี’’ติอาทินา ตํ ยุตฺตึ วิภาเวติ. วิมุตฺติปริปาจนียานํ ธมฺมานํ ปริปกฺกตาย อินฺทฺริยานํ ติกฺขตาย ญาณสฺส วิสทตาย วิปสฺสนาย พลวภาโว เวทิตพฺโพ. โส หิ โวมิสฺสกนเยน สํสรณโก อิธาธิปฺเปโต ‘‘เทเว เจว มานุเส จ สนฺธาวิตฺวา’’ติ วุตฺตตฺตา. อิธ กามภเว ฐิโต อิธฏฺฐโก. มนุสฺสเทวโลกูปปชฺชนโต โอกาเรน โวกิณฺโณ. อริยสาวกสฺส ตํตํสตฺตนิกายุปปตฺติ ตสฺส ตสฺส โสธนสทิสํ กิเลสมลาทิอนตฺถาปนยนโตติ [Pg.147] อาห ‘‘ฉ เทวโลเก โสเธตฺวา’’ติ. ‘‘อกนิฏฺเฐ ฐตฺวา’’ติ เอเตน เหฏฺฐาพฺรหฺมโลกโสธนํ วุตฺตเมวาติ เวทิตพฺพํ. त्या सोतापन्नांचे (स्रोतापन्नांचे). 'हा प्रभेद' म्हणजे एकबीजी इत्यादी विभाग. पूर्वजन्मात सिद्ध झालेले आणि विवट्ट (विवर्त - संसारातून मुक्ती) साठी उपकारक असलेले पुण्यकर्म येथे 'पूर्वहेतू' या नावाने ओळखले जाते. ज्याला 'कृतपुण्यता' म्हटले जाते, ते पहिल्या मार्गाची (सोतापत्ती मार्गाची) प्राप्ती झाल्यावर कृतार्थतेमुळे, जसे विपाकाचा अनुभव घेतलेले कर्म पुढील मार्गांसाठी उपनिस्सय (उपकारक आधार) ठरत नाही, या अभिप्रायाने 'वर...पे... प्राप्त होते' असे म्हटले आहे. तीन मार्गांची निरर्थकता प्राप्त होते, कारण पहिल्या मार्गानेच त्यांच्याद्वारे केले जाणारे कार्य साध्य झाले आहे. 'पहिल्या मार्गात...पे... प्राप्त होते' कारण जे उत्पन्न झाले नाही त्याची अर्थक्रिया (कार्यकारित्व) संभवत नाही. अशा प्रकारे तीन वादांची अयुक्तता (अयोग्यत्व) दर्शवून येथे चौथा वादच योग्य आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'विपस्सना...पे... योग्य आहे' असे म्हटले आहे. 'जर खरोखरच' इत्यादींद्वारे ती युक्ती स्पष्ट केली आहे. विमुक्ती परिपक्व करणाऱ्या धर्मांच्या परिपक्वतेमुळे, इंद्रियांच्या तीक्ष्णतेमुळे आणि ज्ञानाच्या स्पष्टतेमुळे विपस्सनेचे बलवानपण समजून घ्यावे. कारण तो मिश्र पद्धतीने संसरण करणारा येथे अभिप्रेत आहे, कारण 'देव आणि मनुष्यांमध्ये संसरण करून' असे म्हटले आहे. येथे कामभवात स्थित असलेला तो 'इधट्ठक' (येथे स्थित असलेला) होय. मनुष्य आणि देवलोकात उत्पन्न होण्यामुळे तो अवकाशाने (स्थानाने) मिश्रित आहे. आर्यश्रावकाची त्या त्या सत्त्व-निकायात (प्राणीसमूहात) उत्पत्ती होणे म्हणजे त्या त्या स्थानाचे शोधन करण्यासारखे, क्लेशमल इत्यादी अनर्थ दूर करण्यासारखे आहे, म्हणून 'सहा देवलोकांचे शोधन करून' असे म्हटले आहे. 'अकनिष्ठ लोकात राहून' याने खालील ब्रह्मलोकांचे शोधन सांगितलेच आहे, असे समजावे. สทฺธํ ธุรํ กตฺวาติ สทฺธํ ธุรํ เชฏฺฐกํ ปุพฺพงฺคมํ กตฺวา. สทฺธาย อนุสฺสติ ปฏิปตฺติ, สทฺธํ วา ปุพฺพภาคิยํ อนุสฺสติ, สทฺธาย วา อนุสรณสีโลติ สทฺธานุสารี. ธมฺมานุสารีติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. ธมฺโมติ ปเนตฺถ ปญฺญา เวทิตพฺพา. สทฺทหนฺโต วิมุตฺโตติ สทฺธาวิมุตฺโต. ยทิปิ สพฺพถา อวิมุตฺโต, สทฺธามตฺเตน ปน วิมุตฺโตติ อตฺโถ. สทฺธาย วา อธิมุตฺโตติ สทฺธาวิมุตฺโต. วุตฺตนเยนาติ อุปริมคฺควิปสฺสนาย พลวมนฺทมนฺทตรภาเวน. ทิฏฺฐิยา ปตฺโตติ ทิฏฺฐิปฺปตฺโต, จตุสจฺจทสฺสนสงฺขาตาย ทิฏฺฐิยา นิโรธปฺปตฺโตติ อตฺโถ. ทิฏฺฐนฺตํ วา ปตฺโตติ ทิฏฺฐิปฺปตฺโต, ทสฺสนสงฺขาตสฺส โสตาปตฺติมคฺคญาณสฺส อนนฺตรปฺปวตฺโตติ วุตฺตํ โหติ. ปฐมผลโต ปฏฺฐาย หิ ยาว อคฺคมคฺคา ทิฏฺฐิปฺปตฺตาติ. อิทนฺติ ยถาวุตฺตโสตาปนฺนานํ สทฺธาวิมุตฺตทิฏฺฐิปฺปตฺตตาวจนํ. อฏฺฐนฺนํ วิโมกฺขานนฺติ จตสฺโส รูปาวจรสมาปตฺติโย, จตสฺโส อรูปาวจรสมาปตฺติโยติ อฏฺฐ วิโมกฺขา, เตสํ. 'श्रद्धेला मुख्य करून' म्हणजे श्रद्धेला धुरा, श्रेष्ठ आणि अग्रगामी करून. श्रद्धेचे अनुस्मरण करणे हीच प्रतिपत्ती (साधना) आहे, किंवा पूर्वभागीय श्रद्धेचे अनुस्मरण करणे, किंवा श्रद्धेचे अनुसरण करण्याचा स्वभाव असणारा तो 'श्रद्धानुसारी' होय. 'धम्मानुसारी' (धर्मानुसारी) यामध्ये देखील हाच नियम आहे. येथे 'धम्म' म्हणजे प्रज्ञा असे समजावे. श्रद्धा ठेवून विमुक्त झालेला तो 'श्रद्धाविमुक्त' होय. जरी तो सर्व प्रकारे विमुक्त झालेला नसला, तरी केवळ श्रद्धेमुळे विमुक्त झाला आहे असा अर्थ आहे. किंवा श्रद्धेमध्ये अधिमुक्त (दृढ निश्चय असलेला) तो 'श्रद्धाविमुक्त' होय. 'सांगितलेल्या पद्धतीने' म्हणजे पुढील मार्गाच्या विपस्सनेच्या बलवान, मंद आणि अतिमंद भावामुळे. दृष्टीने प्राप्त झालेला तो 'दिठ्ठिप्पत्त' (दृष्टिप्राप्त) होय, चतुःसत्य-दर्शना नावाच्या दृष्टीने निरोधाला प्राप्त झालेला असा अर्थ आहे. किंवा दृष्टीच्या अंताला प्राप्त झालेला तो 'दिठ्ठिप्पत्त' होय, दर्शन नावाच्या सोतापत्तिमग्गञाणाच्या (स्रोतापत्तिमार्गज्ञानाच्या) लगेचच नंतर प्रवृत्त होणारा असा याचा अर्थ आहे. कारण पहिल्या फलापासून (सोतापत्तिफलापासून) घेऊन अग्र मार्गापर्यंत (अर्हत् मार्गापर्यंत) असणारे 'दिठ्ठिप्पत्त' (दृष्टिप्राप्त) असतात. 'हे' म्हणजे वर सांगितलेल्या सोतापन्नांचे श्रद्धाविमुक्त आणि दृष्टिप्राप्त असण्याचे वचन होय. 'आठ विमोक्षांचे' म्हणजे चार रूपावचर समापत्ती आणि चार अरूपावचर समापत्ती मिळून आठ विमोक्ष, त्यांचे. ผุฏฺฐนฺตํ สจฺฉิกโรตีติ กายสกฺขี, ผุฏฺฐานํ อนฺโต ผุฏฺฐนฺโต, ผุฏฺฐานํ อรูปชฺฌานานํ อนนฺตโร กาโลติ อธิปฺปาโย. อจฺจนฺตสํโยเค เจตํ อุปโยควจนํ, ผุฏฺฐานนฺตรกาลเมว สจฺฉิกาตพฺพํ สจฺฉิกโรตีติ วุตฺตํ โหติ, ‘‘วิสมํ จนฺทิมสูริยา ปริวตฺตนฺตี’’ติอาทีสุ (อ. นิ. ๔.๗๐) วิย วา ภาวนปุํสกนฺติ เอตํ ทฏฺฐพฺพํ. โย หิ อรูปชฺฌาเนน รูปกายโต, นามกาเยกเทสโต จ วิกฺขมฺภนวิโมกฺเขน วิมุตฺโต, เตน นิโรธสงฺขาโต วิโมกฺโข อาโลจิโต ปกาสิโต วิย โหติ, น กาเยน สจฺฉิกโต, นิโรธํ ปน อารมฺมณํ กตฺวา เอกจฺเจสุ อาสเวสุ เขปิเตสุ เตน โส สจฺฉิกโต โหติ. ตสฺมา โส สจฺฉิกาตพฺพํ นิโรธํ ยถาอาโลจิตํ นามกาเยน สจฺฉิกโรตีติ ‘‘กายสกฺขี’’ติ วุจฺจติ, น ตุ วิมุตฺโต เอกจฺจานํ เอว อาสวานํ อปริกฺขีณตฺตา. 'स्पर्श केलेल्या अंताचा साक्षात्कार करतो' तो 'कायसाक्षी' होय. स्पर्श केलेल्यांचा अंत म्हणजे 'फुठ्ठंत' (स्पर्श-अंत), स्पर्श केलेल्या अरूपध्यानांच्या लगेचच नंतरचा काळ असा अभिप्राय आहे. आणि हे अत्यंतसंयोगात (व्याप्तीत) द्वितीया विभक्तीचे रूप आहे; स्पर्श केलेल्याच्या लगेचच नंतरच्या काळातच साक्षात्कृत करण्यायोग्य गोष्टीचा साक्षात्कार करतो, असे म्हटले आहे. किंवा 'विषम पद्धतीने चंद्र आणि सूर्य फिरतात' इत्यादींप्रमाणे हे भावनपुंसक (क्रियाविशेषण नपुंसकलिंगी) समजावे. जो खरोखर अरूपध्यानाने रूपकायापासून आणि नामकायाच्या एका भागापासून विक्खंभनविमोक्षाद्वारे (दाबून टाकून मिळणाऱ्या मुक्तीद्वारे) विमुक्त झाला आहे, त्याला निरोध नावाचा विमोक्ष आलोकित (दिसल्यासारखा) किंवा प्रकाशित झाल्यासारखा होतो, कायाने साक्षात्कृत झालेला नसतो; परंतु निरोधाला आलंबन (आरंभीचे कारण) करून काही आसवांचा क्षय केला असता, त्याने त्याचा साक्षात्कार केलेला असतो. म्हणून तो साक्षात्कृत करण्यायोग्य निरोधाचा, जसा आलोकित झाला आहे तसा, नामकायाने साक्षात्कार करतो, म्हणून त्याला 'कायसाक्षी' म्हटले जाते, परंतु तो पूर्णपणे विमुक्त नसतो, कारण त्याचे काही आसव अजून नष्ट झालेले नसतात. อเภเทนาติ อนฺตราปรินิพฺพายิอาทิเภเทน วินา. ‘‘อเภเทนา’’ติ จ อิทํ ‘‘สทฺธาวิมุตฺตทิฏฺฐิปฺปตฺตกายสกฺขิโน’’ติ อิธาปิ อาเนตฺวา โยเชตพฺพํ. ยเถว หิ อนฺตราปรินิพฺพายิอาทิเภทานามสเนเนว เอโก อนาคามี [Pg.148] โหติ, เอวํ ยถาวุตฺตเภทอามสเนเนว สทฺธาวิมุตฺโต, ทิฏฺฐิปฺปตฺโต, กายสกฺขีติ ตโย อนาคามิโน โหนฺติ. อยญฺจ อนาคามิโน ตาทิสมวตฺถาเภทํ คเหตฺวา คณนา กตาติ เวทิตพฺพํ. ‘‘อวิหาทีสู’’ติอาทิ สุวิญฺเญยฺยเมว. "अभेदेन" म्हणजे अंतरापरिनिब्बायी (अंतरापरिनिर्वायी) इत्यादी भेदांशिवाय. आणि "अभेदेन" हे "सद्धाविमुत्त, दिट्ठिप्पत्त, कायसक्खी" (श्रद्धाविमुक्त, दृष्टिप्राप्त, कायसाक्षी) येथेही आणून जोडले पाहिजे. कारण ज्याप्रमाणे अंतरापरिनिब्बायी इत्यादी भेदांचा विचार न करताच एक 'अनागामी' होतो, त्याचप्रमाणे वर सांगितलेल्या भेदांचा विचार न करताच सद्धाविमुत्त, दिट्ठिप्पत्त आणि कायसक्खी हे तीन अनागामी होतात. आणि ही अनागामींची गणना तशा प्रकारच्या अवस्थाभेदाला लक्षात घेऊन केली आहे, असे जाणावे. "अविहादीसु" (अविह इत्यादींमध्ये) इत्यादी सहज समजण्यासारखेच आहे. ปญฺญาย เอว วิมุตฺโต, น เจโตวิมุตฺติภูเตน สาติสเยน สมาธินาปีติ ปญฺญาวิมุตฺโต. อุภโตภาควิมุตฺโตติ อุโภหิ ภาเคหิ อุภโตภาคโต วิมุตฺโต. กิเลสานํ วิกฺขมฺภนสมุจฺฉินฺเนหิ รูปกายนามกายโต วิมุตฺโตติ อิมมตฺถํ ทสฺเสนฺโต ‘‘วิกฺขมฺภน…เป… วิมุตฺโต นามา’’ติ อาห. อรูปสมาปตฺติยา รูปกายโต, อคฺคมคฺเคน อรูปกายโต วิมุตฺตํ. ยถาห – केवळ प्रज्ञेनेच विमुक्त झालेला, चेतोविमुक्तीरूप अशा अतिशयित (उत्कृष्ट) समाधीने नव्हे, तो 'प्रज्ञाविमुक्त' (पञ्ञाविमुत्त) होय. 'उभतोभागविमुक्त' (उभतोभागविमुत्त) म्हणजे दोन्ही भागांनी, दोन्ही बाजूंनी विमुक्त झालेला. क्लेशांच्या विष्कंभन (दडपून टाकणे) आणि समुच्छेद (समूळ नष्ट करणे) याद्वारे रूपकाय आणि नामकाय यांपासून विमुक्त झालेला, हा अर्थ दर्शविताना "विष्कंभन...पे... विमुक्त नाम" असे म्हटले आहे. अरूप समापत्तीने रूपकायापासून, आणि अग्र मार्गाने (अर्हतमार्गाने) अरूपकायापासून विमुक्त झालेला. जसे म्हटले आहे – ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, เอกจฺโจ ปุคฺคโล เย เต สนฺตา วิโมกฺขา อติกฺกมฺม รูเป อารุปฺปา, เต กาเยน ผุสิตฺวา วิหรติ, ปญฺญาย จสฺส ทิสฺวา อาสวา ปริกฺขีณา โหนฺติ, อยํ วุจฺจติ, ภิกฺขเว, ปุคฺคโล อุภโตภาควิมุตฺโต’’ติ (ม. นิ. ๒.๑๘๒). "इथे, भिक्खूहो, एखादा पुद्गल (व्यक्ती) जे ते शांत विमोक्ष आहेत, जे रूपांचे अतिक्रमण करून अरूप आहेत, त्यांना कायेने स्पर्श करून (अनुभवून) विहरतो, आणि प्रज्ञेने पाहून त्याचे आसव परिक्षीण (नष्ट) झालेले असतात. भिक्खूहो, हा पुद्गल 'उभतोभागविमुक्त' म्हटला जातो." (म. नि. २.१८२) ยํ ปน มหานิทานสุตฺเต ‘‘รูปี รูปานิ ปสฺสตี’’ติอาทิเก (ที. นิ. ๒.๑๒๙) นิโรธสมาปตฺติอนฺเต อฏฺฐ วิโมกฺเข วตฺวา – परंतु, जे महानिदान सुत्तात "रूपी रूपांना पाहतो" इत्यादी (दी. नि. २.१२९) निरोधसमापत्तीपर्यंतच्या आठ विमोक्षांना सांगून – ‘‘ยโต โข, อานนฺท, ภิกฺขุ อิเม อฏฺฐ วิโมกฺเข อนุโลมมฺปิ สมาปชฺชติ…เป… อยํ วุจฺจตานนฺท, ภิกฺขุ อุภโตภาควิมุตฺโต, อิมาย จ, อานนฺท, อุภโตภาควิมุตฺติยา อญฺญา อุภโตภาควิมุตฺติ อุตฺตริตรา วา ปณีตตรา วา นตฺถี’’ติ (ที. นิ. ๒.๑๓๐) – "आनंदा, जेव्हा भिक्खू या आठ विमोक्षांना अनुलोम रीतीनेही समापन्न होतो...पे... आनंदा, हा भिक्खू 'उभतोभागविमुक्त' म्हटला जातो. आणि आनंदा, या उभतोभागविमुक्तीपेक्षा दुसरी कोणतीही उभतोभागविमुक्ती अधिक श्रेष्ठ किंवा अधिक प्रणीत (उत्कृष्ट) नाही." (दी. नि. २.१३०) – วุตฺตํ, ตํ อุภโตภาควิมุตฺตเสฏฺฐวเสน วุตฺตํ. ตตฺถ ยสฺมา อารุปฺปสมาปตฺตีสุ เอกายปิ รูปกาโย วิกฺขมฺภิโต เอว นาม โหติ, ตสฺมา จตุนฺนํ อารุปฺปสมาปตฺตีนํ, นิโรธสมาปตฺติยา จ ลาภีนํ วเสน ปญฺจ อุภโตภาควิมุตฺตา เวทิตพฺพา. เอส นโย กายสกฺขิมฺหิปิ. อฏฺฐวิโมกฺเขกเทเสปิ หิ อฏฺฐวิโมกฺขสมญฺญา ยถา ‘‘โลเก สตฺตา’’ติ. असे जे म्हटले आहे, ते उभतोभागविमुक्तांच्या श्रेष्ठत्वाच्या दृष्टीने म्हटले आहे. त्यामध्ये ज्याअर्थी अरूप समापत्तींपैकी एका समापत्तीनेही रूपकाय विष्कंभित (दडपला) गेलेलाच असतो, त्याअर्थी चार अरूप समापत्ती आणि निरोधसमापत्ती प्राप्त करणाऱ्यांच्या दृष्टीने पाच प्रकारचे उभतोभागविमुक्त जाणावेत. हाच नियम 'कायसाक्षी' (कायसक्खी) च्या बाबतीतही आहे. कारण आठ विमोक्षांच्या एका भागालाही 'आठ विमोक्ष' अशी संज्ञा दिली जाते, जसे "लोकात सत्त्व (प्राणी)" असे म्हटले आहे. เตรสสุ สีเสสุ ปลิโพธสีสาทีนิ, ปวตฺตสีสญฺจ ปริยาทิยิตพฺพานิ, อธิโมกฺขสีสาทีนิ ปริยาทกานิ, โคจรสีสํ ปริยาทกผลํ. ตญฺหิ [Pg.149] วิสยชฺฌตฺตํ ผลํ, วิโมกฺโข ปริยาทกสฺส มคฺคสฺส, ผลสฺส จ อารมฺมณํ. สงฺขารสีสํ สงฺขารวิเวกภูโต นิโรโธติ ปริยาทิยิตพฺพานํ, ปริยาทกผลานญฺจ สห วิสยสํสิทฺธิทสฺสเนน สมสีสิภาวํ ทสฺเสตุํ ปฏิสมฺภิทายํ (ปฏิ. ม. ๑.๘๗) เตรส สีสานิ วุตฺตานิ. อิธ ปน ‘‘ยสฺส ปุคฺคลสฺส อปุพฺพํ อจริมํ อาสวปริยาทานญฺจ โหติ ชีวิตปริยาทานญฺจา’’ติ (ปุ. ป. ๑๖) ปุคฺคลปญฺญตฺติยํ อาคตตฺตา เตสุ กิเลสปวตฺตสีสานํ เอว วเสน โยชนํ กโรนฺโต ‘‘กิเลสสีส’’นฺติอาทิมาห. ตตฺถ ปวตฺตสีสมฺปิ มคฺโค ปวตฺติโต วุฏฺฐหนฺโต จุติโต อุทฺธํ อปฺปวตฺติกรเณน ยทิปิ ปริยาทิยติ, ยาว ปน จุติ, ตาว ปวตฺติสมฺภวโต ‘‘ปวตฺตสีสํ ชีวิตินฺทฺริยํ จุติจิตฺตํ ปริยาทิยตี’’ติ อาห. तेरा शीर्षांमध्ये (मुद्द्यांमध्ये) पलिबोधशीर्ष (अडथळ्यांचे शीर्ष) इत्यादी आणि प्रवृत्तीशीर्ष हे परियादियितव्य (क्षय केले जाण्याजोगे) आहेत; अधिमोक्षशीर्ष इत्यादी हे परियादक (क्षय करणारे) आहेत; गोचरशीर्ष हे परियादकफळ (क्षयाचे फळ) आहे. कारण ते विषयाच्या अंतर्गत असलेले फळ आहे, आणि विमोक्ष हा क्षय करणाऱ्या मार्गाचा व फळाचा आलंबन (विषय) आहे. संस्कारशीर्ष हे संस्कारांच्या विवेकरूप (अलिप्ततारूप) असलेला निरोध आहे. अशा प्रकारे क्षय केले जाण्याजोग्या आणि क्षय करणाऱ्या फळांच्या विषयाच्या सिद्धीसह समशीर्षीभाव (समानता) दर्शविण्यासाठी पटिसंभिदामग्गात (पटि. म. १.८७) तेरा शीर्षे सांगितली आहेत. परंतु येथे "ज्या पुद्गलाचा आसवांचा क्षय आणि जीविताचा क्षय एकाच वेळी (अपूर्व अचरम) होतो" (पु. प. १६) असे पुद्गलपञ्ञत्तीमध्ये आलेले असल्यामुळे, त्यांच्यामध्ये क्लेशप्रवृत्तीशीर्षांच्या आधारेच योजना करताना "क्लेशशीर्ष" इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये प्रवृत्तीशीर्ष देखील मार्ग प्रवृत्त होऊन (उदित होऊन) उगम पावत असताना च्युतीनंतर (मृत्य्यूनंतर) पुनरुत्पत्ती न करण्याद्वारे जरी क्षय करत असले, तरी जोपर्यंत च्युती होत नाही, तोपर्यंत प्रवृत्तीची शक्यता असल्यामुळे "प्रवृत्तीशीर्ष, जीवितेंद्रिय आणि च्युतिचित्त यांचा क्षय करते" असे म्हटले आहे. กิเลสปริยาทาเนน อตฺตโน อนนฺตรํ วิย นิปฺผาเทตพฺพา, ปจฺจเวกฺขณวารา จ กิเลสปริยาทานสฺเสว วาราติ วตฺตพฺพตํ อรหนฺติ. ‘‘วิมุตฺตสฺมึ วิมุตฺตมิติ ญาณํ โหตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๗๘; สํ. นิ. ๓.๑๒, ๑๔) หิ วจนโต ปจฺจเวกฺขณปริสมาปเนน กิเลสปริยาทานํ สมาปิตํ นาม โหติ. ตํ ปน ปริสมาปนํ ยทิ จุติจิตฺเตน โหติ, เตเนว ชีวิตปริสมาปนญฺจ โหตีติ อิมาย วารจุติสมตาย กิเลสปริยาทานชีวิตปริยาทานานํ อปุพฺพาจริมตา โหตีติ อาห ‘‘วารสมตายา’’ติ. ภวงฺคํ โอตริตฺวา ปรินิพฺพายโตติ เอตฺถ ปรินิพฺพานจิตฺตเมว ภงฺโคตฺตรณภาเวน วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. क्लेशक्षयामुळे आपल्या लगेचच नंतर निष्पन्न केल्या जाण्याजोग्या, आणि प्रत्यवेक्षणवार (पुनरावलोकन वार) हे क्लेशक्षयाचेच वार आहेत, असे म्हणणे योग्य ठरते. कारण "विमुक्त झाल्यावर 'विमुक्त झाले' असे ज्ञान होते" (म. नि. १.७८; सं. नि. ३.१२, १४) या वचनानुसार प्रत्यवेक्षणाच्या समाप्तीने क्लेशक्षय समाप्त (पूर्ण) होतो. परंतु ती समाप्ती जर च्युतिचित्ताने होत असेल, तर त्यानेच जीवितसमाप्ती देखील होते. या वार-च्युती-समतेमुळे क्लेशक्षय आणि जीवितक्षय यांची अपूर्व-अचरमता (एकाच वेळी होणे) होते, म्हणून "वारसमतेमुळे" असे म्हटले आहे. "भवंगात उतरून परिनिर्वाण पावतो" येथे परिनिर्वाणचित्तच भंगाच्या पलीकडे जाण्याच्या भावाने सांगितले आहे, असे जाणावे. จริตนฺติ จริตา กายวจีมนปฺปวตฺติ. เอตฺถ จ เยน ราคาธิกภาเวน ปุคฺคโล ‘‘ราคจริโต’’ติ ลกฺขียติ, ตยิทํ ลกฺขณํ. เตนาห ‘‘ราคชฺฌาสโย ราคาธิโกติ อตฺโถ’’ติ, เตน อปฺปหีนภาเวน สนฺตาเน ถามคตสฺส ราคสฺส พลภาโว ลกฺขียตีติ ทฏฺฐพฺพํ. เอเสว นโย เสเสสุปิ. "चरित" म्हणजे आचरलेली काय, वाचा आणि मनाची प्रवृत्ती. आणि येथे ज्या रागाच्या अतिरेकामुळे पुद्गल "रागचरित" म्हणून ओळखला जातो, ते हे लक्षण आहे. म्हणूनच "रागाचा आशय असलेला, म्हणजे रागाचा अतिरेक असलेला" असे म्हटले आहे. त्याद्वारे नष्ट न झालेल्या रूपाने संतानामध्ये (चित्तप्रवाहात) दृढ झालेल्या रागाचे बलवानपण दिसून येते, असे जाणावे. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही आहे. สีลวนฺเตหีติ อาทิสทฺทสฺส โลปํ กตฺวา นิทฺเทโส กโตติ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘สีลวนฺตาทีหี’’ติ. อาทิสทฺเทน ทายกาทีนํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. "शीलवंतांद्वारे" (सीलवंतेहि) यामध्ये 'आदि' शब्दाचा लोप करून निर्देश केला आहे, हे दर्शविताना "शीलवंत इत्यादींद्वारे" असे म्हटले आहे. 'आदि' शब्दाने दायक (दान देणारे) इत्यादींचा संग्रह जाणावा. อารมฺมณภูตา [Pg.150] เญยฺยนฺติ อารมฺมณภูตาว เญยฺยํ. "आलंबनभूत ज्ञेय" म्हणजे आलंबनभूतच ज्ञेय होय. ปุถุชฺชนภูมิอาทีสูติ ปุถุชฺชนเสกฺขาเสกฺขภูมีสุ. ตตฺถ ปุถุชฺชนภูมิวเสน สํวโร, เสกฺขภูมิวเสน ปหานภาวนา, อเสกฺขภูมิวเสน สจฺฉิกิริยา, ปุถุชฺชนภูมิเสกฺขภูมิวเสน วา ยถารหํ สํวรปหานภาวนา. ปุพฺพภาคิยา หิ สํวรปหานภาวนา ปุถุชฺชนสฺส สมฺภวนฺติ, อิตรา เสกฺขสฺส, อเสกฺขภูมิวเสน สจฺฉิกิริยา. นยโต ทสฺสิตนฺติ ‘‘ยํ, ภิกฺขเว, มยา ‘อิทํ น กปฺปตี’ติ อปฺปฏิกฺขิตฺตํ, ตํ เจ กปฺปิยํ อนุโลเมติ, อกปฺปิยํ ปฏิพาหติ, ตํ โว กปฺปตี’’ติอาทินา (มหาว. ๓๐๕) นยทสฺสนวเสน ปกาสิตํ. สราคาทิสํวตฺตนนฺติ สราคาทิภาวาย สํวตฺตนํ. "पृथग्जनभूमी इत्यादींमध्ये" म्हणजे पृथग्जन, शैक्ष आणि अशैक्ष भूमींमध्ये. त्यामध्ये पृथग्जनभूमीच्या दृष्टीने संवर, शैक्षभूमीच्या दृष्टीने प्रहाण-भावना (त्याग व विकास), अशैक्षभूमीच्या दृष्टीने साक्षात्कारीकरण, किंवा पृथग्जनभूमी व शैक्षभूमीच्या दृष्टीने योग्यतेनुसार संवर-प्रहाण-भावना होते. कारण पूर्वभागातील संवर-प्रहाण-भावना पृथग्जनाच्या बाबतीत संभवतात, इतर शैक्षाच्या बाबतीत, आणि अशैक्षभूमीच्या दृष्टीने साक्षात्कारीकरण होते. "नयाने (पद्धतीने) दर्शविले आहे" म्हणजे "भिक्खूहो, जे माझ्याद्वारे 'हे कल्पत (योग्य) नाही' म्हणून नाकारलेले नाही, ते जर कल्प्य गोष्टीशी सुसंगत असेल आणि अकल्प्य गोष्टीचा निषेध करत असेल, तर ते तुम्हाला कल्पते (योग्य आहे)" इत्यादींद्वारे (महाव. ३०५) नय दर्शविण्याच्या स्वरूपात प्रकाशित केले आहे. "सरागादिसंवत्तन" म्हणजे सरागादी (रागयुक्त इत्यादी) भावाकडे नेणारे. อญฺญมญฺญํ สํสคฺคโตติ ‘‘สํกิเลสภาคิยญฺจ วาสนาภาคิยญฺจา’’ติอาทินา สํกิเลสภาคิยาทีนํ ปทานํ อญฺญมญฺญสํสคฺคโต. อเนกวิโธติ ทฺวาทสวิโธ ยาว ทฺวานวุตาธิกจตุสหสฺสวิโธปิ อเนกปฺปกาโร. โลกิยสตฺตาธิฏฺฐานาทิสํสคฺคโตติ อาทิสทฺเทน โลกิยํ ญาณํ, โลกุตฺตรํ ญาณํ, โลกิยญฺจ โลกุตฺตรญฺจ ญาณํ, โลกิยํ เญยฺยํ, โลกุตฺตรํ เญยฺยํ, โลกิยญฺจ โลกุตฺตรญฺจ เญยฺยํ, โลกิยํ ญาณญฺจ เญยฺยญฺจ, โลกุตฺตรํ ญาณญฺจ เญยฺยญฺจ, โลกิยญฺจ โลกุตฺตรญฺจ ญาณญฺจ เญยฺยญฺจาติอาทิโก สมฺภวนฺโต ปฏฺฐานเภโท สงฺคหิโต. อุภยตฺถาติ สํกิเลสภาคิยาทิเก, โลกิยาทิเก จ. ยถารหนฺติ โย โย สํสคฺควเสน โยชนํ อรหติ, โส โส ธมฺโม. สมฺภวาวิโรเธเนว หิ โยชนา. น หิ ‘‘โลกิยํ นิพฺเพธภาคิย’’นฺติอาทินา โยชนา สมฺภวติ. परस्परांच्या संसर्गामुळे म्हणजे 'संकिलेसभागिय (संक्लेशभागीय) आणि वासनाभागिय (वासनाभागीय)' इत्यादींद्वारे संकिलेसभागिय इत्यादी पदांच्या परस्पर संसर्गामुळे होय. 'अनेकविध' म्हणजे बारा प्रकारांपासून ते चार हजार ब्याण्णव प्रकारांपर्यंतचे अनेक प्रकार होय. 'लोकिय-सत्ताधिट्ठान (लौकिक प्राणी-अधिष्ठान) इत्यादींच्या संसर्गामुळे' यातील 'इत्यादी' शब्दाने लोकिय ज्ञान, लोकुत्तर ज्ञान, लोकिय आणि लोकुत्तर ज्ञान; लोकिय ज्ञेय, लोकुत्तर ज्ञेय, लोकिय आणि लोकुत्तर ज्ञेय; लोकिय ज्ञान आणि ज्ञेय, लोकुत्तर ज्ञान आणि ज्ञेय, लोकिय व लोकुत्तर ज्ञान आणि ज्ञेय इत्यादी संभवणारा प्रस्थान-भेद (वर्गीकरण भेद) समाविष्ट केला आहे. 'दोन्ही ठिकाणी' म्हणजे संकिलेसभागिय इत्यादींमध्ये आणि लोकिय इत्यादींमध्ये होय. 'यथायोग्य' म्हणजे जो जो धर्म संसर्गाच्या आधारे योजनेस (जोडणीस) पात्र ठरतो, तो तो धर्म होय. कारण संभाव्यतेच्या अविरोधानेच (विसंगती नसतानाच) योजना होते. 'लोकिय हे निब्बेधभागिय (निर्वेधभागीय) आहे' इत्यादी प्रकारे योजना संभवत नाही. ตีสุ ปิฏเกสุ ลพฺภมานสฺสาติ ติสฺโส สงฺคีติโย อารุฬฺเห เตปิฏเก พุทฺธวจเน อุปลพฺภมานสฺส วิชฺชมานสฺส, เอเตน น เกวลํ สงฺคโห เอว ยถาวุตฺตเภทานํ ปฏฺฐานภาคานํ นิทฺธารณาย การณํ, อถ โข ปาฬิยํ ทสฺสนญฺจาติ วิภาเวติ. เตนาห ‘‘ยํ ทิสฺสติ ตาสุ ตาสุ ภูมีสู’’ติ. ‘‘เตเนว หี’’ติอาทินา ยถาวุตฺตสฺส อตฺถสฺส ปาฐานุคมํ ทสฺเสติ. 'तिन्ही पिटकांमध्ये आढळणाऱ्या' म्हणजे तिन्ही संगीतींमध्ये आरूढ झालेल्या त्रिपिटक बुद्धवचनात उपलब्ध असलेल्या, विद्यमान असलेल्या. याने केवळ संग्रहच पूर्वोक्त भेदांच्या प्रस्थान-भागांच्या (वर्गीकरणाच्या भागांच्या) निर्धारणाचे कारण नाही, तर पाळीमध्ये (मूळ पाठात) दिसणे देखील कारण आहे, हे स्पष्ट होते. म्हणूनच म्हटले आहे - 'जे त्या त्या भूमींमध्ये दिसते'. 'त्यामुळेच' इत्यादींद्वारे पूर्वोक्त अर्थाचा पाठाशी सुसंगतपणा दर्शविला आहे. สาสนปฏฺฐานวารวณฺณนา นิฏฺฐิตา. शासनपठ्ठानवार-वर्णन समाप्त झाले. นิคมนกถาวณฺณนา निगमनकथा-वर्णन. สทฺธมฺมาวตรฏฺฐาเนติ [Pg.151] เทสนฺตรโต อาคนฺตฺวา สทฺธมฺมสฺส อวตรโณกาสภูเต สทฺธมฺมสฺสวนธารณปริจยปริปุจฺฉามนสิการพหุลานํ นิวาสฏฺฐานตํ สนฺธาเยตํ วุตฺตํ, อตฺตโน วา สนฺตาเน ปริยตฺติสทฺธมฺมสฺส อนุปฺปเวสนฏฺฐานตาย เอวํ วุตฺตํ. เสสํ สุวิญฺเญยฺยเมวาติ. 'सद्धम्मावतार स्थानात' म्हणजे दुसऱ्या देशातून येऊन सद्धम्माच्या अवतरणाचा (प्रवेशाचा) मार्ग मोकळा झालेल्या, सद्धम्माचे श्रवण, धारण, परिचय, परिपृच्छा (प्रश्न विचारणे) आणि मनसिकार (मनन) करणाऱ्या बहुसंख्य लोकांचे निवासस्थान असण्याच्या संदर्भाने हे म्हटले आहे; किंवा स्वतःच्या चित्तसंततीमध्ये परियत्ति-सद्धम्माच्या (प्रवचन-सद्धम्माच्या) अनुप्रवेशाचे स्थान असल्यामुळे असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखाच आहे. เนตฺติอฏฺฐกถาย ลีนตฺถวณฺณนา นิฏฺฐิตา. नेत्ति-अट्ठकथेचे लीनत्थवर्णन (गूढार्थ वर्णन) समाप्त झाले. เนตฺติปฺปกรณ-ฏีกา นิฏฺฐิตา. नेत्तिप्पकरण-टीका समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
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| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |