| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
Namo tassa bhagavato arahato sammāsambuddhassa Verehrung ihm, dem Erhabenen, dem Heiligen, dem vollkommen Erleuchteten. Khuddakanikāye In der Sammlung der kurzen Lehrreden (Khuddaka-Nikāya) Jātaka-aṭṭhakathā Die Jātaka-Kommentare (Jātaka-Aṭṭhakathā) (Paṭhamo bhāgo) (Erster Teil) Ganthārambhakathā Einleitung des Buches (Ganthārambhakathā) Jātikoṭisahassehi[Pg.1], pamāṇarahitaṃ hitaṃ; Lokassa lokanāthena, kataṃ yena mahesinā. Das unermessliche Wohl für die Welt wurde durch jenen Weltenbeschützer, den großen Seher, durch viele Tausende von Millionen Existenzen hindurch bewirkt. Tassa pāde namassitvā, katvā dhammassa cañjaliṃ; Saṅghañca patimānetvā, sabbasammānabhājanaṃ. Nachdem ich seine Füße verehrt, der Lehre mit gefalteten Händen Ehrerbietung erwiesen und die Gemeinschaft der Jünger, die des höchsten Respekts würdig ist, geehrt habe; Namassanādino assa, puññassa ratanattaye; Pavattassānubhāvena, chetvā sabbe upaddave. durch die Kraft dieses Verdienstes, das aus der Verehrung des Dreifachen Juwels hervorgegangen ist, werde ich, nachdem alle Hindernisse beseitigt sind, die Jātakas verkünden. Taṃ taṃ kāraṇamāgamma, desitāni jutīmatā; Apaṇṇakādīni purā, jātakāni mahesinā. Die früheren Jātakas, beginnend mit dem Apaṇṇaka, wurden von dem glanzvollen großen Seher in Bezug auf diesen und jenen Anlass verkündet. Yāni yesu ciraṃ satthā, lokanittharaṇatthiko; Anante bodhisambhāre, paripācesi nāyako. In welchen Jātakas der Meister, der Führer, der das Entkommen der Welt aus dem Samsara erstrebte, die unendlichen Voraussetzungen für die Erleuchtung über lange Zeit hinweg heranreifen ließ. Tāni sabbāni ekajjhaṃ, āropentehi saṅgahaṃ; Jātakaṃ nāma saṅgītaṃ, dhammasaṅgāhakehi yaṃ. All diese Jātakas wurden von den Bewahrern des Dhamma zusammengetragen und in einer Sammlung als das sogenannte Jātaka rezitiert. Buddhavaṃsassa etassa, icchantena ciraṭṭhitiṃ; Yācito abhigantvāna, therena atthadassinā. Auf die Bitte des Thera Atthadassī hin, welcher das dauerhafte Bestehen dieser Chronik der Buddhas wünschte und an mich herantrat; Asaṃsaṭṭhavihāre[Pg.2], sadā suddhavihārinā; Tatheva buddhamittena, santacittena viññunā. ebenso von Buddhamitta, der ein abgeschiedenes Leben führt, stets in Reinheit verweilt, von friedvollem Geist und weise ist; Mahiṃsāsakavaṃsamhi, sambhūtena nayaññunā; Buddhadevena ca tathā, bhikkhunā suddhabuddhinā. und ebenso von dem Mönch Buddhadeva, der aus der Linie der Mahīśāsakas stammt, die Lehrweise kennt und von reinem Verstand ist; Mahāpurisacariyānaṃ, ānubhāvaṃ acintiyaṃ; Tassa vijjotayantassa, jātakassatthavaṇṇanaṃ. werde ich die Erklärung der Bedeutung dieses Jātaka (Atthavaṇṇanā) vortragen, welche die unvorstellbare Macht des Wirkens des Großen Wesens erhellt, Mahāvihāravāsīnaṃ, vācanāmagganissitaṃ; Bhāsissaṃ bhāsato taṃ me, sādhu gaṇhantu sādhavoti. basierend auf der Tradition der Unterweisung der Bewohner des Mahāvihāra. Mögen die Edlen diese von mir vorgetragene Erklärung aufmerksam aufnehmen. Nidānakathā Die Einleitungserzählung (Nidānakathā) Sā panāyaṃ jātakassa atthavaṇṇanā dūrenidānaṃ, avidūrenidānaṃ, santikenidānanti imāni tīṇi nidānāni dassetvā vaṇṇiyamānā ye naṃ suṇanti, tehi samudāgamato paṭṭhāya viññātattā yasmā suṭṭhu viññātā nāma hoti, tasmā taṃ tāni nidānāni dassetvā vaṇṇayissāma. Da diese Erklärung der Jātakas, wenn sie unter Darlegung der drei Ursprünge – des fernen Ursprungs (Dūre-nidāna), des nicht sehr fernen Ursprungs (Avidūre-nidāna) und des nahen Ursprungs (Santike-nidāna) – erläutert wird, von den Zuhörern von ihrem eigentlichen Ursprung an vollkommen verstanden werden kann, so wollen wir sie unter Darlegung dieser drei Ursprünge erklären. Tattha ādito tāva tesaṃ nidānānaṃ paricchedo veditabbo. Dīpaṅkarapādamūlasmiñhi katābhinīhārassa mahāsattassa yāva vessantarattabhāvā cavitvā tusitapure nibbatti, tāva pavatto kathāmaggo dūrenidānaṃ nāma. Tusitabhavanato pana cavitvā yāva bodhimaṇḍe sabbaññutappatti, tāva pavatto kathāmaggo avidūrenidānaṃ nāma. Santikenidānaṃ pana tesu tesu ṭhānesu viharato tasmiṃ tasmiṃyeva ṭhāne labbhatīti. Hierbei ist zuerst die Abgrenzung dieser Ursprünge zu verstehen: Der Bericht, der von dem Entschluss des großen Wesens zu Füßen des Buddha Dīpaṅkara bis zu seinem Verscheiden aus der Existenz als Vessantara und seiner Wiedergeburt im Tusita-Himmel reicht, wird als der ferne Ursprung (Dūre-nidāna) bezeichnet. Der Bericht jedoch, der vom Verscheiden aus dem Tusita-Himmel bis zur Erlangung der Allwissenheit am Fuße des Bodhi-Baumes reicht, wird als der nicht sehr ferne Ursprung (Avidūre-nidāna) bezeichnet. Der nahe Ursprung (Santike-nidāna) hingegen findet sich an den jeweiligen Orten, an denen der Erhabene verweilte. 1. Dūrenidānakathā 1. Die Erzählung vom fernen Ursprung (Dūrenidāna-kathā) Tatridaṃ dūrenidānaṃ nāma – ito kira kappasatasahassādhikānaṃ catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake amaravatī nāma nagaraṃ ahosi. Tattha sumedho nāma brāhmaṇo paṭivasati ubhato sujāto mātito [Pg.3] ca pitito ca saṃsuddhagahaṇiko yāva sattamā kulaparivaṭṭā akkhitto anupakuṭṭho jātivādena abhirūpo dassanīyo pāsādiko paramāya vaṇṇapokkharatāya samannāgato. So aññaṃ kammaṃ akatvā brāhmaṇasippameva uggaṇhi. Tassa daharakāleyeva mātāpitaro kālamakaṃsu. Athassa rāsivaḍḍhako amacco āyapotthakaṃ āharitvā suvaṇṇarajatamaṇimuttādibharite gabbhe vivaritvā ‘‘ettakaṃ te, kumāra, mātu santakaṃ, ettakaṃ pitu santakaṃ, ettakaṃ ayyakapayyakāna’’nti yāva sattamā kulaparivaṭṭā dhanaṃ ācikkhitvā ‘‘etaṃ paṭipajjāhī’’ti āha. Sumedhapaṇḍito cintesi – ‘‘imaṃ dhanaṃ saṃharitvā mayhaṃ pitupitāmahādayo paralokaṃ gacchantā ekaṃ kahāpaṇampi gahetvā na gatā, mayā pana gahetvā gamanakāraṇaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti. So rañño ārocetvā nagare bheriṃ carāpetvā mahājanassa dānaṃ datvā tāpasapabbajjaṃ pabbaji. Imassa panatthassa āvibhāvatthaṃ imasmiṃ ṭhāne sumedhakathā kathetabbā. Sā panesā kiñcāpi buddhavaṃse nirantaraṃ āgatāyeva, gāthāsambandhena pana āgatattā na suṭṭhu pākaṭā. Tasmā taṃ antarantarā gāthāya sambandhadīpakehi vacanehi saddhiṃ kathessāma. Hierin ist Folgendes der ferne Ursprung: Vor vier Unzählbaren und einhunderttausend Äonen von diesem Weltalter an gemessen gab es eine Stadt namens Amaravatī. Dort lebte ein Brahmane namens Sumedha, der von beiden Seiten, mütterlicherseits wie väterlicherseits, wohlgeboren war, von reinem Schoße bis zur siebten Generation, makellos und ungetadelt in Fragen der Abstammung, wunderschön, herrlich anzusehen, anmutig und mit edelster körperlicher Schönheit ausgestattet. Er verrichtete keine andere Arbeit, sondern erlernte ausschließlich die Künste der Brahmanen. Schon in seiner Jugend verstarben seine Eltern. Daraufhin brachte sein Vermögensverwalter das Rechnungsbuch herbei, öffnete die Schatzkammern, die mit Gold, Silber, Edelsteinen, Perlen und anderem gefüllt waren, wies das Vermögen bis zur siebten Generation der Ahnenreihe nach und sprach: 'Dies, junger Herr, ist der Besitz deiner Mutter, dies der Besitz deines Vaters, und dies der deiner Großeltern und Urgroßeltern; nimm all dies in Besitz.' Der weise Sumedha dachte: 'Obwohl meine Eltern, Großeltern und Vorfahren dieses Vermögen anhäuften, haben sie bei ihrem Übergang in die jenseitige Welt nicht einmal eine einzige Münze mitgenommen. Mir aber gebührt es, so zu handeln, dass ich den wahren Reichtum mitnehmen kann, wenn ich gehe.' Nachdem er den König informiert hatte, ließ er die Trommel in der Stadt schlagen, verteilte Almosen an das Volk und ging in die Hauslosigkeit als Asket (Tāpasa) über. Um diesen Sachverhalt zu verdeutlichen, soll an dieser Stelle die Geschichte von Sumedha erzählt werden. Obwohl diese im Buddhavaṃsa lückenlos überliefert ist, ist sie, da sie in Versform abgefasst ist, nicht sogleich leicht verständlich. Daher werden wir sie hier erzählen, zusammen mit verbindenden Worten zwischen den einzelnen Versen. Sumedhakathā Die Geschichte von Sumedha (Sumedha-kathā) Kappasatasahassādhikānañhi catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake dasahi saddehi avivittaṃ ‘‘amaravatī’’ti ca ‘‘amara’’nti ca laddhanāmaṃ nagaraṃ ahosi, yaṃ sandhāya buddhavaṃse vuttaṃ – Vor vier Unzählbaren und einhunderttausend Äonen gab es nämlich eine Stadt namens „Amaravatī“ oder „Amara“, die niemals frei von den zehn Geräuschen war, worauf sich die folgende Passage im Buddhavaṃsa bezieht: ‘‘Kappe ca satasahasse, caturo ca asaṅkhiye; Amaraṃ nāma nagaraṃ, dassaneyyaṃ manoramaṃ; Dasahi saddehi avivittaṃ, annapānasamāyuta’’nti. „Vor vier Unzählbaren und einhunderttausend Äonen gab es eine Stadt namens Amara, herrlich anzusehen und lieblich, niemals frei von den zehn Geräuschen, reichlich versehen mit Speise und Trank.“ Tattha dasahi saddehi avivittanti hatthisaddena, assasaddena, rathasaddena, bherisaddena, mudiṅgasaddena, vīṇāsaddena, sammasaddena, tāḷasaddena, saṅkhasaddena ‘‘asnātha, pivatha, khādathā’’ti dasamena saddenāti imehi dasahi saddehi avivittaṃ ahosi. Tesaṃ pana saddānaṃ ekadesameva gahetvā – Darin bedeutet „niemals frei von den zehn Geräuschen“, dass sie nicht frei von diesen zehn Geräuschen war: dem Elefantenschall, dem Pferdegewieher, dem Wagengerassel, dem Trommelschlag, dem Ton der Tontrommeln, dem Laut der Vīṇā-Harfe, dem Klang der Zimbeln, dem Schlagen der Gongs, dem Blasen des Muschelhorns und als zehntem Ruf: „Esset, trinket, speiset!“ Um jedoch nur einen Teil dieser Geräusche hervorzuheben, sprach er im Buddhavaṃsa: ‘‘Hatthisaddaṃ [Pg.4] assasaddaṃ, bherisaṅkharathāni ca; Khādatha pivatha ceva, annapānena ghosita’’nti. – „Vom Schall der Elefanten und Pferde, von Trommeln, Muschelhörnern und Wagen, und vom Ruf ‚Esset und trinket!‘ erscholl es ringsum mit Speise und Trank.“ Buddhavaṃse imaṃ gāthaṃ vatvā – Nachdem er diese Strophe im Buddhavaṃsa gesprochen hatte, fuhr er fort: ‘‘Nagaraṃ sabbaṅgasampannaṃ, sabbakammamupāgataṃ; Sattaratanasampannaṃ, nānājanasamākulaṃ; Samiddhaṃ devanagaraṃva, āvāsaṃ puññakamminaṃ. „Die Stadt was mit allen guten Eigenschaften ausgestattet, voller emsiger Betriebsamkeit, reich an den sieben Schätzen und von verschiedensten Menschen bevölkert. Sie war wohlhabend wie eine Götterstadt, eine Wohnstätte für jene, die verdienstvolle Taten vollbracht hatten.“ ‘‘Nagare amaravatiyā, sumedho nāma brāhmaṇo; Anekakoṭisannicayo, pahūtadhanadhaññavā. „In jener Stadt Amaravatī lebte ein Brahmane namens Sumedha, der viele Millionen angehäuft hatte und reich an Besitztümern und Getreide war.“ ‘‘Ajjhāyako mantadharo, tiṇṇaṃ vedāna pāragū; Lakkhaṇe itihāse ca, sadhamme pāramiṃ gato’’ti. – vuttaṃ; „Er war ein Lehrer, der die heiligen Verse bewahrte, die drei Veden vollkommen beherrschte und in der Kunst der Körpermerkmale, den alten Chroniken und in seiner eigenen Tradition Vollkommenheit erlangt hatte.“ – So wurde es gesagt. Athekadivasaṃ so sumedhapaṇḍito uparipāsādavaratale rahogato hutvā pallaṅkaṃ ābhujitvā nisinno cintesi – ‘‘punabbhave, paṇḍita, paṭisandhiggahaṇaṃ nāma dukkhaṃ, tathā nibbattanibbattaṭṭhāne sarīrabhedanaṃ, ahañca jātidhammo jarādhammo byādhidhammo maraṇadhammo, evaṃbhūtena mayā ajātiṃ ajaraṃ abyādhiṃ adukkhaṃ sukhaṃ sītalaṃ amatamahānibbānaṃ pariyesituṃ vaṭṭati, avassaṃ bhavato muccitvā nibbānagāminā ekena maggena bhavitabba’’nti. Tena vuttaṃ – Eines Tages zog sich der weise Sumedha auf das oberste Stockwerk seines prächtigen Palastes zurück, setzte sich im Kreuzsitz nieder und dachte bei sich: „O Weiser, wahrlich, eine erneute Empfängnis im Daseinskreislauf ist leidvoll; ebenso ist der Zerfall des Körpers an jedem Ort der Wiedergeburt leidvoll. Ich selbst unterliege der Geburt, dem Altern, der Krankheit und dem Tod. Als einer, der dieser Natur unterworfen ist, ist es für mich angebracht, nach dem ungeborenen, alterlosen, krankheitsfreien, leidfreien, glückbringenden, kühlen und todlosen großen Nibbāna zu streben. Es muss gewiss einen einzigen Pfad geben, der aus dem Werden herausführt und zum Nibbāna leitet.“ Darauf bezieht sich das Folgende: ‘‘Rahogato nisīditvā, evaṃ cintesahaṃ tadā; Dukkho punabbhavo nāma, sarīrassa ca bhedanaṃ. Als ich mich an einen einsamen Ort zurückgezogen hatte und niedersass, dachte ich damals so: Leidvoll ist wahrlich das erneute Werden im neuen Dasein und das Zerbrechen des Körpers. ‘‘Jātidhammo jarādhammo, byādhidhammo sahaṃ tadā; Ajaraṃ amataṃ khemaṃ, pariyesissāmi nibbutiṃ. Da ich selbst der Natur der Geburt, des Alterns und der Krankheit unterworfen bin, will ich das Unalternde, das Todeslose, das Sichere, das Erlöschen (Nibbāna) suchen. ‘‘Yaṃnūnimaṃ pūtikāyaṃ, nānākuṇapapūritaṃ; Chaḍḍayitvāna gaccheyyaṃ, anapekkho anatthiko. Wie wäre es, wenn ich diesen fauligen Körper, der mit allerlei stinkendem Aas gefüllt ist, ohne Verlangen und ohne Begehren zurückließe und wegginge? ‘‘Atthi hehiti so maggo, na so sakkā na hetuye; Pariyesissāmi taṃ maggaṃ, bhavato parimuttiyā’’ti. Es gibt jenen Pfad zur Befreiung vom Dasein, es muss ihn geben; es ist unmöglich, dass er nicht existiert. Ich werde diesen Pfad zur Befreiung vom Dasein suchen. Tato [Pg.5] uttaripi evaṃ cintesi – yathā hi loke dukkhassa paṭipakkhabhūtaṃ sukhaṃ nāma atthi, evaṃ bhave sati tappaṭipakkhena vibhavenāpi bhavitabbaṃ. Yathā ca uṇhe sati tassa vūpasamabhūtaṃ sītampi atthi, evaṃ rāgādīnaṃ aggīnaṃ vūpasamena nibbānenāpi bhavitabbaṃ. Yathā ca pāpassa lāmakassa dhammassa paṭipakkhabhūto kalyāṇo anavajjadhammopi atthiyeva, evameva pāpikāya jātiyā sati sabbajātikkhepanato ajātisaṅkhātena nibbānenāpi bhavitabbamevāti. Tena vuttaṃ – Darüber hinaus dachte er auch so: Wie es in der Welt das Glück gibt, das das Gegenteil des Leides darstellt, ebenso muss es, wenn Dasein existiert, auch das Nicht-Dasein als dessen Gegenteil geben. Und wie bei vorhandener Hitze auch Kälte existiert, die diese lindert, ebenso muss es beim Erlöschen der Feuer von Gier und den anderen Leidenschaften auch das Nibbāna geben. Und wie es als Gegenteil zu unheilsamen, schlechten Zuständen gewiss auch heilsame, tadellose Zustände gibt, ebenso gewiss muss es, wenn es die üble Geburt gibt, auch das Nibbāna geben, welches als das Geburtslose bezeichnet wird, da es alle Geburten überwindet. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Yathāpi dukkhe vijjante, sukhaṃ nāmapi vijjati; Evaṃ bhave vijjamāne, vibhavopi icchitabbako. Wie beim Vorhandensein von Leid auch das sogenannte Glück existiert, ebenso ist beim Vorhandensein von Dasein anzunehmen, dass es auch ein Nicht-Dasein geben muss. ‘‘Yathāpi uṇhe vijjante, aparaṃ vijjati sītalaṃ; Evaṃ tividhaggi vijjante, nibbānaṃ icchitabbakaṃ. Wie beim Vorhandensein von Hitze auch das Gegenteil, die Kälte, existiert, ebenso ist beim Vorhandensein der dreifachen Feuer (von Gier, Hass und Verblendung) anzunehmen, dass es das Nibbāna geben muss. ‘‘Yathāpi pāpe vijjante, kalyāṇamapi vijjati; Evameva jāti vijjante, ajātipicchitabbaka’’nti. Wie beim Vorhandensein des Bösen auch das Gute existiert, ebenso gewiss ist beim Vorhandensein von Geburt anzunehmen, dass auch das Geburtslose existieren muss. Aparampi cintesi – yathā nāma gūtharāsimhi nimuggena purisena dūrato pañcavaṇṇapadumasañchannaṃ mahātaḷākaṃ disvā ‘‘katarena nu kho maggena ettha gantabba’’nti taṃ taḷākaṃ gavesituṃ yuttaṃ. Yaṃ tassa agavesanaṃ, na so taḷākassa doso. Evameva kilesamaladhovane amatamahānibbānataḷāke vijjante tassa agavesanaṃ na amatanibbānamahātaḷākassa doso. Yathā ca corehi samparivārito puriso palāyanamagge vijjamānepi sace na palāyati, na so maggassa doso, purisasseva doso. Evameva kilesehi parivāretvā gahitassa purisassa vijjamāneyeva nibbānagāmimhi sive magge maggassa agavesanaṃ nāma na maggassa doso, puggalasseva doso. Yathā ca byādhipīḷito puriso vijjamāne byādhitikicchake vejje sace taṃ vejjaṃ gavesitvā byādhiṃ na tikicchāpeti, na so vejjassa doso, purisasseva doso. Evameva yo kilesabyādhipīḷito puriso kilesavūpasamamaggakovidaṃ vijjamānameva ācariyaṃ na gavesati, tasseva doso, na kilesavināsakassa ācariyassāti. Tena vuttaṃ – Er dachte weiter: Wie ein Mann, der in einem Misthaufen versunken ist, wenn er aus der Ferne einen großen, mit fünf farbigen Lotusblumen bedeckten See sieht, sich fragen sollte: 'Auf welchem Weg kann ich dorthin gelangen?' und es für ihn angemessen wäre, diesen See aufzusuchen; und wenn er ihn nicht sucht, dies nicht die Schuld des Sees ist – ebenso ist es nicht die Schuld des großen, todeslosen Nibbāna-Sees, der den Schmutz der Befleckungen abwäscht, wenn man ihn nicht sucht, obwohl er existiert. Und wie bei einem Mann, der von Räubern umringt ist, wenn er nicht flieht, obwohl ein Fluchtweg vorhanden ist, dies nicht die Schuld des Weges, sondern die Schuld des Mannes selbst ist – ebenso ist es, wenn ein von Befleckungen umgebener und ergriffener Mann den tatsächlich existierenden, friedvollen, nach Nibbāna führenden Pfad nicht sucht, nicht die Schuld des Pfades, sondern die Schuld der Person selbst. Und wie ein von Krankheit geplagter Mann, wenn ein Arzt, der Krankheiten behandeln kann, vorhanden ist, diesen Arzt nicht aufsucht und seine Krankheit nicht behandeln lässt, dies nicht die Schuld des Arztes, sondern die Schuld des Mannes selbst ist – ebenso ist es die Schuld des Mannes selbst und nicht die des die Befleckungen vernichtenden Lehrers, wenn er, von der Krankheit der Befleckungen geplagt, den tatsächlich existierenden Lehrer nicht aufsucht, der den Pfad zur Beruhigung der Befleckungen meisterhaft kennt. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Yathā gūthagato puriso, taḷākaṃ disvāna pūritaṃ; Na gavesati taṃ taḷākaṃ, na doso taḷākassa so. Wie ein in Kot versunkener Mann, der einen vollen See sieht, diesen See nicht aufsucht – so ist dies nicht die Schuld des Sees. ‘‘Evaṃ [Pg.6] kilesamaladhove, vijjante amatantaḷe; Na gavesati taṃ taḷākaṃ, na doso amatantaḷe. Ebenso, wenn der todeslose See, der den Schmutz der Befleckungen abwäscht, existiert: Wenn man diesen See nicht aufsucht, ist dies nicht die Schuld des todeslosen Sees. ‘‘Yathā arīhi pariruddho, vijjante gamanampathe; Na palāyati so puriso, na doso añjasassa so. Wie ein von Feinden umringter Mann, wenn ein Fluchtweg existiert, nicht flieht – so ist dies nicht die Schuld des Weges. ‘‘Evaṃ kilesapariruddho, vijjamāne sive pathe; Na gavesati taṃ maggaṃ, na doso sivamañjase. Ebenso, wenn einer von Befleckungen umringt ist und der friedvolle Pfad existiert: Wenn er diesen Pfad nicht aufsucht, ist dies nicht die Schuld des friedvollen Weges. ‘‘Yathāpi byādhito puriso, vijjamāne tikicchake; Na tikicchāpeti taṃ byādhiṃ, na doso so tikicchake. Wie auch ein kranker Mann, wenn ein heilender Arzt vorhanden ist, seine Krankheit nicht behandeln lässt – so ist dies nicht die Schuld des Arztes. ‘‘Evaṃ kilesabyādhīhi, dukkhito paripīḷito; Na gavesati taṃ ācariyaṃ, na doso so vināyake’’ti. Ebenso, wenn jemand von den Krankheiten der Befleckungen gequält und geplagt wird und jenen Lehrer nicht aufsucht – so ist dies nicht die Schuld des Wegweisers. Aparampi cintesi – yathā maṇḍanajātiko puriso kaṇṭhe āsattaṃ kuṇapaṃ chaḍḍetvā sukhī gacchati, evaṃ mayāpi imaṃ pūtikāyaṃ chaḍḍetvā anapekkhena nibbānanagaraṃ pavisitabbaṃ. Yathā ca naranāriyo ukkārabhūmiyaṃ uccārapassāvaṃ katvā na taṃ ucchaṅgena vā ādāya dasantena vā veṭhetvā gacchanti, jigucchamānā pana anapekkhāva chaḍḍetvā gacchanti, evaṃ mayāpi imaṃ pūtikāyaṃ anapekkhena chaḍḍetvā amataṃ nibbānanagaraṃ pavisituṃ vaṭṭati. Yathā ca nāvikā nāma jajjaraṃ nāvaṃ anapekkhā chaḍḍetvā gacchanti, evaṃ ahampi imaṃ navahi vaṇamukhehi paggharantaṃ kāyaṃ chaḍḍetvā anapekkho nibbānapuraṃ pavisissāmi. Yathā ca puriso nānāratanāni ādāya corehi saddhiṃ maggaṃ gacchanto attano ratananāsabhayena te chaḍḍetvā khemaṃ maggaṃ gaṇhāti, evaṃ ayampi karajakāyo ratanavilopakacorasadiso. Sacāhaṃ ettha taṇhaṃ karissāmi, ariyamaggakusaladhammaratanaṃ me nassissati. Tasmā mayā imaṃ corasadisaṃ kāyaṃ chaḍḍetvā nibbānanagaraṃ pavisituṃ vaṭṭatīti. Tena vuttaṃ – Er dachte weiter: Wie ein Mann, der sich gerne schmückt, ein an seinem Hals hängendes Aas wegwirft und glücklich und unbeschwert seines Weges geht, ebenso sollte auch ich diesen fauligen Körper abwerfen und verlangenslos die Stadt des Nibbāna betreten. Und wie Männer und Frauen, nachdem sie auf der Freistatt Kot und Urin gelassen haben, diesen nicht in ihrem Schoß mitnehmen oder in den Saum ihres Gewandes einwickeln und forttragen, sondern ihn voller Abscheu und ohne Verlangen zurücklassen und weggehen – ebenso ziemt es sich für mich, diesen fauligen Körper verlangenslos abzuwerfen und die todeslose Stadt des Nibbāna zu betreten. Und wie Fährleute ein morsches Boot verlangenslos zurücklassen und davonfahren, ebenso werde auch ich diesen Körper, aus dessen neun Wundöffnungen Unrat fließt, zurücklassen und verlangenslos die Stadt des Nibbāna betreten. Und wie ein Mann, der verschiedene Schätze mit sich führt und mit Räubern auf dem Weg ist, aus Angst vor dem Verlust seiner Schätze jene Räuber verlässt und einen sicheren Weg einschlägt – ebenso ist dieser physische Körper einem räuberischen Dieb gleich, der Schätze raubt. Wenn ich an diesem Körper Verlangen hege, wird das Juwel des heilsamen Dhammas des edlen Pfades für mich verloren gehen. Darum ziemt es sich für mich, diesen räubergleichen Körper abzuwerfen und die Stadt des Nibbāna zu betreten. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Yathāpi kuṇapaṃ puriso, kaṇṭhe baddhaṃ jigucchiya; Mocayitvāna gaccheyya, sukhī serī sayaṃvasī. Wie ein Mann ein um seinen Hals gebundenes Aas voller Abscheu losmachen und glücklich, frei und als sein eigener Herr davongehen würde; ‘‘Tathevimaṃ [Pg.7] pūtikāyaṃ, nānākuṇapasañcayaṃ; Chaḍḍayitvāna gaccheyyaṃ, anapekkho anatthiko. ebenso möchte ich diesen fauligen Körper, der eine Anhäufung verschiedener Kadaver ist, zurücklassen und ohne Verlangen und ohne Begehren davonrücken. ‘‘Yathā uccāraṭṭhānamhi, karīsaṃ naranāriyo; Chaḍḍayitvāna gacchanti, anapekkhā anatthikā. Wie Männer und Frauen an der Kotstätte den Kot zurücklassen und ohne Verlangen und Begehren weggehen; ‘‘Evamevāhaṃ imaṃ kāyaṃ, nānākuṇapapūritaṃ; Chaḍḍayitvāna gacchissaṃ, vaccaṃ katvā yathā kuṭiṃ. ebenso werde ich diesen mit verschiedenen Kadavern gefüllten Körper abwerfen und fortgehen, wie man nach dem Kotlassen den Abtritt verlässt. ‘‘Yathāpi jajjaraṃ nāvaṃ, paluggaṃ udagāhiniṃ; Sāmī chaḍḍetvā gacchanti, anapekkhā anatthikā. Wie die Besitzer ein morsches, brüchiges Boot, das Wasser einlässt, zurücklassen und ohne Bedauern und Begehren weggehen; ‘‘Evamevāhaṃ imaṃ kāyaṃ, navacchiddaṃ dhuvassavaṃ; Chaḍḍayitvāna gacchissaṃ, jiṇṇanāvaṃva sāmikā. ebenso werde ich diesen Körper mit seinen neun Öffnungen, aus denen es ständig fließt, abwerfen und fortgehen, wie die Besitzer ein morsches Boot verlassen. ‘‘Yathāpi puriso corehi, gacchanto bhaṇḍamādiya; Bhaṇḍacchedabhayaṃ disvā, chaḍḍayitvāna gacchati. Wie ein Mann, der wertvolle Güter mit sich führt und mit Räubern reist, die Gefahr des Raubes seiner Güter erkennt, jene Räuber verlässt und seines Weges geht; ‘‘Evameva ayaṃ kāyo, mahācorasamo viya; Pahāyimaṃ gamissāmi, kusalacchedanābhayā’’ti. ebenso ist dieser Körper einem Erzräuber gleich; ich werde ihn hinter mir lassen und fortgehen, aus Angst vor dem Verlust meiner heilsamen Güter (des edlen Pfades). Evaṃ sumedhapaṇḍito nānāvidhāhi upamāhi imaṃ nekkhammūpasaṃhitaṃ atthaṃ cintetvā sakanivesane aparimitaṃ bhogakkhandhaṃ heṭṭhā vuttanayena kapaṇaddhikādīnaṃ vissajjetvā mahādānaṃ datvā vatthukāme ca kilesakāme ca pahāya amaranagarato nikkhamitvā ekakova himavante dhammikaṃ nāma pabbataṃ nissāya assamaṃ katvā tattha paṇṇasālañca caṅkamañca māpetvā pañcahi nīvaraṇadosehi vivajjitaṃ ‘‘evaṃ samāhite citte’’tiādinā nayena vuttehi aṭṭhahi kāraṇaguṇehi samupetaṃ abhiññāsaṅkhātaṃ balaṃ āharituṃ tasmiṃ assamapade navadosasamannāgataṃ sāṭakaṃ pajahitvā dvādasaguṇasamannāgataṃ vākacīraṃ nivāsetvā isipabbajjaṃ pabbaji. Evaṃ pabbajito aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ taṃ paṇṇasālaṃ pahāya dasaguṇasamannāgataṃ rukkhamūlaṃ upagantvā sabbaṃ dhaññavikatiṃ pahāya pavattaphalabhojano hutvā nisajjaṭṭhānacaṅkamanavaseneva padhānaṃ padahanto sattāhabbhantareyeva aṭṭhannaṃ samāpattīnaṃ pañcannañca abhiññānaṃ lābhī ahosi. Evaṃ taṃ yathāpatthitaṃ abhiññābalaṃ pāpuṇi. Tena vuttaṃ – Als der weise Sumedha so durch verschiedene Gleichnisse über diese mit der Entsagung verbundene Angelegenheit nachgedacht hatte, verteilte er den unermesslichen Reichtum in seinem Hause in der oben beschriebenen Weise an Arme, Reisende und andere, gab ein großes Almosen, entsagte sowohl den Objekten des Begehrens als auch den Befleckungen des Begehrens, verließ die Stadt Amara und zog ganz allein in den Himalaya. Dort errichtete er in der Nähe des Berges namens Dhammika eine Einsiedelei, erschuf eine Blätterhütte und einen Wandelpfad, legte sein mit neun Fehlern behaftetes Gewand ab und legte ein mit zwölf Vorzügen ausgestattetes Rindenkleid an, um jene Kraft zu erlangen, die man als die höheren Geisteskräfte bezeichnet – welche frei von den fünf Fehlern der Hemmnisse ist und mit den acht ursächlichen Qualitäten ausgestattet ist, die in der Weise von „wenn der Geist so gesammelt ist“ usw. beschrieben werden –, und trat in die Hauslosigkeit der Seher ein. Als er so ordiniert war, verließ er jene von acht Fehlern erfüllte Blätterhütte, begab sich an den Fuß eines Baumes, der mit zehn Vorzügen ausgestattet war, gab jegliche Art von zubereitetem Getreide auf und ernährte sich nur von von selbst herabgefallenen Früchten. Indem er die Hauptpraxis allein durch Sitzen, Stehen und Gehen eifrig ausfÿhrte, erlangte er innerhalb von nur sieben Tagen die acht Errungenschaften und die fünf höheren Geisteskräfte. So erreichte er jene wie gewünscht angestrebte Kraft der höheren Geisteskräfte. Darum wurde gesagt: ‘‘Evāhaṃ [Pg.8] cintayitvāna, nekakoṭisataṃ dhanaṃ; Nāthānāthānaṃ datvāna, himavantamupāgamiṃ. „Nachdem ich so nachgedacht und Reichtum von vielen Hunderten von Millionen an Schutzbedürftige und Schutzlose verschenkt hatte, begab ich mich in den Himalaya.“ ‘‘Himavantassāvidūre, dhammiko nāma pabbato; Assamo sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā. „Nicht weit vom Himalaya entfernt liegt der Berg namens Dhammika; dort wurde mir eine wohlgebaute Einsiedelei errichtet und eine Blätterhütte wohl erschaffen.“ ‘‘Caṅkamaṃ tattha māpesiṃ, pañcadosavivajjitaṃ; Aṭṭhaguṇasamupetaṃ, abhiññābalamāhariṃ. „Dort erschuf ich einen Wandelpfad, der frei von fünf Fehlern und mit acht Vorzügen ausgestattet war, und erlangte die Kraft der höheren Geisteskräfte.“ ‘‘Sāṭakaṃ pajahiṃ tattha, navadosamupāgataṃ; Vākacīraṃ nivāsesiṃ, dvādasaguṇamupāgataṃ. „Dort legte ich mein Gewand ab, das mit neun Fehlern behaftet war, und legte ein Rindenkleid an, das mit zwölf Vorzügen ausgestattet war.“ ‘‘Aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ, pajahiṃ paṇṇasālakaṃ; Upāgamiṃ rukkhamūlaṃ, guṇe dasahupāgataṃ. „Ich verließ die kleine Blätterhütte, die von acht Fehlern erfüllte war, und begab mich an den Fuß eines Baumes, der mit zehn Vorzügen ausgestattet war.“ ‘‘Vāpitaṃ ropitaṃ dhaññaṃ, pajahiṃ niravasesato; Anekaguṇasampannaṃ, pavattaphalamādiyiṃ. „Gesätes und gepflanztes Getreide gab ich gänzlich und ohne Rest auf; stattdessen nahm ich von selbst herabgefallene Früchte zu mir, die mit vielen Vorzügen ausgestattet waren.“ ‘‘Tatthappadhānaṃ padahiṃ, nisajjaṭṭhānacaṅkame; Abbhantaramhi sattāhe, abhiññābalapāpuṇi’’nti. „Dort eiferte ich in der Hauptpraxis durch Sitzen, Stehen und Begehen des Wandelpfades; innerhalb von sieben Tagen erlangte ich die Kraft der höheren Geisteskräfte.“ Tattha ‘‘assamo sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā’’ti imāya pāḷiyā sumedhapaṇḍitena assamapaṇṇasālācaṅkamā sahatthā māpitā viya vuttā. Ayaṃ panettha attho – mahāsattaṃ ‘‘himavantaṃ ajjhogāhetvā ajja dhammikaṃ pabbataṃ pavisissāmī’’ti nikkhantaṃ disvā sakko devānamindo vissakammadevaputtaṃ āmantesi – ‘‘tāta, ayaṃ sumedhapaṇḍito pabbajissāmīti nikkhanto, etassa vasanaṭṭhānaṃ māpehī’’ti. So tassa vacanaṃ sampaṭicchitvā ramaṇīyaṃ assamaṃ, suguttaṃ paṇṇasālaṃ, manoramaṃ caṅkamañca māpesi. Bhagavā pana tadā attano puññānubhāvena nipphannaṃ taṃ assamapadaṃ sandhāya sāriputta, tasmiṃ dhammikapabbate – Hierbei wird durch diese kanonischen Worte: ‘Mir wurde eine wohlgebaute Einsiedelei errichtet, eine Blätterhütte wohl erschaffen’ ausgedrückt, als ob die Einsiedelei, die Blätterhütte und der Wandelpfad vom weisen Sumedha mit eigener Hand erschaffen worden wären. Die Bedeutung dahinter ist jedoch folgende: Als Sakka, der Herrscher der Götter, das Große Wesen ausziehen sah, um in den Himalaya einzudringen und heute den Berg Dhammika zu betreten, sprach er zum Göttersohn Vissakamma: ‘Lieber Vissakamma, dieser weise Sumedha ist ausgezogen, um in die Hauslosigkeit einzutreten; erschaffe ihm eine Wohnstätte!’ Dieser nahm die Worte Sakkas an und erschuf eine liebliche Einsiedelei, eine gut geschützte Blätterhütte und einen entzückenden Wandelpfad. Der Erhabene aber bezog sich auf diesen Ort der Einsiedelei, der damals durch die Macht seiner eigenen Verdienste entstanden war, und sprach: ‘Sāriputta, auf jenem Berg Dhammika:’ ‘‘Assamo sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā; Caṅkamaṃ tattha māpesiṃ, pañcadosavivajjita’’nti. – „‘wurde mir eine wohlgebaute Einsiedelei errichtet, eine Blätterhütte wohl erschaffen; dort erschuf ich einen Wandelpfad, der frei von fünf Fehlern war.’“ Āha. Tattha sukato mayhanti sukato mayā. Paṇṇasālā sumāpitāti paṇṇacchadanasālāpi me sumāpitā ahosi. So sprach er. Darin bedeutet ‘sukato mayhaṃ’: ‘von mir wohlgebaut’. ‘Paṇṇasālā sumāpitā’ bedeutet: ‘auch die mit Blättern gedeckte Hütte wurde für mich wohl erschaffen’. Pañcadosavivajjitanti [Pg.9] pañcime caṅkamadosā nāma – thaddhavisamatā, antorukkhatā, gahanacchannatā, atisambādhatā, ativisālatāti. Thaddhavisamabhūmibhāgasmiñhi caṅkame caṅkamantassa pādā rujjanti, phoṭā uṭṭhahanti, cittaṃ ekaggaṃ na labhati, kammaṭṭhānaṃ vipajjati. Mudusamatale pana phāsuvihāraṃ āgamma kammaṭṭhānaṃ sampajjati. Tasmā thaddhavisamabhūmibhāgatā eko dosoti veditabbo. Caṅkamassa anto vā majjhe vā koṭiyaṃ vā rukkhe sati pamādamāgamma caṅkamantassa nalāṭaṃ vā sīsaṃ vā paṭihaññatīti antorukkhatā dutiyo doso. Tiṇalatādigahanacchanne caṅkame caṅkamanto andhakāravelāyaṃ uragādike pāṇe akkamitvā vā māreti, tehi vā daṭṭho dukkhaṃ āpajjatīti gahanacchannatā tatiyo doso. Atisambādhe caṅkame vitthārato ratanike vā aḍḍharatanike vā caṅkamantassa paricchede pakkhalitvā nakhāpi aṅguliyopi bhijjantīti atisambādhatā catuttho doso. Ativisāle caṅkame caṅkamantassa cittaṃ vidhāvati, ekaggataṃ na labhatīti ativisālatā pañcamo doso. Puthulato pana diyaḍḍharatanaṃ dvīsu passesu ratanamattaanucaṅkamaṃ dīghato saṭṭhihatthaṃ mudutalaṃ samavippakiṇṇavālukaṃ caṅkamaṃ vaṭṭati cetiyagirimhi dīpappasādakamahindattherassa caṅkamanaṃ viya, tādisaṃ taṃ ahosi. Tenāha ‘‘caṅkamaṃ tattha māpesiṃ, pañcadosavivajjita’’nti. „Pañcadosavivajjitaṃ“ bedeutet, dass dies die fünf Fehler eines Wandelpfades sind: Härte und Unebenheit des Bodens, Bäume auf dem Pfad, Überwucherung mit Dickicht, extreme Enge und extreme Breite. Denn auf einem Wandelpfad mit hartem und unebenem Boden schmerzen demjenigen, der auf ihm auf und ab geht, die Füße, es bilden sich Blasen, der Geist erlangt keine Einspitzigkeit und das Meditationsobjekt schlägt fehl. Auf einem weichen und ebenen Boden hingegen gelingt das Meditationsobjekt aufgrund des angenehmen Verweilens. Daher ist eine harte und unebene Bodenbeschaffenheit als der erste Fehler anzusehen. Wenn sich am Anfang, in der Mitte oder am Ende des Wandelpfades ein Baum befindet, stößt sich derjenige, der dort aus Unachtsamkeit wandelt, die Stirn oder den Kopf; somit ist das Vorhandensein von Bäumen auf dem Pfad der zweite Fehler. Wenn man auf einem mit Gras, Ranken und Ähnlichem überwucherten Wandelpfad in der Dunkelheit auf und ab geht, tritt man auf Lebewesen wie Schlangen und tötet sie, oder man wird von ihnen gebissen und erleidet Schmerz; somit ist die Überwucherung mit Dickicht der dritte Fehler. Auf einem extrem engen Wandelpfad, der in der Breite nur eine Elle oder eine halbe Elle misst, stolpert man beim Gehen an den Rändern, sodass man sich die Fußnägel oder die Zehen verletzt; somit ist die extreme Enge der vierte Fehler. Auf einem extrem breiten Wandelpfad schweift der Geist dessen, der dort geht, umher und erlangt keine Einspitzigkeit; somit ist die extreme Breite der fünfte Fehler. Angemessen ist jedoch ein Wandelpfad, der in der Breite anderthalb Ellen misst, an beiden Seiten einen kleinen Nebenpfad von etwa einer Elle hat, in der Länge sechzig Ellen misst, einen weichen Boden besitzt und gleichmäßig mit Sand bestreut ist – so wie der Wandelpfad des ehrwürdigen Mahinda-Thera auf dem Cetiyagiri, der die ganze Insel erfreute; von solcher Art war er. Darum sprach er: ‘dort erschuf ich einen Wandelpfad, der frei von fünf Fehlern war.’ Aṭṭhaguṇasamupetanti aṭṭhahi samaṇasukhehi upetaṃ. Aṭṭhimāni samaṇasukhāni nāma – dhanadhaññapariggahābhāvo, anavajjapiṇḍapātapariyesanabhāvo, nibbutapiṇḍapātabhuñjanabhāvo, raṭṭhaṃ pīḷetvā dhanasāraṃ vā sīsakahāpaṇādīni vā gaṇhantesu rājakulesu raṭṭhapīḷanakilesābhāvo, upakaraṇesu nicchandarāgabhāvo, coravilope nibbhayabhāvo, rājarājamahāmattehi asaṃsaṭṭhabhāvo, catūsu disāsu appaṭihatabhāvoti. Idaṃ vuttaṃ hoti – yathā tasmiṃ assame vasantena sakkā honti imāni aṭṭha samaṇasukhāni vindituṃ, evaṃ aṭṭhaguṇasamupetaṃ taṃ assamaṃ māpesinti. „Aṭṭhabhāgasamupetaṃ“ bedeutet: mit den acht Freuden eines Asketen versehen. Dies sind die acht Freuden eines Asketen: das Freisein vom Horten von Besitz und Getreide, das Suchen nach fehlerlosem Almosenessen, das sorgenfreie und friedliche Verzehren der Almosenspeise, das Freisein von der mit der Bedrückung des Landes verbundenen Trübung, wenn königliche Familien das Land bedrücken, um Reichtümer oder Blei-Münzen usw. einzutreiben, das Freisein von Begierde und Anhaftung bezüglich der Bedarfsgegenstände, das Freisein von Furcht vor Räuberüberfällen, das Freisein von gesellschaftlichem Umgang mit Königen und königlichen Staatsministern sowie das ungehinderte Gehen in alle vier Himmelsrichtungen. Dies will besagen: In solcher Weise, dass ein in jener Einsiedelei Lebender in der Lage ist, diese acht Freuden eines Asketen zu erfahren, wurde jene mit acht Vorzügen ausgestattete Einsiedelei erschaffen. Abhiññābalamāharinti pacchā tasmiṃ assame vasanto kasiṇaparikammaṃ katvā abhiññānaṃ samāpattīnañca uppādanatthāya aniccato dukkhato vipassanaṃ ārabhitvā thāmappattaṃ vipassanābalaṃ āhariṃ. Yathā tasmiṃ vasanto taṃ balaṃ [Pg.10] āharituṃ sakkomi, evaṃ taṃ assamaṃ tassa abhiññatthāya vipassanābalassa anucchavikaṃ katvā māpesinti attho. „Abhiññābalamāhariṃ“ bedeutet: Später, als ich in jener Einsiedelei lebte, vollzog ich die Kasiṇa-Vorbereitungsübungen, leitete zur Erlangung der höheren Geisteskräfte und Errungenschaften die Hellsichtmeditation über die Unbeständigkeit und das Leiden ein und erlangte so die mächtige Kraft der Hellsicht. Dies bedeutet: In solcher Weise, dass ich dort lebend fähig war, jene Kraft zu erlangen, erschuf ich jene Einsiedelei, indem ich sie passend für jene höheren Geisteskräfte und für jene Kraft der Hellsicht gestaltete. Sāṭakaṃ pajahiṃ tattha, navadosamupāgatanti etthāyaṃ anupubbikathā – tadā kira kuṭileṇacaṅkamādipaṭimaṇḍitaṃ pupphūpagaphalūpagarukkhasañchannaṃ ramaṇīyaṃ madhurasalilāsayaṃ apagatavāḷamigabhiṃsanakasakuṇaṃ pavivekakkhamaṃ assamaṃ māpetvā alaṅkatacaṅkamassa ubhosu antesu ālambanaphalakaṃ saṃvidhāya nisīdanatthāya caṅkamavemajjhe samatalaṃ muggavaṇṇasilaṃ māpetvā antopaṇṇasālāyaṃ jaṭāmaṇḍalavākacīratidaṇḍakuṇḍikādike tāpasaparikkhāre, maṇḍape pānīyaghaṭapānīyasaṅkhapānīyasarāvāni, aggisālāyaṃ aṅgārakapalladāruādīnīti evaṃ yaṃ yaṃ pabbajitānaṃ upakārāya saṃvattati, taṃ taṃ sabbaṃ māpetvā paṇṇasālāya bhittiyaṃ ‘‘ye keci pabbajitukāmā ime parikkhāre gahetvā pabbajantū’’ti akkharāni chinditvā devalokameva gate vissakammadevaputte sumedhapaṇḍito himavantapabbatapāde girikandarānusārena attano nivāsānurūpaṃ phāsukaṭṭhānaṃ olokento nadīnivattane vissakammanimmitaṃ sakkadattiyaṃ ramaṇīyaṃ assamaṃ disvā caṅkamanakoṭiṃ gantvā padavalañjaṃ apassanto ‘‘dhuvaṃ pabbajitā dhuragāme bhikkhaṃ pariyesitvā kilantarūpā āgantvā paṇṇasālaṃ pavisitvā nisinnā bhavissantī’’ti cintetvā thokaṃ āgametvā ‘‘ativiya cirāyanti, jānissāmī’’ti paṇṇāsālākuṭidvāraṃ vivaritvā anto pavisitvā ito cito ca olokento mahābhittiyaṃ akkharāni vācetvā ‘‘mayhaṃ kappiyaparikkhārā ete, ime gahetvā pabbajissāmī’’ti attano nivatthapārutaṃ sāṭakayugaṃ pajahi. Tenāha ‘‘sāṭakaṃ pajahiṃ tatthā’’ti. Evaṃ paviṭṭho ahaṃ, sāriputta, tassaṃ paṇṇasālāyaṃ sāṭakaṃ pajahiṃ. „Dort legte ich mein Gewand ab, das mit den neun Mängeln behaftet war“ – hierbei ist dies die fortlaufende Erzählung: Damals, so heißt es, hatte der Göttersohn Vissakamma eine liebliche, zur Einsamkeit geeignete Einsiedelei erschaffen, die mit Hütten, Höhlen und Wandelgängen verziert, von blühenden und fruchttragenden Bäumen bedeckt war, süße Wasserstellen besaß und frei von gefährlichen wilden Tieren und furchterregenden Vögeln war. Er hatte an beiden Enden des geschmückten Wandelgangs eine Anlehnplanke angebracht, in der Mitte des Wandelgangs zum Sitzen eine flache, mungobohnenfarbene Steinplatte erschaffen und im Inneren der Blätterhütte die Ausrüstungsgegenstände eines Asketen wie Flechtenhaarschmuck, Rindenkleidung, Dreifuß, Wasserkrug und so weiter bereitgestellt; im Pavillon Trinkwassergefäße, Trinkmuscheln und Trinkschalen; im Feuerhaus Kohlenbecken, Brennholz und so weiter. Nachdem er all das erschaffen hatte, was immer den Weltentsagern von Nutzen ist, ritzte er Schriftzeichen in die Wand der Blätterhütte: „Wer auch immer die Weltentsagung vollziehen möchte, möge diese Ausrüstungsgegenstände nehmen und die Hauslosigkeit antreten.“ Als der Göttersohn Vissakamma daraufhin in die Götterwelt zurückgekehrt war, hielt der weise Sumedha am Fuße des Himalaya-Gebirges, den Bergschluchten folgend, Ausschau nach einem für ihn geeigneten, angenehmen Aufenthaltsort. An einer Flussbiegung erblickte er die von Vissakamma erschaffene, von Sakka dargebotene, liebliche Einsiedelei. Er ging zum Ende des Wandelgangs, und da er keine Fußabdrücke sah, dachte er: „Sicherlich sind die hier lebenden Weltentsager im nahegelegenen Dorf auf Almosengang gegangen, müde zurückgekehrt, in die Blätterhütte eingetreten und sitzen nun dort.“ Nachdem er ein wenig gewartet hatte, dachte er: „Sie lassen sehr lange auf sich warten; ich will nachsehen.“ Er öffnete die Tür der Blätterhütte, trat ein, blickte hier- und dorthin, las die Schriftzeichen auf der großen Wand und dachte: „Dies sind für mich geeignete Requisiten; ich will diese nehmen und das asketische Leben antreten.“ Da legte er das Gewandpaar ab, das er am Körper trug und umgeworfen hatte. Darum heißt es: „Dort legte ich mein Gewand ab.“ So eingetreten, o Sāriputta, legte ich in jener Blätterhütte mein Gewand ab. Navadosamupāgatanti sāṭakaṃ pajahanto nava dose disvā pajahinti dīpeti. Tāpasapabbajjaṃ pabbajitānañhi sāṭakasmiṃ nava dosā upaṭṭhahanti. Tesu tassa mahagghabhāvo eko doso, parapaṭibaddhatāya uppajjanabhāvo eko, paribhogena lahuṃ kilissanabhāvo eko. Kiliṭṭho hi dhovitabbo ca rajitabbo ca hoti. Paribhogena jīraṇabhāvo eko. Jiṇṇassa hi tunnaṃ vā aggaḷadānaṃ vā kātabbaṃ hoti[Pg.11]. Puna pariyesanāya durabhisambhavabhāvo eko, tāpasapabbajjāya asāruppabhāvo eko, paccatthikānaṃ sādhāraṇabhāvo eko. Yathā hi naṃ paccatthikā na gaṇhanti, evaṃ gopetabbo hoti. Paribhuñjantassa vibhūsanaṭṭhānabhāvo eko, gahetvā vicarantassa khandhabhāramahicchabhāvo ekoti. „Das mit den neun Mängeln behaftet war“: Dies drückt aus, dass er das Gewand ablegte, weil er darin neun Mängel erkannte. Denn für diejenigen, welche die asketische Hauslosigkeit angetreten haben, zeigen sich neun Mängel an einem gewöhnlichen Gewand. Unter diesen ist erstens sein hoher Wert (Kostbarkeit) ein Mangel; zweitens, dass seine Beschaffung von anderen abhängt; drittens, dass es durch den Gebrauch schnell schmutzig wird. Denn wenn es schmutzig ist, muss es gewaschen und gefärbt werden. Viertens ist das Verschleißen durch den Gebrauch ein Mangel. Denn ein verschlissenes Gewand muss genäht oder geflickt werden. Fünftens ist die Schwierigkeit, es erneut zu beschaffen, ein Mangel; sechstens seine Unangemessenheit für die asketische Hauslosigkeit; siebtens, dass es mit Feinden geteilt wird (die Aufmerksamkeit von Dieben erregt). Man muss es nämlich so hüten, dass Feinde es nicht entwenden können. Achtens stellt es für den Träger einen Gegenstand des Schmucks dar (was die Eitelkeit fördert), und neuntens bedeutet das Mitführen auf Reisen eine schwere Last für den Körper und fördert großes Begehren. Vākacīraṃ nivāsesinti tadāhaṃ, sāriputta, ime nava dose disvā sāṭakaṃ pahāya vākacīraṃ nivāsesiṃ, muñjatiṇaṃ hīraṃ hīraṃ katvā ganthetvā katavākacīraṃ nivāsanapārupanatthāya ādiyinti attho. „Ich legte das Rindenkleid an“: Dies bedeutet: Damals, o Sāriputta, legte ich, nachdem ich diese neun Mängel erkannt und das Gewand abgelegt hatte, das Rindenkleid an. Der Sinn ist, dass ich das aus Muñja-Gras – welches in einzelne Fasern zerteilt und zusammengeknüpft worden war – gefertigte Rindenkleid zum Zwecke des Umkleidens und Umwerfens annahm. Dvādasaguṇamupāgatanti dvādasahi ānisaṃsehi samannāgataṃ. Vākacīrasmiñhi dvādasa ānisaṃsā – appagghaṃ sundaraṃ kappiyanti ayaṃ tāva eko ānisaṃso, sahatthā kātuṃ sakkāti ayaṃ dutiyo, paribhogena saṇikaṃ kilissati, dhoviyamānepi papañco natthīti ayaṃ tatiyo, paribhogena jiṇṇepi sibbitabbābhāvo catuttho, puna pariyesantassa sukhena karaṇabhāvo pañcamo, tāpasapabbajjāya sāruppabhāvo chaṭṭho, paccatthikānaṃ nirupabhogabhāvo sattamo, paribhuñjantassa vibhūsanaṭṭhānābhāvo aṭṭhamo, dhāraṇe sallahukabhāvo navamo, cīvarapaccaye appicchabhāvo dasamo, vākuppattiyā dhammikaanavajjabhāvo ekādasamo, vākacīre naṭṭhepi anapekkhabhāvo dvādasamoti. „Mit den zwölf Vorzügen versehen“: Dies bedeutet, dass es mit zwölf heilsamen Wirkungen (Vorteilen) ausgestattet ist. Denn am Rindenkleid gibt es zwölf Vorteile: Erstens, dass es billig, gut und statthaft ist; zweitens, dass man es mit eigenen Händen herstellen kann; drittens, dass es durch den Gebrauch nur langsam schmutzig wird und auch beim Waschen kein Umstand entsteht; viertens, dass es selbst bei Verschleiß durch Gebrauch nicht genäht werden muss; fünftens, dass es bei erneuter Suche leicht wiederherzustellen ist; sechstens seine Angemessenheit für das Leben eines Asketen; siebtens, dass es für Feinde unbrauchbar ist; achtens, dass es für den Träger kein Mittel zur Zierde darstellt; neuntens seine Leichtigkeit beim Tragen; zehntens die Genügsamkeit bezüglich des Gewand-Requisits; elftens die rechtmäßige und fehlerfreie Gewinnung der Rinde; und zwölftens, dass man keine Sorge oder Anhaftung empfindet, selbst wenn das Rindenkleid verloren geht. Aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ, pajahiṃ paṇṇasālakanti. Kathaṃ pajahi? So kira varasāṭakayugaṃ omuñcitvā cīvaravaṃse laggitaṃ anojapupphadāmasadisaṃ rattaṃ vākacīraṃ gahetvā nivāsetvā, tassūpari aparaṃ suvaṇṇavaṇṇaṃ vākacīraṃ paridahitvā, punnāgapupphasantharasadisaṃ sakhuraṃ ajinacammaṃ ekaṃsaṃ katvā jaṭāmaṇḍalaṃ paṭimuñcitvā cūḷāya saddhiṃ niccalabhāvakaraṇatthaṃ sārasūciṃ pavesetvā muttajālasadisāya sikkāya pavāḷavaṇṇaṃ kuṇḍikaṃ odahitvā tīsu ṭhānesu vaṅkakājaṃ ādāya ekissā kājakoṭiyā kuṇḍikaṃ, ekissā aṅkusapacchitidaṇḍakādīni olaggetvā khāribhāraṃ aṃse katvā, dakkhiṇena hatthena kattaradaṇḍaṃ gahetvā paṇṇasālato nikkhamitvā saṭṭhihatthe mahācaṅkame aparāparaṃ caṅkamanto attano vesaṃ oloketvā – ‘‘mayhaṃ manoratho matthakaṃ patto, sobhati vata me pabbajjā, buddhapaccekabuddhādīhi sabbehi dhīrapurisehi vaṇṇitā thomitā [Pg.12] ayaṃ pabbajjā nāma, pahīnaṃ me gihibandhanaṃ, nikkhantosmi nekkhammaṃ, laddhā me uttamapabbajjā, karissāmi samaṇadhammaṃ, labhissāmi maggaphalasukha’’nti ussāhajāto khārikājaṃ otāretvā caṅkamavemajjhe muggavaṇṇasilāpaṭṭe suvaṇṇapaṭimā viya nisinno divasabhāgaṃ vītināmetvā sāyanhasamayaṃ paṇṇasālaṃ pavisitvā, bidalamañcakapasse kaṭṭhattharikāya nipanno sarīraṃ utuṃ gāhāpetvā, balavapaccūse pabujjhitvā attano āgamanaṃ āvajjesi ‘‘ahaṃ gharāvāse ādīnavaṃ disvā amitabhogaṃ anantayasaṃ pahāya araññaṃ pavisitvā nekkhammagavesako hutvā pabbajito, ito dāni paṭṭhāya pamādacāraṃ carituṃ na vaṭṭati. „Die mit den acht Mängeln behaftete Blätterhütte gab ich auf“: Wie gab er sie auf? Er, so heißt es, legte sein kostbares Gewandpaar ab, nahm ein rotes Rindenkleid, das an der Gewandstange hing und einer Girlande aus Anoja-Blüten glich, und zog es als Untergewand an. Darüber warf er ein anderes, goldfarbenes Rindenkleid als Übergewand über, legte das mit Klauen versehene Antilopenfell, das wie ein Lager aus Punnāga-Blüten aussah, über eine Schulter, setzte den Flechtenhaarschmuck auf, steckte eine Holznadel hinein, um ihn zusammen mit dem Haarschopf unbeweglich zu machen, hängte den korallenfarbenen Wasserkrug in ein Tragenetz, das einem Perlennetz glich, nahm die dreifach gebogene Tragstange auf und hängte an das eine Ende der Tragstange den Wasserkrug, an das andere Ende Gegenstände wie Haken, Korb, Wanderstab und so weiter. Er lud sich diese Last der Asketenrequisiten auf die Schulter, nahm in die rechte Hand den Wanderstab, verließ die Blätterhütte und ging auf dem sechzig Ellen langen, prächtigen Wandelgang auf und ab. Dabei betrachtete er seine eigene Gestalt und dachte mit großem Eifer: „Mein Wunsch hat seinen Gipfel erreicht! Wie herrlich ist doch mein asketisches Leben! Diese Weltentsagung wird von allen weisen Männern, wie den Buddhas und Paccekabuddhas, gepriesen und gerühmt. Meine Fesseln des Hauslebens sind abgelegt, ich bin zur Entsagung ausgezogen, ich habe die höchste Weltentsagung erlangt. Ich werde die Pflichten eines Asketen erfüllen, ich werde das Glück von Pfad und Frucht erlangen!“ Nachdem er die Tragstange abgesetzt hatte, setzte er sich wie eine goldene Statue auf die mungobohnenfarbene Steinplatte in der Mitte des Wandelgangs und verbrachte so den Tag. Am Abend betrat er die Blätterhütte, legte sich neben dem geflochtenen Bett auf die Holzunterlage nieder, um seinen Körper ruhen zu lassen, erwachte in der Morgendämmerung und dachte über sein Kommen nach: „Ich habe das Elend des Hauslebens erkannt, unermesslichen Reichtum und endloses Gefolge aufgegeben, bin in den Wald gezogen, um Befreiung zu suchen, und bin Weltentsager geworden. Von heute an ist es mir nicht mehr angemessen, ein nachlässiges Leben zu führen.“ Pavivekañhi pahāya vicarantaṃ micchāvitakkamakkhikā khādanti, idāni mayā vivekamanubrūhetuṃ vaṭṭati. Ahañhi gharāvāsaṃ palibodhato disvā nikkhanto, ayañca manāpā paṇṇasālā, beluvapakkavaṇṇaparibhaṇḍakatā bhūmi, rajatavaṇṇā setabhittiyo, kapotapādavaṇṇaṃ paṇṇacchadanaṃ, vicittattharaṇavaṇṇo bidalamañcako, nivāsaphāsukaṃ vasanaṭṭhānaṃ, na etto atirekatarā viya me gehasampadā paññāyatī’’ti paṇṇasālāya dose vicinanto aṭṭha dose passi. Wahrlich, wer die Abgeschiedenheit aufgibt und umherwandert, den beißen die Fliegen der falschen Gedanken; jetzt geziemt es mir, die Abgeschiedenheit zu pflegen. Denn ich bin in die Hauslosigkeit ausgezogen, da ich das Hausleben als ein Hindernis sah. Diese Blätterhütte ist lieblich: der Boden ist geglättet wie die Farbe einer reifen Bael-Frucht, die weißen Wände glänzen wie Silber, das Blätterdach hat die Farbe von Taubenfüßen, das geflochtene Bettchen hat die Farbe einer bunten Decke und die Wohnstätte ist angenehm zu bewohnen. Mein einstiger häuslicher Wohlstand scheint nicht herrlicher gewesen zu sein als dies. Als er so nach den Mängeln der Blätterhütte suchte, erblickte er acht Mängel. Paṇṇasālāparibhogasmiñhi aṭṭha ādīnavā – mahāsamārambhena dabbasambhāre samodhānetvā karaṇapariyesanabhāvo eko ādīnavo, tiṇapaṇṇamattikāsu patitāsu tāsaṃ punappunaṃ ṭhapetabbatāya nibandhajagganabhāvo dutiyo, senāsanaṃ nāma mahallakassa pāpuṇāti, avelāya vuṭṭhāpiyamānassa cittekaggatā na hotīti uṭṭhāpaniyabhāvo tatiyo, sītuṇhapaṭighātena kāyassa sukhumālakaraṇabhāvo catuttho, gehaṃ paviṭṭhena yaṃkiñci pāpaṃ sakkā kātunti garahāpaṭicchādanabhāvo pañcamo, ‘‘mayha’’nti pariggahakaraṇabhāvo chaṭṭho, gehassa atthibhāvo nāma sadutiyakavāsoti sattamo, ūkāmaṅgulagharagoḷikādīnaṃ sādhāraṇatāya bahusādhāraṇabhāvo aṭṭhamo. Iti ime aṭṭha ādīnave disvā mahāsatto paṇṇasālaṃ pajati. Tenāha ‘‘aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ, pajahiṃ paṇṇasālaka’’nti. Denn beim Bewohnen einer Blätterhütte gibt es acht Nachteile: Erstens, dass man unter großem Aufwand Baumaterialien beschaffen und sie erbauen und zusammensuchen muss; zweitens, das ständige Ausbessern, da Gras, Blätter und Lehm herabfallen und immer wieder erneuert werden müssen; drittens, das Aufstehen-Müssen – denn eine solche Lagerstätte gebührt einem Älteren, und wenn man zu Unzeit aufstehen muss, erlangt das Gemüt keine Einspitzigkeit; viertens, dass der Körper durch das Abwehren von Kälte und Hitze verweichlicht wird; fünftens, das Verbergen von Tadelnswertem, da einer, der ein Haus betreten hat, leicht jede Art von unheilsamer Tat begehen kann; sechstens, das Ergreifen mit den Gedanken „Das ist mein“; siebtens, dass das Vorhandensein eines Hauses wie das Leben mit einem Gefährten ist; achtens, die gemeinsame Nutzung mit vielen Wesen wie Läusen, Wanzen, Geckos und anderen. Als das Große Wesen diese acht Nachteile sah, verließ es die Blätterhütte. Darum sagte er: ‚Ich verließ die kleine Blätterhütte, die von acht Mängeln erfüllt war.‘ Upāgamiṃ rukkhamūlaṃ, guṇe dasahupāgatanti channaṃ paṭikkhipitvā dasahi guṇehi upetaṃ rukkhamūlaṃ upagatosmīti vadati. Tatrime dasa guṇā – appasamārambhatā eko guṇo, upagamanamattakameva hi tattha hoti; apaṭijagganatā [Pg.13] dutiyo, tañhi sammaṭṭhampi asammaṭṭhampi paribhogaphāsukaṃ hotiyeva. Anuṭṭhāpariyabhāvo tatiyo, garahaṃ nappaṭicchādeti; tattha hi pāpaṃ karonto lajjatīti garahāya appaṭicchannabhāvo catuttho; abbhokāsavāso viya kāyaṃ na santhambhetīti kāyassa asanthambhanabhāvo pañcamo; pariggahakaraṇābhāvo chaṭṭho; gehālayapaṭikkhepo sattamo; bahusādhāraṇagehe viya ‘‘paṭijaggissāmi naṃ, nikkhamathā’’ti nīharaṇakābhāvo aṭṭhamo; vasantassa sappītikabhāvo navamo; rukkhamūlasenāsanassa gatagataṭṭhāne sulabhatāya anapekkhabhāvo dasamoti ime dasa guṇe disvā rukkhamūlaṃ upāgatosmīti vadati. Mit den Worten: ‚Ich suchte den Fuß eines Baumes auf, der mit zehn Vorzügen ausgestattet ist‘, sagt er, dass er ein schützendes Dach ablehnte und sich unter einen Baum begab, der diese zehn Vorzüge besitzt. Diese zehn Vorzüge sind: Erstens, der geringe Aufwand, denn man muss sich lediglich dorthin begeben; zweitens, dass keine Instandhaltung nötig ist, denn ob gefegt oder ungefegt, der Fuß eines Baumes ist stets angenehm zu bewohnen; drittens, dass man von niemandem aufgefordert wird aufzustehen; viertens, dass er Tadelnswertes nicht verbirgt – denn wer dort Unheilsames tut, schämt sich, weshalb das Nicht-Verbergen von Tadelnswertem der vierte Vorzug ist; fünftens, das Ausbleiben von körperlicher Trägheit, ähnlich dem Verweilen unter freiem Himmel; sechstens, das Fehlen jeglicher Aneignung; siebtens, das Ablehnen der Anhaftung an eine Wohnung; achtens, das Ausbleiben einer Vertreibung, wie es bei einem gemeinsam genutzten Haus geschieht (wo man sagen würde: ‚Ich will diesen Ort herrichten, geht hinaus!‘); neuntens, das Entstehen von Freude in demjenigen, der dort wohnt; zehntens, die Unabhängigkeit, da an jedem Ort, wohin man gelangt, der Fuß eines Baumes als Wohnstätte leicht zu finden ist. Als er diese zehn Vorzüge sah, sagte er: ‚Ich habe den Fuß eines Baumes aufgesucht.‘ Imāni ettakāni kāraṇāni sallakkhetvā mahāsatto punadivase bhikkhāya gāmaṃ pāvisi. Athassa sampattagāme manussā mahantena ussāhena bhikkhaṃ adaṃsu. So bhattakiccaṃ niṭṭhāpetvā assamaṃ āgamma nisīditvā cintesi ‘‘nāhaṃ āhāraṃ na labhāmīti pabbajito, siniddhāhāro nāmesa mānamadapurisamade vaḍḍheti, āhāramūlakassa ca dukkhassa anto natthi. Yaṃnūnāhaṃ vāpitaropitadhaññanibbattaṃ āhāraṃ pajahitvā pavattaphalabhojano bhaveyya’’nti. So tato ṭṭhāya tathā katvā ghaṭento vāyamanto sattāhabbhantareyeva aṭṭha samāpattiyo pañca abhiññāyo ca nibbattesi. Tena vuttaṃ – Nachdem das Große Wesen all diese Gründe wohl erwogen hatte, betrat es am folgenden Tag das Dorf, um Almosen zu sammeln. Da spendeten ihm die Menschen in dem erreichten Dorf mit großem Eifer Almosen. Er beendete sein Mahl, kehrte zur Einsiedelei zurück, setzte sich nieder und dachte nach: ‚Ich bin nicht in die Hauslosigkeit ausgezogen, weil ich keine Nahrung finden konnte. Solch feine Nahrung vermehrt nur den Stolz und die Trunkenheit der Männlichkeit, und das auf Nahrung zurückzuführende Leiden nimmt kein Ende. Wie wäre es, wenn ich jene Nahrung aufgäbe, die aus gesätem und angepflanztem Getreide stammt, und mich stattdessen von selbst herabgefallenen Früchten ernährte?‘ Von da an handelte er danach, bemühte sich eifrig und erlangte innerhalb von nur sieben Tagen die acht Errungenschaften der Vertiefung (Samāpattis) und die fūnf höheren Geisteskräfte (Abhiññās). Darum wurde gesagt: ‘‘Vāpitaṃ ropitaṃ dhaññaṃ, pajahiṃ niravasesato; Anekaguṇasampannaṃ, pavattaphalamādiyiṃ. ‚Gesätes und gepflanztes Getreide gab ich restlos auf; ich nahm stattdessen die von selbst herabgefallenen Früchte an, die mit zahllosen Vorzügen ausgestattet sind. ‘‘Tatthappadhānaṃ padahiṃ, nisajjaṭṭhānacaṅkame; Abbhantaramhi sattāhe, abhiññābalapāpuṇi’’nti. ‚Dort übte ich das Streben im Sitzen, Stehen und Wandeln; innerhalb von sieben Tagen erlangte ich die Kraft der höheren Geisteskräfte.‘ Evaṃ abhiññābalaṃ patvā sumedhatāpase samāpattisukhena vītināmente dīpaṅkaro nāma satthā loke udapādi. Tassa paṭisandhijātisambodhidhammacakkappavattanesu sakalāpi dasasahassī lokadhātu saṃkampi sampakampi sampavedhi, mahāviravaṃ viravi, dvattiṃsa pubbanimittāni pāturahesuṃ. Sumedhatāpaso samāpattisukhena vītināmento neva taṃ saddamassosi, na tāni nimittāni addasa. Tena vuttaṃ – Als der Asket Sumedha so die Kraft der höheren Geisteskräfte erlangt hatte und seine Zeit im Glück der Vertiefung verbrachte, erschien der Lehrer namens Dīpaṅkara in der Welt. Bei dessen Empfängnis, Geburt, Erleuchtung und dem Drehen des Rades der Lehre bebte, erbebte und erzitterte das gesamte zehntausendfache Weltsystem heftig, stieß ein gewaltiges Tönen aus und die zweiunddreißig Vorzeichen traten deutlich in Erscheinung. Doch der Asket Sumedha, der seine Zeit im Glück der Vertiefung verbrachte, vernahm weder jenes Geräusch noch erblickte er jene Vorzeichen. Darum wurde gesagt: ‘‘Evaṃ [Pg.14] me siddhippattassa, vasībhūtassa sāsane; Dīpaṅkaro nāma jino, uppajji lokanāyako. ‚Als ich so die Meisterschaft erlangt und die Beherrschung meines Geistes in der Lehre verwirklicht hatte, erschien der Sieger namens Dīpaṅkara, der Führer der Welt. ‘‘Uppajjante ca jāyante, bujjhante dhammadesane; Caturo nimitte nāddasaṃ, jhānaratisamappito’’ti. ‚Bei seiner Empfängnis, Geburt, Erleuchtung und der Verkündigung der Lehre sah ich die vier Zeichen nicht, da ich ganz dem Entzücken der Vertiefung hingegeben war.‘ Tasmiṃ kāle dīpaṅkaradasabalo catūhi khīṇāsavasatasahassehi parivuto anupubbena cārikaṃ caramāno rammaṃ nāma nagaraṃ patvā sudassanamahāvihāre paṭivasati. Rammanagaravāsino ‘‘dīpaṅkaro kira samaṇissaro paramātisambodhiṃ patvā pavattavaradhammacakko anupubbena cārikaṃ caramāno rammanagaraṃ patvā sudassanamahāvihāre paṭivasatī’’ti sutvā sappinavanītādīni ceva bhesajjāni vatthacchādanāni ca gāhāpetvā gandhamālādihatthā yena buddho, yena dhammo, yena saṅgho, tanninnā tappoṇā tappabbhārā hutvā satthāraṃ upasaṅkamitvā vanditvā gandhamālādīhi pūjetvā ekamantaṃ nisinnā dhammadesanaṃ sutvā svātanāya nimantetvā uṭṭhāyāsanā pakkamiṃsu. Zu jener Zeit wanderte der Zehnkräftige Dīpaṅkara, von vierhunderttausend triebbefreiten Heiligen begleitet, allmählich von Ort zu Ort, erreichte die Stadt namens Ramma und verweilte im großen Sudassana-Vihāra. Als die Einwohner der Stadt Ramma hörten: ‚Der Ehrwürdige Dīpaṅkara, der Herr der Asketen, hat die höchste, vollkommene Erleuchtung erlangt, das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt und verweilt nun auf seiner allmählichen Wanderung in der Stadt Ramma im großen Sudassana-Vihāra‘, ließen sie Heilmittel wie geklärte Butter, Butter und anderes sowie Gewänder und Kleidung herbeibringen. Mit Duftstoffen, Blumen und dergleichen in den Händen wandten sie sich dorthin, wo der Buddha, die Lehre und die Gemeinde (Sangha) waren, ganz auf sie ausgerichtet, ihnen zugeneigt und zugewandt. Sie näherten sich dem Meister, erwiesen ihm Ehrerbietung, verehrten ihn mit Duftstoffen und Blumen, setzten sich an einer Seite nieder, lauschten der Lehrverkündigung, luden ihn für den folgenden Tag ein, erhoben sich von ihren Sitzen und gingen fort. Te punadivase mahādānaṃ sajjetvā nagaraṃ alaṅkaritvā dasabalassa āgamanamaggaṃ alaṅkarontā udakabhinnaṭṭhānesu paṃsuṃ pakkhipitvā samaṃ bhūmitalaṃ katvā rajatapaṭṭavaṇṇaṃ vālukaṃ ākiranti, lājāni ceva pupphāni ca vikiranti, nānāvirāgehi vatthehi dhajapaṭāke ussāpenti, kadaliyo ceva puṇṇaghaṭapantiyo ca patiṭṭhāpenti. Tasmiṃ kāle sumedhatāpaso attano assamapadā uggantvā tesaṃ manussānaṃ uparibhāgena ākāsena gacchanto te haṭṭhatuṭṭhe manusse disvā ‘‘kiṃ nu kho kāraṇa’’nti ākāsato oruyha ekamantaṃ ṭhito manusse pucchi – ‘‘ambho kassa tumhe imaṃ maggaṃ alaṅkarothā’’ti? Tena vuttaṃ – Am folgenden Tag bereiteten sie eine große Gabe vor, schmückten die Stadt und richteten den Weg für die Ankunft des Zehnkräftigen her. An den vom Wasser weggespülten Stellen schütteten sie Erde auf, machten den Boden eben und streuten Sand aus, der wie Silberplatten glänzte; sie verstreuten Puffreis und Blumen, hissten Flaggen und Banner aus verschiedenfarbigen Stoffen und stellten Bananenstauden sowie Reihen von reich gefüllten Wasserkrügen auf. Zu jener Zeit erhob sich der Asket Sumedha von seiner Einsiedelei in die Luft und reiste am Himmel über jenen Menschen hinweg. Als er die Menschen so voller Freude und Entzücken sah, fragte er sich: ‚Was mag wohl der Grund sein?‘, stieg vom Himmel herab, stellte sich an einer Seite auf und fragte die Menschen: ‚Ihr Lieben, für wen schmückt ihr diesen Weg?‘ Darum wurde gesagt: ‘‘Paccantadesavisaye, nimantetvā tathāgataṃ; Tassa āgamanaṃ maggaṃ, sodhenti tuṭṭhamānasā. Nachdem sie den Tathāgata in das Grenzland eingeladen hatten, bereiteten sie mit erfreutem Geist den Weg für seine Ankunft vor. ‘‘Ahaṃ tena samayena, nikkhamitvā sakassamā; Dhunanto vākacīrāni, gacchāmi ambare tadā. Zu jener Zeit verließ ich meine eigene Einsiedelei, schüttelte meine Rindenkleider aus und flog damals durch den Himmel. ‘‘Vedajātaṃ janaṃ disvā, tuṭṭhahaṭṭhaṃ pamoditaṃ; Orohitvāna gaganā, manusse pucchi tāvade. Als ich die von Freude erfüllte, glückliche, hocherfreute und jubelnde Volksmenge sah, stieg ich vom Himmel herab und fragte sogleich die Menschen: ‘‘‘Tuṭṭhahaṭṭho [Pg.15] pamudito, vedajāto mahājano; Kassa sodhīyati maggo, añjasaṃ vaṭumāyana’’’nti. „Die große Volksmenge ist glücklich, hocherfreute und von Freude erfüllt. Für wen wird dieser Weg, dieser Pfad, diese Straße bereitet?“ Manussā āhaṃsu ‘‘bhante sumedha, na tvaṃ jānāsi, dīpaṅkaradasabalo sammāsambodhiṃ patvā pavattitavaradhammacakko cārikaṃ caramāno amhākaṃ nagaraṃ patvā sudassanamahāvihāre paṭivasati. Mayaṃ taṃ bhagavantaṃ nimantayimhā, tassetaṃ buddhassa bhagavato āgamanamaggaṃ alaṅkaromā’’ti. Sumedhatāpaso cintesi – ‘‘buddhoti kho ghosamattakampi loke dullabhaṃ, pageva buddhuppādo, mayāpi imehi manussehi saddhiṃ dasabalassa maggaṃ alaṅkarituṃ vaṭṭatī’’ti. So te manusse āha – ‘‘sace bho tumhe etaṃ maggaṃ buddhassa alaṅkarotha, mayhampi ekaṃ okāsaṃ detha, ahampi tumhehi saddhiṃ maggaṃ alaṅkarissāmī’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā ‘‘sumedhatāpaso iddhimā’’ti jānantā udakabhinnokāsaṃ sallakkhetvā ‘‘tvaṃ imaṃ ṭhānaṃ alaṅkarohī’’ti adaṃsu. Sumedho buddhārammaṇaṃ pītiṃ gahetvā cintesi ‘‘ahaṃ imaṃ okāsaṃ iddhiyā alaṅkarituṃ sakkomi, evaṃ alaṅkato pana mama manaṃ na paritosessati, ajja mayā kāyaveyyāvaccaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti paṃsuṃ āharitvā tasmiṃ padese pakkhipi. Die Menschen antworteten: „Ehrwürdiger Sumedha, du weißt es nicht? Der Zehnkräftebesitzer Dīpaṅkara, der die vollkommene Selbst-Erleuchtung erlangt und das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt hat, ist auf seiner Wanderung in unserer Stadt angekommen und weilt im Sudassana-Großkloster. Wir haben diesen Erhabenen eingeladen und bereiten nun diesen Weg für das Kommen dieses Buddha, des Erhabenen, vor.“ Der Asket Sumedha dachte: „Schon allein der Klang des Wortes ‚Buddha‘ ist in der Welt schwer zu vernehmen, geschweige denn das Erscheinen eines Buddha! Es ist auch für mich recht, zusammen mit diesen Menschen den Weg für den Zehnkräftebesitzer zu schmücken.“ Er sagte zu jenen Menschen: „Werte Herren, wenn ihr diesen Weg für den Buddha schmückt, so gebt auch mir einen Abschnitt. Auch ich werde zusammen mit euch den Weg schmücken.“ Sie stimmten mit den Worten „Sehr wohl!“ zu, und da sie wussten, dass der Asket Sumedha über magische Kräfte verfügte, wählten sie eine vom Wasser weggespülte, schlammige Stelle aus und gaben sie ihm mit den Worten: „Schmücke du diesen Platz!“ Sumedha, erfüllt von einer auf den Buddha ausgerichteten Freude, dachte: „Ich könnte diese Stelle zwar durch übernatürliche Kraft herrichten, doch eine solche Verschönerung würde meinen Geist nicht wahrhaft zufriedenstellen. Heute gebührt es mir, mit meinem eigenen Körper tatkräftigen Dienst zu leisten.“ So holte er Erde herbei und schüttete sie auf jene Stelle. Tassa tasmiṃ padese analaṅkateyeva dīpaṅkaro dasabalo mahānubhāvānaṃ chaḷabhiññānaṃ khīṇāsavānaṃ catūhi satasahassehi parivuto devatāsu dibbagandhamālādīhi pūjayantīsu dibbasaṅgītesu pavattantesu manussesu mānusakagandhehi ceva mālādīhi ca pūjayantesu anantāya buddhalīḷāya manosilātale vijambhamāno sīho viya taṃ alaṅkatapaṭiyattaṃ maggaṃ paṭipajji. Sumedhatāpaso akkhīni ummīletvā alaṅkatamaggena āgacchantassa dasabalassa dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitaṃ asītiyā anubyañjanehi anurañjitaṃ byāmappabhāya samparivāritaṃ maṇivaṇṇagaganatale nānappakārā vijjulatā viya āveḷāveḷabhūtā ceva yugalayugalabhūtā ca chabbaṇṇaghanabuddharasmiyo vissajjentaṃ rūpaggappattaṃ attabhāvaṃ oloketvā ‘‘ajja mayā dasabalassa jīvitapariccāgaṃ kātuṃ vaṭṭati, mā bhagavā kalalaṃ akkami, maṇiphalakasetuṃ pana akkamanto viya saddhiṃ catūhi khīṇāsavasatasahassehi mama piṭṭhiṃ maddamāno gacchatu, taṃ me [Pg.16] bhavissati dīgharattaṃ hitāya sukhāyā’’ti kese mocetvā ajinacammajaṭāmaṇḍalavākacīrāni kāḷavaṇṇe kalale pattharitvā maṇiphalakasetu viya kalalapiṭṭhe nipajji. Tena vuttaṃ – Noch ehe er diese Stelle fertig geschmückt hatte, betrat der Zehnkräftebesitzer Dīpaṅkara den geschmückten und vorbereiteten Weg. Er war umgeben von vierhunderttausend triebversiegten Heiligen von großer Macht, welche die sechs höheren Geisteskräfte besaßen. Während Gottheiten ihn mit himmlischen Wohlgerüchen, Blumen und Ähnlichem verehrten und himmlische Musik ertönte, und während Menschen ihn mit menschlichen Wohlgerüchen und Blumen ehrten, schritt er in unendlicher Buddha-Anmut einher, gleich einem Löwen, der sich auf einer Klippe aus Realgar stolz erhebt. Der Asket Sumedha öffnete seine Augen und erblickte den Körper des heranschreitenden Zehnkräftebesitzers, der die vollkommenste Gestalt besaß: geschmückt mit den zweiunddreißig Merkmalen eines großen Mannes, verziert mit den achtzig Nebenmerkmalen, umgeben von einer eine Klafter weiten Aura und dichte, sechsfarbige Buddha-Strahlen aussendend, die wie vielfältige Blitze am juwelenfarbenen Himmel in Bündeln und Paaren aufflammten. Da dachte er: „Heute geziemt es mir, mein Leben für den Zehnkräftebesitzer hinzugeben. Der Erhabene soll nicht in den Schlamm treten! Möge er vielmehr, wie auf einer Brücke aus Juwelenplatten schreitend, zusammen mit den vierhunderttausend Triebversiegten über meinen Rücken hinweggehen. Das wird mir für lange Zeit zum Heil und zum Segen gereichen.“ Er löste sein Haar, breitete seine Antilopenhaut, sein geflochtenes Haar und seine Rindenkleider auf dem schwarzen Schlamm aus und legte sich wie eine Brücke aus Juwelenplatten flach auf den Schlamm nieder. Darüber wurde Folgendes gesagt: ‘‘Te me puṭṭhā viyākaṃsu, ‘buddho loke anuttaro; Dīpaṅkaro nāma jino, uppajji lokanāyako; Tassa sodhīyati maggo, añjasaṃ vaṭumāyanaṃ’. „Die von mir Befragten antworteten: ‚Ein Buddha, der Unübertreffliche in der Welt, der Sieger namens Dīpaṅkara, der Führer der Welt, ist erschienen. Für ihn wird dieser Weg, dieser Pfad, diese Straße bereitet.‘“ ‘‘Buddhoti mama sutvāna, pīti uppajji tāvade; Buddho buddhoti kathayanto, somanassaṃ pavedayiṃ. „Als ich das Wort ‚Buddha‘ vernahm, stieg sogleich eine tiefe Freude in mir auf. Während ich immer wieder ‚Buddha, Buddha!‘ rief, gab ich meiner Glückseligkeit Ausdruck.“ ‘‘Tattha ṭhatvā vicintesiṃ, tuṭṭho saṃviggamānaso; ‘Idha bījāni ropissaṃ, khaṇo eva mā upaccagā’. „Dort stehend dachte ich nach, erfreut und von heilsamer Erschütterung bewegt: ‚Hier werde ich die heilsamen Samen säen. Möge dieser günstige Augenblick nicht ungenutzt vorübergehen!‘“ ‘‘Yadi buddhassa sodhetha, ekokāsaṃ dadātha me; Ahampi sodhayissāmi, añjasaṃ vaṭumāyanaṃ. „‚Wenn ihr den Weg für den Buddha bereitet, so gebt mir einen Abschnitt! Auch ich will diesen Pfad, diesen Weg herrichten.‘“ ‘‘Adaṃsu te mamokāsaṃ, sodhetuṃ añjasaṃ tadā; Buddho buddhoti cintento, maggaṃ sodhemahaṃ tadā. „Da gaben sie mir einen Abschnitt, um den Pfad herzurichten; und während ich beständig dachte: ‚Buddha, Buddha!‘, säuberte ich damals den Weg.“ ‘‘Aniṭṭhite mamokāse, dīpaṅkaro mahāmuni; Catūhi satasahassehi, chaḷabhiññehi tādihi; Khīṇāsavehi vimalehi, paṭipajji añjasaṃ jino. „Noch ehe mein Abschnitt fertiggestellt war, betrat der große Weise Dīpaṅkara, der Sieger, den Pfad, zusammen mit vierhunderttausend unerschütterlichen, makellosen und triebversiegten Heiligen, welche die sechs höheren Geisteskräfte besaßen.“ ‘‘Paccuggamanā vattanti, vajjanti bheriyo bahū; Āmoditā naramarū, sādhukāraṃ pavattayuṃ. „Feierliche Empfänge fanden statt, und viele Trommeln ertönten von selbst. Erfreut ließen Menschen und Götter Rufe des Beifalls erschallen.“ ‘‘Devā manusse passanti, manussāpi ca devatā; Ubhopi te pañjalikā, anuyanti tathāgataṃ. „Die Götter sahen die Menschen, und auch die Menschen sahen die Götter. Beide folgten mit ehrerbietig gefalteten Händen dem Tathāgata nach.“ ‘‘Devā dibbehi turiyehi, manussā mānusehi ca; Ubhopi te vajjayantā, anuyanti tathāgataṃ. „Die Götter mit himmlischen Musikinstrumenten und die Menschen mit menschlichen Instrumenten folgten, während beide Gruppen musizierten, dem Tathāgata nach.“ ‘‘Dibbaṃ mandāravaṃ pupphaṃ, padumaṃ pārichattakaṃ; Disodisaṃ okiranti, ākāsanabhagatā marū. „Himmlische Mandārava-Blüten, Lotusblüten und Pārichattaka-Blüten verstreuten die am Himmel verweilenden Götter nach allen Richtungen.“ ‘‘Campakaṃ [Pg.17] salalaṃ nīpaṃ, nāgapunnāgaketakaṃ; Disodisaṃ ukkhipanti, bhūmitalagatā narā. „Campaka-, Salala-, Nīpa-, Nāga-, Punnāga- und Ketaka-Blüten warfen die auf dem Erdboden stehenden Menschen nach allen Richtungen empor.“ ‘‘Kese muñcitvāhaṃ tattha, vākacīrañca cammakaṃ; Kalale pattharitvāna, avakujjo nipajjahaṃ. „Dort löste ich mein Haar, breitete meine Rindenkleider und die Tierhaut auf dem Schlamm aus und legte mich bäuchlings nieder.“ ‘‘Akkamitvāna maṃ buddho, saha sissehi gacchatu; Mā naṃ kalale akkamittho, hitāya me bhavissatī’’ti. „‚Möge der Buddha, indem er auf mich tritt, zusammen mit seinen Jüngern dahingehen. Möge er nicht in den Schlamm treten; dies wird mir zum Heil gereichen.‘“ So kalalapiṭṭhe nipannakova puna akkhīni ummīletvā dīpaṅkaradasabalassa buddhasiriṃ sampassamāno evaṃ cintesi – ‘‘sacāhaṃ iccheyyaṃ, sabbakilese jhāpetvā saṅghanavako hutvā rammanagaraṃ paviseyyaṃ. Aññātakavesena pana me kilese jhāpetvā nibbānappattiyā kiccaṃ natthi. Yaṃnūnāhaṃ dīpaṅkaradasabalo viya paramābhisambodhiṃ patvā dhammanāvaṃ āropetvā mahājanaṃ saṃsārasāgarā uttāretvā pacchā parinibbāyeyyaṃ, idaṃ mayhaṃ patirūpa’’nti. Tato aṭṭha dhamme samodhānetvā buddhabhāvāya abhinīhāraṃ katvā nipajji. Tena vuttaṃ – Als er so auf dem Schlammbett lag, öffnete er erneut seine Augen, blickte auf die Buddha-Herrlichkeit des Dīpaṅkara, des Zehnfach Mächtigen, und dachte bei sich: „Wenn ich es wünschte, könnte ich alle Verunreinigungen verbrennen, als jüngster Mönch der Gemeinschaft in die Stadt Ramma einziehen. Doch was nützt es mir, meine Verunreinigungen in unerkannter Gestalt zu verbrennen und das Nibbāna zu erlangen? Was wäre, wenn ich wie Dīpaṅkara, der Zehnfach Mächtige, die höchste vollkommene Erleuchtung erlangte, die Menschenmassen auf das Boot des Dhamma brächte, sie über das Meer des Saṃsāra hinüberrettete und erst danach ins Parinibbāna einginge? Dies ist für mich das Angemessene.“ Von da an führte er die acht Bedingungen zusammen, fasste den Entschluss zur Erlangung der Buddhaschaft und legte sich nieder. Daher wurde gesagt: ‘‘Pathaviyaṃ nipannassa, evaṃ me āsi cetaso; ‘Icchamāno ahaṃ ajja, kilese jhāpaye mama. „Als ich so auf der Erde lag, stieg folgender Gedanke in meinem Geist auf: ‚Wenn ich es heute wollte, könnte ich meine geistigen Trübungen gänzlich verbrennen. ‘Kiṃ me aññātavesena, dhammaṃ sacchikatenidha; Sabbaññutaṃ pāpuṇitvā, buddho hessaṃ sadevake. „‚Was nützt es mir, hier unerkannt die Wahrheit zu verwirklichen? Wenn ich die Allwissenheit erlangt habe, will ich ein Buddha in der Welt samt ihren Göttern werden. ‘Kiṃ me ekena tiṇṇena, purisena thāmadassinā; Sabbaññutaṃ pāpuṇitvā, santāressaṃ sadevake. „‚Was nützt es mir, wenn ich als ein Mann, der seine Kraft kennt, allein das Ufer erreiche? Wenn ich die Allwissenheit erlangt habe, will ich die Welt samt ihren Göttern hinüberretten.‘“ ‘Iminā me adhikārena, katena purisuttame; Sabbaññutaṃ pāpuṇitvā, tāremi janataṃ bahuṃ. „Durch dieses außerordentliche Verdienst, das ich gegenüber dem Höchsten der Menschen vollbracht habe, will ich nach Erlangen der Allwissenheit die große Schar der Wesen hinüberretten. ‘Saṃsārasotaṃ chinditvā, viddhaṃsetvā tayo bhave; Dhammanāvaṃ samāruyha, santāressaṃ sadevake’’’ti. (bu. vaṃ. 2.54-58); Nachdem ich den Strom des Saṃsāra durchschnitten, die drei Daseinsbereiche vernichtet und das Schiff des Dhamma bestiegen habe, werde ich die Welt samt den Göttern hinüberretten.“ Yasmā pana buddhattaṃ patthentassa – Weil jedoch für jemanden, der die Buddhaschaft erstrebt – ‘‘Manussattaṃ liṅgasampatti, hetu satthāradassanaṃ; Pabbajjā guṇasampatti, adhikāro ca chandatā; Aṭṭhadhammasamodhānā, abhinīhāro samijjhatī’’ti. (bu. vaṃ. 2.59); „„Menschsein, das männliche Geschlecht, die hinreichende Ursache, das Erblicken eines Meisters, das Hauslosenleben, die Vollkommenheit der geistigen Errungenschaften, der außerordentliche Dienst und der starke Wille: Durch das Zusammentreffen dieser acht Bedingungen geht der feste Entschluss in Erfüllung.““ Manussattabhāvasmiṃyeva [Pg.18] hi ṭhatvā buddhattaṃ patthentassa patthanā samijjhati, na nāgassa vā supaṇṇassa vā devatāya vā patthanā samijjhati. Manussattabhāvepi purisaliṅge ṭhitasseva patthanā samijjhati, na itthiyā vā paṇḍakanapuṃsakaubhatobyañjanakānaṃ vā patthanā samijjhati. Purisassāpi tasmiṃ attabhāve arahattappattiyā hetusampannasseva patthanā samijjhati, no itarassa. Hetusampannassāpi jīvamānakabuddhasseva santike patthentassa patthanā samijjhati, parinibbute buddhe cetiyasantike vā bodhimūle vā patthentassa na samijjhati. Buddhānaṃ santike patthentassāpi pabbajjāliṅge ṭhitasseva samijjhati, no gihiliṅge ṭhitassa. Pabbajitassāpi pañcābhiññassa aṭṭhasamāpattilābhinoyeva samijjhati, na imāya guṇasampattiyā virahitassa. Guṇasampannenāpi yena attano jīvitaṃ buddhānaṃ pariccattaṃ hoti, tassa iminā adhikārena adhikārasampannasseva samijjhati, na itarassa. Adhikārasampannassāpi yassa buddhakārakadhammānaṃ atthāya mahanto chando ca ussāho ca vāyāmo ca pariyeṭṭhi ca, tasseva samijjhati, na itarassa. Denn nur im Zustand des Menschseins verweilt derjenige, dessen Gelübde nach der Buddhaschaft in Erfüllung geht; der Wunsch eines Nāgas, eines Garudas oder einer Gottheit geht nicht in Erfüllung. Selbst im menschlichen Dasein geht der Wunsch nur bei einem im männlichen Geschlecht Verweilenden in Erfüllung, nicht bei einer Frau, einem Eunuchen, einem Neutrum oder einem Zwitter. Auch für einen Mann geht in jener Existenz das Gelübde nur dann in Erfüllung, wenn er mit den Voraussetzungen zur Erlangung der Arahatschaft ausgestattet ist, nicht bei einem anderen. Selbst bei einem mit diesen Voraussetzungen Ausgestatteten erfüllt sich das Gelübde nur in der Gegenwart eines lebenden Buddha; nach dem Parinibbāna des Buddha erfüllt es sich für jemanden, der den Wunsch bei einem Cetiya oder am Fuße des Bodhi-Baumes äußert, nicht. Selbst wenn man in der Gegenwart der Buddhas den Wunsch äußert, erfüllt er sich nur bei einem, der im Stande der Hauslosigkeit verweilt, nicht bei einem im Laienstand. Selbst bei einem Hauslosen erfüllt er sich nur bei einem, der die fünf höheren Geisteskräfte und die acht Sammlungserrungenschaften besitzt, nicht bei einem, dem diese Vollkommenheit der Errungenschaften fehlt. Selbst bei einem mit diesen Errungenschaften Ausgestatteten erfüllt sich der Wunsch nur, wenn er sein eigenes Leben für die Buddhas hingegeben hat; nur für einen, der mit diesem außergewöhnlichen Dienst ausgestattet ist, geht er in Erfüllung, nicht für einen anderen. Selbst für einen mit solchem Dienst Ausgestatteten erfüllt sich das Gelübde nur, wenn sein Wille, sein Eifer, sein Streben und sein Suchen zum Zwecke der Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen, groß sind, nicht für einen anderen. Tatridaṃ chandamahantatāya opammaṃ – sace hi evamassa ‘‘yo sakalacakkavāḷagabbhaṃ ekodakībhūtaṃ attano bāhubalena uttaritvā pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇāti. Yo vā pana sakalacakkavāḷagabbhaṃ veḷugumbasañchannaṃ byūhitvā madditvā padasā gacchanto pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇāti. Yo vā pana sakalacakkavāḷagabbhaṃ sattiyo ākoṭetvā nirantaraṃ sattiphalasamākiṇṇaṃ padasā akkamamāno pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇāti. Yo vā pana sakalacakkavāḷagabbhaṃ vītaccitaṅgārabharitaṃ pādehi maddamāno pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇātī’’ti. Yo etesu ekampi attano dukkaraṃ na maññati, ‘‘ahaṃ etampi taritvā vā gantvā vā pāraṃ gahessāmī’’ti evaṃ mahantena chandena ca ussāhena ca vāyāmena ca pariyeṭṭhiyā ca samannāgato hoti, tassa patthanā samijjhati, na itarassa. Sumedhatāpaso pana ime aṭṭha dhamme samodhānetvā buddhabhāvāya abhinīhāraṃ katvā nipajji. Hierzu dient das folgende Gleichnis für die Größe des Willens: Wenn es nämlich so wäre: ‚Wer imstande ist, das gesamte Universum, das zu einer einzigen Wasserfläche geworden ist, durch die Kraft seiner eigenen Arme schwimmend zu überqueren und das andere Ufer zu erreichen, der erlangt die Buddhaschaft. Oder wer imstande ist, das gesamte Universum, das dicht mit Bambusdickicht bedeckt ist, beiseitebiegend und niederstretend zu Fuß zu durchqueren und das andere Ufer zu erreichen, der erlangt die Buddhaschaft. Oder wer imstande ist, das gesamte Universum, das dicht an dicht mit aufrecht stehenden Lanzen gespickt ist, zu Fuß beschreitend zu überqueren und das andere Ufer zu erreichen, der erlangt die Buddhaschaft. Oder wer imstande ist, das gesamte Universum, das mit flammenloser, glühender Holzkohle angefüllt ist, mit den Füßen zertretend zu überqueren und das andere Ufer zu erreichen, der erlangt die Buddhaschaft.‘ Wer auch nur eine einzige dieser Taten für sich selbst nicht als zu schwer ansieht, sondern denkt: ‚Selbst dies will ich durchschwimmen oder durchschreiten und das andere Ufer erreichen‘, und wer somit mit solch großem Willen, großem Eifer, großem Streben und großem Suchen ausgestattet ist, dessen Gelübde geht in Erfüllung, nicht das eines anderen. Der Asket Sumedha nun vereinte diese acht Bedingungen, fasste den festen Entschluss zur Erreichung der Buddhaschaft und legte sich nieder. Dīpaṅkaropi [Pg.19] bhagavā āgantvā sumedhatāpasassa sīsabhāge ṭhatvā maṇisīhapañjaraṃ ugghāṭento viya pañcavaṇṇappasādasampannāni akkhīni ummīletvā kalalapiṭṭhe nipannaṃ sumedhatāpasaṃ disvā ‘‘ayaṃ tāpaso buddhattāya abhinīhāraṃ katvā nipanno, ijjhissati nu kho imassa patthanā, udāhu no’’ti anāgataṃsañāṇaṃ pesetvā upadhārento ‘‘ito kappasatasahassādhikāni cattāri asaṅkhyeyyāni atikkamitvā gotamo nāma buddho bhavissatī’’ti ñatvā ṭhitakova parisamajjhe byākāsi – ‘‘passatha no tumhe imaṃ uggatapaṃ tāpasaṃ kalalapiṭṭhe nipanna’’nti? ‘‘Evaṃ, bhante’’ti. ‘‘Ayaṃ buddhattāya abhinīhāraṃ katvā nipanno, samijjhissati imassa patthanā, ito kappasatasahassādhikānaṃ catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake gotamo nāma buddho bhavissati. Tasmiṃ panassa attabhāve kapilavatthu nāma nagaraṃ nivāso bhavissati, māyā nāma devī mātā, suddhodano nāma rājā pitā, aggasāvako upatisso nāma thero, dutiyasāvako kolito nāma, buddhupaṭṭhāko ānando nāma, aggasāvikā khemā nāma therī, dutiyasāvikā uppalavaṇṇā nāma therī bhavissati, paripakkañāṇo mahābhinikkhamanaṃ katvā mahāpadhānaṃ padahitvā nigrodhamūle pāyāsaṃ paṭiggahetvā nerañjarāya tīre paribhuñjitvā bodhimaṇḍaṃ āruyha assattharukkhamūle abhisambujjhissatī’’ti. Tena vuttaṃ – Auch der Erhabene Dīpaṅkara kam herbei, trat an das Kopfende des Asketen Sumedha und öffnete seine Augen, die von der reinen Klarheit der fūnf Farben erfüllt waren – gerade so, als würde er ein juwelenbesetztes Löwenfenster öffnen. Als er den im Schlamm liegenden Asketen Sumedha sah, sandte er sein Wissen über die Zukunft aus, um zu prüfen: ‚Dieser Asket hat sich niedergelassen und den festen Entschluss gefasst, die Buddhaschaft zu erlangen. Wird sein Wunsch in Erfüllung gehen oder nicht?‘ Er erkannte: ‚Nach dem Vergehen von vier unzählbaren Zeitaltern und einhunderttausend Weltzeitaltern von jetzt an wird ein Buddha namens Gotama entstehen‘, und verkündete noch im Stehen inmitten der Versammlung: ‚Seht ihr diesen Asketen von strenger Askese, der im Schlamm liegt?‘ – ‚Ja, Erhabener‘, antworteten sie. ‚Dieser hat den festen Entschluss gefasst, die Buddhaschaft zu erlangen; sein Wunsch wird in Erfüllung gehen. Nach Ablauf von vier unzählbaren Zeitaltern und einhunderttausend Weltzeitaltern wird ein Buddha namens Gotama entstehen. In jener Existenz wird die Stadt namens Kapilavatthu seine Wohnstätte sein, die Königin namens Māyā seine Mutter, der König namens Suddhodana sein Vater. Der Ältere namens Upatissa wird sein erster Hauptschüler sein, der namens Kolita sein zweiter Hauptschüler, der namens Ānanda sein persönlicher Diener. Die Nonne namens Khemā wird seine erste Hauptschülerin sein, die Nonne namens Uppalavaṇṇā seine zweite Hauptschülerin. Wenn sein Wissen herangereift ist, wird er die Große Entsagung vollziehen, die große Anstrengung ausüben, am Fuße des Banyan-Baumes eine Milchspeise empfangen, sie am Ufer des Flusses Nerañjarā verzehren, die Stätte der Erleuchtung besteigen und unter dem Assattha-Baum die vollkommene Erleuchtung erlangen.‘ Deshalb wurde gesagt: ‘‘Dīpaṅkaro lokavidū, āhutīnaṃ paṭiggaho; Ussīsake maṃ ṭhatvāna, idaṃ vacanamabravi. „„Dīpaṅkara, der Weltenkenner, der Empfänger der dargebrachten Gaben, trat an mein Hauptende und sprach diese Worte zu mir: ‘Passatha imaṃ tāpasaṃ, jaṭilaṃ uggatāpanaṃ; Aparimeyye ito kappe, buddho loke bhavissati. ‚Seht diesen Asketen mit geflochtenem Haar und von strenger Askese; in unermesslichen Weltzeitaltern von jetzt an wird er als Buddha in der Welt erscheinen. ‘Ahu kapilavhayā rammā, nikkhamitvā tathāgato; Padhānaṃ padahitvāna, katvā dukkarakārikaṃ. ‚Nachdem er aus der lieblichen Stadt namens Kapilavatthu ausgezogen ist, wird der Tathāgata eifrige Anstrengung üben und die schwer auszuführenden Kasteiungen vollziehen. ‘Ajapālarukkhamūle, nisīditvā tathāgato; Tattha pāyāsaṃ paggayha, nerañjaramupehiti. ‚Nachdem der Tathāgata unter dem Ajapāla-Baum gesessen und dort eine Milchspeise angenommen hat, wird er sich zum Fluss Nerañjarā begeben. ‘Nerañjarāya tīramhi, pāyāsaṃ ada so jino; Paṭiyattavaramaggena, bodhimūlamūpehiti. ‚Am Ufer des Nerañjarā-Flusses wird jener Sieger die Milchspeise verzehren. Auf dem herrlich bereiteten Pfad wird er sich zum Fuße des Bodhi-Baumes begeben. ‘Tato [Pg.20] padakkhiṇaṃ katvā, bodhimaṇḍaṃ anuttaro; Assattharukkhamūlamhi, bujjhissati mahāyaso. ‚Danach wird der Unübertreffliche von großem Ruhm die Stätte der Erleuchtung im Uhrzeigersinn umschreiten und unter dem Assattha-Baum die Erleuchtung erlangen. ‘Imassa janikā mātā, māyā nāma bhavissati; Pitā suddhodano nāma, ayaṃ hessati gotamo. ‚Seine leibliche Mutter wird Māyā heißen, sein Vater Suddhodana; dieser hier wird Gotama sein. ‘Anāsavā vītarāgā, santacittā samāhitā; Kolito upatisso ca, aggā hessanti sāvakā; Ānando nāmupaṭṭhāko, upaṭṭhissati taṃ jinaṃ. ‚Frei von den Trieben, leidenschaftslos, von friedvollem Geist und gesammelt werden Kolita und Upatissa die Hauptschüler sein. Der Diener namens Ānanda wird jenen Sieger bedienen. ‘Khemā uppalavaṇṇā ca, aggā hessanti sāvikā; Anāsavā vītarāgā, santacittā samāhitā; Bodhi tassa bhagavato, assatthoti pavuccatī’’’ti. ‚Khemā und Uppalavaṇṇā werden die Hauptschülerinnen sein – frei von den Trieben, leidenschaftslos, von friedvollem Geist und gesammelt. Der Erleuchtungsbaum dieses Erhabenen wird Assattha genannt.‘“ Sumedhatāpaso ‘‘mayhaṃ kira patthanā samijjhissatī’’ti somanassappatto ahosi. Mahājano dīpaṅkaradasabalassa vacanaṃ sutvā ‘‘sumedhatāpaso kira buddhabījaṃ buddhaṅkuro’’ti haṭṭhatuṭṭho ahosi. Evañcassa ahosi ‘‘yathā nāma puriso nadiṃ taranto ujukena titthena uttarituṃ asakkonto heṭṭhātitthena uttarati, evameva mayampi dīpaṅkaradasabalassa sāsane maggaphalaṃ alabhamānā anāgate yadā tvaṃ buddho bhavissasi, tadā tava sammukhā maggaphalaṃ sacchikātuṃ samatthā bhaveyyāmā’’ti patthanaṃ ṭhapayiṃsu. Dīpaṅkaradasabalopi bodhisattaṃ pasaṃsitvā aṭṭhahi pupphamuṭṭhīhi pūjetvā padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi, tepi catusatasahassasaṅkhā khīṇāsavā bodhisattaṃ gandhehi ca mālehi ca pūjetvā padakkhiṇaṃ katvā pakkamiṃsu. Devamanussā pana tatheva pūjetvā vanditvā pakkantā. Der Asket Sumedha geriet in helle Freude bei dem Gedanken: „Mein Wunsch wird wahrlich in Erfüllung gehen.“ Die Volksmenge hörte die Worte des Zehnmächtigen Dīpaṅkara und war hocherfreut: „Der Asket Sumedha ist wahrlich ein Buddha-Same, ein Buddha-Keim.“ Und sie äußerten folgenden Wunsch: „Gleichwie ein Mensch, der einen Fluss überquert und unfähig ist, direkt an der gegenüberliegenden Anlegestelle anzulanden, an einer weiter unten gelegenen Stelle übersetzt, ebenso wollen auch wir, falls wir in der Lehre des Zehnmächtigen Dīpaṅkara Pfad und Frucht nicht erlangen sollten, in der Zukunft, wenn du ein Buddha wirst, in deiner Gegenwart fähig sein, Pfad und Frucht zu verwirklichen.“ Auch der Zehnmächtige Dīpaṅkara lobte den Bodhisatta, verehrte ihn mit acht Handvoll Blumen, umschritt ihn ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn und reiste ab. Auch jene vierhunderttausend triebversiegten Heiligen (Arahants) verehrten den Bodhisatta mit Wohlgerüchen und Blumengirlanden, umschritten ihn im Uhrzeigersinn und reisten ab. Götter und Menschen taten desgleichen, verehrten und grüßten ihn ehrfurchtsvoll und gingen davon. Bodhisatto sabbesaṃ paṭikkantakāle sayanā vuṭṭhāya ‘‘pāramiyo vicinissāmī’’ti puppharāsimatthake pallaṅkaṃ ābhujitvā nisīdi. Evaṃ nisinne bodhisatte sakaladasasahassacakkavāḷadevatā sannipatitvā sādhukāraṃ datvā ‘‘ayya sumedhatāpasa, porāṇakabodhisattānaṃ pallaṅkaṃ ābhujitvā ‘pāramiyo vicinissāmā’ti nisinnakāle yāni pubbanimittāni nāma paññāyanti, tāni sabbānipi ajja pātubhūtāni, nissaṃsayena [Pg.21] tvaṃ buddho bhavissasi, mayampetaṃ jānāma ‘yassetāni nimittāni paññāyanti, ekantena so buddho hoti’, tvaṃ attano vīriyaṃ daḷhaṃ katvā paggaṇhā’’ti bodhisattaṃ nānappakārāhi thutīhi abhitthuniṃsu. Tena vuttaṃ – Als alle weggegangen waren, erhob sich der Bodhisatta von seinem Lager und setzte sich mit den Worten „Ich will die Vollkommenheiten (Pāramīs) erforschen“ im Kreuzsitz auf den Haufen von Blumen. Als der Bodhisatta so dasaß, versammelten sich die Gottheiten aus allen zehntausend Weltsystemen, riefen Beifall (Sādhu) und priesen den Bodhisatta mit vielfältigem Lobpreis: „Edler Asket Sumedha! Wenn frühere Bodhisattas sich im Kreuzsitz niederließen mit dem Gedanken ‚Wir wollen die Vollkommenheiten erforschen‘, traten gewisse Vorzeichen in Erscheinung. All diese Vorzeichen sind heute offenbar geworden. Ohne Zweifel wirst du ein Buddha werden. Auch wir wissen dies: ‚Derjenige, bei dem diese Vorzeichen in Erscheinung treten, wird unweigerlich ein Buddha.‘ Mache deine Tatkraft fest und nimm sie entschlossen auf!“ Darüber wurde folgendes gesagt: ‘‘Idaṃ sutvāna vacanaṃ, asamassa mahesino; Āmoditā naramarū, buddhabījaṃ kira ayaṃ. „Als sie diese Worte des unvergleichlichen großen Weisen hörten, freuten sich Menschen und Götter: ‚Dieser ist wahrlich ein Buddha-Same!‘ ‘Ukkuṭṭhisaddā vattanti, apphoṭenti hasanti ca; Katañjalī namassanti, dasasahassī sadevakā. Jubelrufe erschollen, sie klatschten in die Hände und lachten; mit gefalteten Händen erwiesen die zehntausend Welten samt den Göttern ihre Ehrerbietung. ‘Yadimassa lokanāthassa, virajjhissāma sāsanaṃ; Anāgatamhi addhāne, hessāma sammukhā imaṃ. ‚Wenn wir die Lehre dieses Weltenhüters verpassen sollten, so werden wir in zukünftiger Zeit diesem hier (Sumedha) persönlich gegenübertreten.‘ ‘Yathā manussā nadiṃ tarantā, paṭibhitthaṃ virajjhiya; Heṭṭhātitthe gahetvāna, uttaranti mahānadiṃ. Gleichwie Menschen, die einen Fluss überquert haben und die gegenüberliegende Anlegestelle verpassen, eine weiter unten gelegene Stelle nehmen und so den großen Fluss überqueren, ‘Evameva mayaṃ sabbe, yadi muñcāmimaṃ jinaṃ; Anāgatamhi addhāne, hessāma sammukhā imaṃ’. ebenso werden wir alle, wenn wir diesen Sieger verpassen, in zukünftiger Zeit diesem hier persönlich gegenübertreten.‘ ‘Dīpaṅkaro lokavidū, āhutīnaṃ paṭiggaho; Mama kammaṃ pakittetvā, dakkhiṇaṃ pādamuddhari. ‚Dīpaṅkara, der Weltenkenner, der Empfänger von Gaben, verkündete mein Werk und hob seinen rechten Fuß an. ‘Ye tatthāsuṃ jinaputtā, sabbe padakkhiṇamakaṃsu maṃ; Narā nāgā ca gandhabbā, abhivādetvāna pakkamuṃ. Alle Söhne des Siegers, die dort waren, umschritten mich im Uhrzeigersinn; Menschen, Nāgas und Gandharvas grüßten ehrfurchtsvoll und gingen davon. ‘Dassanaṃ me atikkante, sasaṅghe lokanāyake; Haṭṭhatuṭṭhena cittena, āsanā vuṭṭhahiṃ tadā. Als der Weltenführer samt seiner Gemeinde meinen Blicken entschwunden war, erhob ich mich mit freudigem und glücklichem Herzen von meinem Lager. ‘Sukhena sukhito homi, pāmojjena pamodito; Pītiyā ca abhissanno, pallaṅkaṃ ābhujiṃ tadā. Beglückt von Glück, erfreut von Heiterkeit und durchdrungen von Verzückung setzte ich mich sodann im Kreuzsitz nieder. ‘Pallaṅkena nisīditvā, evaṃ cintesahaṃ tadā; ‘Vasībhūto ahaṃ jhāne, abhiññāsu pāramiṃ gato. Nachdem ich mich im Kreuzsitz niedergelassen hatte, dachte ich damals so: ‚Ich habe Meisterschaft über die Vertiefungen (Jhānas) erlangt und die Vollendung in den höheren Geisteskräften (Abhiññās) erreicht. ‘Sahassiyamhi lokamhi, isayo natthi me samā; Asamo iddhidhammesu, alabhiṃ īdisaṃ sukhaṃ’. In der zehntausendfachen Welt gibt es keine Weisen, die mir gleichkommen. Unübertroffen in den magischen Kräften erlangte ich solch ein Glück.‘ ‘Pallaṅkābhujane [Pg.22] mayhaṃ, dasasahassādhivāsino; Mahānādaṃ pavattesuṃ, dhuvaṃ buddho bhavissasi. ‚Als ich mich im Kreuzsitz niedergelassen hatte, erhoben die Bewohner der zehntausend Welten ein gewaltiges Getöse und riefen: „Du wirst gewisslich ein Buddha werden! ‘Yā pubbe bodhisattānaṃ, pallaṅkavaramābhuje; Nimittāni padissanti, tāni ajja padissare. Die Vorzeichen, die sich früher zeigten, wenn vortreffliche Bodhisattas sich im edlen Kreuzsitz niederließen, ebendiese zeigen sich heute. ‘Sītaṃ byapagataṃ hoti, uṇhañca upasammati; Tāni ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Kälte ist gewichen und die Hitze ist gestillt. Diese Zeichen zeigen sich heute; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Dasasahassī lokadhātū, nissaddā honti nirākulā; Tāni ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die zehntausend Weltsysteme sind still und unaufgewühlt. Diese Zeichen zeigen sich heute; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Mahāvātā na vāyanti, na sandanti savantiyo; Tāni ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Große Winde wehen nicht, und die Flüsse fließen nicht. Diese Zeichen zeigen sich heute; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Thalajā dakajā pupphā, sabbe pupphanti tāvade; Tepajja pupphitā sabbe, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Alle auf dem Land und im Wasser wachsenden Blumen blühen sogleich auf; heute sind sie alle aufgeblüht; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Latā vā yadi vā rukkhā, phalabhārā honti tāvade; Tepajja phalitā sabbe, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Ob Schlingpflanzen oder Bäume, sie hängen sogleich voller Früchte; heute tragen sie alle Früchte; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Ākāsaṭṭhā ca bhūmaṭṭhā, ratanā jotanti tāvade; Tepajja ratanā jotanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Juwelen am Himmel und auf der Erde leuchten sogleich auf; heute leuchten diese Juwelen; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Mānusakā ca dibbā ca, turiyā vajjanti tāvade; Tepajjubho abhiravanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Menschliche und himmlische Musikinstrumente erklingen sogleich; heute ertönen beide; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Vicittapupphā gaganā, abhivassanti tāvade; Tepi ajja pavassanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Bunte Blumen regnen sogleich vom Himmel herab; auch heute regnen sie herab; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Mahāsamuddo ābhujati, dasasahassī pakampati; Tepajjubho abhiravanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Der große Ozean zieht sich zusammen und die zehntausend Weltsysteme erbeben; heute ertönen beide; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Nirayepi dasasahasse, aggī nibbanti tāvade; Tepajja nibbutā aggī, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Sogar in den zehntausend Höllen erlöschen die Feuer sogleich; heute sind jene Feuer erloschen; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Vimalo hoti sūriyo, sabbā dissanti tārakā; Tepi ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Sonne ist makellos rein und alle Sterne sind sichtbar; auch heute zeigen sie sich; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Anovaṭṭhena [Pg.23] udakaṃ, mahiyā ubbhijji tāvade; Tampajjubbhijjate mahiyā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Ohne dass es regnet, quillt sogleich Wasser aus der Erde hervor; auch heute quillt es aus der Erde; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Tārāgaṇā virocanti, nakkhattā gaganamaṇḍale; Visākhā candimāyuttā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Scharen der Sterne und Planeten leuchten am Himmelsrund; das Visākhā-Gestirn steht im Bündnis mit dem Mond; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Bilāsayā darīsayā, nikkhamanti sakāsayā; Tepajja āsayā chuddhā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die in Höhlen und Felsspalten lebenden Tiere kommen aus ihren Schlupfwinkeln hervor; heute haben sie ihre Behausungen verlassen; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Na hoti arati sattānaṃ, santuṭṭhā honti tāvade; Tepajja sabbe santuṭṭhā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Unbehagen kommt über die Wesen nicht, vielmehr sind sie sogleich zufriedengestellt; heute sind sie alle zufrieden; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Rogā tadūpasammanti, jighacchā ca vinassati; Tānipajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Krankheiten sind alsdann gestillt und der Hunger ist vergangen. Diese Zeichen zeigen sich heute; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Rāgo tadā tanu hoti, doso moho vinassati; Tepajja vigatā sabbe, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Gier (Rāga) wird alsdann schwach, und Hass (Dosa) sowie Verblendung (Moha) vergehen. Heute sind sie alle geschwunden; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Bhayaṃ tadā na bhavati, ajjapetaṃ padissati; Tena liṅgena jānāma, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Furcht gibt es damals nicht; auch heute wird dies geschaut. An diesem Kennzeichen erkennen wir: Du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Rajo nuddhaṃsati uddhaṃ, ajjapetaṃ padissati; Tena liṅgena jānāma, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Staub wirbelt nicht nach oben auf; auch heute wird dies geschaut. An diesem Kennzeichen erkennen wir: Du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Aniṭṭhagandho pakkamati, diṭṭhagandho pavāyati; Sopajja vāyati gandho, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Unangenehmer Geruch verzieht sich und ein himmlischer Duft weht herbei; dieser Duft weht auch heute; du wirst gewisslich ein Buddha werden. ‘Sabbe devā padissanti, ṭhapayitvā arūpino; Tepajja sabbe dissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Alle Götter sind sichtbar, ausgenommen die formlosen; heute sind sie alle zu sehen; du wirst gewisslich ein Buddha werden.“ ‘Yāvatā nirayā nāma, sabbe dissanti tāvade; Tepajja sabbe dissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. „Alle Höllen, so viele es auch geben mag, sind in diesem Moment sichtbar; sie alle sind auch heute sichtbar. Du wirst gewiss ein Buddha werden.“ ‘Kuṭṭā kavāṭā selā ca, na hontāvaraṇā tadā; Ākāsabhūtā tepajja, dhuvaṃ buddho bhavissasi. „Wände, Tore und Felsen bildeten damals kein Hindernis; sie alle sind heute wie der freie Raum geworden. Du wirst gewiss ein Buddha werden.“ ‘Cutī ca upapatti ca, khaṇe tasmiṃ na vijjati; Tānipajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. „In jenem Augenblick gibt es weder Sterben noch Wiedergeburt; auch dies ist heute zu sehen. Du wirst gewiss ein Buddha werden.“ ‘Daḷhaṃ [Pg.24] paggaṇha vīriyaṃ, mā nivatta abhikkama; Mayampetaṃ vijānāma, dhuvaṃ buddho bhavissasī’’’ti. „Nimm feste Willenskraft an, weiche nicht zurück, schreite voran! Auch wir wissen dies: Du wirst gewiss ein Buddha werden!“ Bodhisatto dīpaṅkaradasabalassa ca dasasahassacakkavāḷadevatānañca vacanaṃ sutvā bhiyyoso mattāya sañjātussāho hutvā cintesi ‘‘buddhā nāma amoghavacanā, natthi buddhānaṃ kathāya aññathattaṃ. Yathā hi ākāse khittaleḍḍussa patanaṃ dhuvaṃ, jātassa maraṇaṃ dhuvaṃ, aruṇe uggate sūriyassuṭṭhānaṃ, āsayā nikkhantasīhassa sīhanādanadanaṃ, garugabbhāya itthiyā bhāramoropanaṃ avassaṃbhāvī, evameva buddhānaṃ vacanaṃ nāma dhuvaṃ amoghaṃ, addhā ahaṃ buddho bhavissāmī’’ti. Tena vuttaṃ – Als der Bodhisatta die Worte des Zehnkraftbesitzenden Dīpaṅkara und der Gottheiten aus zehntausend Weltsystemen hörte, wurde er überaus enthusiastisch und dachte: „Die Buddhas sind wahrlich von unfehlbarem Wort; es gibt keine Abweichung in den Worten der Buddhas. Wie nämlich das Herabfallen eines in die Luft geworfenen Erdklumpens gewiss ist, wie der Tod eines Geborenen gewiss ist, wie das Aufgehen der Sonne beim Anbruch der Morgenröte gewiss ist, wie das Brüllen eines Löwen, der seine Höhle verlässt, gewiss ist und wie die Entbindung einer hochschwangeren Frau unvermeidlich ist; ebenso ist das Wort der Buddhas gewiss und nicht vergeblich. Ich werde ganz gewiss ein Buddha werden.“ Daher wurde gesagt: ‘‘Buddhassa vacanaṃ sutvā, dasasahassīna cūbhayaṃ; Tuṭṭhahaṭṭho pamodito, evaṃ cintesahaṃ tadā. „Als ich die Worte des Buddhas und jene der zehntausend Weltsysteme vernahm, dachte ich damals, voller Freude, Entzücken und Heiterkeit, also: ‘‘Advejjhavacanā buddhā, amoghavacanā jinā; Vitathaṃ natthi buddhānaṃ, dhuvaṃ buddho bhavāmahaṃ. „Die Buddhas sprechen keine zwiespältigen Worte, die Sieger sind von unfehlbarer Rede; Unwahrheit gibt es bei den Buddhas nicht. Ich werde gewiss ein Buddha werden. ‘‘Yathā khittaṃ nabhe leḍḍu, dhuvaṃ patati bhūmiyaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. „Wie ein in den Himmel geworfener Erdklumpen gewiss auf die Erde fällt, ebenso ist das Wort der edelsten Buddhas gewiss und ewig beständig. ‘‘Yathāpi sabbasattānaṃ, maraṇaṃ dhuvasassataṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. „Und wie auch der Tod aller Wesen gewiss und ewig beständig ist, ebenso ist das Wort der edelsten Buddhas gewiss und ewig beständig. ‘‘Yathā rattikkhaye patte, sūriyuggamanaṃ dhuvaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. „Wie beim Ende der Nacht das Aufgehen der Sonne gewiss ist, ebenso ist das Wort der edelsten Buddhas gewiss und ewig beständig. ‘‘Yathā nikkhantasayanassa, sīhassa nadanaṃ dhuvaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. „Wie das Brüllen eines Löwen, der sein Lager verlassen hat, gewiss ist, ebenso ist das Wort der edelsten Buddhas gewiss und ewig beständig. ‘‘Yathā āpannasattānaṃ, bhāramoropanaṃ dhuvaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassata’’nti. „Wie das Niederlegen der Last von schwangeren Frauen gewiss ist, ebenso ist das Wort der edelsten Buddhas gewiss und ewig beständig.““ So ‘‘dhuvāhaṃ buddho bhavissāmī’’ti evaṃ katasanniṭṭhāno buddhakārake dhamme upadhāretuṃ ‘‘kahaṃ nu kho buddhakārakadhammā, kiṃ uddhaṃ, udāhu adho, disāsu, vidisāsū’’ti anukkamena sakalaṃ dhammadhātuṃ vicinanto porāṇakabodhisattehi āsevitanisevitaṃ paṭhamaṃ dānapāramiṃ disvā evaṃ attānaṃ ovadi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya paṭhamaṃ dānapāramiṃ pūreyyāsi. Yathā hi nikkujjito udakakumbho nissesaṃ katvā udakaṃ [Pg.25] vamatiyeva, na paccāharati, evameva dhanaṃ vā yasaṃ vā puttaṃ vā dāraṃ vā aṅgapaccaṅgaṃ vā anoloketvā sampattayācakānaṃ sabbaṃ icchiticchitaṃ nissesaṃ katvā dadamāno bodhirukkhamūle nisīditvā buddho bhavissasī’’ti paṭhamaṃ dānapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Nachdem er den festen Entschluss gefasst hatte: „Ich werde gewiss ein Buddha werden“, suchte er, um die buddha-wirkenden Eigenschaften zu untersuchen, der Reihe nach das gesamte Phänomenreich ab, indem er dachte: „Wo wohl sind die Eigenschaften, die einen zum Buddha machen? Sind sie oben oder unten, in den Himmelsrichtungen oder in den Zwischenrichtungen?“ Als er die erste Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gebens, erblickte, die von den Bodhisattas der Vergangenheit gepflegt und ausgeübt worden war, ermahnte er sich selbst wie folgt: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du die erste Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gebens, erfüllen. Denn wie ein umgestürzter Wasserkrug das Wasser vollständig ausgießt und nicht wieder zurückhält, ebenso sollst du, ohne Rücksicht auf Reichtum, Ruhm, Sohn, Frau oder Glieder zu nehmen, den herbeigekommenen Bittstellern alles Gewünschte vollständig geben; so wirst du am Fuße des Bodhi-Baumes sitzen und ein Buddha werden.“ So festigte er die erste Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gebens, und fasste diesen Entschluss. Daher wurde gesagt: ‘‘Handa buddhakare dhamme, vicināmi ito cito; Uddhaṃ adho dasa disā, yāvatā dhammadhātuyā. „Wohlan, ich will die buddha-wirkenden Eigenschaften hier und dort suchen: oben, unten, in den zehn Himmelsrichtungen, soweit das Phänomenreich reicht. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, paṭhamaṃ dānapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, anuciṇṇaṃ mahāpathaṃ. „Als ich damals suchte, erblickte ich die erste Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gebens – den großen Pfad, den die großen Seher der Vergangenheit begangen haben. ‘‘Imaṃ tvaṃ paṭhamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Dānapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm diese erste zuerst fest auf und nimm sie auf dich; gelange zur Vollkommenheit des Gebens, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst. ‘‘Yathāpi kumbho sampuṇṇo, yassa kassaci adhokato; Vamatevudakaṃ nissesaṃ, na tattha parirakkhati. „Wie ein gefüllter Krug, wenn er von jemandem umgestürzt wird, das Wasser vollständig ausgießt und nichts davon zurückhält; ‘‘Tatheva yācake disvā, hīnamukkaṭṭhamajjhime; Dadāhi dānaṃ nissesaṃ, kumbho viya adhokato’’ti. „Ebenso gib, wenn du Bittsteller siehst – seien sie niedere, edle oder mittlere –, die Gabe vollständig ab, wie ein umgestürzter Krug.““ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato dutiyaṃ sīlapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya sīlapāramimpi pūreyyāsi. Yathā hi camarīmigo nāma jīvitampi anoloketvā attano vālameva rakkhati, evaṃ tvampi ito paṭṭhāya jīvitampi anoloketvā sīlameva rakkhanto buddho bhavissasī’’ti dutiyaṃ sīlapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er: „Dies können nicht die einzigen buddha-wirkenden Eigenschaften sein“, und als er noch weiter forschte, erblickte er die zweite Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Tugend, und es kam ihm folgender Gedanke: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Tugend erfüllen. Denn wie das Yak, ohne Rücksicht auf sein Leben zu nehmen, seinen eigenen Schweif hütet, ebenso sollst auch du von nun an, ohne Rücksicht auf dein Leben zu nehmen, allein deine Tugend hüten; so wirst du ein Buddha werden.“ So festigte er die zweite Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Tugend, und fasste diesen Entschluss. Daher wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Wahrlich, dies können nicht die einzigen Buddha-Eigenschaften sein; ich will auch nach anderen suchen, nach jenen Eigenschaften, welche die Erleuchtung zur Reife bringen. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, dutiyaṃ sīlapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals suchte, erblickte ich die zweite Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Tugend, die von den großen Sehern der Vergangenheit gepflegt und ausgeübt worden war. ‘‘Imaṃ tvaṃ dutiyaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Sīlapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm diese zweite zuerst fest auf und nimm sie auf dich; gelange zur Vollkommenheit der Tugend, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst. ‘‘Yathāpi camarī vālaṃ, kismiñci paṭilaggitaṃ; Upeti maraṇaṃ tattha, na vikopeti vāladhiṃ. „Wie ein Yak, dessen Schweifhaar sich in etwas verfangen hat, lieber dort den Tod erleidet, als dass es seinen Schweif beschädigt; ‘‘Tatheva catūsu[Pg.26], bhūmīsu, sīlāni paripūraya; Parirakkha sabbadā sīlaṃ, camarī viya vāladhi’’nti. „Ebenso erfülle die Tugendregeln auf den vier Ebenen; hüte allezeit deine Tugend, wie das Yak seinen Schweif.““ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato tatiyaṃ nekkhammapāramiṃ disvā etadahosi ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya nekkhammapāramimpi pūreyyāsi. Yathā hi ciraṃ bandhanāgāre vasamāno puriso na tattha sinehaṃ karoti, atha kho ukkaṇṭhitoyeva avasitukāmo hoti, evameva tvampi sabbabhave bandhanāgārasadise katvā sabbabhavehi ukkaṇṭhito muccitukāmo hutvā nekkhammābhimukhova hohi, evaṃ buddho bhavissasī’’ti tatiyaṃ nekkhammapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er: „Dies können nicht die einzigen buddha-wirkenden Eigenschaften sein“, und als er noch weiter forschte, erblickte er die dritte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Entsagung, und es kam ihm folgender Gedanke: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Entsagung erfüllen. Denn wie ein Mensch, der lange Zeit im Gefängnis gelebt hat, keine Zuneigung zu diesem hegt, sondern vielmehr seiner überdrüssig ist und fortgehen möchte, ebenso sollst auch du alle Daseinsformen wie Gefängnisse betrachten, aller Daseinsformen überdrüssig sein, nach Befreiung verlangen und dich ganz der Entsagung zuwenden; so wirst du ein Buddha werden.“ So festigte er die dritte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Entsagung, und fasste diesen Entschluss. Daher wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Wahrlich, dies können nicht die einzigen Buddha-Eigenschaften sein; ich will auch nach anderen suchen, nach jenen Eigenschaften, welche die Erleuchtung zur Reife bringen. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, tatiyaṃ nekkhammapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals suchte, erblickte ich die dritte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Entsagung, die von den großen Sehern der Vergangenheit gepflegt und ausgeübt worden war. ‘‘Imaṃ tvaṃ tatiyaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Nekkhammapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm diese dritte zuerst fest auf und nimm sie auf dich; gelange zur Vollkommenheit der Entsagung, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst. ‘‘Yathā andughare puriso, ciravuttho dukhaṭṭito; Na tattha rāgaṃ janeti, muttimeva gavesati. „Wie ein Mensch im Gefängnishaus, der dort lange Zeit gelebt hat und von Schmerz geplagt wird, keine Zuneigung dazu entwickelt, sondern allein nach Befreiung sucht; ‘‘Tatheva tvaṃ sabbabhave, passa andughare viya; Nekkhammābhimukho hohi, bhavato parimuttiyā’’ti. „Ebenso betrachte du alle Daseinsformen wie ein Gefängnis; richte deinen Sinn auf die Entsagung, um Befreiung vom Dasein zu erlangen.“ Dies wurde (im Buddhavaṃsa) verkündet. Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato catutthaṃ paññāpāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya paññāpāramimpi pūreyyāsi. Hīnamajjhimukkaṭṭhesu kañci avajjetvā sabbepi paṇḍite upasaṅkamitvā pañhaṃ puccheyyāsi. Yathā hi piṇḍacāriko bhikkhu hīnādikesu kulesu kiñci avajjetvā paṭipāṭiyā piṇḍāya caranto khippaṃ yāpanaṃ labhati, evaṃ tvampi sabbapaṇḍite upasaṅkamitvā pañhaṃ pucchanto buddho bhavissasī’’ti catutthaṃ paññāpāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es darf nicht nur bei diesen Qualitäten verbleiben, die einen Buddha ausmachen“, und als er die vierte, die Vollkommenheit der Weisheit (paññāpāramī), erblickte, kam ihm dieser Gedanke: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Weisheit erfüllen. Ohne jemanden unter den Niedrigen, Mittleren oder Hohen auszuschließen, sollst du an alle Weisen herantreten und sie Fragen fragen. Denn so wie ein auf Almosengang befindlicher Mönch, ohne irgendeine Familie unter den niedrigen und anderen zu meiden, der Reihe nach um Almosenspeise wandert und schnell seinen Lebensunterhalt erlangt, ebenso wirst auch du, wenn du an alle Weisen herantrittst und sie Fragen fragst, ein Buddha werden.“ So festigte er die vierte Vollkommenheit der Weisheit und fasste den Entschluss dazu. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na [Pg.27] hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Gewiss gibt es nicht nur diese so vielen Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen; ich werde auch nach anderen Eigenschaften suchen, die zur Erleuchtung reifen lassen. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, catutthaṃ paññāpāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Suchend erblickte ich damals die vierte, die Vollkommenheit der Weisheit, die von den früheren großen Weisen praktiziert und gepflegt wurde. ‘‘Imaṃ tvaṃ catutthaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Paññāpāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm diese vierte zuerst fest entschlossen auf dich und führe sie aus; gelange zur Vollkommenheit der Weisheit, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst. ‘‘Yathāpi bhikkhu bhikkhanto, hīnamukkaṭṭhamajjhime; Kulāni na vivajjento, evaṃ labhati yāpanaṃ. „Wie ein Mönch, der auf Almosengang geht und dabei weder niedrige, hohe noch mittlere Familien meidet, auf diese Weise seinen Lebensunterhalt erhält, ‘‘Tatheva tvaṃ sabbakālaṃ, paripucchanto budhaṃ janaṃ; Paññāpāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso wirst du, wenn du allezeit die weisen Menschen befragst, die Vollkommenheit der Weisheit erreichen und die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato pañcamaṃ vīriyapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya vīriyapāramimpi pūreyyāsi. Yathā hi sīho migarājā sabbairiyāpathesu daḷhavīriyo hoti, evaṃ tvampi sabbabhavesu sabbairiyāpathesu daḷhavīriyo anolīnavīriyo samāno buddho bhavissasī’’ti pañcamaṃ vīriyapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es darf nicht nur bei diesen Qualitäten verbleiben, die einen Buddha ausmachen“, und als er die fünfte, die Vollkommenheit der Tatkraft (vīriyapāramī), erblickte, kam ihm dieser Gedanke: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Tatkraft erfüllen. Denn so wie der Löwe, der König der Tiere, in allen Körperhaltungen von unerschütterlicher Tatkraft ist, ebenso wirst auch du, wenn du in allen Daseinsformen und in allen Körperhaltungen von unerschütterlicher und unermüdlicher Tatkraft bist, ein Buddha werden.“ So festigte er die fünfte Vollkommenheit der Tatkraft und fasste den Entschluss dazu. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Gewiss gibt es nicht nur diese so vielen Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen; ich werde auch nach anderen Eigenschaften suchen, die zur Erleuchtung reifen lassen. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, pañcamaṃ vīriyapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Suchend erblickte ich damals die fünfte, die Vollkommenheit der Tatkraft, die von den früheren großen Weisen praktiziert und gepflegt wurde. ‘‘Imaṃ tvaṃ pañcamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Vīriyapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm diese fünfte zuerst fest entschlossen auf dich und führe sie aus; gelange zur Vollkommenheit der Tatkraft, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst. ‘‘Yathāpi sīho migarājā, nisajjaṭṭhānacaṅkame; Alīnavīriyo hoti, paggahitamano sadā. „Wie der Löwe, der König der Tiere, beim Sitzen, Stehen und Wandeln von unermüdlicher Tatkraft und stets von entschlossener Geisteshaltung ist, ‘‘Tatheva tvaṃ sabbabhave, paggaṇha vīriyaṃ daḷhaṃ; Vīriyapāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso entfalte du in jeder Daseinsform eine unerschütterliche Tatkraft; wenn du die Vollkommenheit der Tatkraft erreicht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato chaṭṭhaṃ khantipāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito [Pg.28] paṭṭhāya khantipāramimpi pūreyyāsi. Sammānanepi avamānanepi khamova bhaveyyāsi. Yathā hi pathaviyaṃ nāma sucimpi pakkhipanti asucimpi, na tena pathavī sinehaṃ, na paṭighaṃ karoti, khamati sahati adhivāsetiyeva, evaṃ tvampi sammānanāvamānanakkhamova samāno buddho bhavissasī’’ti chaṭṭhaṃ khantipāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es darf nicht nur bei diesen Qualitäten verbleiben, die einen Buddha ausmachen“, und als er die sechste, die Vollkommenheit der Geduld (khantipāramī), erblickte, kam ihm dieser Gedanke: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Geduld erfüllen. Sowohl bei Ehrung als auch bei Missachtung sollst du geduldig sein. Denn so wie man auf die Erde sowohl Reines als auch Unreines wirft, und die Erde deswegen weder Zuneigung noch Abneigung hegt, sondern geduldig ist, erträgt und es einfach hinnimmt, ebenso wirst auch du, wenn du gegenüber Ehrung und Missachtung gleichermaßen geduldig bist, ein Buddha werden.“ So festigte er die sechste Vollkommenheit der Geduld und fasste den Entschluss dazu. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Gewiss gibt es nicht nur diese so vielen Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen; ich werde auch nach anderen Eigenschaften suchen, die zur Erleuchtung reifen lassen. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, chaṭṭhamaṃ khantipāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Suchend erblickte ich damals die sechste, die Vollkommenheit der Geduld, die von den früheren großen Weisen praktiziert und gepflegt wurde. ‘‘Imaṃ tvaṃ chaṭṭhamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tattha advejjhamānaso, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Nimm diese sechste zuerst fest entschlossen auf dich und führe sie aus; wenn du darin unerschütterlich (ohne geteilten Geist) bist, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen. ‘‘Yathāpi pathavī nāma, sucimpi asucimpi ca; Sabbaṃ sahati nikkhepaṃ, na karoti paṭighaṃ tayā. „Wie die Erde sowohl Reines als auch Unreines erträgt, was immer auf sie geworfen wird, und deswegen keinen Groll empfindet, ‘‘Tatheva tvampi sabbesaṃ, sammānāvamānakkhamo; Khantipāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso wirst auch du, wenn du gegenüber der Ehrung und Missachtung aller geduldig bist, die Vollkommenheit der Geduld erreichen und die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato sattamaṃ saccapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya saccapāramimpi pūreyyāsi. Asaniyā matthake patamānāyapi dhanādīnaṃ atthāya chandādivasena sampajānamusāvādaṃ nāma mākāsi. Yathā hi osadhitārakā nāma sabbautūsu attano gamanavīthiṃ jahitvā aññāya vīthiyā na gacchati, sakavīthiyāva gacchati, evameva tvampi saccaṃ pahāya musāvādaṃ nāma akarontoyeva buddho bhavissasī’’ti sattamaṃ saccapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es darf nicht nur bei diesen Qualitäten verbleiben, die einen Buddha ausmachen“, und als er die siebte, die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit (saccapāramī), erblickte, kam ihm dieser Gedanke: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit erfüllen. Selbst wenn ein Blitz auf dein Haupt fallen sollte, darfst du um des Reichtums oder anderer Dinge willen, geleitet von Verlangen, Hass, Furcht oder Verblendung, niemals eine bewusste Lüge sprechen. Denn so wie der Morgenstern in allen Jahreszeiten nicht von seiner eigenen Umlaufbahn abweicht, um auf einer anderen Bahn zu wandeln, sondern stets auf seiner eigenen Bahn zieht, ebenso wirst auch du, wenn du die Wahrheit niemals aufgibst und keine Lüge sprichst, ein Buddha werden.“ So festigte er die siebte Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit und fasste den Entschluss dazu. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Gewiss gibt es nicht nur diese so vielen Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen; ich werde auch nach anderen Eigenschaften suchen, die zur Erleuchtung reifen lassen. ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, sattamaṃ saccapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Suchend erblickte ich damals die siebte, die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit, die von den früheren großen Weisen praktiziert und gepflegt wurde. ‘‘Imaṃ [Pg.29] tvaṃ sattamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tattha advejjhavacano, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Nimm diese siebte zuerst fest entschlossen auf dich und führe sie aus; wenn du darin ohne doppelzüngige Rede bist, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen. ‘‘Yathāpi osadhī nāma, tulābhūtā sadevake; Samaye utuvasse vā, na vokkamati vīthito. „Wie der Morgenstern, der in der Götter- und Menschenwelt als Richtmaß dient, in der rechten Zeit, sei es in der heißen Jahreszeit oder der Regenzeit, nicht von seiner Bahn abweicht, ‘‘Tatheva tvampi saccesu, mā vokkamasi vīthito; Saccapāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso weiche auch du in deinen Wahrheiten nicht von der Bahn ab; wenn du die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit erreicht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato aṭṭhamaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya adhiṭṭhānapāramimpi pūreyyāsi. Yaṃ adhiṭṭhāsi, tasmiṃ adhiṭṭhāne niccalo bhaveyyāsi. Yathā hi pabbato nāma sabbadisāsu vātehi pahaṭopi na kampati na calati, attano ṭhāneyeva tiṭṭhati, evameva tvampi attano adhiṭṭhāne niccalo hontova buddho bhavissasī’’ti aṭṭhamaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es darf nicht nur bei diesen Qualitäten verbleiben, die einen Buddha ausmachen“, und als er die achte, die Vollkommenheit des Entschlusses (adhiṭṭhānapāramī), erblickte, kam ihm dieser Gedanke: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit des Entschlusses erfüllen. Worauf du dich entschlossen hast, in diesem Entschluss sollst du unerschütterlich sein. Denn so wie ein Berg, selbst wenn er von Winden aus allen Himmelsrichtungen getroffen wird, weder erzittert noch wankt, sondern an seiner eigenen Stelle stehen bleibt, ebenso wirst auch du, wenn du in deinem eigenen Entschluss stets unerschütterlich bleibst, ein Buddha werden.“ So festigte er die achte Vollkommenheit des Entschlusses und fasste den Entschluss dazu. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Gewiss gibt es nicht nur diese so vielen Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen; ich werde auch nach anderen Eigenschaften suchen, die zur Erleuchtung reifen lassen.“ ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, aṭṭhamaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals suchte, erblickte ich die achte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Entschlusses, welche von den früheren großen Weisen gepflegt und stets praktiziert worden war.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ aṭṭhamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tattha tvaṃ acalo hutvā, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Nimm du diese achte [Vollkommenheit] zuerst fest entschlossen auf dich; wenn du darin unerschütterlich bist, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ ‘‘Yathāpi pabbato selo, acalo suppatiṭṭhito; Na kampati bhusavātehi, sakaṭṭhāneva tiṭṭhati. „Wie ein felsiger Berg, unerschütterlich und fest gegründet, durch heftige Winde nicht erschüttert wird, sondern fest an seinem Platz stehen bleibt,“ ‘‘Tatheva tvampi adhiṭṭhāne, sabbadā acalo bhava; Adhiṭṭhānapāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso sei auch du in deinem Entschluss allezeit unerschütterlich. Wenn du die Vollkommenheit des Entschlusses zur Vollendung gebracht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato navamaṃ mettāpāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya navamaṃ mettāpāramimpi pūreyyāsi. Ahitesupi hitesupi ekacitto bhaveyyāsi. Yathā hi udakaṃ nāma pāpajanassāpi kalyāṇajanassāpi sītibhāvaṃ ekasadisaṃ katvā pharati, evameva tvampi sabbasattesu [Pg.30] mettacittena ekacittova honto buddho bhavissasī’’ti navamaṃ mettāpāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, als er darüber hinaus weiterforschte: „Es kann nicht sein, dass es nur so viele Buddhaschaft bewirkende Eigenschaften gibt.“ Als er die neunte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der liebenden Güte, erblickte, dachte er: „Weiser Sumedha, erfülle von nun an auch die neunte Vollkommenheit der liebenden Güte. Sei gegenüber jenen, die dir Schaden zufügen, als auch jenen, die dir Gutes tun, von ein und demselben Geist. Denn so wie Wasser sowohl für schlechte als auch für gute Menschen gleichermaßen Kühlung verbreitet, ebenso wirst auch du ein Buddha werden, wenn du allen Wesen mit einem Geist der liebenden Güte gleichermaßen begegnest.“ So fasste er fest den Entschluss, die neunte Vollkommenheit der liebenden Güte zu erfüllen. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Sicherlich gibt es nicht nur so viele Buddhaschaft bewirkende Eigenschaften; ich werde nach weiteren suchen, jenen Eigenschaften, die zur Erleuchtung reifen.“ ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, navamaṃ mettāpāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals suchte, erblickte ich die neunte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der liebenden Güte, welche von den früheren großen Weisen gepflegt und stets praktiziert worden war.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ navamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Mettāya asamo hohi, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm du diese neunte [Vollkommenheit] zuerst fest entschlossen auf dich; sei unübertroffen an liebender Güte, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst.“ ‘‘Yathāpi udakaṃ nāma, kalyāṇe pāpake jane; Samaṃ pharati sītena, pavāheti rajomalaṃ. „Wie das Wasser sowohl für gute als auch für böse Menschen sich gleichermaßen mit Kühle verbreitet und Schmutz und Staub fortspült,“ ‘‘Tatheva tvampi ahitahite, samaṃ mettāya bhāvaya; Mettāpāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso entfalte auch du gleichermaßen liebende Güte gegenüber jenen, die dir schaden, und jenen, die dir nützen. Wenn du die Vollkommenheit der liebenden Güte zur Vollendung gebracht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttaripi upadhārayato dasamaṃ upekkhāpāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya upekkhāpāramimpi pūreyyāsi. Sukhepi dukkhepi majjhattova bhaveyyāsi. Yathā hi pathavī nāma sucimpi asucimpi pakkhippamānā majjhattāva hoti, evameva tvampi sukhadukkhesu majjhattova honto buddho bhavissasī’’ti dasamaṃ upekkhāpāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, als er darüber hinaus weiterforschte: „Es kann nicht sein, dass es nur so viele Buddhaschaft bewirkende Eigenschaften gibt.“ Als er die zehnte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gleichmuts, erblickte, dachte er: „Weiser Sumedha, erfülle von nun an auch die Vollkommenheit des Gleichmuts. Sei sowohl bei Glück als auch bei Leid stets gleichmütig. Denn so wie die Erde gleichmütig bleibt, gleichgültig, ob Reines oder Unreines auf sie geworfen wird, ebenso wirst auch du ein Buddha werden, wenn du bei Glück und Leid stets gleichmütig bist.“ So fasste er fest den Entschluss, die zehnte Vollkommenheit des Gleichmuts zu erfüllen. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Sicherlich gibt es nicht nur so viele Buddhaschaft bewirkende Eigenschaften; ich werde nach weiteren suchen, jenen Eigenschaften, die zur Erleuchtung reifen.“ ‘‘Vicinanto tadādakkhiṃ, dasamaṃ upekkhāpāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals searched, erblickte ich die zehnte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gleichmuts, welche von den früheren großen Weisen gepflegt und stets praktiziert worden war.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ dasamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tulābhūto daḷho hutvā, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Nimm du diese zehnte [Vollkommenheit] zuerst fest entschlossen auf dich; wenn du fest und ausgewogen wie eine Waage bist, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ ‘‘Yathāpi pathavī nāma, nikkhittaṃ asuciṃ suciṃ; Upekkhati ubhopete, kopānunayavajjitā. „Wie die Erde, wenn Reines oder Unreines auf sie geworfen wird, frei von Abneigung und Vorliebe beides gleichermaßen gleichmütig hinnimmt,“ ‘‘Tatheva tvampi sukhadukkhe, tulābhūto sadā bhava; Upekkhāpāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. „ebenso sei auch du bei Glück und Leid allezeit ausgeglichen wie eine Waage. Wenn du die Vollkommenheit des Gleichmuts zur Vollendung gebracht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Tato [Pg.31] cintesi – ‘‘imasmiṃ loke bodhisattehi pūretabbā bodhiparipācanā buddhakārakadhammā ettakāyeva, dasa pāramiyo ṭhapetvā aññe natthi, imāpi dasa pāramiyo uddhaṃ ākāsepi natthi, heṭṭhā pathaviyampi, puratthimādīsu disāsupi natthi, mayhameva pana hadayamaṃsabbhantare patiṭṭhitā’’ti. Evaṃ tāsaṃ hadaye patiṭṭhitabhāvaṃ disvā sabbāpi tā daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāya punappunaṃ sammasanto anulomapaṭilomaṃ sammasati, pariyante gahetvā ādiṃ pāpeti, ādimhi gahetvā pariyante ṭhapeti, majjhe gahetvā ubhato osāpeti, ubhato koṭīsu hetvā majjhe osāpeti. Bāhirakabhaṇḍapariccāgo dānapāramī nāma, aṅgapariccāgo dānaupapāramī nāma, jīvitapariccāgo dānaparamatthapāramī nāmāti dasa pāramiyo dasa upapāramiyo dasa paramatthapāramiyo yantatelaṃ vinivaṭṭento viya mahāmeruṃ matthaṃ katvā cakkavāḷamahāsamuddaṃ āluḷento viya ca sammasi. Tassevaṃ dasa pāramiyo sammasantassa dhammatejena catunahutādhikadviyojanasatasahassabahalā ayaṃ mahāpathavī hatthinā akkantanaḷakalāpo viya, pīḷiyamānaṃ ucchuyantaṃ viya ca mahāviravaṃ viravamānā saṅkampi sampakampi sampavedhi, kulālacakkaṃ viya telayantacakkaṃ viya ca paribbhami. Tena vuttaṃ – Daraufhin überlegte er: „In dieser Welt gibt es nur diese Eigenschaften, die von Bodhisattas zu erfüllen sind, welche die Erleuchtung reifen lassen und zur Buddhaschaft führen; abgesehen von den zehn Vollkommenheiten gibt es keine anderen. Und diese zehn Vollkommenheiten existieren weder hoch oben im Himmel, noch unten in der Erde, noch im Osten oder in den anderen Himmelsrichtungen. Vielmehr sind sie tief in meinem eigenen Herzen gegründet.“ Als er so erkannte, dass sie in seinem Herzen gegründet waren, entschloss er sich fest, sie alle zu erfüllen. Indem er sie immer wieder untersuchte, erwog er sie in direkter und umgekehrter Reihenfolge: Er nahm das Ende und führte es zum Anfang, er nahm den Anfang und setzte es ans Ende, er nahm die Mitte und führte es zu beiden Enden, er nahm die beiden Enden und schloss in der Mitte ab. Das Aufgeben äußerer Besitztümer ist die Vollkommenheit des Gebens; das Aufgeben der eigenen Glieder ist die mittlere Vollkommenheit des Gebens; das Aufgeben des eigenen Lebens ist die höchste Vollkommenheit des Gebens. Auf diese Weise untersuchte er die zehn Vollkommenheiten, die zehn mittleren Vollkommenheiten und die zehn höchsten Vollkommenheiten, gleichsam wie man eine Ölpresse dreht oder wie man den Weltenozean aufwühlt, indem man den Berg Meru als Quirl benutzt. Während er die zehn Vollkommenheiten auf diese Weise untersuchte, erbebte kraft der Macht seiner Erkenntnis diese große Erde, die zweihundertundvierzigtausend Yojanas dick ist, wie ein Bündel Schilfrohr, das von einem Elefanten zertrampelt wird, oder wie Zuckerrohr, das in einer Presse ausgepresst wird. Unter einem gewaltigen Brüllen erzitterte sie, bebte heftig, schwankte und drehte sich im Kreis wie eine Töpferscheibe oder das Rad einer Ölpresse. Darum wurde gesagt: ‘‘Ettakāyeva te loke, ye dhammā bodhipācanā; Tatuddhaṃ natthi aññatra, daḷhaṃ tattha patiṭṭhaha. „In der Welt gibt es nur so viele Eigenschaften, die zur Erleuchtung reifen; darüber hinaus gibt es keine anderen; stehe fest in ihnen.“ ‘‘Ime dhamme sammasato, sabhāvasarasalakkhaṇe; Dhammatejena vasudhā, dasasahassī pakampatha. „Während er diese Eigenschaften hinsichtlich ihrer eigenen Natur und wesentlichen Merkmale untersuchte, erbebte kraft der Macht seiner Erkenntnis die zehntausendfache Erde.“ ‘‘Calatī ravatī pathavī, ucchuyantaṃva pīḷitaṃ; Telayante yathā cakkaṃ, evaṃ kampati medanī’’ti. „Die Erde schwankt und brüllt wie Zuckerrohr, das gepresst wird; wie das Rad in einer Ölpresse, so bebt die Erde.“ Mahāpathaviyā kampamānāya rammanagaravāsino saṇṭhātuṃ asakkontā yugantavātabbhāhatā mahāsālā viya mucchitamucchitāva papatiṃsu, ghaṭādīni [Pg.32] kulālabhājanāni pavaṭṭantāni aññamaññaṃ paharantāni cuṇṇavicuṇṇāni ahesuṃ. Mahājano bhītatasito satthāraṃ upasaṅkamitvā ‘‘kiṃ nu kho bhagavā nāgāvaṭṭo ayaṃ bhūtayakkhadevatāsu aññatarāvaṭṭoti na hi mayaṃ etaṃ jānāma, apica kho sabbopi ayaṃ mahājano upadduto, kiṃ nu kho imassa lokassa pāpakaṃ bhavissati, udāhu kalyāṇaṃ, kathetha no etaṃ kāraṇa’’nti āha. Atha satthā tesaṃ kathaṃ sutvā ‘‘tumhe mā bhāyatha mā cintayittha, natthi vo itonidānaṃ bhayaṃ. Yo so mayā ajja sumedhapaṇḍito ‘anāgate gotamo nāma buddho bhavissatī’ti byākato, so dasa pāramiyo sammasati, tassa dasa pāramiyo sammasantassa viloḷentassa dhammatejena sakaladasasahassilokadhātu ekappahārena kampati, ceva, ravati cā’’ti āha. Tena vuttaṃ – Als die große Erde erbebte, konnten sich die Einwohner der Stadt Ramma nicht aufrecht halten. Wie riesige Sal-Bäume, die vom Sturm am Ende eines Weltzeitalters umgeweht werden, fielen sie ohnmächtig und betäubt zu Boden. Töpferwaren wie Wassertöpfe rollten umher, stießen aneinander und zerbrachen in tausend Stücke. Die Menschen nahten sich voller Angst und Schrecken dem Erhabenen und sprachen: „O Erhabener, ist dies das Werk von Schlangen, oder ist es das Werk von Geistern, Dämonen oder Gottheiten? Wir wissen es wahrlich nicht. Doch diese ganze Menschenmenge ist in Bedrängnis. Wird dies der Welt Unheil bringen oder Segen? Bitte verkünde uns den Grund dafür!“ Da vernahm der Meister ihre Worte und sprach: „Fürchtet euch nicht, sorgt euch nicht! Daraus erwächst euch keine Gefahr. Der weise Sumedha, dem ich heute prophezeit habe: ‚In der Zukunft wirst du ein Buddha namens Gotama sein‘, untersucht die zehn Vollkommenheiten. Kraft der Macht seiner Erkenntnis erbebt und brüllt das gesamte zehntausendfache Weltsystem auf einmal, während er diese zehn Vollkommenheiten untersucht und durchdringt.“ Darum wurde gesagt: ‘‘Yāvatā parisā āsi, buddhassa parivesane; Pavedhamānā sā tattha, mucchitā sesi bhūmiyaṃ. „Wie groß die Versammlung bei der Speisung des Buddha auch war, sie alle erzitterten dort und lagen ohnmächtig auf der Erde.“ ‘‘Ghaṭānekasahassāni, kumbhīnañca satā bahū; Sañcuṇṇamathitā tattha, aññamaññaṃ paghaṭṭitā. Viele tausend Wassertöpfe und viele hunderte Krüge stießen dort aneinander und wurden völlig zertrümmert und zu Staub zermalmt. ‘‘Ubbiggā tasitā bhītā, bhantā byadhitamānasā; Mahājanā samāgamma, dīpaṅkaramupāgamuṃ. Erschrocken, zitternd, verängstigt, verwirrt und mit von Furcht gepeinigtem Herzen kamen die Menschen zusammen und näherten sich Dīpaṅkara. ‘Kiṃ bhavissati lokassa, kalyāṇamatha pāpakaṃ; Sabbo upadduto loko, taṃ vinodehi cakkhuma’. „Was wird mit der Welt geschehen? Wird es Gutes sein oder Unheil? Die ganze Welt ist in Bedrängnis; vertreibe diese Furcht, o Sehender!“ ‘‘Tesaṃ tadā saññāpesi, dīpaṅkaro mahāmuni; Vissatthā hotha mā bhātha, imasmiṃ pathavikampane. Da beruhigte der große Weise Dīpaṅkara sie damals und sprach: „Seid beruhigt und fürchtet euch nicht wegen dieses Erdbebens! ‘‘Yamahaṃ ajja byākāsiṃ, buddho loke bhavissati; Eso sammasati dhammaṃ, pubbakaṃ jinasevitaṃ. Er, dem ich heute die Prophezeiung erteilt habe, wird ein Buddha in der Welt werden. Er reflektiert nun über die einstige Lehre (die Vollkommenheiten), die von den Siegreichen gepflegt wurde. ‘‘Tassa sammasato dhammaṃ, buddhabhūmiṃ asesato; Tenāyaṃ kampitā pathavī, dasasahassī sadevake’’ti. Während er die Lehre, die den Boden des Buddha-Seins bildet, ohne Rest reflektiert, erbebte dadurch diese zehntausendfältige Erde samt den Götterwelten.“ Mahājano tathāgatassa vacanaṃ sutvā haṭṭhatuṭṭho mālāgandhavilepanaṃ ādāya rammanagarā nikkhamitvā bodhisattaṃ upasaṅkamitvā mālādīhi pūjetvā [Pg.33] vanditvā padakkhiṇaṃ katvā rammanagarameva pāvisi. Bodhisattopi dasa pāramiyo sammasitvā vīriyaṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāya nisinnāsanā vuṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als die Volksmenge die Worte des Tathāgata gehört hatte, war sie hocherfreut; sie nahmen Blumen, Düfte und Salben, verließen die Stadt Ramma, näherten sich dem Bodhisatta, verehrten ihn mit Blumen und anderem, erwiesen ihm die Ehrfurcht, umwandelten ihn rechtsherum und kehrten in die Stadt Ramma zurück. Auch der Bodhisatta erhob sich von seinem Sitz, nachdem er über die zehn Vollkommenheiten (Pāramīs) reflektiert, seine Willenskraft gestärkt und den festen Entschluss gefasst hatte. Darüber wurde Folgendes gesagt: ‘‘Buddhassa vacanaṃ sutvā, mano nibbāyi tāvade; Sabbe maṃ upasaṅkamma, punāpi abhivandisuṃ. „Als ich die Worte des Buddha gehört hatte, beruhigte sich mein Geist sogleich; alle kamen zu mir herzu und verbeugten sich nochmals vor mir. ‘‘Samādiyitvā buddhaguṇaṃ, daḷhaṃ katvāna mānasaṃ; Dīpaṅkaraṃ namassitvā, āsanā vuṭṭhahiṃ tadā’’ti. Ich nahm die Qualitäten eines Buddha auf mich, machte meinen Geist fest, verneigte mich vor Dīpaṅkara und erhob mich sodann von meinem Sitz.“ Atha bodhisattaṃ āsanā vuṭṭhahantaṃ sakaladasasahassacakkavāḷadevatā sannipatitvā dibbehi mālāgandhehi pūjetvā vanditvā ‘‘ayya sumedhatāpasa, tayā ajja dīpaṅkaradasabalassa pādamūle mahatī patthanā patthitā, sā te anantarāyena samijjhatu, mā te bhayaṃ vā chambhitattaṃ vā ahosi, sarīre appamattakopi rogo mā uppajji, khippaṃ pāramiyo pūretvā sammāsambodhiṃ paṭivijjha. Yathā pupphūpagaphalūpagā rukkhā samaye pupphanti ceva phalanti ca, tatheva tvampi samayaṃ anatikkamitvā khippaṃ sambodhimuttamaṃ phusassū’’tiādīni thutimaṅgalāni payirudāhaṃsu, evaṃ payirudāhitvā attano attano devaṭṭhānameva agamaṃsu. Bodhisattopi devatāhi abhitthuto ‘‘ahaṃ dasa pāramiyo pūretvā kappasatasahassādhikānaṃ catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake buddho bhavissāmī’’ti vīriyaṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāya nabhaṃ abbhuggantvā himavantameva agamāsi. Tena vuttaṃ – Als sich der Bodhisatta nun von seinem Sitz erhob, kamen die Gottheiten aus allen zehntausend Weltsystemen zusammen, verehrten ihn mit himmlischen Blumen und Düften, verbeugten sich vor ihm und sprachen diese Worte des Lobes und des Segens: „O edler Asket Sumedha, du hast heute zu den Füßen des zehnkräftebegabten Dīpaṅkara den erhabenen Wunsch nach der Buddhaschaft geäußert. Möge dieser dein Wunsch ohne Hindernis in Erfüllung gehen! Mögest du weder Furcht noch Zittern empfinden, und möge in deinem Körper nicht die geringste Krankheit entstehen! Erfülle rasch die Vollkommenheiten (Pāramīs) und dringe zur vollkommenen Selbst-Erleuchtung (Sammāsambodhi) durch! So wie Bäume, die Blüten und Früchte tragen, zu ihrer Zeit blühen und Früchte tragen, so mögest auch du, ohne die Zeit zu überschreiten, rasch die höchste Erleuchtung erlangen!“ Nachdem sie diese Segenswünsche ausgesprochen hatten, kehrten sie in ihre jeweiligen himmlischen Bereiche zurück. Auch der Bodhisatta, von den Gottheiten so gepriesen, fasste den festen Entschluss mit starker Tatkraft: „Nachdem ich die zehn Vollkommenheiten erfüllt habe, werde ich nach Ablauf von vier Unzählbaren (Asaṅkheyya) und einhunderttausend Weltzeitaltern (Kappa) gewiss ein Buddha werden.“ Er stieg in die Luft empor und begab sich direkt zum Himalaya-Gebirge. Darüber wurde Folgendes gesagt: ‘‘Dibbaṃ mānusakaṃ pupphaṃ, devā mānusakā ubho; Samokiranti pupphehi, vuṭṭhahantassa āsanā. „Sowohl Götter als auch Menschen bestreuten ihn mit himmlischen und irdischen Blumen, als er sich von seinem Sitz erhob. ‘‘Vedayanti ca te sotthiṃ, devā mānusakā ubho; Mahantaṃ patthitaṃ tuyhaṃ, taṃ labhassu yathicchitaṃ. Sowohl Götter als auch Menschen verkündeten ihm Segen und Wohlergehen: „Großartig ist dein geäußerter Wunsch; mögest du ihn ganz nach deinem Begehren erlangen! ‘‘Sabbītiyo vivajjantu, soko rogo vinassatu; Mā te bhavantvantarāyā, phusa khippaṃ bodhimuttamaṃ. Mögen alle Gefahren abgewendet sein, mögen Kummer und Krankheit schwinden! Mögen dir keine Hindernisse erstehen, und erlange rasch die höchste Erleuchtung! ‘‘Yathāpi samaye patte, pupphanti pupphino dumā; Tatheva tvaṃ mahāvīra, buddhañāṇena pupphassu. Wie blühende Bäume erblühen, wenn die rechte Zeit herbeigekommen ist, ebenso, o großer Held, erblühe du mit dem Wissen eines Buddha! ‘‘Yathā [Pg.34] ye keci sambuddhā, pūrayuṃ dasa pāramī; Tatheva tvaṃ mahāvīra, pūraya dasa pāramī. So wie alle vollkommen Erleuchteten die zehn Vollkommenheiten erfüllten, ebenso, o großer Held, erfülle du die zehn Vollkommenheiten! ‘‘Yathā ye keci sambuddhā, bodhimaṇḍamhi bujjhare; Tatheva tvaṃ mahāvīra, bujjhassu jinabodhiyaṃ. So wie alle vollkommen Erleuchteten am Sitze der Erleuchtung (Bodhimaṇḍa) erwachten, ebenso, o großer Held, erwache du unter dem Erleuchtungsbaum der Siegreichen! ‘‘Yathā ye keci sambuddhā, dhammacakkaṃ pavattayuṃ; Tatheva tvaṃ mahāvīra, dhammacakkaṃ pavattaya. So wie alle vollkommen Erleuchteten das Rad der Lehre in Bewegung setzten, ebenso, o großer Held, setze du das Rad der Lehre in Bewegung! ‘‘Puṇṇamāye yathā cando, parisuddho virocati; Tatheva tvaṃ puṇṇamano, viroca dasasahassiyaṃ. So wie der Mond in der Vollmondnacht völlig rein erstrahlt, ebenso erstrahle du, mit erfülltem Geist, in der zehntausendfältigen Welt! ‘‘Rāhumutto yathā sūriyo, tāpena atirocati; Tatheva lokā muccitvā, viroca siriyā tuvaṃ. So wie die von Rāhu befreite Sonne in hellem Glanze erstrahlt, ebenso, befreit von den weltlichen Bedingungen, erstrahle du in deiner erhabenen Pracht! ‘‘Yathā yā kāci nadiyo, osaranti mahodadhiṃ; Evaṃ sadevakā lokā, osarantu tavantike. So wie alle Flüsse in den großen Ozean münden, ebenso möge die Welt mitsamt den Göttern in deine Nähe strömen! ‘‘Tehi thutappasattho so, dasa dhamme samādiya; Te dhamme paripūrento, pavanaṃ pāvisī tadā’’ti. Gepriesen und gelobt von ihnen, nahm er die zehn Eigenschaften (Vollkommenheiten) auf sich und betrat, diese Eigenschaften erfüllend, damals den großen Wald.“ Sumedhakathā niṭṭhitā. Die Geschichte von Sumedha ist beendet. Rammanagaravāsinopi kho nagaraṃ pavisitvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adaṃsu. Satthā tesaṃ dhammaṃ desetvā mahājanaṃ saraṇādīsu patiṭṭhāpetvā rammanagaramhā nikkhamitvā tato uddhampi yāvatāyukaṃ tiṭṭhanto sabbaṃ buddhakiccaṃ katvā anukkamena anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyi. Tattha yaṃ vattabbaṃ, taṃ sabbaṃ buddhavaṃse vuttanayeneva veditabbaṃ. Vuttañhi tattha – Auch die Bewohner der Stadt Ramma kehrten in die Stadt zurück und gaben der Gemeinschaft der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe (Mahādāna). Nachdem der Meister ihnen die Lehre verkündet und die Menschenmenge in den Zufluchten und Tugendregeln etabliert hatte, verließ er die Stadt Ramma. Auch danach wirkte er für den Rest seiner Lebensspanne weiter, vollbrachte alle Aufgaben eines Buddha und ging schließlich im Element des Erlöschens ohne verbleibende Daseinsgrundlagen (Anupādisesa-Nibbāna) ein. Was darüber hinaus zu berichten ist, das ist genau so zu verstehen, wie es im Buddhavaṃsa überliefert ist. Denn dort heißt es: ‘‘Tadā te bhojayitvāna, sasaṅghaṃ lokanāyakaṃ; Upagacchuṃ saraṇaṃ tassa, dīpaṅkarassa satthuno. „Nachdem sie damals den Weltenführer mitsamt seiner Gemeinde gespeist hatten, nahmen sie Zuflucht zu jenem Meister Dīpaṅkara. ‘‘Saraṇāgamane kañci, niveseti tathāgato; Kañci pañcasu sīlesu, sīle dasavidhe paraṃ. Einige etablierte der Tathāgata in der Zufluchtnahme, andere in den fünf Tugendregeln, und wieder andere in den zehnfachen Tugendregeln. ‘‘Kassaci [Pg.35] deti sāmaññaṃ, caturo phalamuttame; Kassaci asame dhamme, deti so paṭisambhidā. Manchen verlieh er das Asketentum und die vier höchsten Früchte; manchen gab er die unvergleichlichen Lehren der analytischen Wissenszweige (Paṭisambhidā). ‘‘Kassaci varasamāpattiyo, aṭṭha deti narāsabho; Tisso kassaci vijjāyo, chaḷabhiññā pavecchati. Der Beste der Menschen verlieh manchen die acht edlen Sammlungsstufen (Samāpatti); manchen schenkte er die drei dreifachen Wissenszweige (Vijjā) und anderen die sechs höheren Geisteskräfte (Abhiññā). ‘‘Tena yogena janakāyaṃ, ovadati mahāmuni; Tena vitthārikaṃ āsi, lokanāthassa sāsanaṃ. Auf diese Weise unterwies der große Weise die Menschenschar; dadurch verbreitete sich die Lehre des Weltenhüters weithin. ‘‘Mahāhanusabhakkhandho, dīpaṅkarasanāmako; Bahū jane tārayati, parimoceti duggatiṃ. Er mit dem kräftigen Kiefer und dem stiergleichen Nacken, namens Dīpaṅkara, rettete viele Menschen und befreite viele aus den niederen Daseinsbereichen. ‘‘Bodhaneyyaṃ janaṃ disvā, satasahassepi yojane; Khaṇena upagantvāna, bodheti taṃ mahāmuni. Sah er einen Menschen, der für das Erwachen bereit war, selbst in einer Entfernung von hunderttausend Yojanas, so eilte der große Weise in einem Augenblick herbei und führte ihn zum Erwachen. ‘‘Paṭhamābhisamaye buddho, koṭisatamabodhayi; Dutiyābhisamaye nātho, navutikoṭimabodhayi. Bei seiner ersten Bekehrung führte der Buddha einhundert Koṭis (Wesen) zum Erwachen; bei der zweiten Bekehrung führte der Beschützer neunzig Koṭis zum Erwachen. ‘‘Yadā ca devabhavanamhi, buddho dhammamadesayi; Navutikoṭisahassānaṃ, tatiyābhisamayo ahu. Und als der Buddha im Götterreich die Lehre verkündete, ereignete sich die dritte Bekehrung an neunzigtausend Koṭis (Gottheiten). ‘‘Sannipātā tayo āsuṃ, dīpaṅkarassa satthuno; Koṭisatasahassānaṃ, paṭhamo āsi samāgamo. Es gab drei Versammlungen des Meisters Dīpaṅkara; die erste Versammlung bestand aus einhunderttausend Koṭis (von Arahants). ‘‘Puna nāradakūṭamhi, pavivekagate jine; Khīṇāsavā vītamalā, samiṃsu satakoṭiyo. Als sich der Siegreiche wieder auf dem Gipfel des Nārada-Berges in die Einsamkeit zurückgezogen hatte, versammelten sich einhundert Koṭis von makellosen, triebfreien Heiligen (Arahants). ‘‘Yamhi kāle mahāvīro, sudassanasiluccaye; Navutikoṭisahassehi, pavāresi mahāmuni. Zu jener Zeit, als der große Held auf dem Sudassana-Berg verweilte, vollzog der große Weise die Pavāraṇā-Zeremonie zusammen mit neunzigtausend Koṭis (von Arahants). ‘‘Ahaṃ tena samayena, jaṭilo uggatāpano; Antalikkhamhi caraṇo, pañcābhiññāsu pāragū. Ich war zu jener Zeit ein asketischer Flechtenhaarträger von strenger Askese, der durch die Luft wandeln konnte und die pfirsichfarbenen fünf höheren Geisteskräfte (Abhiññā) vollendet beherrschte.“ ‘‘Dasavīsasahassānaṃ, dhammābhisamayo ahu; Ekadvinnaṃ abhisamayā, gaṇanāto asaṅkhiyā. „Bei zehn- oder zwanzigtausend Wesen fand das Durchdringen des Dhamma statt; die Durchdringungen von einzelnen oder zweien waren der Zahl nach unzählbar.“ ‘‘Vitthārikaṃ bāhujaññaṃ, iddhaṃ phītaṃ ahu tadā; Dīpaṅkarassa bhagavato, sāsanaṃ suvisodhitaṃ. „Weit verbreitet, von vielen gekannt, blühend und gedeihend war damals die Lehre des erhabenen Dīpaṅkara, wohlgesäubert.“ ‘‘Cattāri [Pg.36] satasahassāni, chaḷabhiññā mahiddhikā; Dīpaṅkaraṃ lokaviduṃ, parivārenti sabbadā. „Vierhunderttausend, die die sechs höheren Geisteskräfte besaßen und von großer magischer Macht waren, umgaben allezeit Dīpaṅkara, den Weltenkenner.“ ‘‘Ye keci tena samayena, jahanti mānusaṃ bhavaṃ; Apattamānasā sekkhā, garahitā bhavanti te. „Wer auch immer zu jener Zeit das menschliche Dasein aufgab, während er noch ein Übender war, der das höchste Ziel nicht erreicht hatte, der wurde getadelt.“ ‘‘Supupphitaṃ pāvacanaṃ, arahantehi tādihi; Khīṇāsavehi vimalehi, upasobhati sadevake. „Die aufs Schönste erblühte Lehre glänzte, getragen von solchen unerschütterlichen Arahants, deren Triebe versiegt und die makellos waren, in der Welt samt den Göttern.“ ‘‘Nagaraṃ rammavatī nāma, sudevo nāma khattiyo; Sumedhā nāma janikā, dīpaṅkarassa satthuno. „Rammavatī hieß die Stadt, Sudeva hieß der Khattiya-König und Vater, Sumedhā hieß die Mutter des Lehrers Dīpaṅkara.“ ‘‘Sumaṅgalo ca tisso ca, ahesuṃ aggasāvakā; Sāgato nāmupaṭṭhāko, dīpaṅkarassa satthuno. „Sumaṅgala und Tissa waren die Hauptschüler, und Sāgata hieß der Diener des Lehrers Dīpaṅkara.“ ‘‘Nandā ceva sunandā ca, ahesuṃ aggasāvikā; Bodhi tassa bhagavato, pipphalīti pavuccati. „Nandā und Sunandā waren die Hauptschülerinnen; der Bodhi-Baum dieses Erhabenen wird Pipphalī genannt.“ ‘‘Asītihatthamubbedho, dīpaṅkaro mahāmuni; Sobhati dīparukkhova, sālarājāva phullito. „Achtzig Ellen hoch ragte der große Weise Dīpaṅkara empor; er erstrahlte wie ein Lichterbaum oder wie ein königlicher Sāl-Baum in voller Blüte.“ ‘‘Satasahassavassāni, āyu tassa mahesino; Tāvatā tiṭṭhamāno so, tāresi janataṃ bahuṃ. „Einhunderttausend Jahre betrug die Lebensspanne jenes großen Sehers; so lange verweilend, führte er eine große Menschenmenge hinüber.“ ‘‘Jotayitvāna saddhammaṃ, santāretvā mahājanaṃ; Jalitvā aggikhandhova, nibbuto so sasāvako. „Nachdem er das wahre Dhamma zum Leuchten gebracht und die große Menschenmenge hinübergerettet hatte, erlosch er, nachdem er wie eine gewaltige Feuersbrunst aufloderte, samt seiner Jüngerschar.“ ‘‘Sā ca iddhi so ca yaso, tāni ca pādesu cakkaratanāni; Sabbaṃ tamantarahitaṃ, nanu rittā sabbasaṅkhārā’’ti. „Jene magische Macht, jener Ruhm und jene Rad-Kostbarkeiten auf seinen Fußsohlen – all das ist geschwunden. Sind nicht wahrlich alle gestalteten Dinge leer?“ Dies wurde gesagt. Dīpaṅkarassa pana bhagavato aparabhāge ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā koṇḍañño nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ, dutiye koṭisahassaṃ, tatiye navutikoṭiyo. Tadā bodhisatto vijitāvī nāma cakkavattī hutvā koṭisatasahassasaṅkhassa buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adāsi. Satthā bodhisattaṃ ‘‘buddho bhavissasī’’ti byākaritvā dhammaṃ desesi. So satthu dhammakathaṃ sutvā rajjaṃ niyyādetvā pabbaji. So tīṇi [Pg.37] piṭakāni uggahetvā aṭṭha samāpattiyo pañca abhiññāyo ca uppādetvā aparihīnajjhāno brahmaloke nibbatti. Koṇḍaññassa buddhassa pana rammavatī nāma nagaraṃ, sunando nāma khattiyo pitā, sujātā nāma devī mātā, bhaddo ca subhaddo ca dve aggasāvakā, anuruddho nāmupaṭṭhāko, tissā ca upatissā ca dve aggasāvikā, sālakalyāṇī bodhi, aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ sarīraṃ, vassasatasahassaṃ āyuppamāṇaṃ ahosi. Nach der Zeit des erhabenen Dīpaṅkara erhob sich nach dem Verlauf eines unzählbaren Zeitalters der Lehrer namens Koṇḍañña. Auch er hatte drei Schülerversammlungen: Bei der ersten Versammlung waren es hunderttausend Koṭis von Mönchen, bei der zweiten tausend Koṭis und bei der dritten neunzig Koṭis. Zu jener Zeit war der Bodhisatta ein Weltenherrscher namens Vijitāvī und gab der Mönchsgemeinschaft unter der Führung des Buddha, die hunderttausend Koṭis zählte, eine große Spende. Der Lehrer prophezeite dem Bodhisatta: „Du wirst ein Buddha werden“, und lehrte den Dhamma. Als er die Dhamma-Lehrrede des Lehrers gehört hatte, übergab er die Königsherrschaft und trat in den Hauslosenstand ein. Er erlernte die drei Korb-Schriften, erlangte die acht Samāpattis sowie die fünf höheren Geisteskräfte und wurde, ohne das Jhāna zu verlieren, in der Brahma-Welt wiedergeboren. Die Stadt des Buddha Koṇḍañña aber hieß Rammavatī, sein Vater war der Khattiya-König namens Sunanda, seine Mutter die Königin namens Sujātā; Bhadda und Subhadda waren die beiden Hauptschüler, Anuruddha hieß der persönliche Diener, Tissā und Upatissā waren die beiden Hauptschülerinnen, Sālakalyāṇī war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtundachtzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Dīpaṅkarassa aparena, koṇḍañño nāma nāyako; Anantatejo amitayaso, appameyyo durāsado’’ti. „Nach Dīpaṅkara erhob sich der Führer namens Koṇḍañña, von unendlicher Tatkraft, unermesslichem Ruhm, unergründlich und schwer zu bezwingen.“ Tassa aparabhāge ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā ekasmiṃyeva kappe caturo buddhā nibbattiṃsu maṅgalo, sumano, revato, sobhitoti. Maṅgalassa bhagavato tayo sannipātā ahesuṃ. Tesu paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye koṭisahassaṃ, tatiye navutikoṭiyo. Vemātikabhātā kirassa ānandakumāro nāma navutikoṭisaṅkhāya parisāya saddhiṃ dhammassavanatthāya satthu santikaṃ agamāsi. Satthā tassa anupubbiṃ kathaṃ kathesi, so saddhiṃ parisāya saha paṭisambhidāhi arahattaṃ pāpuṇi. Satthā tesaṃ kulaputtānaṃ pubbacaritaṃ olokento iddhimayapattacīvarassa upanissayaṃ disvā dakkhiṇahatthaṃ pasāretvā ‘‘etha, bhikkhavo’’ti āha. Sabbe taṅkhaṇaññeva iddhimayapattacīvaradharā saṭṭhivassamahātherā viya ākappasampannā hutvā satthāraṃ vanditvā parivārayiṃsu. Ayamassa tatiyo sāvakasannipāto ahosi. Nach ihm erhob sich, nach dem Verlauf eines unzählbaren Zeitalters, in ein und demselben Weltalter eine Vierzahl von Buddhas: Maṅgala, Sumana, Revata und Sobhita. Der erhabene Maṅgala hatte drei Schülerversammlungen. Unter diesen waren bei der ersten Versammlung hunderttausend Koṭis von Mönchen, bei der zweiten tausend Koṭis und bei der dritten neunzig Koṭis. Es heißt, sein Halbbruder, der Prinz Ānanda, begab sich zusammen mit einer Gefolgschaft von neunzig Koṭis zum Lehrer, um das Dhamma zu hören. Der Lehrer verkündete ihm die stufenweise Lehrrede. Er erlangte zusammen mit seiner Gefolgschaft das Arahant-Dasein samt den analytischen Wissenszweigen. Als der Lehrer die früheren Taten dieser Edelsöhne betrachtete und ihre Eignung für übernatürlich erschaffene Almosenschalen und Gewänder erkannte, streckte er seine rechte Hand aus und sprach: „Kommt, ihr Bhikkhus!“ Im selben Augenblick trugen alle übernatürlich erschaffene Almosenschalen und Gewänder, besaßen das würdevolle Auftreten wie sechzigjährige ältere Mönche, verneigten sich vor dem Lehrer und umgaben ihn. Dies war seine dritte Schülerversammlung. Yathā pana aññesaṃ buddhānaṃ samantā asītihatthappamāṇāyeva sarīrappabhā ahosi, na evaṃ tassa tassa pana bhagavato sarīrappabhā niccakālaṃ dasasahassilokadhātuṃ pharitvā aṭṭhāsi. Rukkhapathavipabbatasamuddādayo antamaso ukkhalikādīni upādāya suvaṇṇapaṭṭapariyonaddhā viya ahesuṃ. Āyuppamāṇaṃ panassa navutivassasahassāni ahosi. Ettakaṃ kālaṃ candimasūriyādayo attano pabhāya virocituṃ nāsakkhiṃsu, rattindivaparicchedo na paññāyittha. Divā sūriyālokena viya sattā niccaṃ [Pg.38] buddhālokeneva vicariṃsu, sāyaṃ pupphitakusumānaṃ, pāto ravanakasakuṇādīnañca vasena loko rattindivaparicchedaṃ sallakkhesi. Während die Körperausstrahlung der anderen Buddhas ringsherum nur das Maß von achtzig Ellen betrug, so verhielt es sich bei diesem Erhabenen nicht so: Seine Körperausstrahlung durchdrang und erfüllte allezeit das zehntausendfache Weltsystem. Bäume, Wege, Erdboden, Berge, Meere und dergleichen, ja selbst Kochtöpfe und andere Haushaltsgeräte, erschienen wie mit Goldplatten überzogen. Seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. Während dieser ganzen Zeit konnten Mond, Sonne und die übrigen Gestirne nicht durch ihr eigenes Licht leuchten; ein Unterschied zwischen Tag und Nacht war nicht erkennbar. Wie am Tage durch das Sonnenlicht, so wandelten die Wesen stets allein durch das Buddha-Licht umher. Den Unterschied zwischen Tag und Nacht unterschieden die Menschen anhand der am Abend erblühenden Blumen und der am Morgen rufenden Vögel und dergleichen. Kiṃ pana aññesaṃ buddhānaṃ ayamānubhāvo natthīti? No natthi. Tepi hi ākaṅkhamānā dasasahassiṃ vā lokadhātuṃ tato vā bhiyyo ābhāya phareyyuṃ. Maṅgalassa pana bhagavato pubbapatthanāvasena aññesaṃ byāmappabhā viya sarīrappabhā niccakālameva dasasahassilokadhātuṃ pharitvā aṭṭhāsi. So kira bodhisattacariyakāle vessantarasadise attabhāve ṭhito saputtadāro vaṅkapabbatasadise pabbate vasi. Atheko kharadāṭhiko nāma yakkho mahāpurisassa dānajjhāsayataṃ sutvā brāhmaṇavaṇṇena upasaṅkamitvā mahāsattaṃ dve dārake yāci. Mahāsatto ‘‘dadāmi brāhmaṇassa puttake’’ti haṭṭhapahaṭṭho udakapariyantaṃ pathaviṃ kampento dvepi dārake adāsi. Yakkho caṅkamanakoṭiyaṃ ālambanaphalakaṃ nissāya ṭhatvā passantasseva mahāsattassa mūlakalāpe viya dve dārake khādi. Mahāpurisassa yakkhaṃ oloketvā mukhe vivaṭamatte aggijālaṃ viya lohitadhāraṃ uggiramānaṃ tassa mukhaṃ disvāpi kesaggamattampi domanassaṃ na uppajji. ‘‘Sudinnaṃ vata me dāna’’nti cintayato panassa sarīre mahantaṃ pītisomanassa udapādi. So ‘‘imassa me nissandena anāgate imināva nīhārena rasmiyo nikkhamantū’’ti patthanaṃ akāsi. Tassa taṃ patthanaṃ nissāya buddhabhūtassa sarīrato rasmiyo nikkhamitvā ettakaṃ ṭhānaṃ phariṃsu. Fragt man sich nun: Haben andere Buddhas diese Macht nicht? Nein, dem ist nicht so. Denn auch sie könnten, wenn sie es wünschten, zehntausend Weltwelten oder noch mehr mit ihrem Glanz durchdringen. Beim erhabenen Maṅgala jedoch durchdrang die körperliche Ausstrahlung aufgrund seines einstigen Wunsches allzeit zehntausend Weltwelten, ähnlich wie bei anderen Buddhas die ein Klafter weite Aura. Als er in seiner Zeit als Bodhisatta in einer Existenz gleich Vessantara lebte, wohnte er mit Frau und Kindern auf einem dem Berge Vaṅka gleichenden Gebirge. Da vernahm ein Yakkha namens Kharadāṭhika von der edlen Freigebigkeit des Großen Mannes. Er näherte sich ihm in der Gestalt eines Brahmanen und bat das Große Wesen um seine beiden Kinder. Hocherfreut sprach das Große Wesen: „Ich gebe dem Brahmanen meine Kinder“, und gab beide Kinder hin, während er die Erde bis an die Grenzen des Wassers erzittern ließ. Der Yakkha stand am Ende des Wandelpfades, lehnte sich an eine Stütze und fraß vor den Augen des Großen Wesens die beiden Kinder auf wie ein Bündel Wurzeln. Obwohl der Große Mann den Yakkha ansah und den Blutstrom erblickte, der wie eine Feuerflamme aus seinem weit geöffneten Rachen quoll, regte sich in ihm nicht einmal das geringste Missfallen. Während er dachte: „Wahrlich, wohlgespendet ist meine Gabe!“, stieg in seinem Körper ein mächtiges Entzücken und Freude auf. Er tat das Gelübde: „Mögen durch die Nachwirkung dieser Tat in der Zukunft auf eben diese Weise Strahlen aus mir hervorgehen, wenn ich Buddha werde.“ Gestützt auf dieses Gelübde strömten, als er zum Buddha geworden war, Strahlen aus seinem Körper und durchdrangen diesen gesamten Bereich. Aparampissa pubbacaritaṃ atthi. So kira bodhisattakāle ekassa buddhassa cetiyaṃ disvā ‘‘imassa buddhassa mayā jīvitaṃ pariccajituṃ vaṭṭatī’’ti daṇḍadīpikāveṭhananiyāmena sakalasarīraṃ veṭhāpetvā ratanamattamakuḷaṃ satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ sappissa pūrāpetvā tattha sahassavaṭṭiyo jālāpetvā taṃ sīsenādāya sakalasarīraṃ jālāpetvā cetiyaṃ padakkhiṇaṃ karonto sakalarattiṃ vītināmesi. Evaṃ yāva aruṇuggamanā vāyamantassāpissa lomakūpamattampi usumaṃ na gaṇhi. Padumagabbhaṃ paviṭṭhakālo viya ahosi. Dhammo hi nāmesa attānaṃ rakkhantaṃ rakkhati. Tenāha bhagavā – Er hat noch eine weitere frühere Tat vollbracht. Es heißt, dass er in seiner Zeit als Bodhisatta den Schrein eines Buddhas erblickte und dachte: „Für diesen Buddha ist es recht, mein Leben hinzugeben.“ Er ließ seinen ganzen Körper nach Art einer Fackel umwickeln, füllte eine einhunderttausend Einheiten werte goldene Schale, die so groß wie ein Juwelenknopf war, mit geklärter Butter, entzündete darin tausend Dochte, setzte sich diese auf das Haupt, ließ seinen ganzen Körper entflammen und verbrachte die ganze Nacht damit, den Schrein ehrfurchtsvoll rechtsherum zu umwandeln. Obwohl er sich so bis zum Aufgang der Morgenröte anstrengte, ergriff ihn nicht die geringste Hitze, nicht einmal an den Haarwurzeln. Es war ihm, als wäre er in das Innere einer Lotusblüte eingetreten. Denn wahrlich, das Gesetz schützt den, der das Gesetz schützt. Daher sprach der Erhabene: ‘‘Dhammo [Pg.39] have rakkhati dhammacāriṃ, dhammo suciṇṇo sukhamāvahāti; Esānisaṃso dhamme suciṇṇe, na duggatiṃ gacchati dhammacārī’’ti. (theragā. 303; jā. 1.10.102; 1.15.385); „Das Gesetz beschützt wahrlich den, der nach dem Gesetz lebt; das wohlgeübte Gesetz bringt Glück herbei. Dies ist der Segen des wohlgeübten Gesetzes: Wer nach dem Gesetz lebt, geht nicht den Weg des Verderbens.“ Imassāpi kammassa nissandena tassa bhagavato sarīrobhāso dasasahassilokadhātuṃ pharitvā aṭṭhāsi. Auch durch die Auswirkung dieses heilsamen Wirkens durchdrang das Körperlicht dieses Erhabenen zehntausend Weltwelten und verblieb so. Tadā amhākaṃ bodhisatto suruci nāma brāhmaṇo hutvā ‘‘satthāraṃ nimantessāmī’’ti upasaṅkamitvā madhuradhammakathaṃ sutvā ‘‘sve mayhaṃ bhikkhaṃ gaṇhatha, bhante’’ti āha. Brāhmaṇa, kittakehi te bhikkhūhi atthoti? ‘‘Kittakā pana vo, bhante, parivārabhikkhū’’ti āha. Tadā pana satthu paṭhamasannipātoyeva hoti, tasmā ‘‘koṭisatasahassa’’nti āha. Bhante, sabbehipi saddhiṃ mayhaṃ gehe bhikkhaṃ gaṇhathāti. Satthā adhivāsesi. Brāhmaṇo svātanāya nimantetvā gehaṃ gacchanto cintesi – ‘‘ahaṃ ettakānaṃ bhikkhūnaṃ yāgubhattavatthādīni dātuṃ sakkomi, nisīdanaṭṭhānaṃ pana kathaṃ bhavissatī’’ti. Zu jener Zeit war unser Bodhisatta ein Brahmane namens Suruci. Er trat mit dem Gedanken heran: „Ich will den Meister einladen“, und nachdem er der süßen Lehrrede gelauscht hatte, sprach er: „Möget Ihr, o Herr, morgen meine Speisung annehmen.“ – „Brahmane, wie viele Mönche wünschst du einzuladen?“ – „Wie viele Mönche umfasst denn Euer Gefolge, o Herr?“, fragte er. Zu jener Zeit fand gerade die erste Versammlung des Meisters statt, weshalb er antwortete: „Eine Billion.“ – „O Herr, nehmt die Speisung in meinem Hause zusammen mit ihnen allen an.“ Der Meister willigte ein. Nach der Einladung für den folgenden Tag ging der Brahmane heimwärts und überlegte: „Ich vermag zwar, so vielen Mönchen Reisschleim, Speise, Gewänder und anderes zu spenden; wie aber soll das mit den Sitzplätzen werden?“ Tassa sā cintā caturāsītiyojanasahassamatthake ṭhitassa devarañño paṇḍukambalasilāsanassa uṇhabhāvaṃ janesi. Sakko ‘‘ko nu kho maṃ imamhā ṭhānā cāvetukāmo’’ti dibbacakkhunā olokento mahāpurisaṃ disvā ‘‘suruci nāma brāhmaṇo buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nimantetvā nisīdanaṭṭhānatthāya cintesi, mayāpi tattha gantvā puññakoṭṭhāsaṃ gahetuṃ vaṭṭatī’’ti vaḍḍhakivaṇṇaṃ nimminitvā vāsipharasuhattho mahāpurisassa purato pāturahosi. So ‘‘atthi nu kho kassaci bhatiyā kattabba’’nti āha. Mahāpuriso taṃ disvā ‘‘kiṃ kammaṃ karissasī’’ti āha. ‘‘Mama ajānanasippaṃ nāma natthi, gehaṃ vā maṇḍapaṃ vā yo yaṃ kāreti, tassa taṃ kātuṃ jānāmī’’ti. ‘‘Tena hi mayhaṃ kammaṃ atthī’’ti. ‘‘Kiṃ ayyā’’ti? ‘‘Svātanāya me koṭisatasahassabhikkhū nimantitā, tesaṃ nisīdanamaṇḍapaṃ karissasī’’ti. ‘‘Ahaṃ nāma kareyyaṃ, sace mama bhatiṃ dātuṃ sakkhissathā’’ti. ‘‘Sakkhissāmi tātā’’ti. ‘‘Sādhu karissāmī’’ti gantvā ekaṃ padesaṃ olokesi, dvādasaterasayojanappamāṇo padeso kasiṇamaṇḍalaṃ [Pg.40] viya samatalo ahosi. So ‘‘ettake ṭhāne sattaratanamayo maṇḍapo uṭṭhahatū’’ti cintetvā olokesi. Tāvadeva pathaviṃ bhinditvā maṇḍapo uṭṭhahi. Tassa sovaṇṇamayesu thambhesu rajatamayā ghaṭakā ahesuṃ, rajatamayesu sovaṇṇamayā, maṇitthambhesu pavāḷamayā, pavāḷatthambhesu maṇimayā, sattaratanamayesu sattaratanamayāva ghaṭakā ahesuṃ. Tato ‘‘maṇḍapassa antarantarena kiṅkiṇikajālaṃ olambatū’’ti olokesi, saha olokaneneva kiṅkiṇikajālaṃ olambi, yassa mandavāteritassa pañcaṅgikasseva tūriyassa madhurasaddo niggacchati, dibbasaṅgītivattanakālo viya hoti. ‘‘Antarantarā gandhadāmamālādāmāni olambantū’’ti cintesi, dāmāni olambiṃsu. ‘‘Koṭisatasahassasaṅkhānaṃ bhikkhūnaṃ āsanāni ca ādhārakāni ca pathaviṃ bhinditvā uṭṭhahantū’’ti cintesi, tāvadeva uṭṭhahiṃsu. ‘‘Koṇe koṇe ekekā udakacāṭiyo uṭṭhahantū’’ti cintesi, udakacāṭiyo uṭṭhahiṃsu. Sein Gedanke bewirkte, dass der rötliche Steinsitz des Götterkönigs Sakka, der auf dem vierundachtzigtausend Yojanas hohen Gipfel thronte, heiß wurde. Sakka dachte: „Wer will mich wohl von dieser Stätte vertreiben?“, blickte mit dem himmlischen Auge umher, sah den Großen Mann und erkannte: „Der Brahmane Suruci hat die Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze eingeladen und sorgt sich nun um die Sitzplätze. Auch mir gebührt es, dorthin zu gehen und einen Anteil an diesem Verdienst zu erwerben.“ Er nahm die Gestalt eines Zimmermanns an und erschien mit Dechsel und Axt in der Hand vor dem Großen Mann. Er sprach: „Gibt es hier jemanden, für den ich eine Arbeit gegen Lohn verrichten kann?“ Als der Große Mann ihn sah, fragte er: „Welche Arbeit verstehst du zu tun?“ – „Es gibt kein Handwerk, das ich nicht beherrsche. Ob Haus oder Halle, was immer jemand bauen lassen möchte, das verstehe ich für ihn zu errichten“, erwiderte er. „Wenn dem so ist, dann habe ich eine Arbeit für dich.“ – „Welche ist das, o Herr?“ – „Für morgen habe ich eine Billion Mönche eingeladen. Kannst du für sie eine Festhalle zum Sitzen bauen?“ – „Ein Mann wie ich könnte dies wohl tun, sofern Ihr imstande seid, meinen Lohn zu zahlen“, entgegnete er. „Ich werde es vermögen, mein Lieber!“, sprach jener. „Gut, ich werde es tun“, sagte er, ging hin und betrachtete eine Stelle. Ein Bereich von zwölf bis dreizehn Yojanas Ausdehnung wurde eben wie eine Kasiṇa-Scheibe. Er dachte: „An diesem Ort soll eine aus den sieben Juwelen bestehende Festhalle entstehen!“, und blickte dorthin. Im selben Augenblick tat sich die Erde auf, und die Halle erhob sich. An ihren goldenen Säulen befanden sich silberne Kapitelle, an den silbernen Säulen goldene, an den Edelsteinsäulen korallene, an den Korallensäulen edelsteinerne und an den aus den sieben Kostbarkeiten gefertigten Säulen solche aus den sieben Kostbarkeiten. Daraufhin dachte er: „In den Zwischenräumen der Festhalle soll ein Netz aus Glöckchen herabhängen!“, und blickte hin. Kaum hatte er hingeblickt, hing das Glöckchennetz herab, das, wenn ein milder Wind es bewegte, einen so süßen Klang von sich gab wie ein fünstimmiges Musikspiel, sodass es wie bei einem himmlischen Konzert war. Weiter dachte er: „In den Zwischenräumen sollen Duft- und Blumengirlanden herabhängen!“, und die Girlanden hingen herab. Er dachte: „Die Sitze und Ständer für eine Billion Mönche sollen sich aus der Erde erheben!“, und im selben Augenblick erhoben sie sich. Er dachte: „In jeder Ecke soll je ein großer Wasserkrug entstehen!“, und die Wasserkrüge entstanden. Ettakaṃ māpetvā brāhmaṇassa santikaṃ gantvā ‘‘ehi ayya, tava maṇḍapaṃ oloketvā mayhaṃ bhatiṃ dehī’’ti āha. Mahāpuriso gantvā maṇḍapaṃ olokesi, olokentassevassa sakalasarīraṃ pañcavaṇṇāya pītiyā nirantaraṃ phuṭaṃ ahosi. Athassa maṇḍapaṃ olokayato etadahosi – ‘‘nāyaṃ maṇḍapo manussabhūtena kato, mayhaṃ pana ajjhāsayaṃ mayhaṃ guṇaṃ āgamma addhā sakkabhavanaṃ uṇhaṃ ahosi, tato sakkena devaraññā ayaṃ maṇḍapo kārito bhavissatī’’ti. ‘‘Na kho pana me yuttaṃ evarūpe maṇḍape ekadivasaṃyeva dānaṃ dātuṃ, sattāhaṃ dassāmī’’ti cintesi. Bāhirakadānañhi kittakampi samānaṃ bodhisattānaṃ tuṭṭhiṃ kātuṃ na sakkoti, alaṅkatasīsaṃ pana chinditvā añjitaakkhīni uppāṭetvā hadayamaṃsaṃ vā ubbaṭṭetvā dinnakāle bodhisattānaṃ cāgaṃ nissāya tuṭṭhi nāma hoti. Amhākampi hi bodhisattassa sivijātake devasikaṃ pañca kahāpaṇasatasahassāni vissajjetvā catūsu dvāresu nagaramajjhe ca dānaṃ dentassa taṃ dānaṃ cāgatuṭṭhiṃ uppādetuṃ nāsakkhi. Yadā panassa brāhmaṇavaṇṇena āgantvā sakko devarājā akkhīni yāci, tadā tāni uppāṭetvā dadamānasseva hāso uppajji, kesaggamattampi cittassa aññathattaṃ nāhosi. Evaṃ dānaṃ nissāya bodhisattānaṃ titti nāma natthi. Tasmā sopi mahāpuriso [Pg.41] ‘‘sattāhaṃ mayā koṭisatasahassasaṅkhānaṃ bhikkhūnaṃ dānaṃ dātuṃ vaṭṭatī’’ti cintetvā tasmiṃ maṇḍape buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nisīdāpetvā sattāhaṃ gavapānaṃ nāma dānaṃ adāsi. Gavapānanti mahante mahante kolambe khīrassa pūretvā uddhanesu āropetvā ghanapākapakke khīre thoke taṇḍule pakkhipitvā pakkamadhusakkarācuṇṇasappīhi abhisaṅkhataṃ bhojanaṃ vuccati. Manussāyeva pana parivisituṃ nāsakkhiṃsu, devāpi ekantarikā hutvā parivisiṃsu. Dvādasaterasayojanappamāṇaṃ ṭhānampi bhikkhū gaṇhituṃ nappahosiyeva. Te pana bhikkhū attano attano ānubhāvena nisīdiṃsu. Pariyosānadivase sabbabhikkhūnaṃ pattāni dhovāpetvā bhesajjatthāya sappinavanītamadhuphāṇitādīni pūretvā ticīvarehi saddhiṃ adāsi, saṅghanavakabhikkhunā laddhacīvarasāṭakā satasahassagghanakā ahesuṃ. Nachdem er so viel erschaffen hatte, ging er zu dem Brahmanen und sagte: „Komm, Herr! Betrachte deinen Pavillon und gib mir meinen Lohn.“ Der Große Mann ging hin und betrachtete den Pavillon. Während er ihn noch betrachtete, wurde sein ganzer Körper lückenlos von der fünffarbigen Verzückung durchdrungen. Da dachte er beim Betrachten des Pavillons: „Dieser Pavillon wurde nicht von einem gewöhnlichen Menschen erbaut. Gewiss wurde aufgrund meiner Absicht und meiner Verdienste der Palast Sakkas heiß, und daraufhin hat Sakka, der König der Götter, diesen Pavillon erbauen lassen.“ Er dachte: „Es schickt sich für mich nicht, in einem solchen Pavillon nur einen einzigen Tag lang Gaben zu spenden. Ich werde sieben Tage lang spenden.“ Denn eine äußerliche Gabe, wie groß sie auch sein mag, vermag die Bodhisattas nicht zufriedenzustellen; nur wenn sie ihr geschmücktes Haupt abschneiden, ihre gesalbten Augen herausreißen oder das Fleisch ihres Herzens herausreißen und hingeben, entsteht für die Bodhisattas wahre Freude, die auf der Selbstaufgabe beruht. Denn auch als unser Bodhisatta im Sivi-Jātaka täglich fünfhunderttausend Kahāpaṇas ausgab und an den vier Toren sowie inmitten der Stadt Gaben spendete, konnte diese Gabe keine auf Selbstaufgabe beruhende Freude in ihm provocar. Als jedoch Sakka, der König der Götter, in der Gestalt eines Brahmanen kam und ihn um seine Augen bat, da überkam ihn tiefe Freude, während er sie herausriss und hingab, und nicht einmal um die Breite einer Haarspitze veränderte sich sein Geist. Auf diese Weise gibt es für die Bodhisattas keine Sättigung im Geben. Daher dachte auch jener Große Mann: „Es ist mir angemessen, sieben Tage lang eine Gabe an eine Schar von hunderttausend Koṭis von Mönchen zu spenden.“ Er ließ die Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze in jenem Pavillon Platz nehmen und spendete sieben Tage lang die Speise namens Gavapāna. Als Gavapāna bezeichnet man eine Speise, die zubereitet wird, indem man sehr große Kessel mit Milch füllt, sie auf die Herde stellt, und wenn die Milch dick eingekocht ist, ein wenig Reis hineingibt und das Ganze mit gekochtem Honig, Zuckerpulver und geklärter Butter verfeinert. Die Menschen allein jedoch vermochten die Speise nicht zu servieren; auch die Götter halfen abwechselnd beim Servieren. Selbst ein Raum von zwölf bis dreizehn Yojanas Ausdehnung reichte nicht aus, um die Mönche aufzunehmen. Jene Mönche setzten sich jedoch durch ihre eigene übernatürliche Macht nieder. Am Abschlusstag ließ er die Almosenschalen aller Mönche waschen, füllte sie zu Heilzwecken mit geklärter Butter, frischer Butter, Honig, Melasse und Ähnlichem und übergab sie zusammen mit dem dreifachen Gewand. Die Gewandstoffe, die selbst der jüngste Mönch im Orden erhielt, waren hunderttausend wert. Satthā anumodanaṃ karonto ‘‘ayaṃ puriso evarūpaṃ mahādānaṃ adāsi, ko nu kho bhavissatī’’ti upadhārento ‘‘anāgate kappasatasahassādhikānaṃ dvinnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake gotamo nāma buddho bhavissatī’’ti disvā mahāpurisaṃ āmantetvā ‘‘tvaṃ ettakaṃ nāma kālaṃ atikkamitvā gotamo nāma buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Mahāpuriso byākaraṇaṃ sutvā ‘‘ahaṃ kira buddho bhavissāmi, ko me gharāvāsena attho, pabbajissāmī’’ti cintetvā tathārūpaṃ sampattiṃ kheḷapiṇḍaṃ viya pahāya satthu santike pabbajitvā buddhavacanaṃ uggaṇhitvā abhiññā ca samāpattiyo ca nibbattetvā āyupariyosāne brahmaloke nibbatti. Als der Meister seinen Dank aussprach, überlegte er: „Dieser Mann hat eine so große Gabe dargebracht; wer mag er wohl sein?“ Da sah er voraus: „In der Zukunft, nach Ablauf von zwei unzählbaren Zeitaltern und hunderttausend Äonen, wird er ein Buddha namens Gotama werden.“ Er wandte sich an den Großen Mann und verkündete ihm: „Nachdem du eine solche Zeitspanne durchschritten hast, wirst du ein Buddha namens Gotama werden.“ Als der Große Mann diese Prophezeiung hörte, dachte er: „Ich werde also tatsächlich ein Buddha werden. Was nützt mir da das Leben als Hausvater? Ich will in die Hauslosigkeit hinausziehen.“ Er gab einen solchen Reichtum wie einen Speichelklumpen auf, trat in der Gegenwart des Meisters in den Orden ein, erlernte das Wort des Buddha, erlangte die höheren Geisteskräfte und die vertieften Geisteszustände und wurde am Ende seines Lebens in der Brahma-Welt wiedergeboren. Maṅgalassa pana bhagavato nagaraṃ uttaraṃ nāma ahosi, pitāpi uttaro nāma khattiyo, mātāpi uttarā nāma devī, sudevo ca dhammaseno ca dve aggasāvakā, pālito nāmupaṭṭhāko, sīvalī ca asokā ca dve aggasāvikā, nāgarukkho bodhi, aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi. Navutivassasahassāni ṭhatvā parinibbute pana tasmiṃ bhagavati ekappahāreneva dasa cakkavāḷasahassāni ekandhakārāni ahesuṃ. Sabbacakkavāḷesu manussānaṃ mahantaṃ ārodanaparidevanaṃ ahosi. Die Geburtsstadt des erhabenen Mangala hieß Uttara. Sein Vater war der Kriegerkönig namens Uttara, seine Mutter die Königin namens Uttarā. Sudeva und Dhammasena waren seine beiden Hauptschüler, Pālita war sein persönlicher Diener. Sīvalī und Asokā waren seine beiden Hauptschülerinnen. Der Nāga-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtundachtzig Ellen hoch. Nachdem er neunzigtausend Jahre gelebt hatte und jener Erhabene ins Parinibbāna eingegangen war, versanken zehntausend Weltsysteme auf einen Schlag in völliger Dunkelheit. In allen Weltsystemen erhob sich ein großes Weinen und Wehklagen der Menschen. ‘‘Koṇḍaññassa [Pg.42] aparena, maṅgalo nāma nāyako; Tamaṃ loke nihantvāna, dhammokkamabhidhārayī’’ti. „Nach Koṇḍañña erschien der Führer namens Maṅgala, der die Dunkelheit in der Welt vertrieb und die Fackel des Dhamma emporhielt.“ Evaṃ dasasahassilokadhātuṃ andhakāraṃ katvā parinibbutassa tassa bhagavato aparabhāge sumano nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ, dutiye kañcanapabbatamhi navutikoṭisahassāni, tatiye asītikoṭisahassāni. Tadā mahāsatto atulo nāma nāgarājā ahosi mahiddhiko mahānubhāvo. So ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā ñātisaṅghaparivuto nāgabhavanā nikkhamitvā koṭisatasahassabhikkhuparivārassa tassa bhagavato dibbatūriyehi upahāraṃ kāretvā mahādānaṃ pavattetvā paccekaṃ dussayugāni datvā saraṇesu patiṭṭhāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato nagaraṃ khemaṃ nāma ahosi, sudatto nāma rājā pitā, sirimā nāma mātā, saraṇo ca bhāvitatto ca dve aggasāvakā, udeno nāmupaṭṭhāko, soṇā ca upasoṇā ca dve aggasāvikā, nāgarukkho bodhi, navutihatthubbedhaṃ sarīraṃ, navutiyeva vassasahassāni āyuppamāṇaṃ ahosi. Nachdem er so zehntausend Welten in Dunkelheit gehüllt hatte und jener Erhabene ins Parinibbāna eingegangen war, erschien in der Folgezeit der Meister namens Sumana. Auch er hatte drei Schülerversammlungen. Bei der ersten Versammlung gab es eine Schar von hunderttausend Koṭis von Mönchen, bei der zweiten auf dem Goldenen Berg neunzigtausend Koṭis, bei der dritten achtzigtausend Koṭis. Zu jener Zeit war der Große Mann der Schlangenkönig namens Atula, von großer Zaubermacht und großer Herrlichkeit. Als er hörte, dass ein Buddha erschienen war, verließ er in Begleitung seines Gefolges von Verwandten das Reich der Nāgas. Er ließ für jenen Erhabenen, der von hunderttausend Koṭis von Mönchen umgeben war, eine Ehrung mit himmlischer Musik darbringen, veranstaltete ein großes Almosengeben, schenkte jedem ein Paar Gewänder und nahm Zuflucht zu den Dreifachen Juwelen. Auch jener Meister prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Geburtsstadt dieses Erhabenen hieß Khema. Der König namens Sudatta war sein Vater, die Königin namens Sirimā seine Mutter. Saraṇa und Bhāvitatta waren seine beiden Hauptschüler, Udena war sein persönlicher Diener. Soṇā und Upasoṇā waren seine beiden Hauptschülerinnen. Der Nāga-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war neunzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Maṅgalassa aparena, sumano nāma nāyako; Sabbadhammehi asamo, sabbasattānamuttamo’’ti. „Nach Maṅgala erschien der Führer namens Sumana, der in allen Tugenden ohnegleichen und der Höchste aller Wesen war.“ Tassa aparabhāge revato nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte gaṇanā natthi, dutiye koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ, tathā tatiye. Tadā bodhisatto atidevo nāma brāhmaṇo hutvā satthu dhammadesanaṃ sutvā saraṇesu patiṭṭhāya sirasmiṃ añjaliṃ ṭhapetvā tassa satthuno kilesappahāne vaṇṇaṃ vatvā uttarāsaṅgena pūjaṃ akāsi. Sopi naṃ ‘‘buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato nagaraṃ dhaññavatī nāma ahosi, pitā vipulo nāma khattiyo, mātāpi vipulā nāma devī, varuṇo ca brahmadevo ca dve aggasāvakā, sambhavo nāmupaṭṭhāko, bhaddā ca subhaddā ca dve aggasāvikā, nāgarukkhova bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, āyu saṭṭhi vassasahassānīti. In der Folgezeit jenes Sumana-Buddhas erschien der Meister namens Revata. Auch von ihm gab es drei Schülerversammlungen. Bei der ersten Versammlung gab es keine Zählung, bei der zweiten gab es hunderttausend Koṭis von Mönchen, und ebenso bei der dritten. Damals war der Bodhisatta ein Brahmane namens Atideva; nachdem er die Lehrverkündigung des Meisters gehört hatte, festigte er sich in den Zufluchten, legte die gefalteten Hände an sein Haupt, pries das Aufgeben der Befleckungen dieses Meisters und verehrte ihn mit seinem Obergewand. Auch jener prophezeite ihm: „Du wirst ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen aber hieß Dhaññavatī, sein Vater war der Khattiya namens Vipula, seine Mutter die Königin namens Vipulā. Varuṇa und Brahmadeva waren die beiden Hauptschüler, Sambhava hieß der Diener. Bhaddā und Subhaddā waren die beiden Hauptschülerinnen, sein Bodhi-Baum war ein Nāga-Baum. Sein Körper hatte eine Höhe von achtzig Ellen, und seine Lebensspanne betrug sechzigtausend Jahre. ‘‘Sumanassa [Pg.43] aparena, revato nāma nāyako; Anūpamo asadiso, atulo uttamo jino’’ti. Nach Sumana erschien der Führer namens Revata, unvergleichlich, ohnegleichen, unermesslich, der höchste Sieger. Tassa aparabhāge sobhito nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatabhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto ajito nāma brāhmaṇo hutvā satthu dhammadesanaṃ sutvā saraṇesu patiṭṭhāya buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adāsi. Sopi naṃ ‘‘buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato sudhammaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitāpi sudhammo nāma rājā, mātāpi sudhammā nāma devī, asamo ca sunetto ca dve aggasāvakā, anomo nāmupaṭṭhāko, nakulā ca sujātā ca dve aggasāvikā, nāgarukkhova bodhi, aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, navuti vassasahassāni āyuppamāṇanti. In der Folgezeit jenes Revata-Buddhas erschien der Meister namens Sobhita. Auch von ihm gab es drei Schülerversammlungen. Bei der ersten Versammlung gab es hundert Koṭis von Mönchen, bei der zweiten neunzig Koṭis, bei der dritten achtzig Koṭis. Damals war der Bodhisatta ein Brahmane namens Ajita; nachdem er die Lehrverkündigung des Meisters gehört hatte und sich in den Zufluchten gefestigt hatte, spendete er der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine große Gabe. Auch jener prophezeite ihm: „Du wirst ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen aber hieß Sudhamma, sein Vater war der König namens Sudhamma, seine Mutter die Königin namens Sudhammā. Asama und Sunetta waren die beiden Hauptschüler, Anoma hieß der Diener. Nakulā und Sujātā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der Bodhi-Baum war ein Nāga-Baum. Sein Körper hatte eine Höhe von achtundfünfzig Ellen, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Revatassa aparena, sobhito nāma nāyako; Samāhito santacitto, asamo appaṭipuggalo’’ti. Nach Revata erschien der Führer namens Sobhita, hochgesammelt, von friedvollem Geist, unvergleichlich und ohnegleichen. Tassa aparabhāge ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā ekasmiṃyeva kappe tayo buddhā nibbattiṃsu anomadassī padumo nāradoti. Anomadassissa bhagavato tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte bhikkhū aṭṭhasatasahassāni ahesuṃ, dutiye satta, tatiye cha. Tadā bodhisatto eko yakkhasenāpati ahosi mahiddhiko mahānubhāvo anekakoṭisatasahassānaṃ yakkhānaṃ adhipati. So ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā āgantvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adāsi. Satthāpi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Anomadassissa pana bhagavato candavatī nāma nagaraṃ ahosi, yasavā nāma rājā pitā, yasodharā nāma mātā, nisabho ca anomo ca dve aggasāvakā, varuṇo nāmupaṭṭhāko, sundarī ca sumanā ca dve aggasāvikā, ajjunarukkho bodhi, aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. In der Folgezeit jenes Sobhita-Buddhas, nach dem Vergehen eines unzählbaren Zeitalters (Asankheyya), erschienen in ein und demselben Äon (Kappa) drei Buddhas: Anomadassī, Paduma und Nārada. Vom erhabenen Anomadassī gab es drei Schülerversammlungen. Bei der ersten Versammlung gab es achthunderttausend Mönche, bei der zweiten siebenhunderttausend, bei der dritten sechshunderttausend. Damals war der Bodhisatta ein Yakkhageneral von großer magischer Macht und mächtiger Ausstrahlung, der Herrscher über viele hunderttausend Koṭis von Yakkhas. Als er hörte: „Ein Buddha ist erschienen“, kam er herbei und spendete der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine große Gabe. Auch der Meister prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt des erhabenen Anomadassī hieß Candavatī, sein Vater war der König namens Yasavā, seine Mutter hieß Yasodharā. Nisabha und Anoma waren die beiden Hauptschüler, Varuṇa hieß der Diener. Sundarī und Sumanā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der Ajjuna-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper hatte eine Höhe von achtundfünfzig Ellen, und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Sobhitassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Anomadassī amitayaso, tejassī duratikkamo’’ti. Nach Sobhita erschien der vollkommen Erwachte, der Höchste der Zweibeiner, Anomadassī von unermesslichem Ruhm, glanzvoll und unüberwindlich. Tassa [Pg.44] aparabhāge padumo nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo bhāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ, dutiye tīṇi satasahassāni, tatiye agāmake araññe mahāvanasaṇḍavāsīnaṃ bhikkhūnaṃ dve satasahassāni. Tadā tathāgate tasmiṃ vanasaṇḍe vasante bodhisatto sīho hutvā satthāraṃ nirodhasamāpattiṃ samāpannaṃ disvā pasannacitto vanditvā padakkhiṇaṃ katvā pītisomanassajāto tikkhattuṃ sīhanādaṃ naditvā sattāhaṃ buddhārammaṇapītiṃ avijahitvā pītisukheneva gocarāya apakkamitvā jīvitapariccāgaṃ katvā payirupāsamāno aṭṭhāsi. Satthā sattāhaccayena nirodhā vuṭṭhito sīhaṃ oloketvā ‘‘bhikkhusaṅghepi cittaṃ pasādetvā saṅghaṃ vandissatīti bhikkhusaṅgho āgacchatū’’ti cintesi. Bhikkhū tāvadeva āgamiṃsu. Sīho saṅghe cittaṃ pasādesi. Satthā tassa manaṃ oloketvā ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Padumassa pana bhagavato campakaṃ nāma nagaraṃ ahosi, asamo nāma rājā pitā, asamā nāma devī mātā, sālo ca upasālo ca dve aggasāvakā, varuṇo nāmupaṭṭhāko, rāmā ca surāmā ca dve aggasāvikā, soṇarukkho nāma bodhi, aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, āyu vassasatasahassanti. In der Folgezeit jenes Anomadassī-Buddhas erschien der Meister namens Paduma. Auch von ihm gab es drei Schülerversammlungen. Bei der ersten Versammlung gab es hunderttausend Koṭis von Mönchen, bei der zweiten dreihunderttausend, bei der dritten zweihunderttausend Mönche, die in einem dorffernen Urwald, in einem großen Waldgebiet lebten. Damals, als der Vollendete in jenem Waldgebiet verweilte, war der Bodhisatta ein Löwe. Als er den Meister erblickte, der in die Errungenschaft des Erlöschens (nirodhasamāpatti) eingetreten war, verneigte er sich mit gläubigem Herzen, umwandelte ihn ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn, stieß von Freude und Heiterkeit erfüllt dreimal ein mächtiges Löwenbrüllen aus und verharrte sieben Tage lang, ohne die auf den Buddha gerichtete Freude aufzugeben. Allein von diesem Freudenglück getragen, ging er nicht auf Nahrungssuche, sondern gab sein Leben ganz hin und blieb in hingebungsvoller Verehrung stehen. Nach Ablauf von sieben Tagen erhob sich der Meister aus dem Erlöschen, blickte den Löwen an und dachte: „Er soll sein Herz auch gegenüber der Mönchsgemeinde klären und die Gemeinde verehren. Die Mönchsgemeinde möge herkommen.“ Da kamen die Mönche sogleich herbei. Der Löwe klärte sein Herz gegenüber der Gemeinschaft. Der Meister erkannte seine Gesinnung und prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt des erhabenen Paduma aber hieß Campaka, sein Vater war der König namens Asama, seine Mutter die Königin namens Asamā. Sāla und Upasāla waren die beiden Hauptschüler, Varuṇa hieß der Diener. Rāmā und Surāmā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der Soṇa-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper hatte eine Höhe von achtundfünfzig Ellen, und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Anomadassissa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Padumo nāma nāmena, asamo appaṭipuggalo’’ti. Nach Anomadassī erschien der vollkommen Erwachte, der Höchste der Zweibeiner, namens Paduma, unvergleichlich und ohnegleichen. Tassa aparabhāge nārado nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭisahassāni, tatiye asītikoṭisahassāni. Tadā bodhisatto isipabbajjaṃ pabbajitvā pañcasu abhiññāsu aṭṭhasu ca samāpattīsu ciṇṇavasī hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā lohitacandanena pūjaṃ akāsi. Sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato dhaññavatī nāma nagaraṃ ahosi, sudevo nāma khattiyo pitā, anomā nāma mātā, saddasālo ca jitamitto ca dve aggasāvakā, vāseṭṭho nāmupaṭṭhāko[Pg.45], uttarā ca phaggunī ca dve aggasāvikā, mahāsoṇarukkho nāma bodhi, sarīraṃ aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ ahosi, navutivassasahassāni āyūti. In der Folgezeit jenes Paduma-Buddhas erschien der Meister namens Nārada. Auch von ihm gab es drei Schülerversammlungen. Bei der ersten Versammlung gab es hunderttausend Koṭis von Mönchen, bei der zweiten neunzigtausend Koṭis, bei der dritten achtzigtausend Koṭis. Damals trat der Bodhisatta in das obdachlose Leben eines Sehers (Isi) ein, erlangte vollkommene Meisterschaft in den fünf höheren Geisteskräften (Abhiññā) und den acht Sammlungsstufen (Samāpatti) und spendete der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine große Gabe, wobei er eine Opfergabe aus rotem Sandelholz darbrachte. Auch jener prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Dhaññavatī, sein Vater war der König namens Sudeva, seine Mutter hieß Anomā. Saddasāla und Jitamitta waren die beiden Hauptschüler, Vāseṭṭha hieß der Diener. Uttarā und Phaggunī waren die beiden Hauptschülerinnen. Der große Soṇa-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper hatte eine Höhe von achtundachtzig Ellen, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Padumassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Nārado nāma nāmena, asamo appaṭipuggalo’’ti. Nach Paduma erschien der vollkommen Erwachte, der Höchste der Zweibeiner, namens Nārada, unvergleichlich und ohnegleichen. Nāradabuddhassa aparabhāge ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā ito satasahassakappamatthake ekasmiṃ kappe ekova padumuttarabuddho nāma udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhame koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ, dutiye vebhārapabbate navutikoṭisahassāni, tatiye asītikoṭisahassāni. Tadā bodhisatto jaṭilo nāma mahāraṭṭhiyo hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sacīvaraṃ dānaṃ adāsi. Sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Padumuttarassa pana bhagavato kāle titthiyā nāma nāhesuṃ. Sabbe devamanussā buddhameva saraṇaṃ agamaṃsu. Tassa nagaraṃ haṃsavatī nāma ahosi, pitā ānando nāma khattiyo, mātā sujātā nāma devī, devalo ca sujāto ca dve aggasāvakā, sumano nāmupaṭṭhāko, amitā ca asamā ca dve aggasāvikā, salalarukkho bodhi, sarīraṃ aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā samantato dvādasa yojanāni gaṇhi, vassasatasahassaṃ āyūti. In der Zeit nach dem Buddha Nārada, nach dem Vergehen eines unzählbaren Weltzeitalters (Asaṅkheyya), erhob sich vor einhunderttausend Äonen (Kappas) von diesem jetzigen Äon an gerechnet in einem einzigen Äon ein einziger Buddha namens Padumuttara. Auch er hatte drei Jüngerversammlungen. In der ersten gab es hunderttausend Koṭis Mönche, in der zweiten auf dem Berg Vebhāra neunzigtausend Koṭis und in der dritten achtzigtausend Koṭis. Damals war der Bodhisatta ein hoher Reichsbeamter namens Jaṭila und gab der Gemeinschaft der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eine Spende bestehend aus Roben. Auch jener prophezeite ihm: ‚In der Zukunft wirst du ein Buddha sein.‘ Zur Zeit des erhabenen Padumuttara aber gab es keine Andersgläubigen (Titthiyas). Alle Götter und Menschen nahmen allein zum Buddha Zuflucht. Seine Stadt hieß Haṃsavatī, sein Vater war ein Khattiya namens Ānanda, seine Mutter war die Königin namens Sujātā. Devala und Sujāta waren die beiden Hauptjünger, Sumana war sein Diener, Amitā und Asamā waren die beiden Hauptjüngerinnen, und der Salala-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch, das Licht seines Körpers erhellte ringsum einen Bereich von zwölf Yojanas, und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Nāradassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Padumuttaro nāma jino, akkhobho sāgarūpamo’’ti. „Nach Nārada erschien der vollkommen Erleuchtete, der Höchste unter den Menschen, der Sieger namens Padumuttara, unerschütterlich gleich dem Ozean.“ Tassa aparabhāge sattati kappasahassāni atikkamitvā sumedho sujāto cāti ekasmiṃ kappe dve buddhā nibbattiṃsu. Sumedhassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ, paṭhamasannipāte sudassananagare koṭisatakhīṇāsavā ahesuṃ, dutiye pana navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto uttaro nāma māṇavo hutvā nidahitvā ṭhapitaṃyeva asītikoṭidhanaṃ vissajjetvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā dhammaṃ sutvā saraṇesu patiṭṭhāya [Pg.46] nikkhamitvā pabbaji. Sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Sumedhassa bhagavato sudassanaṃ nāma nagaraṃ ahosi, sudatto nāma rājā pitā, mātāpi sudattā nāma, saraṇo ca sabbakāmo ca dve aggasāvakā, sāgaro nāmupaṭṭhāko, rāmā ca surāmā ca dve aggasāvikā, mahānīparukkho bodhi, sarīraṃ aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ ahosi, āyu navuti vassasahassānīti. In der Zeit nach ihm, nach dem Vergehen von siebzigtausend Äonen, erschienen in einem einzigen Äon zwei Buddhas namens Sumedha und Sujāta. Auch Sumedha hatte drei Jüngerversammlungen; in der ersten Versammlung in der Stadt Sudassana gab es hundert Koṭis von Triebversiegten (Arahants), in der zweiten neunzig Koṭis und in der dritten achtzig Koṭis. Damals war der Bodhisatta ein Jüngling namens Uttara, der sein vergrabenes Vermögen von achtzig Koṭis weggab, der Gemeinschaft der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eine große Spende darbrachte, die Lehre hörte, sich in den Zufluchten festigte, in die Hauslosigkeit hinauszog und das Mönchsleben annahm. Auch jener prophezeite ihm: ‚In der Zukunft wirst du ein Buddha sein.‘ Die Stadt des erhabenen Sumedha hieß Sudassana, sein Vater war der König namens Sudatta, auch seine Mutter hieß Sudattā. Saraṇa und Sabbakāma waren die beiden Hauptjünger, Sāgara war sein Diener, Rāmā und Surāmā waren die beiden Hauptjüngerinnen, und der große Nīpa-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtundachtzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Padumuttarassa aparena, sumedho nāma nāyako; Durāsado uggatejo, sabbalokuttamo munī’’ti. „Nach Padumuttara erschien der Führer namens Sumedha, schwer nahbar, von gewaltiger Pracht, der die ganze Welt überragende Weise.“ Tassa aparabhāge sujāto nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte saṭṭhi bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye paññāsaṃ, tatiye cattālīsaṃ. Tadā bodhisatto cakkavattirājā hutvā ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā upasaṅkamitvā dhammaṃ sutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa saddhiṃ sattahi ratanehi catumahādīparajjaṃ datvā satthu santike pabbaji. Sakalaraṭṭhavāsino raṭṭhuppādaṃ gahetvā ārāmikakiccaṃ sādhentā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa niccaṃ mahādānaṃ adaṃsu. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato nagaraṃ sumaṅgalaṃ nāma ahosi, uggato nāma rājā pitā, pabhāvatī nāma mātā, sudassano ca sudevo ca dve aggasāvakā, nārado nāmupaṭṭhāko, nāgā ca nāgasamālā ca dve aggasāvikā, mahāveḷurukkho bodhi. So kira mandacchiddo ghanakkhandho upari niggatāhi mahāsākhāhi morapiñchakalāpo viya virocittha. Tassa bhagavato sarīraṃ paṇṇāsahatthubbedhaṃ ahosi, āyu navuti vassasahassānīti. In der Zeit nach ihm erschien der Lehrer namens Sujāta. Auch er hatte drei Jüngerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es sechs Millionen Mönche, in der zweiten fünf Millionen und in der dritten vier Millionen. Damals war der Bodhisatta ein Weltenherrscher (Cakkavatti-König). Als er hörte, dass ein Buddha erschienen war, suchte er ihn auf, vernahm die Lehre, gab die Herrschaft über die vier großen Kontinente mitsamt den sieben Juwelen der Gemeinschaft der Mönche mit dem Buddha an der Spitze hin und trat unter dem Lehrer in den Orden ein. Sämtliche Einwohner des Reiches nahmen die Erträge des Landes und spendeten, während sie die Pflichten von Tempelpflegern erfüllten, der Gemeinschaft der Mönche mit dem Buddha an der Spitze beständig eine große Gabe. Auch jener Lehrer prophezeite ihm: ‚In der Zukunft wirst du ein Buddha sein.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Sumaṅgala, sein Vater war der König namens Uggata, seine Mutter war Pabhāvatī. Sudassana und Sudeva waren die beiden Hauptjünger, Nārada war sein Diener, Nāgā und Nāgasamālā waren die beiden Hauptjüngerinnen, und ein großer Bambus (Mahāveḷu) war sein Bodhi-Baum. Dieser war, wie man sagt, ohne nennenswerte Hohlräume, hatte einen dichten Stamm und erstrahlte mit seinen oben herausragenden großen Zweigen wie ein Pfauenfederfächer. Der Körper des Erhabenen war fünfzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, sujāto nāma nāyako; Sīhahanusabhakkhandho, appameyyo durāsado’’ti. „In ebendiesem Maṇḍa-Äon erschien der Führer namens Sujāta, mit dem Kiefer eines Löwen und den Schultern eines Stiers, unermesslich und schwer bezwingbar.“ Tassa aparabhāge ito aṭṭhārasakappasatamatthake ekasmiṃ kappe piyadassī, atthadassī, dhammadassīti tayo buddhā nibbattiṃsu. Piyadassissāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhame koṭisatasahassā bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto kassapo nāma māṇavo tiṇṇaṃ vedānaṃ pāraṃ gato hutvā [Pg.47] satthu dhammadesanaṃ sutvā koṭisatasahassadhanapariccāgena saṅghārāmaṃ kāretvā saraṇesu ca sīlesu ca patiṭṭhāsi. Atha naṃ satthā ‘‘aṭṭhārasakappasataccayena buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato anomaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitā sudinno nāma rājā, mātā candā nāma devī, pālito ca sabbadassī ca dve aggasāvakā, sobhito nāmupaṭṭhāko, sujātā ca dhammadinnā ca dve aggasāvikā, kakudharukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, navuti vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm, vor einhundertachtzehn Äonen von heute an gerechnet, erschienen in einem einzigen Äon drei Buddhas namens Piyadassī, Atthadassī und Dhammadassī. Auch Piyadassī hatte drei Jüngerversammlungen. In der ersten gab es hunderttausend Koṭis Mönche, in der zweiten neunzig Koṭis und in der dritten achtzig Koṭis. Damals war der Bodhisatta ein Jüngling namens Kassapa, der die drei Veden gemeistert hatte; nachdem er die Lehrpredigt des Lehrers vernommen hatte, ließ er unter Aufwendung eines Vermögens von hunderttausend Koṭis ein Kloster errichten und festigte sich in den Zufluchten und den Tugendregeln. Da prophezeite ihm der Lehrer: ‚Nach dem Vergehen von einhundertachtzehn Äonen wirst du ein Buddha sein.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Anoma, sein Vater war der König namens Sudinna, seine Mutter war die Königin namens Candā. Pālita und Sabbadassī waren die beiden Hauptjünger, Sobhita war sein Diener, Sujātā und Dhammadinnā waren die beiden Hauptjüngerinnen, und der Kakudha-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Sujātassa aparena, sayambhū lokanāyako; Durāsado asamasamo, piyadassī mahāyaso’’ti. „Nach Sujāta erschien der aus sich selbst heraus Erleuchtete (Sayambhū), der Führer der Welt, schwer bezwingbar, ohnegleichen, Piyadassī von großem Ruhm.“ Tassa aparabhāge atthadassī nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhame aṭṭhanavuti bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye aṭṭhāsītisatasahassāni, tathā tatiye. Tadā bodhisatto susīmo nāma mahiddhiko tāpaso hutvā devalokato mandāravapupphacchattaṃ āharitvā satthāraṃ pūjesi, sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato sobhitaṃ nāma nagaraṃ ahosi, sāgaro nāma rājā pitā, sudassanā nāma mātā, santo ca upasanto ca dve aggasāvakā, abhayo nāmupaṭṭhāko, dhammā ca sudhammā ca dve aggasāvikā, campakarukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā samantato sabbakālaṃ yojanamattaṃ pharitvā aṭṭhāsi, āyu vassasatasahassanti. In der Zeit nach ihm erschien der Lehrer namens Atthadassī. Auch er hatte drei Jüngerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es neun Millionen achthunderttausend Mönche, in der zweiten acht Millionen achthunderttausend und ebenso in der dritten. Damals war der Bodhisatta ein Asket von großer übernatürlicher Macht namens Susīma; er brachte einen Schirm aus Mandārava-Blüten aus der Götterwelt herbei und verehrte den Lehrer. Auch dieser prophezeite ihm: ‚In der Zukunft wirst du ein Buddha sein.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Sobhita, sein Vater war der König namens Sāgara, seine Mutter war Sudassanā. Santa und Upasanta waren die beiden Hauptjünger, Abhaya war sein Diener, Dhammā und Sudhammā waren die beiden Hauptjüngerinnen, und der Campaka-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtzig Ellen hoch, das Licht seines Körpers breitete sich allezeit über eine Entfernung von einem Yojana ringsum aus, und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, atthadassī narāsabho; Mahātamaṃ nihantvāna, patto sambodhimuttama’’nti. „In ebendiesem Äon erlangte der edelste der Menschen, Atthadassī, nachdem er die große Finsternis vertrieben hatte, die höchste Erleuchtung.“ Tassa aparabhāge dhammadassī nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhame koṭisataṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye sattatikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto sakko devarājā hutvā dibbagandhapupphehi ca dibbatūriyehi ca pūjaṃ akāsi, sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato saraṇaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitā saraṇo nāma rājā, mātā sunandā nāma, padumo ca phussadevo ca dve aggasāvakā, sunetto nāmupaṭṭhāko[Pg.48], khemā ca sabbanāmā ca dve aggasāvikā, rattaṅkurarukkho bodhi, ‘‘bimbijālo’’tipi vuccati, sarīraṃ panassa asītihatthubbedhaṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. Nach ihm erschien der Meister namens Dhammadassī. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten gab es einhundert Koṭis von Mönchen, in der zweiten siebzig Koṭis, in der dritten achtzig Koṭis. Damals war der Bodhisatta als Sakka, der König der Götter, geboren und brachte ihm Verehrung dar mit himmlischen Düften und Blumen sowie mit himmlischen Musikinstrumenten. Auch jener prophezeite ihm: ‚In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Saraṇa, sein Vater war der König namens Saraṇa, seine Mutter hieß Sunandā, Paduma und Phussadeva waren die beiden Hauptschüler, Sunetta hieß der persönliche Diener, Khemā und Sabbanāmā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Rattaṅkura-Baum (auch Bimbijāla genannt) war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, dhammadassī mahāyaso; Tamandhakāraṃ vidhamitvā, atirocati sadevake’’ti. „Ebenso in jenem Maṇḍa-Weltzeitalter leuchtete der weithin berühmte Dhammadassī, nachdem er jene Finsternis vertrieben hatte, hell über der Welt samt ihren Göttern.“ Tassa aparabhāge ito catunavutikappamatthake ekasmiṃ kappe ekova siddhattho nāma buddho udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto uggatejo abhiññābalasampanno maṅgalo nāma tāpaso hutvā mahājambuphalaṃ āharitvā tathāgatassa adāsi. Satthā taṃ phalaṃ paribhuñjitvā ‘‘catunavutikappamatthake buddho bhavissasī’’ti bodhisattaṃ byākāsi. Tassa bhagavato nagaraṃ vebhāraṃ nāma ahosi, pitā jayaseno nāma rājā, mātā suphassā nāma, sambalo ca sumitto ca dve aggasāvakā, revato nāmupaṭṭhāko, sīvalī ca surāmā ca dve aggasāvikā, kaṇikārarukkho bodhi, sarīraṃ saṭṭhihatthubbedhaṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. Nach ihm, vierundneunzig Weltzeitalter von hier entfernt, entstand in einem einzigen Weltzeitalter ein einziger Buddha namens Siddhattha. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es einhunderttausend Koṭis von Mönchen, in der zweiten neunzig Koṭis, in der dritten achtzig Koṭis. Damals war der Bodhisatta als ein Asket namens Maṅgala wiedergeboren, von feuriger Willenskraft und ausgestattet mit der Kraft höherer Geisteskräfte; er brachte eine große Jambu-Frucht herbei und opferte sie dem Tathāgata. Der Meister genoss diese Frucht und prophezeite dem Bodhisatta: ‚Vierundneunzig Weltzeitalter von heute an wirst du ein Buddha werden.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Vebhāra, sein Vater war der König namens Jayasena, seine Mutter hieß Suphassā, Sambala und Sumitta waren die beiden Hauptschüler, Revata hieß der persönliche Diener, Sīvalī und Surāmā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Kaṇikāra-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war sechzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Dhammadassissa aparena, siddhattho nāma nāyako; Nihanitvā tamaṃ sabbaṃ, sūriyo abbhuggato yathā’’ti. „Nach Dhammadassī erschien der Führer namens Siddhattha; nachdem er alle Finsternis vertrieben hatte, glich er der aufgehenden Sonne.“ Tassa aparabhāge ito dvānavutikappamatthake tisso phussoti ekasmiṃ kappe dve buddhā nibbattiṃsu. Tissassa bhagavato tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte bhikkhūnaṃ koṭisataṃ ahosi, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto mahābhogo mahāyaso sujāto nāma khattiyo hutvā isipabbajjaṃ pabbajitvā mahiddhikabhāvaṃ patvā ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā dibbamandāravapadumapāricchattakapupphāni ādāya catuparisamajjhe gacchantaṃ tathāgataṃ pūjesi, ākāse pupphavitānaṃ akāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘ito dvānavutikappe buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato khemaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitā janasandho nāma khattiyo, mātā padumā nāma[Pg.49], brahmadevo ca udayo ca dve aggasāvakā, samaṅgo nāmupaṭṭhāko, phussā ca sudattā ca dve aggasāvikā, asanarukkho bodhi, sarīraṃ saṭṭhihatthubbedhaṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. Nach ihm, zweiundneunzig Weltzeitalter von hier entfernt, erschienen in einem einzigen Weltzeitalter zwei Buddhas namens Tissa und Phussa. Der erhabene Tissa hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es einhundert Koṭis von Mönchen, in der zweiten neunzig Koṭis, in der dritten achtzig Koṭis. Damals war der Bodhisatta als ein Kṣatriya namens Sujāta geboren, reich an Besitztümern und weithin berühmt; er trat in die Hauslosigkeit der Weisen ein, erlangte große übernatürliche Kräfte und als er hörte: ‚Ein Buddha ist erschienen!‘, nahm er himmlische Mandārava-, Paduma- und Pāricchattaka-Blumen und verehrte den Tathāgata, der inmitten der vierfachen Versammlung schritt, und erschuf einen Baldachin aus Blumen am Himmel. Auch jener Meister prophezeite ihm: ‚Zweiundneunzig Weltzeitalter von hier an wirst du ein Buddha werden.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Khema, sein Vater war der Kṣatriya namens Janasandha, seine Mutter hieß Padumā, Brahmadeva und Udaya waren die beiden Hauptschüler, Samaṅga hieß der persönliche Diener, Phussā und Sudattā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Asana-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war sechzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Siddhatthassa aparena, asamo appaṭipuggalo; Anantasīlo amitayaso, tisso lokagganāyako’’ti. „Nach Siddhattha erschien der Unvergleichliche, ohnegleichen Dastehende, von unendlicher Tugend und unermesslichem Ruhm, Tissa, der höchste Leiter der Welt.“ Tassa aparabhāge phusso nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte saṭṭhi bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye paṇṇāsa, tatiye dvattiṃsa. Tadā bodhisatto vijitāvī nāma khattiyo hutvā mahārajjaṃ pahāya satthu santike pabbajitvā tīṇi piṭakāni uggahetvā mahājanassa dhammakathaṃ kathesi, sīlapāramiñca pūresi. Sopi naṃ ‘‘buddho bhavissasī’’ti tatheva byākāsi. Tassa bhagavato kāsī nāma nagaraṃ ahosi, jayaseno nāma rājā pitā, sirimā nāma mātā, surakkhito ca dhammaseno ca dve aggasāvakā, sabhiyo nāmupaṭṭhāko, cālā ca upacālā ca dve aggasāvikā, āmalakarukkho bodhi, sarīraṃ aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ ahosi, navuti vassasahassāni āyūti. Nach ihm erschien der Meister namens Phussa. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es sechs Millionen Mönche, in der zweiten fünf Millionen, in der dritten drei Millionen zweihunderttausend. Damals war der Bodhisatta als ein Kṣatriya namens Vijitāvī geboren; er gab sein großes Reich auf, trat unter dem Meister in den Orden ein, erlernte die drei Korb-Schriften, verkündete der großen Volksmenge die Lehrrede und erfüllte die Vollkommenheit der Tugend. Auch jener prophezeite ihm ebenso: ‚Du wirst ein Buddha werden.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Kāsī, der König namens Jayasena war sein Vater, die Königin namens Sirimā seine Mutter, Surakkhito und Dhammaseno waren die beiden Hauptschüler, Sabhiya hieß der persönliche Diener, Cālā und Upacālā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Āmalaka-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, ahu satthā anuttaro; Anūpamo asamasamo, phusso lokagganāyako’’ti. „In eben jenem Maṇḍa-Weltzeitalter erschien der unübertreffliche Meister, der Unvergleichliche, ohnegleichen Dastehende, Phussa, der höchste Leiter der Welt.“ Tassa aparabhāge ito ekanavutikappe vipassī nāma bhagavā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte aṭṭhasaṭṭhi bhikkhusatasahassaṃ ahosi, dutiye ekasatasahassaṃ, tatiye asītisahassāni. Tadā bodhisatto mahiddhiko mahānubhāvo atulo nāma nāgarājā hutvā sattaratanakhacitaṃ sovaṇṇamayaṃ mahāpīṭhaṃ bhagavato adāsi. Sopi naṃ ‘‘ito ekanavutikappe buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato bandhumatī nāma nagaraṃ ahosi, bandhumā nāma rājā pitā, bandhumatī nāma mātā, khaṇḍo ca tisso ca dve aggasāvakā, asoko nāmupaṭṭhāko, candā ca candamittā ca dve aggasāvikā, pāṭalirukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ [Pg.50] ahosi, sarīrappabhā sadā satta yojanāni pharitvā aṭṭhāsi, asīti vassasahassāni āyūti. Nach ihm, einundneunzig Weltzeitalter von hier entfernt, erschien der Erhabene namens Vipassī. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es sechs Millionen achthunderttausend Mönche, in der zweiten einhunderttausend, in der dritten achtzigtausend. Damals war der Bodhisatta als ein sehr mächtiger und majestätischer Schlangenkönig namens Atula geboren; er opferte dem Erhabenen einen großen, aus Gold gefertigten und mit den sieben Juwelen besetzten Thron. Auch jener prophezeite ihm: ‚Einundneunzig Weltzeitalter von hier an wirst du ein Buddha werden.‘ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Bandhumatī, der König namens Bandhumant war sein Vater, die Königin namens Bandhumatī seine Mutter, Khaṇḍa und Tissa waren die beiden Hauptschüler, Asoka hieß der persönliche Diener, Candā und Candamittā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Pāṭali-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtzig Ellen hoch, seine Körperstrahlung breitete sich stets über sieben Yojanas aus und verblieb so, und seine Lebensspanne betrug achtzigtausend Jahre. ‘‘Phussassa ca aparena, sambuddho dvipaduttamo; Vipassī nāma nāmena, loke uppajji cakkhumā’’ti. „Nach Phussa erschien in der Welt der vollkommen Erwachte, das höchste der zweibeinigen Wesen, mit Namen Vipassī, der Sehende.“ Tassa aparabhāge ito ekatiṃsakappe sikhī ca vessabhū cāti dve buddhā ahesuṃ. Sikhissāpi bhagavato tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte bhikkhusatasahassaṃ ahosi, dutiye asītisahassāni, tatiye sattattisahassāni. Tadā bodhisatto arindamo nāma rājā hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sacīvaraṃ mahādānaṃ pavattetvā sattaratanapaṭimaṇḍitaṃ hatthiratanaṃ datvā hatthippamāṇaṃ katvā kappiyabhaṇḍaṃ adāsi. Sopi naṃ ‘‘ito katiṃsakappe buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato aruṇavatī nāma nagaraṃ ahosi, aruṇo nāma khattiyo pitā, pabhāvatī nāma mātā, abhibhū ca sambhavo ca dve aggasāvakā, khemaṅkaro nāmupaṭṭhāko, sakhilā ca padumā ca dve aggasāvikā, puṇḍarīkarukkho bodhi, sarīraṃ sattatihatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā yojanattayaṃ pharitvā aṭṭhāsi, sattati vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm, einunddreißig Weltzeitalter von diesem entfernt, erschienen die zwei Buddhas Sikhī und Vessabhū. Auch für den erhabenen Sikhī gab es drei Versammlungen der Jünger. Bei der ersten Versammlung waren es einhunderttausend Mönche, bei der zweiten achtzigtausend, bei der dritten siebenundsiebzigtausend. Damals war der Bodhisatta ein König namens Arindama; er veranstaltete für die Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe mitsamt Roben, schenkte ein mit den sieben Juwelen geschmücktes königliches Elefanten-Juwel und gab dem Wert des Elefanten entsprechende zulässige Güter. Auch jener prophezeite ihm: „Einunddreißig Weltzeitalter von heute an wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Aruṇavatī, der Krieger namens Aruṇa war sein Vater, Pabhāvatī namens seine Mutter. Abhibhū und Sambhava waren die beiden Hauptjünger, Khemaṅkara hieß sein persönlicher Diener. Sakhilā und Padumā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Puṇḍarīka-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war siebzig Ellen hoch; sein Körperlicht breitete sich über drei Yojanas aus. Seine Lebensspanne betrug siebzigtausend Jahre. ‘‘Vipassissa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Sikhivhayo nāma jino, asamo appaṭipuggalo’’ti. „Nach Vipassī erschien der vollkommen Erwachte, das Höchste der zweibeinigen Wesen, der Sieger namens Sikhī, der Unvergleichliche, der ohnegleichen ist.“ Tassa aparabhāge vessabhū nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte asīti bhikkhusahassāni ahesuṃ, dutiye sattati, tatiye saṭṭhi. Tadā bodhisatto sudassano nāma rājā hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sacīvaraṃ mahādānaṃ datvā tassa santike pabbajitvā ācāraguṇasampanno buddharatane cittīkārapītibahulo ahosi. Sopi naṃ bhagavā ‘‘ito ekatiṃsakappe buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato anomaṃ nāma nagaraṃ ahosi, suppatīto nāma rājā pitā, yasavatī nāma mātā[Pg.51], soṇo ca uttaro ca dve aggasāvakā, upasanto nāmupaṭṭhāko, dāmā ca samālā ca dve aggasāvikā, sālarukkho bodhi, sarīraṃ saṭṭhihatthubbedhaṃ ahosi, saṭṭhi vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm erschien der Meister namens Vessabhū. Auch für ihn gab es drei Versammlungen der Jünger. Bei der ersten Versammlung gab es achtzigtausend Mönche, bei der zweiten siebzigtausend, bei der dritten sechzigtausend. Damals war der Bodhisatta ein König namens Sudassana; er schenkte der Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe mitsamt Roben, trat unter ihm in den Orden ein, war vollkommen in gutem Wandel und Tugend und besaß tiefe Ehrfurcht und Freude gegenüber dem Juwel des Buddha. Auch jener Erhabene prophezeite ihm: „Einunddreißig Weltzeitalter von heute an wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Anoma, der König namens Suppatīta war sein Vater, Yasavatī namens seine Mutter. Soṇa und Uttara waren die beiden Hauptjünger, Upasanto hieß sein persönlicher Diener. Dāmā und Samālā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Sal-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war sechzig Ellen hoch. Seine Lebensspanne betrug sechzigtausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, asamo appaṭipuggalo; Vessabhū nāma nāmena, loke uppajji so jino’’ti. „In eben diesem Maṇḍa-Weltzeitalter erschien jener Sieger in der Welt, namens Vessabhū, der Unvergleichliche, der ohnegleichen ist.“ Tassa aparabhāge imasmiṃ kappe cattāro buddhā nibbattā kakusandho, koṇāgamano, kassapo, amhākaṃ bhagavāti. Kakusandhassa bhagavato ekova sāvakasannipāto, tattha cattālīsa bhikkhusahassāni ahesuṃ. Tadā bodhisatto khemo nāma rājā hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sapattacīvaraṃ mahādānañceva añjanādibhesajjāni ca datvā satthu dhammadesanaṃ sutvā pabbaji. Sopi naṃ satthā byākāsi. Kakusandhassa pana bhagavato khemaṃ nāma nagaraṃ ahosi, aggidatto nāma brāhmaṇo pitā, visākhā nāma brāhmaṇī mātā, vidhuro ca sañjīvo ca dve aggasāvakā, buddhijo nāmupaṭṭhāko, sāmā ca campakā ca dve aggasāvikā, mahāsirīsarukkho bodhi, sarīraṃ cattālīsahatthubbedhaṃ ahosi, cattālīsa vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm erschienen in diesem Weltzeitalter vier Buddhas: Kakusandha, Koṇāgamana, Kassapa und unser Erhabener. Für den erhabenen Kakusandha gab es nur eine einzige Versammlung der Jünger, bei der vierzigtausend Mönche anwesend waren. Damals war der Bodhisatta ein König namens Khema; er gab der Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe mitsamt Almosenschalen und Roben sowie Heilsalben und andere Arzneien, hörte die Lehrrede des Meisters und trat in den Orden ein. Auch jener Meister prophezeite ihm. Die Stadt des erhabenen Kakusandha hieß Khema, der Brahmane namens Aggidatta war sein Vater, die Brahmanin namens Visākhā seine Mutter. Vidhura und Sañjīva waren die beiden Hauptjünger, Buddhija hieß sein persönlicher Diener. Sāmā und Campakā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der große Sirīsa-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war vierzig Ellen hoch. Seine Lebensspanne betrug vierzigtausend Jahre. ‘‘Vessabhussa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Kakusandho nāma nāmena, appameyyo durāsado’’ti. „Nach Vessabhū erschien der vollkommen Erwachte, das Höchste der zweibeinigen Wesen, namens Kakusandha, der Unermessliche, der unnahbar ist.“ Tassa aparabhāge koṇāgamano nāma satthā udapādi. Tassāpi eko sāvakasannipāto, tattha tiṃsa bhikkhusahassāni ahesuṃ. Tadā bodhisatto pabbato nāma rājā hutvā amaccagaṇaparivuto satthu santikaṃ gantvā dhammadesanaṃ sutvā buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nimantetvā mahādānaṃ pavattetvā paṭṭuṇṇacīnapaṭṭakoseyyakambaladukūlāni ceva suvaṇṇapādukañca datvā satthu santike pabbaji. Sopi naṃ byākāsi. Tassa bhagavato sobhavatī nāma nagaraṃ ahosi, yaññadatto nāma brāhmaṇo pitā, uttarā nāma brāhmaṇī mātā, bhiyyaso ca uttaro ca dve aggasāvakā, sotthijo nāmupaṭṭhāko, samuddā ca uttarā ca dve aggasāvikā, udumbararukkho bodhi, sarīraṃ tiṃsahatthubbedhaṃ ahosi, tiṃsa vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm erschien der Meister namens Koṇāgamana. Auch für ihn gab es eine einzige Versammlung der Jünger, bei der dreißigtausend Mönche anwesend waren. Damals war der Bodhisatta ein König namens Pabbata; umgeben von seinem Gefolge an Ministern ging er zum Meister, hörte die Lehrrede, lud die Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze ein, veranstaltete eine große Gabe, spendete feine Wollstoffe, chinesische Seide, Seidenstoffe, Decken und feine Leinentücher sowie goldene Sandalen und trat in der Gegenwart des Meisters in den Orden ein. Auch jener prophezeite ihm. Die Stadt dieses Erhabenen hieß Sobhavatī, der Brahmane namens Yaññadatta war sein Vater, die Brahmanin namens Uttarā seine Mutter. Bhiyyasa und Uttara waren die beiden Hauptjünger, Sotthija hieß sein persönlicher Diener. Samuddā und Uttarā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Udumbara-Feigenbaum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war dreißig Ellen hoch. Seine Lebensspanne betrug dreißigtausend Jahre. ‘‘Kakusandhassa [Pg.52] aparena, sambuddho dvipaduttamo; Koṇāgamano nāma jino, lokajeṭṭho narāsabho’’ti. „Nach Kakusandha erschien der vollkommen Erwachte, das Höchste der zweibeinigen Wesen, der Sieger namens Koṇāgamana, der Höchste in der Welt, der Edelste unter den Menschen.“ Tassa aparabhāge kassapo nāma satthā udapādi. Tassāpi eko sāvakasannipāto, tattha vīsati bhikkhusahassāni ahesuṃ. Tadā bodhisatto jotipālo nāma māṇavo hutvā tiṇṇaṃ vedānaṃ pāragū bhūmiyañca antalikkhe ca pākaṭo ghaṭīkārassa kumbhakārassa mitto ahosi. So tena saddhiṃ satthāraṃ upasaṅkamitvā dhammakathaṃ sutvā pabbajitvā āraddhavīriyo tīṇi piṭakāni uggahetvā vattāvattasampattiyā buddhassa sāsanaṃ sobhesi. Sopi naṃ byākāsi. Tassa bhagavato jātanagaraṃ bārāṇasī nāma ahosi, brahmadatto nāma brāhmaṇo pitā, dhanavatī nāma brāhmaṇī mātā, tisso ca bhāradvājo ca dve aggasāvakā, sabbamitto nāmupaṭṭhāko, anuḷā ca uruveḷā ca dve aggasāvikā, nigrodharukkho bodhi, sarīraṃ vīsatihatthubbedhaṃ ahosi, vīsati vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm erschien der Meister namens Kassapa. Auch für ihn gab es eine einzige Versammlung der Jünger, bei der zwanzigtausend Mönche anwesend waren. Damals war der Bodhisatta ein junger Brahmane namens Jotipāla, der die drei Veden gemeistert hatte, bekannt in der Wissenschaft der Erde und des Himmels, und er war ein Freund des Töpfers Ghaṭīkāra. Er suchte zusammen mit diesem den Meister auf, hörte die Lehrrede, trat in den Orden ein, lernte mit unermüdlicher Tatkraft die drei Körbe und brachte die Lehre des Buddha durch das vollkommene Erfüllen aller Pflichten zum Glänzen. Auch jener prophezeite ihm. Die Geburtsstadt dieses Erhabenen hieß Bārāṇasī, der Brahmane namens Brahmadatta war sein Vater, die Brahmanin namens Dhanavatī seine Mutter. Tissa und Bhāradvāja waren die beiden Hauptjünger, Sabbamitta hieß sein persönlicher Diener. Anuḷā und Uruveḷā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Banyan-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war zwanzig Ellen hoch. Seine Lebensspanne betrug zwanzigtausend Jahre. ‘‘Koṇāgamanassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Kassapo nāma gottena, dhammarājā pabhaṅkaro’’ti. „Nach Koṇāgamana erschien der vollkommen Erwachte, das Höchste der zweibeinigen Wesen, Kassapa mit Sippennamen, der König des Dharma, der Lichtspender.“ Yasmiṃ pana kappe dīpaṅkaro dasabalo udapādi, tasmiṃ aññepi tayo buddhā ahesuṃ. Tesaṃ santikā bodhisattassa byākaraṇaṃ natthi, tasmā te idha na dassitā. Aṭṭhakathāyaṃ pana tamhā kappā paṭṭhāya sabbepi buddhe dassetuṃ idaṃ vuttaṃ – In jenem Weltzeitalter aber, in dem der Zehnkräftebesitzende Dīpaṅkara erschien, gab es auch drei andere Buddhas. Von ihnen erhielt der Bodhisatta keine Prophezeiung, weshalb sie hier nicht aufgeführt sind. Im Kommentar jedoch wurde Folgendes gesagt, um alle Buddhas von jenem Weltzeitalter an darzustellen: ‘‘Taṇhaṅkaro medhaṅkaro, athopi saraṇaṅkaro; Dīpaṅkaro ca sambuddho, koṇḍañño dvipaduttamo. „Taṇhaṅkara, Medhaṅkara, ferner auch Saraṇaṅkara, der vollkommen Erwachte Dīpaṅkara und Koṇdañña, das Höchste der zweibeinigen Wesen.“ ‘‘Maṅgalo ca sumano ca, revato sobhito muni; Anomadassī padumo, nārado padumuttaro. „Maṅgala und Sumana, Revata, der Weise Sobhita, Anomadassī, Paduma, Nārada und Padumuttara.“ ‘‘Sumedho ca sujāto ca, piyadassī mahāyaso; Atthadassī dhammadassī, siddhattho lokanāyako. „Sumedha und Sujāta, und der ruhmreiche Piyadassī, Atthadassī, Dhammadassī und Siddhattha, der Führer der Welt.“ ‘‘Tisso phusso ca sambuddho, vipassī sikhi vessabhū; Kakusandho koṇāgamano, kassapo cāti nāyako. „Tissa und der vollkommen erwachte Phussa, Vipassī, Sikhi und Vessabhū, Kakusandha, Koṇāgamana und Kassapa, der Führer.“ ‘‘Ete [Pg.53] ahesuṃ sambuddhā, vītarāgā samāhitā; Sataraṃsīva uppannā, mahātamavinodanā; Jalitvā aggikhandhāva, nibbutā te sasāvakā’’ti. „Diese waren die vollkommen Erwachten, frei von Leidenschaft, gefestigten Geistes; sie erschienen wie die Sonne mit ihren hundert Strahlen und vertrieben die große Dunkelheit. Nachdem sie wie gewaltige Feuersbrünste geleuchtet hatten, sind sie samt ihren Jüngern vollkommen erloschen.“ Tattha amhākaṃ bodhisatto dīpaṅkarādīnaṃ catuvīsatiyā buddhānaṃ santike adhikāraṃ karonto kappasatasahassādhikāni cattāri asaṅkhyeyyāni āgato. Kassapassa pana bhagavato orabhāge ṭhapetvā imaṃ sammāsambuddhaṃ añño buddho nāma natthi. Iti dīpaṅkarādīnaṃ catuvīsatiyā buddhānaṃ santike laddhabyākaraṇo pana bodhisatto yenena – Dabei legte unser Bodhisatta, indem er in der Gegenwart der vierundzwanzig Buddhas, beginnend mit Dīpaṅkara, außergewöhnliche Verdienste wirkte, den Weg über vier Unzählbare (Asaṅkhyeyya) und einhunderttausend Äonen hinweg zurück. Seit der Zeit des erhabenen Kassapa jedoch gibt es, abgesehen von diesem unseren vollkommen Erwachten, keinen anderen Buddha. Der Bodhisatta, der so in der Gegenwart der vierundzwanzig Buddhas von Dīpaṅkara an seine Prophezeiung erhalten hatte – ‘‘Manussattaṃ liṅgasampatti, hetu satthāradassanaṃ; Pabbajjā guṇasampatti, adhikāro ca chandatā; Aṭṭhadhammasamodhānā, abhinīhāro samijjhatī’’ti. (bu. vaṃ. 2.59) – „„Das Menschsein, die Männlichkeit, die nötige Voraussetzung, das Erblicken des Meisters, die Hauslosigkeit, der Besitz von Geisteskräften, eine außergewöhnliche Tat der Aufopferung und der starke Wille: Durch das Zusammentreffen dieser acht Bedingungen wird der Entschluss (zur Buddhaschaft) erfolgreich.“ –“ Ime aṭṭha dhamme samodhānetvā dīpaṅkarapādamūle katābhinīhārena ‘‘handa buddhakare dhamme, vicināmi ito cito’’ti ussāhaṃ katvā ‘‘vicinanto tadādakkhiṃ, paṭhamaṃ dānapārami’’nti dānapāramitādayo buddhakārakadhammā diṭṭhā, te pūrentoyeva yāva vessantarattabhāvā āgami. Āgacchanto ca ye te katābhinīhārānaṃ bodhisattānaṃ ānisaṃsā saṃvaṇṇitā – Nachdem er diese acht Bedingungen vereint und zu Füßen des Buddha Dīpaṅkara den Entschluss gefasst hatte, bemühte er sich mit den Worten: ‚Wohlan, ich will nun hier und dort nach den Eigenschaften suchen, die einen zum Buddha machen!‘ Beim Suchen sah er: ‚Zuerst die Vollkommenheit des Gebens (Dāna-Pāramī)‘. So sah er die buddhamachenden Eigenschaften, beginnend mit der Vollkommenheit des Gebens, und kam, eben diese erfüllend, bis zur Existenz als Vessantara. Und während er so dahinschritt, wurden die Segnungen der Bodhisattas, die ihren Entschluss gefasst hatten, wie folgt gepriesen: ‘‘Evaṃ sabbaṅgasampannā, bodhiyā niyatā narā; Saṃsaraṃ dīghamaddhānaṃ, kappakoṭisatehipi. „Menschen, die so mit allen Eigenschaften ausgestattet und gewiss für die Erleuchtung bestimmt sind, wandern zwar für lange Zeit durch den Daseinskreislauf, selbst über Hunderte von Millionen Äonen hinweg,“ ‘‘Avīcimhi nuppajjanti, tathā lokantaresu ca; Nijjhāmataṇhā khuppipāsā, na honti kālakañjakā. „doch werden sie weder in der Avīci-Hölle noch in den Zwischenwelthöllen wiedergeboren. Sie werden weder zu von Begierde verbrannten Geistern noch zu von Hunger und Durst gepeinigten Geistern, noch werden sie zu Kālakañjaka-Asuras.“ ‘‘Na honti khuddakā pāṇā, uppajjantāpi duggatiṃ; Jāyamānā manussesu, jaccandhā na bhavanti te. „Selbst wenn sie in unglücklichen Welten wiedergeboren werden, werden sie keine winzigen Tiere; und wenn sie unter Menschen geboren werden, werden sie nicht von Geburt an blind.“ ‘‘Sotavekallatā natthi, na bhavanti mūgapakkhikā; Itthibhāvaṃ na gacchanti, ubhatobyañjanapaṇḍakā. „Sie leiden nicht an Taubheit, werden weder stumm noch gelähmt; sie werden nicht als Frauen geboren, noch werden sie zu Zwittern oder Eunuchen.“ ‘‘Na bhavanti pariyāpannā, bodhiyā niyatā narā; Muttā ānantarikehi, sabbattha suddhagocarā. „Diese für die Erleuchtung bestimmten Menschen gehören nicht zu den Mangelhaften; sie sind frei von den Taten mit sofortiger Wirkung (Ānantarika-Kamma) und weilen überall in einem reinen Bereich der Achtsamkeit.“ ‘‘Micchādiṭṭhiṃ [Pg.54] na sevanti, kammakiriyadassanā; Vasamānāpi saggesu, asaññaṃ nūpapajjare. „Sie hängen keiner falschen Anschauung an, da sie das Wirken von Kamma und Tat klar erkennen; selbst wenn sie in den Himmelswelten verweilen, werden sie nicht im Bereich der wahrnehmungslosen Wesen geboren.“ ‘‘Suddhāvāsesu devesu, hetu nāma na vijjati; Nekkhammaninnā sappurisā, visaṃyuttā bhavābhave; Caranti lokatthacariyāyo, pūrenti sabbapāramī’’ti. „In den Reinen Gefilden der Devas gibt es für sie keine Ursache zur Wiedergeburt. Diese edlen Menschen neigen zur Entsagung, sind ungebunden in allen Formen des Daseins, wirken zum Wohle der Welt und erfüllen alle Vollkommenheiten.“ Te ānisaṃse adhigantvāva āgato. Pāramiyo pūrentassa cassa akittibrāhmaṇakāle saṅkhabrāhmaṇakāle dhanañcayarājakāle mahāsudassanakāle mahāgovindakāle nimimahārājakāle candakumārakāle visayhaseṭṭhikāle sivirājakāle vessantarakāleti dānapāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa sasapaṇḍitajātake – Diese Segnungen erlangend, schritt er voran. Und für ihn, während er die Vollkommenheiten erfüllte, gibt es kein Maß für die Existenzen, in denen er die Vollkommenheit des Gebens vervollkommnete – wie zur Zeit als Brahmane Akitti, als Brahmane Saṅkha, als König Dhanañcaya, als König Mahāsudassana, als Brahmane Mahāgovinda, als Großkönig Nimi, als Prinz Candakumāra, als Großkaufmann Visayha, als König Sivi und als König Vessantara. Ganz besonders aber in seiner Geburt als weiser Hase im Sasa-Jātaka: ‘‘Bhikkhāya upagataṃ disvā, sakattānaṃ pariccajiṃ; Dānena me samo natthi, esā me dānapāramī’’ti. (cariyā. 1.tassudānaṃ) – „„Als ich jemanden sah, der um Almosen herankam, gab ich mein eigenes Selbst (mein Leben) hin. Im Geben gibt es keinen, der mir gleicht; dies ist meine höchste Vollkommenheit des Gebens (Dāna-Pāramī).“ –“ Evaṃ attapariccāgaṃ karontassa dānapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā sīlavarājakāle campeyyanāgarājakāle bhūridattanāgarājakāle chaddantanāgarājakāle jayaddisarājaputtakāle alīnasattukumārakāleti sīlapāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa saṅkhapālajātake – Für ihn, der so sein eigenes Selbst hingab, wurde die Vollkommenheit des Gebens zur absoluten Vollkommenheit (Paramattha-Pāramī). Ebenso gibt es kein Maß für die Existenzen, in denen er die Vollkommenheit der Tugend (Sīla-Pāramī) erfüllte – wie zur Zeit als Elefantenkönig Sīlava, als Schlangenkönig Campeyya, als Schlangenkönig Bhūridatta, als Elefantenkönig Chaddanta, als Königssohn Jayaddisa und als Prinz Alīnasattu. Ganz besonders aber in seiner Geburt im Saṅkhapāla-Jātaka: ‘‘Sūlehi vijjhiyantopi, koṭṭiyantopi sattihi; Bhojaputte na kuppāmi, esā me sīlapāramī’’ti. (cariyā. 2.91) – „„Obgleich ich mit Spießen durchbohrt und mit Speeren gestochen wurde, wurde ich auf die Jägerbuben nicht zornig. Dies ist meine Vollkommenheit der Tugend (Sīla-Pāramī).“ –“ Evaṃ attapariccāgaṃ karontassa sīlapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā somanassakumārakāle, hatthipālakumārakāle, ayogharapaṇḍitakāleti mahārajjaṃ pahāya nekkhammapāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa cūḷasutasomajātake – Für ihn, der so sein eigenes Leben hingab, wurde die Vollkommenheit der Tugend zur absoluten Vollkommenheit. Ebenso gibt es kein Maß für die Existenzen, in denen er ein großes Königreich aufgab und die Vollkommenheit der Entsagung (Nekkhamma-Pāramī) erfüllte – wie zur Zeit als Prinz Somanassa, als Prinz Hatthipāla und als der weise Ayoghara. Ganz besonders aber in seiner Geburt im Cūḷasutasoma-Jātaka: ‘‘Mahārajjaṃ hatthagataṃ, kheḷapiṇḍaṃva chaḍḍayiṃ; Cajato na hoti laggaṃ, esā me nekkhammapāramī’’ti. – „„Das große Königreich, das mir bereits in den Händen lag, verwarf ich wie einen Speichelklumpen. Beim Aufgeben gab es für mich keinerlei Anhaftung; dies ist meine Vollkommenheit der Entsagung (Nekkhamma-Pāramī).“ –“ Evaṃ [Pg.55] nissaṅgatāya rajjaṃ chaḍḍetvā nikkhamantassa nekkhammapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā vidhurapaṇḍitakāle, mahāgovindapaṇḍitakāle, kuddālapaṇḍitakāle, arakapaṇḍitakāle, bodhiparibbājakakāle, mahosadhapaṇḍitakāleti, paññāpāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa sattubhastajātake senakapaṇḍitakāle – Für ihn, der so frei von Anhaftung das Königreich aufgab und in die Hauslosigkeit zog, wurde die Vollkommenheit der Entsagung zur absoluten Vollkommenheit. Ebenso gibt es kein Maß für die Existenzen, in denen er die Vollkommenheit der Weisheit (Paññā-Pāramī) erfüllte – wie zur Zeit als der weise Vidhura, als der weise Mahāgovinda, als der weise Kuddāla, als der weise Araka, als der Wanderer Bodhi und als der weise Mahosadha. Ganz besonders aber in seiner Geburt im Sattubhasta-Jātaka als der weise Senaka: ‘‘Paññāya vicinantohaṃ, brāhmaṇaṃ mocayiṃ dukhā; Paññāya me samo natthi, esā me paññāpāramī’’ti. – „„Indem ich mit Weisheit prüfte, befreite ich den Brahmanen aus seinem Leid. In der Weisheit kommt mir niemand gleich; dies ist meine Vollkommenheit der Weisheit (Paññā-Pāramī).“ – Und so –“ Antobhastagataṃ sappaṃ dassentassa paññāpāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā vīriyapāramitādīnampi pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa mahājanakajātake – Für ihn, der die Schlange im Inneren des Sackes aufzeigte, wurde die Vollkommenheit der Weisheit zur absoluten Vollkommenheit. Ebenso gibt es kein Maß für die Existenzen, in denen er auch die Vollkommenheit der Tatkraft (Vīriya-Pāramī) und die anderen erfüllte. Ganz besonders aber in seiner Geburt im Mahājanaka-Jātaka: ‘‘Atīradassī jalamajjhe, hatā sabbeva mānusā; Cittassa aññathā natthi, esā me vīriyapāramī’’ti. – „„Ohne das Ufer zu sehen, mitten im Wasser, kamen all die anderen Menschen um; mein Geist jedoch war frei von Wankelmut. Dies ist meine Vollkommenheit der Tatkraft (Vīriya-Pāramī).“ –“ Evaṃ mahāsamuddaṃ tarantassa pavattā vīriyapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Khantivādijātake – Für ihn, der so den großen Ozean durchschwamm, wurde die ausgeübte Vollkommenheit der Tatkraft zur absoluten Vollkommenheit. Im Khantivādi-Jātaka: ‘‘Acetanaṃva koṭṭente, tiṇhena pharasunā mamaṃ; Kāsirāje na kuppāmi, esā me khantipāramī’’ti. – „„Obgleich er mich mit einer scharfen Axt wie ein fühlloses Ding zerstückeln ließ, wurde ich auf den König von Kāsi nicht zornig. Dies ist meine Vollkommenheit der Geduld (Khanti-Pāramī).“ –“ Evaṃ acetanabhāvena viya mahādukkhaṃ adhivāsentassa khantipāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Mahāsutasomajātake – Für ihn, der so, gleichsam als wäre er fühllos, den großen Schmerz ertrug, wurde die Vollkommenheit der Geduld zur absoluten Vollkommenheit. Im Mahāsutasoma-Jātaka: ‘‘Saccavācaṃ anurakkhanto, cajitvā mama jīvitaṃ; Mocesiṃ ekasataṃ khattiye, esā me saccapāramī’’ti. – „„Indem ich mein wahres Wort bewahrte und mein Leben hingab, befreite ich einhundertunderst Könige. Dies ist meine Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit (Sacca-Pāramī).“ –“ Evaṃ jīvitaṃ cajitvā saccamanurakkhantassa saccapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Mūgapakkhajātake – Für ihn, der so sein Leben hingab und das wahre Wort bewahrte, wurde die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit zur absoluten Vollkommenheit. Im Mūgapakkha-Jātaka: ‘‘Mātā pitā na me dessā, napi me dessaṃ mahāyasaṃ; Sabbaññutaṃ piyaṃ mayhaṃ, tasmā vatamadhiṭṭhahi’’nti. (cariyā. 3.6 thokaṃ visadisaṃ) – „„Weder Mutter noch Vater waren mir verhasst, noch war mir der große Ruhm verhasst; doch die Allwissenheit war mir über alles lieb, darum entschloss ich mich zu diesem Gelübde (so zu tun, als sei ich stumm und lahm).“ –“ Evaṃ jīvitampi cajitvā vataṃ adhiṭṭhahantassa adhiṭṭhānapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Ekarājajātake – Für ihn, der so selbst das Leben hingab und dieses Gelübde aufrechterhielt, wurde die Vollkommenheit des Entschlusses (Adhiṭṭhāna-Pāramī) zur absoluten Vollkommenheit. Im Ekarāja-Jātaka – ‘‘Na [Pg.56] maṃ koci uttasati, napihaṃ bhāyāmi kassaci; Mettābalenupatthaddho, ramāmi pavane tadā’’ti. (cariyā. 3.113) – „Niemand erschreckt vor mir, und ich fürchte mich vor keinem; gestützt von der Kraft der liebenden Güte, erfreue ich mich damals im großen Walde.“ Evaṃ jīvitampi anoloketvā mettāyantassa mettāpāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Lomahaṃsajātake – Als er so, ohne Rücksicht auf das eigene Leben, liebende Güte entfaltete, wurde seine Vollkommenheit der liebenden Güte (mettā-pāramī) zur sogenannten höchsten Vollkommenheit (paramattha-pāramī). Im Lomahaṃsa-Jātaka heißt es: ‘‘Susāne seyyaṃ kappemi, chavaṭṭhikaṃ upadhāyahaṃ; Gāmaṇḍalā upāgantvā, rūpaṃ dassentinappaka’’nti. (cariyā. 3.119) – „Auf dem Friedhof richte ich mein Lager, ein Skelett als Kissen benutzend. Dorfkinder kommen herbei und zeigen vielfältiges Verhalten.“ Evaṃ gāmadārakesu niṭṭhubhanādīhi ceva mālāgandhūpahārādīhi ca sukhadukkhaṃ uppādentesupi upekkhaṃ anativattantassa upekkhāpāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Ayamettha saṅkhepo, vitthārato panesa attho cariyāpiṭakato gahetabbo. Evaṃ pāramiyo pūretvā vessantarattabhāve ṭhito – Obwohl die Dorfkinder durch Spucken und Ähnliches einerseits sowie durch das Darbringen von Blumen, Düften und Ähnlichem andererseits Glück und Leid in ihm hervorriefen, überschritt er nicht seinen Gleichmut. Dadurch wurde seine Vollkommenheit des Gleichmutes (upekkhā-pāramī) zur sogenannten höchsten Vollkommenheit (paramattha-pāramī). Dies ist hier die Kurzfassung; in aller Ausführlichkeit ist diese Bedeutung jedoch aus dem Cariyāpiṭaka zu entnehmen. Nachdem er so die Vollkommenheiten erfüllt hatte und in seiner Existenz als Vessantara verweilte, sprach er: ‘‘Acetanāyaṃ pathavī, aviññāya sukhaṃ dukhaṃ; Sāpi dānabalā mayhaṃ, sattakkhattuṃ pakampathā’’ti. (cariyā. 1.124) – „Diese Erde ist ohne Bewusstsein, sie empfindet weder Glück noch Schmerz. Und doch erbebte sie durch die Kraft meiner Freigebigkeit siebenmal.“ Evaṃ mahāpathavikampanādīni mahāpuññāni katvā āyupariyosāne tato cuto tusitabhavane nibbatti. Iti dīpaṅkarapādamūlato paṭṭhāya yāva ayaṃ tusitapure nibbatti, ettakaṃ ṭhānaṃ dūrenidānaṃ nāmāti veditabbaṃ. Nachdem er so große Verdienste vollbracht hatte, wie das Erbebenlassen der großen Erde, schied er am Ende seiner Lebenszeit aus jenem Dasein und wurde im Tusita-Himmelreich wiedergeboren. Somit ist zu verstehen, dass dieser gesamte Zeitraum, angefangen bei den Füßen [des Buddha] Dīpaṅkara bis hin zu seiner Wiedergeburt im Tusita-Himmelreich, als die „Ferne Vorgeschichte“ (dūrenidāna) bezeichnet wird. Dūrenidānakathā niṭṭhitā. Die Darlegung der Fernen Vorgeschichte (dūrenidāna) ist abgeschlossen. 2. Avidūrenidānakathā 2. Die Darlegung der nicht allzu fernen Vorgeschichte (avidūrenidāna) Tusitapure vasanteyeva pana bodhisatte buddhakolāhalaṃ nāma udapādi. Lokasmiñhi tīṇi kolāhalāni uppajjanti – kappakolāhalaṃ, buddhakolāhalaṃ, cakkavattikolāhalanti. Tattha ‘‘vassasatasahassassa accayena kappuṭṭhānaṃ bhavissatī’’ti lokabyūhā nāma kāmāvacaradevā muttasirā vikiṇṇakesā rudamukhā assūni hatthehi puñchamānā rattavatthanivatthā ativiya virūpavesadhārino hutvā manussapathe vicarantā evaṃ ārocenti ‘‘mārisā [Pg.57] ito vassasatasahassassa accayena kappuṭṭhānaṃ bhavissati, ayaṃ loko vinassissati, mahāsamuddopi sussissati, ayañca mahāpathavī sineru ca pabbatarājā uḍḍayhissanti vinassissanti, yāva brahmalokā lokavināso bhavissati, mettaṃ mārisā bhāvetha, karuṇaṃ, muditaṃ, upekkhaṃ mārisā bhāvetha, mātaraṃ upaṭṭhahatha, pitaraṃ upaṭṭhahatha, kule jeṭṭhāpacāyino hothā’’ti. Idaṃ kappakolāhalaṃ nāma. Vassasahassassa accayena pana sabbaññubuddho loke uppajjissatīti lokapāladevatā ‘‘ito mārisā vassasahassassa accayena buddho loke uppajjissatī’’ti ugghosentā āhiṇḍanti. Idaṃ buddhakolāhalaṃ nāma. Vassasatassa accayena cakkavattī rājā uppajjissatīti devatā ‘‘ito mārisā vassasatassa accayena cakkavattī rājā loke uppajjissatī’’ti ugghosentiyo āhiṇḍanti. Idaṃ cakkavattikolāhalaṃ nāma. Imāni tīṇi kolāhalāni mahantāni honti. Als der Bodhisatta jedoch im Tusita-Himmelreich verweilte, entstand der sogenannte Buddha-Aufruhr (buddhakolāhala). In der Welt entstehen nämlich drei große Aufruhre (kolāhala): der Weltzeitalter-Aufruhr (kappakolāhala), der Buddha-Aufruhr (buddhakolāhala) und der Weltherrscher-Aufruhr (cakkavattikolāhala). Unter diesen wandern die im Sinnesbereich weilenden Götter namens Lokabyūha, wenn nach Ablauf von hunderttausend Jahren der Untergang des Weltzeitalters bevorsteht, mit gelöstem Haar, zerzausten Haaren und weinenden Gesichtern, sich die Tränen mit den Händen abwischend, in rote Gewänder gekleidet und in einer überaus entstellten Gestalt auf den Wegen der Menschen umher und verkünden: „Ihr Lieben, nach Ablauf von hunderttausend Jahren von heute an wird der Untergang des Weltzeitalters stattfinden! Diese Welt wird vernichtet werden, selbst der große Ozean wird austrocknen, und diese große Erde sowie Sineru, der König der Berge, werden verbrennen und vernichtet werden; bis hinauf zur Brahma-Welt wird die Vernichtung der Welt reichen. Ihr Lieben, entfaltet die liebende Güte (mettā)! Entfaltet das Mitgefühl (karuṇā), die Mitfreude (muditā) und den Gleichmut (upekkhā), ihr Lieben! Pflegt eure Mütter, pflegt eure Väter, erweist den Ältesten in der Familie Ehrfurcht!“ Dies wird als der Weltzeitalter-Aufruhr bezeichnet. Nach Ablauf von tausend Jahren aber wird ein allwissender Buddha in der Welt erscheinen; [dies verkündend] wandern die Weltwächter-Gottheiten (lokapāladevatā) umher und rufen aus: „Ihr Lieben, nach Ablauf von tausend Jahren von heute an wird ein Buddha in der Welt erscheinen!“ Dies wird als der Buddha-Aufruhr bezeichnet. Nach Ablauf von hundert Jahren wird ein Weltherrscher-König (cakkavatti) erscheinen; [dies verkündend] wandern Gottheiten umher und rufen aus: „Ihr Lieben, nach Ablauf von hundert Jahren von heute an wird ein Weltherrscher-König in der Welt erscheinen!“ Dies wird als der Weltherrscher-Aufruhr bezeichnet. Diese drei Aufruhre sind von gewaltigem Ausmaß. Tesu buddhakolāhalasaddaṃ sutvā sakaladasasahassacakkavāḷadevatā ekato sannipatitvā ‘‘asuko nāma satto buddho bhavissatī’’ti ñatvā taṃ upasaṅkamitvā āyācanti. Āyācamānā ca pubbanimittesu uppannesu āyācanti. Tadā pana sabbāpi devatā ekekacakkavāḷe catumahārājasakkasuyāmasantusitasunimmitavasavattimahābrahmehi saddhiṃ ekacakkavāḷe sannipatitvā tusitabhavane bodhisattassa santikaṃ gantvā ‘‘mārisā tumhehi dasa pāramiyo pūrentehi na sakkasampattiṃ, na mārasampattiṃ, na brahmasampattiṃ, na cakkavattisampattiṃ patthentehi pūritā, lokanittharaṇatthāya pana sabbaññutaṃ patthentehi pūritā, so vo idāni kālo mārisā buddhattāya samayo, mārisā buddhattāya samayo’’ti yāciṃsu. Wenn die Gottheiten aus allen zehntausend Weltensystemen den Ruf des Buddha-Aufruhrs hören, versammeln sie sich an einem Ort. Da sie wissen: „Dieses bestimmte Wesen wird ein Buddha werden“, suchen sie jenen [Bodhisatta] auf und bitten ihn inständig. Und wenn sie ihn bitten, so tun sie dies, sobald die Vorzeichen (pubbanimitta) aufgetreten sind. Zu jener Zeit versammelten sich alle Gottheiten aus jedem einzelnen Weltensystem zusammen mit den vier Großen Königen, Sakka, Suyāma, Santusita, Sunimmita, Vasavatti und den Großen Brahmas in einem einzigen Weltensystem, begaben sich im Tusita-Himmelreich in die Gegenwart des Bodhisattas und baten ihn: „Lieber Herr, als ihr die zehn Vollkommenheiten (pāramī) erfüllt habt, habt ihr sie nicht im Verlangen nach der Herrlichkeit Sakkas, der Herrlichkeit Māras, der Herrlichkeit Brahmas oder der Herrlichkeit eines Weltherrschers erfüllt; vielmehr habt ihr sie im Verlangen nach der Allwissenheit (sabbaññuta) zum Zwecke der Befreiung der Welt [aus dem Kreislauf des Leidens] erfüllt. Nun ist für euch die Zeit gekommen, lieber Herr, es ist der rechte Zeitpunkt für die Buddhaschaft! Lieber Herr, es ist der rechte Zeitpunkt für die Buddhaschaft!“ Atha mahāsatto devatānaṃ paṭiññaṃ adatvāva kāladīpadesakulajanettiāyuparicchedavasena pañcamahāvilokanaṃ nāma vilokesi. Tattha ‘‘kālo nu kho, akālo nu kho’’ti paṭhamaṃ kālaṃ vilokesi. Tattha vassasatasahassato uddhaṃ vaḍḍhitaāyukālo kālo nāma na hoti. Kasmā? Tadā hi sattānaṃ jātijarāmaraṇāni na paññāyanti. Buddhānañca dhammadesanā tilakkhaṇamuttā nāma natthi. Tesaṃ ‘‘aniccaṃ, dukkhaṃ, anattā’’ti kathentānaṃ ‘‘kiṃ nāmetaṃ kathentī’’ti neva sotabbaṃ na saddhātabbaṃ [Pg.58] maññanti, tato abhisamayo na hoti, tasmiṃ asati aniyyānikaṃ sāsanaṃ hoti. Tasmā so akālo. Vassasatato ūnaāyukālopi kālo na hoti. Kasmā? Tadā sattā ussannakilesā honti, ussannakilesānañca dinno ovādo ovādaṭṭhāne na tiṭṭhati, udake daṇḍarāji viya khippaṃ vigacchati. Tasmā sopi akālo. Vassasatasahassato pana paṭṭhāya heṭṭhā, vassasatato paṭṭhāya uddhaṃ āyukālo kālo nāma. Tadā ca vassasatakālo. Atha mahāsatto ‘‘nibbattitabbakālo’’ti kālaṃ passi. Daraufhin gab das Große Wesen (mahāsatto) den Gottheiten noch keine Zusage, sondern vollzog die sogenannten fünf großen Betrachtungen (pañcamahāvilokana) bezüglich der Zeit (kāla), des Kontinents (dīpa), des Landes (desa), der Familie (kula) und der Lebensspanne der Mutter (janetti-āyupariccheda). Unter diesen betrachtete er zuerst die Zeit: „Ist es nun die rechte Zeit oder ist es nicht die rechte Zeit?“ Hierbei ist eine Zeit, in der die Lebensspanne der Menschen über hunderttausend Jahre ansteigt, nicht als die rechte Zeit anzusehen. Warum? Weil zu jener Zeit den Wesen Geburt, Altern und Tod nicht offenkundig sind. Auch gibt es keine Lehrverkündung der Buddhas, die frei von den drei Merkmalen des Daseins (tilakkhaṇa) wäre. Wenn [die Buddhas] jenen verkünden: „Es ist unbeständig (anicca), leidvoll (dukkha) und nicht-selbst (anattā)“, so meinen diese nur: „Was ist das bloß, wovon sie da reden?“, und halten es weder für hörenswert noch für glaubwürdig. Infolgedessen findet kein Durchdringen der Wahrheiten (abhisamaya) statt, und wenn dieses ausbleibt, führt die Lehre (sāsana) nicht zur Befreiung. Deshalb ist jene Zeit ungeeignet. Doch auch eine Zeit, in der die Lebensspanne unter hundert Jahre sinkt, ist nicht die rechte Zeit. Warum? Weil zu jener Zeit die Wesen von übermäßig starken Befleckungen (kilesa) beherrscht werden. Die Unterweisung, die jenen mit so starken Befleckungen Behafteten gegeben wird, bleibt nicht haften; sie schwindet rasch dahin wie ein Strich, den man mit einem Stock ins Wasser zieht. Deshalb ist auch diese Zeit ungeeignet. Die Lebensspanne jedoch, die von hunderttausend Jahren abwärts bis hin zu hundert Jahren aufwärts reicht, wird als die rechte Zeit bezeichnet. Zu jener Zeit betrug die Lebensspanne gerade hundert Jahre. Da erkannte das Große Wesen: „Es ist die Zeit, in der ich geboren werden muss“, und sah so die rechte Zeit. Tato dīpaṃ vilokento saparivāre cattāro dīpe oloketvā ‘‘tīsu dīpesu buddhā na nibbattanti, jambudīpeyeva nibbattantī’’ti dīpaṃ passi. Daraufhin betrachtete er den Kontinent; er blickte auf die vier großen Kontinente samt ihren Nebeninseln und erkannte den Kontinent, indem er sah: „Auf drei Kontinenten erscheinen die Buddhas nicht; sie erscheinen einzig auf Jambudīpa.“ Tato ‘‘jambudīpo nāma mahā dasayojanasahassaparimāṇo, katarasmiṃ nu kho padese buddhā nibbattantī’’ti okāsaṃ vilokento majjhimadesaṃ passi. Majjhimadeso nāma – ‘‘puratthimāya disāya gajaṅgalaṃ nāma nigamo, tassa aparena mahāsālo, tato paraṃ paccantimā janapadā, orato majjhe. Pubbadakkhiṇāya disāya sallavatī nāma nadī, tato paraṃ paccantimā janapadā, orato majjhe. Dakkhiṇāya disāya setakaṇṇikaṃ nāma nigamo, tato paraṃ paccantimā janapadā, orato majjhe. Pacchimāya disāya thūṇaṃ nāma brāhmaṇagāmo, tato paraṃ paccantimā janapadā, orato majjhe. Uttarāya disāya usīraddhajo nāma pabbato, tato paraṃ paccantimā janapadā, orato majjhe’’ti evaṃ vinaye (mahāva. 259) vutto padeso. So āyāmato tīṇi yojanasatāni, vitthārato aḍḍhateyyāni, parikkhepato nava yojanasatānīti etasmiṃ padese buddhā, paccekabuddhā, aggasāvakā, asīti mahāsāvakā, cakkavattirājā aññe ca mahesakkhā khattiyabrāhmaṇagahapatimahāsālā uppajjanti. Idañcettha kapilavatthu nāma nagaraṃ, tattha mayā nibbattitabbanti niṭṭhaṃ agamāsi. Daraufhin erblickte er, während er den Raum betrachtete und dachte: 'Jambudīpa genannt ist groß und misst zehntausend Yojanas; an welchem Ort wohl werden die Buddhas geboren?', das Mittelland (Majjhimadesa). Das Mittelland ist jene Gegend, die im Vinaya wie folgt beschrieben wird: 'In östlicher Richtung liegt der Marktflecken namens Gajaṅgala, jenseits davon steht ein großer Sāla-Baum, und dahinter liegen die Grenzländer; diesseits davon ist die Mitte. In südöstlicher Richtung fließt der Fluss namens Sallavatī, dahinter liegen die Grenzländer; diesseits davon ist die Mitte. In südlicher Richtung liegt der Marktflecken namens Setakaṇṇika, dahinter liegen die Grenzländer; diesseits davon ist die Mitte. In westlicher Richtung liegt das Brahmanendorf namens Thūṇa, dahinter liegen die Grenzländer; diesseits davon ist die Mitte. In nördlicher Richtung liegt der Berg namens Usīraddhaja, dahinter liegen die Grenzländer; diesseits davon ist die Mitte.' Diese Gegend misst in der Länge dreihundert Yojanas, in der Breite zweihundertfünfzig Yojanas und im Umfang neunhundert Yojanas. In dieser Gegend werden Buddhas, Paccekabuddhas, die beiden Hauptjünger, die achtzig großen Jünger, Weltherrscher-Könige sowie andere einflussreiche Kṣatriyas, Brahmanen und Hausväter von großem Wohlstand geboren. Und er fasste den Entschluss: 'Hier liegt die Stadt namens Kapilavatthu; dort soll ich geboren werden.' Tato kulaṃ vilokento ‘‘buddhā nāma vessakule vā suddakule vā na nibbattanti, lokasammate pana khattiyakule vā brāhmaṇakulevāti dvīsuyeva kulesu nibbattanti. Idāni ca khattiyakulaṃ lokasammataṃ[Pg.59], tattha nibbattissāmi. Suddhodano nāma rājā me pitā bhavissatī’’ti kulaṃ passi. Danach betrachtete er die Kaste und dachte: 'Buddhas werden gewiss nicht in einer Vessa- oder Sudda-Familie geboren. Vielmehr werden sie nur in den beiden von der Welt hochangesehenen Kasten geboren, nämlich in der Kṣatriya- oder der Brahmana-Kaste. Heutzutage ist die Kṣatriya-Kaste von der Welt hochangesehen; in dieser will ich geboren werden. Der König namens Suddhodana wird mein Vater sein.' So sah er die Familie. Tato mātaraṃ vilokento ‘‘buddhamātā nāma lolā surādhuttā na hoti, kappasatasahassaṃ pana pūritapāramī jātito paṭṭhāya akhaṇḍapañcasīlāyeva hoti. Ayañca mahāmāyā nāma devī edisī, ayaṃ me mātā bhavissati, kittakaṃ panassā āyūti dasannaṃ māsānaṃ upari satta divasānī’’ti passi. Danach betrachtete er die Mutter und dachte: 'Eine Buddhamutter ist weder leichtfertig noch trunksüchtig, sondern sie hat über hunderttausend Äonen hinweg die Vollkommenheiten erfüllt und hält von Geburt an die fünf Tugendregeln makellos ein. Und diese Königin namens Mahāmāyā ist von solcher Art; sie wird meine Mutter sein. Wie lange aber ist ihre verbleibende Lebensspanne?' Da sah er: 'Sie beträgt zehn Monate und sieben Tage darüber hinaus.' Iti imaṃ pañcamahāvilokanaṃ viloketvā ‘‘kālo me mārisā buddhabhāvāyā’’ti devatānaṃ saṅgahaṃ karonto paṭiññaṃ datvā ‘‘gacchatha, tumhe’’ti tā devatā uyyojetvā tusitadevatāhi parivuto tusitapure nandanavanaṃ pāvisi. Sabbadevalokesu hi nandanavanaṃ atthiyeva. Tattha naṃ devatā ‘‘ito cuto sugatiṃ gaccha, ito cuto sugatiṃ gacchā’’ti pubbe katakusalakammokāsaṃ sārayamānā vicaranti. So evaṃ devatāhi kusalaṃ sārayamānāhi parivuto tattha vicaranto cavitvā mahāmāyāya deviyā kucchismiṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. Nachdem er so diese die fünf großen Betrachtungen angestellt hatte, dachte er: 'Es ist Zeit für mich, ihr Edlen, die Buddhaschaft zu verwirklichen.' Er erfreute die Gottheiten, gab ihnen sein Versprechen und verabschiedete sie mit den Worten: 'Geht nun!' Umgeben von den Tusita-Gottheiten betrat er den Nandana-Hain in der Tusita-Stadt. Denn in allen Deva-Welten gibt es einen Nandana-Hain. Dort wandelten die Gottheiten um ihn herum, um ihn an die Gelegenheit seiner früher vollbrachten heilsamen Taten zu erinnern, und sprachen: 'Scheide von hier und geh an einen glücklichen Ort! Scheide von hier und geh an einen glücklichen Ort!' Während er dort, umgeben von den Gottheiten, die ihn an das Heilsame erinnerten, umherwandelte, schied er ab und nahm im Schoß der Königin Mahāmāyā Wiedergeburt an. Tassa āvibhāvatthaṃ ayamanupubbikathā – tadā kira kapilavatthunagare āsāḷhinakkhattaṃ saṅghuṭṭhaṃ ahosi, mahājano nakkhattaṃ kīḷati. Mahāmāyāpi devī pure puṇṇamāya sattamadivasato paṭṭhāya vigatasurāpānaṃ mālāgandhavibhūtisampannaṃ nakkhattakīḷaṃ anubhavamānā sattame divase pātova uṭṭhāya gandhodakena nhāyitvā cattāri satasahassāni vissajjetvā mahādānaṃ datvā sabbālaṅkāravibhūsitā varabhojanaṃ bhuñjitvā uposathaṅgāni adhiṭṭhāya alaṅkatapaṭiyattaṃ sirigabbhaṃ pavisitvā sirisayane nipannā niddaṃ okkamamānā imaṃ supinaṃ addasa – ‘cattāro kira naṃ mahārājāno sayaneneva saddhiṃ ukkhipitvā himavantaṃ netvā saṭṭhiyojanike manosilātale sattayojanikassa mahāsālarukkhassa heṭṭhā ṭhapetvā ekamantaṃ aṭṭhaṃsu. Atha nesaṃ deviyo āgantvā deviṃ anotattadahaṃ netvā manussamalaharaṇatthaṃ nhāpetvā dibbavatthaṃ nivāsāpetvā gandhehi vilimpāpetvā dibbapupphāni piḷandhāpetvā tato avidūre eko rajatapabbato atthi, tassa anto kanakavimānaṃ atthi[Pg.60], tattha pācīnasīsakaṃ dibbasayanaṃ paññāpetvā nipajjāpesuṃ. Atha bodhisatto setavaravāraṇo hutvā tato avidūre eko suvaṇṇapabbato atthi, tattha vicaritvā tato oruyha rajatapabbataṃ abhiruhitvā uttaradisato āgamma rajatadāmavaṇṇāya soṇḍāya setapadumaṃ gahetvā koñcanādaṃ naditvā kanakavimānaṃ pavisitvā mātusayanaṃ tikkhattuṃ padakkhiṇaṃ katvā dakkhiṇapassaṃ phāletvā kucchiṃ paviṭṭhasadiso ahosī’ti. Evaṃ uttarāsāḷhanakkhattena paṭisandhiṃ gaṇhi. Um dies zu verdeutlichen, folgt hier die aufeinanderfolgende Erzählung: Damals wurde, so heißt es, in der Stadt Kapilavatthu das Āsāḷha-Fest ausgerufen, und die große Volksmenge feierte das Fest. Auch die Königin Mahāmāyā genoss ab dem siebten Tag vor dem Vollmond das Festspiel, frei von jeglichem Rauschgetränk und herrlich geschmückt mit Blumenkränzen und Wohlgerüchen. Am siebten Tag stand sie frühmorgens auf, badete in duftendem Wasser, verteilte eine große Spende, nachdem sie vierhunderttausend [Münzen] ausgegeben hatte, legte all ihren Prachtschmuck an, genoss erlesene Speisen, gelobte die Uposatha-Regeln, betrat das festlich hergerichtete Prachtgemach, legte sich auf das Prachtbett und sah, als sie einschlief, folgenden Traum: Die vier großen Könige hoben sie samt ihrem Bett empor, trugen sie zum Himalaya, setzten sie auf der sechzig Yojanas großen Realgar-Fläche unter einen sieben Yojanas hohen großen Sāla-Baum und stellten sich beiseite. Da kamen deren Gemahlinnen, brachten die Königin zum Anotatta-See, badeten sie, um allen menschlichen Schmutz zu entfernen, kleideten sie in göttliche Gewänder, salbten sie mit himmlischen Wohlgerüchen, schmückten sie mit himmlischen Blumen und ließen sie sich in einem goldenen Prachtgebäude im Inneren eines unweit davon gelegenen silbernen Berges auf einem himmlischen Bett niederlegen, das mit dem Kopfende nach Osten ausgerichtet war. Da wurde der Bodhisatta zu einem edlen weißen Elefanten. Nachdem er auf einem unweit davon gelegenen goldenen Berg umhergewandert war, stieg er von dort herab, bestieg den silbernen Berg, kam aus nördlicher Richtung, hielt in seinem Rüssel, der wie eine Kette aus Silber glänzte, einen weißen Lotus, stieß einen Schrei wie ein Kranich aus, betrat das goldene Prachtgebäude, umkreiste dreimal ehrerbietig das Bett seiner Mutter, öffnete ihre rechte Flanke und schien so in ihren Schoß einzutreten. Auf diese Weise nahm er unter dem Uttarāsāḷha-Sternbild Wiedergeburt an. Punadivase pabuddhā devī taṃ supinaṃ rañño ārocesi. Rājā catusaṭṭhimatte brāhmaṇapāmokkhe pakkosāpetvā gomayaharitūpalittāya lājādīhi katamaṅgalasakkārāya bhūmiyā mahārahāni āsanāni paññāpetvā tattha nisinnānaṃ brāhmaṇānaṃ sappimadhusakkharābhisaṅkhatassa varapāyāsassa suvaṇṇarajatapātiyo pūretvā suvaṇṇarajatapātīhiyeva paṭikujjitvā adāsi, aññehi ca ahatavatthakapilagāvidānādīhi te santappesi. Atha nesaṃ sabbakāmehi santappitānaṃ supinaṃ ārocāpetvā ‘‘kiṃ bhavissatī’’ti pucchi. Brāhmaṇā āhaṃsu ‘‘mā cintayi, mahārāja, deviyā te kucchimhi gabbho patiṭṭhito, so ca kho purisagabbho, na itthigabbho, putto te bhavissati. So sace agāraṃ ajjhāvasissati, rājā bhavissati cakkavattī; sace agārā nikkhamma pabbajissati, buddho bhavissati loke vivaṭṭacchado’’ti. Am folgenden Tag erwacht, berichtete die Königin dem König diesen Traum. Der König ließ etwa vierundsechzig der angesehensten Brahmanen rufen, ließ auf dem Boden, der mit frischem Kuhdung bestrichen und mit feierlichen Gaben wie geröstetem Reis hergerichtet war, kostbare Sitze aufstellen, füllte goldene und silberne Schalen mit bestem Milchreis, der mit Butter, Honig und Zucker zubereitet war, deckte sie mit eben solchen goldenen und silbernen Schalen ab und reichte sie den dort sitzenden Brahmanen. Auch stellte er sie mit anderen Gaben wie neuen Gewändern und rotbraunen Kühen zufrieden. Nachdem er sie so mit allem Begehrenswerten zufriedengestellt hatte, ließ er sie den Traum hören und fragte: 'Was wird geschehen?' Die Brahmanen sprachen: 'Sorge dich nicht, o Großkönig! Im Schoß der Königin hat sich eine Empfängnis eingestellt, und zwar ist es eine männliche Frucht, kein Mädchen. Du wirst einen Sohn erhalten. Wenn er das Hausleben führt, wird er ein Weltherrscher-König werden; wenn er aber aus dem Haus in die Hauslosigkeit zieht, wird er ein Buddha werden, der in der Welt den Schleier [der Unwissenheit] lüftet.' Bodhisattassa pana mātukucchimhi paṭisandhiggahaṇakkhaṇe ekappahāreneva sakaladasasahassī lokadhātu saṅkampi sampakampi sampavedhi. Bāttiṃsapubbanimittāni pāturahesuṃ – dasasu cakkavāḷasahassesu appamāṇo obhāso phari. Tassa taṃ siriṃ daṭṭhukāmā viya andhā cakkhūni paṭilabhiṃsu, badhirā saddaṃ suṇiṃsu, mūgā samālapiṃsu, khujjā ujugattā ahesuṃ, paṅgulā padasā gamanaṃ paṭilabhiṃsu, bandhanagatā sabbasattā andubandhanādīhi mucciṃsu, sabbanarakesu aggi nibbāyi, pettivisaye khuppipāsā vūpasami, tiracchānānaṃ bhayaṃ nāhosi, sabbasattānaṃ rogo vūpasami, sabbasattā piyaṃvadā ahesuṃ, madhurenākārena assā hasiṃsu, vāraṇā gajjiṃsu, sabbatūriyāni sakasakaninnādaṃ muñciṃsu, aghaṭṭitāniyeva manussānaṃ hatthūpagādīni ābharaṇāni viraviṃsu, sabbadisā vippasannā ahesuṃ[Pg.61], sattānaṃ sukhaṃ uppādayamāno mudusītalavāto vāyi, akālamegho vassi, pathavitopi udakaṃ ubbhijjitvā vissandi, pakkhino ākāsagamanaṃ vijahiṃsu, nadiyo asandamānā aṭṭhaṃsu, mahāsamudde madhuraṃ udakaṃ ahosi, sabbatthakameva pañcavaṇṇehi padumehi sañchannatalo ahosi, thalajajalajādīni sabbapupphāni pupphiṃsu, rukkhānaṃ khandhesu khandhapadumāni, sākhāsu sākhāpadumāni, latāsu latāpadumāni pupphiṃsu, thale silātalāni bhinditvā uparūpari satta satta hutvā daṇḍapadumāni nāma nikkhamiṃsu, ākāse olambakapadumāni nāma nibbattiṃsu, samantato pupphavassā vassiṃsu, ākāse dibbatūriyāni vajjiṃsu, sakaladasasahassilokadhātu vaṭṭetvā vissaṭṭhamālāguḷo viya, uppīḷetvā baddhamālākalāpo viya, alaṅkatapaṭiyattaṃ mālāsanaṃ viya ca ekamālāmālinī vipphurantavāḷabījanī pupphadhūmagandhaparivāsitā paramasobhaggappattā ahosi. Als der Bodhisatta im Mutterleib empfangen wurde, erbebte, erzitterte und erschütterte das gesamte zehntausendfache Weltsystem auf einen Schlag heftig. Die zweiunddieißig Vorzeichen traten in Erscheinung: In den zehntausend Weltsystemen breitete sich ein unermesslicher Glanz aus. Gleichsam als wollten sie diese Pracht des unermesslichen Lichts schauen, erhielten die Blinden ihr Augenlicht, die Tauben hörten Töne, die Stummen begannen miteinander zu sprechen, die Buckligen wurden geradgliedrig, die Lahmen erlangten die Fähigkeit zu gehen, alle gefesselten Wesen wurden von Fußblockfesseln und anderen Banden befreit, in allen Höllen erlosch das Feuer, im Reich der Geister legten sich Hunger und Durst, unter den Tieren gab es keine Furcht, die Krankheit aller Wesen schwand, alle Wesen sprachen liebevolle Worte, auf lieblich-heitere Weise wieherten die Pferde, die Elefanten brüllten freudig, alle Musikinstrumente gaben von selbst ihren jeweiligen Wohlklang ab, ohne berührt zu werden, erklangen die Schmuckstücke der Menschen wie Armringe und anderes, alle Himmelsrichtungen wurden völlig klar, ein sanfter, kühler Wind wehte, der den Wesen Wohlbefinden brachte, ein unzeitiger Regen fiel, auch aus der Erde quoll Wasser hervor und floss dahin, die Vögel gaben das Fliegen am Himmel auf, die Flüsse blieben stehen, ohne zu fließen, im großen Ozean wurde das Wasser süß, überall war die Wasseroberfläche ganz mit fünffarbigen Lotusblumen bedeckt, alle Land- und Wasserblumen erblühten, an den Stämmen der Bäume erblühten Stammlotusser, an den Ästen Astlotusser, an den Ranken Rankenlotusser, auf dem Land durchbrachen sie die Steinflächen, wuchsen zu je sieben übereinander empor und traten als sogenannte Stängellotusser hervor, am Himmel entstanden hängende Lotusser, ringsumher regnete es Blumenregen, am Himmel erklangen himmlische Musikinstrumente, das gesamte zehntausendfache Weltsystem wurde wie ein zusammengerollter und weggeworfener Blumenkranz oder wie ein fest zusammengebundener Blumenstrauß und wie ein geschmückter, hergerichteter Blumensitz; mit einem einzigen Blumenkranz umgeben, glänzend von wehenden Fliegenwedeln, erfüllt vom Duft von Blütenrauch, erreichte es das allerhöchste Maß an Herrlichkeit. Evaṃ gahitapaṭisandhikassa bodhisattassa paṭisandhito paṭṭhāya bodhisattassa ceva bodhisattamātuyā ca upaddavanivāraṇatthaṃ khaggahatthā cattāro devaputtā ārakkhaṃ gaṇhiṃsu. Bodhisattamātu pana purisesu rāgacittaṃ nuppajji, lābhaggayasaggappattā ca ahosi sukhinī akilantakāyā. Bodhisattañca antokucchigataṃ vippasanne maṇiratane āvutapaṇḍusuttaṃ viya passati. Yasmā ca bodhisattena vasitakucchi nāma cetiyagabbhasadisā hoti, na sakkā aññena sattena āvasituṃ vā paribhuñjituṃ vā, tasmā bodhisattamātā sattāhajāte bodhisatte kālaṃ katvā tusitapure nibbattati. Yathā ca aññā itthiyo dasa māse apatvāpi atikkamitvāpi nisinnāpi nipannāpi vijāyanti, na evaṃ bodhisattamātā. Sā pana bodhisattaṃ dasa māse kucchinā pariharitvā ṭhitāva vijāyati. Ayaṃ bodhisattamātudhammatā. Für den Bodhisatta, der so die Empfängnis angenommen hatte, übernahmen von der Empfängnis an vier Göttersöhne mit Schwertern in den Händen den Schutz, um Unheil vom Bodhisatta und der Mutter des Bodhisattas abzuwenden. Im Geist der Mutter des Bodhisattas regte sich jedoch kein leidenschaftliches Begehren gegenüber Männern, und sie erreichte den Gipfel des Gewinns und des Ruhmes, war glücklich und von unermüdtem Körper. Und sie sah den im Schoß befindlichen Bodhisatta so, wie man einen gelblich-weißen Faden sieht, der durch ein vollkommen klares Juwel gezogen ist. Und weil der Schoß, den ein Bodhisatta bewohnt hat, einer Schrein-Reliquienkammer gleicht und es für kein anderes Wesen möglich ist, darin zu wohnen oder ihn zu nutzen, darum stirbt die Mutter des Bodhisattas sieben Tage nach der Geburt des Bodhisattas und wird im Tusita-Himmel wiedergeboren. Und während andere Frauen gebären, noch ehe zehn Monate vollendet sind oder nachdem sie überschritten sind, im Sitzen oder im Liegen, ist dies bei der Mutter des Bodhisattas nicht so. Sie vielmehr trägt den Bodhisatta genau zehn Monate lang in ihrem Schoß und gebiert ihn im Stehen. Dies ist das Naturgesetz für die Mutter eines Bodhisattas. Mahāmāyāpi devī pattena telaṃ viya dasa māse kucchinā bodhisattaṃ pariharitvā paripuṇṇagabbhā ñātigharaṃ gantukāmā suddhodanamahārājassa ārocesi – ‘‘icchāmahaṃ, deva, kulasantakaṃ devadahanagaraṃ gantu’’nti. Rājā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā kapilavatthuto yāva devadahanagarā maggaṃ samaṃ kāretvā kadalipuṇṇaghaṭadhajapaṭākādīhi alaṅkārāpetvā devi suvaṇṇasivikāya nisīdāpetvā amaccasahassena ukkhipāpetvā mahantena [Pg.62] parivārena pesesi. Dvinnaṃ pana nagarānaṃ antare ubhayanagaravāsīnampi lumbinīvanaṃ nāma maṅgalasālavanaṃ atthi, tasmiṃ samaye mūlato paṭṭhāya yāva aggasākhā sabbaṃ ekapāliphullaṃ ahosi, sākhantarehi ceva pupphantarehi ca pañcavaṇṇā bhamaragaṇā nānappakārā ca sakuṇasaṅghā madhurassarena vikūjantā vicaranti. Sakalaṃ lumbinīvanaṃ cittalatāvanasadisaṃ, mahānubhāvassa rañño susajjitaṃ āpānamaṇḍalaṃ viya ahosi. Deviyā taṃ disvā sālavanakīḷaṃ kīḷitukāmatācittaṃ udapādi. Amaccā deviṃ gahetvā sālavanaṃ pavisiṃsu. Sā maṅgalasālamūlaṃ gantvā sālasākhaṃ gaṇhitukāmā ahosi, sālasākhā suseditavettaggaṃ viya onamitvā deviyā hatthapathaṃ upagañchi. Sā hatthaṃ pasāretvā sākhaṃ aggahesi. Tāvadeva cassā kammajavātā caliṃsu. Athassā sāṇiṃ parikkhipitvā mahājano paṭikkami. Sālasākhaṃ gahetvā tiṭṭhamānāya evassā gabbhavuṭṭhānaṃ ahosi. Taṅkhaṇaṃyeva cattāro visuddhacittā mahābrahmāno suvaṇṇajālaṃ ādāya sampattā tena suvaṇṇajālena bodhisattaṃ sampaṭicchitvā mātu purato ṭhapetvā ‘‘attamanā, devi, hohi, mahesakkho te putto uppanno’’ti āhaṃsu. Auch Königin Mahāmāyā trug den Bodhisatta zehn Monate lang in ihrem Schoß, gleichsam wie man Öl in einer Almosenschale trägt. Als die Schwangerschaft vollendet war, wünschte sie, zum Hause ihrer Verwandten zu gehen, und sprach zu König Suddhodana: 'Ich wünsche, o König, in die Stadt Devadaha zu gehen, die meiner Familie gehört.' Der König willigte mit den Worten 'Es ist gut' ein, ließ den Weg von Kapilavatthu bis zur Stadt Devadaha einebnen, mit Bananenstauden, mit Wasser gefüllten Krügen, Bannern, Flaggen und anderem schmücken, ließ die Königin in einer goldenen Sänfte Platz nehmen, von tausend Ministern emporheben und sandte sie mit einem großen Gefolge aus. Zwischen den beiden Städten aber gab es für die Bewohner beider Städte einen glückverheißenden Salbaum-Hain namens Lumbinī-Hain. Zu jener Zeit stand der gesamte Salwald von den Wurzeln bis zu den äußersten Zweigen in voller Blüte; zwischen den Zweigen und Blüten schwirrten Scharen von fünffarbigen Hummeln und Schwärme verschiedenster Vögel umher und zwitscherten mit süßer Stimme. Der gesamte Lumbinī-Hain glich dem Cittalatā-Hain und war wie ein hergerichteter Festplatz eines mächtigen Königs. Als die Königin dies sah, erwachte in ihr der Wunsch, im Salwald zu spielen. Die Minister geleiteten die Königin und betraten den Salwald. Sie ging zum Fuß des glückverheißenden Salbaumes und wünschte, einen Salzweig zu ergreifen; der Salzweig neigte sich wie die Spitze eines weich gedämpften Rohres herab und kam in die Reichweite der Hand der Königin. Sie streckte die Hand aus und ergriff den Zweig. Und im selben Augenblick setzten bei ihr die vom Kamma erzeugten Winde ein. Da spannte man einen Vorhang um sie herum, und die Volksmenge zog sich zurück. Während sie so dastand und den Salzweig hielt, fand ihre Entbindung statt. In genau diesem Augenblick trafen vier reine Großbrahmas ein, die ein goldenes Netz trugen, fingen den Bodhisatta mit diesem goldenen Netz auf, legten ihn vor die Mutter und sprachen: 'Sei erfreut, o Königin! Ein überaus mächtiger Sohn ist dir geboren.' Yathā pana aññe sattā mātukucchito nikkhamantā paṭikūlena asucinā makkhitā nikkhamanti, na evaṃ bodhisatto. So pana dhammāsanato otaranto dhammakathiko viya, nisseṇito otaranto puriso viya, ca dve ca hatthe dve ca pāde pasāretvā ṭhitakova mātukucchisambhavena kenaci asucinā amakkhito suddho visado kāsikavatthe nikkhittamaṇiratanaṃ viya jotayanto mātukucchito nikkhami. Evaṃ santepi bodhisattassa ca bodhisattamātuyā ca sakkāratthaṃ ākāsato dve udakadhārā nikkhamitvā bodhisattassa ca mātuyā ca sarīre utuṃ gāhāpesuṃ. Wie jedoch andere Wesen, wenn sie aus dem Mutterleib hervorgehen, mit widerwärtigem Schmutz beschmiert herauskommen, so war es beim Bodhisatta nicht. Er vielmehr trat hervor wie ein Dharmaredner, der von der Kanzel herabsteigt, oder wie ein Mann, der von einer Leiter herabsteigt, indem er beide Hände und beide Füße ausstreckte, ganz im Stehen, unbeschmiert von irgendeiner im Mutterleib entstandenen Unreinheit, rein und lauter, strahlend wie ein kostbares Juwel, das auf ein feines Gewebe aus Kāsi gelegt ist, so trat er aus dem Mutterleib hervor. Obwohl dies so war, ergossen sich, um dem Bodhisatta und der Mutter des Bodhisattas Ehre zu erweisen, zwei Wasserströme aus dem Himmel, die dem Körper des Bodhisattas und der Mutter die angenehme Temperatur verliehen. Atha naṃ suvaṇṇajālena paṭiggahetvā ṭhitānaṃ brahmānaṃ hatthato cattāro mahārājāno maṅgalasammatāya sukhasamphassāya ajinappaveṇiyā gaṇhiṃsu, tesaṃ hatthato manussā dukūlacumbaṭakena. Manussānaṃ hatthato muccitvā pathaviyaṃ patiṭṭhāya puratthimadisaṃ olokesi, anekāni cakkavāḷasahassāni ekaṅgaṇāni ahesuṃ. Tattha devamanussā gandhamālādīhi [Pg.63] pūjayamānā ‘‘mahāpurisa, idha tumhehi sadiso añño natthi, kutettha uttaritaro’’ti āhaṃsu. Evaṃ catasso disā, catasso anudisā, heṭṭhā, uparīti dasa disā anuviloketvā attanā sadisaṃ kañci adisvā ‘‘ayaṃ uttarādisā’’ti sattapadavītihārena agamāsi, mahābrahmunā setacchattaṃ dhāriyamāno, suyāmena vāḷabījaniṃ, aññāhi ca devatāhi sesarājakakudhabhaṇḍahatthāhi anugammamāno. Tato sattamapade ṭhito ‘‘aggohamasmiṃ lokassā’’tiādikaṃ āsabhiṃ vācaṃ nicchārento sīhanādaṃ nadi. Daraufhin nahmen die vier großen Könige ihn aus den Händen der Brahmas, die ihn mit einem goldenen Netz aufgefangen hatten und dastanden, mit einer als glückverheißend geltenden, sich angenehm anfühlenden Decke aus schwarzem Antilopenfell entgegen. Aus den Händen der Könige nahmen ihn Menschen mit einem Tragering aus feiner Seide entgegen. Nachdem er sich aus den Händen der Menschen befreit hatte und fest auf der Erde stand, blickte er in die östliche Himmelsrichtung. Viele Tausende von Weltsystemen wurden zu einem einzigen weiten Platz. Dort verehrten ihn Götter und Menschen mit Duftstoffen, Blumen und anderem und sprachen: „O großer Mann, hier gibt es keinen, der dir gleicht; wie sollte es da jemanden geben, der dir überlegen ist?“ Nachdem er so nacheinander die zehn Himmelsrichtungen – die vier Hauptrichtungen, die vier Zwischenrichtungen, unten und oben – betrachtet und niemanden erblickt hatte, der ihm glich, dachte er: „Dies ist die nördliche Richtung“, und ging mit einem Schrittmaß von sieben Schritten voran, während der Große Brahma den weißen Prachtschirm hielt, Suyāma den Wedel aus Schweifhaaren schwang und andere Gottheiten, die die übrigen königlichen Insignien in den Händen hielten, ihm folgten. Sodann blieb er auf dem siebten Schritt stehen, stieß seine majestätische Stimme aus, beginnend mit „Der Höchste bin ich in der Welt“, und ließ sein Löwenbrüllen erschallen. Bodhisatto hi tīsu attabhāvesu mātukucchito nikkhantamattova vācaṃ nicchāresi mahosadhattabhāve, vessantarattabhāve, imasmiṃ attabhāveti. Mahosadhattabhāve kirassa mātukucchito nikkhantamattasseva sakko devarājā āgantvā candanasāraṃ hatthe ṭhapetvā gato, so taṃ muṭṭhiyaṃ katvāva nikkhanto. Atha naṃ mātā ‘‘tāta, kiṃ gahetvā āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Osadhaṃ, ammā’’ti. Iti osadhaṃ gahetvā āgatattā ‘‘osadhadārako’’tvevassa nāmaṃ akaṃsu. Taṃ osadhaṃ gahetvā cāṭiyaṃ pakkhipiṃsu, āgatāgatānaṃ andhabadhirādīnaṃ tadeva sabbarogavūpasamāya bhesajjaṃ ahosi. Tato ‘‘mahantaṃ idaṃ osadhaṃ, mahantaṃ idaṃ osadha’’nti uppannavacanaṃ upādāya ‘‘mahosadho’’tvevassa nāmaṃ jātaṃ. Vessantarattabhāve pana mātukucchito nikkhanto dakkhiṇahatthaṃ pasāretvā ‘‘atthi nu kho, amma, kiñci gehasmiṃ, dānaṃ dassāmī’’ti vadanto nikkhami. Athassa mātā ‘‘sadhane kule nibbattosi, tātā’’ti puttassa hatthaṃ attano hatthatale katvā sahassatthavikaṃ ṭhapesi. Imasmiṃ pana attabhāve imaṃ sīhanādaṃ nadīti evaṃ bodhisatto tīsu attabhāvesu mātukucchito nikkhantamattova vācaṃ nicchāresi. Yathā ca paṭisandhiggahaṇakkhaṇe, jātakkhaṇepissa dvattiṃsa pubbanimittāni pāturahesuṃ. Yasmiṃ pana samaye amhākaṃ bodhisatto lumbinīvane jāto, tasmiṃyeva samaye rāhulamātā devī, ānandatthero, channo amacco, kāḷudāyī amacco, kaṇḍako assarājā, mahābodhirukkho, catasso nidhikumbhiyo [Pg.64] ca jātā. Tattha ekā gāvutappamāṇā, ekā aḍḍhayojanappamāṇā, ekā tigāvutappamāṇā, ekā yojanappamāṇā ahosīti. Ime satta sahajātā nāma. Der Bodhisatta sprach nämlich in drei Existenzen sogleich nach dem Verlassen des Mutterleibs: in der Existenz als Mahosadha, in der Existenz als Vessantara und in dieser jetzigen Existenz. In der Existenz als Mahosadha, so wird berichtet, kam Sakka, der König der Götter, just in dem Moment, als er den Mutterleib verließ, legte ihm feines Sandelholz in die Hand und verschwand. Er kam zur Welt, während er dieses fest in der Faust geschlossen hielt. Daraufhin fragte ihn seine Mutter: „Mein Sohn, was hast du mitgebracht, als du kamst?“ Er antwortete: „Ein Heilmittel, Mutter.“ Weil er so mit einem Heilmittel in der Hand zur Welt gekommen war, gaben sie ihm den Namen „Osadha-Knabe“. Sie nahmen dieses Heilmittel und legten es in ein Tongefäß; für alle Blinden, Tauben und anderen, die herbeikamen, wurde eben dieses zur Medizin zur Linderung all ihrer Krankheiten. Aufgrund des daraufhin entstandenen Rufs „Dies ist ein großes Heilmittel, dies ist ein großes Heilmittel!“ wurde sein Name schließlich zu „Mahosadha“. In der Existenz als Vessantara wiederum streckte er beim Verlassen des Mutterleibs seine rechte Hand aus und kam zur Welt, indem er sagte: „Mutter, gibt es irgendetwas im Haus? Ich möchte eine Gabe spenden.“ Daraufhin sprach seine Mutter: „Mein Sohn, du bist in einer wohlhabenden Familie geboren“, legte die Hand ihres Sohnes in ihre eigene Handfläche und legte einen Beutel mit tausend Münzen darauf. In dieser Existenz jedoch ließ er dieses Löwenbrüllen erschallen. Auf diese Weise sprach der Bodhisatta in drei Existenzen sogleich nach dem Verlassen des Mutterleibs. Und wie im Moment der Empfängnis, so traten auch im Moment seiner Geburt zweiunddreißig Vorzeichen in Erscheinung. Zu der Zeit, als unser Bodhisatta im Lumbinī-Hain geboren wurde, wurden zur selben Zeit auch die Königin, Rāhulas Mutter, der Thera Ānanda, der Minister Channa, der Minister Kāḷudāyī, der königliche Hengst Kaṇḍaka, der große Bodhi-Baum und die vier Schatzkrüge geboren. Darunter hatte ein Krug die Größe von einem Gāvuta, einer die Größe von einer halben Yojana, einer die Größe von drei Gāvutas und einer die Größe von einer Yojana. Diese sieben werden als die gemeinsam Geborenen (Sahajātā) bezeichnet. Ubhayanagaravāsino bodhisattaṃ gahetvā kapilavatthunagarameva agamaṃsu. Taṃ divasaṃyeva ca ‘‘kapilavatthunagare suddhodanamahārājassa putto jāto, ayaṃ kumāro bodhitale nisīditvā buddho bhavissatī’’ti tāvatiṃsabhavane haṭṭhatuṭṭhā devasaṅghā celukkhepādīni pavattentā kīḷiṃsu. Tasmiṃ samaye suddhodanamahārājassa kulūpako aṭṭhasamāpattilābhī kāḷadevīlo nāma tāpaso bhattakiccaṃ katvā divāvihāratthāya tāvatiṃsabhavanaṃ gantvā tattha divāvihāraṃ nisinno tā devatā kīḷamānā disvā ‘‘kiṃkāraṇā tumhe evaṃ tuṭṭhamānasā kīḷatha, mayhampetaṃ kāraṇaṃ kathethā’’ti pucchi. Devatā āhaṃsu ‘‘mārisa, suddhodanarañño putto jāto, so bodhitale nisīditvā buddho hutvā dhammacakkaṃ pavattessati, tassa anantaṃ buddhalīḷaṃ daṭṭhuṃ dhammañca sotuṃ lacchāmāti iminā kāraṇena tuṭṭhāmhā’’ti. Tāpaso tāsaṃ vacanaṃ sutvā khippaṃ devalokato oruyha rājanivesanaṃ pavisitvā paññattāsane nisinno ‘‘putto kira te, mahārāja, jāto, passissāmi na’’nti āha. Rājā alaṅkatapaṭiyattaṃ kumāraṃ āharāpetvā tāpasaṃ vandāpetuṃ abhihari, bodhisattassa pādā parivattitvā tāpasassa jaṭāsu patiṭṭhahiṃsu. Bodhisattassa hi tenattabhāvena vanditabbayuttako nāma añño natthi. Sace hi ajānantā bodhisattassa sīsaṃ tāpasassa pādamūle ṭhapeyyuṃ, sattadhā tassa muddhā phaleyya. Tāpaso ‘‘na me attānaṃ nāsetuṃ yutta’’nti uṭṭhāyāsanā bodhisattassa añjaliṃ paggahesi. Rājā taṃ acchariyaṃ disvā attano puttaṃ vandi. Die Bewohner beider Städte nahmen den Bodhisatta mit und begaben sich in die Stadt Kapilavatthu. Und an ebendiesem Tag feierten die hocherfreuten Götterscharen in der Tāvatiṃsa-Himmelwelt, indem sie ihre Gewänder emporwarfen und andere Festlichkeiten ausführten, und sprachen: „In der Stadt Kapilavatthu ist dem großen König Suddhodana ein Sohn geboren worden. Dieser Prinz wird unter dem Bodhi-Baum sitzen, ein Buddha werden und das Rad der Lehre in Bewegung setzen.“ Zu jener Zeit reiste der Asket namens Kāḷadevela, der die acht Errungenschaften erlangt hatte und ein vertrauter Hauspriester des Königs Suddhodana gewesen war, nach dem Mahl zur Mittagsruhe in die Tāvatiṃsa-Himmelwelt. Als er sich dort zur Mittagsruhe niedergelassen hatte und jene Gottheiten beim Feiern erblickte, fragte er: „Aus welchem Grund feiert ihr mit so freudigem Gemüt? Nennt auch mir diesen Grund!“ Die Gottheiten sprachen: „Werter Herr, dem König Suddhodana ist ein Sohn geboren worden. Er wird am Fuße des Bodhi-Baumes sitzen, ein Buddha werden und das Rad der Lehre drehen. Wir werden seine unendliche Buddha-Pracht schauen und der Lehre lauschen dürfen; aus diesem Grund sind wir so hocherfreut.“ Als der Asket ihre Worte vernahm, stieg er rasch aus der Götterwelt herab, betrat den königlichen Palast, setzte sich auf den vorbereiteten Sitz und sprach: „Man sagt, dir sei ein Sohn geboren worden, o großer König. Ich möchte ihn sehen.“ Der König ließ den festlich geschmückten Knaben herbeibringen und reichte ihn dar, damit er dem Asketen seine Ehrfurcht erweise. Doch die Füße des Bodhisatta drehten sich um und stellten sich auf das Flechtenhaar des Asketen. Denn in jener Existenz des Bodhisatta gab es keinen anderen, der es wert gewesen wäre, von ihm verehrt zu werden. Hätten nämlich Unwissende das Haupt des Bodhisatta an die Füße des Asketen gelegt, so wäre dessen Kopf in sieben Teile gespalten worden. Der Asket dachte: „Es ist für mich nicht ratsam, mich selbst ins Verderben zu stürzen“, erhob sich von seinem Sitz und legte die Hände ehrerbietig vor dem Bodhisatta zusammen. Als der König dieses Wunder sah, verneigte er sich vor seinem eigenen Sohn. Tāpaso atīte cattālīsa kappe, anāgate cattālīsāti asīti kappe anussarati. Bodhisattassa lakkhaṇasampattiṃ disvā ‘‘bhavissati nu kho buddho, udāhu no’’ti āvajjetvā upadhārento ‘‘nissaṃsayaṃ buddho bhavissatī’’ti ñatvā ‘‘acchariyapuriso aya’’nti sitaṃ akāsi. Tato ‘‘ahaṃ imaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ labhissāmi nu kho, no’’ti upadhārento ‘‘na labhissāmi, antarāyeva kālaṃ katvā buddhasatenapi [Pg.65] buddhasahassenapi gantvā bodhetuṃ asakkuṇeyye arūpabhave nibbattissāmī’’ti disvā ‘‘evarūpaṃ nāma acchariyapurisaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ na labhissāmi, mahatī vata me jāni bhavissatī’’ti parodi. Der Asket konnte sich an achtzig Weltalter erinnern – vierzig in der Vergangenheit und vierzig in der Zukunft. Als er die Vollkommenheit der körperlichen Merkmale des Bodhisatta sah, dachte er nach und erwog: „Wird er ein Buddha werden oder nicht?“ Da er erkannte: „Er wird zweifellos ein Buddha werden“, dachte er: „Dies ist ein erstaunlicher Mensch“, und lächelte. Daraufhin überlegte er: „Werde ich die Gelegenheit erhalten, ihn zu sehen, wenn er ein Buddha geworden ist, oder nicht?“ Als er erkannte: „Ich werde sie nicht erhalten. Ich werde noch in der Zwischenzeit verscheiden und in der formlosen Welt wiedergeboren werden, wo man selbst dann nicht zur Erleuchtung geführt werden kann, wenn Hunderte oder Tausende von Buddhas dorthin kämen“, weinte er bitterlich und dachte: „Einen solch erstaunlichen Menschen werde ich nicht schauen dürfen, wenn er ein Buddha geworden ist. Wahrlich, welch ein großer Verlust wird dies für mich sein!“ Manussā disvā ‘‘amhākaṃ ayyo idāneva hasitvā puna parodi. Kiṃ nu kho, bhante, amhākaṃ ayyaputtassa koci antarāyo bhavissatī’’ti pucchiṃsu. ‘‘Natthetassa antarāyo, nissaṃsayena buddho bhavissatī’’ti. Atha ‘‘kasmā paroditthā’’ti? ‘‘Evarūpaṃ purisaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ na labhissāmi, ‘mahatī vata me jāni bhavissatī’ti attānaṃ anusocanto rodāmī’’ti āha. Tato so ‘‘kiṃ nu kho me ñātakesu koci etaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ labhissati, na labhissatī’’ti upadhārento attano bhāgineyyaṃ nāḷakadārakaṃ addasa. So bhaginiyā gehaṃ gantvā ‘‘kahaṃ te putto nāḷako’’ti? ‘‘Atthi gehe, ayyā’’ti. ‘‘Pakkosāhi na’’nti pakkosāpetvā attano santikaṃ āgataṃ kumāraṃ āha – ‘‘tāta, suddhodanamahārājassa kule putto jāto, buddhaṅkuro esa, pañcatiṃsa vassāni atikkamitvā buddho bhavissati, tvaṃ etaṃ daṭṭhuṃ labhissasi, ajjeva pabbajāhī’’ti. Sattāsītikoṭidhane kule nibbattadārakopi ‘‘na maṃ mātulo anatthe niyojessatī’’ti cintetvā tāvadeva antarāpaṇato kāsāyāni ceva mattikāpattañca āharāpetvā kesamassuṃ ohāretvā kāsāyāni vatthāni acchādetvā ‘‘yo loke uttamapuggalo, taṃ uddissa mayhaṃ pabbajjā’’ti bodhisattābhimukhaṃ añjaliṃ paggayha pañcapatiṭṭhitena vanditvā pattaṃ thavikāya pakkhipitvā aṃsakūṭe laggetvā himavantaṃ pavisitvā samaṇadhammaṃ akāsi. So paramābhisambodhiṃ pattaṃ tathāgataṃ upasaṅkamitvā nāḷakapaṭipadaṃ kathāpetvā puna himavantaṃ pavisitvā arahattaṃ patvā ukkaṭṭhapaṭipadaṃ paṭipanno satteva māse āyuṃ pāletvā ekaṃ suvaṇṇapabbataṃ nissāya ṭhitakova anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyi. Als die Menschen dies sahen, fragten sie: „Unser ehrwürdiger Herr hat soeben gelacht und weint nun wieder. Wird unserem edlen Prinzen etwa irgendeine Gefahr drohen, o Ehrwürdiger?“ Er sprach: „Für ihn gibt es keine Gefahr; er wird zweifellos ein Buddha werden.“ Daraufhin fragten sie: „Warum habt Ihr dann geweint?“ Er sprach: „Einen solchen Menschen, der zum Buddha wird, werde ich nicht mehr sehen dürfen. Wahrlich, ein großer Verlust wird mir widerfahren! Über mich selbst klagend, weine ich.“ Daraufhin überlegte er: „Wird wohl jemand unter meinen Verwandten diesen sehen dürfen, wenn er zum Buddha geworden ist, oder nicht?“ Dabei erblickte er seinen Neffen, den Knaben Nālaka. Er ging zum Haus seiner Schwester und fragte: „Wo ist dein Sohn Nālaka?“ Sie antwortete: „Er ist im Haus, o Herr.“ Er sprach: „Rufe ihn her!“ Als der Knabe gerufen worden und zu ihm gekommen war, sagte er zu ihm: „Mein Lieber, im Hause des Großkönigs Suddhodana ist ein Sohn geboren worden; er ist ein Bodhisatta (Buddhaspross). Wenn er fünfunddreißig Jahre überschritten hat, wird er ein Buddha werden. Du wirst ihn sehen dürfen. Tritt noch heute in den Orden ein!“ Obgleich der Knabe in einer Familie mit einem Vermögen von siebenundachtzig Kotis geboren worden war, dachte er: „Mein Onkel mütterlicherseits würde mich nicht zu etwas anhalten, das nicht zu meinem Segen ist.“ Sofort ließ er sich vom Markt ockergelbe Gewänder und eine Almosenschale aus Ton bringen, schor sein Haar und seinen Bart, legte die ockergelben Gewänder an und sprach: „Dem höchsten Wesen in der Welt sei meine Hauslosigkeit geweiht!“ Er erhob die gefalteten Hände ehrerbietig in Richtung des Bodhisatta, verneigte sich mit den fünf Berührungspunkten, legte die Almosenschale in die Tasche, hängte sie sich über die Schulter, begab sich in den Himalaja und übte sich im mönchischen Streben (Samaṇadhamma). Er suchte den Tathāgata auf, der die höchste vollkommene Erleuchtung erlangt hatte, ließ sich von ihm die Nālaka-Praxis verkünden, begab sich abermals in den Himalaja, erlangte die Arahatschaft und lebte, während er die höchste Stufe dieser Praxis ausführte, noch sieben Monate lang. Schließlich ging er, an einen goldenen Berg gelehnt, im Stehen im restlosen Erlöschenselement (anupādisesa-nibbānadhātu) völlig ein. Bodhisattampi kho pañcame divase sīsaṃ nhāpetvā ‘‘nāmaggahaṇaṃ gaṇhissāmā’’ti rājabhavanaṃ catujjātikagandhehi vilimpitvā lājāpañcamakāni pupphāni vikiritvā asambhinnapāyāsaṃ pacāpetvā tiṇṇaṃ vedānaṃ pāraṅgate aṭṭhasatabrāhmaṇe nimantetvā rājabhavane nisīdāpetvā subhojanaṃ [Pg.66] bhojetvā mahāsakkāraṃ katvā ‘‘kiṃ nu kho bhavissatī’’ti lakkhaṇāni pariggahāpesuṃ. Tesu – Am fünften Tag ließen sie auch dem Bodhisatta das Haupt waschen, um die Namensgebung zu vollziehen. Sie ließen den Königspalast mit den vier Arten von Wohlgerüchen einsalben, streuten Blumen aus, unter denen gerösteter Reis die fünfte Art war, ließen reinen Milchbrei kochen, luden einhundertacht Brahmanen ein, die die drei Veden vollständig beherrschten, ließen sie im Königspalast Platz nehmen, bewirteten sie mit vorzüglicher Speise, erwiesen ihnen große Ehrung und ließen sie die Körpermerkmale untersuchen, um zu erfahren: „Was wird wohl aus ihm werden?“ Unter diesen Brahmanen waren: ‘‘Rāmo dhajo lakkhaṇo cāpi mantī, koṇḍañño ca bhojo suyāmo sudatto; Ete tadā aṭṭha ahesuṃ brāhmaṇā, chaḷaṅgavā mantaṃ viyākariṃsū’’ti. – „Rāma, Dhaja, Lakkhaṇa sowie Mantī, Koṇḍañña und Bhoja, Suyāmo und Sudatta; diese acht Brahmanen waren damals anwesend, welche, in den sechs Hilfswissenschaften der Veden bewandert, die Zeichen deuteten.“ Ime aṭṭheva brāhmaṇā lakkhaṇapariggāhakā ahesuṃ. Paṭisandhiggahaṇadivase supinopi eteheva pariggahito. Tesu satta janā dve aṅguliyo ukkhipitvā dvedhā byākariṃsu – ‘‘imehi lakkhaṇehi samannāgato agāraṃ ajjhāvasamāno rājā hoti cakkavattī, pabbajamāno buddho’’ti, sabbaṃ cakkavattirañño sirivibhavaṃ ācikkhiṃsu. Tesaṃ pana sabbadaharo gottato koṇḍañño nāma māṇavo bodhisattassa varalakkhaṇanipphattiṃ oloketvā – ‘‘imassa agāramajjhe ṭhānakāraṇaṃ natthi, ekantenesa vivaṭṭacchado buddho bhavissatī’’ti ekameva aṅguliṃ ukkhipitvā ekaṃsabyākaraṇaṃ byākāsi. Ayañhi katādhikāro pacchimabhavikasatto paññāya itare satta jane abhibhavitvā ‘‘imehi lakkhaṇehi samannāgatassa agāramajjhe ṭhānaṃ nāma natthi, asaṃsayaṃ buddho bhavissatī’’ti ekameva gatiṃ addasa, tasmā ekaṃ aṅguliṃ ukkhipitvā evaṃ byākāsi. Athassa nāmaṃ gaṇhantā sabbalokassa atthasiddhikarattā ‘‘siddhattho’’ti nāmamakaṃsu. Genau diese acht Brahmanen waren es, die die Körpermerkmale untersuchten. Auch der Traum am Tag der Empfängnis wurde von ebendiesen gedeutet. Unter ihnen hoben sieben Männer zwei Finger empor und gaben eine zweifache Vorhersage ab: „Wer mit diesen Merkmalen ausgestattet ist, wird, wenn er im Hause bleibt, ein weltbeherrschender Radkönig (Cakkavatti) werden; wenn er aber in die Hauslosigkeit hinauszieht, wird er ein Buddha werden.“ Und sie schilderten die ganze Pracht und Herrlichkeit eines Radkönigs. Der Jüngste von ihnen allen jedoch, ein junger Brahmane namens Koṇḍañña nach seinem Clan, blickte auf die vollkommene Beschaffenheit der trefflichen Merkmale des Bodhisatta, hob nur einen einzigen Finger empor und gab eine eindeutige, sichere Vorhersage ab: „Es gibt für ihn keinen Grund, im Hause zu verbleiben. Er wird ganz gewiss ein Buddha werden, der den Schleier gelüftet hat.“ Denn dieser Koṇḍañña war einer, der in früheren Leben Verdienste erworben hatte und sich in seiner letzten Existenz befand. Indem er mit seiner Weisheit die anderen sieben übertraf, sah er nur einen einzigen Lebensweg: „Für einen, der mit diesen Merkmalen ausgestattet ist, gibt es kein Verbleiben im Hausleben; er wird zweifellos ein Buddha werden.“ Daher hob er nur einen Finger empor und weissagte so. Als sie danach den Namen für den Prinzen wählten, nannten sie ihn „Siddhattha“ (Dessen Ziel erreicht ist), weil er das Wohl der ganzen Welt bewirken würde. Atha te brāhmaṇā attano gharāni gantvā putte āmantayiṃsu – ‘‘tātā, amhe mahallakā, suddhodanamahārājassa puttaṃ sabbaññutaṃ pattaṃ mayaṃ sambhaveyyāma vā no vā, tumhe tasmiṃ kumāre sabbaññutaṃ patte tassa sāsane pabbajeyyāthā’’ti. Te sattapi janā yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gatā, koṇḍaññamāṇavova arogo ahosi. So mahāsatte vuḍḍhimanvāya mahābhinikkhamanaṃ abhinikkhamitvā anukkamena uruvelaṃ gantvā ‘‘ramaṇīyo, vata ayaṃ bhūmibhāgo, alaṃ vatidaṃ kulaputtassa [Pg.67] padhānatthikassa padhānāyā’’ti cittaṃ uppādetvā tattha vāsaṃ upagate ‘‘mahāpuriso pabbajito’’ti sutvā tesaṃ brāhmaṇānaṃ putte upasaṅkamitvā evamāha ‘‘siddhatthakumāro kira pabbajito, so nissaṃsayaṃ buddho bhavissati. Sace tumhākaṃ pitaro arogā assu, ajja nikkhamitvā pabbajeyyuṃ. Sace tumhepi iccheyyātha, etha, ahaṃ taṃ purisaṃ anupabbajissāmī’’ti. Te sabbe ekacchandā bhavituṃ nāsakkhiṃsu, tayo janā na pabbajiṃsu. Koṇḍaññabrāhmaṇaṃ jeṭṭhakaṃ katvā itare cattāro pabbajiṃsu. Te pañcapi janā pañcavaggiyattherā nāma jātā. Daraufhin gingen jene Brahmanen in ihre Häuser zurück und sprachen zu ihren Söhnen: „Kinder, wir sind alt. Ob wir es noch erleben werden, dass der Sohn des Großkönigs Suddhodana die Allwissenheit erlangt, wissen wir nicht. Ihr aber sollt, wenn jener Prinz die Allwissenheit erlangt hat, unter seiner Lehre in den Orden eintreten.“ Jene sieben Männer lebten ihre Lebensspanne zu Ende und gingen gemäß ihrem Kamma dahin; einzig der junge Brahmane Koṇḍañña blieb am Leben und gesund. Als der Große Weise heranwuchs und die Große Entsagung vollzog, reiste Koṇḍañña nach und nach nach Uruvelā. Er dachte bei sich: „Wahrlich, dieser Landstrich ist lieblich! Er eignet sich trefflich für das mönchische Streben eines edlen Sohnes, dem es nach Kampf verlangt.“ So ließ er sich dort nieder. Als er hörte, dass der Große Mann in die Hauslosigkeit gezogen war, suchte er die Söhne jener Brahmanen auf und sprach zu ihnen: „Wie man hört, ist Prinz Siddhattha in die Hauslosigkeit gezogen. Er wird zweifellos ein Buddha werden. Wenn eure Väter heute noch am Leben wären, würden sie sich sogleich aufmachen und in den Orden eintreten. Wenn auch ihr es wünscht, so kommt! Ich werde jenem großen Mann nachfolgen und ebenfalls die Hauslosigkeit wählen.“ Sie konnten sich jedoch nicht alle einig werden: Drei von ihnen traten nicht in den Orden ein. Die anderen vier machten den Brahmanen Koṇḍañña zu ihrem Anführer und traten in den Orden ein. Diese fünf Männer wurden später als die Gruppe der fünf älteren Mönche (Pañcavaggiya-Theras) bekannt. Tadā pana rājā ‘‘kiṃ disvā mayhaṃ putto pabbajissatī’’ti pucchi. ‘‘Cattāri pubbanimittānī’’ti. ‘‘Katarañca katarañcā’’ti? ‘‘Jarājiṇṇaṃ, byādhitaṃ, kālakataṃ, pabbajita’’nti. Rājā ‘‘ito paṭṭhāya evarūpānaṃ mama puttassa santikaṃ upasaṅkamituṃ mā adattha, mayhaṃ puttassa buddhabhāvena kammaṃ natthi, ahaṃ mama puttaṃ dvisahassadīpaparivārānaṃ catunnaṃ mahādīpānaṃ issariyādhipaccaṃ rajjaṃ kārentaṃ chattiṃsayojanaparimaṇḍalāya parisāya parivutaṃ gaganatale vicaramānaṃ passitukāmo’’ti. Evañca pana vatvā imesaṃ catuppakārānaṃ nimittānaṃ kumārassa cakkhupathe āgamananivāraṇatthaṃ catūsu disāsu gāvute gāvute ārakkhaṃ ṭhapesi. Taṃ divasaṃ pana maṅgalaṭṭhāne sannipatitesu asītiyā ñātikulasahassesu ekeko ekamekaṃ puttaṃ paṭijāni – ‘‘ayaṃ buddho vā hotu rājā vā, mayaṃ ekamekaṃ puttaṃ dassāma. Sacepi buddho bhavissati, khattiyasamaṇeheva purakkhataparivārito vicarissati. Sacepi rājā bhavissati, khattiyakumāreheva purakkhataparivārito vicarissatī’’ti. Rājāpi bodhisattassa uttamarūpasampannā vigatasabbadosā dhātiyo paccupaṭṭhāpesi. Bodhisatto anantena parivārena mahantena sirisobhaggena vaḍḍhati. Da fragte der König: „Was wird mein Sohn sehen, dass er der Welt entsagt und in die Hauslosigkeit zieht?“ – „Die vier Vorzeichen.“ – „Welche und welche sind es?“ – „Einen Altersschwachen, einen Kranken, einen Verstorbenen und einen Asketen.“ Der König sprach: „Zulasset von nun an nicht, dass solche Personen in die Nähe meines Sohnes gelangen! Es gibt für meinen Sohn keinen Grund, ein Buddha zu werden. Ich wünsche meinen Sohn als Herrscher über die vier großen Kontinente zu sehen, die von zweitausend kleinen Inseln umgeben sind, wie er, umgeben von einem Gefolge im Umkreis von sechsunddreißig Yojanas, am Himmelsgewölbe einherzieht.“ Nachdem er dies gesagt hatte, stellte er in allen vier Himmelsrichtungen im Abstand von je einem Gāvuta Wachen auf, um zu verhindern, dass diese vier Arten von Zeichen in das Sichtfeld des Prinzen gelangten. An jenem Tag aber versprachen die achtzigtausend am Festort versammelten Verwandtenfamilien einzeln je einen Sohn: „Mag dieser ein Buddha oder ein König werden, wir wollen ihm jeder einen Sohn geben. Wenn er ein Buddha wird, soll er, von kriegerischen Asketen angeführt und umgeben, einherwandern. Wenn er ein König wird, soll er, von kriegerischen Prinzen angeführt und umgeben, einherwandern.“ Auch der König stellte für den Bodhisatta Ammen bereit, die mit vollendeter Schönheit ausgestattet und frei von allen Mängeln waren. Der Bodhisatta wuchs mit einem unendlichen Gefolge und mit großem Glanz und herrlicher Pracht heran. Athekadivasaṃ rañño vappamaṅgalaṃ nāma ahosi. Taṃ divasaṃ sakalanagaraṃ devavimānaṃ viya alaṅkaronti. Sabbe dāsakammakarādayo ahatavatthanivatthā gandhamālādipaṭimaṇḍitā rājakule sannipatanti. Rañño kammante naṅgalasahassaṃ yojīyati. Tasmiṃ pana divase ekenūnaaṭṭhasatanaṅgalāni saddhiṃ balibaddarasmiyottehi rajataparikkhatāni honti, rañño ālambananaṅgalaṃ [Pg.68] pana rattasuvaṇṇaparikkhataṃ hoti. Balibaddānaṃ siṅgarasmipatodāpi suvaṇṇaparikkhatāva honti. Rājā mahatā parivārena nikkhanto puttaṃ gahetvā agamāsi. Kammantaṭṭhāne eko jamburukkho bahalapalāso sandacchāyo ahosi. Tassa heṭṭhā kumārassa sayanaṃ paññapāpetvā upari suvaṇṇatārakakhacitaṃ vitānaṃ bandhāpetvā sāṇipākārena parikkhipāpetvā ārakkhaṃ ṭhapāpetvā rājā sabbālaṅkāraṃ alaṅkaritvā amaccagaṇaparivuto naṅgalakaraṇaṭṭhānaṃ agamāsi. Tattha rājā suvaṇṇanaṅgalaṃ gaṇhāti, amaccā ekenūnaṭṭhasatarajatanaṅgalāni, kassakā sesanaṅgalāni. Te tāni gahetvā ito cito ca kasanti. Rājā pana orato vā pāraṃ gacchati, pārato vā oraṃ āgacchati. Etasmiṃ ṭhāne mahāsampatti ahosi. Bodhisattaṃ parivāretvā nisinnā dhātiyo ‘‘rañño sampattiṃ passissāmā’’ti antosāṇito bahi nikkhantā. Bodhisatto ito cito ca olokento kañci adisvā vegena uṭṭhāya pallaṅkaṃ ābhujitvā ānāpāne pariggahetvā paṭhamajjhānaṃ nibbattesi. Dhātiyo khajjabhojjantare vicaramānā thokaṃ cirāyiṃsu. Sesarukkhānaṃ chāyā nivattā, tassa pana rukkhassa parimaṇḍalā hutvā aṭṭhāsi. Dhātiyo ‘‘ayyaputto ekato’’ti vegena sāṇiṃ ukkhipitvā anto pavisamānā bodhisattaṃ sayane pallaṅkena nisinnaṃ tañca pāṭihāriyaṃ disvā gantvā rañño ārocesuṃ – ‘‘deva, kumāro evaṃ nisinno, aññesaṃ rukkhānaṃ chāyā nivattā, jamburukkhassa pana parimaṇḍalā ṭhitā’’ti. Rājā vegenāgantvā pāṭihāriyaṃ disvā – ‘‘idaṃ te, tāta, dutiyaṃ vandana’’nti puttaṃ vandi. Eines Tages fand das Pflugfest des Königs statt. An jenem Tag schmückte man die gesamte Stadt wie einen Götterpalast. Sämtliche Diener, Arbeiter und andere kamen im königlichen Palast zusammen, in neue Gewänder gekleidet und mit Duftstoffen, Blumen und dergleichen geschmückt. Für die Arbeit des Königs wurden tausend Pflüge angeschirrt. An jenem Tag aber waren siebenhundertneunundneunzig Pflüge mitsamt den Zügeln und Stricken der Ochsen mit Silber beschlagen, der Pflug des Königs jedoch, an dem er sich hielt, war mit rotem Gold beschlagen. Auch die Hörner, Zügel und Treibstacheln der Ochsen waren ganz mit Gold beschlagen. Der König zog mit großem Gefolge aus, nahm seinen Sohn mit und begab sich dorthin. Am Arbeitsplatz stand ein Jambu-Baum mit dichtem Laub, der einen kühlen Schatten spendete. Darunter ließ der König ein Lager für den Prinzen bereiten, darüber einen mit goldenen Sternen verzierten Baldachin aufspannen, ringsum einen Vorhangvorbau errichten und Wachen aufstellen. Der König legte all seinen Schmuck an und begab sich, umgeben von der Schar der Minister, zum Ort des Pflügens. Dort ergriff der König den goldenen Pflug, die Minister die siebenhundertneunundneunzig silbernen Pflüge und die Bauern die übrigen Pflüge. Diese nahmen sie und pflügten hin und her. Der König aber zog von dieser Seite zu jener Seite, und von jener Seite zu dieser Seite. An diesem Ort herrschte große Pracht. Die Ammen, die den Bodhisatta umgebend dasaßen, dachten: „Wir wollen die Pracht des Königs sehen“, und traten hinter dem Vorhang hervor nach draußen. Der Bodhisatta blickte hin und her, und als er niemanden sah, erhob er sich rasch, setzte sich mit gekreuzten Beinen nieder, erfasste die Ein- und Ausatmung und brachte die erste meditative Vertiefung hervor. Die Ammen, die sich unter den Ess- und Knabberwaren aufhielten, blieben eine Weile aus. Der Schatten der übrigen Bäume hatte sich gewendet, doch der Schatten jenes Baumes blieb kreisrund über ihm stehen. Als die Ammen dachten: „Der junge Herr ist allein“, hoben sie rasch den Vorhang auf und traten ein. Sie sahen den Bodhisatta mit gekreuzten Beinen auf dem Lager sitzen und erblickten dieses Wunder. Sie liefen hin und berichteten dem König: „Majestät, der Prinz sitzt in dieser Weise da. Während sich der Schatten der anderen Bäume gewendet hat, steht der Schatten des Jambu-Baumes kreisrund über ihm.“ Der König eilte herbei, sah das Wunder und verehrte seinen Sohn mit den Worten: „Dies, mein Lieber, ist meine zweite Ehrung vor dir“, und verneigte sich vor seinem Sohn. Atha anukkamena bodhisatto soḷasavassuddesiko jāto. Rājā bodhisattassa tiṇṇaṃ utūnaṃ anucchavike tayo pāsāde kāresi – ekaṃ navabhūmakaṃ, ekaṃ sattabhūmakaṃ, ekaṃ pañcabhūmakaṃ, cattālīsasahassā ca nāṭakitthiyo upaṭṭhāpesi. Bodhisatto devo viya accharāsaṅghaparivuto, alaṅkatanāṭakaparivuto, nippurisehi tūriyehi paricāriyamāno mahāsampattiṃ anubhavanto utuvārena tesu pāsādesu viharati. Rāhulamātā panassa devī aggamahesī ahosi. Danach wurde der Bodhisatta allmählich sechzehn Jahre alt. Der König ließ für den Bodhisatta drei Paläste erbauen, die für die drei Jahreszeiten geeignet waren: einen neunstöckigen, einen siebenstöckigen und einen fünfstöckigen, und stellte vierzigtausend Tänzerinnen für seinen Dienst bereit. Der Bodhisatta lebte wie ein Gott, umgeben von einer Schar von Nymphen, umringt von geschmückten Tänzerinnen, unterhalten von Musikinstrumenten, die ausschließlich von Frauen gespielt wurden. Er genoss großen Reichtum und hielt sich entsprechend den Jahreszeiten in jenen Palästen auf. Die Königin, die Mutter Rahulas, war seine Hauptgemahlin. Tassevaṃ [Pg.69] mahāsampattiṃ anubhavantassa ekadivasaṃ ñātisaṅghassa abbhantare ayaṃ kathā udapādi – ‘‘siddhattho kīḷāpasutova vicarati, kiñci sippaṃ na sikkhati, saṅgāme paccupaṭṭhite kiṃ karissatī’’ti. Rājā bodhisattaṃ pakkosāpetvā – ‘‘tāta, tava ñātakā ‘siddhattho kiñci sippaṃ asikkhitvā kīḷāpasutova vicaratī’ti vadanti, ettha kiṃ pattakāle maññasī’’ti. Deva, mama sippaṃ sikkhanakiccaṃ natthi, nagare mama sippadassanatthaṃ bheriṃ carāpetha ‘‘ito sattame divase ñātakānaṃ sippaṃ dassessāmī’’ti. Rājā tathā akāsi. Bodhisatto akkhaṇavedhivālavedhidhanuggahe sannipātāpetvā mahājanassa majjhe aññehi dhanuggahehi asādhāraṇaṃ ñātakānaṃ dvādasavidhaṃ sippaṃ dassesi. Taṃ sarabhaṅgajātake āgatanayeneva veditabbaṃ. Tadāssa ñātisaṅgho nikkaṅkho ahosi. Während er so diesen großen Reichtum genoss, entstand eines Tages unter den Verwandten folgendes Gespräch: „Siddhattha lebt nur dem Spiel hingegeben, er lernt keinerlei Künste. Was wird er tun, wenn ein Krieg ausbricht?“ Der König ließ den Bodhisatta rufen und sprach: „Mein Lieber, deine Verwandten sagen: „Siddhattha lernt keine Kunst, sondern verbringt seine Zeit nur mit Spielen.“ Was meinst du dazu, wenn die Zeit zum Handeln gekommen ist?“ – „Majestät, für mich gibt es keine Notwendigkeit, eine Kunst zu erlernen. Lasst in der Stadt die Trommel schlagen und verkünden: „Am siebten Tag von heute an werde ich den Verwandten meine Kunst zeigen.““ Der König tat genau so. Der Bodhisatta ließ Bogenschützen zusammenkommen, die in der Lage waren, im Nu zu treffen oder ein Haar zu spalten, und zeigte inmitten der Volksmenge den Verwandten die zwölffache Kunst des Bogenschießens, die keinem anderen Bogenschützen eigen war. Dies ist genau nach der im Sarabhaṅga-Jātaka überlieferten Weise zu verstehen. Da verlor die Schar seiner Verwandten jeden Zweifel an ihm. Athekadivasaṃ bodhisatto uyyānabhūmiṃ gantukāmo sārathiṃ āmantetvā ‘‘rathaṃ yojehī’’ti āha. So ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā mahārahaṃ uttamarathaṃ sabbālaṅkārena alaṅkaritvā kumudapattavaṇṇe cattāro maṅgalasindhave yojetvā bodhisattassa paṭivedesi. Bodhisatto devavimānasadisaṃ rathaṃ abhiruhitvā uyyānābhimukho agamāsi. Devatā ‘‘siddhatthakumārassa abhisambujjhanakālo āsanno, pubbanimittaṃ dassessāmā’’ti ekaṃ devaputtaṃ jarājajjaraṃ khaṇḍadantaṃ palitakesaṃ vaṅkaṃ obhaggasarīraṃ daṇḍahatthaṃ pavedhamānaṃ katvā dassesuṃ. Taṃ bodhisatto ceva sārathi ca passanti. Tato bodhisatto sārathiṃ – ‘‘samma, ko nāmesa puriso, kesāpissa na yathā aññesa’’nti mahāpadāne āgatanayena pucchitvā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘dhīratthu vata bho jāti, yatra hi nāma jātassa jarā paññāyissatī’’ti saṃviggahadayo tatova paṭinivattitvā pāsādameva abhiruhi. Rājā ‘‘kiṃ kāraṇā mama putto khippaṃ paṭinivattī’’ti pucchi. ‘‘Jiṇṇakaṃ purisaṃ disvā devā’’ti. ‘‘Jiṇṇakaṃ disvā pabbajissatīti āhaṃsu, kasmā maṃ nāsetha, sīghaṃ puttassa nāṭakāni sajjetha, sampattiṃ anubhavanto pabbajjāya satiṃ na karissatī’’ti vatvā ārakkhaṃ vaḍḍhetvā sabbadisāsu aḍḍhayojane aḍḍhayojane ṭhapesi. Da sprach der Bodhisatta eines Tages, als er sich in die Gartenanlage begeben wollte, zu seinem Wagenlenker: „Spanne den Wagen an!“ Dieser antwortete mit den Worten „Sehr wohl!“, schmückte den kostbaren Prachtwagen mit allerlei Zierrat, spannte vier glückverheißende Sindh-Pferde an, die die Farbe von weißen Kumuda-Lotusblättern hatten, und meldete dies dem Bodhisatta. Der Bodhisatta bestieg den Wagen, der einem Götterpalast glich, und fuhr in Richtung des Gartens. Die Gottheiten dachten: „Die Zeit für die vollkommene Erleuchtung des Prinzen Siddhattha ist nahe; wir wollen ihm ein Vorzeichen zeigen“, und ließen einen Himmelssohn erscheinen, den sie als einen altersschwachen, zahnlückigen, grauhaarigen, krummen, tief gebeugten Mann darstellten, der sich auf einen Stab stützte und zitterte. Diesen sahen sowohl der Bodhisatta als auch der Wagenlenker. Daraufhin fragte der Bodhisatta den Wagenlenker in der Weise, wie es im Mahāpadāna-Sutta überliefert ist: „Freund, wer ist dieser Mann? Selbst sein Haar ist nicht wie das der anderen.“ Als er dessen Antwort vernommen hatte, sprach er mit tief erschüttertem Herzen: „Wehe wahrlich über die Geburt, ihr Lieben! Denn an dem Geborenen wird sich doch das Alter zeigen.“ Von genau dort kehrte er um und begab sich sogleich hinauf in den Palast. Der König fragte: „Aus welchem Grund ist mein Sohn so schnell umgekehrt?“ – „Weil er einen gealterten Mann gesehen hat, o König“, [antwortete man]. Der König sagte: „Sie sagen: ‚Wenn er einen Greis sieht, wird er in die Hauslosigkeit hinausziehen.‘ Warum wollt ihr mich ruinieren? Bereitet rasch Tänzerinnen für meinen Sohn vor! Wenn er die königliche Pracht genießt, wird er seine Achtsamkeit nicht auf das Hinausziehen in die Hauslosigkeit richten.“ Nach diesen Worten verstärkte er die Bewachung und stellte sie in allen Himmelsrichtungen im Abstand von jeweils einer halben Yojana auf. Punekadivasaṃ [Pg.70] bodhisatto tatheva uyyānaṃ gacchanto devatāhi nimmitaṃ byādhitaṃ purisaṃ disvā purimanayeneva pucchitvā saṃviggahadayo nivattitvā pāsādaṃ abhiruhi. Rājāpi pucchitvā heṭṭhā vuttanayeneva saṃvidahitvā puna vaḍḍhetvā samantā tigāvutappamāṇe padese ārakkhaṃ ṭhapesi. Aparaṃ ekadivasaṃ bodhisatto tatheva uyyānaṃ gacchanto devatāhi nimmitaṃ kālakataṃ disvā purimanayeneva pucchitvā saṃviggahadayo puna nivattitvā pāsādaṃ abhiruhi. Rājāpi pucchitvā heṭṭhā vuttanayeneva saṃvidahitvā puna vaḍḍhetvā samantā yojanappamāṇe padese ārakkhaṃ ṭhapesi. Aparaṃ pana ekadivasaṃ uyyānaṃ gacchanto tatheva devatāhi nimmitaṃ sunivatthaṃ supārutaṃ pabbajitaṃ disvā ‘‘ko nāmeso sammā’’ti sārathiṃ pucchi. Sārathi kiñcāpi buddhuppādassa abhāvā pabbajitaṃ vā pabbajitaguṇe vā na jānāti, devatānubhāvena pana ‘‘pabbajito nāmāyaṃ devā’’ti vatvā pabbajjāya guṇe vaṇṇesi. Bodhisatto pabbajjāya ruciṃ uppādetvā taṃ divasaṃ uyyānaṃ agamāsi. Dīghabhāṇakā panāhu ‘‘cattāri nimittāni ekadivaseneva disvā agamāsī’’ti. Als der Bodhisatta an einem anderen Tag auf dieselbe Weise zum Garten fuhr, sah er einen von den Gottheiten erschaffenen kranken Mann. Nachdem er ihn in genau derselben Weise wie zuvor befragt hatte, kehrte er mit erschüttertem Herzen um und ging hinauf in den Palast. Auch der König fragte nach, veranlasste Vorkehrungen in genau derselben Weise wie zuvor, verstärkte die Bewachung erneut und ließ sie im Umkreis von drei Gāvutas Entfernung aufstellen. An einem weiteren Tag, als der Bodhisatta auf dieselbe Weise zum Garten fuhr, sah er einen von den Gottheiten erschaffenen Verstorbenen. Nachdem er ihn in genau derselben Weise wie zuvor befragt hatte, kehrte er mit erschüttertem Herzen erneut um und ging hinauf in den Palast. Auch der König fragte nach, veranlasste Vorkehrungen in genau derselben Weise wie zuvor, verstärkte die Bewachung erneut und ließ sie im Umkreis von einer Yojana Entfernung aufstellen. An einem weiteren Tag jedoch, als er zum Garten fuhr, sah er einen von den Gottheiten ebenso erschaffenen, ordentlich gekleideten und verhüllten Hauslosen und fragte den Wagenlenker: „Freund, wer ist dieser Mann?“ Obwohl der Wagenlenker wegen des Ausbleibens des Erscheinens eines Buddhas weder einen Hauslosen noch die Vorzüge des Hauslosenlebens kannte, antwortete er durch die Macht der Gottheiten: „O König, dies ist ein Hausloser“, und rühmte die Vorzüge des Hauslosenlebens. Der Bodhisatta fand Gefallen am Hinausziehen in die Hauslosigkeit und begab sich an diesem Tag in den Garten. Die Rezitatoren der Längeren Sammlung jedoch sagen: „Er sah die vier Vorzeichen an ein und demselben Tag und zog fort.“ So tattha divasabhāgaṃ kīḷitvā maṅgalapokkharaṇiyaṃ nhāyitvā atthaṅgate sūriye maṅgalasilāpaṭṭe nisīdi attānaṃ alaṅkārāpetukāmo. Athassa paricārakapurisā nānāvaṇṇāni dussāni nānappakārā ābharaṇavikatiyo mālāgandhavilepanāni ca ādāya samantā parivāretvā aṭṭhaṃsu. Tasmiṃ khaṇe sakkassa nisinnāsanaṃ uṇhaṃ ahosi. So ‘‘ko nu kho maṃ imamhā ṭhānā cāvetukāmo’’ti upadhārento bodhisattassa alaṅkāretukāmataṃ ñatvā vissakammaṃ āmantesi ‘‘samma vissakamma, siddhatthakumāro ajja aḍḍharattasamaye mahābhinikkhamanaṃ nikkhamissati, ayamassa pacchimo alaṅkāro, uyyānaṃ gantvā mahāpurisaṃ dibbālaṅkārehi alaṅkarohī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā devatānubhāvena taṅkhaṇaṃyeva upasaṅkamitvā tasseva kappakasadiso hutvā kappakassa hatthato veṭhanadussaṃ gahetvā bodhisattassa sīsaṃ veṭhesi. Bodhisatto hatthasamphasseneva ‘‘nāyaṃ manusso, devaputto eso’’ti aññāsi. Veṭhanena veṭhitamatte sīse moḷiyaṃ maṇiratanākārena dussasahassaṃ abbhuggañchi. Puna veṭhentassa dussasahassanti dasakkhattuṃ veṭhentassa dasa dussasahassāni abbhuggacchiṃsu[Pg.71]. ‘‘Sīsaṃ khuddakaṃ, dussāni bahūni, kathaṃ abbhuggatānī’’ti na cintetabbaṃ. Tesu hi sabbamahantaṃ āmalakapupphappamāṇaṃ, avasesāni kusumbakapupphappamāṇāni ahesuṃ. Bodhisattassa sīsaṃ kiñjakkhagavacchitaṃ viya kuyyakapupphaṃ ahosi. Nachdem er sich dort einen Teil des Tages vergnügt hatte, badete er im glückverheißenden Lotusteich und setzte sich bei Sonnenuntergang auf die glückverheißende Steinplatte, um sich schmücken zu lassen. Da nahmen seine Diener verschiedenfarbige Gewänder, allerlei Arten von Schmuck sowie Kränze, Düfte und Salben, umstellten ihn von allen Seiten und blieben so stehen. In diesem Augenblick wurde der Thron Sakkas heiß. Er überlegte: „Wer wohl will mich von dieser Stätte vertreiben?“, und als er den Wunsch des Bodhisatta erkannte, sich schmücken zu lassen, rief er Vissakamma und sprach: „Freund Vissakamma, heute um Mitternacht wird Prinz Siddhattha zum Großen Hinausziehen aufbrechen. Dies ist sein letzter Schmuck. Geh in den Garten und schmücke den Großen Mann mit göttlichem Zierrat!“ Dieser antwortete mit den Worten „Sehr wohl!“, begab sich durch die Macht der Gottheiten im selben Augenblick vor den Bodhisatta, nahm die Gestalt von dessen eigenem Friseur an, nahm das Tuch für den Kopfbund aus den Händen des Friseurs und wand den Turban um das Haupt des Bodhisatta. Der Bodhisatta erkannte allein an der Berührung der Hand: „Das ist kein Mensch, das ist ein Himmelssohn.“ Kaum war der Turban um sein Haupt gewunden, da stiegen im Haarknoten tausend Tücher in Form von Edelsteinen empor. Während er weiter wand, stiegen abermals tausend Tücher empor – so stiegen bei zehnmaligem Winden zehntausend Tücher empor. Man sollte sich nicht fragen: „Das Haupt ist klein, der Tücher aber sind viele, wie konnten sie da emporsteigen?“ Denn das größte unter ihnen hatte die Größe einer Myrobalanenblüte, die übrigen hatten die Größe von Saflorblüten. Das Haupt des Bodhisatta glich einer Kuyyaka-Blüte, die mit Blütenstaub bedeckt ist. Athassa sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitassa sabbatālāvacaresu sakāni sakāni paṭibhānāni dassayantesu, brāhmaṇesu ‘‘jayanandā’’tiādivacanehi, sūtamāgadhādīsu nānappakārehi maṅgalavacanatthutighosehi sambhāventesu sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ rathavaraṃ abhiruhi. Tasmiṃ samaye ‘‘rāhulamātā puttaṃ vijātā’’ti sutvā suddhodanamahārājā ‘‘puttassa me tuṭṭhiṃ nivedethā’’ti sāsanaṃ pahiṇi. Bodhisatto taṃ sutvā ‘‘rāhu jāto, bandhanaṃ jāta’’nti āha. Rājā ‘‘kiṃ me putto avacā’’ti pucchitvā taṃ vacanaṃ sutvā ‘‘ito paṭṭhāya me nattā rāhulakumāroyeva nāma hotū’’ti āha. Als er nun mit allem Zierrat geschmückt war, brachten alle Musiker ihre jeweiligen Talente dar, die Brahmanen sprachen Segenswünsche wie „Sieg und Freude!“ aus, und die Wagenlenker, Hofsänger und andere brachten verschiedene glückverheißende Worte und Lobgesänge dar. Unter diesen Ehrenbezeugungen bestieg er den vollends geschmückten, edlen Wagen. Zu dieser Zeit sandte der Großkönig Suddhodana, als er vernahm, dass Rāhulas Mutter einen Sohn geboren hatte, eine Botschaft mit den Worten: „Überbringt meinem Sohn meine Freude!“ Als der Bodhisatta dies hörte, sprach er: „Ein Rāhu [eine Fessel] ist geboren, eine Bindung ist entstanden.“ Der König fragte: „Was hat mein Sohn gesagt?“, und als er diese Worte vernommen hatte, sprach er: „Von heute an soll mein Enkelsohn den Namen Prinz Rāhula tragen!“ Bodhisattopi kho rathavaraṃ āruyha mahantena yasena atimanoramena sirisobhaggena nagaraṃ pāvisi. Tasmiṃ samaye kisāgotamī nāma khattiyakaññā uparipāsādavaratalagatā nagaraṃ padakkhiṇaṃ kurumānassa bodhisattassa rūpasiriṃ disvā pītisomanassajātā idaṃ udānaṃ udānesi – Auch der Bodhisatta betrat, den edlen Wagen besteigend, mit großem Gefolge und in überaus entzückender Pracht und Schönheit die Stadt. Zu dieser Zeit blickte eine Kṣatriya-Jungfrau namens Kisāgotamī von der obersten Terrasse ihres prächtigen Palastes herab. Als sie die herrliche Gestalt des Bodhisatta erblickte, der die Stadt im Uhrzeigersinn umfuhr, geriet sie in helle Freude und Entzücken und stieß diesen feierlichen Ausruf aus: ‘‘Nibbutā nūna sā mātā, nibbuto nūna so pitā; Nibbutā nūna sā nārī, yassāyaṃ īdiso patī’’ti. „Friedvoll fürwahr ist jene Mutter, friedvoll fürwahr ist jener Vater; friedvoll fürwahr ist jene Frau, die einen solchen Gatten hat!“ Bodhisatto taṃ sutvā cintesi ‘‘ayaṃ evamāha ‘evarūpaṃ attabhāvaṃ passantiyā mātu hadayaṃ nibbāyati, pitu hadayaṃ nibbāyati, pajāpatiyā hadayaṃ nibbāyatī’ti! Kismiṃ nu kho nibbute hadayaṃ nibbutaṃ nāma hotī’’ti? Athassa kilesesu virattamānasassa etadahosi – ‘‘rāgaggimhi nibbute nibbutaṃ nāma hoti, dosaggimhi nibbute nibbutaṃ nāma hoti, mohaggimhi nibbute nibbutaṃ nāma hoti, mānadiṭṭhiādīsu sabbakilesadarathesu nibbutesu nibbutaṃ nāma hoti. Ayaṃ me sussavanaṃ sāvesi, ahañhi nibbānaṃ gavesanto carāmi, ajjeva mayā gharāvāsaṃ chaḍḍetvā nikkhamma pabbajitvā [Pg.72] nibbānaṃ gavesituṃ vaṭṭati, ayaṃ imissā ācariyabhāgo hotū’’ti kaṇṭhato omuñcitvā kisāgotamiyā satasahassagghanakaṃ muttāhāraṃ pesesi. Sā ‘‘siddhatthakumāro mayi paṭibaddhacitto hutvā paṇṇākāraṃ pesesī’’ti somanassajātā ahosi. Als der Bodhisatta dies hörte, dachte er: „Diese [Kisāgotamī] hat Folgendes gesagt: ‚Beim Anblick einer solchen Gestalt kommt das Herz der Mutter zur Ruhe, das Herz des Vaters kommt zur Ruhe, das Herz der Ehefrau kommt zur Ruhe!‘ Worin muss wohl das Erlöschen stattfinden, damit das Herz wirklich zur Ruhe gekommen ist?“ Da stieg in ihm, dessen Geist von den Befleckungen abgewandt war, dieser Gedanke auf: „Wenn das Feuer der Gier erloschen ist, ist das Herz wahrlich zur Ruhe gekommen; wenn das Feuer des Hasses erloschen ist, ist es zur Ruhe gekommen; wenn das Feuer der Verblendung erloschen ist, ist es zur Ruhe gekommen; wenn alle Leiden der Befleckungen wie Stolz, falsche Ansichten und die übrigen erloschen sind, ist das Herz wahrlich zur Ruhe gekommen. Sie hat mich eine gute Botschaft hören lassen. Ich wandere ja auf der Suche nach Nibbāna. Noch heute geziemt es mir, das Hausleben aufzugeben, hinauszuziehen, die Hauslosigkeit zu wählen und nach Nibbāna zu suchen. Dies soll ihr Lehreranteil sein!“ Er nahm eine Perlenkette im Wert von einhunderttausend Goldstücken von seinem Hals ab und sandte sie Kisāgotamī. Sie wurde von Freude erfüllt und dachte: „Prinz Siddhattha hat sein Herz an mich verloren und mir dieses Geschenk gesandt.“ Bodhisattopi mahantena sirisobhaggena attano pāsādaṃ abhiruhitvā sirisayane nipajji. Tāvadeva ca naṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitā naccagītādīsu susikkhitā devakaññā viya rūpasobhaggappattā itthiyo nānātūriyāni gahetvā samparivārayitvā abhiramāpentiyo naccagītavāditāni payojayiṃsu. Bodhisatto kilesesu virattacittatāya naccādīsu anabhirato muhuttaṃ niddaṃ okkami. Tāpi itthiyo ‘‘yassatthāya mayaṃ naccādīni payojema, so niddaṃ upagato, idāni kimatthaṃ kilamāmā’’ti gahitaggahitāni tūriyāni ajjhottharitvā nipajjiṃsu, gandhatelappadīpā jhāyanti. Bodhisatto pabujjhitvā sayanapiṭṭhe pallaṅkena nisinno addasa tā itthiyo tūriyabhaṇḍāni avattharitvā niddāyantiyo – ekaccā paggharitakheḷā, lālākilinnagattā, ekaccā dante khādantiyo, ekaccā kākacchantiyo, ekaccā vippalapantiyo, ekaccā vivaṭamukhā, ekaccā apagatavatthā, pākaṭabībhacchasambādhaṭṭhānā. So tāsaṃ taṃ vippakāraṃ disvā bhiyyosomattāya kāmesu virattacitto ahosi. Tassa alaṅkatapaṭiyattaṃ sakkabhavanasadisampi taṃ mahātalaṃ apaviddhanānākuṇapabharitaṃ āmakasusānaṃ viya upaṭṭhāsi, tayo bhavā ādittagehasadisā khāyiṃsu – ‘‘upaddutaṃ vata bho, upassaṭṭhaṃ vata bho’’ti udānaṃ pavattesi, ativiya pabbajjāya cittaṃ nami. Auch der Bodhisatta stieg in großer Pracht und Herrlichkeit auf seinen Palast empor und legte sich auf das Prachtbett. Sogleich umringten ihn reich geschmückte, in Tanz, Gesang und Musik wohlgeschulte Frauen von vollendeter, nymphengleicher Schönheit. Sie nahmen verschiedene Musikinstrumente zur Hand, um ihn zu erfreuen, und führten Tanz, Gesang und Instrumentalmusik vor. Da der Bodhisatta jedoch einen von den Befleckungen abgewandten Geist hatte, fand er kein Gefallen an Tanz und Musik und schlief für eine Weile ein. Die Frauen dachten: „Derjenige, um dessentwillen wir tanzen und musizieren, ist eingeschlafen. Warum sollten wir uns jetzt noch abmühen?“ Da legten sie sich nieder, über die Instrumente gebeugt, die sie in den Händen hielten, während die Duftöllampen weiterbrannten. Als der Bodhisatta erwachte, setzte er sich mit gekreuzten Beinen auf dem Bett hin und erblickte jene Frauen, die über ihre Instrumente gebeugt schliefen: Bei einigen floss der Speichel aus dem Mund und benetzte ihren Körper, einige knirschten mit den Zähnen, einige schnarchten laut, einige redeten wirr im Schlaf, einige hatten den Mund weit geöffnet, und bei einigen waren die Gewänder verrutscht, sodass ihre abstoßenden Schambereiche unverhüllt dalagen. Als er sie in diesem entstellten Zustand sah, wandte sich sein Geist noch viel heftiger von den Sinnengenüssen ab. Die prächtige, geschmückte Palasthalle, die sonst der Wohnstatt des Götterkönigs Sakka glich, erschien ihm nun wie ein Leichenacker voller weggeworfener, verwesender Leichen aller Art. Die drei Daseinsbereiche erschienen ihm wie ein lichterloh brennendes Haus. Er stieß diesen feierlichen Ausruf aus: „O weh, wahrlich bedrängt! O weh, wahrlich heimgesucht!“ Und sein Geist neigte sich überaus stark dem Hinausziehen in die Hauslosigkeit zu. So ‘‘ajjeva mayā mahābhinikkhamanaṃ nikkhamituṃ vaṭṭatī’’ti sayanā uṭṭhāya dvārasamīpaṃ gantvā ‘‘ko etthā’’ti āha. Ummāre sīsaṃ katvā nipanno channo ‘‘ahaṃ ayyaputta channo’’ti āha. ‘‘Ahaṃ ajja mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitukāmo, ekaṃ me assaṃ kappehī’’ti āha. So ‘‘sādhu devā’’ti assabhaṇḍikaṃ gahetvā assasālaṃ gantvā gandhatelapadīpesu jalantesu sumanapaṭṭavitānassa heṭṭhā ramaṇīye bhūmibhāge ṭhitaṃ kaṇḍakaṃ assarājānaṃ disvā ‘‘ajja mayā imameva kappetuṃ vaṭṭatī’’ti kaṇḍakaṃ kappesi. So kappiyamānova aññāsi ‘‘ayaṃ kappanā atigāḷhā[Pg.73], aññesu divasesu uyyānakīḷādigamane kappanā viya na hoti, mayhaṃ ayyaputto ajja mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitukāmo bhavissatī’’ti. Tato tuṭṭhamānaso mahāhasitaṃ hasi. So saddo sakalanagaraṃ pattharitvā gaccheyya, devatā pana taṃ saddaṃ nirumbhitvā na kassaci sotuṃ adaṃsu. Er dachte: „Noch heute geziemt es mir, das große Hinausziehen anzutreten“, erhob sich von seinem Lager, ging zur Tür und rief: „Wer ist da?“ Channa, der den Kopf auf die Türschwelle gebettet hatte und dort schlief, antwortete: „Ich bin es, edler Herr, Channa.“ Der Bodhisatta sprach: „Ich möchte heute das große Hinausziehen antreten. Sattele mir ein Pferd!“ Channa antwortete: „Sehr wohl, Herr!“, nahm das Pferdegeschirr und ging zum Pferdestall. Beim Schein der brennenden Duftöllampen erblickte er unter einem Baldachin aus Jasminblüten den auf einem anmutigen Platz stehenden königlichen Hengst Kaṇḍaka. Er dachte: „Heute geziemt es mir, genau dieses Pferd zu satteln“, und sattelte Kaṇḍaka. Das Pferd erkannte schon während des Sattelns: „Dieses Anschirren ist überaus fest. Es ist nicht wie das Satteln an anderen Tagen für Ausfahrten in den Lustgarten und dergleichen. Mein Herr möchte heute gewiss das große Hinausziehen antreten.“ Daraufhin wieherte es mit hocherfreutem Herzen laut auf. Dieses Wiehern hätte die ganze Stadt erfüllen können, doch die Gottheiten unterdrückten den Schall, sodass niemand ihn hören konnte. Bodhisattopi kho channaṃ pesetvāva ‘‘puttaṃ tāva passissāmī’’ti cintetvā nisinnapallaṅkato uṭṭhāya rāhulamātāya vasanaṭṭhānaṃ gantvā gabbhadvāraṃ vivari. Tasmiṃ khaṇe antogabbhe gandhatelapadīpo jhāyati, rāhulamātā sumanamallikādīnaṃ pupphānaṃ ambaṇamattena abhippakiṇṇasayane puttassa matthake hatthaṃ ṭhapetvā niddāyati. Bodhisatto ummāre pādaṃ ṭhapetvā ṭhitakova oloketvā ‘‘sacāhaṃ deviyā hatthaṃ apanetvā mama puttaṃ gaṇhissāmi, devī pabujjhissati, evaṃ me gamanantarāyo bhavissati, buddho hutvāva āgantvā puttaṃ passissāmī’’ti pāsādatalato otari. Yaṃ pana jātakaṭṭhakathāyaṃ ‘‘tadā sattāhajāto rāhulakumāro hotī’’ti vuttaṃ, taṃ sesaṭṭhakathāsu natthi, tasmā idameva gahetabbaṃ. Nachdem der Bodhisatta Channa weggeschickt hatte, dachte er: „Zuerst will ich meinen Sohn sehen.“ Er erhob sich von seinem Sitz, begab sich zu den Gemächern von Rāhulas Mutter und öffnete die Kammertür. In diesem Augenblick brannte im Inneren des Gemachs eine Duftöllampe. Rāhulas Mutter schlief auf einem Bett, das mit einer Fülle von Jasmin- und Mallikā-Blüten im Ausmaß eines Ambaṇa-Maßes bestreut war, und hielt ihre Hand auf dem Kopf ihres Sohnes. Der Bodhisatta setzte einen Fuß auf die Türschwelle, blickte im Stehen hinein und dachte: „Wenn ich die Hand der Königin beiseitehebe, um meinen Sohn aufzunehmen, wird die Königin erwachen. Dadurch würde meiner Abreise ein Hindernis bereitet. Erst wenn ich ein Buddha geworden bin, werde ich zurückkehren und meinen Sohn sehen.“ Mit diesem Gedanken stieg er vom Palast hinab. Was jedoch im Jātaka-Kommentar mit den Worten überliefert ist: „Damals war Prinz Rāhula sieben Tage alt“, findet sich in den übrigen Kommentaren nicht; darum ist genau dies zu akzeptieren. Evaṃ bodhisatto pāsādatalā otaritvā assasamīpaṃ gantvā evamāha – ‘‘tāta kaṇḍaka, tvaṃ ajja ekarattiṃ maṃ tāraya, ahaṃ taṃ nissāya buddho hutvā sadevakaṃ lokaṃ tāressāmī’’ti. Tato ullaṅghitvā kaṇḍakassa piṭṭhiṃ abhiruhi. Kaṇḍako gīvato paṭṭhāya āyāmena aṭṭhārasahattho hoti tadanucchavikena ubbedhena samannāgato thāmajavasampanno sabbaseto dhotasaṅkhasadiso. So sace haseyya vā padasaddaṃ vā kareyya, saddo sakalanagaraṃ avatthareyya. Tasmā devatā attano ānubhāvena tassa yathā na koci suṇāti, evaṃ hasitasaddaṃ sannirumbhitvā akkamanaakkamanapadavāre hatthatalāni upanāmesuṃ. Bodhisatto assavarassa piṭṭhivemajjhagato channaṃ assassa vāladhiṃ gāhāpetvā aḍḍharattasamaye mahādvārasamīpaṃ patto. Tadā pana rājā ‘‘evaṃ bodhisatto yāya kāyaci velāya nagaradvāraṃ vivaritvā nikkhamituṃ na sakkhissatī’’ti dvīsu dvārakavāṭesu ekekaṃ purisasahassena vivaritabbaṃ kārāpesi. Bodhisatto thāmabalasampanno, hatthigaṇanāya koṭisahassahatthīnaṃ balaṃ dhāreti, purisagaṇanāya dasakoṭisahassapurisānaṃ[Pg.74]. So cintesi ‘‘sace dvāraṃ na vivarīyati, ajja kaṇḍakassa piṭṭhe nisinnova vāladhiṃ gahetvā ṭhitena channena saddhiṃyeva kaṇḍakaṃ ūrūhi nippīḷetvā aṭṭhārasahatthubbedhaṃ pākāraṃ uppatitvā atikkamissāmī’’ti. Channopi cintesi ‘‘sace dvāraṃ na vivarīyati, ahaṃ ayyaputtaṃ khandhe nisīdāpetvā kaṇḍakaṃ dakkhiṇena hatthena kucchiyaṃ parikkhipanto upakacchantare katvā pākāraṃ uppatitvā atikkamissāmī’’ti. Kaṇḍakopi cintesi ‘‘sace dvāraṃ na vivarīyati, ahaṃ attano sāmikaṃ piṭṭhiyaṃ yathānisinnameva channena vāladhiṃ gahetvā ṭhitena saddhiṃyeva ukkhipitvā pākāraṃ uppatitvā atikkamissāmī’’ti. Sace dvāraṃ na avāpurīyittha, yathācintitameva tesu tīsu janesu aññataro sampādeyya. Dvāre adhivatthā devatā pana dvāraṃ vivari. Als der Bodhisatta so vom Flachdach des Palastes herabgestiegen war, ging er zu dem Pferd und sprach so: "Mein lieber Kaṇḍaka, bringe mich heute in dieser einen Nacht hinüber! Wenn ich mich auf dich stütze und zum Buddha geworden bin, werde ich die Welt samt den Göttern hinüberretten." Danach sprang er auf und bestieg den Rücken von Kaṇḍaka. Kaṇḍaka war, vom Hals an gemessen, achtzehn Ellen lang und besaß eine dieser Länge entsprechende Höhe; er war mit Kraft und Schnelligkeit ausgestattet, vollkommen weiß und glich einer polierten Muschel. Wenn er wiehern oder ein Hufgeräusch machen würde, würde der Schall die ganze Stadt erfüllen. Deshalb unterdrückten die Gottheiten durch ihre eigene Macht sein Wiehern, so dass es niemand hören konnte, und hielten bei jedem einzelnen seiner Schritte ihre Handflächen unter seine Hufe. Der Bodhisatta, der mitten auf dem Rücken des edlen Pferdes saß, ließ Channa den Schweif des Pferdes ergreifen und erreichte um Mitternacht die Nähe des großen Stadtores. Damals aber hatte der König in dem Gedanken: "Auf diese Weise wird der Bodhisatta nicht in der Lage sein, zu irgendeiner Zeit das Stadttor zu öffnen und hinauszugehen", veranlasst, dass jeder der beiden Torflügel nur von tausend Männern geöffnet werden konnte. Der Bodhisatta war mit enormer Körperkraft ausgestattet; nach der Zählung von Elefanten besaß er die Kraft von tausend Koṭi Elefanten, und nach der Zählung von Männern die Kraft von zehntausend Koṭi Männern. Er dachte sich: "Wenn das Tor nicht geöffnet wird, werde ich heute, während ich auf dem Rücken von Kaṇḍaka sitze, zusammen mit Channa, der den Schweif festhält, Kaṇḍaka mit meinen Oberschenkeln fest zusammenpressen, über die achtzehn Ellen hohe Mauer springen und sie überwinden." Auch Channa dachte sich: "Wenn das Tor nicht geöffnet wird, werde ich den Edlen auf meine Schultern setzen, Kaṇḍaka mit meinem rechten Arm um den Bauch fassen, ihn unter meine Achsel klemmen, über die Mauer springen und sie überwinden." Auch Kaṇḍaka dachte sich: "Wenn das Tor nicht geöffnet wird, werde ich meinen Herrn, so wie er auf meinem Rücken sitzt, zusammen mit Channa, der meinen Schweif festhält, emporheben, über die Mauer springen und sie überwinden." Wenn das Tor nicht geöffnet worden wäre, hätte gewiss einer dieser drei genau wie gedacht das Hinausgehen vollbracht. Die im Tor wohnende Gottheit aber öffnete das Tor. Tasmiṃyeva khaṇe māro ‘‘bodhisattaṃ nivattessāmī’’ti āgantvā ākāse ṭhito āha – ‘‘mārisa, mā nikkhama, ito te sattame divase cakkaratanaṃ pātubhavissati, dvisahassaparittadīpaparivārānaṃ catunnaṃ mahādīpānaṃ rajjaṃ kāressasi, nivatta mārisā’’ti. ‘‘Kosi tva’’nti? ‘‘Ahaṃ vasavattī’’ti. ‘‘Māra, jānāmahaṃ mayhaṃ cakkaratanassa pātubhāvaṃ, anatthikohaṃ rajjena, dasasahassilokadhātuṃ unnādetvā buddho bhavissāmī’’ti āha. Māro ‘‘ito dāni te paṭṭhāya kāmavitakkaṃ vā byāpādavitakkaṃ vā vihiṃsāvitakkaṃ vā cintitakāle jānissāmī’’ti otārāpekkho chāyā viya anapagacchanto anubandhi. In genau diesem Moment kam Māra mit dem Gedanken "Ich werde den Bodhisatta zur Umkehr bewegen", verweilte in der Luft und sprach: "Werter Herr, ziehe nicht hinaus! Am siebten Tag von heute an wird dir das Rad-Juwel erscheinen. Du wirst die Herrschaft über die vier großen Kontinente mit ihren zweitausend kleinen Nebeninseln ausüben. Kehre um, werter Herr!" "Wer bist du?", fragte der Bodhisatta. "Ich bin Vasavatti", antwortete Māra. "Māra, ich weiß selbst um das Erscheinen meines Rad-Juwels. Ich habe kein Verlangen nach der Königsherrschaft. Ich werde die zehntausend Weltensysteme erschüttern lassen und ein Buddha werden", sprach der Bodhisatta. Māra dachte: "Von jetzt an werde ich genau darauf achten, wann du einen Gedanken der Sinnlichkeit, des Übelwollens oder der Grausamkeit hegst", und er folgte ihm wie ein Schatten, ohne von seiner Seite zu weichen, stets nach einer Schwachstelle suchend. Bodhisattopi hatthagataṃ cakkavattirajjaṃ kheḷapiṇḍaṃ viya anapekkho chaḍḍetvā mahantena sakkārena nagarā nikkhami āsāḷhipuṇṇamāya uttarāsāḷhanakkhatte vattamāne. Nikkhamitvā ca puna nagaraṃ oloketukāmo jāto. Evañca panassa citte uppannamatteyeva ‘‘mahāpurisa, na tayā nivattitvā olokanakammaṃ kata’’nti vadamānā viya mahāpathavī kulālacakkaṃ viya bhijjitvā parivatti. Bodhisatto nagarābhimukho ṭhatvā nagaraṃ oloketvā tasmiṃ pathavippadese kaṇḍakanivattanacetiyaṭṭhānaṃ dassetvā gantabbamaggābhimukhaṃ kaṇḍakaṃ katvā pāyāsi mahantena sakkārena uḷārena sirisobhaggena. Tadā kirassa devatā purato saṭṭhi ukkāsahassāni dhārayiṃsu, pacchato saṭṭhi, dakkhiṇapassato saṭṭhi, vāmapassato [Pg.75] saṭṭhi, aparā devatā cakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ aparimāṇā ukkā dhārayiṃsu, aparā devatā ca nāgasupaṇṇādayo ca dibbehi gandhehi mālāhi cuṇṇehi dhūmehi pūjayamānā gacchanti. Pāricchattakapupphehi ceva mandāravapupphehi ca ghanameghavuṭṭhikāle dhārāhi viya nabhaṃ nirantaraṃ ahosi, dibbāni saṃgītāni pavattiṃsu, samantato aṭṭhasaṭṭhi tūriyasatasahassāni pavajjiṃsu, samuddakucchiyaṃ meghatthanitakālo viya yugandharakucchiyaṃ sāgaranigghosakālo viya vattati. Auch der Bodhisatta gab die bereits in seiner Hand liegende Weltherrschaft ohne Zögern wie einen Speichelklumpen auf und zog mit großer Ehrerbietung aus der Stadt hinaus, am Vollmondtag des Monats Āsāḷha, während das Uttarāsāḷha-Gestirn am Himmel stand. Als er hinausgegangen war, überkam ihn der Wunsch, noch einmal zurück auf die Stadt zu blicken. Und in demselben Augenblick, als dieser Gedanke in seinem Geist entstand, drehte sich die große Erde wie eine Töpferscheibe im Kreis, gleichsam als wollte sie sagen: "Großer Mann, es ist für dich nicht angemessen, dich umzudrehen und zurückzublicken!" Der Bodhisatta wandte sich der Stadt zu, blickte auf sie, zeigte Channa an jener Stelle der Erde den Ort, an dem später der Kaṇḍakanivattana-Cetiya stehen sollte, wendete Kaṇḍaka wieder in Richtung des einzuschlagenden Weges und zog mit großer Ehrerbietung und erhabener, herrlicher Pracht weiter. Damals, so sagt man, trugen Gottheiten sechzigtausend Fackeln vor ihm, sechzigtausend hinter ihm, sechzigtausend an seiner rechten Seite und sechzigtausend an seiner linken Seite. Andere Gottheiten trugen unzählige Fackeln am Rand des Weltraums. Und wieder andere Gottheiten sowie Nāgas, Supaṇṇas und andere Wesen zogen dahin, während sie ihn mit himmlischen Wohlgerüchen, Blumen, Puder und Räucherwerk verehrten. Durch Pāricchattaka-Blumen und Mandārava-Blumen wurde der Himmel lückenlos ausgefüllt, wie von herabstürzenden Wassermassen zur Zeit eines schweren Regenstrudels aus dichten Wolken. Himmlische Gesänge erklangen, und ringsumher ertönten einhundertachtundsechzigtausend Musikinstrumente von selbst, so dass es widerhallte wie das Donnern im Inneren des Ozeans oder das Tosen des Meeres an den Hängen des Yugandhara-Gebirges. Iminā sirisobhaggena gacchanto bodhisatto ekaratteneva tīṇi rajjāni atikkamma tiṃsayojanamatthake anomānadītīraṃ pāpuṇi. ‘‘Kiṃ pana asso tato paraṃ gantuṃ na sakkotī’’ti? ‘‘No, na sakko’’ti. So hi ekaṃ cakkavāḷagabbhaṃ nābhiyā ṭhitacakkassa nemivaṭṭiṃ maddanto viya antantena caritvā purepātarāsameva āgantvā attano sampāditaṃ bhattaṃ bhuñjituṃ samattho. Tadā pana devanāgasupaṇṇādīhi ākāse ṭhatvā ossaṭṭhehi gandhamālādīhi yāva ūruppadesā sañchannaṃ sarīraṃ ākaḍḍhitvā gandhamālājaṭaṃ chindantassa atippapañco ahosi, tasmā tiṃsayojanamattameva agamāsi. Atha bodhisatto nadītīre ṭhatvā channaṃ pucchi – ‘‘kinnāmā ayaṃ nadī’’ti? ‘‘Anomā nāma, devā’’ti. ‘‘Amhākampi pabbajjā anomā bhavissatī’’ti paṇhiyā ghaṭṭento assassa saññaṃ adāsi. Asso uppatitvā aṭṭhūsabhavitthārāya nadiyā pārimatīre aṭṭhāsi. Der Bodhisatta, der in dieser herrlichen Pracht dahinzog, durchquerte in nur einer einzigen Nacht drei Königreiche und erreichte nach dreißig Yojanas das Ufer des Flusses Anomā. Konnte das Pferd denn nicht noch weiter als diese Distanz gehen? Nein, das ist nicht so, dass es das nicht konnte. Denn dieses Pferd war imstande, um das gesamte Weltensystem herumzulaufen, gleichsam als träte es auf den Felgenrand eines Rades, das auf seiner Nabe ruht, und noch vor dem Frühstück zurückzukehren, um sein zubereitetes Futter zu fressen. Damals jedoch entstand für Kaṇḍaka eine große Verzögerung, da er seinen Körper, der bis zu den Oberschenkeln von Wohlgerüchen, Blumen und anderem bedeckt war, die von den in der Luft stehenden Gottheiten, Nāgas, Supaṇṇas und anderen herabgeworfen worden waren, mühsam vorwärtsziehen und sich einen Weg durch dieses Dickicht aus duftenden Blumen bahnen musste. Deshalb legte er nur eine Strecke von genau dreißig Yojanas zurück. Daraufhin hielt der Bodhisatta am Flussufer an und fragte Channa: "Wie heißt dieser Fluss?" "Er heißt Anomā, o Herr", antwortete er. "Auch unsere Entsagung soll erhaben sein!", dachte er, gab dem Pferd mit seinen Fersen einen Stoß und signalisierte ihm zu springen. Das Pferd sprang ab und landete am jenseitigen Ufer des Flusses, der acht Usabhas breit war. Bodhisatto assapiṭṭhito oruyha rajatapaṭṭasadise vālukāpuline ṭhatvā channaṃ āmantesi – ‘‘samma, channa, tvaṃ mayhaṃ ābharaṇāni ceva kaṇḍakañca ādāya gaccha, ahaṃ pabbajissāmī’’ti. ‘‘Ahampi, deva, pabbajissāmī’’ti. Bodhisatto ‘‘na labbhā tayā pabbajituṃ, gaccha tva’’nti tikkhattuṃ paṭibāhitvā ābharaṇāni ceva kaṇḍakañca paṭicchāpetvā cintesi ‘‘ime mayhaṃ kesā samaṇasāruppā na hontī’’ti. Añño bodhisattassa kese chindituṃ yuttarūpo natthi, tato ‘‘sayameva khaggena chindissāmī’’ti dakkhiṇena hatthena asiṃ gaṇhitvā vāmahatthena moḷiyā [Pg.76] saddhiṃ cūḷaṃ gahetvā chindi, kesā dvaṅgulamattā hutvā dakkhiṇato āvattamānā sīsaṃ allīyiṃsu. Tesaṃ yāvajīvaṃ tadeva pamāṇaṃ ahosi, massu ca tadanurūpaṃ, puna kesamassuohāraṇakiccaṃ nāma nāhosi. Bodhisatto saha moḷiyā cuḷaṃ gahetvā ‘‘sacāhaṃ buddho bhavissāmi, ākāse tiṭṭhatu, no ce, bhūmiyaṃ patatū’’ti antalikkhe khipi. Taṃ cūḷāmaṇiveṭhanaṃ yojanappamāṇaṃ ṭhānaṃ gantvā ākāse aṭṭhāsi. Sakko devarājā dibbacakkhunā oloketvā yojaniyaratanacaṅkoṭakena sampaṭicchitvā tāvatiṃsabhavane cūḷāmaṇicetiyaṃ nāma patiṭṭhāpesi. Der Bodhisatta stieg vom Rücken des Pferdes herab, stellte sich auf eine Sandbank, die einer Silberplatte glich, und sprach zu Channa: „Mein lieber Channa, nimm meinen Schmuck und Kanthaka und kehre heim. Ich werde das asketische Leben erwählen.“ Channa sagte: „O Herr, auch ich werde das asketische Leben erwählen.“ Der Bodhisatta wies ihn dreimal ab mit den Worten: „Es ist dir nicht gestattet, dich ordinieren zu lassen. Geh du zurück!“, übergab ihm den Schmuck sowie Kanthaka und dachte: „Dieses mein Haar ist für einen Asketen unschicklich.“ Da es niemanden sonst gab, der geeignet war, das Haar des Bodhisatta zu schneiden, dachte er: „Ich werde es selbst mit dem Schwert abschneiden.“ Er nahm das Schwert mit der rechten Hand, ergriff mit der linken Hand das Haarbüschel mitsamt dem Haarknoten und schnitt es ab. Das Haar wurde zwei Finger breit kurz, lockte sich nach rechts und schmiegte sich eng an den Kopf. Diese Länge behielt das Haar für den Rest seines Lebens, und der Bart entsprach ihm; es gab nie wieder die Notwendigkeit, Haar oder Bart zu scheren. Der Bodhisatta ergriff das Haarbüschel samt dem Haarknoten, warf es in die Luft und sprach: „Wenn ich wahrlich ein Buddha werden soll, möge es in der Luft stehen bleiben; wenn nicht, möge es auf die Erde fallen!“ Jenes juwelengeschmückte Haarbündel stieg eine Yojana weit empor und blieb in der Luft stehen. Sakka, der König der Götter, erblickte dies mit dem himmlischen Auge, fing es mit einem eine Yojana großen, juwelenbesetzten Korb auf und errichtete im Reich der Tāvatiṃsa-Götter das Cūḷāmaṇi-Heiligtum. ‘‘Chetvāna moḷiṃ varagandhavāsitaṃ, vehāyasaṃ ukkhipi aggapuggalo; Sahassanetto sirasā paṭiggahi, suvaṇṇacaṅkoṭavarena vāsavo’’ti. „Nachdem er den mit erlesenen Düften parfümierten Haarknoten abgeschnitten hatte, warf das höchste aller Wesen ihn in den Himmel empor; der Tausendäugige Vāsava (Sakka) fing ihn ehrerbietig auf dem Haupte in einem kostbaren goldenen Korb auf.“ Puna bodhisatto cintesi ‘‘imāni kāsikavatthāni mayhaṃ na samaṇasāruppānī’’ti. Athassa kassapabuddhakāle purāṇasahāyako ghaṭīkāramahābrahmā ekaṃ buddhantaraṃ jaraṃ apattena mittabhāvena cintesi – ‘‘ajja me sahāyako mahābhinikkhamanaṃ nikkhanto, samaṇaparikkhāramassa gahetvā gacchissāmī’’ti. Wiederum dachte der Bodhisatta: „Diese Gewänder aus Kāsī-Seide sind für einen Asketen nicht angemessen.“ Da dachte der Große Brahma Ghaṭīkāra, sein einstiger Gefährte zur Zeit des Buddha Kassapa – geleitet von einer Freundschaft, die über eine ganze Buddha-Zwischenzeit hinweg unverändert geblieben war –: „Heute ist mein Gefährte zum Großen Aufbruch ausgezogen. Ich will die Utensilien eines Asketen für ihn mitnehmen und zu ihm gehen.“ ‘‘Ticīvarañca patto ca, vāsī sūci ca bandhanaṃ; Parissāvanena aṭṭhete, yuttayogassa bhikkhuno’’ti. – „Die dreifache Robe, die Almosenschale, das Rasiermesser, die Nadel, der Gürtel und der Wasserfilter – diese acht Dinge gehören dem um die geistige Praxis bemühten Mönch.“ Ime aṭṭha samaṇaparikkhāre āharitvā adāsi. Bodhisatto arahaddhajaṃ nivāsetvā uttamapabbajjāvesaṃ gaṇhitvā ‘‘channa, mama vacanena mātāpitūnaṃ ārogyaṃ vadehī’’ti vatvā uyyojesi. Channo bodhisattaṃ vanditvā padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi. Kaṇḍako pana channena saddhiṃ mantayamānassa bodhisattassa vacanaṃ suṇanto ṭhatvā ‘‘natthi dāni mayhaṃ puna sāmino dassana’’nti cakkhupathaṃ vijahanto sokaṃ adhivāsetuṃ asakkonto hadayena phalitena kālaṃ katvā tāvatiṃsabhavane kaṇḍako nāma devaputto hutvā nibbatti. Channassa paṭhamaṃ ekova soko [Pg.77] ahosi, kaṇḍakassa pana kālakiriyāya dutiyena sokena pīḷito rodanto paridevanto nagaraṃ agamāsi. Er brachte diese acht Utensilien eines Asketen herbei und überreichte sie ihm. Der Bodhisatta legte das Gewand, das das Banner der Arahants ist, an, nahm das edle Gewand eines Asketen an und entließ Channa mit den Worten: „Channa, richte meinen Eltern in meinem Namen Grüße und Wünsche für ihr Wohlergehen aus.“ Channa verneigte sich vor dem Bodhisatta, umrundete ihn ehrfurchtsvoll rechtsherum und ging fort. Das Pferd Kanthaka aber stand da und lauschte den Worten des Bodhisatta, der mit Channa sprach. Bei dem Gedanken „Nun werde ich meinen Herrn nie wiedersehen“ verlor es ihn aus den Augen. Unfähig, den großen Schmerz zu ertragen, verstarb es an gebrochenem Herzen und wurde im Reich der Tāvatiṃsa-Götter als ein Göttersohn namens Kanthaka wiedergeboren. Channa hatte anfangs nur den einen Schmerz der Trennung; nun aber, gepeinigt von einem zweiten Schmerz über den Tod Kanthakas, kehrte er weinend und klagend in die Stadt zurück. Bodhisattopi pabbajitvā tasmiṃyeva padese anupiyaṃ nāma ambavanaṃ atthi, tattha sattāhaṃ pabbajjāsukhena vītināmetvā ekadivaseneva tiṃsayojanamaggaṃ padasā gantvā rājagahaṃ pāvisi. Pavisitvā sapadānaṃ piṇḍāya cari. Sakalanagaraṃ bodhisattassa rūpadassanena dhanapālakena paviṭṭharājagahaṃ viya asurindena paviṭṭhadevanagaraṃ viya ca saṅkhobhaṃ agamāsi. Rājapurisā gantvā ‘‘deva, evarūpo nāma satto nagare piṇḍāya carati, ‘devo vā manusso vā nāgo vā supaṇṇo vā ko nāmeso’ti na jānāmā’’ti ārocesuṃ. Rājā pāsādatale ṭhatvā mahāpurisaṃ disvā acchariyabbhutajāto purise āṇāpesi – ‘‘gacchatha bhaṇe, vīmaṃsatha, sace amanusso bhavissati, nagarā nikkhamitvā antaradhāyissati, sace devatā bhavissati, ākāsena gacchissati, sace nāgo bhavissati, pathaviyaṃ nimujjitvā gamissati, sace manusso bhavissati, yathāladdhaṃ bhikkhaṃ paribhuñjissatī’’ti. Auch der Bodhisatta, der nun ein Asket geworden war, verweilte in jener Gegend sieben Tage lang im Glück des asketischen Lebens in einem Mangohain namens Anupiya. Danach legte er an einem einzigen Tag eine Strecke von dreißig Yojanas zu Fuß zurück und betrat die Stadt Rājagaha. Nachdem er eingetreten war, zog er von Haus zu Haus, um Almosen zu sammeln. Die ganze Stadt geriet beim Anblick der Gestalt des Bodhisatta in helle Aufregung, gleichwie Rājagaha beim Einzug des Elefanten Dhanapālaka oder die Stadt der Götter beim Einbrechen des Asurenkönigs. Die königlichen Diener begaben sich zum König und berichteten: „O König, ein Wesen von solch außergewöhnlicher Gestalt zieht in der Stadt auf Almosengang. Wir wissen nicht, wer er ist – ob ein Gott, ein Mensch, ein Nāga oder ein Supaṇṇa.“ Der König stand auf der Terrasse seines Palastes, erblickte den Großen Mann und war von Staunen und Verwunderung ergriffen. Er befahl seinen Männern: „Geht, ihr Männer, und beobachtet ihn! Wenn es ein Geistwesen ist, wird er die Stadt verlassen und verschwinden; wenn es eine Gottheit ist, wird sie durch die Luft dahinschweben; wenn es ein Nāga ist, wird er in die Erde einsinken und davonziehen; wenn es jedoch ein Mensch ist, wird er die erhaltene Almosenspeise verzehren.“ Mahāpurisopi kho missakabhattaṃ saṃharitvā ‘‘alaṃ me ettakaṃ yāpanāyā’’ti ñatvā paviṭṭhadvāreneva nagarā nikkhamitvā paṇḍavapabbatacchāyāya puratthābhimukho nisīditvā āhāraṃ paribhuñjituṃ āraddho. Athassa antāni parivattitvā mukhena nikkhamanākārappattāni viya ahesuṃ. Tato tena attabhāvena evarūpassa āhārassa cakkhunāpi adiṭṭhapubbatāya tena paṭikūlāhārena aṭṭiyamāno evaṃ attanāva attānaṃ ovadi ‘‘siddhattha, tvaṃ sulabhannapāne kule tivassikagandhasālibhojanaṃ nānaggarasehi bhuñjanaṭṭhāne nibbattitvāpi ekaṃ paṃsukūlikaṃ disvā ‘kadā nu kho ahampi evarūpo hutvā piṇḍāya caritvā bhuñjissāmi, bhavissati nu kho me so kālo’ti cintetvā nikkhanto, idāni kiṃ nāmetaṃ karosī’’ti. Evaṃ attanāva attānaṃ ovaditvā nibbikāro hutvā āhāraṃ paribhuñji. Auch der Große Mann sammelte die verschiedenartigen Speisen ein. Als er erkannte: „Dies reicht mir hin zum Lebensunterhalt“, verließ er die Stadt durch dasselbe Tor, durch das er gekommen war, setzte sich im Schatten des Paṇḍava-Berges mit dem Gesicht nach Osten gewandt nieder und begann, die Nahrung zu verzehren. Da drehten sich seine Eingeweide um und es schien fast, als wollten sie ihm zum Munde herauskommen. Weil er in diesem Dasein eine solche Speise noch nie zuvor auch nur mit Augen erblickt hatte, empfand er tiefen Widerwillen gegen diese ekelerregende Nahrung. Da ermahnte er sich selbst mit den Worten: „Siddhattha, obwohl du in einer Familie geboren wurdest, in der Speise und Trank im Überfluss vorhanden waren, und wo du dreijährigen, duftenden Sāli-Reis mit den erlesensten Aromen speistest, hast du beim Anblick eines Lumpen tragenden Asketen gedacht: ‚Wann wohl werde auch ich so werden, auf Almosengang gehen und meine Speise verzehren? Wird diese Zeit wohl jemals für mich kommen?‘ Mit diesem Gedanken bist du in die Hauslosigkeit hinausgezogen. Warum also sträubst du dich jetzt dagegen?“ Nachdem er sich selbst so ermahnt hatte, verzehrte er die Nahrung ohne jeden Widerwillen. Rājapurisā taṃ pavattiṃ disvā gantvā rañño ārocesuṃ. Rājā dūtavacanaṃ sutvā vegena nagarā nikkhamitvā bodhisattassa santikaṃ gantvā iriyāpathasmiṃyeva pasīditvā bodhisattassa sabbaṃ issariyaṃ niyyādesi[Pg.78]. Bodhisatto ‘‘mayhaṃ, mahārāja, vatthukāmehi vā kilesakāmehi vā attho natthi, ahaṃ paramābhisambodhiṃ patthayanto nikkhanto’’ti āha. Rājā anekappakāraṃ yācantopi tassa cittaṃ alabhitvā ‘‘addhā tvaṃ buddho bhavissasi, buddhabhūtena pana te paṭhamaṃ mama vijitaṃ āgantabba’’nti paṭiññaṃ gaṇhi. Ayamettha saṅkhepo, vitthāro pana ‘‘pabbajjaṃ kittayissāmi, yathā pabbaji cakkhumā’’ti imaṃ pabbajjāsuttaṃ (su. ni. 407 ādayo) saddhiṃ aṭṭhakathāya oloketvā veditabbo. Als die königlichen Diener diesen Vorfall sahen, eilten sie hin und berichteten es dem König. Als der König die Worte des Boten vernahm, verließ er in großer Eile die Stadt, begab sich zum Bodhisatta und fasste allein schon aufgrund von dessen würdevoller Haltung solches Vertrauen zu ihm, dass er dem Bodhisatta seine gesamte Herrschaft anbot. Der Bodhisatta sprach: „O König, ich habe kein Verlangen nach den Objekten der Sinnlichkeit oder nach den sinnlichen Trieben. Ich bin in die Hauslosigkeit hinausgezogen, weil ich nach der höchsten, vollkommenen Erleuchtung strebe.“ Obwohl der König ihn auf mannigfaltige Weise anflehte, konnte er den Entschluss des Bodhisatta nicht beugen. Schließlich rang er ihm das Versprechen ab: „Gewiss wirst du ein Buddha werden. Sobald du aber die Buddhaschaft erlangt hast, musst du als Erstes mein Reich besuchen.“ Dies ist hier die Zusammenfassung. Die ausführliche Darstellung jedoch ist zu verstehen, indem man das Pabbajjā-Sutta („Ich will das Hinausziehen preisen, wie der Sehende hinauszog...“) zusammen mit seinem Kommentar studiert. Bodhisattopi rañño paṭiññaṃ datvā anupubbena cārikaṃ caramāno āḷārañca kālāmaṃ udakañca rāmaputtaṃ upasaṅkamitvā samāpattiyo nibbattetvā ‘‘nāyaṃ maggo bodhāyā’’ti tampi samāpattibhāvanaṃ analaṅkaritvā sadevakassa lokassa attano thāmavīriyasandassanatthaṃ mahāpadhānaṃ padahitukāmo uruvelaṃ gantvā ‘‘ramaṇīyo vatāyaṃ bhūmibhāgo’’ti tattheva vāsaṃ upagantvā mahāpadhānaṃ padahi. Tepi kho koṇḍaññappamukhā pañca pabbajitā gāmanigamarājadhānīsu bhikkhāya carantā tattha bodhisattaṃ sampāpuṇiṃsu. Atha naṃ chabbassāni mahāpadhānaṃ padahantaṃ ‘‘idāni buddho bhavissati, idāni buddho bhavissatī’’ti pariveṇasammajjanādikāya vattapaṭipattiyā upaṭṭhahamānā santikāvacarāvassa ahesuṃ. Bodhisattopi kho ‘‘koṭippattaṃ dukkarakāriyaṃ karissāmī’’ti ekatilataṇḍulādīhipi vītināmesi, sabbasopi āhārūpacchedaṃ akāsi, devatāpi lomakūpehi ojaṃ upasaṃharamānā paṭikkhipi. Auch der Bodhisatta gab dem König sein Versprechen und begab sich allmählich auf Wanderschaft. Er suchte Āḷāra Kālāma und Uddaka, den Sohn Rāmas, auf und erlangte die meditativen Errungenschaften. Doch er erkannte: „Dies ist nicht der Weg zur Erleuchtung“, fand an jener Entfaltung der meditativen Errungenschaften kein Wohlgefallen und wünschte, um der Welt samt ihren Göttern seine eigene Kraft und Willensstärke zu zeigen, die große Anstrengung auf sich zu nehmen. So ging er nach Uruvelā, dachte: „Lieblich ist wahrlich dieser Landstrich!“, ließ sich ebendort nieder und übte sich in der großen Anstrengung. Auch jene fünf Asketen, angeführt von Koṇḍañña, die in den Dörfern, Marktflecken und Königsstädten auf Almosengang gingen, trafen dort auf den Bodhisatta. Während er sechs Jahre lang die große Anstrengung vollzog, dienten sie ihm stets in seiner Nähe mit Pflichten wie dem Kehren seiner Zelle und dachten: „Jetzt wird er ein Buddha werden, jetzt wird er ein Buddha werden.“ Auch der Bodhisatta dachte: „Ich will die äußerste Selbstkasteiung vollziehen“, und verbrachte die Zeit, indem er sich von nur einem einzelnen Sesamkorn, einem Reiskorn oder Ähnlichem ernährte, bis er schließlich jegliche Nahrung völlig einstellte. Selbst die Gottheiten, die ihm durch seine Poren feinstoffliche Nahrung einflößen wollten, wies er ab. Athassa tāya nirāhāratāya paramakasimānappattakāyassa suvaṇṇavaṇṇo kāyo kāḷavaṇṇo ahosi. Bāttiṃsamahāpurisalakkhaṇāni paṭicchannāni ahesuṃ. Appekadā appāṇakaṃ jhānaṃ jhāyanto mahāvedanāhi abhitunno visaññībhūto caṅkamanakoṭiyaṃ patati. Atha naṃ ekaccā devatā ‘‘kālakato samaṇo gotamo’’ti vadanti, ekaccā ‘‘vihāroveso arahata’’nti āhaṃsu. Tattha yāsaṃ ‘‘kālakato’’ti ahosi, tā gantvā suddhodanamahārājassa ārocesuṃ ‘‘tumhākaṃ putto kālakato’’ti. Mama putto buddho hutvā kālakato, ahutvāti? Buddho bhavituṃ nāsakkhi, padhānabhūmiyaṃyeva patitvā [Pg.79] kālakatoti. Idaṃ sutvā rājā ‘‘nāhaṃ saddahāmi, mama puttassa bodhiṃ appatvā kālakiriyā nāma natthī’’ti paṭikkhipi. Kasmā pana rājā na saddahatīti? Kāḷadevīlatāpasassa vandāpanadivase jamburukkhamūle ca pāṭihāriyānaṃ diṭṭhattā. Aufgrund dieser Nahrungslosigkeit wurde sein Körper, der die äußerste Grenze der Magerkeit erreicht hatte, schwarz anstatt goldfarben. Die zweiunddreißig Merkmale eines großen Mannes wurden unsichtbar. Manchmal, als er die atemlose Meditation übte, verlor er, von heftigen Schmerzen geplagt, das Bewusstsein und brach am Ende des Wandelpfades zusammen. Da sagten einige Gottheiten: „Der Asket Gotama ist gestorben“, während andere sagten: „Dies ist nur die Weise des Verweilens der Arahants.“ Unter ihnen gingen jene, die dachten: „Er ist gestorben“, zum Großkönig Suddhodana und berichteten ihm: „Euer Sohn ist gestorben.“ Der König fragte: „Ist mein Sohn als Buddha gestorben oder ohne die Erleuchtung erlangt zu haben?“ Sie antworteten: „Er konnte kein Buddha werden, sondern brach auf dem Boden seiner Anstrengung zusammen und verstarb.“ Als der König dies hörte, wies er es zurück und sprach: „Ich glaube das nicht. Für meinen Sohn gibt es kein Sterben, ohne dass er zuvor die Erleuchtung erlangt hat.“ Warum aber glaubte es der König nicht? Weil er die Wunder am Tage der Ehrerbietung vor dem Asketen Kāḷadevela und im Schatten des Jambulbaums gesehen hatte. Puna bodhisatte saññaṃ paṭilabhitvā uṭṭhite tā devatā gantvā ‘‘arogo te mahārāja putto’’ti ārocenti. Rājā ‘‘jānāmahaṃ puttassa amaraṇabhāva’’nti vadati. Mahāsattassa chabbassāni dukkarakāriyaṃ karontassa ākāse gaṇṭhikaraṇakālo viya ahosi. So ‘‘ayaṃ dukkarakārikā nāma bodhāya maggo na hotī’’ti oḷārikaṃ āhāraṃ āhāretuṃ gāmanigamesu piṇḍāya caritvā āhāraṃ āhari, athassa bāttiṃsamahāpurisalakkhaṇāni pākatikāni ahesuṃ, kāyo suvaṇṇavaṇṇo ahosi. Pañcavaggiyā bhikkhū ‘‘ayaṃ chabbassāni dukkarakārikaṃ karontopi sabbaññutaṃ paṭivijjhituṃ nāsakkhi, idāni gāmādīsu piṇḍāya caritvā oḷārikaṃ āhāraṃ āhariyamāno kiṃ sakkhissati, bāhuliko esa padhānavibbhanto, sīsaṃ nhāyitukāmassa ussāvabindutakkanaṃ viya amhākaṃ etassa santikā visesatakkanaṃ, kiṃ no iminā’’ti mahāpurisaṃ pahāya attano attano pattacīvaraṃ gahetvā aṭṭhārasayojanamaggaṃ gantvā isipatanaṃ pavisiṃsu. Als der Bodhisatta wieder zu Bewusstsein kam und aufstand, gingen jene Gottheiten hin und berichteten: „Großer König, Euer Sohn ist wohlauf.“ Der König sprach: „Ich weiß um das Nicht-Sterben meines Sohnes.“ Für das Große Wesen, das sechs Jahre lang diese qualvollen Kasteiungen vollzog, war jene Zeit wie der Versuch, Knoten in die Luft zu knüpfen. Er erkannte: „Diese Kasteiung ist nicht der Weg zur Erleuchtung“, begab sich in Dörfern und Marktflecken auf Almosengang, um feste Nahrung zu sich zu nehmen, und aß. Daraufhin kehrten seine zweiunddreißig Merkmale eines großen Mannes in ihren natürlichen Zustand zurück, und sein Körper wurde wieder goldfarben. Die fünf Asketen jedoch dachten: „Selbst als dieser Mann sechs Jahre lang qualvolle Kasteiungen vollzog, vermochte er die Allwissenheit nicht zu erlangen. Wie soll er sie jetzt erlangen, da er in den Dörfern auf Almosengang geht und feste Nahrung zu sich nimmt? Er ist dem Luxus verfallen und von der Anstrengung abgefallen. Unsere Erwartung, von ihm eine höhere Errungenschaft zu erlangen, ist so wie die Hoffnung von jemandem, der sein Haupt baden will, dies mit einem Tautropfen zu tun. Was nützt uns dieser Mann noch?“ Sie verließen das Große Wesen, nahmen ihre Schalen und Gewänder, legten einen Weg von achtzehn Yojanas zurück und begaben sich nach Isipatana. Tena kho pana samayena uruvelāyaṃ senānigame senānikuṭumbikassa gehe nibbattā sujātā nāma dārikā vayappattā ekasmiṃ nigrodharukkhe patthanaṃ akāsi ‘‘sace samajātikaṃ kulagharaṃ gantvā paṭhamagabbhe puttaṃ labhissāmi, anusaṃvaccharaṃ te satasahassapariccāgena balikammaṃ karissāmī’’ti. Tassā sā patthanā samijjhi. Sā mahāsattassa dukkarakārikaṃ karontassa chaṭṭhe vasse paripuṇṇe visākhapuṇṇamāyaṃ balikammaṃ kātukāmā hutvā puretaraṃ dhenusahassaṃ laṭṭhimadhukavane carāpetvā tāsaṃ khīraṃ pañca dhenusatāni pāyetvā tāsaṃ khīraṃ aḍḍhatiyānīti evaṃ yāva soḷasannaṃ dhenūnaṃ khīraṃ aṭṭha dhenuyo pivanti, tāva khīrassa bahalatañca madhuratañca ojavantatañca patthayamānā khīraparivattanaṃ nāma akāsi. Sā visākhapuṇṇamadivase ‘‘pātova balikammaṃ karissāmī’’ti rattiyā paccūsasamayaṃ paccuṭṭhāya tā aṭṭha dhenuyo duhāpesi. Vacchakā [Pg.80] dhenūnaṃ thanamūlaṃ nāgamiṃsu, thanamūle pana navabhājane upanītamatte attano dhammatāya khīradhārā pavattiṃsu. Taṃ acchariyaṃ disvā sujātā sahattheneva khīraṃ gahetvā navabhājane pakkhipitvā sahattheneva aggiṃ katvā pacituṃ ārabhi. Zu jener Zeit war im Dorf Senā in Uruvelā im Hause des Großgrundbesitzers Senāni ein Mädchen namens Sujātā geboren worden. Als sie herangewachsen war, legte sie an einem Banyanbaum ein Gelübde ab: „Wenn ich in eine Familie gleichen Standes heirate und bei meiner ersten Schwangerschaft einen Sohn gebäre, will ich dir alljährlich mit einem Opfer im Wert von einhunderttausend Münzen huldigen.“ Ihr Wunsch ging in Erfüllung. Als das sechste Jahr der Selbstkasteiung des Großen Wesens vollendet war, wollte sie am Vollmondtag des Monats Visākha ein Opfer darbringen. Zuvor ließ sie tausend Milchkühe im Süßholz-Wald weiden, gab deren Milch fünfhundert Milchkühen zu trinken, deren Milch wiederum zweihundertfünfzig Kühen, und verfuhr so weiter, bis schließlich die Milch von sechzehn Kühen von acht Kühen getrunken wurde. So vollzog sie diese Milch-Verfeinerung, um die Milch besonders dickflüssig, süß und nahrhaft zu machen. Am Vollmondtag des Visākha dachte sie: „Ich will das Opfer am frühen Morgen darbringen“, stand in der Morgendämmerung auf und ließ jene acht Kühe melken. Die Kälber näherten sich den Eutern der Kühe nicht einmal. Doch sobald ein neues Gefäß unter die Euter gehalten wurde, floss der Milchstrom aus eigener Natur von selbst. Als Sujātā dieses Wunder sah, nahm sie die Milch mit eigenen Händen, goss sie in das neue Gefäß, entfachte mit eigenen Händen das Feuer und begann, sie zu kochen. Tasmiṃ pāyāse paccamāne mahantamahantā bubbuḷā uṭṭhahitvā dakkhiṇāvattā hutvā sañcaranti, ekaphusitampi bahi na patati, uddhanato appamattakopi dhūmo na uṭṭhahati. Tasmiṃ samaye cattāro lokapālā āgantvā uddhane ārakkhaṃ gaṇhiṃsu, mahābrahmā chattaṃ dhāresi, sakko alātāni samānento aggiṃ jālesi. Devatā dvisahassadīpaparivāresu catūsu mahādīpesu devānañca manussānañca upakappanaojaṃ attano devānubhāvena daṇḍakabaddhaṃ madhupaṭalaṃ pīḷetvā madhuṃ gaṇhamānā viya saṃharitvā tattha pakkhipiṃsu. Aññesu hi kālesu devatā kabaḷe kabaḷe ojaṃ pakkhipanti, sambodhidivase ca pana parinibbānadivase ca ukkhaliyaṃyeva pakkhipanti. Sujātā ekadivaseyeva tattha attano pākaṭāni anekāni acchariyāni disvā puṇṇaṃ dāsiṃ āmantesi ‘‘amma puṇṇe, ajja amhākaṃ devatā ativiya pasannā, mayā ettake kāle evarūpaṃ acchariyaṃ nāma na diṭṭhapubbaṃ, vegena gantvā devaṭṭhānaṃ paṭijaggāhī’’ti. Sā ‘‘sādhu, ayye’’ti tassā vacanaṃ sampaṭicchitvā turitaturitā rukkhamūlaṃ agamāsi. Während dieser Milchreis kochte, stiegen sehr große Blasen auf und wirbelten im Uhrzeigersinn herum; nicht ein einziger Tropfen fiel nach draußen, und aus der Feuerstelle stieg nicht einmal der geringste Rauch auf. In diesem Moment kamen die vier Weltenhüter herbei und hielten Wache an der Feuerstelle; der große Brahma hielt einen Schirm über das Gefäß, und Sakka ordnete die Holzscheite und schürte das Feuer. Die Gottheiten sammelten auf den vier großen Kontinenten mitsamt ihren zweitausend kleinen Begleitinseln die den Göttern und Menschen zuträgliche Lebenskraft durch ihre göttliche Macht – wie man Honig aus einer an einem Zweig hängenden Honigwabe presst – und gaben sie in jenen Milchreis hinein. Zu anderen Zeiten nämlich geben die Gottheiten die Lebenskraft Bissen für Bissen hinzu; am Tag der Erleuchtung und am Tag des Parinibbāna jedoch tun sie sie direkt in den Kochtopf. Als Sujātā an diesem einzigen Tag dort so viele außergewöhnliche Wunder mit eigenen Augen sah, rief sie ihre Magd Puṇṇā und sprach: „Liebe Puṇṇā, heute ist unsere Gottheit uns überaus wohlgesinnt. In all dieser Zeit habe ich noch nie ein solches Wunder gesehen. Geh schnell hin und fege den Platz der Gottheit.“ Diese willigte ein: „Sehr wohl, Herrin“, nahm ihre Worte an und eilte geschwind zum Fuße des Baumes. Bodhisattopi kho tasmiṃ rattibhāge pañca mahāsupine disvā pariggaṇhanto ‘‘nissaṃsayenāhaṃ ajja buddho bhavissāmī’’ti katasanniṭṭhāno tassā rattiyā accayena katasarīrapaṭijaggano bhikkhācārakālaṃ āgamayamāno pātova āgantvā tasmiṃ rukkhamūle nisīdi attano pabhāya sakalarukkhaṃ obhāsayamāno. Atha kho sā puṇṇā āgantvā addasa bodhisattaṃ rukkhamūle pācīnalokadhātuṃ olokayamānaṃ nisinnaṃ, sarīrato cassa nikkhantāhi pabhāhi sakalarukkhaṃ suvaṇṇavaṇṇaṃ. Disvā tassā etadahosi – ‘‘ajja amhākaṃ devatā rukkhato oruyha sahattheneva balikammaṃ sampaṭicchituṃ nisinnā maññe’’ti ubbegappattā hutvā vegenāgantvā sujātāya etamatthaṃ ārocesi. Auch der Bodhisatta, der in jener Nachtphase die fünf großen Träume gesehen und erwogen hatte, fasste den festen Entschluss: „Zweifellos werde ich heute ein Buddha werden.“ Nach dem Vergehen jener Nacht verrichtete er die Körperpflege, wartete auf die Zeit für den Almosengang, kam schon am frühen Morgen herbei und setzte sich am Fuße jenes Baumes nieder, wobei er den ganzen Baum mit seiner eigenen Ausstrahlung erleuchtete. Da kam die Magd Puṇṇā herbei und sah den Bodhisatta am Fuße des Baumes sitzen, wie er nach Osten blickte, und den gesamten Baum im goldenen Glanz der Strahlen, die aus seinem Körper drangen. Als sie dies sah, dachte sie bei sich: „Heute ist wohl unsere Baumgottheit vom Baum herabgestiegen und sitscht hier, um das Speiseopfer mit eigener Hand entgegenzunehmen.“ Von großer Aufregung ergriffen, lief sie schnell herbei und berichtete Sujātā diese Angelegenheit. Sujātā [Pg.81] tassā vacanaṃ sutvā tuṭṭhamānasā hutvā ‘‘ajja dāni paṭṭhāya mama jeṭṭhadhītuṭṭhāne tiṭṭhāhī’’ti dhītu anucchavikaṃ sabbālaṅkāraṃ adāsi. Yasmā pana buddhabhāvaṃ pāpuṇanadivase satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ laddhuṃ vaṭṭati, tasmā sā ‘‘suvaṇṇapātiyaṃ pāyāsaṃ pakkhipissāmī’’ti cittaṃ uppādetvā satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ nīharāpetvā tattha pāyāsaṃ pakkhipitukāmā pakkabhājanaṃ āvajjesi. ‘Sabbo pāyāso padumapattā udakaṃ viya vinivattitvā pātiyaṃ patiṭṭhāsi, ekapātipūramattova ahosi’. Sā taṃ pātiṃ aññāya suvaṇṇapātiyā paṭikujjitvā odātavatthena veṭhetvā sabbālaṅkārehi attabhāvaṃ alaṅkaritvā taṃ pātiṃ attano sīse ṭhapetvā mahantena ānubhāvena nigrodharukkhamūlaṃ gantvā bodhisattaṃ oloketvā balavasomanassajātā ‘‘rukkhadevatā’’ti saññāya diṭṭhaṭṭhānato paṭṭhāya onatonatā gantvā sīsato pātiṃ otāretvā vivaritvā suvaṇṇabhiṅkārena gandhapupphavāsitaṃ udakaṃ gahetvā bodhisattaṃ upagantvā aṭṭhāsi. Ghaṭīkāramahābrahmunā dinno mattikāpatto ettakaṃ addhānaṃ bodhisattaṃ avijahitvā tasmiṃ khaṇe adassanaṃ gato, bodhisatto pattaṃ apassanto dakkhiṇahatthaṃ pasāretvā udakaṃ sampaṭicchi. Sujātā saheva pātiyā pāyāsaṃ mahāpurisassa hatthe ṭhapesi, mahāpuriso sujātaṃ olokesi. Sā ākāraṃ sallakkhetvā ‘‘ayya, mayā tumhākaṃ pariccattaṃ, gaṇhitvā yathāruciṃ gacchathā’’ti vanditvā ‘‘yathā mayhaṃ manoratho nipphanno, evaṃ tumhākampi nipphajjatū’’ti vatvā satasahassagghanikāya suvaṇṇapātiyā purāṇapaṇṇe viya anapekkhā hutvā pakkāmi. Als Sujātā ihre Worte hörte, war sie hocherfreut und sprach: „Von heute an nimm die Stellung meiner ältesten Tochter ein!“ Und sie gab ihr allen Schmuck, der einer Tochter angemessen ist. Da es sich jedoch geziemt, am Tag des Erreichens der Buddhaschaft eine goldene Schale im Wert von einhunderttausend Münzen zu erhalten, fasste sie den Entschluss: „Ich will den Milchreis in eine goldene Schale füllen.“ Sie ließ die hunderttausend wertvolle goldene Schale herbeibringen und neigte, in der Absicht, den Milchreis hineinzufüllen, das Kochgefäß. Der gesamte Milchreis glitt hinab wie Wasser von einem Lotusblatt, sammelte sich in der Schale und füllte genau diese eine Schale aus. Sie deckte diese Schale mit einer anderen goldenen Schale ab, wickelte sie in ein reines weißes Tuch, schmückte sich selbst mit all ihrem Schmuck, stellte die Schale auf ihren Kopf und ging mit großem Prunk zum Fuße des Banyanbaumes. Als sie den Bodhisatta erblickte, geriet sie in große Freude. In der Annahme, er sei die Baumgottheit, schritt sie von der Stelle an, an der sie ihn erblickt hatte, tief gebeugt voran, ließ die Schale von ihrem Kopf herabnehmen, öffnete sie, nahm mit einem goldenen Krug das mit Duftstoffen und Blumen parfümierte Wasser, trat an den Bodhisatta heran und blieb stehen. Die Tonschale, die ihm vom großen Brahma Ghaṭīkāra dargebracht worden war und die den Bodhisatta während dieser ganzen Zeit nicht verlassen hatte, verschwand in diesem Augenblick. Da der Bodhisatta die Almosenschale nicht sah, streckte er seine rechte Hand aus und empfing das Wasser. Sujātā stellte den Milchreis mitsamt der goldenen Schale in die Hand des Großen Mannes. Der Große Mann blickte Sujātā an. Sie bemerkte seine Geste und sprach: „Ehrwürdiger Herr, alles wurde von mir für Euch dargebracht; nehmt es und geht, wohin es Euch beliebt.“ Sie verneigte sich vor ihm und sprach: „Wie mein Wunsch in Erfüllung gegangen ist, so möge auch Euer Wunsch in Erfüllung gehen!“ So ging sie fort, ohne die hunderttausend wertvolle goldene Schale im Mindesten zu beachten, als wäre sie ein welkes Blatt. Bodhisattopi kho nisinnaṭṭhānā uṭṭhāya rukkhaṃ padakkhiṇaṃ katvā pātiṃ ādāya nerañjarāya tīraṃ gantvā anekesaṃ bodhisattasahassānaṃ abhisambujjhanadivase otaritvā nhānaṭṭhānaṃ suppatiṭṭhitatitthaṃ nāma atthi, tassa tīre pātiṃ ṭhapetvā otaritvā nhatvā anekabuddhasatasahassānaṃ nivāsanaṃ arahaddhajaṃ nivāsetvā puratthābhimukho nisīditvā ekaṭṭhitālapakkappamāṇe ekūnapaññāsa piṇḍe katvā sabbaṃ appodakaṃ madhupāyāsaṃ paribhuñji. So eva hissa buddhabhūtassa sattasattāhaṃ bodhimaṇḍe vasantassa ekūnapaññāsa divasāni āhāro ahosi. Ettakaṃ kālaṃ [Pg.82] neva añño āhāro atthi, na nhānaṃ, na mukhadhovanaṃ, na sarīravaḷañjo, jhānasukhena maggasukhena phalasukhena ca vītināmesi. Taṃ pana pāyāsaṃ paribhuñjitvā suvaṇṇapātiṃ gahetvā ‘‘sacāhaṃ, ajja buddho bhavituṃ sakkhissāmi, ayaṃ pāti paṭisotaṃ gacchatu, no ce sakkhissāmi, anusotaṃ gacchatū’’ti vatvā nadīsote pakkhipi. Sā sotaṃ chindamānā nadīmajjhaṃ gantvā majjhamajjhaṭṭhāneneva javasampanno asso viya asītihatthamattaṭṭhānaṃ paṭisotaṃ gantvā ekasmiṃ āvaṭṭe nimujjitvā kāḷanāgarājabhavanaṃ gantvā tiṇṇaṃ buddhānaṃ paribhogapātiyo ‘‘kili kilī’’ti ravaṃ kārayamānā paharitvāva tāsaṃ sabbaheṭṭhimā hutvā aṭṭhāsi. Kāḷo nāgarājā taṃ saddaṃ sutvā ‘‘hiyyo eko buddho nibbatto, puna ajja eko nibbatto’’ti vatvā anekehi padasatehi thutiyo vadamāno uṭṭhāsi. Tassa kira mahāpathaviyā ekayojanatigāvutappamāṇaṃ nabhaṃ pūretvā ārohanakālo ‘‘ajja vā hiyyo vā’’ti sadiso ahosi. Auch der Bodhisatta erhob sich von seinem Sitz, umschritt den Baum ehrerbietig, nahm die goldene Schale und ging an das Ufer des Nerañjarā-Flusses. Es gibt dort eine Badestelle namens Suppatiṭṭhita-Furt, wohin viele tausend Bodhisattas an ihrem Tag der Erleuchtung herabgestiegen sind, um zu baden. Er stellte die Schale an deren Ufer ab, stieg hinab, badete, legte das Gewand von vielen hunderttausend Buddhas an – das Banner der Arahants –, setzte sich mit dem Gesicht nach Osten gewandt nieder, formte den gesamten wasserfreien, süßen Milchreis zu neunundvierzig Bissen von der Größe reifer Palmyrapalmen-Kerne und verzehrte ihn vollständig. Denn genau dieser Milchreis diente ihm, als er zum Buddha geworden war und sieben Wochen lang auf dem Bodhi-Sitz verweilte, für neunundvierzig Tage als Nahrung. Während dieser ganzen Zeit gab es weder eine andere Nahrung noch ein Bad, kein Gesichtwaschen und keine körperliche Notdurft; er verbrachte die Zeit im Glück der Vertiefung, im Glück des Pfades und im Glück der Frucht. Nachdem er jenen Milchreis verzehrt hatte, nahm er die goldene Schale und sprach den Entschluss: „Wenn ich heute fähig sein werde, ein Buddha zu werden, so möge diese Schale gegen den Strom fließen; wenn ich es nicht vermag, so möge sie mit dem Strom fließen“, und warf sie in die Strömung des Flusses. Sie durchschnitt die Strömung, gelangte in die Mitte des Flusses und floss genau in der Flussmitte wie ein schnelles Pferd etwa achtzig Ellen weit gegen den Strom, versank in einem Strudel, gelangte in das Reich des Schlangenkönigs Kāḷa, stieß klirrend an die von den drei früheren Buddhas benutzten Schalen und kam unter ihnen allen als die unterste zu liegen. Der Schlangenkönig Kāḷa hörte dieses Geräusch, sprach: „Gestern ist ein Buddha erschienen, und heute ist schon wieder einer erschienen!“, erhob sich und verkündete Lobpreisungen in vielen hundert Versen. Die Zeit seines Aufsteigens – wobei er den Himmel über der großen Erde im Ausmaß von einer Yojana und drei Gāvutas ausfüllte – war für ihn so, als wäre es heute oder gestern gewesen. Bodhisattopi nadītīramhi supupphitasālavane divāvihāraṃ katvā sāyanhasamaye pupphānaṃ vaṇṭato muccanakāle devatāhi alaṅkatena aṭṭhūsabhavitthārena maggena sīho viya vijambhamāno bodhirukkhābhimukho pāyāsi. Nāgayakkhasupaṇṇādayo dibbehi gandhapupphādīhi pūjayiṃsu, dibbasaṅgītādīni pavattayiṃsu, dasasahassī lokadhātu ekagandhā ekamālā ekasādhukārā ahosi. Tasmiṃ samaye sotthiyo nāma tiṇahārako tiṇaṃ ādāya paṭipathe āgacchanto mahāpurisassa ākāraṃ ñatvā aṭṭha tiṇamuṭṭhiyo adāsi. Bodhisatto tiṇaṃ gahetvā bodhimaṇḍaṃ āruyha dakkhiṇadisābhāge uttarābhimukho aṭṭhāsi. Tasmiṃ khaṇe dakkhiṇacakkavāḷaṃ osīditvā heṭṭhā avīcisampattaṃ viya ahosi, uttaracakkavāḷaṃ ullaṅghitvā upari bhavaggappattaṃ viya ahosi. Bodhisatto ‘‘idaṃ sambodhiṃ pāpuṇanaṭṭhānaṃ na bhavissati maññe’’ti padakkhiṇaṃ karonto pacchimadisābhāgaṃ gantvā puratthābhimukho aṭṭhāsi, tato pacchimacakkavāḷaṃ osīditvā heṭṭhā avīcisampattaṃ viya ahosi, puratthimacakkavāḷaṃ ullaṅghitvā upari bhavaggappattaṃ viya ahosi. Ṭhitaṭṭhitaṭṭhāne kirassa nemivaṭṭipariyante akkante nābhiyā patiṭṭhitamahāsakaṭacakkaṃ viya [Pg.83] mahāpathavī onatunnatā ahosi. Bodhisatto ‘‘idampi sambodhiṃ pāpuṇanaṭṭhānaṃ na bhavissati maññe’’ti padakkhiṇaṃ karonto uttaradisābhāgaṃ gantvā dakkhiṇābhimukho aṭṭhāsi, tato uttaracakkavāḷaṃ osīditvā heṭṭhā avīcisampattaṃ viya ahosi, dakkhiṇacakkavāḷaṃ ullaṅghitvā upari bhavaggappattaṃ viya ahosi. Bodhisatto ‘‘idampi sambodhiṃ pāpuṇanaṭṭhānaṃ na bhavissati maññe’’ti padakkhiṇaṃ karonto puratthimadisābhāgaṃ gantvā pacchimābhimukho aṭṭhāsi. Puratthimadisābhāge pana sabbabuddhānaṃ pallaṅkaṭṭhānaṃ, taṃ neva chambhati, na kampati. Mahāsatto ‘‘idaṃ sabbabuddhānaṃ avijahitaṃ acalaṭṭhānaṃ kilesapañjaraviddhaṃsanaṭṭhāna’’nti ñatvā tāni tiṇāni agge gahetvā cālesi, tāvadeva cuddasahattho pallaṅko ahosi. Tānipi kho tiṇāni tathārūpena saṇṭhānena saṇṭhahiṃsu, yathārūpaṃ sukusalopi cittakāro vā potthakāro vā ālikhitumpi samattho natthi. Bodhisatto bodhikkhandhaṃ piṭṭhito katvā puratthābhimukho daḷhamānaso hutvā – Auch der Bodhisatta verbrachte den Tag im wohlblühenden Sālahain am Flussufer [der Nerañjarā]. Am Abend, zur Zeit, da die Blüten von ihren Stängeln abfallen, schritt er auf einem von den Devas geschmückten, acht Usabha breiten Weg, sich majestätisch wie ein Löwe reckend, auf den Bodhi-Baum zu. Die Nāgas, Yakkhas, Supaṇṇas und andere verehrten ihn mit himmlischen Duftstoffen, Blumen und dergleichen, und stimmten himmlische Musik und Gesänge an. Das zehntausendfache Weltsystem war erfüllt von einem einzigen Duft, einer einzigen Blumengirlande und einem einzigen Ruf des Beifalls. Zu jener Zeit kam ein Grasschneider namens Sotthiya, der Gras trug, ihm auf dem Weg entgegen. Als er die Gestalt des Großen Wesens erkannte, opferte er acht Hände voll Gras. Der Bodhisatta nahm das Gras entgegen, betrat die Erleuchtungsstätte und stellte sich an der Südseite mit dem Gesicht nach Norden auf. In diesem Moment sank das südliche Weltsystem hinab, als ob es die untere Avīci-Hölle erreichte, während das nördliche Weltsystem emporstieg, als ob es die höchste Ebene des Daseins erreichte. Der Bodhisatta dachte: „Dies ist wohl nicht der Ort, um die vollkommene Erleuchtung zu erlangen“, ging im Uhrzeigersinn um den Baum herum zur Westseite und stellte sich mit dem Gesicht nach Osten auf. Da sank das westliche Weltsystem hinab, als ob es die Avīci-Hölle erreichte, und das östliche Weltsystem stieg empor, als ob es die höchste Daseinsebene erreichte. Überall dort, wo er stand, neigte und hob sich die große Erde wie ein riesiges Wagenrad, das auf seiner Nabe steht, wenn man auf seinen Felgenrand tritt. Der Bodhisatta dachte: „Auch dies ist wohl nicht der Ort, um die vollkommene Erleuchtung zu erlangen“, umrundete den Baum im Uhrzeigersinn, ging zur Nordseite und stellte sich mit dem Gesicht nach Süden auf. Da sank das nördliche Weltsystem hinab, als ob es die Avīci-Hölle erreichte, und das südliche Weltsystem stieg empor, als ob es die höchste Daseinsebene erreichte. Der Bodhisatta dachte: „Auch dies ist wohl nicht der Ort, um die vollkommene Erleuchtung zu erlangen“, ging im Uhrzeigersinn zur Ostseite und stellte sich mit dem Gesicht nach Westen auf. An der Ostseite jedoch befindet sich die Stätte des Throns aller Buddhas; diese wankt nicht und erzittert nicht. Das Große Wesen erkannte: „Dies ist die unerschütterliche Stätte, die von allen Buddhas nicht verlassen wird, der Ort zur Zerstörung des Käfigs der Verunreinigungen“, nahm das Gras an den Spitzen, schüttelte es aus, und augenblicklich entstand ein vierzehn Ellen großer Thron. Dieses Gras ordnete sich in einer solchen Weise an, wie es selbst ein hochbegabter Maler oder Bildhauer nicht aufzuzeichnen oder zu gestalten vermocht hätte. Der Bodhisatta brachte den Stamm des Bodhi-Baumes hinter seinen Rücken, wandte sich nach Osten und fasste mit festem Entschluss den Entschluss: ‘‘Kāmaṃ taco ca nhāru ca, aṭṭhi ca avasissatu; Upasussatu nissesaṃ, sarīre maṃsalohitaṃ’’. „Gerne mögen Haut, Sehnen und Knochen übrigbleiben; mag das Fleisch und Blut in meinem Körper völlig vertrocknen!“ Na tvevāhaṃ sammāsambodhiṃ appatvā imaṃ pallaṅkaṃ bhindissāmīti asanisatasannipātenapi abhejjarūpaṃ aparājitapallaṅkaṃ ābhujitvā nisīdi. „Niemals werde ich diesen Sitz auflösen, ohne die vollkommene Erleuchtung erlangt zu haben!“ Mit diesem festen Entschluss setzte er sich mit gekreuzten Beinen auf den unbesiegbaren Thron, der selbst durch das Einschlagen von hunderten von Blitzen unzerstörbar war. Tasmiṃ samaye māro devaputto ‘‘siddhatthakumāro mayhaṃ vasaṃ atikkamitukāmo, na dānissa atikkamituṃ dassāmī’’ti mārabalassa santikaṃ gantvā etamatthaṃ ārocetvā māraghosanaṃ nāma ghosāpetvā mārabalaṃ ādāya nikkhami. Sā mārasenā mārassa purato dvādasayojanā hoti, dakkhiṇato ca vāmato ca dvādasayojanā, pacchato yāva cakkavāḷapariyantaṃ katvā ṭhitā, uddhaṃ navayojanubbedhā, yassā unnadantiyā unnādasaddo yojanasahassato paṭṭhāya pathaviundriyanasaddo viya suyyati. Atha māro devaputto diyaḍḍhayojanasatikaṃ girimekhalaṃ nāma hatthiṃ abhiruhitvā bāhusahassaṃ māpetvā nānāvudhāni aggahesi. Avasesāyapi māraparisāya dve janā ekasadisaṃ āvudhaṃ na gaṇhiṃsu, nānappakāravaṇṇā nānappakāramukhā hutvā mahāsattaṃ ajjhottharamānā āgamiṃsu. Zu jener Zeit dachte der Deva-Sohn Māra: „Prinz Siddhattha will sich meiner Macht entziehen. Ich werde nicht zulassen, dass er sich ihr jetzt entzieht!“ Er begab sich zu seinem Heer, verkündete ihnen diese Absicht, ließ den Kriegsschrei Māras erschallen und zog mit seiner Armee aus. Dieses Heer Māras erstreckte sich vor Māra über zwölf Yojanas, zur Rechten und zur Linken über zwölf Yojanas und nach hinten reichte es bis an die Grenzen des Weltsystems. Nach oben hin war es neun Yojanas hoch. Wenn dieses Heer schrie, war sein Lärmen noch aus tausend Yojanas Entfernung wie das Geräusch einer berstenden Erde zu hören. Da bestieg der Deva-Sohn Māra sein einhundertfünfzig Yojanas großes Reittier, den Elefanten namens Girimekhala, erschuf tausend Arme und ergriff verschiedenste Waffen. Auch unter den übrigen Mitgliedern von Māras Gefolge gab es keine zwei Personen, die die gleiche Waffe trugen; in verschiedensten Gestalten und mit verschiedensten Gesichtern rückten sie heran, um das Große Wesen zu überwältigen. Dasasahassacakkavāḷadevatā [Pg.84] pana mahāsattassa thutiyo vadamānā aṭṭhaṃsu. Sakko devarājā vijayuttarasaṅkhaṃ dhamamāno aṭṭhāsi. So kira saṅkho vīsahatthasatiko hoti. Sakiṃ vātaṃ gāhāpetvā dhamanto cattāro māse saddaṃ karitvā nissaddo hoti. Mahākāḷanāgarājā atirekapadasatena vaṇṇaṃ vadanto aṭṭhāsi, mahābrahmā setacchattaṃ dhārayamāno aṭṭhāsi. Mārabale pana bodhimaṇḍaṃ upasaṅkamante tesaṃ ekopi ṭhātuṃ nāsakkhi, sammukhasammukhaṭṭhāneneva palāyiṃsu. Kāḷo nāgarājā pathaviyaṃ nimujjitvā pañcayojanasatikaṃ mañjerikanāgabhavanaṃ gantvā ubhohi hatthehi mukhaṃ pidahitvā nipanno. Sakko vijayuttarasaṅkhaṃ piṭṭhiyaṃ katvā cakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ aṭṭhāsi. Mahābrahmā setacchattaṃ cakkavāḷakoṭiyaṃ ṭhapetvā brahmalokameva agamāsi. Ekā devatāpi ṭhātuṃ samatthā nāhosi, mahāpuriso ekakova nisīdi. Die Gottheiten aus zehntausend Weltsystemen standen jedoch da und sprachen Lobpreisungen auf das Große Wesen aus. Sakka, der König der Devas, stand da und blies das Muschelhorn Vijayuttara. Dieses Muschelhorn war angeblich einhundertzwanzig Ellen lang. Wenn man einmal Luft holte und hineinblies, tönte es vier Monate lang, bevor es wieder verstummte. Der Nāga-König Mahākāḷa stand da und besang die Tugenden des Bodhisatta in mehr als hundert Strophen. Der große Brahmā stand da und hielt den weißen Sonnenschirm. Als sich jedoch das Heer Māras der Erleuchtungsstätte näherte, vermochte auch nicht einer von jenen Devas und Brahmās standzuhalten; sie flohen alle in die Richtung, in die sie gerade blickten. Der Nāga-König Kāḷa tauchte in die Erde ein, begab sich in das fündeinhalbhundert Yojanas große Mañjerika-Nāga-Reich, bedeckte sein Gesicht mit beiden Händen und legte sich schlafen. Sakka nahm das Muschelhorn Vijayuttara auf den Rücken und stellte sich an den äußersten Rand des Weltsystems. Der große Brahmā stellte den weißen Sonnenschirm am Rande des Weltsystems ab und kehrte sogleich in die Brahmā-Welt zurück. Nicht eine einzige Gottheit vermochte standzuhalten; das Große Wesen saß ganz allein da. Māropi attano parisaṃ āha ‘‘tātā suddhodanaputtena siddhatthena sadiso añño puriso nāma natthi, mayaṃ sammukhā yuddhaṃ dātuṃ na sakkhissāma, pacchābhāgena dassāmā’’ti. Mahāpurisopi tīṇi passāni oloketvā sabbadevatānaṃ palātattā suññāni addasa. Puna uttarapassena mārabalaṃ ajjhottharamānaṃ disvā ‘‘ayaṃ ettako jano maṃ ekakaṃ sandhāya mahantaṃ vāyāmaṃ parakkamaṃ karoti, imasmiṃ ṭhāne mayhaṃ mātā vā pitā vā bhātā vā añño vā koci ñātako natthi, imā pana dasa pāramiyova mayhaṃ dīgharattaṃ puṭṭhaparijanasadisā, tasmā pāramiyova phalakaṃ katvā pāramisattheneva paharitvā ayaṃ balakāyo mayā viddhaṃsetuṃ vaṭṭatī’’ti dasa pāramiyo āvajjamāno nisīdi. Auch Māra sprach zu seinem Gefolge: „Ihr Lieben, es gibt keinen anderen Mann, der Prinz Siddhattha, dem Sohn von König Suddhodana, gleicht. Wir werden nicht in der Lage sein, ihn von vorne anzugreifen; wir werden ihn von hinten attackieren.“ Auch das Große Wesen blickte nach drei Seiten und sah, dass alle Gottheiten geflohen waren und alles leer war. Als er das Heer Māras von der Nordseite heranstürmen sah, dachte er: „Diese gewaltige Schar unternimmt eine so große Anstrengung und Bemühung gegen mich, der ich allein bin. An diesem Ort habe ich weder meine Mutter noch meinen Vater, noch meinen Bruder, noch irgendeinen anderen Verwandten. Doch diese zehn Vollkommenheiten sind mir über lange Zeit wie ein von mir genährtes Gefolge gewesen. Deshalb ist es recht, dass ich diese Vollkommenheiten als meinen Schutzschild nehme, mit der Waffe der Vollkommenheiten zuschlage und dieses Heer vernichte.“ So saß er da und betrachtete die zehn Vollkommenheiten. Atha kho māro devaputto ‘‘eteneva siddhatthaṃ palāpessāmī’’ti vātamaṇḍalaṃ samuṭṭhāpesi. Taṅkhaṇaṃyeva puratthimādibhedā vātā samuṭṭhahitvā aḍḍhayojanaekayojanadviyojanatiyojanappamāṇāni pabbatakūṭāni padāletvā vanagaccharukkhādīni ummūletvā samantā gāmanigame cuṇṇavicuṇṇaṃ kātuṃ samatthāpi mahāpurisassa puññatejena vihatānubhāvā bodhisattaṃ patvā cīvarakaṇṇamattampi cāletuṃ nāsakkhiṃsu. Tato ‘‘udakena na ajjhottharitvā māressāmī’’ti mahāvassaṃ [Pg.85] samuṭṭhāpesi. Tassānubhāvena uparūpari satapaṭalasahassapaṭalādibhedā valāhakā uṭṭhahitvā vassiṃsu. Vuṭṭhidhārāvegena pathavī chiddā ahosi. Vanarukkhādīnaṃ uparibhāgena mahāmegho āgantvā mahāsattassa cīvare ussāvabinduṭṭhānamattampi temetuṃ nāsakkhi. Tato pāsāṇavassaṃ samuṭṭhāpesi. Mahantāni mahantāni pabbatakūṭāni dhūmāyantāni pajjalantāni ākāsenāgantvā bodhisattaṃ patvā dibbamālāguḷabhāvaṃ āpajjiṃsu. Tato paharaṇavassaṃ samuṭṭhāpesi. Ekatodhārāubhatodhārāasisattikhurappādayo dhūmāyantā pajjalantā ākāsenāgantvā bodhisattaṃ patvā dibbapupphāni ahesuṃ. Tato aṅgāravassaṃ samuṭṭhāpesi. Kiṃsukavaṇṇā aṅgārā ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle dibbapupphāni hutvā vikiriṃsu. Tato kukkuḷavassaṃ samuṭṭhāpesi. Accuṇho aggivaṇṇo kukkuḷo ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle dibbacandanacuṇṇaṃ hutvā nipati. Tato vālukāvassaṃ samuṭṭhāpesi. Atisukhumavālukā dhūmāyantā pajjalantā ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle dibbapupphāni hutvā nipatiṃsu. Tato kalalavassaṃ samuṭṭhāpesi. Taṃ kalalaṃ dhūmāyantaṃ pajjalantaṃ ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle dibbavilepanaṃ hutvā nipati. Tato ‘‘iminā bhiṃsetvā siddhatthaṃ palāpessāmī’’ti andhakāraṃ samuṭṭhāpesi. Taṃ caturaṅgasamannāgataṃ viya mahātamaṃ hutvā bodhisattaṃ patvā sūriyappabhāvihataṃ viya andhakāraṃ antaradhāyi. Da erschuf der Devasohn Māra, in der Absicht: „Allein mit diesem Wirbelwind werde ich Siddhattha zur Flucht treiben“, einen Wirbelwind. In jenem Augenblick erhoben sich Winde aus dem Osten und anderen Richtungen. Obwohl sie imstande waren, Berggipfel von einer halben Yojana, einer, zwei oder drei Yojanas Größe zu zertrümmern, Wälder, Gebüsche und Bäume zu entwurzeln und ringsum die Dörfer und Marktflecken gänzlich in Staub zu verwandeln, verloren sie durch die Kraft des Verdienstes des Großen Wesens ihre Macht; als sie den Bodhisatta erreichten, vermochten sie nicht einmal den Saum seines Gewandes zu bewegen. Daraufhin dachte er: „Ich werde ihn mit Wasser überschwemmen und töten“, und ließ einen gewaltigen Regen entstehen. Durch seine Macht stiegen nacheinander Wolkenschichten in Hunderten und Tausenden empor und regneten herab. Durch die Wucht der Regengüsse wurde die Erde aufgerissen. Obwohl die riesige Regenwolke über die Wälder, Bäume und alles andere hinwegzog, vermochte sie nicht einmal eine Stelle von der Größe eines Tautropfens am Gewand des Großen Wesens nass zu machen. Daraufhin ließ er einen Steinregen entstehen. Riesige Berggipfel flogen rauchend und lodernd durch den Himmel, doch als sie den Bodhisatta erreichten, verwandelten sie sich in himmlische Blumenkränze. Daraufhin ließ er einen Waffenregen entstehen. Ein- und zweischneidige Schwerter, Speere, Pfeile und andere Waffen flogen rauchend und lodernd durch die Luft, doch als sie den Bodhisatta erreichten, wurden sie zu himmlischen Blumen. Daraufhin ließ er einen Glutregen entstehen. Kohlen von der Farbe der Kiṃsuka-Blüten flogen durch die Luft und fielen zu Füßen des Bodhisattas nieder, wo sie sich in himmlische Blumen verwandelten und sich zerstreuten. Daraufhin ließ er einen heißen Ascheregen entstehen. Extrem heiße, feuerfarbene Asche flog durch die Luft und fiel zu Füßen des Bodhisattas als himmlisches Sandelholzpulver nieder. Daraufhin ließ er einen Sandregen entstehen. Äußerst feiner Sand flog rauchend und brennend durch die Luft und fiel zu Füßen des Bodhisattas als himmlische Blumen nieder. Daraufhin ließ er einen Schlammregen entstehen. Dieser Schlamm flog rauchend und brennend durch die Luft und fiel zu Füßen des Bodhisattas als himmlische Salbe nieder. Daraufhin dachte er: „Mit dieser Finsternis werde ich ihn erschrecken und zur Flucht treiben“, und erschuf eine tiefe Finsternis. Diese Finsternis, die wie eine vierfache Dunkelheit war, verschwand, sobald sie den Bodhisatta erreichte, gleich einer Finsternis, die vom Sonnenlicht vertrieben wird. Evaṃ māro imāhi navahi vātavassapāsāṇapaharaṇaaṅgārakukkuḷavālukākalalaandhakāravuṭṭhīhi bodhisattaṃ palāpetuṃ asakkonto ‘‘kiṃ bhaṇe, tiṭṭhatha, imaṃ siddhatthakumāraṃ gaṇhatha hanatha palāpethā’’ti parisaṃ āṇāpetvā sayampi girimekhalassa hatthino khandhe nisinno cakkāvudhaṃ ādāya bodhisattaṃ upasaṅkamitvā ‘‘siddhattha uṭṭhāhi etasmā pallaṅkā, nāyaṃ tuyhaṃ pāpuṇāti, mayhaṃ eva pāpuṇātī’’ti āha. Mahāsatto tassa vacanaṃ sutvā avoca – ‘‘māra, neva tayā dasa pāramiyo pūritā, na upapāramiyo, na paramatthapāramiyo, nāpi pañca mahāpariccāgā pariccattā, na ñātatthacariyā, na lokatthacariyā, na buddhicariyā pūritā, sabbā [Pg.86] tā mayāyeva pūritā, tasmā nāyaṃ pallaṅko tuyhaṃ pāpuṇāti, mayheveso pāpuṇātī’’ti. Als Māra auf diese Weise mit diesen neun Regenarten – nämlich Wind, Regen, Steinen, Waffen, glühenden Kohlen, heißen Aschen, Sand, Schlamm und Finsternis – den Bodhisatta nicht zur Flucht treiben konnte, befahl er seinem Gefolge: „He, warum steht ihr da? Ergreift diesen Prinzen Siddhattha, tötet ihn, treibt ihn zur Flucht!“ Er selbst saß auf dem Nacken des Elefanten Girimekhala, nahm seine Diskuswaffe zur Hand, näherte sich dem Bodhisatta und sprach: „Siddhattha, steh auf von diesem Thron! Er gebührt dir nicht, er gebührt mir allein!“ Als das Große Wesen seine Worte hörte, sprach er: „Māra, du hast weder die zehn Vollkommenheiten erfüllt, noch die zehn mittleren Vollkommenheiten, noch die zehn höchsten Vollkommenheiten; auch hast du nicht die fünf großen Entsagungen vollzogen, noch hast du das Wirken zum Wohle der Verwandten, das Wirken zum Wohle der Welt oder das Wirken zur Erlangung der Buddhaschaft vollbracht. All dies wurde allein von mir erfüllt. Darum gebührt dieser Thron nicht dir, sondern mir allein!“ Māro kuddho kodhavegaṃ asahanto mahāpurisassa cakkāvudhaṃ vissajjesi. Taṃ tassa dasa pāramiyo āvajjentassa uparibhāge mālāvitānaṃ hutvā aṭṭhāsi. Taṃ kira khuradhāracakkāvudhaṃ aññadā tena kuddhena vissaṭṭhaṃ ekaghanapāsāṇatthambhe vaṃsakaḷīre viya chindantaṃ gacchati, idāni pana tasmiṃ mālāvitānaṃ hutvā ṭhite avasesā māraparisā ‘‘idāni pallaṅkato vuṭṭhāya palāyissatī’’ti mahantamahantāni selakūṭāni vissajjesuṃ. Tānipi mahāpurisassa dasa pāramiyo āvajjentassa mālāguḷabhāvaṃ āpajjitvā bhūmiyaṃ patiṃsu. Devatā cakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ṭhitā gīvaṃ pasāretvā sīsaṃ ukkhipitvā ‘‘naṭṭho vata so siddhatthakumārassa rūpaggappatto attabhāvo, kiṃ nu kho karissatī’’ti olokenti. Māra wurde zornig, und unfähig, den Impuls seines Zorns zu zügeln, schleuderte er seine Diskuswaffe gegen das Große Wesen. Während dieser die zehn Vollkommenheiten bedachte, blieb jene über ihm hängen und verwandelte sich in einen Blumenbaldachin. Man sagt, dass diese messerscharfe Diskuswaffe, wenn sie sonst von ihm im Zorn geschleudert wurde, massive Steinsäulen wie junge Bambussprossen zerschnitt. Doch als sie nun zu einem Blumenbaldachin geworden über ihm schwebte, schleuderte das übrige Gefolge Māras riesige Berggipfel herbei, in der Annahme: „Jetzt wird er vom Thron aufstehen und fliehen!“ Doch auch diese verwandelten sich, während das Große Wesen die zehn Vollkommenheiten bedachte, in Blumenkränze und fielen auf die Erde. Die Gottheiten, die am Rand des Weltraums standen, streckten ihre Hälse, erhoben ihre Köpfe und blickten voller Sorge hin: „Ach, der an Schönheit unübertroffene Körper des Prinzen Siddhattha ist verloren! Was wird er bloß tun?“ Tato mahāpuriso ‘‘pūritapāramīnaṃ bodhisattānaṃ abhisambujjhanadivase pattapallaṅko mayhaṃva pāpuṇātī’’ti vatvā ṭhitaṃ māraṃ āha – ‘‘māra tuyhaṃ dānassa dinnabhāve ko sakkhī’’ti. Māro ‘‘ime ettakā janā sakkhino’’ti mārabalābhimukhaṃ hatthaṃ pasāresi. Tasmiṃ khaṇe māraparisāya ‘‘ahaṃ sakkhī, ahaṃ sakkhī’’ti pavattasaddo pathaviundriyanasaddasadiso ahosi. Atha māro mahāpurisaṃ āha ‘‘siddhattha, tuyhaṃ dānassa dinnabhāve ko sakkhī’’ti. Mahāpuriso ‘‘tuyhaṃ tāva dānassa dinnabhāve sacetanā sakkhino, mayhaṃ pana imasmiṃ ṭhāne sacetano koci sakkhī nāma natthi, tiṭṭhatu tāva me avasesattabhāvesu dinnadānaṃ, vessantarattabhāve pana ṭhatvā mayhaṃ sattasatakamahādānassa dinnabhāve ayaṃ acetanāpi ghanamahāpathavī sakkhī’’ti cīvaragabbhantarato dakkhiṇahatthaṃ abhinīharitvā ‘‘vessantarattabhāve ṭhatvā mayhaṃ sattasatakamahādānassa dinnabhāve tvaṃ sakkhī na sakkhī’’ti mahāpathaviabhimukhaṃ hatthaṃ pasāresi. Mahāpathavī ‘‘ahaṃ te tadā sakkhī’’ti viravasatena viravasahassena viravasatasahassena mārabalaṃ avattharamānā viya unnadi. Daraufhin sprach das Große Wesen zu Māra, der davorstand und behauptet hatte: „Dieser Thron, der den Bodhisattas zusteht, die am Tag ihrer Erleuchtung die Vollkommenheiten erfüllt haben, gebührt mir“: „Māra, wer ist der Zeuge dafür, dass du Gaben gegeben hast?“ Māra sprach: „All diese vielen Wesen hier sind meine Zeugen“, und streckte seine Hand in Richtung seines Heeres aus. In jenem Augenblick ertönte das Geschrei von Māras Heer: „Ich bin Zeuge! Ich bin Zeuge!“, und dieser Schall glich dem Tösen einer berstenden Erde. Daraufhin sprach Māra zum Großen Wesen: „Siddhattha, wer ist der Zeuge dafür, dass du Gaben gegeben hast?“ Das Große Wesen entgegnete: „Für deine Gabengebung hast du lebendige, mit Bewusstsein ausgestattete Zeugen. Für mich jedoch gibt es an diesem Ort keinen einzigen lebenden Zeugen. Lass meine Gabengaben in all den anderen Existenzen beiseite; aber diese feste, große, unbeseelte Erde ist mein Zeuge dafür, dass ich in meiner Existenz als König Vessantara das große Geschenk von siebenmal siebenhundert Gaben dargebracht habe.“ Er zog seine rechte Hand unter seinem Gewand hervor, streckte sie zur großen Erde hin aus und sprach: „Bist du oder bist du nicht mein Zeuge dafür, dass ich in der Existenz als Vessantara das große Geschenk von siebenmal siebenhundert dargebracht habe?“ Da erdröhnte die große Erde: „Ich bin dein Zeuge dafür!“, mit hunderten, tausenden und hunderttausenden Brüllen, als wollte sie Māras ganzes Heer überfluten. Tato [Pg.87] mahāpurise ‘‘dinnaṃ te siddhattha mahādānaṃ uttamadāna’’nti vessantaradānaṃ sammasante diyaḍḍhayojanasatiko girimekhalahatthī jaṇṇukehi pathaviyaṃ patiṭṭhāsi, māraparisā disāvidisā palāyi, dve ekamaggena gatā nāma natthi, sīsābharaṇāni ceva nivatthavatthāni ca pahāya sammukhasammukhadisāhiyeva palāyiṃsu. Tato devasaṅghā palāyamānaṃ mārabalaṃ disvā ‘‘mārassa parājayo jāto, siddhatthakumārassa jayo, jayapūjaṃ karissāmā’’ti nāgā nāgānaṃ, supaṇṇā supaṇṇānaṃ, devatā devatānaṃ, brahmāno brahmānaṃ, ugghosetvā gandhamālādihatthā mahāpurisassa santikaṃ bodhipallaṅkaṃ agamaṃsu. Daraufhin, als der Große Mensch über die Vessantara-Spende nachsann – „Dir, o Siddhattha, ist die große Spende, die höchste Spende, gegeben worden“ –, sank der Elefant Girimekhala, einhundertfünfzig Yojanas groß, mit den Knien auf die Erde nieder. Das Gefolge Māras floh in alle Himmels- und Zwischenrichtungen. Es gab nicht zwei, die denselben Weg flohen; sie warfen ihren Kopfschmuck und ihre Gewänder ab und flohen in alle Richtungen, in die ihre Gesichter zeigten. Daraufhin sahen die Scharen der Götter das fliehende Heer Māras und riefen aus: „Māras Niederlage ist besiegelt, der Sieg gehört dem Prinzen Siddhattha! Wir wollen den Sieg ehren!“ Und nachdem die Nagas den Nagas, die Supannas den Supannas, die Gottheiten den Gottheiten und die Brahmas den Brahmas dies verkündet hatten, begaben sie sich mit Duftstoffen, Blumen und anderem in den Händen zum Thron der Erleuchtung in die Nähe des Großen Menschen. Evaṃ gatesu ca pana tesu – Und als diese so dorthin gegangen waren und dastanden: ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā nāgagaṇā mahesino. „Dies ist wahrlich der Sieg des glorreichen Buddhas und die Niederlage des bösen Māra! Voller Freude verkündeten damals die Scharen der Nāgas auf dem Platz der Erleuchtung den Sieg des großen Weisen.“ ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, supaṇṇasaṅghāpi jayaṃ mahesino. „Dies ist wahrlich der Sieg des glorreichen Buddhas und die Niederlage des bösen Māra! Voller Freude verkündeten damals auch die Scharen der Supaṇṇas auf dem Platz der Erleuchtung den Sieg des großen Weisen.“ ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā devagaṇā mahesino. „Dies ist wahrlich der Sieg des glorreichen Buddhas und die Niederlage des bösen Māra! Voller Freude verkündeten damals die Scharen der Devas auf dem Platz der Erleuchtung den Sieg des großen Weisen.“ ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā brahmagaṇāpi tādino’’ti. „Dies ist wahrlich der Sieg des glorreichen Buddhas und die Niederlage des bösen Māra! Voller Freude verkündeten damals auch die Scharen der Brahmas auf dem Platz der Erleuchtung den Sieg des so Beschaffenen.“ Avasesā dasasu cakkavāḷasahassesu devatā mālāgandhavilepanehi ca pūjayamānā nānappakārā thutiyo ca vadamānā aṭṭhaṃsu. Evaṃ anatthaṅgateyeva [Pg.88] sūriye mahāpuriso mārabalaṃ vidhametvā cīvarūpari patamānehi bodhirukkhaṅkurehi rattapavāḷapallavehi viya pūjiyamāno paṭhamayāme pubbenivāsañāṇaṃ anussaritvā, majjhimayāme dibbacakkhuṃ visodhetvā, pacchimayāme paṭiccasamuppāde ñāṇaṃ otāresi. Athassa dvādasapadikaṃ paccayākāraṃ vaṭṭavivaṭṭavasena anulomapaṭilomato sammasantassa dasasahassī lokadhātu udakapariyantaṃ katvā dvādasakkhattuṃ sampakampi. Die übrigen Gottheiten in den zehntausend Weltsystemen standen da, während sie ihn mit Blumen, Düften und Salben verehrten und vielfältige Lobpreisungen sprachen. Als die Sonne noch nicht untergegangen war, hatte der Große Mensch das Heer Māras vernichtet. Während er von den Trieben des Bodhi-Baumes, die wie rote Korallensprossen auf seine Gewänder herabfielen, verehrt wurde, erinnerte er sich in der ersten Nachtwache an seine früheren Daseinsformen (pubbenivāsañāṇa), reinigte in der mittleren Nachtwache das himmlische Auge (dibbacakkhu) und drang in der letzten Nachtwache mit seiner Erkenntnis in das Entstehen in Abhängigkeit (paṭiccasamuppāda) ein. Als er sodann die zwölffache Kette der Bedingungen in direkter und umgekehrter Reihenfolge nach der Art des Kreislaufs und des Entrinnens (vaṭṭavivaṭṭa) durchdachte, erbebte das zehntausendfache Weltall, bis hinab zu den stützenden Wassern, zwölfmal im heftigsten Maße. Mahāpurise pana dasasahassilokadhātuṃ unnādetvā aruṇuggamanavelāya sabbaññutaññāṇaṃ paṭivijjhante sakaladasasahassī lokadhātu alaṅkatapaṭiyattā ahosi. Pācīnacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ dhajānaṃ paṭākānaṃ raṃsiyo pacchimacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ paharanti, tathā pacchimacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ pācīnacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ, dakkhiṇacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ uttaracakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ, uttaracakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ dakkhiṇacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ paharanti, pathavitale ussāpitānaṃ pana dhajānaṃ paṭākānaṃ brahmalokaṃ āhacca aṭṭhaṃsu, brahmaloke baddhānaṃ pathavitale patiṭṭhahiṃsu, dasasahassacakkavāḷesu pupphūpagarukkhā pupphaṃ gaṇhiṃsu, phalūpagarukkhā phalapiṇḍībhārabharitā ahesuṃ. Khandhesu khandhapadumāni pupphiṃsu, sākhāsu sākhāpadumāni, latāsu latāpadumāni, ākāse olambakapadumāni, silātalāni bhinditvā uparūpari satta satta hutvā daṇḍakapadumāni uṭṭhahiṃsu. Dasasahassī lokadhātu vaṭṭetvā vissaṭṭhamālāguḷā viya susanthatapupphasanthāro viya ca ahosi. Cakkavāḷantaresu aṭṭhayojanasahassalokantarikā sattasūriyappabhāyapi anobhāsitapubbā ekobhāsā ahesuṃ, caturāsītiyojanasahassagambhīro mahāsamuddo madhurodako ahosi, nadiyo nappavattiṃsu, jaccandhā rūpāni passiṃsu, jātibadhirā saddaṃ suṇiṃsu, jātipīṭhasappino padasā gacchiṃsu, andubandhanādīni chijjitvā patiṃsu. Als nun der Große Mensch das zehntausendfache Weltall zum Erschallen brachte und zur Zeit des Morgengrauens die Allwissenheit (sabbaññutaññāṇa) durchdrang, wurde das gesamte zehntausendfache Weltall herrlich geschmückt und hergerichtet. Die Strahlen der Banner und Fahnen, die am östlichen Rand des Weltsystems aufgepflanzt waren, trafen auf den westlichen Rand des Weltsystems; ebenso trafen jene, die am westlichen Rand aufgepflanzt waren, den östlichen Rand; jene, die am südlichen Rand aufgepflanzt waren, den nördlichen Rand; und jene, die am nördlichen Rand aufgepflanzt waren, den südlichen Rand. Die auf dem Erdboden aufgepflanzten Banner und Fahnen reichten hinauf bis zur Brahma-Welt, und jene, die in der Brahma-Welt befestigt waren, standen auf dem Erdboden. In den zehntausend Weltsystemen trieben die blütentragenden Bäume Blüten und die fruchttragenden Bäume hingen schwer unter der Last von Fruchtbündeln. An den Stämmen erblühten Stamm-Lotusse, an den Ästen Ast-Lotusse, an den Schlingpflanzen Ranken-Lotusse, am Himmel hängende Lotusse, und aus den Felsplatten brachen stängellose Lotusse hervor, die sich in Schichten von je sieben übereinander erhoben. Das zehntausendfache Weltall war wie ein zusammengerolltes und weggeworfenes Blumenband oder wie ein wohlbereitetes Blumenlager. In den Zwischenräumen der Weltsysteme wurden die achttausend Yojanas weiten Lokantarika-Höllen, die zuvor selbst durch das Licht von sieben Sonnen nie erhellt worden waren, von einem einzigen Glanz erfüllt. Der vierundachtzigtausend Yojanas tiefe Ozean wurde zu Süßwasser. Die Flüsse flossen nicht mehr. Die von Geburt an Blinden sahen Gestalten, die von Geburt an Tauben hörten Töne, die von Geburt an Lahmen gingen zu Fuß, und die Fesseln und Bande brachen entzwei und fielen ab. Evaṃ aparimāṇena sirivibhavena pūjiyamāno mahāpuriso anekappakāresu acchariyadhammesu pātubhūtesu sabbaññutaññāṇaṃ paṭivijjhitvā sabbabuddhānaṃ avijahitaṃ udānaṃ udānesi – Als der Große Mensch so mit unermesslicher Pracht und Herrlichkeit verehrt wurde und vielfältige Wunderdinge in Erscheinung traten, drang er zur Allwissenheit durch und stieß den feierlichen Ausruf (udāna) aus, den kein Buddha je auslässt: ‘‘Anekajātisaṃsāraṃ[Pg.89], sandhāvissaṃ anibbisaṃ; Gahakāraṃ gavesanto, dukkhā jāti punappunaṃ. „Durch den Kreislauf vieler Geburten bin ich geeilt, ohne Rast, den Erbauer des Hauses suchend. Schmerzvoll ist die Geburt immer und immer wieder. ‘‘Gahakāraka diṭṭhosi, puna gehaṃ na kāhasi; Sabbā te phāsukā bhaggā, gahakūṭaṃ visaṅkhataṃ; Visaṅkhāragataṃ cittaṃ, taṇhānaṃ khayamajjhagā’’ti. (dha. pa. 153-154); O Hausbauer! Du bist nun gesehen. Du wirst kein Haus mehr bauen! All deine Sparren sind gebrochen, der Dachfirst ist zertrümmert. Der Geist, dem Gestaltlosen (Nirvana) zugewandt, hat das Erlöschen aller Begierden erreicht.“ Iti tusitapurato paṭṭhāya yāva ayaṃ bodhimaṇḍe sabbaññutappatti, ettakaṃ ṭhānaṃ avidūrenidānaṃ nāmāti veditabbaṃ. So ist diese Spanne, beginnend von der Tusita-Götterwelt bis zur Erlangung der Allwissenheit auf dem Platz der Erleuchtung, als die „Nicht allzu ferne Epoche“ (avidūrenidāna) zu verstehen. Avidūrenidānakathā niṭṭhitā. Hier endet die Erzählung von der nicht allzu fernen Epoche. 3. Santikenidānakathā 3. Die Erzählung von der nahen Epoche ‘‘Santikenidānaṃ pana ‘bhagavā sāvatthiyaṃ viharati jetavane anāthapiṇḍikassa ārāme. Vesāliyaṃ viharati mahāvane kūṭāgārasālāya’nti evaṃ tesu tesu ṭhānesu viharato tasmiṃ tasmiṃ ṭhāneyeva labbhatī’’ti vuttaṃ. Kiñcāpi evaṃ vuttaṃ, atha kho pana tampi ādito paṭṭhāya evaṃ veditabbaṃ – udānaṃ udānetvā jayapallaṅke nisinnassa hi bhagavato etadahosi ‘‘ahaṃ kappasatasahassādhikāni cattāri asaṅkhyeyyāni imassa pallaṅkassa kāraṇā sandhāviṃ, ettakaṃ me kālaṃ imasseva pallaṅkassa kāraṇā alaṅkatasīsaṃ gīvāya chinditvā dinnaṃ, suañjitāni akkhīni hadayamaṃsañca ubbaṭṭetvā dinnaṃ, jālīkumārasadisā puttā kaṇhājinakumārisadisā dhītaro maddīdevisadisā bhariyāyo ca paresaṃ dāsatthāya dinnā, ayaṃ me pallaṅko jayapallaṅko varapallaṅko ca. Ettha me nisinnassa saṅkappā paripuṇṇā, na tāva ito uṭṭhahissāmī’’ti anekakoṭisatasahassā samāpattiyo samāpajjanto sattāhaṃ tattheva nisīdi. Yaṃ sandhāya vuttaṃ ‘‘atha kho bhagavā sattāhaṃ ekapallaṅkena nisīdi vimuttisukhapaṭisaṃvedī’’ti (udā. 1; mahāva. 1). Was jedoch die Nahe Herkunft (Santikenidāna) betrifft, so wurde gesagt: 'Sie ist an jenen jeweiligen Orten zu finden, an denen der Erhabene verweilte, wie etwa: „Der Erhabene verweilte bei Sāvatthī im Jetavana, dem Kloster des Anāthapiṇḍika. Er verweilte bei Vesālī im Großen Wald in der Halle mit dem Giebeldach.“' Auch wenn dies so gesagt wurde, ist dies dennoch von Anfang an wie folgt zu verstehen: Als der Erhabene, nachdem er den feierlichen Ausspruch getan hatte, auf dem Siegesthron (jayapallaṅka) saß, dachte er bei sich: 'Vier unzählbare Zeitalter (Asaṅkhyeyya) und zusätzlich hunderttausend Weltalter (Kappa) lang bin ich um dieses Throns willen im Kreislauf der Wiedergeburten gewandert. Während dieser langen Zeit habe ich um eben dieses Throns willen mein geschmücktes Haupt vom Halse schneidend dargebracht; meine wohlgesalbten Augen und mein Herzfleisch herausreißend dargebracht; Söhne wie den Prinzen Jālī, Töchter wie die Prinzessin Kaṇhājinā und Gattinnen wie die Königin Maddī anderen zur Sklaverei dargegeben. Dies ist mein Siegesthron und mein vorzüglicher Thron. Hier, wo ich sitze, sind meine Absichten erfüllt. Ich werde von hier noch nicht aufstehen.' So verweilte er, indem er in viele hunderttausend Millionen (Koṭis) von meditative Errungenschaften (samāpatti) eintrat, sieben Tage lang eben dort sitzend. Darauf bezieht sich das Wort: 'Daraufhin saß der Erhabene sieben Tage lang in ein und derselben Meditationshaltung und erlebte das Glück der Befreiung.' Atha ekaccānaṃ devatānaṃ ‘‘ajjāpi nūna siddhatthassa kattabbakiccaṃ atthi, pallaṅkasmiñhi ālayaṃ na vijahatī’’ti parivitakko udapādi. Satthā devatānaṃ [Pg.90] parivitakkaṃ ñatvā tāsaṃ vitakkavūpasamanatthaṃ vehāsaṃ abbhuggantvā yamakapāṭihāriyaṃ dassesi. Mahābodhimaṇḍasmiñhi katapāṭihāriyañca, ñātisamāgame katapāṭihāriyañca, pāthikaputtasamāgame katapāṭihāriyañca, sabbaṃ kaṇḍambarukkhamūle yamakapāṭihāriyasadisaṃ ahosi. Daraufhin entstand bei einigen Gottheiten der Gedanke: 'Sicherlich gibt es selbst heute noch für Siddhattha eine Pflicht zu erfüllen, denn er lässt das Anhaften an diesem Thron nicht los.' Als der Meister den Gedanken der Gottheiten erkannte, stieg er zur Beruhigung ihrer Zweifel in den Himmel empor und vollbrachte das Doppelwunder (yamakapāṭihāriya). Denn das Wunder, das an der Stätte der großen Erleuchtung (Mahābodhimaṇḍa) vollbracht wurde, das Wunder, das bei der Versammlung der Verwandten vollbracht wurde, und das Wunder, das bei der Versammlung mit Pāthikaputta vollbracht wurde – all diese waren dem am Fuße des Kaṇḍamba-Mangobaums vollbrachten Doppelwunder gleich. Evaṃ satthā iminā pāṭihāriyena devatānaṃ vitakkaṃ vūpasametvā pallaṅkato īsakaṃ pācīnanissite uttaradisābhāge ṭhatvā ‘‘imasmiṃ vata me pallaṅke sabbaññutaññāṇaṃ paṭividdha’’nti cattāri asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca pūritānaṃ pāramīnaṃ phalādhigamaṭṭhānaṃ pallaṅkaṃ bodhirukkhañca animisehi akkhīhi olokayamāno sattāhaṃ vītināmesi, taṃ ṭhānaṃ animisacetiyaṃ nāma jātaṃ. Atha pallaṅkassa ca ṭhitaṭṭhānassa ca antarā caṅkamaṃ māpetvā puratthimapacchimato āyate ratanacaṅkame caṅkamanto sattāhaṃ vītināmesi, taṃ ṭhānaṃ ratanacaṅkamacetiyaṃ nāma jātaṃ. Nachdem der Meister auf diese Weise durch dieses Wunder die Zweifel der Gottheiten beruhigt hatte, stellte er sich ein wenig abseits des Throns im Nordosten auf und dachte bei sich: 'An diesem Thron wahrlich habe ich das Allwissenheitswissen (sabbaññutaññāṇa) durchdrungen.' Indem er mit unblinzelnden Augen den Thron und den Bodhi-Baum betrachtete, welche die Stätte des Erlangens der Frucht jener Vollkommenheiten (pāramī) waren, die er über vier unzählbare Zeitalter und hunderttausend Weltalter hinweg erfüllt hatte, verbrachte er sieben Tage. Jene Stätte wurde als der 'Unblinzelnde Schrein' (Animisacetiya) bekannt. Danach erschuf er einen Wandelpfad im Zwischenraum zwischen dem Thron und jener Standstätte und verbrachte sieben Tage damit, auf diesem sich von Osten nach Westen erstreckenden Juwelen-Wandelpfad (ratanacaṅkame) auf und ab zu gehen. Jene Stätte wurde als der 'Juwelen-Wandelpfad-Schrein' (Ratanacaṅkamacetiya) bekannt. Catutthe pana sattāhe bodhito pacchimuttaradisābhāge devatā ratanagharaṃ māpayiṃsu, tattha pallaṅkena nisīditvā abhidhammapiṭakaṃ visesato cettha anantanayaṃ samantapaṭṭhānaṃ vicinanto sattāhaṃ vītināmesi. Ābhidhammikā panāhu ‘‘ratanagharaṃ nāma na sattaratanamayaṃ gehaṃ, sattannaṃ pana pakaraṇānaṃ sammasitaṭṭhānaṃ ‘ratanaghara’nti vuccatī’’ti. Yasmā panettha ubhopete pariyāyā yujjanti, tasmā ubhayampetaṃ gahetabbameva. Tato paṭṭhāya pana taṃ ṭhānaṃ ratanagharacetiyaṃ nāma jātaṃ. Evaṃ bodhisamīpeyeva cattāri sattāhāni vītināmetvā pañcame sattāhe bodhirukkhamūlā yena ajapālanigrodho tenupasaṅkami, tatrāpi dhammaṃ vicinantoyeva vimuttisukhaṃ paṭisaṃvedento nisīdi. In der vierten Woche jedoch erschufen die Gottheiten im Nordwesten des Bodhi-Baumes ein Juwelenhaus (ratanaghara). Dort saß er mit gekreuzten Beinen und verbrachte sieben Tage damit, den Abhidhamma-Piṭaka zu untersuchen, insbesondere das mit unendlichen Methoden versehene universale Bedingungsbuch (Samantapaṭṭhāna). Die Abhidhamma-Lehrer aber sagten: 'Das sogenannte Juwelenhaus ist kein aus sieben Edelsteinen bestehendes Gebäude; vielmehr wird die Stätte der Reflexion über die sieben Abhandlungen das „Juwelenhaus“ genannt.' Da an dieser Stelle beide Erklärungsweisen zutreffend sind, sind auch beide anzunehmen. Von da an wurde jene Stätte als der 'Juwelenhaus-Schrein' (Ratanagharacetiya) bekannt. Nachdem er so vier Wochen lang in unmittelbarer Nähe des Bodhi-Baumes verweilt hatte, begab er sich in der fünften Woche vom Fuße des Bodhi-Baumes dorthin, wo der Ajapāla-Banyanbaum stand, und saß auch dort, während er die Lehre untersuchte und das Glück der Befreiung erlebte. Tasmiṃ samaye māro devaputto ‘‘ettakaṃ kālaṃ anubandhanto otārāpekkhopi imassa na kiñci khalitaṃ addasaṃ, atikkantodāni esa mama vasa’’nti domanassappatto mahāmagge nisīditvā soḷasa kāraṇāni cintento bhūmiyaṃ soḷasa lekhā kaḍḍhi – ‘‘ahaṃ eso viya dānapāramiṃ na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti ekaṃ lekhaṃ kaḍḍhi. Tathā ‘‘ahaṃ eso viya sīlapāramiṃ, nekkhammapāramiṃ, paññāpāramiṃ, vīriyapāramiṃ, khantipāramiṃ, saccapāramiṃ, adhiṭṭhānapāramiṃ, mettāpāramiṃ, upekkhāpāramiṃ na pūresiṃ[Pg.91], tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti dasamaṃ lekhaṃ kaḍḍhi. Tathā ‘‘ahaṃ eso viya asādhāraṇassa indriyaparopariyattañāṇassa paṭivedhāya upanissayabhūtā dasa pāramiyo na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti ekādasamaṃ lekhaṃ kaḍḍhi. Tathā ‘‘ahaṃ eso viya asādhāraṇassa āsayānusayañāṇassa, mahākaruṇāsamāpattiñāṇassa, yamakapāṭihīrañāṇassa, anāvaraṇañāṇassa, sabbaññutaññāṇassa paṭivedhāya upanissayabhūtā dasa pāramiyo na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti soḷasamaṃ lekhaṃ kaḍḍhi. Evaṃ imehi kāraṇehi mahāmagge soḷasa lekhā kaḍḍhamāno nisīdi. Zu jener Zeit dachte der Mara-Göttersohn: 'Obwohl ich ihm all diese Zeit gefolgt bin und nach einer Angriffsfläche gesucht habe, habe ich bei ihm nicht die geringste Verfehlung erblickt. Er hat sich nun meinem Einflussbereich entzogen.' Von Kummer erfüllt saß er auf der Hauptstraße, dachte über sechzehn Gründe nach und zeichnete sechzehn Linien in den Boden. Er zeichnete eine erste Linie und dachte: 'Ich habe nicht wie dieser hier die Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī) erfüllt, darum bin ich ihm nicht gleichgeworden.' Ebenso zeichnete er bis zur zehnten Linie und dachte: 'Ich habe nicht wie dieser hier die Vollkommenheit der Tugend (sīlapāramī), der Entsagung (nekkhammapāramī), der Weisheit (paññāpāramī), der Tatkraft (vīriyapāramī), der Geduld (khantipāramī), der Wahrhaftigkeit (saccapāramī), des Entschlusses (adhiṭṭhānapāramī), der liebenden Güte (mettāpāramī) und des Gleichmuts (upekkhāpāramī) erfüllt, darum bin ich ihm nicht gleichgeworden.' Ebenso zeichnete er die elfte Linie und dachte: 'Ich habe nicht wie dieser hier jene zehn Vollkommenheiten erfüllt, die als die unentbehrliche Grundlage (upanissaya) für das Durchdringen des ungeteilt-außergewöhnlichen Wissens über die Fähigkeiten und die Reife anderer Wesen (indriyaparopariyattañāṇa) dienen, darum bin ich ihm nicht gleichgeworden.' Ebenso zeichnete er die sechzehnte Linie und dachte: 'Ich habe nicht wie dieser hier jene zehn Vollkommenheiten erfüllt, die als unentbehrliche Grundlage für das Durchdringen des ungeteilt-außergewöhnlichen Wissens über die Absichten und schlummernden Neigungen (āsayānusayañāṇa), des Wissens um das Eintreten in das Große Mitgefühl (mahākaruṇāsamāpattiñāṇa), des Wissens um das Doppelwunder (yamakapāṭihāriyañāṇa), des unbehinderten Wissens (anāvaraṇañāṇa) und des Allwissenheitswissens (sabbaññutaññāṇa) dienen, darum bin ich ihm nicht gleichgeworden.' Aus diesen Gründen saß er auf der Hauptstraße und zeichnete sechzehn Linien. Tasmiṃ samaye taṇhā, arati, ragāti tisso māradhītaro ‘‘pitā no na paññāyati, kahaṃ nu kho etarahī’’ti olokayamānā taṃ domanassappattaṃ bhūmiṃ vilekhamānaṃ nisinnaṃ disvā pitu santikaṃ gantvā ‘‘kasmā, tāta, dukkhī dummano’’ti pucchiṃsu. Ammā, ayaṃ mahāsamaṇo mayhaṃ vasaṃ atikkanto, ettakaṃ kālaṃ olokento otāramassa daṭṭhuṃ nāsakkhiṃ, tenāhaṃ dukkhī dummanoti. Yadi evaṃ mā cintayittha, mayametaṃ attano vase katvā ādāya āgamissāmāti. Na sakkā, ammā, eso kenaci vase kātuṃ, acalāya saddhāya patiṭṭhito eso purisoti. ‘‘Tāta mayaṃ itthiyo nāma idāneva naṃ rāgapāsādīhi bandhitvā ānessāma, tumhe mā cintayitthā’’ti bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ‘‘pāde te samaṇa paricāremā’’ti āhaṃsu. Bhagavā va tāsaṃ vacanaṃ manasi akāsi, na akkhīni ummīletvā olokesi, anuttare upadhisaṅkhaye vimuttamānaso vivekasukhaññeva anubhavanto nisīdi. Zu jener Zeit blickten die drei Töchter Maras namens Taṇhā (Begehren), Arati (Missmut) und Ragā (Leidenschaft) umher und fragten sich: 'Unser Vater ist nicht zu sehen. Wo mag er jetzt wohl sein?' Als sie ihn voller Kummer auf der Erde zeichnend dasitzen sahen, gingen sie zu ihrem Vater und fragten: 'Lieber Vater, warum bist du so traurig und niedergeschlagen?' – 'Liebe Töchter, dieser große Asket hat sich meinem Einfluss entzogen. Obwohl ich ihn all diese Zeit beobachtet habe, konnte ich keine Schwachstelle an ihm finden. Darum bin ich traurig und niedergeschlagen.' – 'Wenn dem so ist, sorgt euch nicht. Wir werden ihn uns gefügig machen und ihn mitbringen.' – 'Es ist unmöglich, meine Töchter, diesen Mann sich gefügig zu machen. Dieser Mann ist im unerschütterlichen Vertrauen (saddhā) fest gegründet.' – 'Lieber Vater, wir sind schließlich Frauen; wir werden ihn auf der Stelle mit den Schlingen der Leidenschaft (rāgapāsa) fesseln und herbeibringen. Macht euch keine Sorgen!' Da begaben sie sich zum Erhabenen und sprachen: 'Asket, wir wollen dir zu Füßen dienen!' Der Erhabene aber schenkte ihren Worten keinerlei Beachtung, noch öffnete er seine Augen, um sie anzusehen. Mit einem Geist, der in der unübertrefflichen Vernichtung aller Daseinsgrundlagen (upadhisaṅkhaye) vollkommen befreit war, saß er da und genoss einzig das Glück der Einsamkeit (vivekasukha). Puna māradhītaro ‘‘uccāvacā kho purisānaṃ adhippāyā, kesañci kumārikāsu pemaṃ hoti, kesañci paṭhamavaye ṭhitāsu, kesañci majjhimavaye ṭhitāsu, yaṃnūna mayaṃ nānappakārehi rūpehi palobheyyāmā’’ti ekamekā kumārivaṇṇādivasena sataṃ sataṃ attabhāve abhinimminitvā kumāriyo, avijātā, sakiṃvijātā, duvijātā, majjhimitthiyo, mahitthiyo ca hutvā chakkhattuṃ bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ‘‘pāde te samaṇa paricāremā’’ti āhaṃsu. Tampi bhagavā na manasākāsi, yathā taṃ anuttare upadhisaṅkhayeva vimutto. Keci panācariyā vadanti ‘‘tā mahitthibhāvena [Pg.92] upagatā disvā bhagavā ‘evamevaṃ etā khaṇḍadantā palitakesā hontū’ti adhiṭṭhāsī’’ti, taṃ na gahetabbaṃ. Na hi satthā evarūpaṃ adhiṭṭhānaṃ karoti. Bhagavā pana ‘‘apetha tumhe, kiṃ disvā evaṃ vāyamatha, evarūpaṃ nāma avītarāgādīnaṃ purato kātuṃ yuttaṃ, tathāgatassa pana rāgo pahīno, doso pahīno, moho pahīno’’ti attano kilesappahānaṃ ārabbha – Wiederum überlegten die Töchter Māras: „Die Wünsche der Männer sind wahrlich vielfältig. Manche empfinden Liebe zu sehr jungen Mädchen, manche zu solchen im ersten Lebensalter, manche zu solchen im mittleren Lebensalter. Wie wäre es, wenn wir sie mit verschiedenen körperlichen Erscheinungen verführten?“ Jede von ihnen erschuf jeweils hundert eigene Gestalten – als junge Mädchen, als Frauen, die noch nicht geboren hatten, als Frauen, die einmal geboren hatten, als Frauen, die zweimal geboren hatten, als Frauen im mittleren Lebensalter und als ältere Frauen. So näherten sie sich sechsmal dem Erhabenen und sprachen: „O Asket, lass uns deinen Füßen dienen!“ Aber der Erhabene schenkte dem keine Beachtung, da er wahrlich im unübertrefflichen Erlöschen der Daseinsgrundlagen erlöst ist. Einige Lehrer jedoch sagen: „Als der Erhabene sah, dass sie im Zustand älterer Frauen herangetreten waren, bestimmte er: ‚Genau so sollen diese abgebrochene Zähne und graues Haar haben!‘“ Doch dies sollte man nicht akzeptieren. Denn der Meister fasst keinen solchen Entschluss. Vielmehr sprach der Erhabene: „Geht fort! Was habt ihr gesehen, dass ihr euch so bemüht? So etwas zu tun, schickt sich vor jenen, deren Gier noch nicht geschwunden ist. Dem Tathāgata jedoch ist die Gier überwunden, der Hass überwunden, die Verblendung überwunden.“ Und er bezog sich auf die Überwindung seiner eigenen Befleckungen und sprach: ‘‘Yassa jitaṃ nāvajīyati, jitamassa noyāti koci loke; Taṃ buddhamanantagocaraṃ, apadaṃ kena padena nessatha. „Dessen Sieg nicht wieder zunichte gemacht wird, dessen Sieg niemand in der Welt nachfolgt – diesen Buddha von unendlichem Bereich, den Pfadlosen, auf welchem Pfad wollt ihr ihn führen? ‘‘Yassa jālinī visattikā, taṇhā natthi kuhiñci netave; Taṃ buddhamanantagocaraṃ, apadaṃ kena padena nessathā’’ti. (dha. pa. 179-180) – „Wer kein netzartiges, giftiges Begehren hat, das ihn irgendwohin entführen könnte – diesen Buddha von unendlichem Bereich, den Pfadlosen, auf welchem Pfad wollt ihr ihn führen?“ Imā dhammapade buddhavagge dve gāthā vadanto dhammaṃ kathesi. Tā ‘‘saccaṃ kira no pitā avoca, arahaṃ sugato loke na rāgena suvānayo’’tiādīni vatvā pitu santikaṃ agamaṃsu. Indem er diese beiden Strophen im Buddha-Kapitel des Dhammapada sprach, verkündete er die Lehre. Jene Töchter Māras sprachen: „Wahrlich, unser Vater hat die Wahrheit gesagt: Der Ehrwürdige, der Sugata in der Welt, lässt sich nicht leicht durch Gier verführen.“ Nachdem sie dies und Ähnliches gesagt hatten, gingen sie zu ihrem Vater. Bhagavāpi tattha sattāhaṃ vītināmetvā mucalindamūlaṃ agamāsi. Tattha sattāhavaddalikāya uppannāya sītādipaṭibāhanatthaṃ mucalindena nāgarājena sattakkhattuṃ bhogehi parikkhitto asambādhāya gandhakuṭiyaṃ viharanto viya vimuttisukhaṃ paṭisaṃvediyamāno sattāhaṃ vītināmetvā rājāyatanaṃ upasaṅkami, tatthāpi vimuttisukhaṃ paṭisaṃvediyamānoyeva nisīdi. Ettāvatā satta sattāhāni paripuṇṇāni. Etthantare neva mukhadhovanaṃ, na sarīrapaṭijagganaṃ, na āhārakiccaṃ ahosi, jhānasukhaphalasukheneva vītināmesi. Auch der Erhabene verbrachte dort sieben Tage und begab sich dann zum Fuß des Mucalinda-Baumes. Als dort ein siebentägiger Dauerregen einsetzte, umschlang der Schlangenkönig Mucalinda den Erhabenen siebenmal mit seinen Windungen, um Kälte und anderes von ihm abzuhalten. Wie in einer geräumigen Duftkammer verweilend, erlebte er das Glück der Erlösung und verbrachte so sieben Tage, bevor er sich zum Rājāyatana-Baum begab. Auch dort saß er und erlebte das Glück der Erlösung. Damit waren die sieben Wochen vollendet. In dieser Zeit gab es weder ein Waschen des Gesichts noch eine Pflege des Körpers noch die Einnahme von Nahrung; er verbrachte die Zeit ausschließlich im Glück der Vertiefung und im Glück der Frucht der Erlösung. Athassa tasmiṃ sattasattāhamatthake ekūnapaññāsatime divase tattha nisinnassa ‘‘mukhaṃ dhovissāmī’’ti cittaṃ udapādi. Sakko devānamindo agadaharīṭakaṃ āharitvā adāsi, satthā taṃ paribhuñji, tenassa sarīravaḷañjaṃ ahosi. Athassa sakkoyeva nāgalatādantakaṭṭhañceva mukhadhovanaudakañca [Pg.93] adāsi. Satthā taṃ dantakaṭṭhaṃ khāditvā anotattadahodakena mukhaṃ dhovitvā tattheva rājāyatanamūle nisīdi. Am neunundvierzigsten Tag, dem Ende der sieben Wochen, entstand in ihm, der dort saß, der Gedanke: „Ich will mein Gesicht waschen.“ Da brachte Sakka, der Herr der Götter, eine heilsame Myrobalane-Frucht und reichte sie ihm dar. Der Meister verzehrte sie, wodurch er eine körperliche Reinigung hatte. Danach gab ihm Sakka selbst ein Zahnholz von der Schlangenrebe und Wasser zum Waschen des Gesichts aus dem Anotatta-See. Der Meister kaute das Zahnholz, wusch sein Gesicht mit dem Wasser des Anotatta-Sees und setzte sich wieder genau dort am Fuße des Rājāyatana-Baumes nieder. Tasmiṃ samaye tapussabhallikā nāma dve vāṇijā pañcahi sakaṭasatehi ukkalājanapadā majjhimadesaṃ gacchantā attano ñātisālohitāya devatāya sakaṭāni sannirumbhitvā satthu āhārasampādane ussāhitā manthañca madhupiṇḍikañca ādāya ‘‘paṭiggaṇhātu no, bhante, bhagavā imaṃ āhāraṃ anukampaṃ upādāyā’’ti satthāraṃ upasaṅkamitvā aṭṭhaṃsu. Bhagavā pāyāsapaṭiggahaṇadivaseyeva pattassa antarahitattā ‘‘na kho tathāgatā hatthesu paṭiggaṇhanti, kimhi nu kho ahaṃ paṭiggaṇheyya’’nti cintesi. Athassa cittaṃ ñatvā catūhi disāhi cattāro mahārājāno indanīlamaṇimaye patte upanāmesuṃ, bhagavā te paṭikkhipi. Puna muggavaṇṇaselamaye cattāro patte upanāmesuṃ. Bhagavā catunnampi devaputtānaṃ anukampāya cattāropi patte paṭiggahetvā uparūpari ṭhapetvā ‘‘eko hotū’’ti adhiṭṭhāsi, cattāropi mukhavaṭṭiyaṃ paññāyamānalekhā hutvā majjhimena pamāṇena ekattaṃ upagamiṃsu. Bhagavā tasmiṃ paccagghe selamaye patte āhāraṃ paṭiggaṇhitvā paribhuñjitvā anumodanaṃ akāsi. Dve bhātaro vāṇijā buddhañca dhammañca saraṇaṃ gantvā dvevācikā upāsakā ahesuṃ. Atha nesaṃ ‘‘ekaṃ no, bhante, paricaritabbaṭṭhānaṃ dethā’’ti vadantānaṃ dakkhiṇahatthena attano sīsaṃ parāmasitvā kesadhātuyo adāsi. Te attano nagare tā dhātuyo suvaṇṇasamuggassa anto pakkhipitvā cetiyaṃ patiṭṭhāpesuṃ. Zu jener Zeit reisten zwei Kaufleute namens Tapussa und Bhallika mit fünfhundert Wagen aus dem Ukkalā-Land in das Mittelland. Eine Gottheit, die in einem früheren Leben ihre Blutsverwandte gewesen war, hielt die Wagen an und ermunterte sie, dem Meister Nahrung darzubieten. Sie nahmen Gerstenmehlkuchen und Honigklößchen, näherten sich dem Meister und blieben stehen, während sie sprachen: „Möge der Erhabene, o Herr, diese Nahrung aus Mitgefühl für uns annehmen!“ Da die Almosenschale, die er am Tag der Annahme der Milchspeise besessen hatte, verschwunden war, dachte der Erhabene: „Die Tathāgatas nehmen Speise wahrlich nicht mit den Händen an. Worin soll ich diese Gabe empfangen?“ Als die vier Großkönige seinen Gedanken erkannten, reichten sie ihm aus den vier Himmelsrichtungen Schalen aus Saphir. Der Erhabene wies diese jedoch zurück. Wiederum reichten sie ihm vier Schalen aus mungobohnenfarbenem Stein. Aus Mitgefühl mit den vier Göttersöhnen nahm der Erhabene alle vier Schalen an, stellte sie übereinander und bestimmte: „Sie sollen zu einer werden!“ Alle vier Schalen verschmolzen zu einer einzigen von mittlerer Größe, an deren Rand feine Linien sichtbar blieben. Der Erhabene nahm die Nahrung in dieser neuen Steinschale entgegen, verzehrte sie und sprach die Worte des Dankes. Die beiden kaufmännischen Brüder nahmen Zuflucht zum Buddha und zur Lehre und wurden so zu Laienanhängern der zweifachen Zuflucht. Als sie baten: „O Herr, gib uns ein Objekt der Verehrung, dem wir dienen können“, strich er sich mit der rechten Hand über sein Haupt und schenkte ihnen Haarreliquien. Sie brachten diese Reliquien in ihre Stadt, legten sie in ein goldenes Kästchen und errichteten ein Heiligtum darüber. Sammāsambuddhopi kho tato uṭṭhāya puna ajapālanigrodhameva gantvā nigrodhamūle nisīdi. Athassa tattha nisinnamattasseva attanā adhigatassa dhammassa gambhīrataṃ paccavekkhantassa sabbabuddhānaṃ āciṇṇo ‘‘adhigato kho myāyaṃ dhammo’’ti paresaṃ dhammaṃ adesetukamyatākārapavatto vitakko udapādi. Atha brahmā sahampati ‘‘nassati vata bho loko, vinassati vata bho loko’’ti dasahi cakkavāḷasahassehi sakkasuyāmasantusitasunimmitavasavattimahābrahmāno ādāya satthu santikaṃ gantvā ‘‘desetu, bhante, bhagavā dhamma’’ntiādinā nayena dhammadesanaṃ āyāci. Auch der vollkommen Erleuchtete erhob sich von dort, begab sich wieder zum Ajapāla-Banyanbaum und setzte sich an dessen Fuß nieder. Während er dort saß und die Tiefe der von ihm erlangten Lehre betrachtete, stieg in ihm ein Gedanke auf, der allen Buddhas eigen ist, nämlich die Lehre anderen nicht verkünden zu wollen: „Erreicht habe ich wahrlich diese Lehre...“ Da rief der Brahma Sahampati aus: „Wehe, die Welt geht zugrunde! Wehe, die Welt wird vernichtet!“ Er rief die Herrscher Sakka, Suyama, Santusita, Sunimmita, Vasavatti sowie die großen Brahmas aus zehntausend Weltsystemen zusammen, begab sich zum Meister und bat ihn dringend um die Verkündung der Lehre mit den Worten: „Möge der Erhabene, o Herr, die Lehre verkünden!“ Satthā [Pg.94] tassa paṭiññaṃ datvā ‘‘kassa nu kho ahaṃ paṭhamaṃ dhammaṃ deseyya’’nti cintento ‘‘āḷāro paṇḍito, so imaṃ dhammaṃ khippaṃ ājānissatī’’ti cittaṃ uppādetvā puna olokento tassa sattāhakālakatabhāvaṃ ñatvā udakaṃ āvajjesi. Tassāpi abhidosakālakatabhāvaṃ ñatvā ‘‘bahūpakārā kho me pañcavaggiyā bhikkhū’’ti pañcavaggiye ārabbha manasikāraṃ katvā ‘‘kahaṃ nu kho te etarahi viharantī’’ti āvajjento ‘‘bārāṇasiyaṃ isipatane migadāye’’ti ñatvā ‘‘tattha gantvā dhammacakkaṃ pavattessāmī’’ti katipāhaṃ bodhimaṇḍasāmantāyeva piṇḍāya caranto viharitvā āsāḷhipuṇṇamāsiyaṃ ‘‘bārāṇasiṃ gamissāmī’’ti cātuddasiyaṃ paccūsasamaye vibhātāya rattiyā kālasseva pattacīvaramādāya aṭṭhārasayojanamaggaṃ paṭipanno antarāmagge upakaṃ nāma ājīvakaṃ disvā tassa attano buddhabhāvaṃ ācikkhitvā taṃ divasaṃyeva sāyanhasamaye isipatanaṃ agamāsi. Nachdem der Meister jene Zusage gegeben hatte, überlegte er: „Wem wohl soll ich zuerst die Lehre verkünden?“ Er fasste den Gedanken: „Āḷāra ist weise, er wird diese Lehre schnell verstehen.“ Als er jedoch genauer hinblickte, erkannte er, dass dieser vor sieben Tagen verstorben war, und dachte an Udaka. Als er erkannte, dass auch dieser am gestrigen Abend verstorben war, dachte er an die fünf Mönche: „Sehr hilfreich waren mir fürwahr die fünf Mönche.“ Er richtete seine Aufmerksamkeit auf die Gruppe der fünf Mönche und überlegte: „Wo weilen sie wohl jetzt?“ Als er erkannte: „Im Wildpark Isipatana bei Bārāṇasī“, beschloss er: „Dorthin will ich gehen und das Rad der Lehre in Bewegung setzen.“ Nachdem er noch einige Tage in der unmittelbaren Umgebung des Bodhi-Sitzes verweilt hatte, indem er für Almosen umherging, dachte er am Vollmondtag des Monats Āsāḷha: „Ich werde nach Bārāṇasī gehen.“ Am vierzehnten Tag (der Mondphase) zur Zeit der Morgendämmerung, als die Nacht verging, nahm er am frühen Morgen Schale und Gewand, machte sich auf den achtzehn Yojana langen Weg, erblickte unterwegs einen Ājīvaka namens Upaka, verkündete ihm seine eigene Buddhaschaft und erreichte noch am Abend desselben Tages Isipatana. Pañcavaggiyā therā tathāgataṃ dūratova āgacchantaṃ disvā ‘‘ayaṃ āvuso samaṇo gotamo paccayabāhullāya āvattitvā paripuṇṇakāyo pīṇindriyo suvaṇṇavaṇṇo hutvā āgacchati, imassa abhivādanādīni na karissāma, mahākulapasuto kho panesa āsanābhihāraṃ arahati, tenassa āsanamattaṃ paññāpessāmā’’ti katikaṃ akaṃsu. Bhagavā sadevakassa lokassa cittācāraṃ jānanasamatthena ñāṇena ‘‘kiṃ nu kho ime cintayiṃsū’’ti āvajjetvā cittaṃ aññāsi. Atha ne sabbadevamanussesu anodissakavasena pharaṇasamatthaṃ mettacittaṃ saṅkhipitvā odissakavasena mettacittena phari. Te bhagavatā mettacittena phuṭṭhā tathāgate upasaṅkamante sakāya katikāya saṇṭhātuṃ asakkontā abhivādanapaccuṭṭhānādīni sabbakiccāni akaṃsu, sammāsambuddhabhāvaṃ panassa ajānamānā kevalaṃ nāmena ca āvusovādena ca samudācaranti. Als die fūnf Mönche den Tathāgata von weitem kommen sahen, trafen sie eine Vereinbarung: „Ihr Freunde, dieser Asket Gotama, der zur Fülle an Lebensbedürfnissen zurückgekehrt ist, kommt mit wohlgenährtem Körper, erstarkten Sinnen und von goldener Farbe. Wir wollen ihm keine Ehrerbietung erweisen, ihn nicht grüßen und so weiter. Da er jedoch aus einer vornehmen Familie stammt, gebührt ihm das Herrichten eines Sitzplatzes; daher wollen wir ihm lediglich einen Sitzplatz bereitstellen.“ Der Erhabene erkannte mit seinem Wissen, das die Gedankenbewegungen der Welt samt den Göttern zu erkennen vermag, durch die Überlegung: „Was haben diese wohl gedacht?“, ihre Gesinnung. Daraufhin zog er seinen Geist der liebenden Güte, der sich ungerichtet auf alle Götter und Menschen ausbreiten konnte, zusammen und durchdrang sie gerichtet mit diesem Geist der liebenden Güte. Von diesem vom Erhabenen ausgehenden Geist der liebenden Güte berührt, waren sie bei der Annäherung des Tathāgata nicht imstande, an ihrer Vereinbarung festzuhalten, und vollzogen alle Pflichten wie Ehrerbietung, Aufstehen zur Begrüßung und so weiter. Da sie jedoch seine vollkommene Buddhaschaft noch nicht erkannten, redeten sie ihn lediglich mit seinem Namen und der Anrede „Freund“ an. Atha ne bhagavā ‘‘mā vo, bhikkhave, tathāgataṃ nāmena ca āvusovādena ca samudācaratha, arahaṃ, bhikkhave, tathāgato sammāsambuddho’’ti attano buddhabhāvaṃ saññāpetvā paññatte varabuddhāsane nisinno uttarāsāḷhanakkhattayoge vattamāne aṭṭhārasahi brahmakoṭīhi parivuto pañcavaggiye [Pg.95] there āmantetvā dhammacakkappavattanasuttantaṃ desesi. Tesu aññāsikoṇḍaññatthero desanānusārena ñāṇaṃ pesento suttapariyosāne aṭṭhārasahi brahmakoṭīhi saddhiṃ sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Satthā tattheva vassaṃ upagantvā punadivase vappattheraṃ ovadanto vihāreyeva nisīdi, sesā cattāro piṇḍāya cariṃsu. Vappatthero pubbaṇheyeva sotāpattiphalaṃ pāpuṇi. Eteneva upāyena punadivase bhaddiyattheraṃ, punadivase mahānāmattheraṃ, punadivase assajittheranti sabbe sotāpattiphale patiṭṭhāpetvā pañcamiyaṃ pakkhassa pañcapi jane sannipātetvā anattalakkhaṇasuttantaṃ (saṃ. ni. 3.59; mahāva. 20 ādayo) desesi. Desanāpariyosāne pañcapi therā arahattaphale patiṭṭhahiṃsu. Atha satthā yasakulaputtassa upanissayaṃ disvā taṃ rattibhāge nibbijjitvā gehaṃ pahāya nikkhantaṃ ‘‘ehi yasā’’ti pakkositvā tasmiṃyeva rattibhāge sotāpattiphale, punadivase arahatte patiṭṭhāpetvā, aparepi tassa sahāyake catupaṇṇāsa jane ehibhikkhupabbajjāya pabbājetvā arahattaṃ pāpesi. Daraufhin ließ der Erhabene sie seine eigene Buddhaschaft erkennen, indem er sprach: „Ihr Mönche, redet den Tathāgata nicht mit Namen und mit der Anrede ‚Freund‘ an! Ein Heiliger, ihr Mönche, ist der Tathāgata, ein vollkommen Erleuchteter.“ Er nahm auf dem hergerichteten, edlen Buddhasitz Platz und verkündete, als das Mondhaus Uttarāsāḷha am Himmel stand, umgeben von achtzehn Koti (hundertachtzig Millionen) Brahmās, den ehrwürdigen fünf Mönchen das Dhammacakkappavattana-Suttanta. Unter ihnen lenkte der ehrwürdige Aññāsikoṇḍañña seine Erkenntnis dem Verlauf der Darlegung folgend und gründete sich am Ende der Lehrrede zusammen mit den achtzehn Koti Brahmās in der Frucht des Stromeintritts. Der Meister trat ebendort in die Regenzeitklausur ein, saß am folgenden Tag im Kloster und belehrte den ehrwürdigen Vappa, während die übrigen vier für Almosen umhergingen. Der ehrwürdige Vappa erlangte noch am Vormittag die Frucht des Stromeintritts. Auf ebendiese Weise etablierte er am nächsten Tag den ehrwürdigen Bhaddiya, am nächsten Tag den ehrwürdigen Mahānāma und am nächsten Tag den ehrwürdigen Assaji in der Frucht des Stromeintritts. Am fünften Tag der Monatshälfte versammelte er alle fünf Personen und verkündete das Anattalakkhaṇa-Suttanta. Am Ende der Lehrrede gründeten sich alle fūnf ehrwürdigen Mönche in der Frucht der Arhatschaft. Danach sah der Meister die Heilsbedingungen des Sohnes aus gutem Hause namens Yasa, der in der Nacht der Welt überdrüssig geworden war, sein Haus verlassen hatte und ausgezogen war. Er rief ihn mit den Worten: „Komm, Yasa!“ und gründete ihn noch in derselben Nacht in der Frucht des Stromeintritts, am folgenden Tag in der Arhatschaft, woraufhin er auch dessen vierundfünfzig andere Gefährten durch die „Ehi-Bhikkhu“-Ordination ordinieren ließ und sie zur Arhatschaft führte. Evaṃ loke ekasaṭṭhiyā arahantesu jātesu satthā vutthavasso pavāretvā ‘‘caratha, bhikkhave, cārika’’nti saṭṭhi bhikkhū disāsu pesetvā sayaṃ uruvelaṃ gacchanto antarāmagge kappāsikavanasaṇḍe tiṃsa jane bhaddavaggiyakumāre vinesi. Tesu sabbapacchimako sotāpanno, sabbuttamo anāgāmī ahosi. Tepi sabbe ehibhikkhubhāveneva pabbājetvā disāsu pesetvā uruvelaṃ gantvā aḍḍhuḍḍhāni pāṭihāriyasahassāni dassetvā uruvelakassapādayo sahassajaṭilaparivāre tebhātikajaṭile vinetvā ehibhikkhubhāveneva pabbājetvā gayāsīse nisīdāpetvā ādittapariyāyadesanāya (mahāva. 54) arahatte patiṭṭhāpetvā tena arahantasahassena parivuto ‘‘bimbisārarañño dinnaṃ paṭiññaṃ mocessāmī’’ti rājagahaṃ gantvā nagarūpacāre laṭṭhivanuyyānaṃ agamāsi. Rājā uyyānapālassa santikā ‘‘satthā āgato’’ti sutvā dvādasanahutehi brāhmaṇagahapatikehi parivuto satthāraṃ upasaṅkamitvā [Pg.96] cakkavicittatalesu suvaṇṇapaṭṭavitānaṃ viya pabhāsamudayaṃ vissajjantesu tathāgatassa pādesu sirasā nipatitvā ekamantaṃ nisīdi saddhiṃ parisāya. Als so einundsechzig Arhats in der Welt entstanden waren, hielt der Meister nach Ablauf der Regenzeit die Pavāraṇā-Zeremonie ab, sandte die sechzig Mönche mit den Worten: „Wandert, ihr Mönche, auf Wanderung!“ in alle Himmelsrichtungen aus und begab sich selbst nach Uruvelā. Auf dem Weg dorthin bezähmte er im Baumwollhain dreißig Jünglinge der Bhaddavaggiya-Gruppe. Unter ihnen wurde der Geringste ein Stromeingetretener, der Höchste ein Nie-Wiederkehrender. Nachdem er auch sie alle durch die „Ehi-Bhikkhu“-Ordination ordinierte und in alle Himmelsrichtungen ausgesandt hatte, ging er nach Uruvelā, zeigte dreieinhalbtausend Wunder, bezähmte die drei Jaṭila-Brüder um Uruvela-Kassapa mit ihrem Gefolge von tausend Jaṭilas, ordinierte sie durch die „Ehi-Bhikkhu“-Ordination, ließ sie sich auf dem Gayāsīsa-Hügel niederlassen, gründete sie durch die Verkündung des Ādittapariyāya-Sutta in der Arhatschaft und zog, umgeben von diesem Gefolge aus tausend Arhats, nach Rājagaha, um das dem König Bimbisāra gegebene Versprechen einzulösen, und begab sich in den Laṭṭhivana-Hain am Rande der Stadt. Als der König durch den Hüter des Gartens erfuhr: „Der Meister ist gekommen“, suchte er, umgeben von einhundertzwanzigtausend Brahmanen und Hausvätern, den Meister auf, warf sich mit dem Haupt vor den Füßen des Tathāgata nieder, die mit Radzeichen geschmückt waren und einen Glanz wie ein Baldachin aus Goldplatten ausstrahlten, und setzte sich mit seinem Gefolge an einer Seite nieder. Atha kho tesaṃ brāhmaṇagahapatikānaṃ etadahosi ‘‘kiṃ nu kho mahāsamaṇo uruvelakassape brahmacariyaṃ carati, udāhu uruvelakassapo mahāsamaṇe’’ti. Bhagavā tesaṃ cetasā cetoparivitakkamaññāya theraṃ gāthāya ajjhabhāsi – Da kam jenen Brahmanen und Hausvätern folgender Gedanke: „Führt wohl der große Asket das heilige Leben unter Uruvela-Kassapa, oder führt Uruvela-Kassapa das heilige Leben unter dem großen Asketen?“ Der Erhabene erkannte den Gedanken ihres Geistes mit seinem Geist und sprach den Thera mit einer Strophe an: ‘‘Kimeva disvā uruvelavāsi, pahāsi aggiṃ kisako vadāno; Pucchāmi taṃ kassapa etamatthaṃ, kathaṃ pahīnaṃ tava aggihutta’’nti. (mahāva. 55); „Was hast du nur gesehen, o Bewohner von Uruvelā, der du als ausgemergelter Lehrer (andere) anweist, dass du das Feueropfer aufgegeben hast? Ich frage dich, Kassapa, nach diesem Grund: Wie hast du dein Opferfeuer aufgegeben?“ Theropi bhagavato adhippāyaṃ viditvā – Auch der Thera erkannte die Absicht des Erhabenen und antwortete: ‘‘Rūpe ca sadde ca atho rase ca, kāmitthiyo cābhivadanti yaññā; Etaṃ malanti upadhīsu ñatvā, tasmā na yiṭṭhe na hute arañji’’nti. (mahāva. 55) – „Die Opfer preisen Formen, Töne und auch Geschmäcke, Sinnesfreuden und Frauen; da ich dies als Befleckung inmitten der Daseinsgrundlagen erkannt habe, fand ich kein Gefallen am großen Opfer und auch nicht am täglichen Brandopfer.“ Imaṃ gāthaṃ vatvā attano sāvakabhāvapakāsanatthaṃ tathāgatassa pādapiṭṭhe sīsaṃ ṭhapetvā ‘‘satthā me, bhante, bhagavā, sāvakohamasmī’’ti vatvā ekatālaṃ dvitālaṃ titālanti yāva sattatālappamāṇaṃ sattakkhattuṃ vehāsaṃ abbhuggantvā oruyha tathāgataṃ vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Taṃ pāṭihāriyaṃ disvā mahājano ‘‘aho mahānubhāvā buddhā, evaṃ thāmagatadiṭṭhiko nāma ‘arahā’ti maññamāno uruvelakassapopi diṭṭhijālaṃ bhinditvā tathāgatena damito’’ti satthu guṇakathaṃyeva kathesi. Bhagavā ‘‘nāhaṃ idāniyeva uruvelakassapaṃ damemi, atītepi esa mayā damitoyevā’’ti vatvā imissā aṭṭhuppattiyā mahānāradakassapajātakaṃ (jā. 2.22.545 ādayo) kathetvā cattāri saccāni pakāsesi. Magadharājā ekādasahi nahutehi saddhiṃ sotāpattiphale patiṭṭhāsi, ekaṃ nahutaṃ upāsakattaṃ paṭivedesi. Rājā satthu santike nisinnoyeva pañca assāsake pavedetvā [Pg.97] saraṇaṃ gantvā svātanāya nimantetvā āsanā vuṭṭhāya bhagavantaṃ padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi. Nachdem er diese Strophe gesprochen hatte, legte er, um seine Schülerschaft kundzutun, sein Haupt auf den Spann der Füße des Tathāgata, sprach: „Der Erhabene, o Herr, ist mein Lehrer, ich bin der Schüler“, stieg dann siebenmal bis zu einer Höhe von einer Palme, zwei Palmen, drei Palmen, ja bis zu einer Höhe von sieben Palmen in die Luft empor, stieg wieder herab, erwies dem Tathāgata Ehrfurcht und setzte sich an eine Seite nieder. Als die große Volksmenge dieses Wunder sah, rühmte sie nur die Tugenden des Meisters: „Oh, von welch großer Macht sind doch die Buddhas! Selbst ein Uruvela-Kassapa, der eine so tief verwurzelte falsche Ansicht hegte und sich selbst für einen Arahant hielt, wurde vom Tathāgata gezähmt, nachdem dieser das Netz der falschen Ansichten zerrissen hatte.“ Der Erhabene sprach: „Nicht erst jetzt zähme ich Uruvela-Kassapa; auch in der Vergangenheit wurde dieser bereits von mir gezähmt.“ Aus diesem Anlass erzählte er das Mahānāradakassapa-Jātaka und verkündete die vier edlen Wahrheiten. Der König von Magadha etablierte sich zusammen mit einhundertzehntausend [Priestern und Hausvätern] in der Frucht des Stromeintritts, während zehntausend sich als Laienanhänger bekannten. Noch während er in der Gegenwart des Meisters saß, gab der König seine fünf Wünsche kund, nahm Zuflucht, lud [den Erhabenen] für den folgenden Tag ein, erhob sich von seinem Sitz, umwandelte den Erhabenen ehrfurchtsvoll zur Rechten und ging davon. Punadivase yehi ca bhagavā diṭṭho, yehi ca adiṭṭho, sabbepi rājagahavāsino aṭṭhārasakoṭisaṅkhā manussā tathāgataṃ daṭṭhukāmā pātova rājagahato laṭṭhivanuyyānaṃ agamaṃsu. Tigāvuto maggo nappahosi, sakalalaṭṭhivanuyyānaṃ nirantaraṃ phuṭaṃ ahosi. Mahājano dasabalassa rūpasobhaggappattaṃ attabhāvaṃ passanto tittiṃ kātuṃ nāsakkhi. Vaṇṇabhūmi nāmesā. Evarūpesu hi ṭhānesu tathāgatassa lakkhaṇānubyañjanādippabhedā sabbāpi rūpakāyasirī vaṇṇetabbā. Evaṃ rūpasobhaggappattaṃ dasabalassa sarīraṃ passamānena mahājanena nirantaraṃ phuṭe uyyāne ca magge ca ekabhikkhussapi nikkhamanokāso nāhosi. Taṃ divasaṃ kira bhagavā chinnabhatto bhaveyya, taṃ mā ahosīti sakkassa nisinnāsanaṃ uṇhākāraṃ dassesi. So āvajjamāno taṃ kāraṇaṃ ñatvā māṇavakavaṇṇaṃ abhinimminitvā buddhadhammasaṅghapaṭisaṃyuttā thutiyo vadamāno dasabalassa purato otaritvā devatānubhāvena okāsaṃ katvā – Am folgenden Tag machten sich alle Einwohner von Rājagaha, sowohl jene, die den Erhabenen bereits gesehen hatten, als auch jene, die ihn noch nicht gesehen hatten – insgesamt eine Anzahl von achtzehn Koṭis Menschen –, von dem Wunsch beseelt, den Tathāgata zu sehen, frühmorgens von Rājagaha auf den Weg zum Laṭṭhivana-Hain. Der drei Gāvutas lange Weg reichte nicht aus; der gesamte Laṭṭhivana-Hain war dicht gedrängt ohne Zwischenraum mit Menschen gefüllt. Die große Volksmenge konnte sich nicht sattsehen, als sie die physische Gestalt des Zehnkräftigen betrachtete, die die höchste Schönheit der Form erreicht hatte. Dies ist fürwahr ein Ort für eine ausführliche Schilderung. Denn an solchen Orten muss die gesamte Herrlichkeit des physischen Körpers des Tathāgata, mit all seinen Haupt- und Nebenmerkmalen, gepriesen werden. Da der Hain und der Weg durch die große Volksmenge, die den an Schönheit vollkommenen Körper des Zehnkräftigen betrachtete, so dicht gedrängt war, gab es nicht einmal für einen einzigen Mönch Raum, um herauszukommen. An jenem Tag, so heißt es, wäre der Erhabene wohl ohne Almosenspeise geblieben. Damit dies nicht geschehe, zeigte der Sitz Sakkas Hitze an. Als er nachsann und die Ursache erkannte, nahm er die Gestalt eines jungen Mannes an, stieg vor dem Zehnkräftigen herab, während er Loblieder auf Buddha, Dhamma und Sangha anstimmte, und schuf durch göttliche Macht Raum: ‘‘Danto dantehi saha purāṇajaṭilehi, vippamutto vippamuttehi; Siṅgīnikkhasavaṇṇo, rājagahaṃ pāvisi bhagavā. „Der Gezähmte zusammen mit den Gezähmten, den einstigen Haarflechtenträgern, der völlig Befreite mit den völlig Befreiten; glänzend wie eine Scheibe aus feinstem Gold zog der Erhabene in Rājagaha ein.“ ‘‘Mutto muttehi saha purāṇajaṭilehi, vippamutto vippamuttehi; Siṅgīnikkhasavaṇṇo, rājagahaṃ pāvisi bhagavā. „Der Befreite zusammen mit den Befreiten, den einstigen Haarflechtenträgern, der völlig Befreite mit den völlig Befreiten; glänzend wie eine Scheibe aus feinstem Gold zog der Erhabene in Rājagaha ein.“ ‘‘Tiṇṇo tiṇṇehi saha purāṇajaṭilehi, vippamutto vippamuttehi; Siṅgīnikkhasavaṇṇo, rājagahaṃ pāvisi bhagavā. „Der Hinübergegangene zusammen mit den Hinübergegangenen, den einstigen Haarflechtenträgern, der völlig Befreite mit den völlig Befreiten; glänzend wie eine Scheibe aus feinstem Gold zog der Erhabene in Rājagaha ein.“ ‘‘Dasavāso [Pg.98] dasabalo, dasadhammavidū dasabhi cupeto; So dasasataparivāro, rājagahaṃ pāvisi bhagavā’’ti. (mahāva. 58) – „Der in den zehn edlen Wohnstätten Weilende, der Zehnkräftige, der Kenner der zehn Dinge, der mit den zehn Eigenschaften Ausgestattete; er, umgeben von tausend Gefährten, zog als der Erhabene in Rājagaha ein.“ Imāhi gāthāhi satthu vaṇṇaṃ vadamāno purato pāyāsi. Tadā mahājano māṇavakassa rūpasiriṃ disvā ‘‘ativiya abhirūpo ayaṃ māṇavako, na kho pana amhehi diṭṭhapubbo’’ti cintetvā ‘‘kuto ayaṃ māṇavako, kassa vāya’’nti āha. Taṃ sutvā māṇavo – Während er mit diesen Strophen das Lob des Meisters verkündete, schritt er voran. Da sah die große Volksmenge die herrliche Gestalt des jungen Mannes, dachte: „Außerordentlich schön ist dieser junge Mann, wir haben ihn jedoch noch nie zuvor gesehen“, und fragte: „Woher kommt dieser junge Mann? Zu wem gehört er?“ Als der junge Mann dies hörte, sprach er die Strophe: ‘‘Yo dhīro sabbadhi danto, suddho appaṭipuggalo; Arahaṃ sugato loke, tassāhaṃ paricārako’’ti. (mahāva. 58) – gāthamāha; „Der Weise, der in jeder Hinsicht Gezähmte, der Reine, der Ohnegleichen, der Arahant, der Wohlgegangene in der Welt – dessen Diener bin ich.“ Diese Strophe sprach er. Satthā sakkena katokāsaṃ maggaṃ paṭipajjitvā bhikkhusahassaparivuto rājagahaṃ pāvisi. Rājā buddhappamukhassa saṅghassa mahādānaṃ datvā ‘‘ahaṃ, bhante, tīṇi ratanāni vinā vattituṃ na sakkhissāmi, velāya vā avelāya vā bhagavato santikaṃ āgamissāmi, laṭṭhivanuyyānaṃ nāma atidūre, idaṃ pana amhākaṃ veḷuvanaṃ nāma uyyānaṃ nātidūre nāccāsanne gamanāgamanasampannaṃ buddhārahaṃ senāsanaṃ. Idaṃ me bhagavā paṭiggaṇhātū’’ti suvaṇṇabhiṅkārena pupphagandhavāsitaṃ maṇivaṇṇaṃ udakaṃ ādāya veḷuvanuyyānaṃ pariccajanto dasabalassa hatthe udakaṃ pātesi. Tasmiṃ ārāmapaṭiggahaṇe ‘‘buddhasāsanassa mūlāni otiṇṇānī’’ti mahāpathavī kampi. Jambudīpasmiñhi ṭhapetvā veḷuvanaṃ aññaṃ mahāpathaviṃ kampetvā gahitasenāsanaṃ nāma natthi. Tambapaṇṇidīpepi ṭhapetvā mahāvihāraṃ aññaṃ pathaviṃ kampetvā gahitasenāsanaṃ nāma natthi. Satthā veḷuvanārāmaṃ paṭiggahetvā rañño anumodanaṃ katvā uṭṭhāyāsanā bhikkhusaṅghaparivuto veḷuvanaṃ agamāsi. Der Meister betrat den Weg, den Sakka freigemacht hatte, und zog, von tausend Mönchen umgeben, in Rājagaha ein. Der König reichte der Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eine große Spende und sprach: „O Herr, ich werde ohne die Drei Juwelen nicht existieren können; zu passender oder unpassender Zeit werde ich in die Gegenwart des Erhabenen kommen. Der Laṭṭhivana-Hain ist sehr weit entfernt, dieser unser Veḷuvana-Hain jedoch ist weder zu weit noch zu nahe gelegen, leicht zugänglich und eine für Buddhas würdige Wohnstätte. Möge der Erhabene diesen von mir annehmen!“ Mit diesen Worten nahm er aus einem goldenen Krug smaragdgrünes Wasser, das mit dem Duft von Blumen parfümiert war, und goss es über die Hand des Zehnkräftigen, um so den Veḷuvana-Hain zu übereignen. Bei dieser Annahme des Klosters erbebte die große Erde, als wolle sie sagen: „Die Wurzeln der Lehre des Buddha haben festen Halt gefunden.“ Denn in Jambudīpa gibt es außer dem Veḷuvana-Hain keine andere angenommene Wohnstätte, bei deren Übergabe die große Erde erbebte. Auch auf der Insel Tambapaṇṇi gibt es außer dem Mahāvihāra keine andere angenommene Wohnstätte, bei deren Übergabe die Erde erbebte. Nachdem der Meister das Veḷuvana-Kloster angenommen und dem König Segenswünsche dargebracht hatte, erhob er sich von seinem Sitz und begab sich, umgeben von der Mönchsgemeinde, zum Veḷuvana. Tasmiṃ kho pana samaye sāriputto ca moggallāno cāti dve paribbājakā rājagahaṃ upanissāya viharanti amataṃ pariyesamānā. Tesu sāriputto assajittheraṃ piṇḍāya paviṭṭhaṃ disvā pasannacitto payirupāsitvā [Pg.99] ‘‘ye dhammā hetuppabhavā’’ti gāthaṃ sutvā sotāpattiphale patiṭṭhāya attano sahāyakassa moggallānaparibbājakassapi tameva gāthaṃ abhāsi. Sopi sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Te ubhopi janā sañcayaṃ oloketvā attano parisāya saddhiṃ bhagavato santike pabbajiṃsu. Tesu mahāmoggallāno sattāhena arahattaṃ pāpuṇi, sāriputtatthero aḍḍhamāsena. Ubhopi ca ne satthā aggasāvakaṭṭhāne ṭhapesi. Sāriputtattherena arahattappattadivaseyeva sāvakasannipātaṃ akāsi. Zu jener Zeit lebten die beiden Wanderbettiermönche Sāriputta und Moggallāna in der Nähe von Rājagaha, während sie nach dem Todlosen suchten. Unter ihnen sah Sāriputta den ehrwürdigen Thera Assaji, wie dieser zum Almosengang eintrat. Von Vertrauen erfüllt trat er an ihn heran, vernahm die Strophe „Die aus einer Ursache entstandenen Dinge...“ (ye dhammā hetuppabhavā), etablierte sich in der Frucht des Stromeintritts und trug eben diese Strophe auch seinem Gefährten, dem Wanderbettiermönch Moggallāna, vor. Auch dieser etablierte sich in der Frucht des Stromeintritts. Beide suchten Sañcaya auf, verabschiedeten sich von ihm und traten zusammen mit ihrer Gefolgschaft in der Gegenwart des Erhabenen in den Orden ein. Unter ihnen erreichte der ehrwürdige Mahāmoggallāna in sieben Tagen die Arahantschaft, der ehrwürdige Thera Sāriputta in einem halben Monat. Und der Meister setzte beide in die Stellung der Hauptschüler ein. Genau an dem Tag, an dem der ehrwürdige Thera Sāriputta die Arahantschaft erlangte, hielt der Meister die Versammlung der Jünger ab. Tathāgate pana tasmiṃyeva veḷuvanuyyāne viharante suddhodanamahārājā ‘‘putto kira me chabbassāni dukkarakārikaṃ caritvā paramābhisambodhiṃ patvā pavattavaradhammacakko rājagahaṃ upanissāya veḷuvane viharatī’’ti sutvā aññataraṃ amaccaṃ āmantesi ‘‘ehi, bhaṇe, purisasahassaparivāro rājagahaṃ gantvā mama vacanena ‘pitā vo suddhodanamahārājā daṭṭhukāmo’ti vatvā puttaṃ me gaṇhitvā ehī’’ti āha. So ‘‘evaṃ, devā’’ti rañño vacanaṃ sirasā sampaṭicchitvā purisasahassaparivāro khippameva saṭṭhiyojanamaggaṃ gantvā dasabalassa catuparisamajjhe nisīditvā dhammadesanāvelāya vihāraṃ pāvisi. So ‘‘tiṭṭhatu tāva rañño pahitasāsana’’nti pariyante ṭhito satthu dhammadesanaṃ sutvā yathāṭhitova saddhiṃ purisasahassena arahattaṃ patvā pabbajjaṃ yāci. Bhagavā ‘‘etha bhikkhavo’’ti hatthaṃ pasāresi, sabbe taṅkhaṇaṃyeva iddhimayapattacīvaradharā saṭṭhivassattherā viya ahesuṃ. Arahattaṃ pattakālato paṭṭhāya pana ariyā nāma majjhattāva hontīti so raññā pahitasāsanaṃ dasabalassa na kathesi. Rājā ‘‘neva gato āgacchati, na sāsanaṃ suyyatī’’ti ‘‘ehi, bhaṇe, tvaṃ gacchāhī’’ti teneva niyāmena aññaṃ amaccaṃ pesesi. Sopi gantvā purimanayeneva saddhiṃ parisāya arahattaṃ patvā tuṇhī ahosi. Rājā eteneva niyāmena purisasahassaparivāre nava amacce pesesi, sabbe attano kiccaṃ niṭṭhāpetvā tuṇhībhūtā tattheva vihariṃsu. Als der Erhabene (Tathāgata) jedoch in genau jenem Bambushain-Park verwelte, hörte der Großkönig Suddhodana: „Mein Sohn hat angeblich sechs Jahre lang Askese (dukkarakārika) praktiziert, die höchste Erleuchtung (paramābhisambodhi) erlangt, das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt und verweilt nun, nahe an Rājagaha, im Bambushain.“ Als er dies hörte, rief er einen gewissen Minister zu sich und sprach: „Komm, mein Lieber, reise in Begleitung von tausend Männern nach Rājagaha, richte in meinem Namen aus: ‚Euer Vater, der Großkönig Suddhodana, wünscht Euch zu sehen‘, und bringe meinen Sohn hierher.“ Dieser nahm die Worte des Königs ehrerbietig an („Sehr wohl, Eure Majestät“), reiste in Begleitung von tausend Männern rasch über den sechzig Yojanas langen Weg und trat zur Zeit der Lehrpredigt in das Kloster ein, wo er sich inmitten der vierfachen Versammlung des Zehnstärkigen niedersetzte. Mit dem Gedanken „Die Botschaft des Königs mag erst einmal warten“ blieb er am Rande der Versammlung stehen, hörte die Lehrrede des Meisters und erlangte genau so, wie er dastand, zusammen mit seinen tausend Gefährten die Arhatschaft. Daraufhin bat er um die Ordination. Der Erhabene streckte die Hand aus und sprach: „Kommt, ihr Mönche!“ Im selben Augenblick waren sie alle mit übernatürlichen Almosenschalen und Roben ausgestattet und glichen Älteren von sechzig Jahren regenmäßiger Ordination. Da jedoch Edle ab dem Zeitpunkt, an dem sie die Arhatschaft erlangt haben, gleichmütig gegenüber weltlichen Belangen sind, überbrachte er dem Zehnstärkigen die Botschaft des Königs nicht. Der König dachte: „Wer gegangen ist, kehrt nicht zurück, und keine Nachricht ist zu hören.“ Auf dieselbe Weise sandte er einen weiteren Minister mit den Worten: „Komm, mein Lieber, geh du!“ Auch dieser ging hin, erlangte auf dieselbe Weise wie zuvor zusammen mit seiner Gefolgschaft die Arhatschaft und schwieg. Auf ebendiese Weise sandte der König nacheinander neun Minister mit jeweils einer Gefolgschaft von tausend Männern. Sie alle vollendeten ihr Werk (die Arhatschaft), verhielten sich schweigend und verblieben genau dort. Rājā [Pg.100] sāsanamattampi āharitvā ācikkhantaṃ alabhitvā cintesi ‘‘ettakā janā mayi sinehābhāvena sāsanamattampi na paccāhariṃsu, ko nu kho mama vacanaṃ karissatī’’ti sabbaṃ rājabalaṃ olokento kāḷudāyiṃ addasa. So kira rañño sabbatthasādhako amacco abbhantariko ativissāsiko bodhisattena saddhiṃ ekadivase jāto sahapaṃsukīḷako sahāyo. Atha naṃ rājā āmantesi ‘‘tāta, kāḷudāyi ahaṃ mama puttaṃ passitukāmo nava purisasahassāni pesesiṃ, ekapurisopi āgantvā sāsanamattaṃ ārocentopi natthi, dujjāno kho pana jīvitantarāyo, ahaṃ jīvamānova puttaṃ daṭṭhuṃ icchāmi, sakkhissasi nu kho me puttaṃ dassetu’’nti. Sakkhissāmi, deva, sace pabbajituṃ labhissāmīti. Tāta, tvaṃ pabbajitvā vā apabbajitvā vā mayhaṃ puttaṃ dassehīti. So ‘‘sādhu, devā’’ti rañño sāsanaṃ ādāya rājagahaṃ gantvā satthu dhammadesanāvelāya parisapariyante ṭhito dhammaṃ sutvā saparivāro arahattaphalaṃ patvā ehibhikkhubhāve patiṭṭhāsi. Da der König niemanden fand, der ihm auch nur eine Nachricht überbrachte oder Auskunft gab, dachte er: „So viele Menschen haben, weil es ihnen an Liebe zu mir fehlt, nicht einmal eine Nachricht zurückgebracht. Wer wird wohl mein Wort befolgen?“ Als er seine gesamte Gefolgschaft musterte, erblickte er Kāḷudāyin. Jener Minister war dem König in allen Angelegenheiten behilflich, gehörte zum inneren Kreis und genoss sein vollstes Vertrauen; er war am selben Tag wie der Bodhisatta geboren und war sein Spielgefährte im Sande gewesen. Da sprach der König zu ihm: „Lieber Kāḷudāyi, in meinem Wunsch, meinen Sohn zu sehen, habe ich neuntausend Männer ausgesandt, doch nicht ein einziger Mann kam zurück, um mir auch nur eine kleine Nachricht zu überbringen. Gefahren für das Leben sind jedoch schwer vorherzusehen. Ich möchte meinen Sohn noch sehen, solange ich lebe. Wirst du in der Lage sein, mir meinen Sohn zu zeigen?“ Er antwortete: „Ich werde es vermögen, o König, wenn ich die Erlaubnis erhalte, die Hauslosigkeit anzunehmen.“ „Lieber, ob du nun Mönch wirst oder nicht, zeige mir meinen Sohn!“ Er willigte ein („Sehr wohl, Eure Majestät“), nahm die Botschaft des Königs entgegen, reiste nach Rājagaha, stellte sich zur Zeit der Lehrpredigt des Meisters an den Rand der Versammlung, hörte die Lehre, erlangte zusammen mit seiner Gefolgschaft die Frucht der Arhatschaft und wurde als Ehi-Bhikkhu ordiniert. Satthā buddho hutvā paṭhamaṃ antovassaṃ isipatane vasitvā vutthavasso pavāretvā uruvelaṃ gantvā tattha tayo māse vasanto tebhātikajaṭile vinetvā bhikkhusahassaparivāro phussamāsapuṇṇamāyaṃ rājagahaṃ gantvā dve māse vasi. Ettāvatā bārāṇasito nikkhantassa pañca māsā jātā, sakalo hemanto atikkanto. Kāḷudāyittherassa āgatadivasato sattaṭṭha divasā vītivattā, so phagguṇīpuṇṇamāsiyaṃ cintesi ‘‘atikkanto hemanto, vasantasamayo anuppatto, manussehi sassādīni uddharitvā sammukhasammukhaṭṭhānehi maggā dinnā, haritatiṇasañchannā pathavī, supupphitā vanasaṇḍā, paṭipajjanakkhamā maggā, kālo dasabalassa ñātisaṅgahaṃ kātu’’nti. Atha bhagavantaṃ upasaṅkamitvā – Nachdem der Meister Buddha geworden war, verbrachte er die erste Regenzeit in Isipatana. Als die Regenzeit vorüber war und er die Pavāraṇā-Zeremonie abgehalten hatte, begab er sich nach Uruvelā. Er verwelte dort drei Monate lang, bekehrte die drei Jaṭila-Brüder und reiste am Vollmondtag des Monats Phussa in Begleitung von tausend Mönchen nach Rājagaha, wo er zwei Monate lang blieb. Bis zu diesem Zeitpunkt waren seit seinem Aufbruch aus Bārāṇasī fünf Monate vergangen. Der gesamte Winter war vorüber. Seit dem Tag der Ankunft des Älteren Kāḷudāyi waren sieben oder acht Tage vergangen. Am Vollmondtag des Monats Phagguṇa dachte dieser: „Der Winter ist vorüber, die Frühlingszeit ist angebrochen. Die Menschen haben die Ernte eingeholt und die Wege in alle Richtungen freigegeben. Die Erde ist mit grünem Gras bedeckt, die Wälder stehen in voller Blüte, die Wege sind gut zu bereisen. Es ist nun die rechte Zeit für den Zehnstärkigen, seinen Verwandten seine Fürsorge zu erweisen.“ Daraufhin trat er an den Erhabenen heran – ‘‘Aṅgārino dāni dumā bhadante, phalesino chadanaṃ vippahāya; Te accimantova pabhāsayanti, samayo mahāvīra aṅgīrasānaṃ…pe…. „Die Bäume glühen nun wie Kohlen, o Herr, nachdem sie ihr Laub abgeworfen haben, um neue Früchte zu suchen; sie leuchten, als ob sie Flammen trügen. Es ist die Zeit, o großer Held, für die Strahlenden, um aufzubrechen...“ ‘‘Nātisītaṃ [Pg.101] nātiuṇhaṃ, nātidubbhikkhachātakaṃ; Saddalā haritā bhūmi, esa kālo mahāmunī’’ti. – „Es ist weder zu kalt noch zu heiß; es gibt weder Hungersnot noch Entbehrung auf dem Weg. Die Erde ist mit frischem, grünem Gras bedeckt. Dies ist die rechte Zeit, o großer Weiser.“ Saṭṭhimattāhi gāthāhi dasabalassa kulanagaraṃ gamanatthāya gamanavaṇṇaṃ vaṇṇesi. Atha naṃ satthā ‘‘kiṃ nu kho udāyi madhurassarena gamanavaṇṇaṃ vaṇṇesī’’ti āha. Bhante, tumhākaṃ pitā suddhodanamahārājā passitukāmo, karotha ñātakānaṃ saṅgahanti. Sādhu udāyi, karissāmi ñātakānaṃ saṅgahaṃ, bhikkhusaṅghassa ārocehi, gamikavattaṃ pūressantīti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti thero tesaṃ ārocesi. Mit etwa sechzig Strophen pries er die Vorzüge der Reise, um den Zehnstärkigen dazu zu bewegen, in seine Heimatstadt aufzubrechen. Da sprach der Meister zu ihm: „Warum nur, Udāyi, preist du mit so lieblicher Stimme die Vorzüge der Reise?“ „Herr, Euer Vater, der Großkönig Suddhodana, sehnt sich danach, Euch zu sehen. Erweist Euren Verwandten Eure Fürsorge.“ „Gut, Udāyi, ich werde meinen Verwandten Fürsorge erweisen. Kündige es der Mönchsgemeinschaft an, damit sie die Pflichten für die Reise erfüllen.“ „Sehr wohl, Herr“, antwortete der Ältere und teilte es ihnen mit. Bhagavā aṅgamagadhavāsīnaṃ kulaputtānaṃ dasahi sahassehi, kapilavatthuvāsīnaṃ dasahi sahassehīti sabbeheva vīsatisahassehi khīṇāsavabhikkhūhi parivuto rājagahā nikkhamitvā divase divase yojanaṃ gacchati. ‘‘Rājagahato saṭṭhiyojanaṃ kapilavatthuṃ dvīhi māsehi pāpuṇissāmī’’ti aturitacārikaṃ pakkāmi. Theropi ‘‘bhagavato nikkhantabhāvaṃ rañño ārocessāmī’’ti vehāsaṃ abbhuggantvā rañño nivesane pāturahosi. Rājā theraṃ disvā tuṭṭhacitto mahārahe pallaṅke nisīdāpetvā attano paṭiyāditassa nānaggarasabhojanassa pattaṃ pūretvā adāsi. Thero uṭṭhāya gamanākāraṃ dassesi. Nisīditvā bhuñjatha, tātāti. Satthu santikaṃ gantvā bhuñjissāmi, mahārājāti. Kahaṃ pana, tāta, satthāti? Vīsatisahassabhikkhuparivāro tumhākaṃ dassanatthāya cārikaṃ nikkhanto, mahārājāti. Rājā tuṭṭhamānaso āha ‘‘tumhe imaṃ paribhuñjitvā yāva mama putto imaṃ nagaraṃ pāpuṇāti, tāvassa itova piṇḍapātaṃ harathā’’ti. Thero adhivāsesi. Rājā theraṃ parivisitvā pattaṃ gandhacuṇṇena ubbaṭṭetvā uttamabhojanassa pūretvā ‘‘tathāgatassa dethā’’ti therassa hatthe patiṭṭhāpesi. Thero sabbesaṃ passantānaṃyeva pattaṃ ākāse khipitvā sayampi vehāsaṃ abbhuggantvā piṇḍapātaṃ āharitvā satthu hatthe ṭhapesi. Satthā taṃ paribhuñji. Etenupāyena thero divase divase āhari, satthāpi antarāmagge raññoyeva piṇḍapātaṃ paribhuñji. Theropi bhattakiccāvasāne divase divase ‘‘ajja ettakaṃ bhagavā āgato, ajja ettaka’’nti buddhaguṇapaṭisaṃyuttāya kathāya sakalaṃ rājakulaṃ satthu dassanaṃ vināyeva satthari sañjātappasādaṃ akāsi. Teneva naṃ bhagavā ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ [Pg.102] bhikkhūnaṃ kulappasādakānaṃ yadidaṃ kāḷudāyī’’ti (a. ni. 1.219, 225) etadagge ṭhapesi. Der Erhabene, umgeben von insgesamt zwanzigtausend triebversiegten Mönchen – zehntausend Söhnen edler Familien aus den Ländern Anga und Magadha und zehntausend Söhnen edler Familien aus Kapilavatthu –, zog aus Rājagaha aus und legte jeden Tag eine Yojana zurück. Er dachte: „Die sechzig Yojanas von Rājagaha nach Kapilavatthu werde ich in zwei Monaten erreichen“, und begab sich auf eine gemächliche Wanderung. Auch der Thera Kāḷudāyī dachte: „Ich werde dem König den Aufbruch des Erhabenen verkünden“, erhob sich in die Luft und erschien im Palast des Königs. Als der König den Thera sah, ließ er ihn mit erfreutem Herzen auf einem kostbaren Thron Platz nehmen, füllte dessen Almosenschale mit der für ihn selbst zubereiteten Speise von mancherlei erlesenem Geschmack und überreichte sie ihm. Der Thera erhob sich und deutete an, gehen zu wollen. „Setzt Euch nieder und esst, mein Lieber“, sagte der König. „Ich werde gehen und in der Gegenwart des Meisters essen, o Großkönig“, erwiderte der Thera. „Wo aber, mein Lieber, ist der Meister?“, fragte der König. „Umgeben von zwanzigtausend Mönchen hat er sich auf den Weg gemacht, um Euch zu sehen, o Großkönig“, antwortete er. Der König sprach mit erfreutem Herzen: „Esst ihr diese Speise, und solange mein Sohn diese Stadt noch nicht erreicht hat, bringt ihm die Almosenspeise von hier aus.“ Der Thera willigte ein. Nachdem der König den Thera bedient hatte, rieb er die Almosenschale mit Duftpulver aus, füllte sie mit vorzüglicher Speise und legte sie dem Thera in die Hände mit den Worten: „Gebt dies dem Tathāgata.“ Vor den Augen aller warf der Thera die Schale in die Luft, erhob sich selbst ebenfalls in den Himmel, brachte die Almosenspeise und legte sie in die Hand des Meisters. Der Meister aß sie. Auf diese Weise brachte der Thera Tag für Tag die Nahrung, und auch der Meister genoss auf dem Weg dorthin ausschließlich die Almosenspeise des Königs. Und der Thera erweckte nach dem Beenden des Mahls Tag für Tag mit Worten über die Tugenden des Buddhas – indem er sagte: „Heute ist der Erhabene so weit gekommen, heute so weit“ – im gesamten Königshaus tiefes Vertrauen zum Meister, noch bevor sie ihn überhaupt gesehen hatten. Aus diesem Grund setzte der Erhabene diesen Thera auf den höchsten Rang und sprach: „Ihr Mönche, unter meinen Mönchsjüngern, die in den Familien Vertrauen erwecken, ist Kāḷudāyī der Vorzüglichste.“ Sākiyāpi kho ‘‘anuppatte bhagavati amhākaṃ ñātiseṭṭhaṃ passissāmā’’ti sannipatitvā bhagavato vasanaṭṭhānaṃ vīmaṃsamānā ‘‘nigrodhasakkassa ārāmo ramaṇīyo’’ti sallakkhetvā tattha sabbaṃ paṭijagganavidhiṃ kāretvā gandhapupphahatthā paccuggamanaṃ karontā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍite daharadahare nāgaradārake ca nāgaradārikāyo ca paṭhamaṃ pahiṇiṃsu, tato rājakumāre ca rājakumārikāyo ca, tesaṃ anantaraṃ sāmaṃ gandhapupphacuṇṇādīhi pūjayamānā bhagavantaṃ gahetvā nigrodhārāmameva agamaṃsu. Tatra bhagavā vīsatisahassakhīṇāsavaparivuto paññattavarabuddhāsane nisīdi. Sākiyā nāma mānajātikā mānatthaddhā, te ‘‘siddhatthakumāro amhehi daharataro, amhākaṃ kaniṭṭho, bhāgineyyo, putto, nattā’’ti cintetvā daharadahare rājakumāre āhaṃsu ‘‘tumhe vandatha, mayaṃ tumhākaṃ piṭṭhito nisīdissāmā’’ti. Auch die Sakyer versammelten sich, als der Erhabene eintraf, und dachten: „Wir wollen unseren edelsten Verwandten sehen.“ Sie hielten Ausschau nach einer Unterkunft für den Erhabenen und stellten fest: „Der Park des Sakyers Nigrodha ist lieblich.“ Dort ließen sie alle Vorbereitungen treffen, gingen ihm mit Duftstoffen und Blumen in den Händen entgegen und sandten zuerst die ganz jungen Knaben und Mädchen der Stadt voraus, die mit allerlei Schmuck geschmückt waren. Danach sandten sie die Prinzen und Prinzessinnen, und gleich hinter ihnen verehrten sie selbst den Erhabenen mit Düften, Blumen und Pulvern, geleiteten ihn und begaben sich direkt zum Nigrodha-Park. Dort setzte sich der Erhabene, umgeben von zwanzigtausend triebversiegten Heiligen, auf den für ihn hergerichteten, edlen Buddhasitz. Die Sakyer jedoch sind von stolzer Natur und starrsinnig vor Stolz. Sie dachten: „Prinz Siddhattha ist viel jünger als wir; er ist unser jüngerer Bruder, unser Neffe, unser Sohn, unser Enkel“, und sagten zu den ganz jungen Prinzen: „Erweist ihr ihm die Ehrerbietung, wir werden uns hinter euch setzen.“ Tesu evaṃ avanditvā nisinnesu bhagavā tesaṃ ajjhāsayaṃ oloketvā ‘‘na maṃ ñātayo vandanti, handa dāni ne vandāpessāmī’’ti abhiññāpādakaṃ catutthajjhānaṃ samāpajjitvā tato vuṭṭhāya ākāsaṃ abbhuggantvā tesaṃ sīse pādapaṃsuṃ okiramāno viya kaṇḍambarukkhamūle yamakapāṭihāriyasadisaṃ pāṭihāriyaṃ akāsi. Rājā taṃ acchariyaṃ disvā āha – ‘‘bhagavā tumhākaṃ jātadivase kāḷadevalassa vandanatthaṃ upanītānaṃ pāde vo parivattitvā brāhmaṇassa matthake patiṭṭhite disvāpi ahaṃ tumhe vandiṃ, ayaṃ me paṭhamavandanā. Vappamaṅgaladivase jambucchāyāya sirisayane nisinnānaṃ vo jambucchāyāya aparivattanaṃ disvāpi pāde vandiṃ, ayaṃ me dutiyavandanā. Idāni imaṃ adiṭṭhapubbaṃ pāṭihāriyaṃ disvāpi ahaṃ tumhākaṃ pāde vandāmi, ayaṃ me tatiyavandanā’’ti. Raññā pana vandite bhagavantaṃ avanditvā ṭhātuṃ samattho nāma ekasākiyopi nāhosi, sabbe vandiṃsuyeva. Als jene so dasaßen, ohne ihm Ehrerbietung zu erweisen, erkannte der Erhabene ihre Gesinnung und dachte: „Meine Verwandten erweisen mir keine Ehrerbietung. Nun denn, ich werde sie jetzt dazu bringen, sich zu verneigen.“ Er trat in die vierte Vertiefung ein, die als Grundlage für die höheren Geisteskräfte dient, erhob sich nach dem Verlassen dieses Zustands in die Luft und vollbrachte – gleichsam als streue er Staub von seinen Füßen auf ihre Häupter – am Fuße des Kaṇḍamba-Mangobaums ein Wunder, das dem Zwillingswunder glich. Als der König dieses Wunder sah, sprach er: „O Erhabener! Als Ihr am Tage Eurer Geburt herbeigebracht wurdet, um dem Asketen Kāḷadevala Ehrerbietung zu erweisen, und ich sah, wie sich Eure Füße umdrehten und sich auf dem Haupt des Brahmanen niederließen, da verneigte ich mich vor Euch. Dies war meine erste Ehrerbietung. Am Tag des Pflügungsfestes, als Ihr im Schatten des Jambulbaums auf dem Prachtlager saßt, sah ich, dass der Schatten des Jambulbaums sich nicht von der Stelle bewegte, und ich verneigte mich vor Euren Füßen. Dies war meine zweite Ehrerbietung. Und nun, da ich dieses noch nie zuvor gesehene Wunder schaue, verneige ich mich wiederum vor Euren Füßen. Dies ist meine dritte Ehrerbietung.“ Als der König sich verneint hatte, gab es keinen einzigen Sakyer mehr, der imstande gewesen wäre, stehen zu bleiben, ohne dem Erhabenen Ehrerbietung zu erweisen; sie alle verneigten sich ausnahmslos. Iti bhagavā ñātayo vandāpetvā ākāsato otaritvā paññattāsane nisīdi. Nisinne bhagavati sikhāpatto ñātisamāgamo ahosi[Pg.103], sabbe ekaggacittā hutvā nisīdiṃsu. Tato mahāmegho pokkharavassaṃ vassi. Tambavaṇṇaṃ udakaṃ heṭṭhā viravantaṃ gacchati, temitukāmova temeti, atemitukāmassa sarīre ekabindumattampi na patati. Taṃ disvā sabbe acchariyabbhutacittajātā ‘‘aho acchariyaṃ, aho abbhuta’’nti kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ. Satthā ‘‘na idāneva mayhaṃ ñātisamāgame pokkharavassaṃ vassati, atītepi vassī’’ti imissā aṭṭhuppattiyā vessantarajātakaṃ kathesi. Dhammadesanaṃ sutvā sabbe uṭṭhāya vanditvā pakkamiṃsu. Ekopi rājā vā rājamahāmatto vā ‘‘sve amhākaṃ bhikkhaṃ gaṇhathā’’ti vatvā gato nāma natthi. Nachdem der Erhabene so seine Verwandten dazu gebracht hatte, ihm Ehrerbietung zu erweisen, stieg er vom Himmel herab und setzte sich auf den hergerichteten Sitz. Als der Erhabene saß, erreichte das Zusammenkommen der Verwandten seinen Höhepunkt, und alle saßen mit gesammeltem Geist da. Da ließ eine mächtige Wolke einen Lotusregen herabregnen. Das kupferfarbene Wasser floss rauschend am Boden dahin. Nur wer nass werden wollte, wurde nass; auf den Körper dessen, der nicht nass werden wollte, fiel nicht ein einziger Tropfen. Als sie dies sahen, gerieten alle in Verwunderung und Staunen und begannen ein Gespräch: „Oh, wie wunderbar! Oh, wie erstaunlich!“ Der Meister sprach: „Nicht erst jetzt regnet es bei der Zusammenkunft meiner Verwandten einen Lotusregen, sondern auch in der Vergangenheit hat es schon so geregnet“, und aus diesem Anlass erzählte er das Vessantara-Jātaka. Nachdem sie die Lehrrede gehört hatten, erhoben sich alle, verneigten sich und gingen fort. Doch nicht ein einziger, weder ein König noch ein königlicher Minister, ging fort, nachdem er gesagt hätte: „Nehmt morgen unsere Almosenspeise an.“ Satthā punadivase vīsatisahassabhikkhuparivuto kapilavatthuṃ piṇḍāya pāvisi. Taṃ na koci gantvā nimantesi, pattaṃ vā aggahosi. Bhagavā indakhīle ṭhitova āvajjesi ‘‘kathaṃ nu kho pubbabuddhā kulanagare piṇḍāya cariṃsu, kiṃ uppaṭipāṭiyā issarajanānaṃ gharāni agamaṃsu, udāhu sapadānacārikaṃ cariṃsū’’ti. Tato ekabuddhassapi uppaṭipāṭiyā gamanaṃ adisvā ‘‘mayāpi idāni ayameva vaṃso, ayaṃ paveṇī paggahetabbā, āyatiñca me sāvakāpi mamaññeva anusikkhantā piṇḍacārikavattaṃ paripūressantī’’ti koṭiyaṃ niviṭṭhagehato paṭṭhāya sapadānaṃ piṇḍāya cari. ‘‘Ayyo kira siddhatthakumāro piṇḍāya caratī’’ti dvibhūmakatibhūmakādīsu pāsādesu sīhapañjare vivaritvā mahājano dassanabyāvaṭo ahosi. Am folgenden Tag betrat der Meister, umgeben von zwanzigtausend Bhikkhus, Kapilavatthu, um Almosenspeise zu sammeln. Niemand ging hin, um ihn einzuladen, noch nahm jemand seine Almosenschale entgegen. Der Erhabene blieb an der Stadtschwelle stehen und überlegte: „Wie sind wohl die früheren Buddhas in der Stadt ihrer Verwandten um Almosenspeise umhergegangen? Gingen sie unregelmäßig zu den Häusern der vornehmen Leute oder machten sie ihren Almosengang lückenlos von Haus zu Haus?“ Da er selbst bei keinem einzigen Buddha ein Abweichen von der Reihe sah, dachte er: „Auch für mich gilt es nun, diese Erblinie und diese Tradition aufrechtzuerhalten. Zudem werden auch in Zukunft meine Jünger, indem sie mir nacheifern, die Pflicht des Almosengangs erfüllen.“ So ging er, beginnend mit dem am äußersten Rand gelegenen Haus, lückenlos von Haus zu Haus um Almosenspeise. Als die Leute riefen: „Der edle Prinz Siddhattha geht fürwahr um Almosenspeise!“, öffnete die Menge in den zwei- und dreistöckigen Palästen die Bogenfenster und blickte begierig hinaus, um ihn zu sehen. Rāhulamātāpi devī ‘‘ayyaputto kira imasmiṃyeva nagare mahantena rājānubhāvena suvaṇṇasivikādīhi vicaritvā idāni kesamassuṃ ohāretvā kāsāyavatthavasano kapālahattho piṇḍāya carati, sobhati nu kho’’ti sīhapañjaraṃ vivaritvā olokayamānā bhagavantaṃ nānāvirāgasamujjalāya sarīrappabhāya nagaravīthiyo obhāsetvā byāmappabhāparikkhepasamaṅgībhūtāya asītianubyañjanāvabhāsitāya dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitāya anopamāya buddhasiriyā virocamānaṃ disvā uṇhīsato paṭṭhāya yāva pādatalā – Auch die Königin, die Mutter Rāhulas, dachte bei sich: „Der edle Prinzensohn, der einst in eben dieser Stadt mit großer königlicher Macht auf einer goldenen Sänfte und dergleichen umherzureisen pflegte, hat sich nun Haare und Bart scheren lassen, trägt das gelbrote Gewand, hält eine Tonschale in der Hand und geht um Almosenspeise. Ziemt ihm das wohl?“ Sie öffnete das Bogenfenster, blickte hinab und sah den Erhabenen, der mit dem vielfarbig aufleuchtenden Glanz seines Körpers die Gassen der Stadt erleuchtete, von einer klafterweiten Aura umgeben war, erstrahlend in den achtzig Nebenmerkmalen, geschmückt mit den zweiunddreißig Hauptmerkmalen eines großen Mannes und leuchtend in unvergleichlicher Buddha-Pracht. Sie betrachtete ihn vom Scheitel bis zu den Fußsohlen – ‘‘Siniddhanīlamudukuñcitakeso[Pg.104], sūriyanimmalatalābhinalāṭo; Yuttatuṅgamudukāyatanāso, raṃsijālavitato narasīho. „Mit geschmeidigem, tiefschwarzem, weichem und rechtsdrehend gelocktem Haar, einer Stirn, makellos glänzend wie die Scheibe der Sonne, einer wohlgeformten, erhabenen, feinen und langen Nase, ausgebreitet ein Netz von Lichtstrahlen – er ist wahrlich ein Löwe unter den Menschen!“ ‘‘Cakkavaraṅkitarattasupādo, lakkhaṇamaṇḍitaāyatapaṇhi; Cāmarihatthavibhūsitapaṇho, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Mit rötlichen, schönen Fußsohlen, gezeichnet mit dem herrlichen Rad, mit langen, von glückverheißenden Merkmalen verzierten Fersen, mit Fersen, die wie mit einem herrlich wedelnden Yakschweif geschmückt sind – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Sakyakumāro varado sukhumālo, lakkhaṇavicittapasannasarīro; Lokahitāya āgato naravīro, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Der Sakya-Prinz, der Segen Spender, so zart und edel, dessen Körper mit mannigfachen Merkmalen geschmückt und vertrauenerweckend ist; erschienen zum Wohle der Welt, der Held unter den Menschen – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Āyatayuttasusaṇṭhitasoto, gopakhumo abhinīlanetto; Indadhanuabhinīlabhamuko, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Mit wohlgeformten, langen und edlen Ohren, mit Wimpern wie bei einem jungen Kalb und tiefblauen Augen, mit Augenbrauen, geschwungen wie ein Regenbogen – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Puṇṇacandanibho mukhavaṇṇo, devanarānaṃ piyo naranāgo; Mattagajindavilāsitagāmī, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Sein Antlitz gleicht an Glanz dem Vollmond, geliebt von Göttern und Menschen ist er, ein Elefant unter den Menschen; er schreitet mit der anmutigen Würde eines stolzen Elefantenkönigs – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Siniddhasugambhīramañjusaghoso, hiṅgulavaṇṇarattasujivho; Vīsativīsatisetasudanto, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Mit einer sanften, tiefen und lieblichen Stimme, mit einer Zunge, rot wie Zinnober, mit vierzig strahlend weißen Zähnen – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Khattiyasambhavaaggakulindo, devamanussanamassitapādo; Sīlasamādhipatiṭṭhitacitto, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Entsprochen dem edlen Kriegerstand, von allerhöchster Abstammung, dessen Füße von Göttern und Menschen verehrt werden, dessen Geist fest in Tugend und Sammlung gegründet ist – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Vaṭṭasuvaṭṭasusaṇṭhitagīvo[Pg.105], sīhahanumigarājasarīro; Kañcanasucchaviuttamavaṇṇo, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Mit einem vollkommen runden, wohlgeformten Nacken, einem Kiefer wie ein Löwe und einem Rumpf stolz wie der eines Löwenkönigs, mit einer Haut von reinem Goldglanz und herrlicher Farbe – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Añjanasamavaṇṇasunīlakeso, kañcanapaṭṭavisuddhanalāṭo; Osadhipaṇḍarasuddhasuuṇṇo, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho. „Mit blauschwarzem Haar von der Corporate-Farbe feiner Augensalbe, mit einer Stirn, so rein und glatt wie ein goldenes Band, mit einer Stirnlocke, rein und weiß wie der Morgenstern – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ ‘‘Gacchantonilapathe viya cando, tārāgaṇaparivaḍḍhitarūpo; Sāvakamajjhagato samaṇindo, esa hi tuyhaṃ pitā narasīho’’ti. – „Wie der Mond, der am Himmelszelt inmitten des Sternenheeres einherzieht, so schreitet der König der Asketen inmitten seiner Jünger – dies fürwahr ist dein Vater, der Löwe unter den Menschen.“ Evamimāhi dasahi narasīhagāthāhi nāma abhitthavitvā ‘‘tumhākaṃ putto kira idāni piṇḍāya caratī’’ti rañño ārocesi. Rājā saṃviggahadayo hatthena sāṭakaṃ saṇṭhapento turitaturitaṃ nikkhamitvā vegena gantvā bhagavato purato ṭhatvā āha – ‘‘kiṃ, bhante, amhe lajjāpetha, kimatthaṃ piṇḍāya caratha, kiṃ ‘ettakānaṃ bhikkhūnaṃ na sakkā bhattaṃ laddhu’nti saññaṃ karitthā’’ti. Vaṃsacārittametaṃ, mahārāja, amhākanti. Nanu, bhante, amhākaṃ mahāsammatakhattiyavaṃso nāma vaṃso, tattha ca ekakhattiyopi bhikkhācaro nāma natthīti. ‘‘Ayaṃ, mahārāja, rājavaṃso nāma tava vaṃso, amhākaṃ pana dīpaṅkaro koṇḍañño…pe… kassapoti ayaṃ buddhavaṃso nāma. Ete ca aññe ca anekasahassasaṅkhā buddhā bhikkhācarā, bhikkhācāreneva jīvikaṃ kappesu’’nti antaravīthiyaṃ ṭhitova – Nachdem sie ihn auf diese Weise mit diesen zehn als „Narasīha-Gāthās“ bekannten Strophen gepriesen hatte, ließ sie dem König melden: „Euer Sohn geht nun fürwahr um Almosenspeise!“ Der König, von Bestürzung im Herzen ergriffen, ordnete mit den Händen sein Gewand, eilte hastig hinaus, lief schnellen Schrittes herbei, stellte sich vor den Erhabenen und sprach: „Warum, o Herr, beschämt Ihr uns? Warum geht Ihr um Almosenspeise? Habt Ihr etwa geglaubt, es sei unmöglich, Speise für so viele Bhikkhus zu erhalten?“ Der Erhabene sprach: „Dies, o Großkönig, ist die Sitte unserer Ahnenreihe.“ Der König entgegnete: „Aber Herr, unsere Ahnenreihe ist doch das königliche Geschlecht des Mahāsammata, und in dieser Linie gibt es nicht einen einzigen Kriegerkönig, der je um Almosen bettelte!“ Der Erhabene entgegnete: „Jenes königliche Geschlecht, o Großkönig, ist deine Ahnenreihe. Unsere Ahnenreihe jedoch, beginnend mit Dīpaṅkara, Koṇḍañña ... und Kassapa, ist die Erblinie der Buddhas. Diese und viele tausende andere Buddhas waren Almosengänger; sie bestritten ihren Lebensunterhalt einzig durch den Almosengang.“ Mitten auf der Straße stehend, sprach er sodann: ‘‘Uttiṭṭhe nappamajjeyya, dhammaṃ sucaritaṃ care; Dhammacārī sukhaṃ seti, asmiṃ loke paramhi cā’’ti. (dha. pa. 168) – „Säume nicht beim Almosengang, übe die Tugend der rechten Lebensführung aus. Wer die Lehre lebt, lebt glücklich in dieser Welt und in der nächsten.“ Imaṃ gāthamāha. Gāthāpariyosāne rājā sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Er sprach diese Strophe. Am Ende der Strophe erlangte der König die Frucht des Stromeintritts. ‘‘Dhammaṃ care sucaritaṃ, na naṃ duccaritaṃ care; Dhammacārī sukhaṃ seti, asmiṃ loke paramhi cā’’ti. (dha. pa. 169) – „Übe die Tugend der rechten Lebensführung aus, handle nicht auf schlechte Weise. Wer die Lehre lebt, lebt glücklich in dieser Welt und in der nächsten.“ Imaṃ [Pg.106] pana gāthaṃ sutvā sakadāgāmiphale patiṭṭhāsi. Mahādhammapālajātakaṃ (jā. 1.10.92 ādayo) sutvā anāgāmiphale patiṭṭhāsi, maraṇasamaye setacchattassa heṭṭhā sirisayane nipannoyeva arahattaṃ pāpuṇi. Araññavāsena pana padhānānuyogakiccaṃ rañño nāhosi. Sotāpattiphalaṃ sacchikatvāyeva pana bhagavato pattaṃ gahetvā saparisaṃ bhagavantaṃ mahāpāsādaṃ āropetvā paṇītena khādanīyena bhojanīyena parivisi. Bhattakiccapariyosāne sabbaṃ itthāgāraṃ āgantvā bhagavantaṃ vandi ṭhapetvā rāhulamātaraṃ. Sā pana ‘‘gaccha, ayyaputtaṃ vandāhī’’ti parijanena vuccamānāpi ‘‘sace mayhaṃ guṇo atthi, sayameva mama santikaṃ ayyaputto āgamissati, āgatameva naṃ vandissāmī’’ti vatvā na agamāsi. Nach dem Hören dieser Strophe erlangte er die Frucht der Einmalkehr. Als er das Mahādhammapāla-Jātaka gehört hatte, erlangte er die Frucht der Niekehr; und zur Zeit seines Todes erlangte er, während er auf seinem Prachtbett unter dem weißen Staatsschirm lag, die Arahatschaft. Eine Praxis der Meditation im Walde lebend war für den König jedoch nicht nötig gewesen. Doch sogleich nach dem Verwirklichen der Frucht des Stromeintritts nahm er die Almosenschale des Erhabenen, bat den Erhabenen mitsamt seinem Gefolge hinauf in den großen Palast und bewirtete sie mit erlesenen Speisen und Tränken. Nach Beendigung des Mahls kam das gesamte Frauenhaus herbei und verehrte den Erhabenen, ausgenommen die Mutter Rāhulas. Sie aber ging, obwohl sie von ihrem Gefolge mit den Worten: „Geh und erweise dem edlen Prinzensohn deine Ehrerbietung!“ aufgefordert wurde, nicht hin, sondern sagte: „Wenn ich irgendwelche Tugenden besitze, wird der edle Prinzensohn von selbst zu mir kommen. Sobald er hergekommen ist, werde ich ihm meine Ehrerbietung erweisen.“ Nach diesen Worten ging sie nicht hin. Bhagavā rājānaṃ pattaṃ gāhāpetvā dvīhi aggasāvakehi saddhiṃ rājadhītāya sirigabbhaṃ gantvā ‘‘rājadhītā yathāruci vandamānā na kiñci vattabbā’’ti vatvā paññattāsane nisīdi. Sā vegenāgantvā gopphakesu gahetvā pādapiṭṭhiyaṃ sīsaṃ parivattetvā yathāajjhāsayaṃ vandi. Rājā rājadhītāya bhagavati sinehabahumānādiguṇasampattiyo kathesi ‘‘bhante, mama dhītā ‘tumhehi kāsāyāni vatthāni nivāsitānī’ti sutvā tato paṭṭhāya kāsāyavatthanivatthā jātā, tumhākaṃ ekabhattikabhāvaṃ sutvā ekabhattikāva jātā, tumhehi mahāsayanassa chaḍḍitabhāvaṃ sutvā paṭṭikāmañcakeyeva nipannā, tumhākaṃ mālāgandhādīhi viratabhāvaṃ ñatvā viratamālāgandhāva jātā, attano ñātakehi ‘mayaṃ paṭijaggissāmā’ti sāsane pesitepi ekañātakampi na olokesi, evaṃ guṇasampannā me dhītā bhagavā’’ti. ‘‘Anacchariyaṃ, mahārāja, yaṃ idāni tayā rakkhiyamānā rājadhītā paripakke ñāṇe attānaṃ rakkheyya, esā pubbe anārakkhā pabbatapāde vicaramānā aparipakke ñāṇe attānaṃ rakkhī’’ti vatvā candakinnarījātakaṃ (jā. 1.14.18 ādayo) kathetvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Der Erhabene ließ den König die Almosenschale tragen, ging zusammen mit den zwei Hauptschülern in das Prachtgemach der Königstochter und sagte: „Wenn die Königstochter mich nach ihrem Wunsch verehrt, soll man ihr in keiner Weise entgegentreten.“ Nach diesen Worten setzte er sich auf den vorbereiteten Sitz. Sie kam eilig herbei, ergriff seine Knöchel, legte ihr Haupt auf seinen Fußrücken und verehrte ihn ganz nach ihrem Herzenswunsch. Der König erzählte dem Erhabenen von den vorzüglichen Eigenschaften der Königstochter wie ihrer Liebe und tiefen Ehrfurcht: „Herr, als meine Tochter hörte: ‚Ihr habt ockerfarbene Gewänder angelegt‘, trug sie von da an selbst ockerfarbene Gewänder. Als sie hörte, dass Ihr nur eine Mahlzeit am Tag einnehmt, nahm sie auch nur eine Mahlzeit ein. Als sie hörte, dass Ihr das große Bett aufgegeben habt, schlief sie nur noch auf einem einfachen Schnurbett. Als sie erfuhr, dass Ihr auf Blumenschmuck und Wohlgerüche verzichtet habt, verzichtete auch sie auf Blumenschmuck und Wohlgerüche. Selbst als ihre Verwandten ihr eine Botschaft schickten: ‚Wir wollen für dich sorgen‘, blickte sie keinen einzigen Verwandten an. So tugendreich ist meine Tochter, o Erhabener!“ Der Erhabene sprach: „Es ist nicht verwunderlich, o Großkönig, dass die Königstochter, die nun von dir beschützt wird, sich selbst beschützt, da ihre Erkenntnis gereift ist. Einst, als sie ungeschützt am Fuße der Berge umherwanderte und ihre Erkenntnis noch nicht gereift war, beschützte sie sich selbst.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er das Canda-Kinnarī-Jātaka, erhob sich von seinem Sitz und ging fort. Dutiyadivase pana nandassa rājakumārassa abhisekagehappavesanavivāhamaṅgalesu vattamānesu tassa gehaṃ gantvā kumāraṃ pattaṃ gāhāpetvā pabbājetukāmo maṅgalaṃ vatvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Janapadakalyāṇī kumāraṃ gacchantaṃ disvā ‘‘tuvaṭaṃ kho, ayyaputta, āgaccheyyāsī’’ti vatvā [Pg.107] gīvaṃ pasāretvā olokesi. Sopi bhagavantaṃ ‘‘pattaṃ gaṇhathā’’ti vattuṃ avisahamāno vihāraṃyeva agamāsi, taṃ anicchamānaṃyeva bhagavā pabbājesi. Iti bhagavā kapilavatthuṃ gantvā tatiyadivase nandaṃ pabbājesi. Am zweiten Tag jedoch, als die Festlichkeiten zur Amtseinsetzung, dem Einzug in den Palast und der Hochzeit des Prinzen Nanda stattfanden, ging der Erhabene zu dessen Haus, ließ den Prinzen die Almosenschale tragen, sprach Segensworte – da er ihn zu ordinieren wünschte – und erhob sich von seinem Sitz und ging fort. Als Janapadakalyāṇī den Prinzen fortgehen sah, sagte sie: „Komm bitte bald zurück, edler Herr!“, streckte ihren Hals und blickte ihm nach. Auch jener wagte es nicht, zum Erhabenen zu sagen: „Nehmt die Schale zurück“, und ging direkt bis zum Kloster mit. Obwohl er es nicht wünschte, ließ ihn der Erhabene ordinieren. So reiste der Erhabene nach Kapilavatthu und ordinierte am dritten Tag den Nanda. Sattame divase rāhulamātā kumāraṃ alaṅkaritvā bhagavato santikaṃ pesesi ‘‘passa, tāta, etaṃ vīsatisahassasamaṇaparivutaṃ suvaṇṇavaṇṇaṃ brahmarūpavaṇṇaṃ samaṇaṃ, ayaṃ te pitā, etassa mahantā nidhayo ahesuṃ, tyāssa nikkhamanakālato paṭṭhāya na passāma, gaccha, naṃ dāyajjaṃ yācāhi – ‘ahaṃ tāta kumāro abhisekaṃ patvā cakkavattī bhavissāmi, dhanena me attho, dhanaṃ me dehi. Sāmiko hi putto pitu santakassā’ti’’. Kumāro ca bhagavato santikaṃ gantvā pitu sinehaṃ paṭilabhitvā haṭṭhatuṭṭho ‘‘sukhā te, samaṇa, chāyā’’ti vatvā aññañca bahuṃ attano anurūpaṃ vadanto aṭṭhāsi. Bhagavā katabhattakicco anumodanaṃ katvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Kumāropi ‘‘dāyajjaṃ me, samaṇa, dehi, dāyajjaṃ me, samaṇa, dehī’’ti bhagavantaṃ anubandhi. Bhagavā kumāraṃ na nivattāpesi, parijanopi bhagavatā saddhiṃ gacchantaṃ nivattetuṃ nāsakkhi. Iti so bhagavatā saddhiṃ ārāmameva agamāsi. Am siebten Tag schmückte die Mutter Rāhulas den Prinzen und sandte ihn zum Erhabenen mit den Worten: „Sieh, mein Kind, jenen Asketen von goldener Farbe, mit einer Gestalt wie ein Brahma, der von zwanzigtausend Asketen umgeben ist. Das ist dein Vater. Er besaß große Schätze. Seit der Zeit seines Fortgehens haben wir sie nicht mehr gesehen. Geh hin und fordere von ihm dein Erbe: ‚Lieber Vater, ich bin ein Prinz; wenn ich die Weihe empfangen habe, werde ich ein Weltherrscher sein. Ich brauche Reichtum. Gib mir Reichtum. Denn der Sohn ist der rechtmäßige Besitzer des väterlichen Eigentums.‘“ Der Prinz ging zum Erhabenen, empfand die Liebe zu seinem Vater, war hocherfreut und sagte: „O Asket, dein Schatten ist voller Glück!“, und blieb stehen, während er noch vieles andere sprach, was für ihn angemessen war. Nachdem der Erhabene sein Mahl beendet hatte, sprach er die Dankesworte, erhob sich von seinem Sitz und ging fort. Auch der Prinz folgte dem Erhabenen auf dem Fuß und bat: „Gib mir mein Erbe, o Asket! Gib mir mein Erbe, o Asket!“ Der Erhabene schickte den Prinzen nicht zurück, und auch das Gefolge konnte ihn nicht daran hindern, mit dem Erhabenen mitzugehen. So gelangte er zusammen mit dem Erhabenen direkt in das Kloster. Tato bhagavā cintesi ‘‘yaṃ ayaṃ pitu santakaṃ dhanaṃ icchati, taṃ vaṭṭānugataṃ savighātaṃ, handassa bodhimaṇḍe paṭiladdhaṃ sattavidhaṃ ariyadhanaṃ demi, lokuttaradāyajjassa naṃ sāmikaṃ karomī’’ti āyasmantaṃ sāriputtaṃ āmantesi ‘‘tena hi, tvaṃ sāriputta, rāhulakumāraṃ pabbājehī’’ti. Thero taṃ pabbājesi. Pabbajite pana kumāre rañño adhimattaṃ dukkhaṃ uppajji. Taṃ adhivāsetuṃ asakkonto bhagavato nivedetvā ‘‘sādhu, bhante, ayyā mātāpitūhi ananuññātaṃ puttaṃ na pabbājeyyu’’nti varaṃ yāci. Bhagavā tassa taṃ varaṃ datvā punadivase rājanivesane katapātarāso ekamantaṃ nisinnena raññā ‘‘bhante, tumhākaṃ dukkarakārikakāle ekā devatā maṃ upasaṅkamitvā ‘putto te kālakato’ti āha, tassā vacanaṃ asaddahanto ‘na mayhaṃ putto bodhiṃ appatvā kālaṃ karotī’ti taṃ paṭikkhipi’’nti vutte ‘‘idāni kiṃ saddahissatha, ye tumhe pubbepi [Pg.108] aṭṭhikāni dassetvā ‘putto te mato’ti vutte na saddahitthā’’ti imissā aṭṭhuppattiyā mahādhammapālajātakaṃ kathesi. Kathāpariyosāne rājā anāgāmiphale patiṭṭhāsi. Darauf dachte der Erhabene: „Der Reichtum, den er als väterliches Eigentum begehrt, ist an den Kreislauf der Wiedergeburten gebunden und bringt Kummer. Wohlan, ich werde ihm den siebenfachen edlen Reichtum geben, den ich am Fuße des Bodhi-Baumes erlangt habe; ich werde ihn zum Besitzer des überweltlichen Erbes machen.“ Und er wandte sich an den Ehrwürdigen Sāriputta: „Nun denn, Sāriputta, ordiniere du den Prinzen Rāhula.“ Der Ältere ordinierte ihn. Als der Prinz jedoch ordiniert war, entstand im König übermäßiger Schmerz. Da er diesen Schmerz nicht ertragen konnte, teilte er es dem Erhabenen mit und bat um eine Gunst: „Es wäre gut, o Herr, wenn die Ehrwürdigen keinen Sohn ordinieren würden, der nicht die Erlaubnis seiner Eltern hat.“ Der Erhabene gewährte ihm diese Gunst. Als er am nächsten Tag im königlichen Palast sein Frühstück eingenommen hatte, sagte der König, der sich zur Seite niedergesetzt hatte: „Herr, zur Zeit Eurer schweren Kasteiungen kam eine Gottheit zu mir und sagte: ‚Dein Sohn ist gestorben.‘ Da ich ihren Worten keinen Glauben schenkte, wies ich sie ab und sagte: ‚Mein Sohn stirbt nicht, bevor er die Erleuchtung erlangt hat.‘“ Als dies gesagt wurde, sprach der Erhabene: „Wie solltet ihr es jetzt glauben, da ihr doch schon früher, als man euch Knochen zeigte und sagte: ‚Dein Sohn ist tot‘, keinen Glauben geschenkt habt?“ Aus diesem Anlass erzählte er das Mahādhammapāla-Jātaka. Am Ende der Lehrrede etablierte sich der König in der Frucht der Nichtwiederkehr. Iti bhagavā pitaraṃ tīsu phalesu patiṭṭhāpetvā bhikkhusaṅghaparivuto punadeva rājagahaṃ gantvā veḷuvane vihāsi. Tasmiṃ samaye anāthapiṇḍiko gahapati pañcahi sakaṭasatehi bhaṇḍaṃ ādāya rājagahe attano piyasahāyakassa seṭṭhino gehaṃ gantvā tattha buddhassa bhagavato uppannabhāvaṃ sutvā balavapaccūsasamaye devatānubhāvena vivaṭena dvārena satthāraṃ upasaṅkamitvā dhammaṃ sutvā sotāpattiphale patiṭṭhāya dutiyadivase buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā sāvatthiṃ āgamanatthāya satthu paṭiññaṃ gahetvā antarāmagge pañcacattālīsayojanaṭṭhāne satasahassaṃ satasahassaṃ datvā yojanike yojanike vihāre kāretvā jetavanaṃ koṭisanthārena aṭṭhārasahiraññakoṭīhi kiṇitvā navakammaṃ paṭṭhapesi. So majjhe dasabalassa gandhakuṭiṃ kāresi, taṃ parivāretvā asītimahātherānaṃ pāṭiyekkasannivesane āvāse ekakūṭāgāradvikūṭāgārahaṃsavaṭṭakadīghasālāmaṇḍapādivasena sesasenāsanāni pokkharaṇīcaṅkamanarattiṭṭhānadivāṭṭhānāni cāti aṭṭhārasakoṭipariccāgena ramaṇīye bhūmibhāge manoramaṃ vihāraṃ kārāpetvā dasabalassa āgamanatthāya dūtaṃ pesesi. Satthā dūtassa vacanaṃ sutvā mahābhikkhusaṅghaparivuto rājagahā nikkhamitvā anupubbena sāvatthinagaraṃ pāpuṇi. So etablierte der Erhabene seinen Vater in den drei Früchten, reiste in Begleitung der Mönchsgemeinde wieder nach Rājagaha und verweilte im Veḷuvana-Kloster. Zu jener Zeit nahm der Hausvater Anāthapiṇḍika Waren auf fünfhundert Wagen mit und ging zum Haus seines geliebten Freundes, eines Großkaufmanns in Rājagaha. Als er dort hörte, dass der Buddha, der Erhabene, in der Welt erschienen war, suchte er den Meister zur Zeit der frühen Morgendämmerung durch das mittels der Macht einer Gottheit geöffnete Tor auf. Er hörte die Lehre, etablierte sich in der Frucht des Stromeintritts und gab am nächsten Tag der Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze ein großes Almosen. Er erhielt das Versprechen des Meisters, nach Sāvatthī zu kommen, und ließ auf dem Weg dorthin über eine Strecke von fünfundvierzig Yojana, indem er an jedem Kontrollpunkt jeweils einhunderttausend Münzen ausgab, von Yojana zu Yojana Klöster errichten. Dann kaufte er den Jetavana-Hain für achtzehn Millionen Goldmünzen, indem er ihn mit Goldmünzen auslegte, und begann mit den Neubauarbeiten. Er ließ in der Mitte die Duftkammer für den Zehnkraftvollen errichten. Um diese herum baute er separate Wohnungen für die achtzig großen Älteren sowie die übrigen Unterkünfte in Form von Einzelgiebelhäusern, Doppelgiebelhäusern, entenartig geformten Gebäuden, langen Hallen, Pavillons usw., dazu Teiche, Wandelgänge, Nacht- und Tagaufenthaltsorte. Auf diese Weise ließ er unter Aufwendung von achtzehn Millionen Münzen auf einem lieblichen Gelände das herrliche Jetavana-Kloster errichten und sandte einen Boten, um den Zehnkraftvollen einzuladen. Als der Meister die Worte des Boten vernommen hatte, brach er in Begleitung einer großen Mönchsgemeinde aus Rājagaha auf und erreichte allmählich die Stadt Sāvatthī. Mahāseṭṭhipi kho vihāramahaṃ sajjetvā tathāgatassa jetavanappavisanadivase puttaṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ katvā alaṅkatapaṭiyatteheva pañcahi kumārasatehi saddhiṃ pesesi. So saparivāro pañcavaṇṇavatthasamujjalāni pañca dhajasatāni gahetvā dasabalassa purato ahosi. Tesaṃ pacchato mahāsubhaddā cūḷasubhaddāti dve seṭṭhidhītaro pañcahi kumārikāsatehi saddhiṃ puṇṇaghaṭe gahetvā nikkhamiṃsu. Tāsaṃ pacchato seṭṭhibhariyā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitā pañcahi mātugāmasatehi saddhiṃ puṇṇapātiyo gahetvā nikkhami. Sabbesaṃ pacchato sayaṃ mahāseṭṭhi ahatavatthanivattho [Pg.109] ahatavatthanivattheheva pañcahi seṭṭhisatehi saddhiṃ bhagavantaṃ abbhuggañchi. Bhagavā imaṃ upāsakaparisaṃ purato katvā mahābhikkhusaṅghaparivuto attano sarīrappabhāya suvaṇṇarasasekapiñjarāni viya vanantarāni kurumāno anantāya buddhalīḷāya apaṭisamāya buddhasiriyā jetavanavihāraṃ pāvisi. Auch der Großkaufmann veranstaltete das Einweihungsfest des Klosters. Am Tag des Einzugs des Tathāgata in das Jetavana-Kloster schmückte er seinen Sohn mit allen Zierden und sandte ihn zusammen mit fünfhundert ebenfalls festlich geschmückten Jünglingen voraus. Dieser zog mit seinem Gefolge, trug fünfhundert Banner, die aus prächtigen Stoffen in fünf Farben glänzten, und schritt vor dem Zehnkräftigen her. Hinter ihnen trugen die beiden Töchter des Kaufmanns namens Mahāsubhaddā und Cūḷasubhaddā zusammen mit fünfhundert Mädchen mit Wasser gefüllte Krüge und zogen aus. Hinter ihnen ging die Gemahlin des Kaufmanns, reich geschmückt mit allen Zierden, zusammen mit fünfhundert Frauen, trug gefüllte Opferschalen und zog aus. Hinter ihnen allen ging der Großkaufmann selbst, bekleidet mit neuen Gewändern, zusammen mit fünfhundert Kaufleuten, die ebenfalls neue Gewänder trugen, und zog dem Erhabenen entgegen. Der Erhabene stellte diese Schar von Laienanhängern an die Spitze und zog, umgeben von der großen Gemeinde der Mönche, während er durch den Glanz seines eigenen Körpers die Waldungen erstrahlen ließ, als wären sie mit flüssigem Gold übergossen, mit unendlicher Buddha-Anmut und mit unvergleichlicher Buddha-Herrlichkeit in das Jetavana-Kloster ein. Atha naṃ anāthapiṇḍiko pucchi – ‘‘kathāhaṃ, bhante, imasmiṃ vihāre paṭipajjāmī’’ti. Tena hi gahapati imaṃ vihāraṃ āgatānāgatassa cātuddisassa bhikkhusaṅghassa dehīti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti mahāseṭṭhi suvaṇṇabhiṅkāraṃ ādāya dasabalassa hatthe udakaṃ pātetvā ‘‘imaṃ jetavanavihāraṃ āgatānāgatassa cātuddisassa bhikkhusaṅghassa dammī’’ti adāsi. Satthā vihāraṃ paṭiggahetvā anumodanaṃ karonto – Da fragte ihn Anāthapiṇḍika: „Wie, o Herr, soll ich mich bezüglich dieses Klosters verhalten?“ — „Nun denn, Hausvater, übergib dieses Kloster der Mönchsgemeinde aus den vier Himmelsrichtungen, den bereits Gekommenen und den zukünftig noch Kommenden!“ — „Sehr wohl, o Herr“, sprach der Großkaufmann, nahm ein goldenes Wassergefäß, goss Wasser über die Hand des Zehnkräftigen und sprach: „Ich übergebe dieses Jetavana-Kloster der Mönchsgemeinde aus den vier Himmelsrichtungen, den bereits Gekommenen und den zukünftig noch Kommenden.“ Der Meister nahm das Kloster an, und um seinen Dank auszusprechen, sprach er folgende Verse: ‘‘Sītaṃ uṇhaṃ paṭihanti, tato vāḷamigāni ca; Sarīsape ca makase, sisire cāpi vuṭṭhiyo. „Es schützt vor Kälte und vor Hitze, und ebenso vor wilden Tieren, vor kriechendem Getier und Mücken, vor dem Frost im Winter und dem Regen. ‘‘Tato vātātapo ghoro, sañjāto paṭihaññati; Leṇatthañca sukhatthañca, jhāyituñca vipassituṃ. Auch heftiger Wind und sengende Sonnenhitze, wenn sie aufkommen, werden dadurch abgewehrt. Es dient als Zufluchtsort und bringt Bequemlichkeit, um in Vertiefung zu meditieren und Einsicht zu entfalten. ‘‘Vihāradānaṃ saṅghassa, aggaṃ buddhena vaṇṇitaṃ; Tasmā hi paṇḍito poso, sampassaṃ atthamattano. Die Gabe eines Klosters an die Gemeinschaft ist vom Buddha als die höchste Gabe gepriesen worden. Darum soll ein weiser Mensch, der sein eigenes Wohl im Auge hat, ‘‘Vihāre kāraye ramme, vāsayettha bahussute; Tesaṃ annañca pānañca, vatthasenāsanāni ca. erfreuliche Klöster erbauen lassen und darin vielwissende Mönche wohnen lassen. Er soll ihnen Speise und Trank, Gewänder und Lagerstätten reichen, ‘‘Dadeyya ujubhūtesu, vippasannena cetasā; Te tassa dhammaṃ desenti, sabbadukkhāpanūdanaṃ; Yaṃ so dhammaṃ idhaññāya, parinibbāti anāsavo’’ti. (cūḷava. 295) – und sie diesen Aufrechten mit reinem, gläubigem Herzen darbringen. Diese werden ihm dann die Lehre verkünden, welche alles Leiden vertreibt. Wenn er diese Lehre hier auf Erden versteht, erlischt er völlig, frei von allen Trieben.“ Vihārānisaṃsaṃ kathesi. Anāthapiṇḍiko dutiyadivasato paṭṭhāya vihāramahaṃ ārabhi. Visākhāya pāsādamaho catūhi māsehi niṭṭhito, anāthapiṇḍikassa pana vihāramaho navahi māsehi niṭṭhāsi. Vihāramahepi aṭṭhāraseva koṭiyo pariccāgaṃ agamaṃsu. Iti ekasmiṃyeva vihāre catupaṇṇāsakoṭisaṅkhyaṃ dhanaṃ pariccaji. So verkündete er den Segen des Klostergeschenks. Vom nächsten Tag an begann Anāthapiṇḍika mit dem großen Einweihungsfest des Klosters. Während das Einweihungsfest von Visākhas Palastkloster nach vier Monaten abgeschlossen war, dauerte das Einweihungsfest von Anāthapiṇḍikas Jetavana-Kloster neun Monate lang. Auch bei diesem Einweihungsfest wurden achtzehn Koṭis ausgegeben. So wendete er für dieses eine Kloster allein ein Vermögen von insgesamt vierundfünfzig Koṭis auf. Atīte [Pg.110] pana vipassissa bhagavato kāle punabbasumitto nāma seṭṭhi suvaṇṇiṭṭhakāsanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne yojanappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Sikhissa bhagavato kāle sirivaḍḍho nāma seṭṭhi suvaṇṇaphālasanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne tigāvutappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Vessabhussa bhagavato kāle sotthijo nāma seṭṭhi suvaṇṇahatthipadasanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne aḍḍhayojanappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Kakusandhassa bhagavato kāle accuto nāma seṭṭhi suvaṇṇiṭṭhakāsanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne gāvutappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Koṇāgamanassa bhagavato kāle uggo nāma seṭṭhi suvaṇṇakacchapasanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne aḍḍhagāvutappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Kassapassa bhagavato kāle sumaṅgalo nāma seṭṭhi suvaṇṇakaṭṭisanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne soḷasakarīsappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Amhākaṃ pana bhagavato kāle anāthapiṇḍiko nāma seṭṭhi kahāpaṇakoṭisanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne aṭṭhakarīsappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Idaṃ kira ṭhānaṃ sabbabuddhānaṃ avijahitaṭṭhānameva. In der Vergangenheit aber, zur Zeit des erhabenen Buddha Vipassī, kaufte ein Kaufmann namens Punabbasumitta den Boden, indem er ihn lückenlos mit Goldziegeln auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von der Größe einer Yojana. Zur Zeit des erhabenen Buddha Sikhī kaufte ein Kaufmann namens Sirivaḍḍha den Boden, indem er ihn lückenlos mit goldenen Pflugscharen auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von drei Gāvutas Größe. Zur Zeit des erhabenen Buddha Vessabhū kaufte ein Kaufmann namens Sotthija den Boden, indem er ihn lückenlos mit goldenen Elefantenfüßen auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von einer halben Yojana Größe. Zur Zeit des erhabenen Buddha Kakusandha kaufte ein Kaufmann namens Accuta den Boden, indem er ihn lückenlos mit Goldziegeln auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von der Größe eines Gāvuta. Zur Zeit des erhabenen Buddha Koṇāgamana kaufte ein Kaufmann namens Ugga den Boden, indem er ihn lückenlos mit goldenen Schildkröten auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von einem halben Gāvuta Größe. Zur Zeit des erhabenen Buddha Kassapa kaufte ein Kaufmann namens Sumaṅgala den Boden, indem er ihn lückenlos mit Goldbarren auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von der Größe von sechzehn Karīsas. Zur Zeit unseres erhabenen Buddha aber kaufte der Kaufmann namens Anāthapiṇḍika den Boden, indem er ihn lückenlos mit Kahāpaṇas auslegte, und errichtete genau an dieser Stelle ein Kloster von der Größe von acht Karīsas. Dieser Ort ist fürwahr eine Stätte, die von keinem der Buddhas jemals verlassen wird. Iti mahābodhimaṇḍe sabbaññutappattito yāva mahāparinibbānamañcā yasmiṃ yasmiṃ ṭhāne bhagavā vihāsi, idaṃ santikenidānaṃ nāma, tassa vasena sabbajātakāni vaṇṇayissāma. Alles, was sich auf die Orte bezieht, an denen der Erhabene verwelte, angefangen von der Erlangung der Allwissenheit am Fuße des großen Bodhi-Baumes bis hin zu seinem Sterbebett des endgültigen Verlöschens, wird als die „Gegenwärtige Vorgeschichte“ (Santikenidāna) bezeichnet. Auf dieser Grundlage werden wir alle Jātaka-Geschichten erläutern. Nidānakathā niṭṭhitā. Die Einleitungserzählung ist hiermit abgeschlossen. 1. Ekakanipāto 1. Das Buch der Einer-Sprüche 1. Apaṇṇakavaggo 1. Das Kapitel über den sicheren Weg
1. Apaṇṇakajātakavaṇṇanā 1. Die Erläuterung des Apaṇṇaka-Jātaka Imaṃ tāva [Pg.111] apaṇṇakadhammadesanaṃ bhagavā sāvatthiṃ upanissāya jetavanamahāvihāre viharanto kathesi. Kaṃ pana ārabbha ayaṃ kathā samuṭṭhitāti? Seṭṭhissa sahāyake pañcasate titthiyasāvake. Ekasmiñhi divase anāthapiṇḍiko seṭṭhi attano sahāyake pañcasate aññatitthiyasāvake ādāya bahuṃ mālāgandhavilepanañceva sappitelamadhuphāṇitavatthacchādanāni ca gāhāpetvā jetavanaṃ gantvā bhagavantaṃ vanditvā gandhamālādīhi pūjetvā bhesajjāni ceva vatthāni ca bhikkhusaṅghassa vissajjetvā cha nisajjādose vajjetvā ekamantaṃ nisīdi. Tepi aññatitthiyasāvakā tathāgataṃ vanditvā satthu puṇṇacandasassirikaṃ mukhaṃ, lakkhaṇānubyañjanapaṭimaṇḍitaṃ byāmappabhāparikkhittaṃ brahmakāyaṃ, āveḷāveḷā yamakayamakā hutvā niccharantiyo ghanabuddharasmiyo ca olokayamānā anāthapiṇḍikassa samīpeyeva nisīdiṃsu. Diese erste Lehrrede vom sicheren Weg verkündete der Erhabene, als er in der Nähe von Sāvatthi im großen Jetavana-Kloster verweilte. Aus welchem Anlass aber entstand diese Rede? Wegen der fünfhundert Anhänger anderer Sekten, die Freunde des Kaufmanns Anāthapiṇḍika waren. An einem Tag nämlich nahm der Kaufmann Anāthapiṇḍika seine fünfhundert Freunde mit, die Anhänger anderer Sekten waren, ließ sie eine Fülle von Blumen, Wohlgerüchen und Salben, sowie Butter, Öl, Honig, Melasse und Gewänder tragen, begab sich zum Jetavana-Kloster, verneigte sich vor dem Erhabenen, verehrte ihn mit den Blumen, Wohlgerüchen und anderen Gaben, übergab die Heilmittel und Gewänder der Mönchsgemeinde, mied die sechs Fehler des Sitzens und setzte sich an einer passenden Stelle nieder. Auch jene Anhänger anderer Sekten verneigten sich vor dem Tathāgata und blickten auf das Antlitz des Meisters, das glanzvoll wie der Vollmond war, auf seinen erhabenen, einem Brahma gleichenden Körper, der mit den Haupt- und Nebenmerkmalen geschmückt und von einer ein Klafter weiten Aura umgeben war, und auf die dichten Buddha-Lichtstrahlen, die in Bündeln und paarweise hervorbrachen; und so setzten sie sich ganz in der Nähe von Anāthapiṇḍika nieder. Atha nesaṃ satthā manosilātale sīhanādaṃ nadanto taruṇasīho viya gajjanto pāvussakamegho viya ca ākāsagaṅgaṃ otārento viya ca ratanadāmaṃ ganthento viya ca aṭṭhaṅgasamannāgatena savanīyena kamanīyena brahmassarena nānānayavicittaṃ madhuradhammakathaṃ kathesi. Te satthu dhammadesanaṃ sutvā pasannacittā uṭṭhāya dasabalaṃ vanditvā aññatitthiyasaraṇaṃ bhinditvā buddhaṃ saraṇaṃ agamaṃsu. Te tato paṭṭhāya niccakālaṃ anāthapiṇḍikena saddhiṃ gandhamālādihatthā vihāraṃ gantvā dhammaṃ suṇanti, dānaṃ denti, sīlaṃ rakkhanti, uposathakammaṃ karonti. Da verkündete ihnen der Meister — wie ein junger Löwe, der auf einer Realgar-Felsplatte sein Löwengebrüll ausstößt, und wie eine donnernde Wolke der Regenzeit, und wie einer, der den himmlischen Ganges herabfließen lässt, und wie einer, der eine Juwelenkette flicht — mit einer erhabenen Stimme, die mit den acht Eigenschaften ausgestattet, angenehm anzuhören und lieblich ist, eine durch vielfältige Methoden abwechslungsreiche, süße Lehrrede. Als sie die Lehrverkündigung des Meisters gehört hatten, erhoben sie sich mit vertrauensvollem Geist, erwiesen dem Zehnkräftigen ihre Ehrfurcht, brachen ihre Zuflucht zu den anderen Sektenführern und nahmen Zuflucht zum Buddha. Von jener Zeit an gingen sie allezeit zusammen mit Anāthapiṇḍika, Duftstoffe, Blumen und anderes in den Händen haltend, zum Kloster, hörten die Lehre, spendeten Gaben, hielten die Tugendregeln ein und begingen den Uposatha-Tag. Atha bhagavā sāvatthito punadeva rājagahaṃ agamāsi. Te tathāgatassa gatakāle taṃ saraṇaṃ bhinditvā puna aññatitthiyasaraṇaṃ gantvā attano [Pg.112] mūlaṭṭhāneyeva patiṭṭhitā. Bhagavāpi sattaṭṭha māse vītināmetvā puna jetavanameva agamāsi. Anāthapiṇḍiko punapi te ādāya satthu santikaṃ gantvā satthāraṃ gandhamālādīhi pūjetvā vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Tepi bhagavantaṃ vanditvā ekamantaṃ nisīdiṃsu. Atha nesaṃ tathāgate cārikaṃ pakkante gahitasaraṇaṃ bhinditvā puna aññatitthiyasaraṇameva gahetvā mūle patiṭṭhitabhāvaṃ bhagavato ārocesi. Danach begab sich der Erhabene von Sāvatthī aus abermals nach Rājagaha. Als der Tathāgata fortgegangen war, brachen sie jene Zuflucht, suchten wiederum Zuflucht bei anderen Sektenführern und verharrten auf ihrem ursprünglichen Standpunkt. Auch der Erhabene kehrte nach dem Verstreichen von sieben oder acht Monaten wieder zum Jetavana-Kloster zurück. Anāthapiṇḍika nahm sie abermals mit sich, begab sich in die Gegenwart des Meisters, verehrte den Meister mit Duftstoffen, Blumen und dergleichen, erwies ihm Ehrfurcht und setzte sich an eine Seite. Auch jene erwiesen dem Erhabenen die Ehrfurcht und setzten sich an eine Seite. Da berichtete er dem Erhabenen, wie sie nach dem Aufbruch des Tathāgata auf Wanderschaft ihre angenommene Zuflucht gebrochen, abermals Zuflucht bei anderen Sektenführern genommen hatten und wieder in ihrem ursprünglichen Zustand verankert waren. Bhagavā aparimitakappakoṭiyo nirantaraṃ pavattitavacīsucaritānubhāvena dibbagandhagandhitaṃ nānāgandhapūritaṃ ratanakaraṇḍakaṃ vivaranto viya mukhapadumaṃ vivaritvā madhurassaraṃ nicchārento ‘‘saccaṃ kira tumhe upāsakā tīṇi saraṇāni bhinditvā aññatitthiyasaraṇaṃ gatā’’ti pucchi. Atha tehi paṭicchādetuṃ asakkontehi ‘‘saccaṃ bhagavā’’ti vutte satthā ‘‘upāsakā heṭṭhā avīciṃ upari bhavaggaṃ paricchedaṃ katvā tiriyaṃ aparimāṇāsu lokadhātūsu sīlādīhi guṇehi buddhena sadiso nāma natthi, kuto adhikataro’’ti. ‘‘Yāvatā, bhikkhave, sattā apadā vā dvipadā vā catuppadā vā bahuppadā vā, tathāgato tesaṃ aggamakkhāyati (saṃ. ni. 5.139; a. ni. 4.34), yaṃ kiñci vittaṃ idha vā huraṃ vā…pe… (khu. pā. 6.3; su. ni. 226) aggato ve pasannāna’’ntiādīhi (a. ni. 4.34; itivu. 90) suttehi pakāsite ratanattayaguṇe pakāsetvā ‘‘evaṃ uttamaguṇehi samannāgataṃ ratanattayaṃ saraṇaṃ gatā upāsakā vā upāsikā vā nirayādīsu nibbattakā nāma natthi, apāyanibbattito pana muccitvā devaloke uppajjitvā mahāsampattiṃ anubhonti, tasmā tumhehi evarūpaṃ saraṇaṃ bhinditvā aññatitthiyasaraṇaṃ gacchantehi ayuttaṃ kata’’nti āha. Der Erhabene öffnete seinen Lotusmund — wie eine mit mancherlei Wohlgerüchen gefüllte Juwelenschatulle öffnend —, kraft der Wirksamkeit des über unzählige Jahrmillionen ununterbrochen geübten rechten Wandels in Worten. Er ließ seine süße Stimme vernehmen und fragte: „Stimmt es wahrlich, ihr Laienanhänger, dass ihr die drei Zufluchten gebrochen habt und zur Zuflucht anderer Sektenführer gegangen seid?“ Als sie dies nicht verbergen konnten und antworteten: „Es stimmt, Erhabener“, sprach der Meister: „Ihr Laienanhänger, wenn man unten die Avīci-Hölle und oben den höchsten Punkt des Daseins als Grenzen setzt, so gibt es in den unermesslichen Weltsystemen dazwischen niemanden, der dem Buddha an Tugenden wie der Sittlichkeit und so weiter gleichkäme – wie sollte es da einen Höheren geben?“ „Soweit, ihr Mönche, es Wesen gibt, ob fußlos, zweibeinig, vierbeinig oder vielbeinig, so gilt der Tathāgata unter ihnen als der Höchste...“, „Welcher Schatz auch immer hier oder in einer anderen Welt sein mag... [und so weiter] ...für die, die an das Höchste glauben, gibt es wahrhaftig...“ – nachdem er so die Tugenden des Dreijuwels, die in diesen und ähnlichen Suttas dargelegt werden, offenbart hatte, sprach er: „Laienanhänger oder Laienanhängerinnen, die zum so mit höchsten Tugenden ausgestatteten Dreijuwel Zuflucht genommen haben, werden niemals in den Höllen oder anderen Leidensbereichen wiedergeboren. Vielmehr werden sie, befreit von der Wiedergeburt in den Leidenswelten, in der Götterwelt wiedergeboren und genießen dort großes Glück. Daher habt ihr Unrechtes getan, indem ihr eine solche Zuflucht gebrochen habt und zur Zuflucht anderer Sektenführer gegangen seid.“ Ettha ca tīṇi ratanāni mokkhavasena uttamavasena saraṇagatānaṃ apāyesu nibbattiyā abhāvadīpanatthaṃ imāni suttāni dassetabbāni – Hierbei sind zur Veranschaulichung, dass für jene, die zu den drei Juwelen im Sinne der Befreiung und im Sinne des Höchsten Zuflucht genommen haben, keine Wiedergeburt in den Leidenswelten stattfindet, folgende Suttas anzuführen: ‘‘Ye keci buddhaṃ saraṇaṃ gatāse, na te gamissanti apāyabhūmiṃ; Pahāya mānusaṃ dehaṃ, devakāyaṃ paripūressanti. (dī. ni. 2.332; saṃ. ni. 1.37); „Wer auch immer zum Buddha Zuflucht genommen hat, der wird nicht in die Leidenswelt eingehen. Nach dem Ablegen des menschlichen Körpers werden sie die Scharen der Götter füllen.“ ‘‘Ye [Pg.113] keci dhammaṃ saraṇaṃ gatāse, na te gamissanti apāyabhūmiṃ; Pahāya mānusaṃ dehaṃ, devakāyaṃ paripūressanti. „Wer auch immer zum Dhamma Zuflucht genommen hat, der wird nicht in die Leidenswelt eingehen. Nach dem Ablegen des menschlichen Körpers werden sie die Scharen der Götter füllen.“ ‘‘Ye keci saṅghaṃ saraṇaṃ gatāse, na te gamissanti apāyabhūmiṃ; Pahāya mānusaṃ dehaṃ, devakāyaṃ paripūressanti. „Wer auch immer zum Saṅgha Zuflucht genommen hat, der wird nicht in die Leidenswelt eingehen. Nach dem Ablegen des menschlichen Körpers werden sie die Scharen der Götter füllen.“ ‘‘Bahuṃ ve saraṇaṃ yanti, pabbatāni vanāni ca; Ārāmarukkhacetyāni, manussā bhayatajjitā. „Zu vielen Zufluchten gehen sie wahrlich: zu Bergen und zu Wäldern, zu Parkanlagen, Bäumen und Schreinen – die vom Schrecken geängstigten Menschen.“ ‘‘Netaṃ kho saraṇaṃ khemaṃ, netaṃ saraṇamuttamaṃ; Netaṃ saraṇamāgamma, sabbadukkhā pamuccati. „Dies ist wahrlich keine sichere Zuflucht, dies ist nicht die höchste Zuflucht. Wenn man zu dieser Zuflucht geht, wird man nicht von allem Leiden befreit.“ ‘‘Yo ca buddhañca dhammañca, saṅghañca saraṇaṃ gato; Cattāri ariyasaccāni, sammappaññāya passati. „Wer aber zum Buddha, zum Dhamma und zum Saṅgha Zuflucht genommen hat, der schaut mit rechter Weisheit die vier edlen Wahrheiten:“ ‘‘Dukkhaṃ dukkhasamuppādaṃ, dukkhassa ca atikkamaṃ; Ariyañcaṭṭhaṅgikaṃ maggaṃ, dukkhūpasamagāminaṃ. „Das Leiden, die Entstehung des Leidens, das Überwinden des Leidens und den edlen achtteiligen Pfad, der zur Beruhigung des Leidens führt.“ ‘‘Etaṃ kho saraṇaṃ khemaṃ, etaṃ saraṇamuttamaṃ; Etaṃ saraṇamāgamma, sabbadukkhā pamuccatī’’ti. (dha. pa. 188-192); „Dies ist wahrlich die sichere Zuflucht, dies ist die höchste Zuflucht. Wenn man zu dieser Zuflucht geht, wird man von allem Leiden befreit.“ Na kevalañca nesaṃ satthā ettakaṃyeva dhammaṃ desesi, apica kho ‘‘upāsakā buddhānussatikammaṭṭhānaṃ nāma, dhammānussatikammaṭṭhānaṃ nāma, saṅghānussatikammaṭṭhānaṃ nāma sotāpattimaggaṃ deti, sotāpattiphalaṃ deti, sakadāgāmimaggaṃ deti, sakadāgāmiphalaṃ deti, anāgāmimaggaṃ deti, anāgāmiphalaṃ deti, arahattamaggaṃ deti, arahattaphalaṃ detī’’tievamādīhipi nayehi dhammaṃ desetvā ‘‘evarūpaṃ nāma saraṇaṃ bhindantehi ayuttaṃ tumhehi kata’’nti āha. Ettha ca buddhānussatikammaṭṭhānādīnaṃ sotāpattimaggādippadānaṃ ‘‘ekadhammo, bhikkhave, bhāvito bahulīkato ekantanibbidāya virāgāya nirodhāya upasamāya abhiññāya sambodhāya nibbānāya [Pg.114] saṃvattati. Katamo ekadhammo? Buddhānussatī’’tievamādīhi (a. ni. 1.296) suttehi dīpetabbaṃ. Und nicht nur diese Lehre allein verkündete der Meister ihnen, sondern er sprach auch: „Ihr Laienanhänger, das Meditationsobjekt der Vergegenwärtigung des Buddha (buddhānussati-kammaṭṭhāna), das Meditationsobjekt der Vergegenwärtigung des Dhamma (dhammānussati-kammaṭṭhāna) und das Meditationsobjekt der Vergegenwärtigung des Saṅgha (saṅghānussati-kammaṭṭhāna) führen zum Pfad des Stromeintritts (sotāpattimagga), führen zur Frucht des Stromeintritts (sotāpattiphala), führen zum Pfad der Einmalkehr (sakadāgāmimagga), führen zur Frucht der Einmalkehr (sakadāgāmiphala), führen zum Pfad der Nichtkehr (anāgāmimagga), führen zur Frucht der Nichtkehr (anāgāmiphala), führen zum Pfad der Arhatschaft (arahattamagga) und führen zur Frucht der Arhatschaft (arahattaphala).“ Nachdem er so auf diese und ähnliche Weisen das Dhamma dargelegt hatte, sprach er: „Es ist unrecht von euch getan, eine solche Zuflucht zu brechen.“ Und an dieser Stelle ist das Gewähren des Pfades des Stromeintritts und so weiter durch die Meditationsobjekte der Vergegenwärtigung des Buddha und so weiter durch Suttas wie das folgende zu veranschaulichen: „Ein Ding, ihr Mönche, führt, wenn entfaltet und vielfach geübt, zur gänzlichen Abkehr, zur Begehrenslosigkeit, zum Aufhören, zur Beruhigung, zur höheren Erkenntnis, zum Erwachen, zum Nibbāna. Welches eine Ding? Die Vergegenwärtigung des Buddha.“ Evaṃ bhagavā nānappakārehi upāsake ovaditvā ‘‘upāsakā pubbepi manussā asaraṇaṃ ‘saraṇa’nti takkaggāhena viraddhaggāhena gahetvā amanussapariggahite kantāre yakkhabhakkhā hutvā mahāvināsaṃ pattā, apaṇṇakaggāhaṃ pana ekaṃsikaggāhaṃ aviraddhaggāhaṃ gahitamanussā tasmiṃyeva kantāre sotthibhāvaṃ pattā’’ti vatvā tuṇhī ahosi. Atha kho anāthapiṇḍiko gahapati uṭṭhāyāsanā bhagavantaṃ vanditvā abhitthavitvā sirasmiṃ añjaliṃ patiṭṭhāpetvā evamāha ‘‘bhante, idāni tāva imesaṃ upāsakānaṃ uttamasaraṇaṃ bhinditvā takkaggahaṇaṃ amhākaṃ pākaṭaṃ, pubbe pana amanussapariggahite kantāre takkikānaṃ vināso, apaṇṇakaggāhaṃ gahitamanussānañca sotthibhāvo amhākaṃ paṭicchanno, tumhākameva pākaṭo, sādhu vata no bhagavā ākāse puṇṇacandaṃ uṭṭhāpento viya imaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ karotū’’ti. Atha bhagavā ‘‘mayā kho, gahapati, aparimitakālaṃ dasa pāramiyo pūretvā lokassa kaṅkhacchedanatthameva sabbaññutaññāṇaṃ paṭividdhaṃ, sīhavasāya suvaṇṇanāḷiṃ pūrento viya sakkaccaṃ sotaṃ odahitvā suṇohī’’ti seṭṭhino satuppādaṃ janetvā himagabbhaṃ padāletvā puṇṇacandaṃ nīharanto viya bhavantarena paṭicchannakāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Nachdem der Erhabene die Laienanhänger auf diese Weise auf vielfältige Weise ermahnt hatte, sprach er: „Ihr Laienanhänger, auch in der Vergangenheit haben Menschen das, was keine Zuflucht ist, aufgrund von spekulativer und irriger Auffassung als Zuflucht ergriffen, wurden in einer von Geistern besetzten Wildnis zur Beute von Yakshas und erlitten großes Verderben. Diejenigen Menschen hingegen, die die unfehlbare, definitive und richtige Auffassung ergriffen, erlangten genau in jener Wildnis Wohlergehen“, und schwieg danach. Da erhob sich der Hausvater Anāthapiṇḍika von seinem Sitz, verneigte sich vor dem Erhabenen, lobpreiste ihn, legte die gefalteten Hände an seine Stirn und sprach so: „Ehrwürdiger Herr, jetzt ist uns zwar offensichtlich geworden, wie diese Laienanhänger ihre höchste Zuflucht zerstörten, indem sie eine spekulative Auffassung annahmen. Wie aber in der Vergangenheit in der von Geistern besetzten Wildnis das Verderben der Spekulanten und das Wohlergehen der Menschen, die die unfehlbare Auffassung ergriffen hatten, geschah, ist uns verborgen; nur Ihnen allein ist es offenbar. Es wäre wahrlich gut, o Erhabener, wenn Sie uns diesen Sachverhalt offenbaren würden, gleichsam als ließen Sie den Vollmond am Himmel aufsteigen.“ Darauf sprach der Erhabene: „Hausvater, ich habe wahrlich über unermessliche Zeit hinweg die zehn Vollkommenheiten erfüllt und die Allwissenheit erlangt, einzig um die Zweifel der Welt zu zerschneiden. Neige dein Ohr achtsam herbei und höre zu, gleichsam als füllte man eine goldene Röhre mit dem Fett eines Löwen.“ So erweckte er die Aufmerksamkeit des Schatzmeisters und offenbarte den durch eine andere Existenz verborgenen Sachverhalt, gleichsam als spaltete er eine Schneedecke, um den Vollmond hervorzuholen. Atīte kāsiraṭṭhe bārāṇasinagare brahmadatto nāma rājā ahosi. Tadā bodhisatto satthavāhakule paṭisandhiṃ gahetvā dasamāsaccayena mātukucchito nikkhamitvā anupubbena vayappatto pañcahi sakaṭasatehi vaṇijjaṃ karonto vicarati. So kadāci pubbantato aparantaṃ gacchati, kadāci aparantato pubbantaṃ. Bārāṇasiyaṃyeva aññopi satthavāhaputto atthi bālo abyatto anupāyakusalo. Tadā bodhisatto bārāṇasito mahagghaṃ bhaṇḍaṃ gahetvā pañca sakaṭasatāni pūretvā gamanasajjāni katvā ṭhapesi. Sopi bālasatthavāhaputto tatheva pañca sakaṭasatāni pūretvā gamanasajjāni katvā ṭhapesi. In der Vergangenheit regierte in der Stadt Bārāṇasī im Reich Kāsi ein König namens Brahmadatto. Zu jener Zeit nahm der Bodhisatta im Schoße einer Karawanenführerfamilie Wiedergeburt an. Nach Ablauf von zehn Monaten wurde er aus dem Mutterleib geboren und reiste, als er allmählich das Erwachsenenalter erreicht hatte, mit fünfhundert Wagen Handel treibend umher. Manchmal zog er vom Osten in den Westen, manchmal vom Westen in den Osten. In ebenjener Stadt Bārāṇasī gab es auch einen anderen Sohn eines Karawanenführers, der töricht, unerfahren und ungeschickt im Finden von Mitteln war. Damals nahm der Bodhisatta wertvolle Waren aus Bārāṇasī, belud damit fünfhundert Wagen und machte sie zur Abreise bereit. Auch jener törichte Karawanenführersohn belud ebenso fünfhundert Wagen und machte sie zur Abreise bereit. Tadā bodhisatto cintesi ‘‘sace ayaṃ bālasatthavāhaputto mayā saddhiṃyeva gamissati, sakaṭasahasse ekato maggaṃ gacchante maggopi [Pg.115] nappahossati, manussānaṃ dārudakādīnipi, balibaddānaṃ tiṇānipi dullabhāni bhavissanti, etena vā mayā vā purato gantuṃ vaṭṭatī’’ti. So taṃ pakkosāpetvā etamatthaṃ ārocetvā ‘‘dvīhipi amhehi ekato gantuṃ na sakkā, kiṃ tvaṃ purato gamissasi, udāhu pacchato’’ti āha. So cintesi ‘‘mayi purato gacchante bahū ānisaṃsā, maggena abhinneneva gamissāmi, goṇā anāmaṭṭhatiṇaṃ khādissanti, manussānaṃ anāmaṭṭhaṃ sūpeyyapaṇṇaṃ bhavissati, pasannaṃ udakaṃ bhavissati, yathāruciṃ agghaṃ ṭhapetvā bhaṇḍaṃ vikkiṇissāmī’’ti. So ‘‘ahaṃ, samma, purato gamissāmī’’ti āha. Bodhisattopi pacchato gamane bahū ānisaṃse addasa. Evaṃ hissa ahosi – ‘‘purato gacchantā magge visamaṭṭhānaṃ samaṃ karissanti, ahaṃ tehi gatamaggena gamissāmi, purato gatehi balibaddehi pariṇatathaddhatiṇe khādite mama goṇā puna uṭṭhitāni madhuratiṇāni khādissanti, gahitapaṇṇaṭṭhānato uṭṭhitaṃ manussānaṃ sūpeyyapaṇṇaṃ madhuraṃ bhavissati, anudake ṭhāne āvāṭaṃ khanitvā ete udakaṃ uppādessanti, tehi katesu āvāṭesu mayaṃ udakaṃ pivissāma, agghaṭṭhapanaṃ nāma manussānaṃ jīvitā voropanasadisaṃ, ahaṃ pacchato gantvā etehi ṭhapitagghena bhaṇḍaṃ vikkiṇissāmī’’ti. Atha so ettake ānisaṃse disvā ‘‘samma, tvaṃ purato gacchāhī’’ti āha. ‘‘Sādhu, sammā’’ti bālasatthavāho sakaṭāni yojetvā nikkhanto anupubbena manussāvāsaṃ atikkamitvā kantāramukhaṃ pāpuṇi. Damals dachte der Bodhisatta: „Wenn dieser törichte Karawanenführersohn zusammen mit mir reist, wird der Weg für tausend Wagen, die gleichzeitig auf ihm fahren, nicht ausreichen. Auch Feuerholz, Wasser und anderes für die Menschen sowie Gras für die Zugochsen werden schwer zu beschaffen sein. Entweder er oder ich sollte vorausreisen.“ Er ließ ihn herbeirufen, erklärte ihm diesen Sachverhalt und sagte: „Wir beide können nicht zusammen reisen. Willst du vorausreisen oder hinterher?“ Jener dachte: „Wenn ich vorausreise, gibt es viele Vorteile: Ich werde auf einem unbeschädigten Weg reisen; die Ochsen werden unberührtes Gras fressen; den Menschen wird unberührtes Gemüse für die Suppe zur Verfügung stehen; das Wasser wird klar sein; und ich werde meine Waren zu einem Preis verkaufen können, den ich nach Belieben festsetze.“ Er sagte: „Freund, ich werde vorausreisen.“ Auch der Bodhisatta sah viele Vorteile darin, hinterherzureisen. Er dachte nämlich so: „Die Vorausreisenden werden die unebenen Stellen auf dem Weg ebnen, und ich werde auf dem von ihnen geebneten Weg reisen. Wenn die vorausreisenden Zugochsen das reife, harte Gras abgefressen haben, werden meine Ochsen das süße Gras fressen, das neu nachgewachsen ist. Das Gemüse für die Menschen, das an den Stellen nachwächst, wo bereits gepflückt wurde, wird süß sein. An wasserlosen Stellen werden sie Gruben graben und so Wasser herbeiführen, und wir werden aus den von ihnen gegrabenen Brunnen Wasser trinken. Die Preisfestsetzung gleicht dem Entziehen des Lebens der Menschen; ich werde hinterherreisen und meine Waren zu dem von jenen bereits festgesetzten Preis verkaufen.“ Nachdem er diese vielen Vorteile gesehen hatte, sagte er: „Freund, reise du voraus.“ Mit den Worten „Gut, Freund!“ spannte der törichte Karawanenführer seine Wagen an, brach auf, verließ allmählich das bewohnte Gebiet und erreichte den Eingang zur Wildnis. Kantāraṃ nāma – corakantāraṃ, vāḷakantāraṃ, nirudakakantāraṃ, amanussakantāraṃ, appabhakkhakantāranti pañcavidhaṃ. Tattha corehi adhiṭṭhitamaggo corakantāraṃ nāma. Sīhādīhi adhiṭṭhitamaggo vāḷakantāraṃ nāma. Yattha nhāyituṃ vā pātuṃ vā udakaṃ natthi, idaṃ nirudakakantāraṃ nāma. Amanussādhiṭṭhitaṃ amanussakantāraṃ nāma. Mūlakhādanīyādivirahitaṃ appabhakkhakantāraṃ nāma. Imasmiṃ pañcavidhe kantāre taṃ kantāraṃ nirudakakantārañceva amanussakantārañca. Tasmā so bālasatthavāhaputto sakaṭesu mahantamahantā cāṭiyo ṭhapetvā udakassa pūrāpetvā saṭṭhiyojanikaṃ kantāraṃ paṭipajji. Als Wildnis bezeichnet man fünf Arten: die Räuberwildnis, die Raubtierwildnis, die wasserlose Wildnis, die von Geistern besetzte Wildnis und die nahrungslose Wildnis. Darunter ist ein von Räubern beherrschter Weg die sogenannte Räuberwildnis. Ein von Löwen und anderen Raubtieren beherrschter Weg ist die Raubtierwildnis. Wo es weder Wasser zum Baden noch zum Trinken gibt, das ist die wasserlose Wildnis. Eine von Geistern beherrschte ist die Geisterwildnis. Eine von essbaren Wurzeln und Ähnlichem freie Wildnis ist die nahrungslose Wildnis. Unter diesen fünf Arten von Wildnis war jene Wildnis sowohl eine wasserlose Wildnis als auch eine Geisterwildnis. Daher stellte jener törichte Karawanenführersohn sehr große Krüge auf die Wagen, füllte sie mit Wasser und machte sich auf den Weg durch die sechzig Yojanas weite Wildnis. Athassa kantāramajjhaṃ gatakāle kantāre adhivatthayakkho ‘‘imehi manussehi gahitaṃ udakaṃ chaḍḍāpetvā dubbale katvā sabbeva ne khādissāmī’’ti [Pg.116] sabbasetataruṇabalibaddayuttaṃ manoramaṃ yānakaṃ māpetvā dhanukalāpaphalakāvudhahatthehi dasahi dvādasahi amanussehi parivuto uppalakumudāni piḷandhitvā allakoso allavattho issarapuriso viya tasmiṃ yānake nisīditvā kaddamamakkhitehi cakkehi paṭipathaṃ agamāsi. Parivāraamanussāpissa purato ca pacchato ca gacchantā allakesā allavatthā uppalakumudamālā piḷandhitvā padumapuṇḍarīkakalāpe gahetvā bhisamuḷālāni khādantā udakabindūhi ceva kalalehi ca paggharantehi agamaṃsu. Satthavāhā ca nāma yadā dhuravāto vāyati, tadā yānake nisīditvā upaṭṭhākaparivutā rajaṃ pariharantā purato gacchanti. Yadā pacchato vāto vāyati, tadā teneva nayena pacchato gacchanti. Tadā pana dhuravāto ahosi, tasmā so satthavāhaputto purato agamāsi. Als jener [törrichte Karawanenführersohn] in die Mitte der Wildnis gelangt war, beschloss der in der Wildnis hausende Yakkha: „Ich werde diese Menschen dazu bringen, das mitgebrachte Wasser wegzuschütten, sie dadurch schwächen und sie dann alle auffressen.“ Er erschuf einen entzückenden kleinen Wagen, der mit einem Gespann aus makellos weißen, jungen Ochsen bespannt war. Umgeben von zehn oder zwölf Nichtmenschen, die Bogen, Köcher, Schilde und andere Waffen in den Händen hielten, geschmückt mit blauen und weißen Wasserlilien, mit feuchtem Haar und nassen Kleidern, saß er wie ein vornehmer Herr auf diesem Wagen und fuhr ihnen mit schlammbespritzten Rädern entgegen. Auch seine Begleiter – ebenfalls Nichtmenschen –, die vor und hinter ihm hergingen, hatten nasses Haar und nasse Kleider, trugen Kränze aus blauen und weißen Lilien, hielten Bündel aus roten und weißen Lotusblüten in den Händen, kauten auf Lotuswurzeln und -stängeln und gingen einher, während Wassertropfen und Schlamm von ihnen herabtropften. Wenn nun bei Karawanenführern der Gegenwind weht, pflegen sie, umgeben von ihren Dienern, im Wagen sitzend vorauszufahren, um dem Staub zu entgehen. Wenn der Wind von hinten weht, fahren sie auf dieselbe Weise hinterher. Zu jener Zeit aber herrschte Gegenwind; darum fuhr jener Sohn des Karawanenführers voraus. Yakkho taṃ āgacchantaṃ disvā attano yānakaṃ maggā okkamāpetvā ‘‘kahaṃ gacchathā’’ti tena saddhiṃ paṭisanthāraṃ akāsi. Satthavāhopi attano yānakaṃ maggā okkamāpetvā sakaṭānaṃ gamanokāsaṃ datvā ekamante ṭhito taṃ yakkhaṃ avoca ‘‘bho, amhe tāva bārāṇasito āgacchāma. Tumhe pana uppalakumudāni piḷandhitvā padumapuṇḍarīkahatthā bhisamuḷālāni khādantā kaddamamakkhitā udakabindūhi paggharantehi āgacchatha. Kiṃ nu kho tumhehi āgatamagge devo vassati, uppalādisañchannāni vā sarāni atthī’’ti pucchi. Yakkho tassa kathaṃ sutvā ‘‘samma, kiṃ nāmetaṃ kathesi. Esā nīlavanarāji paññāyati. Tato paṭṭhāya sakalaṃ araññaṃ ekodakaṃ, nibaddhaṃ devo vassati, kandarā pūrā, tasmiṃ tasmiṃ ṭhāne padumādisañchannāni sarāni atthī’’ti vatvā paṭipāṭiyā gacchantesu sakaṭesu ‘‘imāni sakaṭāni ādāya kahaṃ gacchathā’’ti pucchi. ‘‘Asukajanapadaṃ nāmā’’ti. ‘‘Imasmiṃ cimasmiñca sakaṭe kiṃ nāma bhaṇḍa’’nti? ‘‘Asukañca asukañcā’’ti. ‘‘Pacchato āgacchantaṃ sakaṭaṃ ativiya garukaṃ hutvā āgacchati, etasmiṃ kiṃ bhaṇḍa’’nti? ‘‘Udakaṃ etthā’’ti. ‘‘Parato tāva udakaṃ ānentehi vo manāpaṃ kataṃ, ito paṭṭhāya pana udakena kiccaṃ natthi, purato bahu udakaṃ, cāṭiyo bhinditvā udakaṃ chaḍḍetvā sukhena gacchathā’’ti āha. Evañca pana vatvā ‘‘tumhe gacchatha, amhākaṃ papañco hotī’’ti thokaṃ gantvā tesaṃ adassanaṃ patvā attano yakkhanagarameva agamāsi. Als der Yakkha jenen herankommen sah, wich er mit seinem Wagen vom Weg ab und grüßte ihn freundlich: „Wohin reist ihr?“ Auch der Karawanenführer wich mit seinem Wagen vom Weg ab, gab den nachfolgenden Karren Raum zum Vorbeifahren, stellte sich beiseite und sprach zu dem Yakkha: „Werter Herr, wir kommen gerade aus Bārāṇasī. Ihr aber kommt daher, geschmückt mit blauen und weißen Wasserlilien, tragt rote und weiße Lotusblüten in den Händen, kaut auf Lotuswurzeln und -stängeln, seid schlammbespritzt und von euch tropft das Wasser. Regnet es etwa auf dem Weg, von dem ihr kommt, oder gibt es dort mit Wasserlilien bedeckte Teiche?“ Als der Yakkha seine Worte hörte, sprach er: „Freund, was redest du da? Dort drüben sieht man doch diesen dunkelgrünen Waldstreifen. Von dort an steht der ganze Wald unter Wasser, es regnet ununterbrochen, die Schluchten sind randvoll und an verschiedenen Stellen gibt es mit Lotus bedeckte Teiche.“ Während die Wagen nacheinander vorbeifuhren, fragte er: „Wohin reist ihr mit all diesen Wagen?“ – „In jenes und jenes Reich.“ – „Und welche Waren habt ihr auf diesem und jenem Karren?“ – „Dies und das.“ – „Der Wagen, der ganz hinten nachkommt, scheint besonders schwer beladen zu sein. Was ist darauf?“ – „Darin ist Wasser.“ – „Bis hierher Wasser mitzubringen, war eine feine Sache von euch. Aber von hier an benötigt ihr kein Wasser mehr; vor euch gibt es reichlich Wasser. Zerbrecht eure Wasserkrüge, schüttet das Wasser weg und reist unbeschwert weiter!“ Nach diesen Worten fügte er hinzu: „Zieht nun weiter, wir werden aufgehalten.“ Er ging ein kleines Stück weiter, und sobald er ihren Blicken entschwunden war, kehrte er in seine eigene Yakkha-Stadt zurück. Sopi [Pg.117] bālasatthavāho attano bālatāya yakkhassa vacanaṃ gahetvā cāṭiyo bhindāpetvā pasatamattampi udakaṃ anavasesetvā sabbaṃ chaḍḍāpetvā sakaṭāni pājāpesi, purato appamattakampi udakaṃ nāhosi, manussā pānīyaṃ alabhantā kilamiṃsu. Te yāva sūriyatthaṅgamanā gantvā sakaṭāni mocetvā parivaṭṭakena ṭhapetvā goṇe cakkesu bandhiṃsu. Neva goṇānaṃ udakaṃ ahosi, na manussānaṃ yāgubhattaṃ vā. Dubbalamanussā tattha tattha nipajjitvā sayiṃsu. Rattibhāgasamanantare yakkhā yakkhanagarato āgantvā sabbepi goṇe ca manusse ca jīvitakkhayaṃ pāpetvā maṃsaṃ khāditvā aṭṭhīni avasesetvā agamaṃsu. Evamekaṃ bālasatthavāhaputtaṃ nissāya sabbepi te vināsaṃ pāpuṇiṃsu, hatthaṭṭhikādīni disāvidisāsu vippakiṇṇāni ahesuṃ. Pañca sakaṭasatāni yathāpūritāneva aṭṭhaṃsu. Auch jener törichte Karawanenführer glaubte aufgrund seiner eigenen Dummheit den Worten des Yakkha, ließ die Wasserkrüge zerbrechen, behielt nicht einmal eine Handvoll Wasser zurück, sondern ließ alles wegschütten und trieb die Wagen voran. Vor ihnen gab es jedoch nicht die geringste Spur von Wasser. Da die Menschen kein Trinkwasser bekamen, waren sie erschöpft. Sie reisten bis zum Sonnenuntergang, spannten dann die Ochsen von den Wagen aus, stellten die Wagen im Kreis auf und banden die Ochsen an die Räder. Es gab weder Wasser für die Ochsen noch Reisschleim oder Essen für die Menschen. Die entkräfteten Menschen legten sich hier und dort schlafen. Gleich nach Einbruch der Nacht kamen Yakkhas aus der Yakkha-Stadt herbei, brachten alle Ochsen und Menschen ums Leben, fraßen ihr Fleisch, ließen nur die Knochen übrig und zogen wieder ab. So kamen wegen dieses einen törichten Sohnes des Karawanenführers sie alle ins Verderben. Die Handknochen und andere Gebeine lagen verstreut in alle Richtungen umher. Die fünfhundert Wagen blieben genau so voll beladen stehen, wie sie gewesen waren. Bodhisattopi kho bālasatthavāhaputtassa nikkhantadivasato māsaḍḍhamāsaṃ vītināmetvā pañcahi sakaṭasatehi nagarā nikkhamma anupubbena kantāramukhaṃ pāpuṇi. So tattha udakacāṭiyo pūretvā bahuṃ udakaṃ ādāya khandhāvāre bheriṃ carāpetvā manusse sannipātetvā evamāha ‘‘tumhe maṃ anāpucchitvā pasatamattampi udakaṃ mā vaḷañjayittha, kantāre visarukkhā nāma honti, pattaṃ vā pupphaṃ vā phalaṃ vā tumhehi pure akhāditapubbaṃ maṃ anāpucchitvā mā khāditthā’’ti. Evaṃ manussānaṃ ovādaṃ datvā pañcahi sakaṭasatehi kantāraṃ paṭipajji. Tasmiṃ kantāramajjhaṃ sampatte so yakkho purimanayeneva bodhisattassa paṭipathe attānaṃ dassesi. Bodhisatto taṃ disvāva aññāsi ‘‘imasmiṃ kantāre udakaṃ natthi, nirudakakantāro nāmesa, ayañca nibbhayo rattanetto, chāyāpissa na paññāyati, nissaṃsayaṃ iminā purato gato bālasatthavāhaputto sabbaṃ udakaṃ chaḍḍāpetvā kilametvā sapariso khādito bhavissati, mayhaṃ pana paṇḍitabhāvaṃ upāyakosallaṃ na jānāti maññe’’ti. Tato naṃ āha ‘‘gacchatha tumhe, mayaṃ vāṇijā nāma aññaṃ udakaṃ adisvā gahitaudakaṃ na chaḍḍema, diṭṭhaṭṭhāne pana chaḍḍetvā sakaṭāni sallahukāni katvā gamissāmā’’ti yakkho thokaṃ gantvā adassanaṃ upagamma attano yakkhanagarameva gato. Der Bodhisatta aber wartete nach dem Abreisetag des törichten Karawanenführersohnes einen halben Monat ab, brach dann mit fünfhundert Wagen aus der Stadt auf und erreichte allmählich den Rand der Wildnis. Dort füllte er die Wasserkrüge, nahm reichlich Wasser mit, ließ im Lager die Trommel schlagen, versammelte die Menschen und sprach zu ihnen: „Ihr dürft, ohne mich vorher zu fragen, nicht einmal eine Handvoll Wasser verbrauchen. In der Wildnis gibt es nämlich Giftbäume. Esst kein Blatt, keine Blüte und keine Frucht, die ihr zuvor noch nie gegessen habt, ohne mich vorher gefragt zu haben!“ Nachdem er den Menschen diese Ermahnung gegeben hatte, zog er mit den fünfhundert Wagen in die Wildnis hinein. Als er die Mitte der Wildnis erreicht hatte, zeigte sich jener Yakkha auf dieselbe Weise wie zuvor dem Bodhisatta auf dem Weg entgegenkommend. Sobald der Bodhisatta ihn sah, erkannte er Folgendes: „In dieser Wildnis gibt es kein Wasser; dies ist als die wasserlose Wildnis bekannt. Und dieser Kerl hier ist völlig furchtlos, hat rote Augen und auch sein Schatten ist nicht zu sehen. Ohne Zweifel hat dieser Yakkha den vorausgefahrenen törichten Sohn des Karawanenführers dazu gebracht, all sein Wasser wegzuschütten, ihn so ermüdet und ihn samt seinem Gefolge aufgefressen. Er weiß wohl nichts von meiner Weisheit und meiner Geschicklichkeit im Finden von Mitteln.“ Daraufhin sprach er zu dem Yakkha: „Zieht nur weiter! Wir Kaufleute schütten das mitgebrachte Wasser nicht weg, bevor wir anderes Wasser sehen. Erst wenn wir an einen Ort kommen, wo wir tatsächlich Wasser sehen, werden wir das mitgebrachte wegschütten, um unsere Wagen leichter zu machen, und dann weiterreisen.“ Der Yakkha ging ein kleines Stück weiter, verschwand aus ihren Augen und kehrte in seine eigene Yakkha-Stadt zurück. Yakkhe pana gate manussā bodhisattaṃ āhaṃsu ‘‘ayya, ete manussā ‘esā nīlavanarāji paññāyati, tato paṭṭhāya nibaddhaṃ devo vassatī’ti vatvā [Pg.118] uppalakumudamālādhārino padumapuṇḍarīkakalāpe ādāya bhisamuḷālāni khādantā allavatthā allakesā udakabindūhi paggharantehi āgatā, udakaṃ chaḍḍetvā sallahukehi sakaṭehi khippaṃ gacchāmā’’ti. Bodhisatto tesaṃ kathaṃ sutvā sakaṭāni ṭhapāpetvā sabbe manusse sannipātāpetvā ‘‘tumhehi ‘imasmiṃ kantāre saro vā pokkharaṇī vā atthī’ti kassaci sutapubba’’nti pucchi. ‘‘Na, ayya, sutapubba’’nti. Nirudakakantāro nāma eso, idāni ekacce manussā ‘‘etāya nīlavanarājiyā purato devo vassatī’’ti vadanti, ‘‘vuṭṭhivāto nāma kittakaṃ ṭhānaṃ vāyatī’’ti? ‘‘Yojanamattaṃ, ayyā’’ti. ‘‘Kacci pana vo ekassāpi sarīraṃ vuṭṭhivāto paharatī’’ti? ‘‘Natthi ayyā’’ti. ‘‘Meghasīsaṃ nāma kittake ṭhāne paññāyatī’’ti? ‘‘Tiyojanamatte ayyā’’ti. ‘‘Atthi pana vo kenaci ekampi meghasīsaṃ diṭṭha’’nti? ‘‘Natthi, ayyā’’ti. ‘‘Vijjulatā nāma kittake ṭhāne paññāyatī’’ti? ‘‘Catuppañcayojanamatte, ayyā’’ti. ‘‘Atthi pana vo kenaci vijjulatobhāso diṭṭho’’ti? ‘‘Natthi, ayyā’’ti. ‘‘Meghasaddo nāma kittake ṭhāne suyyatī’’ti? ‘‘Ekadviyojanamatte, ayyā’’ti. ‘‘Atthi pana vo kenaci meghasaddo suto’’ti? ‘‘Natthi, ayyā’’ti. ‘‘Na ete manussā, yakkhā ete, amhe udakaṃ chaḍḍāpetvā dubbale katvā khāditukāmā āgatā bhavissanti. Purato gato bālasatthavāhaputto na upāyakusalo. Addhā so etehi udakaṃ chaḍḍāpetvā kilametvā khādito bhavissati, pañca sakaṭasatāni yathāpūritāneva ṭhitāni bhavissanti. Ajja mayaṃ tāni passissāma, pasatamattampi udakaṃ achaḍḍetvā sīghasīghaṃ pājethā’’ti pājāpesi. Nachdem der Dämon (Yakkha) jedoch gegangen war, sagten die Leute zum Bodhisatta: „Herr, jene Menschen sagten: ‚Dort drüben ist ein dunkelgrüner Waldstreifen zu sehen, von dort an regnet es ständig.‘ Sie trugen Kränze aus blauen Lotosblüten und Seerosen, hielten Bündel von roten und weißen Lotosblumen, aßen Lotoswurzeln und -stängel, kamen mit nassen Gewändern und nassem Haar, von denen Wassertropfen herabtropften, und sagten: ‚Werft das Wasser weg, damit wir mit erleichterten Wagen schnell vorankommen!‘“ Als der Bodhisatta ihre Worte gehört hatte, ließ er die Wagen anhalten, versammelte alle Leute und fragte: „Hat jemand von euch jemals zuvor gehört, dass es in dieser Einöde einen See oder einen Teich gibt?“ – „Nein, Herr, davon haben wir noch nie gehört“, antworteten sie. „Dies ist als die wasserlose Einöde bekannt. Nun sagen einige Leute: ‚Vor jenem dunkelgrünen Waldstreifen regnet es.‘ Wie weit weht denn ein Regenwind?“ – „Etwa ein Yojana, Herr.“ – „Hat denn der Regenwind den Körper auch nur eines Einzigen von euch berührt?“ – „Nein, Herr.“ – „In welcher Entfernung wird eine Gewitterwolke sichtbar?“ – „In etwa drei Yojanas, Herr.“ – „Hat denn jemand von euch auch nur eine einzige Gewitterwolke gesehen?“ – „Nein, Herr.“ – „In welcher Entfernung wird ein Blitz sichtbar?“ – „In etwa vier bis fünf Yojanas, Herr.“ – „Hat denn jemand von euch einen Blitzschein gesehen?“ – „Nein, Herr.“ – „In welcher Entfernung hört man den Donner?“ – „In etwa ein oder zwei Yojanas, Herr.“ – „Hat denn jemand von euch den Donner gehört?“ – „Nein, Herr.“ „Dies sind keine Menschen, es sind Dämonen (Yakkhas). Sie sind bestimmt gekommen, um uns zu fressen, nachdem sie uns dazu gebracht haben, das Wasser wegzuschütten und uns schwach zu machen. Der törichte Sohn des Karawanenführers, der vor uns hergezogen ist, besaß kein Geschick in den Mitteln. Gewiss haben sie ihn dazu gebracht, sein Wasser wegzuschütten, haben ihn ermüdet und aufgefressen; seine fünfhundert Wagen werden noch genauso beladen dastehen, wie sie waren. Heute werden wir sie sehen. Schüttet nicht einmal eine Handvoll Wasser weg und treibt die Wagen so schnell wie möglich an!“ So ließ er sie antreiben. So gacchanto yathāpūritāneva pañca sakaṭasatāni goṇamanussānañca hatthaṭṭhikādīni disāvidisāsu vippakiṇṇāni disvā sakaṭāni mocāpetvā sakaṭaparivaṭṭakena khandhāvāraṃ bandhāpetvā kālasseva manusse ca goṇe ca sāyamāsabhattaṃ bhojāpetvā manussānaṃ majjhe goṇe nipajjāpetvā sayaṃ balanāyako hutvā khaggahattho tiyāmarattiṃ ārakkhaṃ gahetvā ṭhitakova aruṇaṃ uṭṭhāpesi. Punadivase pana pātova [Pg.119] sabbakiccāni niṭṭhāpetvā goṇe bhojetvā dubbalasakaṭāni chaḍḍāpetvā thirāni gāhāpetvā appagghaṃ bhaṇḍaṃ chaḍḍāpetvā mahagghaṃ bhaṇḍaṃ āropāpetvā yathādhippetaṃ ṭhānaṃ gantvā diguṇatiguṇena mūlena bhaṇḍaṃ vikkiṇitvā sabbaṃ parisaṃ ādāya puna attano nagarameva agamāsi. Als er weiterzog, sah er die fünfhundert Wagen, die noch genauso beladen dastanden, wie sie waren, sowie die Handknochen und andere Gebeine von Ochsen und Menschen, die in allen Himmelsrichtungen verstreut lagen. Er ließ die Wagen ausspannen, stellte sie im Kreis zu einer Wagenburg auf, ließ Mensch und Vieh frühzeitig ihr Abendbrot einnehmen, bettete die Ochsen inmitten der Männer und hielt selbst, als Anführer mit dem Schwert in der Hand, während aller drei Nachtwachen Wache. So stehend erwartete er die Morgendämmerung. Am nächsten Tag erledigte er bereits am frühen Morgen alle Aufgaben, fütterte die Ochsen, ließ die schwachen Wagen zurück, nahm die stabilen mit, warf die minderwertigen Waren ab und ließ die wertvollen Güter aufladen. Er zog an den gewünschten Ort, verkaufte die Waren zum doppelten oder dreifachen Preis und kehrte mit seiner gesamten Gefolgschaft wieder in seine eigene Stadt zurück. Satthā imaṃ dhammakathaṃ kathetvā ‘‘evaṃ, gahapati, pubbe takkaggāhagāhino mahāvināsaṃ pattā, apaṇṇakaggāhagāhino pana amanussānaṃ hatthato muccitvā sotthinā icchitaṭṭhānaṃ gantvā puna sakaṭṭhānameva paccāgamiṃsū’’ti vatvā dvepi vatthūni ghaṭetvā imissā apaṇṇakadhammadesanāya abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Als der Meister diese Lehrrede gehalten hatte, sprach er: „So, Hausvater, erlitten in der Vergangenheit jene, die sich an spekulativen Annahmen festhielten, großes Verderben. Jene jedoch, die das Unfehlbare ergriffen, entkamen den Händen der Nicht-Menschen, gelangten wohlbehalten an ihren gewünschten Ort und kehrten wieder an ihre eigene Heimatstätte zurück.“ Er verknüpfte beide Geschichten und sprach, als der vollkommen Erwachte, in dieser Darlegung der unfehlbaren Wahrheit (Apaṇṇaka-Dhamma) diese Strophe: 1. 1. ‘‘Apaṇṇakaṃ ṭhānameke, dutiyaṃ āhu takkikā; Etadaññāya medhāvī, taṃ gaṇhe yadapaṇṇaka’’nti. „Die Unfehlbarkeit ergreifen die einen als Grund, die Spekulanten behaupten das Gegenteil; wenn der Weise dies erkannt hat, möge er das wählen, was unfehlbar ist.“ Tattha apaṇṇakanti ekaṃsikaṃ aviraddhaṃ niyyānikaṃ. Ṭhānanti kāraṇaṃ. Kāraṇañhi yasmā tadāyattavuttitāya phalaṃ tiṭṭhati nāma, tasmā ‘‘ṭhāna’’nti vuccati, ‘‘ṭhānañca ṭhānato aṭṭhānañca aṭṭhānato’’tiādīsu (vibha. 809) cassa payogo veditabbo. Iti ‘‘apaṇṇakaṃ ṭhāna’’nti padadvayenāpi ‘‘yaṃ ekantahitasukhāvahattā paṇḍitehi paṭipannaṃ ekaṃsikakāraṇaṃ aviraddhakāraṇaṃ niyyānikakāraṇaṃ, taṃ ida’’nti dīpeti. Ayamettha saṅkhepo, pabhedato pana tīṇi saraṇagamanāni, pañca sīlāni, dasa sīlāni, pātimokkhasaṃvaro, indriyasaṃvaro, ājīvapārisuddhi, paccayapaṭisevanaṃ, sabbampi catupārisuddhisīlaṃ; indriyesu guttadvāratā, bhojane mattaññutā, jāgariyānuyogo, jhānaṃ, vipassanā, abhiññā, samāpatti, ariyamaggo, ariyaphalaṃ, sabbampetaṃ apaṇṇakaṭṭhānaṃ apaṇṇakapaṭipadā, niyyānikapaṭipadāti attho. Dabei bedeutet „unfehlbar“ (apaṇṇaka) das Unzweifelhafte, das Fehlerfreie und zur Befreiung Führende. „Grund“ (ṭhāna) bedeutet Ursache. Denn da die Frucht in Abhängigkeit von ihr besteht, wird sie „Grund“ genannt; und ihre Verwendung ist in Sätzen wie „die Ursache als Ursache und die Nicht-Ursache als Nicht-Ursache“ zu verstehen. Somit verdeutlicht das Wortpaar „der unfehlbare Grund“: „Das ist jene unzweifelhafte, fehlerfreie und zur Befreiung führende Ursache, die von den Weisen praktiziert wird, da sie ausschließlich zu Wohl und Glück führt.“ Dies ist hier die Zusammenfassung. Im Einzelnen jedoch bedeutet es: die Zuflucht zu den drei Juwelen, die fünf Silas, die zehn Silas, die Zügelung gemäß dem Patimokkha, die Zügelung der Sinne, die Reinheit des Lebensunterhalts, der rechte Gebrauch der Lebensbedürfnisse – also die gesamte vierfache sittliche Reinheit; die Bewachung der Sinnentore, das Maßhalten beim Essen, die Hingabe an die Wachsamkeit, die Vertiefungen, die Hellsicht, das höhere Wissen, die Errungenschaften, der edle Pfad und die edle Frucht – all dies ist der unfehlbare Grund, die unfehlbare Praxis, die zur Befreiung führende Praxis. Yasmā ca pana niyyānikapaṭipadāya etaṃ nāmaṃ, tasmāyeva bhagavā apaṇṇakapaṭipadaṃ dassento imaṃ suttamāha – Und weil dies der Name für die zur Befreiung führende Praxis ist, sprach der Erhabene, um diese unfehlbare Praxis aufzuzeigen, dieses Sutta: ‘‘Tīhi, bhikkhave, dhammehi samannāgato bhikkhu apaṇṇakapaṭipadaṃ paṭipanno hoti, yoni cassa āraddhā hoti āsavānaṃ khayāya[Pg.120]. Katamehi tīhi? Idha, bhikkhave, bhikkhu indriyesu guttadvāro hoti, bhojane mattaññū hoti, jāgariyaṃ anuyutto hoti. Kathañca, bhikkhave, bhikkhu indriyesu guttadvāro hoti? Idha, bhikkhave, bhikkhu cakkhunā rūpaṃ disvā na nimittaggāhī hoti…pe… evaṃ kho, bhikkhave, bhikkhu indriyesu guttadvāro hoti. „Ihr Mönche, ein Mönch, der mit drei Dingen ausgestattet ist, folgt der unfehlbaren Praxis, und seine Bemühung ist auf die Vernichtung der Triebe (Āsavas) ausgerichtet. Mit welchen drei? Hier, ihr Mönche, ist ein Mönch einer, der die Tore seiner Sinne bewacht, beim Essen Maß hält und der Wachsamkeit hingegeben ist. Und wie, ihr Mönche, bewacht ein Mönch die Tore seiner Sinne? Hier, ihr Mönche, ergreift ein Mönch, wenn er mit dem Auge eine Form sieht, nicht deren äußere Merkmale ... [wie zuvor] ... auf diese Weise, ihr Mönche, bewacht ein Mönch die Tore seiner Sinne.“ ‘‘Kathañca, bhikkhave, bhikkhu bhojane mattaññū hoti? Idha, bhikkhave, bhikkhu paṭisaṅkhā yoniso āhāraṃ āhāreti neva davāya na madāya…pe… evaṃ kho, bhikkhave, bhikkhu bhojane mattaññū hoti. „Und wie, ihr Mönche, hält ein Mönch Maß beim Essen? Hier, ihr Mönche, nimmt ein Mönch Nahrung weise reflektierend zu sich, weder zum Vergnügen noch zur Berauschung ... [wie zuvor] ... auf diese Weise, ihr Mönche, hält ein Mönch Maß beim Essen.“ ‘‘Kathañca, bhikkhave, bhikkhu jāgariyaṃ anuyutto hoti. Idha, bhikkhave, bhikkhu divasaṃ caṅkamena nisajjāya…pe… evaṃ kho, bhikkhave, bhikkhu jāgariyaṃ anuyutto hotī’’ti (a. ni. 3.16). „Und wie, ihr Mönche, ist ein Mönch der Wachsamkeit hingegeben? Here, ihr Mönche, reinigt ein Mönch tagsüber im Gehen und Sitzen [seinen Geist] ... [wie zuvor] ... auf diese Weise, ihr Mönche, ist ein Mönch der Wachsamkeit hingegeben.“ Imasmiñcāpi sutte tayova dhammā vuttā. Ayaṃ pana apaṇṇakapaṭipadā yāva arahattaphalaṃ labbhateva. Tattha arahattaphalampi, phalasamāpattivihārassa ceva, anupādāparinibbānassa ca, paṭipadāyeva nāma hoti. Auch in dieser Sutta sind nur drei Dinge dargelegt worden. Doch diese unfehlbare Praxis wird wahrlich bis hin zur Erlangung der Frucht der Arhatschaft gepflegt. Darin ist selbst die Frucht der Arhatschaft wahrlich die Praxis sowohl für das Verweilen im Zustand der Fruchterlangung als auch für das Erlöschen ohne Ergreifen. Eketi ekacce paṇḍitamanussā. Tattha kiñcāpi ‘‘asukā nāmā’’ti niyamo natthi, idaṃ pana saparisaṃ bodhisattaṃyeva sandhāya vuttanti veditabbaṃ. Dutiyaṃ āhu takkikāti dutiyanti paṭhamato apaṇṇakaṭṭhānato niyyānikakāraṇato dutiyaṃ takkaggāhakāraṇaṃ aniyyānikakāraṇaṃ. Āhu takkikāti ettha pana saddhiṃ purimapadena ayaṃ yojanā – apaṇṇakaṭṭhānaṃ ekaṃsikakāraṇaṃ aviraddhakāraṇaṃ niyyānikakāraṇaṃ eke bodhisattappamukhā paṇḍitamanussā gaṇhiṃsu. Ye pana bālasatthavāhaputtappamukhā takkikā āhu, te dutiyaṃ sāparādhaṃ anekaṃsikaṭṭhānaṃ viraddhakāraṇaṃ aniyyānikakāraṇaṃ aggahesuṃ. Tesu ye apaṇṇakaṭṭhānaṃ aggahesuṃ, te sukkapaṭipadaṃ paṭipannā. Ye dutiyaṃ ‘‘purato bhavitabbaṃ udakenā’’ti takkaggāhasaṅkhātaṃ aniyyānikakāraṇaṃ aggahesuṃ. Te kaṇhapaṭipadaṃ paṭipannā. „Einige“ bedeutet: manche weise Menschen. Darin gibt es zwar keine Festlegung im Sinne von „die und die namentlich“, doch man sollte verstehen, dass dies mit Bezug auf den Bodhisatta samt seiner Gefolgschaft gesagt wurde. „Die zweite (Alternative) nannten die Denker“: „Die zweite“ bedeutet die nach dem ersten unfehlbaren Standpunkt, der zum Entrinnen führt, folgende zweite, auf spekulativer Erfassung beruhende Ursache, die nicht zum Entrinnen führt. Bei „nannten die Denker“ ist die Verknüpfung mit dem vorherigen Begriff folgende: Den unfehlbaren Standpunkt – die sichere Ursache, die fehlerfreie Ursache, die zum Entrinnen führende Ursache – nahmen einige weise Menschen unter Führung des Bodhisatta an. Die Denker unter Führung des törichten Sohnes des Karawanenführers jedoch nannten den zweiten, fehlerhaften, unsicheren Standpunkt, die verfehlte Ursache, die nicht zum Entrinnen führt, und nahmen ihn an. Wer von ihnen den unfehlbaren Standpunkt annahm, der folgte der hellen Praxis. Diejenigen aber, die die zweite Alternative annahmen – die nicht zum Entrinnen führende Ursache, bekannt als spekulative Erfassung, indem sie dachten: „Da vorne muss es Wasser geben“ –, folgten der dunklen Praxis. Tattha [Pg.121] sukkapaṭipadā aparihānipaṭipadā, kaṇhapaṭipadā parihānipaṭipadā. Tasmā ye sukkapaṭipadaṃ paṭipannā, te aparihīnā sotthibhāvaṃ pattā. Ye pana kaṇhapaṭipadaṃ paṭipannā, te parihīnā anayabyasanaṃ āpannāti imamatthaṃ bhagavā anāthapiṇḍikassa gahapatino vatvā uttari idamāha ‘‘etadaññāya medhāvī, taṃ gaṇhe yadapaṇṇaka’’nti. Dabei ist die helle Praxis die Praxis des Nicht-Verfalls, die dunkle Praxis die Praxis des Verfalls. Daher verfielen diejenigen, die der hellen Praxis folgten, nicht, sondern erlangten Wohlergehen. Diejenigen aber, die der dunklen Praxis folgten, verfielen und gerieten in Unheil und Verderben. Nachdem der Erhabene dem Hausvater Anāthapiṇḍika diese Bedeutung erklärt hatte, sprach er darüber hinaus Folgendes: „Nachdem der Weise dies erkannt hat, möge er das wählen, was unfehlbar ist.“ Tattha etadaññāya medhāvīti ‘‘medhā’’ti laddhanāmāya vipulāya visuddhāya uttamāya paññāya samannāgato kulaputto etaṃ apaṇṇake ceva sapaṇṇake cāti dvīsu atakkaggāhatakkaggāhasaṅkhātesu ṭhānesu guṇadosaṃ vuddhihāniṃ atthānatthaṃ ñatvāti attho. Taṃ gaṇhe yadapaṇṇakanti yaṃ apaṇṇakaṃ ekaṃsikaṃ sukkapaṭipadāaparihāniyapaṭipadāsaṅkhātaṃ niyyānikakāraṇaṃ, tadeva gaṇheyya. Kasmā? Ekaṃsikādibhāvatoyeva. Itaraṃ pana na gaṇheyya. Kasmā? Anekaṃsikādibhāvatoyeva. Ayañhi apaṇṇakapaṭipadā nāma sabbesaṃ buddhapaccekabuddhabuddhaputtānaṃ paṭipadā. Sabbabuddhā hi apaṇṇakapaṭipadāyameva ṭhatvā daḷhena vīriyena pāramiyo pūretvā bodhimūle buddhā nāma honti, paccekabuddhā paccekabodhiṃ uppādenti, buddhaputtā sāvakapāramiñāṇaṃ paṭivijjhanti. Hierbei bedeutet „Nachdem der Weise dies erkannt hat“: Ein Sohn aus gutem Hause, der mit der weiten, reinen und höchsten Weisheit ausgestattet ist, die den Namen „medhā“ trägt, hat diesen Vorzug und Fehler, diesen Zuwachs und Verlust, diesen Nutzen und Schaden bei den zwei Standpunkten erkannt, welche als das Nicht-Spekulieren und das Spekulieren bezeichnet werden, nämlich beim Unfehlbaren und beim Zweifelhaften; dies ist die Bedeutung. „Er möge das wählen, was unfehlbar ist“ bedeutet: Was unfehlbar und gewiss ist, was als die helle Praxis und die Praxis des Nicht-Verfalls bezeichnet wird und was die Ursache zur Befreiung ist, eben das soll er wählen. Warum? Eben wegen dessen Gewissheit und dergleichen. Das andere hingegen soll er nicht wählen. Warum? Eben wegen dessen Ungewissheit und dergleichen. Denn diese unfehlbare Praxis ist fürwahr die Praxis aller Buddhas, Paccekabuddhas und Buddhasöhne. Alle Buddhas nämlich verweilen fest in eben dieser unfehlbaren Praxis, erfüllen mit unerschütterlicher Tatkraft die Vollkommenheiten und werden am Fuße des Bodhi-Baumes zu Buddhas; die Paccekabuddhas bringen das Paccekabodhi-Wissen hervor, und die Buddhasöhne durchdringen das Wissen um die Vollkommenheit eines Jüngers. Iti bhagavā tesaṃ upāsakānaṃ tisso kulasampattiyo ca cha kāmasagge brahmalokasampattiyo ca datvāpi pariyosāne arahattamaggaphaladāyikā apaṇṇakapaṭipadā nāma, catūsu apāyesu pañcasu ca nīcakulesu nibbattidāyikā sapaṇṇakapaṭipadā nāmāti imaṃ apaṇṇakadhammadesanaṃ dassetvā uttari cattāri saccāni soḷasahi ākārehi pakāsesi. Catusaccapariyosāne sabbepi te pañcasatā upāsakā sotāpattiphale patiṭṭhahiṃsu. So zeigte der Erhabene jenen Laienanhängern die drei Arten des standesgemäßen Wohlstands, die sechs Sinneshimmel sowie den Wohlstand der Brahma-Welt, wies aber am Ende darauf hin: Die unfehlbare Praxis ist jene, die den Pfad und die Frucht der Arhatschaft gewährt, während die fehlerhafte Praxis jene ist, die zur Wiedergeburt in den vier niederen Welten und den fünst niederen Ständen führt. Nachdem er diese Lehrrede über das Unfehlbare dargelegt hatte, verkündete er darüber hinaus die Vier Edlen Wahrheiten auf sechzehnfache Weise. Am Ende der Verkündung der Vier Wahrheiten wurden all jene fünfhundert Laienanhänger in der Frucht des Stromeintritts gefestigt. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dassetvā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānetvā dassesi – ‘‘tasmiṃ samaye bālasatthavāhaputto devadatto ahosi, tassa parisā devadattaparisāva, paṇḍitasatthavāhaputtaparisā buddhaparisā, paṇḍitasatthavāhaputto pana ahameva ahosi’’nti desanaṃ niṭṭhāpesi. Der Meister brachte diese Lehrrede vor, zeigte sie auf, erzählte die beiden Geschichten, verknüpfte den Zusammenhang und führte die Wiedergeburtsgeschichte zusammen, indem er sprach: „Zu jener Zeit war der törichte Sohn des Karawanenführers Devadatta, sein Gefolge war wahrlich das Gefolge Devadattas, das Gefolge des weisen Karawanenführers war das Gefolge des Buddha, der weise Karawanenführer aber war wahrlich ich selbst.“ Damit schloss er die Lehrrede ab. Apaṇṇakajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Apaṇṇaka-Jātaka, die erste.
2. Vaṇṇupathajātakavaṇṇanā 2. Die Erklärung des Vaṇṇupatha-Jātaka Akilāsunoti [Pg.122] imaṃ dhammadesanaṃ bhagavā sāvatthiyaṃ viharanto kathesi. Kaṃ pana ārabbhāti? Ekaṃ ossaṭṭhavīriyaṃ bhikkhuṃ. Tathāgate kira sāvatthiyaṃ viharante eko sāvatthivāsī kulaputto jetavanaṃ gantvā satthu santike dhammadesanaṃ sutvā pasannacitto kāmesu ādīnavaṃ disvā pabbajitvā upasampadāya pañcavassiko hutvā dve mātikā uggaṇhitvā vipassanācāraṃ sikkhitvā satthu santike attano cittaruciyaṃ kammaṭṭhānaṃ gahetvā ekaṃ araññaṃ pavisitvā vassaṃ upagantvā temāsaṃ vāyamantopi obhāsamattaṃ vā nimittamattaṃ vā uppādetuṃ nāsakkhi. „Unermüdlich“ – diese Lehrrede sprach der Erhabene, als er in Sāvatthī weilte. In Bezug auf wen sprach er sie? In Bezug auf einen Mönch, der seine Willenskraft aufgegeben hatte. Es heißt, als der Tathāgata in Sāvatthī weilte, ging ein in Sāvatthī lebender Sohn aus gutem Hause zum Jetavana-Kloster, hörte im Beisein des Meisters die Lehrrede und war im Herzen tief gläubig gestimmt. Er sah das Elend in den Sinnengenüssen, trat in den Orden ein, und nachdem er seit seiner höheren Weihung fünf Jahre verbracht hatte, erlernte er die beiden Leitfäden, schulte sich in der Praxis der Einsichtsmeditation, nahm im Beisein des Meisters ein Meditationsobjekt an, das seiner Neigung entsprach, zog in einen Wald, trat in die Regenzeit-Klausur ein und vermochte es, obwohl er drei Monate lang strebte, nicht, auch nur den geringsten Lichtschein oder ein Zeichen hervorzubringen. Athassa etadahosi ‘‘satthārā cattāro puggalā kathitā, tesu mayā padaparamena bhavitabbaṃ, natthi maññe mayhaṃ imasmiṃ attabhāve maggo vā phalaṃ vā, kiṃ karissāmi araññavāsena, satthu santikaṃ gantvā rūpasobhaggappattaṃ buddhasarīraṃ olokento madhuraṃ dhammadesanaṃ suṇanto viharissāmī’’ti puna jetavanameva paccāgamāsi. Atha naṃ sandiṭṭhasambhattā āhaṃsu – ‘‘āvuso, tvaṃ satthu santike kammaṭṭhānaṃ gahetvā ‘samaṇadhammaṃ karissāmī’ti gato, idāni pana āgantvā saṅgaṇikāya abhiramamāno carasi, kiṃ nu kho te pabbajitakiccaṃ matthakaṃ pattaṃ, appaṭisandhiko jātosī’’ti? Āvuso, ahaṃ maggaṃ vā phalaṃ vā alabhitvā ‘‘abhabbapuggalena mayā bhavitabba’’nti vīriyaṃ ossajitvā āgatomhīti. ‘‘Akāraṇaṃ te, āvuso, kataṃ daḷhavīriyassa satthu sāsane pabbajitvā vīriyaṃ ossajantena, ayuttaṃ te kataṃ, ehi tathāgatassa dassemā’’ti taṃ ādāya satthu santikaṃ agamaṃsu. Da dachte er: „Der Meister hat von vier Arten von Personen gesprochen. Unter diesen muss ich wohl zu jenen gehören, für die das Wort das Höchste ist. Ich glaube, für mich gibt es in diesem Dasein weder Pfad noch Frucht. Was soll ich mit dem Leben im Wald anfangen? Ich werde in die Gegenwart des Meisters zurückkehren, den Körper des Buddha betrachten, der von vollendeter Schönheit ist, und verweilen, während ich der süßen Lehrverkündigung lausche.“ Und so kehrte er zum Jetavana-Kloster zurück. Da sprachen seine vertrauten Freunde und Gefährten zu ihm: „Freund, du bist in die Gegenwart des Meisters gegangen, hast ein Meditationsobjekt angenommen und bist mit den Worten fortgezogen: ‚Ich will die Pflichten eines Asketen erfüllen‘. Nun aber bist du zurückgekommen und ziehst umher, während du dich in Gesellschaft amüsierst. Ist etwa das Ziel des Mönchslebens von dir erreicht worden? Bist du etwa frei von künftiger Wiedergeburt geworden?“ „Freunde, da ich weder Pfad noch Frucht erlangt habe und dachte: ‚Ich muss wohl eine unfähige Person sein‘, habe ich meine Willenskraft aufgegeben und bin zurückgekehrt.“ „Freund, du hast etwas Unvernünftiges getan, indem du in der Lehre des Meisters, der von unerschütterlicher Tatkraft ist, den Orden betreten und dann deine Willenskraft aufgegeben hast; du hast getan, was sich nicht ziemt. Komm, wir wollen dich dem Tathāgata zeigen.“ Und sie nahmen ihn mit und gingen in die Gegenwart des Meisters. Satthā taṃ disvā evamāha ‘‘bhikkhave, tumhe etaṃ bhikkhuṃ anicchamānaṃ ādāya āgatā, kiṃ kataṃ iminā’’ti? ‘‘Bhante, ayaṃ bhikkhu evarūpe niyyānikasāsane pabbajitvā samaṇadhammaṃ karonto vīriyaṃ ossajitvā āgato’’ti āhaṃsu. Atha naṃ satthā āha ‘‘saccaṃ kira tayā bhikkhu vīriyaṃ ossaṭṭha’’nti? ‘‘Saccaṃ, bhagavā’’ti. ‘‘Kiṃ pana tvaṃ bhikkhu evarūpe mama sāsane pabbajitvā ‘appiccho’ti vā ‘santuṭṭho’ti vā ‘pavivitto’ti vā ‘āraddhavīriyo’ti vā evaṃ attānaṃ ajānāpetvā ‘ossaṭṭhavīriyo bhikkhū’ti jānāpesi. Nanu tvaṃ pubbe vīriyavā ahosi, tayā ekena kataṃ vīriyaṃ nissāya marukantāre pañcasu sakaṭasatesu manussā ca goṇā [Pg.123] ca pānīyaṃ labhitvā sukhitā jātā, idāni kasmā vīriyaṃ ossajasī’’ti. So bhikkhu ettakena vacanena upatthambhito ahosi. Als der Meister ihn sah, sprach er: „Mönche, ihr habt diesen Mönch gegen seinen Willen hierher gebracht; was hat er getan?“ Sie sagten: „Ehrwürdiger Herr, dieser Mönch ist, nachdem er in einer solchen zur Befreiung führenden Lehre ordiniert wurde und die Pflichten eines Asketen ausübte, zurückgekehrt, indem er seine Tatkraft aufgegeben hat.“ Da fragte ihn der Meister: „Ist es wahr, Mönch, dass du deine Tatkraft aufgegeben hast?“ „Es ist wahr, Erhabener“, antwortete er. „Mönch, warum hast du, nachdem du in einer solchen meiner Lehre ordiniert wurdest, dich selbst nicht als einen bekannt gemacht, der wenig begehrt, der zufrieden ist, der abgesondert lebt oder der von tatkräftiger Anstrengung ist, sondern dich stattdessen als einen Mönch gezeigt, der seine Willenskraft aufgegeben hat? Warst du nicht früher voller Tatkraft? Haben nicht, gestützt auf die von dir allein erbrachte Anstrengung, in einer Sandwüste die Menschen und Ochsen von fünfhundert Wagen Trinkwasser gefunden und Rettung erlangt? Warum gibst du nun deine Tatkraft auf?“ Durch diese Worte wurde jener Mönch ermutigt. Taṃ pana kathaṃ sutvā bhikkhū bhagavantaṃ yāciṃsu – ‘‘bhante, idāni iminā bhikkhunā vīriyassa ossaṭṭhabhāvo amhākaṃ pākaṭo, pubbe panassa ekassa vīriyaṃ nissāya marukantāre goṇamanussānaṃ pānīyaṃ labhitvā sukhitabhāvo paṭicchanno, tumhākaṃ sabbaññutaññāṇasseva pākaṭo, amhākampetaṃ kāraṇaṃ kathethā’’ti. ‘‘Tena hi, bhikkhave, suṇāthā’’ti bhagavā tesaṃ bhikkhūnaṃ satuppādaṃ janetvā bhavantarena paṭicchannakāraṇaṃ pākaṭamakāsi. Als die Mönche diese Worte hörten, baten sie den Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, dass dieser Mönch jetzt seine Tatkraft aufgegeben hat, ist uns offensichtlich. Doch wie es sich damals verhielt, als sich die Menschen und Ochsen in der Sandwüste auf die Anstrengung dieses einen Mannes stützten, dadurch Trinkwasser erhielten und gerettet wurden, ist uns verborgen; dies ist allein Eurem allwissenden Wissen offenbar. Bitte erzählt auch uns diese Begebenheit!“ Der Erhabene sagte: „Nun denn, Mönche, hört zu!“, und nachdem er die Aufmerksamkeit jener Mönche geweckt hatte, enthüllte er das Geschehnis, das durch eine andere Existenz verborgen geblieben war. Atīte kāsiraṭṭhe bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto satthavāhakule paṭisandhiṃ gahetvā vayappatto pañcahi sakaṭasatehi vaṇijjaṃ karonto vicarati. So ekadā saṭṭhiyojanikaṃ marukantāraṃ paṭipajji. Tasmiṃ kantāre sukhumavālukā muṭṭhinā gahitā hatthe na tiṭṭhati, sūriyuggamanato paṭṭhāya aṅgārarāsi viya uṇhā hoti, na sakkā akkamituṃ. Tasmā taṃ paṭipajjantā dārudakatilataṇḍulādīni sakaṭehi ādāya rattimeva gantvā aruṇuggamane sakaṭāni parivaṭṭaṃ katvā matthake maṇḍapaṃ kāretvā kālasseva āhārakiccaṃ niṭṭhāpetvā chāyāya nisinnā divasaṃ khepetvā atthaṅgate sūriye sāyamāsaṃ bhuñjitvā bhūmiyā sītalāya jātāya sakaṭāni yojetvā gacchanti, samuddagamanasadisameva gamanaṃ hoti. Thalaniyāmako nāma laddhuṃ vaṭṭati, so tārakasaññā satthaṃ tāreti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta im Königreich Kāsi zu Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta im Hause eines Karawanenführers Wiedergeburt an. Als er herangewachsen war, zog er mit pfünfhundert Wagen umher, um Handel zu treiben. Eines Tages begab er sich in eine sechzig Yojanas weite Sandwüste. In jener Wüste blieb der feine Sand, wenn man ihn mit einer Handvoll aufhob, nicht in der Hand zurück; von Sonnenaufgang an wurde er heiß wie ein Haufen glühender Kohlen und man konnte nicht darauf treten. Daher nahmen jene, die sie durchquerten, Brennholz, Wasser, Sesam, Reis und anderes auf Wagen mit, reisten nur zur Nachtzeit, stellten bei der Morgenröte die Wagen im Kreis auf, errichteten oben ein Zeltdach, nahmen schon früh ihr Mahl ein, saßen im Schatten, um den Tag zu verbringen, aßen nach Sonnenuntergang zu Abend und reisten, sobald der Boden kühl geworden war, nach dem Anspannen der Wagen weiter. Eine solche Reise gleicht einer Seefahrt. Man musste einen sogenannten Landlotsen anwerben, der die Karawane mithilfe der Sternenbilder durch die Wüste führte. Sopi satthavāho tasmiṃ kāle imināva niyāmena taṃ kantāraṃ gacchanto ekūnasaṭṭhi yojanāni gantvā ‘‘idāni ekaratteneva marukantārā nikkhamanaṃ bhavissatī’’ti sāyamāsaṃ bhuñjitvā sabbaṃ dārudakaṃ khepetvā sakaṭāni yojetvā pāyāsi. Niyāmako pana purimasakaṭe āsanaṃ pattharāpetvā ākāse tārakaṃ olokento ‘‘ito pājetha, ito pājethā’’ti vadamāno nipajji. So dīghamaddhānaṃ aniddāyanabhāvena kilanto niddaṃ okkami, goṇe nivattitvā āgatamaggameva gaṇhante na [Pg.124] aññāsi. Goṇā sabbarattiṃ agamaṃsu. Niyāmako aruṇuggamanavelāya pabuddho nakkhattaṃ oloketvā ‘‘sakaṭāni nivattetha nivattethā’’ti āha. Sakaṭāni nivattetvā paṭipāṭiṃ karontānaññeva aruṇo uggato. Manussā ‘‘hiyyo amhākaṃ niviṭṭhakhandhāvāraṭṭhānamevetaṃ, dārudakampi no khīṇaṃ, idāni naṭṭhamhā’’ti sakaṭāni mocetvā parivaṭṭakena ṭhapetvā matthake maṇḍapaṃ katvā attano attano sakaṭassa heṭṭhā anusocantā nipajjiṃsu. Auch jener Karawanenführer reiste zu jener Zeit nach eben dieser Methode durch die Wüste. Als er neunundfünfzig Yojanas zurückgelegt hatte, dachte er: „Nun werden wir in nur einer einzigen Nacht aus der Sandwüste herauskommen“, aß das Abendbrot, verbrauchte das gesamte Brennholz und das Wasser, spannte die Wagen an und brach auf. Der Lotse jedoch ließ sich auf dem vordersten Wagen einen Sitz herrichten, blickte zu den Sternen am Himmel empor, gab Anweisungen wie: „Treibt hierher, treibt dorthin!“ und legte sich hin. Erschöpft vom langen Schlafmangel schlief er fest ein und bemerkte nicht, dass die Ochsen umkehrten und den Weg zurückliefen, auf dem sie gekommen waren. Die Ochsen liefen die ganze Nacht hindurch. Als der Lotse zur Stunde der Morgenröte erwachte und die Gestirne betrachtete, rief er: „Wendet die Wagen um, wendet sie um!“ Während sie die Wagen wendeten und wieder in Reihe brachten, brach bereits der Morgen an. Die Leute erkannten: „Dies ist ja genau unser Lagerplatz von gestern! Auch unser Holz und Wasser ist aufgezehrt, nun sind wir verloren!“ Sie spannten die Wagen ab, stellten sie kreisförmig auf, errichteten oben ein Zeltdach und legten sich, von Kummer geplagt, jeder unter seinen Wagen. Bodhisatto ‘‘mayi vīriyaṃ ossajante sabbe vinassissantī’’ti pāto sītalavelāyameva āhiṇḍanto ekaṃ dabbatiṇagacchaṃ disvā ‘‘imāni tiṇāni heṭṭhā udakasinehena uṭṭhitāni bhavissantī’’ti cintetvā kuddālaṃ gāhāpetvā taṃ padesaṃ khaṇāpesi, te saṭṭhihatthaṭṭhānaṃ khaṇiṃsu. Ettakaṃ ṭhānaṃ khaṇitvā paharantānaṃ kuddālo heṭṭhāpāsāṇe paṭihaññi, pahaṭamatte sabbe vīriyaṃ ossajiṃsu. Bodhisatto pana ‘‘imassa pāsāṇassa heṭṭhā udakena bhavitabba’’nti otaritvā pāsāṇe ṭhito oṇamitvā sotaṃ odahitvā saddaṃ āvajjento heṭṭhā udakassa pavattanasaddaṃ sutvā uttaritvā cūḷupaṭṭhākaṃ āha – ‘‘tāta, tayā vīriye ossaṭṭhe sabbe vinassissāma, tvaṃ vīriyaṃ anossajanto imaṃ ayakūṭaṃ gahetvā āvāṭaṃ otaritvā etasmiṃ pāsāṇe pahāraṃ dehī’’ti. So tassa vacanaṃ sampaṭicchitvā sabbesu vīriyaṃ ossajitvā ṭhitesupi vīriyaṃ anossajanto otaritvā pāsāṇe pahāraṃ adāsi. Pāsāṇo majjhe bhijjitvā heṭṭhā patitvā sotaṃ sannirumbhitvā aṭṭhāsi, tālakkhandhappamāṇā udakavaṭṭi uggañchi. Sabbe pānīyaṃ pivitvā nhāyiṃsu, atirekāni akkhayugādīni phāletvā yāgubhattaṃ pacitvā bhuñjitvā goṇe ca bhojetvā sūriye atthaṅgate udakāvāṭasamīpe dhajaṃ bandhitvā icchitaṭṭhānaṃ agamaṃsu. Te tattha bhaṇḍaṃ vikkiṇitvā diguṇaṃ tiguṇaṃ catugguṇaṃ lābhaṃ labhitvā attano vasanaṭṭhānameva agamaṃsu. Te tattha yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gatā, bodhisattopi dānādīni puññāni katvā yathākammameva gato. Der Bodhisatta dachte: „Wenn ich meine Tatkraft aufgebe, werden alle zugrunde gehen.“ Als er am frühen Morgen, als es noch kühl war, umherging, erblickte er ein Büschel Dabba-Gras und dachte: „Dieses Gras muss gewachsen sein, weil sich darunter Feuchtigkeit befindet.“ Er ließ eine Hacke holen und jene Stelle ausheben. Sie gruben sechzig Ellen tief. Als sie an dieser Stelle gegraben hatten und weiterhackten, stieß die Hacke unten auf eine Steinplatte. Kaum war die Hacke darauf gestoßen, gaben alle ihre Anstrengung auf. Der Bodhisatta jedoch dachte: „Unter dieser Steinplatte muss sich Wasser befinden.“ Er stieg hinab, stellte sich auf den Stein, beugte sich vor, legte das Ohr an und lauschte auf ein Geräusch. Als er das Geräusch von fließendem Wasser darunter vernahm, stieg er wieder hinauf und sagte zu seinem treuen Diener: „Mein Lieber, wenn du deine Tatkraft aufgibst, werden wir alle umkommen. Gib deine Willenskraft nicht auf, nimm diesen eisernen Hammer, steig in die Grube hinab und schlage auf diese Steinplatte!“ Dieser nahm seine Worte an und stieg hinab; obwohl alle anderen ihre Anstrengung aufgegeben hatten und untätig dastanden, gab er seine Tatkraft nicht auf und schlug auf den Stein. Die Steinplatte zerbrach in der Mitte, stürzte hinab und gab den blockierten Fluss frei, sodass eine Wasserfontäne von der Dicke eines Palmstamms emporstieg. Alle tranken Wasser und badeten. Sie spalteten die überzähligen Wagenachsen, Joche und anderes auf, kochten sich Reisschleim und Reis, aßen und fütterten auch die Ochsen. Als die Sonne unterging, befestigten sie eine Flagge nahe der Wassergrube und reisten an den gewünschten Ort. Dort verkauften sie ihre Waren, erzielten den doppelten, dreifachen oder vierfachen Gewinn und kehrten an ihren Wohnort zurück. Sie lebten dort bis an ihr Lebensende und gingen gemäß ihrem Kamma dahin. Auch der Bodhisatta vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Spenden und ging gemäß seinem Kamma dahin. Sammāsambuddho imaṃ dhammadesanaṃ kathetvā abhisambuddhova imaṃ gāthaṃ kathesi – Nachdem der vollkommen Erleuchtete diese Lehrverkündigung gehalten hatte, sprach er, nachdem er selbst die vollkommene Erleuchtung erlangt hatte, diese Strophe: 2. 2. ‘‘Akilāsuno [Pg.125] vaṇṇupathe khaṇantā, udaṅgaṇe tattha papaṃ avinduṃ; Evaṃ munī vīriyabalūpapanno, akilāsu vinde hadayassa santi’’nti. „Die Unermüdlichen, die auf dem Sandpfad gruben, fanden dort auf der kahlen Sandfläche eine Tränke. Ebenso erlangt der Weise, der mit der Kraft der Tatkraft ausgestattet und unermüdlich ist, den Frieden des Herzens.“ Tattha akilāsunoti nikkosajjā āraddhavīriyā. Vaṇṇupatheti vaṇṇu vuccati vālukā, vālukāmaggeti attho. Khaṇantāti bhūmiṃ khaṇamānā. Udaṅgaṇeti ettha udāti nipāto, aṅgaṇeti manussānaṃ sañcaraṇaṭṭhāne, anāvāṭe bhūmibhāgeti attho. Tatthāti tasmiṃ vaṇṇupathe. Papaṃ avindunti udakaṃ paṭilabhiṃsu. Udakañhi papīyanabhāvena ‘‘papā’’ti vuccati. Pavaddhaṃ vā āpaṃ papaṃ, mahodakanti attho. Darin bedeutet „unermüdlich“ (akilāsuno): frei von Trägheit, voll Tatkraft. Bei „auf dem Sandweg“ (vaṇṇupathe) wird Sand „vaṇṇu“ genannt; die Bedeutung ist „auf dem Sandweg“. „Grabend“ (khaṇantā) bedeutet den Erdboden aufgrabend. Bei „udaṅgaṇe“ ist hier „ud“ eine Partikel, und „aṅgaṇe“ bedeutet an einem Ort, wo Menschen umhergehen, auf einem offenen Stück Land. „Dort“ (tattha) bedeutet auf jenem Sandweg. „Sie fanden eine Tränke“ (papaṃ avinduṃ) bedeutet sie erlangten Wasser. Denn Wasser wird aufgrund seiner Trinkbarkeit „papā“ (Tränke) genannt. Oder reichlich vorhandenes Wasser ist „papaṃ“, was „viel Wasser“ bedeutet. Evanti opammapaṭipādanaṃ. Munīti monaṃ vuccati ñāṇaṃ, kāyamoneyyādīsu vā aññataraṃ, tena samannāgatattā puggalo ‘‘munī’’ti vuccati. So panesa agāriyamuni, anagāriyamuni, sekkhamuni, asekkhamuni, paccekabuddhamuni, munimunīti anekavidho. Tattha agāriyamunīti gihī āgataphalo viññātasāsano. Anagāriyamunīti tathārūpova pabbajito. Sekkhamunīti satta sekkhā. Asekkhamunīti khīṇāsavo. Paccekabuddhamunīti paccekasambuddho. Munimunīti sammāsambuddho. Imasmiṃ panatthe sabbasaṅgāhakavasena moneyyasaṅkhātāya paññāya samannāgato ‘‘munī’’ti veditabbo. Vīriyabalūpapannoti vīriyena ceva kāyabalañāṇabalena ca samannāgato. Akilāsūti nikkosajjo – „So“ (evaṃ) dient der Anwendung des Gleichnisses. Zum Wort „Weiser“ (muni): Weisheit (mona) wird Erkenntnis (ñāṇa) genannt, oder eine der Arten wie das weise Verhalten des Körpers (kāyamoneyya) usw. Weil er damit ausgestattet ist, wird ein Mensch „Weiser“ (muni) genannt. Dieser ist jedoch vielfältig: ein häuslicher Weiser (agāriyamuni), ein hausloser Weiser (anagāriyamuni), ein Schüler-Weiser (sekkhamuni), ein Meisterschüler-Weiser (asekkhamuni), ein Einzelbuddha-Weiser (paccekabuddhamuni) und der Weise der Weisen (munimuni). Darin ist der „häusliche Weise“ ein Laie, der die Frucht [des Pfades] erlangt hat und die Lehre versteht. Der „hauslose Weise“ ist ein ebenso beschaffener Ordinierter. Der „Schüler-Weiser“ bezeichnet die sieben Übenden (sekkhā). Der „Meisterschüler-Weiser“ ist der Triebversiegte (Arhat). Der „Einzelbuddha-Weiser“ ist der Einzelbuddha (Paccekabuddho). Der „Weise der Weisen“ ist der vollkommen Erleuchtete (Sammāsambuddho). In dieser Bedeutung jedoch ist im Sinne einer allumfassenden Definition als „Weiser“ derjenige zu verstehen, der mit der als „mona“ bezeichneten Weisheit ausgestattet ist. „Ausgestattet mit Tatkraft und Stärke“ (vīriyabalūpapanno) bedeutet ausgestattet mit Tatkraft sowie mit körperlicher Kraft und Wissenskraft. „Unermüdlich“ (akilāsu) bedeutet frei von Trägheit – ‘‘Kāmaṃ taco ca nhāru ca, aṭṭhi ca avasissatu; Upasussatu nissesaṃ, sarīre maṃsalohita’’nti. – „Gerne mögen Haut, Sehnen und Knochen übrigbleiben; gänzlich vertrocknen mögen im Leib Fleisch und Blut.“ Evaṃ vuttena caturaṅgasamannāgatena vīriyena samannāgatattā analaso. Vinde hadayassa santinti cittassapi hadayarūpassapi sītalabhāvakaraṇena ‘‘santi’’nti saṅkhaṃ gataṃ jhānavipassanābhiññāarahattamaggañāṇasaṅkhātaṃ ariyadhammaṃ vindati paṭilabhatīti attho. Bhagavatā hi – Er ist nicht träge (analaso), weil er mit der so beschriebenen, viergliedrigen Willenskraft ausgestattet ist. „Er möge den Frieden des Herzens finden“ (vinde hadayassa santiṃ) bedeutet: Er erlangt die edle Lehre (ariyadhamma), bekannt als Vertiefung (jhāna), Hellblick (vipassanā), höhere Geisteskräfte (abhiññā) und das Wissen um den Pfad der Arhatschaft (arahattamaggañāṇa), die den Namen „Friede“ (santi) trägt, weil sie sowohl den Geist als auch die physische Grundlage des Herzens kühlt. Denn vom Erhabenen wurde gesagt: ‘‘Dukkhaṃ, bhikkhave, kusīto viharati vokiṇṇo pāpakehi akusalehi dhammehi, mahantañca sadatthaṃ parihāpeti. Āraddhavīriyo ca kho, bhikkhave, sukhaṃ viharati pavivitto pāpakehi akusalehi [Pg.126] dhammehi, mahantañca sadatthaṃ paripūreti, na, bhikkhave, hīnena aggassa patti hotī’’ti (saṃ. ni. 2.22) – „Mönche, in Leiden lebt der Träge, vermischt mit bösen, unheilsamen Dingen, und er lässt sein großes eigenes Wohl schwinden. Der Tatkräftige aber, Mönche, lebt glücklich, abgesondert von bösen, unheilsamen Dingen, und er bringt sein großes eigenes Wohl zur Vollendung. Nicht, o Mönche, wird das Höchste durch Minderwertiges erreicht.“ Evaṃ anekehi suttehi kusītassa dukkhavihāro, āraddhavīriyassa ca sukhavihāro saṃvaṇṇito. Idhāpi āraddhavīriyassa akatābhinivesassa vipassakassa vīriyabalena adhigantabbaṃ tameva sukhavihāraṃ dassento ‘‘evaṃ munī vīriyabalūpapanno, akilāsu vinde hadayassa santi’’nti āha. Idaṃ vuttaṃ hoti – yathā te vāṇijā akilāsuno vaṇṇupathe khaṇantā udakaṃ labhiṃsu, evaṃ imasmimpi sāsane akilāsu hutvā vāyamamāno paṇḍito bhikkhu imaṃ jhānādibhedaṃ hadayassa santiṃ labhati. So tvaṃ bhikkhu pubbe udakamattassa atthāya vīriyaṃ katvā idāni evarūpe maggaphaladāyake niyyānikasāsane kasmā vīriyaṃ ossajasīti evaṃ imaṃ dhammadesanaṃ dassetvā cattāri saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ossaṭṭhavīriyo bhikkhu aggaphale arahatte patiṭṭhāsi. So wurde in zahlreichen Lehrreden das leidvolle Verweilen des Trägen und das glückliche Verweilen des Tatkräftigen gepriesen. Auch hier sprach der Erhabene, um eben dieses glückliche Verweilen aufzuzeigen, das ein tatkräftiger, noch nicht zum Ziel gelangter Hellblick-Übender durch die Kraft seiner Tatkraft erlangen kann: „So möge der Weise, ausgestattet mit Tatkraft und Stärke, unermüdlich den Frieden des Herzens finden.“ Dies bedeutet Folgendes: So wie jene Kaufleute unermüdlich auf dem Sandweg gruben und Wasser fanden, so erlangt in dieser Lehre auch ein weiser Mönch, der unermüdlich strebt, diesen in Vertiefungen und anderen Stufen bestehenden Frieden des Herzens. „Warum, o Mönch, gibst du nun deine Tatkraft in einer solchen Lehre auf, die Pfad und Frucht gewährt und zur Befreiung führt, nachdem du früher für bloß ein wenig Wasser Tatkraft bewiesen hast?“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verkündete er die vier Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten etablierte sich der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte, in der höchsten Frucht, der Arhatschaft. Satthāpi dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānetvā dassesi ‘‘tasmiṃ samaye vīriyaṃ anossajitvā pāsāṇaṃ bhinditvā mahājanassa udakadāyako cūḷupaṭṭhāko ayaṃ ossaṭṭhavīriyo bhikkhu ahosi, avasesaparisā idāni buddhaparisā jātā, satthavāhajeṭṭhako pana ahameva ahosi’’nti desanaṃ niṭṭhāpesi. Auch der Meister erzählte die beiden Geschichten, stellte die Verbindung her, fasste das Jātaka zusammen und zeigte auf: „Der junge Diener damals, der seine Tatkraft nicht aufgab, den Felsen zertrümmerte und der großen Menschenmenge Wasser gab, war dieser Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte. Das übrige Gefolge ist nun die Gefolgschaft des Buddha geworden, der Anführer der Karawane aber war ich selbst.“ Damit schloss er die Lehrverkündigung ab. Vaṇṇupathajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Vaṇṇupatha-Jātaka, die zweite.
3. Serivavāṇijajātakavaṇṇanā 3. Die Erklärung des Serivavāṇija-Jātaka Idha ce naṃ virādhesīti imampi dhammadesanaṃ bhagavā sāvatthiyaṃ viharanto ekaṃ ossaṭṭhavīriyameva bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tañhi purimanayeneva bhikkhūhi ānītaṃ disvā satthā āha – ‘‘tvaṃ bhikkhu, evarūpe maggaphaladāyake sāsane pabbajitvā vīriyaṃ ossajanto satasahassagghanikāya kañcanapātiyā parihīno serivavāṇijo viya ciraṃ socissasī’’ti. Bhikkhū tassatthassa [Pg.127] āvibhāvatthaṃ bhagavantaṃ yāciṃsu, bhagavā bhavantarena paṭicchannakāraṇaṃ pākaṭamakāsi. „Wenn du dies hier verfehlst“ (idha ce naṃ virādhesi) – diese Lehrverkündigung hielt der Erhabene, während er in Sāvatthī verwelte, bezugnehmend auf eben jenen Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte. Als der Meister ihn sah, wie er auf dieselbe Weise wie zuvor von den Mönchen herbeigeführt wurde, sprach er: „Wenn du, o Mönch, in einer solchen Lehre, die Pfad und Frucht gewährt, ordiniert bist und deine Tatkraft aufgibst, wirst du lange Zeit Kummer erleiden, so wie der Händler von Seriva, der die hunderttausend [Münzen] wertvolle goldene Schale verlor.“ Die Mönche baten den Erhabenen um die Verdeutlichung dieses Sachverhalts. Der Erhabene machte die durch ein anderes Leben verborgene Begebenheit offenbar. Atīte ito pañcame kappe bodhisatto serivaraṭṭhe kacchapuṭavāṇijo ahosi. So serivanāmakena ekena lolakacchapuṭavāṇijena saddhiṃ vohāratthāya gacchanto nīlavāhaṃ nāma nadiṃ uttaritvā ariṭṭhapuraṃ nāma nagaraṃ pavisanto nagaravīthiyo bhājetvā attano pattavīthiyā bhaṇḍaṃ vikkiṇanto vicari. Itaropi attano pattavīthiṃ gaṇhi. Tasmiñca nagare ekaṃ seṭṭhikulaṃ parijiṇṇaṃ ahosi, sabbe puttabhātikā ca dhanañca parikkhayaṃ agamaṃsu, ekā dārikā ayyikāya saddhiṃ avasesā ahosi, tā dvepi paresaṃ bhatiṃ katvā jīvanti. Gehe pana tāsaṃ mahāseṭṭhinā paribhuttapubbā suvaṇṇapāti bhājanantare nikkhittā dīgharattaṃ avalañjiyamānā malaggahitā ahosi, tā tassā suvaṇṇapātibhāvampi na jānanti. So lolavāṇijo tasmiṃ samaye ‘‘maṇike gaṇhatha, maṇike gaṇhathā’’ti vicaranto taṃ gharadvāraṃ pāpuṇi. Sā kumārikā taṃ disvā ayyikaṃ āha ‘‘amma mayhaṃ ekaṃ piḷandhanaṃ gaṇhā’’ti. Amma mayaṃ duggatā, kiṃ datvā gaṇhissāmāti. Ayaṃ no pāti atthi, no ca amhākaṃ upakārā, imaṃ datvā gaṇhāti. Sā vāṇijaṃ pakkosāpetvā āsane nisīdāpetvā taṃ pātiṃ datvā ‘‘ayya, imaṃ gahetvā tava bhaginiyā kiñcideva dehī’’ti āha. Vāṇijo pātiṃ hatthena gahetvāva ‘‘suvaṇṇapāti bhavissatī’’ti parivattetvā pātipiṭṭhiyaṃ sūciyā lekhaṃ kaḍḍhitvā suvaṇṇabhāvaṃ ñatvā ‘‘imāsaṃ kiñci adatvāva imaṃ pātiṃ harissāmī’’ti ‘‘ayaṃ kiṃ agghati, aḍḍhamāsakopissā mūlaṃ na hotī’’ti bhūmiyaṃ khipitvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Ekena pavisitvā nikkhantavīthiṃ itaro pavisituṃ labhatīti bodhisatto taṃ vīthiṃ pavisitvā ‘‘maṇike gaṇhatha, maṇike gaṇhathā’’ti vicaranto tameva gharadvāraṃ pāpuṇi. In der Vergangenheit, im fünften Weltzeitalter von diesem an gerechnet, war der Bodhisatta ein Hausierer im Königreich Seriva. Er zog zusammen mit einem anderen, gierigen Hausierer namens Seriva aus, um Handel zu treiben. Nachdem sie den Fluss namens Nīlavāha überquert hatten, betraten sie die Stadt namens Ariṭṭhapura. Sie teilten die Straßen der Stadt unter sich auf, und er zog umher und verkaufte seine Waren in den ihm zugefallenen Straßen. Auch der andere nahm die ihm zugefallene Straße ein. In jener Stadt war eine Kaufmannsfamilie verarmt und herabgekommen; alle Söhne und Brüder sowie das gesamte Vermögen waren zugrunde gegangen. Nur ein junges Mädchen war zusammen mit ihrer Großmutter übrig geblieben. Die beiden ernährten sich, indem sie Lohnarbeit für andere verrichteten. In ihrem Haus aber lag eine goldene Schale, die früher von dem Großkaufmann benutzt worden war; sie war zwischen anderem Geschirr abgestellt worden und, da sie lange Zeit unbenutzt geblieben war, mit Schmutz bedeckt. Sie wussten nicht einmal, dass es eine goldene Schale war. Zu jener Zeit kam der gierige Händler, der umherzog und rief: „Kauft Schmuck! Kauft Schmuck!“, an die Tür dieses Hauses. Als das junge Mädchen ihn sah, sagte sie zur Großmutter: „Großmutter, kauf mir doch ein Schmuckstück!“ – „Mein Kind, wir sind arm, womit sollen wir es kaufen?“ – „Wir haben diese Schale hier, die uns ohnehin nichts nützt; gib diese hin und kaufe es.“ Die Großmutter ließ den Händler hereinrufen, bot ihm einen Sitz an, gab ihm die Schale und sagte: „Werter Herr, nimm dies und gib deiner Schwester irgendein Schmuckstück dafür.“ Der Händler nahm die Schale in die Hand und vermutete, es könnte eine goldene Schale sein. Er drehte sie um, ritzte mit einer Nadel eine Linie auf die Unterseite der Schale, erkannte, dass sie aus Gold war, und dachte: „Ich werde diese Schale mitnehmen, ohne diesen Frauen irgendetwas dafür zu geben.“ Da sagte er: „Was ist die schon wert? Ihr Wert beträgt nicht einmal einen halben Māsaka!“, warf sie auf den Boden, erhob sich von seinem Sitz und ging davon. Da vereinbart war, dass eine Straße, die der eine bereits betreten und wieder verlassen hatte, von dem anderen betreten werden durfte, betrat der Bodhisatta diese Straße. Er zog umher und rief: „Kauft Schmuck! Kauft Schmuck!“ und kam an genau dieselbe Haustür. Puna sā kumārikā tatheva ayyikaṃ āha. Atha naṃ ayyikā ‘‘amma, paṭhamaṃ āgatavāṇijo pātiṃ bhūmiyaṃ khipitvā gato, idāni kiṃ datvā gaṇhissāmā’’ti āha. Amma, so vāṇijo pharusavāco, ayaṃ pana piyadassano mudusallāpo, appeva nāma naṃ gaṇheyyāti. Amma, tena hi pakkosāhīti. Sā taṃ pakkosi. Athassa gehaṃ pavisitvā nisinnassa [Pg.128] taṃ pātiṃ adaṃsu. So tassā suvaṇṇapātibhāvaṃ ñatvā ‘‘amma, ayaṃ pāti satasahassaṃ agghati, satasahassagghanakabhaṇḍaṃ mayhaṃ hatthe natthī’’ti āha. Ayya, paṭhamaṃ āgatavāṇijo ‘‘ayaṃ aḍḍhamāsakampi na agghatī’’ti vatvā bhūmiyaṃ khipitvā gato, ayaṃ pana tava puññena suvaṇṇapāti jātā bhavissati, mayaṃ imaṃ tuyhaṃ dema, kiñcideva no datvā imaṃ gahetvā yāhīti. Bodhisatto tasmiṃ khaṇe hatthagatāni pañca kahāpaṇasatāni pañcasatagghanakañca bhaṇḍaṃ sabbaṃ datvā ‘‘mayhaṃ imaṃ tulañca pasibbakañca aṭṭha ca kahāpaṇe dethā’’ti ettakaṃ yācitvā ādāya pakkāmi. So sīghameva nadītīraṃ gantvā nāvikassa aṭṭha kahāpaṇe datvā nāvaṃ abhiruhi. Wieder sprach das junge Mädchen in genau derselben Weise zu ihrer Großmutter. Daraufhin sagte die Großmutter zu ihr: „Mein Kind, der zuerst gekommene Händler hat die Schale auf den Boden geworfen und ist gegangen. Womit sollen wir jetzt etwas kaufen?“ – „Großmutter, jener Händler hatte eine raue Stimme, dieser hier aber sieht freundlich aus und spricht sanft; vielleicht nimmt er sie ja an.“ – „Mein Kind, wenn dem so ist, dann rufe ihn her.“ Sie rief ihn her. Als er das Haus betreten und sich gesetzt hatte, gaben sie ihm die Schale. Er erkannte, dass es eine goldene Schale war, und sagte: „Mutter, diese Schale ist einhunderttausend wert. Waren im Wert von einhunderttausend habe ich nicht bei mir.“ – „Werter Herr, der zuerst gekommene Händler sagte: ‚Diese ist nicht einmal einen halben Māsaka wert‘, warf sie auf den Boden und ging fort. Durch dein eigenes Verdienst muss sich diese Schale wohl in eine goldene verwandelt haben. Wir geben sie dir. Gib uns, was immer du erübrigen kannst, nimm sie und geh.“ In diesem Augenblick gab der Bodhisatta ihnen die fünfhundert Kahāpaṇas, die er bei sich hatte, sowie all seine Waren im Wert von fünfhundert Kahāpaṇas und bat sie: „Überlasst mir nur diese Waage, diesen Beutel und acht Kahāpaṇas.“ Nachdem er dies erbeten hatte, nahm er sie und ging fort. Schnell eilte er an das Flussufer, gab dem Fährmann die acht Kahāpaṇas und bestieg das Boot. Tato lolavāṇijopi puna taṃ gehaṃ gantvā ‘‘āharatha taṃ pātiṃ, tumhākaṃ kiñcideva dassāmī’’ti āha. Sā taṃ paribhāsitvā ‘‘tvaṃ amhākaṃ satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ aḍḍhamāsagghanikampi na akāsi, tuyhaṃ pana sāmikasadiso eko dhammiko vāṇijo amhākaṃ sahassaṃ datvā taṃ ādāya gato’’ti āha. Taṃ sutvāva ‘‘satasahassagghanikāya suvaṇṇapātiyā parihīnomhi, mahājānikaro vata me aya’’nti sañjātabalavasoko satiṃ paccupaṭṭhāpetuṃ asakkonto visaññī hutvā attano hatthagate kahāpaṇe ceva bhaṇḍikañca gharadvāreyeva vikiritvā nivāsanapārupanaṃ pahāya tulādaṇḍaṃ muggaraṃ katvā ādāya bodhisattassa anupadaṃ pakkanto nadītīraṃ gantvā bodhisattaṃ gacchantaṃ disvā ‘‘ambho, nāvika, nāvaṃ nivattehī’’ti āha. Bodhisatto pana ‘‘tāta, mā nivattayī’’ti paṭisedhesi. Itarassapi bodhisattaṃ gacchantaṃ passantasseva balavasoko udapādi, hadayaṃ uṇhaṃ ahosi, mukhato lohitaṃ uggañchi, vāpikaddamo viya hadayaṃ phali. So bodhisatte āghātaṃ bandhitvā tattheva jīvitakkhayaṃ pāpuṇi. Idaṃ paṭhamaṃ devadattassa bodhisatte āghātabandhanaṃ. Bodhisatto dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Danach ging auch der gierige Händler wieder zu jenem Haus und sagte: „Bringt diese Schale her, ich werde euch irgendetwas dafür geben.“ Das Mädchen schalt ihn aus und sagte: „Du hast unsere goldene Schale, die einhunderttausend wert ist, nicht einmal für einen halben Māsaka gelten lassen! Aber ein rechtschaffener Händler, der deinem Meister gleicht, hat uns tausend gegeben, die Schale mitgenommen und ist gegangen.“ Kaum hatte er das gehört, dachte er: „Ich bin um eine goldene Schale im Wert von einhunderttausend gebracht worden! Wahrlich, dieser Mann hat mir einen riesigen Verlust zugefügt!“ Von heftigem Kummer überwältigt, verlor er den Verstand und war außer sich. Er warf die Kahāpaṇas und die Waren, die er in der Hand hielt, direkt vor der Haustür hin, legte sein Unter- und Obergewand ab, nahm den Waagebalken als Keule und verfolgte die Spuren des Bodhisatta. Als er an das Flussufer kam, sah er den Bodhisatta im Boot davonfahren und rief: „He, Fährmann, wende das Boot!“ Der Bodhisatta aber hielt den Fährmann zurück und sagte: „Lieber Mann, wende nicht!“ Während der andere zusah, wie der Bodhisatta davonfuhr, stieg in ihm ein übermächtiger Kummer auf. Sein Herz wurde heiß, Blut quoll aus seinem Mund, und sein Herz zersprang wie der Schlamm am Grunde eines austrocknenden Teiches. Er hegte tiefen Groll gegen den Bodhisatta und verstarb auf der Stelle am Flussufer. Dies war der erste Groll, den Devadatta gegen den Bodhisatta hegte. Der Bodhisatta vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosen und ging gemäß seinem Kamma fort. Sammāsambuddho imaṃ dhammadesanaṃ kathetvā abhisambuddhova imaṃ gāthaṃ kathesi – Nachdem der vollkommen Erleuchtete diese Lehrrede gehalten hatte, sprach er, nunmehr zum Buddha geworden, diesen Vers: 3. 3. ‘‘Idha [Pg.129] ce naṃ virādhesi, saddhammassa niyāmataṃ; Ciraṃ tvaṃ anutappesi, serivāyaṃva vāṇijo’’ti. „Wenn du hier die feste Ordnung der wahren Lehre verfehlst, wirst du lange Zeit Reue empfinden, so wie dieser Händler aus Seriva.“ Tattha idha ce naṃ virādhesi, saddhammassa niyāmatanti imasmiṃ sāsane etaṃ saddhammassa niyāmatāsaṅkhātaṃ sotāpattimaggaṃ virādhesi. Yadi virādhesi, vīriyaṃ ossajanto nādhigacchasi na paṭilabhasīti attho. Ciraṃ tvaṃ anutappesīti evaṃ sante tvaṃ dīghamaddhānaṃ socanto paridevanto anutapessasi, atha vā ossaṭṭhavīriyatāya ariyamaggassa virādhitattā dīgharattaṃ nirayādīsu uppanno nānappakārāni dukkhāni anubhavanto anutappissasi kilamissasīti ayamettha attho. Kathaṃ? Serivāyaṃva vāṇijoti ‘‘serivā’’ti evaṃnāmako ayaṃ vāṇijo yathā. Idaṃ vuttaṃ hoti – yathā pubbe serivanāmako vāṇijo satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ labhitvā tassā gahaṇatthāya vīriyaṃ akatvā tato parihīno anutappi, evameva tvampi imasmiṃ sāsane paṭiyattasuvaṇṇapātisadisaṃ ariyamaggaṃ ossaṭṭhavīriyatāya anadhigacchanto tato parihīno dīgharattaṃ anutappissasi. Sace pana vīriyaṃ na ossajissasi, paṇḍitavāṇijo suvaṇṇapātiṃ viya mama sāsane navavidhampi lokuttaradhammaṃ paṭilabhissasīti. Dabei bedeutet: „Wenn du ihn hier verfehlst, die Gewissheit der wahren Lehre“: Wenn du in dieser Lehre diesen Pfad des Stromeintritts verfehlst, der als die Gewissheit der wahren Lehre bezeichnet wird. Wenn du ihn verfehlst, indem du deine Tatkraft aufgibst, wirst du ihn nicht erreichen, wirst du ihn nicht erlangen – dies ist die Bedeutung. „Lange wirst du bereuen“: Wenn dies geschieht, wirst du für lange Zeit unter Sorgen und Klagen Reue empfinden. Oder aber: Weil du aufgrund deiner aufgegebenen Tatkraft den edlen Pfad verfehlt hast, wirst du, über eine lange Zeit in den Höllen und anderen leidvollen Welten wiedergeboren, vielfältige Leiden erfahren, Reue empfinden und gequält werden. Dies ist hier die Bedeutung. Wie? „Wie dieser Händler von Seriva“: Wie der Händler dieses Namens. Dies soll damit gesagt sein: So wie früher der Händler namens Seriva eine goldene Schale im Wert von einhunderttausend Münzen fast erhalten hätte, jedoch, weil er keine Tatkraft unternahm, um sie zu bekommen, darum gebracht wurde und es bereute, ebenso wirst auch du in dieser Lehre den edlen Pfad, der einer bereitgestellten goldenen Schale gleicht, durch das Aufgeben der Tatkraft nicht erreichen, dessen verlustig gehen und für lange Zeit Bereuung empfinden. Wenn du jedoch deine Tatkraft nicht aufgibst, wirst du – wie der kluge Händler die goldene Schale erhielt – in meiner Lehre den neunfachen überweltlichen Zustand erlangen. Evamassa satthā arahattena kūṭaṃ gaṇhanto imaṃ dhammadesanaṃ dassetvā cattāri saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ossaṭṭhavīriyo bhikkhu aggaphale arahatte patiṭṭhāsi. Als der Meister ihm auf diese Weise mit der Erreichung der Arhatschaft die Krone aufsetzte, verkündete er diese Lehrrede und legte die vier Wahrheiten dar. Am Ende der Wahrheiten wurde der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte, in der höchsten Frucht, der Arhatschaft, gefestigt. Satthāpi dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānetvā dassesi – ‘‘tadā bālavāṇijo devadatto ahosi, paṇḍitavāṇijo pana ahameva ahosi’’nti desanaṃ niṭṭhāpesi. Auch der Meister erzählte die beiden Geschichten, stellte die Verbindung her, fügte das Jātaka zusammen und zeigte: „Damals war der törichte Händler Devadatta, der kluge Händler aber war ich selbst.“ So schloss er die Lehrverkündigung ab. Serivavāṇijajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erläuterung des Serivavāṇija-Jātaka ist die dritte.
4. Cūḷaseṭṭhijātakavaṇṇanā 4. Die Erläuterung des Cūḷaseṭṭhi-Jātaka Appakenapi [Pg.130] medhāvīti imaṃ dhammadesanaṃ bhagavā rājagahaṃ upanissāya jīvakambavane viharanto cūḷapanthakattheraṃ ārabbha kathesi. „Selbst mit Wenighem ein Weiser“ – diese Lehrverkündigung hielt der Erhabene, als er nahe Rājagaha im Jīvaka-Mango-Hain verweilte, im Hinblick auf den älteren Mönch Cūḷapanthaka. Tattha cūḷapanthakassa tāva nibbatti kathetabbā. Rājagahe kira dhanaseṭṭhikulassa dhītā attano dāseneva saddhiṃ santhavaṃ katvā ‘‘aññepi me imaṃ kammaṃ jāneyyu’’nti bhītā evamāha ‘‘amhehi imasmiṃ ṭhāne vasituṃ na sakkā, sace me mātāpitaro imaṃ dosaṃ jānissanti, khaṇḍākhaṇḍaṃ karissanti, videsaṃ gantvā vasissāmā’’ti hatthasāraṃ gahetvā aggadvārena nikkhamitvā ‘‘yattha vā tattha vā aññehi ajānanaṭṭhānaṃ gantvā vasissāmā’’ti ubhopi agamaṃsu. Dabei soll zunächst die Herkunft von Cūḷapanthaka erzählt werden. In Rājagaha, so heißt es, ging die Tochter einer wohlhabenden Händlerfamilie eine intime Beziehung mit ihrem eigenen Sklaven ein. Aus Furcht davor, dass auch andere von dieser Tat erfahren könnten, sprach sie: „Es ist uns unmöglich, an diesem Ort zu leben. Wenn meine Eltern dieses Vergehen erfahren, werden sie uns in Stücke reißen. Lasst uns in die Fremde ziehen und dort leben.“ Sie nahmen ihr leicht bewegliches Hab und Gut, verließen das Haus durch das Haupttor und dachten: „Wir wollen an irgendeinen Ort gehen, den niemand kennt, und dort leben.“ Und so machten sich beide auf den Weg. Tesaṃ ekasmiṃ ṭhāne vasantānaṃ saṃvāsamanvāya tassā kucchiyaṃ gabbho patiṭṭhāsi. Sā gabbhaparipākaṃ āgamma sāmikena saddhiṃ mantesi ‘‘gabbho me paripākaṃ gato, ñātibandhuvirahite ṭhāne gabbhavuṭṭhānaṃ nāma ubhinnampi amhākaṃ dukkhameva, kulagehameva gacchāmā’’ti. So ‘‘sacāhaṃ gamissāmi, jīvitaṃ me natthī’’ti cintetvā ‘‘ajja gacchāma, sve gacchāmā’’ti divase atikkāmesi. Sā cintesi ‘‘ayaṃ bālo attano dosamahantatāya gantuṃ na ussahati, mātāpitaro nāma ekantahitā, ayaṃ gacchatu vā mā vā, mayā gantuṃ vaṭṭatī’’ti. Sā tasmiṃ gehā nikkhante gehaparikkhāraṃ paṭisāmetvā attano kulagharaṃ gatabhāvaṃ anantaragehavāsīnaṃ ārocetvā maggaṃ paṭipajji. Während sie an einem bestimmten Ort lebten, empfing sie infolge ihres Zusammenlebens ein Kind. Als die Schwangerschaft fortgeschritten war, besprach sie sich mit ihrem Ehemann: „Meine Schwangerschaft ist weit fortgeschritten. Eine Geburt an einem Ort ohne Verwandte und Freunde bringt für uns beide nur Leiden mit sich. Lasst uns in das Haus meiner Familie zurückkehren.“ Er aber dachte: „Wenn ich dorthin gehe, ist mein Leben verwirkt“, und zögerte die Tage hinaus, indem er sagte: „Heute gehen wir, morgen gehen wir.“ Sie dachte: „Dieser Tor wagt es wegen der Schwere seines Vergehens nicht zu gehen. Eltern aber wollen gewiss nur das Wohl ihrer Kinder. Ob dieser Mann nun geht oder nicht, ich muss gehen.“ Als er das Haus verlassen hatte, packte sie den Hausrat zusammen, teilte den Nachbarn mit, dass sie zum Hause ihrer Familie gegangen sei, und machte sich auf den Weg. Atha so puriso gharaṃ āgato taṃ adisvā paṭivissake pucchitvā ‘‘kulagharaṃ gatā’’ti sutvā vegena anubandhitvā antarāmagge sampāpuṇi. Tassāpi tattheva gabbhavuṭṭhānaṃ ahosi. So ‘‘kiṃ idaṃ bhadde’’ti pucchi. ‘‘Sāmi, eko putto jāto’’ti. ‘‘Idāni kiṃ karissāmā’’ti? ‘‘Yassatthāya mayaṃ kulagharaṃ gaccheyyāma, taṃ kammaṃ antarāva nipphannaṃ, tattha gantvā kiṃ karissāma, nivattāmā’’ti dvepi ekacittā hutvā nivattiṃsu. Tassa ca dārakassa panthe jātattā ‘‘panthako’’ti nāmaṃ akaṃsu. Tassā na cirasseva aparopi gabbho patiṭṭhahi. Sabbaṃ purimanayeneva vitthāretabbaṃ. Tassāpi dārakassa panthe jātattā paṭhamajātassa ‘‘mahāpanthako’’ti nāmaṃ [Pg.131] katvā itarassa ‘‘cūḷapanthako’’ti nāmaṃ akaṃsu. Te dvepi dārake gahetvā attano vasanaṭṭhānameva āgatā. Als nun der Mann nach Hause kam und sie nicht vorfand, fragte er die Nachbarn. Als er hörte: „Sie ist zum Haus ihrer Familie gegangen“, eilte er ihr schnell hinterher und holte sie unterwegs ein. Genau dort setzten bei ihr die Wehen ein. Er fragte: „Was ist das, meine Liebe?“ Sie antwortete: „Mein Herr, ein Sohn wurde geboren.“ Er fragte: „Was sollen wir nun tun?“ Sie entgegnete: „Das, weswegen wir zum Haus meiner Familie gehen wollten, ist bereits auf dem Weg geschehen. Was sollen wir dort noch tun? Lasst uns umkehren.“ So kehrten beide einmütig um. Da der Knabe auf dem Weg geboren wurde, nannten sie ihn „Panthaka“. Nicht lange danach wurde sie erneut schwanger. Alles Weitere ist genau wie zuvor ausführlich zu verstehen. Da auch dieser Knabe auf dem Weg geboren wurde, nannten sie den Erstgeborenen „Mahāpanthaka“ und den anderen „Cūḷapanthaka“. Sie nahmen die beiden Knaben mit sich und kehrten an ihren eigenen Wohnort zurück. Tesaṃ tattha vasantānaṃ ayaṃ mahāpanthakadārako aññe dārake ‘‘cūḷapitā mahāpitā’’ti, ‘‘ayyako ayyikā’’ti ca vadante sutvā mātaraṃ pucchi ‘‘amma, aññe dārakā ‘cūḷapitā mahāpitā’tipi vadanti, ‘ayyako ayyikā’tipi vadanti, amhākaṃ ñātakā natthī’’ti. ‘‘Āma, tāta, tumhākaṃ ettha ñātakā natthi, rājagahanagare pana vo dhanaseṭṭhi nāma ayyako, tattha tumhākaṃ bahū ñātakā’’ti. ‘‘Kasmā tattha na gacchatha, ammā’’ti? Sā attano agamanakāraṇaṃ puttassa akathetvā puttesu punappunaṃ kathentesu sāmikaṃ āha – ‘‘ime dārakā maṃ ativiya kilamenti, kiṃ no mātāpitaro disvā maṃsaṃ khādissanti, ehi dārakānaṃ ayyakakulaṃ dassessāmā’’ti. ‘‘Ahaṃ sammukhā bhavituṃ na sakkhissāmi, taṃ pana tattha nayissāmī’’ti. ‘‘Sādhu, ayya, yena kenaci upāyena dārakānaṃ ayyakakulameva daṭṭhuṃ vaṭṭatī’’ti dvepi janā dārake ādāya anupubbena rājagahaṃ patvā nagaradvāre ekissā sālāya nivāsaṃ katvā dārakamātā dve dārake gahetvā āgatabhāvaṃ mātāpitūnaṃ ārocāpesi. Während sie dort lebten, hörte der Knabe Mahāpanthaka, wie andere Kinder Ausdrücke wie „Onkel“, „Großvater“ und „Großmutter“ gebrauchten, und fragte seine Mutter: „Mutter, andere Kinder sprechen von Onkeln und von Großvater und Großmutter. Haben wir denn keine Verwandten?“ Sie antwortete: „Ja, mein Lieber, hier habt ihr keine Verwandten, aber in der Stadt Rājagaha ist der reiche Händler namens Dhanaseṭṭhi dein Großvater, und dort habt ihr viele Verwandte.“ Er fragte: „Mutter, warum geht ihr nicht dorthin?“ Sie verschwieg ihrem Sohn den Grund für das Nichtgehen, doch als die Söhne immer wieder davon sprachen, sagte sie zu ihrem Ehemann: „Diese Kinder bedrängen mich gar sehr. Werden unsere Eltern uns etwa auffressen, wenn sie uns sehen? Komm, lasst uns den Kindern die Familie des Großvaters zeigen!“ Er sagte: „Ich werde nicht in der Lage sein, ihnen persönlich gegenüberzutreten, aber ich werde dich dorthin bringen.“ Sie erwiderte: „Es ist gut, mein Herr. Auf welche Weise auch immer, es ist recht, den Kindern die Familie des Großvaters zu zeigen.“ Die beiden nahmen die Kinder mit sich, erreichten nacheinander Rājagaha, ließen sich in einer Rasthalle am Stadttor nieder, und die Mutter der Kinder ließ ihre Eltern wissen, dass sie mit den beiden Kindern angekommen sei. Te taṃ sāsanaṃ sutvā ‘‘saṃsāre vicarantānaṃ na putto na dhītā nāma natthi, te amhākaṃ mahāparādhikā, na sakkā tehi amhākaṃ cakkhupathe ṭhātuṃ, ettakaṃ pana dhanaṃ gahetvā dvepi janā phāsukaṭṭhānaṃ gantvā jīvantu, dārake pana idha pesentū’’ti. Seṭṭhidhītā mātāpitūhi pesitaṃ dhanaṃ gahetvā dārake āgatadūtānaṃyeva hatthe datvā pesesi, dārakā ayyakakule vaḍḍhanti. Tesu cūḷapanthako atidaharo, mahāpanthako pana ayyakena saddhiṃ dasabalassa dhammakathaṃ sotuṃ gacchati. Tassa niccaṃ satthu sammukhā dhammaṃ suṇantassa pabbajjāya cittaṃ nami. So ayyakaṃ āha ‘‘sace tumhe sampaṭicchatha, ahaṃ pabbajeyya’’nti. ‘‘Kiṃ vadesi, tāta, mayhaṃ sakalalokassapi pabbajjāto taveva pabbajjā bhaddikā, sace sakkosi, pabbaja tātā’’ti sampaṭicchitvā satthu santikaṃ gato. Satthā ‘‘kiṃ mahāseṭṭhi dārako te laddho’’ti. ‘‘Āma, bhante ayaṃ dārako mayhaṃ nattā, tumhākaṃ santike pabbajāmīti vadatī’’ti āha. Satthā aññataraṃ [Pg.132] piṇḍacārikaṃ bhikkhuṃ ‘‘imaṃ dārakaṃ pabbājehī’’ti āṇāpesi. Thero tassa tacapañcakakammaṭṭhānaṃ ācikkhitvā pabbājesi. So bahuṃ buddhavacanaṃ uggaṇhitvā paripuṇṇavasso upasampadaṃ labhi. Upasampanno hutvā yoniso manasikāre kammaṃ karonto arahattaṃ pāpuṇi. Als jene Eltern diese Nachricht hörten, sagten sie: „Für jene, die im Daseinskreislauf (Saṃsāra) umherwandern, gibt es niemanden, der nicht schon einmal Sohn oder Tochter gewesen ist. Doch diese beiden haben sich schwer gegen uns vergangen; sie sollen uns nicht mehr vor die Augen treten. Sie sollen jedoch dieses Vermögen nehmen und an einen angenehmen Ort ziehen, um dort ihr Leben zu fristen, die Kinder aber sollen sie hierher (zu uns) schicken.“ Die Tochter des Kaufmanns nahm das von den Eltern gesandte Geld, übergab die Kinder in die Hände ebenjener gekommenen Boten und sandte sie fort. Die Kinder wuchsen im Hause des Großvaters auf. Unter ihnen war Cūḷapanthaka noch sehr jung, Mahāpanthaka hingegen ging zusammen mit dem Großvater hin, um die Lehrrede des Zehnkräftigen (Buddha) zu hören. Da er beständig in der Gegenwart des Meisters das Dhamma hörte, neigte sich sein Geist dem Hauslosenleben (der Ordination) zu. Er sagte zum Großvater: „Wenn Ihr es erlaubt, möchte ich das Hauslosenleben antreten.“ – „Was sagst du da, mein Lieber? Mehr als das Hinausziehen der ganzen Welt ist mir dein Hinausziehen lieb und teuer. Wenn du es vermagst, dann werde Mönch, mein Lieber!“, stimmte er zu und führte ihn in die Gegenwart des Meisters. Der Meister fragte: „Wie ist es, Großkaufmann, hast du das Kind mitgebracht?“ – „Ja, Herr, dieser Knabe ist mein Enkel. Er sagt, er möchte unter Eurer Führung das Hauslosenleben antreten“, erwiderte er. Der Meister befahl einem der auf Almosengang befindlichen Mönche: „Lass diesen Knaben das Hauslosenleben antreten.“ Der Ältere (Thera) wies ihn in das Meditationsobjekt der fünf Teile mit der Haut als fünftem (tacapañcaka-kammaṭṭhāna) ein und ordinierte ihn. Nachdem jener viele Worte des Buddha gelernt hatte, empfing er nach Erreichen des vollen Alters die höhere Weihe (Upasampadā). Nachdem er vollordinierter Mönch geworden war und seine Aufgabe mit weiser Aufmerksamkeit (yoniso manasikāra) ausführte, erlangte er die Arhatschaft. So jhānasukhena, maggasukhena, phalasukhena vītināmento cintesi ‘‘sakkā nu kho imaṃ sukhaṃ cūḷapanthakassa dātu’’nti. Tato ayyakaseṭṭhissa santikaṃ gantvā ‘‘mahāseṭṭhi sace tumhe sampaṭicchatha, ahaṃ cūḷapanthakaṃ pabbājeyya’’nti āha. ‘‘Pabbājetha, bhante’’ti. Thero cūḷapanthakadārakaṃ pabbājetvā dasasu sīlesu patiṭṭhāpesi. Cūḷapanthakasāmaṇero pabbajitvāva dandho ahosi. Während er seine Zeit im Glück der Vertiefung (Jhāna), im Glück des Pfades (Magga) und im Glück der Frucht (Phala) verbrachte, dachte er: „Wäre es wohl möglich, dieses Glück auch Cūḷapanthaka zuteilwerden zu lassen?“ Daraufhin ging er zum Großvater, dem Kaufmann, und sagte: „Großkaufmann, wenn Ihr einwilligt, würde ich Cūḷapanthaka ordinieren.“ – „Ordiniert ihn, Ehrwürdiger!“, antwortete dieser. Der Ältere ließ den Knaben Cūḷapanthaka das Hauslosenleben antreten und festigte ihn in den zehn Tugendregeln (Sīlas). Der Novize Cūḷapanthaka erwies sich jedoch nach seiner Ordination als schwer von Begriff (träge im Verstand). ‘‘Padumaṃ yathā kokanadaṃ sugandhaṃ, pāto siyā phullamavītagandhaṃ; Aṅgīrasaṃ passa virocamānaṃ, tapantamādiccamivantalikkhe’’ti. (saṃ. ni. 1.123; a. ni. 5.195) – „Wie die rote Lotusblüte (Kokanada), die am Morgen aufblüht, von lieblichem Duft und unvergänglichem Wohlgeruch ist: Sieh den Aṅgīrasa (den Buddha) strahlen, wie die Sonne am Himmel leuchtet!“ Imaṃ ekagāthaṃ catūhi māsehi gaṇhituṃ nāsakkhi. So kira kassapasammāsambuddhakāle pabbajitvā paññavā hutvā aññatarassa dandhabhikkhuno uddesaggahaṇakāle parihāsakeḷiṃ akāsi. So bhikkhu tena parihāsena lajjito neva uddesaṃ gaṇhi, na sajjhāyamakāsi. Tena kammena ayaṃ pabbajitvāva dandho jāto, gahitagahitaṃ padaṃ uparūpari padaṃ gaṇhantassa nassati. Tassa imameva gāthaṃ gahetuṃ vāyamantassa cattāro māsā atikkantā. Es gelang ihm in vier Monaten nicht, diese eine Strophe auswendig zu lernen. Es heißt, dass er zur Zeit des vollkommen Erwachten Kassapa als weiser Mönch ordiniert war und sich über einen anderen, langsameren Mönch lustig gemacht hatte, als dieser die Schriften auswendig lernte. Aus Scham über diesen Spott lernte jener Mönch weder die Texte weiter auswendig, noch rezitierte er sie. Aufgrund dieses Wirkens (Kamma) wurde Cūḷapanthaka in diesem Leben nach seiner Ordination schwer von Begriff; jedes Wort, das er mühsam gelernt hatte, vergaß er wieder, sobald er das darauffolgende lernen wollte. Während er sich bemühte, eben diese eine Strophe zu lernen, vergingen vier Monate. Atha naṃ mahāpanthako āha ‘‘cūḷapanthaka, tvaṃ imasmiṃ sāsane abhabbo, catūhi māsehi ekampi gāthaṃ gahetuṃ na sakkosi, pabbajitakiccaṃ pana tvaṃ kathaṃ matthakaṃ pāpessasi, nikkhama ito’’ti vihārā nikkaḍḍhi. Cūḷapanthako buddhasāsane sinehena gihibhāvaṃ na pattheti. Tasmiñca kāle mahāpanthako bhattuddesako hoti. Jīvako komārabhacco bahuṃ gandhamālaṃ ādāya attano ambavanaṃ gantvā satthāraṃ pūjetvā dhammaṃ sutvā uṭṭhāyāsanā dasabalaṃ vanditvā mahāpanthakaṃ upasaṅkamitvā ‘‘kittakā[Pg.133], bhante, satthu santike bhikkhū’’ti pucchi. ‘‘Pañcamattāni bhikkhusatānī’’ti. ‘‘Sve, bhante, buddhappamukhāni pañca bhikkhusatāni ādāya amhākaṃ nivesane bhikkhaṃ gaṇhathā’’ti. ‘‘Upāsaka, cūḷapanthako nāma bhikkhu dandho aviruḷhidhammo, taṃ ṭhapetvā sesānaṃ nimantanaṃ sampaṭicchāmī’’ti thero āha. Taṃ sutvā cūḷapanthako cintesi ‘‘thero ettakānaṃ bhikkhūnaṃ nimantanaṃ sampaṭicchanto maṃ bāhiraṃ katvā sampaṭicchati, nissaṃsayaṃ mayhaṃ bhātikassa mayi cittaṃ bhinnaṃ bhavissati, kiṃ idāni mayhaṃ iminā sāsanena, gihī hutvā dānādīni puññāni karonto jīvissāmī’’ti. Da sagte Mahāpanthaka zu ihm: „Cūḷapanthaka, du bist für diese Lehre untauglich. In vier Monaten vermagst du nicht einmal eine einzige Strophe zu lernen; wie willst du da das Ziel des Mönchslebens vollenden? Geh fort von hier!“ Und er wies ihn aus dem Kloster. Cūḷapanthaka aber sehnte sich aus Liebe zur Lehre des Buddha nicht nach dem Laienleben zurück. Zu jener Zeit hatte Mahāpanthaka das Amt des Speisenverteilers inne. Jīvaka Komārabhacca nahm reichlich Duftwerk und Blumen mit, ging in seinen Mangohain, verehrte den Meister, hörte die Lehrrede, erhob sich von seinem Sitz, erwies dem Zehnkräftigen die Ehrfurcht, trat an Mahāpanthaka heran und fragte: „Wie viele Mönche, Ehrwürdiger, weilen beim Meister?“ – „Es sind etwa fünfhundert Mönche“, antwortete dieser. „Möget Ihr morgen, Ehrwürdiger, mit den fünfhundert Mönchen an der Spitze mit dem Buddha das Almosenmahl in unserem Hause einnehmen“, lud Jīvaka ein. Der Ältere sagte: „Laienanhänger (Upāsaka), der Mönch namens Cūḷapanthaka ist schwer von Begriff und macht keine Fortschritte in der Lehre. Ihn ausgenommen, nehme ich die Einladung für die übrigen Mönche an.“ Als Cūḷapanthaka dies hörte, dachte er: „Mein Bruder nimmt die Einladung für so viele Mönche an, schließt mich dabei jedoch aus. Zweifellos hat sich das Herz meines Bruders von mir abgewandt. Was nützt mir nun noch dieser Orden? Ich will wieder Laie werden, mein Leben fristen, indem ich Freigebigkeit übe und andere verdienstvolle Taten vollbringe.“ So punadivase pātova ‘‘gihī bhavissāmī’’ti pāyāsi. Satthā paccūsakāleyeva lokaṃ olokento imaṃ kāraṇaṃ disvā paṭhamataraṃ gantvā cūḷapanthakassa gamanamagge dvārakoṭṭhake caṅkamanto aṭṭhāsi. Cūḷapanthako gharaṃ gacchanto satthāraṃ disvā upasaṅkamitvā vandi. Atha naṃ satthā ‘‘kahaṃ pana, tvaṃ cūḷapanthaka, imāya velāya gacchasī’’ti āha. Bhātā maṃ, bhante, nikkaḍḍhati, tenāhaṃ vibbhamituṃ gacchāmīti. Cūḷapanthaka, tava pabbajjā nāma mama santakā, bhātarā nikkaḍḍhito kasmā mama santikaṃ nāgañchi? Ehi kiṃ te gihibhāvena, mama santike bhavissasī’’ti bhagavā cūḷapanthakaṃ ādāya gantvā gandhakuṭippamukhe nisīdāpetvā ‘‘cūḷapanthaka, tvaṃ puratthābhimukho hutvā imaṃ pilotikaṃ ‘rajoharaṇaṃ rajoharaṇa’nti parimajjanto idheva hohī’’ti iddhiyā abhisaṅkhataṃ parisuddhaṃ pilotikākhaṇḍaṃ datvā kāle ārocite bhikkhusaṅghaparivuto jīvakassa gehaṃ gantvā paññattāsane nisīdi. So brach er am folgenden Tag am frühen Morgen auf und dachte: „Ich werde wieder ein Laie werden.“ Der Meister blickte schon in der Morgendämmerung auf die Welt, sah diese Angelegenheit und ging noch vor ihm hin, um am Torweg, auf Cūḷapanthakas Weg, auf und ab zu schreiten. Als Cūḷapanthaka auf dem Weg nach Hause den Meister sah, trat er näher und verneigte sich ehrfurchtsvoll vor ihm. Da fragte ihn der Meister: „Wohin gehst du denn, Cūḷapanthaka, zu dieser Stunde?“ – „Mein Bruder hat mich verjagt, Herr; deshalb gehe ich, um in den Laienstand zurückzukehren“, antwortete er. „Cūḷapanthaka, dein Eintritt in den Orden geschah doch um meinetwillen (gehört mir). Warum bist du, als dein Bruder dich verjagte, nicht zu mir gekommen? Komm, was soll dir das Laienleben? Du wirst bei mir bleiben!“, sagte der Erhabene, nahm Cūḷapanthaka mit, ließ ihn vor der Duftkammer (Gandhakuṭi) Platz nehmen und sprach: „Cūḷapanthaka, setze dich mit dem Gesicht nach Osten gewandt hierher, reibe dieses Tuch und sprich dabei beständig: ‚Schmutzentferner, Schmutzentferner‘ (rajoharaṇaṃ rajoharaṇaṃ).“ Dabei gab er ihm ein durch Geisteskraft erschaffenes, vollkommen reines Tuch. Als die Zeit für das Mahl verkündet wurde, begab sich der Erhabene, umgeben von der Mönchsgemeinde, zum Hause Jīvakas und setzte sich auf den für ihn bereiteten Sitz. Cūḷapanthakopi sūriyaṃ olokento taṃ pilotikākhaṇḍaṃ ‘‘rajoharaṇaṃ rajoharaṇa’’nti parimajjanto nisīdi, tassa taṃ pilotikākhaṇḍaṃ parimajjantassa parimajjantassa kiliṭṭhaṃ ahosi. Tato cintesi ‘‘idaṃ pilotikākhaṇḍaṃ ativiya parisuddhaṃ, imaṃ pana attabhāvaṃ nissāya purimapakatiṃ vijahitvā evaṃ kiliṭṭhaṃ jātaṃ, aniccā vata saṅkhārā’’ti khayavayaṃ paṭṭhapento vipassanaṃ vaḍḍhesi. Satthā ‘‘cūḷapanthakassa cittaṃ vipassanaṃ āruḷha’’nti ñatvā ‘‘cūḷapanthaka, tvaṃ etaṃ pilotikākhaṇḍameva saṃkiliṭṭhaṃ rajorañjitaṃ jātanti mā saññaṃ kari, abbhantare pana te rāgarajādayo atthi, te harāhī’’ti vatvā obhāsaṃ vissajjetvā purato nisinno viya paññāyamānarūpo hutvā imā gāthā abhāsi – Auch Cūḷapanthaka saß da, blickte in die Richtung der Sonne, rieb jenes grobe Tuchstück und sprach dabei: „Schmutzentferner, Schmutzentferner“. Während er dieses Tuchstück wieder und wieder rieb, wurde es schmutzig. Daraufhin dachte er: „Dieses Tuchstück war äußerst rein. Doch in Abhängigkeit von diesem Körper hat es seinen ursprünglichen Zustand verloren und ist so schmutzig geworden. Unbeständig wahrlich sind die Gestaltungen (saṅkhārā)!“ Indem er die Erkenntnis von Entstehen und Vergehen begründete, entfaltete er die Einsicht (vipassanā). Als der Meister erkannte, dass Cūḷapanthakas Geist zur Einsicht aufgestiegen war, sprach er: „Cūḷapanthaka, nimm nicht an, dass nur dieses Tuchstück schmutzig und von Staub befleckt geworden ist. In deinem Inneren vielmehr gibt es den Staub von Gier (rāga) und so weiter; entferne diesen!“ Er sandte ein strahlendes Licht aus, erschien leibhaftig vor ihm, als säße er direkt vor ihm, und sprach folgende Verse: ‘‘Rāgo [Pg.134] rajo na ca pana reṇu vuccati, rāgassetaṃ adhivacanaṃ rajoti; Etaṃ rajaṃ vippajahitva bhikkhavo, viharanti te vigatarajassa sāsane. „Gier wird Staub genannt, nicht aber der bloße Staub (reṇu); ‚Staub‘ ist eine Bezeichnung für die Gier. Nachdem sie diesen Staub gänzlich aufgegeben haben, verweilen jene Mönche in der Lehre dessen, der frei von Staub ist. ‘‘Doso rajo na ca pana reṇu vuccati, dosassetaṃ adhivacanaṃ rajoti; Etaṃ rajaṃ vippajahitva bhikkhavo, viharanti te vigatarajassa sāsane. „Hass (dosa) wird Staub genannt, nicht aber der bloße Staub; ‚Staub‘ ist eine Bezeichnung für den Hass. Nachdem sie diesen Staub gänzlich aufgegeben haben, verweilen jene Mönche in der Lehre dessen, der frei von Staub ist. ‘‘Moho rajo na ca pana reṇu vuccati, mohassetaṃ adhivacanaṃ rajoti; Etaṃ rajaṃ vippajahitva bhikkhavo, viharanti te vigatarajassa sāsane’’ti. (mahāni. 209; cūḷani. udayamāṇavapucchāniddesa 74); „Verblendung (moha) wird Staub genannt, nicht aber der bloße Staub; ‚Staub‘ ist eine Bezeichnung für die Verblendung. Nachdem sie diesen Staub gänzlich aufgegeben haben, verweilen jene Mönche in der Lehre dessen, der frei von Staub ist.“ Gāthāpariyosāne cūḷapanthako saha paṭisambhidāhi arahattaṃ pāpuṇi, paṭisambhidāhiyevassa tīṇi piṭakāni āgamaṃsu. So kira pubbe rājā hutvā nagaraṃ padakkhiṇaṃ karonto nalāṭato sede muccante parisuddhena sāṭakena nalāṭantaṃ puñchi, sāṭako kiliṭṭho ahosi. So ‘‘imaṃ sarīraṃ nissāya evarūpo parisuddho sāṭako pakatiṃ jahitvā kiliṭṭho jāto, aniccā vata saṅkhārā’’ti aniccasaññaṃ paṭilabhi. Tena kāraṇenassa rajoharaṇameva paccayo jāto. Am Ende der Verse erlangte Cūḷapanthaka die Arahatschaft zusammen mit den analytischen Fähigkeiten (paṭisambhidā). Zusammen mit ebendiesen analytischen Fähigkeiten kamen ihm die drei Körbe (Tipiṭaka) zu Bewusstsein. Einst, so heißt es, war er ein König; als er die Stadt im Uhrzeigersinn umrundete und ihm Schweiß auf die Stirn trat, wischte er sich die Stirn mit einem reinen Tuch ab, wodurch das Tuch schmutzig wurde. Da dachte er: „In Abhängigkeit von diesem Körper hat ein solch reines Tuch seinen natürlichen Zustand verloren und ist schmutzig geworden. Unbeständig wahrlich sind die Gestaltungen (saṅkhārā)!“ So erlangte er die Wahrnehmung der Unbeständigkeit (aniccasaññā). Aus diesem Grund wurde für ihn gerade das „Schmutzentferner-Tuch“ (rajoharaṇa) zur entscheidenden Bedingung für die Befreiung. Jīvakopi kho komārabhacco dasabalassa dakkhiṇodakaṃ upanāmesi. Satthā ‘‘nanu, jīvaka, vihāre bhikkhū atthī’’ti hatthena pattaṃ pidahi. Mahāpanthako ‘‘bhante, vihāre natthi bhikkhū’’ti āha. Satthā ‘‘atthi jīvakā’’ti āha. Jīvako ‘‘tena hi, bhaṇe, gaccha, vihāre bhikkhūnaṃ atthibhāvaṃ vā natthibhāvaṃ vā jānāhī’’ti purisaṃ pesesi. Tasmiṃ khaṇe cūḷapanthako ‘‘mayhaṃ bhātiko ‘vihāre bhikkhū natthī’ti bhaṇati, vihāre bhikkhūnaṃ atthibhāvamassa pakāsessāmī’’ti sakalaṃ ambavanaṃ bhikkhūnaṃyeva pūresi. Ekacce bhikkhū cīvarakammaṃ karonti, ekacce rajanakammaṃ, ekacce sajjhāyaṃ karontīti evaṃ aññamaññaṃ asadisaṃ bhikkhusahassaṃ māpesi. So puriso vihāre bahū bhikkhū disvā nivattitvā ‘‘ayya[Pg.135], sakalaṃ ambavanaṃ bhikkhūhi paripuṇṇa’’nti jīvakassa ārocesi. Theropi kho tattheva – Auch Jīvaka Komārabhacca reichte dem Zehnkräftigen (dasabala) das Weihewasser dar. Der Meister bedeckte seine Almosenschale mit der Hand und sagte: „Gibt es nicht noch Mönche im Kloster, Jīvaka?“ Mahāpanthaka entgegnete: „Ehrwürdiger Herr, im Kloster sind keine Mönche mehr.“ Der Meister jedoch sagte: „Es sind welche da, Jīvaka.“ Da sandte Jīvaka einen Diener aus und sprach: „Wohlan, mein Guter, geh hin und finde heraus, ob Mönche im Kloster anwesend sind oder nicht.“ In jenem Augenblick dachte Cūḷapanthaka: „Mein Bruder behauptet, es seien keine Mönche im Kloster. Ich werde ihm zeigen, dass sehr wohl Mönche im Kloster sind.“ Und so füllte er den gesamten Mangohain mit lauter Mönchen. Einige Mönche verrichteten Näharbeiten an Roben, einige färbten Roben, einige rezitierten Lehrreden – so erschuf er tausend Mönche, die alle unterschiedlichen Beschäftigungen nachgingen. Als der Diener im Kloster so viele Mönche sah, kehrte er zurück und meldete Jīvaka: „Herr, der gesamte Mangohain ist gedrängt voll von Mönchen!“ Und auch der Thera verweilte ebendort – ‘‘Sahassakkhattumattānaṃ, nimminitvāna panthako; Nisīdambavane ramme, yāva kālappavedanā’’ti. (theragā. 563); „Nachdem er sich selbst tausendfach vervielfältigt hatte, saß Panthaka im lieblichen Mangohain, bis die Zeit für das Mahl verkündet wurde.“ Atha satthā taṃ purisaṃ āha – ‘‘vihāraṃ gantvā ‘satthā cūḷapanthakaṃ nāma pakkosatī’ti vadehī’’ti. Tena gantvā tathāvutte ‘‘ahaṃ cūḷapanthako, ahaṃ cūḷapanthako’’ti mukhasahassaṃ uṭṭhahi. Puriso gantvā ‘‘sabbepi kira te, bhante, cūḷapanthakāyeva nāmā’’ti āha. Tena hi tvaṃ gantvā yo paṭhamaṃ ‘‘ahaṃ cūḷapanthako’’ti vadati, taṃ hatthe gaṇha, avasesā antaradhāyissantīti. So tathā akāsi, tāvadeva sahassamattā bhikkhū antaradhāyiṃsu. Thero tena purisena saddhiṃ agamāsi. Satthā bhattakiccapariyosāne jīvakaṃ āmantesi ‘‘jīvaka, cūḷapanthakassa pattaṃ gaṇha, ayaṃ te anumodanaṃ karissatī’’ti. Jīvako tathā akāsi. Thero sīhanādaṃ nadanto taruṇasīho viya tīṇi piṭakāni saṃkhobhetvā anumodanaṃ akāsi. Daraufhin sprach der Meister zu dem Diener: „Geh zum Kloster und sprich: ‚Der Meister ruft den Mönch namens Cūḷapanthaka.‘“ Als der Diener hinging und dies so ausrichtete, ertönte es aus tausend Mündern auf einmal: „Ich bin Cūḷapanthaka! Ich bin Cūḷapanthaka!“ Der Mann ging zurück und berichtete: „Ehrwürdiger Herr, alle dort heißen offenbar Cūḷapanthaka.“ Der Meister sprach: „Nun gut, geh wieder hin und ergreife denjenigen an der Hand, der als Erster spricht: ‚Ich bin Cūḷapanthaka.‘ Die übrigen werden sogleich verschwinden.“ Er handelte dementsprechend, und augenblicklich verschwanden die rund tausend Mönche. Der Thera ging daraufhin mit dem Mann mit. Nach Beendigung des Mahls wandte sich der Meister an Jīvaka: „Jīvaka, nimm Cūḷapanthakas Almosenschale entgegen. Er wird für dich die Dankesrede (anumodana) halten.“ Jīvaka tat wie geheißen. Der Thera ließ wie ein junger Löwe sein Löwengebrüll erschallen, schöpfte tief aus den drei Körben (Tipiṭaka) und hielt die Dankespredigt. Satthā uṭṭhāyāsanā bhikkhusaṅghaparivāro vihāraṃ gantvā bhikkhūhi vatte dassite uṭṭhāyāsanā gandhakuṭippamukhe ṭhatvā bhikkhusaṅghassa sugatovādaṃ datvā kammaṭṭhānaṃ kathetvā bhikkhusaṅghaṃ uyyojetvā surabhigandhavāsitaṃ gandhakuṭiṃ pavisitvā dakkhiṇena passena sīhaseyyaṃ upagato. Atha sāyanhasamaye dhammasabhāyaṃ bhikkhū ito cito ca samosaritvā rattakambalasāṇiṃ parikkhipantā viya nisīditvā satthu guṇakathaṃ ārabhiṃsu ‘‘āvuso, mahāpanthako cūḷapanthakassa ajjhāsayaṃ ajānanto ‘catūhi māsehi ekagāthaṃ gaṇhituṃ na sakkoti, dandho aya’nti vihārā nikkaḍḍhi, sammāsambuddho pana attano anuttaradhammarājatāya ekasmiṃyevassa antarabhatte saha paṭisambhidāhi arahattaṃ adāsi, tīṇi piṭakāni paṭisambhidāhiyeva āgatāni, aho buddhānaṃ balaṃ nāma mahanta’’nti. Der Meister erhob sich von seinem Sitz, kehrte in Begleitung der Mönchsgemeinde zum Kloster zurück, und nachdem die Mönche ihm die schuldige Ehrerbietung erwiesen hatten, erhob er sich wieder, stellte sich an den Eingang der Duftkammer (gandhakuṭi), erteilte der Mönchsgemeinde die heilsame Unterweisung des Erhabenen (sugatovāda), lehrte das Meditationsobjekt (kammaṭṭhāna), entließ die Mönchsgemeinde, betrat die von wohlriechenden Düften erfüllte Duftkammer und legte sich auf seiner rechten Seite zur Löwenruhe (sīhaseyya) nieder. Später am Abend versammelten sich die Mönche von überall her in der Dhamma-Halle, saßen beieinander, als würden sie einen roten Wolltuch-Vorhang ringsum aufspannen, und begannen, das Lob des Meisters zu preisen: „Ihr Brüder, Mahāpanthaka verstand Cūḷapanthakas geistige Veranlagung nicht und jagte ihn mit den Worten aus dem Kloster: ‚Er vermag in vier Monaten nicht einmal einen einzigen Vers zu lernen, er ist träge und dumm.‘ Der vollkommen Erwachte jedoch verlieh ihm, kraft seiner unübertrefflichen Herrschaft als König des Dhamma, noch im Zeitraum einer einzigen Mahlzeit die Arahatschaft mitsamt den analytischen Fähigkeiten (paṭisambhidā), und auch die drei Körbe (Tipiṭaka) kamen ihm sogleich mitsamt den analytischen Fähigkeiten zu Bewusstsein. Oh, wie unermesslich groß ist doch wahrlich die Kraft der Buddhas!“ Atha bhagavā dhammasabhāyaṃ imaṃ kathāpavattiṃ ñatvā ‘‘ajja mayā gantuṃ vaṭṭatī’’ti buddhaseyyāya uṭṭhāya surattadupaṭṭaṃ nivāsetvā vijjulataṃ viya kāyabandhanaṃ [Pg.136] bandhitvā rattakambalasadisaṃ sugatamahācīvaraṃ pārupitvā surabhigandhakuṭito nikkhamma mattavāraṇo viya sīhavikkantavilāsena vijambhamāno sīho viya anantāya buddhalīlāya dhammasabhaṃ gantvā alaṅkatamaṇḍapamajjhe supaññattavarabuddhāsanaṃ abhiruyha chabbaṇṇabuddharasmiyo vissajjento aṇṇavakucchiṃ obhāsayamāno yugandharamatthake bālasūriyo viya āsanamajjhe nisīdi. Sammāsambuddhe pana āgatamatte bhikkhusaṅgho kathaṃ pacchinditvā tuṇhī ahosi. Als der Erhabene sodann diesen Gesprächsverlauf in der Lehrhalle wahrnahm, dachte er: „Heute ist es für mich angemessen, dorthin zu gehen.“ Er erhob sich von seinem Buddha-Lager, legte sein wohlgerötetes Doppeluntergewand an, gürtete seinen Gürtel gleich einem Blitz auf, hüllte sich in das große Gewand des Sugata, das einer roten Wolldecke glich, und trat aus der wohlriechenden Duftkammer heraus. Wie ein wilder Elefant, wie ein Löwe, der sich mit der kühnen Eleganz eines Löwen streckt, begab er sich in unendlicher Buddha-Anmut zur Lehrhalle. Er bestieg den wohlbereiteten, edlen Buddha-Sitz inmitten der geschmückten Festhalle und setzte sich in die Mitte des Sitzes, während er die sechsfarbigen Buddha-Strahlen aussandte, gleich der jungen Sonne auf dem Gipfel des Yugandhara-Berges, welche die Tiefe des Ozeans erleuchtet. Kaum war der vollkommen Erleuchtete jedoch herangetreten, brach die Mönchsgemeinschaft ihr Gespräch ab und verharrte in Schweigen. Satthā mudukena mettacittena parisaṃ oloketvā ‘‘ayaṃ parisā ativiya sobhati, ekassapi hatthakukkuccaṃ vā pādakukkuccaṃ vā ukkāsitasaddo vā khipitasaddo vā natthi, sabbepime buddhagāravena sagāravā buddhatejena tajjitā mayi āyukappampi akathetvā nisinne paṭhamaṃ kathaṃ samuṭṭhāpetvā na kathessanti, kathāsamuṭṭhāpanavattaṃ nāma mayāva jānitabbaṃ, ahameva paṭhamaṃ kathessāmī’’ti madhurena brahmassarena bhikkhū āmantetvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā, kā ca pana vo antarākathā vippakatā’’ti āha. Bhante, na mayaṃ imasmiṃ ṭhāne nisinnā aññaṃ tiracchānakathaṃ kathema, tumhākaṃyeva pana guṇe vaṇṇayamānā nisinnāmha ‘‘āvuso mahāpanthako cūḷapanthakassa ajjhāsayaṃ ajānanto ‘catūhi māsehi ekaṃ gāthaṃ gaṇhituṃ na sakkoti, dandho aya’nti vihārā nikkaḍḍhi, sammāsambuddho pana anuttaradhammarājatāya ekasmiṃyevassa antarabhatte saha paṭisambhidāhi arahattaṃ adāsi, aho buddhānaṃ balaṃ nāma mahanta’’nti. Satthā bhikkhūnaṃ kathaṃ sutvā ‘‘bhikkhave, cūḷapanthako maṃ nissāya idāni tāva dhammesu dhammamahantataṃ patto, pubbe pana maṃ nissāya bhogesupi bhogamahantataṃ pāpuṇī’’ti āha. Bhikkhū tassatthassa āvibhāvatthaṃ bhagavantaṃ yāciṃsu. Bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Der Meister blickte mit sanftem Geist der liebenden Güte auf die Versammlung und dachte: „Diese Versammlung ist überaus anmutig. Nicht bei einem Einzigen gibt es ein unruhiges Bewegen der Hände oder der Füße, noch das Geräusch von Räuspern oder Niesen. Sie alle sind voller Ehrfurcht aus Achtung vor dem Buddha und von der majestätischen Kraft des Buddha ehrfürchtig gestimmt. Selbst wenn ich ein ganzes Weltzeitalter lang schweigend dasäße, würden sie nicht von sich aus das erste Wort ergreifen. Es ist an mir, die Pflicht zur Eröffnung des Gesprächs zu kennen; ich selbst will zuerst sprechen.“ Er rief die Mönche mit süßer, erhabener Brahma-Stimme an und sprach: „Welcherlei Gespräch wegen habt ihr euch hier versammelt, o Mönche, und was für ein Gespräch wurde unterbrochen?“ „Ehrwürdiger Herr, wir sitzen nicht hier, um irgendein unheilsames Gespräch zu führen. Vielmehr sitzen wir hier und preisen Eure Tugenden: ‚Freunde, der ehrwürdige Mahāpanthaka verstand die Neigung des Cūḷapanthaka nicht und trieb ihn aus dem Kloster mit den Worten: „In vier Monaten vermag dieser eine einzige Strophe nicht zu lernen, er ist träge.“ Der vollkommen Erleuchtete jedoch, kraft seiner unübertrefflichen Eigenschaft als König der Lehre, verlieh ihm in der Spanne einer einzigen Mahlzeit die Arahatschaft samt den analytischen Fähigkeiten. O, wie groß ist doch die Macht der Buddhas!‘“ Als der Meister die Worte der Mönche hörte, sprach er: „O Mönche, Cūḷapanthaka hat jetzt durch mich in den geistigen Dingen die Fülle der Lehre erreicht; in der Vergangenheit aber hat er durch mich auch in weltlichen Besitztümern die Fülle des Wohlstands erlangt.“ Die Mönche baten den Erhabenen, diese Begebenheit zu enthüllen. Der Erhabene machte das durch eine andere Existenz verborgene Ereignis offenbar. Atīte kāsiraṭṭhe bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto seṭṭhikule nibbattitvā vayappatto seṭṭhiṭṭhānaṃ labhitvā cūḷaseṭṭhi nāma ahosi, so paṇḍito byatto sabbanimittāni jānāti. So ekadivasaṃ rājupaṭṭhānaṃ gacchanto antaravīthiyaṃ matamūsikaṃ disvā taṅkhaṇaññeva nakkhattaṃ [Pg.137] samānetvā idamāha ‘‘sakkā cakkhumatā kulaputtena imaṃ undūraṃ gahetvā puttadārabharaṇañca kātuṃ kammante ca payojetu’’nti? Aññataro duggatakulaputto taṃ seṭṭhissa vacanaṃ sutvā ‘‘nāyaṃ ajānitvā kathessatī’’ti taṃ mūsikaṃ gahetvā ekasmiṃ āpaṇe biḷālassatthāya vikkiṇitvā kākaṇikaṃ labhitvā tāya kākaṇikāya phāṇitaṃ gahetvā ekena ghaṭena pānīyaṃ gaṇhi. So araññato āgacchante mālākāre disvā thokaṃ thokaṃ phāṇitakhaṇḍaṃ datvā uḷuṅkena pānīyaṃ adāsi, te cassa ekekaṃ pupphamuṭṭhiṃ adaṃsu. So tena pupphamūlena punadivasepi phāṇitañca pānīyaghaṭañca gahetvā pupphārāmameva gato. Tassa taṃ divasaṃ mālākārā aḍḍhocitake pupphagacche datvā agamaṃsu. So na cirasseva iminā upāyena aṭṭha kahāpaṇe labhi. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī im Reich Kāsi regierte, wurde der Bodhisatta in einer Kaufmannsfamilie geboren, erhielt nach Erreichen des Erwachsenenalters das Amt des Schatzmeisters und wurde als Cūḷaseṭṭhi bekannt. Er war weise, klug und verstand alle Vorzeichen. Als er eines Tages zum Dienst für den König ging, sah er auf der Straße eine tote Maus. Im selben Moment berechnete er die Sternenkonstellation und sagte: „Ein kluger Sohn aus gutem Hause könnte diese Maus nehmen, damit Frau und Kinder ernähren und ein Geschäft aufbauen.“ Ein gewisser armer Sohn aus gutem Hause hörte diese Worte des Schatzmeisters und dachte: „Dieser Mann würde nichts sagen, ohne es genau zu wissen.“ Er nahm die Maus, verkaufte sie in einem Laden als Katzenfutter und erhielt dafür eine Kupfermünze. Für diese Münze kaufte er Melasse und holte einen Krug mit Trinkwasser. Als er Blumengärtner sah, die aus dem Wald kamen, gab er ihnen jeweils ein kleines Stück Melasse und reichte ihnen mit einer Schöpfkelle Trinkwasser. Sie gaben ihm dafür jeweils eine Handvoll Blumen. Mit dem Erlös aus diesen Blumen kaufte er am nächsten Tag wieder Melasse und Trinkwasser und ging direkt zum Blumengarten. An jenem Tag schenkten ihm die Blumengärtner die halbe Ernte ihrer Blumensträucher und gingen davon. Durch dieses Mittel erlangte er in kurzer Zeit acht Kahāpaṇas. Puna ekasmiṃ vātavuṭṭhidivase rājuyyāne bahū sukkhadaṇḍakā ca sākhā ca palāsañca vātena pātitaṃ hoti, uyyānapālo chaḍḍetuṃ upāyaṃ na passati. So tattha gantvā ‘‘sace imāni dārupaṇṇāni mayhaṃ dassasi, ahaṃ te imāni sabbāni nīharissāmī’’ti uyyānapālaṃ āha, so ‘‘gaṇha ayyā’’ti sampaṭicchi. Cūḷantevāsiko dārakānaṃ kīḷanamaṇḍalaṃ gantvā phāṇitaṃ datvā muhuttena sabbāni dārupaṇṇāni nīharāpetvā uyyānadvāre rāsiṃ kāresi. Tadā rājakumbhakāro rājakule bhājanānaṃ pacanatthāya dārūni pariyesamāno uyyānadvāre tāni disvā tassa hatthato kiṇitvā gaṇhi. Taṃ divasaṃ cūḷantevāsiko dāruvikkayena soḷasa kahāpaṇe cāṭiādīni ca pañca bhājanāni labhi. Später, an einem stürmischen Regentag, wurden im königlichen Garten viele trockene Zweige, Äste und Blätter vom Wind herabgeweht. Der Gärtner sah keine Möglichkeit, sie wegzuschaffen. Jener ging dorthin und sprach zum Gärtner: „Wenn du mir dieses Holz und die Blätter überlässt, werde ich all dies für dich heraustragen.“ Dieser willigte ein und sagte: „Nimm es, mein Herr!“ Der junge Schüler ging zum Spielplatz der Kinder, gab ihnen Melasse und ließ sie in einem Augenblick all das Holz und die Blätter heraustragen und am Gartentor aufhäufen. Zu dieser Zeit suchte der königliche Töpfer nach Brennholz, um die Gefäße für den königlichen Haushalt zu brennen. Als er jene Haufen am Gartentor sah, kaufte er sie ihm ab. An jenem Tag erhielt der junge Schüler durch den Verkauf des Holzes sechzehn Kahāpaṇas sowie fünf Tonkrüge und andere Gefäße. So catuvīsatiyā kahāpaṇesu jātesu ‘‘atthi ayaṃ upāyo mayha’’nti nagaradvārato avidūre ṭhāne ekaṃ pānīyacāṭiṃ ṭhapetvā pañcasate tiṇahārake pānīyena upaṭṭhahi. Te āhaṃsu ‘‘samma, tvaṃ amhākaṃ bahūpakāro, kiṃ te karomā’’ti? So ‘‘mayhaṃ kicce uppanne karissathā’’ti vatvā ito cito ca vicaranto thalapathakammikena ca jalapathakammikena ca saddhiṃ mittasanthavaṃ akāsi. Tassa thalapathakammiko ‘‘sve imaṃ nagaraṃ assavāṇijako pañca assasatāni gahetvā āgamissatī’’ti ācikkhi. So tassa vacanaṃ sutvā tiṇahārake āha ‘‘ajja mayhaṃ ekekaṃ tiṇakalāpaṃ detha, mayā ca tiṇe avikkiṇite attano tiṇaṃ mā vikkiṇathā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā [Pg.138] pañca tiṇakalāpasatāni āharitvā tassa ghare pāpayiṃsu. Assavāṇijo sakalanagare assānaṃ gocaraṃ alabhitvā tassa sahassaṃ datvā taṃ tiṇaṃ gaṇhi. Als er nun vierundzwanzig Kahāpaṇas besaß, dachte er: „Dies ist mein Weg.“ Er stellte unweit des Stadttors einen großen Wassertopf auf und versorgte fünfhundert Grasbündler mit Trinkwasser. Sie sagten: „Freund, du hast uns eine große Wohltat erwiesen. Was können wir für dich tun?“ Er sagte: „Wenn ich ein Anliegen habe, solltet ihr mir helfen.“ Und während er hier- und dorthin ging, schloss er Freundschaft mit Händlern des Landwegs und des Wasserwegs. Ein Landweghändler berichtete ihm: „Morgen wird ein Pferdehändler mit fünfhundert Pferden in diese Stadt kommen.“ Als er dessen Worte hörte, sprach er zu den Grasbündlern: „Gebt mir heute jeder ein Grasbündel. Und solange ich mein Gras nicht verkauft habe, verkauft auch euer eigenes Gras nicht.“ Sie stimmten zu, brachten fünfhundert Grasbündel und lieferten sie bei ihm zu Hause ab. Da der Pferdehändler in der ganzen Stadt kein Futter für seine Pferde finden konnte, zahlte er ihm tausend und kaufte ihm das Gras ab. Tato katipāhaccayenassa jalapathakammiko sahāyako ārocesi ‘‘paṭṭanamhi mahānāvā āgatā’’ti. So ‘‘atthi ayaṃ upāyo’’ti aṭṭhahi kahāpaṇehi sabbaparivārasampannaṃ tāvakālikaṃ rathaṃ gahetvā mahantena yasena nāvāpaṭṭanaṃ gantvā ekaṃ aṅgulimuddikaṃ nāvikassa saccakāraṃ datvā avidūre ṭhāne sāṇiyā parikkhipāpetvā nisinno purise āṇāpesi ‘‘bāhirato vāṇijesu āgatesu tatiyena paṭihārena maṃ ārocethā’’ti. ‘‘Nāvā āgatā’’ti sutvā bārāṇasito satamattā vāṇijā ‘‘bhaṇḍaṃ gaṇhāmā’’ti āgamiṃsu. Bhaṇḍaṃ tumhe na labhissatha, asukaṭṭhāne nāma mahāvāṇijena saccakāro dinnoti. Te taṃ sutvā tassa santikaṃ āgatā. Pādamūlikapurisā purimasaññāvasena tatiyena paṭihārena tesaṃ āgatabhāvaṃ ārocesuṃ. Te satamattā vāṇijā ekekaṃ sahassaṃ datvā tena saddhiṃ nāvāya pattikā hutvā puna ekekaṃ sahassaṃ datvā pattiṃ vissajjāpetvā bhaṇḍaṃ attano santakamakaṃsu. Einige Tage danach berichtete ihm sein Freund, der im Seehandel tätig war: „Ein großes Schiff ist im Hafen eingetroffen.“ Er dachte sich: „Dies ist eine gute Gelegenheit“, mietete für acht Kahāpaṇas einen voll ausgestatteten Wagen für kurze Zeit, fuhr mit großem Gefolge zum Schiffshafen, gab dem Kapitän einen Fingerring als Anzahlung, ließ unweit davon einen Vorhang aufstellen, setzte sich dahinter und befahl seinen Leuten: „Wenn Kaufleute von außerhalb ankommen, meldet es mir beim dritten Torwächter.“ Als sie hörten, dass ein Schiff eingetroffen war, kamen etwa hundert Kaufleute aus Bārāṇasī, um die Waren zu kaufen. Man sagte ihnen: „Ihr werdet die Ware nicht bekommen, denn an jenem Ort hat ein Großkaufmann bereits eine Anzahlung geleistet.“ Als sie dies hörten, begaben sie sich zu ihm. Seine Diener meldeten deren Ankunft gemäß der zuvor getroffenen Vereinbarung beim dritten Torwächter. Jene etwa hundert Kaufleute zahlten ihm jeweils tausend Münzen, um Teilhaber an der Schiffsladung zu werden, und zahlten ihm dann nochmals jeweils tausend Münzen, damit er seine Anteile abtrat, und machten so die gesamte Ware zu ihrem eigenen Besitz. Cūḷantevāsiko dve satasahassāni gaṇhitvā bārāṇasiṃ āgantvā ‘‘kataññunā me bhavituṃ vaṭṭatī’’ti ekaṃ satasahassaṃ gāhāpetvā cūḷaseṭṭhissa samīpaṃ gato. Atha naṃ seṭṭhi ‘‘kiṃ te, tāta, katvā idaṃ dhanaṃ laddha’’nti pucchi. So ‘‘tumhehi kathitaupāye ṭhatvā catumāsambhantareyeva laddha’’nti matamūsikaṃ ādiṃ katvā sabbaṃ vatthuṃ kathesi. Cūḷaseṭṭhi tassa vacanaṃ sutvā ‘‘idāni evarūpaṃ dārakaṃ mama santakaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti vayappattaṃ attano dhītaraṃ datvā sakalakuṭumbassa sāmikaṃ akāsi. So seṭṭhino accayena tasmiṃ nagare seṭṭhiṭṭhānaṃ labhi. Bodhisattopi yathākammaṃ agamāsi. Der junge Schüler des Cūḷaseṭṭhi nahm die zweihunderttausend Münzen an sich, kehrte nach Bārāṇasī zurück, dachte: „Ich muss mich dankbar erweisen“, ließ einhunderttausend davon mitnehmen und begab sich zu Cūḷaseṭṭhi. Da fragte ihn der Großkaufmann: „Mein Lieber, was hast du getan, um dieses Vermögen zu erwerben?“ Er erzählte die ganze Geschichte, beginnend mit der toten Maus, und sagte: „Ich habe mich an die von Euch erklärte Methode gehalten und dies innerhalb von nur vier Monaten erlangt.“ Als Cūḷaseṭṭhi seine Worte hörte, dachte er: „Es ist nun angemessen, einen solchen jungen Mann zu meinem Schwiegersohn zu machen.“ Er gab ihm seine im heiratsfähigen Alter befindliche Tochter und machte ihn zum Herrn über seinen gesamten Hausstand. Nach dem Ableben des Großkaufmanns erhielt er das Amt des Großkaufmanns in jener Stadt. Auch der Bodhisatta ging gemäß seinem Kamma nach dem Tod dahin. Sammāsambuddhopi imaṃ dhammadesanaṃ kathetvā abhisambuddhova imaṃ gāthaṃ kathesi – Auch der vollkommen Erleuchtete verkündete diese Lehrrede und sprach, nachdem er die Buddhaschaft erlangt hatte, folgende Strophe: 4. 4. ‘‘Appakenapi medhāvī, pābhatena vicakkhaṇo; Samuṭṭhāpeti attānaṃ, aṇuṃ aggiṃva sandhama’’nti. „Selbst mit geringem Startkapital baut ein kluger, weitsichtiger Mann sich selbst auf, wie einer, der ein winziges Feuer anbläst.“ Tattha [Pg.139] appakenapīti thokenapi parittakenapi. Medhāvīti paññavā. Pābhatenāti bhaṇḍamūlena. Vicakkhaṇoti vohārakusalo. Samuṭṭhāpeti attānanti mahantaṃ dhanañca yasañca uppādetvā tattha attānaṃ saṇṭhāpeti patiṭṭhāpeti. Yathā kiṃ? Aṇuṃ aggiṃva sandhamaṃ, yathā paṇḍitapuriso parittaṃ aggiṃ anukkamena gomayacuṇṇādīni pakkhipitvā mukhavātena dhamanto samuṭṭhāpeti vaḍḍheti mahantaṃ aggikkhandhaṃ karoti, evameva paṇḍito thokampi pābhataṃ labhitvā nānāupāyehi payojetvā dhanañca yasañca vaḍḍheti, vaḍḍhetvā ca pana tattha attānaṃ patiṭṭhāpeti, tāya eva vā pana dhanayasamahantatāya attānaṃ samuṭṭhāpeti, abhiññātaṃ pākaṭaṃ karotīti attho. Darin bedeutet „appakenapi“: selbst mit einem winzigen, geringfügigen. „Medhāvī“ bedeutet: der Weise. „Pābhatena“ bedeutet: mit dem Startkapital. „Vicakkhaṇo“ bedeutet: erfahren im Handel. „Samuṭṭhāpeti attānaṃ“ bedeutet: Er bringt großen Reichtum und Ansehen hervor und etabliert sowie festigt sich darin selbst. Wie ist das zu verstehen? „Wie einer, der ein winziges Feuer anbläst“: So wie ein kluger Mann ein winziges Feuer schrittweise entfacht, indem er getrockneten Kuhdung-Staub und Ähnliches hineinstreut, mit dem Atem seines Mundes bläst und so einen großen Scheiterhaufen daraus macht, ebenso vermehrt ein Weiser, selbst wenn er nur ein geringes Startkapital erhält, dieses durch die Anwendung verschiedener Mittel und steigert so seinen Wohlstand und sein Ansehen; nachdem er dies vermehrt hat, festigt er sich darin selbst, oder aber er baut sich durch ebendiese Fülle an Reichtum und Ansehen selbst auf, das heißt, er macht sich bekannt und angesehen. Dies ist die Bedeutung. Iti bhagavā ‘‘bhikkhave, cūḷapanthako maṃ nissāya idāni dhammesu dhammamahantataṃ patto, pubbe pana bhogesupi bhogamahantataṃ pāpuṇī’’ti evaṃ imaṃ dhammadesanaṃ dassetvā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā cūḷantevāsiko cūḷapanthako ahosi, cūḷakaseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti desanaṃ niṭṭhāpesi. So zeigte der Erhabene diese Lehrrede auf mit den Worten: „Ihr Mönche, indem er sich auf mich verließ, hat Cūḷapanthaka nun die höchste Größe in den Lehren erlangt; in der Vergangenheit jedoch erlangte er auch große Fülle an Besitztümern.“ Nachdem er diese beiden Geschichten erzählt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der junge Schüler Cūḷapanthaka, der Cūḷaseṭṭhi aber war ich selbst.“ Damit schloss er die Lehrrede ab. Cūḷaseṭṭhijātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Cūḷaseṭṭhi-Jātaka ist die vierte.
5. Taṇḍulanāḷijātakavaṇṇanā 5. Die Erklärung des Taṇḍulanāḷi-Jātaka. Kimagghati taṇḍulanāḷikāti idaṃ satthā jetavane viharanto lāludāyittheraṃ ārabbha kathesi. Tasmiṃ samaye āyasmā dabbo mallaputto saṅghassa bhattuddesako hoti. Tasmiṃ pātova salākabhattāni uddisamāne lāludāyittherassa kadāci varabhattaṃ pāpuṇāti, kadāci lāmakabhattaṃ. So lāmakabhattassa pattadivase salākaggaṃ ākulaṃ karoti, ‘‘kiṃ dabbova salākaṃ dātuṃ jānāti, amhe na jānāmā’’ti vadati. Tasmiṃ salākaggaṃ ākulaṃ karonte ‘‘handa dāni tvameva salākaṃ dehī’’ti salākapacchiṃ adaṃsu. Tato paṭṭhāya so saṅghassa salākaṃ adāsi. Dento ca pana ‘‘idaṃ varabhatta’’nti vā ‘‘lāmakabhatta’’nti vā ‘‘asukavassagge varabhatta’’nti vā ‘‘asukavassagge lāmakabhatta’’nti vā na jānāti, ṭhitikaṃ karontopi ‘‘asukavassagge ṭhitikā’’ti na [Pg.140] sallakkheti. Bhikkhūnaṃ ṭhitavelāya ‘‘imasmiṃ ṭhāne ayaṃ ṭhitikā ṭhitā, imasmiṃ ṭhāne aya’’nti bhūmiyaṃ vā bhittiyaṃ vā lekhaṃ kaḍḍhati. Punadivase salākagge bhikkhū mandatarā vā honti bahutarā vā, tesu mandataresu lekhā heṭṭhā hoti, bahutaresu upari. So ṭhitikaṃ ajānanto lekhāsaññāya salākaṃ deti. „Was ist ein Maß Reis wert?“ – Diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf den älteren Mönch Lāludāyī. Zu jener Zeit war der ehrwürdige Dabba, der Sohn des Malla, der Speisenverteiler des Saṅgha. Wenn dieser frühmorgens die Mahlzeiten per Los zuteilte, fiel dem ehrwürdigen Lāludāyī manchmal eine vorzügliche Speise zu, manchmal eine minderwertige. An den Tagen, an denen er eine minderwertige Speise erhielt, stiftete er in der Verteilungsstelle Unruhe und sagte: „Versteht etwa nur Dabba es, die Lose zu verteilen? Verstehen wir es etwa nicht?“ Da er in der Verteilungsstelle Unruhe stiftete, gaben sie ihm den Loskorb mit den Worten: „Wohlan, dann verteile du selbst die Lose!“ Von da an verteilte er die Lose für den Saṅgha. Doch beim Verteilen wusste er weder, ob dies eine vorzügliche oder eine minderwertige Speise war, noch wusste er, ob einer bestimmten Altersklasse die vorzügliche oder die minderwertige Speise zustand. Auch wenn er die Reihenfolge festlegen wollte, merkte er sich nicht: „In dieser Altersklasse steht die Reihe.“ Wenn die Mönche anstanden, zog er einen Strich auf dem Boden oder an der Wand, um anzuzeigen: „An dieser Stelle steht diese Reihe, an jener Stelle jene.“ Am nächsten Tag waren in der Verteilungsstelle entweder viel weniger oder viel mehr Mönche anwesend. Wenn es weniger waren, lag die Markierung zu tief; wenn es mehr waren, lag sie zu hoch. Da er die tatsächliche Reihenfolge nach dem Ordensalter nicht kannte, verteilte er die Lose blind nach den gezeichneten Markierungen. Atha naṃ bhikkhū ‘‘āvuso, udāyi, lekhā nāma heṭṭhā vā hoti upari vā, varabhattaṃ pana asukavassagge ṭhitaṃ, lāmakabhattaṃ asukavassagge’’ti āhaṃsu. So bhikkhū paṭippharanto ‘‘yadi evaṃ ayaṃ lekhā kasmā evaṃ ṭhitā, kiṃ ahaṃ tumhākaṃ saddahāmi, imissā lekhāya saddahāmī’’ti vadati. Atha naṃ daharā ca sāmaṇerā ca ‘‘āvuso lāludāyi tayi salākaṃ dente bhikkhū lābhena parihāyanti, na tvaṃ dātuṃ anucchaviko, gaccha ito’’ti salākaggato nikkaḍḍhiṃsu. Tasmiṃ khaṇe salākagge mahantaṃ kolāhalaṃ ahosi. Taṃ sutvā satthā ānandattheraṃ pucchi ‘‘ānanda, salākagge mahantaṃ kolāhalaṃ, kiṃ saddo nāmeso’’ti. Thero tathāgatassa tamatthaṃ ārocesi. ‘‘Ānanda, na idāneva lāludāyi attano bālatāya paresaṃ lābhahāniṃ karoti, pubbepi akāsiyevā’’ti āha. Thero tassatthassa āvibhāvatthaṃ bhagavantaṃ yāci. Bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Da sagten die Mönche zu ihm: „Freund Udāyi, eine Markierung kann tiefer oder höher liegen. Das vorzügliche Essen gebührt jedoch jener Altersklasse, und das minderwertige Essen jener Altersklasse!“ Er widersprach den Mönchen und sagte: „Wenn dem so ist, warum befindet sich dann diese Markierung genau hier? Soll ich etwa euch glauben? Ich glaube dieser Markierung!“ Da vertrieben ihn die jungen Mönche und Novizen aus der Verteilungsstelle mit den Worten: „Freund Lāludāyi, wenn du die Lose verteilst, erleiden die Mönche Verlust an ihren Gaben. Du bist nicht geeignet, sie zu verteilen. Geh weg von hier!“ In diesem Moment entstand in der Verteilungsstelle ein großer Lärm. Als der Meister dies hörte, fragte er den ehrwürdigen Ānanda: „Ānanda, da ist ein großer Lärm in der Verteilungsstelle. Was ist das für ein Geräusch?“ Der Thera berichtete dem Tathāgata den Sachverhalt. Der Meister sprach: „Ānanda, nicht erst jetzt fügt Lāludāyi anderen durch seine Torheit Verlust an Gewinn zu; das hat er auch schon in der Vergangenheit getan.“ Der Thera bat den Erhabenen, diese Angelegenheit zu enthüllen. Da machte der Erhabene das durch ein anderes Leben verborgene Geschehen offenbar. Atīte kāsiraṭṭhe bārāṇasiyaṃ brahmadatto rājā ahosi. Tadā amhākaṃ bodhisatto tassa agghāpaniko ahosi. Hatthiassādīni ceva maṇisuvaṇṇādīni ca agghāpesi, agghāpetvā bhaṇḍasāmikānaṃ bhaṇḍānurūpameva mūlaṃ dāpesi. Rājā pana luddho hoti, so lobhapakatitāya evaṃ cintesi ‘‘ayaṃ agghāpaniko evaṃ agghāpento na cirasseva mama gehe dhanaṃ parikkhayaṃ gamessati, aññaṃ agghāpanikaṃ karissāmī’’ti. So sīhapañjaraṃ ugghāṭetvā rājaṅgaṇaṃ olokento ekaṃ gāmikamanussaṃ lolabālaṃ rājaṅgaṇena gacchantaṃ disvā ‘‘esa mayhaṃ agghāpanikakammaṃ kātuṃ sakkhissatī’’ti taṃ pakkosāpetvā ‘‘sakkhissasi, bhaṇe, amhākaṃ agghāpanikakammaṃ kātu’’nti āha. Sakkhissāmi, devāti. Rājā attano dhanarakkhaṇatthāya taṃ bālaṃ agghāpanikakamme ṭhapesi. Tato paṭṭhāya so bālo hatthiassādīni agghāpento agghaṃ hāpetvā [Pg.141] yathāruciyā katheti. Tassa ṭhānantare ṭhitattā yaṃ so katheti, tameva mūlaṃ hoti. In der Vergangenheit regierte in Bārāṇasī im Reich Kāsi der König Brahmadatta. Damals war unser Bodhisatta sein Schätzer. Er schätzte Elefanten, Pferde und dergleichen sowie Juwelen, Gold und andere Dinge; nachdem er sie geschätzt hatte, ließ er den Eigentümern der Waren einen dem Wert der Waren entsprechenden Preis auszahlen. Der König jedoch war gierig; aufgrund seiner gierigen Natur dachte er: „Wenn dieser Schätzer so weiter schätzt, wird der Reichtum in meinem Palast in Kürze erschöpft sein. Ich werde einen anderen Schätzer ernennen.“ Er öffnete das Löwenfenster, blickte auf den Schlosshof und sah einen törichten, leichtfertigen Dorfbewohner über den Hof gehen. Da dachte er: „Dieser Mann wird in der Lage sein, die Arbeit meines Schätzers zu tun.“ Er ließ ihn rufen und fragte: „Mein Guter, wirst du in der Lage sein, die Arbeit unseres Schätzers zu verrichten?“ Dieser antwortete: „Ich werde es können, o Herr.“ Um seinen eigenen Reichtum zu schonen, setzte der König diesen Toren in das Amt des Schätzers ein. Von da an schätzte dieser Tor Elefanten, Pferde und dergleichen, indem er ihren Wert herabsetzte und nach eigenem Belieben sprach. Weil er in diesem Amt eingesetzt war, wurde genau das, was er sagte, zum tatsächlichen Preis. Tasmiṃ kāle uttarāpathato eko assavāṇijo pañca assasatāni ānesi. Rājā taṃ purisaṃ pakkosāpetvā asse agghāpesi. So pañcannaṃ assasatānaṃ ekaṃ taṇḍulanāḷikaṃ agghamakāsi. Katvā ca pana ‘‘assavāṇijassa ekaṃ taṇḍulanāḷikaṃ dethā’’ti vatvā asse assasālāyaṃ saṇṭhāpesi. Assavāṇijo porāṇaagghāpanikassa santikaṃ gantvā taṃ pavattiṃ ārocetvā ‘‘idāni kiṃ kattabba’’nti pucchi. So āha ‘‘tassa purisassa lañjaṃ datvā evaṃ pucchatha ‘amhākaṃ tāva assā ekaṃ taṇḍulanāḷikaṃ agghantīti ñātametaṃ, tumhe pana nissāya taṇḍulanāḷiyā agghaṃ jānitukāmamhā, sakkhissatha no rañño santike ṭhatvā sā taṇḍulanāḷikā idaṃ nāma agghatīti vattu’nti, sace sakkomīti vadati, taṃ gahetvā rañño santikaṃ gacchatha, ahampi tattha āgamissāmī’’ti. Zu jener Zeit brachte ein Pferdehändler aus Uttarāpatha fünfhundert Pferde. Der König ließ jenen Mann rufen und die Pferde schätzen. Dieser setzte den Wert der fünfhundert Pferde auf ein einziges Maß Reis fest. Nachdem er dies getan hatte, sagte er: „Gebt dem Pferdehändler ein Maß Reis“, und ließ die Pferde im Pferdestall unterbringen. Der Pferdehändler ging zum ehemaligen Schätzer, berichtete ihm von diesem Vorfall und fragte: „Was ist nun zu tun?“ Jener sagte: „Gib diesem Mann ein Bestechungsgeld und frage ihn so: ‚Dass unsere Pferde ein Maß Reis wert sind, ist nun bekannt; aber durch dich möchten wir den Wert eines Maßes Reis erfahren. Wirst du in der Gegenwart des Königs stehen und erklären können, wie viel dieses Maß Reis wert ist?‘ Wenn er sagt: ‚Ich kann es‘, dann nimm ihn mit und geht vor den König. Auch ich werde dorthin kommen.“ Assavāṇijo ‘‘sādhū’’ti bodhisattassa vacanaṃ sampaṭicchitvā agghāpanikassa lañjaṃ datvā tamatthaṃ ārocesi. So lañjaṃ labhitvāva ‘‘sakkhissāmi taṇḍulanāḷiṃ agghāpetu’’nti. ‘‘Tena hi gacchāma rājakula’’nti taṃ ādāya rañño santikaṃ agamāsi. Bodhisattopi aññepi bahū amaccā agamiṃsu. Assavāṇijo rājānaṃ vanditvā āha – ‘‘deva, pañcannaṃ assasatānaṃ ekaṃ taṇḍulanāḷiṃ agghanakabhāvaṃ jānāma, sā pana taṇḍulanāḷi kiṃ agghatīti agghāpanikaṃ pucchatha devā’’ti. Rājā taṃ pavattiṃ ajānanto ‘‘ambho agghāpanika, pañca assasatāni kiṃ agghantī’’ti pucchi. Taṇḍulanāḷiṃ, devāti. ‘‘Hotu, bhaṇe, assā tāva taṇḍulanāḷiṃ agghantu. Sā pana kiṃ agghati taṇḍulanāḷikā’’ti pucchi. So bālapuriso ‘‘bārāṇasiṃ santarabāhiraṃ agghati taṇḍulanāḷikā’’ti āha. So kira pubbe rājānaṃ anuvattanto ekaṃ taṇḍulanāḷiṃ assānaṃ agghamakāsi. Puna vāṇijassa hatthato lañjaṃ labhitvā tassā taṇḍulanāḷikāya bārāṇasiṃ santarabāhiraṃ agghamakāsi. Tadā pana bārāṇasiyā pākāraparikkhepo dvādasayojaniko hoti. Idamassa antaraṃ, bāhiraṃ pana tiyojanasatikaṃ raṭṭhaṃ. Iti so bālo [Pg.142] evaṃ mahantaṃ bārāṇasiṃ santarabāhiraṃ taṇḍulanāḷikāya agghamakāsi. Der Pferdehändler stimmte zu, nahm die Worte des Bodhisatta an, gab dem Schätzer ein Bestechungsgeld und trug ihm die Angelegenheit vor. Sobald dieser das Bestechungsgeld erhalten hatte, sagte er: „Ich werde in der Lage sein, den Wert des Maßes Reis zu bestimmen.“ Jener sprach: „Dann lasst uns zum Königspalast gehen“, nahm ihn mit und begab sich vor den König. Auch der Bodhisatta und viele andere Minister gingen dorthin. Der Pferdehändler verneigte sich vor dem König und sagte: „O Herr, wir wissen nun, dass fünfhundert Pferde ein Maß Reis wert sind; aber frage doch den Schätzer, o König, wie viel dieses Maß Reis wert ist.“ Der König, der von dem Bestechungsdeal nichts wusste, fragte: „He, Schätzer, wie viel sind die fünfhundert Pferde wert?“ „Ein Maß Reis, o Herr“, antwortete er. „Nun gut, mein Lieber, die Pferde mögen ein Maß Reis wert sein. Aber wie viel ist dieses Maß Reis wert?“, fragte der König. Der törichte Mann sagte: „Das Maß Reis ist ganz Bārāṇasī wert, samt dem inneren und äußeren Stadtgebiet.“ Zuvor hatte er nämlich, um dem König zu gefallen, den Wert der Pferde auf ein Maß Reis festgesetzt. Nun aber, nachdem er vom Händler ein Bestechungsgeld erhalten hatte, setzte er den Wert dieses Maßes Reis auf ganz Bārāṇasī samt dem inneren und äußeren Gebiet fest. Damals betrug der Umfang der Stadtmauer von Bārāṇasī zwölf Yojanas – dies war das innere Gebiet –, das äußere Reich jedoch erstreckte sich über dreihundert Yojanas. So setzte jener Tor den Wert eines Maßes Reis auf das gesamte, so riesige Bārāṇasī samt dem inneren und äußeren Gebiet fest. Taṃ sutvā amaccā pāṇiṃ paharitvā hasamānā ‘‘mayaṃ pubbe pathaviñca rajjañca anagghanti saññino ahumha, evaṃ mahantaṃ kira sarājakaṃ bārāṇasirajjaṃ taṇḍulanāḷimattaṃ agghati, aho agghāpanikassa ñāṇasampadā. Kahaṃ ettakaṃ kālaṃ ayaṃ agghāpaniko vihāsi, amhākaṃ rañño eva anucchaviko’’ti parihāsaṃ akaṃsu – Als die Minister dies hörten, klatschten sie in die Hände, lachten und machten sich lustig: „Früher dachten wir, dass die Erde und das Königreich unbezahlbar seien. Doch nun ist das so große Königreich Bārāṇasī samt seinem König anscheinend gerade mal ein Maß Reis wert! Oh, was für eine Fülle an Weisheit besitzt dieser Schätzer! Wo hat sich dieser Schätzer nur all diese Zeit aufgehalten? Er ist wahrlich wie geschaffen für unseren König!“ Sie verspotteten ihn mit den Worten: 5. 5. ‘‘Kimagghati taṇḍulanāḷikāyaṃ, assāna mūlāya vadehi rāja; Bārāṇasiṃ santarabāhiraṃ, ayamagghati taṇḍulanāḷikā’’ti. „Was ist das Maß Reis wert, das den Preis für die Pferde bildete? Sag es uns, o König! Ganz Bārāṇasī, samt dem inneren und äußeren Gebiet, ist dieses Maß Reis wert!“ Tasmiṃ kāle rājā lajjito taṃ bālaṃ nikkaḍḍhāpetvā bodhisattasseva agghāpanikaṭṭhānaṃ adāsi. Bodhisattopi yathākammaṃ gato. Da schämte sich der König, jagte jenen Toren davon und gab das Amt des Schätzers wieder dem Bodhisatta. Der Bodhisatta ging schließlich gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā gāmikabālaagghāpaniko lāludāyī ahosi, paṇḍitaagghāpaniko pana ahameva ahosi’’nti desanaṃ niṭṭhāpesi. Der Meister brachte diese Lehrrede dar, erzählte die beiden Geschichten, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der törichte dörfliche Schätzer Lāludāyī, der weise Schätzer aber war ich selbst.“ So schloss er die Lehrrede ab. Taṇḍulanāḷijātakavaṇṇanā pañcamā. Hier endet die Erklärung des Taṇḍulanāḷi-Jātaka, das fünfte.
6. Devadhammajātakavaṇṇanā 6. Die Erklärung des Devadhamma-Jātaka. Hiriottappasampannāti idaṃ bhagavā jetavane viharanto aññataraṃ bahubhaṇḍikaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Sāvatthivāsī kireko kuṭumbiko bhariyāya kālakatāya pabbaji. So pabbajanto attano pariveṇañca aggisālañca bhaṇḍagabbhañca kāretvā bhaṇḍagabbhaṃ sappitaṇḍulādīhi pūretvā pabbaji. Pabbajitvā ca pana attano dāse pakkosāpetvā yathārucitaṃ āhāraṃ pacāpetvā bhuñjati, bahuparikkhāro ca ahosi[Pg.143], rattiṃ aññaṃ nivāsanapārupanaṃ hoti, divā aññaṃ. Vihārapaccante vasati. Tassekadivasaṃ cīvarapaccattharaṇādīni nīharitvā pariveṇe pattharitvā sukkhāpentassa sambahulā jānapadā bhikkhū senāsanacārikaṃ āhiṇḍantā pariveṇaṃ gantvā cīvarādīni disvā ‘‘kassimānī’’ti pucchiṃsu. So ‘‘mayhaṃ, āvuso’’ti āha. ‘‘Āvuso, idampi cīvaraṃ, idampi nivāsanaṃ, idampi paccattharaṇaṃ, sabbaṃ tuyhamevā’’ti? ‘‘Āma mayhamevā’’ti. ‘‘Āvuso bhagavatā tīṇi cīvarāni anuññātāni, tvaṃ evaṃ appicchassa buddhassa sāsane pabbajitvā evaṃ bahuparikkhāro jāto, ehi taṃ dasabalassa santikaṃ nessāmā’’ti taṃ ādāya satthu santikaṃ agamaṃsu. „Die mit Scham und Scheu Ausgestatteten...“ – Diese Lehrrede hielt der Erhabene, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen Mönch, der sehr viel Hab und Gut besaß. Es heißt, ein in Sāvatthī ansässiger Hausvater trat in den Orden ein, nachdem seine Frau gestorben war. Als er den Orden betrat, ließ er für sich eine Zelle, ein Feuerhaus und eine Vorratskammer errichten; er füllte die Vorratskammer mit Butter, Reis und anderen Dingen und ordinierte erst dann. Nach seiner Ordination ließ er seine Diener rufen, ließ sich Speisen nach eigenem Geschmack zubereiten und aß diese. Er besaß sehr viele Gebrauchsgegenstände; für die Nacht hatte er ein anderes Unter- und Obergewand und für den Tag ein anderes. Er lebte am Rande des Klosters. Als er eines Tages seine Gewänder, Decken und andere Dinge herausbrachte, sie im Hof ausbreitete und trocknete, kamen viele Mönche aus der Provinz, die die Wohnstätten besichtigten, in seinen Hof, sahen die Gewänder und fragten: „Wem gehört das alles?“ Er antwortete: „Mir, ihr Ehrwürdigen.“ Sie fragten: „Freund, gehört dieses Obergewand, dieses Untergewand und diese Decke – gehört das alles wirklich dir allein?“ „Ja, es gehört mir allein“, erwiderte er. Da sagten sie: „Freund, der Erhabene hat doch nur drei Gewänder erlaubt. Du bist in der Lehre des Buddha, der so genügsam ist, ordiniert und hast so viele Habseligkeiten angesammelt! Komm, wir bringen dich vor den Zehnkräftigen.“ Und sie nahmen ihn mit und gingen vor den Meister. Satthā disvāva ‘‘kiṃ nu kho, bhikkhave, anicchamānakaṃyeva bhikkhuṃ gaṇhitvā āgatatthā’’ti āha. ‘‘Bhante, ayaṃ bhikkhu bahubhaṇḍo bahuparikkhāro’’ti. ‘‘Saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu bahubhaṇḍo’’ti? ‘‘Saccaṃ, bhagavā’’ti. ‘‘Kasmā pana tvaṃ bhikkhu bahubhaṇḍo jāto’’? ‘‘Nanu ahaṃ appicchatāya santuṭṭhitāya pavivekassa vīriyārambhassa vaṇṇaṃ vadāmī’’ti. So satthu vacanaṃ sutvā kupito ‘‘iminā dāni nīhārena carissāmī’’ti pārupanaṃ chaḍḍetvā parisamajjhe ekacīvaro aṭṭhāsi. Als der Meister ihn sah, fragte er: „Ihr Mönche, warum habt ihr diesen Mönch hergebracht, obwohl er gar nicht mitkommen wollte?“ – „Ehrwürdiger Herr, dieser Mönch besitzt viel Hab und Gut und viele Bedarfsgegenstände.“ – „Stimmt es wirklich, Mönch, dass du viele Besitztümer hast?“ – „Es stimmt, Erhabener.“ – „Aber warum, Mönch, hast du so viele Besitztümer angehäuft? Preise ich nicht etwa die Begehrenslosigkeit, die Zufriedenheit, die Abgeschiedenheit und die Entfaltung von Tatkraft?“ Als jener Mönch die Worte des Meisters hörte, wurde er zornig, dachte: „Dann werde ich eben auf diese Weise umhergehen!“, warf sein Obergewand ab und stand mitten in der Versammlung nur mit einem einzigen Gewand bekleidet da. Atha naṃ satthā upatthambhayamāno ‘‘nanu tvaṃ bhikkhu pubbe hirottappagavesako dakarakkhasakālepi hirottappaṃ gavesamāno dvādasa saṃvaccharāni vihāsi, atha kasmā idāni evaṃ garuke buddhasāsane pabbajitvā catuparisamajjhe pārupanaṃ chaḍḍetvā hirottappaṃ pahāya ṭhitosī’’ti? So satthu vacanaṃ sutvā hirottappaṃ paccupaṭṭhāpetvā taṃ cīvaraṃ pārupitvā satthāraṃ vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Bhikkhū tassatthassa āvibhāvatthaṃ bhagavantaṃ yāciṃsu, bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Da sprach der Meister, um ihn aufzurichten: „Mönch, hast du nicht früher nach Schamgefühl und Gewissensscheu gestrebt? Selbst in der Zeit, als du ein Wasserdämon warst, hast du auf der Suche nach Schamgefühl und Gewissensscheu zwölf Jahre lang gelebt. Warum aber hast du jetzt, da du in dieser so ehrwürdigen Lehre des Buddha ordiniert bist, mitten in der vierfachen Versammlung dein Obergewand abgeworfen, Schamgefühl und Gewissensscheu abgelegt und stehst so da?“ Als er die Worte des Meisters hörte, erweckte er in sich wieder Schamgefühl und Gewissensscheu, legte jenes Gewand wieder an, verneigte sich vor dem Meister und setzte sich an eine Seite nieder. Die Mönche baten den Erhabenen, die Bedeutung dieser Begebenheit zu erklären, und der Erhabene machte das durch ein anderes Dasein verborgene Geschehen offenbar. Atīte kāsiraṭṭhe bārāṇasiyaṃ brahmadatto nāma rājā ahosi. Tadā bodhisatto tassa aggamahesiyā kucchimhi paṭisandhiṃ gaṇhi. Tassa nāmaggahaṇadivase ‘‘mahisāsakumāro’’ti nāmaṃ akaṃsu. Tassa ādhāvitvā paridhāvitvā vicaraṇakāle rañño aññopi putto jāto, tassa ‘‘candakumāro’’ti nāmaṃ akaṃsu. Tassa pana ādhāvitvā paridhāvitvā vicaraṇakāle bodhisattassa mātā kālamakāsi, rājā aññaṃ [Pg.144] aggamahesiṭṭhāne ṭhapesi. Sā rañño piyā ahosi manāpā, sāpi saṃvāsamanvāya ekaṃ puttaṃ vijāyi, ‘‘sūriyakumāro’’tissa nāmaṃ akaṃsu. Rājā puttaṃ disvā tuṭṭhacitto ‘‘bhadde, puttassa te varaṃ dammī’’ti āha. Devī, varaṃ icchitakāle gahetabbaṃ katvā ṭhapesi. Sā putte vayappatte rājānaṃ āha – ‘‘devena mayhaṃ puttassa jātakāle varo dinno, puttassa me rajjaṃ dehī’’ti. Rājā ‘‘mayhaṃ dve puttā aggikkhandhā viya jalamānā vicaranti, na sakkā tava puttassa rajjaṃ dātu’’nti paṭikkhipitvāpi taṃ punappunaṃ yācamānameva disvā ‘‘ayaṃ mayhaṃ puttānaṃ pāpakampi cinteyyā’’ti putte pakkosāpetvā āha – ‘‘tātā, ahaṃ sūriyakumārassa jātakāle varaṃ adāsiṃ. Idānissa mātā rajjaṃ yācati, ahaṃ tassa na dātukāmo, mātugāmo nāma pāpo, tumhākaṃ pāpakampi cinteyya, tumhe araññaṃ pavisitvā mama accayena kulasantake nagare rajjaṃ kareyyāthā’’ti roditvā kanditvā sīse cumbitvā uyyojesi. Te pitaraṃ vanditvā pāsādā otarante rājaṅgaṇe kīḷamāno sūriyakumāro disvā taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘ahampi bhātikehi saddhiṃ gamissāmī’’ti tehi saddhiṃyeva nikkhami. Te himavantaṃ pavisiṃsu. In der Vergangenheit regierte in Bārāṇasī im Königreich Kāsi ein König namens Brahmadatta. Damals nahm der Bodhisatta im Schoß der Hauptgemahlin jenes Königs Empfängnis auf. Am Tag der Namensgebung gaben sie ihm den Namen ‚Prinz Mahisāsa‘. Als dieser herumlaufen und umherstreifen konnte, wurde dem König ein weiterer Sohn geboren, dem sie den Namen ‚Prinz Canda‘ gaben. Als aber auch dieser herumlaufen und umherstreifen konnte, verstarb die Mutter des Bodhisatta, und der König setzte eine andere Frau in das Amt der Hauptgemahlin ein. Sie wurde dem König lieb und angenehm. Aus ihrer Verbindung gebar auch sie einen Sohn, dem sie den Namen ‚Prinz Sūriya‘ gaben. Als der König den Sohn sah, sagte er mit erfreutem Herzen: ‚Meine Liebe, ich gewähre deinem Sohn eine Gunst.‘ Die Königin bewahrte diese Gunst auf, um sie zu einem von ihr gewünschten Zeitpunkt einzufordern. Als ihr Sohn das reife Alter erreicht hatte, sprach sie zum König: ‚Majestät, zur Zeit der Geburt meines Sohnes wurde mir eine Gunst gewährt. Gebt meinem Sohn das Königreich.‘ Der König lehnte ab und sprach: ‚Meine beiden älteren Söhne wandeln umher und leuchten wie lodernde Feuersbrünste; es ist unmöglich, deinem Sohn das Königreich zu geben.‘ Als er jedoch sah, dass sie immer wieder darum bat, dachte er: ‚Diese Frau könnte meinen Söhnen sogar Böses antun.‘ Er ließ seine Söhne rufen und sprach: ‚Meine Söhne, bei Sūriyakumāras Geburt habe ich eine Gunst gewährt. Nun verlangt seine Mutter das Königreich. Ich möchte es ihm jedoch nicht geben. Das weibliche Geschlecht ist voller Tücke; sie könnte euch Böses antun. Geht in den Wald und übernehmt nach meinem Ableben die Herrschaft in der Stadt, die das Erbe unserer Familie ist.‘ Unter Tränen und Wehklagen küsste er sie auf das Haupt und verabschiedete sie. Als sie, nachdem sie sich vor dem Vater verneigt hatten, vom Palast herabstiegen, sah sie Sūriyakumāra, der im Schlosshof spielte. Als er den Grund erfuhr, dachte er: ‚Auch ich werde mit meinen Brüdern gehen‘, und brach gemeinsam mit ihnen auf. Sie begaben sich in die Himālaya-Wälder. Bodhisatto [Pg.145] maggā okkamma rukkhamūle nisīditvā sūriyakumāraṃ āmantesi ‘‘tāta sūriyakumāra, etaṃ saraṃ gantvā nhatvā ca pivitvā ca paduminipaṇṇehi amhākampi pānīyaṃ ānehī’’ti. Taṃ pana saraṃ vessavaṇassa santikā ekena dakarakkhasena laddhaṃ hoti, vessavaṇo ca taṃ āha – ‘‘ṭhapetvā devadhammajānanake ye aññe imaṃ saraṃ otaranti, te khādituṃ labhasi. Anotiṇṇe na labhasī’’ti. Tato paṭṭhāya so rakkhaso ye taṃ saraṃ otaranti, te devadhamme pucchitvā ye na jānanti, te khādati. Atha kho sūriyakumāro taṃ saraṃ gantvā avīmaṃsitvāva otari. Atha naṃ so rakkhaso gahetvā ‘‘devadhamme jānāsī’’ti pucchi. So ‘‘devadhammā nāma candimasūriyā’’ti āha. Atha naṃ ‘‘tvaṃ devadhamme na jānāsī’’ti vatvā udakaṃ pavesetvā attano vasanaṭṭhāne ṭhapesi. Bodhisattopi taṃ aticirāyantaṃ disvā candakumāraṃ pesesi. Rakkhaso tampi gahetvā ‘‘devadhamme jānāsī’’ti pucchi. ‘‘Āma jānāmi, devadhammā nāma catasso disā’’ti. Rakkhaso ‘‘na tvaṃ devadhamme jānāsī’’ti tampi gahetvā tattheva ṭhapesi. Der Bodhisatta wich vom Weg ab, setzte sich am Fuße eines Baumes nieder und wandte sich an Sūriyakumāra: „Mein lieber Sūriyakumāra, geh zu jenem See, bade und trinke, und bringe auch uns Trinkwasser in Lotusblättern mit.“ Jener See war jedoch einem Wasserdämon von Vessavaṇa zur Bewachung übertragen worden. Vessavaṇa hatte zu ihm gesagt: „Ausgenommen jene, die die göttlichen Gesetze kennen, darfst du alle anderen, die in diesen See hinabsteigen, fressen. Diejenigen, die nicht hinabsteigen, darfst du nicht anrühren.“ Von da an fragte jener Dämon alle, die in den See hinabstiegen, nach den göttlichen Gesetzen und fraß jene, die sie nicht kannten. Nun ging Sūriyakumāra zu jenem See und stieg, ohne nachzuforschen, einfach hinein. Da ergriff ihn der Dämon und fragte: „Kennst du die göttlichen Gesetze?“ Er antwortete: „Als die göttlichen Gesetze bezeichnet man Sonne und Mond.“ Da sagte der Dämon zu ihm: „Du kennst die göttlichen Gesetze nicht“, zog ihn ins Wasser hinab und hielt ihn an seinem Aufenthaltsort gefangen. Als der Bodhisatta sah, dass er allzu lange ausblieb, schickte er Candakumāra los. Der Dämon ergriff auch diesen und fragte: „Kennst du die göttlichen Gesetze?“ – „Ja, ich kenne sie. Die vier Himmelsrichtungen heißen die göttlichen Gesetze.“ Der Dämon sprach: „Du kennst die göttlichen Gesetze nicht“, ergriff auch ihn und hielt ihn am selben Ort gefangen. Bodhisatto tasmimpi cirāyante ‘‘ekena antarāyena bhavitabba’’nti sayaṃ tattha gantvā dvinnampi otaraṇapadavaḷañjaṃ disvā ‘‘rakkhasapariggahitena iminā sarena bhavitabba’’nti khaggaṃ sannayhitvā dhanuṃ gahetvā aṭṭhāsi. Dakarakkhaso bodhisattaṃ udakaṃ anotarantaṃ disvā vanakammikapuriso viya hutvā bodhisattaṃ āha – ‘‘bho, purisa, tvaṃ maggakilanto kasmā imaṃ saraṃ otaritvā nhatvā pivitvā bhisamuḷālaṃ khāditvā pupphāni piḷandhitvā yathāsukhaṃ na gacchasī’’ti? Bodhisatto taṃ disvā ‘‘eso yakkho bhavissatī’’ti ñatvā ‘‘tayā me bhātikā gahitā’’ti āha. ‘‘Āma, gahitā’’ti. ‘‘Kiṃ kāraṇā’’ti? ‘‘Ahaṃ imaṃ saraṃ otiṇṇake labhāmī’’ti. ‘‘Kiṃ pana sabbeva labhasī’’ti? ‘‘Ye devadhamme jānanti, te ṭhapetvā avasese labhāmī’’ti. ‘‘Atthi pana te devadhammehi attho’’ti? ‘‘Āma, atthī’’ti. ‘‘Yadi evaṃ ahaṃ te devadhamme kathessāmī’’ti. ‘‘Tena hi kathehi, ahaṃ devadhamme suṇissāmī’’ti. Bodhisatto āha ‘‘ahaṃ devadhamme katheyyaṃ, kiliṭṭhagatto panamhī’’ti. Yakkho bodhisattaṃ nhāpetvā bhojanaṃ bhojetvā pānīyaṃ pāyetvā pupphāni piḷandhāpetvā gandhehi vilimpāpetvā alaṅkatamaṇḍapamajjhe pallaṅkaṃ attharitvā adāsi. Als auch dieser lange ausblieb, dachte der Bodhisatta: „Es muss ein Unglück geschehen sein.“ Er ging selbst dorthin, sah die Spuren der beiden Hinabsteigenden und erkannte: „Dieser See muss von einem Dämon bewacht werden.“ Er gürtete sein Schwert um, nahm seinen Bogen und stellte sich auf. Als der Wasserdämon sah, dass der Bodhisatta nicht ins Wasser stieg, nahm er die Gestalt eines Waldarbeiters an und sprach zum Bodhisatta: „He, guter Mann, du bist müde von der Reise. Warum steigst du nicht in diesen See hinab, badest, trinkst, isst Lotuswurzeln und -stängel, schmückst dich mit Blumen und ziehst dann erfrischt deines Weges?“ Als der Bodhisatta ihn sah, erkannte er: „Das muss der Yakkha sein“, und fragte ihn: „Hast du meine Brüder gefangen genommen?“ – „Ja, das habe ich.“ – „Aus welchem Grund?“ – „Ich darf alle fangen, die in diesen See hinabsteigen.“ – „Darfst du denn alle fressen?“ – „Außer jenen, die die göttlichen Gesetze kennen, darf ich alle übrigen fressen.“ – „Hast du denn ein Verlangen nach den göttlichen Gesetzen?“ – „Ja, das habe ich.“ – „Wenn dem so ist, werde ich dir die göttlichen Gesetze verkünden.“ – „Nun gut, sprich, ich werde den göttlichen Gesetzen lauschen.“ Der Bodhisatta sprach: „Ich möchte dir die göttlichen Gesetze verkünden, doch mein Körper ist schmutzig.“ Da ließ der Yakkha den Bodhisatta baden, gab ihm Speise zu essen, reichte ihm Wasser zu trinken, schmückte ihn mit Blumen, salbte ihn mit wohlriechenden Düften, breitete einen Thronsitz inmitten einer prachtvoll geschmückten Halle aus und bot ihn ihm an. Bodhisatto āsane nisīditvā yakkhaṃ pādamūle nisīdāpetvā ‘‘tena hi ohitasoto sakkaccaṃ devadhamme suṇāhī’’ti imaṃ gāthamāha – Nachdem der Bodhisatta auf dem Sitz Platz genommen und den Yakkha zu seinen Füßen hatte niedersitzen lassen, sprach er diese Strophe: „Wohlan, neige dein Ohr und lausche ehrfürchtig den göttlichen Lehren!“ 6. 6. ‘‘Hiriottappasampannā, sukkadhammasamāhitā; Santo sappurisā loke, devadhammāti vuccare’’ti. „Die mit Gewissensscheu und Schamgefühl Ausgestatteten, in heilsamen Dingen Festgegründeten, die friedvollen, edlen Menschen in der Welt werden jene genannt, die göttliche Lehre besitzen.“ Tattha hiriottappasampannāti hiriyā ca ottappena ca samannāgatā. Tesu kāyaduccaritādīhi hiriyatīti hirī, lajjāyetaṃ adhivacanaṃ. Tehiyeva ottappatīti ottappaṃ, pāpato ubbegassetaṃ adhivacanaṃ. Tattha ajjhattasamuṭṭhānā hirī, bahiddhāsamuṭṭhānaṃ ottappaṃ. Attādhipateyyā hirī, lokādhipateyyaṃ ottappaṃ. Lajjāsabhāvasaṇṭhitā hirī, bhayasabhāvasaṇṭhitaṃ ottappaṃ. Sappatissavalakkhaṇā hirī, vajjabhīrukabhayadassāvilakkhaṇaṃ ottappaṃ. Darunter bedeutet „mit Gewissensscheu und Schamgefühl ausgestattet“: versehen mit Gewissensscheu (Hiri) und Schamgefühl (Ottappa). Unter diesen beiden ist das, was sich vor körperlichem Fehlverhalten und Ähnlichem scheut, die Gewissensscheu (Hiri); dies ist eine andere Bezeichnung für Schamhaftigkeit. Dass man eben vor diesen Dingen erschrickt, ist das Schamgefühl (Ottappa); dies ist eine andere Bezeichnung für die Furcht vor dem Bösen. Dabei entspringt die Gewissensscheu aus dem Inneren, während das Schamgefühl von außen angeregt wird. Die Gewissensscheu nimmt das eigene Selbst als oberste Instanz, während das Schamgefühl die Welt als oberste Instanz nimmt. Die Gewissensscheu ist in der Natur der Schamhaftigkeit begründet, während das Schamgefühl in der Natur der Furcht begründet ist. Die Gewissensscheu hat Respekt als Merkmal, während das Schamgefühl das Fürchten von Verfehlungen und das Sehen von Gefahr in ihnen als Merkmal hat. Tattha ajjhattasamuṭṭhānaṃ hiriṃ catūhi kāraṇehi samuṭṭhāpeti – jātiṃ paccavekkhitvā vayaṃ paccavekkhitvā sūrabhāvaṃ paccavekkhitvā bāhusaccaṃ paccavekkhitvā[Pg.146]. Kathaṃ? ‘‘Pāpakaraṇaṃ nāmetaṃ na jātisampannānaṃ kammaṃ, hīnajaccānaṃ kevaṭṭādīnaṃ kammaṃ, mādisassa jātisampannassa idaṃ kammaṃ kātuṃ na yutta’’nti evaṃ tāva jātiṃ paccavekkhitvā pāṇātipātādipāpaṃ akaronto hiriṃ samuṭṭhāpeti. Tathā ‘‘pāpakaraṇaṃ nāmetaṃ daharehi kattabbaṃ kammaṃ, mādisassa vaye ṭhitassa idaṃ kammaṃ kātuṃ na yutta’’nti evaṃ vayaṃ paccavekkhitvā pāṇātipātādipāpaṃ akaronto hiriṃ samuṭṭhāpeti. Tathā ‘‘pāpakammaṃ nāmetaṃ dubbalajātikānaṃ kammaṃ, mādisassa sūrabhāvasampannassa idaṃ kammaṃ kātuṃ na yutta’’nti evaṃ sūrabhāvaṃ paccavekkhitvā pāṇātipātādipāpaṃ akaronto hiriṃ samuṭṭhāpeti. Tathā ‘‘pāpakammaṃ nāmetaṃ andhabālānaṃ kammaṃ, na paṇḍitānaṃ, mādisassa paṇḍitassa bahussutassa idaṃ kammaṃ kātuṃ na yutta’’nti evaṃ bāhusaccaṃ paccavekkhitvā pāṇātipātādipāpaṃ akaronto hiriṃ samuṭṭhāpeti. Evaṃ ajjhattasamuṭṭhānaṃ hiriṃ catūhi kāraṇehi samuṭṭhāpeti. Samuṭṭhāpetvā ca pana attano citte hiriṃ pavesetvā pāpakammaṃ na karoti. Evaṃ hirī ajjhattasamuṭṭhānā nāma hoti. Dabei erzeugt man die im Inneren entspringende Gewissensscheu aus vier Gründen: indem man die eigene Herkunft bedenkt, das eigene Alter bedenkt, die eigene Willensstärke bedenkt und die eigene Gelehrsamkeit bedenkt. Wie? Indem man zunächst die Herkunft bedenkt: „Das Begehen einer Sünde ist wahrlich keine Tat für Menschen von edler Herkunft; es ist die Tat von niedrig Geborenen wie Fischern und anderen. Für einen wie mich, der von edler Herkunft ist, schickt es sich nicht, eine solche Tat zu tun.“ Indem man so keine bösen Taten wie das Töten von Lebewesen begeht, erzeugt man Gewissensscheu. Ebenso bedenkt man das Alter: „Das Begehen einer Sünde ist wahrlich eine Tat, die von Jungen getan wird. Für einen wie mich, der in fortgeschrittenem Alter steht, schickt es sich nicht, eine solche Tat zu tun.“ Indem man so keine bösen Taten wie das Töten von Lebewesen begeht, erzeugt man Gewissensscheu. Ebenso bedenkt man die Willensstärke: „Eine böse Tat ist wahrlich eine Tat von willensschwachen Menschen. Für einen wie mich, der mit Willensstärke ausgestattet ist, schickt es sich nicht, eine solche Tat zu tun.“ Indem man so keine bösen Taten wie das Töten von Lebewesen begeht, erzeugt man Gewissensscheu. Ebenso bedenkt man die Gelehrsamkeit: „Eine böse Tat ist wahrlich eine Tat von blinden Toren, nicht von Weisen. Für einen wie mich, der weise und vielseitig gelehrt ist, schickt es sich nicht, eine solche Tat zu tun.“ Indem man so keine bösen Taten wie das Töten von Lebewesen begeht, erzeugt man Gewissensscheu. Auf diese Weise erzeugt man die im Inneren entspringende Gewissensscheu aus diesen vier Gründen. Wenn man sie erzeugt hat, lässt man die Gewissensscheu in den eigenen Geist einziehen und begeht keine bösen Taten mehr. Auf diese Weise wird die Gewissensscheu als eine im Inneren entspringende bezeichnet. Kathaṃ ottappaṃ bahiddhāsamuṭṭhānaṃ nāma? ‘‘Sace tvaṃ pāpakammaṃ karissasi, catūsu parisāsu garahappatto bhavissasi. Wie wird das Schamgefühl als ein von außen angeregtes bezeichnet? „Wenn du eine böse Tat begehst, wirst du in den vier Versammlungen Tadel erfahren.“ ‘‘Garahissanti taṃ viññū, asuciṃ nāgariko yathā; Vajjito sīlavantehi, kathaṃ bhikkhu karissasī’’ti. (dha. sa. aṭṭha. 1 balarāsivaṇṇanā) – „Die Weisen werden dich tadeln, wie ein Stadtbewohner Unrat meidet. Von den Tugendhaften gemieden, wie willst du dann handeln, o Mönch?“ Evaṃ paccavekkhanto hi bahiddhāsamuṭṭhitena ottappena pāpakammaṃ na karoti. Evaṃ ottappaṃ bahiddhāsamuṭṭhānaṃ nāma hoti. Wer dies so bedenkt, begeht aufgrund des von außen angeregten Schamgefühls keine böse Tat. Auf diese Weise wird das Schamgefühl als ein von außen angeregtes bezeichnet. Kathaṃ hirī attādhipateyyā nāma? Idhekacco kulaputto attānaṃ adhipatiṃ jeṭṭhakaṃ katvā ‘‘mādisassa saddhāpabbajitassa bahussutassa dhutaṅgadharassa na yuttaṃ pāpakammaṃ kātu’’nti pāpaṃ na karoti. Evaṃ hirī attādhipateyyā nāma hoti. Tenāha bhagavā – Wie wird die Gewissensscheu als eine bezeichnet, die das eigene Selbst als oberste Instanz nimmt? Hierbei macht ein Sohn aus guter Familie das eigene Selbst zu seinem Maßstab und Führer und begeht keine Sünde, indem er denkt: „Für einen wie mich, der aus Glauben das Hausleben verlassen hat, vielseitig gelehrt ist und die asketischen Übungen praktiziert, schickt es sich nicht, eine böse Tat zu begehen.“ Auf diese Weise wird die Gewissensscheu als eine bezeichnet, die das eigene Selbst als oberste Instanz nimmt. Deswegen sprach der Erhabene: ‘‘So attānaṃyeva adhipatiṃ katvā akusalaṃ pajahati, kusalaṃ bhāveti. Sāvajjaṃ pajahati, anavajjaṃ bhāveti. Suddhamattānaṃ pariharatī’’ti (a. ni. 3.40). „Indem er eben das eigene Selbst zu seiner obersten Instanz macht, gibt er das Unheilsame auf und entfaltet das Heilsame. Er gibt das Fehlerhafte auf und entfaltet das Fehlerfreie. Er bewahrt sich selbst in Reinheit.“ Kathaṃ ottappaṃ lokādhipateyyaṃ nāma? Idhekacco kulaputto lokaṃ adhipatiṃ jeṭṭhakaṃ katvā pāpakammaṃ na karoti. Yathāha – Wie wird das Schamgefühl als ein solches bezeichnet, das die Welt als oberste Instanz nimmt? Hierbei macht ein Sohn aus guter Familie die Welt zu seinem Maßstab und Führer und begeht keine böse Tat. Wie gesagt wurde: ‘‘Mahā [Pg.147] kho panāyaṃ lokasannivāso. Mahantasmiṃ kho pana lokasannivāse santi samaṇabrāhmaṇā iddhimanto dibbacakkhukā paracittaviduno, te dūratopi passanti, āsannāpi na dissanti, cetasāpi cittaṃ jānanti, tepi maṃ evaṃ jānissanti ‘passatha bho, imaṃ kulaputtaṃ, saddhā agārasmā anagāriyaṃ pabbajito samāno vokiṇṇo viharati pāpakehi akusalehi dhammehī’ti. „Groß wahrlich ist diese Welt der Lebewesen. In dieser großen Welt der Lebewesen gibt es Asketen und Brahmanen von großer Geisteskraft, die das göttliche Auge besitzen und die Gedanken anderer lesen können. Sie sehen auch aus der Ferne, bleiben jedoch selbst in der Nähe unsichtbar, und sie erkennen den Geist mit ihrem eigenen Geist. Auch sie werden mich so erkennen: ‚Seht doch, ihr Herren, diesen Sohn aus guter Familie! Obwohl er aus Glauben vom Hausleben in die Hauslosigkeit gezogen ist, lebt er vermischt mit bösen, unheilsamen Dingen.‘ ‘‘Santi devatā iddhimantiyo dibbacakkhukā paracittaviduniyo, tā dūratopi passanti, āsannāpi na dissanti, cetasāpi cittaṃ jānanti, tāpi maṃ evaṃ jānissanti ‘passatha bho, imaṃ kulaputtaṃ, saddhā agārasmā anagāriyaṃ pabbajito samāno vokiṇṇo viharati pāpakehi akusalehi dhammehī’ti. So lokaṃyeva adhipatiṃ jeṭṭhakaṃ karitvā akusalaṃ pajahati, kusalaṃ bhāveti. Sāvajjaṃ pajahati, anavajjaṃ bhāveti. Suddhamattānaṃ pariharatī’’ti (a. ni. 3.40). „Es gibt Gottheiten von großer Macht, die das göttliche Auge besitzen und die Gedanken anderer lesen können. Sie sehen auch aus der Ferne, bleiben jedoch selbst in der Nähe unsichtbar, und sie erkennen den Geist mit ihrem eigenen Geist. Auch sie werden mich so erkennen: ‚Seht doch, ihr Herren, diesen Sohn aus guter Familie! Obwohl er aus Glauben vom Hausleben in die Hauslosigkeit gezogen ist, lebt er vermischt mit bösen, unheilsamen Dingen.‘ Indem er eben die Welt zu seiner obersten Instanz und zu seinem Führer macht, gibt er das Unheilsame auf und entfaltet das Heilsame. Er gibt das Fehlerhafte auf und entfaltet das Fehlerfreie. Er bewahrt sich selbst in Reinheit.“ Evaṃ ottappaṃ lokādhipateyyaṃ nāma hoti. Auf diese Weise wird das Schamgefühl als ein solches bezeichnet, das die Welt als oberste Instanz nimmt. ‘‘Lajjāsabhāvasaṇṭhitā hirī, bhayasabhāvasaṇṭhitaṃ ottappa’’nti ettha pana lajjāti lajjanākāro, tena sabhāvena saṇṭhitā hirī. Bhayanti apāyabhayaṃ, tena sabhāvena saṇṭhitaṃ ottappaṃ. Tadubhayampi pāpaparivajjane pākaṭaṃ hoti. Ekacco hi yathā nāmeko kulaputto uccārapassāvādīni karonto lajjitabbayuttakaṃ ekaṃ disvā lajjanākārappatto bhaveyya hīḷito, evamevaṃ ajjhattaṃ lajjidhammaṃ okkamitvā pāpakammaṃ na karoti. Ekacco apāyabhayabhīto hutvā pāpakammaṃ na karoti. Tatridaṃ opammaṃ – yathā hi dvīsu ayoguḷesu eko sītalo bhaveyya gūthamakkhito, eko uṇho āditto. Tattha paṇḍito sītalaṃ gūthamakkhitattā jigucchanto na gaṇhāti, itaraṃ ḍāhabhayena. Tattha sītalassa gūthamakkhitassa jigucchāya agaṇhanaṃ viya ajjhattaṃ lajjidhammaṃ okkamitvā pāpassa akaraṇaṃ, uṇhassa ḍāhabhayena agaṇhanaṃ viya apāyabhayena pāpassa akaraṇaṃ veditabbaṃ. Bei den Aussagen: „Die Gewissensscheu ist in der Natur der Schamhaftigkeit begründet, das Schamgefühl in der Natur der Furcht“ bedeutet Schamhaftigkeit (Lajjā) die Art und Weise des Sich-Schämens; in diesem Zustand gegründet ist die Gewissensscheu (Hiri). Furcht (Bhaya) bedeutet die Furcht vor den niederen Welten; in diesem Zustand gegründet ist das Schamgefühl (Ottappa). Beide zeigen sich deutlich beim Vermeiden von Sünden. Wie nämlich ein Sohn aus guter Familie, der seine Notdurft verrichtet, beim Anblick einer Person, vor der man sich schämen müsste, in Verlegenheit gerät und beschämt ist, genau so begeht er, indem er das innere Schamgefühl walten lässt, keine böse Tat. Ein anderer wiederum begeht aus Furcht vor den niederen Welten keine böse Tat. Hierzu dient folgendes Gleichnis: Es ist so, wie wenn von zwei Eisenkugeln die eine kalt, aber mit Kot beschmiert wäre, die andere jedoch glühend heiß und lodernd. Ein Weiser würde die kalte Kugel aus Ekel vor dem Kotbeschmiertsein nicht anfassen, die andere aus Angst vor Verbrennung nicht. Hierbei ist das Nicht-Begehen einer bösen Tat durch das Waltenlassen des inneren Schamgefühls wie das Nicht-Anfassen der kalten, kotbeschmierten Kugel aus Ekel zu verstehen; und das Nicht-Begehen einer bösen Tat aus Furcht vor den niederen Welten ist wie das Nicht-Anfassen der heißen Kugel aus Angst vor Verbrennung zu verstehen. ‘‘Sappatissavalakkhaṇā [Pg.148] hirī, vajjabhīrukabhayadassāvilakkhaṇaṃ ottappa’’nti idampi dvayaṃ pāpaparivajjaneyeva pākaṭaṃ hoti. Ekacco hi jātimahattapaccavekkhaṇā, satthumahattapaccavekkhaṇā, dāyajjamahattapaccavekkhaṇā, sabrahmacārimahattapaccavekkhaṇāti catūhi kāraṇehi sappatissavalakkhaṇaṃ hiriṃ samuṭṭhāpetvā pāpaṃ na karoti. Ekacco attānuvādabhayaṃ, parānuvādabhayaṃ, daṇḍabhayaṃ, duggatibhayanti catūhi kāraṇehi vajjabhīrukabhayadassāvilakkhaṇaṃ ottappaṃ samuṭṭhāpetvā pāpaṃ na karoti. Tattha jātimahattapaccavekkhaṇādīni ceva attānuvādabhayādīni ca vitthāretvā kathetabbāni. Tesaṃ vitthāro aṅguttaranikāyaṭṭhakathāyaṃ vutto. „Hiri (Gewissensscham) hat das Merkmal der Achtung, und Ottappa (Gewissensscheu) hat das Merkmal der Furcht vor moralischen Verfehlungen und des Erkennens von Gefahr.“ Auch dieses Paar wird gerade bei der Vermeidung des Bösen offenbar. Denn manch einer bringt Hiri, das das Merkmal der Achtung besitzt, aus vier Gründen hervor, nämlich durch die Betrachtung der Erhabenheit der eigenen Geburt, der Erhabenheit des Lehrers, der Erhabenheit des Erbes sowie der Erhabenheit der Gefährten im heiligen Leben, und tut kein Böses. Ein anderer bringt Ottappa, das das Merkmal der Furcht vor moralischen Verfehlungen und des Erkennens von Gefahr besitzt, aus vier Gründen hervor, nämlich aus Furcht vor Selbsttadel, Furcht vor dem Tadel anderer, Furcht vor Bestrafung und Furcht vor einer unglücklichen Wiedergeburt, und tut kein Böses. Dabei sollten die Betrachtung der Erhabenheit der Geburt usw. sowie die Furcht vor Selbsttadel usw. im Detail dargelegt werden. Deren ausführliche Erklärung wurde im Kommentar zum Aṅguttara-Nikāya dargelegt. Sukkadhammasamāhitāti idameva hirottappaṃ ādiṃ katvā kattabbā kusalā dhammā sukkadhammā nāma, te sabbasaṅgāhakanayena catubhūmakalokiyalokuttaradhammā. Tehi samāhitā samannāgatāti attho. Santo sappurisā loketi kāyakammādīnaṃ santatāya santo, kataññukataveditāya sobhanā purisāti sappurisā. Loko pana saṅkhāraloko, sattaloko, okāsaloko, khandhaloko, āyatanaloko, dhātulokoti anekavidho. Tattha ‘‘eko loko sabbe sattā āhāraṭṭhitikā…pe… aṭṭhārasa lokā aṭṭhārasa dhātuyo’’ti (paṭi. ma. 1.112) ettha saṅkhāraloko vutto. Khandhalokādayo tadantogadhāyeva. ‘‘Ayaṃ loko paraloko, devaloko manussaloko’’tiādīsu (mahāni. 3; cūḷani. ajitamāṇavapucchāniddesa 2) pana sattaloko vutto. „Mit hellen Eigenschaften ausgestattet“ (sukkadhammasamāhitā): Ausgehend von ebendieser Gewissensscham und Gewissensscheu werden die auszuführenden heilsamen Geisteszustände als „helle Eigenschaften“ (sukkadhamma) bezeichnet; diese sind nach der allumfassenden Methode die weltlichen und überweltlichen heilsamen Zustände der vier Ebenen. „Damit ausgestattet zu sein“ bedeutet, mit diesen versehen zu sein. „Die friedvollen, guten Menschen in der Welt“ (santo sappurisā loke): „Friedvoll“ (santo) sind sie wegen der Beruhigung von körperlichen Handlungen usw.; „gute Menschen“ (sappurisā) sind edle Menschen, die durch ihre Dankbarkeit und Dankbarkeitsbezeigung glänzen. „Welt“ (loko) wiederum ist vielfältig: die Welt der Gestaltungen (saṅkhāraloka), die Welt der Wesen (sattaloka), die Welt des Raumes (okāsaloka), die Welt der Daseinsgruppen (khandhaloka), die Welt der Sinnesgrundlagen (āyatanaloka) und die Welt der Elemente (dhātuloka). Darunter ist in der Passage: „Eine Welt: alle Wesen bestehen durch Nahrung ... achtzehn Welten: die achtzehn Elemente“ die Welt der Gestaltungen gemeint. Die Welt der Daseinsgruppen usw. sind genau darin enthalten. In Passagen wie „Diese Welt, die jenseitige Welt, die Götterwelt, die Menschenwelt“ ist hingegen die Welt der Wesen gemeint. ‘‘Yāvatā candimasūriyā, pariharanti disā bhanti virocamānā; Tāva sahassadhā loko, ettha te vattate vaso’’ti. (ma. ni. 1.503) – „Soweit Mond und Sonne kreisen und die Himmelsrichtungen erleuchtend erstrahlen, so weit erstreckt sich die Welt tausendfach; darin herrscht deine Macht.“ Ettha okāsaloko vutto. Tesu idha sattaloko adhippeto. Sattalokasmiñhi ye evarūpā sappurisā, te devadhammāti vuccanti. In dieser Passage ist die Welt des Raumes gemeint. Unter diesen verschiedenen Welten ist hier jedoch die Welt der Wesen beabsichtigt. Denn jene guten Menschen in der Welt der Wesen, die eine solche Natur besitzen, werden als jene bezeichnet, die das Göttergesetz (devadhamma) verkörpern. Tattha [Pg.149] devāti sammutidevā, upapattidevā, visuddhidevāti tividhā. Tesu mahāsammatakālato paṭṭhāya lokena ‘‘devā’’ti sammatattā rājarājakumārādayo sammutidevā nāma. Devaloke uppannā upapattidevā nāma. Khīṇāsavā pana visuddhidevā nāma. Vuttampi cetaṃ – Unter dem Begriff „Götter“ (devā) versteht man drei Arten: Götter durch Übereinkunft (sammutideva), Götter durch Wiedergeburt (upapattideva) und Götter durch Reinheit (visuddhideva). Unter diesen werden Könige, Prinzen usw. als „Götter durch Übereinkunft“ bezeichnet, da sie seit der Zeit des Königs Mahāsammata von den Menschen als „Götter“ anerkannt wurden. Die in der Götterwelt Geborenen werden „Götter durch Wiedergeburt“ genannt. Die Triebversiegten (Arahants) wiederum werden „Götter durch Reinheit“ genannt. Dies wurde auch wie folgt gesagt: ‘‘Sammutidevā nāma rājāno deviyo rājakumārā. Upapattidevā nāma bhummadeve upādāya taduttaridevā. Visuddhidevā nāma buddhā paccekabuddhā khīṇāsavā’’ti (cūḷani. dhotakamāṇavapucchāniddesa 32; pārāyanānugītigāthāniddesa 119). „Götter durch Übereinkunft sind Könige, Königinnen und Prinzen. Götter durch Wiedergeburt sind jene, angefangen bei den Erdgöttern bis hin zu den darüber liegenden Göttern. Götter durch Reinheit sind die Buddhas, Paccekabuddhas und Triebversiegten.“ Imesaṃ devānaṃ dhammāti devadhammā. Vuccareti vuccanti. Hirottappamūlakā hi kusalā dhammā kulasampadāya ceva devaloke nibbattiyā ca visuddhibhāvassa ca kāraṇattā kāraṇaṭṭhena tividhānampi tesaṃ devānaṃ dhammāti devadhammā, tehi devadhammehi samannāgatā puggalāpi devadhammā. Tasmā puggalādhiṭṭhānadesanāya te dhamme dassento ‘‘santo sappurisā loke, devadhammāti vuccare’’ti āha. „Die Gesetze dieser Götter“ sind das Göttergesetz (devadhammā). „Vuccare“ bedeutet „sie werden genannt“. Denn die heilsamen Geisteszustände, die in Gewissensscham und Gewissensscheu wurzeln, sind das Göttergesetz, weil sie die Ursache sowohl für eine edle Abstammung als auch für die Wiedergeburt in einer Götterwelt und für den Zustand der Reinheit sind, und somit im Sinne von Ursachen die Eigenschaften jener drei Arten von Göttern darstellen. Auch Personen, die mit diesem Göttergesetz ausgestattet sind, werden als „Göttergesetz“ bezeichnet. Deshalb sprach der Erhabene, um diese Eigenschaften in einer auf Personen bezogenen Lehrverkündigung aufzuzeigen: „Die friedvollen, guten Menschen in der Welt werden als jene bezeichnet, die das Göttergesetz verkörpern.“ Yakkho imaṃ dhammadesanaṃ sutvā pasannacitto bodhisattaṃ āha – ‘‘paṇḍita, ahaṃ tumhākaṃ pasanno, ekaṃ bhātaraṃ demi, kataraṃ ānemī’’ti? ‘‘Kaniṭṭhaṃ ānehī’’ti. ‘‘Paṇḍita, tvaṃ kevalaṃ devadhamme jānāsiyeva, na pana tesu vattasī’’ti. ‘‘Kiṃ kāraṇā’’ti? ‘‘Yaṃkāraṇā jeṭṭhakaṃ ṭhapetvā kaniṭṭhaṃ āṇāpento jeṭṭhāpacāyikakammaṃ na karosī’’ti. Devadhamme cāhaṃ, yakkha, jānāmi, tesu ca vattāmi. Mayañhi imaṃ araññaṃ etaṃ nissāya paviṭṭhā. Etassa hi atthāya amhākaṃ pitaraṃ etassa mātā rajjaṃ yāci, amhākaṃ pana pitā taṃ varaṃ adatvā amhākaṃ anurakkhaṇatthāya araññavāsaṃ anujāni. So kumāro anuvattitvā amhehi saddhiṃ āgato. ‘‘Taṃ araññe eko yakkho khādī’’ti vuttepi na koci saddahissati, tenāhaṃ garahabhayabhīto tameva āṇāpemīti. ‘‘Sādhu sādhu paṇḍita, tvaṃ devadhamme ca jānāsi, tesu ca vattasī’’ti pasanno yakkho bodhisattassa sādhukāraṃ datvā dvepi bhātaro ānetvā adāsi. Als der Yakkha diese Lehrverkündigung gehört hatte, sprach er mit gläubigem Herzen zum Bodhisatta: „Weiser, ich bin dir zugetan. Ich gebe dir einen deiner Brüder zurück. Welchen soll ich herbringen?“ „Bring den jüngsten Bruder!“, sagte der Bodhisatta. „Weiser, du kennst das Göttergesetz wohl nur theoretisch, lebst aber nicht danach“, entgegnete der Yakkha. „Aus welchem Grund sagst du das?“ „Weil du den ältesten Bruder zurücklässt und den jüngsten holen lässt, erweist du dem Älteren nicht die gebührende Achtung.“ „Yakkha, ich kenne das Göttergesetz und lebe auch danach. Denn wir haben diesen Wald eben wegen dieses jüngsten Bruders betreten. Um seinetwillen bat seine Mutter unseren Vater um das Königreich. Unser Vater gewährte diese Bitte jedoch nicht, sondern gestattete uns zum Schutz das Leben im Wald. Dieser Prinz folgte uns und kam mit uns zusammen hierher. Wenn wir nun sagen würden: ‚Ein Yakkha hat ihn im Wald gefressen‘, würde das niemand glauben. Aus Angst vor Tadel verlange ich daher, dass gerade er geholt wird.“ „Gut, gut, Weiser! Du kennst das Göttergesetz wahrlich und lebst auch danach!“, sprach der erfreute Yakkha. Er spendete dem Bodhisatta Beifall, holte beide Brüder herbei und gab sie ihm zurück. Atha naṃ bodhisatto āha – ‘‘samma, tvaṃ pubbe attanā katena pāpakammena paresaṃ maṃsalohitakhādako yakkho hutvā nibbatto, idānipi pāpameva karosi, idaṃ te pāpakammaṃ nirayādīhi muccituṃ okāsaṃ na dassati[Pg.150], tasmā ito paṭṭhāya pāpaṃ pahāya kusalaṃ karohī’’ti. Asakkhi ca pana taṃ dametuṃ. So taṃ yakkhaṃ dametvā tena saṃvihitārakkho tattheva vasanto ekadivasaṃ nakkhattaṃ oloketvā pitu kālakatabhāvaṃ ñatvā yakkhaṃ ādāya bārāṇasiṃ gantvā rajjaṃ gahetvā candakumārassa oparajjaṃ, sūriyakumārassa senāpatiṭṭhānaṃ, datvā yakkhassa ramaṇīye ṭhāne āyatanaṃ kāretvā, yathā so aggamālaṃ aggapupphaṃ aggabhattañca labhati, tathā akāsi. So dhammena rajjaṃ kāretvā yathākammaṃ gato. Daraufhin sprach der Bodhisatta zu ihm: „Freund, du bist in der Vergangenheit aufgrund einer von dir selbst begangenen schlechten Tat als ein Yakkha wiedergeboren worden, der das Fleisch und Blut anderer frisst. Auch jetzt tust du nur Böses. Diese deine schlechte Tat wird dir keine Gelegenheit geben, der Hölle und den anderen Leidensbereichen zu entkommen. Deshalb lasse von heute an das Böse und tue das Gute!“ Und es gelang ihm, ihn zu zähmen. Nachdem er den Yakkha gezähmt hatte und von diesem beschützt wurde, verweilte er ebendort. Eines Tages blickte er zu den Sternen empor und erkannte, dass sein Vater gestorben war. Er nahm den Yakkha mit sich, ging nach Bārāṇasī und übernahm die Königsherrschaft. Dem Prinzen Canda verlieh er das Amt des Vizekönigs und dem Prinzen Suriya den Posten des Generals. Für den Yakkha ließ er an einem lieblichen Ort eine Wohnstätte errichten und sorgte dafür, dass dieser stets die vorzüglichsten Blumengirlanden, die feinsten Blüten und die besten Speisen erhielt. Nachdem er das Reich in Gerechtigkeit regiert hatte, schied er gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dassetvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so bhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. Sammāsambuddhopi dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā dakarakkhaso bahubhaṇḍikabhikkhu ahosi, sūriyakumāro ānando, candakumāro sāriputto, jeṭṭhakabhātā mahisāsakumāro pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor, legte die Wahrheiten dar und verkündete sie. Am Ende der Verkündigung der Wahrheiten festigte sich jener Mönch mit den vielen Besitztümern in der Frucht des Stromeintritts. Auch der Vollkommen Erleuchtete erzählte diese beiden Geschichten, knüpfte die Verbindung und fasste das Jātaka so zusammen: „Damals war der Wasserdämon der Mönch mit den vielen Besitztümern, Prinz Suriya war Ānanda, Prinz Canda war Sāriputta, der älteste Bruder jedoch, Prinz Mahisāsa, war ich selbst.“ Devadhammajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Devadhamma-Jātaka ist die sechste.
7. Kaṭṭhahārijātakavaṇṇanā 7. Die Erklärung des Kaṭṭhahāri-Jātaka Putto tyāhaṃ mahārājāti idaṃ satthā jetavane viharanto vāsabhakhattiyaṃ ārabbha kathesi. Vāsabhakhattiyāya vatthu dvādasakanipāte bhaddasālajātake āvibhavissati. Sā kira mahānāmassa sakkassa dhītā nāgamuṇḍāya nāma dāsiyā kucchismiṃ jātā kosalarājassa aggamahesī ahosi. Sā rañño puttaṃ vijāyi. Rājā panassā pacchā dāsibhāvaṃ ñatvā ṭhānaṃ parihāpesi, puttassa viṭaṭūbhassāpi ṭhānaṃ parihāpesiyeva. Te ubhopi antonivesaneyeva vasanti. Satthā taṃ kāraṇaṃ ñatvā pubbaṇhasamaye pañcasatabhikkhuparivuto rañño nivesanaṃ gantvā paññattāsane nisīditvā ‘‘mahārāja, kahaṃ vāsabhakhattiyā’’ti āha. ‘‘Rājā taṃ kāraṇaṃ ārocesi. Mahārāja vāsabhakhattiyā kassa dhītā’’ti? ‘‘Mahānāmassa bhante’’ti. ‘‘Āgacchamānā kassa āgatā’’ti? ‘‘Mayhaṃ bhante’’ti. Mahārāja sā rañño dhītā, raññova āgatā, rājānaṃyeva paṭicca puttaṃ [Pg.151] labhi, so putto kiṃkāraṇā pitu santakassa rajjassa sāmiko na hoti, pubbe rājāno muhuttikāya kaṭṭhahārikāya kucchismimpi puttaṃ labhitvā puttassa rajjaṃ adaṃsūti. Rājā tassatthassāvibhāvatthāya bhagavantaṃ yāci, bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. „Ich bin dein Sohn, o Großkönig“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf Vāsabhakhattiyā. Die Geschichte der Vāsabhakhattiyā wird im Bhaddasāla-Jātaka im Zwölfer-Buch (Dvādasakanipāta) dargelegt werden. Sie war, wie man sagt, die Tochter des Sakyers Mahānāma, geboren im Schoße einer Sklavin namens Nāgamuṇḍā, und wurde die Hauptgemahlin des Königs von Kosala. Sie gebar dem König einen Sohn. Als der König jedoch später erfuhr, dass sie eine Sklavin war, entzog er ihr ihre Stellung, und auch dem Sohn, Viṭaṭūbha, entzog er seine Stellung ebenfalls. Beide lebten fortan nur noch im inneren Palastbereich. Als der Meister diesen Umstand erfuhr, begab er sich am Vormittag, von fünfhundert Mönchen begleitet, zum Palast des Königs, setzte sich auf den hergerichteten Sitz und fragte: „O Großkönig, wo ist Vāsabhakhattiyā?“ Der König berichtete ihm die Angelegenheit. „O Großkönig, wessen Tochter ist Vāsabhakhattiyā?“ – „Des Mahānāma, o Herr.“ – „Als sie kam, für wen kam sie?“ – „Für mich, o Herr.“ – „O Großkönig, sie ist die Tochter eines Königs, sie kam zu einem König, und in Abhängigkeit von einem König empfing sie einen Sohn. Warum sollte dieser Sohn nicht der Herrscher über das Reich sein, das seinem Vater gehört? In alten Zeiten gaben Könige sogar dem Sohn, den sie im Schoß einer Holzsammlerin empfingen, mit der sie nur für einen kurzen Augenblick zusammen waren, die Königsherrschaft.“ Der König bat den Erhabenen, diese Geschichte zu offenbaren, und der Erhabene enthüllte den durch eine andere Existenz verborgenen Sachverhalt. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatto rājā mahantena yasena uyyānaṃ gantvā tattha pupphaphalalobhena vicaranto uyyānavanasaṇḍe gāyitvā dārūni uddharamānaṃ ekaṃ itthiṃ disvā paṭibaddhacitto saṃvāsaṃ kappesi. Taṅkhaṇaññeva bodhisatto tassā kucchiyaṃ paṭisandhiṃ gaṇhi, tāvadeva tassā vajirapūritā viya garukā kucchi ahosi. Sā gabbhassa patiṭṭhitabhāvaṃ ñatvā ‘‘gabbho me, deva, patiṭṭhito’’ti āha. Rājā aṅgulimuddikaṃ datvā ‘‘sace dhītā hoti, imaṃ vissajjetvā poseyyāsi, sace putto hoti, aṅgulimuddikāya saddhiṃ mama santikaṃ āneyyāsī’’ti vatvā pakkāmi. Einst, als in Bārāṇasī der König Brahmadatta regierte, begab sich dieser mit großem Gefolge in den königlichen Garten. Als er dort, angezogen von Blüten und Früchten, umherstreifte, erblickte er im Dickicht des Gartens eine Frau, die sang und Holz sammelte. Von Verlangen nach ihr erfüllt, vollzog er den Beischlaf mit ihr. In eben diesem Augenblick nahm der Bodhisatta in ihrem Schoß die Wiederverkörperung an, und sogleich fühlte sich ihr Schoß so schwer an, als sei er mit einem Vajra gefüllt. Als sie bemerkte, dass die Empfängnis stattgefunden hatte, sagte sie: „O Herr, eine Empfängnis hat in mir stattgefunden.“ Der König gab ihr einen Siegelring und sagte: „Wenn es ein Mädchen wird, verkaufe diesen Ring und ziehe es auf. Wenn es aber ein Junge wird, bringe ihn zusammen mit dem Siegelring zu mir.“ Nach diesen Worten ging er fort. Sāpi paripakkagabbhā bodhisattaṃ vijāyi. Tassa ādhāvitvā paridhāvitvā vicaraṇakāle kīḷāmaṇḍale kīḷantassa evaṃ vattāro honti ‘‘nippitikenamhā pahaṭā’’ti. Taṃ sutvā bodhisatto mātu santikaṃ gantvā ‘‘amma, ko mayhaṃ pitā’’ti pucchi. ‘‘Tāta, tvaṃ bārāṇasirañño putto’’ti. ‘‘Amma, atthi pana koci sakkhī’’ti? Tāta rājā imaṃ muddikaṃ datvā ‘‘sace dhītā hoti, imaṃ vissajjetvā poseyyāsi, sace putto hoti, imāya aṅgulimuddikāya saddhiṃ āneyyāsī’’ti vatvā gatoti. ‘‘Amma, evaṃ sante kasmā maṃ pitu santikaṃ na nesī’’ti. Sā puttassa ajjhāsayaṃ ñatvā rājadvāraṃ gantvā rañño ārocāpesi. Raññā ca pakkosāpitā pavisitvā rājānaṃ vanditvā ‘‘ayaṃ te, deva, putto’’ti āha. Rājā jānantopi parisamajjhe lajjāya ‘‘na mayhaṃ putto’’ti āha. ‘‘Ayaṃ te, deva, muddikā, imaṃ sañjānāsī’’ti. ‘‘Ayampi mayhaṃ muddikā na hotī’’ti. ‘‘Deva, idāni ṭhapetvā saccakiriyaṃ añño mama sakkhi natthi, sacāyaṃ dārako tumhe paṭicca jāto, ākāse tiṭṭhatu, no ce, bhūmiyaṃ patitvā maratū’’ti bodhisattassa pāde gahetvā ākāse khipi. Bodhisatto ākāse pallaṅkamābhujitvā nisinno madhurassarena pitu dhammaṃ kathento imaṃ gāthamāha – Als ihre Schwangerschaft ausgetragen war, gebar sie den Bodhisatta. Als er heranwuchs und imstande war, hin- und herzulaufen, spielten andere Kinder mit ihm auf dem Spielplatz, und es gab solche, die sagten: „Wir wurden von einem Vaterlosen geschlagen!“ Als der Bodhisatta dies hörte, ging er zu seiner Mutter und fragte: „Mutter, wer ist mein Vater?“ – „Mein Sohn, du bist der Sohn des Königs von Bārāṇasī.“ – „Mutter, gibt es dafür irgendeinen Beweis?“ – „Mein Sohn, der König gab mir diesen Ring und sagte: ‚Wenn es ein Mädchen wird, verkaufe diesen Ring und ziehe es auf. Wenn es aber ein Junge wird, bringe ihn zusammen mit diesem Siegelring zu mir.‘ Nachdem er dies gesagt hatte, ging er fort.“ – „Mutter, wenn das so ist, warum bringst du mich dann nicht zu meinem Vater?“ Sie erkannte die Absicht ihres Sohnes, ging zum Palasttor und ließ dem König Nachricht überbringen. Vom König herbeigerufen, trat sie ein, verneigte sich vor ihm und sagte: „O Herr, dies ist dein Sohn.“ Obwohl der König es wusste, sagte er aus Scham inmitten der Versammlung: „Er ist nicht mein Sohn.“ – „O Herr, dies ist dein Siegelring. Erkennst du ihn wieder?“ – „Auch dieser Ring ist nicht der meine“, leugnete er. „O Herr, abgesehen von einem Wahrheitsakt (Saccakiriya) habe ich nun keinen anderen Zeugen. Wenn dieses Kind in Abhängigkeit von dir gezeugt wurde, möge es in der Luft schweben! Wenn nicht, möge es auf die Erde stürzen und sterben!“ Mit diesen Worten ergriff sie den Bodhisatta an den Füßen und warf ihn in die Luft. Der Bodhisatta saß mit gekreuzten Beinen in der Luft und verkündete seinem Vater mit lieblicher Stimme die Lehre, indem er diese Strophe sprach: 7. 7. ‘‘Putto [Pg.152] tyāhaṃ mahārāja, tvaṃ maṃ posa janādhipa; Aññepi devo poseti, kiñca devo sakaṃ paja’’nti. „Ich bin dein Sohn, o Großkönig! Ernähre mich, o Herrscher der Menschen! Der König ernährt auch andere; warum ernährt der König nicht sein eigenes Kind?“ Tattha putto tyāhanti putto te ahaṃ. Putto ca nāmesa atrajo, khettajo, antevāsiko, dinnakoti catubbidho. Tattha attānaṃ paṭicca jāto atrajo nāma. Sayanapiṭṭhe pallaṅke uretievamādīsu nibbatto khettajo nāma. Santike sippuggaṇhanako antevāsiko nāma. Posāvanatthāya dinno dinnako nāma. Idha pana atrajaṃ sandhāya ‘‘putto’’ti vuttaṃ. Catūhi saṅgahavatthūhi janaṃ rañjetīti rājā, mahanto rājā mahārājā. Tamālapanto āha ‘‘mahārājā’’ti. Tvaṃ maṃ posa janādhipāti janādhipa mahājanajeṭṭhaka tvaṃ maṃ posa bharassu vaḍḍhehi. Aññepi devo posetīti aññepi hatthibandhādayo manusse, hatthiassādayo tiracchānagate ca bahujane devo poseti. Kiñca devo sakaṃ pajanti ettha pana kiñcāti garahatthe ca anuggahaṇatthe ca nipāto. ‘‘Sakaṃ pajaṃ attano puttaṃ maṃ devo na posetī’’ti vadanto garahati nāma, ‘‘aññe bahujane posetī’’ti vadanto anuggaṇhati nāma. Iti bodhisatto garahantopi anuggaṇhantopi ‘‘kiñca devo sakaṃ paja’’nti āha. Darin bedeutet „putto tyāhaṃ“: „Ich bin dein Sohn“ (putto te ahaṃ). Ein Sohn ist nämlich von viererlei Art: der leibliche Sohn (atraja), der auf dem Ehebett geborene Sohn (khettaja), der Schüler-Sohn (antevāsika) und der Adoptivsohn (dinnaka). Darunter ist derjenige, der in Abhängigkeit von einem selbst gezeugt wurde, ein leiblicher Sohn (atraja) genannt. Wer auf dem Bett, dem Thronsessel, im Schoß und an ähnlichen Orten geboren wurde, wird „khettaja“ genannt. Wer in der Gegenwart eines Meisters eine Kunst erlernt, wird Schüler-Sohn (antevāsika) genannt. Wer zur Aufzucht übergeben wurde, wird Adoptivsohn (dinnaka) genannt. Hier jedoch ist im Bezug auf den leiblichen Sohn (atraja) von „Sohn“ (putto) die Rede. Wer die Menschen durch die vier Grundlagen des Zusammenhalts (saṅgahavatthu) erfreut, ist ein König (rājā); ein großer König ist ein Großkönig (mahārājā). Ihn anredend, sagte er: „O Großkönig“. „Tvaṃ maṃ posa janādhipa“ bedeutet: O Herrscher der Menschen, Oberhaupt der großen Volksmenge, ernähre mich, erhalte mich und ziehe mich auf. „Aññepi devo poseti“ bedeutet: Auch andere Menschen, wie Elefantenführer und dergleichen, sowie Tiere wie Elefanten, Pferde usw., ja, eine große Menge von Lebewesen ernährt Seine Majestät. Bezüglich „kiñca devo sakaṃ pajaṃ“ ist das Wort „kiñca“ eine Partikel, die sowohl im Sinne des Tadelns als auch der Unterstützung verwendet wird. Indem er sagt: „Seine Majestät ernährt nicht das eigene Kind, mich, seinen eigenen Sohn“, tadelt er ihn gleichsam. Indem er sagt: „Er ernährt viele andere“, unterstützt bzw. lobt er ihn gleichsam. So sprach der Bodhisatta, sowohl tadelnd als auch unterstützend: „Warum ernährt der König nicht sein eigenes Kind?“ Rājā bodhisattassa ākāse nisīditvā evaṃ dhammaṃ desentassa sutvā ‘‘ehi, tātā’’ti hatthaṃ pasāresi, ‘‘ahameva posessāmi, ahameva posessāmī’’ti hatthasahassaṃ pasāriyittha. Bodhisatto aññassa hatthe anotaritvā raññova hatthe otaritvā aṅke nisīdi. Rājā tassa oparajjaṃ datvā mātaraṃ aggamahesiṃ akāsi. So pitu accayena kaṭṭhavāhanarājā nāma hutvā dhammena rajjaṃ kāretvā yathākammaṃ gato. Als der König den in der Luft sitzenden Bodhisatta so die Lehre verkünden hörte, streckte er die Hände aus und rief: „Komm, mein Sohn!“ Und unter den Rufen „Ich selbst werde ihn aufziehen! Ich selbst werde ihn aufziehen!“ wurden tausend Hände ausgestreckt. Der Bodhisatta stieg jedoch nicht in die Hände eines anderen herab, sondern stieg nur auf die Hände des Königs herab und setzte sich auf seinen Schoß. Der König ernannte ihn zum Vizekönig und erhob seine Mutter zur Hauptgemahlin. Nach dem Ableben seines Vaters wurde er unter dem Namen König Kaṭṭhavāhana Herrscher, regierte das Reich in Gerechtigkeit und ging schließlich gemäß seinem Kamma ein. Satthā kosalarañño imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dve vatthūni dassetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mātā mahāmāyā ahosi, pitā suddhodanamahārājā, kaṭṭhavāhanarājā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede für den König von Kosala vorgetragen, die beiden Geschichten dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war die Mutter Mahāmāyā, der Vater war der Großkönig Suddhodana, und der König Kaṭṭhavāhana aber war ich selbst.“ Kaṭṭhahārijātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Kaṭṭhahāri-Jātaka, die siebte.
8. Gāmaṇijātakavaṇṇanā 8. Die Erklärung des Gāmaṇi-Jātaka Api [Pg.153] ataramānānanti idaṃ satthā jetavane viharanto ossaṭṭhavīriyaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Imasmiṃ pana jātake paccuppannavatthu ca atītavatthu ca ekādasakanipāte saṃvarajātake āvibhavissati. Vatthu hi tasmiñca imasmiñca ekasadisameva, gāthā pana nānā. Gāmaṇikumāro bodhisattassa ovāde ṭhatvā bhātikasatassa kaniṭṭhopi hutvā bhātikasataparivārito setacchattassaheṭṭhā varapallaṅke nisinno attano yasasampattiṃ oloketvā ‘‘ayaṃ mayhaṃ yasasampatti amhākaṃ ācariyassa santakā’’ti tuṭṭho imaṃ udānaṃ udānesi – Diese Lehrrede, beginnend mit „Selbst für jene, die sich nicht beeilen“, sprach der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines Mönchs, der seine Tatkraft aufgegeben hatte. In diesem Jātaka jedoch werden sowohl die gegenwärtige als auch die vergangene Geschichte im Saṃvara-Jātaka des Elfer-Buchs (Ekādasakanipāta) deutlich werden. Denn die Geschichte ist in jenem und in diesem Jātaka völlig gleich, nur die Strophen sind verschieden. Der Prinz Gāmaṇi hielt sich an den Rat des Bodhisatta und wurde, obwohl er der jüngste von hundert Brüdern war, von seinen hundert Brüdern umgeben. Unter dem weißen Schirm auf einem edlen Thron sitzend, blickte er auf seine eigene Herrlichkeit und dachte voller Freude: „Diese meine Herrlichkeit verdanke ich unserem Lehrer.“ Daraufhin stieß er diesen feierlichen Ausspruch aus: 8. 8. ‘‘Api ataramānānaṃ, phalāsāva samijjhati; Vipakkabrahmacariyosmi, evaṃ jānāhi gāmaṇī’’ti. „Selbst für jene, die sich nicht beeilen, erfüllt sich die Hoffnung auf die Frucht. Ich habe die reife Frucht des heiligen Wandels erlangt; wisse dies, o Gāmaṇi!“ Tattha apīti nipātamattaṃ. Ataramānānanti paṇḍitānaṃ ovāde ṭhatvā ataritvā avegāyitvā upāyena kammaṃ karontānaṃ. Phalāsāva samijjhatīti yathāpatthike phale āsā tassa phalassa nipphattiyā samijjhatiyeva. Atha vā phalāsāti āsāphalaṃ, yathāpatthitaṃ phalaṃ samijjhatiyevāti attho. Vipakkabrahmacariyosmīti ettha cattāri saṅgahavatthūni seṭṭhacariyattā brahmacariyaṃ nāma, tañca tammūlikāya yasasampattiyā paṭiladdhattā vipakkaṃ nāma. Yo vāssa yaso nipphanno, sopi seṭṭhaṭṭhena brahmacariyaṃ nāma. Tenāha ‘‘vipakkabrahmacariyosmī’’ti. Evaṃ jānāhi gāmaṇīti katthaci gāmikapurisopi gāmajeṭṭhakopi gāmaṇī. Idha pana sabbajanajeṭṭhakaṃ attānaṃ sandhāyāha. Ambho gāmaṇi, tvaṃ etaṃ kāraṇaṃ evaṃ jānāhi, ācariyaṃ nissāya bhātikasataṃ atikkamitvā idaṃ mahārajjaṃ pattosmīti udānaṃ udānesi. Darin ist das Wort „api“ lediglich eine Partikel. „Jener, die sich nicht beeilen“ (ataramānānaṃ) bedeutet: Jener, die sich an den Rat der Weisen halten, ohne Eile und ohne Überstürzung handeln und ihre Arbeit mit den richtigen Mitteln verrichten. „Die Hoffnung auf die Frucht erfüllt sich“ (phalāsāva samijjhati) bedeutet: Bezüglich der jeweils gewünschten Frucht geht die Hoffnung auf das Zustandekommen dieser Frucht gewiss in Erfüllung. Oder aber „phalāsā“ bedeutet die ersehnte Frucht, womit gemeint ist, dass die jeweils ersehnte Frucht gewiss in Erfüllung geht. Zum Ausdruck „vipakkabrahmacariyosmī“: Hierbei werden die vier Pfeiler des sozialen Zusammenhalts (saṅgahavatthu) wegen ihrer hervorragenden Praxis als „heiliger Wandel“ (brahmacariya) bezeichnet; und da man die darauf gründende Herrlichkeit erlangt hat, wird dies als „ausgereift“ (vipakka) bezeichnet. Oder aber der Ruhm, der ihm zuteilwurde, wird wegen seiner Vortrefflichkeit als „heiliger Wandel“ bezeichnet. Darum sagte er: „Ich habe die reife Frucht des heiligen Wandels erlangt.“ Bei den Worten „wisse dies, o Gāmaṇi“ bezeichnet „Gāmaṇi“ andernorts einen einfachen Dorfbewohner oder einen Dorfvorsteher. Hier jedoch bezog er sich auf sich selbst als das Oberhaupt aller Menschen. „O Gāmaṇi, erkenne diese Tatsache auf diese Weise: Durch die Unterstützung meines Lehrers habe ich meine hundert Brüder übertroffen und dieses große Königreich erlangt“ – so stieß er diesen feierlichen Ausspruch aus. Tasmiṃ pana rajjaṃ patte sattaṭṭhadivasaccayena sabbepi bhātaro attano attano vasanaṭṭhānaṃ gatā. Gāmaṇirājā dhammena rajjaṃ kāretvā yathākammaṃ gato, bodhisattopi puññāni katvā yathākammaṃ gato. Als er nun die Königsherrschaft erlangt hatte, kehrten nach Ablauf von sieben oder acht Tagen alle Brüder an ihre jeweiligen Wohnorte zurück. König Gāmaṇi regierte das Reich mit Gerechtigkeit und ging gemäß seinem Kamma dahin. Auch der Bodhisatta vollbrachte verdienstvolle Taten und ging gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dassetvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ossaṭṭhavīriyo bhikkhu arahatte patiṭṭhito. Satthā dve [Pg.154] vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā gāmaṇikumāro ossaṭṭhavīriyo bhikkhu ahosi, ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen und dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten wurde der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte, in der Arhatschaft gefestigt. Der Meister erzählte diese beiden Geschichten, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war der Prinz Gāmaṇi der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte; der Lehrer jedoch war ich selbst.“ Gāmaṇijātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Gāmaṇi-Jātaka ist die achte.
9. Maghadevajātakavaṇṇanā 9. Die Erklärung des Maghadeva-Jātaka Uttamaṅgaruhā mayhanti idaṃ satthā jetavane viharanto mahābhinikkhamanaṃ ārabbha kathesi. Taṃ heṭṭhā nidānakathāyaṃ kathitameva. Tasmiṃ pana kāle bhikkhū dasabalassa nekkhammaṃ vaṇṇayantā nisīdiṃsu. Atha satthā dhammasabhaṃ āgantvā buddhāsane nisinno bhikkhū āmantesi ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti. ‘‘Bhante, na aññāya kathāya, tumhākaṃyeva pana nekkhammaṃ vaṇṇayamānā nisinnāmhā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, tathāgato etarahiyeva nekkhammaṃ nikkhanto, pubbepi nikkhantoyevā’’ti āha. Bhikkhū tassatthassāvibhāvatthaṃ bhagavantaṃ yāciṃsu, bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. „Die Haare auf meinem Haupt“ – diese Lehrrede sprach der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich der Großen Entsagung. Dies wurde bereits zuvor in der Einleitungserzählung (Nidānakathā) dargelegt. Zu jener Zeit saßen die Mönche zusammen und priesen das Entsagen des Zehnkräftigen (Dasabala). Da kam der Meister zur Versammlungshalle, setzte sich auf den Buddha-Sitz und fragte die Mönche: „Welches Gesprächs wegen, o Mönche, sitzt ihr jetzt hier zusammen?“ Als sie antworteten: „Ehrwürdiger Herr, wir führen kein anderes Gespräch, sondern sitzen hier und preisen Eure eigene Entsagung“, sprach er: „Nicht erst jetzt, o Mönche, ist der Tathāgata zur Entsagung ausgezogen; auch in der Vergangenheit ist er bereits ausgezogen.“ Die Mönche baten den Erhabenen, diese Angelegenheit zu enthüllen. Da machte der Erhabene das durch ein anderes Leben verborgene Geschehen offenbar. Atīte videharaṭṭhe mithilāyaṃ maghadevo nāma rājā ahosi dhammiko dhammarājā. So caturāsīti vassasahassāni kumārakīḷaṃ kīḷi, tathā oparajjaṃ, tathā mahārajjaṃ katvā dīghamaddhānaṃ khepetvā ekadivasaṃ kappakaṃ āmantesi ‘‘yadā me, samma kappaka, sirasmiṃ palitāni passeyyāsi, atha me āroceyyāsī’’ti. Kappakopi dīghamaddhānaṃ khepetvā ekadivasaṃ rañño añjanavaṇṇānaṃ kesānaṃ antare ekameva palitaṃ disvā ‘‘deva, ekaṃ te palitaṃ dissatī’’ti ārocesi. ‘‘Tena hi me, samma, taṃ palitaṃ uddharitvā pāṇimhi ṭhapehī’’ti ca vutte suvaṇṇasaṇḍāsena uddharitvā rañño pāṇimhi patiṭṭhāpesi. Tadā rañño caturāsīti vassasahassāni āyu avasiṭṭhaṃ hoti. Evaṃ santepi palitaṃ disvāva maccurājānaṃ āgantvā samīpe ṭhitaṃ viya attānaṃ ādittapaṇṇasālaṃ paviṭṭhaṃ viya ca maññamāno saṃvegaṃ āpajjitvā ‘‘bāla maghadeva, yāva palitassuppādāva ime kilese jahituṃ nāsakkhī’’ti cintesi. In der Vergangenheit gab es im Lande Videha, in Mithilā, einen gerechten König namens Maghadeva, der nach dem Gesetz regierte. Er verbrachte vierundachtzigtausend Jahre mit den Spielen der Jugend, ebenso viele als Vizekönig und ebenso viele als Großkönig. Nachdem er so eine lange Zeitspanne verbracht hatte, sprach er eines Tages zu seinem Barbier: „Mein lieber Barbier, sobald du auf meinem Haupt graue Haare erblickst, sollst du mir dies mitteilen.“ Auch der Barbier verbrachte eine lange Zeitspanne. Eines Tages erblickte er inmitten des salbenfarbenen, tiefschwarzen Haares des Königs ein einziges graues Haar und berichtete: „Majestät, ein graues Haar ist bei Euch zu sehen.“ Als der König sagte: „Nun gut, mein Lieber, zupfe dieses graue Haar aus und lege es in meine Hand“, zog er es mit einer goldenen Pinzette heraus und legte es auf die Handfläche des Königs. Zu jenem Zeitpunkt verblieb dem König noch eine Lebensspanne von vierundachtzigtausend Jahren. Obwohl dem so war, fühlte er sich allein beim Anblick des grauen Haares, als sei der König des Todes herangetreten und stünde an seiner Seite, oder als sei er selbst in eine lichterloh brennende Blätterhütte getreten. Er wurde von tiefer Erschütterung (saṃvega) ergriffen und dachte: „O törichter Maghadeva, bis zum Erscheinen dieses grauen Haares hast du es nicht vermocht, diese geistigen Befleckungen (kilesa) aufzugeben!“ Tassevaṃ [Pg.155] palitapātubhāvaṃ āvajjentassa antoḍāho uppajji, sarīrā sedā mucciṃsu, sāṭakā pīḷetvā apanetabbākārappattā ahesuṃ. So ‘‘ajjeva mayā nikkhamitvā pabbajituṃ vaṭṭatī’’ti kappakassa satasahassuṭṭhānakaṃ gāmavaraṃ datvā jeṭṭhaputtaṃ pakkosāpetvā ‘‘tāta, mama sīse palitaṃ pātubhūtaṃ, mahallakomhi jāto, bhuttā kho pana me mānusakā kāmā, idāni dibbe kāme pariyesissāmi, nekkhammakālo mayhaṃ, tvaṃ imaṃ rajjaṃ paṭipajja, ahaṃ pana pabbajitvā maghadevaambavanuyyāne vasanto samaṇadhammaṃ karissāmī’’ti āha. Taṃ evaṃ pabbajitukāmaṃ amaccā upasaṅkamitvā ‘‘deva, kiṃ tumhākaṃ pabbajjākāraṇa’’nti pucchiṃsu. Rājā palitaṃ hatthena gahetvā amaccānaṃ imaṃ gāthamāha – Während er so über das Erscheinen des grauen Haares nachsann, stieg in ihm eine innere Hitze auf; Schweiß trat aus seinem Körper aus, so dass seine Gewänder in einem Zustand waren, dass man sie hätte auswringen und ablegen müssen. Er dachte: „Noch am heutigen Tage geziemt es sich für mich, in die Hauslosigkeit auszuziehen und das Ordensleben aufzunehmen.“ Er schenkte dem Barbier ein hervorragendes Dorf, das ein Einkommen von einhunderttausend einbrachte, ließ seinen ältesten Sohn rufen und sprach: „Mein lieber Sohn, auf meinem Haupt ist ein graues Haar erschienen. Ich bin alt geworden. Die menschlichen Sinnesfreuden habe ich wahrlich genossen; nun werde ich nach himmlischen Freuden streben. Es ist für mich die Zeit des Entsagens gekommen. Übernimm du dieses Königreich. Ich aber werde mich als Hausloser im Maghadeva-Mangohain niederlassen und die Pflichten eines Asketen (samaṇadhamma) üben.“ Als die Minister zu ihm traten, da er so die Entsagung wünschte, fragten sie ihn: „Majestät, was ist der Grund für Eure Entsagung?“ Der König nahm das graue Haar in die Hand und sprach zu den Ministern diese Strophe: 9. 9. ‘‘Uttamaṅgaruhā mayhaṃ, ime jātā vayoharā; Pātubhūtā devadūtā, pabbajjāsamayo mamā’’ti. „Die Haare auf meinem Haupt, die mir gewachsen sind, rauben mir die Jugend. Die Götterboten (Todesboten) sind erschienen; es ist für mich die Zeit des Entsagens.“ Tattha uttamaṅgaruhāti kesā. Kesā hi sabbesaṃ hatthapādādīnaṃ aṅgānaṃ uttame sirasmiṃ ruhattā ‘‘uttamaṅgaruhā’’ti vuccanti. Ime jātā vayoharāti passatha, tātā, palitapātubhāvena tiṇṇaṃ vayānaṃ haraṇato ime jātā vayoharā. Pātubhūtāti nibbattā. Devadūtāti devo vuccati maccu, tassa dūtāti devadūtā. Sirasmiñhi palitesu pātubhūtesu maccurājassa santike ṭhito viya hoti, tasmā palitāni ‘‘maccudevassa dūtā’’ti vuccanti. Devā viya dūtātipi devadūtā. Yathā hi alaṅkatapaṭiyattāya devatāya ākāse ṭhatvā ‘‘asukadivase tvaṃ marissasī’’ti vutte taṃ tatheva hoti, evaṃ sirasmiṃ palitesu pātubhūtesu devatāya byākaraṇasadisameva hoti, tasmā palitāni ‘‘devasadisā dūtā’’ti vuccanti. Visuddhidevānaṃ dūtātipi devadūtā. Sabbabodhisattā hi jiṇṇabyādhimatapabbajite disvāva saṃvegamāpajjitvā nikkhamma pabbajanti. Yathāha – Hierbei bedeutet „uttamaṅgaruhā“ (die auf dem edelsten Glied Gewachsenen) Haare. Denn die Haare werden „uttamaṅgaruhā“ genannt, weil sie im Vergleich zu allen Gliedern wie Händen, Füßen usw. auf dem edelsten Teil, dem Kopf, gewachsen sind. „Diese sind entstanden, die das Lebensalter rauben“ bedeutet: Seht, ihr Lieben (Minister), weil sie durch das Erscheinen von grauem Haar die drei Lebensabschnitte rauben, sind diese entstandenen Haare die das Lebensalter raubenden. „Erschienen“ bedeutet hervorgebracht. Unter „Götterboten“ (devadūtā) versteht man Folgendes: Als Gott (deva) wird der Tod bezeichnet; dessen Boten sind Götterboten. Denn wenn graue Haare auf dem Kopf erscheinen, ist es, als stünde man in der Nähe des Königs des Todes; deshalb werden graue Haare „Boten des Todesgottes“ genannt. Auch weil sie wie Boten der Götter sind, heißen sie Götterboten. Denn wie wenn eine geschmückte, hergerichtete Gottheit am Himmel steht und sagt: „An jenem Tag wirst du sterben“, und es genau so geschieht; ebenso ist es, wenn graue Haare auf dem Kopf erscheinen, wie die Vorhersage einer Gottheit. Deshalb werden graue Haare „göttergleiche Boten“ genannt. Auch weil sie Boten der Götter der Reinheit (Heiligen) sind, werden sie Götterboten genannt. Denn alle Bodhisattas geraten in Erschütterung (saṃvega), sobald sie einen Gealterten, Kranken, Toten und einen Entsagten sehen, und ziehen aus, um die Welt zu verlassen. Wie gesagt wurde: ‘‘Jiṇṇañca disvā dukhitañca byādhitaṃ, matañca disvā gatamāyusaṅkhayaṃ; Kāsāyavatthaṃ pabbajitañca disvā, tasmā ahaṃ pabbajitomhi rājā’’ti. (theragā. 73 thokaṃ visadisaṃ); „Nachdem ich einen Gealterten sah und einen leidenden Kranken, und einen Toten sah, dessen Lebenskraft zu Ende gegangen war, und einen in safrangelbe Gewänder gekleideten Entsagten sah, deshalb bin ich, o König, in die Hauslosigkeit gezogen.“ Iminā [Pg.156] pariyāyena palitāni visuddhidevānaṃ dūtattā ‘‘devadūtā’’ti vuccanti. Pabbajjāsamayo mamāti gihibhāvato nikkhantaṭṭhena ‘‘pabbajjā’’ti laddhanāmassa samaṇaliṅgagahaṇassa kālo mayhanti dasseti. Auf diese Weise werden graue Haare „Götterboten“ genannt, weil sie die Boten der Götter der Reinheit sind. „Die Zeit der Entsagung ist für mich gekommen“ zeigt: „Es ist für mich die Zeit, das Kennzeichen eines Asketen anzunehmen, was den Namen Entsagung (pabbajjā) trägt, im Sinne des Hinausgehens aus dem Hausleben.“ So evaṃ vatvā taṃ divasameva rajjaṃ pahāya isipabbajjaṃ pabbajitvā tasmiṃyeva maghadevaambavane viharanto caturāsīti vassasahassāni cattāro brahmavihāre bhāvetvā aparihīnajjhāne ṭhito kālaṃ katvā brahmaloke nibbattitvā puna tato cuto mithilāyaṃyeva nimi nāma rājā hutvā osakkamānaṃ attano vaṃsaṃ ghaṭetvā tattheva ambavane pabbajitvā brahmavihāre bhāvetvā puna brahmalokūpagova ahosi. Nachdem er dies gesagt hatte, gab er noch am selben Tag das Königtum auf, weihte sich der weisen Einsiedler-Entsagung (isipabbajjā) und lebte genau in jenem Maghadeva-Mangohain. Er entfaltete 84.000 Jahre lang die vier göttlichen Verweilungszustände (brahmavihāras), verstarb, während er in ungeminderter Vertiefung (jhāna) verwelkte, und wurde in der Brahma-Welt wiedergeboren. Nachdem er von dort wieder verschieden war, wurde er genau in Mithilā ein König namens Nimi. Er setzte seine im Verfall begriffene Ahnenlinie fort, entsagte genau in jenem Mangohain, entfaltete die göttlichen Verweilungszustände und gelangte wiederum in die Brahma-Welt. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, tathāgato idāneva mahābhinikkhamanaṃ nikkhanto, pubbepi nikkhantoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dassetvā cattāri saccāni pakāsesi, saccapariyosāne keci sotāpannā ahesuṃ, keci sakadāgāmino, keci anāgāmino. Iti bhagavā imāni dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā kappako ānando ahosi, putto rāhulo, maghadevarājā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor, indem er zeigte: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt ist der Tathāgata zur Großen Entsagung ausgezogen, sondern er ist schon früher ausgezogen“, und verkündete die Vier Edlen Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten wurden einige Stromeingetretene (sotāpanna), einige Einmalwiederkehrer (sakadāgāmin) und einige Nichtwiederkehrer (anāgāmin). So erzählte der Erhabene diese beiden Geschichten, stellte die Verbindung her und verknüpfte das Jātaka: „Damals war der Barbier Ānanda, der Sohn war Rāhula, und König Maghadeva war ich selbst.“ Maghadevajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Maghadeva-Jātakas, die neunte.
10. Sukhavihārijātakavaṇṇanā 10. Die Erklärung des Sukhavihāri-Jātakas Yañca aññe na rakkhantīti idaṃ satthā anupiyanagaraṃ nissāya anupiyaambavane viharanto sukhavihāriṃ bhaddiyattheraṃ ārabbha kathesi. Sukhavihārī bhaddiyatthero chakhattiyasamāgame upālisattamo pabbajito. Tesu bhaddiyatthero ca, kimilatthero ca, bhagutthero ca, upālitthero ca arahattaṃ pattā, ānandatthero sotāpanno jāto, anuruddhatthero dibbacakkhuko, devadatto jhānalābhī jāto. Channaṃ pana khattiyānaṃ vatthu yāva anupiyanagarā khaṇḍahālajātake āvibhavissati. Āyasmā pana bhaddiyo rājakāle attano rakkhasaṃvidhānañceva tāva bahūhi [Pg.157] rakkhāhi rakkhiyamānassa uparipāsādavaratale mahāsayane samparivattamānassāpi attano bhayuppattiñca idāni arahattaṃ patvā araññādīsu yattha katthaci viharantopi attano vigatabhayatañca samanussaranto ‘‘aho sukhaṃ, aho sukha’’nti udānaṃ udānesi. Taṃ sutvā bhikkhū ‘‘āyasmā bhaddiyo aññaṃ byākarotī’’ti bhagavato ārocesuṃ. Bhagavā ‘‘na, bhikkhave, bhaddiyo idāneva sukhavihārī, pubbepi sukhavihārīyevā’’ti āha. Bhikkhū tassatthassāvibhāvatthāya bhagavantaṃ yāciṃsu. Bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. „Was andere nicht beschützen...“: Diese Lehrrede sprach der Meister, während er in der Nähe der Stadt Anupiyā im Anupiya-Mangohain weilte, bezüglich des Ehrwürdigen Bhaddiya, der in Glückseligkeit verwelkte (sukhavihārin). Der in Glückseligkeit verweilende Thera Bhaddiya war derjenige, der bei der Zusammenkunft der sechs Kṣatriyas als siebter, mit Upāli, das Ordinariat empfing. Unter diesen erlangten der Thera Bhaddiya, der Thera Kimila, der Thera Bhagu und der Thera Upāli die Arhatschaft; der Thera Ānanda wurde ein Stromeingetretener (sotāpanna); der Thera Anuruddha erlangte das himmlische Auge (dibbacakkhu); Devadatta erlangte die Vertiefungen (jhānalābhī). Die Geschichte der sechs Kṣatriyas bis hin zur Stadt Anupiyā wird jedoch im Khaṇḍahāla-Jātaka deutlich werden. Als der ehrwürdige Bhaddiya jedoch an seine königliche Zeit zurückdachte – an seine eigenen Schutzvorkehrungen, wie er, obwohl er von so vielen Wachen geschützt wurde und sich auf einem prächtigen Bett im obersten Stockwerk eines hervorragenden Palastes wälzte, dennoch Angst verspürte – und wie er jetzt, da er die Arhatschaft erlangt hatte, selbst wenn er im Wald oder irgendwo anders verweilte, völlig frei von Furcht war, stieß er diesen feierlichen Ausruf (udāna) aus: „Oh, welches Glück! Oh, welches Glück!“ Als die Mönche dies hörten, berichteten sie dem Erhabenen: „Der ehrwürdige Bhaddiya verkündet die höchste Erkenntnis.“ Der Erhabene sprach: „Mönche, nicht nur jetzt verweilt Bhaddiya in Glückseligkeit, sondern er verweilte auch schon in der Vergangenheit in Glückseligkeit.“ Die Mönche baten den Erhabenen, diese Angelegenheit zu verdeutlichen. Der Erhabene enthüllte das durch eine andere Existenz verborgene Ereignis. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārayamāne bodhisatto udiccabrāhmaṇamahāsālo hutvā kāmesu ādīnavaṃ, nekkhamme cānisaṃsaṃ disvā kāme pahāya himavantaṃ pavisitvā isipabbajjaṃ pabbajitvā aṭṭha samāpattiyo nibbattesi, parivāropissa mahā ahosi pañca tāpasasatāni. So vassakāle himavantato nikkhamitvā tāpasagaṇaparivuto gāmanigamādīsu cārikaṃ caranto bārāṇasiṃ patvā rājānaṃ nissāya rājuyyāne vāsaṃ kappesi. Tattha vassike cattāro māse vasitvā rājānaṃ āpucchi. Atha naṃ rājā ‘‘tumhe, bhante, mahallakā, kiṃ vo himavantena, antevāsike himavantaṃ pesetvā idheva vasathā’’ti yāci. Bodhisatto jeṭṭhantevāsikaṃ pañca tāpasasatāni paṭicchāpetvā ‘‘gaccha, tvaṃ imehi saddhiṃ himavante vasa, ahaṃ pana idheva vasissāmī’’ti te uyyojetvā sayaṃ tattheva vāsaṃ kappesi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer wohlhabenden, hochgeborenen Brahmanenfamilie aus dem Norden (udiccabrāhmaṇa-mahāsāla) geboren. Er sah das Elend in den Sinnesfreuden (kāma) und den Segen in der Entsagung (nekkhamma), verließ die Sinnesfreuden, ging im Himavanta-Gebirge ein, weihte sich der weisen Einsiedler-Entsagung und erlangte die acht Errungenschaften (samāpattis). Seine Gefolgschaft war groß, bestehend aus fünfhundert Asketen. Während der Regenzeit verließ er das Himavanta-Gebirge, zog, umgeben von der Schar der Asketen, auf Wanderschaft durch Dörfer und Städte, erreichte Bārāṇasī und nahm, vom König unterstützt, im königlichen Park Aufenthalt. Nachdem er dort die vier Monate der Regenzeit verbracht hatte, verabschiedete er sich vom König. Daraufhin bat ihn der König: „Ehrwürdiger Herr, Ihr seid alt. Was nützt Euch das Himavanta-Gebirge? Sendet Eure Schüler dorthin und verweilt genau hier.“ Der Bodhisatta übergab die fünfhundert Asketen seinem ältesten Schüler und sprach: „Geh du und lebe mit ihnen im Himavanta-Gebirge. Ich aber werde genau hier bleiben.“ So schickte er sie fort und verblieb selbst an jenem Ort. So panassa jeṭṭhantevāsiko rājapabbajito mahantaṃ rajjaṃ pahāya pabbajitvā kasiṇaparikammaṃ katvā aṭṭhasamāpattilābhī ahosi. So tāpasehi saddhiṃ himavante vasamāno ekadivasaṃ ācariyaṃ daṭṭhukāmo hutvā te tāpase āmantetvā ‘‘tumhe anukkaṇṭhamānā idheva vasatha, ahaṃ ācariyaṃ vanditvā āgamissāmī’’ti ācariyassa santikaṃ gantvā vanditvā paṭisanthāraṃ katvā ekaṃ kaṭṭhattharikaṃ attharitvā ācariyassa santikeyeva nipajji. Tasmiñca samaye rājā ‘‘tāpasaṃ passissāmī’’ti uyyānaṃ gantvā vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Antevāsikatāpaso rājānaṃ disvā neva vuṭṭhāsi, nipannoyeva pana ‘‘aho sukhaṃ, aho sukha’’nti udānaṃ udānesi. Rājā ‘‘ayaṃ tāpaso maṃ disvāpi na uṭṭhito’’ti [Pg.158] anattamano bodhisattaṃ āha – ‘‘bhante, ayaṃ tāpaso yadicchakaṃ bhutto bhavissati, udānaṃ udānento sukhaseyyameva kappetī’’ti. Mahārāja, ayaṃ tāpaso pubbe tumhādiso eko rājā ahosi, svāyaṃ ‘‘ahaṃ pubbe gihikāle rajjasiriṃ anubhavanto āvudhahatthehi bahūhi rakkhiyamānopi evarūpaṃ sukhaṃ nāma nālattha’’nti attano pabbajjāsukhaṃ jhānasukhañca ārabbha imaṃ udānaṃ udānetīti. Evañca pana vatvā bodhisatto rañño dhammakathaṃ kathetuṃ imaṃ gāthamāha – Jener älteste Schüler von ihm, der ein vom Königtum ordinierter Eremit war, hatte ein großes Reich aufgegeben, war ordiniert, hatte die Kasiṇa-Vorbereitung durchgeführt und war einer geworden, der die acht Errungenschaften erlangt hatte. Als er zusammen mit den Asketen im Himalaya lebte, wünschte er eines Tages, seinen Lehrer zu sehen. Er rief die Asketen und sagte: „Bleibt ihr hier, ohne unzufrieden zu werden; ich werde den Lehrer verehren und dann zurückkehren.“ Er ging zum Lehrer, verbeugte sich vor ihm, hielt eine freundliche Begrüßung ab, breitete eine Holzbohlenmatte aus und legte sich ganz in der Nähe des Lehrers nieder. Zu jener Zeit dachte der König: „Ich will den Asketen sehen“, ging in den Park, verbeugte sich vor ihm und setzte sich an eine Seite nieder. Als der asketische Schüler den König sah, stand er überhaupt nicht auf, sondern verharrend im Liegen stieß er diesen feierlichen Ausruf aus: „Oh, welches Glück! Oh, welches Glück!“ Der König war unzufrieden, dachte: „Dieser Asket ist nicht einmal aufgestanden, als er mich sah“, und sprach zum Bodhisatta: „Ehrwürdiger Herr, dieser Asket hat wohl nach Herzenslust gegessen; er stößt diesen feierlichen Ausruf aus und pflegt nur ein bequemes Lager.“ [Der Bodhisatta sprach:] „Großer König, dieser Asket war früher ein König wie du. Er dachte: ‚Als ich früher in der Zeit als Laie die königliche Pracht genoss, erlangte ich, obwohl ich von vielen mit Waffen in den Händen beschützt wurde, niemals ein solches Glück‘, und im Hinblick auf das Glück des Entsagungslebens und das Glück der Vertiefung stößt er diesen feierlichen Ausruf aus.“ Nachdem der Bodhisatta dies gesagt hatte, sprach er diese Strophe, um dem König eine Lehrrede zu halten: 10. 10. ‘‘Yañca aññe na rakkhanti, yo ca aññe na rakkhati; Sa ve rāja sukhaṃ seti, kāmesu anapekkhavā’’ti. „Wen andere nicht bewachen und wer andere nicht bewacht, der schläft wahrlich glücklich, o König, ohne Verlangen nach den Sinnengenüssen.“ Tattha yañca aññe na rakkhantīti yaṃ puggalaṃ aññe bahū puggalā na rakkhanti. Yo ca aññe na rakkhatīti yo ca ‘‘ekako ahaṃ rajjaṃ kāremī’’ti aññe bahū jane na rakkhati. Sa ve rāja sukhaṃ setīti mahārāja so puggalo eko adutiyo pavivitto kāyikacetasikasukhasamaṅgī hutvā sukhaṃ seti. Idañca desanāsīsameva. Na kevalaṃ pana setiyeva, evarūpo pana puggalo sukhaṃ gacchati tiṭṭhati nisīdati sayatīti sabbiriyāpathesu sukhappattova hoti. Kāmesu anapekkhavāti vatthu kāmakilesakāmesu apekkhārahito vigatacchandarāgo nittaṇho evarūpo puggalo sabbiriyāpathesu sukhaṃ viharati mahārājāti. Darin bedeutet ‚wen andere nicht bewachen‘: jene Person, die von vielen anderen Personen nicht bewacht wird. ‚Und wer andere nicht bewacht‘ bedeutet: wer nicht etwa denkt: ‚Ich allein herrsche über das Reich‘, und viele andere Menschen bewacht. ‚Der schläft wahrlich glücklich, o König‘ bedeutet: O großer König, jene Person, einsam, ohne Gefährten, abgeschieden und im Besitz von körperlichem und geistigem Glück, schläft glücklich. Und dies ist nur eine beispielhafte Hervorhebung der Lehrrede. Er schläft jedoch nicht nur einfach; vielmehr geht, steht, sitzt und liegt eine solche Person glücklich, das heißt, in allen Körperhaltungen erlangt sie wahrhaftig Glück. ‚Ohne Verlangen nach Sinnengenüssen‘ bedeutet: frei von Verlangen nach den Dingen der Sinnlichkeit und den Befleckungen der Sinnlichkeit, frei von leidenschaftlicher Begierde, durstlos – eine solche Person weilt in allen Körperhaltungen glücklich, o großer König. Rājā dhammadesanaṃ sutvā tuṭṭhamānaso vanditvā nivesanameva gato, antevāsikopi ācariyaṃ vanditvā himavantameva gato. Bodhisatto pana tattheva viharanto aparihīnajjhāno kālaṃ katvā brahmaloke nibbatti. Nachdem der König die Lehrrede gehört hatte, verbeugte er sich mit erfreutem Herzen und kehrte in seinen Palast zurück. Auch der Schüler verbeugte sich vor dem Lehrer und kehrte in den Himalaya zurück. Der Bodhisatta aber verwelte eben dort, starb mit unverminderten Vertiefungen und wurde in der Brahmā-Welt wiedergeboren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā dassetvā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā antevāsiko bhaddiyatthero ahosi, gaṇasatthā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister brachte diese Lehrrede dar, zeigte sie auf, erzählte die beiden Geschichten, stellte die Verbindung her und verknüpfte das Jātaka: „Damals war der Schüler der Thera Bhaddiya, der Lehrer der Schar aber war ich selbst.“ Sukhavihārijātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Sukhavihāri-Jātaka, das zehnte. Apaṇṇakavaggo paṭhamo. Die Apaṇṇaka-Vagga, die erste. Tassuddānaṃ – Dessen Zusammenfassung: Apaṇṇakaṃ [Pg.159] vaṇṇupathaṃ, serivaṃ cūḷaseṭṭhi ca; Taṇḍulaṃ devadhammañca, kaṭṭhavāhanagāmaṇi; Maghadevaṃ vihārīti, piṇḍitā dasa jātakāti. „Apaṇṇaka, Vaṇṇupatha, Seriva und Cūḷaseṭṭhi, Taṇḍula, Devadhamma, Kaṭṭhavāhana, Gāmaṇi, Maghadeva und Vihārī – zusammengefasst ergeben sich diese zehn Jātakas.“ 2. Sīlavaggo 2. Sīla-Vagga
[11] 1. Lakkhaṇamigajātakavaṇṇanā [11] 1. Erklärung des Lakkhaṇamiga-Jātaka Hoti sīlavataṃ atthoti idaṃ satthā rājagahaṃ upanissāya veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Devadattassa vatthu yāva abhimārappayojanā khaṇḍahālajātake āvibhavissati, yāva dhanapālakavissajjanā pana cūḷahaṃsajātake āvibhavissati, yāva pathavippavesanā dvādasanipāte samuddavāṇijajātake āvibhavissati. „Es gibt Nutzen für die Tugendhaften“ (Hoti sīlavataṃ attho) – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er in der Nähe von Rājagaha im Veḷuvana-Kloster verweilte, in Bezug auf Devadatta. Die Geschichte von Devadatta wird bis hin zur Aussendung der Attentäter im Khaṇḍahāla-Jātaka deutlich werden, bis hin zur Freilassung des Elefanten Dhanapālaka im Cūḷahaṃsa-Jātaka deutlich werden und bis hin zum Versinken in der Erde im Samuddavāṇija-Jātaka im Zwölfer-Buch (Dvādasakanipāta) deutlich werden. Ekasmiñhi samaye devadatto pañca vatthūni yācitvā alabhanto saṅghaṃ bhinditvā pañca bhikkhusatāni ādāya gayāsīse viharati. Atha tesaṃ bhikkhūnaṃ ñāṇaṃ paripākaṃ agamāsi. Taṃ ñatvā satthā dve aggasāvake āmantesi ‘‘sāriputtā, tumhākaṃ nissitakā pañcasatā bhikkhū devadattassa laddhiṃ rocetvā tena saddhiṃ gatā, idāni pana tesaṃ ñāṇaṃ paripākaṃ gataṃ, tumhe bahūhi bhikkhūhi saddhiṃ tattha gantvā tesaṃ dhammaṃ desetvā te bhikkhū maggaphalehi pabodhetvā gahetvā āgacchathā’’ti. Te tatheva gantvā tesaṃ dhammaṃ desetvā maggaphalehi pabodhetvā punadivase aruṇuggamanavelāya te bhikkhū ādāya veḷuvanameva āgamaṃsu. Āgantvā ca pana sāriputtattherassa bhagavantaṃ vanditvā ṭhitakāle bhikkhū theraṃ pasaṃsitvā bhagavantaṃ āhaṃsu – ‘‘bhante, amhākaṃ jeṭṭhabhātiko dhammasenāpati pañcahi bhikkhusatehi parivuto āgacchanto ativiya sobhati, devadatto pana parihīnaparivāro jāto’’ti. Na, bhikkhave, sāriputto idāneva ñātisaṅghaparivuto āgacchanto sobhati, pubbepi sobhiyeva. Devadattopi [Pg.160] na idāneva gaṇato parihīno, pubbepi parihīnoyevāti. Bhikkhū tassatthassāvibhāvatthāya bhagavantaṃ yāciṃsu, bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Zu einer Zeit nämlich bat Devadatta um fünf Dinge, und als er sie nicht erhielt, spaltete er die Gemeinde, nahm fünfhundert Mönche mit sich und lebte auf dem Gayāsīsa-Hügel. Da erlangte das Wissen dieser Mönche die Reife. Als der Meister dies erkannte, rief er die beiden Hauptschüler: „Sāriputta, eure fûnfhundert Gefolgsleute, die Mönche, fanden Gefallen an Devadattas Ansicht und gingen mit ihm fort. Nun aber ist ihr Wissen gereift. Geht zusammen mit vielen Mönchen dorthin, verkündet ihnen die Lehre, erweckt diese Mönche mit den Pfaden und Früchten, nehmt sie mit und kehrt zurück.“ Sie gingen genau so dorthin, verkündeten ihnen die Lehre, erweckten sie mit den Pfaden und Früchten und kehrten am nächsten Tag zur Zeit des Sonnenaufgangs mit diesen Mönchen in das Veḷuvana-Kloster zurück. Als sie angekommen waren und der Thera Sāriputta dastand, nachdem er sich vor dem Erhabenen verbeugt hatte, lobten die Mönche den Thera und sprachen zum Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, unser älterer Bruder, der Feldherr der Lehre, glänzt überaus, wenn er in Begleitung von fünfhundert Mönchen kommt; Devadatta hingegen hat seine Gefolgschaft verloren.“ [Der Erhabene sprach:] „Mönche, Sāriputta glänzt nicht erst jetzt, wenn er in Begleitung der Schar seiner Verwandten kommt; auch in der Vergangenheit glänzte er schon. Und auch Devadatta hat seine Schar nicht erst jetzt verloren; auch in der Vergangenheit hat er sie schon verloren.“ Die Mönche baten den Erhabenen, diese Bedeutung zu verdeutlichen, und der Erhabene machte das durch eine andere Existenz verborgene Geschehen offenbar. Atīte magadharaṭṭhe rājagahanagare eko magadharājā rajjaṃ kāresi. Tadā bodhisatto migayoniyaṃ paṭisandhiṃ gahetvā vuddhippatto migasahassaparivāro araññe vasati. Tassa lakkhaṇo ca kāḷo cāti dve puttā ahesuṃ. So attano mahallakakāle ‘‘tātā, ahaṃ idāni mahallako, tumhe imaṃ gaṇaṃ pariharathā’’ti pañca pañca migasatāni ekekaṃ puttaṃ paṭicchāpesi. Tato paṭṭhāya te dve janā migagaṇaṃ pariharanti. Magadharaṭṭhasmiñca sassapākasamaye kiṭṭhasambādhe araññe migānaṃ paripantho hoti. Manussā sassakhādakānaṃ migānaṃ māraṇatthāya tattha tattha opātaṃ khaṇanti, sūlāni ropenti, pāsāṇayantāni sajjenti, kūṭapāsādayo pāse oḍḍenti, bahū migā vināsaṃ āpajjanti. Bodhisatto kiṭṭhasambādhasamayaṃ ñatvā dve putte pakkosāpetvā āha – ‘‘tātā, ayaṃ kiṭṭhasambādhasamayo, bahū migā vināsaṃ pāpuṇanti, mayaṃ mahallakā yena kenaci upāyena ekasmiṃ ṭhāne vītināmessāma, tumhe tumhākaṃ migagaṇe gahetvā araññe pabbatapādaṃ pavisitvā sassānaṃ uddhaṭakāle āgaccheyyāthā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti pitu vacanaṃ sutvā saparivārā nikkhamiṃsu. Tesaṃ pana gamanamaggaṃ manussā jānanti ‘‘imasmiṃ kāle migā pabbatamārohanti, imasmiṃ kāle orohantī’’ti. Te tattha tattha paṭicchannaṭṭhāne nilīnā bahū mige vijjhitvā mārenti. In der Vergangenheit regierte ein König von Magadha in der Stadt Rājagaha im Lande Magadha. Damals nahm der Bodhisatta eine Wiedergeburt im Schoße eines Hirsches an, wuchs heran und lebte, umgeben von tausend Hirschen, im Wald. Er hatte zwei Söhne namens Lakkhaṇa und Kāḷa. Als er alt geworden war, sprach er: „Liebe Kinder, ich bin nun alt. Übernehmt ihr die Führung dieser Herde!“ Und er übergab jedem seiner Söhne jeweils fünfhundert Hirsche. Von da an führten diese beiden die Hirschherde. Zur Zeit der Getreidereife im Lande Magadha entstand im Wald, der durch das reifende Korn eng geworden war, eine große Gefahr für die Hirsche. Um die Hirsche, die das Korn fraßen, zu töten, hoben die Menschen hier und da Fallgruben aus, steckten Spieße auf, stellten Steinfallen auf und legten tückische Schlingen aus, sodass viele Hirsche den Tod fanden. Als der Bodhisatta die Zeit der Getreideenge erkannte, ließ er seine beiden Söhne rufen und sprach: „Liebe Kinder, dies ist die Zeit der Getreideenge, in der viele Hirsche den Untergang finden. Wir Alten wollen mit irgendeinem Mittel die Zeit an einem Ort verbringen. Ihr aber nehmt eure Hirschherden, zieht in den Wald am Fuße des Berges und kehrt erst zurück, wenn das Getreide geerntet ist.“ Sie antworteten: „Sehr wohl“, hörten auf die Worte ihres Vaters und zogen mit ihrem Gefolge fort. Die Menschen jedoch kannten ihren Weg und wussten: „Zu dieser Zeit steigen die Hirsche auf den Berg hinauf, zu jener Zeit steigen sie herab.“ Sie verbargen sich hier und da an versteckten Orten, schossen auf die Hirsche und töteten viele von ihnen. Kāḷamigo attano dandhatāya ‘‘imāya nāma velāya gantabbaṃ, imāya velāya na gantabba’’nti ajānanto migagaṇaṃ ādāya pubbaṇhepi sāyanhepi padosepi paccūsepi gāmadvārena gacchati. Manussā tattha tattha pakatiyā ṭhitā ca nilīnā ca bahū mige vināsaṃ pāpenti. Evaṃ so attano dandhatāya bahū mige vināsaṃ pāpetvā appakeheva migehi araññaṃ pāvisi. Lakkhaṇamigo pana paṇḍito byatto upāyakusalo ‘‘imāya velāya gantabbaṃ, imāya velāya na gantabba’’nti jānāti. So gāmadvārenapi na gacchati[Pg.161], divāpi na gacchati, padosepi na gacchati, paccūsepi na gacchati, migagaṇaṃ ādāya aḍḍharattasamayeyeva gacchati. Tasmā ekampi migaṃ avināsetvā araññaṃ pāvisi. Te tattha cattāro māse vasitvā sassesu uddhaṭesu pabbatā otariṃsu. Der Hirsch Kāḷa wusste aufgrund seiner eigenen Unbeholfenheit nicht: „Zu dieser Zeit soll man gehen, zu jener Zeit soll man nicht gehen.“ Er nahm seine Hirschherde und zog am Morgen, am Abend, in der Abenddämmerung sowie in der Morgendämmerung nahe am Dorfeingang vorbei. Die Menschen, die dort teils offen standen, teils im Verborgenen lauerten, brachten viele Hirsche ins Verderben. So führte er wegen seiner eigenen Torheit viele Hirsche in den Untergang und gelangte nur mit wenigen überlebenden Hirschen in den Bergwald. Der Hirsch Lakkhaṇa hingegen, der weise, klug und geschickt im Finden von Mitteln war, wusste wohl: „Zu dieser Zeit soll man gehen, zu jener Zeit soll man nicht gehen.“ Er ging weder nahe am Dorfeingang vorbei, noch zog er am Tage, noch in der Abenddämmerung, noch in der Morgendämmerung; er nahm seine Hirschherde und zog nur zur Mitternachtsstunde los. Daher zog er in den Bergwald ein, ohne auch nur einen einzigen Hirsch zu verlieren. Dort verweilten sie vier Monate lang, und als das Getreide eingebracht war, stiegen sie wieder vom Berg herab. Kāḷo paccāgacchantopi purimanayeneva avasesamige vināsaṃ pāpento ekakova āgami. Lakkhaṇo pana ekamigampi avināsetvā pañcahi migasatehi parivuto mātāpitūnaṃ santikaṃ āgami. Bodhisatto dvepi putte āgacchante disvā migagaṇena saddhiṃ mantento imaṃ gāthaṃ samuṭṭhāpesi – Auch bei seiner Rückkehr führte Kāḷa in gleicher Weise wie zuvor die verbliebenen Hirsche ins Verderben und kehrte ganz allein zurück. Lakkhaṇa hingegen kehrte, ohne auch nur einen einzigen Hirsch verloren zu haben, umgeben von seinen fünfhundert Hirschen, zu seinen Eltern zurück. Als der Bodhisatta seine beiden Söhne zurückkehren sah, sprach er im Kreise der Hirschschar diese Strophe: 11. 11. ‘‘Hoti sīlavataṃ attho, paṭisanthāravuttinaṃ; Lakkhaṇaṃ passa āyantaṃ, ñātisaṅghapurakkhataṃ; Atha passasimaṃ kāḷaṃ, suvihīnaṃva ñātibhī’’ti. „Heil widerfährt den Tugendhaften, die pflichtbewusst und freundlich sind; seht Lakkhaṇa nahen, vorangestellt der Schar seiner Verwandten! Und dann seht diesen Kāḷa, der seiner Verwandten gänzlich beraubt ist.“ Tattha sīlavatanti sukhasīlatāya sīlavantānaṃ ācārasampannānaṃ. Atthoti vuḍḍhi. Paṭisanthāravuttinanti dhammapaṭisanthāro ca āmisapaṭisanthāro ca etesaṃ vuttīti paṭisanthāravuttino, tesaṃ paṭisanthāravuttinaṃ. Ettha ca pāpanivāraṇaovādānusāsanivasena dhammapaṭisanthāro ca, gocaralābhāpanagilānupaṭṭhānadhammikarakkhāvasena āmisapaṭisanthāro ca veditabbo. Idaṃ vuttaṃ hoti – imesu dvīsu paṭisanthāresu ṭhitānaṃ ācārasampannānaṃ paṇḍitānaṃ vuḍḍhi nāma hotīti. Idāni taṃ vuḍḍhiṃ dassetuṃ puttamātaraṃ ālapanto viya ‘‘lakkhaṇaṃ passā’’tiādimāha. Tatrāyaṃ saṅkhepattho – ācārapaṭisanthārasampannaṃ attano puttaṃ ekamigampi avināsetvā ñātisaṅghena purakkhataṃ parivāritaṃ āgacchantaṃ passa. Tāya pana ācārapaṭisanthārasampadāya vihīnaṃ dandhapaññaṃ atha passasimaṃ kāḷaṃ ekampi ñātiṃ anavasesetvā suvihīnameva ñātīhi ekakaṃ āgacchantanti. Evaṃ puttaṃ abhinanditvā pana bodhisatto yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gato. Darin bedeutet „sīlavataṃ“ (den Tugendhaften): jenen, die tugendhaft und von gutem Betragen sind aufgrund ihrer heilsamen Gewohnheit. „Attho“ bedeutet Gedeihen. „Paṭisanthāravuttinaṃ“ (die freundlich und pflichtbewusst handeln): jene, deren Lebensweise sowohl aus geistlicher Zuvorkommenheit (dhammapaṭisanthāra) als auch aus materieller Zuvorkommenheit (āmisapaṭisanthāra) besteht, heißen „paṭisanthāravuttino“; für diese, die so handeln. Hierbei ist unter geistlicher Zuvorkommenheit das Abhalten vom Bösen sowie das Erteilen von Ermahnungen und Unterweisungen zu verstehen; unter materieller Zuvorkommenheit ist das Verschaffen von Weideplätzen, die Pflege der Kranken und die rechtmäßige Absicherung zu verstehen. Dies will gesagt sein: Für jene Weisen, die in diesen beiden Arten der Zuvorkommenheit verweilen und ein gutes Betragen besitzen, gibt es wahrlich Gedeihen. Um nun dieses Gedeihen aufzuzeigen, sprach er – gleichsam als richte er das Wort an die Mutter der Söhne – „Seht Lakkhaṇa...“ und so fort. Darin ist dies der kurze Sinn: Sieh deinen eigenen Sohn Lakkhaṇa, der reich an gutem Betragen und Zuvorkommenheit ist und zurückkehrt, ohne auch nur einen einzigen Hirsch verloren zu haben, umgeben und angeführt von der Schar seiner Verwandten. Doch dann sieh diesen Kāḷa, der dieser Vollkommenheit des Betragens und der Zuvorkommenheit entbehrt, von trägem Verstand ist und ganz allein zurückkehrt, gänzlich verlassen von seinen Verwandten, ohne auch nur einen einzigen Verwandten übrig gelassen zu haben. Nachdem der Bodhisatta so die Freude über seinen Sohn ausgedrückt hatte, verblieb er bis an sein Lebensende und ging gemäß seinem Kamma dahin. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, sāriputto idāneva ñātisaṅghaparivārito sobhati, pubbepi sobhatiyeva. Na ca devadatto etarahiyeva gaṇamhā parihīno, pubbepi parihīnoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ dassetvā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā [Pg.162] kāḷo devadatto ahosi, parisāpissa devadattaparisāva, lakkhaṇo sāriputto, parisā panassa buddhaparisā, mātā rāhulamātā, pitā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, glänzt Sāriputta im Kreise seiner Verwandtenschar; auch in der Vergangenheit glänzte er bereits. Und nicht erst jetzt ist Devadatta von seiner Anhängerschar abgefallen; auch in der Vergangenheit fiel er bereits ab.“ Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt, die beiden Geschichten erzählt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Hirsch Kāḷa Devadatta, und seine Herde war Devadattas Anhängerschar. Der Hirsch Lakkhaṇa war Sāriputta, seine Herde aber war die Schar des Buddha. Die Mutter war die Mutter Rāhulas, der Vater aber war ich selbst.“ Lakkhaṇamigajātakavaṇṇanā paṭhamā. Hier endet die Erklärung des Lakkhaṇamiga-Jātaka, die erste.
[12] 2. Nigrodhamigajātakavaṇṇanā [12] 2. Die Erklärung des Nigrodhamiga-Jātaka Nigrodhameva seveyyāti idaṃ satthā jetavane viharanto kumārakassapattherassa mātaraṃ ārabbha kathesi. Sā kira rājagahanagare mahāvibhavassa seṭṭhino dhītā ahosi ussannakusalamūlā parimadditasaṅkhārā pacchimabhavikā, antoghaṭe padīpo viya tassā hadaye arahattūpanissayo jalati. Sā attānaṃ jānanakālato paṭṭhāya gehe anabhiratā pabbajitukāmā hutvā mātāpitaro āha – ‘‘ammatātā, mayhaṃ gharāvāse cittaṃ nābhiramati, ahaṃ niyyānike buddhasāsane pabbajitukāmā, pabbājetha ma’’nti. Amma, kiṃ vadesi, idaṃ kulaṃ bahuvibhavaṃ, tvañca amhākaṃ ekadhītā, na labbhā tayā pabbajitunti. Sā punappunaṃ yācitvāpi mātāpitūnaṃ santikā pabbajjaṃ alabhamānā cintesi ‘‘hotu, patikulaṃ gatā sāmikaṃ ārādhetvā pabbajissāmī’’ti. Sā vayappattā patikulaṃ gantvā patidevatā hutvā sīlavatī kalyāṇadhammā agāraṃ ajjhāvasi. „Nur Nigrodha soll man dienen...“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf die Mutter des Thera Kumārakassapa. Sie war, so heißt es, in der Stadt Rājagaha die Tochter eines sehr vermögenden Großkaufmanns, reich an heilsamen Wurzeln, mit reiflich meditierten Geistesformationen und in ihrem letzten Dasein begriffen. Wie eine Leuchte im Inneren eines Kruges leuchtete in ihrem Herzen die starke Voraussetzung für die Arhatschaft. Seit der Zeit, als sie zu Verstand gekommen war, fand sie kein Gefallen am häuslichen Leben und wünschte, das Hausmännerleben aufzugeben. Sie sprach zu ihren Eltern: „Mutter, Vater, mein Geist findet kein Gefallen am häuslichen Leben. Ich wünsche, in der aus dem Kreislauf des Leidens herausführenden Lehre des Buddha das Hauslose Leben anzutreten; lasst mich bitte die Ordination empfangen!“ „Liebes Kind, was sagst du da? Diese Familie besitzt großen Reichtum, und du bist unsere einzige Tochter. Es ist dir nicht gestattet, das Hauslose Leben anzutreten.“ Obwohl sie immer wieder darum bat, erhielt sie von ihren Eltern keine Erlaubnis zur Ordination. Da dachte sie: „Es sei darum. Wenn ich erst in das Haus eines Ehemannes gezogen bin, werde ich meinen Gatten erfreuen und dann die Ordination empfangen.“ Als sie das heiratsfähige Alter erreicht hatte, zog sie in das Haus ihres Ehemannes, diente ihm treu wie einer Gottheit, war tugendhaft und von edlem Charakter und führte den Haushalt. Athassā saṃvāsamanvāya kucchiyaṃ gabbho patiṭṭhahi. Sā gabbhassa patiṭṭhitabhāvaṃ na aññāsi. Atha tasmiṃ nagare nakkhattaṃ ghosayiṃsu, sakalanagaravāsino nakkhattaṃ kīḷiṃsu, nagaraṃ devanagaraṃ viya alaṅkatapaṭiyattaṃ ahosi. Sā pana tāva uḷārāyapi nakkhattakīḷāya vattamānāya attano sarīraṃ na vilimpati nālaṅkaroti, pakativeseneva vicarati. Als sie daraufhin durch den Beischlaf mit ihrem Gatten schwanger geworden war, bildete sich in ihrem Schoß ein Embryo. Sie wusste jedoch nichts von ihrer Schwangerschaft. Zu jener Zeit wurde in der Stadt ein Sternenfest ausgerufen, und alle Stadtbewohner feierten dieses Sternenfest. Die Stadt war hergerichtet und geschmückt wie eine Götterstadt. Obwohl nun dieses großartige Sternenfest im Gange war, salbte sie ihren Körper nicht und schmückte ihn nicht, sondern ging in ihrer ganz gewöhnlichen Gestalt umher. Atha naṃ sāmiko āha – ‘‘bhadde, sakalanagaraṃ nakkhattanissitaṃ, tvaṃ pana sarīraṃ nappaṭijaggasī’’ti. Ayyaputta, dvattiṃsāya me kuṇapehi pūritaṃ sarīraṃ, kiṃ iminā alaṅkatena, ayañhi kāyo neva devanimmito, na brahmanimmito, na suvaṇṇamayo, na maṇimayo, na haricandanamayo, na puṇḍarīkakumuduppalagabbhasambhūto[Pg.163], na amatosadhapūrito, atha kho kuṇape jāto, mātāpettikasambhavo, aniccucchādanaparimaddanabhedanaviddhaṃsanadhammo, kaṭasivaḍḍhano, taṇhūpādinno, sokānaṃ nidānaṃ, paridevānaṃ vatthu, sabbarogānaṃ ālayo, kammakaraṇānaṃ paṭiggaho, antopūti, bahi niccapaggharaṇo, kimikulānaṃ āvāso, sivathikapayāto, maraṇapariyosāno, sabbalokassa cakkhupathe vattamānopi – Da sprach ihr Gatte zu ihr: „Meine Liebe, die ganze Stadt feiert das Sternenfest. Du aber pflegst deinen Körper überhaupt nicht?“ – „Edler Herr, mein Körper ist mit zweiunddreißig Arten von Unrat angefüllt. Was soll mir dieser geschmückte Körper? Denn dieser Körper ist weder von Göttern noch von Brahma erschaffen; er besteht weder aus Gold noch aus Juwelen, noch aus gelbem Sandelholz; er ist nicht im Inneren eines weißen, blauen oder roten Lotos entstanden, noch ist er mit dem Trank der Unsterblichkeit gefüllt. Vielmehr ist er im Unreinen entstanden, hervorgegangen aus Vater und Mutter, und ist der Vergänglichkeit, dem Einreiben, Massieren, Zerbrechen und Zerfallen unterworfen. Er vergrößert die Begräbnisstätten, ist vom Begehren ergriffen, die Quelle der Sorgen, die Ursache der Wehklagen, die Herberge aller Krankheiten, der Empfänger von Bestrafungen, innen faulig, außen ständig triefend, die Behausung von Wurmgeschlechtern, auf dem Weg zum Friedhof, mit dem Tod endend – und obwohl er sich im Sichtfeld der ganzen Welt befindet...“ ‘‘Aṭṭhinahārusaṃyutto, tacamaṃsāvalepano; Chaviyā kāyo paṭicchanno, yathābhūtaṃ na dissati. „Zusammengefügt aus Knochen und Sehnen, überzogen mit Haut und Fleisch, bedeckt von der Oberhaut – so wird der Körper nicht so gesehen, wie er in Wirklichkeit ist.“ ‘‘Antapūro udarapūro, yakanapeḷassa vatthino; Hadayassa papphāsassa, vakkassa pihakassa ca. „Gefüllt mit Eingeweiden, gefüllt mit dem Mageninhalt, mit der Leber, der Harnblase, dem Herzen, der Lunge, den Nieren und der Milz;“ ‘‘Siṅghāṇikāya kheḷassa, sedassa ca medassa ca; Lohitassa lasikāya, pittassa ca vasāya ca. „mit Nasenschleim, Speichel, Schweiß, Fett, Blut, Gelenkschmiere, Galle und Talg.“ ‘‘Athassa navahi sotehi, asucī savati sabbadā; Akkhimhā akkhigūthako, kaṇṇamhā kaṇṇagūthako. „Zudem fließt aus seinen neun Öffnungen allzeit Unreinheit heraus: Augensekret aus dem Auge, Ohrenschmalz aus dem Ohr,“ ‘‘Siṅghāṇikā ca nāsato, mukhena vamatekadā; Pittaṃ semhañca vamati, kāyamhā sedajallikā. „Nasenschleim aus der Nase, und manchmal speit er aus dem Mund; Galle und Schleim speit er aus dem Mund, und Schmutz und Schweiß fließen aus dem Körper.“ ‘‘Athassa susiraṃ sīsaṃ, matthaluṅgassa pūritaṃ; Subhato naṃ maññati bālo, avijjāya purakkhato. (su. ni. 196-201); „Überdies ist sein hohles Haupt gefüllt mit Gehirn. Doch der Tor, von Unwissenheit geleitet, hält ihn für schön.“ ‘‘Anantādīnavo kāyo, visarukkhasamūpamo; Āvāso sabbarogānaṃ, puñjo dukkhassa kevalo. (apa. thera 2.54.55); „Der Körper hat unendliche Mängel, er gleicht einem Giftbaum; er ist die Herberge aller Krankheiten, ein reiner Haufen von Leiden.“ ‘‘Sace imassa kāyassa, anto bāhirako siyā; Daṇḍaṃ nūna gahetvāna, kāke soṇe ca vāraye. „Wenn das Innere dieses Körpers nach außen gekehrt wäre, müsste man wahrlich einen Stock nehmen, um die Krähen und Hunde abzuwehren.“ ‘‘Duggandho asuci kāyo, kuṇapo ukkarūpamo; Nindito cakkhubhūtehi, kāyo bālābhinandito. „Übelriechend und unrein ist der Körper, wie ein verwesender Leichnam, einem Misthaufen gleich; verabscheut von den Sehenden, doch von den Toren heiß geliebt.“ ‘‘Allacammapaṭicchanno, navadvāro mahāvaṇo; Samantato paggharati, asucī pūtigandhiyo’’ti. (visuddhi. 1.122); „Bedeckt von feuchter Haut, ist er eine große Wunde mit neun Öffnungen; von allen Seiten fließt unreine, faulig riechende Materie heraus.“ Ayyaputta[Pg.164], imaṃ kāyaṃ alaṅkaritvā kiṃ karissāmi? Nanu imassa alaṅkatakaraṇaṃ gūthapuṇṇaghaṭassa bahi cittakammakaraṇaṃ viya hotīti? Seṭṭhiputto tassā vacanaṃ sutvā āha ‘‘bhadde, tvaṃ imassa sarīrassa ime dose passamānā kasmā na pabbajasī’’ti? ‘‘Ayyaputta, ahaṃ pabbajjaṃ labhamānā ajjeva pabbajeyya’’nti. Seṭṭhiputto ‘‘sādhu, ahaṃ taṃ pabbājessāmī’’ti vatvā mahādānaṃ pavattetvā mahāsakkāraṃ katvā mahantena parivārena bhikkhunupassayaṃ netvā taṃ pabbājento devadattapakkhiyānaṃ bhikkhunīnaṃ santike pabbājesi. Sā pabbajjaṃ labhitvā paripuṇṇasaṅkappā attamanā ahosi. „Edler Herr, was soll ich tun, indem ich diesen Körper schmücke? Ist das Schmücken dieses Körpers nicht so, als würde man die Außenseite eines mit Kot gefüllten Topfes bunt bemalen?“ Als der Kaufmannssohn die Worte seiner Gattin hörte, sprach er: „Meine Liebe, da du diese Mängel an diesem Körper siehst, warum gehst du nicht in die Hauslosigkeit?“ – „Edler Herr, wenn ich die Erlaubnis erhielte, in die Hauslosigkeit zu gehen, würde ich noch heute die Ordination empfangen.“ Der Kaufmannssohn sagte: „Gut, ich werde dich ordinieren lassen.“ Er veranstaltete eine große Almosengabe, erwies ihr große Ehre, brachte sie mit einem großen Gefolge zum Nonnenkloster und ließ sie bei den Nonnen, die auf der Seite Devadattas standen, ordinieren. Nachdem sie die Ordination erhalten hatte, waren ihre Wünsche erfüllt und sie war glücklich gestimmt. Athassā gabbhe paripākaṃ gacchante indriyānaṃ aññathattaṃ hatthapādapiṭṭhīnaṃ bahalattaṃ udarapaṭalassa ca mahantataṃ disvā bhikkhuniyo taṃ pucchiṃsu ‘‘ayye, tvaṃ gabbhinī viya paññāyasi, kiṃ eta’’nti? Ayye, ‘‘idaṃ nāma kāraṇa’’nti na jānāmi, sīlaṃ pana me paripuṇṇanti. Atha naṃ tā bhikkhuniyo devadattassa santikaṃ netvā devadattaṃ pucchiṃsu ‘‘ayya, ayaṃ kuladhītā kicchena sāmikaṃ ārādhetvā pabbajjaṃ labhi, idāni panassā gabbho paññāyati, mayaṃ imassa gabbhassa gihikāle vā pabbajitakāle vā laddhabhāvaṃ na jānāma, kiṃdāni karomā’’ti? Devadatto attano abuddhabhāvena ca khantimettānuddayānañca natthitāya evaṃ cintesi ‘‘devadattapakkhikā bhikkhunī kucchinā gabbhaṃ pariharati, devadatto ca taṃ ajjhupekkhatiyevāti mayhaṃ garahā uppajjissati, mayā imaṃ uppabbājetuṃ vaṭṭatī’’ti. So avīmaṃsitvāva selaguḷaṃ pavaṭṭayamāno viya pakkhanditvā ‘‘gacchatha, imaṃ uppabbājethā’’ti āha. Tā tassa vacanaṃ sutvā uṭṭhāya vanditvā upassayaṃ gatā. Als danach ihre Schwangerschaft voranschritt, sahen die Nonnen die Veränderung ihrer Sinnesorgane, das Anschwellen ihrer Hand- und Fußrücken sowie die Vergrößerung ihrer Bauchdecke und fragten sie: „Ehrwürdige Dame, du siehst aus wie eine Schwangere. Was bedeutet das?“ – „Ehrwürdige Schwestern, ich weiß nicht, was der Grund dafür ist. Meine Tugend jedoch ist vollkommen rein.“ Daraufhin brachten jene Nonnen sie zu Devadatta und fragten Devadatta: „Ehrwürdiger Herr, diese Tochter aus gutem Hause hat mit Mühe ihren Ehemann zufriedengestellt und die Ordination erhalten. Nun aber ist bei ihr eine Schwangerschaft erkennbar. Wir wissen nicht, ob diese Schwangerschaft in ihrer Zeit als Laienfrau oder während ihrer Zeit als Nonne entstanden ist. Was sollen wir nun tun?“ Devadatta dachte aufgrund seiner Unwissenheit und des Fehlens von Geduld, liebender Güte und Mitgefühl wie folgt: „Eine Nonne aus der Anhängerschaft Devadattas trägt ein Kind im Schoß, und Devadatta schaut dabei einfach tatenlos zu – so wird mir Tadel erwachsen. Ich muss sie aus dem Orden ausschließen.“ Ohne die Angelegenheit zu untersuchen, stürzte er unbedacht voran, als würde er einen runden Stein hinabrollen lassen, und sagte: „Geht, schließt sie aus!“ Als jene Nonnen seine Worte hörten, erhoben sie sich, erwiesen ihm Ehrerbietung und kehrten in ihr Kloster zurück. Atha sā daharā tā bhikkhuniyo āha – ‘‘ayye, na devadattatthero buddho, nāpi mayhaṃ tassa santike pabbajjā, loke pana aggapuggalassa sammāsambuddhassa santike mayhaṃ pabbajjā, sā ca pana me dukkhena laddhā, mā naṃ antaradhāpetha, etha maṃ gahetvā satthu santikaṃ jetavanaṃ gacchathā’’ti. Tā taṃ ādāya rājagahā pañcacattālīsayojanikaṃ maggaṃ atikkamma anupubbena jetavanaṃ patvā satthāraṃ vanditvā tamatthaṃ ārocesuṃ. Satthā cintesi – ‘‘kiñcāpi gihikāle etissā gabbho patiṭṭhito, evaṃ santepi ‘samaṇo gotamo devadattena jahitaṃ ādāya caratī’ti titthiyānaṃ okāso bhavissati. Tasmā imaṃ kathaṃ pacchindituṃ sarājikāya parisāya [Pg.165] majjhe imaṃ adhikaraṇaṃ vinicchituṃ vaṭṭatī’’ti. Punadivase rājānaṃ pasenadikosalaṃ mahāanāthapiṇḍikaṃ cūḷaanāthapiṇḍikaṃ visākhaṃ mahāupāsikaṃ aññāni ca abhiññātāni mahākulāni pakkosāpetvā sāyanhasamaye catūsu parisāsu sannipatitāsu upālittheraṃ āmantesi ‘‘gaccha, tvaṃ catuparisamajjhe imissā daharabhikkhuniyā kammaṃ sodhehī’’ti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti thero parisamajjhaṃ gantvā attano paññattāsane nisīditvā rañño purato visākhaṃ upāsikaṃ pakkosāpetvā imaṃ adhikaraṇaṃ paṭicchāpesi ‘‘gaccha visākhe, ‘ayaṃ daharā asukamāse asukadivase pabbajitā’ti tathato ñatvā imassa gabbhassa pure vā pacchā vā laddhabhāvaṃ jānāhī’’ti. Upāsikā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā sāṇiṃ parikkhipāpetvā antosāṇiyaṃ daharabhikkhuniyā hatthapādanābhiudarapariyosānādīni oloketvā māsadivase samānetvā gihibhāve gabbhassa laddhabhāvaṃ tathato ñatvā therassa santikaṃ gantvā tamatthaṃ ārocesi. Thero catuparisamajjhe taṃ bhikkhuniṃ suddhaṃ akāsi. Sā suddhā hutvā bhikkhusaṅghañca satthārañca vanditvā bhikkhunīhi saddhiṃ upassayameva gatā. Sā gabbhaparipākamanvāya padumuttarapādamūle patthitapatthanaṃ mahānubhāvaṃ puttaṃ vijāyi. Da sprach die junge Nonne zu jenen Nonnen: „Ehrwürdige Schwestern, der Älteste Devadatta ist kein Buddha, und meine Ordination fand nicht unter ihm statt. In dieser Welt fand meine Ordination vielmehr unter dem erhabensten Menschen, dem vollkommen Erleuchteten, statt. Zudem habe ich diese Ordination nur unter großen Mühen erlangt; lasst sie nicht zunichtemachen! Kommt, nehmt mich mit und lasst uns nach Jetavana in die Gegenwart des Meisters gehen.“ Diese nahmen sie mit, legten den fünfundvierzig Meilen (Yojanas) weiten Weg von Rājagaha zurück, erreichten nacheinander Jetavana, erwiesen dem Meister ihre Ehrerbietung und berichteten ihm die Angelegenheit. Der Meister dachte: „Auch wenn ihre Schwangerschaft bereits in ihrer Zeit als Laienfrau begann, so wird dies den Andersdenkenden dennoch Gelegenheit geben zu sagen: ‚Der Asket Gotama zieht mit einer von Devadatta verstoßenen Nonne umher.‘ Um dieses Gerede zu unterbinden, ist es daher angebracht, diesen Rechtsfall inmitten der Versammlung, einschließlich des Königs, zu entscheiden.“ Am folgenden Tag ließ er den König Pasenadi von Kosala, Mahā-Anāthapiṇḍika, Cūḷa-Anāthapiṇḍika, die große Laienanhängerin Visākhā und andere angesehene adlige Familien rufen. Als sich am Abend die vierfache Versammlung eingefunden hatte, wandte er sich an den Ältesten Upāli: „Geh, Upāli, kläre diese Angelegenheit der jungen Nonne inmitten der vierfachen Versammlung auf.“ „Sehr wohl, Ehrwürdiger Herr“, antwortete der Älteste, trat in die Mitte der Versammlung, setzte sich auf den für ihn bereiteten Sitz, ließ die Laienanhängerin Visākhā vor den König rufen und übergab ihr diesen Rechtsfall mit den Worten: „Geh, Visākhā, erforsche die Wahrheit: ‚Diese junge Frau wurde in jenem Monat an jenem Tag ordiniert‘, und stelle fest, ob diese Schwangerschaft vor oder nach ihrer Ordination eingetreten ist.“ Die Laienanhängerin stimmte mit den Worten „Sehr wohl“ zu, ließ einen Vorhang aufhängen, untersuchte hinter dem Vorhang die Hände, Füße, den Nabel, den Unterleib und anderes der jungen Nonne, berechnete die Monate und Tage, und als sie die Gewissheit erlangt hatte, dass die Schwangerschaft im Laienstand eingetreten war, begab sie sich zum Ältesten und berichtete ihm diese Tatsache. Der Älteste erklärte die Nonne inmitten der vierfachen Versammlung für rein. Nachdem sie für rein erklärt worden war, verneigte sie sich vor der Mönchsgemeinde und dem Meister und ging gemeinsam mit den Nonnen in das Nonnenkloster zurück. Als die Zeit ihrer Schwangerschaft erfüllt war, brachte sie einen Sohn von großer Macht zur Welt, der einst zu Füßen des Buddhas Padumuttara ein feierliches Gelübde abgelegt hatte. Athekadivasaṃ rājā bhikkhunupassayasamīpena gacchanto dārakasaddaṃ sutvā amacce pucchi. Amaccā taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘deva, daharabhikkhunī puttaṃ vijātā, tasseso saddo’’ti āhaṃsu. ‘‘Bhikkhunīnaṃ, bhaṇe, dārakapaṭijagganaṃ nāma palibodho, mayaṃ naṃ paṭijaggissāmā’’ti rājā taṃ dārakaṃ nāṭakitthīnaṃ dāpetvā kumāraparihārena vaḍḍhāpesi. Nāmaggahaṇadivase cassa ‘‘kassapo’’ti nāmaṃ akaṃsu. Atha naṃ kumāraparihārena vaḍḍhitattā ‘‘kumārakassapo’’ti sañjāniṃsu. So sattavassikakāle satthu santike pabbajitvā paripuṇṇavasso upasampadaṃ labhitvā gacchante gacchante kāle dhammakathikesu citrakathī ahosi. Atha naṃ satthā ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ cittakathikānaṃ yadidaṃ kumārakassapo’’ti (a. ni. 1.209, 217) etadagge ṭhapesi. So pacchā vammikasutte (ma. ni. 1.249 ādayo) arahattaṃ pāpuṇi. Mātāpissa bhikkhunī vipassanaṃ vaḍḍhetvā aggaphalaṃ pattā. Kumārakassapatthero buddhasāsane gaganamajjhe puṇṇacando viya pākaṭo jāto. Als der König eines Tages nahe dem Nonnenkloster vorbeiging, hörte er das Weinen eines Kindes und fragte seine Minister. Die Minister erkundigten sich nach dem Grund und sprachen: „O König, die junge Nonne hat einen Sohn zur Welt gebracht, und dies ist seine Stimme.“ Der König sprach: „Ihr Männer, die Pflege eines Kindes ist für Nonnen wahrlich ein Hindernis (Palibodha). Wir werden ihn aufziehen.“ Er übergab das Kind den Tänzerinnen des Hofes und ließ es mit fürstlicher Fürsorge aufziehen. Am Tag der Namensgebung gaben sie ihm den Namen „Kassapa“. Da er mit fürstlicher Fürsorge aufgewachsen war, wurde er fortan „Kumāra-Kassapa“ genannt. Im Alter von sieben Jahren wurde er in der Gegenwart des Meisters ordiniert. Als er das erforderliche Alter erreicht hatte, erhielt er die höhere Weihe (Upasampadā). Im Laufe der Zeit wurde er unter den Dhamma-Predigern zu einem glänzenden Redner. Später setzte ihn der Meister in den höchsten Rang ein, indem er sprach: „Mönche, unter meinen Jüngern, den Mönchen, die glänzende Redner sind, ist Kumāra-Kassapa der Höchste.“ Später erlangte er durch das Vammika-Sutta die Arahatschaft. Auch seine Mutter, die Nonne, entfaltete die Einsichtsmeditation (Vipassanā) und erreichte die höchste Frucht. Der Älteste Kumāra-Kassapa wurde in der Lehre des Buddha so weithin bekannt wie der Vollmond inmitten des Himmels. Athekadivasaṃ [Pg.166] tathāgato pacchābhattaṃ piṇḍapātapaṭikkanto bhikkhūnaṃ ovādaṃ datvā gandhakuṭiṃ pāvisi. Bhikkhū ovādaṃ gahetvā attano attano rattiṭṭhānadivāṭṭhānesu divasabhāgaṃ khepetvā sāyanhasamaye dhammasabhāyaṃ sannipatitvā ‘‘āvuso, devadattena attano abuddhabhāvena ceva khantimettādīnañca abhāvena kumārakassapatthero ca therī ca ubho nāsitā, sammāsambuddho pana attano dhammarājatāya ceva khantimettānuddayasampattiyā ca ubhinnampi tesaṃ paccayo jāto’’ti buddhaguṇe vaṇṇayamānā nisīdiṃsu. Satthā buddhalīlāya dhammasabhaṃ āgantvā paññattāsane nisīditvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. ‘‘Bhante, tumhākameva guṇakathāyā’’ti sabbaṃ ārocayiṃsu. Na, bhikkhave, tathāgato idāneva imesaṃ ubhinnaṃ paccayo ca patiṭṭhā ca jāto, pubbepi ahosiyevāti. Bhikkhū tassatthassāvibhāvatthāya bhagavantaṃ yāciṃsu. Bhagavā bhavantarena paṭicchannaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Als der Erhabene (Tathāgata) eines Tages nach dem Mahl von seinem Almosengang zurückgekehrt war, gab er den Mönchen eine Unterweisung und betrat die Duftkammer (Gandhakuṭi). Die Mönche nahmen die Unterweisung an, verbrachten den verbleibenden Tag an ihren jeweiligen Ruheplätzen für Tag und Nacht und versammelten sich am Abend in der Dhamma-Halle. Sie saßen da und priesen die Tugenden des Buddha mit den Worten: „Freunde, Devadatta hat aufgrund seiner Unwissenheit – da er kein Buddha ist – sowie seines Mangels an Geduld, liebevoller Güte und anderen Tugenden sowohl den Ältesten Kumāra-Kassapa als auch die Älteste (seine Mutter) ins Verderben gestürzt. Der vollkommen Erleuchtete hingegen ist durch sein Dasein als König des Dhamma und seine Vollkommenheit an Geduld, liebevoller Güte und Mitgefühl für beide zu einer Stütze geworden.“ Da kam der Meister in erhabener Buddha-Haltung in die Dhamma-Halle, setzte sich auf den für ihn bereiteten Sitz und fragte: „Mönche, mit welchem Gespräch seid ihr hier gerade versammelt?“ „Ehrwürdiger Herr, es ist das Gespräch über Eure eigenen Tugenden“, berichteten sie ihm vollauf. „Nicht erst jetzt, Mönche, ist der Tathāgata für diese beiden zu einer Stütze und Zuflucht geworden, sondern dies war bereits in der Vergangenheit der Fall“, sprach er. Um diese Angelegenheit im Detail zu erfahren, baten die Mönche den Erhabenen. Da legte der Erhabene das durch eine frühere Existenz verborgene Geschehnis offen. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārayamāne bodhisatto migayoniyaṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. So mātukucchito nikkhanto suvaṇṇavaṇṇo ahosi, akkhīni panassa maṇiguḷasadisāni ahesuṃ, siṅgāni rajatavaṇṇāni, mukhaṃ rattakambalapuñjavaṇṇaṃ, hatthapādapariyantā lākhārasaparikammakatā viya, vāladhi camarassa viya ahosi, sarīraṃ panassa mahantaṃ assapotakappamāṇaṃ ahosi. So pañcasatamigaparivāro araññe vāsaṃ kappesi nāmena nigrodhamigarājā nāma. Avidūre panassa aññopi pañcasatamigaparivāro sākhamigo nāma vasati, sopi suvaṇṇavaṇṇova ahosi. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, nahm der Bodhisatta im Hirschgeschlecht Wiedergeburt an. Als er aus dem Schoß der Mutter hervorging, war er von goldener Farbe. Seine Augen glichen runden Edelsteinen, seine Geweihe waren silberfarben, sein Maul besaß die Farbe eines scharlachroten Wolltuchs, seine Hufspitzen wirkten wie mit rotem Siegellack verziert, sein Schweif glich dem eines Jak-Rindes, und sein Körper war von beachtlicher Größe, vergleichbar mit einem jungen Fohlen. Er lebte im Wald mit einem Gefolge von fünfhundert Hirschen und trug den Namen Nigrodha, der Hirschkönig. Nicht weit von ihm entfernt lebte ein anderer Hirsch namens Sākha, ebenfalls mit einem Gefolge von fünfhundert Hirschen, und auch dieser war von goldener Farbe. Tena samayena bārāṇasirājā migavadhappasuto hoti, vinā maṃsena na bhuñjati, manussānaṃ kammacchedaṃ katvā sabbe negamajānapade sannipātetvā devasikaṃ migavaṃ gacchati. Manussā cintesuṃ – ‘‘ayaṃ rājā amhākaṃ kammacchedaṃ karoti, yaṃnūna mayaṃ uyyāne migānaṃ nivāpaṃ vapitvā pānīyaṃ sampādetvā bahū mige uyyānaṃ pavesetvā dvāraṃ bandhitvā rañño niyyādeyyāmā’’ti. Te sabbe uyyāne migānaṃ nivāpatiṇāni ropetvā udakaṃ sampādetvā dvāraṃ yojetvā vāgurāni ādāya muggarādinānāvudhahatthā [Pg.167] araññaṃ pavisitvā mige pariyesamānā ‘‘majjhe ṭhite mige gaṇhissāmā’’ti yojanamattaṃ ṭhānaṃ parikkhipitvā saṅkhipamānā nigrodhamigasākhamigānaṃ vasanaṭṭhānaṃ majjhe katvā parikkhipiṃsu. Atha naṃ migagaṇaṃ disvā rukkhagumbādayo ca bhūmiñca muggarehi paharantā migagaṇaṃ gahanaṭṭhānato nīharitvā asisattidhanuādīni āvudhāni uggiritvā mahānādaṃ nadantā taṃ migagaṇaṃ uyyānaṃ pavesetvā dvāraṃ pidhāya rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘deva, nibaddhaṃ migavaṃ gacchantā amhākaṃ kammaṃ nāsetha, amhehi araññato mige ānetvā tumhākaṃ uyyānaṃ pūritaṃ, ito paṭṭhāya tesaṃ maṃsāni khādathā’’ti rājānaṃ āpucchitvā pakkamiṃsu. Zu jener Zeit war der König von Bārāṇasī der Jagd auf Wild verfallen; ohne Fleisch aß er nicht. Indem er die Arbeit der Menschen unterbrach und alle Bewohner der Marktflecken und des Landes versammeln ließ, ging er täglich auf die Jagd. Die Menschen dachten: 'Dieser König unterbricht unsere Arbeit. Wie wäre es, wenn wir im königlichen Park Futter für die Hirsche säen, Trinkwasser bereitstellen, viele Hirsche in den Park treiben, das Tor verschließen und sie dem König übergeben würden?' Sie alle pflanzten daraufhin Futtergras für die Hirsche im Park, stellten Wasser bereit, setzten das Tor ein, nahmen Netze und verschiedene Waffen wie Keulen in die Hände, betraten den Wald, suchten nach den Hirschen und dachten: 'Wir wollen die Hirsche fangen, die in der Mitte stehen.' Sie umstellten ein Gebiet von etwa einer Yojana. Indem sie den Kreis immer enger zogen, umzingelten sie den Aufenthaltsort des Nigrodha-Hirschkönigs und des Sākha-Hirschkönigs, sodass sich dieser in der Mitte befand. Als sie dann die Herde von Hirschen sahen, schlugen sie mit Keulen auf Bäume, Gebüsche und den Boden, trieben die Hirschherde aus dem dichten Unterholz heraus, erhoben ihre Schwerter, Lanzen, Bogen und andere Waffen, stießen großes Geschrei aus, trieben die Hirschherde in den Park, schlossen das Tor, traten vor den König und sprachen: 'O Herr, indem Ihr ständig auf die Jagd geht, zerstört Ihr unsere Arbeit. Wir haben Hirsche aus dem Wald herbeigeholt und Euren Park gefüllt. Von nun an esst deren Fleisch!' Nachdem sie den König so unterrichtet hatten, gingen sie davon. Rājā tesaṃ vacanaṃ sutvā uyyānaṃ gantvā mige olokento dve suvaṇṇamige disvā tesaṃ abhayaṃ adāsi. Tato paṭṭhāya pana kadāci sayaṃ gantvā ekaṃ migaṃ vijjhitvā āneti, kadācissa bhattakārako gantvā vijjhitvā āharati. Migā dhanuṃ disvāva maraṇabhayena tajjitā palāyanti, dve tayo pahāre labhitvā kilamantipi, gilānāpi honti, maraṇampi pāpuṇanti. Migagaṇo taṃ pavattiṃ bodhisattassa ārocesi. So sākhaṃ pakkosāpetvā āha – ‘‘samma, bahū migā nassanti, ekaṃsena maritabbe sati ito paṭṭhāya mā kaṇḍena mige vijjhantu, dhammagaṇḍikaṭṭhāne migānaṃ vāro hotu. Ekadivasaṃ mama parisāya vāro pāpuṇātu, ekadivasaṃ tava parisāya, vārappatto migo gantvā dhammagaṇḍikāya gīvaṃ ṭhapetvā nipajjatu, evaṃ sante migā kilantā na bhavissantī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchi. Tato paṭṭhāya vārappattova migo gantvā dhammagaṇḍikāya gīvaṃ ṭhapetvā nipajjati, bhattakārako āgantvā tattha nipannakameva gahetvā gacchati. Als der König ihre Worte hörte, ging er in den Park, betrachtete die Hirsche, sah zwei goldfarbene Hirsche und gewährte ihnen Schutz vor dem Tod. Von da an ging er manchmal selbst hin, erlegte einen Hirsch mit einem Pfeil und brachte ihn mit, oder sein Koch ging hin, erlegte einen und brachte ihn. Sobald die Hirsche jedoch den Bogen sahen, flohen sie aus Todesangst; sie wurden durch zwei oder drei Treffer verletzt und litten Qualen, wurden krank oder starben gar. Die Hirschherde berichtete dem Bodhisatta von diesem Zustand. Dieser ließ den Sākha-Hirsch rufen und sprach: 'Freund, viele Hirsche kommen um. Da das Sterben unvermeidlich ist, sollen sie von nun an die Hirsche nicht mehr mit Pfeilen beschießen. Die Hirsche sollen der Reihe nach zum Richtblock gehen. An einem Tag soll die Reihe an meinem Gefolge sein, am nächsten Tag an deinem Gefolge. Der an der Reihe befindliche Hirsch soll hingehen, seinen Hals auf den Richtblock legen und sich niederlegen. Wenn es so abläuft, werden die Hirsche nicht so gequält werden.' Jener stimmte zu und sagte: 'Sehr wohl.' Von da an ging nur der an der Reihe befindliche Hirsch hin, legte seinen Hals auf den Richtblock und legte sich nieder. Der Koch kam, nahm genau den dort liegenden Hirsch und ging davon. Athekadivasaṃ sākhamigassa parisāya ekissā gabbhinimigiyā vāro pāpuṇi. Sā sākhaṃ upasaṅkamitvā ‘‘sāmi, ahaṃ gabbhinī, puttaṃ vijāyitvā dve janā vāraṃ gamissāma, mayhaṃ vāraṃ atikkāmehī’’ti āha. So ‘‘na sakkā tava vāraṃ aññesaṃ pāpetuṃ, tvameva tuyhaṃ vāraṃ jānissasi, gacchāhī’’ti āha. Sā tassa santikā anuggahaṃ alabhamānā bodhisattaṃ upasaṅkamitvā tamatthaṃ ārocesi. So tassā vacanaṃ sutvā ‘‘hotu gaccha tvaṃ, ahaṃ te vāraṃ atikkāmessāmī’’ti sayaṃ [Pg.168] gantvā dhammagaṇḍikāya sīsaṃ katvā nipajji. Bhattakārako taṃ disvā ‘‘laddhābhayo migarājā dhammagaṇḍikāya nipanno, kiṃ nu kho kāraṇa’’nti vegena gantvā rañño ārocesi. Da traf es eines Tages eine trächtige Hirschkuh aus dem Gefolge des Sākha-Hirsches, die an der Reihe war. Sie trat an Sākha heran und sprach: 'Herr, ich bin trächtig. Wenn ich mein Kind geboren habe, werden wir beide, Mutter und Kind, an die Reihe gehen. Bitte überspringe meine Reihe.' Er antwortete: 'Es ist nicht möglich, deine Reihe auf andere zu übertragen. Du selbst wirst deine Reihe tragen müssen. Geh nur!' Da sie von ihm keine Gnade erhielt, trat sie an den Bodhisatta heran und berichtete ihm den Sachverhalt. Als er ihre Worte hörte, sprach er: 'Es ist gut, geh du nur. Ich werde deine Reihe übernehmen.' Er ging selbst hin, legte seinen Kopf auf den Richtblock und legte sich nieder. Als der Koch ihn sah, dachte er: 'Der Hirschkönig, dem Schutz gewährt wurde, liegt auf dem Richtblock. Was mag wohl der Grund dafür sein?' Schnell ging er hin und berichtete es dem König. Rājā tāvadeva rathaṃ āruyha mahantena parivārena āgantvā bodhisattaṃ disvā āha ‘‘samma migarāja, nanu mayā tuyhaṃ abhayaṃ dinnaṃ, kasmā tvaṃ idha nipanno’’ti. Mahārāja, gabbhinī migī āgantvā ‘‘mama vāraṃ aññassa pāpehī’’ti āha, na sakkā kho pana mayā ekassa maraṇadukkhaṃ aññassa upari nikkhipituṃ, svāhaṃ attano jīvitaṃ tassā datvā tassā santakaṃ maraṇaṃ gahetvā idha nipanno, mā aññaṃ kiñci āsaṅkittha, mahārājāti. Rājā āha – ‘‘sāmi, suvaṇṇavaṇṇamigarāja, mayā na tādiso khantimettānuddayasampanno manussesupi diṭṭhapubbo, tena te pasannosmi, uṭṭhehi, tuyhañca tassā ca abhayaṃ dammī’’ti. ‘‘Dvīhi abhaye laddhe avasesā kiṃ karissanti, narindā’’ti? ‘‘Avasesānampi abhayaṃ dammi, sāmī’’ti. ‘‘Mahārāja, evampi uyyāneyeva migā abhayaṃ labhissanti, sesā kiṃ karissantī’’ti? ‘‘Etesampi abhayaṃ dammi, sāmī’’ti. ‘‘Mahārāja, migā tāva abhayaṃ labhantu, sesā catuppadā kiṃ karissantī’’ti? ‘‘Etesampi abhayaṃ dammi, sāmī’’ti. ‘‘Mahārāja, catuppadā tāva abhayaṃ labhantu, dijagaṇā kiṃ karissantī’’ti? ‘‘Etesampi abhayaṃ dammi, sāmī’’ti. ‘‘Mahārāja, dijagaṇā tāva abhayaṃ labhantu, udake vasantā macchā kiṃ karissantī’’ti? ‘‘Etesampi abhayaṃ dammi, sāmī’’ti. Evaṃ mahāsatto rājānaṃ sabbasattānaṃ abhayaṃ yācitvā uṭṭhāya rājānaṃ pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā ‘‘dhammaṃ cara, mahārāja, mātāpitūsu puttadhītāsu brāhmaṇagahapatikesu negamajānapadesu dhammaṃ caranto samaṃ caranto kāyassa bhedā paraṃ maraṇā sugatiṃ saggaṃ lokaṃ gamissasī’’ti rañño buddhalīlāya dhammaṃ desetvā katipāhaṃ uyyāne vasitvā rañño ovādaṃ datvā migagaṇaparivuto araññaṃ pāvisi. Sāpi kho migadhenu pupphakaṇṇikasadisaṃ puttaṃ vijāyi. So kīḷamāno sākhamigassa santikaṃ gacchati. Atha naṃ mātā tassa santikaṃ gacchantaṃ disvā ‘‘putta, ito paṭṭhāya mā etassa santikaṃ gaccha, nigrodhasseva santikaṃ gaccheyyāsī’’ti ovadantī imaṃ gāthamāha – Der König bestieg sogleich seinen Wagen, kam mit großem Gefolge herbei, sah den Bodhisatta und sprach: 'Mein Freund, Hirschkönig, habe ich dir nicht Schutz gewährt? Warum liegst du hier?' – 'Großer König, eine trächtige Hirschkuh kam und bat mich: „Übertrag meine Reihe auf einen anderen!“ Doch ich konnte das Todesleid des einen nicht auf einen anderen abwälzen. Daher habe ich mein eigenes Leben für sie hingegeben, ihren Tod auf mich genommen und mich hier niedergelegt. Hegt keinen anderen Verdacht, o großer König!' Der König sprach: 'O Herr, goldfarbener Hirschkönig, selbst unter den Menschen habe ich noch nie jemanden gesehen, der so von Geduld, Güte und Mitgefühl erfüllt ist. Deswegen bin ich dir tief ergeben. Erhebe dich! Ich gewähre sowohl dir als auch ihr Schutz.' – 'Wenn uns beiden Schutz gewährt ist, was werden die übrigen tun, o König der Menschen?' – 'Auch den übrigen gewähre ich Schutz, mein Herr.' – 'Großer König, so werden aber nur die Hirsche im Park Schutz erhalten. Was werden die übrigen Hirsche tun?' – 'Auch diesen gewähre ich Schutz, mein Herr.' – 'Großer König, nun mögen die Hirsche Schutz haben, doch was werden die übrigen vierbeinigen Tiere tun?' – 'Auch diesen gewähre ich Schutz, mein Herr.' – 'Großer König, nun mögen die vierbeinigen Tiere Schutz haben, doch was werden die Vogelscharen tun?' – 'Auch diesen gewähre ich Schutz, mein Herr.' – 'Großer König, nun mögen die Vogelscharen Schutz haben, doch was werden die im Wasser lebenden Fische tun?' – 'Auch diesen gewähre ich Schutz, mein Herr.' So bat das Große Wesen den König um Schutz für alle Lebewesen, erhob sich, etablierte den König in den fünf Tugendregeln und sprach: 'Wandle im Dhamma, o großer König! Wenn du gegenüber deinen Eltern, Söhnen und Töchtern, Brahmanen und Hausvätern sowie den Bewohnern der Marktflecken und des Landes im Dhamma wandelst und gerecht handelst, wirst du nach dem Zerfall des Körpers, nach dem Tod, in eine glückliche Existenz, in eine himmlische Welt gelangen.' Nachdem er dem König mit der Erhabenheit eines Buddhas den Dhamma dargelegt hatte, verweilte er noch einige Tage im Park, gab dem König Unterweisung und zog, umgeben von der Hirschherde, wieder in den Wald. Auch jene Hirschkuh gebar ein Junges, das einer Blütenknospe glich. Als dieses im Spiel oft in die Nähe des Sākha-Hirsches ging, sah seine Mutter dies und ermahnte es mit den Worten: 'Mein Sohn, geh von heute an nicht mehr in seine Nähe, sondern suche nur die Nähe des Nigrodha-Hirsches auf!' Und sie sprach diese Strophe: 12. 12. ‘‘Nigrodhameva [Pg.169] seveyya, na sākhamupasaṃvase; Nigrodhasmiṃ mataṃ seyyo, yañce sākhasmi jīvita’’nti. Nur dem Nigrodha soll man dienen, nicht soll man sich zu Sākha gesellen; im Dienste Nigrodhas zu sterben ist besser als das Leben bei Sākha. Tattha nigrodhameva seveyyāti tāta tvaṃ vā añño vā attano hitakāmo nigrodhameva seveyya bhajeyya upasaṅkameyya, na sākhamupasaṃvaseti sākhamigaṃ pana na upasaṃvase upagamma na saṃvaseyya, etaṃ nissāya jīvikaṃ na kappeyya. Nigrodhasmiṃ mataṃ seyyoti nigrodharañño pādamūle maraṇampi seyyo varaṃ uttamaṃ. Yañce sākhasmi jīvitanti yaṃ pana sākhassa santike jīvitaṃ, taṃ neva seyyo na varaṃ na uttamanti attho. Darin bedeutet 'nigrodhameva seveyyā': Mein Lieber, ob du oder ein anderer, wer sein eigenes Wohl wünscht, sollte sich nur an Nigrodha halten, sich ihm anschließen und sich ihm nähern. 'na sākhamupasaṃvase' bedeutet: Man sollte sich jedoch dem Sākha-Hirsch nicht nähern, nicht zu ihm gehen und bei ihm wohnen; man sollte seinen Lebensunterhalt nicht in Abhängigkeit von ihm bestreiten. 'nigrodhasmiṃ mataṃ seyyo' bedeutet: Selbst der Tod zu Füßen des Hirschkönigs Nigrodha ist besser, vorzüglicher und hervorragend. 'yañce sākhasmi jīvitaṃ' bedeutet: Welches Leben auch immer man in der Nähe von Sākha führt, dieses ist weder besser noch vorzüglicher noch hervorragend. Dies ist die Bedeutung. Tato paṭṭhāya ca pana abhayaladdhakā migā manussānaṃ sassāni khādanti, manussā ‘‘laddhābhayā ime migā’’ti mige paharituṃ vā palāpetuṃ vā na visahanti, te rājaṅgaṇe sannipatitvā rañño tamatthaṃ ārocesuṃ. Rājā ‘‘mayā pasannena nigrodhamigarājassa varo dinno, ahaṃ rajjaṃ jaheyyaṃ, na ca taṃ paṭiññaṃ bhindāmi, gacchatha na koci mama vijite mige paharituṃ labhatī’’ti āha. Nigrodhamigo taṃ pavattiṃ sutvā migagaṇaṃ sannipātāpetvā ‘‘ito paṭṭhāya paresaṃ sassaṃ khādituṃ na labhissathā’’ti mige ovaditvā manussānaṃ ārocāpesi ‘‘ito paṭṭhāya sassakārakā manussā sassarakkhaṇatthaṃ vatiṃ mā karontu, khettaṃ pana āvijjhitvā paṇṇasaññaṃ bandhantū’’ti. Tato paṭṭhāya kira khettesu paṇṇabandhanasaññā udapādi. Tato paṭṭhāya paṇṇasaññaṃ atikkamanamigo nāma natthi. Ayaṃ kira nesaṃ bodhisattato laddhaovādo. Evaṃ migagaṇaṃ ovaditvā bodhisatto yāvatāyukaṃ ṭhatvā saddhiṃ migehi yathākammaṃ gato, rājāpi bodhisattassa ovāde ṭhatvā puññāni katvā yathākammaṃ gato. Von da an aber fraßen die Hirsche, die Schutz erhalten hatten, das Getreide der Menschen. Da die Menschen dachten: „Diese Hirsche haben Schutz erhalten“, wagten sie es nicht, die Hirsche zu schlagen oder zu vertreiben. Sie versammelten sich im Schlosshof und berichteten dem König diese Angelegenheit. Der König sprach: „Aus Vertrauen habe ich dem Hirschkönig Nigrodha diese Gunst gewährt. Ich würde eher mein Königreich aufgeben, als dieses Versprechen zu brechen. Geht hin, niemand in meinem Reich darf die Hirsche schlagen.“ Als der Hirsch Nigrodha von diesem Vorfall hörte, versammelte er die Hirschherde und ermahnte sie: „Von heute an dürft ihr das Getreide anderer nicht mehr fressen.“ So wies er die Hirsche an und ließ den Menschen mitteilen: „Von heute an sollen die Bauern, um ihr Getreide zu schützen, keine Zäune mehr errichten. Vielmehr sollen sie ihre Felder markieren und Blätter als Zeichen daran binden.“ Seitdem, so heißt es, entstand auf den Feldern der Brauch, Blätter als Zeichen anzubringen. Seitdem gab es keinen einzigen Hirsch mehr, der dieses Blattzeichen missachtete. Dies war, so heißt es, die Unterweisung, die sie vom Bodhisatta empfangen hatten. Nachdem der Bodhisatta die Hirschherde so unterwiesen hatte und bis an sein Lebensende verweilt war, ging er zusammen mit den Hirschen gemäß seinem Kamma fort. Auch der König hielt sich an die Unterweisung des Bodhisatta, vollbrachte verdienstvolle Taten und ging gemäß seinem Kamma fort. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idānevāhaṃ theriyā ca kumārakassapassa ca avassayo, pubbepi avassayo evā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā catusaccadhammadesanaṃ vinivaṭṭetvā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā sākhamigo devadatto ahosi, parisāpissa devadattaparisāva, migadhenu therī ahosi, putto kumārakassapo, rājā ānando, nigrodhamigarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt bin ich die Zuflucht für die Therī und für Kumārakassapa, auch in der Vergangenheit war ich bereits ihre Zuflucht.“ Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt, die Verkündung der Vier Edlen Wahrheiten entfaltet, die beiden Geschichten erzählt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er die Geburtserzählung wie folgt zusammen: „Damals war der Sākha-Hirsch Devadatta, sein Gefolge war das Gefolge Devadattas, die Hirschkuh war die Therī, ihr Sohn war Kumārakassapa, der König war Ānanda, der Hirschkönig Nigrodha aber war ich selbst.“ Nigrodhamigajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Nigrodhamiga-Jātaka ist die zweite.
[13] 3. Kaṇḍijātakavaṇṇanā [13] 3. Die Erklärung des Kaṇḍi-Jātaka Dhiratthu [Pg.170] kaṇḍinaṃ sallanti idaṃ satthā jetavane viharanto purāṇadutiyikāpalobhanaṃ ārabbha kathesi. Taṃ aṭṭhakanipāte indriyajātake āvibhavissati. Bhagavā pana taṃ bhikkhuṃ etadavoca ‘‘bhikkhu, pubbepi tvaṃ etaṃ mātugāmaṃ nissāya jīvitakkhayaṃ patvā vītaccitesu aṅgāresu pakko’’ti. Bhikkhū tassatthassāvibhāvatthāya bhagavantaṃ yāciṃsu, bhagavā bhavantarena paṭicchannakāraṇaṃ pākaṭaṃ akāsi. Ito paraṃ pana bhikkhūnaṃ yācanaṃ bhavantarapaṭicchannatañca avatvā ‘‘atītaṃ āharī’’ti ettakameva vakkhāma, ettake vuttepi yācanañca valāhakagabbhato candanīharaṇūpamāya bhavantarapaṭicchannakāraṇabhāvo cāti sabbametaṃ heṭṭhā vuttanayeneva yojetvā veditabbaṃ. „Schande über den gefiederten Pfeil“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich der Verführung durch eine ehemalige Ehefrau. Dies wird im Indriya-Jātaka im Achter-Buch dargelegt werden. Der Erhabene sprach jedoch zu jenem Mönch: „Mönch, schon in der Vergangenheit hast du wegen dieser Frau das Ende deines Lebens erlitten und bist auf glühenden Kohlen ohne Flammen geröstet worden.“ Die Mönche baten den Erhabenen, diese Begebenheit zu enthüllen. Der Erhabene machte das durch eine andere Existenz verborgene Geschehen offenbar. Von hier an werden wir jedoch, ohne die Bitte der Mönche und das Verbergen durch eine andere Existenz eigens zu erwähnen, nur noch sagen: „Er brachte die Vergangenheit herbei.“ Auch wenn nur dies gesagt wird, ist all das – die Bitte und der durch eine andere Existenz verborgene Sachverhalt, gemäß dem Gleichnis vom Hervorholen des Mondes aus dem Inneren einer Wolke – in genau derselben Weise zu verstehen, wie es oben dargelegt wurde. Atīte magadharaṭṭhe rājagahe magadharājā rajjaṃ kāresi. Magadhavāsikānaṃ sassasamaye migānaṃ mahāparipantho hoti. Te araññe pabbatapādaṃ pavisanti. Tattha eko araññavāsī pabbateyyamigo ekāya gāmantavāsiniyā migapotikāya saddhiṃ santhavaṃ katvā tesaṃ migānaṃ pabbatapādato oruyha puna gāmantaṃ otaraṇakāle migapotikāya paṭibaddhacittattā tehi saddhiṃyeva otari. Atha naṃ sā āha – ‘‘tvaṃ khosi, ayya, pabbateyyo bālamigo, gāmanto ca nāma sāsaṅko sappaṭibhayo, mā amhehi saddhiṃ otarī’’ti. So tassā paṭibaddhacittattā anivattitvā saddhiṃyeva agamāsi. Magadhavāsino ‘‘idāni migānaṃ pabbatapādā otaraṇakālo’’ti ñatvā magge paṭicchannakoṭṭhakesu tiṭṭhanti. Tesampi dvinnaṃ āgamanamagge eko luddako paṭicchannakoṭṭhake ṭhito hoti. Migapotikā manussagandhaṃ ghāyitvā ‘‘eko luddako ṭhito bhavissatī’’ti taṃ bālamigaṃ purato katvā sayaṃ pacchato ahosi. Luddako ekeneva sarappahārena migaṃ tattheva pāteti. Migapotikā tassa viddhabhāvaṃ ñatvā uppatitvā vātagatiyāva palāyi. Luddako koṭṭhakato nikkhamitvā migaṃ okkantitvā aggiṃ katvā vītaccitesu aṅgāresu madhuramaṃsaṃ pacitvā khāditvā pānīyaṃ pivitvā avasesaṃ lohitabindūhi paggharantehi kājenādāya dārake tosento gharaṃ agamāsi. In der Vergangenheit, als der König von Magadha in Rājagaha im Magadha-Reich regierte, gab es zur Zeit der Getreideernte für die Hirsche eine große Gefahr. Sie flüchteten aus dem Wald zum Fuß der Berge. Dort ging ein im Wald lebender Berghirsch eine Verbindung mit einer jungen Hirschkuh ein, die am Rande eines Dorfes lebte. Als jene Hirsche vom Fuß der Berge herabstiegen und wieder in die Nähe des Dorfes zurückkehrten, stieg er, da sein Geist an die junge Hirschkuh gefesselt war, zusammen mit ihnen hinab. Da sprach sie zu ihm: „Herr, du bist ein törichter Berghirsch. Die Umgebung von Dörfern ist voller Gefahren und Schrecken. Steig nicht mit uns hinab!“ Da sein Herz jedoch an sie gefesselt war, kehrte er nicht um, sondern ging mit ihr zusammen weiter. Die Bewohner von Magadha wussten: „Nun ist die Zeit, in der die Hirsche vom Fuß der Berge herabsteigen“, und lauerten in Verstecken am Weg. Auch auf dem Weg jener beiden stand ein Jäger in einem Versteck. Als die junge Hirschkuh den Geruch eines Menschen wahrnahm, dachte sie: „Ein Jäger muss dort lauern.“ Sie ließ den törichten Hirsch vorausgehen und blieb selbst hinten. Der Jäger streckte den Hirsch mit einem einzigen Pfeilschuss auf der Stelle nieder. Als die junge Hirschkuh sah, dass er getroffen war, sprang sie auf und floh schnell wie der Wind. Der Jäger trat aus seinem Versteck hervor, schnitt den Hirsch auf, entfachte ein Feuer, briet das schmackhafte Fleisch auf den flammenlosen Kohlen, aß davon und trank Wasser. Das restliche Fleisch, von dem noch Blutstropfen herabtropften, lud er auf eine Tragstange und ging nach Hause, um seine Kinder zu erfreuen. Tadā [Pg.171] bodhisatto tasmiṃ vanasaṇḍe rukkhadevatā hutvā nibbatto hoti. So taṃ kāraṇaṃ disvā ‘‘imassa bālamigassa maraṇaṃ neva mātaraṃ nissāya, na pitaraṃ nissāya, atha kho kāmaṃ nissāya. Kāmanimittañhi sattā sugatiyaṃ hatthacchedādikaṃ, duggatiyañca pañcavidhabandhanādinānappakārakaṃ dukkhaṃ pāpuṇanti, paresaṃ maraṇadukkhuppādanampi nāma imasmiṃ loke garahitameva. Yaṃ janapadaṃ mātugāmo vicāreti anusāsati, so itthipariṇāyako janapadopi garahitoyeva. Ye sattā mātugāmassa vasaṃ gacchanti, tepi garahitāyevā’’ti ekāya gāthāya tīṇi garahavatthūni dassetvā vanadevatāsu sādhukāraṃ datvā gandhapupphādīhi pūjayamānāsu madhurena sarena taṃ vanasaṇḍaṃ unnādento imāya gāthāya dhammaṃ desesi – Damals war der Bodhisatta als Baumgottheit in jenem Waldstück wiedergeboren worden. Als er diese Begebenheit sah, dachte er: „Der Tod dieses törichten Hirsches geschah weder wegen seiner Mutter noch wegen seines Vaters, sondern wahrlich aufgrund von sinnlicher Begierde. Denn aufgrund von sinnlicher Begierde erfahren die Wesen selbst in einer glücklichen Existenz Leiden wie das Abhacken der Hände und dergleichen, und in einer unglücklichen Existenz vielfältiges Leid wie die Fünffache Fesselung. Auch das Verursachen von Todesleiden für andere ist in dieser Welt durchaus tadelnswert. Ein Land, das von einer Frau verwaltet und angewiesen wird – dieses von einer Frau geführte Land ist ebenfalls tadelnswert. Und jene Wesen, die sich dem Willen einer Frau unterwerfen, sind ebenso tadelnswert.“ Nachdem er mit einer einzigen Strophe diese drei tadelnswerten Dinge dargelegt hatte, spendeten die Waldgottheiten Beifall, und während sie ihn mit Duftstoffen, Blumen und anderem verehrten, ließ er jenes Waldstück mit süßer Stimme widerhallen und verkündete die Lehre mit dieser Strophe: 13. 13. ‘‘Dhiratthu kaṇḍinaṃ sallaṃ, purisaṃ gāḷhavedhinaṃ; Dhiratthu taṃ janapadaṃ, yatthitthī pariṇāyikā; Te cāpi dhikkitā sattā, ye itthīnaṃ vasaṃ gatā’’ti. „Schande über den gefiederten Pfeil und über den Mann, der schwer verwundend schießt! Schande über jenes Land, in dem eine Frau die Führerin ist! Und verabscheut seien auch jene Wesen, die sich dem Willen von Frauen unterworfen haben!“ Tattha dhiratthūti garahaṇatthe nipāto, svāyamidha uttāsubbegavasena garahaṇe daṭṭhabbo. Uttasitubbiggo hi honto bodhisatto evamāha. Kaṇḍamassa atthīti kaṇḍī, taṃ kaṇḍinaṃ. Taṃ pana kaṇḍaṃ anupavisanaṭṭhena ‘‘salla’’nti vuccati, tasmā kaṇḍinaṃ sallanti ettha sallakaṇḍinanti attho. Sallaṃ vā assatthītipi sallo, taṃ sallaṃ. Mahantaṃ vaṇamukhaṃ katvā balavappahāraṃ dento gāḷhaṃ vijjhatīti gāḷhavedhī, taṃ gāḷhavedhinaṃ. Nānappakārena kaṇḍena, kumudapattasaṇṭhānathalena ujukagamaneneva sallena ca samannāgataṃ gāḷhavedhinaṃ purisaṃ dhiratthūti ayamettha attho. Pariṇāyikāti issarā saṃvidhāyikā. Dhikkitāti garahitā. Sesamettha uttānatthameva. Ito paraṃ pana ettakampi avatvā yaṃ yaṃ anuttānaṃ, taṃ tadeva vaṇṇayissāma. Evaṃ ekāya gāthāya tīṇi garahavatthūni dassetvā bodhisatto vanaṃ unnādetvā buddhalīlāya dhammaṃ desesi. Darin ist das Wort „dhiratthu“ eine Partikel im Sinne des Tadelns. Sie ist hier als Tadel aus Bestürzung und Furcht anzusehen. Denn der Bodhisatta sprach so, als er erschrocken und bestürzt war. „Er hat einen Pfeil (kaṇḍa)“, daher ist er „kaṇḍī“ (Pfeilträger); auf jenen bezieht sich dies. Jener Pfeil aber wird wegen seines tiefen Eindringens „salla“ (Pfeilspitze) genannt. Daher ist bei den Worten „kaṇḍinaṃ sallaṃ“ die Bedeutung: „einen mit einer eindringenden Pfeilspitze versehenen [Krieger]“. Oder aber: „Er hat eine Pfeilspitze“, so heißt er „sallo“; auf jenen bezieht sich dies. Wer tief trifft, indem er eine große Wundöffnung schlägt und einen schweren Treffer landet, ist ein „gāḷhavedhī“ (Tiefschütze); auf diesen Tiefschützen bezieht sich dies. „Wehe dem tief treffenden Mann, der mit verschiedenen Pfeilen und einer geradewegs fliegenden Pfeilspitze in Form eines weißen Lotusblattes versehen ist!“ – dies ist hier die Bedeutung. „Pariṇāyikā“ bedeutet eine Herrscherin, die alles regelt. „Dhikkitā“ bedeutet verabscheut (getadelt). Der Rest ist hier von offensichtlicher Bedeutung. Von nun an werden wir, ohne auch nur so viel zu sagen, jeweils nur noch das erklären, was nicht offensichtlich ist. Nachdem der Bodhisatta so mit einer einzigen Strophe drei tadelnswerte Dinge aufgezeigt hatte, ließ er den gesamten Wald widerhallen und verkündete das Dhamma mit der Erhabenheit eines Buddhas. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhitabhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. Satthā dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi. Ito paraṃ pana ‘‘dve [Pg.172] vatthūni kathetvā’’ti idaṃ avatvā ‘‘anusandhiṃ ghaṭetvā’’ti ettakameva vakkhāma, avuttampi pana heṭṭhā vuttanayeneva yojetvā gahetabbaṃ. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor und offenbarte die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten war der unzufriedene Mönch in der Frucht des Stromeintritts gefestigt. Der Meister erzählte diese beiden Geschichten, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen. Von hier an werden wir jedoch, ohne zu sagen „nachdem er die zwei Geschichten erzählt hatte“, nur noch sagen: „er stellte die Verbindung her“. Aber auch wenn es nicht gesagt wird, ist es genau nach der zuvor dargelegten Weise zu verknüpfen und zu verstehen. Tadā pabbateyyamigo ukkaṇṭhitabhikkhu ahosi, migapotikā purāṇadutiyikā, kāmesu dosaṃ dassetvā dhammadesakadevatā pana ahameva ahosinti. Damals war das Bergwild der unzufriedene Mönch, das Hirschkalb war seine frühere Ehefrau, und die Gottheit, welche die Lehre verkündete und die Fehler der sinnlichen Begierden aufzeigte, war ich selbst. Kaṇḍijātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Kaṇḍi-Jātaka ist die dritte.
[14] 4. Vātamigajātakavaṇṇanā [14] 4. Die Erklärung des Vātamiga-Jātaka Na kiratthi rasehi pāpiyoti idaṃ satthā jetavane viharanto cūḷapiṇḍapātikatissattheraṃ ārabbha kathesi. Satthari kira rājagahaṃ upanissāya veḷuvane viharante tissakumāro nāma mahāvibhavassa seṭṭhikulassa putto ekadivasaṃ veḷuvanaṃ gantvā satthu dhammadesanaṃ sutvā pabbajitukāmo pabbajjaṃ yācitvā mātāpitūhi ananuññātattā paṭikkhitto sattāhaṃ bhattacchedaṃ katvā raṭṭhapālatthero viya mātāpitaro anujānāpetvā satthu santike pabbaji. Satthā taṃ pabbājetvā aḍḍhamāsamattaṃ veḷuvane viharitvā jetavanaṃ agamāsi. Tatrāyaṃ kulaputto terasa dhutaṅgāni samādāya sāvatthiyaṃ sapadānaṃ piṇḍāya caramāno kālaṃ vītināmeti, ‘‘cūḷapiṇḍapātikatissatthero nāmā’’ti vutte gaganatale puṇṇacando viya buddhasāsane pākaṭo paññāto ahosi. „Es gibt wahrlich nichts Schlimmeres als Geschmäcker“ – diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich des Theras Cūḷapiṇḍapātika Tissa. Als der Meister nahe Rājagaha im Veḷuvana-Kloster wohnte, ging ein junger Mann namens Tissa, der Sohn einer sehr reichen Kaufmannsfamilie, eines Tages zum Veḷuvana-Kloster. Nachdem er die Lehrverkündigung des Meisters gehört hatte, wünschte er, die Hauslosigkeit anzutreten. Da er um die Ordination bat, jedoch abgewiesen wurde, weil seine Eltern ihm keine Erlaubnis gaben, fastete er sieben Tage lang, wie einst der Thera Raṭṭhapāla, brachte seine Eltern schließlich dazu, dem zuzustimmen, und trat in der Gegenwart des Meisters in den Orden ein. Nachdem der Meister ihn hatte ordinieren lassen und noch etwa einen halben Monat im Veḷuvana verweilt war, begab er sich zum Jetavana-Kloster. Dort nahm dieser Sohn aus gutem Hause die dreizehn Dhutaṅga-Übungen auf sich und verbrachte seine Zeit damit, in Sāvatthi von Haus zu Haus auf Almosengang zu gehen. Wenn man vom „Thera Cūḷapiṇḍapātika Tissa“ sprach, war er in der Lehre des Buddha so weithin bekannt und berühmt wie der Vollmond am Himmelszelt. Tasmiṃ kāle rājagahe nakkhattakīḷāya vattamānāya therassa mātāpitaro yaṃ tassa gihikāle ahosi ābharaṇabhaṇḍakaṃ, taṃ ratanacaṅkoṭake nikkhipitvā ure ṭhapetvā ‘‘aññāsu nakkhattakīḷāsu amhākaṃ putto iminā alaṅkārena alaṅkato nakkhattaṃ kīḷati, taṃ no ekaputtaṃ gahetvā samaṇo gotamo sāvatthinagaraṃ gato, kahaṃ nu kho so etarahi nisinno, kahaṃ ṭhito’’ti vatvā rodanti. Zu jener Zeit, als in Rājagaha das Sternenfest gefeiert wurde, legten die Eltern des Theras die Schmuckstücke, die er in seiner Laienzeit besessen hatte, in ein Juwelenkästchen, drückten dieses an ihre Brust und weinten mit den Worten: „Bei anderen Festen vergnügte sich unser Sohn, mit diesem Schmuck geschmückt, beim Festspiel. Doch der Asket Gotama hat unseren einzigen Sohn mitgenommen und ist zur Stadt Sāvatthi gegangen. Wo mag er wohl jetzt sitzen, wo mag er stehen?“ Athekā vaṇṇadāsī taṃ kulaṃ gantvā seṭṭhibhariyaṃ rodantiṃ disvā pucchi ‘‘kiṃ pana, ayye, rodasī’’ti? ‘‘Sā tamatthaṃ ārocesi’’. ‘‘Kiṃ pana, ayye, ayyaputto piyāyatī’’ti? ‘‘Asukañca asukañcā’’ti. ‘‘Sace tumhe [Pg.173] imasmiṃ gehe sabbaṃ issariyaṃ mayhaṃ detha, ahaṃ vo puttaṃ ānessāmī’’ti. Seṭṭhibhariyā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā paribbayaṃ datvā mahantena parivārena taṃ uyyojesi ‘‘gaccha, attano balena mama puttaṃ ānehī’’ti. Sā paṭicchannayāne nisinnā sāvatthiṃ gantvā therassa bhikkhācāravīthiyaṃ nivāsaṃ gahetvā seṭṭhikulā āgate manusse therassa adassetvā attano parivāreneva parivutā therassa piṇḍāya paviṭṭhassa āditova uḷuṅkayāguñca rasakabhikkhañca datvā rasataṇhāya bandhitvā anukkamena gehe nisīdāpetvā bhikkhaṃ dadamānā ca attano vasaṃ upagatabhāvaṃ ñatvā gilānālayaṃ dassetvā antogabbhe nipajji. Theropi bhikkhācāravelāya sapadānaṃ caranto gehadvāraṃ agamāsi. Parijano therassa pattaṃ gahetvā theraṃ ghare nisīdāpesi. Thero nisīditvāva ‘‘kahaṃ upāsikā’’ti pucchi. ‘‘Gilānā, bhante, tumhākaṃ dassanaṃ icchatī’’ti. So rasataṇhāya baddho attano vatasamādānaṃ bhinditvā tassā nipannaṭṭhānaṃ pāvisi. Sā attano āgatakāraṇaṃ kathetvā taṃ palobhetvā rasataṇhāya bandhitvā uppabbājetvā attano vase ṭhapetvā yāne nisīdāpetvā mahantena parivārena rājagahameva agamāsi. Sā pavatti pākaṭā jātā. Da ging eine Kurtisane zu jener Familie, sah die Ehefrau des Kaufmanns weinen und fragte: „Warum weinst du, o Herrin?“ Jene erzählte hernach den Grund. „Was aber, o Herrin, liebt der junge Herr besonders?“ „Dieses und jenes.“ „Wenn ihr mir die ganze Herrschaft über dieses Haus gebt, werde ich euren Sohn zurückbringen.“ Die Kaufmannsfrau stimmte mit den Worten „Gut!“ zu, gab ihr Reisegeld und schickte sie mit einem großen Gefolge fort, indem sie sagte: „Geh, bringe meinen Sohn durch deine eigene Kraft herbei!“ Sie reiste in einem verdeckten Wagen nach Sāvatthi, nahm Unterkunft an der Almosengangstraße des Theras, verbarg die Leute, die aus der Kaufmannsfamilie kamen, vor dem Thera und gab ihm, nur von ihrem eigenen Gefolge umgeben, als er zum Almosengang eintrat, gleich zu Beginn eine Kelle Reisschleim und schmackhafte Speisen. Dadurch fesselte sie ihn an das Verlangen nach Wohlgeschmack, ließ ihn nach und nach im Haus Platz nehmen, reichte ihm Almosen und täuschte, als sie merkte, dass er unter ihren Einfluss geraten war, eine Krankheit vor und legte sich in eine innere Kammer. Auch der Thera kam zur Zeit des Almosengangs, von Haus zu Haus wandernd, an die Haustür. Die Dienerschaft nahm die Almosenschale des Theras entgegen und ließ den Thera im Haus Platz nehmen. Sobald sich der Thera gesetzt hatte, fragte er: „Wo ist die Laienanhängerin?“ „Herr, sie ist krank und wünscht, Euch zu sehen“, antworteten sie. Vom Verlangen nach Wohlgeschmack gefesselt, brach er seine auf sich genommenen Gelübde und betrat das Gemach, in dem sie lag. Sie erklärte ihm den Grund ihres Kommens, verführte ihn, fesselte ihn mit dem Verlangen nach Wohlgeschmack, brachte ihn dazu, den Orden zu verlassen, machte ihn sich gefügig, setzte ihn in den Wagen und kehrte mit großem Gefolge nach Rājagaha zurück. Dieses Ereignis wurde weithin bekannt. Bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannisinnā ‘‘cūḷapiṇḍapātikatissattheraṃ kira ekā vaṇṇadāsī rasataṇhāya bandhitvā ādāya gatā’’ti kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ. Satthā dhammasabhaṃ upagantvā alaṅkatadhammāsane nisīditvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti āha. Te taṃ pavattiṃ kathayiṃsu. ‘‘Na, bhikkhave, idāneva eso bhikkhu rasataṇhāya bajjhitvā tassā vasaṃ gato, pubbepi tassā vasaṃ gatoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Die Mönche versammelten sich in der Versammlungshalle und begannen folgendes Gespräch: „Wie man hört, hat eine Kurtisane den Thera Cūḷapiṇḍapātika Tissa durch das Verlangen nach Wohlgeschmack gefesselt und mitgenommen.“ Der Meister begab sich zur Versammlungshalle, setzte sich auf den geschmückten Lehrthron und fragte: „Mönche, worüber sprecht ihr hier im Kreis?“ Sie berichteten ihm von diesem Vorfall. „Mönche, nicht erst jetzt ist dieser Mönch, gefesselt durch das Verlangen nach Wohlgeschmack, unter ihre Macht geraten; schon in der Vergangenheit ist er unter ihre Macht geraten“, sprach er und trug eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ rañño brahmadattassa sañjayo nāma uyyānapālo ahosi. Atheko vātamigo taṃ uyyānaṃ āgantvā sañjayaṃ disvā palāyati, sañjayopi na taṃ tajjetvā nīharati. So punappunaṃ āgantvā uyyāneyeva carati. Uyyānapālo uyyāne nānappakārāni pupphaphalāni gahetvā divase divase rañño abhiharati. Atha naṃ ekadivasaṃ rājā pucchi ‘‘samma uyyānapāla, uyyāne kiñci acchariyaṃ [Pg.174] passasī’’ti? ‘‘Deva, aññaṃ na passāmi, eko pana vātamigo āgantvā uyyāne carati, etaṃ passāmī’’ti. ‘‘Sakkhissati pana taṃ gahetu’’nti. ‘‘Thokaṃ madhuṃ labhanto anto rājanivesanampi naṃ ānetuṃ sakkhissāmi, devā’’ti. Rājā tassa madhuṃ dāpesi. So taṃ gahetvā uyyānaṃ gantvā vātamigassa caraṇaṭṭhāne tiṇāni madhunā makkhetvā nilīyi. Migo āgantvā madhumakkhitāni tiṇāni khāditvā rasataṇhāya baddho aññatra agantvā uyyānameva āgacchati. Uyyānapālo tassa madhumakkhitatiṇesu paluddhabhāvaṃ ñatvā anukkamena attānaṃ dassesi. So taṃ disvā katipāhaṃ palāyitvā punappunaṃ passanto vissāsaṃ āpajjitvā anukkamena uyyānapālassa hatthe ṭhitatiṇāni khādituṃ ārabhi. In der Vergangenheit gab es in Bārāṇasī zur Regierungszeit des Königs Brahmadatta einen Gärtner namens Sañjaya. Damals kam eine Windantilope in jenen Garten, sah Sañjaya und floh; Sañjaya aber bedrohte sie nicht und vertrieb sie nicht. Sie kam immer wieder und streifte nur im Garten umher. Der Gärtner nahm Tag für Tag verschiedene Blumen und Früchte aus dem Garten und brachte sie dem König. Da fragte ihn der König eines Tages: "Mein lieber Gärtner, siehst du irgendetwas Erstaunliches im Garten?" – "Majestät, etwas anderes sehe ich nicht, aber eine Windantilope kommt und streift im Garten umher; diese sehe ich." – "Wäre es denn möglich, sie zu fangen?" – "Wenn ich ein wenig Honig bekäme, Majestät, könnte ich sie sogar bis in den königlichen Palast bringen." Der König ließ ihm Honig geben. Er nahm ihn, ging in den Garten, bestrich das Gras an den Weideplätzen der Windantilope mit dem Honig und versteckte sich. Die Antilope kam, fraß das mit Honig bestrichene Gras und, gefesselt vom Verlangen nach dem Geschmack, ging sie nirgendwo anders mehr hin, sondern kam nur noch in den Garten. Als der Gärtner erkannte, dass sie nach dem honigbestrichenen Gras gierte, zeigte er sich ihr allmählich. Als sie ihn sah, floh sie einige Tage lang, doch da sie ihn immer wieder sah, fasste sie Vertrauen und begann allmählich, das Gras zu fressen, das in der Hand des Gärtners lag. So tassa vissāsaṃ āpannabhāvaṃ ñatvā yāva rājanivesanā vīthiṃ kilañjehi parikkhipitvā tahiṃ tahiṃ sākhābhaṅgaṃ pātetvā madhulābukaṃ aṃse laggetvā tiṇakalāpaṃ upakacchake ṭhapetvā madhumakkhitāni tiṇāni migassa purato purato vikiranto antorājanivesanaṃyeva agamāsi. Mige anto paviṭṭhe dvāraṃ pidahiṃsu. Migo manusse disvā kampamāno maraṇabhayatajjito antonivesanaṅgaṇe ādhāvati paridhāvati. Rājā pāsādā oruyha taṃ kampamānaṃ disvā ‘‘vātamigo nāma manussānaṃ diṭṭhaṭṭhānaṃ sattāhaṃ na gacchati, tajjitaṭṭhānaṃ yāvajīvaṃ na gacchati, so evarūpo gahananissito vātamigo rasataṇhāya baddho idāni evarūpaṃ ṭhānaṃ āgato, natthi vata bho loke rasataṇhāya pāpataraṃ nāmā’’ti imāya gāthāya dhammadesanaṃ paṭṭhapesi – Als er erkannte, dass sie Vertrauen gefasst hatte, zäunte er den Weg bis hin zum königlichen Palast mit Matten ein, streute hier und da abgebrochene Zweige hin, hängte sich ein Honiggefäß über die Schulter, klemmte sich ein Grasbündel unter den Arm und ging, während er mit Honig bestrichenes Gras immer wieder vor die Antilope hinwarf, direkt in den königlichen Palast. Als die Antilope hineingegangen war, schlossen sie das Tor. Als die Antilope die Menschen sah, zitterte sie vor Todesangst und rannte im Innenhof des Palastes hin und her. Der König stieg vom Palast herab, sah sie zittern und sprach: "Eine Windantilope meidet einen Ort, an dem sie Menschen gesehen hat, sieben Tage lang; einen Ort, an dem sie erschreckt wurde, meidet sie ihr ganzes Leben lang. Doch eine solche Windantilope, die tief im Dickicht lebt, ist, gefesselt vom Verlangen nach Geschmack, nun an einen solchen Ort gekommen! Wahrlich, ihr Leute, es gibt auf der Welt nichts Schlimmeres als das Verlangen nach Geschmack!" Und er leitete mit dieser Strophe die Lehrverkündigung ein: 14. 14. ‘‘Na kiratthi rasehi pāpiyo, āvāsehiva santhavehi vā; Vātamigaṃ gahananissitaṃ, vasamānesi rasehi sañjayo’’ti. "Es gibt wahrlich nichts Schlimmeres als das Verlangen nach Geschmack, schlimmer noch als das Verlangen nach Wohnstätten oder nach Gefährten; Sañjaya brachte die Windantilope, die tief im Dickicht lebte, durch Geschmäcker unter seine Gewalt." Tattha kirāti anussavanatthe nipāto. Rasehīti jivhāviññeyyehi madhurambilādīhi. Pāpiyoti pāpataro. Āvāsehiva santhavehi vāti nibaddhavasanaṭṭhānasaṅkhātesu hi āvāsesupi mittasanthavesupi chandarāgo pāpakova, tehi pana sacchandarāgaparibhogehi āvāsehi vā mittasanthavehi [Pg.175] vā sataguṇena ca sahassaguṇena ca satasahassaguṇena ca dhuvapaṭisevanaṭṭhena āhāraṃ vinā jīvitindriyapālanāya abhāvena ca sacchandarāgaparibhogarasāva pāpatarāti. Bodhisatto pana anussavāgataṃ viya imamatthaṃ katvā ‘‘na kiratthi rasehi pāpiyo, āvāsehiva santhavehi vā’’ti āha. Idāni tesaṃ pāpiyabhāvaṃ dassento ‘‘vātamiga’’ntiādimāha. Tattha gahananissitanti gahanaṭṭhānanissitaṃ. Idaṃ vuttaṃ hoti – passatha rasānaṃ pāpiyabhāvaṃ, idaṃ nāma araññāyatane gahananissitaṃ vātamigaṃ sañjayo uyyānapālo madhurasehi attano vasaṃ ānesi, sabbathāpi sacchandarāgaparibhogehi rasehi nāma aññaṃ pāpataraṃ lāmakataraṃ natthīti rasataṇhāya ādīnavaṃ kathesi. Kathetvā ca pana taṃ migaṃ araññameva pesesi. Dabei ist "kira" eine Partikel im Sinne von Hörensagen. "Als Geschmäcker" (rasehi) bezieht sich auf das Verlangen nach den mit der Zunge wahrnehmbaren Geschmacksrichtungen wie Süßem, Saurem usw. "Schlimmer" (pāpiyo) bedeutet verwerflicher. Zu "als nach Wohnstätten oder Gefährten" (āvāsehiva santhavehi vā): Zwar ist die leidenschaftliche Begierde sowohl nach Wohnstätten, verstanden als beständige Aufenthaltsorte, als auch nach freundschaftlichen Beziehungen schädlich, doch sind im Vergleich zu jenen mit Begierde genutzten Wohnstätten oder jenen freundschaftlichen Gefährten die mit Begierde genossenen Geschmäcker um das Hundertfache, Tausendfache und Hunderttausendfache schlimmer, und zwar wegen der Notwendigkeit des ständigen Genusses und weil ohne Nahrung die Erhaltung des Lebensorgans nicht möglich ist; daher sind die mit Begierde genossenen Geschmäcker weitaus verwerflicher. Der Bodhisatta stellte diese Angelegenheit so dar, als sei sie durch Hörensagen überliefert worden, und sprach: "Es gibt wahrlich nichts Schlimmeres als das Verlangen nach Geschmack, schlimmer noch als das Verlangen nach Wohnstätten oder nach Gefährten." Um nun deren Verwerflichkeit aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit "Die Windantilope". Dabei bedeutet "gahananissitaṃ": an einem dicht bewachsenen Ort lebend. Dies will sagen: Seht die Schädlichkeit der Geschmäcker! Ausgerechnet diese im tiefen Wald an einem dicht bewachsenen Ort lebende Windantilope brachte der Gärtner Sañjaya durch süße Geschmäcker unter seine eigene Gewalt. In jeder Hinsicht gibt es wahrlich nichts Schlimmeres oder Verwerflicheres als die mit Begierde genossenen Geschmäcker; auf diese Weise sprach er über die Gefahr des Geschmacksbegehrens. Nachdem er dies dargelegt hatte, ließ er die Antilope wieder in den Wald schicken. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, sā vaṇṇadāsī idāneva etaṃ rasataṇhāya bandhitvā attano vase karoti, pubbepi akāsiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi. ‘‘Tadā sañjayo ayaṃ vaṇṇadāsī ahosi, vātamigo cūḷapiṇḍapātiko, bārāṇasirājā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrverkündigung vor und sprach: "Ihr Mönche, nicht erst jetzt hat jene Kurtisane diesen Mönch durch das Verlangen nach Geschmack gefesselt und sich gefügig gemacht; das hat sie schon in der Vergangenheit getan." Er stellte die Verbindung her und führte das Jātaka zusammen: "Damals war der Gärtner Sañjaya diese Kurtisane, die Windantilope war der Cūḷapiṇḍapātika-Tissa, der König von Bārāṇasī aber war ich selbst." Vātamigajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Vātamiga-Jātaka ist die vierte.
[15] 5. Kharādiyajātakavaṇṇanā [15] 5. Die Erklärung des Kharādiya-Jātaka Aṭṭhakkhuraṃ kharādiyeti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. So kira bhikkhu dubbaco ovādaṃ na gaṇhāti. Atha naṃ satthā pucchi ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu dubbaco ovādaṃ na gaṇhāsī’’ti? ‘‘Saccaṃ bhagavā’’ti. Satthā ‘‘pubbepi tvaṃ dubbacatāya paṇḍitānaṃ ovādaṃ aggahetvā pāsena baddho jīvitakkhayaṃ patto’’ti vatvā atītaṃ āhari. "Mit acht Hufen, o Kharādiya" – diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen gewissen schwer belehrbaren Mönch. Jener Mönch war nämlich schwer belehrbar und nahm keinen Rat an. Da fragte ihn der Meister: "Ist es wahr, Mönch, dass du schwer belehrbar bist und keinen Rat annimmst?" – "Es ist wahr, o Erhabener." Der Meister sprach: "Schon in der Vergangenheit hast du wegen deiner Unbelehrbarkeit den Rat der Weisen nicht angenommen, wurdest in einer Schlinge gefangen und fandest den Tod." Und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto migo hutvā migagaṇaparivuto araññe vasati. Athassa bhaginimigī puttakaṃ dassetvā ‘‘bhātika, ayaṃ te bhāgineyyo, etaṃ migamāyaṃ uggaṇhāpehī’’ti paṭicchāpesi. So taṃ bhāgineyyaṃ ‘‘asukavelāya nāma āgantvā uggaṇhāhī’’ti āha. So vuttavelāya nāgacchati. Yathā [Pg.176] ca ekadivasaṃ, evaṃ satta divase sattovāde atikkanto so migamāyaṃ anuggaṇhitvāva vicaranto pāse bajjhi. Mātāpissa bhātaraṃ upasaṅkamitvā ‘‘kiṃ te, bhātika, bhāgineyyo migamāyaṃ uggaṇhāpito’’ti pucchi. Bodhisatto ca ‘‘tassa anovādakassa mā cintayi, na te puttena migamāyā uggahitā’’ti vatvā idānipi taṃ anovaditukāmova hutvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, wurde der Bodhisatta als Hirsch geboren und lebte, von einer Hirschherde umgeben, im Wald. Da zeigte seine Schwester, eine Hirschkuh, ihm ihren Sohn und vertraute ihn ihm an mit den Worten: "Bruder, dies ist dein Neffe. Lehre ihn die Hirsch-Listen." Er sprach zu seinem Neffen: "Komm zu jener Stunde und lerne." Dieser kam jedoch nicht zur vereinbarten Zeit. Wie am ersten Tag, so setzte er sich an sieben aufeinanderfolgenden Tagen über sieben Ermahnungen hinweg, und während er umherstreifte, ohne die Hirsch-Listen gelernt zu haben, verfing er sich in einer Schlinge. Seine Mutter ging zu ihrem Bruder und fragte: "Bruder, hast du deinen Neffen die Hirsch-Listen gelehrt?" Der Bodhisatta sprach: "Sorge dich nicht um diesen Unbelehrbaren; dein Sohn hat die Hirsch-Listen nicht gelernt." Da er ihn auch jetzt nicht mehr belehren wollte, sprach er diese Strophe: 15. 15. ‘‘Aṭṭhakkhuraṃ kharādiye, migaṃ vaṅkātivaṅkinaṃ; Sattahi kālātikkantaṃ, na naṃ ovaditussahe’’ti. "Den Hirsch mit acht Hufen, o Kharādiya, mit dem gar sehr krummen Geweih, der sieben Fristen ungenutzt verstreichen ließ – ich vermag diesen nicht mehr zu belehren." Tattha aṭṭhakkhuranti ekekasmiṃ pāde dvinnaṃ dvinnaṃ vasena aṭṭhakkhuraṃ. Kharādiyeti taṃ nāmena ālapati. Miganti sabbasaṅgāhikavacanaṃ. Vaṅkātivaṅkinanti mūle vaṅkāni, agge ativaṅkānīti vaṅkātivaṅkāni, tādisāni siṅgāni assa atthīti vaṅkātivaṅkī, taṃ vaṅkātivaṅkinaṃ. Sattahi kālātikkantanti sattahi ovādakālehi ovādaṃ atikkantaṃ. Na naṃ ovaditussaheti etaṃ dubbacamigaṃ ahaṃ ovadituṃ na ussahāmi, etassa me ovādatthāya cittampi na uppajjatīti dasseti. Atha naṃ dubbacamigaṃ pāse baddhaṃ luddo māretvā maṃsaṃ ādāya pakkāmi. Darin bedeutet 'achtklauig' (aṭṭhakkhura), dass es an jedem einzelnen Fuß aufgrund von jeweils zwei Klauen acht Klauen hat. Mit 'Kharādiya' spricht er sie mit ihrem Namen an. 'Wild' (miga) ist ein allgemeiner Sammelbegriff. 'Mit krummen und sehr krummen [Geweihen]' (vaṅkātivaṅkina) bedeutet: an der Wurzel krumm, an der Spitze sehr krumm, daher 'krumm und sehr krumm'; ein solches Geweih hat es, daher wird es 'krumm-und-sehr-krumm-geweiht' genannt; das bezieht sich auf jenes krumm-und-sehr-krumm-geweihte Tier. 'Der die Zeit um sieben überschritten hat' (sattahi kālātikkanta) bedeutet, dass er die Ermahnung bei sieben Gelegenheiten zur Ermahnung missachtet hat. 'Ich wage nicht, ihn zu ermahnen' (na naṃ ovaditussahe) zeigt: 'Ich vermag dieses widerspenstige Wild nicht zu ermahnen, mir entsteht nicht einmal der Gedanke, dieses zu ermahnen.' Daraufhin tötete der Jäger dieses in einer Schlinge gefangene widerspenstige Wild, nahm das Fleisch und ging davon. Satthāpi ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva dubbaco, pubbepi dubbacoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi. ‘‘Tadā bhāgineyyo migo dubbacabhikkhu ahosi, bhaginī uppalavaṇṇā, ovādamigo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor: 'Nicht nur jetzt, o Mönch, bist du widerspenstig, auch früher schon warst du widerspenstig', verknüpfte den Zusammenhang und führte das Jātaka zusammen: 'Damals war das Neffen-Wild der widerspenstige Mönch, die Schwester war Uppalavaṇṇā, das ermahnende Wild aber war ich selbst.' Kharādiyajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Kharādiya-Jātaka, die fünfte.
[16] 6. Tipallatthamigajātakavaṇṇanā [16] 6. Die Erklärung des Tipallatthamiga-Jātaka Migaṃ [Pg.177] tipallatthanti idaṃ satthā kosambiyaṃ badarikārāme viharanto sikkhākāmaṃ rāhulattheraṃ ārabbha kathesi. Ekasmiñhi kāle satthari āḷavinagaraṃ upanissāya aggāḷave cetiye viharante bahū upāsakā upāsikā bhikkhū bhikkhuniyo ca vihāraṃ dhammassavanatthāya gacchanti, divā dhammassavanaṃ hoti. Gacchante pana kāle upāsikāyo bhikkhuniyo ca na gacchiṃsu, bhikkhū ceva upāsakā ca ahesuṃ. Tato paṭṭhāya rattiṃ dhammassavanaṃ jātaṃ. Dhammassavanapariyosāne therā bhikkhū attano attano vasanaṭṭhānāni gacchanti. Daharā sāmaṇerā ca upāsakehi saddhiṃ upaṭṭhānasālāyaṃ sayanti. Tesu niddaṃ upagatesu ekacce ghurughurupassāsā kākacchamānā dante khādantā nipajjiṃsu, ekacce muhuttaṃ niddāyitvā uṭṭhahiṃsu. Te taṃ vippakāraṃ disvā bhagavato ārocesuṃ. Bhagavā ‘‘yo pana bhikkhu anupasampannena sahaseyyaṃ kappeyya pācittiya’’nti (pāci. 49) sikkhāpadaṃ paññapetvā kosambiṃ agamāsi. „Das Wild, das in drei Stellungen liegt“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er nahe Kosambī im Badarikā-Kloster verweilte, bezüglich des lernbegierigen Ehrwürdigen Rāhula. Einst nämlich, als der Meister nahe der Stadt Āḷavī im Aggāḷava-Heiligtum verweilte, kamen viele Laienanhänger und Laienanhängerinnen, Mönche und Nonnen zum Kloster, um der Lehre zuzuhören; die Lehrverkündung fand tagsüber statt. Als jedoch die Zeit verging, kamen die Laienanhängerinnen und Nonnen nicht mehr, sondern es waren nur noch die Mönche und die Laienanhänger anwesend. Von da an fand die Lehrverkündung nachts statt. Am Ende der Lehrverkündung gingen die älteren Mönche zu ihren jeweiligen Aufenthaltsorten. Die jungen Mönche und Novizen schliefen zusammen mit den Laienanhängern in der Versammlungshalle. Als diese eingeschlafen waren, lagen einige da, indem sie laut atmeten, schnarchten und mit den Zähnen knirschten, während andere nur für eine Weile schliefen und dann aufstanden. Als jene diese unschöne Art des Schlafens sahen, berichteten sie es dem Erhabenen. Der Erhabene erließ die Trainingsregel: „Wenn ein Mönch mit einem Nicht-Ordinierten zusammen schläft, so ist dies ein Pācittiya-Vergehen“, und reiste nach Kosambī. Tattha bhikkhū āyasmantaṃ rāhulaṃ āhaṃsu – ‘‘āvuso rāhula, bhagavatā sikkhāpadaṃ paññattaṃ, idāni tvaṃ attano vasanaṭṭhānaṃ jānāhī’’ti. Pubbe pana te bhikkhū bhagavati ca gāravaṃ tassa cāyasmato sikkhākāmataṃ paṭicca taṃ attano vasanaṭṭhānaṃ āgataṃ ativiya saṅgaṇhanti, khuddakamañcakaṃ paññapetvā ussīsakakaraṇatthāya cīvaraṃ denti. Taṃ divasaṃ pana sikkhāpadabhayena vasanaṭṭhānampi na adaṃsu. Rāhulabhaddopi ‘‘pitā me’’ti dasabalassa vā, ‘‘upajjhāyo me’’ti dhammasenāpatino vā, ‘‘ācariyo me’’ti mahāmoggallānassa vā, ‘‘cūḷapitā me’’ti ānandattherassa vā santikaṃ agantvā dasabalassa vaḷañjanavaccakuṭiṃ brahmavimānaṃ pavisanto viya pavisitvā vāsaṃ kappesi. Buddhānañhi vaḷañjanakuṭiyaṃ dvāraṃ supihitaṃ hoti, gandhaparibhaṇḍakatā bhūmi, gandhadāmamālādāmāni osāritāneva honti, sabbarattiṃ dīpo jhāyati. Rāhulabhaddo pana na tassā kuṭiyā imaṃ sampattiṃ paṭicca tattha vāsaṃ upagato, bhikkhūhi pana ‘‘vasanaṭṭhānaṃ jānāhī’’ti vuttattā ovādagāravena sikkhākāmatāya tattha vāsaṃ upagato. Antarantarā hi bhikkhū taṃ āyasmantaṃ dūratova āgacchantaṃ disvā tassa vīmaṃsanatthāya muṭṭhisammajjaniṃ vā kacavarachaḍḍanakaṃ vā bahi khipitvā tasmiṃ āgate [Pg.178] ‘‘āvuso, imaṃ kena chaḍḍita’’nti vadanti. Tattha kehici ‘‘rāhulo iminā maggena gato’’ti vutte so āyasmā ‘‘nāhaṃ, bhante, etaṃ jānāmī’’ti avatvāva taṃ paṭisāmetvā ‘‘khamatha me, bhante’’ti khamāpetvā gacchati. Evamesa sikkhākāmo. Dort sagten die Mönche zum ehrwürdigen Rāhula: 'Freund Rāhula, der Erhabene hat eine Trainingsregel erlassen. Suche dir nun selbst deine Unterkunft.' Früher jedoch hatten jene Mönche aus Ehrfurcht vor dem Erhabenen und wegen der Lernbegierde des Ehrwürdigen diesen überaus fürsorglich aufgenommen, wenn er zu ihren Unterkünften kam; sie richteten ihm ein kleines Bett her und gaben ihm eine Robe, um sie als Kopfkissen zu verwenden. An jenem Tag aber gaben sie ihm aus Angst vor dem Vergehen gegen die Trainingsregel nicht einmal eine Unterkunft. Da ging der ehrwürdige Rāhula weder zum Zehnkräftigen, denkend 'Er ist mein Vater', noch zum Heerführer der Lehre, denkend 'Er ist mein Präzeptor', noch zu Mahāmoggallāna, denkend 'Er ist mein Lehrer', noch zum älteren Ānanda, denkend 'Er ist mein Onkel', sondern betrat die vom Zehnkräftigen benutzte Abtrittskammer, wie einer, der in einen Brahma-Palast eintritt, und richtete sich dort für die Nacht ein. Denn bei den von den Buddhas benutzten Abtrittskammern ist die Tür gut verschlossen, der Boden ist mit duftender Paste bestrichen, Girlanden von Duftstoffen und Blumen hängen herab und die ganze Nacht hindurch brennt eine Lampe. Der ehrwürdige Rāhula suchte jedoch seine Unterkunft dort nicht wegen dieses Prachtzustands jener Kammer auf, sondern weil die Mönche zu ihm gesagt hatten 'Suche dir selbst deine Unterkunft', und er suchte dort aus Ehrfurcht vor der Ermahnung und aus Lernbegierde Unterkunft. Denn von Zeit zu Zeit warfen die Mönche, wenn sie den Ehrwürdigen von weitem kommen sahen, um ihn auf die Probe zu stellen, einen Handfeger oder einen Korb für den Kehricht nach draußen, und wenn er ankam, sagten sie: 'Freund, wer hat das hier weggeworfen?' Wenn dann einige sagten: 'Rāhula ist diesen Weg gegangen', sagte jener Ehrwürdige nicht etwa 'Ich weiß nichts davon, Ehrwürdige', sondern räumte es weg, bat mit den Worten 'Verzeiht mir, Ehrwürdige' um Vergebung und ging weiter. So lernbegierig war er. So taṃ sikkhākāmataṃyeva paṭicca tattha vāsaṃ upagato. Atha satthā purearuṇaṃyeva vaccakuṭidvāre ṭhatvā ukkāsi, sopāyasmā ukkāsi. ‘‘Ko eso’’ti? ‘‘Ahaṃ rāhulo’’ti nikkhamitvā vandi. ‘‘Kasmā tvaṃ rāhula idha nipannosī’’ti? ‘‘Vasanaṭṭhānassa abhāvato’’. ‘‘Pubbe hi, bhante, bhikkhū mama saṅgahaṃ karonti, idāni attano āpattibhayena vasanaṭṭhānaṃ na denti, svāhaṃ ‘idaṃ aññesaṃ asaṅghaṭṭanaṭṭhāna’nti iminā kāraṇena idha nipannosmīti. Atha bhagavato ‘‘rāhulaṃ tāva bhikkhū evaṃ pariccajanti, aññe kuladārake pabbājetvā kiṃ karissantī’’ti dhammasaṃvego udapādi. Eben wegen dieser Lernbegierde suchte er dort seine Unterkunft. Da stellte sich der Meister noch vor dem Morgengrauen an die Tür der Abtrittskammer und räusperte sich, und auch jener Ehrwürdige räusperte sich. 'Wer ist da?', fragte er. 'Ich bin es, Rāhula', antwortete er, trat heraus und verbeugte sich ehrfurchtsvoll. 'Warum, Rāhula, liegst du hier?', fragte er. 'Weil ich keine Unterkunft habe. Früher nämlich, o Herr, sorgten die Mönche für mich. Jetzt geben sie mir aus Angst vor einem Vergehen keine Unterkunft mehr. Ich dachte mir: „Dies ist ein Ort, an dem ich niemanden störe“, und aus diesem Grund habe ich mich hier hingelegt.' Da stieg im Erhabenen geistige Erschütterung (dhammasaṃvega) auf: 'Wenn die Mönche schon Rāhula auf diese Weise vernachlässigen, was werden sie dann erst mit anderen Söhnen guter Familien tun, die sie ordinieren lassen?' Atha bhagavā pātova bhikkhū sannipātāpetvā dhammasenāpatiṃ pucchi ‘‘jānāsi pana tvaṃ, sāriputta, ajja katthaci rāhulassa vutthabhāva’’nti? ‘‘Na jānāmi, bhante’’ti. ‘‘Sāriputta, ajja rāhulo vaccakuṭiyaṃ vasi, sāriputta, tumhe rāhulaṃ evaṃ pariccajantā aññe kuladārake pabbājetvā kiṃ karissatha? Evañhi sante imasmiṃ sāsane pabbajitā na patiṭṭhā bhavissanti, ito dāni paṭṭhāya anupasampannena ekaṃ dve divase attano santike vasāpetvā tatiyadivase tesaṃ vasanaṭṭhānaṃ ñatvā bahi vāsethā’’ti imaṃ anupaññattiṃ katvā puna sikkhāpadaṃ paññapesi. Daraufhin ließ der Erhabene gleich am Morgen die Mönche versammeln und fragte den Heerführer der Lehre: 'Weißt du eigentlich, Sāriputta, wo Rāhula heute übernachtet hat?' 'Ich weiß es nicht, o Herr', antwortete er. 'Sāriputta, heute hat Rāhula in der Abtrittskammer übernachtet. Sāriputta, wenn ihr Rāhula auf diese Weise vernachlässigt, was werdet ihr dann erst mit anderen Söhnen guter Familien tun, die ihr ordinieren lasst? Wenn es so steht, werden jene, die in dieser Lehre ordinieren, keinen Halt finden. Von heute an sollt ihr einen Nicht-Ordinierten ein oder zwei Tage lang in eurer Nähe übernachten lassen, am dritten Tag aber sollt ihr für sie eine Unterkunft ausfindig machen und sie außerhalb schlafen lassen.' Nachdem er diese Zusatzregel (anupaññatti) erlassen hatte, verkündete er die Trainingsregel erneut. Tasmiṃ samaye dhammasabhāyaṃ sannisinnā bhikkhū rāhulassa guṇakathaṃ kathenti ‘‘passathāvuso, yāva sikkhākāmo vatāyaṃ rāhulo, ‘tava vasanaṭṭhānaṃ jānāhī’ti vutto nāma ‘ahaṃ dasabalassa putto, tumhākaṃ senāsanasmā tumheyeva nikkhamathā’ti ekaṃ bhikkhumpi appaṭippharitvā vaccakuṭiyaṃ vāsaṃ kappesī’’ti. Evaṃ tesu kathayamānesu satthā dhammasabhaṃ gantvā alaṅkatāsane nisīditvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti āha. ‘‘Bhante, rāhulassa sikkhākāmakathāya, na aññāya kathāyā’’ti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, rāhulo idāneva sikkhākāmo, pubbe tiracchānayoniyaṃ nibbattopi sikkhākāmoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Zu jener Zeit sprachen die in der Versammlungshalle versammelten Mönche über das Lob des ehrwürdigen Rāhula: „Seht, ihr Brüder, wie eifrig dieser Rāhula doch nach der Schulung strebt! Als zu ihm gesagt wurde: 'Suche dir deine eigene Bleibe', dachte er nicht etwa: 'Ich bin der Sohn des Zehnkräftigen, verlasst ihr doch eure Unterkunft!', sondern ohne auch nur einem einzigen Mönch gegenüber feindselig zu sein, nahm er in der Latrine Nachtquartier.“ Während sie so sprachen, kam der Meister zur Versammlungshalle, setzte sich auf den geschmückten Sitz und fragte: „Mönche, über welches Thema sprecht ihr hier gerade, während ihr versammelt seid?“ Sie antworteten: „Herr, wir sprechen über Rāhulas Streben nach der Schulung, über kein anderes Thema.“ Der Meister sagte: „Nicht erst jetzt, Mönche, ist Rāhula bestrebt, die Schulung einzuhalten. Schon früher, als er im Schoß eines Tieres wiedergeboren wurde, war er ebenso eifrig bestrebt, die Schulung einzuhalten.“ Und nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte [Pg.179] rājagahe eko magadharājā rajjaṃ kāresi. Tadā bodhisatto migayoniyaṃ nibbattitvā migagaṇaparivuto araññe vasati. Athassa bhaginī attano puttakaṃ upanetvā ‘‘bhātika, imaṃ te bhāgineyyaṃ migamāyaṃ sikkhāpehī’’ti āha. Bodhisatto ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā ‘‘gaccha, tāta, asukavelāya nāma āgantvā sikkheyyāsī’’ti āha. So mātulena vuttavelaṃ anatikkamitvā taṃ upasaṅkamitvā migamāyaṃ sikkhi. So ekadivasaṃ vane vicaranto pāsena baddho baddharavaṃ ravi, migagaṇo palāyitvā ‘‘putto te pāsena baddho’’ti tassa mātuyā ārocesi. Sā bhātu santikaṃ gantvā ‘‘bhātika, bhāgineyyo te migamāyaṃ sikkhāpito’’ti pucchi. Bodhisatto ‘‘mā tvaṃ puttassa kiñci pāpakaṃ āsaṅki, suggahitā tena migamāyā, idāni taṃ hāsayamāno āgacchissatī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit regierte ein König von Magadha in Rājagaha. Damals wurde der Bodhisatta im Schoß eines Hirsches wiedergeboren und lebte, umgeben von einer Herde von Hirschen, im Wald. Da brachte seine Schwester ihren kleinen Sohn zu ihm und sagte: „Bruder, lehre diesen deinen Neffen die Listen der Hirsche.“ Der Bodhisatta stimmte mit den Worten „Gut“ zu und sagte zum Neffen: „Geh, mein Lieber, komm zu einer bestimmten Zeit und lerne.“ Dieser überschritt die vom Onkel genannte Zeit nicht, suchte ihn auf und erlernte die Listen der Hirsche. Eines Tages, als er im Wald umherstreifte, wurde er in einer Schlinge gefangen und stieß den Schrei eines Gefangenen aus. Die Herde floh und berichtete seiner Mutter: „Dein Sohn ist in einer Schlinge gefangen.“ Sie ging zu ihrem Bruder und fragte: „Bruder, hast du deinen Neffen die Listen der Hirsche gelehrt?“ Der Bodhisatta sagte: „Befürchte für deinen Sohn nichts Böses. Er hat die Listen der Hirsche gut gelernt. Er wird jetzt gleich zurückkehren und dich erfreuen.“ Und er sprach diese Strophe: 16. 16. ‘‘Migaṃ tipallatthamanekamāyaṃ, aṭṭhakkhuraṃ aḍḍharattāpapāyiṃ; Ekena sotena chamāssasanto, chahi kalāhitibhoti bhāgineyyo’’ti. „Der Hirsch, der die drei Liegestellungen beherrscht, voll vieler Listen, mit acht Hufen, der um Mitternacht trinkt – indem er mit einem einzigen Nasenloch nahe am Boden atmet, überwindet der Neffe den Jäger mit den sechs Künsten, o edle Dame.“ Tattha miganti bhāgineyyamigaṃ. Tipallatthanti pallatthaṃ vuccati sayanaṃ, ubhohi passehi ujukameva ca nipannakavasenāti tīhākārehi pallatthaṃ assa, tīṇi vā pallatthāni assāti tipallattho, taṃ tipallatthaṃ. Anekamāyanti bahumāyaṃ bahuvañcanaṃ. Aṭṭhakkhuranti ekekasmiṃ pāde dvinnaṃ dvinnaṃ vasena aṭṭhahi khurehi samannāgataṃ. Aḍḍharattāpapāyinti purimayāmaṃ atikkamitvā majjhimayāme araññato āgamma pānīyassa pivanato aḍḍharatte āpaṃ pivatīti aḍḍharattāpapāyī. Taṃ aḍḍharatte apāyinti attho. Mama bhāgineyyaṃ migaṃ ahaṃ sādhukaṃ migamāyaṃ uggaṇhāpesiṃ. Kathaṃ? Yathā ekena sotena chamāssasanto, chahi kalāhitibhoti bhāgineyyoti. Idaṃ vuttaṃ hoti – ahañhi tava puttaṃ tathā uggaṇhāpesiṃ, yathā ekasmiṃ uparimanāsikāsote vātaṃ sannirumbhitvā pathaviyā allīnena ekena heṭṭhimasotena tattheva chamāyaṃ assasanto chahi kalāhi [Pg.180] luddakaṃ atibhoti, chahi koṭṭhāsehi ajjhottharati vañcetīti attho. Katamāhi chahi? Cattāro pāde pasāretvā ekena passena seyyāya, khurehi tiṇapaṃsukhaṇanena, jivhāninnāmanena udarassa uddhumātabhāvakaraṇena, uccārapassāvavissajjanena, vātasannirumbhanenāti. Darin bedeutet „migaṃ“ (den Hirsch) den Neffen. „Tipallatthanti“: Mit „pallattha“ wird eine Liegestellung bezeichnet. Da er auf drei Arten liegt – nämlich auf beiden Flanken und gerade ausgestreckt –, hat er drei Liegestellungen (pallattha), oder er besitzt drei Liegestellungen, daher heißt er „tipallattha“; ihn, den „tipallattha“. „Anekamāyaṃ“ bedeutet mit vielen Listen, voll von Täuschungen. „Aṭṭhakkhuraṃ“ bedeutet mit acht Hufen ausgestattet, da er an jedem Fuß zwei Hufe hat. „Aḍḍharattāpapāyiṃ“ bedeutet: Weil er nach dem Vergehen der ersten Nachtwache in der mittleren Nachtwache aus dem Wald kommt und Wasser trinkt, trinkt er um Mitternacht Wasser; daher heißt er „aḍḍharattāpapāyī“ (der um Mitternacht Trinkende). Ihn, der um Mitternacht trinkt, das ist die Bedeutung. „Meinen Neffen, den Hirsch, habe ich gründlich in den Listen der Hirsche unterwiesen.“ Wie? „Indem er mit einem einzigen Nasenloch nahe am Boden atmet, überwindet der Neffe mit sechs Künsten, o edle Dame.“ Dies soll gesagt sein: „Ich habe deinen Sohn nämlich so gelehrt, dass er, nachdem er den Atem im oberen Nasenloch zurückgehalten hat, mit dem einen, dem Boden zugewandten unteren Nasenloch genau dort am Boden atmet und so mit den sechs Teilen den Jäger überwindet, ihn bezwingt und täuscht, das ist die Bedeutung.“ Welche sind die sechs? Seine vier Beine ausstrecken und auf einer Seite liegen; mit den Hufen Gras und Erde aufkratzen; die Zunge herausstrecken; den Bauch aufblähen; Kot und Urin abgeben; und den Atem anhalten. Aparo nayo – pādena paṃsuṃ gahetvā abhimukhākaḍḍhanena, paṭipaṇāmanena, ubhosu passesu sañcaraṇena, udaraṃ uddhaṃ pakkhipanena, adho avakkhipanenāti imāhi chahi kalāhi yathā atibhoti, ‘‘mato aya’’nti saññaṃ uppādetvā vañceti, evaṃ taṃ migamāyaṃ uggaṇhāpesinti dīpeti. Eine andere Auslegung: Mit dem Fuß Staub aufnehmen und ihn zu sich heranziehen, ihn wegstoßen, sich auf beiden Flanken hin- und herbewegen, den Bauch nach oben wölben und ihn nach unten sinken lassen – mit diesen sechs Teilen (Künsten) überwindet er den Jäger, indem er die Vorstellung erzeugt: „Dieser ist tot“, und ihn so täuscht; so zeigt er auf: „In diesen Listen der Hirsche habe ich ihn unterwiesen.“ Aparo nayo – tathā naṃ uggaṇhāpesiṃ, yathā ekena sotena chamāssasanto chahi kalāhiti dvīsupi nayesu dassitehi chahi kāraṇehi kalāhiti kalāyissati, luddaṃ vañcessatīti attho. Bhotīti bhaginiṃ ālapati. Bhāgineyyoti evaṃ chahi kāraṇehi vañcanakaṃ bhāgineyyaṃ niddisati. Evaṃ bodhisatto bhāgineyyassa migamāyāya sādhukaṃ uggahitabhāvaṃ dassento bhaginiṃ samassāseti. Eine andere Auslegung: „Ich habe ihn so gelehrt, dass er mit einem einzigen Nasenloch nahe am Boden atmend mit sechs Künsten...“ – gemäß den beiden dargestellten Auslegungen wird er mit den sechs Gründen handeln, das heißt, er wird den Jäger täuschen. Mit dem Wort „bhoti“ (o edle Dame) spricht er seine Schwester an. „Bhāgineyyo“ (der Neffe) weist auf den Neffen hin, der auf diese Weise mit den sechs Gründen täuscht. So beruhigte der Bodhisatta seine Schwester, indem er zeigte, wie gut sein Neffe die Listen der Hirsche erlernt hatte. Sopi migapotako pāse baddho avipphanditvāyeva bhūmiyaṃ mahāphāsukapassena pāde pasāretvā nipanno pādānaṃ āsannaṭṭhāne khureheva paharitvā paṃsuñca tiṇāni ca uppāṭetvā uccārapassāvaṃ vissajjetvā sīsaṃ pātetvā jivhaṃ ninnāmetvā sarīraṃ kheḷakilinnaṃ katvā vātaggahaṇena udaraṃ uddhumātakaṃ katvā akkhīni parivattetvā heṭṭhā nāsikāsotena vātaṃ sañcarāpento uparimanāsikāsotena vātaṃ sannirumbhitvā sakalasarīraṃ thaddhabhāvaṃ gāhāpetvā matākāraṃ dassesi. Nīlamakkhikāpi naṃ samparivāresuṃ, tasmiṃ tasmiṃ ṭhāne kākā nilīyiṃsu. Luddo āgantvā udaraṃ hatthena paharitvā ‘‘atipātova baddho bhavissati, pūtiko jāto’’ti tassa bandhanarajjukaṃ mocetvā ‘‘etthevadāni naṃ ukkantitvā maṃsaṃ ādāya gamissāmī’’ti nirāsaṅko hutvā sākhāpalāsaṃ gahetuṃ āraddho. Migapotakopi uṭṭhāya catūhi pādehi ṭhatvā kāyaṃ vidhunitvā gīvaṃ pasāretvā mahāvātena chinnavalāhako viya vegena mātu santikaṃ agamāsi. Auch das Hirschkalb rührte sich, in der Schlinge gefangen, überhaupt nicht, sondern lag mit seiner breiten Flanke auf der Erde, streckte die Beine aus, scharrte ganz nahe bei den Beinen mit den Hufen, riss Erde und Gras auf, ließ Kot und Urin ab, ließ den Kopf hängen, streckte die Zunge heraus, machte seinen Körper mit Speichel nass und schleimig, blähte den Bauch auf, indem er Luft einzog, verdrehte die Augen, ließ den Atem durch das untere Nasenloch strömen, hielt den Atem im oberen Nasenloch zurück, machte den ganzen Körper starr und stellte sich tot. Auch die Schmeißfliegen umschwärmten ihn, und hier und da ließen sich Krähen auf ihm nieder. Der Jäger kam herbei, klopfte mit der Hand auf den Bauch und dachte: „Er muss schon sehr früh gefangen worden sein, er ist schon verwest.“ Er löste die Fesseln und dachte: „Hier werde ich ihn jetzt zerlegen, das Fleisch mitnehmen und gehen.“ Ohne jeden Verdacht begann er, belaubte Zweige abzuschneiden. Da erhob sich das Hirschkalb, stellte sich auf alle vier Beine, schüttelte seinen Körper, streckte den Hals und eilte mit der Schnelligkeit einer Wolke, die vom Sturmwind getrieben wird, zu seiner Mutter. Satthāpi [Pg.181] ‘‘na, bhikkhave, rāhulo idāneva sikkhākāmo, pubbepi sikkhākāmoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā bhāgineyyamigapotako rāhulo ahosi, mātā uppalavaṇṇā, mātulamigo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister verkündete diese Lehrrede mit den Worten: „Nicht erst jetzt, Mönche, ist Rāhula bestrebt, die Schulung einzuhalten, schon früher war er so bestrebt.“ Er stellte die Verbindung her und verknüpfte das Jātaka: „Damals war das Hirschkalb, der Neffe, Rāhula, die Mutter war Uppalavaṇṇā, der Onkel, der Hirsch, aber war ich selbst.“ Tipallatthamigajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Tipallattha-Miga-Jātaka, das sechste.
[17] 7. Mālutajātakavaṇṇanā [17] 7. Die Erklärung des Māluta-Jātaka. Kāḷe vā yadi vā juṇheti idaṃ satthā jetavane viharanto dve vuḍḍhapabbajite ārabbha kathesi. Te kira kosalajanapade ekasmiṃ araññāvāse vasanti. Eko kāḷatthero nāma, eko juṇhatthero nāma. Athekadivasaṃ juṇho kāḷaṃ pucchi ‘‘bhante kāḷa, sītaṃ nāma kasmiṃ kāle hotī’’ti. So ‘‘kāḷe hotī’’ti āha. Athekadivasaṃ kāḷo juṇhaṃ pucchi – ‘‘bhante juṇha, sītaṃ nāma kasmiṃ kāle hotī’’ti. So ‘‘juṇhe hotī’’ti āha. Te ubhopi attano kaṅkhaṃ chindituṃ asakkontā satthu santikaṃ gantvā satthāraṃ vanditvā ‘‘bhante, sītaṃ nāma kasmiṃ kāle hotī’’ti pucchiṃsu. Satthā tesaṃ kathaṃ sutvā ‘‘pubbepi ahaṃ, bhikkhave, tumhākaṃ imaṃ pañhaṃ kathesiṃ, bhavasaṅkhepagatattā pana na sallakkhayitthā’’ti vatvā atītaṃ āhari. "Ob in der dunklen Hälfte oder in der hellen" – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf zwei ältere Mönche. Diese lebten, wie man sagt, in einer Waldeinsiedelei im Kosala-Land. Einer hieß Kāḷa-Thera, der andere Juṇha-Thera. Eines Tages nun fragte Juṇha den Kāḷa: "Ehrwürdiger Kāḷa, zu welcher Zeit herrscht eigentlich Kälte?" Er antwortete: "In der dunklen Mondhälfte." An einem anderen Tag fragte Kāḷa den Juṇha: "Ehrwürdiger Juṇha, zu welcher Zeit herrscht eigentlich Kälte?" Er antwortete: "In der hellen Mondhälfte." Da beide nicht in der Lage waren, ihren Zweifel zu beseitigen, begaben sie sich zum Meister, erwiesen dem Meister ihre Ehrerbietung und fragten ihn: "Ehrwürdiger Herr, zu welcher Zeit herrscht eigentlich Kälte?" Als der Meister ihre Worte vernommen hatte, sprach er: "Mönche, auch in der Vergangenheit habe ich euch diese Frage bereits beantwortet. Doch wegen der Trübung durch den Wechsel der Existenzen habt ihr euch nicht daran erinnert." Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte ekasmiṃ pabbatapāde sīho ca byaggho ca dve sahāyā ekissāyeva guhāya vasanti. Tadā bodhisattopi isipabbajjaṃ pabbajitvā tasmiṃyeva pabbatapāde vasati. Athekadivasaṃ tesaṃ sahāyakānaṃ sītaṃ nissāya vivādo udapādi. Byaggho ‘‘kāḷeyeva sītaṃ hotī’’ti āha. Sīho ‘‘juṇheyeva sītaṃ hotī’’ti āha. Te ubhopi attano kaṅkhaṃ chindituṃ asakkontā bodhisattaṃ pucchiṃsu. Bodhisatto imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit lebten am Fuße eines Berges ein Löwe und ein Tiger, zwei Freunde, in ein und derselben Höhle. Zu jener Zeit hatte auch der Bodhisatta die Entsagung eines Sehers auf sich genommen und lebte an ebendiesem Bergfuß. Eines Tages nun entstand zwischen den beiden Freunden wegen der Kälte ein Streit. Der Tiger sagte: "Nur in der dunklen Mondhälfte wird es kalt." Der Löwe sagte: "Nur in der hellen Mondhälfte wird es kalt." Da beide nicht imstande waren, ihren Zweifel zu lösen, befragten sie den Bodhisatta. Der Bodhisatta sprach diese Strophe: 17. 17. ‘‘Kāḷe vā yadi vā juṇhe, yadā vāyati māluto; Vātajāni hi sītāni, ubhotthamaparājitā’’ti. "Ob in der dunklen Hälfte oder in der hellen – wann immer der Wind weht, [wird es kalt]. Denn die Kälte ist windgeboren; in dieser Frage habt ihr beide nicht verloren." Tattha [Pg.182] kāḷe vā yadi vā juṇheti kāḷapakkhe vā juṇhapakkhe vā. Yadā vāyati mālutoti yasmiṃ samaye puratthimādibhedo vāto vāyati, tasmiṃ samaye sītaṃ hoti. Kiṃkāraṇā? Vātajāni hi sītāni, yasmā vāte vijjanteyeva sītāni honti, kāḷapakkho vā juṇhapakkho vā ettha apamāṇanti vuttaṃ hoti. Ubhotthamaparājitāti ubhopi tumhe imasmiṃ pañhe aparājitāti. Evaṃ bodhisatto te sahāyake saññāpesi. Darin bedeutet "kāḷe vā yadi vā juṇhe": in der dunklen oder in der hellen Mondhälfte. "Yadā vāyati māluto" bedeutet: Zu welcher Zeit auch immer der Wind weht – sei es der Ostwind oder ein anderer –, zu jener Zeit wird es kalt. Aus welchem Grund? "Vātajāni hi sītāni": Weil Kälte nur dann existiert, wenn Wind weht, ist hierbei weder die dunkle noch die helle Mondhälfte das maßgebliche Kriterium; dies ist damit gemeint. "Ubhotthamaparājitā" bedeutet: Ihr beide seid in dieser Frage unbesiegt. Auf diese Weise brachte der Bodhisatta die beiden Freunde zur Einsicht. Satthāpi ‘‘bhikkhave, pubbepi mayā tumhākaṃ ayaṃ pañho kathito’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne dvepi therā sotāpattiphale patiṭṭhahiṃsu. Satthā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā byaggho kāḷo ahosi, sīho juṇho, pañhavissajjanakatāpaso pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: "Mönche, schon in der Vergangenheit wurde diese Frage von mir für euch beantwortet." Nachdem er diese Lehrrede dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten gründeten sich die beiden Älteren in der Frucht des Stromeintritts. Der Meister stellte die Verbindung der Existenzen her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: "Damals war der Tiger Kāḷa, der Löwe war Juṇha, der die Frage beantwortende Asket aber war ich selbst." Mālutajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Māluta-Jātaka, die siebte.
[18] 8. Matakabhattajātakavaṇṇanā [18] 8. Die Erklärung des Matakabhatta-Jātaka Evaṃ ce sattā jāneyyunti idaṃ satthā jetavane viharanto matakabhattaṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi kāle manussā bahū ajeḷakādayo māretvā kālakate ñātake uddissa matakabhattaṃ nāma denti. Bhikkhū te manusse tathā karonte disvā satthāraṃ pucchiṃsu ‘‘etarahi, bhante, manussā bahū pāṇe jīvitakkhayaṃ pāpetvā matakabhattaṃ nāma denti. Atthi nu kho, bhante, ettha vuḍḍhī’’ti? Satthā ‘‘na, bhikkhave, ‘matakabhattaṃ dassāmā’ti katepi pāṇātipāte kāci vuḍḍhi nāma atthi, pubbe paṇḍitā ākāse nisajja dhammaṃ desetvā ettha ādīnavaṃ kathetvā sakalajambudīpavāsike etaṃ kammaṃ jahāpesuṃ. Idāni pana bhavasaṅkhepagatattā puna pātubhūta’’nti vatvā atītaṃ āhari. "Wenn die Wesen nur wüssten..." – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf das Totenmahl (matakabhatta). Zu jener Zeit nämlich töteten die Menschen viele Ziegen, Schafe und andere Tiere, um sie im Gedenken an ihre verstorbenen Verwandten als sogenanntes Totenmahl darzubringen. Als die Mönche sahen, wie die Menschen so handelten, fragten sie den Erhabenen: "Ehrwürdiger Herr, gegenwärtig bringen die Menschen viele Lebewesen um ihr Leben, um ein sogenanntes Totenmahl darzubringen. Gibt es darin, ehrwürdiger Herr, irgendeinen Segen?" Der Meister sprach: "Nein, Mönche, selbst wenn man denkt: 'Ich will ein Totenmahl darbieten', gibt es beim Töten von Lebewesen keinerlei Nutzen. In der Vergangenheit saßen Weise in der Luft, predigten das Dhamma, legten die Mängel dieses Tuns dar und brachten die Bewohner des gesamten Jambudīpa dazu, diese Praxis aufzugeben. Nun aber ist sie wegen der Trübung durch den Wechsel der Existenzen wieder in Erscheinung getreten." Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente eko tiṇṇaṃ vedānaṃ pāragū disāpāmokkho ācariyabrāhmaṇo ‘‘matakabhattaṃ dassāmī’’ti ekaṃ eḷakaṃ gāhāpetvā antevāsike āha – ‘‘tātā, imaṃ eḷakaṃ nadiṃ [Pg.183] netvā nhāpetvā kaṇṭhe mālaṃ parikkhipitvā pañcaṅgulikaṃ datvā maṇḍetvā ānethā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā taṃ ādāya nadiṃ gantvā nhāpetvā maṇḍetvā nadītīre ṭhapesuṃ. So eḷako attano pubbakammaṃ disvā ‘‘evarūpā nāma dukkhā ajja muccissāmī’’ti somanassajāto mattikāghaṭaṃ bhindanto viya mahāhasitaṃ hasitvā puna ‘‘ayaṃ brāhmaṇo maṃ ghātetvā mayā laddhadukkhaṃ labhissatī’’ti brāhmaṇe kāruññaṃ uppādetvā mahantena saddena parodi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wollte ein weltberühmter Brahmanenlehrer, der die drei Veden gemeistert hatte, ein Totenmahl darbieten. Er ließ einen Widder fangen und sprach zu seinen Schülern: "Liebe Söhne, bringt diesen Widder zum Fluss, badet ihn, hängt ihm einen Kranz um den Hals, zeichnet ihn mit Fünffinger-Abdrücken aus, schmückt ihn und bringt ihn her." Sie willigten mit den Worten "Sehr wohl" ein, nahmen ihn mit, gingen zum Fluss, badeten und schmückten ihn und stellten ihn am Flussufer ab. Da erblickte jener Widder sein früheres Karma und dachte voll Freude: "Heute werde ich von solchem Leiden befreit werden!" Er lachte laut auf, als würde ein Tonkrug zerschlagen. Doch dann dachte er: "Dieser Brahmane wird, nachdem er mich getötet hat, das gleiche Leiden erleiden, das ich erlitten habe." Er empfand tiefes Mitgefühl für den Brahmanen und weinte mit lauter Stimme. Atha naṃ te māṇavā pucchiṃsu ‘‘samma eḷaka, tvaṃ mahāsaddena hasi ceva rodi ca, kena nu kho kāraṇena hasi, kena kāraṇena parodī’’ti? ‘‘Tumhe maṃ imaṃ kāraṇaṃ attano ācariyassa santike puccheyyāthā’’ti. Te taṃ ādāya gantvā idaṃ kāraṇaṃ ācariyassa ārocesuṃ. Ācariyo tesaṃ vacanaṃ sutvā eḷakaṃ pucchi ‘‘kasmā tvaṃ eḷaka, hasi, kasmā rodī’’ti? Eḷako attanā katakammaṃ jātissarañāṇena anussaritvā brāhmaṇassa kathesi ‘‘ahaṃ, brāhmaṇa, pubbe tādisova mantajjhāyakabrāhmaṇo hutvā ‘matakabhattaṃ dassāmī’ti ekaṃ eḷakaṃ māretvā matakabhattaṃ adāsiṃ, svāhaṃ ekassa eḷakassa ghātitattā ekenūnesu pañcasu attabhāvasatesu sīsacchedaṃ pāpuṇiṃ, ayaṃ me koṭiyaṃ ṭhito pañcasatimo attabhāvo, svāhaṃ ‘ajja evarūpā dukkhā muccissāmī’ti somanassajāto iminā kāraṇena hasiṃ. Rodanto pana ‘ahaṃ tāva ekaṃ eḷakaṃ māretvā pañca jātisatāni sīsacchedadukkhaṃ patvā ajja tamhā dukkhā muccissāmi, ayaṃ pana brāhmaṇo maṃ māretvā ahaṃ viya pañca jātisatāni sīsacchedadukkhaṃ labhissatī’ti tayi kāruññena rodi’’nti. ‘‘Eḷaka, mā bhāyi, nāhaṃ taṃ māressāmī’’ti. ‘‘Brāhmaṇa, kiṃ vadesi, tayi mārentepi amārentepi na sakkā ajja mayā maraṇā muccitu’’nti. ‘‘Eḷaka, mā bhāyi, ahaṃ te ārakkhaṃ gahetvā tayā saddhiṃyeva vicarissāmī’’ti. ‘‘Brāhmaṇa, appamattako tava ārakkho, mayā katapāpaṃ pana mahantaṃ balava’’nti. Da fragten ihn jene jungen Brahmanenschüler: "Freund Widder, du hast laut gelacht und auch geweint; aus welchem Grund hast du gelacht und aus welchem Grund hast du geweint?" "Fragt mich nach diesem Grund im Beisein eures Lehrers." Sie nahmen ihn mit sich, gingen zum Lehrer und berichteten ihm von dieser Angelegenheit. Als der Lehrer ihre Worte gehört hatte, fragte er den Widder: "Widder, warum hast du gelacht und warum hast du geweint?" Der Widder erinnerte sich durch das Wissen der Erinnerung an frühere Geburten an seine eigene Tat und sprach zum Brahmanen: "Brahmane, in der Vergangenheit war ich ein ebenso die Mantren rezitierender Brahmane wie du. Um ein Totenmahl darzubieten, tötete ich einen Widder und gab das Totenmahl. Weil ich diesen einen Widder getötet hatte, erlitt ich in fünfhundert um eines verringerten Existenzen die Enthauptung. Dies hier ist meine fünfhundertste Existenz, die letzte in dieser Reihe. Voller Freude darüber, dass ich heute von solchem Leiden befreit werde, habe ich aus diesem Grund gelacht. Dass ich aber weinte, geschah aus Mitgefühl mit dir, Brahmane, denn ich dachte: 'Ich habe nur einen einzigen Widder getötet und musste fünfhundert Existenzen lang das Leid der Enthauptung ertragen, um heute endlich von diesem Leid befreit zu werden. Dieser Brahmane aber wird mich töten und genau wie ich fünfhundert Existenzen lang das Leid der Enthauptung erleiden.'" "Widder, fürchte dich nicht, ich werde dich nicht töten!", sprach der Brahmane. "Brahmane, was sagst du da? Ob du mich tötest oder nicht, es ist mir heute unmöglich, dem Tod zu entrinnen." "Widder, fürchte dich nicht, ich werde dich beschützen und nur noch gemeinsam mit dir umherwandern." "Brahmane, dein Schutz ist nur von geringem Wert, das von mir begangene schlechte Karma aber ist groß und mächtig." Brāhmaṇo eḷakaṃ muñcitvā ‘‘imaṃ eḷakaṃ kassacipi māretuṃ na dassāmī’’ti antevāsike ādāya eḷakeneva saddhiṃ vicari. Eḷako vissaṭṭhamattova ekaṃ pāsāṇapiṭṭhiṃ nissāya jātagumbe gīvaṃ ukkhipitvā paṇṇāni khādituṃ āraddho. Taṅkhaṇaññeva tasmiṃ pāsāṇapiṭṭhe asani pati, tato [Pg.184] ekā pāsāṇasakalikā chijjitvā eḷakassa pasāritagīvāya patitvā sīsaṃ chindi, mahājano sannipati. Tadā bodhisatto tasmiṃ ṭhāne rukkhadevatā hutvā nibbatto. So passantasseva tassa mahājanassa devatānubhāvena ākāse pallaṅkena nisīditvā ‘‘ime sattā evaṃ pāpassa phalaṃ jānamānā appevanāma pāṇātipātaṃ na kareyyu’’nti madhurassarena dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Nachdem der Brahmane den Widder freigelassen hatte, dachte er: „Ich werde niemandem erlauben, diesen Widder zu töten“, nahm seine Schüler mit sich und wanderte zusammen mit dem Widder umher. Sobald der Widder freigelassen worden war, streckte er an einem Gebüsch, das an einer Felsplatte wuchs, den Hals empor und begann, Blätter zu fressen. Genau in jenem Augenblick schlug ein Blitz in jene Felsplatte ein. Daraufhin spaltete sich ein Steinsplitter ab, fiel auf den ausgestreckten Hals des Widders und trennte den Kopf ab. Eine große Menschenmenge kam zusammen. Damals war der Bodhisatta an jenem Ort als Baumgottheit wiedergeboren. Vor den Augen der versammelten Menschenmenge setzte er sich durch seine göttliche Macht mit gekreuzten Beinen in die Luft und verkündete mit süßer Stimme die Lehre, um zu zeigen: „Wenn diese Wesen doch die Frucht des bösen Tuns so erkennen würden, würden sie gewiss kein Lebewesen mehr töten!“, und sprach diese Strophe: 18. 18. ‘‘Evaṃ ce sattā jāneyyuṃ, dukkhāyaṃ jātisambhavo; Na pāṇo pāṇinaṃ haññe, pāṇaghātī hi socatī’’ti. „Wenn die Wesen doch so wüssten: 'Leidvoll ist diese Entstehung der Geburt'; kein Lebewesen sollte ein anderes Lebewesen töten, denn wer Leben vernichtet, leidet Kummer.“ Tattha evaṃ ce sattā jāneyyunti ime sattā evaṃ ce jāneyyuṃ. Kathaṃ? Dukkhāyaṃ jātisambhavoti ayaṃ tattha tattha jāti ca jātassa anukkamena vaḍḍhisaṅkhāto sambhavo ca jarābyādhimaraṇaappiyasampayogapiyavippayogahatthapādacchedādīnaṃ dukkhānaṃ vatthubhūtattā ‘‘dukkho’’ti yadi jāneyyuṃ. Na pāṇo pāṇinaṃ haññeti ‘‘paraṃ vadhanto jātisambhave vadhaṃ labhati, pīḷento pīḷaṃ labhatī’’ti jātisambhavassa dukkhavatthutāya dukkhabhāvaṃ jānanto koci pāṇo aññaṃ pāṇinaṃ na haññe, satto sattaṃ na haneyyāti attho. Kiṃkāraṇā? Pāṇaghātī hi socatīti, yasmā sāhatthikādīsu chasu payogesu yena kenaci payogena parassa jīvitindriyupacchedanena pāṇaghātī puggalo aṭṭhasu mahānirayesu soḷasasu ussadanirayesu nānappakārāya tiracchānayoniyā pettivisaye asurakāyeti imesu catūsu apāyesu mahādukkhaṃ anubhavamāno dīgharattaṃ antonijjhāyanalakkhaṇena sokena socati. Yathā vāyaṃ eḷako maraṇabhayena socati, evaṃ dīgharattaṃ socatītipi ñatvā na pāṇo pāṇinaṃ haññe, koci pāṇātipātakammaṃ nāma na kareyya. Mohena pana mūḷhā avijjāya andhīkatā imaṃ ādīnavaṃ apassantā pāṇātipātaṃ karontīti. Darin bedeutet „Wenn die Wesen doch so wüssten“ (evaṃ ce sattā jāneyyuṃ): Wenn diese Wesen doch so wissen würden. Wie? „Leidvoll ist diese Entstehung der Geburt“ (dukkhāyaṃ jātisambhavo): Wenn sie wissen würden, dass diese Geburt in den verschiedenen Daseinsbereichen sowie das Heranwachsen, welches als die allmähliche Entwicklung des Geborenen bezeichnet wird, „leidvoll“ ist, weil es die Grundlage für Leiden wie Alter, Krankheit, Tod, Verbindung mit Ungeliebtem, Trennung vom Geliebten, das Abhacken von Händen und Füßen und Ähnliches darstellt. „Kein Lebewesen sollte ein anderes Lebewesen töten“ (na pāṇo pāṇinaṃ haññe): Wenn man versteht, dass die Entstehung der Geburt eine Grundlage des Leidens ist, und somit deren leidvollen Charakter erkennt – nämlich, dass derjenige, der einen anderen tötet, bei seiner eigenen zukünftigen Geburt getötet wird, und derjenige, der andere quält, selbst Qualen erleidet –, dann sollte kein Lebewesen ein anderes Lebewesen töten, das heißt, kein Wesen sollte ein anderes Wesen erschlagen. Aus welchem Grund? „Denn wer Leben vernichtet, leidet Kummer“ (pāṇaghātī hi socati): Weil eine Person, die Leben vernichtet, indem sie durch eine der sechs Methoden des Tötens – wie die Ausführung mit eigener Hand – die Lebenskraft eines anderen zerstört, großes Leid in den acht großen Höllen, den sechzehn Nebenhöllen, in den verschiedenen Tiergattungen, im Reich der hungrigen Geister und in der Schar der Asuras erfährt. In diesen vier niederen Welten leidet sie lange Zeit unter einem Kummer, dessen Merkmal das innere Verbrennen ist. Wenn man erkennt: „Ebenso wie dieser Widder aus Todesfurcht leidet, so wird jener für lange Zeit leiden“, sollte kein Lebewesen ein anderes Lebewesen töten, und niemand sollte die Tat des Lebensvernichtens begehen. Doch durch Verblendung verwirrt und durch Unwissenheit blind gemacht, sehen die Menschen dieses Elend nicht und begehen die Vernichtung von Leben. Evaṃ mahāsatto nirayabhayena tajjetvā dhammaṃ desesi. Manussā taṃ dhammadesanaṃ sutvā nirayabhayabhītā pāṇātipātā viramiṃsu. Bodhisattopi dhammaṃ desetvā mahājanaṃ sīle patiṭṭhāpetvā yathākammaṃ gato, mahājanopi bodhisattassa ovāde ṭhatvā dānādīni puññāni katvā [Pg.185] devanagaraṃ pūresi. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘ahaṃ tena samayena rukkhadevatā ahosi’’nti. So predigte das Große Wesen die Lehre, indem es sie mit der Furcht vor der Hölle schreckte. Als die Menschen diese Lehrverkündigung hörten, fürchteten sie sich vor den Schrecken der Hölle und ließen von der Vernichtung des Lebens ab. Auch der Bodhisatta ging, nachdem er die Lehre verkündet und die Menschen in der Tugend gefestigt hatte, gemäß seinem Kamma fort. Die Menschen hielten sich an die Unterweisung des Bodhisatta, taten verdienstvolle Werke wie das Geben von Almosen und bevölkerten die Himmelsstadt. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Zu jener Zeit war ich die Baumgottheit.“ Matakabhattajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Matakabhatta-Jātaka ist die achte.
[19] 9. Āyācitabhattajātakavaṇṇanā [19] 9. Die Erklärung des Āyācitabhatta-Jātaka Sace mucce pecca mucceti idaṃ satthā jetavane viharanto devatānaṃ āyācanabalikammaṃ ārabbha kathesi. Tadā kira manussā vaṇijjāya gacchantā pāṇe vadhitvā devatānaṃ balikammaṃ katvā ‘‘mayaṃ anantarāyena atthasiddhiṃ patvā āgantvā puna tumhākaṃ balikammaṃ karissāmā’’ti āyācitvā gacchanti. Tatthānantarāyena atthasiddhiṃ patvā āgatā ‘‘devatānubhāvena idaṃ jāta’’nti maññamānā bahū pāṇe vadhitvā āyācanato muccituṃ balikammaṃ karonti, taṃ disvā bhikkhū ‘‘atthi nu kho, bhante, ettha attho’’ti bhagavantaṃ pucchiṃsu. Bhagavā atītaṃ āhari. Der Meister verkündete diese Lehre mit den Worten „Wenn du befreit sein willst, sei im Jenseits befreit“, während er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf das Geloben und Opfern für die Gottheiten. Damals, so heißt es, töteten die Menschen, wenn sie auf Handelsreisen gingen, Lebewesen und brachten den Gottheiten Opfer dar, wobei sie beteten: „Wenn wir ohne Hindernisse unseren Erfolg erzielt haben und zurückgekehrt sind, werden wir euch wieder ein Opfer darbringen“, und machten sich dann auf den Weg. Diejenigen unter ihnen, die ohne Hindernisse Erfolg erzielt hatten und zurückgekehrt waren, glaubten: „Dies ist durch die Macht der Gottheit geschehen“, töteten viele Lebewesen und brachten ein Opfer dar, um sich von ihrem Gelübde zu befreien. Als die Mönche dies sahen, fragten sie den Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, liegt in diesem Opfer irgendein Nutzen?“ Der Erhabene trug eine Geschichte aus der Vergangenheit vor: Atīte kāsiraṭṭhe ekasmiṃ gāmake kuṭumbiko gāmadvāre ṭhitanigrodharukkhe devatāya balikammaṃ paṭijānitvā anantarāyena āgantvā bahū pāṇe vadhitvā ‘‘āyācanato muccissāmī’’ti rukkhamūlaṃ gato. Rukkhadevatā khandhaviṭape ṭhatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit versprach ein Gutsherr in einem Dorf im Kasi-Reich der Gottheit eines Banyanbaumes, der am Dorfeingang stand, ein Opfer. Nachdem er ohne Hindernisse zurückgekehrt war, tötete er viele Lebewesen und ging zum Fuß des Baumes, um sich von seinem Gelübde zu befreien. Die Baumgottheit stellte sich in die Astgabel des Baumes und sprach diese Strophe: 19. 19. ‘‘Sace mucce pecca mucce, muccamāno hi bajjhati; Na hevaṃ dhīrā muccanti, mutti bālassa bandhana’’nti. „Wenn du befreit sein willst, sei im Jenseits befreit; wer sich so befreit, wird wahrlich gebunden. Nicht auf diese Weise befreien sich die Weisen; die Befreiung des Toren ist eine Fessel.“ Tattha sace mucce pecca mucceti bho purisa, tvaṃ sace mucce yadi muccitukāmosi. Pecca mucceti yathā paraloke na bajjhasi, evaṃ muccāhi. Muccamāno hi bajjhatīti yathā pana tvaṃ pāṇaṃ vadhitvā muccituṃ icchasi, evaṃ muccamāno hi pāpakammena bajjhati. Tasmā na hevaṃ dhīrā muccantīti ye paṇḍitapurisā, te evaṃ paṭissavato na muccanti. Kiṃkāraṇā? Evarūpā hi mutti bālassa bandhanaṃ, esā pāṇātipātaṃ katvā mutti nāma bālassa bandhanameva hotīti dhammaṃ desesi. Tato [Pg.186] paṭṭhāya manussā evarūpā pāṇātipātakammā viratā dhammaṃ caritvā devanagaraṃ pūrayiṃsu. Darin bedeutet „Wenn du befreit sein willst, sei im Jenseits befreit“ (sace mucce pecca mucce): O Mann, wenn du dich von deinem Gelübde befreien willst. „Sei im Jenseits befreit“ (pecca mucce) bedeutet: Befreie dich so, dass du in der jenseitigen Welt nicht gebunden wirst. „Wer sich so befreit, wird wahrlich gebunden“ (muccamāno hi bajjhati) bedeutet: So wie du dich befreien willst, indem du ein Lebewesen tötest, so wird sich derjenige, der sich auf diese Weise befreit, wahrlich durch die böse Tat binden. Darum bedeutet „Nicht auf diese Weise befreien sich die Weisen“ (na hevaṃ dhīrā muccanti): Die weisen Menschen befreien sich nicht auf diese Weise von einem Versprechen. Aus welchem Grund? Denn eine Befreiung dieser Art ist eine Fessel für den Toren; diese sogenannte Befreiung durch die Vernichtung von Leben ist in Wahrheit eine Fessel für den Toren. So verkündete die Gottheit die Lehre. Von da an ließen die Menschen von solchen Taten der Lebensvernichtung ab, lebten gemäß der Lehre und bevölkerten die Himmelsstadt. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘ahaṃ tena samayena rukkhadevatā ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Zu jener Zeit war ich die Baumgottheit.“ Āyācitabhattajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Āyācitabhatta-Jātaka ist die neunte.
[20] 10. Naḷapānajātakavaṇṇanā [20] 10. Die Erklärung des Naḷapāna-Jātaka Disvā padamanuttiṇṇanti idaṃ satthā kosalesu cārikaṃ caramāno naḷakapānagāmaṃ patvā naḷakapānapokkharaṇiyaṃ ketakavane viharanto naḷadaṇḍake ārabbha kathesi. Tadā kira bhikkhū naḷakapānapokkharaṇiyaṃ nhatvā sūcigharatthāya sāmaṇerehi naḷadaṇḍake gāhāpetvā te sabbatthakameva chidde disvā satthāraṃ upasaṅkamitvā ‘‘bhante, mayaṃ sūcigharatthāya naḷadaṇḍake gaṇhāpema, te mūlato yāva aggā sabbatthakameva chiddā, kiṃ nu kho eta’’nti pucchiṃsu. Satthā ‘‘idaṃ, bhikkhave, mayhaṃ porāṇakaadhiṭṭhāna’’nti vatvā atītaṃ āhari. Der Meister verkündete diese Lehre mit den Worten „Als ich sah, dass die Spuren nicht hinüberführten“, während er im Kosala-Land umherwanderte, das Dorf Naḷakapāna erreichte und im Ketaka-Wald nahe dem Teich von Naḷakapāna verweilte, in Bezug auf die Schilfrohre. Damals, so heißt es, badeten die Mönche im Teich von Naḷakapāna und ließen von den Novizen Schilfrohre holen, um daraus Nadelbüchsen herzustellen. Als sie sahen, dass diese über ihre gesamte Länge hinweg hohl waren, traten sie vor den Meister und fragten: „Ehrwürdiger Herr, wir ließen Schilfrohre für Nadelbüchsen holen. Diese sind von der Wurzel bis zur Spitze gänzlich hohl. Wie kann das sein?“ Der Meister sprach: „Das, ihr Mönche, ist mein Entschluss aus alter Zeit“, und trug eine Geschichte aus der Vergangenheit vor: Pubbe kira so vanasaṇḍo arañño ahosi. Tassāpi pokkharaṇiyā eko dakarakkhaso otiṇṇotiṇṇe khādati. Tadā bodhisatto rohitamigapotakappamāṇo kapirājā hutvā asītisahassamattavānaraparivuto yūthaṃ pariharanto tasmiṃ araññe vasati. So vānaragaṇassa ovādaṃ adāsi ‘‘tātā, imasmiṃ araññe visarukkhāpi amanussapariggahitapokkharaṇiyopi honti, tumhe akhāditapubbaṃ phalāphalaṃ khādantā vā apītapubbaṃ pānīyaṃ pivantā vā maṃ paṭipuccheyyāthā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā ekadivasaṃ agatapubbaṭṭhānaṃ gatā tattha bahudeva divasaṃ caritvā pānīyaṃ gavesamānā ekaṃ pokkharaṇiṃ disvā pānīyaṃ apivitvāva bodhisattassāgamanaṃ olokayamānā nisīdiṃsu. Bodhisatto āgantvā ‘‘kiṃ tātā, pānīyaṃ na pivathā’’ti āha. ‘‘Tumhākaṃ āgamanaṃ olokemā’’ti. ‘‘Suṭṭhu, tātā’’ti bodhisatto pokkharaṇiṃ āvijjhitvā padaṃ paricchindanto otiṇṇameva passi, na uttiṇṇaṃ. So ‘‘nissaṃsayaṃ esā amanussapariggahitā’’ti ñatvā ‘‘suṭṭhu vo kataṃ, tātā, pānīyaṃ apivantehi, amanussapariggahitā aya’’nti āha. Es heißt, vorzeiten war dieses Dickicht ein wilder Wald. In jenem Lotusteich lebte ein Wasserdämon, der jeden fraß, der hineinstieg. Damals wurde der Bodhisatta als ein Affenkönig von der Größe eines jungen Rohita-Hirsches geboren. Er führte eine Herde von etwa achtzigtausend Affen an und lebte in jenem Wald. Er gab der Affenschar folgende Ermahnung: „Liebe Kinder, in diesem Wald gibt es giftige Bäume und auch Lotusteiche, die von Dämonen besetzt sind. Wenn ihr Früchte essen wollt, die ihr noch nie zuvor gegessen habt, oder Wasser trinken wollt, das ihr noch nie zuvor getrunken habt, solltet ihr mich zuerst fragen.“ Sie willigten mit den Worten „Sehr wohl!“ ein. Eines Tages gelangten sie an einen Ort, den sie zuvor noch nie besucht hatten. Nachdem sie dort den ganzen Tag umhergestreift waren und nach Wasser gesucht hatten, erblickten sie einen Lotusteich, tranken jedoch kein Wasser, sondern setzten sich hin und warteten auf die Ankunft des Bodhisatta. Als der Bodhisatta eintraf, fragte er: „Liebe Kinder, warum trinkt ihr kein Wasser?“ Sie antworteten: „Wir warten auf Eure Ankunft.“ „Gut gemacht, liebe Kinder!“, sagte der Bodhisatta. Er ging um den Lotusteich herum, um die Spuren zu prüfen, und sah nur Spuren, die hineinführten, aber keine, die wieder herausführten. Da erkannte er: „Zweifellos ist dieser Teich von einem Dämon besetzt“, und sagte: „Ihr habt wohlgetan, liebe Kinder, dass ihr das Wasser nicht getrunken habt. Dieser Teich ist von einem Dämon besetzt.“ Dakarakkhasopi [Pg.187] tesaṃ anotaraṇabhāvaṃ ñatvā nīlodaro paṇḍaramukho surattahatthapādo bībhacchadassano hutvā udakaṃ dvidhā katvā nikkhamitvā ‘‘kasmā nisinnāttha, otaritvā pānīyaṃ pivathā’’ti āha. Atha naṃ bodhisatto pucchi ‘‘tvaṃ idha nibbattadakarakkhasosī’’ti? ‘‘Āma, aha’’nti. ‘‘Tvaṃ pokkharaṇiṃ otiṇṇake labhasī’’ti? ‘‘Āma, labhāmi, ahaṃ idhotiṇṇaṃ antamaso sakuṇikaṃ upādāya na kiñci muñcāmi, tumhepi sabbe khādissāmī’’ti. ‘‘Na mayaṃ attānaṃ tuyhaṃ khādituṃ dassāmā’’ti. ‘‘Pānīyaṃ pana pivissathā’’ti. ‘‘Āma, pānīyaṃ pivissāma, na ca te vasaṃ gamissāmā’’ti. ‘‘Atha kathaṃ pānīyaṃ pivissathā’’ti? Kiṃ pana tvaṃ maññasi ‘‘otaritvā pivissantī’’ti. ‘‘Mayañhi anotaritvā asītisahassānipi ekamekaṃ naḷadaṇḍakaṃ gahetvā uppalanāḷena udakaṃ pivantā viya tava pokkharaṇiyā pānīyaṃ pivissāma, evaṃ no tvaṃ khādituṃ na sakkhissasī’’ti. Etamatthaṃ viditvā satthā abhisambuddho hutvā imissā gāthāya purimapadadvayaṃ abhāsi – Auch der Wasserdämon bemerkte, dass sie nicht hinabstiegen. Er nahm eine schreckliche Gestalt an – mit blauem Bauch, weißem Gesicht und leuchtend roten Händen und Füßen –, teilte das Wasser, stieg heraus und sprach: „Warum sitzt ihr hier herum? Steigt hinab und trinkt das Wasser!“ Da fragte ihn der Bodhisatta: „Bist du der Wasserdämon, der hier geboren wurde?“ „Ja, das bin ich“, antwortete er. „Erhältst du das Recht, jeden zu fressen, der in diesen Lotusteich hinabsteigt?“ „Ja, das tue ich. Ich lasse niemanden entkommen, der hier hinabsteigt, selbst einen winzigen Vogel nicht. Auch euch alle werde ich fressen!“ „Wir werden uns nicht von dir fressen lassen“, sagte der Bodhisatta. „But werdet ihr denn kein Wasser trinken?“, fragte der Dämon. „Doch, wir werden das Wasser trinken, aber wir werden nicht unter deine Gewalt geraten!“ „Wie wollt ihr denn dann das Wasser trinken?“ „Glaubst du etwa, dass wir hinabsteigen werden, um zu trinken? Wir alle, achtzigtausend Affen, werden, ohne hinabzusteigen, jeweils ein Schilfrohr nehmen und das Wasser aus deinem Lotusteich trinken, so als ob wir Wasser durch einen Lotusstängel trinken würden. Auf diese Weise wirst du uns nicht fressen können.“ Als der Meister diesen Sachverhalt erkannt hatte, sprach er, nachdem er die vollkommene Erleuchtung erlangt hatte, die ersten zwei Zeilen dieses Verses: 20. 20. ‘‘Disvā padamanuttiṇṇaṃ, disvānotaritaṃ pada’’nti. „Da er die Spur sah, die nicht herausführte, und da er die Spur sah, die hineinführte...“ Tassattho – bhikkhave, so kapirājā tassā pokkharaṇiyā ekampi uttiṇṇapadaṃ nāddasa, otaritaṃ pana otiṇṇapadameva addasa. Evaṃ disvā padaṃ anuttiṇṇaṃ disvāna otaritaṃ padaṃ ‘‘addhāyaṃ pokkharaṇī amanussapariggahitā’’ti ñatvā tena saddhiṃ sallapanto sapariso āha – Die Bedeutung davon ist: Ihr Mönche, jener Affenkönig sah an diesem Lotusteich nicht eine einzige Spur, die herausführte, sondern sah nur Spuren, die hineinführten. Da er so die nicht herausführende Spur sah und die hineinführende Spur sah, erkannte er: „Sicherlich ist dieser Lotusteich von einem Dämon besetzt.“ Während er mit jenem sprach, sagte er zusammen mit seinem Gefolge: ‘‘Naḷena vāriṃ pissāmā’’ti; „Mit dem Schilfrohr wollen wir Wasser trinken.“ Tassattho – mayaṃ tava pokkharaṇiyaṃ naḷena pānīyaṃ pivissāmāti. Puna mahāsatto āha – Die Bedeutung davon ist: „Wir werden das Wasser in deinem Lotusteich mit einem Schilfrohr trinken.“ Weiter sprach das Große Wesen: ‘‘Neva maṃ tvaṃ vadhissasī’’ti; „Niemals wirst du mich töten!“ Evaṃ naḷena pānīyaṃ pivantaṃ saparisampi maṃ tvaṃ neva vadhissasīti attho. Dies bedeutet: „Mich, der ich zusammen mit meinem Gefolge auf diese Weise durch ein Schilfrohr Wasser trinke, wirst du niemals töten können.“ Evañca pana vatvā bodhisatto ekaṃ naḷadaṇḍakaṃ āharāpetvā pāramiyo āvajjetvā saccakiriyaṃ katvā mukhena dhami, naḷo anto kiñci gaṇṭhiṃ asesetvā sabbatthakameva susiro ahosi. Iminā niyāmena aparampi aparampi āharāpetvā mukhena dhamitvā adāsi. Evaṃ santepi na sakkā niṭṭhāpetuṃ, tasmā evaṃ na gahetabbaṃ. Bodhisatto pana ‘‘imaṃ pokkharaṇiṃ parivāretvā jātā sabbepi naḷā ekacchiddā hontū’’ti adhiṭṭhāsi[Pg.188]. Bodhisattānañhi hitūpacārassa mahantatāya adhiṭṭhānaṃ samijjhati. Tato paṭṭhāya sabbepi taṃ pokkharaṇiṃ parivāretvā uṭṭhitanaḷā ekacchiddā jātā. Imasmiñhi kappe cattāri kappaṭṭhiyapāṭihāriyāni nāma. Katamāni cattāri? Cande sasalakkhaṇaṃ sakalampi imaṃ kappaṃ ṭhassati, vaṭṭakajātake aggino nibbutaṭṭhānaṃ sakalampi imaṃ kappaṃ aggi na jhāyissati, ghaṭīkāranivesanaṭṭhānaṃ sakalampi imaṃ kappaṃ anovassakaṃ ṭhassati, imaṃ pokkharaṇiṃ parivāretvā uṭṭhitanaḷā sakalampi imaṃ kappaṃ ekacchiddā bhavissantīti imāni cattāri kappaṭṭhiyapāṭihāriyāni nāma. Nachdem der Bodhisatta dies gesagt hatte, ließ er ein Schilfrohr bringen, dachte an seine Vollkommenheiten, legte ein Wahrheitsgelübde ab und blies mit seinem Mund hinein. Das Schilfrohr wurde innen völlig hohl, ohne dass auch nur ein einziger Knoten zurückblieb. Auf diese Weise ließ er ein Rohr nach dem anderen bringen, blies hinein und gab sie den Affen. Doch selbst auf diese Weise hätte er die Arbeit nicht beenden können; daher sollte man es nicht so verstehen. Der Bodhisatta fasste vielmehr den Entschluss: „Mögen alle Schilfrohre, die um diesen Lotusteich herum wachsen, durchgehend hohl sein!“ Denn aufgrund der Größe des gemeinnützigen Wirkens der Bodhisattas geht ihr Entschluss in Erfüllung. Seit jener Zeit wuchsen alle Schilfrohre, die diesen Lotusteich umgaben, durchgehend hohl heran. In diesem Weltzeitalter gibt es nämlich vier sogenannte weltzeitalterüberdauernde Wunder. Welche vier sind das? Das Zeichen des Hasen im Mond wird dieses gesamte Weltzeitalter überdauern; die Stelle im Vaṭṭaka-Jātaka, an der das Feuer erlosch, wird dieses gesamte Weltzeitalter hindurch von keinem Feuer mehr verbrannt werden; der Ort von Ghaṭīkāras Haus wird dieses gesamte Weltzeitalter hindurch regengeschützt bleiben; und die Schilfrohre, die diesen Lotusteich umgeben, werden dieses gesamte Weltzeitalter hindurch durchgehend hohl sein. Dies sind die vier sogenannten weltzeitalterüberdauernden Wunder. Bodhisatto evaṃ adhiṭṭhahitvā ekaṃ naḷaṃ ādāya nisīdi. Tepi asītisahassavānarā ekekaṃ ādāya pokkharaṇiṃ parivāretvā nisīdiṃsu. Tepi bodhisattassa naḷena ākaḍḍhitvā pānīyaṃ pivanakāle sabbe tīre nisinnāva piviṃsu. Evaṃ tehi pānīye pivite dakarakkhaso kiñci alabhitvā anattamano sakanivesanameva gato. Bodhisattopi saparivāro araññameva pāvisi. Nachdem der Bodhisatta diesen Entschluss gefasst hatte, nahm er ein Schilfrohr und setzte sich nieder. Auch jene achtzigtausend Affen nahmen sich jeweils ein Schilfrohr, umringten den Lotusteich und setzten sich nieder. Als der Bodhisatta das Wasser durch das Schilfrohr emporzog und trank, tranken sie alle ebenso, während sie am Ufer saßen. Als sie auf diese Weise das Wasser getrunken hatten, konnte der Wasserdämon niemanden fangen; unzufrieden kehrte er in seine eigene Behausung zurück. Auch der Bodhisatta zog mit seinem Gefolge wieder in den Wald hinein. Satthā pana ‘‘imesaṃ, bhikkhave, naḷānaṃ ekacchiddabhāvo nāma mayhamevetaṃ porāṇakaadhiṭṭhāna’’nti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā dakarakkhaso devadatto ahosi, asītisahassavānarā buddhaparisā, upāyakusalo pana kapirājā ahameva ahosi’’nti. Der Meister aber sprach: „Ihr Mönche, dass diese Schilfrohre durchgehend hohl sind, geht auf meinen eigenen, in einer früheren Existenz gefassten Entschluss zurück.“ Nachdem er diese Lehrrede dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er die Geburtsgeschichte wie folgt zusammen: „Damals war der Wasserdämon Devadatta, die achtzigtausend Affen waren die Gefolgschaft des Buddha, und der an Mitteln geschickte Affenkönig war ich selbst.“ Naḷapānajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Naḷapāna-Jātaka, die zehnte. Sīlavaggo dutiyo. Die Sīla-Vagga, die zweite. Tassuddānaṃ – Ihre Zusammenfassung lautet: Nigrodhaṃ lakkhaṇaṃ kaṇḍi, vātamigaṃ kharādiyaṃ; Tipallatthaṃ mālutañca, matabhatta ayācitaṃ; Naḷapānanti te dasāti. Nigrodha, Lakkhaṇa, Kaṇḍi, Vātamiga, Kharādiya, Tipallattha, Māluta, Matabhatta, Ayācita und Naḷapāna – dies sind die zehn. 3. Kuruṅgavaggo 3. Kuruṅga-Vagga
[21] 1. Kuruṅgamigajātakavaṇṇanā [21] 1. Die Erklärung des Kuruṅgamiga-Jātaka Ñātametaṃ [Pg.189] kuruṅgassāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Ekasmiñhi samaye dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū ‘‘āvuso devadatto tathāgatassa ghātanatthāya dhanuggahe payojesi, silaṃ pavijjhi, dhanapālaṃ vissajjesi, sabbathāpi dasabalassa vadhāya parisakkatī’’ti devadattassa avaṇṇaṃ kathentā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā paññattāsane nisinno ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. Bhante, devadatto tumhākaṃ vadhāya parisakkatīti tassa aguṇakathāya sannisinnāmhāti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva mama vadhāya parisakkati, pubbepi mama vadhāya parisakkiyeva, na ca pana maṃ vadhituṃ asakkhī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Das ist dem Kuruṅga-Hirsch bekannt“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verweilte, in Bezug auf Devadatta. Einstmals nämlich saßen die im Dhamma-Saal versammelten Mönche zusammen und sprachen über den Tadel an Devadatta: „Ihr Brüder, Devadatta hat Bogenschützen gedungen, um den Tathāgata zu töten, er hat einen Felsblock hinabgerollt, er hat den Elefanten Dhanapāla losgelassen; auf jede Weise trachtet er danach, den Zehnfach Starken zu töten.“ Der Meister kam herbei, setzte sich auf den hergerichteten Sitz und fragte: „Mönche, mit welchem Gespräch sitzt ihr hier nun zusammen?“ Sie antworteten: „Ehrwürdiger Herr, wir sitzen hier zusammen und sprechen über die schlechten Eigenschaften Devadattas, nämlich dass er trachtet, Euch zu töten.“ Der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt trachtet Devadatta danach, mich zu töten; auch in der Vergangenheit hat er schon nach meinem Tod getrachtet, doch er vermochte es nicht, mich zu töten.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kuruṅgamigo hutvā ekasmiṃ araññāyatane phalāni khādanto vasati. So ekasmiṃ kāle phalasampanne sepaṇṇirukkhe sepaṇṇiphalāni khādati. Atheko gāmavāsī aṭṭakaluddako phalarukkhamūlesu migānaṃ padāni upadhāretvā uparirukkhe aṭṭakaṃ bandhitvā tattha nisīditvā phalāni khādituṃ āgatāgate mige sattiyā vijjhitvā tesaṃ maṃsaṃ vikkiṇanto jīvikaṃ kappeti. So ekadivasaṃ tasmiṃ rukkhamūle bodhisattassa padavaḷañjaṃ disvā tasmiṃ sepaṇṇirukkhe aṭṭakaṃ bandhitvā pātova bhuñjitvā sattiṃ ādāya vanaṃ pavisitvā taṃ rukkhaṃ āruhitvā aṭṭake nisīdi. Bodhisattopi pātova vasanaṭṭhānā nikkhamitvā ‘‘sepaṇṇiphalāni khādissāmī’’ti āgamma taṃ rukkhamūlaṃ sahasāva apavisitvā ‘‘kadāci aṭṭakaluddakā rukkhesu aṭṭakaṃ bandhanti, atthi nu kho evarūpo upaddavo’’ti pariggaṇhanto bāhiratova aṭṭhāsi. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als ein Kuruṅga-Hirsch wiedergeboren und lebte in einem Waldgebiet, wo er sich von Früchten ernährte. Zu jener Zeit fraß er die Früchte eines ertragreichen Sepaṇṇi-Baumes. Damals gab es einen im Dorf lebenden Jäger, der auf einem Hochsitz lauerte. Er spürte an den Wurzeln fruchttragender Bäume die Spuren von Wild auf, errichtete im Geäst der Bäume einen Hochsitz, setzte sich darauf und erlegte mit einem Speer das Wild, das herbeikam, um die Früchte zu fressen; durch den Verkauf von deren Fleisch verdiente er seinen Lebensunterhalt. Eines Tages entdeckte er am Fuße dieses Baumes die Fährte des Bodhisattas. Er errichtete auf jenem Sepaṇṇi-Baum einen Hochsitz, aß am frühen Morgen, nahm seinen Speer, ging in den Wald, stieg auf jenen Baum und setzte sich auf den Hochsitz. Auch der Bodhisatta verließ am frühen Morgen seinen Aufenthaltsort und kam herbei mit dem Gedanken: „Ich will die Sepaṇṇi-Früchte fressen.“ Er trat jedoch nicht sogleich unter den Baum, sondern blieb außerhalb stehen, um die Lage zu prüfen, indem er dachte: „Manchmal errichten Hochsitz-Jäger Plattformen auf Bäumen. Gibt es wohl eine solche Gefahr?“ Luddakopi bodhisattassa anāgamanabhāvaṃ ñatvā aṭṭake nisinnova sepaṇṇiphalāni khipitvā khipitvā tassa purato pātesi. Bodhisatto ‘‘imāni phalāni āgantvā mayhaṃ purato patanti, atthi nu kho upari luddako’’ti punappunaṃ ullokento luddakaṃ disvā apassanto viya hutvā ‘‘ambho, rukkha-pubbe tvaṃ olambakaṃ cārento [Pg.190] viya ujukameva phalāni pātesi, ajja pana te rukkhadhammo pariccatto, evaṃ tayā rukkhadhamme pariccatte ahampi aññaṃ rukkhamūlaṃ upasaṅkamitvā mayhaṃ āhāraṃ pariyesissāmī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als der Jäger bemerkte, dass der Bodhisatta nicht herankam, warf er, auf dem Hochsitz sitzend, wiederholt Sepaṇṇi-Früchte hinab, sodass sie vor dem Hirsch niederfielen. Der Bodhisatta dachte: „Diese Früchte fallen direkt vor mir nieder. Befindet sich da oben etwa ein Jäger?“ Er blickte wiederholt nach oben, erblickte den Jäger, tat jedoch so, als sähe er ihn nicht, und sprach: „He, Baum! Früher hast du deine Früchte gerade herunterfallen lassen, als würdest du sie herabhängend tragen. Heute aber hast du das Naturgesetz der Bäume aufgegeben. Da du das Gesetz der Bäume aufgegeben hast, werde auch ich mich unter einen anderen Baum begeben und dort meine Nahrung suchen.“ Nach diesen Worten sprach er folgende Strophe: 21. 21. ‘‘Ñātametaṃ kuruṅgassa, yaṃ tvaṃ sepaṇṇi seyyasi; Aññaṃ sepaṇṇi gacchāmi, na me te ruccate phala’’nti. „Dies ist dem Kuruṅga-Hirsch bekannt, wie du dich verhältst, o Sepaṇṇi-Baum; zu einem anderen Sepaṇṇi-Baum gehe ich, deine Frucht gefällt mir nicht.“ Tattha ñātanti pākaṭaṃ jātaṃ. Etanti idaṃ. Kuruṅgassāti kuruṅgamigassa. Yaṃ tvaṃ sepaṇṇi seyyasīti yaṃ tvaṃ ambho sepaṇṇirukkha purato phalāni pātayamāno seyyasi viseyyasi visiṇṇaphalo hosi, taṃ sabbaṃ kuruṅgamigassa pākaṭaṃ jātaṃ. Na me te ruccate phalanti evaṃ phalaṃ dadamānāya na me tava phalaṃ ruccati, tiṭṭha tvaṃ, ahaṃ aññattha gacchissāmīti agamāsi. Darin bedeutet „ñātaṃ“: offenkundig geworden. „Etaṃ“ bedeutet: dies. „Kuruṅgassa“ bedeutet: für den Kuruṅga-Hirsch. „Yaṃ tvaṃ sepaṇṇi seyyasi“ bedeutet: „Was du tust, o Sepaṇṇi-Baum, indem du die Früchte vor mir herabfallen lässt, sie wegwirfst und deine Früchte verstreust – all dies ist dem Kuruṅga-Hirsch offenkundig geworden.“ „Na me te ruccate phalaṃ“ bedeutet: „Da du die Früchte auf diese Weise herabwirfst, gefällt mir deine Frucht nicht; bleibe du hier, ich werde anderswohin gehen“, und so ging er davon. Athassa luddako aṭṭake nisinnova sattiṃ khipitvā ‘‘gaccha, viraddho dānimhi ta’’nti āha. Bodhisatto nivattitvā ṭhito āha ‘‘ambho purisa, idānīsi kiñcāpi maṃ viraddho, aṭṭha pana mahāniraye soḷasaussadaniraye pañcavidhabandhanādīni ca kammakāraṇāni aviraddhoyevāsī’’ti. Evañca pana vatvā palāyitvā yathāruciṃ gato, luddopi otaritvā yathāruciṃ gato. Da warf der Jäger, vom Hochsitz aus, seinen Speer nach ihm und rief: „Lauf nur! Jetzt habe ich dich verfehlt!“ Der Bodhisatta wandte sich um, blieb stehen und sprach: „O Mann, wenn du mich jetzt auch verfehlt hast, so wirst du doch die acht großen Höllen, die sechzehn Ussada-Höllen sowie die fünffache Fesselung und die anderen Qualen gewiss nicht verfehlen!“ Nachdem er dies gesagt hatte, floh er und lief davon, wohin es ihm beliebte. Auch der Jäger stieg herab und ging seines Weges. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva mama vadhāya parisakkati, pubbepi parisakkiyeva, na ca pana maṃ vadhituṃ asakkhī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā aṭṭakaluddako devadatto ahosi, kuruṅgamigo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt trachtet Devadatta danach, mich zu töten; auch in der Vergangenheit hat er schon danach getrachtet, doch er vermochte es nicht, mich zu töten.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Jäger auf dem Hochsitz Devadatta, der Kuruṅga-Hirsch aber war ich selbst.“ Kuruṅgamigajātakavaṇṇanā paṭhamā. Hier endet die Erklärung des Kuruṅgamiga-Jātaka, das erste.
[22] 2. Kukkurajātakavaṇṇanā [22] 2. Die Erklärung des Kukkura-Jātaka (Hunde-Jātaka). Ye kukkurāti idaṃ satthā jetavane viharanto ñātatthacariyaṃ ārabbha kathesi. Sā dvādasakanipāte bhaddasālajātake āvibhavissati. Idaṃ pana vatthuṃ patiṭṭhapetvā atītaṃ āhari. „Welche Hunde auch immer“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf sein Wirken zum Wohle seiner Verwandten. Dieses Wirken wird im zwölften Buch im Bhaddasāla-Jātaka deutlich werden. Nachdem der Meister diesen Anlass dargelegt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte [Pg.191] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tathārūpaṃ kammaṃ paṭicca kukkurayoniyaṃ nibbattitvā anekasatakukkuraparivuto mahāsusāne vasati. Athekadivasaṃ rājā setasindhavayuttaṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ rathaṃ āruyha uyyānaṃ gantvā tattha divasabhāgaṃ kīḷitvā atthaṅgate sūriye nagaraṃ pāvisi. Tassa taṃ rathavarattaṃ yathānaddhameva rājaṅgaṇe ṭhapayiṃsu, so rattibhāge deve vassante tinto. Uparipāsādato koleyyakasunakhā otaritvā tassa cammañca naddhiñca khādiṃsu. Punadivase rañño ārocesuṃ ‘‘deva, niddhamanamukhena sunakhā pavisitvā rathassa cammañca naddhiñca khādiṃsū’’ti. Rājā sunakhānaṃ kujjhitvā ‘‘diṭṭhadiṭṭhaṭṭhāne sunakhe ghātethā’’ti āha. Tato paṭṭhāya sunakhānaṃ mahābyasanaṃ udapādi. Te diṭṭhidiṭṭhaṭṭhāne ghātiyamānā palāyitvā susānaṃ gantvā bodhisattassa santikaṃ agamaṃsu. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta aufgrund einer entsprechenden Tat im Schoß einer Hündin wiedergeboren und lebte, umgeben von vielen hundert Hunden, auf einem großen Friedhof. Eines Tages bestieg der König seinen prächtigen Wagen, der mit weißen Sindh-Pferden bespannt und mit allerlei Schmuck verziert war, fuhr in den königlichen Park, vergnügte sich dort den halben Tag und kehrte bei Sonnenuntergang in die Stadt zurück. Man ließ den kostbaren Wagen genau so, wie er angeschirrt war, im Schlosshof stehen. In der Nacht, als es regnete, wurde er nass. Da kamen die im Palast gehaltenen Rassehunde aus den oberen Gemächern des Palastes herab und fraßen das Leder und die Riemen des Wagens auf. Am nächsten Tag berichtete man dem König: „Majestät, Hunde sind durch die Abflussöffnung eingedrungen und haben das Leder und die Riemen des Wagens zerfressen.“ Da wurde der König zornig auf die Hunde und befahl: „Tötet alle Hunde, wo immer ihr sie seht!“ Von da an brach ein großes Unheil über die Hunde herein. Da sie überall, wo man sie erblickte, getötet wurden, flohen sie, suchten den Friedhof auf und begaben sich zum Bodhisatta. Bodhisatto ‘tumhe bahū sannipatitā, kiṃ nu kho kāraṇa’’nti pucchi. Te ‘‘antepure kira rathassa cammañca naddhi ca sunakhehi khāditā’ti kuddho rājā sunakhavadhaṃ āṇāpesi, bahū sunakhā vinassanti, mahābhayaṃ uppanna’’nti āhaṃsu. Bodhisatto cintesi ‘‘ārakkhaṭṭhāne bahi sunakhānaṃ okāso natthi, antorājanivesane koleyyakasunakhānameva taṃ kammaṃ bhavissati. Idāni pana corānaṃ kiñci bhayaṃ natthi, acorā maraṇaṃ labhanti, yaṃnūnāhaṃ core rañño dassetvā ñātisaṅghassa jīvitadānaṃ dadeyya’’nti. So ñātake samassāsetvā ‘‘tumhe mā bhāyittha, ahaṃ vo abhayaṃ āharissāmi, yāva rājānaṃ passāmi, tāva idheva hothā’’ti pāramiyo āvajjetvā mettābhāvanaṃ purecārikaṃ katvā ‘‘mayhaṃ upari leḍḍuṃ vā muggaraṃ vā mā koci khipituṃ ussahī’’ti adhiṭṭhāya ekakova antonagaraṃ pāvisi. Atha naṃ disvā ekasattopi kujjhitvā olokento nāma nāhosi. Rājāpi sunakhavadhaṃ āṇāpetvā sayaṃ vinicchaye nisinno hoti. Bodhisatto tattheva gantvā pakkhanditvā rañño āsanassa heṭṭhā pāvisi. Atha naṃ rājapurisā nīharituṃ āraddhā, rājā pana vāresi. Der Bodhisatta fragte: „Ihr seid in so großer Zahl zusammengekommen. Was ist wohl der Grund?“ Sie sagten: „Im Palastinneren haben angeblich Hunde das Leder und die Riemen des königlichen Wagens gefressen. Deshalb hat der erzürnte König die Tötung aller Hunde befohlen. Viele Hunde kommen ums Leben; eine große Gefahr ist über uns gekommen!“ Der Bodhisatta dachte: „An einem bewachten Ort haben die Hunde von außerhalb keine Gelegenheit hineinzukommen. Diese Tat muss von den Palasthunden begangen worden sein, die im königlichen Palast aufgezogen wurden. Jetzt aber haben die eigentlichen Diebe keinerlei Gefahr zu befürchten, während die Unschuldigen den Tod erleiden. Wie wäre es, wenn ich dem König die Diebe zeigte und so der Gemeinschaft meiner Verwandten das Geschenk des Lebens gäbe?“ Er tröstete seine Verwandten und sprach: „Fürchtet euch nicht! Ich werde euch Sicherheit bringen. Solange, bis ich den König sehe, bleibt genau hier.“ Er dachte über seine Vollkommenheiten nach, stellte die Entfaltung der liebenden Güte an die Spitze und fasste den Entschluss: „Möge niemand es wagen, eine Scholle oder eine Keule nach mir zu werfen!“ Und so ging er ganz allein in die Stadt hinein. Als die Menschen ihn sahen, gab es niemanden, der ihn auch nur im Zorn ansah. Auch der König, der die Tötung der Hunde befohlen hatte, saß selbst in der Gerichtshalle. Der Bodhisatta begab sich genau dorthin, sprang vorwärts und kroch unter den Thron des Königs. Da schickten sich die königlichen Diener an, ihn hervorzuholen, doch der König hielt sie zurück. So thokaṃ vissamitvā heṭṭhāsanā nikkhamitvā rājānaṃ vanditvā ‘‘deva, tumhe kukkure mārāpethā’’ti pucchi. ‘‘Āma, mārāpemaha’’nti[Pg.192]. ‘‘Ko nesaṃ aparādho narindā’’ti? ‘‘Rathassa me parivāracammañca naddhiñca khādiṃsū’’ti. ‘‘Ye khādiṃsu, te jānāthā’’ti? ‘‘Na jānāmā’’ti. ‘‘‘Ime nāma cammakhādakacorā’ti tathato ajānitvā diṭṭhadiṭṭhaṭṭhāneyeva mārāpanaṃ na yuttaṃ, devā’’ti. ‘‘Rathacammassa kukkurehi khāditattā ‘diṭṭhadiṭṭhe sabbeva mārethā’ti sunakhavadhaṃ āṇāpesi’’nti. ‘‘Kiṃ pana vo manussā sabbeva kukkure mārenti, udāhu maraṇaṃ alabhantāpi atthī’’ti? ‘‘Atthi, amhākaṃ ghare koleyyakā maraṇaṃ na labhantī’’ti. Mahārāja idāneva tumhe ‘‘rathacammassa kukkurehi khāditattā ‘diṭṭhadiṭṭhe sabbeva mārethā’ti sunakhavadhaṃ āṇāpesi’’nti avocuttha, idāni pana ‘‘amhākaṃ ghare koleyyakā maraṇaṃ na labhantī’’ti vadetha. ‘‘Nanu evaṃ sante tumhe chandādivasena agatigamanaṃ gacchatha, agatigamanañca nāma na yuttaṃ, na ca rājadhammo, raññā nāma kāraṇagavesakena tulāsadisena bhavituṃ vaṭṭati, idāni ca koleyyakā maraṇaṃ na labhanti, dubbalasunakhāva labhanti, evaṃ sante nāyaṃ sabbasunakhaghaccā, dubbalaghātikā nāmesā’’ti. Evañca pana vatvā mahāsatto madhurassaraṃ nicchāretvā ‘‘mahārāja, yaṃ tumhe karotha, nāyaṃ dhammo’’ti rañño dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Nachdem er sich ein wenig ausgeruht hatte, kam er unter dem Thron hervor, erwies dem König Ehrfurcht und fragte: „O König, lasst Ihr die Hunde töten?“ – „Ja, ich lasse sie töten.“ – „Was ist ihr Vergehen, o Herrscher der Menschen?“ – „Sie haben das schützende Leder und die Riemen meines Wagens gefressen.“ – „Wisst Ihr, welche Hunde es gefressen haben?“ – „Nein, das wissen wir nicht.“ – „O König, ohne die Wahrheit zu kennen, wer diese lederfressenden Diebe eigentlich sind, ist es nicht recht, sie einfach an jedem Ort zu töten, wo man sie erblickt.“ – „Da das Wagenleder von Hunden gefressen wurde, habe ich befohlen: ‚Tötet alle Hunde, wo immer ihr sie seht!‘ und so die Tötung der Hunde angeordnet.“ – „Töten Eure Leute denn wirklich alle Hunde, oder gibt es auch solche, die dem Tod entgehen?“ – „Es gibt welche. Die in unserem Hause gehaltenen Palasthunde erleiden den Tod nicht.“ – „O Großkönig, soeben noch habt Ihr gesagt: ‚Weil das Wagenleder von Hunden gefressen wurde, tötet alle Hunde, wo immer ihr sie seht!‘ und habt so die Tötung der Hunde befohlen. Nun aber sagt Ihr: ‚Die Palasthunde in unserem Haus erleiden den Tod nicht.‘ Wenn dem so ist, wandelt Ihr da nicht unter dem Einfluss von Vorliebe und den anderen Vorurteilen auf Abwegen? Auf Abwegen zu wandeln ist wahrlich nicht recht und entspricht nicht der königlichen Pflicht. Ein König sollte die wahre Ursache erforschen und unparteiisch wie eine Waagschale sein. Jetzt aber sterben die Palasthunde nicht, sondern nur die schwachen Hunde erleiden den Tod. Wenn dem so ist, ist dies keine allgemeine Tötung aller Hunde, sondern dies nennt man ein Abschlachten der Schwachen!“ Nachdem das große Wesen dies gesagt hatte, ließ er eine liebliche Stimme ertönen und sprach: „O Großkönig, was Ihr tut, ist nicht rechtens.“ Um dem König den Dhamma zu verkünden, sprach er folgende Strophe: 22. 22. ‘‘Ye kukkurā rājakulamhi vaddhā, koleyyakā vaṇṇabalūpapannā; Teme na vajjhā mayamasma vajjhā, nāyaṃ saghaccā dubbalaghātikāya’’nti. „Die Hunde, die im Hause des Königs aufgewachsen sind, die Palasthunde, die mit schöner Gestalt und Kraft ausgestattet sind, diese werden nicht getötet; wir aber sind es, die getötet werden! Dies ist keine allgemeine Tötung, sondern ein Abschlachten der Schwachen.“ Tattha ye kukkurāti ye sunakhā. Yathā hi dhāruṇhopi passāvo ‘‘pūtimutta’’nti, tadahujātopi siṅgālo ‘‘jarasiṅgālo’’ti, komalāpi galocilatā ‘‘pūtilatā’’ti, suvaṇṇavaṇṇopi kāyo ‘‘pūtikāyo’’ti vuccati, evamevaṃ vassasatikopi sunakho ‘‘kukkuro’’ti vuccati. Tasmā mahallakā kāyabalūpapannāpi te ‘‘kukkurā’’tveva vuttā. Vaddhāti vaḍḍhitā. Koleyyakāti rājakule jātā sambhūtā saṃvaḍḍhā. Vaṇṇabalūpapannāti sarīravaṇṇena ceva kāyabalena ca sampannā. Teme na vajjhāti te ime sassāmikā sārakkhā na vajjhā. Mayamasma vajjhāti assāmikā anārakkhā mayaṃ vajjhā nāma jātā. Nāyaṃ saghaccāti evaṃ sante ayaṃ avisesena saghaccā nāma na hoti. Dubbalaghātikāyanti [Pg.193] ayaṃ pana dubbalānaṃyeva ghātanato dubbalaghātikā nāma hoti. Rājūhi nāma corā niggaṇhitabbā, no acorā. Idha pana corānaṃ kiñci bhayaṃ natthi, acorā maraṇaṃ labhanti. Aho imasmiṃ loke ayuttaṃ vattati, aho adhammo vattatīti. Darin bedeutet ‚die Hunde‘ (ye kukkurā): welche Hunde auch immer. Wie man nämlich frisch gelassenen, noch warmen Urin dennoch ‚fauligen Urin‘ (pūtimutta) nennt, und wie einen am selben Tag geborenen Schakal dennoch ‚alten Schakal‘ (jarasiṅgālo) nennt, und wie die zarte Galoci-Kletterpflanze dennoch ‚faule Schlinge‘ (pūtilatā) nennt, und wie selbst einen goldfarbenen Körper dennoch ‚fauligen Körper‘ (pūtikāyo) nennt, ebenso wird ein Hund, selbst wenn er hundert Jahre alt ist, als ‚Kukkura‘ bezeichnet. Daher wurden sie, obwohl sie ausgewachsen und mit körperlicher Kraft ausgestattet waren, einfach als ‚Kukkurā‘ bezeichnet. ‚Vaddhā‘ bedeutet: aufgewachsen. ‚Koleyyakā‘ bedeutet: im Hause des Königs geboren, entstanden und herangewachsen. ‚Vaṇṇabalūpapannā‘ bedeutet: sowohl mit körperlicher Schönheit als auch mit physischer Kraft ausgestattet. ‚Diese werden nicht getötet‘ (te me na vajjhā) bedeutet: Diese hier, die einen Besitzer haben und geschützt sind, werden nicht getötet. ‚Wir aber sind es, die getötet werden‘ (mayamasma vajjhā) bedeutet: Wir, die wir besitzerlos und ungeschützt sind, sind dazu bestimmt, getötet zu werden. ‚Dies ist keine allgemeine Tötung‘ (nāyaṃ saghaccā) bedeutet: Wenn dem so ist, ist dies keine unterschiedslose Tötung aller Hunde. ‚Ein Abschlachten der Schwachen‘ (dubbalaghātikā) bedeutet: Weil hierbei nur die Schwachen getötet werden, nennt man es ein Abschlachten der Schwachen. Könige sollten wahrlich die Diebe bestrafen, nicht aber die Unschuldigen. Hier aber haben die Diebe keinerlei Gefahr zu befürchten, während die Unschuldigen den Tod erleiden. Ach, welch Unrecht herrscht in dieser Welt! Ach, wie ungerecht geht es zu! – Dies ist der tiefere Sinn. Rājā bodhisattassa vacaraṃ sutvā āha – ‘‘jānāsi tvaṃ, paṇḍita, asukehi nāma rathacammaṃ khādita’’nti? ‘‘Āma, jānāmī’’ti. ‘‘Kehi khādita’’nti? ‘‘Tumhākaṃ gehe vasanakehi koleyyakasunakhehī’’ti. ‘‘Kathaṃ tehi khāditabhāvo jānitabbo’’ti? ‘‘Ahaṃ tehi khāditabhāvaṃ dassesāmī’’ti. ‘‘Dassehi paṇḍitā’’ti. ‘‘Tumhākaṃ ghare koleyyakasunakhe āharāpetvā thokaṃ takkañca dabbatiṇāni ca āharāpethā’’ti. Rājā tathā akāsi. Atha naṃ mahāsatto ‘‘imāni tiṇāni takkena maddāpetvā ete sunakhe pāyethā’’ti āha. Rājā tathā katvā pāyāpesi, pītā pītā sunakhā saddhiṃ cammehi vamiṃsu. Rājā ‘‘sabbaññubuddhassa byākaraṇaṃ viyā’’ti tuṭṭho bodhisattassa setacchattena pūjaṃ akāsi. Bodhisatto ‘‘dhammaṃ cara, mahārāja, mātāpitūsu khattiyā’’tiādīhi (jā. 2.17.39) tesakuṇajātake āgatāhi dasahi dhammacariyagāthāhi rañño dhammaṃ desetvā ‘‘mahārāja, ito paṭṭhāya appamatto hohī’’ti rājānaṃ pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā setacchattaṃ raññova paṭiadāsi. Als der König die Worte des Bodhisatta gehört hatte, fragte er: „Weißt du, o Weiser, von welchen Hunden das Wagenleder gefressen wurde?“ – „Ja, ich weiß es.“ – „Von welchen wurde es gefressen?“ – „Von den Palasthunden, die in Eurem eigenen Haus leben.“ – „Wie kann man beweisen, dass es von ihnen gefressen wurde?“ – „Ich werde Euch beweisen, dass sie es gefressen haben.“ – „Zeige es, o Weiser!“ – „Lasst die Palasthunde aus Eurem Hause herbeibringen und lasst ein wenig Buttermilch und Dabba-Gras holen.“ Der König tat so. Da sprach das große Wesen zu ihm: „Lasst dieses Gras mit der Buttermilch zerreiben und gebt es diesen Hunden zu trinken.“ Der König verfuhr so und ließ sie trinken. Die Hunde, die davon getrunken hatten, erbrachen sogleich die Buttermilch zusammen mit den Lederstücken. Der König war hocherfreut, als wäre es die Antwort eines allwissenden Buddhas, und erwies dem Bodhisatta Ehrung, indem er ihm den weißen Sonnenschirm anbot. Der Bodhisatta predigte dem König den Dhamma mit den zehn Strophen über die rechte Lebensführung aus dem Tesakuṇa-Jātaka, beginnend mit: „Wandle im Dhamma, o Großkönig, verhalte dich recht gegenüber Vater und Mutter, o Khattiya...“ Er ermahnte ihn: „O Großkönig, sei von nun an achtsam!“, festigte den König in den fünf Sittenregeln und gab den weißen Sonnenschirm dem König wieder zurück. Rājā mahāsattassa dhammakathaṃ sutvā sabbasattānaṃ abhayaṃ datvā bodhisattaṃ ādiṃ katvā sabbasunakhānaṃ attano bhojanasadisameva niccabhattaṃ paṭṭhapetvā bodhisattassa ovāde ṭhito yāvatāyukaṃ dānādīni puññāni katvā kālaṃ katvā devaloke uppajji. Kukkurovādo dasa vassasahassāni pavatti. Bodhisattopi yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gato. Nachdem der König die Lehrrede des Großen Wesens gehört hatte, gewährte er allen Lebewesen Schutz vor Furcht. Beginnend mit dem Bodhisatta, setzte er für alle Hunde eine ständige Nahrung fest, die seiner eigenen Speise glich. Er verblieb in der Unterweisung des Bodhisattas, vollbrachte zeitlebens verdienstvolle Taten wie Freigebigkeit und anderes, verstarb schließlich und wurde in der Götterwelt wiedergeboren. Die Unterweisung des Hundes blieb zehntausend Jahre lang bestehen. Auch der Bodhisatta verblieb für die Dauer seiner Lebensspanne und ging dann entsprechend seinem Kamma dahin. Satthā ‘‘na, bhikkhave, tathāgato idāneva ñātakānaṃ atthaṃ carati, pubbepi cariyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, avasesā parisā buddhaparisā, kukkurapaṇḍito pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte mit den Worten: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt wirkt der Tathāgata zum Wohle seiner Verwandten, sondern auch in der Vergangenheit hat er bereits so gewirkt“, knüpfte er die Verbindung an und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der König Ānanda, das übrige Gefolge war das Gefolge des Buddha, der weise Hund aber war ich selbst.“ Kukkurajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Kukkura-Jātaka ist die zweite.
[23] 3. Bhojājānīyajātakavaṇṇanā [23] 3. Die Erklärung des Bhojājānīya-Jātaka. Api [Pg.194] passena semānoti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ ossaṭṭhavīriyaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi samaye satthā taṃ bhikkhuṃ āmantetvā ‘‘bhikkhu, pubbe paṇḍitā anāyatanepi vīriyaṃ akaṃsu, pahāraṃ laddhāpi neva ossajiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Auch wenn ich auf der Flanke liege“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, über einen Mönch, der seine Willenskraft aufgegeben hatte. Zu jener Zeit rief der Meister nämlich diesen Mönch zu sich und sprach: „Mönch, in der Vergangenheit haben die Weisen selbst in einer ausweglosen Lage Willenskraft bewiesen; selbst nachdem sie Verwundungen erlitten hatten, gaben sie keineswegs auf.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bhojājānīyasindhavakule nibbatto sabbālaṅkārasampanno bārāṇasirañño maṅgalasso ahosi. So satasahassagghanikāya suvaṇṇapātiyaṃyeva nānaggarasasampannaṃ tivassikagandhasālibhojanaṃ bhuñjati, cātujjātikagandhūpalittāyameva bhūmiyaṃ tiṭṭhati, taṃ ṭhānaṃ rattakambalasāṇiparikkhittaṃ upari suvaṇṇatārakakhacitacelavitānaṃ samosaritagandhadāmamālādāmaṃ avijahitagandhatelapadīpaṃ hoti. Bārāṇasirajjaṃ pana apatthentā rājāno nāma natthi. Ekaṃ samayaṃ satta rājāno bārāṇasiṃ parikkhipitvā ‘‘amhākaṃ rajjaṃ vā detu, yuddhaṃ vā’’ti bārāṇasirañño paṇṇaṃ pesesuṃ. Rājā amacce sannipātetvā taṃ pavattiṃ ācikkhitvā ‘‘idāni kiṃ karoma, tātā’’ti pucchi. ‘‘Deva, tumhehi tāva āditova yuddhāya na gantabbaṃ, asukaṃ nāma assārohaṃ pesetvā yuddhaṃ kāretha, tasmiṃ asakkonte pacchā jānissāmā’’ti. Rājā taṃ pakkosāpetvā ‘‘sakkhissasi, tāta, sattahi rājūhi saddhiṃ yuddhaṃ kātu’’nti āha. ‘‘Deva, sace bhojājānīyasindhavaṃ labhāmi, tiṭṭhantu satta rājāno, sakalajambudīpe rājūhipi saddhiṃ yujjhituṃ sakkhissāmī’’ti. ‘‘Tāta, bhojājānīyasindhavo vā hotu añño vā, yaṃ icchasi, taṃ gahetvā yuddhaṃ karohī’’ti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in der Familie der edlen Bhoja-Sindhu-Pferde geboren und wurde das mit allem Schmuck ausgestattete Prachtpferd des Königs von Bārāṇasī. Er fraß nur aus einer goldenen Schale im Wert von einhunderttausend Münzen ein mit verschiedenen erlesenen Geschmacksrichtungen versehenes, drei Jahre lang mit Wohlgerüchen aromatisiertes Sāli-Reisgericht, und stand auf einem Boden, der mit viererlei Wohlgerüchen bestrichen war. Sein Aufenthaltsort war mit roten Wolldecken umgeben, hatte oben einen mit goldenen Sternen verzierten Stoffhimmel, herabhängende Kränze aus Duft- und Blumenketten, und ein stets brennendes Duftöllämpchen. Nun gab es gewiss keine Könige, die nicht das Königreich von Bārāṇasī begehrten. Einmal belagerten sieben Könige Bārāṇasī und schickten ein Schreiben an den König von Bārāṇasī: „Überlasst uns das Königreich oder liefert uns eine Schlacht!“ Der König rief seine Minister zusammen, berichtete ihnen von diesem Vorfall und fragte: „Liebe Freunde, was sollen wir nun tun?“ Sie antworteten: „Majestät, Ihr solltet zunächst nicht gleich selbst in den Kampf ziehen. Sendet jenen bestimmten Reiter aus und lasst ihn den Kampf führen. Sollte er scheitern, werden wir danach weitersehen.“ Der König ließ diesen rufen und fragte: „Mein Lieber, wirst du in der Lage sein, den Kampf gegen die sieben Könige aufzunehmen?“ Er antwortete: „Majestät, wenn ich das edle Bhoja-Sindhu-Pferd bekomme, mögen die sieben Könige nur kommen – selbst gegen die Könige des gesamten Jambudīpa werde ich zu kämpfen vermögen!“ Der König sprach: „Mein Lieber, ob es das edle Bhoja-Sindhu-Pferd oder ein anderes ist – nimm das Pferd, welches du wünschst, und ziehe in den Kampf!“ So ‘‘sādhu, devā’’ti rājānaṃ vanditvā pāsādā oruyha bhojājānīyasindhavaṃ āharāpetvā suvammitaṃ katvā attanāpi sabbasannāhasannaddho khaggaṃ bandhitvā sindhavapiṭṭhivaragato nagarā nikkhamma vijjulatā viya caramāno paṭhamaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā ekaṃ rājānaṃ jīvaggāhameva gahetvā āgantvā nagare balassa niyyādetvā puna gantvā dutiyaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā tathā tatiyanti evaṃ pañca rājāno jīvaggāhaṃ gahetvā chaṭṭhaṃ balakoṭṭhakaṃ [Pg.195] bhinditvā chaṭṭhassa rañño gahitakāle bhojājānīyo pahāraṃ labhati, lohitaṃ paggharati, vedanā balavatiyo vattanti. Assāroho tassa pahaṭabhāvaṃ ñatvā bhojājānīyasindhavaṃ rājadvāre nipajjāpetvā sannāhaṃ sithilaṃ katvā aññaṃ assaṃ sannayhituṃ āraddho. Bodhisatto mahāphāsukapassena nipannova akkhīni ummiletvā assārohaṃ disvā ‘‘ayaṃ aññaṃ assaṃ sannayhati, ayañca asso sattamaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā sattamaṃ rājānaṃ gaṇhituṃ na sakkhissati, mayā katakammañca nassissati, appaṭisamo assārohopi nassissati, rājāpi parahatthaṃ gamissati, ṭhapetvā maṃ añño asso sattamaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā sattamaṃ rājānaṃ gahetuṃ samattho nāma natthī’’ti nipannakova assārohaṃ pakkosāpetvā ‘‘samma assāroha, sattamaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā sattamaṃ rājānaṃ gahetuṃ samattho ṭhapetvā maṃ añño asso nāma natthi, nāhaṃ mayā katakammaṃ nāsessāmi, mamaññeva uṭṭhāpetvā sannayhāhī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Er antwortete: „Sehr wohl, Majestät!“, verneigte sich vor dem König, stieg vom Palast herab, ließ das edle Bhoja-Sindhu-Pferd bringen und legte ihm eine prächtige Rüstung an. Auch er selbst rüstete sich mit allen Rüstungsteilen, gürtete sein Schwert, bestieg den Rücken des edlen Sindhu-Pferdes, ritt aus der Stadt hinaus und bewegte sich wie ein Blitzstrahl dahin. Er durchbrach das erste Heereslager, nahm einen König lebendig gefangen, kehrte zurück, übergab ihn den Truppen in der Stadt, ritt erneut aus, durchbrach das zweite Heereslager, und ebenso das dritte. Auf diese Weise nahm er fünf Könige lebendig gefangen. Als er das sechste Heereslager durchbrach und den sechsten König gefangen nahm, erlitt das edle Bhoja-Pferd eine Verletzung; Blut floss herab und heftige Schmerzen setzten ein. Als der Reiter bemerkte, dass das Pferd verwundet war, ließ er das edle Bhoja-Sindhu-Pferd am Palasttor niederlegen, lockerte die Rüstung und schickte sich an, ein anderes Pferd zu rüsten. Der Bodhisatta, der auf seiner breiten Flanke lag, öffnete die Augen, blickte den Reiter an und erkannte: „Dieser rüstet ein anderes Pferd. Doch jenes Pferd wird nicht imstande sein, das siebte Heereslager zu durchbrechen und den siebten König gefangen zu nehmen. Das von mir vollbrachte Werk wird zunichte werden, auch dieser unvergleichliche Reiter wird zugrunde gehen, und mein König wird in die Hände der Feinde fallen. Außer mir gibt es kein anderes Pferd, das fähig wäre, das siebte Heereslager zu durchbrechen und den siebten König gefangen zu nehmen.“ Noch im Liegen ließ er den Reiter rufen und sprach: „Mein Freund Reiter, außer mir gibt es kein anderes Pferd, das fähig wäre, das siebte Heereslager zu durchbrechen und den siebten König gefangen zu nehmen. Ich werde mein vollbrachtes Werk nicht zunichte machen lassen. Richte mich selbst auf und rüste mich!“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er diese Strophe: 23. 23. ‘‘Api passena semāno, sallebhi sallalīkato; Seyyova vaḷavā bhojjho, yuñja maññeva sārathī’’ti. „Auch wenn ich auf der Flanke liege, von Pfeilen vielfach durchbohrt, ist das edle Bhoja-Pferd doch besser als ein minderwertiges Pferd. Anschirre mich nur, o Wagenlenker!“ Tattha api passena semānoti ekena passena sayamānakopi. Sallebhi sallalīkatoti sallehi viddhopi samāno. Seyyova vaḷavā bhojjhoti vaḷavāti sindhavakulesu ajāto khaluṅkasso. Bhojjhoti bhojājānīyasindhavo. Iti etasmā vaḷavā sallehi viddhopi bhojājānīyasindhavova seyyo varo uttamo. Yuñja maññeva sārathīti yasmā eva gatopi ahameva seyyo, tasmā mamaññeva yojehi, maṃ vammehīti vadati. Dabei bedeutet „api passena semāno“: auch wenn ich auf einer Seite liege. „Sallebhi sallalīkato“ bedeutet: obgleich von Pfeilen durchbohrt. Bei „seyyova vaḷavā bhojjho“ bedeutet „vaḷavā“: eine Mähre, die nicht aus der Sindhu-Zucht stammt. „Bhojjho“ bedeutet: das edle Bhoja-Sindhu-Pferd. Somit ist im Vergleich zu jener Mähre das edle Bhoja-Sindhu-Pferd, selbst wenn es von Pfeilen durchbohrt ist, besser, vorzüglicher, hervorragender. „Yuñja maññeva sārathī“ bedeutet: Da selbst in diesem Zustand ich allein der Bessere bin, so schirre mich allein an, lege mir die Rüstung an – so spricht er. Assāroho bodhisattaṃ uṭṭhāpetvā vaṇaṃ bandhitvā susannaddhaṃ sannayhitvā tassa piṭṭhiyaṃ nisīditvā sattamaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā sattamaṃ rājānaṃ jīvaggāhaṃ gahetvā rājabalassa niyyādesi, bodhisattampi rājadvāraṃ ānayiṃsu. Rājā tassa dassanatthāya nikkhami. Mahāsatto rājānaṃ āha – ‘‘mahārāja, satta rājāno mā ghātayittha, sapathaṃ kāretvā vissajjetha, mayhañca assārohassa ca dātabbaṃ yasaṃ assārohasseva detha[Pg.196], satta rājāno gahetvā dinnayodhaṃ nāma nāsetuṃ na vaṭṭati. Tumhepi dānaṃ detha, sīlaṃ rakkhatha, dhammena samena rajjaṃ kārethā’’ti. Evaṃ bodhisattena rañño ovāde dinne bodhisattassa sannāhaṃ mocayiṃsu, so sannāhe muttamatteyeva nirujjhi. Rājā tassa sarīrakiccaṃ kāretvā assārohassa mahantaṃ yasaṃ datvā satta rājāno puna attanno adubbhāya sapathaṃ kāretvā sakasakaṭṭhānāni pesetvā dhammena samena rajjaṃ kāretvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. Der Reiter half dem Bodhisatta aufzustehen, verband seine Wunde, legte ihm die Rüstung fest an, setzte sich auf seinen Rücken, durchbrach die siebte Truppenformation, nahm den siebten König lebendig gefangen und übergab ihn den Truppen des Königs; auch den Bodhisatta brachten sie zum Tor des Königspalastes. Der König kam heraus, um ihn zu sehen. Das Große Wesen sprach zum König: „O Großkönig, tötet die sieben Könige nicht, sondern lasst sie einen Eid schwören und gebt sie frei. Die Ehre, die mir und dem Reiter gebührt, gebt allein dem Reiter. Es ist nicht recht, einen Krieger zu vernichten, der die sieben Könige gefangen genommen hat. Übt auch ihr Freigebigkeit, haltet die sittlichen Regeln ein und regiert gerecht und unparteilich.“ Nachdem der Bodhisatta dem König diesen Rat erteilt hatte, lösten sie die Rüstung des Bodhisatta; kaum war die Rüstung gelöst, verstarb er. Der König vollzog die Bestattungszeremonien für ihn, verlieh dem Reiter großen Wohlstand, ließ die sieben Könige einen Eid schwören, ihm nicht wieder zu schaden, sandte sie in ihre jeweiligen Reiche zurück, regierte gerecht und unparteilich und ging am Ende seines Lebens entsprechend seinem Karma fort. Satthā ‘‘evaṃ bhikkhu pubbe paṇḍitā anāyatanepi vīriyaṃ akaṃsu, evarūpaṃ pahāraṃ laddhāpi na ossajiṃsu, tvaṃ pana evarūpe niyyānikasāsane pabbajitvā kasmā vīriyaṃ ossajasī’’ti vatvā cattāri saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ossaṭṭhavīriyo bhikkhu arahattaphale patiṭṭhāsi. Der Meister sprach: „Mönch, ebenso haben früher die Weisen selbst dann Tatkraft gezeigt, als sie keinen Halt hatten. Selbst nachdem sie eine solche Wunde erhalten hatten, gaben sie ihre Tatkraft nicht auf. Du aber, der du in einer solchen Lehre, die zur Befreiung führt, ordiniert bist, warum gibst du deine Tatkraft auf?“ Nachdem er dies gesagt hatte, verkündete er die Vier Edlen Wahrheiten. Am Ende der Wahrheitsverkündung gründete sich der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte, in der Frucht der Arhatschaft. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, assāroho sāriputto, bhojājānīyasindhavo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen und die Verbindung hergestellt hatte, verknüpfte er das Jātaka wie folgt: „Damals war der König Ānanda, der Reiter war Sāriputta, das edle Bhojājānīya-Sindhu-Pferd aber war ich selbst.“ Bhojājānīyajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Bhojājānīya-Jātaka, die dritte.
[24] 4. Ājaññajātakavaṇṇanā [24] 4. Die Erklärung des Ājañña-Jātaka Yadā yadāti idampi satthā jetavane viharanto ossaṭṭhavīriyameva bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Taṃ pana bhikkhuṃ satthā āmantetvā ‘‘bhikkhu pubbe paṇḍitā anāyatanepi laddhappahārāpi hutvā vīriyaṃ akaṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Wann immer, wo immer“ – auch diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, in Bezug auf denselben Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte. Der Meister rief jenen Mönch zu sich und sprach: „Mönch, in der Vergangenheit haben die Weisen, selbst als sie keinen Halt hatten und verwundet waren, Tatkraft bewiesen“, und erzählte die Begebenheit aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente purimanayeneva satta rājāno nagaraṃ parivārayiṃsu. Atheko rathikayodho dve bhātikasindhave rathe yojetvā nagarā nikkhamma cha balakoṭṭhake bhinditvā cha rājāno aggahesi. Tasmiṃ khaṇe jeṭṭhakaasso pahāraṃ labhi. Rathiko rathaṃ pesento rājadvāraṃ āgantvā jeṭṭhabhātikaṃ rathā mocetvā sannāhaṃ sithilaṃ katvā ekeneva passena nipajjāpetvā [Pg.197] aññaṃ assaṃ sannayhituṃ āraddho. Bodhisatto taṃ disvā purimanayeneva cintetvā rathikaṃ pakkosāpetvā nipannakova imaṃ gāthamāha – Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, belagerten sieben Könige die Stadt in genau derselben Weise wie zuvor. Da spannte ein Streitwagenkämpfer zwei Sindhu-Bruderpferde vor den Streitwagen, zog aus der Stadt hinaus, durchbrach sechs Truppenformationen und nahm sechs Könige gefangen. In jenem Augenblick erlitt das ältere Pferd eine Verletzung. Der Wagenlenker lenkte den Wagen, kam zum Tor des Palastes, spannte den älteren Bruder vom Wagen ab, lockerte seine Rüstung, ließ ihn auf einer Seite liegen und begann, ein anderes Pferd zu rüsten. Als der Bodhisatta dies sah, dachte er in derselben Weise wie zuvor, ließ den Wagenlenker rufen und sprach, während er so dalag, diese Strophe: 24. 24. ‘‘Yadā yadā yattha yadā, yattha yattha yadā yadā; Ājañño kurute vegaṃ, hāyanti tattha vāḷavā’’ti. „Wann immer, wo auch immer, zu welcher Zeit, an welchen Orten auch immer, wann immer [ob verwundet oder unverletzt]: Wenn das edle Ross seine Tatkraft entfaltet, fallen die gewöhnlichen Stuten dort zurück.“ Tattha yadā yadāti pubbaṇhādīsu yasmiṃ yasmiṃ kāle. Yatthāti yasmiṃ ṭhāne magge vā saṅgāmasīse vā. Yadāti yasmiṃ khaṇe. Yattha yatthāti sattannaṃ balakoṭṭhakānaṃ vasena bahūsu yuddhamaṇḍalesu. Yadā yadāti yasmiṃ yasmiṃ kāle pahāraṃ laddhakāle vā aladdhakāle vā. Ājañño kurute veganti sārathissa cittarucitaṃ kāraṇaṃ ājānanasabhāvo ājañño varasindhavo vegaṃ karoti vāyamati vīriyaṃ ārabhati. Hāyanti tattha vāḷavāti tasmiṃ vege kariyamāne itare vaḷavasaṅkhātā khaḷuṅkassā hāyanti parihāyanti, tasmā imasmiṃ rathe maṃyeva yojehīti āha. Darin bedeutet „wann immer“ (yadā yadā): zu welcher Zeit auch immer, ob am Morgen oder zu anderen Zeiten. „Wo auch immer“ (yattha) bedeutet: an welchem Ort auch immer, sei es auf dem Weg oder an der vordersten Front der Schlacht. „Wann“ (yadā) bedeutet: in welchem Augenblick. „Wo und wo auch immer“ (yattha yattha) bedeutet: auf den zahlreichen Schlachtfeldern bezüglich der sieben Heeresgruppen. „Wann immer, wann immer“ (yadā yadā) bedeutet: zu welcher Zeit auch immer, ob zu der Zeit, da eine Verletzung erlitten wurde, oder zu der Zeit, da keine erlitten wurde. „Das edle Ross entfaltet seine Schnelligkeit“ (ājañño kurute vegaṃ) bedeutet: Das edle, vortreffliche Sindhu-Pferd, das die Absichten des Wagenlenkers zu verstehen vermag, entfaltet seine Schnelligkeit, bemüht sich und strengt seine Tatkraft an. „Dort fallen die gewöhnlichen Stuten zurück“ (hāyanti tattha vāḷavā) bedeutet: Wenn diese Schnelligkeit entfaltet wird, fallen die anderen, als minderwertige Stuten bezeichneten ungezähmten Pferde zurück und bleiben hinterher. Deshalb sagte er: „Spanne mich selbst vor diesen Wagen!“ Sārathi bodhisattaṃ uṭṭhāpetvā rathe yojetvā sattamaṃ balakoṭṭhakaṃ bhinditvā sattamaṃ rājānaṃ ādāya rathaṃ pesento rājadvāraṃ āgantvā sindhavaṃ mocesi. Bodhisatto ekena passena nipanno purimanayeneva rañño ovādaṃ datvā nirujjhi. Rājā tassa sarīrakiccaṃ kāretvā sārathissa sammānaṃ katvā dhammena rajjaṃ kāretvā yathākammaṃ gato. Der Wagenlenker half dem Bodhisatta aufzustehen, spannte ihn vor den Wagen, durchbrach die siebte Truppenformation, nahm den siebten König gefangen, lenkte den Wagen zum Tor des Königspalastes und spannte das Sindhu-Pferd ab. Der Bodhisatta lag auf einer Seite, erteilte dem König in genau derselben Weise wie zuvor eine Unterweisung und verstarb. Der König vollzog die Bestattungszeremonien für ihn, ehrte den Wagenlenker gebührend, regierte gerecht und ging entsprechend seinem Karma fort. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so bhikkhu arahatte patiṭṭhāsi. Satthā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā rājā ānandatthero ahosi, asso sammāsambuddho’’ti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheitsverkündung gründete sich jener Mönch in der Arhatschaft. Der Meister verknüpfte das Jātaka wie folgt: „Damals war der König der ältere Ānanda, das Pferd aber war der vollkommen Erleuchtete.“ Ājaññajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Ājañña-Jātaka, die vierte.
[25] 5. Titthajātakavaṇṇanā [25] 5. Die Erklärung des Tittha-Jātaka Aññamaññehi [Pg.198] titthehīti idaṃ satthā jetavane viharanto dhammasenāpatissa saddhivihārikaṃ ekaṃ suvaṇṇakārapubbakaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Āsayānusayañāṇañhi buddhānaṃyeva hoti, na aññesaṃ. Tasmā dhammasenāpati attano āsayānusayañāṇassa natthitāya saddhivihārikassa āsayānusayaṃ ajānanto asubhakammaṭṭhānameva kathesi, tassa taṃ na sappāyamahosi. Kasmā? So kira paṭipāṭiyā pañca jātisatāni suvaṇṇakārageheyeva paṭisandhiṃ gaṇhi, athassa dīgharattaṃ parisuddhasuvaṇṇadassanavasena paricitattā asubhaṃ na sappāyamahosi. So tattha nimittamattampi uppādetuṃ asakkonto cattāro māse khepesi. „An verschiedenen Tränkstellen“ (aññamaññehi titthehi) – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, in Bezug auf einen Mönch, der zuvor ein Goldschmied gewesen war und ein direkter Schüler des Feldherrn des Dhamma [Sāriputta] war. Denn das Wissen um die Neigungen und schlummernden Tendenzen der Wesen besitzen nur die Buddhas, nicht andere. Weil der Feldherr des Dhamma dieses Wissen um die Neigungen und schlummernden Tendenzen selbst nicht besaß, lehrte er, ohne die Neigung seines Schülers zu kennen, ihn nur das Meditationsobjekt der Unreinheit; dies war jedoch für jenen nicht zuträglich. Warum? Er war nämlich in aufeinanderfolgenden Existenzen fünfhundert Leben lang stets im Hause eines Goldschmieds wiedergeboren worden. Da er sich über lange Zeit hinweg daran gewöhnt hatte, reines Gold zu betrachten, war das Meditationsobjekt der Unreinheit für ihn nicht zuträglich. Da er dort nicht einmal ein Zeichen hervorzurufen vermochte, verbrachte er so vier Monate. Dhammasenāpati attano saddhivihārikassa arahattaṃ dātuṃ asakkonto ‘‘addhā ayaṃ buddhaveneyyo bhavissati, tathāgatassa santikaṃ nessāmī’’ti cintetvā pātova taṃ ādāya satthu santikaṃ agamāsi. Satthā ‘‘kiṃ nu kho, sāriputta, ekaṃ bhikkhuṃ ādāya āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Ahaṃ, bhante, imassa kammaṭṭhānaṃ adāsiṃ, ayaṃ pana catūhi māsehi nimittamattampi na uppādesi, svāhaṃ ‘buddhaveneyyo eso bhavissatī’ti cintetvā tumhākaṃ santikaṃ ādāya āgato’’ti. ‘‘Sāriputta, kataraṃ pana te kammaṭṭhānaṃ saddhivihārikassa dinna’’nti? ‘‘Asubhakammaṭṭhānaṃ bhagavā’’ti. ‘‘Sāriputta, natthi tava santāne āsayānusayañāṇaṃ, gaccha, tvaṃ sāyanhasamaye āgantvā tava saddhivihārikaṃ ādāya gaccheyyāsī’’ti. Evaṃ satthā theraṃ uyyojetvā tassa bhikkhussa manāpaṃ cīvarañca nivāsanañca dāpetvā taṃ ādāya gāmaṃ piṇḍāya pavisitvā paṇītaṃ khādanīyabhojanīyaṃ dāpetvā mahābhikkhusaṅghaparivāro puna vihāraṃ āgantvā gandhakuṭiyaṃ divasabhāgaṃ khepetvā sāyanhasamaye taṃ bhikkhuṃ gahetvā vihāracārikaṃ caramāno ambavane ekaṃ pokkharaṇiṃ māpetvā tattha mahantaṃ paduminigacchaṃ, tatrāpi ca mahantaṃ ekaṃ padumapupphaṃ māpetvā ‘‘bhikkhu imaṃ pupphaṃ olokento nisīdā’’ti nisīdāpetvā gandhakuṭiṃ pāvisi. Der Feldherr der Lehre (Dhammasenāpati), der seinem eigenen Mitbewohner die Arahatschaft nicht zu verleihen vermochte, dachte: „Sicherlich ist dieser jemand, der von einem Buddha geführt werden muss (buddhaveneyyo); ich will ihn in die Gegenwart des Tathāgata bringen.“ Am frühen Morgen nahm er ihn mit und begab sich zum Lehrer. Der Lehrer fragte: „Sāriputta, warum bist du gekommen und hast diesen einen Mönch mitgebracht?“ – „Ehrwürdiger Herr, ich habe ihm ein Meditationsobjekt gegeben, aber in vier Monaten hat er nicht einmal ein Zeichen (nimitta) hervorgebracht. Da dachte ich: ‚Dieser ist vom Buddha zu führen‘, und habe ihn in Ihre Gegenwart gebracht.“ – „Sāriputta, welches Meditationsobjekt hast du deinem Mitbewohner gegeben?“ – „Das Meditationsobjekt der Unreinheit (asubhakammaṭṭhāna), o Erhabener.“ – „Sāriputta, in deinem Geiststrom gibt es kein Wissen über die Neigungen und latenten Tendenzen der Wesen (āsayānusayañāṇa). Geh nun; wenn du am Abend wiederkommst, nimm deinen Mitbewohner mit und geh.“ Nachdem der Lehrer den Thera so verabschiedet hatte, ließ er jenem Mönch ein gefälliges Obergewand und Untergewand geben, nahm ihn mit, betrat das Dorf zum Almosengang, ließ ihm vorzügliche Speisen geben, kehrte im Gefolge einer großen Mönchsgemeinde zum Kloster zurück, verbrachte den Tag in der Duftkammer (gandhakuṭi), nahm am Abend diesen Mönch mit, ging im Kloster umher, erschuf in einem Mangohain einen Lotusteich, darin ein großes Lotusgebüsch und darauf eine einzige, große Lotusblüte, ließ ihn sich mit den Worten hinsetzen: „Mönch, blicke auf diese Blume und sitze hier“, und betrat die Duftkammer. So bhikkhu taṃ pupphaṃ punappunaṃ oloketi. Bhagavā taṃ pupphaṃ jaraṃ pāpesi, taṃ tassa passantasseva jaraṃ patvā vivaṇṇaṃ ahosi. Athassa pariyantato paṭṭhāya [Pg.199] pattāni patantāni muhuttena sabbāni patiṃsu. Tato kiñjakkhaṃ pati, kaṇṇikāva avasissi. So bhikkhu taṃ passanto cintesi ‘‘idaṃ padumapupphaṃ idāneva abhirūpaṃ ahosi dassanīyaṃ, athassa vaṇṇo pariṇato, pattāni ca kiñcakkhañca patitaṃ, kaṇṇikāmattameva avasiṭṭhaṃ, evarūpassa nāma padumassa jarā pattā, mayhaṃ sarīrassa kiṃ na pāpuṇissati, sabbe saṅkhārā aniccā’’ti vipassanaṃ paṭṭhapesi. Satthā ‘‘tassa cittaṃ vipassanaṃ āruḷha’’nti ñatvā gandhakuṭiyaṃ nisinnova obhāsaṃ pharitvā imaṃ gāthamāha – Jener Mönch blickte immer wieder auf diese Blume. Der Erhabene ließ diese Blume welken; während er noch zusah, welkte sie und verlor ihre Farbe. Dann, am Rand beginnend, fielen die Blütenblätter herab, und in einem Augenblick waren sie alle abgefallen. Daraufhin fielen die Staubfäden ab, und nur der Fruchtknoten blieb zurück. Als der Mönch dies sah, dachte er: „Gerade eben noch war diese Lotusblüte wunderschön und herrlich anzusehen, doch nun ist ihre Farbe vergangen, die Blätter und Staubfäden sind abgefallen, und nur der nackte Fruchtknoten ist übrig geblieben. Wenn selbst an einer solchen Lotusblüte der Verfall eintritt, wie sollte er da nicht meinen eigenen Körper ereilen? Alle gestalteten Dinge (saṅkhārā) sind unbeständig!“ So entfaltete er die Einsicht (vipassanā). Als der Lehrer erkannte, dass dessen Geist zur Einsicht gelangt war, sandte er, während er in der Duftkammer saß, ein strahlendes Licht aus und sprach diese Strophe: ‘‘Ucchinda sinehamattano, kumudaṃ sāradikaṃva pāṇinā; Santimaggameva brūhaya, nibbānaṃ sugatena desita’’nti. (dha. pa. 285); „Schneide die Liebe zu dir selbst ganz ab, wie man mit der Hand einen herbstlichen Lotus bricht; entfalte nur den Pfad des Friedens, das Nibbāna, das vom Wohlgegangenen (Sugata) gewiesen wurde.“ So bhikkhu gāthāpariyosāne arahattaṃ patvā ‘‘mutto vatamhi sabbabhavehī’’ti cintetvā – Am Ende der Strophe erlangte jener Mönch die Arahatschaft und dachte: „Wahrlich, ich bin von allen Daseinsformen befreit!“, und sprach: ‘‘So vutthavāso paripuṇṇamānaso, khīṇāsavo antimadehadhārī; Visuddhasīlo susamāhitindriyo, cando yathā rāhumukhā pamutto. „Der ich das heilige Leben vollendet habe, dessen Herz erfüllt ist, dessen Triebe versiegt sind und der den letzten Körper trägt, rein an Tugend und mit wohlgezügelten Sinnen, bin befreit wie der Mond aus dem Rachen des Rāhu. ‘‘Samotataṃ mohamahandhakāraṃ, vinodayiṃ sabbamalaṃ asesaṃ; Ālokapajjotakaro pabhaṅkaro, sahassaraṃsī viya bhāṇumā nabhe’’ti. – Die ringsum ausgebreitete, große Finsternis der Verblendung habe ich vertrieben und allen Makel restlos beseitigt, gleich der strahlenden Sonne am Himmel, die tausendfältigen Glanz verbreitet und Licht spendet.“ Ādīhi gāthāhi udānaṃ udānesi. Udānetvā ca pana gantvā bhagavantaṃ vandi. Theropi āgantvā satthāraṃ vanditvā attano saddhivihārikaṃ gahetvā agamāsi. Ayaṃ pavatti bhikkhūnaṃ antare pākaṭā jātā. Bhikkhū dhammasabhāyaṃ dasabalassa guṇe vaṇṇayamānā nisīdiṃsu – ‘‘āvuso, sāriputtatthero āsayānusayañāṇassa abhāvena attano saddhivihārikassa āsayaṃ na jānāti, satthā pana ñatvā ekadivaseneva tassa saha paṭisambhidāhi arahattaṃ adāsi, aho buddhā nāma mahānubhāvā’’ti. Mit diesen und weiteren Strophen rief er diesen feierlichen Ausruf (Udāna) aus. Nachdem er seiner Freude Ausdruck verliehen hatte, ging er hin und erwies dem Erhabenen Ehrfurcht. Auch der Thera kam herbei, verneigte sich vor dem Lehrer, nahm seinen Mitbewohner mit sich und ging fort. Dieses Ereignis wurde unter den Mönchen weithin bekannt. Die Mönche saßen in der Versammlungshalle und gepriesen die Tugenden des Zehnkräftigen (Dasabala): „Ihr Brüder, der Thera Sāriputta konnte wegen des Fehlens des Wissens über die Neigungen und latenten Tendenzen der Wesen den Charakter seines Mitbewohners nicht erkennen. Der Lehrer jedoch erkannte ihn und verlieh ihm an nur einem einzigen Tag die Arahatschaft samt den vier analytischen Wissenszweigen (paṭisambhidā). Wie gewaltig ist doch die Macht der Buddhas!“ Satthā [Pg.200] āgantvā paññattāsane nisīditvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. ‘‘Na bhagavā aññāya kathāya, tumhākaññeva pana dhammasenāpatino saddhivihārikassa āsayānusayañāṇakathāyā’’ti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, etaṃ acchariyaṃ, svāhaṃ etarahi buddho hutvā tassa āsayaṃ jānāmi, pubbepāhaṃ tassa āsayaṃ jānāmiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Der Lehrer kam herbei, setzte sich auf den vorbereiteten Sitz und fragte: „Mönche, worüber habt ihr euch gerade in eurem Gespräch unterhalten?“ – „Herr, über kein anderes Thema als über Ihr Wissen bezüglich der Neigungen und latenten Tendenzen des Mitbewohners des Feldherrn der Lehre.“ Der Lehrer sprach: „Mönche, dies ist kein Wunder, dass ich jetzt, da ich ein Buddha geworden bin, seine Neigung kenne. Also in der Vergangenheit kannte ich bereits seine Neigung.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatto rajjaṃ kāresi. Tadā bodhisatto taṃ rājānaṃ atthe ca dhamme ca anusāsati. Tadā rañño maṅgalaassanhānatitthe aññataraṃ vaḷavaṃ khaḷuṅkassaṃ nhāpesuṃ. Maṅgalasso vaḷavena nhānatitthaṃ otāriyamāno jigucchitvā otarituṃ na icchi. Assagopako gantvā rañño ārocesi ‘‘deva, maṅgalasso titthaṃ otarituṃ na icchatī’’ti. Rājā bodhisattaṃ pesesi – ‘‘gaccha, paṇḍita, jānāhi kena kāraṇena asso titthaṃ otāriyamāno na otaratī’’ti. Bodhisatto ‘‘sādhu, devā’’ti nadītīraṃ gantvā assaṃ oloketvā nirogabhāvamassa ñatvā ‘‘kena nu kho kāraṇena ayaṃ imaṃ titthaṃ na otaratī’’ti upadhārento ‘‘paṭhamataraṃ ettha añño nhāpito bhavissati, tenesa jigucchamāno titthaṃ na otarati maññe’’ti cintetvā assagopake pucchi ‘‘ambho, imasmiṃ titthe kaṃ paṭhamaṃ nhāpayitthā’’ti? ‘‘Aññataraṃ vaḷavassaṃ, sāmī’’ti. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wies der Bodhisatta jenen König in weltlichen und geistlichen Dingen an. Damals wuschen sie an der königlichen Prachtpferde-Tränke einen anderen, minderwertigen Hengst, der einer Stute glich. Als das Prachtpferd zu dieser Tränke hinabgeführt werden sollte, empfand es Abscheu und weigerte sich, hinabzugehen. Der Pferdepfleger ging zum König und meldete: „O König, das Prachtpferd will nicht zur Tränke hinabsteigen.“ Der König sandte den Bodhisatta mit den Worten: „Geh, Weiser, und finde heraus, aus welchem Grund das Pferd nicht hinabsteigt, wenn es zur Tränke geführt wird.“ Der Bodhisatta sagte: „Sehr wohl, o König!“, ging zum Flussufer, betrachtete das Pferd, erkannte dessen Gesundheit und überlegte: „Aus welchem Grund mag dieses Pferd wohl nicht in diese Tränke hinabsteigen?“ Er dachte bei sich: „Zuvor wurde hier wohl ein anderes Pferd gewaschen; voller Abscheu davor weigert es sich wohl, hinabzusteigen.“ Da fragte er die Pferdepfleger: „Ihr Männer, welches Pferd habt ihr zuerst an dieser Tränke gewaschen?“ – „Einen gewissen minderwertigen Hengst, o Herr!“, antworteten sie. Bodhisatto ‘‘esa attano sindhavatāya jigucchanto ettha nhāyituṃ na icchati, imaṃ aññatitthe nhāpetuṃ vaṭṭatī’’ti tassa āsayaṃ ñatvā ‘‘bho assagopaka, sappimadhuphāṇitādibhisaṅkhatapāyāsampi tāva punappunaṃ bhuñjantassa titti hoti. Ayaṃ asso bahū vāre idha titthe nhāto, aññampi tāva naṃ titthaṃ otāretvā nhāpetha ca pāyetha cā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta erkannte dessen Neigung und dachte: „Dieses Pferd empfindet wegen seiner edlen Sindh-Herkunft Abscheu und will sich hier nicht waschen lassen; es ist angebracht, es an einer anderen Tränke zu waschen.“ Er sagte: „Lieber Pferdepfleger, selbst von süßem Milchreis, der mit Butter, Honig, Sirup und dergleichen zubereitet ist, hat man schließlich genug, wenn man ihn immer wieder isst. Dieses Pferd hat schon sehr oft an dieser Tränke gebadet; führt es doch an eine andere Tränke hinab, wascht es dort und lasst es dort trinken.“ Und er sprach diese Strophe: 25. 25. ‘‘Aññamaññehi titthehi, assaṃ pāyehi sārathi; Accāsanassa puriso, pāyāsassapi tappatī’’ti. „Tränke das Pferd an verschiedenen anderen Tränken, o Wagenlenker! Selbst an Milchreis übersättigt sich ein Mensch, wenn er ihn allzu oft isst.“ Tattha aññamaññehīti aññehi aññehi. Pāyehīti desanāsīsametaṃ, nhāpehi ca pāyehi cāti attho. Accāsanassāti karaṇatthe sāmivacanaṃ[Pg.201], atiasanena atibhuttenāti attho. Pāyāsassapi tappatīti sappiādīhi abhisaṅkhatena madhurapāyāsena tappati titto hoti, dhāto suhito na puna bhuñjitukāmataṃ āpajjati. Tasmā ayampi asso imasmiṃ titthe nibaddhaṃ nhānena pariyattiṃ āpanno bhavissati, aññattha naṃ nhāpethāti. In diesem Vers bedeutet das Wort „aññamaññehi“: an verschiedenen [Wasserstellen]. „Pāyehi“ (Tränke [ihn]!) ist das Leitwort der Lehrdarlegung; die Bedeutung ist: „Bade ihn und tränke ihn!“. Das Wort „accāsanassa“ steht als Genitiv im Sinne des Instrumentals; die Bedeutung ist: „durch übermäßiges Essen, durch Überessen“. „Pāyāsassapi tappati“ (Selbst an Milchspeise wird er satt) bedeutet: Durch süße Milchspeise, die mit geklärter Butter und anderem zubereitet wurde, wird er gesättigt, das heißt, er ist vollkommen satt, sein Körper ist gänzlich befriedigt und er verspürt kein Verlangen mehr, erneut zu essen. Daher wird auch dieses Pferd durch das ständige Baden an dieser Furt des Badens überdrüssig geworden sein. Badet es an einem anderen Ort! Te tassa vacanaṃ sutvā assaṃ aññatitthaṃ otāretvā pāyiṃsu ceva nhāpayiṃsu ca. Bodhisatto assassa pānīyaṃ pivitvā nhānakāle rañño santikaṃ agamāsi. Rājā ‘‘kiṃ, tāta, asso nhāto ca pīto cā’’ti pucchi. ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Paṭhamaṃ kiṃ kāraṇā na icchatī’’ti? ‘‘Iminā nāma kāraṇenā’’ti sabbaṃ ācikkhi. Rājā ‘‘evarūpassa tiracchānassāpi nāma āsayaṃ jānāti, aho paṇḍito’’ti bodhisattassa mahantaṃ yasaṃ datvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. Bodhisattopi yathākammameva gato. Als sie seine Worte hörten, führten sie das Pferd zu einer anderen Furt hinab, tränkten es und badeten es. Als das Pferd getrunken hatte und gebadet wurde, begab sich der Bodhisatta zum König. Der König fragte: „Mein Lieber, hat das Pferd gebadet und getrunken?“ – „Ja, Majestät“, antwortete er. „Aus welchem Grund wollte es dies zuerst nicht?“ – „Aus diesem bestimmten Grund“, sagte er und erklärte alles im Detail. Der König dachte: „Er erkennt wahrlich selbst die Gesinnung eines solchen Tieres! O, wie weise!“, verlieh dem Bodhisatta großes Ansehen und ging am Ende seines Lebens gemäß seinem Kamma einher. Auch der Bodhisatta ging gemäß seinem Kamma einher. Satthā ‘‘na, bhikkhave, ahaṃ etassa idāneva āsayaṃ jānāmi, pubbepi jānāmiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā maṅgalaasso ayaṃ bhikkhu ahosi, rājā ānando, paṇḍitāmacco pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, kenne ich die Gesinnung dieses [Mönchs], auch in der Vergangenheit kannte ich sie wohl.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt und den Zusammenhang hergestellt hatte, führte er das Jātaka mit den Worten zusammen: „Damals war das Prachtpferd dieser Mönch, der König war Ānanda, der weise Minister aber war ich selbst.“ Titthajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Tittha-Jātaka ist die fünfte.
[26] 6. Mahiḷāmukhajātakavaṇṇanā [26] 6. Die Erklärung des Mahiḷāmukha-Jātaka Purāṇacorāna vaco nisammāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Devadatto ajātasattukumāraṃ pasādetvā lābhasakkāraṃ nipphādesi. Ajātasattukumāro devadattassa gayāsīse vihāraṃ kāretvā nānaggarasehi tivassikagandhasālibhojanassa divase divase pañca thālipākasatāni abhihari. Lābhasakkāraṃ nissāya devadattassa parivāro mahanto jāto, devadatto parivārena saddhiṃ vihāreyeva hoti. Tena samayena rājagahavāsikā dve sahāyā. Tesu eko satthu santike pabbajito, eko devadattassa. Te aññamaññaṃ tasmiṃ tasmiṃ ṭhānepi passanti, vihāraṃ gantvāpi passantiyeva. „Nachdem er die Worte der einstigen Diebe vernommen hatte...“ – diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verweilte, in Bezug auf Devadatta. Devadatta hatte den Prinzen Ajātasattu für sich gewonnen und so Gewinn und Ehrerbietung erlangt. Der Prinz Ajātasattu ließ für Devadatta auf dem Gayāsīsa-Hügel ein Kloster erbauen und brachte ihm täglich fünfhundert Kessel mit köstlichster, dreijähriger, duftender Sāli-Reisspeise von vielfältigem bestem Geschmack dar. Aufgrund dieses Gewinns und dieser Ehrerbietung wuchs Devadattas Gefolgschaft stark an, und Devadatta hielt sich mitsamt seiner Gefolgschaft stets in diesem Kloster auf. Zu jener Zeit lebten in Rājagaha zwei Freunde. Von diesen war einer im Beisein des Meisters ordiniert, der andere im Beisein Devadattas. Sie sahen einander an verschiedenen Orten und besuchten sich auch gegenseitig in ihren Klöstern. Athekadivasaṃ [Pg.202] devadattassa nissitako itaraṃ āha – ‘‘āvuso, kiṃ tvaṃ devasikaṃ sedehi muccamānehi piṇḍāya carasi, devadatto gayāsīsavihāre nisīditvāva nānaggarasehi subhojanaṃ bhuñjati, evarūpo upāyo natthi, kiṃ tvaṃ dukkhaṃ anubhosi, kiṃ te pātova gayāsīsaṃ āgantvā sauttaribhaṅgaṃ yāguṃ pivitvā aṭṭhārasavidhaṃ khajjakaṃ khāditvā nānaggarasehi subhojanaṃ bhuñjituṃ na vaṭṭatī’’ti? So punappunaṃ vuccamāno gantukāmo hutvā tato paṭṭhāya gayāsīsaṃ gantvā bhuñjitvā kālasseva veḷuvanaṃ āgacchati. So sabbakālaṃ paṭicchādetuṃ nāsakkhi, ‘‘gayāsīsaṃ gantvā devadattassa paṭṭhapitaṃ bhattaṃ bhuñjatī’’ti na cirasseva pākaṭo jāto. Atha naṃ sahāyā pucchiṃsu ‘‘saccaṃ kira, tvaṃ āvuso, devadattassa paṭṭhapitaṃ bhattaṃ bhuñjasī’’ti. ‘‘Ko evamāhā’’ti? ‘‘Asuko ca asuko cā’’ti. ‘‘Saccaṃ ahaṃ āvuso gayāsīsaṃ gantvā bhuñjāmi, na pana me devadatto bhattaṃ deti, aññe manussā dentī’’ti. ‘‘Āvuso, devadatto buddhānaṃ paṭikaṇṭako dussīlo ajātasattuṃ pasādetvā adhammena attano lābhasakkāraṃ uppādesi, tvaṃ evarūpe niyyānike buddhasāsane pabbajitvā devadattassa adhammena uppannaṃ bhojanaṃ bhuñjasi, ehi taṃ satthu santikaṃ nessāmā’’ti taṃ bhikkhuṃ ādāya dhammasabhaṃ āgamiṃsu. Eines Tages sprach der Schüler Devadattas zu dem anderen: „Freund, warum gehst du täglich auf Almosengang, sodass dir der Schweiß herunterläuft? Devadatta sitzt einfach im Gayāsīsa-Kloster und isst köstliche Speisen von vielfältigstem bestem Geschmack. Gibt es denn für dich keinen solchen Ausweg? Warum erträgst du dieses Leid? Geziemt es sich für dich denn nicht, am frühen Morgen nach Gayāsīsa zu kommen, Reisschleim samt Beilagen zu trinken, achtzehn Arten von festen Speisen zu essen und köstlichste Nahrung mit erlesenen Geschmäckern zu genießen?“ Da ihm dies immer wieder gesagt wurde, verspürte er den Wunsch zu gehen. Von diesem Tag an ging er nach Gayāsīsa, speiste dort und kehrte am frühen Morgen ins Veḷuvana-Kloster zurück. Er konnte dies jedoch nicht auf Dauer verbergen, und bald wurde weithin bekannt: „Er geht nach Gayāsīsa und isst die für Devadatta bereitgestellte Nahrung.“ Da fragten ihn seine Gefährten: „Stimmt es wirklich, Freund, dass du die für Devadatta bereitgestellte Nahrung isst?“ – „Wer behauptet das?“ – „Der und der“, antworteten sie. „Es stimmt, Freunde, ich gehe nach Gayāsīsa und esse dort. Doch Devadatta gibt mir die Speise nicht; andere Menschen spenden sie mir.“ – „Freund, Devadatta ist ein Widersacher der Buddhas, er ist tugendlos. Er hat Ajātasattu für sich gewonnen und auf unrechtmäßige Weise für sich Gewinn und Ehrerbietung erlangt. Du hast dich in dieser zur Befreiung führenden Lehre des Buddha ordinieren lassen und isst Speisen, die durch Devadattas unrechtes Handeln entstanden sind! Komm, wir bringen dich vor den Meister!“ Und sie nahmen diesen Mönch mit sich und begaben sich zur Versammlungshalle. Satthā disvāva ‘‘kiṃ, bhikkhave, etaṃ bhikkhuṃ anicchantaññeva ādāya āgatatthā’’ti? ‘‘Āma bhante, ayaṃ bhikkhu tumhākaṃ santike pabbajitvā devadattassa adhammena uppannaṃ bhojanaṃ bhuñjatī’’ti. ‘‘Saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu devadattassa adhammena uppannaṃ bhojanaṃ bhuñjasī’’ti? ‘‘Na bhante, devadatto mayhaṃ deti, aññe manussā denti, tamahaṃ bhuñjāmī’’ti. Satthā ‘‘mā bhikkhu ettha parihāraṃ kari, devadatto anācāro dussīlo, kathañhi nāma tvaṃ idha pabbajitvā mama sāsanaṃ bhajantoyeva devadattassa bhattaṃ bhuñjasi, niccakālampi bhajanasīlakova tvaṃ diṭṭhadiṭṭheyeva bhajasī’’ti vatvā atītaṃ āhari. Als der Meister sie sah, fragte er: „Mönche, warum habt ihr diesen Mönch gegen seinen Willen hierher gebracht?“ – „Ja, Herr, dieser Mönch ist in eurer Gegenwart ordiniert worden und isst Nahrung, die von Devadatta auf unrechtmäßige Weise erlangt wurde.“ – „Stimmt es wirklich, Mönch, dass du Nahrung isst, die von Devadatta auf unrechtmäßige Weise erlangt wurde?“ – „Nein, Herr, Devadatta gibt sie mir nicht; andere Menschen spenden sie mir, und diese esse ich.“ Der Meister sprach: „Mönch, versuche hierbei nicht, dich herauszureden! Devadatta verhält sich ungebührlich und ist tugendlos. Wie kannst du nur, nachdem du hier ordiniert bist und dich an meine Lehre hältst, Devadattas Speise essen? Du bist einer, der schon immer die Gewohnheit hatte, sich jedem anzuschließen, dem er begegnet.“ Nach diesen Worten trug er eine Begebenheit aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa amacco ahosi. Tadā rañño mahiḷāmukho nāma maṅgalahatthī ahosi sīlavā ācārasampanno, na kañci viheṭheti. Athekadivasaṃ tassa sālāya samīpe rattibhāgasamanantare corā āgantvā tassa avidūre [Pg.203] nisinnā coramantaṃ mantayiṃsu ‘‘evaṃ ummaṅgo bhinditabbo, evaṃ sandhicchedakammaṃ kattabbaṃ, ummaṅgañca sandhicchedañca maggasadisaṃ titthasadisaṃ nijjaṭaṃ niggumbaṃ katvā bhaṇḍaṃ harituṃ vaṭṭati, harantena māretvāva haritabbaṃ, evaṃ uṭṭhātuṃ samattho nāma na bhavissati, corena ca nāma sīlācārayuttena na bhavitabbaṃ, kakkhaḷena pharusena sāhasikena bhavitabba’’nti. Evaṃ mantetvā aññamaññaṃ uggaṇhāpetvā agamaṃsu. Eteneva upāyena punadivasepi punadivasepīti bahū divase tattha āgantvā mantayiṃsu. So tesaṃ vacanaṃ sutvā ‘‘te maṃ sikkhāpentī’’ti saññāya ‘‘idāni mayā kakkhaḷena pharusena sāhasikena bhavitabba’’nti tathārūpova ahosi. Pātova āgataṃ hatthigopakaṃ soṇḍāya gahetvā bhūmiyaṃ pothetvā māresi. Aparampi tathā aparampi tathāti āgatāgataṃ māretiyeva. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta sein Minister. Zu jener Zeit besaß der König einen Prachtelefanten namens Mahiḷāmukha, der tugendhaft war, von gutem Verhalten und niemanden verletzte. Eines Tages kamen mitten in der Nacht Diebe in die Nähe seines Stalls, setzten sich unweit von ihm nieder und hielten Rat über ihre Diebereien: „So muss man einen Tunnel graben, so einen Mauerdurchbruch machen. Man muss den Tunnel und den Mauerdurchbruch frei von Hindernissen wie einen Weg oder eine Furt anlegen, um die Beute wegzutragen. Wer sie wegträgt, muss [die Menschen] töten und sie erst dann wegtragen. Auf diese Weise wird niemand imstande sein, sich zu wehren. Ein Dieb darf gewiss nicht von Tugend und gutem Betragen sein; er muss roh, grob und gewalttätig sein.“ Nachdem sie sich so besprochen und einander darin unterwiesen hatten, gingen sie fort. Auf dieselbe Weise kamen sie auch am nächsten und übernächsten Tag, ja an vielen Tagen dorthin und beratschlagten sich. Als der Elefant ihre Worte hörte, dachte er: „Sie unterweisen mich“, und in dem Glauben: „Nun muss ich roh, grob und gewalttätig sein“, wurde er genau so. Am frühen Morgen packte er den herbeikommenden Elefantenpfleger mit dem Rüssel, schleuderte ihn zu Boden und tötete ihn. Ebenso verfuhr er mit einem weiteren und noch einem weiteren; er tötete jeden, der herbeikam. ‘‘Mahiḷāmukho ummattako jāto diṭṭhadiṭṭhe māretī’’ti rañño ārocayiṃsu. Rājā bodhisattaṃ pahiṇi ‘‘gaccha paṇḍita, jānāhi kena kāraṇena so duṭṭho jāto’’ti. Bodhisatto gantvā tassa sarīre arogabhāvaṃ ñatvā ‘‘kena nu kho kāraṇena esa duṭṭho jāto’’ti upadhārento ‘‘addhā avidūre kesañci vacanaṃ sutvā ‘maṃ ete sikkhāpentī’ti saññāya duṭṭho jāto’’ti sanniṭṭhānaṃ katvā hatthigopake pucchi ‘‘atthi nu kho hatthisālāya samīpe rattibhāge kehici kiñci kathitapubba’’nti? ‘‘Āma, sāmi, corā āgantvā kathayiṃsū’’ti. Bodhisatto gantvā rañño ārocesi ‘‘deva, añño hatthissa sarīre vikāro natthi, corānaṃ kathaṃ sutvā duṭṭho jāto’’ti. ‘‘Idāni kiṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti? ‘‘Sīlavante samaṇabrāhmaṇe hatthisālāyaṃ nisīdāpetvā sīlācārakathaṃ kathāpetuṃ vaṭṭatī’’ti. ‘‘Evaṃ kārehi, tātā’’ti. Sie berichteten dem König: „Mahiḷāmukha ist tollwütig geworden; er tötet jeden, den er sieht.“ Der König sandte den Bodhisatta aus: „Geh, Weiser, finde heraus, aus welchem Grund er bösartig geworden ist.“ Der Bodhisatta ging hin, stellte fest, dass dessen Körper gesund war, und überlegte: „Aus welchem Grund wohl ist er bösartig geworden?“ Er folgerte: „Sicherlich hat er ganz in der Nähe die Worte von jemandem gehört und ist in der Vorstellung ‚Diese unterweisen mich‘ bösartig geworden.“ Er fragte die Elefantenpfleger: „Wurde denn nahe beim Elefantenstall zur Nachtzeit von irgendjemandem etwas besprochen?“ – „Ja, Herr, Diebe kamen und sprachen miteinander.“ Der Bodhisatta ging hin und berichtete dem König: „O König, am Körper des Elefanten liegt keine andere Störung vor. Weil er die Rede von Dieben gehört hat, ist er bösartig geworden.“ – „Was muss nun getan werden?“ – „Man sollte tugendhafte Asketen und Brahmanen im Elefantenstall Platz nehmen lassen und sie über sittliches Verhalten sprechen lassen.“ – „Lass es so tun, mein Lieber!“ Bodhisatto gantvā sīlavante samaṇabrāhmaṇe hatthisālāyaṃ nisīdāpetvā ‘‘sīlakathaṃ kathetha, bhante’’ti āha. Te hatthissa avidūre nisinnā ‘‘na koci parāmasitabbo na māretabbo, sīlācārasampannena khantimettānuddayayuttena bhavituṃ vaṭṭatī’’ti sīlakathaṃ kathayiṃsu. So taṃ sutvā ‘‘maṃ ime sikkhāpenti, ito dāni paṭṭhāya sīlavantena bhavitabba’’nti sīlavā ahosi. Rājā bodhisattaṃ pucchi ‘‘kiṃ, tāta, sīlavā jāto’’ti[Pg.204]? Bodhisatto ‘‘āma, devā’’ti. ‘‘Evarūpo duṭṭhahatthī paṇḍite nissāya porāṇakadhammeyeva patiṭṭhito’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta ging hin, ließ die tugendhaften Asketen und Brahmanen im Elefantenstall Platz nehmen und sagte: „Sprecht über die Tugend, ehrwürdige Herren.“ Sie setzten sich unweit des Elefanten nieder und sprachen über die Tugend: „Niemand darf verletzt werden, niemand darf getötet werden; wer mit sittlichem Verhalten ausgestattet ist, sollte mit Geduld, liebevoller Güte und Mitgefühl erfüllt sein.“ Als er dies hörte, dachte er: „Diese unterweisen mich. Von nun an muss ich tugendhaft sein“, und so wurde er tugendhaft. Der König fragte den Bodhisatta: „Nun, mein Lieber, ist er tugendhaft geworden?“ Der Bodhisatta antwortete: „Ja, o König.“ Er sprach: „Ein solch bösartiger Elefant hat sich dank der Weisen wieder in seiner ursprünglichen guten Natur gefestigt“, und sprach diese Strophe: 26. 26. ‘‘Purāṇacorāna vaco nisamma, mahiḷāmukho pothayamanvacārī; Susaññatānañhi vaco nisamma, gajuttamo sabbaguṇesu aṭṭhā’’ti. „Indem er die Worte der einstigen Diebe vernahm, schlug Mahiḷāmukha um sich und verhielt sich entsprechend; doch indem er die Worte der Wohlgezügelten vernahm, festigte sich der edle Elefant wieder in all seinen guten Eigenschaften.“ Tattha purāṇacorānanti porāṇacorānaṃ. Nisammāti sutvā, paṭhamaṃ corānaṃ vacanaṃ sutvāti attho. Mahiḷāmukhoti hatthinimukhena sadisamukho. Yathā mahiḷā purato olokiyamānā sobhati, na pacchato, tathā sopi purato olokiyamāno sobhati. Tasmā ‘‘mahiḷāmukho’’tissa nāmaṃ akaṃsu. Pothayamanvacārīti pothayanto mārento anucārī. Ayameva vā pāṭho. Susaññatānanti suṭṭhu saññatānaṃ sīlavantānaṃ. Gajuttamoti uttamagajo maṅgalahatthī. Sabbaguṇesu aṭṭhāti sabbesu porāṇaguṇesu patiṭṭhito. Rājā ‘‘tiracchānagatassāpi āsayaṃ jānātī’’ti bodhisattassa mahantaṃ yasaṃ adāsi. So yāvatāyukaṃ ṭhatvā saddhiṃ bodhisattena yathākammaṃ gato. Darin bedeutet ‚purāṇacorānaṃ‘: von früheren Dieben. ‚Nisamma‘ bedeutet ‚gehört habend‘; der Sinn ist: ‚nachdem er zuerst das Wort von Dieben gehört hatte‘. ‚Mahiḷāmukha‘ bedeutet: mit einem Gesicht ähnlich dem einer Elefantenkuh. So wie eine Frau schön anzusehen ist, wenn man sie von vorne betrachtet, nicht aber von hinten, so war auch er schön anzusehen, wenn man ihn von vorne betrachtete. Deshalb gaben sie ihm den Namen ‚Mahiḷāmukha‘. ‚Pothayamanvacārī‘ bedeutet: schlagend und tötend wanderte er umher (verhielt er sich entsprechend). Dies ist die tatsächliche Lesart. ‚Susaññatānaṃ‘ bedeutet: der im Verhalten vorzüglich Gezügelten, der Tugendhaften. ‚Gajuttamo‘ bedeutet: der vorzüglichste Elefant, der königliche Festelefant. ‚Sabbaguṇesu aṭṭhā‘ bedeutet: in allen seinen früheren guten Eigenschaften gefestigt. Der König dachte: „Er versteht selbst die Absichten eines Tieres“, und verlieh dem Bodhisatta großes Ansehen. Nachdem der König sein Lebensalter vollendet hatte, ging er zusammen mit dem Bodhisatta gemäß seinem Karma dahin. Satthā ‘‘pubbepi tvaṃ bhikkhu diṭṭhadiṭṭheyeva bhaji, corānaṃ vacanaṃ sutvā core bhaji, dhammikānaṃ vacanaṃ sutvā dhammike bhajī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mahiḷāmukho vipakkhasevakabhikkhu ahosi, rājā ānando, amacco pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Auch in der Vergangenheit, o Mönch, hast du dich jedem angeschlossen, den du getroffen hast. Als du die Worte von Dieben hörtest, hast du dich Dieben angeschlossen; als du die Worte von Rechtschaffenen hörtest, hast du dich den Rechtschaffenen angeschlossen.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war Mahiḷāmukha der Mönch, der sich der gegnerischen Partei anschloss. Der König war Ānanda, der Minister aber war ich selbst.“ Mahiḷāmukhajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Mahiḷāmukha-Jātaka, die sechste, ist abgeschlossen.
[27] 7. Abhiṇhajātakavaṇṇanā [27] 7. Die Erklärung des Abhiṇha-Jātaka. Nālaṃ [Pg.205] kabaḷaṃ padātaveti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ upāsakañca mahallakattherañca ārabbha kathesi. Sāvatthiyaṃ kira dve sahāyakā. Tesu eko pabbajitvā devasikaṃ itarassa gharaṃ gacchati. So tassa bhikkhaṃ datvā sayampi bhuñjitvā teneva saddhiṃ vihāraṃ gantvā yāva sūriyatthaṅgamanā ālāpasallāpena nisīditvā nagaraṃ pavisati, itaropi naṃ yāva nagaradvārā anugantvā nivattati. So tesaṃ vissāso bhikkhūnaṃ antare pākaṭo jāto. Athekadivasaṃ bhikkhū tesaṃ vissāsakathaṃ kathentā dhammasabhāyaṃ nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi, te ‘‘imāya nāma, bhante’’ti kathayiṃsu. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idāneva ime vissāsikā, pubbepi vissāsikāyeva ahesu’’nti vatvā atītaṃ āhari. „Nicht taugt es, einen Bissen zu reichen...“ – Diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen Laienanhänger und einen älteren Thera. In Sāvatthī gab es, so heißt es, zwei Freunde. Einer von ihnen war ins Hauslose gezogen (Mönch geworden) und ging täglich zum Haus des anderen. Dieser gab ihm Almosenspeise, aß selbst auch und ging mit ihm zusammen zum Kloster. Sie saßen bis zum Sonnenuntergang im vertrauten Gespräch beisammen, woraufhin der Laie in die Stadt zurückkehrte; der andere begleitete ihn bis zum Stadttor und kehrte dann um. Diese Vertrautheit der beiden wurde unter den Mönchen bekannt. Eines Tages saßen die Mönche in der Versammlungshalle und sprachen über diese Vertrautheit. Der Meister kam hinzu und fragte: „Mönche, worüber sprecht ihr gerade in eurer Runde?“ Sie antworteten: „Über dieses Thema, ehrwürdiger Herr.“ Der Meister sagte: „Mönche, nicht erst jetzt sind diese beiden miteinander vertraut; schon in der Vergangenheit waren sie sehr vertraut“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa amacco ahosi. Tadā eko kukkuro maṅgalahatthisālaṃ gantvā maṅgalahatthissa bhuñjanaṭṭhāne patitāni bhattasitthāni khādati. So teneva bhojanena saṃvaddhamāno maṅgalahatthissa vissāsiko jāto hatthisseva santike bhuñjati, ubhopi vinā vattituṃ na sakkonti. So hatthī naṃ soṇḍāya gahetvā aparāparaṃ karonto kīḷati, ukkhipitvā kumbhe patiṭṭhāpeti. Athekadivasaṃ eko gāmikamanusso hatthigopakassa mūlaṃ datvā taṃ kukkuraṃ ādāya attano gāmaṃ agamāsi. Tato paṭṭhāya so hatthī kukkuraṃ apassanto neva khādati na pivati na nhāyati. Tamatthaṃ rañño ārocesuṃ. Rājā bodhisattaṃ pahiṇi ‘‘gaccha paṇḍita, jānāhi kiṃkāraṇā hatthī evaṃ karotī’’ti. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta sein Minister. Damals ging ein Hund in den Stall des königlichen Festelefanten und fraß die herabgefallenen Reiskörner an der Futterstelle des Elefanten. Da er durch diese Nahrung herangewachsen war, wurde er mit dem Festelefanten vertraut und fraß direkt an dessen Seite. Beide konnten nicht ohne den anderen leben. Der Elefant packte ihn mit dem Rüssel, bewegte ihn hin und her und spielte mit ihm, hob ihn hoch und setzte ihn auf seine Stirnhöcker. Eines Tages gab ein Dorfbewohner dem Elefantenwärter Geld, nahm den Hund mit und ging in sein Dorf. Von da an fraß der Elefant, da er den Hund nicht mehr sah, weder, noch trank er, noch badete er. Man berichtete dem König von dieser Angelegenheit. Der König sandte den Bodhisatta aus: „Geh, Weiser, und finde heraus, aus welchem Grund der Elefant sich so verhält.“ Bodhisatto hatthisālaṃ gantvā hatthissa dummanabhāvaṃ ñatvā ‘‘imassa sarīre rogo na paññāyati, kenaci panassa saddhiṃ mittasanthavena bhavitabbaṃ, taṃ apassanto esa maññe sokābhibhūto’’ti hatthigopake pucchi ‘‘atthi nu kho imassa kenaci saddhiṃ vissāso’’ti? ‘‘Āma, atthi sāmi ekena sunakhena saddhiṃ balavā mettī’’ti. ‘‘Kahaṃ so etarahī’’ti? ‘‘Ekena manussena nīto’’ti. ‘‘Jānātha panassa nivāsanaṭṭhāna’’nti? ‘‘Na jānāma, sāmī’’ti. Bodhisatto rañño santikaṃ gantvā ‘‘natthi, deva, hatthissa koci ābādho[Pg.206], ekena panassa sunakhena saddhiṃ balavavissāso, taṃ apassanto na bhuñjati maññe’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta ging zum Elefantenstall und erkannte die Niedergeschlagenheit des Elefanten. Er dachte: „An seinem Körper ist keine Krankheit zu erkennen. Doch er muss mit jemandem eng befreundet gewesen sein; weil er diesen nicht sieht, ist er wohl von Kummer überwältigt.“ Er fragte die Elefantenwärter: „Ist dieser Elefant denn mit jemandem besonders vertraut?“ – „Ja, Herr, er hat eine tiefe Freundschaft mit einem Hund.“ – „Wo ist dieser jetzt?“ – „Er wurde von einem Mann mitgenommen.“ – „Wisst ihr, wo dieser wohnt?“ – „Das wissen wir nicht, Herr.“ Der Bodhisatta ging zum König und sagte: „O König, der Elefant hat keine körperliche Erkrankung. Er ist jedoch sehr vertraut mit einem Hund; weil er diesen nicht sieht, frisst er wohl nicht.“ Nach diesen Worten trug er folgende Strophe vor: 27. 27. ‘‘Nālaṃ kabaḷaṃ padātave, na ca piṇḍaṃ na kuse na ghaṃsituṃ; Maññāmi abhiṇhadassanā, nāgo snehamakāsi kukkure’’ti. "Weder vermag er einen Bissen Nahrung aufzunehmen, noch einen Reisballen, noch Gras, noch lässt er sich abreiben; ich glaube, wegen des beständigen Sehens hat der Elefant eine Zuneigung zu dem Hund gefasst." Tattha nālanti na samattho. Kabaḷanti bhojanakāle paṭhamameva dinnaṃ kaṭukakabaḷaṃ. Padātaveti paādātave, sandhivasena ākāralopo veditabbo, gahetunti attho. Na ca piṇḍanti vaḍḍhetvā dīyamānaṃ bhattapiṇḍampi nālaṃ gahetuṃ. Na kuseti khādanatthāya dinnāni tiṇānipi nālaṃ gahetuṃ. Na ghaṃsitunti nhāpiyamāno sarīrampi ghaṃsituṃ nālaṃ. Evaṃ yaṃ yaṃ so hatthī kātuṃ na samattho, taṃ taṃ sabbaṃ rañño ārocetvā tassa asamatthabhāve attanā sallakkhitakāraṇaṃ ārocento ‘‘maññāmī’’tiādimāha. Darin bedeutet 'nālaṃ': nicht imstande. 'Kabaḷaṃ' bezeichnet den allerersten, zur Essenszeit gereichten Bissen. 'Padātave' ist als pa-ā-dātave zu verstehen; man sollte wissen, dass das 'ā' durch Sandhi weggefallen ist; die Bedeutung ist 'aufzunehmen'. 'Na ca piṇḍaṃ' bedeutet, dass er auch nicht imstande ist, den reichlich dargebotenen Reisballen aufzunehmen. 'Na kuse' bedeutet, dass er auch das zum Fressen dargebotene Gras nicht aufzunehmen vermag. 'Na ghaṃsituṃ' bedeutet, dass er sich beim Baden nicht einmal den Körper abreiben lassen mag. Indem der Minister dem König all das berichtete, was jener Elefant zu tun nicht imstande war, und den von ihm selbst erkannten Grund für dieses Unvermögen darlegte, sprach er die Worte, die mit 'Ich glaube' beginnen. Rājā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘idāni kiṃ kātabbaṃ paṇḍitā’’ti pucchi. ‘‘‘Amhākaṃ kira maṅgalahatthissa sahāyaṃ sunakhaṃ eko manusso gahetvā gato, yassa ghare taṃ sunakhaṃ passanti, tassa ayaṃ nāma daṇḍo’ti bheriṃ carāpetha devā’’ti. Rājā tathā kāresi. Taṃ pavattiṃ sutvā so puriso sunakhaṃ vissajjesi, sunakho vegenāgantvā hatthissa santikameva agamāsi. Hatthī taṃ soṇḍāya gahetvā kumbhe ṭhapetvā roditvā paridevitvā kumbhā otāretvā tena bhutte pacchā attanāpi bhuñji. ‘‘Tiracchānagatassa āsayaṃ jānātī’’ti rājā bodhisattassa mahantaṃ yasaṃ adāsi. Als der König seine Worte hörte, fragte er: 'O Weiser, was ist nun zu tun?' Der Bodhisatta antwortete: 'Lasst, o König, die Trommel schlagen und verkünden: „Ein Mann hat den Hund, den Gefährten unseres Staatselefanten, mitgenommen. In wessen Haus man diesen Hund findet, dem wird jene Strafe auferlegt!“' Der König ließ dies so tun. Als jener Mann diese Nachricht hörte, ließ er den Hund frei. Der Hund kam eilig gelaufen und begab sich geradewegs zum Elefanten. Der Elefant nahm ihn mit seinem Rüssel, setzte ihn auf seine Stirnhöcker, weinte und klagte, ließ ihn dann von den Stirnhöckern herab, und erst nachdem der Hund gefressen hatte, fraß er schließlich auch selbst. Der König pries ihn mit den Worten: 'Er versteht das Verlangen eines Tieres', und verlieh dem Bodhisatta großes Ansehen. Satthā ‘‘na, bhikkhave, ime idāneva vissāsikā, pubbepi vissāsikāyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā catusaccakathāya vinivaṭṭetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi. Idaṃ catusaccakathāya vinivaṭṭanaṃ nāma sabbajātakesupi atthiyeva. Mayaṃ pana yatthassa ānisaṃso paññāyati[Pg.207], tattheva dassayissāma. Der Meister sprach: 'Nicht nur jetzt, ihr Mönche, sind diese beiden vertraut miteinander, auch in der Vergangenheit waren sie bereits vertraut miteinander.' Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt, sie mit der Verkündigung der Vier Edlen Wahrheiten entfaltet und den Zusammenhang hergestellt hatte, führte er das Jātaka zusammen. Diese Entfaltung der Verkündigung der Vier Edlen Wahrheiten ist zwar in allen Jātakas enthalten; wir jedoch werden sie nur dort aufzeigen, wo ihr Nutzen offenkundig ist. Tadā sunakho upāsako ahosi, hatthī mahallakatthero, rājā ānando, amaccapaṇḍito pana ahameva ahosinti. Damals war der Hund der Laienanhänger, der Elefant war der alte ehrwürdige Thera, der König war Ānanda, und der weise Minister aber war ich selbst. Abhiṇhajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Abhiṇha-Jātaka, die siebte.
[28] 8. Nandivisālajātakavaṇṇanā [28] 8. Die Erklärung des Nandivisāla-Jātaka. Manuññameva bhāseyyāti idaṃ satthā jetavane viharanto chabbaggiyānaṃ bhikkhūnaṃ omasavādaṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi samaye chabbaggiyā kalahaṃ karontā pesale bhikkhū khuṃsenti vambhenti ovijjhanti, dasahi akkosavatthūhi akkosanti. Bhikkhū bhagavato ārocesuṃ. Bhagavā chabbaggiye pakkosāpetvā ‘‘saccaṃ kira bhikkhavo’’ti pucchitvā ‘‘sacca’’nti vutte vigarahitvā ‘‘bhikkhave, pharusavācā nāma tiracchānagatānampi amanāpā, pubbepi eko tiracchānagato attānaṃ pharusena samudācarantaṃ sahassaṃ parājesī’’ti vatvā atītaṃ āhari. 'Man soll nur Liebliches sprechen' – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf die verletzenden Reden der Gruppe von sechs Mönchen. Denn zu jener Zeit entfachten die Sechser-Mönche Streit, beschimpften, verachteten und verletzten die tugendliebenden Mönche mit Worten und schmähten sie mit den zehn Arten von Schmähungen. Die Mönche berichteten dies dem Erhabenen. Der Erhabene ließ die Sechser-Mönche herbeirufen, fragte sie: 'Ist es wahr, ihr Mönche?', und als sie antworteten: 'Es ist wahr', tadelte er sie und sprach: 'Ihr Mönche, eine raue Sprache ist selbst für Tiere unangenehm. In der Vergangenheit hat ein Tier jemanden, der es mit rauen Worten behandelte, um tausend Münzen verlieren lassen.' Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte gandhāraraṭṭhe takkasilāyaṃ gandhārarājā rajjaṃ kāresi. Tadā bodhisatto goyoniyaṃ nibbatti. Atha naṃ taruṇavacchakakāleyeva eko brāhmaṇo godakkhiṇādāyakānaṃ santikā labhitvā ‘‘nandivisālo’’ti nāmaṃ katvā puttaṭṭhāne ṭhapetvā sampiyāyamāno yāgubhattādīni datvā posesi. Bodhisatto vayappatto cintesi ‘‘ahaṃ iminā brāhmaṇena kicchena paṭijaggito, mayā ca saddhiṃ sakalajambudīpe añño samadhuro goṇo nāma natthi, yaṃnūnāhaṃ attano balaṃ dassetvā brāhmaṇassa posāvaniyaṃ dadeyya’’nti so ekadivasaṃ brāhmaṇaṃ āha ‘‘gaccha, brāhmaṇa, ekaṃ govittakaseṭṭhiṃ upasaṅkamitvā ‘mayhaṃ balibaddo atibaddhaṃ sakaṭasataṃ pavaṭṭetī’ti vatvā sahassena abbhutaṃ karohī’’ti. So brāhmaṇo seṭṭhissa santikaṃ gantvā kathaṃ samuṭṭhāpesi ‘‘imasmiṃ nagare kassa goṇo thāmasampanno’’ti. Atha naṃ seṭṭhi ‘‘asukassa ca asukassa cā’’ti vatvā ‘‘sakalanagare pana amhākaṃ goṇehi sadiso nāma natthī’’ti āha. Brāhmaṇo ‘‘mayhaṃ eko [Pg.208] goṇo atibaddhaṃ sakaṭasataṃ pavaṭṭetuṃ samattho atthī’’ti āha. Seṭṭhi gahapati ‘‘kuto evarūpo goṇo’’ti āha. Brāhmaṇo ‘‘mayhaṃ gehe atthī’’ti. ‘‘Tena hi abbhutaṃ karohī’’ti. ‘‘Sādhu karomī’’ti sahassena abbhutaṃ akāsi. Als einst im Lande Gandhara zu Takkasila der König von Gandhara herrschte, wurde der Bodhisatta als Rind geboren. Da erhielt ihn ein Brahmane, als er noch ein junges Kälbchen war, von Leuten, die Rinder als Gabe spendeten. Er gab ihm den Namen 'Nandivisāla', behandelte ihn wie einen eigenen Sohn und zog ihn liebevoll auf, indem er ihm Reisschleim, Reis und anderes Futter gab. Als der Bodhisatta herangewachsen war, dachte er: 'Ich wurde von diesem Brahmanen unter großen Mühen aufgezogen. Es gibt auf der ganzen Rosenapfel-Insel keinen anderen Ochsen, der eine gleich schwere Last wie ich tragen kann. Wie wäre es, wenn ich meine Kraft zeigte und dem Brahmanen den Lohn für seine Aufzucht erstattete?' Eines Tages sagte er zum Brahmanen: 'Geh, Brahmane, begib dich zu einem reichen Rinderbesitzer und sprich: „Mein Ochse kann hundert aneinandergebundene Karren fortbewegen“, und schließe eine Wette um tausend Münzen ab.' Jener Brahmane ging zum reichen Rinderbesitzer und begann ein Gespräch mit den Worten: 'Wessen Ochse in dieser Stadt ist wohl mit der größten Kraft ausgestattet?' Da nannte ihm der reiche Mann diesen und jenen und fügte hinzu: 'In der ganzen Stadt gibt es keinen Ochsen, der den unseren gleicht.' Der Brahmane entgegnete: 'Ich habe einen Ochsen, der imstande ist, hundert aneinandergebundene Karren fortzubewegen.' Der reiche Hausvater fragte: 'Woher sollte ein solcher Ochse kommen?' Der Brahmane sagte: 'Er steht in meinem Haus.' 'Wenn dem so ist, dann schließe eine Wette ab!' 'Gut, das werde ich tun', sprach the Brahmane und schloss eine Wette um tausend Münzen ab. So sakaṭasataṃ vālukāsakkharapāsāṇānaṃyeva pūretvā paṭipāṭiyā ṭhapetvā sabbāni akkhabandhanayottena ekato bandhitvā nandivisālaṃ nhāpetvā gandhapañcaṅgulikaṃ katvā kaṇṭhe mālaṃ piḷandhitvā purimasakaṭadhure ekakameva yojetvā sayaṃ dhure nisīditvā patodaṃ ukkhipitvā ‘‘gaccha kūṭa, vahassu kūṭā’’ti āha. Bodhisatto ‘‘ayaṃ maṃ akūṭaṃ kūṭavādena samudācaratī’’ti cattāro pāde thambhe viya niccale katvā aṭṭhāsi. Seṭṭhi taṅkhaṇaññeva brāhmaṇaṃ sahassaṃ āharāpesi. Brāhmaṇo sahassaparājito goṇaṃ muñcitvā gharaṃ gantvā sokābhibhūto nipajji. Nandivisālo caritvā āgato brāhmaṇaṃ sokābhibhūtaṃ disvā upasaṅkamitvā ‘‘kiṃ, brāhmaṇa, niddāyasī’’ti āha. ‘‘Kuto me, niddā, sahassaparājitassāti, brāhmaṇa, mayā ettakaṃ kālaṃ tava gehe vasantena atthi kiñci bhājanaṃ vā bhinditapubbaṃ, koci vā madditapubbo, aṭṭhāne vā pana uccārapassāvo katapubbo’’ti? ‘‘Natthi tātā’’ti. Atha tvaṃ maṃ kasmā kūṭavādena samudācarasi, taveveso doso, mayhaṃ doso natthi, gaccha, tena saddhiṃ dvīhi sahassehi abbhutaṃ karohi, kevalaṃ maṃ akūṭaṃ kūṭavādena mā samudācarasīti. Jener füllte hundert Karren mit Sand, Kies und Steinen, stellte sie in einer Reihe auf, band sie alle mit dem Achsenstrick zusammen, wusch Nandivisāla, versah ihn mit wohlriechenden Handabdrücken, hängte ihm einen Blumenkranz um den Hals, spannte ihn allein an die Deichsel des vordersten Karrens, setzte sich selbst auf die Deichsel, erhob die Peitsche und rief: 'Zieh, du falscher Ochse! Zieh, du krummes Vieh!' Der Bodhisatta dachte: 'Dieser Brahmane betitelt mich, der ich gar nicht falsch bin, mit beleidigenden Worten.' Da machte er seine vier Beine starr wie Säulen und blieb unbeweglich stehen. Der reiche Mann ließ den Brahmanen augenblicklich die tausend Münzen zahlen. Der Brahmane, der die tausend Münzen verloren hatte, spannte den Ochsen aus, ging nach Hause und legte sich von Kummer überwältigt nieder. Nandivisāla kam vom Weiden zurück, sah den von Kummer überwältigten Brahmanen, trat an ihn heran und fragte: 'Brahmane, warum schläfst du?' 'Wie soll ich schlafen, da ich doch tausend Münzen verloren habe?' 'Brahmane, habe ich in all der Zeit, die ich in deinem Haus verbracht habe, jemals irgendein Gefäß zerbrochen, jemals jemanden getreten oder an unpassender Stelle Kot oder Urin gelassen?' 'Nein, mein Lieber.' 'Warum also hast du mich mit dem Schimpfwort „falscher Ochse“ angeredet? Das ist allein deine Schuld, an mir liegt keine Schuld. Geh hin und schließe mit ihm eine Wette um zweitausend Münzen ab; hüte dich aber wohl, mich, der ich nicht falsch bin, erneut mit solchen Schmähworten anzureden!' Brāhmaṇo tassa vacanaṃ sutvā gantvā dvīhi sahassehi abbhutaṃ katvā purimanayeneva sakaṭasataṃ atibandhitvā nandivisālaṃ maṇḍetvā purimasakaṭadhure yojesi. Kathaṃ yojesīti? Yugaṃ dhure niccalaṃ bandhitvā ekāya koṭiyā nandivisālaṃ yojetvā ekaṃ koṭiṃ dhurayottena paliveṭhetvā yugakoṭiñca akkhapādañca nissāya muṇḍarukkhadaṇḍakaṃ datvā tena yottena niccalaṃ bandhitvā ṭhapesi. Evañhi kate yugaṃ etto vā ito vā na gacchati, sakkā hoti ekeneva goṇena ākaḍḍhituṃ. Athassa brāhmaṇo dhure nisīditvā nandivisālassa piṭṭhiṃ parimajjitvā ‘‘gaccha bhadra, vahassu, bhandrā’’ti āha. Bodhisatto atibaddhaṃ sakaṭasataṃ ekavegeneva ākaḍḍhitvā pacchā ṭhitaṃ sakaṭaṃ purato ṭhitassa sakaṭassa ṭhāne ṭhapesi[Pg.209]. Govittakaseṭṭhi parājito brāhmaṇassa dve sahassāni adāsi. Aññepi manussā bodhisattassa bahuṃ dhanaṃ adaṃsu, sabbaṃ brāhmaṇasseva ahosi. Evaṃ so bodhisattaṃ nissāya bahuṃ dhanaṃ labhi. Als der Brāhmaṇa seine Worte gehört hatte, ging er hin, schloss eine Wette über zweitausend Münzen ab, band auf die gleiche Weise wie zuvor die hundert Karren aneinander, schmückte Nandivisāla und spannte ihn an die Deichsel des vordersten Karrens. Wie spannte er ihn an? Er band das Joch unbeweglich an der Deichsel fest, spannte Nandivisāla an das eine Ende des Jochs, umwickelte das andere Ende mit dem Deichselseil, stützte es ab, indem er ein glattes Holzstück zwischen das Ende des Jochs und das Achsenlager setzte, und band es mit jenem Seil unbeweglich fest. Wenn dies so getan ist, schwankt das Joch weder hierhin noch dorthin, und ein einziger Ochse vermag die Last zu ziehen. Daraufhin setzte sich der Brāhmaṇa auf die Deichsel, streichelte Nandivisāla über den Rücken und sagte: „Zieh, mein Guter! Trage die Last, mein Guter!“ Der Bodhisatta zog die hundert fest aneinandergebundenen Karren mit einem einzigen Ruck an und brachte den hintersten Karren an die Stelle, an der zuvor der vorderste Karren gestanden hatte. Der Rinderbesitzer hatte verloren und gab dem Brāhmaṇa die zweitausend Münzen. Auch andere Menschen gaben dem Bodhisatta viel Geld, und all dies ging an den Brāhmaṇa. So erlangte er durch die Hilfe des Bodhisatta viel Wohlstand. Satthā ‘‘na, bhikkhave, pharusavacanaṃ nāma kassaci manāpa’’nti chabbaggiye bhikkhū garahitvā sikkhāpadaṃ paññapetvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister die Mönche der Sechser-Gruppe getadelt hatte mit den Worten: „Ihr Mönche, ein grobes Wort gefällt gewiss niemandem“, und die Trainingsregel erlassen hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diese Strophe: 28. 28. ‘‘Manuññameva bhāseyya, nāmanuññaṃ kudācanaṃ; Manuññaṃ bhāsamānassa, garuṃ bhāraṃ udaddhari; Dhanañca naṃ alābhesi, tena cattamano ahū’’ti. „Man sollte nur Liebliches sprechen, niemals Unliebliches. Als er Liebliches sprach, zog er die schwere Last fort; er brachte ihm Wohlstand ein, und jener wurde dadurch frohgemut.“ Tattha manuññameva bhāseyyāti parena saddhiṃ bhāsamāno catudosavirahitaṃ madhuraṃ manāpaṃ saṇhaṃ mudukaṃ piyavacanameva bhāseyya. Garuṃ bhāraṃ udaddharīti nandivisālo balibaddo amanāpaṃ bhāsamānassa bhāraṃ anuddharitvā pacchā manāpaṃ piyavacanaṃ bhāsamānassa brāhmaṇassa garuṃ bhāraṃ uddhari, uddharitvā kaḍḍhitvā pavaṭṭesīti attho, da-kāro panettha byañjanasandhivasena padasandhikaro. Darin bedeutet „man sollte nur Liebliches sprechen“: Wenn man mit anderen spricht, sollte man nur liebevolle Worte sprechen – Worte, die frei von den vier Fehlern der Rede sind, süß, angenehm, sanft und weich. „Er zog die schwere Last fort“ bedeutet: Der Stier Nandivisāla bewegte die Last nicht für den, der Unangenehmes sprach; doch später, als der Brāhmaṇa angenehme, liebevolle Worte sprach, zog er die schwere Last fort. „Fortgezogen“ (uddhari) bedeutet hierbei, dass er sie herauszog, vorwärtszog und ins Rollen brachte. Der Buchstabe „d“ in „udaddhari“ dient dabei als Sandhi-Konsonant zur Wortverbindung gemäß den Regeln des Konsonanten-Sandhis. Iti satthā ‘‘manuññameva bhāseyyā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā brāhmaṇo ānando ahosi, nandivisālo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung mit den Worten „Man sollte nur Liebliches sprechen“ dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Brāhmaṇa Ānanda, Nandivisāla aber war ich selbst.“ Nandivisālajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Hier endet die achte Erläuterung, die Erklärung des Nandivisāla-Jātaka.
[29] 9. Kaṇhajātakavaṇṇanā [29] 9. Die Erläuterung des Kaṇha-Jātaka. Yato yato garu dhuranti idaṃ satthā jetavane viharanto yamakapāṭihāriyaṃ ārabbha kathesi. Taṃ saddhiṃ devorohaṇena terasakanipāte sarabhamigajātake (jā. 1.13.134 ādayo) āvi bhavissati. Sammāsambuddhe pana yamakapāṭihāriyaṃ katvā devaloke temāsaṃ vasitvā mahāpavāraṇāya saṅkassanagaradvāre oruyha mahantena parivārena jetavanaṃ paviṭṭhe bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitvā ‘‘āvuso, tathāgato nāma asamadhuro, tathāgatena vuḷhadhuraṃ añño vahituṃ samattho nāma natthi, cha satthāro ‘mayameva [Pg.210] pāṭihāriyaṃ karissāma, mayameva pāṭihāriyaṃ karissāmā’ti vatvā ekampi pāṭihāriyaṃ na akaṃsu, aho satthā asamadhuro’’ti satthu guṇakathaṃ kathentā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. ‘‘Mayaṃ, bhante, na aññāya kathāya, evarūpāya nāma tumhākameva guṇakathāyā’’ti. Satthā ‘‘bhikkhave, idāni mayā vuḷhadhuraṃ ko vahissati, pubbe tiracchānayoniyaṃ nibbattopi ahaṃ attanā samadhuraṃ kañci nālattha’’nti vatvā atītaṃ āhari. „Von wo auch immer die Last schwer ist...“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, anlässlich des Zwillingswunders. Dieses Ereignis wird zusammen mit dem Herabsteigen aus der Götterwelt im Sarabhamiga-Jātaka im Dreizehner-Buch (Terasanipāta) ausführlich dargelegt werden. Als nun der vollkommen Erleuchtete das Zwillingswunder vollbracht hatte, drei Monate in der Götterwelt verweilt war und am Tag der Großen Einladung (Mahāpavāraṇā) am Tor der Stadt Saṅkassa herabgestiegen war, betrat er mit großem Gefolge das Jetavana-Kloster. Da versammelten sich die Mönche in der Lehrhalle und saßen da, während sie die Tugenden des Meisters rühmten: „Ihr Brüder, der Tathāgata ist fürwahr unübertrefflich im Tragen von Lasten. Außer dem Tathāgata gibt es niemanden, der imstande wäre, die von ihm getragene Last zu tragen. Die sechs Sektenführer hingegen sagten: ‚Wir selbst werden ein Wunder vollbringen, wir selbst werden ein Wunder vollbringen!‘, aber sie konnten kein einziges Wunder vollbringen. Oh, wie unübertrefflich ist der Meister im Tragen von Lasten!“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mit welchem Gespräch, ihr Mönche, sitzt ihr jetzt hier zusammen?“ Sie antworteten: „Ehrwürdiger Herr, wir sitzen nicht wegen eines anderen Themas hier, sondern wegen dieses Gesprächs über Eure eigenen Tugenden.“ Der Meister sprach: „Ihr Mönche, wer vermag heute die Last zu tragen, die ich trage? Selbst in der Vergangenheit, als ich im Tierreich wiedergeboren worden war, fand ich niemanden, der mir im Tragen der Last ebenbürtig gewesen wäre.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto goyoniyaṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. Atha naṃ sāmikā taruṇavacchakakāleyeva ekissā mahallikāya ghare vasitvā tassā nivāsavetanato paricchinditvā adaṃsu. Sā taṃ yāgubhattādīhi paṭijaggamānā puttaṭṭhāne ṭhapetvā vaḍḍhesi. So ‘‘ayyikākāḷako’’ tveva nāmaṃ paññāyittha. Vayappatto ca añjanavaṇṇo hutvā gāmagoṇehi saddhiṃ carati, sīlācārasampanno ahosi. Gāmadārakā siṅgesupi kaṇṇesupi galepi gahetvā olambanti, naṅguṭṭhepi gahetvā kīḷanti, piṭṭhiyampi nisīdanti. So ekadivasaṃ cintesi ‘‘mayhaṃ mātā duggatā, maṃ puttaṭṭhāne ṭhapetvā dukkhena posesi, yaṃnūnāhaṃ bhatiṃ katvā imaṃ duggatabhāvato moceyya’’nti. So tato paṭṭhāya bhatiṃ upadhārento carati. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta eine Wiedergeburt im Schoße eines Rindes an. Als er noch ein junges Kalb war, übergaben ihn seine Besitzer einer alten Frau als Gegenleistung für ihre Unterkunft in deren Haus. Diese pflegte ihn mit Reisschleim, gekochtem Reis und anderen Dingen, nahm ihn an Sohnes statt an und zog ihn auf. Er wurde allgemein unter dem Namen „Ayyikā-Kāḷaka“ bekannt. Als er herangewachsen war, hatte er eine glänzende, kohlschwarze Farbe wie Augensalbe, zog mit den Dorfstieren umher und war vollkommen in Tugend und gutem Betragen. Die Dorfkinder hielten sich an seinen Hörnern, seinen Ohren und an seinem Hals fest und ließen sich herabhängen, sie spielten, indem sie sich an seinem Schwanz festhielten, und ritten auch auf seinem Rücken. Eines Tages dachte er: „Meine Mutter ist arm. Sie hat mich an Sohnes statt angenommen und mich unter Entbehrungen aufgezogen. Wie wäre es, wenn ich Lohnarbeit verrichten und sie aus dieser Armut befreien würde?“ Von diesem Tag an zog er umher und hielt Ausschau nach Lohnarbeit. Athekadivasaṃ eko satthavāhaputto pañcahi sakaṭasatehi visamatitthaṃ sampatto, tassa goṇā sakaṭāni uttāretuṃ na sakkonti, pañcasu sakaṭasatesu goṇā yugaparamparāya yojitā ekampi sakaṭaṃ uttāretuṃ nāsakkhiṃsu. Bodhisattopi gāmagoṇehi saddhiṃ tattha samīpe carati. Satthavāhaputtopi gosuttavittako, so ‘‘atthi nu kho etesaṃ gunnaṃ antare imāni sakaṭāni uttāretuṃ samattho usabhājānīyo’’ti upadhārayamāno bodhisattaṃ disvā ‘‘ayaṃ ājānīyo sakkhissati mayhaṃ sakaṭāni uttāretuṃ, ko nu kho assa sāmiko’’ti gopālake pucchi ‘‘ko nu kho bho imassa sāmiko, ahaṃ imaṃ sakaṭe yojetvā sakaṭesu uttāritesu vetanaṃ dassāmī’’ti. Te āhaṃsu ‘‘gahetvā naṃ yojetha, natthi imassa imasmiṃ ṭhāne sāmiko’’ti. So naṃ nāsāya rajjukena bandhitvā ākaḍḍhento cāletumpi nāsakkhi. Bodhisatto kira ‘‘bhatiyā kathitāya [Pg.211] gamissāmī’’ti na agamāsi. Satthavāhaputto tassādhippāyaṃ ñatvā ‘‘sāmi, tayā pañcasu sakaṭasatesu uttāritesu ekekassa sakaṭassa dve dve kahāpaṇe bhatiṃ katvā sahassaṃ dassāmī’’ti āha. Tadā bodhisatto sayameva agamāsi. Atha naṃ purisā purimasakaṭesu yojesuṃ. Atha naṃ ekavegeneva ukkhipitvā thale patiṭṭhāpesi. Etenupāyena sabbasakaṭāni uttāresi. Eines Tages gelangte ein Karawanenführersohn mit fünfhundert Wagen an eine unwegsame Furt. Seine Ochsen waren nicht in der Lage, die Wagen hinaufzuziehen; selbst als die Ochsen der fünfhundert Wagen nacheinander angeschirrt wurden, konnten sie nicht einen einzigen Wagen hinaufbringen. Auch der Bodhisatta weidete dort in der Nähe zusammen mit den Dorfochsen. Der Karawanenführersohn war in der Rinderkunde bewandert. Als er prüfte, ob sich unter diesen Rindern ein edler Leitstier befände, der fähig wäre, diese Wagen hinaufzuziehen, erblickte er den Bodhisatta und dachte: „Dieser edle Stier wird fähig sein, meine Wagen hinaufzuziehen. Wer mag wohl sein Besitzer sein?“ Er fragte die Hirten: „Wer, werte Herren, ist der Besitzer dieses Stieres? Wenn ich diesen vor die Wagen spanne und die Wagen hinaufgebracht sind, werde ich einen Lohn zahlen.“ Sie sagten: „Nehmt ihn und spannt ihn an, sein Besitzer ist nicht an diesem Ort.“ Er band ihm ein Seil durch die Nase, doch als er an ihm zog, vermochte er ihn nicht einmal zu bewegen. Der Bodhisatta dachte nämlich: „Erst wenn der Lohn vereinbart ist, werde ich gehen“, und ging nicht mit. Als der Karawanenführersohn seine Absicht erkannte, sagte er: „Werter Herr, wenn du die fünfhundert Wagen hinaufgebracht hast, werde ich dir, bei einem Lohn von zwei Kahāpaṇas für jeden einzelnen Wagen, eintausend geben.“ Da ging der Bodhisatta von selbst mit. Daraufhin spannten ihn die Männer vor den vordersten Wagen. Er zog ihn mit einem einzigen gewaltigen Ruck hinauf und stellte ihn auf das feste Land. Auf diese Weise brachte er alle Wagen hinauf. Satthavāhaputto ekekassa sakaṭassa ekekaṃ katvā pañcasatāni bhaṇḍikaṃ katvā tassa gale bandhi. So ‘‘ayaṃ mayhaṃ yathāparicchinnaṃ bhatiṃ na deti, na dānissa gantuṃ dassāmī’’ti gantvā sabbapurimasakaṭassa purato maggaṃ nivāretvā aṭṭhāsi. Apanetuṃ vāyamantāpi naṃ apanetuṃ nāsakkhiṃsu. Satthavāhaputto ‘‘jānāti maññe esa attano bhatiyā ūnabhāva’’nti ekekasmiṃ sakaṭe dve dve katvā sahassabhaṇḍikaṃ bandhitvā ‘‘ayaṃ te sakaṭuttaraṇabhatī’’ti gīvāyaṃ laggesi. So sahassabhaṇḍikaṃ ādāya mātu santikaṃ agamāsi. Gāmadārakā ‘‘kiṃ nāmetaṃ ayyikākāḷakassa gale’’ti bodhisattassa santikaṃ āgacchanti. So te anubandhitvā dūratova palāpento mātu santikaṃ gato. Pañcannaṃ pana sakaṭasatānaṃ uttāritattā rattehi akkhīhi kilantarūpo paññāyittha. Ayyikā tassa gīvāya sahassatthavikaṃ disvā ‘‘tāta, ayaṃ te kahaṃ laddhā’’ti gopālakadārake pucchitvā tamatthaṃ sutvā ‘‘tāta, kiṃ ahaṃ tayā laddhabhatiyā jīvitukāmā, kiṃkāraṇā evarūpaṃ dukkhaṃ anubhosī’’ti vatvā bodhisattaṃ uṇhodakena nhāpetvā sakalasarīraṃ telena makkhetvā pānīyaṃ pāyetvā sappāyaṃ bhojanaṃ bhojetvā jīvitapariyosāne saddhiṃ bodhisattena yathākammaṃ gatā. Der Karawanenführersohn schnürte jedoch, indem er nur eine Münze pro Wagen berechnete, fünfhundert Münzen in ein Bündel und band es ihm um den Hals. Der Bodhisatta dachte: „Dieser Mann gibt mir nicht den vereinbarten Lohn. Nun werde ich ihn nicht weiterziehen lassen.“ Er ging hin, stellte sich vor den allerersten Wagen und versperrte den Weg. Obwohl sie versuchten, ihn wegzutreiben, vermochten sie ihn nicht zu entfernen. Der Karawanenführersohn dachte: „Ich glaube, er bemerkt, dass sein Lohn unvollständig ist“, berechnete zwei Münzen für jeden einzelnen Wagen, schnürte ein Bündel von tausend Münzen und hängte es ihm um den Hals mit den Worten: „Dies ist dein Lohn für das Hinaufziehen der Wagen.“ Der Bodhisatta nahm das Bündel mit tausend Münzen und ging zu seiner Mutter. Die Dorfskinder fragten: „Was ist das am Hals von Großmütters Schwarzling?“ und liefen zum Bodhisatta hin. Er jagte hinter ihnen her, trieb sie schon von weitem in die Flucht und ging zu seiner Mutter. Da er jedoch pfünfhundert Wagen hinaufgezogen hatte, sah er mit seinen geröteten Augen sehr erschöpft aus. Als die Großmutter den Beutel mit tausend Münzen an seinem Hals erblickte, fragte sie: „Mein Sohn, woher hast du das?“ Sie befragte die Hirtenjungen, und als sie die Geschichte hörte, sagte sie: „Mein Sohn, möchte ich denn von dem von dir verdienten Lohn leben? Warum hast du solches Leid ertragen?“ Sie badete den Bodhisatta mit warmem Wasser, salbte seinen ganzen Körper mit Öl, gab ihm zu trinken, fütterte ihn mit bekömmlicher Nahrung und ging am Ende ihres Lebens zusammen mit dem Bodhisatta entsprechend ihren Taten dahin. Satthā ‘‘na, bhikkhave, tathāgato idāneva asamadhuro, pubbepi asamadhuroyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, o Mönche, trägt der Tathāgata eine unvergleichliche Last; auch in der Vergangenheit hat er eine unvergleichliche Last getragen.“ Nachdem er diese Lehrrede vorgetragen und die Verbindung hergestellt hatte, sprach er als der vollkommen Erleuchtete diese Strophe: 29. 29. ‘‘Yato yato garu dhuraṃ, yato gambhīravattanī; Tadāssu kaṇhaṃ yuñjanti, svāssu taṃ vahate dhura’’nti. „Wo immer die Last schwer ist, wo immer der Weg tief und unwegsam ist; da spannen sie den Schwarzling an, und er trägt diese Last.“ Tattha yato yato garu dhuranti yasmiṃ yasmiṃ ṭhāne dhuraṃ garu bhāriyaṃ hoti, aññe balibaddā ukkhipituṃ na sakkonti. Yato gambhīravattanīti [Pg.212] vattanti etthāti vattanī, maggassetaṃ nāmaṃ, yasmiṃ ṭhāne udakacikkhallamahantatāya vā visamacchinnataṭabhāvena vā maggo gambhīro hotīti attho. Tadāssu kaṇhaṃ yuñjantīti ettha assūti nipātamattaṃ, tadā kaṇhaṃ yuñjantīti attho. Yadā dhurañca garu hoti maggo ca gambhīro, tadā aññe balibadde apanetvā kaṇhameva yojentīti vuttaṃ hoti. Svāssu taṃ vahate dhuranti etthāpi assūti nipātamattameva, so taṃ dhuraṃ vahatīti attho. Darin bedeutet „yato yato garu dhuraṃ“: an welchem Ort auch immer die Last schwer und drückend ist, so dass andere Ochsen sie nicht emporzuziehen vermögen. Bei „yato gambhīravattanī“ ist „vattanī“ das, worauf man sich fortbewegt; dies ist eine Bezeichnung für den Weg. Es bedeutet: an welchem Ort der Weg entweder wegen des Übermaßes an Wasser und Schlamm oder wegen der unebenen, steilen Ufer tief ist. In „tadāssu kaṇhaṃ yuñjanti“ ist „assu“ bloß eine Partikel; die Bedeutung ist: „dann spannen sie den Schwarzling an“. Es soll damit gesagt sein: Wenn die Last schwer und der Weg tief ist, spannen sie – nachdem sie die anderen Ochsen beiseitegeführt haben – eben den Schwarzling an. Auch in „svāssu taṃ vahate dhuraṃ“ ist „assu“ bloß eine Partikel; die Bedeutung ist: „er trägt jene Last“. Evaṃ bhagavā ‘‘tadā, bhikkhave, kaṇhova taṃ dhuraṃ vahatī’’ti dassetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mahallikā uppalavaṇṇā ahosi, ayyikākāḷako pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Erhabene so gezeigt hatte: „Damals, o Mönche, trug der Schwarzling jene Last“, stellte er die Verbindung her und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Die alte Frau von damals war Uppalavaṇṇā, und der Schwarzling der Großmutter aber war ich selbst.“ Kaṇhajātakavaṇṇanā navamā. Die Erläuterung des Kaṇha-Jātaka, die neunte.
[30] 10. Munikajātakavaṇṇanā [30] 10. Die Erläuterung des Munika-Jātaka Mā munikassa pihayīti idaṃ satthā jetavane viharanto thullakumārikāpalobhanaṃ ārabbha kathesi. Taṃ terasakanipāte cūḷanāradakassapajātake (jā. 1.13.40 ādayo) āvi bhavissati. Satthā pana taṃ bhikkhuṃ ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhitosī’’ti pucchi. ‘‘Āma, bhante’’ti. ‘‘Kiṃ nissāyā’’ti? ‘‘Thullakumārikāpalobhanaṃ bhante’’ti. Satthā ‘‘bhikkhu esā tava anatthakārikā, pubbepi tvaṃ imissā vivāhadivase jīvitakkhayaṃ patvā mahājanassa uttaribhaṅgabhāvaṃ patto’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Beneide Munika nicht“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich der Verführung durch ein reifes Mädchen. Dies wird im Cūḷanāradakassapa-Jātaka im Dreizehner-Buch deutlich werden. Der Meister aber fragte jenen Mönch: „Ist es wahr, o Mönch, dass du des Ordenslebens überdrüssig bist?“ „Ja, Ehrwürdiger Herr.“ „Worauf beruht dies?“ „Auf der Verführung durch ein reifes Mädchen, Ehrwürdiger Herr.“ Der Meister sprach: „O Mönch, diese Frau bringt dir Unheil. Schon in der Vergangenheit hast du an ihrem Hochzeitstag dein Leben verloren und bist zur Beilage für die Festgesellschaft geworden.“ Nach diesen Worten erzählte er die Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto ekasmiṃ gāmake ekassa kuṭumbikassa gehe goyoniyaṃ nibbatti ‘‘mahālohito’’ti nāmena, kaniṭṭhabhātāpissa cūḷalohito nāma ahosi. Teyeva dve bhātike nissāya tasmiṃ kule kammadhuraṃ vattati. Tasmiṃ pana kule ekā kumārikā atthi, taṃ eko nagaravāsī kulaputto attano puttassa vāresi. Tassā mātāpitaro ‘‘kumārikāya vivāhakāle āgatānaṃ pāhunakānaṃ uttaribhaṅgo bhavissatī’’ti yāgubhattaṃ datvā munikaṃ nāma sūkaraṃ posesuṃ. Taṃ disvā cūḷalohito [Pg.213] bhātaraṃ pucchi ‘‘imasmiṃ kule kammadhuraṃ vattamānaṃ amhe dve bhātike nissāya vattati, ime pana amhākaṃ tiṇapalālādīneva denti, sūkaraṃ yāgubhattena posenti, kena nu kho kāraṇena esa etaṃ labhatī’’ti. Athassa bhātā ‘‘tāta cūḷalohita, mā tvaṃ etassa bhojanaṃ pihayi, ayaṃ sūkaro maraṇabhattaṃ bhuñjati. Etissā hi kumārikāya vivāhakāle āgatānaṃ pāhunakānaṃ uttaribhaṅgo bhavissatīti ime etaṃ sūkaraṃ posenti, ito katipāhaccayena te manussā āgamissanti, atha naṃ sūkaraṃ pādesu gahetvā kaḍḍhentā heṭṭhāmañcato nīharitvā jīvitakkhayaṃ pāpetvā pāhunakānaṃ sūpabyañjanaṃ kariyamānaṃ passissasī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einem Dorf im Hause eines Hausvaters im Schoß einer Kuh geboren und erhielt den Namen „Mahālohita“ (Groß-Rot). Sein jüngerer Bruder hieß „Cūḷalohito“ (Klein-Rot). Auf eben diesen beiden Brüdern beruhte die Last der Arbeit in dieser Familie. In dieser Familie aber gab es ein junges Mädchen. Dieses hielt ein in der Stadt wohnender Sohn einer guten Familie für seinen Sohn an. Ihre Eltern zogen, in der Annahme: „Dies wird eine Beilage für die Gäste sein, die zur Hochzeitszeit des Mädchens kommen“, ein Schwein namens Munika auf, indem sie ihm Reisschleim und Reis gaben. Als Cūḷalohita dieses sah, fragte er seinen Bruder: „Die Last der Arbeit, die in dieser Familie verrichtet wird, beruht auf uns beiden Brüdern. Diese Menschen aber geben uns nur Gras, Stroh und Ähnliches, während sie das Schwein mit Reisschleim und Reis füttern. Aus welchem Grund wohl erhält dieses jene Nahrung?“ Da sprach sein Bruder zu ihm: „Lieber Cūḷalohita, beneide dieses nicht um sein Futter! Dieses Schwein isst ein Todesmahl. Denn in der Annahme, dass es eine Beilage für die Gäste sein wird, die zur Hochzeitszeit dieses Mädchens kommen, ziehen sie dieses Schwein auf. Nach Ablauf von wenigen Tagen von heute an werden jene Leute kommen. Dann wirst du sehen, wie sie dieses Schwein an den Füßen packen, unter dem Bett hervorziehen, töten und als Suppe und Beilage für die Gäste zubereiten.“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er folgende Strophe: 30. 30. ‘‘Mā munikassa pihayi, āturannāni bhuñjati; Appossukko bhusaṃ khāda, etaṃ dīghāyulakkhaṇa’’nti. „Beneide Munika nicht! Er isst die Nahrung des Leidens. Iss sorgenfrei Kleie; das ist das Zeichen für ein langes Leben.“ Tattha mā munikassa pihayīti munikassa bhojane pihaṃ mā uppādayi, ‘‘esa muniko subhojanaṃ bhuñjatī’’ti mā munikassa pihayi, ‘‘kadā nu kho ahampi evaṃ sukhito bhaveyya’’nti mā munikabhāvaṃ patthayi. Ayañhi āturannāni bhuñjati. Āturannānīti maraṇabhojanāni. Appossukko bhusaṃ khādāti tassa bhojane nirussukko hutvā attanā laddhaṃ bhusaṃ khāda. Etaṃ dīghāyulakkhaṇanti etaṃ dīghāyubhāvassa kāraṇaṃ. Tato na cirasseva te manussā āgamiṃsu, munikaṃ ghātetvā nānappakārehi paciṃsu. Bodhisatto cūḷalohitaṃ āha ‘‘diṭṭho te, tāta, muniko’’ti. Diṭṭhaṃ me, bhātika, munikassa bhojanaphalaṃ, etassa bhojanato sataguṇena sahassaguṇena amhākaṃ tiṇapalālabhusamattameva uttamañca anavajjañca dīghāyulakkhaṇañcāti. Darin bedeutet „Mā munikassa pihayī“: Erzeuge kein Verlangen nach der Nahrung Munikas. Denke nicht: „Dieses Schwein Munika isst gutes Futter“, und beneide es nicht. Wünsche dir nicht den Zustand Munikas, indem du denkst: „Wann wohl werde auch ich so glücklich sein?“ Denn dieses isst die Nahrung des Leidens. „Āturannāni“ bedeutet Mahlzeiten des Todes. „Appossukko bhusaṃ khāda“ bedeutet: Sei unbekümmert um dessen Futter und iss die Kleie, die du selbst erhalten hast. „Etaṃ dīghāyulakkhaṇan“ bedeutet: Dies ist die Ursache für ein langes Leben. Nicht lange danach kamen jene Menschen, töteten Munika und bereiteten ihn auf vielfältige Weise zu. Der Bodhisatta fragte Cūḷalohita: „Lieber Bruder, hast du Munika gesehen?“ — „Ich habe die Frucht von Munikas Nahrung gesehen, mein Bruder. Hundertfach, ja tausendfach besser als dessen Nahrung ist für uns das bloße Gras, Stroh und die Kleie; es ist vorzüglich, tadellos und das Zeichen für ein langes Leben.“ Satthā ‘‘evaṃ kho tvaṃ bhikkhu pubbepi imaṃ kumārikaṃ nissāya jīvitakkhayaṃ patvā mahājanassa uttaribhaṅgabhāvaṃ gato’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhito bhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Satthā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi [Pg.214] – ‘‘tadā munikasūkaro ukkaṇṭhitabhikkhu ahosi, thullakumārikā esā eva, cūḷalohito ānando, mahālohito pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „So bist du, o Mönch, auch in der Vergangenheit wegen dieses Mädchens zu Tode gekommen und zur Beilage für die Volksmenge geworden.“ Nachdem er diese Lehrrede dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten wurde der unzufriedene Mönch in der Frucht des Stromeintritts gefestigt. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war das Schwein Munika dieser unzufriedene Mönch, das dicke Mädchen war eben dieses Mädchen, Cūḷalohito war Ānanda, und Mahālohito aber war ich selbst.“ Munikajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Munika-Jātaka, die zehnte. Kuruṅgavaggo tatiyo. Die Kuruṅga-Vagga, die dritte. Tassuddānaṃ – Die Zusammenfassung davon: Kuruṅgaṃ kukkurañceva, bhojājānīyañca ājaññaṃ; Titthaṃ mahiḷāmukhābhiṇhaṃ, nandikaṇhañca munikanti. Das Kuruṅga-Jātaka, das Kukkura-Jātaka, das Bhojājānīya-Jātaka, das Ājañña-Jātaka, das Tittha-Jātaka, das Mahiḷāmukha-Jātaka, das Abhiṇha-Jātaka, das Nandivisāla-Jātaka, das Kaṇha-Jātaka und das Munika-Jātaka. 4. Kulāvakavaggo 4. Die Kulāvaka-Vagga
[31] 1. Kulāvakajātakavaṇṇanā [31] 1. Die Erklärung des Kulāvaka-Jātaka Kulāvakāti idaṃ satthā jetavane viharanto aparissāvetvā pānīyaṃ pītaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Sāvatthito kira dve sahāyakā daharabhikkhū janapadaṃ gantvā ekasmiṃ phāsukaṭṭhāne yathājjhāsayaṃ vasitvā ‘‘sammāsambuddhaṃ passissāmā’’ti puna tato nikkhamitvā jetavanābhimukhā pāyiṃsu. Ekassa hatthe parissāvanaṃ atthi, ekassa natthi. Dvepi ekato pānīyaṃ parissāvetvā pivanti. Te ekadivasaṃ vivādaṃ akaṃsu. Parissāvanasāmiko itarassa parissāvanaṃ adatvā sayameva pānīyaṃ parissāvetvā pivi, itaro pana parissāvanaṃ alabhitvā pipāsaṃ sandhāretuṃ asakkonto aparissāvetvā pānīyaṃ pivi. Te ubhopi anupubbena jetavanaṃ patvā satthāraṃ vanditvā nisīdiṃsu. Satthā sammodanīyaṃ kathaṃ kathetvā ‘‘kuto āgatatthā’’ti pucchi. ‘‘Bhante, mayaṃ kosalajanapade ekasmiṃ gāmake vasitvā tato nikkhamitvā tumhākaṃ dassanatthāya āgatā’’ti. ‘‘Kacci pana vo samaggā āgatatthā’’ti? Aparissāvanako āha ‘‘ayaṃ, bhante, antarāmagge mayā saddhiṃ vivādaṃ katvā parissāvanaṃ nādāsī’’ti. Itaropi āha ‘‘ayaṃ, bhante, aparissāvetvāva jānaṃ sapāṇakaṃ udakaṃ pivī’’ti. ‘‘Saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu jānaṃ sapāṇakaṃ udakaṃ pivī’’ti? ‘‘Āma, bhante, aparissāvitaṃ udakaṃ pivinti[Pg.215]. Satthā ‘‘bhikkhu pubbe paṇḍitā devanagare rajjaṃ kārentā yuddhaparājitā samuddapiṭṭhena palāyantā ‘issariyaṃ nissāya pāṇavadhaṃ na karissāmā’ti tāva mahantaṃ yasaṃ pariccajitvā supaṇṇapotakānaṃ jīvitaṃ datvā rathaṃ nivattayiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Kulāvaka“ — diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen Mönch, der Wasser trank, ohne es vorher zu filtern. Es heißt, dass zwei befreundete junge Mönche aus Sāvatthī in die Provinz reisten, dort an einem angenehmen Ort ganz nach ihrem Wunsch lebten und sich dann mit den Worten: „Wir wollen den vollkommen Erleuchteten sehen“, wieder von dort aufmachten und sich in Richtung des Jetavana-Klosters begaben. Einer von ihnen hatte einen Wasserfilter in der Hand, der andere nicht. Beide filterten und tranken das Wasser gemeinsam. Eines Tages gerieten sie in einen Streit. Der Besitzer des Wasserfilters gab dem anderen den Filter nicht mehr und filterte und trank das Wasser selbst. Der andere jedoch konnte, da er keinen Filter bekam, seinen Durst nicht länger ertragen und trank das Wasser ungefiltert. Beide erreichten schließlich nacheinander das Jetavana-Kloster, erwiesen dem Meister ihre Ehrfurcht und setzten sich nieder. Nach einer freundlichen Begrüßung fragte der Meister: „Woher kommt ihr?“ — „Ehrwürdiger Herr, wir haben in einem Dorf im Kosala-Land gelebt und sind von dort aufgebrochen, um Euch zu sehen.“ — „Seid ihr denn in Eintracht hierher gekommen?“ Der Mönch ohne Filter sagte: „Ehrwürdiger Herr, dieser hier hat auf dem Weg mit mir gestritten und mir den Filter nicht gegeben.“ Der andere sagte: „Ehrwürdiger Herr, dieser hier hat ungefiltertes Wasser getrunken, obwohl er wusste, dass Lebewesen darin waren.“ — „Stimmt es wirklich, o Mönch, dass du Wasser getrunken hast, obwohl du wusstest, dass Lebewesen darin waren?“ — „Ja, ehrwürdiger Herr, ich habe ungefiltertes Wasser getrunken.“ Der Meister sprach: „O Mönch, in der Vergangenheit haben Weise, als sie die Herrschaft in der Götterstadt ausübten und nach einer Niederlage im Krieg über den Ozean flohen, aus Mitgefühl gedacht: ‚Wir wollen nicht um der Herrschaft willen Leben vernichten‘, gaben ihre so große Herrlichkeit auf, retteten das Leben der jungen Garuḍas und ließen ihren Wagen umkehren.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte magadharaṭṭhe rājagahe eko māgadharājā rajjaṃ kāresi. Tadā bodhisatto yathā etarahi sakko purimattabhāve magadharaṭṭhe macalagāmake nibbatti, evaṃ tasmiṃyeva macalagāmake mahākulassa putto hutvā nibbatti. Nāmaggahaṇadivase cassa ‘‘maghakumāro’’tveva nāmaṃ akaṃsu. So vayappatto ‘‘maghamāṇavo’’ti paññāyittha. Athassa mātāpitaro samānajātikakulato dārikaṃ ānayiṃsu. So puttadhītāhi vaḍḍhamāno dānapati ahosi, pañca sīlāni rakkhati. Tasmiñca gāme tettiṃseva kulāni honti, tepi tettiṃsa kulā manussā ekadivasaṃ gāmamajjhe ṭhatvā gāmakammaṃ karonti. Bodhisatto ṭhitaṭṭhāne pādehi paṃsuṃ viyūhitvā taṃ padesaṃ ramaṇīyaṃ katvā aṭṭhāsi, athañño eko āgantvā tasmiṃ ṭhāne ṭhito. Bodhisatto aparaṃ ṭhānaṃ ramaṇīyaṃ katvā aṭṭhāsi, tatrāpi añño ṭhito. Bodhisatto aparampi aparampīti sabbesampi ṭhitaṭṭhānaṃ ramaṇīyaṃ katvā aparena samayena tasmiṃ ṭhāne maṇḍapaṃ kāresi, maṇḍapampi apanetvā sālaṃ kāresi, tattha phalakāsanāni santharitvā pānīyacāṭiṃ ṭhapesi. In der Vergangenheit, im Reich Magadha, in Rājagaha, herrschte ein magadhischer König. Damals wurde der Bodhisatta – so wie der heutige Sakka in einer früheren Existenz im Reich Magadha im Dorf Macala geboren wurde – ebenso in genau diesem Dorf Macala als Sohn einer angesehenen Familie geboren. An dem Tag, an dem er seinen Namen erhalten sollte, nannte man ihn „Magha-kumāra“ (der Jüngling Magha). Als er heranwuchs, wurde er als „Magha-māṇava“ (der junge Mann Magha) bekannt. Daraufhin brachten ihm seine Eltern ein Mädchen aus einer Familie von gleichem Stande. Während er an Söhnen und Töchtern reich wurde, war er ein Herr des Gebens und hielt die fünf Tugendregeln ein. In jenem Dorf gab es genau dreiunddreißig Familien. Auch diese Männer aus den dreiunddreißig Familien standen eines Tages in der Mitte des Dorfes und verrichteten Gemeinschaftsarbeiten für das Dorf. Der Bodhisatta fegte an der Stelle, an der er stand, den Staub mit seinen Füßen beiseite, machte diesen Platz angenehm und blieb dort stehen. Da kam ein anderer herbei und stellte sich an diesen Platz. Der Bodhisatta säuberte eine andere Stelle, machte sie angenehm und stellte sich dorthin; doch auch dort stellte sich ein anderer hin. Der Bodhisatta machte so immer und immer wieder die Stehplätze für alle angenehm, und nach einiger Zeit ließ er an diesem Ort eine Laube errichten. Später ließ er die Laube wieder abbauen und errichtete eine Rasthalle; dort stellte er Holzsitze auf und stellte ein Gefäß mit Trinkwasser bereit. Aparena samayena tepi tettiṃsajanā bodhisattena samānacchandā ahesuṃ. Te bodhisatto pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā tato paṭṭhāya tehi saddhiṃ puññāni karonto vicarati. Tepi teneva saddhiṃ puññāni karontā kālasseva vuṭṭhāya vāsipharasumusalahatthā catumahāpathādīsu musalena pāsāṇe ubbattetvā pavaṭṭenti, yānānaṃ akkhapaṭighātarukkhe haranti, visamaṃ samaṃ karonti, setuṃ attharanti, pokkharaṇiyo khaṇanti, sālaṃ karonti, dānāni denti, sīlāni rakkhanti. Evaṃ yebhuyyena sakalagāmavāsino bodhisattassa ovāde ṭhatvā sīlāni rakkhiṃsu. Nach einiger Zeit bekamen auch jene dreiunddreißig Männer dieselbe Gesinnung wie der Bodhisatta. Der Bodhisatta festigte sie in den fünf Tugendregeln, und von da an zog er mit ihnen umher und tat heilsame Werke. Auch sie verrichteten gemeinsam mit ihm heilsame Werke. Sie standen frühmorgens auf, nahmen Hacken, Äxte und Brechstangen in die Hände, hoben an den Kreuzungen der Hauptstraßen die Steine mit den Brechstangen aus dem Weg und rollten sie beiseite. Sie entfernten Bäume, an denen die Achsen der Wagen anstießen, machten unebene Wege eben, bauten Brücken, hoben Teiche aus, errichteten Rasthallen, gaben Gaben und hielten die Tugendregeln ein. So hielten die Dorfbewohner im Allgemeinen fast alle die Tugendregeln ein, indem sie der Ermahnung des Bodhisatta folgten. Atha [Pg.216] nesaṃ gāmabhojako cintesi ‘‘ahaṃ pubbe etesu suraṃ pivantesu pāṇātipātādīni karontesu cāṭikahāpaṇādivasena ceva daṇḍabalivasena ca dhanaṃ labhāmi, idāni pana magho māṇavo sīlaṃ rakkhāpeti, tesaṃ pāṇātipātādīni kātuṃ na deti, idāni pana te pañca sīlāni na rakkhāpessāmī’’ti kuddho rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘deva, bahū corā gāmaghātādīni karontā vicarantī’’ti āha. Rājā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘gaccha, te ānehī’’ti āha. So gantvā sabbepi te bandhitvā ānetvā ‘‘ānītā, deva, corā’’ti rañño ārocesi. Rājā tesaṃ kammaṃ asodhetvāva ‘‘hatthinā ne maddāpethā’’ti āha. Tato sabbepi te rājaṅgaṇe nipajjāpetvā hatthiṃ ānayiṃsu. Bodhisatto tesaṃ ovādaṃ adāsi ‘‘tumhe sīlāni āvajjetha, pesuññakārake ca raññe ca hatthimhi ca attano sarīre ca ekasadisameva mettaṃ bhāvethā’’ti. Te tathā akaṃsu. Atha nesaṃ maddanatthāya hatthiṃ upanesuṃ. So upanīyamānopi na upagacchati, mahāviravaṃ viravitvā palāyati. Aññaṃ aññaṃ hatthiṃ ānayiṃsu, tepi tatheva palāyiṃsu. Da dachte ihr Dorfvorsteher: „Früher, als diese Leute noch Rauschgetränke tranken und Lebewesen töteten, erhielt ich viel Geld durch die Steuer auf Krüge und Münzen sowie durch Strafgelder. Nun aber bringt der junge Magha sie dazu, die Tugendregeln einzuhalten, und lässt sie keine Lebewesen mehr töten. Nun werde ich dafür sorgen, dass sie die fünf Tugendregeln nicht mehr einhalten.“ Voller Zorn begab er sich zum König und sagte: „Majestät, viele Räuber ziehen umher und plündern Dörfer!“ Als der König dies hörte, sagte er: „Geh und bringe sie her!“ Er ging hin, fesselte sie alle, brachte sie herbei und meldete dem König: „Majestät, die Räuber sind herbeigebracht worden.“ Ohne ihre Taten überhaupt zu untersuchen, sagte der König: „Lasst sie von einem Elefanten zertrampeln!“ Daraufhin ließ man sie alle auf dem Schlosshof flach auf den Boden legen und brachte den Elefanten herbei. Der Bodhisatta gab ihnen folgenden Rat: „Besinnt euch auf eure Tugendregeln. Entfaltet eine völlig gleiche liebevolle Güte gegenüber dem Verleumder, dem König, dem Elefanten und eurem eigenen Körper.“ Sie taten so. Da führte man den Elefanten heran, um sie zu zertrampeln. Doch obwohl er herangeführt wurde, ging er nicht auf sie zu, stieß ein lautes Geschrei aus und lief davon. Man brachte nacheinander andere Elefanten herbei, doch auch diese flohen auf genau dieselbe Weise. Rājā ‘‘etesaṃ hatthe kiñci osadhaṃ bhavissatī’’ti cintetvā ‘‘vicinathā’’ti āha. Vicinantā adisvā ‘‘natthi, devā’’ti āhaṃsu. Tena hi kiñci mantaṃ parivattessanti, pucchatha ne ‘‘atthi vo parivattanamanto’’ti? Rājapurisā pucchiṃsu, bodhisatto ‘‘atthī’’ti āha. Rājapurisā ‘‘atthi kira, devā’’ti ārocayiṃsu, rājā sabbepi te pakkosāpetvā ‘‘tumhākaṃ jānanamantaṃ kathethā’’ti āha. Bodhisatto avoca ‘‘deva, añño amhākaṃ manto nāma natthi, amhe pana tettiṃsamattā janā pāṇaṃ na hanāma, adinnaṃ nādiyāma, micchācāraṃ na carāma, musāvādaṃ na bhaṇāma, majjaṃ na pivāma, mettaṃ bhāvema, dānaṃ dema, maggaṃ samaṃ karoma, pokkharaṇiyo khaṇāma, sālaṃ karoma, ayaṃ amhākaṃ manto ca parittañca vuḍḍhi cā’’ti. Rājā tesaṃ pasanno pesuññakārakassa sabbaṃ gehavibhavaṃ tañca tesaṃyeva dāsaṃ katvā adāsi, taṃ hatthiñca gāmañca tesaṃyeva adāsi. Der König dachte: „Sie müssen irgendein Heilmittel bei sich haben“, und befahl: „Durchsucht sie!“ Sie durchsuchten sie, fanden jedoch nichts und sagten: „Es gibt keines, Majestät.“ „Dann rezitieren sie gewiss irgendeinen Zauberspruch. Fragt sie: ‚Habt ihr einen Spruch, den ihr rezitiert?‘“ Die Männer des Königs fragten sie, und der Bodhisatta antwortete: „Ja, den haben wir.“ Die Männer des Königs meldeten: „Majestät, sie sagen, sie hätten einen.“ Der König ließ sie alle rufen und sagte: „Sagt mir, welchen Zauberspruch ihr kennt.“ Der Bodhisatta sprach: „Majestät, wir haben keinen anderen Zauberspruch. Doch wir dreiunddreißig Menschen töten kein lebendes Wesen, nehmen nichts Nicht-Gegebenes, begehen keinen Ehebruch, sprechen keine Lüge und trinken keine berauschenden Getränke. Wir entfalten liebevolle Güte, geben Gaben, machen die Wege eben, heben Teiche aus und bauen Rasthallen. Dies ist unser Zauberspruch, unser Schutz und unser Segen.“ Der König war von ihnen tief beeindruckt; er gab ihnen den gesamten Hausbesitz des Verleumders, machte diesen zu ihrem Sklaven und schenkte ihnen auch jenen Elefanten sowie das ganze Dorf. Te tato paṭṭhāya yathāruciyā puññāni karontā ‘‘catumahāpathe mahantaṃ sālaṃ kāressāmā’’ti vaḍḍhakiṃ pakkosāpetvā sālaṃ [Pg.217] paṭṭhapesuṃ. Mātugāmesu pana vigatacchandatāya tassā sālāya mātugāmānaṃ pattiṃ nādaṃsu. Tena ca samayena bodhisattassa gehe sudhammā, cittā, nandā, sujāti catasso itthiyo honti. Tāsu sudhammā vaḍḍhakinā saddhiṃ ekato hutvā ‘‘bhātika, imissā sālāya maṃ jeṭṭhikaṃ karohī’’ti vatvā lañjaṃ adāsi. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā paṭhamameva kaṇṇikārukkhaṃ sukkhāpetvā tacchetvā vijjhitvā kaṇṇikaṃ niṭṭhāpetvā vatthena paliveṭhetvā ṭhapesi. Atha sālaṃ niṭṭhāpetvā kaṇṇikāropanakāle ‘‘aho, ayyā, ekaṃ na sarimhā’’ti āha. ‘‘Kiṃ nāma, bho’’ti. ‘‘Kaṇṇikā laddhuṃ vaṭṭatī’’ti. ‘‘Hotu āharissāmā’’ti? ‘‘Idāni chinnarukkhena kātuṃ na sakkā, pubbeyeva chinditvā tacchetvā vijjhitvā ṭhapitakaṇṇikā laddhuṃ vaṭṭatī’’ti. ‘‘Idāni kiṃ kātabba’’nti? ‘‘Sace kassaci gehe niṭṭhāpetvā ṭhapitā vikkāyikakaṇṇikā atthi, sā pariyesitabbā’’ti. Te pariyesantā sudhammāya gehe disvā mūlena na labhiṃsu. ‘‘Sace maṃ sālāya pattikaṃ karotha, dassāmī’’ti vutte ‘‘na mayaṃ mātugāmānaṃ pattiṃ damhā’’ti āhaṃsu. Von da an verrichteten sie nach Belieben heilsame Werke. Sie ließen einen Zimmermann rufen und sagten: „Wir wollen eine große Rasthalle an der großen Straßenkreuzung bauen“, und begannen mit dem Bau der Halle. Da sie jedoch frei von Verlangen gegenüber Frauen waren, gaben sie den Frauen keinen Anteil am Verdienst für diese Rasthalle. Zu jener Zeit lebten im Hause des Bodhisatta vier Frauen namens Sudhammā, Cittā, Nandā und Sujā. Unter ihnen tat sich Sudhammā mit dem Zimmermann zusammen, sagte zu ihm: „Lieber Bruder, mach mich zur Hauptstifterin dieser Rasthalle“, und gab ihm ein Bestechungsgeschenk. Dieser willigte mit den Worten „Sehr wohl“ ein. Als Erstes ließ er das Holz für die Dachkrone trocknen, behobelte es, bohrte Löcher hinein, stellte die Dachkrone fertig, wickelte sie in ein Tuch und legte sie beiseite. Als die Halle fertiggestellt war und die Dachkrone aufgesetzt werden sollte, sagte er: „O weh, werte Herren, eines haben wir völlig vergessen!“ „Was denn, mein Guter?“ „Wir müssen eine passende Dachkrone haben.“ „Nun gut, wir werden eine besorgen!“ „Jetzt kann man sie nicht mehr aus frisch gefälltem Holz anfertigen. Man müsste eine Dachkrone bekommen, die schon vor langer Zeit gefällt, behobelt, gebohrt und gelagert wurde.“ „Was sollen wir nun tun?“ „Wenn in jemandes Haus eine fertige Dachkrone zum Verkauf steht, sollte man nach ihr suchen.“ Als sie suchten, fanden sie eine in Sudhammās Haus; doch sie konnten sie nicht für Geld erwerben. Als sie sagte: „Wenn ihr mir einen Anteil am Verdienst dieser Rasthalle gewährt, werde ich sie euch geben“, erwiderten sie: „Wir geben Frauen keinen Anteil am Verdienst.“ Atha ne vaḍḍhakī āha ‘‘ayyā, tumhe kiṃ kathetha, ṭhapetvā brahmalokaṃ aññaṃ mātugāmarahitaṭṭhānaṃ nāma natthi, gaṇhatha kaṇṇikaṃ, evaṃ sante amhākaṃ kammaṃ niṭṭhaṃ gamissatī’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti kaṇṇikaṃ gahetvā sālaṃ niṭṭhāpetvā āsanaphalakāni santharitvā pānīyacāṭiyo ṭhapetvā yāgubhattaṃ nibandhiṃsu. Sālaṃ pākārena parikkhipitvā dvāraṃ yojetvā antopākāre vālukaṃ ākiritvā bahipākāre tālapantiyo ropesuṃ. Cittāpi tasmiṃ ṭhāne uyyānaṃ kāresi, ‘‘pupphūpagaphalūpagarukkho asuko nāma tasmiṃ natthī’’ti nāhosi. Nandāpi tasmiṃyeva ṭhāne pokkharaṇiṃ kāresi pañcavaṇṇehi padumehi sañchannaṃ ramaṇīyaṃ. Sujā na kiñci akāsi. Da sprach der Zimmermann zu ihnen: „Ihr Herren, was sagt ihr da? Abgesehen von der Brahma-Welt gibt es keinen Ort, der frei von Frauen ist. Nehmt den Dachfirst an! Wenn dies geschieht, wird unsere Arbeit vollendet sein.“ Sie willigten ein, indem sie „Gut!“ sagten, nahmen den Dachfirst an, vollendeten die Halle, breiteten Sitzbretter aus, stellten Trinkwasserkrüge auf und stifteten eine dauerhafte Gabe von Reisschleim und Speise. Sie umgaben die Halle mit einer Ringmauer, brachten ein Tor an, streuten Sand im Inneren der Mauer aus und pflanzten Reihen von Palmen außerhalb der Mauer. Auch Cittā ließ an jenem Ort einen Park anlegen; es gab keinen Baum, der Früchte oder Blüten trug, von dem man hätte sagen können, dass er in jenem Park fehlte. Auch Nandā ließ an eben jenem Ort einen lieblichen Teich ausheben, der mit fünf farbigen Arten von Lotusblumen bedeckt war. Sujā tat gar nichts. Bodhisatto mātu upaṭṭhānaṃ pitu upaṭṭhānaṃ kule jeṭṭhāpacāyikakammaṃ saccavācaṃ apharusavācaṃ apisuṇavācaṃ maccheravinayanti imāni satta vatapadāni pūretvā – Indem der Bodhisatta diese sieben Pflichten erfüllte – nämlich die Fürsorge für die Mutter, die Fürsorge für den Vater, die Ehrfurcht gegenüber den Ältesten in der Familie, wahrheitsgemäße Rede, sanfte Rede, verleumdungsfreie Rede und das Bezwingen von Geiz – ‘‘Mātāpettibharaṃ jantuṃ, kule jeṭṭhāpacāyinaṃ; Saṇhaṃ sakhilasambhāsaṃ, pesuṇeyyappahāyinaṃ. „Ein Wesen, das Mutter und Vater versorgt, die Ältesten in der Familie ehrt, sanft und freundlich im Gespräch ist und die Verleumdung aufgegeben hat, ‘‘Maccheravinaye [Pg.218] yuttaṃ, saccaṃ kodhābhibhuṃ naraṃ; Taṃ ve devā tāvatiṃsā, āhu sappuriso itī’’ti. (saṃ. ni. 1.257) – das sich der Überwindung des Geizes widmet, wahrhaftig ist und den Zorn bezwingt – einen solchen Menschen bezeichnen die Tāvatiṃsa-Götter fürwahr als einen edlen Menschen.“ Evaṃ pasaṃsiyabhāvaṃ āpajjitvā jīvitapariyosāne tāvatiṃsabhavane sakko devarājā hutvā nibbatti, tepissa sahāyā tattheva nibbattiṃsu. Tasmiṃ kāle tāvatiṃsabhavane asurā paṭivasanti. Sakko devarājā ‘‘kiṃ no sādhāraṇena rajjenā’’ti asure dibbapānaṃ pāyetvā matte samāne pādesu gāhāpetvā sinerupabbatapāde khipāpesi. Te asurabhavanameva sampāpuṇiṃsu. Nachdem er auf diese Weise Lobwürdigkeit erlangt hatte, wurde er am Ende seines Lebens im Reich der Tāvatiṃsa-Götter als Sakka, der König der Götter, wiedergeboren. Auch seine Gefährten wurden ebendort wiedergeboren. Zu jener Zeit bewohnten die Asuras das Reich der Tāvatiṃsa-Götter. Der Götterkönig Sakka dachte: „Was nützt uns ein geteiltes Königreich?“ Er gab den Asuras den himmlischen Trank zu trinken, und als sie betrunken waren, ließ er sie an den Füßen packen und an den Fuß des Sineru-Berges hinabwerfen. Sie gelangten direkt in das Reich der Asuras. Asurabhavanaṃ nāma sinerussa heṭṭhimatale tāvatiṃsadevalokappamāṇameva, tattha devānaṃ pāricchattako viya cittapāṭali nāma kappaṭṭhiyarukkho hoti. Te cittapāṭaliyā pupphitāya jānanti ‘‘nāyaṃ amhākaṃ devaloko, devalokasmiñhi pāricchattako pupphatī’’ti. Atha te ‘‘jarasakko amhe matte katvā mahāsamuddapiṭṭhe khipitvā amhākaṃ devanagaraṃ gaṇhi, te mayaṃ tena saddhiṃ yujjhitvā amhākaṃ devanagarameva gaṇhissāmā’’ti kipillikā viya thambhaṃ sineruṃ anusañcaramānā uṭṭhahiṃsu. Sakko ‘‘asurā kira uṭṭhitā’’ti sutvā samuddapiṭṭheyeva abbhuggantvā yujjhamāno tehi parājito diyaḍḍhayojanasatikena vejayantarathena dakkhiṇasamuddassa matthakena palāyituṃ āraddho. Athassa ratho samuddapiṭṭhena vegena gacchanto simbalivanaṃ pakkhanto, tassa gamanamagge simbalivanaṃ naḷavanaṃ viya chijjitvā chijjitvā samuddapiṭṭhe patati. Supaṇṇapotakā samuddapiṭṭhe paripatantā mahāviravaṃ raviṃsu. Sakko mātaliṃ pucchi ‘‘samma mātali, kiṃ saddo nāmesa, atikāruññaravo vattatī’’ti? ‘‘Deva, tumhākaṃ rathavegena vicuṇṇite simbalivane patante supaṇṇapotakā maraṇabhayatajjitā ekaviravaṃ viravantī’’ti. Das Reich der Asuras befindet sich auf der untersten Ebene des Sineru-Berges und ist genau so groß wie die Tāvatiṃsa-Götterwelt. Dort gibt es einen ein ganzes Weltzeitalter überdauernden Baum namens Cittapāṭali, vergleichbar mit dem Pāricchattaka-Baum der Götter. Wenn dieser Cittapāṭali-Baum blühte, erkannten die Asuras: „Dies ist nicht unsere Götterwelt; denn in der Götterwelt blüht der Pāricchattaka-Baum.“ Daraufhin dachten sie: „Der alte Sakka hat uns betrunken gemacht, uns in den großen Ozean geworfen und unsere Götterstadt weggenommen. Wir wollen mit ihm kämpfen und unsere Götterstadt zurückholen!“ Und wie Ameisen an einer Säule kletterten sie den Sineru-Berg hinauf. Als Sakka hörte: „Die Asuras kommen herauf!“, zog er ihnen direkt über der Meeresoberfläche entgegen und kämpfte mit ihnen. Doch er wurde von ihnen besiegt und trat auf seinem einhundertfünfzig Yojanas großen Vejayanta-Streitwagen die Flucht über den südlichen Ozean an. Als sein Streitwagen in rasender Fahrt über die Meeresoberfläche eilte, geriet er in den Simbali-Wald (Seidenbaumwald). Auf dem Weg des Streitwagens wurde der Simbali-Wald wie ein Schilfgehege niedergerissen und stürzte ins Meer. Die jungen Supaṇṇas (Garuda-Küken), die auf die Meeresoberfläche fielen, stießen ein lautes Wehgeschrei aus. Sakka fragte Mātali: „Freund Mātali, was ist das für ein Laut? Ein überaus jämmerlicher Schrei ertönt!“ – „Herr, durch die Wucht Eures Streitwagens wird der Simbali-Wald zertrümmert; während er herabstürzt, schreien die jungen Supaṇṇas, von Todesfurcht gepackt, im Chor auf.“ Mahāsatto ‘‘samma mātali, mā amhe nissāya ete kilamantu, na mayaṃ issariyaṃ nissāya pāṇavadhakammaṃ karoma, etesaṃ pana atthāya mayaṃ jīvitaṃ pariccajitvā asurānaṃ dassāma, nivattayetaṃ ratha’’nti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Große Weise sprach: „Freund Mātali, wegen uns sollen diese Wesen nicht leiden! Wir wollen nicht um der Herrschaft willen Lebewesen töten. Vielmehr wollen wir zum Wohl dieser Küken unser eigenes Leben hingeben und uns den Asuras ausliefern. Wende diesen Streitwagen!“ Nach diesen Worten sprach er diese Strophe: 31. 31. ‘‘Kulāvakā [Pg.219] mātali simbalismiṃ, īsāmukhena parivajjayassu; Kāmaṃ cajāma asuresu pāṇaṃ, māme dijā vikulāvā ahesu’’nti. „Die Nester im Seidenbaum, o Mātali, umgehe mit der Deichselspitze des Wagens! Lieber wollen wir unser Leben im Kampf mit den Asuras opfern, als dass diese Vögel ihrer Nester beraubt werden.“ Tattha kulāvakāti supaṇṇapotakā. Mātalīti sārathiṃ āmantesi. Simbalisminti passa ete simbalirukkhe olambantā ṭhitāti dasseti. Īsāmukhena parivajjayassūti ete etassa rathassa īsāmukhena yathā na haññanti, evaṃ te parivajjayassu. Kāmaṃ cajāma asuresu pāṇanti yadi amhesu asurānaṃ pāṇaṃ cajantesu etesaṃ sotthi hoti, kāmaṃ cajāma ekaṃseneva mayaṃ asuresu amhākaṃ pāṇaṃ cajāma. Māme dijā vikulāvā ahesunti ime pana dijā ime garuḷapotakā viddhastavicuṇṇitakulāvakatāya vikulāvā mā ahesuṃ, mā amhākaṃ dukkhaṃ etesaṃ upari khipa, nivattaya nivattaya rathanti. Mātalisaṅgāhako tassa vacanaṃ sutvā rathaṃ nivattetvā aññena maggena devalokābhimukhaṃ akāsi. Asurā pana taṃ nivattayamānameva disvā ‘‘addhā aññehipi cakkavāḷehi sakkā āgacchanti, balaṃ labhitvā ratho nivatto bhavissatī’’ti maraṇabhayabhītā palāyitvā asurabhavanameva pavisiṃsu. Darin bedeutet „kulāvakā“: die jungen Supaṇṇas. Mit „Mātali“ redete er den Wagenlenker an. Mit „im Seidenbaum“ zeigt er: „Siehe, sie befinden sich an jenen Seidenbäumen und klammern sich daran fest.“ „Umgehe mit der Deichselspitze“ bedeutet: Weiche ihnen so aus, dass sie durch die Deichselspitze dieses Streitwagens nicht verletzt werden. „Lieber wollen wir unser Leben den Asuras opfern“ bedeutet: Wenn diesen Küken Wohlergehen zuteilwird, während wir unser Leben den Asuras ausliefern, wollen wir es gewiss tun; wir wollen unser Leben vor den Asuras zweifellos opfern. „Als dass diese Vögel ihrer Nester beraubt werden“ bedeutet: Mögen diese Vögel, diese jungen Garudas, nicht nestlos werden, weil ihre Nester zerstört und zertrümmert werden. Bringe unser Leid nicht über diese Vögel! Wende den Streitwagen, wende ihn! Der Wagenlenker Mātali hörte auf seine Worte, wendete den Streitwagen und lenkte ihn auf einem anderen Weg in Richtung der Götterwelt. Als die Asuras jedoch sahen, dass der Streitwagen wendete, dachten sie: „Sicherlich kommen Sakkas aus anderen Weltsystemen zu Hilfe; nachdem sie Verstärkung erhalten haben, wendet sich der Streitwagen nun gegen uns.“ Von Todesfurcht gepackt flohen sie und zogen sich direkt in ihr Asura-Reich zurück. Sakkopi devanagaraṃ pavisitvā dvīsu devalokesu devagaṇena parivuto nagaramajjhe aṭṭhāsi. Tasmiṃ khaṇe pathaviṃ bhinditvā yojanasahassubbedho vejayantapāsādo uṭṭhahi. Vijayante uṭṭhitattā ‘‘vejayanto’’ tveva nāmaṃ akaṃsu. Atha sakko puna asurānaṃ anāgamanatthāya pañcasu ṭhānesu ārakkhaṃ ṭhapesi. Yaṃ sandhāya vuttaṃ – Auch Sakka betrat die Götterstadt und ließ sich, umgeben von der Götterschar aus den beiden Götterwelten, in der Mitte der Stadt nieder. In jenem Augenblick tat sich die Erde auf, und der eintausend Yojanas hohe Vejayanta-Palast erhob sich. Weil er am Ende des Sieges emporgestiegen war, gaben sie ihm den Namen „Vejayanta“. Daraufhin stellte Sakka an fünf Stellen Wachen auf, um eine erneute Rückkehr der Asuras zu verhindern. Worauf sich das Folgende bezieht: ‘‘Antarā dvinnaṃ ayujjhapurānaṃ, pañcavidhā ṭhapitā abhirakkhā; Uragakaroṭipayassa ca hārī, madanayutā caturo ca mahantā’’ti. (saṃ. ni. aṭṭha. 1.1.247); „Zwischen den beiden unbezwingbaren Städten wurden fünf Arten von Schutzwachen aufgestellt: die Nāgas, die Garudas, die Kumbhaṇḍas, die Yakkhas und die Vier Großen Könige.“ Dve nagarānipi yuddhena gahetuṃ asakkuṇeyyatāya ayujjhapurāni nāma jātāni devanagarañca asuranagarañca. Yadā hi asurā balavantā honti, atha devehi palāyitvā devanagaraṃ pavisitvā dvāre pihite asurānaṃ satasahassampi [Pg.220] kiñci kātuṃ na sakkoti. Yadā devā balavantā honti, atha asurehi palāyitvā asuranagaraṃ pavisitvā dvāre pihite sakkānaṃ satasahassampi kiñci kātuṃ na sakkoti. Iti imāni dve nagarāni ayujjhapurāni nāma. Tesaṃ antarā etesu uragādīsu pañcasu ṭhānesu sakkena ārakkhā ṭhapitā. Tattha uraga-saddena nāgā gahitā. Te udake balavantā honti, tasmā sinerussa paṭhamālinde tesaṃ ārakkhā. Karoṭi-saddena supaṇṇā gahitā. Tesaṃ kira karoṭi nāma pānabhojanaṃ, tena taṃ nāmaṃ labhiṃsu, dutiyālinde tesaṃ ārakkhā. Payassahāri-saddena kumbhaṇḍā gahitā. Dānavarakkhasā kirete, tatiyālinde tesaṃ ārakkhā. Madanayuta-saddena yakkhā gahitā. Visamacārino kira te yuddhasoṇḍā, catutthālinde tesaṃ ārakkhā. Caturo ca mahantāti cattāro mahārājāno vuttā, pañcamālinde tesaṃ ārakkhā. Tasmā yadi asurā kupitā āvilacittā devapuraṃ upayanti, pañcavidhesu yaṃ girino paṭhamaṃ paribhaṇḍaṃ, taṃ uragā paribāhiya tiṭṭhanti. Evaṃ sesesu sesā. Weil beide Städte – die Deva-Stadt und die Asura-Stadt – durch Krieg unbezwingbar waren, wurden sie „Ayujjhapura“ (die Unbesiegbaren Städte) genannt. Denn wenn die Asuras mächtig sind, fliehen die Devas, betreten die Deva-Stadt und schließen die Tore; selbst hunderttausend Asuras können ihnen dann nichts anhaben. Wenn wiederum die Devas mächtig sind, fliehen die Asuras, betreten die Asura-Stadt und schließen die Tore; selbst hunderttausend Gefolgsleute des Sakka können ihnen nichts anhaben. Daher heißen diese beiden Städte „Ayujjhapura“. Zwischen ihnen, an diesen fünf Orten von den Uragas (Schlangen) an, wurde von Sakka eine Wache aufgestellt. Dabei sind mit dem Wort „uraga“ die Nāgas gemeint. Diese sind im Wasser mächtig, weshalb ihre Wache auf der ersten Terrasse des Sineru-Berges aufgestellt ist. Mit dem Wort „karoṭi“ sind die Supaṇṇas (Garudas) gemeint. Ihre Speise und ihr Trank soll „Karoṭi“ heißen, weshalb sie diesen Namen erhielten; ihre Wache befindet sich auf der zweiten Terrasse. Mit dem Wort „payassahāri“ sind die Kumbhaṇḍas gemeint. Sie sind angeblich Dānava-Rakkhasas (Dämonen); ihre Wache befindet sich auf der dritten Terrasse. Mit dem Wort „madanayuta“ sind die Yakkhas gemeint. Sie wandeln ungestüm und sind kriegslüstern; ihre Wache ist auf der vierten Terrasse. Mit „die vier Großen“ sind die vier Großen Könige gemeint; ihre Wache ist auf der fünften Terrasse. Wenn daher die Asuras zornig und aufgewühlten Geistes sich der Deva-Stadt nähern, stellen sich die Nāgas schützend an die erste Einfassung des Berges unter den fünf Schutzstellungen. Ebenso tun es die übrigen Wachen auf den verbleibenden Terrassen. Imesu pana pañcasu ṭhānesu ārakkhaṃ ṭhapetvā sakke devānaminde dibbasampattiṃ anubhavamāne sudhammā cavitvā tasseva pādaparicārikā hutvā nibbatti, kaṇṇikāya dinnanissandena cassā pañcayojanasatikā sudhammā nāma devasabhā udapādi, yattha dibbasetacchattassa heṭṭhā yojanappamāṇe kañcanapallaṅke nisinno sakko devānamindo devamanussānaṃ kattabbakiccāni karoti. Cittāpi cavitvā tasseva pādaparicārikā hutvā nibbatti, uyyānassa karaṇanissandena cassā cittalatāvanaṃ nāma uyyānaṃ udapādi. Nandāpi cavitvā tasseva pādaparicārikā hutvā nibbatti, pokkharaṇiyā nissandena cassā nandā nāma pokkharaṇī udapādi. Während Sakka, der Herrscher der Götter, nach Aufstellung der Wachen an diesen fünf Orten die göttliche Glückseligkeit genoss, verschied Sudhammā und wurde als seine Gemahlin wiedergeboren. Durch die Frucht ihrer Gabe eines Giebeldaches entstand für sie die göttliche Versammlungshalle namens Sudhammā von fünfhundert Yojanas Ausdehnung. Dort verrichtet Sakka, der Herrscher der Götter, unter dem göttlichen weißen Schirm auf einem goldenen Thron von einem Yojana Ausmaß sitzend die Pflichten für Götter und Menschen. Auch Cittā verschied und wurde als seine Gemahlin wiedergeboren; durch das Verdienst der Anlage eines Gartens entstand für sie der Garten namens Cittalatāvana. Auch Nandā verschied und wurde als seine Gemahlin wiedergeboren; durch das Verdienst der Anlage eines Teiches entstand für sie der Teich namens Nandā. Sujā pana kusalakammassa akatattā ekasmiṃ araññe kandarāya bakasakuṇikā hutvā nibbattā. Sakko ‘‘sujā na paññāyati, kattha nu kho nibbattā’’ti āvajjento taṃ disvā tattha gantvā taṃ ādāya devalokaṃ āgantvā tassā ramaṇīyaṃ devanagaraṃ sudhammaṃ devasabhaṃ cittalatāvanaṃ nandāpokkharaṇiñca dassetvā ‘‘etā kusalaṃ katvā mayhaṃ pādaparicārikā hutvā nibbattā, tvaṃ pana kusalaṃ akatvā tiracchānayoniyaṃ nibbattā[Pg.221], ito paṭṭhāya sīlaṃ rakkhāhī’’ti taṃ ovaditvā pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā tattheva netvā vissajjesi. Sāpi tato paṭṭhāya sīlaṃ rakkhati. Sakko katipāhaccayena ‘‘sakkā nu kho sīlaṃ rakkhitu’’nti gantvā maccharūpena uttāno hutvā purato nipajji, sā ‘‘matamacchako’’ti saññāya sīse aggahesi, maccho naṅguṭṭhaṃ cālesi, atha naṃ ‘‘jīvati maññe’’ti vissajjesi. Sakko ‘‘sādhu sādhu, sakkhissasi sīlaṃ rakkhitu’’nti agamāsi. Sā tato cutā bārāṇasiyaṃ kumbhakāragehe nibbatti. Sujā jedoch wurde, da sie keine heilsame Tat vollbracht hatte, in einem Wald in einer Schlucht als Reiherweibchen wiedergeboren. Sakka dachte: „Sujā ist nirgends zu sehen; wo wohl ist sie wiedergeboren?“ Als er nachsann, sah er sie, ging dorthin, nahm sie mit sich in die Götterwelt und zeigte ihr die herrliche Götterstadt, die Sudhammā-Versammlungshalle, den Cittalatāvana-Garten und den Nandā-Teich. Er ermahnte sie: „Diese haben heilsame Taten vollbracht und wurden als meine Gemahlinnen wiedergeboren. Du aber hast nichts Heilsames getan und bist im Tierreich geboren worden. Halte von nun an die Tugendregeln ein!“ Er festigte sie in den Fünf Tugendregeln, brachte sie wieder an denselben Ort zurück und ließ sie frei. Von da an hielt auch sie die Tugendregeln ein. Nach einigen Tagen ging Sakka hin, um zu prüfen: „Kann sie wohl die Tugendregeln bewahren?“ Er nahm die Gestalt eines Fisches an und legte sich auf dem Rücken vor ihr nieder. In der Annahme, es sei ein toter Fisch, packte sie ihn am Kopf. Der Fisch bewegte seine Schwanzflosse. Da dachte sie: „Er lebt wohl noch“, und ließ ihn frei. Sakka sprach: „Gut, gut! Du wirst imstande sein, die Tugendregeln zu bewahren“, und ging fort. Als sie aus jenem Leben verschied, wurde sie in Vārāṇasī im Haus eines Töpfers wiedergeboren. Sakko ‘‘kahaṃ nu kho nibbattā’’ti tattha nibbattabhāvaṃ ñatvā suvaṇṇaeḷālukānaṃ yānakaṃ pūretvā majjhe gāmassa mahallakavesena nisīditvā ‘‘eḷālukāni gaṇhatha, eḷālukāni gaṇhathā’’ti ugghosesi. Manussā āgantvā ‘‘dehi, tātā’’ti āhaṃsu. ‘‘Ahaṃ sīlarakkhakānaṃ dammi, tumhe sīlaṃ rakkhathā’’ti? ‘‘Mayaṃ sīlaṃ nāma na jānāma, mūlena dehī’’ti. ‘‘Na mayhaṃ mūlena attho, sīlarakkhakānaññevāhaṃ dammī’’ti. Manussā ‘‘ko cāyaṃ eḷāluko’’ti pakkamiṃsu. Sujā taṃ pavattiṃ sutvā ‘‘mayhaṃ ānītaṃ bhavissatī’’ti cintetvā gantvā taṃ ‘‘dehi, tātā’’ti āha. ‘‘Sīlaṃ rakkhasi, ammā’’ti? ‘‘Āma, rakkhāmī’’ti. ‘‘Idaṃ mayā tuyhameva atthāya ābhata’’nti saddhiṃ yānakena gehadvāre ṭhapetvā pakkāmi. Sakka dachte: „Wo ist sie wohl wiedergeboren?“ Als er erfuhr, dass sie dort wiedergeboren war, füllte er einen kleinen Wagen mit goldenen Gurken, setzte sich in der Gestalt eines alten Mannes mitten im Dorf nieder und rief aus: „Nehmt Gurken! Nehmt Gurken!“ Die Leute kamen herbei und sagten: „Gib uns welche, Väterchen!“ – „Ich gebe sie nur jenen, die die Tugendregeln einhalten. Haltet ihr die Tugendregeln ein?“ – „Wir wissen gar nicht, was Tugendregeln sind. Gib sie uns gegen Bezahlung!“ – „Ich brauche kein Geld; ich gebe sie nur jenen, die die Tugendregeln einhalten.“ Da sagten die Leute: „Was soll das für eine Gurke sein?“ und gingen weg. Als Sujā von diesem Vorfall hörte, dachte sie: „Das muss wohl für mich gebracht worden sein.“ Sie ging hin und sprach zu ihm: „Gib sie mir, Väterchen!“ – „Hältst du die Tugendregeln ein, mein Kind?“ – „Ja, ich halte sie ein.“ – „Dies habe ich eigens für dich mitgebracht.“ Er stellte den Wagen vor ihrer Haustür ab und ging fort. Sāpi yāvajīvaṃ sīlaṃ rakkhitvā tato cutā vepacittissa asurindassa dhītā hutvā nibbatti, sīlānisaṃsena abhirūpā ahosi. So tassā vayappattakāle ‘‘mayhaṃ dhītā attano cittarucitaṃ sāmikaṃ gaṇhatū’’ti asure sannipātesi. Sakko ‘‘kahaṃ nu kho sā nibbattā’’ti olokento tattha nibbattabhāvaṃ ñatvā ‘‘sujā cittarucitaṃ sāmikaṃ gaṇhantī maṃ gaṇhissatī’’ti asuravaṇṇaṃ māpetvā tattha agamāsi. Sujaṃ alaṅkaritvā sannipātaṭṭhānaṃ ānetvā ‘‘cittarucitaṃ sāmikaṃ gaṇhā’’ti āhaṃsu. Sā olokentī sakkaṃ disvā pubbepi sinehavasena uppannapemena mahoghena viya ajjhotthaṭahadayā hutvā ‘‘ayaṃ me sāmiko’’ti vatvā tassa upari pupphadāmaṃ khipitvā aggahesi. Asurā ‘‘amhākaṃ rājā ettakaṃ kālaṃ dhītu anucchavikaṃ alabhitvā idāni labhati[Pg.222], ayamevassā dhītu pitāmahato mahallako anucchaviko’’ti lajjamānā pakkamiṃsu. So taṃ devanagaraṃ ānetvā aḍḍhateyyānaṃ nāṭikākoṭīnaṃ jeṭṭhikaṃ katvā yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gato. Auch sie hielt zeit ihres Lebens die Tugendregeln ein, verschied aus jenem Dasein und wurde als Tochter des Asura-Königs Vepacitti wiedergeboren. Durch die heilsame Frucht der Tugendregeln war sie von überragender Schönheit. Als sie das heiratsfähige Alter erreicht hatte, versammelte jener die Asuras mit den Worten: „Meine Tochter soll sich einen Ehemann nach ihrem eigenen Herzen wählen.“ Sakka hielt Ausschau: „Wo ist sie wohl wiedergeboren?“ Als er erfuhr, dass sie dort wiedergeboren war, dachte er: „Wenn Sujā sich einen Ehemann nach ihrem Herzen wählt, wird sie mich wählen.“ Er nahm die Gestalt eines alten Asuras an und begab sich dorthin. Man schmückte Sujā, brachte sie zum Versammlungsort und sagte zu ihr: „Wähle einen Ehemann nach deinem Herzen!“ Als sie umherblickte, sah sie Sakka. Durch die Macht ihrer Zuneigung aus früherer Zeit wurde ihr Herz von einer Liebe wie von einer gewaltigen Flut überwältigt. Sie sprach: „Dieser hier ist mein Ehemann!“, warf den Blumenkranz über ihn und erwählte ihn. Die Asuras sagten: „Unser König hat so lange Zeit keinen standesgemäßen Schwiegersohn für seine Tochter gefunden, und nun bekommt er diesen! Ausgerechnet dieser alte Mann, der älter ist als ihr Großvater, soll für seine Tochter passend sein?“ Beschämt zogen sie von dannen. Er brachte sie in die Götterstadt, machte sie zur Anführerin von zweieinhalb Koṭis (fünfundzwanzig Millionen) göttlichen Tänzerinnen, verblieb dort für die Dauer seiner Lebensspanne und ging dann gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘evaṃ bhikkhu pubbe paṇḍitā devanagare rajjaṃ kārayamānā attano jīvitaṃ pariccajantāpi pāṇātipātaṃ na kariṃsu, tvaṃ nāma evarūpe niyyānike sāsane pabbajitvā aparissāvitaṃ sapāṇakaṃ udakaṃ pivissasī’’ti taṃ bhikkhuṃ garahitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mātalisaṅgāhako ānando ahosi, sakko pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor, tadelte jenen Mönch mit den Worten: „Mönch, so haben in der Vergangenheit die Weisen, selbst als sie die Herrschaft im Reich der Götter ausübten und ihr eigenes Leben opferten, kein Leben genommen. Wie aber konntest du, nachdem du in dieser zur Befreiung führenden Lehre die Hauslosigkeit angetreten hast, ungefiltertes Wasser trinken, das lebende Wesen enthält?“, stellte die Verknüpfung her und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Wagenlenker Mātali Ānanda, Sakka aber war ich selbst.“ Kulāvakajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Kulāvaka-Jātaka ist die erste.
[32] 2. Naccajātakavaṇṇanā [32] 2. Die Erläuterung des Nacca-Jātaka. Rudaṃ manuññanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ bahubhaṇḍikaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Vatthu heṭṭhā devadhammajātake (jā. 1.1.6) vuttasadisameva. Satthā taṃ bhikkhuṃ ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu bahubhaṇḍo’’ti pucchi. ‘‘Āma, bhante’’ti. ‘‘Kiṃkāraṇā tvaṃ bhikkhu bahubhaṇḍo jātosī’’ti? So ettakaṃ sutvāva kuddho nivāsanapārupanaṃ chaḍḍetvā ‘‘iminā dāni nīhārena vicarāmī’’ti satthu purato naggo aṭṭhāsi. Manussā ‘‘dhī dhī’’ti āhaṃsu. So tato palāyitvā hīnāyāvatto. Bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannisinnā ‘‘satthu nāma purato evarūpaṃ karissatī’’ti tassa aguṇakathaṃ kathesuṃ. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti bhikkhū pucchi. Bhante, ‘‘so hi nāma bhikkhu tumhākaṃ purato catuparisamajjhe hirottappaṃ pahāya gāmadārako viya naggo ṭhatvā manussehi jigucchiyamāno hīnāyāvattitvā sāsanā parihīno’’ti tassa aguṇakathāya nisinnāmhāti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idāneva so bhikkhu hirottappābhāvena ratanasāsanā parihīno, pubbe itthiratanapaṭilābhatopi parihīnoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Rudaṃ manuññaṃ“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines Mönches mit vielem Besitz. Die Hintergrundgeschichte ist genau dieselbe wie unten im Devadhamma-Jātaka (Jā. 1.1.6) beschrieben. Der Meister fragte jenen Mönch: „Ist es wahr, Mönch, dass du viel Besitz hast?“ – „Ja, Ehrwürdiger.“ – „Aus welchem Grund, Mönch, bist du jemand mit so viel Besitz geworden?“ Als er nur dies hörte, wurde er zornig, warf sein Unter- und Obergewand ab und rief: „Dann werde ich eben auf diese Weise umherwandern!“, und stellte sich nackt vor den Meister. Die Menschen riefen: „Pfui! Pfui!“ Er floh von dort und kehrte in das niedere Laienleben zurück. Die im Dhamma-Saal versammelten Mönche sprachen über sein schändliches Verhalten: „Wie kann er es wagen, so etwas direkt vor dem Meister zu tun!“ Der Meister kam herbei und fragte die Mönche: „Mönche, mit welchem Gespräch seid ihr hier gerade beschäftigt?“ – „Ehrwürdiger Herr, dieser Mönch hat vor Eurem Angesicht inmitten der vierfachen Versammlung Scham und Scheu abgelegt, stand nackt wie ein Dorfjunge da, wurde von den Menschen verabscheut, ist in das niedere Laienleben zurückgekehrt und von der Lehre abgefallen. Über dieses unrühmliche Verhalten sprechen wir hier sitzend.“ Der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt ist dieser Mönch aus Mangel an Scham und Scheu von der juwelengleichen Lehre abgefallen; auch in der Vergangenheit hat er bereits den Erhalt eines Frauen-Juwels verwirkt“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte [Pg.223] paṭhamakappe catuppadā sīhaṃ rājānaṃ akaṃsu, macchā ānandamacchaṃ, sakuṇā suvaṇṇahaṃsaṃ. Tassa pana suvaṇṇahaṃsarājassa dhītā haṃsapotikā abhirūpā ahosi. So tassā varaṃ adāsi, sā attano cittarucitaṃ sāmikaṃ vāresi. Haṃsarājā tassā varaṃ datvā himavante sabbe sakuṇe sannipātāpesi, nānappakārā haṃsamorādayo sakuṇagaṇā samāgantvā ekasmiṃ mahante pāsāṇatale sannipatiṃsu. Haṃsarājā ‘‘attano cittarucitaṃ sāmikaṃ āgantvā gaṇhātū’’ti dhītaraṃ pakkosāpesi. Sā sakuṇasaṅghaṃ olokentī maṇivaṇṇagīvaṃ citrapekhuṇaṃ moraṃ disvā ‘‘ayaṃ me sāmiko hotū’’ti ārocesi. Sakuṇasaṅghā moraṃ upasaṅkamitvā āhaṃsu ‘‘samma mora, ayaṃ rājadhītā ettakānaṃ sakuṇānaṃ majjhe sāmikaṃ rocentī tayi ruciṃ uppādesī’’ti. Moro ‘‘ajjāpi tāva me balaṃ na passatī’’ti atituṭṭhiyā hirottappaṃ bhinditvā tāva mahato sakuṇasaṅghassa majjhe pakkhe pasāretvā naccituṃ ārabhi, naccanto appaṭicchanno ahosi. In der Vergangenheit, im ersten Weltzeitalter, machten die Vierbeiner den Löwen zu ihrem König, die Fische den Ānanda-Fisch und die Vögel die goldene Gans. Die Tochter dieses goldenen Gänsekönigs, eine junge Gans, war wunderschön. Er gewährte ihr einen Wunsch, und sie wählte einen Ehemann nach dem Wunsch ihres Herzens. Nachdem der Gänsekönig ihr den Wunsch gewährt hatte, ließ er alle Vögel im Himavanta-Gebirge zusammenkommen. Verschiedenste Vogelscharen, darunter Gänse, Pfauen und andere, kamen zusammen und versammelten sich auf einer großen Felsplatte. Der Gänsekönig ließ seine Tochter rufen und sprach: „Komm und wähle dir einen Ehemann nach dem Wunsch deines Herzens!“ Als sie die Vogelschar betrachtete, erblickte sie einen Pfau mit einem juwelenfarbenen Hals und bunt schillernden Federn und verkündete: „Dieser soll mein Ehemann sein!“ Die Vogelschar trat an den Pfau heran und sprach: „Freund Pfau, diese Königstochter hat unter all diesen Vögeln nach einem Ehemann gesucht und Gefallen an dir gefunden.“ Der Pfau dachte bei sich: „Noch haben sie meine wahre Pracht und Kraft nicht gesehen!“ Aus übergroßer Freude verwarf er Scham und Scheu, breitete inmitten dieser riesigen Vogelschar die Flügel aus und begann zu tanzen. Während er tanzte, entblößte er sich völlig. Suvaṇṇahaṃsarājā lajjito ‘‘imassa neva ajjhattasamuṭṭhānā hirī atthi, na bahiddhāsamuṭṭhānaṃ ottappaṃ, nāssa bhinnahirottappassa mama dhītaraṃ dassāmī’’ti sakuṇasaṅghamajjhe imaṃ gāthamāha – Der goldene Gänsekönig schämte sich und sprach inmitten der Vogelschar diese Strophe: „Dieser Pfau besitzt weder Scham, die im Inneren entsteht, noch Scheu vor Sünde, die von außen erzeugt wird. Einem solchen, der Scham und Scheu verloren hat, werde ich meine Tochter nicht geben.“ 32. 32. ‘‘Rudaṃ manuññaṃ rucirā ca piṭṭhi, veḷuriyavaṇṇūpanibhā ca gīvā; Byāmamattāni ca pekhuṇāni, naccena te dhītaraṃ no dadāmī’’ti. „Lieblich ist dein Ruf und prächtig dein Rücken, dein Hals glänzt wie ein Beryll-Edelstein, und eine Klafter lang sind deine Schwanzfedern; doch wegen deines schamlosen Tanzes gebe ich dir meine Tochter nicht.“ Tattha rudaṃ manuññanti ta-kārassa da-kāro kato, rutaṃ manāpaṃ, vassitasaddo madhuroti attho. Rucirā ca piṭṭhīti piṭṭhipi te citrā ceva sobhanā ca. Veḷuriyavaṇṇūpanibhāti veḷuriyamaṇivaṇṇasadisā. Byāmamattānīti ekabyāmappamāṇāni. Pekhuṇānīti piñchāni. Naccena te dhītaraṃ no dadāmīti hirottappaṃ bhinditvā naccitabhāveneva te evarūpassa nillajjassa dhītaraṃ no dadāmīti vatvā haṃsarājā tasmiṃyeva parisamajjhe attano bhāgineyyassa haṃsapotakassa dhītaraṃ adāsi. Moro haṃsapotikaṃ alabhitvā lajjitvā tatova uppatitvā palāyi. Haṃsarājāpi attano vasanaṭṭhānameva gato. Darin bedeutet „rudaṃ manuññaṃ“: Der Buchstabe „t“ wurde zu „d“ abgeändert; die Bedeutung ist „ein lieblicher Ruf“, ein süßer Klang des Schreiens. „rucirā ca piṭṭhī“ bedeutet: Auch dein Rücken ist bunt gemustert und wunderschön. „veḷuriyavaṇṇūpanibhā“ bedeutet: ähnlich der Farbe eines Beryll-Juwels. „byāmamattāni“ bedeutet: von der Länge einer Klafter. „pekhuṇāni“ bedeutet: Federn. „naccena te dhītaraṃ no dadāmi“ bedeutet: Weil du Scham und Scheu abgelegt hast und so getanzt hast, gebe ich dir, einem so schamlosen Wesen, meine Tochter nicht. Nachdem er dies gesagt hatte, gab der Gänsekönig noch mitten in der Versammlung seiner Tochter seinem Neffen, einer jungen Gans, zur Frau. Der Pfau, der die junge Gans nicht bekommen hatte, schämte sich, flog auf der Stelle davon und floh. Auch der Gänsekönig kehrte an seinen Wohnort zurück. Satthā [Pg.224] ‘‘na, bhikkhave, idāneva esa hirottappaṃ bhinditvā ratanasāsanā parihīno, pubbepi itthiratanapaṭilābhato parihīnoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā moro bahubhaṇḍiko ahosi, haṃsarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und sprach: „Mönche, nicht erst jetzt ist dieser aus Mangel an Scham und Scheu von der juwelengleichen Lehre abgefallen; auch in der Vergangenheit hat er bereits den Erhalt eines Frauen-Juwels verwirkt.“ Er stellte die Verknüpfung her und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Pfau der Mönch mit viel Besitz, der Gänsekönig aber war ich selbst.“ Naccajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erläuterung des Nacca-Jātaka ist die zweite.
[33] 3. Sammodamānajātakavaṇṇanā [33] 3. Die Erläuterung des Sammodamāna-Jātaka. Sammodamānāti idaṃ satthā kapilavatthuṃ upanissāya nigrodhārāme viharanto cumbaṭakakalahaṃ ārabbha kathesi. So kuṇālajātake (jā. 2.21.kuṇālajātaka) āvi bhavissati. Tadā pana satthā ñātake āmantetvā ‘‘mahārājā ñātakānaṃ aññamaññaṃ viggaho nāma na yutto, tiracchānagatāpi hi pubbe samaggakāle paccāmitte abhibhavitvā sotthiṃ pattā yadā vivādamāpannā, tadā mahāvināsaṃ pattā’’ti vatvā ñātirājakulehi āyācito atītaṃ āhari. „Sammodamānā“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er nahe Kapilavatthu im Nigrodha-Kloster verweilte, bezüglich eines Streites um ein Tragkissen (cumbaṭaka). Dieser Streit wird im Kuṇāla-Jātaka (Jā. 2.21) ausführlich dargelegt werden. Damals jedoch wandte sich der Meister an seine Verwandten und sprach: „Große Könige, ein Streit unter Verwandten ist wahrlich nicht angemessen. Selbst Tiere haben in der Vergangenheit, als sie einig waren, ihre Feinde überwunden und Sicherheit erlangt; als sie jedoch in Streit gerieten, erlitten sie großes Verderben.“ Auf Bitten der königlichen Verwandten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto vaṭṭakayoniyaṃ nibbattitvā anekavaṭṭakasahassaparivāro araññe paṭivasati. Tadā eko vaṭṭakaluddako tesaṃ vasanaṭṭhānaṃ gantvā vaṭṭakavassitaṃ katvā tesaṃ sannipatitabhāvaṃ ñatvā tesaṃ upari jālaṃ khipitvā pariyantesu maddanto sabbe ekato katvā pacchiṃ pūretvā gharaṃ gantvā te vikkiṇitvā tena mūlena jīvikaṃ kappeti. Athekadivasaṃ bodhisatto te vaṭṭake āha – ‘‘ayaṃ sākuṇiko amhākaṃ ñātake vināsaṃ pāpeti, ahaṃ ekaṃ upāyaṃ jānāmi, enesa amhe gaṇhituṃ na sakkhissati, ito dāni paṭṭhāya etena tumhākaṃ upari jāle khittamatte ekeko ekekasmiṃ jālakkhike sīsaṃ ṭhapetvā jālaṃ ukkhipitvā icchitaṭṭhānaṃ haritvā ekasmiṃ kaṇṭakagumbe pakkhipatha, evaṃ sante heṭṭhā tena tena ṭhānena palāyissāmā’’ti. Te sabbe ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇiṃsu. Dutiyadivase upari jāle khitte te bodhisattena vuttanayeneva jālaṃ ukkhipitvā ekasmiṃ [Pg.225] kaṇṭakagumbe khipitvā sayaṃ heṭṭhābhāgena tato tato palāyiṃsu. Sākuṇikassa gumbato jālaṃ mocentasseva vikālo jāto, so tucchahatthova agamāsi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī die Herrschaft ausübte, wurde der Bodhisatta im Schoß einer Wachtel wiedergeboren und lebte, umgeben von vielen tausend Wachteln, im Wald. Damals ging ein Wachteljäger an ihren Wohnort, ahmte den Ruf der Wachteln nach, und als er merkte, dass sie sich versammelt hatten, warf er ein Netz über sie. Er trat auf die Ränder des Netzes, brachte sie alle zusammen, füllte seinen Korb, ging nach Hause, verkaufte sie und bestritt mit diesem Erlös seinen Lebensunterhalt. Eines Tages sprach der Bodhisatta zu jenen Wachteln: „Dieser Vogelfänger bringt unsere Verwandten ins Verderben. Ich kenne einen Ausweg, durch den er uns nicht fangen kann. Von nun an sollt ihr, sobald er das Netz über euch wirft, jeder euren Kopf durch je eine Masche des Netzes stecken, das Netz emporheben, es an einen Ort eurer Wahl tragen und auf einen Dornenbusch fallen lassen. Wenn dies geschehen ist, werden wir darunter nach allen Seiten hin entkommen.“ Sie alle stimmten zu und sagten: „Sehr gut!“ Am nächsten Tag, als das Netz über sie geworfen wurde, hoben sie genau nach der vom Bodhisatta beschriebenen Weise das Netz empor, warfen es auf einen Dornenbusch und entkamen selbst durch die Unterseite nach allen Richtungen. Während der Vogelfänger noch damit beschäftigt war, das Netz aus dem Busch zu befreien, wurde es spät für ihn, und er kehrte mit leeren Händen heim. Punadivasato paṭṭhāyapi vaṭṭakā tatheva karonti. Sopi yāva sūriyatthaṅgamanā jālameva mocento kiñci alabhitvā tucchahatthova gehaṃ gacchati. Athassa bhariyā kujjhitvā ‘‘tvaṃ divase divase tucchahattho āgacchasi, aññampi te bahi positabbaṭṭhānaṃ atthi maññe’’ti āha. Sākuṇiko ‘‘bhadde, mama aññaṃ positabbaṭṭhānaṃ natthi, apica kho pana te vaṭṭakā samaggā hutvā caranti, mayā khittamatte jālaṃ ādāya kaṇṭakagumbe khipitvā gacchanti, na kho panete sabbakālameva sammodamānā viharissanti, tvaṃ mā cintayi, yadā te vivādamāpajjissanti, tadā te sabbeva ādāya tava mukhaṃ hāsayamāno āgacchissāmī’’ti vatvā bhariyāya imaṃ gāthamāha – Auch von dem folgenden Tag an machten es die Wachteln genau so. Auch jener Vogelfänger befreite bis zum Sonnenuntergang nur das Netz, ohne etwas zu fangen, und ging mit leeren Händen nach Hause. Da wurde seine Frau zornig und sagte: „Tag für Tag kommst du mit leeren Händen heim. Ich glaube, du hast außerhalb noch einen anderen Haushalt zu versorgen!“ Der Vogelfänger sprach: „Liebe Frau, ich habe keinen anderen Haushalt zu versorgen. Aber diese Wachteln leben in Einigkeit zusammen. Sobald ich das Netz auswerfe, nehmen sie es mit, werfen es auf einen Dornenbusch und entkommen. Doch sie werden gewiss nicht für immer in solcher Eintracht leben. Sorge dich nicht! Sobald sie in Streit geraten, werde ich sie alle fangen, dein Gesicht erfreuen und so zu dir zurückkehren.“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er zu seiner Frau diese Strophe: 33. 33. ‘‘Sammodamānā gacchanti, jālamādāya pakkhino; Yadā te vivadissanti, tadā ehinti me vasa’’nti. „In Eintracht fliegen sie davon und nehmen das Netz mit sich, die Vögel. Sobald sie aber in Streit geraten, werden sie in meine Gewalt kommen.“ Tattha yadā te vivadissantīti yasmiṃ kāle te vaṭṭakā nānāladdhikā nānāgāhā hutvā vivadissanti, kalahaṃ karissantīti attho. Tadā ehinti me vasanti tasmiṃ kāle sabbepi te mama vasaṃ āgacchissanti. Athāhaṃ te gahetvā tava mukhaṃ hāsento āgacchissāmīti bhariyaṃ samassāsesi. Darin bedeutet „Sobald sie in Streit geraten“ (yadā te vivadissanti): Zu welcher Zeit jene Wachteln verschiedene Ansichten und Meinungen haben und miteinander streiten, einen Zwist austragen werden – dies ist die Bedeutung. „Dann werden sie in meine Gewalt kommen“ (tadā ehinti me vasaṃ): Zu jener Zeit werden sie alle unter meine Kontrolle geraten. „Dann werde ich sie fangen, dein Gesicht erfreuen und zurückkehren“, so tröstete er seine Frau. Katipāhasseva pana accayena eko vaṭṭako gocarabhūmiṃ otaranto asallakkhetvā aññassa sīsaṃ akkami, itaro ‘‘ko maṃ sīse akkamī’’ti kujjhiṃ. ‘‘Ahaṃ asallakkhetvā akkamiṃ, mā kujjhī’’ti vuttepi kujjhiyeva. Te punappunaṃ kathentā ‘‘tvameva maññe jālaṃ ukkhipasī’’ti aññamaññaṃ vivādaṃ kariṃsu. Tesu vivadantesu bodhisatto cintesi ‘‘vivādake sotthibhāvo nāma natthi, idāneva te jālaṃ na ukkhipissanti, tato mahantaṃ vināsaṃ pāpuṇissanti, sākuṇiko okāsaṃ labhissati, mayā imasmiṃ ṭhāne na sakkā vasitu’’nti. So attano parisaṃ ādāya aññattha gato. Sākuṇikopi kho katipāhaccayena āgantvā vaṭṭakavassitaṃ vassitvā tesaṃ sannipatitānaṃ upari jālaṃ [Pg.226] khipi. Atheko vaṭṭako ‘‘tuyhaṃ kira jālaṃ ukkhipantasseva matthake lomāni patitāni, idāni ukkhipā’’ti āha. Aparo ‘‘tuyhaṃ kira jālaṃ ukkhipantasseva dvīsu pakkhesu pattāni patitāni, idāni ukkhipā’’ti āha. Iti tesaṃ ‘‘tvaṃ ukkhipa, tvaṃ ukkhipā’’ti vadantānaññeva sākuṇiko jālaṃ ukkhipitvā sabbeva te ekato katvā pacchiṃ pūretvā bhariyaṃ hāsayamāno gehaṃ agamāsi. Nach Verlauf von nur wenigen Tagen jedoch trat eine Wachtel beim Herabfliegen auf den Futterplatz unachtsam auf den Kopf einer anderen. Die andere wurde zornig: „Wer ist mir auf den Kopf getreten?“ Obwohl die erste sagte: „Ich bin unachtsam darauf getreten, sei nicht zornig!“, blieb die andere zornig. Während sie immer wieder aufeinander einredeten, begannen sie miteinander zu streiten: „Du glaubst wohl, nur du allein hebst das Netz empor!“ Als sie so stritten, dachte der Bodhisatta: „Für jene, die im Streit liegen, gibt es kein Heil. Gleich werden sie das Netz nicht mehr emporheben, dadurch werden sie ins große Verderben stürzen und der Vogelfänger wird seine Gelegenheit bekommen. Es ist mir nicht möglich, an diesem Ort zu bleiben.“ Er nahm seine Gefolgschaft mit und ging an einen anderen Ort. Auch der Vogelfänger kam nach Ablauf einiger Tage, ahmte den Ruf der Wachteln nach und warf das Netz über sie, als sie sich versammelt hatten. Da sagte eine Wachtel: „Beim Emporheben des Netzes sind dir ja wohl alle Federn auf dem Kopf ausgefallen! Heb du es jetzt empor!“ Eine andere sagte: „Beim Emporheben des Netzes sind dir ja wohl an beiden Flügeln die Federn ausgefallen! Heb du es jetzt empor!“ Während sie so zueinander sagten: „Heb du es empor, heb du es empor!“, zog der Vogelfänger das Netz zusammen, fasste sie alle zusammen, füllte seinen Korb und kehrte, seine Frau erfreuend, nach Hause zurück. Satthā ‘‘evaṃ mahārājā ñātakānaṃ kalaho nāma na yutto, kalaho vināsamūlameva hotī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā apaṇḍitavaṭṭako devadatto ahosi, paṇḍitavaṭṭako pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „O Könige, so ist der Streit unter Verwandten wahrlich unangebracht. Streit ist der Ursprung des Verderbens.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war die törichte Wachtel Devadatta, die weise Wachtel aber war ich selbst.“ Sammodamānajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Sammodamāna-Jātaka ist die dritte.
[34] 4. Macchajātakavaṇṇanā [34] 4. Die Erklärung des Maccha-Jātaka. Na maṃ sītaṃ na maṃ uṇhanti idaṃ satthā jetavane viharanto purāṇadutiyikāpalobhanaṃ ārabbha kathesi. Tadā hi satthā taṃ bhikkhuṃ ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhitosī’’ti pucchi. ‘‘Saccaṃ, bhagavā’’ti. ‘‘Kenāsi ukkaṇṭhāpito’’ti? ‘‘Purāṇadutiyikā me, bhante madhurahattharasā, taṃ jahituṃ na sakkomī’’ti. Atha naṃ satthā ‘‘bhikkhu esā itthī tava anatthakārikā, pubbepi tvaṃ etaṃ nissāya maraṇaṃ pāpuṇanto maṃ āgamma maraṇā mutto’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Weder Kälte noch Hitze plagen mich...“ Diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich der Verlockung durch die frühere Ehefrau. Damals nämlich fragte der Meister jenen Mönch: „Ist es wahr, Mönch, dass du unzufrieden bist?“ – „Es ist wahr, Erhabener.“ – „Von wem bist du unzufrieden gemacht worden?“ – „Meine frühere Ehefrau, o Herr, bereitet so wohlschmeckendes Essen; ich kann sie nicht verlassen.“ Da sprach der Meister zu ihm: „Mönch, diese Frau bringt dir Unheil. Schon in der Vergangenheit bist du ihretwegen fast gestorben, und hast, auf mich gestützt, den Tod überstanden.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa purohito ahosi. Tadā kevaṭṭā nadiyaṃ jālaṃ khipiṃsu. Atheko mahāmaccho rativasena attano macchiyā saddhiṃ kīḷamāno āgacchati. Tassa sā macchī purato gacchamānā jālagandhaṃ ghāyitvā jālaṃ pariharamānā gatā. So pana kāmagiddho lolamaccho jālakucchimeva paviṭṭho. Kevaṭṭā tassa jālaṃ paviṭṭhabhāvaṃ ñatvā jālaṃ ukkhipitvā macchaṃ gahetvā amāretvāva vālikāpiṭṭhe khipitvā ‘‘imaṃ aṅgāresu pacitvā khādissāmā’’ti aṅgāre karonti, sūlaṃ tacchenti. Maccho ‘‘etaṃ aṅgāratāpanaṃ vā sūlavijjhanaṃ vā aññaṃ vā pana dukkhaṃ na maṃ kilameti, yaṃ [Pg.227] panesā macchī ‘aññaṃ so nūna ratiyā gato’ti mayi domanassaṃ āpajjati, tameva maṃ bādhatī’’ti paridevamāno imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī die Herrschaft ausübte, war der Bodhisatta sein Hofpriester. Damals warfen Fischer im Fluss ihr Netz aus. Da kam ein großer Fisch herbeigeschwommen, der aus Liebeslust mit seinem Fischweibchen spielte. Dieses Fischweibchen schwamm voraus, roch den Geruch des Netzes, wich dem Netz aus und schwamm vorbei. Er aber, der vor Sinnenlust gierige, leichtfertige Fisch, schwamm direkt in den Bauch des Netzes hinein. Als die Fischer merkten, dass er ins Netz gegangen war, hoben sie das Netz empor, fingen den Fisch, töteten ihn jedoch nicht gleich, sondern warfen ihn auf den Sandstrand. Während sie Kohlen vorbereiteten und den Bratspieß schnitzten, um ihn über den Kohlen zu braten und zu essen, jammerte der Fisch: „Weder diese Hitze der Kohlen noch das Durchbohren mit dem Spieß noch irgendein anderes Leid quält mich. Doch dass dieses Fischweibchen Kummer erleidet, weil sie denkt: ‚Er ist gewiss aus Liebeslust zu einer anderen geschwommen‘, das allein bedrückt mich!“ Und so klagend sprach er diese Strophe: 34. 34. ‘‘Na maṃ sītaṃ na maṃ uṇhaṃ, na maṃ jālasmi bādhanaṃ; Yañca maṃ maññate macchī, aññaṃ so ratiyā gato’’ti. „Weder die Kälte quält mich, noch die Hitze quält mich, noch quält mich die Gefangenschaft im Netz. Doch dass das Fischweibchen von mir denkt: ‚Er ist aus Vergnügen zu einer anderen gegangen‘, das allein quält mich.“ Tattha na maṃ sītaṃ na maṃ uṇhanti macchānaṃ udakā nīhaṭakāle sītaṃ hoti, tasmiṃ vigate uṇhaṃ hoti, tadubhayampi sandhāya ‘‘na maṃ sītaṃ na maṃ uṇhaṃ bādhatī’’ti paridevati. Yampi aṅgāresu paccanamūlakaṃ dukkhaṃ bhavissati, tampi sandhāya ‘‘na maṃ uṇha’’nti paridevateva. Na maṃ jālasmi bādhananti yampi me jālasmiṃ bādhanaṃ ahosi, tampi maṃ na bādhetīti paridevati. ‘‘Yañca ma’’ntiādīsu ayaṃ piṇḍattho – sā macchī mama jāle patitassa imehi kevaṭṭehi gahitabhāvaṃ ajānantī maṃ apassamānā ‘‘so maccho idāni aññaṃ macchiṃ kāmaratiyā gato bhavissatī’’ti cinteti, taṃ tassā domanassappattāya cintanaṃ maṃ bādhatīti vālikāpiṭṭhe nipanno paridevati. „Hierbei bedeutet ‚Weder die Kälte quält mich, noch die Hitze quält mich‘: Wenn Fische aus dem Wasser gezogen werden, ist es kalt; wenn diese Kälte vergeht, wird es heiß. Auf diese beiden Zustände bezogen jammert er: ‚Weder die Kälte noch die Hitze quält mich.‘ Auch im Hinblick auf das Leid, das durch das Braten auf glühenden Kohlen entstehen wird, klagt er ebenso: ‚Mich quält die Hitze nicht.‘ ‚Nicht quält mich die Gefangenschaft im Netz‘ bedeutet: Er jammert: ‚Auch die Qual, die ich im Netz erlitt, bedrückt mich nicht.‘ Bei den Worten ‚Und was mich betrifft‘ (yañca maṃ) usw. ist dies der zusammenfassende Sinn: Jene Fischdame weiß nicht, dass ich, der ich ins Netz geriet, von diesen Fischern gefangen wurde. Da sie mich nicht sieht, denkt sie: ‚Dieser Fisch ist nun wohl aus Liebeslust zu einem anderen Weibchen gegangen.‘ Jener Gedanke von ihr, die in tiefe Betrübnis versunken ist, quält mich. So jammert er, während er auf dem Sandstrand liegt.“ Tasmiṃ samaye purohito dāsaparivuto nhānatthāya nadītīraṃ āgato. So pana sabbarutaññū hoti. Tenassa macchaparidevanaṃ sutvā etadahosi ‘‘ayaṃ maccho kilesavasena paridevati, evaṃ āturacitto kho panesa mīyamāno nirayeyeva nibbattissati, ahamassa avassayo bhavissāmī’’ti kevaṭṭānaṃ santikaṃ gantvā ‘‘ambho tumhe amhākaṃ ekadivasampi byañjanatthāya macchaṃ na dethā’’ti āha. Kevaṭṭā ‘‘kiṃ vadetha, sāmi, tumhākaṃ ruccanakamacchaṃ gaṇhitvā gacchathā’’ti āhaṃsu. ‘‘Amhākaṃ aññena kammaṃ natthi, imaññeva dethā’’ti. ‘‘Gaṇhatha sāmī’’ti. Bodhisatto taṃ ubhohi hatthehi gahetvā nadītīre nisīditvā ‘‘ambho maccha, sace tāhaṃ ajja na passeyyaṃ, jīvitakkhayaṃ pāpuṇeyyāsi, idāni ito paṭṭhāya mā kilesavasiko ahosī’’ti ovaditvā udake vissajjetvā nhatvā nagaraṃ pāvisi. „Zu jener Zeit kam der Hofpriester, von Dienern umgeben, zum Flussufer, um zu baden. Er aber verstand die Stimmen aller Lebewesen. Als er das Wehklagen des Fisches hörte, dachte er: ‚Dieser Fisch jammert unter dem Einfluss der geistigen Befleckungen. Wenn er mit einem so gequälten Geist stirbt, wird er gewiss in der Hölle wiedergeboren werden. Ich will ihm eine Zuflucht sein.‘ Er ging zu den Fischern und sagte: ‚He, ihr lieben Leute! Ihr gebt uns nicht einmal an einem einzigen Tag einen Fisch für unsere Mahlzeit.‘ Die Fischer antworteten: ‚Was sagt Ihr da, Herr? Nehmt euch einfach einen Fisch, der euch gefällt, und geht!‘ Er erwiderte: ‚Wir brauchen keinen anderen Fisch, gebt mir genau diesen hier.‘ Sie sagten: ‚Nehmt ihn, Herr!‘ Der Bodhisatta nahm ihn mit beiden Händen, setzte sich am Flussufer nieder und ermahnte ihn: ‚O Fisch, wenn ich dich heute nicht gesehen hätte, wärst du gestorben. Werde von heute an nicht mehr vom Verlangen beherrscht!‘ Nachdem er ihn so ermahnt hatte, entließ er ihn ins Wasser, badete und kehrte in die Stadt zurück.“ Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhitabhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā [Pg.228] jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā macchī purāṇadutiyikā ahosi, maccho ukkaṇṭhitabhikkhu purohito pana ahameva ahosi’’nti. „Der Meister trug diese Lehrrede vor und verkündete die Wahrheiten. Am Ende der Verkündung der Wahrheiten wurde der unzufriedene mönch in der Frucht des Stromeintritts gefestigt. Auch der Meister stellte die Verknüpfung der Existenzen her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: ‚Damals war das Fischweibchen die frühere Ehefrau, der Fisch war der unzufriedene Mönch, und der Hofpriester war ich selbst.‘“ Macchajātakavaṇṇanā catutthā. „Die Erklärung des Maccha-Jātaka ist die vierte.“
[35] 5. Vaṭṭakajātakavaṇṇanā [35] 5. „Die Erklärung des Vaṭṭaka-Jātaka“ Santi pakkhā apatanāti idaṃ satthā magadhesu cārikaṃ caramāno dāvagginibbānaṃ ārabbha kathesi. Ekasmiñhi samaye satthā magadhesu cārikaṃ caramāno aññatarasmiṃ magadhagāmake piṇḍāya caritvā pacchābhattaṃ piṇḍapātapaṭikkanto bhikkhugaṇaparivuto maggaṃ paṭipajji. Tasmiṃ samaye mahāḍāho uṭṭhahi, purato ca pacchato ca bahū bhikkhū dissanti, sopi kho aggi ekadhūmo ekajālo hutvā avattharamāno āgacchateva. Tattheke puthujjanabhikkhū maraṇabhayabhītā ‘‘paṭaggiṃ dassāma, tena daḍḍhaṭṭhānaṃ itaro aggi na ottharissatī’’ti araṇisahitaṃ nīharitvā aggiṃ karonti. Apare āhaṃsu ‘‘āvuso, tumhe kiṃ nāma karotha, gaganamajjhe ṭhitaṃ candamaṇḍalaṃ, pācīnalokadhātuto uggacchantaṃ sahassaraṃsipaṭimaṇḍitaṃ sūriyamaṇḍalaṃ, velāya tīre ṭhitā samuddaṃ, sineruṃ nissāya ṭhitā sineruṃ apassantā viya sadevake loke aggapuggalaṃ attanā saddhiṃ gacchantameva sammāsambuddhaṃ anoloketvā ‘paṭaggiṃ demā’ti vadatha, buddhabalaṃ nāma na jānātha, etha satthu santikaṃ gamissāmā’’ti. Te purato ca pacchato ca gacchantā sabbepi ekato hutvā dasabalassa santikaṃ agamaṃsu. Satthā mahābhikkhusaṅghaparivāro aññatarasmiṃ padese aṭṭhāsi. Dāvaggi abhibhavanto viya viravanto āgacchati. Āgantvā tathāgatassa ṭhitaṭṭhānaṃ patvā tassa padesassa samantā soḷasakarīsamattaṭṭhānaṃ patto udake opilāpitatiṇukkā viya nibbāyi, vinibbedhato dvattiṃsakarīsamattaṭṭhānaṃ avattharituṃ nāsakkhi. „‚Es gibt Flügel, die nicht fliegen‘ (Santi pakkhā apatanā) – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Lande Magadha auf Wanderschaft war, aus Anlass des Erlöschens eines Waldbrandes. Zu einer Zeit nämlich, als der Meister im Lande Magadha wanderte, ging er in einem bestimmten magadhischen Dorf auf Almosengang. Nach dem Mahl kehrte er vom Almosengang zurück und schlug, von einer Schar von Mönchen begleitet, den Weg ein. Zu jener Zeit brach ein gewaltiger Waldbrand aus. Vorne und hinten sah man viele Mönche. Auch jenes Feuer, das eine einzige Rauchwolke und ein einziges Flammenmeer bildete, kam alles verschlingend heran. Da holten einige gewöhnliche Mönche, die aus Todesangst zitterten, das Reibholz samt Reibbrett hervor und machten ein Gegenfeuer, indem sie dachten: ‚Wir wollen ein Gegenfeuer legen. Die Stelle, die dadurch verbrannt ist, wird das andere Feuer nicht überspringen.‘ Andere Mönche aber sagten: ‚Ihr Ehrwürdigen, was tut ihr da eigentlich? Es ist, als sähe man die Vollmondscheibe inmitten des Himmels nicht, oder die im Osten aufsteigende, mit tausend Strahlen geschmückte Sonnenscheibe, oder das Meer, wenn man am Ufer steht, oder den Berg Sineru, wenn man an ihn gelehnt ist. Ohne auf den vollkommen Erleuchteten zu blicken – die höchste Persönlichkeit in der Welt samt den Göttern, der leibhaftig mit euch geht –, sagt ihr: „Wir legen ein Gegenfeuer“! Ihr kennt wohl die Macht eines Buddhas nicht! Kommt, wir wollen uns zum Meister begeben.‘ Alle diese Mönche, die vor und hinter ihm gingen, schlossen sich zusammen und begaben sich zum Besitzer der Zehn Kräfte. Der Meister blieb, umgeben von einer großen Mönchsgemeinde, an einer bestimmten Stelle stehen. Der Waldbrand kam brüllend heran, als wollte er alles verschlingen. Als er die Stelle erreichte, wo der Tathāgata stand, erlosch er im Umkreis von sechzehn Karīsa um diesen Ort wie eine ins Wasser geworfene Grasfackel. Er vermochte das Gebiet von zweiunddreißig Karīsa im Durchmesser nicht zu überschreiten.“ Bhikkhū satthu guṇakathaṃ ārabhiṃsu – ‘‘aho buddhānaṃ guṇā nāma, ayañhi nāma acetano aggi buddhānaṃ ṭhitaṭṭhānaṃ avattharituṃ na sakkoti, udake [Pg.229] tiṇukkā viya nibbāyati, aho buddhānaṃ ānubhāvo nāmā’’ti. Satthā tesaṃ kathaṃ sutvā ‘‘na, bhikkhave, etaṃ etarahi mayhaṃ balaṃ, yaṃ imaṃ bhūmippadesaṃ patvā esa aggi nibbāyati. Idaṃ pana mayhaṃ porāṇakasaccabalaṃ. Imasmiñhi padese sakalampi imaṃ kappaṃ aggi na jalissati, kappaṭṭhiyapāṭihāriyaṃ nāmeta’’nti āha. Athāyasmā ānando satthu nisīdanatthāya catugguṇaṃ saṅghāṭiṃ paññapesi, nisīdi satthā pallaṅkaṃ ābhujitvā. Bhikkhusaṅghopi tathāgataṃ vanditvā parivāretvā nisīdi. Atha satthā ‘‘idaṃ tāva, bhante, amhākaṃ pākaṭaṃ, atītaṃ paṭicchannaṃ, taṃ no pākaṭaṃ karothā’’ti bhikkhūhi āyācito atītaṃ āhari. „Die Mönche begannen die Tugenden des Meisters zu rühmen: ‚O wie wunderbar sind doch die Vorzüge der Buddhas! Selbst dieses leblose Feuer vermag den Aufenthaltsort der Buddhas nicht zu überwinden und erlischt wie eine Grasfackel im Wasser. O wie wunderbar ist doch die Macht der Buddhas!‘ Als der Meister ihre Worte hörte, sprach er: ‚Mönche, dies ist nicht meine gegenwärtige Kraft, dass dieses Feuer erlischt, wenn es dieses Stück Erde erreicht. Vielmehr ist dies die Kraft meiner früheren Wahrhaftigkeit. An diesem Ort nämlich wird für dieses ganze Weltzeitalter kein Feuer brennen. Dies nennt man ein weltzeitalterüberdauerndes Wunder.‘ Daraufhin breitete der ehrwürdige Ānanda das äußere Gewand vierfach gefaltet aus, damit der Meister darauf sitzen könne. Der Meister setzte sich mit gekreuzten Beinen nieder. Auch die Mönchsgemeinde verneigte sich vor dem Tathāgata und setzte sich rings um ihn herum nieder. Daraufhin baten die Mönche: ‚Herr, dieses gegenwärtige Geschehen ist uns nun offenbar. Die Vergangenheit jedoch ist verborgen. Macht uns jene Vergangenheit offenbar!‘ Vom Mönchsorden so gebeten, trug der Meister die Vergangenheit vor.“ Atīte magadharaṭṭhe tasmiṃyeva padese bodhisatto vaṭṭakayoniyaṃ paṭisandhiṃ gahetvā mātukucchito jāto aṇḍakosaṃ padāletvā nikkhantakāle mahāgeṇḍukappamāṇo vaṭṭakapotako ahosi. Atha naṃ mātāpitaro kulāvake nipajjāpetvā mukhatuṇḍakena gocaraṃ āharitvā posenti. Tassa pakkhe pasāretvā ākāse gamanabalaṃ vā pāde ukkhipitvā thale gamanabalaṃ vā natthi. Tañca padesaṃ saṃvacchare saṃvacchare dāvaggi gaṇhāti, so tasmimpi samaye mahāravaṃ ravanto taṃ padesaṃ gaṇhi, sakuṇasaṅghā attano attano kulāvakehi nikkhamitvā maraṇabhayabhītā viravantā palāyanti, bodhisattassapi mātāpitaro maraṇabhayabhītā bodhisattaṃ chaḍḍetvā palāyiṃsu. Bodhisatto kulāvake nipannakova gīvaṃ ukkhipitvā avattharitvā āgacchantaṃ aggiṃ disvā cintesi ‘‘sace mayhaṃ pakkhe pasāretvā ākāsena gamanabalaṃ bhaveyya, uppatitvā aññattha gaccheyyaṃ. Sace pāde ukkhipitvā gamanabalaṃ bhaveyya, padavārena aññattha gaccheyyaṃ. Mātāpitaropi kho me maraṇabhayabhītā maṃ ekakaṃ pahāya attānaṃ parittāyantā palātā. Idāni me aññaṃ paṭisaraṇaṃ natthi, atāṇomhi asaraṇo, kiṃ nu kho ajja mayā kātuṃ vaṭṭatī’’ti. In der Vergangenheit, im Königreich Magadha, an eben diesem Ort, nahm der Bodhisatta eine Wiedergeburt im Schoß einer Wachtel. Als er aus dem Mutterleib geboren wurde, die Eierschale durchbrach und schlüpfte, war er ein Wachtelküken von der Größe eines großen Spielballs. Daraufhin legten ihn seine Eltern ins Nest und ernährten ihn, indem sie mit ihren Schnäbeln Nahrung herbeitrugen. Er besaß weder die Kraft, seine Flügel auszubreiten und am Himmel zu fliegen, noch die Kraft, seine Füße zu heben und auf dem Erdboden zu gehen. Und jenes Gebiet wurde Jahr für Jahr von einem Waldbrand erfasst. Auch zu jener Zeit kam das Feuer mit lautem Getöse heran und ergriff dieses Gebiet. Scharen von Vögeln verließen ihre jeweiligen Nester und flohen schreiend aus Angst vor dem Tod. Auch die Eltern des Bodhisatta flohen aus Angst vor dem Tod und ließen den Bodhisatta zurück. Der Bodhisatta, der im Nest lag, hob den Hals, sah das herannahende, alles versengende Feuer und dachte: 'Wenn ich die Kraft hätte, meine Flügel auszubreiten und durch die Luft zu fliegen, würde ich auffliegen und an einen anderen Ort gelangen. Wenn ich die Kraft hätte, meine Füße zu heben und zu laufen, würde ich Schritt für Schritt an einen anderen Ort gehen. Doch selbst meine Eltern sind aus Angst vor dem Tod geflohen, haben mich allein zurückgelassen und sich selbst in Sicherheit gebracht. Nun habe ich keine andere Zuflucht, ich bin schutzlos und ohne Zuflucht. Was sollte ich heute wohl tun?' Athassa etadahosi ‘‘imasmiṃ loke sīlaguṇo nāma atthi, saccaguṇo nāma atthi, atīte pāramiyo pūretvā bodhimūle nisīditvā abhisambuddhā sīlasamādhipaññāvimuttivimuttiñāṇadassanasampannā saccānuddayakāruññakhantisamannāgatā sabbasattesu samappavattamettābhāvanā sabbaññubuddhā [Pg.230] nāma atthi, tehi ca paṭividdhā dhammaguṇā nāma atthi, mayi cāpi ekaṃ saccaṃ atthi, saṃvijjamāno eko sabhāvadhammo paññāyati, tasmā atīte buddhe ceva tehi paṭividdhaguṇe ca āvajjetvā mayi vijjamānaṃ saccasabhāvadhammaṃ gahetvā saccakiriyaṃ katvā aggiṃ paṭikkamāpetvā ajja mayā attano ceva sesasakuṇānañca sotthibhāvaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti. Tena vuttaṃ – Da dachte er: 'In dieser Welt gibt es die Qualität der Tugend, es gibt die Qualität der Wahrheit. In der Vergangenheit gibt es die Allwissenden Buddhas, die die Vollkommenheiten erfüllten, am Fuße des Bodhi-Baumes saßen, die vollkommene Erleuchtung erlangten, reich an Tugend, Sammlung, Weisheit, Befreiung sowie dem Wissen und der Schauung der Befreiung sind, die mit Wahrheit, liebevoller Güte, Mitgefühl und Geduld ausgestattet sind und deren Entfaltung der liebenden Güte sich gleichermaßen auf alle Wesen erstreckt. Und es gibt die Qualitäten des Dhamma, die von ihnen durchdrungen wurden. Auch in mir gibt es eine Wahrheit; ein einziger in mir vorhandener natürlicher Zustand ist offenkundig. Daher sollte ich heute, indem ich mich der vergangenen Buddhas sowie der von ihnen durchdrungenen Qualitäten erinnere, die in mir vorhandene wahre Natur der Wahrheit ergreife, einen Akt der Wahrheit vollziehe und das Feuer zum Rückzug zwinge, das Wohlergehen für mich selbst und für die übrigen Vögel herbeiführen.' Deshalb wurde gesagt: ‘‘Atthi loke sīlaguṇo, saccaṃ soceyyanuddayā; Tena saccena kāhāmi, saccakiriyamanuttaraṃ. „Es gibt in der Welt die Qualität der Tugend, Wahrheit, Reinheit und Mitgefühl. Durch diese Wahrheit werde ich einen unübertrefflichen Akt der Wahrheit vollziehen. ‘‘Āvajjetvā dhammabalaṃ, saritvā pubbake jine; Saccabalamavassāya, saccakiriyamakāsaha’’nti. (cariyā. 3.79-80); Indem ich die Kraft des Dhamma bedachte, mich an die früheren Überwinder erinnerte und auf die Kraft der Wahrheit vertraute, vollzog ich einen Akt der Wahrheit.“ Atha bodhisatto atīte parinibbutānaṃ buddhānaṃ guṇe āvajjetvā attani vijjamānaṃ saccasabhāvaṃ ārabbha saccakiriyaṃ karonto imaṃ gāthamāha – Daraufhin dachte der Bodhisatta an die Qualitäten der in der Vergangenheit erloschenen Buddhas, richtete seine Aufmerksamkeit auf die in ihm vorhandene wahre Natur und sprach, während er den Akt der Wahrheit vollzog, diese Strophe: 35. 35. ‘‘Santi pakkhā apatanā, santi pādā avañcanā; Mātāpitā ca nikkhantā, jātaveda paṭikkamā’’ti. „Flügel sind da, doch sie fliegen nicht; Füße sind da, doch sie laufen nicht. Mutter und Vater sind geflohen; o Feuer, weiche zurück!“ Tattha santi pakkhā apatanāti mayhaṃ pakkhā nāma atthi upalabbhanti, no ca kho sakkā etehi uppatituṃ ākāsena gantunti apatanā. Santi pādā avañcanāti pādāpi me atthi, tehi pana vañcituṃ padavāragamanena gantuṃ na sakkāti avañcanā. Mātāpitā ca nikkhantāti ye ca maṃ aññattha neyyuṃ, tepi maraṇabhayena mātāpitaro nikkhantā. Jātavedāti aggiṃ ālapati. So hi jātova vedayati paññāyati, tasmā ‘‘jātavedo’’ti vuccati. Paṭikkamāti paṭigaccha nivattāti jātavedaṃ āṇāpeti. Darin bedeutet „Flügel sind da, doch sie fliegen nicht“: Ich habe zwar Flügel, sie sind vorhanden, aber es ist nicht möglich, mit ihnen aufzufliegen und durch die Luft zu reisen; daher „nicht fliegend“. „Füße sind da, doch sie laufen nicht“ bedeutet: Auch Füße habe ich, doch mit ihnen zu schreiten, sich schrittweise fortzubewegen, ist unmöglich; daher „nicht laufend“. „Mutter und Vater sind geflohen“ bedeutet: Auch jene Eltern, die mich an einen anderen Ort hätten bringen sollen, selbst diese Eltern sind aus Angst vor dem Tod geflohen. Mit „Jātaveda“ spricht er das Feuer an. Denn sobald es entsteht, macht es sich bemerkbar und wird wahrgenommen; deshalb wird es „Jātaveda“ genannt. „Weiche zurück“ bedeutet: „Geh zurück, kehre um!“ – so befiehlt er dem Feuer. Iti mahāsatto ‘‘sace mayhaṃ pakkhānaṃ atthibhāvo, te ca pasāretvā ākāse apatanabhāvo, pādānaṃ atthibhāvo, te ca ukkhipitvā avañcanabhāvo, mātāpitūnaṃ maṃ kulāvakeyeva chaḍḍetvā palātabhāvo ca sacco sabhāvabhūtoyeva, jātaveda, etena [Pg.231] saccena tvaṃ ito paṭikkamā’’ti kulāvake nipannakova saccakiriyaṃ akāsi. Tassa saha saccakiriyāya soḷasakarīsamatte ṭhāne jātavedo paṭikkami. Paṭikkamanto ca na jhāyamānova aññaṃ gato, udake pana opilāpitā ukkā viya tattheva nibbāyi. Tena vuttaṃ – So vollzog das Große Wesen, noch während es im Nest lag, einen Akt der Wahrheit: 'O Feuer, wenn das Vorhandensein meiner Flügel und die Tatsache, dass ich sie nicht ausbreiten und am Himmel fliegen kann, das Vorhandensein meiner Füße und die Tatsache, dass ich sie nicht heben und gehen kann, sowie die Tatsache, dass meine Eltern mich im Nest zurückgelassen haben und geflohen sind, wahr und der Wirklichkeit entsprechend sind – durch diese Wahrheit weiche du von hier zurück!' Gleichzeitig mit seinem Akt der Wahrheit wich das Feuer über einen Bereich von etwa sechzehn Karīsa zurück. Und während es zurückwich, brannte es nicht andernorts weiter, sondern erlosch genau dort wie eine Fackel, die ins Wasser getaucht wird. Daher wurde gesagt: ‘‘Saha sacce kate mayhaṃ, mahāpajjalito sikhī; Vajjesi soḷasa karīsāni, udakaṃ patvā yathā sikhī’’ti. (cariyā. 3.82); „Sobald der Akt der Wahrheit von mir vollzogen war, wich das hell lodernde Feuer um sechzehn Karīsa zurück, gleichwie ein Feuer erlischt, wenn es auf Wasser trifft.“ Taṃ pana ṭhānaṃ sakalepi imasmiṃ kappe agginā anabhibhavanīyattā kappaṭṭhiyapāṭihāriyaṃ nāma jātaṃ. Evaṃ bodhisatto saccakiriyaṃ katvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. Jener Ort aber wurde als ein für das ganze Äon bestehendes Wunder bekannt, da er während dieses gesamten Weltzeitalters nicht vom Feuer überwältigt werden kann. Auf diese Weise vollzog der Bodhisatta den Akt der Wahrheit und ging am Ende seines Lebens gemäß seinem Kamma fort. Satthā ‘‘na, bhikkhave, imassa vanassa agginā anajjhottharaṇaṃ etarahi mayhaṃ balaṃ, porāṇaṃ panetaṃ vaṭṭapotakakāle mayhameva saccabala’’nti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi. Saccapariyosāne keci sotāpannā ahesuṃ, keci sakadāgāmino, keci anāgāmino, keci arahattaṃ pattāti. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mātāpitaro etarahi mātāpitarova ahesuṃ, vaṭṭakarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Ihr Mönche, dass dieses Waldgebiet nicht vom Feuer überrannt wird, ist nicht meine jetzige Kraft. Vielmehr ist dies die alte Kraft der Wahrheit, die mir allein aus der Zeit gehörte, als ich ein Wachtelküken war.“ Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten wurden einige Stromeingetretene, einige Einmalkehrere, einige Niekehrere und einige erlangten die Arahantschaft. Auch der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Die damaligen Eltern waren die heutigen Eltern, der Wachtelkönig aber war ich selbst.“ Vaṭṭakajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Vaṭṭaka-Jātaka ist die fünfte.
[36] 6. Sakuṇajātakavaṇṇanā [36] 6. Die Erklärung des Sakuṇa-Jātaka Yaṃ nissitāti idaṃ satthā jetavane viharanto daḍḍhapaṇṇasālaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Eko kira bhikkhu satthu santike kammaṭṭhānaṃ gahetvā jetavanato nikkhamma kosalesu ekaṃ paccantagāmaṃ nissāya ekasmiṃ araññasenāsane vasati. Athassa paṭhamamāseyeva paṇṇasālā ḍayhittha. So ‘‘paṇṇasālā me daḍḍhā, dukkhaṃ vasāmī’’ti manussānaṃ ācikkhi. Manussā ‘‘idāni no khettaṃ parisukkhaṃ, kedāre pāyetvā karissāma’’, tasmiṃ pāyite ‘‘bījaṃ vapitvā’’, bīje vutte ‘‘vatiṃ katvā’’, vatiyā katāya ‘‘niddāyitvā, lāyitvā, madditvā’’ti evaṃ taṃ taṃ kammaṃ apadisantāyeva temāsaṃ vītināmesuṃ. So bhikkhu temāsaṃ ajjhokāse dukkhaṃ vasanto [Pg.232] kammaṭṭhānaṃ vaḍḍhetvā visesaṃ nibbattetuṃ nāsakkhi. Pavāretvā pana satthu santikaṃ gantvā vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Satthā tena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā ‘‘kiṃ bhikkhu sukhena vassaṃvutthosi, kammaṭṭhānaṃ te matthakaṃ patta’’nti pucchi. So taṃ pavattiṃ ācikkhitvā ‘‘senāsanasappāyassa me abhāvena kammaṭṭhānaṃ matthakaṃ na patta’’nti āha. Satthā ‘‘pubbe bhikkhu tiracchānagatāpi attano sappāyāsappāyaṃ jāniṃsu, tvaṃ kasmā na aññāsī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Yaṃ nissitā“ [Diejenigen, die sich stützen] – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines Mönchs, dessen Blätterhütte abgebrannt war. Ein Mönch hatte nämlich beim Meister ein Meditationsobjekt (Kammaṭṭhāna) genommen, verließ das Jetavana-Kloster und lebte in einer Waldeinsiedelei in der Nähe eines Grenzdorfes im Kosala-Land. Da brannte bereits in seinem ersten Monat seine Blätterhütte ab. Er berichtete den Menschen: „Meine Blätterhütte ist abgebrannt, ich lebe im Elend.“ Die Menschen hielten ihn hin, indem sie immer wieder auf diese und jene Arbeit verwiesen: „Jetzt ist unser Feld ausgetrocknet, wir müssen die Felder bewässern“; wenn bewässert: „Samen säen“; wenn gesät: „einen Zaun bauen“; wenn der Zaun gebaut ist: „Unkraut jäten, ernten, dreschen“ – und so ließen sie die drei Monate der Regenzeit vergehen. Jener Mönch, der drei Monate lang im Freien im Elend lebte, konnte sein Meditationsobjekt nicht entfalten und keine höhere Stufe (Visesa) erreichen. Nach der Pavāraṇā-Feier ging er jedoch zum Meister, erwies ihm die Ehre und setzte sich zur Seite nieder. Der Meister tauschte freundliche Worte mit ihm aus und fragte: „Mönch, hast du die Regenzeit in Wohlbefinden verbracht? Hat dein Kammaṭṭhāna den Gipfel erreicht?“ Er berichtete von jenen Vorkommnissen und sagte: „Da es mir an einer zuträglichen Unterkunft fehlte, hat mein Kammaṭṭhāna den Gipfel nicht erreicht.“ Der Meister sagte: „Mönch, in der Vergangenheit kannten selbst Tiere, was für sie zuträglich und unzuträglich war. Warum hast du es nicht gewusst?“, und trug eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto sakuṇayoniyaṃ nibbattitvā sakuṇasaṅghaparivuto araññāyatane sākhāviṭapasampannaṃ mahārukkhaṃ nissāya vasati. Athekadivasaṃ tassa rukkhassa sākhāsu aññamaññaṃ ghaṃsantīsu cuṇṇaṃ patati, dhūmo uṭṭhāti. Taṃ disvā bodhisatto cintesi ‘‘imā dve sākhā evaṃ ghaṃsamānā aggiṃ vissajjessanti, so patitvā purāṇapaṇṇāni gaṇhissati, tato paṭṭhāya imampi rukkhaṃ jhāpessati, na sakkā idha amhehi vasituṃ, ito palāyitvā aññattha gantuṃ vaṭṭatī’’ti. So sakuṇasaṅghassa imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoß der Vögel wiedergeboren und lebte, umgeben von einer Vogelschar, in einem Waldgebiet im Schutz eines großen Baumes, der reich an Ästen und Zweigen war. Eines Tages rieben die Äste jenes Baumes aneinander, wodurch Staub herabfiel und Rauch aufstieg. Als der Bodhisatta dies sah, dachte er: „Diese beiden Äste werden durch das gegenseitige Reiben Feuer erzeugen. Dieses wird herabfallen und das alte Laub entzünden. Von da an wird es auch diesen Baum verbrennen. Es ist uns nicht möglich, hier zu leben; es ist angebracht, von hier wegzufliegen und an einen anderen Ort zu gehen.“ Er sprach diese Strophe zu der Vogelschar: 36. 36. ‘‘Yaṃ nissitā jagatiruhaṃ vihaṅgamā, svāyaṃ aggiṃ pamuñcati; Disā bhajatha vakkaṅgā, jātaṃ saraṇato bhaya’’nti. „Der Baum, auf den sich die Vögel stützen, ebendieser gibt nun Feuer ab; Sucht das Weite, ihr Krummgliedrigen! Gefahr ist aus der Zuflucht erwachsen.“ Tattha jagatiruhanti jagati vuccati pathavī, tattha jātattā rukkho ‘‘jagatiruho’’ti vuccati. Vihaṅgamāti vihaṃ vuccati ākāsaṃ, tattha gamanato pakkhī ‘‘vihaṅgamā’’ti vuccanti. Disā bhajathāti imaṃ rukkhaṃ muñcitvā ito palāyantā catasso disā bhajatha. Vakkaṅgāti sakuṇe ālapati. Te hi uttamaṅgaṃ galaṃ kadāci kadāci vaṅkaṃ karonti, tasmā ‘‘vakkaṅgā’’ti vuccanti. Vaṅkā vā tesaṃ ubhosu passesu pakkhā jātāti vakkaṅgā. Jātaṃ saraṇato bhayanti amhākaṃ avassayarukkhatoyeva bhayaṃ nibbattaṃ, etha aññattha gacchāmāti. Darin bedeutet „jagatiruhaṃ“: „jagati“ wird die Erde genannt; weil er darauf wächst, wird ein Baum „jagatiruha“ genannt. „Vihaṅgamā“: „viha“ wird der Luftraum genannt; weil sie sich darin bewegen, werden Vögel „vihaṅgamā“ genannt. „Disā bhajatha“ bedeutet: Verlasst diesen Baum, fliegt von hier weg und wendet euch den vier Himmelsrichtungen zu. Mit „vakkaṅgā“ spricht er die Vögel an. Sie machen nämlich bisweilen ihren Kopf und ihren Hals krumm; daher werden sie „vakkaṅgā“ genannt. Oder aber an ihren beiden Seiten sind gekrümmte Flügel gewachsen, daher „vakkaṅgā“. „Jātaṃ saraṇato bhayaṃ“ bedeutet: Gerade von unserem Schutzbaum ist die Gefahr ausgegangen. „Kommt, lasst uns an einen anderen Ort gehen“, meint er damit. Bodhisattassa vacanakarā paṇḍitasakuṇā tena saddhiṃ ekappahāreneva uppatitvā aññattha gatā. Ye pana apaṇḍitā, te ‘‘evameva esa bindumatte udake kumbhīle passatī’’ti tassa vacanaṃ aggahetvā tattheva vasiṃsu. Tato na cirasseva bodhisattena cintitākāreneva aggi nibbattitvā taṃ rukkhaṃ aggahesi. Dhūmesu ca jālāsu ca uṭṭhitāsu dhūmandhā [Pg.233] sakuṇā aññattha gantuṃ nāsakkhiṃsu, aggimhi patitvā patitvā vināsaṃ pāpuṇiṃsu. Die weisen Vögel, welche die Worte des Bodhisatta befolgten, flogen mit ihm auf einen Schlag empor und begaben sich an einen anderen Ort. Diejenigen aber, die unweise waren, sprachen: „Ebenso sieht dieser Krokodile in einem Wassertropfen“, nahmen seine Worte nicht an und blieben genau dort. Kurz darauf entstand, genau wie vom Bodhisatta vorausgedacht, Feuer und ergriff jenen Baum. Als Rauch und Flammen aufstiegen, konnten die vom Rauch geblendeten Vögel nicht mehr entkommen; sie stürzten ins Feuer und kamen ums Leben. Satthā ‘‘evaṃ bhikkhu pubbe tiracchānagatāpi rukkhagge vasantā attano sappāyāsappāyaṃ jānanti, tvaṃ kasmā na aññāsī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi. Saccapariyosāne so bhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhito. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā bodhisattassa vacanakarā sakuṇā buddhaparisā ahesuṃ, paṇḍitasakuṇo pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor: „So erkannten, o Mönch, in der Vergangenheit selbst Tiere, die auf den Wipfeln der Bäume lebten, was für sie zuträglich und unzuträglich war; warum hast du es nicht gewusst?“, und legte die Wahrheiten dar. Am Ende der Wahrheitsverkündung war jener Mönch in der Frucht des Stromeintritts (Sotāpattiphala) gefestigt. Auch der Meister stellte die Verknüpfung her und fasste die Wiedergeburtsgeschichte zusammen: „Damals waren die Vögel, welche den Worten des Bodhisatta folgten, die Gefolgschaft des Buddha, der weise Vogel aber war ich selbst.“ Sakuṇajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die sechste Erklärung des Sakuṇa-Jātaka.
[37] 7. Tittirajātakavaṇṇanā [37] 7. Die Erklärung des Tittira-Jātaka. Ye vuḍḍhamapacāyantīti idaṃ satthā sāvatthiṃ gacchanto sāriputtattherassa senāsanapaṭibāhanaṃ ārabbha kathesi. Anāthapiṇḍikena hi vihāraṃ kāretvā dūte pesite satthā rājagahā nikkhamma vesāliṃ patvā tattha yathābhirantaṃ viharitvā ‘‘sāvatthiṃ gamissāmī’’ti maggaṃ paṭipajji. Tena ca samayena chabbaggiyānaṃ antevāsikā purato purato gantvā therānaṃ senāsanesu aggahitesveva ‘‘idaṃ senāsanaṃ amhākaṃ upajjhāyassa, idaṃ ācariyassa, idaṃ amhākameva bhavissatī’’ti senāsanāni palibundhenti. Pacchā āgatā therā senāsanāni na labhanti. Sāriputtattherassāpi antevāsikā therassa senāsanaṃ pariyesantā na labhiṃsu. Thero senāsanaṃ alabhanto satthu senāsanassa avidūre ekasmiṃ rukkhamūle nisajjāya ca caṅkamena ca rattiṃ vītināmesi. Satthā paccūsasamaye nikkhamitvā ukkāsi, theropi ukkāsi. ‘‘Ko eso’’ti? ‘‘Ahaṃ, bhante, sāriputto’’ti. ‘‘Sāriputta, imāya velāya idha kiṃ karosī’’ti? ‘‘So taṃ pavattiṃ ārocesi’’. Satthā therassa vacanaṃ sutvā ‘‘idāni tāva mayi jīvanteyeva bhikkhū aññamaññaṃ agāravā apatissā viharanti, parinibbute kiṃ nu kho karissantī’’ti āvajjentassa dhammasaṃvego udapādi. „Ye vuḍḍhamapacāyanti“ [Diejenigen, die die Älteren ehren] – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er nach Sāvatthī reiste, bezüglich der Verweigerung einer Unterkunft für den ehrwürdigen Sāriputta. Nachdem Anāthapiṇḍika nämlich ein Kloster erbauen lassen und Boten entsandt hatte, verließ der Meister Rājagaha, gelangte nach Vesālī, verwelte dort so lange, wie es ihm gefiel, und machte sich auf den Weg mit den Worten: „Ich werde nach Sāvatthī gehen.“ Zu jener Zeit reisten die Schüler der sechsköpfigen Mönchsgruppe (Chabbaggiya) immer ein Stück voraus, und noch bevor die älteren Theras Unterkünfte auswählen konnten, besetzten sie die Unterkünfte mit den Worten: „Diese Unterkunft ist für unseren Upajjhāya, diese für unseren Ācariya, diese wird uns selbst gehören.“ Die später eintreffenden Theras erhielten keine Unterkünfte. Selbst die Schüler des ehrwürdigen Sāriputta, die nach einer Unterkunft für den Thera suchten, fanden keine. Da der Thera keine Unterkunft erhielt, verbrachte er die Nacht in der Nähe der Unterkunft des Meisters am Fuße eines Baumes, indem er saß und auf und ab ging. Der Meister trat zur Morgendämmerung heraus und räusperte sich; auch der Thera räusperte sich. „Wer ist da?“, fragte der Meister. „Ich bin es, Ehrwürdiger Herr, Sāriputta“, antwortete er. „Sāriputta, was tust du zu dieser Stunde hier?“ Er berichtete ihm von jenen Vorkommnissen. Als der Meister die Worte des Thera hörte, dachte er: „Wenn die Mönche jetzt, da ich noch am Leben bin, einander so respektlos und ungehorsam begegnen, was werden sie erst tun, wenn ich vollkommen erloschen bin?“ Bei diesem Gedanken stieg in ihm tiefe religiöse Ergriffenheit (Dhammasaṃvega) auf. So pabhātāya rattiyā bhikkhusaṅghaṃ sannipātāpetvā bhikkhū pucchi ‘‘saccaṃ kira, bhikkhave, chabbaggiyā bhikkhū purato purato gantvā therānaṃ bhikkhūnaṃ [Pg.234] senāsanaṃ paṭibāhantī’’ti. ‘‘Saccaṃ, bhagavā’’ti? Tato chabbaggiye garahitvā dhammiṃ kathaṃ katvā bhikkhū āmantesi ‘‘ko nu kho, bhikkhave, aggāsanaṃ aggodakaṃ aggapiṇḍaṃ arahatī’’ti? Ekacce ‘‘khattiyakulā pabbajito’’ti āhaṃsu, ekacce ‘‘brāhmaṇakulā, gahapatikulā pabbajito’’ti, apare ‘‘vinayadharo, dhammakathiko, paṭhamassa jhānassa lābhī, dutiyassa, tatiyassa, catutthassa jhānassa lābhī’’ti. Apare ‘‘sotāpanno, sakadāgāmī, anāgāmī, arahā, tevijjo, chaḷabhiñño’’ti āhaṃsu. Evaṃ tehi bhikkhūhi attano attano rucivasena aggāsanādirahānaṃ kathitakāle satthā āha – ‘‘na, bhikkhave, mayhaṃ sāsane aggāsanādīni patvā khattiyakulā pabbajito pamāṇaṃ, na brāhmaṇakulā pabbajito, na gahapatikulā pabbajito, na vinayadharo, na suttantiko, na ābhidhammiko, na paṭhamajjhānādilābhino, na sotāpannādayo pamāṇaṃ, atha kho, bhikkhave, imasmiṃ sāsane yathāvuḍḍhaṃ abhivādanaṃ paccuṭṭhānaṃ añjalikammaṃ sāmīcikammaṃ kātabbaṃ, aggāsanaṃ aggodakaṃ aggapiṇḍo laddhabbo. Idamettha pamāṇaṃ. Tasmā vuḍḍhataro bhikkhu etesaṃ anucchaviko. Idāni kho pana, bhikkhave, sāriputto mayhaṃ aggasāvako anudhammacakkappavattako mamānantaraṃ senāsanaṃ laddhuṃ arahati, so imaṃ rattiṃ senāsanaṃ alabhanto rukkhamūle vītināmesi, tumhe idāneva evaṃ agāravā apatissā, gacchante gacchante kāle kinti katvā viharissathā’’ti. Atha nesaṃ ovādadānatthāya ‘‘pubbe, bhikkhave, tiracchānagatāpi ‘na kho panetaṃ amhākaṃ patirūpaṃ, yaṃ mayaṃ aññamaññaṃ agāravā apatissā asabhāgavuttino vihareyyāma, amhesu mahallakataraṃ jānitvā tassa abhivādanādīni karissāmā’ti sādhukaṃ vīmaṃsitvā ‘ayaṃ no mahallako’ti ñatvā tassa abhivādanādīni katvā devapathaṃ pūrayamānā gatā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Als die Nacht vergangen war, ließ der Erhabene den Bhikkhu-Saṅgha versammeln und fragte die Bhikkhus: „Ist es wahr, ihr Mönche, dass die Bhikkhus der Sechsergruppe vorauszueilen pflegen und den älteren Bhikkhus ihre Schlaf- und Sitzplätze streitig machen?“ – „Es ist wahr, Erhabener.“ Daraufhin tadelte er die Sechsergruppe, hielt eine Lehrrede und sprach zu den Bhikkhus: „Wer wohl, ihr Mönche, verdient den besten Sitzplatz, das beste Wasser und die beste Speise?“ Einige sagten: „Ein aus einer Kriegerfamilie Ausgetretener.“ Einige sagten: „Ein aus einer Brahmanenfamilie oder einer Hausvaterfamilie Ausgetretener.“ Andere sagten: „Ein Kenner der Ordensdisziplin, ein Lehrer der Lehre, einer, der die erste Vertiefung erlangt hat, die zweite, die dritte oder die vierte Vertiefung.“ Wieder andere sagten: „Ein Stromeingetretener, ein Einmalwiederkehrer, ein Nie-Wiederkehrer, ein Arahant, einer mit dem dreifachen Wissen oder einer mit den sechs höheren Geisteskräften.“ Als die Bhikkhus so nach ihren eigenen Vorlieben diejenigen nannten, die den besten Sitzplatz und so weiter verdienten, sprach der Meister: „Ihr Mönche, in meiner Lehre ist beim Erhalt des besten Sitzplatzes und so weiter die Herkunft aus einer Kriegerfamilie kein Maßstab, die Herkunft aus einer Brahmanenfamilie kein Maßstab, die Herkunft aus einer Hausvaterfamilie kein Maßstab, ein Kenner der Ordensdisziplin kein Maßstab, ein Kenner der Lehrreden kein Maßstab, ein Kenner des Abhidhamma kein Maßstab, jene, die die erste Vertiefung und so weiter erlangt haben, kein Maßstab, und auch die Stromeingetretenen und so weiter sind kein Maßstab. Vielmehr, ihr Mönche, soll in dieser Lehre die Ehrerbietung, das Aufstehen vom Sitz, das Falten der Hände und das ehrerbietige Verhalten dem Dienstalter entsprechend erwiesen werden, und der beste Sitzplatz, das beste Wasser sowie die beste Speise sollen dem Dienstalter entsprechend empfangen werden. Dies ist hierbei der Maßstab. Daher ist der ältere Bhikkhu dieser Dinge würdig. Nun aber, ihr Mönche, ist Sāriputta mein Hauptschüler, der das Rad der Lehre in Übereinstimmung mit mir dreht; er verdient es, gleich nach mir den Schlaf- und Sitzplatz zu erhalten. Doch er verbrachte diese Nacht, da er keinen Schlaf- und Sitzplatz fand, am Fuße eines Baumes. Wenn ihr schon jetzt so respektlos und ungehorsam seid, wie werdet ihr dann leben, wenn die Zeit immer weiter fortschreitet?“ Um ihnen dann eine Unterweisung zu geben, sprach er: „Ihr Mönche, in alten Zeiten dachten selbst Tiere: ‚Es schickt sich für uns nicht, dass wir ohne Respekt und Ehrerbietung füreinander leben und keine harmonische Lebensweise führen. Lasst uns herausfinden, wer unter uns der Älteste ist, und ihm Ehrerbietung und dergleichen erweisen.‘ Nachdem sie dies gründlich überlegt und erkannt hatten: ‚Dieser hier ist der Älteste unter uns‘, erwiesen sie ihm Ehrerbietung und dergleichen und gingen so, den Weg in die Götterwelt füllend.“ Nach diesen Worten trug er eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte himavantappadese ekaṃ mahānigrodhaṃ upanissāya tayo sahāyā vihariṃsu – tittiro, makkaṭo, hatthīti. Te aññamaññaṃ agāravā apatissā asabhāgavuttino ahesuṃ. Atha nesaṃ etadahosi ‘‘na yuttaṃ amhākaṃ evaṃ viharituṃ, yaṃnūna mayaṃ yo no mahallakataro, tassa [Pg.235] abhivādanādīni karontā vihareyyāmā’’ti. ‘‘Ko pana no mahallakataro’’ti cintentā ekadivasaṃ ‘‘attheso upāyo’’ti tayopi janā nigrodhamūle nisīditvā tittiro ca makkaṭo ca hatthiṃ pucchiṃsu ‘‘samma hatthi, tvaṃ imaṃ nigrodharukkhaṃ kīvappamāṇakālato paṭṭhāya jānāsī’’ti? So āha ‘‘sammā, ahaṃ taruṇapotakakāle imaṃ nigrodhagacchaṃ antarasatthīsu katvā gacchāmi, avattharitvā ṭhitakāle ca pana me etassa aggasākhā nābhiṃ ghaṭṭeti, evāhaṃ imaṃ gacchakālato paṭṭhāya jānāmī’’ti puna ubhopi janā purimanayeneva makkaṭaṃ pucchiṃsu. So āha ‘‘ahaṃ sammā makkaṭacchāpako samāno bhūmiyaṃ nisīditvā gīvaṃ anukkhipitvāva imassa nigrodhapotakassa aggaṅkure khādāmi, evāhaṃ imaṃ khuddakakālato paṭṭhāya jānāmī’’ti. Atha itare ubhopi purimanayeneva tittiraṃ pucchiṃsu. So āha ‘‘sammā, pubbe asukasmiṃ nāma ṭhāne mahānigrodharukkho ahosi, ahaṃ tassa phalāni khāditvā imasmiṃ ṭhāne vaccaṃ pātesiṃ, tato esa rukkho jāto, evāhaṃ imaṃ ajātakālato paṭṭhāya jānāmi, tasmā ahaṃ tumhehi jātiyā mahallakataro’’ti. In der Vergangenheit lebten in einer Gegend des Himalaya drei Freunde im Schatten eines großen Banyanbaumes: ein Rebhuhn, ein Affe und ein Elefant. Sie lebten ohne gegenseitigen Respekt, ohne Ehrerbietung und führten keine harmonische Lebensweise. Da kam ihnen folgender Gedanke: „Es schickt sich für uns nicht, so zu leben. Wie wäre es, wenn wir herausfänden, wer unter uns der Ältere ist, und diesem dann Ehrerbietung und dergleichen erweisend leben?“ Als sie darüber nachdachten, wer wohl der Ältere unter ihnen sei, dachten sie eines Tages: „Es gibt einen Weg.“ Und alle drei setzten sich unter den Banyanbaum, und das Rebhuhn und der Affe fragten den Elefanten: „Freund Elefant, seit welcher Zeit kennst du diesen Banyanbaum?“ Er antwortete: „Freunde, als ich noch ein junges Kalb war, ging ich über diesen Banyan-Strauch hinweg, sodass er sich zwischen meinen Beinen befand. Und wenn ich stillstand, berührte sein oberster Zweig meinen Nabel. So kenne ich diesen Baum, seit er noch ein Strauch war.“ Wiederum fragten beide auf dieselbe Weise den Affen. Dieser antwortete: „Freunde, als ich noch ein kleiner Affenjunge war, saß ich auf dem Boden, und ohne meinen Hals strecken zu müssen, fraß ich die obersten Triebe dieses Banyan-Schösslings. So kenne ich diesen Baum, seit er noch klein war.“ Da fragten die anderen beiden auf dieselbe Weise das Rebhuhn. Es sagte: „Freunde, in der Vergangenheit stand an jenem bestimmten Ort ein großer Banyanbaum. Nachdem ich dessen Früchte gefressen hatte, ließ ich an dieser Stelle meinen Kot fallen. Daraus ist dieser Baum gewachsen. So kenne ich diesen Baum, seit der Zeit, als er noch gar nicht entstanden war. Darum bin ich der Geburt nach älter als ihr.“ Evaṃ vutte makkaṭo ca hatthī ca tittirapaṇḍitaṃ āhaṃsu ‘‘samma, tvaṃ amhehi mahallakataro, ito paṭṭhāya mayaṃ tava sakkāragarukāramānanavandanapūjanāni ceva abhivādanapaccuṭṭhānaañjalikammasāmīcikammāni ca karissāma, ovāde ca te ṭhassāma, tvaṃ pana ito paṭṭhāya amhākaṃ ovādānusāsaniṃ dadeyyāsī’’ti. Tato paṭṭhāya tittiro tesaṃ ovādaṃ adāsi, sīlesu patiṭṭhāpesi, sayampi sīlāni samādiyi. Te tayopi janā pañcasu sīlesu patiṭṭhāya aññamaññaṃ sagāravā sappatissā sabhāgavuttino hutvā jīvitapariyosāne devalokaparāyaṇā ahesuṃ. Tesaṃ tiṇṇaṃ samādānaṃ tittiriyaṃ brahmacariyaṃ nāma ahosi. Als dies gesagt war, sprachen der Affe und der Elefant zu dem weisen Rebhuhn: „Freund, du bist älter als wir. Von heute an werden wir dir Ehre, Respekt, Verehrung, Huldigung und Ehrerbietung erweisen sowie Gruß, Aufstehen vom Sitz, das Falten der Hände und ehrerbietige Dienste leisten. Wir werden nach deinem Rat leben. Du aber sollst uns von heute an Rat und Unterweisung erteilen.“ Von da an gab das Rebhuhn ihnen Unterweisung und festigte sie in den Tugendregeln, während es selbst auch die Tugendregeln auf sich nahm. Diese drei Wesen festigten sich in den fünf Tugendregeln, lebten mit gegenseitigem Respekt und Ehrerbietung in einer harmonischen Weise und gingen am Ende ihres Lebens in die Götterwelt ein. Das Verhalten dieser drei wurde als „das heilige Leben des Rebhuhns“ bekannt. Te hi nāma, bhikkhave, tiracchānagatā aññamaññaṃ sagāravā sappatissā vihariṃsu, tumhe evaṃ svākhāte dhammavinaye pabbajitvā kasmā aññamaññaṃ agāravā apatissā viharatha. Anujānāmi, bhikkhave, ito paṭṭhāya tumhākaṃ yathāvuḍḍhaṃ abhivādanaṃ paccuṭṭhānaṃ añjalikammaṃ sāmīcikammaṃ, yathāvuḍḍhaṃ aggāsanaṃ aggodakaṃ aggapiṇḍaṃ, na ito paṭṭhāya ca navakatarena vuḍḍhataro [Pg.236] senāsanena paṭibāhitabbo, yo paṭibāheyya, āpattidukkaṭassāti evaṃ satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – „Wenn schon jene Tiere, ihr Mönche, mit gegenseitigem Respekt und Ehrerbietung lebten, warum lebt ihr, die ihr in dieser so wohlverkündeten Lehre und Disziplin aus dem Hausleben ausgetreten seid, ohne gegenseitigen Respekt und Ehrerbietung? Ich erlaube, ihr Mönche, von heute an, dass ihr euch dem Dienstalter entsprechend Ehrerbietung, Aufstehen vom Sitz, das Falten der Hände und ehrerbietiges Verhalten erweist, sowie dem Dienstalter entsprechend den besten Sitzplatz, das beste Wasser und die beste Speise erhaltet. Und von heute an darf ein älterer Mönch von einem jüngeren Mönch nicht von seinem Schlaf- und Sitzplatz vertrieben werden. Wer ihn vertreibt, begeht ein Vergehen des Fehlverhaltens.“ Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diese Strophe: 37. 37. ‘‘Ye vuḍḍhamapacāyanti, narā dhammassa kovidā; Diṭṭheva dhamme pāsaṃsā, samparāye ca suggatī’’ti. „Die Menschen, die die Älteren ehren und in der Lehre wohlbewandert sind, sind schon in diesem gegenwärtigen Leben lobenswert und erlangen in der zukünftigen Welt eine glückliche Wiedergeburt.“ Tattha ye vuḍḍhamapacāyantīti jātivuḍḍho, vayovuḍḍho, guṇavuḍḍhoti tayo vuḍḍhā. Tesu jātisampanno jātivuḍḍho nāma, vaye ṭhito vayovuḍḍho nāma, guṇasampanno guṇavuḍḍho nāma. Tesu guṇasampanno vayovuḍḍho imasmiṃ ṭhāne ‘‘vuḍḍho’’ti adhippeto. Apacāyantīti jeṭṭhāpacāyikakammena pūjenti. Dhammassa kovidāti jeṭṭhāpacāyanadhammassa kovidā kusalā. Diṭṭheva dhammeti imasmiṃyeva attabhāve. Pāsaṃsāti pasaṃsārahā. Samparāye ca suggatīti samparetabbe imaṃ lokaṃ hitvā gantabbe paralokepi tesaṃ sugatiyeva hotīti. Ayaṃ panettha piṇḍattho – bhikkhave, khattiyā vā hontu brāhmaṇā vā vessā vā suddā vā gahaṭṭhā vā pabbajitā vā tiracchānagatā vā, ye keci sattā jeṭṭhāpacitikamme chekā kusalā guṇasampannānaṃ vayovuḍḍhānaṃ apacitiṃ karonti, te imasmiñca attabhāve jeṭṭhāpacitikārakāti pasaṃsaṃ vaṇṇanaṃ thomanaṃ labhanti, kāyassa ca bhedā sagge nibbattantīti. Hierbei bezieht sich der Ausdruck „ye vuḍḍhamapacāyanti“ auf die drei Arten von Älteren: jātivuḍḍha (älter durch Geburt), vayovuḍḍha (älter durch Alter) und guṇavuḍḍha (älter durch Tugend). Unter diesen wird jemand, der von edler Herkunft ist, als „älter durch Geburt“ bezeichnet; jemand, der im fortgeschrittenen Alter steht, als „älter durch Alter“; und jemand, der reich an guten Eigenschaften ist, als „älter durch Tugend“. Unter diesen ist an dieser Stelle mit „Älterer“ (vuḍḍha) der tugendhafte Bejahrte gemeint. Das Wort „apacāyanti“ bedeutet: Sie verehren durch die Handlung, den Älteren Respekt zu erweisen. „Dhammassa kovidā“ bedeutet: Erfahren und kundig in der Praxis des Respekts vor den Älteren. „Diṭṭheva dhamme“ bedeutet: In eben diesem gegenwärtigen Dasein. „Pāsaṃsā“ bedeutet: Lobenswert. „Samparāye ca suggatī“ bedeutet: Auch in der jenseitigen Welt, die nach dem Verlassen dieser Welt zu betreten ist, ist ihr Ziel wahrlich eine glückliche Wiedergeburt. Dies ist hierbei der zusammenfassende Sinn: Ihr Mönche, seien sie Könige, Brahmanen, Händler, Arbeiter, Hausleute, Ordinierte oder sogar Tiere – welche Wesen auch immer geschickt und kundig darin sind, den Älteren Respekt zu erweisen, und den an Tugend reichen Bejahrten Ehrerbietung erweisen, diese erlangen in eben diesem Dasein Lob, Anerkennung und Preisung als jene, die den Älteren Respekt erweisen, und werden nach dem Zerfall des Körpers in der Himmelswelt wiedergeboren. Evaṃ satthā jeṭṭhāpacitikammassa guṇaṃ kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā hatthināgo moggallāno ahosi, makkaṭo sāriputto, tittirapaṇḍito pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister so den Segen der Respekterweisung gegenüber den Älteren dargelegt hatte, stellte er die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der edle Elefant Moggallāna, der Affe war Sāriputta, aber das weise Rebhuhn war ich selbst.“ Tittirajātakavaṇṇanā sattamā. Die siebte Erklärung des Tittira-Jātaka.
[38] 8. Bakajātakavaṇṇanā [38] 8. Die Erklärung des Baka-Jātaka. Nāccantaṃ [Pg.237] nikatippaññoti idaṃ satthā jetavane viharanto cīvaravaḍḍhakaṃ bhikkhu ārabbha kathesi. Eko kira jetavanavāsiko bhikkhu yaṃkiñci cīvare kattabbaṃ chedanaghaṭṭanavicāraṇasibbanādikaṃ kammaṃ, tattha sukusalo. So tāya kusalatāya cīvaraṃ vaḍḍheti, tasmā ‘‘cīvaravaḍḍhako’’ tveva paññāyittha. Kiṃ panesa karotīti? Jiṇṇapilotikāsu hatthakammaṃ dassetvā suphassikaṃ manāpaṃ cīvaraṃ katvā rajanapariyosāne piṭṭhodakena rajitvā saṅkhena ghaṃsitvā ujjalaṃ manuññaṃ katvā nikkhipati. Cīvarakammaṃ kātuṃ ajānantā bhikkhū ahate sāṭake gahetvā tassa santikaṃ āgantvā ‘‘mayaṃ cīvaraṃ kātuṃ na jānāma, cīvaraṃ no katvā dethā’’ti vadanti. So ‘‘cīvaraṃ āvuso kariyamānaṃ cirena niṭṭhāti, mayā katacīvarameva atthi, ime sāṭake ṭhapetvā taṃ gaṇhitvā gacchathā’’ti nīharitvā dasseti. Te tassa vaṇṇasampattimeva disvā antaraṃ ajānantā ‘‘thira’’nti saññāya ahatasāṭake cīvaravaḍḍhakassa datvā taṃ gaṇhitvā gacchanti. Taṃ tehi thokaṃ kiliṭṭhakāle uṇhodakena dhoviyamānaṃ attano pakatiṃ dasseti, tattha tattha jiṇṇaṭṭhānaṃ paññāyati, te vippaṭisārino honti. Evaṃ āgatāgate pilotikāhi vañcento so bhikkhu sabbattha pākaṭo jāto. „Nicht bis zum Äußersten reicht die Klugheit des Betrügers“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen Mönch, der Roben gewinnbringend eintauschte. Es heißt, ein im Jetavana lebender Mönch war überaus geschickt in jeglicher Arbeit, die an Roben zu tun war, wie dem Zuschneiden, Zusammenfügen, Ausbessern, Nähen und dergleichen. Durch diese seine Geschicklichkeit vermehrte er seine Roben; daher war er nur als der „Roben-Vermehrer“ bekannt. Was tat er nun eigentlich? Er wandte seine Handwerkskunst an alten Lumpen an, fertigte daraus eine weiche, ansprechende Robe an, färbte sie nach dem Färbevorgang mit Mehlkleister, polierte sie mit einer Muschel, machte sie glänzend sowie gefällig und legte sie bereit. Mönche, die sich auf das Herstellen von Roben nicht verstanden, brachten neue, ungewaschene Stoffbahnen mit, kamen zu ihm und sagten: „Lieber Bruder, wir wissen nicht, wie man eine Robe anfertigt. Bitte fertigt eine Robe für uns an und gebt sie uns.“ Er holte eine Robe hervor, zeigte sie ihnen und sagte: „Brüder, wenn eine Robe erst angefertigt werden muss, dauert das lange. Ich habe bereits eine fertige Robe hier. Lasst diese Stoffbahnen hier, nehmt diese fertige Robe und geht.“ Sie sahen nur deren prächtige Farbe, erkannten das Innere nicht und gaben dem Roben-Vermehrer im Glauben, sie sei haltbar, die neuen Stoffbahnen, nahmen jene Robe und gingen fort. Wenn diese nach kurzer Zeit etwas schmutzig geworden war und sie sie mit heißem Wasser wuschen, offenbarte sie ihre wahre Beschaffenheit; überall kamen die morsch gewordenen Stellen zum Vorschein, und jene Mönche bereuten es bitter. Da er auf diese Weise alle Ankömmlinge mit Lumpenroben betrog, wurde dieser Mönch überall berüchtigt. Yathā cesa jetavane, tathā aññatarasmiṃ gāmakepi eko cīvaravaḍḍhako lokaṃ vañceti. Tassa sambhattā bhikkhū ‘‘bhante, jetavane kira eko cīvaravaḍḍhako evaṃ lokaṃ vañcetī’’ti ārocesuṃ. Athassa etadahosi ‘‘handāhaṃ, taṃ nagaravāsikaṃ vañcemī’’ti pilotikacīvaraṃ atimanāpaṃ katvā surattaṃ rajitvā taṃ pārupitvā jetavanaṃ agamāsi. Itaro taṃ disvāva lobhaṃ uppādetvā ‘‘bhante, imaṃ cīvaraṃ tumhehi kata’’nti pucchi. ‘‘Āmāvuso’’ti. ‘‘Bhante, imaṃ cīvaraṃ mayhaṃ detha, tumhe aññaṃ labhissathā’’ti? ‘‘Āvuso, mayaṃ gāmavāsikā dullabhapaccayā, imāhaṃ tuyhaṃ datvā attanā kiṃ pārupissāmī’’ti? ‘‘Bhante, mama santike ahatasāṭakā atthi, te gahetvā tumhākaṃ cīvaraṃ karothā’’ti. ‘‘Āvuso, mayā ettha hatthakammaṃ dassitaṃ, tayi pana evaṃ vadante kiṃ sakkā kātuṃ, gaṇhāhi na’’nti tassa pilotikacīvaraṃ datvā ahatasāṭake ādāya taṃ vañcetvā pakkāmi. Jetavanavāsikopi [Pg.238] taṃ cīvaraṃ pārupitvā katipāhaccayena uṇhodakena dhovanto jiṇṇapilotikabhāvaṃ disvā lajjito ‘‘gāmavāsicīvaravaḍḍhakena kira jetavanavāsiko vañcito’’ti tassa vañcitabhāvo saṅghamajjhe pākaṭo jāto. Genau wie dieser Mönch im Jetavana, so betrog auch in einem bestimmten Dorf ein anderer Roben-Vermehrer die Mitbrüder. Befreundete Mönche berichteten ihm: „Ehrwürdiger Herr, es heißt, im Jetavana betrügt ein gewisser Roben-Vermehrer auf diese Weise die Mitbrüder.“ Da dachte er bei sich: „Wohlan, ich werde diesen Stadtbewohner betrügen!“ Er machte eine Lumpenrobe überaus ansprechend, färbte sie wunderschön rot, legte sie an und ging zum Jetavana. Als der andere ihn erblickte, stieg sogleich Begehren in ihm auf, und er fragte: „Ehrwürdiger Herr, habt Ihr diese Robe selbst angefertigt?“ – „Ja, lieber Bruder“, antwortete er. „Ehrwürdiger Herr, gebt mir diese Robe, Ihr werdet eine andere bekommen.“ – „Bruder, wir Dorfbewohner erhalten nur schwerlich Gaben. Wenn ich dir diese gebe, womit soll ich mich selbst bekleiden?“ – „Ehrwürdiger Herr, ich habe neue Stoffbahnen bei mir. Nehmt diese und fertigt daraus eine Robe für Euch an.“ – „Bruder, ich habe hierin meine Handwerkskunst bewiesen. Doch wenn du so bittest, was soll ich tun? Nimm sie nur.“ Er gab ihm die Lumpenrobe, nahm die neuen Stoffbahnen an sich, betrog ihn und ging fort. Auch der im Jetavana lebende Mönch legte diese Robe an. Als er sie nach wenigen Tagen mit heißem Wasser wusch und erkannte, dass es sich um eine alte Lumpenrobe handelte, schämte er sich. Die Tatsache, dass der im Jetavana Lebende von dem dörflichen Roben-Vermehrer betrogen worden war, wurde inmitten der Ordensgemeinschaft bekannt. Athekadivasaṃ bhikkhū dhammasabhāyaṃ taṃ kathaṃ kathentā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. Te tamatthaṃ ārocesuṃ. Satthā ‘‘na, bhikkhave, jetavanavāsī cīvaravaḍḍhako idāneva aññe vañceti, pubbepi vañcesiyeva. Na gāmavāsikenāpi idāneva esa jetavanavāsī cīvaravaḍḍhako vañcito, pubbepi vañcitoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Eines Tages saßen die Mönche in der Lehrhalle und sprachen über dieses Thema. Der Meister kam herzu und fragte: „Mönche, worüber sprecht ihr gerade, während ihr hier zusammensitzt?“ Sie berichteten ihm den Sachverhalt. Da sprach der Meister: „Mönche, nicht erst jetzt betrügt der im Jetavana lebende Roben-Vermehrer andere; schon in der Vergangenheit hat er betrogen. Und auch dieser im Jetavana lebende Roben-Vermehrer wurde nicht erst jetzt von dem dörflichen Mönch betrogen; schon in der Vergangenheit wurde er von ihm betrogen.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte ekasmiṃ araññāyatane bodhisatto aññataraṃ padumasaraṃ nissāya ṭhite varaṇarukkhe rukkhadevatā hutvā nibbatti. Tadā aññatarasmiṃ nātimahante sare nidāghasamaye udakaṃ mandaṃ ahosi, bahū cettha macchā honti. Atheko bako te macche disvā ‘‘ekena upāyena ime macche vañcetvā khādissāmī’’ti gantvā udakapariyante cintento nisīdi. Atha naṃ macchā disvā ‘‘kiṃ, ayya, cintento nisinnosī’’ti pucchiṃsu. ‘‘Tumhākaṃ cintento nisinnomhī’’ti. ‘‘Kiṃ amhākaṃ cintesi, ayyā’’ti? ‘‘‘Imasmiṃ sare udakaṃ parittaṃ, gocaro mando, nidāgho ca mahanto, idānime macchā kiṃ nāma karissantī’ti tumhākaṃ cintento nisinnomhī’’ti. ‘‘Atha kiṃ karoma, ayyā’’ti? ‘‘Tumhe sace mayhaṃ vacanaṃ kareyyātha, ahaṃ vo ekekaṃ mukhatuṇḍakena gahetvā ekaṃ pañcavaṇṇapadumasañchannaṃ mahāsaraṃ netvā vissajjeyya’’nti. ‘‘Ayya, paṭhamakappikato paṭṭhāya macchānaṃ cintanakabako nāma natthi, tvaṃ amhesu ekekaṃ khāditukāmosī’’ti. ‘‘Nāhaṃ tumhe mayhaṃ saddahante khādissāmi’’. ‘‘Sace pana sarassa atthibhāvaṃ mayhaṃ na saddahatha, ekaṃ macchaṃ mayā saddhiṃ saraṃ passituṃ pesethā’’ti. Macchā tassa saddahitvā ‘‘ayaṃ jalepi thalepi samattho’’ti ekaṃ kāḷamahāmacchaṃ adaṃsu ‘‘imaṃ gahetvā gacchathā’’ti. So taṃ gahetvā netvā sare vissajjetvā sabbaṃ saraṃ dassetvā puna ānetvā tesaṃ macchānaṃ santike vissajjesi. So tesaṃ macchānaṃ sarassa sampattiṃ vaṇṇesi. Te [Pg.239] tassa kathaṃ sutvā gantukāmā hutvā ‘‘sādhu, ayya, amhe gaṇhitvā gacchāhī’’ti āhaṃsu. In der Vergangenheit, als der Bodhisatta in einem bestimmten Waldgebiet als Baumgottheit auf einem dort stehenden Varana-Baum nahe einem Lotusteich wiedergeboren worden war, wurde das Wasser in einem anderen, nicht allzu großen Teich zur Sommerzeit knapp, und es gab darin viele Fische. Da sah ein Reiher diese Fische und dachte: ‚Mit einer List will ich diese Fische täuschen und fressen.‘ Er ging hin, setzte sich am Wasserrand nieder und tat so, als ob er nachdächte. Da sahen ihn die Fische und fragten: ‚Herr, worüber nachdenkend sitzt du da?‘ Er antwortete: ‚Ich sitze hier und mache mir Sorgen um euch.‘ – ‚Was besorgt dich wegen uns, Herr?‘ – ‚In diesem Teich ist das Wasser gering, die Nahrung ist knapp und die Sommerhitze ist groß. Was werden diese Fische nun tun? Darauf bedacht sitze ich hier.‘ – ‚Was sollen wir da tun, Herr?‘ – ‚Wenn ihr auf mein Wort hören wollt, werde ich euch einen nach dem anderen mit meinem Schnabel aufnehmen, zu einem großen, mit fünfartigen Lotusblumen bedeckten Teich bringen und dort freilassen.‘ Da sagten die Fische: ‚Herr, seit dem Anfang des Weltzeitalters gibt es keinen Reiher, der das Wohl von Fischen im Sinn hat. Du willst uns doch nur einen nach dem anderen fressen!‘ Er entgegnete: ‚Ich werde euch nicht fressen, wenn ihr mir vertraut. Wenn ihr mir aber bezüglich der Existenz des Teiches nicht glaubt, dann schickt einen Fisch mit mir, um den Teich zu sehen.‘ Die Fische glaubten ihm und sagten: ‚Dieser Wels ist sowohl im Wasser als auch an Land geschickt‘, und gaben ihm einen großen schwarzen Wels mit den Worten: ‚Nimm diesen mit und geh.‘ Er nahm ihn mit, ließ ihn im Teich frei, zeigte ihm den ganzen Teich, brachte ihn wieder zurück und entließ ihn bei den anderen Fischen. Dieser rühmte vor den Fischen den Reichtum des Teiches. Als sie seine Worte hörten, bekamen sie Lust zu gehen und sagten: ‚Es ist gut, Herr, nimm uns mit und geh!‘ Bako paṭhamaṃ taṃ kāḷamahāmacchameva gahetvā saratīraṃ netvā saraṃ dassetvā saratīre jāte varaṇarukkhe nilīyitvā taṃ viṭapantare pakkhipitvā tuṇḍena vijjhanto jīvitakkhayaṃ pāpetvā maṃsaṃ khāditvā kaṇṭake rukkhamūle pātetvā puna gantvā ‘‘vissaṭṭho, me so maccho, añño āgacchatū’’ti etenupāyena ekekaṃ gahetvā sabbe macche khāditvā puna āgato ekaṃ macchampi nāddasa. Eko panettha kakkaṭako avasiṭṭho. Bako tampi khāditukāmo hutvā ‘‘bho, kakkaṭaka, mayā sabbete macchā netvā padumasañchanne mahāsare vissajjitā, ehi tampi nessāmī’’ti. ‘‘Maṃ gahetvā gacchanto kathaṃ gaṇhissasī’’ti? ‘‘Ḍaṃsitvā gaṇhissāmī’’ti. ‘‘Tvaṃ evaṃ gahetvā gacchanto maṃ pātessasi, nāhaṃ tayā saddhiṃ gamissāmī’’ti. ‘‘Mā bhāyi, ahaṃ taṃ suggahitaṃ gahetvā gamissāmī’’ti. Kakkaṭako cintesi ‘‘imassa macche netvā sare vissajjanaṃ nāma natthi. Sace pana maṃ sare vissajjessati, iccetaṃ kusalaṃ. No ce vissajjessati, gīvamassa chinditvā jīvitaṃ harissāmī’’ti. Der Reiher nahm zuerst ebendiesen großen schwarzen Wels, brachte ihn an das Ufer des Teiches, zeigte ihm den Teich, ließ sich dann aber auf einem am Ufer wachsenden Varana-Baum nieder, legte ihn in eine Astgabel, hackte ihn mit dem Schnabel tot, fraß sein Fleisch, ließ die Gräten am Fuße des Baumes herabfallen, ging wieder zurück und rief: ‚Jener Fisch ist von mir freigelassen worden, der nächste soll kommen!‘ Mit dieser List nahm er einen nach dem anderen mit, fraß alle Fische auf, und als er wieder dorthin kam, sah er keinen einzigen Fisch mehr. Es war jedoch noch eine Krabbe übriggeblieben. Da der Reiher auch diese fressen wollte, sagte er: ‚He, Krabbe, ich habe all diese Fische weggeschafft und in dem großen, von Lotus bedeckten Teich freigelassen. Komm, ich werde auch dich dorthin bringen.‘ Sie fragte: ‚Wenn du mich mitnimmst, wie wirst du mich halten?‘ – ‚Ich werde dich mit dem Schnabel packen.‘ – ‚Wenn du mich so transportierst, wirst du mich fallen lassen. Ich werde nicht mit dir gehen.‘ – ‚Fürchte dich nicht, ich werde dich sicher festhalten und davontragen.‘ Die Krabbe dachte: ‚Dass dieser die Fische weggeschafft und im Teich freigelassen hat, gibt es gewiss nicht. Wenn er mich aber tatsächlich im Teich freilässt, ist das gut. Wenn er mich nicht freilässt, werde ich ihm den Hals durchschneiden und ihm das Leben nehmen.‘ Atha naṃ evamāha ‘‘samma baka, na kho tvaṃ suggahitaṃ gahetuṃ sakkhissasi, amhākaṃ pana gahaṇaṃ suggahaṇaṃ, sacāhaṃ aḷehi tava gīvaṃ gahetuṃ labhissāmi, tava gīvaṃ suggahitaṃ katvā tayā saddhiṃ gamissāmī’’ti. So taṃ ‘‘vañcetukāmo esa ma’’nti ajānanto ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchi. Kakkaṭako attano aḷehi kammārasaṇḍāsena viya tassa gīvaṃ suggahitaṃ katvā ‘‘idāni gacchā’’ti āha. So taṃ netvā saraṃ dassetvā varaṇarukkhābhimukho pāyāsi. Kakkaṭako āha ‘‘mātula, ayaṃ saro etto, tvaṃ pana ito kiṃ nesī’’ti? Bako ‘‘na te mātulo ahaṃ, na bhaginiputtosi vata me tva’’nti vatvā ‘‘tvaṃ ‘esa maṃ ukkhipitvā vicaranto mayhaṃ dāso’ti saññaṃ karosi maññe, passetaṃ varaṇarukkhassa mūle kaṇṭakarāsiṃ, yathā me te sabbe macchā khāditā, tampi tatheva khādissāmī’’ti āha. Kakkaṭako ‘‘ete macchā attano bālatāya tayā khāditā, ahaṃ pana te maṃ khādituṃ na dassāmi, taññeva pana vināsaṃ pāpessāmi. Tvañhi [Pg.240] bālatāya mayā vañcitabhāvaṃ na jānāsi, marantā ubhopi marissāma, ahaṃ te sīsaṃ chinditvā bhūmiyaṃ khipissāmī’’ti vatvā kammārasaṇḍāsena viya aḷehi tassa gīvaṃ nippīḷesi. So vivaṭena mukhena akkhīhi assunā paggharantena maraṇabhayatajjito ‘‘sāmi, ahaṃ taṃ na khādissāmi, jīvitaṃ me dehī’’ti āha. ‘‘Yadi evaṃ otaritvā maṃ sarasmiṃ vissajjehī’’ti. So nivattitvā sarameva otaritvā kakkaṭakaṃ sarapariyante paṅkapiṭṭhe ṭhapesi, kakkaṭako kattarikāya kumudanāḷaṃ kappento viya tassa gīvaṃ kappetvā udakaṃ pāvisi. Da sprach sie zu ihm: ‚Freund Reiher, du wirst mich gewiss nicht sicher festhalten können. Unser Griff jedoch ist ein sicherer Griff. Wenn ich deinen Hals mit meinen Scheren packen darf, werde ich deinen Hals fest im Griff halten und mit dir gehen.‘ Er stimmte zu: ‚Gut so‘, da er nicht erkannte: ‚Diese will mich betrügen.‘ Die Krabbe umschloss mit ihren Scheren seinen Hals wie mit einer Schmiedezange und sagte: ‚Jetzt flieg los!‘ Er trug sie davon, zeigte ihr den Teich und hielt dann direkt auf den Varana-Baum zu. Da sagte die Krabbe: ‚Onkel, der Teich ist dort drüben. Warum aber bringst du mich hierher?‘ Der Reiher erwiderte: ‚Ich bin nicht dein Onkel, und du bist wahrlich nicht der Sohn meiner Schwester!‘ Und er fuhr fort: ‚Du dachtest wohl: «Dieser trägt mich herum, er ist mein Diener»? Sieh dir diesen Haufen Fischgräten am Fuße des Varana-Baumes an! So wie ich all jene Fische gefressen habe, so werde ich auch dich fressen.‘ Die Krabbe entgegnete: ‚Jene Fische wurden von dir wegen ihrer eigenen Dummheit gefressen. Ich aber werde nicht zulassen, dass du mich frisst. Vielmehr werde ich dich selbst vernichten! Wahrlich, in deiner Dummheit erkennst du nicht, dass du von mir überlistet wurdest. Wenn wir sterben, werden wir beide sterben. Ich werde dir den Kopf abschneiden und ihn auf den Boden werfen!‘ Nach diesen Worten drückte sie seinen Hals mit ihren Scheren zusammen, wie mit einer Schmiedezange. Mit weit geöffnetem Schnabel, Tränen in den Augen und von Todesfurcht gepeinigt flehte er: ‚Herr, ich werde dich nicht fressen, schenke mir mein Leben!‘ – ‚Wenn dem so ist, dann flieg hinab und lass mich im Teich frei!‘ Er drehte um, flog direkt zum Teich hinab und setzte die Krabbe am Ufer des Teiches auf den Schlamm. Da durchschnitt die Krabbe seinen Hals, wie man einen Lotusstängel mit einer Schere durchschneidet, und glitt ins Wasser. Taṃ acchariyaṃ disvā varaṇarukkhe adhivatthā devatā sādhukāraṃ dadamānā vanaṃ unnādayamānā madhurassarena imaṃ gāthamāha – Als die auf dem Varana-Baum wohnende Gottheit dieses Wunder sah, rief sie Beifall aus, ließ den Wald widerhallen und sprach mit süßer Stimme diese Strophe: 38. 38. ‘‘Nāccantaṃ nikatippañño, nikatyā sukhamedhati; Ārādheti nikatippañño, bako kakkaṭakāmivā’’ti. „Nicht für immer erlangt der durch Betrug Kluge Glück durch seine Arglist; der arglistige Betrüger erntet sein Verderben, wie der Reiher durch die Krabbe.“ Tattha nāccantaṃ nikatippañño, nikatyā sukhamedhatīti nikati vuccati vañcanā, nikatippañño vañcanapañño puggalo tāya nikatyā nikatiyā vañcanāya na accantaṃ sukhamedhati, niccakāle sukhasmiṃyeva patiṭṭhātuṃ na sakkoti, ekaṃsena pana vināsaṃ pāpuṇātiyevāti attho. Ārādhetīti paṭilabhati. Nikatippaññoti kerāṭikabhāvaṃ sikkhitapañño pāpapuggalo attanā katassa pāpassa phalaṃ ārādheti paṭilabhati vindatīti attho. Kathaṃ? Bako kakkaṭakāmiva, yathā bako kakkaṭakā gīvacchedaṃ pāpuṇāti, evaṃ pāpapuggalo attanā katapāpato diṭṭhadhamme vā samparāye vā bhayaṃ ārādheti paṭilabhatīti imamatthaṃ pakāsento mahāsatto vanaṃ unnādento dhammaṃ desesi. Darin bedeutet die Passage „nāccantaṃ nikatippañño, nikatyā sukhamedhati“: Als „nikati“ wird Betrug bezeichnet. Ein „nikatippañño“ ist eine Person mit betrügerischem Verstand. Durch diesen Betrug, diese Täuschung, erlangt sie kein dauerhaftes Glück; sie ist nicht in der Lage, für immer im reinen Glück gegründet zu sein, sondern geht unweigerlich dem Verderben entgegen. Dies ist die Bedeutung. „Ārādheti“ bedeutet erlangen. „Nikatippañño“ bezeichnet einen bösen Menschen, dessen Verstand in Hinterlist geschult ist; er erlangt, erhält und erfährt die Frucht der von ihm selbst begangenen bösen Tat. Dies ist die Bedeutung. Wie? „Bako kakkaṭakāmiva“ (Wie der Reiher von der Krabbe): So wie der Reiher von der Krabbe die Enthauptung erleidet, ebenso erlangt und erfährt der böse Mensch aufgrund seiner eigenen bösen Tat entweder in diesem Leben oder in der zukünftigen Existenz Gefahr. Indem das Große Wesen diese Bedeutung verkündete und den Wald erschallen ließ, predigte es die Lehre. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idāneva gāmavāsicīvaravaḍḍhakenesa vañcito, atītepi vañcitoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā so bako jetavanavāsī cīvaravaḍḍhako ahosi, kakkaṭako gāmavāsī cīvaravaḍḍhako, rukkhadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor mit den Worten: „Mönche, nicht erst jetzt wurde dieser im Jetavana-Kloster lebende Gewänderschneider von dem im Dorf lebenden Gewänderschneider betrogen; auch in der Vergangenheit wurde er schon von ihm betrogen.“ Er stellte die Verknüpfung her und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war jener Reiher der im Jetavana-Kloster lebende Gewänderschneider, die Krabbe war der im Dorf lebenden Gewänderschneider, die Baumgottheit aber war ich selbst.“ Bakajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Baka-Jātaka ist die achte.
[39] 9. Nandajātakavaṇṇanā [39] 9. Die Erklärung des Nanda-Jātaka Maññe [Pg.241] sovaṇṇayo rāsīti idaṃ satthā jetavane viharanto sāriputtattherassa saddhivihārikaṃ ārabbha kathesi. So kira bhikkhu subbaco ahosi vacanakkhamo, therassa mahantenussāhena upakāraṃ karoti. Athekaṃ samayaṃ thero satthāraṃ āpucchitvā cārikaṃ caranto dakkhiṇāgirijanapadaṃ agamāsi. So bhikkhu tattha gatakāle mānatthaddho hutvā therassa vacanaṃ na karoti ‘‘āvuso, idaṃ nāma karohī’’ti vutte pana therassa paṭipakkho hoti. Thero tassa āsayaṃ na jānāti. So tattha cārikaṃ caritvā puna jetavanaṃ āgato. So bhikkhu therassa jetavanavihāraṃ āgatakālato paṭṭhāya puna tādisova jāto. Thero tathāgatassa ārocesi ‘‘bhante, mayhaṃ eko saddhivihāriko ekasmiṃ ṭhāne satena kītadāso viya hoti, ekasmiṃ ṭhāne mānatthaddho hutvā ‘idaṃ nāma karohī’ti vutte paṭipakkho hotī’’ti. Satthā ‘‘nāyaṃ, sāriputta, bhikkhu idāneva evaṃsīlo, pubbepesa ekaṃ ṭhānaṃ gato satena kītadāso viya hoti. Ekaṃ ṭhānaṃ gato paṭipakkho paṭisattu hotī’’ti vatvā therena yācito atītaṃ āhari. „Maññe sovaṇṇayo rāsī“ – diese Lehrverkündigung hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen Schüler, der bei dem Ehrwürdigen Sāriputta wohnte. Jener Mönch war angeblich folgsam und ertrug Ermahnungen geduldig; er leistete dem Thera mit großem Eifer Dienste. Einmal bat der Thera den Meister um Erlaubnis und begab sich auf eine Wanderung in das Land Dakkhiṇāgiri. Als jener Mönch dorthin gelangte, wurde er stolz und eigensinnig und befolgte die Worte des Thera nicht mehr. Wenn der Thera sagte: „Freund, tu dies und jenes“, stellte er sich ihm entgegen. Der Thera verstand seine Gesinnung nicht. Nachdem der Thera dort umhergewandert war, kehrte er wieder zum Jetavana-Kloster zurück. Von dem Zeitpunkt an, als der Thera zum Jetavana-Kloster zurückkehrte, wurde jener Mönch wieder so folgsam wie zuvor. Der Thera berichtete dem Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, ein bei mir wohnender Schüler ist an einem Ort wie ein für hundert Münzen gekaufter Sklave, an einem anderen Ort aber wird er stolz und eigensinnig, und wenn man ihm sagt: ‚Tu dies und jenes‘, stellt er sich gegen einen.“ Der Meister sprach: „Sāriputta, dieser Mönch verhält sich nicht erst jetzt so; auch in der Vergangenheit war er an einem Ort wie ein für hundert Münzen gekaufter Sklave, und an einem anderen Ort wurde er zu einem Widersacher und Feind.“ Auf Bitten des Thera erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto ekasmiṃ kuṭumbiyakule paṭisandhiṃ gaṇhi. Tasseko sahāyako kuṭumbiko sayaṃ mahallako, bhariyā panassa taruṇī. Sā taṃ nissāya puttaṃ paṭilabhi. So cintesi ‘‘ayaṃ itthī taruṇattā mamaccayena kañcideva purisaṃ gahetvā imaṃ dhanaṃ vināseyya, puttassa me na dadeyya, yaṃnūnāhaṃ imaṃ dhanaṃ pathavigataṃ kareyya’’nti ghare nandaṃ nāma dāsaṃ gahetvā araññaṃ gantvā ekasmiṃ ṭhāne taṃ dhanaṃ nidahitvā tassa ācikkhitvā ‘‘tāta, nanda, imaṃ dhanaṃ mamaccayena mayhaṃ puttassa ācikkheyyāsi, mā ca naṃ pariccajasī’’ti ovaditvā kālamakāsi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta in einer Hausvaterfamilie Wiedergeburt. Er hatte einen befreundeten Hausvater, der selbst schon alt war, dessen Ehefrau jedoch jung war. Von diesem empfing sie einen Sohn. Der alte Hausvater dachte: „Da diese Frau jung ist, könnte sie nach meinem Ableben irgendeinen anderen Mann nehmen, dieses Vermögen verschwenden und es meinem Sohn vorenthalten. Wie wäre es, wenn ich dieses Vermögen in der Erde vergrübe?“ Er nahm einen Sklaven namens Nanda aus seinem Haus, ging in den Wald, vergrub das Vermögen an einer Stelle, zeigte es ihm und wies ihn an: „Mein lieber Nanda, nach meinem Ableben sollst du dieses Vermögen meinem Sohn zeigen, und verlass ihn nicht!“ Nach dieser Ermahnung verstarb er. Puttopissa anukkamena vayappatto jāto. Atha naṃ mātā āha – ‘‘tāta, tava pitā nandaṃ dāsaṃ gahetvā dhanaṃ nidhesi, taṃ āharāpetvā kuṭumbaṃ saṇṭhapehī’’ti. So ekadivasaṃ nandaṃ āha – ‘‘mātula, atthi kiñci mayhaṃ pitarā dhanaṃ nidahita’’nti. ‘‘Āma, sāmī’’ti. ‘‘Kuhiṃ [Pg.242] taṃ nidahita’’nti. ‘‘Araññe, sāmī’’ti. ‘‘Tena hi gacchāmā’’ti kuddālapiṭakaṃ ādāya nidhiṭṭhānaṃ gantvā ‘‘kahaṃ mātula, dhana’’nti āha. Nando āruyha dhanamatthake ṭhatvā dhanaṃ nissāya mānaṃ uppādetvā ‘‘are dāsiputta ceṭaka, kuto te imasmiṃ ṭhāne dhana’’nti kumāraṃ akkosati. Kumāro tassa pharusavacanaṃ sutvā asuṇanto viya ‘‘tena hi gacchāmā’’ti taṃ gahetvā paṭinivattitvā puna dve tayo divase atikkamitvā agamāsi, nando tatheva akkosati. Kumāro tena saddhiṃ pharusavacanaṃ avatvāva nivattitvā ‘‘ayaṃ dāso ito paṭṭhāya ‘dhanaṃ ācikkhissāmī’ti gacchati, gantvā pana maṃ akkosati, tattha kāraṇaṃ na jānāmi, atthi kho pana me pitu sahāyo kuṭumbiko, taṃ paṭipucchitvā jānissāmī’’ti bodhisattassa santikaṃ gantvā sabbaṃ taṃ pavattiṃ ārocetvā ‘‘kiṃ nu kho, tāta, kāraṇa’’nti pucchi. Auch sein Sohn wuchs allmählich heran und erreichte das Erwachsenenalter. Da sprach seine Mutter zu ihm: „Mein lieber Sohn, dein Vater hat zusammen mit dem Sklaven Nanda einen Schatz vergraben. Lass diesen holen und richte unseren Haushalt ein.“ Eines Tages sagte er zu Nanda: „Onkel, gibt es irgendeinen Schatz, den mein Vater vergraben hat?“ – „Ja, Herr.“ – „Wo ist er vergraben?“ – „Im Wald, Herr.“ – „Nun gut, dann lass uns gehen.“ Er nahm Hacke und Korb, ging zum Ort des Schatzes und fragte: „Wo ist der Schatz, Onkel?“ Nanda stieg hinauf, stellte sich direkt auf den Schatz, schöpfte aus der Nähe zum Reichtum Stolz und beschimpfte den Jüngling: „He, du Sklavensohn, du kleiner Diener, woher sollst du an diesem Ort einen Schatz haben?“ Als der Jüngling seine groben Worte hörte, tat er so, als würde er sie nicht hören, sagte: „Nun gut, dann lass uns gehen“, nahm ihn mit und kehrte um. Nach Verlauf von zwei oder drei Tagen ging er erneut hin, doch Nanda beschimpfte ihn auf genau dieselbe Weise. Ohne mit ihm mit groben Worten zu streiten, kehrte der Jüngling um und dachte: „Dieser Sklave geht von hier aus los und sagt: ‚Ich werde den Schatz zeigen‘, doch wenn er dort ankommt, beschimpft er mich. Ich kenne den Grund dafür nicht. Es gibt jedoch einen befreundeten Hausvater meines Vaters; den werde ich fragen, um es zu erfahren.“ Er ging zum Bodhisatta, berichtete ihm von dem ganzen Vorfall und fragte: „Mein lieber Vater, was könnte wohl der Grund dafür sein?“ Bodhisatto ‘‘yasmiṃ te, tāta, ṭhāne ṭhito nando akkosati, tattheva te pitu santakaṃ dhanaṃ, tasmā yadā te nando akkosati, tadā naṃ ‘ehi re dāsa, kiṃ akkosasī’ti ākaḍḍhitvā taṃ ṭhānaṃ bhinditvā kulasantakaṃ dhanaṃ nīharitvā dāsaṃ ukkhipāpetvā dhanaṃ āharā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta sprach: „Mein lieber Sohn, genau an der Stelle, wo Nanda steht und dich beschimpft, befindet sich das Vermögen deines Vaters. Wenn Nanda dich also das nächste Mal beschimpft, packe ihn und rufe: ‚Komm her, du Sklave, was beschimpfst du mich!‘, grabe diese Stelle auf, hole das Familienvermögen heraus, lass es den Sklaven tragen und bringe das Geld heim.“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er folgende Strophe: 39. 39. ‘‘Maññe sovaṇṇayo rāsi, sovaṇṇamālā ca nandako; Yattha dāso āmajāto, ṭhito thullāni gajjatī’’ti. „Ich glaube, ein goldener Haufen und ein goldener Kranz liegen dort, wo der als Sklave geborene Nanda steht und so unverschämte Worte ausstößt.“ Tattha maññeti evaṃ ahaṃ jānāmi. Sovaṇṇayoti sundaro vaṇṇo etesanti sovaṇṇāni. Kāni tāni? Rajatamaṇikañcanapavāḷādīni ratanāni. Imasmiñhi ṭhāne sabbānetāni ‘‘suvaṇṇānī’’ti adhippetāni, tesaṃ rāsi sovaṇṇayo rāsi. Sovaṇṇamālā cāti tuyhaṃ pitusantakā suvaṇṇamālā ca etthevāti maññāmi. Nandako yattha dāsoti yasmiṃ ṭhāne ṭhito nandako dāso. Āmajātoti ‘‘āma, ahaṃ vo dāsī’’ti evaṃ dāsabyaṃ upagatāya āmadāsisaṅkhātāya dāsiyā putto. Ṭhito thullāni gajjatīti ‘‘so yasmiṃ ṭhāne ṭhito thullāni pharusavacanāni vadati, tattheva te kulasantakaṃ dhanaṃ, evaṃ ahaṃ taṃ maññāmī’’ti bodhisatto kumārassa dhanaggahaṇūpāyaṃ ācikkhi. Darin bedeutet "maññe" (ich meine): "So weiß ich." "Sovaṇṇayo" bedeutet: Sie haben eine schöne Farbe, daher nennt man sie "golden" (sovaṇṇāni). Welche sind das? Kostbarkeiten wie Silber, Edelsteine, Gold, Korallen und dergleichen. Denn an dieser Stelle sind mit "Goldenen" all diese Juwelen gemeint, und deren Haufen ist der "goldene Haufen" (sovaṇṇayo rāsi). "Sovaṇṇamālā ca" bedeutet: "Und die goldene Kette, die deinem Vater gehörte, ist genau hier" – so meine ich. "Nandako yattha dāso" bedeutet: "An dem Ort, wo der Sklave Nanda steht." "Āmajāto" bedeutet: Der Sohn einer im Haus geborenen Sklavin (āmadāsī), die sich mit den Worten "Ja, ich bin eure Sklavin" freiwillig in die Knechtschaft begeben hat. "Ṭhito thullāni gajjati" bedeutet: "Wo jener steht und grobe, raue Worte ausstößt, genau dort befindet sich das Erbe deiner Familie. So meine ich es." Auf diese Weise wies der Bodhisatta dem Knaben den Weg, wie er den Schatz bergen könne. Kumāro [Pg.243] bodhisattaṃ vanditvā gharaṃ gantvā nandaṃ ādāya nidhiṭṭhānaṃ gantvā yathānusiṭṭhaṃ paṭipajjitvā taṃ dhanaṃ āharitvā kuṭumbaṃ saṇṭhapetvā bodhisattassa ovāde ṭhito dānādīni puññāni katvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. Der Knabe verneigte sich vor dem Bodhisatta, ging nach Hause, nahm Nanda mit sich und begab sich zu dem Ort, an dem der Schatz vergraben war. Er verfuhr genau wie angewiesen, barg den Schatz, ordnete seinen Hausstand und verblieb in der Unterweisung des Bodhisatta. Nachdem er verdienstvolle Taten wie das Spenden und andere gute Werke vollbracht hatte, ging er am Ende seines Lebens gemäß seinem Kamma fort. Satthā ‘‘pubbepesa evaṃsīloyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā nando sāriputtassa saddhivihāriko ahosi, paṇḍitakuṭumbiko pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: "Schon in der Vergangenheit hatte er denselben Charakter", trug diese Lehrrede vor, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: "Damals war Nanda der Mitbewohner (Schüler) von Sāriputta, der weise Hausvater aber war ich selbst." Nandajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Nanda-Jātaka, das neunte, ist abgeschlossen.
[40] 10. Khadiraṅgārajātakavaṇṇanā [40] 10. Die Erklärung des Khadiraṅgāra-Jātaka Kāmaṃ patāmi nirayanti idaṃ satthā jetavane viharanto anāthapiṇḍikaṃ ārabbha kathesi. Anāthapiṇḍiko hi vihārameva ārabbha catupaññāsakoṭidhanaṃ buddhasāsane pariccajitvā vikiritvā ṭhapetvā tīṇi ratanāni aññattha ratanasaññameva anuppādetvā satthari jetavane viharante devasikaṃ tīṇi mahāupaṭṭhānāni gacchati. Pātova ekavāraṃ gacchati, katapātarāso ekavāraṃ, sāyanhe ekavāraṃ. Aññānipi antarantarupaṭṭhānāni hontiyeva. Gacchanto ca ‘‘kiṃ nu kho ādāya āgatoti sāmaṇerā vā daharā vā hatthampi me olokeyyu’’nti tucchahattho nāma na gatapubbo. Pātova gacchanto yāguṃ gāhāpetvā gacchati, katapātarāso sappinavanītamadhuphāṇitādīnipi, sāyanhasamaye gandhamālāvatthādihatthoti. Evaṃ divase divase pariccajantassa panassa pariccāge pamāṇaṃ natthi. Dies: "Gern stürze ich in die Hölle", erzählte der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich Anāthapiṇḍika. Denn Anāthapiṇḍika hatte allein für das Kloster vierundfünfzig Millionen [Koti] an Vermögen in der Lehre des Buddha gespendet und verteilt. Abgesehen von den Drei Juwelen sah er in nichts anderem mehr ein kostbares Juwel. Während der Meister im Jetavana-Kloster verweilte, begab er sich täglich zu drei großen Aufwartungen dorthin. Frühmorgens ging er einmal, nach dem Frühstück einmal und am Abend einmal. Auch dazwischen gab es immer wieder Besuche. Wenn er ging, dachte er: "Die Novizen oder jungen Mönche könnten auf meine Hände schauen und sich fragen: Was hat er wohl mitgebracht?", und so ging er niemals mit leeren Händen. Frühmorgens ging er und ließ Reisschleim mitnehmen; nach dem Frühstück nahm er geklärte Butter, frische Butter, Honig, Melasse und dergleichen mit; am Abend trug er Duftstoffe, Blumen, Gewänder und Ähnliches in den Händen. Für seine täglichen Spenden gab es kein Maß. Bahū vohārūpajīvinopissa hatthato paṇṇe āropetvā aṭṭhārasakoṭisaṅkhyaṃ dhanaṃ iṇaṃ gaṇhiṃsu, te mahāseṭṭhi na āharāpeti. Aññā panassa kulasantakā aṭṭhārasa koṭiyo nadītīre nidahitvā ṭhapitā aciravatodakena nadīkūle bhinne mahāsamuddaṃ paviṭṭhā, tā yathāpihitalañchi tāva lohacāṭiyo aṇḍavakucchiyaṃ pavaṭṭantā vicaranti. Gehe [Pg.244] panassa pañcannaṃ bhikkhusatānaṃ niccabhattaṃ nibaddhameva hoti. Seṭṭhino hi gehaṃ bhikkhusaṅghassa catumahāpathe khatapokkharaṇisadisaṃ, sabbabhikkhūnaṃ mātāpituṭṭhāne ṭhitaṃ. Tenassa gharaṃ sammāsambuddhopi gacchati, asītimahātherāpi gacchantiyeva. Sesabhikkhūnaṃ pana gacchantānañca āgacchantānañca pamāṇaṃ natthi. Taṃ pana gharaṃ sattabhūmakaṃ sattadvārakoṭṭhakapaṭimaṇḍitaṃ, tassa catutthe dvārakoṭṭhake ekā micchādiṭṭhikā devatā vasati, sā sammāsambuddhe gehaṃ pavisante attano vimāne ṭhātuṃ na sakkoti, dārake gahetvā otaritvā bhūmiyaṃ tiṭṭhati. Asītimahātheresupi avasesattheresupi pavisantesu ca nikkhamantesu ca tatheva karoti. Sā cintesi ‘‘samaṇe gotame ca sāvakesu cassa imaṃ gehaṃ pavisantesu mayhaṃ sukhaṃ nāma natthi, niccakālaṃ otaritvā otaritvā bhūmiyaṃ ṭhātuṃ na sakkhissāmi. Yathā ime etaṃ gharaṃ na pavisanti, tathā mayā kātuṃ vaṭṭatī’’ti. Athekadivasaṃ sayanūpagatasseva mahākammantikassa santikaṃ gantvā obhāsaṃ pharitvā aṭṭhāsi. ‘‘Ko etthā’’ti ca vutte ‘‘ahaṃ catutthadvārakoṭṭhake nibbattadevatā’’ti āha. ‘‘Kasmā āgatāsī’’ti? ‘‘Kiṃ tumhe seṭṭhissa kiriyaṃ na passatha, attano pacchimakālaṃ anoloketvā dhanaṃ nīharitvā samaṇaṃ gotamaṃyeva pūjeti, neva vaṇijjaṃ payojeti, na kammante paṭṭhapeti, tumhe seṭṭhiṃ tathā ovadatha, yathā attano kammantaṃ karoti. Yathā ca samaṇo gotamo sasāvako imaṃ gharaṃ na pavisati, tathā karothā’’ti. Atha naṃ so āha ‘‘bāladevate, seṭṭhi dhanaṃ vissajjento niyyānike buddhasāsane vissajjeti, so sace maṃ cūḷāyaṃ gahetvā vikkiṇissati, nevāhaṃ kiñci kathessāmi, gaccha tvaṃ’’nti. Sā punekadivasaṃ seṭṭhino jeṭṭhaputtaṃ upasaṅkamitvā tatheva ovadi, sopi taṃ purimanayeneva tajjesi. Seṭṭhinā pana saddhiṃ kathetuṃyeva na sakkoti. Viele Kaufleute hatten sich von ihm gegen schriftliche Schuldverschreibungen eine Summe von achtzehn Millionen geliehen. Diese forderte der Großgutsituierte jedoch nicht ein. Zudem waren weitere achtzehn Millionen seines ererbten Familienvermögens, die am Flussufer vergraben waren, als das Ufer des Aciravatī-Flusses wegbrach, in den großen Ozean gespült worden. Jene versiegelten und gestempelten Kupfertöpfe rollten nun auf dem Grund des Ozeans hin und her. In seinem Haus jedoch war die ständige Speisung für fünfhundert Mönche fest eingerichtet. Denn das Haus des Großkaufmanns war für den Bhikkhu-Saṅgha wie ein ausgegrabener Lotusteich an einer Viererkreuzung; es stand allen Mönchen anstelle von Mutter und Vater offen. Deshalb ging der vollkommen Erleuchtete selbst in sein Haus, und auch die achtzig großen Theras gingen dorthin. Von den übrigen gehenden und kommenden Mönchen gab es keine Zahl. Das Haus war sieben Stockwerke hoch und mit sieben Torhäusern verziert. Im vierten Torhaus wohnte eine Gottheit mit falscher Ansicht. Wenn der vollkommen Erleuchtete das Haus betrat, konnte sie nicht in ihrem Palast verbleiben; sie musste mit ihren Kindern herabsteigen und auf dem Erdboden stehen. Auch wenn die achtzig großen Theras und die übrigen Theras ein- und ausgingen, tat sie dasselbe. Sie dachte: "Wenn der Asket Gotama und seine Jünger dieses Haus betreten, gibt es für mich keine Annehmlichkeit. Ich kann nicht für alle Zeit ständig herabsteigen und auf der Erde stehen. Ich muss dafür sorgen, dass diese Mönche das Haus nicht mehr betreten." Da ging sie eines Tages zu dem obersten Verwalter, der sich gerade schlafen gelegt hatte, verbreitete ihr Licht und stellte sich vor ihn hin. Als er fragte: "Wer ist da?", antwortete sie: "Ich bin die Gottheit, die im vierten Torhaus wohnt." "Warum bist du gekommen?" "Seht ihr denn nicht das Treiben des Kaufmanns? Ohne an seine eigene Zukunft zu denken, gibt er all sein Vermögen aus und verehrt nur den Asketen Gotama. Er betreibt keinen Handel mehr und führt keine Geschäfte fort. Belehrt den Kaufmann so, dass er sich wieder um seine Geschäfte kümmert. Und sorgt dafür, dass der Asket Gotama mit seinen Jüngern dieses Haus nicht mehr betritt." Da sprach er zu ihr: "Du törichte Gottheit! Wenn der Kaufmann sein Geld ausgibt, so tut er dies für die erlösende Lehre des Buddha. Selbst wenn er mich am Schopf packen und verkaufen würde, würde ich kein Wort dagegen sagen. Geh fort von hier!" An einem anderen Tag ging sie zum ältesten Sohn des Kaufmanns und belehrte ihn auf dieselbe Weise. Doch auch er wies sie in der gleichen Weise wie zuvor zurück. Mit dem Kaufmann selbst aber wagte sie gar nicht erst zu sprechen. Seṭṭhinopi nirantaraṃ dānaṃ dentassa vohāre akarontassa āye mandībhūte dhanaṃ parikkhayaṃ agamāsi. Athassa anukkamena dāliddiyappattassa paribhogasāṭakasayanabhojanānipi purāṇasadisāni na bhaviṃsu. Evaṃbhūtopi bhikkhusaṅghassa dānaṃ deti, paṇītaṃ pana katvā dātuṃ na sakkoti[Pg.245]. Atha naṃ ekadivasaṃ vanditvā nisinnaṃ satthā ‘‘dīyati pana te, gahapati, kule dāna’’nti pucchi. So ‘‘dīyati, bhante, tañca kho kaṇājakaṃ bilaṅgadutiya’’nti āha. Atha naṃ satthā ‘‘gahapati, ‘lūkhaṃ dānaṃ demī’ti mā cittaṃ saṅkocayittha. Cittasmiñhi paṇīte buddhapaccekabuddhabuddhasāvakānaṃ dinnadānaṃ lūkhaṃ nāma na hoti. Kasmā? Vipākamahantattā’’ti āha. Cittañhi paṇītaṃ kātuṃ sakkontassa dānaṃ lūkhaṃ nāma natthīti cetaṃ evaṃ veditabbaṃ – Auch für den Großkaufmann, der fortlaufend Gaben spendete, ohne Handel zu treiben, ging das Vermögen zur Neige, als seine Einnahmen spärlich wurden. Als er daraufhin allmählich in Armut geriet, waren auch seine Gebrauchsgegenstände, Kleidung, Lagerstätten und Speisen nicht mehr wie früher. Doch selbst in diesem Zustand gab er der Mönchsgemeinde weiterhin Gaben; er war jedoch nicht mehr in der Lage, diese erlesen zu bereiten. Eines Tages fragte ihn der Meister, als er nach der Begrüßung dasaß: „Wird denn in deiner Familie, Hausvater, noch eine Gabe gegeben?“ Er sprach: „Es wird gegeben, Herr, und zwar ist es gebrochener Reis zusammen mit saurem Reisschleim.“ Darauf sprach der Meister zu ihm: „Hausvater, lass deinen Geist nicht betrübt sein im Gedanken: ‚Ich gebe eine unansehnliche Gabe.‘ Denn wenn der Geist rein und voller Vertrauen ist, gibt es für Buddhas, Paccekabuddhas und Jünger des Buddha keine Gabe, die man als geringwertig bezeichnen könnte. Warum? Wegen der Größe der Frucht.“ Denn für jemanden, der seinen Geist erhaben machen kann, gibt es wahrlich keine minderwertige Gabe. Dies ist wie folgt zu verstehen: ‘‘Natthi citte pasannamhi, appakā nāma dakkhiṇā; Tathāgate vā sambuddhe, atha vā tassa sāvake. (vi. va. 804); „Wenn der Geist voller Vertrauen ist, gibt es keine geringe Gabe für den vollkommen erwachten Tathāgata oder für seinen Jünger. ‘‘Na kiratthi anomadassisu, pāricariyā buddhesu appakā; Sukkhāya aloṇikāya ca, passa phalaṃ kummāsapiṇḍiyā’’ti. Gewiss gibt es keinen geringen Dienst an den Buddhas, die von edlem Blick sind. Sieh die Frucht einer Kugel aus trockenem und ungesalzenem Sauerteigbrot.“ Aparampi naṃ āha ‘‘gahapati, tvaṃ tāva lūkhaṃ dānaṃ dadamāno aṭṭhannaṃ ariyapuggalānaṃ desi, ahaṃ velāmakāle sakalajambudīpaṃ unnaṅgalaṃ katvā satta ratanāni dadamāno pañca mahānadiyo ekoghapuṇṇaṃ katvā viya ca mahādānaṃ pavattayamāno tisaraṇagataṃ vā pañcasīlarakkhanakaṃ vā kañci nālatthaṃ, dakkhiṇeyyapuggalā nāma evaṃ dullabhā. Tasmā ‘lūkhaṃ me dāna’nti mā cittaṃ saṅkocayitthā’’ti evañca pana vatvā velāmasuttaṃ (a. ni. 9.20) kathesi. Und er sprach ferner zu ihm: „Hausvater, obwohl du eine einfache Gabe spendest, gibst du sie doch den acht edlen Personen. Als ich zu Zeiten des Velāma ganz Jambudīpa so einrichtete, dass die Pflüge ruhten, und die sieben Schätze verschenkte, wobei ich ein großes Almosen veranstaltete, als würde ich die fünf großen Ströme zu einer einzigen Flut anschwellen lassen, fand ich nicht einen einzigen Empfänger, der Zuflucht zu den Drei Juwelen genommen hatte oder die Fünf Tugendregeln einhielt. So schwer zu finden sind wahrlich würdige Empfänger. Lass daher deinen Geist nicht betrübt sein im Gedanken: ‚Meine Gabe ist unansehnlich.‘“ Nachdem er dies gesagt hatte, verkündete er das Velāma-Sutta. Atha kho sā devatā issarakāle seṭṭhinā saddhiṃ kathetumpi asakkontī ‘‘idānāyaṃ duggatattā mama vacanaṃ gaṇhissatī’’ti maññamānā aḍḍharattasamaye sirigabbhaṃ pavisitvā obhāsaṃ pharitvā ākāse aṭṭhāsi. Seṭṭhi taṃ disvā ‘‘ko eso’’ti āha. ‘‘Ahaṃ mahāseṭṭhi catutthadvārakoṭṭhake adhivatthā, devatā’’ti. ‘‘Kimatthamāgatāsī’’ti? ‘‘Tuyhaṃ ovādaṃ kathetukāmā hutvā āgacchāmī’’ti. ‘‘Tena hi kathehī’’ti. Mahāseṭṭhi tvaṃ pacchimakālaṃ na cintesi, puttadhītaro na olokesi, samaṇassa te gotamassa sāsane bahuṃ dhanaṃ vippakiṇṇaṃ, so tvaṃ ativelaṃ dhanavissajjanena vā vaṇijjādikammānaṃ akaraṇena vā [Pg.246] samaṇaṃ gotamaṃ nissāya duggato jāto, evaṃbhūtopi samaṇaṃ gotamaṃ na muñcasi, ajjapi te samaṇā gharaṃ pavisantiyeva. Yaṃ tāva tehi nītaṃ, taṃ na sakkā paccāharāpetuṃ, gahitaṃ gahitameva hotu, ito paṭṭhāya pana sayañca samaṇassa gotamassa santikaṃ mā gamittha, sāvakānañcassa imaṃ gharaṃ pavisituṃ mā adāsi, samaṇaṃ gotamaṃ nivattitvāpi anolokento attano vohāre ca vaṇijjañca katvā kuṭumbaṃ saṇṭhapehī’’ti. Atha naṃ so evamāha ‘‘ayaṃ tayā mayhaṃ dātabbaovādo’’ti. ‘‘Āma, ayyā’’ti. Tādisānaṃ devatānaṃ satenapi sahassenapi satasahassenapi akampanīyo ahaṃ dasabalena kato. Mama hi saddhā sineru viya acalā suppatiṭṭhitā, mayā niyyānike ratanasāsane dhanaṃ vissajjitaṃ, ayuttaṃ te kathitaṃ, buddhasāsane pahāro dinno, evarūpāya anācārāya dussīlāya kāḷakaṇṇiyā saddhiṃ tayā mama ekagehe vasanakiccaṃ natthi, sīghaṃ mama gehā nikkhamitvā aññattha gacchāti. Da jene Gottheit in den Zeiten des Wohlstands nicht einmal in der Lage gewesen war, mit dem Großkaufmann zu sprechen, dachte sie: „Da er jetzt arm geworden ist, wird er gewiss auf meine Worte hören.“ Zur Mitternachtsstunde betrat sie das Prachtgemach, verbreitete ihren Glanz und stellte sich in die Luft. Als der Großkaufmann sie erblickte, fragte er: „Wer ist da?“ Sie antwortete: „O Großkaufmann, ich bin die Gottheit, die im vierten Torhaus wohnt.“ „Zu welchem Zweck bist du gekommen?“ – „Ich bin gekommen, weil ich dir einen Rat erteilen möchte.“ – „Wenn dem so ist, dann sprich.“ „Großkaufmann, du hast nicht an die Zukunft gedacht und hast nicht auf deine Söhne und Töchter geachtet. Du hast viel Vermögen für die Lehre des Asketen Gotama verstreut. Durch das übermäßige Weggeben von Vermögen und weil du keine Geschäfte wie den Handel mehr betrieben hast, bist du wegen des Asketen Gotama verarmt. Selbst in diesem Zustand lässt du nicht vom Asketen Gotama ab; noch heute betreten jene Asketen dein Haus. Was von ihnen bereits fortgebracht wurde, das kann man nicht zurückfordern; was genommen wurde, bleibe genommen. Von nun an aber sollst du weder selbst zum Asketen Gotama gehen, noch seinen Jüngern erlauben, dieses Haus zu betreten. Schau dich nicht einmal nach dem Asketen Gotama um, sondern betreibe wieder deinen eigenen Handel und Gewerbe und stelle dein Familienvermögen wieder her.“ Darauf sprach der Großkaufmann zu ihr: „Ist dies der Rat, den du mir zu geben hast?“ – „Ja, mein Herr.“ „Selbst durch hundert, tausend oder hunderttausend solcher Gottheiten wie dich bin ich nicht ins Wanken zu bringen, so fest hat mich der Besitzer der Zehn Kräfte gegründet. Denn mein Vertrauen ist unerschütterlich und fest gegründet wie der Berg Sineru. Ich habe mein Vermögen für die erlösende Lehre der Drei Juwelen hingegeben. Ungebührlich ist das, was du gesagt hast; du hast der Lehre des Buddha einen Schlag versetzt. Mit einer solchen sittenlosen, tugendlosen Unglückbringerin wie dir gibt es für mich kein gemeinsames Wohnen in einem Haus. Verlasse schnell mein Haus und geh anderswohin!“ Sā sotāpannassa ariyasāvakassa vacanaṃ sutvā ṭhātuṃ asakkontī attano vasanaṭṭhānaṃ gantvā dārake hatthena gahetvā nikkhami. Nikkhamitvā ca pana aññattha vasanaṭṭhānaṃ alabhamānā ‘‘seṭṭhiṃ khamāpetvā tattheva vasissāmī’’ti cintetvā nagarapariggāhakadevaputtassa santikaṃ gantvā taṃ vanditvā aṭṭhāsi. ‘‘Kenaṭṭhena āgatāsī’’ti ca vutte ‘‘ahaṃ sāmi, attano bālatāya anupadhāretvā anāthapiṇḍikena seṭṭhinā saddhiṃ kathesiṃ, so maṃ kujjhitvā vasanaṭṭhānā nikkaḍḍhi, maṃ seṭṭhissa santikaṃ netvā khamāpetvā vasanaṭṭhānaṃ me dethā’’ti. ‘‘Kiṃ pana tayā seṭṭhi vutto’’ti ‘‘ito paṭṭhāya buddhupaṭṭhānaṃ saṅghupaṭṭhānaṃ mā kari, samaṇassa gotamassa gharappavesanaṃ mā adāsī’’ti ‘‘evaṃ me vutto, sāmī’’ti. Ayuttaṃ tayā vuttaṃ, sāsane pahāro dinno, ‘‘ahaṃ taṃ ādāya seṭṭhino santikaṃ gantuṃ na ussahāmī’’ti. Sā tassa santikā saṅgahaṃ alabhitvā catunnaṃ mahārājānaṃ santikaṃ agamāsi. Als sie die Worte des stromeingetretenen edlen Jüngers hörte, konnte sie dort nicht länger bleiben. Sie ging zu ihrer Wohnstätte, nahm ihre Kinder bei der Hand und zog aus. Nachdem sie ausgezogen war und anderswo keine Bleibe fand, dachte sie: „Ich will den Großkaufmann um Verzeihung bitten und genau dort wieder wohnen.“ Sie begab sich zu dem Schutzgott der Stadt, erwies ihm Ehrerbietung und blieb vor ihm stehen. Als sie gefragt wurde: „Aus welchem Grund bist du gekommen?“, antwortete sie: „Mein Herr, aus eigener Torheit habe ich, ohne nachzudenken, mit dem Großkaufmann Anāthapiṇḍika gesprochen. Er geriet in Zorn auf mich und hat mich aus meiner Wohnstätte vertrieben. Bitte führt mich zum Großkaufmann, erwirkt seine Verzeihung und gebt mir meine Wohnstätte zurück.“ „Was aber hast du dem Großkaufmann gesagt?“, wurde sie gefragt. – „‚Erweise von nun an dem Buddha und dem Saṅgha keine Verehrung mehr und gestatte dem Asketen Gotama nicht, dein Haus zu betreten.‘ So habe ich zu ihm gesprochen, mein Herr.“ „Ungebührlich ist das, was du gesagt hast; du hast der Lehre einen Schlag versetzt. Ich wage es nicht, dich mitzunehmen und zum Großkaufmann zu gehen.“ Da sie von ihm keine Unterstützung erhielt, begab sie sich zu den Vier Großen Königen. Tehipi tatheva paṭikkhittā sakkaṃ devarājaṃ upasaṅkamitvā taṃ pavattiṃ ācikkhitvā ‘‘ahaṃ, deva, vasanaṭṭhānaṃ alabhamānā dārake hatthena gahetvā anāthā vicarāmi, tumhākaṃ siriyā mayhaṃ vasanaṭṭhānaṃ dāpethā’’ti suṭṭhutaraṃ [Pg.247] yāci. Sopi naṃ āha ‘‘tayā ayuttaṃ kataṃ, jinasāsane pahāro dinno, ahampi taṃ nissāya seṭṭhinā saddhiṃ kathetuṃ na sakkomi, ekaṃ pana te seṭṭhissa khamanūpāyaṃ kathessāmī’’ti. ‘‘Sādhu, deva, kathehī’’ti. Mahāseṭṭhissa hatthato manussehi paṇṇe āropetvā aṭṭhārasakoṭisaṅkhyaṃ dhanaṃ gahitaṃ atthi, tvaṃ tassa āyuttakavesaṃ gahetvā kañci ajānāpetvā tāni paṇṇāni ādāya katipayehi yakkhataruṇehi parivāritā ekena hatthena paṇṇaṃ, ekena lekhaniṃ gahetvā tesaṃ gehaṃ gantvā gehamajjhe ṭhitā attano yakkhānubhāvena te uttāsetvā ‘‘idaṃ tumhākaṃ iṇapaṇṇaṃ, amhākaṃ seṭṭhi attano issarakāle tumhe na kiñci āha, idāni duggato jāto, tumhehi gahitakahāpaṇāni dethā’’ti attano yakkhānubhāvaṃ dassetvā sabbāpi tā aṭṭhārasa hiraññakoṭiyo sādhetvā seṭṭhissa tucchakoṭṭhake pūretvā aññaṃ aciravatinadītīre nidahitaṃ dhanaṃ nadīkūle bhinne samuddaṃ paviṭṭhaṃ atthi, tampi attano ānubhāvena āharitvā tucchakoṭṭhake pūretvā, aññampi asukaṭṭhāne nāma assāmikaṃ aṭṭhārasakoṭimattameva dhanaṃ atthi, tampi āharitvā tucchakoṭṭhake pūrehi, imāhi catupaññāsakoṭīhi imaṃ tucchakoṭṭhakapūrakaṃ daṇḍakammaṃ katvā mahāseṭṭhiṃ khamāpehīti. Als sie auch von jenen [vier Himmelskönigen] auf genau dieselbe Weise abgewiesen worden war, begab sie sich zu Sakka, dem König der Götter, berichtete ihm von diesem Vorfall und bat ihn inständig: „O Herr, da ich keinen Wohnort finde, irre ich schutzlos umher und halte meine Kinder an der Hand. Lasst mir durch Eure Macht eine Wohnstätte geben!“ Auch er sprach zu ihr: „Du hast Unrecht getan; du hast der Lehre des Siegers (Jina) einen Schlag versetzt. Auch ich kann wegen dir nicht mit dem Großkaufmann sprechen. Ich will dir jedoch eine Möglichkeit nennen, wie du die Vergebung des Großkaufmanns erlangen kannst.“ Sie sagte: „Gut, o Herr, sagt es mir!“ [Sakka sprach:] „Es gibt Vermögen im Wert von achtzehn Millionen (Koṭis), das Menschen vom Großkaufmann geliehen haben und das auf Urkunden festgehalten ist. Nimm die Gestalt seines Verwalters an, lass es niemanden wissen, nimm diese Urkunden an dich und gehe, umgeben von einigen jungen Yakkhas, mit einer Urkunde in der einen Hand und einem Griffel in der anderen Hand zu deren Häusern. Stelle dich mitten in ihr Haus, erschrecke sie durch deine übernatürliche Macht als Yakkhin und sprich, indem du deine Macht zeigst: ‚Dies ist eure Schuldurkunde. Unser Großkaufmann hat in den Tagen seines Wohlstands nichts zu euch gesagt; jetzt aber ist er verarmt. Gebt die Kahāpaṇas zurück, die ihr euch geliehen habt!‘ Treibe all diese achtzehn Millionen Goldmünzen ein und fülle damit die leeren Schatzhäuser des Großkaufmanns. Zudem gibt es noch ein anderes Vermögen, das am Ufer des Flusses Aciravatī vergraben lag und, als das Flussufer einbrach, in den Ozean gespült wurde. Bringe auch dieses durch deine eigene Macht herbei und fülle die leeren Schatzhäuser damit. Und es gibt an einem bestimmten Ort noch ein weiteres, herrenloses Vermögen im Wert von genau achtzehn Millionen; bringe auch dieses herbei und fülle die leeren Schatzhäuser. Wenn du mit diesen vierundfünfzig Millionen dieses Strafwerk der Auffüllung der leeren Schatzhäuser vollbracht hast, dann bitte den Großkaufmann um Vergebung.“ Sā ‘‘sādhu, devā’’ti tassa vacanaṃ sampaṭicchitvā vuttanayeneva sabbaṃ dhanaṃ āharitvā koṭṭhake pūretvā aḍḍharattasamaye seṭṭhissa sirigabbhaṃ pavisitvā obhāsaṃ pharitvā ākāse aṭṭhāsi. ‘‘Ko eso’’ti vutte ‘‘ahaṃ te mahāseṭṭhi catutthadvārakoṭṭhake adhivatthā andhabāladevatā, mayā mahāmohamūḷhāya buddhaguṇe ajānitvā purimesu divasesu tumhehi saddhiṃ kiñci kathitaṃ atthi, taṃ me dosaṃ khamatha. Sakkassa hi me devarājassa vacanena tumhākaṃ iṇaṃ sodhetvā aṭṭhārasa koṭiyo, samuddaṃ gatā aṭṭhārasa koṭiyo, tasmiṃ tasmiṃ ṭhāne assāmikadhanassa aṭṭhārasa koṭiyoti catupaṇṇāsa koṭiyo āharitvā tucchakoṭṭhakapūraṇena daṇḍakammaṃ kataṃ, jetavanavihāraṃ ārabbha parikkhayaṃ gatadhanaṃ sabbaṃ sampiṇḍitaṃ, vasanaṭṭhānaṃ alabhamānā kilamāmi, mayā [Pg.248] aññāṇatāya kathitaṃ manasi akatvā khamatha mahāseṭṭhī’’ti āha. Sie willigte ein und sprach: „Gut, o Herr!“ Sie nahm seine Worte an, brachte auf die beschriebene Weise das gesamte Vermögen herbei, füllte die Schatzhäuser und betrat zur Mitternachtsstunde das Prachtgemach des Großkaufmanns. Sie verbreitete ihren Glanz und stellte sich in die Luft. Auf die Frage: „Wer ist da?“ sprach sie: „O Großkaufmann, ich bin die törichte, verblendete Gottheit, die an deinem vierten Torweg wohnte. Da ich von großer Verblendung betört war und die Vorzüge des Buddha nicht kannte, habe ich in den vergangenen Tagen gewisse Worte zu dir gesprochen. Vergib mir dieses Vergehen! Auf Geheiß von Sakka, dem König der Götter, habe ich eure Außenstände eingetrieben und achtzehn Millionen herbeigebracht; weitere achtzehn Millionen, die in den Ozean gelangt waren, sowie achtzehn Millionen an herrenlosem Gut von verschiedenen Orten – insgesamt also vierundfünfzig Millionen habe ich herbeigebracht und durch das Auffüllen der leeren Schatzhäuser mein Strafwerk vollbracht. Das gesamte Vermögen, das im Zusammenhang mit dem Jetavana-Kloster aufgezehrt worden war, habe ich wieder zusammengetragen. Da ich keinen Wohnort finde, leide ich große Not. Bitte nimm mir das nicht übel, was ich aus Unwissenheit gesagt habe, und vergib mir, o Großkaufmann!“ Anāthapiṇḍiko tassā vacanaṃ sutvā cintesi ‘‘ayaṃ devatā ‘daṇḍakammañca me kata’nti vadati, attano ca dosaṃ paṭijānāti, satthā imaṃ vinetvā attano guṇe jānāpessati, sammāsambuddhassa naṃ dassessāmī’’ti. Atha naṃ āha ‘‘amma, devate, sacesi maṃ khamāpetukāmā, satthu santike maṃ khamāpehī’’ti. Sādhu evaṃ karissāmi, ‘‘satthu pana maṃ santikaṃ gahetvā gacchāhī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti vatvā vibhātāya rattiyā pātova taṃ gahetvā satthu santikaṃ gantvā tāya katakammaṃ sabbaṃ tathāgatassa ārocesi. Satthā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘idha, gahapati, pāpapuggalopi yāva pāpaṃ na paccati, tāva bhadrāni passati. Yadā panassa pāpaṃ paccati, tadā pāpameva passati. Bhadrapuggalopi yāva bhadraṃ na paccati, tāva pāpāni passati. Yadā panassa bhadraṃ paccati, tadā bhadrameva passatī’’ti vatvā imā dhammapade dve gāthā abhāsi – Als Anāthapiṇḍika ihre Worte hörte, dachte er: „Diese Gottheit sagt: ‚Ich habe mein Strafwerk vollbracht‘, und sie gesteht ihr eigenes Vergehen ein. Der Meister wird sie zähmen und sie seine eigenen Vorzüge erkennen lassen. Ich will sie vor den vollkommen Erwachten führen.“ Daraufhin sprach er zu ihr: „Liebe Gottheit, wenn du wünschst, dass ich dir vergebe, dann bitte mich im Beisein des Meisters um Vergebung.“ Sie antwortete: „Gut, so will ich es tun. Führe mich jedoch in die Gegenwart des Meisters.“ Er willigte ein mit den Worten: „Gut.“ Als die Nacht vergangen war, nahm er sie am frühen Morgen mit sich, ging zum Meister und berichtete dem Erhabenen (Tathāgata) alles, was sie getan hatte. Als der Meister seine Worte hörte, sprach er: „Hier, Hausvater, sieht selbst ein schlechter Mensch Gutes, solange sein schlechtes Karma noch nicht reift. Wenn aber sein schlechtes Karma reift, dann sieht er nur Schlechtes. Auch ein guter Mensch sieht Schlechtes, solange sein gutes Karma noch nicht reift. Wenn aber sein gutes Karma reift, dann sieht er nur Gutes.“ Nach diesen Worten sprach er diese zwei Verse aus dem Dhammapada: ‘‘Pāpopi passatī bhadraṃ, yāva pāpaṃ na paccati; Yadā ca paccatī pāpaṃ, atha pāpo pāpāni passati. „Selbst der Übeltäter sieht Gutes, solange sein Übel noch nicht reift; wenn aber das Übel reift, dann sieht der Übeltäter nur Übles. ‘‘Bhadropi passatī pāpaṃ, yāva bhadraṃ na paccati; Yadā ca paccatī bhadraṃ, atha bhadro bhadrāni passatī’’ti. (dha. pa. 119-120); Selbst der Gutes Tuende sieht Übles, solange sein Gutes noch nicht reift; wenn aber das Gute reift, dann sieht der Gutes Tuende nur Gutes.“ Imāsañca pana gāthānaṃ pariyosāne sā devatā sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Sā cakkaṅkitesu satthu pādesu nipatitvā ‘‘mayā, bhante, rāgarattāya dosapaduṭṭhāya mohamūḷhāya avijjandhāya tumhākaṃ guṇe ajānantiyā pāpakaṃ vacanaṃ vuttaṃ, taṃ me khamathā’’ti satthāraṃ khamāpetvā mahāseṭṭhimpi khamāpesi. Am Ende dieser Verse erlangte diese Gottheit die Frucht des Stromeintritts (Sotāpattiphale). Sie warf sich vor den mit dem Radsymbol gekennzeichneten Füßen des Meisters nieder und bat den Meister um Vergebung, indem sie sprach: „O Herr, von Gier entflammt, von Hass verdorben, von Verblendung betört und von Unwissenheit blind gemacht, habe ich, ohne Eure Vorzüge zu kennen, sündige Worte gesprochen. Vergibt mir dies!“ Und sie bat auch den Großkaufmann um Vergebung. Tasmiṃ samaye anāthapiṇḍiko satthu purato attano guṇaṃ kathesi ‘‘bhante, ayaṃ devatā ‘buddhupaṭṭhānādīni mā karohī’ti vārayamānāpi maṃ vāretuṃ nāsakkhi, ‘dānaṃ na dātabba’nti imāya vāriyamānopahaṃ dānaṃ adāsimeva, nūna esa, bhante, mayhaṃ guṇo’’ti. Satthā ‘‘tvaṃ khosi gahapati sotāpanno ariyasāvako acalasaddho visuddhadassano, tuyhaṃ imāya appesakkhadevatāya vārentiyā avāritabhāvo na acchariyo[Pg.249]. Yaṃ pana pubbe paṇḍitā anuppanne buddhe aparipakkañāṇe ṭhitā kāmāvacarissarena mārena ākāse ṭhatvā ‘sace dānaṃ dassasi, imasmiṃ niraye paccissasī’ti asītihatthagambhīraṃ aṅgārakāsuṃ dassetvā ‘mā dānaṃ adāsī’ti vāritāpi padumakaṇṇikāmajjhe ṭhatvā dānaṃ adaṃsu, idaṃ acchariya’’nti vatvā anāthapiṇḍikena yācito atītaṃ āhari. Zu dieser Zeit rühmte Anāthapiṇḍika vor dem Meister seine eigenen Vorzüge: „O Herr, obwohl diese Gottheit mich zurückhalten wollte, indem sie sprach: ‚Diene nicht dem Buddha und dergleichen‘, vermochte sie mich nicht zurückzuhalten. Und obwohl sie mir wehren wollte, indem sie sprach: ‚Gib keine Gaben‘, habe ich dennoch Gaben gespendet. Gewiss, o Herr, ist dies mein Verdienst!“ Der Meister sprach: „Du bist ja, Hausvater, ein in den Strom Eingetretener (Sotāpanna), ein edler Schüler mit unerschütterlichem Vertrauen und reinem Geist. Dass du dich von dieser machtlosen Gottheit nicht zurückhalten ließest, ist kein Wunder. Dass aber einstmals Weise, als noch kein Buddha erschienen war und sie im Zustand noch unreifer Erkenntnis verwelten, vom Māra, dem Beherrscher der Sinneswelt, der in der Luft stand und ihnen eine achtzig Ellen tiefe Grube voll glühender Kohlen zeigte und drohte: ‚Wenn du Gaben spendest, wirst du in dieser Hölle schmoren!‘, dennoch nicht vom Spenden abgehalten werden konnten, sondern mitten auf dem Fruchtknoten einer Lotusblüte stehend ihre Gaben darbrachten – das ist fürwahr ein Wunder!“ Und auf Bitten Anāthapiṇḍikas erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bārāṇasiseṭṭhissa kule nibbattitvā nānappakārehi sukhūpakaraṇehi devakumāro viya saṃvaḍḍhiyamāno anukkamena viññutaṃ patvā soḷasavassakāleyeva sabbasippesu nipphattiṃ patto. So pitu accayena seṭṭhiṭṭhāne ṭhatvā catūsu nagaradvāresu catasso dānasālāyo, majjhe nagarassa ekaṃ, attano nivesanadvāre ekanti cha dānasālāyo kāretvā mahādānaṃ deti, sīlaṃ rakkhati, uposathakammaṃ karoti. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in der Familie eines reichen Kaufmanns von Bārāṇasī geboren. Aufgezogen wie ein Göttersohn mit mannigfachen Bequemlichkeiten und Annehmlichkeiten des Lebens, erlangte er allmählich die Reife und erreichte bereits im Alter von sechzehn Jahren die Meisterschaft in allen Künsten. Nach dem Verscheiden seines Vaters übernahm er das Amt des Kaufmanns, ließ sechs Almosenhallen errichten – vier an den vier Stadttoren, eine im Zentrum der Stadt und eine am Tor seines eigenen Hauses –, gab große Almosen, hielt die Tugendregeln ein und beging die Uposatha-Feiertage. Athekadivasaṃ pātarāsavelāya bodhisattassa nānaggarase manuññabhojane upanīyamāne eko paccekabuddho sattāhaccayena nirodhā vuṭṭhāya bhikkhācāravelaṃ sallakkhetvā ‘‘ajja mayā bārāṇasiseṭṭhissa gehadvāraṃ gantuṃ vaṭṭatī’’ti nāgalatādantakaṭṭhaṃ khāditvā anotattadahe mukhadhovanaṃ katvā manosilātale ṭhito nivāsetvā vijjulatāsadisaṃ kāyabandhanaṃ bandhitvā cīvaraṃ pārupitvā iddhimayamattikāpattaṃ ādāya ākāsenāgantvā bodhisattassa bhatte upanītamatte gehadvāre aṭṭhāsi. Bodhisatto taṃ disvāva āsanā vuṭṭhāya nipaccakāraṃ dassetvā parikammakārakaṃ olokesi. ‘‘Kiṃ karomi, sāmī’’ti ca vutte ‘‘ayyassa pattaṃ āharathā’’ti āha. Taṅkhaṇaññeva māro pāpimā vikampamāno uṭṭhāya ‘‘ayaṃ paccekabuddho ito sattame divase āhāraṃ labhi, ajja alabhamāno vinassissati, imañca vināsessāmi, seṭṭhino ca dānantarāyaṃ karissāmī’’ti taṅkhaṇaññeva āgantvā antaravatthumhi asītihatthamattaṃ aṅgārakāsuṃ nimmini. Sā khadiraṅgārapuṇṇā sampajjalitā sajotibhūtā avīcimahānirayo viya khāyittha. Taṃ pana māpetvā sayaṃ ākāse aṭṭhāsi. Pattāharaṇatthāya gacchamāno puriso taṃ disvā mahābhayappatto nivatti. Bodhisatto ‘‘kiṃ, tāta, nivattosī’’ti pucchi. Ayaṃ sāmi antaravatthumhi mahatī aṅgārakāsu sampajjalitā sajotibhūtāti[Pg.250]. Athañño athaññoti evaṃ āgatāgatā sabbepi bhayappattā vegena palāyiṃsu. Da erhob sich eines Tages zur Zeit des Frühstücks, als dem Bodhisatta eine köstliche Speise mit mannigfachen edlen Wohlgeschmäcken dargeboten wurde, ein Paccekabuddha nach Ablauf von sieben Tagen aus der Erlöschungsmeditation. Er bestimmte die Zeit für den Almosengang und dachte: „Heute schickt es sich für mich, an die Tür des Kaufmanns von Bārāṇasī zu gehen.“ Er kaute sein Zahnputzholz aus der Nāgalatā-Ranke, wusch sein Gesicht im Anotatta-See, stand auf der Realgar-Felsplatte, legte sein Untergewand an, gürtete seinen Gürtel, der wie ein Blitzstrahl glänzte, warf das Obergewand über, nahm seine durch Geisteskraft erschaffene Tonschale, flog durch die Luft und trat genau in dem Augenblick vor die Haustür, als das Mahl des Bodhisatta herbeigetragen wurde. Sobald der Bodhisatta ihn sah, erhob er sich von seinem Sitz, erwies ihm tiefe Ehrerbietung und blickte seinen Diener an. Auf die Frage: „Was soll ich tun, Herr?“ sprach er: „Bringt die Schale des Ehrwürdigen her!“ In genau diesem Moment erhob sich Māra, der Böse, zitternd vor Unruhe und dachte: „Dieser Paccekabuddha hat vor sieben Tagen Nahrung erhalten. Wenn er heute nichts bekommt, wird er sterben. Ich werde ihn vernichten und das Almosengeben des Kaufmanns vereiteln.“ Im selben Augenblick kam er herbei und erschuf auf dem Boden dazwischen eine achtzig Ellen tiefe Grube voll glühender Kohlen. Sie war gefüllt mit glühenden Akazienkohlen, loderte empor, sprühte Funken und erschien wie die große Avīci-Hölle. Nachdem er diese erschaffen hatte, stellte er sich selbst in die Luft. Der Diener, der hinging, um die Schale zu holen, sah sie, geriet in große Furcht und kehrte um. Der Bodhisatta fragte: „Warum, mein Lieber, bist du umgekehrt?“ Er antwortete: „Herr, auf dem Boden dazwischen ist eine riesige Grube voller glühender Kohlen, lodernd und funkensprühend.“ Danach liefen auch alle anderen, die nacheinander herbeikamen, von Furcht ergriffen eilig davon. Bodhisatto cintesi ‘‘ajja mayhaṃ dānantarāyaṃ kātukāmo vasavattī māro uyyutto bhavissati, na kho pana jānāti mārasatena mārasahassenapi mayhaṃ akampiyabhāvaṃ, ajja dāni mayhaṃ vā mārassa vā balamahantataṃ, ānubhāvamahantataṃ jānissāmī’’ti taṃ yathāsajjitameva bhattapātiṃ sayaṃ ādāya gehā nikkhamma aṅgārakāsutaṭe ṭhatvā ākāsaṃ ulloketvā māraṃ disvā ‘‘kosi tva’’nti āha. ‘‘Ahaṃ, māro’’ti. ‘‘Ayaṃ aṅgārakāsu tayā nimmitā’’ti? ‘‘Āma, mayā’’ti. ‘‘Kimatthāyā’’ti. ‘‘Tava dānassa antarāyakaraṇatthāya ca paccekabuddhassa ca jīvitanāsanatthāyā’’ti. Bodhisatto ‘‘neva te ahaṃ attano dānassa antarāyaṃ, na paccekabuddhassa jīvitantarāyaṃ kātuṃ dassāmi, ajja dāni mayhaṃ vā tuyhaṃ vā balamahantataṃ, ānubhāvamahantataṃ jānissāmī’’ti aṅgārakāsutaṭe ṭhatvā ‘‘bhante, paccekabuddha ahaṃ imissā aṅgārakāsuyā adhosīso patamānopi na nivattissāmi, kevalaṃ tumhe mayā dinnaṃ bhojanaṃ paṭiggaṇhathā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta dachte: „Heute ist Māra, der Herrscher über die Vasavatti-Götterwelt, herbeigeeilt, um mein Almosengeben zu vereiteln. Er weiß wohl nicht, dass meine Entschlossenheit selbst durch hundert oder tausend Māras unerschütterlich ist. Heute will ich sehen, wessen Macht und wessen Majestät größer ist, die meine oder die des Māra!“ Er nahm die zubereitete Essensschale selbst in die Hand, trat aus dem Haus, stellte sich an den Rand der Kohlegrube, blickte zum Himmel empor, sah Māra und fragte: „Wer bist du?“ Er antwortete: „Ich bin Māra.“ – „Wurde diese Kohlegrube von dir erschaffen?“ – „Ja, von mir.“ – „Wozu dient sie?“ – „Um dein Almosengeben zu vereiteln und das Leben des Paccekabuddha zu vernichten.“ Der Bodhisatta sprach: „Ich werde dir gewiss weder erlauben, mein Almosengeben zu vereiteln, noch das Leben des Paccekabuddha zu gefährden. Heute will ich sehen, wessen Stärke und wessen Majestät größer ist, die meine oder die deine!“ Er stellte sich an den Rand der Kohlegrube und rief: „Ehrwürdiger Paccekabuddha, selbst wenn ich kopfüber in diese Kohlegrube stürzen sollte, werde ich nicht umkehren. Nehmt nur die von mir dargebotene Speise an!“ Nach diesen Worten sprach er folgende Strophe: 40. 40. ‘‘Kāmaṃ patāmi nirayaṃ, uddhaṃpādo avaṃsiro; Nānariyaṃ karissāmi, handa piṇḍaṃ paṭiggahā’’ti. „Mag ich auch gerne in die Hölle stürzen, die Füße nach oben, den Kopf nach unten; niemals werde ich eine unedle Tat begehen. Wohlan, nehmt diese Opferspeise an!“ Tatthāyaṃ piṇḍattho – bhante, paccekavarabuddha sacepahaṃ tumhākaṃ piṇḍapātaṃ dento ekaṃseneva imaṃ nirayaṃ uddhaṃpādo avaṃsiro hutvā patāmi, tathāpi yadidaṃ adānañca asīlañca ariyehi akattabbattā anariyehi ca kattabbattā ‘‘anariya’’nti vuccati, ‘‘na taṃ anariyaṃ karissāmi, handa imaṃ mayā dīyamānaṃ piṇḍaṃ paṭiggaha paṭiggaṇhāhī’’ti. Ettha ca handāti vossaggatthe nipāto. Dazu ist dies der Sinn: „Ehrwürdiger, edler Paccekabuddha! Selbst wenn ich, während ich Euch diese Almosenspeise darbringe, unweigerlich in diese Hölle stürzen sollte – mit den Füßen nach oben und dem Kopf nach unten –, so werde ich doch das Nicht-Geben und die Sittenlosigkeit, was man ‚unedel‘ (anariya) nennt, weil es von den Edlen nicht getan, von den Unedlen jedoch getan wird, nicht begehen. Wohlan, nehmt diese von mir dargebotene Speise an!“ Das Wort ‚handa‘ ist hier eine Partikel im Sinne des Hingegebenseins. Evaṃ vatvā bodhisatto daḷhasamādānena bhattapātiṃ gahetvā aṅgārakāsumatthakena pakkhanto, tāvadeva asītihatthagambhīrāya aṅgārakāsuyā talato uparūparijātaṃ satapattapupphitaṃ ekaṃ mahāpadumaṃ uggantvā bodhisattassa pāde sampaṭicchi. Tato mahātumbamattā reṇu uggantvā [Pg.251] mahāsattassa muddhani ṭhatvā sakalasarīraṃ suvaṇṇacuṇṇasamokiṇṇamiva akāsi. So padumakaṇṇikāya ṭhatvā nānaggarasabhojanaṃ paccekabuddhassa patte patiṭṭhāpesi. So taṃ paṭiggahetvā anumodanaṃ katvā pattaṃ ākāse khipitvā passantasseva mahājanassa sayampi vehāsaṃ abbhuggantvā nānappakāraṃ valāhakapantiṃ maddamāno viya himavantameva gato. Māropi parājito domanassaṃ patvā attano vasanaṭṭhānameva gato. Bodhisatto pana padumakaṇṇikāya ṭhitakova mahājanassa dānasīlasaṃvaṇṇanena dhammaṃ desetvā mahājanena parivuto attano nivesanameva pavisitvā yāvajīvaṃ dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nach diesen Worten hielt der Bodhisatta mit fester Entschlossenheit die Speiseschale und schritt über die Kohlegrube hinweg. Im selben Augenblick erhob sich vom Grunde der achtzig Ellen tiefen Kohlegrube eine riesige, hundertblättrige Lotusblüte und fing die Füße des Bodhisatta auf. Daraufhin stieg Blütenstaub im Ausmaß eines großen Scheffels empor, senkte sich auf das Haupt des Großen Wesens und bedeckte seinen ganzen Körper, als wäre er mit Goldstaub überschüttet worden. Auf dem Blütenboden des Lotus stehend, reichte er die köstliche Speise in die Schale des Paccekabuddha. Dieser nahm die Gabe an, sprach Worte des Dankes, warf seine Schale in die Luft und erhob sich vor den Augen der versammelten Menge selbst in den Himmel. Wie auf verschiedenen Wolkenbänken dahinschreitend, begab er sich direkt zum Himavanta-Gebirge. Auch Māra zog sich besiegt und betrübt an seinen eigenen Wohnort zurück. Der Bodhisatta aber, der noch immer auf dem Lotusblütenboden stand, verkündete der Menschenmenge das Dhamma, indem er das Geben von Almosen und die Tugend rühmte. Umgeben von der Menge kehrte er in sein Haus zurück, wirkte zeit seines Lebens heilsame Taten wie das Almosengeben und ging schließlich gemäß seinem Karma ein. Satthā ‘‘nayidaṃ, gahapati, acchariyaṃ, yaṃ tvaṃ evaṃ dassanasampanno etarahi devatāya na kampito, pubbe paṇḍitehi katameva acchariya’’nti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā paccekabuddho tattheva parinibbāyi, māraṃ parājetvā padumakaṇṇikāya ṭhatvā paccekabuddhassa piṇḍapātadāyako bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Hausvater, es ist kein Wunder, dass du, der du nun mit dieser Erkenntnis der Stromeintrittschaft begabt bist, jetzt nicht von einer Gottheit erschüttert wurdest; die von den Weisen in vergangenen Zeiten vollbrachte Tat ist wahrlich bewundernswert.“ Nachdem der Erhabene diese Lehrrede gehalten hatte, stellte er die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals erlangte jener Paccekabuddha eben dort das Parinibbāna. Der Kaufmann von Bārāṇasī aber, der Māra besiegte, auf dem Blütenboden des Lotus stand und dem Paccekabuddha die Almosenspeise darbrachte, das war ich selbst.“ Khadiraṅgārajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Khadiraṅgāra-Jātaka, das zehnte. Kulāvakavaggo catuttho. Das vierte Kapitel, das Kulāvaka-Kapitel. Tassuddānaṃ – Dessen Inhaltsverzeichnis: Kulāvakañca naccañca, sammodamacchavaṭṭakaṃ; Sakuṇaṃ tittiraṃ bakaṃ, nandañca khadiraṅgāranti. Das Kulāvaka-Jātaka und das Nacca-Jātaka, Sammodamāna, Maccha und Vaṭṭaka, Sakuṇa, Tittira, Baka, Nanda und das Khadiraṅgāra-Jātaka. 5. Atthakāmavaggo 5. Das Atthakāma-Kapitel
[41] 1. Losakajātakavaṇṇanā [41] 1. Die Erklärung des Losaka-Jātaka Yo atthakāmassāti idaṃ satthā jetavane viharanto losakatissattheraṃ nāma ārabbha kathesi. Ko panesa losakatissatthero nāmāti? Kosalaraṭṭhe eko attano kulanāsako kevaṭṭaputtako [Pg.252] alābhī bhikkhu. So kira nibbattaṭṭhānetā cavitvā kosalaraṭṭhe ekasmiṃ kulasahassavāse kevaṭṭagāme ekissā kevaṭṭiyā kucchismiṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. Tassa paṭisandhiggahaṇadivase taṃ kulasahassaṃ jālahatthaṃ nadiyañca taḷākādīsu ca macche pariyesantaṃ ekaṃ khuddakamacchampi nālattha. Tato paṭṭhāya ca te kevaṭṭā parihāyantiyeva. Tasmiñhi kucchigateyeva nesaṃ gāmo satta vāre agginā daḍḍho, satta vāre raññā daṇḍito. Evaṃ anukkamena duggatā jātā. Te cintayiṃsu ‘‘pubbe amhākaṃ evarūpaṃ natthi, idāni pana parihāyāma, amhākaṃ antare ekāya kāḷakaṇṇiyā bhavitabbaṃ, dve bhāgā homā’’ti pañca pañca kulasatāni ekato ahesuṃ. Tato yattha tassa mātāpitaro, sova koṭṭhāso parihāyati, itaro vaḍḍhati. Te tampi koṭṭhāsaṃ dvidhā, tampi dvidhāti evaṃ yāva tameva kulaṃ ekaṃ ahosi, tāva vibhajitvā tesaṃ kāḷakaṇṇibhāvaṃ ñatvā pothetvā nikkaḍḍhiṃsu. 'Yo atthakāmassa' – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf den Ehrwürdigen Losaka Tissa. Wer aber war dieser Ehrwürdige Losaka Tissa? Er war ein Mönch im Kosala-Land, der das Verderben seiner eigenen Sippe herbeiführte, der Sohn eines Fischers und ohne jeden Gewinn. Er schied aus seiner früheren Existenz und nahm, wie es heißt, im Kosala-Land in einem Fischerdorf von tausend Familien im Schoß einer Fischerfrau Wiedergeburt an. Am Tag seiner Empfängnis fingen diese tausend Familien, die mit Netzen in Händen im Fluss und in Teichen nach Fischen suchten, nicht einen einzigen kleinen Fisch. Von da an verarmten diese Fischer immer mehr. Denn während er sich im Mutterleib befand, brannte ihr Dorf siebenmal ab und wurde siebenmal vom König mit einer Strafe belegt. So wurden sie allmählich bitterarm. Sie dachten: 'Früher hatten wir kein solches Unheil, jetzt aber verarmen wir. Unter uns muss ein Unglücksbringer sein, lasst uns in zwei Gruppen teilen.' So bildeten sie Gruppen von jeweils fünfhundert Familien. Danach verarmte stets der Teil, in dem sich seine Eltern befanden, während der andere florierte. Sie teilten diesen Teil wiederum in zwei Hälften und diesen wiederum in zwei, bis nur noch diese eine Familie übrig war. Nachdem sie diese aufgeteilt und so ihre Unglückseligkeit erkannt hatten, schlugen sie sie und jagten sie davon. Athassa mātā kicchena jīvamānā paripakke gabbhe ekasmiṃ ṭhāne vijāyi. Pacchimabhavikasattaṃ na sakkā nāsetuṃ, antoghaṭe padīpo viya tassa hadaye arahattassa upanissayo jalati. Sā taṃ dārakaṃ paṭijaggitvā ādhāvitvā paridhāvitvā vicaraṇakāle ekamassa kapālakaṃ hatthe datvā ‘‘putta, etaṃ gharaṃ pavisā’’ti pesetvā palātā. So tato paṭṭhāya ekakova hutvā tattha tattha bhikkhaṃ pariyesitvā ekasmiṃ ṭhāne sayati, na nhāyati, na sarīraṃ paṭijaggati, paṃsupisācako viya kicchena jīvikaṃ kappeti. So anukkamena sattavassiko hutvā ekasmiṃ gehadvāre ukkhalidhovanassa chaḍḍitaṭṭhāne kāko viya ekekaṃ bhattasitthaṃ uccinitvā khādati. Daraufhin brachte seine Mutter, die ihr Leben nur mühsam fristete, nach Ablauf der Schwangerschaft das Kind an einem Ort zur Welt. Es ist unmöglich, ein Wesen in seiner letzten Existenz zu vernichten; wie eine Lampe in einem Tonkrug leuchtete in seinem Herzen die starke Voraussetzung für die Arhatschaft. Sie zog den Knaben auf, und als er alt genug war, um hin und her zu laufen und umherzustreifen, gab sie ihm eine kleine Scherbe in die Hand, schickte ihn mit den Worten 'Mein Sohn, geh in dieses Haus hinein' fort und floh. Von da an war er ganz allein, suchte hier und dort nach Almosen, schlief an irgendeinem Ort, badete nicht, pflegte seinen Körper nicht und fristete mühsam sein Dasein wie ein Schmutzdämon. Als er allmählich sieben Jahre alt geworden war, suchte und aß er an einer Hauspforte, wo das Spülwasser der Töpfe ausgegossen wurde, wie eine Krähe einzelne Reiskörner. Atha naṃ dhammasenāpati sāvatthiyaṃ piṇḍāya caramāno disvā ‘‘ayaṃ satto atikāruññappatto, kataragāmavāsiko nu kho’’ti tasmiṃ mettacittaṃ vaḍḍhetvā ‘‘ehi, re’’ti āha. So āgantvā theraṃ vanditvā aṭṭhāsi. Atha naṃ thero ‘‘kataragāmavāsikosi, kahaṃ vā te mātāpitaro’’ti pucchi. ‘‘Ahaṃ, bhante, nippaccayo, mayhaṃ mātāpitaro maṃ nissāya ‘kilantamhā’ti maṃ chaḍḍetvā palātā’’ti. ‘‘Api pana pabbajissasī’’ti. ‘‘Bhante, ahaṃ tāva pabbajeyyaṃ, mādisaṃ pana kapaṇaṃ ko pabbājessasī’’ti? ‘‘Ahaṃ [Pg.253] pabbājessāmī’’ti. ‘‘Sādhu, bhante, pabbājethā’’ti. Thero tassa khādanīyabhojanīyaṃ datvā taṃ vihāraṃ netvā sahattheneva nhāpetvā pabbājetvā paripuṇṇavassaṃ upasampādesi. So mahallakakāle ‘‘losakatissatthero’’ti paññāyittha appapuñño appalābho. Tena kira asadisadānepi kucchipūro na laddhapubbo, jīvitaghaṭanamattameva labhati. Tassa hi patte ekasmiṃyeva yāguuḷuṅke dinne patto samatittiko viya hutvā paññāyati. Atha manussā ‘‘imassa patto pūro’’ti heṭṭhā yāguṃ denti. Tassa patte yāguṃ dānakāle manussānaṃ bhājane yāgu antaradhāyatītipi vadanti. Khajjakādīsupi eseva nayo. Als ihn der Feldherr der Lehre (Sāriputta) erblickte, während er in Sāvatthī auf Almosengang war, dachte er: 'Dieses Wesen ist in tiefstes Elend geraten; aus welchem Dorf mag er wohl stammen?' Er empfand tiefes Wohlwollen für ihn und rief: 'Komm her, mein Junge!' Er kam herbei, verneigte sich vor dem Ehrwürdigen und blieb stehen. Da fragte ihn der Ehrwürdige: 'Aus welchem Dorf stammst du, und wo sind deine Eltern?' – 'Ehrwürdiger Herr, ich bin ohne Schutz. Meine Eltern sagten, sie seien meinetwegen erschöpft, verließen mich und flohen.' – 'Möchtest du denn das Ordensleben aufnehmen?' – 'Ehrwürdiger Herr, ich würde mich wohl ordinieren lassen, doch wer würde einen so Hilflosen wie mich ordinieren?' – 'Ich werde dich ordinieren.' – 'Es ist gut, ehrwürdiger Herr, ordiniert mich bitte.' Der Ehrwürdige gab ihm feste und weiche Speise, brachte ihn zum Kloster, wusch ihn mit eigenen Händen, ordinierte ihn (als Novizen) und erteilte ihm, als er das entsprechende Alter erreicht hatte, die höhere Ordination. Als er älter wurde, war er als der Ehrwürdige Losaka Tissa bekannt, doch er hatte nur wenig Verdienst und erhielt kaum Gaben. Man sagt, dass er selbst bei der Unvergleichlichen Almosenspende (Asadisadāna) niemals eine Sättigung des Magens erfuhr, sondern stets nur gerade so viel erhielt, wie zum Überleben reichte. Denn wenn ihm auch nur eine einzige Schöpfkelle Suppe in seine Almosenschale gegeben wurde, erschien die Schale sogleich wie bis zum Rand gefüllt. Dann dachten die Menschen: 'Seine Schale ist voll', und gaben die Suppe den nachfolgenden Mönchen. Man erzählt sich auch, dass zur Zeit, da man Suppe in seine Schale goss, die Suppe im Gefäß der Menschen verschwand. Bei festen Speisen und Ähnlichem war es ebenso. So aparena samayena vipassanaṃ vaḍḍhetvā aggaphale arahatte patiṭṭhitopi appalābhova ahosi. Athassa anupubbena āyusaṅkhāresu parihīnesu parinibbānadivaso sampāpuṇi. Dhammasenāpati āvajjento tassa parinibbānabhāvaṃ ñatvā ‘‘ayaṃ losakatissatthero ajja parinibbāyissati, ajja mayā etassa yāvadatthaṃ āhāraṃ dātuṃ vaṭṭatī’’ti taṃ ādāya sāvatthiṃ piṇḍāya pāvisi. Thero taṃ nissāya tāva bahumanussāya sāvatthiyā hatthaṃ pasāretvā vandanamattampi nālattha. Atha naṃ thero ‘‘gacchāvuso, āsanasālāya nisīdā’’ti uyyojetvā gato. Taṃ āgatameva manussā ‘‘ayyo, āgato’’ti āsane nisīdāpetvā bhojesi. Theropi ‘‘imaṃ losakassa dethā’’ti laddhāhāraṃ pesesi. Taṃ gahetvā gatā losakatissattheraṃ asaritvā sayameva bhuñjiṃsu. Atha therassa uṭṭhāya vihāraṃ gamanakāle losakatissatthero āgantvā theraṃ vandi, thero nivattitvā ṭhitakova ‘‘laddhaṃ te, āvuso, bhatta’’nti pucchi. Labhissāma no, bhanteti. Thero saṃvegapatto kālaṃ olokesi, kālo atikkanto. Thero ‘‘hotāvuso, idheva nisīdā’’ti losakattheraṃ āsanasālāyaṃ nisīdāpetvā kosalarañño nivesanaṃ agamāsi. Rājā therassa pattaṃ gāhāpetvā ‘‘bhattassa akālo’’ti pattapūraṃ catumadhuraṃ dāpesi. Thero taṃ ādāya gantvā ‘‘ehāvuso, tissa imaṃ catumadhuraṃ bhuñjā’’ti vatvā pattaṃ gahetvā aṭṭhāsi. So there gāravena lajjanto na paribhuñjati. Atha naṃ thero ‘‘ehāvuso tissa, ahaṃ imaṃ pattaṃ gahetvāva ṭhassāmi, tvaṃ nisīditvā paribhuñja. Sace ahaṃ pattaṃ hatthato [Pg.254] muñceyyaṃ, kiñci na bhaveyyā’’ti āha. Athāyasmā losakatissatthero aggasāvake dhammasenāpatimhi pattaṃ gahetvā ṭhite catumadhuraṃ paribhuñji. Taṃ therassa ariyiddhibalena parikkhayaṃ na agamāsi. Tadā losakatissatthero yāvadatthaṃ udarapūraṃ katvā paribhuñji, taṃ divasaṃyeva ca anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyi. Sammāsambuddho santike ṭhatvā sarīranikkhepaṃ kāresi, dhātuyo gahetvā cetiyaṃ kariṃsu. Als er zu einer anderen Zeit die Einsichtsmeditation entfaltete und sich in der höchsten Frucht der Arhatschaft etablierte, blieb er dennoch jemand von nur geringem Gewinn. Als schließlich seine Lebenskräfte allmählich schwanden, nahte der Tag seines Parinibbāna. Der Feldherr der Lehre (Sāriputta) besann sich darauf, und als er erkannte, dass der Ehrwürdige Losaka Tissa heute verscheiden würde, dachte er: 'Dieser Ehrwürdige Losaka Tissa wird heute das Parinibbāna erreichen. Heute ist es angemessen, dass ich ihm so viel Nahrung gebe, wie er wünscht.' Er nahm ihn mit sich und betrat Sāvatthī für den Almosengang. Doch wegen ihm (Losaka Tissa) erhielt der Ehrwürdige (Sāriputta) in dem so volkreichen Sāvatthī, selbst als er seine Hand ausstreckte, nicht einmal eine ehrerbietige Begrüßung, geschweige denn Nahrung. Da schickte ihn der Ehrwürdige fort und sagte: 'Geh, Bruder, und setze dich in die Speisehalle.' Kaum war er fortgegangen, sprachen die Menschen bei der Ankunft des Ehrwürdigen Sāriputta: 'Der Edle ist gekommen!', ließen ihn auf einem Sitz Platz nehmen und bewirteten ihn. Auch der Ehrwürdige sandte die erhaltene Nahrung ab und sagte: 'Gebt dies Losaka.' Diejenigen, welche die Nahrung mitnahmen, vergaßen jedoch den Ehrwürdigen Losaka Tissa und verzehrten sie selbst. Als sich der Ehrwürdige daraufhin erhob, um zum Kloster zurückzukehren, kam der Ehrwürdige Losaka Tissa herbei und verneigte sich vor ihm. Der Ehrwürdige drehte sich um, blieb stehen und fragte: 'Bruder, hast du deine Speise erhalten?' – 'Werden wir sie denn noch erhalten, ehrwürdiger Herr? (Nein, ich habe nichts bekommen)', antwortete er. Der Ehrwürdige wurde von tiefem Erschrecken (Saṃvega) ergriffen und blickte auf die Zeit; die Mittagszeit war bereits verstrichen. Der Ehrwürdige sprach: 'Es sei drum, Bruder, setze dich genau hierhin', ließ den Ehrwürdigen Losaka in der Speisehalle Platz nehmen und begab sich zur Residenz des Königs von Kosala. Der König ließ die Schale des Ehrwürdigen nehmen und spendete, da er wusste, dass es für eine normale Mahlzeit zu spät war, eine Schale voll Catumadhura (die vier süßen Köstlichkeiten). Der Ehrwürdige nahm diese mit sich, kehrte zurück und sagte: 'Komm, Bruder Tissa, iss dieses Catumadhura', und hielt dabei die Schale fest, während er stehen blieb. Aus Ehrfurcht vor dem Ehrwürdigen schämte sich dieser jedoch und mochte nicht essen. Da sprach der Ehrwürdige zu ihm: 'Komm, Bruder Tissa, ich werde diese Schale halten und so stehen bleiben; setze dich hin und iss. Wenn ich die Schale aus meiner Hand ließe, würde gewiss nichts davon übrig bleiben.' Daraufhin aß der ehrwürdige Losaka Tissa das Catumadhura, während der Hauptschüler und Feldherr der Lehre die Schale hielt. Durch die edle übernatürliche Kraft (Ariyiddhi) des Ehrwürdigen ging dieses Catumadhura nicht zur Neige. Damals aß der Ehrwürdige Losaka Tissa nach Herzenslust, füllte seinen Magen und ging noch am selben Tag im rückstandslosen Erlöschenselement (Anupādisesa-Nibbānadhātu) in das Parinibbāna ein. Der vollkommen Erwachte stand in der Nähe und veranlasste die Bestattung des Körpers; man nahm die Reliquien an sich und errichtete eine Stupa. Tadā bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitvā ‘‘āvuso, aho losakatissatthero appapuñño appalābhī, evarūpena nāma appapuññena appalābhinā kathaṃ ariyadhammo laddho’’ti kathentā nisīdiṃsu. Satthā dhammasabhaṃ gantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. Te ‘‘imāya nāma, bhante’’ti ārocayiṃsu. Satthā ‘‘bhikkhave, eso bhikkhu attano alābhibhāvañca ariyadhammalābhibhāvañca attanāva akāsi. Ayañhi pubbe paresaṃ lābhantarāyaṃ katvā appalābhī jāto, ‘‘aniccaṃ, dukkhaṃ, anattā’’ti vipassanāya yuttabhāvassa balena ariyadhammalābhī jāto’’ti vatvā atītaṃ āhari. Zu jener Zeit versammelten sich die Mönche in der Dhamma-Halle, saßen beisammen und sprachen: „Ihr Ehrwürdigen, wie erstaunlich! Der ältere Mönch Losakatissa hat wahrlich wenig Verdienst und erhält kaum Gaben. Wie konnte jemand von solcher Art, mit so wenig Verdienst und so wenig Gewinn, die edle Lehre erlangen?“ Der Erhabene begab sich zur Dhamma-Halle und fragte: „Mönche, mit welchem Gespräch sitzt ihr nun hier zusammen?“ Sie antworteten: „Mit diesem und jenem, o Herr.“ Der Erhabene sprach: „Mönche, dieser Mönch hat sowohl seinen Mangel an Gewinn als auch das Erlangen der edlen Lehre selbst verursacht. Denn in der Vergangenheit behinderte er den Gewinn anderer und wurde so zu einem Menschen mit wenig Gewinn. Doch durch die Kraft seiner Hingabe an die Einsicht (Vipassanā), indem er dachte: ‚unbeständig, leidvoll, nicht-selbst‘ (anicca, dukkha, anattā), erlangte er schließlich die edle Lehre.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte kira kassapasammāsambuddhakāle aññataro bhikkhu ekaṃ kuṭumbikaṃ nissāya gāmakāvāse vasati pakatatto sīlavā vipassanāya yuttappayutto. Atheko khīṇāsavatthero samavattavāsaṃ vasamāno anupubbena tassa bhikkhuno upaṭṭhākakuṭumbikassa vasanagāmaṃ sampatto. Kuṭumbiko therassa iriyāpatheyeva pasīditvā pattaṃ ādāya gharaṃ pavesetvā sakkaccaṃ bhojetvā thokaṃ dhammakathaṃ sutvā theraṃ vanditvā ‘‘bhante, amhākaṃ dhuravihārameva gacchatha, mayaṃ sāyanhasamaye āgantvā passissāmā’’ti āha. Thero vihāraṃ gantvā nevāsikattheraṃ vanditvā āpucchitvā ekamantaṃ nisīdi. Sopi tena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā ‘‘laddho te, āvuso, bhikkhāhāro’’ti pucchi. ‘‘Āma, laddho’’ti. ‘‘Kahaṃ laddho’’ti? ‘‘Tumhākaṃ dhuragāme kuṭumbikaghare’’ti. Evañca pana vatvā attano senāsanaṃ pucchitvā paṭijaggitvā pattacīvaraṃ paṭisāmetvā jhānasukhena phalasukhena ca vītināmento nisīdi. In der Vergangenheit, zur Zeit des vollkommen erleuchteten Kassapa-Buddhas, lebte ein gewisser Mönch in einem Dorfkloster, unterstützt von einem Hausvater. Er war von gutem Charakter, tugendhaft und der Ausübung der Einsichtsmeditation (Vipassanā) hingegeben. Damals erreichte ein älterer Mönch, dessen Triebe versiegt waren, der ein ausgeglichenes Wanderleben führte, im Laufe der Zeit das Wohndorf jenes Hausvaters, der den dortigen Mönch unterstützte. Der Hausvater war allein schon durch die würdevolle Haltung des älteren Mönchs tief beeindruckt, nahm dessen Almosenschale, bat ihn ins Haus, bewirtete ihn ehrerbietig, hörte eine kurze Dhamma-Lehrrede, verneigte sich vor dem älteren Mönch und sagte: „Ehrwürdiger Herr, bitte geht zu unserem Hauptkloster. Wir werden am Abend kommen, um Euch aufzusuchen.“ Der ältere Mönch ging zum Kloster, verneigte sich vor dem ansässigen Mönch, bat um Erlaubnis und setzte sich an eine Seite. Dieser wechselte freundliche Worte mit ihm und fragte: „Freund, hast du Almosen erhalten?“ – „Ja, ich habe welche erhalten.“ – „Wo hast du sie erhalten?“ – „Im Hause des Hausvaters in eurem Hauptdorf.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erkundigte er sich nach seiner Unterkunft, bereitete sie vor, räumte Schale und Gewand fort und verweilte, indem er seine Zeit im Glück der Vertiefung (Jhāna) und im Glück der Frucht (Phala) verbrachte. Sopi [Pg.255] kuṭumbiko sāyanhe gandhamālañceva padīpeyyañca gāhāpetvā vihāraṃ gantvā nevāsikattheraṃ vanditvā ‘‘bhante, eko āgantukatthero atthi, āgato nu kho’’ti pucchi. ‘‘Āma, āgato’’ti. ‘‘Idāni kaha’’nti. ‘‘Asukasenāsane nāmā’’ti. So tassa santikaṃ gantvā vanditvā ekamantaṃ nisinno dhammakathaṃ sutvā sītalavelāya cetiyañca bodhiñca pūjetvā dīpe jāletvā ubhopi jane nimantetvā gato. Nevāsikattheropi kho ‘‘ayaṃ kuṭumbiko paribhinno, sacāyaṃ bhikkhu imasmiṃ vihāre vasissati, na maṃ esa kismiñci gaṇayissatī’’ti there anattamanataṃ āpajjitvā ‘‘imasmiṃ vihāre etassa avasanākāro mayā kātuṃ vaṭṭatī’’ti tena upaṭṭhānavelāya āgatena saddhiṃ kiñci na kathesi. Khīṇāsavatthero tassa ajjhāsayaṃ jānitvā ‘‘ayaṃ thero mama kule vā gaṇe vā apalibuddhabhāvaṃ na jānātī’’ti attano vasanaṭṭhānaṃ gantvā jhānasukhena phalasukhena vītināmesi. Auch jener Hausvater ließ am Abend Duftstoffe, Blumen und Lampen bringen, ging zum Kloster, verneigte sich vor dem ansässigen Mönch und fragte: „Ehrwürdiger Herr, ein gastbesuchender älterer Mönch soll gekommen sein; ist er eingetroffen?“ – „Ja, er ist eingetroffen.“ – „Wo ist er jetzt?“ – „In jener Unterkunft.“ Er begab sich zu ihm, verneigte sich vor ihm, setzte sich an eine Seite, hörte eine Dhamma-Lehrrede und verehrte in der Kühle des Abends den Schrein (Cetiya) und den Bodhi-Baum, zündete die Lampen an, lud beide Mönche für den nächsten Tag ein und ging fort. Der ansässige Mönch dachte jedoch: „Dieser Hausvater hat sich von mir abgewandt. Wenn dieser Mönch in diesem Kloster bleibt, wird mich der Hausvater für nichts mehr achten.“ Er geriet in Unwillen gegenüber dem älteren Mönch und dachte: „Ich muss dafür sorgen, dass er nicht in diesem Kloster bleiben kann.“ Als der Gastmönch zur Zeit des Aufwartens zu ihm kam, sprach er kein Wort mit ihm. Der ältere Mönch, dessen Triebe versiegt waren, erkannte dessen Absicht und dachte: „Dieser ältere Mönch weiß nicht, dass ich keinerlei Anhaftung an Unterstützerfamilien oder Anhängerschaften besitze.“ Er begab sich zu seinem Aufenthaltsort zurück und verbrachte die Zeit im Glück der Vertiefung und der Frucht. Nevāsikopi punadivase nakhapiṭṭhena gaṇḍiṃ paharitvā nakhena dvāraṃ ākoṭetvā kuṭumbikassa gehaṃ agamāsi. So tassa pattaṃ gahetvā paññattāsane nisīdāpetvā ‘‘āgantukatthero kahaṃ, bhante’’ti pucchi. ‘‘Nāhaṃ tava kulūpakassa pavattiṃ jānāmi, gaṇḍiṃ paharantopi dvāraṃ ākoṭentopi pabodhetuṃ nāsakkhiṃ, hiyyo tava gehe paṇītabhojanaṃ bhuñjitvā jīrāpetuṃ asakkonto idāni niddaṃ okkantoyeva bhavissati, tvaṃ pasīdamāno evarūpesuyeva ṭhānesu pasīdasī’’ti āha – ‘‘khīṇāsavattheropi attano bhikkhācāravelaṃ sallakkhetvā sarīraṃ paṭijaggitvā pattacīvaramādāya ākāse uppatitvā aññattha agamāsi. So kuṭumbiko nevāsikattheraṃ sappimadhusakkharābhisaṅkhataṃ pāyāsaṃ pāyetvā pattaṃ gandhacuṇṇehi ubbaṭṭetvā puna pūretvā ‘‘bhante, so thero maggakilanto bhavissati, idamassa harathā’’ti adāsi. Itaro apaṭikkhipitvāva gahetvā gacchanto ‘‘sace so bhikkhu imaṃ pāyāsaṃ pivissati, gīvāyaṃ gahetvā nikkaḍḍhiyamānopi na gamissati. Sace panāhaṃ imaṃ pāyāsaṃ manussānaṃ dassāmi, pākaṭaṃ me kammaṃ bhavissati. Sace udake opilāpessāmi, udakapiṭṭhe sappi paññāyissati[Pg.256]. Sace bhūmiyaṃ chaḍḍessāmi, kākasannipātena paññāyissati. Kattha nu kho imaṃ chaḍḍeyya’’nti upadhārento ekaṃ jhāmakkhettaṃ disvā aṅgāre viyūhitvā tattha pakkhipitvā upari aṅgārehi paṭicchādetvā vihāraṃ gato taṃ bhikkhuṃ adisvā cintesi ‘‘addhā so bhikkhu khīṇāsavo mama ajjhāsayaṃ viditvā aññattha gato bhavissati, aho mayā udarahetu ayuttaṃ kata’’nti tāvadevassa mahantaṃ domanassaṃ udapādi. Tato paṭṭhāyeva ca manussapeto hutvā na cirasseva kālaṃ katvā niraye nibbatti. Am nächsten Tag schlug der ansässige Mönch den Gong nur mit der Rückseite seines Fingernagels, klopfte mit dem Fingernagel an die Tür und begab sich zum Haus des Hausvaters. Dieser nahm seine Almosenschale, ließ ihn auf dem bereitgestellten Sitz Platz nehmen und fragte: „Ehrwürdiger Herr, wo ist der gastbesuchende älterer Mönch?“ Er sprach: „Ich weiß nicht, wie es um deinen Vertrauten steht. Obwohl ich den Gong schlug und an die Tür klopfte, konnte ich ihn nicht wecken. Gestern hat er in deinem Haus exquisite Speisen gegessen, konnte sie wohl nicht verdauen und liegt nun sicherlich im tiefen Schlummer. Wenn du Verehrung schenkst, dann verehrst du eben solche Leute!“ Der ältere Mönch, dessen Triebe versiegt waren, hatte jedoch aufmerksam die Zeit für den Almosengang bedacht, reinigte seinen Körper, nahm Schale und Gewand, flog in die Luft empor und begab sich an einen anderen Ort. Der Hausvater reichte dem ansässigen Mönch eine mit Ghee, Honig und Zucker zubereitete Milchspeise (Pāyāsa), rieb die Almosenschale mit Duftpulver aus, füllte sie erneut mit Milchspeise und gab sie ihm mit den Worten: „Ehrwürdiger Herr, jener ältere Mönch ist gewiss müde von der Reise. Bringt ihm dies.“ Der andere wies es nicht zurück, nahm es an und dachte auf dem Weg: „Wenn jener Mönch diese Milchspeise isst, wird er selbst dann nicht gehen, wenn man ihn am Hals packt und hinauswirft. Wenn ich diese Milchspeise jedoch anderen Menschen gebe, wird meine Tat bekannt werden. Wenn ich sie im Wasser schwimmen lasse, wird das Ghee auf der Wasseroberfläche sichtbar sein. Wenn ich sie auf die Erde schütte, wird es durch die herbeiströmenden Krähen auffallen. Wo also soll ich sie wegwerfen?“ Während er überlegte, erblickte er ein abgebranntes Feld, scharrte die Kohlen beiseite, schüttete die Speise hinein, bedeckte sie von oben mit Kohlen und kehrte zum Kloster zurück. Als er den Mönch dort nicht vorfand, dachte er: „Wahrlich, jener Mönch hatte seine Triebe versiegt. Da er meine Gesinnung erkannt hat, ist er wohl an einen anderen Ort gegangen. Oh weh, um meines Bauches willen habe ich Unrechtes getan!“ Sogleich stieg großer Kummer in ihm auf. Von da an lebte er wie ein Mensch-Preta (Hungergeist im Menschenkörper), starb bald darauf und wurde in der Hölle wiedergeboren. So bahūni vassasatasahassāni niraye paccitvā pakkāvasesena paṭipāṭiyā pañcajātisatesu yakkho hutvā ekadivasampi udarapūraṃ āhāraṃ na labhi. Ekadivasaṃ pana gabbhamalaṃ udarapūraṃ labhi. Puna pañcajātisatesu sunakho ahosi. Tadāpi ekadivasaṃ bhattavamanaṃ udarapūraṃ labhi, sesakāle pana tena udarapūro āhāro nāma na laddhapubbo. Sunakhayonito pana cavitvā kāsiraṭṭhe ekasmiṃ gāme duggatakule nibbatti. Tassa nibbattito paṭṭhāya taṃ kulaṃ paramaduggatameva jātaṃ, jātito uddhaṃ udakakañjikāmattampi na labhi. Tassa pana ‘‘mittavindako’’ti nāmaṃ ahosi. Mātāpitaro chātakadukkhaṃ adhivāsetuṃ asakkontā ‘‘gaccha kāḷakaṇṇī’’ti taṃ pothetvā nīhariṃsu. So apaṭisaraṇo vicaranto bārāṇasiṃ agamāsi. Tadā bodhisatto bārāṇasiyaṃ disāpāmokkho ācariyo hutvā pañca māṇavakasatāni sippaṃ vāceti. Tadā bārāṇasivāsino duggatānaṃ paribbayaṃ datvā sippaṃ sikkhāpenti. Ayampi mittavindako bodhisattassa santike sippaṃ sikkhati. So pharuso anovādakkhamo taṃ taṃ paharanto vicarati, bodhisattena ovadiyamānopi ovādaṃ na gaṇhāti. Taṃ nissāya āyopissa mando jāto. Nachdem dieser viele hunderttausend Jahre in der Hölle gelitten hatte, wurde er aufgrund des verbleibenden Karmas nacheinander in fünfhundert Existenzen als Yakkha wiedergeboren und erhielt nicht ein einziges Mal eine magenfüllende Mahlzeit. Nur an einem einzigen Tag jedoch bekam er den Bauch voll mit Geburtsunreinheiten zu essen. Danach wurde er für fünfhundert Existenzen ein Hund. Auch in jener Zeit erhielt er nur an einem einzigen Tag erbrochene Speise, um seinen Bauch zu füllen; in der übrigen Zeit jedoch hatte er noch nie zuvor eine magenfüllende Mahlzeit erhalten. Nachdem er aus dem Schoß des Hundedaseins geschieden war, wurde er im Kasi-Reich in einem Dorf in einer bitterarmen Familie geboren. Von seiner Geburt an wurde diese Familie völlig verarmt, und nach seiner Geburt erhielt er nicht einmal dünne Reisschleimsuppe. Sein Name war Mittavindaka. Da seine Eltern das Leid des Hungers nicht ertragen konnten, schlugen sie ihn, riefen: „Geh fort, du Unglücksbringer!“, und jagten ihn davon. Schutzlos umherwandernd gelangte er nach Bārāṇasī. Zu jener Zeit war der Bodhisatta in Bārāṇasī ein weltberühmter Lehrer und unterrichtete fünfhundert junge Brahmanenschüler in den Künsten. Damals gaben die Einwohner von Bārāṇasī den Armen finanzielle Unterstützung und ließen sie die Künste erlernen. Auch dieser Mittavindaka lernte die Künste in der Gegenwart des Bodhisatta. Er war jedoch grob und unbelehrbar, wanderte umher, indem er diesen und jenen schlug, und nahm die Ermahnungen des Bodhisatta nicht an, obwohl dieser ihn ermahnte. Wegen ihm wurden auch die Einnahmen des Lehrers spärlich. Atha so māṇavakehi saddhiṃ bhaṇḍitvā ovādaṃ aggaṇhanto tato palāyitvā āhiṇḍanto ekaṃ paccantagāmaṃ patvā bhatiṃ katvā jīvati. So tattha ekāya duggatitthiyā saddhiṃ saṃvāsaṃ kappesi. Sā taṃ nissāya dve dārake vijāyi. Gāmavāsino ‘‘amhākaṃ susāsanaṃ dussāsanaṃ āroceyyāsī’’ti mittavindakassa bhatiṃ datvā taṃ gāmadvāre kuṭikāya [Pg.257] vasāpesuṃ. Taṃ pana mittavindakaṃ nissāya te paccantagāmavāsino sattakkhattuṃ rājadaṇḍaṃ agamaṃsu, sattakkhattuṃ nesaṃ gehāni jhāyiṃsu, sattakkhattuṃ taḷākaṃ bhijji. Te cintayiṃsu ‘‘amhākaṃ pubbe imassa mittavindakassa anāgamanakāle evarūpaṃ natthi, idāni panassa āgatakālato paṭṭhāya parihāyāmā’’ti taṃ pothetvā nīhariṃsu. Daraufhin stritt er mit den anderen Schülern, nahm keine Ermahnung an, floh von dort und wanderte umher, bis er in ein Grenzdorf gelangte, wo er seinen Lebensunterhalt durch Lohnarbeit verdiente. Dort ging er eine Lebensgemeinschaft mit einer armen Frau ein. Diese gebar ihm zwei Söhne. Die Dorfbewohner sagten zu ihm: „Du sollst uns gute und schlechte Nachrichten melden“, gaben Mittavindaka einen Lohn und ließen ihn in einer kleinen Hütte am Dorfeingang wohnen. Doch wegen dieses Mittavindaka erlitten die Bewohner des Grenzdorfes siebenmal königliche Strafen, siebenmal brannten ihre Häuser nieder und siebenmal brach ihr Wasserbecken. Da dachten sie: „Früher, vor der Ankunft dieses Mittavindaka, gab es bei uns kein solches Unglück. Jetzt aber, seit seiner Ankunft, erleiden wir nur noch Verfall!“ Sie schlugen ihn und jagten ihn davon. So attano dārake gahetvā aññattha gacchanto ekaṃ amanussapariggahaṃ aṭaviṃ pāvisi. Tatthassa amanussā dārake ca bhariyañca māretvā maṃsaṃ khādiṃsu. So tato palāyitvā tato tato āhiṇḍanto ekaṃ gambhīraṃ nāma paṭṭanagāmaṃ nāvāvissajjanadivaseyeva patvā kammakārako hutvā nāvaṃ abhiruhi. Nāvā samuddapiṭṭhe sattāhaṃ gantvā sattame divase samuddamajjhe ākoṭetvā ṭhapitā viya aṭṭhāsi. Te kāḷakaṇṇisalākaṃ cāresuṃ, sattakkhattuṃ mittavindakasseva pāpuṇi. Manussā tassekaṃ veḷukalāpaṃ datvā hatthe gahetvā samuddapiṭṭhe khipiṃsu, tasmiṃ khittamatte nāvā agamāsi. Mittavindako veḷukalāpe nipajjitvā samuddapiṭṭhe gacchanto kassapasammāsambuddhakāle rakkhitasīlassa phalena samuddapiṭṭhe ekasmiṃ phalikavimāne catasso devadhītaro paṭilabhitvā tāsaṃ santike sukhaṃ anubhavamāno sattāhaṃ vasi. Tā pana vimānapetiyo sattāhaṃ sukhaṃ anubhavanti, sattāhaṃ dukkhaṃ. Sattāhaṃ dukkhaṃ anubhavituṃ gacchamānā ‘‘yāva mayaṃ āgacchāma, tāva idheva hohī’’ti vatvā agamaṃsu. Er nahm seine Söhne und zog an einen anderen Ort, wobei er einen von Unholden beherrschten Urwald betrat. Dort töteten jene Unholde seine Kinder und seine Ehefrau und aßen ihr Fleisch. Er floh von dort, wanderte von Ort zu Ort und erreichte genau an dem Tag, an dem ein Schiff in See stechen sollte, ein Hafendorf namens Gambhīra, wo er sich als Arbeiter verdingte und an Bord ging. Das Schiff fuhr sieben Tage lang auf dem Meer und blieb am siebten Tag mitten auf dem Ozean stehen, als wäre es festgenagelt. Die Seeleute warfen das Unglückslos aus, und siebenmal fiel es auf Mittavindaka. Da gaben die Männer ihm ein Bambusbündel, packten ihn bei den Händen und warfen ihn ins Meer. Kaum war er hineingeworfen worden, fuhr das Schiff weiter. Mittavindaka legte sich auf das Bambusbündel und trieb auf dem Meer dahin. Als Frucht seiner Tugend, die er zur Zeit des vollkommen erwachten Buddha Kassapa bewahrt hatte, erlangte er auf dem Meer in einem Kristallpalast vier Göttertöchter und lebte sieben Tage lang bei ihnen, während er Glückseligkeit genoss. Jene Palast-Geistermädchen jedoch genossen sieben Tage lang Glück und erlitten sieben Tage lang Qualen. Als sie sich anschickten, aufzubrechen, um sieben Tage lang ihr Leid zu ertragen, sprachen sie zu ihm: „Bleibe hier, bis wir zurückkehren!“, und gingen fort. Mittavindako tāsaṃ gatakāle veḷukalāpe nipajjitvā purato gacchanto rajatavimāne aṭṭha devadhītaro labhi. Tatopi paraṃ gacchanto maṇivimāne soḷasa, kanakavimāne dvattiṃsa devadhītaro labhi. Tāsampi vacanaṃ akatvā parato gacchanto antaradīpake ekaṃ yakkhanagaraṃ addasa. Tatthekā yakkhinī ajarūpena vicarati. Mittavindako tassā yakkhinibhāvaṃ ajānanto ‘‘ajamaṃsaṃ khādissāmī’’ti taṃ pāde aggahesi, sā yakkhānubhāvena taṃ ukkhipitvā khipi. So tāya khitto samuddamatthakena gantvā bārāṇasiyaṃ parikhāpiṭṭhe ekasmiṃ kaṇṭakagumbamatthake patitvā pavaṭṭamāno bhūmiyaṃ patiṭṭhāsi. Tasmiñca samaye tasmiṃ parikhāpiṭṭhe rañño ajikā caramānā corā haranti. Ajikagopakā ‘‘core gaṇhissāmā’’ti [Pg.258] ekamantaṃ nilīnā aṭṭhaṃsu. Mittavindako pavaṭṭitvā bhūmiyaṃ ṭhito tā ajikā disvā cintesi ‘‘ahaṃ samudde ekasmiṃ dīpake ajikaṃ pāde gahetvā tāya khitto idha patito. Sace idāni ekaṃ ajikaṃ pāde gahessāmi, sā maṃ parato samuddapiṭṭhe vimānadevatānaṃ santike khipissatī’’ti. So evaṃ ayoniso manasikaritvā ajikaṃ pāde gaṇhi, sā gahitamattā viravi. Ajikagopakā ito cito ca āgantvā taṃ gahetvā ‘‘ettakaṃ kālaṃ rājakule ajikakhādako esa coro’’ti taṃ koṭṭetvā bandhitvā rañño santikaṃ nenti. Als jene fortgegangen waren, legte sich Mittavindaka auf sein Bambusbündel, reiste weiter und gelangte zu einem Silberpalast, wo er acht Göttertöchter erhielt. Als er noch weiter reiste, erhielt er in einem Edelsteinpalast sechzehn und in einem Goldpalast zweiunddreißig Göttertöchter. Da er auch auf deren Worte nicht hörte, zog er weiter und erblickte auf einer dazwischenliegenden Insel eine Stadt der Yakkhas. Dort wanderte eine Yakkhinī in Gestalt einer Ziege umher. Mittavindaka wusste nicht, dass sie eine Yakkhinī war. In dem Gedanken: „Ich werde Ziegenfleisch essen!“, packte er sie bei den Beinen. Sie hob ihn durch ihre übernatürliche Yakkha-Kraft empor und schleuderte ihn fort. Von her fortgeschleudert, flog er über die Meeresoberfläche dahin, fiel in Bārāṇasī am Rand des Festungsgrabens mitten in ein Dornengestrüpp, rollte hinab und blieb auf dem Boden liegen. Zu jener Zeit stahlen Diebe die Ziegen des Königs, die am Rand des Grabens weideten. Die Ziegenhirten hielten sich an einer Seite verborgen und dachten: „Wir wollen die Diebe fangen.“ Als Mittavindaka, der hinabgerollt war und auf dem Boden stand, die Ziegen erblickte, dachte er: „Als ich auf einer Insel im Meer eine Ziege bei den Beinen packte, wurde ich von ihr hierher geschleudert. Wenn ich nun eine Ziege bei den Beinen packe, wird sie mich sicher über das Meer zurück in die Gegenwart der Palastgottheiten schleudern.“ Er überlegte unweise auf diese Weise und packte eine Ziege am Bein. Kaum war sie gepackt, schrie sie auf. Da kamen die Ziegenhirten von überall herbeigelaufen, packten ihn und riefen: „Das ist der Dieb, der all die Zeit die Ziegen des Königshauses gestohlen und gefressen hat!“ Sie schlugen ihn, fesselten ihn und führten ihn vor den König. Tasmiṃ khaṇe bodhisatto pañcasatamāṇavakaparivuto nagarā nikkhamma nhāyituṃ gacchanto mittavindakaṃ disvā sañjānitvā te manusse āha – ‘‘tātā, ayaṃ amhākaṃ antevāsiko, kasmā naṃ gaṇhathā’’ti? ‘‘Ajikacorako, ayya, ekaṃ ajikaṃ pāde gaṇhi, tasmā gahito’’ti. ‘‘Tena hetaṃ amhākaṃ dāsaṃ katvā detha, amhe nissāya jīvissatī’’ti. Te, ‘‘sādhu ayyā’’ti taṃ vissajjetvā agamaṃsu. Atha naṃ bodhisatto ‘‘mittavindaka, tvaṃ ettakaṃ kālaṃ kahaṃ vasī’’ti pucchi. So sabbaṃ attanā katakammaṃ ārocesi. Bodhisatto ‘‘atthakāmānaṃ vacanaṃ akaronto evaṃ dukkhaṃ pāpuṇātī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In diesem Augenblick verließ der Bodhisatta, umgeben von fünfhundert Schülern, die Stadt, um baden zu gehen. Er erblickte Mittavindaka, erkannte ihn und sprach zu jenen Männern: „Liebe Leute, dies ist unser Schüler. Warum nehmt ihr ihn fest?“ Sie antworteten: „Herr, er ist ein Ziegendieb. Er hat eine Ziege bei den Beinen gepackt, deshalb wurde er festgenommen.“ – „Wenn dem so ist, dann übergebt ihn mir als meinen Sklaven. Er soll unter unserer Obhut leben.“ Sie willigten ein: „Es ist gut, o Herr“, ließen ihn frei und gingen fort. Daraufhin fragte ihn der Bodhisatta: „Mittavindaka, wo hast du dich all diese Zeit aufgehalten?“ Dieser berichtete ihm alles, was er getan hatte. Da sprach der Bodhisatta: „Wer nicht auf die Worte derer hört, die sein Wohl wünschen, gelangt in solch schweres Leid“, und rezitierte folgende Strophe: 41. 41. ‘‘Yo atthakāmassa hitānukampino, ovajjamāno na karoti sāsanaṃ; Ajiyā pādamolamba, mittako viya socatī’’ti. „Wer, wenn er ermahnt wird, den Rat dessen nicht befolgt, der sein Wohl wünscht und aus Mitgefühl Gutes für ihn sucht, der leidet – so wie Mittavindaka, der das Bein der Ziege umklammerte.“ Tattha atthakāmassāti vuḍḍhiṃ icchantassa. Hitānukampinoti hitena anukampamānassa. Ovajjamānoti mudukena hitacittena ovadiyamāno. Na karoti sāsananti anusiṭṭhaṃ na karoti, dubbaco anovādako hoti. Mittako viya socatīti yathāyaṃ mittavindako ajikāya pādaṃ gahetvā socati kilamati, evaṃ niccakālaṃ socatīti imāya gāthāya bodhisatto dhammaṃ desesi. Darin bedeutet 'atthakāmassa' (für einen, der das Wohl wünscht): für einen, der das Gedeihen wünscht. 'Hitānukampino' (des mitfühlenden Wohltäters) bedeutet: eines, der mit Wohlwollen mitfühlt. 'Ovajjamāno' (ermahnt werdend) bedeutet: mit sanftem, wohlwollendem Geist ermahnt werdend. 'Na karoti sāsanam' (befolgt die Lehre nicht) bedeutet: er befolgt den Rat nicht, ist schwer zu belehren und nimmt keinen Rat an. 'Mittako viya socati' (er jammert wie ein Freund [Mittavindaka]) bedeutet: Wie dieser Mittavindaka jammert und leidet, nachdem er den Fuß der Ziege ergriffen hat, so jammert er für alle Zeit. Mit dieser Strophe verkündete der Bodhisatta die Lehre. Evaṃ tena therena ettake addhāne tīsuyeva attabhāvesu kucchipūro laddhapubbo. Yakkhena hutvā ekadivasaṃ gabbhamalaṃ laddhaṃ, sunakhena hutvā ekadivasaṃ [Pg.259] bhattavamanaṃ, parinibbānadivase dhammasenāpatissānubhāvena catumadhuraṃ laddhaṃ. Evaṃ parassa lābhantarāyakaraṇaṃ nāma mahādosanti veditabbaṃ. Tasmiṃ pana kāle sopi ācariyo mittavindakopi yathākammaṃ gato. So hatte dieser Thera in einer so langen Zeitspanne in nur drei Existenzen jemals einen vollen Magen erlangt. Als er ein Yakkha (Dämon) war, erhielt er an einem Tag füllenden Schwangerschaftsschmutz (Plazenta). Als er ein Hund war, erhielt er an einem Tag erbrochene Speise. Am Tag seines Parinibbāna erhielt er durch die Macht des Feldherrn der Lehre (Sāriputta) die vier süßen Speisen zur Sättigung. So sollte man verstehen, dass die Behinderung des Gewinns eines anderen ein schweres Vergehen ist. Zu jener Zeit aber gingen sowohl jener Lehrer als auch Mittavindaka gemäß ihrem Kamma dahin. Satthā ‘‘evaṃ, bhikkhave, attano appalābhibhāvañca ariyadhammalābhibhāvañca sayameva esa akāsī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mittavindako losakatissatthero ahosi, disāpāmokkhācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: 'Ihr Mönche, ebenso hat dieser (Losakatissa) selbst sowohl seinen Mangel an Gewinn als auch sein Erlangen der edlen Lehre bewirkt.' Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt und die Verbindung herbeigeführt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: 'Damals war Mittavindaka der Thera Losakatissa, der weltberühmte Lehrer aber war ich selbst.' Losakajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Losaka-Jātaka ist die erste.
[42] 2. Kapotajātakavaṇṇanā [42] 2. Die Erklärung des Kapota-Jātaka (Tauben-Jātaka) Yo atthakāmassāti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ lolabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tassa lolabhāvo navakanipāte kākajātake āvi bhavissati. Tadā pana taṃ bhikkhū ‘‘ayaṃ, bhante, bhikkhu lolo’’ti satthu ārocesuṃ. Atha naṃ satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu lolosī’’ti pucchi. ‘‘Āma, bhante’’ti. Satthā ‘‘pubbepi tvaṃ bhikkhu lolo lolakāraṇā jīvitakkhayaṃ patto, paṇḍitāpi taṃ nissāya attano vasanaṭṭhānā parihīnā’’ti vatvā atītaṃ āhari. 'Yo atthakāmassa' – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen gewissen gierigen Mönch. Seine Gier wird im Neuner-Buch (Navakanipāta) im Krähen-Jātaka (Kāka-Jātaka) deutlich werden. Damals aber berichteten die Mönche dem Meister: 'Ehrwürdiger Herr, dieser Mönch ist gierig.' Daraufhin fragte ihn der Meister: 'Ist es wahr, Mönch, dass du gierig bist?' Er antwortete: 'Ja, ehrwürdiger Herr.' Der Meister sprach: 'Mönch, schon früher warst du gierig und bist aufgrund deiner Gier zu Tode gekommen, und selbst Weise haben deinetwegen ihren Wohnort verloren.' Nach diesen Worten erzählte er die Begebenheit aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto pārāvatayoniyaṃ nibbatti. Tadā bārāṇasivāsino puññakāmatāya tasmiṃ tasmiṃ ṭhāne sakuṇānaṃ sukhavasanatthāya thusapacchiyo olambenti. Bārāṇasiseṭṭhinopi bhattakārako attano mahānase ekaṃ thusapacchiṃ olambetvā ṭhapesi, bodhisatto tattha vāsaṃ kappesi. So pātova nikkhamitvā gocare caritvā sāyaṃ āgantvā tattha vasanto kālaṃ khepesi. Athekadivasaṃ eko kāko mahānasamatthakena gacchanto ambilānambilamacchamaṃsānaṃ dhūpanavāsaṃ ghāyitvā lobhaṃ uppādetvā ‘‘kaṃ nu kho nissāya imaṃ macchamaṃsaṃ labhissāmī’’ti avidūre [Pg.260] nisīditvā pariggaṇhanto sāyaṃ bodhisattaṃ āgantvā mahānasaṃ pavisantaṃ disvā ‘‘imaṃ pārāvataṃ nissāya macchamaṃsaṃ labhissāmī’’ti punadivase pātova āgantvā bodhisattassa nikkhamitvā gocaratthāya gamanakāle piṭṭhito piṭṭhito agamāsi. Atha naṃ bodhisatto ‘‘kasmā tvaṃ, samma, amhehi saddhiṃ carasī’’ti āha. ‘‘Sāmi, tumhāhaṃ kiriyā mayhaṃ ruccati, ito paṭṭhāya tumhe upaṭṭhahissāmī’’ti. ‘‘Samma, tumhe aññagocarā, mayaṃ aññagocarā, tumhehi amhākaṃ upaṭṭhānaṃ dukkara’’nti. ‘‘Sāmi, tumhākaṃ gocaraggahaṇakāle ahampi gocaraṃ gahetvā tumhehi saddhiṃyeva gamissāmī’’ti. ‘‘Sādhu, kevalaṃ te appamattena bhavitabba’’nti evaṃ bodhisatto kākaṃ ovaditvā gocaraṃ caranto tiṇabījādīni khādati. Bodhisattassa pana gocaraggahaṇakāle kāko gantvā gomayapiṇḍaṃ apanetvā pāṇake khāditvā udaraṃ pūretvā bodhisattassa santikaṃ āgantvā ‘‘sāmi, tumhe ativelaṃ caratha, atibahubhakkhena nāma bhavituṃ na vaṭṭatī’’ti vatvā bodhisattena gocaraṃ gahetvā sāyaṃ āgacchantena saddhiṃyeva mahānasaṃ pāvisi. Bhattakārako ‘‘amhākaṃ kapoto aññampi gahetvā āgato’’ti kākassapi pacchiṃ ṭhapesi. Tato paṭṭhāya dve janā vasanti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoße einer Taube wiedergeboren. Damals hängten die Einwohner von Bārāṇasī aus Wunsch nach Verdiensten an verschiedenen Orten Spreukörbe auf, damit die Vögel dort bequem wohnen konnten. Auch der Koch des Großkaufmanns von Bārāṇasī hängte einen Spreukorb in seiner Küche auf, und der Bodhisatta richtete sich dort häuslich ein. Er flog am frühen Morgen aus, suchte nach Futter, kehrte am Abend zurück und verbrachte seine Zeit dort lebend. Da flog eines Tages eine Krähe über die Küche hinweg, roch den durch Gewürze wohlriechenden Duft von saurem und nicht saurem Fisch und Fleisch und verspürte große Gier. Sie dachte: 'Von wem wohl abhängig kann ich an dieses Fisch- und Fleischessen gelangen?' Sie setzte sich in der Nähe nieder, beobachtete aufmerksam und sah am Abend den Bodhisatta ankommen und die Küche betreten. Sie dachte: 'Durch diese Taube werde ich an das Fisch- und Fleischessen gelangen.' Am folgenden Tag kam sie am frühen Morgen, und als der Bodhisatta aufbrach, um Futter zu suchen, folgte sie ihm auf Schritt und Tritt. Da sprach der Bodhisatta zu ihr: 'Mein Freund, warum fliegst du mit uns umher?' Die Krähe antwortete: 'Herr, euer Verhalten gefällt mir. Von heute an möchte ich euch dienen.' – 'Freund, ihr habt eine andere Nahrung und wir haben eine andere Nahrung. Es ist schwer für dich, uns zu dienen.' – 'Herr, wenn ihr auf Nahrungssuche geht, werde ich auch meine Nahrung suchen und nur mit euch zusammen fliegen.' – 'Gut, doch du musst stets wachsam sein.' Nachdem der Bodhisatta die Krähe so ermahnt hatte, ging er auf Nahrungssuche und fraß Grassamen und dergleichen. Während der Bodhisatta jedoch auf Nahrungssuche war, ging die Krähe hin, scharrte in Kuhfladen, fraß Insekten, füllte ihren Magen und kehrte dann zum Bodhisatta zurück. Sie sagte: 'Herr, ihr sucht viel zu lange nach Nahrung. Man sollte wahrlich nicht so übermäßig fressen.' Und kehrte zusammen mit dem Bodhisatta, der seine Nahrung gesucht hatte und am Abend zurückkam, in die Küche zurück. Der Koch dachte: 'Unsere Taube hat noch eine andere mitgebracht', und stellte auch für die Krähe einen Korb auf. Von da an lebten die beiden dort. Athekadivasaṃ seṭṭhissa bahuṃ macchamaṃsaṃ āhariṃsu. Taṃ ādāya bhattakārako mahānase tattha tattha olambesi. Kāko taṃ disvā lobhaṃ uppādetvā ‘‘sve gocarabhūmiṃ agantvā mayā idameva khāditabba’’nti rattiṃ nitthunanto nipajji. Punadivase bodhisatto gocarāya gacchanto ‘‘ehi, samma, kākā’’ti āha. ‘‘Sāmi, tumhe gacchatha, mayhaṃ kucchirogo atthī’’ti. ‘‘Samma, kākānaṃ kucchirogo nāma na kadāci bhūtapubbo, rattiṃ tīsu yāmesu ekekasmiṃ yāme mucchitā honti, dīpavaṭṭiṃ gilitakāle pana nesaṃ muhuttaṃ titti hoti, tvaṃ imaṃ macchamaṃsaṃ khāditukāmo bhavissasi, ehi manussaparibhogo nāma tumhākaṃ dupparibhuñjiyo, mā evarūpaṃ akāsi, mayā saddhiṃyeva gocarāya gacchāhī’’ti. ‘‘Na sakkomi, sāmī’’ti. ‘‘Tena hi paññāyissasi sakena kammena, lobhavasaṃ agantvā appamatto hohī’’ti taṃ ovaditvā bodhisatto gocarāya gato. Da brachte man eines Tages für den Großkaufmann viel Fisch und Fleisch. Der Koch nahm dies und hängte es in der Küche hier und da auf. Als die Krähe das sah, überkam sie die Gier und sie dachte: 'Morgen werde ich nicht auf das Futterfeld fliegen, sondern genau das hier fressen.' So legte sie sich nieder und stöhnte die ganze Nacht hindurch. Am nächsten Tag sagte der Bodhisatta, als er zur Nahrungssuche aufbrach: 'Komm, mein Freund Krähe!' Sie antwortete: 'Herr, fliegt ihr nur. Ich habe Magenschmerzen.' – 'Freund, eine Magenkrankheit bei Krähen hat es noch nie gegeben. In den drei Nachtwachen sind sie in jeder Wache einmal benommen, doch wenn sie einen Lampendocht verschlingen, erlangen sie für einen Augenblick Sättigung. Du willst wohl diesen Fisch und dieses Fleisch fressen. Komm, die Nahrung der Menschen ist für euch schwer zu genießen. Tu so etwas nicht! Geh mit mir zusammen auf Nahrungssuche.' – 'Ich kann nicht, Herr', sagte sie. 'Nun, dann wirst du durch deine eigene Tat bekannt werden. Gib dich nicht der Gier hin und sei achtsam!' Nachdem er sie so ermahnt hatte, flog der Bodhisatta zur Nahrungssuche davon. Bhattakārako [Pg.261] nānappakāraṃ macchamaṃsavikatiṃ sampādetvā usumanikkhamanatthaṃ bhājanāni thokaṃ vivaritvā rasaparissāvanakaroṭiṃ bhājanamatthake ṭhapetvā bahi nikkhamitvā sedaṃ puñchamāno aṭṭhāsi. Tasmiṃ khaṇe kāko pacchito sīsaṃ ukkhipitvā bhattagehaṃ olokento tassa nikkhantabhāvaṃ ñatvā ‘‘ayaṃdāni mayhaṃ manorathaṃ pūretvā maṃsaṃ khādituṃ kālo, kiṃ nu kho mahāmaṃsaṃ khādāmi, udāhu cuṇṇikamaṃsa’’nti cintetvā ‘‘cuṇṇikamaṃsena nāma khippaṃ kucchiṃ pūretuṃ na sakkā, mahantaṃ maṃsakhaṇḍaṃ āharitvā pacchiyaṃ nikkhipitvā khādamāno nipajjissāmī’’ti pacchito uppatitvā rasakaroṭiyaṃ nilīyi. Sā ‘‘kirī’’ti saddamakāsi. Bhattakārako taṃ saddaṃ sutvā ‘‘kiṃ nu kho eta’’nti paviṭṭho kākaṃ disvā ‘‘ayaṃ duṭṭhakāko mahāseṭṭhino pakkamaṃsaṃ khāditukāmo, ahaṃ kho pana seṭṭhiṃ nissāya jīvāmi, na imaṃ bālaṃ, kiṃ me iminā’’ti dvāraṃ pidhāya kākaṃ gahetvā sakalasarīre pattāni luñcitvā allasiṅgīveraloṇajīrakādayo koṭṭetvā ambilatakkena āloḷetvā tenassa sakalasarīraṃ makkhetvā taṃ kākaṃ pacchiyaṃ khipi. So adhimattavedanābhibhūto nitthunanto nipajji. Nachdem der Koch verschiedene Arten von Fisch- und Fleischgerichten zubereitet hatte, öffnete er die Töpfe ein wenig, um den Dampf entweichen zu lassen, stellte ein Siebbecken auf die Töpfe, ging nach draußen und blieb stehen, während er sich den Schweiß abwischte. In jenem Moment hob eine Krähe ihren Kopf aus dem Korb, blickte in die Küche und bemerkte, dass der Koch hinausgegangen war. Sie dachte: „Jetzt ist die Zeit für mich, meinen Wunsch zu erfüllen und Fleisch zu fressen. Soll ich nun ein großes Stück Fleisch fressen oder gehacktes Fleisch?“ Dann dachte sie: „Mit gehacktem Fleisch kann man den Magen wahrlich nicht schnell füllen. Ich werde ein großes Stück Fleisch holen, es in den Korb legen und mich hinlegen, während ich es fresse.“ Sie flog aus dem Korb empor und ließ sich auf dem Siebbecken nieder. Dieses machte das Geräusch „kiri“. Als der Koch dieses Geräusch hörte, trat er mit dem Gedanken „Was ist das wohl?“ ein, sah die Krähe und dachte: „Diese boshafte Krähe will das Fleisch fressen, das für den Großkaufmann gekocht wurde. Ich hänge jedoch vom Großkaufmann ab, um meinen Lebensunterhalt zu verdienen, nicht von diesem törichten Vogel! Was soll ich mit ihr tun?“ Er schloss die Tür, fing die Krähe, rupfte ihr alle Federn vom ganzen Leib, zerstieß frischen Ingwer, Salz, Kreuzkümmel und anderes, verrührte es mit saurer Buttermilch, rieb ihren ganzen Körper damit ein und warf die Krähe in den Korb. Von heftigen Schmerzen überwältigt, lag sie stöhnend da. Bodhisatto sāyaṃ āgantvā taṃ byasanappattaṃ disvā ‘‘lolakāka, mama vacanaṃ akatvā tava lobhaṃ nissāya mahādukkhaṃ pattosī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta am Abend kam und sie in diesem unheilvollen Zustand sah, sprach er: „O gierige Krähe, weil du meine Worte nicht befolgt hast und wegen deiner Gier bist du in großes Elend geraten“, und sprach diese Strophe: 42. 42. ‘‘Yo atthakāmassa hitānukampino, ovajjamāno na karoti sāsanaṃ; Kapotakassa vacanaṃ akatvā, amittahatthatthagatova setī’’ti. „Wer den Rat eines Wohlwollenden, der aus Mitgefühl sein Bestes sucht, nicht befolgt, wenn er ermahnt wird, der liegt da – wie jene Krähe, die die Worte der Taube missachtete –, in die Hände der Feinde gefallen.“ Tattha kapotakassa vacanaṃ akatvāti pārāvatassa hitānusāsanavacanaṃ akatvā. Amittahatthatthagatova setīti amittānaṃ anatthakārakānaṃ dukkhuppādakapuggalānaṃ hatthatthaṃ hatthapathaṃ gato ayaṃ kāko viya so puggalo mahantaṃ byasanaṃ patvā anusocamāno setīti. Darin bedeutet „die Worte der Taube missachtete“: ohne den heilsamen Rat der Taube zu befolgen. „In die Hände der Feinde gefallen liegt er da“ bedeutet: Wie diese Krähe, die in die Hände und in die Reichweite von Feinden geraten ist – das heißt von Personen, die Schaden stiften und Leid verursachen –, so gerät jene Person in großes Verderben und liegt voller Reue da. Bodhisatto [Pg.262] imaṃ gāthaṃ vatvā ‘‘idāni mayā ca imasmiṃ ṭhāne na sakkā vasitu’’nti aññattha gato. Kākopi tattheva jīvitakkhayaṃ patto. Atha naṃ bhattakārako saddhiṃ pacchiyā gahetvā saṅkāraṭṭhāne chaḍḍesi. Nachdem der Bodhisatta diese Strophe gesprochen hatte, dachte er: „Nun kann auch ich nicht mehr an diesem Ort wohnen“, und ging an einen anderen Ort. Auch die Krähe fand genau dort ihr Lebensende. Da nahm der Koch sie mitsamt dem Korb und warf sie auf den Müllhaufen. Satthāpi ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva lolo, pubbepi loloyeva, tañca pana te lolyaṃ nissāya paṇḍitāpi sakāvāsā parihīnā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so bhikkhu anāgāmiphalaṃ patto. Satthā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kāko lolabhikkhu ahosi, pārāvato pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: „Mönch, nicht nur jetzt bist du gierig, auch in der Vergangenheit warst du gierig. Und überdies mussten wegen dieser deiner Gier selbst Weise ihre eigene Wohnstätte verlassen.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten erlangte jener Mönch die Frucht der Nichtwiederkehr. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war die Krähe der gierige Mönch, die Taube aber war ich selbst.“ Kapotajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des zweiten Kapota-Jātaka ist beendet.
[43] 3. Veḷukajātakavaṇṇanā [43] 3. Die Erklärung des Veḷuka-Jātaka Yo atthakāmassāti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tañhi bhagavā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu dubbacosī’’ti pucchitvā ‘‘saccaṃ, bhante’’ti vutte ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva dubbaco, pubbepi dubbacoyeva, dubbacattāyeva ca paṇḍitānaṃ vacanaṃ akatvā sappamukhe jīvitakkhayaṃ patto’’ti vatvā atītaṃ āhari. Diese Lehrverkündigung, beginnend mit „Yo atthakāmassa“, sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen gewissen schwer belehrbaren Mönch. Denn der Erhabene fragte ihn: „Mönch, stimmt es wirklich, dass du schwer belehrbar bist?“, und als dieser antwortete: „Es stimmt, Ehrwürdiger Herr“, sprach der Meister: „Mönch, nicht nur jetzt bist du schwer belehrbar, auch in der Vergangenheit warst du schwer belehrbar. Und eben wegen deiner Unbelehrbarkeit hast du, weil du die Worte der Weisen missachtet hast, einst im Rachen einer Schlange dein Lebensende gefunden“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kāsiraṭṭhe mahābhogakule nibbatto viññutaṃ patvā kāmesu ādīnavaṃ nekkhamme cānisaṃsaṃ disvā kāme pahāya himavantaṃ pavisitvā isipabbajjaṃ pabbajitvā kasiṇaparikammaṃ katvā pañcābhiññā aṭṭha samāpattiyo ca uppādetvā jhānasukhena vītināmento aparabhāge mahāparivāro pañcahi tāpasasatehi parivuto gaṇassa satthā hutvā vihāsi. Atheko āsivisapotako attano dhammatāya caranto aññatarassa tāpasassa assamapadaṃ patto. Tāpaso tasmiṃ puttasinehaṃ uppādetvā taṃ ekasmiṃ veḷupabbe sayāpetvā paṭijaggati. Tassa veḷupabbe sayanato ‘‘veḷuko’’tveva nāmaṃ akaṃsu. Taṃ puttasinehena paṭijagganato tāpasassa ‘‘veḷukapitā’’tveva nāmaṃ akaṃsu. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Lande Kāsi in einer sehr wohlhabenden Familie geboren. Als er das Alter der Vernunft erreicht hatte, sah er das Elend in den Sinnesfreuden und den Segen der Entsagung, gab die Sinnesfreuden auf, zog in den Himalaya und empfing die Einsiedler-Ordination. Er übte die Kasiṇa-Meditation, erlangte die fünf höheren Geisteskräfte und die acht geistigen Errungenschaften und verbrachte seine Zeit im Glück der Vertiefung. Später lebte er mit einer großen Gefolgschaft, umgeben von fünfhundert Einsiedlern, als Lehrer der Gemeinschaft. Zu jener Zeit kam eine junge Giftschlange, die ihrer Natur entsprechend umherstreifte, zur Einsiedelei eines gewissen Asketen. Der Asket entwickelte eine väterliche Liebe zu ihr, ließ sie in einem Bambusrohr schlafen und pflegte sie. Weil sie im Bambusrohr schlief, nannten sie sie „Veḷuka“. Da er sie mit väterlicher Liebe pflegte, gab man dem Asketen den Namen „Veḷukas Vater“. Tadā [Pg.263] bodhisatto ‘‘eko kira tāpaso āsivisaṃ paṭijaggatī’’ti sutvā taṃ pakkosāpetvā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ āsivisaṃ paṭijaggasī’’ti pucchitvā ‘‘sacca’’nti vutte ‘‘āsivisena saddhiṃ vissāso nāma natthi, mā evaṃ jaggāhī’’ti āha. ‘‘So me ācariya putto, nāhaṃ tena vinā vattituṃ sakkhissāmī’’ti. ‘‘Tena hi etasseva santikā jīvitakkhayaṃ pāpuṇissasī’’ti. Tāpaso bodhisattassa vacanaṃ na gaṇhi, āsivisampi jahituṃ nāsakkhi. Tato katipāhaccayeneva sabbe tāpasā phalāphalatthāya gantvā gataṭṭhāne phalāphalassa sulabhabhāvaṃ disvā dve tayo divase tattheva vasiṃsu, veḷukapitāpi tehi saddhiṃ gacchanto āsivisaṃ veḷupabbeyeva sayāpetvā pidahitvā gato. So puna tāpasehi saddhiṃ dvīhatīhaccayena āgantvā ‘‘veḷukassa gocaraṃ dassāmī’’ti veḷupabbaṃ ugghāṭetvā ‘‘ehi, puttaka, chātakosī’’ti hatthaṃ pasāresi. Āsiviso dvīhatīhaṃ nirāhāratāya kujjhitvā pasāritahatthaṃ ḍaṃsitvā tāpasaṃ tattheva jīvitakkhayaṃ pāpetvā araññaṃ pāvisi. Tāpasā taṃ disvā bodhisattassa ārocesuṃ. Bodhisatto tassa sarīrakiccaṃ kāretvā isigaṇassa majjhe nisīditvā isīnaṃ ovādavasena imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta damals hörte: „Ein Asket soll angeblich eine Giftschlange halten“, ließ er ihn rufen und fragte ihn: „Stimmt es wirklich, dass du eine Giftschlange hältst?“ Als dieser antwortete: „Es stimmt“, sagte er: „Man sollte niemals mit einer Giftschlange vertraut werden, halte sie nicht so!“ „O Lehrer, sie ist mein Söhnchen. Ich kann ohne sie nicht leben“, erwiderte dieser. „Wenn das so ist, wirst du eben durch diese Schlange dein Lebensende finden“, entgegnete der Bodhisatta. Der Asket befolgte die Worte des Bodhisatta nicht und konnte sich auch nicht von der Giftschlange trennen. Nur wenige Tage danach gingen alle Asketen aus, um wilde Früchte zu sammeln, und da sie an dem Ort, zu dem sie gelangt waren, reichlich Früchte fanden, blieben sie zwei oder drei Tage lang genau dort. Auch Veḷukas Vater, der mit ihnen ging, ließ die Giftschlange im Bambusrohr schlafen, verschloss es und ging davon. Als er nach zwei oder drei Tagen zusammen mit den anderen Asketen zurückkehrte, dachte er: „Ich will Veḷuka Futter geben“, öffnete das Bambusrohr und streckte die Hand aus mit den Worten: „Komm, mein Söhnchen, bist du hungrig?“ Weil die Giftschlange zwei oder drei Tage lang ohne Nahrung gewesen und deshalb zornig war, biss sie in die ausgestreckte Hand, brachte den Asketen genau dort um und entfloh in den Wald. Als die Asketen dies sahen, berichteten sie es dem Bodhisatta. Der Bodhisatta ließ das Begräbnis für ihn ausrichten, setzte sich mitten unter die Schar der Einsiedler und sprach zur Unterweisung der Asketen diese Strophe: 43. 43. ‘‘Yo atthakāmassa hitānukampino, ovajjamāno na karoti sāsanaṃ; Evaṃ so nihato seti, veḷukassa yathā pitā’’ti. „Wer den Rat eines Wohlwollenden, der aus Mitgefühl sein Bestes sucht, nicht befolgt, wenn er ermahnt wird, der liegt so erschlagen da wie der Vater von Veḷuka.“ Tattha evaṃ so nihato setīti yo hi isīnaṃ ovādaṃ na gaṇhāti, so yathā esa tāpaso āsivisamukhe pūtibhāvaṃ patvā nihato seti, evaṃ mahāvināsaṃ patvā nihato setīti attho. Evaṃ bodhisatto isigaṇaṃ ovaditvā cattāro brahmavihāre bhāvetvā āyupariyosāne brahmaloke uppajji. Dabei bedeutet „So liegt er erschlagen da“: Wer nämlich den Rat der Weisen nicht annimmt, der liegt, nachdem er ins große Verderben geraten ist, erschlagen da, so wie dieser Asket im Rachen der Giftschlange in Fäulnis überging und erschlagen dalag; dies ist die Bedeutung. So ermahnte der Bodhisatta die Schar der Asketen, entfaltete die vier Verweilzustände des Brahma und wurde am Ende seiner Lebensspanne in der Brahma-Welt wiedergeboren. Satthā ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva dubbaco, pubbepi dubbacoyeva, dubbacabhāveneva ca āsivisamukhe pūtibhāvaṃ patto’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā [Pg.264] anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā veḷukapitā dubbacabhikkhu ahosi, sesaparisā buddhaparisā, gaṇasatthā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, o Mönch, bist du schwer zu belehren; auch in der Vergangenheit warst du schwer zu belehren, und eben wegen deiner Unbelehrbarkeit bist du im Rachen der Giftschlange in Fäulnis übergegangen.“ Nachdem er diese Lehrrede vorgetragen und den Zusammenhang hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Vater des Veḷuka der schwer zu belehrende Mönch, die übrige Gefolgschaft war die Gefolgschaft des Buddha, und der Anführer der Schar aber war ich selbst.“ Veḷukajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Veḷuka-Jātaka, die dritte.
[44] 4. Makasajātakavaṇṇanā [44] 4. Die Erklärung des Makasa-Jātaka Seyyo amittoti idaṃ satthā magadhesu cārikaṃ caramāno aññatarasmiṃ gāmake bālagāmikamanusse ārabbha kathesi. Tathāgato kira ekasmiṃ samaye sāvatthito magadharaṭṭhaṃ gantvā tattha cārikaṃ caramāno aññataraṃ gāmakaṃ sampāpuṇi. So ca gāmako yebhuyyena andhabālamanussehiyeva ussanno. Tatthekadivasaṃ te andhabālamanussā sannipatitvā ‘‘bho, amhe araññaṃ pavisitvā kammaṃ karonte makasā khādanti, tappaccayā amhākaṃ kammacchedo hoti, sabbeva dhanūni ceva āvudhāni ca ādāya gantvā makasehi saddhiṃ yujjhitvā sabbamakase vijjhitvā chinditvā ca māressāmā’’ti mantayitvā araññaṃ gantvā ‘‘makase vijjhissāmā’’ti aññamaññaṃ vijjhitvā ca paharitvā ca dukkhappattā āgantvā antogāme ca gāmamajjhe ca gāmadvāre ca nipajjiṃsu. „Besser ist ein Feind...“ – Dies sprach der Meister, als er im Land der Magadher umherzog, in Bezug auf die törichten Bewohner eines gewissen kleinen Dorfes. Es heißt, dass der Tathāgata zu einer Zeit von Sāvatthī in das Land der Magadher reiste und, als er dort umherzog, zu einem gewissen kleinen Dorf gelangte. Und dieses Dorf war größtenteils von verblendeten Toren überlaufen. Dort versammelten sich eines Tages jene verblendeten Toren und beratschlagten: ‚Ihr lieben Leute, wenn wir in den Wald gehen und arbeiten, beißen uns die Mücken. Aus diesem Grund wird unsere Arbeit unterbrochen. Wir alle wollen Bogen und Waffen mitnehmen, in den Wald gehen, mit den Mücken kämpfen und alle Mücken erschießen und zerhauen und sie so töten.‘ Sie gingen in den Wald, und mit dem Gedanken: ‚Wir wollen die Mücken erschießen‘, schossen und schlugen sie sich gegenseitig. In tiefem Elend kehrten sie zurück und legten sich im Inneren des Dorfes, mitten im Dorf und an den Dorftoren nieder. Satthā bhikkhusaṅghaparivuto taṃ gāmaṃ piṇḍāya pāvisi. Avasesā paṇḍitamanussā bhagavantaṃ disvā gāmadvāre maṇḍapaṃ kāretvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā satthāraṃ vanditvā nisīdiṃsu. Satthā tasmiṃ tasmiṃ ṭhāne patitamanusse disvā te upāsake pucchi ‘‘bahū ime gilānā manussā, kiṃ etehi kata’’nti? ‘‘Bhante, ete manussā ‘makasayuddhaṃ karissāmā’ti gantvā aññamaññaṃ vijjhitvā sayaṃ gilānā jātā’’ti. Satthā ‘‘na idāneva andhabālamanussā ‘makase paharissāmā’ti attānaṃ paharanti, pubbepi ‘makasaṃ paharissāmā’ti paraṃ paharaṇakamanussā ahesuṃyevā’’ti vatvā tehi manussehi yācito atītaṃ āhari. Der Meister betrat, umgeben von der Mönchsgemeinde, dieses Dorf für den Almosengang. Die übrigen, weisen Menschen sahen den Erhabenen, ließen am Dorftor eine Halle errichten, gaben der Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze eine große Spende, erwiesen dem Meister ihre Ehrerbietung und setzten sich nieder. Als der Meister an verschiedenen Stellen die am Boden liegenden Menschen sah, fragte er jene Laienanhänger: ‚Viele dieser Menschen hier sind verletzt; was haben sie getan?‘ – ‚Ehrwürdiger Herr, diese Menschen sind ausgezogen, um einen Krieg gegen die Mücken zu führen, und haben sich gegenseitig beschossen, wodurch sie sich selbst verletzt haben.‘ Der Meister sprach: ‚Nicht erst jetzt schlagen diese verblendeten Toren sich selbst in der Absicht, Mücken zu treffen; auch in der Vergangenheit gab es schon Menschen, die in der Absicht, eine Mücke zu treffen, andere schlugen.‘ Auf Bitten dieser Menschen hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto vaṇijjāya jīvikaṃ kappeti. Tadā kāsiraṭṭhe ekasmiṃ paccantagāme bahū [Pg.265] vaḍḍhakī vasanti. Tattheko khalitavaḍḍhakī rukkhaṃ tacchati, athassa eko makaso tambalohathālakapiṭṭhisadise sīse nisīditvā sattiyā paharanto viya sīsaṃ mukhatuṇḍakena vijjhi. So attano santike nisinnaṃ puttaṃ āha – ‘‘tāta, mayhaṃ sīsaṃ makaso sattiyā paharanto viya vijjhati, vārehi na’’nti. ‘‘Tāta, adhivāsehi, ekappahāreneva taṃ māressāmī’’ti. Tasmiṃ samaye bodhisattopi attano bhaṇḍaṃ pariyesamāno taṃ gāmaṃ patvā tassā vaḍḍhakisālāya nisinno hoti. Atha so vaḍḍhakī puttaṃ āha – ‘‘tāta, imaṃ makasaṃ vārehī’’ti. So ‘‘vāressāmi, tātā’’ti tikhiṇaṃ mahāpharasuṃ ukkhipitvā pitu piṭṭhipasse ṭhatvā ‘‘makasaṃ paharissāmī’’ti pitu matthakaṃ dvidhā bhindi, vaḍḍhakī tattheva jīvitakkhayaṃ patto. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, verdiente der Bodhisatta seinen Lebensunterhalt durch Handel. Damals lebten in einem Grenzort des Reiches Kāsi viele Zimmerleute. Dort behaute ein glatzköpfiger Zimmermann ein Stück Holz. Da ließ sich eine Mücke auf seinem Kopf, der einer Kupferschale glich, nieder und stach ihn mit ihrem Rüssel in den Kopf, als ob sie ihn mit einer Lanze stäche. Er sagte zu seinem Sohn, der in seiner Nähe saß: ‚Mein lieber Sohn, eine Mücke sticht mich in den Kopf, als ob sie mich mit einer Lanze stäche; halte sie ab!‘ – ‚Lieber Vater, hab Geduld, mit einem einzigen Schlag werde ich sie töten.‘ Zu jener Zeit war auch der Bodhisatta auf der Suche nach Handelswaren in jenes Dorf gelangt und saß in der Werkstatt der Zimmerleute. Da sagte der Zimmermann zu seinem Sohn: ‚Lieber Sohn, halte diese Mücke ab!‘ Der Sohn sprach: ‚Ich werde sie abhalten, Vater!‘, hob eine scharfe, große Axt empor, stellte sich hinter den Rücken des Vaters und spaltete mit dem Gedanken ‚Ich werde die Mücke treffen‘ den Schädel seines Vaters entzwei. Der Zimmermann fand genau dort den Tod. Bodhisatto tassa taṃ kammaṃ disvā ‘‘paccāmittopi paṇḍitova seyyo. So hi daṇḍabhayenapi manusse na māressatī’’ti cintetvā imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta diese Tat sah, dachte er: „Besser ist selbst ein Feind, wenn er nur weise ist. Denn dieser wird, sei es auch nur aus Furcht vor Bestrafung, keine Menschen töten“, und sprach folgende Strophe: 44. 44. ‘‘Seyyo amitto matiyā upeto, na tveva mitto mativippahīno; ‘Makasaṃ vadhissa’nti hi eḷamūgo, putto pitu abbhidā uttamaṅga’’nti. „Besser ist ein Feind, der mit Verstand begabt ist, als ein Freund, der des Verstandes bar ist; denn in der Absicht, eine Mücke zu töten, hat der sabbernde, törichte Sohn den Kopf seines Vaters gespalten.“ Tattha seyyoti pavaro uttamo. Matiyā upetoti paññāya samannāgato. Eḷamūgoti lālāmukho bālo. Putto pitu abbhidā uttamaṅganti attano bālatāya puttopi hutvā pitu uttamaṅgaṃ matthakaṃ ‘‘makasaṃ paharissāmī’’ti dvidhā bhindi. Tasmā bālamittato paṇḍitaamittova seyyoti imaṃ gāthaṃ vatvā bodhisatto uṭṭhāya yathākammaṃ gato. Vaḍḍhakissapi ñātakā sarīrakiccaṃ akaṃsu. Dabei bedeutet ‚besser‘: vorzüglicher, hervorragender. ‚Mit Verstand begabt‘ bedeutet: mit Weisheit ausgestattet. ‚Der sabbernde, törichte‘ bedeutet: ein sabbernder Tor. ‚Der Sohn hat den Kopf des Vaters gespalten‘ bedeutet: Aufgrund seiner eigenen Torheit spaltete er, obwohl er der Sohn war, das Haupt, den Kopf seines Vaters entzwei, in der Absicht, die Mücke zu treffen. Daher ist ein weiser Feind besser als ein törichter Freund. Nachdem der Bodhisatta diese Strophe gesprochen hatte, erhob er sich und ging seiner Wege. Die Verwandten des Zimmermanns vollzogen die Bestattungsriten für ihn. Satthā ‘‘evaṃ upāsakā pubbepi ‘makasaṃ paharissāmā’ti paraṃ paharaṇakamanussā ahesuṃyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā gāthaṃ vatvā pakkanto paṇḍitavāṇijo pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „So gab es, o Laienanhänger, auch in der Vergangenheit schon Menschen, die in der Absicht, eine Mücke zu treffen, andere schlugen.“ Nachdem er diese Lehrrede vorgetragen und den Zusammenhang hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Der weise Kaufmann aber, der damals diese Strophe sprach und wegging, war ich selbst.“ Makasajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Makasa-Jātaka, die vierte.
[45] 5. Rohiṇijātakavaṇṇanā [45] 5. Die Erklärung des Rohiṇī-Jātaka Seyyo [Pg.266] amittotiidaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ anāthapiṇḍikaseṭṭhino dāsiṃ ārabbha kathesi. Anāthapiṇḍikassa kira ekā rohiṇī nāma dāsī ahosi. Tassā vīhipaharaṇaṭṭhāne āgantvā mahallikā mātā nipajji, taṃ makkhikā parivāretvā sūciyāvijjhamānā viya khādanti. Sā dhītaraṃ āha – ‘‘amma, makkhikā maṃ khādanti, etā vārehī’’ti. Sā ‘‘vāressāmi, ammā’’ti musalaṃ ukkhipitvā ‘‘mātu sarīre makkhikā māretvā vināsaṃ pāpessāmī’’ti mātaraṃ musalena paharitvā jīvitakkhayaṃ pāpesi. Taṃ disvā ‘‘mātā me matā’’ti rodituṃ ārabhi. Taṃ pavattiṃ seṭṭhissa ārocesuṃ. Seṭṭhi tassā sarīrakiccaṃ kāretvā vihāraṃ gantvā sabbaṃ taṃ pavattiṃ satthu ārocesi. Satthā ‘‘na kho, gahapati, esā ‘mātu sarīre makkhikā māressāmī’ti idāneva musalena paharitvā mātaraṃ māresi, pubbepi māresiyevā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „‚Besser ist ein Feind...‘ – Dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, in Bezug auf eine Magd des Großkaufmanns Anāthapiṇḍika. Es heißt, Anāthapiṇḍika hatte eine Magd namens Rohiṇī. Deren betagte Mutter kam dorthin, wo Reis gestampft wurde, und legte sich nieder. Fliegen umschwärmten sie und bissen sie, als ob sie sie mit Nadeln stächen. Sie sagte zu ihrer Tochter: ‚Meine liebe Tochter, die Fliegen beißen mich; halte sie ab!‘ Jene sprach: ‚Ich werde sie abhalten, Mutter!‘, hob einen Mörserstößel empor und dachte: ‚Ich werde die Fliegen auf dem Körper meiner Mutter erschlagen und sie vernichten.‘ Sie schlug ihre Mutter mit dem Mörserstößel und tötete sie. Als sie das sah, begann sie zu weinen: ‚Meine Mutter ist tot!‘ Man berichtete dem Großkaufmann von diesem Vorfall. Der Großkaufmann ließ die Bestattung für sie ausrichten, ging zum Kloster und berichtete dem Meister die ganze Begebenheit. Der Meister sprach: ‚Nicht erst jetzt, o Hausvater, hat diese Magd ihre Mutter mit einem Mörserstößel erschlagen, in der Absicht, die Fliegen auf dem Körper der Mutter zu töten; auch in der Vergangenheit hat sie sie schon getötet.‘ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit.“ Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto seṭṭhikule nibbattitvā pituaccayena seṭṭhiṭṭhānaṃ pāpuṇi. Tassāpi rohiṇīyeva nāma dāsī ahosi. Sāpi attano vīhipaharaṇaṭṭhānaṃ āgantvā nipannaṃ mātaraṃ ‘‘makkhikā me, amma, vārehī’’ti vuttā evameva musalena paharitvā mātaraṃ jīvitakkhayaṃ pāpetvā rodituṃ ārabhi. Bodhisatto taṃ pavattiṃ sutvā ‘‘amittopi hi imasmiṃ loke paṇḍitova seyyo’’ti cintetvā imaṃ gāthamāha – Als in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Großkaufmannsfamilie geboren und erlangte nach dem Tod seines Vaters das Amt eines Großkaufmanns. Er hatte eine Magd namens Rohiṇī. Als diese an den Ort kam, wo sie Reis stampfte, und ihre dort liegende Mutter zu ihr sagte: „Liebe Tochter, vertreibe die Fliegen von mir!“, schlug sie mit dem Mörserstößel zu, brachte ihre Mutter um das Leben und begann zu weinen. Als der Bodhisatta von diesem Vorfall hörte, dachte er: „In dieser Welt ist selbst ein Feind, sofern er weise ist, besser“, und sprach diese Strophe: 45. 45. ‘‘Seyyo amitto medhāvī, yañce bālānukampako; Passa rohiṇikaṃ jammiṃ, mātaraṃ hantvāna socatī’’ti. „Besser ist ein kluger Feind als ein törichter Mitfühlender; sieh dir die jämmerliche Rohiṇī an: Nachdem sie ihre Mutter erschlug, trauert sie.“ Tattha medhāvīti paṇḍito ñāṇī vibhāvī. Yañce bālānukampakoti ettha yanti liṅgavipallāso kato, ceti nāmatthe nipāto. Yo nāma bālo anukampako, tato sataguṇena sahassaguṇena paṇḍito amitto hontopi seyyoyevāti attho. Atha vā yanti paṭisedhanatthe nipāto, no ce bālānukampakoti attho. Jamminti lāmikaṃ dandhaṃ. Mātaraṃ hantvāna socatīti ‘‘makkhikā māressāmī’’ti mātaraṃ hantvā idāni ayaṃ bālā sayameva rodati paridevati. Iminā kāraṇena [Pg.267] imasmiṃ loke amittopi paṇḍito seyyoti bodhisatto paṇḍitaṃ pasaṃsanto imāya gāthāya dhammaṃ desesi. Darin bedeutet „medhāvī“: weise, erkenntnisreich, klar blickend. Im Ausdruck „yañce bālānukampako“ wurde hier bei „yaṃ“ eine Vertauschung des grammatikalischen Geschlechts vorgenommen, und „ce“ ist eine Partikel zur Bezeichnung eines Namens. Die Bedeutung ist: Wer auch immer ein törichter Mitfühlender ist – im Vergleich zu ihm ist ein weiser Mensch, selbst wenn er ein Feind ist, um das Hundertfache, ja Tausendfache besser; das ist die Bedeutung. Oder aber: „yaṃ“ ist eine Partikel im Sinne der Verneinung, sodass die Bedeutung lautet: „Wenn er ein törichter Mitfühlender ist, so ist das keineswegs gut.“ „Jammiṃ“ bedeutet verwerflich, dumm. „Nachdem sie die Mutter erschlug, trauert sie“ bedeutet: Mit dem Gedanken „Ich werde die Fliegen töten“ erschlug sie die Mutter, und nun weint und klagt diese Törrichte selbst. Aus diesem Grund verkündete der Bodhisatta, um den Weisen zu loben, mit dieser Strophe die Lehre, dass in dieser Welt selbst ein Feind, sofern er weise ist, besser ist. Satthā ‘‘na kho, gahapati, esā idāneva ‘makkhikā māressāmī’ti mātaraṃ ghātesi, pubbepi ghātesiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mātāyeva mātā ahosi, dhītāyeva dhītā, mahāseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Hausvater, nicht erst jetzt hat sie mit dem Gedanken ‚Ich will die Fliegen töten‘ ihre Mutter getötet, sondern sie hat sie auch schon in einer früheren Existenz getötet.“ Nachdem er diese Lehrunterweisung dargelegt und die Verknüpfung der Zusammenhänge hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war die Mutter eben die Mutter, die Tochter eben die Tochter, der Großkaufmann aber war ich selbst.“ Rohiṇijātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Rohiṇi-Jātaka, die fünfte.
[46] 6. Ārāmadūsakajātakavaṇṇanā [46] 6. Die Erklärung des Ārāmadūsaka-Jātaka. Na ve anatthakusalenāti idaṃ satthā aññatarasmiṃ kosalagāmake viharanto uyyānadūsakaṃ ārabbha kathesi. Satthā kira kosalesu cārikaṃ caramāno aññataraṃ gāmakaṃ sampāpuṇi. Tattheko kuṭumbiko tathāgataṃ nimantetvā attano uyyāne nisīdāpetvā buddhappamukhassa saṅghassa mahādānaṃ datvā ‘‘bhante, yathāruciyā imasmiṃ uyyāne vicarathā’’ti āha. Bhikkhū uṭṭhāya uyyānapālaṃ gahetvā uyyāne vicarantā ekaṃ aṅgaṇaṭṭhānaṃ disvā uyyānapālaṃ pucchiṃsu ‘‘upāsaka, imaṃ uyyānaṃ aññattha sandacchāyaṃ, imasmiṃ pana ṭhāne na koci rukkho vā gaccho vā atthi, kiṃ nu kho kāraṇa’’nti? ‘‘Bhante, imassa uyyānassa ropanakāle eko gāmadārako udakaṃ siñcanto imasmiṃ ṭhāne rukkhapotake ummūlaṃ katvā mūlappamāṇena udakaṃ siñci. Te rukkhapotakā milāyitvā matā. Iminā kāraṇena idaṃ ṭhānaṃ aṅgaṇaṃ jāta’’nti. Bhikkhū satthāraṃ upasaṅkamitvā etamatthaṃ ārocesuṃ. Satthā ‘‘na, bhikkhave, so gāmadārako idāneva ārāmadūsako, pubbepi ārāmadūsakoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Nicht wahrlich durch einen im Unheil Erfahrenen“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er in einem bestimmten Dorf im Kosala-Land verweilte, bezüglich eines Parkverwüsters. Es heißt, als der Meister im Kosala-Land umherwanderte, erreichte er ein gewisses Dorf. Dort lud ein Hausvater den Tathāgata ein, hieß ihn in seinem Park Platz nehmen, gab der Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eine große Spende und sagte: „Ehrwürdige Herren, wandelt in diesem Park ganz nach Belieben umher.“ Die Mönche erhoben sich, nahmen den Parkwächter mit sich und bemerkten beim Umherwandern im Park eine kahle Stelle. Da fragten sie den Parkwächter: „Laie, dieser Park spendet andernorts dichten Schatten, doch an dieser Stelle steht weder ein Baum noch ein Strauch. Was ist wohl der Grund dafür?“ „Ehrwürdige Herren, zur Zeit, als dieser Park angelegt wurde, goss ein Dorfjunge die Pflanzen. An dieser Stelle zog er die jungen Bäumchen mitsamt den Wurzeln heraus und goss sie entsprechend der Größe ihrer Wurzeln. Diese jungen Bäumchen verwelkten und starben ab. Aus diesem Grund ist diese Stelle zu einer kahlen Fläche geworden.“ Die Mönche begaben sich zum Meister und berichteten ihm diesen Vorfall. Der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt ist dieser Dorfjunge ein Parkverwüster, er war schon in der Vergangenheit ein Parkverwüster“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bārāṇasiyaṃ nakkhattaṃ ghosayiṃsu. Nakkhattabherisaddasavanakālato paṭṭhāya sakalanagaravāsino nakkhattanissitakā hutvā vicaranti. Tadā rañño uyyāne bahū makkaṭā vasanti. Uyyānapālo cintesi ‘‘nagare nakkhattaṃ ghuṭṭhaṃ, ime vānare ‘udakaṃ siñcathā’ti vatvā ahaṃ nakkhattaṃ kīḷissāmī’’ti jeṭṭhakavānaraṃ upasaṅkamitvā [Pg.268] ‘‘samma vānarajeṭṭhaka, imaṃ uyyānaṃ tumhākampi bahūpakāraṃ, tumhe ettha pupphaphalapallavāni khādatha, nagare nakkhattaṃ ghuṭṭhaṃ, ahaṃ nakkhattaṃ kīḷissāmi. Yāvāhaṃ āgacchāmi, tāva imasmiṃ uyyāne rukkhapotakesu udakaṃ siñcituṃ sakkhissathā’’ti pucchi. ‘‘Sādhu, siñcissāmī’’ti. ‘‘Tena hi appamattā hothā’’ti udakasiñcanatthāya tesaṃ cammakuṭe ca dārukuṭe ca datvā gato. Vānarā cammakuṭe ceva dārukuṭe ca gahetvā rukkhapotakesu udakaṃ siñcanti. Atha ne vānarajeṭṭhako evamāha ‘‘bhonto vānarā, udakaṃ nāma rakkhitabbaṃ, tumhe rukkhapotakesu udakaṃ siñcantā uppāṭetvā uppāṭetvā mūlaṃ oloketvā gambhīragatesu mūlesu bahuṃ udakaṃ siñcatha, agambhīragatesu appaṃ, pacchā amhākaṃ udakaṃ dullabhaṃ bhavissatī’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā tathā akaṃsu. Als in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde in Bārāṇasī ein Volksfest ausgerufen. Von dem Augenblick an, als der Schall der Festtrommel zu hören war, liefen alle Stadtbewohner, ganz dem Festfieber hingegeben, umher. Damals lebten im königlichen Park viele Affen. Der Parkwächter dachte: „In der Stadt ist das Fest ausgerufen worden. Ich werde diesen Affen sagen: ‚Gießt das Wasser!‘, und dann selbst am Fest teilnehmen.“ Er begab sich zum Affenführer und fragte: „Freund Affenführer, dieser Park ist auch für euch von großem Nutzen. Ihr esst hier Blüten, Früchte und junge Triebe. In der Stadt ist das Fest ausgerufen worden, und ich möchte mitfeiern. Könnt ihr, bis ich zurückkehre, die jungen Bäumchen in diesem Park gießen?“ „Gut, wir werden gießen“, antwortete dieser. „Seid also achtsam!“, sprach er, gab ihnen lederne Schläuche und hölzerne Gefäße zum Gießen des Wassers und ging fort. Die Affen nahm die ledernen Schläuche und hölzernen Gefäße und gossen die jungen Bäumchen. Da sprach der Affenführer zu ihnen: „Werte Affen, Wasser muss man sparen! Wenn ihr die jungen Bäumchen gießt, zieht sie einzeln heraus, betrachtet die Wurzeln, und gießt viel Wasser bei jenen, deren Wurzeln tief reichen, aber nur wenig bei jenen, deren Wurzeln flach sind. Später wird uns sonst das Wasser knapp werden.“ Sie willigten mit den Worten „Sehr wohl!“ ein und taten genau so. Tasmiṃ samaye eko paṇḍitapuriso rājuyyāne te vānare tathā karonte disvā evamāha ‘‘bhonto vānarā, kasmā tumhe rukkhapotake uppāṭetvā uppāṭetvā mūlappamāṇena udakaṃ siñcathā’’ti? Te ‘‘evaṃ no vānarajeṭṭhako ovadatī’’ti āhaṃsu. So taṃ vacanaṃ sutvā ‘‘aho vata bho bālā apaṇḍitā, ‘atthaṃ karissāmā’ti anatthameva karontī’’ti cintetvā imaṃ gāthamāha – Zu jener Zeit sah ein weiser Mann, wie diese Affen im königlichen Park so handelten, und fragte sie: „Werte Affen, warum zieht ihr die jungen Bäumchen einzeln heraus und gießt sie entsprechend der Größe ihrer Wurzeln?“ Sie antworteten: „So hat es uns unser Affenführer angewiesen.“ Als jener Mann diese Antwort hörte, dachte er: „Ach, wie töricht und unverständig sind sie doch! In der Absicht, Gutes zu tun, richten sie nur Unheil an“, und sprach diese Strophe. 46. 46. ‘‘Na ve anatthakusalena, atthacariyā sukhāvahā; Hāpeti atthaṃ dummedho, kapi ārāmiko yathā’’ti. „Wahrlich, das Handeln zum Wohl durch einen im Unheil Erfahrenen bringt kein Glück. Der Unverständige schmälert das Wohl, so wie der Affe, der den Park hütete.“ Tattha veti nipātamattaṃ. Anatthakusalenāti anatthe anāyatane kusalena, atthe āyatane kāraṇe akusalena vāti attho. Atthacariyāti vuḍḍhikiriyā. Sukhāvahāti evarūpena anatthakusalena kāyikacetasikasukhasaṅkhātassa atthassa cariyā na sukhāvahā, na sakkā āvahitunti attho. Kiṃkāraṇā? Ekanteneva hi hāpeti atthaṃ dummedhoti, bālapuggalo ‘‘atthaṃ karissāmī’’ti atthaṃ hāpetvā anatthameva karoti. Kapi ārāmiko yathāti yathā ārāme niyutto ārāmarakkhanako makkaṭo ‘‘atthaṃ karissāmī’’ti anatthameva karoti, evaṃ yo koci anatthakusalo, tena na sakkā atthacariyaṃ āvahituṃ, so ekaṃsena atthaṃ hāpetiyevāti. Evaṃ so paṇḍito puriso imāya [Pg.269] gāthāya vānarajeṭṭhakaṃ garahitvā attano parisaṃ ādāya uyyānā nikkhami. Darin ist das Wort 've' bloß eine Partikel. Das Wort 'anatthakusalena' bedeutet: durch jemanden, der in dem kundig ist, was nicht zum Wohl führt, oder der in dem unkundig ist, was zum Wohl führt, angemessen ist und die Ursache dafür darstellt. Das Wort 'atthacariyā' bedeutet das Bewirken von Wachstum. Das Wort 'sukhāvahā' bedeutet: Das Wirken für das Wohl durch eine solche unkundige Person ist nicht glückbringend, das heißt, es kann das Wohl, welches als körperliches und geistiges Glück bezeichnet wird, nicht herbeiführen. Aus welchem Grund? 'Denn der Unverständige schmälert gewisslich den Nutzen' – ein törichter Mensch denkt nämlich: 'Ich will Gutes tun', verringert dadurch das Wohl und bewirkt nur Unheil. Die Worte 'kapi ārāmiko yathā' bedeuten: Wie ein im Garten beschäftigter Affe, der den Garten hütet, denkt: 'Ich will Gutes tun', und doch nur Schaden anrichtet, ebenso kann irgendjemand, der im Unheilsamen kundig ist, das Wirken für das Wohl nicht herbeiführen; er schmälert ganz gewiss den Nutzen. So tadelte jener weise Mann mit dieser Strophe den Affenhäuptling, nahm sein Gefolge und verließ den Garten. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, esa gāmadārako idāneva ārāmadūsako, pubbepi ārāmadūsakoyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā vānarajeṭṭhako ārāmadūsakagāmadārako ahosi, paṇḍitapuriso pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister verkündete diese Lehrrede mit den Worten: „Ihr Mönche, dieser Dorfjunge ist nicht erst jetzt ein Gartenzerstörer, schon in der Vergangenheit war er ein Gartenzerstörer.“ Er stellte die Verknüpfung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Affenhäuptling der Dorfjunge, der den Garten zerstörte, der weise Mann aber war ich selbst.“ Ārāmadūsakajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Ārāmadūsaka-Jātaka, das sechste.
[47] 7. Vāruṇidūsakajātakavaṇṇanā [47] 7. Die Erklärung des Vāruṇidūsaka-Jātaka. Na ve anatthakusalenāti idaṃ satthā jetavane viharanto vāruṇidūsakaṃ ārabbha kathesi. Anāthapiṇḍikassa kira sahāyo eko vāruṇivāṇijo tikhiṇaṃ vāruṇiṃ yojetvā hiraññasuvaṇṇādīni gahetvā vikkiṇanto mahājane sannipatite ‘‘tāta, tvaṃ mūlaṃ gahetvā vāruṇiṃ dehī’’ti antevāsikaṃ āṇāpetvā sayaṃ nhāyituṃ agamāsi. Antevāsiko mahājanassa vāruṇiṃ dento manusse antarantarā loṇasakkharā āharāpetvā khādante disvā ‘‘ayaṃ surā aloṇikā bhavissati, loṇamettha pakkhipissāmī’’ti surācāṭiyaṃ nāḷimattaṃ loṇaṃ pakkhipitvā tesaṃ suraṃ adāsi. Te mukhaṃ pūretvā pūretvā chaḍḍetvā ‘‘kiṃ te kata’’nti pucchiṃsu. ‘‘Tumhe suraṃ pivitvā loṇaṃ āharāpente disvā loṇena yojesi’’nti. ‘‘Evarūpaṃ nāma manāpaṃ vāruṇiṃ nāsesi bālā’’ti taṃ garahitvā uṭṭhāyuṭṭhāya pakkantā. Vāruṇivāṇijo āgantvā ekampi adisvā ‘‘vāruṇipāyakā kahaṃ gatā’’ti pucchi, so tamatthaṃ ārocesi. Atha naṃ ācariyo ‘‘bāla, evarūpā nāma te surā nāsitā’’ti garahitvā imaṃ kāraṇaṃ anāthapiṇḍikassa ārocesi. Anāthapiṇḍiko ‘‘atthidāni me idaṃ kathāpābhata’’nti jetavanaṃ gantvā satthāraṃ vanditvā etamatthaṃ ārocesi. Satthā ‘‘na esa, gahapati, idāneva vāruṇidūsako, pubbepi vāruṇidūsakoyevā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Nicht fürwahr durch einen im Unheilsamen Kundigen“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen Alkoholverderber. Es heißt, ein befreundeter Schnapshändler von Anāthapiṇḍika stellte starken Schnaps her, nahm Gold, Silber und andere Zahlungsmittel ein und verkaufte ihn. Als sich eine große Menschenmenge versammelt hatte, befahl er seinem Lehrling: „Lieber Junge, nimm das Geld entgegen und gib ihnen den Schnaps“, und ging selbst zum Baden. Während der Lehrling den Schnaps an die Menge ausschenkte, sah er, wie die Leute zwischendurch Salzbrocken herbeischaffen ließen und sie aßen. Da dachte er: „Dieser Schnaps ist wohl ungesalzen, ich werde Salz hineintun.“ Er warf eine Portion Salz in das Schnapsfass und gab ihnen den Schnaps. Die Leute füllten ihre Münder damit, spuckten ihn wieder aus und fragten: „Was hast du getan?“ Er antwortete: „Ich sah, dass ihr Schnaps trankt und Salz holen ließt, da habe ich ihn mit Salz versetzt.“ Da schalten sie ihn: „Du Narr hast solch köstlichen Schnaps verdorben!“, standen nacheinander auf und gingen davon. Als der Schnapshändler zurückkehrte und niemanden mehr vorfand, fragte er: „Wo sind die Schnapstrinker hin?“ Der Lehrling berichtete ihm den Vorfall. Da tadelte ihn der Meister: „Du Tor, du hast solch einen Schnaps verdorben!“, und meldete diese Angelegenheit Anāthapiṇḍika. Anāthapiṇḍika dachte: „Nun habe ich ein schönes Gesprächsthema“, ging zum Jetavana, erwies dem Meister seine Ehrfurcht und trug ihm die Sache vor. Der Meister sagte: „Hausvater, dieser ist nicht erst jetzt ein Schnapsverderber, er war es schon in der Vergangenheit“, und erzählte auf dessen Bitte hin die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte [Pg.270] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bārāṇasiyaṃ seṭṭhi ahosi. Taṃ upanissāya eko vāruṇivāṇijo jīvati. So tikhiṇaṃ suraṃ yojetvā ‘‘imaṃ vikkiṇāhī’’ti antevāsikaṃ vatvā nhāyituṃ gato. Antevāsiko tasmiṃ gatamatteyeva surāya loṇaṃ pakkhipitvā imināva nayena suraṃ vināsesi. Athassa ācariyo āgantvā taṃ kāraṇaṃ ñatvā seṭṭhissa ārocesi. Seṭṭhi ‘‘anatthakusalā nāma bālā ‘atthaṃ karissāmā’ti anatthameva karontī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta ein reicher Kaufmann in Bārāṇasī. In Abhängigkeit von ihm bestritt ein Schnapshändler seinen Lebensunterhalt. Dieser stellte starken Schnaps her, sagte zu seinem Lehrling: „Verkaufe diesen!“, und ging zum Baden. Kaum war der Meister weggegangen, schüttete der Lehrling Salz in den Schnaps und verdarb ihn auf genau dieselbe Weise. Als sein Meister zurückkehrte, erfuhr er den Grund und berichtete es dem Kaufmann. Der Kaufmann sagte: „Die im Unheilsamen kundigen Toren denken: ‚Wir wollen Gutes tun‘, und bewirken doch nur Unheil“, und sprach folgende Strophe: 47. 47. ‘‘Na ve anatthakusalena, atthacariyā sukhāvahā; Hāpeti atthaṃ dummedho, koṇḍañño vāruṇiṃ yathā’’ti. „Nicht fürwahr durch einen im Unheilsamen Kundigen bringt das Wirken für das Wohl Glück; der Unverständige schmälert den Nutzen, so wie Koṇḍañña den Schnaps verdarb.“ Tattha koṇḍañño vāruṇiṃ yathāti yathā ayaṃ koṇḍaññanāmako antevāsiko ‘‘atthaṃ karissāmī’’ti loṇaṃ pakkhipitvā vāruṇiṃ hāpesi parihāpesi vināsesi, evaṃ sabbopi anatthakusalo atthaṃ hāpetīti bodhisatto imāya gāthāya dhammaṃ desesi. Darin bedeuten die Worte „so wie Koṇḍañña den Schnaps“: Wie dieser Lehrling namens Koṇḍañña in der Absicht: „Ich will Gutes tun“, Salz hineinschüttete und den Schnaps minderte, verdarb und ruinierte, ebenso schmälert jeder, der im Unheilsamen kundig ist, den Nutzen. So verkündete der Bodhisatta mit dieser Strophe die Lehre. Satthāpi ‘‘na esa gahapati idāneva vāruṇidūsako, pubbepi vāruṇidūsakoyevā’’ti vatvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā vāruṇidūsako idānipi vāruṇidūsakova ahosi, bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sagte: „Hausvater, dieser ist nicht erst jetzt ein Schnapsverderber, schon in der Vergangenheit war er ein Schnapsverderber.“ Er stellte die Verknüpfung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Schnapsverderber eben jener, der auch jetzt der Schnapsverderber ist, der Kaufmann von Bārāṇasī aber war ich selbst.“ Vāruṇidūsakajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Vāruṇidūsaka-Jātaka, das siebte.
[48] 8. Vedabbajātakavaṇṇanā [48] 8. Die Erklärung des Vedabba-Jātaka. Anupāyena yo atthanti idaṃ satthā jetavane viharanto dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tañhi bhikkhuṃ satthā ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva dubbaco, pubbepi dubbacoyeva, teneva ca kāraṇena paṇḍitānaṃ vacanaṃ akatvā tiṇhena asinā dvidhā katvā chinno hutvā magge nipatittha, tañca ekakaṃ nissāya purisasahassaṃ jīvitakkhayaṃ patta’’nti vatvā atītaṃ āhari. „Wer auf unrechte Weise das Wohl...“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen schwer belehrbaren Mönch. Zu diesem Mönch sprach der Meister nämlich: „Mönch, nicht erst jetzt bist du schwer belehrbar, du warst schon in der Vergangenheit schwer belehrbar. Und genau aus diesem Grund wurdest du, weil du nicht auf die Worte der Weisen hörtest, mit einem scharfen Schwert in zwei Teile gespalten und lagst tot auf dem Weg; und wegen dir allein kamen tausend Männer ums Leben.“ Nach diesen Worten erzählte er die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente ekasmiṃ gāmake aññataro brāhmaṇo vedabbaṃ nāma mantaṃ jānāti. So kira manto anaggho [Pg.271] mahāraho, nakkhattayoge laddhe taṃ mantaṃ parivattetvā ākāse ullokite ākāsato sattaratanavassaṃ vassati. Tadā bodhisatto tassa brāhmaṇassa santike sippaṃ uggaṇhāti. Athekadivasaṃ brāhmaṇo bodhisattaṃ ādāya kenacideva karaṇīyena attano gāmā nikkhamitvā cetaraṭṭhaṃ agamāsi, antarāmagge ca ekasmiṃ araññaṭṭhāne pañcasatā pesanakacorā nāma panthaghātaṃ karonti. Te bodhisattañca vedabbabrāhmaṇañca gaṇhiṃsu. Kasmā panete ‘‘pesanakacorā’’ti vuccanti? Te kira dve jane gahetvā ekaṃ dhanāharaṇatthāya pesenti, tasmā ‘‘pesanakacorā’’tveva vuccanti. Tepi ca pitāputte gahetvā pitaraṃ ‘‘tvaṃ amhākaṃ dhanaṃ āharitvā puttaṃ gahetvā yāhī’’ti vadanti. Etenupāyena mātudhītaro gahetvā mātaraṃ vissajjenti, jeṭṭhakaniṭṭhe gahetvā jeṭṭhabhātikaṃ vissajjenti, ācariyantevāsike gahetvā antevāsikaṃ vissajjenti. Te tasmiṃ kāle vedabbabrāhmaṇaṃ gahetvā bodhisattaṃ vissajjesuṃ. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Benares regierte, lebte in einem kleinen Dorf ein gewisser Brahmane, der eine Beschwörungsformel namens Vedabba kannte. Diese Formel, so heißt es, war unbezahlbar und von höchstem Wert; wenn eine bestimmte Planetenkonstellation erreicht war, rezitierte er diese Formel, blickte zum Himmel empor, und sogleich regnete es die sieben Arten von Edelsteinen vom Himmel herab. Zu jener Zeit erlernte der Bodhisatta bei diesem Brahmanen diese Kunst. Eines Tages nahm der Brahmane den Bodhisatta mit sich und verließ wegen einer Angelegenheit sein eigenes Dorf, um in das Reich Ceta zu reisen. Unterwegs, an einer Stelle im Wald, trieben fünfhundert sogenannte Sende-Räuber ihr Unwesen, indem sie Reisende überfielen. Sie nahmen sowohl den Bodhisatta als auch den Vedabba-Brahmanen gefangen. Warum aber werden sie „Sende-Räuber“ genannt? Wenn sie zwei Personen gefangen nahmen, schickten sie angeblich eine davon los, um Geld herbeizuschaffen; darum werden sie „Sende-Räuber“ genannt. Wenn sie Vater und Sohn gefangen nahmen, sagten sie zum Vater: „Bringe uns Geld, nimm dann deinen Sohn mit und geh.“ Auf diese Weise ließen sie, wenn sie Mutter und Tochter gefangen nahmen, die Mutter frei; wenn sie den älteren und den jüngeren Bruder gefangen nahmen, ließen sie den älteren Bruder frei; wenn sie Lehrer und Schüler gefangen nahmen, ließen sie den Schüler frei. Zu jener Zeit nahmen sie dementsprechend den Vedabba-Brahmanen gefangen und ließen den Bodhisatta frei. Bodhisatto ācariyaṃ vanditvā ‘‘ahaṃ ekāhadvīhaccayena āgamissāmi, tumhe mā bhāyittha, apica kho pana mama vacanaṃ karotha, ajja dhanavassāpanakanakkhattayogo bhavissati, mā kho tumhe dukkhaṃ asahantā mantaṃ parivattetvā dhanaṃ vassāpayittha. Sace vassāpessatha, tumhe ca vināsaṃ pāpuṇissatha, ime ca pañcasatā corā’’ti evaṃ ācariyaṃ ovaditvā dhanatthāya agamāsi. Corāpi sūriye atthaṅgate brāhmaṇaṃ bandhitvā nipajjāpesuṃ. Taṅkhaṇaññeva pācīnalokadhātuto paripuṇṇacandamaṇḍalaṃ uṭṭhahi. Brāhmaṇo nakkhattaṃ olokento ‘‘dhanavassāpanakanakkhattayogo laddho, kiṃ me dukkhena anubhūtena, mantaṃ parivattetvā ratanavassaṃ vassāpetvā corānaṃ dhanaṃ datvā yathāsukhaṃ gamissāmī’’ti cintetvā core āmantesi ‘‘bhonto corā, tumhe maṃ kimatthāya gaṇhathā’’ti? ‘‘Dhanatthāya, ayyā’’ti. ‘‘Sace vo, dhanena attho, khippaṃ maṃ bandhanā mocetvā sīsaṃ nhāpetvā ahatavatthāni acchādetvā gandhehi vilimpāpetvā pupphāni pilandhāpetvā ṭhapethā’’ti. ‘‘Corā tassa kathaṃ sutvā tathā akaṃsu’’. Der Bodhisatta verbeugte sich vor seinem Lehrer und sagte: „Ich werde in ein oder zwei Tagen zurückkehren. Habt keine Angst! Tut jedoch genau das, was ich euch sage: Heute wird eine Planetenkonstellation eintreffen, die einen Schatzregen bewirkt. Da ihr den Schmerz der Gefangenschaft nicht ertragen könnt, rezitiert nicht die Formel, um Schätze herabregnen zu lassen. Solltet ihr sie herabregnen lassen, werdet sowohl ihr als auch diese fünfhundert Räuber im Verderben enden.“ Nachdem er seinen Lehrer so ermahnt hatte, ging er fort, um das Geld zu beschaffen. Als die Sonne untergegangen war, fesselten die Räuber den Brahmanen und legten ihn hin. Genau in diesem Augenblick ging am östlichen Horizont die volle Mondscheibe auf. Als der Brahmane zu den Sternen blickte, dachte er: „Die Konstellation, die den Schatzregen bewirkt, ist erreicht. Warum sollte ich dieses Leid ertragen? Ich werde die Formel rezitieren, einen Edelsteinregen herabrufen, den Räubern das Geld geben und in Frieden meines Weges gehen.“ So wandte er sich an die Räuber: „Ihr Räuber, wozu haltet ihr mich gefangen?“ „Wegen des Geldes, Herr“, antworteten sie. „Wenn ihr Geld wollt, so befreit mich schnell von meinen Fesseln, wascht mein Haupt, kleidet mich in neue Gewänder, salbt mich mit Düften, schmückt mich mit Blumen und lasst mich so stehen.“ Als die Räuber seine Worte hörten, taten sie genau so. Brāhmaṇo [Pg.272] nakkhattayogaṃ ñatvā mantaṃ parivattetvā ākāsaṃ ullokesi, tāvadeva ākāsato ratanāni patiṃsu. Corā taṃ dhanaṃ saṅkaḍḍhitvā uttarāsaṅgesu bhaṇḍikaṃ katvā pāyiṃsu. Brāhmaṇopi tesaṃ pacchatova agamāsi. Atha te core aññe pañcasatā corā gaṇhiṃsu. ‘‘Kimatthaṃ amhe gaṇhathā’’ti ca vuttā ‘‘dhanatthāyā’’ti āhaṃsu. ‘‘Yadi vo dhanena attho, etaṃ brāhmaṇaṃ gaṇhatha, eso ākāsaṃ ulloketvā dhanaṃ vassāpesi, amhākampetaṃ eteneva dinna’’nti. Corā core vissajjetvā ‘‘amhākampi dhanaṃ dehī’’ti brāhmaṇaṃ gaṇhiṃsu. Brāhmaṇo ‘‘ahaṃ tumhākaṃ dhanaṃ dadeyyaṃ, dhanavassāpanakanakkhattayogo pana ito saṃvaccharamatthake bhavissati. Yadi vo dhanenattho, adhivāsetha, tadā dhanavassaṃ vassāpessāmī’’ti āha. Corā kujjhitvā ‘‘ambho, duṭṭhabrāhmaṇa, aññesaṃ idāneva dhanaṃ vassāpetvā amhe aññaṃ saṃvaccharaṃ adhivāsāpesī’’ti tiṇhena asinā brāhmaṇaṃ dvidhā chinditvā magge chaḍḍetvā vegena anubandhitvā tehi corehi saddhiṃ yujjhitvā te sabbepi māretvā dhanaṃ ādāya puna dve koṭṭhāsā hutvā aññamaññaṃ yujjhitvā aḍḍhateyyāni purisasatāni ghātetvā etena upāyena yāva dve janā avasiṭṭhā ahesuṃ, tāva aññamaññaṃ ghātayiṃsu. Evaṃ taṃ purisasahassaṃ vināsaṃ pattaṃ. Der Brahmane erkannte die Sternenkonstellation, rezitierte die Formel und blickte zum Himmel empor; im selben Augenblick fielen Edelsteine vom Himmel herab. Die Räuber rafften die Schätze zusammen, banden sie in ihren Obergewändern zu Bündeln zusammen und machten sich auf den Weg. Auch der Brahmane folgte ihnen unmittelbar nach. Da wurden diese Räuber von einer anderen Bande von fünfhundert Räubern gefangen genommen. Auf die Frage: „Warum nehmt ihr uns gefangen?“, antworteten sie: „Wegen der Schätze.“ „Wenn ihr Schätze wollt, so nehmt diesen Brahmanen gefangen! Er hat zum Himmel geblickt und Geld herabregnen lassen; auch dieses unsere Hab und Gut wurde uns von ihm gegeben.“ Daraufhin ließen die Räuber die ersten Räuber laufen und ergriffen den Brahmanen mit den Worten: „Gib auch uns Schätze!“ Der Brahmane sprach: „Ich würde euch gerne Schätze geben, doch die Konstellation, die den Schatzregen bewirkt, wird erst in genau einem Jahr von heute an wiederkehren. Wenn ihr Schätze wollt, so geduldet euch; dann werde ich es für euch herabregnen lassen.“ Da wurden die Räuber zornig und riefen: „He, du schändlicher Brahmane! Den anderen hast du sogleich Schätze herabregnen lassen, uns aber vertröstest du auf ein ganzes Jahr!“ Mit einem scharfen Schwert hieben sie den Brahmanen mitten entzwei, warfen ihn auf den Weg, verfolgten die anderen Räuber in aller Eile, kämpften mit ihnen, töteten sie alle, nahmen die Schätze an sich, spalteten sich dann wieder in zwei Gruppen auf, bekämpften sich gegenseitig, töteten zweihundertfünfzig Männer und metzelten sich auf diese Weise so lange gegenseitig nieder, bis nur noch zwei Männer übrig blieben. So ging diese gesamte Schar von tausend Männern zugrunde. Te pana dve janā upāyena taṃ dhanaṃ āharitvā ekasmiṃ gāmasamīpe gahanaṭṭhāne dhanaṃ paṭicchādetvā eko khaggaṃ gahetvā rakkhanto nisīdi, eko taṇḍule gahetvā bhattaṃ pacāpetuṃ gāmaṃ pāvisi. Lobho ca nāmesa vināsamūlamevāti dhanasantike nisinno cintesi ‘‘tasmiṃ āgate idaṃ dhanaṃ dve koṭṭhāsā bhavissanti, yaṃnūnāhaṃ taṃ āgatamattameva khaggena paharitvā ghāteyya’’nti. So khaggaṃ sannayhitvā tassa āgamanaṃ olokento nisīdi. Itaropi cintesi ‘‘taṃ dhanaṃ dve koṭṭhāsā bhavissanti, yaṃnūnāhaṃ bhatte visaṃ pakkhipitvā taṃ purisaṃ bhojetvā jīvitakkhayaṃ pāpetvā ekakova dhanaṃ gaṇheyya’’nti. So niṭṭhite bhatte sayaṃ bhuñjitvā sesake visaṃ pakkhipitvā taṃ ādāya tattha agamāsi. Taṃ bhattaṃ otāretvā ṭhitamattameva itaro khaggena dvidhā chinditvā taṃ paṭicchannaṭṭhāne chaḍḍetvā tañca bhattaṃ bhuñjitvā sayampi tattheva jīvitakkhayaṃ pāpuṇi. Evañca taṃ dhanaṃ nissāya sabbeva vināsaṃ pāpuṇiṃsu. Jene zwei übrig gebliebenen Männer schafften die Beute mit List fort, versteckten sie an einem dicht bewachsenen Ort nahe einem Dorf, woraufhin sich einer mit dem Schwert in der Hand niedersetzte, um sie zu bewachen, während der andere Reis nahm und ins Dorf ging, um Reis kochen zu lassen. Die Gier ist wahrlich die Wurzel des Verderbens. Und so dachte derjenige, der bei den Schätzen saß: „Wenn jener zurückkommt, müssen diese Schätze in zwei Teile geteilt werden. Wie wäre es, wenn ich ihn, sobald er ankommt, mit dem Schwert erschlüge und tötete?“ Er gürtete sein Schwert und saß da, um nach dessen Rückkehr Ausschau zu halten. Auch der andere dachte: „Jene Schätze werden in zwei Teile geteilt werden. Wie wäre es, wenn ich Gift in den Reis mischte, jenen Mann davon essen ließe, ihn so umbrächte und die Schätze ganz für mich allein nähme?“ Als der Reis fertig gekocht war, aß er selbst davon, mischte Gift in den Rest, nahm ihn und ging dorthin zurück. Kaum hatte er den Topf mit dem Reis abgestellt und stand da, spaltete der andere ihn mit dem Schwert entzwei, warf seine Leiche an einen verborgenen Ort, aß den Reis und fand sogleich an Ort und Stelle selbst den Tod. Und so gingen wegen jenes Schatzes alle miteinander im Verderben unter. Bodhisattopi [Pg.273] kho ekāhadvīhaccayena dhanaṃ ādāya āgato tasmiṃ ṭhāne ācariyaṃ adisvā vippakiṇṇaṃ pana dhanaṃ disvā ‘‘ācariyena mama vacanaṃ akatvā dhanaṃ vassāpitaṃ bhavissati, sabbehi vināsaṃ pattehi bhavitabba’’nti mahāmaggena pāyāsi. Gacchanto ācariyaṃ mahāmagge dvidhā chinnaṃ disvā ‘‘mama vacanaṃ akatvā mato’’ti dārūni uddharitvā citakaṃ katvā ācariyaṃ jhāpetvā vanapupphehi pūjetvā purato gacchanto jīvitakkhayaṃ patte pañcasate, purato aḍḍhateyyasateti anukkamena avasāne dve jane jīvitakkhayaṃ patte disvā cintesi ‘‘imaṃ dvīhi ūnaṃ purisasahassaṃ vināsaṃ pattaṃ, aññehi dvīhi corehi bhavitabbaṃ, tepi santhambhituṃ na sakkhissanti, kahaṃ nu kho te gatā’’ti gacchanto tesaṃ dhanaṃ ādāya gahanaṭṭhānaṃ paviṭṭhamaggaṃ disvā gacchanto bhaṇḍikabaddhassa dhanassa rāsiṃ disvā ekaṃ bhattapātiṃ avattharitvā mataṃ addasa. Tato ‘‘idaṃ nāma tehi kataṃ bhavissatī’’ti sabbaṃ ñatvā ‘‘kahaṃ nu kho so puriso’’ti vicinanto tampi paṭicchannaṭṭhāne apaviddhaṃ disvā ‘‘amhākaṃ ācariyo mama vacanaṃ akatvā attano dubbacabhāvena attanāpi vināsaṃ patto, aparampi tena purisasahassaṃ vināsitaṃ, anupāyena vata akāraṇena attano vuḍḍhiṃ patthayamānā amhākaṃ ācariyo viya mahāvināsameva pāpuṇissantī’’ti cintetvā imaṃ gāthamāha – Auch der Bodhisatta kam nach dem Verlauf von ein oder zwei Tagen zurück, nahm den Schatz mit sich, und als er an jener Stelle den Lehrer nicht sah, wohl aber das verstreute Geld erblickte, dachte er: „Der Lehrer hat, ohne auf meine Worte zu hören, den Schatz herabregnen lassen. Alle müssen wohl ins Verderben geraten sein“, und machte sich auf den Hauptweg auf. Während er dahinging, sah er den Lehrer auf dem Hauptweg in zwei Teile zerhauen und dachte: „Weil er nicht auf meine Worte hörte, ist er gestorben.“ Er sammelte Holz, errichtete einen Scheiterhaufen, verbrannte den Leichnam des Lehrers, ehrte ihn mit Waldblumen und ging weiter. Dabei sah er nacheinander fünfhundert Männer, die ihr Leben verloren hatten, weiter vorne zweihundertfünfzig und schließlich am Ende zwei Personen, die das Leben verloren hatten. Da dachte er: „Diese tausend Männer, bis auf zwei, sind ins Verderben geraten. Es muss noch zwei andere Räuber gegeben haben. Auch sie werden sich nicht im Zaum halten können. Wo mögen sie nur hingegangen sein?“ Als er weiterging, entdeckte er den Pfad, auf dem sie mit dem Schatz in ein Dickicht eingedrungen waren, und als er diesem folgte, erblickte er einen Haufen von in Bündeln verschnürtem Gut sowie einen Toten, der über einer umgestürzten Reisschale lag. Daraufhin erkannte er das Ganze: „Dies also müssen sie getan haben.“ Bei der Suche nach dem anderen Mann: „Wo ist er wohl?“, fand er auch diesen an einem verborgenen Ort hingeworfen und dachte: „Unser Lehrer hat, indem er nicht auf meine Worte hörte, durch seine eigene Unbelehrbarkeit selbst das Verderben gefunden. Und durch ihn wurden noch weitere tausend Männer vernichtet. Wahrlich, diejenigen, die auf unrechte Weise, ohne vernünftigen Grund, ihr eigenes Wohl begehren, werden genau wie unser Lehrer nur in ein großes Verderben rennen.“ Nach diesen Gedanken sprach er folgende Strophe: 48. 48. ‘‘Anupāyena yo atthaṃ, icchati so vihaññati; Cetā haniṃsu vedabbaṃ, sabbe te byasanamajjhagū’’ti. „Wer auf unrechte Weise sein Wohl begehrt, der scheitert; die Ceta-Männer erschlugen den Vedabba, und sie alle gerieten ins Verderben.“ Tattha so vihaññatīti so anupāyena ‘‘attano atthaṃ vuḍḍhiṃ sukhaṃ icchāmī’’ti akāle vāyāmaṃ karonto puggalo vihaññati kilamati mahāvināsaṃ pāpuṇāti. Cetāti cetaraṭṭhavāsino corā. Haniṃsu vedabbanti vedabbamantavasena ‘‘vedabbo’’ti laddhanāmaṃ brāhmaṇaṃ haniṃsu. Sabbe te byasanamajjhagūti tepi ca anavasesā aññamaññaṃ ghātayamānā byasanaṃ adhigacchiṃsu paṭilabhiṃsūti. Darin bedeutet „der scheitert“ (so vihaññati): Jene Person, die auf unrechte Weise zur Unzeit Anstrengung unternimmt, indem sie denkt: „Ich begehre mein eigenes Wohl, mein Gedeihen und mein Glück“, scheitert, leidet Mühsal und gerät in großes Verderben. „Die Ceter“ (cetā) bedeutet: die im Reich Ceta lebenden Räuber. „Erschlugen den Vedabba“ (haniṃsu vedabbaṃ) bedeutet: Sie töteten den Brahmanen, der aufgrund des Vedabba-Mantras den Namen „Vedabba“ erhalten hatte. „Sie alle gerieten ins Verderben“ (sabbe te byasanamajjhagū) bedeutet: Auch sie fanden ausnahmslos, indem sie sich gegenseitig erschlugen, das Verderben und erlitten den Untergang. Evaṃ bodhisatto ‘‘yathā amhākaṃ ācariyo anupāyena aṭṭhāne parakkamaṃ karonto dhanaṃ vassāpetvā attanāpi jīvitakkhayaṃ patto, aññesañca [Pg.274] vināsapaccayo jāto, evameva yo aññopi anupāyena attano atthaṃ icchanto vāyāmaṃ karissati, sabbo so attanā ca vinassissati, paresañca vināsapaccayo bhavissatī’’ti vanaṃ unnādento devatāsu sādhukāraṃ dadamānāsu imāya gāthāya dhammaṃ desetvā taṃ dhanaṃ upāyena attano gehaṃ āharitvā dānādīni puññāni karonto yāvatāyukaṃ ṭhatvā jīvitapariyosāne saggapathaṃ pūrayamāno agamāsi. So verkündete der Bodhisatta mit dieser Strophe die Lehre, während er den Wald widerhallen ließ und die Gottheiten Beifall riefen: „Ebenso wie unser Lehrer, der auf unrechte Weise am falschen Ort Anstrengung unternahm, indem er Schätze herabregnen ließ, selbst den Tod fand und auch die Ursache für das Verderben anderer wurde – genau so wird jeder andere, der auf unrechte Weise sein eigenes Wohl begehrend Anstrengungen unternimmt, selbst zugrunde gehen und die Ursache für das Verderben anderer werden.“ Er brachte jenen Schatz auf geschickte Weise in sein eigenes Haus, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosen und anderes, lebte sein Leben bis zum Ende und ging nach dem Erlöschen des Lebens ein, indem er den Pfad zum Himmelreich erfüllte. Satthāpi ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva dubbaco, pubbepi dubbacova, dubbacattā pana mahāvināsaṃ patto’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā vedabbabrāhmaṇo dubbacabhikkhu ahosi, antevāsiko pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrverkündung vor, stellte die Verbindung der Zusammenhänge her und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Nicht nur jetzt, o Mönch, bist du unbelehrbar; auch in der Vergangenheit warst du unbelehrbar, und wegen deiner Unbelehrbarkeit bist du in großes Verderben geraten.“ [Und er fügte hinzu:] „Damals war der Vedabba-Brahmane der unbelehrbare Mönch, der Schüler aber war ich selbst.“ Vedabbajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Vedabba-Jātaka ist die achte.
[49] 9. Nakkhattajātakavaṇṇanā [49] 9. Die Erklärung des Nakkhatta-Jātaka Nakkhattaṃ patimānentanti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ ājīvakaṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyaṃ kirekaṃ kuladhītaraṃ janapade eko kulaputto attano puttassa vāretvā ‘‘asukadivase nāma gaṇhissāmī’’ti divasaṃ ṭhapetvā tasmiṃ divase sampatte attano kulūpakaṃ ājīvakaṃ pucchi ‘‘bhante, ajja mayaṃ ekaṃ maṅgalaṃ karissāma, sobhanaṃ nu kho nakkhatta’’nti. So ‘‘ayaṃ maṃ paṭhamaṃ apucchitvāva divasaṃ ṭhapetvā idāni paṭipucchati, hotu, sikkhāpessāmi na’’nti kujjhitvā ‘‘ajja asobhanaṃ nakkhattaṃ, mā ajja maṅgalaṃ karittha, sace karissatha, mahāvināso bhavissatī’’ti āha. Tasmiṃ kule manussā tassa saddahitvā taṃ divasaṃ na gacchiṃsu. Nagaravāsino sabbaṃ maṅgalakiriyaṃ katvā tesaṃ anāgamanaṃ disvā ‘‘tehi ajja divaso ṭhapito, no ca kho āgatā, amhākampi bahu vayakammaṃ kataṃ, kiṃ no tehi, amhākaṃ dhītaraṃ aññassa dassāmā’’ti yathākateneva maṅgalena dhītaraṃ aññassa kulassa adaṃsu. „Auf das Gestirn wartend ...“ – Dies erzählte der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, mit Bezug auf einen gewissen Ājīvaka. Es heißt, in Sāvatthi hatte ein Sohn einer Familie vom Lande eine Tochter aus einer dortigen Familie für seinen Sohn erbeten und vereinbart: „An jenem bestimmten Tag werde ich sie heimführen.“ Als er so den Tag festgesetzt hatte und dieser Tag herannahte, fragte er den Ājīvaka, den vertrauten Hausasketen der Familie: „Ehrwürdiger Herr, wir wollen heute ein Fest der Vermählung feiern. Ist das Gestirn heute günstig?“ Jener dachte verärgert: „Er hat den Tag festgesetzt, ohne mich zuerst zu fragen, und fragt mich erst jetzt! Nun gut, ich werde ihm eine Lehre erteilen“, und sagte: „Heute steht das Gestirn ungünstig. Haltet heute kein Fest ab! Wenn ihr es dennoch tut, wird großes Verderben über euch kommen.“ Die Leute aus jener Familie glaubten ihm und reisten an jenem Tag nicht ab. Die Stadtbewohner hatten bereits alle Festvorbereitungen getroffen, und als sie sahen, dass jene nicht erschienen, sagten sie: „Sie hatten den heutigen Tag vereinbart und sind nicht gekommen. Auch wir haben erhebliche Ausgaben gehabt. Was scheren sie uns noch? Geben wir unsere Tochter einem anderen!“ Und so gaben sie, im Rahmen des bereits vorbereiteten Festes, ihre Tochter einer anderen Familie zur Frau. Itare punadivase āgantvā ‘‘detha no dārika’’nti āhaṃsu. Atha ne sāvatthivāsino ‘‘janapadavāsino nāma tumhe gahapatikā pāpamanussā divasaṃ ṭhapetvā avaññāya na āgatā, āgatamaggeneva paṭigacchatha[Pg.275], amhehi aññesaṃ dārikā dinnā’’ti paribhāsiṃsu. Te tehi saddhiṃ kalahaṃ katvā dārikaṃ alabhitvā yathāgatamaggeneva gatā. Tenapi ājīvakena tesaṃ manussānaṃ maṅgalantarāyassa katabhāvo bhikkhūnaṃ antare pākaṭo jāto. Te bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitā ‘‘āvuso, ājīvakena kulassa maṅgalantarāyo kato’’ti kathayamānā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchi. Te ‘‘imāya nāmā’’ti kathayiṃsu. ‘‘Na, bhikkhave, idāneva ājīvako tassa kulassa maṅgalantarāyaṃ karoti, pubbepi esa tesaṃ kujjhitvā maṅgalantarāyaṃ akāsiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Die anderen kamen am folgenden Tag und sagten: „Gebt uns das Mädchen!“ Da beschimpften die Bewohner von Sāvatthi sie: „Ihr Landbewohner, ihr Hausväter, seid wahrlich schlechte Menschen! Ihr habt den Tag festgesetzt und seid aus Geringschätzung nicht erschienen. Geht nur auf demselben Weg zurück, auf dem ihr gekommen seid! Wir haben das Mädchen bereits einem anderen gegeben.“ Sie gerieten mit ihnen in Streit, erhielten das Mädchen jedoch nicht und zogen auf demselben Weg ab, auf dem sie gekommen waren. Dass jener Ājīvaka das Fest dieser Leute vereitelt hatte, wurde auch unter den Mönchen bekannt. Diese Mönche versammelten sich in der Lehrhalle und sprachen beim Beisammensein: „Brüder, der Ājīvaka hat das Fest jener Familie vereitelt.“ Der Meister kam hinzu und fragte: „Mönche, über welches Thema sprecht ihr hier im Beisammensein?“ Sie antworteten: „Über dieses, o Herr.“ Da sprach der Meister: „Mönche, nicht erst jetzt hat dieser Ājīvaka das Fest jener Familie vereitelt; auch in der Vergangenheit hat er ihnen aus Zorn ihr Fest vereitelt.“ Und er trug eine Begebenheit aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente nagaravāsino janapadavāsīnaṃ dhītaraṃ vāretvā divasaṃ ṭhapetvā attano kulūpakaṃ ājīvakaṃ pucchiṃsu ‘‘bhante, ajja amhākaṃ ekā maṅgalakiriyā, sobhanaṃ nu kho nakkhatta’’nti. So ‘‘ime attano ruciyā divasaṃ ṭhapetvā idāni maṃ pucchantī’’ti kujjhitvā ‘‘ajja nesaṃ maṅgalantarāyaṃ karissāmī’’ti cintetvā ‘‘ajja asobhanaṃ nakkhattaṃ, sace karotha, mahāvināsaṃ pāpuṇissathā’’ti āha. Te tassa saddahitvā na gamiṃsu. Janapadavāsino tesaṃ anāgamanaṃ ñatvā ‘‘te ajja divasaṃ ṭhapetvāpi na āgatā, kiṃ no tehi, aññesaṃ dhītaraṃ dassāmā’’ti aññesaṃ dhītaraṃ adaṃsu. Nagaravāsino punadivase āgantvā dārikaṃ yāciṃsu. Janapadavāsino ‘‘tumhe nagaravāsino nāma chinnahirikā gahapatikā, divasaṃ ṭhapetvā dārikaṃ na gaṇhittha, mayaṃ tumhākaṃ anāgamanabhāvena aññesaṃ adamhā’’ti. Mayaṃ ājīvakaṃ paṭipucchitvā ‘‘‘nakkhattaṃ na sobhana’nti nāgatā, detha no dārika’’nti. ‘‘Amhehi tumhākaṃ anāgamanabhāvena aññesaṃ dinnā, idāni dinnadārikaṃ kathaṃ puna ānessāmā’’ti. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, hielten die Stadtbewohner um die Hand einer Tochter der Landbewohner an, legten einen Tag fest und fragten den Ājīvaka-Asketen, der ihr Haus aufsuchte: „Ehrwürdiger Herr, heute ist unsere Hochzeitsfeier. Ist das Gestirn günstig?“ Dieser wurde zornig und dachte: „Diese Leute haben den Tag nach ihrem eigenen Belieben festgelegt und fragen mich erst jetzt!“ So beschloss er: „Heute werde ich ihre Festlichkeit vereiteln.“ Er sagte zu ihnen: „Heute steht das Gestirn ungünstig. Wenn ihr die Feier heute abhaltet, werdet ihr ins große Verderben stürzen.“ Sie glaubten ihm und reisten nicht an. Als die Landbewohner merkten, dass jene nicht kamen, dachten sie: „Sie haben den Tag vereinbart und sind dennoch nicht gekommen. Was wollen wir mit ihnen? Wir werden unsere Tochter anderen geben“, und gaben sie anderen. Am nächsten Tag kamen die Stadtbewohner und verlangten das Mädchen. Die Landbewohner sagten: „Ihr Stadtbewohner seid schamlose Hausväter! Ihr habt einen Tag festgelegt und habt das Mädchen nicht abgeholt. Weil ihr nicht gekommen seid, haben wir sie anderen gegeben.“ [Die Stadtbewohner sagten:] „Wir haben den Ājīvaka-Asketen befragt, und da er sagte: ‚Das Gestirn steht ungünstig‘, kamen wir nicht. Gebt uns nun das Mädchen!“ [Die Landbewohner entgegneten:] „Da ihr nicht gekommen seid, haben wir sie anderen gegeben. Wie sollten wir ein bereits weggegebenes Mädchen jetzt wieder zurückholen?“ Evaṃ tesu aññamaññaṃ kalahaṃ karontesu eko nagaravāsī paṇḍitapuriso ekena kammena janapadaṃ gato tesaṃ nagaravāsīnaṃ ‘‘mayaṃ ājīvakaṃ pucchitvā nakkhattassa asobhanabhāvena nāgatā’’ti kathentānaṃ sutvā ‘‘nakkhattena ko attho, nanu dārikāya laddhabhāvova nakkhatta’’nti vatvā imaṃ gāthamāha – Während sie so miteinander stritten, hörte ein weiser Mann aus der Stadt, der geschäftlich auf das Land gereist war, die Stadtbewohner sagen: „Wir haben den Ājīvaka gefragt, und weil das Gestirn ungünstig stand, sind wir nicht gekommen.“ Er erwiderte: „Was nützt ein Gestirn? Ist nicht die Erlangung des Mädchens selbst das günstige Gestirn?“ und sprach diese Strophe: 49. 49. ‘‘Nakkhattaṃ [Pg.276] patimānentaṃ, attho bālaṃ upaccagā; Attho atthassa nakkhattaṃ, kiṃ karissanti tārakā’’ti. „Während der Tor auf ein günstiges Gestirn wartet, entgeht ihm sein Vorteil. Das Erreichen des Ziels selbst ist das günstige Gestirn; was können da die Sterne am Himmel ausrichten?“ Tattha patimānentanti olokentaṃ, ‘‘idāni nakkhattaṃ bhavissati, idāni nakkhattaṃ bhavissatī’’ti āgamayamānaṃ. Attho bālaṃ upaccagāti etaṃ nagaravāsikaṃ bālaṃ dārikāpaṭilābhasaṅkhāto attho atikkanto. Attho atthassa nakkhattanti yaṃ atthaṃ pariyesanto carati, so paṭiladdho atthova atthassa nakkhattaṃ nāma. Kiṃ karissanti tārakāti itare pana ākāse tārakā kiṃ karissanti, kataraṃ atthaṃ sādhessantīti attho. Nagaravāsino kalahaṃ katvā dārikaṃ alabhitvāva agamaṃsu. Dabei bedeutet ‚patimānentaṃ‘ Ausschau halten, darauf wartend, dass ‚jetzt die Konstellation günstig sein wird, jetzt die Konstellation günstig sein wird‘. ‚Attho bālaṃ upaccagā‘ bedeutet: Dem törichten Stadtbewohner ist der Vorteil, nämlich das Erlangen des Mädchens, entgangen. ‚Attho atthassa nakkhattaṃ‘ bedeutet: Das erstrebte Ziel, das man sucht und erlangt, ist selbst das günstige Gestirn für diesen Nutzen. ‚Kiṃ karissanti tārakā‘ bedeutet: Was können die anderen Sterne am Himmel schon tun, welchen Nutzen können sie herbeiführen? Dies ist die Bedeutung. Die Stadtbewohner stritten sich noch, mussten dann aber abziehen, ohne das Mädchen erhalten zu haben. Satthā ‘‘na, bhikkhave, esa ājīvako idāneva kulassa maṅgalantarāyaṃ karoti, pubbepi akāsiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā ājīvako etarahi ājīvakova ahosi, tānipi kulāni etarahi kulāniyeva, gāthaṃ vatvā ṭhito paṇḍitapuriso pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt hat dieser Ājīvaka-Asket das Fest einer Familie vereitelt; das hat er auch schon in der Vergangenheit getan.“ Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt und die Verknüpfung hergestellt hatte, führte er die Wiedergeburten zusammen: „Der damalige Ājīvaka war der heutige Ājīvaka, jene Familien von damals waren ebendiese Familien von heute, und der weise Mann, der dastand und die Strophe sprach, war ich selbst.“ Nakkhattajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Nakkhatta-Jātaka, das neunte.
[50] 10. Dummedhajātakavaṇṇanā [50] 10. Die Erklärung des Dummedha-Jātaka Dummedhānanti idaṃ satthā jetavane viharanto lokatthacariyaṃ ārabbha kathesi. Sā dvādasakanipāte mahākaṇhajātake (jā. 1.12.61 ādayo) āvi bhavissati. „Dummedhānaṃ...“ – Diese Lehrrede hielt der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf sein Wirken zum Wohle der Welt. Diese Angelegenheit wird im Mahākaṇha-Jātaka (Jā. 1.12.61 u.a.) des Zwölften Buches (Dvādasakanipāta) deutlich werden. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa rañño aggamahesiyā kucchimhi paṭisandhiṃ gaṇhi. Tassa mātukucchito nikkhantassa nāmaggahaṇadivase ‘‘brahmadattakumāro’’ti nāmaṃ akaṃsu. So soḷasavassuddesiko hutvā takkasilāyaṃ sippaṃ uggaṇhitvā tiṇṇaṃ vedānaṃ [Pg.277] pāraṃ gantvā aṭṭhārasannaṃ vijjaṭṭhānānaṃ nipphattiṃ pāpuṇi, athassa pitā oparajjaṃ adāsi. Tasmiṃ samaye bārāṇasivāsino devatāmaṅgalikā honti, devatā namassanti, bahū ajeḷakakukkuṭabhūkarādayo vadhitvā nānappakārehi pupphagandhehi ceva maṃsalohitehi ca balikammaṃ karonti. Bodhisatto cintesi ‘‘idāni sattā devatāmaṅgalikā, bahuṃ pāṇavadhaṃ karonti, mahājano yebhuyyena adhammasmiṃyeva niviṭṭho, ahaṃ pitu accayena rajjaṃ labhitvā ekampi akilametvā upāyeneva pāṇavadhaṃ kātuṃ na dassāmī’’ti. So ekadivasaṃ rathaṃ abhiruyha nagarā nikkhanto addasa ekasmiṃ mahante vaṭarukkhe mahājanaṃ sannipatitaṃ, tasmiṃ rukkhe nibbattadevatāya santike puttadhītuyasadhanādīsu yaṃ yaṃ icchati, taṃ taṃ patthentaṃ. So taṃ disvā rathā oruyha taṃ rukkhaṃ upasaṅkamitvā gandhapupphehi pūjetvā udakena abhisekaṃ katvā rukkhaṃ padakkhiṇaṃ katvā devatāmaṅgaliko viya hutvā devataṃ namassitvā rathaṃ abhiruyha nagaraṃ pāvisi. Tato paṭṭhāya imināva niyāmena antarantare tattha gantvā devatāmaṅgaliko viya pūjaṃ karoti. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta im Schoß der Hauptgemahlin jenes Königs Empfängnis. Als er aus dem Mutterschoß geboren war, gaben sie ihm am Tag der Namensgebung den Namen „Prinz Brahmadatta“. Als er etwa sechzehn Jahre alt war, erlernte er in Takkasilā die Künste, drang bis zum anderen Ufer der drei Veden vor und erlangte Meisterschaft in den achtzehn Wissenszweigen. Daraufhin verlieh ihm sein Vater das Amt des Vizekönigs. Zu jener Zeit waren die Einwohner von Bārāṇasī den Göttern und Festen ergeben; sie verehrten Gottheiten und brachten Opferdarbringungen mit verschiedenen Blumen und Düften sowie Fleisch und Blut dar, wofür sie viele Ziegen, Schafe, Hähne, Schweine und andere Tiere abschlachteten. Der Bodhisatta dachte bei sich: „Heutzutage hängen die Wesen dem Aberglauben an Gottheiten an und töten viele Lebewesen; die Allgemeinheit ist meist ganz im Unrecht verwurzelt. Wenn ich nach dem Verscheiden meines Vaters das Königreich erhalte, werde ich, ohne auch nur ein einziges Lebewesen zu quälen, durch ein geschicktes Mittel dem Töten von Lebewesen Einhalt gebieten.“ Als er eines Tages auf seinem Streitwagen aus der Stadt fuhr, sah er eine große Menschenmenge, die sich an einem mächtigen Banyanbaum versammelt hatte und von der dort residierenden Baumgottheit alles erbat, was sie sich wünschte – Söhne, Töchter, Ruhm, Wohlstand und anderes mehr. Als er dies sah, stieg er vom Wagen herab, trat an den Baum heran, verehrte ihn mit Düften und Blumen, besprengte ihn mit Wasser, umwandelte den Baum ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn, tat so, als sei er selbst ein gläubiger Verehrer von Baumgöttern, verneigte sich vor der Gottheit, bestieg wieder seinen Wagen und kehrte in die Stadt zurück. Von da an begab er sich in genau dieser Weise von Zeit zu Zeit dorthin und brachte wie ein gläubiger Gottheitenverehrer Opfer dar. So aparena samayena pitu accayena rajje patiṭṭhāya catasso agatiyo vajjetvā dasa rājadhamme akopento dhammena rajjaṃ kārento cintesi ‘‘mayhaṃ manoratho matthakaṃ patto, rajje patiṭṭhitomhi. Yaṃ panāhaṃ pubbe ekaṃ atthaṃ cintayiṃ, idāni taṃ matthakaṃ pāpessāmī’’ti amacce ca brāhmaṇagahapatikādayo ca sannipātāpetvā āmantesi ‘‘jānātha bho mayā kena kāraṇena rajjaṃ patta’’nti? ‘‘Na jānāma, devā’’ti. ‘‘Api vohaṃ asukaṃ nāma vaṭarukkhaṃ gandhādīhi pūjetvā añjaliṃ paggahetvā namassamāno diṭṭhapubbo’’ti. ‘‘Āma, devā’’ti. Tadāhaṃ patthanaṃ akāsiṃ ‘‘sace rajjaṃ pāpuṇissāmi, balikammaṃ te karissāmī’’ti. ‘‘Tassā me devatāya ānubhāvena idaṃ rajjaṃ laddhaṃ, idānissā balikammaṃ karissāmi, tumhe papañcaṃ akatvā khippaṃ devatāya balikammaṃ sajjethā’’ti. ‘‘Kiṃ kiṃ gaṇhāma, devā’’ti? Bho ahaṃ devatāya āyācamāno ‘‘ye mayhaṃ rajje pāṇātipātādīni pañca dussīlakammāni dasa akusalakammapathe samādāya vattissanti, te ghātetvā antavaṭṭimaṃsalohitādīhi balikammaṃ karissāmī’’ti āyāciṃ. Tasmā tumhe evaṃ bheriṃ carāpetha ‘‘amhākaṃ rājā uparājakāleyeva evaṃ āyāci ‘sacāhaṃ rajjaṃ pāpuṇissāmi, ye [Pg.278] me rajje dussīlā bhavissanti, te sabbe ghātetvā balikammaṃ karissāmī’ti, so idāni pañcavidhaṃ dussīlakammaṃ dasavidhaṃ akusalakammapathaṃ samādāya vattamānānaṃ dussīlānaṃ sahassaṃ ghātetvā tesaṃ hadayamaṃsādīni gāhāpetvā devatāya balikammaṃ kātukāmo, evaṃ nagaravāsino jānantū’’ti. Evañca pana vatvā ‘‘yedāni ito paṭṭhāya dussīlakamme vattissanti, tesaṃ sahassaṃ ghātetvā yaññaṃ yajitvā āyācanato muccissāmī’’ti etamatthaṃ pakāsento imaṃ gāthamāha – Später trat er nach dem Hinscheiden seines Vaters die Königsherrschaft an. Er mied die vier Abwege, verletzte die zehn königlichen Pflichten nicht und regierte das Reich in Gerechtigkeit. Da dachte er: „Mein Wunsch hat seinen Gipfel erreicht, ich bin in der Königsherrschaft gefestigt. Was ich mir aber früher als ein bestimmtes Ziel vorgenommen hatte, das will ich nun zur Vollendung bringen.“ Er ließ die Minister, Brahmanen, Hausväter und anderen versammeln und fragte sie: „Wißt ihr, ihr Herren, aus welchem Grunde ich die Königsherrschaft erlangt habe?“ – „Wir wissen es nicht, o König.“ – „Habt ihr mich jemals einen gewissen Banyanbaum mit Wohlgerüchen und anderem verehren, die Hände ehrfurchtsvoll zusammenlegen und anbeten sehen?“ – „Ja, o König.“ – „Damals legte ich ein Gelübde ab: ‚Wenn ich die Königsherrschaft erlange, will ich dir eine Opfergabe darbringen.‘ Durch die Macht dieser Gottheit habe ich diese Königsherrschaft erhalten. Nun will ich ihr die Opfergabe darbringen. Zögert nicht lange und bereitet der Gottheit rasch die Opfergabe vor.“ – „Was sollen wir alles herbeiholen, o König?“ – „Als ich die Gottheit anflehte, gelobte ich: ‚Diejenigen in meinem Reich, die die fünf Sünden wie das Töten von Lebewesen und so weiter begehen und den zehn unheilsamen Karmapfaden folgen, die werde ich töten lassen und mit ihren Gedärmen, ihrem Fleisch und Blut ein Opfer darbringen.‘ Darum lasst die Trommel schlagen und verkünden: ‚Unser König hat schon in seiner Zeit als Vizekönig so gefleht: „Wenn ich die Königsherrschaft erlange, werde ich alle, die in meinem Reich sittenlos sind, töten lassen und ein Opfer darbringen.“ Nun möchte er eintausend Sittenlose, die die fūnf Arten des sittenlosen Verhaltens und die zehn unheilsamen Karmapfade praktizieren, töten lassen, ihr Herzfleisch und andere Teile nehmen und der Gottheit ein Opfer darbringen. Dies sollen die Stadtbewohner wissen.‘“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er, um diese Bedeutung zu verdeutlichen, folgende Strophe, indem er dachte: „Wer sich von nun an unheilsam verhält, von denen werde ich tausend töten lassen, ein Opfer darbringen und mich so von meinem Gelübde befreien“: 50. 50. ‘‘Dummedhānaṃ sahassena, yañño me upayācito; Idāni khohaṃ yajissāmi, bahu adhammiko jano’’ti. „Mit tausend Toren habe ich mir ein Opfer gelobt; nun wahrlich werde ich opfern, denn zahlreich ist das ungerechte Volk.“ Tattha dummedhānaṃ sahassenāti ‘‘idaṃ kammaṃ kātuṃ vaṭṭati, idaṃ na vaṭṭatī’’ti ajānanabhāvena, dasasu vā pana akusalakammapathesu samādāya vattanabhāvena duṭṭhā medhā etesanti dummedhā, tesaṃ dummedhānaṃ nippaññānaṃ bālapuggalānaṃ gaṇitvā gahitena sahassena. Yañño me upayācitoti mayā devataṃ upasaṅkamitvā ‘‘evaṃ yajissāmī’’ti yañño yācito. Idāni khohaṃ yajissāmīti so ahaṃ iminā āyācanena rajjassa paṭiladdhattā idāni yajissāmi. Kiṃkāraṇā? Idāni hi bahu adhammiko jano, tasmā idāneva naṃ gahetvā balikammaṃ karissāmīti. Darin bedeutet „mit tausend Toren“ (dummedhānaṃ sahassena): Weil sie nicht wissen: „Diese Tat gehört sich zu tun, diese gehört sich nicht zu tun“, oder weil sie die zehn unheilsamen Karmapfade auf sich nehmen und danach handeln, ist ihre Einsicht verdorben, daher sind sie „Toren“ (dummedhā). Mit einer gezählten Zahl von tausend dieser Toren, der weisheitslosen, törichten Personen. „Habe ich mir ein Opfer gelobt“ (yañño me upayācito) bedeutet: Ich bin zu der Gottheit hingetreten und habe ein Opfer gelobt mit den Worten: „So will ich opfern.“ „Nun wahrlich werde ich opfern“ (idāni khohaṃ yajissāmi) bedeutet: Da ich durch dieses Geloben die Königsherrschaft erlangt habe, werde ich nun opfern. Aus welchem Grund? Da es jetzt viele ungerechte Menschen gibt, werde ich sie eben jetzt ergreifen und das Opfer darbringen. Amaccā bodhisattassa vacanaṃ sutvā ‘‘sādhu, devā’’ti dvādasayojanike bārāṇasinagare bheriṃ carāpesuṃ. Bheriyā āṇaṃ sutvā ekampi dussīlakammaṃ samādāya ṭhito ekapurisopi nāhosi. Iti yāva bodhisatto rajjaṃ kāresi, tāva ekapuggalopi pañcasu dasasu vā dussīlakammesu ekampi kammaṃ karonto na paññāyittha. Evaṃ bodhisatto ekapuggalampi akilamento sakalaraṭṭhavāsino sīlaṃ rakkhāpetvā sayampi dānādīni puññāni katvā jīvitapariyosāne attano parisaṃ ādāya devanagaraṃ pūrento agamāsi. Als die Minister die Worte des Bodhisatta hörten, stimmten sie zu mit: „Sehr wohl, o König!“, und ließen in der zwölf Yojanas großen Stadt Bārāṇasī die Trommel schlagen. Als die Menschen den Befehl der Trommel hörten, gab es keinen einzigen Mann mehr, der auch nur eine einzige sittenlose Tat beging. So wurde, solange der Bodhisatta regierte, nicht eine einzige Person dabei ertappt, wie sie auch nur eine unheilsame Tat unter den fünf oder zehn Arten des sittenlosen Verhaltens beging. Auf diese Weise brachte der Bodhisatta, ohne auch nur einen einzigen Menschen zu quälen, alle Einwohner des Reiches dazu, die Tugendregeln einzuhalten, vollbrachte selbst verdienstvolle Taten wie das Spenden und ging am Ende seines Lebens, gefolgt von seinem Gefolge, ein, um die Götterstadt zu füllen. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, tathāgato idāneva lokassa atthaṃ carati, pubbepi cariyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ [Pg.279] samodhānesi – ‘‘tadāparisā buddhaparisā ahesuṃ, bārāṇasirājā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor mit den Worten: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, wirkt der Tathāgata zum Wohle der Welt, sondern auch früher hat er schon so gewirkt“, stellte die Verknüpfung her und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war das Gefolge das Gefolge des Buddha, der König von Bārāṇasī aber war ich selbst.“ Dummedhajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Dummedha-Jātaka, die zehnte. Atthakāmavaggo pañcamo. Das fūnfte Kapitel, die Atthakāma-Vagga. Tassuddānaṃ – Seine Zusammenfassung: Losakatissakapota, veḷukaṃ makasampi ca; Rohiṇī ārāmadūsaṃ, vāruṇīdūsavedabbaṃ; Nakkhattaṃ dummedhaṃ dasāti. Losaka, Tissakāpota, Veḷuka und auch Makasa; Rohiṇī, Ārāmadūsa, Vāruṇīdūsa und Vedabba; Nakkhatta und Dummedha sind diese zehn. Paṭhamo paṇṇāsako. Die ersten fünfzig [Jātakas]. 6. Āsīsavaggo 6. Das Āsīsa-Kapitel.
[51] 1. Mahāsīlavajātakavaṇṇanā [51] 1. Die Erklärung des Mahāsīlava-Jātaka. Āsīsetheva purisoti idaṃ satthā jetavane viharanto ossaṭṭhavīriyaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tañhi satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ossaṭṭhavīriyosī’’ti pucchi. ‘‘Āma, bhante’’ti ca vutte ‘‘kasmā tvaṃ bhikkhu evarūpe niyyānikasāsane pabbajitvā vīriyaṃ ossaji, pubbe paṇḍitā rajjā parihāyitvāpi attano vīriye ṭhatvāva naṭṭhampi yasaṃ puna uppādayiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Hoffen soll der Mann gewiss“: Diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, in Bezug auf einen Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte. Der Meister fragte ihn nämlich: „Ist es wahr, Mönch, dass du deine Tatkraft aufgegeben hast?“ Als dieser antwortete: „Ja, Ehrwürdiger Herr“, sprach der Meister: „Warum, Mönch, hast du, nachdem du in einer solchen Heilslehre, die zur Befreiung führt, ordiniert wurdest, deine Tatkraft aufgegeben? In früheren Zeiten haben Weise, selbst nachdem sie ihrer Königsherrschaft beraubt worden waren, allein durch ihre eigene Tatkraft ihr verlorenes Ansehen wiederhergestellt“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto rañño aggamahesiyā kucchimhi nibbatto. Tassa nāmaggahaṇadivase ‘‘sīlavakumāro’’ti nāmaṃ akaṃsu. So soḷasavassuddesikova sabbasippesu nipphattiṃ patvā aparabhāge pitu accayena rajje patiṭṭhito mahāsīlavarājā nāma ahosi dhammiko dhammarājā. So nagarassa catūsu dvāresu catasso, majjhe ekaṃ, nivesanadvāre ekanti niccaṃ cha dānasālāyo kārāpetvā kapaṇaddhikānaṃ dānaṃ deti, sīlaṃ rakkhati, uposathakammaṃ karoti, khantimettānuddayasampanno aṅke nisinnaṃ puttaṃ paritosayamāno [Pg.280] viya sabbasatte paritosayamāno dhammena rajjaṃ kāreti. Tasseko amacco antepure padubbhitvā aparabhāge pākaṭo jāto. Amaccā rañño ārocesuṃ. Rājā pariggaṇhanto attanā paccakkhato ñatvā taṃ amaccaṃ pakkosāpetvā ‘‘andhabāla ayuttaṃ te kataṃ, na tvaṃ mama vijite vasituṃ arahasi, attano dhanañca puttadāre ca gahetvā aññattha yāhī’’ti raṭṭhā pabbājesi. So nikkhamitvā kāsiraṭṭhaṃ atikkamma kosalajanapadaṃ gantvā kosalarājānaṃ upaṭṭhahanto anukkamena rañño abbhantariko vissāsiko jāto. Als einst in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoße der Hauptgemahlin des Königs wiedergeboren. Am Tag der Namensgebung gaben sie ihm den Namen „Prinz Sīlava“. Als er etwa sechzehn Jahre alt war, hatte er alle Künste und Wissenschaften vollendet. Später, nach dem Tod seines Vaters, trat er die Königsherrschaft an und wurde als König Mahāsīlava bekannt – ein gerechter König, der im Einklang mit dem Dhamma regierte. Er ließ sechs Spendenzentren errichten: vier an den vier Toren der Stadt, eines im Zentrum und eines am Palasttor. Dort gab er den Armen und Reisenden beständig Almosen, hielt die Tugendregeln ein, fastete an den Uposatha-Tagen und regierte sein Reich in Gerechtigkeit, erfüllt von Geduld, liebender Güte und Mitgefühl, wobei er alle Wesen erfreute, so wie man ein auf dem Schoß sitzendes Kind erfreut. Einer seiner Minister verging sich im inneren Palastbereich, was später bekannt wurde. Die Minister berichteten es dem König. Der König untersuchte die Angelegenheit, erkannte die Wahrheit mit eigenen Augen, ließ den Minister rufen und sprach: „Du blinder Tor, du hast Unrecht getan! Du verdienst es nicht, in meinem Reich zu leben. Nimm dein Vermögen sowie deine Frau und Kinder und geh anderswohin!“, und verbannte ihn aus dem Land. Dieser ging fort, durchquerte das Kāsī-Reich, gelangte in das Kosala-Gebiet, trat dort in den Dienst des Königs von Kosala und wurde allmählich ein vertrauter Vertrauter des Königs. So ekadivasaṃ kosalarājānaṃ āha – ‘‘deva bārāṇasirajjaṃ nāma nimmakkhikamadhupaṭalasadisaṃ, rājā atimuduko, appeneva balavāhanena sakkā bārāṇasirajjaṃ gaṇhitu’’nti. Rājā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘bārāṇasirajjaṃ nāma mahā, ayañca ‘appeneva balavāhanena sakkā bārāṇasirajjaṃ gaṇhitu’nti āha, kiṃ nu kho pana payuttakacoro siyā’’ti cintetvā ‘‘payuttakosi maññe’’ti āha. ‘‘Nāhaṃ, deva, payuttako, saccameva vadāmi. Sace me na saddahatha, manusse pesetvā paccantagāmaṃ hanāpetha, te manusse gahetvā attano santikaṃ nīte dhanaṃ datvā vissajjessatī’’ti. Rājā ‘‘ayaṃ ativiya sūro hutvā vadati, vīmaṃsissāmi tāvā’’ti attano purise pesetvā paccantagāmaṃ hanāpesi. Manussā te core gahetvā bārāṇasirañño dassesuṃ. Rājā te disvā ‘‘tātā, kasmā gāmaṃ hanathā’’ti pucchi. ‘‘Jīvituṃ asakkontā, devā’’ti vutte rājā ‘‘atha kasmā mama santikaṃ nāgamittha, itodāni paṭṭhāya evarūpaṃ kammaṃ mā karitthā’’ti tesaṃ dhanaṃ datvā vissajjesi. Te gantvā kosalarañño taṃ pavattiṃ ārocesuṃ. So ettakenāpi gantuṃ avisahanto puna majjhejanapadaṃ hanāpesi. Tepi core rājā tatheva dhanaṃ datvā vissajjesi. So ettakenāpi agantvā puna pesetvā antaravīthiyaṃ vilumpāpesi, rājā tesampi corānaṃ dhanaṃ datvā vissajjesiyeva. Tadā kosalarājā ‘‘ativiya dhammiko rājā’’ti ñatvā ‘‘bārāṇasirajjaṃ gahessāmī’’ti balavāhanaṃ ādāya niyyāsi. Eines Tages sagte dieser zum König von Kosala: „O König, das Königreich Bārāṇasī gleicht einer Bienenwabe ohne Bienen. Der König ist überaus sanftmütig; mit nur einer kleinen Streitmacht ist es möglich, das Königreich Bārāṇasī einzunehmen.“ Als der König seine Worte hörte, dachte er: „Das Königreich Bārāṇasī ist doch groß, und dieser behauptet, man könne es mit nur einer kleinen Streitmacht einnehmen. Könnte er wohl ein heimlicher Spion sein?“ Und er sagte: „Ich glaube, du bist ein Spion.“ – „O König, ich bin kein Spion, ich sage die reine Wahrheit. Wenn Ihr mir nicht glaubt, so sendet Männer aus und lasst sie ein Grenzdorf plündern. Wenn er diese Männer gefangen nehmen und vor sich bringen lässt, wird er ihnen Geld geben und sie wieder freilassen.“ Der König dachte: „Dieser spricht überaus kühn; ich will das zuerst prüfen.“ So sandte er seine Männer aus und ließ ein Grenzdorf plündern. Die Leute nahmen jene Räuber gefangen und führten sie dem König von Bārāṇasī vor. Als der König sie sah, fragte er: „Liebe Kinder, warum plündert ihr das Dorf?“ Als sie antworteten: „O König, weil wir unseren Lebensunterhalt nicht bestreiten können“, sagte der König: „Warum seid ihr dann nicht zu mir gekommen? Begeht von nun an keine solche Tat mehr!“ Er gab ihnen Geld und ließ sie frei. Diese gingen hin und berichteten dem König von Kosala von diesem Vorfall. Da dieser sich selbst dadurch noch nicht wagte vorzurücken, ließ er erneut das Landesinnere plündern. Auch diesen Räubern gab der König auf die gleiche Weise Geld und ließ sie frei. Da er selbst dadurch noch nicht vorrückte, sandte er erneut Männer und ließ sie in den Straßen der Stadt plündern; der König gab auch diesen Räubern Geld und entließ sie einfach wieder. Da erkannte der König von Kosala: „Er ist ein überaus gerechter König“, und dachte: „Ich werde das Königreich Bārāṇasī einnehmen.“ Er nahm seine Streitmacht und zog aus. Tadā pana bārāṇasirañño mattavāraṇepi abhimukhaṃ āgacchante anivattanadhammā asaniyāpi sīse patantiyā asantasanasabhāvā sīlavamahārājassa [Pg.281] ruciyā sati sakalajambudīpe rajjaṃ gahetuṃ samatthā sahassamattā abhejjavarasūrā mahāyodhā honti. Te ‘‘kosalarājā āgacchatī’’ti sutvā rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘deva, kosalarājā kira ‘bārāṇasirajjaṃ gaṇhissāmī’ti āgacchati, gacchāma, naṃ amhākaṃ rajjasīmaṃ anokkantameva pothetvā gaṇhāmā’’ti vadiṃsu. Rājā ‘‘tātā, maṃ nissāya aññesaṃ kilamanakiccaṃ natthi, rajjatthiko rajjaṃ gaṇhātu, māgamitthā’’ti nivāresi. Kosalarājā rajjasīmaṃ atikkamitvā janapadamajjhaṃ pāvisi. Amaccā punapi rājānaṃ upasaṅkamitvā tatheva vadiṃsu, rājā purimanayeneva nivāresi. Kosalarājā bahinagare ṭhatvā ‘‘rajjaṃ vā detu yuddhaṃ vā’’ti sīlavamahārājassa sāsanaṃ pesesi. Rājā taṃ sutvā ‘‘natthi mayā saddhiṃ yuddhaṃ, rajjaṃ gaṇhātū’’ti paṭisāsanaṃ pesesi. Punapi amaccā rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘deva, na mayaṃ kosalarañño nagaraṃ pavisituṃ dema, bahinagareyeva naṃ pothetvā gaṇhāmā’’ti āhaṃsu, rājā purimanayeneva nivāretvā nagaradvārāni vivarāpetvā saddhiṃ amaccasahassena mahātale pallaṅkamajjhe nisīdi. Zu jener Zeit aber hatte der König von Bārāṇasī rund tausend unbezwingbare, treffliche und tapfere Krieger, die selbst dann nicht zurückgewichen wären, wenn ihnen ein wütender Elefant entgegengestürmt wäre, und die selbst dann keine Furcht gezeigt hätten, wenn ein Blitzschlag auf ihr Haupt gefallen wäre. Wenn der große König Sīlava es nur gewünscht hätte, wären sie imstande gewesen, die Herrschaft über ganz Jambudīpa einzunehmen. Als diese hörten: „Der König von Kosala rückt heran“, traten sie vor den König und sagten: „O König, man hört, der König von Kosala komme, um das Königreich Bārāṇasī einzunehmen. Lasst uns gehen, um ihn zu schlagen und gefangen zu nehmen, noch bevor er unsere Landesgrenze überschreitet.“ Der König hielt sie zurück und sprach: „Liebe Kinder, meinetwegen soll es keine Mühsal für andere geben. Wer das Königreich begehrt, der mag es nehmen. Geht nicht hin!“ Der König von Kosala überschritt die Landesgrenze und drang in das Landesinnere ein. Die Minister traten erneut vor den König und sprachen ebenso; der König aber hielt sie in gleicher Weise wie zuvor zurück. Der König von Kosala bezog außerhalb der Stadt Stellung und sandte eine Botschaft an den großen König Sīlava: „Er soll mir entweder das Königreich übergeben oder zum Kampf antreten!“ Als der König dies hörte, sandte er als Antwort zurück: „Mit mir gibt es keinen Kampf; er mag das Königreich nehmen.“ Abermals traten die Minister vor den König und sagten: „O König, wir werden den König von Kosala nicht in die Stadt einziehen lassen. Wir wollen ihn noch außerhalb der Stadt schlagen und gefangen nehmen.“ Der König hielt sie in gewohnter Weise zurück, ließ die Stadttore öffnen und setzte sich zusammen mit tausend Ministern auf der oberen Terrasse inmitten seines Prachtstuhls nieder. Kosalarājā mahantena balavāhanena bārāṇasiṃ pāvisi. So ekampi paṭisattuṃ apassanto rañño nivesanadvāraṃ gantvā amaccagaṇaparivuto apārutadvāre nivesane alaṅkatapaṭiyattaṃ mahātalaṃ āruyha nisinnaṃ nirāparādhaṃ sīlavamahārājānaṃ saddhiṃ amaccasahassena gaṇhāpetvā ‘‘gacchatha, imaṃ rājānaṃ saddhiṃ amaccehi pacchābāhaṃ gāḷhabandhanaṃ bandhitvā āmakasusānaṃ netvā galappamāṇe āvāṭe khanitvā yathā ekopi hatthaṃ ukkhipituṃ na sakkoti, evaṃ paṃsuṃ pakkhipitvā nikhanatha, rattiṃ siṅgālā āgantvā etesaṃ kātabbayuttakaṃ karissantī’’ti āha. Manussā corarañño āṇaṃ sutvā rājānaṃ saddhiṃ amaccehi pacchābāhaṃ gāḷhabandhanaṃ bandhitvā nikkhamiṃsu. Tasmimpi kāle sīlavamahārājā corarañño āghātamattampi nākāsi. Tesupi amaccesu evaṃ bandhitvā nīyamānesu ekopi rañño vacanaṃ bhindituṃ samattho nāma nāhosi. Evaṃ suvinītā kirassa parisā. Atha te rājapurisā sāmaccaṃ sīlavamahārājānaṃ āmakasusānaṃ netvā galappamāṇe āvāṭe khanitvā sīlavamahārājānaṃ majjhe[Pg.282], ubhosu passesu sesaamacceti evaṃ sabbepi āvāṭesu otāretvā paṃsuṃ ākiritvā ghanaṃ ākoṭetvā agamaṃsu. Tadā sīlavamahārājā amacce āmantetvā ‘‘corarañño upari kopaṃ akatvā mettaṃ eva bhāvetha, tātā’’ti ovadi. Der König von Kosala zog mit einer großen Streitmacht in Bārāṇasī ein. Da er nicht einen einzigen Gegner erblickte, ging er zum Tor des Königspalastes. Umgeben von seiner Gefolgschaft betrat er den Palast, dessen Tore unverschlossen waren, stieg zur prächtig geschmückten oberen Terrasse hinauf und ließ den dort sitzenden, unschuldigen großen König Sīlava zusammen mit seinen tausend Ministern festnehmen. Dann sprach er: „Geht! Fesselt diesen König samt seinen Ministern fest mit auf dem Rücken zusammengebundenen Armen, bringt sie zum Leichenacker für unbestattete Tote, grabt halstiefe Gruben aus und vergrabt sie, indem ihr Erde hineinschüttet, sodass nicht ein einziger auch nur die Hand heben kann. In der Nacht werden die Schakale kommen und mit ihnen tun, was sich zu tun gebührt.“ Als die Männer den Befehl des Räuberkönigs hörten, fesselten sie den König samt seinen Ministern fest mit auf dem Rücken zusammengebundenen Armen und führten sie hinaus. Selbst in jenem Augenblick hegte der große König Sīlava nicht den geringsten Groll gegen den Räuberkönig. Und unter jenen Ministern, die so gefesselt und weggeführt wurden, war nicht ein einziger bereit, das Wort des Königs zu brechen. So vortrefflich war sein Gefolge geschult! Daraufhin brachten die königlichen Diener den großen König Sīlava samt den Ministern zum Leichenacker für unbestattete Tote, gruben halstiefe Gruben aus, ließen den großen König Sīlava in die Mitte und die übrigen Minister an beiden Seiten in die Gruben hinab, schütteten Erde hinein, stampften diese fest und gingen davon. Da wandte sich der große König Sīlava an seine Minister und ermahnte sie: „Liebe Kinder, hegt keinen Zorn gegen den Räuberkönig, sondern entfaltet einzig liebende Güte!“ Atha aḍḍharattasamaye ‘‘manussamaṃsaṃ khādissāmā’’ti siṅgālā āgamiṃsu. Te disvā rājā ca amaccā ca ekappahāreneva saddamakaṃsu, siṅgālā bhītā palāyiṃsu. Te nivattitvā olokentā pacchato kassaci anāgamanabhāvaṃ ñatvā puna paccāgamiṃsu. Itarepi tatheva saddamakaṃsu. Evaṃ yāvatatiyaṃ palāyitvā puna olokentā tesu ekassapi anāgamanabhāvaṃ ñatvā ‘‘vajjhappattā ete bhavissantī’’ti sūrā hutvā nivattitvā puna tesu saddaṃ karontesupi na palāyiṃsu. Jeṭṭhakasiṅgālo rājānaṃ upagañchi, sesā siṅgālā sesānaṃ amaccānaṃ santikaṃ agamaṃsu. Upāyakusalo rājā tassa attano santikaṃ āgatabhāvaṃ ñatvā ḍaṃsituṃ okāsaṃ dento viya gīvaṃ ukkhipitvā taṃ gīvāya ḍaṃsamānaṃ hanukaṭṭhikena ākaḍḍhitvā yante pakkhipitvā viya gāḷhaṃ gaṇhi, nāgabalena raññā hanukaṭṭhikena ākaḍḍhitvā gīvāya gāḷhaṃ gahitasiṅgālo attānaṃ mocetuṃ asakkonto maraṇabhayatajjito mahāviravaṃ viravi. Avasesā siṅgālā tassa taṃ aṭṭassaraṃ sutvā ‘‘ekena purisena suggahito bhavissatī’’ti amacce upasaṅkamituṃ asakkontā maraṇabhayatajjitā sabbe palāyiṃsu. Rañño hanukaṭṭhikena daḷhaṃ katvā gahitasiṅgāle aparāparaṃ sañcarante paṃsu sithilā ahosi. Sopi siṅgālo maraṇabhayabhīto catūhi pādehi rañño uparibhāge paṃsuṃ apabyūhi, rājā paṃsuno sithilabhāvaṃ ñatvā siṅgālaṃ vissajjetvā nāgabalo thāmasampanno aparāparaṃ sañcaranto ubho hatthe ukkhipitvā āvāṭamukhavaṭṭiyaṃ olubbha vātacchinnavalāhako viya nikkhamitvā ṭhito amacce assāsetvā paṃsuṃ viyūhitvā sabbe uddharitvā amaccaparivuto āmakasusāne aṭṭhāsi. Zur Mitternachtsstunde kamen Schakale herbei, denkend: 'Wir wollen Menschenfleisch fressen.' Als der König und seine Minister sie sahen, erhoben sie alle gleichzeitig ein lautes Geschrei, woraufhin die Schakale erschrocken flohen. Als sie jedoch umkehrten und zurückblickten, erkannten sie, dass ihnen niemand nachgefolgt war, und kamen wieder zurück. Die anderen machten ebenso ein lautes Geschrei. Nachdem sie auf diese Weise bis zu dreimal geflohen waren und wieder zurückblickten, erkannten sie, dass nicht ein einziger von jenen ihnen nachfolgte. Da dachten sie: 'Diese Leute müssen dem Tode geweiht sein', wurden kühn, kehrten um und flohen nicht mehr, selbst als jene wieder Lärm machten. Der Anführer der Schakale näherte sich dem König, und die übrigen Schakale näherten sich den übrigen Ministern. Der im Finden von Mitteln geschickte König bemerkte, dass der Schakal sich ihm genähert hatte, und hob, als ob er ihm Gelegenheit zum Beißen gäbe, den Hals an. Als der Schakal ihn in den Hals beißen wollte, zog der König ihn mit seinem Unterkiefer herbei und packte ihn so fest, als ob er ihn in eine Presse gesteckt hätte. Der Schakal, der vom König, welcher die Kraft eines mächtigen Elefanten besaß, mit dem Unterkiefer herbeigezogen und fest am Hals gepackt worden war, konnte sich nicht selbst befreien und stieß, von Todesfurcht gepeinigt, ein lautes Geheul aus. Als die übrigen Schakale diesen seinen Schmerzensschrei hörten, dachten sie: 'Er muss von einem Mann fest gepackt worden sein.' Sie wagten es nicht mehr, sich den Ministern zu näheren, und flohen alle, von Todesfurcht gepeinigt. Während der vom König mit dem Unterkiefer fest gepackte Schakal sich heftig hin und her bewegte, wurde die Erde locker. Auch dieser Schakal scharrte aus Todesangst mit seinen vier Pfoten die Erde oberhalb des Königs weg. Als der König merkte, dass die Erde locker geworden war, ließ er den Schakal los. Der König, der die Kraft und Stärke eines mächtigen Elefanten besaß, bewegte sich hin und her, hob beide Hände, stützte sich am Rand der Grubenöffnung ab, entkam aus der Grube wie eine vom Sturm zerteilte Wolke, stellte sich hin, sprach den Ministern Mut zu, scharrte die Erde weg, zog sie alle heraus und stand, von seinen Ministern umgeben, auf dem Leichenacker. Tasmiṃ samaye manussā ekaṃ matamanussaṃ āmakasusāne chaḍḍentā dvinnaṃ yakkhānaṃ sīmantarikāya chaḍḍesuṃ. Te yakkhā taṃ matamanussaṃ bhājetuṃ asakkontā ‘‘na mayaṃ imaṃ bhājetuṃ sakkoma, ayaṃ sīlavarājā dhammiko, esa no bhājetvā dassati, etassa santikaṃ gacchāmā’’ti [Pg.283] taṃ matamanussaṃ pāde gahetvā ākaḍḍhantā rañño santikaṃ gantvā ‘‘deva, amhākaṃ imaṃ matakaṃ bhājetvā dehī’’ti āhaṃsu. ‘‘Bho yakkhā, ahaṃ imaṃ tumhākaṃ bhājetvā dadeyyaṃ, aparisuddho panamhi, nhāyissāmi tāvā’’ti. Yakkhā corarañño ṭhapitaṃ vāsitaudakaṃ attano ānubhāvena āharitvā rañño nhānatthāya adaṃsu. Nhatvā ṭhitassa saṃharitvā ṭhapite corarañño sāṭake āharitvā adaṃsu, te nivāsetvā ṭhitassa catujjātiyagandhasamuggaṃ āharitvā adaṃsu, gandhe vilimpitvā ṭhitassa suvaṇṇasamugge maṇitālavaṇṭesu ṭhapitāni nānāpupphāni āharitvā adaṃsu. Pupphāni piḷandhitvā ṭhitakāle ‘‘aññaṃ kiṃ karomā’’ti pucchiṃsu. Rājā attano chātakākāraṃ dassesi, te gantvā corarañño sampāditaṃ nānaggarasabhojanaṃ āharitvā adaṃsu, rājā nhātānulitto sumaṇḍitappasādhito nānaggarasabhojanaṃ bhuñji. Yakkhā corarañño ṭhapitaṃ vāsitapānīyaṃ suvaṇṇabhiṅkāreneva suvaṇṇasarakenapi saddhiṃ āhariṃsu. Athassa pānīyaṃ pivitvā mukhaṃ vikkhāletvā hatthe dhovitvā ṭhitakāle corarañño sampāditaṃ pañcasugandhikasuparibhāvitaṃ tambūlaṃ āharitvā adaṃsu. Taṃ khāditvā ṭhitakāle ‘‘aññaṃ kiṃ karomā’’ti pucchiṃsu. Gantvā corarañño ussīsake nikkhittaṃ maṅgalakhaggaṃ āharathāti. Tampi gantvā āhariṃsu. Rājā taṃ khaggaṃ gahetvā taṃ matamanussaṃ ujukaṃ ṭhapāpetvā matthakamajjhe asinā paharitvā dve koṭṭhāse katvā dvinnaṃ yakkhānaṃ samavibhattameva vibhajitvā adāsi, datvā ca pana khaggaṃ dhovitvā sannayhitvā aṭṭhāsi. Atha te yakkhā manussamaṃsaṃ khāditvā suhitā hutvā tuṭṭhacittā ‘‘aññaṃ te, mahārāja, kiṃ karomā’’ti pucchiṃsu. Tena hi tumhe attano ānubhāvena maṃ corarañño sirigabbhe otāretha, ime ca amacce attano attano gehesu patiṭṭhāpethāti. Te ‘‘sādhu devā’’ti sampaṭicchitvā tathā akaṃsu. Zu jener Zeit warfen die Menschen einen Leichnam auf dem Leichenacker ab, und zwar genau an der Grenze zwischen den Gebieten zweier Yakkhas. Da diese Yakkhas den Leichnam unter sich nicht aufteilen konnten, dachten sie: 'Wir können diesen Leichnam nicht gerecht aufteilen. Dieser König Sīlava ist gerecht. Er wird ihn gewiss für uns aufteilen. Lasst uns zu ihm gehen.' Sie ergriffen den Leichnam an den Füßen, schleiften ihn mit sich, gingen zum König und baten ihn: 'O Herr, teile diesen Leichnam für uns auf!' Der König antwortete: 'Ihr Yakkhas, ich würde diesen Leichnam gerne für euch aufteilen, doch ich bin unrein. Zuerst will ich baden.' Da brachten die Yakkhas durch ihre übernatürliche Macht duftendes Wasser herbei, das für den Usurpator-König bereitgestellt worden war, und gaben es dem König zum Baden. Dem König, der gebadet hatte und dastand, brachten sie die zusammengelegten Gewänder des Usurpator-Königs und reichten sie ihm. Als er diese angelegt hatte und dastand, brachten sie ihm eine Schatulle mit viererlei Wohlgerüchen und überreichten sie ihm. Dem König, der sich mit den Wohlgerüchen gesalbt hatte und dastand, brachten sie verschiedene Blumen, die in einer goldenen Schatulle und auf mit Juwelen verzierten Fächern angerichtet waren, und überreichten sie ihm. Als er die Blumen angelegt hatte und dastand, fragten sie: 'Was können wir sonst noch tun?' Der König gab ihnen zu verstehen, dass er hungrig sei. Da gingen sie hin, brachten die für den Usurpator-König zubereitete Speise von erlesenstem Geschmack und reichten sie ihm. Der König, der gebadet, sich gesalbt und herrlich geschmückt hatte, genoss die köstliche Speise. Die Yakkhas brachten auch das für den Usurpator-König bereitgestellte, parfümierte Trinkwasser in einer goldenen Kanne zusammen mit einem goldenen Trinkbecher. Als der König das Wasser getrunken, den Mund ausgespült und seine Hände gewaschen hatte und dastand, brachten sie ihm den für den Usurpator-König zubereiteten, mit fünf Wohlgerüchen reich aromatisierten Betel und reichten ihn ihm. Als er diesen gekaut hatte und dastand, fragten sie: 'Was können wir sonst noch tun?' Er antwortete: 'Geht und bringt das königliche Prachtschwert, das am Kopfende des Bettes des Usurpator-Königs liegt.' Da gingen sie hin und brachten es. Der König nahm das Schwert, ließ den Leichnam gerade ausrichten, spaltete ihn mit dem Schwert genau in der Mitte des Kopfes, teilte ihn in zwei Hälften und gab jedem der beiden Yakkhas ein genau gleiches Teil. Nachdem er ihnen die Teile gegeben hatte, wusch er das Schwert, gürtete es um und stellte sich hin. Daraufhin fraßen die Yakkhas das Menschenfleisch, wurden satt, und mit erfreutem Herzen fragten sie: 'Großer König, was können wir sonst noch für dich tun?' Er antwortete: 'Wenn dem so ist, dann bringt mich durch eure magische Kraft in das Prachtgemach des Usurpator-Königs und bringt diese Minister jeweils in ihre eigenen Häuser zurück.' Sie stimmten zu mit den Worten: 'Sehr wohl, o König', und handelten genau so. Tasmiṃ samaye corarājā alaṅkatasirigabbhe sirisayanapiṭṭhe nipanno niddāyati. Rājā tassa pamattassa niddāyantassa khaggatalena udaraṃ pahari. So bhīto pabujjhitvā dīpālokena sīlavamahārājānaṃ sañjānitvā sayanā uṭṭhāya satiṃ upaṭṭhapetvā ṭhito rājānaṃ āha ‘‘mahārāja, evarūpāya [Pg.284] rattiyā gahitārakkhe pihitadvāre bhavane ārakkhamanussehi nirokāse ṭhāne khaggaṃ sannayhitvā alaṅkatapaṭiyatto kathaṃ nāma tvaṃ imaṃ sayanapiṭṭhaṃ āgatosī’’ti. Rājā attano āgamanākāraṃ sabbaṃ vitthārato kathesi. Taṃ sutvā corarājā saṃviggamānaso ‘‘mahārāja, ahaṃ manussabhūtopi samāno tumhākaṃ guṇe na jānāmi, paresaṃ lohitamaṃsakhādakehi pana kakkhaḷehi pharusehi yakkhehi tava guṇā ñātā, na dānāhaṃ, narinda, evarūpe sīlasampanne tayi dubbhissāmī’’ti khaggaṃ ādāya sapathaṃ katvā rājānaṃ khamāpetvā mahāsayane nipajjāpetvā attanā khuddakamañcake nipajjitvā pabhātāya rattiyā uṭṭhite sūriye bheriṃ carāpetvā sabbaseniyo ca amaccabrāhmaṇagahapatike ca sannipātāpetvā tesaṃ purato ākāse puṇṇacandaṃ ukkhipanto viya sīlavarañño guṇe kathetvā parisamajjheyeva puna rājānaṃ khamāpetvā rajjaṃ paṭicchāpetvā ‘‘mahārāja, ito paṭṭhāya tumhākaṃ uppanno corūpaddavo mayhaṃ bhāro, mayā gahitārakkhā tumhe rajjaṃ karothā’’ti vatvā pesuññakārakassa āṇaṃ kāretvā attano balavāhanaṃ ādāya sakaraṭṭhameva gato. Zu jener Zeit schlief der Räuberkönig, auf dem königlichen Prachtbett in dem geschmückten Gemach liegend. Der König [Sīlava] schlug mit der flachen Seite seines Schwertes auf den Bauch des unachtsamen, schlafenden Räuberkönigs. Dieser erwachte erschrocken, erkannte im Lampenlicht den großen König Sīlava, erhob sich vom Bett, sammelte seine Achtsamkeit, blieb stehen und sagte zum König: „Großer König, wie bist du in einer solchen Nacht in den bewachten Palast mit verschlossenen Toren gelangt, an einen Ort, der für die Wachen unzugänglich ist, mit umgegürtetem Schwert und festlich geschmückt auf dieses Prachtbett?“ Der König erzählte ihm ausführlich die ganze Art und Weise seines Kommens. Als der Räuberkönig dies hörte, war er tief erschüttert und sagte: „Großer König, obwohl ich ein Mensch bin, erkannte ich deine Tugenden nicht; doch die grausamen, wilden Yakkhas, die das Fleisch und Blut anderer fressen, haben deine Tugenden erkannt. O Herrscher der Menschen, ich werde dir, der du so vollkommen in der Tugend bist, von nun an nicht mehr schaden!“ Er nahm das Schwert, leistete einen Eid, bat den König um Vergebung, ließ ihn auf dem großen Prachtbett ruhen, während er selbst sich auf einem kleinen Bett niederlegte. Als die Nacht vergangen und die Sonne aufgegangen war, ließ er die Trommel schlagen, um das gesamte Heer, die Minister, Brahmanen und Hausväter zu versammeln. Vor ihnen pries er – als würde er den Vollmond am Himmel emporheben – die Tugenden des tugendhaften Königs Sīlava, bat den König mitten in der Versammlung nochmals um Vergebung, gab ihm das Königreich zurück und sagte: „Großer König, von heute an ist jede Bedrohung durch Räuber, die euch widerfährt, meine Sorge. Führt eure Herrschaft, während ich den Schutz übernehme!“ Nachdem er dies gesagt hatte, ließ er den verleumderischen Minister bestrafen, nahm sein Heer und seine Reittiere und kehrte in sein eigenes Land zurück. Sīlavarājāpi kho alaṅkatapaṭiyatto setacchattassa heṭṭhā sarabhapādake kañcanapallaṅke nisinno attano sampattiṃ oloketvā ‘‘ayañca evarūpā sampatti amaccasahassassa ca jīvitapaṭilābho mayi vīriyaṃ akaronte na kiñci abhavissa, vīriyabalena panāhaṃ naṭṭhañca imaṃ yasaṃ paṭilabhiṃ, amaccasahassassa ca jīvitadānaṃ adāsiṃ, āsacchedaṃ vata akatvā vīriyameva kattabbaṃ. Katavīriyassa hi phalaṃ nāma evaṃ samijjhatī’’ti cintetvā udānavasena imaṃ gāthamāha – Auch der festlich geschmückte König Sīlava saß unter dem weißen Schirm auf dem goldenen Thron mit Füßen in Gestalt einer Sarabha-Antilope, blickte auf seinen Wohlstand und dachte: „Dieser so geartete Erfolg und die Rettung des Lebens der tausend Minister wäre keineswegs zustande gekommen, wenn ich keine Tatkraft (vīriya) aufgebracht hätte. Durch die Kraft der Tatkraft jedoch habe ich diesen verloren gegangenen Ruhm wiedererlangt und den tausend Ministern das Geschenk des Lebens gegeben. Wahrlich, ohne die Hoffnung aufzugeben, muss man stets Tatkraft anwenden. Denn die Frucht dessen, der Tatkraft aufbringt, geht auf diese Weise in Erfüllung.“ Mit dieser freudigen Ausrufung sprach er folgenden Vers: 51. 51. ‘‘Āsīsetheva puriso, na nibbindeyya paṇḍito; Passāmi vohaṃ attānaṃ, yathā icchiṃ tathā ahū’’ti. „Hoffen soll der Mensch und niemals verzagen, der Weise sollte nicht aufgeben. Ich sehe mich selbst: Wie ich es wünschte, so ist es geschehen.“ Tattha āsīsethevāti ‘‘evāhaṃ vīriyaṃ ārabhanto imamhā dukkhā muccissāmī’’ti attano vīriyabalena āsaṃ karotheva. Na nibbindeyya paṇḍitoti paṇḍito upāyakusalo yuttaṭṭhāne vīriyaṃ karonto ‘‘ahaṃ imassa vīriyassa phalaṃ na labhissāmī’’ti na ukkaṇṭheyya, āsacchedaṃ kareyyāti attho. Passāmi vohaṃ attānanti ettha voti nipātamattaṃ[Pg.285], ahaṃ ajja attānaṃ passāmi. Yathā icchiṃ tathā ahūti ahañhi āvāṭe nikhāto tamhā dukkhā muccitvā puna attano rajjasampattiṃ icchiṃ, so ahaṃ imaṃ sampattiṃ pattaṃ attānaṃ passāmi. Yathevāhaṃ pubbe icchiṃ, tatheva me attā jātoti. Evaṃ bodhisatto ‘‘aho vata bho sīlasampannānaṃ vīriyaphalaṃ nāma samijjhatī’’ti imāya gāthāya udānaṃ udānetvā yāvajīvaṃ puññāni katvā yathākammaṃ gato. Darin bedeutet ‚āsīsetheva‘: Er sollte durch die Kraft seiner eigenen Tatkraft die Hoffnung hegen: ‚Wenn ich so Tatkraft aufwende, werde ich von diesem Leiden befreit werden.‘ ‚Na nibbindeyya paṇḍito‘ bedeutet: Der Weise, der in den Mitteln geschickt ist und am rechten Ort Tatkraft anwendet, sollte nicht ungeduldig werden oder die Hoffnung aufgeben, indem er denkt: ‚Ich werde die Frucht dieser Tatkraft nicht erlangen.‘ Das ist die Bedeutung. In ‚passāmi vohaṃ attānaṃ‘ ist das Wort ‚vo‘ nur eine Partikel; es bedeutet: ‚Ich sehe mich heute selbst.‘ Zu ‚yathā icchiṃ tathā ahū‘: Da ich in einer Grube vergraben war, wünschte ich mir, von diesem Leiden befreit zu werden und mein Königreich wiederzuerlangen. Nun sehe ich mich selbst, wie ich diesen Erfolg erlangt habe. Genau so, wie ich es mir zuvor gewünscht hatte, ist es mit mir geschehen. Auf diese Weise rief der Bodhisatta voller Freude mit diesem Vers aus: „O wie wunderbar, wahrlich, die Frucht der Tatkraft derer, die vollkommen in der Tugend sind, geht in Erfüllung!“ Er tat sein Leben lang Verdienstvolles und ging gemäß seinem Kamma fort. Satthāpi imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ossaṭṭhavīriyo bhikkhu arahatte patiṭṭhāsi. Satthā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā paduṭṭhāmacco devadatto ahosi, amaccasahassaṃ buddhaparisā, sīlavamahārājā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor und verkündete die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten wurde der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte, im Zustand der Arahatschaft gefestigt. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der boshafte Minister Devadatta, die tausend Minister waren die Buddha-Gemeinschaft, und der große König Sīlava war ich selbst.“ Mahāsīlavajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Mahāsīlava-Jātaka ist die erste.
[52] 2. Cūḷajanakajātakavaṇṇanā [52] 2. Die Erklärung des Cūḷajanaka-Jātaka Vāyametheva purisoti idaṃ satthā jetavane viharanto ossaṭṭhavīriyamevārabbha kathesi. Tattha yaṃ vattabbaṃ, taṃ sabbaṃ mahājanakajātake (jā. 2.22.123 ādayo) āvi bhavissati. Janakarājā pana setacchattassa heṭṭhā nisinno imaṃ gāthamāha – „Vāyametheva puriso“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf eben jenen Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte. Was dazu zu sagen ist, wird im Mahājanaka-Jātaka alles deutlich werden. Der König Janaka jedoch saß unter dem weißen Schirm und sprach diesen Vers: 52. 52. ‘‘Vāyametheva puriso, na nibbindeyya paṇḍito; Passāmi vohaṃ attānaṃ, udakā thalamubbhata’’nti. „Anstrengen soll sich der Mensch und niemals verzagen, der Weise sollte nicht aufgeben. Ich sehe mich selbst: Aus dem Wasser auf das Festland gerettet.“ Tattha vāyamethevāti vāyāmaṃ karotheva. Udakā thalamubbhatanti udakato thalamuttiṇṇaṃ thale patiṭṭhitaṃ attānaṃ passāmīti. Idhāpi ossaṭṭhavīriyo bhikkhu arahattaṃ patto, janakarājā sammāsambuddhova ahosīti. Darin bedeutet ‚vāyametheva‘: Er soll gewiss Anstrengung unternehmen. ‚Udakā thalamubbhatanti‘ bedeutet: Ich sehe mich selbst, wie ich aus dem Wasser auf das Festland gelangt bin und auf dem Festland stehe. Auch hier erlangte der Mönch, der seine Tatkraft aufgegeben hatte, die Arahatschaft, und der König Janaka war kein anderer als der vollkommen Erleuchtete. Cūḷajanakajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Cūḷajanaka-Jātaka ist die zweite.
[53] 3. Puṇṇapātijātakavaṇṇanā [53] 3. Die Erklärung des Puṇṇapāti-Jātaka Tatheva [Pg.286] puṇṇā pātiyoti idaṃ satthā jetavane viharanto visavāruṇiṃ ārabbha kathesi. Ekaṃ samayaṃ sāvatthiyaṃ surādhuttā sannipatitvā mantayiṃsu – ‘‘surāmūlaṃ no khīṇaṃ, kahaṃ nu kho labhissāmā’’ti. Atheko kakkhaḷadhutto āha ‘‘mā cintayittha, attheko upāyo’’ti. ‘‘Kataro upāyo nāmā’’ti? ‘‘Anāthapiṇḍiko aṅgulimuddikā piḷandhitvā maṭṭhasāṭakanivattho rājupaṭṭhānaṃ gacchati, mayaṃ surāpātiyaṃ visaññīkaraṇaṃ bhesajjaṃ pakkhipitvā āpānaṃ sajjetvā nisīditvā anāthapiṇḍikassa āgamanakāle ‘ito ehi mahāseṭṭhī’ti pakkositvā taṃ suraṃ pāyetvā visaññībhūtassa aṅgulimuddikā ca sāṭake ca gahetvā surāmūlaṃ karissāmā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā tathā katvā seṭṭhissa āgamanakāle paṭimaggaṃ gantvā ‘‘sāmi, ito tāva āgacchatha, ayaṃ amhākaṃ santike atimanāpā surā, thokaṃ pivitvā gacchathā’’ti vadiṃsu. Sotāpanno ariyasāvako kiṃ suraṃ pivissati, anatthiko samānopi pana ‘‘ime dhutte pariggaṇhissāmī’’ti tesaṃ āpānabhūmiṃ gantvā tesaṃ kiriyaṃ oloketvā ‘‘ayaṃ surā imehi iminā nāma kāraṇena yojitā’’ti ñatvā ‘‘ito dāni paṭṭhāya ime ito palāpessāmī’’ti cintetvā āha – ‘‘hare duṭṭhadhuttā, tumhe ‘surāpātiyaṃ bhesajjaṃ pakkhipitvā āgatāgate pāyetvā visaññī katvā vilumpissāmā’ti āpānamaṇḍalaṃ sajjetvā nisinnā kevalaṃ imaṃ suraṃ vaṇṇetha, ekopi taṃ ukkhipitvā pivituṃ na ussahati. Sace ayaṃ ayojitā assa, imaṃ tumheva piveyyāthā’’ti te dhutte tajjetvā tato palāpetvā attano gehaṃ gantvā ‘‘dhuttehi katakāraṇaṃ tathāgatassa ārocessāmī’’ti cintento jetavanaṃ gantvā ārocesi. Satthā ‘‘idāni tāva gahapati te dhuttā taṃ vañcetukāmā jātā, pubbe pana paṇḍitepi vañcetukāmā ahesu’’nti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Ebenso voll sind die Schalen“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana verweilte, bezüglich eines mit Gift versetzten Alkohols. Einst versammelten sich in Sāvatthi einige Trunkenbolde und beratschlagten sich: „Unser Geld für Alkohol ist aufgebraucht. Woher sollen wir wohl neues bekommen?“ Da sagte ein skrupelloser Trunkenbold: „Sorgt euch nicht, es gibt eine Möglichkeit.“ – „Was für eine Möglichkeit soll das sein?“ – „Der Großkaufmann Anāthapiṇḍika trägt seine Fingerringe, ist in feine Gewänder gekleidet und geht zum Dienst beim König. Wir wollen ein betäubendes Mittel in eine Alkoholschale tun, ein Trinkgelage vorbereiten, uns hinsetzen, und wenn Anāthapiṇḍika herbeikommt, ihn mit den Worten rufen: ‚Komm hierher, großer Hausvater!‘ Wir geben ihm diesen Alkohol zu trinken, und wenn er besinnungslos ist, nehmen wir ihm seine Fingerringe und seine Gewänder ab und machen daraus Geld für Alkohol.“ Sie stimmten mit den Worten „Gut!“ zu, handelten danach, stellten sich dem Großkaufmann bei dessen Kommen in den Weg und sagten: „Herr, kommt doch hierher! Bei uns gibt es diesen überaus köstlichen Alkohol; trinkt ein wenig und geht dann weiter.“ Wird ein in den Strom Eingetretener, ein edler Jünger, etwa Alkohol trinken? Obwohl er kein Verlangen danach hatte, dachte er sich jedoch: „Ich will diese Schurken auf die Probe stellen.“ Er ging zu ihrem Trinkplatz, beobachtete ihr Verhalten und erkannte: „Dieser Alkohol wurde von ihnen aus diesem bestimmten Grund zubereitet.“ Er dachte sich: „Von nun an werde ich diese Leute von hier vertreiben“, und sprach: „He, ihr bösen Schurken! Ihr habt ein Betäubungsmittel in die Alkoholschale getan, um jeden, der vorbeikommt, trinken zu lassen, ihn besinnungslos zu machen und auszurauben. Ihr habt eine Trinkrunde vorbereitet, sitzt hier und preist bloß diesen Alkohol an; doch kein Einziger von euch wagt es, ihn anzuheben und zu trinken. Wenn dieser ungemischt wäre, würdet ihr ihn selbst trinken!“ So schüchterte er die Schurken ein, vertrieb sie von dort, ging zu seinem Haus zurück und dachte sich: „Ich will dem Erhabenen berichten, was die Schurken getan haben.“ Er ging zum Jetavana und berichtete es ihm. Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, o Hausvater, wollten diese Schurken dich täuschen; auch in der Vergangenheit wollten sie Weise täuschen.“ Auf seine Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bārāṇasiseṭṭhi ahosi. Tadāpete dhuttā evameva sammantetvā suraṃ yojetvā bārāṇasiseṭṭhissa āgamanakāle paṭimaggaṃ gantvā evameva kathayiṃsu. Seṭṭhi anatthikopi hutvā te pariggaṇhitukāmo gantvā tesaṃ [Pg.287] kiriyaṃ oloketvā ‘‘idaṃ nāmete kātukāmā, palāpessāmi ne ito’’ti cintetvā evamāha ‘‘bhonto, dhuttā suraṃ pivitvā rājakulaṃ gantuṃ nāma ayuttaṃ, rājānaṃ disvā puna āgacchanto jānissāmi, tumhe idheva nisīdathā’’ti rājupaṭṭhānaṃ gantvā paccāgañchi. Dhuttā ‘‘ito etha, sāmī’’ti. Sopi tattha gantvā bhesajjena saṃyojitā surāpātiyo oloketvā evamāha ‘‘bhonto dhuttā tumhākaṃ kiriyā mayhaṃ na ruccati, tumhākaṃ surāpātiyo yathāpūritāva ṭhitā, tumhe kevalaṃ suraṃ vaṇṇetha, na pana pivatha. Sacāyaṃ manāpā assa, tumhepi piveyyātha, imāya pana visasaṃyuttāya bhavitabba’’nti tesaṃ manorathaṃ bhindanto imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta der Großkaufmann von Bārāṇasī. Auch damals beratschlagten sich diese Schurken auf genau dieselbe Weise, mischten den Alkohol, stellten sich dem Großkaufmann von Bārāṇasī bei dessen Kommen in den Weg und sprachen genau ebenso zu ihm. Der Großkaufmann ging hin, obwohl er kein Verlangen danach hatte, weil er sie auf die Probe stellen wollte. Er beobachtete ihr Verhalten, erkannte: „Das wollen diese Leute also tun, ich werde sie von hier vertreiben“, dachte sich dies und sprach so: „Ihr Schurken, es schickt sich wahrlich nicht, Alkohol zu trinken und dann zum Königshof zu gehen. Nachdem ich den König aufgesucht habe und zurückkehre, werde ich mich darum kümmern. Setzt euch einstweilen hierher.“ So ging er zum Dienst beim König und kehrte zurück. Die Schurken sagten: „Kommt hierher, Herr!“ Auch er ging dorthin, betrachtete die mit dem Mittel versetzten Alkoholschalen und sprach so: „Ihr Schurken, euer Verhalten gefällt mir nicht. Eure Alkoholschalen stehen noch genauso voll da wie zuvor. Ihr preist den Alkohol bloß an, trinkt ihn aber nicht. Wenn er köstlich wäre, würdet auch ihr ihn trinken. Dieser hier muss jedoch mit Gift versetzt sein.“ Und während er ihr Vorhaben vereitelte, sprach er diese Strophe: 53. 53. ‘‘Tatheva puṇṇā pātiyo, aññāyaṃ vattate kathā; Ākāraṇena jānāmi, na cāyaṃ bhaddikā surā’’ti. „Die Schalen sind ebenso voll wie zuvor, und eure Rede lautet ganz anders. Durch ein klares Anzeichen weiß ich: Dieser Alkohol ist nicht gut.“ Tattha tathevāti yathā mayā gamanakāle diṭṭhā, idānipi imā surāpātiyo tatheva puṇṇā. Aññāyaṃ vattate kathāti yā ayaṃ tumhākaṃ surāvaṇṇanakathā vattati, sā aññāva abhūtā atacchā. Yadi hi esā surā manāpā assa, tumhepi piveyyātha, upaḍḍhapātiyo avasisseyyuṃ. Tumhākaṃ pana ekenāpi surā na pītā. Ākāraṇena jānāmīti tasmā iminā kāraṇena jānāmi. Na cāyaṃ bhaddikā surāti ‘‘nevāyaṃ bhaddikā surā, visasaṃyojitāya etāya bhavitabba’’nti dhutte niggaṇhitvā yathā na puna evarūpaṃ karonti, tathā te tajjetvā vissajjesi. So yāvajīvaṃ dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Darin bedeutet „ebenso voll“ (tatheva): Wie sie von mir beim Weggehen gesehen wurden, so sind diese Alkoholschalen auch jetzt noch ebenso voll. „Eure Rede lautet ganz anders“ (aññāyaṃ vattate kathā) bedeutet: Diese eure Rede, mit der ihr den Alkohol anpreist, ist ganz anders – unwahr und nicht der Wirklichkeit entsprechend. Denn wenn dieser Alkohol köstlich wäre, würdet auch ihr ihn trinken, und es wären nur halbe Schalen übriggeblieben. Von euch aber hat nicht ein Einziger vom Alkohol getrunken. „Durch ein klares Anzeichen weiß ich“ (ākāraṇena jānāmi) bedeutet: Aus diesem Grund weiß ich es. „Dieser Alkohol ist nicht gut“ (na cāyaṃ bhaddikā surā) bedeutet: „Dieser Alkohol ist keineswegs gut, er muss mit Gift versetzt sein.“ So wies er die Schurken zurecht und schüchterte sie so ein, dass sie so etwas nie wieder tun würden, und ließ sie dann gehen. Er vollbrachte zeit seines Lebens verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosengaben und ging entsprechend seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā dhuttā etarahi dhuttā, bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, führte er das Jātaka zusammen: „Die damaligen Schurken waren die heutigen Schurken, der Großkaufmann von Bārāṇasī aber war ich selbst.“ Puṇṇapātijātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Puṇṇapāti-Jātaka ist die dritte.
[54] 4. Kiṃphalajātakavaṇṇanā [54] 4. Die Erklärung des Kiṃphala-Jātaka. Nāyaṃ [Pg.288] rukkho durāruhāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ phalakusalaṃ upāsakaṃ ārabbha kathesi. Eko kira sāvatthivāsī kuṭumbiko buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nimantetvā attano ārāme nisīdāpetvā yāgukhajjakaṃ datvā uyyānapālaṃ āṇāpesi ‘‘bhikkhūhi saddhiṃ uyyāne vicaritvā ayyānaṃ ambādīni nānāphalāni dehī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā bhikkhūsaṅghamādāya uyyāne vicaranto rukkhaṃ ulloketvāva ‘‘etaṃ phalaṃ āmaṃ, etaṃ na supakkaṃ, etaṃ supakka’’nti jānāti. Yaṃ so vadati, taṃ tatheva hoti. Bhikkhū gantvā tathāgatassa ārocesuṃ ‘‘bhante, ayaṃ uyyānapālo phalakusalo bhūmiyaṃ ṭhitova rukkhaṃ ulloketvā ‘etaṃ phalaṃ āmaṃ, etaṃ na supakkaṃ, etaṃ supakka’nti jānāti. Yaṃ so vadati, taṃ tatheva hotī’’ti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, ayameva uyyānapālo phalakusalo, pubbe paṇḍitāpi phalakusalāyeva ahesu’’nti vatvā atītaṃ āhari. „Dieser Baum ist nicht schwer zu erklimmen“ – dies lehrte der Meister, als er im Jetavana verweiltete, bezüglich eines in Bezug auf Früchte sachkundigen Laienanhängers. Es heißt, ein in Sāvatthi lebender Hausvater lud die Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze ein, ließ sie in seinem Park Platz nehmen, reichte ihnen Reisschleim und Speisen und wies den Gärtner an: „Gehe mit den Mönchen im Park umher und gib den Ehrwürdigen verschiedene Früchte wie Mangos und andere.“ Dieser willigte mit „Sehr wohl“ ein, führte die Mönchsgemeinde durch den Park und erkannte, bloß indem er zu einem Baum emporblickte: „Diese Frucht ist unreif, jene ist nicht richtig reif, diese hier ist wohlgereift.“ Und was immer er sagte, genau so verhielt es sich auch. Die Mönche gingen hin und berichteten dem Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, dieser Gärtner ist überaus kundig in Bezug auf Früchte. Während er bloß auf dem Boden steht und zu einem Baum emporblickt, weiß er: 'Diese Frucht ist unreif, jene ist nicht richtig reif, diese hier ist wohlgereift.' Was immer er sagt, genau so verhielt es sich auch.“ Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, ist dieser Gärtner kundig in Bezug auf Früchte; auch in der Vergangenheit waren die Weisen in Bezug auf Früchte kundig.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er die Begebenheit aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto satthavāhakule nibbattitvā vayappatto pañcahi sakaṭasatehi vaṇijjaṃ karonto ekasmiṃ kāle mahāvattaniaṭaviṃ patvā aṭavimukhe ṭhatvā sabbe manusse sannipātāpetvā ‘‘imissā aṭaviyā visarukkhā nāma honti, visapattāni, visapupphāni, visaphalāni, visamadhūni hontiyeva, pubbe tumhehi aparibhuttaṃ, yaṃ kiñci pattaṃ vā pupphaṃ vā phalaṃ vā pallavaṃ vā maṃ aparipucchitvā mā khādathā’’ti āha. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā aṭaviṃ otariṃsu. Aṭavimukhe ca ekasmiṃ gāmadvāre kiṃphalarukkho nāma atthi, tassa khandhasākhāpalāsapupphaphalāni sabbāni ambasadisāneva honti. Na kevalaṃ vaṇṇasaṇṭhānatova, gandharasehipissa āmapakkāni phalāni ambaphalasadisāneva, khāditāni pana halāhalavisaṃ viya taṅkhaṇaññeva jīvitakkhayaṃ pāpenti. Purato gacchantā ekacce lolapurisā ‘‘amburukkho aya’’nti saññāya phalāni khādiṃsu, ekacce ‘‘satthavāhaṃ pucchitvāva khādissāmā’’ti hatthena gahetvā aṭṭhaṃsu. Te satthavāhe āgate ‘‘ayya, imāni ambaphalāni khādāmā’’ti pucchiṃsu. Bodhisatto ‘‘nāyaṃ [Pg.289] ambarukkho’’ti ñatvā ‘‘kiṃ phalarukkho nāmesa, nāyaṃ ambarukkho, mā khāditthā’’ti vāretvā ye khādiṃsu. Tepi vamāpetvā catumadhuraṃ pāyetvā niroge akāsi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Karawanenführerfamilie geboren. Als er das Erwachsenenalter erreicht hatte und mit fünfhundert Wagen Handel trieb, erreichte er zu einer gewissen Zeit einen großen, windungsreichen Wald. Er hielt am Waldeingang an, versammelte alle Leute und sprach: „In diesem Wald gibt es sogenannte Giftbäume. Es gibt darin Giftblätter, Giftblüten, Giftfrüchte und Gift-Honig. Esst nichts davon – weder irgendein Blatt, noch eine Blüte, eine Frucht oder einen jungen Trieb –, was ihr zuvor noch nie verzehrt habt, ohne mich vorher gefragt zu haben!“ Sie stimmten mit den Worten „Sehr wohl“ zu und betraten den Wald. Am Waldeingang, nahe einem Dorftor, stand ein Baum namens Kiṃphala. Sein Stamm, seine Äste, Blätter, Blüten und Früchte glichen allesamt völlig denen eines Mangobaumes. Nicht nur in Farbe und Gestalt, sondern auch im Duft und Geschmack glichen seine rohen wie auch seine reifen Früchte völlig den Mangos. Wenn sie jedoch verzehrt wurden, führten sie im selben Augenblick zum Verlust des Lebens, wie ein tödliches Halāhala-Gift. Einige leichtsinnige Männer, die vorausgingen, aßen die Früchte in dem Glauben: „Dies ist ein Mangobaum.“ Andere dachten sich: „Wir wollen erst essen, nachdem wir den Karawanenführer gefragt haben“, und hielten die Früchte nur in den Händen. Als der Karawanenführer eintraf, fragten sie ihn: „Herr, dürfen wir diese Mangos essen?“ Der Bodhisatta erkannte: „Dies ist kein Mangobaum“, und hielt sie zurück, indem er sagte: „Dies ist der sogenannte Kiṃphala-Baum, das ist kein Mangobaum. Esst nicht davon!“ Diejenigen, die bereits davon gegessen hatten, brachte er zum Erbrechen, gab ihnen die vier süßen Speisen zu trinken und machte sie wieder gesund. Pubbe pana imasmiṃ rukkhamūle manussā nivāsaṃ kappetvā ‘‘ambaphalānī’’ti saññāya imāni visaphalāni khāditvā jīvitakkhayaṃ pāpuṇanti. Punadivase gāmavāsino nikkhamitvā matamanusse disvā pāde gaṇhitvā paṭicchannaṭṭhāne chaḍḍetvā sakaṭehi saddhiṃyeva sabbaṃ tesaṃ santakaṃ gahetvā gacchanti. Te taṃ divasampi aruṇuggamanakāleyeva ‘‘mayhaṃ balibaddo bhavissati, mayhaṃ sakaṭaṃ, mayhaṃ bhaṇḍa’’nti vegena taṃ rukkhamūlaṃ gantvā manusse niroge disvā ‘‘kathaṃ tumhe imaṃ rukkhaṃ ‘nāyaṃ ambarukkho’ti jānitthā’’ti pucchiṃsu. Te ‘‘mayaṃ na jānāma, satthavāhajeṭṭhako no jānātī’’ti āhaṃsu. Manussā bodhisattaṃ pucchiṃsu ‘‘paṇḍita, kinti katvā tvaṃ imassa rukkhassa anambarukkhabhāvaṃ aññāsī’’ti? So ‘‘dvīhi kāraṇehi aññāsi’’nti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit jedoch schlugen Menschen am Fuße dieses Baumes ihr Lager auf, aßen diese Giftfrüchte im Glauben, es seien Mangos, und starben. Am nächsten Tag kamen die Dorfbewohner heraus, sahen die toten Menschen, packten sie an den Füßen, warfen sie an einen verborgenen Ort, nahmen all ihren Besitz mitsamt den Wagen an sich und gingen davon. Auch an jenem Tag eilten sie schon zur Zeit des Sonnenaufgangs mit den Gedanken: „Ein Ochse wird mir gehören, ein Wagen mir, die Waren mir“, hastig zum Fuße dieses Baumes. Als sie die Menschen jedoch gesund vorfanden, fragten sie: „Wie habt ihr gewusst, dass dieser Baum kein Mangobaum ist?“ Jene antworteten: „Wir wissen es nicht, aber unser Karawanenführer weiß es.“ Da fragten die Leute den Bodhisatta: „Weiser, wie hast du erkannt, dass dieser Baum kein Mangobaum ist?“ Er antwortete: „Aus zwei Gründen habe ich es erkannt“, und sprach diese Strophe: 54. 54. ‘‘Nāyaṃ rukkho durāruho, napi gāmato ārakā; Ākāraṇena jānāmi, nāyaṃ sāduphalo dumo’’ti. „Dieser Baum ist nicht schwer zu erklimmen, noch ist er weit vom Dorf entfernt; an diesen Anzeichen erkenne ich: Dieser Baum trägt keine süßen Früchte.“ Tattha nāyaṃ rukkho durāruhoti ayaṃ visarukkho na dukkhāruho, ukkhipitvā ṭhapitanisseṇī viya sukhenārohituṃ sakkāti vadati. Napi gāmato ārakāti gāmato dūre ṭhitopi na hoti, gāmadvāre ṭhitoyevāti dīpeti. Ākāraṇena jānāmīti iminā duvidhena kāraṇenāhaṃ imaṃ rukkhaṃ jānāmi. Kinti? Nāyaṃ sāduphalo dumoti. Sace hi ayaṃ madhuraphalo ambarukkho abhavissa, evaṃ sukhāruḷhe avidūre ṭhite etasmiṃ ekampi phalaṃ na tiṭṭheyya, phalakhādakamanussehi niccaṃ parivutova assa. Evaṃ ahaṃ attano ñāṇena paricchinditvā imassa visarukkhabhāvaṃ aññāsinti mahājanassa dhammaṃ desetvā sotthigamanaṃ gato. Darin bedeutet „nāyaṃ rukkho durāruho“: Dieser Giftbaum ist nicht schwer zu erklimmen. Er drückt aus, dass man ihn leicht besteigen kann, wie eine aufgestellte Leiter. „Napi gāmato ārakā“ verdeutlicht, dass er nicht weit vom Dorf entfernt steht, sondern direkt am Dorftor. „Ākāraṇena jānāmī“ bedeutet: Aufgrund dieses zweifachen Grundes kenne ich diesen Baum. Was bedeutet das? „Dieser Baum trägt keine süßen Früchte.“ Denn wenn dies ein Mangobaum mit süßen Früchten gewesen wäre, so leicht zu erklimmen und so nah gelegen, dann würde an ihm nicht eine einzige Frucht übrig sein; er wäre ständig von fruchtessenden Menschen umringt gewesen. „So habe ich durch meine eigene Weisheit geurteilt und erkannt, dass dies ein Giftbaum ist.“ Nachdem er der Volksmenge die Lehre verkündet hatte, setzte er seine Reise wohlbehalten fort. Satthāpi ‘‘evaṃ, bhikkhave, pubbe paṇḍitāpi phalakusalā ahesu’’nti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā parisā buddhaparisā ahesuṃ, satthavāho pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor mit den Worten: „So, ihr Mönche, waren auch in der Vergangenheit die Weisen kundig in Bezug auf Früchte.“ Er stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war das Gefolge die Gefolgschaft des Buddha, der Karawanenführer aber war ich selbst.“ Kiṃphalajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Kiṃphala-Jātaka ist die vierte.
[55] 5. Pañcāvudhajātakavaṇṇanā [55] 5. Die Erklärung des Pañcāvudha-Jātaka. Yo [Pg.290] alīnena cittenāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ ossaṭṭhavīriyaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tañhi bhikkhuṃ satthā āmantetvā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ossaṭṭhavīriyosī’’ti pucchitvā ‘‘saccaṃ, bhagavā’’ti vutte ‘‘bhikkhu pubbe paṇḍitā vīriyaṃ kātuṃ yuttaṭṭhāne vīriyaṃ katvā rajjasampattiṃ pāpuṇiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Yo alīnena cittenā“ (Wer mit unerschlafftem Geist) – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf einen Mönch, der seine Willenskraft aufgegeben hatte. Der Meister rief diesen Mönch zu sich und fragte ihn: „Stimmt es wirklich, Mönch, dass du deine Willenskraft aufgegeben hast?“ Als dieser antwortete: „Es ist wahr, Erhabener“, sagte der Meister: „Mönch, in der Vergangenheit haben Weise an Orten, an denen es angebracht war, Willenskraft aufzubringen, Tatkraft gezeigt und das königliche Erbe erlangt“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa rañño aggamahesiyā kucchismiṃ nibbatti. Tassa nāmaggahaṇadivase aṭṭhasate brāhmaṇe sabbakāmehi santappetvā lakkhaṇāni pucchiṃsu. Lakkhaṇakusalā brāhmaṇā lakkhaṇasampattiṃ disvā ‘‘puññasampanno, mahārāja, kumāro tumhākaṃ accayena rajjaṃ pāpuṇissati, pañcāvudhakamme paññāto pākaṭo jambudīpe aggapuriso bhavissatī’’ti byākariṃsu. Rājā brāhmaṇānaṃ vacanaṃ sutvā kumārassa nāmaṃ gaṇhanto ‘‘pañcāvudhakumāro’’ti nāmaṃ akāsi. Atha naṃ viññutaṃ patvā soḷasavassuddese ṭhitaṃ rājā āmantetvā ‘‘tāta, sippaṃ uggaṇhāhī’’ti āha. ‘‘Kassa santike uggaṇhāmi, devā’’ti? ‘‘Gaccha, tāta, gandhāraraṭṭhe takkasilanagare disāpāmokkhassa ācariyassa santike uggaṇha, idañcassa ācariyabhāgaṃ dajjeyyāsī’’ti sahassaṃ datvā uyyojesi. So tattha gantvā sippaṃ sikkhitvā ācariyena dinnaṃ pañcāvudhaṃ gahetvā ācariyaṃ vanditvā takkasilanagarato nikkhamitvā sannaddhapañcāvudho bārāṇasimaggaṃ paṭipajji. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoße der Hauptgemahlin jenes Königs wiedergeboren. Am Tag seiner Namensgebung wurden einhundertacht Brahmanen mit allen begehrenswerten Dingen zufriedengestellt, und man befragte sie über seine körperlichen Merkmale. Die in der Merkmalsdeutung kundigen Brahmanen sahen die Vollkommenheit seiner Merkmale und sagten voraus: „O Großkönig, der Prinz ist reich an Verdiensten. Nach eurem Ableben wird er die Herrschaft erlangen. Er wird im Umgang mit den fünf Waffen berühmt und bekannt sein und der vorzüglichste Mann auf der ganz Jambudīpa werden.“ Als der König die Worte der Brahmanen hörte, gab er dem Prinzen bei der Namensgebung den Namen „Pañcāvudha-Kumāra“. Als er heranwuchs und im Alter von etwa sechzehn Jahren stand, rief ihn der König zu sich und sagte: „Mein Sohn, lerne eine Kunst.“ – „Bei wem soll ich lernen, o König?“ – „Gehe, mein Sohn, in das Land Gandhāra, in die Stadt Takkasilā, und lerne bei dem weltberühmten Lehrer. Und gib ihm dies als Lehrerhonorar.“ Er gab ihm tausend Münzen und sandte ihn fort. Er ging dorthin, erlernte die Kunst, nahm die fünf Waffen entgegen, die der Lehrer ihm gab, erwies dem Lehrer seine Ehrfurcht, verließ die Stadt Takkasilā und machte sich, mit den fünf Waffen ausgerüstet, auf den Weg nach Bārāṇasī. So antarāmagge silesalomayakkhena nāma adhiṭṭhitaṃ ekaṃ aṭaviṃ pāpuṇi. Atha naṃ aṭavimukhe manussā disvā ‘‘bho māṇava, mā imaṃ aṭaviṃ pavisa, silesalomayakkho nāmettha atthi, so diṭṭhadiṭṭhe manusse jīvitakkhayaṃ pāpetī’’ti vārayiṃsu. Bodhisatto attānaṃ takkento asambhītakesarasīho viya aṭaviṃ pāvisiyeva. Tasmiṃ aṭavimajjhaṃ sampatte so yakkho tālamatto hutvā kūṭāgāramattaṃ sīsaṃ pattappamāṇāni akkhīni, dakalimakuḷamattā dve dāṭhā ca māpetvā setamukho kabarakucchi nīlahatthapādo hutvā bodhisattassa attānaṃ dassetvā ‘‘kahaṃ yāsi, tiṭṭha bhakkhosi me’’ti āha. Atha naṃ bodhisatto [Pg.291] ‘‘yakkha, ahaṃ attānaṃ takketvā idha paviṭṭho, tvaṃ appamatto hutvā maṃ upagaccheyyāsi. Visapītena hi sarena taṃ vijjhitvā ettheva pātessāmī’’ti santajjetvā halāhalavisapītaṃ saraṃ sannayhitvā muñci, so yakkhassa lomesuyeva allīyi. Tato aññaṃ, tato aññanti evaṃ paññāsa sare muñci, sabbe tassa lomesuyeva allīyiṃsu. Yakkho sabbepi te sare phoṭetvā attano pādamūleyeva pātetvā bodhisattaṃ upasaṅkami. Unterwegs erreichte er einen Wald, der von einem Dämon namens Silesaloma (Klebhaar) beherrscht wurde. Als ihn die Menschen am Rande des Waldes sahen, hielten sie ihn zurück und sagten: „O Jüngling, betritt diesen Wald nicht! Hier lebt ein Dämon namens Silesaloma; er bringt jeden Menschen, den er erblickt, um das Leben.“ Der Bodhisatta jedoch vertraute auf sich selbst und betrat den Wald wie ein furchtloser Mähnenlöwe. Als er die Mitte des Waldes erreicht hatte, zeigte sich der Dämon, der sich so groß wie eine Palme gemacht hatte, mit einem Haupt so groß wie ein Giebelhaus, Augen wie Almosenschalen und zwei Stoßzähnen wie Bananenknospen. Mit weißem Gesicht, geflecktem Bauch und blau-schwarzen Händen und Füßen zeigte er sich dem Bodhisatta und sagte: „Wohin gehst du? Halt ein! Du bist meine Beute!“ Da bedrohte ihn der Bodhisatta: „Dämon, ich habe diesen Wald im Vertrauen auf meine eigene Kraft betreten. Tritt nur unbesorgt an mich heran! Ich werde dich mit einem giftbestrichenen Pfeil durchbohren und genau hier zu Boden strecken.“ Er spannte einen mit tödlichem Halāhala-Gift bestrichenen Pfeil ein und schoss ihn ab. Dieser blieb jedoch bloß an den Haaren des Dämons hängen. Danach schoss er einen weiteren und noch einen ab, insgesamt fünfzig Pfeile; sie alle blieben an den Haaren des Dämons hängen. Da schüttelte der Dämon all diese Pfeile ab, ließ sie direkt vor seinen Füßen niederfallen und trat an den Bodhisatta heran. Bodhisatto punapi taṃ tajjetvā khaggaṃ kaḍḍhitvā pahari, tettiṃsaṅgulāyato khaggo lomesuyeva allīyi. Atha naṃ kaṇayena pahari, sopi lomesuyeva allīyi. Tassa allīnabhāvaṃ ñatvā muggarena pahari, sopi lomesuyeva allīyi. Tassa allīnabhāvaṃ ñatvā kuntena pahari, sopi lomesuyeva allīyi. Tassa allīnabhāvaṃ ñatvā ‘‘bho yakkhana, te ahaṃ ‘pañcāvudhakumāro nāmā’ti sutapubbo, ahaṃ tayā adhiṭṭhitaṃ aṭaviṃ pavisanto na dhanuādīni takketvā paviṭṭho, attānaṃyeva pana takketvā paviṭṭho, ajja taṃ pothetvā cuṇṇavicuṇṇaṃ karissāmī’’ti unnādento attānaṃ takketvā dakkhiṇahatthena yakkhaṃ pahari, hattho lomesuyeva allīyi. Vāmahatthena pahari, sopi allīyi. Dakkhiṇapādena pahari, sopi allīyi. Vāmapādena pahari, sopi allīyi. ‘‘Sīsena taṃ pothetvā cuṇṇavicuṇṇaṃ karissāmī’’ti sīsena pahari, tampi lomesuyeva allīyi. So pañcoḍḍito pañcasu ṭhānesu baddho olambantopi nibbhayo nissārajjova ahosi. Der Bodhisatta bedrohte ihn erneut, zog sein Schwert und schlug zu. Doch das dreiunddreißig Zoll lange Schwert blieb bloß an den Haaren hängen. Daraufhin schlug er ihn mit einem Dreizack, doch auch dieser blieb an den Haaren hängen. Als er sah, dass dieser hängen geblieben war, schlug er mit einer Keule zu, doch auch sie blieb an den Haaren hängen. Als er sah, dass sie hängen geblieben war, stach er mit einer Lanze zu, doch auch sie blieb an den Haaren hängen. Als er sah, dass sie hängen geblieben war, rief er laut hallend: „He, Dämon! Hast du noch nie vom Prinzen Pañcāvudha gehört? Als ich diesen von dir beherrschten Wald betrat, verließ ich mich nicht auf Bogen und andere Waffen, sondern betrat ihn im Vertrauen auf mich selbst allein. Heute werde ich dich niederschlagen und in feinsten Staub zermalmen!“ Im Vertrauen auf sich selbst schlug er den Dämon mit der rechten Hand; doch die Hand blieb an den Haaren hängen. Er schlug mit der linken Hand zu; auch sie blieb hängen. Er trat mit dem rechten Fuß; auch er blieb hängen. Er trat mit dem linken Fuß; auch er blieb hängen. Er rief: „Ich werde dich mit dem Kopf rammen und zu feinstem Staub zermalmen!“, und stieß mit dem Kopf zu; doch auch dieser blieb an den Haaren hängen. So hing er da, an fünf Stellen festgehalten und gefesselt, doch er war furchtlos und völlig ohne Zittern. Yakkho cintesi ‘‘ayaṃ eko purisasīho purisājānīyo, na purisamattova, mādisena nāmassa yakkhena gahitassa santāsamattampi na bhavissati, mayā imaṃ maggaṃ hanantena ekopi evarūpo puriso na diṭṭhapubbo, kasmā nu kho esa na bhāyatī’’ti. So taṃ khādituṃ avisahanto ‘‘kasmā nu kho, tvaṃ māṇava, maraṇabhayaṃ na bhāyasī’’ti pucchi. ‘‘Kiṃkāraṇā, yakkha, bhāyissāmi. Ekasmiñhi attabhāve ekaṃ maraṇaṃ niyatameva, apica mayhaṃ kucchimhi vajirāvudhaṃ atthi. Sace maṃ khādissasi, taṃ āvudhaṃ jīrāpetuṃ na sakkhissasi, taṃ te antāni khaṇḍākhaṇḍikaṃ chinditvā jīvitakkhayaṃ [Pg.292] pāpessati. Iti ubhopi nassissāma, iminā kāraṇenāhaṃ na bhāyāmī’’ti. Idaṃ kira bodhisatto attano abbhantare ñāṇāvudhaṃ sandhāya kathesi. Taṃ sutvā yakkho cintesi ‘‘ayaṃ māṇavo saccameva bhaṇati, imassa purisasīhassa sarīrato muggabījamattampi maṃsakhaṇḍaṃ mayhaṃ kucchi jīretuṃ na sakkhissati, vissajjessāmi na’’nti maraṇabhayatajjito bodhisattaṃ vissajjetvā ‘‘māṇava, purisasīho tvaṃ, na te ahaṃ maṃsaṃ khādissāmi, tvaṃ ajja rāhumukhā muttacando viya mama hatthato muccitvā ñātisuhajjamaṇḍalaṃ tosento yāhī’’ti āha. Der Dämon dachte nach: „Dies ist ein wahrer Löwe unter den Menschen, ein edler Mann, kein gewöhnlicher Mensch. Obwohl er von einem Dämon wie mir gepackt wurde, zeigt er nicht einmal die geringste Furcht. Seit ich diesen Weg unsicher mache, habe ich noch nie einen solchen Mann gesehen. Warum wohl fürchtet er sich nicht?“ Da er es nicht wagte, ihn zu fressen, fragte er ihn: „Jüngling, warum fürchtest du dich nicht vor dem Tod?“ – „Dämon, aus welchem Grund sollte ich mich fürchten? In einer einzigen Existenz ist der einmalige Tod ohnehin gewiss. Überdies befindet sich in meinem Bauch eine Diamantenwaffe. Wenn du mich frisst, wirst du diese Waffe nicht verdauen können. Sie wird deine Eingeweide in Stücke schneiden und dein Leben beenden. So würden wir beide umkommen. Aus diesem Grund fürchte ich mich nicht.“ Dies sagte der Bodhisatta, so heißt es, im Hinblick auf die Waffe der Erkenntnis in seinem Inneren. Als der Dämon dies hörte, dachte er: „Dieser Jüngling spricht die Wahrheit. Mein Magen wird nicht in der Lage sein, auch nur ein Stück Fleisch von der Größe eines Mungbohnensamens aus dem Körper dieses Löwen unter den Menschen zu verdauen. Ich werde ihn freilassen.“ Vom Schrecken des Todes gepackt, ließ er den Bodhisatta frei und sagte: „Jüngling, du bist ein Löwe unter den Menschen! Ich werde dein Fleisch nicht essen. Befreit aus meiner Hand, gleich dem Mond, der aus dem Rachen des Rahu entkommen ist, geh nun hin und erfreue die Schar deiner Verwandten und Freunde!“ Atha naṃ bodhisatto āha – ‘‘yakkha, ahaṃ tāva gacchissāmi, tvaṃ pana pubbepi akusalaṃ katvā luddo lohitapāṇi pararuhiramaṃsabhakkho yakkho hutvā nibbatto. Sace idhāpi ṭhatvā akusalameva karissasi, andhakārā andhakārameva gamissasi, maṃ diṭṭhakālato paṭṭhāya pana na sakkā tayā akusalaṃ kātuṃ, pāṇātipātakammaṃ nāma niraye tiracchānayoniyaṃ pettivisaye asurakāye ca nibbatteti, manussesu nibbattanibbattaṭṭhāne appāyukasaṃvattanikaṃ hotī’’ti evamādinā nayena pañcannaṃ dussīlyakammānaṃ ādīnavaṃ, pañcannaṃ sīlānaṃ ānisaṃsañca kathetvā nānākāraṇehi yakkhaṃ tajjetvā dhammaṃ desetvā dametvā nibbisevanaṃ katvā pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā tassāyeva naṃ aṭaviyā balipaṭiggāhakaṃ devataṃ katvā appamādena ovaditvā aṭavito nikkhamitvā aṭavimukhe manussānaṃ ācikkhitvā sannaddhapañcāvudho bārāṇasiṃ gantvā mātāpitaro disvā aparabhāge rajje patiṭṭhāya dhammena rajjaṃ kārento dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Da sprach der Bodhisatta zu ihm: „Dämon, ich werde nun zwar gehen. Doch du bist schon in der Vergangenheit wiedergeboren worden, weil du unheilsame Taten begangen hast, als ein grausamer Dämon mit blutigen Händen, der sich vom Blut und Fleisch anderer ernährt. Wenn du auch weiterhin hier bleibst und nur Unheilsames tust, wirst du wahrlich von der Dunkelheit in noch tiefere Dunkelheit gehen. Von dem Moment an jedoch, da du mich gesehen hast, ist es dir nicht mehr gestattet, Unheilsames zu tun. Denn das Töten von Lebewesen führt zu einer Wiedergeburt in der Hölle, im Tierreich, im Reich der Geister oder im Reich der Asuras; und sollte man unter den Menschen wiedergeboren werden, so führt es an jedem Ort der Wiedergeburt zu einem kurzen Leben.“ Auf diese Weise erklärte er ihm die Nachteile der fünf Arten des Sittenverfalls sowie die Vorzüge der fünf Tugendregeln. Er wies den Dämon mit verschiedenen Argumenten zurecht, verkündete das Dhamma, zähmte ihn und brachte ihn dazu, von unheilsamem Verhalten abzulassen. Er etablierte ihn in den fünf Tugendregeln und machte ihn zu einer Gottheit in ebendiesem Wald, die Speiseopfer empfängt. Nachdem er ihn zu unermüdlicher Achtsamkeit ermahnt hatte, verließ er den Wald, informierte die Menschen am Waldrand, zog mit seinen fünf wohlgerüsteten Waffen nach Bārāṇasī und sah seine Eltern wieder. Später bestieg er den Thron, regierte das Reich in Gerechtigkeit, vollbrachte heilsame Taten wie das Geben von Almosen und ging schließlich gemäß seinem Kamma dahin. Satthāpi imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diese Strophe: 55. 55. ‘‘Yo alīnena cittena, alīnamanaso naro; Bhāveti kusalaṃ dhammaṃ, yogakkhemassa pattiyā; Pāpuṇe anupubbena, sabbasaṃyojanakkhaya’’nti. „Der Mensch, der mit unerschütterlichem Geist und unerschrockenem Herzen heilsame Qualitäten entfaltet, um die Sicherheit vor den Jochen zu erlangen, wird allmählich die Vernichtung aller Fesseln erreichen.“ Tatrāyaṃ piṇḍattho – yo puriso alīnena asaṃkuṭitena cittena pakatiyāpi alīnamano alīnajjhāsayova hutvā anavajjaṭṭhena kusalaṃ sattatiṃ sabodhipakkhiyabhedaṃ dhammaṃ bhāveti vaḍḍheti, visālena cittena vipassanaṃ [Pg.293] anuyuñjati catūhi yogehi khemassa nibbānassa pattiyā, so evaṃ sabbasaṅkhāresu ‘‘aniccaṃ dukkhaṃ anattā’’ti tilakkhaṇaṃ āropetvā taruṇavipassanato paṭṭhāya uppanne bodhipakkhiyadhamme bhāvento anupubbena ekasaṃyojanampi anavasesetvā sabbasaṃyojanakkhayakarassa catutthamaggassa pariyosāne uppannattā ‘‘sabbasaṃyojanakkhayo’’ti saṅkhyaṃ gataṃ arahattaṃ pāpuṇeyyāti. Hier ist die zusammenfassende Bedeutung: Wenn ein Mensch mit unverzagtem, unerschütterlichem Geist, der auch von Natur aus von unverzagtem Gemüt und von unverzagter Absicht ist, das Heilsame in der Bedeutung des Fehlerlosen – nämlich die siebenunddreißig Glieder des Erwachens – entfaltet und vermehrt, und mit weitem Geist die Einsichtspflege ausübt, um das von den vier Jochen sichere Nibbāna zu erlangen; wenn er so die drei Merkmale der Unbeständigkeit, des Leidens und des Nicht-Selbst auf alle Gestaltungen anwendet, und von der zarten Einsicht an beginnend die entstandenen, dem Erwachen förderlichen Faktoren entfaltet, so mag er der Reihe nach, ohne auch nur eine einzige Fessel übrigzulassen, die Arhatschaft erlangen, welche als die „Versiegung aller Fesseln“ bezeichnet wird, da sie am Ende des vierten Pfades entsteht, der die Vernichtung aller Fesseln bewirkt. Evaṃ satthā arahattena dhammadesanāya kūṭaṃ gahetvā matthake cattāri saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so bhikkhu arahattaṃ pāpuṇi. Satthā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā yakkho aṅgulimālo ahosi, pañcāvudhakumāro pana ahameva ahosi’’nti. So krönte der Meister seine Lehrrede mit der Arhatschaft und verkündete auf dem Höhepunkt die vier Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten erreichte jener Mönch die Arhatschaft. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war der Yakkha Angulimāla, der Prinz Pañcāvudha aber war ich selbst.“ Pañcāvudhajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Pañcāvudha-Jātaka ist die fünfte.
[56] 6. Kañcanakkhandhajātakavaṇṇanā [56] 6. Die Erklärung des Kañcanakkhandha-Jātaka Yo pahaṭṭhena cittenāti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Eko kira sāvatthivāsī kulaputto satthu dhammadesanaṃ sutvā ratanasāsane uraṃ datvā pabbaji. Athassa ācariyupajjhāyā ‘‘āvuso, ekavidhena sīlaṃ nāma, duvidhena, tividhena, catubbidhena, pañcavidhena, chabbidhena, sattavidhena, aṭṭhavidhena, navavidhena, dasavidhena, bahuvidhena sīlaṃ nāma. Idaṃ cūḷasīlaṃ nāma, idaṃ majjhimasīlaṃ nāma, idaṃ mahāsīlaṃ nāma. Idaṃ pātimokkhasaṃvarasīlaṃ nāma, idaṃ indriyasaṃvarasīlaṃ nāma, idaṃ ājīvapārisuddhisīlaṃ nāma, idaṃ paccayapaṭisevanasīlaṃ nāmā’’ti sīlaṃ ācikkhanti. So cintesi ‘‘idaṃ sīlaṃ nāma atibahu, ahaṃ ettakaṃ samādāya vattituṃ na sakkhissāmi, sīlaṃ pūretuṃ asakkontassa ca nāma pabbajjāya ko attho, ahaṃ gihī hutvā dānādīni puññāni ca karissāmi, puttadārañca posessāmī’’ti. Evañca pana cintetvā ‘‘bhante, ahaṃ sīlaṃ rakkhituṃ na sakkhissāmi, asakkontassa ca nāma pabbajjāya ko attho, ahaṃ hīnāyāvattissāmi, tumhākaṃ pattacīvaraṃ gaṇhathā’’ti āha. „Mit freudigem Geiste...“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen gewissen Mönch. Ein in Sāvatthī lebender Sohn aus gutem Hause hörte nämlich die Lehrrede des Meisters, übergab sein Herz der kostbaren Lehre und trat in den Orden ein. Da erklärten ihm seine Lehrer und Präzeptoren die Tugendregeln: „Freund, die Tugend ist von einer Art, von zweierlei Art, dreierlei, vierlei, fünferlei, sechserlei, siebenerlei, achterlei, neunerlei, zehnerlei und von vielfältiger Art. Dies ist die kleine Tugend, dies die mittlere Tugend, dies die große Tugend. Dies ist die Tugend der Beherrschung durch die Ordensregeln, dies die Tugend der Zügelung der Sinnenkräfte, dies die Tugend der Reinheit des Lebensunterhalts, dies die Tugend bezüglich des Gebrauchs der Lebensbedürfnisse.“ Er dachte: „Diese Tugendregeln sind überaus zahlreich. Ich werde nicht in der Lage sein, so viel Tugend auf mich zu nehmen und danach zu leben. Welchen Nutzen hat das Ordensleben für jemanden, der die Tugendregeln nicht erfüllen kann? Ich will wieder Laie werden, verdienstvolle Taten wie das Spenden vollbringen und Frau und Kinder ernähren.“ Nachdem er so gedacht hatte, sagte er: „Ehrwürdiger Herr, ich werde nicht fähig sein, die Tugend zu bewahren. Welchen Nutzen hat das Ordensleben für jemanden, der es nicht vermag? Ich werde in den niederen Stand des Laienlebens zurückkehren. Bitte nehmt Eure Almosenschale und Euer Gewand zurück.“ Atha [Pg.294] naṃ āhaṃsu ‘‘āvuso evaṃ sante dasabalaṃ vanditvāva yāhī’’ti te taṃ ādāya satthu santikaṃ dhammasabhaṃ agamaṃsu. Satthā disvāva ‘‘kiṃ, bhikkhave, anatthikaṃ bhikkhuṃ ādāya āgatatthā’’ti āha. Bhante, ayaṃ bhikkhu ‘‘ahaṃ sīlaṃ rakkhituṃ na sakkhissāmī’’ti pattacīvaraṃ niyyādeti, atha naṃ mayaṃ gahetvā āgatamhāti. ‘‘Kasmā pana tumhe, bhikkhave, imassa bhikkhuno bahuṃ sīlaṃ ācikkhatha. Yattakaṃ esa rakkhituṃ sakkoti, tattakameva rakkhissati. Ito paṭṭhāya tumhe etaṃ mā kiñci avacuttha, ahamettha kattabbaṃ jānissāmi, ehi tvaṃ bhikkhu, kiṃ te bahunā sīlena, tīṇiyeva sīlāni rakkhituṃ sakkhissasī’’ti? ‘‘Rakkhissāmi, bhante’’ti. Tena hi tvaṃ ito paṭṭhāya kāyadvāraṃ vacīdvāraṃ manodvāranti tīṇi dvārāni rakkha, mā kāyena pāpakammaṃ kari, mā vācāya, mā manasā. ‘‘Gaccha mā hīnāyāvatti, imāni tīṇiyeva sīlāni rakkhā’’ti. Ettāvatā so bhikkhu tuṭṭhamānaso ‘‘sādhu, bhante, rakkhissāmi imāni tīṇi sīlānī’’ti satthāraṃ vanditvā ācariyupajjhāyehi saddhiṃyeva agamāsi. So tāni tīṇi sīlāni pūrentova aññāsi ‘‘ācariyupajjhāyehi mayhaṃ ācikkhitaṃ sīlampi ettakameva, te pana attano abuddhabhāvena maṃ bujjhāpetuṃ nāsakkhiṃsu, sammāsambuddho attano buddhasubuddhatāya anuttaradhammarājatāya ettakaṃ sīlaṃ tīsuyeva dvāresu pakkhipitvā maṃ gaṇhāpesi, avassayo vata me satthā jāto’’ti vipassanaṃ vaḍḍhetvā katipāheneva arahatte patiṭṭhāsi. Da sprachen sie zu ihm: „Freund, wenn dem so ist, dann gehe erst, nachdem du dich vor dem Zehnkraft-Besitzenden verneigt hast.“ Sie nahmen ihn mit sich und gingen zur Versammlungshalle in die Gegenwart des Meisters. Sobald der Meister ihn sah, sagte er: „Warum, ihr Mönche, kommt ihr und bringt einen unwilligen Mönch mit?“ – „Ehrwürdiger Herr, dieser Mönch übergibt uns seine Almosenschale und sein Gewand mit den Worten: ‚Ich werde nicht in der Lage sein, die Tugend zu bewahren.‘ Da haben wir ihn mitgenommen und sind hierhergekommen.“ – „Warum aber, ihr Mönche, erklärt ihr diesem Mönch so viele Tugendregeln? Soviel er zu bewahren vermag, genau so viel soll er bewahren. Sprecht von nun an nicht mehr zu ihm; ich werde wissen, was hier zu tun ist. Komm her, o Mönch! Was nützt dir so viel Tugend? Wirst du in der Lage sein, nur drei Tugenden zu bewahren?“ – „Ich werde sie bewahren, ehrwürdiger Herr.“ – „Wenn dem so ist, dann bewahre von nun an drei Tore: das Körpertor, das Sprachtor und das Geisttor. Begehe keine schlechte Tat mit dem Körper, nicht mit der Sprache und nicht mit dem Geist. Geh, kehre nicht in den niederen Stand zurück, bewahre eben diese drei Tugenden!“ Dadurch war jener Mönch von Herzen erfreut und sagte: „Gut, ehrwürdiger Herr, ich werde diese drei Tugenden bewahren.“ Er verneigte sich vor dem Meister und ging zusammen mit seinen Lehrern und Präzeptoren fort. Während er jene drei Tugenden erfüllte, erkannte er: „Die Tugend, die mir von meinen Lehrern und Präzeptoren erklärt wurde, ist im Grunde genau so viel. Sie aber vermochten es aufgrund ihres Nicht-Buddha-Seins nicht, mich dies verstehen zu lassen. Der vollkommen Erleuchtete hingegen hat mir aufgrund seiner vollkommenen Buddhaschaft und seiner unübertrefflichen Rolle als König des Dhamma diese Tugend in eben diese drei Tore hineingelegt und sie mich so annehmen lassen. Wahrlich, der Meister ist meine Stütze geworden!“ Er entfaltete die Einsicht und gründete sich innerhalb weniger Tage in der Arhatschaft. Taṃ pavattiṃ ñatvā dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū ‘‘āvuso, taṃ kira bhikkhuṃ ‘bahusīlāni rakkhituṃ na sakkomī’ti hīnāyāvattantaṃ sabbāni sīlāni tīhi koṭṭhāsehi saṅkhipitvā gāhāpetvā satthā arahattaṃ pāpesi, aho buddhānaṃ balaṃ nāma acchariya’’nti buddhaguṇe kathentā nisīdiṃsu. Atha satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘bhikkhave, atigarukopi bhāro koṭṭhāsavasena bhājetvā dinno lahuko viya hoti, pubbepi paṇḍitā mahantaṃ kañcanakkhandhaṃ labhitvā ukkhipituṃ asakkontā vibhāgaṃ katvā ukkhipitvā agamaṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. Als die in der Versammlungshalle zusammengekommenen Mönche von diesem Vorfall erfuhren, saßen sie da und sprachen über die Vorzüge des Buddha: „Freunde, jenen Mönch, der im Begriff war, in den niederen Stand des Laien zurückzukehren, weil er dachte: ‚Ich kann nicht so viele Tugendregeln bewahren‘, hat der Meister veranlasst, alle Tugenden zusammenzufassen und in drei Teilen anzunehmen, und hat ihn so zur Arhatschaft geführt. Oh, wie wunderbar ist doch wahrlich die Kraft der Buddhas!“ Da kam der Meister herbei und fragte: „Mönche, mit welchem Gespräch seid ihr hier gerade versammelt?“ Als sie antworteten: „Mit eben diesem“, sprach er: „Mönche, selbst eine überaus schwere Last wird gleichsam leicht, wenn man sie in Portionen aufteilt und übergibt. Auch in der Vergangenheit fanden Weise einen großen Goldklumpen; als sie ihn nicht emporheben konnten, teilten sie ihn auf, hoben ihn an und nahmen ihn mit.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte [Pg.295] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto ekasmiṃ gāmake kassako ahosi. So ekadivasaṃ aññatarasmiṃ chaḍḍitagāmake khette kasiṃ kasati. Pubbe ca tasmiṃ gāme eko vibhavasampanno seṭṭhi ūrumattapariṇāhaṃ catuhatthāyāmaṃ kañcanakkhandhaṃ nidahitvā kālamakāsi. Tasmiṃ bodhisattassa naṅgalaṃ lagitvā aṭṭhāsi. So ‘‘mūlasantānakaṃ bhavissatī’’ti paṃsuṃ viyūhanto taṃ disvā paṃsunā paṭicchādetvā divasaṃ kasitvā atthaṅgate sūriye yuganaṅgalādīni ekamante nikkhipitvā ‘‘kañcanakkhandhaṃ gaṇhitvā gacchissāmī’’ti taṃ ukkhipituṃ nāsakkhi. Asakkonto nisīditvā ‘‘ettakaṃ kucchibharaṇāya bhavissati, ettakaṃ nidahitvā ṭhapessāmi, ettakena kammante payojessāmi, ettakaṃ dānādipuññakiriyāya bhavissatī’’ti cattāro koṭṭhāse akāsi. Tassevaṃ vibhattakāle so kañcanakkhandho sallahuko viya ahosi. So taṃ ukkhipitvā gharaṃ netvā catudhā vibhajitvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, war der Bodhisatta ein Bauer in einem kleinen Dorf. Eines Tages pflügte er auf einem Feld in einem verlassenen Dorf. Zuvor hatte in jenem Dorf ein wohlhabender Großkaufmann einen Goldbarren von der Dicke eines Oberschenkels und einer Länge von vier Ellen vergraben und war dann verstorben. Daran verfing sich der Pflug des Bodhisatta und blieb stecken. Da er dachte, es sei eine Baumwurzel, scharrte er die Erde weg, sah den Goldbarren, bedeckte ihn wieder mit Erde und pflügte den Tag über weiter. Als die Sonne untergegangen war, legte er Joch, Pflug und die anderen Geräte beiseite und dachte: ‚Ich will den Goldbarren nehmen und gehen‘, doch er konnte ihn nicht anheben. Da er es nicht vermochte, setzte er sich nieder und teilte ihn gedanklich in vier Teile: ‚Dieser Teil soll für den Lebensunterhalt dienen, diesen Teil werde ich vergraben und aufbewahren, mit diesem Teil werde ich mein Geschäft betreiben, und dieser Teil soll für verdienstvolle Taten wie das Geben von Gaben sein.‘ Als er ihn so aufgeteilt hatte, wurde jener Goldbarren ganz leicht. Er hob ihn an, brachte ihn nach Hause, teilte ihn tatsächlich in vier Teile auf, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Gaben und ging schließlich gemäß seinem Kamma fort. Iti bhagavā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Erhabene diese Lehrrede dargelegt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diesen Vers: 56. 56. ‘‘Yo pahaṭṭhena cittena, pahaṭṭhamanaso naro; Bhāveti kusalaṃ dhammaṃ, yogakkhemassa pattiyā; Pāpuṇe anupubbena, sabbasaṃyojanakkhaya’’nti. „Ein Mensch, der mit freudigem Geist und erfreutem Herzen heilsame Eigenschaften entfaltet, um die Sicherheit vor den Jochen zu erlangen, erreicht allmählich die Vernichtung aller Fesseln.“ Tattha pahaṭṭhenāti vinīvaraṇena. Pahaṭṭhamanasoti tāya eva vinīvaraṇatāya pahaṭṭhamānaso, suvaṇṇaṃ viya pahaṃsitvā samujjotitasappabhāsacitto hutvāti attho. Darin bedeutet „mit freudigem [Geist]“: frei von den Hemmnissen. „Mit erfreutem Herzen“ bedeutet: eben wegen dieser Freiheit von den Hemmnissen erfreuten Herzens zu sein; wie poliertes Gold zu sein, dessen Geist hell erleuchtet und von strahlendem Glanz erfüllt ist – dies ist die Bedeutung. Evaṃ satthā arahattakūṭena desanaṃ niṭṭhāpetvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kañcanakkhandhaladdhapuriso ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister so die Lehrrede mit dem Erlangen der Arhatschaft als Höhepunkt abgeschlossen und den Zusammenhang hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Der Mann, der damals den Goldbarren fand, war ich selbst.“ Kañcanakkhandhajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Kañcanakkhandha-Jātaka ist die sechste.
[57] 7. Vānarindajātakavaṇṇanā [57] 7. Die Erklärung des Vānarinda-Jātaka Yassete [Pg.296] caturo dhammāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattassa vadhāya parisakkanaṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi samaye satthā ‘‘devadatto vadhāya parisakkatī’’ti sutvā ‘‘na, bhikkhave, idāneva devadatto mayhaṃ vadhāya parisakkati, pubbepi parisakkiyeva, tāsamattampi pana kātuṃ nāsakkhī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „In wem diese vier Dinge [vorhanden sind]“: Dies sprach der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster weilte, bezüglich Devadattas Anschlag auf sein Leben. Als der Meister zu jener Zeit nämlich hörte: „Devadatta trachtet nach deinem Leben“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt trachtet Devadatta nach meinem Leben; auch in der Vergangenheit hat er bereits danach getrachtet, doch er vermochte mir nicht einmal den geringsten Schrecken einzujagen.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kapiyoniyaṃ nibbattitvā vuḍḍhimanvāya assapotakappamāṇo thāmasampanno ekacaro hutvā nadītīre viharati. Tassā pana nadiyā vemajjhe eko dīpako nānappakārehi ambapanasādīhi phalarukkhehi sampanno. Bodhisatto nāgabalo thāmasampanno nadiyā orimatīrato uppatitvā dīpakassa orato nadīmajjhe eko piṭṭhipāsāṇo atthi, tasmiṃ nipatati, tato uppatitvā tasmiṃ dīpake patati. Tattha nānappakārāni phalāni khāditvā sāyaṃ teneva upāyena paccāgantvā attano vasanaṭṭhāne vasitvā punadivasepi tatheva karoti. Iminā niyāmena tattha vāsaṃ kappeti. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, wurde der Bodhisatta im Schoß eines Affen wiedergeboren. Herangewachsen erreichte er die Größe eines jungen Fohlens, war von großer Kraft erfüllt, lebte als Einzelgänger und hielt sich am Ufer eines Flusses auf. In der Mitte dieses Flusses befand sich eine kleine Insel, die reich an verschiedenen Fruchtbäumen wie Mangos, Jackfruchtbäumen und anderen war. Der Bodhisatta, der die Kraft eines Elefanten besaß und voller Stärke war, sprang vom diesseitigen Flussufer ab und landete auf einer Felsplatte, die in der Mitte des Flusses vor der Insel lag. Von dort sprang er weiter und landete auf der Insel. Nachdem er dort verschiedene Früchte verzehrt hatte, kehrte er am Abend auf dieselbe Weise wieder zurück, verbrachte die Nacht an seinem Wohnort und tat am nächsten Tag genau dasselbe. Auf diese Weise lebte er dort. Tasmiṃ pana kāle eko kumbhīlo sapajāpatiko tassā nadiyā vasati. Tassa bhariyā bodhisattaṃ aparāparaṃ gacchantaṃ disvā bodhisattassa hadayamaṃse dohaḷaṃ uppādetvā kumbhīlaṃ āha – ‘‘mayhaṃ kho, ayya, imassa vānarindassa hadayamaṃse dohaḷo uppanno’’ti. Kumbhīlo ‘‘sādhu, bhadde, lacchasī’’ti vatvā ‘‘ajja taṃ sāyaṃ dīpakato āgacchantameva gaṇhissāmī’’ti gantvā piṭṭhipāsāṇe nipajji. Zu jener Zeit lebte in diesem Fluss ein Krokodil zusammen mit seinem Weibchen. Als das Weibchen den Bodhisatta hin- und herwechseln sah, überkam es ein Schwangerschaftsverlangen nach dem Herzfleisch des Bodhisatta, und es sprach zum Krokodilmännchen: ‚Mein Herr, in mir ist wahrlich das Verlangen nach dem Herzfleisch dieses Affenkönigs erwacht.‘ Das Krokodil erwiderte: ‚Gut, meine Liebe, du sollst es bekommen‘, und dachte sich: ‚Heute Abend werde ich ihn fangen, wenn er von der Insel zurückkehrt.‘ Es schwamm hin und legte sich auf die Felsplatte. Bodhisatto divasaṃ caritvā sāyanhasamaye dīpake ṭhitova pāsāṇaṃ oloketvā – ‘‘ayaṃ pāsāṇo idāni uccataro khāyati, kiṃ nu kho kāraṇa’’nti cintesi. Tassa kira udakappamāṇañca pāsāṇappamāṇañca suvavatthāpitameva hoti. Tenassa etadahosi ‘‘ajja imissā nadiyā udakaṃ neva hāyati, na ca vaḍḍhati, atha ca panāyaṃ pāsāṇo mahā hutvā paññāyati, kacci nu kho ettha mayhaṃ gahaṇatthāya kumbhīlo nipanno’’ti. So ‘‘vīmaṃsāmi tāva na’’nti tattheva [Pg.297] ṭhatvā pāsāṇena saddhiṃ kathento viya ‘‘bho pāsāṇā’’ti vatvā paṭivacanaṃ alabhanto yāvatatiyaṃ ‘‘bho pāsāṇā’’ti āha. Pāsāṇo kiṃ paṭivacanaṃ dassati. Punapi vānaro ‘‘kiṃ bho pāsāṇa, ajja mayhaṃ paṭivacanaṃ na desī’’ti āha. Kumbhīlo ‘‘addhā aññesu divasesu ayaṃ pāsāṇo vānarindassa paṭivacanaṃ adāsi, dassāmi dānissa paṭivacana’’nti cintetvā ‘‘kiṃ, bho vānarindā’’ti āha. ‘‘Kosi tva’’nti? ‘‘Ahaṃ kumbhīlo’’ti. ‘‘Kimatthaṃ ettha nipannosī’’ti? ‘‘Tava hadayamaṃsaṃ patthayamāno’’ti. Bodhisatto cintesi ‘‘añño me gamanamaggo natthi, ajja mayā esa kumbhīlo vañcetabbo’’ti. Atha naṃ evamāha ‘‘samma kumbhīla, ahaṃ attānaṃ tuyhaṃ pariccajissāmi, tvaṃ mukhaṃ vivaritvā maṃ tava santikaṃ āgatakāle gaṇhāhī’’ti. Kumbhīlānañhi mukhe vivaṭe akkhīni nimmīlanti. So taṃ kāraṇaṃ asallakkhetvā mukhaṃ vivari, athassa akkhīni pithīyiṃsu. So mukhaṃ vivaritvā akkhīni nimmīletvā nipajji. Bodhisatto tathābhāvaṃ ñatvā dīpakā uppatito gantvā kumbhīlassa matthake akkamitvā tato uppatito vijjulatā viya vijjotamāno paratīre aṭṭhāsi. Nachdem der Bodhisatta den ganzen Tag umhergestreift war, blickte er am Abend, noch auf der Insel stehend, zu der Felsplatte hinüber und dachte: ‚Dieser Fels erscheint jetzt höher. Was mag wohl der Grund dafür sein?‘ Er hatte sich nämlich den Wasserstand und die Höhe des Felsens sehr gut eingeprägt. Daher kam ihm folgender Gedanke: ‚Heute ist das Wasser dieses Flusses weder gefallen noch gestiegen, und doch erscheint dieser Fels so groß. Liegt dort vielleicht ein Krokodil auf der Lauer, um mich zu fangen?‘ Er dachte sich: ‚Ich werde es erst einmal prüfen‘, blieb auf der Insel stehen und rief, als ob er mit dem Felsen spräche: ‚He, Fels!‘ Da er keine Antwort erhielt, rief er bis zu drei Malen: ‚He, Fels!‘ Wie sollte der Fels auch antworten? Der Affe rief nochmals: ‚He, Fels, warum gibst du mir heute keine Antwort?‘ Das Krokodil dachte sich: ‚Sicherlich hat dieser Fels dem Affenkönig an anderen Tagen geantwortet. Ich werde ihm nun eine Antwort geben.‘ So sprach es: ‚Was gibt es, o Affenkönig?‘ – ‚Wer bist du?‘ – ‚Ich bin das Krokodil.‘ – ‚Wozu liegst du dort?‘ – ‚Weil ich dein Herzfleisch begehre.‘ Der Bodhisatta dachte: ‚Ich habe keinen anderen Weg. Heute muss ich dieses Krokodil überlisten.‘ Daraufhin sprach er zu ihm: ‚Freund Krokodil, ich werde mich dir hingeben. Öffne dein Maul und fange mich, wenn ich bei dir ankomme.‘ Wenn Krokodile nämlich das Maul weit öffnen, schließen sich ihre Augen. Ohne diesen Umstand zu bedenken, öffnete das Krokodil sein Maul, und sogleich schlossen sich seine Augen. So lag es da mit weit geöffnetem Maul und geschlossenen Augen. Als der Bodhisatta sah, dass dies geschehen war, sprang er von der Insel ab, trat auf den Kopf des Krokodils, sprang von dort weiter und stand, wie ein Blitz aufleuchtend, auf dem jenseitigen Ufer. Kumbhīlo taṃ acchariyaṃ disvā ‘‘iminā vānarindena atiaccherakaṃ kata’’nti cintetvā ‘‘bho vānarinda, imasmiṃ loke catūhi dhammehi samannāgato puggalo paccāmitte adhibhavati. Te sabbepi tuyhaṃ abbhantare atthi maññe’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als das Krokodil dieses Wunder sah, dachte es: ‚Dieser Affenkönig hat etwas Außerordentliches vollbracht‘, und sprach: ‚O Affenkönig, in dieser Welt überwindet ein Mensch, der mit vier Eigenschaften ausgestattet ist, seine Feinde. Ich glaube, all diese Eigenschaften sind in dir vorhanden‘, und sprach folgenden Vers: 57. 57. ‘‘Yassete caturo dhammā, vānarinda yathā tava; Saccaṃ dhammo dhiti cāgo, diṭṭhaṃ so ativattatī’’ti. „Wer diese vier Eigenschaften besitzt, o Affenkönig, wie sie in dir sind: Wahrhaftigkeit, Weisheit, Standhaftigkeit und Selbstlosigkeit; der triumphiert über den Feind.“ Tattha yassāti yassa kassaci puggalassa. Eteti idāni vattabbe paccakkhato niddisati. Caturo dhammāti cattāro guṇā. Saccanti vacīsaccaṃ, ‘‘mama santikaṃ āgamissāmī’’ti vatvā musāvādaṃ akatvā āgatoyevāti etaṃ te vacīsaccaṃ. Dhammoti vicāraṇapaññā, ‘‘evaṃ kate idaṃ nāma bhavissatī’’ti esā te vicāraṇapaññā atthi. Dhitīti abbocchinnaṃ vīriyaṃ vuccati, etampi te atthi. Cāgoti attapariccāgo, tvaṃ attānaṃ pariccajitvā [Pg.298] mama santikaṃ āgato. Yaṃ panāhaṃ gaṇhituṃ nāsakkhiṃ, mayhamevesa doso. Diṭṭhanti paccāmittaṃ. So ativattatīti yassa puggalassa yathā tava, evaṃ ete cattāro dhammā atthi, so yathā maṃ ajja tvaṃ atikkanto, tatheva attano paccāmittaṃ atikkamati abhibhavatīti. Evaṃ kumbhīlo bodhisattaṃ pasaṃsitvā attano vasaṭṭhānaṃ gato. Darin bedeutet „yassa“: für irgendeine Person. „Ete“ (diese) weist unmittelbar auf die nun zu nennenden Eigenschaften hin. „Vier Eigenschaften“ (caturo dhammā) meint die vier edlen Tugenden. „Wahrhaftigkeit“ (saccaṃ) bezeichnet die Wahrhaftigkeit der Rede; indem du sagtest: „Ich werde zu dir kommen“, hast du keine Lüge gesprochen, sondern bist tatsächlich gekommen – das ist deine Wahrhaftigkeit der Rede. „Weisheit“ (dhammo) ist die erwägende Weisheit; der Gedanke: „Wenn dies getan wird, wird dieses und jenes eintreffen“ – diese erwägende Weisheit besitzt du. „Standhaftigkeit“ (dhiti) nennt man ununterbrochene Tatkraft; auch diese besitzt du. „Selbstlosigkeit“ (cāgo) bedeutet die Hingabe des eigenen Lebens; du hast dich selbst aufgegeben und bist zu mir gekommen. Dass ich dich jedoch nicht fangen konnte, ist allein meine eigene Schuld. „Den Gesehenen“ (diṭṭhaṃ) meint den Feind. „Der triumphiert“ (so ativattati) bedeutet: Welche Person auch immer, gleich dir, diese vier Eigenschaften besitzt, der überwindet und bezwingt seinen eigenen Feind ebenso, wie du mich heute überwunden hast. Nachdem das Krokodil den Bodhisatta auf diese Weise gelobt hatte, kehrte es an seinen eigenen Wohnort zurück. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva mayhaṃ vadhāya parisakkati, pubbepi parisakkiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kumbhīlo devadatto ahosi, bhariyāssa ciñcamāṇavikā, vānarindo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor, verknüpfte die Zusammenhänge und legte die Geburtserzählung dar, indem er sprach: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, trachtet Devadatta nach meinem Leben, sondern auch in der Vergangenheit hat er bereits danach getrachtet.“ Dann fasste er das Jātaka zusammen: „Damals war das Krokodil Devadatta, seine Ehefrau war Ciñcamāṇavikā, der Affenkönig aber war ich selbst.“ Vānarindajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Vānarinda-Jātaka ist die siebte.
[58] 8. Tayodhammajātakavaṇṇanā [58] 8. Die Erklärung des Tayodhamma-Jātaka. Yassa ete tayo dhammāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattassa vadhāya parisakkanamevārabbha kathesi. Dies: „Wer jene drei Eigenschaften besitzt...“ sprach der Erhabene, als er im Veḷuvana-Kloster verwelte, im Hinblick auf Devadattas Trachten nach seinem Leben. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente devadatto vānarayoniyaṃ nibbattitvā himavantappadese yūthaṃ pariharanto attānaṃ paṭicca jātānaṃ vānarapotakānaṃ ‘‘vuḍḍhippattā ime yūthaṃ parihareyyu’’nti bhayena dantehi ḍaṃsitvā tesaṃ bījāni uppāṭeti. Tadā bodhisattopi taññeva paṭicca ekissā vānariyā kucchismiṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. Atha sā vānarī gabbhassa patiṭṭhitabhāvaṃ ñatvā attano gabbhaṃ anurakkhamānā aññaṃ pabbatapādaṃ agamāsi. Sā paripakkagabbhā bodhisattaṃ vijāyi. So vuḍḍhimanvāya viññutaṃ patto thāmasampanno ahosi. So ekadivasaṃ mātaraṃ pucchi ‘‘amma, mayhaṃ pitā kaha’’nti? ‘‘Tāta, asukasmiṃ nāma pabbatapāde yūthaṃ pariharanto vasatī’’ti. ‘‘Amma, tassa maṃ santikaṃ nehī’’ti. ‘‘Tāta, na sakkā tayā pitu santikaṃ gantuṃ. Pitā hi te attānaṃ paṭicca jātānaṃ vānarapotakānaṃ yūthapariharaṇabhayena dantehi ḍaṃsitvā bījāni uppāṭetī’’ti. ‘‘Amma, nehi maṃ tattha, ahaṃ jānissāmī’’ti. Sā puttaṃ ādāya tassa santikaṃ agamāsi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde Devadatta im Schoß einer Affenfamilie wiedergeboren. Als er die Affenbande im Himavanta-Gebirge anführte, biss er aus Angst, dass die von ihm gezeugten jungen Affen, sobald sie herangewachsen waren, die Führung der Herde übernehmen könnten, mit den Zähnen in ihre Hoden und riss sie heraus. Zu jener Zeit nahm auch der Bodhisatta, von eben diesem Affen gezeugt, im Schoß einer Affenmutter Empfängnis an. Als jene Affenmutter erkannte, dass sie schwanger war, zog sie an einen anderen Fuß eines Berges, um ihre Frucht zu schützen. Als ihre Schwangerschaft ausgereift war, gebar sie den Bodhisatta. Herangewachsen erlangte er Unterscheidungskraft und war voller Kraft und Stärke. Eines Tages fragte er seine Mutter: „Mutter, wo ist mein Vater?“ – „Mein Sohn, am Fuße jenes Berges lebt er und führt die Affenherde.“ – „Mutter, bring mich zu ihm!“ – „Mein Sohn, es ist dir nicht möglich, zu deinem Vater zu gehen. Denn dein Vater beißt aus Angst vor dem Verlust der Führung der Herde mit den Zähnen in die Hoden der von ihm gezeugten Affenjungen und reißt sie heraus.“ – „Mutter, bring mich dennoch zu ihm; ich werde schon wissen, was zu tun ist.“ Da nahm sie ihren Sohn mit und ging zu dem Vater. So [Pg.299] vānaro attano puttaṃ disvāva ‘‘ayaṃ vaḍḍhanto mayhaṃ yūthaṃ pariharituṃ na dassati, idāneva māretabbo’’ti ‘‘etaṃ āliṅganto viya gāḷhaṃ pīḷetvā jīvitakkhayaṃ pāpessāmī’’ti cintetvā ‘‘ehi, tāta, ettakaṃ kālaṃ kahaṃ gatosī’’ti bodhisattaṃ āliṅganto viya nippīḷesi. Bodhisatto pana nāgabalo thāmasampanno, sopi naṃ nippīḷesi, athassa aṭṭhīni bhijjanākārappattāni ahesuṃ. Athassa etadahosi ‘‘ayaṃ vaḍḍhanto maṃ māressati, kena nu kho upāyena puretaraññeva māreyya’’nti. Tato cintesi ‘‘ayaṃ avidūre rakkhasapariggahito saro atthi, tattha naṃ rakkhasena khādāpessāmī’’ti. Atha naṃ evamāha ‘‘tāta, ahaṃ mahallako, imaṃ yūthaṃ tuyhaṃ niyyādemi, ajjeva taṃ rājānaṃ karomi, asukasmiṃ nāma ṭhāne saro atthi, tattha dve kumudiniyo, tisso uppaliniyo, pañca paduminiyo ca pupphanti, gaccha, tato pupphāni āharā’’ti. So ‘‘sādhu, tāta, āharissāmī’’ti gantvā sahasā anotaritvā samantā padaṃ paricchindanto otiṇṇapadaññeva addasa, na uttiṇṇapadaṃ. So ‘‘iminā sarena rakkhasapariggahitena bhavitabbaṃ, mayhaṃ pitā attanā māretuṃ asakkonto rakkhasena maṃ khādāpetukāmo bhavissati, ahaṃ imañca saraṃ na otarissāmi, pupphāni ca gahessāmī’’ti nirudakaṭṭhānaṃ gantvā vegaṃ gahetvā uppatitvā parato gacchanto nirudake okāse ṭhitāneva dve pupphāni gahetvā paratīre pati. Paratīratopi orimatīraṃ āgacchanto tenevupāyena dve gaṇhi. Evaṃ ubhosu passesu rāsiṃ karonto pupphāni ca gaṇhi, rakkhasassa ca āṇaṭṭhānaṃ na otari. Sobald jener Affe seinen Sohn sah, dachte er: „Wenn dieser heranwächst, wird er mir nicht erlauben, die Herde zu führen. Ich muss ihn sogleich töten.“ Er überlegte: „Ich will ihn fest umklammern, als ob ich ihn umarmen würde, ihn zerquetschen und so um sein Leben bringen.“ Dann rief er: „Komm, mein Sohn! Wo bist du so lange Zeit gewesen?“ und presste den Bodhisatta fest an sich, als ob er ihn umarmen wollte. Der Bodhisatta jedoch, der die Kraft eines Elefanten besaß und übermächtig stark war, presste ihn ebenfalls zusammen. Da waren die Knochen des alten Affen nahe daran zu brechen. Da dachte dieser: „Wenn dieser heranwächst, wird er mich töten. Mit welchem Mittel kann ich ihn nur rechtzeitig töten?“ Daraufhin überlegte er: „Nicht weit von hier gibt es einen See, der von einem Wassergeist bewacht wird. Dort werde ich ihn von dem Wassergeist fressen lassen.“ Dann sprach er zu ihm: „Mein Sohn, ich bin alt geworden. Ich übergebe dir diese Herde und will dich heute noch zum König machen. An jenem Ort gibt es einen See, in dem zwei weiße Lilien, drei blaue Lotusblumen und fünf rote Lotusblumen blühen. Geh dorthin und bringe mir die Blumen.“ Der Bodhisatta stimmte zu: „Sehr wohl, Vater, ich werde sie bringen“, ging dorthin, stieg aber nicht voreilig hinab, sondern untersuchte ringsherum die Spuren und sah nur hineinführende Fußspuren, keine herausführenden. Er dachte: „Dieser See muss von einem Wassergeist bewacht werden. Mein Vater, der mich nicht selbst töten konnte, will mich wohl vom Wassergeist fressen lassen. Ich werde nicht in diesen See hinabsteigen und dennoch die Lotusblumen pflücken.“ Er begab sich an eine wasserfreie Stelle, nahm Anlauf, sprang ab und pflückte im Flug über die wasserfreie Stelle hinweg zwei Lotusblumen, ehe er auf dem gegenüberliegenden Ufer landete. Vom gegenüberliegenden Ufer sprang er ebenso zum diesseitigen Ufer zurück und pflückte auf dieselbe Weise wieder zwei Blumen. So bildete er auf beiden Seiten Haufen, pflückte die Blumen und betrat doch niemals den Machtbereich des Wassergeistes. Athassa ‘‘ito uttari ukkhipituṃ na sakkhissāmī’’ti tāni pupphāni gahetvā ekasmiṃ ṭhāne rāsiṃ karontassa so rakkhaso ‘‘mayā ettakaṃ kālaṃ evarūpo paññavā acchariyapuriso na diṭṭhapubbo, pupphāni ca nāma yāvadicchakaṃ gahitāni, mayhañca āṇaṭṭhānaṃ na otarī’’ti udakaṃ dvidhā bhindanto udakato uṭṭhāya bodhisattaṃ upasaṅkamitvā ‘‘vānarinda, imasmiṃ loke yassa tayo dhammā atthi, so paccāmittaṃ abhibhavati, te sabbepi tava abbhantare atthi maññe’’ti vatvā bodhisattassa thutiṃ karonto imaṃ gāthamāha – Während der Bodhisatta dachte: „Mehr als das werde ich wohl nicht tragen können“, und die gepflückten Blumen an einem Ort aufschichtete, überlegte der Wassergeist: „Noch nie in all dieser Zeit habe ich einen so weisen, wunderbaren Mann gesehen. Er hat so viele Blumen gepflückt, wie er wollte, und hat doch meinen Machtbereich nicht betreten.“ Er teilte das Wasser, stieg daraus empor, trat an den Bodhisatta heran und sprach: „O Affenkönig, wer in dieser Welt drei Eigenschaften besitzt, der bezwingt jeden Feind. Ich glaube, sie alle sind in dir vorhanden.“ Um den Bodhisatta zu preisen, sprach er folgende Strophe: 58. 58. ‘‘Yassa [Pg.300] ete tayo dhammā, vānarinda yathā tava; Dakkhiyaṃ sūriyaṃ paññā, diṭṭhaṃ so ativattatī’’ti. „Wer diese drei Eigenschaften besitzt, o Affenkönig, wie sie in dir sind: Geschicklichkeit, Tapferkeit und Weisheit; der triumphiert über den Feind.“ Tattha dakkhiyanti dakkhabhāvo, sampattabhayaṃ vidhamituṃ jānanapaññāya sampayuttauttamavīriyassetaṃ nāmaṃ. Sūriyanti sūrabhāvo, nibbhayabhāvassetaṃ nāmaṃ. Paññāti paññāpadaṭṭhānāya upāyapaññāyetaṃ nāmaṃ. Darin bedeutet „Geschicklichkeit“ (dakkhiyaṃ) die Eigenschaft des Geschicktseins; dies ist die Bezeichnung für höchste, mit unterscheidender Weisheit verbundene Tatkraft, um eine drohende Gefahr abzuwenden. „Tapferkeit“ (sūriyaṃ) bedeutet Heldenhaftigkeit; dies ist die Bezeichnung für Furchtlosigkeit. „Weisheit“ (paññā) ist die Bezeichnung für die auf den richtigen Mitteln beruhende praktische Weisheit, welche die Erkenntnis als ihre nahe Ursache hat. Evaṃ so dakarakkhaso imāya gāthāya bodhisattassa thutiṃ katvā ‘‘imāni pupphāni kimatthaṃ harasī’’ti pucchi. ‘‘Pitā maṃ rājānaṃ kātukāmo, tena kāraṇena harāmī’’ti. ‘‘Na sakkā tādisena uttamapurisena pupphāni vahituṃ ahaṃ vahissāmī’’ti ukkhipitvā tassa pacchato pacchato agamāsi. Athassa pitā dūratova taṃ disvā ‘‘ahaṃ imaṃ ‘rakkhasabhattaṃ bhavissatī’ti pahiṇiṃ, so dānesa rakkhasaṃ pupphāni gāhāpento āgacchati, idānimhi naṭṭho’’ti cintento sattadhā hadayaphālanaṃ patvā tattheva jīvitakkhayaṃ patto. Sesavānarā sannipatitvā bodhisattaṃ rājānaṃ akaṃsu. Nachdem der Wasserdämon auf diese Weise mit dieser Strophe das Lob des Bodhisatta verkündet hatte, fragte er: \"Zu welchem Zweck trägst du diese Lotosblüten fort?\" – \"Mein Vater möchte mich zum König machen; aus diesem Grund trage ich sie fort.\" – \"Es geziemt sich nicht für einen so edlen Mann, die Blumen selbst zu tragen. Ich werde sie tragen\", sprach jener, hob sie empor und folgte ihm dicht auf dem Fuße nach. Da sah ihn sein Vater schon von weitem kommen und dachte: \"Ich habe ihn weggeschickt, damit er dem Dämon zur Speise werde. Nun aber kommt er und lässt den Dämon die Blumen tragen! Jetzt bin ich verloren.\" Während er dies dachte, zerbarst sein Herz in sieben Teile, und er fand auf der Stelle den Tod. Die übrigen Affen versammelten sich und machten den Bodhisatta zu ihrem König. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā yūthapati devadatto ahosi, yūthapatiputto pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt und die Verknüpfung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: \"Damals war der Herdenführer Devadatta, der Sohn des Herdenführers aber war ich selbst.\" Tayodhammajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Tayodhamma-Jātaka, die achte.
[59] 9. Bherivādakajātakavaṇṇanā [59] 9. Die Erklärung des Bherivādaka-Jātaka Dhame dhameti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tañhi bhikkhuṃ satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu dubbacosī’’ti pucchitvā ‘‘saccaṃ, bhagavā’’ti vutte ‘‘na tvaṃ bhikkhu idāneva dubbaco, pubbepi dubbacoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Spiele, spiele“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen gewissen widerspenstigen Mönch. Der Meister fragte diesen Mönch nämlich: \"Ist es wahr, Mönch, dass du widerspenstig bist?\" Als dieser antwortete: \"Es ist wahr, Erhabener\", sprach der Meister: \"Mönch, nicht erst jetzt bist du widerspenstig, sondern du warst es auch schon in der Vergangenheit\", und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bherivādakakule nibbattitvā gāmake vasati. So ‘‘bārāṇasiyaṃ nakkhattaṃ [Pg.301] ghuṭṭha’’nti sutvā ‘‘samajjamaṇḍale bheriṃ vādetvā dhanaṃ āharissāmī’’ti puttaṃ ādāya tattha gantvā bheriṃ vādetvā bahudhanaṃ labhi. So taṃ ādāya attano gāmaṃ gacchanto corāṭaviṃ patvā puttaṃ nirantaraṃ bheriṃ vādentaṃ vāresi ‘‘tāta, nirantaraṃ avādetvā maggapaṭipannassa issarassa bheriṃ viya antarantarā vādehī’’ti so pitarā vāriyamānopi ‘‘bherisaddeneva core palāpessāmī’’ti vatvā nirantarameva vādesi. Corā paṭhamaññeva bherisaddaṃ sutvā ‘‘issarabherī bhavissatī’’ti palāyitvā ati viya ekābaddhaṃ saddaṃ sutvā ‘‘nāyaṃ issarabherī bhavissatī’’ti āgantvā upadhārentā dveyeva jane disvā pothetvā vilumpiṃsu. Bodhisatto ‘‘kicchena vata no laddhaṃ dhanaṃ ekābaddhaṃ katvā vādento nāsesī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Familie von Trommelschlägern wiedergeboren und lebte in einem kleinen Dorf. Als er hörte, dass in Bārāṇasī ein Fest ausgerufen worden war, dachte er: \"Ich will auf dem Festplatz die Trommel schlagen und Geld verdienen.\" Er nahm seinen Sohn mit, ging dorthin, schlug die Trommel und erwarb viel Geld. Als er dieses Geld nahm und auf dem Heimweg in sein Dorf durch einen von Räubern bewohnten Wald kam, hielt er seinen Sohn, der unablässig die Trommel schlug, davon ab und sprach: \"Mein Sohn, schlage sie nicht unablässig, sondern schlage sie von Zeit zu Zeit, so wie die Trommel eines vornehmen Herrn, der auf dem Reiseweg ist.\" Obwohl er von seinem Vater davon abgehalten wurde, sprach er: \"Ich will die Räuber allein durch den Klang der Trommel in die Flucht schlagen\", und schlug sie unablässig weiter. Als die Räuber zuerst den Trommelklang hörten, flohen sie im Glauben: \"Das muss die Trommel eines vornehmen Herrn sein.\" Als sie jedoch den ununterbrochenen, anhaltenden Ton hörten, dachten sie: \"Das ist gewiss keine Trommel eines vornehmen Herrn\", kehrten um, um nachzuforschen, und als sie nur zwei Personen sahen, schlugen sie sie nieder und raubten sie aus. Der Bodhisatta sprach: \"Ach, das Geld, das wir unter so großen Mühen erworben haben, hast du durch dein ununterbrochenes Trommeln vernichtet!\", und sprach diese Strophe: 59. 59. ‘‘Dhame dhame nātidhame, atidhantañhi pāpakaṃ; Dhantena hi sataṃ laddhaṃ, atidhantena nāsita’’nti. „Spiele, spiele, doch spiele nicht zu viel, denn zu vieles Spielen bringt Unheil. Durch das Spielen hat man ein Hundert erlangt, doch durch zu vieles Spielen wurde es vernichtet.“ Tattha dhame dhameti dhameyya no na dhameyya, bheriṃ vādeyya no na vādeyyāti attho. Nātidhameti atikkamitvā pana nirantarameva katvā na vādeyya. Kiṃkāraṇā? Atidhantañhi pāpakaṃ, nirantaraṃ bherivādanaṃ idāni amhākaṃ pāpakaṃ lāmakaṃ jātaṃ. Dhantena hi sataṃ laddhanti nagare dhamantena bherivādanena kahāpaṇasataṃ laddhaṃ. Atidhantena nāsitanti idāni pana me puttena vacanaṃ akatvā yadidaṃ aṭaviyaṃ atidhantaṃ, tena atidhantena sabbaṃ nāsitanti. Darin bedeutet „spiele, spiele“: Man möge spielen, nicht dass man nicht spielen sollte; man möge die Trommel schlagen, nicht dass man sie nicht schlagen sollte – das ist die Bedeutung. „Doch spiele nicht zu viel“ bedeutet: Man soll das Maß nicht überschreiten und es nicht zu einer ununterbrochenen Handlung machen. Aus welchem Grund? „Denn zu vieles Spielen bringt Unheil“: Das ununterbrochene Trommeln ist uns nun zum Unheil, zum Nachteil geworden. „Durch das Spielen hat man ein Hundert erlangt“ bedeutet: Durch das Trommeln in der Stadt hat man hundert Kahāpaṇas erlangt. „Doch durch zu vieles Spielen wurde es vernichtet“ bedeutet: Nun aber hat mein Sohn, ohne auf meine Worte zu hören, im Wald eben dieses übermäßige Spielen betrieben, und durch dieses übermäßige Spielen wurde alles vernichtet. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā putto dubbacabhikkhu ahosi, pitā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt und die Verknüpfung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: \"Damals war der Sohn der widerspenstige Mönch, der Vater aber war ich selbst.\" Bherivādakajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Bherivādaka-Jātaka, die neunte.
[60] 10. Saṅkhadhamajātakavaṇṇanā [60] 10. Die Erklärung des Saṅkhadhama-Jātaka Dhame [Pg.302] dhameti idaṃ satthā jetavane viharanto dubbacamevārabbha kathesi. „Spiele, spiele“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf eben denselben widerspenstigen Mönch. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto saṅkhadhamakakule nibbattitvā bārāṇasiyaṃ nakkhatte ghuṭṭhe pitaraṃ ādāya saṅkhadhamanakammena dhanaṃ labhitvā āgamanakāle corāṭaviyaṃ pitaraṃ nirantaraṃ saṅkhaṃ dhamantaṃ vāresi. So ‘‘saṅkhasaddena core palāpessāmī’’ti nirantarameva dhami, corā purimanayeneva āgantvā vilumpiṃsu. Bodhisatto purimanayeneva gāthaṃ abhāsi – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Familie von Muschelbläsern wiedergeboren. Als in Bārāṇasī ein Fest ausgerufen worden war, nahm er seinen Vater mit, erwarb durch das Blasen des Muschelhorns viel Geld, und als sie auf dem Heimweg durch einen von Räubern bewohnten Wald kamen, hielt er seinen Vater, der unablässig das Muschelhorn blies, davon ab. Jener aber sprach: \"Ich will die Räuber allein durch den Klang des Muschelhorns in die Flucht schlagen\", und blies unablässig weiter. Die Räuber kamen in genau derselben Weise wie zuvor und raubten sie aus. Der Bodhisatta sprach in genau derselben Weise wie zuvor diese Strophe: 60. 60. ‘‘Dhame dhame nātidhame, atidhantañhi pāpakaṃ; Dhantenādhigatā bhogā, te tāto vidhamī dhama’’nti. „Spiele, spiele, doch spiele nicht zu viel, denn zu vieles Spielen bringt Unheil. Durch das Spielen wurden Reichtümer erlangt, doch diese hat der Vater durch zu vieles Spielen verblasen.“ Tattha te tāto vidhamī dhamanti te saṅkhaṃ dhamitvā laddhabhoge mama pitā punappunaṃ dhamanto vidhami viddhaṃsesi vināsesīti. Darin bedeutet „doch diese hat der Vater durch zu vieles Spielen verblasen“: Mein Vater hat diese Reichtümer, die durch das Blasen des Muschelhorns erlangt worden waren, durch sein wiederholtes Blasen verblasen, zerstört und zunichte gemacht. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā pitā dubbacabhikkhu ahosi, putto panassa ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt und die Verknüpfung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: \"Damals war der Vater der widerspenstige Mönch, sein Sohn aber war ich selbst.\" Saṅkhadhamajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Saṅkhadhama-Jātaka, die zehnte. Āsīsavaggo chaṭṭho. Die Āsīsa-Vagga, die sechste. Tassuddānaṃ – Ihr Inhaltsverzeichnis: Mahāsīlavajanakaṃ, puṇṇapāti ca kiṃphalaṃ; Pañcāvudhakañcanakkhandhaṃ, vānarindaṃ tayodhammaṃ; Bherivādasaṅkhadhamanti. Mahāsīlava, Janaka, Puṇṇapāti und Kiṃphala; Pañcāvudha, Kañcanakkhandha, Vānarinda, Tayodhamma; Bherivāda und Saṅkhadhama. 7. Itthivaggo 7. Die Itthi-Vagga
[61] 1. Asātamantajātakavaṇṇanā [61] 1. Die Erklärung des Asātamanta-Jātaka Asā [Pg.303] lokitthiyo nāmāti idaṃ satthā jetavane viharanto ukkaṇṭhitaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tassa vatthu ummādantijātake āvi bhavissati. Taṃ pana bhikkhuṃ satthā ‘‘bhikkhu itthiyo nāma asātā asatiyo lāmikā pacchimikā, tvaṃ evarūpaṃ lāmikaṃ itthiṃ nissāya kasmā ukkaṇṭhitosī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Unzuverlässig sind die Frauen in der Welt genannt“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen unzufriedenen Mönch. Seine Geschichte wird im Ummādantī-Jātaka deutlich werden. Der Meister sprach jedoch zu jenem Mönch: \"Mönch, die Frauen wahrlich sind unbefriedigend, unachtsam, minderwertig und gemein. Warum bist du wegen einer solchen minderwertigen Frau unzufrieden geworden?\", und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto gandhāraraṭṭhe takkasilāyaṃ brāhmaṇakule nibbattitvā viññutaṃ patto tīsu vedesu sabbasippesu ca nipphattiṃ patto disāpāmokkho ācariyo ahosi. Tadā bārāṇasiyaṃ ekasmiṃ brāhmaṇakule puttassa jātadivase aggiṃ gahetvā anibbāyantaṃ ṭhapayiṃsu. Atha naṃ brāhmaṇakumāraṃ soḷasavassakāle mātāpitaro āhaṃsu ‘‘putta, mayaṃ tava jātadivase aggiṃ gahetvā ṭhapayimha. Sace brahmalokaparāyaṇo bhavitukāmo, tvaṃ aggiṃ ādāya araññaṃ pavisitvā aggiṃ bhagavantaṃ namassamāno brahmalokaparāyaṇo hohi. Sace agāraṃ ajjhāvasitukāmo, takkasilaṃ gantvā disāpāmokkhassa ācariyassa santike sippaṃ uggaṇhitvā kuṭumbaṃ saṇṭhapehī’’ti. Māṇavo ‘‘nāhaṃ sakkhissāmi araññe aggiṃ paricarituṃ, kuṭumbameva saṇṭhapessāmī’’ti mātāpitaro vanditvā ācariyabhāgaṃ sahassaṃ gahetvā takkasilaṃ gantvā sippaṃ uggaṇhitvā paccāgamāsi. Einst, als zu Bārāṇasī Brahmadatta regierte, wurde der Bodhisatta im Lande Gandhāra zu Takkasilā in einer Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, erlangte er die Meisterschaft in den drei Veden sowie in allen Künsten und wurde ein weltberühmter Lehrer. Damals entzündete eine Brahmanenfamilie in Bārāṇasī am Tag der Geburt ihres Sohnes ein Feuer und hielt es ununterbrochen brennend. Als der Brahmanenjunge sechzehn Jahre alt war, sprachen die Eltern zu ihm: ‚Sohn, am Tag deiner Geburt haben wir ein Feuer entzündet und bewahrt. Wenn du die Brahma-Welt als deine Zuflucht wünschst, so nimm das Feuer, geh in den Wald, verehre das Feuer als den Erhabenen und mache die Brahma-Welt zu deinem Ziel. Wenn du jedoch das Hausleben führen willst, so geh nach Takkasilā, erlerne die Künste bei dem weltberühmten Lehrer und gründe einen Hausstand.‘ Der Jüngling sprach: ‚Ich werde das Feuer im Walde nicht pflegen können; ich will lieber einen Hausstand gründen.‘ Da verneigte er sich vor seinen Eltern, nahm tausend Münzen für den Anteil des Lehrers, reiste nach Takkasilā, erlernte die Künste und kehrte zurück. Mātāpitaro panassa anatthikā gharāvāsena, araññe aggiṃ paricarāpetukāmā honti. Atha naṃ mātā itthīnaṃ dosaṃ dassetvā araññaṃ pesetukāmā ‘‘so ācariyo paṇḍito byatto sakkhissati me puttassa itthīnaṃ dosaṃ kathetu’’nti cintetvā āha – ‘‘uggahitaṃ te, tāta, sippa’’nti. ‘‘Āma, ammā’’ti. ‘‘Asātamantopi te uggahito’’ti. ‘‘Na uggahito, ammā’’ti. ‘‘Tāta, yadi te asātamanto na uggahito, kiṃ nāma te sippaṃ uggahitaṃ, gaccha, uggaṇhitvā ehī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti puna takkasilābhimukho pāyāsi. Tassapi ācariyassa mātā mahallikā vīsativassasatikā[Pg.304]. So taṃ sahatthā nhāpento bhojento pāyento paṭijaggati. Aññe manussā naṃ tathā karontaṃ jigucchanti. So cintesi ‘‘yaṃnūnāhaṃ araññaṃ pavisitvā tattha mātaraṃ paṭijagganto vihareyya’’nti. Athekasmiṃ vivitte araññe udakaphāsukaṭṭhāne paṇṇasālaṃ kāretvā sappitaṇḍulādīni āharāpetvā mātaraṃ ukkhipitvā tattha gantvā mātaraṃ paṭijagganto vāsaṃ kappesi. Seine Eltern jedoch wünschten nicht, dass er das Hausleben führe, sondern wollten, dass er das Feuer im Walde pflege. Da wollte die Mutter, um ihm die Fehler der Frauen vor Augen zu führen und ihn in den Wald zu schicken, ihn auf die Probe stellen. Sie dachte: ‚Jener Lehrer ist weise und klug; er wird imstande sein, meinem Sohn die Fehler der Frauen zu erklären.‘ So sprach sie zu ihm: ‚Mein Sohn, hast du die Kunst erlernt?‘ ‚Ja, Mutter‘, antwortete er. ‚Hast du auch das Asāta-Mantra erlernt?‘ ‚Nein, Mutter, das habe ich nicht erlernt.‘ ‚Mein Sohn, wenn du das Asāta-Mantra nicht erlernt hast, was für eine Kunst willst du dann erlernt haben? Geh, lerne es und kehre zurück!‘ Er sprach: ‚Es ist gut‘, und machte sich erneut auf den Weg nach Takkasilā. Die Mutter jenes Lehrers war sehr alt und zählte einhundertzwanzig Jahre. Er pflegte sie, indem er sie eigenhändig badete, speiste, tränkte und für sie sorgte. Andere Menschen empfanden Abscheu gegen ihn, da er dies tat. Da dachte er: ‚Wie wäre es, wenn ich in den Wald ginge, dort meine Mutter pflegte und lebte?‘ So ließ er in einem einsamen Wald an einem Ort mit angenehmer Wasserversorgung eine Blätterhütte errichten, ließ Butterschmalz, Reis und andere Dinge herbeischaffen, hob seine Mutter auf den Arm, ging dorthin und verbrachte sein Leben mit der Pflege seiner Mutter. Sopi kho māṇavo takkasilaṃ gantvā ācariyaṃ apassanto ‘‘kahaṃ ācariyo’’ti pucchitvā taṃ pavattiṃ sutvā tattha gantvā vanditvā aṭṭhāsi. Atha naṃ ācariyo ‘‘kiṃ nu kho, tāta, atisīghaṃ āgatosī’’ti? ‘‘Nanu ahaṃ tumhehi asātamanto nāma na uggaṇhāpito’’ti? ‘‘Ko pana te asātamante uggaṇhitabbe katvā kathesī’’ti? ‘‘Mayhaṃ mātā ācariyā’’ti. Bodhisatto cintesi ‘‘asātamanto nāma koci natthi, imassa pana mātā imaṃ itthidose jānāpetukāmā bhavissatī’’ti. Atha naṃ ‘‘sādhu, tāta, dassāmi te asātamante, tvaṃ ajja ādiṃ katvā mama ṭhāne ṭhatvā mama mātaraṃ sahatthā nhāpento bhojento pāyento paṭijaggāhi, hatthapādasīsapiṭṭhisambāhanādīni cassā karonto ‘ayye jaraṃ pattakālepi tāva te evarūpaṃ sarīraṃ, daharakāle kīdisaṃ ahosī’ti hatthapādaparikammādikaraṇakāle hatthapādādīnaṃ vaṇṇaṃ katheyyāsi. Yañca te mama mātā katheti, taṃ alajjanto aniguhanto mayhaṃ āroceyyāsi, evaṃ karonto asātamante lacchasi, akaronto na lacchasī’’ti āha. So ‘‘sādhu ācariyā’’ti tassa vacanaṃ sampaṭicchitvā tato paṭṭhāya sabbaṃ yathāvuttavidhānaṃ akāsi. Als nun auch der Jüngling nach Takkasilā kam und den Lehrer nicht vorfand, fragte er: ‚Wo ist der Lehrer?‘ Nachdem er von den Umständen gehört hatte, ging er dorthin, verneigte sich vor ihm und blieb stehen. Da fragte ihn der Lehrer: ‚Mein Sohn, warum bist du so schnell zurückgekehrt?‘ ‚Habt Ihr mich nicht das sogenannte Asāta-Mantra ungelehrt gelassen?‘ ‚Wer aber hat dir gesagt, dass du das Asāta-Mantra lernen sollst?‘ ‚Meine Mutter, o Lehrer‘, antwortete er. Der Bodhisatta dachte: ‚Es gibt kein wirkliches Asāta-Mantra. Aber seine Mutter möchte ihn gewess die Fehler der Frauen erkennen lassen.‘ Da sprach er zu ihm: ‚Gut, mein Sohn, ich werde dich das Asāta-Mantra lehren. Tritt von heute an an meine Stelle und pflege meine Mutter, indem du sie eigenhändig badest, speist, tränkst und für sie sorgst. Wenn du ihr Hände, Füße, das Haupt und den Rücken massierst, sollst du bei der Pflege der Hände und Füße deren Schönheit preisen und sagen: „O Herrin, selbst jetzt im hohen Alter ist Euer Körper noch von solcher Beschaffenheit; wie herrlich muss er erst in Eurer Jugend gewesen sein!“ Und was immer meine Mutter dir sagen wird, das sollst du mir ohne Scham und ohne Verheimlichung berichten. Wenn du so handelst, wirst du das Asāta-Mantra empfangen; wenn du es nicht tust, wirst du es nicht empfangen.‘ Er sprach: ‚Es ist gut, o Lehrer‘, nahm dessen Worte an und verrichtete von da an alles genau nach den Anweisungen. Athassā tasmiṃ māṇave punappunaṃ vaṇṇayamāne ‘‘ayaṃ mayā saddhiṃ abhiramitukāmo bhavissatī’’ti andhāya jarājiṇṇāya abbhantare kileso uppajji. Sā ekadivasaṃ attano sarīravaṇṇaṃ kathayamānaṃ māṇavaṃ āha ‘‘mayā saddhiṃ abhiramituṃ icchasī’’ti? ‘‘Ayye, ahaṃ tāva iccheyyaṃ, ācariyo pana garuko’’ti. ‘‘Sace maṃ icchasi, puttaṃ me mārehī’’ti. ‘‘Ahaṃ ācariyassa santike ettakaṃ sippaṃ uggaṇhitvā kilesamattaṃ nissāya kinti katvā ācariyaṃ māressāmī’’ti. ‘‘Tena hi sace tvaṃ maṃ na pariccajasi, ahameva naṃ māressāmī’’ti. Evaṃ itthiyo nāma asātā [Pg.305] lāmikā pacchimikā, tathārūpe nāma vaye ṭhitā rāgacittaṃ uppādetvā kilesaṃ anuvattamānā evaṃ upakārakaṃ puttaṃ māretukāmā jātā. Māṇavo sabbaṃ taṃ kathaṃ bodhisattassa ārocesi. Als nun der Jüngling sie immer wieder pries, erwachte in der blinden, vom Alter gebeugten Greisin das Begehren. Sie dachte: ‚Dieser Jüngling möchte wohl mit mir Lust genießen.‘ Eines Tages sprach sie zu dem Jüngling, der die Schönheit ihres Körpers rühmte: ‚Begehrst du, mit mir Lust zu genießen?‘ Er antwortete: ‚O Herrin, ich würde es wohl wünschen, doch der Lehrer ist mir heilig.‘ Sie sprach: ‚Wenn du mich begehrst, so töte meinen Sohn!‘ Er entgegnete: ‚Wie könnte ich den Lehrer, bei dem ich so viele Künste erlernt habe, wegen bloßer Leidenschaft töten? Wie sollte ich so etwas tun?‘ ‚Nun, wenn du mich nicht im Stich lässt, werde ich ihn selbst töten‘, sprach sie. So sind die Frauen fürwahr unbefriedigend, gemein und von niederster Art; selbst in einem solchen Alter lassen sie das Begehren in sich aufkommen, folgen der Leidenschaft und trachten danach, ihren eigenen, so gütigen Sohn zu töten. Der Jüngling berichtete all dies dem Bodhisatta. Bodhisatto ‘‘suṭṭhu te, māṇava, kataṃ mayhaṃ ārocentenā’’ti vatvā mātu āyusaṅkhāraṃ olokento ‘‘ajjeva marissatī’’ti ñatvā ‘‘ehi, māṇava, vīmaṃsissāma na’’nti ekaṃ udumbararukkhaṃ chinditvā attano pamāṇena kaṭṭharūpakaṃ katvā sasīsaṃ pārupitvā attano sayanaṭṭhāne uttānaṃ nipajjāpetvā rajjukaṃ bandhitvā antevāsikaṃ āha – ‘‘tāta, pharasuṃ ādāya gantvā mama mātu saññaṃ dehī’’ti. Māṇavo gantvā ‘‘ayye, ācariyo paṇṇasālāyaṃ attano sayanaṭṭhāne nipanno, rajjusaññā me baddhā, imaṃ pharasuṃ ādāya gantvā sace sakkosi, mārehi na’’nti āha. ‘‘Tvaṃ pana maṃ na pariccajissasī’’ti? ‘‘Kiṃkāraṇā pariccajissāmī’’ti? Sā pharasuṃ ādāya pavedhamānā uṭṭhāya rajjusaññāya gantvā hatthena parāmasitvā ‘‘ayaṃ me putto’’ti saññāya kaṭṭharūpakassa mukhato sāṭakaṃ apanetvā pharasuṃ ādāya ‘‘ekappahāreneva māressāmī’’ti gīvāyameva paharitvā ‘‘dha’’nti sadde uppanne rukkhabhāvaṃ aññāsi. Atha bodhisattena ‘‘kiṃ karosi, ammā’’ti vutte sā ‘‘vañcitāmhī’’ti tattheva maritvā patitā. Attano kira paṇṇasālāya nipannāyapi taṅkhaṇaññeva tāya maritabbameva. Der Bodhisatta sprach: ‚Du hast wohlgehandelt, mein Sohn, dass du mir dies berichtet hast.‘ Er betrachtete die verbleibende Lebenskraft seiner Mutter und erkannte, dass sie noch am selben Tage sterben werde. Darauf sprach er: ‚Komm, Jüngling, wir wollen sie auf die Probe stellen.‘ Er fällte einen Feigenbaum, fertigte eine Holzfigur in seiner eigenen Größe an, verhüllte sie samt dem Haupte, legte sie rücklings auf sein Lager, spannte eine Schnur und sprach zu dem Schüler: ‚Mein Sohn, nimm die Axt, geh hin und gib meiner Mutter das Zeichen.‘ Der Jüngling ging hin und sprach: ‚O Herrin, der Lehrer liegt in der Blätterhütte auf seinem Lager. Ich habe das Schnurzeichen gespannt. Nimm diese Axt, geh hin und töte ihn, wenn du es vermagst!‘ Sie fragte: ‚Wirst du mich aber auch nicht verlassen?‘ ‚Warum sollte ich dich verlassen?‘, entgegnete er. Da nahm die Greisin die Axt, erhob sich mit zitternden Gliedern, ging entlang der Richtschnur, tastete mit der Hand umher und im Glauben ‚Dies ist mein Sohn‘ zog sie das Gewand vom Antlitz der Holzfigur. Sie nahm die Axt und dachte: ‚Mit einem einzigen Streich will ich ihn töten‘, schlug direkt auf den Hals, und als ein dumpfer Holzklang ertönte, erkannte sie, dass es Holz war. Als nun der Bodhisatta rief: ‚Mutter, was tust du da?‘, erkannte sie: ‚Ich bin getäuscht worden‘, und fiel augenblicklich tot zu Boden. Selbst wenn sie auf ihrem Lager in der Blätterhütte geblieben wäre, hätte sie in genau diesem Augenblick sterben müssen. So tassā matabhāvaṃ ñatvā sarīrakiccaṃ katvā āḷāhanaṃ nibbāpetvā vanapupphehi pūjetvā māṇavaṃ ādāya paṇṇasāladvāre nisīditvā ‘‘tāta, pāṭiyekko asātamanto nāma natthi, itthiyo asātā nāma, tava mātā ‘asātamantaṃ uggaṇhā’ti mama santikaṃ pesayamānā itthīnaṃ dosaṃ jānanatthaṃ pesesi. Idāni pana te paccakkhameva mama mātu doso diṭṭho, iminā kāraṇena ‘itthiyo nāma asātā lāmikā pacchimikā’ti jāneyyāsī’’ti taṃ ovaditvā uyyojesi. Sopi ācariyaṃ vanditvā mātāpitūnaṃ santikaṃ agamāsi. Atha naṃ mātā pucchi ‘‘tāta, uggahito te asātamanto’’ti? ‘‘Āma, ammā’’ti. ‘‘Idāni kiṃ karissasi, pabbajitvā aggiṃ vā paricarissasi, agāramajjhe vā vasissasī’’ti? Māṇavo ‘‘mayā, amma, paccakkhato itthīnaṃ dosā diṭṭhā[Pg.306], agārena me kiccaṃ natthi, pabbajissāmaha’’nti attano adhippāyaṃ pakāsento imaṃ gāthamāha – Als dieser [der Bodhisatta] erkannte, dass sie gestorben war, vollzog er die Bestattungsriten, löschte den Scheiterhaufen, ehrte sie mit Waldblumen, nahm den Jüngling mit sich, setzte sich am Eingang der Blätterhütte und sprach zu ihm: „Mein lieber Sohn, es gibt kein eigenständiges Mantra namens Asātamantra. Vielmehr werden die Frauen selbst „asātā“ (die Unliebsamen) genannt. Als deine Mutter dich zu mir sandte mit den Worten „Lerne das Asātamantra“, tat sie dies, damit du den Makel der Frauen erkennen mögest. Nun hast du den Makel meiner Mutter mit eigenen Augen gesehen. Erkenne aus diesem Grund: „Frauen sind wahrlich unliebsam, minderwertig und von niederer Natur“.“ Nachdem er ihn so ermahnt hatte, entließ er ihn. Dieser verneigte sich vor dem Lehrer und kehrte zu seinen Eltern zurück. Da fragte ihn seine Mutter: „Mein Sohn, hast du das Asātamantra gelernt?“ – „Ja, Mutter“, antwortete er. „Was wirst du nun tun? Wirst du in die Hauslosigkeit hinausziehen und dem Feuer dienen, oder wirst du inmitten eines Hauses leben?“ Der Jüngling, der seine eigene Absicht offenbaren wollte, sprach: „Mutter, ich habe den Makel der Frauen mit eigenen Augen gesehen. Ich habe keine Verwendung mehr für das Hausleben; ich werde in die Hauslosigkeit hinausziehen“, und sprach diese Strophe: 61. 61. ‘‘Asā lokitthiyo nāma, velā tāsaṃ na vijjati; Sārattā ca pagabbhā ca, sikhī sabbaghaso yathā; Tā hitvā pabbajissāmi, vivekamanubrūhaya’’nti. „Die Frauen in dieser Welt sind wahrlich unliebsam, für sie gibt es keine sittlichen Schranken. Sie sind voller Leidenschaft und unbändig, gleich dem alles verschlingenden Feuer. Ich werde sie verlassen, in die Hauslosigkeit hinausziehen und die Abgeschiedenheit pflegen.“ Tattha asāti asatiyo lāmikā. Atha vā sātaṃ vuccati sukhaṃ, taṃ tāsu natthi. Attani paṭibaddhacittānaṃ asātameva dentītipi asā, dukkhā dukkhavatthubhūtāti attho. Imassa panatthassa sādhanatthāya idaṃ suttaṃ āharitabbaṃ – Darin bedeutet „asā“: unachtsam und minderwertig. Oder aber: Glück wird als „sāta“ bezeichnet, und dieses ist bei ihnen nicht zu finden. Weil sie jenen, deren Geist an sie gefesselt ist, nur Unliebsames bringen, werden sie „asā“ genannt; das bedeutet, sie sind leidvoll und die Grundlage für Leiden. Um diese Bedeutung zu untermauern, sollte diese Strophe angeführt werden: ‘‘Māyā cetā marīcī ca, soko rogo cupaddavo; Kharā ca bandhanā cetā, maccupāsā guhāsayā; Tāsu yo vissase poso, so naresu narādhamo’’ti. (jā. 2.21.118); „Sie sind wie Täuschung und Luftspiegelung, sie sind Kummer, Krankheit und Verderben. Sie sind grausam und Fesseln, Schlingen des Todes, die in Höhlen lauern. Welcher Mann ihnen vertraut, der ist der Abschaum unter den Menschen.“ Lokitthiyoti loke itthiyo. Velā tāsaṃ na vijjatīti amma, tāsaṃ itthīnaṃ kilesuppattiṃ patvā velā saṃvaro mariyādā pamāṇaṃ nāma natthi. Sārattā ca pagabbhā cāti velā ca etāsaṃ natthi, pañcasu kāmaguṇesu sārattā allīnā, tathā kāyapāgabbhiyena, vācāpāgabbhiyena, manopāgabbhiyenāti tividhena pāgabbhiyena samannāgatattā pagabbhā cetā. Etāsañhi abbhantare kāyadvārādīni patvā saṃvaro nāma natthi, lolā kākapaṭibhāgāti dasseti. Sikhī sabbaghaso yathāti amma, yathā jālasikhāya ‘‘sikhī’’ti saṅkhaṃ gato aggi nāma gūthagatādibhedaṃ asucimpi, sappimadhuphāṇitādibhedaṃ sucimpi, iṭṭhampi aniṭṭhampi yaṃ yadeva labhati, sabbaṃ ghasati khādati, tasmā ‘‘sabbaghaso’’ti vuccati. Tatheva tā itthiyopi hatthimeṇḍagomeṇḍādayo vā hontu hīnajaccā hīnakammantā, khattiyādayo vā hontu uttamakammantā, hīnukkaṭṭhabhāvaṃ acintetvā lokassādavasena kilesasanthave uppanne yaṃ yaṃ labhanti, sabbameva sevantīti sabbaghasasikhisadisā honti. Tasmā sikhī sabbaghaso yathā, tathevetāti veditabbā. „Lokitthiyo“ bedeutet: die Frauen in der Welt. „Velā tāsaṃ na vijjati“ bedeutet: Mutter, wenn in diesen Frauen die Befleckungen aufsteigen, gibt es für sie weder Zügelung noch sittliche Schranken noch irgendein Maß. „Sārattā ca pagabbhā ca“ bedeutet: Sie kennen keine Schranken, sie sind zutiefst verfallen und verstrickt in den fünf Arten der Sinnlichkeit. Zudem sind sie unbändig, da sie mit einer dreifachen Zügellosigkeit ausgestattet sind: der Zügellosigkeit des Körpers, der Sprache und des Geistes. In ihrem Inneren gibt es an den Toren des Körpers usw. keinerlei Zügelung; dies zeigt, dass sie flatterhaft sind und Krähen gleichen. „Sikhī sabbaghaso yathā“ bedeutet: Mutter, so wie das Feuer, das wegen seiner Flammenkronen „Sikhī“ genannt wird, sowohl Unreines wie Exkremente als auch Reines wie geklärte Butter, Honig und Melasse, ob Begehrenswertes oder Unbegehrenswertes – was immer es auch ergreift –, ganz verschlingt und verzehrt und daher „alles verschlingend“ genannt wird; ebenso verhält es sich mit jenen Frauen: Ob sie nun von niederer Geburt und mit niederen Arbeiten beschäftigt sind, wie Elefanten- oder Schafhirten, oder von edler Herkunft und mit edler Beschäftigung, wie Herrscher – ohne Rücksicht auf niedrigen oder hohen Status geben sie sich, getrieben vom Genuss an der Welt, sobald eine Verstrickung in Befleckungen entsteht, jedem hin, den sie bekommen können. So gleichen sie dem alles verschlingenden Feuer. Darum ist zu verstehen: „Wie das alles verschlingende Feuer, ebenso sind jene Frauen.“ Tā [Pg.307] hitvā pabbajissāmīti ahaṃ tā lāmikā dukkhavatthubhūtā itthiyo hitvā araññaṃ pavisitvā isipabbajjaṃ pabbajissāmi. Vivekamanubrūhayanti kāyaviveko cittaviveko upadhivivekoti tayo vivekā, tesu idha kāyavivekopi vaṭṭati cittavivekopi. Idaṃ vuttaṃ hoti – ahaṃ, amma, pabbajitvā kasiṇaparikammaṃ katvā aṭṭha samāpattiyo ca pañcābhiññā ca uppādetvā gaṇato kāyaṃ, kilesehi ca cittaṃ vivecetvā imaṃ vivekaṃ brūhento vaḍḍhento brahmalokaparāyaṇo bhavissāmi, alaṃ me agārenāti. Evaṃ itthiyo garahitvā mātāpitaro vanditvā himavantaṃ pavisitvā pabbajitvā vuttappakāraṃ vivekaṃ brūhento brahmalokaparāyaṇo ahosi. „Tā hitvā pabbajissāmi“ bedeutet: Ich werde jene minderwertigen Frauen, die die Ursache des Leidens sind, verlassen, in den Wald gehen und die Einsiedler-Hauslosigkeit erwählen. „Vivekamanubrūhayaṃ“: Es gibt drei Arten der Abgeschiedenheit: körperliche Abgeschiedenheit, geistige Abgeschiedenheit und die Abgeschiedenheit von den Daseinsgrundlagen. Von diesen sind hier sowohl die körperliche als auch die geistige Abgeschiedenheit passend. Dies bedeutet Folgendes: „Mutter, wenn ich in die Hauslosigkeit hinausgezogen bin, die Kasina-Meditation ausgeübt, die acht Errungenschaften und die fünf höheren Geisteskräfte entfaltet habe, meinen Körper von der Gemeinschaft und meinen Geist von den Befleckungen abgesondert habe, werde ich diese Abgeschiedenheit pflegen und mehren und nach dem Tod in die Brahma-Welt gelangen. Genug für mich mit dem Hausleben!“ Nachdem er so die Frauen getadelt, seine Eltern verehrt, sich in den Himalaja zurückgezogen und die Hauslosigkeit erwählt hatte, pflegte er die besagte Abgeschiedenheit und ging schließlich in die Brahma-Welt ein. Satthāpi ‘‘evaṃ bhikkhu itthiyo nāma asātā lāmikā pacchimikā dukkhadāyikā’’ti itthīnaṃ aguṇaṃ kathetvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so bhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Satthā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mātā bhaddakāpilānī, pitā mahākassapo ahosi, antevāsiko ānando, ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: „So, o Mönch, sind Frauen wahrlich unliebsam, minderwertig, von niederer Natur und leidbringend.“ Nachdem er so den Makel der Frauen dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten etablierte sich jener Mönch in der Frucht des Stromeintritts. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war die Mutter Bhaddakāpilānī, der Vater war Mahākassapa, der Schüler war Ānanda, und der Lehrer war ich selbst.“ Asātamantajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Asātamanta-Jātaka, das erste.
[62] 2. Aṇḍabhūtajātakavaṇṇanā [62] 2. Die Erklärung des Aṇḍabhūta-Jātaka. Yaṃ brāhmaṇo avādesīti idaṃ satthā jetavane viharanto ukkaṇṭhitamevārabbha kathesi. Tañhi satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhitosī’’ti pucchitvā ‘‘sacca’’nti vutte ‘‘bhikkhu itthiyo nāma arakkhiyā, pubbe paṇḍitā itthiṃ gabbhato paṭṭhāya rakkhantāpi rakkhituṃ nāsakkhiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Was der Brahmane riet“ – diese Lehrrede hielt der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf einen unzufriedenen Mönch. Der Meister fragte ihn nämlich: „Ist es wahr, o Mönch, dass du unzufrieden bist?“ Als dieser antwortete: „Es ist wahr“, sprach der Meister: „Mönch, Frauen kann man nicht behüten. In der Vergangenheit vermochten selbst Weise eine Frau nicht zu schützen, obwohl sie sie von der Empfängnis im Mutterleib an bewachten“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa aggamahesiyā kucchismiṃ nibbattitvā vayappatto sabbasippesu nipphattiṃ patvā pitu accayena rajje patiṭṭhāya dhammena rajjaṃ kāresi. So purohitena saddhiṃ jūtaṃ kīḷati. Kīḷanto pana – Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoß von dessen Hauptgemahlin wiedergeboren. Als er herangewachsen war, erlangte er Meisterschaft in allen Künsten. Nach dem Tod seines Vaters bestieg er den Thron und regierte das Reich mit Gerechtigkeit. Er pflegte mit seinem Hofpriester das Würfelspiel zu spielen. Während er jedoch spielte, ‘‘Sabbā [Pg.308] nadī vaṅkagatī, sabbe kaṭṭhamayā vanā; Sabbitthiyo kare pāpaṃ, labhamāne nivātake’’ti. (jā. 2.21.308) – „Krumm fließen alle Flüsse, aus Holz bestehen alle Wälder; alle Frauen tun Böses, finden sie einen geheimen Ort.“ Imaṃ jūtagītaṃ gāyanto rajataphalake suvaṇṇapāsake khipati. Evaṃ kīḷanto pana rājā niccaṃ jināti, purohito parājīyati. Dieses Würfellied singend, warf er die goldenen Würfel auf das silberne Spielbrett. Wenn er so spielte, gewann der König immer, während der Hofpriester stets verlor. So anukkamena ghare vibhave parikkhayaṃ gacchante cintesi ‘‘evaṃ sante sabbaṃ imasmiṃ ghare dhanaṃ khīyissati, pariyesitvā purisantaraṃ agataṃ ekaṃ mātugāmaṃ ghare karissāmī’’ti. Athassa etadahosi ‘‘aññaṃ purisaṃ diṭṭhapubbaṃ itthiṃ rakkhituṃ na sakkhissāmi, gabbhato paṭṭhāyekaṃ mātugāmaṃ rakkhitvā taṃ vayappattaṃ vase ṭhapetvā ekapurisikaṃ katvā gāḷhaṃ ārakkhaṃ saṃvidahitvā rājakulato dhanaṃ āharissāmī’’ti. So ca aṅgavijjāya cheko hoti, athekaṃ duggatitthiṃ gabbhiniṃ disvā ‘‘dhītaraṃ vijāyissatī’’ti ñatvā taṃ pakkosāpetvā paribbayaṃ datvā ghareyeva vasāpetvā vijātakāle dhanaṃ datvā uyyojetvā taṃ kumārikaṃ aññesaṃ purisānaṃ daṭṭhuṃ adatvā itthīnaṃyeva hatthe datvā posāpetvā vayappattakāle taṃ attano vase ṭhapesi. Yāva cesā vaḍḍhati, tāva raññā saddhiṃ jūtaṃ na kīḷi. Taṃ pana vase ṭhapetvā brāhmaṇo ‘‘mahārāja, jūtaṃ kīḷāmā’’ti āha. Rājā ‘‘sādhū’’ti purimaniyāmeneva kīḷi. Purohito rañño gāyitvā pāsakaṃ khipanakāle ‘‘ṭhapetvā mama māṇavika’’nti āha. Tato paṭṭhāya purohito jināti, rājā parājīyati. Als der Wohlstand in seinem Hause allmählich dahinschwand, dachte jener Hofpriester: „Wenn es so weitergeht, wird der gesamte Reichtum in diesem Haus aufgezehrt werden. Ich werde nach einer Frau suchen, die noch nie mit einem anderen Mann zusammen war, und sie in meinem Hause aufnehmen.“ Daraufhin kam ihm folgender Gedanke: „Eine Frau, die schon einmal einen anderen Mann gesehen hat, werde ich nicht behüten können. Ich werde ein weibliches Kind schon vom Mutterleib an behüten, sie nach dem Erreichen des reifen Alters unter meine Gewalt bringen, sie an nur einen einzigen Mann binden, eine strenge Bewachung einrichten und so Reichtum aus dem Königshause erlangen.“ Und er war kundig in der Kunst der Körpermerkmale (Angavijja). Als er nun eine arme schwangere Frau sah und erkannte: „Sie wird eine Tochter gebären“, ließ er sie herbeirufen, gab ihr Lebensunterhalt, ließ sie in seinem Hause wohnen, gab ihr zur Zeit der Geburt Geld, schickte sie fort und übergab das junge Mädchen – ohne zu erlauben, dass andere Männer sie sahen – nur in die Hände von Frauen, um sie aufziehen zu lassen. Als sie das reife Alter erreichte, hielt er sie unter seiner eigenen Kontrolle. Solange sie heranwuchs, spielte er nicht mit dem König das Würfelspiel. Nachdem er sie jedoch unter seine Kontrolle gebracht hatte, sagte der Brahmane: „Großer König, lasst uns Würfel spielen!“ Der König sagte: „Sehr wohl!“, und spielte genau wie zuvor. Während der König sang und die Würfel warf, sagte der Hofpriester: „Ausgenommen mein junges Mädchen!“ Von da an gewann der Hofpriester, und der König verlor. Bodhisatto ‘‘imassa ghare ekapurisikāya ekāya itthiyā bhavitabba’’nti pariggaṇhāpento atthibhāvaṃ ñatvā ‘‘sīlamassā bhindāpessāmī’’ti ekaṃ dhuttaṃ pakkosāpetvā ‘‘sakkhissasi purohitassa itthiyā sīlaṃ bhinditu’’nti āha. ‘‘Sakkomi, devā’’ti. Athassa rājā dhanaṃ datvā ‘‘tena hi khippaṃ niṭṭhāpehī’’ti taṃ pahiṇi. So rañño santikā dhanaṃ ādāya gandhadhūmacuṇṇakappūrādīni gahetvā tassa gharato avidūre sabbagandhāpaṇaṃ pasāresi. Purohitassapi gehaṃ sattabhūmakaṃ sattadvārakoṭṭhakaṃ hoti, sabbesu dvārakoṭṭhakesu itthīnaṃyeva ārakkhā. Ṭhapetvā pana brāhmaṇaṃ añño puriso gehaṃ pavisituṃ labhanto nāma [Pg.309] natthi, kacavarachaḍḍanapacchimpi sodhetvāyeva pavesenti. Taṃ māṇavikaṃ purohitoyeva daṭṭhuṃ labhati. Tassā ca ekā paricārikā itthī atthi. Athassā sā paricārikā gandhapupphamūlaṃ gahetvā gacchantī tassa dhuttassa āpaṇasamīpena gacchati. So ‘‘ayaṃ tassā paricārikā’’ti suṭṭhu ñatvā ekadivasaṃ taṃ āgacchantiṃ disvā āpaṇā uṭṭhāya gantvā tassā pādamūle patitvā ubhohi hatthehi pāde gāḷhaṃ gahetvā ‘‘amma, ettakaṃ kālaṃ kahaṃ gatāsī’’ti paridevi, avasesāpi payuttakadhuttā ekamantaṃ ṭhatvā ‘‘hatthapādamukhasaṇṭhānehi ca ākappena ca mātāputtā ekasadisāyevā’’ti āhaṃsu. Sā itthī tesu tesu kathentesu attano asaddahitvā ‘‘ayaṃ me putto bhavissatī’’ti sayampi rodituṃ ārabhi. Te ubhopi kanditvā roditvā aññamaññaṃ āliṅgetvā aṭṭhaṃsu. Der Bodhisatta dachte bei sich: „In dem Haus dieses Hofpriesters muss es eine Frau geben, die nur einem einzigen Mann ergeben ist.“ Als er nachforschen ließ und erfuhr, dass dies der Fall war, dachte er: „Ich werde ihre Tugend brechen lassen.“ Er ließ einen Wüstling rufen und fragte ihn: „Wirst du in der Lage sein, die Tugend der Frau des Hofpriesters zu brechen?“ „Ich kann es, o Herr!“, antwortete dieser. Daraufhin gab ihm der König Geld, sandte ihn fort und sagte: „Wenn dem so ist, dann bringe die Angelegenheit schnell zu Ende!“ Dieser nahm das Geld vom König entgegen, besorgte sich Wohlgerüche, Räucherwerk, Duftpulver, Kampfer und Ähnliches, und eröffnete unweit des Hauses jenes Hofpriesters einen Laden für allerlei Wohlgerüche. Auch das Haus des Hofpriesters war sieben Stockwerke hoch und hatte sieben Torhäuser; an allen Torhäusern gab es nur weibliche Wachen. Außer dem Brahmanen selbst gab es keinen anderen Mann, der das Haus betreten durfte; selbst der Korb zum Wegwerfen des Mülls wurde erst gründlich durchsucht, bevor man ihn hineinließ. Nur der Hofpriester selbst durfte das junge Mädchen sehen. Und sie hatte eine Dienerin. Da ging diese Dienerin, um Geld für Wohlgerüche und Blumen zu holen, und kam dabei am Laden des Wüstlings vorbei. Dieser wusste genau: „Dies ist ihre Dienerin.“ Als er sie eines Tages herbeikommen sah, stand er aus seinem Laden auf, ging zu ihr hin, warf sich ihr zu Füßen, packte ihre Füße fest mit beiden Händen und wehklagte: „Mutter, wo bist du all diese Zeit gewesen?“ Auch die übrigen, angestellten Spießgesellen standen beiseite und sagten: „Nach der Gestalt von Händen, Füßen und Gesicht sowie nach ihrem Gebaren sind Mutter und Sohn einander völlig gleich!“ Während jene Leute dies so besprachen, begann die Frau, an sich selbst zu zweifeln, dachte: „Dies muss wohl mein Sohn sein“, und fing selbst an zu weinen. Sie beide jammerten und weinten, umarmten einander und blieben so stehen. Atha so dhutto āha ‘‘amma, kahaṃ vasasī’’ti? ‘‘Kinnarilīlāya vasamānāya rūpasobhaggappattāya purohitassa daharitthiyā upaṭṭhānaṃ kurumānā vasāmi, tātā’’ti. ‘‘Idāni kahaṃ yāsi, ammā’’ti? ‘‘Tassā gandhamālādīnaṃ atthāyā’’ti. ‘‘Amma, kiṃ te aññattha gatāya, ito paṭṭhāya mameva santikā harā’’ti mūlaṃ aggahetvāva bahūni tambūlatakkolakādīni ceva nānāpupphāni ca adāsi. Māṇavikā bahūni gandhapupphādīni disvā ‘‘kiṃ, amma, ajja amhākaṃ brāhmaṇo pasanno’’ti āha. ‘‘Kasmā evaṃ vadasī’’ti? ‘‘Imesaṃ bahubhāvaṃ disvā’’ti. Na brāhmaṇo bahumūlaṃ adāsi, mayā panetaṃ mayhaṃ puttassa santikā ābhatanti. Tato paṭṭhāya sā brāhmaṇena dinnamūlaṃ attanā gahetvā tasseva santikā gandhapupphādīni āharati. Dhutto katipāhaccayena gilānālayaṃ katvā nipajji. Sā tassa āpaṇadvāraṃ gantvā taṃ adisvā ‘‘kahaṃ me putto’’ti pucchi. ‘‘Puttassa te aphāsukaṃ jāta’’nti? Sā tassa nipannaṭṭhānaṃ gantvā nisīditvā piṭṭhiṃ parimajjantī ‘‘kiṃ te, tāta, aphāsuka’’nti pucchi. So tuṇhī ahosi. ‘‘Kiṃ na kathesi puttā’’ti? ‘‘Amma, marantenāpi tuyhaṃ kathetuṃ na sakkā’’ti. ‘‘Tāta, mayhaṃ akathetvā kassa katheyyāsi, kathehi, tātā’’ti. ‘‘Amma, mayhaṃ aññaṃ aphāsukaṃ natthi, tassā pana māṇavikāya vaṇṇaṃ sutvā paṭibaddhacittosmi[Pg.310], taṃ labhanto jīvissāmi, alabhanto idheva marissāmī’’ti. ‘‘Tāta, mayhaṃ esa bhāro, mā tvaṃ etaṃ nissāya cintayī’’ti taṃ assāsetvā bahūni gandhapupphādīni ādāya māṇavikāya santikaṃ gantvā ‘‘putto me, amma, mama santikā tava vaṇṇaṃ sutvā paṭibaddhacitto jāto, kiṃ kātabba’’nti? ‘‘Sace ānetuṃ sakkotha, mayā katokāsoyevā’’ti. Da fragte der Wüstling: „Mutter, wo wohnst du?“ Sie antwortete: „Mein Sohn, ich wohne dort und diene der jungen Frau des Hofpriesters, die von erlesener Schönheit ist und sich mit der Anmut einer Kinnari bewegt.“ „Wohin gehst du jetzt, Mutter?“ – „Um Wohlgerüche, Blumenkränze und Ähnliches für sie zu holen.“ „Mutter, was nützt es dir, anderswohin zu gehen? Hole es von nun an nur noch von mir!“, sagte er und gab ihr, ohne Bezahlung zu verlangen, eine Menge Betel, Takkola-Früchte und Ähnliches sowie verschiedene Blumen. Als das junge Mädchen die Fülle an Wohlgerüchen und Blumen sah, sagte sie: „Wie kommt es, Mutter, ist unser Brahmane heute so großzügig gestimmt?“ – „Warum sagst du das?“ – „Weil ich diese große Menge sehe.“ „Nicht der Brahmane hat viel Geld gegeben; vielmehr habe ich dies aus der Hand meines Sohnes mitgebracht.“ Von da an behielt die Dienerin das vom Brahmanen gegebene Geld für sich und holte die Wohlgerüche und Blumen nur noch von ihm. Nach einigen Tagen täuschte der Wüstling eine Krankheit vor und legte sich hin. Als die Dienerin zu seinem Laden kam und ihn nicht sah, fragte sie: „Wo ist mein Sohn?“ Sie sagten zu ihr: „Deinem Sohn geht es nicht gut.“ Sie ging dorthin, wo er lag, setzte sich nieder, strich ihm über den Rücken und fragte: „Was fehlt dir, mein Sohn?“ Er schwieg. „Warum sprichst du nicht, mein Sohn?“ – „Mutter, selbst wenn ich sterbe, kann ich es dir nicht sagen.“ „Mein Sohn, wenn du es mir nicht erzählst, wem sonst willst du es erzählen? Sprich doch, mein Sohn!“ „Mutter, mir fehlt sonst nichts; doch als ich von der Schönheit dieses jungen Mädchens hörte, hat sich mein Herz an sie gefesselt. Wenn ich sie bekomme, werde ich leben; wenn nicht, werde ich genau hier sterben.“ „Mein Sohn, das ist meine Sorge. Sorge dich nicht ihretwegen!“, tröstete sie ihn. Sie nahm viele Wohlgerüche und Blumen, ging zu dem jungen Mädchen und sagte: „Mein Kind, mein Sohn hat durch mich von deiner Schönheit gehört und sein Herz an dich verloren. Was sollen wir tun?“ „Wenn ihr ihn herbringen könnt, so ist die Gelegenheit meinerseits bereits gegeben“, antwortete sie. Sā tassā vacanaṃ sutvā tato paṭṭhāya tassa gehassa kaṇṇakaṇṇehi bahuṃ kacavaraṃ saṅkaḍḍhitvā ārakkhitthiyā upari chaḍḍesi. Sā tena aṭṭīyamānā apeti. Itarā teneva niyāmena yā yā kiñci katheti, tassā tassā upari kacavaraṃ chaḍḍesi. Tato paṭṭhāya pana sā yaṃ yaṃ āharati vā harati vā, taṃ taṃ na kāci sodhetuṃ ussahati. Tasmiṃ kāle sā taṃ dhuttaṃ pupphapacchiyaṃ nipajjāpetvā māṇavikāya santikaṃ abhihari. Dhutto māṇavikāya sīlaṃ bhinditvā ekāhadvīhaṃ pāsādeyeva ahosi. Purohite bahi nikkhante ubho abhiramanti. Tasmiṃ āgate dhutto nilīyati. Als jene ihre Worte hörte, sammelte sie von da an viel Unrat und Müll aus den Ecken des Hauses und warf ihn über die Wächterinnen. Diese wichen, davon geplagt, von ihren Plätzen. Auf dieselbe Weise warf die andere Dienerin Müll über jede Wächterin, die irgendetwas einzuwenden wagte. Von da an wagte es keine Wächterin mehr, das zu durchsuchen, was sie hinein- oder heraustrug. Zu jener Zeit ließ sie den Wüstling in einem Blumenkorb Platz nehmen und trug ihn direkt zu dem jungen Mädchen. Der Wüstling brach die Tugend des jungen Mädchens und blieb ein oder zwei Tage im Palast. Wenn der Hofpriester nach draußen ging, vergnügten sich beide miteinander. Sobald er zurückkehrte, versteckte sich der Wüstling. Atha naṃ sā ekāhadvīhaccayena ‘‘sāmi, idāni tayā gantuṃ vaṭṭatī’’ti āha. ‘‘Ahaṃ brāhmaṇaṃ paharitvā gantukāmo’’ti. Sā ‘‘evaṃ hotū’’ti dhuttaṃ nilīyāpetvā brāhmaṇe āgate evamāha ‘‘ahaṃ, ayya, tumhesu vīṇaṃ vādentesu naccituṃ icchāmī’’ti. ‘‘Sādhu, bhadde, naccassū’’ti vīṇaṃ vādesi. ‘‘Tumhesu olokentesu lajjāmi, mukhaṃ pana vo sāṭakena bandhitvā naccissāmī’’ti. ‘‘Sace lajjasi, evaṃ karohī’’ti. Māṇavikā ghanasāṭakaṃ gahetvā tassa akkhīni pidahamānā mukhaṃ bandhi. Brāhmaṇo mukhaṃ bandhāpetvā vīṇaṃ vādesi. Sā muhuttaṃ naccitvā ‘‘ayya, ahaṃ te ekavāraṃ sīse paharitukāmā’’ti āha. Itthilolo brāhmaṇo kiñci kāraṇaṃ ajānanto ‘‘paharāhī’’ti āha, māṇavikā dhuttassa saññaṃ adāsi. So saṇikaṃ āgantvā brāhmaṇassa piṭṭhipasse ṭhatvā sīse kapparena pahari, akkhīni patanākārappattāni ahesuṃ, sīse gaṇḍo uṭṭhahi. So vedanāṭṭo hutvā ‘‘āhara te hattha’’nti āha. Māṇavikā attano hatthaṃ ukkhipitvā tassa hatthe ṭhapesi. Brāhmaṇo ‘‘hattho muduko, pahāro pana thaddho’’ti āha[Pg.311]. Dhutto brāhmaṇaṃ paharitvā nilīyi. Māṇavikā tasmiṃ nilīne brāhmaṇassa mukhato sāṭakaṃ mocetvā telaṃ ādāya sīsaṃ parisambāhi. Brāhmaṇe bahi nikkhante puna sā itthī dhuttaṃ pacchiyaṃ nipajjāpetvā nīhari. Nach Ablauf von ein oder zwei Tagen sagte das junge Mädchen zu dem Wüstling: 'Herr, nun ist es für dich an der Zeit zu gehen.' Er erwiderte: 'Ich möchte den Brahmanen erst schlagen und dann gehen.' Sie sagte: 'So soll es sein', versteckte den Wüstling und sprach, als der Brahmane kam, zu ihm: 'Herr, ich wünsche zu tanzen, während Ihr die Laute spielt.' Er antwortete: 'Gut, meine Liebe, tanze!', und spielte die Laute. Sie sagte: 'Wenn Ihr zuseht, schäme ich mich. Ich möchte daher Euer Gesicht mit einem Tuch verbinden und dann tanzen.' Er entgegnete: 'Wenn du dich schämst, so tue das.' Das junge Mädchen nahm ein dikes Tuch, bedeckte seine Augen und verband sein Gesicht. Der Brahmane ließ sich das Gesicht verbinden und spielte die Laute. Nachdem sie einen Augenblick getanzt hatte, sagte sie: 'Herr, ich möchte Euch einmal auf den Kopf schlagen.' Der nach Frauen gierige Brahmane, der den wahren Grund nicht ahnte, sagte: 'Schlag nur zu!' Da gab das Mädchen dem Wüstling ein Zeichen. Dieser kam leise herbei, stellte sich hinter den Brahmanen und schlug ihm mit dem Ellbogen auf den Kopf. Seine Augen drohten herauszufallen und auf dem Kopf entstand eine Beule. Von Schmerz gepeinigt sagte er: 'Reiche mir deine Hand!' Das Mädchen hob ihre Hand und legte sie in seine Hand. Der Brahmane sagte: 'Die Hand ist zwar weich, doch der Schlag war hart!' Der Wüstling verbarg sich wieder, nachdem er den Brahmanen geschlagen hatte. Als dieser sich versteckt hatte, löste das Mädchen das Tuch vom Gesicht des Brahmanen, nahm Öl und salbte seinen Kopf ringsum. Als der Brahmane nach draußen gegangen war, legte jene Frau den Wüstling in einen Korb und trug ihn hinaus. So rañño santikaṃ gantvā sabbaṃ taṃ pavattiṃ ārocesi. Rājā attano upaṭṭhānaṃ āgataṃ brāhmaṇaṃ āha ‘‘jūtaṃ kīḷāma brāhmaṇā’’ti? ‘‘Sādhu, mahārājā’’ti. Rājā jūtamaṇḍalaṃ sajjāpetvā purimanayeneva jūtagītaṃ gāyitvā pāsake khipati. Brāhmaṇo māṇavikāya tapassa bhinnabhāvaṃ ajānanto ‘‘ṭhapetvā mama māṇavika’’nti āha. Evaṃ vadantopi parājitoyeva. Rājā jinitvā ‘‘brāhmaṇa, kiṃ vadesi, māṇavikāya te tapo bhinno, tvaṃ ‘mātugāmaṃ gabbhato paṭṭhāya rakkhanto sattasu ṭhānesu ārakkhaṃ karonto rakkhituṃ sakkhissāmī’ti maññasi, mātugāmo nāma kucchiyaṃ pakkhipitvā carantenāpi rakkhituṃ na sakkā, ekapurisikā itthī nāma natthi, tava māṇavikā ‘naccitukāmāmhī’ti vatvā vīṇaṃ vādentassa tava sāṭakena mukhaṃ bandhitvā attano jāraṃ tava sīse kapparena paharāpetvā uyyojesi, idāni kiṃ kathesī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Dieser ging zum König und berichtete ihm das ganze Ereignis. Der König sprach zu dem Brahmanen, der gekommen war, um ihm aufzuwarten: 'Brahmane, wollen wir würfeln?' Er antwortete: 'Sehr wohl, o Großkönig.' Der König ließ das Würfelbrett herrichten, sang nach der früheren Weise das Würfellied und warf die Würfel. Da der Brahmane nicht wusste, dass die Tugend des jungen Mädchens gebrochen war, sprach er: 'Ausgenommen mein junges Mädchen!' Doch obwohl er dies sagte, verlor er dennoch. Der König siegte und sprach: 'Brahmane, was sagst du da? Die Tugend deines jungen Mädchens ist gebrochen. Du dachtest: Ich werde eine Frau vom Mutterleib an beschützen, sie an sieben Orten bewachen und fähig sein, sie zu behüten. Doch eine Frau kann selbst von jemandem, der sie in seinem eigenen Bauch umherträgt, nicht behütet werden. Es gibt keine Frau, die nur einem einzigen Mann treu bleibt. Dein junges Mädchen sagte: Ich möchte tanzen, verband dir, während du die Laute spieltest, das Gesicht mit einem Tuch, ließ ihren Liebhaber dir mit dem Ellbogen auf den Kopf schlagen und schickte ihn dann fort. Was sagst du nun?' Nach diesen Worten sprach er folgende Strophe: 62. 62. ‘‘Yaṃ brāhmaṇo avādesi, vīṇaṃ samukhaveṭhito; Aṇḍabhūtābhatā bhariyā, tāsu ko jātu vissase’’ti. 'Weil der Brahmane mit verbundenem Gesicht die Laute spielte – sie war seine Ehefrau, schon vor ihrer Geburt im Mutterleib erworben und aufgezogen. Wer könnte solchen Frauen jemals trauen?' Tattha yaṃ brāhmaṇo avādesi, vīṇaṃ samukhaveṭhitoti yena kāraṇena brāhmaṇo ghanasāṭakena saha mukhena veṭhito hutvā vīṇaṃ vādesi, taṃ kāraṇaṃ na jānātīti attho. Tañhi sā vañcetukāmā evamakāsi. Brāhmaṇo pana taṃ itthiṃ bahumāyābhāvaṃ ajānanto mātugāmassa saddahitvā ‘‘maṃ esā lajjatī’’ti evaṃsaññī ahosi, tenassa aññāṇabhāvaṃ pakāsento rājā evamāha, ayametthādhippāyo. Aṇḍabhūtābhatā bhariyāti aṇḍaṃ vuccati bījaṃ, bījabhūtā mātukucchito anikkhantakāleyeva ābhatā ānītā, bhatāti vā puṭṭhāti attho. Kā sā? Bhariyā pajāpati pādaparicārikā. Sā hi bhattavatthādīhi [Pg.312] bharitabbatāya, bhinnasaṃvaratāya, lokadhammehi bharitatāya vā ‘‘bhariyā’’ti vuccati. Tāsu ko jātu vissaseti jātūti ekaṃsādhivacanaṃ, tāsu mātukucchito paṭṭhāya rakkhiyamānāsupi evaṃ vippakāraṃ āpajjantīsu bhariyāsu ko nāma paṇḍito puriso ekaṃsena vissase, ‘‘nibbikārā esā mayī’’ti ko saddaheyyāti attho. Asaddhammavasena hi āmantakesu nimantakesu vijjamānesu mātugāmo nāma na sakkā rakkhitunti. Darin bedeutet 'yaṃ brāhmaṇo avādesi, vīṇaṃ samukhaveṭhito': Aus welchem Grund der Brahmane, mit einem dicken Tuch um sein Gesicht gewickelt, die Laute spielte – diesen Grund kannte er nicht; das ist die Bedeutung. Denn jene Frau tat dies, weil sie ihn täuschen wollte. Der Brahmane jedoch wusste nicht, dass diese Frau voller Arglist war, glaubte ihr und dachte: 'Sie schämt sich vor mir.' Um seine Unwissenheit offenzulegen, sprach der König diese Worte; das ist hier die Absicht. 'Aṇḍabhūtābhatā bhariyā': 'aṇḍa' (Ei) bezeichnet den Samen. Als bloßer Same, noch ehe sie aus dem Mutterleib hervorgegangen war, wurde sie herbeigebracht; oder 'bhatā' bedeutet 'aufgezogen'. Das ist die Bedeutung. Wer ist sie? Die Ehefrau, die Gefährtin, die Dienerin zu den Füßen. Sie wird nämlich 'bhariyā' genannt, weil sie mit Nahrung, Kleidung usw. versorgt werden muss, weil ihre Selbstbeherrschung gebrochen ist oder weil sie von den weltlichen Dingen erfüllt ist. 'Tāsu ko jātu vissase': 'jātu' ist ein Ausdruck für Gewissheit. Selbst wenn solche Ehefrauen vom Mutterleib an behütet werden, verfallen sie auf diese Weise der Verderbtheit. Welcher weise Mann würde ihnen jemals mit Gewissheit vertrauen? Wer würde glauben: 'Diese Frau ist mir treu'? Das ist die Bedeutung. Denn aufgrund des unheilsamen Verhaltens, wenn Verführer und Einladende vorhanden sind, kann eine Frau unmöglich behütet werden. Evaṃ bodhisatto brāhmaṇassa dhammaṃ desesi. Brāhmaṇo bodhisattassa dhammadesanaṃ sutvā nivesanaṃ gantvā taṃ māṇavikaṃ āha – ‘‘tayā kira evarūpaṃ pāpakammaṃ kata’’nti? ‘‘Ayya, ko evamāha, na karomi, ‘ahameva pahariṃ, na añño koci’. Sace na saddahatha, ahaṃ ‘tumhe ṭhapetvā aññassa purisassa hatthasamphassaṃ na jānāmī’ti saccakiriyaṃ katvā aggiṃ pavisitvā tumhe saddahāpessāmī’’ti. Brāhmaṇo ‘‘evaṃ hotū’’ti mahantaṃ dārurāsiṃ kāretvā aggiṃ katvā taṃ pakkosāpetvā ‘‘sace attano saddahasi, aggiṃ pavisāhī’’ti āha. Auf diese Weise verkündete der Bodhisatta dem Brahmanen die Lehre. Als der Brahmane die Lehrverkündigung des Bodhisatta gehört hatte, ging er nach Hause und sprach zu dem jungen Mädchen: 'Du sollst eine solche schlechte Tat begangen haben?' Sie sagte: 'Herr, wer sagt das? Ich habe es nicht getan! Ich selbst habe Euch geschlagen, kein anderer! Wenn Ihr mir nicht glaubt, werde ich eine Wahrheitsbeteuerung ablegen, indem ich schwöre: Außer Euch kenne ich die Berührung keines anderen Mannes, und in ein Feuer treten, um Euer Vertrauen zu gewinnen.' Der Brahmane sagte: 'So soll es sein!', ließ einen großen Scheiterhaufen errichten, entzündete ein Feuer, ließ sie herbeirufen und sprach: 'Wenn du dir deiner selbst sicher bist, so geh in das Feuer!' Māṇavikā attano paricārikaṃ paṭhamameva sikkhāpesi ‘‘amma, tava puttaṃ tattha gantvā mama aggiṃ pavisanakāle hatthaggahaṇaṃ kātuṃ vadehī’’ti. Sā gantvā tathā avaca. Dhutto āgantvā parisamajjhe aṭṭhāsi. Sā māṇavikā brāhmaṇaṃ vañcetukāmā mahājanamajjhe ṭhatvā ‘‘brāhmaṇa, taṃ ṭhapetvā aññassa purisassa hatthasamphassaṃ nāma na jānāmi, iminā saccena ayaṃ aggi mā maṃ jhāpesī’’ti aggiṃ pavisituṃ āraddhā. Tasmiṃ khaṇe dhutto ‘‘passatha bho purohitabrāhmaṇassa kammaṃ, evarūpaṃ mātugāmaṃ aggiṃ pavesāpetī’’ti gantvā taṃ māṇavikaṃ hatthe gaṇhi. Sā hatthaṃ vissajjāpetvā purohitaṃ āha – ‘‘ayya, mama saccakiriyā bhinnā, na sakkā aggiṃ pavisitu’’nti. ‘‘Kiṃkāraṇā’’ti? ‘‘Ajja mayā evarūpā saccakiriyā katā ‘ṭhapetvā mama sāmikaṃ aññassa purisassa hatthasamphassaṃ na jānāmī’ti, idāni camhi iminā purisena hatthe gahitā’’ti. Brāhmaṇo ‘‘vañcito ahaṃ imāyā’’ti ñatvā taṃ pothetvā nīharāpesi. Evaṃ asaddhammasamannāgatā kiretā itthiyo tāva mahantampi pāpakammaṃ katvā attano sāmikaṃ vañcetuṃ ‘‘nāhaṃ evarūpaṃ kammaṃ karomī’’ti divasampi sapathaṃ kurumānā nānācittāva honti. Tena vuttaṃ – Das junge Mädchen wies zuerst ihre Dienerin an: „Mutter, geh dorthin und sag deinem Sohn, er soll meine Hand ergreifen, wenn ich ins Feuer gehe.“ Sie ging und sprach so. Der liederliche Mann kam und stellte sich mitten in die Menge. Das junge Mädchen, das den Brahmanen täuschen wollte, stellte sich mitten unter das Volk und rief: „Brahmane, außer dir kenne ich keine Berührung durch die Hand eines anderen Mannes. Durch diese Wahrheit möge dieses Feuer mich nicht verbrennen!“ und schickte sich an, ins Feuer zu treten. In diesem Augenblick rief der liederliche Mann: „Seht doch, ihr Herren, das Tun des Hofpriester-Brahmanen! Eine solche Frau lässt er ins Feuer gehen!“, ging hin und ergriff das junge Mädchen an der Hand. Sie entwand ihre Hand und sagte zum Hofpriester: „Herr, mein Wahrheitsakt ist gebrochen; ich kann nicht ins Feuer gehen.“ – „Aus welchem Grund?“ – „Heute habe ich einen solchen Wahrheitsakt abgelegt: „Außer meinem Ehemann kenne ich keine Berührung durch die Hand eines anderen Mannes“, und nun bin ich von diesem Mann an der Hand ergriffen worden.“ Der Brahmane erkannte: „Ich bin von ihr getäuscht worden“, schlug sie und jagte sie davon. So handeln diese Frauen, die mit dem schlechten Charakter behaftet sind: Selbst wenn sie ein so großes Verbrechen begangen haben, leisten sie den ganzen Tag Schwüre wie: „Ich tue so etwas nicht“, um ihren Ehemann zu täuschen, und sind doch von unbeständigem Geiste. Darum wurde gesagt: ‘‘Corīnaṃ [Pg.313] bahubuddhīnaṃ, yāsu saccaṃ sudullabhaṃ; Thīnaṃ bhāvo durājāno, macchassevodake gataṃ. (jā. 2.21.347); „Der Charakter der Frauen, die Diebinnen sind und voll von listigen Gedanken, bei denen die Wahrheit überaus schwer zu finden ist, ist schwer zu durchschauen, gleich dem Pfad eines Fisches im Wasser. ‘‘Musā tāsaṃ yathā saccaṃ, saccaṃ tāsaṃ yathā musā; Gāvo bahi tiṇasseva, omasanti varaṃ varaṃ. Für sie ist die Lüge wie die Wahrheit und die Wahrheit wie die Lüge. Wie Kühe auf der Weide nach frischem Gras grasen, so wählen sie stets das aus, was ihnen am besten erscheint. ‘‘Coriyo kathinā hetā, vāḷā ca lapasakkharā; Na tā kiñci na jānanti, yaṃ manussesu vañcana’’nti. (jā. 2.21.332, 334); Denn sie sind Diebinnen, hartherzig, grausam und schmeichlerisch im Reden. Es gibt keine Täuschung unter den Menschen, die sie nicht kennen.“ Satthā ‘‘evaṃ arakkhiyo mātugāmo’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhitabhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā bārāṇasirājā ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor, indem er sprach: „So unbehütbar ist das weibliche Geschlecht“, und offenbarte die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten etablierte sich der unzufriedene Mönch in der Frucht des Stromeintritts. Auch der Meister stellte die Verknüpfung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der König von Bārāṇasī ich selbst.“ Aṇḍabhūtajātakavaṇṇanā dutiyā. Die zweite Erklärung des Aṇḍabhūta-Jātaka ist beendet.
[63] 3. Takkapaṇḍitajātakavaṇṇanā [63] 3. Die Erklärung des Takkapaṇḍita-Jātaka Kodhanā akataññū cāti idaṃ satthā jetavane viharanto ukkaṇṭhitabhikkhuññevārabbha kathesi. Tañhi satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhitosī’’ti pucchitvā ‘‘sacca’’nti vutte ‘‘itthiyo nāma bhikkhu akataññū mittadubbhā, kasmā tā nissāya ukkaṇṭhitosī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Zornig und undankbar...“ – Dies verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf eben jenen unzufriedenen Mönch. Denn der Meister fragte ihn: „Ist es wahr, Mönch, dass du unzufrieden bist?“, und als dieser antwortete: „Es ist wahr“, sprach er: „Mönche, Frauen sind undankbar und verräterisch gegenüber Freunden. Warum bist du ihretwegen unzufrieden?“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto isipabbajjaṃ pabbajitvā gaṅgātīre assamaṃ māpetvā samāpattiyo ceva abhiññāyo ca nibbattetvā jhānasukhena viharati. Tasmiṃ samaye bārāṇasiseṭṭhino dhītā duṭṭhakumārī nāma caṇḍā ahosi pharusā, dāsakammakare akkosati paribhāsati paharati. Atha naṃ ekadivasaṃ parivāramanussā gahetvā ‘‘gaṅgāya kīḷissāmā’’ti agamaṃsu. Tesaṃ kīḷantānaññeva sūriyatthaṅgamanavelā jātā, megho uṭṭhahi, manussā meghaṃ disvā [Pg.314] ito cito ca vegena palāyiṃsu. Seṭṭhidhītāyapi dāsakammakarā ‘‘ajja amhehi etissā piṭṭhiṃ passituṃ vaṭṭatī’’ti taṃ antoudakasmiṃyeva chaḍḍetvā uttariṃsu. Devo pāvassi, sūriyopi atthaṅgato, andhakāro jāto. Te tāya vināva gehaṃ gantvā ‘‘kahaṃ sā’’ti vutte ‘‘gaṅgāto tāva uttiṇṇā, atha naṃ na jānāma kahaṃ gatā’’ti. Ñātakā vicinitvāpi na passiṃsu. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, vollzog der Bodhisatta die Entsagung der Seher, errichtete eine Einsiedelei am Ufer des Ganges, erlangte sowohl die meditativen Errungenschaften als auch das höhere Wissen und verweilte im Glück der Vertiefung. Zu jener Zeit gab es eine Tochter des Großkaufmanns von Bārāṇasī namens Duṭṭhakumārī, die grimmig und unhöflich war; sie beschimpfte, bedrohte und schlug die Sklaven und Arbeiter. Da nahmen ihre Begleiter sie eines Tages mit und gingen zum Ganges, um im Wasser zu spielen. Während sie spielten, kam die Zeit des Sonnenuntergangs und ein Gewölk zog auf. Als die Menschen das Gewölk sahen, flohen sie eilig hierhin und dorthin. Auch die Sklaven und Arbeiter der Kaufmannstochter dachten: „Heute schickt es sich für uns, dieser Frau den Rücken zu kehren“, ließen sie mitten im Wasser zurück und stiegen ans Ufer. Es regnete heftig, die Sonne ging unter und Dunkelheit brach herein. Sie kehrten ohne sie nach Hause zurück, und als sie gefragt wurden: „Wo ist sie?“, sagten sie: „Sie ist zwar zuerst aus dem Ganges gestiegen, aber danach wissen wir nicht, wohin sie gegangen ist.“ Auch als ihre Verwandten nach ihr suchten, fanden sie sie nicht. Sā mahāviravaṃ viravantī udakena vuyhamānā aḍḍharattasamaye bodhisattassa paṇṇasālāsamīpaṃ pāpuṇi. So tassā saddaṃ sutvā ‘‘mātugāmassa saddo eso, parittāṇamassā karissāmī’’ti tiṇukkaṃ ādāya nadītīraṃ gantvā taṃ disvā ‘‘mā bhāyi, mā bhāyī’’ti assāsetvā nāgabalo thāmasampanno bodhisatto nadiṃ taramāno gantvā taṃ ukkhipitvā assamapadaṃ ānetvā aggiṃ katvā adāsi. Sīte vigate madhurāni phalāphalāni upanāmesi. Tāni khāditvā ṭhitaṃ ‘‘kattha vāsikāsi, kathañca gaṅgāya patitāsī’’ti pucchi. Sā taṃ pavattiṃ ārocesi. Atha naṃ ‘‘tvaṃ idheva vasā’’ti paṇṇasālāya vasāpento dvīhatīhaṃ sayaṃ abbhokāse vasitvā ‘‘idāni gacchā’’ti āha. Sā ‘‘imaṃ tāpasaṃ sīlabhedaṃ pāpetvā gahetvā gamissāmī’’ti na gacchati. Atha gacchante kāle itthikuttaṃ itthilīlaṃ dassetvā tassa sīlabhedaṃ katvā jhānaṃ antaradhāpesi. So taṃ gahetvā araññeyeva vasati. Atha naṃ sā āha ‘‘ayya, kiṃ no araññavāsena, manussapathaṃ gamissāmā’’ti? So taṃ ādāya ekaṃ paccantagāmakaṃ gantvā takkabhatiyā jīvikaṃ kappetvā taṃ poseti. Tassa takkaṃ vikkiṇitvā jīvatīti ‘‘takkapaṇḍito’’ti nāmaṃ akaṃsu. Athassa gāmavāsino paribbayaṃ datvā ‘‘amhākaṃ suyuttaduyuttakaṃ ācikkhanto ettha vasā’’ti gāmadvāre kuṭiyaṃ vāsesuṃ. Laut schreiend und vom Wasser fortgerissen, gelangte sie um Mitternacht in die Nähe der Blätterhütte des Bodhisatta. Als er ihre Stimme hörte, dachte er: „Das ist die Stimme einer Frau, ich werde sie retten“, nahm eine Grasfackel, ging zum Flussufer, erblickte sie und beruhigte sie: „Fürchte dich nicht, fürchte dich nicht!“ Der Bodhisatta, der die Kraft eines Elefanten besaß und voller Stärke war, schwamm durch den Fluss, hob sie heraus, brachte sie zur Einsiedelei und machte ihr ein Feuer. Als die Kälte vergangen war, bot er ihr süße Früchte aller Art an. Als sie diese gegessen hatte und dastand, fragte er sie: „Wo wohnst du und wie bist du in den Ganges gefallen?“ Sie erzählte ihm die Begebenheit. Daraufhin ließ er sie in der Blätterhütte wohnen, indem er sprach: „Wohn du genau hier“, während er selbst zwei oder drei Tage lang unter freiem Himmel lebte, und sagte schließlich: „Nun geh.“ Sie aber dachte: „Ich werde diesen Asketen zum Bruch seiner Tugend bringen, ihn mitnehmen und dann gehen“, und ging nicht fort. Als nun die Zeit verging, zeigte sie weibliche Verführungskünste und weibliche Anmut, brachte ihn zum Bruch seiner Tugend und ließ seine meditative Vertiefung schwinden. Er nahm sie mit und lebte fortan im Wald. Da sagte sie zu ihm: „Herr, was nützt uns das Leben im Wald? Lass uns dorthin gehen, wo Menschen leben.“ Er nahm sie mit, ging in ein Grenzdorf, verdiente seinen Lebensunterhalt durch den Verkauf von Buttermilch und ernährte sie so. Da er vom Verkauf von Buttermilch lebte, nannte man ihn „Takkapaṇḍita“ (Buttermilch-Weiser). Später gaben ihm die Dorfbewohner einen Lohn und ließen ihn in einer Hütte am Dorfeingang wohnen, indem sie sagten: „Verweile hier und verkünde uns, was vorteilhaft und was unvorteilhaft ist.“ Tena ca samayena corā pabbatā oruyha paccantaṃ paharanti. Te ekadivasaṃ taṃ gāmaṃ paharitvā gāmavāsikehiyeva bhaṇḍikā ukkhipāpetvā gacchantā tampi seṭṭhidhītaraṃ gahetvā attano vasanaṭṭhānaṃ gantvā sesajane vissajjesuṃ. Corajeṭṭhako pana tassā rūpe bajjhitvā taṃ attano bhariyaṃ akāsi. Bodhisatto ‘‘itthannāmā kaha’’nti pucchi. ‘‘Corajeṭṭhakena gahetvā attano bhariyā katā’’ti ca sutvāpi ‘‘na sā [Pg.315] tattha mayā vinā vasissati, palāyitvā āgacchissatī’’ti tassā āgamanaṃ olokento tattheva vasi. Zu jener Zeit stiegen Räuber von den Bergen herab und plünderten das Grenzgebiet. Eines Tages überfielen sie dieses Dorf, ließen die Dorfbewohner selbst die Beutebündel tragen, nahmen auf dem Weg auch jene Kaufmannstochter mit, kehrten zu ihrem Schlupfwinkel zurück und ließen die übrigen Leute wieder frei. Der Räuberhauptmann aber verfiel ihrer Schönheit und machte sie zu seiner Frau. Der Bodhisatta fragte: „Wo ist die Frau mit jenem Namen?“ Und obwohl er hörte: „Der Räuberhauptmann hat sie mitgenommen und zu seiner Frau gemacht“, blieb er genau dort wohnen und hielt Ausschau nach ihrer Rückkehr, im Glauben: „Sie wird dort nicht ohne mich leben können, sie wird entfliehen und zurückkommen.“ Seṭṭhidhītāpi cintesi ‘‘ahaṃ idha sukhaṃ vasāmi, kadāci maṃ takkapaṇḍito kiñcideva nissāya āgantvā ito ādāya gaccheyya, atha etasmā sukhā parihāyissāmi, yannūnāhaṃ sampiyāyamānā viya taṃ pakkosāpetvā ghātāpeyya’’nti. Sā ekaṃ manussaṃ pakkositvā ‘‘ahaṃ idha dukkhaṃ jīvāmi, takkapaṇḍito āgantvā maṃ ādāya gacchatū’’ti sāsanaṃ pesesi. So taṃ sāsanaṃ sutvā saddahitvā tattha gantvā gāmadvāre ṭhatvā sāsanaṃ pesesi. Sā nikkhamitvā taṃ disvā ‘‘ayya, sace mayaṃ idāni gacchissāma, corajeṭṭhako anubandhitvā ubhopi amhe ghātessati, rattibhāge gacchissāmā’’ti taṃ ānetvā bhojetvā koṭṭhake nisīdāpetvā sāyaṃ corajeṭṭhakassa āgantvā suraṃ pivitvā mattakāle ‘‘sāmi, sace imāya velāya tava sattuṃ passeyyāsi, kinti naṃ kareyyāsī’’ti āha. ‘‘Idañcidañca karissāmīti’’. ‘‘Kiṃ pana so dūre, nanu koṭṭhake nisinno’’ti? Corajeṭṭhako ukkaṃ ādāya tattha gantvā taṃ disvā gahetvā gehamajjhe pātetvā kapparādīhi yathāruciṃ pothesi. So pothiyamānopi aññaṃ kiñci avatvā ‘‘kodhanā akataññū ca, pisuṇā mittabhedikā’’ti ettakameva vadati. Coro taṃ pothetvā bandhitvā nipajjāpetvā sāyamāsaṃ bhuñjitvā sayi. Pabuddho jiṇṇāya surāya puna taṃ pothetuṃ ārabhi, sopi tāneva cattāri padāni vadati. Auch die Kaufmannstochter dachte sich: „Ich lebe hier glücklich. Wenn der weise Takka (Takkapaṇḍita) irgendwann aus irgendeinem Grund hierher käme, mich von hier wegholen und mitnehmen würde, dann würde ich dieses Glücks verlustig gehen. Wie wäre es, wenn ich so tue, als ob ich ihm liebevoll zugeneigt wäre, ihn herbeirufen und töten ließe?“ Sie rief einen Mann zu sich und sandte die Botschaft: „Ich lebe hier im Elend. Möge Takkapaṇḍita kommen und mich mitnehmen.“ Als dieser die Botschaft hörte, glaubte er ihr, begab sich dorthin, blieb am Dorftor stehen und sandte eine Nachricht. Sie kam heraus, sah ihn und sagte: „Herr, wenn wir jetzt fliehen, wird uns der Räuberhauptmann verfolgen und uns beide töten. Wir wollen in der Nacht aufbrechen.“ Sie führte ihn hinein, bewirtete ihn mit Speise, ließ ihn in der Scheune (Kornkammer) sitzen, kam am Abend zum betrunkenen Räuberhauptmann, der Alkohol getrunken hatte, und fragte ihn zur Zeit seiner Trunkenheit: „Mein Herr, wenn du in diesem Augenblick deinen Feind sehen würdest, was würdest du mit ihm tun?“ Er antwortete: „Dies und das würde ich mit ihm tun.“ Sie entgegnete: „Ist er denn weit weg? Sitzt er nicht etwa in der Scheune?“ Da nahm der Räuberhauptmann eine Fackel, ging dorthin, sah ihn, packte ihn, warf ihn mitten im Haus zu Boden und schlug ihn nach Belieben mit Ellbogen und anderem. Obwohl jener so geschlagen wurde, sagte er nichts anderes, sondern wiederholte nur diese Worte: „Zornig, undankbar, verleumderisch und gemeinschaftsspaltend.“ Der Räuber schlug ihn weiter, fesselte ihn, ließ ihn auf dem Boden liegen, nahm sein Abendbrot ein und legte sich schlafen. Als er aufwachte und sein Rausch verflogen war, begann er von neuem, ihn zu schlagen, doch jener sprach wiederum nur eben diese vier Worte. Coro cintesi ‘‘ayaṃ evaṃ pothiyamānopi aññaṃ kiñci avatvā imāneva cattāri padāni vadati, pucchissāmi na’’nti tassā suttabhāvaṃ ñatvā taṃ pucchi ‘‘ambho tvaṃ evaṃ pothiyamānopi kasmā etāneva padāni vadasī’’ti? Takkapaṇḍito ‘‘tena hi suṇāhī’’ti taṃ kāraṇaṃ ādito paṭṭhāya kathesi. ‘‘Ahaṃ pubbe araññavāsiko eko tāpaso jhānalābhī, svāhaṃ etaṃ gaṅgāya vuyhamānaṃ uttāretvā paṭijaggiṃ. Atha maṃ esā palobhetvā jhānā parihāpesi, svāhaṃ araññaṃ pahāya etaṃ posento paccantagāmake vasāmi, athesā corehi idhānītā ‘ahaṃ dukkhaṃ vasāmi, āgantvā maṃ netū’ti mayhaṃ sāsanaṃ pesetvā idāni [Pg.316] tava hatthe pātesi, iminā kāraṇenāhaṃ evaṃ kathemī’’ti. Coro cintesi ‘‘yā esā evarūpe guṇasampanne upakārake evaṃ vippaṭipajji, sā mayhaṃ kataraṃ nāma upaddavaṃ na kareyya, māretabbā esā’’ti so takkapaṇḍitaṃ assāsetvā taṃ pabodhetvā khaggaṃ ādāya nikkhamma ‘‘etaṃ purisaṃ gāmadvāre ghātessāmī’’ti vatvā tāya saddhiṃ bahigāmaṃ gantvā ‘‘etaṃ hatthe gaṇhā’’ti taṃ tāya hatthe gāhāpetvā khaggaṃ ādāya takkapaṇḍitaṃ paharanto viya taṃ dvidhā chinditvā sasīsaṃ nhāpetvā takkapaṇḍitaṃ katipāhaṃ paṇītena bhojanena santappetvā idāni kahaṃ gamissasī’’ti āha. Takkapaṇḍito ‘‘gharāvāsena me kiccaṃ natthi, isipabbajjaṃ pabbajitvā tattheva araññe vasissāmī’’ti āha. ‘‘Tena hi ahampi pabbajissāmī’’ti ubhopi pabbajitvā taṃ araññāyatanaṃ gantvā pañca abhiññā aṭṭha ca samāpattiyo nibbattetvā jīvitapariyosāne brahmalokūpagā ahesuṃ. Der Räuber dachte: „Obwohl dieser Mann so geschlagen wird, sagt er nichts anderes, sondern wiederholt nur diese vier Worte. Ich will ihn fragen.“ Als er erkannte, dass die Frau schlief, fragte er ihn: „He, du! Warum sprichst du, obwohl du so geschlagen wirst, nur diese Worte?“ Der weise Takka sagte: „Nun denn, so höre zu!“, und erzählte ihm die Begebenheit von Anfang an: „Ich war früher ein im Walde lebender Asket, der die Vertiefungen (Jhānas) erlangt hatte. Ich rettete diese Frau, als sie im Ganges dahintrieb, und pflegte sie. Daraufhin verführte sie mich und brachte mich um meine Vertiefungen. Ich verließ den Wald, um für sie zu sorgen, und lebte in einem Grenzdorf. Als sie dann von Räubern hierher verschleppt wurde, sandte sie mir die Nachricht: ‚Ich lebe im Elend, komm und hol mich weg‘, und hat mich nun in deine Hände ausgeliefert. Aus diesem Grunde spreche ich so.“ Da dachte der Räuber: „Wenn diese Frau sich gegenüber einem so tugendhaften Wohltäter so verhält, welches Unheil würde sie dann erst mir nicht antun? Sie muss getötet werden.“ Er beruhigte den weisen Takka, weckte die Frau, nahm sein Schwert und ging hinaus, wobei er sagte: „Ich werde diesen Mann am Dorftor töten.“ Gemeinsam mit ihr ging er aus dem Dorf hinaus. Er sagte zu ihr: „Halte diesen Mann fest!“ Er ließ sie seine Hand ergreifen, hob das Schwert und tat so, als wolle er den weisen Takka schlagen, spaltete sie jedoch in zwei Teile. Dann wusch er den weisen Takka mitsamt dem Haupt, bewirtete ihn einige Tage lang mit vorzüglicher Speise und fragte ihn schließlich: „Wohin wirst du nun gehen?“ Der weise Takka antwortete: „Ich habe kein Bedürfnis nach dem Hausvaterleben. Ich werde die Asketenweihe empfangen und eben dort im Walde leben.“ Der Räuber sagte: „Wenn dem so ist, werde auch ich das Hausleben verlassen.“ Beide empfingen die Weihe, begaben sich in jenes Waldgebiet, entfalteten die fünf höheren Geisteskräfte (Abhiññās) und die acht Sammlungsstufen (Samāpattis) und gelangten am Ende ihres Lebens in die Brahma-Welt. Satthā imāni dve vatthūni kathetvā anusandhiṃ ghaṭetvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese beiden Geschichten erzählt und die Verbindung hergestellt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte folgende Strophe: 63. 63. ‘‘Kodhanā akataññū ca, pisuṇā mittabhedikā; Brahmacariyaṃ cara bhikkhu, so sukhaṃ na vihāhisī’’ti. „Zornig und undankbar sind sie, verleumderisch und gemeinschaftsspaltend; führe das heilige Leben, o Mönch, so wirst du das Glück nicht einbüßen.“ Tatrāyaṃ piṇḍattho – bhikkhu itthiyo nāmetā kodhanā, uppannaṃ kodhaṃ nivāretuṃ na sakkonti. Akataññū ca, atimahantampi upakāraṃ na jānanti. Pisuṇā ca, piyasuññabhāvakaraṇameva kathaṃ kathenti. Mittabhedikā, mitte bhindanti, mittabhedanakathaṃ kathanasīlāyeva, evarūpehi pāpadhammehi samannāgatā etā. Kiṃ te etāhi, brahmacariyaṃ cara bhikkhu, ayañhi methunavirati parisuddhaṭṭhena brahmacariyaṃ nāma, taṃ cara. So sukhaṃ na vihāhisīti so tvaṃ etaṃ brahmacariyavāsaṃ vasanto jhānasukhaṃ maggasukhaṃ phalasukhañca na vihāhisi, etaṃ sukhaṃ na vijahissati, etasmā sukhā na parihāyissasīti attho. ‘‘Na parihāhisī’’tipi pāṭho, ayamevattho. Hierbei ist die zusammenfassende Bedeutung: O Mönch, Frauen sind wahrlich zornig; sie sind unfähig, den in ihnen entstandenen Zorn zu zügeln. Und sie sind undankbar; selbst eine überaus große Wohltat erkennen sie nicht an. Und sie sind verleumderisch; sie führen nur Reden, die dazu führen, die Zuneigung zu zerstören. Sie sind gemeinschaftsspaltend; sie entzweien Freunde und haben die Gewohnheit, Zwietracht säende Reden zu führen. Mit solch schlechten Eigenschaften sind sie behaftet. Was hast du mit ihnen zu schaffen? Führe das heilige Leben, o Mönch! Denn diese Abkehr vom Geschlechtsverkehr wird wegen ihrer Reinheit ‚heiliges Leben‘ (Brahmacariya) genannt; dieses übe aus. ‚So wirst du das Glück nicht einbüßen‘ (so sukhaṃ na vihāhisi) bedeutet: Wenn du dieses heilige Leben führst, wirst du das Glück der Vertiefungen (Jhāna-sukha), das Glück des Pfades (Magga-sukha) und das Glück der Frucht (Phala-sukha) nicht verlieren. Du wirst dieses dreifache Glück nicht aufgeben; du wirst dieses Glücks nicht verlustig gehen. Dies ist der Sinn. Es gibt auch die Lesart ‚na parihāhisi‘, welche dieselbe Bedeutung hat. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhitabhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. Satthā jātakaṃ [Pg.317] samodhānesi – ‘‘tadā corajeṭṭhako ānando ahosi, takkapaṇḍito pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten erlangte der unzufriedene Mönch die Frucht des Stromeintritts (Sotāpatti-phala). Der Meister verknüpfte die Geburten (das Jātaka): „Damals war der Räuberhauptmann Ānanda, der weise Takka aber war ich selbst.“ Takkapaṇḍitajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Takkapaṇḍita-Jātaka, die dritte.
[64] 4. Durājānajātakavaṇṇanā [64] 4. Die Erklärung des Durājāna-Jātaka. Māsu nandi icchati manti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ upāsakaṃ ārabbha kathesi. Eko kira sāvatthivāsī upāsako tīsu saraṇesu pañcasu ca sīlesu patiṭṭhito buddhamāmako, dhammamāmako, saṅghamāmako, bhariyā panassa dussīlā pāpadhammā. Yaṃ divasaṃ micchācāraṃ carati, taṃ divasaṃ satakītadāsī viya hoti, micchācārassa pana akatadivase sāminī viya hoti caṇḍā pharusā. So tassā bhāvaṃ jānituṃ na sakkoti, atha tāya ubbāḷho buddhūpaṭṭhānaṃ na gacchati. Atha naṃ ekadivasaṃ gandhapupphādīni ādāya āgantvā vanditvā nisinnaṃ satthā āha – ‘‘kiṃ nu kho tvaṃ, upāsaka, sattaṭṭha divase buddhūpaṭṭhānaṃ nāgacchasī’’ti. Gharaṇī me, bhante, ekasmiṃ divase satakītadāsī viya hoti, ekasmiṃ divase sāminī viya caṇḍā pharusā. Ahaṃ tassā bhāvaṃ jānituṃ na sakkomi, svāhaṃ tāya ubbāḷho buddhūpaṭṭhānaṃ nāgacchāmīti. Athassa vacanaṃ sutvā satthā ‘‘upāsaka, ‘mātugāmassa bhāvo nāma dujjāno’ti pubbepi te paṇḍitā kathayiṃsu, tvaṃ pana taṃ bhavasaṅkhepagatattā sallakkhetuṃ na sakkosī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Māsu nandi icchati maṃ“ (Sie freue sich nicht darüber, dass sie mich begehrt) – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana verweilte, in Bezug auf einen Laienanhänger. Es lebte nämlich, so heißt es, ein Laienanhänger in Sāvatthi, der fest in den drei Zufluchten und den fünf Tugendregeln verankert und ein treuer Verehrer des Buddha, des Dhamma und des Sangha war. Seine Ehefrau jedoch war tugendlos und von schlechtem Charakter. An den Tagen, an denen sie Ehebruch beging, verhielt sie sich wie eine für hundert Münzen gekaufte Sklavin. An den Tagen jedoch, an denen sie keinen Ehebruch beging, gebärdete sie sich wie eine Herrin, herrschsüchtig und grob. Er konnte ihre wahre Gesinnung nicht durchschauen, und da er von ihr so gequält wurde, ging er nicht mehr hin, um dem Buddha aufzuwarten. Als er nun eines Tages mit wohlriechenden Stoffen, Blumen und anderem herbeikam, sich ehrfurchtsvoll verneigte und niedersetzte, fragte ihn der Meister: „Warum bist du, o Laienanhänger, sieben oder acht Tage lang nicht gekommen, um dem Buddha aufzuwarten?“ Er antwortete: „Herr, meine Ehefrau ist an einem Tag wie eine für hundert Münzen gekaufte Sklavin, an einem anderen Tag aber wie eine Herrin, herrschsüchtig und grob. Ich kann ihre Gesinnung nicht verstehen; und da ich von ihr so gequält werde, komme ich nicht, um dem Buddha aufzuwarten.“ Als der Meister seine Worte vernommen hatte, sprach er: „O Laienanhänger, ‚Die Gesinnung der Frauen ist wahrlich schwer zu erkennen‘ – das haben dir schon in früheren Zeiten die Weisen verkündet. Du aber konntest dich daran nicht erinnern, weil es durch den Wechsel der Existenzen verborgen war.“ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto disāpāmokkho ācariyo hutvā pañca māṇavakasatāni sippaṃ sikkhāpeti. Atheko tiroraṭṭhavāsiko brāhmaṇamāṇavako āgantvā tassa santike sippaṃ uggaṇhanto ekāya itthiyā paṭibaddhacitto hutvā taṃ bhariyaṃ katvā tasmiṃyeva bārāṇasinagare vasanto dve tisso velāyo ācariyassa upaṭṭhānaṃ na gacchati. Sā panassa bhariyā dussīlā pāpadhammā. Micchācāraṃ ciṇṇadivase dāsī viya hoti, aciṇṇadivase sāminī viya hoti caṇḍā pharusā. So tassā bhāvaṃ jānituṃ asakkonto tāya ubbāḷho ākulacitto ācariyassa upaṭṭhānaṃ na gacchati. Atha naṃ sattaṭṭha divase atikkamitvā āgataṃ ‘‘kiṃ, māṇava[Pg.318], na paññāyasī’’ti ācariyo pucchi. So ‘‘bhariyā maṃ, ācariya, ekadivasaṃ icchati pattheti, dāsī viya nihatamānā hoti. Ekadivasaṃ sāminī viya thaddhā caṇḍā pharusā, ahaṃ tassā bhāvaṃ jānituṃ na sakkomi, tāya ubbāḷho ākulacitto tumhākaṃ upaṭṭhānaṃ nāgatomhī’’ti. Ācariyo ‘‘evametaṃ, māṇava, itthiyo nāma anācāraṃ ciṇṇadivase sāmikaṃ anuvattanti, dāsī viya nihatamānā honti. Anāciṇṇadivase pana mānatthaddhā hutvā sāmikaṃ na gaṇenti. Evaṃ itthiyo nāmetā anācārā dussīlā, tāsaṃ bhāvo nāma dujjāno, tāsu icchantīsupi anicchantīsupi majjhatteneva bhavitabba’’nti vatvā tassovādavasena imaṃ gāthamāha – Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta ein weltberühmter Lehrer und unterrichtete fünfhundert junge Brahmanen in den Wissenschaften. Da kam ein junger Brahmane aus einem anderen Land, um bei ihm zu lernen. Er verliebte sich leidenschaftlich in eine Frau, nahm sie zur Gattin und lebte in eben dieser Stadt Bārāṇasī. Doch bald vernachlässigte er zwei- oder dreimal seinen Dienst am Lehrer und ging nicht zu ihm. Seine Ehefrau aber war tugendlos und von schlechtem Charakter. An den Tagen, an denen sie Ehebruch beging, verhielt sie sich wie eine Sklavin; an den Tagen, an denen sie es nicht tat, gebärdete sie sich wie eine Herrin, herrschsüchtig und grob. Da er ihre Gesinnung nicht zu durchschauen vermochte, von ihr gequält wurde und sein Geist verwirrt war, ging er nicht mehr hin, um dem Lehrer aufzuwarten. Als er sich nach sieben oder acht Tagen schließlich wieder einfand, fragte ihn der Lehrer: „Warum, junger Mann, hast du dich so lange nicht sehen lassen?“ Er antwortete: „Lehrer, meine Frau begehrt und verlangt an einem Tag nach mir und ist demütig wie eine Sklavin. An einem anderen Tag aber ist sie wie eine Herrin, stolz, herrschsüchtig und grob. Ich kann ihre Gesinnung nicht verstehen; und da ich von ihr so gequält werde und mein Geist verwirrt ist, bin ich nicht gekommen, um Euch aufzuwarten.“ Da sprach der Lehrer: „So verhält es sich, o junger Mann! Frauen passen sich an den Tagen, an denen sie sich ungehörig verhalten, ihren Ehemännern an und sind demütig wie Sklavinnen. An den Tagen jedoch, an denen sie sich nicht ungehörig verhalten, sind sie voller Stolz und beachten ihren Ehemann gar nicht. So sind die Frauen wahrlich ungehörig und tugendlos; ihre Gesinnung ist schwer zu durchschauen. Ob sie nun Zuneigung zeigen oder nicht, man sollte ihnen gegenüber stets gleichmütig bleiben.“ Nach diesen Worten sprach er, um dem jungen Mann einen Rat zu geben, folgende Strophe: 64. 64. ‘‘Mā su nandi icchati maṃ, mā su soci na micchati; Thīnaṃ bhāvo durājāno, macchassevodake gata’’nti. „Freue dich nicht zu sehr darüber: ‚Sie begehrt mich!‘, gräme dich nicht zu sehr: ‚Sie begehrt mich nicht!‘ Die Gesinnung der Frauen ist schwer zu erkennen, gleich dem Weg eines Fisches im Wasser.“ Tattha mā su nandi icchati manti su-kāro nipātamattaṃ, ‘‘ayaṃ itthī maṃ icchati pattheti, mayi sinehaṃ karotī’’ti mā tussi. Mā su soci na micchatīti ‘‘ayaṃ maṃ na icchatī’’tipi mā soci, tassā icchamānāya nandiṃ, na icchamānāya ca sokaṃ akatvā majjhattova hohīti dīpeti. Thīnaṃ bhāvo durājānoti itthīnaṃ bhāvo nāma itthimāyāya paṭicchannattā durājāno. Yathā kiṃ? Macchassevodake gatanti yathā macchassa gamanaṃ udakena paṭicchannattā dujjānaṃ, teneva so kevaṭṭe āgate udakena gamanaṃ paṭicchādetvā palāyati, attānaṃ gaṇhituṃ na deti, evameva itthiyo mahantampi dussīlakammaṃ katvā ‘‘mayaṃ evarūpaṃ na karomā’’ti attanā katakammaṃ itthimāyāya paṭicchādetvā sāmike vañcenti. Evaṃ itthiyo nāmetā pāpadhammā durājānā, tāsu majjhattoyeva sukhito hotīti. Darin ist bei „mā su nandi icchati maṃ“ die Silbe „su“ bloß ein Füllwort. Der Sinn ist: Freue dich nicht mit dem Gedanken: „Diese Frau begehrt mich, verlangt nach mir, sie schenkt mir ihre Liebe.“ Bei „mā su soci na micchati“ ist der Sinn: Gräme dich nicht mit dem Gedanken: „Diese begehrt mich nicht.“ Es wird damit gezeigt: Empfinde weder Freude, wenn sie dich begehrt, noch Kummer, wenn sie dich nicht begehrt, sondern bleibe ganz und gar gleichmütig. „Die Gesinnung der Frauen ist schwer zu erkennen“ bedeutet: Die Gesinnung der Frauen ist wegen der Verhüllung durch weibliche Täuschung schwer zu durchschauen. Wie ist das zu verstehen? „Gleich dem Weg eines Fisches im Wasser“: So wie das Schwimmen eines Fisches, weil es vom Wasser verdeckt wird, schwer wahrzunehmen ist – weswegen er auch, wenn ein Fischer kommt, seine Bewegung durch das Wasser verbirgt, flieht und sich nicht fangen lässt –, genau so verbergen Frauen, selbst wenn sie ein großes Vergehen gegen die Tugend begangen haben, ihre eigene Tat durch weibliche Täuschung, indem sie sagen: „Wir tun so etwas nicht“, und betrügen so ihre Ehemänner. Auf diese Weise sind die Frauen wahrlich von schlechtem Charakter und schwer zu durchschauen; wer ihnen gegenüber ganz gleichmütig bleibt, der lebt glücklich. Evaṃ bodhisatto antevāsikassa ovādaṃ adāsi. Tato paṭṭhāya so tassā upari majjhattova ahosi. Sāpissa bhariyā ‘‘ācariyena kira me dussīlabhāvo ñāto’’ti tato paṭṭhāya na anācāraṃ cari. Sāpi tassa upāsakassa itthī ‘‘sammāsambuddhena kira mayhaṃ durācārabhāvo ñāto’’ti tato paṭṭhāya pāpakammaṃ nāma na akāsi. So gab der Bodhisatta seinem Schüler die Unterweisung. Von da an verhielt sich jener ihr gegenüber völlig gleichmütig. Auch seine Ehefrau dachte: „Der Lehrer hat wohl von meiner Tugendlosigkeit erfahren“, und beging von jener Zeit an kein ungehöriges Verhalten mehr. Und auch jene Frau des Laienanhängers dachte: „Der vollkommen Erwachte hat wohl von meinem schlechten Verhalten erfahren“, und beging von jener Zeit an keinerlei böse Tat mehr. Satthāpi imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so upāsako sotāpattiphale patiṭṭhahi, satthā anusandhiṃ ghaṭetvā [Pg.319] jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jayampatikāyeva idāni jayampatikā, ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister verkündete, nachdem er diese Lehrrede vorgetragen hatte, die Wahrheiten. Am Ende der Verkündung der Wahrheiten erlangte jener Laienanhänger die Frucht des Stromeintritts. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Das damalige Ehepaar ist das heutige Ehepaar; der Lehrer aber war ich selbst.“ Durājānajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung zum Durājāna-Jātaka, das vierte.
[65] 5. Anabhiratijātakavaṇṇanā [65] 5. Die Erklärung zum Anabhirati-Jātaka. Yathā nadī ca pantho cāti idaṃ satthā jetavane viharanto tathārūpaṃyeva upāsakaṃ ārabbha kathesi. So pana pariggaṇhanto tassā dussīlabhāvaṃ ñatvā bhaṇḍito cittabyākulatāya sattaṭṭha divase upaṭṭhānaṃ nāgamāsi. So ekadivasaṃ vihāraṃ gantvā tathāgataṃ vanditvā nisinno ‘‘kasmā sattaṭṭha divasāni nāgatosī’’ti vutte ‘‘bhariyā me, bhante, dussīlā, tassā upari byākulacittatāya nāgatomhī’’ti āha. Satthā ‘‘upāsaka, itthīsu ‘anācārā etā’ti kopaṃ akatvā majjhatteneva bhavituṃ vaṭṭatīti pubbepi te paṇḍitā kathayiṃsu, tvaṃ pana bhavantarena paṭicchannattā taṃ kāraṇaṃ na sallakkhesī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Yathā nadī ca pantho ca“ (Gleich einem Fluss und einem Pfad) – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana verweilte, in Bezug auf denselben Laienanhänger. Als dieser nämlich Nachforschungen anstellte und von der Tugendlosigkeit seiner Ehefrau erfuhr, geriet er in Streit und kam wegen seines aufgewühlten Geistes sieben oder acht Tage lang nicht, um dem Buddha aufzuwarten. Als er eines Tages in das Kloster ging, sich vor dem Erhabenen verneigte und niedersetzte, fragte ihn dieser: „Warum bist du sieben oder acht Tage lang nicht gekommen?“ Da antwortete er: „Herr, meine Frau ist tugendlos; wegen meines aufgewühlten Geistes ihretwegen bin ich nicht gekommen.“ Der Meister sprach: „O Laienanhänger, man sollte gegenüber Frauen keinen Zorn empfinden, sondern bei dem Gedanken ‚Sie verhalten sich eben ungehörig‘ stets gleichmütig bleiben. Das haben dir schon in früheren Zeiten die Weisen verkündet. Du aber konntest dich an diesen Umstand nicht erinnern, weil er durch ein anderes Leben verborgen war.“ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto purimanayeneva disāpāmokkho ācariyo ahosi. Athassa antevāsiko bhariyāya dosaṃ disvā byākulacittatāya katipāhaṃ anāgantvā ekadivasaṃ ācariyena pucchito taṃ kāraṇaṃ nivedesi. Athassa ācariyo ‘‘tāta, itthiyo nāma sabbasādhāraṇā, tāsu ‘dussīlā etā’ti paṇḍitā kopaṃ na karontī’’ti vatvā ovādavasena imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta, genau wie zuvor, ein weltberühmter Lehrer. Da bemerkte sein Schüler das Fehlverhalten seiner Frau und kam wegen seines verwirrten Geistes einige Tage lang nicht. Als er eines Tages vom Lehrer befragt wurde, offenbarte er ihm diesen Grund. Daraufhin sprach der Lehrer, um ihm eine Unterweisung zu geben: „Mein Lieber, Frauen sind wahrlich allen gemein; über sie geraten die Weisen nicht in Zorn mit dem Gedanken: ‚Sie sind tugendlos‘“, und er sprach diese Strophe: 65. 65. ‘‘Yathā nadī ca panto ca, pānāgāraṃ sabhā papā; Evaṃ lokitthiyo nāma, nāsaṃ kujjhanti paṇḍitā’’ti. „Wie ein Fluss, ein Pfad, eine Schenke, eine Versammlungshalle und eine Trinkwasserstelle, so sind die Frauen in dieser Welt allen gemein; die Weisen zürnen ihnen nicht.“ Tattha yathā nadīti yathā anekatitthā nadī nhānatthāya sampattasampattānaṃ caṇḍālādīnampi khattiyādīnampi sādhāraṇā, na tattha koci nhāyituṃ na labhati nāma. ‘‘Pantho’’tiādīsupi yathā mahāmaggopi sabbesaṃ sādhāraṇo[Pg.320], na koci tena gantuṃ na labhati. Pānāgārampi surāgehaṃ sabbesaṃ sādhāraṇaṃ, yo yo pātukāmo, sabbo tattha pavisateva. Puññatthikehi tattha tattha manussānaṃ nivāsatthāya katā sabhāpi sādhāraṇā, na tattha koci pavisituṃ na labhati. Mahāmagge pānīyacāṭiyo ṭhapetvā katā papāpi sabbesaṃ sādhāraṇā, na tattha koci pānīyaṃ pivituṃ na labhati. Evaṃ lokitthiyo nāmāti evameva tāta māṇava imasmiṃ loke itthiyopi sabbasādhāraṇāva, teneva ca sādhāraṇaṭṭhena nadīpanthapānāgārasabhāpapāsadisā. Tasmā nāsaṃ kujjhanti paṇḍitā, etāsaṃ itthīnaṃ ‘‘lāmikā etā anācārā dussīlā sabbasādhāraṇā’’ti cintetvā paṇḍitā chekā buddhisampannā na kujjhantīti. Hierbei bedeutet „Wie ein Fluss“: Wie ein Fluss mit vielen Badestellen allen gemein ist, die zum Baden dorthin kommen – seien es Kastenlose oder Könige –, und es niemanden gibt, dem das Baden dort verwehrt wäre. Auch bei „ein Pfad“ usw. ist die Bedeutung wie folgt zu verstehen: Wie eine Hauptstraße allen gemein ist und niemand daran gehindert wird, darauf zu gehen. Auch eine Schenke, das heißt ein Wirtshaus, ist allen gemein; wer immer trinken möchte, ein jeder tritt dort ein. Auch eine Versammlungshalle, die von Verdienstsuchenden hier und da als Unterkunft für die Menschen errichtet wurde, ist allen gemein; es gibt niemanden, dem der Zutritt verwehrt wäre. Auch eine Trinkwasserstelle, die an der Hauptstraße durch das Aufstellen von Wassertöpfen errichtet wurde, ist allen gemein; es gibt niemanden, dem es verwehrt wäre, dort Wasser zu trinken. „Ebenso die Frauen in der Welt“ bedeutet: Genau so, mein lieber Junge, sind in dieser Welt auch die Frauen allen gemein; und eben wegen dieser Eigenschaft, allen gemein zu sein, gleichen sie einem Fluss, einem Pfad, einer Schenke, einer Versammlungshalle und einer Trinkwasserstelle. „Deshalb zürnen die Weisen ihnen nicht“ bedeutet: Die Weisen, die Klugen und mit Einsicht Gesegneten zürnen diesen Frauen nicht, indem sie denken: „Sie sind verwerflich, von schlechtem Betragen, tugendlos und allen gemein.“ Evaṃ bodhisatto antevāsikassa ovādaṃ adāsi, so taṃ ovādaṃ sutvā majjhatto ahosi. Bhariyāpissa ‘‘ācariyena kiramhi ñātā’’ti tato paṭṭhāya pāpakammaṃ na akāsi. Tassapi upāsakassa bhariyā ‘‘satthārā kiramhi ñātā’’ti tato paṭṭhāya pāpakammaṃ na akāsi. So gab der Bodhisatta seinem Schüler die Unterweisung. Als dieser die Unterweisung gehört hatte, wurde er gleichmütig. Auch seine Frau dachte: „Der Lehrer weiß offenbar über mich Bescheid“, und beging von da an keine schlechten Taten mehr. Auch die Frau jenes Laienanhängers dachte: „Der Meister weiß offenbar über mich Bescheid“, und beging von da an keine schlechten Taten mehr. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne upāsako sotāpattiphale patiṭṭhahi. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jayampatikāva etarahi jayampatikā, ācariyabrāhmaṇo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten gründete der Laienanhänger in der Frucht des Stromeintritts. Der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: „Das damalige Ehepaar ist das heutige Ehepaar; der Lehrer-Brahmane aber war ich selbst.“ Anabhiratijātakavaṇṇanā pañcamā. Die fünfte Erklärung, die des Anabhirati-Jātaka, ist abgeschlossen.
[66] 6. Mudulakkhaṇajātakavaṇṇanā [66] 6. Die Erklärung des Mudulakkhaṇa-Jātaka. Ekā icchā pure āsīti idaṃ satthā jetavane viharanto saṃkilesaṃ ārabbha kathesi. Eko kira sāvatthivāsī kulaputto satthu dhammadesanaṃ sutvā ratanasāsane uraṃ datvā pabbajitvā paṭipannako yogāvacaro avissaṭṭhakammaṭṭhāno hutvā ekadivasaṃ sāvatthiyaṃ piṇḍāya caranto ekaṃ alaṅkatapaṭiyattaṃ itthiṃ disvā subhavasena indriyāni bhinditvā olokesi. Tassa abbhantare kileso cali, vāsiyā ākoṭitakhīrarukkho viya ahosi. So tato paṭṭhāya [Pg.321] kilesavasiko hutvā neva kāyassādaṃ na cittassādaṃ labhati, bhantamigasappaṭibhāgo sāsane anabhirato parūḷhakesalomanakho kiliṭṭhacīvaro ahosi. Athassa indriyavikāraṃ disvā sahāyakā bhikkhū ‘‘kiṃ nu kho te, āvuso, na yathā porāṇāni indriyānī’’ti pucchiṃsu. Anabhiratosmi, āvusoti. „Einst gab es ein einziges Begehren“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich der Unzufriedenheit. Ein Sohn aus guter Familie, der in Sāvatthī lebte, hörte die Lehrverkündigung des Meisters, weihte sein Leben ganz der kostbaren Lehre und trat in den Orden ein. Er wurde ein praktizierender Übender, der sein Meditationsobjekt niemals vernachlässigte. Als er eines Tages in Sāvatthī auf Almosengang war, sah er eine reich geschmückte und herausgeputzte Frau; geblendet von ihrer vermeintlichen Schönheit, verlor er die Beherrschung über seine Sinne und starrte sie an. In seinem Inneren regte sich die Leidenschaft; er wurde wie ein mit einer Axt angehauener Milchbaum, aus dem der Saft fließt. Von da an geriet er unter die Herrschaft der Leidenschaften und fand weder körperliche noch geistige Ruhe; er glich einem aufgeschreckten Hirsch, war unzufrieden mit dem Ordensleben, hatte langes Haar, lange Körperhaare und Nägel, und seine Gewänder waren schmutzig. Als seine befreundeten Mönche die Veränderung seiner Sinne bemerkten, fragten sie ihn: „Freund, warum sind deine Sinne nicht mehr wie früher?“ Er antwortete: „Freunde, ich habe die Freude am Ordensleben verloren.“ Atha naṃ te satthu santikaṃ nayiṃsu. Satthā ‘‘kiṃ, bhikkhave, anicchamānaṃ bhikkhuṃ ādāya āgatatthā’’ti pucchi. ‘‘Ayaṃ, bhante, bhikkhu anabhirato’’ti? ‘‘Saccaṃ bhikkhū’’ti. ‘‘Saccaṃ bhagavā’’ti. ‘‘Ko taṃ ukkaṇṭhāpesī’’ti? ‘‘Ahaṃ, bhante, piṇḍāya caranto ekaṃ itthiṃ disvā indriyāni bhinditvā olokesiṃ, atha me kileso cali, tenamhi ukkaṇṭhito’’ti. Atha naṃ satthā ‘‘anacchariyametaṃ bhikkhu, yaṃ tvaṃ indriyāni bhinditvā visabhāgārammaṇaṃ subhavasena olokento kilesehi kampito, pubbe pañcābhiññā aṭṭhasamāpattilābhino jhānabalena kilese vikkhambhetvā visuddhacittā gaganatalacarā bodhisattāpi indriyāni bhinditvā visabhāgārammaṇaṃ olokayamānā jhānā parihāyitvā kilesehi kampitā mahādukkhaṃ anubhaviṃsu. Na hi sineruuppāṭanakavāto hatthimattaṃ muṇḍapabbataṃ, mahājambuummūlakavāto chinnataṭe virūḷhagacchakaṃ, mahāsamuddaṃ vā pana sosanakavāto khuddakataḷākaṃ kismiñcideva gaṇeti, evaṃ uttamabuddhīnaṃ nāma visuddhacittānaṃ bodhisattānaṃ aññāṇabhāvakarā kilesā tayi kiṃ lajjissanti, visuddhāpi sattā saṃkilissanti, uttamayasasamaṅginopi āyasakyaṃ pāpuṇantī’’ti vatvā atītaṃ āhari. Da brachten sie ihn in die Gegenwart des Meisters. Der Meister fragte: „Mönche, warum bringt ihr diesen unwilligen Mönch her?“ – „Herr, dieser Mönch hat die Freude am Ordensleben verloren.“ – „Ist das wahr, Mönch?“ – „Es ist wahr, Erhabener.“ – „Wer hat dich so verdrossen gemacht?“ – „Herr, als ich auf Almosengang war, sah ich eine Frau, verlor die Beherrschung über meine Sinne und starrte sie an. Da regte sich in mir die Leidenschaft, und deshalb bin ich verdrossen.“ Da sprach der Meister zu ihm: „Mönch, es ist nicht verwunderlich, dass du, der du deine Sinne unbeherrscht gelassen hast und ein unpassendes Objekt als schön betrachtest, von den Leidenschaften erschüttert wurdest. In der Vergangenheit wurden selbst Bodhisattas, welche die fūnf übernatürlichen Erkenntnisse und die acht Errungenschaften erlangt hatten, die durch die Kraft der Vertiefung die Leidenschaften unterdrückt hatten, reinen Geistes waren und durch die Lüfte wandelten, als sie ihre Sinne unbeherrscht ließen und ein unpassendes Objekt betrachteten, ihrer Vertiefung beraubt, von den Leidenschaften erschüttert und erfuhren großes Leid. Denn der Sturm, der den Berg Sineru entwurzelt, nimmt auf einen kahlen Hügel von der Größe eines Elefanten keinerlei Rücksicht; der Sturm, der den großen Jambu-Baum entwurzelt, nimmt auf ein kleines Gestrüpp, das an einem Steilufer wächst, keinerlei Rücksicht; und der austrocknende Wind, der den großen Ozean austrocknet, nimmt auf einen winzigen Teich keinerlei Rücksicht. Wenn nun die Leidenschaften, die Unwissenheit erzeugen, selbst bei Bodhisattas von höchster Weisheit und reinem Geist wirksam sind, wie sollten sie sich da vor dir scheuen? Selbst reine Wesen werden befleckt, und selbst jene, die mit höchstem Ruhm ausgestattet sind, geraten in Schande.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kāsiraṭṭhe ekassa mahāvibhavassa brāhmaṇassa kule nibbattitvā viññutaṃ patto sabbasippānaṃ pāraṃ gantvā kāme pahāya isipabbajjaṃ pabbajitvā kasiṇaparikammaṃ katvā pañca abhiññā ca aṭṭha samāpattiyo ca uppādetvā jhānasukhena vītināmento himavantappadese vāsaṃ kappesi. So ekasmiṃ kāle loṇambilasevanatthāya himavantā otaritvā bārāṇasiṃ patvā rājuyyāne vasitvā punadivase katasarīrapaṭijaggano rattavākamayaṃ nivāsanapārupanaṃ saṇṭhāpetvā ajinacammaṃ ekasmiṃ aṃse katvā jaṭāmaṇḍalaṃ bandhitvā bhikkhābhājanamādāya bārāṇasiyaṃ bhikkhāya caramāno rañño gharadvāraṃ sampāpuṇi. Rājā tassa iriyāpatheyeva pasīditvā [Pg.322] pakkosāpetvā mahārahe āsane nisīdāpetvā paṇītena khādanīyabhojanīyena santappetvā katānumodanaṃ uyyāne vasanatthāya yāci. So sampaṭicchitvā rājagehe bhuñjitvā rājakulaṃ ovadamāno tasmiṃ uyyāne soḷasa vassāni vasi. Als in vergangenen Zeiten Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Reich Kāsī in der Familie eines sehr wohlhabenden Brahmanen geboren. Als er herangewachsen war, erlangte er die Meisterschaft in allen Künsten, entsagte den Sinnengenüssen, zog in die Hauslosigkeit der Asketen (Isipabbajjā), vollzog die Kasiṇa-Übungen, brachte die fünf höheren Geisteskräfte (Abhiññā) sowie die acht geistigen Errungenschaften (Samāpatti) hervor und lebte im Himavanta-Gebiet, wobei er seine Zeit in der Glückseligkeit der Vertiefung (Jhāna) verbrachte. Eines Tages stieg er aus dem Himavanta-Gebirge herab, um Salz und Saures zu sich zu nehmen, erreichte Bārāṇasī und verweilte im königlichen Park. Am folgenden Tag verrichtete er seine körperliche Pflege, ordnete sein rotes Gewand aus Baumrinde, legte sich ein Antilopenfell über eine Schulter, band sein geflochtenes Haar zu einem Knoten, nahm seine Almosenschale und zog, um in Bārāṇasī um Almosenspeise zu bitten, umher, wobei er das Tor des königlichen Palastes erreichte. Der König fand allein an seinem ehrfurchtgebietenden Auftreten Wohlgefallen, ließ ihn herbeirufen, auf einem kostbaren Sitz Platz nehmen, bewirtete ihn reichlich mit erlesenen Speisen und bat ihn, nachdem jener Dankesworte (Anumodanā) gesprochen hatte, im königlichen Park zu wohnen. Er willigte ein, speiste im königlichen Palast, belehrte die königliche Familie und lebte sechzehn Jahre lang in diesem Park. Athekadivasaṃ rājā kupitaṃ paccantaṃ vūpasametuṃ gacchanto mudulakkhaṇaṃ nāma aggamahesiṃ ‘‘appamattā ayyassa upaṭṭhānaṃ karohī’’ti vatvā agamāsi. Bodhisatto rañño gatakālato paṭṭhāya attano ruccanavelāya rājagehaṃ gacchati. Athekadivasaṃ mudulakkhaṇā bodhisattassa āhāraṃ sampādetvā – ‘‘ajja ayyo cirāyatī’’ti gandhodakena nhāyitvā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitā mahātale cūḷasayanaṃ paññāpetvā bodhisattassa āgamanaṃ olokayamānā nipajji. Bodhisattopi attano velaṃ sallakkhetvā jhānā vuṭṭhāya ākāseneva rājanivesanaṃ agamāsi. Mudulakkhaṇā vākacīrasaddaṃ sutvāva ‘‘ayyo, āgato’’ti vegena uṭṭhahi, tassā vegena uṭṭhahantiyā maṭṭhasāṭako bhassi. Tāpasopi sīhapañjarena pavisanto deviyā visabhāgarūpārammaṇaṃ indriyāni bhinditvā subhavasena olokesi. Athassa abbhantare kileso cali, vāsiyā pahaṭakhīrarukkho viya ahosi. Tāvadevassa jhānaṃ antaradhāyi, chinnapakkho kāko viya ahosi. So ṭhitakova āhāraṃ gahetvā abhuñjitvāva kilesakampito pāsādā oruyha uyyānaṃ gantvā paṇṇasālaṃ pavisitvā phalakattharaṇasayanassa heṭṭhā āhāraṃ ṭhapetvā visabhāgārammaṇena baddho kilesagginā ḍayhamāno nirāhāratāya sussamāno satta divasāni phalakattharaṇe nipajji. Eines Tages zog der König fort, um einen Aufstand im Grenzgebiet niederzuschlagen. Zuvor sprach er zu seiner Hauptkönigin namens Mudulakkhaṇā: „Diene dem edlen Herrn stets achtsam!“, und reiste ab. Seit der Abreise des Königs begab sich der Bodhisatta zu der von ihm bevorzugten Zeit zum königlichen Palast. Eines Tages bereitete Mudulakkhaṇā die Speise für den Bodhisatta vor und dachte: „Heute verspätet sich der edle Herr.“ Sie badete in duftendem Wasser, schmückte sich mit allerlei Zierrat, ließ auf der oberen Etage des Palastes ein kleines Lager herrichten und legte sich nieder, um nach der Ankunft des Bodhisatta Ausschau zu halten. Auch der Bodhisatta achtete auf die Zeit, erhob sich aus seiner Vertiefung und gelangte durch die Luft direkt zum königlichen Palast. Als Mudulakkhaṇā das Rascheln seines Rindengewands hörte, dachte sie: „Der edle Herr ist gekommen“, und stand hastig auf. Als sie so hastig aufstand, glitt ihr feines Gewand herab. Als der Asket durch das Prunkfenster eintrat und den für ihn ungeeigneten, aufreizenden Anblick (visabhāgārammaṇa) der Königin wahrnahm, verlor er die Beherrschung über seine Sinne und blickte sie voll Begehren nach ihrer Schönheit an. Da regten sich in seinem Inneren die leidenschaftlichen Befleckungen (kilesa); es war wie bei einem Milchsaft führenden Baum, der mit einer Axt verletzt wird. Auf der Stelle schwand seine Vertiefung (jhāna) dahin, und er war wie eine Krähe mit gebrochenen Flügeln. Er nahm im Stehen die Speise entgegen, aß sie jedoch nicht, sondern stieg, von Leidenschaft aufgewühlt, vom Palast hinab, begab sich in den Park, betrat seine Blätterhütte, stellte die Speise unter sein Holzbett und lag, gefesselt von jenem aufreizenden Objekt, verzehrt vom Feuer der Leidenschaft und vor Nahrungsmangel auszehrend, sieben Tage lang auf dem Holzbrett. Sattame divase rājā paccantaṃ vūpasametvā āgato nagaraṃ padakkhiṇaṃ katvā nivesanaṃ agantvāva ‘‘ayyaṃ passissāmī’’ti uyyānaṃ gantvā paṇṇasālaṃ pavisitvā taṃ nipannakaṃ disvā ‘‘ekaṃ aphāsukaṃ jātaṃ maññe’’ti paṇṇasālaṃ sodhāpetvā pāde parimajjanto ‘‘kiṃ, ayya, aphāsuka’’nti pucchi. ‘‘Mahārāja aññaṃ me aphāsukaṃ natthi, kilesavasena panamhi paṭibaddhacitto jāto’’ti. ‘‘Kahaṃ paṭibaddhaṃ te, ayya, citta’’nti? ‘‘Mudulakkhaṇāya, mahārājā’’ti. ‘‘Sādhu ayya, ahaṃ mudulakkhaṇaṃ tumhākaṃ dammī’’ti [Pg.323] tāpasaṃ ādāya nivesanaṃ pavisitvā deviṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ katvā tāpasassa adāsi. Dadamānoyeva ca mudulakkhaṇāya saññamadāsi ‘‘tayā attano balena ayyaṃ rakkhituṃ vāyamitabba’’nti. ‘‘Sādhu, deva, rakkhissāmī’’ti. Tāpaso deviṃ gahetvā rājanivesanā otari. Am siebten Tag kehrte der König zurück, nachdem er das Grenzgebiet befriedet hatte. Er umrundete die Stadt im Uhrzeigersinn, ging jedoch nicht sogleich in seinen Palast, sondern begab sich mit dem Gedanken „Ich will den edlen Herrn sehen“ in den Park. Er betrat die Blätterhütte, sah ihn dort liegen und dachte: „Sicherlich plagt ihn ein Unwohlsein.“ Er ließ die Hütte säubern, massierte ihm die Füße und fragte: „Welches Unwohlsein quält Euch, edler Herr?“ Er antwortete: „O Großkönig, kein anderes Unwohlsein plagt mich, doch mein Geist ist durch die Macht der Leidenschaft gefesselt worden.“ – „Worauf ist Euer Geist gerichtet, edler Herr?“ – „Auf Mudulakkhaṇā, o Großkönig.“ – „Es ist gut, edler Herr, ich gebe Euch Mudulakkhaṇā.“ Er nahm den Asketen mit sich, betrat den Palast, ließ die Königin mit allerlei Zierrat schmücken und übergab sie dem Asketen. Noch während er sie übergab, gab er Mudulakkhaṇā die Weisung: „Du musst dich nach Kräften bemühen, den edlen Herrn zu behüten.“ Sie antwortete: „Es ist gut, mein Herr, ich werde ihn behüten.“ Der Asket nahm die Königin mit sich und verließ den königlichen Palast. Atha naṃ mahādvārato nikkhantakāle ‘‘ayya, amhākaṃ ekaṃ gehaṃ laddhuṃ vaṭṭati, gaccha, rājānaṃ gehaṃ yācāhī’’ti āha. Tāpaso gantvā gehaṃ yāci. Rājā manussānaṃ vaccakuṭikiccaṃ sādhayamānaṃ ekaṃ chaḍḍitagehaṃ dāpesi. So deviṃ gahetvā tattha agamāsi, sā pavisituṃ na icchati. ‘‘Kiṃkāraṇā na pavisasī’’ti? ‘‘Asucibhāvenā’’ti. Idāni ‘‘kiṃ karomī’’ti. ‘‘Paṭijaggāhi na’’nti vatvā rañño santikaṃ pesetvā ‘‘gaccha, kuddālaṃ āhara, pacchiṃ āharā’’ti āharāpetvā asuciñca saṅkārañca chaḍḍāpetvā gāmayaṃ āharāpetvā limpāpetvā punapi ‘‘gaccha, mañcaṃ āhara, pīṭhaṃ āhara, attharaṇaṃ āhara, cāṭiṃ āhara, ghaṭaṃ āharā’’ti ekamekaṃ āharāpetvā puna udakāharaṇādīnaṃ atthāya āṇāpesi. So ghaṭaṃ ādāya udakaṃ āharitvā cāṭiṃ pūretvā nhānodakaṃ sajjetvā sayanaṃ atthari. Atha naṃ sayane ekato nisinnaṃ dāṭhikāsu gahetvā ‘‘tava samaṇabhāvaṃ vā brāhmaṇabhāvaṃ vā na jānāsī’’ti oṇametvā attano abhimukhaṃ ākaḍḍhi. So tasmiṃ kāle satiṃ paṭilabhi, ettakaṃ pana kālaṃ aññāṇī ahosi. Evaṃ aññāṇakaraṇā kilesā nāma. ‘‘Kāmacchandanīvaraṇaṃ, bhikkhave, andhakaraṇaṃ aññāṇakaraṇa’’ntiādi (saṃ. ni. 5.221) cettha vattabbaṃ. Als sie das Haupttor verließen, sprach sie zu ihm: „Edler Herr, wir benötigen ein Haus. Geh und bitte den König um ein Haus.“ Der Asket ging und bat um ein Haus. Der König ließ ihm ein verlassenes Haus geben, das den Menschen als Toilette gedient hatte. Er nahm die Königin mit sich und ging dorthin, doch sie weigerte sich, es zu betreten. „Aus welchem Grund gehst du nicht hinein?“, fragte er. „Wegen der Unreinheit“, erwiderte sie. Da fragte er: „Was soll ich nun tun?“ Sie sagte: „Reinige es!“, sandte ihn zum König und befahl ihm: „Geh, bring eine Hacke, bring einen Korb!“ Nachdem er dies herbeigeholt hatte, ließ sie ihn den Kot und den Unrat wegschaffen, Kuhdung herbeischaffen und den Boden damit bestreichen. Und wiederum befahl sie ihm: „Geh, bring ein Bett, bring einen Schemel, bring ein Bettlaken, bring ein großes Gefäß, bring einen Wasserkrug!“ Nachdem er jedes Einzelne herbeigetragen hatte, schickte sie ihn erneut los, um Wasser zu holen und andere Dienste zu verrichten. Er nahm den Krug, holte Wasser, füllte das große Gefäß, bereitete Badewasser vor und breitete das Bettlager aus. Als er sich dann zu ihr auf das Bett setzte, packte sie ihn am Bart und an den Koteletten, zog ihn zu sich herab und sprach: „Kennst du nicht einmal mehr deinen Zustand als Asket oder als Brahmane?“ In diesem Augenblick erlangte er seine Achtsamkeit (sati) zurück; bis zu diesem Zeitpunkt war er völlig unwissend gewesen. Derart verblendend sind wahrlich die Befleckungen (kilesa). An dieser Stelle ist zu sagen: „Ihr Mönche, das Hemmnis des Sinnengebegehrens (kāmacchandanīvaraṇa) macht blind, es macht unwissend...“ und so weiter. So satiṃ paṭilabhitvā cintesi ‘‘ayaṃ taṇhā vaḍḍhamānā mama catūhi apāyehi sīsaṃ ukkhipituṃ na dassati, ajjeva mayā imaṃ rañño niyyādetvā himavantaṃ pavisituṃ vaṭṭatī’’ti. So taṃ ādāya rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘mahārāja, tava deviyā mayhaṃ attho natthi, kevalaṃ me imaṃ nissāya taṇhā vaḍḍhitā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als er seine Achtsamkeit wiedererlangt hatte, dachte er: „Wenn dieses Begehren (taṇhā) weiter wächst, wird es mir nicht erlauben, mein Haupt aus den vier Leidenswelten (apāya) zu erheben. Noch heute ist es ratsam, dass ich diese Königin dem König zurückgebe und in das Himavanta-Gebirge zurückkehre.“ Er nahm sie mit sich, begab sich zum König und sprach: „O Großkönig, ich habe kein Verlangen nach deiner Königin. Einzig durch sie ist mein Begehren gewachsen“, und sprach diese Strophe: 66. 66. ‘‘Ekā icchā pure āsi, aladdhā mudulakkhaṇaṃ; Yato laddhā aḷārakkhī, icchā icchaṃ vijāyathā’’ti. „Einst hatte ich nur einen einzigen Wunsch, als ich Mudulakkhaṇā noch nicht besaß. Doch seit ich die Großäugige erlangt habe, gebiert ein Wunsch den nächsten.“ Tatrāyaṃ [Pg.324] piṇḍattho – mahārāja, mayhaṃ imaṃ tava deviṃ mudulakkhaṇaṃ alabhitvā pure ‘‘aho vatāhaṃ etaṃ labheyya’’nti ekā icchā āsi, ekāva taṇhā uppajji. Yato pana me ayaṃ aḷārakkhī visālanettā sobhanalocanā laddhā, atha me sā purimikā icchā gehataṇhaṃ upakaraṇataṇhaṃ upabhogataṇhanti uparūpari aññaṃ nānappakāraṃ icchaṃ vijāyatha janesi uppādesi. Sā kho pana me evaṃ vaḍḍhamānā icchā apāyato sīsaṃ ukkhipituṃ na dassati, alaṃ me imāya, tvaññeva tava bhariyaṃ gaṇha, ahaṃ pana himavantaṃ gamissāmīti tāvadeva naṭṭhaṃ jhānaṃ uppādetvā ākāse nisinno dhammaṃ desetvā rañño ovādaṃ datvā ākāseneva himavantaṃ gantvā puna manussapathaṃ nāma nāgamāsi, brahmavihāre pana bhāvetvā aparihīnajjhāno brahmaloke nibbatti. Hierbei ist die zusammenfassende Bedeutung: O großer König, bevor ich diese deine Königin Mudulakkhaṇā erlangte, hatte ich nur das eine Verlangen: „O dass ich sie doch erlangen könnte!“ Ein einziges Begehren stieg in mir auf. Seitdem ich aber diese Großäugige mit den feingeschwungenen, schönen Augen erlangt habe, gebar, erzeugte und rief mein früheres Verlangen weiteres, vielfältiges Begehren hervor – das Begehren nach einem Heim, das Begehren nach Besitztümern und das Begehren nach Genüssen. Dieses mein so anwachsende Begehren aber wird es mir nicht erlauben, das Haupt aus den niederen Welten zu erheben. Genug für mich mit ihr! Nimm du selbst deine Gemahlin zurück, ich aber werde in den Himalaya gehen. Sogleich erweckte er die verloren gegangene Vertiefung wieder, saß in der Luft, verkündete die Lehre, gab dem König Unterweisung, ging durch die Luft in den Himalaya und kehrte nie wieder auf den Pfad der Menschen zurück. Indem er aber die göttlichen Verweilungen entfaltete, wurde er, ohne dass seine Vertiefung schwand, in der Brahma-Welt wiedergeboren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne so bhikkhu arahattaphale patiṭṭhahi. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, mudulakkhaṇā uppalavaṇṇā, isi pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten erlangte jener Mönch die Frucht der Arhatschaft. Auch der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war der König Ānanda, Mudulakkhaṇā war Uppalavaṇṇā, der Weise aber war ich selbst.“ Mudulakkhaṇajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die sechste Erklärung des Mudulakkhaṇa-Jātaka.
[67] 7. Ucchaṅgajātakavaṇṇanā [67] 7. Die Erklärung des Ucchaṅga-Jātaka Ucchaṅge deva me puttoti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ jānapaditthiṃ ārabbha kathesi. Ekasmiñhi samaye kosalaraṭṭhe tayo janā aññatarasmiṃ aṭavimukhe kasanti. Tasmiṃ samaye antoaṭaviyaṃ corā manusse vilumpitvā palāyiṃsu. Manussā te core pariyesitvā apassantā taṃ ṭhānaṃ āgamma ‘‘tumhe aṭaviyaṃ vilumpitvā idāni kassakā viya hothā’’ti ‘‘te corā ime’’ti bandhitvā ānetvā kosalarañño adaṃsu. Athekā itthī āgantvā ‘‘acchādanaṃ me detha, acchādanaṃ me dethā’’ti paridevantī punappunaṃ rājanivesanaṃ pariyāti. Rājā tassā saddaṃ sutvā ‘‘gacchatha, detha imissā acchādana’’nti āha. Manussā sāṭakaṃ gahetvā adaṃsu. Sā taṃ disvā ‘‘nāhaṃ etaṃ acchādanaṃ yācāmi[Pg.325], sāmikacchādanaṃ yācāmī’’ti āha. Manussā gantvā rañño ārocayiṃsu ‘‘na kiresā idaṃ acchādanaṃ katheti, sāmikacchādanaṃ kathetī’’ti. Atha naṃ rājā pakkosāpetvā ‘‘tvaṃ kira sāmikacchādanaṃ yācasī’’ti pucchi. Āma, deva, itthiyā hi sāmiko acchādanaṃ nāma, sāmike hi asati sahassamūlampi sāṭakaṃ nivatthā itthī naggāyeva nāma. Imassa panatthassa sādhanatthaṃ – „In meinem Schoß, o König, mein Sohn...“ – Dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf eine Frau aus dem Lande. Zu jener Zeit pflügten drei Männer im Kosala-Land an einem Waldrand. Zu jener Zeit raubten Räuber im Inneren des Waldes die Menschen aus und flohen. Die Menschen suchten nach diesen Räubern, und da sie sie nicht sahen, kamen sie an jenen Ort und sagten: „Ihr habt im Wald geraubt und tut nun so, als wäret ihr Bauern!“, banden sie mit den Worten „Dies sind die Räuber!“ fest, führten sie herbei und übergaben sie dem König von Kosala. Da kam eine Frau und klagte immer wieder: „Gebt mir ein Gewand, gebt mir ein Gewand!“, während sie das königliche Anwesen umkreiste. Als der König ihre Stimme hörte, sprach er: „Geht und gebt dieser Frau ein Gewand!“ Die Leute nahmen ein Gewand und gaben es ihr. Als sie dieses sah, sprach sie: „Ich bitte nicht um dieses Gewand, ich bitte um das Ehemann-Gewand!“ Die Leute gingen hin und berichteten dem König: „Sie spricht wohl nicht von diesem Gewand, sondern vom Ehemann-Gewand.“ Da ließ der König sie rufen und fragte: „Stimmt es, dass du um das Ehemann-Gewand bittest?“ „Ja, Herr König, für eine Frau ist wahrlich der Ehemann das Gewand; denn wenn kein Ehemann da ist, ist eine Frau, selbst wenn sie ein Gewand im Wert von tausend Münzen trägt, wahrlich nackt.“ Um diesen Sinn zu beweisen: ‘‘Naggā nadī anūdakā, naggaṃ raṭṭhaṃ arājakaṃ; Itthīpi vidhavā naggā, yassāpi dasa bhātaro’’ti. (jā. 2.22.1840) – „Nackt ist ein Fluss ohne Wasser, nackt ist ein Reich ohne König; nackt ist auch eine ehemannlose Frau, selbst wenn sie zehn Brüder hat.“ Idaṃ suttaṃ āharitabbaṃ. Dieses Sutta ist hier anzuführen. Rājā tassā pasanno ‘‘ime te tayo janā ke hontī’’ti pucchi. ‘‘Eko me, deva, sāmiko, eko bhātā, eko putto’’ti. Rājā ‘‘ahaṃ te tuṭṭho, imesu tīsu ekaṃ demi, kataraṃ icchasī’’ti pucchi. Sā āha ‘‘ahaṃ, deva, jīvamānā ekaṃ sāmikaṃ labhissāmi, puttampi labhissāmiyeva, mātāpitūnaṃ pana me matattā bhātāva dullabho, bhātaraṃ me dehi, devā’’ti. Rājā tussitvā tayopi vissajjesi. Evaṃ taṃ ekikaṃ nissāya te tayo janā dukkhato muttā. Taṃ kāraṇaṃ bhikkhusaṅghe pākaṭaṃ jātaṃ. Athekadivasaṃ bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitā ‘‘āvuso, ekaṃ itthiṃ nissāya tayo janā dukkhato muttā’’ti tassā guṇakathāya nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, esā itthī idāneva te tayo jane dukkhā moceti, pubbepi mocesiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Der König, von ihr angetan, fragte: „Wer sind diese drei Männer für dich?“ „Einer, o Herr, ist mein Ehemann, einer mein Bruder, einer mein Sohn“, antwortete sie. Der König sprach: „Ich bin mit dir zufrieden, von diesen dreien gebe ich dir einen; welchen wünschst du?“ Sie sprach: „O König, solange ich lebe, werde ich wohl einen Ehemann bekommen, und auch einen Sohn werde ich gewiss bekommen. Da aber meine Eltern gestorben sind, ist ein Bruder wahrlich schwer zu bekommen. Gib mir meinen Bruder, o König!“ Der König war hocherfreut und ließ alle drei frei. So wurden diese drei Männer dank dieser einen Frau aus dem Leiden befreit. Diese Angelegenheit wurde in der Mönchsgemeinde bekannt. Da versammelten sich die Mönche eines Tages in der Versammlungshalle und saßen da, während sie das Lob dieser Frau sprachen: „Ihr Brüder, dank einer einzigen Frau wurden drei Männer aus dem Leiden befreit.“ Der Meister kam hinzu und fragte: „Zu welchem Thema habt ihr euch hier versammelt, ihr Mönche?“ Als sie antworteten: „Zu diesem“, sprach er: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, hat diese Frau diese drei Männer aus dem Leiden befreit, auch in der Vergangenheit hat sie sie befreit“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente tayo janā aṭavimukhe kasantīti sabbaṃ purimasadisameva. Tadā pana raññā ‘‘tīsu janesu kaṃ icchasī’’ti vutte sā āha – ‘‘tayopi dātuṃ na sakkotha, devā’’ti? ‘‘Āma, na sakkomī’’ti. ‘‘Sace tayo dātuṃ na sakkotha, bhātaraṃ me dethā’’ti. ‘‘Puttaṃ vā sāmikaṃ vā gaṇha, kiṃ te bhātarā’’ti ca vuttā ‘‘ete nāma deva sulabhā, bhātā pana dullabho’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, pflügten drei Männer an einem Waldrand – alles ist genau wie in der vorhergehenden Geschichte. Als sie damals vom König gefragt wurde: „Wen von den dreien wünschst du?“, sagte sie: „Könnt ihr mir nicht alle drei geben, o König?“ „Nein, das kann ich nicht“, sprach er. „Wenn ihr mir nicht alle drei geben könnt, so gebt mir meinen Bruder.“ Und als er zu ihr sprach: „Nimm doch entweder den Sohn oder den Ehemann, was soll dir der Bruder?“, sprach sie: „Diese, o König, sind leicht zu bekommen, ein Bruder aber ist schwer zu bekommen“, und sprach diese Strophe: 67. 67. ‘‘Ucchaṅge [Pg.326] deva me putto, pathe dhāvantiyā pati; Tañca desaṃ na passāmi, yato sodariyamānaye’’ti. „In meinem Schoß, o König, mein Sohn; auf dem Weg, auf dem ich laufe, ein Ehemann; jenen Ort aber sehe ich nicht, aus dem ich einen leiblichen Bruder herbringen könnte.“ Tattha ucchaṅge, deva, me puttoti deva, mayhaṃ putto ucchaṅgeyeva. Yathā hi araññaṃ pavisitvā ucchaṅge katvā ḍākaṃ uccinitvā tattha pakkhipantiyā ucchaṅge ḍākaṃ nāma sulabhaṃ hoti, evaṃ itthiyā puttopi sulabho ucchaṅge ḍākasadisova. Tena vuttaṃ ‘‘ucchaṅge, deva, me putto’’ti. Pathe dhāvantiyā patīti maggaṃ āruyha ekikāya gacchamānāyapi hi itthiyā pati nāma sulabho, diṭṭhadiṭṭhoyeva hoti. Tena vuttaṃ ‘‘pathe dhāvantiyā patī’’ti. Tañca desaṃ na passāmi, yato sodariyamānayeti yasmā pana me mātāpitaro natthi, tasmā idāni taṃ mātukucchisaṅkhātaṃ aññaṃ desaṃ na passāmi. Yato ahaṃ samāne udare jātattā saudariyasaṅkhātaṃ bhātaraṃ āneyyaṃ, tasmā bhātaraṃyeva me dethāti. Darin bedeutet „In meinem Schoß, o König, mein Sohn“: O König, mein Sohn ist gleichsam in meinem Schoß. Wie nämlich eine Frau, die in den Wald geht, ihren Schoß als Behältnis nutzt, Gemüse sammelt und es hineinwirft, so dass das Gemüse in ihrem Schoß leicht zu erlangen ist, ebenso ist auch für eine Frau ein Sohn leicht zu erlangen, gleichsam wie Gemüse im Schoß. Daher wurde gesagt: „In meinem Schoß, o König, mein Sohn.“ „Auf dem Weg, auf dem ich laufe, ein Ehemann“ bedeutet: Selbst für eine Frau, die sich auf den Weg macht und allein reist, ist ein Ehemann leicht zu erlangen; er begegnet ihr auf Schritt und Tritt. Daher wurde gesagt: „Auf dem Weg, auf dem ich laufe, ein Ehemann.“ „Jenen Ort aber sehe ich nicht, aus dem ich einen leiblichen Bruder herbringen könnte“ bedeutet: Da meine Mutter und mein Vater nicht mehr am Leben sind, sehe ich nun keinen anderen Ort – nämlich den Schoß einer Mutter – mehr, aus dem ich einen aus demselben Mutterleib geborenen, leiblichen Bruder herbringen könnte. Darum gebt mir eben meinen Bruder. Dies ist die Erklärung. Rājā ‘‘saccaṃ esā vadatī’’ti tuṭṭhacitto tayopi jane bandhanāgārato ānetvā adāsi, sā tayopi te gahetvā gatā. Der König dachte: „Sie sagt die Wahrheit“, und hocherfreut ließ er alle drei Männer aus dem Gefängnis holen und gab sie ihr. Sie nahm alle drei mit sich und ging fort. Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, idāneva, pubbepesā ime tayo jane dukkhato mocesiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘atīte cattārova etarahi cattāro, rājā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, sondern auch in der Vergangenheit hat diese Frau diese drei Personen aus dem Leiden befreit.“ Er trug diese Lehrverkündigung vor, stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Die vier Personen in der Vergangenheit sind genau die vier Personen von heute, der König aber war ich selbst.“ Ucchaṅgajātakavaṇṇanā sattamā. Die siebte Erklärung des Ucchaṅga-Jātaka.
[68] 8. Sāketajātakavaṇṇanā [68] 8. Erklärung des Sāketa-Jātaka. Yasmiṃ mano nivisatīti idaṃ satthā sāketaṃ nissāya añjanavane viharanto ekaṃ brāhmaṇaṃ ārabbha kathesi. Bhagavato kira bhikkhusaṅghaparivutassa sāketaṃ piṇḍāya pavisanakāle eko sāketanagaravāsī mahallakabrāhmaṇo nagarato bahi gacchanto antaradvāre dasabalaṃ disvā pādesu patitvā gopphakesu gāḷhaṃ gahetvā ‘‘tāta, nanu nāma puttehi jiṇṇakāle mātāpitaro paṭijaggitabbā, kasmā ettakaṃ [Pg.327] kālaṃ amhākaṃ attānaṃ na dassesi? Mayā tāva diṭṭhosi, mātaraṃ pana passituṃ ehī’’ti satthāraṃ gahetvā attano gehaṃ agamāsi. Satthā tattha gantvā nisīdi paññatte āsane saddhiṃ bhikkhusaṅghena. Brāhmaṇīpi āgantvā satthu pādesu patitvā ‘‘tāta, ettakaṃ kālaṃ kahaṃ gatosi, nanu nāma mātāpitaro mahallakakāle upaṭṭhātabbā’’ti paridevi. Puttadhītaropi ‘‘etha, bhātaraṃ vandathā’’ti vandāpesi. Ubho tuṭṭhamānasā mahādānaṃ adaṃsu. Satthā bhattakiccaṃ niṭṭhāpetvā tesaṃ dvinnampi janānaṃ jarāsuttaṃ (su. ni. 810 ādayo) kathesi. Suttapariyosāne ubhopi anāgāmiphale patiṭṭhahiṃsu. Satthā uṭṭhāyāsanā añjanavanameva agamāsi. „Auf wen sich der Geist richtet“ – diese Lehrrede hielt der Meister, während er in der Nähe von Sāketa im Añjana-Wald verweilte, im Hinblick auf einen bestimmten Brahmanen. Als der Erhabene, umgeben von der Mönchsgemeinde, Sāketa zur Almosenrunde betreten wollte, erblickte ein alter, in Sāketa ansässiger Brahmane, der gerade die Stadt verließ, den Zehnkraftbegabten am Zwischentor. Er warf sich ihm zu Füßen, packte fest seine Knöchel und rief: „Sohn, müssen Kinder nicht etwa ihre Eltern im Alter pflegen? Warum hast du dich uns so lange Zeit nicht gezeigt? Nun habe ich dich endlich gesehen; komm mit, um auch deine Mutter zu sehen!“ Er führte den Meister mit sich und ging zu seinem Haus. Der Meister begab sich dorthin und setzte sich zusammen mit der Mönchsgemeinde auf den vorbereiteten Sitz. Auch die Brahmanin kam herbei, warf sich dem Meister zu Füßen und klagte: „Sohn, wo bist du all diese Zeit gewesen? Müssen Kinder nicht etwa ihre Eltern im Alter pflegen?“ Sie hieß auch ihre Söhne und Töchter mit den Worten: „Kommt, erweist eurem älteren Bruder die Ehre!“ ihn verehren. Beide gaben mit erfreutem Herzen eine große Gabe. Als der Meister das Mahl beendet hatte, verkündete er diesen beiden Personen das Jarā-Sutta. Am Ende des Suttas erlangten beide die Frucht der Nichtwiederkehr. Der Meister erhob sich von seinem Sitz und kehrte in den Añjana-Wald zurück. Bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannisinnā kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, brāhmaṇo ‘tathāgatassa pitā suddhodano, mātā mahāmāyā’ti jānāti, jānantova saddhiṃ brāhmaṇiyā tathāgataṃ ‘amhākaṃ putto’ti vadati, satthāpi adhivāseti. Kiṃ nu kho kāraṇa’’nti? Satthā tesaṃ kathaṃ sutvā ‘‘bhikkhave, ubhopi te attano puttameva ‘putto’ti vadantī’’ti vatvā atītaṃ āhari. In der Halle der Lehre versammelt, begannen die Mönche folgendes Gespräch: „Freunde, der Brahmane weiß doch: ‚Der Vater des Tathāgata ist Suddhodana, seine Mutter ist Mahāmāyā.‘ Obwohl er dies weiß, nennt er zusammen mit der Brahmanin den Tathāgata ‚unseren Sohn‘, und auch der Meister lässt dies geschehen. Was mag wohl der Grund dafür sein?“ Als der Meister ihr Gespräch hörte, sagte er: „Mönche, diese beiden nennen in der Tat nur ihren eigenen Sohn ‚Sohn‘“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Bhikkhave, ayaṃ brāhmaṇo atīte nirantaraṃ pañca jātisatāni mayhaṃ pitā ahosi, pañca jātisatāni cūḷapitā, pañca jātisatāni mahāpitā. Esāpi brāhmaṇī nirantarameva pañca jātisatāni mātā ahosi, pañca jātisatāni cūḷamātā, pañca jātisatāni mahāmātā. Evāhaṃ diyaḍḍhajātisahassaṃ brāhmaṇassa hatthe saṃvaḍḍho, diyaḍḍhajātisahassaṃ brāhmaṇiyā hatthe saṃvaḍḍhoti tīṇi jātisahassāni kathetvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – „Mönche, dieser Brahmane war in der Vergangenheit ununterbrochen fünfhundert Leben lang mein Vater, fünfhundert Leben lang mein Onkel und fünfhundert Leben lang mein älterer Vaterbruder. Auch diese Brahmanin war ununterbrochen fünfhundert Leben lang meine Mutter, fünfhundert Leben lang meine Tante und fünfhundert Leben lang meine ältere Mutterschwester. So bin ich eintausendfünfhundert Leben lang an der Hand des Brahmanen aufgewachsen und eintausendfünfhundert Leben lang an der Hand der Brahmanin.“ Nachdem er so von dreitausend Leben gesprochen hatte, sprach er als vollkommen Erwachter folgende Strophe: 68. 68. ‘‘Yasmiṃ mano nivisati, cittañcāpi pasīdati; Adiṭṭhapubbake pose, kāmaṃ tasmimpi vissase’’ti. „Auf wen der Geist sich richtet, und in wem das Herz Vertrauen findet, zu diesem Menschen, selbst wenn man ihn zuvor nie sah, mag man wahrlich volles Vertrauen fassen.“ Tattha yasmiṃ mano nivisatīti yasmiṃ puggale diṭṭhamatteyeva cittaṃ patiṭṭhāti. Cittañcāpi pasīdatīti yasmiṃ diṭṭhamatte cittaṃ pasīdati, mudukaṃ hoti. Adiṭṭhapubbake poseti pakatiyā tasmiṃ attabhāve adiṭṭhapubbepi [Pg.328] puggale. Kāmaṃ tasmimpi vissaseti anubhūtapubbasineheneva tasmimpi puggale ekaṃsena vissase, vissāsaṃ āpajjatiyevāti attho. Dabei bedeutet „Auf wen der Geist sich richtet“: Bei welcher Person allein beim bloßen Anblick der Geist (die Zuneigung) verweilt. „Und in wem das Herz Vertrauen findet“ bedeutet: Bei dessen Anblick der Geist rein und sanft wird. „Zu einem Menschen, den man zuvor nie sah“ bedeutet: Zu einer Person, die man in dieser Existenz natürlicherweise zuvor noch nie gesehen hat. „Mag man wahrlich volles Vertrauen fassen“ bedeutet: Allein aufgrund der in der Vergangenheit erfahrenen Liebe fasst man zu dieser Person ganz gewiss Vertrauen; man gelangt wahrlich zu tiefem Vertrauen. Dies ist die Bedeutung. Evaṃ satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā brāhmaṇo ca brāhmaṇī ca ete eva ahesuṃ, putto pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, verknüpfte er das Jātaka mit den Worten: „Damals waren jener Brahmane und jene Brahmanin eben diese beiden; der Sohn aber war ich selbst.“ Sāketajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Sāketa-Jātaka ist die achte.
[69] 9. Visavantajātakavaṇṇanā [69] 9. Erklärung des Visavanta-Jātaka. Dhiratthu taṃ visaṃ vantanti idaṃ satthā jetavane viharanto dhammasenāpatiṃ ārabbha kathesi. Therassa kira piṭṭhakhajjakakhādanakāle manussā saṅghassa bahuṃ piṭṭhakhādanīyaṃ gahetvā vihāraṃ agamaṃsu, bhikkhusaṅghassa gahitāvasesaṃ bahu atirittaṃ ahosi. Manussā ‘‘bhante, antogāmagatānampi gaṇhathā’’ti āhaṃsu. Tasmiṃ khaṇe therassa saddhivihāriko daharo antogāme hoti, tassa koṭṭhāsaṃ gahetvā tasmiṃ anāgacchante ‘‘atidivā hotī’’ti therassa adaṃsu. Therena tasmiṃ paribhutte daharo agamāsi. Atha naṃ thero ‘‘mayaṃ, āvuso, tuyhaṃ ṭhapitakhādanīyaṃ paribhuñjimhā’’ti āha. So ‘‘madhuraṃ nāma, bhante, kassa appiya’’nti āha. Mahātherassa saṃvego uppajji. So ito paṭṭhāya ‘‘piṭṭhakhādanīyaṃ na khādissāmī’’ti adhiṭṭhāsi. Tato paṭṭhāya kira sāriputtattherena piṭṭhakhādanīyaṃ nāma na khāditapubbaṃ. Tassa piṭṭhakhādanīyaṃ akhādanabhāvo bhikkhusaṅghe pākaṭo jāto. Bhikkhū taṃ kathaṃ kathentā dhammasabhāyaṃ nisīdiṃsu. Atha satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘bhikkhave, sāriputto ekavāraṃ jahitakaṃ jīvitaṃ pariccajantopi puna na gaṇhātiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Schande über jenes ausgespuckte Gift“ – diese Lehrrede hielt der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf den Feldherrn der Lehre (Sāriputta). Als der Ehrwürdige einst Kuchen aß, brachten die Menschen eine große Menge Kuchen für die Gemeinde und begaben sich zum Kloster. Was nach dem Empfang durch die Mönchsgemeinde übrig blieb, war reichlich vorhanden. Die Menschen sagten: „Ehrwürdige Herren, nehmt doch auch für diejenigen, die ins Dorf gegangen sind.“ Zu jener Zeit befand sich ein junger Mitbewohner des Ehrwürdigen im Dorf. Man nahm seinen Anteil, und da er nicht zurückkehrte und es bereits sehr spät am Tag war, gaben sie ihn dem Ehrwürdigen. Nachdem der Ehrwürdige diesen verzehrt hatte, traf der junge Mönch ein. Da sprach der Ehrwürdige zu ihm: „Freund, wir haben den für dich aufgehobenen Kuchen gegessen.“ Jener sagte: „Ehrwürdiger Herr, wem schmeckt das Süße denn nicht?“ Da stieg im großen Ehrwürdigen tiefe Erschütterung auf. Er gelobte von jenem Zeitpunkt an: „Ich werde keinen Kuchen mehr essen.“ Seit dieser Zeit soll der Ehrwürdige Sāriputta niemals wieder Kuchen gegessen haben. Dass er keinen Kuchen mehr aß, wurde in der Mönchsgemeinde bekannt. Die Mönche saßen in der Halle der Lehre und unterhielten sich darüber. Da kam der Meister herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem Thema“, sagte der Meister: „Mönche, Sāriputta nimmt das, was er einmal aufgegeben hat, selbst unter Preisgabe seines Lebens nicht wieder an“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto visavejjakule nibbattitvā vejjakammena jīvikaṃ kappesi. Athekaṃ janapadamanussaṃ sappo ḍaṃsi, tassa ñātakā pamādaṃ akatvā khippaṃ vejjaṃ ānayiṃsu[Pg.329]. Vejjo āha ‘‘kiṃ tāva osadhena, paribhāvetvā visaṃ harāmi, daṭṭhasappaṃ āvāhetvā daṭṭhaṭṭhānato teneva visaṃ ākaḍḍhāpemī’’ti. ‘‘Sappaṃ āvāhetvā visaṃ ākaḍḍhāpehī’’ti. So sappaṃ āvāhetvā ‘‘tayā ayaṃ daṭṭho’’ti āha. ‘‘Āma, mayā’’ti. ‘‘Tayā daṭṭhaṭṭhānato tvaññeva mukhena visaṃ ākaḍḍhāhī’’ti. ‘‘Mayā ekavāraṃ jahitakaṃ puna na gahitapubbaṃ, nāhaṃ mayā jahitavisaṃ ākaḍḍhissāmī’’ti. So dārūni āharāpetvā aggiṃ katvā āha ‘‘sace attano visaṃ nākaḍḍhasi, imaṃ aggiṃ pavisā’’ti. Sappo ‘‘api aggiṃ pavisissāmi, nevattanā ekavāraṃ jahitavisaṃ paccāharissāmī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Familie von Giftärzten geboren und verdiente seinen Lebensunterhalt mit der Heilkunst. Da biss eine Schlange einen Mann vom Lande. Seine Verwandten blieben nicht untätig, sondern holten rasch den Arzt herbei. Der Arzt fragte: „Soll ich zuerst mit Medizin das Gift behandeln und vertreiben, oder soll ich die Schlange herbeirufen und sie das Gift direkt aus der Bissstelle heraussaugen lassen?“ Sie antworteten: „Rufe die Schlange herbei und lass sie das Gift heraussaugen!“ Er rief die Schlange herbei und fragte sie: „Hast du diesen Mann gebissen?“ Sie antwortete: „Ja, ich habe es getan.“ „Dann sauge du selbst mit deinem eigenen Mund das Gift aus der Bissstelle wieder heraus!“ Die Schlange entgegnete: „Was ich einmal ausgestoßen habe, habe ich noch nie wieder zurückgenommen. Ich werde das von mir ausgestoßene Gift nicht wieder heraussaugen.“ Da ließ er Holz herbeischaffen, entfachte ein Feuer und sagte: „Wenn du dein Gift nicht heraussaugst, so geh in dieses Feuer!“ Die Schlange dachte: „Eher gehe ich ins Feuer, als das einmal von mir ausgestoßen Gift wieder zurückzunehmen“, und sprach folgende Strophe: 69. 69. ‘‘Dhiratthu taṃ visaṃ vantaṃ, yamahaṃ jīvitakāraṇā; Vantaṃ paccāharissāmi, mataṃ me jīvitā vara’’nti. „Schande über jenes ausgespuckte Gift, das ich um des Lebens willen wieder aufnehmen würde; zu sterben ist mir weitaus lieber als ein solches Leben.“ Tattha dhiratthūti garahatthe nipāto. Taṃ visanti yamahaṃ jīvitakāraṇā vantaṃ visaṃ paccāharissāmi, taṃ vantaṃ visaṃ dhiratthu. Mataṃ me jīvitā varanti tassa visassa apaccāharaṇakāraṇā yaṃ aggiṃ pavisitvā maraṇaṃ, taṃ mama jīvitato varanti attho. Darin ist 'dhiratthu' eine Partikel im Sinne des Tadelns. 'Taṃ visaṃ' bedeutet: 'Das Gift, das ich um des Lebens willen wieder zu mir nehmen würde, nachdem ich es ausgespuckt habe, Pfui über dieses ausgespuckte Gift!' 'Mataṃ me jīvitā varaṃ' bedeutet: Weil ich dieses Gift nicht wieder aufnehme, ist der Tod, der eintritt, wenn man ins Feuer geht, für mich besser als das Leben; das ist die Bedeutung. Evañca pana vatvā aggiṃ pavisituṃ pāyāsi. Atha naṃ vejjo nivāretvā taṃ purisaṃ osadhehi ca mantehi ca nibbisaṃ arogaṃ katvā sappassa sīlāni datvā ‘‘ito paṭṭhāya mā kañci viheṭhesī’’ti vatvā vissajjesi. Nachdem er dies gesagt hatte, machte er sich auf den Weg, um ins Feuer zu gehen. Da hielt ihn der Arzt auf, befreite jenen Mann durch Heilkräuter und Zaubersprüche vom Gift, machte ihn gesund, gab der Schlange die Tugendregeln und entließ sie mit den Worten: 'Ab heute sollst du niemanden mehr quälen!' Satthāpi ‘‘na, bhikkhave, sāriputto ekavāraṃ jahitakaṃ jīvitampi pariccajanto puna gaṇhātī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā sappo sāriputto ahosi, vejjo pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrverkündigung vor, indem er sagte: 'Ihr Mönche, Sāriputta nimmt das, was er einmal aufgegeben hat, nicht wieder an, selbst wenn er sein Leben hingibt', stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka wie folgt zusammen: 'Damals war die Schlange Sāriputta, der Arzt aber war ich selbst.' Visavantajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Visavanta-Jātaka ist die neunte.
[70] 10. Kuddālajātakavaṇṇanā [70] 10. Die Erklärung des Kuddāla-Jātaka Na [Pg.330] taṃ jitaṃ sādhu jitanti idaṃ satthā jetavane viharanto cittahatthasāriputtaṃ ārabbha kathesi. So kira sāvatthiyaṃ eko kuladārako. Athekadivasaṃ kasitvā āgacchanto vihāraṃ pavisitvā ekassa therassa pattato siniddhaṃ madhuraṃ paṇītabhojanaṃ labhitvā cintesi ‘‘mayaṃ rattindivaṃ sahatthena nānākammāni kurumānāpi evarūpaṃ madhurāhāraṃ na labhāma, mayāpi samaṇena bhavitabba’’nti. So pabbajitvā māsaḍḍhamāsaccayena ayoniso manasikaronto kilesavasiko hutvā vibbhamitvā puna bhattena kilamanto āgantvā pabbajitvā abhidhammaṃ uggaṇhi. Imināva upāyena cha vāre vibbhamitvā pabbajito. Tato sattame bhikkhubhāve sattappakaraṇiko hutvā bahū bhikkhū dhammaṃ vācento vipassanaṃ vaḍḍhetvā arahattaṃ pāpuṇi. Athassa sahāyakā bhikkhū ‘‘kiṃ nu kho, āvuso cittahattha, pubbe viya te etarahi kilesā na vaḍḍhantī’’ti parihāsaṃ kariṃsu. ‘‘Āvuso, abhabbo dāni ahaṃ ito paṭṭhāya gihibhāvāyā’’ti. Dies: 'Nicht das ist ein Sieg, was gut gesiegt ist' erzählte der Meister, als er im Jetavana verwelte, bezüglich Cittahattha Sāriputta. Jener war, wie man sagt, ein Sohn aus gutem Hause in Sāvatthi. Als er eines Tages nach dem Pflügen zurückkehrte, betrat er das Kloster und erhielt aus der Schale eines Thera nahrhaftes, süßes, vorzügliches Essen. Da dachte er: 'Obwohl wir Tag und Nacht mit eigenen Händen verschiedene Arbeiten verrichten, erhalten wir keine solche köstliche Nahrung. Ich sollte auch ein Mönch werden.' Er trat in den Orden ein, wurde jedoch nach Ablauf von anderthalb Monaten aufgrund unweiser Aufmerksamkeit von den Leidenschaften beherrscht, trat wieder aus, und als er wieder unter der Mühsal des Broterwerbs litt, kehrte er zurück, trat wieder ein und erlernte das Abhidhamma. Auf diese Weise trat er sechsmal aus und wieder ein. Danach, bei seiner siebten Mönchschaft, beherrschte er die sieben Abhandlungen [des Abhidhamma], lehrte viele Mönche das Dhamma, entfaltete die Einsicht und erlangte die Arahatschaft. Da scherzten seine befreundeten Mönche mit ihm: 'Freund Cittahattha, regen sich in dir jetzt die Leidenschaften nicht mehr so wie früher?' Er antwortete: 'Freunde, von nun an bin ich unfähig, wieder ins Laienleben zurückzukehren.' Evaṃ tasmiṃ arahattaṃ patte dhammasabhāyaṃ kathā udapādi ‘‘āvuso, evarūpassa nāma arahattassa upanissaye sati āyasmā cittahatthasāriputto chakkhattuṃ uppabbajito, aho mahādoso puthujjanabhāvo’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘bhikkhave, puthujjanacittaṃ nāma lahukaṃ dunniggahaṃ, ārammaṇavasena gantvā allīyati, ekavāraṃ allīnaṃ na sakkā hoti khippaṃ mocetuṃ, evarūpassa cittassa damatho sādhu. Dantameva hi taṃ sukhaṃ āvahati. Als er auf diese Weise die Arahatschaft erlangt hatte, entstand in der Lehrhalle das Gespräch: 'Freunde, obwohl der ehrwürdige Cittahattha Sāriputta die starke Voraussetzung für eine solche Arahatschaft besaß, ist er sechsmal ausgetreten. Oh, wie voller Fehler ist doch der Zustand eines Weltlings!' Der Meister kam hinzu und fragte: 'Mit welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt, ihr Mönche?' Als sie antworteten: 'Mit diesem', sprach er: 'Mönche, der Geist eines Weltlings ist wahrlich flüchtig und schwer zu zügeln; er eilt den Sinnesobjekten nach und haftet an ihnen. Wenn er einmal verhaftet ist, kann man ihn nicht so schnell wieder befreien. Die Bezähmung eines solchen Geistes ist gut. Denn ein bezähmter Geist bringt Glück.' ‘‘Dunniggahassa lahuno, yatthakāmanipātino; Cittassa damatho sādhu, cittaṃ dantaṃ sukhāvahaṃ’’. (dha. pa. 35); 'Die Bezähmung des schwer zu zügelnden, flüchtigen Geistes, der sich dorthin wendet, wohin es ihn gelüstet, ist gut; ein gezähmter Geist bringt Glück.' (Dhp. 35) Tassa pana dunniggahatāya pubbe paṇḍitā ekaṃ kuddālakaṃ nissāya taṃ jahituṃ asakkontā lobhavasena chakkhattuṃ uppabbajitvā sattame pabbajitabhāve jhānaṃ uppādetvā taṃ lobhaṃ niggaṇhiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. 'Wegen dieser Schwerbezähmbarkeit des Geistes konnten Weise in alten Zeiten wegen einer einzigen Hacke diese nicht aufgeben, traten aus Gier sechsmal aus dem Orden aus, erzeugten aber bei ihrer siebten Ordination die Vertiefung und bezähmten diese Gier.' Nach diesen Worten trug er die Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte [Pg.331] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto paṇṇikakule nibbattitvā viññutaṃ pāpuṇi, ‘‘kuddālapaṇḍito’’tissa nāmaṃ ahosi. So kuddālakena bhūmiparikammaṃ katvā ḍākañceva alābukumbhaṇḍaeḷālukādīni ca vapitvā tāni vikkiṇanto kapaṇajīvikaṃ kappesi. Tañhissa ekaṃ kuddālakaṃ ṭhapetvā aññaṃ dhanaṃ nāma natthi. So ekadivasaṃ cintesi ‘‘kiṃ me gharāvāsena, nikkhamitvā pabbajissāmī’’ti. Athekadivasaṃ kuddālakaṃ paṭicchannaṭṭhāne ṭhapetvā isipabbajjaṃ pabbajitvā taṃ kuddālakaṃ anussaritvā lobhaṃ chindituṃ asakkonto kuṇṭhakuddālakaṃ nissāya uppabbaji. Evaṃ dutiyampi, tatiyampīti cha vāre taṃ kuddālakaṃ paṭicchannaṭṭhāne nikkhipitvā pabbajito ceva uppabbajito ca. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in der Familie eines Gemüsehändlers geboren und erlangte Unterscheidungsvermögen; sein Name war 'Kuddāla-Paṇḍita'. Er bearbeitete den Boden mit einer Hacke, pflanzte Gemüse, Flaschenkürbisse, Riesenkürbisse, Gurken und dergleichen an, verkaufte diese und führte ein kärgliches Leben. Abgesehen von jener einen Hacke besaß er kein anderes Vermögen. Eines Tages dachte er: 'Was nützt mir das Leben als Hausvater? Ich will in die Hauslosigkeit hinausziehen und Entsagung üben.' Eines Tages versteckte er die Hacke an einem verborgenen Ort, empfing die Seher-Weihe, dachte jedoch wieder an jene Hacke, und da er seine Begierde nicht überwinden konnte, trat er wegen dieser stumpfen Hacke wieder aus dem Orden aus. Auf dieselbe Weise versteckte er auch ein zweites und ein drittes Mal jene Hacke an einem verborgenen Ort, trat in den Orden ein und wieder aus – insgesamt sechsmal. Sattame pana vāre cintesi ‘‘ahaṃ imaṃ kuṇṭhakuddālakaṃ nissāya punappunaṃ uppabbajito, idāni naṃ mahānadiyaṃ pakkhipitvā pabbajissāmī’’ti nadītīraṃ gantvā ‘‘sacassa patitaṭṭhānaṃ passissāmi, punāgantvā uddharitukāmatā bhaveyyā’’ti taṃ kuddālakaṃ daṇḍe gahetvā nāgabalo thāmasampanno sīsassa uparibhāge tikkhattuṃ āvijjhitvā akkhīni nimmīletvā nadīmajjhe khipitvā ‘‘jitaṃ me jitaṃ me’’ti tikkhattuṃ sīhanādaṃ nadi. Tasmiṃ khaṇe bārāṇasirājā paccantaṃ vūpasametvā āgato nadiyā sīsaṃ nhāyitvā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍito hatthikkhandhena gacchamāno taṃ bodhisattassa saddaṃ sutvā ‘‘ayaṃ puriso ‘jitaṃ me jitaṃ me’ti vadati, ko nu kho etena jito, pakkosatha na’’nti pakkosāpetvā ‘‘bho purisa, ahaṃ tāva vijitasaṅgāmo idāni jayaṃ gahetvā āgacchāmi, tayā pana ko jito’’ti pucchi. Bodhisatto ‘‘mahārāja, tayā saṅgāmasatampi saṅgāmasahassampi saṅgāmasatasahassampi jinantena dujjitameva kilesānaṃ ajitattā. Ahaṃ pana mama abbhantare lobhaṃ niggaṇhanto kilese jini’’nti kathentoyeva mahānadiṃ oloketvā āpokasiṇārammaṇaṃ jhānaṃ nibbattetvā sampattānubhāvo ākāse nisīditvā rañño dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Beim siebten Mal jedoch dachte er: 'Wegen dieser stumpfen Hacke bin ich immer wieder ausgetreten. Nun werde ich sie in den großen Fluss werfen und Entsagung üben.' Er ging an das Flussufer und dachte: 'Wenn ich die Stelle sehe, wo sie hineinfällt, überkommt mich vielleicht wieder das Verlangen, zurückzukehren und sie herauszuholen.' Da ergriff der Bodhisatta, der mit der Kraft eines Elefanten ausgestattet war, jene Hacke am Stiel, wirbelte sie dreimal über seinem Kopf im Kreis, schloss die Augen und warf sie mitten in den Fluss. Dann stieß er dreimal den Löwenruf aus: 'Ich habe gesiegt! Ich habe gesiegt!' In diesem Moment kehrte der König von Bārāṇasī zurück, nachdem er die Grenzregion befriedet hatte. Er hatte ein Bad im Fluss genommen, war mit allem Schmuck geschmückt und ritt auf dem Nacken eines Elefanten vorüber. Er hörte den Ruf des Bodhisatta und dachte: 'Dieser Mann sagt: „Ich habe gesiegt! Ich habe gesiegt!“ Wer wurde wohl von ihm besiegt? Ruft ihn her!' Er ließ ihn herbeirufen und fragte: 'He, Mann, ich selbst habe die Schlacht gewonnen und komme nun siegreich zurück. Wer aber wurde von dir besiegt?' Der Bodhisatta sprach: 'Großer König, selbst wenn du hundert Schlachten, tausend Schlachten oder gar hunderttausend Schlachten gewinnst, ist dies doch ein schlechter Sieg, weil die Leidenschaften nicht besiegt sind. Ich aber habe, indem ich die Gier in meinem Inneren bezähmte, die Leidenschaften besiegt.' Während er dies sagte, blickte er auf den großen Fluss, erzeugte die Vertiefung mit dem Meditationsobjekt der Wasser-Kasiṇa, erlangte übernatürliche Kräfte, setzte sich in die Luft und verkündete dem König das Dhamma, indem er diese Strophe sprach: 70. 70. ‘‘Na taṃ jitaṃ sādhu jitaṃ, yaṃ jitaṃ avajīyati; Taṃ kho jitaṃ sādhu jitaṃ, yaṃ jitaṃ nāvajīyatī’’ti. 'Nicht jener Sieg ist ein guter Sieg, der wieder in eine Niederlage umschlägt; jener Sieg wahrlich ist ein guter Sieg, der nicht wieder in eine Niederlage umschlägt.' Tattha [Pg.332] na taṃ jitaṃ sādhu jitaṃ, yaṃ jitaṃ avajīyatīti yaṃ paccāmitte parājinitvā raṭṭhaṃ jitaṃ paṭiladdhaṃ punapi tehi paccāmittehi avajīyati, taṃ jitaṃ sādhujitaṃ nāma na hoti. Kasmā? Puna avajīyanato. Aparo nayo – jitaṃ vuccati jayo. Yo paccāmittehi saddhiṃ yujjhitvā adhigato jayo puna tesu jinantesu, parājayo hoti, so na sādhu na sobhano. Kasmā? Yasmā puna parājayova hoti. Taṃ kho jitaṃ sādhu jitaṃ, yaṃ jitaṃ nāvajīyatīti yaṃ kho pana paccāmitte nimmathetvā jitaṃ puna tehi nāvajīyati, yo vā ekavāraṃ laddho jayo na puna parājayo hoti, taṃ jitaṃ sādhu jitaṃ sobhanaṃ, so jayo sādhu sobhano nāma hoti. Kasmā? Puna nāvajīyanato. Tasmā, tvaṃ mahārāja, satakkhattumpi sahassakkhattumpi satasahassakkhattumpi saṅgāmasīsaṃ jinitvāpi saṅgāmayodho nāma na hosi. Kiṃkāraṇā? Attano kilesānaṃ ajitattā. Yo pana ekavārampi attano abbhantare kilese jināti, ayaṃ uttamo saṅgāmasīsayodhoti ākāse nisinnakova buddhalīlāya rañño dhammaṃ desesi. Uttamasaṅgāmayodhabhāvo panettha – Hierin [bedeutet die Stelle]: 'Das ist kein gut errungener Sieg, welcher Sieg wieder verloren geht' (na taṃ jitaṃ sādhu jitaṃ, yaṃ jitaṃ avajīyati): Wenn man die Feinde besiegt hat und ein Reich erobert und zurückgewonnen hat, dieses aber wieder von eben diesen Feinden zurückerobert wird, so ist jener Sieg kein sogenannter guter Sieg. Warum? Weil er wieder verloren geht. Eine andere Erklärungsmethode: Als 'Sieg' (jita) wird der Triumph (jayo) bezeichnet. Derjenige Triumph, den man im Kampf mit den Feinden erlangt hat, welcher jedoch, wenn diese wiederum siegen, zu einer Niederlage wird, der ist weder gut noch schön. Warum? Weil daraus wieder eine Niederlage entsteht. 'Jener Sieg aber ist ein gut errungener Sieg, welcher Sieg nicht wieder verloren geht' (taṃ kho jitaṃ sādhu jitaṃ, yaṃ jitaṃ nāvajīyati): Welcher Sieg nämlich errungen wird, nachdem man die Feinde völlig zerschmettert hat, und der von ihnen nicht wieder zunichte gemacht werden kann, oder jener Triumph, der, einmal erlangt, nicht wieder zu einer Niederlage wird – dieser Sieg ist ein gut errungener, vortrefflicher Sieg, und dieser Triumph wird wahrlich als gut und herrlich bezeichnet. Warum? Weil er nicht wieder verloren geht. Darum, o Großkönig, bist du, selbst wenn du hundertmal, tausendmal oder hunderttausendmal an der Spitze der Schlacht gesiegt hast, kein wahrer Krieger der Schlacht. Aus welchem Grund? Weil du deine eigenen Befleckungen (kilesa) nicht besiegt hast. Wer aber auch nur ein einziges Mal die Befleckungen in seinem eigenen Inneren besiegt, der ist der höchste Krieger an der Spitze der Schlacht.' So predigte er, in der Luft sitzend, mit der Anmut eines Buddhas dem König die Lehre. Der Zustand eines höchsten Kriegers an der Spitze der Schlacht wird hierbei [wie folgt erklärt]: ‘‘Yo sahassaṃ sahassena, saṅgāme mānuse jine; Ekañca jeyyamattānaṃ, sa ve saṅgāmajuttamo’’ti. (dha. pa. 103) – „Wer in der Schlacht tausendmal tausend Menschen besiegen würde, wer aber sich selbst besiegt, den einen, der zu besiegen ist, der ist wahrlich der höchste Sieger in der Schlacht.“ (Dhp. 103) Idaṃ suttaṃ sādhakaṃ. Diese Lehrrede dient als Beleg. Rañño pana dhammaṃ suṇantasseva tadaṅgappahānavasena kilesā pahīnā, pabbajjāya cittaṃ nami. Rājabalassapi tatheva kilesā pahīyiṃsu. Rājā ‘‘idāni tumhe kahaṃ gamissathā’’ti bodhisattaṃ pucchi. ‘‘Himavantaṃ pavisitvā isipabbajjaṃ pabbajissāmi, mahārājā’’ti. ‘‘Tena hi ahampi pabbajissāmī’’ti bodhisatteneva saddhiṃ nikkhami, balakāyo brāhmaṇagahapatikā sabbā seniyoti sabbopi tasmiṃ ṭhāne sannipatito mahājanakāyo raññā saddhiṃyeva nikkhami. Bārāṇasivāsinopi ‘‘amhākaṃ kira rājā kuddālapaṇḍitassa dhammadesanaṃ sutvā pabbajjābhimukho hutvā saddhiṃ balakāyena nikkhanto, mayaṃ idha kiṃ karissāmā’’ti dvādasayojanikāya bārāṇasiyā sakalanagaravāsino nikkhamiṃsu. Dvādasayojanikā parisā ahosi. Taṃ ādāya bodhisatto himavantaṃ pāvisi. Während der König der Lehre lauschte, wurden seine Befleckungen durch das Aufgeben durch Unterdrückung der einzelnen Faktoren (tadaṅgapahāna) vernichtet, und sein Geist neigte sich dem Heimatlosenleben zu. Ebenso wurden auch beim Heer des Königs die Befleckungen vernichtet. Der König fragte den Bodhisatta: „Wohin werdet ihr nun gehen?“ – „O Großkönig, ich werde in den Himalaja ziehen und das asketische Heimatlosenleben aufnehmen.“ – „Wenn dem so ist, werde auch ich das Heimatlosenleben aufnehmen“, sprach er und zog mit dem Bodhisatta aus. Das Heer, die Brahmanen und Hausväter sowie alle Truppenteile – die gesamte an jener Stelle versammelte Volksmenge – zogen gemeinsam mit dem König aus. Auch die Einwohner von Bārāṇasī dachten: „Unser König hat, wie man hört, die Lehrverkündigung des weisen Kuddāla vernommen, hat sich dem Heimatlosenleben zugewandt und ist mit dem Heer ausgezogen; was sollen wir hier noch tun?“ Und so zogen alle Einwohner der zwölf Yojanas großen Stadt Bārāṇasī aus. Es bildete sich eine Gefolgschaft von zwölf Yojanas Ausdehnung. Mit dieser Gefolgschaft zog der Bodhisatta in den Himalaja ein. Tasmiṃ [Pg.333] khaṇe sakkassa devarañño nisinnāsanaṃ uṇhākāraṃ dassesi. So āvajjamāno ‘‘kuddālapaṇḍito mahābhinikkhamanaṃ nikkhanto’’ti disvā ‘‘mahāsamāgamo bhavissati, vasanaṭṭhānaṃ laddhuṃ vaṭṭatī’’ti vissakammaṃ āmantetvā ‘‘tāta, kuddālapaṇḍito mahābhinikkhamanaṃ nikkhanto, vasanaṭṭhānaṃ laddhuṃ vaṭṭati, tvaṃ himavantappadesaṃ gantvā same bhūmibhāge dīghato tiṃsayojanaṃ vitthārato pannarasayojanaṃ assamapadaṃ māpehī’’ti āha. So ‘‘sādhu, devā’’ti paṭissuṇitvā gantvā tathā akāsi. Ayamettha saṅkhepo, vitthāro pana hatthipālajātake āvi bhavissati. Idañca hi tañca ekaparicchedameva. Vissakammopi assamapade paṇṇasālaṃ māpetvā dussadde mige ca sakuṇe ca amanusse ca paṭikkamāpetvā tena tena disābhāgena ekapadikamaggaṃ māpetvā attano vasanaṭṭhānameva agamāsi. Kuddālapaṇḍitopi taṃ parisaṃ ādāya himavantaṃ pavisitvā sakkadattiyaṃ assamapadaṃ gantvā vissakammena māpitaṃ pabbajitaparikkhāraṃ gahetvā paṭhamaṃ attanā pabbajitvā pacchā parisaṃ pabbājetvā assamapadaṃ bhājetvā adāsi. Satta rājāno satta rajjāni chaḍḍayiṃsu. Tiṃsayojanaṃ assamapadaṃ pūri. Kuddālapaṇḍito sesakasiṇesupi parikammaṃ katvā brahmavihāre bhāvetvā parisāya kammaṭṭhānaṃ ācikkhi. Sabbe samāpattilābhino hutvā brahmavihāre bhāvetvā brahmalokaparāyaṇā ahesuṃ. Ye pana tesaṃ pāricariyaṃ akaṃsu, te devalokaparāyaṇā ahesuṃ. In jenem Moment zeigte der Sitz Sakkas, des Königs der Götter, Anzeichen von Hitze. Als er darüber nachsann, sah er: „Der weise Kuddāla ist zum großen Aufbruch ausgezogen.“ Er dachte: „Es wird eine große Versammlung geben, es ist angebracht, eine Wohnstätte zu beschaffen.“ Da rief er Vissakamma und sprach: „Mein Lieber, der weise Kuddāla ist zum großen Aufbruch ausgezogen, und es ist angebracht, eine Wohnstätte zu beschaffen. Gehe du in die Himalaja-Region und erschaffe auf einem ebenen Stück Land eine Einsiedelei von dreißig Yojanas Länge und fünfzehn Yojanas Breite.“ Er antwortete: „Sehr wohl, o Herr“, ging hin und tat genau so. Dies ist hier die Kurzfassung; die ausführliche Darstellung wird jedoch im Hatthipāla-Jātaka deutlich werden. Denn dieses und jenes [Jātaka] haben genau denselben Verlauf. Auch Vissakamma erschuf in der Einsiedelei eine Blätterhütte, vertrieb die wilden Tiere mit unangenehmen Stimmen, die Vögel und die Nicht-Menschen (amanussa), legte in den jeweiligen Himmelsrichtungen einen schmalen Fußpfad an und kehrte an seinen eigenen Wohnort zurück. Auch der weise Kuddāla zog mit jener Gefolgschaft in den Himalaja ein, gelangte zu der von Sakka geschenkten Einsiedelei, nahm die von Vissakamma erschaffenen Asketenutensilien, trat zuerst selbst in den Orden ein, ließ danach die Gefolgschaft die Ordination empfangen und teilte die Einsiedelei auf. Sieben Könige gaben sieben Königreiche auf. Die dreißig Yojanas große Einsiedelei füllte sich. Der weise Kuddāla führte auch bei den übrigen Kasiṇa-Meditationen die Vorbereitungen durch, entfaltete die göttlichen Verweilungszustände (brahmavihāra) und wies die Gefolgschaft in die Meditationsobjekte (kammaṭṭhāna) ein. Alle erlangten die meditativen Vertiefungen (samāpatti), entfalteten die göttlichen Verweilungszustände und wurden im Brahma-Reich wiedergeboren. Diejenigen aber, die ihnen dienten, wurden in den Götterwelten wiedergeboren. Satthā ‘‘evaṃ, bhikkhave, cittaṃ nāmetaṃ kilesavasena allīnaṃ dummocayaṃ hoti, uppannā lobhadhammā duppajahā, evarūpepi paṇḍite aññāṇe karontī’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne keci sotāpannā ahesuṃ, keci sakadāgāmino, keci anāgāmino, keci arahattaṃ pāpuṇiṃsu. Satthāpi anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, parisā buddhaparisā, kuddālapaṇḍito pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „So ist es, o Mönche; dieses sogenannte Bewusstsein, wenn es durch den Einfluss der Befleckungen anhaftet, ist schwer zu befreien; die entstandenen Gier-Zustände (lobhadhamma) sind schwer aufzugeben; sie machen selbst solche Weisen zu Unwissenden.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten wurden einige Stromeingetretene (sotāpanna), einige Einmalwiederkehrer (sakadāgāmin), einige Nie-Wiederkehrer (anāgāmin) und einige erlangten die Arhatschaft (arahatta). Auch der Meister stellte die Verbindung her und fasste das Jātaka zusammen: „Damals war der König Ānanda, die Gefolgschaft war die Buddha-Gefolgschaft, der weise Kuddāla aber war ich selbst.“ Kuddālajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Kuddāla-Jātaka, die zehnte, ist abgeschlossen. Itthivaggo sattamo. Das Frauen-Kapitel (Itthivagga), das siebente, ist abgeschlossen. Tassuddānaṃ – Dessen Zusammenfassung (Uddāna) lautet: Asātamantaṇḍabhūtaṃ[Pg.334], takkapaṇḍi durājānaṃ; Anabhirati mudulakkhaṇaṃ, ucchaṅgampi ca sāketaṃ; Visavantaṃ kuddālakanti. Asātamanta- und Aṇḍabhūta-Jātaka, Takkapaṇḍita- und Durājāna-Jātaka, Anabhirati- und Mudulakkhaṇa-Jātaka, Ucchaṅga- und Sāketa-Jātaka, Visavanta- und Kuddāla-Jātaka. 8. Varuṇavaggo 8. Das Varuṇa-Kapitel (Varuṇavagga)
[71] 1. Varuṇajātakavaṇṇanā [71] 1. Die Erklärung des Varuṇa-Jātaka Yo [Pg.335] pubbe karaṇīyānīti idaṃ satthā jetavane viharanto kuṭumbikaputtatissattheraṃ ārabbha kathesi. Ekasmiṃ kira divase sāvatthivāsino aññamaññasahāyakā tiṃsamattā kulaputtā gandhapupphavatthādīni gahetvā ‘‘satthu dhammadesanaṃ suṇissāmā’’ti mahājanaparivutā jetavanaṃ gantvā nāgamāḷakasālamāḷakādīsu thokaṃ nisīditvā sāyanhasamaye satthari surabhigandhavāsitāya gandhakuṭito nikkhamitvā dhammasabhaṃ gantvā alaṅkatabuddhāsane nisinne saparivārā dhammasabhaṃ gantvā satthāraṃ gandhapupphehi pūjetvā cakkaṅkitatalesu phullapadumasassirikesu pādesu vanditvā ekamantaṃ nisinnā dhammaṃ suṇiṃsu. „Wer zuvor das zu Tuende...“ – Dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf den Thera Kuṭumbikaputtatissa. An einem Tag nämlich nahmen etwa dreißig miteinander befreundete Söhne edler Familien aus Sāvatthī Duftstoffe, Blumen, Gewänder und anderes und dachten: „Wir wollen die Lehrverkündigung des Meisters hören.“ Umgeben von einer großen Menschenmenge gingen sie zum Jetavana, saßen eine Weile in den Hallen der Nāga-Bäume und Sāla-Bäume und dergleichen. Als der Meister am Abend aus der mit süßen Düften erfüllten Duftkammer (gandhakuṭi) heraustrat, zur Lehrhalle (dhammasabhā) schritt und sich auf dem geschmückten Buddha-Sitz niederließ, begaben auch sie sich mit ihrer Begleitung zur Lehrhalle, verehrten den Meister mit Duftstoffen und Blumen, verneigten sich vor seinen Füßen, die mit den Radzeichen versehen waren und die Pracht einer erblühten Lotusblüte besaßen, setzten sich an eine Seite nieder und lauschten der Lehre. Atha nesaṃ etadahosi ‘‘yathā yathā kho mayaṃ bhagavatā dhammaṃ desitaṃ ājānāma, pabbajeyyāmā’’ti. Te tathāgatassa dhammasabhāto nikkhantakāle tathāgataṃ upasaṅkamitvā vanditvā pabbajjaṃ yāciṃsu, satthā tesaṃ pabbajjaṃ adāsi. Te ācariyupajjhāye ārādhetvā upasampadaṃ labhitvā pañca vassāni ācariyupajjhāyānaṃ santike vasitvā dve mātikā paguṇaṃ katvā kappiyākappiyaṃ ñatvā tisso anumodanā uggaṇhitvā cīvarāni sibbetvā rajitvā ‘‘samaṇadhammaṃ karissāmā’’ti ācariyupajjhāye āpucchitvā satthāraṃ upasaṅkamitvā vanditvā ekamantaṃ nisīditvā ‘‘mayaṃ, bhante, bhavesu ukkaṇṭhitā jātijarābyādhimaraṇabhayabhītā, tesaṃ no saṃsāraparimocanatthāya kammaṭṭhānaṃ kathethā’’ti yāciṃsu. Satthā tesaṃ aṭṭhatiṃsāya kammaṭṭhānesu sappāyaṃ vicinitvā kammaṭṭhānaṃ kathesi. Te satthu santike kammaṭṭhānaṃ gahetvā satthāraṃ vanditvā padakkhiṇaṃ katvā pariveṇaṃ gantvā ācariyupajjhāye oloketvā pattacīvaramādāya ‘‘samaṇadhammaṃ karissāmā’’ti nikkhamiṃsu. Da dachten jene Männer: „In der Weise, wie wir die vom Erhabenen dargelegte Lehre verstehen, sollten wir in die Hauslosigkeit hinausziehen.“ Als der Tathāgata die Lehrhalle verließ, traten sie an den Tathāgata heran, erwiesen ihm Ehrerbietung und baten um die Ordination (Pabbajjā). Der Meister gewährte ihnen die Ordination. Nachdem sie ihre Lehrer und Präzeptoren zufriedengestellt und die höhere Ordination (Upasampadā) erlangt hatten, lebten sie fünf Jahre lang in der Nähe ihrer Lehrer und Präzeptoren. Sie machten sich mit den beiden Listen (Mātikās des Pātimokkha) vertraut, lernten, was erlaubt und unerlaubt ist, erlernten die drei Arten der Dankesreden, nähten und färbten ihre Gewänder und verabschiedeten sich von ihren Lehrern und Präzeptoren mit den Worten: „Wir wollen die Pflichten eines Asketen (Samaṇadhamma) ausüben.“ Sie suchten den Meister auf, verbeugten sich vor ihm, setzten sich an eine Seite nieder und baten: „Ehrwürdiger Herr, wir haben das Dasein in den Welten satt und fürchten uns vor der Gefahr von Geburt, Alter, Krankheit und Tod. Bitte legt uns ein Meditationsobjekt (Kammaṭṭhāna) dar, damit wir uns aus dem Kreislauf der Wiedergeburten (Saṃsāra) befreien können.“ Der Meister wählte aus den achtunddreißig Meditationsobjekten das für sie jeweils Geeignete aus und legte ihnen das Meditationsobjekt dar. Sie empfingen das Meditationsobjekt in der Gegenwart des Meisters, verbeugten sich vor ihm, umschritten ihn ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn, gingen zu ihren Wohnbereichen, verabschiedeten sich von ihren Lehrern und Präzeptoren, nahmen Almosenschale und Gewänder und brachen auf mit den Worten: „Wir wollen die Pflichten eines Asketen ausüben.“ Atha nesaṃ abbhantare eko bhikkhu nāmena kuṭumbikaputtatissatthero nāma kusīto hīnavīriyo rasagiddho. So evaṃ cintesi ‘‘ahaṃ neva araññe vasituṃ, na padhānaṃ padahituṃ, na bhikkhācariyāya yāpetuṃ sakkhissāmi, ko me gamanena attho, nivattissāmī’’ti so vīriyaṃ ossajitvā te bhikkhū anugantvā nivatti. Tepi kho bhikkhū kosalesu cārikaṃ caramānā aññataraṃ paccantagāmaṃ gantvā taṃ upanissāya ekasmiṃ araññāyatane vassaṃ upagantvā antotemāsaṃ appamattā ghaṭentā vāyamantā vipassanāgabbhaṃ gāhāpetvā pathaviṃ unnādayamānā arahattaṃ patvā vutthavassā pavāretvā ‘‘paṭiladdhaguṇaṃ satthu ārocessāmā’’ti tato nikkhamitvā anupubbena jetavanaṃ patvā pattacīvaraṃ paṭisāmetvā ācariyupajjhāye disvā tathāgataṃ daṭṭhukāmā satthu santikaṃ gantvā vanditvā nisīdiṃsu. Satthā tehi saddhiṃ madhurapaṭisanthāraṃ akāsi. Te katapaṭisanthārā attanā paṭiladdhaguṇaṃ tathāgatassa ārocesuṃ, satthā te bhikkhū pasaṃsi. Kuṭumbikaputtatissatthero satthāraṃ tesaṃ guṇakathaṃ kathentaṃ disvā sayampi samaṇadhammaṃ kātukāmo jāto. Tepi kho bhikkhū ‘‘mayaṃ, bhante, tameva araññavāsaṃ gantvā vasissāmā’’ti satthāraṃ āpucchiṃsu. Satthā ‘‘sādhū’’ti anujāni. Te satthāraṃ vanditvā pariveṇaṃ agamaṃsu. Unter ihnen befand sich jedoch ein Mönch namens Elder Kuṭumbikaputta Tissa, der träge war, eine schwache Willenskraft besaß und gierig nach wohlschmeckenden Speisen war. Er dachte bei sich: „Ich werde weder im Wald leben noch mich intensiv anstrengen können, noch werde ich meinen Lebensunterhalt durch Almosengänge bestreiten können. Was nützt mir dieses Fortgehen? Ich werde umkehren.“ So gab er seine Anstrengung auf, begleitete die Mönche ein Stück und kehrte dann um. Jene Mönche aber wanderten durch das Kosala-Land, erreichten ein bestimmtes Grenzdorf und ließen sich in Abhängigkeit von diesem Ort in einem Waldgebiet für die Regenzeit nieder. Während der drei Monate der Regenzeit bemühten sie sich unermüdlich und achtsam, brachten die Frucht der Einsichtsmeditation (Vipassanā) zur Reife, brachten die Erde zum Erbeben, erlangten die Arahatschaft und hielten nach Beendigung der Regenzeit die Pavāraṇā-Zeremonie ab. Mit dem Gedanken „Wir wollen dem Meister von unseren erlangten geistigen Errungenschaften berichten“, brachen sie von dort auf, erreichten allmählich das Jetavana-Kloster, legten ihre Almosenschalen und Gewänder weg, suchten ihre Lehrer und Präzeptoren auf und gingen, voller Wunsch, den Tathāgata zu sehen, zum Meister, verbeugten sich vor ihm und setzten sich nieder. Der Meister hieß sie mit freundlichen und herzlichen Worten willkommen. Nach diesem Empfang berichteten sie dem Tathāgata von ihren erlangten Errungenschaften. Der Meister lobte jene Mönche. Als der ältere Mönch Kuṭumbikaputta Tissa sah, wie der Meister lobend von ihren Tugenden sprach, erwachte auch in ihm der Wunsch, die Pflichten eines Asketen auszuüben. Auch jene Mönche verabschiedeten sich vom Meister mit den Worten: „Ehrwürdiger Herr, wir wollen genau in jene Waldunterkunft zurückkehren und dort leben.“ Der Meister stimmte mit den Worten „Es ist gut“ zu. Sie verbeugten sich vor dem Meister und begaben sich in ihre Wohnbereiche. Atha so kuṭumbikaputtatissatthero rattibhāgasamanantare accāraddhavīriyo hutvā ativegena samaṇadhammaṃ karonto majjhimayāmasamanantare ālambanaphalakaṃ nissāya ṭhitakova niddāyanto parivattitvā pati, ūruṭṭhikaṃ bhijji, vedanā mahantā jātā. Tesaṃ bhikkhūnaṃ taṃ paṭijaggantānaṃ gamanaṃ na sampajji. Atha ne upaṭṭhānavelāyaṃ āgate satthā pucchi ‘‘nanu tumhe, bhikkhave, ‘sve gamissāmā’ti hiyyo āpucchitthā’’ti? ‘‘Āma, bhante, apica kho pana amhākaṃ sahāyako kuṭumbikaputtatissatthero akāle ativegena samaṇadhammaṃ karonto niddābhibhūto parivattitvā patito, ūruṭṭhissa bhinnaṃ, taṃ nissāya amhākaṃ gamanaṃ na sampajjī’’ti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idānevesa attano hīnavīriyabhāvena akāle [Pg.336] ativegena vīriyaṃ karonto tumhākaṃ gamanantarāyaṃ karoti, pubbepesa tumhākaṃ gamanantarāyaṃ akāsiyevā’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. Daraufhin wurde dieser ältere Mönch Kuṭumbikaputta Tissa im ersten Teil der Nacht von übermäßigem Eifer ergriffen. Als er mit großer Hast die Pflichten eines Asketen ausübte, lehnte er sich während der mittleren Nachtwache an ein Stützbrett, nickte im Stehen ein, stürzte um und brach sich den Oberschenkelknochen, was ihm schreckliche Schmerzen verursachte. Da jene Mönche ihn pflegen mussten, kam ihre Abreise nicht zustande. Als sie zur Stunde der Aufwartung erschienen, fragte der Meister sie: „Mönche, habt ihr euch nicht gestern verabschiedet mit den Worten: ‚Morgen werden wir aufbrechen‘?“ „Ja, ehrwürdiger Herr, doch unser Gefährte, der ältere Mönch Kuṭumbikaputta Tissa, übte zur Unzeit und mit übermäßiger Hast die Pflichten eines Asketen aus, wurde vom Schlaf überwältigt, stürzte um und brach sich den Oberschenkelknochen. Wegen ihm konnte unsere Abreise nicht stattfinden.“ Der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt hindert er euch durch seine Willensschwäche an der Abreise, indem er zur Unzeit mit übertriebenem Eifer Anstrengungen unternimmt. Schon in der Vergangenheit hat er eure Abreise verhindert.“ Auf ihre Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte gandhāraraṭṭhe takkasilāyaṃ bodhisatto disāpāmokkho ācariyo hutvā pañca māṇavakasatāni sippaṃ uggaṇhāpesi. Athassa te māṇavā ekadivasaṃ dāruṃ āharaṇatthāya araññaṃ gantvā dārūni uddhariṃsu. Tesaṃ antare eko kusītamāṇavo mahantaṃ varuṇarukkhaṃ disvā ‘‘sukkharukkho eso’’ti saññāya ‘‘muhuttaṃ tāva nipajjitvā pacchā rukkhaṃ abhiruhitvā dārūni pātetvā ādāya gamissāmī’’ti uttarisāṭakaṃ pattharitvā nipajjitvā kākacchamāno niddaṃ okkami. Itare māṇavakā dārukalāpe bandhitvā ādāya gacchantā taṃ pādena piṭṭhiyaṃ paharitvā pabodhetvā agamaṃsu. Kusītamāṇavo uṭṭhāya akkhīni puñchitvā puñchitvā avigataniddova varuṇarukkhaṃ abhiruhitvā sākhaṃ gahetvā attano abhimukhaṃ ākaḍḍhitvā bhañjanto bhijjitvā uṭṭhitakoṭiyā attano akkhiṃ bhindāpetvā ekena hatthena taṃ pidhāya ekena hatthena alladārūni bhañjitvā rukkhato oruyha dārukalāpaṃ bandhitvā ukkhipitvā vegena gantvā tehi pātitānaṃ dārūnaṃ upari pātesi. Einst, im Land Gandhara, in der Stadt Takkasilā, war der Bodhisatta ein weltberühmter Lehrer und unterrichtete fünfhundert junge Schüler in den Künsten. Eines Tages gingen diese jungen Männer in den Wald, um Brennholz zu sammeln, und hoben trockenes Holz auf. Unter ihnen erblickte ein fauler Junge einen großen Varuṇa-Baum und dachte irrtümlich: „Das ist ein dürrer Baum. Ich will mich zuerst ein wenig hinlegen, dann auf den Baum klettern, Äste herunterwerfen und sie mitnehmen.“ Er breitete sein Obergewand aus, legte sich hin und schlief laut schnarchend ein. Die anderen Jungen banden ihr Holz in Bündel zusammen und stießen ihn im Vorbeigehen mit dem Fuß in den Rücken, weckten ihn auf und gingen davon. Der faule Junge stand auf, rieb sich die Augen und kletterte, noch ganz schlaftrunken, auf den Varuṇa-Baum. Er ergriff einen Ast und zog ihn zu sich heran; als er ihn abbrechen wollte, brach der Ast ab und das hochschnellende Ende verletzte ihn schwer am Auge. Er hielt sich mit der einen Hand das Auge zu, brach mit der anderen Hand frisches Holz ab, stieg vom Baum herab, band das Holzbündel zusammen, hob es auf die Schulter, lief eilig zurück und warf sein Bündel oben auf das von den anderen gesammelte Holz. Taṃ divasañca janapadagāmake ekaṃ kulaṃ ‘‘sve brāhmaṇavācanakaṃ karissāmā’’ti ācariyaṃ nimantesi. Ācariyo māṇavake āha ‘‘tātā, sve ekaṃ gāmakaṃ gantabbaṃ, tumhe pana nirāhārā na sakkhissatha gantuṃ, pātova yāguṃ pacāpetvā tattha gantvā attanā laddhakoṭṭhāsañca amhākaṃ pattakoṭṭhāsañca sabbamādāya āgacchathā’’ti. Te pātova yāgupacanatthāya dāsiṃ uṭṭhāpetvā ‘‘khippaṃ no yāguṃ pacāhī’’ti āhaṃsu. Sā dārūni gaṇhantī upari ṭhitāni allavaruṇadārūni gahetvā punappunaṃ mukhavātaṃ dadamānāpi aggiṃ ujjāletuṃ asakkontī sūriyaṃ uṭṭhāpesi. Māṇavakā ‘‘atidivā jāto, idāni na sakkā gantu’’nti ācariyassa santikaṃ agamiṃsu. Ācariyo ‘‘kiṃ, tātā, na gatatthā’’ti? ‘‘Āma, ācariya na gatamhā’’ti. ‘‘Kiṃkāraṇā’’ti? ‘‘Asuko nāma kusītamāṇavo amhehi saddhiṃ dārūnamatthāya araññaṃ gantvā varuṇarukkhamūle niddāyitvā pacchā [Pg.337] vegena rukkhaṃ āruyha akkhiṃ bhindāpetvā allavaruṇadārūni āharitvā amhehi ānītadārūnaṃ upari pakkhipi. Yāgupācikā tāni sukkhadārusaññāya gahetvā yāva sūriyuggamanā ujjāletuṃ nāsakkhi. Iminā no kāraṇena gamanantarāyo jāto’’ti. Ācariyo māṇavena katakammaṃ sutvā ‘‘andhabālānaṃ kammaṃ nissāya evarūpā parihāni hotī’’ti vatvā imaṃ gāthaṃ samuṭṭhāpesi – Und an jenem Tag lud eine Familie in einem Dorf auf dem Lande den Lehrer ein, indem sie dachte: „Morgen werden wir eine Lesung für die Brahmanen veranstalten.“ Der Lehrer sprach zu den jungen Schülern: „Liebe Söhne, morgen müssen wir in ein Dorf gehen. Ihr aber werdet nicht ohne Nahrung gehen können. Lasst daher ganz früh eine Reissuppe kochen, geht dorthin, nehmt euren eigenen Anteil sowie den uns gebührenden Anteil, nehmt alles mit und kommt zurück.“ Sie weckten schon früh am Morgen die Magd auf, damit sie die Reissuppe koche, und sagten: „Koche uns schnell die Reissuppe!“ Als sie Brennholz holte, nahm sie feuchtes Varuna-Holz, das obenauf lag, und obwohl sie immer wieder mit dem Mund Luft hineinblies, gelang es ihr nicht, das Feuer zu entfachen, bis schließlich die Sonne aufging. Die Schüler dachten: „Es ist schon viel zu spät am Tag; jetzt ist es nicht mehr möglich zu gehen“, und gingen zu ihrem Lehrer. Der Lehrer fragte: „Wie, liebe Söhne, seid ihr nicht gegangen?“ „Ja, Lehrer, wir sind nicht gegangen“, antworteten sie. „Aus welchem Grund?“ „Ein gewisser fauler Schüler ging mit uns in den Wald, um Holz zu holen, schlief unter einem Varuna-Baum und kletterte später in großer Eile auf den Baum, verletzte sich dabei das Auge, brachte feuchtes Varuna-Holz mit und warf es über das von uns herbeigebrachte Holz. Die Köchin, die dachte, es sei trockenes Holz, nahm es und konnte das Feuer bis zum Aufgang der Sonne nicht entzünden. Aus diesem Grund ist uns ein Hindernis für die Reise entstanden.“ Als der Lehrer hörte, was der Schüler getan hatte, sprach er: „Durch das Handeln von blinden Toren entsteht solch ein Verlust“, und sprach diese Strophe: 71. 71. ‘‘Yo pubbe karaṇīyāni, pacchā so kātumicchati; Varuṇakaṭṭhabhañjova, sa pacchā manutappatī’’ti. „Wer das, was zuerst getan werden sollte, erst später tun will, der bereut es hinterher, gleich dem Knaben, der das feuchte Varuna-Holz brach.“ Tattha sa pacchā manutappatīti yo koci puggalo ‘‘idaṃ pubbe kattabbaṃ, idaṃ pacchā’’ti avīmaṃsitvā pubbe karaṇīyāni paṭhamameva kattabbakammāni pacchā karoti, ayaṃ varuṇakaṭṭhabhañjo amhākaṃ māṇavako viya so bālapuggalo pacchā anutappati socati paridevatīti attho. Darin bedeutet „sa pacchā manutappatī“ (der bereut es hinterher): Wer auch immer, ohne zu prüfen: „Dies ist zuerst zu tun, jenes danach“, jene Dinge, die zuerst hätten getan werden müssen, also die primär auszuführenden Handlungen, erst später tut – jener törichte Mensch bereut es später, grämt sich und klagt, ganz so wie unser Schüler, der das Varuna-Holz brach. Dies ist die Bedeutung. Evaṃ bodhisatto antevāsikānaṃ imaṃ kāraṇaṃ kathetvā dānādīni puññāni karitvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta seinen Schülern diesen Sachverhalt dargelegt hatte, vollbrachte er verdienstvolle Taten wie Freigebigkeit und ging am Ende seines Lebens gemäß seinem Kamma ein. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idānevesa tumhākaṃ antarāyaṃ karoti, pubbepi akāsiyevā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā akkhibhedaṃ patto māṇavo ūrubhedaṃ pattabhikkhu ahosi, sesamāṇavā buddhaparisā, ācariyabrāhmaṇo pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt hat dieser euch ein Hindernis bereitet, auch in der Vergangenheit hat er dies bereits getan.“ Er trug diese Lehrrede vor, stellte die Verbindung her und verband das Jātaka: „Damals war der Schüler, der sich das Auge verletzte, der Mönch, der sich den Oberschenkel brach; die übrigen Schüler waren die Gefolgschaft des Buddha, der brahmanische Lehrer aber war ich selbst.“ Varuṇajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Varuṇa-Jātaka, das erste.
[72] 2. Sīlavanāgarājajātakavaṇṇanā [72] 2. Die Erklärung des Sīlavanāgarāja-Jātaka (Das Jātaka vom tugendhaften Elefantenkönig) Akataññussa posassāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Dhammasabhāyañhi bhikkhū ‘‘āvuso, devadatto akataññū tathāgatassa guṇe na jānātī’’ti kathentā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva devadatto [Pg.338] akataññū, pubbepi akataññūyeva, na kadāci mayhaṃ guṇaṃ jānātī’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. „Akataññussa posassa...“ (Einem undankbaren Menschen...): Diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verwelte, sich auf Devadatta beziehend. In der Versammlungshalle saßen nämlich die Mönche beisammen und sprachen: „Brüder, Devadatta is undankbar, er erkennt die Tugenden des Tathāgata nicht.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem und jenem“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt ist Devadatta undankbar, auch in der Vergangenheit war er wahrlich undankbar; niemals hat er meine Tugenden erkannt.“ Auf ihre Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto himavantappadese hatthiyoniyaṃ nibbatti. So mātukucchito nikkhanto sabbaseto ahosi rajatapuñjasannibho, akkhīni panassa maṇiguḷasadisāni, paññāyamānāni pañca pasādāni ahesuṃ, mukhaṃ rattakambalasadisaṃ, soṇḍā rattasuvaṇṇabindupaṭimaṇḍitaṃ rajatadāmaṃ viya, cattāro pādā katalākhārasaparikammā viya. Evamassa dasahi pāramīhi alaṅkato rūpasobhaggappatto attabhāvo ahosi. Atha naṃ viññutaṃ pattaṃ sakalahimavante vāraṇā sannipatitvā upaṭṭhahantā vicariṃsu. Evaṃ so asītisahassavāraṇaparivāro himavantappadese vasamāno aparabhāge gaṇe dosaṃ disvā gaṇamhā kāyavivekāya ekakova araññe vāsaṃ kappesi. Sīlavantatāya ca panassa ‘‘sīlavanāgarājā’’ tveva nāmaṃ ahosi. Als in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in der Region des Himavanta im Schoße einer Elefantenkuh geboren. Als er aus dem Schoß seiner Mutter hervorging, war er ganz und gar weiß, ähnlich einem Haufen Silber. Seine Augen waren wie Edelsteine, und seine pfünf Sinnesorgane (pasāda) waren deutlich ausgeprägt. Sein Mund war wie eine rote Decke, sein Rüssel glich einer Kette aus Silber, die mit roten Goldpunkten verziert war, und seine vier Füße sahen aus wie mit Lackfarbe poliert. So war seine äußere Erscheinung, geschmückt mit den zehn Vollkommenheiten (pāramī), von vollendeter Schönheit. Als er nun das reife Alter erreicht hatte, versammelten sich die Elefanten im gesamten Himavanta, dienten ihm und zogen mit ihm umher. Als er, der auf diese Weise von achtzigtausend Elefanten umgeben in der Region des Himavanta lebte, später die Mängel in der Herde erkannte, zog er sich zur körperlichen Abgeschiedenheit von der Herde allein in den Wald zurück und richtete sich dort ein Leben ein. Aufgrund seiner Tugendhaftigkeit wurde er fortan „Sīlavanāgarāja“ (der tugendhafte Elefantenkönig) genannt. Atheko bārāṇasivāsiko vanacarako himavantaṃ pavisitvā attano ājīvabhaṇḍakaṃ gavesamāno disā vavatthāpetuṃ asakkonto maggamūḷho hutvā maraṇabhayabhīto bāhā paggayha paridevamāno vicarati. Bodhisatto tassa taṃ balavaparidevitaṃ sutvā ‘‘imaṃ purisaṃ dukkhā mocessāmī’’ti kāruññena codito tassa santikaṃ agamāsi. So taṃ disvāva bhīto palāyi. Bodhisatto taṃ palāyantaṃ disvā tattheva aṭṭhāsi. So puriso bodhisattaṃ ṭhitaṃ disvā aṭṭhāsi. Bodhisatto puna agamāsi, so puna palāyitvā tassa ṭhitakāle ṭhatvā cintesi ‘‘ayaṃ vāraṇo mama palāyanakāle tiṭṭhati, ṭhitakāle āgacchati, nāyaṃ mayhaṃ anatthakāmo, imamhā pana maṃ dukkhā mācetukāmo bhavissatī’’ti sūro hutvā aṭṭhāsi. Bodhisatto taṃ upasaṅkamitvā ‘‘kasmā bho tvaṃ purisa, paridevamāno vicarasī’’ti pucchi. ‘‘Sāmi, disā vavatthāpetuṃ asakkonto maggamūḷho hutvā maraṇabhayenā’’ti. Atha naṃ bodhisatto attano vasanaṭṭhānaṃ netvā katipāhaṃ phalāphalehi santappetvā ‘‘bho, purisa, mā bhāyi, ahaṃ taṃ manussapathaṃ [Pg.339] nessāmī’’ti attano piṭṭhe nisīdāpetvā manussapathaṃ pāyāsi. Da trat ein in Bārāṇasī lebender Waldläufer in den Himavanta ein, um nach Mitteln für seinen Lebensunterhalt zu suchen. Er war jedoch nicht in der Lage, die Himmelsrichtungen zu bestimmen, verirrte sich, und aus Angst vor dem Tod erhob er seine Arme, weinte laut und irrte umher. Als der Bodhisatta sein heftiges Klagen hörte, wurde er von Mitgefühl bewegt und dachte: „Ich will diesen Mann aus seiner Not befreien“, und begab sich zu ihm. Sobald der Mann ihn erblickte, floh er aus Furcht. Als der Bodhisatta ihn fliehen sah, blieb er auf der Stelle stehen. Der Mann sah den Bodhisatta stehen und hielt ebenfalls an. Der Bodhisatta ging erneut auf ihn zu, und der Mann floh wieder; doch als der Elefant stehen blieb, hielt auch er inne und dachte: „Dieser Elefantenbulle bleibt stehen, wenn ich fliehe, und kommt näher, wenn ich stehen bleibe. Er will mir gewiss nichts Böses tun, vielmehr möchte er mich wohl aus dieser Not befreien.“ Mutig geworden, blieb er stehen. Der Bodhisatta trat an ihn heran und fragte: „He, du Mann, warum irrst du weinend umher?“ – „Herr, ich kann die Himmelsrichtungen nicht bestimmen, habe mich verirrt und tue dies aus Todesangst.“ Daraufhin führte ihn der Bodhisatta zu seinem Wohnplatz, bewirtete ihn einige Tage lang mit allerlei Früchten zur Genüge und sprach: „Lieber Mann, fürchte dich nicht! Ich werde dich auf den Weg der Menschen bringen.“ Er ließ ihn auf seinem Rücken Platz nehmen und brach zum Weg der Menschen auf. Atha kho so mittadubbhī puriso ‘‘sace koci pucchissati, ācikkhitabbaṃ bhavissatī’’ti bodhisattassa piṭṭhe nisinnoyeva rukkhanimittaṃ pabbatanimittaṃ upadhārentova gacchati. Atha naṃ bodhisatto araññā nīharitvā bārāṇasigāmimahāmagge ṭhapetvā ‘‘bho purisa, iminā maggena gaccha, mayhaṃ pana vasanaṭṭhānaṃ pucchitopi apucchitopi mā kassaci ācikkhī’’ti taṃ uyyojetvā attano vasanaṭṭhānaṃyeva agamāsi. Atha so puriso bārāṇasiṃ gantvā anuvicaranto dantakāravīthiṃ patvā dantakāre dantavikatiyo kurumāne disvā ‘‘kiṃ pana bho, jīvadantampi labhitvā gaṇheyyāthā’’ti? ‘‘Bho, kiṃ vadesi, jīvadanto nāma matahatthidantato mahagghataro’’ti. ‘‘Tena hi ahaṃ vo jīvadantaṃ āharissāmī’’ti pātheyyaṃ gahetvā kharakakacaṃ ādāya bodhisattassa vasanaṭṭhānaṃ agamāsi. Da ging jener treulose Mann, während er auf dem Rücken des Bodhisatta saß, und dachte sich: „Falls mich jemand fragen sollte, muss ich Auskunft geben können“, wobei er sich die Merkmale der Bäume und Berge genau einprägte. Daraufhin führte ihn der Bodhisatta aus dem Wald hinaus, brachte ihn auf die nach Bārāṇasī führende Hauptstraße und verabschiedete ihn mit den Worten: „O Mann, geh auf diesem Weg; meinen Aufenthaltsort aber verrate niemandem, ob du nun danach gefragt wirst oder nicht.“ Nachdem er ihn weggeschickt hatte, kehrte er zu seinem eigenen Wohnort zurück. Jener Mann ging nach Bārāṇasī, wanderte umher und gelangte in die Gasse der Elfenbeinschnitzer. Als er sah, wie die Elfenbeinschnitzer verschiedene kunstvolle Gegenstände aus Elfenbein herstellten, fragte er: „Ihr Herren, würdet ihr auch das Elfenbein eines lebenden Elefanten kaufen, wenn ihr es bekämt?“ Sie erwiderten: „Werter Herr, was sagst du da? Das Elfenbein eines lebenden Elefanten ist weitaus wertvoller als das eines toten.“ Er sagte: „Wenn das so ist, werde ich euch Elfenbein von einem Lebenden bringen.“ Er nahm Wegzehrung sowie eine scharfe Säge mit sich und begab sich zum Aufenthaltsort des Bodhisatta. Bodhisatto taṃ disvā ‘‘kimatthaṃ āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Ahaṃ, sāmi, duggato kapaṇo jīvituṃ asakkonto tumhe dantakhaṇḍaṃ yācitvā sace dassatha, taṃ ādāya gantvā vikkiṇitvā tena mūlena jīvissāmī’’ti āgatoti. ‘‘Hotu bho, dantaṃ te dassāmi, sace dantakappanatthāya kakacaṃ atthī’’ti. ‘‘Kakacaṃ gahetvā āgatomhi sāmī’’ti. ‘‘Tena hi dante kakacena kantitvā ādāya gacchā’’ti bodhisatto pāde samiñjitvā gonisinnakaṃ nisīdi. So dvepi aggadante chindi. Bodhisatto te dante soṇḍāya gahetvā ‘‘bho purisa, nāhaṃ ‘ete dantā mayhaṃ appiyā amanāpā’ti dammi, imehi pana me dantehi sataguṇena sahassaguṇena satasahassaguṇena sabbadhammapaṭivedhanasamatthā sabbaññutaññāṇadantāva piyatarā, tassa me idaṃ dantadānaṃ sabbaññutaññāṇapaṭivijjhanatthāya hotū’’ti sabbaññutaññāṇassa ārādhanaṃ katvā dantayugalaṃ adāsi. Als der Bodhisatta ihn sah, fragte er: „Aus welchem Grund bist du gekommen?“ Er antwortete: „O Herr, ich bin arm und bedürftig und kann meinen Lebensunterhalt nicht bestreiten. Ich bin gekommen, um euch um ein Stück Stoßzahn zu bitten; wenn ihr es mir gebt, werde ich es nehmen, fortgehen, es verkaufen und von diesem Erlös leben.“ – „Es sei so, mein Freund, ich werde dir das Elfenbein geben, wenn du eine Säge zum Schneiden der Stoßzähne hast.“ – „Ich bin mit einer Säge gekommen, Herr.“ – „Nun gut, dann säge die Stoßzähne mit der Säge ab, nimm sie und geh.“ Der Bodhisatta zog seine Beine an und legte sich nieder wie ein kauerndes Rind. Jener schnitt die beiden Stoßzahnspitzen ab. Der Bodhisatta nahm die Stoßzähne mit seinem Rüssel und sprach: „O Mann, ich gebe dir diese Stoßzähne nicht etwa, weil sie mir unlieb oder missfällig wären. Vielmehr sind mir die Stoßzähne des Allwissenheitswissens, welche fähig sind, alle Wahrheiten vollständig zu durchdringen, hundertmal, tausendmal, hunderttausendmal lieber als diese materiellen Stoßzähne. Möge dieses mein Geschenk der Stoßzähne zur Durchdringung des Allwissenheitswissens führen!“ Nachdem er so das Allwissenheitswissen erstrebt hatte, übergab er ihm das Stoßzahnpaar. So taṃ ādāya gantvā vikkiṇitvā tasmiṃ mūle khīṇe puna bodhisattassa santikaṃ gantvā ‘‘sāmi, tumhākaṃ dante vikkiṇitvā laddhamūlaṃ mayhaṃ [Pg.340] iṇasodhanamattameva jātaṃ, avasesadante dethā’’ti āha. Bodhisatto ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā purimanayeneva kappāpetvā avasesadante adāsi. So tepi vikkiṇitvā puna āgantvā ‘‘sāmi, jīvituṃ na sakkomi, mūladāṭhā me dethā’’ti āha. Bodhisatto ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā purimanayeneva nisīdi. So pāpapuriso mahāsattassa rajatadāmasadisaṃ soṇḍaṃ maddamāno kelāsakūṭasadisaṃ kumbhaṃ abhiruhitvā ubho dantakoṭiyo paṇhiyā paharanto maṃsaṃ viyūhitvā kumbhaṃ āruyha kharakakacena mūladāṭhā kappetvā pakkāmi. Bodhisattassa dassanūpacāraṃ vijahanteyeva pana tasmiṃ pāpapurise catunahutādhikadviyojanasatasahassabahalā ghanapathavī sineruyugandharādayo mahābhāre duggandhajegucchāni gūthamuttādīni ca dhāretuṃ samatthāpi tassa aguṇarāsiṃ dhāretuṃ asakkontī viya bhijjitvā vivaraṃ adāsi. Tāvadeva avīcimahānirayato aggijālā nikkhamitvā taṃ mittadubbhipurisaṃ kulasantakena kambalena pārupantī viya parikkhipitvā gaṇhi. Er nahm diese, ging fort, verkaufte sie, und als dieses Geld aufgebraucht war, begab er sich erneut zum Bodhisatta und sagte: „Herr, der Erlös aus dem Verkauf eurer Stoßzähne reichte gerade aus, um meine Schulden zu tilgen. Gebt mir bitte das restliche Elfenbein.“ Der Bodhisatta willigte mit den Worten „Es ist gut“ ein, ließ sie auf dieselbe Weise wie zuvor abschneiden und schenkte ihm die verbleibenden Stoßzähne. Auch diese verkaufte jener, kehrte wieder zurück und bat: „Herr, ich kann meinen Lebensunterhalt nicht bestreiten. Gebt mir die Stoßzahnwurzeln.“ Der Bodhisatta willigte mit den Worten „Es ist gut“ ein und legte sich auf dieselbe Weise wie zuvor nieder. Jener böse Mann trat auf den silberkettenartigen Rüssel des Großen Wesens, stieg auf dessen Stirnhöcker, der dem Gipfel des Kelāsa-Berges glich, stieß mit seinen Fersen gegen die beiden Stoßzahnstümpfe, schabte das Fleisch beiseite, erklomm den Stirnhöcker, sägte die Zahnwurzeln mit der groben Säge ab und machte sich davon. Doch kaum hatte dieser sündige Mann den Sichtkreis des Bodhisatta verlassen, da spaltete sich die feste Erde – die zweihundertvierzigtausend Yojanas dick ist und schwere Lasten wie die Berge Sineru und Yugandhara sowie übelriechenden, abscheulichen Kot und Urin zu tragen vermag, jedoch unfähig schien, die Fülle seiner Verfehlungen zu tragen – und öffnete einen Schlund. Im selben Augenblick schossen Flammen aus der großen Avīci-Hölle empor, umschlossen jenen treulosen Mann, als hüllten sie ihn in eine familieneigene Decke ein, und rissen ihn hinab. Evaṃ tassa pāpapuggalassa pathaviṃ paviṭṭhakāle tasmiṃ vanasaṇḍe adhivatthā rukkhadevatā ‘‘akataññū mittadubbhī puggalo cakkavattirajjaṃ datvāpi tosetuṃ na sakkā’’ti vanaṃ unnādetvā dhammaṃ desayamānā imaṃ gāthamāha – Als jener böse Mensch auf diese Weise in der Erde versank, ließ die in jenem Waldstück ansässige Baumgottheit den Wald widerhallen und sprach, um die Lehre zu verkünden: „Einen undankbaren, treulosen Menschen kann man selbst dann nicht zufriedenstellen, wenn man ihm die Herrschaft eines Weltenherrschers schenkt“, und trug diese Strophe vor: 72. 72. ‘‘Akataññussa posassa, niccaṃ vivaradassino; Sabbaṃ ce pathaviṃ dajjā, neva naṃ abhirādhaye’’ti. „Gäbe man selbst die ganze Erde einem undankbaren Menschen, der stets nur nach Schwachstellen sucht, so könnte man ihn dennoch niemals zufriedenstellen.“ Tattha akataññussāti attano kataguṇaṃ ajānantassa. Posassāti purisassa. Vivaradassinoti chiddameva okāsameva olokentassa. Sabbaṃ ce pathaviṃ dajjāti sacepi tādisassa puggalassa sakalaṃ cakkavattirajjaṃ, imaṃ vā pana mahāpathaviṃ parivattetvā pathavojaṃ dadeyya. Neva naṃ abhirādhayeti evaṃ karontopi evarūpaṃ kataguṇaviddhaṃsakaṃ koci paritosetuṃ vā pasādetuṃ vā na sakkuṇeyyāti attho. Darin bedeutet „akataññussa“: einem, der die ihm erwiesene Wohltat nicht anerkennt. „Posassa“ bedeutet: einem Menschen. „Vivaradassino“ bedeutet: einem, der stets nur nach Lücken und Gelegenheiten Ausschau hält. „Sabbaṃ ce pathaviṃ dajjā“ bedeutet: Selbst wenn man einer solchen Person das gesamte Reich eines Weltenherrschers gäbe oder diese große Erde umdrehte und ihr die nahrhafte Erdessenz darböte. „Neva naṃ abhirādhaye“ bedeutet: Selbst wenn man dies täte, könnte niemand einen solchen Zerstörer von Wohltaten zufriedenstellen oder erfreuen. Dies ist die Bedeutung. Evaṃ sā devatā vanaṃ unnādetvā dhammaṃ desesi. Bodhisatto yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ agamāsi. So verkündete jene Gottheit die Lehre, während sie den Wald erzittern ließ. Der Bodhisatta verblieb dort bis zum Ende seiner Lebensspanne und schied dann gemäß seinem Kamma dahin. Satthā [Pg.341] ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva akataññū, pubbepi akataññūyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā mittadubbhī puggalo devadatto ahosi, rukkhadevatā sāriputto, sīlavanāgarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, ist Devadatta undankbar, auch in der Vergangenheit war er bereits undankbar.“ Nachdem er diese Lehrrede vorgetragen und die Verknüpfung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der treulose Mensch Devadatta, die Baumgottheit war Sāriputto, und der tugendhafte Elefantenkönig war ich selbst.“ Sīlavanāgarājajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Sīlavanāgarāja-Jātaka, die zweite, ist abgeschlossen.
[73] 3. Saccaṃkirajātakavaṇṇanā [73] 3. Die Erklärung des Saccaṃkira-Jātaka. Saccaṃ kirevamāhaṃsūti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattassa vadhāya parisakkanaṃ ārabbha kathesi. Bhikkhusaṅghasmiñhi dhammasabhāyaṃ nisīditvā ‘‘āvuso, devadatto satthu guṇaṃ na jānāti, vadhāyayeva parisakkatī’’ti devadattassa aguṇaṃ kathente satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva devadatto mayhaṃ vadhāya parisakkati, pubbepi parisakkiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Saccaṃ kirevamāhaṃsu“ („Wahrlich, so sprachen sie die Wahrheit“) – dies erzählte der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verweilte, im Hinblick auf Devadattas Versuche, ihn zu töten. Als nämlich die Mönchsgemeinschaft in der Lehrhalle zusammensaß und über Devadattas Undankbarkeit sprach: „Ihr Brüder, Devadatta erkennt die Tugenden des Meisters nicht an, sondern trachtet ihm nur nach dem Leben“, kam der Meister hinzu und fragte: „Zu welchem Gespräch habt ihr euch hier niedergelassen, ihr Mönche?“ Als sie antworteten: „Zu diesem Thema“, sprach er: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, trachtet Devadatta danach, mich zu töten; auch in der Vergangenheit hat er dies schon versucht“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente tassa duṭṭhakumāro nāma putto ahosi kakkhaḷo pharuso pahaṭāsīvisūpamo, anakkositvā vā apaharitvā vā kenaci saddhiṃ na katheti. So antojanassa ca bahijanassa ca akkhimhi patitarajaṃ viya, khādituṃ āgatapisāco viya ca amanāpo ahosi ubbejanīyo. So ekadivasaṃ nadīkīḷaṃ kīḷitukāmo mahantena parivārena nadītīraṃ agamāsi. Tasmiṃ khaṇe mahāmegho uṭṭhahi, disā andhakārā jātā. So dāsapessajanaṃ āha ‘‘etha bhaṇe, maṃ gahetvā nadīmajjhaṃ netvā nhāpetvā ānethā’’ti. Te taṃ tattha netvā ‘‘kiṃ no rājā karissati, imaṃ pāpapurisaṃ ettheva māremā’’ti mantayitvā ‘‘ettha gaccha kāḷakaṇṇī’’ti udake naṃ opilāpetvā paccuttaritvā tīre aṭṭhaṃsu. ‘‘Kahaṃ kumāro’’ti ca vutte ‘‘na mayaṃ kumāraṃ passāma, meghaṃ uṭṭhitaṃ disvā udake nimujjitvā purato āgato [Pg.342] bhavissatī’’ti. Amaccā rañño santikaṃ agamaṃsu. Rājā ‘‘kahaṃ me putto’’ti pucchi. Na jānāma deva, meghe uṭṭhite ‘‘purato āgato bhavissatī’’ti saññāya āgatamhāti. Rājā dvāraṃ vivarāpetvā ‘‘nadītīraṃ gantvā vicinathā’’ti tattha tattha vicināpesi, koci kumāraṃ nāddasa. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, hatte er einen Sohn namens Duṭṭhakumāra, der grob, grausam und wie eine geschlagene Giftschlange war; er sprach mit niemandem, ohne ihn entweder zu beschimpfen oder zu schlagen. Sowohl der Dienerschaft im Palast als auch den Menschen außerhalb war er unwillkommen und furchteinflößend, wie Staub, der ins Auge geraten ist, oder wie ein Dämon, der gekommen ist, um sie zu verschlingen. Eines Tages wünschte er, im Fluss zu spielen, und ging mit einem großen Gefolge an das Flussufer. In diesem Augenblick zog ein großes Unwetter auf, und die Himmelsrichtungen wurden finster. Er sagte zu seinen Dienern und Gefolgsleuten: 'Kommt her, ihr Männer, nehmt mich, bringt mich in die Mitte des Flusses, badet mich und bringt mich zurück.' Diese brachten ihn dorthin und berieten sich: 'Was kann uns der König schon anhaben? Lasst uns diesen bösen Menschen genau hier töten!' Sie sagten: 'Geh hinein, du Unglücksvogel!', ließen ihn im Wasser abtreiben, stiegen wieder hinauf und blieben am Ufer stehen. Als gefragt wurde: 'Wo ist der Prinz?', sagten sie: 'Wir sehen den Prinzen nicht. Als wir sahen, dass das Unwetter aufzog, ist er wohl im Wasser untergetaucht und uns vorausgegangen.' Die Minister begaben sich zum König. Der König fragte: 'Wo ist mein Sohn?' 'Wir wissen es nicht, o König. Als das Unwetter aufzog, kamen wir in der Annahme her, er sei uns vorausgegangen', sagten sie. Der König ließ die Tore öffnen, befahl: 'Geht an das Flussufer und sucht!', und ließ an allen möglichen Orten suchen. Doch niemand sah den Prinzen. Sopi kho meghandhakāre deve vassante nadiyā vuyhamāno ekaṃ dārukkhandhaṃ disvā tattha nisīditvā maraṇabhayatajjito paridevamāno gacchati. Tasmiṃ pana kāle bārāṇasivāsī eko seṭṭhi nadītīre cattālīsakoṭidhanaṃ nidahitvāva maranto dhanataṇhāya dhanapiṭṭhe sappo hutvā nibbatti. Aparo tasmiṃyeva padese tiṃsa koṭiyo nidahitvā dhanataṇhāya tattheva undūro hutvā nibbatti. Tesaṃ vasanaṭṭhānaṃ udakaṃ pāvisi. Te udakassa paviṭṭhamaggeneva nikkhamitvā sotaṃ chindantā gantvā taṃ rājakumārena abhinisinnaṃ dārukkhandhaṃ patvā eko ekaṃ koṭiṃ, itaro itaraṃ āruyha khandhapiṭṭheyeva nipajjiṃsu. Tassāyeva kho pana nadiyā tīre eko simbalirukkho atthi, tattheko suvapotako vasati. Sopi rukkho udakena dhotamūlo nadīpiṭṭhe pati, suvapotako deve vassante uppatitvā gantuṃ asakkonto gantvā tasseva khandhassa ekapasse nilīyi. Evaṃ te cattāro janā ekato vuyhamānā gacchanti. Auch er trieb in der Dunkelheit der Wolken, während der Regen fiel, im Fluss dahin, erblickte einen Baumstamm, setzte sich darauf und trieb von Todesangst gepeinigt und wehklagend davon. Zu jener Zeit aber hatte ein in Bārāṇasī lebender Großkaufmann am Flussufer ein Vermögen von vierzig Millionen vergraben, und als er starb, wurde er aufgrund seiner Gier nach dem Reichtum als Schlange auf diesem Schatz wiedergeboren. Ein anderer hatte in derselben Gegend dreißig Millionen vergraben und wurde aufgrund seiner Gier nach dem Reichtum genau dort als Maus wiedergeboren. Wasser drang in ihre Höhlen ein. Sie kamen auf demselben Weg heraus, auf dem das Wasser eingedrungen war, schwammen durch die Strömung und erreichten den Baumstamm, auf dem der Königssohn saß; der eine stieg am einen Ende hinauf, der andere am anderen Ende, und sie legten sich auf dem Stamm nieder. Am Ufer genau dieses Flusses stand auch ein Seidenbaum, auf dem ein junger Papagei lebte. Auch dieser Baum stürzte, da seine Wurzeln vom Wasser unterspült worden waren, in den Fluss; und da es regnete, konnte der junge Papagei nicht wegfliegen, sondern flog hin und ließ sich an einer Seite ebendieses Stammes nieder. So trieben diese vier Wesen zusammen davon. Bodhisattopi kho tasmiṃ kāle kāsiraṭṭhe udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vuḍḍhippatto isipabbajjaṃ pabbajitvā ekasmiṃ nadīnivattane paṇṇasālaṃ māpetvā vasati. So aḍḍharattasamaye caṅkamamāno tassa rājakumārassa balavaparidevanasaddaṃ sutvā cintesi ‘‘mādise nāma mettānuddayasampanne tāpase passante etassa purisassa maraṇaṃ ayuttaṃ, udakato uddharitvā tassa jīvitadānaṃ dassāmī’’ti. So taṃ ‘‘mā bhāyi, mā bhāyī’’ti assāsetvā udakasotaṃ chindanto gantvā taṃ dārukkhandhaṃ ekāya koṭiyā gahetvā ākaḍḍhanto nāgabalo thāmasampanno ekavegena tīraṃ patvā kumāraṃ ukkhipitvā tīre patiṭṭhāpesi. Tepi sappādayo disvā ukkhipitvā assamapadaṃ netvā aggiṃ jāletvā ‘‘ime dubbalatarā’’ti paṭhamaṃ sappādīnaṃ sarīraṃ sedetvā pacchā rājakumārassa sarīraṃ sedetvā tampi arogaṃ katvā āhāraṃ dentopi paṭhamaṃ sappādīnaṃyeva datvā pacchā tassa phalāphalāni upanāmesi. Rājakumāro ‘‘ayaṃ kūṭatāpaso maṃ rājakumāraṃ agaṇetvā tiracchānagatānaṃ sammānaṃ karotī’’ti bodhisatte āghātaṃ bandhi. Auch der Bodhisatta war zu jener Zeit im Königreich Kāsi in einer hochgeborenen Brahmanenfamilie geboren worden. Als er herangewachsen war, weihte er sich dem asketischen Leben, errichtete an einer Flusskrümmung eine Blätterhütte und lebte dort. Als er zur Mitternachtsstunde auf und ab schritt, hörte er das laute Wehklagen des Königssohnes und dachte: 'Es ist nicht recht, dass dieser Mensch stirbt, während ein Asket wie ich, der reich an liebender Güte und Mitgefühl ist, zusieht. Ich will ihn aus dem Wasser retten und ihm das Geschenk des Lebens gewähren.' Er sprach ihm Mut zu: 'Fürchte dich nicht, fürchte dich nicht!', schwamm durch die Strömung, ergriff den Baumstamm an einem Ende und zog ihn heran; mit der Kraft eines Elefanten und voller Stärke ausgestattet, erreichte er mit einem einzigen Zug das Ufer, hob den Prinzen heraus und setzte ihn auf festen Boden. Als er auch die Schlange und die anderen Tiere erblickte, hob er sie auf, brachte sie zur Einsiedelei, entfachte ein Feuer und wärmte, da er dachte: 'Diese sind noch schwächer', zuerst die Körper der Schlange und der anderen Tiere und danach erst den Körper des Königssohnes. Nachdem er sie alle wieder zu Kräften gebracht hatte, gab er ihnen Nahrung, wobei er wiederum zuerst der Schlange und den anderen Tieren zu essen gab und danach erst dem Prinzen verschiedene Früchte darreichte. Der Prinz dachte bei sich: 'Dieser betrügerische Asket achtet mich, einen Königssohn, überhaupt nicht, sondern erweist bloßen Tieren Ehre', und hegte fortan Groll gegen den Bodhisatta. Tato [Pg.343] katipāhaccayena sabbesupi tesu thāmabalappattesu nadiyā oghe pacchinne sappo tāpasaṃ vanditvā āha ‘‘bhante, tumhehi mayhaṃ mahāupakāro kato, na kho panāhaṃ daliddo, asukaṭṭhāne me cattālīsa hiraññakoṭiyo nidahitvā ṭhapitā, tumhākaṃ dhanena kicce sati sabbampetaṃ dhanaṃ tumhākaṃ dātuṃ sakkomi, taṃ ṭhānaṃ āgantvā ‘dīghā’ti pakkoseyyāthā’’ti vatvā pakkāmi. Undūropi tatheva tāpasaṃ nimantetvā ‘‘asukaṭṭhāne ṭhatvā ‘undūrā’ti pakkoseyyāthā’’ti vatvā pakkāmi. Suvapotako pana tāpasaṃ vanditvā ‘‘bhante, mayhaṃ dhanaṃ natthi, rattasālīhi pana vo atthe sati asukaṃ nāma mayhaṃ vasanaṭṭhānaṃ, tattha gantvā ‘suvā’ti pakkoseyyātha, ahaṃ ñātakānaṃ ārocetvā anekasakaṭapūramattā rattasāliyo āharāpetvā dātuṃ sakkomī’’ti vatvā pakkāmi. Itaro pana mittadubbhī ‘‘dhammasudhammatāya kiñci avatvā gantuṃ ayuttaṃ, evaṃ taṃ attano santikaṃ āgataṃ māressāmī’’ti cintetvā ‘‘bhante, mayi rajje patiṭṭhite āgaccheyyātha, ahaṃ vo catūhi paccayehi upaṭṭhahissāmī’’ti vatvā pakkāmi. So gantvā na cirasseva rajje patiṭṭhāsi. Als nach einigen Tagen alle wieder zu voller Kraft gelangt waren und das Hochwasser des Flusses zurückgegangen war, verneigte sich die Schlange vor dem Asketen und sprach: 'Herr, Ihr habt mir eine große Wohltat erwiesen. Ich bin nicht arm; an jenem Ort habe ich vierzig Millionen Goldstücke vergraben. Solltet Ihr Bedarf an Reichtum haben, so bin ich in der Lage, Euch diesen gesamten Schatz zu geben. Kommt an jenen Ort und ruft nach 'Dīgha'!' Nach diesen Worten ging sie fort. Auch die Maus lud den Asketen in gleicher Weise ein, sagte: 'Stellt Euch an jenen Ort und ruft nach 'Undūra'!', und ging fort. Der junge Papagei verneigte sich vor dem Asketen und sprach: 'Herr, ich besitze keinen Reichtum. Solltet Ihr jedoch Bedarf an rotem Reis haben, so befindet sich an jenem Ort meine Wohnstätte. Geht dorthin und ruft nach 'Suva'! Ich werde meinen Verwandten Bescheid geben und kann veranlassen, dass man Euch viele Wagenladungen voll roten Reises bringt.' Nach diesen Worten flog er fort. Der andere jedoch, der treulose Prinz, dachte bei sich: 'Es schickt sich nicht, einfach davonzugehen, ohne aus reinem Anstand etwas gesagt zu haben. Wenn er dann zu mir kommt, werde ich ihn töten lassen!' Und so sprach er: 'Herr, wenn ich die Königsherrschaft angetreten habe, kommt zu mir. Ich werde Euch mit den vier Lebensbedürfnissen versorgen.' Nach diesen Worten ging er fort. Er kehrte zurück und bestieg nicht lange danach den Thron. Bodhisatto ‘‘vīmaṃsissāmi tāva ne’’ti paṭhamaṃ sappassa santikaṃ gantvā avidūre ṭhatvā ‘‘dīghā’’ti pakkosi. So ekavacaneneva nikkhamitvā bodhisattaṃ vanditvā ‘‘bhante, imasmiṃ ṭhāne cattālīsa hiraññakoṭiyo, tā sabbāpi nīharitvā gaṇhathā’’ti āha. Bodhisatto ‘‘evamatthu, uppanne kicce jānissāmī’’ti taṃ nivattetvā undūrassa santikaṃ gantvā saddamakāsi. Sopi tatheva paṭipajji. Bodhisatto tampi nivattetvā suvassa santikaṃ gantvā ‘‘suvā’’ti pakkosi. Sopi ekavacaneneva rukkhaggato otaritvā bodhisattaṃ vanditvā ‘‘kiṃ, bhante, mayhaṃ ñātakānaṃ santikaṃ gantvā himavantappadesato tumhākaṃ sayaṃjātasālī āharāpemī’’ti pucchi. Bodhisatto ‘‘atthe sati jānissāmī’’ti tampi nivattetvā ‘‘idāni rājānaṃ pariggaṇhissāmī’’ti gantvā rājuyyāne vasitvā punadivase ākappasampattiṃ katvā bhikkhācāravattena nagaraṃ pāvisi. Tasmiṃ khaṇe so mittadubbhī rājā alaṅkatahatthikkhandhavaragato mahantena parivārena [Pg.344] nagaraṃ padakkhiṇaṃ karoti. So bodhisattaṃ dūratova disvā ‘‘ayaṃ so kūṭatāpaso mama santike bhuñjitvā vasitukāmo āgato, yāva parisamajjhe attano mayhaṃ kataguṇaṃ nappakāseti, tāvadevassa sīsaṃ chindāpessāmī’’ti purise olokesi. ‘‘Kiṃ karoma, devā’’ti ca vutte ‘‘esa kūṭatāpaso maṃ kiñci yācitukāmo āgacchati maññe, etassa kāḷakaṇṇitāpasassa maṃ passituṃ adatvāva etaṃ gahetvā pacchābāhaṃ bandhitvā catukke catukke paharantā nagarā nikkhāmetvā āghātane sīsamassa chinditvā sarīraṃ sūle uttāsethā’’ti āha. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā gantvā niraparādhaṃ mahāsattaṃ bandhitvā catukke catukke paharantā āghātanaṃ netuṃ ārabhiṃsu. Bodhisatto pahaṭapahaṭaṭṭhāne ‘‘amma, tātā’’ti akanditvā nibbikāro imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta dachte: „Ich will sie zuerst einmal auf die Probe stellen.“ Er ging zuerst in die Nähe der Schlange, blieb nicht weit entfernt stehen und rief: „He, Langkörper!“ Diese kam sogleich auf sein einziges Rufen hin heraus, verneigte sich vor dem Bodhisatta und sagte: „Ehrwürdiger Herr, an diesem Ort liegen vierzig Millionen Goldstücke vergraben. Holt sie alle hervor und nehmt sie.“ Der Bodhisatta sprach: „So soll es sein; wenn ein Bedarf entsteht, werde ich es wissen.“ Er schickte sie zurück, ging zum Aufenthaltsort der Ratte und gab ein Zeichen. Auch diese verhielt sich genau so. Der Bodhisatta schickte auch sie zurück, ging zum Papagei und rief: „He, Papagei!“ Auch dieser kam auf sein einziges Rufen hin von der Baumkrone herab, verneigte sich vor dem Bodhisatta und fragte: „Ehrwürdiger Herr, soll ich zu meinen Verwandten fliegen und für Euch aus dem Himavanta-Gebiet von selbst gewachsenen Wildreis herbeischaffen lassen?“ Der Bodhisatta sprach: „Wenn Bedarf besteht, werde ich es wissen.“ Er schickte auch ihn zurück. Mit dem Gedanken „Nun werde ich den König prüfen“ ging er hin, verweilte im königlichen Garten, kleidete sich am folgenden Tag gebührend an und betrat die Stadt zur Almosenrunde. In diesem Augenblick ritt jener verräterische König auf dem Nacken eines geschmückten, edlen Elefanten und hielt in Begleitung eines großen Gefolges einen feierlichen Umzug um die Stadt. Als er den Bodhisatta schon von weitem erblickte, dachte er: „Dieser betrügerische Asket kommt wohl in der Absicht, bei mir zu essen und zu wohnen. Bevor er inmitten der Menge die Wohltat öffentlich verkündet, die er mir erwiesen hat, werde ich ihm noch zuvor den Kopf abschlagen lassen.“ Und er blickte seine Männer an. Als sie fragten: „Was sollen wir tun, o Gebieter?“, sprach er: „Dieser betrügerische Asket kommt wohl, weil er mich um etwas bitten will. Erlaubt diesem unheilbringenden Asketen überhaupt nicht, mich anzusehen! Ergreift ihn, bindet ihm die Arme auf den Rücken, peitscht ihn an jeder Straßenkreuzung aus, treibt ihn aus der Stadt, schlagt ihm an der Richtstätte den Kopf ab und spießt seinen Leichnam auf!“ Sie stimmten mit den Worten „Sehr wohl“ zu, gingen hin, fesselten das unschuldige Große Wesen und schickten sich an, ihn unter fortwährenden Schlägen an jeder Straßenkreuzung zur Richtstätte zu führen. Der Bodhisatta jedoch schrie an jeder Stelle, an der er geschlagen wurde, nicht nach Mutter oder Vater, sondern sprach ganz gelassen diese Strophe: 73. 73. ‘‘Saccaṃ kirevamāhaṃsu, narā ekacciyā idha; Kaṭṭhaṃ niplavitaṃ seyyo, na tvevekacciyo naro’’ti. „Die Wahrheit wahrlich sprachen manche Menschen hier auf Erden: Ein herangeschwemmtes Stück Holz zu retten ist besser als so mancher Mensch.“ Tattha saccaṃ kirevamāhaṃsūti avitathameva kira evaṃ vadanti. Narā ekacciyā idhāti idhekacce paṇḍitapurisā. Kaṭṭhaṃ niplavitaṃ seyyoti nadiyā vuyhamānaṃ sukkhadāruṃ niplavitaṃ uttāretvā thale ṭhapitaṃ seyyo sundarataro. Evañhi vadamānā te purisā saccaṃ kira vadanti. Kiṃkāraṇā? Tañhi yāgubhattādīnaṃ pacanatthāya, sītāturānaṃ visibbanatthāya, aññesampi ca parissayānaṃ haraṇatthāya upakāraṃ hoti. Na tvevekacciyo naroti ekacco pana mittadubbhī akataññū pāpapuriso oghena vuyhamāno hatthena gahetvā uttārito na tveva seyyo. Tathā hi ahaṃ imaṃ pāpapurisaṃ uttāretvā imaṃ attano dukkhaṃ āharinti. Evaṃ pahaṭapahaṭaṭṭhāne imaṃ gāthamāha. Darin bedeutet: ‚Die Wahrheit wahrlich sprachen...‘: Sie verkünden wahrlich das, was untrüglich ist. ‚Manche Menschen hier auf Erden‘: hier einige weise Männer. ‚Ein herangeschwemmtes Stück Holz zu retten ist besser‘: Ein trockenes Holzstück, das vom Fluss fortgerissen, herausgezogen und an das trockene Land gelegt wurde, ist besser, das heißt weitaus nützlicher. Denn jene Männer, die dies sagen, sprechen wahrlich die Wahrheit. Aus welchem Grund? Weil es nützlich ist, um Reisschleim, Reis und andere Speisen zu kochen, um jenen, die von Frost geplagt sind, Wärme zu spenden, und um auch andere Gefahren abzuwenden. ‚Als so mancher Mensch‘: Ein mancher verräterischer, undankbarer, böser Mensch hingegen, den man, als er von den Fluten fortgeschwemmt wurde, mit den Händen ergriff und rettete, ist keineswegs besser. Denn indem ich diesen bösen Menschen rettete, habe ich mir selbst dieses Leid eingehandelt. So sprach er an jeder Stelle, an der er geschlagen wurde, diese Strophe. Taṃ sutvā ye tattha paṇḍitapurisā, te āhaṃsu ‘‘kiṃ pana, bho pabbajita, tayā amhākaṃ rañño atthi koci guṇo kato’’ti? Bodhisatto taṃ pavattiṃ ārocetvā ‘‘evamimaṃ mahoghato uttārento ahameva attano dukkhaṃ akāsiṃ, ‘na vata me porāṇakapaṇḍitānaṃ vacanaṃ kata’nti anussaritvā evaṃ vadāmī’’ti āha. Taṃ [Pg.345] sutvā khattiyabrāhmaṇādayo nagaravāsino ‘‘svāyaṃ mittadubbhī rājā evaṃ guṇasampannassa attano jīvitadāyakassa guṇamattampi na jānāti, taṃ nissāya kuto amhākaṃ vuḍḍhi, gaṇhatha na’’nti kupitā samantato uṭṭhahitvā ususattipāsāṇamuggarādippahārehi hatthikkhandhagatameva naṃ ghātetvā pāde gahetvā kaḍḍhitvā parikhāpiṭṭhe chaḍḍetvā bodhisattaṃ abhisiñcitvā rajje patiṭṭhāpesuṃ. Als die weisen Männer, die dort anwesend waren, dies hörten, fragten sie: „Wie nun, o ehrwürdiger Asket, hast du unserem König irgendeine Wohltat erwiesen?“ Der Bodhisatta erzählte ihnen den gesamten Vorfall und sprach: „Indem ich diesen Mann aus den gewaltigen Fluten rettete, habe ich mir selbst dieses Leid zugefügt. Im Gedenken daran: ‚Ach, ich habe das Wort der alten Weisen nicht befolgt!‘, spreche ich so.“ Als die Stadtbewohner, darunter Adlige, Brahmanen und andere, dies hörten, wurden sie zornig: „Dieser verräterische König weiß nicht einmal die geringste Wohltat dessen an, der so tugendhaft ist und ihm das Leben schenkte! Welches Gedeihen soll uns durch ihn erwachsen? Ergreift ihn!“ Sie erhoben sich von allen Seiten und erschlugen den König, während er noch auf dem Elefantenrücken saß, mit Pfeilen, Speeren, Steinen, Keulen und anderen Waffen. Sie packten ihn an den Füßen, schleiften ihn fort, warfen ihn in den Festungsgraben, salbten sodann den Bodhisatta zum König und setzten ihn auf den Thron. So dhammena rajjaṃ kārento puna ekadivasaṃ sappādayo pariggaṇhitukāmo mahantena parivārena sappassa vasanaṭṭhānaṃ gantvā ‘‘dīghā’’ti pakkosi. Sappo āgantvā vanditvā ‘‘idaṃ te sāmi dhanaṃ gaṇhā’’ti āha. Rājā cattālīsahiraññakoṭidhanaṃ amacce paṭicchāpetvā undūrassa santikaṃ gantvā ‘‘undūrā’’ti pakkosi. Sopi āgantvā vanditvā tiṃsakoṭidhanaṃ niyyādesi. Rājā tampi amacce paṭicchāpetvā suvassa vasanaṭṭhānaṃ gantvā ‘‘suvā’’ti pakkosi. Sopi āgantvā pāde vanditvā ‘‘kiṃ, sāmi, sāliṃ āharāmī’’ti āha. Rājā ‘‘sālīhi atthe sati āharissasi, ehi gacchāmā’’ti sattatiyā hiraññakoṭīhi saddhiṃ te tayopi jane gāhāpetvā nagaraṃ gantvā pāsādavare mahātalaṃ āruyhaṃ dhanaṃ saṅgopetvā sappassa vasanatthāya suvaṇṇanāḷiṃ, undūrassa phalikaguhaṃ, suvassa suvaṇṇapañjaraṃ kārāpetvā sappassa ca suvassa ca bhojanatthāya devasikaṃ kañcanataṭṭake madhulāje, undūrassa gandhasālitaṇḍule dāpesi, dānādīni ca puññāni karoti. Evaṃ te cattāropi janā yāvajīvaṃ samaggā sammodamānā viharitvā jīvitakkhaye yathākammaṃ agamaṃsu. Während er das Reich in Gerechtigkeit regierte, ging er eines Tages in Begleitung eines großen Gefolges zum Wohnort der Schlange, da er sie und die anderen Tiere auf die Probe stellen wollte, und rief: „He, Langkörper!“ Die Schlange kam herbei, verneigte sich vor ihm und sagte: „Herr, dieses Geld gehört dir, nimm es an.“ Der König übergab den Schatz von vierzig Millionen Goldstücken seinen Ministern, ging dann zum Aufenthaltsort der Ratte und rief: „He, Ratte!“ Auch diese kam herbei, verneigte sich vor ihm und händigte ihm einen Schatz von dreißig Millionen Goldstücken aus. Der König übergab auch diesen Schatz seinen Ministern, ging zum Wohnort des Papageis und rief: „He, Papagei!“ Auch dieser kam herbei, verneigte sich vor seinen Füßen und fragte: „Soll ich, o Herr, Wildreis herbeibringen?“ Der König sprach: „Wenn Bedarf an Wildreis besteht, magst du ihn bringen. Komm, lass uns gehen!“ Er ließ alle drei Geschöpfe zusammen mit den siebzig Millionen Goldstücken mitnehmen, kehrte in die Stadt zurück und stieg auf die oberste Plattform seines prächtigen Palastes hinauf. Nachdem er die Schätze sicher verwahrt hatte, ließ er für die Schlange ein goldenes Behältnis, für die Ratte eine Kristallhöhle und für den Papagei einen goldenen Käfig anfertigen. Er ließ der Schlange und dem Papagei täglich auf einer goldenen Schale mit Honig vermischten Puffreis als Nahrung geben und der Ratte duftende Wildreiskörner. Zudem vollbrachte er gute Taten wie das Geben von Almosen. So lebten alle vier Wesen ihr Leben lang in Eintracht und Freude beisammen, und nach ihrem Ableben gingen sie gemäß ihrem angesammelten Karma dahin. Satthā ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva mayhaṃ vadhāya parisakkati, pubbepi parisakkiyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā duṭṭharājā devadatto ahosi, sappo sāriputto, undūro moggallāno, suvo ānando, pacchā rajjappatto dhammarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, trachtet Devadatta danach, mich zu töten; auch in der Vergangenheit hat er schon danach getrachtet.“ Nachdem er diese Lehrrede vorgetragen und den Zusammenhang dargelegt hatte, führte er das Jātaka mit folgenden Worten zusammen: „Damals war der böse König Devadatta, die Schlange war Sāriputta, die Ratte war Moggallāna, der Papagei war Ānanda, der gerechte König aber, der später die Herrschaft erlangte, war ich selbst.“ Saccaṃkirajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Saccaṃkira-Jātaka ist die dritte.
[74] 4. Rukkhadhammajātakavaṇṇanā [74] 4. Die Erklärung des Rukkhadhamma-Jātaka Sādhū [Pg.346] sambahulā ñātīti idaṃ satthā jetavane viharanto udakakalahe attano ñātakānaṃ mahāvināsaṃ paccupaṭṭhitaṃ ñatvā ākāsena gantvā rohiṇīnadiyā upari pallaṅkena nisīditvā nīlaraṃsiṃ vissajjetvā ñātake saṃvejetvā ākāsā oruyha nadītīre nisinno taṃ kalahaṃ ārabbha kathesi. Ayamettha saṅkhepo, vitthāro pana kuṇālajātake (jā. 2.21.kuṇālajātaka) āvi bhavissati. Tadā pana satthā ñātake āmantetvā ‘‘mahārājā, tumhe ñātakā, ñātakehi nāma samaggehi sammodamānehi bhavituṃ vaṭṭati. Ñātakānañhi sāmaggiyā sati paccāmittā okāsaṃ na labhanti, tiṭṭhantu tāva manussabhūtā, acetanānaṃ rukkhānampi sāmaggiṃ laddhuṃ vaṭṭati. Atītasmiñhi himavantappadese mahāvāto sālavanaṃ pahari, tassa pana sālavanassa aññamaññaṃ rukkhagacchagumbalatāhi sambandhattā ekarukkhampi pātetuṃ asakkonto matthakamatthakeneva agamāsi. Ekaṃ pana aṅgaṇe ṭhitaṃ sākhāviṭapasampannampi mahārukkhaṃ aññehi rukkhehi asambandhattā ummūletvā bhūmiyaṃ pātesi, iminā kāraṇena tumhehipi samaggehi sammodamānehi bhavituṃ vaṭṭatī’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. „Gut sind zahlreiche Verwandte“ – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana verweilte. Als er nämlich das drohende große Verderben seiner Verwandten bei dem Streit um das Wasser erkannte, reiste er durch die Luft, setzte sich im Kreuzsitz über dem Fluss Rohiṇī nieder, sandte blaue Strahlen aus, flößte den Verwandten heilsamen Schrecken ein, stieg vom Himmel herab und erzählte, am Flussufer sitzend, diese Geschichte im Hinblick auf jenen Streit. Dies ist hier die Zusammenfassung; die ausführliche Darstellung wird jedoch im Kuṇālajātaka deutlich werden. Damals nun wandte sich der Meister an seine Verwandten und sprach: „O Könige, ihr seid Verwandte; für Verwandte geziemt es sich, einig und miteinander erfreut zu sein. Denn wenn Eintracht unter Verwandten herrscht, finden Feinde keine Gelegenheit. Lasst die Menschen erst einmal beiseite, selbst für leblose Bäume geziemt es sich, Eintracht zu halten. In der Vergangenheit nämlich suchte ein heftiger Sturm im Himalaya-Gebiet einen Sal-Wald heim. Da jener Sal-Wald jedoch durch die gegenseitige Verflechtung von Bäumen, Sträuchern, Gebüsch und Schlingpflanzen miteinander verbunden war, konnte der Sturm nicht einmal einen einzigen Baum zu Fall bringen, sondern strich nur über deren Wipfel hinweg. Einen einzelnen, auf einer Lichtung stehenden großen Baum jedoch, der, obwohl er reich an Ästen und Zweigen war, nicht mit anderen Bäumen verbunden war, entwurzelte er und stürzte ihn zu Boden. Aus diesem Grund geziemt es sich auch für euch, einig und miteinander erfreut zu sein.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er auf ihre Bitte hin eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente paṭhamaṃ uppanno vessavaṇo mahārājā cavi, sakko aññaṃ vessavaṇaṃ ṭhapesi. Etasmiṃ vessavaṇe parivatte pacchā nibbattavessavaṇo ‘‘rukkhagacchagumbalatānaṃ attano attano ruccanaṭṭhāne vimānaṃ gaṇhantū’’ti sāsanaṃ pesesi. Tadā bodhisatto himavantappadese ekasmiṃ sālavane rukkhadevatā hutvā nibbatti. So ñātake āha ‘‘tumhe vimānāni gaṇhantā aṅgaṇe ṭhitarukkhesu mā gaṇhatha, imasmiṃ pana sālavane mayā gahitavimānaṃ parivāretvā ṭhitavimānāni gaṇhathā’’ti. Tattha bodhisattassa vacanakarā paṇḍitadevatā bodhisattassa vimānaṃ parivāretvā ṭhitavimānāni gaṇhiṃsu. Apaṇḍitā pana devatā ‘‘kiṃ amhākaṃ attho araññavimānehi, mayaṃ manussapathe gāmanigamarājadhānidvāresu vimānāni gaṇhissāma. Gāmādayo hi upanissāya vasamānā devatā lābhaggayasaggappattā hontī’’ti manussapathe aṅgaṇaṭṭhāne nibbattamahārukkhesu vimānāni gaṇhiṃsu. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, verschied der zuerst geborene Großkönig Vessavaṇa. Sakka setzte einen anderen Vessavaṇa ein. Als dieser Vessavaṇa-Wechsel stattfand, sandte der danach erschienene Vessavaṇa folgende Botschaft aus: „Die Gottheiten der Bäume, Sträucher, Gebüsche und Schlingpflanzen sollen sich jeweils an einem Ort ihrer eigenen Wahl eine Wohnstätte nehmen.“ Damals wurde der Bodhisatta im Himalaya-Gebiet in einem Sal-Wald als Baumgottheit wiedergeboren. Er sprach zu seinen Verwandten: „Wenn ihr euch Wohnstätten erwählt, so nehmt sie nicht in Bäumen, die auf einer freien Lichtung stehen, sondern nehmt in diesem Sal-Wald Wohnstätten, die jene von mir gewählte Wohnstätte umgeben.“ Unter ihnen nahmen die weisen Gottheiten, die auf das Wort des Bodhisatta hörten, Wohnstätten, die die Wohnstätte des Bodhisatta umgaben. Die törichten Gottheiten hingegen dachten: „Was nützen uns Wohnstätten im Wald? Wir wollen uns Wohnstätten auf den Wegen der Menschen, an den Toren von Dörfern, Städten und Königsstädten nehmen. Denn Gottheiten, die in der Nähe von Dörfern und dergleichen wohnen, erlangen das Höchste an Gewinn und das Höchste an Ansehen.“ So nahmen sie sich Wohnstätten in großen Bäumen, die auf freien Plätzen entlang der Menschenwege wuchsen. Athekasmiṃ [Pg.347] divase mahatī vātavuṭṭhi uppajji. Vātassa atibalavatāya daḷhamūlā vanajeṭṭhakarukkhāpi saṃbhaggasākhāviṭapā samūlā nipatiṃsu. Taṃ pana aññamaññaṃ sambandhanena ṭhitaṃ sālavanaṃ patvā ito cito ca paharanto ekarukkhampi pātetuṃ nāsakkhi. Bhaggavimānā devatā nippaṭisaraṇā dārake hatthesu gahetvā himavantaṃ gantvā attano pavattiṃ sālavanadevatānaṃ kathayiṃsu. Tā tāsaṃ evaṃ āgatabhāvaṃ bodhisattassa ārocesuṃ. Bodhisatto ‘‘paṇḍitānaṃ vacanaṃ aggahetvā nippaccayaṭṭhānaṃ gatā nāma evarūpāva hontī’’ti vatvā dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Da zog eines Tages ein gewaltiger Sturm mit heftigem Regen auf. Aufgrund der übergroßen Gewalt des Windes wurden selbst die fest verwurzelten riesigen Waldbäume an Ästen und Zweigen zerschmettert und samt den Wurzeln umgestürzt. Als der Wind jedoch jenen Sal-Wald erreichte, der durch die gegenseitige Verflechtung der Bäume fest zusammenhielt, konnte er, obwohl er von hier und dort dagegen peitschte, auch nicht einen einzigen Baum zu Fall bringen. Die Gottheiten, deren Wohnstätten zerstört worden waren, waren nun schutzlos. Sie nahmen ihre Kinder an den Händen, flohen in den Himalaya und erzählten den Gottheiten des Sal-Waldes von ihrem Schicksal. Diese berichteten dem Bodhisatta von deren Ankunft. Der Bodhisatta sprach: „Wer die Worte der Weisen nicht annimmt und an einen Ort geht, an dem es keinen Beistand gibt, dem ergeht es wahrlich so.“ Und um die Lehre zu verkünden, sprach er folgende Strophe: 74. 74. ‘‘Sādhū sambahulā ñātī, api rukkhā araññajā; Vāto vahati ekaṭṭhaṃ, brahantampi vanappati’’nti. „Gut sind zahlreiche Verwandte, selbst wenn es im Wald gewachsene Bäume sind; der Wind reißt den einzeln stehenden, selbst den riesigen Herrscher des Waldes fort.“ Tattha sambahulā ñātīti cattāro upādāya tatuttari satasahassampi sambahulā nāma, evaṃ sambahulā aññamaññaṃ nissāya vasantā ñātakā. Sādhūti sobhanā pasatthā, parehi appadhaṃsiyāti attho. Api rukkhā araññajāti tiṭṭhantu manussabhūtā, araññe jātarukkhāpi sambahulā aññamaññūpatthambhena ṭhitā sādhuyeva. Rukkhānampi hi sapaccayabhāvo laddhuṃ vaṭṭati. Vāto vahati ekaṭṭhanti puratthimādibhedo vāto vāyanto aṅgaṇaṭṭhāne ṭhitaṃ ekaṭṭhaṃ ekakameva ṭhitaṃ brahantampi vanappatiṃ sākhāviṭapasampannaṃ mahārukkhampi vahati, ummūletvā pātetīti attho. Bodhisatto imaṃ kāraṇaṃ kathetvā āyukkhaye yathākammaṃ gato. Darin bedeutet „zahlreiche Verwandte“: Angefangen bei vieren bis hin zu mehr als hunderttausend nennt man „zahlreich“; solche zahlreichen Verwandten, die in gegenseitiger Abhängigkeit voneinander leben. „Gut“ bedeutet schön, lobenswert, von anderen unbezwingbar; dies ist der Sinn. „Selbst wenn es im Wald gewachsene Bäume sind“: Lasst die Menschen erst einmal beiseite, selbst im Wald gewachsene Bäume, wenn sie zahlreich sind und sich gegenseitig stützend dastehen, sind wahrlich gut. Denn auch für Bäume ist es angemessen, unterstützende Bedingungen zu haben. „Der Wind reißt den einzeln stehenden fort“: Der wehende Wind – ob Ostwind oder andere Winde – reißt den auf einer Lichtung einzeln stehenden, das heißt ganz allein stehenden, selbst den riesigen Herrscher des Waldes fort, also auch einen großen Baum, der reich an Ästen und Zweigen ist; er entwurzelt ihn und stürzt ihn zu Boden; dies ist der Sinn. Nachdem der Bodhisatta diesen Sachverhalt dargelegt hatte, ging er nach dem Ende seiner Lebensspanne gemäß seinem Kamma einher. Satthāpi ‘‘evaṃ, mahārājā, ñātakānaṃ tāva sāmaggiyeva laddhuṃ vaṭṭati, samaggā sammodamānā piyasaṃvāsameva vasathā’’ti imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā devatā buddhaparisā ahesuṃ, paṇḍitadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister sprach: „Ebenso, o Könige, geziemt es sich vor allem für Verwandte, Eintracht zu halten. Lebt einig, einander erfreuend, in liebevoller Gemeinschaft!“ Nachdem er diese Lehrverkündung dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er die Geburtengeschichte wie folgt zusammen: „Damals waren jene Gottheiten die Buddha-Gemeinde, die weise Gottheit aber war ich selbst.“ Rukkhadhammajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Rukkhadhamma-Jātaka ist die vierte.
[75] 5. Macchajātakavaṇṇanā [75] 5. Die Erklärung des Maccha-Jātaka. Abhitthanaya [Pg.348] pajjunnāti idaṃ satthā jetavane viharanto attanā vassāpitavassaṃ ārabbha kathesi. Ekasmiṃ kira samaye kosalaraṭṭhe devo na vassi, sassāni milāyanti, tesu tesu ṭhānesu taḷākapokkharaṇisarāni sussanti. Jetavanadvārakoṭṭhakasamīpe jetavanapokkharaṇiyāpi udakaṃ chijji. Kalalagahanaṃ pavisitvā nipanne macchakacchape kākakulalādayo kaṇayaggasadisehi tuṇḍehi koṭṭetvā nīharitvā nīharitvā vipphandamāne khādanti. „Donnere laut, o Regenwolke!“ – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana verweilte, im Hinblick auf den Regen, den er selbst hatte regnen lassen. Zu jener Zeit nämlich, so heißt es, regnete es im Kosala-Reich nicht. Die Saaten welkten dahin, und an den verschiedenen Orten trockneten Teiche, Weiher und Seen aus. Auch im Jetavana-Teich nahe dem Torhaus des Jetavana-Klosters versiegte das Wasser. Krähen, Milane und andere Vögel pickten mit ihren speerspitzenartigen Schnäbeln nach den Fischen und Schildkröten, die sich in den dicken Schlamm zurückgezogen hatten, zogen sie heraus und fraßen sie, während sie noch zappelten. Satthā macchakacchapānaṃ taṃ byasanaṃ disvā mahākaruṇāya ussāhitahadayo ‘‘ajja mayā devaṃ vassāpetuṃ vaṭṭatī’’ti pabhātāya rattiyā sarīrapaṭijagganaṃ katvā bhikkhācāravelaṃ sallakkhetvā mahābhikkhusaṅghaparivuto buddhalīlāya sāvatthiyaṃ piṇḍāya pavisitvā pacchābhattaṃ piṇḍapātapaṭikkanto sāvatthito vihāraṃ gacchanto jetavanapokkharaṇiyā sopāne ṭhatvā ānandattheraṃ āmantesi ‘‘ānanda, udakasāṭikaṃ āhara, jetavanapokkharaṇiyaṃ nhāyissāmī’’ti. ‘‘Nanu, bhante, jetavanapokkharaṇiyaṃ udakaṃ chinnaṃ, kalalamattameva avasiṭṭha’’nti? ‘‘Ānanda, buddhabalaṃ nāma mahantaṃ, āhara tvaṃ udakasāṭika’’nti. Thero āharitvā adāsi. Satthā ekenantena udakasāṭikaṃ nivāsetvā ekenantena sarīraṃ pārupitvā ‘‘jetavanapokkharaṇiyaṃ nhāyissāmī’’ti sopāne aṭṭhāsi. Taṅkhaṇaññeva sakkassa paṇḍukambalasilāsanaṃ uṇhākāraṃ dassesi. So ‘‘kiṃ nu kho’’ti āvajjento taṃ kāraṇaṃ ñatvā vassavalāhakadevarājānaṃ pakkosāpetvā ‘‘tāta, satthā ‘jetavanapokkharaṇiyaṃ nhāyissāmī’ti dhurasopāne ṭhito, khippaṃ sakalakosalaraṭṭhaṃ ekameghaṃ katvā vassāpehī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā ekaṃ valāhakaṃ nivāsetvā ekaṃ pārupitvā meghagītaṃ gāyanto pācīnalokadhātuabhimukho pakkhandi. Pācīnadisābhāge khalamaṇḍalamattaṃ ekaṃ meghapaṭalaṃ uṭṭhāya satapaṭalaṃ sahassapaṭalaṃ hutvā abhitthanantaṃ vijjulatā nicchārentaṃ adhomukhaṃ ṭhapitaudakakumbhākārena vassamānaṃ sakalakosalaraṭṭhaṃ mahoghena viya ajjhotthari. Devo acchinnadhāraṃ vassanto muhutteneva [Pg.349] jetavanapokkharaṇiṃ pūresi, dhurasopānaṃ āhacca udakaṃ aṭṭhāsi. Als der Meister jene Not der Fische und Schildkröten sah, war sein Herz von großem Mitgefühl bewegt. Er dachte: „Heute ist es für mich angemessen, Regen herabzurufen.“ Als die Nacht gewichen war, verrichtete er seine Körperpflege, merkte sich die Zeit für den Almosengang und betrat, umgeben von einer großen Mönchsgemeinde, in der erhabenen Haltung eines Buddhas Sāvatthī zum Almosensammeln. Nach dem Mahle kehrte er vom Almosengang zurück, begab sich von Sāvatthī auf den Weg zum Kloster, blieb an den Stufen des Jetavana-Teichs stehen und wandte sich an den ehrwürdigen Ānanda: „Ānanda, bringe mein Badegewand, ich werde im Jetavana-Teich baden.“ – „Aber Herr, ist das Wasser im Jetavana-Teich nicht versiegt und nur noch Schlamm übrig?“ – „Ānanda, die Kraft eines Buddhas ist wahrlich groß. Bringe du nur das Badegewand!“ Der Ehrwürdige brachte es und überreichte es ihm. Der Meister legte das Badegewand mit dem einen Ende um die Hüften, bedeckte seinen Körper mit dem anderen Ende und trat auf die Stufen mit dem Gedanken: „Ich werde im Jetavana-Teich baden.“ In genau diesem Augenblick wurde der gelbe Steinthron Sakkas heiß. Als dieser sich besann: „Was mag wohl der Grund sein?“, erkannte er die Ursache, ließ den König der Regenwolken-Gottheiten rufen und befahl ihm: „Mein Lieber, der Meister steht an den Stufen des Jetavana-Teichs, um zu baden. Lass sogleich über dem gesamten Kosala-Reich eine einzige Wolke aufsteigen und Regen herabfallen!“ Jener willigte ein, indem er sagte: „Sehr wohl!“, kleidete sich in eine Regenwolke, hüllte sich in eine andere ein und eilte, ein Wolkenlied singend, der östlichen Weltgegend entgegen. Im Osten stieg eine Wolke von der Größe eines Dreschplatzes empor, wuchs zu hunderten und tausenden von Schichten an, donnerte laut, schleuderte Blitze herab und ergoss sich wie ein umgestülpter Wasserkrug wie eine gewaltige Flut über das gesamte Kosala-Reich. Der Regen fiel in ununterbrochenen Strömen und füllte in nur einem Augenblick den Jetavana-Teich, bis das Wasser die oberste Stufe erreichte. Satthā pokkharaṇiyaṃ nhāyitvā surattadupaṭṭaṃ nivāsetvā kāyabandhanaṃ bandhitvā sugatamahācīvaraṃ ekaṃsaṃ katvā bhikkhusaṅghaparivuto gantvā gandhakuṭipariveṇe paññattavarabuddhāsane nisīditvā bhikkhusaṅghena vatte dassite uṭṭhāya maṇisopānaphalake ṭhatvā bhikkhusaṅghassa ovādaṃ datvā uyyojetvā surabhigandhakuṭiṃ pavisitvā dakkhiṇena passena sīhaseyyaṃ kappetvā sāyanhasamaye dhammasabhāyaṃ sannipatitānaṃ bhikkhūnaṃ ‘‘passathāvuso, dasabalassa khantimettānuddayasampattiṃ, vividhasassesu milāyantesu nānājalāsayesu sussantesu macchakacchapesu mahādukkhaṃ pāpuṇantesu kāruññaṃ paṭicca ‘mahājanaṃ dukkhā mocessāmī’ti udakasāṭikaṃ nivāsetvā jetavanapokkharaṇiyā dhurasopāne ṭhatvā muhuttena sakalakosalaraṭṭhaṃ mahoghena opilāpento viya devaṃ vassāpetvā mahājanaṃ kāyikacetasikadukkhato mocetvā vihāraṃ paviṭṭho’’ti kathāya vattamānāya gandhakuṭito nikkhamitvā dhammasabhaṃ āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, tathāgato idāneva mahājane kilamante devaṃ vassāpeti, pubbe tiracchānayoniyaṃ nibbattitvā maccharājakālepi vassāpesiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Nachdem der Meister im Teich gebadet hatte, legte er sein leuchtend rotes, doppeltes Untergewand an, band den Gürtel um, warf das edle Obergewand des Erhabenen über eine Schulter und begab sich, begleitet von der Mönchsgemeinde, zum Vorhof der Duftkammer, wo er sich auf den für ihn bereiteten Buddhasitz setzte. Nachdem die Mönche ihre Pflichten erfüllt hatten, erhob er sich, trat auf die Plattform der Juwelentreppe, erteilte der Mönchsgemeinde eine Lehrrede, entließ sie, betrat die wohlriechende Duftkammer und legte sich auf der rechten Seite liegend zur Löwenruhe nieder. Am Abend, als sich die Mönche in der Lehrhalle versammelt hatten und folgendes Gespräch führten: „Seht, Brüder, die Vollkommenheit der Geduld, der liebenden Güte und des Mitgefühls des Zehnkräftebesitzers! Als die verschiedenen Saaten vertrockneten, die verschiedenen Gewässer versiegten und die Fische und Schildkröten großes Leid erfuhren, dachte er aus Mitgefühl: ‚Ich werde die vielen Wesen aus dem Leid befreien‘, legte sein Badegewand an, stellte sich an die oberste Stufe des Jetavana-Teichs, ließ in einem einzigen Augenblick Regen herabkommen, als würde er das gesamte Kosala-Reich in einer gewaltigen Flut ertränken, befreite so die vielen Wesen von körperlichem und geistigem Leid und kehrte in das Kloster zurück“ – da verließ der Erhabene die Duftkammer, ging zur Lehrhalle und fragte: „Zu welchem Thema habt ihr euch, ihr Mönche, jetzt hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem und jenem Thema“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt hat der Tathāgata, als die vielen Menschen litten, Regen herabgerufen; auch in der Vergangenheit, als er im Schoß eines Tieres wiedergeboren worden war, hat er zu jener Zeit als Fischkönig ebenfalls Regen herabgerufen.“ Nach diesen Worten erzählte er die Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte imasmiṃyeva kosalaraṭṭhe imissā sāvatthiyā imasmiṃyeva jetavanapokkharaṇiṭṭhāne ekā valligahanaparikkhittā kandarā ahosi. Tadā bodhisatto macchayoniyaṃ nibbattitvā macchagaṇaparivuto tattha paṭivasati. Yathā pana idāni, evameva tadāpi tasmiṃ raṭṭhe devo na vassi, manussānaṃ sassāni milāyiṃsu, vāpitaḷākakandarādīsu udakaṃ chijji, macchakacchapā kalalagahanaṃ pavisiṃsu. Imissāpi kandarāya macchakacchapā kalalagahanaṃ pavisitvā tasmiṃ tasmiṃ ṭhāne nilīyiṃsu. Kākādayo tuṇḍena koṭṭetvā nīharitvā khādiṃsu. In der Vergangenheit gab es genau in diesem Kosala-Reich, genau hier in Sāvatthī, an genau der Stelle des Jetavana-Teiches, ein tiefes, von dichtem Schlingpflanzengestrüpp umgebenes Becken. Damals wurde der Bodhisatta im Schoß eines Fisches wiedergeboren und lebte dort, umgeben von einem großen Fischschwarm. Genau wie heute regnete es damals in jenem Reich nicht. Die Saaten der Menschen vertrockneten, in den Teichen, Seen und Schluchten versiegte das Wasser, und die Fische und Schildkröten flüchteten in den tiefen Schlamm. Auch in diesem Becken flüchteten die Fische und Schildkröten in den dichten Schlamm und verbargen sich an verschiedenen Stellen. Krähen und andere Vögel hackten mit ihren Schnäbeln nach ihnen, zogen sie heraus und fraßen sie auf. Bodhisatto ñātisaṅghassa taṃ byasanaṃ disvā ‘‘imaṃ tesaṃ dukkhaṃ ṭhapetvā maṃ añño mocetuṃ samattho nāma natthi, saccakiriyaṃ katvā devaṃ [Pg.350] vassāpetvā ñātake maraṇadukkhā mocessāmī’’ti kāḷavaṇṇaṃ kaddamaṃ dvidhā viyūhitvā nikkhamitvā añjanarukkhasāraghaṭikavaṇṇo mahāmaccho sudhotalohitaṅgamaṇiguḷasadisāni akkhīni ummīletvā ākāsaṃ ulloketvā pajjunnadevarājassa saddaṃ datvā ‘‘bho pajjunna, ahaṃ ñātake nissāya dukkhito, tvaṃ mayi sīlavante kilamante kasmā devaṃ na vassāpesi? Mayā samānajātikānaṃ khādanaṭṭhāne nibbattitvā taṇḍulappamāṇampi macchaṃ ādiṃ katvā khāditapubbo nāma natthi, aññopi me pāṇo jīvitā na voropitapubbo, iminā saccena devaṃ vassāpetvā ñātisaṅghaṃ me dukkhā mocehī’’ti vatvā paricārakaceṭakaṃ āṇāpento viya pajjunnadevarājānaṃ ālapanto imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta dieses Verderben seiner Verwandtenschar sah, dachte er: „Außer mir gibt es niemanden, der fähig ist, sie von diesem Leid zu befreien. Ich werde eine Wahrheitsbekräftigung vollziehen, Regen herabrufen und meine Verwandten vor der Qual des Todes bewahren.“ Er teilte den schwarzen Schlamm nach zwei Seiten auf, kam hervor, und als großer Fisch, der die glänzende Farbe eines Keils aus dem Kernholz des Añjana-Baumes hatte, öffnete er seine Augen, die wie frisch polierte rote Rubinkugeln glänzten, blickte zum Himmel empor, rief den Regengott Pajjunna an und sprach: „O Pajjunna, ich leide um meiner Verwandten willen. Warum lässt du es nicht regnen, während ich, ein Tugendhafter, Qualen leide? Obwohl ich in einer Gattung geboren wurde, die ihresgleichen frisst, habe ich niemals auch nur einen einzigen Fisch von der Größe eines Reiskorns gefressen, noch habe ich je einem anderen Lebewesen das Leben genommen. Durch diese Wahrheit lass es regnen und befreie meine Verwandtenschar von diesem Leid!“ Nach diesen Worten rief er den Regengott Pajjunna an, als würde er einen Dienerjungen herumkommandieren, und sprach diesen Vers: 75. 75. ‘‘Abhitthanaya pajjunna, nidhiṃ kākassa nāsaya; Kākaṃ sokāya randhehi, mañca sokā pamocayā’’ti. „Donnere, o Pajjunna, und vernichte den Schatz der Krähe! Bringe der Krähe Kummer und befreie mich von meinem Kummer!“ Tattha abhitthanaya pajjunnāti pajjunno vuccati megho, ayaṃ pana meghavasena laddhanāmaṃ vassavalāhakadevarājānaṃ ālapati. Ayaṃ kirassa adhippāyo – devo nāma anabhitthananto vijjulatā anicchārento vassantopi na sobhati, tasmā tvaṃ abhitthananto vijjulatā nicchārento vassāpehīti. Nidhiṃ kākassa nāsayāti kākā kalalaṃ pavisitvā ṭhite macche tuṇḍena koṭṭetvā nīharitvā khādanti, tasmā tesaṃ antokalale macchā ‘‘nidhī’’ti vuccanti, taṃ kākasaṅghassa nidhiṃ devaṃ vassāpento udakena paṭicchādetvā nāsehīti. Kākaṃ sokāya randhehīti kākasaṅgho imissā kandarāya udakena puṇṇāya macche alabhamāno socissati, taṃ kākagaṇaṃ tvaṃ imaṃ kandaraṃ pūrento sokāya randhehi, sokassatthāya macchassa assāsatthāya devaṃ vassāpehi. Yathā antonijjhānalakkhaṇaṃ sokaṃ pāpuṇāti, evaṃ karohīti attho, mañca sokā pamocayāti ettha ca-kāro sampiṇḍanattho, mañca mama ñātake ca sabbeva imamhā maraṇasokā mocehīti. Hierin bedeutet „Donnere, oh Pajjunna!“ (abhitthanaya pajjunna): Mit Pajjunna ist die Regenwolke gemeint; hier jedoch ruft er den König der Regengötter an, der diesen Namen aufgrund der Regenwolke erhalten hat. Dies ist wohl seine Absicht: „Wenn es regnet, ohne dass der Regengott donnert und Blitze aussendet, ist es nicht herrlich. Darum regne du, indem du donnerst und Blitze aussendest!“ „Zerstöre den Schatz der Krähe“ (nidhiṃ kākassa nāsayā) bedeutet: Wenn Fische im Schlamm stecken, hacken die Krähen mit ihren Schnäbeln nach ihnen, ziehen sie heraus und fressen sie. Darum werden die Fische im Schlamm als ihr „Schatz“ bezeichnet. Indem du es regnen lässt und sie mit Wasser bedeckst, zerstöre diesen Schatz der Krähenschar. „Bringe der Krähe Kummer“ (kākaṃ sokāya randhehi) bedeutet: Wenn diese Schlucht mit Wasser gefüllt ist, wird die Krähenschar betrübt sein, da sie keine Fische mehr fangen kann. Indem du diese Schlucht füllst, bringe dieser Krähenschar Kummer; lass es regnen zum Kummer der Krähen und zur Beruhigung der Fische. Die Bedeutung ist: Handle so, dass sie Kummer empfinden, der durch inneres Brennen gekennzeichnet ist. „Und befreie mich vom Kummer“ (mañca sokā pamocayā): Hier hat das Wort „ca“ eine verbindende Bedeutung; es bedeutet: „Befreie sowohl mich als auch all meine Verwandten von diesem Todesschmerz.“ Evaṃ [Pg.351] bodhisatto paricārakaceṭakaṃ āṇāpento viya pajjunnaṃ ālapitvā sakalakosalaraṭṭhe mahāvassaṃ vassāpetvā mahājanaṃ maraṇadukkhā mocetvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. So rief der Bodhisatta den Regengott an, gleichsam als würde er einem dienenden Knaben Befehle erteilen, ließ im gesamten Kosala-Reich einen großen Regen niedergehen, befreite die Menschenmenge vom Todesschmerz und ging am Ende seines Lebens gemäß seinem Karma fort. Satthā ‘‘na, bhikkhave, tathāgato idāneva devaṃ vassāpeti, pubbe macchayoniyaṃ nibbattopi vassāpesiyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā macchagaṇā buddhaparisā ahesuṃ, pajjunnadevarājā ānando, maccharājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt lässt der Tathāgata es regnen; auch in der Vergangenheit, als er im Schoß eines Fisches wiedergeboren wurde, ließ er es regnen.“ Nachdem er diese Lehrrede dargelegt und die Verbindung hergestellt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war die Schar der Fische die Gefolgschaft des Buddha, der König der Regengötter, Pajjunna, war Ānanda, und der Fischkönig war ich selbst.“ Macchajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Maccha-Jātaka, die fünfte.
[76] 6. Asaṅkiyajātakavaṇṇanā [76] 6. Die Erklärung des Asaṅkiya-Jātaka Asaṅkiyomhi gāmamhīti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ sāvatthivāsiṃ upāsakaṃ ārabbha kathesi. So kira sotāpanno ariyasāvako kenacideva karaṇīyena ekena sakaṭasatthavāhena saddhiṃ maggaṃ paṭipajjitvā ekasmiṃ araññaṭṭhāne sakaṭāni mocetvā khandhāvārabandhe kate satthavāhassa avidūre aññatarasmiṃ rukkhamūle caṅkamati. Athattano kālaṃ sallakkhetvā pañcasatā corā ‘‘khandhāvāraṃ vilumpissāmā’’ti dhanumuggarādihatthā taṃ ṭhānaṃ parivārayiṃsu. Upāsakopi caṅkamatiyeva. Corā naṃ disvā ‘‘addhā esa khandhāvārarakkhako bhavissati, imassa niddaṃ okkantakāle vilumpissāmā’’ti ajjhottharituṃ asakkontā tattha tattheva aṭṭhaṃsu. Sopi upāsako paṭhamayāmepi majjhimayāmepi pacchimayāmepi caṅkamantoyeva aṭṭhāsi. Paccūsakāle jāte corā okāsaṃ alabhantā gahite pāsāṇamuggarādayo chaḍḍetvā palāyiṃsu. „Ich bin im Dorfe ohne Furcht“ (asaṅkiyomhi gāmamhi) – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, in Bezug auf einen Laienanhänger (Upāsaka), der in Sāvatthī wohnte. Dieser edle Jünger, der ein Stromeingetretener (Sotāpanna) war, begab sich aus irgendeinem Anlass zusammen mit einer Wagenkarawane auf den Weg. Als sie an einer Stelle im Wald die Wagen abspannten und das Wagenlager aufschlugen, ging er in der Nähe des Karawanenführers am Fuße eines bestimmten Baumes auf und ab. Daraufhin bemerkten fünfhundert Räuber, die Zeit abwartend, das Lager und umstellten den Ort mit Bögen, Keulen und anderen Waffen in den Händen, in der Absicht: „Wir wollen das Wagenlager ausrauben.“ Doch der Laienanhänger ging unentwegt weiter auf und ab. Als die Räuber ihn sahen, dachten sie: „Wahrlich, dieser Mann muss der Wächter des Wagenlagers sein. Wir wollen plündern, wenn er eingeschlafen ist.“ Da sie ihn nicht überwältigen konnten, blieben sie an ihren jeweiligen Plätzen stehen. Auch jener Laienanhänger ging sowohl in der ersten Nachtwache als auch in der mittleren und der letzten Nachtwache unaufhörlich auf und ab. Als die Morgendämmerung anbrach und die Räuber keine Gelegenheit zum Raub fanden, warfen sie die Steine, Keulen und anderen Waffen, die sie ergriffen hatten, weg und flohen. Upāsakopi attano kammaṃ niṭṭhāpetvā puna sāvatthiṃ āgantvā satthāraṃ upasaṅkamitvā ‘‘bhante, attānaṃ rakkhamānā pararakkhakā hontī’’ti pucchi. ‘‘Āma, upāsaka, attānaṃ rakkhanto parampi rakkhati, paraṃ rakkhanto attānampi rakkhatī’’ti. So ‘‘yāva subhāsitañcidaṃ, bhante, bhagavatā, ahaṃ ekena [Pg.352] satthavāhena saddhiṃ maggaṃ paṭipanno rukkhamūle caṅkamanto ‘maṃ rakkhissāmī’ti sakalasatthaṃ rakkhi’’nti āha. Satthā ‘‘upāsaka, pubbepi paṇḍitā attānaṃ rakkhantā paraṃ rakkhiṃsū’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. Auch der Laienanhänger beendete seine Angelegenheit, kehrte nach Sāvatthī zurück, trat vor den Meister und fragte: „Herr, ist es so, dass diejenigen, die sich selbst schützen, auch andere schützen?“ „Ja, Laienanhänger, wer sich selbst schützt, schützt auch den anderen; wer den anderen schützt, schützt auch sich selbst.“ Er sagte: „Wie vortrefflich gesprochen ist dies, Herr, vom Erhabenen! Als ich mich zusammen mit einer Wagenkarawane auf den Weg begab und am Fuße eines Baumes auf und ab ging, schützte ich die gesamte Karawane, während ich dachte: ‚Ich will mich selbst schützen‘.“ Der Meister sprach: „Laienanhänger, schon in der Vergangenheit haben die Weisen, während sie sich selbst schützten, auch andere geschützt.“ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto brāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto kāmesu ādīnavaṃ disvā isipabbajjaṃ pabbajitvā himavante vasanto loṇambilasevanatthāya janapadaṃ āgantvā janapadacārikaṃ caranto ekena satthavāhena saddhiṃ maggaṃ paṭipajjitvā ekasmiṃ araññaṭṭhāne satthe niviṭṭhe satthato avidūre jhānasukhena vītināmento aññatarasmiṃ rukkhamūle caṅkamanto aṭṭhāsi. Atha kho pañcasatā corā ‘‘sāyamāsabhattassa bhuttakāle taṃ sakaṭasatthaṃ vilumpissāmā’’ti āgantvā parivārayiṃsu. Te taṃ tāpasaṃ disvā ‘‘sace ayaṃ amhe passissati, satthavāsikānaṃ ārocessati, etassa niddūpagatavelāya vilumpissāmā’’ti tattheva aṭṭhaṃsu. Tāpaso sakalampi rattiṃ caṅkamiyeva. Corā okāsaṃ alabhitvā gahitagahite muggarapāsāṇe chaḍḍetvā sakaṭasatthavāsīnaṃ saddaṃ datvā ‘‘bhonto, satthavāsino sace esa rukkhamūle caṅkamanakatāpaso ajja nābhavissa, sabbe mahāvilopaṃ pattā abhavissatha, sve tāpasassa mahāsakkāraṃ kareyyāthā’’ti vatvā pakkamiṃsu. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, sah er das Elend in den Sinnesfreuden, empfing die Einsiedlerweihe und lebte im Himavanta-Wald. Um Salz und Saures zu sich zu nehmen, kam er in bewohnte Gegenden, und während er durch das Land wanderte, begab er sich zusammen mit einer Wagenkarawane auf den Weg. Als die Karawane an einer Stelle im Wald Halt machte, verbrachte er unweit der Karawane seine Zeit im Glück der Vertiefung und ging am Fuße eines bestimmten Baumes auf und ab. Da kamen fünfhundert Räuber in der Absicht: „Wir wollen das Wagenlager zur Zeit des Abendessens ausrauben“, und umstellten den Ort. Als sie den Asketen sahen, dachten sie: „Wenn dieser uns sieht, wird er es den Leuten im Wagenlager mitteilen. Wir wollen plündern, wenn er eingeschlafen ist“, und blieben genau dort stehen. Der Asket ging die ganze Nacht hindurch unentwegt auf und ab. Da die Räuber keine Gelegenheit fanden, warfen sie die ergriffenen Keulen und Steine weg, riefen den Leuten im Wagenlager zu: „Ihr Herren im Wagenlager, wenn dieser Asket, der am Fuße des Baumes auf und ab geht, heute nicht hier gewesen wäre, wärt ihr alle einer großen Plünderung zum Opfer gefallen. Erweist dem Asketen morgen große Ehrung!“, und zogen davon. Te pabhātāya rattiyā corehi chaḍḍite muggarapāsāṇādayo disvā bhītā bodhisattassa santikaṃ gantvā vanditvā ‘‘bhante, diṭṭhā vo corā’’ti pucchiṃsu. ‘‘Āmāvuso, diṭṭhā’’ti. ‘‘Bhante, ettakevo core disvā bhayaṃ vā sārajjaṃ vā na uppajjī’’ti? Bodhisatto ‘‘āvuso core disvā bhayaṃ nāma sadhanassa hoti, ahaṃ pana niddhano, svāhaṃ kiṃ bhāyissāmi. Mayhañhi gāmepi araññepi vasantassa bhayaṃ vā sārajjaṃ vā natthī’’ti vatvā tesaṃ dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Als die Nacht vorüber war und der Morgen graute, sahen die Karawanenleute die von den Räubern weggeworfenen Keulen, Steine und anderen Dinge. Erschrocken gingen sie zum Bodhisatta, verneigten sich vor ihm und fragten: „Herr, habt Ihr die Räuber gesehen?“ „Ja, ihr Lieben, ich habe sie gesehen.“ „Herr, entstand bei Euch kein Schrecken oder Furcht, als Ihr so viele Räuber saht?“ Der Bodhisatta sprach: „Ihr Lieben, Furcht empfindet nur derjenige, der Besitztümer hat. Ich jedoch bin besitzlos, warum sollte ich mich also fürchten? Wahrlich, ob ich im Dorf oder im Wald lebe, für mich gibt es weder Schrecken noch Furcht.“ Nachdem er dies gesagt hatte, verkündete er ihnen die Lehre und sprach diese Strophe: 76. 76. ‘‘Asaṅkiyomhi gāmamhi, araññe natthi me bhayaṃ; Ujumaggaṃ samāruḷho, mettāya karuṇāya cā’’ti. „Ich bin im Dorfe ohne Furcht, und auch im Walde schreckt mich nichts; den geraden Pfad habe ich betreten durch Liebende Güte und Mitgefühl.“ Tattha [Pg.353] asaṅkiyomhi gāmamhīti saṅkāya niyutto patiṭṭhitoti saṅkiyo, na saṅkiyo asaṅkiyo. Ahaṃ gāme vasantopi saṅkāya appatiṭṭhitattā asaṅkiyo nibbhayo nirāsaṅkoti dīpeti. Araññeti gāmagāmūpacāravinimutte ṭhāne. Ujumaggaṃ samāruḷho, mettāya karuṇāya cāti ahaṃ tikacatukkajjhānikāhi mettākaruṇāhi kāyavaṅkādivirahitaṃ ujuṃ brahmalokagāmimaggaṃ āruḷhoti vadati. Atha vā parisuddhasīlatāya kāyavacīmanovaṅkavirahitaṃ ujuṃ devalokamaggaṃ āruḷhomhīti dassetvā tato uttari mettāya karuṇāya ca patiṭṭhitattā ujuṃ brahmalokamaggampi āruḷhomhītipi dasseti. Aparihīnajjhānassa hi ekantena brahmalokaparāyaṇattā mettākaruṇādayo ujumaggā nāma. Hierbei bedeutet 'asaṅki yomhi gāmamhī' (frei von Besorgnis bin ich im Dorf): 'saṅkiyo' ist einer, der in Besorgnis verstrickt und darin gegründet ist; wer nicht 'saṅkiyo' ist, ist 'asaṅkiyo'. Er erklärt damit: 'Auch wenn ich im Dorf lebe, bin ich frei von Besorgnis, furchtlos und ohne Zweifel, da ich nicht in Besorgnis gegründet bin.' 'Araññe' (im Wald) bedeutet an einem Ort, der von einem Dorf und seiner Umgebung weit entfernt ist. Mit den Worten 'Aufgestiegen auf den geraden Weg, durch Wohlwollen (Mettā) und Mitgefühl (Karuṇā)' sagt er: 'Ich bin auf den geraden Weg aufgestiegen, der zur Brahma-Welt führt und frei von körperlicher Krummheit und anderem Fehlverhalten ist, mittels des Wohlwollens und Mitgefühls, die mit den drei und vier vertieften Meditationszuständen (Jhānas) verbunden sind.' Oder aber, nachdem er gezeigt hat: 'Aufgrund meiner völlig reinen Tugend bin ich auf den geraden, zur Götterwelt führenden Weg aufgestiegen, der frei von Krummheit in Körper, Rede und Geist ist', zeigt er darüber hinaus: 'Weil ich in Wohlwollen und Mitgefühl gefestigt bin, bin ich auch auf den geraden Weg zur Brahma-Welt aufgestiegen.' Denn für jemanden, dessen Jhana nicht verfallen ist, ist die Brahma-Welt das sichere Ziel; daher werden Wohlwollen, Mitgefühl und die anderen reinen Geisteszustände als der 'gerade Weg' bezeichnet. Evaṃ bodhisatto imāya gāthāya dhammaṃ desetvā tuṭṭhacittehi tehi manussehi sakkato pūjito yāvajīvaṃ cattāro brahmavihāre bhāvetvā brahmaloke nibbatti. Nachdem der Bodhisatta auf diese Weise mit dieser Strophe die Lehre dargelegt hatte, wurde er von jenen Menschen mit erfreuten Herzen geehrt und verehrt, entfaltete lebenslang die vier göttlichen Verweilungszustände (Brahmavihāras) und wurde in der Brahma-Welt wiedergeboren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā satthavāsino buddhaparisā ahesuṃ, tāpaso pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister brachte diese Lehrdarlegung herbei, stellte die Verbindung her und verknüpfte die Geburtsgeschichte: 'Damals waren die Wagenreisenden die Gefolgschaft des Buddha, der Asket aber war ich selbst.' Asaṅkiyajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Asaṅkiya-Jātaka, die sechste, is abgeschlossen.
[77] 7. Mahāsupinajātakavaṇṇanā [77] 7. Die Erklärung des Mahāsupina-Jātaka (Die Erzählung von den großen Träumen) Lābūni sīdantīti idaṃ satthā jetavane viharanto soḷasa mahāsupine ārabbha kathesi. Ekadivasaṃ kira kosalamahārājā rattiṃ niddūpagato pacchimayāme soḷasa mahāsupine disvā bhītatasito pabujjhitvā ‘‘imesaṃ supinānaṃ diṭṭhattā kiṃ nu kho me bhavissatī’’ti maraṇabhayatajjito sayanapiṭṭhe nisinnakova rattiṃ vītināmesi. 'Flaschenkürbisse sinken' – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilt, bezugnehmend auf sechzehn große Träume. Es heißt, dass der große König von Kosala eines Nachts, als er eingeschlafen war, in der letzten Nachtwache sechzehn große Träume sah. Erschrocken und zitternd erwachte er, von Todesfurcht gepeinigt, und verbrachte die restliche Nacht auf seinem Bett sitzend, während er dachte: 'Was wird mir wohl geschehen, weil ich diese Träume gesehen habe?' Atha naṃ pabhātāya rattiyā brāhmaṇapurohitā upasaṅkamitvā ‘‘sukhaṃ sayittha, mahārājā’’ti pucchiṃsu. ‘‘Kuto me ācariyā sukhaṃ, ajjāhaṃ paccūsasamaye soḷasa mahāsupine passiṃ, somhi tesaṃ diṭṭhakālato paṭṭhāya bhayappatto’’ti. ‘‘Vadetha, mahārāja, sutvā jānissāmā’’ti vuttaṃ [Pg.354] brāhmaṇānaṃ diṭṭhasupine kathetvā ‘‘kiṃ nu kho me imesaṃ diṭṭhakāraṇā bhavissatī’’ti pucchi. Brāhmaṇā hatthe vidhuniṃsu. ‘‘Kasmā hatthe vidhunathā’’ti ca vutte ‘‘kakkhaḷā, mahārāja, supinā’’ti. ‘‘Kā tesaṃ nipphatti bhavissatī’’ti? ‘‘Rajjantarāyo jīvitantarāyo bhogantarāyoti imesaṃ tiṇṇaṃ antarāyānaṃ aññataro’’ti. ‘‘Sappaṭikammā, appaṭikammā’’ti? ‘‘Kāmaṃ ete supinā atipharusattā appaṭikammā, mayaṃ pana te sappaṭikamme karissāma, ete paṭikkamāpetuṃ asakkontānaṃ amhākaṃ sikkhitabhāvo nāma kiṃ karissatī’’ti. ‘‘Kiṃ pana katvā paṭikkamāpessathā’’ti? ‘‘Sabbacatukkena yaññaṃ yajissāma, mahārājā’’ti. Rājā bhītatasito ‘‘tena hi ācariyā mama jīvitaṃ tumhākaṃ hatthe hotu, khippaṃ me sotthiṃ karothā’’ti āha. Brāhmaṇā ‘‘bahuṃ dhanaṃ labhissāma, bahuṃ khajjabhojjaṃ āharāpessāmā’’ti haṭṭhatuṭṭhā ‘‘mā cintayittha, mahārājā’’ti rājānaṃ samassāsetvā rājanivesanā nikkhamitvā bahinagare yaññāvāṭaṃ katvā bahū catuppadagaṇe thūṇūpanīte katvā pakkhigaṇe samāharitvā ‘‘idañcidañca laddhuṃ vaṭṭatī’’ti punappunaṃ sañcaranti. Als es nun Tag wurde, kamen die Brahmanen und Hofpriester zu ihm und fragten: 'Habt Ihr wohlgeruht, o großer König?' – 'Wie sollte ich wohlgeruht haben, meine Lehrer? Heute in der Morgendämmerung habe ich sechzehn große Träume gesehen, und seit der Zeit, als ich sie erblickte, bin ich von Furcht ergriffen.' Sie sprachen: 'Erzählt sie uns, o König! Wenn wir sie gehört haben, werden wir ihre Bedeutung erkennen.' Als er den Brahmanen die geschauten Träume erzählt hatte, fragte er: 'Was wird mir wohl zustoßen, weil ich diese Träume gesehen habe?' Da schüttelten die Brahmanen die Hände. Auf die Frage: 'Warum schüttelt ihr die Hände?' antworteten sie: 'Schrecklich, o König, sind diese Träume!' – 'Was wird ihre Auswirkung sein?' – 'Entweder Gefahr für das Reich, Gefahr für Euer Leben oder Gefahr für Euren Besitz; eine von diesen drei Gefahren wird eintreffen.' – 'Sind sie abwendbar oder unabwendbar?' – 'Gewiss sind diese Träume, weil sie überaus schrecklich sind, schwer abwendbar; aber wir werden sie für Euch abwendbar machen. Was nützte uns sonst unsere Gelehrsamkeit, wenn wir nicht imstande wären, diese Gefahren abzuwenden?' – 'Wie wollt ihr sie denn abwenden?' – 'Wir werden ein großes Opfer von allem je vierfältig darbringen, o großer König.' Da sprach der in Todesangst versetzte König: 'Wohlan, meine Lehrer, so sei mein Leben in eure Hände gelegt; schafft mir schnell Heil!' Die Brahmanen dachten hocherfreut: 'Wir werden viel Geld bekommen und uns reichlich Speisen bringen lassen!' Sie trösteten den König mit den Worten: 'Sorgt Euch nicht, o großer König!', verließen den Palast, errichteten außerhalb der Stadt eine Opferstätte, ließen viele vierfüßige Tiere an die Opferpfähle binden, trieben Scharen von Vögeln zusammen und liefen geschäftig hin und her, indem sie immer wieder sagten: 'Dies und das müssen wir noch beschaffen!' Atha kho mallikā devī taṃ kāraṇaṃ ñatvā rājānaṃ upasaṅkamitvā pucchi ‘‘kiṃ nu kho, mahārāja, brāhmaṇā punappunaṃ sañcarantī’’ti? ‘‘Sukhitā, tvaṃ bhadde, amhākaṃ kaṇṇamūle āsīvisaṃ carantaṃ na jānāsī’’ti. ‘‘Kiṃ etaṃ, mahārājā’’ti? Mayā evarūpā dussupinā diṭṭhā, brāhmaṇā ‘‘tiṇṇaṃ antarāyānaṃ aññataro paññāyatī’’ti vatvā ‘‘‘tesaṃ paṭighātāya yaññaṃ yajissāmā’ti vatvā punappunaṃ sañcarantī’’ti. ‘‘Kiṃ pana te, mahārāja, sadevake loke aggabrāhmaṇo supinapaṭikammaṃ pucchito’’ti? ‘‘Kataro panesa, bhadde, sadevake loke aggabrāhmaṇo’’ti. ‘‘Sadevake loke aggapuggalaṃ sabbaññuṃ visuddhaṃ nikkilesaṃ mahābrāhmaṇaṃ na jānāsi. So hi bhagavā supinantaraṃ jāneyya, gaccha tvaṃ puccha taṃ, mahārājā’’ti. ‘‘Sādhu, devī’’ti rājā vihāraṃ gantvā satthāraṃ vanditvā nisīdi. Als nun die Königin Mallikā den Grund dafür erfuhr, trat sie vor den König und fragte: 'Warum laufen die Brahmanen so geschäftig hin und her, o großer König?' – 'Du hast gut reden, meine Liebe! Du weißt wohl nicht, dass uns eine Giftschlange direkt am Ohr herumkriecht?' – 'Was meint Ihr damit, o König?' – 'Ich habe solch schreckliche Träume gesehen. Die Brahmanen erklärten, dass sich eine von drei Gefahren ankündigt, und um diese abzuwenden, wollen sie ein Opfer darbringen; deshalb laufen sie so geschäftig hin und her.' – 'Habt Ihr denn, o König, den besten Brahmanen in der Welt samt den Göttern nach dem Mittel zur Abwendung der Träume gefragt?' – 'Wer aber ist denn, meine Liebe, dieser beste Brahmane in der Welt samt den Göttern?' – 'Kennt Ihr denn nicht den höchsten Menschen in der Welt samt den Göttern, den Allwissenden, den Reinen, den Makellosen, den wahren großen Brahmanen (den Erhabenen)? Denn jener Erhabene würde die tiefere Bedeutung der Träume kennen. Geht hin und fragt ihn, o König!' – 'Es ist gut, Königin', sprach der König, begab sich zum Kloster, grüßte den Meister ehrerbietig und setzte sich nieder. Satthā madhurassaraṃ nicchāretvā ‘‘kiṃ nu kho, mahārāja, atippagova āgatosī’’ti āha. Ahaṃ, bhante, paccūsasamaye soḷasa mahāsupine disvā bhīto brāhmaṇānaṃ ārocesiṃ. Brāhmaṇā ‘‘kakkhaḷā, mahārāja[Pg.355], supinā, etesaṃ paṭighātatthāya sabbacatukkena yaññaṃ yajissāmā’’ti yaññaṃ sajjenti, bahū pāṇā maraṇabhayatajjitā, tumhe ca sadevake loke aggapuggalā, atītānāgatapaccuppannaṃ upādāya natthi so ñeyyadhammo, yo vo ñāṇamukhe āpāthaṃ nāgacchati. ‘‘Etesaṃ me supinānaṃ nipphattiṃ kathetha bhagavā’’ti. ‘‘Evametaṃ, mahārāja, sadevake loke maṃ ṭhapetvā añño etesaṃ supinānaṃ antaraṃ vā nipphattiṃ vā jānituṃ samattho nāma natthi, ahaṃ te kathessāmi, apica kho tvaṃ diṭṭhadiṭṭhaniyāmeneva supine kathehī’’ti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti rājā diṭṭhaniyāmeneva kathento – Der Meister ließ seine liebliche Stimme ertönen und fragte: 'Warum bist du so überaus früh gekommen, o großer König?' – 'Herr, ich habe in der Morgendämmerung sechzehn große Träume gesehen. Aus Furcht habe ich es den Brahmanen erzählt. Diese erklärten: "Schrecklich sind die Träume, o König! Um sie abzuwenden, werden wir ein Opfer von allem je vierfältig darbringen", und nun bereiten sie das Opfer vor. Viele Lebewesen sind von Todesfurcht bedroht. Ihr aber seid das höchste Wesen in der Welt samt den Göttern. Bezüglich Vergangenheit, Zukunft und Gegenwart gibt es nichts Erkennbares, das Eurem Auge der Erkenntnis verborgen bleibt. Verkündet mir, o Erhabener, die Auswirkung dieser Träume!' – 'So ist es, o König! In der Welt samt den Göttern gibt es außer mir niemanden, der fähig wäre, die tiefere Bedeutung oder die Auswirkung dieser Träume zu kennen. Ich werde sie dir verkünden; erzähle mir jedoch deine Träume genau in der Reihenfolge, wie du sie geschaut hast.' – 'Es ist gut, o Herr', sprach der König und trug sie in der geschauten Reihenfolge vor: ‘‘Usabhā rukkhā gāviyo gavā ca,Asso kaṃso siṅgālī ca kumbho; Pokkharaṇī ca apākacandanaṃ. 'Stiere, Bäume, Kühe und Kälber, ein Pferd, eine Schale, eine Schakalin und ein Krug; ein Lotusteich, ungarer Reis und Sandelholz. ‘‘Lābūni sīdanti silā plavanti, maṇḍūkiyo kaṇhasappe gilanti; Kākaṃ suvaṇṇā parivārayanti, tasā vakā eḷakānaṃ bhayā hī’’ti. – Kürbisse sinken, Steine schwimmen, Frösche verschlingen schwarze Kobras; goldene Gänse scharen sich um eine Krähe, und Wölfe zittern vor Angst vor den Schafen.' Imaṃ mātikaṃ nikkhipitvā kathesi. Nachdem er diese Auflistung dargelegt hatte, sprach er sie aus. (1) Ahaṃ, bhante, ekaṃ tāva supinaṃ evaṃ addasaṃ – cattāro añjanavaṇṇā kāḷausabhā ‘‘yujjhissāmā’’ti catūhi disāhi rājaṅgaṇaṃ āgantvā ‘‘usabhayuddhaṃ passissāmā’’ti mahājane sannipatite yujjhanākāraṃ dassetvā naditvā gajjitvā ayujjhitvāva paṭikkantā. Imaṃ paṭhamaṃ supinaṃ addasaṃ, imassa ko vipākoti? ‘‘Mahārāja, imassa vipāko neva tava, na mama kāle bhavissati, anāgate pana adhammikānaṃ kapaṇarājūnaṃ adhammikānañca manussānaṃ kāle loke viparivattamāne kusale ossanne, akusale ussanne, lokassa parihāyanakāle devo na sammā vassissati, meghapādā pacchijjissanti, sassāni milāyissanti, dubbhikkhaṃ bhavissati, vassitukāmā viya catūhi disāhi meghā uṭṭhahitvā itthikāhi ātape patthaṭānaṃ vīhiādīnaṃ temanabhayena antopavesitakāle purisesu kuddālapiṭakahatthesu āḷibandhanatthāya nikkhantesu vassanākāraṃ [Pg.356] dassetvā gajjitvā vijjulatā nicchāretvā te usabhā viya ayujjhitvā avassitvāva palāyissanti. Ayametassa vipāko. Tuyhaṃ pana tappaccayā koci antarāyo natthi, anāgataṃ ārabbha diṭṭho supino esa, brāhmaṇā pana attano jīvitavuttiṃ nissāya kathayiṃsū’’ti evaṃ satthā supinassa nipphattiṃ kathetvā āha ‘‘dutiyaṃ kathehi, mahārājā’’ti. (1) „Herr, ich sah zuerst einen solchen Traum: Vier kohlschwarze Stiere kamen aus den vier Himmelsrichtungen auf das königliche Hofgelände mit dem Gedanken: ‚Wir wollen kämpfen.‘ Als sich eine große Menschenmenge mit dem Gedanken versammelt hatte: ‚Wir wollen den Stierkampf sehen‘, zeigten sie Kampfgebaren, brüllten und dröhnten, zogen sich jedoch zurück, ohne überhaupt gekämpft zu haben. Diesen ersten Traum habe ich gesehen. Was ist dessen Frucht?“ „Großer König, die Frucht dieses Traumes wird sich weder zu deiner noch zu meiner Zeit ereignen. In der Zukunft jedoch, in einer Zeit von ungerechten, armseligen Königen und ungerechten Menschen, wenn sich die Welt verkehrt, das Heilsame schwindet, das Unheilsame überhandnimmt, in einer Zeit des Verfalls der Welt, wird der Regen nicht ordnungsgemäß fallen. Die Wolkenbahnen werden abreißen, die Saaten werden verwelken und es wird eine Hungersnot geben. Wenn Wolken aus den vier Himmelsrichtungen aufziehen, als wollten sie regnen, und die Frauen aus Angst vor Durchnässung die in der Sonne ausgebreiteten Getreidekörner ins Haus bringen, während die Männer mit Hacken und Körben in den Händen hinausgehen, um Dämme zu bauen, dann werden jene Wolken – gleich jenen Stieren – Anzeichen von Regen zeigen, donnern, Blitze aussenden, sich jedoch verziehen, ohne abzuregnen. Dies ist die Frucht dieses Traumes. Für dich jedoch besteht aus diesem Grunde keinerlei Gefahr. Dieser Traum wurde mit Bezug auf die Zukunft gesehen. Die Brahmanen aber haben dies nur im Hinblick auf ihren eigenen Lebensunterhalt dargelegt.“ Nachdem der Meister so die Erfüllung des Traumes erklärt hatte, sprach er: „Erzähle den zweiten, großer König!“ (2) Dutiyāhaṃ, bhante, evaṃ addasaṃ – khuddakā rukkhā ceva gacchā ca pathaviṃ bhinditvā vidatthimattampi ratanamattampi anuggantvāva pupphanti ceva phalanti ca. Imaṃ dutiyaṃ addasaṃ, imassa ko vipākoti? Mahārāja, imassāpi vipāko lokassa parihāyanakāle manussānaṃ parittāyukakāle bhavissati. Anāgatasmiñhi sattā tibbarāgā bhavissanti, asampattavayāva kumāriyo purisantaraṃ gantvā utuniyo ceva gabbhiniyo ca hutvā puttadhītāhi vaḍḍhissanti. Khuddakarukkhānaṃ pupphaṃ viya hi tāsaṃ utunibhāvo, phalaṃ viya ca puttadhītaro bhavissanti. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, tatiyaṃ kathehi, mahārājāti. (2) „Als zweites, Herr, sah ich folgendes: Sehr kleine Bäume und Sträucher durchbrachen die Erde und blühten und trugen bereits Früchte, ohne auch nur eine Spanne oder eine Elle hoch gewachsen zu sein. Diesen zweiten Traum habe ich gesehen. Was ist dessen Frucht?“ „Großer König, auch die Frucht dieses Traumes wird sich in der Zeit des Verfalls der Welt ereignen, wenn die Menschen eine kurze Lebensspanne haben. Denn in der Zukunft werden die Wesen von heftiger Leidenschaft erfüllt sein. Junge Mädchen, die das reife Alter noch gar nicht erreicht haben, werden sich mit Männern einlassen, die Menstruation bekommen, schwanger werden und sich durch Söhne und Töchter vermehren. Denn gleich den Blüten kleiner Bäume wird ihr Eintritt in die Reife sein, und gleich den Früchten werden ihre Söhne und Töchter sein. Auch aus diesem Grunde besteht für dich keine Gefahr. Erzähle den dritten, großer König!“ (3) Gāviyo, bhante, tadahujātānaṃ vacchakānaṃ khīraṃ pivantiyo addasaṃ. Ayaṃ me tatiyo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi vipāko anāgate eva manussānaṃ jeṭṭhāpacāyikakammassa naṭṭhakāle bhavissati. Anāgatasmiñhi sattā mātāpitūsu vā sassusasuresu vā lajjaṃ anupaṭṭhāpetvā sayameva kuṭumbaṃ saṃvidahantāva ghāsacchādanamattampi mahallakānaṃ dātukāmā dassanti, adātukāmā na dassanti. Mahallakā anāthā asayaṃvasī dārake ārādhetvā jīvissanti tadahujātānaṃ vacchakānaṃ khīraṃ pivantiyo mahāgāviyo viya. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, catutthaṃ kathehi, mahārājāti. (3) „Herr, ich sah ausgewachsene Kühe, die die Milch von Kälbchen tranken, die erst am selben Tag geboren worden waren. Dies ist mein dritter Traum. Was ist dessen Frucht?“ „Auch die Frucht dieses Traumes wird sich in der Zukunft ereignen, zu einer Zeit, in der das Verhalten der Ehrerbietung gegenüber den Älteren unter den Menschen geschwunden ist. Denn in der Zukunft werden die Wesen keine Scheu mehr vor ihren Eltern oder Schwiegereltern haben. Sie werden das Vermögen des Haushalts selbst verwalten, und den älteren Generationen werden sie nur dann das bloße Auskommen an Nahrung und Kleidung geben, wenn sie es wünschen; wenn sie es nicht wünschen, werden sie es ihnen nicht geben. Die Alten werden schutzlos und ohne eigenen Willen sein, und sie werden leben müssen, indem sie den Kindern schmeicheln, ganz wie die großen Kühe, welche die Milch der am selben Tag geborenen Kälbchen trinken. Auch aus diesem Grunde besteht für dich keine Gefahr. Erzähle den vierten, großer König!“ (4) Dhuravāhe, bhante, ārohapariṇāhasampanne mahāgoṇeyugaparamparāya ayojetvā taruṇe godamme dhure yojente addasaṃ. Te dhuraṃ vahituṃ asakkontā chaḍḍetvā aṭṭhaṃsu, sakaṭāni nappavaṭṭiṃsu. Ayaṃ me catuttho supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi vipāko [Pg.357] anāgate eva adhammikarājūnaṃ kāle bhavissati. Anāgatasmiñhi adhammikakapaṇarājāno paṇḍitānaṃ paveṇikusalānaṃ kammaṃ nittharaṇasamatthānaṃ mahāmattānaṃ yasaṃ na dassanti. Dhammasabhāyaṃ vinicchayaṭṭhānepi paṇḍite vohārakusale mahallake amacce na ṭhapessanti, tabbiparītānaṃ pana taruṇataruṇānaṃ yasaṃ dassanti, tathārūpe eva vinicchayaṭṭhāne ṭhapessanti, te rājakammāni ceva yuttāyuttañca ajānantā neva taṃ yasaṃ ukkhipituṃ sakkhissanti, na rājakammāni nittharituṃ. Te asakkontā kammadhuraṃ chaḍḍessanti, mahallakāpi paṇḍitāmaccā yasaṃ alabhantā kiccāni nittharituṃ samatthāpi ‘‘kiṃ amhākaṃ etehi, mayaṃ bāhirakā jātā, abbhantarikā taruṇadārakā jānissantī’’ti uppannāni kammāni na karissanti, evaṃ sabbathāpi tesaṃ rājūnaṃ hāniyeva bhavissati, dhuraṃ vahituṃ asamatthānaṃ vacchadammānaṃ dhure yojitakālo viya, dhuravāhānañca mahāgoṇānaṃ yugaparamparāya ayojitakālo viya bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, pañcamaṃ kathehi, mahārājāti. (4) „Herr, ich sah, dass man große Ochsen, die fähig waren, schwere Lasten zu tragen, und die an Wuchs und Umfang wohlgebaut waren, nicht an das Joch spannte, sondern junge, ungezähmte Stiere an das Joch anspannte. Da diese unfähig waren, die Last zu tragen, warfen sie das Joch ab und blieben stehen, und die Wagen bewegten sich nicht vorwärts. Dies ist mein vierter Traum. Was ist dessen Frucht?“ „Auch die Frucht dieses Traumes wird sich in der Zukunft ereignen, zur Zeit von ungerechten Königen. Denn in der Zukunft werden ungerechte, armselige Könige den weisen, traditionsbewussten Ministern, die fähig sind, die Regierungsgeschäfte erfolgreich zu führen, kein Ansehen und keinen Einfluss gewähren. In der Versammlungshalle und an den Stätten der Rechtsprechung werden sie weise, im Recht erfahrene, ältere Minister nicht einsetzen. Stattdessen werden sie ganz jungen Leuten Ansehen gewähren und genau solche an den Orten der Urteilsfindung einsetzen. Da diese jedoch weder die Staatsgeschäfte noch das, was recht oder unrecht ist, verstehen, werden sie weder imstande sein, diese Würde zu tragen, noch die Staatsgeschäfte erfolgreich zu bewältigen. Unfähig dazu, werden sie die Last der Aufgaben hinwerfen. Und die älteren, weisen Minister, die kein Ansehen erhalten, werden, obwohl sie durchaus in der Lage wären, die Aufgaben zu bewältigen, sagen: ‚Was gehen uns diese Dinge an? Wir sind zu Außenseitern geworden. Die bevorzugten jungen Burschen werden es schon wissen!‘, und so die anstehenden Arbeiten nicht ausführen. Auf diese Weise wird für jene Könige in jeder Hinsicht nur Verlust entstehen. Es wird so sein wie zu einer Zeit, in der junge Stiere, die unfähig sind, Lasten zu tragen, an das Joch gespannt werden, während die starken, lasttragenden Ochsen nicht an das Joch geschirrt werden. Auch aus diesem Grunde besteht für dich keine Gefahr. Erzähle den fünften, großer König!“ (5) Bhante, ekaṃ ubhatomukhaṃ assaṃ addasaṃ, tassa dvīsu passesu yavasaṃ denti, so dvīhi mukhehi khādati. Ayaṃ me pañcamo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgate adhammikarājakāleyeva vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi adhammikā bālarājāno adhammike lolamanusse vinicchaye ṭhapessanti, te pāpapuññesu anādarā bālā sabhāyaṃ nisīditvā vinicchayaṃ dentā ubhinnampi atthapaccatthikānaṃ hatthato lañjaṃ gahetvā khādissanti asso viya dvīhi mukhehi yavasaṃ. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, chaṭṭhaṃ kathehi, mahārājāti. (5) „Herr, ich sah ein Pferd mit zwei Mäulern. Man gab ihm auf beiden Seiten Gerstenfutter, und es fraß mit beiden Mäulern. Dies ist mein fünfter Traum. Was ist dessen Frucht?“ „Auch die Frucht dieses Traumes wird sich in der Zukunft, zur Zeit von ungerechten Königen, ereignen. Denn in der Zukunft werden ungerechte, törichte Könige ungerechte, gierige Menschen in der Rechtsprechung einsetzen. Diese Toren, die sich nicht um schlechte und gute Taten scheren, werden in der Gerichtshalle sitzen, und wenn sie Urteile fällen, werden sie von beiden Streitparteien Bestechungsgelder annehmen und einstreichen, ganz wie das Pferd, das mit zwei Mäulern Gerstenfutter frisst. Auch aus diesem Grunde besteht für dich keine Gefahr. Erzähle den sechsten, großer König!“ (6) Bhante, mahājano satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ sammajjitvā ‘‘idha passāvaṃ karohī’’ti ekassa jarasiṅgālassa upanāmesi, taṃ tattha passāvaṃ karontaṃ addasaṃ. Ayaṃ me chaṭṭho supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi vipāko anāgateyeva bhavissati. Anāgatasmiñhi [Pg.358] adhammikā vijātirājāno jātisampannānaṃ kulaputtānaṃ āsaṅkāya yasaṃ na dassanti, akulīnānaṃyeva dassanti. Evaṃ mahākulāni duggatāni bhavissanti, lāmakakulāni issarāni. Te ca kulīnapurisā jīvituṃ asakkontā ‘‘ime nissāya jīvissāmā’’ti akulīnānaṃ dhītaro dassanti, iti tāsaṃ kuladhītānaṃ akulīnehi saddhiṃ saṃvāso jarasiṅgālassa suvaṇṇapātiyaṃ passāvakaraṇasadiso bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, sattamaṃ kathehīti. (6) „Herr, viele Menschen reinigten eine goldene Schale im Wert von hunderttausend Goldstücken, hielten sie einem alten Schakal hin und sagten: ‚Uriniere hier hinein!‘, und ich sah ihn dort hinein urinieren. Dies ist mein sechster Traum; was ist seine Auswirkung?“ – „Auch die Auswirkung dieses Traumes wird erst in der Zukunft eintreten. Denn in der Zukunft werden ungerechte Könige von niederer Herkunft den Söhnen edler Familien aus Argwohn kein Ansehen und keine Macht verleihen, sondern nur den Niedriggeborenen. Auf diese Weise werden die edlen Familien verarmen und die niederen Familien werden an der Macht sein. Und jene edlen Männer, die ihren Lebensunterhalt nicht mehr selbst bestreiten können, werden sich sagen: ‚Wir wollen in Abhängigkeit von diesen leben‘, und werden den Niedriggeborenen ihre Töchter geben. So wird die Gemeinschaft jener edlen Töchter mit den Niedriggeborenen dem Urinieren des alten Schakals in die goldene Schale gleichen. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den siebten Traum.“ (7) Bhante, eko puriso rajjuṃ vaṭṭetvā vaṭṭetvā pādamūle nikkhipati, tena nisinnapīṭhassa heṭṭhā sayitā ekā chātasiṅgālī tassa ajānantasseva taṃ khādati, evāhaṃ addasaṃ. Ayaṃ me sattamo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgateyeva vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi itthiyo purisalolā surālolā alaṅkāralolā visikhālolā āmisalolā bhavissanti dussīlā durācārā, tā sāmikehi kasigorakkhādīni kammāni katvā kicchena kasirena sambhataṃ dhanaṃ jārehi saddhiṃ suraṃ pivantiyo mālāgandhavilepanaṃ dhārayamānā antogehe accāyikampi kiccaṃ anoloketvā gehe parikkhepassa uparibhāgenapi chiddaṭṭhānehipi jāre upadhārayamānā sve vapitabbayuttakaṃ bījampi koṭṭetvā yāgubhattakhajjakādīni sampādetvā khādamānā vilumpissanti heṭṭhāpīṭhake nipannachātasiṅgālī viya vaṭṭetvā vaṭṭetvā pādamūle nikkhittarajjuṃ. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, aṭṭhamaṃ kathehīti. (7) „Herr, ich sah einen Mann, der ein Seil flocht und flocht und es zu seinen Füßen ablegte. Eine hungrige Schakalin, die unter dem Stuhl lag, auf dem er saß, fraß dieses Seil auf, ohne dass er es bemerkte. So sah ich es. Dies ist mein siebter Traum; was ist seine Auswirkung?“ – „Auch die Auswirkung dieses Traumes wird erst in der Zukunft eintreten. Denn in der Zukunft werden die Frauen gierig nach Männern, gierig nach Rauschtrank, gierig nach Schmuck, versessen auf das Umherstreifen auf den Straßen und gierig nach Genüssen sein; sie werden tugendlos und von schlechtem Lebenswandel sein. Sie werden das Vermögen, das ihre Ehemänner durch mühsame Arbeit wie Ackerbau, Viehzucht und dergleichen unter großen Anstrengungen und Entbehrungen erworben haben, zusammen mit ihren Liebhabern verprassen. Während sie Rauschtrank trinken und sich mit Blumen, Düften und Salben schmücken, vernachlässigen sie selbst die dringendsten Hausarbeiten. Sie spähen über den oberen Rand der Umzäunung des Hauses oder durch Ritzen und Löcher nach ihren Liebhabern aus. Sie werden sogar das Saatgut, das am nächsten Tag ausgesät werden müsste, zerstampfen, um daraus Reisschleim, Reis und Speisen zuzubereiten, diese verzehren und das Vermögen verschleudern – geradeso wie die hungrige Schakalin, die unter dem Stuhl liegt und das geflochtene Seil auffrisst, das zu den Füßen abgelegt wurde. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den achten Traum.“ (8) Bhante, rājadvāre bahūhi tucchakumbhehi parivāretvā ṭhapitaṃ ekaṃ mahantaṃ pūritakumbhaṃ addasaṃ. Cattāropi pana vaṇṇā catūhi disāhi catūhi anudisāhi ca ghaṭehi udakaṃ āharitvā āharitvā pūritakumbhameva pūrenti, pūritapūritaṃ udakaṃ uttaritvā palāyati, tepi punappunaṃ tattheva udakaṃ āsiñcanti, tucchakumbhe pana olokentāpi natthi. Ayaṃ me aṭṭhamo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgateyeva vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi loko parihāyissati, raṭṭhaṃ [Pg.359] nirojaṃ bhavissati, rājāno duggatā kapaṇā bhavissanti. Yo issaro bhavissati, tassa bhaṇḍāgāre satasahassamattā kahāpaṇā bhavissanti, te evaṃ duggatā sabbe jānapade attanova kamme kāressanti, upaddutā manussā sake kammante chaḍḍetvā rājūnaññeva atthāya pubbaṇṇāparaṇṇāni vapantā rakkhantā lāyantā maddantā pavesentā ucchukhettāni karontā yantāni karontā yantāni vāhentā phāṇitādīni pacantā pupphārāme ca phalārāme ca karontā tattha tattha nipphannāni pubbaṇṇādīni āharitvā rañño koṭṭhāgārameva pūressanti, attano gehesu tucchakoṭṭhe olokentāpi na bhavissanti, tucchakumbhe anoloketvā pūritakumbhe pūraṇasadisameva bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, navamaṃ kathehīti. (8) „Herr, ich sah am Palasttor einen großen, randvollen Wasserkrug, der von vielen leeren Krügen umgeben aufgestellt war. Menschen aller vier Stände trugen aus den vier Himmelsrichtungen und den vier Zwischenrichtungen mit Krügen Wasser herbei und füllten nur den bereits vollen Krug. Das überlaufende Wasser floss weg, doch sie gossen immer wieder von Neuem Wasser dorthin. Die leeren Krüge jedoch beachtete niemand auch nur mit einem Blick. Dies ist mein achter Traum; was ist seine Auswirkung?“ – „Auch die Auswirkung dieses Traumes wird erst in der Zukunft eintreten. Denn in der Zukunft wird die Welt verfallen, das Land wird seine Lebenskraft verlieren, und die Könige werden arm und bedürftig sein. Wer auch immer Herrscher sein wird, in dessen Schatzkammer werden sich nur etwa hunderttausend Kahāpaṇas befinden. Weil sie so arm sein werden, werden sie alle Bewohner des Landes nur für ihre eigenen Zwecke arbeiten lassen. Die geplagten Menschen werden ihre eigenen Arbeiten aufgeben und nur noch für die Könige Getreide und Feldfrüchte aussäen, bewachen, ernten, dreschen und einlagern. Sie werden Zuckerrohrfelder anlegen, Zuckerpressen bauen und betreiben, Melasse sieden, Blumen- und Obstgärten anlegen, und sie werden die geernteten Feldfrüchte von überall herbeitragen, um einzig die Kornspeicher des Königs zu füllen. In ihren eigenen Häusern wird niemand mehr nach den leeren Kornspeichern sehen. Dies wird genau so sein, wie wenn man die leeren Krüge unbeachtet lässt und stattdessen den bereits vollen Krug füllt. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den neunten Traum.“ (9) Bhante, ekaṃ pañcavaṇṇapadumasañchannaṃ gambhīraṃ sabbato titthaṃ pokkharaṇiṃ addasaṃ. Samantato dvipadacatuppadā otaritvā tattha pānīyaṃ pivanti. Tassā majjhe gambhīraṭṭhāne udakaṃ āvilaṃ, tīrappadesesu dvipadacatuppadānaṃ akkamaṭṭhāne acchaṃ vippasannaṃ anāvilaṃ. Evāhaṃ addasaṃ. Ayaṃ me navamo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgateyeva vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi rājāno adhammikā bhavissanti, chandādivasena agatiṃ gacchantā rajjaṃ kāressanti, dhammena vinicchayaṃ nāma na dassanti, lañjavittakā bhavissanti dhanalolā, raṭṭhavāsikesu nesaṃ khantimettānuddayā nāma na bhavissanti, kakkhaḷā pharusā ucchuyante ucchugaṇṭhikā viya manusse pīḷentā nānappakārena baliṃ uppādentā dhanaṃ gaṇhissanti. Manussā balipīḷitā kiñci dātuṃ asakkontā gāmanigamādayo chaḍḍetvā paccantaṃ gantvā vāsaṃ kappessanti, majjhimajanapado suñño bhavissati, paccanto ghanavāso seyyathāpi pokkharaṇiyā majjhe udakaṃ āvilaṃ pariyante vippasannaṃ. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, dasamaṃ kathehīti. (9) „Herr, ich sah einen tiefen Lotosteich, der mit fünf Arten von Lotosblumen bedeckt und von allen Seiten zugänglich war. Ringsherum stiegen zweibeinige und vierbeinige Wesen hinab und tranken dort Wasser. In der Mitte des Teiches, an den tiefen Stellen, war das Wasser trüb; an den Uferbereichen jedoch, wo die zweibeinigen und vierbeinigen Wesen hineintraten, war es klar, rein und ungetrübt. So sah ich es. Dies ist mein neunter Traum; was ist seine Auswirkung?“ – „Auch die Auswirkung dieses Traumes wird erst in der Zukunft eintreten. Denn in der Zukunft werden die Könige ungerecht sein. Sie werden das Reich regieren, indem sie den Fehlwegen wie Parteilichkeit und Voreingenommenheit folgen, und werden keine gerechten Urteile fällen. Sie werden bestechlich und gierig nach Reichtum sein. Den Bewohnern des Landes gegenüber werden sie weder Geduld noch Wohlwollen oder Mitgefühl zeigen; sie werden grausam und roh sein. Indem sie die Menschen wie Zuckerrohrknoten in einer Zuckerpresse ausquetschen, werden sie auf vielfältige Weise Steuern und Abgaben erheben und das Vermögen an sich reißen. Die durch Abgaben geplagten Menschen, die nichts mehr zu geben vermögen, werden Dörfer und Städte verlassen, in die Grenzgebiete fliehen und sich dort niederlassen. Das Kernland wird menschenleer sein, während die Grenzgebiete dicht besiedelt sein werden – geradeso wie bei dem Lotosteich, in dessen Mitte das Wasser trüb und an dessen Rändern es klar ist. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den zehnten Traum.“ (10) Bhante, ekissāyeva kumbhiyā paccamānaṃ odanaṃ apākaṃ addasaṃ ‘‘apāka’’nti vicāretvā vibhajitvā ṭhapitaṃ viya tīhākārehi paccamānaṃ, ekasmiṃ [Pg.360] passe atikilinno hoti, ekasmiṃ uttaṇḍulo, ekasmiṃ supakkoti. Ayaṃ me dasamo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgateyeva vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi rājāno adhammikā bhavissanti, tesu adhammikesu rājayuttāpi brāhmaṇagahapatikāpi negamajānapadāpīti samaṇabrāhmaṇe upādāya sabbe manussā adhammikā bhavissanti, tato tesaṃ ārakkhadevatā, balipaṭiggāhikā devatā, rukkhadevatā, ākāsaṭṭhadevatāti evaṃ devatāpi adhammikā bhavissanti. Adhammikarājūnañca rajje vātā visamā kharā vāyissanti, te ākāsaṭṭhavimānāni kampessanti, tesu kampitesu devatā kupitā devaṃ vassituṃ na dassanti, vassamānopi sakalaraṭṭhe ekappahārena na vassissati, vassamānopi sabbattha kasikammassa vā vappakammassa vā upakārako hutvā na vassissati. Yathā ca raṭṭhe, evaṃ janapadepi gāmepi ekataḷākepi ekasarepi ekappahāreneva na vassissati, taḷākassa uparibhāge vassanto heṭṭhābhāge na vassissati, heṭṭhā vassanto upari na vassissati. Ekasmiṃ bhāge sassaṃ ativassena nassissati, ekasmiṃ avassanena milāyissati, ekasmiṃ sammā vassamāno sampādessati. Evaṃ ekassa rañño rajje vuttasassā tippakārā bhavissanti ekakumbhiyā odano viya. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, ekādasamaṃ kathehīti. (10) Herr, ich sah in einem einzigen Topf kochenden Reis, der ungleichmäßig garte. 'Ungleichmäßig garend' bedeutet: wie in drei Teile getrennt und aufgeteilt, kochte er auf dreifache Weise: An einer Seite war er völlig verkocht, an einer Seite war er roh und an einer Seite war er gut gar gekocht. Dies ist mein zehnter Traum; was ist dessen Auswirkung? Auch die Auswirkung dieses Traumes wird erst in der Zukunft eintreffen. Denn in der Zukunft werden die Könige unrechtschaffen sein. Wenn diese unrechtschaffen sind, werden auch die königlichen Beamten, die Brahmanen und Hausväter, die Stadt- und Landbewohner – angefangen bei den Asketen und Brahmanen – alle Menschen unrechtschaffen sein. Infolgedessen werden auch deren Schutzgottheiten, die Opfergaben empfangenden Gottheiten, die Baumgottheiten und die im Raum weilenden Gottheiten, ja all diese Gottheiten unrechtschaffen werden. Und im Reich unrechtschaffener Könige werden unregelmäßige, heftige Winde wehen; diese werden die im Raum schwebenden Paläste erschüttern. Wenn diese erschüttert werden, geraten die Gottheiten in Zorn und lassen es nicht regnen. Selbst wenn es regnet, wird es nicht über das gesamte Reich auf einmal regnen; und selbst wenn es regnet, wird es nicht überall so regnen, dass es für die Pflügung oder Aussaat nützlich ist. Wie im Reich, so wird es auch im Verwaltungsbezirk, im Dorf, an einem einzigen Teich oder einem einzigen See nicht zur selben Zeit regnen. Wenn es über dem oberen Teil des Teiches regnet, wird es im unteren Teil nicht regnen; regnet es im unteren Teil, wird es im oberen Teil nicht regnen. In einem Teil wird das Getreide durch zu viel Regen verderben; in einem anderen Teil wird es aus Mangel an Regen verwelken; und in einem weiteren Teil wird es bei rechtem Regen gedeihen. Ebenso wird in der Regierungszeit eines einzigen Königs das ausgesäte Getreide dreierlei Art sein, wie der Reis in dem einen Topf. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den elften Traum! (11) Bhante, satasahassagghanikaṃ candanasāraṃ pūtitakkena vikkiṇante addasaṃ. Ayaṃ me ekādasamo supino, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgateyeva mayhaṃ sāsane parihāyante vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi paccayalolā alajjī bhikkhū bahū bhavissanti, te mayā paccayaloluppaṃ nimmathetvā kathitadhammadesanaṃ cīvarādicatupaccayahetu paresaṃ desessanti, paccayehi mucchitā nissaraṇapakkhe ṭhitā nibbānābhimukhaṃ katvā desetuṃ na sakkhissanti, kevalaṃ ‘‘padabyañjanasampattiñceva madhurasaddañca sutvā mahagghāni cīvarādīni dassanti’’ iccevaṃ desessanti. Apare [Pg.361] antaravīthicatukkarājadvārādīsu nisīditvā kahāpaṇaaḍḍhakahāpaṇapādamāsakarūpādīnipi nissāya desessanti. Iti mayā nibbānagghanakaṃ katvā desitaṃ dhammaṃ catupaccayatthāya ceva kahāpaṇaḍḍhakahāpaṇādīnaṃ atthāya ca vikkiṇitvā desentā satasahassagghanakaṃ candanasāraṃ pūtitakkena vikkiṇantā viya bhavissanti. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, dvādasamaṃ kathehīti. (11) Herr, ich sah Leute, die kostbares Sandelholz im Wert von einhunderttausend Münzen für faule Buttermilch verkauften. Dies ist mein elfter Traum; was ist dessen Auswirkung? Auch die Auswirkung dieses Traumes wird in der Zukunft eintreffen, wenn meine Lehre im Verfall begriffen ist. Denn in der Zukunft wird es viele gewinnsüchtige und schamlose Mönche geben. Sie werden die Lehrverkündigung, die ich unter Überwindung jeglicher Gewinnsucht gepredigt habe, um der vier Requisiten wie Gewänder und so weiter willen anderen vortragen. Betört von den Requisiten werden sie nicht mehr in der Lage sein, die Lehre so zu verkünden, dass sie auf der Seite der Befreiung steht und direkt auf das Nibbana ausgerichtet ist. Vielmehr werden sie nur in der Absicht predigen: 'Wenn sie die Vollkommenheit der Worte und Silben sowie die liebliche Stimme hören, werden sie uns kostbare Gewänder und anderes spenden.' Andere wiederum werden sich in engen Gassen, an Kreuzungen, an Palasttoren und an anderen Orten niedersetzen und die Lehre im Austausch für Kahapanas, halbe Kahapanas, Padas, Masakas und Münzen predigen. Indem sie so die von mir als unschätzbar wie das Nibbana verkündete Lehre sowohl für die vier Requisiten als auch für Kahapanas, halbe Kahapanas und so weiter feilbieten und predigen, werden sie wie jene sein, die kostbares Sandelholz im Wert von einhunderttausend Münzen für faule Buttermilch verkaufen. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den zwölften Traum! (12) Bhante, tucchalābūni udake sīdantāni addasaṃ, imassa ko vipākoti? Imassapi anāgate adhammikarājakāle loke viparivattanteyeva vipāko bhavissati. Tadā hi rājāno jātisampannānaṃ kulaputtānaṃ yasaṃ na dassanti, akulīnānaṃyeva dassanti, te issarā bhavissanti, itare daliddā. Rājasammukhepi rājadvārepi amaccasammukhepi vinicchayaṭṭhānepi tucchalābusadisānaṃ akulīnānaṃyeva kathā osīditvā ṭhitā viya niccalā suppatiṭṭhitā bhavissati. Saṅghasannipātesupi saṅghakammagaṇakammaṭṭhānesu ceva pattacīvarapariveṇādivinicchayaṭṭhānesu ca dussīlānaṃ pāpapuggalānaṃyeva kathā niyyānikā bhavissati, na lajjibhikkhūnanti evaṃ sabbathāpi tucchalābusīdanakālo viya bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, terasamaṃ kathehīti. (12) Herr, ich sah leere Flaschenkürbisse im Wasser versinken. Was ist dessen Auswirkung? Auch die Auswirkung dieses Traumes wird sich in der Zukunft zur Zeit unrechtschaffener Könige zeigen, wenn die Welt völlig auf dem Kopf steht. Denn dann werden die Könige wohlerhobenen Söhnen aus gutem Hause kein Ansehen verleihen, sondern nur den Unedlen. Jene werden die Herrschenden sein, während die anderen arm sein werden. Sowohl vor dem König als auch am Palasttor, vor den Ministern und an den Gerichtsstätten wird allein das Wort der unedlen Menschen, die leeren Flaschenkürbissen gleichen, wie fest verankert und unerschütterlich dastehen, als wäre es versunken. Auch in den Versammlungen des Ordens, bei der Ausführung von Ordenshandlungen oder Gruppenangelegenheiten sowie bei Entscheidungen über Almosenschalen, Gewänder und Klosterzellen wird allein das Wort von tugendlosen und sündhaften Personen maßgeblich sein, nicht aber das der gewissenhaften Mönche. So wird es in jeder Hinsicht eine Zeit sein, die dem Versinken leerer Flaschenkürbisse gleicht. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den dreizehnten Traum! (13) Bhante, mahantamahantā kūṭāgārappamāṇā ghanasilā nāvā viya udake plavamānā addasaṃ, imassa ko vipākoti? Imassapi tādiseyeva kāle vipāko bhavissati. Tadā hi adhammikarājāno akulīnānaṃ yasaṃ dassanti, te issarā bhavissanti, kulīnā duggatā. Tesu na keci gāravaṃ karissanti, itaresuyeva karissanti. Rājasammukhe vā amaccasammukhe vā vinicchayaṭṭhāne vā vinicchayakusalānaṃ ghanasilāsadisānaṃ kulaputtānaṃ kathā na ogāhitvā patiṭṭhahissati. Tesu kathentesu ‘‘kiṃ ime kathentī’’ti itare parihāsameva karissanti. Bhikkhusannipātesupi vuttappakāresu ṭhānesu neva pesale bhikkhū garukātabbe maññissanti, nāpi tesaṃ kathā pariyogāhitvā patiṭṭhahissati, silānaṃ plavanakālo viya bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, cuddasamaṃ kathehīti. (13) Herr, ich sah riesengroße, feste Felsblöcke von der Größe herrschaftlicher Häuser wie Boote auf dem Wasser schwimmen. Was ist dessen Auswirkung? Die Auswirkung dieses Traumes wird ebenfalls in eben jener Zeit eintreffen. Denn dann werden unrechtschaffene Könige den Niedriggeborenen Ansehen verleihen; jene werden die Herrschenden sein, während die Wohlgeborenen im Elend leben werden. Niemand wird jenen Edlen Respekt erweisen, sondern man wird ihn nur den anderen erweisen. Sowohl vor dem König als auch vor den Ministern oder an den Gerichtsstätten wird das Wort der rechtskundigen Söhne aus gutem Hause, die festen Felsblöcken gleichen, keinen Eingang finden und keinen Bestand haben. Wenn sie sprechen, werden die anderen sie nur verspotten und sagen: 'Was reden diese da?' Auch in den Mönchsversammlungen an den zuvor genannten Stätten wird man die tugendliebenden Mönche weder als ehrungswürdig erachten, noch wird ihr Wort tiefen Eingang finden und Bestand haben. Es wird eine Zeit sein, die dem Schwimmen von Felsblöcken gleicht. Auch aus diesem Grund droht Dir keine Gefahr. Erzähle den vierzehnten Traum! (14) Bhante[Pg.362], khuddakamadhukapupphappamāṇā maṇḍūkiyo mahantamahante kaṇhasappe vegena anubandhitvā uppalanāḷe viya chinditvā chinditvā maṃsaṃ khāditvā gilantiyo addasaṃ, imassa ko vipākoti? Imassapi loke parihāyante anāgate eva vipāko bhavissati. Tadā hi manussā tibbarāgajātikā kilesānuvattakā hutvā taruṇataruṇānaṃ attano bhariyānaṃ vase vattissanti, gehe dāsakammakarādayopi gomahiṃsādayopi hiraññasuvaṇṇampi sabbaṃ tāsaññeva āyattaṃ bhavissati. ‘‘Asukaṃ hiraññasuvaṇṇaṃ vā paricchadādijātaṃ vā kaha’’nti vutte ‘‘yattha vā tattha vā hotu, kiṃ tuyhiminā byāpārena, tvaṃ mayhaṃ ghare santaṃ vā asantaṃ vā jānitukāmo jāto’’ti vatvā nānappakārehi akkositvā mukhasattīhi koṭṭetvā dāsaceṭake viya attano vase katvā attano issariyaṃ pavattessanti. Evaṃ madhukapupphappamāṇānaṃ maṇḍūkapotikānaṃ āsīvise kaṇhasappe gilanakālo viya bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, pannarasamaṃ kathehīti. (14) „Herr, ich sah winzige weibliche Frösche von der Größe von Madhuka-Blüten, die sehr großen schwarzen Kobras rasch folgten, sie wie Lotusstängel in Stücke rissen, ihr Fleisch fraßen und sie verschlangen. Was ist die Wirkung hiervon?“ – „Auch die Wirkung dieses Traumes wird sich erst in der Zukunft zeigen, wenn die Welt verfällt. Denn dann werden die Menschen von heftiger Leidenschaft beherrscht sein, den Befleckungen folgen und ganz unter der Herrschaft ihrer sehr jungen Ehefrauen stehen. Alles im Haus – Sklaven, Arbeiter, Rinder, Büffel, Silber und Gold – wird allein in der Verfügungsgewalt dieser Frauen liegen. Wenn gefragt wird: ‚Wo ist jenes Gold, Silber oder jener Hausrat?‘, werden sie sagen: ‚Wo auch immer es sein mag, was geht dich das an? Bist du etwa darauf aus zu erfahren, was in meinem Haus vorhanden ist oder nicht?‘, und sie werden sie auf vielfältige Weise beschimpfen, sie mit den Lanzen des Mundes verletzen, sie wie Sklavenjungen unter ihre Kontrolle bringen und ihre eigene Herrschaft ausüben. Dies wird wie die Zeit sein, in der winzige Frösche von der Größe von Madhuka-Blüten die giftigen schwarzen Kobras verschlingen. Auch aus diesem Grund droht Euch keine Gefahr. Berichtet nun den fünfzehnten Traum.“ (15) Bhante, dasahi asaddhammehi samannāgataṃ gāmagocaraṃ kākaṃ kañcanavaṇṇatāya ‘‘suvaṇṇā’’ti laddhanāme suvaṇṇarājahaṃse parivārente addasaṃ, imassa ko vipākoti? Imassāpi anāgate dubbalarājakāleyeva vipāko bhavissati. Anāgatasmiñhi rājāno hatthisippādīsu akusalā yuddhesu avisāradā bhavissanti, te attano rajjavipattiṃ āsaṅkamānā samānajātikānaṃ kulaputtānaṃ issariyaṃ adatvā attano pādamūlikanhāpakakappakādīnaṃ dassanti, jātigottasampannā kulaputtā rājakule patiṭṭhaṃ alabhamānā jīvikaṃ kappetuṃ asamatthā hutvā issariye ṭhite jātigottahīne akulīne upaṭṭhahantā vicarissanti, suvaṇṇarājahaṃsehi kākassa parivāritakālo viya bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi, soḷasamaṃ kathehīti. (15) „Herr, ich sah eine im Dorf nach Nahrung suchende Krähe, die mit den zehn schlechten Eigenschaften behaftet ist, umringt von goldenen Königsgänsen, die aufgrund ihrer goldenen Färbung den Namen ‚Suvaṇṇa‘ tragen. Was ist die Wirkung hiervon?“ – „Auch die Wirkung dieses Traumes wird sich erst in der Zukunft zur Zeit schwacher Könige zeigen. Denn in der Zukunft werden die Könige in den Künsten wie der Elefantenführung unkundig und im Kampf zaghaft sein. Aus Angst vor dem Verlust ihrer Herrschaft werden sie Söhnen aus edler Familie gleicher Herkunft keine Macht verleihen, sondern sie stattdessen ihren eigenen Fußdienern, Bademeistern, Barbieren und Ähnlichen geben. Die edlen Söhne aus gutem Hause, die am Königshof keinen Rückhalt finden und ihren Lebensunterhalt nicht mehr selbst bestreiten können, werden umherziehen und jenen von niedriger Herkunft und schlechtem Stammbaum dienen, die nun an der Macht sind. Dies wird wie die Zeit sein, in der goldene Königsgänse eine Krähe umringen. Auch aus diesem Grund droht Euch keine Gefahr. Berichtet nun den sechzehnten Traum.“ (16) Bhante, pubbe dīpino eḷake khādanti, ahaṃ pana eḷake dīpino anubandhitvā murumurūti khādante addasaṃ. Athaññe tasā vakā eḷake dūratova disvā tasitā tāsappattā hutvā eḷakānaṃ bhayāpalāyitvā gumbagahanādīni [Pg.363] pavisitvā nilīyiṃsu, evāhaṃ addasaṃ, imassa ko vipākoti? Imassapi anāgate adhammikarājakāleyeva vipāko bhavissati. Tadā hi akulīnā rājavallabhā issarā bhavissanti, kulīnā apaññātā duggatā. Te rājavallabhā rājānaṃ attano kathaṃ gāhāpetvā vinicchayaṭṭhānādīsu balavanto hutvā kulīnānaṃ paveṇiāgatāni khettavatthādīni ‘‘amhākaṃ santakāni etānī’’ti abhiyuñjitvā tesu ‘‘na tumhākaṃ, amhāka’’nti āgantvā vinicchayaṭṭhānādīsu vivadantesu vettalatādīhi paharāpetvā gīvāyaṃ gahetvā apakaḍḍhāpetvā ‘‘attano pamāṇaṃ na jānātha, amhehi saddhiṃ vivadatha, idāni vo rañño kathetvā hatthapādacchedanādīni kāressāmā’’ti santajjessanti. Te tesaṃ bhayena attano santakāni vatthūni ‘‘tumhākaṃyevetāni gaṇhathā’’ti niyyādetvā attano gehāni pavisitvā bhītā nipajjissanti. Pāpabhikkhūpi pesale bhikkhū yathāruci viheṭhessanti, te pesalā bhikkhū paṭisaraṇaṃ alabhamānā araññaṃ pavisitvā gahanaṭṭhānesu nilīyissanti. Evaṃ hīnajaccehi ceva pāpabhikkhūhi ca upaddutānaṃ jātimantakulaputtānañceva pesalabhikkhūnañca eḷakānaṃ bhayena tasavakānaṃ palāyanakālo viya bhavissati. Itonidānampi te bhayaṃ natthi. Ayampi hi supino anāgataṃyeva ārabbha diṭṭho. Brāhmaṇā pana na dhammasudhammatāya tayi sinehena kathayiṃsu, ‘‘bahudhanaṃ labhissāmā’’ti āmisāpekkhatāya jīvitavuttiṃ nissāya kathayiṃsūti. (16) „Herr, früher fraßen Leoparden Schafe. Ich aber sah Schafe, die Leoparden nachjagten und sie mit einem knuspernden Geräusch fraßen. Und andere, verängstigte Wölfe sahen die Schafe schon von weitem, wurden von Furcht und Schrecken gepackt, flohen aus Angst vor den Schafen, drangen in dichtes Gebüsch ein und versteckten sich dort. So sah ich es. Was ist die Wirkung hiervon?“ – „Auch die Wirkung dieses Traumes wird sich erst in der Zukunft zur Zeit ungerechter Könige zeigen. Denn dann werden Menschen von niedriger Geburt Günstlinge des Königs sein und Macht erlangen, während edle Menschen unbedeutend und verarmt sein werden. Diese Günstlinge des Königs werden bewirken, dass der König auf ihre Worte hört, wodurch sie an den Gerichtsstätten mächtig werden. Sie werden das von Generation zu Generation ererbte Eigentum wie Felder und Ländereien der edlen Menschen beanspruchen, indem sie klagen: ‚Das ist unser Besitz!‘ Wenn die edlen Menschen herbeikommen und an den Gerichtsstätten streiten: ‚Das gehört nicht euch, sondern uns!‘, werden die Günstlinge sie mit Ruten und Ähnlichem schlagen lassen, sie am Nacken packen und hinauszerren lassen und sie bedrohen: ‚Ihr kennt eure Grenzen nicht, dass ihr es wagt, mit uns zu streiten! Wir werden dies nun dem König berichten und dafür sorgen, dass man euch die Hände und Füße abhackt und Ähnliches!‘ Aus Angst vor ihnen werden die edlen Menschen ihr eigenes Eigentum mit den Worten übergeben: ‚Es gehört ohnehin euch, nehmt es nur!‘, in ihre Häuser zurückkehren und sich voller Furcht hinlegen. Auch schlechte Mönche werden tugendhafte Mönche nach Belieben schikanieren. Diese tugendhaften Mönche werden, da sie keine Zuflucht finden, in den Wald gehen und sich im dichten Dickicht verstecken. Dies wird wie die Zeit sein, in der verängstigte Wölfe aus Angst vor Schafen fliehen – eine Zeit der Bedrängnis für die Söhne aus gutem Hause durch Menschen niedriger Geburt und für die tugendhaften Mönche durch die schlechten Mönche. Auch aus diesem Grund droht Euch keine Gefahr. Denn auch dieser Traum wurde im Hinblick auf die Zukunft geschaut. Die Brahmanen aber sprachen nicht aus wahrer Rechtschaffenheit oder aus Liebe zu Euch, sondern sie sprachen in der Erwartung materieller Gewinne, in der Hoffnung: ‚Wir werden viel Reichtum erlangen‘, um so ihren Lebensunterhalt zu sichern.“ Evaṃ satthā soḷasannaṃ mahāsupinānaṃ nipphattiṃ kathetvā ‘‘na kho, mahārāja, etarahi tvaññeva ime supine addasa, porāṇakarājānopi addasaṃsu. Brāhmaṇāpi nesaṃ evameva ime supine gahetvā yaññamatthake khipiṃsu, tato paṇḍitehi dinnanayena gantvā bodhisattaṃ pucchiṃsu. Porāṇakā paṇḍitāpi nesaṃ ime supine kathentā imināva niyāmena kathesu’’nti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. Nachdem der Meister so die Bedeutung der sechzehn großen Träume dargelegt hatte, sprach er: „O großer König, nicht nur Du hast in dieser Zeit diese Träume geschaut; auch die Könige der Vorzeit haben sie geschaut. Damals nutzten die Brahmanen diese Träume ebenso aus, um sie für Opferzwecke zu missbrauchen. Daraufhin gingen jene Könige nach dem von Weisen gegebenen Rat und befragten den Bodhisatta. Und auch die Weisen der Vorzeit erklärten ihnen diese Träume auf genau dieselbe Weise.“ Nachdem er dies gesagt hatte, trug er, vom König gebeten, eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto isipabbajjaṃ pabbajitvā abhiññā ceva [Pg.364] samāpattiyo ca nibbattetvā himavantappadese jhānakīḷaṃ kīḷanto viharati. Tadā bārāṇasiyaṃ brahmadatto imināva niyāmena ime supine disvā brāhmaṇe pucchi. Brāhmaṇā evameva yaññaṃ yajituṃ ārabhiṃsu. Tesu purohitassa antevāsikamāṇavo paṇḍito byatto ācariyaṃ āha – ‘‘ācariya, tumhehi mayaṃ tayo vede uggaṇhāpitā, nanu tesu ekaṃ māretvā ekassa sotthikammassa kāraṇaṃ nāma natthī’’ti. Tāta, iminā upāyena amhākaṃ bahudhanaṃ uppajjissati, tvaṃ pana rañño dhanaṃ rakkhitukāmo maññeti. Māṇavo ‘‘tena hi, ācariya, tumhe tumhākaṃ kammaṃ karotha, ahaṃ tumhākaṃ santike kiṃ karissāmī’’ti vicaranto rañño uyyānaṃ agamāsi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer hochgestellten Brahmanenfamilie im Norden geboren. Als er das Mannesalter erreicht hatte, weihte er sich dem Leben eines Einsiedlers, erlangte die höheren Geisteskräfte sowie die geistigen Sammlungen und lebte im Himalayagebiet, wo er im Spiel der Vertiefungen verweilte. Damals schaute Brahmadatta in Bārāṇasī auf genau dieselbe Weise diese Träume und befragte die Brahmanen. Die Brahmanen schickten sich ebenso an, ein großes Opfer darzubringen. Unter ihnen sprach ein weiser und kluger Schüler des Hofpriesters zu seinem Lehrer: „Lehrer, Ihr habt uns die drei Veden gelehrt. Steht darin nicht geschrieben, dass es unmöglich ist, das Wohlergehen eines Menschen zu bewirken, indem man ein anderes Lebewesen tötet?“ – „Mein Sohn, durch dieses Mittel wird uns großer Reichtum zufließen. Du aber scheinst wohl das Vermögen des Königs schützen zu wollen!“ Der junge Brahmane entgegnete: „Nun gut, Lehrer, tut, was Eures Amtes ist. Was soll ich noch in Eurer Nähe tun?“, und während er umherwandelte, begab er sich in den königlichen Garten. Taṃ divasameva bodhisattopi taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘ajja mayi manussapathaṃ gate mahājanassa bandhanā mokkho bhavissatī’’ti ākāsena gantvā uyyāne otaritvā suvaṇṇapaṭimā viya maṅgalasilātale nisīdi. Māṇavo bodhisattaṃ upasaṅkamitvā vanditvā ekamantaṃ nisīditvā paṭisanthāramakāsi. Bodhisattopi tena saddhiṃ madhurapaṭisanthāraṃ katvā ‘‘kiṃ nu kho, māṇava, rājā dhammena rajjaṃ kāretī’’ti pucchi. ‘‘Bhante, rājā nāma dhammiko, apica kho taṃ brāhmaṇā atitthe pakkhandāpe’’nti. Rājā soḷasa supine disvā brāhmaṇānaṃ ārocesi. Brāhmaṇā ‘‘yaññaṃ yajissāmā’’ti āraddhā. Kiṃ nu kho, bhante, ‘‘ayaṃ nāma imesaṃ supinānaṃ nipphattī’’ti rājānaṃ saññāpetvā tumhākaṃ mahājanaṃ bhayā mocetuṃ na vaṭṭatīti. Mayaṃ kho, māṇava, rājānaṃ na jānāma, rājāpi amhe na jānāti. Sace pana idhāgantvā puccheyya, katheyyāmassa mayanti. Māṇavo ‘‘ahaṃ, bhante, taṃ ānessāmi, tumhe mamāgamanaṃ udikkhantā muhuttaṃ nisīdathā’’ti bodhisattaṃ paṭijānāpetvā rañño santikaṃ gantvā ‘‘mahārāja, eko ākāsacāriko tāpaso tumhākaṃ uyyāne otaritvā ‘tumhehi diṭṭhasupinānaṃ nipphattiṃ kathessāmī’ti tumhe pakkosatī’’ti āha. An eben diesem Tag erkannte auch der Bodhisatta diesen Grund und dachte: „Wenn ich mich heute auf den Weg der Menschen begebe, wird die Befreiung einer großen Menge von Menschen aus ihren Fesseln erfolgen.“ So reiste er durch die Luft, stieg im königlichen Garten herab und setzte sich wie eine goldene Bildsäule auf die festliche Steinplatte. Ein Jüngling trat an den Bodhisatta heran, verneigte sich vor ihm, setzte sich beiseite und hielt eine freundliche Begrüßung. Auch der Bodhisatta tauschte mit diesem Jüngling eine angenehme Begrüßung aus und fragte: „Lieber Jüngling, regiert der König wohl rechtmäßig?“ – „Ehrwürdiger Herr, der König ist zwar gerecht, doch die Brahmanen verleiten ihn dazu, an einen ungeeigneten Ort abzuweichen. Der König hat sechzehn Träume gesehen und sie den Brahmanen mitgeteilt. Nun schicken sich die Brahmanen an, ein Opfer darzubringen. Wäre es nicht angemessen, ehrwürdiger Herr, wenn Ihr dem König begreiflich machtet: ‚Dies ist das Ergebnis dieser Träume‘, und dadurch die große Volksmenge vor der Gefahr befreitet?“ – „Lieber Jüngling, wir kennen den König nicht, und auch der König kennt uns nicht. Wenn er jedoch hierher käme und uns befragte, würden wir es ihm erklären.“ Der Jüngling sprach: „Ehrwürdiger Herr, ich werde ihn herbringen. Bitte verweilt hier einen Augenblick und wartet auf meine Ankunft.“ Nachdem er sich die Zusage des Bodhisatta geholt hatte, ging er zum König und sagte: „O Großkönig, ein asketischer Weiser, der durch die Luft reist, ist in Eurem Garten herabgestiegen und lässt Euch rufen, indem er sagt: ‚Ich werde das Ergebnis der von Euch gesehenen Träume erklären.‘“ Rājā tassa kathaṃ sutvā tāvadeva mahantena parivārena uyyānaṃ gantvā tāpasaṃ vanditvā ekamantaṃ nisinno pucchi ‘‘tumhe kira, bhante, mayā diṭṭhasupinānaṃ nipphattiṃ jānāthā’’ti? ‘‘Āma, mahārājā’’ti. ‘‘Tena hi kathethā’’ti. ‘‘Kathemi, mahārāja, yathādiṭṭhe tāva supine maṃ sāvehī’’ti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti rājā – Als der König die Worte des Jünglings hörte, begab er sich sogleich mit einer großen Gefolgschaft in den Garten, verneigte sich vor dem Asketen, setzte sich an eine Seite und fragte: „Stimmt es, ehrwürdiger Herr, dass Ihr das Ergebnis der von mir gesehenen Träume kennt?“ – „Ja, Großkönig“, antwortete er. „Wenn dem so ist, dann sprecht!“ – „Ich werde sprechen, Großkönig, doch lasst mich zuerst die Träume so hören, wie Ihr sie gesehen habt.“ – „Sehr wohl, ehrwürdiger Herr“, sprach der König und – 77. 77. ‘‘Usabhā [Pg.365] rukkhā gāviyo gavā ca,Asso kaṃso siṅgālī ca kumbho; Pokkharaṇī ca apākacandanaṃ. „Stiere, Bäume, Kühe und Jungstiere, ein Pferd, eine Bronzeschale, eine Schakalin und ein Krug; ein Lotusteich, ungekochter Reis und Sandelholz. ‘‘Lābūni sīdanti silā plavanti, maṇḍūkiyo kaṇhasappe gilanti; Kākaṃ suvaṇṇā parivārayanti, tasā vakā eḷakānaṃ bhayā hī’’ti. – Kürbisse sinken, Felsplatten treiben obenauf; Frösche verschlingen schwarze Schlangen; goldene Gänse umringen eine Krähe; verängstigt sind die Wölfe aus Furcht vor den Schafen.“ – Vatvā pasenadiraññā kathitaniyāmeneva supine kathesi. Nachdem er dies gesprochen hatte, erzählte er die Träume genau auf jene Weise, wie sie auch von König Pasenadi berichtet worden waren. Bodhisattopi tesaṃ idāni satthārā kathitaniyāmeneva vitthārato nipphattiṃ kathetvā pariyosāne sayaṃ idaṃ kathesi – Auch der Bodhisatta erklärte nun die Bedeutung jener Träume ausführlich auf dieselbe Weise, wie sie heute vom Meister verkündet wurde, und sprach am Ende selbst folgende Worte: ‘‘Vipariyāso vattati nayidha matthī’’ti; „Es herrscht Verkehrtheit, dies geschieht nicht hier.“ Tatrāyamattho – ayaṃ, mahārāja, imesaṃ supinānaṃ nipphatti. Yaṃ panetaṃ tesaṃ paṭighātatthāya yaññakammaṃ vattati, taṃ vipariyāso vattati viparītato vattati, vipallāsena vattatīti vuttaṃ hoti. Kiṃkāraṇā? Imesañhi nipphatti nāma lokassa viparivattanakāle, akāraṇassa kāraṇanti gahaṇakāle, kāraṇassa akāraṇanti chaḍḍanakāle, abhūtassa bhūtanti gahaṇakāle, bhūtassa abhūtanti jahanakāle, alajjīnaṃ ussannakāle, lajjīnañca parihīnakāle bhavissati. Nayidha matthīti idāni pana tava vā mama vā kāle idha imasmiṃ purisayuge vattamāne etesaṃ nipphatti natthi. Tasmā etesaṃ paṭighātāya vattamānaṃ yaññakammaṃ vipallāsena vattati, alaṃ tena. Natthi te itonidānaṃ bhayaṃ vā chambhitattaṃ vāti mahāpuriso rājānaṃ samassāsetvā mahājanaṃ bandhanā mocetvā puna ākāse ṭhatvā rañño ovādaṃ datvā pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā ‘‘ito paṭṭhāya, mahārāja, brāhmaṇehi saddhiṃ ekato hutvā pasughātayaññaṃ mā yajī’’ti dhammaṃ desetvā ākāseneva attano vasanaṭṭhānaṃ agamāsi. Rājāpi tassa ovāde ṭhito dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Hierbei ist die Bedeutung wie folgt: „Dies, o Großkönig, ist die Erfüllung dieser Träume. Was aber dieses Opferwerk betrifft, das zur Abwendung dieser Träume betrieben wird, so heißt das: ‚Es verläuft verkehrt, es vollzieht sich in verfälschter Weise, es geschieht in Verwirrung.‘ Aus welchem Grund? Denn die Erfüllung dieser Träume wird sich erst in einer Zeit ereignen, in der die Welt im Wandel begriffen ist, in einer Zeit, in der das Nicht-Ursächliche als Ursache angesehen wird, in einer Zeit, in der das Ursächliche als Nicht-Ursächliche verworfen wird, in einer Zeit, in der das Unwahre als wahr angesehen wird, in einer Zeit, in der das Wahre als unwahr aufgegeben wird, in einer Zeit, in der die Schamlosen überhandnehmen und die Schamhaften schwinden. ‚Dies geschieht nicht hier‘ bedeutet: In der jetzigen Zeit jedoch, sei es zu deiner oder meiner Zeit, während dieses gegenwärtige Zeitalter der Menschen andauert, gibt es keine Erfüllung dieser Träume. Daher geschieht das zur Abwendung jener Träume betriebene Opferwerk in Verwirrung; genug davon! Es besteht für dich aus diesem Grund weder Furcht noch Bestürzung.“ Nachdem der Große Mann den König so getröstet und die große Volksmenge aus ihren Fesseln befreit hatte, erhob er sich wieder in die Luft, erteilte dem König eine Ermahnung, festigte ihn in den fünf Tugendregeln und lehrte das Dhamma mit den Worten: „O Großkönig, bringe von nun an nicht gemeinsam mit den Brahmanen Tieropfer dar!“ Daraufhin reiste er durch die Luft an seinen eigenen Wohnort zurück. Auch der König hielt sich an seine Ermahnung, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Spenden von Gaben und ging gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘supinapaccayā te bhayaṃ natthi, haretaṃ yañña’’nti yaññaṃ hāretvā mahājanassa jīvitadānaṃ datvā anusandhiṃ [Pg.366] ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, māṇavo sāriputto, tāpaso pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, sprach er: „Aufgrund der Träume brauchst du dich nicht zu fürchten, schafft dieses Opfer fort!“ Damit ließ er das Opfer aufheben, schenkte der großen Volksmenge das Geschenk des Lebens, stellte die Verbindung her und verknüpfte die Geburten wie folgt: „Damals war der König Ānanda, der junge Brahmane war Sāriputta, der asketische Weise aber war ich selbst.“ Parinibbute pana bhagavati saṅgītikārakā ‘‘usabhā’’tiādīni tīṇi padāni aṭṭhakathaṃ āropetvā ‘‘lābūnī’’tiādīni cattāri padāni ekaṃ gāthaṃ katvā ekakanipātapāḷiṃ āropesunti. Nach dem vollkommenen Erlöschen des Erhabenen übertrugen die Konzilsteilnehmer die drei Zeilen beginnend mit „Usabhā“ in den Kommentar, machten aus den vier Zeilen beginnend mit „Lābūni“ eine einzige Strophe und fügten sie in das Ekakanipāta-Pāli ein. Mahāsupinajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Mahāsupina-Jātaka, die siebente.
[78] 8. Illisajātakavaṇṇanā [78] 8. Die Erklärung des Illisa-Jātaka. Ubho khañjāti idaṃ satthā jetavane viharanto macchariyakosiyaseṭṭhiṃ ārabbha kathesi. Rājagahanagarassa kira avidūre sakkāraṃ nāma nigamo ahosi, tattheko macchariyakosiyo nāma seṭṭhi asītikoṭivibhavo paṭivasati. So tiṇaggena telabindumattampi neva paresaṃ deti, na attanā paribhuñjati. Iti tassa taṃ vibhavajātaṃ neva puttadārādīnaṃ, na samaṇabrāhmaṇānaṃ atthaṃ anubhoti, rakkhasapariggahitapokkharaṇī viya aparibhogaṃ tiṭṭhati. „Beide sind lahm“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verwelte, in Bezug auf den geizigen Großkaufmann Kosiya. Nicht weit von der Stadt Rājagaha entfernt gab es einen Marktflecken namens Sakkāra. Dort lebte ein geiziger Großkaufmann namens Kosiya, der über ein Vermögen von achtzig Millionen verfügte. Er gab anderen nicht einmal einen winzigen Tropfen Öl von der Spitze eines Grashalms, noch genoss er es selbst. So diente dieser Reichtum weder dem Nutzen seiner Frau und Kinder noch dem der Asketen und Brahmanen; er blieb ungenutzt wie ein Lotusteich, der von einem Wassergeist bewacht wird. Satthā ekadivasaṃ paccūsasamaye mahākaruṇāsamāpattito vuṭṭhāya sakalalokadhātuyaṃ bodhaneyyabandhave olokento pañcacattālīsayojanamatthake vasantassa tassa seṭṭhino sapajāpatikassa sotāpattiphalassa upanissayaṃ addasa. Tato purimadivase pana rājānaṃ upaṭṭhātuṃ rājagehaṃ gantvā rājūpaṭṭhānaṃ katvā āgacchanto ekaṃ chātajjhattaṃ janapadamanussaṃ kummāsapūraṃ kapallapūvaṃ khādantaṃ disvā tattha pipāsaṃ uppādetvā attano gharaṃ gantvā cintesi ‘‘sacāhaṃ ‘kapallapūvaṃ khāditukāmomhī’ti vakkhāmi, bahū mayā saddhiṃ khāditukāmā bhavissanti, evaṃ me bahūni taṇḍulasappimadhuphāṇitādīni parikkhayaṃ gamissanti, na kassaci kathessāmī’’ti taṇhaṃ adhivāsento vicarati. So gacchante gacchante kāle uppaṇḍupaṇḍukajāto dhamanisanthatagatto jāto[Pg.367]. Tato taṇhaṃ adhivāsetuṃ asakkonto gabbhaṃ pavisitvā mañcakaṃ upagūhitvā nipajji. Evaṃgatopi dhanahānibhayena kassaci kiñci na kathesi. Eines Tages, in der Morgendämmerung, erhob sich der Meister aus dem Zustand des Großen Mitgefühls. Während er die gesamte Weltordnung nach Wesen durchsuchte, die zur Erleuchtung fähig waren, sah er das starke Potenzial für die Frucht des Stromeintritts bei jenem Großkaufmann und seiner Ehefrau, die in einer Entfernung von fünfundvierzig Yojanas wohnten. Am Tag zuvor jedoch war der Großkaufmann in den Königspalast gegangen, um dem König aufzuwarten. Als er nach getaner Aufwartung auf dem Rückweg war, sah er einen hungrigen Landbewohner, der einen mit Gerstenschrot gefüllten, in der Pfanne gebackenen Kuchen aß. Da erwachte in ihm das Verlangen nach einem solchen Kuchen. Er ging nach Hause und dachte: „Wenn ich sage: ‚Ich möchte einen Pfannkuchen essen‘, werden viele andere mit mir essen wollen. Auf diese Weise werden meine reichlichen Vorräte an Reis, geklärter Butter, Honig, Melasse und so weiter aufgezehrt werden. Ich werde es niemandem erzählen.“ So ging er umher, während er sein Verlangen unterdrückte. Im Laufe der Zeit wurde er immer blasser und blasser, und sein Körper war bald ganz von Adern überzogen. Da er das Verlangen nicht langer unterdrücken konnte, ging er in sein Gemach, klammerte sich an sein Bettchen und legte sich hin. Doch selbst in diesem Zustand sagte er aus Angst vor dem Verlust seines Reichtums niemandem auch nur ein Wort. Atha naṃ bhariyā upasaṅkamitvā piṭṭhiṃ parimajjitvā ‘‘kiṃ te sāmi, aphāsuka’’nti pucchi. ‘‘Na me kiñci aphāsukaṃ atthī’’ti. ‘‘Kiṃ nu kho te rājā kupito’’ti? ‘‘Rājāpi me na kuppatī’’ti. ‘‘Atha kiṃ te puttadhītāhi vā dāsakammakarādīhi vā kiñci amanāpaṃ kataṃ atthī’’ti? ‘‘Evarūpampi natthī’’ti. ‘‘Kismiñci pana te taṇhā atthī’’ti? Evaṃ vuttepi dhanahānibhayena kiñci avatvā nissaddova nipajji. Atha naṃ bhariyā ‘‘kathehi, sāmi, kismiṃ te taṇhā’’ti āha. So vacanaṃ parigilanto viya ‘‘atthi me ekā taṇhā’’ti āha. ‘‘Kiṃ taṇhā, sāmī’’ti? ‘‘Kapallapūvaṃ khāditukāmomhī’’ti. ‘‘Atha kimatthaṃ na kathesi, kiṃ tvaṃ daliddo, idāni sakalasakkāranigamavāsīnaṃ pahonake kapallapūve pacissāmī’’ti? ‘‘Kiṃ te etehi, te attano kammaṃ katvā khādissantī’’ti? ‘‘Tena hi ekaracchavāsīnaṃ pahonake pacāmī’’ti. Jānāmahaṃ tava mahaddhanabhāvanti. ‘‘Tena hi imasmiṃ gehamatte sabbesaṃ pahonakaṃ katvā pacāmī’’ti. ‘‘Jānāmahaṃ tava mahajjhāsayabhāva’’nti. ‘‘Tena hi te puttadāramattasseva pahonakaṃ katvā pacāmī’’ti. ‘‘Kiṃ pana te etehī’’ti? ‘‘Tena hi tuyhañca mayhañca pahonakaṃ katvā pacāmī’’ti. ‘‘Tvaṃ kiṃ karissasī’’ti? ‘‘Tena hi ekasseva te pahonakaṃ katvā pacāmī’’ti. ‘‘Imasmiṃ ṭhāne paccamānaṃ bahū paccāsīsanti, sakalataṇḍule ṭhapetvā bhinnataṇḍule ca uddhanakapallādīni ca ādāya thokaṃ khīrasappimadhuphāṇitañca gahetvā sattabhūmikassa pāsādassa uparimatalaṃ āruyha paca, tatthāhaṃ ekakova nisīditvā khādissāmī’’ti. Sā ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā gahetabbaṃ gāhāpetvā pāsādaṃ āruyha dāsiyo vissajjetvā seṭṭhiṃ pakkosāpesi. So ādito paṭṭhāya dvārāni pidahanto sabbadvāresu sūcighaṭikāni datvā sattamatalaṃ abhiruhitvā tatthapi dvāraṃ pidahitvā nisīdi. Bhariyāpissa uddhane aggiṃ jāletvā kapallakaṃ āropetvā pūve pacituṃ ārabhi. Da trat seine Frau zu ihm, strich ihm über den Rücken und fragte: „Mein Herr, fehlt dir etwas?“ – „Mir fehlt überhaupt nichts“, antwortete er. „Ist der König etwa zornig auf dich?“ – „Auch der König ist nicht zornig auf mich.“ – „Haben dir dann deine Söhne oder Töchter, Sklaven, Arbeiter oder andere irgendetwas Unangenehmes angetan?“ – „Nichts dergleichen.“ – „Hast du denn nach irgendetwas ein Verlangen?“ Obwohl dies so gefragt wurde, sagte er aus Angst vor dem Verlust seines Reichtums kein Wort und lag ganz still da. Da sagte seine Frau zu ihm: „Sprich, mein Herr, wonach hast du Verlangen?“ Er antwortete, als ob er die Worte hinunterwürgte: „Ich habe ein einziges Verlangen.“ – „Was für ein Verlangen, mein Herr?“ – „Ich möchte einen in der Pfanne gebackenen Kuchen essen.“ – „Warum hast du das denn nicht gesagt? Bist du etwa arm? Ich werde jetzt Pfannkuchen backen, die für alle Bewohner des Sakkāra-Marktfleckens ausreichen!“ – „Was hast du mit jenen zu schaffen? Sie werden ihre eigene Arbeit tun und essen“, sagte er. „Nun gut, dann backe ich genug für die Bewohner einer einzigen Straße.“ – „Ich kenne deinen großen Wohlstand [mit dem du so großzügig sein willst]!“ – „Nun gut, dann backe ich genug für alle in diesem Haus.“ – „Ich kenne deinen großzügigen Charakter!“ – „Nun gut, dann backe ich genug nur für deine Kinder und deine Frau.“ – „Was hast du mit denen zu schaffen?“ – „Nun gut, dann backe ich genug für dich und mich.“ – „Was willst du denn damit?“ – „Nun gut, dann backe ich genug nur für dich allein.“ – „Wenn man es an diesem Ort backt, werden viele danach verlangen. Lass den ganzen unbeschädigten Reis zurück, nimm nur den Bruchreis, den Ofen, die Pfanne und so weiter, nimm ein wenig Milch, geklärte Butter, Honig und Melasse, geh hinauf in das oberste Stockwerk des siebenstöckigen Palastes und backe dort. Dort werde ich ganz allein sitzen und essen.“ Sie willigte mit den Worten „Sehr wohl“ ein, ließ die benötigten Dinge zusammentragen, stieg auf den Palast hinauf, schickte die Dienerinnen weg und ließ den Großkaufmann rufen. Er schloss von unten anfangend alle Türen ab, verriegelte sie mit Bolzen, stieg in das siebte Stockwerk hinauf, schloss auch dort die Tür und setzte sich hin. Seine Frau entzündete das Feuer im Ofen, setzte die Pfanne auf und begann, die Kuchen zu backen. Atha [Pg.368] satthā pātova mahāmoggallānattheraṃ āmantesi, ‘‘eso, moggallāna, rājagahanagarassa avidūre sakkāranigame macchariyakosiyaseṭṭhi ‘kapallapūve khādissāmī’ti aññesaṃ dassanabhayena sattabhūmike pāsāde kapallapūve pacāpeti. Tvaṃ tattha gantvā taṃ seṭṭhiṃ dametvā nibbisevanaṃ katvā ubhopi jayampatike pūve ca khīrasappimadhuphāṇitādīni ca gāhāpetvā attano balena jetavanaṃ ānehi. Ajjāhaṃ pañcahi bhikkhusatehi saddhiṃ vihāreyeva nisīdissāmi, pūveheva bhattakiccaṃ karissāmī’’ti. Thero ‘‘sādhu, bhante’’ti satthu vacanaṃ sampaṭicchitvā tāvadeva iddhibalena taṃ nigamaṃ gantvā tassa pāsādassa sīhapañjaradvāre sunivattho supāruto ākāseyeva maṇirūpakaṃ viya aṭṭhāsi. Da sprach der Meister am frühen Morgen zum ehrwürdigen Mahāmoggallāna: „Moggallāna, dort in dem Marktflecken Sakkāra, unweit der Stadt Rājagaha, lässt der geizige Kaufmann Kosiya Pfannkuchen backen, weil er sie essen möchte. Aus Angst davor, von anderen gesehen zu werden, lässt er sie im obersten Stockwerk eines siebenstöckigen Palastes backen. Geh dorthin, bezwinge jenen Kaufmann, befreie ihn von seinem Geiz und veranlasse beide Ehegatten, die Kuchen sowie Milch, geklärte Butter, Honig, Melasse und so weiter mitzunehmen. Bringe sie durch deine Geisteskraft in das Jetavana-Kloster. Heute werde ich zusammen mit fünfhundert Mönchen im Kloster verweilen; wir werden unsere Mahlzeit allein mit diesen Pfannkuchen einnehmen.“ Der Ältere willigte mit den Worten „Sehr wohl, o Herr“ in die Worte des Meisters ein, begab sich augenblicklich mit seiner übernatürlichen Kraft zu jenem Marktflecken und stellte sich am Erkerfenster jenes Palastes, ordentlich gekleidet und mit der äußeren Robe bedeckt, in der Luft schwebend auf wie eine Statue aus Edelstein. Mahāseṭṭhino theraṃ disvāva hadayamaṃsaṃ kampi. So ‘‘ahaṃ evarūpānaññeva bhayena imaṃ ṭhānaṃ āgato, ayañca āgantvā vātapānadvāre ṭhito’’ti gahetabbagahaṇaṃ apassanto aggimhi pakkhittaloṇasakkharā viya dosena taṭataṭāyanto evamāha ‘‘samaṇa, ākāse ṭhatvā tvaṃ kiṃ labhissasi, ākāse apade padaṃ dassetvā caṅkamantopi neva labhissasī’’ti. Thero tasmiṃyeva ṭhāne aparāparaṃ caṅkami. Seṭṭhi ‘‘caṅkamanto kiṃ labhissasi, ākāse pallaṅkena nisīdamānopi na labhissasiyevā’’ti āha. Thero pallaṅkaṃ ābhujitvā nisīdi. Atha naṃ ‘‘nisinno kiṃ labhissasi, āgantvā vātapānaummāre ṭhitopi na labhissasī’’ti āha. Atha thero ummāre aṭṭhāsi. Atha naṃ ‘‘ummāre ṭhito kiṃ labhissasi, dhūmāyantopi na labhissasiyevā’’ti āha. Thero dhūmāyi, sakalapāsādo ekadhūmo ahosi, seṭṭhino akkhīnaṃ sūciyā vijjhanakālo viya jāto. Gehajjhāyanabhayena pana naṃ ‘‘pajjalantopi na labhissasī’’ti avatvā cintesi ‘‘ayaṃ samaṇo suṭṭhu laggo, aladdhā na gamissati, ekamassa pūvaṃ dāpessāmī’’ti bhariyaṃ āha – ‘‘bhadde, ekaṃ khuddakapūvaṃ pacitvā samaṇassa datvā uyyojehi na’’nti. Sā thokaññeva piṭṭhaṃ kapallapātiyaṃ pakkhipi, mahāpūvo hutvā sakalapātiṃ pūretvā uddhumāto aṭṭhāsi. Sobald der Großkaufmann den Älteren sah, zitterte sein Herz. Er dachte: „Genau aus Angst vor solchen Leuten bin ich an diesen Ort gekommen, und nun steht dieser hier am Fenster!“ Da er keinen Ausweg sah, um ihn loszuwerden, knisterte und zischte er vor Zorn wie Salz, das ins Feuer geworfen wird, und sagte: „Asket, was wirst du davon haben, wenn du in der Luft stehst? Selbst wenn du auf und ab gehst und deine Fußspuren am fußspurlosen Himmel zeigst, wirst du gewiss nichts bekommen!“ Der Ältere ging genau an diesem Ort hin und her. Der Kaufmann sagte: „Was wirst du vom Hin- und Hergehen haben? Selbst wenn du dich mit gekreuzten Beinen in die Luft setzt, wirst du gewiss nichts bekommen!“ Der Ältere nahm den Kreuzsitz ein und setzte sich hin. Da sagte er zu ihm: „Was wirst du vom Sitzen haben? Selbst wenn du herkommst und dich auf die Fensterschwelle stellst, wirst du nichts bekommen!“ Da stellte sich der Ältere auf die Fensterschwelle. Da sagte er zu ihm: „Was wirst du davon haben, wenn du auf der Schwelle stehst? Selbst wenn du Rauch ausstößt, wirst du gewiss nichts bekommen!“ Der Ältere stieß Rauch aus; der ganze Palast war von einer einzigen Rauchwolke erfüllt. Dem Kaufmann war es, als ob ihm Nadeln in die Augen gestoßen würden. Aus Angst, dass sein Haus abbrennen könnte, sagte er jedoch nicht zu ihm: „Selbst wenn du Flammen ausstößt, wirst du nichts bekommen“, sondern dachte: „Dieser Asket ist äußerst hartnäckig. Er wird nicht gehen, ohne etwas zu bekommen. Ich werde ihm einen einzigen Kuchen danke lassen.“ Er sagte zu seiner Frau: „Liebe Frau, backe einen winzigen Pfannkuchen, gib ihn dem Asketen und schicke ihn fort.“ Sie tat nur ganz wenig Mehl in die Backpfanne, doch dieser wurde zu einem riesigen Kuchen, füllte die ganze Pfanne aus und stand aufgebläht darin. Seṭṭhi taṃ disvā ‘‘bahu tayā piṭṭhaṃ gahitaṃ bhavissatī’’ti sayameva dabbikaṇṇena thokataraṃ piṭṭhaṃ gahetvā pakkhipi, pūvo purimapūvato mahantataro [Pg.369] jāto. Evaṃ yaṃ yaṃ pacati, so so mahantamahantova hoti. So nibbinno bhariyaṃ āha ‘‘bhadde, imassa ekaṃ pūvaṃ dehī’’ti. Tassā pacchito ekaṃ pūvaṃ gaṇhantiyā sabbe ekābaddhā allīyiṃsu. Sā seṭṭhiṃ āha ‘‘sāmi, sabbe pūvā ekato laggā, visuṃ kātuṃ na sakkomī’’ti. ‘‘Ahaṃ karissāmī’’ti sopi kātuṃ nāsakkhi. Ubho janā koṭiyaṃ gahetvā kaḍḍhantāpi viyojetuṃ nāsakkhiṃsuyeva. Athassa pūvehi saddhiṃ vāyamantasseva sarīrato sedā mucciṃsu, pipāsā ca pacchijji. Tato bhariyaṃ āha ‘‘bhadde, na me pūvehi attho, pacchiyā saddhiṃyeva imassa bhikkhussa dehī’’ti. Sā pacchiṃ ādāya theraṃ upasaṅkamitvā sabbe pūve therassa adāsi. Thero ubhinnampi dhammaṃ desesi, tiṇṇaṃ ratanānaṃ guṇe kathesi, ‘‘atthi dinnaṃ, atthi yiṭṭha’’nti dānādīnaṃ phalaṃ gaganatale puṇṇacandaṃ viya dassesi. Als der Großkaufmann dies sah, sagte er: „Du wirst wohl zu viel Teig genommen haben“, und tat selbst mit der Spitze des Löffels eine viel geringere Menge Teig hinein. Doch der Kuchen wurde noch viel größer als der vorherige. Welchen Kuchen sie auch immer backte, ein jeder wurde immer noch größer und größer. Da wurde er des Ganzen überdrüssig und sagte zu seiner Frau: „Werteste, gib diesem Mönch einen einzigen Kuchen!“ Als sie nun einen Kuchen aus dem Korb nehmen wollte, klebten alle Kuchen zusammen als ein einziges Ganzes aneinander. Sie sagte zum Kaufmann: „Mein Herr, alle Kuchen kleben zusammen, ich kann sie nicht voneinander trennen.“ „Ich werde es tun“, sagte er, doch auch er vermochte es nicht. Obwohl beide an den Enden anfassten und zogen, konnten sie sie überhaupt nicht voneinander trennen. Während er sich so mit den Kuchen abmühte, trat ihm der Schweiß am ganzen Körper aus, und sein Verlangen nach dem Essen verging ihm völlig. Daraufhin sagte er zu seiner Frau: „Werteste, ich brauche diese Kuchen nicht mehr. Gib sie diesem Mönch mitsamt dem Korb!“ Sie nahm den Korb, trat an den Ehrwürdigen heran und gab dem Thera alle Kuchen. Der Thera verkündete beiden die Lehre, sprach über die Vorzüge der Drei Juwelen und zeigte ihnen die Frucht des Gebens und Opferns – wie den Vollmond am Himmelszelt –, indem er sprach: „Es gibt eine Frucht des Gegebenen, es gibt eine Frucht des Geopferten.“ Taṃ sutvā pasannacitto seṭṭhi ‘‘bhante, āgantvā imasmiṃ pallaṅke nisīditvā pūve paribhuñjathā’’ti āha. Thero ‘‘mahāseṭṭhi, sammāsambuddho ‘pūve khādissāmī’ti pañcahi bhikkhusatehi saddhiṃ vihāre nisinno, tumhākaṃ ruciyā sati seṭṭhibhariyaṃ pūve ca khīrādīni ca gaṇhāpetha, satthu santikaṃ gamissāmā’’ti āha. ‘‘Kahaṃ pana, bhante, etarahi satthā’’ti? ‘‘Ito pañcacattālīsayojanamatthake jetavanamahāvihāre’’ti. ‘‘Bhante, kālaṃ anatikkamitvā ettakaṃ addhānaṃ kathaṃ gamissāmā’’ti? ‘‘Mahāseṭṭhi tumhākaṃ ruciyā sati ahaṃ vo attano iddhibalena nessāmi, tumhākaṃ pāsāde sopānasīsaṃ attano ṭhāneyeva bhavissati, sopānapariyosānaṃ pana jetavanadvārakoṭṭhake bhavissati, uparipāsādā heṭṭhāpāsādaṃ otaraṇakālamattena vo jetavanaṃ nessāmī’’ti. So ‘‘sādhu, bhante’’ti sampaṭicchi. Thero sopānasīsaṃ tattheva katvā ‘‘sopānapādamūlaṃ jetavanadvārakoṭṭhake hotū’’ti adhiṭṭhāsi, tathevāhosi. Als der Großkaufmann dies hörte, wurde sein Geist voller Vertrauen und er sagte: „Ehrwürdiger Herr, bitte kommt her, setzt Euch auf diesen Thronsitz und speist die Kuchen!“ Der Thera erwiderte: „Großkaufmann, der Vollkommen Erleuchtete sitzt im Kloster zusammen mit fünfhundert Mönchen und gedenkt, die Kuchen zu essen. Wenn es euch beliebt, lasst eure Gattin die Kuchen sowie Milch und andere Speisen nehmen; wir wollen zum Erhabenen gehen.“ „Wo aber, ehrwürdiger Herr, befindet sich der Meister zurzeit?“ „Fünfundvierzig Yojanas von hier entfernt, im großen Jetavana-Kloster.“ „Ehrwürdiger Herr, wie sollen wir eine so weite Strecke zurücklegen, ohne dass die Essenszeit überschritten wird?“ „Großkaufmann, wenn es euch beliebt, werde ich euch durch meine eigene übernatürliche Kraft dorthin bringen. Die Spitze der Treppe eures Palastes wird an ihrem Ort bleiben, doch das Ende der Treppe wird am Tor des Jetavana-Klosters sein. In der Zeit, die man braucht, um vom oberen Stockwerk des Palastes ins untere Stockwerk hinabzusteigen, werde ich euch ins Jetavana-Kloster bringen.“ Er stimmte zu und sagte: „Sehr wohl, ehrwürdiger Herr.“ Der Thera beließ die Spitze der Treppe genau dort und bestimmte durch seine Entschlusskraft: „Der Fuß der Treppe möge sich am Tor des Jetavana-Klosters befinden!“ Und genau so geschah es. Iti thero seṭṭhiñca seṭṭhibhariyañca uparipāsādā heṭṭhāotaraṇakālato khippataraṃ jetavanaṃ sampāpesi. Te ubhopi satthāraṃ upasaṅkamitvā vanditvā kālaṃ ārocesuṃ. Satthā bhattaggaṃ pavisitvā paññattavarabuddhāsane nisīdi saddhiṃ bhikkhusaṅghena. Mahāseṭṭhi buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa [Pg.370] dakkhiṇodakaṃ adāsi, seṭṭhibhariyā tathāgatassa patte pūve patiṭṭhāpesi. Satthā attano yāpanamattaṃ gaṇhi, pañcasatā bhikkhūpi tatheva gaṇhiṃsu. Seṭṭhi khīrasappimadhuphāṇitasakkharādīni dadamāno agamāsi. Satthā pañcahi bhikkhusatehi saddhiṃ bhattakiccaṃ niṭṭhāpesi. Mahāseṭṭhipi saddhiṃ bhariyāya yāvadatthaṃ khādi, pūvānaṃ pariyosānameva na paññāyati, sakalavihāre bhikkhūnañca vighāsādānañca dinnepi na pariyanto paññāyati. ‘‘Bhante, pūvā parikkhayaṃ na gacchantī’’ti bhagavato ārocesuṃ. Tena hi jetavanadvārakoṭṭhake chaḍḍethāti. Atha ne dvārakoṭṭhakassa avidūre pabbhāraṭṭhāne chaḍḍayiṃsu. Ajjatanāpi taṃ ṭhānaṃ ‘‘kapallapūvapabbhāro’’tveva paññāyati. Mahāseṭṭhi saddhiṃ bhariyāya bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ekamantaṃ aṭṭhāsi. Bhagavā anumodanaṃ akāsi. Anumodanāpariyosāne ubhopi sotāpattiphale patiṭṭhāya satthāraṃ vanditvā dvārakoṭṭhake sopānaṃ āruyha attano pāsādeyeva patiṭṭhahiṃsu. Tato paṭṭhāya mahāseṭṭhi asītikoṭidhanaṃ buddhasāsaneyeva vikiri. So brachte der Thera den Kaufmann und seine Gattin schneller in das Jetavana-Kloster, als man braucht, um vom oberen Stockwerk des Palastes nach unten zu gehen. Beide traten vor den Meister, erwiesen ihm Ehrerbietung und verkündeten die Zeit für das Mahl. Der Meister betrat die Speisehalle und setzte sich zusammen mit der Mönchsgemeinschaft auf den für ihn hergerichteten, edlen Buddhasitz. Der Großkaufmann reichte der Mönchsgemeinschaft mit dem Buddha an der Spitze das Spendenwasser, und die Gattin des Kaufmanns legte die Kuchen in die Almosenschale des Vollendeten. Der Meister nahm nur so viel an, wie für seinen Lebensunterhalt nötig war, und ebenso taten es die fünfhundert Mönche. Der Kaufmann ging umher und spendete Milch, geklärte Butter, Honig, Melasse, Zucker und anderes. Der Meister beendete das Mahl zusammen mit den fünfhundert Mönchen. Auch der Großkaufmann aß gemeinsam mit seiner Frau nach Herzenslust, doch ein Ende der Kuchen war überhaupt nicht abzusehen. Selbst als sie an alle Mönche im ganzen Kloster und an die Resteesser verteilt wurden, war kein Ende abzusehen. „Ehrwürdiger Herr, die Kuchen gehen einfach nicht zur Neige“, berichteten sie dem Erhabenen. „Dann werft sie am Tor des Jetavana-Klosters weg“, sprach er. Da warfen sie sie in eine Senke unweit des Klostertores. Selbst heute noch ist dieser Ort als „die Kuchenpfannen-Senke“ bekannt. Der Großkaufmann trat zusammen mit seiner Frau vor den Erhabenen und stellte sich an eine Seite. Der Erhabene sprach Worte des Dankes und Segenwünsche aus. Am Ende dieser Dankesrede erlangten beide die Frucht des Stromeintritts, erwiesen dem Meister Ehrerbietung, stiegen die Treppe am Klostertor hinauf und befanden sich sogleich wieder in ihrem eigenen Palast. Von da an gab der Großkaufmann sein Vermögen von achtzig Millionen im Besitztum des Buddha-Dhamma hin. Punadivase sammāsambuddhe sāvatthiyaṃ piṇḍāya caritvā jetavanaṃ āgamma bhikkhūnaṃ sugatovādaṃ datvā gandhakuṭiṃ pavisitvā paṭisallīne sāyanhasamaye dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū ‘‘passathāvuso, mahāmoggallānattherassānubhāvaṃ, anupahacca saddhaṃ anupahacca bhoge macchariyaseṭṭhiṃ muhutteneva dametvā nibbisevanaṃ katvā pūve gāhāpetvā jetavanaṃ ānetvā satthu sammukhaṃ katvā sotāpattiphale patiṭṭhāpesi, aho mahānubhāvo thero’’ti therassa guṇakathaṃ kathentā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘bhikkhave, kuladamakena nāma bhikkhunā kule aviheṭhetvā akilametvā pupphato reṇuṃ gaṇhantena bhamarena viya upasaṅkamitvā buddhaguṇe jānāpetabba’’nti vatvā theraṃ pasaṃsanto – Am folgenden Tag ging der Vollkommen Erleuchtete in Sāvatthī auf Almosengang, kehrte ins Jetavana-Kloster zurück, gab den Mönchen die heilsame Unterweisung des Erhabenen, betrat die Duftkammer und verweilte in stiller Betrachtung. Am Abend versammelten sich die Mönche in der Lehrhalle und saßen da, wobei sie die Tugenden des Thera rühmten und sprachen: „Seht, ihr Brüder, die Macht des ehrwürdigen Mahāmoggallāna! Ohne den Glauben zu verletzen, ohne ihren Reichtum zu schmälern, hat er den geizigen Kaufmann in einem Augenblick bezähmt, ihn von seinem Geiz befreit, ihn veranlasst, die Kuchen mitzubringen, ihn ins Jetavana-Kloster geführt, vor den Meister gestellt und ihn in der Frucht des Stromeintritts gefestigt! Oh, wie machtvoll ist dieser Thera!“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, mit welchem Gespräch wart ihr hier gerade beschäftigt?“ Als sie antworteten: „Mit diesem hier“, sprach er: „Mönche, ein Mönch, der Familien bekehrt, sollte sich den Familien so nähern, wie eine Biene, die den Blütenstaub aus einer Blume saugt, ohne sie zu verletzen oder zu ermüden, und sollte sie so die Vorzüge des Buddha erkennen lassen.“ Und um den Thera zu preisen, sprach er: ‘‘Yathāpi bhamaro pupphaṃ, vaṇṇagandhamaheṭhayaṃ; Paleti rasamādāya, evaṃ gāme munī care’’ti. (dha. pa. 49) – „Wie eine Biene, ohne die Blume, deren Farbe oder Duft zu beschädigen, davonfliegt, nachdem sie den Nektar genommen hat, ebenso wandle der Weise im Dorf.“ Imaṃ [Pg.371] dhammapade gāthaṃ vatvā uttaripi therassa guṇaṃ pakāsetuṃ ‘‘na bhikkhave, idāneva moggallānena macchariyaseṭṭhi damito, pubbepi taṃ dametvā kammaphalasambandhaṃ jānāpesiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Nachdem er diesen Vers im Dhammapada verkündet hatte, sprach er, um die Tugenden des Thera noch weiter zu offenbaren: „Mönche, nicht erst jetzt hat Moggallāna den geizigen Kaufmann bezähmt; schon in der Vergangenheit hat er ihn bezähmt und ihn den Zusammenhang zwischen Tat und Frucht erkennen lassen.“ Daraufhin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bārāṇasiyaṃ illiso nāma seṭṭhi ahosi asītikoṭivibhavo purisadosasamannāgato khañjo kuṇī visamakkhimaṇḍalo assaddho appasanno maccharī, neva aññesaṃ deti, na sayaṃ paribhuñjati. Rakkhasapariggahitapokkharaṇī viyassa gehaṃ ahosi. Mātāpitaro panassa yāva sattamā kulaparivaṭṭā dāyakā dānapatino. So seṭṭhiṭṭhānaṃ labhitvāyeva kulavaṃsaṃ nāsetvā dānasālaṃ jhāpetvā yācake pothetvā nikkaḍḍhitvā dhanameva saṇṭhāpesi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, gab es in Bārāṇasī einen Schatzmeister namens Illīsa, der ein Vermögen von achtzig Millionen besaß, doch mit körperlichen Gebrechen behaftet war: Er war lahm, hatte verkrümmte Hände, schielende Augen, war ohne Glauben, ohne Frömmigkeit und geizig. Weder gab er anderen etwas, noch genoss er es selbst. Sein Haus war wie ein Teich, der von einem Dämon bewacht wird. Seine Eltern jedoch waren bis in die siebte Generation der Ahnenreihe hinweg großzügige Spender und Herren der Freigebigkeit gewesen. Sobald er aber das Amt des Schatzmeisters erlangt hatte, vernichtete er die Familientradition, brannte die Spendenhalle nieder, ließ die Bettler schlagen und vertreiben und hortete nur noch den Reichtum. So ekadivasaṃ rājūpaṭṭhānaṃ gantvā attano gharaṃ āgacchanto ekaṃ maggakilantaṃ jānapadamanussaṃ, ekaṃ surāvārakaṃ, ādāya pīṭhake nisīditvā ambilasurāya kosakaṃ pūretvā pūretvā pūtimacchakena uttaribhaṅgena pivantaṃ disvā suraṃ pātukāmo hutvā cintesi ‘‘sacāhaṃ suraṃ pivissāmi, mayi pivante bahū pivitukāmā bhavissanti, evaṃ me dhanaparikkhayo bhavissatī’’ti. So taṇhaṃ adhivāsento vicaritvā gacchante gacchante kāle adhivāsetuṃ asakkonto vihatakappāso viya paṇḍusarīro ahosi dhammanisanthatagatto jāto. Athekadivasaṃ gabbhaṃ pavisitvā mañcakaṃ upagūhitvā nipajji. Tamenaṃ bhariyā upasaṅkamitvā piṭṭhiṃ parimajjitvā ‘‘kiṃ te, sāmi, aphāsuka’’nti pucchi. Sabbaṃ heṭṭhā kathitaniyāmeneva veditabbaṃ. ‘‘Tena hi ekasseva te pahonakaṃ suraṃ karomī’’ti pana vutte ‘‘gehe surāya kāriyamānāya bahū paccāsīsanti, antarāpaṇato āharāpetvāpi na sakkā idha nisinnena pivitu’’nti māsakamattaṃ datvā antarāpaṇato surāvārakaṃ āharāpetvā ceṭakena gāhāpetvā nagarā nikkhamma nadītīraṃ gantvā mahāmaggasamīpe ekaṃ gumbaṃ pavisitvā surāvārakaṃ ṭhapāpetvā ‘‘gaccha tva’’nti ceṭakaṃ dūre nisīdāpetvā kosakaṃ pūretvā suraṃ pātuṃ ārabhi. Als er eines Tages nach seinem Dienst beim König auf dem Heimweg zu seinem Haus war, sah er einen reisemüden Mann vom Lande, der mit einem Krug Branntwein auf einem kleinen Schemel saß, sich einen Becher nach dem anderen mit saurem Branntwein füllte und diesen mit faulem Fisch als Beilage trank. Da überkam ihn das Verlangen, ebenfalls Branntwein zu trinken, und er dachte: „Wenn ich Branntwein trinke, werden, während ich trinke, viele andere ebenfalls trinken wollen, und so wird mein Vermögen schwinden.“ Er ging umher und unterdrückte sein Verlangen, doch als die Zeit verging und er es nicht länger ertragen konnte, wurde sein Körper blass wie zerzupfte Baumwolle und seine Adern traten auf dem ganzen Körper hervor. Da ging er eines Tages in sein Schlafgemach, klammerte sich an sein Bettchen und legte sich nieder. Seine Frau trat an ihn heran, rieb ihm den Rücken und fragte: „Mein Herr, was fehlt dir?“ (Alles Weitere ist genau so zu verstehen, wie es zuvor geschildert wurde.) Als sie jedoch sagte: „Wenn das so ist, werde ich Branntwein zubereiten lassen, der für dich allein ausreicht“, entgegnete er: „Wenn im Hause Branntwein zubereitet wird, werden viele danach verlangen. Selbst wenn man ihn vom Markt holen lässt, kann ich ihn nicht hier im Hause sitzend trinken.“ Er gab ihr eine Münze im Wert von einem Māsaka, ließ einen Krug Branntwein vom Markt holen, befahl einem Diener, diesen zu tragen, verließ die Stadt, ging zum Flussufer, trat nahe der Hauptstraße in ein Gebüsch, ließ den Krug dort abstellen, schickte den Diener mit den Worten „Geh du fort!“ in die Ferne, füllte den Becher und begann, den Branntwein zu trinken. Pitā [Pg.372] panassa dānādīnaṃ puññānaṃ katattā devaloke sakko hutvā nibbatti. So tasmiṃ khaṇe ‘‘pavattati nu kho me dānaggaṃ, udāhu no’’ti āvajjento tassa appavattiṃ ñatvā, puttassa kulavaṃsaṃ nāsetvā dānasālaṃ jhāpetvā yācake nikkaḍḍhitvā macchariyabhāve patiṭṭhāya ‘‘aññesaṃ dātabbaṃ bhavissatī’’ti bhayena gumbaṃ pavisitvā ekakasseva suraṃ pivanabhāvañca disvā ‘‘gacchāmi, naṃ saṅkhobhetvā dametvā kammaphalasambandhaṃ jānāpetvā dānaṃ dāpetvā devaloke nibbattanārahaṃ karomī’’ti manussapathaṃ otaritvā illisaseṭṭhinā sadisaṃ khañjaṃ kuṇiṃ visamacakkhumaṇḍalaṃ attabhāvaṃ nimminitvā bārāṇasinagaraṃ pavisitvā rañño nivesanadvāre ṭhatvā attano āgatabhāvaṃ ārocāpetvā ‘‘pavisatū’’ti vutte pavisitvā rājānaṃ vanditvā aṭṭhāsi. Rājā ‘‘kiṃ, mahāseṭṭhi, avelāya āgatosī’’ti āha. ‘‘Āma, āgatomhi, deva ghare me asītikoṭimattaṃ dhanaṃ atthi, taṃ devo āharāpetvā attano bhaṇḍāgāraṃ pūrāpetū’’ti. ‘‘Alaṃ mahāseṭṭhi, tava dhanato amhākaṃ gehe bahutaraṃ dhana’’nti. ‘‘Sace, deva, tumhākaṃ kammaṃ natthi, yathāruciyā dhanaṃ gahetvā dānaṃ dammī’’ti. ‘‘Dehi, mahāseṭṭhī’’ti. So ‘‘sādhu, devā’’ti rājānaṃ vanditvā nikkhamitvā illisaseṭṭhino gehaṃ agamāsi, sabbe upaṭṭhākamanussā parivāresuṃ, ekopi ‘‘nāyaṃ, illiso’’ti jānituṃ samattho nāma natthi. Sein Vater jedoch war aufgrund seiner heilsamen Taten wie der Freigebigkeit als Sakka in der Götterwelt wiedergeboren worden. In jenem Augenblick dachte dieser nach: „Besteht meine Spendenhalle eigentlich noch oder nicht?“ Als er erfuhr, dass sie nicht mehr bestand, und sah, dass sein Sohn die Familientradition zerstört, die Spendenhalle niedergebrannt, die Bettler vertrieben hatte, in Geiz verharrte und aus Angst, etwas abgeben zu müssen, in ein Gebüsch geschlüpft war, um ganz allein Branntwein zu trinken, dachte er: „Ich will hingehen, ihn aufrütteln, ihn zähmen, ihn den Zusammenhang zwischen Tat und Wirkung verstehen lassen, ihn zum Spenden bewegen und ihn so würdig machen, in der Götterwelt wiedergeboren zu werden.“ Er stieg in das Reich der Menschen hinab, nahm eine Gestalt an, die genau wie der Schatzmeister Illīsa lahm war, verkrümmte Hände sowie schielende Augen hatte, betrat die Stadt Bārāṇasī, stellte sich an das Tor des königlichen Palastes und ließ seine Ankunft melden. Als es hieß: „Er möge eintreten!“, trat er ein, verneigte sich ehrfurchtsvoll vor dem König und blieb stehen. Der König sprach: „Was führt dich, großer Schatzmeister, zu so ungewohnter Stunde her?“ Er antwortete: „Ja, o König, ich bin gekommen. In meinem Haus gibt es ein Vermögen von etwa achtzig Millionen. Möge der König dieses holen lassen und seine eigene Schatzkammer damit füllen.“ Der König erwiderte: „Es ist genug, großer Schatzmeister, in unserem Palast gibt es weit mehr Reichtum als dein Vermögen.“ Er sagte: „Wenn es für dich, o König, keine Verwendung findet, werde ich das Vermögen nach Belieben nehmen und als Gaben spenden.“ Der König sagte: „Spende es, großer Schatzmeister!“ Er sprach: „Sehr wohl, o König“, verneigte sich vor dem König, ging hinaus und begab sich zum Haus des Schatzmeisters Illīsa. Alle Bediensteten scharten sich um ihn, und kein einziger war imstande zu erkennen: „Das ist nicht Illīsa.“ So gehaṃ pavisitvā antoummāre ṭhatvā dovārikaṃ pakkosāpetvā ‘‘yo añño mayā samānarūpo āgantvā ‘mametaṃ geha’nti pavisituṃ āgacchati, taṃ piṭṭhiyaṃ paharitvā nīhareyyāthā’’ti vatvā pāsādaṃ āruyha mahārahe āsane nisīditvā seṭṭhibhariyaṃ pakkosāpetvā sitākāraṃ dassetvā ‘‘bhadde, dānaṃ demā’’ti āha. Tassa taṃ vacanaṃ sutvāva seṭṭhibhariyā ca puttadhītaro ca dāsakammakarā ca ‘‘ettakaṃ kālaṃ dānaṃ dātuṃ cittameva natthi, ajja pana suraṃ pivitvā muducitto hutvā dātukāmo jāto bhavissatī’’ti vadiṃsu. Atha naṃ seṭṭhibhariyā ‘‘yathāruciyā detha, sāmī’’ti āha. Tena hi bherivādakaṃ pakkosāpetvā ‘‘‘suvaṇṇarajatamaṇimuttādīhi atthikā illisaseṭṭhissa gharaṃ gacchantū’nti sakalanagare bheriṃ carāpehī’’ti. Sā ca tathā kāresi. Mahājano pacchipasibbakādīni gahetvā gehadvāre sannipati. Sakko sattaratanapūre [Pg.373] gabbhe vivarāpetvā ‘‘tumhākaṃ dammi, yāvadicchakaṃ gahetvā gacchathā’’ti āha. Mahājano dhanaṃ nīharitvā mahātale rāsiṃ katvā ābhatabhājanāni pūretvā gacchati. Er betrat das Haus, stellte sich auf die Türschwelle, rief den Türhüter herbei und wies ihn an: „Wenn ein anderer, der mir gleicht, hierherkommt und unter den Worten ‚Dies ist mein Haus‘ eintreten will, so schlagt ihn auf den Rücken und treibt ihn hinaus!“ Nach diesen Worten stieg er in den Palast empor, setzte sich auf einen kostbaren Sitz, ließ die Frau des Schatzmeisters rufen, blickte sie mit einem Lächeln an und sagte: „Liebe Frau, lasst uns Gaben spenden!“ Als sie diese Worte hörten, dachten die Frau des Schatzmeisters, die Söhne und Töchter sowie die Diener und Arbeiter: „Die ganze Zeit über hatte er nicht einmal im Traum daran gedacht, Gaben zu spenden. Heute aber hat er wohl Branntwein getrunken, ist mildherzig geworden und will nun freigebig sein.“ Da sagte die Frau des Schatzmeisters zu ihm: „Gebt ganz nach eurem Belieben, mein Herr!“ Er sprach: „Wenn dem so ist, rufe den Trommelschläger und lass in der ganzen Stadt ausrufen: ‚Wer Verlangen nach Gold, Silber, Edelsteinen, Perlen und Ähnlichem hat, der soll zum Haus des Schatzmeisters Illīsa kommen!‘“ Sie ließ dies so ausführen. Die Menschenmenge nahm Körbe, Säcke und andere Behälter mit und versammelte sich am Haustor. Sakka ließ die mit den sieben Kostbarkeiten gefüllten Schatzkammern öffnen und rief: „Ich schenke sie euch! Nehmt so viel, wie ihr wünscht, und geht!“ Die Menschen trugen die Reichtümer hinaus, häuften sie auf dem großen Platz auf, füllten ihre mitgebrachten Gefäße und zogen von dannen. Aññataro janapadamanusso illisaseṭṭhino goṇe tasseva rathe yojetvā sattahi ratanehi pūretvā nagarā nikkhamma mahāmaggaṃ paṭipajjitvā tassa gumbassa avidūrena rathaṃ pesento ‘‘vassasataṃ jīva, sāmi, illisaseṭṭhi, taṃ nissāya idāni me yāvajīvaṃ kammaṃ akatvā jīvitabbaṃ jātaṃ, taveva ratho, taveva goṇā, taveva gehe satta ratanāni, neva mātarā dinnāni, na pitarā, taṃ nissāya laddhāni, sāmī’’ti seṭṭhino guṇakathaṃ kathento gacchati. So taṃ saddaṃ sutvā bhītatasito cintesi ‘‘ayaṃ mama nāmaṃ gahetvā idañcidañca vadati, kacci nu kho mama dhanaṃ raññā lokassa dinna’’nti gumbā nikkhamitvā goṇe ca rathañca sañjānitvā ‘‘are, ceṭaka, mayhaṃ goṇā, mayhaṃ ratho’’ti vatvā gantvā goṇe nāsārajjuyaṃ gaṇhi, gahapatiko rathā oruyha ‘‘are, duṭṭhaceṭaka, illisamahāseṭṭhi sakalanagarassa dānaṃ deti, tvaṃ kiṃ ahosī’’ti pakkhanditvā asaniṃ pātento viya khandhe paharitvā rathaṃ ādāya agamāsi. So puna kampamāno uṭṭhāya paṃsuṃ puñchitvā puñchitvā vegena gantvā rathaṃ gaṇhi, gahapatiko rathā otaritvā kesesu gahetvā oṇāmetvā kapparapahārehi koṭṭetvā gale gahetvā āgatamaggābhimukhaṃ khipitvā pakkāmi. Ettāvatāssa surāmado chijji. So kampamāno vegena nivesanadvāraṃ gantvā dhanaṃ ādāya gacchante mahājane disvā ‘‘ambho kiṃ nāmetaṃ, kiṃ rājā mama dhanaṃ vilumpāpetī’’ti taṃ taṃ gantvā gaṇhāti, gahitagahitā paharitvā pādamūleyeva pātenti. So vedanāppatto gehaṃ pavisituṃ ārabhi. Dvārapālā ‘‘are, duṭṭhagahapati, kahaṃ pavisasī’’ti vaṃsapesikāhi pothetvā gīvāyaṃ gahetvā nīhariṃsu. Ein gewisser Landmann spannte die Ochsen des Schatzmeisters Illisa an dessen eigenen Wagen, füllte ihn mit den sieben Arten von Edelsteinen, verließ die Stadt, schlug den Hauptweg ein und trieb den Wagen unweit jenes Dickichts voran, während er das Lob des Schatzmeisters verkündete: „Lebe hundert Jahre, o Herr, Schatzmeister Illisa! Dank dir kann ich nun für den Rest meines Lebens ohne Arbeit meinen Lebensunterhalt bestreiten. Es ist dein Wagen, es sind deine Ochsen, es sind die sieben Edelsteine aus deinem Hause; weder von meiner Mutter wurden sie mir gegeben, noch von meinem Vater. Dir verdanke ich es, dass ich sie erhalten habe, o Herr!“ So sprechend zog er des Weges. Als jener Illisa diese Stimme hörte, dachte er voller Furcht und Zittern: „Dieser Mann nennt meinen Namen und spricht dieses und jenes. Hat der König etwa mein Vermögen den Leuten geschenkt?“ Er kam aus dem Dickicht hervor, erkannte die Ochsen und den Wagen, schrie: „He, Knecht! Das sind meine Ochsen, das ist mein Wagen!“, ging hin und ergriff die Ochsen am Nasenseil. Der Hausvater stieg vom Wagen herab, rief: „He, du elender Knecht! Der große Schatzmeister Illisa gibt der ganzen Stadt Gaben. Was fällt dir ein?“, stürzte sich auf ihn, schlug ihn wie ein herabfahrender Blitz auf die Schulter, nahm den Wagen und fuhr davon. Jener erhob sich wieder zitternd, wischte sich den Staub ab, eilte herbei und packte den Wagen. Der Hausvater stieg vom Wagen herab, packte ihn an den Haaren, bog ihn nieder, versetzte ihm Ellbogenschläge, packte ihn im Nacken, schleuderte ihn in die Richtung des Weges, aus dem er gekommen war, und zog von dannen. Durch diese Züchtigung verflog sein Rausch. Zitternd eilte er zum Tor seines Hauses. Als er die Menschenmassen sah, die mit seinem Vermögen davonzogen, schrie er: „He, ihr Leute, was bedeutet das? Lässt der König etwa meinen Besitz plündern?“, und lief hin, um einen nach dem anderen festzuhalten. Doch jeder, den er packte, schlug auf ihn ein und streckte ihn direkt vor seinen Füßen nieder. Unter großen Schmerzen versuchte er, das Haus zu betreten. Doch die Torwächter riefen: „He, du elender Hausvater, wohin willst du hinein?“, schlugen mit Bambusstöcken auf ihn ein, packten ihn am Nacken und warfen ihn hinaus. So ‘‘ṭhapetvā idāni rājānaṃ natthi me añño koci paṭisaraṇo’’ti rañño santikaṃ gantvā ‘‘deva, mama gehaṃ tumhe vilumpāpethā’’ti āha. Nāhaṃ seṭṭhi vilumpāpemi, nanu tvameva āgantvā ‘‘sace tumhe na gaṇhatha, ahaṃ mama dhanaṃ dānaṃ dassāmī’’ti nagare bheriṃ carāpetvā dānaṃ adāsīti. Nāhaṃ[Pg.374], deva, tumhākaṃ santikaṃ āgacchāmi, kiṃ tumhe mayhaṃ macchariyabhāvaṃ na jānātha, ahaṃ tiṇaggena telabindumpi na kassaci demi. Yo dānaṃ deti, taṃ pakkosāpetvā vīmaṃsatha, devāti. Rājā sakkaṃ pakkosāpesi, dvinnaṃ janānaṃ visesaṃ neva rājā jānāti, na amaccā. Macchariyaseṭṭhi ‘‘kiṃ, deva, ayaṃ seṭṭhi, ahaṃ seṭṭhī’’ti āha. ‘‘Mayaṃ na sañjānāma, atthi te koci sañjānanako’’ti? ‘‘Bhariyā me, devā’’ti. Bhariyaṃ pakkosāpetvā ‘‘kataro te sāmiko’’ti pucchiṃsu. Sā ‘‘aya’’nti sakkasseva santike aṭṭhāsi. Puttadhītaro dāsakammakare ca pakkosāpetvā pucchiṃsu, sabbepi sakkasseva santike tiṭṭhanti. Da dachte er: „Außer dem König gibt es jetzt keine andere Zuflucht mehr für mich“, ging vor den König und sprach: „Majestät, habt Ihr mein Haus plündern lassen?“ Der König sprach: „Ich habe es nicht plündern lassen, Schatzmeister. Bist du nicht selbst gekommen und hast gesagt: ‚Wenn Ihr es nicht annehmt, werde ich mein Vermögen als Gabe spenden‘, woraufhin du die Trommel in der Stadt schlagen ließest und Almosen verteiltest?“ „Majestät, ich bin nicht zu Euch gekommen! Kennt Ihr denn meine Geizhalsigkeit nicht? Ich würde niemandem auch nur einen Tropfen Öl von der Spitze eines Grashalms geben. Lasst denjenigen rufen, der die Gaben verteilt, und untersucht die Angelegenheit, o König!“ Der König ließ Sakka herbeirufen. Weder der König noch die Minister konnten jedoch einen Unterschied zwischen den beiden Männern erkennen. Der geizige Schatzmeister sagte: „Wie ist das, Majestät? Ist dieser der Schatzmeister oder bin ich es?“ „Wir wissen es nicht“, antwortete der König. „Gibt es jemanden, der dich wiedererkennen kann?“ „Meine Frau, Majestät.“ Sie ließen die Ehefrau rufen und fragten sie: „Wer von beiden ist dein Gatte?“ Sie deutete auf Sakka und sagte: „Dieser hier!“, und stellte sich an seine Seite. Auch die Söhne, Töchter, Sklaven und Diener wurden herbeigerufen und befragt, und sie alle stellten sich an die Seite Sakkas. Puna seṭṭhi cintesi ‘‘mayhaṃ sīse piḷakā atthi, kesehi paṭicchannā, taṃ kho pana kappako eva jānāti, taṃ pakkosāpessāmī’’ti. So ‘‘kappako maṃ, deva, sañjānāti, taṃ pakkosāpethā’’ti āha. Tasmiṃ pana kāle bodhisatto tassa kappako ahosi. Rājā taṃ pakkosāpetvā ‘‘illisaseṭṭhiṃ jānāsī’’ti pucchi. ‘‘Sīsaṃ oloketvā jānissāmi, devā’’ti. ‘‘Tena hi dvinnampi sīsaṃ olokehī’’ti. Tasmiṃ khaṇe sakko sīse piḷakaṃ māpesi. Bodhisatto dvinnampi sīsaṃ olokento piḷakā disvā ‘‘mahārāja, dvinnampi sīse piḷakā attheva, nāhaṃ etesu ekassāpi illisabhāvaṃ sañjānituṃ sakkomī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Da dachte der Schatzmeister bei sich: „Auf meinem Kopf befindet sich eine Geschwulst, die von Haaren verdeckt ist. Diese kennt jedoch nur der Barbier. Ich werde ihn rufen lassen.“ Er sprach: „Majestät, der Barbier erkennt mich wieder. Lasst ihn herbeirufen!“ Zu jener Zeit war der Bodhisatta sein Barbier. Der König ließ ihn rufen und fragte: „Kennst du den Schatzmeister Illisa?“ „Wenn ich ihren Kopf betrachte, werde ich es wissen, Majestät“, antwortete er. „Nun denn, untersuche die Köpfe von beiden.“ In diesem Augenblick ließ Sakka auf seinem Kopf ebenfalls eine Geschwulst erscheinen. Als der Bodhisatta die Köpfe beider untersuchte, sah er die Geschwulst bei beiden und sagte: „Großer König, auf den Köpfen beider befindet sich wahrlich eine Geschwulst. Ich vermag bei keinem von beiden zu erkennen, wer der echte Illisa ist.“ Nach diesen Worten sprach er folgende Strophe: 78. 78. ‘‘Ubho khañjā ubho kuṇī, ubho visamacakkhukā; Ubhinnaṃ piḷakā jātā, nāhaṃ passāmi illisa’’nti. „Beide hinken, beide haben verkrümmte Hände, beide schielen mit ungleichen Augen; auf beider Köpfen ist eine Geschwulst entstanden. Ich kann Illisa nicht erkennen.“ Tattha ubhoti dvepi janā. Khañjāti kuṇṭhapādā. Kuṇīti kuṇṭhahatthā. Visamacakkhukāti visamakkhimaṇḍalā kekarā. Piḷakāti dvinnampi ekasmiṃyeva sīsapadese ekasaṇṭhānāva piḷakā jātā. Nāhaṃ passāmīti ahaṃ ‘‘imesu ayaṃ nāma illiso’’ti na passāmi, ekassāpi illisabhāvaṃ na jānāmīti avoca. Darin bedeutet „ubho“ (beide) beide Personen. „Khañjā“ (hinkend) bedeutet solche mit verkrümmten Füßen. „Kuṇī“ (mit verkrümmten Händen) bedeutet solche mit verkrümmten Händen. „Visamacakkhukā“ (mit ungleichen Augen) bedeutet schielend, mit ungleichen Augensternen. „Piḷakā“ (Geschwulst) bedeutet, dass bei beiden an genau derselben Stelle des Kopfes eine völlig gleichgeformte Geschwulst entstanden ist. „Nāhaṃ passāmi“ (Ich sehe nicht) bedeutet: Er drückte damit aus: „Ich sehe unter diesen beiden nicht, wer von ihnen Illisa genannt werden kann; ich kann bei keinem von beiden das wahre Wesen Illisas erkennen.“ Bodhisattassa vacanaṃ sutvā seṭṭhi kampamāno dhanasokena satiṃ paccupaṭṭhāpetuṃ asakkonto tattheva pati. Tasmiṃ khaṇe sakko ‘‘nāhaṃ, mahārāja[Pg.375], illiso, sakkohamasmī’’ti mahatiyā sakkalīlāya ākāse aṭṭhāsi. Illisassa mukhaṃ puñchitvā udakena siñciṃsu, so uṭṭhāya sakkaṃ devarājānaṃ vanditvā aṭṭhāsi. Atha naṃ sakko āha ‘‘illisa, idaṃ dhanaṃ mama santakaṃ, na tava. Ahañhi te pitā, tvaṃ mama putto. Ahaṃ dānādīni puññāni katvā sakkattaṃ patto, tvaṃ pana me vaṃsaṃ upacchinditvā adānasīlo hutvā macchariye patiṭṭhāya dānasālāyo jhāpetvā yācake nikkaḍḍhitvā dhanameva saṇṭhāpesi. Taṃ neva tvaṃ paribhuñjasi, na aññesaṃ desi, rakkhasapariggahitaṃ viya tiṭṭhati. Sace me dānasālā pākatikā katvā dānaṃ dassasi, iccetaṃ kusalaṃ. No ce dassasi, sabbaṃ te dhanaṃ antaradhāpetvā iminā indavajirena te sīsaṃ chinditvā jīvitakkhayaṃ pāpessāmī’’ti. Illisaseṭṭhi maraṇabhayena santajjito ‘‘ito paṭṭhāya dānaṃ dassāmī’’ti paṭiññaṃ adāsi. Sakko tassa paṭiññaṃ gahetvā ākāse nisinnova dhammaṃ desetvā taṃ sīlesu patiṭṭhāpetvā sakaṭṭhānameva agamāsi. Illisopi dānādīni puññāni katvā saggaparāyaṇo ahosi. Als der Schatzmeister die Worte des Bodhisattas hörte, begann er zu zittern, und unfähig, vor Kummer um sein Vermögen seine Besinnung zu bewahren, brach er auf der Stelle zusammen. In diesem Augenblick sprach Sakka: „Großer König, ich bin nicht Illisa, ich bin Sakka!“, und erhob sich in der ganzen Pracht Sakkas in die Luft. Man wischte das Gesicht des Illisa ab und besprengte es mit Wasser; da erhob er sich, erwies Sakka, dem König der Götter, seine Ehrfurcht und blieb stehen. Da sprach Sakka zu ihm: „Illisa, dieses Vermögen gehört mir, nicht dir. Denn wahrlich, ich bin dein Vater, und du bist mein Sohn. Ich habe heilsame Taten wie das Almosengeben vollbracht und erlangte so die Würde Sakkas. Du aber hast mein Geschlecht abgeschnitten, bist unbarmherzig und geizig geworden, hast die Almosenhallen niedergebrannt, die Bettler vertrieben und nur darauf geachtet, Reichtum anzuhäufen. Weder genießt du ihn selbst, noch gibst du ihn anderen; er liegt da wie ein von einem Unhold bewachter Besitz. Wenn du meine Almosenhallen wieder im alten Zustand errichtest und Gaben spendest, so ist das heilsam und gut. Wenn du es aber nicht tust, werde ich all dein Vermögen verschwinden lassen, dein Haupt mit diesem Donnerkeil Indras spalten und dein Leben beenden.“ Der Schatzmeister Illisa, von Todesfurcht gepeinigt, gab das Versprechen: „Von heute an werde ich Gaben spenden.“ Nachdem Sakka sein Versprechen entgegengenommen hatte, verkündete er noch in der Luft sitzend das Dhamma, festigte ihn in den Tugendregeln und kehrte an seine eigene Stätte zurück. Auch Illisa vollbrachte fortan heilsame Taten wie das Almosengeben und ging nach seinem Tod in die himmlische Welt ein. Satthā ‘‘na, bhikkhave, idāneva moggallāno macchariyaseṭṭhiṃ dameti, pubbepesa iminā damitoyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā illiso macchariyaseṭṭhi ahosi, sakko devarājā mahāmoggallāno, rājā ānando, kappako pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Mönche, nicht erst jetzt bezähmt Moggallāna den geizigen Kaufmann; auch in der Vergangenheit wurde dieser schon von ihm bezähmt.“ Nachdem er diese Lehrunterweisung dargelegt und den Zusammenhang hergestellt hatte, fasste er das Jātaka zusammen: „Damals war der geizige Kaufmann Illisa. Sakka, der König der Götter, war Mahāmoggallāna. Der König war Ānanda, der Barbier aber war ich selbst.“ Illisajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Erklärung des Illisa-Jātaka, die achte.
[79] 9. Kharassarajātakavaṇṇanā [79] 9. Erklärung des Kharassara-Jātaka. Yato viluttā ca hatā ca gāvoti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ amaccaṃ ārabbha kathesi. Kosalarañño kira eko amacco rājānaṃ ārādhetvā paccantagāme rājabaliṃ labhitvā corehi saddhiṃ ekato hutvā ‘‘ahaṃ manusse ādāya araññaṃ pavisissāmi, tumhe gāmaṃ vilumpitvā upaḍḍhaṃ mayhaṃ dadeyyāthā’’ti vatvā pageva manusse sannipātetvā araññaṃ gantvā coresu āgantvā gāviyo ghātetvā [Pg.376] maṃsaṃ khāditvā gāmaṃ vilumpitvā gatesu sāyanhasamaye mahājanaparivuto āgacchati. Tassa na cirasseva taṃ kammaṃ pākaṭaṃ jātaṃ. Manussā rañño ārocesuṃ. Rājā taṃ pakkosāpetvā dosaṃ patiṭṭhāpetvā suniggahitaṃ niggahetvā aññaṃ gāmabhojakaṃ pesetvā jetavanaṃ gantvā bhagavato etamatthaṃ ārocesi. Bhagavā ‘‘na, mahārāja, idāneva esa evaṃsīlo, pubbepi evaṃsīloyevā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Wo geraubt und getötet die Rinder...“ – diese Lehrunterweisung verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen bestimmten Minister. Es heißt, ein Minister des Königs von Kosala machte sich beim König beliebt, erlangte die königlichen Steuern in einem Grenzdorf, verbündete sich mit Räubern und sprach zu ihnen: „Ich werde die Dorfbewohner mitnehmen und in den Wald gehen. Plündert ihr das Dorf und gebt mir die Hälfte!“ Er versammelte die Dorfbewohner schon früh am Morgen, ging in den Wald, und als die Räuber kamen, die Kühe abschlachteten, das Fleisch verzehrten, das Dorf plünderten und wieder abzogen, kehrte er am Abend, von einer großen Menschenmenge umgeben, zurück. Seine Tat wurde jedoch schon bald darauf bekannt. Die Menschen berichteten es dem König. Der König ließ ihn rufen, überführte ihn seiner Schuld, bestrafte ihn streng und gerecht, setzte einen anderen Dorfvorsteher ein und ging daraufhin zum Jetavana-Kloster, um dem Erhabenen diesen Vorfall zu berichten. Der Erhabene sprach: „O Großkönig, nicht erst jetzt ist er von solchem Charakter; auch in der Vergangenheit war er von eben solchem Charakter“, und auf die Bitte des Königs hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente ekassa amaccassa paccantagāmaṃ adāsi. Sabbaṃ purimasadisameva. Tadā pana bodhisatto vaṇijjāya paccante vicaranto tasmiṃ gāmake nivāsaṃ kappesi. So tasmiṃ gāmabhojake sāyanhasamaye mahājanaparivārena bheriyā vajjamānāya āgacchante ‘‘ayaṃ duṭṭhagāmabhojako corehi saddhiṃ ekato hutvā gāmaṃ vilumpāpetvā coresu palāyitvā aṭaviṃ paviṭṭhesu idāni upasantūpasanto viya bheriyā vajjamānāya āgacchatī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, gab er einem seiner Minister ein Grenzdorf zur Verwaltung. Alles Weitere gleicht genau dem vorherigen Fall. Damals jedoch reiste der Bodhisatta zu Handelszwecken im Grenzgebiet umher und hielt sich in diesem kleinen Dorf auf. Als nun jener Dorfvorsteher am Abend, umgeben von einer großen Menschenmenge und unter dem Schlagen von Trommeln, zurückkehrte, sagte der Bodhisatta: „Dieser bösartige Dorfvorsteher hat sich mit den Räubern verbündet, das Dorf plündern lassen, und nun, da die Räuber geflohen und in den Wald entkommen sind, kommt er daher, als sei er völlig friedlich, während die Trommeln geschlagen werden!“ Und er sprach folgende Strophe: 79. 79. ‘‘Yato viluttā ca hatā ca gāvo, daḍḍhāni gehāni jano ca nīto; Athāgamā puttahatāya putto, kharassaraṃ ḍiṇḍimaṃ vādayanto’’ti. „Wo die Rinder geraubt und erschlagen wurden, die Häuser niedergebrannt und die Menschen fortgeführt wurden, da kommt nun der schamlose Sohn einer kinderlos Gemachten daher und schlägt die rauklingende Trommel!“ Tattha yatoti yadā. Viluttā ca hatā cāti vilumpitvā bandhitvā ca nītā, maṃsaṃ khādanatthāya ca hatā. Gāvoti gorūpāni. Daḍḍhānīti aggiṃ datvā jhāpitāni. Jano ca nītoti karamaraggāhaṃ gahetvā nīto. Puttahatāya puttoti hataputtāya putto, nillajjoti attho. Chinnahirottappassa hi mātā nāma natthi, iti so tassā jīvantopi hataputtaṭṭhāne tiṭṭhatīti hataputtāya putto nāma hoti. Kharassaranti thaddhasaddaṃ. Ḍiṇḍimanti paṭahabheriṃ. Darin bedeutet „yato“: wann. „Geraubt und erschlagen“ (viluttā ca hatā ca) bedeutet: geplündert, gefesselt und weggeführt sowie zum Zwecke des Fleischverzehrs getötet. „Gāvo“ meint Rinder. „Niedergebrannt“ (daḍḍhāni) bedeutet: durch Brandstiftung eingeäschert. „Und die Menschen fortgeführt“ (jano ca nīto) bedeutet: als Kriegsgefangene ergriffen und weggeführt. „Sohn einer Frau, deren Sohn getötet wurde“ (puttahatāya putto) bedeutet: der Sohn einer Frau, deren Sohn tot ist, was einen Schamlosen beschreibt. Denn wer jede Scham und moralische Scheu verloren hat, für den gibt es wahrlich keine Mutter mehr; daher steht er für sie, obwohl er noch am Leben ist, an der Stelle eines getöteten Sohnes, weshalb er „der Sohn einer Frau, deren Sohn getötet wurde“ genannt wird. „Kharassara“ bedeutet von rauhem und hartem Klang. „Ḍiṇḍima“ bezeichnet eine Kriegstrommel. Evaṃ bodhisatto imāya gāthāya taṃ paribhāsi. Na cireneva ca tassa taṃ kammaṃ pākaṭaṃ jātaṃ, athassa rājā dosānurūpaṃ niggahaṃ akāsi. So tadelte der Bodhisatta jenen Dorfvorsteher mit dieser Strophe. Und es dauerte nicht lange, bis dessen Tat offenbar wurde. Daraufhin bestrafte ihn der König seiner Schuld entsprechend. Satthā [Pg.377] ‘‘na, mahārāja, idānevesa evaṃsīlo, pubbepi evaṃsīloyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā amacco idāni amaccoyeva, gāthāya udāhārakapaṇḍitamanusso pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „O Großkönig, nicht erst jetzt ist er von solchem Charakter; auch in der Vergangenheit war er von eben solchem Charakter.“ Nachdem er diese Lehrunterweisung dargelegt und den Zusammenhang hergestellt hatte, fasste er das Jātaka zusammen: „Der damalige Minister ist der heutige Minister; der weise Mann aber, der die Strophe vortrug, war ich selbst.“ Kharassarajātakavaṇṇanā navamā. Erklärung des Kharassara-Jātaka, die neunte.
[80] 10. Bhīmasenajātakavaṇṇanā [80] 10. Erklärung des Bhīmasena-Jātaka. Yaṃ te pavikatthitaṃ pureti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ vikatthitaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Eko kira bhikkhu ‘‘āvuso, amhākaṃ jātisamā jāti, gottasamaṃ gottaṃ nāma natthi, mayaṃ evarūpe nāma mahākhattiyakule jātā, gottena vā dhanena vā kulappadesena vā amhehi sadiso nāma natthi, amhākaṃ suvaṇṇarajatādīnaṃ anto natthi, dāsakammakarāpi no sālimaṃsodanaṃ bhuñjanti, kāsikavatthaṃ nivāsenti, kāsikavilepanaṃ vilimpanti. Mayaṃ pabbajitabhāvena etarahi evarūpāni lūkhāni bhojanāni bhuñjāma, lūkhāni cīvarāni dhāremā’’ti theranavamajjhimānaṃ bhikkhūnaṃ antare vikatthento jātiādivasena vambhento khuṃsento vicarati. Athassa eko bhikkhu kulappadesaṃ pariggaṇhitvā taṃ vikatthanabhāvaṃ bhikkhūnaṃ ārocesi. Bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitā ‘‘āvuso, asuko nāma bhikkhu evarūpe niyyānikasāsane pabbajitvā vikatthento vambhento khuṃsento vicaratī’’ti etassa aguṇaṃ kathayiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, so bhikkhu idāneva vikatthento vambhento khuṃsento vicarati, pubbepi vikatthento vambhento khuṃsento vicarī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Was du früher prahlend kundtatst...“ – diese Lehrunterweisung verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen bestimmten prahlerischen Mönch. Es heißt, ein bestimmter Mönch ging unter den älteren, jüngeren und mittleren Mönchen umher, prahlte und schmähte sowie beschimpfte andere aufgrund ihrer Herkunft usw., indem er sagte: „Ihr Ehrwürdigen, es gibt keine Herkunft, die unserer Herkunft gleicht, und keine Sippe, die unserer Sippe gleicht. Wir wurden in einer so erhabenen großen Kriegerkaste geboren. Weder an Sippe noch an Reichtum noch an edler Abstammung gibt es jemanden, der uns gleicht. Unser Gold und Silber ist grenzenlos. Sogar unsere Sklaven und Arbeiter essen feinen Reis mit Fleisch, tragen Gewänder aus Kāsī-Seide und salben sich mit Salben aus Kāsī. Wir hingegen müssen nun wegen des mönchischen Lebens so grobe Speisen essen und so grobe Gewänder tragen!“ Da untersuchte ein anderer Mönch dessen familiäre Herkunft und berichtete den anderen Mönchen von seiner Prahlerei. Die Mönche versammelten sich in der Gerichtshalle und sprachen über seine Verfehlung: „Ihr Ehrwürdigen, der Mönch mit dem Namen Soundso ist in dieser zur Befreiung führenden Lehre ordiniert und geht nun umher, prahlt, schmäht und beschimpft andere.“ Der Meister kam herbei, fragte: „Mönche, worüber sprecht ihr, während ihr hier zusammensitzt?“ Und als sie antworteten: „Über dieses Thema, o Herr“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt geht dieser Mönch prahlend, schmähend und beschimpfend umher; auch in der Vergangenheit ist er schon prahlend, schmähend und beschimpfend umhergegangen.“ Und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto ekasmiṃ nigamagāme udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto takkasilāyaṃ disāpāmokkhassa ācariyassa santike tayo vede aṭṭhārasa vijjaṭṭhānāni uggahetvā sabbasippesu nipphattiṃ patvā cūḷadhanuggahapaṇḍito nāma [Pg.378] ahosi. So takkasilāto nikkhamitvā sabbasamayasippāni pariyesamāno mahiṃsakaraṭṭhaṃ agamāsi. Imasmiṃ pana jātake bodhisatto thokaṃ rasso oṇatākāro ahosi. So cintesi ‘‘sacāhaṃ kañci rājānaṃ upasaṅkamissāmi, so ‘evaṃ rassasarīro tvaṃ kiṃ amhākaṃ kammaṃ karissasī’ti vakkhati, yaṃnūnāhaṃ ārohapariṇāhasampannaṃ abhirūpaṃ ekaṃ purisaṃ phalakaṃ katvā tassa piṭṭhicchāyāya jīvikaṃ kappeyya’’nti. So tathārūpaṃ purisaṃ pariyesamāno bhīmasenassa nāmekassa tantavāyassa tantavītaṭṭhānaṃ gantvā tena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā ‘‘samma, tvaṃ kinnāmosī’’ti pucchi. ‘‘Ahaṃ bhīmaseno nāmā’’ti? ‘‘Kiṃ pana tvaṃ evaṃ abhirūpo upadhisampanno hutvā imaṃ lāmakakammaṃ karosī’’ti? ‘‘Jīvituṃ asakkonto’’ti. ‘‘Samma, mā etaṃ kammaṃ kari, sakalajambudīpe mayā sadiso dhanuggaho nāma natthi. Sace panāhaṃ kañci rājānaṃ passeyyaṃ, so maṃ ‘evaṃrasso ayaṃ kiṃ amhākaṃ kammaṃ karissatī’ti kopeyya, tvaṃ rājānaṃ disvā ‘ahaṃ dhanuggaho’ti vakkhasi. Rājā te paribbayaṃ datvā vuttiṃ nibaddhaṃ dassati. Ahaṃ te uppannakammaṃ karonto tava piṭṭhicchāyāya jīvissāmi. Evaṃ ubhopi sukhitā bhavissāma. Karohi mama vacana’’nti āha. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einem Marktflecken in einer angesehenen Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, studierte er in Takkasilā bei einem weltberühmten Lehrer die drei Veden sowie die achtzehn Wissenschaften und erlangte Meisterschaft in allen Künsten, woraufhin er als der weise Cūḷadhanuggaha (der kleine Bogenschütze) bekannt wurde. Er verließ Takkasilā und reiste auf der Suche nach verschiedenen Lehren und Künsten in das Königreich Mahiṃsaka. In diesem Jātaka war der Bodhisatta jedoch von kleiner Statur und von gekrümmter Gestalt. Er dachte bei sich: „Wenn ich mich irgendeinem König nähre, wird er wohl sagen: ‚Du mit einem so kleinen Körper, was für eine Arbeit willst du für uns verrichten?‘ Wie wäre es, wenn ich mir einen wohlgebauten, gut aussehenden Mann als Schutzschild nähme und in seinem Schatten meinen Lebensunterhalt verdiente?“ Auf der Suche nach einem solchen Mann ging er zum Webstuhl eines Webers namens Bhīmasena. Er begrüßte ihn freundlich und fragte: „Mein Freund, wie heißt du?“ — „Ich heiße Bhīmasena.“ — „Warum verrichtest du, der du so gut aussiehst und von so stattlicher Gestalt bist, diese niedere Arbeit?“ — „Weil ich meinen Lebensunterhalt nicht anders bestreiten kann.“ — „Mein Freund, verrichte diese Arbeit nicht. Auf der ganzen Rosenapfel-Insel (Jambudīpa) gibt es keinen Bogenschützen, der mir gleichkommt. Wenn ich jedoch vor irgendeinen König träte, könnte er mich verachten und denken: ‚Was kann dieser Zwerg schon für mich tun?‘ Wenn du vor den König trittst, sollst du sagen: ‚Ich bin ein Bogenschütze.‘ Der König wird dir einen Sold geben und dich dauerhaft anstellen. Ich werde alle anfallenden Arbeiten für dich erledigen und in deinem Schatten leben. So werden wir beide glücklich sein. Folge meinem Rat.“ Dieser stimmte zu und sagte: „Sehr wohl.“ Atha naṃ ādāya bārāṇasiṃ gantvā sayaṃ cūḷūpaṭṭhāko hutvā taṃ purato katvā rājadvāre ṭhatvā rañño ārocāpesi. ‘‘Āgacchantū’’ti vutte ubhopi pavisitvā rājānaṃ vanditvā aṭṭhaṃsu. ‘‘Kiṃkāraṇā āgatatthā’’ti ca vutte bhīmaseno āha – ‘‘ahaṃ dhanuggaho, mayā sadiso sakalajambudīpe dhanuggaho natthī’’ti. ‘‘Kiṃ pana labhanto maṃ upaṭṭhahissasī’’ti? ‘‘Aḍḍhamāse sahassaṃ labhanto upaṭṭhahissāmi, devā’’ti. ‘‘Ayaṃ te puriso kiṃ hotī’’ti? ‘‘Cūḷūpaṭṭhāko, devā’’ti. ‘‘Sādhu upaṭṭhahā’’ti. Tato paṭṭhāya bhīmaseno rājānaṃ upaṭṭhahati. Uppannakiccaṃ panassa bodhisattova nittharati. Daraufhin nahm er ihn mit sich, ging nach Bārāṇasī, machte sich selbst zu seinem Gehilfen, stellte ihn an die Spitze, trat vor das Palasttor und ließ sich beim König anmelden. Als es hieß: „Sie sollen eintreten“, traten beide ein, verneigten sich vor dem König und blieben stehen. Auf die Frage: „Aus welchem Grund seid ihr gekommen?“, antwortete Bhīmasena: „Ich bin ein Bogenschütze. Auf der ganzen Rosenapfel-Insel gibt es keinen Bogenschützen, der mir gleichkommt.“ — „Welchen Lohn erwartest du, um mir zu dienen?“ — „Wenn ich alle halbe Monate tausend Münzen erhalte, werde ich Euch dienen, o König.“ — „Wer ist dieser Mann für dich?“ — „Er ist mein kleiner Gehilfe, o König.“ — „Gut, tritt in meinen Dienst.“ Von da an diente Bhīmasena dem König. Doch alle anfallenden Aufgaben wurden allein vom Bodhisatta bewältigt. Tena kho pana samayena kāsiraṭṭhe ekasmiṃ araññe bahūnaṃ manussānaṃ sañcaraṇamaggaṃ byaggho chaḍḍāpeti, bahū manusse gahetvā gahetvā khādati. Taṃ pavattiṃ rañño ārocesuṃ. Rājā bhīmasenaṃ pakkosāpetvā ‘‘sakkhissasi, tāta, naṃ byagghaṃ gaṇhitu’’nti āha. ‘‘Deva, kiṃ dhanuggaho nāmāhaṃ[Pg.379], yadi byagghaṃ gahetuṃ na sakkomī’’ti. Rājā tassa paribbayaṃ datvā uyyojesi. So gharaṃ gantvā bodhisattassa kathesi. Bodhisatto ‘‘sādhu, samma, gacchā’’ti āha. ‘‘Tvaṃ pana na gamissasī’’ti? ‘‘Āma na gamissāmi, upāyaṃ pana te ācikkhissāmī’’ti. ‘‘Ācikkha, sammā’’ti. Tvaṃ byagghassa vasanaṭṭhānaṃ sahasā ekakova mā agamāsi, janapadamanusse pana sannipātetvā ekaṃ vā dve vā dhanusahassāni gāhāpetvā tattha gantvā byagghassa uṭṭhitabhāvaṃ ñatvā palāyitvā ekaṃ gumbaṃ pavisitvā urena nipajjeyyāsi, jānapadāva byagghaṃ pothetvā gaṇhissanti, tehi byagghe gahite tvaṃ dantehi ekaṃ valliṃ chinditvā koṭiyaṃ gahetvā matabyagghassa santikaṃ gantvā ‘‘bho, kenesa, byaggho mārito, ahaṃ imaṃ byagghaṃ goṇaṃ viya valliyā bandhitvā rañño santikaṃ nessāmī’ti valliatthāya gumbaṃ paviṭṭho, mayā valliyā anābhatāya eva kenesa mārito’’ti katheyyāsi. Atha te jānapadā bhītatasitā ‘‘sāmi, mā rañño ācikkhī’’ti bahuṃ dhanaṃ dassanti, byaggho tayā gahito bhavissati, raññopi santikā bahuṃ dhanaṃ labhissasīti. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā bodhisattena kathitaniyāmeneva byagghaṃ gahetvā araññaṃ khemaṃ katvā mahājanaparivuto bārāṇasiṃ āgantvā rājānaṃ disvā ‘‘gahito me, deva, byaggho, araññaṃ khemaṃ kata’’nti āha. Rājā tuṭṭho bahuṃ dhanaṃ adāsi. Punekadivasaṃ ‘‘ekamaggaṃ mahiṃso chaḍḍāpetī’’ti ārocesuṃ, rājā tatheva bhīmasenaṃ pesesi. Sopi bodhisattena dinnanayena byagghaṃ viya tampi gahetvā āgañchi, rājā puna bahuṃ dhanaṃ adāsi, mahantaṃ issariyaṃ jātaṃ. So issariyamadamatto bodhisattaṃ avamaññaṃ katvā tassa vacanaṃ na gaṇhāti, ‘‘nāhaṃ taṃ nissāya jīvāmi, kiṃ tvaññeva puriso’’tiādīni pharusavacanāni vadati. Zu jener Zeit machte ein Tiger in einem Wald im Königreich Kāsi die Wege für viele Menschen unpassierbar, fing sie ab und fraß sie auf. Man berichtete dem König von diesen Vorfällen. Der König ließ Bhīmasena rufen und fragte ihn: „Mein Lieber, wirst du in der Lage sein, diesen Tiger zu fangen?“ — „O König, was für ein Bogenschütze wäre ich denn, wenn ich nicht einmal einen Tiger fangen könnte?“ Der König gab ihm Reisegeld und entließ ihn. Er ging nach Hause und erzählte es dem Bodhisatta. Der Bodhisatta sagte: „Gut, mein Freund, geh nur.“ — „Aber gehst du denn nicht mit?“ — „Nein, ich werde nicht mitgehen, aber ich werde dir eine List verraten.“ — „Verrate sie mir, mein Freund!“ — „Gehe nicht plötzlich ganz allein dorthin, wo der Tiger haust. Versammle stattdessen die Landbewohner, lass sie eintausend oder zweitausend Bögen nehmen, gehe mit ihnen dorthin und sobald du merkst, dass der Tiger aufgesprungen ist, laufe weg, krieche in ein Gebüsch und lege dich flach auf den Bauch. Die Landbewohner selbst werden den Tiger erschlagen und fangen. Sobald sie den Tiger gefangen haben, beiße mit deinen Zähnen eine Schlingpflanze durch, halte sie an einem Ende fest, geh zu dem toten Tiger und sprich: ‚He, wer hat diesen Tiger getötet? Ich bin in das Gebüsch gekrochen, um eine Schlingpflanze zu holen, damit ich diesen Tiger wie einen Ochsen fesseln und zum König bringen kann! Wer hat ihn getötet, noch bevor ich mit der Schlingpflanze zurückgekehrt bin?‘ Dann werden die Landbewohner erschrecken und bitten: ‚Herr, melde es nicht dem König!‘ und sie werden dir viel Geld geben. So wird es gelten, als hättest du den Tiger gefangen, und auch vom König wirst du eine reiche Belohnung erhalten.“ Er willigte ein, fing den Tiger genau nach der Anweisung des Bodhisatta, befreite den Wald von der Gefahr und kehrte, von einer großen Menschenmenge begleitet, nach Bārāṇasī zurück. Er trat vor den König und sprach: „O König, ich habe den Tiger gefangen; der Wald ist nun sicher.“ Der König war hocherfreut und gab ihm reichlich Reichtum. An einem anderen Tag wurde berichtet: „Ein wilder Büffel macht einen Weg unpassierbar.“ Der König sandte Bhīmasena in genau derselben Weise aus. Auch diesen fing er nach der Methode des Bodhisatta wie den Tiger und kehrte zurück. Der König schenkte ihm erneut viel Reichtum, wodurch er zu großem Wohlstand und Einfluss gelangte. Doch von Stolz über seine Macht und seinen Wohlstand berauscht, begann er, den Bodhisatta herabzusetzen und hörte nicht mehr auf seinen Rat. Er sprach grobe Worte zu ihm wie: „Ich bin nicht von dir abhängig, um meinen Lebensunterhalt zu bestreiten. Glaubst du etwa, du allein seist ein ganzer Kerl?“ Atha katipāhaccayena eko sāmantarājā āgantvā bārāṇasiṃ uparundhitvā ‘‘rajjaṃ vā detu, yuddhaṃ vā’’ti rañño sāsanaṃ pesesi. Rājā ‘‘yujjhāhī’’ti bhīmasenaṃ pesesi. So sabbasannāhasannaddho rājavesaṃ gahetvā susannaddhassa vāraṇassa piṭṭhe nisīdi. Bodhisattopi tassa maraṇabhayena sabbasannāhasannaddho bhīmasenasseva pacchimāsane nisīdi. Vāraṇo mahājanaparivuto nagaradvārena nikkhamitvā saṅgāmasīsaṃ pāpuṇi. Bhīmaseno yuddhabherisaddaṃ sutvāva kampituṃ āraddho. Bodhisatto ‘‘idānesa [Pg.380] hatthipiṭṭhito patitvā marissatī’’ti hatthikkhandhato apatanatthaṃ bhīmasenaṃ yottena parikkhipitvā gaṇhi, bhīmaseno sampahāraṭṭhānaṃ disvā maraṇabhayatajjito sarīravaḷañjena hatthipiṭṭhiṃ dūsesi. Bodhisatto ‘‘na kho te bhīmasena purimena pacchimaṃ sameti, tvaṃ pubbe saṅgāmayodho viya ahosi, idāni hatthipiṭṭhiṃ dūsesī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Darauf, nach Ablauf einiger Tage, kam ein benachbarter König, belagerte Bārāṇasī und sandte eine Botschaft an den König: „Übergib das Königreich oder kämpfe!“ Der König sandte Bhīmasena mit dem Befehl: „Kämpfe!“ Dieser legte die volle Rüstung an, nahm die Gestalt des Königs an und setzte sich auf den Rücken des reich geschmückten Elefanten. Auch der Bodhisatta legte aus Furcht vor dessen Tod die volle Rüstung an und setzte sich auf den hinteren Sitz direkt hinter Bhīmasena. Der Elefant, von einer großen Menschenmenge umgeben, zog durch das Stadttor hinaus und erreichte die vorderste Front der Schlacht. Als Bhīmasena den Schall der Kriegstrommeln hörte, begann er sogleich zu zittern. Der Bodhisatta dachte: „Nun wird dieser vom Rücken des Elefanten stürzen und sterben.“ Um zu verhindern, dass er vom Nacken des Elefanten fiel, band er Bhīmasena mit einem Seil fest und hielt ihn. Als Bhīmasena das Schlachtfeld erblickte, packte ihn die Todesangst und er verunreinigte den Rücken des Elefanten mit seinen körperlichen Ausscheidungen. Da sagte der Bodhisatta: „Bhīmasena, dein früheres Verhalten stimmt keineswegs mit dem jetzigen überein. Zuvor warst du wie ein Kriegsheld, doch nun verunreinigst du den Rücken des Elefanten!“, und sprach diese Strophe: 80. 80. ‘‘Yaṃ te pavikatthitaṃ pure, atha te pūtisarā sajanti pacchā; Ubhayaṃ na sameti bhīmasena, yuddhakathā ca idañca te vihañña’’nti. „Was du zuvor so prahlend verkündet hast, und wie nun danach deine stinkenden Säfte fließen – das beides, o Bhīmasena, stimmt nicht überein: deine Kriegsreden und dieser dein jämmerlicher Zustand.“ Tattha yaṃ te pavikatthitaṃ pureti yaṃ tayā pubbe ‘‘kiṃ tvaṃyeva puriso, nāhaṃ puriso, ahampi saṅgāmayodho’’ti vikatthitaṃ vambhanavacanaṃ vuttaṃ, idaṃ tāva ekaṃ. Atha te pūtisarā sajanti pacchāti atha te ime pūtibhāvena saraṇabhāvena ca ‘‘pūtisarā’’ti laddhanāmā sarīravaḷañjadhārā sajanti vaḷañjanti paggharanti. Pacchāti tato pure vikatthitato aparabhāge, idāni imasmiṃ saṅgāmasīseti attho. Ubhayaṃ na sameti bhīmasenāti idaṃ bhīmasena ubhayaṃ na sameti. Kataraṃ? Yuddhakathā ca idañca te vihaññanti, yā ca pure kathitā yuddhakathā, yañca te idāni vihaññaṃ kilamatho hatthipiṭṭhidūsanākārappatto vighātoti attho. Darin bedeutet 'yaṃ te pavikatthitaṃ pure' (was du zuvor prahlend verkündet hast): die prahlerischen, herabsetzenden Worte, die du zuvor gesprochen hast, wie 'Bist nur du ein Mann und ich etwa kein Mann? Auch ich bin ein Kriegsheld!' Dies ist das Erste. 'atha te pūtisarā sajanti pacchā' (danach fließen deine stinkenden Säfte) bedeutet: Danach fließen und strömen diese Ströme deiner körperlichen Ausscheidungen, die wegen ihres fauligen Geruchs und ihres rinnenden Wesens den Namen 'stinkende Säfte' (pūtisarā) tragen. 'pacchā' (danach) bedeutet: nach jener früheren Prahlerei, also jetzt auf diesem Schlachtfeld. 'ubhayaṃ na sameti bhīmasenā' bedeutet: O Bhīmasena, diese beiden Dinge stimmen nicht überein. Welche beiden? 'yuddhakathā ca idañca te vihaññaṃ' (deine Kriegsreden und dieser dein jämmerlicher Zustand): deine zuvor geführten Reden über den Kampf und deine jetzige Not, Mühsal und Bedrängnis, durch die der Rücken des Elefanten verunreinigt wurde. Das ist die Bedeutung. Evaṃ bodhisatto taṃ garahitvā ‘‘mā bhāyi, samma, kasmā mayi ṭhite vihaññasī’’ti bhīmasenaṃ hatthipiṭṭhito otāretvā ‘‘nhāyitvā gehameva gacchā’’ti uyyojetvā ‘‘ajja mayā pākaṭena bhavituṃ vaṭṭatī’’ti saṅgāmaṃ pavisitvā unnaditvā balakoṭṭhakaṃ bhinditvā sapattarājānaṃ jīvaggāhaṃ gāhāpetvā bārāṇasirañño santikaṃ agamāsi. Rājā tuṭṭho bodhisattassa mahantaṃ yasaṃ adāsi. Tato paṭṭhāya ‘‘cūḷadhanuggahapaṇḍito’’ti sakalajambudīpe pākaṭo ahosi. So bhīmasenassa paribbayaṃ datvā sakaṭṭhānameva pesetvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta ihn so getadelt hatte, sprach er: „Fürchte dich nicht, mein Freund! Warum bist du so voller Not, während ich hier stehe?“, half Bhīmasena vom Rücken des Elefanten herab und entließ ihn mit den Worten: „Geh, nimm ein Bad und geh einfach nach Hause!“ Darauf dachte der Bodhisatta: „Heute ist es an der Zeit, dass ich mich offenbare“, zog in die Schlacht, erhob ein großes Geschrei, durchbrach die feindliche Heeresmacht, nahm den feindlichen König lebendig gefangen und brachte ihn zum König von Bārāṇasī. Der König war erfreut und verlieh dem Bodhisatta großes Ansehen. Von da an wurde er in ganz Jambudīpa als 'Cūḷadhanuggha-Paṇḍita' (der weise kleine Bogenschütze) bekannt. Er versorgte Bhīmasena mit Unterhalt, schickte ihn an seinen eigenen Ort zurück, tat gute Taten wie Almosen geben und ging schließlich gemäß seinem Karma ein. Satthā [Pg.381] ‘‘na, bhikkhave, idānevesa bhikkhu vikattheti, pubbepi vikatthiyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā anusandhiṃ ghaṭetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā bhīmaseno vikatthitabhikkhu ahosi, cūḷadhanuggahapaṇḍito pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt prahlt dieser Mönch, auch in der Vergangenheit hat er schon geprahlt.“ Nachdem er diese Lehrrede dargelegt und die Verbindung hergestellte hatte, verknüpfte er das Jātaka: „Damals war Bhīmasena der prahlerische Mönch, der weise Cūḷadhanuggaha aber war ich selbst.“ Bhīmasenajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Bhīmasena-Jātaka, die zehnte. Varuṇavaggo aṭṭhamo. Die Varuṇa-Vagga, die achte. Tassuddānaṃ – Deren Zusammenfassung lautet: Varuṇaṃ sīlavanāgaṃ, saccaṃkira rukkhadhammaṃ; Maccharājā asaṅkiyaṃ, mahāsupinaillisaṃ; Kharassaraṃ bhīmasenanti. Varuṇa-Jātaka, Sīlavanāga-Jātaka, Saccaṅkira-Jātaka, Rukkhadhamma-Jātaka, Maccharāja-Jātaka, Asaṅkiya-Jātaka, Mahāsupina-Jātaka, Illisa-Jātaka, Kharassara-Jātaka und Bhīmasena-Jātaka. 9. Apāyimhavaggo 9. Die Apāyimha-Vagga
[81] 1. Surāpānajātakavaṇṇanā [81] 1. Die Erklärung des Surāpāna-Jātaka Apāyimha anaccimhāti idaṃ satthā kosambiṃ upanissāya ghositārāme viharanto sāgatattheraṃ ārabbha kathesi. Bhagavati hi sāvatthiyaṃ vassaṃ vasitvā cārikāgamanena bhaddavatikaṃ nāma nigamaṃ sampatte gopālakā pasupālakā kassakā pathāvino ca satthāraṃ disvā vanditvā ‘‘mā, bhante, bhagavā ambatitthaṃ agamāsi, ambatitthe jaṭilassa assame ambatitthako nāma nāgo āsīviso ghoraviso, so bhagavantaṃ viheṭheyyā’’ti vārayiṃsu. Bhagavāpi tesaṃ kathaṃ asuṇanto viya tesu yāvatatiyaṃ vārayamānesupi agamāsiyeva. „Wir tranken und wir tanzten“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er nahe Kosambī im Ghosita-Kloster verweilte, in Bezug auf den Ehrwürdigen Sāgata. Als nämlich der Erhabene nach der Regenzeitresidenz in Sāvatthī auf seiner Wanderung den Marktflecken Bhaddavatikā erreichte, sahen ihn die Kuhhirten, Viehhirten, Bauern und Reisenden. Sie verneigten sich vor dem Meister und warnten ihn: „Ehrwürdiger Herr, der Erhabene möge nicht nach Ambatittha gehen! In der Einsiedelei des Asketen in Ambatittha haust eine Schlange namens Ambatitthako, die eine Schlange mit schnellem und schrecklichem Gift ist. Sie könnte den Erhabenen schädigen.“ Doch obwohl sie ihn bis zu dreimal warnten, ging der Erhabene dennoch weiter, als würde er ihre Worte nicht hören. Tatra sudaṃ bhagavā bhaddavatikāya avidūre aññatarasmiṃ vanasaṇḍe viharati. Tena kho pana samayena buddhūpaṭṭhāko sāgato nāma thero pothujjanikāya iddhiyā samannāgato taṃ assamaṃ upasaṅkamitvā tassa nāgarājassa vasanaṭṭhāne tiṇasanthārakaṃ paññāpetvā pallaṅkena nisīdi. Nāgo makkhaṃ asahamāno dhūmāyi, theropi dhūmāyi. Nāgo pajjali, theropi pajjali. Nāgassa tejo theraṃ na bādhati, therassa tejo nāgaṃ [Pg.382] bādhati. Evaṃ so khaṇena taṃ nāgarājānaṃ dametvā saraṇesu ca sīlesu ca patiṭṭhāpetvā satthu santikaṃ agamāsi. Dort verweilte der Erhabene in einem bestimmten Waldstück unweit von Bhaddavatikā. Zu jener Zeit begab sich der Ehrwürdige Sāgata, der Diener des Buddha, der mit weltlicher übernatürlicher Kraft ausgestattet war, zu jener Einsiedelei, breitete an dem Wohnort jener feindseligen Schlange ein Graslager aus und setzte sich im Kreuzsitz nieder. Da die Schlange dieses respektlose Verhalten nicht ertragen konnte, stieß sie Rauch aus, und auch der Ehrwürdige stieß Rauch aus. Die Schlange spie Flammen, und auch der Ehrwürdige spie Flammen. Die feurige Glut der Schlange konnte dem Ehrwürdigen nichts anhaben, doch die Glut des Ehrwürdigen bezwang die Schlange. So zähmte er jenen Schlangenkönig im Handumdrehen, festigte ihn in den Zufluchten und den Tugendregeln und begab sich dann zum Meister. Satthā bhaddavatikāyaṃ yathābhirantaṃ viharitvā kosambiṃ agamāsi. Sāgatattherena nāgassa damitabhāvo sakalajanapadaṃ patthari. Kosambinagaravāsino satthu paccuggamanaṃ katvā satthāraṃ vanditvā sāgatattherassa santikaṃ gantvā vanditvā ekamantaṃ ṭhitā evamāhaṃsu ‘‘bhante, yaṃ tumhākaṃ dullabhaṃ, taṃ vadeyyātha, tadeva mayaṃ paṭiyādessāmā’’ti. Thero tuṇhī ahosi. Chabbaggiyā panāhaṃsu ‘‘āvuso, pabbajitānaṃ nāma kāpotikā surā dullabhā ceva manāpā ca. Sace tumhe therassa pasannā, kāpotikaṃ suraṃ paṭiyādethā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā satthāraṃ svātanāya nimantetvā nagaraṃ pavisitvā attano attano gehe ‘‘therassa dassāmā’’ti kāpotikaṃ suraṃ pasannaṃ paṭiyādetvā theraṃ nimantetvā ghare ghare pasannaṃ suraṃ adaṃsu. Thero pivitvā surāmadamatto nagarato nikkhamanto dvārantare patitvā vilapamāno nipajji. Nachdem der Meister so lange, wie es ihm gefiel, in Bhaddavatikā verweilt hatte, reiste er nach Kosambī. Die Nachricht, dass der Ehrwürdige Sāgata die Schlange gezähmt hatte, verbreitete sich über das ganze Land. Die Einwohner von Kosambī gingen dem Meister entgegen, verneigten sich vor ihm, begaben sich dann zum Ehrwürdigen Sāgata, verneigten sich ebenfalls vor ihm, stellten sich an eine Seite und sprachen: „Ehrwürdiger Herr, sagt uns, was für euch schwer zu bekommen ist. Genau das wollen wir für euch bereiten.“ Der Ehrwürdige schwieg. Doch die Mönche der Sechsergruppe sprachen: „Ihr Freunde, für Mönche ist der hellbraune Alkohol, der wie die Füße einer Taube gefärbt ist, schwer zu bekommen und sehr begehrt. Wenn ihr Vertrauen in den Ehrwürdigen habt, dann bereitet diesen hellbraunen Alkohol.“ Jene willigten ein mit den Worten „Sehr wohl“, luden den Meister für den nächsten Tag ein, betraten die Stadt und bereiteten in ihren jeweiligen Häusern den klaren, taubenfußfarbenen Alkohol mit dem Gedanken „Wir wollen ihn dem Ehrwürdigen schenken“. Sie luden den Ehrwürdigen ein und boten ihm in jedem Haus den klaren Alkohol an. Nachdem der Ehrwürdige getrunken hatte, wurde er vollkommen betrunken. Als er die Stadt verließ, brach er im Tortor zusammen und lag dort jammernd am Boden. Satthā katabhattakicco nagarā nikkhamanto theraṃ tenākārena nipannaṃ disvā ‘‘gaṇhatha, bhikkhave, sāgata’’nti gāhāpetvā ārāmaṃ agamāsi. Bhikkhū therassa sīsaṃ tathāgatassa pādamūle katvā taṃ nipajjāpesuṃ, so parivattitvā pāde tathāgatābhimukhe katvā nipajji. Satthā bhikkhū paṭipucchi ‘‘kiṃ nu kho, bhikkhave, yaṃ pubbe sāgatassa mayi gāravaṃ, taṃ idāni atthī’’ti? ‘‘Natthi, bhante’’ti. ‘‘Bhikkhave, ambatitthakaṃ nāgarājānaṃ ko damesī’’ti. ‘‘Sāgato, bhante’’ti. ‘‘Kiṃ panetarahi, bhikkhave, sāgato udakadeḍḍūbhakampi dametuṃ sakkuṇeyyā’’ti. ‘‘No hetaṃ, bhante’’. ‘‘Api nu kho, bhikkhave, evarūpaṃ pātuṃ yuttaṃ, yaṃ pivitvā evaṃvisaññī hotī’’ti. ‘‘Ayuttaṃ, bhante’’ti. Atha kho bhagavā theraṃ garahitvā bhikkhū āmantetvā ‘‘surāmerayapāne pācittiya’’nti (pāci. 327) sikkhāpadaṃ paññāpetvā uṭṭhāyāsanā gandhakuṭiṃ pāvisi. Als der Meister nach Beendigung seines Mahls die Stadt verließ, sah er den ehrwürdigen Sāgata in jenem Zustand daliegen, ließ ihn mit den Worten „Mönche, nehmt Sāgata mit!“ aufheben und begab sich zum Kloster. Die Mönche legten den Kopf des ehrwürdigen Sāgata zu den Füßen des Tathāgata und legten ihn so hin. Doch er drehte sich um und lag da, während er seine Füße in Richtung des Tathāgata streckte. Der Meister fragte die Mönche: „Mönche, ist die Ehrfurcht, die Sāgata mir gegenüber früher hatte, jetzt noch da?“ – „Nein, ehrwürdiger Herr.“ – „Mönche, wer hat den Schlangenkönig Ambatitthaka gezähmt?“ – „Sāgata, ehrwürdiger Herr.“ – „Mönche, wäre Sāgata denn jetzt noch imstande, auch nur eine Wasserschlange zu zähmen?“ – „Gewiss nicht, ehrwürdiger Herr.“ – „Mönche, ist es denn angemessen, ein solches Getränk zu trinken, nach dessen Genuss man so das Bewusstsein verliert?“ – „Es ist unangemessen, ehrwürdiger Herr.“ Da tadelte der Erhabene den Ehrwürdigen, rief die Mönche herbei, verkündete die Trainingsregel: „Das Trinken von Alkohol und berauschenden Getränken ist ein Pācittiya-Vergehen“, erhob sich von seinem Sitz und betrat die Duftkammer. Dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū surāpānassa avaṇṇaṃ kathayiṃsu ‘‘yāva mahādosañcetaṃ, āvuso, surāpānaṃ nāma, tāva paññāsampannaṃ nāma iddhimantaṃ [Pg.383] sāgataṃ yathā satthu guṇamattampi na jānāti, tathā akāsī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva suraṃ pivitvā pabbajitā visaññino honti, pubbepi ahesuṃyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Die in der Halle der Lehre versammelten Mönche sprachen über die Schädlichkeit des Alkoholtrinkens: „Wie schwerwiegend ist doch dieses Trinken von Alkohol, ihr Brüder! Es hat bewirkt, dass selbst der an Weisheit reiche und übernatürliche Kräfte besitzende Sāgata nicht einmal mehr die Tugenden des Meisters erkennt.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, über welches Thema sprecht ihr hier im Kreis?“ Als sie antworteten: „Über dieses und jenes“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt verlieren Ordinierte das Bewusstsein, nachdem sie Alkohol getrunken haben; auch in der Vergangenheit war dies bereits der Fall“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kāsiraṭṭhe udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto isipabbajjaṃ pabbajitvā abhiññā ca samāpattiyo ca uppādetvā jhānakīḷaṃ kīḷanto himavantappadese vasati pañcahi antevāsikasatehi parivuto. Atha naṃ vassānasamaye sampatte antevāsikā āhaṃsu ‘‘ācariya, manussapathaṃ gantvā loṇambilaṃ sevitvā āgacchāmā’’ti. ‘‘Āvuso, ahaṃ idheva vasissāmi, tumhe pana gantvā sarīraṃ santappetvā vassaṃ vītināmetvā āgacchathā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti ācariyaṃ vanditvā bārāṇasiṃ gantvā rājuyyāne vasitvā punadivase bahidvāragāmeyeva bhikkhāya caritvā suhitā hutvā punadivase nagaraṃ pavisiṃsu. Manussā sampiyāyamānā bhikkhaṃ adaṃsu. Katipāhaccayena ca raññopi ārocesuṃ ‘‘deva, himavantato pañcasatā isayo āgantvā uyyāne vasanti ghoratapā paramadhitindriyā sīlavanto’’ti. Rājā tesaṃ guṇe sutvā uyyānaṃ gantvā vanditvā katapaṭisanthāro vassānaṃ catumāsaṃ tattheva vasanatthāya paṭiññaṃ gahetvā nimantesi, te tato paṭṭhāya rājageheyeva bhuñjitvā uyyāne vasanti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Lande Kāsi in einer hochangesehenen Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, trat er in den Orden der Asketen ein, erlangte die höheren Geisteskräfte und die Vertiefungen und verweilte, im Spiel der Vertiefungen verharrend, in der Region des Himavanta, umgeben von fünfhundert Schülern. Als nun die Regenzeit herannahte, sagten die Schüler zu ihm: „Lehrer, wir möchten in die bewohnten Gebiete der Menschen gehen, um salzige und saure Speisen zu uns zu nehmen und dann zurückzukehren.“ Er antwortete: „Ihr Lieben, ich werde hierbleiben. Ihr aber geht, stärkt eure Körper, verbringt dort die Regenzeit und kehrt dann zurück.“ Sie sagten: „Sehr wohl“, erwiesen dem Lehrer ihre Ehrerbietung, gingen nach Bārāṇasī und ließen sich im königlichen Garten nieder. Am nächsten Tag sammelten sie Almosenspeisen in einem Dorf direkt vor dem Stadttor, und nachdem sie gesättigt waren, betraten sie am folgenden Tag die Stadt. Die Menschen gaben ihnen voller Zuneigung Almosenspeisen. Nach Ablauf einiger Tage berichtete man auch dem König: „Majestät, fünfhundert Asketen aus dem Himavanta verweilen im Garten; sie üben strenge Entbehrungen, besitzen vollkommen gezügelte Sinne und sind von vorzüglicher Tugend.“ Als der König von ihren Tugenden hörte, begab er sich in den Garten, erwies ihnen seine Ehrerbietung, hieß sie freundlich willkommen und lud sie ein, die vier Monate der Regenzeit genau dort zu verbringen, nachdem er ihr Einverständnis eingeholt hatte. Von da an speisten sie im königlichen Palast und lebten im Garten. Athekadivasaṃ nagare surānakkhattaṃ nāma ahosi. Rājā ‘‘pabbajitānaṃ surā dullabhā’’ti bahuṃ uttamasuraṃ dāpesi. Tāpasā suraṃ pivitvā uyyānaṃ gantvā surāmadamattā hutvā ekacce uṭṭhāya nacciṃsu, ekacce gāyiṃsu, naccitvā gāyitvā khārikādīni avattharitvā niddāyitvā surāmade chinne pabujjhitvā taṃ attano vippakāraṃ disvā ‘‘na amhehi pabbajitasāruppaṃ kata’’nti roditvā paridevitvā ‘‘mayaṃ ācariyena vinābhūtattā evarūpaṃ pāpakammaṃ karimhā’’ti taṅkhaṇaññeva uyyānaṃ pahāya himavantaṃ gantvā paṭisāmitaparikkhārā ācariyaṃ vanditvā nisīditvā ‘‘kiṃ nu kho, tātā, manussapathe bhikkhāya akilamamānā sukhaṃ vasittha, samaggavāsañca pana vasitthā’’ti [Pg.384] pucchitā ‘‘ācariya, sukhaṃ vasimha, apica kho pana mayaṃ apātabbayuttakaṃ pivitvā visaññībhūtā satiṃ paccupaṭṭhāpetuṃ asakkontā naccimha ceva gāyimha cā’’ti etamatthaṃ ārocentā imaṃ gāthaṃ samuṭṭhāpetvā āhaṃsu – Eines Tages gab es in der Stadt ein sogenanntes Schnapsfest. Der König dachte: „Für Ordinierte ist berauschendes Getränk schwer zu bekommen“, und ließ ihnen reichlich feinsten Alkohol spenden. Die Asketen tranken den Alkohol, gingen in den Garten und wurden vom Alkoholrausch betrunken. Einige standen auf und tanzten, andere sangen. Nachdem sie getanzt und gesungen hatten, warfen sie ihre Tragstangen und andere Habseligkeiten durcheinander und schliefen ein. Als der Rausch verflogen war, erwachten sie, sahen ihr eigenes ungebührliches Verhalten und klagten weinend: „Wir haben nicht getan, was sich für Ordinierte geziemt!“ Sie weinten und jammerten: „Weil wir von unserem Lehrer getrennt waren, haben wir ein solches Fehlverhalten begangen!“ Augenblicklich verließen sie den Garten, kehrten in den Himavanta zurück, räumten ihre Utensilien auf, erwiesen dem Lehrer ihre Ehrerbietung und setzten sich nieder. Auf seine Frage: „Meine Lieben, habt ihr im bewohnten Gebiet der Menschen ohne Mühe beim Almosengang glücklich gelebt und habt ihr in Eintracht zusammengelebt?“, antworteten sie, um ihm den Sachverhalt zu berichten und diese Strophe anzustimmen: „Lehrer, wir lebten glücklich. Dennoch haben wir etwas getrunken, das man nicht trinken sollte. Dadurch verloren wir das Bewusstsein, und unfähig, die Achtsamkeit aufrechtzuerhalten, haben wir sowohl getanzt als auch gesungen.“ 81. 81. ‘‘Apāyimha anaccimha, agāyimha rudimha ca; Visaññīkaraṇiṃ pitvā, diṭṭhā nāhumha vānarā’’ti. „Wir tranken und wir tanzten, wir sangen und wir weinten; nachdem wir das getrunken hatten, was das Bewusstsein raubt, ist es ein Glück, dass wir nicht zu Affen wurden.“ Tattha apāyimhāti suraṃ pivimha. Anaccimhāti taṃ pivitvā hatthapāde lāḷentā naccimha. Agāyimhāti mukhaṃ vivaritvā āyatakena sarena gāyimha. Rudimha cāti puna vippaṭisārino ‘‘evarūpaṃ nāma amhehi kata’’nti rodimha ca. Visaññīkaraṇiṃ pitvā, diṭṭhā nāhumha vānarāti evarūpaṃ saññāvināsanato visaññīkaraṇiṃ suraṃ pivitvā ‘‘etadeva sādhu, yaṃ vānarā nāhumhā’’ti. Evaṃ te attano aguṇaṃ kathesuṃ. Darin bedeutet „apāyimhā“: Wir tranken berauschendes Getränk. „anaccimhā“ bedeutet: Nachdem wir es getrunken hatten, tanzten wir, während wir Hände und Füße bewegten. „agāyimhā“ bedeutet: Wir öffneten den Mund und sangen mit lauter, gedehnter Stimme. „rudimha ca“ bedeutet: Später bereuten wir und weinten, indem wir dachten: „So etwas Ungehöriges haben wir getan!“ „visaññīkaraṇiṃ pitvā, diṭṭhā nāhumha vānarā“ bedeutet: Nachdem wir dieses berauschende Getränk getrunken hatten, das wegen der Zerstörung der Wahrnehmung das Bewusstsein raubt, war es das Beste, dass wir nicht zu Affen wurden. So offenbarten sie ihr eigenes Fehlverhalten. Bodhisatto ‘‘garusaṃvāsarahitānaṃ nāma evarūpaṃ hotiyevā’’ti te tāpase garahitvā ‘‘puna evarūpaṃ mākaritthā’’ti tesaṃ ovādaṃ datvā aparihīnajjhāno brahmalokaparāyaṇo ahosi. Der Bodhisatta tadelte jene Asketen mit den Worten: „Für diejenigen, die getrennt von einem zu respektierenden Lehrer leben, geschieht so etwas Ungehöriges eben“, und ermahnte sie: „Tut so etwas nicht wieder!“ Mit ungeminderten Vertiefungen ging er schließlich in die Brahma-Welt ein. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi. Ito paṭṭhāya hi ‘‘anusandhiṃ ghaṭetvā’’ti idampi na vakkhāma. Tadā isigaṇo buddhaparisā ahosi, gaṇasatthā pana ahameva ahosinti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und führte die Geburtshistorie zusammen: „Ab hier werden wir die Verknüpfung nicht mehr explizit so formulieren. Die damalige Schar der Asketen war die Gefolgschaft des Buddha, der Anführer der Asketenschar aber war ich selbst.“ Surāpānajātakavaṇṇanā paṭhamā. Hier endet die Erklärung des Surāpāna-Jātaka, das erste.
[82] 2. Mittavindakajātakavaṇṇanā [82] 2. Die Erklärung des Mittavindaka-Jātaka. Atikkamma ramaṇakanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Imassa pana jātakassa kassapasammāsambuddhakālikaṃ vatthu, taṃ dasakanipāte mahāmittavindakajātake (jā. 1.1.82; 1.5.100 ādayo) āvi bhavissati. Tadā pana bodhisatto imaṃ gāthamāha – „Atikkamma ramaṇakaṃ“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf einen schwer belehrbaren Mönch. Die Hintergrundgeschichte dieses Jātaka jedoch stammt aus der Zeit des vollkommen Erleuchteten Kassapa; diese wird im Zehner-Buch im Mahāmittavindaka-Jātaka deutlich werden. Damals aber sprach der Bodhisatta diese Strophe: 82. 82. ‘‘Atikkamma [Pg.385] ramaṇakaṃ, sadāmattañca dūbhakaṃ; Svāsi pāsāṇamāsīno, yasmā jīvaṃ na mokkhasī’’ti. „Nachdem du den Ramaṇaka-Palast, den Sadāmatta- und den Dūbhaka-Palast hinter dir gelassen hast, sitzt du nun auf einer Steinplatte, von der du nicht lebendig entkommen wirst.“ Tattha ramaṇakanti tasmiṃ kāle phalikassa nāmaṃ, phalikapāsādañca atikkantosīti dīpeti. Sadāmattañcāti rajatassa nāmaṃ, rajatapāsādañca atikkantosīti dīpeti. Dūbhakanti maṇino nāmaṃ, maṇipāsādañca atikkantosīti dīpeti. Svāsīti so asi tvaṃ. Pāsāṇamāsīnoti khuracakkaṃ nāma pāsāṇamayaṃ vā hoti rajatamayaṃ vā maṇimayaṃ vā, taṃ pana pāsāṇamayameva. So ca tena āsīno atiniviṭṭho ajjhotthaṭo. Tasmā pāsāṇena āsīnattā ‘‘pāsāṇāsīno’’ti vattabbe byañjanasandhivasena makāraṃ ādāya ‘‘pāsāṇamāsīno’’ti vuttaṃ. Pāsāṇaṃ vā āsīno, taṃ khuracakkaṃ āsajja pāpuṇitvā ṭhitoti attho. Yasmā jīvaṃ na mokkhasīti yasmā khuracakkā yāva te pāpaṃ na khīyati, tāva jīvantoyeva na muccissasi, taṃ āsīnosīti. Darin bedeutet ‚ramaṇaka‘: zu jener Zeit der Name des Kristalls; es zeigt an: ‚und du hast den Kristallpalast hinter dir gelassen‘. ‚sadāmattañca‘ ist der Name des Silbers; es zeigt an: ‚und du hast den Silberpalast hinter dir gelassen‘. ‚dūbhaka‘ ist der Name des Edelsteins; es zeigt an: ‚und du hast den Edelsteinpalast hinter dir gelassen‘. ‚svāsī‘ bedeutet: ‚das bist du selbst‘. Zu ‚pāsāṇamāsīno‘: Das sogenannte Schermesser-Rad besteht entweder aus Stein, aus Silber oder aus Edelsteinen; dieses jedoch besteht nur aus Stein. Und er sitzt darauf, ist darauf fixiert und davon überwältigt. Weil er auf Stein sitzt, sollte es eigentlich ‚pāsāṇāsīno‘ heißen, aber aufgrund einer Konsonantenverbindung wurde der Buchstabe ‚ma‘ eingefügt und es wurde ‚pāsāṇamāsīno‘ gesagt. Oder aber: ‚auf den Stein gelangt‘, was bedeutet, dass er dieses Schermesser-Rad erreicht hat, dorthin gelangt ist und darauf steht. ‚yasmā jīvaṃ na mokkhasi‘ bedeutet: Weil du von diesem Schermesser-Rad, solange dein böses Karma nicht erschöpft ist, so lange du noch lebst, nicht befreit werden wirst, darauf sitzt du nun. Imaṃ gāthaṃ vatvā bodhisatto attano vasanaṭṭhānaṃyeva gato. Mittavindakopi khuracakkaṃ ukkhipitvā mahādukkhaṃ anubhavamāno pāpakamme parikkhīṇe yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta diesen Vers gesprochen hatte, ging er an seinen eigenen Wohnort zurück. Auch Mittavindaka trug das Schermesser-Rad auf dem Kopf, erlitt großes Leid und ging, als sein böses Karma erschöpft war, gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mittavindako dubbacabhikkhu ahosi, devarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister brachte diese Lehrverkündigung dar und verknüpfte das Jātaka: ‚Damals war Mittavindaka der schwer zu belehrende Mönch, der Götterkönig aber war ich selbst.‘ Mittavindakajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des zweiten Mittavindaka-Jātaka.
[83] 3. Kāḷakaṇṇijātakavaṇṇanā [83] 3. Die Erklärung des Kāḷakaṇṇi-Jātaka Mitto have sattapadena hotīti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ anāthapiṇḍikassa mittaṃ ārabbha kathesi. So kira anāthapiṇḍikena saddhiṃ sahapaṃsukīḷiko ekācariyasseva santike uggahitasippo nāmena kāḷakaṇṇī nāma. So gacchante kāle duggato hutvā [Pg.386] jīvituṃ asakkonto seṭṭhissa santikaṃ agamāsi. So taṃ samassāsetvā paribbayaṃ datvā attano kuṭumbaṃ paṭicchāpesi. So seṭṭhino upakārako hutvā sabbakiccāni karoti. Taṃ seṭṭhissa santikaṃ āgatakāle ‘‘tiṭṭha, kāḷakaṇṇi, nisīda, kāḷakaṇṇi, bhuñja kāḷakaṇṇī’’ti vadanti. Athekadivasaṃ seṭṭhino mittāmaccā seṭṭhiṃ upasaṅkamitvā evamāhaṃsu ‘‘mahāseṭṭhi, mā etaṃ tava santike kari, ‘tiṭṭha, kāḷakaṇṇi, nisīda kāḷakaṇṇi, bhuñja kāḷakaṇṇī’ti hi iminā saddena yakkhopi palāyeyya, na cesa tayā samāno, duggato durūpeto, kiṃ te iminā’’ti. Anāthapiṇḍiko ‘‘nāmaṃ nāma vohāramattaṃ, na taṃ paṇḍitā pamāṇaṃ karonti, sutamaṅgalikena nāma bhavituṃ na vaṭṭati, na sakkā mayā nāmamattaṃ nissāya sahapaṃsukīḷikaṃ sahāyaṃ pariccajitu’’nti tesaṃ vacanaṃ anādāya ekadivasaṃ attano bhogagāmaṃ gacchanto taṃ geharakkhakaṃ katvā agamāsi. „Ein Freund wahrlich wird man durch sieben Schritte“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verwelte, im Hinblick auf einen Freund von Anāthapiṇḍika. Jener war angeblich ein Jugendfreund von Anāthapiṇḍika, der mit ihm im Staub gespielt hatte und bei demselben Lehrer die Künste erlernt hatte; sein Name war Kāḷakaṇṇi. Als die Zeit verging, verarmte er, und da er seinen Lebensunterhalt nicht mehr bestreiten konnte, ging er zum Großkaufmann. Dieser tröstete ihn, gab ihm ein Auskommen und betraute ihn mit der Pflege seines Haushalts. Er erwies sich dem Großkaufmann als nützlich und erledigte alle Aufgaben. Wenn er in die Nähe des Großkaufmanns kam, sagten die Leute: „Steh auf, Kāḷakaṇṇi (Unglücksbringer)! Setz dich, Kāḷakaṇṇi! Iss, Kāḷakaṇṇi!“ Eines Tages traten die Freunde und Berater des Großkaufmanns an ihn heran und sprachen: „Großkaufmann, halte diesen Mann nicht in deiner Nähe! Denn bei diesem Ruf: ‚Steh auf, Kāḷakaṇṇi! Setz dich, Kāḷakaṇṇi! Iss, Kāḷakaṇṇi!‘ würde selbst ein Yakkha fliehen. Zudem ist er dir nicht ebenbürtig, er ist arm und von hässlicher Gestalt. Was willst du mit ihm?“ Anāthapiṇḍika dachte: „Ein Name ist bloß eine Bezeichnung, die Weisen messen ihm keine Bedeutung bei. Es ist nicht recht, abergläubisch an glückverheißende Worte zu glauben. Ich kann meinen Jugendfreund, mit dem ich im Staub gespielt habe, nicht bloß wegen seines Namens verstoßen.“ Ohne auf ihre Worte zu hören, setzte er ihn eines Tages, als er zu seinem Lehnsdorf reiste, als Hauswächter ein und reiste ab. Corā ‘‘seṭṭhi kira bhogagāmaṃ gato, gehamassa vilumpissāmā’’ti nānāvudhahatthā rattibhāge āgantvā gehaṃ parivāresuṃ. Itaropi corānaññeva āgamanaṃ āsaṅkamāno aniddāyantova nisīdi. So corānaṃ āgatabhāvaṃ ñatvā manusse pabodhetuṃ ‘‘tvaṃ saṅkhaṃ dhama, tvaṃ mudiṅgaṃ vādehī’’ti mahāsamajjaṃ karonto viya sakalanivesanaṃ ekasaddaṃ kāresi. Corā ‘‘suññaṃ gehanti dussutaṃ amhehi, attheva idha mahāseṭṭhī’’ti pāsāṇamuggarādīni tattheva chaḍḍetvā palāyiṃsu. Die Diebe dachten: „Der Großkaufmann ist wohl in sein Lehnsdorf gereist; wir wollen sein Haus ausrauben.“ Sie kamen zur Nachtzeit mit verschiedenen Waffen in den Händen und umstellten das Haus. Der andere aber, der das Kommen von Dieben ahnte, saß schlaflos da. Als er das Kommen der Diebe bemerkte, rief er, um die Leute aufzuwecken: „Blas du das Muschelhorn! Schlag du die Trommel!“, und erzeugte im ganzen Haus einen ohrenbetäubenden Lärm, als feierten sie ein großes Fest. Die Diebe dachten: „Wir haben fälschlicherweise gehört, dass das Haus leer sei. Der Großkaufmann ist gewiss hier!“, warfen ihre Steine, Keulen und andere Waffen genau dort hin und flohen. Punadivase manussā tattha tattha chaḍḍite pāsāṇamuggarādayo disvā saṃvegappattā hutvā ‘‘sace ajja evarūpo buddhisampanno gharavicārako nābhavissa, corehi yathāruciyā pavisitvā sabbaṃ gehaṃ viluttaṃ assa, imaṃ daḷhamittaṃ nissāya seṭṭhino vuḍḍhi jātā’’ti taṃ pasaṃsitvā seṭṭhissa bhogagāmato āgatakāle sabbaṃ taṃ pavattiṃ ārocayiṃsu. Atha ne seṭṭhi avoca ‘‘tumhe evarūpaṃ mama geharakkhakaṃ mittaṃ nikkaḍḍhāpetha, sacāyaṃ tumhākaṃ vacanena mayā nikkaḍḍhito assa, ajja me kuṭumbaṃ kiñci nābhavissa, nāmaṃ nāma appamāṇaṃ, hitacittameva pamāṇa’’nti tassa uttaritaraṃ paribbayaṃ datvā ‘‘atthi dāni me idaṃ kathāpābhata’’nti satthu santikaṃ gantvā ādito [Pg.387] paṭṭhāya sabbaṃ taṃ pavattiṃ ārocesi. Satthā ‘‘na kho, gahapati, idāneva kāḷakaṇṇimitto attano mittassa ghare kuṭumbaṃ rakkhati, pubbepi rakkhiyevā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. Am nächsten Tag sahen die Leute die hier und da weggeworfenen Steine, Keulen und andere Waffen. Sie erschraken zutiefst und sagten: „Wenn heute nicht ein so kluger Hausverwalter da gewesen wäre, wären die Diebe nach Belieben eingedrungen und das ganze Haus wäre ausgeraubt worden. Dank dieses treuen Freundes ist dem Großkaufmann Gutes widerfahren.“ Sie lobten ihn und berichteten dem Großkaufmann das ganze Geschehnis, als er aus seinem Lehnsdorf zurückkehrte. Darauf sprach der Großkaufmann zu ihnen: „Ihr wolltet, dass ich einen solchen Freund, der mein Haus bewacht, vertreibe. Wenn ich ihn auf euer Wort hin vertrieben hätte, hätte ich heute keinerlei Besitz mehr übrig. Ein Name ist wahrlich ohne Bedeutung, nur der wohlwollende Geist ist von Bedeutung.“ Er gab ihm einen noch höheren Lohn, dachte: „Nun habe ich ein schönes Gesprächsgeschenk für den Meister“, ging zum Meister und berichtete ihm das ganze Geschehnis von Anfang an. Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, Hausvater, beschützt der Freund Kāḷakaṇṇi den Besitz im Hause seines Freundes; auch in der Vergangenheit hat er ihn schon beschützt.“ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mahāyaso seṭṭhi ahosi. Tassa kāḷakaṇṇī nāma mittoti sabbaṃ paccuppannavatthusadisameva. Bodhisatto bhogagāmato āgato taṃ pavattiṃ sutvā ‘‘sace mayā tumhākaṃ vacanena evarūpo mitto nikkaḍḍhito assa, ajja me kuṭumbaṃ kiñci nābhavissā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta ein sehr angesehener Großkaufmann. Er hatte einen Freund namens Kāḷakaṇṇi. Alles Weitere ist genau wie in der Gegenwartserzählung. Als der Bodhisatta aus seinem Lehnsdorf zurückkehrte und von dem Vorfall hörte, sprach er: „Wenn ich auf euer Wort hin einen solchen Freund vertrieben hätte, hätte ich heute keinerlei Besitz mehr übrig“, und sprach diesen Vers: 83. 83. ‘‘Mitto have sattapadena hoti, sahāyo pana dvādasakena hoti; Māsaḍḍhamāsena ca ñāti hoti, tatuttariṃ attasamopi hoti; Sohaṃ kathaṃ attasukhassa hetu, cirasanthutaṃ kāḷakaṇṇiṃ jaheyya’’nti. „Ein Freund wird man fürwahr durch sieben Schritte, ein Gefährte aber durch ein zwölftägiges Beisammensein; durch einen Monat oder einen halben Monat wird man wie ein Verwandter, und darüber hinaus wird man gar wie man selbst. Wie könnte ich also um meines eigenen Glückes willen Kāḷakaṇṇi, meinen langjährigen Gefährten, verstoßen?“ Tattha haveti nipātamattaṃ. Mettāyatīti mitto, mettaṃ paccupaṭṭhāpeti, sinehaṃ karotīti attho. So panesa sattapadena hoti, ekato sattapadavītihāragamanamattena hotīti attho. Sahāyo pana dvādasakena hotīti sabbakiccāni ekato karaṇavasena sabbiriyāpathesu saha gacchatīti sahāyo. So panesa dvādasakena hoti, dvādasāhaṃ ekato nivāsena hotīti attho. Māsaḍḍhamāsena cāti māsena vā aḍḍhamāsena vā. Ñāti hotīti ñātisamo hoti. Tatuttarinti tato uttariṃ ekato vāsena attasamopi hotiyeva. Jaheyyanti ‘‘evarūpaṃ sahāyaṃ kathaṃ jaheyya’’nti mittassa guṇaṃ kathesi. Tato paṭṭhāya puna koci tassa antare vattā nāma nāhosīti. Darin ist ‚have‘ bloß eine Partikel. ‚mettāyati‘ (wer Metta übt) ist ein Freund (mitto); das bedeutet, er bringt Metta (liebevolle Güte) entgegen und erzeugt Zuneigung. Und dieser wird durch sieben Schritte zum Freund, was bedeutet, allein durch das gemeinsame Gehen von sieben Schritten. Zu ‚sahāyo pana dvādasakena hoti‘ (ein Gefährte aber wird man durch zwölf Tage): Wer alle Angelegenheiten gemeinsam erledigt und in allen Körperhaltungen gemeinsam geht, wird Gefährte (sahāyo) genannt. Und dieser wird durch zwölf Tage zum Gefährten, was bedeutet, durch ein zwölftägiges Zusammenwohnen. Zu ‚māsaḍḍhamāsena ca‘: entweder durch einen Monat oder durch einen halben Monat. Zu ‚ñāti hoti‘: er gleicht einem Verwandten. Zu ‚tatuttariṃ‘ (darüber hinaus): durch ein noch längeres Zusammenwohnen darüber hinaus wird er wahrlich wie die eigene Person. Zu ‚jaheyyaṃ‘ (wie könnte ich verstoßen): „Wie könnte ich einen solchen Gefährten verstoßen?“, so sprach er über die Vorzüge des Freundes. Von da an gab es niemanden mehr, der es wagte, im Hause des Großkaufmanns über diesen Freund Schlechtes zu reden. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kāḷakaṇṇī ānando ahosi, bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war Kāḷakaṇṇi der Ehrwürdige Ānanda, der Kaufmann von Bārāṇasī aber war ich selbst.“ Kāḷakaṇṇijātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Kāḷakaṇṇi-Jātaka, das dritte, ist abgeschlossen.
[84] 4. Atthassadvārajātakavaṇṇanā [84] 4. Die Erklärung des Atthassadvāra-Jātaka. Ārogyamicche [Pg.388] paramañca lābhanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ atthakusalaṃ kulaputtaṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyañhi ekassa mahāvibhavassa seṭṭhino putto jātiyā sattavasso paññavā atthakusalo. So ekadivasaṃ pitaraṃ upasaṅkamitvā atthassa dvārapañhaṃ nāma pucchi, so taṃ na jānāti. Athassa etadahosi ‘‘ayaṃ pañho atisukhumo, ṭhapetvā sabbaññubuddhaṃ añño upari bhavaggena, heṭṭhā ca avīcinā paricchinne lokasannivāse etaṃ pañhaṃ kathetuṃ samattho nāma natthī’’ti. So puttamādāya bahuṃ mālāgandhavilepanaṃ gāhāpetvā jetavanaṃ gantvā satthāraṃ pūjetvā vanditvā ekamantaṃ nisinno bhagavantaṃ etadavoca ‘‘ayaṃ, bhante, dārako paññavā atthakusalo maṃ atthassa dvārapañhaṃ nāma pucchi, ahaṃ taṃ pañhaṃ ajānanto tumhākaṃ santikaṃ āgato, sādhu me, bhante, bhagavā taṃ pañhaṃ kathetū’’ti. Satthā ‘‘pubbepāhaṃ, upāsaka, iminā kumārakenetaṃ pañhaṃ puṭṭho, mayā cassa kathito, tadā naṃ esa jānāti, idāni pana bhavasaṅkhepagatattā na sallakkhetī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Man sollte Gesundheit als den höchsten Gewinn erstreben“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines klugen Jünglings, der seinen Nutzen wohl verstand. In Sāvatthī war nämlich der Sohn eines sehr wohlhabenden Kaufmanns von Geburt an erst sieben Jahre alt, jedoch weise und geschickt darin, zu erkennen, was nützlich ist. Eines Tages trat er an seinen Vater heran und stellte ihm die Frage nach den Toren zum Nutzen. Dieser wusste die Antwort darauf nicht. Da dachte der Vater: „Diese Frage ist äußerst tiefgründig. Abgesehen von einem allwissenden Buddha gibt es in der gesamten bewohnten Welt, die oben durch die höchste Existenzebene und unten durch die Avīci-Hölle begrenzt ist, niemanden, der diese Frage beantworten könnte.“ Er nahm seinen Sohn mit, ließ reichlich Blumen, Duftstoffe und Salben mitnehmen, ging zum Jetavana, verehrte den Meister, grüßte ihn ehrerbietig, setzte sich seitlich nieder und sprach zum Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, dieser Knabe ist weise und versteht es, den Nutzen zu erkennen. Er hat mir die Frage nach den Toren zum Nutzen gestellt. Da ich diese Frage nicht beantworten konnte, bin ich zu Euch gekommen. Möge der Erhabene mir gütigerweise diese Frage beantworten.“ Der Meister sprach: „Löblicher Hausvater, bereits in der Vergangenheit hat dieser Knabe mich diese Frage gefragt, und ich habe sie ihm beantwortet. Damals wusste er es, doch jetzt, da er in eine neue Existenz eingetreten ist, erinnert er sich nicht mehr daran.“ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mahāvibhavo seṭṭhi ahosi. Athassa putto sattavassiko jātiyā paññavā atthakusalo. So ekadivasaṃ pitaraṃ upasaṅkamitvā ‘‘tāta, atthassa dvāraṃ nāma ki’’nti atthassa dvārapañhaṃ pucchi. Athassa pitā taṃ pañhaṃ kathento imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta ein sehr wohlhabender Kaufmann. Damals hatte er einen siebenjährigen Sohn, der von Geburt an weise und geschickt darin war, zu erkennen, was nützlich ist. Eines Tages trat er an seinen Vater heran und stellte ihm die Frage nach den Toren zum Nutzen, indem er fragte: „Lieber Vater, was ist das sogenannte Tor zum Nutzen?“ Da sprach sein Vater, um diese Frage zu beantworten, folgende Strophe: 84. 84. ‘‘Ārogyamicche paramañca lābhaṃ, sīlañca vuddhānumataṃ sutañca; Dhammānuvattī ca alīnatā ca, atthassa dvārā pamukhā chaḷete’’ti. „Man sollte Gesundheit als den höchsten Gewinn erstreben, Sittlichkeit, die von den Weisen gebilligt wird, und Gelehrsamkeit, ein Leben gemäß dem Dhamma sowie Unverdrossenheit – diese sechs sind die vorzüglichsten Tore zum Nutzen.“ Tattha ārogyamicche paramañca lābhanti ca-kāro nipātamattaṃ. Tāta, paṭhamameva ārogyasaṅkhātaṃ paramaṃ lābhaṃ iccheyyāti imamatthaṃ dīpento evamāha. Tattha ārogyaṃ nāma sarīrassa ceva cittassa ca arogabhāvo anāturatā. Sarīre hi rogāture neva aladdhaṃ bhogalābhaṃ uppādetuṃ sakkoti, na laddhaṃ paribhuñjituṃ, anāture pana ubhayampetaṃ sakkoti. Citte ca kilesāture neva aladdhaṃ jhānādibhedaṃ lābhaṃ uppādetuṃ [Pg.389] sakkoti, na laddhaṃ puna samāpattivasena paribhuñjituṃ. Etasmiṃ anārogye sati aladdhopi lābho na labbhati, laddhopi niratthako hoti, asati panetasmiṃ aladdhopi lābho labbhati, laddhopi sātthako hotīti ārogyaṃ paramo lābho nāma. Taṃ sabbapaṭhamaṃ icchitabbaṃ. Idamekaṃ atthassa dvāranti ayamettha attho. Sīlañcāti ācārasīlaṃ. Iminā lokacārittaṃ dasseti. Vuddhānumatanti guṇavuddhānaṃ paṇḍitānaṃ anumataṃ. Iminā ñāṇasampannānaṃ garūnaṃ ovādaṃ dasseti. Sutañcāti kāraṇanissitaṃ sutaṃ. Iminā imasmiṃ loke atthanissitaṃ bāhusaccaṃ dasseti. Dhammānuvattī cāti tividhassa sucaritadhammassa anuvattanaṃ. Iminā duccaritadhammaṃ vajjetvā sucaritadhammassa anuvattanabhāvaṃ dasseti. Alīnatā cāti cittassa alīnatā anīcatā. Iminā cittassa asaṅkocataṃ paṇītabhāvaṃ uttamabhāvaṃ dasseti. Atthassa dvārā pamukhā chaḷeteti attho nāma vuḍḍhi, tassa vuḍḍhisaṅkhātassa lokiyalokuttarassa atthassa ete pamukhā uttamā cha dvārā upāyā adhigamamukhānīti. Darin ist das Wort „ca“ in der Formulierung „ārogyamicche paramañca lābhaṃ“ bloß eine Partikel. „Lieber Sohn, man sollte vor allem den höchsten Gewinn erstreben, der als Gesundheit bekannt ist“ – um diese Bedeutung zu verdeutlichen, sprach er dies. Hierbei bedeutet „Gesundheit“ (ārogya) das Freisein von Krankheit und das Nicht-Leiden des Körpers wie auch des Geistes. Denn wenn der Körper von Krankheit geplagt ist, kann man weder neuen, noch nicht erlangten Besitz erwerben, noch den bereits erlangten genießen. Wenn er jedoch gesund ist, ist beides möglich. Und wenn der Geist von Befleckungen geplagt ist, kann man weder einen noch nicht erlangten Gewinn wie die Vertiefungen (jhāna) und dergleichen hervorbringen, noch den bereits erlangten im Zustand der Erreichung (samāpatti) genießen. Wenn diese Krankheit vorliegt, wird ein noch nicht erlangter Gewinn nicht erlangt, und ein bereits erlangter wird nutzlos. Wenn diese Krankheit jedoch nicht vorliegt, wird auch der noch nicht erlangte Gewinn erlangt und der bereits erlangte wird nützlich. Daher wird Gesundheit der höchste Gewinn genannt. Diese sollte man zuallererst erstreben. „Dies ist ein Tor zum Nutzen“ – das ist hier die Bedeutung. „Und Sittlichkeit“ (sīlañca) bezieht sich auf die gute Lebensführung. Damit zeigt er das weltliche Verhalten. „Von den Weisen gebilligt“ (vuddhānumata) bedeutet: gebilligt von jenen, die reich an Tugenden und weise sind. Damit zeigt er den Rat von weisen Respektspersonen. „Und Gelehrsamkeit“ (sutañca) meint das Wissen, das auf vernünftigen Gründen beruht. Damit zeigt er das nützliche, breite Wissen in dieser Welt. „Ein Leben gemäß dem Dhamma“ (dhammānuvattī ca) bedeutet die Ausübung des dreifachen heilsamen Wandels. Damit zeigt er das Meiden von schlechtem Verhalten und das Ausüben des guten Verhaltens. „Und Unverdrossenheit“ (alīnatā ca) bedeutet das Unverzagtsein und die Unbeugsamkeit des Geistes. Damit zeigt er die Entschlossenheit, die Vorzüglichkeit und den edlen Zustand des Geistes. „Diese sechs sind die vorzüglichsten Tore zum Nutzen“: Nutzen (attha) bedeutet Fortschritt. Für diesen als Fortschritt bezeichneten weltlichen und überweltlichen Nutzen sind dies die sechs vorzüglichen, hervorragenden Tore, Mittel und Zugangswege. Evaṃ bodhisatto puttassa atthassa dvārapañhaṃ kathesi. So tato paṭṭhāya tesu chasu dhammesu vatti. Bodhisattopi dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. So beantwortete der Bodhisatta seinem Sohn die Frage nach den Toren zum Nutzen. Von da an übte sich jener Sohn in diesen sechs Tugenden. Auch der Bodhisatta vollbrachte heilsame Taten wie das Geben von Almosen und dergleichen und ging gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā puttova paccuppannaputto, mahāseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Sohn ebendieser Sohn von heute, der große Kaufmann aber war ich selbst.“ Atthassadvārajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Atthassadvāra-Jātaka, das vierte, ist abgeschlossen.
[85] 5. Kiṃpakkajātakavaṇṇanā [85] 5. Die Erklärung des Kimpakka-Jātaka. Āyatiṃ dosaṃ nāññāyāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ ukkaṇṭhitabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Aññataro kira kulaputto buddhasāsane uraṃ datvā pabbajito ekadivasaṃ sāvatthiyaṃ piṇḍāya caranto ekaṃ alaṅkataitthiṃ disvā ukkaṇṭhi. Atha naṃ ācariyupajjhāyā satthu santikaṃ ānayiṃsu. Satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhitosī’’ti pucchitvā [Pg.390] ‘‘sacca’’nti vutte ‘‘pañca kāmaguṇā nāmete bhikkhu paribhogakāle ramaṇīyā. So pana tesaṃ paribhogo nirayādīsu paṭisandhidāyakattā kiṃpakkaphalaparibhogasadiso hoti. Kiṃpakkaphalaṃ nāma vaṇṇagandharasasampannaṃ, khāditaṃ pana antāni khaṇḍitvā jīvitakkhayaṃ pāpeti. Pubbe bahū bālajanā tassa dosaṃ adisvā vaṇṇagandharasesu bajjhitvā taṃ phalaṃ paribhuñjitvā jīvitakkhayaṃ pāpuṇiṃsū’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. „Ohne das zukünftige Verderben zu erkennen“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines unzufriedenen Mönchs. Es heißt, ein gewisser Jüngling aus gutem Hause widmete sich ganz der Lehre des Buddha und wurde Mönch. Als er eines Tages in Sāvatthī auf Almosengang ging, erblickte er eine geschmückte Frau und verlor die Freude am Mönchsleben. Da brachten ihn seine Lehrer und Lehrer-Mönche zum Meister. Der Meister fragte ihn: „Mönch, stimmt es, dass du unzufrieden geworden bist?“ Als dieser antwortete: „Es stimmt“, sprach der Meister: „Mönch, diese pfirsichähnlichen fünf Arten von Sinnesfreuden sind zur Zeit des Genusses zwar verlockend, doch dieser Genuss führt zur Wiedergeburt in den Höllen und anderen niederen Welten und gleicht daher dem Verzehr der Kimpakka-Frucht. Die Kimpakka-Frucht ist zwar reich an ansprechender Farbe, Duft und Wohlgeschmack, doch wenn man sie isst, zerschneidet sie die Gedärme und führt zum Tod. In der Vergangenheit erkannten viele törichte Menschen deren Verderben nicht, ließen sich von Farbe, Duft und Geschmack fesseln, verzehrten diese Frucht und fanden so den Tod.“ Nach diesen Worten erzählte er auf Bitten der Mönche eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto satthavāho hutvā pañcahi sakaṭasatehi pubbantāparantaṃ gacchanto aṭavimukhaṃ patvā manusse sannipātetvā ‘‘imissā aṭaviyā visarukkhā nāma atthi, mā kho maṃ anāpucchā pubbe akhāditapubbāni phalāphalāni khāditthā’’ti ovadi. Manussā aṭaviṃ atikkamitvā aṭavimukhe ekaṃ kiṃpakkarukkhaṃ phalabhāraoṇamitasākhaṃ addasaṃsu. Tassa khandhasākhāpattaphalāni saṇṭhānavaṇṇarasagandhehi ambasadisāneva. Tesu ekacce vaṇṇagandharasesu bajjhitvā ambaphalasaññāya phalāni khādiṃsu, ekacce ‘‘satthavāhaṃ pucchitvā khādissāmā’’ti gahetvā aṭṭhaṃsu. Bodhisatto taṃ ṭhānaṃ patvā ye gahetvā ṭhitā, te phalāni chaḍḍāpetvā, ye khādamānā aṭṭhaṃsu, te vamanaṃ kāretvā tesaṃ bhesajjaṃ adāsi. Tesu ekacce arogā jātā, paṭhamameva khāditvā ṭhitā pana jīvitakkhayaṃ pattā. Bodhisattopi icchitaṭṭhānaṃ sotthinā gantvā lābhaṃ labhitvā puna sakaṭṭhānameva āgantvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Als in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta ein Karawanenführer. Als er mit fünfhundert Wagen von Osten nach Westen reiste und den Eingang eines Waldes erreichte, versammelte er die Menschen und ermahnte sie: „In diesem Wald gibt es sogenannte Giftbäume. Esst ja keine Früchte, die ihr zuvor noch nie gegessen habt, ohne mich vorher zu fragen!“ Nachdem die Menschen den Wald durchquert hatten, sahen sie am Rande des Waldes einen Kimpakka-Baum (Giftbaum), dessen Äste sich unter der Last der Früchte bogen. Dessen Stamm, Äste, Blätter und Früchte glichen in Form, Farbe, Geschmack und Geruch völlig denen eines Mangobaumes. Einige von ihnen ließen sich von der Farbe, dem Geruch und dem Geschmack fesseln und aßen die Früchte im Glauben, es seien Mangos. Andere dachten: „Wir wollen erst den Karawanenführer fragen und dann essen“, hielten die Früchte in der Hand und warteten. Als der Bodhisatta jenen Ort erreichte, veranlasste er jene, die die Früchte nur in der Hand hielten, diese wegzuwerfen. Jene, die bereits davon gegessen hatten, brachte er zum Erbrechen und gab ihnen Medizin. Einige von ihnen wurden wieder gesund; diejenigen jedoch, die bereits ganz zu Anfang davon gegessen hatten, starben. Auch der Bodhisatta zog wohlbehalten an den gewünschten Ort, machte seinen Gewinn, kehrte wieder an seinen eigenen Ort zurück, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosen und ging gemäß seinem Karma fort. Satthā taṃ vatthuṃ kathetvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte erzählt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diese Strophe: 85. 85. ‘‘Āyatiṃ dosaṃ nāññāya, yo kāme paṭisevati; Vipākante hananti naṃ, kiṃpakkamiva bhakkhita’’nti. „Wer die Sinnesfreuden genießt, ohne das künftige Unheil zu erkennen, den vernichten sie, wenn die Reifung eintritt, so wie eine verzehrte Kimpakka-Frucht.“ Tattha āyatiṃ dosaṃ nāññāyāti anāgate dosaṃ na aññāya, ajānitvāti attho. Yo kāme paṭisevatīti yo vatthukāme ca kilesakāme ca paṭisevati. Vipākante hananti nanti te kāmā taṃ purisaṃ attano vipākasaṅkhāte ante nirayādīsu uppannaṃ nānappakārena dukkhena saṃyojayamānā hananti. Kathaṃ? Kiṃpakkamiva bhakkhitanti, yathā paribhogakāle [Pg.391] vaṇṇagandharasasampattiyā manāpaṃ kiṃpakkaphalaṃ anāgatadosaṃ adisvā bhakkhitaṃ ante hanati, jīvitakkhayaṃ pāpeti, evaṃ paribhogakāle manāpāpi kāmā vipākakāle hanantīti desanaṃ yathānusandhiṃ pāpetvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhitabhikkhu sotāpattiphalaṃ pāpuṇi. Sesaparisāyapi keci sotāpannā, keci sakadāgāmino, keci anāgāmino, keci arahanto ahesuṃ. Darin bedeutet „ohne das künftige Unheil zu erkennen“ (āyatiṃ dosaṃ nāññāya): ohne das Unheil in der Zukunft zu erkennen, also ohne es zu wissen – dies ist die Bedeutung. „Wer die Sinnesfreuden genießt“ (yo kāme paṭisevati) bedeutet: wer sowohl die materiellen Objekte der Sinneslust (vatthukāma) als auch die geistige Befleckung der Sinneslust (kilesakāma) pflegt. „Den vernichten sie, wenn die Reifung eintritt“ (vipākante hananti naṃ) bedeutet: Diese Sinnesfreuden vernichten jenen Menschen, wenn das Ende, das als ihre Reifung bezeichnet wird, herbeigeführt ist, indem sie ihn, der in den Höllen oder anderen niederen Welten wiedergeboren wurde, mit vielfältigem Leiden verbinden. Wie? „Wie eine verzehrte Kimpakka-Frucht“ (kiṃpakkamiva bhakkhitaṃ): So wie die Kimpakka-Frucht, die zur Zeit des Genusses wegen ihrer vollendeten Farbe, ihres Dufts und Geschmacks lieblich ist, wenn sie verzehrt wird, ohne das künftige Unheil zu sehen, am Ende tötet, das heißt zum Ende des Lebens führt, ebenso töten auch die Sinnesfreuden, die zur Zeit des Genusses lieblich sind, zur Zeit der Reifung – nachdem der Meister diese Lehrrede in angemessener Verknüpfung dargelegt hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten erlangte der unzufriedene Mönch die Frucht des Stromeintritts (sotāpattiphala). Auch unter der übrigen Zuhörerschaft wurden einige zu Stromeingetretenen (sotāpanna), einige zu Einmalwiederkehrenden (sakadāgāmin), einige zu Nie-Wiederkehrenden (anāgāmin) und einige zu Arahants. Satthāpi imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā parisā buddhaparisā ahosi, satthavāho pana ahameva ahosi’’nti. Auch der Meister trug diese Lehrrede vor und verknüpfte das Jātaka: „Die damalige Gefolgschaft war die heutige Buddha-Gefolgschaft, der Karawanenführer aber war ich selbst.“ Kiṃpakkajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Kimpakka-Jātaka, das fünfte.
[86] 6. Sīlavīmaṃsakajātakavaṇṇanā [86] 6. Die Erklärung des Sīlavīmaṃsaka-Jātaka Sīlaṃ kireva kalyāṇanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ sīlavīmaṃsakaṃ brāhmaṇaṃ ārabbha kathesi. So kira kosalarājānaṃ nissāya jīvati tisaraṇaṃ gato akhaṇḍapañcasīlo tiṇṇaṃ vedānaṃ pāragū. Rājā ‘‘ayaṃ sīlavā’’ti tassa atirekasammānaṃ karoti. So cintesi ‘‘ayaṃ rājā mayhaṃ aññehi brāhmaṇehi atirekasammānaṃ karoti, ativiya maṃ garuṃ katvā passati, kiṃ nu kho esa mama jātigottakulappadesasippasampattiṃ nissāya imaṃ sammānaṃ karoti, udāhu sīlasampattiṃ, vīmaṃsissāmi tāvā’’ti. So ekadivasaṃ rājūpaṭṭhānaṃ gantvā gharaṃ āgacchanto ekassa heraññikassa phalakato anāpucchitvā ekaṃ kahāpaṇaṃ gahetvā agamāsi, heraññiko brāhmaṇe garubhāvena kiñci avatvā nisīdi. Punadivase dve kahāpaṇe gaṇhi, heraññiko tatheva adhivāsesi. Tatiyadivase kahāpaṇamuṭṭhiṃ aggahesi, atha naṃ heraññiko ‘‘ajja te tatiyo divaso rājakuṭumbaṃ vilumpantassā’’ti ‘‘rājakuṭumbavilumpakacoro me gahito’’ti tikkhattuṃ viravi. Atha naṃ manussā ito cito ca āgantvā ‘‘ciraṃdāni tvaṃ sīlavā viya vicarī’’ti dve tayo pahāre datvā bandhitvā rañño dassesuṃ. „Die Tugend wahrlich ist heilsam“ (sīlaṃ kireva kalyāṇaṃ) – diese Lehrrede erzählte der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich eines Brahmanen, der seine eigene Tugend auf die Probe stellte. Dieser lebte angeblich in Abhängigkeit vom König von Kosala, hatte Zuflucht zu den drei Juwelen genommen, besaß eine makellose Praxis der fünf Tugendregeln (pañcasīla) und hatte die drei Veden gemeistert. Der König erwies ihm übermäßigen Respekt, indem er dachte: „Er ist ein tugendhafter Mann.“ Er (der Brahmane) dachte bei sich: „Dieser König erweist mir im Vergleich zu anderen Brahmanen übermäßigen Respekt und blickt mit größter Ehrfurcht auf mich. Tut er dies wohl aufgrund meiner Herkunft, meiner Sippe, meiner edlen Familie, meiner Heimat oder meiner Gelehrsamkeit in den Künsten, oder aber wegen meiner vollkommenen Tugend (sīlasampatti)? Ich werde dies erst einmal auf die Probe stellen.“ Eines Tages ging er zum königlichen Hofdienst und nahm auf dem Heimweg von der Auslage eines Geldwechslers, ohne zu fragen, eine Kahāpaṇa-Münze mit sich fort. Der Geldwechsler schwieg aus Respekt vor dem Brahmanen und blieb einfach sitzen. Am folgenden Tag nahm er zwei Kahāpaṇa-Münzen mit; der Geldwechsler duldete es ebenso. Am dritten Tag griff er eine ganze Handvoll Kahāpaṇa-Münzen. Da rief der Geldwechsler dreimal laut aus: „Heute ist der dritte Tag, an dem du königliches Eigentum raubst! Ich habe den Dieb gefasst, der das königliche Eigentum plündert!“ Da liefen die Leute von überall herbei, riefen: „Lange Zeit bist du nun umhergegangen, als wärst du tugendhaft!“, gaben ihm zwei oder drei Schläge, fesselten ihn und führten ihn vor den König. Rājā [Pg.392] vippaṭisārī hutvā ‘‘kasmā, brāhmaṇa, evarūpaṃ dussīlakammaṃ karosī’’ti vatvā ‘‘gacchatha, tassa rājāṇaṃ karothā’’ti āha. Brāhmaṇo ‘‘nāhaṃ, mahārāja, coro’’ti āha. Atha ‘‘kasmā rājakuṭumbikassa phalakato kahāpaṇe gaṇhī’’ti? ‘‘Etaṃ mayā tayi mama atisammānaṃ karonte ‘kiṃ nu kho rājā mama jātiādīni nissāya atisammānaṃ karoti, udāhu sīlaṃ nissāyā’ti vīmaṃsanatthāya kataṃ, idāni pana mayā ekaṃsena ñātaṃ. Yathā sīlameva nissāya tayā mama sammāno kato, na jātiādīni. Tathā hi me idāni rājāṇaṃ kāresi, svāhaṃ iminā kāraṇena ‘imasmiṃ loke sīlameva uttamaṃ sīlaṃ pamukha’nti sanniṭṭhānaṃ gato. Imassa panāhaṃ sīlassa anucchavikaṃ karonto gehe ṭhito kilese paribhuñjanto na sakkhissāmi kātuṃ, ajjeva jetavanaṃ gantvā satthu santike pabbajissāmi, pabbajjaṃ me detha, devā’’ti vatvā rājānaṃ anujānāpetvā jetavanābhimukho pāyāsi. Der König war bedrückt und fragte: „Warum, Brahmane, tust du eine solche Tat der Sittenlosigkeit?“, und befahl: „Geht und vollzieht an ihm die königliche Strafe!“ Der Brahmane entgegnete: „Ich bin kein Dieb, o Großer König!“ – „Warum aber hast du dann Kahāpaṇa-Münzen von der Auslage des königlichen Schatzmeisters genommen?“ – „Dies habe ich getan, um eine Prüfung anzustellen. Da Ihr mir übermäßigen Respekt erwieset, dachte ich: „Erweist mir der König wohl diesen übermäßigen Respekt aufgrund meiner Herkunft und anderer Eigenschaften, oder aber aufgrund meiner Tugend?“ Jetzt aber habe ich Gewissheit erlangt. So wie Ihr mir Euren Respekt allein aufgrund der Tugend erwieset, so tatet Ihr es nicht wegen meiner Herkunft oder anderer Dinge. Denn eben deshalb habt Ihr jetzt die königliche Strafe über mich verhängen lassen. Durch diesen Umstand bin ich zu dem Entschluss gelangt: „In dieser Welt ist allein die Tugend das Höchste, die Tugend ist das Vorzüglichste.“ Wenn ich jedoch dieser Tugend entsprechend handeln will, werde ich dies nicht tun können, während ich im Hause bleibe und die sinnlichen Befleckungen (kilesa) genieße. Noch heute werde ich zum Jetavana gehen und vor dem Meister das Hauslosenleben antreten. Gewährt mir die Erlaubnis zur Ordination, o König!“ Nachdem er so gesprochen und sich vom König die Erlaubnis hatte geben lassen, brach er in Richtung des Jetavana auf. Atha naṃ ñātisuhajjabandhavā sannipatitvā nivāretuṃ asakkontā nivattiṃsu. So satthu santikaṃ gantvā pabbajjaṃ yācitvā pabbajjañca upasampadañca labhitvā avissaṭṭhakammaṭṭhāno vipassanaṃ vaḍḍhetvā arahattaṃ patvā satthāraṃ upasaṅkamitvā ‘‘bhante, mayhaṃ pabbajjā matthakaṃ pattā’’ti aññaṃ byākāsi. Tassa taṃ aññabyākaraṇaṃ bhikkhusaṅghe pākaṭaṃ jātaṃ. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū ‘‘āvuso, asuko nāma rañño upaṭṭhākabrāhmaṇo attano sīlaṃ vīmaṃsitvā rājānaṃ āpucchitvā pabbajitvā arahatte patiṭṭhito’’ti tassa guṇaṃ kathayamānā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāni ayameva brāhmaṇo attano sīlaṃ vīmaṃsitvā pabbajitvā attano patiṭṭhaṃ akāsi, pubbepi paṇḍitā attano sīlaṃ vīmaṃsitvā pabbajitvā attano patiṭṭhaṃ kariṃsū’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. Da kamen seine Verwandten, Freunde und Vertrauten zusammen, und da sie nicht in der Lage waren, ihn zurückzuhalten, kehrten sie um. Er ging zum Erhabenen, bat um die Ordination, erhielt sowohl die Novizenordination als auch die höhere Ordination, gab sein Meditationsobjekt nicht auf, entfaltete die Einsicht, erlangte die Arhatschaft, trat vor den Erhabenen und verkündete seine endgültige Erkenntnis mit den Worten: „Ehrwürdiger Herr, meine Ordination hat ihren Höhepunkt erreicht.“ Diese Verkündung seiner endgültigen Erkenntnis wurde in der Bhikkhu-Gemeinschaft bekannt. Da versammelten sich eines Tages die Bhikkhus in der Lehrhalle und saßen da, um sein Lob zu preisen: „Ihr Brüder, jener Diener-Brahmane des Königs hat seine eigene Tugend geprüft, bat den König um Erlaubnis, trat in den Orden ein und ist nun fest in der Arhatschaft verankert.“ Der Erhabene kam herbei und fragte: „Zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt, ihr Bhikkhus?“ Als sie antworteten: „Zu diesem, o Herr“, sprach er: „Nicht nur jetzt, ihr Bhikkhus, hat dieser Brahmane seine eigene Tugend geprüft, ist in den Orden eingetreten und hat sich selbst einen festen Halt geschaffen; auch in der Vergangenheit haben Weise ihre eigene Tugend geprüft, sind in den Orden eingetreten und haben sich selbst einen festen Halt geschaffen.“ Auf ihre Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa purohito ahosi dānādhimutto sīlajjhāsayo akhaṇḍapañcasīlo. Rājā sesabrāhmaṇehi atirekaṃ tassa sammānaṃ karotīti sabbaṃ purimasadisameva. Bodhisatte pana bandhitvā rañño santikaṃ nīyamāne [Pg.393] ahituṇḍikā antaravīthiyaṃ sappaṃ kīḷāpentā naṅguṭṭhe gaṇhanti, gīvāya gaṇhanti, gale veṭhenti. Bodhisatto te disvā ‘‘mā, tātā, evaṃ sappaṃ naṅguṭṭhe gaṇhatha, mā gīvāya gaṇhatha, mā gale veṭhetha. Ayañhi vo ḍaṃsitvā jīvitakkhayaṃ pāpeyyā’’ti āha. Ahituṇḍikā ‘‘ayaṃ, brāhmaṇa, sappo sīlavā ācārasampanno tādiso dussīlo na hoti, tvaṃ pana attano dussīlatāya anācārena rājakuṭumbavilumpakacoroti bandhitvā nīyasī’’ti āhaṃsu. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta sein Hofpriester, der dem Geben von Gaben zugeneigt war, eine tugendhafte Gesinnung besaß und die fünf Tugendregeln makellos einhielt. Der König erwies ihm weit mehr Ehre als den anderen Brahmanen. Alles Weitere ist genau wie in der vorherigen Geschichte. Als der Bodhisatta jedoch gefesselt und vor den König geführt wurde, ließen Schlangenbeschwörer auf den Straßen der Stadt eine Schlange spielen, packten sie am Schwanzende, packten sie am Nacken und wickelten sie um ihren Hals. Als der Bodhisatta dies sah, sagte er: „Ihr Lieben, packt eine solche Schlange nicht am Schwanzende, packt sie nicht am Nacken und wickelt sie nicht um den Hals. Denn wenn sie euch beißt, könnte sie euch das Leben kosten.“ Die Schlangenbeschwörer sagten: „Brahmane, diese Schlange ist tugendhaft und von gutem Betragen, sie ist nicht so lasterhaft wie du. Du hingegen wirst wegen deiner eigenen Lasterhaftigkeit und deines schlechten Betragens als ein Dieb, der den königlichen Schatz geplündert hat, gefesselt weggeführt.“ So cintesi ‘‘sappāpi tāva aḍaṃsantā aviheṭhentā ‘sīlavanto’ti nāmaṃ labhanti, kimaṅgaṃ pana manussabhūtā. Sīlameva imasmiṃ loke uttamaṃ, natthi tato uttaritara’’nti. Atha naṃ netvā rañño dassesuṃ. Rājā ‘‘kiṃ idaṃ, tātā’’ti pucchi. ‘‘Rājakuṭumbavilumpako coro, devā’’ti. ‘‘Tena hissa rājāṇaṃ karothā’’ti. Brāhmaṇo ‘‘nāhaṃ, mahārāja, coro’’ti āha. ‘‘Atha kasmā kahāpaṇe aggahesī’’ti ca vutte purimanayeneva sabbaṃ ārocento ‘‘svāhaṃ iminā kāraṇena ‘imasmiṃ loke sīlameva uttamaṃ, sīlaṃ pāmokkha’nti sanniṭṭhānaṃ gato’’ti vatvā ‘‘tiṭṭhatu tāva idaṃ, āsīvisopi tāva aḍaṃsanto aviheṭhento ‘sīlavā’ti vattabbataṃ labhati. Imināpi kāraṇena sīlameva uttamaṃ, sīlaṃ pavara’’nti sīlaṃ vaṇṇento imaṃ gāthamāha – Er dachte: „Selbst Schlangen erhalten, solange sie nicht beißen und niemanden verletzen, die Bezeichnung „tugendhaft“ – wie viel mehr erst Menschen! Tugend allein ist das Höchste auf dieser Welt, es gibt nichts Höheres als sie.“ Daraufhin führten sie ihn ab und zeigten ihn dem König. Der König fragte: „Ihr Lieben, was ist das?“ Sie antworteten: „Ein Dieb, der den königlichen Schatz geplündert hat, o König.“ – „Wenn dem so ist, dann vollzieht an ihm das königliche Urteil.“ Der Brahmane sprach: „O Großkönig, ich bin kein Dieb.“ Als er gefragt wurde: „Warum aber hast du dann die Kahāpaṇas genommen?“, erzählte er alles nach der früheren Weise und sprach: „Aus diesem Grund bin ich zu dem Entschluss gelangt: „Auf dieser Welt ist allein die Tugend das Höchste, die Tugend ist das Vorzüglichste.““ Er fügte hinzu: „Lassen wir dies einmal beiseite: Selbst eine Giftschlange erhält, solange sie nicht beißt und niemanden verletzt, die Bezeichnung „tugendhaft“. Auch aus diesem Grund ist allein die Tugend das Höchste, die Tugend ist das Vorzüglichste.“ Und um die Tugend zu preisen, sprach er diese Strophe: 86. 86. ‘‘Sīlaṃ kireva kalyāṇaṃ, sīlaṃ loke anuttaraṃ; Passa ghoraviso nāgo, sīlavāti na haññatī’’ti. „Die Tugend wahrlich ist heilsam, die Tugend ist das Höchste auf der Welt. Sieh nur: Die schrecklich giftige Schlange wird nicht getötet, weil man sie für tugendhaft hält.“ Tattha sīlaṃ kirevāti kāyavācācittehi avītikkamasaṅkhātaṃ ācārasīlameva. Kirāti anussavavasena vadati. Kalyāṇanti sundarataraṃ. Anuttaranti jeṭṭhakaṃ sabbaguṇadāyakaṃ. Passāti attanā diṭṭhakāraṇaṃ abhimukhaṃ karonto katheti. Sīlavāti na haññatīti ghoravisopi samāno aḍaṃsanaaviheṭhanamattakena sīlavāti pasaṃsaṃ labhati, na haññati na vihaññatīti. Imināpi kāraṇena sīlameva uttamanti. Darin bedeutet „sīlaṃ kireva“: allein die tugendhafte Lebensweise, die als das Nicht-Überschreiten mit Körper, Rede und Geist bestimmt ist. „kira“ sagt er im Sinne von Hörensagen. „kalyāṇanti“ bedeutet: weitaus besser. „anuttaranti“ bedeutet: das Höchste, das alle guten Eigenschaften verleiht. „passa“ sagt er, um die von ihm selbst gesehene Tatsache direkt vor Augen zu fällen. „sīlavāti na haññatī“ bedeutet: Obwohl sie schrecklich giftig ist, erhält sie allein dadurch, dass sie nicht beißt und nicht verletzt, das Lob, „tugendhaft“ zu sein, und wird weder getötet noch gequält. Auch aus diesem Grund ist allein die Tugend das Höchste. Evaṃ bodhisatto imāya gāthāya rañño dhammaṃ desetvā kāme pahāya isipabbajjaṃ pabbajitvā himavantaṃ pavisitvā pañcābhiññā aṭṭha samāpattiyo nibbattetvā brahmalokaparāyaṇo ahosi. Nachdem der Bodhisatta dem König mit dieser Strophe die Lehre dargelegt hatte, entsagte er den Sinnengenüssen, trat in den Stand eines Weisen ein, zog in den Himavanta-Wald, erlangte die fünf höheren Geisteskräfte und die acht Vertiefungen und ging nach dem Tode in die Brahma-Welt ein. Satthā [Pg.394] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, rājaparisā buddhaparisā, purohito pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Erhabene diese Lehrrede dargelegt hatte, stellte er die Verbindung zur Geburt her: „Damals war der König Ānanda, das Gefolge des Königs war das Gefolge des Buddha, der Hofpriester aber war ich selbst.“ Sīlavīmaṃsakajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Sīlavīmaṃsaka-Jātaka ist die sechste.
[87] 7. Maṅgalajātakavaṇṇanā [87] 7. Die Erklärung des Maṅgala-Jātaka Yassa maṅgalā samūhatāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto ekaṃ sāṭakalakkhaṇabrāhmaṇaṃ ārabbha kathesi. Rājagahavāsiko kireko brāhmaṇo kotuhalamaṅgaliko tīsu ratanesu appasanno micchādiṭṭhiko aḍḍho mahaddhano mahābhogo, tassa samugge ṭhapitaṃ sāṭakayugaṃ mūsikā khādiṃsu. Athassa sīsaṃ nhāyitvā ‘‘sāṭake āharathā’’ti vuttakāle mūsikāya khāditabhāvaṃ ārocayiṃsu. So cintesi ‘‘sace idaṃ mūsikādaṭṭhaṃ sāṭakayugaṃ imasmiṃ gehe bhavissati, mahāvināso bhavissati. Idañhi avamaṅgalaṃ kāḷakaṇṇisadisaṃ puttadhītādīnaṃ vā dāsakammakarādīnaṃ vā na sakkā dātuṃ. Yo hi idaṃ gaṇhissati, sabbassa mahāvināso bhavissati, āmakasusāne taṃ chaḍḍāpessāmi, na kho pana sakkā dāsakammakarādīnaṃ hatthe dātuṃ. Te hi ettha lobhaṃ uppādetvā imaṃ gahetvā vināsaṃ pāpuṇeyyuṃ, puttassa taṃ hatthe dassāmī’’ti. So puttaṃ pakkosāpetvā tamatthaṃ ārocetvā ‘‘tvampi naṃ, tāta, hatthena aphusitvā daṇḍakena gahetvā āmakasusāne chaḍḍetvā sīsaṃ nhāyitvā ehī’’ti pesesi. „Dessen Vorzeichen beseitigt sind“ – diese Lehrrede verkündete der Erhabene, als er im Veḷuvana-Kloster weilte, bezüglich eines Brahmanen, der die Vorzeichen an Gewändern deutete. Ein in Rājagaha lebender Brahmane, so heißt es, glaubte an abergläubische Vorzeichen, hatte kein Vertrauen in die Drei Juwelen, besaß eine falsche Anschauung, war sehr reich, besaß großes Vermögen und viele Genüsse. Ein Paar Gewänder, die in seiner Truhe aufbewahrt waren, wurden von Mäusen angefressen. Als er sich dann das Haupt gewaschen hatte und sagte: „Bringt mir die Gewänder!“, berichtete man ihm, dass sie von Mäusen angefressen worden waren. Er dachte: „Wenn dieses von Mäusen angefressene Paar Gewänder in diesem Haus bleibt, wird großes Unheil geschehen. Denn dieses Gewand bringt Unglück und gleicht einem Unglücksvogel; man kann es weder Söhnen und Töchtern noch Sklaven und Arbeitern geben. Wer immer dies nimmt, über den wird großes Unheil hereinbrechen. Ich werde es auf dem Leichenacker wegwerfen lassen; es ist wahrlich nicht ratsam, es in die Hände von Sklaven und Arbeitern zu geben. Denn sie könnten Gier danach entwickeln, es nehmen und dadurch ins Verderben stürzen. Ich werde es in die Hand meines Sohnes geben.“ Er ließ seinen Sohn rufen, teilte ihm die Angelegenheit mit und sandte ihn fort mit den Worten: „Mein Lieber, berühre es auch du nicht mit den Händen, sondern nimm es mit einem Stock, wirf es auf dem Leichenacker weg, wasche dir das Haupt und komm wieder.“ Satthāpi kho taṃ divasaṃ paccūsasamaye bodhaneyyabandhave olokento imesaṃ pitāputtānaṃ sotāpattiphalassa upanissayaṃ disvā migavīthiṃ gahetvā migaluddako viya gantvā āmakasusānadvāre nisīdi chabbaṇṇabuddharasmiyo vissajjento. Māṇavopi pitu vacanaṃ sampaṭicchitvā ajagarasappaṃ viya taṃ yugasāṭakaṃ yaṭṭhikoṭiyā gahetvā āmakasusānadvāraṃ pāpuṇi. Atha naṃ satthā ‘‘kiṃ karosi māṇavā’’ti āha. ‘‘Bho gotama, idaṃ sāṭakayugaṃ mūsikādaṭṭhaṃ kāḷakaṇṇisadisaṃ halāhalavisūpamaṃ, mama pitā ‘añño etaṃ chaḍḍento lobhaṃ uppādetvā gaṇheyyā’ti [Pg.395] bhayena maṃ pahiṇi, ahametaṃ chaḍḍetvā sīsaṃ nhāyissāmīti āgatomhi, bho gotamā’’ti. ‘‘Tena hi chaḍḍehī’’ti. Māṇavo chaḍḍesi, satthā ‘‘amhākaṃ dāni vaṭṭatī’’ti tassa sammukhāva gaṇhi. ‘‘Avamaṅgalaṃ, bho gotama, etaṃ kāḷakaṇṇisadisaṃ, mā gaṇhi mā gaṇhī’’ti tasmiṃ vārayamāneyeva taṃ gahetvā veḷuvanābhimukho pāyāsi. Auch der Erhabene blickte an jenem Tag in der Morgendämmerung auf jene Wesen, die für die Erkenntnis der Wahrheit bereit waren. Als er die starke Unterstützung dieses Vaters und Sohnes für das Erlangen der Frucht des Stromeintritts sah, ging er wie ein Jäger, der dem Pfad des Wildes folgt, und setzte sich an das Tor des Leichenfeldes für frische Leichen, während er die sechsfarbigen Buddha-Strahlen aussandte. Auch der junge Mann nahm das Wort seines Vaters an, hob das vom Frevel befallene Gewandpaar mit der Spitze eines Stabes empor, als wäre es eine Python, und erreichte das Tor des Leichenfeldes. Da fragte ihn der Meister: „Was tust du, junger Mann?“ – „O Gotama, dieses Gewandpaar wurde von Ratten zerbissen. Es gleicht einem Unglückbringer und ist wie das tödliche Halāhala-Gift. Mein Vater hat mich aus Angst geschickt, dass ein anderer, wenn ich es wegwerfe, Gier danach entwickeln und es an sich nehmen könnte. Ich bin hierhergekommen, o Gotama, um dieses Gewand wegzuwerfen und danach mein Haupt rituell zu waschen.“ – „Wenn dem so ist, dann wirf es weg!“ Der junge Mann warf es weg, und der Meister sprach: „Für uns ist es nun geeignet“, und hob es direkt vor seinen Augen auf. „Das bringt Unglück, o Gotama! Es gleicht einem Unglückbringer! Nimm es nicht, nimm es nicht!“, rief er. Doch während der Jüngling ihn noch davon abhielt, nahm er es und machte sich auf den Weg in Richtung des Veluvana-Klosters. Māṇavo vegena gantvā pitu ārocesi ‘‘tāta, mayā āmakasusāne chaḍḍitaṃ sāṭakayugaṃ samaṇo gotamo ‘amhākaṃ vaṭṭatī’ti mayā vāriyamānopi gahetvā veḷuvanaṃ gato’’ti. Brāhmaṇo cintesi ‘‘taṃ sāṭakayugaṃ avamaṅgalaṃ kāḷakaṇṇisadisaṃ, taṃ vaḷañjento samaṇopi gotamo nassissati, vihāropi nassissati, tato amhākaṃ garahā bhavissati, samaṇassa gotamassa aññe bahū sāṭake datvā taṃ chaḍḍāpessāmī’’ti. So bahū sāṭake gāhāpetvā puttena saddhiṃ veḷuvanaṃ gantvā satthāraṃ disvā ekamantaṃ ṭhito evamāha ‘‘saccaṃ kira vo, bho gotama, āmakasusāne sāṭakayugaṃ gahita’’nti? ‘‘Saccaṃ, brāhmaṇā’’ti. ‘‘Bho gotama, taṃ sāṭakayugaṃ avamaṅgalaṃ, tumhe taṃ paribhuñjamānā nassissatha, sakalavihāropi nassissati. Sace vo nivāsanaṃ vā pārupanaṃ vā nappahoti, ime sāṭake gahetvā taṃ chaḍḍāpethā’’ti. Atha naṃ satthā ‘‘mayaṃ brāhmaṇa pabbajitā nāma, amhākaṃ āmakasusāne antaravīthiyaṃ saṅkāraṭṭhāne nhānatitthe mahāmaggeti evarūpesu ṭhānesu chaḍḍitā vā patitā vā pilotikā vaṭṭati, tvaṃ pana na idāneva evaṃladdhiko, pubbepi evaṃladdhikoyevā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. Der junge Mann lief eilig zu seinem Vater und berichtete ihm: „Vater, das Gewandpaar, das ich auf dem Leichenfeld weggeworfen habe, hat der Asket Gotama mit den Worten ‚Für uns ist es geeignet‘ an sich genommen, obwohl ich ihn davon abhielt, und ist damit zum Veluvana gegangen.“ Der Brāhmaṇa dachte bei sich: „Dieses Gewandpaar bringt Unglück und gleicht einem Unglückbringer. Wenn er dieses Gewand benutzt, wird der Asket Gotama Schaden nehmen, und auch das Kloster wird Schaden nehmen. Dadurch werden wir Vorwürfe erleiden. Ich werde dem Asketen Gotama viele andere Gewänder geben und ihn veranlassen, jenes wegzuwerfen.“ Er ließ viele Gewänder mitnehmen, ging zusammen mit seinem Sohn zum Veluvana, erblickte den Meister, stellte sich auf eine Seite und sprach: „Stimmt es tatsächlich, o Gotama, dass von euch ein Gewandpaar auf dem Leichenfeld genommen wurde?“ – „Es stimmt, Brāhmaṇa“, sprach der Meister. „O Gotama, dieses Gewandpaar bringt Unglück. Wenn ihr es benutzt, werdet ihr Schaden nehmen, und auch das gesamte Kloster wird Schaden nehmen. Sollte es euch an Unter- oder Obergewändern mangeln, so nehmt diese Gewänder hier und lasst jenes wegwerfen!“ Da sprach der Meister zu ihm: „Brāhmaṇa, wir sind wahrlich Hauslose. Für uns ist ein abgetragenes Tuch, das an solchen Orten wie auf einem Leichenfeld, in einer Gasse, auf einem Müllhaufen, an einer Badestelle oder auf einer Hauptstraße weggeworfen wurde oder heruntergefallen ist, durchaus angemessen. Du aber hast nicht erst jetzt diese Ansicht; auch in der Vergangenheit hattest du eben diese Ansicht.“ Nachdem er dies gesagt hatte, trug er auf dessen Bitten hin eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte magadharaṭṭhe rājagahanagare dhammiko magadharājā rajjaṃ kāresi. Tadā bodhisatto ekasmiṃ udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā viññutaṃ patto isipabbajjaṃ pabbajitvā abhiññā ca samāpattiyo ca nibbattetvā himavante vasamāno ekasmiṃ kāle himavantato nikkhamitvā rājagahanagare rājuyyānaṃ patvā tattha vasitvā dutiyadivase bhikkhācāratthāya nagaraṃ pāvisi. Rājā taṃ disvā pakkosāpetvā pāsāde nisīdāpetvā bhojetvā uyyāneyeva vasanatthāya paṭiññaṃ gaṇhi. Bodhisatto rañño nivesane bhuñjitvā uyyāne vasati. Tasmiṃ kāle rājagahanagare dussalakkhaṇabrāhmaṇo [Pg.396] nāma ahosi. Tassa samugge ṭhapitaṃ sāṭakayuganti sabbaṃ purimasadisameva. Einst, als im Königreich Magadha in der Stadt Rājagaha ein gerechter König von Magadha regierte, wurde der Bodhisatta in einer hochgestellten Brāhmaṇa-Familie wiedergeboren. Als er das Alter der Vernunft erlangt hatte, trat er als Weiser in die Hauslosigkeit ein, entfaltete die höheren Geisteskräfte sowie die geistigen Vertiefungen und lebte im Himavanta-Gebirge. Eines Tages verließ er das Himavanta-Gebirge, erreichte den königlichen Garten in Rājagaha, ließ sich dort nieder und betrat am zweiten Tag die Stadt zum Almosengang. Als der König ihn sah, ließ er ihn rufen, im Palast Platz nehmen, bewirtete ihn mit Speise und nahm ihm das Versprechen ab, im königlichen Garten zu wohnen. Der Bodhisatta speiste im Palast des Königs und lebte im Garten. Zu jener Zeit lebte in Rājagaha ein Brāhmaṇa namens Dussalakkhaṇa („Gewand-Zeichendeuter“). Alles Übrige bezüglich des Gewandpaares, das in seiner Truhe aufbewahrt wurde, war genau wie zuvor beschrieben. Māṇave pana susānaṃ gacchante bodhisatto paṭhamataraṃ gantvā susānadvāre nisīditvā tena chaḍḍitaṃ sāṭakayugaṃ gahetvā uyyānaṃ agamāsi. Māṇavo gantvā pitu ārocesi. Pitā ‘‘rājakulūpako tāpaso nasseyyā’’ti bodhisattassa santikaṃ gantvā ‘‘tāpasa, tayā gahitasāṭake chaḍḍehi, mā nassī’’ti āha. Tāpaso ‘‘amhākaṃ susāne chaḍḍitapilotikā vaṭṭati, na mayaṃ kotuhalamaṅgalikā, kotuhalamaṅgalaṃ nāmetaṃ na buddhapaccekabuddhabodhisattehi vaṇṇitaṃ, tasmā paṇḍitena nāma kotuhalamaṅgalikena na bhavitabba’’nti brāhmaṇassa dhammaṃ desesi. Brāhmaṇo dhammaṃ sutvā diṭṭhiṃ bhinditvā bodhisattaṃ saraṇaṃ gato. Bodhisattopi aparihīnajjhāno brahmalokaparāyaṇo ahosi. Als der junge Mann sich jedoch auf den Weg zum Leichenfeld machte, begab sich der Bodhisatta noch vor ihm dorthin, setzte sich an das Friedhofstor, nahm das von jenem weggeworfene Gewandpaar an sich und kehrte in den Garten zurück. Der junge Mann ging hin und berichtete es seinem Vater. Der Vater dachte bei sich: „Der dem Königshaus nahestehende Asket könnte Schaden nehmen“, begab sich zum Bodhisatta und sprach: „Asket, wirf die von dir genommenen Gewänder weg, nimm keinen Schaden!“ Der Asket sprach: „Für uns ist ein auf dem Friedhof weggeworfenes Tuch angemessen. Wir hängen keinem Aberglauben an Omina und Festlichkeiten an. Ein solcher Aberglaube an Vorzeichen wurde weder von den Buddhas, den Paccekabuddhas noch von den Bodhisattas gelobt. Daher darf ein Weiser nicht abergläubisch sein.“ So verkündete er dem Brāhmaṇa die Lehre. Als der Brāhmaṇa die Lehre gehört hatte, gab er seine falsche Ansicht auf und nahm Zuflucht beim Bodhisatta. Auch der Bodhisatta erlangte, ohne die Vertiefungen einzubüßen, die Wiedergeburt in der Brahma-Welt. Satthāpi imaṃ atītaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā brāhmaṇassa dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit dargelegt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte, um dem Brāhmaṇa die Lehre zu verkünden, folgende Strophe: 87. 87. ‘‘Yassa maṅgalā samūhatā, uppātā supinā ca lakkhaṇā ca; So maṅgaladosavītivatto, yugayogādhigato na jātumetī’’ti. „Wer Omina, Vorzeichen, Träume und körperliche Merkmale gänzlich beseitigt hat; wer die Fehler des Aberglaubens an Omina überwunden hat und die Joche und Fesseln transzendiert hat, kehrt gewiss niemals wieder zurück.“ Tattha yassa maṅgalā samūhatāti yassa arahato khīṇāsavassa diṭṭhamaṅgalaṃ, sutamaṅgalaṃ, mutamaṅgalanti ete maṅgalā samucchinnā. Uppātā supinā ca lakkhaṇā cāti ‘‘evarūpo candaggāho bhavissati, evarūpo sūriyaggāho bhavissati, evarūpo nakkhattaggāho bhavissati, evarūpo ukkāpāto bhavissati, evarūpo disāḍāho bhavissatī’’ti ime pañca mahāuppātā, nānappakārā supinā, subhagalakkhaṇaṃ, dubbhagalakkhaṇaṃ, itthilakkhaṇaṃ, purisalakkhaṇaṃ, dāsilakkhaṇaṃ, dāsalakkhaṇaṃ, asilakkhaṇaṃ, hatthilakkhaṇaṃ, assalakkhaṇaṃ, usabhalakkhaṇaṃ, āvudhalakkhaṇaṃ, vatthalakkhaṇanti evamādikāni lakkhaṇāni ime ca diṭṭhiṭṭhānā yassa samūhatā, na etehi uppātādīhi attano maṅgalaṃ vā avamaṅgalaṃ vā pacceti. So maṅgaladosavītivattoti [Pg.397] so khīṇāsavo sabbamaṅgaladose vītivatto atikkanto pajahitvā ṭhito. Yugayogādhigatoti ‘‘kodho ca upanāho ca, makkho ca paḷāso cā’’tiādinā (vibha. 833) nayena dve dve ekato āgatakilesā yugā nāma. Kāmayogo, bhavayogo, diṭṭhiyogo, avijjāyogoti ime saṃsāre yojanabhāvato cattāro yogā nāma. Te yuge ca yoge cāti yugayoge adhigato abhibhavitvā gato vītivatto samatikkanto khīṇāsavo bhikkhu. Na jātumetīti puna paṭisandhivasena ekaṃseneva imaṃ lokaṃ na eti nāgacchatīti. In dieser Strophe bedeutet "yassa maṅgalā samūhatā" (für wen die Glückszeichen gänzlich vernichtet sind): Für jenen Arahat, dessen Triebe versiegt sind (khīṇāsava), sind das gesehene Glückszeichen, das gehörte Glückszeichen und das wahrgenommene Glückszeichen – diese Glückszeichen – vollständig abgeschnitten. "Uppātā supinā ca lakkhaṇā cā" bedeutet: "Eine solche Mondfinsternis wird geschehen, eine solche Sonnenfinsternis wird geschehen, eine solche Finsternis der Planetenkonstellationen wird geschehen, ein solcher Meteoritenabsturz wird geschehen, ein solches Aufglühen der Himmelsrichtungen wird geschehen" – diese fünf großen Himmelserscheinungen, verschiedene Arten von Träumen, das Merkmal des Glücks, das Merkmal des Unglücks, das Merkmal einer Frau, das Merkmal eines Mannes, das Merkmal einer Dienerin, das Merkmal eines Dieners, das Merkmal eines Schwertes, das Merkmal eines Elefanten, das Merkmal eines Pferdes, das Merkmal eines Stieres, das Merkmal einer Waffe, das Merkmal von Gewändern – solche und ähnliche Merkmale sowie diese Grundlagen falscher Ansichten sind für ihn völlig vernichtet; er verlässt sich aufgrund dieser Himmelserscheinungen und dergleichen nicht auf ein eigenes Glück oder Unglück. "So maṅgaladosavītivatto" bedeutet: Jener Khīṇāsava, der alle Fehler der Glückszeichen vollständig überwunden, überschritten und durch Aufgeben hinter sich gelassen hat. In "yugayogādhigato" sind "Zorn und Groll, Undankbarkeit und Rivalität" und so weiter – nach dieser Methode – die paarweise zusammen auftretenden Befleckungen als "Paare" (yugā) bekannt. Das Joch der Sinnlichkeit, das Joch des Werdens, das Joch der Ansichten und das Joch der Unwissenheit – diese vier werden "Joche" (yogā) genannt, da sie an den Daseinskreislauf binden. Wer über diese Paare und Joche hinweggegangen ist (yugayoge adhigato), ist der Khīṇāsava-Mönch, der sie überwältigt, hinter sich gelassen, überschritten und vollständig gemeistert hat. "Na jātumetīti" bedeutet: Durch die Kraft einer erneuten Wiedergeburt kehrt er ganz gewiss nicht mehr in diese Welt zurück. Evaṃ satthā imāya gāthāya brāhmaṇassa dhammaṃ desetvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne brāhmaṇo saddhiṃ puttena sotāpattiphale patiṭṭhahi. Satthā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā eteva pitāputtā idāni pitāputtā ahesuṃ, tāpaso pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister auf diese Weise mit dieser Strophe dem Brahmanen das Dhamma verkündet hatte, legte er die Wahrheiten dar. Am Ende der Verkündung der Wahrheiten erlangte der Brahmane zusammen mit seinem Sohn die Frucht des Stromeintritts. Der Meister verknüpfte das Jātaka: "Damals waren eben diese Vater und Sohn die heutigen Vater und Sohn, der Asket aber war ich selbst." Maṅgalajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Maṅgala-Jātaka, die siebte.
[88] 8. Sārambhajātakavaṇṇanā [88] 8. Die Erklärung des Sārambha-Jātaka. Kalyāṇimeva muñceyyāti idaṃ satthā jetavane viharanto omasavādasikkhāpadaṃ (pāci. 15) ārabbha kathesi. Dvepi vatthūni heṭṭhā nandivisālajātake vuttasadisāneva. Imasmiṃ pana jātake bodhisatto gandhāraraṭṭhe takkasilāyaṃ aññatarassa brāhmaṇassa sārambho nāma balibaddo ahosi. Satthā idaṃ atītavatthuṃ kathetvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – "Man sollte nur Gutes sprechen" – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich der Trainingsregel über herabsetzende Rede. Beide Geschichten gleichen den unten im Nandivisāla-Jātaka erzählten. In diesem Jātaka jedoch war der Bodhisatta ein Stier namens Sārambha im Besitz eines bestimmten Brahmanen in Takkasilā im Reich Gandhāra. Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit erzählt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diese Strophe: 88. 88. ‘‘Kalyāṇimeva muñceyya, na hi muñceyya pāpikaṃ; Mokkho kalyāṇiyā sādhu, mutvā tappati pāpika’’nti. "Man sollte nur Gutes sprechen, niemals sollte man Böses sprechen; das Aussprechen des Guten ist heilsam, wer Böses spricht, bereut es später." Tattha kalyāṇimeva muñceyyāti catudosavinimuttaṃ kalyāṇiṃ sundaraṃ anavajjaṃ vācameva muñceyya vissajjeyya katheyya. Na hi muñceyya pāpikanti pāpikaṃ lāmikaṃ paresaṃ appiyaṃ amanāpaṃ na muñceyya na katheyya. Mokkho [Pg.398] kalyāṇiyā sādhūti kalyāṇavācāya vissajjanameva imasmiṃ loke sādhu sundaraṃ bhaddakaṃ. Mutvā tappati pāpikanti pāpikaṃ pharusavācaṃ muñcitvā vissajjetvā kathetvā so puggalo tappati socati kilamatīti. Darin bedeutet "kalyāṇimeva muñceyyā": Man sollte nur eine Rede aussprechen, äußern oder reden, die frei von den vier Fehlern ist, heilsam, schön und untadelig ist. "Na hi muñceyya pāpikaṃ" bedeutet: Eine böse, schlechte Rede, die für andere unangenehm und unliebsam ist, sollte man weder aussprechen noch reden. "Mokkho kalyāṇiyā sādhū" bedeutet: Allein das Äußern von heilsamer Rede ist in dieser Welt gut, schön und vortrefflich. "Mutvā tappati pāpikaṃ" bedeutet: Wenn man eine böse, raue Rede ausgesprochen, geäußert oder geredet hat, leidet, trauert und quält sich diese Person danach. Dies ist das Ende der Erklärung der Strophe. Evaṃ satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā brāhmaṇo ānando ahosi, brāhmaṇī uppalavaṇṇā, sārambho pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka: "Damals war der Brahmane Ānanda, die Brahmanin war Uppalavaṇṇā, der Stier Sārambha aber war ich selbst." Sārambhajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Sārambha-Jātaka, die achte.
[89] 9. Kuhakajātakavaṇṇanā [89] 9. Die Erklärung des Kuhaka-Jātaka. Vācāva kira te āsīti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ kuhakabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Kuhakavatthu uddālakajātake āvi bhavissati. "Deine Worte waren fürwahr..." – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines betrügerischen Mönchs. Die Geschichte des Betrügers wird im Uddālaka-Jātaka deutlich werden. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente ekaṃ gāmakaṃ upanissāya eko kūṭajaṭilo kuhakatāpaso vasati. Eko kuṭumbiko tassa araññe paṇṇasālaṃ kāretvā tattha naṃ vāsento attano gehe paṇītāhārena paṭijaggati. So taṃ kūṭajaṭilaṃ ‘‘sīlavā eso’’ti saddahitvā corabhayena suvaṇṇanikkhasataṃ tassa paṇṇasālaṃ netvā bhūmigataṃ katvā ‘‘idaṃ olokeyyāsi, bhante’’ti āha. Atha naṃ tāpaso ‘‘pabbajitānaṃ nāma, āvuso, evarūpaṃ kathetuṃ, na vaṭṭati, amhākaṃ pana parasantake lobho nāma natthī’’ti āha. So ‘‘sādhu, bhante’’ti tassa vacanaṃ saddahitvā pakkāmi. Duṭṭhatāpaso ‘‘sakkā ettakena jīvitu’’nti katipāhaṃ atikkamitvā taṃ suvaṇṇaṃ gahetvā antarāmagge ekasmiṃ ṭhāne ṭhapetvā āgantvā paṇṇasālāyameva vasitvā punadivase tassa gehe bhattakiccaṃ katvā evamāha ‘‘āvuso, mayaṃ tumhe nissāya ciraṃ vasimha, aticiraṃ ekasmiṃ ṭhāne vasantānaṃ manussehi saddhiṃ saṃsaggo hoti, saṃsaggo ca nāma pabbajitānaṃ malaṃ, tasmā gacchāmaha’’nti vatvā tena punappunaṃ yāciyamānopi nivattituṃ na icchi. Atha naṃ so ‘‘evaṃ sante gacchatha, bhante’’ti yāva gāmadvāraṃ anugantvā nivatti. Tāpasopi thokaṃ gantvāva ‘‘imaṃ kuṭumbikaṃ mayā vañcetuṃ vaṭṭatī’’ti cintetvā [Pg.399] jaṭānaṃ antare tiṇaṃ ṭhapetvā paṭinivatti. Kuṭumbiko ‘‘kiṃ, bhante, nivattitthā’’ti pucchi. Āvuso tumhākaṃ gehacchadanato me jaṭāsu ekatiṇaṃ laggaṃ, adinnādānañca nāma pabbajitānaṃ na vaṭṭati, taṃ ādāya āgatomhīti. Kuṭumbiko ‘‘chaḍḍetvā gacchatha, bhante’’ti vatvā ‘‘tiṇasalākampi nāma parasantakaṃ na gaṇhāti, aho kukkuccako me ayyo’’ti pasīditvā vanditvā uyyojesi. Als einst in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, lebte in Abhängigkeit von einem kleinen Dorf ein betrügerischer Asket mit Flechthaaren. Ein Hausvater ließ für ihn im Wald eine Blätterhütte errichten, ließ ihn dort wohnen und versorgte ihn in seinem eigenen Haus mit erlesener Nahrung. Er vertraute diesem betrügerischen Asketen im Glauben "Dieser ist tugendhaft" und brachte aus Angst vor Dieben einhundert Goldmünzen in dessen Blätterhütte, vergrub sie in der Erde und sagte: "Bitte gebt acht hierauf, Ehrwürdiger Herr." Daraufhin sagte der Asket zu ihm: "Lieber Freund, für Entsagte geziemt es sich nicht, über so etwas zu sprechen; wir haben wahrlich kein Verlangen nach dem Besitz anderer." Er antwortete: "Es ist gut, Ehrwürdiger Herr", vertraute seinen Worten und ging fort. Der verdorbene Asket dachte: "Mit so viel kann man gut leben", ließ einige Tage vergehen, nahm das Gold an sich, versteckte es unterwegs an einem bestimmten Ort, kehrte zurück, verblieb in der Blätterhütte, verrichtete am nächsten Tag sein Mahl im Haus des Hausvaters und sprach so: "Lieber Freund, wir haben lange Zeit in Abhängigkeit von euch gelebt. Wenn man allzu lange an einem Ort verweilt, entsteht eine enge Vertrautheit mit den Menschen, und eine solche Vertrautheit ist für Entsagte ein Makel. Daher wollen wir gehen." Obwohl er von ihm immer wieder gebeten wurde, wollte er nicht umkehren. Da sagte jener zu ihm: "Wenn dem so ist, geht, Ehrwürdiger Herr", begleitete ihn bis zum Dorfeingang und kehrte um. Der Asket ging ein kleines Stück weiter und dachte: "Ich sollte diesen Hausvater täuschen", steckte sich einen Grashalm zwischen seine Flechthaare und kehrte um. Der Hausvater fragte: "Ehrwürdiger Herr, warum seid Ihr umgekehrt?" "Lieber Freund, von eurem Hausdach hat sich ein einzelner Grashalm in meinen Flechthaaren verfangen, und das Nehmen von Nichtgegebenem geziemt sich für Entsagte nicht. Um diesen zurückzubringen, bin ich gekommen." Der Hausvater sagte: "Werft ihn einfach weg und geht, Ehrwürdiger Herr", und dachte voller Vertrauen und Bewunderung: "Er nimmt nicht einmal einen Grashalm, der einem anderen gehört! Oh, wie gewissenhaft mein edler Herr doch ist!", verbeugte sich vor ihm und verabschiedete ihn. Tadā pana bodhisattena bhaṇḍatthāya paccantaṃ gacchantena tasmiṃ nivesane nivāso gahito hoti. So tāpasassa vacanaṃ sutvāva ‘‘addhā iminā duṭṭhatāpasena imassa kiñci gahitaṃ bhavissatī’’ti kuṭumbikaṃ pucchi ‘‘atthi pana te, samma, kiñci etassa tāpasassa santike nikkhitta’’nti? ‘‘Atthi, samma, suvaṇṇanikkhasata’’nti. ‘‘Tena hi gaccha, taṃ upadhārehī’’ti. So paṇṇasālaṃ gantvā taṃ adisvā vegenāgantvā ‘‘natthi, sammā’’ti āha. ‘‘Na te suvaṇṇaṃ aññena gahitaṃ, teneva kuhakatāpasena gahitaṃ, ehi, taṃ anubandhitvā gaṇhāmā’’ti vegena gantvā kūṭatāpasaṃ gaṇhitvā hatthehi ca pādehi ca pothetvā suvaṇṇaṃ āharāpetvā gaṇhiṃsu. Bodhisatto suvaṇṇaṃ disvā ‘‘nikkhasataṃ haramāno asajjitvā tiṇamatte sattosī’’ti vatvā taṃ garahanto imaṃ gāthamāha – Damals aber hatte der Bodhisatta, der auf dem Weg ins Grenzland war, um Waren zu erwerben, in jenem Hause Herberge genommen. Als er die Worte des Asketen hörte, dachte er sogleich: „Sicherlich hat dieser böse Asket diesem Hausvater etwas weggenommen“, und fragte den Hausvater: „Gibt es vielleicht irgendetwas, mein Freund, das du bei diesem Asketen hinterlegt hast?“ – „Ja, mein Freund, einhundert Gold-Nikkhas.“ – „Dann geh und überprüfe es.“ Jener ging zur Blätterhütte, und als er es nicht fand, kam er eilig zurück und sagte: „Es ist nicht da, mein Freund.“ – „Dein Gold wurde von keinem anderen genommen; es wurde von genau jenem heuchlerischen Asketen genommen. Komm, lass uns ihm nachgehen und ihn festnehmen!“ Sie liefen schnell hin, ergriffen den betrügerischen Asketen, schlugen ihn mit Händen und Füßen, ließen ihn das Gold herbeischaffen und nahmen es an sich. Als der Bodhisatta das Gold sah, sagte er: „Während du einhundert Nikkhas stiehlst, tust du so, als hättest du kein Anhaften, doch an einem bloßen Grashalm haftest du an!“, und um ihn zu tadeln, sprach er diese Strophe: 89. 89. ‘‘Vācāva kira te āsi, saṇhā sakhilabhāṇino; Tiṇamatte asajjittho, no ca nikkhasataṃ hara’’nti. „Nur deine Rede, so heißt es, war sanft, o du sanftmütig Sprechender! An einem bloßen Grashalm bliebst du hängen, doch nicht beim Stehlen der hundert Nikkhas!“ Tattha vācāva kira te āsi, saṇhā sakhilabhāṇinoti ‘‘pabbajitānaṃ tiṇamattampi adinnaṃ ādātuṃ na vaṭṭatī’’ti evaṃ sakhilaṃ muduvacanaṃ vadantassa vācā eva kira te saṇhā āsi, vacanamattameva maṭṭhaṃ ahosīti attho. Tiṇamatte asajjitthoti kūṭajaṭila ekissā tiṇasalākāya kukkuccaṃ kurumāno tvaṃ satto āsatto laggo ahosi. No ca nikkhasataṃ haranti imaṃ pana nikkhasataṃ haranto asatto nillaggova jātosīti. Darin bedeutet „Vācāva kira te āsi, saṇhā sakhilabhāṇino“: Von dir, der du solch sanfte und milde Worte sprachst wie „Es geziemt sich für einen Weltentsagenden nicht, auch nur einen bloßen Grashalm zu nehmen, der ihm nicht gegeben wurde“, war fürwahr nur deine Rede sanft; die Bedeutung ist, dass bloß deine Worte glatt waren. „Tiṇamatte asajjittho“ bedeutet: O betrügerischer Haarflechtenträger, indem du wegen eines einzigen Grashalms Skrupel zeigtest, warst du anhaftend, verstrickt und hängengeblieben. „No ca nikkhasataṃ haraṃ“ (im Lemma „haranti“) bedeutet: Beim Stehlen dieser einhundert Nikkhas jedoch bist du ohne Anhaften und völlig frei von Verstrickung geblieben. Evaṃ bodhisatto taṃ garahitvā ‘‘mā puna, kūṭajaṭila, evarūpamakāsī’’ti ovādaṃ datvā yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta ihn so getadelt und ihm die Ermahnung erteilt hatte: „O betrügerischer Haarflechtenträger, tu so etwas nicht noch einmal!“, ging er seiner Wege. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘na, bhikkhave, idānevesa bhikkhu kuhako, pubbepi kuhakoyevā’’ti vatvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā [Pg.400] kūṭatāpaso kuhakabhikkhu ahosi, paṇḍitapuriso pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, sprach er: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, ist dieser Mönch ein Heuchler, auch in der Vergangenheit war er schon ein Heuchler“, und führte die Geburtenerzählung zusammen: „Damals war der betrügerische Asket der heuchlerische Mönch, der weise Mann aber war ich selbst.“ Kuhakajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Kuhaka-Jātaka, die neunte.
[90] 10. Akataññujātakavaṇṇanā [90] 10. Die Erklärung des Akataññu-Jātaka Yo pubbe katakalyāṇoti idaṃ satthā jetavane viharanto anāthapiṇḍikaṃ ārabbha kathesi. Tassa kireko paccantavāsiko seṭṭhi adiṭṭhasahāyo ahosi. So ekadā paccante uṭṭhānakabhaṇḍassa pañca sakaṭasatāni pūretvā kammantikamanusse āha – ‘‘gacchatha, bho, imaṃ bhaṇḍaṃ sāvatthiṃ netvā amhākaṃ sahāyakassa anāthapiṇḍikamahāseṭṭhissa paccagghena vikkiṇitvā paṭibhaṇḍaṃ āharathā’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti tassa vacanaṃ sampaṭicchitvā sāvatthiṃ gantvā mahāseṭṭhiṃ disvā paṇṇākāraṃ datvā taṃ pavattiṃ ārocesuṃ. Mahāseṭṭhi ‘‘svāgataṃ vo’’ti tesaṃ āvāsañca paribbayañca dāpetvā sahāyakassa sukhaṃ pucchitvā bhaṇḍaṃ vikkiṇitvā paṭibhaṇḍaṃ dāpesi. Te paccantaṃ gantvā tamatthaṃ attano seṭṭhissa ārocesuṃ. „Yo pubbe katakalyāṇo“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf Anāthapiṇḍika. Er hatte, wie man sagt, im Grenzland einen befreundeten Großkaufmann, den er noch nie persönlich gesehen hatte. Dieser füllte einst im Grenzland fünfhundert Wagen mit dortigen Erzeugnissen und sprach zu seinen Arbeitsleuten: „Geht, ihr Lieben, bringt diese Waren nach Sāvatthi, verkauft sie zu einem guten Preis an unseren Freund, den Großkaufmann Anāthapiṇḍika, und bringt Tauschwaren zurück.“ Sie willigten mit den Worten „Sehr wohl“ ein, reisten nach Sāvatthi, suchten den Großkaufmann auf, überreichten ihm Geschenke und berichteten ihm von der Angelegenheit. Der Großkaufmann hieß sie mit den Worten „Willkommen seid ihr!“ willkommen, ließ ihnen Unterkunft und Verpflegung geben, erkundigte sich nach dem Wohlgehen seines Freundes, verkaufte ihre Waren und ließ ihnen Tauschwaren geben. Sie kehrten ins Grenzland zurück und berichteten ihrem Großkaufmann von dieser Begebenheit. Aparabhāge anāthapiṇḍikopi tatheva pañca sakaṭasatāni tattha pesesi. Manussā tattha gantvā paṇṇākāraṃ ādāya paccantavāsikaseṭṭhiṃ passiṃsu. So ‘‘kuto āgacchathā’’ti pucchitvā ‘‘sāvatthito tumhākaṃ sahāyakassa anāthapiṇḍikassa santikā’’ti vutte ‘‘anāthapiṇḍikoti kassaci purisassa nāmaṃ bhavissatī’’ti parihāsaṃ katvā paṇṇākāraṃ gahetvā ‘‘gacchatha tumhe’’ti uyyojesi, neva nivāsaṃ, na paribbayaṃ dāpesi. Te sayameva bhaṇḍaṃ vikkiṇitvā paṭibhaṇḍaṃ ādāya sāvatthiṃ āgantvā seṭṭhissa taṃ pavattiṃ ārocesuṃ. Später sandte auch Anāthapiṇḍika in gleicher Weise fünfhundert Wagen dorthin. Seine Leute reisten dorthin, nahmen Geschenke mit und suchten den im Grenzland lebenden Großkaufmann auf. Dieser fragte: „Woher kommt ihr?“, und als sie antworteten: „Aus Sāvatthi, von eurem Freund Anāthapiṇḍika“, machte er sich lustig und sagte: „Anāthapiṇḍika – das wird wohl der Name irgendeines Mannes sein!“ Er nahm zwar die Geschenke an, schickte sie dann aber mit den Worten „Geht fort mit euch!“ weg und gab ihnen weder Unterkunft noch Verpflegung. Da verkauften sie die Waren ganz allein, nahmen die Tauschwaren mit, kehrten nach Sāvatthi zurück und berichteten dem Großkaufmann von diesem Vorfall. Atha so paccantavāsī punapi ekavāraṃ tatheva pañca sakaṭasatāni sāvatthiṃ pesesi, manussā paṇṇākāraṃ ādāya mahāseṭṭhiṃ passiṃsu. Te [Pg.401] pana disvā anāthapiṇḍikassa manussā ‘‘mayaṃ, sāmi, etesaṃ nivāsañca bhattañca paribbayañca jānissāmā’’ti vatvā tesaṃ sakaṭāni bahinagare tathārūpe ṭhāne mocāpetvā ‘‘tumhe idheva vasatha, amhākaṃ vo ghare yāgubhattañca paribbayo ca bhavissatī’’ti gantvā dāsakammakare sannipātetvā majjhimayāmasamanantare pañca sakaṭasatāni vilumpitvā nivāsanapārupanānipi nesaṃ acchinditvā goṇe palāpetvā sakaṭāni vicakkāni katvā bhūmiyaṃ ṭhapetvā cakkānipi gaṇhitvāva agamaṃsu. Paccantavāsino nivāsanamattassapi sāmikā ahutvā bhītā vegena palāyitvā paccantameva gatā. Seṭṭhimanussāpi tamatthaṃ mahāseṭṭhino ārocesuṃ. So ‘‘atthi dānidaṃ kathāpābhata’’nti satthu santikaṃ gantvā ādito paṭṭhāya sabbaṃ taṃ pavattiṃ ārocesi. Satthā ‘‘na kho, gahapati, so paccantavāsī idāneva evaṃsīlo, pubbepi evaṃsīloyeva ahosī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. Daraufhin sandte jener Grenzlandbewohner noch einmal in gleicher Weise fünfhundert Wagen nach Sāvatthi. Seine Leute nahmen Geschenke mit und suchten den Großkaufmann auf. Als jedoch die Leute Anāthapiṇḍikas sie sahen, sagten sie: „Herr, wir werden uns um die Unterkunft, das Essen und den Proviant dieser Leute kümmern.“ Sie ließen deren Wagen außerhalb der Stadt an einem passenden Ort abspannen und sagten zu ihnen: „Bleibt nur hier wohnen, in unserem Haus wird es für euch Schleimsuppe, Essen und Proviant geben.“ Nachdem sie weggegangen waren, versammelten sie die Sklaven und Arbeiter, plünderten am Ende der mittleren Nachtwache die fünfhundert Wagen, raubten ihnen sogar ihre Unter- und Obergewänder, trieben die Rinder fort, montierten die Räder der Wagen ab, ließen die Wagen auf dem Boden stehen und gingen mit den Rädern davon. Die Grenzlandbewohner, die nun nicht einmal mehr ein Unterkleid besaßen, flohen voller Angst in großer Eile und kehrten direkt ins Grenzland zurück. Auch die Leute des Großkaufmanns berichteten dem Großkaufmann von dieser Begebenheit. Er dachte: „Nun habe ich einen willkommenen Anlass für ein Gespräch“, ging zum Meister und berichtete ihm von Anfang an die ganze Begebenheit. Der Meister sprach: „Nicht erst jetzt, o Hausvater, hat jener Grenzlandbewohner einen solchen Charakter; auch in der Vergangenheit hatte er schon genau diesen Charakter“, und auf dessen Bitte hin erzählte er eine Begebenheit aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bārāṇasiyaṃ mahāvibhavo seṭṭhi ahosi. Tasseko paccantavāsiko seṭṭhi adiṭṭhasahāyo ahosi. Sabbaṃ atītavatthu paccuppannavatthusadisameva bodhisatto pana attano manussehi ‘‘ajja amhehi idaṃ nāma kata’’nti ārocite ‘‘paṭhamaṃ attano kataṃ upakāraṃ ajānantā pacchā evarūpaṃ labhantiyevā’’ti vatvā sampattaparisāya dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta ein sehr wohlhabender Großkaufmann in Bārāṇasī. Er hatte einen befreundeten Großkaufmann im Grenzland, den er noch nie persönlich gesehen hatte. Die ganze Geschichte der Vergangenheit gleicht genau der der Gegenwart. Als aber dem Bodhisatta von seinen Leuten berichtet wurde: „Heute haben wir diese und jene Tat vollbracht“, sagte er: „Diejenigen, die eine ihnen zuvor erwiesene Wohltat nicht anerkennen, erleiden später genau ein solches Elend“, und um der versammelten Zuhörerschaft die Lehre zu verkünden, sprach er diese Strophe: 90. 90. ‘‘Yo pubbe katakalyāṇo, katattho nāvabujjhati; Pacchā kicce samuppanne, kattāraṃ nādhigacchatī’’ti. „Wer eine zuvor empfangene Wohltat und Hilfe nicht anerkennt, der findet später, wenn eine Notlage eintritt, keinen Helfer.“ Tatrāyaṃ piṇḍattho – khattiyādīsu yo koci puriso pubbe paṭhamataraṃ aññena katakalyāṇo katūpakāro katattho nipphāditakicco hutvā taṃ parena attani kataṃ kalyāṇañceva atthañca na jānāti, so pacchā attano kicce samuppanne tassa kiccassa kattāraṃ nādhigacchati na labhatīti. Hierbei ist dies die zusammenfassende Bedeutung: Wenn irgendein Mensch – ob aus dem Kriegerstand oder anderen Ständen – zuvor, ganz am Anfang, von einem anderen eine Wohltat empfangen hat – das heißt, dem Hilfe erwiesen wurde –, und wessen Anliegen erfüllt wurde – das heißt, dessen Angelegenheit erledigt wurde –, dieser Mensch jedoch jene von dem anderen an ihm vollbrachte gute Tat und Hilfe nicht anerkennt, so findet er später, wenn seine eigene Angelegenheit ansteht, für dieses Anliegen keinen Ausführenden, das heißt, er erlangt keinen. Evaṃ bodhisatto imāya gāthāya dhammaṃ desetvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta so mit dieser Strophe die Lehre dargelegt und verdienstvolle Taten wie das Spenden und anderes vollbracht hatte, ging er gemäß seinen Taten (ins Jenseits) ein. Satthā [Pg.402] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā paccantavāsī idānīpi paccantavāsīyeva, bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrdarlegung vorgetragen hatte, verknüpfte er die Geburtserzählung mit der Gegenwart: „Der damalige Grenzlandbewohner ist auch jetzt wieder ebendieser Grenzlandbewohner, der Schatzmeister von Bārāṇasī aber war ich selbst.“ Akataññujātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Akataññu-Jātaka ist die zehnte. Apāyimhavaggo navamo. Das Apāyimha-Vagga ist das neunte Kapitel. Tassuddānaṃ – Dessen Inhaltsübersicht ist wie folgt: Surāpānaṃ mittavindaṃ, kāḷakaṇṇī atthadvāraṃ; Kiṃpakkasīlavīmaṃsaṃ, maṅgalañcāpi sārambhaṃ; Kuhakaṃ akataññū cāti. „Surāpāna, Mittavinda, Kāḷakaṇṇī, Atthadvāra, Kiṃpakka, Sīlavīmaṃsa, Maṅgala sowie Sārambha, Kuhaka und Akataññū.“ 10. Littavaggo 10. Das Litta-Kapitel (Littavagga)
[91] 1. Littajātakavaṇṇanā [91] 1. Die Erklärung des Litta-Jātaka Littaṃ paramena tejasāti idaṃ satthā jetavane viharanto apaccavekkhitaparibhogaṃ ārabbha kathesi. Tasmiṃ kira kāle bhikkhū cīvarādīni labhitvā yebhuyyena apaccavekkhitvā paribhuñjanti. Te cattāro paccaye apaccavekkhitvā paribhuñjamānā yebhuyyena nirayatiracchānayonito na muccanti. Satthā taṃ kāraṇaṃ ñatvā bhikkhūnaṃ anekapariyāyena dhammiṃ kathaṃ kathetvā apaccavekkhitaparibhoge ādīnavaṃ dassetvā ‘‘bhikkhave, bhikkhunā nāma cattāro paccaye labhitvā apaccavekkhitvā paribhuñjituṃ na vaṭṭati, tasmā ito paṭṭhāya cattāro paccaye paccavekkhitvā paribhuñjeyyāthā’’ti paccavekkhanavidhiṃ dassento ‘‘idha pana, bhikkhave, bhikkhu paṭisaṅkhā yoniso cīvaraṃ paṭisevati sītassa paṭighātāyā’’tiādinā (ma. ni. 1.23; a. ni. 6.58) nayena tantiṃ ṭhapetvā ‘‘bhikkhave, cattāro paccaye evaṃ paccavekkhitvā paribhuñjituṃ vaṭṭati, apaccavekkhitvā paribhogo nāma halāhalavisaparibhogasadiso. Porāṇakā hi apaccavekkhitvā dosaṃ ajānitvā visaṃ paribhuñjitvā vipākante mahādukkhaṃ anubhaviṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Mit starkem Gift bestrichen“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf den unreflektierten Gebrauch der Requisiten. Zu jener Zeit, so heißt es, erhielten die Mönche Gewänder und andere Dinge und gebrauchten sie meist, ohne sie weise zu reflektieren. Da sie die vier Requisiten ohne weise Reflexion gebrauchten, wurden die meisten von ihnen nicht aus der Hölle oder dem Tierreich befreit. Als der Meister diesen Umstand erkannte, hielt er den Mönchen auf vielfältige Weise eine Lehrrede, zeigte die Nachteile des unreflektierten Gebrauchs auf und sprach: „Ihr Mönche, für einen Mönch gehört es sich nicht, die vier Requisiten, wenn er sie erhalten hat, unreflektiert zu gebrauchen. Darum sollt ihr von heute an die vier Requisiten nur nach weiser Reflexion gebrauchen.“ Um die Methode der Reflexion aufzuzeigen, legte er den kanonischen Text fest nach der Methode: „Hierbei, ihr Mönche, gebraucht ein Mönch mit gründlicher Reflexion das Gewand nur, um die Kälte abzuwehren...“ und so weiter, und fügte hinzu: „Ihr Mönche, es gehört sich, die vier Requisiten in dieser Weise nach gründlicher Reflexion zu gebrauchen. Der unreflektierte Gebrauch gleicht dem Einnehmen des tödlichen Halāhala-Giftes. Denn die Menschen in alter Zeit nahmen, ohne zu reflektieren und ohne die Gefahr zu kennen, Gift zu sich und erlitten am Ende, als die Wirkung eintrat, großes Leid.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte [Pg.403] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto aññatarasmiṃ mahābhogakule nibbattitvā vayappatto akkhadhutto ahosi. Athāparo kūṭakkhadhutto bodhisattena saddhiṃ kīḷanto attano jaye vattamāne keḷimaṇḍalaṃ na bhindati, parājayakāle pana akkhaṃ mukhe pakkhipitvā ‘‘akkho naṭṭho’’ti keḷimaṇḍalaṃ bhinditvā pakkamati. Bodhisatto tassa taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘hotu, jānissāmettha patirūpakāraṇa’’nti akkhe ādāya attano ghare halāhalavisena rañjitvā punappunaṃ sukkhāpetvā te ādāya tassa santikaṃ gantvā ‘‘ehi, samma, akkhehi kīḷāmā’’ti āha. So ‘‘sādhu, sammā’’ti keḷimaṇḍalaṃ sajjetvā tena saddhiṃ kīḷanto attano parājayakāle ekaṃ akkhaṃ mukhe pakkhipi. Atha naṃ bodhisatto tathā karontaṃ disvā ‘‘gilāhi tāva, pacchā idaṃ nāmetanti jānissasī’’ti codetuṃ imaṃ gāthamāha – Als einst zu Bārāṇasī Brahmadatta regierte, wurde der Bodhisatta in einer sehr wohlhabenden Familie geboren und wurde, als er herangewachsen war, ein leidenschaftlicher Würfelspieler. Ein anderer, betrügerischer Würfelspieler, der mit dem Bodhisatta spielte, zerstörte das Spielfeld nicht, wenn er am Gewinnen war; im Falle einer Niederlage jedoch steckte er einen Würfel in den Mund, rief „Der Würfel ist verloren!“, löste die Spielrunde auf und ging davon. Als der Bodhisatta diesen Trick durchschaute, dachte er: „Nun gut, ich werde hierfür eine passende Gegenmaßnahme finden.“ Er nahm die Würfel, strich sie in seinem Haus mit tödlichem Halāhala-Gift ein, ließ sie wiederholt trocknen, ging mit ihnen zu dem Betrüger und sagte: „Komm, mein Freund, lass uns würfeln!“ Dieser stimmte zu mit den Worten: „Sehr wohl, mein Freund!“, bereitete das Spielfeld vor, spielte mit ihm und steckte bei seiner drohenden Niederlage einen Würfel in den Mund. Als der Bodhisatta sah, dass er dies tat, sprach er, um ihn zurechtzuweisen, folgende Strophe: 91. 91. ‘‘Littaṃ paramena tejasā, gilamakkhaṃ puriso na bujjhati; Gila re gila pāpadhuttaka, pacchā te kaṭukaṃ bhavissatī’’ti. „Der Mann merkt nicht, dass er den mit stärkstem Gift bestrichenen Würfel verschluckt; schlucke, ja schlucke, du elender Betrüger! Später wird es für dich bitter werden.“ Tattha littanti makkhitaṃ rañjitaṃ. Paramena tejasāti uttamatejasampannena halāhalavisena. Gilanti gilanto. Akkhanti guḷakaṃ. Na bujjhatīti ‘‘ayaṃ me gilato idaṃ nāma karissatī’’ti na jānāti. Gila reti gilāhi are. Gilāti punapi codento vadati. Pacchā te kaṭukaṃ bhavissatīti imasmiṃ te akkhe gilite pacchā etaṃ visaṃ tikhiṇaṃ bhavissatīti attho. Darin bedeutet „littanti“: bestrichen, eingefärbt. „Paramena tejasāti“ bedeutet: mit dem überaus wirksamen, tödlichen Halāhala-Gift. „Gilanti“ bedeutet: verschluckend. „Akkhanti“ bedeutet: die Spielkugel (den Würfel). „Na bujjhatīti“ bedeutet: er weiß nicht: „Wenn ich diesen verschlucke, wird er mir diesen und jenen Schaden zufügen.“ „Gila reti“ bedeutet: „Schlucke doch, du Kerl!“ „Gilāti“ sagt er, um ihn nochmals anzutreiben. „Pacchā te kaṭukaṃ bhavissatīti“ bedeutet: Wenn du diesen Würfel verschluckt hast, wird dieses Gift danach brennend scharf und schmerzhaft für dich sein – dies ist die Bedeutung. So bodhisattassa kathentasseva visavegena mucchito akkhīni parivattetvā khandhaṃ nāmetvā pati. Bodhisatto ‘‘idānissa jīvitadānaṃ dātuṃ vaṭṭatī’’ti osadhaparibhāvitaṃ vamanayogaṃ datvā vametvā sappiphāṇitamadhusakkarādayo khādāpetvā arogaṃ katvā ‘‘puna evarūpaṃ mā akāsī’’ti ovaditvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Noch während der Bodhisatta sprach, wurde jener durch die Kraft des Giftes ohnmächtig, verdrehte die Augen, ließ die Schultern hängen und brach zusammen. Der Bodhisatta dachte: „Nun gehört es sich, ihm das Geschenk des Lebens zu geben.“ Er verabreichte ihm ein mit Heilkräutern präpariertes Brechmittel, brachte ihn zum Erbrechen, gab ihm geklärte Butter, Melasse, Honig, Zucker und anderes zu essen, stellte seine Gesundheit wieder her, ermahnte ihn mit den Worten: „Tu so etwas nie wieder!“, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Spenden und ging gemäß seinen Taten (ins Jenseits) ein. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘bhikkhave, apaccavekkhitaparibhogo nāma apaccavekkhitvā katavisaparibhogasadiso hotī’’ti vatvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā paṇḍitadhutto ahameva ahosiṃ, kūṭadhutto [Pg.404] panettha na kathīyati, yathā ca ettha, evaṃ sabbattha. Yo pana imasmiṃ kāle na paññāyati, so na kathīyatevā’’ti. Nachdem der Meister diese Lehrdarlegung vorgetragen hatte, sprach er: „Ihr Mönche, der unreflektierte Gebrauch der Requisiten gleicht dem unreflektierten Einnehmen von Gift“, und verknüpfte die Geburtserzählung: „Der damalige kluge Spieler war ich selbst; der betrügerische Spieler jedoch wird hier nicht namentlich identifiziert. Wie hier, so verhält es sich überall: Wer in dieser gegenwärtigen Zeit nicht offenkundig in Erscheinung tritt, der wird auch nicht namentlich identifiziert.“ Littajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Litta-Jātaka ist die erste.
[92] 2. Mahāsārajātakavaṇṇanā [92] 2. Die Erklärung des Mahāsāra-Jātaka Ukkaṭṭhe sūramicchantīti idaṃ satthā jetavane viharanto āyasmantaṃ ānandattheraṃ ārabbha kathesi. Ekasmiñhi samaye kosalarañño itthiyo cintayiṃsu ‘‘buddhuppādo nāma dullabho, tathā manussapaṭilābho, paripuṇṇāyatanatā ca. Mayañca imaṃ dullabhaṃ khaṇasamavāyaṃ labhitvāpi attano ruciyā vihāraṃ gantvā dhammaṃ vā sotuṃ buddhapūjaṃ vā kātuṃ dānaṃ vā dātuṃ na labhāma, mañjūsāya pakkhittā viya vasāma, rañño kathetvā amhākaṃ dhammaṃ desetuṃ anucchavikaṃ ekaṃ bhikkhuṃ pakkosāpetvā tassa santike dhammaṃ sossāma, tato yaṃ sakkhissāma, taṃ uggaṇhissāma, dānādīni ca puññāni karissāma. Evaṃ no ayaṃ khaṇapaṭilābho saphalo bhavissatī’’ti. Tā sabbāpi rājānaṃ upasaṅkamitvā attanā cintitakāraṇaṃ kathayiṃsu. Rājā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchi. „In Zeiten der Not wünscht man sich einen Helden“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf den Ehrwürdigen Thera Ānanda. Zu jener Zeit nämlich dachten die Frauen des Königs von Kosala: „Es ist schwer, die Erscheinung eines Buddha zu erlangen, ebenso die Geburt als Mensch und die Vollkommenheit der Sinnesorgane. Obwohl wir diese seltene, günstige Gelegenheit erlangt haben, ist es uns nicht vergönnt, nach eigenem Wunsch zum Kloster zu gehen, um die Lehre zu hören, dem Buddha Ehrung zu erweisen oder Spenden zu geben; wir leben wie in eine Truhe gesperrt. Wir sollten mit dem König sprechen, einen geeigneten Mönch herbeirufen lassen, damit er uns die Lehre verkündet, und in seiner Gegenwart die Lehre hören. Was wir dann behalten können, das wollen wir lernen, und wir wollen verdienstvolle Werke wie das Spenden und anderes tun. Auf diese Weise wird uns das Erlangen dieser günstigen Gelegenheit fruchtbringend sein.“ Sie alle begaben sich zum König und berichteten ihm von ihrem Vorhaben. Der König stimmte mit den Worten „Sehr gut!“ zu. Athekadivasaṃ rājā uyyānakīḷaṃ kīḷitukāmo uyyānapālaṃ pakkosāpetvā ‘‘uyyānaṃ sodhehī’’ti āha. Uyyānapālo uyyānaṃ sodhento satthāraṃ aññatarasmiṃ rukkhamūle nisinnaṃ disvā rañño santikaṃ gantvā ‘‘suddhaṃ, deva, uyyānaṃ, apicettha aññatarasmiṃ rukkhamūle bhagavā nisinno’’ti āha. Rājā ‘‘sādhu, samma, satthu santike dhammampi sossāmā’’ti alaṅkatarathaṃ abhiruhitvā uyyānaṃ gantvā satthu santikaṃ agamāsi. Eines Tages wünschte der König, sich im königlichen Garten zu vergnügen, rief den Obergärtner herbei und sprach: „Säubere den Garten!“ Als der Gärtner den Garten säuberte, sah er den Meister am Fuße eines bestimmten Baumes sitzen. Er ging zum König und sagte: „Majestät, der Garten ist gesäubert, doch zudem sitzt dort der Erhabene am Fuße eines bestimmten Baumes.“ Der König dachte: „Sehr gut, mein Freund, wir wollen in der Gegenwart des Meisters auch die Lehre hören.“ Er bestieg einen festlich geschmückten Wagen, fuhr zum Garten und begab sich in die Gegenwart des Meisters. Tasmiñca samaye chattapāṇi nāmeko anāgāmī upāsako satthu santike dhammaṃ suṇamāno nisinno hoti. Rājā taṃ disvā āsaṅkamāno muhuttaṃ ṭhatvā puna ‘‘sacāyaṃ pāpako bhaveyya, na satthu santike nisīditvā dhammaṃ suṇeyya, apāpakena iminā bhavitabba’’nti cintetvā satthāraṃ upasaṅkamitvā vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Upāsako buddhagāravena rañño [Pg.405] paccuṭṭhānaṃ vā vandanaṃ vā na akāsi, tenassa rājā anattamano ahosi. Satthā tassa anattamanabhāvaṃ ñatvā upāsakassa guṇaṃ kathesi ‘‘ayaṃ, mahārāja, upāsako bahussuto āgatāgamo kāmesu vītarāgo’’ti rājā ‘‘na iminā orakena bhavitabbaṃ, yassa satthā guṇaṃ vaṇṇetī’’ti cintetvā ‘‘upāsaka, vadeyyāsi yena te attho’’ti āha. Upāsako ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchi. Rājā satthu santike dhammaṃ sutvā satthāraṃ padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi. Zu jener Zeit saß ein Laienanhänger namens Chattapāṇi, der ein Anāgāmi war, beim Erhabenen und hörte die Lehre. Als der König ihn erblickte, schöpfte er Verdacht, verweilte einen Augenblick und dachte wiederum: „Wenn dieser ein böser Mensch wäre, würde er sich nicht beim Erhabenen niedersetzen und die Lehre hören; er muss ein rechtschaffener Mann sein.“ Nachdem er so gedacht hatte, trat er an den Erhabenen heran, verneigte sich vor ihm und setzte sich an eine Seite nieder. Aus Ehrfurcht vor dem Buddha stand der Laienanhänger vor dem König weder auf, noch erwies er ihm Ehrerbietung; deswegen war der König mit ihm unzufrieden. Als der Erhabene seine Unzufriedenheit bemerkte, pries er die Tugenden des Laienanhängers: „Großer König, dieser Laienanhänger ist vielerfahren, im Besitz der überlieferten Lehren und frei von Begierde nach den Sinnengenüssen.“ Da dachte der König: „Er kann kein geringer Mann sein, wenn der Erhabene seine Tugenden rühmt“, und sprach: „Laienanhänger, nenne mir, was immer du benötigst.“ Der Laienanhänger willigte ein und sagte: „Sehr wohl.“ Nachdem der König beim Erhabenen die Lehre gehört hatte, umrundete er den Erhabenen ehrerbietig zur Rechten und ging fort. So ekadivasaṃ uparipāsāde mahāvātapānaṃ vivaritvā ṭhito taṃ upāsakaṃ bhuttapātarāsaṃ chattamādāya jetavanaṃ gacchantaṃ disvā pakkosāpetvā evamāha ‘‘tvaṃ kira, upāsaka, bahussuto, amhākañca itthiyo dhammaṃ sotukāmā ceva uggahetukāmā ca, sādhu vatassa sace tāsaṃ dhammaṃ vāceyyāsī’’ti. ‘‘Deva, gihīnaṃ nāma rājantepure dhammaṃ desetuṃ vā vācetuṃ vā nappatirūpaṃ, ayyānaṃ eva patirūpa’’nti. Rājā ‘‘saccaṃ esa vadatī’’ti uyyojetvā itthiyo pakkosāpetvā ‘‘bhadde, ahaṃ tumhākaṃ dhammadesanatthāya ca dhammavācanatthāya ca satthu santikaṃ gantvā ekaṃ bhikkhuṃ yācāmi, asītiyā mahāsāvakesu kataraṃ yācāmī’’ti āha. Tā sabbāpi mantetvā dhammabhaṇḍāgārikaṃ ānandattherameva ārocesuṃ. Rājā satthu santikaṃ gantvā vanditvā ekamantaṃ nisinno evamāha ‘‘bhante, amhākaṃ gehe itthiyo ānandattherassa santike dhammaṃ sotuñca uggaṇhituñca icchanti, sādhu vata sace thero amhākaṃ gehe dhammaṃ deseyya ceva vāceyya cā’’ti. Satthā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā theraṃ āṇāpesi. Tato paṭṭhāya rañño itthiyo therassa santike dhammaṃ suṇanti ceva uggaṇhanti ca. Eines Tages stand er oben auf dem Palast, öffnete ein großes Windfenster und sah jenen Laienanhänger, der nach dem Frühstück mit einem Schirm in der Hand auf dem Weg zum Jetavana-Kloster war. Er ließ ihn rufen und sprach zu ihm: „Man sagt, Laienanhänger, du seist vielerfahren. Auch unsere Frauen wünschen sich, die Lehre zu hören und zu lernen. Es wäre fürwahr gut, wenn du sie die Lehre lehren würdest.“ Er antwortete: „Majestät, für Hausleute schickt es sich nicht, im königlichen Palast die Lehre zu verkünden oder zu lehren; dies geziemt sich nur für die Ehrwürdigen.“ Der König dachte: „Er spricht die Wahrheit“, entließ ihn, ließ die Frauen rufen und sprach: „Ihr Edlen, ich werde zum Erhabenen gehen und um einen Mönch bitten, damit er euch die Lehre verkündet und lehrt. Welchen unter den achtzig großen Jüngern soll ich erbitten?“ Sie alle berieten sich und baten um den ehrwürdigen Ānanda, den Schatzmeister der Lehre. Der König begab sich zum Erhabenen, verneigte sich vor ihm, setzte sich an eine Seite nieder und sprach: „Ehrwürdiger Herr, die Frauen in unserem Palast wünschen, vom ehrwürdigen Ānanda die Lehre zu hören und zu lernen. Es wäre fürwahr gut, wenn der ältere Ehrwürdige in unserem Haus die Lehre verkünden und lehren würde.“ Der Erhabene stimmte mit den Worten „Gut so“ zu und wies den Thera an. Von jener Zeit an hörten und lernten die Frauen des Königs die Lehre beim ehrwürdigen Thera. Athekadivasaṃ rañño cūḷāmaṇi naṭṭho. Rājā tassa naṭṭhabhāvaṃ sutvā amacce āṇāpesi ‘‘sabbe antovaḷañjanake manusse gahetvā cūḷāmaṇiṃ āharāpethā’’ti. Amaccā mātugāme ādiṃ katvā cūḷāmaṇiṃ paripucchantā adisvā mahājanaṃ kilamenti. Taṃ divasaṃ ānandatthero rājanivesanaṃ paviṭṭho. Yathā tā itthiyo pubbe theraṃ disvāva haṭṭhatuṭṭhā dhammaṃ suṇanti ceva uggaṇhanti ca, tathā akatvā sabbā domanassappattāva ahesuṃ. Tato therena ‘‘kasmā tumhe ajja evarūpā [Pg.406] jātā’’ti pucchitā evamāhaṃsu ‘‘bhante, rañño cūḷāmaṇiṃ pariyesāmāti amaccā mātugāme upādāya antovaḷañjanake kilamenti, na jānāma kassa ‘kiṃ bhavissatī’ti, tenamha domanassappattā’’ti. Thero ‘‘mā cintayitthā’’ti tā samassāsetvā rañño santikaṃ gantvā paññattāsane nisīditvā ‘‘maṇi kira te, mahārāja, naṭṭho’’ti pucchi. ‘‘Āma, bhante’’ti. ‘‘Asakkhi pana taṃ āharāpetu’’nti. ‘‘Bhante, sabbaṃ antojanaṃ gahetvā kilamentopi na sakkomi āharāpetu’’nti. ‘‘Mahārāja, mahājanaṃ akilametvāva āharaṇūpāyo atthī’’ti. ‘‘Kataro, bhante’’ti? ‘‘Piṇḍadānaṃ, mahārājā’’ti. ‘‘Kataraṃ piṇḍadānaṃ, bhante’’ti? ‘‘Mahārāja, yattakesu āsaṅkā atthi, te gahetvā ekekassa ekekaṃ palālapiṇḍaṃ vā mattikāpiṇḍaṃ vā datvā ‘imaṃ paccūsakāle āharitvā asukaṭṭhāne nāma pātethā’ti vattabbaṃ. Yena gahito bhavissati, so tasmiṃ pakkhipitvā āharissati. Sace paṭhamadivaseyeva pātenti, iccetaṃ kusalaṃ. No ce pātenti, dutiyadivasepi tatiyadivasepi tatheva kātabbaṃ. Evaṃ mahājano ca na kilamissati, maṇiñca labhissasī’’ti evaṃ vatvā thero agamāsi. Darauf ging eines Tages das Haarschmuck-Juwel des Königs verloren. Als der König von dessen Verlust erfuhr, befahl er den Ministern: „Ergreift alle Bediensteten des inneren Palastes und lasst das Haarschmuck-Juwel herbeischaffen!“ Die Minister verhörten, angefangen bei den Frauen, alle nach dem Haarschmuck-Juwel; da sie es jedoch nicht fanden, quälten sie die Leute. An jenem Tag betrat der ehrwürdige Ānanda den königlichen Palast. Anstatt sich wie früher beim Anblick des Theras zu freuen und glücklich die Lehre zu hören und zu lernen, waren alle Frauen von tiefer Niedergeschlagenheit erfüllt. Als sie daraufhin vom Thera gefragt wurden: „Warum seid ihr heute so niedergeschlagen?“, antworteten sie: „Ehrwürdiger Herr, auf der Suche nach dem Haarschmuck-Juwel des Königs quälen die Minister, angefangen bei den Frauen, alle Bediensteten des inneren Palastes. Wir wissen nicht, wer von uns was zu erwarten hat; darum sind wir so niedergeschlagen.“ Der Thera tröstete sie mit den Worten „Sorgt euch nicht“ und begab sich zum König. Er setzte sich auf den vorbereiteten Sitz und fragte: „Stimmt es, großer König, dass dein Juwel verloren gegangen ist?“ „Ja, ehrwürdiger Herr.“ „War es denn möglich, es herbeischaffen zu lassen?“ „Ehrwürdiger Herr, obwohl ich das gesamte Gesinde des inneren Palastes ergreifen und quälen lasse, gelingt es mir nicht, es herbeizuschaffen.“ „Großer König, es gibt eine Methode, das Juwel herbeizuschaffen, ohne die Menschen zu quälen.“ „Welche Methode ist das, ehrwürdiger Herr?“ „Das Geben von Ballen, großer König.“ „Was für ein Geben von Ballen, ehrwürdiger Herr?“ „Großer König, rufe alle zusammen, gegen die ein Verdacht besteht, und gib jedem Einzelnen entweder einen Strohballen oder einen Tonklumpen und sprich zu ihnen: ‚Bringt dies im Morgengrauen zurück und lasst es an jenem bestimmten Ort fallen!‘ Wer das Juwel an sich genommen hat, wird es darin verstecken und so herbeibringen. Wenn sie es gleich am ersten Tag zurückgeben, ist es gut. Wenn sie es nicht tun, soll man am zweiten und am dritten Tag ebenso verfahren. Auf diese Weise werden die Menschen nicht gequält, und du wirst das Juwel zurückbekommen.“ Nach diesen Worten ging der Thera fort. Rājā vuttanayeneva tayo divase dāpesi, neva maṇiṃ āhariṃsu. Thero tatiyadivase āgantvā ‘‘kiṃ, mahārāja, pātito maṇī’’ti pucchi. ‘‘Na pātenti, bhante’’ti. ‘‘Tena hi, mahārāja, mahātalasmiṃyeva paṭicchannaṭṭhāne mahācāṭiṃ ṭhapāpetvā udakassa pūrāpetvā sāṇiṃ parikkhipāpetvā ‘sabbe antovaḷañjanakamanussā ca itthiyo ca uttarāsaṅgaṃ katvā ekekova antosāṇiṃ pavisitvā hatthaṃ dhovitvā āgacchantū’ti vadehī’’ti thero imaṃ upāyaṃ ācikkhitvā pakkāmi. Rājā tathā kāresi. Maṇicoro cintesi ‘‘dhammabhaṇḍāgāriko imaṃ adhikaraṇaṃ ādāya maṇiṃ adassetvā osakkissatīti aṭṭhānametaṃ, pātetuṃ dāni vaṭṭatī’’ti maṇiṃ paṭicchannaṃ katvā ādāya antosāṇiṃ pavisitvā cāṭiyaṃ pātetvā nikkhami. Sabbesaṃ nikkhantakāle udakaṃ chaḍḍetvā maṇiṃ addasaṃsu. Rājā ‘‘theraṃ nissāya mahājanaṃ akilametvāva me maṇi laddho’’ti tussi, antovaḷañjanakamanussāpi ‘‘theraṃ nissāya mahādukkhato muttamhā’’ti tussiṃsu. ‘‘Therassānubhāvena rañño [Pg.407] cūḷāmaṇi laddho’’ti therassānubhāvo sakalanagare ceva bhikkhusaṅghe ca pākaṭo jāto. Der König ließ die Ballen genau in dieser Weise drei Tage lang verteilen, doch das Juwel wurde nicht zurückgebracht. Am dritten Tag kam der Thera und fragte: „Nun, großer König, wurde das Juwel zurückgegeben?“ „Sie geben es nicht zurück, ehrwürdiger Herr.“ „In diesem Fall, großer König, lass an einem geschützten Ort auf dem großen Platz ein großes Tongefäß aufstellen, es mit Wasser füllen und einen Vorhang darum spannen. Dann sprich: ‚Alle Bediensteten des inneren Palastes und alle Frauen sollen ihr Obergewand anlegen, einzeln hinter den Vorhang treten, ihre Hände waschen und wieder herauskommen!‘“ Nachdem der Thera diese List erklärt hatte, ging er fort. Der König verfuhr genau so. Der Juwelendieb dachte: „Dass der Schatzmeister der Lehre diese Angelegenheit übernimmt und sich zurückzieht, ohne das Juwel ans Licht zu bringen, ist unmöglich. Jetzt ist es an der Zeit, es hineinzulegen.“ So nahm er das Juwel heimlich an sich, trat hinter den Vorhang, ließ es in das Tongefäß fallen und ging wieder hinaus. Als alle herausgegangen waren, goss man das Wasser aus und fand das Juwel. Der König freute sich und dachte: „Dank des Theras habe ich mein Juwel zurückerhalten, ohne das Volk gequält zu haben.“ Auch die Bediensteten des inneren Palastes freuten sich und dachten: „Dank des Theras sind wir von großem Leid befreit worden.“ „Durch die Macht des Theras wurde das Haarschmuck-Juwel des Königs wiedererlangt.“ So wurde die Macht des Theras in der gesamten Stadt wie auch in der Mönchsgemeinde weithin bekannt. Dhammasabhāyaṃ sannisinnā bhikkhū therassa guṇaṃ vaṇṇayiṃsu ‘‘āvuso, ānandatthero attano bahussutatāya paṇḍiccena upāyakusalatāya mahājanaṃ akilametvā upāyeneva rañño maṇiṃ dassesī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāni ānandeneva parahatthagataṃ bhaṇḍaṃ dassitaṃ, pubbepi paṇḍitā mahājanaṃ akilametvā upāyeneva tiracchānahatthagataṃ bhaṇḍaṃ dassayiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. Als die Mönche in der Lehrhalle versammelt waren, lobten sie die Tugenden des ehrwürdigen Älteren mit den Worten: „Ihr Ehrwürdigen, der ehrwürdige Ānanda hat aufgrund seiner Gelehrsamkeit, seiner Klugheit und seiner Geschicklichkeit in den Mitteln, ohne die breite Masse zu bedrängen, allein durch ein geschicktes Mittel dem König das Juwel gezeigt.“ Da kam der Meister herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch seid ihr hier jetzt zusammengekommen?“ Als sie antworteten: „Zu diesem Thema“, sprach der Erhabene: „Mönche, nicht erst jetzt hat Ānanda einen Besitz, der in fremde Hände gelangt war, wieder zum Vorschein gebracht. Schon in der Vergangenheit haben Weise, ohne die Volksmenge zu plagen, allein durch ein geschicktes Mittel einen Besitz, der in die Hände eines Tieres gelangt war, wieder zum Vorschein gebracht.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto sabbasippesu nipphattiṃ patto tasseva amacco ahosi. Athekadivasaṃ rājā mahantena parivārena uyyānaṃ gantvā vanantarāni vicaritvā udakakīḷaṃ kīḷitukāmo maṅgalapokkharaṇiṃ otaritvā itthāgārampi pakkosi. Itthiyo attano attano sīsūpagagīvūpagādīni ābharaṇāni omuñcitvā uttarāsaṅgesu pakkhipitvā samuggapiṭṭhesu ṭhapetvā dāsiyo paṭicchāpetvā pokkharaṇiṃ otariṃsu. Athekā uyyānamakkaṭī sākhantare nisinnā deviṃ piḷandhanāni omuñcitvā uttarāsaṅge pakkhipitvā samuggapiṭṭhe ṭhapayamānaṃ disvā tassā muttāhāraṃ piḷandhitukāmā hutvā dāsiyā pamādaṃ olokayamānā nisīdi, dāsīpi taṃ rakkhamānā tahaṃ tahaṃ oloketvā nisinnāyeva niddāyituṃ ārabhi. Makkaṭī tassā pamādabhāvaṃ ñatvā vātavegena otaritvā mahāmuttāhāraṃ gīvāya paṭimuñcitvā vātavegena uppatitvā sākhantare nisīditvā aññāsaṃ makkaṭīnaṃ dassanabhayena ekasmiṃ rukkhasusiraṭṭhāne ṭhapetvā upasantūpasantā viya taṃ rakkhamānā nisīdi. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, erlangte der Bodhisatta die Meisterschaft in allen Künsten und wurde ein Minister ebendieses Königs. Eines Tages ging der König mit einem großen Gefolge in den königlichen Garten, durchstreifte die Wälder und stieg, da er sich im Wasser vergnügen wollte, in den festlichen Teich hinab; zudem rief er seinen Harem herbei. Die Frauen legten ihren jeweiligen Kopf- und Halsschmuck sowie sonstige Zierden ab, wickelten sie in ihre Obergewänder, legten sie auf die Truhen, übergaben sie den Dienerinnen zur Bewachung und stiegen in den Teich hinab. Da saß eine Gartenäffin im Gezweig. Als sie sah, wie die Königin ihren Schmuck ablegte, in ihr Obergewand wickelte und auf einer Truhe ablegte, bekam sie Lust, deren Perlenkette anzulegen, und blieb sitzen, während sie auf eine Unachtsamkeit der Dienerin wartete. Die Dienerin aber, die die Kette bewachte, blickte hier- und dorthin, schlief jedoch im Sitzen ein. Als die Äffin deren Unachtsamkeit bemerkte, stieg sie pfeilschnell herab, hängte sich die große Perlenkette um den Hals, sprang blitzschnell wieder empor und setzte sich ins Gezweig. Aus Furcht, die anderen Äffinnen könnten sie sehen, versteckte sie die Kette in einer Baumhöhle und saß da, um sie zu bewachen, wobei sie sich ganz ruhig und harmlos stellte. Sāpi kho dāsī paṭibujjhitvā muttāhāraṃ apassantī kampamānā aññaṃ upāyaṃ adisvā ‘‘puriso deviyā muttāhāraṃ gahetvā palāto’’ti mahāviravaṃ viravi. Ārakkhamanussā tato tato sannipatitvā tassā vacanaṃ sutvā rañño ārocayiṃsu. Rājā ‘‘coraṃ gaṇhathā’’ti āha. Purisā uyyānā [Pg.408] nikkhamitvā ‘‘coraṃ gaṇhatha, coraṃ gaṇhathā’’ti ito cito ca olokenti. Atheko jānapado balikārakapuriso taṃ saddaṃ sutvā kampamāno palāyi. Taṃ disvā rājapurisā ‘‘ayaṃ coro bhavissatī’’ti anubandhitvā taṃ gahetvā pothetvā ‘‘are, duṭṭhacora, evaṃ mahāsāraṃ nāma piḷandhanaṃ avaharissasī’’ti paribhāsiṃsu. So cintesi ‘‘sacāhaṃ ‘na gaṇhāmī’ti vakkhāmi, ajja me jīvitaṃ natthi, pothentāyeva maṃ māressanti, sampaṭicchāmi na’’nti. So ‘‘āma, sāmi, gahitaṃ me’’ti āha. Atha naṃ bandhitvā rañño santikaṃ ānayiṃsu. Rājāpi naṃ pucchi ‘‘gahitaṃ te mahāsārapiḷandhana’’nti? ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Idāni taṃ kaha’’nti. ‘‘Deva, mayā mahāsāraṃ nāma mañcapīṭhampi na diṭṭhapubbaṃ, seṭṭhi pana maṃ mahāsārapiḷandhanaṃ gaṇhāpesi, sohaṃ taṃ gahetvāva tassa adāsiṃ, so naṃ jānātī’’ti. Als nun die Dienerin erwachte und die Perlenkette nicht sah, zitterte sie vor Angst. Da sie keinen anderen Ausweg sah, schrie sie laut auf: „Ein Mann hat die Perlenkette der Königin geraubt und ist geflohen!“ Die Wachen liefen von allen Seiten herbei, hörten ihre Worte und meldeten es dem König. Der König befahl: „Ergreift den Dieb!“ Die Männer liefen aus dem Garten hinaus, riefen „Ergreift den Dieb! Ergreift den Dieb!“ und blickten sich überall um. Da hörte ein Landbewohner, der ein Steuerzahler war, dieses Geschrei und floh voller Angst. Als die königlichen Diener ihn sahen, dachten sie: „Das muss der Dieb sein“, setzten ihm nach, nahmen ihn fest, schlugen ihn und beschimpften ihn: „He, du elender Dieb, wie konntest du ein so überaus kostbares Schmuckstück stehlen?“ Er dachte: „Wenn ich sage: ‚Ich habe es nicht genommen‘, werde ich den heutigen Tag nicht überleben. Sie werden mich totschlagen. Ich will es gestehen.“ So sagte er: „Ja, Herr, ich habe es genommen.“ Daraufhin fesselten sie ihn und brachten ihn vor den König. Auch der König fragte ihn: „Hast du das kostbare Schmuckstück genommen?“ „Ja, Majestät.“ „Wo ist es jetzt?“ „Majestät, ich habe in meinem Leben noch nicht einmal ein kostbares Bett oder einen Stuhl gesehen. Doch der Schatzmeister hat mich dazu gebracht, das kostbare Schmuckstück an mich zu nehmen. Ich habe es genommen und ihm übergeben. Er weiß darum.“ Rājā seṭṭhiṃ pakkosāpetvā ‘‘gahitaṃ te imassa hatthato mahāsārapiḷandhana’’nti pucchi. ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Kahaṃ ta’’nti. ‘‘Purohitassa me dinna’’nti. Purohitampi pakkosāpetvā tatheva pucchi, sopi sampaṭicchitvā ‘‘gandhabbassa me dinna’’nti āha. Tampi pakkosāpetvā ‘‘purohitassa hatthato te mahāsārapiḷandhanaṃ gahita’’nti pucchi. ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Kahaṃ ta’’nti. ‘‘Kilesavasena me vaṇṇadāsiyā dinna’’nti. Tampi pakkosāpetvā pucchi, sā ‘‘na gaṇhāmī’’ti āha. Te pañca jane pucchantānaññeva sūriyo atthaṃ gato. Rājā ‘‘idāni vikālo jāto, sve jānissāmā’’ti te pañca jane amaccānaṃ datvā nagaraṃ pāvisi. Der König ließ den Schatzmeister rufen und fragte: „Hast du das kostbare Schmuckstück aus der Hand dieses Mannes erhalten?“ „Ja, Majestät.“ „Wo ist es?“ „Ich habe es dem Hofpriester gegeben.“ Daraufhin ließ er auch den Hofpriester rufen und fragte ihn in gleicher Weise. Auch dieser gestand und sagte: „Ich habe es dem Musiker gegeben.“ Er ließ auch diesen rufen und fragte: „Hast du das kostbare Schmuckstück aus den Händen des Hofpriesters erhalten?“ „Ja, Majestät.“ „Wo ist es?“ „Getrieben von Leidenschaft habe ich es einer Kurtisane gegeben.“ Da ließ der König auch die Kurtisane rufen und befragte sie; sie aber sagte: „Ich habe es nicht genommen.“ Während diese fünd Personen verhört wurden, ging die Sonne unter. Der König sagte: „Es ist nun zu spät geworden, morgen werden wir die Wahrheit erfahren.“ Er übergab die fünf Personen seinen Ministern und begab sich zurück in die Stadt. Bodhisatto cintesi – ‘‘idaṃ piḷandhanaṃ antovaḷañje naṭṭhaṃ, ayañca gahapatiko bahivaḷañjo, dvārepi balavārakkho, tasmā antovaḷañjanakānampi taṃ gahetvā palāyituṃ na sakkā. Evaṃ neva bahivaḷañjanakānaṃ, na anto, uyyāne vaḷañjanakānaṃ gahaṇūpāyo dissati. Iminā duggatamanussena ‘seṭṭhissa me dinna’nti kathentena attano mokkhatthāya kathitaṃ bhavissati, seṭṭhināpi ‘purohitassa me dinna’nti kathentena ‘ekato hutvā nittharissāmī’ti cintetvā kathitaṃ bhavissati, purohitenāpi ‘gandhabbassa me dinna’nti kathentena ‘bandhanāgāre gandhabbaṃ nissāya sukhena vasissāmā’ti cintetvā [Pg.409] kathitaṃ bhavissati, gandhabbenāpi ‘vaṇṇadāsiyā me dinna’nti kathentena ‘ekantena anukkaṇṭhitā bhavissāmā’ti cintetvā kathitaṃ bhavissati, imehi pañcahipi corehi na bhavitabbaṃ, uyyāne makkaṭā bahū, piḷandhanena ekissā makkaṭiyā hatthe āruḷhena bhavitabba’’nti. So rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘mahārāja, core amhākaṃ niyyādetha, mayaṃ taṃ kiccaṃ sodhessāmā’’ti āha. Rājā ‘‘sādhu, paṇḍita, sodhehī’’ti tassa niyyādesi. Der Bodhisatta dachte bei sich: „Dieses Schmuckstück ging im inneren Bereich verloren. Dieser Hausvater aber ist jemand, der sich nur im Außenbereich aufhält. Zudem gibt es an den Toren eine starke Bewachung. Daher wäre es selbst für die Personen aus dem Innenbereich unmöglich gewesen, das Schmuckstück an sich zu nehmen und damit zu fliehen. Somit zeigt sich weder für die Außenstehenden noch für jene im inneren Garten eine plausible Möglichkeit, wie sie es hätten entwenden können. Dass dieser arme Mann behauptete: ‚Ich habe es dem Schatzmeister gegeben‘, geschah wohl nur zum Zweck seiner eigenen Befreiung. Auch der Schatzmeister, der sagte: ‚Ich habe es dem Hofpriester gegeben‘, dachte sich wohl: ‚Zusammen werden wir diese Sache durchstehen‘, und erfand diese Geschichte. Der Hofpriester, der sagte: ‚Ich habe es dem Musiker gegeben‘, dachte sich wohl: ‚Im Gefängnis werde ich mit der Hilfe des Musikers angenehm leben‘, und erfand es deshalb. Und auch der Musiker, der sagte: ‚Ich habe es der Kurtisane gegeben‘, dachte wohl: „So wird es uns im Kerker gewiss nicht langweilig werden“, und erfand es. Keiner von diesen fünf Personen kann der wahre Dieb sein. Im Garten gibt es jedoch viele Affen. Das Schmuckstück muss in die Hände einer Äffin gelangt sein.“ Er ging zum König und sagte: „Großer König, überlasst uns die vermeintlichen Diebe. Wir werden diese Angelegenheit aufklären.“ Der König sprach: „Sehr wohl, Weiser, kläre sie auf!“, und übergab sie ihm. Bodhisatto attano dāsapurise pakkosāpetvā te pañca jane ekasmiṃyeva ṭhāne vasāpetvā samantā ārakkhaṃ katvā kaṇṇaṃ datvā ‘‘yaṃ te aññamaññaṃ kathenti, taṃ mayhaṃ ārocethā’’ti vatvā pakkāmi. Te tathā akaṃsu. Tato manussānaṃ sannisinnavelāya seṭṭhi taṃ gahapatikaṃ āha – ‘‘are, duṭṭhagahapati, tayā ahaṃ, mayā vā tvaṃ kahaṃ diṭṭhapubbo, kadā te mayhaṃ piḷandhanaṃ dinna’’nti āha. So ‘‘sāmi mahāseṭṭhi, ahaṃ mahāsāraṃ nāma rukkhasārapādakaṃ mañcapīṭhampi na jānāmi, ‘taṃ nissāya pana mokkhaṃ labhissāmī’ti evaṃ avacaṃ, mā me kujjha, sāmī’’ti āha. Purohitopi seṭṭhiṃ āha ‘‘mahāseṭṭhi, tvaṃ iminā attano adinnakameva mayhaṃ kathaṃ adāsī’’ti? ‘‘Mayampi dve issarā, amhākaṃ ekato hutvā ṭhitakāle kammaṃ khippaṃ nipphajjissatī’’ti kathesinti. Gandhabbopi purohitaṃ āha ‘‘brāhmaṇa, kadā tayā mayhaṃ piḷandhanaṃ dinna’’nti? ‘‘Ahaṃ taṃ nissāya vasanaṭṭhāne sukhaṃ vasissāmī’’ti kathesinti. Vaṇṇadāsīpi gandhabbaṃ āha ‘‘are duṭṭhagandhabba, ahaṃ kadā tava santikaṃ gatapubbā, tvaṃ vā mama santikaṃ āgatapubbo, kadā te mayhaṃ piḷandhanaṃ dinna’’nti? Bhagini kiṃkāraṇā kujjhasi, ‘‘amhesu pañcasu ekato vasantesu gharāvāso bhavissati, anukkaṇṭhamānā sukhaṃ vasissāmā’’ti kathesinti. Bodhisatto payojitamanussānaṃ santikā taṃ kathaṃ sutvā tesaṃ tathato acorabhāvaṃ ñatvā ‘‘makkaṭiyā gahitapiḷandhanaṃ upāyeneva pātessāmī’’ti geṇḍumayāni bahūni piḷandhanāni kāretvā uyyāne makkaṭiyo gāhāpetvā hatthapādagīvāsu geṇḍupiḷandhanāni piḷandhāpetvā vissajjesi. Itarā makkaṭī piḷandhanaṃ rakkhamānā uyyāne eva nisīdi. Der Bodhisatta ließ seine Diener herbeirufen, ließ jene fünf Personen an ein und demselben Ort wohnen, stellte ringsum Wachen auf, wies die Diener an, genau hinzuhören, sprach: „Was immer diese untereinander sprechen, das berichtet mir“, und ging davon. Sie taten wie geheißen. Danach, als die Leute gemütlich beisammensaßen, sprach der Großkaufmann zu jenem Bürgerlichen: „He, du schändlicher Bürgerlicher! Wo hast du mich je zuvor gesehen, oder wo habe ich dich gesehen? Wann hast du mir den kostbaren Schmuck gegeben?“ Dieser entgegnete: „Herr Großkaufmann, ich kenne nicht einmal eine Liege oder einen Stuhl aus Hartholz, geschweige denn den wertvollen Schmuck. Doch ich dachte mir: 'Wenn ich mich auf den Großkaufmann stütze, werde ich die Freilassung erlangen', und so sprach ich dies. Zürnt mir nicht, mein Herr!“ Auch der Hofpriester sprach zum Großkaufmann: „Großkaufmann, wie konntest du mir diesen wertvollen Schmuck geben, den dieser Bürgerliche dir selbst gar nicht gegeben hatte?“ „Auch wir beide sind einflussreiche Männer. Ich dachte mir: 'Wenn wir uns zusammentun, wird unsere Angelegenheit schnell gelingen', und so sprach ich es“, entgegnete er. Auch der Musiker sprach zum Hofpriester: „Brahmane, wann hast du mir den Schmuck gegeben?“ „Ich dachte mir: 'Wenn ich mich auf dich stütze, werde ich an meinem Wohnort glücklich leben', und so sprach ich es“, entgegnete er. Auch die Kurtisane sprach zum Musiker: „He, du schändlicher Musiker, wann bin ich je zuvor zu dir gegangen, oder wann bist du zu mir gekommen? Wann hast du mir den Schmuck gegeben?“ „Schwester, warum zürnst du? Ich dachte mir: 'Wenn wir fünf zusammenleben, wird es wie ein gemeinsames Heim sein, und wir werden ohne Überdruss glücklich leben', und so sprach ich es“, entgegnete er. Als der Bodhisatta diese Unterredung durch die beauftragten Männer erfuhr und der Wahrheit entsprechend erkannte, dass diese fünf keine Diebe waren, dachte er: „Ich werde den von der Äffin entwendeten Schmuck nur durch eine List herabfallen lassen.“ Er ließ zahlreiche Schmuckstücke aus Spielbällen anfertigen, ließ die Äffinnen im Garten fangen, schmückte ihre Hände, Füße und Hälse mit dem Ball-Schmuck und ließ sie wieder frei. Die andere Äffin, die den echten Schmuck hütete, blieb im Garten sitzen. Bodhisatto manusse āṇāpesi ‘‘gacchatha tumhe, uyyāne sabbā makkaṭiyo upadhāretha, yassā taṃ piḷandhanaṃ passatha, taṃ uttāsetvā piḷandhanaṃ gaṇhathā’’ti. Tāpi kho makkaṭiyo ‘‘piḷandhanaṃ no laddha’’nti tuṭṭhapahaṭṭhā [Pg.410] uyyāne vicarantiyo tassā santikaṃ gantvā ‘‘passa amhākaṃ piḷandhana’’nti āhaṃsu. Sā makkaṭī asahamānā ‘‘kiṃ iminā geṇḍupiḷandhanenā’’ti muttāhāraṃ piḷandhitvā nikkhami. Atha naṃ te purisā disvā piḷandhanaṃ chaḍḍāpetvā āharitvā bodhisattassa adaṃsu. So taṃ ādāya rañño dassetvā ‘‘idaṃ te deva piḷandhanaṃ, te pañcapi acorā, idaṃ pana uyyāne makkaṭiyā ābhata’’nti āha. ‘‘Kathaṃ pana te, paṇḍita, makkaṭiyā hatthaṃ āruḷhabhāvo ñāto, kathaṃ te gahita’’nti? So sabbaṃ ācikkhi. Rājā tuṭṭhamānaso ‘‘saṅgāmasīsādīsu nāma sūrādayo icchitabbā hontī’’ti bodhisattassa thutiṃ karonto imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta befahl den Männern: „Geht hin, beobachtet alle Äffinnen im Garten genau. Bei welcher Äffin ihr jenen Schmuck seht, die erschreckt, und nehmt den Schmuck an euch.“ Auch jene Äffinnen freuten sich hocherfreut und dachten: „Wir haben Schmuck bekommen!“, liefen im Garten umher, gingen zu jener Äffin und sagten: „Sieh unseren Schmuck an!“ Diese Äffin konnte es nicht ertragen, dachte: „Was soll ich mit diesem Ball-Schmuck?“, legte die Perlenkette an und kam heraus. Als die Männer sie sahen, brachten sie sie dazu, den Schmuck fallen zu lassen, nahmen ihn an sich und gaben ihn dem Bodhisatta. Er nahm ihn, zeigte ihn dem König und sprach: „O König, dies ist Euer Schmuck. Jene fünf Personen sind keine Diebe. Dieser Schmuck wurde jedoch von einer Äffin im Garten genommen.“ „Wie aber, o Weiser, hast du gewusst, dass er in die Hände der Äffin gelangt war, und wie hast du ihn erlangt?“ Er berichtete alles. Der König sprach mit erfreutem Herzen: „An der Spitze einer Schlacht und in ähnlichen Situationen verlangt man nach Tapferen und dergleichen“, und um den Bodhisatta zu loben, sprach er diese Strophe: 92. 92. ‘‘Ukkaṭṭhe sūramicchanti, mantīsu akutūhalaṃ; Piyañca annapānamhi, atthe jāte ca paṇḍita’’nti. „Im heftigen Kampf wünscht man sich den Tapferen, bei Beratern einen, der keine Unruhe stiftet; bei Speise und Trank wünscht man sich den Geliebten, und wenn eine schwierige Lage entsteht, den Weisen.“ Tattha ukkaṭṭheti upakaṭṭhe, ubhatobyūḷhe saṅgāme sampahāre vattamāneti attho. Sūramicchantīti asaniyāpi matthake patamānāya apalāyinaṃ sūraṃ icchanti, tasmiṃ khaṇe evarūpo saṅgāmayodho patthetabbo hoti. Mantīsu akutūhalanti kattabbākattabbakiccaṃ sammantanakāle uppanne mantīsu yo akutūhalo avikiṇṇavāco mantaṃ na bhindati, taṃ icchanti, tādiso tesu ṭhānesu patthetabbo hoti. Piyañca annapānamhīti madhure annapāne paccupaṭṭhite sahaparibhuñjanatthāya piyapuggalaṃ patthenti, tādiso tasmiṃ kāle patthetabbo hoti. Atthe jāte ca paṇḍitanti atthagambhīre dhammagambhīre kismiñcideva kāraṇe vā pañhe vā uppanne paṇḍitaṃ vicakkhaṇaṃ icchanti. Tathārūpo hi tasmiṃ samaye patthetabbo hotīti. Dabei bedeutet „ukkaṭṭhe“: wenn der Kampf nahe herbeigekommen ist, wenn das Gefecht im beiderseitig aufgestellten Heer im Gange ist. „Sūramicchantī“ bedeutet: Sie wünschen sich einen Tapferen, der selbst dann nicht flieht, wenn ein Blitz auf sein Haupt niedergeht; in diesem Augenblick ist ein solcher Krieger herbeizuwünschen. „Mantīsu akutūhalanti“ bedeutet: Wenn die Zeit der Beratung über das, was zu tun und zu lassen ist, gekommen ist, wünscht man sich unter den Ratgebern einen, der keine Unruhe stiftet, der nicht unbedachte Worte spricht und das Geheimnis der Beratung nicht verrät; ein solcher ist an diesen Stellen herbeizuwünschen. „Piyañca annapānamhī“ bedeutet: Wenn süße Speisen und Getränke dargeboten werden, wünscht man sich eine geliebte Person zum gemeinsamen Genuss; eine solche ist zu jener Zeit herbeizuwünschen. „Atthe jāte ca paṇḍitaṃ“ bedeutet: Wenn eine tiefe Bedeutung, eine tiefe Lehre, irgendeine schwierige Angelegenheit oder eine Frage aufgeworfen wird, wünscht man sich einen weisen und klarsichtigen Menschen; denn ein solcher ist in jenem Moment herbeizuwünschen. Evaṃ rājā bodhisattaṃ vaṇṇetvā thometvā ghanavassaṃ vassento mahāmegho viya sattāhi ratanehi pūjetvā tassovāde ṭhatvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato, bodhisattopi yathākammaṃ gato. So lobte und pries der König den Bodhisatta, beschenkte ihn mit den sieben Arten von Kostbarkeiten wie eine große Wolke, die einen heftigen Regen herabregnen lässt, verblieb in dessen Unterweisung, vollbrachte verdienstvolle Taten wie Freigebigkeit und dergleichen und ging gemäß seinem Kamma dahin. Auch der Bodhisatta ging gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā therassa guṇaṃ kathetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājā ānando ahosi, paṇḍitāmacco pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor, verkündete die Tugenden des ehrwürdigen Thera (Ananda) und verknüpfte das Jātaka: „Damals war der König Ānanda, der weise Minister aber war ich selbst.“ Mahāsārajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Mahāsāra-Jātaka, die zweite.
[93] 3. Vissāsabhojanajātakavaṇṇanā [93] 3. Die Erklärung des Vissāsabhojana-Jātaka. Na [Pg.411] vissase avissattheti idaṃ satthā jetavane viharanto vissāsabhojanaṃ ārabbha kathesi. Tasmiṃ kira samaye yebhuyyena bhikkhū ‘‘mātarā no dinnaṃ, pitarā no dinnaṃ, bhātarā, bhaginiyā, cūḷamātarā, cūḷapitarā, mātulena, mātulāniyā dinnaṃ. Amhākaṃ gihikālepi bhikkhukālepi ete dātuṃ yuttarūpāvā’’ti ñātīhi dinne cattāro paccaye vissatthā hutvā apaccavekkhitvā paribhuñjanti. Satthā taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘bhikkhūnaṃ mayā dhammadesanaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti bhikkhū sannipātāpetvā ‘‘bhikkhave, bhikkhunā nāma ñātīhipi aññātīhipi dinnake cattāro paccaye paccavekkhitvāva paribhogo kātabbo. Apaccavekkhitvā paribhogaṃ katvā hi kālaṃ kurumāno bhikkhu yakkhapetaattabhāvato na muccati, apaccavekkhitaparibhogo nāmesa visaparibhogasadiso. Visañhi vissāsikena dinnakampi avissāsikena dinnakampi māretiyeva. Pubbepi vissāsena dinnaṃ visaṃ paribhuñjitvā jīvitakkhayaṃ pattā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Man sollte dem Misstrauten nicht vertrauen“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf das Essen in Vertrautheit. Damals nämlich genossen die Mönche meistens voll Vertrauen die vier Requisiten, die ihnen von Verwandten gegeben worden waren, ohne sie weise zu betrachten, indem sie dachten: „Dies wurde uns von der Mutter gegeben, dies vom Vater, vom Bruder, von der Schwester, von der Tante, vom Onkel, vom Onkel mütterlicherseits, von der Tante mütterlicherseits. Sowohl zu unserer Zeit als Laien als auch zu unserer Zeit als Mönche ist es für diese Personen völlig angemessen, uns Gaben zu geben.“ Der Meister erkannte diesen Umstand, dachte: „Es ist angebracht, dass ich den Mönchen eine Lehrrede halte“, ließ die Mönche versammeln und sprach: „Ihr Mönche, ein Mönch sollte die vier Requisiten, die ihm sowohl von Verwandten als auch von Nichtverwandten gegeben werden, nur nach gründlicher Erwägung nutzen. Denn ein Mönch, der stirbt, nachdem er sie ohne gründliche Erwägung genutzt hat, wird nicht von der Wiedergeburt als Yakkha oder Peta befreit. Dieser Gebrauch ohne vorherige Erwägung gleicht dem Konsum von Gift. Denn Gift tötet gewiss, ob es nun von einem Vertrauten oder von einem Unvertrauten gegeben wurde. Auch in der Vergangenheit sind Menschen gestorben, weil sie aus Vertrauen gegebenes Gift zu sich nahmen und so ihr Leben verloren.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mahāvibhavo seṭṭhi ahosi. Tasseko gopālako kiṭṭhasambādhasamaye gāvo gahetvā araññaṃ pavisitvā tattha gosālaṃ katvā rakkhanto vasati. Seṭṭhino ca kālena kālaṃ gorasaṃ āharati. Athassa gosālāya avidūre sīho nivāsaṃ gaṇhi. Gāvīnaṃ sīhasantāsena milātānaṃ khīraṃ mandaṃ ahosi. Atha naṃ ekadivasaṃ sappiṃ ādāya āgataṃ seṭṭhi pucchi ‘‘kiṃ nu kho, samma gopālaka, mandaṃ sappī’’ti? So taṃ kāraṇaṃ ācikkhi. ‘‘Atthi pana, samma, tassa sīhassa katthaci paṭibandho’’ti? ‘‘Atthissa sāmi, ekāya migamātukāya saddhiṃ saṃsaggo’’ti. ‘‘Sakkā pana taṃ gāhāpetu’’nti? ‘‘Sakkā, sāmī’’ti. ‘‘Tena hi taṃ gahetvā tassā nalāṭato paṭṭhāya sarīre lomāni visena punappunaṃ rajitvā sukkhāpetvā dve tayo divase atikkāmetvā taṃ migamātukaṃ vissajjehi, so tassā sinehena sarīraṃ lehitvā jīvitakkhayaṃ pāpuṇissati. Athassa cammanakhadāṭhā ceva vasañca maṃsañca gahetvā āgaccheyyāsī’’ti halāhalavisaṃ datvā uyyojesi. Als in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta ein sehr wohlhabender Großkaufmann. Sein Kuhhirte nahm zur Zeit, als die Felder mit Saatgut bestellt und somit eng für das Vieh waren, die Kühe mit sich, ging in den Wald, errichtete dort einen Kuhstall und lebte dort, um sie zu hüten. Dem Kaufmann brachte er von Zeit zu Zeit Erzeugnisse aus Kuhmilch. Zu jener Zeit schlug ein Löwe unweit von diesem Kuhstall sein Lager auf. Aus Furcht vor dem Löwen verkümmerten die Kühe, und ihre Milch wurde spärlich. Da fragte ihn eines Tages der Großkaufmann, als er mit Butter ankam: ‚Warum, mein lieber Kuhhirte, ist die Butter so spärlich?‘ Dieser erklärte ihm den Grund. ‚Hat jener Löwe denn, mein Lieber, irgendwo eine Bindung?‘ – ‚Ja, Herr, er pflegt Umgang mit einer Hirschkuh.‘ – ‚Kann man diese Hirschkuh fangen lassen?‘ – ‚Das ist möglich, Herr.‘ – ‚Wenn dem so ist, dann fange sie, bestreiche die Haare auf ihrem Körper, angefangen von der Stirn, wieder und wieder mit Gift, lass es trocknen, warte zwei oder drei Tage ab und lass die Hirschkuh dann wieder frei. Er wird aus Liebe zu ihr ihren Körper lecken und dadurch sein Leben verlieren. Bringe mir dann sein Fell, seine Krallen, seine Reißzähne, sein Fett und sein Fleisch mit.‘ Nach diesen Worten gab er ihm starkes Halāhala-Gift und schickte ihn fort. So [Pg.412] gopālako jālaṃ khipitvā upāyena taṃ migamātukaṃ gaṇhitvā tathā akāsi. Sīho taṃ disvāva balavasinehena tassā sarīraṃ lehitvā jīvitakkhayaṃ pāpuṇi. Gopālakopi cammādīni gahetvā bodhisattassa santikaṃ agamāsi. Bodhisatto taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘paresu sineho nāma na kātabbo, evaṃ balasampannopi sīho migarājā kilesavasena saṃsaggaṃ nissāya migamātukāya sarīraṃ lehanto visaparibhogaṃ katvā jīvitakkhayaṃ patto’’ti vatvā sampattaparisāya dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Der Kuhhirte warf ein Netz aus, fing die Hirschkuh mit dieser List und verfuhr genau so. Sobald der Löwe sie sah, leckte er aus übergroßer Liebe ihren Körper ab und verlor sein Leben. Auch der Kuhhirte nahm das Fell und die anderen Teile und ging zum Bodhisatta. Als der Bodhisatta diesen Grund erfuhr, dachte er: ‚Man sollte zu anderen kein Verlangen fassen. Selbst ein so kraftvoller Löwe, der König der Tiere, ist durch seinen Umgang aufgrund von Befleckungen gestorben, weil er den Körper der Hirschkuh leckte und so das Gift aufnahm.‘ Nachdem er dies gesagt hatte, verkündete er der versammelten Gemeinde die Lehre und sprach diese Strophe: 93. 93. ‘‘Na vissase avissatthe, vissatthepi na vissase; Vissāsā bhayamanveti, sīhaṃva migamātukā’’ti. „Man sollte dem Misstrauenswürdigen nicht vertrauen, und auch dem Vertrauenswürdigen sollte man nicht vertrauen. Aus Vertrauen erwächst Gefahr, wie dem Löwen durch die Hirschkuh.“ Tatrāyaṃ saṅkhepattho – yo pubbe sabhayo attani avissattho ahosi, tasmiṃ avissatthe, yo pubbepi nibbhayo attani vissāsikoyeva, tasmiṃ vissatthepi na vissase, neva vissāsaṃ kareyya. Kiṃkāraṇā? Vissāsā bhayamanveti, yo hi mittepi amittepi vissāso, tato bhayameva āgacchati. Kathaṃ? Sīhaṃva migamātukā, yathā mittasanthavavasena katavissāsāya migamātukāya santikā sīhassa bhayaṃ anveti, upagataṃ sampattanti attho. Yathā vā vissāsavasena sīhaṃ migamātukā anvetā upagatātipi attho. Hierbei ist dies die kurze Bedeutung: Wer zuvor furchterregend war und dem man nicht vertraute, diesem „Misstrauenswürdigen“ gegenüber, und wer zuvor furchtlos war und dem man bereits vertraute, diesem „Vertrauenswürdigen“ gegenüber soll man „nicht vertrauen“; man sollte keinerlei Vertrauen schenken. Aus welchem Grund? „Aus Vertrauen erwächst Gefahr“, denn das Vertrauen, sei es zu Freunden oder zu Feinden, bringt nur Gefahr mit sich. Wie? „Wie dem Löwen durch die Hirschkuh“. So wie dem Löwen Gefahr droht vonseiten der Hirschkuh, zu der er aufgrund freundschaftlicher Vertrautheit Zuneigung gefasst hatte – dies bedeutet, dass die Gefahr auf ihn zukam und ihn erreichte. Oder aber: „Wie die Hirschkuh dem Löwen folgte“ – dies bedeutet, dass sich die Hirschkuh dem Löwen aufgrund seines Vertrauens näherte und ihn erreichte. Evaṃ bodhisatto sampattaparisāya dhammaṃ desetvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta der versammelten Gemeinde so die Lehre verkündet und verdienstvolle Taten wie das Geben von Gaben verrichtet hatte, ging er gemäß seinem Kamma fort. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mahāseṭṭhi ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: ‚Damals war der reiche Großkaufmann niemand anderes als ich selbst.‘ Vissāsabhojanajātakavaṇṇanā tatiyā. Hier endet die Erklärung des Vissāsabhojana-Jātaka, das dritte.
[94] 4. Lomahaṃsajātakavaṇṇanā [94] 4. Erklärung des Lomahaṃsa-Jātaka Sotatto [Pg.413] sosinno cevāti idaṃ satthā vesāliṃ upanissāya pāṭikārāme viharanto sunakkhattaṃ ārabbha kathesi. Ekasmiñhi samaye sunakkhatto satthu upaṭṭhāko hutvā pattacīvaramādāya vicaramāno korakkhattiyassa dhammaṃ rocento dasabalassa pattacīvaraṃ niyyādetvā korakkhattiyaṃ nissāya vasati. Tassa kālakañjikaasurayoniyaṃ nibbattakāle gihi hutvā ‘‘natthi samaṇassa gotamassa uttari manussadhammā alamariyañāṇadassanaviseso, takkapariyāhataṃ samaṇo gotamo dhammaṃ deseti vīmaṃsānucaritaṃ sayaṃpaṭibhānaṃ. Yassa ca khvāssa atthāya dhammo desito, na so niyyāti takkarassa sammā dukkhakkhayāyā’’ti (ma. ni. 1.146) vesāliyaṃ tiṇṇaṃ pākārānaṃ antare vicaranto satthu avaṇṇaṃ bhāsati. Die Worte „Erhitzt und durchnässt zugleich“ sprach der Meister, als er nahe Vesālī im Pāṭika-Hain verweilte, bezüglich Sunakkhatta. Zu jener Zeit nämlich war Sunakkhatta der Diener des Meisters gewesen. Als er mit Almosenschale und Gewand umherzog, fand er Gefallen an der Lehre des Korakkhattiya, gab Almosenschale und Gewand des Meisters an diesen zurück und lebte in Abhängigkeit von Korakkhattiya. Als dieser im Schoß der Kālakañjika-Asuras wiedergeboren worden war, wurde jener wieder zum Laien und verleumdete den Meister in Vesālī, indem er zwischen den drei Stadtmauern umherging: ‚Der Asket Gotama besitzt keine übermenschlichen Zustände, kein besonderes edles Wissen und Schauen. Der Asket Gotama verkündet eine Lehre, die durch bloßes Nachdenken mühsam errungen, durch Prüfung erforscht und aus eigener Eingebung entstanden ist. Und jene Lehre, die er zu diesem Zweck verkündet hat, führt denjenigen, der sie ausübt, nicht zur vollständigen Vernichtung des Leidens.‘ Athāyasmā sāriputto piṇḍāya caranto tassevaṃ avaṇṇaṃ bhāsantassa sutvā piṇḍapātapaṭikkanto tamatthaṃ bhagavato ārocesi. Bhagavā ‘‘kodhano, sāriputta, sunakkhatto moghapuriso, kodhavasenevamāha, kodhavasenāpi pana ‘na so niyyāti takkarassa sammā dukkhakkhayāyā’ti vadanto ajānitvāpi mayhaṃ guṇameva bhāsati. Na kho pana so moghapuriso mayhaṃ guṇaṃ jānāti. Mayhañhi, sāriputta, cha abhiññā nāma atthi, ayampi me uttarimanussadhammova. Dasabalañāṇāni atthi, catuvesārajjañāṇaṃ atthi, catuyoniparicchedakañāṇaṃ atthi, pañcagatiparicchedakañāṇaṃ atthi, ayampi me uttarimanussadhammova. Evaṃ uttarimanussadhammasamannāgataṃ pana maṃ yo evaṃ vadeyya ‘natthi samaṇassa gotamassa uttarimanussadhammo’ti, so taṃ vācaṃ appahāya taṃ cittaṃ appahāya taṃ diṭṭhiṃ appaṭinissajjitvā yathābhataṃ nikkhitto evaṃ niraye’’ti evaṃ attano vijjamānaṃ uttarimanussadhammassa guṇaṃ kathetvā ‘‘sunakkhatto kira, sāriputta, korakkhattiyassa dukkarakārikāya micchātape pasanno, micchātape pasīdantena pana mayi eva pasīdituṃ vaṭṭati. Ahañhi ito ekanavutikappamatthake ‘atthi nu kho ettha sāro’ti bāhirakaṃ micchātapaṃ vīmaṃsanto caturaṅgasamannāgataṃ brahmacariyavāsaṃ vasiṃ, tapassī sudaṃ homi paramatapassī, lūkho [Pg.414] sudaṃ homi paramalūkho, jegucchī sudaṃ homi paramajegucchī, pavivitto sudaṃ homi paramapavivitto’’ti vatvā therena yācito atītaṃ āhari. Als nun der ehrwürdige Sāriputta auf Almosengang war und ihn so schmähen hörte, kehrte er nach dem Almosengang zurück und berichtete dem Erhabenen diesen Sachverhalt. Der Erhabene sprach: ‚Zornig ist Sunakkhatta, Sāriputta, dieser törichte Mensch, und aus Zorn spricht er diese Worte. Aber selbst wenn er aus Zorn sagt: „Diese Lehre führt denjenigen, der sie ausübt, nicht zur vollständigen Vernichtung des Leidens“, so verkündet er damit, ohne es zu wissen, nur mein Lob. Jener törichte Mensch kennt meine wahren Qualitäten nicht. Ich besitze nämlich, Sāriputta, die sechs höheren Geisteskräfte; auch dies ist mein übermenschlicher Zustand. Ich besitze die zehn Kräfte des Wissens, die vier Arten der Unerschrockenheit, das Wissen zur Bestimmung der vier Arten der Geburt und das Wissen zur Bestimmung der fünf Welten der Wiedergeburt; auch dies ist mein übermenschlicher Zustand. Wer nun über mich, der ich mit solch übermenschlichen Zuständen ausgestattet bin, sagen würde: „Der Asket Gotama besitzt keinen übermenschlichen Zustand“, der wird – wenn er diese Rede nicht aufgibt, diese Gesinnung nicht aufgibt und diese Ansicht nicht fahren lässt – geradewegs in die Hölle gestürzt werden, so als ob man ihn dorthin getragen und abgelegt hätte.‘ Nachdem er so die an ihm vorhandenen Qualitäten des übermenschlichen Zustands dargelegt hatte, sprach er weiter: ‚Sunakkhatta, so heißt es, Sāriputta, ist erfreut über Korakkhattiyas schwere Selbstkasteiung im falschen Askese-Pfad. Wer jedoch an falscher Askese Gefallen findet, sollte vielmehr an mir Gefallen finden. Ich selbst habe nämlich vor einundneunzig Äonen, um zu prüfen, ob in dieser äußeren, falschen Askese ein wahrer Kern liegt, ein mit vier Faktoren ausgestattetes heiliges Leben geführt: Ich übte Askese – ein wahrhaft extremer Asket war ich; ich lebte rau – ein wahrhaft extrem rauer Asket war ich; ich war gewissenhaft – ein wahrhaft extrem Gewissenhafter war ich; ich lebte zurückgezogen – ein wahrhaft extrem Zurückgezogener war ich.‘ Auf Bitten des Thera hin erzählte er dann die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte ekanavutikappamatthake bodhisatto ‘‘bāhirakatapaṃ vīmaṃsissāmī’’ti ājīvakapabbajjaṃ pabbajitvā acelako ahosi rajojalliko, pavivitto ahosi ekavihārī. Manusse disvā migo viya palāyi, mahāvikatibhojano ahosi, vacchakagomayādīni paribhuñji, appamādavihāratthāya araññe ekasmiṃ bhiṃsanake vanasaṇḍe vihāsi. Tasmimpi viharanto himapātasamaye antaraṭṭhake rattiṃ vanasaṇḍā nikkhamitvā abbhokāse viharitvā sūriye uggate vanasaṇḍaṃ pavisati. So yathā rattiṃ abbhokāse himodakena tinto, tatheva divā vanasaṇḍato paggharantehi udakabindūhi temayi. Evaṃ ahorattaṃ sītadukkhaṃ anubhoti. Gimhānaṃ pana pacchime māse divā abbhokāse viharitvā rattiṃ vanasaṇḍaṃ pavisati. So yathā divā abbhokāse ātapena pariḷāhappatto, tatheva rattiṃ nivāte vanasaṇḍe pariḷāhaṃ pāpuṇāti, sarīrā sedadhārā muccanti. Athassa pubbe assutapubbā ayaṃ gāthā paṭibhāsi – In der Vergangenheit, vor einundneunzig Äonen, dachte der Bodhisatta: „Ich will die Kasteiung außerhalb [der Lehre] prüfen“, trat in den Orden der Ājīvakas ein, war nackt, staub- und schmutzbedeckter [Asket], lebte zurückgezogen und allein. Wenn er Menschen sah, floh er wie ein Wildtier. Er ernährte sich von abscheulicher Nahrung, verzehrte Kälbermist und dergleichen. Um in Wachsamkeit zu verweilen, lebte er in einem bestimmten schreckenerregenden Waldgebüsch. Während er dort lebte, verließ er in der Zeit des Schneefalls während der acht Tage zwischen den Monaten [Māgha und Phāguna] in der Nacht das Waldgebüsch, hielt sich im Freien auf und betrat bei Sonnenaufgang das Waldgebüsch. So wie er nachts im Freien von Frostwasser durchnässt war, so wurde er tagsüber von den Wassertropfen benetzt, die im Waldgebüsch herabtropften. So erlitt er Tag und Nacht das Leid der Kälte. Im letzten Sommermonat hingegen verweilte er tagsüber im Freien und betrat nachts das Waldgebüsch. So wie er tagsüber im Freien durch die Sonnenhitze von Fieberglut geplagt war, so erlitt er nachts im windstillen Waldgebüsch dieselbe Glut, und Schweißströme flossen von seinem Körper. Da kam ihm diese zuvor nie gehörte Strophe in den Sinn: 94. 94. ‘‘Sotatto sosinno ceva, eko bhiṃsanake vane; Naggo na caggimāsīno, esanāpasuto munī’’ti. „Sengender Hitze ausgesetzt und zugleich durchnässt, allein im schreckenerregenden Wald; nackt und ohne am Feuer zu sitzen, ist der Weise eifrig bemüht auf seiner Suche.“ Tattha sotattoti sūriyasantāpena suṭṭhu tatto. Sosinnoti himodakena susinno suṭṭhu tinto. Eko bhiṃsanake vaneti yattha paviṭṭhānaṃ yebhuyyena lomāni haṃsanti, tathārūpe bhiṃsanakevanasaṇḍe eko adutiyova ahosinti dīpeti. Naggo na caggimāsīnoti naggo ca na ca aggimāsīno. Tathā sītena pīḷiyamānopi neva nivāsanapārupanaṃ vā ādiyiṃ, na ca aggiṃ āgamma nisīdinti dīpeti. Esanāpasutoti abrahmacariyepi tasmiṃ brahmacariyasaññī hutvā ‘‘brahmacariyamevetaṃ esanā gavesanā upāyo brahmalokassā’’ti evaṃ tāya brahmacariyesanāya pasuto anuyutto ussukkaṃ āpanno ahosinti dasseti. Munīti [Pg.415] ‘‘muni kho esa monatthāya paṭipanno’’ti evaṃ lokena sambhāvito ahosinti dīpeti. Darin bedeutet ‚sotatto‘ (sengender Hitze ausgesetzt): durch die Sonnenhitze überaus erhitzt. ‚sosinno‘ (durchnässt): von Frostwasser gut durchnässt, völlig durchnässt. ‚eko bhiṃsanake vane‘ (allein im schreckenerregenden Wald) drückt aus: In einem so schauerlichen Waldgebüsch, in dem denjenigen, die es betreten, meist die Haare zu Berge stehen, war er allein, ohne einen Zweiten. ‚naggo na caggimāsīno‘ bedeutet: nackt und nicht am Feuer sitzend. Dies verdeutlicht: Obwohl er von der Kälte gequält wurde, legte er weder ein Unter- noch ein Obergewand an und setzte sich auch nicht ans Feuer. ‚esanāpasuto‘ (eifrig bemüht auf der Suche) zeigt: Obwohl es kein reines, heiliges Leben (Abrahmacariya) war, hatte er die Vorstellung von einem heiligen Leben und dachte: „Dies ist wahrlich das heilige Leben, das Suchen, Streben und der Weg zur Brahma-Welt“; so war er diesem Streben nach dem heiligen Leben hingegeben, eifrig bemüht und voller Eifer. ‚munī‘ (der Weise) zeigt: „Dieser Weise praktiziert wahrlich um der Erkenntnis willen“ – so wurde er von den Menschen verehrt. Evaṃ caturaṅgasamannāgataṃ brahmacariyaṃ caritvā bodhisatto maraṇakāle upaṭṭhitaṃ nirayanimittaṃ disvā ‘‘idaṃ vatasamādānaṃ niratthaka’’nti ñatvā taṅkhaṇaññeva taṃ laddhiṃ bhinditvā sammādiṭṭhiṃ gahetvā devaloke nibbatti. Nachdem der Bodhisatta das mit diesen vier Faktoren ausgestattete heilige Leben praktiziert hatte, sah er zur Zeit des Todes das Zeichen der Hölle vor sich auftauchen. Er erkannte: „Diese Selbstverpflichtung ist wahrlich nutzlos“, verwarf in genau jenem Moment diese Ansicht, nahm die rechte Anschauung an und wurde in der Götterwelt wiedergeboren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘ahaṃ tena samayena so ājīvako ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er die Geburtserzählung zusammen: „Ich selbst war zu jener Zeit dieser Ājīvaka.“ Lomahaṃsajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Lomahaṃsa-Jātaka ist die vierte.
[95] 5. Mahāsudassanajātakavaṇṇanā [95] 5. Die Erklärung des Mahāsudassana-Jātaka Aniccā vata saṅkhārāti idaṃ satthā parinibbānamañce nipanno ānandattherassa ‘‘mā, bhante, bhagavā imasmiṃ khuddakanagarake’’tyādivacanaṃ (dī. ni. 2.210) ārabbha kathesi. Tathāgate hi jetavane viharante sāriputtatthero kattikapuṇṇamāyaṃ nāḷakagāmake jātovarake parinibbāyi, mahāmoggallāno kattikamāsasseva kāḷapakkhaamāvasiyaṃ. Evaṃ parinibbute aggasāvakayuge ‘‘ahampi kusinārāyaṃ parinibbāyissāmī’’ti anupubbena cārikaṃ caramāno tattha gantvā yamakasālānamantare uttarasīsake mañcake anuṭṭhānaseyyāya nipajji. Atha naṃ āyasmā ānandatthero ‘‘mā, bhante, bhagavā imasmiṃ khuddakanagarake visame ujjaṅgalanagarake, sākhānagarake parinibbāyi, aññesaṃ campārājagahādīnaṃ mahānagarānaṃ aññatarasmiṃ bhagavā parinibbāyatū’’ti yāci. Satthā ‘‘mā, ānanda, imaṃ ‘khuddakanagarakaṃ, ujjaṅgalanagarakaṃ sākhānagaraka’nti vadehi, ahañhi pubbe sudassanacakkavattirājakāle imasmiṃ nagare vasiṃ, tadā idaṃ dvādasayojanikena ratanapākārena parikkhittaṃ mahānagaraṃ ahosī’’ti vatvā therena yācito atītaṃ āharanto mahāsudassanasuttaṃ (dī. ni. 2.241 ādayo) kathesi. „Vergänglich wahrlich sind die Gestaltungen“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er auf dem Bett des vollkommenen Verlöschen (Parinibbāna) lag, bezugnehmend auf die Worte des ehrwürdigen Ānanda: „Herr, möge der Erhabene nicht in dieser kleinen Stadt...“ (Dī. Ni. 2.210) und so weiter. Denn während der Tathāgata im Jetavana-Kloster verweilte, erlosch der ehrwürdige Sāriputta am Vollmondtag des Monats Kattika in seinem Geburtshaus im Dorf Nāḷaka vollkommen; der ehrwürdige Mahāmoggallāna am Neumondtag der dunklen Monatshälfte desselben Monats Kattika. Als das Paar der Hauptschüler so vollkommen erloschen war, dachte der Erhabene: „Auch ich werde in Kusinārā vollkommen verlöschen“, zog allmählich auf Wanderschaft, ging dorthin und legte sich zwischen den Zwillings-Sāla-Bäumen auf einem Lager mit dem Haupt nach Norden im Sterbebett (Anuṭṭhānaseyyā) nieder. Da bat ihn der ehrwürdige Ānanda: „Herr, möge der Erhabene nicht in dieser kleinen, unwegsamen und wasserarmen Kleinstadt, dieser unbedeutenden Außenstelle vollkommen verlöschen. Möge der Erhabene in einer anderen der großen Städte wie Campā, Rājagaha und so weiter vollkommen verlöschen.“ Der Meister sprach: „Sage nicht so, Ānanda: ‚eine kleine Stadt, eine wasserarme Stadt, eine Außenstelle‘. Denn in der Vergangenheit, zur Zeit des Rades drehenden Königs Sudassana, wohnte ich in dieser Stadt. Damals war dies eine zwölf Meilen (Yojanas) große Stadt, umgeben von einer Mauer aus sieben Arten von Edelsteinen.“ Nachdem er dies gesagt hatte, legte er auf Bitten des Thera die Vergangenheit dar und verkündete das Mahāsudassana-Sutta. Tadā pana mahāsudassanaṃ sudhammapāsādā otaritvā avidūre sattaratanamaye tālavane paññattasmiṃ kappiyamañcake dakkhiṇena passena [Pg.416] anuṭṭhānaseyyāya nipannaṃ disvā ‘‘imāni te, deva, caturāsīti nagarasahassāni kusāvatirājadhānippamukhāni, ettha chandaṃ karohī’’ti subhaddāya deviyā vutte mahāsudassano ‘‘mā devi evaṃ avaca, atha kho ‘ettha chandaṃ vinehi, mā apekkhaṃ akāsī’ti evaṃ maṃ ovadā’’ti vatvā ‘‘kiṃkāraṇā, devā’’ti pucchito ‘‘ajjāhaṃ kālakiriyaṃ karissāmī’’ti. Atha naṃ devī rodamānā akkhīni puñchitvā kicchena kasirena tathā vatvā rodi paridevi. Sesāpi caturāsītisahassaitthiyo rodiṃsu parideviṃsu. Amaccādīsupi ekopi adhivāsetuṃ nāsakkhi, sabbepi rodiṃsu. Bodhisatto ‘‘alaṃ, bhaṇe, mā saddamakatthā’’ti sabbe nivāretvā deviṃ āmantetvā ‘‘mā tvaṃ devi rodi, mā paridevi. Tilaphalamattopi hi saṅkhāro nicco nāma natthi, sabbepi aniccā bhedanadhammā evā’’ti vatvā deviṃ ovadanto imaṃ gāthamāha – Damals nun sah Königin Subhaddā den großen König Sudassana, der aus dem Sudhamma-Palast herabgestiegen war und unweit davon in einem aus den sieben Edelsteinen bestehenden Palmengarten auf einem hergerichteten, passenden Lager auf der rechten Seite im Sterbebett lag, und sprach zu ihm: „Herr, diese deine vierundachtzigtausend Städte, allen voran die königliche Hauptstadt Kusāvatī – richte dein Begehren auf sie.“ Der große Sudassana sprach: „Königin, sprich nicht so. Ermahne mich vielmehr so: ‚Beseitige das Begehren nach diesen Städten, blicke nicht sehnsüchtig auf sie zurück.‘“ Als er gefragt wurde: „Aus welchem Grund, o König?“, antwortete er: „Heute werde ich verscheiden.“ Da wischte sich die Königin weinend die Augen ab, sprach unter großen Mühen und Schmerzen genau diese Worte und weinte und klagte laut. Auch die übrigen vierundachtzigtausend Frauen weinten und klagten. Selbst unter den Ministern und Hofbeamten konnte sich kein einziger beherrschen; sie alle weinten. Der Bodhisatta sprach: „Genug, Freunde, macht keinen Lärm!“ Er hielt sie alle zurück, wandte sich an die Königin und sprach: „Weine nicht, Königin, klage nicht. Denn es gibt kein dauerhaftes gestaltetes Ding (Saṅkhāra), und sei es auch nur so groß wie ein Sesamsamen. Alle gestalteten Dinge sind unbeständig, ihrer Natur nach dem Zerfall preisgegeben.“ Um die Königin zu ermahnen, sprach er diese Strophe: 95. 95. ‘‘Aniccā vata saṅkhārā, uppādavayadhammino; Uppajjitvā nirujjhanti, tesaṃ vūpasamo sukho’’ti. „Vergänglich wahrlich sind die Gestaltungen, dem Entstehen und Vergehen unterworfen. Entstanden vergehen sie wieder; ihr Zurruhekommen ist Glück.“ Tattha aniccā vata saṅkhārāti bhadde subhaddādevi, yattakā kehici paccayehi samāgantvā katā khandhāyatanādayo saṅkhārā, sabbe te aniccāyeva nāma. Etesu hi rūpaṃ aniccaṃ…pe… viññāṇaṃ aniccaṃ. Cakkhu aniccaṃ…pe… dhammā aniccā. Yaṃkiñci saviññāṇakaṃ aviññāṇakaṃ ratanaṃ, sabbaṃ taṃ aniccameva. Iti ‘‘aniccā vata saṅkhārā’’ti gaṇha. Kasmā? Uppādavayadhamminoti, sabbe hete uppādadhammino ceva vayadhammino ca uppajjanabhijjanasabhāvāyeva, tasmā ‘‘aniccā’’ti veditabbā. Yasmā ca aniccā, tasmā uppajjitvā nirujjhanti, uppajjitvā ṭhitiṃ patvāpi nirujjhantiyeva. Sabbeva hete nibbattamānā uppajjanti nāma, bhijjamānā nirujjhanti nāma. Tesaṃ uppāde satiyeva ca ṭhiti nāma hoti, ṭhitiyā satiyeva bhaṅgo nāma hoti, na hi anuppannassa ṭhiti nāma, nāpi ṭhitaṃ abhijjanakaṃ nāma atthi. Iti sabbepi saṅkhārā tīṇi lakkhaṇāni patvā tattha tattheva nirujjhanti, tasmā sabbepime aniccā khaṇikā ittarā adhuvā pabhaṅguno calitā samīritā anaddhaniyā payātā tāvakālikā nissārā, tāvakālikaṭṭhena māyāmarīcipheṇasadisā. Tesu bhadde subhaddādevi, kasmā sukhasaññaṃ uppādesi, evaṃ pana gaṇha tesaṃ vūpasamo sukhoti, sabbavaṭṭavūpasamanato tesaṃ vūpasamo nāma nibbānaṃ, tadevekaṃ ekantato sukhaṃ, tato aññaṃ sukhaṃ nāma natthīti. Hierbei bedeutet "Unbeständig wahrlich sind die Gestaltungen" Folgendes: O edle Königin Subhaddā, all die Gestaltungen wie die Daseinsgruppen, Sinnesbereiche usw., die durch das Zusammentreffen von irgendwelchen Bedingungen entstanden sind, sie alle sind wahrlich unbeständig. Denn unter diesen ist die Körperform unbeständig... und das Bewusstsein unbeständig. Das Auge ist unbeständig... und die Geistobjekte sind unbeständig. Was auch immer an beseelten oder unbeseelten Kostbarkeiten existiert, all das ist wahrlich unbeständig. Präge dir daher ein: "Unbeständig wahrlich sind die Gestaltungen". Warum? Weil sie der Natur des Entstehens und Vergehens unterworfen sind (uppādavayadhammino). Denn alle diese [Gestaltungen] haben sowohl die Natur des Entstehens als auch die Natur des Vergehens; sie haben die inhärente Eigenschaft des Entstehens und des Zerfallens. Darum sind sie als unbeständig zu erkennen. Und weil sie unbeständig sind, vergehen sie, nachdem sie entstanden sind; selbst wenn sie entstanden sind und das Verweilen erreicht haben, vergehen sie dennoch unweigerlich. Denn all diese [Gestaltungen] werden im Entstehen begriffen als "entstehend" bezeichnet, und im Zerfallen begriffen als "vergehend". Und nur wenn ihr Entstehen vorliegt, gibt es das sogenannte Verweilen (ṭhiti). Nur wenn das Verweilen vorliegt, gibt es den sogenannten Zerfall (bhaṅgo). Denn für ein Unentstandenes gibt es kein Verweilen, und es gibt auch kein Verweilendes, das nicht zerfällt. So erreichen alle Gestaltungen die drei Merkmale und vergehen genau in dem jeweiligen Moment. Daher sind sie alle unbeständig, augenblicklich (khaṇikā), vergänglich (ittarā), unbeständig (adhuvā), zerbrechlich (pabhaṅguno), beweglich (calitā), schwankend (samīritā), nicht von Dauer (anaddhaniyā), vergehend (payātā), zeitweilig (tāvakālikā) und kernlos (nissārā); und wegen ihrer Zeitweiligkeit gleichen sie einer Täuschung (māyā), einer Luftspiegelung (marīci) und Schaum (pheṇa). Warum hast du bezüglich dieser [Gestaltungen], o edle Königin Subhaddā, die Vorstellung von Glück (sukhasaññā) entstehen lassen? Nimm es vielmehr so auf: "Das Zur-Ruhe-Bringen derselben ist Glück." Wegen des Zur-Ruhe-Bringens des gesamten Daseinskreislaufs wird das Zur-Ruhe-Bringen derselben Nibbāna genannt. Nur dieses eine ist das absolute Glück. Abgesehen davon gibt es kein wahres Glück. Evaṃ [Pg.417] mahāsudassano amatamahānibbānena desanāya kūṭaṃ gahetvā avasesassapi mahājanassa ‘‘dānaṃ detha, sīlaṃ rakkhatha, uposathakammaṃ karothā’’ti ovādaṃ datvā devalokaparāyaṇo ahosi. So setzte der König Mahāsudassana mit dem unsterblichen, großen Nibbāna den Höhepunkt seiner Lehrrede, gab auch den übrigen Menschen die Ermahnung: "Gebt Gaben, hütet die Tugendregeln, begeht den Uposatha-Tag!" und ging daraufhin in die Götterwelt ein. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā subhaddā devī rāhulamātā ahosi, pariṇāyakaratanaṃ rāhulo, sesaparisā buddhaparisā, mahāsudassano pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er die Geburtserzählung (Jātaka) wie folgt zusammen: "Damals war die Königin Subhaddā die Mutter Rāhulas, der Kronprinz war Rāhula, die übrige Gefolgschaft war die Gefolgschaft des Buddha, und der König Mahāsudassana war ich selbst." Mahāsudassanajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Mahāsudassana-Jātaka, die fünfte.
[96] 6. Telapattajātakavaṇṇanā [96] 6. Die Erklärung des Telapatta-Jātaka. Samatittikaṃ anavasesakanti idaṃ satthā sumbharaṭṭhe sedakaṃ nāma nigamaṃ upanissāya aññatarasmiṃ vanasaṇḍe viharanto janapadakalyāṇisuttaṃ ārabbha kathesi. Tatra hi bhagavā – "Bis zum Rand gefüllt, ohne Rest..." – Diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Lande Sumbha nahe der Ortschaft namens Sedaka in einem bestimmten Waldgebiet verwelte, bezugnehmend auf die Janapadakalyāṇī-Sutta. Dort sprach der Erhabene nämlich: ‘‘Seyyathāpi, bhikkhave, ‘janapadakalyāṇī janapadakalyāṇī’ti kho, bhikkhave, mahājanakāyo sannipateyya, sā kho panassa janapadakalyāṇī paramapāsāvinī nacce, paramapāsāvinī gīte. ‘Janapadakalyāṇī naccati gāyatī’ti kho, bhikkhave, bhiyyosomattāya mahājanakāyo sannipateyya. Atha puriso āgaccheyya jīvitukāmo amaritukāmo sukhakāmo dukkhapaṭikūlo. Tamenaṃ evaṃ vadeyya ‘‘ayaṃ te, ambho purisa, samatittiko telapatto antarena ca mahājanakāyassa antarena ca janapadakalyāṇiyā pariharitabbo, puriso ca taṃ ukkhittāsiko piṭṭhito piṭṭhito anubandhissati ‘yattheva naṃ thokampi chaḍḍessasi, tattheva te sīsaṃ pātessāmī’’’ti. ‘‘Taṃ kiṃ maññatha, bhikkhave, api nu so puriso amuṃ telapattaṃ amanasikaritvā bahiddhā pamādaṃ āhareyyā’’ti? ‘‘No hetaṃ, bhante’’. Upamā kho myāyaṃ, bhikkhave, katā atthassa viññāpanāya. Ayamevettha attho – ‘samatittiko telapatto’ti kho, bhikkhave, kāyagatāyetaṃ satiyā adhivacanaṃ. Tasmātiha[Pg.418], bhikkhave, evaṃ sikkhitabbaṃ ‘kāyagatā no sati bhāvitā bhavissati susamāraddhā’ti evañhi vo, bhikkhave, sikkhitabba’’nti (saṃ. ni. 5.386) – "Gleichwie, ihr Mönche, eine große Menschenmenge zusammenströmen würde, indem sie riefe: ‚Die Schönste des Landes! Die Schönste des Landes!‘ Und diese Schönste des Landes wäre im Tanz von höchster Anmut, im Gesang von höchster Anmut. Und wenn sie riefen: ‚Die Schönste des Landes tanzt und singt!‘, ihr Mönche, würde die Menschenmenge in noch weitaus größerem Maße zusammenströmen. Dann aber käme ein Mann herbei, der leben möchte, nicht sterben möchte, der nach Glück strebt und dem Schmerz abgeneigt ist. Zu diesem würde man wie folgt sprechen: „Hier, mein lieber Mann, ist eine bis zum Rand gefüllte Ölschale, die du mitten durch die große Menschenmenge und mitten an der Schönsten des Landes vorbei tragen musst. Und ein Mann mit gezücktem Schwert wird dir auf dem Fuße folgen und sagen: ‚Wo auch immer du auch nur einen Tropfen davon verschüttest, genau dort werde ich dir den Kopf abschlagen!‘“ Was meint ihr wohl, ihr Mönche: Würde jener Mann diese Ölschale unbeachtet lassen und nach außen hin unachtsam mit ihr umhergehen?" – "Sicherlich nicht, o Herr." – "Dies ist ein Gleichnis, das ich gebraucht habe, ihr Mönche, um die Bedeutung verständlich zu machen. Und dies ist die Bedeutung hierbei: „Die bis zum Rand gefüllte Ölschale“, ihr Mönche, ist eine Bezeichnung für die auf den Körper gerichtete Achtsamkeit (kāyagatāsati). Darum, ihr Mönche, solltet ihr euch so üben: „Die auf unseren Körper gerichtete Achtsamkeit soll entfaltet und gut geübt werden.“ So, ihr Mönche, solltet ihr euch üben." Idaṃ janapadakalyāṇisuttaṃ sātthaṃ sabyañjanaṃ kathesi. So verkündete er diese Janapadakalyāṇī-Sutta, reich an Sinn und reich an rechtem Ausdruck. Tatrāyaṃ saṅkhepattho – janapadakalyāṇīti janapadamhi kalyāṇī uttamā chasarīradosarahitā pañcakalyāṇasamannāgatā. Sā hi yasmā nātidīghā, nātirassā, nātikisā, nātithūlā, nātikāḷā, nāccodātā, atikkantā mānusakavaṇṇaṃ, apattā dibbavaṇṇaṃ, tasmā chasarīradosarahitā. Chavikalyāṇaṃ, maṃsakalyāṇaṃ, nhārukalyāṇaṃ, aṭṭhikalyāṇaṃ, vayokalyāṇanti imehi pana pañcahi kalyāṇehi samannāgatattā pañcakalyāṇasamannāgatā nāma. Tassā hi āgantukobhāsakiccaṃ nāma natthi, attano sarīrobhāseneva dvādasahatthe ṭhāne ālokaṃ karoti, piyaṅgusāmā vā hoti suvaṇṇasāmā vā. Ayamassā chavikalyāṇatā. Cattāro panassā hatthapādā mukhapariyosānañca lākhārasaparikammakataṃ viya rattapavāḷarattakambalasadisaṃ hoti. Ayamassā maṃsakalyāṇatā. Vīsati nakhapattāni maṃsato amuttaṭṭhāne lākhārasapūritāni viya, muttaṭṭhāne khīradhārāsadisāni. Ayamassā nhārukalyāṇatā. Dvattiṃsa dantā suphusitā sudhotavajirapanti viya khāyanti. Ayamassā aṭṭhikalyāṇatā. Vīsativassasatikāpi pana samānā soḷasavassuddesikā viya hoti nibbalipalitā. Ayamassā vayokalyāṇatā. Hierbei ist die kurze Bedeutung wie folgt: "Janapadakalyāṇī" (die Schönste des Landes) bedeutet eine im Lande Schöne, eine Vortreffliche, die von den sechs körperlichen Makeln frei ist und die fünf Schönheitsmerkmale besitzt. Denn weil sie weder zu groß noch zu klein, weder zu mager noch zu korpulent, weder zu dunkel noch zu blass ist und die menschliche Schönheit übertrifft, ohne jedoch die göttliche Schönheit zu erreichen, ist sie frei von den sechs körperlichen Makeln. Weil sie mit den fünf Schönheiten ausgestattet ist, nämlich der Schönheit der Haut, der Schönheit des Fleisches, der Schönheit der Sehnen (gezeigt an den Nägeln), der Schönheit der Knochen und der Schönheit des Alters, wird sie "mit den fünf Schönheitsmerkmalen ausgestattet" genannt. Denn für sie gibt es kein Bedürfnis nach äußerem Glanz; durch das Strahlen ihres eigenen Körpers erleuchtet sie einen Bereich von zwölf Ellen und hat entweder die Farbe einer braunen Lilie oder eine goldgelbe Farbe. Dies ist ihre Schönheit der Haut (chavikalyāṇatā). Ihre vier Gliedmaßen (Hände und Füße) und ihre Lippen sind wie mit Lack bearbeitet, ähnlich einer roten Koralle oder einer roten Wolldecke. Dies ist ihre Schönheit des Fleisches (maṃsakalyāṇatā). Ihre zwanzig Nägel sind an den Stellen, wo sie mit dem Fleisch verwachsen sind, wie mit Lacksaft gefüllt, und an den freien Stellen wie ein Milchstrom. Dies ist ihre Schönheit der Nägel/Sehnen (nhārukalyāṇatā). Ihre zweiunddreißig Zähne schließen lückenlos und erscheinen wie eine Reihe gut geschliffener Diamanten. Dies ist ihre Schönheit der Knochen/Zähne (aṭṭhikalyāṇatā). Selbst wenn sie hundertzwanzig Jahre alt ist, sieht sie aus wie ein sechzehnjähriges Mädchen, ohne Falten und ohne graues Haar. Dies ist ihre Schönheit des Alters (vayokalyāṇatā). Paramapāsāvinīti ettha pana pasavanaṃ pasavo, pavattīti attho. Pasavo eva pāsāvo, paramo pāsāvo paramapāsāvo, so assā atthīti paramapāsāvinī. Nacce ca gīte ca uttamappavatti seṭṭhakiriyā. Uttamameva naccaṃ naccati, gītañca gāyatīti vuttaṃ hoti. In dem Wort "paramapāsāvinī" bedeutet "pasavana" bzw. "pasavo" das Entstehen oder die Aktivität (pavatti). "Pasavo" selbst wird zu "pāsāvo". Ein hervorragendes Entstehen ist "paramapāsāvo". Wer dieses besitzt, ist "paramapāsāvinī". Im Tanz und im Gesang bedeutet dies eine hervorragende Darbietung, eine vortreffliche Ausführung. Damit ist gemeint: Sie tanzt nur den hervorragendsten Tanz und singt nur den hervorragendsten Gesang. Atha puriso āgaccheyyāti na attano ruciyā āgaccheyya, ayaṃ panettha adhippāyo – athevaṃ mahājanamajjhe janapadakalyāṇiyā naccamānāya ‘‘sādhu sādhū’’ti sādhukāresu aṅguliphoṭanesu celukkhepesu ca pavattamānesu taṃ pavattiṃ sutvā rājā bandhanāgārato ekaṃ corapurisaṃ pakkosāpetvā [Pg.419] nigaḷāni chinditvā samatittikaṃ suparipuṇṇaṃ telapattaṃ tassa hatthe datvā ubhohi hatthehi daḷhaṃ gāhāpetvā ekaṃ asihatthaṃ purisaṃ āṇāpesi ‘‘etaṃ gahetvā janapadakalyāṇiyā samajjaṭṭhānaṃ gaccha. Yattheva cesa pamādaṃ āgamma ekampi telabinduṃ chaḍḍeti, tatthevassa sīsaṃ chindā’’ti. So puriso asiṃ ukkhipitvā taṃ tajjento tattha nesi. So maraṇabhayatajjito jīvitukāmatāya pamādavasena taṃ amanasikaritvā sakimpi akkhīni ummīletvā taṃ janapadakalyāṇiṃ na olokesi. Evaṃ bhūtapubbamevetaṃ vatthu, sutte pana parikappavasenetaṃ vuttanti veditabbaṃ. „Und ein Mann käme herbei“ bedeutet, dass er nicht aus eigenem Verlangen käme. Dies ist hierbei der Sinn: Wenn inmitten einer großen Menschenmenge die schönste Frau des Landes tanzt und Beifallsrufe wie „Gut, gut!“, das Schnippen mit den Fingern und das Hochwerfen von Gewändern stattfinden, hört der König von diesem Ereignis. Er lässt einen Dieb aus dem Gefängnis herbeirufen, nimmt ihm die Fesseln ab, gibt ihm eine bis zum Rand gefüllte, übervolle Schale Öl in die Hände, lässt ihn diese mit beiden Händen fest greifen und befiehlt einem Mann mit einem Schwert in der Hand: „Nimm diesen und geh dorthin, wo die schönste Frau des Landes auftritt. Wo immer er aus Unachtsamkeit auch nur einen einzigen Tropfen Öl vergießt, genau dort schlage ihm den Kopf ab.“ Jener Mann hob das Schwert, bedrohte ihn und führte ihn dorthin. Von Todesfurcht geplagt und aus Verlangen zu leben, schenkte der Dieb ihr aus Angst vor Unachtsamkeit keine Beachtung, öffnete kein einziges Mal die Augen und blickte die schönste Frau des Landes nicht an. So hat sich diese Geschichte in der Vergangenheit tatsächlich zugetragen, doch im Sutta ist zu verstehen, dass dies als hypothetisches Gleichnis dargelegt wurde. Upamā kho myāyanti ettha pana telapattassa tāva kāyagatāsatiyā opammasaṃsandanaṃ katameva. Ettha pana rājā viya kammaṃ daṭṭhabbaṃ, asi viya kilesā, ukkhittāsikapuriso viya māro, telapattahattho puriso viya kāyagatāsatibhāvako vipassakayogāvacaro. Iti bhagavā ‘‘kāyagatāsatiṃ bhāvetukāmena bhikkhunā telapattahatthena tena purisena viya satiṃ avissajjetvā appamattena kāyagatāsati bhāvetabbā’’ti imaṃ suttaṃ āharitvā dassesi. Bei den Worten „Dies ist ein Gleichnis für mich“ ist der Vergleich der Ölschale mit der Achtsamkeit auf den Körper bereits vollzogen. Hierbei ist das Kamma wie der König anzusehen, die Befleckungen sind wie das Schwert, Māra ist wie der Mann mit dem erhobenen Schwert, und der die Achtsamkeit auf den Körper entfaltende, die Einsichtspraxis übende Meditierende ist wie der Mann mit der Ölschale in der Hand. So zeigte der Erhabene, indem er dieses Sutta vortrug: „Ein Mönch, der die Achtsamkeit auf den Körper zu entfalten wünscht, muss wie jener Mann mit der Ölschale in der Hand die Achtsamkeit ununterbrochen aufrechterhalten und achtsam die Achtsamkeit auf den Körper entfalten.“ Bhikkhū imaṃ suttañca atthañca sutvā evamāhaṃsu – ‘‘dukkaraṃ, bhante, tena purisena kataṃ tathārūpiṃ janapadakalyāṇiṃ anoloketvā telapattaṃ ādāya gacchantenā’’ti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, tena dukkaraṃ kataṃ, sukaramevetaṃ. Kasmā? Ukkhittāsikena purisena santajjetvā nīyamānatāya. Yaṃ pana pubbe paṇḍitā appamādena satiṃ avissajjetvā abhisaṅkhataṃ dibbarūpampi indriyāni bhinditvā anoloketvāva gantvā rajjaṃ pāpuṇiṃsu, etaṃ dukkara’’nti vatvā atītaṃ āhari. Als die Mönche dieses Sutta und seine Bedeutung hörten, sagten sie: „Schwer zu vollbringen, o Herr, war das, was jener Mann tat, der mit der Ölschale in der Hand ging, ohne eine so schöne Frau des Landes anzusehen.“ Der Meister sprach: „Mönche, jener hat nichts Schweres getan; das war vielmehr leicht zu tun. Warum? Weil er von dem Mann mit dem erhobenen Schwert bedroht und geführt wurde. Was jedoch in der Vergangenheit die Weisen taten, indem sie unermüdlich die Achtsamkeit nicht aufgaben, selbst eine künstlich erschaffene göttliche Gestalt nicht ansahen, ihre Sinne bezähmten und weitergingen, bis sie die Königsherrschaft erlangten – das ist schwer zu vollbringen.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa rañño puttasatassa sabbakaniṭṭho hutvā nibbatti, so anupubbena viññutaṃ pāpuṇi. Tadā ca rañño gehe paccekabuddhā bhuñjanti, bodhisatto tesaṃ veyyāvaccaṃ karoti. So ekadivasaṃ cintesi ‘‘mama bahū bhātaro, lacchāmi nu kho ahaṃ imasmiṃ nagare kulasantakaṃ rajjaṃ, udāhu no’’ti? Athassa etadahosi ‘‘paccekabuddhe pucchitvā jānissāmī’’ti. So dutiyadivase paccekabuddhesu āgatesu dhamakaraṇaṃ ādāya pānīyaṃ parissāvetvā pāde dhovitvā telena makkhetvā tesaṃ antarakhajjakaṃ khāditvā [Pg.420] nisinnakāle vanditvā ekamantaṃ nisinno tamatthaṃ pucchi. Atha naṃ te avocuṃ – kumāra, na tvaṃ imasmiṃ nagare rajjaṃ labhissasi, ito pana vīsayojanasatamatthake gandhāraraṭṭhe takkasilānagaraṃ nāma atthi, tattha gantuṃ sakkonto ito sattame divase rajjaṃ lacchasi. Antarāmagge pana mahāvattaniaṭaviyaṃ paripantho atthi, taṃ aṭaviṃ pariharitvā gacchantassa yojanasatiko maggo hoti, ujukaṃ gacchantassa paññāsa yojanāni honti. So hi amanussakantāro nāma. Tattha yakkhiniyo antarāmagge gāme ca sālāyo ca māpetvā upari suvaṇṇatārakavicittavitānaṃ mahārahaseyyaṃ paññāpetvā nānāvirāgapaṭasāṇiyo parikkhipitvā dibbālaṅkārehi attabhāvaṃ maṇḍetvā sālāsu nisīditvā āgacchante purise madhurāhi vācāhi saṅgaṇhitvā ‘‘kilantarūpā viya paññāyatha, idhāgantvā nisīditvā pānīyaṃ pivitvā gacchathā’’ti pakkositvā āgatāgatānaṃ āsanāni datvā attano rūpalīlāvilāsehi palobhetvā kilesavasike katvā attanā saddhiṃ ajjhācāre kate tattheva ne lohitena paggharantena khāditvā jīvitakkhayaṃ pāpenti. Rūpagocaraṃ sattaṃ rūpeneva gaṇhanti, saddagocaraṃ madhurena gītavāditasaddena, gandhagocaraṃ dibbagandhehi, rasagocaraṃ dibbena nānaggarasabhojanena, phoṭṭhabbagocaraṃ ubhatolohitakūpadhānehi dibbasayanehi gaṇhanti. Sace indriyāni bhinditvā tā anoloketvā satiṃ paccupaṭṭhāpetvā gamissasi, sattame divase tattha rajjaṃ lacchasīti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als der jüngste von hundert Söhnen dieses Königs geboren; im Laufe der Zeit erlangte er das Alter der Verständigkeit. Zu jener Zeit speisten Paccekabuddhas im Hause des Königs, und der Bodhisatta leistete ihnen Dienste. Eines Tages dachte er: „Ich habe viele Brüder. Werde ich wohl in dieser Stadt das ererbte Königtum erlangen oder nicht?“ Da kam ihm der Gedanke: „Ich werde die Paccekabuddhas fragen und es so erfahren.“ Am nächsten Tag, als die Paccekabuddhas eintrafen, nahm er das Wasserfilter, filterte das Trinkwasser, wusch ihre Füße, salbte sie mit Öl, und als sie nach dem Essen beieinander saßen, verneigte er sich, setzte sich an eine Seite und stellte ihnen diese Frage. Da sprachen sie zu ihm: „Prinz, du wirst das Königtum in dieser Stadt nicht erlangen. Aber in einer Entfernung von einhundertzwanzig Yojanas von hier gibt es im Land Gandhāra eine Stadt namens Takkasilā. Wenn du dorthin gelangen kannst, wirst du am siebten Tag von heute an das Königtum erlangen. Auf dem Weg dorthin jedoch, in der großen Wildnis von Mahāvattani, gibt es eine danger. Für denjenigen, der diese Wildnis umgeht, beträgt der Weg einhundert Yojanas; für denjenigen, der direkt hindurchgeht, sind es fünfzig Yojanas. Dies ist wahrlich eine von Dämonen beherrschte Wildnis. Dort erschaffen Dämoninnen auf dem Weg Dörfer und Rasthäuser, bereiten darin ein kostbares Bett unter einer mit goldenen Sternen verzierten Decke, umgeben von bunten Vorhängen, schmücken sich mit himmlischem Schmuck, sitzen in den Rasthäusern und empfangen die vorbeikommenden Männer mit süßen Worten: ‚Ihr seht erschöpft aus, kommt herein, setzt euch, trinkt etwas Wasser und geht dann weiter.‘ So rufen sie sie herbei, geben allen Ankommenden Plätze, verführen sie mit ihrer Schönheit und Anmut, machen sie von ihren Begierden beherrscht, und wenn sie sich mit ihnen eingelassen haben, fressen sie sie genau dort auf, während das Blut herabtropft, und bringen sie um ihr Leben. Wesen, die an sichtbaren Formen haften, fangen sie mit Formen; jene, die an Tönen haften, mit süßem Gesang und Musik; jene, die an Gerüchen haften, mit himmlischen Düften; jene, die an Geschmack haften, mit himmlischen, erlesenen Speisen; jene, die an Berührung haften, mit himmlischen Betten mit roten Kissen an beiden Enden. Wenn du deine Sinne bezähmst, sie nicht ansiehst, die Achtsamkeit fest etablierst und weitergehst, wirst du am siebten Tag dort das Königtum erlangen.“ Bodhisatto ‘‘hotu, bhante, tumhākaṃ ovādaṃ gahetvā kiṃ tā olokessāmī’’ti paccekabuddhehi parittaṃ kārāpetvā parittavālukañceva parittasuttañca ādāya paccekabuddhe ca mātāpitaro ca vanditvā nivesanaṃ gantvā attano purise āha – ‘‘ahaṃ takkasilāyaṃ rajjaṃ gahetuṃ gacchāmi, tumhe idheva tiṭṭhathā’’ti. Atha naṃ pañca janā āhaṃsu ‘‘mayampi anugacchāmā’’ti. ‘‘Na sakkā tumhehi anugantuṃ, antarāmagge kira yakkhiniyo rūpādigocare manusse evañcevañca rūpādīhi palobhetvā gaṇhanti, mahā paripantho, ahaṃ pana attānaṃ takketvā gacchāmī’’ti. ‘‘Kiṃ pana, deva, mayaṃ tumhehi saddhiṃ gacchantā attano piyāni rūpādīni olokessāma, mayampi [Pg.421] tatheva gamissāmā’’ti. Bodhisatto ‘‘tena hi appamattā hothā’’ti te pañca jane ādāya maggaṃ paṭipajji. Der Bodhisatta sprach: „Es sei so, ehrwürdige Herren. Warum sollte ich sie ansehen, nachdem ich Euren Rat angenommen habe?“ Er ließ die Paccekabuddhas Schutzverse sprechen, nahm Schutzsand und einen Schutzfaden, verneigte sich vor den Paccekabuddhas und seinen Eltern, ging nach Hause und sagte zu seinen Männern: „Ich gehe nach Takkasilā, um die Königsherrschaft zu übernehmen. Ihr bleibt genau hier.“ Da sagten fünf Männer zu ihm: „Auch wir wollen mitgehen.“ – „Es ist euch nicht möglich, mitzugehen. Auf dem Weg verführen Dämoninnen die Menschen, die an Formen und anderen Sinnesobjekten haften, auf diese und jene Weise mit eben diesen Formen und fangen sie. Die Gefahr ist groß. Ich aber gehe, indem ich mich auf mich selbst verlasse.“ – „Aber Herr, warum sollten wir, wenn wir mit Euch gehen, die uns lieben Formen und anderen Objekte ansehen? Wir werden ebenso gehen.“ Der Bodhisatta sprach: „Wenn dem so ist, dann seid achtsam!“ Er nahm diese fünf Männer mit sich und machte sich auf den Weg. Yakkhiniyo gāmādīni māpetvā nisīdiṃsu. Tesu rūpagocaro puriso tā yakkhiniyo oloketvā rūpārammaṇe paṭibaddhacitto thokaṃ ohīyi. Bodhisatto ‘‘kiṃ bho, thokaṃ ohīyasī’’ti āha. ‘‘Deva, pādā me rujjanti, thokaṃ sālāyaṃ nisīditvā āgacchāmī’’ti. ‘‘Ambho, etā yakkhiniyo, mā kho patthesī’’ti. ‘‘Yaṃ hoti, taṃ hotu, na sakkomi, devā’’ti. ‘‘Tena hi paññāyissasī’’ti itare cattāro ādāya agamāsi. Sopi rūpagocarako tāsaṃ santikaṃ agamāsi. Tā attanā saddhiṃ ajjhācāre kate taṃ tattheva jīvitakkhayaṃ pāpetvā purato gantvā aññaṃ sālaṃ māpetvā nānātūriyāni gahetvā gāyamānā nisīdiṃsu, tattha saddagocarako ohīyi. Purimanayeneva tampi khāditvā purato gantvā nānappakāre gandhakaraṇḍake pūretvā āpaṇaṃ pasāretvā nisīdiṃsu, tattha gandhagocarako ohīyi. Tampi khāditvā purato gantvā nānaggarasānaṃ dibbabhojanānaṃ bhājanāni pūretvā odanikāpaṇaṃ pasāretvā nisīdiṃsu, tattha rasagocarako ohīyi. Tampi khāditvā purato gantvā dibbasayanāni paññāpetvā nisīdiṃsu, tattha phoṭṭhabbagocarako ohīyi. Tampi khādiṃsu, bodhisatto ekakova ahosi. Die Yakkhinĩs erschufen Dörfer und anderes und ließen sich dort nieder. Unter jenen fünf Begleitern blickte der Mann, der nach visuellen Formen strebte, diese Yakkhinĩs an, und da sein Geist an dem schönen Anblick haftete, blieb er ein wenig zurück. Der Bodhisatta fragte: ‘Mein Guter, warum bleibst du ein wenig zurück?’ – ‘Herr, meine Füße schmerzen. Ich werde mich ein wenig in der Rasthalle niedersetzen und dann nachkommen.’ – ‘Freund, das sind Yakkhinĩs! Begehre sie ja nicht!’ – ‘Was auch immer geschehen mag, es geschehe. Ich kann nicht anders, Herr!’ – ‘Dann wird sich dein Schicksal bald zeigen’, sprach er, nahm die anderen vier mit sich und zog weiter. Auch jener Mann, der den visuellen Formen nachjagte, ging zu ihnen hin. Nachdem sie mit ihm geschlechtlichen Umgang gepflogen hatten, brachten sie ihn ebendort um. Dann eilten sie voraus, erschufen eine andere Rasthalle, nahmen verschiedene Musikinstrumente zur Hand und ließen sich singend nieder. Dort blieb der Mann zurück, der den Tönen nachjagte. Auf dieselbe Weise fraßen sie auch ihn, eilten voraus, füllten verschiedene Duftdosen, errichteten einen Verkaufsstand und ließen sich nieder. Dort blieb der Mann zurück, der den Düften nachjagte. Nachdem sie auch diesen gefressen hatten, eilten sie voraus, füllten Schalen mit himmlischen Speisen von erlesenstem Wohlgeschmack, errichteten eine Garküche und ließen sich nieder. Dort blieb der Mann zurück, der den Geschmäckern nachjagte. Nachdem sie auch diesen gefressen hatten, eilten sie voraus, bereiteten himmlische Lagerstätten und ließen sich nieder. Dort blieb der Mann zurück, der den Berührungsreizen nachjagte. Sie fraßen auch ihn, und der Bodhisatta war ganz allein übrig. Athekā yakkhinī ‘‘atikharamanto vatāyaṃ, ahaṃ taṃ khāditvāva nivattissāmī’’ti bodhisattassa pacchato pacchato agamāsi. Aṭaviyā parabhāge vanakammikādayo yakkhiniṃ disvā ‘‘ayaṃ te purato gacchanto puriso kiṃ hotī’’ti pucchiṃsu. ‘‘Komārasāmiko me, ayyā’’ti. ‘‘Ambho, ayaṃ evaṃ sukumālā pupphadāmasadisā suvaṇṇavaṇṇā kumārikā attano kulaṃ chaḍḍetvā bhavantaṃ takketvā nikkhantā, kasmā etaṃ akilametvā ādāya na gacchasī’’ti? ‘‘Nesā, ayyā, mayhaṃ pajāpati, yakkhinī esā, etāya me pañca manussā khāditā’’ti. ‘‘Ayyā, purisā nāma kuddhakāle attano pajāpatiyo yakkhiniyopi karonti petiniyopī’’ti. Sā gacchamānā gabbhinivaṇṇaṃ dassetvā puna sakiṃ vijātavaṇṇaṃ katvā puttaṃ aṅkena ādāya bodhisattaṃ anubandhi, diṭṭhadiṭṭhā [Pg.422] purimanayeneva pucchanti. Bodhisattopi tatheva vatvā gacchanto takkasilaṃ pāpuṇi. Sā puttaṃ antaradhāpetvā ekikāva anubandhi. Bodhisatto nagaradvāraṃ gantvā ekissā sālāya nisīdi. Sā bodhisattassa tejena pavisituṃ asakkontī dibbarūpaṃ māpetvā sālādvāre aṭṭhāsi. Da dachte eine Yakkhinĩ: ‘Dieser Mann ist fürwahr überaus scharfsinnig. Ich werde erst umkehren, nachdem ich ihn gefressen habe’, und folgte dem Bodhisatta Schritt für Schritt. Am anderen Ende des Waldes sahen Waldarbeiter und andere die Yakkhinĩ und fragten: ‘Dieser Mann, der vor dir hergeht, wer ist er für dich?’ – ‘Er ist mein Jugendgatte, ihr Herren’, antwortete sie. – ‘He, Mann! Dieses so zarte, einer Blumengirlande gleichende, goldfarbene junge Mädchen hat ihre eigene Familie verlassen und ist im Vertrauen auf dich ausgezogen. Warum nimmst du sie nicht mit, ohne sie so zu ermüden?’ – ‘Ihr Herren, sie ist nicht meine Ehefrau. Sie ist eine Yakkhinĩ! Sie hat meine fünf Begleiter gefressen!’ – ‘Ach, ihr Herren! Wenn Männer zornig sind, bezeichnen sie ihre eigenen Ehefrauen sogar als Yakkhinĩs oder Geisterfrauen!’ Während sie ging, zeigte sie die Gestalt einer Schwangeren, nahm dann die Gestalt einer Frau an, die erst einmal geboren hatte, nahm ein Kind auf den Schoß und folgte dem Bodhisatta weiter. Jeder, der sie sah, fragte auf dieselbe Weise wie zuvor. Auch der Bodhisatta antwortete wie zuvor und erreichte schließlich Takkasilā. Sie ließ das Kind verschwinden und folgte ihm ganz allein weiter. Der Bodhisatta begab sich zum Stadttor und setzte sich in eine Rasthalle. Da sie wegen der spirituellen Macht des Bodhisatta die Halle nicht betreten konnte, erschuf sie eine himmlische Gestalt und stellte sich an das Tor der Rasthalle. Tasmiṃ samaye takkasilarājā uyyānaṃ gacchanto taṃ disvā paṭibaddhacitto hutvā ‘‘gaccha, imissā sassāmikaassāmikabhāvaṃ jānāhī’’ti manussaṃ pesesi. So taṃ upasaṅkamitvā ‘‘sassāmikāsī’’ti pucchi. ‘‘Āma, ayya, ayaṃ me sālāya nisinno sāmiko’’ti. Bodhisatto ‘‘nesā mayhaṃ pajāpati, yakkhinī esā, etāya me pañca manussā khāditā’’ti āha. Sāpi ‘‘purisā nāma ayyā kuddhakāle yaṃ icchanti, taṃ vadantī’’ti āha. So ubhinnampi vacanaṃ rañño ārocesi. Rājā ‘‘assāmikabhaṇḍaṃ nāma rājasantakaṃ hotī’’ti yakkhiniṃ pakkosāpetvā ekahatthipiṭṭhe nisīdāpetvā nagaraṃ padakkhiṇaṃ katvā pāsādaṃ abhiruyha taṃ aggamahesiṭṭhāne ṭhapesi. Zu jener Zeit begab sich der König von Takkasilā in seinen Lustgarten. Als er sie erblickte, entbrannte sein Geist in Leidenschaft für sie, und er sandte einen Diener aus mit den Worten: ‘Geh und finde heraus, ob diese Frau einen Ehemann hat oder nicht.’ Dieser trat an sie heran und fragte: ‘Hast du einen Ehemann?’ – ‘Ja, Herr, dieser Mann, der dort in der Rasthalle sitzt, ist mein Gatte’, antwortete sie. Der Bodhisatta sprach: ‘Sie ist nicht meine Ehefrau. Sie ist eine Yakkhinĩ! Sie hat meine fünf Begleiter gefressen!’ Auch sie entgegnete: ‘Ihr Herren, wenn Männer zornig sind, sagen sie eben, was ihnen beliebt.’ Der Diener berichtete dem König die Aussagen von beiden. Der König sprach: ‘Was keinen Besitzer hat, gehört dem König.’ Er ließ die Yakkhinĩ rufen, setzte sie auf den Rücken eines Elefanten, ließ sie die Stadt im Uhrzeigersinn umrunden, stieg in seinen Palast empor und erhob sie in den Rang der Hauptgemahlin. So nhātavilitto sāyamāsaṃ bhuñjitvā sirīsayanaṃ abhiruhi. Sāpi yakkhinī attano upakappanakaṃ āhāraṃ āharitvā alaṅkatapaṭiyattā sirisayane raññā saddhiṃ nipajjitvā rañño rativasena sukhaṃ samappitassa nipannakāle ekena passena parivattitvā parodi. Atha naṃ rājā ‘‘kiṃ, bhadde, rodasī’’ti pucchi. ‘‘Deva, ahaṃ tumhehi magge disvā ānītā, tumhākañca gehe bahū itthiyo, ahaṃ sapattīnaṃ antare vasamānā kathāya uppannāya ‘ko tuyhaṃ mātaraṃ vā pitaraṃ vā gottaṃ vā jātiṃ vā jānāti, tvaṃ antarāmagge disvā ānītā nāmā’ti sīse gahetvā nippīḷiyamānā viya maṅku bhavissāmi. Sace tumhe sakalarajje issariyañca āṇañca mayhaṃ dadeyyātha, koci mayhaṃ cittaṃ kopetvā kathetuṃ na sakkhissatī’’ti. ‘‘Bhadde, mayhaṃ sakalaraṭṭhavāsino na kiñci honti, nāhaṃ etesaṃ sāmiko. Ye pana rājāṇaṃ kopetvā akattabbaṃ karonti, tesaññevāhaṃ sāmiko. Iminā kāraṇena na sakkā tuyhaṃ sakalaraṭṭhe vā nagare vā issariyañca āṇañca dātu’’nti. ‘‘Tena hi, deva, sace raṭṭhe vā nagare vā āṇaṃ dātuṃ na sakkotha, antonivesane [Pg.423] antovaḷañjanakānaṃ upari mama vasaṃ vattanatthāya āṇaṃ dethā’’ti. Rājā dibbaphoṭṭhabbena baddho tassā vacanaṃ atikkamituṃ asakkonto ‘‘sādhu, bhadde, antovaḷañjanakesu tuyhaṃ āṇaṃ dammi, tvaṃ ete attano vase vattāpehī’’ti āha. Sā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā rañño niddaṃ okkantakāle yakkhanagaraṃ gantvā yakkhe pakkositvā attanā rājānaṃ jīvitakkhayaṃ pāpetvā aṭṭhimattaṃ sesetvā sabbaṃ nhārucammamaṃsalohitaṃ khādi, avasesā yakkhā mahādvārato paṭṭhāya antonivesane kukkuṭakukkure ādiṃ katvā sabbe khāditvā aṭṭhimattasese akaṃsu. Nachdem er gebadet und sich gesalbt hatte, nahm er sein Abendessen ein und bestieg das Prachtbett. Auch die Yakkhinĩ nahm eine ihr angemessene Nahrung zu sich, schmückte und kleidete sich festlich, legte sich mit dem König auf das Prachtbett und weinte, während der König, ganz hingegeben an das Glück der Liebeslust, eingeschlafen war, indem sie sich auf die Seite drehte. Da fragte der König sie: ‘Meine Liebe, warum weinst du?’ – ‘O Herr, ich wurde von Euch am Wegrand gesehen und hergebracht. In Eurem Hause aber gibt es viele Frauen. Wenn ich nun inmitten meiner Mitbuhlerinnen lebe und Streit entsteht, werden sie mich am Kopf packen und gleichsam demütigen, indem sie sagen: ‘Wer kennt schon deine Mutter oder deinen Vater, deine Sippe oder deine Kaste? Du bist doch nur eine, die man am Wegesrand gefunden und hergebracht hat!’ Wenn Ihr mir aber die Herrschaft und die Befehlsgewalt über das gesamte Reich geben würdet, könnte niemand es wagen, mich zu kränken und so mit mir zu sprechen.’ – ‘Meine Liebe, all die Bewohner des Reiches gehören mir nicht; ich bin nicht ihr Eigentümer. Diejenigen aber, die des Königs Befehl missachten und Unrecht tun, über diese allein habe ich Gewalt. Aus diesem Grunde ist es unmöglich, dir die Herrschaft und die Befehlsgewalt über das gesamte Reich oder die Stadt zu geben.’ – ‘Wenn das so ist, o Herr, und Ihr mir keine Befehlsgewalt über das Reich oder die Stadt geben könnt, so gebt mir doch die Befehlsgewalt innerhalb des Palastes über das Palastgesinde, damit sie sich nach meinem Willen richten.’ Der König, gefesselt von ihrer himmlischen Berührung, war unfähig, ihr Begehren abzuschlagen, und sprach: ‘Gut, meine Liebe, ich gebe dir die Befehlsgewalt über das Palastgesinde. Bringe du sie unter deine Kontrolle.’ Sie nahm das Angebot mit den Worten ‘Sehr wohl’ an. Als der König tief eingeschlafen war, eilte sie in die Stadt der Yakkhis, rief die Yakkhis herbei, tötete den König selbst, ließ nur die Knochen übrig und fraß all seine Sehnen, seine Haut, sein Fleisch und sein Blut. Die übrigen Yakkhis drangen durch das Haupttor ein, fraßen im Palast angefangen bei den Hühnern und Hunden alle Lebewesen auf und ließen nur noch Knochen übrig. Punadivase dvāraṃ yathāpihitameva disvā manussā pharasūhi kavāṭāni koṭṭetvā anto pavisitvā sabbaṃ nivesanaṃ aṭṭhikaparikiṇṇaṃ disvā ‘‘saccaṃ vata so puriso āha ‘nāyaṃ mayhaṃ pajāpati, yakkhinī esā’ti. Rājā pana kiñci ajānitvā taṃ gahetvā attano bhariyaṃ akāsi, sā yakkhe pakkositvā sabbaṃ janaṃ khāditvā gatā bhavissatī’’ti āhaṃsu. Bodhisattopi taṃ divasaṃ tassāyeva sālāyaṃ parittavālukaṃ sīse katvā parittasuttañca parikkhipitvā khaggaṃ gahetvā ṭhitakova aruṇaṃ uṭṭhāpesi. Manussā sakalarājanivesanaṃ sodhetvā haritūpalittaṃ katvā upari gandhehi vilimpitvā pupphāni vikiritvā pupphadāmāni osāretvā dhūmaṃ datvā navamālā bandhitvā sammantayiṃsu ‘‘ambho, yo puriso dibbarūpaṃ māpetvā pacchato āgacchantiṃ yakkhiniṃ indriyāni bhinditvā olokanamattampi na akāsi, so ativiya uḷārasatto dhitimā ñāṇasampanno, tādise purise rajjaṃ anusāsante sabbaraṭṭhaṃ sukhitaṃ bhavissati, taṃ rājānaṃ karomā’’ti. Atha sabbe amaccā ca nāgarā ca ekacchandā hutvā bodhisattaṃ upasaṅkamitvā ‘‘deva, tumhe imaṃ rajjaṃ kārethā’’ti nagaraṃ pavesetvā ratanarāsimhi ṭhapetvā abhisiñcitvā takkasilarājānaṃ akaṃsu. So cattāri agatigamanāni vajjetvā dasa rājadhamme akopetvā dhammena rajjaṃ kārento dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Als die Menschen am folgenden Tag das Tor wie gewohnt verschlossen sahen, brachen sie die Torflügel mit Äxten auf, betraten den Palast und sahen das gesamte Gebäude mit Knochen übersät. Da sagten sie: „Wahrlich, jener Mann hat die Wahrheit gesprochen, als er sagte: ‚Dies ist nicht meine Frau, es ist eine Yakkhinī.‘ Der König aber hat, ohne etwas zu wissen, sie zu sich genommen und zu seiner Gemahlin gemacht. Sie muss andere Yakkhas herbeigerufen, alle Menschen aufgefressen haben und dann weggegangen sein.“ Auch der Bodhisatta verbrachte jenen Tag in eben jener Rasthalle, wobei er sich Schutzsand auf das Haupt streute, den Schutzfaden ringsherum spannte, sein Schwert ergriff und im Stehen den Anbruch des Morgens erwartete. Die Menschen reinigten den gesamten königlichen Palast, bestrichen ihn mit frischem Kuhdung, salbten ihn darüber mit Duftstoffen, verstreuten Blumen, hängten Blumengirlanden auf, entzündeten Räucherwerk, banden frische Kränze und berieten sich: „Ihr Männer, jener Mann, der seine Sinne zügelte und nicht einmal einen einzigen Blick auf die ihm folgende Yakkhinī warf, die eine göttliche Gestalt angenommen hatte – er ist ein überaus edles Wesen, standhaft und weise. Wenn ein solcher Mann das Reich regiert, wird das ganze Land glücklich sein. Lasst uns ihn zum König machen!“ Daraufhin kamen alle Minister und Stadtbewohner einmütig zum Bodhisatta und baten: „Majestät, regiert Ihr dieses Reich!“ Sie führten ihn in die Stadt, ließen ihn auf einem Haufen von Juwelen Platz nehmen, weihten ihn und machten ihn zum König von Takkasilā. Er mied die vier Abwege, verletzte die zehn königlichen Tugenden nicht, regierte das Reich mit Gerechtigkeit, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Spenden und ging gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ atītaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit erzählt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte folgende Strophe: 96. 96. ‘‘Samatittikaṃ [Pg.424] anavasesakaṃ, telapattaṃ yathā parihareyya; Evaṃ sacittamanurakkhe, patthayāno disaṃ agatapubba’’nti. „Wie man eine bis zum Rand gefüllte Schale mit Öl, ohne auch nur einen Tropfen zu verschütten, vorsichtig tragen würde; ebenso sollte einer, der die noch nie zuvor erreichte Himmelsgegend ersehnt, seinen eigenen Geist behüten.“ Tattha samatittikanti antomukhavaṭṭilekhaṃ pāpetvā samabharitaṃ. Anavasesakanti anavasiñcanakaṃ aparissāvanakaṃ katvā. Telapattanti pakkhittatilatelapattaṃ. Parihareyyāti hareyya, ādāya gaccheyya. Evaṃ sacittamanurakkheti taṃ telabharitaṃ pattaṃ viya attano cittaṃ kāyagatāsatiyā gocare ceva sampayuttasatiyā cāti ubhinnaṃ antare pakkhipitvā yathā muhuttampi bahiddhā gocare na vikkhipati, tathā paṇḍito yogāvacaro rakkheyya gopeyya. Kiṃkāraṇā? Etassa hi – Darin bedeutet ‚samatittikaṃ‘ (bis zum Rand gefüllt): bis zum inneren Rand gefüllt und vollkommen ebenmäßig gefüllt. ‚Anavasesakaṃ‘ bedeutet: ohne etwas zu verschütten und ohne es überlaufen zu lassen. ‚Telapattaṃ‘ bedeutet: eine Schale, die mit Sesamöl gefüllt ist. ‚Parihareyya‘ bedeutet: er würde sie tragen, sie nehmen und gehen. ‚Evaṃ sacittamanurakkhe‘ (ebenso sollte er seinen eigenen Geist behüten) bedeutet: Wie jene mit Öl gefüllte Schale sollte der weise Übende (yogāvacaro) seinen eigenen Geist behüten und schützen, indem er ihn zwischen den beiden Bereichen – nämlich dem Bereich der Achtsamkeit auf den Körper (kāyagatāsati) und der mit ihr verbundenen Achtsamkeit – so fixiert, dass er nicht einmal für einen Augenblick zu äußeren Objekten abschweift. Aus welchem Grund? Denn für diesen [Geist gilt] – ‘‘Dunniggahassa lahuno, yatthakāmanipātino; Cittassa damatho sādhu, cittaṃ dantaṃ sukhāvaha’’nti. (dha. pa. 35); „Schwer zu bezähmen, flüchtig ist der Geist, er fällt dorthin, wohin es ihn gelüstet. Die Bändigung des Geistes ist gut; ein gezähmter Geist bringt Glück.“ (Dhp. 35) Tasmā – Darum – ‘‘Sududdasaṃ sunipuṇaṃ, yatthakāmanipātinaṃ; Cittaṃ rakkhetha medhāvī, cittaṃ guttaṃ sukhāvahaṃ’’. (dha. pa. 36); „Sehr schwer zu sehen, äußerst feinsinnig, dorthin fallend, wohin es ihn gelüstet, sollte der Weise den Geist behüten; ein behüteter Geist bringt Glück.“ (Dhp. 36) Idañhi – Denn dieser [Geist ist] – ‘‘Dūraṅgamaṃ ekacaraṃ, asarīraṃ guhāsayaṃ; Ye cittaṃ saṃyamessanti, mokkhanti mārabandhanā’’. (dha. pa. 37); „Weit wandernd, allein schweifend, körperlos, in einer Höhle ruhend; jene, die diesen Geist zügeln werden, befreien sich aus den Fesseln Māras.“ (Dhp. 37) Itarassa pana – Für den anderen [der seinen Geist nicht hütet] aber: ‘‘Anavaṭṭhitacittassa, saddhammaṃ avijānato; Pariplavapasādassa, paññā na paripūrati’’. (dha. pa. 38); „Wer einen unbeständigen Geist hat, die wahre Lehre (Saddhamma) nicht versteht und dessen Vertrauen wankend ist, dessen Weisheit wird nicht vollkommen.“ (Dhp. 38) Thirakammaṭṭhānasahāyassa pana – Für denjenigen aber, der die feste Meditation (kammaṭṭhāna) als seinen Gefährten hat: ‘‘Anavassutacittassa, ananvāhatacetaso; Puññapāpapahīnassa, natthi jāgarato bhayaṃ’’. (dha. pa. 39); „Wessen Geist frei von Begierde ist, wessen Gemüt unverletzt von Hass ist, wer Verdienst und Sünde überwunden hat und wachsam bleibt, für den gibt es keine Furcht.“ (Dhp. 39) Tasmā etaṃ – Darum diesen – ‘‘Phandanaṃ capalaṃ cittaṃ, dūrakkhaṃ dunnivārayaṃ; Ujuṃ karoti medhāvī, usukārova tejanaṃ’’. (dha. pa. 33); „Den zitternden, unruhigen Geist, der schwer zu behüten und schwer zu zügeln ist, macht der Weise gerade, so wie der Pfeilmacher den Pfeilschaft gerade richtet.“ (Dhp. 33) Evaṃ ujuṃ karonto sacittamanurakkhe. Indem er ihn so gerade richtet, sollte er seinen eigenen Geist behüten. Patthayāno [Pg.425] disaṃ agatapubbanti imasmiṃ kāyagatāsatikammaṭṭhāne kammaṃ ārabhitvā anamatagge saṃsāre agatapubbaṃ disaṃ patthento pihento vuttanayena sakaṃ cittaṃ rakkheyyāti attho. Kā panesā disā nāma? – „Patthayāno disaṃ agatapubbaṃ“ (die noch nie zuvor erreichte Himmelsgegend ersehnend) bedeutet: Wer die Praxis in diesem Meditationsobjekt der Achtsamkeit auf den Körper (kāyagatāsati-kammaṭṭhāna) aufnimmt und die im anfangslosen Samsāra noch nie zuvor erreichte Himmelsgegend [das Nibbāna] ersehnt und begehrt, sollte seinen eigenen Geist in der beschriebenen Weise behüten; das ist die Bedeutung. Was aber ist diese sogenannte „Himmelsgegend“ (disā)? ‘‘Mātāpitā disā pubbā, ācariyā dakkhiṇā disā; Puttadārā disā pacchā, mittāmaccā ca uttarā. „Die Mutter und der Vater sind die östliche Himmelsrichtung, die Lehrer sind die südliche Himmelsrichtung; Kinder und Ehefrau sind die westliche Himmelsrichtung, Freunde und Gefährten sind die nördliche Himmelsrichtung. ‘‘Dāsakammakarā heṭṭhā, uddhaṃ samaṇabrāhmaṇā; Etā disā namasseyya, alamatto kule gihī’’ti. (dī. ni. 3.273) – Dienstboten und Arbeiter sind die Himmelsrichtung unten, Asketen und Brahmanen sind die Richtung oben. Diese Richtungen sollte ein fähiger Hausvater in seiner Familie verehren.“ (DN III, 273) – Ettha tāva puttadārādayo ‘‘disā’’ti vuttā. Hier werden zunächst Kinder, Ehefrau usw. als „Himmelsrichtungen“ bezeichnet. ‘‘Disā catasso vidisā catasso, uddhaṃ adho dasa disā imāyo; Katamaṃ disaṃ tiṭṭhati nāgarājā, yamaddasā supine chabbisāṇa’’nti. (jā. 1.16.104) – „Die vier Haupthimmelsrichtungen, die vier Zwischenrichtungen, oben und unten – dies sind die zehn Himmelsrichtungen. In welcher Himmelsrichtung befindet sich der Elefantenkönig mit den sechs Stoßzähnen, den sie im Traum gesehen hat?“ (Jā. 1.16.104) – Ettha puratthimādibhedā disāva ‘‘disā’’ti vuttā. Hier werden eben die Himmelsrichtungen, unterschieden nach Osten usw., als „Himmelsrichtungen“ bezeichnet. ‘‘Agārino annadapānavatthadā, avhāyikā tampi disaṃ vadanti; Esā disā paramā setaketu, yaṃ patvā dukkhī sukhino bhavantī’’ti. (jā. 1.6.9) – „Die Hausväter, die Nahrung, Trank und Kleidung geben und einladen – auch sie bezeichnet man als Himmelsrichtung. Dies, o Setaketu, ist die höchste Himmelsgegend, nach deren Erreichen die Leidenden glücklich werden.“ (Jā. 1.6.9) – Ettha pana nibbānaṃ ‘‘disā’’ti vuttaṃ. Idhāpi tadeva adhippetaṃ. Tañhi ‘‘khayaṃ virāga’’ntiādīhi dissati apadissati, tasmā ‘‘disā’’ti vuccati. Anamatagge pana saṃsāre kenaci bālaputhujjanena supinenapi agatapubbatāya agatapubbā disā nāmāti vuttaṃ. Taṃ patthayantena kāyagatāsatiyā yogo karaṇīyoti. Hier jedoch wird das Nibbāna als „Himmelsgegend“ (disā) bezeichnet. Auch hier [in dieser Strophe des Telapatta-Jātaka] ist genau dieses gemeint. Denn es wird durch Ausdrücke wie „Versiegen“ (khaya), „Begehrenslosigkeit“ (virāga) usw. aufgezeigt und dargelegt, weshalb es „Himmelsgegend“ genannt wird. Da es aber im anfangslosen Samsāra von keinem gewöhnlichen Weltling (bālaputhujjana) auch nur im Traum jemals zuvor erreicht worden ist, wird es als „die noch nie zuvor erreichte Himmelsgegend“ bezeichnet. Wer diese ersehnt, sollte sich im Bereich der Achtsamkeit auf den Körper (kāyagatāsati) unablässig bemühen. Evaṃ satthā nibbānena desanāya kūṭaṃ gahetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rājaparisā buddhaparisā ahosi, rajjappattakumāro pana ahameva ahosi’’nti. So krönte der Meister seine Lehrrede mit dem Nibbāna und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war das Gefolge des Königs die Gefolgschaft des Buddha, der Prinz aber, der die Königsherrschaft erlangte, war ich selbst.“ Telapattajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Telapatta-Jātaka, die sechste.
[97] 7. Nāmasiddhijātakavaṇṇanā [97] 7. Die Erklärung des Nāmasiddhi-Jātaka. Jīvakañca [Pg.426] mataṃ disvāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ nāmasiddhikaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Eko kira kulaputto nāmena pāpako nāma. So sāsane uraṃ datvā pabbajito bhikkhūhi ‘‘ehāvuso, pāpaka, tiṭṭhāvuso, pāpakā’’ti vuccamāno cintesi ‘‘loke pāpakaṃ nāma lāmakaṃ kāḷakaṇṇibhūtaṃ vuccati, aññaṃ maṅgalapaṭisaṃyuttaṃ nāmaṃ āharāpessāmī’’ti. So ācariyupajjhāye upasaṅkamitvā ‘‘bhante, mayhaṃ nāmaṃ avamaṅgalaṃ, aññaṃ me nāmaṃ karothā’’ti āha. Atha naṃ te evamāhaṃsu – ‘‘āvuso, nāmaṃ nāma paṇṇattimattaṃ, nāmena kāci atthasiddhi nāma natthi, attano nāmeneva santuṭṭho hohī’’ti. So punappunaṃ yāciyeva. Tassāyaṃ nāmasiddhikabhāvo bhikkhusaṅghe pākaṭo jāto. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ sannisinnā bhikkhū kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, asuko kira bhikkhu nāmasiddhiko maṅgalaṃ nāmaṃ āharāpetī’’ti. Atha satthā dhammasabhaṃ āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, so idāneva, pubbepi nāmasiddhikoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Nachdem ich Jīvaka tot sah“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines Mönchs, der an die Wirksamkeit von Namen glaubte. Einst gab es nämlich einen Sohn aus gutem Hause namens Pāpaka (der Schlechte). Dieser hatte sein Leben der Lehre geweiht und war in den Orden eingetreten. Als er von den Mönchen mit den Worten gerufen wurde: „Komm, Freund Pāpaka! Bleib stehen, Freund Pāpaka!“, dachte er: „In der Welt bezeichnet man das, was ‚pāpaka‘ (schlecht) genannt wird, als gemein und unheilsbringend. Ich will mir einen anderen Namen geben lassen, der mit Segen verbunden ist.“ Er suchte seine Lehrer und Präzeptoren auf und sagte: „Ehrwürdige Herren, mein Name ist unheilvoll. Gebt mir bitte einen anderen Namen.“ Da sprachen jene zu ihm: „Freund, ein Name ist bloß eine Bezeichnung. Durch einen Namen gibt es keine Erlangung von Nutzen. Sei mit deinem eigenen Namen zufrieden.“ Er bat jedoch immer wieder aufs Neue. Seine Besessenheit von Namen wurde in der Mönchsgemeinschaft bekannt. Eines Tages begannen die in der Versammlungshalle sitzenden Mönche folgendes Gespräch: „Freunde, jener Mönch glaubt an die Wirksamkeit von Namen und will sich einen glückverheißenden Namen geben lassen.“ Da kam der Meister in die Versammlungshalle und fragte: „Mönche, worüber sprecht ihr, während ihr hier beisammensitzt?“ Als sie antworteten: „Über dieses Thema“, sprach der Meister: „Mönche, nicht erst jetzt, sondern auch schon in der Vergangenheit war er auf Namen fixiert.“ Und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte takkasilāyaṃ bodhisatto disāpāmokkho ācariyo hutvā pañca māṇavakasatāni mante vācesi. Tasseko māṇavo pāpako nāma nāmena. So ‘‘ehi, pāpaka, yāhi, pāpakā’’ti vuccamāno cintesi ‘‘mayhaṃ nāmaṃ avamaṅgalaṃ, aññaṃ nāmaṃ āharāpessāmī’’ti. So ācariyaṃ upasaṅkamitvā ‘‘ācariya, mayhaṃ nāmaṃ avamaṅgalaṃ, aññaṃ me nāmaṃ karothā’’ti āha. Atha naṃ ācariyo avoca ‘‘gaccha, tāta, janapadacārikaṃ caritvā attano abhirucitaṃ ekaṃ maṅgalanāmaṃ gahetvā ehi, āgatassa te nāmaṃ parivattetvā aññaṃ nāmaṃ karissāmī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti pātheyyaṃ gahetvā nikkhanto gāmena gāmaṃ caranto ekaṃ nagaraṃ pāpuṇi. Tattha ceko puriso kālakato jīvako nāma nāmena. So taṃ ñātijanena āḷāhanaṃ nīyamānaṃ disvā ‘‘kiṃ nāmako esa puriso’’ti pucchi. ‘‘Jīvako nāmeso’’ti. ‘‘Jīvakopi maratī’’ti? ‘‘Jīvakopi marati, ajīvakopi marati, nāmaṃ nāma paṇṇattimattaṃ, tvaṃ bālo maññe’’ti. So taṃ kathaṃ sutvā nāme majjhatto hutvā antonagaraṃ pāvisi. In der Vergangenheit war der Bodhisatta in Takkasilā ein weltberühmter Lehrer und lehrte fünfhundert jungen Brahmanen die Veden. Einer seiner Schüler hieß Pāpaka (der Schlechte). Als er gerufen wurde mit den Worten: „Komm, Pāpaka! Geh, Pāpaka!“, dachte er: „Mein Name ist unheilvoll, ich will mir einen anderen Namen besorgen.“ Er ging zum Lehrer und sagte: „Lehrer, mein Name ist unheilvoll. Gebt mir bitte einen anderen Namen.“ Da sagte der Lehrer zu ihm: „Geh, mein Lieber, wandere durch das Land und bringe einen glückverheißenden Namen deiner Wahl mit zurück. Wenn du zurückkehrst, werde ich deinen Namen ändern und dir den anderen Namen geben.“ Er stimmte mit den Worten „Sehr wohl“ zu, nahm Reiseproviant, brach auf und erreichte, von Dorf zu Dorf wandernd, eine Stadt. Dort war ein Mann namens Jīvaka (der Lebende) gestorben. Als er sah, wie dieser von seinen Verwandten zum Verbrennungsplatz getragen wurde, fragte er: „Wie heißt dieser Mann?“ – „Er heißt Jīvaka.“ – „Stirbt denn auch ein Jīvaka?“ – „Sowohl ein Jīvaka stirbt als auch ein Nicht-Jīvaka. Ein Name ist bloß eine Bezeichnung. Du scheinst mir ein Tor zu sein!“ Als er diese Worte hörte, wurde er gegenüber Namen gleichgültig und betrat das Innere der Stadt. Athekaṃ [Pg.427] dāsiṃ bhatiṃ adadamānaṃ sāmikā dvāre nisīdāpetvā rajjuyā paharanti, tassā ca ‘‘dhanapālī’’ti nāmaṃ hoti. So antaravīthiyā gacchanto taṃ pothiyamānaṃ disvā ‘‘kasmā imaṃ pothethā’’ti pucchi. ‘‘Bhatiṃ dātuṃ na sakkotī’’ti. ‘‘Kiṃ panassā nāma’’nti? ‘‘Dhanapālī nāmā’’ti. Nāmena dhanapālī samānāpi bhatimattaṃ dātuṃ na sakkotīti dhanapāliyopi adhanapāliyopi duggatā honti, nāmaṃ nāma paṇṇattimattaṃ, tvaṃ bālo maññeti. So nāme majjhattataro hutvā nagarā nikkhamma maggaṃ paṭipanno antarāmagge maggamūḷhapurisaṃ disvā ‘‘ambho kiṃ karonto vicarasī’’ti pucchi. ‘‘Maggamūḷhomhi, sāmī’’ti. ‘‘Kiṃ pana te nāma’’nti? ‘‘Panthako nāmā’’ti. ‘‘Panthakopi maggamūḷho hotī’’ti? ‘‘Panthakopi apanthakopi maggamūḷho hoti, nāmaṃ nāma paṇṇattimattaṃ tvaṃ pana bālo maññeti’’. So nāme atimajjhatto hutvā bodhisattassa santikaṃ gantvā ‘‘kiṃ, tāta, nāmaṃ rocetvā āgatosī’’ti vutte ‘‘ācariya, jīvakāpi nāma maranti ajīvakāpi, dhanapāliyopi duggatā honti adhanapāliyopi, panthakāpi maggamūḷhā honti apanthakāpi, nāmaṃ nāma paṇṇattimattaṃ, nāmena siddhi natthi, kammeneva siddhi. Alaṃ mayhaṃ aññena nāmena, tadeva me nāmaṃ hotū’’ti āha. Bodhisatto tena diṭṭhañca katañca saṃsandetvā imaṃ gāthamāha – Da ließen die Besitzer eine Sklavin, die ihre Abgabe nicht bezahlen konnte, an der Tür sitzen und schlugen sie mit einem Seil. Ihr Name war Dhanapālī (Hüterin des Reichtums). Als er auf der Straße ging und sah, wie sie geschlagen wurde, fragte er: „Warum schlagt ihr diese Frau?“ – „Sie kann ihre Abgabe nicht bezahlen.“ – „Wie ist denn ihr Name?“ – „Sie heißt Dhanapālī.“ – „Obwohl sie Dhanapālī heißt, kann sie nicht einmal eine so geringe Abgabe bezahlen? Dhanapālīs und Nicht-Dhanapālīs werden gleichermaßen arm. Ein Name ist bloß eine Bezeichnung. Du scheinst mir ein Tor zu sein!“ Da wurde er noch gleichgültiger gegenüber Namen, verließ die Stadt und begab sich auf den Weg. Unterwegs traf er auf einen Mann, der sich verirrt hatte, und fragte ihn: „He, mein Guter, was tust du, dass du hier umherwanderst?“ – „Herr, ich habe mich verirrt.“ – „Wie ist denn dein Name?“ – „Ich heiße Panthaka (Wegmann).“ – „Verirrt sich denn auch ein Panthaka?“ – „Sowohl ein Panthaka als auch ein Nicht-Panthaka verirrt sich. Ein Name ist bloß eine Bezeichnung. Du aber scheinst mir ein Tor zu sein!“ Er wurde völlig gleichgültig gegenüber Namen, ging zum Bodhisatta zurück und als dieser ihn fragte: „Nun, mein Lieber, hast du dir einen Namen ausgesucht und bist zurückgekehrt?“, antwortete er: „Lehrer, Menschen namens Jīvaka sterben ebenso wie jene, die nicht so heißen. Frauen namens Dhanapālī sind arm ebenso wie jene, die nicht so heißen. Männer namens Panthaka verirren sich ebenso wie jene, die nicht so heißen. Ein Name ist bloß eine Bezeichnung, durch einen Namen gibt es keinen Erfolg. Erfolg gibt es nur durch das eigene Handeln. Ich brauche keinen anderen Namen mehr, lasst mir einfach meinen alten Namen.“ Der Bodhisatta verknüpfte das, was jener gesehen und getan hatte, und sprach diese Strophe: 97. 97. ‘‘Jīvakañca mataṃ disvā, dhanapāliñca duggataṃ; Panthakañca vane mūḷhaṃ, pāpako punarāgato’’ti. „Nachdem er Jīvaka tot sah, und Dhanapālī in Armut, und Panthaka im Wald verirrt, ist Pāpaka wieder zurückgekehrt.“ Tattha punarāgatoti imāni tīṇi kāraṇāni disvā puna āgato, ra-kāro sandhivasena vutto. Darin bedeutet „punarāgato“ (wieder zurückgekehrt): Nachdem er diese drei Gründe gesehen hatte, kehrte er wieder zurück. Der Buchstabe „r“ wurde aus Gründen des Sandhi-Anschlusses eingefügt. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘na, bhikkhave, idāneva, pubbepesa nāmasiddhikoyevā’’ti vatvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā nāmasiddhiko idānipi nāmasiddhikoyeva, ācariyaparisā buddhaparisā, ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt, sondern auch schon in der Vergangenheit war er auf Namen fixiert.“ Dann verknüpfte er das Jātaka miteinander: „Derjenige, der damals an die Wirksamkeit von Namen glaubte, ist auch heute derjenige, der an die Wirksamkeit von Namen glaubt. Die damalige Schülerschar ist die heutige Buddha-Gemeinde, und der Lehrer damals war ich selbst.“ Nāmasiddhijātakavaṇṇanā sattamā. Die Erläuterung des Nāmasiddhi-Jātaka, das siebte.
[98] 8. Kūṭavāṇijajātakavaṇṇanā [98] 8. Die Erläuterung des Kūṭavāṇija-Jātaka Sādhu [Pg.428] kho paṇḍito nāmāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ kūṭavāṇijaṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyañhi dve janā ekato vaṇijjaṃ karontā bhaṇḍaṃ sakaṭenādāya janapadaṃ gantvā laddhalābhā paccāgamiṃsu. Tesu kūṭavāṇijo cintesi ‘‘ayaṃ bahū divase dubbhojanena dukkhaseyyāya kilanto, idāni attano ghare nānaggarasehi yāvadatthaṃ subhojanaṃ bhuñjitvā ajīrakena marissati. Athāhaṃ imaṃ bhaṇḍaṃ tayo koṭṭhāse katvā ekaṃ tassa dārakānaṃ dassāmi, dve koṭṭhāse attanā gahessāmī’’ti. So ‘‘ajja bhājessāma, sve bhājessāmā’’ti bhaṇḍaṃ bhājetuṃ na icchi. Atha naṃ paṇḍitavāṇijo akāmakaṃ nippīḷetvā bhājāpetvā vihāraṃ gantvā satthāraṃ vanditvā katapaṭisanthāro ‘‘atipapañco te kato, idhāgantvāpi cirena buddhupaṭṭhānaṃ āgatosī’’ti vutte taṃ pavattiṃ bhagavato ārocesi. Satthā ‘‘na kho so, upāsaka, idāneva kūṭavāṇijo, pubbepi kūṭavāṇijoyeva. Idāni pana taṃ vañcetukāmo jāto, pubbe paṇḍitepi vañcetuṃ ussahī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Gut fürwahr ist ein Weiser genannt“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich eines betrügerischen Kaufmanns. Einst trieben in Sāvatthi zwei Männer gemeinsam Handel, luden ihre Waren auf einen Karren, zogen aufs Land und kehrten mit reichem Gewinn zurück. Unter ihnen dachte der betrügerische Kaufmann: „Dieser Mann ist durch tagelange schlechte Nahrung und unbequeme Lagerstätten erschöpft. Wenn er nun in seinem eigenen Haus köstliche Speisen verschiedenster Art nach Herzenslust zu sich nimmt, wird er an einer Magenverstimmung sterben. Dann werde ich diese Waren in drei Teile teilen, einen Teil seinen Kindern geben und zwei Teile selbst behalten.“ Indem er sagte: „Heute wollen wir teilen, morgen wollen wir teilen“, weigerte er sich, die Waren aufzuteilen. Schließlich zwang ihn der weise Kaufmann gegen seinen Willen zur Teilung, ging zum Kloster, erwies dem Meister seine Ehrerbietung und nach der Begrüßung – als der Meister zu ihm sagte: „Du hast dir sehr viel Zeit gelassen; obwohl du hierher zurückgekehrt bist, kommst du erst nach langer Zeit, um dem Buddha deine Aufwartung zu machen“ – berichtete er dem Erhabenen diesen Vorfall. Der Meister sprach: „Laienanhänger, nicht erst jetzt ist er ein betrügerischer Kaufmann, auch in der Vergangenheit war er ein betrügerischer Kaufmann. Doch jetzt wollte er dich betrügen; in der Vergangenheit versuchte er sogar, die Weisen zu betrügen.“ Auf dessen Bitte hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bārāṇasiyaṃ vāṇijakule nibbatti, nāmaggahaṇadivase cassa ‘‘paṇḍito’’ti nāmaṃ akaṃsu. So vayappatto aññena vāṇijena saddhiṃ ekato hutvā vaṇijjaṃ karoti, tassa ‘‘atipaṇḍito’’ti nāmaṃ ahosi. Te bārāṇasito pañcahi sakaṭasatehi bhaṇḍaṃ ādāya janapadaṃ gantvā vaṇijjaṃ katvā laddhalābhā puna bārāṇasiṃ āgamiṃsu. Atha nesaṃ bhaṇḍabhājanakāle atipaṇḍito āha ‘‘mayā dve koṭṭhāsā laddhabbā’’ti. ‘‘Kiṃkāraṇā’’ti? ‘‘Tvaṃ paṇḍito, ahaṃ atipaṇḍito. Paṇḍito ekaṃ laddhuṃ arahati, atipaṇḍito dve’’ti. ‘‘Nanu amhākaṃ dvinnaṃ bhaṇḍamūlakampi goṇādayopi samasamāyeva, tvaṃ kasmā dve koṭṭhāse laddhuṃ arahasī’’ti. ‘‘Atipaṇḍitabhāvenā’’ti. Evaṃ te kathaṃ vaḍḍhetvā kalahaṃ akaṃsu. Als vorzeiten Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in Bārāṇasī in einer Kaufmannsfamilie geboren. Am Tag der Namensgebung gab man ihm den Namen „Paṇḍita“ (der Weise). Als er herangewachsen war, trieb er gemeinsam mit einem anderen Kaufmann Handel, dessen Name „Atipaṇḍita“ (der Überweise) war. Sie nahmen Waren auf fünfhundert Karren mit, reisten von Bārāṇasī aus ins Hinterland, trieben Handel, erzielten Gewinne und kehrten wieder nach Bārāṇasī zurück. Als es nun an die Aufteilung der Güter ging, sagte Atipaṇḍita: „Ich muss zwei Anteile erhalten.“ – „Aus welchem Grund?“ – „Du bist Paṇḍita (der Weise), ich aber bin Atipaṇḍita (der Überweise). Paṇḍita verdient einen Anteil, Atipaṇḍita aber zwei.“ – „Sind nicht unser beider Kapital sowie die Ochsen und alles andere völlig gleich? Warum verdienst du es, zwei Anteile zu erhalten?“ – „Aufgrund meines Wesens als Überweiser.“ So ließen sie den Wortstreit anschwellen und gerieten in Streit. Tato atipaṇḍito ‘‘attheko upāyo’’ti cintetvā attano pitaraṃ ekasmiṃ susirarukkhe pavesetvā ‘‘tvaṃ amhesu āgatesu [Pg.429] ‘atipaṇḍito dve koṭṭhāse laddhuṃ arahatī’ti vadeyyāsī’’ti vatvā bodhisattaṃ upasaṅkamitvā ‘‘samma, mayhaṃ dvinnaṃ koṭṭhāsānaṃ yuttabhāvaṃ vā ayuttabhāvaṃ vā esā rukkhadevatā jānāti, ehi, taṃ pucchissāmā’’ti taṃ tattha netvā ‘‘ayye rukkhadevate, amhākaṃ aṭṭaṃ pacchindā’’ti āha. Athassa pitā saraṃ parivattetvā ‘‘tena hi kathethā’’ti āha. ‘‘Ayye, ayaṃ paṇḍito, ahaṃ atipaṇḍito. Amhehi ekato vohāro kato, tattha kena kiṃ laddhabbanti. Paṇḍitena eko koṭṭhāso, atipaṇḍitena pana dve koṭṭhāsā laddhabbā’’ti. Bodhisatto evaṃ vinicchitaṃ aṭṭaṃ sutvā ‘‘idāni devatābhāvaṃ vā adevatābhāvaṃ vā jānissāmī’’ti palālaṃ āharitvā susiraṃ pūretvā aggiṃ adāsi, atipaṇḍitassa pitā jālāya phuṭṭhakāle aḍḍhajjhāmena sarīrena upari āruyha sākhaṃ gahetvā olambanto bhūmiyaṃ patitvā imaṃ gāthamāha – Daraufhin dachte Atipaṇḍita: „Es gibt einen Ausweg“, ließ seinen eigenen Vater in einen hohlen Baum steigen und wies ihn an: „Wenn wir kommen, sollst du sagen: 'Atipaṇḍita verdient es, zwei Anteile zu erhalten!'“ Dann ging er zum Bodhisatta und sagte: „Freund, ob es rechtmäßig oder unrechtmäßig ist, dass ich zwei Anteile erhalte, weiß diese Baumgottheit. Komm, lass uns sie fragen.“ Er führte ihn dorthin und sprach: „O edle Baumgottheit, entscheide unseren Streitfall!“ Da verstellte sein Vater seine Stimme und sprach: „Nun denn, so berichtet!“ – „Edle Gottheit, dieser ist Paṇḍita, ich bin Atipaṇḍita. Wir haben gemeinsam Handel betrieben. Wer soll was davon erhalten?“ – „Paṇḍita soll einen Anteil erhalten, Atipaṇḍita aber zwei Anteile.“ Als der Bodhisatta das so gefällte Urteil hörte, dachte er: „Nun werde ich erkennen, ob dies eine Gottheit ist oder keine Gottheit.“ Er holte Stroh, füllte die Baumhöhlung damit aus und steckte sie in Brand. Als die Flammen Atipaṇḍitas Vater erfassten, kletterte er mit halb verbranntem Körper nach oben, hielt sich an einem Ast fest, hing herab, fiel auf die Erde und sprach folgenden Vers: 98. 98. ‘‘Sādhu kho paṇḍito nāma, na tveva atipaṇḍito; Atipaṇḍitena puttena, manamhi upakūḷito’’ti. „Ein Weiser ist fürwahr gut, keineswegs aber ein Überweiser; durch meinen überweisen Sohn bin ich fast völlig verbrannt worden.“ Tattha sādhu kho paṇḍito nāmāti imasmiṃ loke paṇḍiccena samannāgato kāraṇākāraṇaññū puggalo sādhu sobhano. Atipaṇḍitoti nāmamattena atipaṇḍito kūṭapuriso na tveva varaṃ. Manamhi upakūḷitoti thokenamhi jhāmo, aḍḍhajjhāmakova muttoti attho. Te ubhopi majjhe bhinditvā samaññeva koṭṭhāsaṃ gaṇhitvā yathākammaṃ gatā. Darin bedeutet „Ein Weiser ist fürwahr gut“: In dieser Welt ist ein Mensch, der mit Weisheit ausgestattet ist und weiß, was recht und unrecht ist, gut und edel. „Ein Überweiser“ (atipaṇḍito) bedeutet: Ein betrügerischer Mann, der nur dem Namen nach ein Überweiser ist, ist keineswegs besser. „Ich bin fast verbrannt worden“ (manamhi upakūḷito) bedeutet: Ich bin ein wenig verbrannt worden; die Bedeutung ist, dass er erst halbbrennend entkommen konnte. Die beiden teilten die Güter genau in der Mitte, nahmen jeweils den gleichen Anteil und gingen gemäß ihren Taten fort. Satthā ‘‘pubbepi esa kūṭavāṇijoyevā’’ti imaṃ atītaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kūṭavāṇijo paccuppannepi kūṭavāṇijoyeva, paṇḍitavāṇijo pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Schon in der Vergangenheit war dieser ein betrügerischer Kaufmann“, trug diese Geschichte aus der Vergangenheit vor und verknüpfte das Jātaka: „Der damalige betrügerische Kaufmann ist auch in der Gegenwart der betrügerische Kaufmann; der weise Kaufmann aber war ich selbst.“ Kūṭavāṇijajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Kūṭavāṇija-Jātaka, die achte.
[99] 9. Parosahassajātakavaṇṇanā [99] 9. Die Erklärung des Parosahassa-Jātaka Parosahassampi [Pg.430] samāgatānanti idaṃ satthā jetavane viharanto puthujjanapucchāpañcakaṃ ārabbha kathesi. Vatthu sarabhajātake (jā. 1.13.134 ādayo) āvi bhavissati. Ekasmiṃ pana samaye bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitvā ‘‘āvuso, dasabalena saṃkhittena kathitaṃ dhammasenāpati sāriputto vitthārena byākāsī’’ti therassa guṇaṃ kathayamānā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, sāriputto idāneva mayā saṃkhittena bhāsitaṃ vitthārena byākaroti, pubbepi byākāsiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Selbst wenn mehr als tausend zusammengekommen sind“ – dieses sprach der Meister, während er im Jetavana verweilte, anlässlich der fünf Fragen, die von einem Weltling gestellt worden waren. Die Geschichte wird im Sarabha-Jātaka deutlich dargelegt werden. Zu einer Zeit versammelten sich die Mönche in der Lehrhalle und saßen da, während sie die Vorzüge des Älteren rühmten: „Brüder, das, was vom Zehnkraftvollen kurz dargelegt wurde, hat der Feldherr der Lehre, Sāriputta, ausführlich erläutert.“ Der Meister kam hinzu und fragte: „Mönche, mit welchem Gespräch sitzt ihr hier nun zusammen?“ Als sie antworteten: „Mit diesem hier“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt erklärt Sāriputta das von mir in Kürze Gesprochene ausführlich; auch in der Vergangenheit hat er dies schon getan“, und trug eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā takkasilāyaṃ sabbasippāni uggaṇhitvā kāme pahāya isipabbajjaṃ pabbajitvā pañcābhiññā aṭṭha samāpattiyo nibbattetvā himavante vihāsi. Parivāropissa pañca tāpasasatāni ahesuṃ. Athassa jeṭṭhantevāsiko vassārattasamaye upaḍḍhaṃ isigaṇaṃ ādāya loṇambilasevanatthāya manussapathaṃ agamāsi. Tadā bodhisattassa kālakiriyāsamayo jāto. Atha naṃ antevāsikā ‘‘ācariya, kataro vo guṇo laddho’’ti adhigamaṃ pucchiṃsu. So ‘‘natthi kiñcī’’ti vatvā ābhassarabrahmaloke nibbatti. Bodhisattā hi arūpasamāpattilābhino hutvāpi abhabbaṭṭhānattā āruppe na nibbattanti. Antevāsikā ‘‘ācariyassa adhigamo natthī’’ti āḷāhane sakkāraṃ na kariṃsu. Als vorzeiten Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer hochangesehenen Brahmanenfamilie geboren, erlernte in Takkasilā alle Künste, entsagte den Sinnengenüssen, weihte sich der Lebensweise der Einsiedler, erlangte die fünf höheren Geisteskräfte sowie die acht Vertiefungen und lebte im Himalaya. Seine Gefolgschaft bestand aus fünfhundert Asketen. Da zog sein ältester Schüler während der Regenzeit mit der Hälfte der Asketenschar in bewohnte Gebiete, um Salz und saure Speisen zu sich zu nehmen. Zu dieser Zeit kam für den Bodhisatta die Zeit des Sterbens. Da fragten ihn die anwesenden Schüler nach seiner Errungenschaft: „Lehrer, welche geistige Errungenschaft habt Ihr erlangt?“ Er sprach: „Da ist nichts“ und wurde in der Ābhassara-Brahma-Welt wiedergeboren. Denn obwohl Bodhisattas die formlosen Vertiefungen erlangen können, werden sie wegen der Ungeeignetheit dieses Ortes nicht im formlosen Bereich wiedergeboren. Die Schüler dachten: „Unser Lehrer hat keine Errungenschaft erzielt“, und erwiesen ihm auf dem Verbrennungsplatz keine Ehrerbietung. Jeṭṭhantevāsiko āgantvā ‘‘kahaṃ ācariyo’’ti pucchitvā ‘‘kālakato’’ti sutvā ‘‘api ācariyaṃ adhigamaṃ pucchitthā’’ti āha. ‘‘Āma, pucchimhā’’ti. ‘‘Kiṃ kathesī’’ti? ‘‘Natthi kiñcīti tena vuttaṃ, athassa amhehi sakkāro na kato’’ti āhaṃsu. Jeṭṭhantevāsiko ‘‘tumhe ācariyassa vacanatthaṃ na jānātha, ākiñcaññāyatanasamāpattilābhī ācariyo’’ti āha. Te tasmiṃ punappunaṃ kathentepi na saddahiṃsu. Bodhisatto taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘andhabālā mama jeṭṭhantevāsikassa vacanaṃ na saddahanti. Imaṃ [Pg.431] tesaṃ kāraṇaṃ pākaṭaṃ karissāmī’’ti brahmalokā āgantvā assamapadamatthake mahantenānubhāvena ākāse ṭhatvā jeṭṭhantevāsikassa paññānubhāvaṃ vaṇṇento imaṃ gāthamāha – Als der älteste Schüler zurückkehrte, fragte er: „Wo ist der Lehrer?“ Da er hörte, dass er verstorben war, fragte er: „Habt ihr den Lehrer nach seiner Errungenschaft gefragt?“ – „Ja, wir haben gefragt.“ – „Was hat er geantwortet?“ – „Er sagte: 'Da ist nichts.' Darum haben wir ihm keine Ehrerbietung erwiesen.“ Der älteste Schüler entgegnete: „Ihr versteht die Bedeutung der Worte des Lehrers nicht. Der Lehrer hatte die Vertiefung der Sphäre der Nichtsheit erlangt.“ Obwohl er es ihnen wieder und wieder erklärte, glaubten sie ihm nicht. Als der Bodhisatta diesen Zustand erkannte, dachte er: „Die verblendeten Toren glauben den Worten meines ältesten Schülers nicht. Ich werde ihnen diese Angelegenheit verdeutlichen.“ Er stieg aus der Brahma-Welt herab, verwelte mit großer übernatürlicher Macht am Himmel über der Einsiedelei und sprach, um die Kraft der Weisheit des ältesten Schülers zu preisen, folgenden Vers: 99. 99. ‘‘Parosahassampi samāgatānaṃ, kandeyyuṃ te vassasataṃ apaññā; Ekova seyyo puriso sapañño, yo bhāsitassa vijānāti attha’’nti. „Selbst wenn mehr als tausend Unweise zusammengekommen sind und hundert Jahre lang wehklagen würden, so ist doch ein einziger weiser Mensch besser, der die Bedeutung des Gesprochenen versteht.“ Tattha parosahassampīti atirekasahassampi. Samāgatānanti sannipatitānaṃ bhāsitassa atthaṃ jānituṃ asakkontānaṃ bālānaṃ. Kandeyyuṃ te vassasataṃ apaññāti te evaṃ samāgatā apaññā ime bālatāpasā viya vassasatampi vassasahassampi rodeyyuṃ parideveyyuṃ, rodamānāpi pana atthaṃ vā kāraṇaṃ vā neva jāneyyunti dīpeti. Ekova seyyo puriso sapaññoti evarūpānaṃ bālānaṃ parosahassatopi eko paṇḍitapurisova seyyo varataroti attho. Kīdiso sapaññoti? Yo bhāsitassa vijānāti atthaṃ ayaṃ jeṭṭhantevāsiko viyāti. Hierbei bedeutet ‚parosahassampi‘: mehr als tausend. ‚Samāgatānaṃ‘ bedeutet: der Versammelten, nämlich der Toren, die unfähig sind, den Sinn des Gesprochenen zu verstehen. Mit den Worten ‚kandeyyuṃ te vassasataṃ apaññā‘ zeigt er: Wenn jene so versammelten Unweisen wie diese törichten Asketen hundert Jahre oder gar tausend Jahre weinen und klagen würden, würden sie, selbst während sie weinen, weder den Sinn noch den Grund erkennen. ‚Ekova seyyo puriso sapañño‘ bedeutet: Selbst im Vergleich zu mehr als tausend solcher Toren ist ein einziger weiser Mann besser, ja vorzüglicher. Was für ein Weiser? ‚Der den Sinn des Gesprochenen versteht‘, so wie dieser älteste Schüler hier. Evaṃ mahāsatto ākāse ṭhitova dhammaṃ desetvā tāpasagaṇaṃ bujjhāpetvā brahmalokameva gato. Tepi tāpasā jīvitapariyosāne brahmalokaparāyaṇā ahesuṃ. Nachdem das Große Wesen so, in der Luft stehend, die Lehre verkündet und die Schar der Asketen zur Einsicht gebracht hatte, ging er in die Brahma-Welt ein. Auch jene Asketen gelangten am Ende ihres Lebens in die Brahma-Welt. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jeṭṭhantevāsiko sāriputto ahosi, mahābrahmā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister brachte diese Lehrverkündigung herbei und verknüpfte das Jātaka mit den Worten: ‚Damals war der älteste Schüler Sāriputta, der Große Brahma aber war ich selbst.‘ Parosahassajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Parosahassa-Jātaka ist die neunte.
[100] 10. Asātarūpajātakavaṇṇanā [100] 10. Die Erklärung des Asātarūpa-Jātaka Asātaṃ sātarūpenāti idaṃ satthā kuṇḍiyanagaraṃ upanissāya kuṇḍadhānavane viharanto koliyarājadhītaraṃ suppavāsaṃ upāsikaṃ ārabbha kathesi. Sā hi tasmiṃ samaye satta vassāni kucchinā gabbhaṃ pariharitvā sattāhaṃ mūḷhagabbhā ahosi, adhimattā vedanā pavattiṃsu. Sā [Pg.432] evaṃ adhimattavedanābhibhūtāpi ‘‘sammāsambuddho vata so bhagavā, yo evarūpassa dukkhassa pahānāya dhammaṃ deseti. Suppaṭipanno vata tassa bhagavato sāvakasaṅgho, yo evarūpassa dukkhassa pahānāya paṭipanno. Susukhaṃ vata nibbānaṃ, yattheva rūpaṃ dukkhaṃ natthī’’ti (udā. 18) imehi tīhi vitakkehi adhivāsesi. Sā sāmikaṃ pakkosetvā tañca attano pavattiṃ vandanasāsanañca ārocetuṃ satthu santikaṃ pesesi. Satthā vandanasāsanaṃ sutvāva ‘‘sukhinī hotu suppavāsā koliyadhītā, sukhinī arogā arogaṃ puttaṃ vijāyatū’’ti āha. Saha vacaneneva pana bhagavato suppavāsā koliyadhītā sukhinī arogā arogaṃ puttaṃ vijāyi. Athassā sāmiko gehaṃ gantvā taṃ vijātaṃ disvā ‘‘acchariyaṃ vata, bho’’ti ativiya tathāgatassa ānubhāvena acchariyabbhutacittajāto ahosi. ‚Das Unangenehme in Form des Angenehmen...‘ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er in der Nähe der Stadt Kuṇḍiya im Kuṇḍadhāna-Wald verweilte, im Hinblick auf die Laienanhängerin Suppavāsā, die Tochter des Koliya-Königs. Denn diese trug zu jener Zeit sieben Jahre lang ein Kind im Schoß und lag sieben Tage lang in blockierter Geburt; überaus heftige Schmerzen überkamen sie. Obwohl sie von solch heftigen Schmerzen überwältigt war, ertrug sie es mit diesen drei Gedanken: ‚Wahrlich, ein vollkommen Erwachter ist der Erhabene, der die Lehre zur Überwindung eines solchen Leides verkündet! Wahrlich, wohlaufrecht wandelt die Jüngerschaft des Erhabenen, die zur Überwindung eines solchen Leides praktiziert! Wahrlich, überaus glückvoll ist das Nibbāna, in dem es solches Leid nicht gibt!‘ Sie rief ihren Gatten herbei und sandte ihn zum Meister, um ihm diesen ihren Zustand zu berichten und ihm ihre Ehrerbietung zu übermitteln. Als der Meister die Botschaft der Ehrerbietung hörte, sprach er: ‚Möge Suppavāsā, die Koliya-Tochter, glücklich sein! Möge sie gesund und glücklich einen gesunden Sohn gebären!‘ Und zugleich mit den Worten des Erhabenen gebar Suppavāsā, die Koliya-Tochter, gesund und glücklich einen gesunden Sohn. Da ging ihr Gatte nach Hause, und als er sah, dass sie entbunden hatte, rief er aus: ‚Wahrlich, wie erstaunlich!‘ Durch die Macht des Tathāgata war er überaus tief von Staunen und Verwunderung erfüllt. Suppavāsāpi puttaṃ vijāyitvā sattāhaṃ buddhappamukhassa saṅghassa dānaṃ dātukāmā puna nimantanatthāya taṃ pesesi. Tena kho pana samayena mahāmoggallānassa upaṭṭhākena buddhappamukho saṅgho nimantito hoti. Satthā suppavāsāya dānassa okāsadānatthāya theraṃ tassa santikaṃ pesetvā taṃ saññāpetvā sattāhaṃ tassā dānaṃ paṭiggahesi saddhiṃ bhikkhusaṅghena. Sattame pana divase suppavāsā puttaṃ sīvalikumāraṃ maṇḍetvā satthārañceva bhikkhusaṅghañca vandāpesi. Tasmiṃ paṭipāṭiyā sāriputtattherassa santikaṃ nīte thero tena saddhiṃ ‘‘kacci te, sīvali, khamanīya’’nti paṭisanthāramakāsi. So ‘‘kuto me, bhante, sukhaṃ, svāhaṃ satta vassāni lohitakumbhiyaṃ vasi’’nti therena saddhiṃ evarūpaṃ kathaṃ kathesi. Suppāvāsā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘sattāhajāto me putto anubuddhena dhammasenāpatinā saddhiṃ mantetī’’ti somanassappattā ahosi. Satthā ‘‘api nu suppavāse aññepi evarūpe putte icchasī’’ti āha. ‘‘Sace, bhante, evarūpe aññe satta putte labheyyaṃ, iccheyyamevāha’’nti. Satthā udānaṃ udānetvā anumodanaṃ katvā pakkāmi. Sīvalikumāropi kho sattavassikakāleyeva sāsane uraṃ datvā pabbajitvā paripuṇṇavasso upasampadaṃ labhitvā puññavā lābhaggappatto hutvā pathaviṃ unnādetvā arahattaṃ patvā puññavantānaṃ antare etadaggaṭṭhānaṃ pāpuṇi. Nachdem auch Suppavāsā den Sohn geboren hatte, wünschte sie der Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze sieben Tage lang Almosen zu spenden, und sandte ihren Gatten erneut hin, um sie einzuladen. Zu jener Zeit aber war die Gemeinde mit dem Buddha an der Spitze bereits von einem Unterstützer des ehrwürdigen Mahāmoggallāna eingeladen worden. Um Suppavāsā die Gelegenheit für ihre Almosengabe zu gewähren, sandte der Meister den Thera zu jenem Unterstützer, um ihn umzustimmen, und nahm dann sieben Tage lang zusammen mit der Mönchsgemeinde ihre Gabe an. Am siebten Tag aber schmückte Suppavāsā ihren Sohn, den Prinzen Sīvali, und ließ ihn den Meister sowie die Mönchsgemeinde verehren. Als dieser der Reihe nach vor den ehrwürdigen Sāriputta gebracht wurde, hielt der Thera eine freundliche Begrüßung mit ihm und fragte: ‚Ist es dir erträglich, Sīvali?‘ Er sprach mit dem Thera solche Worte: ‚Ehrwürdiger Herr, woher sollte mir Glück kommen? Ich habe sieben Jahre lang in einem Topf voll Blut gewohnt!‘ Als Suppavāsā diese Worte hörte, geriet sie in große Freude und dachte: ‚Mein erst sieben Tage alter Sohn unterhält sich mit dem dem Buddha nacheifernden Feldherrn der Lehre!‘ Der Meister sprach: ‚Möchtest du, Suppavāsā, noch weitere solche Söhne haben?‘ ‚Wenn ich, ehrwürdiger Herr, noch sieben andere solche Söhne bekäme, würde ich sie wahrlich begehren!‘, antwortete sie. Der Meister sprach einen feierlichen Ausruf aus, dankte ihr mit Segensworten und ging fort. Auch der Prinz Sīvali widmete sich bereits im Alter von sieben Jahren mit ganzem Herzen der Lehre, trat in den Orden ein, erhielt nach Erreichen des vollen Lebensalters die höhere Weihe, wurde durch seine großen Verdienste zum Höchsten im Empfangen von Gaben, ließ die Erde erbeben, erlangte die Arahatschaft und erreichte unter den Verdienstvollen die Spitzenstellung. Athekadivasaṃ [Pg.433] bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitvā ‘‘āvuso, sīvalitthero nāma evarūpo mahāpuñño patthitapatthano pacchimabhavikasatto satta vassāni lohitakumbhiyaṃ vasitvā sattāhaṃ mūḷhagabbhabhāvaṃ āpajji, aho mātāputtā mahantaṃ dukkhaṃ anubhaviṃsu, kiṃ nu kho kammaṃ akaṃsū’’ti kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ. Satthā tatthāgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘bhikkhave, sīvalino mahāpuññatova satta vassāni lohitakumbhiyaṃ nivāso ca sattāhaṃ mūḷhagabbhabhāvappatti ca attanā katakammamūlakāva, suppavāsāyapi satta vassāni kucchinā gabbhapariharaṇadukkhañca sattāhaṃ mūḷhagabbhadukkhañca attanā katakammamūlakamevā’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. Da kamen eines Tages die Mönche in der Lehrhalle zusammen und warfen folgende Frage auf: ‚Ihr Brüder, der ehrwürdige Sīvali, der von so großem Verdienst ist, der einst dieses Gelübde abgelegt hatte, der sich in seiner letzten Existenz befindet, musste sieben Jahre lang in einem Topf voll Blut leben und verbrachte sieben Tage in blockierter Geburtslage. Ach, wie großes Leid haben Mutter und Sohn erfahren! Was für eine Tat haben sie wohl begangen?‘ Der Meister trat herzu und fragte: ‚Zu welchem Thema habt ihr euch hier versammelt, ihr Mönche?‘ Als sie antworteten: ‚Zu diesem Thema‘, sprach er: ‚Mönche, dass Sīvali trotz seines großen Verdienstes sieben Jahre lang im Bluttopf wohnte und sieben Tage lang in blockierter Geburt verbrachte, hat seine Ursache allein in Taten, die er selbst begangen hat. Auch dass Suppavāsā sieben Jahre lang das Kind im Schoß tragen musste und die sieben Tage dauernde Pein der blockierten Geburt erlitt, hat seine Ursache allein in Taten, die sie selbst begangen hat.‘ Nachdem er dies gesagt hatte und von ihnen gebeten wurde, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa aggamahesiyā kucchismiṃ paṭisandhiṃ gaṇhitvā vayappatto takkasilāyaṃ sabbasippāni uggaṇhitvā pitu accayena rajjaṃ patvā dhammena rajjaṃ kāresi. Tasmiṃ samaye kosalamahārājā mahantena balenāgantvā bārāṇasiṃ gahetvā rājānaṃ māretvā tasseva aggamahesiṃ attano aggamahesiṃ akāsi. Bārāṇasirañño pana putto pitu maraṇakāle niddhamanadvārena palāyitvā balaṃ saṃharitvā bārāṇasiṃ āgantvā avidūre nisīditvā tassa rañño paṇṇaṃ pesesi ‘‘rajjaṃ vā detu yuddhaṃ vā’’ti. So ‘‘yuddhaṃ demī’’ti paṭipaṇṇaṃ pesesi. Rājakumārassa pana mātā taṃ sāsanaṃ sutvā ‘‘yuddhena kammaṃ natthi, sabbadisāsu sañcāraṃ pacchinditvā bārāṇasinagaraṃ parivāretu, tato dārūdakabhattaparikkhayena kilantamanussaṃ nagaraṃ vināva yuddhena gaṇhissasī’’ti paṇṇaṃ pesesi. So mātu sāsanaṃ sutvā satta divasāni sañcāraṃ pacchinditvā nagaraṃ rundhi, nāgarā sañcāraṃ alabhamānā sattame divase tassa rañño sīsaṃ gahetvā kumārassa adaṃsu. Kumāro pana nagaraṃ pavisitvā rajjaṃ gahetvā jīvitapariyosāne yathākammaṃ gato. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, empfing der Bodhisatta im Schoß von dessen Hauptgemahlin eine Wiederverkörperung. Als er das reife Alter erreicht hatte, erlernte er in Takkasilā alle Künste. Nach dem Tod seines Vaters erlangte er die Herrschaft und regierte gerecht. Zu jener Zeit kam der Großkönig von Kosala mit einer großen Streitmacht, nahm Bārāṇasī ein, tötete den König und machte dessen Hauptgemahlin zu seiner eigenen Hauptgemahlin. Der Sohn des Königs von Bārāṇasī jedoch floh zur Zeit des Todes seines Vaters durch eine Abwasseröffnung. Er sammelte eine Streitmacht, kehrte nach Bārāṇasī zurück, ließ sich nicht weit davon entfernt nieder und sandte einen Brief an jenen König: „Gebt entweder das Königreich oder liefert eine Schlacht!“ Dieser sandte als Antwort: „Ich gebe die Schlacht.“ Die Mutter des Prinzen aber hörte diese Nachricht und sandte einen Brief: „Es besteht keine Notwendigkeit für einen Kampf. Schneide den Verkehr in alle Richtungen ab und belagere die Stadt Bārāṇasī. Danach wirst du die Stadt, deren Menschen durch den Mangel an Brennholz, Wasser und Nahrung erschöpft sein werden, ganz ohne Kampf einnehmen.“ Er hörte auf die Nachricht seiner Mutter, schnitt sieben Tage lang den Verkehr ab und belagerte die Stadt. Da die Stadtbewohner keinen Ausgang fanden, schlugen sie am siebten Tag dem König das Haupt ab und übergaben es dem Prinzen. Der Prinz aber betrat die Stadt, übernahm die Herrschaft und ging am Ende seines Lebens entsprechend seinen Taten dahin. So etarahi satta divasāni sañcāraṃ pacchinditvā nagaraṃ rundhitvā gahitakammanissandena satta vassāni lohitakumbhiyaṃ vasitvā sattāhaṃ mūḷhagabbhabhāvaṃ āpajji. Yaṃ pana so padumuttarassa bhagavato pādamūle ‘‘lābhīnaṃ aggo bhaveyya’’nti mahādānaṃ datvā patthanaṃ akāsi, yañca vipassibuddhakāle [Pg.434] nāgarehi saddhiṃ sahassagghanakaṃ guḷadadhiṃ datvā patthanamakāsi, tassānubhāvena lābhīnaṃ aggo jāto. Suppavāsāpi ‘‘nagaraṃ rundhitvā gaṇha, tātā’’ti pesitabhāvena satta vassāni kucchinā gabbhaṃ pariharitvā sattāhaṃ mūḷhagabbhā jātā. Wegen der Nachwirkung jener Tat, dass er damals sieben Tage lang den Verkehr abgeschnitten und die Stadt belagert hatte, verbrachte er in dieser Existenz sieben Jahre im Mutterleib wie in einem blutigen Kessel und erlitt sieben Tage lang eine schwere Geburt. Was aber jenen Wunsch betrifft, den er zu Füßen des erhabenen Padumuttara geäußert hatte, nachdem er eine große Gabe dargebracht hatte mit den Worten: „Möge ich der Erste unter den Empfängern von Gaben sein!“, und was den Wunsch betrifft, den er zur Zeit des Buddha Vipassī zusammen mit den Bürgern äußerte, nachdem er süßen Quark im Wert von tausend Münzen gespendet hatte – durch die Kraft dieses Wunsches wurde er zum Ersten unter den Empfängern von Gaben. Auch Suppavāsā trug, weil sie einst befohlen hatte: „Mein Lieber, belagere die Stadt und nimm sie ein!“, sieben Jahre lang die Schwangerschaft in ihrem Leib und litt sieben Tage lang unter einer schweren Geburt. Satthā imaṃ atītaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit erzählt hatte, sprach er als der vollkommen Erwachte diese Strophe: 100. 100. ‘‘Asātaṃ sātarūpena, piyarūpena appiyaṃ; Dukkhaṃ sukhassa rūpena, pamattamativattatī’’ti. „Das Unangenehme in Form des Angenehmen, das Unliebsame in Form des Lieblichen, das Leiden in Form des Glücks überwältigt den Unachtsamen.“ Tattha asātaṃ sātarūpenāti amadhurameva madhurapatirūpakena. Pamattamativattatīti asātaṃ appiyaṃ dukkhanti etaṃ tividhampi etena sātarūpādinā ākārena sativippavāsavasena pamattaṃ puggalaṃ ativattati abhibhavati ajjhottharatīti attho. Idaṃ bhagavatā yañca te mātāputtā iminā gabbhapariharaṇagabbhavāsasaṅkhātena asātādinā pubbe nagararundhanasātādipatirūpakena ajjhotthaṭā, yañca idāni sā upāsikā punapi sattakkhattuṃ evarūpaṃ asātaṃ appiyaṃ dukkhaṃ pemavatthubhūtena puttasaṅkhātena sātādipatirūpakena ajjhotthaṭā hutvā tathā avaca, taṃ sabbampi sandhāya vuttanti veditabbaṃ. Dabei bedeutet „das Unangenehme in Form des Angenehmen“: das eigentlich Nicht-Süße in der Maske des Süßen. „Überwältigt den Unachtsamen“ bedeutet: Diese dreifache Natur – das Unangenehme, das Unliebsame, das Leiden – überwältigt, besiegt und erdrückt eine Person, die aufgrund des Verlusts der Achtsamkeit unachtsam ist, in jener Weise des scheinbar Angenehmen usw. Dies wurde vom Erhabenen im Hinblick auf all das Folgende gesprochen, so ist es zu verstehen: dass jene Mutter und ihr Sohn früher durch das Unangenehme, das in dem Austragen des Kindes und dem Aufenthalt im Mutterleib bestand, überwältigt wurden, welches damals die Maske des Angenehmen der Stadtbelagerung trug; und dass nun diese Laienanhängerin, wiederum überwältigt von der Maske des Angenehmen in Form ihres Sohnes, der die Quelle ihrer Liebe war, siebenmal solch ein Unangenehmes, Unliebsames und Leiden ertrug und sich dementsprechend äußerte. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā nagaraṃ rundhitvā rajjappattakumāro sīvali ahosi, mātā suppavāsā, pitā pana bārāṇasirājā ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka zusammen: „Der Prinz, der damals die Stadt belagerte und das Königreich erlangte, war Sīvali, die Mutter war Suppavāsā, der Vater aber, der König von Bārāṇasī, war ich selbst.“ Asātarūpajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Asātarūpa-Jātaka, die zehnte. Littavaggo dasamo. Das Litta-Kapitel, das zehnte. Tassuddānaṃ – Dessen Zusammenfassung: Littatejaṃ mahāsāraṃ, vissāsa lomahaṃsanaṃ; Sudassana telapattaṃ, nāmasiddhi kūṭavāṇijaṃ; Parosahassa asātarūpanti. Das Litta-Jātaka, das Mahāsāra-Jātaka, das Vissāsabhojana-Jātaka, das Lomahaṃsa-Jātaka, das Mahāsudassana-Jātaka, das Telapatta-Jātaka, das Nāmasiddhi-Jātaka, das Kūṭavāṇija-Jātaka, das Parosahassa-Jātaka und das Asātarūpa-Jātaka. Majjhimapaṇṇāsako niṭṭhito. Die mittleren fünfzig Jātakas sind abgeschlossen. 11. Parosatavaggo 11. Das Parosata-Kapitel
[101] 1. Parosatajātakavaṇṇanā [101] 1. Die Erklärung des Parosata-Jātaka 101. 101. ‘‘Parosatañcepi [Pg.435] samāgatānaṃ, jhāyeyyuṃ te vassasataṃ apaññā; Ekova seyyo puriso sapañño, yo bhāsitassa vijānāti attha’’nti. – „Kämen auch mehr als hundert Toren zusammen und dächten ein ganzes Jahrhundert lang nach, so ist doch ein einziger weiser Mensch besser, welcher die Bedeutung des Gesprochenen versteht.“ Idaṃ jātakaṃ vatthuto ca veyyākaraṇato ca samodhānato ca parosahassajātakasadisameva. Kevalañhettha ‘‘jhāyeyyu’’nti padamattameva viseso. Tassattho – vassasatampi apaññā jhāyeyyuṃ olokeyyuṃ upadhāreyyuṃ, evaṃ olokentāpi pana atthaṃ vā kāraṇaṃ vā na passanti, tasmā yo bhāsitassa atthaṃ jānāti, so ekova sapañño seyyoti. Dieses Jātaka ist hinsichtlich der Hintergrundgeschichte, der grammatikalischen Erklärung und der Zusammenführung genau wie das Parosahassa-Jātaka. Einzig das Wort „jhāyeyyuṃ“ stellt hier den Unterschied dar. Dessen Bedeutung ist: Selbst wenn unweise Menschen hundert Jahre lang nachdenken, hinsehen oder prüfen würden, so sehen sie doch, obwohl sie so hinsehen, weder den wahren Nutzen noch die Ursache. Daher ist ein einziger weiser Mensch, welcher die Bedeutung des Gesprochenen versteht, besser. Parosatajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Parosata-Jātaka, die erste.
[102] 2. Paṇṇikajātakavaṇṇanā [102] 2. Die Erklärung des Paṇṇika-Jātaka Yo dukkhaphuṭṭhāya bhaveyya tāṇanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ paṇṇikaṃ upāsakaṃ ārabbha kathesi. So kira sāvatthivāsī upāsako nānappakārāni mūlapaṇṇādīni ceva lābukumbhaṇḍādīni ca vikkiṇitvā jīvikaṃ kappeti. Tassekā dhītā abhirūpā pāsādikā ācārasīlasampannā hirottappasamannāgatā kevalaṃ niccappahasitamukhā. Tassā samānakulesu vāreyyatthāya āgatesu so cintesi ‘‘imissā vāreyyaṃ vattati, ayañca niccappahasitamukhā. Kumārikādhamme pana asati kumārikāya parakulaṃ gatāya mātāpitūnaṃ garahā hoti, ‘atthi nu kho imissā kumārikādhammo, natthī’ti vīmaṃsissāmi na’’nti. So ekadivasaṃ dhītaraṃ pacchiṃ gāhāpetvā paṇṇatthāya araññaṃ gantvā vīmaṃsanavasena kilesasannissito viya hutvā rahassakathaṃ kathetvā taṃ hatthe gaṇhi. Sā gahitamattāva rodantī kandantī ‘‘ayuttametaṃ, tāta, udakato aggipātubhāvasadisaṃ, mā evarūpaṃ karothā’’ti āha. ‘‘Amma, mayā vīmaṃsanatthāya [Pg.436] tvaṃ hatthe gahitā, na ca kilesavasena. Vadehi, atthi dāni te kumārikādhammo’’ti. ‘‘Āma, tāta, atthi. Mayā hi lobhavasena na koci puriso olokitapubbo’’ti. So dhītaraṃ assāsetvā gharaṃ netvā maṅgalaṃ katvā parakulaṃ pesetvā ‘‘satthāraṃ vandissāmī’’ti gandhamālādihattho jetavanaṃ gantvā satthāraṃ vanditvā pūjetvā ekamantaṃ nisīdi, ‘‘cirassamāgatosī’’ti ca vutte tamatthaṃ bhagavato ārocesi. Satthā ‘‘upāsaka, kumārikā ciraṃ paṭṭhāya ācārasīlasampannāva, tvaṃ pana na idāneva evaṃ vīmaṃsasi, pubbepi vīmaṃsiyevā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Wer für den vom Leid Getroffenen ein Schutz sein sollte“ – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen Gemüsehändler, einen Laienanhänger (Upāsaka). Dieser Laienanhänger, der in Sāvatthi wohnte, verdiente sich nämlich seinen Lebensunterhalt, indem er verschiedene Arten von Wurzeln, Blättern usw. sowie Kürbisse, Flaschenkürbisse und Ähnliches verkaufte. Er hatte eine Tochter, die wunderschön war, anmutig, mit gutem Betragen und Tugend ausgestattet, von Scham und Scheu vor dem Bösen (hiri-ottappa) erfüllt, und deren Gesicht stets von einem reinen Lächeln erhellt war. Als junge Männer aus gleichrangigen Familien kamen, um um ihre Hand anzuhalten, dachte er: „Es ist an der Zeit, diese Tochter zu vermählen. Sie hat jedoch ein stets lächelndes Gesicht. Wenn aber die Tugend eines jungen Mädchens nicht vorhanden ist und das Mädchen in die Familie des Ehemannes geht, bringt dies Tadel über die Eltern. Ich will prüfen, ob die Tugend eines jungen Mädchens in ihr vorhanden ist oder nicht.“ Eines Tages ließ er seine Tochter einen Korb tragen, ging mit ihr in den Wald, um Blätter zu sammeln, tat aus Prüfungsabsicht so, als sei er von Leidenschaft ergriffen, sprach heimliche Worte zu ihr und ergriff sie an der Hand. Sobald sie ergriffen wurde, weinte und klagte sie und sagte: „Vater, das ist unrecht, es ist wie Feuer, das aus dem Wasser aufsteigt. Tue so etwas nicht!“ Er sagte: „Liebe Tochter, ich habe dich nur an der Hand ergriffen, um dich zu prüfen, und nicht aus Leidenschaft. Sag mir, besitzt du nun die Tugend eines jungen Mädchens?“ Sie antwortete: „Ja, Vater, ich besitze sie. Wahrlich, ich habe noch nie einen Mann aus Begehren (lobha) angesehen.“ Er tröstete seine Tochter, brachte sie nach Hause, richtete die Hochzeit aus, sandte sie zur Familie ihres Ehemannes und dachte: „Ich will den Meister verehren.“ Mit Duftstoffen, Blumen usw. in den Händen ging er zum Jetavana-Kloster, verehrte und beschenkte den Meister und setzte sich an eine Seite nieder. Als der Meister zu ihm sprach: „Du bist nach langer Zeit gekommen“, berichtete er dem Erhabenen die Angelegenheit. Der Meister sagte: „Upāsaka, das junge Mädchen ist schon seit langer Zeit mit gutem Betragen und Tugend ausgestattet. Aber nicht erst jetzt hast du sie so geprüft, auch in der Vergangenheit hast du sie schon geprüft.“ Und auf dessen Bitte hin erzählte er die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto araññe rukkhadevatā hutvā nibbatti. Atheko bārāṇasiyaṃ paṇṇikaupāsakoti atītavatthu paccuppannasadisameva. Tena pana sā vīmaṃsanatthāya hatthe gahitamattā paridevamānā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als eine Baumgottheit im Wald wiedergeboren. Damals gab es in Bārāṇasī einen Gemüsehändler, einen Laienanhänger – und so ist die Geschichte der Vergangenheit genau wie die der Gegenwart. Jener Vater ergriff jedoch seine Tochter an der Hand, um sie zu prüfen, woraufhin sie weinend diese Strophe sprach: 102. 102. ‘‘Yo dukkhaphuṭṭhāya bhaveyya tāṇaṃ, so me pitā dubbhi vane karoti; Sā kassa kandāmi vanassa majjhe, yo tāyitā so sahasaṃ karotī’’ti. „Er, der mir Schutz gewähren sollte, wenn ich vom Leid getroffen bin – eben dieser, mein Vater, handelt tückisch an mir im Walde. Zu wem soll ich mitten im Walde klagen? Er, der mein Beschützer sein sollte, wendet Gewalt gegen mich an.“ Tattha yo dukkhaphuṭṭhāya bhaveyya tāṇanti kāyikacetasikehi dukkhehi phuṭṭhāya tāyitā paritāyitā patiṭṭhā bhaveyya. So me pitā dubbhi vane karotīti so mayhaṃ dukkhaparitāyako pitāva imasmiṃ vane evarūpaṃ mittadubbhi kammaṃ karoti, attano jātāya dhītari vītikkamaṃ kātuṃ maññatīti attho. Sā kassa kandāmīti kassa rodāmi, ko me patiṭṭhā bhavissatīti dīpeti. Yo tāyitā so sahasaṃ karotīti yo mayhaṃ tāyitā rakkhitā avassayo bhavituṃ arahati, so pitāyeva sāhasikakammaṃ karotīti attho. Darin bedeutet „yo dukkhaphuṭṭhāya bhaveyya tāṇaṃ“: Er sollte ein Beschützer, ein Rundum-Schützer, eine Zuflucht für mich sein, wenn ich von körperlichen und geistigen Leiden getroffen bin. „so me pitā dubbhi vane karoti“ bedeutet: Eben dieser mein Vater, der mich vor Leiden schützen sollte, begeht in diesem Wald einen solchen Vertrauensbruch; er beabsichtigt, sich an seiner leiblichen Tochter zu vergehen – das ist die Bedeutung. „sā kassa kandāmi“ verdeutlicht: Vor wem soll ich weinen, wer wird meine Zuflucht sein? „yo tāyitā so sahasaṃ karoti“ bedeutet: Eben jener Vater, der mein Beschützer, Hüter und Beistand sein sollte, begeht eine Gewalttat – das ist die Bedeutung. Atha naṃ pitā assāsetvā ‘‘amma, rakkhitattāsī’’ti pucchi. ‘‘Āma, tāta rakkhito me attā’’ti. So taṃ gharaṃ netvā maṇḍetvā maṅgalaṃ katvā parakulaṃ pesesi. Daraufhin tröstete der Vater sie und fragte: „Liebe Tochter, hast du dich selbst beschützt?“ Sie antwortete: „Ja, Vater, ich habe mich selbst beschützt.“ Er brachte sie nach Hause, schmückte sie, richtete die Hochzeit aus und sandte sie zur Familie ihres Ehemannes. Satthā [Pg.437] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi, saccapariyosāne upāsako sotāpattiphale patiṭṭhahi. Nachdem der Meister diese Lehrverkündung dargelegt und die Wahrheiten verkündet hatte, führte er die Geburtserzählung (Jātaka) zusammen. Am Ende der Wahrheiten erlangte der Laienanhänger die Frucht des Stromeintritts (Sotāpattiphala). Tadā pitā etarahi pitāva, dhītā ca etarahi dhītāva, taṃ kāraṇaṃ paccakkhato diṭṭharukkhadevatā pana ahameva ahosinti. „Der damalige Vater war der heutige Vater, die damalige Tochter war die heutige Tochter, und die Baumgottheit, die diesen Vorfall mit eigenen Augen sah, war ich selbst.“ Paṇṇikajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Paṇṇika-Jātaka, das zweite.
[103] 3. Verijātakavaṇṇanā [103] 3. Die Erklärung des Veri-Jātaka. Yattha verī nivisatīti idaṃ satthā jetavane viharanto anāthapiṇḍikaṃ ārabbha kathesi. Anāthapiṇḍiko kira bhogagāmaṃ gantvā āgacchanto antarāmagge core disvā ‘‘antarāmagge vasituṃ na yuttaṃ, sāvatthimeva gamissāmī’’ti vegena goṇe pājetvā sāvatthimeva āgantvā punadivase vihāraṃ gato satthu etamatthaṃ ārocesi. Satthā ‘‘pubbepi gahapati paṇḍitā antarāmagge core disvā antarā avilambamānā attano vasanaṭṭhānameva gamiṃsū’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Wo ein Feind weilt“ – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf Anāthapiṇḍika. Anāthapiṇḍika war nämlich zu einem Dorf gereist, das ihm Einkünfte brachte, und sah auf dem Rückweg unterwegs Räuber. Er dachte: „Es ist nicht ratsam, auf dem Weg zu bleiben, ich werde direkt nach Sāvatthi reisen.“ Er trieb die Ochsen rasch an, kehrte nach Sāvatthi zurück, ging am nächsten Tag zum Kloster und berichtete dem Meister von dieser Angelegenheit. Der Meister sagte: „Hausvater, auch in der Vergangenheit haben die Weisen, als sie Räuber auf dem Weg sahen, nicht gezögert, sondern sind zu ihrem eigenen Wohnort gereist.“ Und auf dessen Bitte hin erzählte er die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mahāvibhavo seṭṭhi hutvā ekaṃ gāmakaṃ nimantanaṃ bhuñjanatthāya gantvā paccāgacchanto antarāmagge core disvā antarāmagge avasitvāva vegena goṇe pājento attano gehameva āgantvā nānaggarasehi bhuñjitvā mahāsayane nisinno ‘‘corānaṃ hatthato muccitvā nibbhayaṭṭhānaṃ attano gehaṃ āgatomhī’’ti udānavasena imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als ein sehr wohlhabender Großkaufmann (Seṭṭhi) wiedergeboren. Als er einmal zu einer Einladung in ein kleines Dorf gegangen war, um dort zu speisen, sah er auf dem Rückweg unterwegs Räuber. Er hielt sich auf dem Weg nicht auf, sondern trieb die Ochsen rasch an, kehrte zu seinem eigenen Haus zurück, speiste Speisen von erlesenstem Geschmack, saß auf einem großen Lager und sprach voller Freude (Udāna) diese Strophe: „Ich bin den Händen der Räuber entkommen und in mein eigenes Haus an einen sicheren Ort gelangt.“ 103. 103. ‘‘Yattha verī nivisati, na vase tattha paṇḍito; Ekarattaṃ dirattaṃ vā, dukkhaṃ vasati verisū’’ti. „Wo ein Feind weilt, dort sollte ein Weiser nicht wohnen; ob eine oder zwei Nächte, unter Feinden wohnt man in Kummer.“ Tattha verīti veracetanāsamaṅgipuggalo. Nivisatīti patiṭṭhāti. Na vase tattha paṇḍitoti so verīpuggalo yasmiṃ ṭhāne patiṭṭhito hutvā vasati, tattha paṇḍito paṇḍiccena samannāgato na vaseyya. Kiṃkāraṇā? Ekarattaṃ dirattaṃ vā, dukkhaṃ vasati verisūti, verīnañhi antare vasanto ekāhampi dvīhampi dukkhameva vasatīti attho. Darin bedeutet „verī“: Eine Person, die von feindseliger Absicht erfüllt ist. „nivisati“ bedeutet: Er lässt sich nieder (weilt). „na vase tattha paṇḍito“ bedeutet: An dem Ort, an dem sich jene feindselige Person niedergelassen hat und wohnt, sollte sich ein Weiser, der mit Weisheit ausgestattet ist, nicht aufhalten. Aus welchem Grund? „ekarattaṃ dirattaṃ vā, dukkhaṃ vasati verisū“ bedeutet: Wenn man inmitten von Feinden wohnt, sei es auch nur für einen oder zwei Tage, lebt man wahrlich nur in Kummer – das ist die Bedeutung. Evaṃ [Pg.438] mahāsatto udānaṃ udānetvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nachdem das Große Wesen (Mahāsatta) so diesen Freudenausruf getan hatte, vollbrachte er gute Taten wie Freigebigkeit (Dāna) und Ähnliches und ging gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā ahameva bārāṇasiseṭṭhi ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündung dargelegt hatte, führte er die Geburtserzählung zusammen: „Der damalige Großkaufmann von Bārāṇasī war ich selbst.“ Verijātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Veri-Jātaka, das dritte.
[104] 4. Mittavindakajātakavaṇṇanā [104] 4. Die Erklärung des Mittavindaka-Jātaka. Catubbhi aṭṭhajjhagamāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Vatthu heṭṭhā mittavindakajātake vuttanayena vitthāretabbaṃ. Idaṃ pana jātakaṃ kassapabuddhakālikaṃ. Tasmiñhi kāle uracakkaṃ ukkhipitvā niraye paccamāno eko nerayikasatto ‘‘bhante, kiṃ nu kho pāpakammaṃ akāsi’’nti bodhisattaṃ pucchi. Bodhisatto ‘‘tayā idañcidañca pāpakammaṃ kata’’nti vatvā imaṃ gāthamāha – „Catubbhi aṭṭhajjhagamā“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana verwelte, bezüglich eines widerspenstigen Mönchs. Die Vorgeschichte ist im Einzelnen so darzulegen, wie sie unten im Mittavindaka-Jātaka beschrieben ist. Dieses Jātaka jedoch gehört in die Zeit des Buddha Kassapa. In jener Zeit trug nämlich ein Wesen in der Hölle, das dort gepeinigt wurde, ein rasiermesserscharfes Rad auf dem Kopf und fragte den Bodhisatta: „Herr, was für eine böse Tat habe ich wohl begangen?“ Der Bodhisatta sprach: „Du hast diese und jene böse Tat begangen“, und sprach diese Strophe: 104. 104. ‘‘Catubbhi aṭṭhajjhagamā, aṭṭhāhipi ca soḷasa; Soḷasāhi ca bāttiṃsa, atricchaṃ cakkamāsado; Icchāhatassa posassa, cakkaṃ bhamati matthake’’ti. „Von vieren gelangtest du zu achten, und von achten zu sechzehn; von sechzehn zu zweiunddreißig. Der übermäßig Gierige stieß auf das Rad. Auf dem Haupt des von Begehren geschlagenen Mannes dreht sich das Rad.“ Tattha catubbhi aṭṭhajjhagamāti samuddantare catasso vimānapetiyo labhitvā tāhi asantuṭṭho atricchatāya parato gantvā aparā aṭṭha adhigatosīti attho. Sesapadadvayepi eseva nayo. Atricchaṃ cakkamāsadoti evaṃ sakalābhena asantuṭṭho atra atra icchanto parato parato lābhaṃ patthento idāni cakkamāsado idaṃ uracakkaṃ pattosi. Tassa te evaṃ icchāhatassa posassa taṇhāya hatassa upahatassa tava cakkaṃ bhamati matthake. Pāsāṇacakkaṃ, ayacakkanti imesu dvīsu khuradhāraṃ ayacakkaṃ tassa matthake punappunaṃ patanavasena bhamantaṃ disvā evamāha. Vatvā ca pana attano devalokameva gato. Sopi nerayikasatto attano pāpe khīṇe yathākammaṃ gato. Hierbei bedeutet „catubbhi aṭṭhajjhagamā“: Nachdem er mitten im Ozean vier Palast-Geisterfrauen erhalten hatte, ging er, unzufrieden mit ihnen, aufgrund seines übermäßigen Begehrens weiter und erlangte weitere acht. Dies ist die Bedeutung. Bei den folgenden zwei Verszeilen gilt genau dieselbe Methode. „atricchaṃ cakkamāsado“ bedeutet: Wer mit seinem eigenen Gewinn unzufrieden ist, dieses und jenes begehrt und immer weiteren Gewinn sucht, stößt schließlich auf das Rad, das heißt, er ist zu diesem rasiermesserscharfen Rad gelangt. Auf dem Haupt von dir, dem so von Begehren geschlagenen Mann – das heißt, von der Gier geschlagenen und gepeinigten –, dreht sich das Rad. Unter den beiden Arten von Rädern, dem Steinrad und dem Eisenrad, sah er das rasiermesserscharfe Eisenrad, das sich durch das wiederholte Herabfallen auf dessen Haupt drehte, und sprach so. Und nachdem er dies gesagt hatte, ging er in seine eigene Götterwelt zurück. Auch jenes Wesen in der Hölle ging, als seine böse Tat erschöpft war, gemäß seinem Kamma fort. Satthā [Pg.439] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mittavindako dubbacabhikkhu ahosi, devaputto pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war Mittavindaka der widerspenstige Mönch, der Göttersohn aber war ich selbst.“ Mittavindakajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Mittavindaka-Jātaka ist die vierte.
[105] 5. Dubbalakaṭṭhajātakavaṇṇanā [105] 5. Die Erklärung des Dubbalakaṭṭha-Jātaka. Bahumpetaṃ vane kaṭṭhanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ uttasitabhikkhuṃ ārabbha kathesi. So kira sāvatthivāsī eko kulaputto satthu dhammadesanaṃ sutvā pabbajitvā maraṇabhīruko ahosi, rattiṭṭhānadivāṭṭhānesu vātassa vā vījantassa sukkhadaṇḍakassa vā patantassa pakkhicatuppadānaṃ vā saddaṃ sutvā maraṇabhayatajjito mahāravaṃ ravanto palāyati. Tassa hi ‘‘maritabbaṃ mayā’’ti satimattampi natthi. Sace hi so ‘‘ahaṃ marissāmī’’ti jāneyya, na maraṇaṃ bhāyeyya. Maraṇassatikammaṭṭhānassa pana tassa abhāvitattāva bhāyati. Tassa so maraṇabhīrukabhāvo bhikkhusaṅghe pākaṭo jāto. „Bahumpetaṃ vane kaṭṭhaṃ“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana verweilte, bezüglich eines von Furcht erfüllten Mönchs. Ein in Sāvatthī wohnender Sohn aus guter Familie hatte, nachdem er die Lehrverkündigung des Meisters gehört hatte, die Hauslosigkeit angetreten, war jedoch von Todesfurcht erfüllt. Wenn er an den Orten seines nächtlichen oder täglichen Aufenthalts das Wehen des Windes, das Herabfallen eines trockenen Zweiges oder die Laute von Vögeln und vierbeinigen Tieren hörte, schrie er laut auf und floh, von Todesangst gepeinigt. Er hatte nämlich nicht die geringste Achtsamkeit mit dem Gedanken: „Ich muss sterben“. Wenn er sich nämlich bewusst gewesen wäre: „Ich werde sterben“, so hätte er sich vor dem Tod nicht gefürchtet. Weil er aber das Meditationsobjekt der Todesbetrachtung nicht entfaltet hatte, fürchtete er sich. Diese seine Todesfurcht wurde in der Mönchsgemeinde bekannt. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ bhikkhū kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, asuko nāma bhikkhu maraṇabhīruko maraṇaṃ bhāyati, bhikkhunā nāma ‘avassaṃ mayā maritabba’nti maraṇassatikammaṭṭhānaṃ bhāvetuṃ vaṭṭatī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte taṃ bhikkhuṃ pakkosāpetvā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ maraṇabhīruko’’ti pucchitvā ‘‘saccaṃ, bhante’’ti vutte ‘‘bhikkhave, mā etassa bhikkhuno anattamanā hotha, nāyaṃ idāneva maraṇabhīruko, pubbepi maraṇabhīrukoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Da begannen die Mönche eines Tages in der Versammlungshalle folgendes Gespräch: „Brüder, jener Mönch namens Soundso hat Todesangst und fürchtet den Tod. Ein Mönch sollte wahrlich das Meditationsobjekt der Todesbetrachtung entfalten mit dem Gedanken: ‚Sicherlich muss ich sterben‘.“ Der Meister kam hinzu und fragte: „Zu welchem Thema habt ihr euch hier versammelt, ihr Mönche?“ Als sie antworteten: „Zu diesem Thema“, ließ er jenen Mönchen rufen und fragte: „Ist es wahr, dass du Todesangst hast?“ Als dieser antwortete: „Es ist wahr, o Herr“, sprach der Meister: „Mönche, seid diesem Mönch gegenüber nicht unwillig. Nicht erst jetzt hat er Todesangst; schon in der Vergangenheit war er von Todesfurcht erfüllt“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto himavante rukkhadevatā hutvā nibbatti. Tasmiṃ kāle bārāṇasirājā attano maṅgalahatthiṃ āneñjakāraṇaṃ sikkhāpetuṃ hatthācariyānaṃ adāsi. Taṃ āḷāne niccalaṃ bandhitvā tomarahatthā manussā parivāretvā āneñjakāraṇaṃ kārenti. So taṃ kāraṇaṃ kāriyamāno vedanaṃ adhivāsetuṃ asakkonto āḷānaṃ bhinditvā manusse palāpetvā himavantaṃ [Pg.440] pāvisi. Manussā taṃ gahetuṃ asakkontā nivattiṃsu. So tattha maraṇabhīruko ahosi, vātasaddāni sutvā kampamāno maraṇabhayatajjito soṇḍaṃ vidhunitvā vegena palāyati, āḷāne bandhitvā āneñjakāraṇaṃ karaṇakālo viyassa hoti, kāyassādaṃ vā cittassādaṃ vā alabhanto kampamāno vicarati. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als Baumgottheit im Himavanta geboren. Zu jener Zeit übergab der König von Bārāṇasī seinen Festelefanten den Elefantenbändigern, um ihn Unerschütterlichkeit zu lehren. Sie banden ihn fest an einen Pfahl, umstellten ihn mit Lanzen in den Händen und lehrten ihn Unerschütterlichkeit. Während er dieser Prozedur unterzogen wurde, konnte er den Schmerz nicht ertragen, zerbrach den Pfahl, trieb die Menschen in die Flucht und drang in den Himavanta ein. Da die Menschen ihn nicht fangen konnten, kehrten sie um. Dort war er von Todesfurcht erfüllt. Wenn er das Geräusch des Windes hörte, zitterte er, schüttelte vor Todesangst den Rüssel und floh in rasender Eile; ihm war zumute, als sei er wieder an den Pfahl gebunden und würde zur Unerschütterlichkeit abgerichtet. Ohne körperliche oder geistige Ruhe zu finden, wanderte er zitternd umher. Rukkhadevatā taṃ disvā khandhaviṭape ṭhatvā imaṃ gāthamāha – Als die Baumgottheit ihn erblickte, stellte sie sich in eine Astgabel und sprach diese Strophe: 105. 105. ‘‘Bahumpetaṃ vane kaṭṭhaṃ, vāto bhañjati dubbalaṃ; Tassa ce bhāyasi nāga, kiso nūna bhavissasī’’ti. „Gar vieles schwache Holz bricht der Wind im Walde; wenn du dich vor diesem fürchtest, o Elefant, wirst du wahrlich mager werden.“ Tatthāyaṃ piṇḍattho – yaṃ etaṃ dubbalaṃ kaṭṭhaṃ puratthimādibhedo vāto bhañjati, taṃ imasmiṃ vane bahuṃ sulabhaṃ, tattha tattha saṃvijjati. Sace tvaṃ tassa bhāyasi, evaṃ sante niccaṃ bhīto maṃsalohitakkhayaṃ patvā kiso nūna bhavissasi, imasmiṃ pana vane tava bhayaṃ nāma natthi, tasmā ito paṭṭhāya mā bhāyīti. Hierbei ist der Gesamtinhalt wie folgt: Jenes schwache Holz, das der aus Osten oder anderen Richtungen wehende Wind bricht, gibt es in diesem Wald in Hülle und Fülle, es ist überall zu finden. Wenn du dich davor fürchtest, wirst du, in beständiger Angst lebend, an Fleisch und Blut abnehmen und wahrlich mager werden. In diesem Wald jedoch gibt es für dich keinerlei Gefahr; fürchte dich daher von nun an nicht mehr. Evaṃ devatā tassa ovādaṃ adāsi, sopi tato paṭṭhāya nibbhayo ahosi. So erteilte die Gottheit dem Elefanten den Rat; und dieser war von da an furchtlos. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi, saccapariyosāne so bhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. ‘‘Tadā nāgo ayaṃ bhikkhu ahosi, rukkhadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt und die Wahrheiten verkündet hatte, führte er das Jātaka zusammen. Am Ende der Verkündigung der Wahrheiten erlangte jener Mönch die Frucht des Stromeintritts. „Damals war der Elefant dieser Mönch, die Baumgottheit aber war ich selbst.“ Dubbalakaṭṭhajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Dubbalakaṭṭha-Jātaka ist die fünfte.
[106] 6. Udañcanījātakavaṇṇanā [106] 6. Die Erklärung des Udañcanī-Jātaka. Sukhaṃ vata maṃ jīvantanti idaṃ satthā jetavane viharanto thullakumārikāpalobhanaṃ ārabbha kathesi. Vatthu terasakanipāte cūḷanāradakassapajātake (jā. 1.13.40 ādayo) āvi bhavissati. Taṃ pana bhikkhuṃ satthā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhitosī’’ti pucchitvā ‘‘saccaṃ, bhagavā’’ti vutte ‘‘kattha te cittaṃ paṭibaddha’’nti pucchi. So ‘‘ekissā thullakumārikāyā’’ti āha. Atha [Pg.441] naṃ satthā ‘‘ayaṃ te bhikkhu anatthakārikā, pubbepi tvaṃ etaṃ nissāya sīlabyasanaṃ patvā kampanto vicaramāno paṇḍite nissāya sukhaṃ labhī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Sukhaṃ vata maṃ jīvantaṃ“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana verweilte, bezüglich der Verführung durch ein fülliges Mädchen. Die Vorgeschichte wird im Cūḷanāradakassapa-Jātaka im dreizehnten Buch offenbar werden. Bezüglich jenes Mönchs fragte der Meister: „Ist es wahr, o Mönch, dass du unzufrieden bist?“ Als dieser antwortete: „Es ist wahr, Erhabener“, fragte er: „An wen ist dein Geist gefesselt?“ Er antwortete: „An ein fülliges Mädchen.“ Da sprach der Meister zu ihm: „Mönch, diese bringt dir Unheil. Schon in der Vergangenheit bist du ihretwegen vom sittlichen Verhalten abgefallen, bist zitternd umhergewandert und hast erst durch die Zuflucht zu den Weisen Glück gefunden“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārenteti atītavatthupi cūḷanāradakassapajātakeyeva āvi bhavissati. Tadā pana bodhisatto sāyaṃ phalāphale ādāya āgantvā paṇṇasālādvāraṃ vivaritvā pavisitvā puttaṃ cūḷatāpasaṃ etadavoca ‘‘tāta, tvaṃ aññesu divasesu dārūni āharasi, pānīyaṃ paribhojanīyaṃ āharasi, aggiṃ karosi, ajja pana ekampi akatvā kasmā dummukho pajjhāyanto nipannosī’’ti? ‘‘Tāta, tumhesu phalāphalatthāya gatesu ekā itthī āgantvā maṃ palobhetvā ādāya gantuṃ ārabhi, ahaṃ pana ‘tumhehi vissajjito gamissāmī’ti na gacchiṃ, asukaṭṭhāne pana naṃ nisīdāpetvā āgatomhi, idāni gacchāmahaṃ tātā’’ti. Bodhisatto ‘‘na sakkā etaṃ nivattetu’’nti ñatvā ‘‘tena hi, tāta, gaccha, esā pana taṃ netvā yadā macchamaṃsādīni vā khāditukāmā bhavissati, sappiloṇataṇḍulādīhi vā panassā attho bhavissati, tadā ‘idañcidañcāharā’ti taṃ kilamessati. Tadā mayhaṃ guṇaṃ saritvā palāyitvā idheva āgaccheyyāsī’’ti vissajjesi. So tāya saddhiṃ manussapathaṃ agamāsi. Atha naṃ sā attano vasaṃ gametvā ‘‘maṃsaṃ āhara, macchaṃ āharā’’ti yena yena atthikā hoti, taṃ taṃ āharāpeti. Tadā so ‘‘ayaṃ maṃ attano dāsaṃ viya kammakāraṃ viya ca katvā pīḷetī’’ti palāyitvā pitu santikaṃ āgantvā pitaraṃ vanditvā ṭhitakova imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte... – diese Geschichte aus der Vergangenheit wird im Cūḷanāradakassapa-Jātaka offenkundig werden. Damals aber kam der Bodhisatta am Abend zurück, nachdem er verschiedene Früchte gesammelt hatte, öffnete die Tür der Blätterhütte, trat ein und sprach zu seinem Sohn, dem jungen Asketen: „Mein Lieber, an anderen Tagen holst du Holz, bringst Trink- und Nutzwasser und machst Feuer; warum aber liegst du heute da, ohne auch nur eines davon getan zu haben, mit finsterem Gesicht und in Grübeleien versunken?“ – „Mein Vater, als ihr fortgegangen wart, um Früchte zu sammeln, kam eine Frau, verführte mich und schickte sich an, mich mitzunehmen. Ich aber ging nicht mit, da ich dachte: ‚Ich werde erst gehen, wenn ich von euch freigegeben bin.‘ Ich habe sie jedoch an jenem Ort warten lassen und bin hergekommen. Nun, mein Vater, werde ich gehen.“ Der Bodhisatta erkannte: „Es ist nicht möglich, ihn davon abzuhalten“, und entließ ihn mit den Worten: „Wenn dem so ist, mein Lieber, dann geh. Wenn diese Frau dich aber mitgenommen hat und dann Fleisch, Fisch oder Ähnliches essen möchte oder wenn sie Bedarf an Butter, Salz, Reis und dergleichen hat, wird sie dich plagen und sagen: ‚Bring dies und bring jenes!‘ Wenn du dich dann an meine Güte erinnerst, entfliehe und komm genau hierher zurück.“ Er zog mit ihr auf dem Weg der Menschen fort. Daraufhin machte sie ihn sich gefügig und ließ ihn all das herbeischaffen, wonach es sie verlangte, indem sie sagte: „Bring Fleisch, bring Fisch!“ Da dachte er: „Diese Frau quält mich, indem sie mich wie ihren Sklaven und wie einen Tagelöhner behandelt“, entfloh, kam zu seinem Vater zurück, verneigte sich vor ihm und sprach noch im Stehen diesen Vers: 106. 106. ‘‘Sukhaṃ vata maṃ jīvantaṃ, pacamānā udañcanī; Corī jāyappavādena, telaṃ loṇañca yācatī’’ti. „Wahrlich, mich, der ich glücklich lebte, quält nun das Wasserschöpfgefäß (diese Frau); eine Diebin unter dem Namen einer Ehefrau verlangt ständig Öl und Salz.“ Tattha sukhaṃ vata maṃ jīvantanti tāta, tumhākaṃ santike maṃ sukhaṃ jīvantaṃ. Pacamānāti tāpayamānā pīḷayamānā, yaṃ yaṃ vā khāditukāmā hoti, taṃ taṃ pacamānā. Udakaṃ añcanti etāyāti udañcanī, cāṭito vā kūpato vā udakaussiñcanaghaṭikāyetaṃ nāmaṃ. Sā pana udañcanī viya, udakaṃ viya ghaṭikā, yena yenatthikā hoti, taṃ taṃ ākaḍḍhatiyevāti attho[Pg.442]. Corī jāyappavādenāti ‘‘bhariyā’’ti nāmena ekā corī maṃ madhuravacanena upalāpetvā tattha netvā telaṃ loṇañca yañca aññaṃ icchati, taṃ sabbaṃ yācati, dāsaṃ viya kammakāraṃ viya ca katvā āharāpetīti tassā aguṇaṃ kathesi. Darin bedeutet: „mich, der ich wahrlich glücklich lebte“ (sukhaṃ vata maṃ jīvantaṃ): „Vater, mich, der ich in eurer Gegenwart glücklich lebte.“ „Quälend“ (pacamānā): erhitzend, peinigend, oder was auch immer sie zu essen wünscht, dies kochend und zubereitend. Weil man damit Wasser schöpft (añcanti), nennt man es „Wasserschöpfgefäß“ (udañcanī); dies ist eine Bezeichnung für ein kleines Gefäß zum Schöpfen von Wasser aus einem großen Krug oder einem Brunnen. Sie aber ist wie ein solches Wasserschöpfgefäß. Wie das Gefäß das Wasser heraufzieht, so zieht sie all das an sich, wonach es sie verlangte; dies ist die Bedeutung. „Eine Diebin unter dem Namen einer Ehefrau“ (corī jāyappavādena): eine Diebin unter der Bezeichnung „Ehefrau“ verführte mich mit süßen Worten, brachte mich dorthin und verlangt nun Öl, Salz und alles andere, was sie begehrt, und lässt mich dies herbeischaffen, indem sie mich wie einen Sklaven oder Tagelöhner behandelt – so berichtete er von ihren schlechten Eigenschaften. Atha naṃ bodhisatto assāsetvā ‘‘hotu, tāta, ehi tvaṃ mettaṃ bhāvehi, karuṇaṃ bhāvehī’’ti cattāro brahmavihāre ācikkhi, ācikkhitvā kasiṇaparikammaṃ ācikkhi. So na cirasseva abhiññā ca samāpattiyo ca uppādetvā brahmavihāre bhāvetvā saddhiṃ pitarā brahmaloke nibbatti. Daraufhin tröstete ihn der Bodhisatta und sprach: „Es ist gut, mein Lieber. Komm, entfalte liebende Güte, entfalte Mitgefühl!“ Und er wies ihn in die vier göttlichen Verweilungszustände (Brahmavihāra) ein; nachdem er ihn eingewiesen hatte, lehrte er ihn die Vorbereitungen für die Kasiṇa-Meditation. Er erlangte in Kürze die höheren Geisteskräfte (Abhiññā) und die meditativen Vertiefungen (Samāpatti), entfaltete die göttlichen Verweilungszustände und wurde zusammen mit seinem Vater in der Brahma-Welt wiedergeboren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi, saccapariyosāne so bhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. Der Meister brachte diese Lehrverkündigung vor, verkündete die Wahrheiten und führte das Jātaka zusammen. Am Ende der Verkündigung der Wahrheiten erlangte jener Mönch die Frucht des Stromeintritts (Sotāpattiphala). ‘‘Tadā thullakumārikāva etarahi thullakumārikā. Cūḷatāpaso ukkaṇṭhitabhikkhu ahosi, pitā pana ahameva ahosi’’nti. „Die damalige dicke Jungfrau war die heutige dicke Jungfrau. Der junge Asket war der unzufriedene Mönch, der Vater aber war ich selbst.“ Udañcanījātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Udañcanī-Jātaka, die sechste.
[107] 7. Sālittakajātakavaṇṇanā [107] 7. Die Erklärung des Sālittaka-Jātaka Sādhū kho sippakaṃ nāmāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ haṃsapaharanakaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. So kireko sāvatthivāsī kulaputto sālittakasippe nipphattiṃ patto. ‘‘Sālittakasippa’’nti sakkharākhipanasippaṃ vuccati. So ekadivasaṃ dhammaṃ sutvā sāsane uraṃ datvā pabbajitvā upasampadaṃ labhi, na pana sikkhākāmo, na paṭipattisādhako ahosi. So ekadivasaṃ ekaṃ daharabhikkhuṃ ādāya aciravatiṃ gantvā nhāyitvā nadītīre aṭṭhāsi. Tasmiṃ samaye dve setahaṃsā ākāsena gacchanti. So taṃ daharaṃ āha ‘‘imaṃ pacchimahaṃsaṃ sakkharāya akkhimhi paharitvā pādamūle pātemī’’ti. Itaro ‘‘kathaṃ pātessasi, na sakkhissasi paharitu’’nti āha. Itaro ‘‘tiṭṭhatu tāvassa orato akkhi, parato akkhimhi taṃ paharāmī’’ti. Idāni pana tvaṃ asantaṃ kathesīti. ‘‘Tena hi upadhārehī’’ti ekaṃ tikhiṇasakkharaṃ gahetvā aṅguliyā pariyante katvā tassa [Pg.443] haṃsassa pacchato khipi. Sā ‘‘ru’’nti saddaṃ akāsi, haṃso ‘‘parissayena bhavitabba’’nti nivattitvā saddaṃ sotuṃ ārabhi. Itaro tasmiṃ khaṇe ekaṃ vaṭṭasakkharaṃ gahetvā tassa nivattitvā olokentassa parabhāge akkhiṃ pahari. Sakkharā itarampi akkhiṃ vinivijjhitvā gatā. Haṃso mahāravaṃ ravanto pādamūleyeva pati. Tato tato bhikkhū āgantvā garahitvā ‘‘ananucchavikaṃ te kata’’nti satthu santikaṃ netvā ‘‘bhante, iminā idaṃ nāma kata’’nti tamatthaṃ ārocesuṃ. Satthā taṃ bhikkhuṃ garahitvā ‘‘na, bhikkhave, idānevesa etasmiṃ sippe kusalo, pubbepi kusaloyeva ahosī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Gut ist wahrlich das, was man eine Kunst nennt“ – diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen Mönch, der eine Gans abgeworfen hatte. Dieser war, wie man sagt, ein in Sāvatthī lebender Sohn aus gutem Hause, der die Kunst des Steineschleuderns (Sālittaka-Kunst) meisterhaft beherrschte. Unter „sālittakasippa“ versteht man die Kunst des Werfens von Kieselsteinen. Eines Tages hörte er die Lehre, verschrieb sich ganz der Lehre, trat in den Orden ein und erhielt die höhere Ordination. Er war jedoch nicht bestrebt, die Übungsregeln einzuhalten, und praktizierte die Lehre nicht pflichtbewusst. Eines Tages ging er zusammen mit einem jungen Mönch zum Fluss Aciravatī, badete und stellte sich ans Flussufer. Zu dieser Zeit flogen zwei weiße Gänse am Himmel entlang. Er sagte zu dem jungen Mönch: „Ich werde diese hintere Gans mit einem Kieselstein im Auge treffen und zu meinen Füßen herabstürzen lassen.“ Der andere sagte: „Wie willst du sie herabstürzen lassen? Du wirst sie nicht treffen können.“ Der andere erwiderte: „Das Auge auf dieser Seite soll erst einmal unberührt bleiben; ich werde sie im Auge auf der anderen Seite treffen.“ – „Nun erzählst du Unmögliches!“, meinte der andere. „Wenn dem so ist, dann pass gut auf!“, sagte er, nahm einen scharfen Kieselstein, legte ihn auf seine Fingerspitze und schleuderte ihn hinter die Gans. Der Stein erzeugte ein pfeifendes Geräusch („ru“). Die Gans dachte: „Da muss eine Gefahr sein“, drehte sich um und schickte sich an, auf das Geräusch zu horchen. In jenem Augenblick nahm der andere einen runden Kieselstein und traf die sich umdrehende und blickende Gans im Auge auf der anderen Seite. Der Kieselstein drang durch das Auge hindurch und trat auf der anderen Seite wieder aus. Die Gans stieß einen lauten Schrei aus und stürzte genau vor seinen Füßen nieder. Von überall her kamen Mönche herbei, tadelten ihn mit den Worten: „Du hast etwas Ungebührliches getan!“, führten ihn vor den Meister und berichteten ihm die Angelegenheit: „Ehrwürdiger Herr, dieser Mönch hat folgende Tat begangen.“ Der Meister tadelte jenen Mönch und sprach: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, ist dieser geschickt in dieser Kunst; auch in der Vergangenheit war er bereits geschickt darin“, und erzählte die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa amacco ahosi. Tasmiṃ kāle rañño purohito atimukharo hoti bahubhāṇī, tasmiṃ kathetuṃ āraddhe aññe okāsameva na labhanti. Rājā cintesi ‘‘kadā nu kho etassa vacanupacchedakaṃ kañci labhissāmī’’ti. So tato paṭṭhāya tathārūpaṃ ekaṃ upadhārento vicarati. Tasmiṃ kāle bārāṇasiyaṃ eko pīṭhasappī sakkharākhipanasippe nipphattiṃ patto hoti. Gāmadārakā taṃ rathakaṃ āropetvā ākaḍḍhamānā bārāṇasinagaradvāramūle eko viṭapasampanno mahānigrodho atthi, tattha ānetvā samparivāretvā kākaṇikādīni datvā ‘‘hatthirūpakaṃ kara, assarūpakaṃ karā’’ti vadanti. So sakkharā khipitvā khipitvā nigrodhapaṇṇesu nānārūpāni dasseti, sabbāni paṇṇāni chiddāvachiddāneva ahesuṃ. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta sein Minister. Zu jener Zeit war der Hofpriester des Königs überaus geschwätzig und redselig; wenn er zu sprechen begann, erhielten andere überhaupt keine Gelegenheit mehr, das Wort zu ergreifen. Der König dachte: „Wann wohl werde ich jemanden finden, der imstande ist, den Redefluss dieses Mannes zu unterbrechen?“ Von da an hielt er Ausschau nach einer solchen Person und wanderte umher. Zu jener Zeit gab es in Bārāṇasī einen Gelähmten, der die Meisterschaft in der Kunst des Steineschleuderns erlangt hatte. Die Dorfknaben setzten ihn auf einen kleinen Wagen, zogen ihn umher und brachten ihn zu einem großen, astreichen Banyanbaum nahe dem Tor der Stadt Bārāṇasī. Dort umringten sie ihn, gaben ihm kleine Kupfermünzen und sagten: „Bilde die Gestalt eines Elefanten nach! Bilde die Gestalt eines Pferdes nach!“ Indem er wieder und wieder Steine schleuderte, stellte er verschiedene Figuren in den Blättern des Banyanbaums dar, sodass alle Blätter völlig durchlöchert waren. Atha bārāṇasirājā uyyānaṃ gacchanto taṃ ṭhānaṃ pāpuṇi. Ussāraṇābhayena sabbe dārakā palāyiṃsu, pīṭhasappī tattheva nipajji. Rājā nigrodhamūlaṃ patvā rathe nisinno pattānaṃ chiddatāya chāyaṃ kabarakabaraṃ disvā olokento sabbesaṃ pattānaṃ chiddabhāvaṃ disvā ‘‘kenetāni evaṃ katānī’’ti pucchi. ‘‘Pīṭhasappinā, devā’’ti. Rājā ‘‘imaṃ nissāya brāhmaṇassa vacanupacchedaṃ kātuṃ sakkā bhavissatī’’ti cintetvā ‘‘kahaṃ, bhaṇe, pīṭhasappī’’ti pucchi. Vicinantā mūlantare nipannaṃ disvā ‘‘ayaṃ, devā’’ti āhaṃsu. Rājā naṃ pakkosāpetvā parisaṃ ussāretvā pucchi ‘‘amhākaṃ santike eko mukharabrāhmaṇo atthi, sakkhissasi taṃ nissaddaṃ kātu’’nti. Nāḷimattā ajalaṇḍikā labhanto sakkhissāmi, devāti. Rājā pīṭhasappiṃ gharaṃ netvā antosāṇiyaṃ nisīdāpetvā sāṇiyaṃ chiddaṃ kāretvā brāhmaṇassa chiddābhimukhaṃ [Pg.444] āsanaṃ paññapetvā nāḷimattā sukkhā ajalaṇḍikā pīṭhasappissa santike ṭhapāpetvā brāhmaṇaṃ upaṭṭhānakāle āgataṃ tasmiṃ āsane nisīdāpetvā kathaṃ samuṭṭhāpesi. Brāhmaṇo aññesaṃ okāsaṃ adatvā raññā saddhiṃ kathetuṃ ārabhi. Athassa so pīṭhasappī sāṇicchiddena ekekaṃ ajalaṇḍikaṃ pacchiyaṃ pavesento viya tālutalamhiyeva pāteti, brāhmaṇo āgatāgataṃ nāḷiyaṃ telaṃ pavesento viya gilati, sabbā parikkhayaṃ gamiṃsu. Tassetā nāḷimattā ajalaṇḍikā kucchiṃ paviṭṭhā aḍḍhāḷhakamattā ahesuṃ. Als nun der König von Bārāṇasī auf dem Weg zum königlichen Park an jene Stelle gelangte, flohen alle Knaben aus Angst vor den Wegbereitern des Königs. Der Gelähmte jedoch legte sich genau dort nieder. Als der König am Fuße des Banyanbaums ankam, sah er vom Wagen aus wegen der Löcher in den Blättern den scheckigen Schatten. Er blickte auf, bemerkte die Durchlöcherung aller Blätter und fragte: „Wer hat diese Blätter so zugerichtet?“ – „Der Gelähmte, o Herr“, erwiderten sie. Der König dachte: „Mit Hilfe dieses Mannes wird es wohl möglich sein, das endlose Gerede des Brahmanen zu unterbrechen.“ Und er fragte: „He, ihr Leute, wo ist der Gelähmte?“ Als sie suchten und ihn zwischen den Wurzeln liegend fanden, sagten sie: „Hier ist er, o Herr.“ Der König ließ ihn herbeirufen, hieß sein Gefolge zurücktreten und fragte ihn: „In unserer Umgebung gibt es einen geschwätzigen Brahmanen. Wirst du ihn zum Schweigen bringen können?“ – „Wenn ich ein Maß Ziegenkot erhalte, o Herr, werde ich es vermögen“, antwortete er. Der König ließ den Gelähmten in den Palast bringen, hinter einem Vorhang Platz nehmen und schnitt ein Loch in den Vorhang. Genau gegenüber diesem Loch ließ er einen Sitz für den Brahmanen herrichten und ein Maß an trockenem Ziegenkot neben dem Gelähmten bereitlegen. Als der Brahmane zur Audienzzeit eintraf, ließ er ihn auf jenem Sitz Platz nehmen und leitete ein Gespräch ein. Der Brahmane, ohne anderen auch nur die geringste Gelegenheit zu gewähren, begann sofort mit dem König zu sprechen. Da schleuderte der Gelähmte durch das Loch im Vorhang eine Ziegenkotpille nach der anderen genau auf dessen Gaumen, als würde er sie in einen Korb werfen. Und der Brahmane schluckte jede einzelne herbeigeflogene Pille hinunter, als würde man Öl in ein Gefäß gießen, bis alle aufgebraucht waren. Dieses eine Maß an Ziegenkotpillen, das in seinen Magen gelangt war, schwoll darin auf ein halbes Aḍhaka-Maß an. Rājā tāsaṃ parikkhīṇabhāvaṃ ñatvā āha – ‘‘ācariya, tumhe atimukharatāya nāḷimattā ajalaṇḍikā gilantā kiñci na jānittha, ito dāni uttari jīrāpetuṃ na sakkhissatha. Gacchatha, piyaṅgudakaṃ pivitvā chaḍḍetvā attānaṃ arogaṃ karothā’’ti brāhmaṇo tato paṭṭhāya pihitamukho viya hutvā kathentenāpi saddhiṃ akathanasīlo ahosi. Rājā ‘‘iminā me kaṇṇasukhaṃ kata’’nti pīṭhasappissa satasahassuṭṭhānake catūsu disāsu cattāro gāme adāsi. Bodhisatto rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘deva, sippaṃ nāma loke paṇḍitehi uggahitabbaṃ, pīṭhasappinā sālittakamattenāpi ayaṃ sampatti laddhā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als der König erkannte, dass die Pillen aufgebraucht waren, sprach er: „Meister, vor lauter Geschwätzigkeit habt ihr ein ganzes Maß Ziegenkot verschluckt, ohne es überhaupt zu bemerken. Mehr als diese Menge werdet ihr nun nicht verdauen können. Geht fort, trinkt ein Dekokt aus Piyaṅgu-Pflanzen, erbrecht euch und stellt eure Gesundheit wieder her!“ Von diesem Tag an war es dem Brahmanen, als sei sein Mund versiegelt, und er pflegte selbst mit denjenigen nicht mehr zu sprechen, die ihn ansprachen. Der König dachte: „Dieser Mann hat mir Ohrenweide verschafft“, und schenkte dem Gelähmten vier Dörfer in den vier Himmelsrichtungen, die einen Ertrag von je hunderttausend Münzen einbrachten. Der Bodhisatta trat vor den König und sprach: „O König, wahrlich, jede Kunst in der Welt sollte von Weisen erlernt werden; selbst durch das bloße Steineschleudern hat dieser Gelähmte solch großen Wohlstand erlangt“, und sprach folgende Strophe: 107. 107. ‘‘Sādhuṃ kho sippakaṃ nāma, api yādisa kīdisaṃ; Passa khañjappahārena, laddhā gāmā catuddisā’’ti. „Heilsam ist wahrlich eine Kunst, ganz gleich, welcher Art sie sein mag; sieh nur, durch das Schleudern des Gelähmten wurden Dörfer in allen vier Himmelsrichtungen gewonnen!“ Tattha passa khañjappahārenāti passa, mahārāja, iminā khañjapīṭhasappinā ajalaṇḍikāpahārena catuddisā cattāro gāmā laddhā, aññesaṃ sippānaṃ ko ānisaṃsaparicchedoti sippaguṇaṃ kathesi. Darin bedeutet die Passage „sieh nur, durch das Schleudern des Gelähmten“: Sieh, o Großkönig, durch diesen hinkenden Gelähmten wurden mittels des Schleuderns von Ziegenkot vier Dörfer in den vier Himmelsrichtungen erlangt. Wie viel unermesslicher muss erst der Nutzen anderer Künste sein! Auf diese Weise pries er die Vorzüge der Kunstfertigkeit. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā pīṭhasappī ayaṃ bhikkhu ahosi, rājā ānando, paṇḍitāmacco pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er die Geburtserzählung wie folgt zusammen: „Damals war der Gelähmte dieser Mönch, der König war Ānanda, der weise Minister aber war ich selbst.“ Sālittakajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Sālittaka-Jātaka ist die siebte.
[108] 8. Bāhiyajātakavaṇṇanā [108] 8. Die Erklärung des Bāhiya-Jātaka. Sikkheyya [Pg.445] sikkhitabbānīti idaṃ satthā vesāliṃ upanissāya mahāvane kūṭāgārasālāyaṃ viharanto ekaṃ licchaviṃ ārabbha kathesi. So kira licchavirājā saddho pasanno buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nimantetvā attano nivesane mahādānaṃ pavattesi. Bhariyā panassa thūlaṅgapaccaṅgā uddhumātakanimittasadisā anākappasampannā ahosi. Satthā bhattakiccāvasāne anumodanaṃ katvā vihāraṃ gantvā bhikkhūnaṃ ovādaṃ datvā gandhakuṭiṃ pāvisi. Bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, tassa nāma licchavirañño tāva abhirūpassa tādisā bhariyā thūlaṅgapaccaṅgā anākappasampannā, kathaṃ so tāya saddhiṃ abhiramatī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, esa idāneva, pubbepi thūlasarīrāya eva itthiyā saddhiṃ abhiramī’’ti vatvā tehi yācito atītaṃ āhari. „Man sollte lernen, was zu erlernen ist“ – diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er nahe Vesālī im Großen Wald in der Halle des Giebelhauses verweilte, in Bezug auf einen bestimmten Licchavi-Prinzen. Jener Licchavi-König war voller Vertrauen und Zuversicht; er lud die Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze ein und veranstaltete in seiner Residenz eine große Almosengabe. Seine Ehefrau jedoch hatte plumpe Glieder, glich einer aufgeblähten Leiche und besaß keinerlei anmutige Haltung. Der Meister sprach nach Beendigung des Mahles die Segensworte, kehrte zum Kloster zurück, gab den Mönchen eine Unterweisung und betrat die Duftkammer. Die Mönche begannen in der Versammlungshalle folgendes Gespräch: „Freunde, jener Licchavi-König ist doch so gutaussehend, und seine Gattin hat derart plumpe Glieder und ist so ungehobelt in ihrem Auftreten. Wie kann er nur an ihr Gefallen finden?“ Der Meister kam herbei und fragte: „Worüber sprecht ihr gerade, ihr Mönche, während ihr hier zusammensitzt?“ Als sie antworteten: „Über dieses Thema, o Herr“, sprach er: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, findet er Gefallen an einer Frau mit einem so plumpen Körper; auch in der Vergangenheit hat er bereits an einer Frau mit genau solch einem plumpen Körper Gefallen gefunden.“ Auf ihre Bitte hin erzählte er sodann eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto tassa amacco ahosi. Athekā janapaditthī thūlasarīrā anākappasampannā bhatiṃ kurumānā rājaṅgaṇassa avidūrena gacchamānā sarīravaḷañjapīḷitā hutvā nivatthasāṭakena sarīraṃ paṭicchādetvā nisīditvā sarīravaḷañjaṃ muñcitvā khippameva uṭṭhāsi. Tasmiṃ khaṇe bārāṇasirājā vātapānena rājaṅgaṇaṃ olokento taṃ disvā cintesi ‘‘ayaṃ evarūpe aṅgaṇaṭṭhāne sarīravaḷañjaṃ muñcamānā hirottappaṃ appahāya nivāsaneneva paṭicchannā hutvā sarīravaḷañjaṃ mocetvā khippaṃ uṭṭhitā, imāya nirogāya bhavitabbaṃ, etissā vatthu visadaṃ bhavissati, visade pana vatthusmiṃ eko putto labbhamāno visado puññavā bhavissati, imaṃ mayā aggamahesiṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti. So tassā apariggahitabhāvaṃ ñatvā āharāpetvā aggamahesiṭṭhānaṃ adāsi. Sā tassa piyā ahosi manāpā, na cirasseva ekaṃ puttaṃ vijāyi. So panassā putto cakkavattī rājā ahosi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasi regierte, war der Bodhisatta sein Minister. Damals ging eine Landfrau mit kräftigem Körper und unvorteilhafter Erscheinung, die für Lohn arbeitete, unweit des königlichen Hofes vorüber. Vom Drang, sich zu erleichtern, geplagt, bedeckte sie ihren Körper mit ihrem getragenen Gewand, setzte sich nieder, entleerte ihren Darm und stand sogleich wieder auf. In diesem Augenblick blickte der König von Bārāṇasī durch das Fenster auf den Schlosshof, sah sie und dachte: „Obwohl diese Frau sich an einem solchen offenen Ort erleichtert, hat sie Scham und moralische Scheu nicht abgelegt; sie hüllte sich in ihr Gewand, erleichterte sich und stand schnell wieder auf. Sie muss frei von Krankheiten sein. Ihre Gebärmutter muss rein sein. In einer reinen Gebärmutter wird ein empfangener Sohn rein und verdienstvoll sein. Es ist angemessen, dass ich sie zur Hauptkönigin mache.“ Als er erfuhr, dass sie ungebunden war, ließ er sie holen und gab ihr den Rang der Hauptkönigin. Sie wurde ihm lieb und angenehm, und nach nicht langer Zeit gebar sie einen Sohn. Dieser ihr Sohn aber wurde ein Weltherrscher (Cakkavattī-König). Bodhisatto tassā sampattiṃ disvā tathārūpaṃ vacanokāsaṃ labhitvā ‘‘deva, sikkhitabbayuttakaṃ nāma sippaṃ kasmā na sikkhitabbaṃ, yatra hi nāmāyaṃ mahāpuññā hirottappaṃ appahāya paṭicchannākārena sarīravaḷañjaṃ kurumānā tumhe [Pg.446] ārādhetvā evarūpaṃ sampattiṃ pattā’’ti vatvā sikkhitabbayuttakānaṃ sippānaṃ vaṇṇaṃ kathento imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta ihren Wohlstand sah, nutzte er eine passende Gelegenheit zum Sprechen und sagte: „Majestät, warum sollte man eine Kunst, die es zu lernen lohnt, nicht erlernen? Denn siehe, diese überaus verdienstvolle Frau hat, ohne Scham und moralische Scheu abzulegen, auf verhüllte Weise ihre Notdurft verrichtet, Euch damit erfreut und einen solchen Wohlstand erlangt.“ Um das Lob der erlernenswerten Künste zu verkünden, sprach er diese Strophe: 108. 108. ‘‘Sikkheyya sikkhitabbāni, santi sacchandino janā; Bāhiyā hi suhannena, rājānamabhirādhayī’’ti. „Man sollte lernen, was zu lernen ist; es gibt Menschen mit gleichen Interessen. Denn die Außenstehende erfreute den König durch ihr wohlanständiges Erleichtern.“ Tattha santi sacchandino janāti tesu tesu sippesu sacchandā janā atthiyeva. Bāhiyāti bahijanapade jātā saṃvaḍḍhā itthī. Suhannenāti hirottappaṃ appahāya paṭicchannenākārena hannaṃ suhannaṃ nāma, tena suhannena. Rājānamabhirādhayīti devaṃ abhirādhayitvā imaṃ sampattiṃ pattāti. Evaṃ mahāsatto sikkhitabbayuttakānaṃ sippānaṃ guṇaṃ kathesi. Darin bedeutet „es gibt Menschen mit gleichen Interessen“ (santi sacchandino janā): In den verschiedenen Künsten gibt es wahrlich Menschen mit den gleichen Interessen. „Die Außenstehende“ (Bāhiyā) meint eine Frau, die im äußeren Landgebiet geboren und aufgewachsen ist. „Durch wohlanständiges Erleichtern“ (suhannena): Das Verrichten der Notdurft (hannaṃ), ohne Scham und moralische Scheu abzulegen und auf verhüllte Weise, wird „gutes Erleichtern“ (suhannaṃ) genannt; durch dieses gute Erleichtern. „Erfreute den König“ (rājānamabhirādhayī) bedeutet, dass sie den König erfreute und diesen Wohlstand erlangte. So sprach das Große Wesen über den Wert der erlernenswerten Künste. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jayampatikā etarahipi jayampatikāva, paṇḍitāmacco pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Das damalige Ehepaar ist auch heute das Ehepaar; der weise Minister aber war ich selbst.“ Bāhiyajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Bāhiya-Jātaka ist die achte.
[109] 9. Kuṇḍakapūvajātakavaṇṇanā [109] 9. Die Erklärung des Kuṇḍakapūva-Jātaka Yathanno puriso hotīti idaṃ satthā sāvatthiyaṃ viharanto mahāduggataṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyañhi kadāci ekameva kulaṃ buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa dānaṃ deti, kadāci tīṇi cattāri ekato hutvā, kadāci gaṇabandhanena, kadāci vīthisabhāgena, kadāci sakalanagaraṃ chandakaṃ saṃharitvā. Tadā pana vīthibhattaṃ nāma ahosi. Atha manussā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa yāguṃ datvā ‘‘khajjakaṃ āharathā’’ti āhaṃsu. Tadā paneko paresaṃ bhatikārako duggatamanusso tassaṃ vīthiyaṃ vasamāno cintesi ‘‘ahaṃ yāguṃ dātuṃ na sakkhissāmi, khajjakaṃ pana dassāmī’’ti saṇhasaṇhaṃ kuṇḍakaṃ vaḍḍhāpetvā udakena temetvā akkapaṇṇena veṭhetvā kukkuḷe pacitvā ‘‘idaṃ buddhassa dassāmī’’ti taṃ ādāya gantvā satthu santike ṭhito ‘‘khajjakaṃ āharathā’’ti ekasmiṃ vacane vuttamatte sabbapaṭhamaṃ gantvā taṃ pūvaṃ satthu patte patiṭṭhāpesi, satthā aññehi dīyamānaṃ khajjakaṃ aggahetvā tameva pūvakhajjakaṃ paribhuñji. „Welcher Art die Nahrung eines Menschen ist ...“ – Dies sprach der Meister, als er in Sāvatthī verweilte, bezüglich des Mahāduggata (des bitterarmen Mannes). In Sāvatthī gab nämlich manchmal eine einzelne Familie der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine Almosenspende; manchmal schlossen sich drei oder vier Familien zusammen; manchmal taten sie sich als Gruppe zusammen; manchmal als Straßengemeinschaft; manchmal sammelte die ganze Stadt Beiträge für eine gemeinsame Spende. Damals fand eine Straßenspeisung statt. Nachdem die Menschen der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde Reisschleim gegeben hatten, sagten sie: „Bringt feste Speisen!“ Zu jener Zeit dachte ein armer Mann, der als Tagelöhner für andere arbeitete und in jener Straße wohnte: „Ich werde keinen Reisschleim geben können, aber ich werde feste Speise geben.“ Er rieb Reiskleie ganz fein, feuchtete sie mit Wasser an, wickelte sie in ein Calotropis-Blatt, buk sie in heißer Asche und dachte: „Dies will ich dem Buddha geben.“ Er nahm den Kuchen, ging hin und stand in der Nähe des Meisters. Kaum war das eine Wort „Bringt feste Speisen!“ gesprochen worden, ging er als allererster hin und legte den Kuchen in die Schale des Meisters. Der Meister nahm die von den anderen angebotenen festen Speisen nicht an, sondern verzehrte genau diese feste Speise aus Reiskleie. Tasmiṃyeva [Pg.447] pana khaṇe ‘‘sammāsambuddhena kira mahāduggatassa kuṇḍakakhajjakaṃ ajigucchitvā amataṃ viya paribhutta’’nti sakalanagaraṃ ekakolāhalaṃ ahosi. Rājarājamahāmattādayo antamaso dovārike upādāya sabbeva sannipatitvā satthāraṃ vanditvā mahāduggataṃ upasaṅkamitvā ‘‘handa bho, sataṃ gahetvā, dve satāni gahetvā, pañca satāni gahetvā amhākaṃ pattiṃ dehī’’ti vadiṃsu. So ‘‘satthāraṃ paṭipucchitvā jānissāmī’’ti satthu santikaṃ gantvā tamatthaṃ ārocesi. Satthā ‘‘dhanaṃ gahetvā vā aggahetvā vā sabbasattānaṃ pattiṃ dehī’’ti āha. So dhanaṃ gahetuṃ ārabhi. Manussā diguṇacatugguṇaaṭṭhaguṇādivasena dadantā nava hiraññakoṭiyo adaṃsu. Satthā anumodanaṃ katvā vihāraṃ gantvā bhikkhūhi vatte dassite sugatovādaṃ datvā gandhakuṭiṃ pāvisi. Rājā sāyanhasamaye mahāduggataṃ pakkosāpetvā seṭṭhiṭṭhānena pūjesi. In genau diesem Augenblick entstand in der ganzen Stadt ein einziger Aufruhr: „Es heißt, der Vollkommen Erleuchtete habe die Reiskleiespeise des bitterarmen Mannes ohne Abscheu verzehrt, als wäre sie der Nektar der Unsterblichkeit!“ Könige, königliche Minister und alle anderen, herab bis zu den Torhütern, versammelten sich, erwiesen dem Meister ihre Ehrerbietung, traten an den bitterarmen Mann heran und sagten: „Wohlan, werter Mann, nimm hundert Münzen, nimm zweihundert, nimm fünfhundert und gib uns einen Anteil an deinem Verdienst!“ Er sagte: „Ich werde den Meister fragen und es dann wissen.“ Er ging zum Meister und berichtete ihm von dieser Angelegenheit. Der Meister sagte: „Ob du nun das Geld annimmst oder nicht, teile das Verdienst mit allen Lebewesen.“ Da begann er, das Geld anzunehmen. Die Menschen gaben das Doppelte, Vierfache, Achtfache und so weiter, bis sie ihm neunzig Millionen (neun Koṭis) Goldstücke gaben. Nachdem der Meister die Segensworte der Wertschätzung (Anumodanā) gesprochen hatte, begab er sich zum Kloster. Als die Mönche ihre Pflichten erfüllt hatten, erteilte er ihnen die Unterweisung des Erhabenen (Sugata) und betrat die Duftkammer (Gandhakuṭī). Am Abend ließ der König den bitterarmen Mann rufen und ehrte ihn mit dem Amt des Großkaufmanns (Seṭṭhi). Bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, satthā mahāduggatena dinnaṃ kuṇḍakapūvaṃ ajigucchanto amataṃ viya paribhuñji, mahāduggatopi bahudhanañca seṭṭhiṭṭhānañca labhitvā mahāsampattiṃ patto’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva mayā ajigucchantena tassa kuṇḍakapūvo paribhutto, pubbepi rukkhadevatāya hutvā paribhuttoyeva, tadāpi cesa maṃ nissāya seṭṭhiṭṭhānaṃ alatthevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Die Mönche begannen in der Halle der Lehre folgendes Gespräch: „Ihr Brüder, der Meister hat den von Mahāduggata gespendeten Reiskleiekuchen ohne Abscheu verzehrt, als wäre er der Nektar der Unsterblichkeit. Auch Mahāduggata hat viel Reichtum und das Amt des Großkaufmanns erlangt und ist so zu großem Wohlstand gelangt.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Ihr Mönche, mit welchem Gespräch sitzt ihr hier zusammen?“ Als sie antworteten: „Mit diesem“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt habe ich seinen Reiskleiekuchen ohne Abscheu verzehrt. Schon in der Vergangenheit, als ich eine Baumgottheit war, habe ich ihn verzehrt. Und auch damals erlangte er durch mich das Amt des Großkaufmanns.“ Nach diesen Worten trug er die Begebenheit aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto ekasmiṃ ṭhāne eraṇḍarukkhe rukkhadevatā hutvā nibbatti. Tadā tasmiṃ gāmake manussā devatāmaṅgalikā honti. Athekasmiṃ chaṇe sampatte manussā attano attano rukkhadevatānaṃ balikammaṃ akaṃsu. Atheko duggatamanusso te manusse rukkhadevatā paṭijaggante disvā ekaṃ eraṇḍarukkhaṃ paṭijaggi. Te manussā attano attano devatānaṃ nānappakārāni mālāgandhavilepanādīni ceva khajjabhojjāni ca ādāya gacchiṃsu. So pana kuṇḍakapūvañceva uḷuṅkena ca udakaṃ ādāya gantvā eraṇḍarukkhassa avidūre ṭhatvā cintesi ‘‘devatā nāma dibbakhajjakāni khādanti, mayhaṃ devatā imaṃ [Pg.448] kuṇḍakapūvaṃ na khādissati, kiṃ imaṃ akāraṇena nāsemi, ahameva naṃ khādissāmī’’ti tatova nivatti. Bodhisatto khandhaviṭape ṭhatvā ‘‘bho purisa, sace tvaṃ issaro bhaveyyāsi, mayhaṃ madhurakhajjakaṃ dadeyyāsi. Tvaṃ pana duggato, ahaṃ tava pūvaṃ na khāditvā aññaṃ kiṃ khādissāmi, mā me koṭṭhāsaṃ nāsehī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta an einem Ort in einem Rizinusbaum als Baumgottheit wiedergeboren. Damals glaubten die Menschen in jenem Dorf, dass die Verehrung von Gottheiten Segen bringe. Als nun ein Fest herbeigekommen war, brachten die Menschen ihren jeweiligen Baumgottheiten Opfergaben dar. Da sah ein armer Mann, wie jene Menschen die Baumgottheiten verehrten, und er begann, einen Rizinusbaum zu verehren. Jene Menschen nahmen verschiedene Arten von Blumen, Düften, Salben sowie feste und weiche Speisen für ihre jeweiligen Gottheiten mit und gingen hin. Er aber nahm einen Kuchen aus Kleie sowie Wasser in einer Schöpfkelle, ging hin, blieb unweit des Rizinusbaums stehen und dachte: „Götter essen gewiss göttliche Speisen. Meine Gottheit wird diesen Kleiekuchen nicht essen. Warum sollte ich ihn ohne Grund verschwenden? Ich selbst werde ihn essen“, und so kehrte er von dort wieder um. Der Bodhisatta stand in der Astgabel des Baumes und sprach: „O Mann, wenn du wohlhabend wärst, würdest du mir süße Speisen geben. Du aber bist arm; wenn ich deinen Kuchen nicht esse, was sonst soll ich essen? Verdirb mir nicht meinen Anteil!“, und sprach diese Strophe: 109. 109. ‘‘Yathanno puriso hoti, tathannā tassa devatā; Āharetaṃ kuṇḍapūvaṃ, mā me bhāgaṃ vināsayā’’ti. „Wie die Nahrung des Menschen ist, so ist auch die seiner Gottheit. Bring diesen Kleiekuchen her, verdirb mir nicht meinen Anteil!“ Tattha yathannoti yathārūpabhojano hoti. Tathannāti tassa purisassa devatāpi tathārūpabhojanāva hoti. Āharetaṃ kuṇḍapūvanti etaṃ kuṇḍakena pakkapūvaṃ ānehi, mayhaṃ bhāgaṃ mā vināsehīti. Darin bedeutet 'yathanno': er hat eine solche Speise. 'Tathannā' bedeutet: Auch die Gottheit dieses Mannes hat genau eine solche Speise. 'Āharetaṃ kuṇḍapūvaṃ' bedeutet: Bring diesen aus Kleie gebackenen Kuchen her, verdirb mir nicht meinen Anteil. So nivattitvā bodhisattaṃ oloketvā balikammamakāsi. Bodhisatto tato ojaṃ paribhuñjitvā ‘‘purisa, tvaṃ kimatthaṃ maṃ paṭijaggasī’’ti āha. ‘‘Duggatomhi, sāmi, taṃ nissāya duggatabhāvato muccitukāmatāya paṭijaggāmī’’ti. ‘‘Bho purisa, mā cintayi, tayā kataññussa katavedino pūjā katā, imaṃ eraṇḍaṃ parikkhipitvā nidhikumbhiyo gīvāya gīvaṃ āhaccaṭhitā. Tvaṃ rañño ācikkhitvā sakaṭehi dhanaṃ āharāpetvā rājaṅgaṇe rāsiṃ kārehi, rājā te tussitvā seṭṭhiṭṭhānaṃ dassatī’’ti vatvā bodhisatto antaradhāyi. So tathā akāsi. Rājāpi tassa seṭṭhiṭṭhānaṃ adāsi. Iti so bodhisattaṃ nissāya mahāsampattiṃ patvā yathākammaṃ gato. Er kehrte um, blickte den Bodhisatta an und brachte die Opfergabe dar. Der Bodhisatta genoss die Essenz daraus und fragte: „O Mann, zu welchem Zweck verehrst du mich?“ – „Herr, ich bin arm. Ich verehre dich, weil ich mich im Vertrauen auf dich aus meiner Armut befreien möchte.“ – „O Mann, sorge dich nicht. Du hast einem Dankbaren, der empfangene Wohltaten erwidert, deine Verehrung erwiesen. Rund um diesen Rizinusbaum stehen Schatzkrüge, deren Hälse einander berühren. Melde dies dem König, lass die Schätze mit Wagen herbeischaffen und auf dem Schlosshof aufhäufen. Der König wird sich darüber freuen und dir das Amt des Großkaufmanns verleihen.“ Nachdem der Bodhisatta dies gesagt hatte, verschwand er. Der Mann tat genau so. Und auch der König verlieh ihm das Amt des Großkaufmanns. So erlangte er im Vertrauen auf den Bodhisatta großen Wohlstand und ging schließlich gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā duggato etarahi duggatova, eraṇḍarukkhadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Der damalige arme Mann ist der heutige arme Mann, die Gottheit des Rizinusbaumes aber war ich selbst.“ Kuṇḍakapūvajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Kuṇḍakapūva-Jātaka, das neunte.
[110] 10. Sabbasaṃhārakapañhajātakavaṇṇanā [110] 10. Die Erklärung des Sabbasaṃhārakapañha-Jātaka Sabbasaṃhārako natthīti [Pg.449] ayaṃ sabbasaṃhārakapañho sabbākārena umaṅgajātake āvi bhavissatīti. „Sabbasaṃhārako natthi“ (Es gibt kein All-Parfüm) – dieses Sabbasaṃhārakapañha-Jātaka wird in jeder Hinsicht im Umangga-Jātaka vorkommen. Sabbasaṃhārakapañhajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Sabbasaṃhārakapañha-Jātaka, das zehnte. Parosatavaggo ekādasamo. Die Parosata-Gruppe, die elfte. Tassuddānaṃ – Die Zusammenfassung davon lautet: Parosatampi paṇṇikaṃ, verī ca mittavindakaṃ; Dubbalañca udañcanī, sālittampi ca bāhiyaṃ; Kuṇḍakapūvasabbasaṃhārakanti. Das Parosata-Jātaka, das Paṇṇika-Jātaka, das Verī-Jātaka und das Mittavindaka-Jātaka; das Dubbala-Jātaka, das Udañcanī-Jātaka, das Sālittaka-Jātaka und das Bāhiya-Jātaka; das Kuṇḍakapūva-Jātaka und das Sabbasaṃhāraka-Jātaka. 12. Haṃcivaggo 12. Die Haṃci-Gruppe [111] 1. Gadrabhapañhajātakavaṇṇanā [111] 1. Die Erklärung des Gadrabhapañha-Jātaka Haṃci tuvaṃ evamaññasīti ayampi gadrabhapañho mahāumaṅgajātakeyeva (jā. 2.22.590 ādayo) āvi bhavissati. „Haṃci tuvaṃ evamaññasi“ – auch dieses Gadrabhapañha-Jātaka wird genau im Mahā-Umangga-Jātaka vorkommen. Gadrabhapañhajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Gadrabhapañha-Jātaka, das erste. [112] 2. Amarādevīpañhajātakavaṇṇanā [112] 2. Die Erklärung des Amarādevīpañha-Jātaka Yena sattubilaṅgā cāti ayampi amarādevipañho nāma tattheva āvi bhavissati. „Yena sattubilaṅgā ca“ – auch dieses sogenannte Amarādevīpañha-Jātaka wird genau dort vorkommen. Amarādevīpañhajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Amarādevīpañha-Jātaka, das zweite. [113] 3. Siṅgālajātakavaṇṇanā [113] 3. Die Erklärung des Siṅgāla-Jātaka Saddahāsi [Pg.450] siṅgālassāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi samaye bhikkhū dhammasabhāyaṃ sannipatitvā ‘‘āvuso, devadattena pañca bhikkhusatāni ādāya gayāsīsaṃ gantvā ‘yaṃ samaṇo gotamo karoti, na so dhammo. Yamahaṃ karomi, ayameva dhammo’ti te bhikkhū attano laddhiṃ gāhāpetvā ṭhānappattaṃ musāvādaṃ katvā saṅghaṃ bhinditvā ekasīmāya dve uposathā katā’’ti devadattassa aguṇakathaṃ kathentā nisīdiṃsu. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva musāvādī, pubbepi musāvādīyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Saddahāsi siṅgālassa“ – dies erzählte der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verweilte, bezüglich Devadatta. Zu jener Zeit hatten sich die Mönche in der Versammlungshalle versammelt und saßen da, während sie über die Fehler Devadattas sprachen: „Ihr Brüder, Devadatta hat fünfhundert Mönche mitgenommen, ist nach Gayāsīsa gegangen und hat gesagt: ‚Was der Asket Gotama tut, ist nicht das Dhamma. Was ich tue, das allein ist das Dhamma.‘ Er hat jene Mönche veranlasst, seine eigene Ansicht anzunehmen, hat eine schwerwiegende Lüge begangen, die in die Hölle führt, den Orden gespalten und innerhalb einer einzigen Sīmā zwei Uposatha-Feiern abgehalten.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem“, sprach er: „Mönche, nicht nur jetzt ist Devadatta ein Lügner, auch in der Vergangenheit war er bereits ein Lügner“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto susānavane rukkhadevatā hutvā nibbatti. Tadā bārāṇasiyaṃ nakkhattaṃ ghuṭṭhaṃ ahosi. Manussā ‘‘yakkhabalikammaṃ karomā’’ti tesu tesu caccararacchādiṭṭhānesu macchamaṃsādīni vippakiritvā kapālakesu bahuṃ suraṃ ṭhapayiṃsu. Atheko siṅgālo aḍḍharattasamaye niddhamanena nagaraṃ pavisitvā macchamaṃsaṃ khāditvā suraṃ pivitvā punnāgagacchantaraṃ pavisitvā yāva aruṇuggamanā niddaṃ okkami. So pabujjhitvā ālokaṃ disvā ‘‘idāni nikkhamituṃ na sakkā’’ti maggasamīpaṃ gantvā adissamāno nipajjitvā aññe manusse disvāpi kiñci avatvā ekaṃ brāhmaṇaṃ mukhadhovanatthāya gacchantaṃ disvā cintesi ‘‘brāhmaṇā nāma dhanalolā honti, imaṃ dhanena palobhetvā yathā maṃ upakacchakantare katvā uttarāsaṅgena paṭicchādetvā nagarā nīharati, tathā karissāmī’’ti. So manussabhāsāya ‘‘brāhmaṇā’’ti āha. So nivattitvā ‘‘ko maṃ pakkosatī’’ti āha. ‘‘Ahaṃ, brāhmaṇā’’ti. ‘‘Kiṃkāraṇā’’ti. ‘‘Brāhmaṇa, mayhaṃ dve kahāpaṇasatāni atthi. Sace maṃ upakacchakantare katvā uttarāsaṅgena paṭicchādetvā yathā na koci passati, tathā nagarā nikkhāmetuṃ sakkosi, tuyhaṃ te kahāpaṇe dassāmī’’ti. Brāhmaṇo dhanalobhena ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā taṃ tathā katvā ādāya nagarā nikkhamitvā thokaṃ agamāsi. Atha naṃ siṅgālo pucchi ‘‘kataraṭṭhānaṃ, brāhmaṇā’’ti? ‘‘Asukaṃ nāmā’’ti. ‘‘Aññaṃ thokaṃ ṭhānaṃ gacchā’’ti. Evaṃ punappunaṃ vadanto mahāsusānaṃ patvā ‘‘idha maṃ otārehī’’ti [Pg.451] āha. Tattha naṃ otāresi. Atha siṅgālo ‘‘tena hi, brāhmaṇa, uttarisāṭakaṃ pattharā’’ti āha. So dhanalobhena ‘‘sādhū’’ti patthari. Atha naṃ ‘‘imaṃ rukkhamūlaṃ khaṇāhī’’ti pathavikhaṇane yojetvā brāhmaṇassa uttarisāṭakaṃ abhiruyha catūsu kaṇṇesu ca majjhe cāti pañcasu ṭhānesu sarīranissandaṃ pātetvā makkhetvā ceva temetvā ca susānavanaṃ pāvisi. Bodhisatto rukkhaviṭape ṭhatvā imaṃ gāthamāha – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als Baumgottheit in einem Friedhofswald wiedergeboren. Damals wurde in Bārāṇasī ein Fest ausgerufen. Die Menschen dachten: „Wir wollen ein Opfer für die Yakkhas darbringen“, streuten an verschiedenen Kreuzungen, Straßen und Plätzen Fisch, Fleisch und anderes aus und stellten in Tonschalen reichlich Branntwein bereit. Da betrat ein Schakal zur Mitternachtszeit durch einen Abflusskanal die Stadt, fraß von dem Fisch und Fleisch, trank von dem Branntwein, schlüpfte in ein Dickicht von Punnāga-Bäumen und schlief bis zum Sonnenaufgang ein. Als er erwachte und das Tageslicht sah, dachte er: „Jetzt kann ich nicht mehr entkommen“, lief in die Nähe der Straße, legte sich unsichtbar hin und sagte, obwohl er andere Menschen sah, kein Wort. Doch als er einen Brahmanen sah, der vorbeiging, um sich das Gesicht zu waschen, dachte er: „Brahmanen sind wahrlich geldgierig. Ich werde diesen mit Reichtum ködern, so dass er mich unter seine Achsel nimmt, mit seinem Obergewand bedeckt und aus der Stadt hinausträgt. So will ich es machen.“ Er rief ihn mit menschlicher Stimme: „O Brahmane!“ Dieser wandte sich um und fragte: „Wer ruft mich?“ „Ich bin es, Brahmane!“ „Aus welchem Grund?“ „Brahmane, ich besitze zweihundert Kahāpaṇas. Wenn du mich unter deine Achsel nimmst, mit deinem Obergewand bedeckst, so dass mich niemand sieht, und mich so aus der Stadt hinausbringen kannst, werde ich dir diese Kahāpaṇas geben.“ Aus Gier nach dem Geld willigte der Brahmane mit den Worten „Gut!“ ein, verfuhr so mit ihm, nahm ihn mit, verließ die Stadt und ging ein Stück weit. Da fragte ihn der Schakal: „Welcher Ort ist dies, Brahmane?“ „Er heißt soundso“, antwortete er. „Geh noch ein kleines Stück weiter zu einem anderen Ort“, sagte er. Während er dies immer wieder sagte, erreichten sie den großen Friedhof, und er sprach: „Setze mich hier ab!“ Dort setzte er ihn ab. Da sprach der Schakal: „Nun denn, Brahmane, breite dein Obergewand aus!“ Dieser breitete es aus Gier nach dem Geld mit den Worten „Gut!“ aus. Daraufhin beschäftigte er ihn mit dem Graben der Erde, indem er sagte: „Grabe an dieser Baumwurzel!“, stieg auf das Obergewand des Brahmanen, entleerte an fünf Stellen – an den vier Ecken und in der Mitte – seine Körpersäfte, beschmierte und durchnässte es damit und lief in den Friedhofswald. Der Bodhisatta stand in einer Astgabel des Baumes und sprach folgende Strophe: 113. 113. ‘‘Saddahāsi siṅgālassa, surāpītassa brāhmaṇa; Sippikānaṃ sataṃ natthi, kuto kaṃsasatā duve’’ti. „Glaubst du etwa dem betrunkenen Schakal, o Brahmane? Er besitzt nicht einmal hundert Muschelschalen, woher sollten da zweihundert Kupfermünzen kommen?“ Tattha saddahāsīti saddahasi, ayameva vā pāṭho, pattiyāyasīti attho. Sippikānaṃ sataṃ natthīti etassa hi sippikāsatampi natthi. Kuto kaṃsasatā duveti dve kahāpaṇasatāni panassa kuto evāti. Darin bedeutet „saddahāsi“: du glaubst, oder dies ist einfach die Lesart, der Sinn ist „du vertraust“. „Sippikānaṃ sataṃ natthi“ bedeutet: Dieser besitzt ja nicht einmal hundert Muschelschalen. „Kuto kaṃsasatā duve“ bedeutet: Woher sollten für ihn denn zweihundert Kahāpaṇas (Münzen) kommen? Bodhisatto imaṃ gāthaṃ vatvā ‘‘gaccha, brāhmaṇa, tava sāṭakaṃ dhovitvā nhāyitvā attano kammaṃ karohī’’ti vatvā antaradhāyi. Brāhmaṇo tathā katvā ‘‘vañcito vatamhī’’ti domanassappatto pakkāmi. Nachdem der Bodhisatta diese Strophe gesprochen hatte, sagte er: „Geh, Brahmane, wasche dein Gewand, bade dich und gehe deiner Arbeit nach!“, und verschwand. Der Brahmane tat so, dachte voller Kummer: „Ach, ich bin wahrlich betrogen worden!“ und ging davon. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā siṅgālo devadatto ahosi, rukkhadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der Schakal Devadatta, die Baumgottheit aber war ich selbst.“ Siṅgālajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Siṅgāla-Jātaka, die dritte.
[114] 4. Mitacintījātakavaṇṇanā [114] 4. Die Erklärung des Mitacintī-Jātaka. Bahucintī appacintīti idaṃ satthā jetavane viharanto dve mahallakatthere ārabbha kathesi. Te kira janapade ekasmiṃ araññāvāse vassaṃ vasitvā ‘‘satthu dassanatthāya gacchissāmā’’ti pātheyyaṃ sajjetvā ‘‘ajja gacchāma, sve gacchāmā’’ti māsaṃ atikkāmetvā puna pātheyyaṃ sajjetvā tatheva māsaṃ, puna māsanti evaṃ attano kusītabhāvena ceva nivāsaṭṭhāne ca apekkhāya tayo māse atikkāmetvā [Pg.452] tato nikkhamma jetavanaṃ gantvā sabhāgaṭṭhāne pattacīvaraṃ paṭisāmetvā satthāraṃ passiṃsu. Atha ne bhikkhū pucchiṃsu ‘‘ciraṃ vo, āvuso, buddhupaṭṭhānaṃ akarontānaṃ, kasmā evaṃ cirāyitthā’’ti? Te tamatthaṃ ārocesuṃ. Atha nesaṃ so ālasiyakusītabhāvo bhikkhusaṅghe pākaṭo jāto. Dhammasabhāyampi tesaṃ bhikkhūnameva ālasiyabhāvaṃ nissāya kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte te pakkosāpetvā ‘‘saccaṃ kira tumhe, bhikkhave, alasā kusītā’’ti pucchitvā ‘‘saccaṃ, bhante’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idānevete alasā, pubbepi alasā ceva nivāsaṭṭhāne ca sālayā sāpekkhā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Bahucintī appacintī“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana verweilte, in Bezug auf zwei alte Theras. Diese hatten, wie man hört, in einer Waldunterkunft im Lande die Regenzeit verbracht und dachten: „Wir wollen aufbrechen, um den Meister zu sehen.“ Sie bereiteten ihren Reiseproviant vor, ließen jedoch mit den Gedanken „Heute reisen wir ab, morgen reisen wir ab“ einen Monat vergehen. Sie bereiteten erneut Proviant vor, ließen auf dieselbe Weise wieder einen Monat verstreichen und dann noch einen Monat. So ließen sie wegen ihrer eigenen Trägheit sowie aus Anhänglichkeit an ihren Wohnort drei Monate vergehen. Danach brachen sie von dort auf, gelangten zum Jetavana, verstauten Almosenschalen und Gewänder an einem geeigneten Ort und suchten den Meister auf. Da fragten sie die Mönche: „Es ist lange her, ihr Ehrwürdigen, dass ihr dem Buddha nicht eure Aufwartung gemacht habt. Warum habt ihr so lange gezögert?“ Sie berichteten ihnen diese Angelegenheit. Da wurde jene Trägheit und Nachlässigkeit von ihnen in der Mönchsgemeinschaft bekannt. Auch in der Versammlungshalle brachten die Mönche ein Gespräch über eben die Trägheit jener Mönche auf. Der Meister kam hinzu und fragte: „Mit welchem Gespräch, o Mönche, sitzt ihr hier zusammen?“ Als sie antworteten: „Mit diesem und jenem“, ließ er jene Mönche rufen und fragte: „Ist es wahr, Mönche, dass ihr träge und nachlässig seid?“ Sie antworteten: „Es ist wahr, o Herr.“ Da sprach der Meister: „Mönche, nicht erst jetzt sind diese beiden träge; auch in der Vergangenheit waren sie träge und voller Sehnsucht und Anhänglichkeit an ihren Wohnort“, und trug eine Begebenheit aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bārāṇasinadiyaṃ tayo macchā ahesuṃ, bahucintī, appacintī, mitacintīti tesaṃ nāmāni. Te araññato manussapathaṃ āgamiṃsu. Tattha mitacintī itare dve evamāha ‘‘ayaṃ manussapatho nāma sāsaṅko sappaṭibhayo, kevaṭṭā nānappakārāni jālakuminādīni khipitvā macche gaṇhanti, mayaṃ araññameva gacchāmā’’ti. Itare dve janā alasatāya ceva āmisagiddhatāya ca ‘‘ajja gacchāma, sve gacchāmā’’ti tayo māse atikkāmesuṃ. Atha kevaṭṭā nadiyaṃ jālaṃ khipiṃsu. Bahucintī ca appacintī ca gocaraṃ gaṇhantā purato gacchanti. Te attano andhabālatāya jālagandhaṃ asallakkhetvā jālakucchimeva pavisiṃsu. Mitacintī pacchato āgacchanto jālagandhaṃ sallakkhetvā tesañca jālakucchiṃ paviṭṭhabhāvaṃ ñatvā ‘‘imesaṃ kusītānaṃ andhabālānaṃ jīvitadānaṃ dassāmī’’ti cintetvā bahipassena jālakucchiṭṭhānaṃ gantvā jālakucchiṃ phāletvā nikkhantasadiso hutvā udakaṃ āluḷento jālassa purato patitvā puna jālakucchiṃ pavisitvā pacchimabhāgena phāletvā nikkhantasadiso udakaṃ āluḷento pacchimabhāge pati. Kevaṭṭā ‘‘macchā jālaṃ phāletvā gatā’’ti maññamānā jālakoṭiyaṃ gahetvā ukkhipiṃsu. Te dvepi macchā jālato muccitvā udake patiṃsu. Iti tehi mitacintiṃ nissāya jīvitaṃ laddhaṃ. Als einst Brahmadatta in Benares regierte, gab es im Fluss von Benares drei Fische; Bahucintī (der Viel-Denker), Appacintī (der Wenig-Denker) und Mitacintī (der Maßvoll-Denker) waren ihre Namen. Sie kamen aus der Wildnis in den Bereich der Menschen. Dort sprach Mitacintī zu den anderen beiden: 'Dieser sogenannte Bereich der Menschen ist gefahrvoll und voller Schrecken. Fischer werfen vielerlei Netze, Reusen und Ähnliches aus und fangen die Fische. Lasst uns lieber in die Wildnis zurückkehren.' Die anderen beiden schoben es jedoch aus Trägheit und Gier nach Nahrung drei Monate lang auf, indem sie sagten: 'Heute gehen wir, morgen gehen wir.' Da warfen Fischer ein Netz in den Fluss. Bahucintī und Appacintī schwammen auf der Nahrungssuche voraus. Aufgrund ihrer eigenen blinden Torheit bemerkten sie den Geruch des Netzes nicht und schwammen direkt in das Innere des Netzes. Mitacintī, der hinterherkam, bemerkte den Geruch des Netzes und erkannte, dass jene in das Innere des Netzes geraten waren. Er dachte: 'Ich werde diesen trägen, blinden Toren das Geschenk des Lebens geben.' Er schwamm an der Außenseite zur Stelle des Netzes hin, tat so, als ob er das Netz zerrissen hätte und entkommen wäre, wühlte das Wasser auf und sprang vor das Netz. Dann schlüpfte er erneut in das Netz hinein, tat so, als ob er es am hinteren Teil zerrissen hätte und entkommen wäre, wühlte das Wasser auf und sprang hinter das Netz. Die Fischer dachten: 'Die Fische haben das Netz zerrissen und sind entkommen', ergriffen den Rand des Netzes und hoben es empor. So befreiten sich auch diese beiden Fische aus dem Netz und fielen ins Wasser. Auf diese Weise erlangten sie durch die Hilfe von Mitacintī ihr Leben wieder. Satthā [Pg.453] imaṃ atītaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit erzählt hatte, sprach er, als vollkommen Erwachter, diesen Vers: 114. 114. ‘‘Bahucintī appacintī, ubho jāle abajjhare; Mitacintī pamocesi, ubho tattha samāgatā’’ti. 'Sowohl Bahucintī als auch Appacintī verfingen sich im Netz; Mitacintī befreite sie, und im Wasser kamen beide wieder mit ihm zusammen.' Tattha bahucintīti bahucintanatāya vitakkabahulatāya evaṃladdhanāmo. Itaresupi dvīsu ayameva nayo. Ubho tattha samāgatāti mitacintiṃ nissāya laddhajīvitā tattha udake puna ubhopi janā mitacintinā saddhiṃ samāgatāti attho. Dabei bezeichnet 'Bahucintī' denjenigen, der diesen Namen aufgrund seines vielen Nachdenkens und der Fülle seiner Gedankengänge erhalten hat. Bei den anderen beiden ist es ebenso zu verstehen. 'Beide kamen dort zusammen' bedeutet: Nachdem sie durch die Hilfe von Mitacintī ihr Leben gerettet hatten, kamen beide im Wasser wieder mit Mitacintī zusammen. Evaṃ satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi, saccapariyosāne mahallakā bhikkhū sotāpattiphale patiṭṭhahiṃsu. Tadā bahucintī ca appacintī ca ime dve ahesuṃ, mitacintī pana ahameva ahosinti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt und die Wahrheiten verkündet hatte, stellte er die Verbindung zum Jātaka her. Am Ende der Wahrheiten gelangten die alten Mönche zur Frucht des Stromeintritts. Damals waren Bahucintī und Appacintī diese beiden Mönche, Mitacintī aber war ich selbst. Mitacintījātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Mitacintī-Jātaka, die vierte.
[115] 5. Anusāsikajātakavaṇṇanā [115] 5. Die Erklärung des Anusāsika-Jātaka Yāyaññe manusāsatīti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ anusāsikaṃ bhikkhuniṃ ārabbha kathesi. Sā kira sāvatthivāsinī ekā kuladhītā pabbajitvā upasampannakālato paṭṭhāya samaṇadhamme ananuyuttā āmisagiddhā hutvā yattha aññā bhikkhuniyo na gacchanti, tādise nagarassa ekadese piṇḍāya carati. Athassā manussā paṇītapiṇḍapātaṃ denti. Sā rasataṇhāya bajjhitvā ‘‘sace imasmiṃ padese aññāpi bhikkhuniyo piṇḍāya carissanti, mayhaṃ lābho parihāyissati. Yathā etaṃ padesaṃ aññā nāgacchanti, evaṃ mayā kātuṃ vaṭṭatī’’ti cintetvā bhikkhunūpassayaṃ gantvā ‘‘ayye, asukaṭṭhāne caṇḍo hatthī, caṇḍo asso, caṇḍo meṇḍo, caṇḍo kukkuro carati, saparissayaṭṭhānaṃ, mā tattha piṇḍāya caritthā’’ti bhikkhuniyo anusāsati. Tassā vacanaṃ sutvā ekā bhikkhunīpi taṃ padesaṃ gīvaṃ parivattetvā na olokesi. Tassā ekasmiṃ divase tasmiṃ padese piṇḍāya carantiyā vegenekaṃ [Pg.454] gehaṃ pavisantiyā caṇḍo meṇḍako paharitvā ūruṭṭhikaṃ bhindi. Manussā vegena upadhāvitvā dvidhā bhinnaṃ ūruṭṭhikaṃ ekato bandhitvā taṃ bhikkhuniṃ mañcenādāya bhikkhunūpassayaṃ nayiṃsu. Bhikkhuniyo ‘‘ayaṃ aññā bhikkhuniyo anusāsitvā sayaṃ tasmiṃ padese carantī ūruṭṭhikaṃ bhindāpetvā āgatā’’ti parihāsaṃ akaṃsu. Tampi tāya katakāraṇaṃ na cirasseva bhikkhusaṅghe pākaṭaṃ ahosi. 'Die andere belehrt': Diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf eine belehrende Nonne (Anusāsikā). Sie war, wie man sagt, eine Tochter aus gutem Hause in Sāvatthī, die nach ihrer Ordination und dem Erhalt der höheren Weihen das mönchische Leben vernachlässigte. Aus Gier nach materiellen Dingen ging sie an einem solchen Ort der Stadt auf Almosengang, den die anderen Nonnen nicht aufsuchten. Dort gaben die Menschen ihr vorzügliche Almosenspeise. Von der Gier nach Wohlgeschmack gefesselt, dachte sie: 'Wenn auch andere Nonnen in dieser Gegend auf Almosengang gehen, wird mein Gewinn schwinden. Ich muss dafür sorgen, dass keine anderen Nonnen hierherkommen.' Sie ging zum Nonnenkloster und ermahnte die Nonnen fortlaufend: 'Ehrwürdige Schwestern, an jenem Ort treibt sich ein wilder Elefant, ein wildes Pferd, ein wilder Schafbock und ein wilder Hund herum. Es ist ein gefährlicher Ort; geht dort nicht auf Almosengang!' Als sie ihre Worte hörten, wandte keine einzige Nonne auch nur den Blick dorthin. Als sie jedoch eines Tages selbst in dieser Gegend auf Almosengang war und eilig ein Haus betrat, stieß sie ein wilder Schafbock und brach ihr den Oberschenkelknochen. Die Menschen eilten herbei, schienten den zweifach gebrochenen Oberschenkelknochen und trugen die Nonne auf einer Trage zum Nonnenkloster zurück. Die Nonnen verspotteten sie und sagten: 'Diese belehrt andere Nonnen, geht aber selbst in jene Gegend auf Almosengang und kommt nun mit gebrochenem Oberschenkel zurück!' Auch diese Tat von ihr wurde schon bald in der Mönchsgemeinschaft bekannt. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ bhikkhū ‘‘āvuso, asukā anusāsikā bhikkhunī aññaṃ anusāsitvā sayaṃ tasmiṃ padese caramānā caṇḍena meṇḍakena ūruṃ bhindāpesī’’ti tassā aguṇakathaṃ kathesuṃ. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva, pubbepesā aññe anusāsatiyeva, sayaṃ pana na vattati, niccakālaṃ dukkhameva anubhotī’’ti vatvā atītaṃ āhari. Eines Tages sprachen die Mönche in der Versammlungshalle über ihre Verfehlung: 'Brüder, die Nonne namens Anusāsikā, die andere belehrt, lief selbst in jener Gegend herum und ließ sich von einem wilden Schafbock den Oberschenkel brechen.' Der Meister kam herbei und fragte: 'Mönche, worüber sprecht ihr hier in eurer Versammlung?' Als sie antworteten: 'Über dieses Thema', sprach er: 'Mönche, nicht erst jetzt belehrt sie andere, ohne sich selbst daran zu halten, und erfährt dadurch stets nur Leid; das hat sie auch schon in der Vergangenheit getan.' Und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto araññe sakuṇayoniyaṃ nibbattitvā vayappatto sakuṇajeṭṭhako hutvā anekasakuṇasahassaparivāro himavantaṃ pāvisi. Tassa tattha vasanakāle ekā caṇḍasakuṇikā mahāvattanimaggaṃ gantvā gocaraṃ gaṇhāti. Sā tattha sakaṭehi patitāni vīhimuggabījādīni labhitvā ‘‘yathā idāni imaṃ padesaṃ aññe sakuṇā nāgacchanti, tathā karissāmī’’ti cintetvā sakuṇasaṅghassa ovādaṃ deti ‘‘vattanimahāmaggo nāma sappaṭibhayo, hatthiassādayo ceva caṇḍagoṇayuttayānādīni ca sañcaranti, sahasā uppatitumpi na sakkā hoti, na tattha gantabba’’nti. Sakuṇasaṅgho tassā ‘‘anusāsikā’’teva nāmaṃ akāsi. Als einst Brahmadatta in Benares regierte, wurde der Bodhisatta im Wald als Vogel wiedergeboren. Herangewachsen wurde er zum Vogelführer und zog, umgeben von vielen Tausend Vögeln, in den Himavanta-Wald. Während er dort lebte, flog ein wilder Vogel direkt zur großen Handelsstraße, um dort Nahrung zu suchen. Sie fand dort Reiskörner, Mungobohnen und andere Samen, die von den Wagen gefallen waren, und dachte: 'Ich muss dafür sorgen, dass jetzt keine anderen Vögel an diesen Ort kommen.' Sie gab der Vogelschar folgenden Rat: 'Die große Handelsstraße ist voller Gefahren. Elefanten, Pferde und Wagen, die von wilden Stieren gezogen werden, fahren dort entlang. Man kann auch nicht schnell genug auffliegen. Ihr solltet nicht dorthin gehen.' Die Vogelschar gab ihr daraufhin den Namen 'Anusāsikā' (die Ratgeberin). Sā ekadivasaṃ vattanimahāmagge carantī atimahāvegena āgacchantassa yānassa saddaṃ sutvā nivattitvā oloketvā ‘‘dūre tāvā’’ti caratiyeva. Atha naṃ yānaṃ vātavegena sīghameva sampāpuṇi, sā uṭṭhātuṃ nāsakkhi, cakkena dvidhā chinditvā gatā. Sakuṇajeṭṭhako sakuṇe samānento taṃ adisvā ‘‘anusāsikā na dissati, upadhāretha na’’nti āha. Sakuṇā upadhārentā taṃ mahāmagge dvidhā chinnaṃ disvā sakuṇajeṭṭhakassa ārocesuṃ. Sakuṇajeṭṭhako ‘‘sā aññā sakuṇikā vāretvā sayaṃ tattha caramānā dvidhā chinnā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als sie eines Tages auf der großen Landstraße Futter suchte, hörte sie das Geräusch eines Wagens, der mit sehr großer Geschwindigkeit herankam. Sie wandte sich um, blickte hin und dachte: „Er ist noch weit weg“, und suchte einfach weiter nach Nahrung. Da erreichte der Wagen mit Windeseile sehr schnell jenen Ort. Sie konnte nicht mehr auffliegen, wurde vom Rad entzweigeschnitten und ging zugrunde. Als der Vogelführer die Vögel versammelte und sie nicht sah, sagte er: „Die Anusāsikā ist nicht zu sehen, sucht nach ihr!“ Als die Vögel suchten und sie entzweigeschnitten auf der Landstraße fanden, berichteten sie es dem Vogelführer. Der Vogelführer sagte: „Nachdem sie die anderen Vögel zurückgehalten hatte, suchte sie selbst dort nach Nahrung und wurde entzweigeschnitten“, und sprach diese Strophe: 115. 115. ‘‘Yāyaññe [Pg.455] manusāsati, sayaṃ loluppacārinī; Sāyaṃ vipakkhikā seti, hatā cakkena sāsikā’’ti. „Sie, die andere belehrt, während sie selbst von flatterhafter Gier getrieben umherstreift; diese Belehrende liegt nun da mit zerbrochenen Flügeln, erschlagen von einem Rad.“ Tattha yāyaññe manusāsatīti yakāro padasandhikaro, yā aññe anusāsatīti attho. Sayaṃ loluppacārinīti attanā loluppacārinī samānā. Sāyaṃ vipakkhikā setīti sā esā vihatapakkhā hutvā mahāmagge sayati. Hatā cakkena sāsikāti yānacakkena hatā sāsikā sakuṇikāti. Hierbei bedeutet „yāyaññe manusāsatī“: Der Buchstabe „y“ dient der Wortverbindung (Sandhi); die Bedeutung ist „yā aññe anusāsatī“ (die andere belehrt). „sayaṃ loluppacārinī“ bedeutet: selbst von flatterhafter Gier getrieben umherstreifend. „sāyaṃ vipakkhikā setī“ bedeutet: genau diese liegt auf der Hauptstraße, nachdem ihre Flügel zerstört wurden. „hatā cakkena sāsikā“ bedeutet: das belehrende Vogelweibchen, erschlagen vom Wagenrad. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā anusāsikā sakuṇikā ayaṃ anusāsikā bhikkhunī ahosi, sakuṇajeṭṭhako pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündung dargelegt hatte, führte er die Geburtengeschichte zusammen: „Damals war das Anusāsikā-Vogelweibchen diese Nonne Anusāsikā, der Vogelführer aber war ich selbst.“ Anusāsikajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Anusāsika-Jātaka, die fünfte.
[116] 6. Dubbacajātakavaṇṇanā [116] 6. Erklärung des Dubbaca-Jātaka Atikaramakarācariyāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ dubbacabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tassa vatthu navakanipāte gijjhajātake (jā. 1.9.1 ādayo) āvi bhavissati. Satthā pana taṃ bhikkhuṃ āmantetvā ‘‘bhikkhu na tvaṃ idāneva dubbaco, pubbepi dubbacoyeva. Dubbacabhāveneva paṇḍitānaṃ ovādaṃ akaronto sattippahārena jīvitakkhayaṃ pattosī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Atikaramakarācariya“ – dies erzählte der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf einen schwer zu belehrenden Mönch. Dessen Vorgeschichte wird im Neuner-Buch im Gijjha-Jātaka deutlich werden. Der Meister sprach jedoch jenen Mönch an und sagte: „Mönch, nicht erst jetzt bist du schwer zu belehren, auch in der Vergangenheit warst du schon schwer zu belehren. Gerade wegen deiner Unbelehrbarkeit hast du den Rat der Weisen missachtet und fandest durch einen Lanzenstich den Tod“, und er trug eine Begebenheit aus der Vergangenheit vor: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto laṅghanaṭakayoniyaṃ paṭisandhiṃ gahetvā vayappatto paññavā upāyakusalo ahosi. So ekassa laṅghanakassa santike sattilaṅghanasippaṃ sikkhitvā ācariyena saddhiṃ sippaṃ dassento vicarati. Ācariyo panassa catunnaṃyeva sattīnaṃ laṅghanasippaṃ jānāti, na pañcannaṃ. So ekadivasaṃ ekasmiṃ gāmake sippaṃ dassento surāmadamatto ‘‘pañca sattiyo laṅghissāmī’’ti paṭipāṭiyā ṭhapesi. Atha naṃ bodhisatto āha ‘‘ācariya, tvaṃ pañcasattilaṅghanasippaṃ na jānāsi, ekaṃ sattiṃ hara. Sace laṅghissasi, pañcamāya sattiyā viddho marissasī’’ti. So suṭṭhu mattatāya ‘‘tvañhi mayhaṃ pamāṇaṃ na jānāsī’’ti tassa vacanaṃ anādiyitvā catasso laṅghitvā pañcamāya [Pg.456] sattiyā daṇḍake madhukapupphaṃ viya āvuto paridevamāno nipajji. Atha naṃ bodhisatto ‘‘paṇḍitānaṃ vacanaṃ akatvā imaṃ byasanaṃ pattosī’’ti imaṃ gāthamāha – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta im Schoß einer Familie von Lanzenakrobaten Wiedergeburt an; als er herangewachsen war, war er weise und gewandt in den Mitteln. Er erlernte bei einem Lanzenakrobaten die Kunst des Lanzenspringens und zog mit seinem Lehrer umher, um die Kunst vorzuführen. Sein Lehrer beherrschte jedoch nur die Kunst, über vier Lanzen zu springen, nicht aber über fünde. Als dieser eines Tages in einem kleinen Dorf seine Kunst vorführte, war er vom Alkohol berauscht und dachte: „Ich werde über fünf Lanzen springen“, und stellte sie in einer Reihe auf. Da sprach der Bodhisatta zu ihm: „Lehrer, Ihr beherrscht die Kunst des Springens über fünf Lanzen nicht. Entfernt eine Lanze! Wenn Ihr springt, werdet Ihr von der fünften Lanze durchbohrt werden und sterben.“ Er aber, völlig betrunken, sagte: „Du kennst meine Fähigkeiten gar nicht“, missachtete dessen Worte, sprang über vier Lanzen hinweg und wurde an der fünften Lanze aufgespießt – wie eine Madhuka-Blüte auf einem Holzstäbchen. Klagend lag er da. Da sprach der Bodhisatta zu ihm: „Weil du nicht auf die Worte der Weisen gehört hast, bist du in dieses Verderben geraten“, und verkündete diese Strophe: 116. 116. ‘‘Atikaramakarācariya, mayhampetaṃ na ruccati; Catutthe laṅghayitvāna, pañcamāyasi āvuto’’ti. „Ihr habt das Maß überschritten, Lehrer! Auch mir gefällt diese Übertreibung nicht. Nach dem Sprung über die vierte wurdet Ihr an der fünften Lanze aufgespießt.“ Tattha atikaramakarācariyāti ācariya ajja tvaṃ atikaraṃ akari, attano karaṇato atirekaṃ karaṇaṃ akarīti attho. Mayhampetaṃ na ruccatīti mayhaṃ antevāsikassapi samānassa etaṃ tava karaṇaṃ na ruccati, tena te ahaṃ paṭhamameva kathesinti dīpeti. Catutthe laṅghayitvānāti catutthe sattithale apatitvā attānaṃ laṅghayitvā. Pañcamāyasi āvutoti paṇḍitānaṃ vacanaṃ aggaṇhanto idāni pañcamāya sattiyā āvutosīti. Idaṃ vatvā ācariyaṃ sattito apanetvā kattabbayuttakaṃ akāsi. Darin bedeutet „atikaramakarācariyā“: Lehrer, heute habt Ihr das Maß überschritten, Ihr habt eine Tat begangen, die weit über Euer gewohntes Tun hinausging. „mayhampetaṃ na ruccatī“ zeigt: Auch mir, obwohl ich Euer Schüler bin, gefällt diese Eure Tat nicht; daher habe ich es Euch schon von Anfang an gesagt. „catutthe laṅghayitvānā“ bedeutet: ohne auf der vierten Lanzenspitze zu landen, habt Ihr Euch darübergeworfen. „pañcamāyasi āvuto“ bedeutet: Da Ihr die Worte der Weisen nicht annahmt, seid Ihr nun an der fünften Lanze aufgespießt worden. Nachdem der Bodhisatta dies gesagt hatte, zog er den Lehrer von der Lanze und tat, was zu tun angemessen war. Satthā imaṃ atītaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā ācariyo ayaṃ dubbaco ahosi, antevāsiko pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Begebenheit aus der Vergangenheit dargelegt hatte, führte er die Geburtengeschichte zusammen: „Damals war der Lehrer dieser schwer zu belehrende Mönch, der Schüler aber war ich selbst.“ Dubbacajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Dubbaca-Jātaka, die sechste.
[117] 7. Tittirajātakavaṇṇanā [117] 7. Erklärung des Tittira-Jātaka Accuggatātibalatāti idaṃ satthā jetavane viharanto kokālikaṃ ārabbha kathesi. Tassa vatthu terasakanipāte takkāriyajātake (jā. 1.13.104 ādayo) āvi bhavissati. Satthā pana ‘‘na, bhikkhave, kokāliko idāneva attano vācaṃ nissāya naṭṭho, pubbepi naṭṭhoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Accuggatātibalatā“ – dies erzählte der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf Kokālika. Dessen Vorgeschichte wird im Dreizehner-Buch im Takkāriya-Jātaka deutlich werden. Der Meister sprach jedoch: „Mönche, nicht erst jetzt ging Kokālika aufgrund seiner eigenen Worte zugrunde, auch in der Vergangenheit ging er bereits zugrunde“, und er trug eine Begebenheit aus der Vergangenheit vor: Atīte [Pg.457] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto takkasilāyaṃ sabbasippāni uggaṇhitvā kāme pahāya isipabbajjaṃ pabbajitvā pañcābhiññā aṭṭha samāpattiyo nibbattesi. Himavantappadese sabbo isigaṇo sannipatitvā taṃ ovādācariyaṃ katvā parivāresi. So pañcannaṃ isisatānaṃ ovādācariyo hutvā jhānakīḷaṃ kīḷanto himavante vasati. Tadā eko cettha paṇḍurogī tāpaso kuṭhāriṃ gahetvā kaṭṭhaṃ phāleti. Atheko mukharatāpaso tassa santike nisīditvā ‘‘idha pahāraṃ dehi, idha pahāraṃ dehī’’ti taṃ tāpasaṃ rosesi. So kujjhitvā ‘‘na dāni me tvaṃ dāruphālanasippaṃ sikkhāpanakācariyo’’ti tiṇhaṃ kuṭhāriṃ ukkhipitvā naṃ ekappahāreneva jīvitakkhayaṃ pāpesi. Bodhisatto tassa sarīrakiccaṃ kāresi. Tadā assamato avidūre ekasmiṃ vammikapāde eko tittiro vasati. So sāyaṃ pātaṃ tasmiṃ vammikamatthake ṭhatvā mahāvassitaṃ vassati. Taṃ sutvā eko luddako ‘‘tittirena bhavitabba’’nti cintetvā saddasaññāya tattha gantvā taṃ vadhitvā ādāya gato. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer hochangesehenen Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, erlernte er in Takkasilā alle Künste, entsagte den sinnlichen Genüssen, trat in den Orden der Seher ein und erlangte die fünf höheren Geisteskräfte sowie die acht Errungenschaften. Im Himalayagebiet versammelte sich die gesamte Schar der Seher, machte ihn zu ihrem beratenden Lehrer und umgab ihn. Als beratender Lehrer von fünfhundert Sehern verweilte er im Himalaya und gab sich dem meditativem Spiel der Vertiefungen hin. Zu jener Zeit spaltete dort ein blasser Asket mit einer Axt Holz. Da setzte sich ein schwatzhafter Asket neben ihn und neckte jenen Asketen, indem er ständig sagte: „Schlag hier zu! Schlag hier zu!“ Jener wurde zornig, rief: „Du bist nicht mein Lehrer, der mir die Kunst des Holzspaltens beizubringen hat!“, hob die scharfe Axt und tötete den schwatzhaften Asketen mit einem einzigen Schlag. Der Bodhisatta ließ die Bestattung für den Verstorbenen ausführen. Damals lebte unweit der Einsiedelei am Fuße eines Ameisenhügels ein Rebhuhn. Es stand abends und morgens auf dem Ameisenhügel und stieß ein lautes Rufen aus. Als ein Jäger dies hörte, dachte er: „Dort muss ein Rebhuhn sein“, ging aufgrund des Rufs dorthin, tötete es und nahm es mit. Bodhisatto tassa saddaṃ asuṇanto ‘‘asukaṭṭhāne tittiro vasati, kiṃ nu kho tassa saddo na sūyatī’’ti tāpase pucchi. Te tassa tamatthaṃ ārocesuṃ. So ubhopi tāni kāraṇāni saṃsandetvā isigaṇamajjhe imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta dessen Ruf nicht mehr hörte, fragte er die Asketen: „An jenem Ort lebt doch ein Rebhuhn, warum hört man seine Stimme nicht mehr?“ Sie berichteten ihm den Sachverhalt. Er verglich diese beiden Vorfälle miteinander und sprach inmitten der Schar der Seher diese Strophe: 117. 117. ‘‘Accuggatātibalatā, ativelaṃ pabhāsitā; Vācā hanati dummedhaṃ, tittiraṃ vātivassita’’nti. „Eine Rede, die überheblich und allzu heftig ist und über die Maßen zur Unzeit gesprochen wird, tötet den Unweisen – so wie das übermäßige Rufen das Rebhuhn tötet.“ Tattha accuggatāti atiuggatā. Atibalatāti punappunaṃ bhāsanena atibalasabhāvā. Ativelaṃ pabhāsitāti atikkantavelā pamāṇātikkamena bhāsitā. Tittiraṃ vātivassitanti yathā tittiraṃ ativassitaṃ hanati, tathā evarūpā vācā dummedhaṃ bālapuggalaṃ hanatīti. Dabei bedeutet ‚accuggatā‘: übermäßig hochfahrend. ‚Atibalatā‘ bedeutet: von übermächtiger Beschaffenheit durch ständiges Wiederholen. ‚Ativelaṃ pabhāsitā‘ bedeutet: zu einer ungebührlichen Zeit, das rechte Maß überschreitend gesprochen. ‚Tittiraṃ vātivassitaṃ‘ bedeutet: Wie das übermäßige Rufen das Rebhuhn tötet, so tötet eine Rede von solcher Art den unweisen, törichten Menschen. Evaṃ bodhisatto isigaṇassa ovādaṃ datvā cattāro brahmavihāre bhāvetvā brahmalokaparāyaṇo ahosi. Nachdem der Bodhisatta so der Schar der Weisen Unterweisung gegeben und die vier göttlichen Verweilungszustände entfaltet hatte, ging er nach seinem Scheiden in die Brahma-Welt ein. Satthā [Pg.458] ‘‘na, bhikkhave, kokāliko idāneva attano vacanaṃ nissāya naṭṭho, pubbepi naṭṭhoyevā’’ti vatvā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā mukharatāpaso kokāliko ahosi, isigaṇo buddhaparisā, gaṇasatthā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister sprach: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt ist Kokālika aufgrund seiner eigenen Worte ins Verderben gestürzt, auch in der Vergangenheit ist er bereits ins Verderben gestürzt.“ Nachdem er diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka mit den Worten: „Damals war der geschwätzige Einsiedler Kokālika, die Schar der Einsiedler war die Anhängerschaft des Buddha, der Führer der Schar aber war ich selbst.“ Tittirajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Tittira-Jātaka, die siebte.
[118] 8. Vaṭṭajātakavaṇṇanā [118] 8. Die Erklärung des Vaṭṭa-Jātaka. Nācintayanto purisoti idaṃ satthā jetavane viharanto uttaraseṭṭhiputtaṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyaṃ kira uttaraseṭṭhi nāma ahosi mahāvibhavo. Tassa bhariyāya kucchiyaṃ eko puññavā satto brahmalokā cavitvā paṭisandhiṃ gahetvā vayappatto abhirūpo pāsādiko ahosi brahmavaṇṇī. Atha ekadivasaṃ sāvatthiyaṃ kattikachaṇe nakkhatte ghuṭṭhe sabbo loko nakkhattanissito ahosi. Tassa sahāyakā aññe seṭṭhiputtā sapajāpatikā ahesuṃ. Uttaraseṭṭhiputtassa pana dīgharattaṃ brahmaloke vasitattā kilesesu cittaṃ na allīyati. Athassa sahāyakā ‘‘uttaraseṭṭhiputtassapi ekaṃ itthiṃ ānetvā nakkhattaṃ kīḷissāmā’’ti sammantayitvā taṃ upasaṅkamitvā ‘‘samma, imasmiṃ nagare kattikachaṇo ghuṭṭho, tuyhampi ekaṃ itthiṃ ānetvā nakkhattaṃ kīḷissāmā’’ti āhaṃsu. ‘‘Na me attho itthiyā’’ti ca vuttepi punappunaṃ nibandhitvā sampaṭicchāpetvā ekaṃ vaṇṇadāsiṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ katvā tassa gharaṃ netvā ‘‘tvaṃ seṭṭhiputtassa santikaṃ gacchā’’ti sayanigharaṃ pesetvā nikkhamiṃsu. Taṃ sayanigharaṃ paviṭṭhampi seṭṭhiputto neva oloketi, nālapati. Sā cintesi ‘‘ayaṃ evaṃ rūpasobhaggappattaṃ uttamavilāsasampannaṃ maṃ neva oloketi, nālapati, idāni naṃ attano itthikuttalīlāya olokāpessāmī’’ti itthilīlaṃ dassentī pahaṭṭhākārena aggadante vivaritvā hasitaṃ akāsi. Seṭṭhiputto oloketvā dantaṭṭhike nimittaṃ gaṇhi. Athassa aṭṭhikasaññā uppajji, sakalampi taṃ sarīraṃ aṭṭhikasaṅkhalikā viya paññāyi. So tassā paribbayaṃ datvā ‘‘gacchā’’ti uyyojesi. „Nācintayanto puriso“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana verweilte, in Bezug auf den Sohn des Großkaufmanns Uttara. In Sāvatthi gab es, wie man sagt, einen sehr vermögenden Großkaufmann namens Uttara. Im Schoß seiner Frau nahm ein verdienstvolles Wesen, das aus der Brahma-Welt geschieden war, Wiederverkörperung an. Als er herangewachsen war, war er von wunderschöner Gestalt, anmutig und von glänzender, brahma-gleicher Erscheinung. Eines Tages nun wurde in Sāvatthi das Kattika-Fest ausgerufen, und das ganze Volk gab sich dem Fest hin. Seine Freunde, andere Kaufmannssöhne, waren alle mit ihren Ehefrauen zusammen. Da jedoch der Sohn des Großkaufmanns Uttara lange Zeit in der Brahma-Welt gelebt hatte, haftete sein Geist nicht an den sinnlichen Begierden. Da beratschlagten seine Freunde: „Lasst uns auch für den Sohn des Großkaufmanns Uttara eine Frau herbeiholen und das Fest feiern!“ Sie traten an ihn heran und sagten: „Freund, in dieser Stadt ist das Kattika-Fest ausgerufen worden. Wir wollen auch für dich eine Frau herbeiholen und das Fest feiern.“ Obwohl er antwortete: „Ich habe kein Bedürfnis nach einer Frau“, bedrängten sie ihn immer wieder, bis er schließlich einwilligte. Sie schmückten eine Edelkurtisane mit allerlei Schmuckstücken, brachten sie zu seinem Haus und schickten sie in sein Schlafgemach mit den Worten: „Geh zu dem Kaufmannssohn!“ Dann gingen sie fort. Obwohl sie das Schlafgemach betreten hatte, blickte der Kaufmannssohn sie weder an, noch sprach er mit ihr. Sie dachte: „Er blickt mich, die ich von vollendeter Schönheit und herrlichster Anmut bin, weder an, noch spricht er mit mir. Nun will ich ihn durch mein weibliches Gehabe dazu bringen, mich anzusehen.“ Indem sie ihr weibliches Spiel trieb, öffnete sie mit freudiger Miene die Lippen, sodass ihre Zahnspitzen sichtbar wurden, und lachte. Der Kaufmannssohn blickte hin und erfasste das Zeichen der Knochenreihe ihrer Zähne. Da stieg in ihm die Vorstellung des Skeletts auf. Ihr ganzer Körper erschien ihm wie ein Skelett. Er gab ihr ihren Lohn und schickte sie fort mit den Worten: „Geh hin!“ Taṃ tassa gharā otiṇṇaṃ eko issaro antaravīthiyaṃ disvā paribbayaṃ datvā attano gharaṃ nesi, sattāhe vītivatte nakkhattaṃ ositaṃ. Vaṇṇadāsiyā [Pg.459] mātā dhītu āgamanaṃ adisvā seṭṭhiputtānaṃ santikaṃ gantvā ‘‘kahaṃ sā’’ti pucchi. Te uttaraseṭṭhiputtassa gharaṃ gantvā ‘‘kahaṃ sā’’ti pucchiṃsu. ‘‘Taṅkhaṇaññeva tassā paribbayaṃ datvā uyyojesi’’nti. Athassā mātā rodantī ‘‘dhītaraṃ me na passāmi, dhītaraṃ me samānethā’’ti uttaraseṭṭhiputtaṃ ādāya rañño santikaṃ agamāsi. Rājā aṭṭaṃ vinicchinanto ‘‘ime te seṭṭhiputtā vaṇṇadāsiṃ ānetvā tuyhaṃ adaṃsū’’ti pucchi. ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Idāni sā kaha’’nti? ‘‘Na jānāmi, taṅkhaṇaññeva naṃ uyyojesi’’nti. ‘‘Idāni taṃ samānetuṃ sakkosī’’ti? ‘‘Na sakkomi, devā’’ti. Rājā ‘‘sace samānetuṃ na sakkoti, rājāṇamassa karothā’’ti āha. Atha naṃ pacchābāhaṃ bandhitvā ‘‘rājāṇaṃ karissāmā’’ti gahetvā pakkamiṃsu. ‘‘Seṭṭhiputtaṃ kira vaṇṇadāsiṃ samānetuṃ asakkontaṃ rājā rājāṇaṃ kāretī’’ti sakalanagaraṃ ekakolāhalaṃ ahosi. Mahājano ure hatthe ṭhapetvā ‘‘kiṃ nāmetaṃ, sāmi, attano te ananucchavikaṃ laddha’’nti paridevati. Seṭṭhipi puttassa pacchato pacchato paridevanto gacchati. Als sie aus seinem Haus herabstieg, sah sie ein reicher Mann auf der Straße, zahlte ihr den Lohn und nahm sie mit in sein Haus. Nach Ablauf von sieben Tagen war das Fest vorbei. Die Mutter der Edelkurtisane, die das Ausbleiben ihrer Tochter bemerkte, ging zu den Kaufmannssöhnen und fragte: „Wo ist sie?“ Diese gingen zum Haus des Sohnes des Großkaufmanns Uttara und fragten: „Wo ist sie?“ Er antwortete: „Gleich im selben Augenblick habe ich ihr den Lohn gegeben und sie weggeschickt.“ Da ging ihre Mutter weinend zum König, führte den Sohn des Großkaufmanns Uttara mit sich und klagte: „Ich kann meine Tochter nicht finden. Bringt mir meine Tochter herbei!“ Der König, der den Fall untersuchte, fragte ihn: „Haben dir diese Kaufmannssöhne eine Edelkurtisane gebracht und übergeben?“ – „Ja, o Herr.“ – „Wo ist sie jetzt?“ – „Ich weiß es nicht. Genau in jenem Augenblick habe ich sie entlassen.“ – „Kannst du sie jetzt herbeischaffen?“ – „Ich kann es nicht, o Herr.“ Der König sprach: „Wenn er sie nicht herbeischaffen kann, so vollstreckt an ihm die königliche Strafe.“ Da banden sie ihm die Arme hinter dem Rücken zusammen und führten ihn ab mit den Worten: „Wir werden die königliche Strafe an ihm vollziehen!“ In der ganzen Stadt entstand ein gewaltiger Aufruhr: „Es heißt, der König lässt am Sohn des Großkaufmanns die königliche Strafe vollziehen, weil er die Edelkurtisane nicht herbeischaffen kann!“ Die Menschen legten die Hände auf die Brust und jammerten: „Was ist das nur, o Herr? Du hast etwas erlitten, das deiner nicht würdig ist!“ Auch der Vater des Kaufmannssohns folgte ihm weinend auf dem Fuße. Seṭṭhiputto cintesi ‘‘idaṃ mayhaṃ evarūpaṃ dukkhaṃ agāre vasanabhāvena uppannaṃ. Sace ito muccissāmi, mahāgotamasammāsambuddhassa santike pabbajissāmī’’ti. Sāpi kho vaṇṇadāsī taṃ kolāhalasaddaṃ sutvā ‘‘kiṃsaddo nāmeso’’ti pucchitvā taṃ pavattiṃ sutvā vegena otaritvā ‘‘ussaratha, ussaratha, sāmī, maṃ rājapurisānaṃ daṭṭhuṃ dethā’’ti attānaṃ dassesi. Rājapurisā taṃ disvā mātaraṃ paṭicchāpetvā seṭṭhiputtaṃ muñcitvā pakkamiṃsu. So sahāyakaparivutova nadiṃ gantvā sasīsaṃ nhāyitvā gehaṃ gantvā bhuttapātarāso mātāpitaro vanditvā pabbajjaṃ anujānāpetvā cīvarasāṭake ādāya mahantena parivārena satthu santikaṃ gantvā vanditvā pabbajjaṃ yācitvā pabbajjañca upasampadañca labhitvā avissaṭṭhakammaṭṭhāno vipassanaṃ vaḍḍhetvā na cirasseva arahatte patiṭṭhāsi. Der Kaufmannssohn dachte: „Dieses so geartete Leiden ist mir nur erwachsen, weil ich im Hausstand lebe. Wenn ich hiervon frei werde, werde ich mich in die Gegenwart des großen, vollkommen erwachten Buddha Gotama begeben und das Hausleben verlassen.“ Auch jene Edelkurtisane hörte den Lärm des Aufruhrs und fragte: „Was ist das für ein Geräusch?“ Als sie den Sachverhalt erfuhr, eilte sie rasch herbei und rief: „Weicht zurück, weicht zurück, ihr Herren! Zeigt mich den königlichen Dienern!“ Und sie zeigte sich selbst. Als die königlichen Diener sie sahen, übergaben sie sie der Mutter, ließen den Kaufmannssohn frei und gingen fort. Dieser ging, von seinen Freunden begleitet, zum Fluss, badete samt dem Haupt, kehrte nach Hause zurück, nahm sein Frühstück ein, verbeugte sich vor seinen Eltern und bat sie um die Erlaubnis, das Hausleben zu verlassen. Er nahm das Gewandtuch an sich, ging in Begleitung einer großen Gefolgschaft zum Meister, verbeugte sich vor ihm, bat um die Aufnahme in den Orden und empfing sowohl das Noviziat als auch die höhere Weihe. Ohne sein Meditationsobjekt jemals aufzugeben, entfaltete er die Hellsicht und erlangte schon bald die Arahatschaft. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū ‘‘āvuso, uttaraseṭṭhiputto attano bhaye uppanne sāsanassa guṇaṃ jānitvā ‘imamhā dukkhā muccamāno pabbajissāmī’ti cintetvā tena sucintitena maraṇamutto ceva, pabbajito ca aggaphale patiṭṭhito’’ti tassa guṇakathaṃ kathesuṃ. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti [Pg.460] pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, uttaraseṭṭhiputtova attano bhaye uppanne ‘iminā upāyena imamhā dukkhā muccissāmī’ti cintetvā maraṇabhayā mutto, atīte paṇḍitāpi attano bhaye uppanne ‘iminā upāyena imamhā dukkhā muccissāmā’ti cintetvā maraṇabhayato mucciṃsuyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Eines Tages versammelten sich die Mönche in der Lehrhalle und sprachen über die Vorzüge des Uttara, des Sohnes des Schatzmeisters: „Freunde, als der Sohn des Schatzmeisters Uttara in Gefahr geriet, erkannte er den Wert der Lehre und dachte: ‚Wenn ich von diesem Leiden befreit bin, werde ich in die Hauslosigkeit hinausgehen.‘ Durch diesen heilsamen Gedanken wurde er vom Tode befreit, trat in den Orden ein und gründete sich auf die höchste Frucht.“, so sprachen sie über seine Tugenden. Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch jetzt hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem und jenem“, sprach er: „Mönche, nicht nur der Sohn des Schatzmeisters Uttara dachte in Zeiten der Gefahr: ‚Durch dieses Mittel werde ich von diesem Leiden frei werden‘, und wurde so von der Todesfurcht befreit. Auch in der Vergangenheit dachten Weise, als ihnen Gefahr drohte: ‚Durch dieses Mittel werden wir von diesem Leiden frei werden‘, und wurden wahrlich von der Todesfurcht befreit.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto cutipaṭisandhivasena parivattanto vaṭṭakayoniyaṃ nibbatti. Tadā eko vaṭṭakaluddako araññā bahū vaṭṭake āharitvā gehe ṭhapetvā gocaraṃ datvā mūlaṃ gahetvā āgatāgatānaṃ hatthe vaṭṭake vikkiṇanto jīvikaṃ kappeti. So ekadivasaṃ bahūhi vaṭṭakehi saddhiṃ bodhisattampi gahetvā ānesi. Bodhisatto cintesi ‘‘sacāhaṃ iminā dinnaṃ gocarañca pānīyañca paribhuñjissāmi, ayaṃ maṃ gahetvā āgatānaṃ manussānaṃ dassati. Sace pana na paribhuñjissāmi, ahaṃ milāyissāmi, atha maṃ milāyantaṃ disvā manussā na gaṇhissanti. Evaṃ me sotthi bhavissati, imaṃ upāyaṃ karissāmī’’ti. So tathā karonto milāyitvā aṭṭhicammamatto ahosi. Manussā taṃ disvā na gaṇhiṃsu. Luddako bodhisattaṃ ṭhapetvā sesesu vaṭṭakesu parikkhīṇesu pacchiṃ nīharitvā dvāre ṭhapetvā bodhisattaṃ hatthatale katvā ‘‘kiṃ nu kho ayaṃ vaṭṭako’’ti cintetvā oloketuṃ āraddho. Athassa pamattabhāvaṃ ñatvā bodhisatto pakkhe pasāretvā uppatitvā araññameva gato. Aññe vaṭṭakā taṃ disvā ‘‘kiṃ nu kho na paññāyasi, kahaṃ gatosī’’ti pucchitvā ‘‘luddakena gahitomhī’’ti vutte ‘‘kinti katvā muttosī’’ti pucchiṃsu. Bodhisatto ‘‘ahaṃ tena dinnaṃ gocaraṃ aggahetvā pānīyaṃ apivitvā upāyacintāya mutto’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Kreislauf von Tod und Wiedergeburt im Schoß einer Wachtel geboren. Damals verdiente ein Wachtelfänger seinen Lebensunterhalt, indem er viele Wachteln aus dem Wald brachte, sie im Hause hielt, fütterte und für Geld an die vorbeikommenden Kunden verkaufte. Eines Tages fing er auch den Bodhisatta zusammen mit vielen anderen Wachteln und brachte ihn heim. Der Bodhisatta überlegte: „Wenn ich das von ihm dargebotene Futter und Wasser zu mir nehme, wird er mich nehmen und den herbeikommenden Menschen übergeben. Wenn ich aber nichts verzehre, werde ich abmagern. Wenn die Menschen mich dann abgemagert sehen, werden sie mich nicht kaufen. Auf diese Weise werde ich gerettet sein. Ich will diese List anwenden.“ Da er so handelte, magerte er ab und bestand nur noch aus Haut und Knochen. Die Menschen sahen ihn und kauften ihn nicht. Der Wachtelfänger ließ den Bodhisatta beiseite, und als die übrigen Wachteln alle verkauft waren, holte er den Korb heraus, stellte ihn an die Tür, setzte den Bodhisatta auf seine Handfläche und begann ihn zu betrachten, während er dachte: „Was ist wohl mit dieser Wachtel los?“ Da bemerkte der Bodhisatta die Unachtsamkeit des Fängers, breitete seine Flügel aus, flog empor und kehrte in den Wald zurück. Als die anderen Wachteln ihn sahen, fragten sie: „Warum warst du verschwunden? Wo bist du gewesen?“ Als er antwortete: „Ich wurde vom Wachtelfänger gefangen“, fragten sie weiter: „Wie hast du dich befreit?“ Der Bodhisatta sprach: „Ich habe das von ihm dargebotene Futter nicht angenommen, kein Wasser getrunken und mich durch ein kluges Vorhaben befreit“, und sprach folgende Strophe: 118. 118. ‘‘Nācintayanto puriso, visesamadhigacchati; Cintitassa phalaṃ passa, muttosmi vadhabandhanā’’ti. „Ein Mensch, der nicht nachdenkt, erlangt keinen Vorzug; sieh die Frucht des Nachdenkens: Ich bin befreit von Tod und Fesselung!“ Tatthāyaṃ piṇḍattho – puriso dukkhaṃ patvā ‘‘iminā nāma upāyena imamhā dukkhā muccissāmī’’ti acintayanto attano dukkhā mokkhasaṅkhātaṃ visesaṃ nādhigacchati. Idāni pana mayā cintitakammassa phalaṃ passa. Teneva upāyena [Pg.461] muttosmi vadhabandhanā, maraṇato ca bandhanato ca muttosmi ahanti. Evaṃ bodhisatto attanā katakāraṇaṃ ācikkhi. Darin ist dies die zusammenfassende Bedeutung: Wenn ein Mensch in Leiden gerät und nicht nachdenkt: ‚Durch diese List werde ich von diesem Leiden frei werden‘, erlangt er nicht jenen Vorzug, der Befreiung von seinem eigenen Leiden genannt wird. Nun aber sieh die Frucht des von mir bedachten Werkes: Eben durch diese List bin ich von Tod und Fesselung befreit; ich bin befreit vom Tode und von der Gefangenschaft. So erklärte der Bodhisatta die Tat, die er vollbracht hatte. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā maraṇamutto vaṭṭako ahameva ahosi’’nti. Der Meister verkündete diese Lehrrede und führte die Wiedergeburtsgeschichte zusammen: „Die damals vom Tode befreite Wachtel war ich selbst.“ Vaṭṭajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Vaṭṭa-Jātaka ist die achte.
[119] 9. Akālarāvijātakavaṇṇanā [119] 9. Die Erklärung des Akālarāvi-Jātaka. Amātāpitarasaṃvaddhoti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ akālarāviṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. So kira sāvatthivāsī kulaputto sāsane pabbajitvā vattaṃ vā sikkhaṃ vā na uggaṇhi. So ‘‘imasmiṃ kāle mayā vattaṃ kātabbaṃ, imasmiṃ kāle upaṭṭhātabbaṃ, imasmiṃ kāle uggahetabbaṃ, imasmiṃ kāle sajjhāyitabba’’nti na jānāti, paṭhamayāmepi majjhimayāmepi pacchimayāmepi pabuddhapabuddhakkhaṇeyeva mahāsaddaṃ karoti, bhikkhū niddaṃ na labhanti. Dhammasabhāyaṃ bhikkhū ‘‘āvuso, asuko nāma bhikkhu evarūpe ratanasāsane pabbajitvā vattaṃ vā sikkhaṃ vā kālaṃ vā akālaṃ vā na jānātī’’ti tassa aguṇakathaṃ kathesuṃ. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idānevesa akālarāvī, pubbepi akālarāvīyeva, kālākālaṃ ajānanabhāvena ca gīvāya vaṭṭitāya jīvitakkhayaṃ patto’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Nicht von Mutter und Vater aufgezogen“ – diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verwelte, im Hinblick auf einen Mönch, der zur Unzeit Lärm schlug. Dieser Sohn einer guten Familie aus Sāvatthi hatte sich zwar in der Lehre weihen lassen, lernte aber weder die Pflichten noch die Übungsregeln. Er wusste nicht: „Zu dieser Zeit muss ich meine Pflichten erfüllen, zu dieser Zeit muss ich dienen, zu dieser Zeit muss ich lernen, zu dieser Zeit muss ich rezitieren.“ Sowohl in der ersten, der mittleren als auch in der letzten Nachtwache machte er, wann immer er aufwachte, einen gewaltigen Lärm, sodass die Mönche keinen Schlaf fanden. In der Lehrhalle sprachen die Mönche über seine Verfehlungen: „Freunde, jener Mönch hat sich in einer so kostbaren Lehre weihen lassen, doch er kennt weder Pflichten noch Übungsregeln, weder die rechte noch die unrechte Zeit.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch jetzt hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem und jenem“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt schreit dieser zur Unzeit; auch in der Vergangenheit schrie er zur Unzeit, und weil er die rechte von der unrechten Zeit nicht zu unterscheiden wusste, wurde ihm der Hals umgedreht, wodurch er sein Leben verlor.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto sabbasippesu pāraṃ gantvā bārāṇasiyaṃ disāpāmokkho ācariyo hutvā pañcasate māṇave sippaṃ vāceti. Tesaṃ māṇavānaṃ eko kālarāvī kukkuṭo atthi, te tassa vassitasaddena uṭṭhāya sippaṃ sikkhanti. So kālamakāsi. Te aññaṃ kukkuṭaṃ pariyesantā caranti. Atheko māṇavako susānavane dārūni uddharanto ekaṃ kukkuṭaṃ disvā ānetvā pañjare ṭhapetvā paṭijaggati. So susāne vaḍḍhitattā ‘‘asukavelāya nāma vassitabba’’nti ajānanto kadāci atirattiṃ vassati, kadāci aruṇuggamane. Māṇavā [Pg.462] tassa atirattiṃ vassitakāle sippaṃ sikkhantā yāva aruṇuggamanā sikkhituṃ na sakkonti, niddāyamānā gahitaṭṭhānampi na passanti. Atipabhāte vassitakāle sajjhāyassa okāsameva na labhanti. Māṇavā ‘‘ayaṃ atirattiṃ vā vassati atipabhāte vā, imaṃ nissāya amhākaṃ sippaṃ na niṭṭhāyissatī’’ti taṃ gahetvā gīvaṃ vaṭṭetvā jīvitakkhayaṃ pāpetvā ‘‘akālarāvī kukkuṭo amhehi ghātito’’ti ācariyassa kathesuṃ. Ācariyo ‘‘ovādaṃ aggahetvā saṃvaḍḍhitabhāvena maraṇaṃ patto’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer angesehenen Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, meisterte er alle Künste vollkommen, wurde ein weltberühmter Lehrer in Bārāṇasī und unterrichtete fünfhundert junge Schüler in den Wissenschaften. Diese Schüler besaßen einen Hahn, der zur rechten Zeit krähte; durch dessen Krähen standen sie auf und lernten ihre Lektionen. Dieser Hahn starb jedoch. Auf der Suche nach einem anderen Hahn liefen sie umher. Da fand ein Schüler, der im Friedhofswald Holz sammelte, einen Hahn, brachte ihn mit, setzte ihn in einen Käfig und zog ihn auf. Weil jener Hahn jedoch auf dem Friedhof aufgewachsen war, wusste er nicht: „Zu dieser bestimmten Stunde muss man krähen.“ Manchmal krähte er mitten in der Nacht, manchmal erst bei Sonnenaufgang. Wenn er nun mitten in der Nacht krähte, lernten die Schüler zwar bis zum Morgengrauen, konnten aber nichts behalten, da sie schläfrig waren, und erkannten nicht einmal die gelernten Stellen. Krähte er hingegen erst am späten Morgen, fanden sie überhaupt keine Zeit mehr für ihre Rezitationen. Die Schüler dachten: „Dieser Hahn kräht entweder viel zu früh in der Nacht oder viel zu spät am Morgen. Wenn wir uns nach diesem Hahn richten, werden wir unsere Studien niemals abschließen.“ Sie packten ihn, drehten ihm den Hals um, töteten ihn und berichteten dem Lehrer: „Wir haben den Hahn, der zur Unzeit kräht, getötet.“ Der Lehrer sprach: „Weil er aufwuchs, ohne Ermahnung anzunehmen, hat er den Tod gefunden“, und sprach folgende Strophe. 119. 119. ‘‘Amātāpitara-saṃvaddho, anācerakule vasaṃ; Nāyaṃ kālaṃ akālaṃ vā, abhijānāti kukkuṭo’’ti. „Weder von Mutter noch von Vater aufgezogen, noch im Hause eines Lehrers lebend, kennt dieser Hahn weder die rechte noch die unrechte Zeit.“ Tattha amātāpitarasaṃvaddhoti mātāpitaro nissāya tesaṃ ovādaṃ aggahetvā saṃvaḍḍho. Anācerakule vasanti ācariyakulepi avasamāno, ācārasikkhāpakaṃ kañci nissāya avasitattāti attho. Nāyaṃ kālaṃ akālaṃ vāti ‘‘imasmiṃ kāle vassitabbaṃ, imasmiṃ na vassitabba’’nti evaṃ vassitabbayuttakaṃ kālaṃ vā akālaṃ vā esa kukkuṭo na jānāti, ajānanabhāveneva jīvitakkhayaṃ pattoti. Idaṃ kāraṇaṃ dassetvā bodhisatto yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gato. Hierbei bedeutet „ohne Mutter und Vater aufgewachsen“ (amātāpitarasaṃvaddho), dass er zwar bei seinen Eltern aufwuchs, aber ohne deren Ermahnungen anzunehmen. „In einer Familie ohne Lehrer lebend“ (anācerakule vasaṃ) bedeutet, dass er nicht im Hause eines Lehrers lebte, da er sich an niemanden hielt, der ihn in rechtem Verhalten unterwies. „Dieser kennt weder die richtige noch die falsche Zeit“ bedeutet: Dieser Hahn weiß nicht: „Zu dieser Zeit soll man krähen, zu jener Zeit soll man nicht krähen“ – er erkennt also nicht die zum Krähen angemessene oder unangemessene Zeit, und eben wegen dieser Unwissenheit fand er den Tod. Nachdem der Bodhisatta diesen Grund aufgezeigt hatte, verblieb er dort für die Dauer seines Lebens und ging dann gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā akālarāvī kukkuṭo ayaṃ bhikkhu ahosi, antevāsikā buddhaparisā, ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Der damals zur Unzeit krähende Hahn war dieser Mönch, die Schüler waren die Gefolgschaft des Buddha, und der Lehrer war ich selbst.“ Akālarāvijātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Akālarāvi-Jātaka ist die neunte.
[120] 10. Bandhanamokkhajātakavaṇṇanā [120] 10. Die Erklärung des Bandhanamokkha-Jātaka. Abaddhā tattha bajjhantīti idaṃ satthā jetavane viharanto ciñcamāṇavikaṃ ārabbha kathesi. Tassā vatthu dvādasakanipāte mahāpadumajātake (jā. 1.12.106 ādayo) āvi bhavissati. Tadā pana satthā ‘‘na, bhikkhave, ciñcamāṇavikā idāneva maṃ abhūtena abbhācikkhati, pubbepi abbhācikkhiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Die Ungebundenen werden dort gebunden“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf Ciñcamāṇavikā. Ihre Geschichte wird im Zwölfer-Buch (Dvādasakanipāta) im Mahāpaduma-Jātaka offenkundig werden. Damals aber sprach der Meister: „Ihr Mönche, nicht erst jetzt verleumdet mich Ciñcamāṇavikā mit Unwahrheiten, auch in der Vergangenheit hat sie mich bereits verleumdet“, und trug eine Begebenheit aus der Vergangenheit vor. Atīte [Pg.463] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto purohitassa gehe nibbattitvā vayappatto pitu accayena tasseva purohito ahosi. Tena aggamahesiyā varo dinno hoti ‘‘bhadde, yaṃ icchasi, taṃ vadeyyāsī’’ti. Sā evamāha ‘‘na mayhaṃ añño varo nāma dullabho, ito pana te paṭṭhāya aññā itthī kilesavasena na oloketabbā’’ti. So paṭikkhipitvā punappunaṃ nippīḷiyamāno tassā vacanaṃ atikkamituṃ asakkonto sampaṭicchitvā tato paṭṭhāya soḷasasu nāṭakitthisahassesu kilesavasena ekitthimpi na olokesi. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Hause des Hofpriesters geboren. Nachdem er das Erwachsenenalter erreicht hatte, wurde er nach dem Ableben seines Vaters der Hofpriester desselben Königs. Dieser hatte seiner Hauptgemahlin ein Versprechen gegeben: „Meine Liebe, nenne mir, was immer du begehrst.“ Sie sprach: „Kein anderer Wunsch ist für mich schwer zu erlangen. Doch von heute an darfst du keine andere Frau mehr aus fleischlichem Begehren betrachten.“ Er wies dies zunächst zurück, doch da er immer wieder bedrängt wurde und nicht imstande war, sich ihrem Wunsch zu widersetzen, willigte er ein. Von diesem Tag an blickte er unter den sechzehntausend Tänzerinnen nicht eine einzige Frau mehr aus fleischlichem Begehren an. Athassa paccanto kuppi, paccante ṭhitā yodhā corehi saddhiṃ dve tayo saṅgāme katvā ‘‘ito uttari mayaṃ na sakkomā’’ti rañño paṇṇaṃ pesesuṃ. Rājā tattha gantukāmo balakāyaṃ saṃharitvā taṃ pakkosāpetvā ‘‘bhadde, ahaṃ paccantaṃ gacchāmi, tattha nānappakārāni yuddhāni honti, jayaparājayopi anibaddho, tādisesu ṭhānesu mātugāmo dupparihāro, tvaṃ idheva nivattāhī’’ti āha. Sā ‘‘na sakkā, deva, mayā nivattitu’’nti punappunaṃ raññā paṭikkhittā āha ‘‘tena hi ekekaṃ yojanaṃ gantvā mayhaṃ sukhadukkhajānanatthaṃ ekekaṃ manussaṃ peseyyāthā’’ti. Rājā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā bodhisattaṃ nagare ṭhapetvā mahantena balakāyena nikkhamitvā gacchanto yojane yojane ekekaṃ purisaṃ ‘‘amhākaṃ ārogyaṃ ārocetvā deviyā sukhadukkhaṃ jānitvā āgacchā’’ti pesesi. Sā āgatāgataṃ purisaṃ ‘‘rājā kimatthaṃ taṃ pesetī’’ti pucchitvā ‘‘tumhākaṃ sukhadukkhajānanatthāyā’’ti vutte ‘‘tena hi ehī’’ti tena saddhiṃ asaddhammaṃ paṭisevati. Rājā dvattiṃsayojanamaggaṃ gacchanto dvattiṃsa jane pesesi, sā sabbehipi tehi saddhiṃ tatheva akāsi. Da erhob sich an den Landesgrenzen ein Aufstand. Die dort stationierten Soldaten lieferten sich zwei- oder dreimal Gefechte mit den Räubern und sandten dem König einen Brief: „Darüber hinaus können wir nicht mehr standhalten.“ Der König, der dorthin reisen wollte, zog sein Heer zusammen, ließ die Königin rufen und sprach: „Meine Liebe, ich ziehe an die Grenze. Dort wird es verschiedenartige Kämpfe geben, und Sieg oder Niederlage sind ungewiss. An solchen Orten ist es schwer, eine Frau zu beschützen. Bleibe du lieber hier zurück.“ Sie erwiderte: „O Herr, es ist mir unmöglich, zurückzubleiben.“ Als der König dies wiederholt ablehnte, sagte sie: „Wenn dem so ist, dann sendet mir doch nach jedem Yojana, das Ihr zurücklegt, einen Mann, damit wir gegenseitig von unserem Wohlergehen oder Wehe erfahren.“ Der König willigte ein und sagte: „Es sei so.“ Er ließ den Bodhisatta in der Stadt zurück und zog mit einem großen Heer aus. Auf dem Weg sandte er nach jedem Yojana einen Mann mit den Worten: „Melde der Königin, dass es uns gut geht, erkundige dich nach ihrem Befinden und kehre dann zurück.“ Sie fragte jeden der ankommenden Männer: „Wozu sendet dich der König?“ Wenn er antwortete: „Um nach Eurem Befinden zu sehen“, sprach sie: „Dann komm her!“, und beging mit ihm Ehebruch. Als der König einen Weg von zweiunddreißig Yojanas zurücklegte, sandte er zweiunddreißig Männer aus, und sie tat mit ihnen allen genau dasselbe. Rājā paccantaṃ vūpasametvā janapadaṃ samassāsetvā puna āgacchantopi tatheva dvattiṃsa jane pesesi, sā tehipi saddhiṃ tatheva vippaṭipajjiyeva. Rājā āgantvā jayakkhandhāvāraṭṭhāne ṭhatvā ‘‘nagaraṃ paṭijaggāpetū’’ti bodhisattassa paṇṇaṃ pesesi. Bodhisatto sakalanagaraṃ paṭijaggāpetvā rājanivesanaṃ paṭijaggāpento deviyā vasanaṭṭhānaṃ agamāsi. Sā bodhisattassa rūpasobhaggappattaṃ kāyaṃ disvā saṇṭhātuṃ asakkontī ‘‘ehi[Pg.464], brāhmaṇa, sayanaṃ abhiruhā’’ti āha. Bodhisatto ‘‘mā evaṃ avaca, rājāpi garu, akusalampi bhāyāmi, na sakkā mayā evaṃ kātu’’nti āha. ‘‘Catusaṭṭhiyā pādamūlikānaṃ neva rājā garu, na akusalaṃ bhāyanti. Taveva rājā garu, tvaṃyeva ca akusalaṃ bhāyasī’’ti. ‘‘Āma, devi, sace tesampi evaṃ bhaveyya, na evarūpaṃ kareyyuṃ’’. ‘‘Ahaṃ pana jānamāno evarūpaṃ sāhasiyakammaṃ na karissāmī’’ti. ‘‘Kiṃ bahuṃ vippalapasi, sace me vacanaṃ na karosi, sīsaṃ te chindāpessāmī’’ti. ‘‘Tiṭṭhatu tāva ekasmiṃ attabhāve sīsaṃ, attabhāvasahassepi sīse chijjante na sakkā mayā evarūpaṃ kātu’’nti. Sā ‘‘hotu, jānissāmī’’ti bodhisattaṃ tajjetvā attano gabbhaṃ pavisitvā sarīre nakhavaḷañjaṃ dassetvā telena gattāni abbhañjitvā kiliṭṭhavatthaṃ nivāsetvā gilānālayaṃ katvā dāsiyo āṇāpesi ‘raññā kahaṃ devī’ti vutte ‘gilānā’ti katheyyāthā’’ti. Nachdem der König die Grenze befriedet und dem Land Frieden gebracht hatte, sandte er auch auf dem Rückweg ebenso zweiunddreißig Männer aus, und sie verging sich auch mit diesen in genau derselben Weise. Nach seiner Rückkehr machte der König im Siegeslager Halt und sandte einen Brief an den Bodhisatta mit der Aufforderung: „Lass die Stadt herrichten.“ Der Bodhisatta ließ die gesamte Stadt säubern, und während er den Palast herrichten ließ, betrat er die Gemächer der Königin. Als sie den Körper des Bodhisatta erblickte, der die Vollendung an Schönheit besaß, konnte sie sich nicht beherrschen und sprach: „Komm, Brahmane, steig auf mein Bett!“ Der Bodhisatta erwiderte: „Sprich nicht so! Ich respektiere den König zutiefst und fürchte auch das Unheilsame (akusala). Es ist mir unmöglich, so etwas zu tun.“ Sie entgegnete: „Die vierundsechzig Diener achten weder den König noch fürchten sie das Unheilsame. Nur dir ist der König heilig und nur du fürchtest das Unheilsame!“ Er sagte: „Ja, Königin, wenn sie die Einsicht besäßen, würden sie so etwas gewiss nicht tun. Da ich es jedoch weiß, werde ich eine solche schändliche Tat niemals begehen.“ Sie sprach: „Was redest du so viel Unsinn! Wenn du mir nicht gehorchst, werde ich deinen Kopf abschlagen lassen!“ Er antwortete: „Selbst wenn es um meinen Kopf in diesem einen Leben geht, ja, selbst wenn mir in tausend Leben der Kopf abgeschlagen würde – ich könnte eine solche Tat niemals begehen.“ Sie drohte dem Bodhisatta mit den Worten: „Es sei drum, du wirst schon sehen!“, zog sich in ihr Gemach zurück, fügte sich selbst Kratzspuren von Fingernägeln am Körper zu, salbte ihre Glieder mit Öl, zog schmutzige Kleider an, stellte sich krank und befahl den Dienerinnen: „Wenn der König fragt: ‚Wo ist die Königin?‘, so sollt ihr sagen: ‚Sie ist krank.‘“ Bodhisattopi rañño paṭipathaṃ agamāsi. Rājā nagaraṃ padakkhiṇaṃ katvā pāsādaṃ āruyha deviṃ apassanto ‘‘kahaṃ, devī’’ti pucchi. ‘‘Gilānā, devā’’ti. Sopi sirigabbhaṃ pavisitvā tassā piṭṭhiṃ parimajjanto ‘‘kiṃ te, bhadde, aphāsuka’’nti pucchi. Sā tuṇhī ahosi. Tatiyavāre rājānaṃ oloketvā ‘‘tvampi, mahārāja, jīvasi nāma, mādisāpi itthiyo sassāmikāyeva nāmā’’ti āha. ‘‘Kiṃ etaṃ, bhadde’’ti? Tumhehi nagaraṃ rakkhanatthāya ṭhapito purohito ‘‘tumhākaṃ nivesanaṃ paṭijaggāmī’’ti idhāgantvā attano vacanaṃ akarontiṃ maṃ paharitvā attano manaṃ pūretvā gatoti. Rājā aggimhi pakkhittaloṇasakkharā viya kodhena taṭataṭāyanto sirigabbhā nikkhamitvā dovārikapādamūlikādayo pakkosāpetvā ‘‘gacchatha, bhaṇe, purohitaṃ pacchābāhaṃ bandhitvā vajjhabhāvappattaṃ katvā nagarā nīharitvā āghātanaṃ netvā sīsamassa chindathā’’ti āha. Te vegena gantvā taṃ pacchābāhaṃ bandhitvā vajjhabheriṃ carāpesuṃ. Auch der Bodhisatta ging dem König entgegen. Der König zog im Uhrzeigersinn um die Stadt, betrat den Palast und fragte, als er die Königin nicht sah: „Wo ist die Königin?“ „Sie ist krank, o Herr“, antworteten sie. Da betrat auch er das Prachtgemach, streichelte ihr den Rücken und fragte: „Was fehlt dir, meine Liebe? Welches Unwohlsein hast du?“ Sie schwieg. Beim dritten Mal blickte sie den König an und sagte: „Großer König, lebst du überhaupt noch? Haben Frauen wie ich überhaupt noch einen Ehemann?“ „Was bedeutet das, meine Liebe?“, fragte er. „Der Hauspriester, den ihr zum Schutz der Stadt eingesetzt habt, kam mit den Worten hierher: ‚Ich werde mich um euren Palast kümmern.‘ Da ich seinen Willen nicht tat, schlug er mich, befriedigte sein Begehren und ging fort.“ Der König, der vor Zorn wie ein ins Feuer geworfenes Salzkorn knisterte, verließ das Prachtgemach, ließ die Torwächter, Diener und andere herbeirufen und sprach: „Geht, ihr Männer! Fesselt den Hauspriester mit auf den Rücken gebundenen Armen, erklärt ihn für des Todes schuldig, führt ihn aus der Stadt zur Richtstätte und schlagt ihm den Kopf ab!“ Sie eilten schnell hin, fesselten ihn mit auf den Rücken gebundenen Armen und ließen die Henkerstrommel schlagen. Bodhisatto cintesi – ‘‘addhā tāya duṭṭhadeviyā rājā puretarameva paribhinno, ajja dānāhaṃ attano baleneva attānaṃ mocessāmī’’ti. So te purise āha ‘‘bho, tumhe maṃ mārentā rañño dassetvāva mārethā’’ti. ‘‘Kiṃkāraṇā’’ti? ‘‘Ahaṃ rājakammiko, bahu me kammaṃ kataṃ, bahūni mahānidhiṭṭhānāni jānāmi, rājakuṭumbaṃ mayā vicāritaṃ. Sace maṃ rañño [Pg.465] na dassessatha, bahudhanaṃ nassissati, mayā rañño sāpateyye ācikkhite pacchā kātabbaṃ karothā’’ti. Te taṃ rañño dassayiṃsu. Rājā taṃ disvāva ‘‘kasmā bho, brāhmaṇa, mayi lajjaṃ na akāsi, kasmā te evarūpaṃ pāpakammaṃ kata’’nti āha. ‘‘Mahārāja, ahaṃ sotthiyakule jāto, mayā kunthakipillikamattopi pāṇātipāto na katapubbo, tiṇasalākamattampi adinnaṃ nādinnapubbaṃ, lobhavasena paresaṃ itthī akkhīni ummīletvāpi na olokitapubbā, hassavasenāpi musā na bhāsitapubbā, kusaggenāpi majjaṃ na pītapubbaṃ, ahaṃ tumhesu niraparādho. Sā pana bālā lobhavasena maṃ hatthe gahetvā mayā paṭikkhittā maṃ tajjetvā attanā kataṃ pāpaṃ uttānaṃ katvā mama ācikkhitvā antogabbhaṃ paviṭṭhā. Ahaṃ niraparādho, paṇṇaṃ gahetvā pana āgatā catusaṭṭhi janā sāparādhā, te pakkosāpetvā ‘‘tāya vo vacanaṃ kataṃ, na kata’’nti puccha, devāti. Rājā te catusaṭṭhi jane bandhāpetvā deviṃ pakkosāpetvā ‘‘tayā etehi saddhiṃ pāpaṃ kataṃ, na kata’’nti pucchi. ‘‘Kataṃ, devā’’ti vutte te pacchābāhaṃ bandhāpetvā ‘‘imesaṃ catusaṭṭhijanānaṃ sīsāni chindathā’’ti āṇāpesi. Der Bodhisatta dachte: „Sicherlich hat diese verdorbene Königin den König schon im Voraus gegen mich aufgebracht. Heute werde ich mich nun durch meine eigene Kraft selbst befreien.“ Er sagte zu den Männern: „Ihr Männer, wenn ihr mich tötet, zeigt mich zuerst dem König und tötet mich erst danach.“ „Aus welchem Grund?“, fragten sie. „Ich verrichte königliche Dienste, ich habe viele Taten für den König vollbracht, ich kenne viele Orte großer verborgener Schätze, und das königliche Vermögen wurde von mir verwaltet. Wenn ihr mich dem König nicht zeigt, wird viel Vermögen verloren gehen. Wenn ich dem König die Schätze gezeigt habe, könnt ihr danach tun, was getan werden muss.“ Sie zeigten ihn dem König. Sobald der König ihn sah, sprach er: „O Brahmane, warum hast du keine Scheu vor mir gehabt? Warum hast du eine solche böse Tat begangen?“ „Großer König, ich bin in einer edlen Brahmanenfamilie geboren. Niemals zuvor habe ich das Leben eines Lebewesens genommen, sei es auch nur das einer winzigen Ameise. Niemals zuvor habe ich Ungegebenes genommen, sei es auch nur ein Grashalm. Aus Gier habe ich niemals die Frauen anderer auch nur mit geöffneten Augen angeschaut. Selbst im Scherz habe ich niemals eine Lüge gesprochen. Nicht einmal mit einer Grasspitze habe ich Rauschtrank berührt. Ich bin unschuldig vor euch. Jene törichte Frau jedoch ergriff mich aus Begierde an der Hand. Als ich sie abwies, bedrohte sie mich, machte ihre eigene böse Tat offenbar, warf sie mir vor und betrat dann die innere Kammer. Ich bin unschuldig. Die vierundsechzig Männer jedoch, die kamen, um den königlichen Brief zu empfangen, sind schuldig. Lass sie rufen, o Herr, und frage sie: ‚Habt ihr ihren Willen getan oder nicht?‘“ Der König ließ die vierundsechzig Männer fesseln, rief die Königin herbei und fragte: „Hast du mit diesen eine böse Tat begangen oder nicht?“ Als sie antwortete: „Ich habe es getan, o Herr“, ließ er sie mit auf dem Rücken zusammengebundenen Armen fesseln und befahl: „Schlagt diesen vierundsechzig Männern die Köpfe ab!“ Atha naṃ bodhisatto āha – ‘‘natthi, mahārāja, etesaṃ doso, devī attano ruciṃ kārāpesi. Niraparādhā ete, tasmā nesaṃ khamatha. Tassāpi doso natthi, itthiyo nāma methunadhammena atittā. Jātisabhāvo hi esa. Etāsaṃ khamitabbayuttameva hoti. Tasmā etissāpi khamathā’’ti nānappakārena rājānaṃ saññāpetvā te catusaṭṭhipi jane tañca bālaṃ mocāpetvā sabbesaṃ yathāsakāni ṭhānāni dāpesi. Evaṃ te sabbe mocetvā sakaṭṭhāne patiṭṭhāpetvā bodhisatto rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘mahārāja, andhabālānaṃ nāma avatthukena vacanena abandhitabbayuttakāpi paṇḍitā pacchābāhaṃ baddhā, paṇḍitānaṃ kāraṇayuttena vacanena pacchābāhaṃ baddhāpi muttā. Evaṃ bālā nāma abandhitabbayuttakepi bandhāpenti, paṇḍitā baddhepi mocentī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Da sprach der Bodhisatta zu ihm: „Großer König, diese Männer trifft keine Schuld. Die Königin ließ sie nur ihren eigenen Willen ausführen. Sie sind unschuldig, daher vergebt ihnen. Auch sie selbst trifft keine Schuld, denn Frauen sind ungesättigt im Geschlechtsverkehr. Das ist nun einmal ihre angeborene Natur. Es ist nur recht und billig, ihnen zu vergeben. Darum vergebt auch ihr.“ Auf vielfältige Weise stimmte er den König um, befreite die vierundsechzig Männer und jene törichte Frau und ließ sie alle wieder in ihre jeweiligen Ämter einsetzen. Nachdem er sie alle befreit und in ihre alten Stellungen hatte einsetzen lassen, trat der Bodhisatta vor den König und sprach: „Großer König, durch das haltlose Gerede blinder Toren werden selbst Weise, die nicht gefesselt werden sollten, mit auf dem Rücken gebundenen Armen gefesselt. Doch durch die vernünftige und begründete Rede von Weisen werden selbst jene befreit, die mit auf dem Rücken gebundenen Armen gefesselt sind. So lassen Toren selbst jene fesseln, die nicht gefesselt werden sollten, während Weise selbst die Gefesselten befreien.“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er folgende Strophe: 120. 120. ‘‘Abaddhā tattha bajjhanti, yattha bālā pabhāsare; Baddhāpi tattha muccanti, yattha dhīrā pabhāsare’’ti. „Dort werden Ungefesselte gefesselt, wo Toren das Wort führen; Dort werden selbst Gefesselte befreit, wo Weise das Wort führen.“ Tattha [Pg.466] abaddhāti abandhitabbayuttā. Pabhāsareti pabhāsanti vadanti kathenti. Darin bedeutet „abaddhā“ (Ungefesselte): diejenigen, die nicht gefesselt werden sollten. „Pabhāsareti“: sie sprechen, sagen, erklären. Evaṃ mahāsatto imāya gāthāya rañño dhammaṃ desetvā ‘‘mayā imaṃ dukkhaṃ agāre vasanabhāvena laddhaṃ, idāni me agārena kiccaṃ natthi, pabbajjaṃ me anujāna, devā’’ti pabbajjaṃ anujānāpetvā assumukhaṃ ñātijanaṃ mahantañca vibhavaṃ pahāya isipabbajjaṃ pabbajitvā himavante vasanto abhiññā ca samāpattiyo ca nibbattetvā brahmalokaparāyaṇo ahosi. Nachdem das Große Wesen dem König mit dieser Strophe die Lehre dargelegt hatte, sprach er: „Ich habe dieses Leid erfahren, weil ich im Hause gelebt habe. Jetzt habe ich kein Bedürfnis mehr nach dem Hausleben. Erlaube mir das Hauslosenleben, o Herr.“ Nachdem er die Erlaubnis zur Entsagung erhalten hatte, verließ er seine weinenden Verwandten und seinen großen Besitz, zog als Einsiedler in die Hauslosigkeit, erlangte im Himalaya lebend die höheren Geisteskräfte und die geistigen Vertiefungen und ging nach dem Tode in die Brahma-Welt ein. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā duṭṭhadevī ciñcamāṇavikā ahosi, rājā ānando, purohito pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka wie folgt: „Damals war die verdorbene Königin Ciñcamāṇavikā, der König war Ānanda, der Hauspriester aber war ich selbst.“ Bandhanamokkhajātakavaṇṇanā dasamā. Hier endet die Erklärung des Bandhanamakkha-Jātaka, die zehnte. Haṃcivaggo dvādasamo. Das Haṃci-Kapitel ist das zwölfte. Tassuddānaṃ – Dessen Inhaltsübersicht: Gadrabhapañhā amarā, siṅgālaṃ mitacinti ca; Anusāsikadubbacaṃ, tittiraṃ vaṭṭakaṃ puna; Akālarāvi bandhananti. Gadrabhapañha, Amarā, Siṅgāla, Mitacinti, Anusāsika, Dubbaca, Tittira, Vaṭṭaka, ferner Akālarāvi und Bandhana. 13. Kusanāḷivaggo 13. Das Kusanāḷi-Kapitel
[121] 1. Kusanāḷijātakavaṇṇanā [121] 1. Die Erklärung des Kusanāḷi-Jātaka Kare sarikkhoti idaṃ satthā jetavane viharanto anāthapiṇḍikassa mittaṃ ārabbha kathesi. Anāthapiṇḍikassa hi mittasuhajjañātibandhavā ekato hutvā ‘‘mahāseṭṭhi ayaṃ tayā jātigottadhanadhaññādīhi neva sadiso, na uttaritaro, kasmā etena saddhiṃ santhavaṃ karosi, mā karohī’’ti punappunaṃ nivāresuṃ. Anāthapiṇḍiko pana ‘‘mittasanthavo nāma hīnehipi samehipi atirekehipi kattabboyevā’’ti tesaṃ [Pg.467] vacanaṃ aggahetvā bhogagāmaṃ gacchanto taṃ kuṭumbarakkhakaṃ katvā agamāsīti sabbaṃ kāḷakaṇṇivatthusmiṃ vuttanayeneva veditabbaṃ. Idha pana anāthapiṇḍikena attano ghare pavattiyā ārocitāya satthā ‘‘gahapati, mitto nāma khuddako natthi, mittadhammaṃ rakkhituṃ samatthabhāvovettha pamāṇaṃ, mitto nāma attanā samopi hīnopi seṭṭhopi gahetabbo. Sabbepi hete attano pattabhāraṃ nittharantiyeva, idāni tāva tvaṃ attano nīcamittaṃ nissāya kuṭumbassa sāmiko jāto, porāṇā pana nīcamittaṃ nissāya vimānasāmikā jātā’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Kare sarikkho“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, mit Bezug auf einen Freund von Anāthapiṇḍika. Denn die Freunde, Vertrauten, Verwandten und Sippenmitglieder Anāthapiṇḍikas kamen zusammen und warnten ihn immer wieder: „Großkaufmann, dieser Mann ist dir weder an Geburt, Stand, Vermögen, Getreide noch in anderen Dingen ebenbürtig, noch ist er dir überlegen. Warum pflegst du Umgang mit ihm? Tu das nicht!“ Anāthapiṇḍika jedoch dachte: „Eine Freundschaft sollte man wahrlich pflegen, sei es mit Niedrigeren, Gleichgestellten oder Höheren“, und nahm ihre Worte nicht an. Als er zu seinem Lehnsgut reiste, setzte er jenen Freund als Hüter seines Haushalts ein und reiste ab. Dies alles ist in genau der Weise zu verstehen, wie es in der Kāḷakaṇṇi-Geschichte geschildert wurde. Hier jedoch berichtete Anāthapiṇḍika dem Meister von den Vorkommnissen in seinem Haus. Daraufhin sprach der Meister: „Hausvater, es gibt keinen unbedeutenden Freund. Die Fähigkeit, die Pflichten eines Freundes zu wahren, ist hierbei das entscheidende Maß. Ein Freund sollte gewählt werden, sei er einem selbst gleichgestellt, niedriger oder höher gestellt. Denn sie alle tragen die ihnen auferlegte Last ab. Jetzt bist du zunächst, indem du dich auf deinen niedrigeren Freund stütztest, der Besitzer deines Vermögens geblieben. In alten Zeiten jedoch wurden Wesen, indem sie sich auf einen niedrigeren Freund stützten, wieder Besitzer ihrer himmlischen Paläste.“ Nach diesen Worten erzählte er, von ihm gebeten, die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto rañño uyyāne kusanāḷigacche devatā hutvā nibbatti. Tasmiṃyeva ca uyyāne maṅgalasilaṃ nissāya ujugatakkhandho parimaṇḍalasākhāviṭapasampanno rañño santikā laddhasammāno rucamaṅgalarukkho atthi, ‘‘mukhako’’tipi vuccati. Tasmiṃ eko mahesakkho devarājā nibbatti. Bodhisattassa tena saddhiṃ mittasanthavo ahosi. Tadā rājā ekasmiṃ ekatthambhake pāsāde vasati, tassa so thambho cali. Athassa calitabhāvaṃ rañño ārocesuṃ. Rājā vaḍḍhakī pakkosāpetvā ‘‘tātā, mama ekatthambhakassa maṅgalapāsādassa thambho calito, ekaṃ sāratthambhaṃ āharitvā taṃ niccalaṃ karothā’’ti āha. Te ‘‘sādhu, devā’’ti rañño vacanaṃ sampaṭicchitvā tadanucchavikaṃ rukkhaṃ pariyesamānā aññattha adisvā uyyānaṃ pavisitvā taṃ mukhakarukkhaṃ disvā rañño santikaṃ gantvā ‘‘kiṃ, tātā, diṭṭho vo tadanucchaviko rukkho’’ti vutte ‘‘diṭṭho, deva, apica taṃ chindituṃ na visahāmā’’ti āhaṃsu. ‘‘Kiṃkāraṇā’’ti? Mayañhi aññattha rukkhaṃ apassantā uyyānaṃ pavisimha, tatrapi ṭhapetvā maṅgalarukkhaṃ aññaṃ na passāma. Iti naṃ maṅgalarukkhatāya chindituṃ na visahāmāti. Gacchatha, taṃ chinditvā pāsādaṃ thiraṃ karotha, mayaṃ aññaṃ maṅgalarukkhaṃ karissāmāti. Te ‘‘sādhū’’ti balikammaṃ gahetvā uyyānaṃ gantvā ‘‘sve chindissāmā’’ti rukkhassa balikammaṃ katvā nikkhamiṃsu. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als Gottheit in einem Busch von Kusa-Gras im königlichen Park geboren. In eben diesem Park gab es, nahe an einer Glückssteinplatte, einen kerzengeraden, mit einer vollkommen runden Krone aus Ästen und Laubwerk versehenen, vom König hoch verehrten Glücksbaum namens Ruca, der auch „Mukhaka“ genannt wurde. Darin war eine mächtige Gottheit wiedergeboren worden. Der Bodhisatta schloss Freundschaft mit dieser Gottheit. Zu jener Zeit wohnte der König in einem Palast, der von einer einzigen Säule getragen wurde. Diese Säule begann zu wanken. Da meldete man dem König das Wanken der Säule. Der König ließ die Zimmerleute rufen und sprach: „Liebe Leute, die Säule meines glückbringenden Ein-Säulen-Palastes wankt. Bringt eine feste Kernholzsäule herbei und macht den Palast wieder stabil.“ Sie antworteten: „Sehr wohl, o König“, nahmen den Befehl des Königs an, suchten nach einem geeigneten Baum und betraten, da sie anderswo keinen fanden, den Park. Als sie jenen Mukhaka-Baum sahen, gingen sie zum König. Auf die Frage des Königs: „Liebe Leute, habt ihr einen geeigneten Baum gefunden?“, sagten sie: „Wir haben einen gefunden, o König, aber wir wagen es nicht, ihn zu fällen.“ „Aus welchem Grund?“ „Da wir anderswo keinen geeigneten Baum sahen, betraten wir den königlichen Park. Aber selbst dort sehen wir keinen anderen Baum als den Glücksbaum. Weil er der Glücksbaum ist, wagen wir es nicht, ihn zu fällen.“ „Geht hin, fällt ihn und macht den Palast stabil! Wir werden einen anderen Baum zum Glücksbaum machen.“ Sie willigten ein, nahmen Opfergaben mit, gingen in den Park, brachten dem Baum ein Opfer dar mit den Worten: „Morgen werden wir ihn fällen“, und gingen wieder fort. Rukkhadevatā taṃ kāraṇaṃ ñatvā ‘‘sve mayhaṃ vimānaṃ nāsessanti, dārake gahetvā kuhiṃ gamissāmī’’ti gantabbaṭṭhānaṃ apassantī puttake gīvāya [Pg.468] gahetvā parodi. Tassā sandiṭṭhasambhattā rukkhadevatā āgantvā ‘‘kiṃ eta’’nti pucchitvā taṃ kāraṇaṃ sutvā sayampi vaḍḍhakīnaṃ paṭikkamanūpāyaṃ apassantiyo taṃ parissajitvā rodituṃ ārabhiṃsu. Tasmiṃ samaye bodhisatto ‘‘rukkhadevataṃ passissāmī’’ti tattha gantvā taṃ kāraṇaṃ sutvā ‘‘hotu, mā cintayittha, ahaṃ rukkhaṃ chindituṃ na dassāmi, sve vaḍḍhakīnaṃ āgatakāle mama kāraṇaṃ passathā’’ti tā devatā samassāsetvā punadivase vaḍḍhakīnaṃ āgatavelāya kakaṇṭakavesaṃ gahetvā vaḍḍhakīnaṃ purato gantvā maṅgalarukkhassa mūlantaraṃ pavisitvā taṃ rukkhaṃ susiraṃ viya katvā rukkhamajjhena abhiruhitvā khandhamatthakena nikkhamitvā sīsaṃ kampayamāno nipajji. Mahāvaḍḍhakī taṃ kakaṇṭakaṃ disvā rukkhaṃ hatthena paharitvā ‘‘susirarukkho eso nissāro, hiyyo anupadhāretvāva balikammaṃ karimhā’’ti ekaghanaṃ mahārukkhaṃ garahitvā pakkāmi. Rukkhadevatā bodhisattaṃ nissāya vimānassa sāminī jātā. Als die Baumgottheit diesen Grund erfuhr, dachte sie: „Morgen werden sie meine Wohnstätte zerstören. Wohin soll ich mit meinen Kindern gehen?“, und da sie keinen Zufluchtsort sah, schlang sie die Arme um den Hals ihrer Kinder und weinte bitterlich. Ihre vertrauten und befreundeten Baumgottheiten kamen herbei, fragten: „Was ist los?“, und als sie den Grund erfuhren, sahen auch sie keinen Ausweg, wie man die Zimmerleute abwenden könnte, umarmten sie und begannen ebenfalls zu weinen. In diesem Moment dachte der Bodhisatta: „Ich will nach der Baumgottheit sehen“, ging dorthin, hörte den Grund und sagte: „Es ist gut, sorgt euch nicht! Ich werde nicht zulassen, dass sie den Baum fällen. Schaut morgen, wenn die Zimmerleute kommen, auf mein Werk.“ Er tröstete jene Gottheiten, und am nächsten Tag, zur Zeit der Ankunft der Zimmerleute, nahm er die Gestalt eines Chamäleons an, lief vor den Zimmerleuten her, schlüpfte zwischen die Wurzeln des Glücksbaumes, ließ den Baum hohl erscheinen, kletterte durch das Innere des Baumes hinauf, kam oben am Stamm wieder heraus und legte sich hin, während er den Kopf schüttelte. Der Oberzimmerermann sah das Chamäleon, klopfte mit der Hand gegen den Baum und rief: „Dieser Baum ist hohl und kernlos! Gestern haben wir, ohne ihn genauer zu prüfen, ein Opfer dargebracht.“ So tadelte er den an sich massiven, großen Baum und ging davon. Die Baumgottheit blieb dank des Bodhisatta weiterhin die Herrin ihrer Wohnstätte. Tassā paṭisanthāratthāya sandiṭṭhasambhattā bahū devatā sannipatiṃsu. Rukkhadevatā ‘‘vimānaṃ me laddha’’nti tuṭṭhacittā tāsaṃ devatānaṃ majjhe bodhisattassa guṇaṃ kathayamānā ‘‘bho, devatā, mayaṃ mahesakkhā hutvāpi dandhapaññatāya imaṃ upāyaṃ na jānimha, kusanāḷidevatā pana attano ñāṇasampattiyā amhe vimānasāmike akāsi, mitto nāma sadisopi adhikopi hīnopi kattabbova. Sabbepi hi attano thāmena sahāyakānaṃ uppannaṃ dukkhaṃ nittharitvā sukhe patiṭṭhāpentiyevā’’ti mittadhammaṃ vaṇṇetvā imaṃ gāthamāha – Um ihr ihre Aufwartung zu machen und sie zu beglückwünschen, versammelten sich viele vertraute und befreundete Gottheiten. Mit erfreutem Herzen dachte die Baumgottheit: „Ich habe meine Wohnstatt behalten!“, und verkündete inmitten jener Gottheiten die Tugenden des Bodhisatta: „Ihr Gottheiten, obwohl wir von großer Macht sind, erkannten wir wegen unseres stumpfen Verstandes diese List nicht. Doch die Kusa-Gras-Gottheit hat uns durch die Fülle ihrer eigenen Weisheit wieder zu Besitzern unserer Wohnstätte gemacht. Einen Freund soll man sich wahrlich suchen, sei er einem gleichgestellt, überlegen oder niedriger gestellt. Denn sie alle befreien ihre Gefährten mit ihrer eigenen Kraft aus dem entstandenen Leid und begründen sie im Glück.“ Nachdem sie so die Tugend der Freundschaft gepriesen hatte, sprach sie diese Strophe: 121. 121. ‘‘Kare sarikkho atha vāpi seṭṭho, nihīnako vāpi kareyya eko; Kareyyumete byasane uttamatthaṃ, yathā ahaṃ kusanāḷi rucāya’’nti. „Man mag sich mit einem Gleichgestellten anfreunden, oder auch mit einem Höhergestellten; selbst ein Niedrigergestellter mag einem Freundschaft erweisen. Sie alle bewirken in Zeiten der Not das höchste Wohl – so wie es die Kusa-Gras-Gottheit für mich am Rucā-Baum tat.“ Tattha kare sarikkhoti jātiādīhi sadisopi mittadhammaṃ kareyya. Atha vāpi seṭṭhoti jātiādīhi adhikopi kareyya. Nihīnako vāpi kareyya ekoti eko jātiādīhi hīnopi mittadhammaṃ kareyya. Tasmā sabbepi ete mittā kātabbāyevāti dīpeti. Kiṃkāraṇā? Kareyyumete [Pg.469] byasane uttamatthanti sabbepete sahāyassa byasane uppanne attano attano pattabhāraṃ vahamānā uttamatthaṃ kareyyuṃ, kāyikacetasikadukkhato taṃ sahāyakaṃ moceyyumevāti attho. Tasmā hīnopi mitto kātabboyeva, pageva itare. Tatridaṃ opammaṃ – yathā ahaṃ kusanāḷi rucāyanti, yathā ahaṃ rucāyaṃ nibbattadevatā ayañca kusanāḷidevatā, appesakkhāpi mittasanthavaṃ karimha, tatrapāhaṃ mahesakkhāpi samānā attano uppannadukkhaṃ bālatāya anupāyakusalatāya harituṃ nāsakkhiṃ, imaṃ pana appesakkhampi samānaṃ paṇḍitadevataṃ nissāya dukkhato muttomhi. Tasmā aññehipi dukkhā muccitukāmehi samavisiṭṭhabhāvaṃ anoloketvā hīnopi paṇḍito mitto kātabboti. Darin bedeutet ‚kare sarikkho‘ [er mag mit seinesgleichen befreundet sein]: Auch ein bezüglich Geburt usw. Gleichgestellter möge die Pflichten eines Freundes erfüllen. ‚Atha vāpi seṭṭho‘ [oder auch mit einem Höheren] bedeutet: Auch ein bezüglich Geburt usw. Überlegener möge diese erfüllen. ‚Nihīnako vāpi kareyya eko‘ [oder auch ein Niedrigerer möge allein Freundschaft schließen] bedeutet: Auch ein Einzelner, der bezüglich Geburt usw. niedriger gestellt ist, möge die Pflichten eines Freundes erfüllen. Damit wird gezeigt: Daher sind sie alle durchaus als Freunde zu gewinnen. Aus welchem Grund? ‚Kareyyumete byasane uttamattham‘ [Diese mögen in der Not das Beste tun] bedeutet: Wenn dem Gefährten ein Unglück zustößt, mögen sie alle, indem sie ihre jeweilige eigene Last tragen, das höchste Wohl bewirken und diesen Gefährten gewiss aus körperlichem und geistigem Leiden befreien. Daher ist selbst ein Niedriggestellter gewiss als Freund zu gewinnen, wie viel mehr erst die anderen. Hierzu dient folgendes Gleichnis: ‚yathā ahaṃ kusanāḷi rucāyaṃ‘ [wie ich, Kusanāḷi, und der Rucā-Baum]: Wie ich, die im Rucā-Baum geborene Gottheit, und diese Kusanāḷi-Gottheit, obwohl von geringer Macht, eine Freundschaft schlossen. Doch obwohl ich unter uns beiden von großer Macht war, vermochte ich mein eigenes entstandenes Leid aufgrund von Torheit und mangelnder Geschicklichkeit in den Mitteln nicht zu beseitigen; indem ich mich jedoch auf diese weise Gottheit stützte, die, obwohl von geringer Macht, weise ist, bin ich vom Leiden befreit worden. Daher sollten auch andere, die sich vom Leiden befreien wollen, ohne auf Gleichheit oder Überlegenheit zu achten, selbst einen niedriggestellten, aber weisen Menschen zum Freund machen. Rucādevatā imāya gāthāya devasaṅghassa dhammaṃ desetvā yāvatāyukaṃ ṭhatvā saddhiṃ kusanāḷidevatāya yathākammaṃ gatā. Nachdem die Rucā-Baumgottheit mit dieser Strophe der Schar der Götter die Lehre verkündet hatte, verblieb sie dort bis an ihr Lebensende und ging dann zusammen mit der Kusanāḷi-Gottheit entsprechend ihrem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā rucādevatā ānando ahosi, kusanāḷidevatā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündung vor und führte das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war die Rucā-Baumgottheit Ānanda, die Kusanāḷi-Gottheit aber war ich selbst.“ Kusanāḷijātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erläuterung des Kusanāḷi-Jātaka ist die erste.
[122] 2. Dummedhajātakavaṇṇanā [122] 2. Die Erläuterung des Dummedha-Jātaka Yasaṃ laddhāna dummedhoti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Dhammasabhāyañhi bhikkhū ‘‘āvuso devadatto, tathāgatassa puṇṇacandasassirikamukhaṃ asītānubyañjanadvattiṃsamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitaṃ byāmappabhāparikkhittaṃ āveḷāveḷābhūtā yamakayamakabhūtā ghanabuddharasmiyo vissajjentaṃ paramasobhaggappattaṃ attabhāvañca oloketvā cittaṃ pasādetuṃ na sakkoti, usūyameva karoti. ‘Buddhā nāma evarūpena sīlena samādhinā paññāya vimuttiyā vimuttiñāṇadassanena samannāgatā’ti vuccamāne vaṇṇaṃ sahituṃ na sakkoti, usūyameva karotī’’ti devadattassa aguṇakathaṃ kathayiṃsu. Satthā āgantvā [Pg.470] ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva devadatto mama vaṇṇe bhaññamāne usūyaṃ karoti, pubbepi akāsiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Wenn der Tor Ruhm erlangt“ – diese Lehrverkündung sprach der Meister, als er im Veluvana-Kloster verweilte, in Bezug auf Devadatta. In der Halle der Lehre sprachen die Mönche nämlich über Devadattas Verfehlungen: „Ihr Brüder, Devadatta vermag seine Gesinnung nicht zu klären, wenn er den Körper des Tathāgata erblickt, der das herrlich glänzende Antlitz eines Vollmonds besitzt, geschmückt mit den achtzig Nebenmerkmalen und den zweiunddreißig Hauptmerkmalen eines großen Mannes, umgeben von einer Aura von einer Klafter Weite, und der dichte, wellenförmige und paarweise herabströmende Buddha-Strahlen aussendet sowie die höchste Schönheit erlangt hat; stattdessen empfindet er nur Neid. Wenn man sagt: ‚Die Buddhas sind wahrlich mit einer solchen Tugend, Konzentration, Weisheit, Befreiung und dem Wissen und der Schau der Befreiung ausgestattet‘, kann er dieses Lob nicht ertragen und empfindet nur Neid.“ Als der Meister herbeikam, fragte er: „Worüber habt ihr gerade gesprochen, ihr Mönche, während ihr hier zusammensaßet?“ Als sie antworteten: „Über dieses Thema“, sprach er: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, empfindet Devadatta Neid, wenn mein Lob verkündet wird; das hat er auch schon früher getan.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte magadharaṭṭhe rājagahanagare ekasmiṃ magadharāje rajjaṃ kārente bodhisatto hatthiyoniyaṃ nibbattitvā sabbaseto ahosi heṭṭhā vaṇṇitasadisāya rūpasampattiyā samannāgato. Atha naṃ ‘‘lakkhaṇasampanno aya’’nti so rājā maṅgalahatthiṃ akāsi. Athekasmiṃ chaṇadivase sakalanagaraṃ devanagaraṃ viya alaṅkārāpetvā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ maṅgalahatthiṃ abhiruhitvā mahantena rājānubhāvena nagaraṃ padakkhiṇaṃ akāsi. Mahājano tattha tattha ṭhatvā maṅgalahatthino rūpasobhaggappattaṃ sarīraṃ disvā ‘‘aho rūpaṃ, aho gati, aho līḷā, aho lakkhaṇasampatti, evarūpo nāma sabbasetavaravāraṇo cakkavattirañño anucchaviko’’ti maṅgalahatthimeva vaṇṇesi. Einst, als im Königreich Magadha in der Stadt Rājagaha ein König von Magadha die Herrschaft ausübte, wurde der Bodhisatta im Schoß eines Elefanten wiedergeboren; er war gänzlich weiß und mit einer herrlichen Gestalt ausgestattet, die der zuvor beschriebenen glich. Da machte jener König ihn mit den Worten: „Dieser ist mit hervorragenden Merkmalen ausgestattet“, zu seinem Festelefanten. An einem Festtag ließ der König die gesamte Stadt wie eine Götterstadt schmücken, bestieg den mit allerlei Schmuck verzierten Festelefanten und umrundete die Stadt im Uhrzeigersinn mit großer königlicher Pracht. Die Volksmenge stand hier und dort, sah den Körper des Festelefanten, der die Vollendung körperlicher Schönheit erreicht hatte, und pries nur den Festelefanten mit den Worten: „O welch eine Gestalt! O welch ein Gang! O welch eine Anmut! O welch eine Fülle an Merkmalen! Ein solch edler, gänzlich weißer Elefant ist wahrlich eines Weltherrschers würdig!“ Rājā maṅgalahatthissa vaṇṇaṃ sutvā sahituṃ asakkonto usūyaṃ uppādetvā ‘‘ajjeva taṃ pabbatapāde pātetvā jīvitakkhayaṃ pāpessāmī’’ti hatthācariyaṃ pakkosāpetvā ‘‘kinti katvā tayā ayaṃ nāgo sikkhāpito’’ti āha. ‘‘Susikkhāpito, devā’’ti. ‘‘Na susikkhito, dusikkhito’’ti. ‘‘Susikkhito, devā’’ti. ‘‘Yadi susikkhito, sakkhissasi naṃ vepullapabbatamatthakaṃ āropetu’’nti. ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Tena hi ehī’’ti sayaṃ otaritvā hatthācariyaṃ āropetvā pabbatapādaṃ gantvā hatthācariyena hatthipiṭṭhiyaṃ nisīditvāva hatthimhi vepullapabbatamatthakaṃ āropite sayampi amaccagaṇaparivuto pabbatamatthakaṃ abhiruhitvā hatthiṃ papātābhimukhaṃ kāretvā ‘‘tvaṃ ‘mayā esa susikkhāpito’ti vadesi, tīhiyeva tāva naṃ pādehi ṭhapehī’’ti āha. Hatthācariyo piṭṭhiyaṃ nisīditvāva ‘‘bho tīhi pādehi tiṭṭhā’’ti hatthissa paṇhikāya saññaṃ adāsi, mahāsatto tathā akāsi. Puna rājā ‘‘dvīhi purimapādehiyeva ṭhapehī’’ti āha, mahāsatto dve pacchimapāde ukkhipitvā purimapādehi aṭṭhāsi. ‘‘Pacchimapādehiyevā’’ti vuttepi dve purimapāde ukkhipitvā pacchimapādehi aṭṭhāsi, ‘‘ekenā’’ti vuttepi tayo pāde ukkhipitvā ekeneva [Pg.471] aṭṭhāsi. Athassa apatanabhāvaṃ ñatvā ‘‘sace pahosi, ākāse naṃ ṭhapehī’’ti āha. Als der König das Lob auf den Festelefanten hörte, vermochte er es nicht zu ertragen. Er geriet in Neid und dachte: „Noch heute werde ich ihn vom Berghang hinabstürzen lassen und ihn um sein Leben bringen.“ Er ließ den Elefantenführer rufen und fragte ihn: „Wie hast du diesen Elefanten ausgebildet?“ „Er ist gut ausgebildet, Eure Majestät“, antwortete dieser. „Er ist nicht gut ausgebildet, sondern schlecht ausgebildet!“ „Er ist gut ausgebildet, Eure Majestät.“ „Wenn er gut ausgebildet ist, wirst du ihn dann auf den Gipfel des Vepulla-Berges führen können?“ „Ja, Eure Majestät.“ „Nun gut, dann komm!“ Der König stieg selbst ab, ließ den Elefantenführer aufsitzen und begab sich zum Fuß des Berges. Als der Elefantenführer, auf dem Rücken des Elefanten sitzend, den Elefanten auf den Gipfel des Vepulla-Berges geführt hatte, stieg auch der König selbst, umgeben von seiner Ministergötterschar, auf den Berggipfel. Er ließ den Elefanten mit dem Gesicht zum Abgrund aufstellen und sagte: „Du behauptest doch: ‚Ich habe ihn gut ausgebildet.‘ Lass ihn erst einmal auf nur drei Beinen stehen!“ Der Elefantenführer gab dem Elefanten, während er auf seinem Rücken saß, mit der Ferse das Zeichen: „He, steh auf drei Beinen!“ Das Große Wesen verhielt sich genau so. Erneut sagte der König: „Lass ihn nur auf den zwei Vorderbeinen stehen!“ Das Große Wesen hob die beiden Hinterbeine an und stand auf den Vorderbeinen. Als der König sagte: „Nur auf den Hinterbeinen!“, hob er die beiden Vorderbeine an und stand auf den Hinterbeinen. Selbst als er sagte: „Auf nur einem Bein!“, hob er drei Beine an und stand auf nur einem einzigen Bein. Als der König nun sah, dass der Elefant nicht stürzte, sagte er: „Wenn du es vermagst, lass ihn in der Luft stehen!“ Ācariyo cintesi – ‘‘sakalajambudīpe iminā sadiso susikkhito hatthī nāma natthi, nissaṃsayaṃ panetaṃ esa papāte pātetvā māretukāmo bhavissatī’’ti. So tassa kaṇṇamūle mantesi ‘‘tāta, ayaṃ rājā taṃ papāte pātetvā māretukāmo, na tvaṃ etassa anucchaviko. Sace te ākāsena gantuṃ balaṃ atthi, maṃ yathānisinnaṃyeva ādāya vehāsaṃ abbhuggantvā bārāṇasiṃ gacchā’’ti. Puññiddhiyā samannāgato mahāsatto taṅkhaṇaññeva ākāse aṭṭhāsi. Hatthācariyo ‘‘mahārāja, ayaṃ hatthī puññiddhiyā samannāgato, na tādisassa mandapuññassa dubbuddhino anucchaviko, paṇḍitassa puññasampannassa rañño anucchaviko, tādisā nāma mandapuññā evarūpaṃ vāhanaṃ labhitvā tassa guṇaṃ ajānantā tañceva vāhanaṃ avasesañca yasasampattiṃ nāsentiyevā’’ti vatvā hatthikkhandhe nisinnova imaṃ gāthamāha – Der Elefantenlehrer dachte: „Auf dem gesamten Jambudīpa gibt es keinen Elefanten, der so gut abgerichtet ist wie dieser. Ohne Zweifel möchte dieser König ihn über einen Abgrund stürzen und töten.“ Er flüsterte in sein Ohr: „Mein Lieber, dieser König möchte dich über den Abgrund stürzen und töten; du bist seiner nicht würdig. Wenn du die Kraft hast, durch die Luft zu fliegen, dann nimm mich, genau so wie ich auf dir sitze, erhebe dich in die Luft und fliege nach Bārāṇasī.“ Das mit verdienstvoller Macht ausgestattete Große Wesen erhob sich in genau jenem Augenblick in die Luft. Der Elefantenlehrer sagte: „Großer König, dieser Elefant ist mit verdienstvoller Macht ausgestattet. Er ist für einen wie dich, der von geringem Verdienst und von schlechtem Verstand ist, nicht geeignet, sondern er ist eines weisen, verdienstvollen Königs würdig. Menschen mit so geringem Verdienst wie du, die ein solches Prachtreittier erhalten, ohne dessen Wert zu erkennen, vernichten nur dieses Reittier sowie all ihren übrigen Ruhm und Wohlstand.“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er, auf dem Nacken des Elefanten sitzend, diese Strophe: 122. 122. ‘‘Yasaṃ laddhāna dummedho, anatthaṃ carati attano; Attano ca paresañca, hiṃsāya paṭipajjatī’’ti. „Wenn ein Unverständiger zu Ruhm und Wohlstand gelangt, wirkt er zu seinem eigenen Schaden; er handelt nur zum Verderben für sich selbst und für andere.“ Tatrāyaṃ saṅkhepattho – mahārāja, tādiso dummedho nippañño puggalo parivārasampattiṃ labhitvā attano anatthaṃ carati. Kiṃkāraṇā? So hi yasamadamatto kattabbākattabbaṃ ajānanto attano ca paresañca hiṃsāya paṭipajjati. Hiṃsā vuccati kilamanaṃ dukkhuppādanaṃ, tadatthāya eva paṭipajjatīti. Hierbei ist dies die kurze Bedeutung: O großer König, eine solche törichte, weisheitslose Person bewirkt, nachdem sie Gefolgschaft und Wohlstand erlangt hat, ihren eigenen Schaden. Aus welchem Grund? Denn sie, berauscht vom Stolz auf Ruhm und Wohlstand, weiß nicht, was zu tun und was nicht zu tun ist, und handelt zum Verderben für sich selbst und für andere. Als „Verderben“ (hiṃsā) wird die Mühsal und das Erzeugen von Leiden bezeichnet; genau zu diesem Zweck handelt sie. Evaṃ imāya gāthāya rañño dhammaṃ desetvā ‘‘tiṭṭha dāni tva’’nti vatvā ākāse uppatitvā bārāṇasinagaraṃ gantvā rājaṅgaṇe ākāse aṭṭhāsi. Sakalanagaraṃ saṅkhubhitvā ‘‘amhākaṃ rañño ākāsena setavaravāraṇo āgantvā rājaṅgaṇe ṭhito’’ti ekakolāhalaṃ ahosi. Vegena raññopi ārocesuṃ. Rājā nikkhamitvā ‘‘sace mayhaṃ upabhogatthāya āgatosi, bhūmiyaṃ patiṭṭhāhī’’ti āha. Bodhisatto bhūmiyaṃ patiṭṭhāsi, ācariyo otaritvā rājānaṃ vanditvā ‘‘kuto āgatosi, tātā’’ti vutte ‘‘rājagahato’’ti vatvā sabbaṃ pavattiṃ ārocesi. Rājā ‘‘manāpaṃ te, tāta, kataṃ idhāgacchantenā’’ti tuṭṭhahaṭṭho [Pg.472] nagaraṃ sajjāpetvā vāraṇaṃ maṅgalahatthiṭṭhāne ṭhapetvā sakalarajjaṃ tayo koṭṭhāse katvā ekaṃ bodhisattassa adāsi, ekaṃ ācariyassa, ekaṃ attanā aggahesi. Bodhisattassa āgatakālato paṭṭhāyeva pana rañño sakalajambudīpe rajjaṃ hatthagatameva jātaṃ. So jambudīpe aggarājā hutvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ agamāsi. Nachdem er dem König so mit dieser Strophe die Lehre dargelegt hatte, sagte er: „Bleibe du nun hier zurück“, flog in die Luft empor, begab sich zur Stadt Bārāṇasī und verweilte dort am Himmel über dem königlichen Hof. Die ganze Stadt geriet in Aufruhr, und es entstand ein großes Geschrei: „Für unseren König ist ein edler weißer Elefant durch die Luft gekommen und steht auf dem königlichen Hof!“ Man berichtete es eilends auch dem König. Der König kam heraus und sagte: „Wenn du zu meinem Nutzen gekommen bist, so lasse dich auf der Erde nieder.“ Der Bodhisatta ließ sich auf der Erde nieder. Der Lehrer stieg herab, erwies dem König Ehrfurcht, und als er gefragt wurde: „Woher bist du gekommen, mein Lieber?“, antwortete er: „Aus Rājagaha“, und berichtete den gesamten Vorfall. Der König war hocherfreut und sagte: „Mein Lieber, du hast eine erfreuliche Tat getan, indem du hierher gekommen bist.“ Er ließ die Stadt festlich schmücken, setzte den Elefanten in das Amt des königlichen Prachtelefanten ein, teilte sein ganzes Reich in drei Teile, gab einen Teil dem Bodhisatta, einen Teil dem Lehrer und behielt einen Teil für sich selbst. Seit der Ankunft des Bodhisatta fiel dem König die Herrschaft über das gesamte Jambudīpa in die Hände. Er wurde der oberste König in Jambudīpa, vollbrachte verdienstvolle Taten wie Freigebigkeit und ging schließlich gemäß seinem Kamma hin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā magadharājā devadatto ahosi, bārāṇasirājā sāriputto, hatthācariyo ānando, hatthī pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündigung vor und verknüpfte das Jātaka: „Damals war der König von Magadha Devadatta, der König von Bārāṇasī Sāriputta, der Elefantenlehrer Ānanda, und der Elefant war ich selbst.“ Dummedhajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Dummedha-Jātaka ist die zweite.
[123] 3. Naṅgalīsajātakavaṇṇanā [123] 3. Die Erklärung des Naṅgalīsa-Jātaka. Asabbatthagāmiṃ vācanti idaṃ satthā jetavane viharanto lāḷudāyittheraṃ ārabbha kathesi. So kira dhammaṃ kathento ‘‘imasmiṃ ṭhāne idaṃ kathetabbaṃ, imasmiṃ ṭhāne idaṃ na kathetabba’’nti yuttāyuttaṃ na jānāti, maṅgale avamaṅgalaṃ vadanto ‘‘tirokuṭṭesu tiṭṭhanti, sandhisiṅghāṭakesu cā’’ti idaṃ avamaṅgalaṃ maṅgalaṃ katvā anumodanaṃ katheti. Avamaṅgalesu anumodanaṃ karonto ‘‘bahū devā manussā ca, maṅgalāni acintayu’’nti vatvā ‘‘evarūpānaṃ maṅgalānaṃ satampi sahassampi kātuṃ samatthā hothā’’ti vadati. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ bhikkhū ‘‘āvuso, lāḷudāyī yuttāyuttaṃ na jānāti, sabbattha abhāsitabbavācaṃ bhāsatī’’ti kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, lāḷudāyī idāneva dandhaparisakkano yuttāyuttaṃ na jānāti, pubbepi evarūpo ahosi, niccaṃ lāḷakoyeva eso’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Eine Rede, die nicht überallhin passt“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana verweilte, in Bezug auf den Thera Lāḷudāyī. Wenn jener nämlich die Lehre verkündete, wusste er nicht, was angemessen und was unangemessen war: „An dieser Stelle sollte dies gesprochen werden, an jener Stelle sollte dies nicht gesprochen werden.“ Bei glückbringenden Anlässen sprach er Unglückbringendes und rezitierte als Segenswunsch jene unheilvollen Worte: „Sie stehen hinter den Wänden und an den Straßenkreuzungen...“ Bei unglückbringenden Anlässen wiederum sprach er Segenssprüche, indem er sagte: „Viele Götter und Menschen dachten über glückbringende Dinge nach...“, und fügte hinzu: „Möget ihr imstande sein, ein solches Glück hundertfach oder tausendfach zu bewirken!“ Eines Tages nun begannen die Mönche in der Versammlungshalle folgendes Gespräch: „Ihr Brüder, Lāḷudāyī weiß nicht, was angemessen und was unangemessen ist; er spricht an allen Orten Worte, die man nicht aussprechen sollte.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt?“ Als sie antworteten: „Zu diesem“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt ist Lāḷudāyī schwerfällig im Handeln und weiß nicht, was angemessen und was unangemessen ist. Schon in der Vergangenheit war er von solcher Art; er war stets ein einfältiger Tropf.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto brāhmaṇamahāsālakule nibbattitvā vayappatto takkasilāyaṃ sabbasippāni uggaṇhitvā bārāṇasiyaṃ disāpāmokkho ācariyo hutvā pañca [Pg.473] māṇavakasatāni sippaṃ vācesi. Tadā tesu māṇavesu eko dandhaparisakkano lāḷako māṇavo dhammantevāsiko hutvā sippaṃ uggaṇhāti, dandhabhāvena pana uggaṇhituṃ na sakkoti. Bodhisattassa pana upakāro hoti, dāso viya sabbakiccāni karoti. Athekadivasaṃ bodhisatto sāyamāsaṃ bhuñjitvā sayane nipanno taṃ māṇavaṃ hatthapādapiṭṭhiparikammāni katvā gacchantaṃ āha ‘‘tāta, mañcapāde upatthambhetvā yāhī’’ti. Māṇavo ekaṃ pādaṃ upatthambhetvā ekassa upatthambhakaṃ alabhanto attano ūrumhi ṭhapetvā rattiṃ khepesi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, erlernte er in Takkasilā alle Künste und Wissenschaften, wurde ein weltberühmter Lehrer in Bārāṇasī und unterrichtete fünfhundert junge Männer in den Künsten. Unter jenen Schülern befand sich damals ein schwerfälliger, einfältiger junger Mann, der als Hausschüler die Künste erlernte, sie jedoch wegen seiner Schwerfälligkeit nicht begreifen konnte. Dem Bodhisatta war er jedoch von großem Nutzen; wie ein Sklave verrichtete er alle Arbeiten. Eines Tages nun, als der Bodhisatta das Abendessen eingenommen hatte und auf seinem Lager ruhte, sagte er zu dem jungen Mann, der nach dem Massieren seiner Hände, Füße und seines Rückens gehen wollte: „Mein Lieber, stütze die Bettpfosten ab, bevor du gehst.“ Der junge Mann stützte einen Pfosten ab; da er jedoch für den anderen keine Stütze finden konnte, legte er den Bettpfosten auf seinen eigenen Oberschenkel und verbrachte so die Nacht. Bodhisatto paccūsasamaye uṭṭhāya taṃ disvā ‘‘kiṃ, tāta, nisinnosī’’ti pucchi. ‘‘Ācariya, ekassa mañcapādassa upatthambhakaṃ alabhanto ūrumhi ṭhapetvā nisinnomhī’’ti. Bodhisatto saṃviggamānaso hutvā ‘‘ayaṃ ati viya mayhaṃ upakāro, ettakānaṃ pana māṇavakānaṃ antare ayameva dandho sippaṃ sikkhituṃ na sakkoti, kathaṃ nu kho ahaṃ imaṃ paṇḍitaṃ kareyya’’nti cintesi. Athassa etadahosi ‘‘attheko upāyo, ahaṃ imaṃ māṇavaṃ dāruatthāya paṇṇatthāya ca vanaṃ gantvā āgataṃ ‘ajja te kiṃ diṭṭhaṃ, kiṃ kata’nti pucchissāmi. Atha me ‘idaṃ nāma ajja mayā diṭṭhaṃ, idaṃ kata’nti ācikkhissati. Atha naṃ ‘tayā diṭṭhañca katañca kīdisa’nti pucchissāmi, so ‘evarūpaṃ nāmā’ti upamāya ca kāraṇena ca kathessati. Iti naṃ navaṃ navaṃ upamañca kāraṇañca kathāpetvā iminā upāyena paṇḍitaṃ karissāmī’’ti. So taṃ pakkosāpetvā ‘‘tāta māṇava, ito paṭṭhāya dāruatthāya vā paṇṇatthāya vā gataṭṭhāne yaṃ te tattha diṭṭhaṃ vā sutaṃ vā bhuttaṃ vā pītaṃ vā khāditaṃ vā hoti, taṃ āgantvā mayhaṃ āroceyyāsī’’ti āha. Der Bodhisatta stand in der Morgendämmerung auf, sah ihn und fragte: „Mein Lieber, warum sitzt du hier?“ – „Lehrer, da ich keine Stütze für einen der Bettpfosten finden konnte, habe ich ihn auf meinen Oberschenkel gestellt und sitze nun so hier.“ Der Bodhisatta war zutiefst bewegt und dachte: „Dieser junge Mann ist mir überaus nützlich. Doch unter all diesen Schülern ist ausgerechnet er so schwerfällig im Geist, dass er die Kunst nicht erlernen kann. Wie kann ich diesen jungen Mann nur zu einem Weisen machen?“ Da kam ihm folgender Gedanke: „Es gibt einen Weg. Wenn dieser Schüler in den Wald gegangen ist, um Brennholz und Blätter zu sammeln, und zurückkehrt, werde ich ihn fragen: ‚Was hast du heute gesehen, was hast du getan?‘ Daraufhin wird er mir berichten: ‚Dieses und jenes habe ich heute gesehen, dieses und jenes habe ich getan.‘ Dann werde ich ihn fragen: ‚Wie war das, was du gesehen und getan hast?‘ Er wird mir antworten: ‚Es war von solcher Art‘, und es mit einem Vergleich und einer Begründung erklären. Indem ich ihn so immer wieder neue Vergleiche und Begründungen sprechen lasse, werde ich ihn mit dieser Methode zu einem Weisen machen.“ Er ließ ihn rufen und sagte: „Mein lieber Junge, von nun an sollst du, wo immer du hingehst, um Brennholz oder Blätter zu holen, mir nach deiner Rückkehr berichten, was du dort gesehen, gehört, gegessen, getrunken oder gekaut hast.“ So ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā ekadivasaṃ māṇavehi saddhiṃ dāruatthāya araññaṃ gato tattha sappaṃ disvā āgantvā ‘‘ācariya, sappo me diṭṭho’’ti ārocesi. ‘‘Sappo nāma, tāta, kīdiso hotī’’ti? ‘‘Seyyathāpi naṅgalīsā’’ti. ‘‘Sādhu, tāta, manāpā te upamā āhaṭā, sappā nāma naṅgalīsasadisāva hontī’’ti. Atha bodhisatto ‘‘māṇavakena manāpā upamā āhaṭā, sakkhissāmi naṃ paṇḍitaṃ kātu’’nti cintesi. Māṇavo puna ekadivasaṃ araññe hatthiṃ disvā ‘‘hatthī me ācariya diṭṭho’’ti āha. ‘‘Hatthī nāma, tāta, kīdiso’’ti? ‘‘Seyyathāpi, naṅgalīsā’’ti. Bodhisatto ‘‘hatthissa [Pg.474] soṇḍā naṅgalīsasadisā honti, dantādayo evarūpā ca evarūpā ca. Ayaṃ pana bālatāya vibhajitvā kathetuṃ asakkonto soṇḍaṃ sandhāya kathesi maññe’’ti tuṇhī ahosi. Athekadivasaṃ nimantane ucchuṃ labhitvā ‘‘ācariya, ajja mayaṃ ucchu khādimhā’’ti āha. ‘‘Ucchu nāma kīdiso’’ti vutte ‘‘seyyathāpi naṅgalīsā’’ti āha. Ācariyo ‘‘thokaṃ patirūpaṃ kāraṇaṃ kathesī’’ti tuṇhī jāto. Er willigte mit den Worten „Sehr wohl“ ein. Als er eines Tages mit den anderen Schülern zur Holzsuche in den Wald ging, sah er dort eine Schlange. Nach seiner Rückkehr berichtete er: „Lehrer, ich habe eine Schlange gesehen.“ – „Mein Lieber, wie sieht eine Schlange denn aus?“ – „Ganz wie eine Pflugdeichsel.“ – „Gut, mein Lieber, du hast einen treffenden Vergleich vorgebracht; Schlangen gleichen wahrlich einer Pflugdeichsel.“ Da dachte der Bodhisatta: „Der Junge hat einen treffenden Vergleich vorgebracht, es wird mir gelingen, ihn weise zu machen.“ An einem anderen Tag sah der Schüler im Wald einen Elefanten. Nach seiner Rückkehr sagte er: „Lehrer, ich habe einen Elefanten gesehen.“ – „Mein Lieber, wie sieht ein Elefant denn aus?“ – „Ganz wie eine Pflugdeichsel.“ Der Bodhisatta dachte: „Der Rüssel des Elefanten gleicht einer Pflugdeichsel, doch die Stoßzähne und die anderen Teile sind von ganz anderer Beschaffenheit. Da er jedoch aufgrund seiner Torheit unfähig ist, dies differenziert zu erklären, meint er wohl den Rüssel, wenn er dies sagt“, und er schwieg. Als er an einem anderen Tag bei einer Einladung Zuckerrohr erhielt, sagte er: „Lehrer, heute haben wir Zuckerrohr gekaut.“ Auf die Frage: „Wie sieht denn Zuckerrohr aus?“, antwortete er: „Ganz wie eine Pflugdeichsel.“ Der Lehrer dachte: „Er hat eine halbwegs passende Erklärung geliefert“, und schwieg. Punekadivasaṃ nimantane ekacce māṇavā guḷaṃ dadhinā bhuñjiṃsu, ekacce khīrena. So āgantvā ‘‘ācariya, ajja mayaṃ dadhinā khīrena ca bhuñjimhā’’ti vatvā ‘‘dadhikhīraṃ nāma kīdisaṃ hotī’’ti vutte ‘‘seyyathāpi naṅgalīsā’’ti āha. Ācariyo ‘‘ayaṃ māṇavo ‘sappo naṅgalīsasadiso’ti kathento tāva sukathitaṃ kathesi, ‘hatthī naṅgalīsasadiso’ti kathentenāpi soṇḍaṃ sandhāya lesena kathitaṃ. ‘Ucchu naṅgalīsasadisa’nti kathanepi leso atthi, ‘dadhikhīrāni pana niccaṃ paṇḍarāni pakkhittabhājanasaṇṭhānānī’ti idha sabbena sabbaṃ upamaṃ na kathesi, na sakkā imaṃ lāḷakaṃ sikkhāpetu’’nti vatvā imaṃ gāthamāha – Wiederum an einem anderen Tag aßen einige Schüler bei einer Einladung Zuckersirup mit Sauermilch, andere mit Frischmilch. Er kam zurück und sagte: „Lehrer, heute haben wir Sauermilch und Milch gegessen.“ Als er gefragt wurde: „Wie sieht denn Sauermilch und Milch aus?“, antwortete er: „Ganz wie eine Pflugdeichsel.“ Der Lehrer dachte: „Als dieser Schüler sagte: ‚Die Schlange gleicht einer Pflugdeichsel‘, sprach er noch recht treffend. Auch als er sagte: ‚Der Elefant gleicht einer Pflugdeichsel‘, sprach er im Hinblick auf den Rüssel in gewisser Weise andeutungsweise. Selbst in der Aussage: ‚Das Zuckerrohr gleicht einer Pflugdeichsel‘, liegt noch eine gewisse Ähnlichkeit. Sauermilch und Milch jedoch sind stets weiß und nehmen die Form des Gefäßes an, in das sie gegossen werden. Hierbei hat er einen völlig unpassenden Vergleich gewählt. Es ist unmöglich, diesen speichelnden Tropf zu belehren.“ Nach diesen Worten sprach er folgende Strophe: 123. 123. ‘‘Asabbatthagāmiṃ vācaṃ, bālo sabbattha bhāsati; Nāyaṃ dadhiṃ vedi na naṅgalīsaṃ, dadhippayaṃ maññati naṅgalīsa’’nti. „Eine Aussage, die nicht überallhin passt, wendet der Tor überall an. Weder kennt er Sauermilch noch eine Pflugdeichsel; Sauermilch und Milch hält er für eine Pflugdeichsel.“ Tatrāyaṃ saṅkhepattho – yā vācā opammavasena sabbattha na gacchati, taṃ asabbatthagāmiṃ vācaṃ bālo dandhapuggalo sabbattha bhāsati, ‘‘dadhi nāma kīdisa’’nti puṭṭhopi ‘‘seyyathāpi, naṅgalīsā’’ti vadateva. Evaṃ vadanto nāyaṃ dadhiṃ vedi na naṅgalīsaṃ. Kiṃkāraṇā? Dadhippayaṃ maññati naṅgalīsaṃ, yasmā ayaṃ dadhimpi naṅgalīsameva maññati. Atha vā dadhīti dadhimeva, payanti khīraṃ, dadhi ca payañca dadhippayaṃ. Yasmā dadhikhīrānipi ayaṃ naṅgalīsameva maññati, ediso cāyaṃ bālo, kiṃ imināti antevāsikānaṃ dhammakathaṃ kathetvā paribbayaṃ datvā taṃ uyyojesi. Hierbei ist dies die kurze Erklärung: Eine Aussage, die im Wege des Vergleichs nicht auf alles zutrifft – eine solche unpassende Aussage wendet der Tor, der schwerfällige Mensch, auf alles an. Selbst wenn er gefragt wird: „Wie sieht Sauermilch aus?“, sagt er dennoch: „Ganz wie eine Pflugdeichsel.“ Wer so spricht, kennt weder Sauermilch noch eine Pflugdeichsel. Aus welchem Grund? Weil er Sauermilch und Milch für eine Pflugdeichsel hält, da dieser Tor auch Sauermilch für nichts anderes als eine Pflugdeichsel hält. Oder aber: „Dadhi“ bedeutet Sauermilch, „paya“ bedeutet Milch; Sauermilch und Milch zusammen nennt man „Dadhippaya“. Weil dieser Tor selbst Sauermilch und Milch für nichts anderes als eine Pflugdeichsel hält – und da dieser Tor von solcher Art ist, was soll man mit ihm anfangen? Nach dieser Lehrrede für seine Schüler gab er ihm Reisegeld und entließ ihn. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā lāḷakamāṇavo lāḷudāyī ahosi, disāpāmokkho ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, stellte er die Verbindung zum Jātaka her: „Damals war der speichelnde Schüler Lāḷudāyin, der weltberühmte Lehrer aber war ich selbst.“ Naṅgalīsajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erläuterung des Naṅgalīsa-Jātaka, das dritte.
[124] 4. Ambajātakavaṇṇanā [124] 4. Die Erläuterung des Amba-Jātaka. Vāyametheva [Pg.475] purisoti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ vattasampannaṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. So kira sāvatthivāsī kulaputto sāsane uraṃ datvā pabbajito vattasampanno ahosi, ācariyupajjhāyavattāni pānīyaparibhojanīyauposathāgārajantāgharādivattāni ca sādhukaṃ karoti, cuddasasu mahāvattesu asītikhandhakavattesu ca paripūrakārīyeva hoti, vihāraṃ sammajjati, pariveṇaṃ vitakkamāḷakaṃ vihāramaggaṃ sammajjati, manussānaṃ pānīyaṃ deti. Manussā tassa vattasampattiyaṃ pasīditvā pañcasatamattāni dhuvabhattāni adaṃsu, mahālābhasakkāro uppajji. Taṃ nissāya bahūnaṃ phāsuvihāro jāto. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ bhikkhū kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, asuko nāma bhikkhu attano vattasampattiyā mahantaṃ lābhasakkāraṃ nibbattesi, etaṃ ekaṃ nissāya bahūnaṃ phāsuvihāro jāto’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva, pubbepāyaṃ bhikkhu vattasampanno, pubbepetaṃ ekaṃ nissāya pañca isisatāni phalāphalatthāya araññaṃ agantvā eteneva ānītaphalāphalehi yāpesu’’nti vatvā atītaṃ āhari. „Mühen soll sich der Mensch...“ – diese Lehrverkündigung sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verwelte, in Bezug auf einen Mönch, der gewissenhaft seine Pflichten erfüllte. Dieser Sohn einer angesehenen Familie aus Sāvatthī hatte sich ganz der Lehre verschrieben, war ordiniert worden und erfüllte seine Pflichten mustergültig. Er verrichtete sorgfältig die Pflichten gegenüber dem Lehrer und dem Präzeptor, sowie die Pflichten bezüglich des Trink- und Brauchwassers, der Uposatha-Halle, des Heizhauses und anderes. Er erfüllte stets vollkommen die vierzehn großen Pflichten sowie die achtzig Pflichten aus den Khandhakas. Er kehrte das Kloster, er fegte den Hof, den Pavillon zum Nachdenken und den Klosterweg, und er gab den Menschen Trinkwasser. Die Menschen, die über seine tadellose Pflichterfüllung erfreut waren, spendeten ihm rund fünfhundert ständige Mahlzeiten. So entstanden für ihn großer Gewinn und große Ehrerbietung. Durch ihn begünstigt, lebten viele in Bequemlichkeit. Eines Tages begannen die Mönche in der Versammlungshalle folgendes Gespräch: „Freunde, der und der Mönch hat durch seine vorzügliche Pflichterfüllung großen Gewinn und große Ehrerbietung erlangt. Durch diesen einen Mönch begünstigt, leben viele in Bequemlichkeit.“ Als der Meister herbeitrat, fragte er: „Mönche, über welches Thema sprecht ihr hier gerade, während ihr beisammensitzt?“ Als sie antworteten: „Über dieses Thema“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt, auch in der Vergangenheit erfüllte dieser Mönch gewissenhaft seine Pflichten. Auch in der Vergangenheit gingen fünfhundert Seher nicht in den Wald, um Waldfrüchte zu suchen, sondern fristeten ihr Leben allein von den Waldfrüchten, die dieser herbeigeschafft hatte“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto isipabbajjaṃ pabbajitvā pañcasataisiparivāro pabbatapāde vihāsi. Tadā himavante caṇḍo nidāgho ahosi, tattha tattha pānīyāni chijjiṃsu, tiracchānā pānīyaṃ alabhamānā kilamanti. Atha tesu tāpasesu eko tāpaso tesaṃ pipāsadukkhaṃ disvā ekaṃ rukkhaṃ chinditvā doṇiṃ katvā pānīyaṃ ussiñcitvā doṇiṃ pūretvā tesaṃ pānīyaṃ adāsi. Bahūsu sannipatitvā pānīyaṃ pivantesu tāpasassa phalāphalatthāya gamanokāso nāhosi. So nirāhāropi pānīyaṃ detiyeva. Migagaṇā cintesuṃ ‘‘ayaṃ amhākaṃ pānīyaṃ dento phalāphalatthāya gantuṃ okāsaṃ na labhati, nirāhāratāya ativiya kilamati, handamayaṃ katikaṃ karomā’’ti. Te katikaṃ akaṃsu ‘‘ito paṭṭhāya pānīyaṃ pivanatthāya āgacchantena attano balānurūpena phalāphalaṃ gahetvāva āgantabba’’nti. Te tato paṭṭhāya ekeko tiracchāno [Pg.476] attano attano balānurūpena madhuramadhurāni ambajambupanasādīnigahetvāva āgacchati. Ekassa atthāya ābhataṃ phalāphalaṃ aḍḍhateyyasakaṭabhārappamāṇaṃ ahosi. Pañcasatatāpasā tadeva paribhuñjanti. Atirekaṃ chaḍḍiyittha. Einst, als Brahmadatta in Benares regierte, wurde der Bodhisatta in einer hochangesehenen Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, entsagte er der Welt und wurde ein Einsiedler. Mit einem Gefolge von fünfhundert Einsiedlern lebte er am Fuße der Berge. Zu jener Zeit herrschte im Himalaya eine heftige Sommerhitze, und hier und da versiegte das Trinkwasser. Da die Tiere kein Trinkwasser bekamen, litten sie große Not. Unter diesen Einsiedlern sah einer die Qual des Durstes dieser Tiere, fällte einen Baum, fertigte einen Trog an, schöpfte Trinkwasser hinein, füllte den Trog und gab den Tieren zu trinken. Da viele Tiere zusammenkamen und tranken, hatte der Einsiedler keine Gelegenheit mehr, wegzugehen, um Waldfrüchte zu sammeln. Obwohl er selbst ohne Nahrung blieb, gab er ihnen weiterhin Wasser. Die Herden von Wildtieren dachten: "Dieser Einsiedler, der uns Wasser gibt, hat keine Gelegenheit, wegzugehen, um Waldfrüchte zu sammeln. Weil er ohne Nahrung ist, leidet er große Erschöpfung. Wohlan, lasst uns eine Vereinbarung treffen!" Sie trafen die Vereinbarung: "Wer von heute an kommt, um Wasser zu trinken, muss entsprechend seiner eigenen Kraft Waldfrüchte mitbringen." Von da an brachte jedes einzelne Tier entsprechend seiner Kraft süße Früchte wie Mangos, Rosenäpfel, Jackfrüchte und andere mit. Die für den einzelnen Einsiedler herbeigebrachten Früchte entsprachen der Ladung von zweieinhalb Ochsenkarren. Die fünfhundert Einsiedler ernährten sich von genau diesen Früchten, und was übrig blieb, wurde weggeworfen. Bodhisatto taṃ disvā ‘‘ekaṃ nāma vattasampannaṃ nissāya ettakānaṃ tāpasānaṃ phalāphalatthāya agantvā yāpanaṃ uppannaṃ, vīriyaṃ nāma kātabbamevā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta dies sah, sagte er: "In Abhängigkeit von einem einzigen pflichtbewussten Mann ist all diesen Einsiedlern der Lebensunterhalt zuteilgeworden, ohne dass sie selbst nach Früchten suchen gehen mussten. Wahrlich, man sollte stets Anstrengung zeigen!", und er sprach diese Strophe: 124. 124. ‘‘Vāyametheva puriso, na nibbindeyya paṇḍito; Vāyāmassa phalaṃ passa, bhuttā ambā anītiha’’nti. "Ein Mann sollte sich stets bemühen, ein Weiser sollte niemals verzagen. Sieh den Lohn der Anstrengung: Die Mangos wurden gegessen – und das ist keine bloße Legende!" Tatrāyaṃ saṅkhepattho – paṇḍito attano vattapūraṇādike kammasmiṃ vāyametheva, na ukkaṇṭheyya. Kiṃkāraṇā? Vāyāmassa nipphalatāya abhāvato. Iti mahāsatto ‘‘vāyāmo nāmesa saphalova hotī’’ti isigaṇaṃ ālapanto ‘‘vāyāmassa phalaṃ passā’’ti āha. Kīdisaṃ? Bhuttā ambā anītihaṃ. Tattha ambāti desanāmattaṃ, tehi pana nānappakārāni phalāphalāni ābhatāni. Tesu sampannatarānaṃ ussannatarānaṃ vā vasena ‘‘ambā’’ti vuttaṃ. Ye imehi pañcahi isisatehi sayaṃ araññaṃ agantvā ekassa atthāya ānītā ambā bhuttā, idaṃ vāyāmassa phalaṃ. Tañca kho pana anītihaṃ, ‘‘iti āha iti āhā’’ti evaṃ itihītihena gahetabbaṃ na hoti, paccakkhameva taṃ phalaṃ passāti. Evaṃ mahāsatto isigaṇassa ovādaṃ adāsi. Hierbei ist dies die kurze Bedeutung: Ein Weiser sollte sich bei der Erfüllung seiner Pflichten und anderen Aufgaben stets bemühen und nicht verdrossen sein. Aus welchem Grund? Weil Anstrengung niemals fruchtlos bleibt. So sprach das Große Wesen, indem es sich an die Schar der Einsiedler wandte: "Sieh den Lohn der Anstrengung!", um zu zeigen, dass Anstrengung stets Früchte trägt. Welcher Art ist dieser? "Die Mangos wurden gegessen – und das ist keine bloße Legende." Hierbei ist "Mangos" nur eine beispielhafte Lehrweise; tatsächlich wurden von ihnen verschiedene Arten von Früchten herbeigebracht. Wegen der besonderen Süße oder der großen Fülle dieser Früchte wurde das Wort "Mangos" verwendet. Dass diese fünfhundert Einsiedler, ohne selbst in den Wald zu gehen, die Mangos aßen, die für den Nutzen eines einzigen herbeigebracht worden waren – das ist die Frucht der Anstrengung. Und dies ist überdies keine bloße Legende, nichts, das man durch Hörensagen wie 'So hat er gesagt, so hat er gesagt' annehmen müsste; sieh diese Frucht als etwas direkt Offensichtliches. Auf diese Weise gab das Große Wesen der Schar der Einsiedler seine Unterweisung. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā vattasampanno tāpaso ayaṃ bhikkhu ahosi, gaṇasatthā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte, stellte er die Verbindung zur Jātaka-Erzählung her: "Der pflichtbewusste Einsiedler von damals war dieser Mönch, und das Haupt der Schar war ich selbst." Ambajātakavaṇṇanā catutthā. Die vierte Erklärung des Ambajātaka.
[125] 5. Kaṭāhakajātakavaṇṇanā [125] 5. Die Erklärung des Kaṭāhakajātaka. Bahumpi [Pg.477] so vikattheyyāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ vikatthakabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tassa vatthu heṭṭhā kathitasadisameva. "Auch wenn er viel prahlen mag" – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf einen prahlerischen Mönch. Die Geschichte dazu gleicht genau der zuvor erzählten. Atīte pana bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mahāvibhavo seṭṭhi ahosi. Tassa bhariyā puttaṃ vijāyi, dāsīpissa taṃ divasaññeva puttaṃ vijāyi. Te ekatova vaḍḍhiṃsu. Seṭṭhiputte lekhaṃ sikkhante dāsopissa phalakaṃ vahamāno gantvā teneva saddhiṃ lekhaṃ sikkhi, gaṇanaṃ sikkhi, dve tayo vohāre akāsi. So anukkamena vacanakusalo vohārakusalo yuvā abhirūpo ahosi, nāmena kaṭāheko nāma. So seṭṭhighare bhaṇḍāgārikakammaṃ karonto cintesi ‘‘na maṃ ime sabbakālaṃ bhaṇḍāgārikakammaṃ kāressanti, kiñcideva dosaṃ disvā tāḷetvā bandhitvā lakkhaṇena aṅketvā dāsaparibhogenapi paribhuñjissanti. Paccante kho pana seṭṭhissa sahāyako seṭṭhi atthi, yaṃnūnāhaṃ seṭṭhissa vacanena lekhaṃ ādāya tattha gantvā ‘ahaṃ seṭṭhiputto’ti vatvā taṃ seṭṭhiṃ vañcetvā tassa dhītaraṃ gahetvā sukhaṃ vaseyya’’nti. So sayameva paṇṇaṃ gahetvā ‘‘ahaṃ asukaṃ nāma mama puttaṃ tava santikaṃ pahiṇiṃ, āvāhavivāhasambandho nāma mayhañca tayā, tuyhañca mayā saddhiṃ patirūpo, tasmā tvaṃ imassa dārakassa attano dhītaraṃ datvā etaṃ tattheva vasāpehi, ahampi okāsaṃ labhitvā āgamissāmī’’ti likhitvā seṭṭhisseva muddikāya lañjetvā yathārucitaṃ paribbayañceva gandhavatthādīni ca gahetvā paccantaṃ gantvā seṭṭhiṃ disvā vanditvā aṭṭhāsi. In der Vergangenheit nun, als Brahmadatta in Benares regierte, war der Bodhisatta ein sehr wohlhabender Großkaufmann. Seine Ehefrau gebar einen Sohn, und auch seine Sklavin gebar am selben Tag einen Sohn. Die beiden wuchsen zusammen auf. Als der Kaufmannssohn das Schreiben erlernte, ging auch der Sklavensohn mit ihm, trug die Schrifttafel, lernte das Schreiben mit ihm zusammen, erlernte das Rechnen und machte zwei oder drei geschäftliche Erfahrungen. Er wurde allmählich sprachgewandt, geschäftstüchtig, jung und gutaussehend; sein Name war Kaṭāhaka. Während er im Hause des Kaufmanns die Arbeit des Schatzmeisters verrichtete, dachte er: "Diese Herrschaften werden mich nicht für immer als Schatzmeister arbeiten lassen. Wenn sie den kleinsten Fehler bei mir entdecken, werden sie mich schlagen, fesseln, brandmarken und mich wie einen gewöhnlichen Sklaven behandeln. Nun gibt es aber im Grenzgebiet einen Kaufmann, der ein Freund meines Herren ist. Wie wäre es, wenn ich ein Schreiben im Namen des Kaufmanns verfassen, dorthin reisen, behaupten würde: 'Ich bin der Kaufmannssohn', jenen Kaufmann täuschen, seine Tochter heiraten und glücklich leben würde?" Er selbst verfasste einen Brief: "Ich habe meinen Sohn namens Soundso zu dir gesandt. Eine eheliche Verbindung zwischen meiner Familie und der deinen ist durchaus angemessen. Schenke daher diesem Knaben deine Tochter und lass ihn dort bei dir wohnen. Wenn ich die Gelegenheit finde, werde auch ich nachkommen." Er schrieb dies auf, siegelte es mit dem Siegelring des Kaufmanns selbst, nahm die nötigen Reisemittel sowie Wohlgerüche, Kleider und anderes nach Belieben an sich, reiste in das Grenzgebiet, suchte den dortigen Kaufmann auf, erwies ihm respektvoll seine Ehrerbietung und blieb vor ihm stehen. Atha naṃ seṭṭhi ‘‘kuto āgatosi, tātā’’ti pucchi. ‘‘Bārāṇasito’’ti. ‘‘Kassa puttosī’’ti? ‘‘Bārāṇasiseṭṭhissā’’ti. ‘‘Kenatthenāgatosī’’ti? Tasmiṃ khaṇe kaṭāhako ‘‘idaṃ disvā jānissathā’’ti paṇṇaṃ adāsi. Seṭṭhi paṇṇaṃ vācetvā ‘‘idānāhaṃ jīvāmi nāmā’’ti tuṭṭhacitto dhītaraṃ datvā patiṭṭhāpesi. Tassa parivāro mahanto ahosi. So yāgukhajjakādīsu vā vatthagandhādīsu vā upanītesu ‘‘evampi nāma yāguṃ [Pg.478] pacanti, evaṃ khajjakaṃ, evaṃ bhattaṃ, aho paccantavāsikā nāmā’’ti yāguādīni garahati. ‘‘Ime paccantavāsibhāveneva ahatasāṭake vaḷañjituṃ na jānanti, gandhe pisituṃ, pupphāni ganthituṃ na jānantī’’ti vatthakammantikādayo garahati. Da fragte ihn der Kaufmann: "Woher kommst du, mein Lieber?" – "Aus Benares." – "Wessen Sohn bist du?" – "Des Kaufmanns von Benares." – "Aus welchem Grund bist du gekommen?" In diesem Moment überreichte Kaṭāhaka den Brief und sagte: "Wenn Ihr dies seht, werdet Ihr es wissen." Nachdem der Kaufmann den Brief gelesen hatte, dachte er hocherfreut: "Nun bin ich wahrhaft glücklich!", gab ihm seine Tochter zur Frau und ließ ihn sich dort niederlassen. Er hatte ein großes Gefolge. Wann immer ihm Reisschleim, Speisen oder Gewänder, Wohlgerüche und dergleichen gereicht wurden, tadelte er den Reisschleim und die anderen Dinge mit den Worten: "Kocht man etwa so Reisschleim? So bereitet man Speisen zu? So kocht man Reis? Oh, diese Grenzbewohner eben!" Er tadelte die Weber und andere Handwerker und sagte: "Allein wegen ihres Daseins als Grenzbewohner wissen diese Leute nicht, wie man neue Gewänder trägt, noch wissen sie, wie man Wohlgerüche zerreibt oder Blumen kränzt." Bodhisattopi dāsaṃ apassanto ‘‘kaṭāhako na dissati, kahaṃ gato, pariyesatha na’’nti samantā manusse payojesi. Tesu eko tattha gantvā taṃ disvā sañjānitvā attānaṃ ajānāpetvā āgantvā bodhisattassa ārocesi. Bodhisatto taṃ pavattiṃ sutvā ‘‘ayuttaṃ tena kataṃ, gantvā naṃ gahetvā āgacchissāmī’’ti rājānaṃ āpucchitvā mahantena parivārena nikkhami. ‘‘Seṭṭhi kira paccantaṃ gacchatī’’ti sabbattha pākaṭo jāto. Kaṭāhako ‘‘seṭṭhi kira āgacchatī’’ti sutvā cintesi ‘‘na so aññena kāraṇena āgacchissati, maṃ nissāyevassa āgamanena bhavitabbaṃ. Sace panāhaṃ palāyissāmi, puna āgantuṃ na sakkā bhavissati. Atthi panesa upāyo. Mama sāmikassa paṭipathaṃ gantvā dāsakammaṃ katvā tameva ārādhessāmī’’ti. So tato paṭṭhāya parisamajjhe evaṃ bhāsati ‘‘aññe bālamanussā attano bālabhāvena mātāpitūnaṃ guṇaṃ ajānantā tesaṃ bhojanavelāya apacitikammaṃ akatvā tehi saddhiṃyeva bhuñjanti, mayaṃ pana mātāpitūnaṃ bhojanakāle paṭiggahaṃ upanema, kheḷamallakaṃ upanema, bhājanāni upanema, pānīyampi bījanimpi gahetvā upatiṭṭhāmā’’ti yāva sarīravaḷañjanakāle udakakalasaṃ ādāya paṭicchannaṭṭhānagamanā sabbaṃ dāsehi sāmikānaṃ kattabbakiccaṃ pakāsesi. Als auch der Bodhisatta den Sklaven nicht sah, schickte er ringsum Leute aus mit den Worten: „Kaṭāhaka ist nicht zu sehen. Wohin ist er gegangen? Sucht ihn!“ Einer von ihnen ging dorthin, sah ihn, erkannte ihn und kehrte zurück, ohne sich zu erkennen zu geben, um es dem Bodhisatta zu berichten. Als der Bodhisatta diese Nachricht hörte, dachte er: „Er hat Ungehöriges getan. Ich werde hingehen, ihn ergreifen und zurückkehren.“ Er verabschiedete sich vom König und brach mit einem großen Gefolge auf. Überall wurde bekannt: „Der Großkaufmann reist angeblich in das Grenzgebiet.“ Als Kaṭāhaka hörte: „Der Großkaufmann kommt angeblich“, dachte er: „Er wird aus keinem anderen Grund kommen; sein Kommen muss wegen mir geschehen. Wenn ich jedoch fliehe, wird es mir unmöglich sein, jemals wiederzukehren. Es gibt jedoch diesen Ausweg: Ich werde meinem Herrn entgegengehen, die Dienste eines Sklaven verrichten und ihn so besänftigen.“ Von da an sprach er inmitten der Leute wie folgt: „Andere, törichte Menschen, die aufgrund ihrer eigenen Torheit die Güte ihrer Eltern nicht erkennen, erweisen ihnen zur Essenszeit keine Ehrfurcht, sondern essen einfach mit ihnen zusammen. Wir hingegen reichen unseren Eltern zur Essenszeit das Waschbecken, reichen die Speischale, reichen das Geschirr und stehen bereit, um ihnen Trinkwasser und den Fächer zu halten.“ So zeigte er, indem er beim Verrichten der Notdurft das Wassergefäß nahm und ihm bis zum verborgenen Ort folgte, all jene Pflichten auf, die Sklaven für ihre Herren zu erbringen haben. So evaṃ parisaṃ uggaṇhāpetvā bodhisattassa paccantasamīpaṃ āgatakāle sasuraṃ avoca ‘‘tāta, mama kira pitā tumhākaṃ dassanatthāya āgacchati, tumhe khādanīyabhojanīyaṃ paṭiyādāpetha, ahaṃ paṇṇākāraṃ gahetvā paṭipathaṃ gamissāmī’’ti. So ‘‘sādhu, tātā’’ti sampaṭicchi. Kaṭāhako bahuṃ paṇṇākāramādāya mahantena parivārena gantvā bodhisattaṃ vanditvā paṇṇākāraṃ adāsi. Bodhisattopi paṇṇākāraṃ gahetvā tena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā pātarāsakāle khandhāvāraṃ nivāsetvā sarīravaḷañjanatthāya paṭicchannaṭṭhānaṃ pāvisi. Kaṭāhako attano parivāraṃ [Pg.479] nivattetvā kalasaṃ ādāya bodhisattassa santikaṃ gantvā udakakiccapariyosāne pādesu patitvā ‘‘sāmi, ahaṃ tumhākaṃ yattakaṃ icchatha, tattakaṃ dhanaṃ dassāmi, mā me yasaṃ antaradhāpayitthā’’ti āha. Bodhisatto tassa vattasampadāya pasīditvā ‘‘mā bhāyi, natthi te mama santikā antarāyo’’ti samassāsetvā paccantanagaraṃ pāvisi. Mahanto sakkāro ahosi, kaṭāhakopissa nirantaraṃ dāsena kattabbakiccaṃ karoti. Atha naṃ ekāya velāya sukhanisinnaṃ paccantaseṭṭhi āha ‘‘mahāseṭṭhi, mayā tumhākaṃ paṇṇaṃ disvāva tumhākaṃ puttassa dārikā dinnā’’ti bodhisatto kaṭāhakaṃ puttameva katvā tadanucchavikaṃ piyavacanaṃ vatvā seṭṭhiṃ tosesi. Tato paṭṭhāya kaṭāhakassa mukhaṃ ulloketuṃ samattho nāma nāhosi. Nachdem er die Leute auf diese Weise unterwiesen hatte, sagte er, als der Bodhisatta in die Nähe des Grenzgebiets kam, zu seinem Schwiegervater: „Vater, mein Vater kommt angeblich, um euch zu besuchen. Bitte lasst feste und weiche Speisen zubereiten. Ich werde Geschenke nehmen und ihm entgegengehen.“ Dieser stimmte zu: „Sehr wohl, mein Lieber.“ Kaṭāhaka nahm zahlreiche Geschenke mit, ging mit einem großen Gefolge hin, verneigte sich ehrfurchtsvoll vor dem Bodhisatta und überreichte die Gaben. Auch der Bodhisatta nahm die Geschenke an, wechselte freundliche Worte mit ihm, schlug zur Frühstückszeit sein Lager auf und begab sich an einen verborgenen Ort, um sich zu reinigen. Kaṭāhaka hieß sein Gefolge umkehren, nahm das Wassergefäß, trat an den Bodhisatta heran und warf sich nach Beendigung der Reinigung vor dessen Füßen nieder: „Herr, ich werde Euch so viel Reichtum geben, wie Ihr wünscht. Bitte zerstört nicht mein Ansehen!“ Der Bodhisatta war über seine vorbildliche Pflichterfüllung erfreut, beruhigte ihn mit den Worten: „Fürchte dich nicht, von meiner Seite droht dir keine Gefahr“, und betrat die Grenzstadt. Es wurde ihm ein großartiger Empfang bereitet, und Kaṭāhaka verrichtete unermüdlich alle Pflichten eines Sklaven für ihn. Als der Großkaufmann des Grenzgebiets später einmal in einer entspannten Stunde zu dem sitzenden Bodhisatta sagte: „Großkaufmann, als ich Euren Brief sah, habe ich Eurem Sohn mein Mädchen zur Frau gegeben“, behandelte der Bodhisatta Kaṭāhaka wie seinen eigenen Sohn, sprach dem Anlass entsprechende, liebevolle Worte und stellte den Großkaufmann zufrieden. Von diesem Tag an wagte es niemand mehr, Kaṭāhaka direkt ins Gesicht zu sehen. Athekadivasaṃ mahāsatto seṭṭhidhītaraṃ pakkositvā ‘‘ehi, amma, sīse me ūkā vicināhī’’ti vatvā taṃ āgantvā ūkā gahetvā ṭhitaṃ piyavacanaṃ vatvā ‘‘kathehi, amma, kacci te mama putto sukhadukkhesu appamatto, ubho janā sammodamānā samaggavāsaṃ vasathā’’ti pucchi. ‘‘Tāta, mahāseṭṭhi tumhākaṃ puttassa añño doso natthi, kevalaṃ āhāraṃ garahatī’’ti. ‘‘Amma, niccakālamesa dukkhasīlova, apica te ahaṃ tassa mukhabandhanamantaṃ dassāmi, taṃ tvaṃ sādhukaṃ uggaṇhitvā mama puttassa bhojanakāle garahantassa uggahitaniyāmeneva purato ṭhatvā vadeyyāsī’’ti gāthaṃ uggaṇhāpetvā katipāhaṃ vasitvā bārāṇasimeva agamāsi. Kaṭāhakopi bahuṃ khādanīyabhojanīyaṃ ādāya anumaggaṃ gantvā bahudhanaṃ datvā vanditvā nivatti. So bodhisattassa gatakālato paṭṭhāya atirekamānī ahosi. So ekadivasaṃ seṭṭhidhītāya nānaggarasabhojanaṃ upanetvā kaṭacchuṃ ādāya parivisantiyā bhattaṃ garahituṃ ārabhi. Seṭṭhidhītā bodhisattassa santike uggahitaniyāmeneva imaṃ gāthamāha – Eines Tages rief das Große Wesen die Tochter des Großkaufmanns zu sich und sagte: „Komm, mein Kind, suche nach Läusen auf meinem Kopf.“ Als sie herbeikam und dastand, um die Läuse abzusuchen, sprach er liebevoll zu ihr und fragte: „Sag mir, mein Kind, sorgt sich mein Sohn in Freud und Leid pflichtbewusst um dich? Lebt ihr beide einträchtig und glücklich zusammen?“ Sie antwortete: „Vater, Großkaufmann, Euer Sohn hat keinen anderen Fehler, außer dass er ständig das Essen tadelt.“ Daraufhin sagte er: „Mein Kind, er war schon immer von schwieriger Natur. Dennoch werde ich dir einen Spruch geben, der ihm den Mund verschließt. Lerne ihn gut auswendig, und wenn mein Sohn beim Essen nörgelt, stelle dich vor ihn und sprich ihn genau so, wie du ihn gelernt hast.“ Er lehrte sie die Strophe, blieb noch einige Tage und kehrte dann nach Benares zurück. Auch Kaṭāhaka nahm reichlich Speisen mit, begleitete ihn ein Stück des Weges, übergab ihm viel Vermögen, verneigte sich ehrfurchtsvoll und kehrte um. Nach der Abreise des Bodhisatta wurde er überaus hochmütig. Als die Kaufmannstochter ihm eines Tages Speisen von erlesenstem Geschmack brachte und ihn mit der Schöpfkelle bediente, fing er wieder an, das Essen zu tadeln. Da sprach die Kaufmannstochter genau so, wie sie es beim Bodhisatta gelernt hatte, diese Strophe: 125. 125. ‘‘Bahumpi so vikattheyya, aññaṃ janapadaṃ gato; Anvāgantvāna dūseyya, bhuñja bhoge kaṭāhakā’’ti. „Viel mag jener prahlen, der in ein anderes Land gezogen ist; doch einer, der ihm nachreist, könnte ihn bloßstellen. Genieße deine Reichtümer, o Kaṭāhaka!“ Tattha bahumpi so vikattheyya, aññaṃ janapadaṃ gatoti yo attano jātibhūmito aññaṃ janapadaṃ gato hoti, yatthassa jātiṃ na jānanti, so [Pg.480] bahumpi vikattheyya, vambhanavacanaṃ vañcanavacanaṃ vadeyya. Anvāgantvāna dūseyyāti imaṃ tāva vāraṃ sāmikassa paṭipathaṃ gantvā dāsakiccassa katattā kasāhi paharitvā piṭṭhicammuppāṭanato ca lakkhaṇāhananato ca muttosi. Sace anācāraṃ karosi, puna aññasmiṃ āgamanavāre tava sāmiko anvāgantvāna dūseyya, imaṃ gehaṃ anuāgantvā kasābhighātehi ceva lakkhaṇāhananena ca jātippakāsanena ca taṃ dūseyya upahaneyya. Tasmā imaṃ anācāraṃ pahāya bhuñja bhoge kaṭāhaka, mā pacchā attano dāsabhāvaṃ pākaṭaṃ kāretvā vippaṭisārī ahosīti ayamettha seṭṭhino adhippāyo. Hierbei bedeutet „Viel mag jener prahlen, der in ein anderes Land gezogen ist“: Wer von seiner Geburtsstätte in ein anderes Land zieht, wo man seine Herkunft nicht kennt, der mag viel prahlen und verächtliche sowie täuschende Worte sprechen. „Doch einer, der ihm nachreist, könnte ihn bloßstellen“ bedeutet: Dieses Mal bist du, weil du deinem Herrn entgegengegangen bist und die Pflichten eines Sklaven verrichtet hast, dem Auspeitschen mit Ruten, dem Abziehen der Haut vom Rücken und dem Brandmarken entgangen. Wenn du dich jedoch ungehörig verhältst, wird dein Herr bei seinem nächsten Kommen dir nachreisen und dich bloßstellen; er wird in dieses Haus nachfolgen und dich durch Auspeitschen, Brandmarken und das Offenlegen deiner wahren Herkunft ruinieren und demütigen. „Darum lasse von diesem ungehörigen Verhalten ab und genieße deine Reichtümer, o Kaṭāhaka; sorge nicht dafür, dass deine Sklavennatur später offenbar wird und du es bereust.“ Dies ist hierbei die Absicht des Großkaufmanns. Seṭṭhidhītā pana etamatthaṃ ajānantī uggahitaniyāmena byañjanameva payirudāhāsi. Kaṭāhako ‘‘addhā seṭṭhinā mama kulaṃ ācikkhitvā etissā sabbaṃ kathitaṃ bhavissatī’’ti tato paṭṭhāya puna bhattaṃ garahituṃ na visahi, nihatamāno yathāladdhaṃ bhuñjitvā yathākammaṃ gato. Die Kaufmannstochter jedoch, die diese Bedeutung nicht verstand, sprach lediglich den reinen Wortlaut so aus, wie sie ihn gelernt hatte. Kaṭāhaka dachte: „Sicherlich hat der Großkaufmann meine Herkunft offengelegt und ihr alles erzählt!“ Von da an wagte er es nicht mehr, das Essen zu tadeln. Mit gebrochenem Stolz aß er fortan, was immer er vorgesetzt bekam, und ging schließlich gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā kaṭāhako vikatthakabhikkhu ahosi, bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, führte er die Geburtsgeschichte wie folgt zusammen: „Damals war Kaṭāhaka der prahlerische Mönch, der Großkaufmann von Benares aber war ich selbst.“ Kaṭāhakajātakavaṇṇanā pañcamā. Hier endet die Erklärung des Kaṭāhaka-Jātaka, die fünfte.
[126] 6. Asilakkhaṇajātakavaṇṇanā [126] 6. Die Erklärung des Asilakkhaṇa-Jātaka Tathevekassa kalyāṇanti idaṃ satthā jetavane viharanto kosalarañño asilakkhaṇapāṭhakaṃ brāhmaṇaṃ ārabbha kathesi. So kira kammārehi rañño asīnaṃ āhaṭakāle asiṃ upasiṅghitvā asilakkhaṇaṃ udāharati. So yesaṃ hatthato lābhaṃ labhati, tesaṃ asiṃ ‘‘lakkhaṇasampanno maṅgalasaṃyutto’’ti vadati. Yesaṃ hatthato lābhaṃ na labhati, tesaṃ asiṃ ‘‘avalakkhaṇo’’ti garahati. Atheko kammāro asiṃ katvā kosiyaṃ sukhumaṃ maricacuṇṇaṃ pakkhipitvā rañño asiṃ āhari. Rājā brāhmaṇaṃ pakkosāpetvā ‘‘asiṃ vīmaṃsā’’ti āha. Brāhmaṇassa asiṃ ākaḍḍhitvā upasiṅghantassa maricacuṇṇāni nāsaṃ pavisitvā [Pg.481] khipitukāmataṃ uppādesuṃ. Tassa khipantassa nāsikā asidhārāya paṭihatā dvidhā chijji. Tassevaṃ nāsikāya chinnabhāvo bhikkhusaṅghe pākaṭo jāto. Athekadivasaṃ dhammasabhāyaṃ bhikkhū kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, rañño kira asilakkhaṇapāṭhako asiṃ upasiṅghanto nāsikaṃ chindāpesī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva so brāhmaṇo asiṃ upasiṅghanto nāsikāchedaṃ patto, pubbepi pattoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Ebenso ist es für den einen gut“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines Brahmanen des Königs von Kosala, der die Merkmale von Schwertern las. Dieser pflegte nämlich, wenn die Schmiede dem König Schwerter brachten, an dem Schwert zu riechen und dessen Merkmale zu verkünden. Von wem er ein Geschenk erhielt, dessen Schwert bezeichnete er als ‚mit guten Merkmalen versehen und glückverheißend‘. Von wem er kein Geschenk erhielt, dessen Schwert tadelte er als ‚fehlerhaft‘. Da fertigte ein Schmied ein Schwert an, streute feines Pfefferpulver in die Scheide und brachte das Schwert dem König. Der König ließ den Brahmanen rufen und sprach: „Prüfe das Schwert!“ Als der Brahmane das Schwert herauszog und daran roch, drang das Pfefferpulver in seine Nase und erregte einen Niesreiz. Als er nieste, stieß seine Nase an die Schwertschneide und wurde in zwei Teile geschnitten. Dass ihm so die Nase abgeschnitten worden war, wurde in der Mönchsgemeinschaft bekannt. Da begannen die Mönche eines Tages in der Versammlungshalle ein Gespräch darüber: „Ihr Brüder, man sagt, der Schwertleser des Königs habe sich beim Riechen an einem Schwert die Nase abgeschnitten!“ Der Meister kam hinzu, fragte: „Mönche, zu welchem Gespräch habt ihr euch jetzt hier versammelt?“ und als sie antworteten: „Zu diesem und jenem“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt hat dieser Brahmane beim Riechen an einem Schwert den Verlust seiner Nase erlitten, auch in der Vergangenheit hat er ihn schon erlitten“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente tassa asilakkhaṇapāṭhako brāhmaṇo ahosīti sabbaṃ paccuppannavatthusadisameva. Rājā pana tassa vejje datvā nāsikākoṭiṃ phāsukaṃ kārāpetvā lākhāya paṭināsikaṃ kāretvā puna taṃ upaṭṭhākameva akāsi. Bārāṇasirañño pana putto natthi, ekā dhītā ceva bhāgineyyo ca ahesuṃ. So ubhopi te attano santikeyeva vaḍḍhāpesi. Te ekato vaḍḍhantā aññamaññaṃ paṭibaddhacittā ahesuṃ. Rājāpi amacce pakkosāpetvā ‘‘mayhaṃ bhāgineyyopi imassa rajjassa sāmikova, dhītaraṃ etasseva datvā abhisekamassa karomī’’ti vatvā puna cintesi ‘‘mayhaṃ bhāgineyyo sabbathāpi ñātakoyeva, etassa aññaṃ rājadhītaraṃ ānetvā abhisekaṃ katvā dhītaraṃ aññassa rañño dassāmi, evaṃ no ñātakā bahū bhavissanti, dvinnampi rajjānaṃ mayameva sāmikā bhavissāmā’’ti. So amaccehi saddhiṃ sammantetvā ‘‘ubhopete visuṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti bhāgineyyaṃ aññasmiṃ nivesane, dhītaraṃ aññasmiṃ vāsesi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Varanasi regierte, gab es dort einen Brahmanen, der die Merkmale von Schwertern las – alles Weitere gleicht der gegenwärtigen Geschichte. Der König jedoch übergab ihn den Ärzten, ließ die Nasenspitze heilen, ließ ihm eine künstliche Nase aus Lack anfertigen und machte ihn wieder zu seinem Diener. Der König von Varanasi hatte jedoch keinen Sohn, sondern nur eine Tochter und einen Neffen. Er ließ beide in seiner eigenen Nähe aufwachsen. Da sie zusammen aufwuchsen, verliebten sie sich ineinander. Auch der König rief seine Minister zusammen und sprach: „Mein Neffe ist ebenfalls ein rechtmäßiger Erbe dieses Reiches; ich werde ihm meine Tochter zur Frau geben und ihn salben lassen.“ Später jedoch dachte er: „Mein Neffe ist ohnehin schon mein Verwandter. Wenn ich für ihn die Tochter eines anderen Königs herbeiführe, ihn salbe und meine eigene Tochter einem anderen König gebe, so werden wir viele Verwandte haben, und wir selbst werden die Herrscher über zwei Reiche sein.“ Er beriet sich mit den Ministern und beschloss: „Es ist angebracht, die beiden voneinander zu trennen“, und so ließ er den Neffen in einem anderen Haus und die Tochter in einem anderen Haus wohnen. Te soḷasavassuddesikabhāvaṃ pattā ativiya paṭibaddhacittā ahesuṃ. Rājakumāro ‘‘kena nu kho upāyena mātuladhītaraṃ rājagehā nīharāpetuṃ sakkā bhaveyyā’’ti cintento ‘‘attheko upāyo’’ti mahāikkhaṇikaṃ pakkosāpetvā tassā sahassabhaṇḍikaṃ datvā ‘‘kiṃ mayā kattabba’’nti vutte ‘‘amma, tayi karontiyā anipphatti nāma natthi, kiñcideva kāraṇaṃ vatvā yathā mama mātulo rājā dhītaraṃ antogehā nīharāpeti, tathā karohī’’ti āha. Sādhu, sāmi, ahaṃ rājānaṃ upasaṅkamitvā evaṃ vakkhāmi ‘‘deva, rājadhītāya upari kāḷakaṇṇī atthi, ettakaṃ kālaṃ nivattitvā olokentopi natthi, ahaṃ rājadhītaraṃ asukadivase [Pg.482] nāma rathaṃ āropetvā bahuāvudhahatthe purise ādāya mahantena parivārena susānaṃ gantvā maṇḍalapīṭhikāya heṭṭhāmañce matamanussaṃ nipajjāpetvā uparimañce rājadhītaraṃ ṭhapetvā gandhodakaghaṭānaṃ aṭṭhuttarasatena nhāpetvā kāḷakaṇṇiṃ pavāhessāmī’’ti evaṃ vatvā rājadhītaraṃ susānaṃ nessāmi, tvaṃ amhākaṃ tattha gamanadivase amhehi puretarameva thokaṃ maricacuṇṇaṃ ādāya āvudhahatthehi attano manussehi parivuto rathaṃ abhiruyha susānaṃ gantvā rathaṃ susānadvāre ekapadese ṭhapetvā āvudhahatthe manusse susānavanaṃ pesetvā sayaṃ susāne maṇḍalapīṭhikaṃ pasāretvā matako viya paṭikujjo hutvā nipajja. Ahaṃ tattha āgantvā tava upari mañcakaṃ attharitvā rājadhītaraṃ ukkhipitvā mañce sayāpessāmi, tvaṃ tasmiṃ khaṇe maricacuṇṇaṃ nāsikāya pakkhipitvā dve tayo vāre khipeyyāsi. Tayā khipitakāle mayaṃ rājadhītaraṃ pahāya palāyissāma. Atha tvaṃ rājadhītaraṃ sīsaṃ nhāpetvā sayampi sīsaṃ nhāyitvā taṃ ādāya attano nivesanaṃ gaccheyyāsīti. So ‘‘sādhu sundaro upāyo’’ti sampaṭicchi. Als sie etwa sechzehn Jahre alt wurden, waren sie überaus heftig ineinander verliebt. Der Prinz dachte nach: „Mit welchem Mittel könnte ich wohl die Tochter meines Onkels aus dem Palast herbeiholen?“ Da überlegte er: „Es gibt einen Weg“, ließ eine große Wahrsagerin rufen, gab ihr eine Geldbörse mit tausend Münzen und als sie fragte: „Was soll ich tun?“, sprach er: „Mutter, wenn du es unternimmst, gibt es kein Misslingen. Erfinde irgendeinen Grund, so dass mein Onkel, der König, seine Tochter aus dem Palast hinausschickt, und handle danach!“ Sie antwortete: „Sehr wohl, mein Herr. Ich werde zum König gehen und so zu ihm sprechen: »O König, auf der Prinzessin lastet ein Unglück; all diese Zeit über gibt es niemanden, der sich nach ihr umdreht und sie ansieht. Ich werde die Prinzessin an einem bestimmten Tag auf einen Wagen setzen, viele Männer mit Waffen in den Händen mitnehmen und mit großem Gefolge zum Friedhof gehen. Dort werde ich unter einem runden Gestell auf einem unteren Bett einen Toten hinlegen, die Prinzessin auf ein oberes Bett setzen, sie mit einhundertacht Töpfen Duftwasser waschen und so das Unglück fortspülen.« So werde ich sprechen und die Prinzessin zum Friedhof bringen. Du aber musst am Tag unseres Aufbruchs noch vor uns dorthin gehen, ein wenig Pfefferpulver mitnehmen, umgeben von deinen eigenen bewaffneten Männern auf einem Wagen zum Friedhof fahren, den Wagen an einer Stelle nahe dem Friedhofstor stehen lassen, die bewaffneten Männer in den Friedhofswald schicken, selbst auf dem Friedhof das runde Gestell aufstellen und dich wie eine Leiche bäuchlings darunter hinlegen. Ich werde dorthin kommen, über dir ein kleines Bett aufstellen, die Prinzessin emporheben und sie auf dem Bett lagern. In diesem Augenblick musst du das Pfefferpulver in deine Nase stecken und zwei- oder dreimal niesen. Wenn du niest, werden wir die Prinzessin zurücklassen und fliehen. Dann musst du der Prinzessin das Haupt waschen, dir selbst auch das Haupt waschen, sie mitnehmen und zu deinem Haus gehen.“ Er stimmte zu: „Sehr gut, das ist ein hervorragender Plan!“ Sāpi gantvā rañño tamatthaṃ ārocesi, rājāpi sampaṭicchi. Rājadhītāyapi taṃ antaraṃ ācikkhi, sāpi sampaṭicchi. Sā nikkhamanadivase kumārassa saññaṃ datvā mahantena parivārena susānaṃ gacchantī ārakkhamanussānaṃ bhayajananatthaṃ āha – ‘‘mayā rājadhītāya mañce ṭhapitakāle heṭṭhāmañce matapuriso khipissati, khipitvā ca heṭṭhāmañcā nikkhamitvā yaṃ paṭhamaṃ passissati, tameva gahessati, appamattā bhaveyyāthā’’ti. Rājakumāro puretaraṃ gantvā vuttanayeneva tattha nipajji. Mahāikkhaṇikā rājadhītaraṃ ukkhipitvā maṇḍalapīṭhikāṭhānaṃ gacchantī ‘‘mā bhāyī’’ti saññāpetvā mañce ṭhapesi. Tasmiṃ khaṇe kumāro maricacuṇṇaṃ nāsāya pakkhipitvā khipi. Tena khipitamatteyeva mahāikkhaṇikā rājadhītaraṃ pahāya mahāravaṃ ravamānā sabbapaṭhamaṃ palāyi, tassā palātakālato paṭṭhāya ekopi ṭhātuṃ samattho nāma nāhosi, gahitagahitāni āvudhāni chaḍḍetvā sabbe palāyiṃsu. Kumāro yathāsammantitaṃ sabbaṃ katvā rājadhītaraṃ ādāya attano nivesanaṃ agamāsi. Sie ging hin und berichtete dem König von dieser Angelegenheit, und auch der König stimmte zu. Sie teilte diesen geheimen Plan auch der Prinzessin mit, und auch diese stimmte zu. Am Tag des Aufbruchs gab sie dem Prinzen ein Zeichen und sprach auf dem Weg zum Friedhof mit großem Gefolge zu den Wachtleuten, um ihnen Angst einzujagen: „Wenn ich die Prinzessin auf das Bett lege, wird der tote Mann auf dem Bett darunter niesen. Und wenn er geniest hat, wird er unter dem Bett hervorkommen und denjenigen, den er zuerst erblickt, packen! Seid also äußerst wachsam!“ Der Prinz war bereits zuvor dorthin gegangen und hatte sich auf die vereinbarte Weise hingelegt. Die Wahrsagerin hob die Prinzessin empor, ging zum Ort des runden Gestells, beruhigte sie mit den Worten: „Fürchte dich nicht“, und legte sie auf das Bett. In diesem Augenblick steckte der Prinz das Pfefferpulver in seine Nase und nieste. Sobald er nieste, ließ die Wahrsagerin die Prinzessin im Stich, stieß ein lautes Geschrei aus und floh als Erste von allen. Von dem Augenblick an, als sie floh, war nicht ein einziger Mensch mehr imstande, standzuhalten; sie warfen die Waffen weg, die sie gerade hielten, und alle flohen. Der Prinz tat alles, was vereinbart worden war, nahm die Prinzessin mit und kehrte in sein eigenes Haus zurück. Ikkhaṇikā [Pg.483] gantvā taṃ kāraṇaṃ rañño ārocesi. Rājā ‘‘pakatiyāpi sā mayā tassevatthāya puṭṭhā, pāyāse chaḍḍitasappi viya jāta’’nti sampaṭicchitvā aparabhāge bhāgineyyassa rajjaṃ datvā dhītaraṃ mahādeviṃ kāresi. So tāya saddhiṃ samaggavāsaṃ vasamāno dhammena rajjaṃ kāresi. Sopi asilakkhaṇapāṭhako tasseva upaṭṭhāko ahosi. Tassekadivasaṃ rājūpaṭṭhānaṃ āgantvā paṭisūriyaṃ ṭhatvā upaṭṭhahantassa lākhā vilīyi, paṭināsikā bhūmiyaṃ pati. So lajjāya adhomukho aṭṭhāsi. Atha naṃ rājā parihasanto ‘‘ācariya, mā cintayittha, khipitaṃ nāma ekassa kalyāṇaṃ hoti, ekassa pāpakaṃ. Tumhehi khipitena nāsikā chijjīyittha, mayaṃ pana khipantā mātuladhītaraṃ labhitvā rajjaṃ pāpuṇimhā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Die Wahrsagerin ging hin und berichtete dem König diese Angelegenheit. Der König stimmte dem zu und dachte: ‚Schon von Natur aus habe ich sie nur für ihn aufgezogen; es ist wie geklärte Butter, die in Milchreis gegossen wurde.‘ Später übergab er seinem Neffen die Königsherrschaft und machte seine Tochter zur Hauptkönigin. Dieser lebte mit ihr in einträchtiger Gemeinschaft und regierte das Reich rechtmäßig. Auch jener Deuter der Schwertmerkmale stand in dessen Diensten. Als dieser eines Tages zum königlichen Dienst erschien, um dem König aufzuwarten, und sich dabei mit dem Gesicht zur Sonne stellte, schmolz der Siegellack und seine künstliche Nase fiel zu Boden. Vor Scham stand er mit gesenktem Haupt da. Da neckte ihn der König und sprach: ‚Meister, sorgt Euch nicht! Ein Niesen bringt wahrlich dem einen Heil, dem anderen Unheil. Durch Euer Niesen wurde Eure Nase abgeschnitten, wir aber haben durch unser Niesen die Tochter des Onkels mütterlicherseits gewonnen und die Königsherrschaft erlangt.‘ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er folgende Strophe: 126. 126. ‘‘Tathevekassa kalyāṇaṃ, tathevekassa pāpakaṃ; Tasmā sabbaṃ na kalyāṇaṃ, sabbaṃ vāpi na pāpaka’’nti. „Ebenso bringt dasselbe dem einen Heil, ebenso bringt dasselbe dem anderen Unheil; darum ist nicht alles nur gut, noch ist alles nur böse.“ Tattha tathevekassāti tadevekassa. Ayameva vā pāṭho. Dutiyapadepi eseva nayo. Dabei bezieht sich ‚tathevekassa‘ auf ‚tadevekassa‘. Oder dies ist die eigentliche Lesart. Auch im zweiten Versfuß gilt dieselbe Methode. Iti so imāya gāthāya taṃ kāraṇaṃ āharitvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. So gab der König mit dieser Strophe jenen Vorfall wieder, vollbrachte heilsame Taten wie das Geben von Gaben und ging gemäß seinem Kamma dahin. Satthā imāya desanāya lokasammatānaṃ kalyāṇapāpakānaṃ anekaṃsikabhāvaṃ pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā asilakkhaṇapāṭhakova etarahi asilakkhaṇapāṭhako, bhāgineyyarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister verkündete mit dieser Lehrrede, dass das weltlich anerkannte Gute und Böse nicht absolut ist, und verknüpfte das Jātaka wie folgt: „Damals war der Deuter der Schwertmerkmale eben der heutige Deuter der Schwertmerkmale, der königliche Neffe aber war ich selbst.“ Asilakkhaṇajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung des Asilakkhaṇa-Jātaka ist die sechste.
[127] 7. Kalaṇḍukajātakavaṇṇanā [127] 7. Erklärung des Kalaṇḍuka-Jātaka Te desā tāni vatthūnīti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ vikatthakabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tattha dvepi vatthūni kaṭāhakajātakasadisāneva. „Te desā tāni vatthūni“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines prahlerischen Mönchs. Dabei sind beide Geschichten ganz ähnlich wie im Kaṭāhaka-Jātaka. Idha [Pg.484] panesa bārāṇasiseṭṭhino dāso kalaṇḍuko nāma ahosi. Tassa palāyitvā paccantavāsiseṭṭhino dhītaraṃ gahetvā mahantena parivārena vasanakāle bārāṇasiseṭṭhi pariyesāpetvāpi tassa gataṭṭhānaṃ ajānanto ‘‘gaccha, kalaṇḍukaṃ pariyesā’’ti attanā puṭṭhaṃ sukapotakaṃ pesesi. Sukapotako ito cito ca vicaranto taṃ nagaraṃ pāpuṇi. Tasmiñca kāle kalaṇḍuko nadīkīḷaṃ kīḷitukāmo bahuṃ mālāgandhavilepanañceva khādanīyabhojanīyāni ca gāhāpetvā nadiṃ gantvā seṭṭhidhītāya saddhiṃ nāvaṃ āruyha udake kīḷati. Tasmiñca padese nadīkīḷaṃ kīḷantā issarajātikā tikhiṇabhesajjaparibhāvitaṃ khīraṃ pivanti, tena tesaṃ divasabhāgampi udake kīḷantānaṃ sītaṃ na bādhati. Ayaṃ pana kalaṇḍuko khīragaṇḍūsaṃ gahetvā mukhaṃ vikkhāletvā taṃ khīraṃ nuṭṭhubhati. Nuṭṭhubhantopi udake anuṭṭhubhitvā seṭṭhidhītāya sīse nuṭṭhubhati. Sukapotakopi nadītīraṃ gantvā ekissā udumbarasākhāya nisīditvā oloketvā kalaṇḍukaṃ sañjānitvā seṭṭhidhītāya sīse nuṭṭhubhantaṃ disvā ‘‘are, kalaṇḍuka dāsa, attano jātiñca vasanaṭṭhānañca anussara, khīragaṇḍūsaṃ gahetvā mukhaṃ vikkhāletvā jātisampannāya sukhasaṃvaḍḍhāya seṭṭhidhītāya sīse mā nuṭṭhubhi, attano pamāṇaṃ na jānāsī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Hier in diesem Jātaka jedoch war dieser Sklave des Großkaufmanns von Bārāṇasī namens Kalaṇḍuka. Als dieser entflohen war, die Tochter eines Großkaufmanns im Grenzland geheiratet hatte und mit großem Gefolge lebte, erfuhr der Großkaufmann von Bārāṇasī trotz Nachforschungen nicht, wohin er gegangen war. Er sandte einen jungen Papagei, den er selbst aufgezogen hatte, mit den Worten aus: ‚Geh und suche Kalaṇḍuka!‘ Der junge Papagei flog hier- und dorthin und erreichte schließlich jene Stadt. Zu dieser Zeit wünschte Kalaṇḍuka sich ein Wasserspiel im Fluss zu veranstalten. Er ließ reichlich Blumenkränze, Duftstoffe und Salben sowie feste und flüssige Speisen mitnehmen, ging zum Fluss, bestieg zusammen mit der Kaufmannstochter ein Boot und vergnügte sich im Wasser. In jener Gegend tranken die vornehmen Leute, die sich im Fluss vergnügten, mit starker Medizin versetzte Milch; dadurch machte ihnen die Kälte keine Beschwerden, selbst wenn sie den halben Tag im Wasser spielten. Dieser Kalaṇḍuka jedoch nahm einen Schluck Milch in den Mund, spülte sich den Mund aus und spie die Milch aus. Beim Ausspucken spie er sie jedoch nicht ins Wasser, sondern auf den Kopf der Kaufmannstochter. Der junge Papagei flog an das Flussufer, ließ sich auf dem Ast eines Feigenbaums nieder, blickte hinab und erkannte Kalaṇḍuka. Als er sah, wie dieser auf den Kopf der Kaufmannstochter spie, rief er: ‚He, Sklave Kalaṇḍuka! Erinnere dich an deine Herkunft und deinen Wohnort! Nimm einen Schluck Milch, spüle deinen Mund aus, aber speie nicht auf den Kopf der Kaufmannstochter, die von edler Herkunft ist und in Wohlstand aufgewachsen ist! Kennst du dein rechtes Maß nicht?‘ Nach diesen Worten sprach er folgende Strophe: 127. 127. ‘‘Te desā tāni vatthūni, ahañca vanagocaro; Anuvicca kho taṃ gaṇheyyuṃ, piva khīraṃ kalaṇḍukā’’ti. „Jene Gegenden, jene Stätten gibt es, und ich, ein Waldbewohner, kenne sie. Nach genauer Untersuchung wird man dich gewiss ergreifen; trink die Milch, o Kalaṇḍuka!“ Tattha te desā tāni vatthūnīti mātukucchiṃ sandhāya vadati. Ayametthādhippāyo – yattha te vasitaṃ, na te khattiyadhītādīnaṃ kucchidesā. Yattha vāsi patiṭṭhito, na tāni khattiyadhītādīnaṃ kucchivatthūni. Atha kho dāsikucchiyaṃ tvaṃ vasi ceva patiṭṭhito cāti. Ahañca vanagocaroti tiracchānabhūtopi etamatthaṃ jānāmīti dīpeti. Anuvicca kho taṃ gaṇheyyunti evaṃ anācāraṃ caramānaṃ mayā gantvā ārocite anuvicca jānitvā tava sāmikā tāḷetvā ceva lakkhaṇāhatañca katvā taṃ gaṇheyyuṃ, gahetvā gamissanti, tasmā attano pamāṇaṃ ñatvā seṭṭhidhītāya sīse anuṭṭhubhitvā piva khīraṃ. Kalaṇḍukāti taṃ nāmenālapati. Dabei bezieht sich ‚jene Gegenden, jene Stätten‘ auf den Mutterleib. Dies ist hierbei der Sinn: Wo du verweilt hast, das waren nicht die Leiber von Königstöchtern und dergleichen. Wo du empfangen wurdest, das waren nicht die Leiber von Königstöchtern und dergleichen. Vielmehr hast du im Leib einer Sklavin gewohnt und bist darin empfangen worden. Und ‚ich, ein Waldbewohner‘ verdeutlicht: ‚Obwohl ich nur ein Tier bin, weiß ich um diesen Umstand.‘ ‚Nach genauer Untersuchung wird man dich gewiss ergreifen‘ bedeutet: Wenn du dich so ungehörig verhältst und ich hingehre und dies berichte, werden deine Herren nach genauer Untersuchung der Sache dich ergreifen, dich schlagen, brandmarken und wegbringen. Darum erkenne dein rechtes Maß, speie nicht auf den Kopf der Kaufmannstochter, sondern trink die Milch. Mit ‚Kalaṇḍuka‘ ruft er ihn beim Namen. Kalaṇḍukopi [Pg.485] suvapotakaṃ sañjānitvā ‘‘maṃ pākaṭaṃ kareyyā’’ti bhayena ‘‘ehi, sāmi, kadā āgatosī’’ti āha. Suko ‘‘na esa maṃ hitakāmatāya pakkosati, gīvaṃ pana me vaṭṭetvā māretukāmo’’ti ñatvāva ‘‘na me tayā attho’’ti tato uppatitvā bārāṇasiṃ gantvā yathādiṭṭhaṃ seṭṭhino vitthārena kathesi. Seṭṭhi ‘‘ayuttaṃ tena kata’’nti vatvā gantvā tassa āṇaṃ kāretvā bārāṇasimeva naṃ ānetvā dāsaparibhogena paribhuñji. Auch Kalaṇḍuka erkannte den jungen Papagei und sprach aus Angst, er könnte ihn entlarven: ‚Komm, mein Herr! Wann bist du angekommen?‘ Der Papagei jedoch erkannte: ‚Er ruft mich nicht aus Wohlwollen, sondern er will mir den Hals umdrehen und mich töten.‘ So sprach er: ‚Ich habe nichts mit dir zu schaffen‘, flog von dort auf, kehrte nach Bārāṇasī zurück und berichtete dem Großkaufmann ausführlich alles, was er gesehen hatte. Der Großkaufmann sagte: ‚Das war unrecht von ihm‘, ging dorthin, setzte seine Autorität durch, brachte ihn zurück nach Bārāṇasī und hielt ihn wieder im Sklavendienst. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kalaṇḍuko ayaṃ bhikkhu ahosi, bārāṇasiseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und verknüpfte das Jātaka wie folgt: „Damals war der Sklave Kalaṇḍuka dieser Mönch, der Großkaufmann von Bārāṇasī aber war ich selbst.“ Kalaṇḍukajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Kalaṇḍuka-Jātaka ist die siebte.
[128] 8. Biḷāravatajātakavaṇṇanā [128] 8. Erklärung des Biḷāravata-Jātaka Yo ve dhammaṃ dhajaṃ katvāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ kuhakabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Tadā hi satthā tassa kuhakabhāve ārocite ‘‘na, bhikkhave, idāneva, pubbepesa kuhakoyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Yo ve dhammaṃ dhajaṃ katvā“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines heuchlerischen Mönchs. Als dem Meister damals dessen Heuchelei gemeldet wurde, sprach er: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, sondern auch schon früher war dieser ein Heuchler.“ Nach diesen Worten trug er die Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mūsikayoniyaṃ paṭisandhiṃ gahetvā vuḍḍhimanvāya mahāsarīro sūkaracchāpakasadiso hutvā anekasatamūsikāhi parivuto araññe viharati. Atheko siṅgālo ito cito ca vicaranto taṃ mūsikayūthaṃ disvā ‘‘imā mūsikā vañcetvā khādissāmī’’ti cintetvā mūsikānaṃ āsayassa avidūre sūriyābhimukho vātaṃ pivanto ekena pādena aṭṭhāsi. Bodhisatto gocarāya caramāno taṃ disvā ‘‘sīlavā eso bhavissatī’’ti tassa santikaṃ gantvā ‘‘bhante, tvaṃ ko nāmo’’ti pucchi. ‘‘Dhammiko nāmā’’ti. ‘‘Cattāro pāde bhūmiyaṃ aṭhapetvā kasmā ekeneva ṭhitosī’’ti. ‘‘Mayi cattāro pāde pathaviyaṃ ṭhapente pathavī vahituṃ na sakkoti, tasmā ekeneva tiṭṭhāmī’’ti. ‘‘Mukhaṃ vivaritvā kasmā ṭhitosī’’ti? ‘‘Mayaṃ aññaṃ na bhakkhayāma, vātameva bhakkhayāmā’’ti. ‘‘Atha kasmā sūriyābhimukho [Pg.486] tiṭṭhasī’’ti? ‘‘Sūriyaṃ namassāmī’’ti. Bodhisatto tassa vacanaṃ sutvā ‘‘sīlavā eso bhavissatī’’ti tato paṭṭhāya mūsikagaṇena saddhiṃ sāyaṃ pātaṃ tassa upaṭṭhānaṃ gacchati. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta seine Wiedergeburt im Schoß einer Maus an. Als er herangewachsen war, besaß er einen großen Körper, der einem Frischling glich, und lebte, umgeben von vielen Hunderten von Mäusen, im Wald. Da schweifte ein Schakal hier- und dorthin, erblickte diese Mäuseschar und dachte: „Ich will diese Mäuse täuschen und sie fressen.“ Unweit vom Aufenthaltsort der Mäuse stellte er sich auf ein einziges Bein, das Gesicht der Sonne zugewandt, und verweilte dort, den Wind trinkend (mit geöffnetem Maul). Als der Bodhisatta auf Nahrungssuche umherstreifte, sah er ihn und dachte: „Dieser muss ein Tugendhafter sein.“ Er begab sich zu ihm und fragte: „Herr, wie ist dein Name?“ „Mein Name ist Dhammika“, antwortete er. „Warum stehst du auf nur einem einzigen Bein und setzt deine vier Beine nicht auf den Boden?“ „Wenn ich meine vier Beine auf die Erde setzen würde, könnte die Erde sie nicht tragen. Deshalb stehe ich auf nur einem Bein.“ „Warum stehst du da und hältst dein Maul geöffnet?“ „Wir fressen nichts anderes, wir nähren uns nur vom Wind.“ „Warum aber stehst du der Sonne zugewandt?“ „Ich verehre die Sonne.“ Als der Bodhisatta seine Worte vernahm, dachte er: „Dieser ist gewiss tugendhaft.“ Von jener Zeit an ging er zusammen mit der Mäuseschar morgens und abends hin, um ihm aufzuwarten. Athassa upaṭṭhānaṃ katvā gamanakāle siṅgālo sabbapacchimaṃ mūsikaṃ gahetvā maṃsaṃ khāditvā ajjhoharitvā mukhaṃ puñchitvā tiṭṭhati. Anupubbena mūsikagaṇo tanuko jāto. Mūsikā ‘‘pubbe amhākaṃ ayaṃ āsayo nappahoti, nirantarā tiṭṭhāma. Idāni sithilā, evampi āsayo na pūrateva, kiṃ nu kho eta’’nti bodhisattassa taṃ pavattiṃ ārocesuṃ. Bodhisatto ‘‘kena nu kho kāraṇena musikā tanuttaṃ gatā’’ti cintento siṅgāle āsaṅkaṃ ṭhapetvā ‘‘vīmaṃsissāmi na’’nti upaṭṭhānakāle sesamūsikā purato katvā sayaṃ pacchato ahosi. Siṅgālo tassa upari pakkhandi, bodhisatto attano gahaṇatthāya taṃ pakkhandantaṃ disvā nivattitvā ‘‘bho siṅgāla, idaṃ te vatasamādānaṃ na dhammasudhammatāya, paresaṃ pana vihiṃsanatthāya dhammaṃ dhajaṃ katvā carasī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Wenn sie ihm nun aufgewartet hatten und im Begriff waren zu gehen, ergriff der Schakal stets die allerletzte Maus, fraß ihr Fleisch, verschlang sie, wischte sich das Maul ab und blieb so stehen. Mit der Zeit wurde die Mäuseschar spärlicher. Die Mäuse berichteten diese Begebenheit dem Bodhisatta: „Früher reichte unser Wohnort kaum aus, wir standen dicht an dicht gedrängt. Jetzt ist es hier geräumig, und dennoch füllt sich der Wohnort nicht. Was mag wohl die Ursache dafür sein?“ Der Bodhisatta überlegte: „Aus welchem Grund ist die Zahl der Mäuse wohl so geschrumpft?“, hegte Verdacht gegen den Schakal und dachte: „Ich will ihn prüfen.“ Zur Zeit der Aufwartung schickte er die übrigen Mäuse voraus und hielt sich selbst ganz hinten auf. Der Schakal sprang auf ihn zu. Als der Bodhisatta sah, dass dieser heransprang, um ihn zu packen, wich er aus, wandte sich um und sprach: „He, Schakal! Dieses dein Gelübde dient nicht einer wahren, guten Lehre, sondern vielmehr der Schädigung anderer; du ziehst umher, indem du das Gesetz wie eine Fahne vor dir herträgst!“, und sprach diese Strophe: 128. 128. ‘‘Yo ve dhammaṃ dhajaṃ katvā, nigūḷho pāpamācare; Vissāsayitvā bhūtāni, biḷāraṃ nāma taṃ vata’’nti. „Wer wahrlich das Gesetz als Flagge hisst, doch heimlich Sündhaftes begeht, nachdem er das Vertrauen der Geschöpfe erschlichen hat – ein solches Gelübde nennt man ein Katzen-Gelübde (ein betrügerisches Verhalten).“ Tattha yo veti khattiyādīsu yo kocideva. Dhammaṃ dhajaṃ katvāti dasakusalakammapathadhammaṃ dhajaṃ karitvā, kūṭaṃ karonto viya ussāpetvā dassentoti attho. Vissāsayitvāti ‘‘sīlavā aya’’nti saññāya sañjātavissāsāni katvā. Biḷāraṃ nāma taṃ vatanti taṃ evaṃ dhammaṃ dhajaṃ katvā raho pāpāni karontassa vataṃ kerāṭikavataṃ nāma hotīti attho. Darin bedeutet „wer wahrlich“ (yo ve): irgendeine Person unter den Kṣatriyas und so weiter. „Das Gesetz als Flagge hisst“ (dhammaṃ dhajaṃ katvā): Er macht das Gesetz der zehn heilsamen Handlungswege zu seiner Flagge, richtet sie auf und zeigt sie vor, wie einer, der einen Betrug plant – dies ist die Bedeutung. „Nachdem er Vertrauen erschlichen hat“ (vissāsayitvā): indem er das Vertrauen der Wesen gewinnt, sodass sie denken: „Dieser ist tugendhaft.“ „Ein solches Gelübde nennt man Katzen-Gelübde“ (biḷāraṃ nāma taṃ vataṃ): Das Verhalten eines solchen, der das Gesetz zu seiner Flagge macht und im Geheimen Sünden begeht, wird als betrügerisches Verhalten (Katzen-Gelübde) bezeichnet – dies ist die Bedeutung. Mūsikarājā kathentova uppatitvā tassa gīvāyaṃ patitvā hanukassa heṭṭhā antogalanāḷiyaṃ ḍaṃsitvā galanāḷiṃ phāletvā jīvitakkhayaṃ pāpesi. Mūsikagaṇo nivattitvā siṅgālaṃ ‘‘muru murū’’ti khāditvā agamāsi. Paṭhamāgatāva kirassa maṃsaṃ labhiṃsu, pacchā āgatā na labhiṃsu. Tato paṭṭhāya mūsikagaṇo nibbhayo jāto. Noch während der Mäusekönig sprach, sprang er empor, landete auf dem Nacken des Schakals, biss ihn unterhalb des Kiefers tief in die Kehle, zerriss seine Luftröhre und brachte ihn so zu Tode. Die Mäuseschar kehrte um, fraß den Schakal mit einem schmatzenden Geräusch („muru muru“) auf und ging von dannen. Es heißt, dass nur diejenigen Mäuse, die zuerst eintrafen, von seinem Fleisch bekamen, während die später Hinzugekommenen leer ausgingen. Von dieser Zeit an war die Mäuseschar frei von Furcht. Satthā [Pg.487] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā siṅgālo kuhakabhikkhu ahosi, mūsikarājā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, verknüpfte er das Jātaka mit den Worten: „Damals war der Schakal der heuchlerische Mönch, der Mäusekönig aber war ich selbst.“ Biḷāravatajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Biḷāravata-Jātaka ist die achte.
[129] 9. Aggikabhāradvājajātakavaṇṇanā [129] 9. Die Erklärung des Aggikabhāradvāja-Jātaka. Nāyaṃ sikhā puññahetūti idaṃ satthā jetavane viharanto kuhakaññeva bhikkhuṃ ārabbha kathesi. „Diese Locke dient nicht dem Verdienst“: Dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf eben jenen heuchlerischen Mönch. Atītasmiñhi bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mūsikarājā hutvā araññe vasati. Atheko siṅgālo davaḍāhe uṭṭhite palāyituṃ asakkonto ekasmiṃ rukkhe sīsaṃ āhacca aṭṭhāsi. Tassa sakalasarīre lomāni jhāyiṃsu, rukkhaṃ āhacca ṭhitaṭṭhāne pana matthake cūḷā viya thokāni lomāni aṭṭhaṃsu. So ekadivasaṃ soṇḍiyaṃ pānīyaṃ pivanto chāyaṃ olokento cūḷaṃ disvā ‘‘uppannaṃ dāni me bhaṇḍamūla’’nti araññe vicaranto taṃ mūsikādariṃ disvā ‘‘imā mūsikā vañcetvā khādissāmī’’ti heṭṭhā vuttanayeneva avidūre aṭṭhāsi. Atha naṃ bodhisatto gocarāya caranto disvā ‘‘sīlavā aya’’nti saññāya upasaṅkamitvā ‘‘tvaṃ kinnāmosī’’ti pucchi. ‘‘Ahaṃ aggikabhāradvājo nāmā’’ti. ‘‘Atha kasmā āgatosī’’ti? ‘‘Tumhākaṃ rakkhanatthāyā’’ti. ‘‘Kinti katvā amhe rakkhissasī’’ti? ‘‘Ahaṃ aṅguṭṭhagaṇanaṃ nāma jānāmi, tumhākaṃ pātova nikkhamitvā gocarāya gamanakāle ‘ettakā’ti gaṇetvā paccāgamanakālepi gaṇessāmi, evaṃ sāyaṃ pātaṃ gaṇento rakkhissāmī’’ti. ‘‘Tena hi rakkha mātulā’’ti. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā nikkhamanakāle ‘‘eko dve tayo’’ti gaṇetvā paccāgamanakālepi tatheva gaṇetvā sabbapacchimaṃ gahetvā khādati. Sesaṃ purimasadisameva. In der Vergangenheit nämlich, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, lebte der Bodhisatta als Mäusekönig im Wald. Damals gab es einen Schakal, der, als ein Waldbrand ausbrach, nicht fliehen konnte und seinen Kopf gegen einen Baum lehnend stehen blieb. An seinem ganzen Körper verbrannten die Haare, doch an der Stelle, wo sein Kopf den Baum berührt hatte, verblieben einige wenige Haare auf seinem Scheitel, die wie ein Haarschopf (eine Locke) aussahen. Als er eines Tages Wasser an einer Felsquelle trank und sein Spiegelbild betrachtete, erblickte er diesen Haarschopf und dachte: „Nun habe ich ein Kapital für meinen Lebensunterhalt gefunden!“ Während er im Wald umherstreifte, entdeckte er jene Mäuseschlucht und dachte: „Ich will diese Mäuse täuschen und fressen.“ Er stellte sich in derselben Weise, wie oben beschrieben, unweit von ihnen auf. Da erblickte ihn der Bodhisatta, als er auf Nahrungssuche war. In dem Glauben „Dieser ist tugendhaft“ trat er an ihn heran und fragte: „Wie ist dein Name?“ „Ich heiße Aggikabhāradvāja“, antwortete er. „Warum aber bist du hierher gekommen?“ „Um euch zu beschützen.“ „Auf welche Weise willst du uns beschützen?“ „Ich verstehe mich auf das sogenannte Zählen der Schwänze. Wenn ihr frühmorgens aufbrecht und zur Nahrungssuche geht, werde ich zählen: ‚So viele sind es‘, und auch bei eurer Rückkehr werde ich euch zählen. Auf diese Weise werde ich euch morgens und abends zählend beschützen.“ „In diesem Fall beschütze uns, Onkel!“ Er stimmte mit den Worten „Sehr wohl“ zu. Wenn sie aufbrachen, zählte er „eins, zwei, drei“, und ebenso zählte er sie bei ihrer Rückkehr, ergriff die allerletzte Maus und fraß sie auf. Das Übrige ist genau wie im vorherigen Fall. Idha pana mūsikarājā nivattitvā ṭhito ‘‘bho aggikabhāradvāja, nāyaṃ tava dhammasudhammatāya matthake cūḷā ṭhapitā, kucchikāraṇā pana ṭhapitā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Hier jedoch blieb der Mäusekönig stehen, wandte sich um und sprach: „He, Aggikabhāradvāja! Dieser Haarschopf auf deinem Scheitel wurde nicht wegen deiner Liebe zur Tugend stehengelassen, sondern einzig um deines Bauches willen!“, und sprach diese Strophe: 129. 129. ‘‘Nāyaṃ [Pg.488] sikhā puññahetu, ghāsahetu ayaṃ sikhā; Nāguṭṭhigaṇanaṃ yāti, alaṃ te hotu aggikā’’ti. „Dieser Haarschopf dient nicht dem Verdienst; um des Fraßes willen ist dieser Haarschopf da. Die Mäuse gehen nicht mehr in der Zählung der Schwänze auf. Genug damit für dich, Aggika!“ Tattha nāguṭṭhigaṇanaṃ yātīti ‘‘aṅguṭṭhigaṇanā’’ti aṅguṭṭhagaṇanā vuccati, ayaṃ mūsikagaṇo aṅguṭṭhagaṇanaṃ na gacchati na upeti na pūreti, parikkhayaṃ gacchatīti attho. Alaṃ te hotu aggikāti siṅgālaṃ nāmena ālapanto āha. Ettāvatā te alaṃ hotu, na ito paraṃ mūsike khādissasi. Amhehi vā tayā saddhiṃ saṃvāso alaṃ hotu, na mayaṃ idāni tayā saddhiṃ vasissāmātipi attho. Sesaṃ purimasadisameva. Darin bedeutet „die Schwanzzählung geht nicht mehr auf“ (nāguṭṭhigaṇanaṃ yāti): Mit „aṅguṭṭhigaṇanā“ ist die Schwanzzählung (aṅguṭṭhagaṇanā) gemeint. Diese Mäuseschar erreicht die Zählung nicht mehr, kommt ihr nicht nahe, füllt sie nicht auf, das heißt, sie schwindet dahin. „Genug damit für dich, Aggika“ (alaṃ te hotu aggikā): Damit sprach er den Schakal bei seinem Namen an. „Lass es dir mit diesem Maße an Fraß genug sein; von nun an wirst du keine Mäuse mehr fressen.“ Oder es bedeutet auch: „Lass das Zusammenleben von uns mit dir ein Ende haben; wir werden von nun an nicht mehr mit dir zusammenleben.“ Das Übrige ist genau wie im vorherigen Fall. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā siṅgālo ayaṃ bhikkhu ahosi, mūsikarājā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, stellte er die Verbindung zur Jātaka-Erzählung her: „Damals war der Schakal dieser Mönch, der Mäusekönig aber war ich selbst.“ Aggikabhāradvājajātakavaṇṇanā navamā. Die Erläuterung des Aggikabhāradvāja-Jātaka ist die neunte.
[130] 10. Kosiyajātakavaṇṇanā [130] 10. Die Erläuterung des Kosiya-Jātaka. Yathā vācā ca bhuñjassūti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ sāvatthiyaṃ mātugāmaṃ ārabbha kathesi. Sā kirekassa saddhāsampannassa upāsakabrāhmaṇassa brāhmaṇī dussīlā pāpadhammā rattiṃ aticaritvā divā kiñci kammaṃ akatvā gilānālayaṃ dassetvā nitthunamānā nipajjati. Atha naṃ brāhmaṇo ‘‘kiṃ te bhadde aphāsuka’’nti pucchi. ‘‘Vātā me vijjhantī’’ti. ‘‘Atha kiṃ laddhuṃ vaṭṭatī’’ti? ‘‘Siniddhamadhurāni paṇītapaṇītāni yāgubhattatelādīnī’’ti. Brāhmaṇo yaṃ yaṃ sā icchati, taṃ taṃ āharitvā deti, dāso viya sabbakiccāni karoti. Sā pana brāhmaṇassa gehaṃ paviṭṭhakāle nipajjati, bahi nikkhantakāle jārehi saddhiṃ vītināmeti. „Wie dein Wort so iss“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf eine bestimmte Frau aus Sāvatthī. Diese Frau eines gläubigen Brahmanen-Laienanhängers war, wie man sagt, von schlechtem moralischen Verhalten und von böser Natur; nachts trieb sie Ehebruch, und tagsüber tat sie keine Arbeit, tat so, als sei sie krank, und lag stöhnend da. Da fragte sie der Brahmane: „Was fehlt dir, meine Liebe?“ Sie antwortete: „Winde stechen mich.“ Er fragte: „Was sollte man dir denn besorgen?“ Sie antwortete: „Milde, süße und erlesenste Speisen wie Schleimsuppe, Reis und Öl.“ Der Brahmane brachte und gab ihr alles, was sie wünschte, und verrichtete wie ein Sklave alle Arbeiten. Sie jedoch legte sich hin, sobald der Brahmane das Haus betrat, und verbrachte die Zeit mit ihren Liebhabern, sobald er das Haus verließ. Atha brāhmaṇo ‘‘imissā sarīre vijjhanavātānaṃ pariyanto na paññāyatī’’ti ekadivasaṃ gandhamālādīni ādāya jetavanaṃ gantvā satthāraṃ pūjetvā vanditvā ekamantaṃ nisīditvā ‘‘kiṃ, brāhmaṇa, na paññāyasī’’ti vutte ‘‘bhante, brāhmaṇiyā kira me sarīre vātā vijjhanti, svāhaṃ tassā [Pg.489] sappitelādīni ceva paṇītapaṇītabhojanāni ca pariyesāmi, sarīramassā ghanaṃ vippasannacchavivaṇṇaṃ jātaṃ, vātarogassa pana pariyanto na paññāyati. Ahaṃ taṃ paṭijaggantova idhāgamanassa okāsaṃ na labhāmī’’ti āha. Satthā brāhmaṇiyā pāpabhāvaṃ ñatvā ‘‘brāhmaṇa, ‘evaṃ nipannassa mātugāmassa roge avūpasamante idañcidañca bhesajjaṃ kātuṃ vaṭṭatī’ti pubbepi te paṇḍitehi kathitaṃ, bhavasaṅkhepagatattā pana na sallakkhesī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. Da dachte der Brahmane: „Es ist kein Ende dieser stechenden Winde im Körper dieser Frau abzusehen.“ Eines Tages nahm er Duftstoffe, Blumen und anderes mit, ging zum Jetavana-Kloster, verehrte und grüßte den Meister und setzte sich zur Seite nieder. Als er gefragt wurde: „Brahmane, warum lässt du dich so selten sehen?“, sagte er: „Herr, im Körper meiner Brahmanen-Frau stechen angeblich die Winde. Deshalb beschaffe ich ihr Butterschmalz, Öl und die erlesensten Speisen. Ihr Körper ist zwar prall und von reiner Gesichtsfarbe geworden, aber ein Ende der Windkrankheit ist nicht abzusehen. Nur weil ich sie pflege, finde ich keine Gelegenheit, hierherzukommen.“ Der Meister, der die Schlechtigkeit der Brahmanen-Frau durchschaute, sprach: „Brahmane, schon früher wurde dir von den Weisen gesagt: ‚Wenn die Krankheit einer solchen daliegenden Frau nicht vergeht, ist es angebracht, diese und jene Medizin anzuwenden.‘ Aber aufgrund des Wechsels der Existenzen erinnerst du dich nicht daran.“ Auf Bitten des Brahmanen erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto brāhmaṇamahāsālakule nibbattitvā vayappatto takkasilāyaṃ sabbasippāni uggaṇhitvā bārāṇasiyaṃ disāpāmokkho ācariyo ahosi. Ekasatarājadhānīsu khattiyakumārā ca brāhmaṇakumārā ca yebhuyyena tasseva santike sippaṃ uggaṇhanti. Atheko janapadavāsī brāhmaṇamāṇavo bodhisattassa santike tayo vede aṭṭhārasa ca vijjāṭṭhānāni uggaṇhitvā bārāṇasiyaṃyeva kuṭumbaṃ saṇṭhapetvā divase divase dvattikkhattuṃ bodhisattassa santikaṃ āgacchati. Tassa brāhmaṇī dussīlā ahosi pāpadhammāti sabbaṃ paccuppannavatthusadisameva. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, erlernte er in Takkasilā alle Künste und wurde in Bārāṇasī ein weltberühmter Lehrer. Kṣatriya-Prinzen und Brahmanenjünglinge aus einhunderteins Königreichen lernten meistens nur bei ihm die Künste. Damals kam ein auf dem Lande lebender Brahmanenjüngling zum Bodhisatta, erlernte die drei Veden und die achtzehn Zweige des Wissens, gründete in Bārāṇasī einen Hausstand und suchte den Bodhisatta täglich zwei- bis dreimal auf. Seine Ehefrau war von schlechtem moralischen Verhalten und böser Natur – alles ist genau wie in der gegenwärtigen Geschichte. Bodhisatto pana ‘‘iminā kāraṇena ovādagahaṇāya okāsaṃ na labhāmī’’ti vutte ‘‘sā māṇavikā imaṃ vañcetvā nipajjatī’’ti ñatvā ‘‘tassā rogānucchavikaṃ bhesajjaṃ ācikkhissāmī’’ti cintetvā āha ‘‘tāta, tvaṃ ito paṭṭhāya tassā sappikhīrarasādīni mā adāsi, gomutte pana pañcapaṇṇāni phalādīni ca pakkhipitvā koṭṭetvā navatambalohabhājane pakkhipitvā lohagandhaṃ gāhāpetvā rajjuṃ vā yottaṃ vā rukkhaṃ vā lataṃ vā gahetvā ‘idaṃ te rogassa anucchavikabhesajjaṃ, idaṃ vā piva, uṭṭhāya vā tayā bhuttabhattassa anucchavikaṃ kammaṃ karohī’’ti vatvā imaṃ gāthaṃ vadeyyāsi. ‘‘Sace bhesajjaṃ na pivati, atha naṃ rajjuyā vā yottena vā rukkhena vā latāya vā katici pahāre paharitvā kesesu gahetvā ākaḍḍhitvā kapparena potheyyāsi, sā taṅkhaṇaññeva uṭṭhāya kammaṃ karissatī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā vuttaniyāmeneva bhesajjaṃ katvā ‘‘bhadde, imaṃ bhesajjaṃ pivā’’ti āha. ‘‘Kena te idaṃ ācikkhita’’nti? [Pg.490] ‘‘Ācariyena, bhadde’’ti. ‘‘Apanehi taṃ, na pivissāmī’’ti. Māṇavo ‘‘na tvaṃ attano ruciyā pivissasī’’ti rajjuṃ gahetvā ‘‘attano rogassa anucchavikaṃ bhesajjaṃ vā piva, yāgubhattānucchavikaṃ kammaṃ vā karohī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als der Jüngling sagte: „Aus diesem Grunde finde ich keine Gelegenheit, Unterweisung zu erhalten“, erkannte der Bodhisatta: „Diese junge Frau betrügt ihn und liegt nur faul da.“ Er dachte: „Ich werde ihr eine Medizin verordnen, die ihrer Krankheit angemessen ist“, und sprach: „Mein Lieber, gib ihr von nun an kein Butterschmalz, keine Milch, keine Säfte und Ähnliches mehr. Gib stattdessen fünf Sorten von Blättern und Früchten in Kuhurin, zerstoße sie, fülle sie in ein neues Kupfergefäß und lass sie den Kupfergeruch annehmen. Nimm dann ein Seil, einen Riemen, einen Stock oder eine Rute und sprich: ‚Dies ist die für deine Krankheit passende Medizin; trinke entweder dies oder steh auf und verrichte die Arbeit, die dem von dir verzehrten Essen entspricht‘, und sprich diese Strophe. Wenn sie die Medizin nicht trinkt, dann versetze ihr mit dem Seil, dem Riemen, dem Stock oder der Rute einige Schläge, packe sie an den Haaren, ziehe sie herbei und versetze ihr Stöße mit dem Ellbogen. Sie wird sofort aufstehen und arbeiten.“ Er willigte mit den Worten „Sehr wohl“ ein, stellte die Medizin genau wie angewiesen her und sprach: „Meine Liebe, trinke diese Medizin.“ Sie fragte: „Wer hat dir das gesagt?“ Er antwortete: „Der Lehrer, meine Liebe.“ Sie sagte: „Weg damit, ich werde es nicht trinken.“ Der Jüngling sagte: „Du wirst es wohl nicht aus freien Stücken trinken“, nahm das Seil und sprach: „Trinke entweder die deiner Krankheit angemessene Medizin oder verrichte die Arbeit, die der Suppe und dem Reis entspricht, die du gegessen hast“, und sprach diese Strophe: 130. 130. ‘‘Yathāvācā ca bhuñjassu, yathābhuttañca byāhara; Ubhayaṃ te na sameti, vācā bhuttañca kosiye’’ti. „Wie dein Wort so iss, und sprich gemäß dem, was du gegessen hast. Beides stimmt bei dir nicht überein, dein Wort und dein Essen, o Kosiya-Frau!“ Tattha yathāvācā ca bhuñjassūti yathā te vācā, tathā bhuñjassu, ‘‘vātā me vijjhantī’’ti vācāya anucchavikameva katvā bhuñjassūti attho. ‘‘Yathāvācaṃ vā’’tipi pāṭho yujjati, ‘‘yathāvācāyā’’tipi paṭhanti, sabbattha ayameva attho. Yathābhuttañca byāharāti yaṃ yathā te bhuttaṃ, tassa anucchavikameva byāhara, ‘‘arogamhī’’ti vatvā gehe kattabbaṃ karosīti attho. ‘‘Yathābhūtañcā’’tipi pāṭho, atha vā arogamhīti yathābhūtameva vatvā kammaṃ karohīti attho. Ubhayaṃ te na sameti, vācābhuttañca kosiyeti yā ca te ayaṃ vācā ‘‘vātā maṃ vijjhantī’’ti yañca te idaṃ paṇītabhojanaṃ bhuttaṃ, idaṃ ubhayampi tuyhaṃ na sameti, tasmā uṭṭhāya kammaṃ karohi. ‘‘Kosiye’’ti taṃ gottenālapati. Hierbei bedeutet „Wie dein Wort so iss“: Wie dein Wort ist, so iss; der Sinn ist: Handle so, dass es zu deinem Wort „Winde stechen mich“ passt, und iss die Medizin. Auch die Lesart „yathā vācaṃ vā“ ist passend, und manche lesen „yathā vācāya“; in allen Fällen ist die Bedeutung dieselbe. „Und sprich gemäß dem, was du gegessen hast“ bedeutet: Wie du gegessen hast, so sprich demgemäß; der Sinn ist: Sag „Ich bin gesund“ und verrichte die im Haus zu erledigende Arbeit. Es gibt auch die Lesart „yathābhūtañca“; oder aber der Sinn ist: Sag einfach die Wahrheit, nämlich „Ich bin gesund“, und tu deine Arbeit. „Beides stimmt bei dir nicht überein, dein Wort und dein Essen, o Kosiya-Frau“ bedeutet: Dieses dein Wort „Winde stechen mich“ und dieses von dir verzehrte köstliche Essen – diese beiden stimmen bei dir nicht überein; steh daher auf und arbeite. Mit „Kosiye“ spricht er sie bei ihrem Gentilnamen an. Evaṃ vutte kosiyabrāhmaṇadhītā ‘‘ācariyena ussukkaṃ āpannakālato paṭṭhāya na sakkā mayā esa vañcetuṃ, uṭṭhāya kammaṃ karissāmī’’ti uṭṭhāya kammaṃ akāsi. ‘‘Ācariyena me dussīlabhāvo ñāto, idāni na sakkā ito paṭṭhāya puna evarūpaṃ kātu’’nti ācariye gāravena pāpakammatopi viramitvā sīlavatī ahosi. Sāpi brāhmaṇī ‘‘sammāsambuddhena kiramhi ñātā’’ti sattharipi gāravena na puna anācāraṃ akāsi. Auf diese Worte hin dachte die Kosiya-Brahmanentochter: „Seit sich der Lehrer darum bemüht, kann ich diesen Mann nicht mehr täuschen. Ich will aufstehen und meine Arbeit tun“, und sie stand auf und verrichtete die Arbeit. Sie dachte: „Der Lehrer hat mein schlechtes Verhalten erkannt; von nun an ist es mir unmöglich, so etwas wieder zu tun.“ Aus Respekt vor dem Lehrer hielt sie sich auch von bösen Taten fern und wurde tugendhaft. Auch jene Brahmanenfrau zur Zeit des Meisters hörte: „Der vollkommen Erleuchtete hat mich wohl durchschaut“, und aus Respekt vor dem Meister beging sie nie wieder ein ungebührliches Verhalten. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jayampatikā idāni jayampatikāva, ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, stellte er die Verbindung zur Jātaka-Erzählung her: „Das damalige Ehepaar ist das heutige Ehepaar, der Lehrer aber war ich selbst.“ Kosiyajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Kosiya-Jātaka ist die zehnte. Kusanāḷivaggo terasamo. Das Kusanāḷi-Kapitel ist das dreizehnte. Tassuddānaṃ – Dessen Zusammenfassung ist wie folgt: Kusanāḷi [Pg.491] ca dummedhaṃ, naṅgalīsambakaṭāhaṃ; Asilakkhaṇakalaṇḍukaṃ, biḷāraggikakosiyanti. Kusanāḷi und Dummedha, Naṅgalīsa, Amba und Kaṭāhaka, Asilakkhaṇa und Kalaṇḍuka, Biḷāra, Aggika und Kosiya. 14. Asampadānavaggo 14. Das Asampadāna-Kapitel
[131] 1. Asampadānajātakavaṇṇanā [131] 1. Die Erklärung des Asampadāna-Jātaka Asampadānenitarītarassāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi kāle bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso devadatto, akataññū tathāgatassa guṇaṃ na jānātī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva devadatto akataññū, pubbepi akataññūyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Asampadānenitarītarassa“ – diese Lehrrede hielt der Meister, während er im Veḷuvana-Kloster weilte, bezüglich Devadattas. Zu jener Zeit nämlich begannen die Mönche in der Versammlungshalle folgendes Gespräch: „Ihr Brüder, Devadatta ist undankbar, er erkennt die Tugenden des Tathāgata nicht.“ Als der Meister herbeikam und fragte: „Mit welchem Gespräch, o Mönche, sitzt ihr hier jetzt zusammen?“, und sie antworteten: „Mit diesem namens...“, sprach er: „Nicht erst jetzt, o Mönche, ist Devadatta undankbar; auch in der Vergangenheit war er bereits undankbar.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte magadharaṭṭhe rājagahe ekasmiṃ magadharaññe rajjaṃ kārente bodhisatto tasseva seṭṭhi ahosi asītikoṭivibhavo saṅkhaseṭṭhīti nāmena. Bārāṇasiyaṃ pīḷiyaseṭṭhi nāma asītikoṭivibhavova ahosi. Te aññamaññaṃ sahāyakā ahesuṃ. Tesu bārāṇasiyaṃ pīḷiyaseṭṭhissa kenacideva kāraṇena mahantaṃ bhayaṃ uppajji, sabbaṃ sāpateyyaṃ parihāyi. So daliddo appaṭisaraṇo hutvā bhariyaṃ ādāya saṅkhaseṭṭhiṃ paccayaṃ katvā bārāṇasito nikkhamitvā padasāva rājagahaṃ patvā saṅkhaseṭṭhissa nivesanaṃ agamāsi. So taṃ disvāva ‘‘sahāyo me āgato’’ti parissajitvā sakkārasammānaṃ katvā katipāhaṃ vītināmetvā ekadivasaṃ ‘‘samma, kenaṭṭhena āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Bhayaṃ me, samma, uppannaṃ, sabbaṃ dhanaṃ parikkhīṇaṃ, upatthambho me hohī’’ti. ‘‘Sādhu samma, mā bhāyī’’ti bhaṇḍāgāraṃ vivarāpetvā cattālīsa hiraññakoṭiyo dāpetvā sesampi paricchadaparivāraṃ sabbaṃ attano santakaṃ saviññāṇakaṃ aviññāṇakaṃ majjhe bhinditvā upaḍḍhameva adāsi. So taṃ vibhavaṃ ādāya puna bārāṇasiṃ gantvā nivāsaṃ kappesi. In der Vergangenheit, als ein magadhischer König in Rājagaha im Reich Magadha regierte, war der Bodhisatta der Schatzmeister eben dieses Königs namens Saṅkha, im Besitz eines Vermögens von achtzig Millionen. In Bārāṇasī gab es einen Schatzmeister namens Pīḷiya, der ebenfalls achtzig Millionen besaß. Sie waren miteinander befreundet. Unter ihnen widerfuhr dem Schatzmeister Pīḷiya in Bārāṇasī aus irgendeinem Grund eine große Gefahr, und sein ganzer Besitz ging verloren. Er wurde arm und schutzlos; so nahm er seine Frau mit, verließ Bārāṇasī, um sich auf den Schatzmeister Saṅkha als Stütze zu verlassen, gelangte zu Fuß nach Rājagaha und ging zum Haus des Schatzmeisters Saṅkha. Als dieser ihn erblickte, rief er: „Mein Freund ist gekommen!“, umarmte ihn, erwies ihm Ehre und Gastfreundschaft, ließ einige Tage vergehen und fragte ihn eines Tages: „Mein Freund, aus welchem Grund bist du gekommen?“ Er antwortete: „Mein Freund, mir ist Unheil widerfahren, mein ganzes Vermögen ist aufgezehrt. Sei mir eine Stütze!“ Saṅkha sprach: „Gut, mein Freund, fürchte dich nicht“, ließ die Schatzkammer öffnen, gab ihm vierzig Millionen Goldstücke und teilte auch den gesamten übrigen Hausrat und das Gefolge, all seinen Besitz, sowohl das Belebte als auch das Unbelebte, in der Mitte und gab ihm genau die Hälfte davon. Jener nahm diesen Reichtum, ging wieder nach Bārāṇasī und ließ sich dort nieder. Aparabhāge [Pg.492] saṅkhaseṭṭhissapi tādisameva bhayaṃ uppajji. So attano paṭisaraṇaṃ upadhārento ‘‘sahāyassa me mahāupakāro kato, upaḍḍhavibhavo dinno. Na so maṃ disvā pariccajissati, tassa santikaṃ gamissāmī’’ti cintetvā bhariyaṃ ādāya padasāva bārāṇasiṃ gantvā bhariyaṃ āha ‘‘bhadde, tava mayā saddhiṃ antaravīthiyā gamanaṃ nāma na yuttaṃ, mayā pesitayānamāruyha mahantena parivārena pacchā āgamissasi. Yāva yānaṃ pesemi, tāva idheva hohī’’ti vatvā taṃ sālāya ṭhapetvā sayaṃ nagaraṃ pavisitvā seṭṭhissa gharaṃ gantvā ‘‘rājagahanagarato tumhākaṃ sahāyo saṅkhaseṭṭhi nāma āgato’’ti ārocāpesi. So ‘‘āgacchatū’’ti pakkosāpetvā taṃ disvā neva āsanā vuṭṭhāsi, na paṭisanthāraṃ akāsi, kevalaṃ ‘‘kimatthaṃ āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Tumhākaṃ dassanatthaṃ āgatomhī’’ti. ‘‘Nivāso te kahaṃ gahito’’ti? ‘‘Na tāva nivāsaṭṭhānaṃ atthi, seṭṭhigharaṇimpi sālāya ṭhapetvāva āgatomhī’’ti. ‘‘Tumhākaṃ idha nivāsaṭṭhānaṃ natthi, nivāpaṃ gahetvā ekasmiṃ ṭhāne pacāpetvā bhuñjitvā gacchatha, puna amhākaṃ gharaṃ mā pavisathā’’ti vatvā ‘‘mayhaṃ sahāyassa dussante bandhitvā ekaṃ bahalapalāpatumbaṃ dehī’’ti dāsaṃ āṇāpesi. Taṃ divasaṃ kira so rattasālīnaṃ sakaṭasahassamattaṃ ophunāpetvā koṭṭhāgāraṃ pūrāpesi, cattālīsakoṭidhanaṃ gahetvā āgato akataññū mahācoro sahāyakassa tumbamatte palāpe dāpesi. Dāso pacchiyaṃ ekaṃ palāpatumbaṃ pakkhipitvā bodhisattassa santikaṃ agamāsi. Zu einer späteren Zeit widerfuhr auch dem Schatzmeister Saṅkha ein ebensolches Unheil. Als er überlegte, wer ihm Zuflucht gewähren könnte, dachte er: „Ich habe meinem Freund eine große Wohltat erwiesen, ich habe ihm die Hälfte meines Vermögens gegeben. Wenn er mich sieht, wird er mich nicht im Stich lassen. Ich werde zu ihm gehen.“ Er nahm seine Frau mit, reiste zu Fuß nach Bārāṇasī und sprach zu seiner Frau: „Liebe Frau, es schickt sich nicht, dass du mit mir zusammen durch die Straßen der Stadt gehst. Du sollst später in einer von mir geschickten Sänfte mit großem Gefolge nachkommen. Bis ich die Sänfte schicke, bleibe genau hier.“ Nachdem er sie in der Herberge zurückgelassen hatte, betrat er selbst die Stadt, ging zum Haus des Schatzmeisters und ließ ausrichten: „Euer Freund namens Saṅkha-Schatzmeister ist aus der Stadt Rājagaha eingetroffen.“ Dieser rief: „Er soll herkommen!“, doch als er ihn sah, stand er nicht einmal von seinem Sitz auf, noch erwies er ihm ein gastfreundliches Willkommen; er fragte bloß: „Wozu bist du gekommen?“ Er antwortete: „Ich bin gekommen, um euch zu sehen.“ – „Wo hast du Quartier genommen?“ – „Ich habe noch keine Unterkunft; ich habe sogar die Gattin des Schatzmeisters in der Herberge zurückgelassen und bin direkt hierhergekommen.“ – „Für euch gibt es hier im Haus keine Unterkunft. Nehmt diese Essensration, lasst sie an einem anderen Ort kochen, esst und geht eures Weges; betretet unser Haus nicht noch einmal!“ Nach diesen Worten befahl er einem Diener: „Binde meinem Freund ein Maß grobe Spreu in das Ende seines Gewandes und gib es ihm.“ An jenem Tag hatte er, so heißt es, rund tausend Karrenladungen roten Reis worfeln lassen und seine Kornspeicher gefüllt. Doch dieser undankbare Erzdieb, der mit vierzig Millionen Vermögen davongegangen war, ließ seinem Freund nur ein einziges Maß Spreu geben. Der Diener tat ein Maß Spreu in einen Korb und ging damit zum Bodhisatta. Bodhisatto cintesi – ‘‘ayaṃ asappuriso mama santikā cattālīsakoṭidhanaṃ labhitvā idāni palāpatumbaṃ dāpesi, gaṇhāmi nu kho, na gaṇhāmī’’ti? Athassa etadahosi ‘‘ayaṃ tāva akataññū mittadubbhī katavināsakabhāvena mayā saddhiṃ mittabhāvaṃ bhindi. Sacāhaṃ etena dinnaṃ palāpatumbaṃ lāmakattā na gaṇhissāmi, ahampi mittabhāvaṃ bhindissāmi. Andhabālā parittakaṃ laddhaṃ aggaṇhantā mittabhāvaṃ vināsenti, ahaṃ pana etena dinnaṃ palāpatumbaṃ gahetvā mama vasena mittabhāvaṃ patiṭṭhāpessāmī’’ti. So palāpatumbaṃ dussante bandhitvā pāsādā oruyha sālaṃ agamāsi. Atha naṃ bhariyā ‘‘kiṃ te, ayya, laddha’’nti pucchi. ‘‘Bhadde amhākaṃ sahāyo pīḷiyaseṭṭhi palāpatumbaṃ datvā amhe ajjeva [Pg.493] vissajjesī’’ti. Sā ‘‘ayya, kimatthaṃ aggahesi, kiṃ etaṃ cattālīsakoṭidhanassa anucchavika’’nti rodituṃ ārabhi. Bodhisattopi ‘‘bhadde, mā rodi, ahaṃ tena saddhiṃ mittabhāvabhedanabhayena mama vasena mittabhāvaṃ patiṭṭhāpetuṃ gaṇhiṃ, tvaṃ kiṃkāraṇā rodasī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Der Bodhisatta überlegte: „Dieser schlechte Mensch hat von mir ein Vermögen von vierzig Millionen erhalten und lässt mir nun ein Maß Spreu geben. Soll ich es annehmen oder nicht?“ Da dachte er: „Dieser undankbare Freundesverräter hat durch sein zerstörerisches Verhalten die Freundschaft zu mir gebrochen. Wenn ich dieses von ihm angebotene Maß Spreu wegen seiner Geringwertigkeit nicht annehme, werde auch ich die Freundschaft brechen. Blinde Toren zerstören die Freundschaft, weil sie das Wenige, das sie erhalten, nicht annehmen. Ich aber werde dieses von ihm gegebene Maß Spreu annehmen und durch mein Zutun die Freundschaft aufrechterhalten.“ Er band das Maß Spreu in das Ende seines Gewandes, stieg von der Residenz herab und ging zur Herberge. Da fragte ihn seine Frau: „Herr, was hast du bekommen?“ Er antwortete: „Liebe Frau, unser Freund, der Schatzmeister Pīḷiya, hat uns ein Maß Spreu gegeben und uns noch heute weggeschickt.“ Sie sprach: „Herr, warum hast du das angenommen? Ist das etwa angemessen für ein Vermögen von vierzig Millionen?“ Und sie begann zu weinen. Der Bodhisatta sprach: „Liebe Frau, weine nicht. Aus Furcht vor dem Bruch der Freundschaft mit ihm habe ich es angenommen, um die Freundschaft durch mein Zutun aufrechtzuerhalten. Aus welchem Grund weinst du?“ Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er diese Strophe: 131. 131. ‘‘Asampadānenitarītarassa, bālassa mittāni kalībhavanti; Tasmā harāmi bhusaṃ aḍḍhamānaṃ, mā me mitti jīyittha sassatāya’’nti. „Durch das Verweigern selbst des Geringsten werden die Freundschaften eines Toren zerstört; darum trage ich dieses halbe Maß Spreu fort, damit meine Freundschaft nicht vergehe und für immer bestehe.“ Tattha asampadānenāti asampādānena. Akāralope sandhi, aggahaṇenāti attho. Itarītarassāti yassa kassaci lāmakālāmakassa. Bālassa mittāni kalībhavantīti dandhassa apaññassa mittāni kalīni kāḷakaṇṇisadisāni honti, bhijjantīti attho. Tasmā harāmi bhusaṃ aḍḍhamānanti tena kāraṇena ahaṃ sahāyena dinnaṃ ekapalāpatumbaṃ harāmi gaṇhāmīti dasseti. ‘‘Māna’’nti hi aṭṭhannaṃ nāḷīnaṃ nāmaṃ, catunnaṃ aḍḍhamānaṃ, catasso ca nāḷiyo tumbo nāma. Tena vuttaṃ ‘‘palāpatumba’’nti. Mā me mitti jīyittha sassatāyanti mama sahāyena saddhiṃ mitti mā bhijjittha, sassatāva ayaṃ hotūti attho. Hierbei bedeutet die Wendung „asampadānena“: durch Nicht-Annehmen. Das Wortbildende ist eine Sandhi-Verbindung durch den Wegfall des Lautes „a“; „Nicht-Ergreifen“ ist die Bedeutung. „Itarītarassa“ bedeutet: eines beliebigen, unbedeutenden oder schlechten Menschen. Die Passage „bālassa mittāni kalībhavanti“ bedeutet: Für einen Trägen und Unweisen werden die Freundschaften zum Unheil, sie gleichen einem Unglücksbringer; „sie zerbrechen“ ist die Bedeutung. Mit den Worten „tasmā harāmi bhusaṃ aḍḍhamānaṃ“ zeigt er: Aus diesem Grund trage (bzw. nehme) ich das eine Maß wertloser Spreu fort, das mir vom Gefährten gegeben wurde. Denn unter „Māna“ versteht man ein Maß von acht Nāḷi; ein halbes Māna (aḍḍhamāna) entspricht vier Nāḷi, und vier Nāḷi werden wiederum als ein Tumba bezeichnet. Aus diesem Grund wurde es als „palāpatumba“ (ein Tumba wertloser Spreu) bezeichnet. Die Worte „mā me mitti jīyittha sassatāya“ bedeuten: Möge die Freundschaft mit meinem Gefährten nicht zerbrechen, möge diese wahrlich ewig (beständig) sein. Evaṃ vuttepi seṭṭhibhariyā rodateva. Tasmiṃ khaṇe saṅkhaseṭṭhinā pīḷiyaseṭṭhissa dinno kammantadāso sālādvārena āgacchanto seṭṭhibhariyāya rodanasaddaṃ sutvā sālaṃ pavisitvā attano sāmike disvā pādesu nipatitvā roditvā kanditvā ‘‘kimatthaṃ idhāgatattha, sāmī’’ti pucchi. Seṭṭhi sabbaṃ ārocesi. Kammantadāso ‘‘hotu, sāmi, mā cintayitthā’’ti ubhopi assāsetvā attano gehaṃ netvā gandhodakena nhāpetvā bhojetvā ‘‘sāmikā, vo āgatā’’ti sesadāse sannipātetvā dassetvā katipāhaṃ vītināmetvā sabbe dāse gahetvā rājaṅgaṇaṃ gantvā uparavaṃ akāsi. Rājā pakkosāpetvā ‘‘kiṃ eta’’nti pucchi, te sabbaṃ taṃ pavattiṃ rañño ārocesuṃ. Obwohl dies so gesagt wurde, weinte die Gattin des Schatzmeisters nur weiter. In diesem Moment kam der Arbeitssklave, den der Schatzmeister Saṅkha einst dem Schatzmeister Pīḷiya geschenkt hatte, am Tor der Halle vorbei. Als er das Weinen der Gattin des Schatzmeisters vernahm, betrat er die Halle, erblickte seine Herrschaften, warf sich ihnen zu Füßen, weinte und klagte laut und fragte: „Aus welchem Grund seid Ihr hierhergekommen, o Herrschaften?“ Der Schatzmeister berichtete ihm alles. Der Arbeitssklave sprach: „Es ist gut, o Herrschaften, sorgt euch nicht“, tröstete beide, führte sie in sein Haus, ließ sie sich mit duftendem Wasser baden und speiste sie. Daraufhin sprach er zu den übrigen Sklaven: „Eure Herrschaften sind angekommen!“, versammelte sie, zeigte ihnen die beiden und ließ einige Tage vergehen. Dann nahm er alle Sklaven mit sich, begab sich zum Palasthof und erhob ein lautes Wehklagen. Der König ließ sie rufen und fragte: „Was bedeutet dies?“ Und sie berichteten dem König den gesamten Hergang der Ereignisse. Rājā [Pg.494] tesaṃ vacanaṃ sutvā ubhopi seṭṭhī pakkosāpetvā saṅkhaseṭṭhiṃ pucchi ‘‘saccaṃ kira tayā mahāseṭṭhi pīḷiyaseṭṭhissa cattālīsakoṭidhanaṃ dinna’’nti? ‘‘Āma, mahārāja, mama sahāyassa maṃ takketvā rājagahaṃ āgatassa na kevalaṃ dhanaṃ, sabbaṃ vibhavajātaṃ saviññāṇakaṃ aviññāṇakaṃ dve koṭṭhāse katvā samabhāge adāsinti. Rājā ‘‘saccameta’’nti pīḷiyaseṭṭhiṃ pucchi. ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Tayā panassa taññeva takketvā āgatassa atthi koci sakkāro vā sammāno vā kato’’ti. So tuṇhī ahosi. Api pana te etassa palāpatumbamattaṃ dussante pakkhipāpetvā dāpitaṃ atthīti. Tampi sutvā tuṇhīyeva ahosi. Rājā ‘‘kiṃ kātabba’’nti amaccehi saddhiṃ mantetvā taṃ paribhāsitvā ‘‘gacchatha, pīḷiyaseṭṭhissa ghare sabbaṃ vibhavaṃ saṅkhaseṭṭhissa dethā’’ti āha. Bodhisatto ‘‘mahārāja, mayhaṃ parasantakena attho natthi, mayā dinnamattameva pana dāpethā’’ti āha. Rājā bodhisattassa santakaṃ dāpesi. Bodhisatto sabbaṃ attano dinnavibhavaṃ paṭilabhitvā dāsaparivuto rājagahameva gantvā kuṭumbaṃ saṇṭhapetvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Als der König ihre Worte vernahm, ließ er beide Schatzmeister vorladen und fragte den Schatzmeister Saṅkha: „Ist es wahr, o Großschatzmeister, dass du dem Schatzmeister Pīḷiya ein Vermögen von vierzig Millionen gegeben hast?“ – „Ja, o Großkönig. Meinem Gefährten, der im Vertrauen auf mich nach Rājagaha kam, habe ich nicht nur reinen Besitz gegeben; ich habe mein gesamtes Vermögen, belebt wie unbelebt, in zwei Teile geteilt und ihm einen völlig gleichen Anteil gegeben.“ Der König fragte den Schatzmeister Pīḷiya: „Ist dies wahr?“ – „Ja, o Herr.“ – „Hast du ihm aber, der im Vertrauen auf dich zu dir kam, irgendeine gastfreundliche Aufnahme oder Ehrerbietung erwiesen?“ Jener schwieg. „Hast du ihm denn wenigstens das bloße Maß eines Tumba tauber Spreu in den Zipfel seines Gewandes legen und übergeben lassen?“ Auch als er dies hörte, schwieg er bloß. Der König beriet sich mit seinen Ministern darüber, was zu tun sei, wies jenen Schatzmeister streng zurecht und sprach: „Geht hin und übergebt das gesamte Vermögen im Hause des Schatzmeisters Pīḷiya dem Schatzmeister Saṅkha!“ Der Bodhisatta sprach: „O Großkönig, ich habe kein Verlangen nach dem Eigentum eines anderen. Lasst mir jedoch nur genau das zurückgeben, was von mir gegeben worden war.“ Der König ließ dem Bodhisatta sein Eigentum zurückgeben. Nachdem der Bodhisatta seinen gesamten gegebenen Wohlstand zurückerhalten hatte, begab er sich in Begleitung seiner Schar von Sklaven nach Rājagaha zurück, stellte seinen Hausstand wohlgeordnet wieder her, wirkte heilsame Taten wie das Geben von Gaben und ging entsprechend seinem Kamma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā pīḷiyaseṭṭhi devadatto ahosi, saṅkhaseṭṭhi pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündung vor und verknüpfte das Jātaka mit den Worten: „Damals war der Schatzmeister Pīḷiya Devadatta, der Schatzmeister Saṅkha aber war ich selbst.“ Asampadānajātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Asampadāna-Jātaka ist die erste.
[132] 2. Bhīrukajātakavaṇṇanā [132] 2. Die Erklärung des Bhīruka-Jātaka Kusalūpadese dhitiyā daḷhāya cāti idaṃ satthā jetavane viharanto ajapālanigrodhe māradhītānaṃ palobhanasuttantaṃ ārabbha kathesi. Bhagavatā hi ādito paṭṭhāya vuttaṃ – Die Lehrrede beginnend mit den Worten „Kusalūpadese dhitiyā daḷhāya ca“ verkündete der Meister, während er im Jetavana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf das Suttanta über die Versuchung durch die Töchter Māras am Ajapāla-Banyanbaum. Vom Erhabenen wurde nämlich von Anfang an Folgendes gesprochen: ‘‘Daddallamānā āgañchuṃ, taṇhā ca aratī ragā; Tā tattha panudī satthā, tūlaṃ bhaṭṭhaṃva māluto’’ti. (saṃ. ni. 1.161); „In strahlendem Glanze kamen sie herbei: Begehren (Taṇhā), Unlust (Aratī) und Leidenschaft (Ragā). Doch der Meister vertrieb sie dort, wie der Wind eine herabgefallene Flocke aus Pflanzendaunen verweht.“ (Saṃ. Ni. 1.161) Evaṃ yāva pariyosānā tassa suttantassa kathitakāle dhammasabhāyaṃ sannipatitā bhikkhū kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, sammāsambuddho māradhītaro [Pg.495] anekasatānipi dibbarūpāni māpetvā palobhanatthāya upasaṅkamantiyo akkhīnipi ummīletvā na olokesi, aho buddhabalaṃ nāma acchariya’’nti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva mayhaṃ sabbāsave khepetvā sabbaññutaṃ sampattassa māradhītānaṃ anolokanaṃ nāma acchariyaṃ, ahañhi pubbe bodhiñāṇaṃ pariyesamāno sakilesakālepi abhisaṅkhataṃ dibbarūpaṃ indriyāni bhinditvā kilesavasena anoloketvāva gantvā mahārajjaṃ pāpuṇi’’nti vatvā atītaṃ āhari. Als jene Lehrrede so bis zu ihrem Ende verkündet worden war, begannen die in der Versammlungshalle zusammengekommenen Mönche folgendes Gespräch: „O Freunde, der vollkommen Erleuchtete hat die Töchter Māras, die herangetreten waren und vielhundertfache göttliche Gestalten erschaffen hatten, um ihn zu versuchen, nicht einmal mit geöffneten Augen angesehen. Wie wunderbar ist doch wahrlich die Kraft eines Buddha!“ Der Meister kam herbei und fragte: „Zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt, o Mönche?“ Als sie antworteten: „Zu diesem bestimmten Thema“, sprach er: „Mönche, es ist nicht nur im jetzigen Zustand, in dem ich alle Triebe versiegen ließ und die Allwissenheit erlangt habe, ein Wunder, dass ich die Töchter Māras nicht ansah. Denn auch in der Vergangenheit, als ich nach dem Erleuchtungs-Wissen suchte und mich noch in einer Zeit der Befleckungen befand, ging ich weiter, ohne die künstlich erschaffene göttliche Gestalt durch ein Trüben der Sinne unter dem Einfluss von Befleckungen anzusehen, und erlangte so die große Königsherrschaft.“ Nach diesen Worten trug er eine Geschichte aus der Vergangenheit vor: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto bhātikasatassa kaniṭṭho ahosīti sabbaṃ heṭṭhā takkasilājātake vuttanayeneva vitthāretabbaṃ. Tadā pana takkasilānagaravāsīhi bahinagare sālāyaṃ bodhisattaṃ upasaṅkamitvā yācitvā rajjaṃ paṭicchāpetvā abhiseke kate takkasilānagaravāsino nagaraṃ devanagaraṃ viya, rājabhavanañca indabhavanaṃ viya alaṅkariṃsu. Tadā bodhisatto nagaraṃ pavisitvā rājabhavane pāsāde mahātale samussitasetacchattaṃ ratanavarapallaṅkaṃ abhiruyha devarājalīlāya nisīdi, amaccā ca brāhmaṇagahapatikādayo ca khattiyakumārā ca sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitā parivāretvā aṭṭhaṃsu, devaccharāpaṭibhāgā soḷasasahassanāṭakitthiyo naccagītavāditakusalā uttamavilāsasampannā naccagītavāditāni payojesuṃ. Gītavāditasaddena rājabhavanaṃ meghatthanitapūritā mahāsamuddakucchi viya ekaninnādaṃ ahosi. Bodhisatto taṃ attano sirisobhaggaṃ olokayamānova cintesi ‘‘sacāhaṃ tāsaṃ yakkhinīnaṃ abhisaṅkhataṃ dibbarūpaṃ olokessaṃ, jīvitakkhayaṃ patto abhavissaṃ, imaṃ sirisobhaggaṃ na olokessaṃ. Paccekabuddhānaṃ pana ovāde ṭhitabhāvena idaṃ mayā sampatta’’nti. Evañca pana cintetvā udānaṃ udānento imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta der jüngste von hundert Brüdern – all dies ist genau in jener Weise im Einzelnen darzulegen, wie es bereits weiter unten im Takkasīla-Jātaka (auch Telapatta-Jātaka genannt) geschildert wurde. Damals traten die Bewohner der Stadt Takkasilā an den Bodhisatta heran, der in einer Halle außerhalb der Stadt verweilte, baten ihn und ließen ihn die Königsherrschaft annehmen. Nach vollzogener Weihe schmückten die Einwohner von Takkasilā die Stadt wie eine Götterstadt und den Königspalast wie den Palast Indras. Da betrat der Bodhisatta die Stadt, bestieg auf der oberen Ebene des Palastes im königlichen Hause den erlesenen Juwelenthron, über dem der weiße Prachtschirm aufgerichtet war, und setzte sich in der würdevollen Pracht eines Götterkönigs nieder. Die Minister, Brahmanen, Hausväter und die übrigen Bürger sowie die Prinzen des Adelsgeschlechts, geschmückt mit jeglichem Zierrat, umringten ihn und stellten sich auf. Sechzehntausend Tänzerinnen, die Himmelsnymphen glichen, kunstfertig in Tanz, Gesang und Instrumentalspiel und von vollendeter Anmut, führten Tänze, Gesänge und Musik vor. Durch den Schall des Gesangs und der Instrumente wurde der Königspalast von einem einzigen Widerhall erfüllt, gleich dem Schoße des großen Ozeans, wenn er vom Donnergrollen der Wolken erfüllt ist. Der Bodhisatta blickte auf diese seine herrliche Pracht und dachte bei sich: „Hätte ich jene von den Dämoninnen künstlich erschaffene göttliche Gestalt angesehen, so wäre ich dem Tode verfallen. Diese glanzvolle Pracht hätte ich niemals erblickt. Da ich jedoch in den Unterweisungen der Paccekabuddhas fest verankert blieb, wurde dieses Glück von mir erlangt.“ Und während er so bei sich dachte, stieß er voller Freude einen feierlichen Ausruf aus und sprach diese Strophe: 132. 132. ‘‘Kusalūpadese dhitiyā daḷhāya ca, anivattitattā bhayabhīrutāya ca; Na rakkhasīnaṃ vasamāgamimhase, sa sotthibhāvo mahatā bhayena me’’ti. „Durch feste Entschlossenheit gemäß der Unterweisung des Weisen und weil wir uns nicht durch Furcht und Schrecken zurückdrängen ließen, gerieten wir nicht unter die Gewalt der Dämoninnen; dieses mein Wohlbefinden ist aus einer großen Gefahr entstanden.“ Tattha [Pg.496] kusalūpadeseti kusalānaṃ upadese, paccekabuddhānaṃ ovādeti attho. Dhitiyā daḷhāya cāti daḷhāya dhitiyā ca, thirena abbocchinnanirantaravīriyena cāti attho. Anivattitattā bhayabhīrutāya cāti bhayabhīrutāya anivattitatāya ca. Tattha bhayanti cittutrāsamattaṃ parittabhayaṃ. Bhīrutāti sarīrakampanappattaṃ mahābhayaṃ. Idaṃ ubhayampi mahāsattassa ‘‘yakkhiniyo nāmetā manussakhādikā’’ti bheravārammaṇaṃ disvāpi nāhosi. Tenāha ‘‘anivattitattā bhayabhīrutāya cā’’ti. Bhayabhīrutāya abhāveneva bheravārammaṇaṃ disvāpi anivattanabhāvenāti attho. Na rakkhasīnaṃ vasamāgamimhaseti yakkhakantāre tāsaṃ rakkhasīnaṃ vasaṃ na agamimha. Yasmā amhākaṃ kusalūpadese dhiti ca daḷhā ahosi, bhayabhīrutābhāvena ca anivattanasabhāvā ahumhā, tasmā rakkhasīnaṃ vasaṃ na agamimhāti vuttaṃ hoti. Sa sotthibhāvo mahatā bhayena meti so mayhaṃ ayaṃ ajja mahatā bhayena rakkhasīnaṃ santikā pattabbena dukkhadomanassena sotthibhāvo khemabhāvo pītisomanassabhāvoyeva jātoti. Hierin bedeutet „kusalūpadese“: in der Unterweisung der Heilsamen, das heißt in der Ermahnung der Paccekabuddhas. „Dhitiyā daḷhāya ca“ bedeutet: mit fester Entschlossenheit, das heißt mit beständiger, ununterbrochener und unaufhörlicher Tatkraft. „Anivattitattā bhayabhīrutāya ca“ bedeutet: aufgrund des Nichtzurückweichens trotz Furcht und Schrecken. Hierbei ist „Furcht“ (bhaya) bloße geistige Erschütterung, eine geringe Furcht. „Schrecken“ (bhīrutā) ist eine große Furcht, die zu einem Zittern des Körpers führt. Beides entstand im Großen Wesen nicht, selbst als er das schreckenerregende Objekt sah und dachte: „Diese sogenannten Dämoninnen sind Menschenfresserinnen.“ Daher heißt es: „anivattitattā bhayabhīrutāya ca“, was bedeutet: eben wegen des Nichtvorhandenseins von Furcht und Schrecken, selbst beim Erblicken eines schrecklichen Objekts, durch die Eigenschaft des Nichtzurückweichens. „Na rakkhasīnaṃ vasamāgamimhase“ bedeutet: Wir gerieten in der Dämonen-Wildnis nicht unter die Gewalt jener Dämoninnen. Da unsere Entschlossenheit bezüglich der Unterweisung des Weisen fest war und wir aufgrund des Fehlens von Furcht und Schrecken von einer Natur des Nichtzurückweichens waren, gerieten wir deshalb nicht unter die Gewalt der Dämoninnen – so lautet die Bedeutung. „Sa sotthibhāvo mahatā bhayena me“ bedeutet: Dieser mein heutiger Zustand des Heils, Zustand der Sicherheit, ja, dieser Zustand des Entzückens und der Freude ist mir aus einer großen Gefahr erwachsen, nämlich aus dem Schmerz und dem Kummer, die mir in der Gegenwart der Dämoninnen gedroht hätten. Evaṃ mahāsatto imāya gāthāya dhammaṃ desetvā dhammena rajjaṃ kāretvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nachdem das Große Wesen so mit dieser Strophe die Lehre verkündet hatte, regierte er gerecht das Reich, vollbrachte verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosen und ging entsprechend seinem Karma in die nächste Existenz ein. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘ahaṃ tena samayena takkasilaṃ gantvā rajjappattakumāro ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrverkündung vor und verknüpfte das Jātaka mit den Worten: „Ich selbst war zu jener Zeit der Prinz, der nach Takkasilā ging und das Königreich erlangte.“ Bhīrukajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Bhīruka-Jātaka ist die zweite.
[133] 3. Ghatāsanajātakavaṇṇanā [133] 3. Die Erklärung des Ghatāsana-Jātaka Khemaṃ yahinti idaṃ satthā jetavane viharanto aññataraṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. So hi bhikkhu satthu santike kammaṭṭhānaṃ gahetvā paccantaṃ gantvā ekaṃ gāmakaṃ upanissāya araññasenāsane vassaṃ upagañchi. Tassa paṭhamamāseyeva piṇḍāya paviṭṭhassa paṇṇasālā jhāyittha. So vasanaṭṭhānābhāvena kilamanto upaṭṭhākānaṃ ācikkhi. Te ‘‘hotu, bhante, paṇṇasālaṃ karissāma, kasāma tāva, vapāma tāvā’’tiādīni vadantā [Pg.497] temāsaṃ vītināmesuṃ. So senāsanasappāyābhāvena kammaṭṭhānaṃ matthakaṃ pāpetuṃ nāsakkhi. So nimittamattampi anuppādetvā vutthavasso jetavanaṃ gantvā satthāraṃ vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Satthā tena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā ‘‘kiṃ nu kho te, bhikkhu, kammaṭṭhānaṃ sappāyaṃ jāta’’nti pucchi. So ādito paṭṭhāya asappāyabhāvaṃ kathesi. Satthā ‘‘pubbe kho, bhikkhu, tiracchānāpi attano sappāyāsappāyaṃ ñatvā sappāyakāle vasitvā asappāyakāle vasanaṭṭhānaṃ pahāya aññattha agamaṃsu, tvaṃ kasmā attano sappāyāsappāyaṃ na aññāsī’’ti vatvā tena yācito atītaṃ āhari. „Khemaṃ yahiṃ“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich eines bestimmten Mönchs. Dieser Mönch nämlich hatte beim Meister ein Meditationsobjekt (Kammaṭṭhāna) empfangen, war in ein Grenzgebiet gezogen und verbrachte die Regenzeit an einem Walddomizil in der Nähe eines kleinen Dorfes. Gleich im ersten Monat brannte seine Blätterhütte nieder, als er zum Almosengang aufgebrochen war. Da er keine Unterkunft mehr hatte, war er erschöpft und informierte seine Unterstützer. Diese sagten: „Es ist gut, Ehrwürdiger Herr, wir werden eine Blätterhütte bauen; aber zuerst müssen wir pflügen, zuerst müssen wir säen“, und ließen so unter solchen Ausreden die drei Monate der Regenzeit vergehen. Da die Unterkunft für ihn nicht zuträglich war, konnte er sein Meditationsobjekt nicht zur Vollendung bringen. Er konnte nicht einmal ein Zeichen (nimitta) erzeugen. Nach dem Ende der Regenzeit reiste er zum Jetavana, erwies dem Meister seine Ehrfurcht und setzte sich zur Seite nieder. Der Meister hielt eine freundliche Begrüßung mit ihm und fragte: „Nun, Mönch, ist dein Meditationsobjekt für dich zuträglich geworden?“ Er erzählte von Anfang an von den unzuträglichen Umständen. Der Meister sprach: „In der Vergangenheit, o Mönch, erkannten selbst Tiere, was für sie zuträglich oder unzuträglich war, blieben zur zuträglichen Zeit dort und verließen zur unzuträglichen Zeit ihre Wohnstätte, um anderswohin zu gehen. Warum hast du nicht erkannt, was für dich zuträglich oder unzuträglich war?“ Auf Bitten des Mönchs erzählte er die Begebenheit aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto sakuṇayoniyaṃ nibbattitvā viññutaṃ patvā sobhaggappatto sakuṇarājā hutvā ekasmiṃ araññāyatane jātassaratīre sākhāviṭapasampannaṃ bahalapattapalāsaṃ mahārukkhaṃ upanissāya saparivāro vāsaṃ kappesi. Bahū sakuṇā tassa rukkhassa udakamatthake patthaṭasākhāsu vasantā sarīravaḷañjaṃ udake pātenti. Tasmiñca jātassare caṇḍo nāgarājā vasati. Tassa etadahosi ‘‘ime sakuṇā mayhaṃ nivāse jātassare sarīravaḷañjaṃ pātenti, yaṃnūnāhaṃ udakato aggiṃ uṭṭhāpetvā rukkhaṃ jhāpetvā ete palāpeyya’’nti. So kuddhamānaso rattibhāge sabbesaṃ sakuṇānaṃ sannipatitvā rukkhasākhāsu nipannakāle paṭhamaṃ tāva uddhanāropitaṃ viya udakaṃ pakkudhāpetvā dutiyavāre dhūmaṃ uṭṭhāpetvā tatiyavāre tālakkhandhappamāṇaṃ jālaṃ uṭṭhāpesi. Bodhisatto udakato jālaṃ uṭṭhahamānaṃ disvā ‘‘bho, sakuṇā, agginā ādittaṃ nāma udakena nibbāpenti, idāni pana udakameva ādittaṃ. Na sakkā amhehi idha vasituṃ, aññattha gamissāmā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoße der Vögel wiedergeboren. Als er die Jahre des Verstandes erreicht hatte und von vollkommener Schönheit war, wurde er zum Vogelkönig. Er lebte im Gefolge in einem bestimmten Waldgebiet nahe dem Ufer eines natürlichen Sees (Jātassara) im Schutz eines riesigen Baumes, der reich an Ästen und Zweigen sowie dicht belaubt war. Viele Vögel wohnten auf den Zweigen, die über dem Wasser des Baumes ragten, und ließen ihre körperlichen Ausscheidungen ins Wasser fallen. In jenem natürlichen See wohnte ein grimmiger Schlangenkönig (Nāga). Er dachte: „Diese Vögel lassen ihre körperlichen Ausscheidungen in meiner Wohnstätte, dem See, herabfallen. Was wäre, wenn ich Feuer aus dem Wasser aufsteigen ließe, den Baum verbrennen und sie in die Flucht schlagen würde?“ Mit zornigem Gemüt brachte er zur Nachtzeit, als alle Vögel zusammengekommen waren und auf den Baumzweigen schliefen, zuerst das Wasser zum Sieden wie in einem Kessel auf einer Feuerstelle. Beim zweiten Mal ließ er Rauch aufsteigen, und beim dritten Mal ließ er Flammen emporlodern, so groß wie Palmenstämme. Als der Bodhisatta die Flammen aus dem Wasser aufsteigen sah, sagte er: „Ihr Vögel, das, was durch Feuer entzündet ist, löscht man gewöhnlich mit Wasser. Nun aber brennt das Wasser selbst! Wir können hier nicht länger wohnen, lasst uns woanders hingehen!“, und sprach diese Strophe: 133. 133. ‘‘Khemaṃ yahiṃ tattha arī udīrito, dakassa majjhe jalate ghatāsano; Na ajja vāso mahiyā mahīruhe, disā bhajavho saraṇājja nobhaya’’nti. „Dort, wo Sicherheit war, ist der Feind aufgestiegen; mitten im Wasser brennt der Butterspeiser (das Feuer). Heute gibt es für uns keine Bleibe mehr auf diesem Baum der Erde; wendet euch den Himmelsrichtungen zu! Die Zuflucht ist uns heute zur Gefahr geworden.“ Tattha khemaṃ yahiṃ tattha arī udīritoti yasmiṃ udakapiṭṭhe khemabhāvo nibbhayabhāvo, tasmiṃ attapaccatthiko sapatto uṭṭhito. Dakassāti udakassa. Ghatāsanoti aggi. So hi ghataṃ asnāti, tasmā ‘‘ghatāsano’’ti [Pg.498] vuccati. Na ajja vāsoti ajja no vāso natthi. Mahiyā mahīruheti mahiruho vuccati rukkho, tasmiṃ imissā mahiyā jāte rukkheti attho. Disā bhajavhoti disā bhajatha gacchatha. Saraṇājja no bhayanti ajja amhākaṃ saraṇato bhayaṃ jātaṃ, paṭisaraṇaṭṭhānato bhayaṃ uppannanti attho. Hierin bedeutet „khemaṃ yahiṃ tattha arī udīrito“: Auf jener Wasserfläche, wo Sicherheit und Gefahrenfreiheit herrschten, ist der persönliche Widersacher, das gegnerische Feuer, aufgestiegen. „Dakassa“ bedeutet: des Wassers. „Ghatāsanoti“ ist das Feuer. Weil es nämlich geschmolzene Butter (ghata) verzehrt (asnāti), wird es „Ghatāsana“ (Butterspeiser) genannt. „Na ajja vāso“ bedeutet: Heute gibt es für uns keine Wohnstätte mehr. In „mahiyā mahīruhe“ wird der Baum als „mahīruha“ (auf der Erde wachsend) bezeichnet; die Bedeutung ist: auf diesem auf der Erde gewachsenen Baum. „Disā bhajavho“ bedeutet: Wendet euch den Himmelsrichtungen zu, geht fort! „Saraṇājja no bhayaṃ“ bedeutet: Heute ist uns aus unserer Zuflucht Gefahr erwachsen; die Bedeutung ist, dass aus dem Ort, der uns Schutz bot, Gefahr entstanden ist. Evaṃ vatvā bodhisatto attano vacanakare sakuṇe ādāya uppatitvā aññattha gato. Bodhisattassa vacanaṃ aggahetvā ṭhitasakuṇā jīvitakkhayaṃ pattā. Nachdem er dies gesagt hatte, nahm der Bodhisatta die Vögel, die seinen Worten folgten, flog auf und zog an einen anderen Ort. Die Vögel jedoch, die den Rat des Bodhisatta nicht annahmen und zurückblieben, kamen ums Leben. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi, saccapariyosāne so bhikkhu arahatte patiṭṭhāsi. Nachdem der Meister diese Lehrverkündung vorgetragen und die Wahrheiten dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka. Am Ende der Wahrheiten erlangte jener Mönch die Arahatschaft. Tadā bodhisattassa vacanakarā sakuṇā buddhaparisā ahesuṃ, sakuṇarājā pana ahameva ahosinti. Damals waren die Vögel, die den Worten des Bodhisatta folgten, die Gefolgschaft des Buddha, der Vogelkönig aber war ich selbst. Ghatāsanajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Ghatāsana-Jātaka ist die dritte.
[134] 4. Jhānasodhanajātakavaṇṇanā [134] 4. Die Erklärung des Jhānasodhana-Jātaka Ye saññinoti idaṃ satthā jetavane viharanto saṅkassanagaradvāre attanā saṃkhittena pucchitapañhassa dhammasenāpatino vitthārabyākaraṇaṃ ārabbha kathesi. Tatridaṃ atītavatthu – atīte kira bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto araññāyatane kālaṃ karonto antevāsikehi pucchito ‘‘nevasaññīnāsaññī’’ti āha…pe… tāpasā jeṭṭhantevāsikassa kathaṃ na gaṇhiṃsu. Bodhisatto ābhassarato āgantvā ākāse ṭhatvā imaṃ gāthamāha – "Die Wahrnehmung Habenden" (Ye saññino) – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich der ausführlichen Beantwortung einer Frage durch den Feldherrn der Lehre (Sāriputta), die er selbst am Tor der Stadt Saṅkassa in aller Kürze gestellt hatte. Dies ist die dazugehörige Geschichte aus der Vergangenheit: Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, gab der Bodhisatta, als er an einer Waldstätte im Sterben lag und von seinen Schülern gefragt wurde, zur Antwort: "Weder wahrnehmend noch nicht wahrnehmend" (Nevasaññīnāsaññī) ... und so weiter. Die Asketen schenkten den Worten des ältesten Schülers keinen Glauben. Da kam der Bodhisatta aus der Ābhassara-Welt herab, verweilte in der Luft und sprach diese Strophe: 134. 134. ‘‘Ye saññino tepi duggatā, yepi asaññino tepi duggatā; Etaṃ ubhayaṃ vivajjaya, taṃ samāpattisukhaṃ anaṅgaṇa’’nti. "Diejenigen, welche Wahrnehmung besitzen, sind im Elend; auch jene, die keine Wahrnehmung besitzen, sind im Elend. Meide diese beiden Zustände; jene Errungenschaft des Glücks ist makellos (frei von Trieben)." Tattha ye saññinoti ṭhapetvā nevasaññānāsaññāyatanalābhino avasese sacittakasatte dasseti. Tepi duggatāti tassā samāpattiyā alābhato tepi duggatā nāma. Yepi asaññinoti asaññabhave [Pg.499] nibbatte acittakasatte dasseti. Tepi duggatāti tepi imissāyeva samāpattiyā alābhato duggatāyeva nāma. Etaṃ ubhayaṃ vivajjayāti etaṃ ubhayampi saññibhavañca asaññibhavañca vivajjaya pajahāti antevāsikaṃ ovadati. Taṃ samāpattisukhaṃ anaṅgaṇanti taṃ nevasaññānāsaññāyatanasamāpattilābhino santaṭṭhena ‘‘sukha’’nti saṅkhaṃ gataṃ jhānasukhaṃ anaṅgaṇaṃ niddosaṃ balavacittekaggatāsabhāvenapi taṃ anaṅgaṇaṃ nāma jātaṃ. Hierbei zeigt die Formulierung „die Wahrnehmung Habenden“ (ye saññino) mit Ausnahme jener, welche die Errungenschaft des Bereichs von Weder-Wahrnehmung-noch-Nicht-Wahrnehmung erlangt haben, alle übrigen mit Geist ausgestatteten Wesen. „Auch diese sind im Elend“ (tepi duggatā) bedeutet: Weil sie diese Errungenschaft nicht erlangen, werden auch jene als im Elend befindlich bezeichnet. „Auch jene, die keine Wahrnehmung besitzen“ (yepi asaññino) zeigt die geistlosen Wesen, die im Bereich der wahrnehmungslosen Wesen (asaññabhava) wiedergeboren wurden. „Auch diese sind im Elend“ (tepi duggatā) bedeutet: Weil sie eben diese Errungenschaft nicht erlangen, werden auch diese als im Elend befindlich bezeichnet. „Meide diese beiden“ (etaṃ ubhayaṃ vivajjaya) – hiermit ermahnt er den Schüler: „Weiche diesen beiden aus, gib sowohl das Dasein mit Wahrnehmung als auch das Dasein ohne Wahrnehmung auf.“ „Jene Errungenschaft des Glücks ist makellos“ (taṃ samāpattisukhaṃ anaṅgaṇaṃ) bezieht sich auf jenes feine Glück der Vertiefung (jhāna), das für jemanden, der die Errungenschaft der Weder-Wahrnehmung-noch-Nicht-Wahrnehmung erlangt hat, aufgrund seines friedvollen Zustands als „Glück“ bezeichnet wird; es ist makellos (anaṅgaṇa) und fehlerfrei. Auch wegen des Wesens einer sehr starken geistigen Einspitzigkeit wird diese Errungenschaft des Glücks als makellos bezeichnet. Evaṃ bodhisatto dhammaṃ desetvā antevāsikassa guṇaṃ kathetvā brahmalokameva agamāsi. Tadā sesatāpasā jeṭṭhantevāsikassa saddahiṃsu. Nachdem der Bodhisatta so die Lehre verkündet und die Vorzüge des ältesten Schülers gepriesen hatte, kehrte er in die Brahma-Welt zurück. Da glaubten die übrigen Asketen den Worten des ältesten Schülers. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jeṭṭhantevāsiko sāriputto, mahābrahmā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der älteste Schüler Sāriputta, der große Brahma aber war ich selbst.“ Jhānasodhanajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Jhānasodhana-Jātaka ist die vierte.
[135] 5. Candābhajātakavaṇṇanā [135] 5. Die Erklärung des Candābha-Jātaka Candābhanti idaṃ satthā jetavane viharanto saṅkassanagaradvāre therasseva pañhabyākaraṇaṃ ārabbha kathesi. Atīte kira bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto araññāyatane kālaṃ karonto antevāsikehi pucchito ‘‘candābhaṃ sūriyābha’’nti vatvā ābhassare nibbatto. Tāpasā jeṭṭhantevāsikassa na saddahiṃsu. Bodhisatto ābhassarato āgantvā ākāse ṭhito imaṃ gāthamāha – „Mondglanz“ (Candābhaṃ) – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich eben der Beantwortung einer Frage durch den Thera (Sāriputta) am Tor der Stadt Saṅkassa. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, gab der Bodhisatta, als er an einer Waldstätte im Sterben lag und von seinen Schülern gefragt wurde, zur Antwort: „Mondglanz und Sonnenglanz“, und wurde daraufhin in der Ābhassara-Welt wiedergeboren. Die Asketen glaubten dem ältesten Schüler nicht. Da kam der Bodhisatta aus der Ābhassara-Welt herab, verweilte in der Luft und sprach diese Strophe: 135. 135. ‘‘Candābhaṃ sūriyābhañca, yodha paññāya gādhati; Avitakkena jhānena, hoti ābhassarūpago’’ti. „Wer hier Mondglanz und Sonnenglanz mit Weisheit ergründet, der gelangt durch die gedankenfreie Vertiefung in die Ābhassara-Welt.“ Tattha candābhanti odātakasiṇaṃ dasseti. Sūriyābhanti pītakasiṇaṃ. Yodha paññāya gādhatīti yo puggalo idha sattaloke idaṃ kasiṇadvayaṃ paññāya gādhati, ārammaṇaṃ katvā anupavisati, tattheva patiṭṭhahati[Pg.500]. Atha vā candābhaṃ sūriyābhañca, yodha paññāya gādhatīti yattakaṃ ṭhānaṃ candābhā ca sūriyābhā ca patthaṭā, tatthake ṭhāne paṭibhāgakasiṇaṃ vaḍḍhetvā taṃ ārammaṇaṃ katvā jhānaṃ nibbattento ubhayampetaṃ ābhaṃ paññāya gādhati nāma. Tasmā ayampettha atthoyeva. Avitakkena jhānena, hoti ābhassarūpagoti so puggalo tathā katvā paṭiladdhena dutiyena jhānena ābhassarabrahmalokūpago hotīti. Hierbei zeigt „Mondglanz“ (candābhaṃ) das weiße Kasiṇa (odātakasiṇa, das Gegenbild des weißen Meditationsobjekts). „Sonnenglanz“ (sūriyābhā) zeigt das gelbe Kasiṇa (pītakasiṇa). „Wer hier mit Weisheit ergründet“ (yodha paññāya gādhati) bedeutet: Jene Person, die hier in dieser Welt der Wesen diese beiden Kasiṇas mit Weisheit ergründet, indem sie diese zum Meditationsobjekt macht, dringt darin ein und verweilt genau dort. Oder aber, bezüglich „wer hier Mondglanz und Sonnenglanz mit Weisheit ergründet“: Soweit sich das Mondlicht und das Sonnenlicht ausbreiten, so weit vergrößert er das Gegenbild des Kasiṇas (paṭibhāganimitta), macht dieses zum Objekt, erzeugt die Vertiefung und ergründet so mit Weisheit dieses zweifache Licht. Daher ist auch diese Bedeutung hier gemeint. „Gelangt durch die gedankenfreie Vertiefung in die Ābhassara-Welt“ (avitakkena jhānena, hoti ābhassarūpago) bedeutet: Wenn jene Person dies so ausführt, gelangt sie durch die dadurch erlangte zweite Vertiefung (das gedankenfreie zweite Jhāna) in die Ābhassara-Brahmawelt. Evaṃ bodhisatto tāpase bodhetvā jeṭṭhantevāsikassa guṇaṃ kathetvā brahmalokameva gato. Nachdem der Bodhisatta so die Asketen belehrt und die Vorzüge des ältesten Schülers gepriesen hatte, kehrte er in die Brahma-Welt zurück. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jeṭṭhantevāsiko sāriputto, mahābrahmā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er das Jātaka wie folgt zusammen: „Damals war der älteste Schüler Sāriputta, der große Brahma aber war ich selbst.“ Candābhajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Candābha-Jātaka ist die fünfte.
[136] 6. Suvaṇṇahaṃsajātakavaṇṇanā [136] 6. Die Erklärung des Suvaṇṇahaṃsa-Jātaka Yaṃ laddhaṃ tena tuṭṭhabbanti idaṃ satthā jetavane viharanto thullanandaṃ bhikkhuniṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyañhi aññataro upāsako bhikkhunisaṅghaṃ lasuṇena pavāretvā khettapālaṃ āṇāpesi ‘‘sace bhikkhuniyo āgacchanti, ekekāya bhikkhuniyā dve tayo bhaṇḍike dehī’’ti. Tato paṭṭhāya bhikkhuniyo tassa gehampi khettampi lasuṇatthāya gacchanti. Athekasmiṃ ussavadivase tassa gehe lasuṇaṃ parikkhayaṃ agamāsi. Thullanandā bhikkhunī saparivārā gehaṃ gantvā ‘‘lasuṇenāvuso attho’’ti vatvā ‘‘natthayye, yathābhataṃ lasuṇaṃ parikkhīṇaṃ, khettaṃ gacchathā’’ti vuttā khettaṃ gantvā na mattaṃ jānitvā lasuṇaṃ āharāpesi. Khettapālo ujjhāyi ‘‘kathañhi nāma bhikkhuniyo na mattaṃ jānitvā lasuṇaṃ harāpessantī’’ti? Tassa kathaṃ sutvā yā tā bhikkhuniyo appicchā, tāpi, tāsaṃ sutvā bhikkhūpi, ujjhāyiṃsu. Ujjhāyitvā ca pana bhagavato etamatthaṃ ārocesuṃ. Bhagavā thullanandaṃ bhikkhaniṃ garahitvā ‘‘bhikkhave, mahiccho puggalo nāma vijātamātuyāpi appiyo hoti amanāpo, appasanne pasādetuṃ, pasannānaṃ vā bhiyyosomattāya pasādaṃ janetuṃ, anuppannaṃ vā lābhaṃ uppādetuṃ, uppannaṃ vā [Pg.501] pana lābhaṃ thiraṃ kātuṃ na sakkoti. Appiccho pana puggalo appasanne pasādetuṃ, pasannānaṃ vā bhiyyosomattāya pasādaṃ janetuṃ, anuppannaṃ vā lābhaṃ uppādetuṃ, uppannaṃ vā pana lābhaṃ thiraṃ kātuṃ sakkotī’’tiādinā nayena bhikkhūnaṃ tadanucchavikaṃ dhammaṃ kathetvā ‘‘na, bhikkhave, thullanandā idāneva mahicchā, pubbepi mahicchāyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Mit dem, was man erhält, soll man zufrieden sein“ (Yaṃ laddhaṃ tena tuṭṭhabbaṃ) – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich der Nonne Thullanandā. In Sāvatthī hatte nämlich ein gewisser gläubiger Laie die Gemeinde der Nonnen (Bhikkhunī-Saṅgha) mit Knoblauch eingeladen und den Feldwächter angewiesen: „Wenn die Nonnen kommen, gib jeder einzelnen Nonne zwei oder drei Knollen.“ Von da an gingen die Nonnen sowohl zu seinem Haus als auch zu seinem Feld, um Knoblauch zu holen. An einem Festtag ging jedoch der Knoblauch in seinem Haus zur Neige. Die Nonne Thullanandā ging in Begleitung ihrer Gefolgschaft zu seinem Haus und sagte: „Lieber Spender, wir benötigen Knoblauch.“ Als man ihr antwortete: „Es gibt keinen mehr im Haus, ehrwürdige Dame, der herbeigebrachte Knoblauch ist aufgebraucht; geht auf das Feld!“, ging sie zum Feld und ließ, ohne das rechte Maß zu kennen, Knoblauch einsammeln. Der Feldwächter beschwerte sich: „Wie können die Nonnen nur Knoblauch mitnehmen lassen, ohne das rechte Maß zu kennen?“ Als die wenigen genügsamen Nonnen seine Beschwerde hörten, beklagten auch sie sich, und nachdem die Mönche davon gehört hatten, beklagten auch sie sich. Sie tadelten dies und berichteten dem Erhabenen diesen Vorfall. Der Erhabene tadelte die Nonne Thullanandā und sprach: „Ihr Mönche, eine Person mit großem Begehren ist selbst der leiblichen Mutter verhasst und missfällig; sie vermag es weder, jene, die noch kein Vertrauen haben, zum Vertrauen zu führen, noch das Vertrauen derer, die bereits gläubig sind, über das Maß hinaus zu mehren, noch ungeborenen Gewinn herbeizuführen, noch bereits erlangten Gewinn dauerhaft zu bewahren. Eine genügsame Person jedoch vermag es, jene, die noch kein Vertrauen haben, zum Vertrauen zu führen, das Vertrauen derer, die bereits gläubig sind, über das Maß hinaus zu mehren, ungeborenen Gewinn herbeizuführen und bereits erlangten Gewinn dauerhaft zu bewahren.“ Nachdem er den Mönchen in dieser Weise die für diesen Anlass angemessene Lehre dargelegt hatte, fügte er hinzu: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, ist Thullanandā von großem Begehren erfüllt; auch in der Vergangenheit war sie schon von großem Begehren erfüllt“, und erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto aññatarasmiṃ brāhmaṇakule nibbatti. Tassa vayappattassa samānajātikā kulā pajāpatiṃ āhariṃsu. Tassā nandā nandāvatī sundarīnandāti tisso dhītaro ahesuṃ. Tāsu patikulaṃ agatāsuyeva bodhisatto kālaṃ katvā suvaṇṇahaṃsayoniyaṃ nibbatti, jātissarañāṇañcassa uppajji. So vayappatto suvaṇṇasañchannaṃ sobhaggappattaṃ mahantaṃ attabhāvaṃ disvā ‘‘kuto nu kho cavitvā ahaṃ idhūpapanno’’ti āvajjento ‘‘manussalokato’’ti ñatvā puna ‘‘kathaṃ nu kho me brāhmaṇī ca dhītaro ca jīvantī’’ti upadhārento ‘‘paresaṃ bhatiṃ katvā kicchena jīvantī’’ti ñatvā cintesi ‘‘mayhaṃ sarīre sovaṇṇamayāni pattāni koṭṭanaghaṭṭanakhamāni, ito tāsaṃ ekekaṃ pattaṃ dassāmi, tena me pajāpati ca dhītaro ca sukhaṃ jīvissantī’’ti. So tattha gantvā piṭṭhivaṃsakoṭiyaṃ nilīyi, brāhmaṇī ca dhītaro ca bodhisattaṃ disvā ‘‘kuto āgatosi, sāmī’’ti pucchiṃsu. ‘‘Ahaṃ tumhākaṃ pitā kālaṃ katvā suvaṇṇahaṃsayoniyaṃ nibbatto tumhe daṭṭhuṃ āgato. Ito paṭṭhāya tumhākaṃ paresaṃ bhatiṃ katvā dukkhajīvikāya jīvanakiccaṃ natthi, ahaṃ vo ekekaṃ pattaṃ dassāmi, taṃ vikkiṇitvā sukhena jīvathā’’ti ekaṃ pattaṃ datvā agamāsi. So eteneva niyāmena antarantarā āgantvā ekekaṃ pattaṃ deti, brāhmaṇī ca dhītaro ca aḍḍhā sukhitā ahesuṃ. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer bestimmten Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, brachten seine Angehörigen ihm eine Ehefrau aus einer Familie gleicher Kaste. Mit ihr hatte er drei Töchter namens Nandā, Nandāvatī und Sundarīnandā. Noch bevor diese Töchter in das Haus ihrer Ehemänner zogen, verstarb der Bodhisatta und wurde im Schoß einer goldenen Gans wiedergeboren, und in ihm entstand das Wissen der Erinnerung an frühere Leben. Als er herangewachsen war, sah er seinen eigenen großen Körper, der mit goldenen Federn bedeckt und von herrlicher Schönheit war. Er dachte nach: „Aus welchem Zustand wohl bin ich gestorben und hier wiedergeboren worden?“, und als er erkannte: „Aus der Menschenwelt“, forschte er weiter nach: „Wie leben wohl meine Brahmanenfrau und meine Töchter?“ Als er erfuhr: „Sie verrichten Lohnarbeit für andere und leben in Mühsal“, dachte er: „An meinem Körper befinden sich goldene Federn, die dem Stampfen und Schlagen standhalten. Ich werde ihnen von diesen eine Feder nach der anderen geben. Dadurch werden meine Ehefrau und meine Töchter glücklich leben.“ Er flog dorthin und ließ sich auf dem Ende des Dachfirstes nieder. Als die Brahmanenfrau und die Töchter den Bodhisatta sahen, fragten sie: „Woher kommst du, Herr?“ Er sprach: „Ich bin euer Vater. Nach meinem Tod wurde ich im Schoß einer goldenen Gans wiedergeboren und bin gekommen, um nach euch zu sehen. Von nun an habt ihr es nicht mehr nötig, durch Lohnarbeit für andere ein mühseliges Leben zu führen. Ich werde euch jeweils eine Feder geben; verkauft diese und lebt glücklich!“ Nachdem er ihnen eine Feder gegeben hatte, flog er davon. Auf genau diese Weise kam er von Zeit zu Zeit zurück, gab ihnen jeweils eine Feder, und die Brahmanenfrau und ihre Töchter wurden wohlhabend und glücklich. Athekadivasaṃ sā brāhmaṇī dhītaro āmantesi ‘‘ammā, tiracchānānaṃ nāma cittaṃ dujjānaṃ. Kadāci vo pitā idha nāgaccheyya, idānissa āgatakāle sabbāni pattānipi luñcitvā gaṇhāmā’’ti. Tā ‘‘evaṃ no pitā kilamissatī’’ti na sampaṭicchiṃsu. Brāhmaṇī pana mahicchatāya puna ekadivasaṃ suvaṇṇahaṃsarājassa āgatakāle ‘‘ehi tāva, sāmī’’ti vatvā taṃ attano santikaṃ upagataṃ ubhohi hatthehi gahetvā [Pg.502] sabbapattāni luñci. Tāni pana bodhisattassa ruciṃ vinā balakkārena gahitattā sabbāni bakapattasadisāni ahesuṃ. Bodhisatto pakkhe pasāretvā gantuṃ nāsakkhi. Atha naṃ sā mahācāṭiyaṃ pakkhipitvā posesi. Tassa puna uṭṭhahantāni pattāni setāni sampajjiṃsu. So sañjātapatto uppatitvā attano vasanaṭṭhānameva gantvā na puna āgamāsi. Eines Tages sprach die Brahmanenfrau zu ihren Töchtern: „Liebe Kinder, der Geist von Tieren ist schwer zu durchschauen. Eines Tages könnte euer Vater nicht mehr hierher kommen. Lasst uns daher, wenn er diesmal kommt, all seine Federn ausrupfen und nehmen!“ Sie stimmten dem nicht zu und sagten: „Wenn wir das tun, wird unser Vater leiden.“ Doch die Brahmanenfrau packte wegen ihrer großen Gier an einem anderen Tag, als der goldene Gänsekönig kam, nachdem sie gerufen hatte: „Komm her, Herr!“, den zu ihr herangetretenen Gänsekönig mit beiden Händen und rupfte all seine Federn aus. Da diese Federn jedoch gegen den Willen des Bodhisatta mit Gewalt genommen worden waren, wurden sie alle wie die Federn eines Reihers. Der Bodhisatta konnte seine Flügel nicht mehr ausbreiten und nicht mehr fliegen. Da setzte sie ihn in einen großen Tontopf und fütterte ihn. Als seine Federn wieder nachwuchsen, wurden sie ganz weiß. Als seine Federn vollkommen nachgewachsen waren, flog er auf, kehrte zu seinem eigenen Wohnort zurück und kam nie wieder. Satthā imaṃ atītaṃ āharitvā ‘‘na, bhikkhave, thullanandā idāneva mahicchā, pubbepi mahicchāyeva, mahicchatāya ca pana suvaṇṇamhā parihīnā. Idāni pana attano mahicchatāya eva lasuṇamhāpi parihāyissati, tasmā ito paṭṭhāya lasuṇaṃ khādituṃ na labhissati. Yathā ca thullanandā, evaṃ taṃ nissāya sesabhikkhuniyopi. Tasmā bahuṃ labhitvāpi pamāṇameva jānitabbaṃ, appaṃ labhitvā pana yathāladdheneva santoso kātabbo, uttari na patthetabba’’nti vatvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit erzählt hatte, sprach er: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, ist Thullanandā von großer Gier erfüllt; auch in der Vergangenheit war sie schon von großer Gier erfüllt, und aufgrund ihrer großen Gier verlor sie das Gold. Jetzt aber wird sie wegen ihrer eigenen großen Gier auch den Knoblauch verlieren. Darum soll es ihr von heute an nicht mehr erlaubt sein, Knoblauch zu essen. Und wie es Thullanandā ergeht, so wird es wegen ihr auch den übrigen Nonnen ergehen. Deshalb muss man, selbst wenn man viel erhält, das rechte Maß kennen; erhält man aber wenig, so soll man mit dem, was man bekommen hat, zufrieden sein und nicht nach mehr verlangen.“ Nach diesen Worten sprach er diese Strophe: 136. 136. ‘‘Yaṃ laddhaṃ tena tuṭṭhabbaṃ, atilobho hi pāpako; Haṃsarājaṃ gahetvāna, suvaṇṇā parihāyathā’’ti. „Man sollte mit dem zufrieden sein, was man erhalten hat, denn übergroße Gier ist wahrlich übel. Weil sie den Gänsekönig packte, verlor sie das Gold.“ Tattha tuṭṭhabbanti tussitabbaṃ. Dabei bedeutet „tuṭṭhabbaṃ“: man soll zufrieden sein. Idaṃ pana vatvā satthā anekapariyāyena garahitvā ‘‘yā pana bhikkhunī lasuṇaṃ khādeyya, pācittiya’’nti (pāci. 794) sikkhāpadaṃ paññāpetvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā brāhmaṇī ayaṃ thullanandā ahosi, tisso dhītaro idāni tissoyeva bhaginiyo, suvaṇṇahaṃsarājā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister dies gesagt und sie auf vielfältige Weise getadelt hatte, legte er die Ordensregel fest: „Wenn eine Nonne Knoblauch isst, vergeht sie sich mit einem Pācittiya“, und führte die Geburtshistorie wie folgt zusammen: „Die Brahmanenfrau von damals war die heutige Thullanandā, die drei Töchter waren die heutigen drei Schwestern, und der goldene Gänsekönig war ich selbst.“ Suvaṇṇahaṃsajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erklärung zum Suvaṇṇahaṃsa-Jātaka, die sechste.
[137] 7. Babbujātakavaṇṇanā [137] 7. Die Erklärung zum Babbu-Jātaka Yattheko labhate babbūti idaṃ satthā jetavane viharanto kāṇamātusikkhāpadaṃ (pāci. 230 ādayo) ārabbha kathesi. Sāvatthiyañhi kāṇamātā nāma [Pg.503] dhītuvasena pākaṭanāmā upāsikā ahosi sotāpannā ariyasāvikā. Sā dhītaraṃ kāṇaṃ aññatarasmiṃ gāmake samānajātikassa purisassa adāsi. Kāṇā kenacideva karaṇīyena mātu gharaṃ agamāsi. Athassā sāmiko katipāhaccayena dūtaṃ pāhesi ‘‘āgacchatu kāṇā, icchāmi kāṇāya āgamana’’nti. Kāṇā dūtassa vacanaṃ sutvā ‘‘amma, gamissāmī’’ti mātaraṃ āpucchi. Kāṇamātā ‘‘ettakaṃ kālaṃ vasitvā kathaṃ tucchahatthāva gamissasī’’ti pūvaṃ paci. Tasmiṃyeva khaṇe eko piṇḍacāriko bhikkhu tassā nivesanaṃ agamāsi, upāsikā taṃ nisīdāpetvā pattapūraṃ pūvaṃ dāpesi. So bhikkhu nikkhamitvā aññassa ācikkhi, tassapi tatheva dāpesi. Sopi nikkhamitvā aññassa ācikkhi, tassapi tathevāti evaṃ catunnaṃ janānaṃ dāpesi. Yathāpaṭiyattaṃ pūvaṃ parikkhayaṃ agamāsi, kāṇāya gamanaṃ na sampajji. Athassā sāmiko dutiyampi, tatiyampi dūtaṃ pāhesi. Tatiyaṃ pāhento ca ‘‘sace kāṇā nāgacchissati, ahaṃ aññaṃ pajāpatiṃ ānessāmī’’ti pāhesi. Tayopi vāre teneva upāyena gamanaṃ na sampajji, kāṇāya sāmiko aññaṃ pajāpatiṃ ānesi. Kāṇā taṃ pavattiṃ sutvā rodamānā aṭṭhāsi. „Wo eine Katze fängt...“ – Diese Lehrrede hielt der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf die Ordensregel für Kāṇas Mutter. In Sāvatthī lebte nämlich eine gläubige Anhängerin namens Kāṇamātā, die nach ihrer Tochter benannt und als eine Stromeingetretene und edle Schülerin weithin bekannt war. Sie gab ihre Tochter namens Kāṇa einem Mann aus einer Familie von gleichem Stand in einem bestimmten Dorf zur Frau. Kāṇa reiste wegen einer bestimmten Angelegenheit zum Haus ihrer Mutter. Nach einigen Tagen sandte ihr Ehemann einen Boten mit den Worten: „Kāṇa soll zurückkehren, ich wünsche Kāṇas Rückkehr.“ Als Kāṇa die Worte des Boten hörte, verabschiedete sie sich von ihrer Mutter mit den Worten: „Mutter, ich werde gehen.“ Kāṇas Mutter dachte: „Wie kannst du, nachdem du so lange hier geblieben bist, mit leeren Händen zurückgehen?“, und backte Kuchen. Genau in diesem Moment kam ein Almosengänger-Mönch zu ihrem Haus. Die gläubige Anhängerin bat ihn, sich zu setzen, und füllte seine Almosenschale mit Kuchen. Als dieser Mönch das Haus verließ, erzählte er es einem anderen Mönch; diesem gab sie ebenso eine Schale voll. Auch dieser verließ das Haus und erzählte es einem anderen; diesem gab sie ebenso eine Schale voll. Auf diese Weise gab sie vier Personen Kuchen. So ging der gesamte vorbereitete Kuchen zur Neige, und Kāṇas Abreise kam nicht zustande. Daraufhin sandte ihr Ehemann ein zweites und ein drittes Mal einen Boten. Beim dritten Mal sandte er die Nachricht: „Wenn Kāṇa nicht kommt, werde ich mir eine andere Frau nehmen.“ Doch auch nach drei Malen kam ihre Abreise auf dieselbe Weise nicht zustande, und Kāṇas Ehemann nahm sich eine andere Frau. Als Kāṇa davon hörte, stand sie da und weinte. Satthā taṃ kāraṇaṃ ñatvā pubbaṇhasamayaṃ nivāsetvā pattacīvaramādāya kāṇamātāya nivesanaṃ gantvā paññattāsane nisīditvā kāṇamātaraṃ pucchi ‘‘kissāyaṃ kāṇā rodatī’’ti? ‘‘Iminā nāma kāraṇenā’’ti ca sutvā kāṇamātaraṃ samassāsetvā dhammiṃ kathaṃ kathetvā uṭṭhāyāsanā vihāraṃ agamāsi. Atha tesaṃ catunnaṃ bhikkhūnaṃ tayo vāre yathāpaṭiyattapūvaṃ gahetvā kāṇāya gamanassa upacchinnabhāvo bhikkhusaṅghe pākaṭo jāto. Athekadivasaṃ bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, catūhi nāma bhikkhūhi tayo vāre kāṇamātāya pakkapūvaṃ khāditvā kāṇāya gamanantarāyaṃ katvā sāmikena pariccattaṃ dhītaraṃ nissāya mahāupāsikāya domanassaṃ uppādita’’nti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idāneva te cattāro bhikkhū kāṇamātāya santakaṃ khāditvā tassā domanassaṃ uppādesuṃ, pubbepi uppādesuṃyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. Als der Meister diesen Sachverhalt erfahren hatte, kleidete er sich am Morgen an, nahm Almosenschale und Obergewand, ging zum Haus von Kāṇās Mutter, setzte sich auf den für ihn bereiteten Sitz und fragte Kāṇās Mutter: „Warum weint diese Kāṇā?“ Als er die Antwort hörte: „Aus diesem und jenem Grund, Herr“, sprach er Kāṇās Mutter Mut zu, hielt eine Lehrrede, erhob sich von seinem Sitz und ging zum Kloster zurück. Danach wurde in der Mönchsgemeinschaft bekannt, dass durch das dreimalige Entgegennehmen der zubereiteten Kuchen durch jene vier Mönche Kāṇās Abreise zu ihrem Ehemann verhindert worden war. Eines Tages begannen die Mönche in der Versammlungshalle ein Gespräch: „Ihr Ehrwürdigen, vier Mönche haben dreimal die frisch gebackenen Kuchen von Kāṇās Mutter gegessen und dadurch Kāṇās Abreise verhindert. Weil die Tochter nun von ihrem Ehemann verlassen wurde, haben sie der großen Laienanhängerin tiefen Kummer bereitet.“ Der Meister kam herbei und fragte: „Mönche, worüber sprecht ihr gerade, während ihr hier beisammensitzt?“ Als sie antworteten: „Über dieses Thema, Herr“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt haben diese vier Mönche das Eigentum von Kāṇās Mutter verzehrt und ihr Kummer bereitet; das haben sie schon in der Vergangenheit getan.“ Und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte [Pg.504] bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto pāsāṇakoṭṭakakule nibbattitvā vayappatto pariyodātasippo ahosi. Kāsiraṭṭhe ekasmiṃ nigame eko mahāvibhavo seṭṭhi ahosi, tassa nidhānagatāyeva cattālīsa hiraññakoṭiyo ahesuṃ. Athassa bhariyā kālaṃ katvā dhanasinehena gantvā dhanapiṭṭhiyaṃ mūsikā hutvā nibbatti. Evaṃ anukkamena sabbampi taṃ kulaṃ abbhatthaṃ agamāsi, vaṃso upacchijji. So gāmopi chaḍḍito apaṇṇattikabhāvaṃ agamāsi. Tadā bodhisatto tasmiṃ purāṇagāmaṭṭhāne pāsāṇe uppāṭetvā koṭṭeti. Atha sā mūsikā gocarāya caramānā bodhisattaṃ punappunaṃ passantī uppannasinehā hutvā cintesi ‘‘mayhaṃ dhanaṃ bahu nikkāraṇena nassissati, iminā saddhiṃ ekato hutvā idaṃ dhanaṃ datvā maṃsaṃ vikkiṇāpetvā khādissāmī’’ti. Sā ekadivasaṃ ekaṃ kahāpaṇaṃ mukhena ḍaṃsitvā bodhisattassa santikaṃ agamāsi. So taṃ disvā piyavācāya samālapanto ‘‘kiṃ nu kho, amma, kahāpaṇaṃ gahetvā āgatāsī’’ti āha. Tāta, imaṃ gahetvā attanāpi paribhuñja, mayhampi maṃsaṃ āharāti. So ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā kahāpaṇaṃ ādāya gharaṃ gantvā ekena māsakena maṃsaṃ kiṇitvā āharitvā tassā adāsi. Sā taṃ gahetvā attano nivāsaṭṭhānaṃ gantvā yathāruciyā khādi. Tato paṭṭhāya imināva niyāmena divase divase bodhisattassa kahāpaṇaṃ deti, sopissā maṃsaṃ āharati. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer Familie von Steinmetzen geboren. Als er herangewachsen war, meisterte er seine Kunst vollkommen. In einem Marktflecken im Reich Kāsi lebte ein sehr reicher Schatzmeister; er besaß vierzig Millionen Goldstücke, die im Boden vergraben waren. Als seine Ehefrau starb, wurde sie aufgrund ihrer Gier nach dem Reichtum genau über dem Schatz als Maus wiedergeboren. Im Laufe der Zeit ging diese ganze Familie zugrunde, und das Geschlecht erlosch. Auch jenes Dorf wurde verlassen und verfiel zur Namenlosigkeit. Damals brach der Bodhisatta an jener alten Dorfstelle Steine heraus und behauene sie. Als nun jene Maus auf Nahrungssuche umherstreifte, sah sie den Bodhisatta immer wieder. Es entstand Zuneigung in ihr und sie dachte: „Mein großer Schatz wird sonst ohne Grund verloren gehen. Ich will mich mit diesem Steinmetz zusammentun, ihm dieses Geld geben, ihn Fleisch kaufen lassen und es essen.“ Eines Tages trug sie eine Kahāpaṇa-Münze im Maul und lief zum Bodhisatta. Als er sie sah, sprach er sie mit freundlichen Worten an: „Meine Liebe, warum bist du mit einer Kahāpaṇa-Münze im Maul hergekommen?“ — „Mein Lieber, nimm dies und verwende es auch für dich selbst, aber bringe mir auch etwas Fleisch mit!“ Er willigte ein mit den Worten: „Sehr wohl“, nahm die Kahāpaṇa-Münze, ging nach Hause, kaufte für einen Māsaka Fleisch, brachte es herbei und gab es ihr. Sie nahm es, ging zu ihrem Schlupfwinkel und fraß es nach Herzenslust. Von da an gab sie dem Bodhisatta Tag für Tag auf diese Weise eine Kahāpaṇa-Münze, und er brachte ihr stets Fleisch mit. Athekadivasaṃ taṃ mūsikaṃ biḷāro aggahesi. Atha naṃ sā evamāha ‘‘mā, samma, maṃ māresī’’ti. Kiṃkāraṇā na māressāmi? Ahañhi chāto maṃsaṃ khāditukāmo, na sakkā mayā na māretunti. Kiṃ pana ekadivasameva maṃsaṃ khāditukāmosi, udāhu niccakālanti? ‘‘Labhamāno niccakālampi khāditukāmomhī’’ti. ‘‘Yadi evaṃ ahaṃ te niccakālaṃ maṃsaṃ dassāmi, vissajjehi ma’’nti. Atha naṃ biḷāro ‘‘tena hi appamattā hohī’’ti vissajjesi. Tato paṭṭhāya sā attano ābhataṃ maṃsaṃ dve koṭṭhāse katvā ekaṃ biḷārassa deti, ekaṃ sayaṃ khādati. Atha naṃ ekadivasaṃ aññopi biḷāro aggahesi, tampi tatheva saññāpetvā attānaṃ vissajjāpesi. Tato paṭṭhāya tayo koṭṭhāse katvā khādanti. Puna añño aggahesi, tampi tatheva saññāpetvā [Pg.505] attānaṃ mocāpesi. Tato paṭṭhāya cattāro koṭṭhāse katvā khādanti. Puna añño aggahesi, tampi tatheva saññāpetvā attānaṃ mocāpesi. Tato paṭṭhāya pañca koṭṭhāse katvā khādanti. Sā pañcamaṃ koṭṭhāsaṃ khādamānā appāhāratāya kilantā kisā ahosi appamaṃsalohitā Eines Tages fing eine Katze diese Maus. Da sprach sie zu ihr: „Freund, töte mich nicht!“ — „Aus welchem Grund sollte ich dich nicht töten? Ich bin hungrig und möchte Fleisch fressen; es ist mir unmöglich, dich nicht zu töten.“ — „Möchtest du denn nur heute Fleisch fressen oder für immer?“ — „Wenn ich es bekommen kann, möchte ich es für immer fressen.“ — „Wenn das so ist, werde ich dir für immer Fleisch geben. Lass mich frei!“ Da ließ die Katze sie frei mit den Worten: „Nun gut, aber sei achtsam!“ Von da an teilte sie das Fleisch, das sie mitgebracht hatte, in zwei Teile, gab einen Teil der Katze und fraß den anderen selbst. Eines Tages fing eine andere Katze sie. Sie überzeugte auch diese auf dieselbe Weise und ließ sich freilassen. Von da an teilten sie das Fleisch in drei Teile und fraßen. Wieder fing eine andere Katze sie. Sie überzeugte auch diese auf dieselbe Weise und befreite sich. Von da an teilten sie es in vier Teile und fraßen. Wieder fing eine andere Katze sie. Sie überzeugte auch diese auf dieselbe Weise und befreite sich. Von da an teilten sie es in pfünf Teile und fraßen. Da sie nur noch den fünften Teil fressen konnte, wurde sie wegen des Nahrungsmangels erschöpft, mager und hatte nur noch wenig Fleisch und Blut. Bodhisatto taṃ disvā ‘‘amma, kasmā milātāsī’’ti vatvā ‘‘iminā nāma kāraṇenā’’ti vutte ‘‘tvaṃ ettakaṃ kālaṃ kasmā mayhaṃ nācikkhi, ahamettha kātabbaṃ jānissāmī’’ti taṃ samassāsetvā suddhaphalikapāsāṇena guhaṃ katvā āharitvā ‘‘amma, tvaṃ imaṃ guhaṃ pavisitvā nipajjitvā āgatāgatānaṃ pharusāhi vācāhi santajjeyyāsī’’ti āha. Sā guhaṃ pavisitvā nipajji. Atheko biḷāro āgantvā ‘‘dehi, ajja me maṃsa’’nti āha. Atha naṃ mūsikā ‘‘are, duṭṭhabiḷāra, kiṃ te ahaṃ maṃsahārikā, attano puttānaṃ maṃsaṃ khādā’’ti tajjesi. Biḷāro phalikaguhāya nipannabhāvaṃ ajānanto kodhavasena mūsikaṃ gaṇhissāmī’’ti sahasāva pakkhanditvā hadayena phalikaguhāyaṃ pahari. Tāvadevassa hadayaṃ bhijji, akkhīni nikkhamanākārappattāni jātāni. So tattheva jīvitakkhayaṃ patvā ekamantaṃ paṭicchannaṭṭhāne pati. Etenūpāyena aparopi aparopīti cattāropi janā jīvitakkhayaṃ pāpuṇiṃsu. Tato paṭṭhāya mūsikā nibbhayā hutvā bodhisattassa devasikaṃ dve tayo kahāpaṇe deti. Evaṃ anukkamena sabbampi dhanaṃ bodhisattasseva adāsi. Te ubhopi yāvajīvaṃ mettiṃ abhinditvā yathākammaṃ gatā. Als der Bodhisatta sie so sah, fragte er: „Meine Liebe, warum bist du so verwelkt?“ Als sie antwortete: „Aus diesem und jenem Grund“, tröstete er sie und sprach: „Warum hast du mir das so lange nicht erzählt? Ich werde schon wissen, was hier zu tun ist.“ Er fertigte eine Höhle aus reinem Kristallstein an, brachte sie herbei und sagte: „Meine Liebe, geh in diese Höhle hinein, leg dich hin und schüchtere die Katzen, sobald sie herankommen, mit harten Worten ein!“ Sie ging in die Höhle hinein und legte sich nieder. Da kam eine Katze herbei und rief: „Gib mir heute mein Fleisch!“ Da bedrohte die Maus die Katze mit den Worten: „He, du böse Katze! Bin ich etwa deine Fleischbringerin? Friss doch das Fleisch deiner eigenen Jungen!“ Die Katze wusste nicht, dass die Maus in einer Kristallhöhle lag. Aus Zorn dachte sie: „Ich packe mir die Maus!“, sprang blindlings vorwärts und prallte mit der Brust gegen die Kristallhöhle. Im selben Augenblick zersprang ihr Herz, und ihre Augen traten fast aus den Höhlen. Sie fand auf der Stelle den Tod und stürzte an eine verdeckte Stelle beiseite. Mit dieser List fanden auch die anderen Katzen, eine nach der anderen — alle vier —, den Tod. Von da an lebte die Maus ohne Furcht und gab dem Bodhisatta täglich zwei oder drei Kahāpaṇa-Münzen. So gab sie dem Bodhisatta nach und nach den gesamten Schatz. Beide bewahrten ihre Freundschaft unzerbrochen bis an ihr Lebensende und gingen entsprechend ihrem Kamma dahin. Satthā imaṃ atītaṃ āharitvā abhisambuddho hutvā imaṃ gāthamāha – Nachdem der Meister diese Geschichte aus der Vergangenheit erzählt hatte, sprach er, nunmehr vollkommen erwacht, folgende Strophe: 137. 137. ‘‘Yattheko labhate babbu, dutiyo tattha jāyati; Tatiyo ca catuttho ca, idaṃ te babbukā bila’’nti. „Wo eine Katze Beute findet, stellt sich die zweite ebenfalls dort ein, dazu die dritte und die vierte; doch diese Höhle, Katzen, bringt euch Tod.“ Tattha yatthāti yasmiṃ ṭhāne. Babbūti biḷāro. Dutiyo tattha jāyatīti yattha eko mūsikaṃ vā maṃsaṃ vā labhati, dutiyopi tattha biḷāro jāyati uppajjati, tathā tatiyo ca catuttho ca. Evaṃ te tadā cattāro biḷārā ahesuṃ. Hutvā ca pana divase divase maṃsaṃ khādantā te babbukā idaṃ phalikamayaṃ bilaṃ urena paharitvā sabbepi jīvitakkhayaṃ pattāti. Darin bedeutet „yatthā“: an welchem Ort. „Babbū“: eine Katze. „Dutiyo tattha jāyati“: Wo eine Katze eine Maus oder Fleisch bekommt, da entsteht (taucht auf) dort auch eine zweite Katze; ebenso eine dritte und eine vierte. So gab es damals diese vier Katzen. Und nachdem sie Tag für Tag Fleisch gefressen hatten, stießen jene Katzen mit der Brust gegen diese kristallene Höhle und kamen alle ums Leben. Evaṃ [Pg.506] satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā cattāro biḷārā cattāro bhikkhū ahesuṃ, mūsikā kāṇamātā, pāsāṇakoṭṭakamaṇikāro pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung so dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka: „Damals waren die vier Katzen die vier Mönche, die Maus war Kāṇamātā, der Edelsteinschleifer aber war ich selbst.“ Babbujātakavaṇṇanā sattamā. Die Erklärung des Babbu-Jātaka ist die siebte.
[138] 8. Godhājātakavaṇṇanā [138] 8. Die Erklärung des Godha-Jātaka Kiṃ te jaṭāhi dummedhāti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ kuhakabhikkhuṃ ārabbha kathesi. Paccuppannavatthu heṭṭhā kathitasadisameva. „Was nützen dir die Flechten, du Unweiser?“ – Dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, in Bezug auf einen betrügerischen Mönch. Die Gegenwartsgeschichte gleicht genau der zuvor erzählten. Atīte pana bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto godhāyoniyaṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. Tadā eko pañcābhiñño uggatapo tāpaso ekaṃ paccantagāmaṃ nissāya araññāyatane paṇṇasālāyaṃ vasati, gāmavāsino tāpasaṃ sakkaccaṃ upaṭṭhahanti. Bodhisatto tassa caṅkamanakoṭiyaṃ ekasmiṃ vammike vasati, vasanto ca pana divase divase dve tayo vāre tāpasaṃ upasaṅkamitvā dhammūpasaṃhitaṃ atthūpasaṃhitañca vacanaṃ sutvā tāpasaṃ vanditvā vasanaṭṭhānameva gacchati. Aparabhāge tāpaso gāmavāsino āpucchitvā pakkāmi. Pakkamante ca pana tasmiṃ sīlavatasampanne tāpase añño kūṭatāpaso āgantvā tasmiṃ assamapade vāsaṃ kappesi. Bodhisatto ‘‘ayampi sīlavā’’ti sallakkhetvā purimanayeneva tassa santikaṃ agamāsi. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta seine Wiedergeburt im Schoß einer Eidechse. Damals lebte ein Asket mit den fünf höheren Geisteskräften (Abhiññā), der strenge Bußübungen vollzog, in einer Blätterhütte im Wald nahe einem Grenzdorf. Die Dorfbewohner dienten dem Asketen voller Ehrfurcht. Der Bodhisatta lebte in einem Ameisenhügel am Ende des Wandelpfades dieses Asketen. Während er dort lebte, suchte er Tag für Tag zwei- oder dreimal den Asketen auf, hörte Worte über die Lehre (Dhamma) und den Nutzen, erwies dem Asketen Reverenz und kehrte dann an seinen Wohnort zurück. Später verabschiedete sich der Asket von den Dorfbewohnern und zog fort. Als dieser tugendhafte und pflichtbewusste Asket fortgezogen war, kam ein anderer, betrügerischer Asket und ließ sich in jener Einsiedelei nieder. Der Bodhisatta dachte: „Auch dieser ist tugendhaft“, und suchte ihn auf dieselbe Weise wie zuvor auf. Athekadivasaṃ nidāghasamaye akālameghe vuṭṭhe vammikehi makkhikā nikkhamiṃsu, tāsaṃ khādanatthaṃ godhā āhiṇḍiṃsu. Gāmavāsino nikkhamitvā makkhikākhādakā godhā gahetvā siniddhasambhārasaṃyuttaṃ ambilānambilaṃ godhāmaṃsaṃ sampādetvā tāpasassa adaṃsu. Tāpaso godhāmaṃsaṃ khāditvā rasataṇhāya baddho ‘‘idaṃ maṃsaṃ atimadhuraṃ, kissa maṃsaṃ nāmeta’’nti pucchitvā ‘‘godhāmaṃsa’’nti sutvā ‘‘mama santikaṃ mahāgodhā āgacchati, taṃ māretvā maṃsaṃ khādissāmī’’ti cintesi. Cintetvā ca pana bhājanañca sappiloṇādīni ca āharāpetvā ekamante ṭhapetvā muggaramādāya kāsāvena paṭicchādetvā paṇṇasālādvāre bodhisattassa āgamanaṃ olokayamāno upasantūpasanto viya hutvā nisīdi [Pg.507] bodhisatto sāyanhasamaye ‘‘tāpasassa santikaṃ gamissāmī’’ti nikkhamitvā upasaṅkamantova tassa indriyavippakāraṃ disvā cintesi ‘‘nāyaṃ tāpaso aññesu divasesu nisīdanākārena nisinno, ajjesa maṃ olokentopi duṭṭhindriyo hutvā oloketi, pariggaṇhissāmi na’’nti. So tāpasassa heṭṭhāvāte ṭhatvā godhāmaṃsagandhaṃ ghāyitvā ‘‘iminā kūṭatāpasena ajja godhāmaṃsaṃ khāditaṃ bhavissati, tenesa rasataṇhāya baddho ajja maṃ attano santikaṃ upasaṅkamantaṃ muggarena paharitvā maṃsaṃ pacitvā khāditukāmo bhavissatī’’ti tassa santikaṃ anupagantvāva paṭikkamitvā vicarati. Eines Tages in der heißen Jahreszeit, als es zur Unzeit regnete, kamen geflügelte Termiten aus den Ameisenhügeln heraus. Um diese zu fressen, liefen die Eidechsen umher. Die Dorfbewohner gingen hinaus, fingen Eidechsen, die Termiten fraßen, bereiteten schmackhaftes, gut gewürztes, sauer-süßes Eidechsenfleisch zu und gaben es dem Asketen. Als der Asket das Eidechsenfleisch gegessen hatte, wurde er von Geschmacksgier fesselt. Er fragte: „Dieses Fleisch ist überaus köstlich; von welchem Tier stammt dieses Fleisch?“ Als er hörte: „Es ist Eidechsenfleisch“, dachte er: „Eine große Eidechse kommt stets zu mir; ich werde sie töten und ihr Fleisch essen.“ Nachdem er dies gedacht hatte, ließ er ein Gefäß, Ghee, Salz und andere Dinge bringen, stellte sie auf eine Seite, nahm eine Keule, verbarg sie unter seinem safrangelben Gewand und setzte sich an die Tür der Blätterhütte, wobei er nach der Ankunft des Bodhisatta Ausschau hielt und so tat, als sei er äußerst friedvoll und gezügelt. Am Abend verließ der Bodhisatta seinen Bau mit dem Gedanken: „Ich will zum Asketen gehen.“ Doch als er sich ihm näherte, bemerkte er das veränderte Verhalten seiner Sinnesorgane und dachte: „Dieser Asket sitzt nicht in der Weise da, wie er an anderen Tagen zu sitzen pflegte. Heute schaut er mich mit unruhigen Sinnen an. Ich will ihn auf die Probe stellen.“ Er stellte sich in den Windschatten des Asketen und roch den Duft von Eidechsenfleisch. Da dachte er: „Dieser betrügerische Asket muss heute Eidechsenfleisch gegessen haben. Von Geschmacksgier gefesselt, will er mich heute, wenn ich zu ihm komme, mit einer Keule erschlagen, mein Fleisch kochen und essen.“ Ohne sich ihm weiter zu nähern, wich er zurück und lief umher. Tāpaso bodhisattassa anāgamanabhāvaṃ ñatvā ‘‘iminā ‘ayaṃ maṃ paharitukāmo’ti ñātaṃ bhavissati, tena kāraṇena nāgacchati, anāgacchantassāpissa kuto muttī’’ti muggaraṃ nīharitvā khipi. So tassa agganaṅguṭṭhameva āsādesi. Bodhisatto vegena vammikaṃ pavisitvā aññena chiddena sīsaṃ ukkhipitvā ‘‘ambho kūṭajaṭila, ahaṃ tava santikaṃ upasaṅkamanto ‘sīlavā’ti saññāya upasaṅkamiṃ, idāni pana te mayā kūṭabhāvo ñāto, tādisassa mahācorassa kiṃ iminā pabbajjāliṅgenā’’ti vatvā taṃ garahanto imaṃ gāthamāha – Als der Asket merkte, dass der Bodhisatta nicht herankam, dachte er: „Er muss wohl gemerkt haben, dass ich ihn erschlagen will, und deshalb kommt er nicht. Doch selbst wenn er nicht kommt, wie will er mir entkommen?“ Er zog die Keule hervor und warf sie nach ihm. Sie traf jedoch nur die Spitze seines Schwanzes. Der Bodhisatta schlüpfte eilig in den Ameisenhügel, steckte den Kopf aus einer anderen Öffnung heraus und sagte: „He, du betrügerischer Haarflechtenträger! Als ich zu dir kam, kam ich im Glauben, du seist tugendhaft. Nun aber habe ich deine Falschheit erkannt. Was nützt einem solch großen Dieb wie dir dieses Zeichen des asketischen Lebens?“ Und um ihn zu tadeln, sprach er folgende Strophe: 138. 138. ‘‘Kiṃ te jaṭāhi dummedha, kiṃ te ajinasāṭiyā; Abbhantaraṃ te gahanaṃ, bāhiraṃ parimajjasī’’ti. „Was nützen dir die Flechten, du Unweiser, was nützt dir das Kleid aus schwarzem Antilopenfell? Dein Inneres ist ein Dickicht, doch das Äußere putzt du heraus!“ Tattha kiṃ te jaṭāhi dummedhāti ambho dummedha, nippañña etā pabbajitena dhāretabbā jaṭā, pabbajjāguṇarahitassa kiṃ te tāhi jaṭāhīti attho. Kiṃ te ajinasāṭiyāti ajinasāṭiyā anucchavikassa saṃvarassa abhāvakālato paṭṭhāya kiṃ te ajinasāṭiyā. Abbhantaraṃ te gahananti tava abbhantaraṃ hadayaṃ rāgadosamohagahanena gahanaṃ paṭicchannaṃ. Bāhiraṃ parimajjasīti so tvaṃ abbhantare gahane nhānādīhi ceva liṅgagahanena ca bāhiraṃ parimajjasi, taṃ parimajjanto kañjikapūritalābu viya visapūritacāṭi viya āsīvisapūritavammiko viya gūthapūritacittaghaṭo viya ca bahimaṭṭhova hosi, kiṃ tayā corena idha vasantena, sīghaṃ ito palāyāhi, no [Pg.508] ce palāyasi, gāmavāsīnaṃ te ācikkhitvā niggahaṃ kārāpessāmīti. Darin bedeutet „kiṃ te jaṭāhi dummedha“: He, du Unweiser, Tor! Diese Flechten sollten von einem Asketen getragen werden; was nützen dir diese Flechten, da du doch der Tugenden des asketischen Lebens entbehrst? Dies ist der Sinn. „Kiṃ te ajinasāṭiyā“: Was nützt dir das Kleid aus schwarzem Antilopenfell, da dir ohnehin die diesem Kleid angemessene Selbstbeherrschung fehlt? „Abbhantaraṃ te gahanaṃ“: Dein Inneres, dein Herz, ist ein Dickicht, bedeckt vom Dickicht aus Gier, Hass und Verblendung. „Bāhiraṃ parimajjasi“: Du, der du im Inneren voller Dickicht bist, säuberst das Äußere durch Baden und durch das Tragen der äußeren Zeichen des Asketentums. Indem du das Äußere putzt, bist du bloß außen glatt, gleich einer mit saurem Reisschleim gefüllten Kalebasse, einem mit Gift gefüllten Topf, einem mit Giftschlangen gefüllten Ameisenhügel oder einem bemalten Topf voller Kot. Was nützt es dir Dieb, hier zu wohnen? Fliehe schnell von hier! Wenn du nicht fliehst, werde ich es den Dorfbewohnern berichten und dich bestrafen lassen. Evaṃ bodhisatto kūṭatāpasaṃ tajjetvā vammikameva pāvisi, kūṭatāpasopi tato pakkāmi. Nachdem der Bodhisatta den betrügerischen Asketen so eingeschüchtert hatte, zog er sich in den Ameisenhügel zurück; auch der betrügerische Asket ging von dort fort. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kūṭatāpaso ayaṃ kuhako ahosi, purimo sīlavantatāpaso sāriputto, godhāpaṇḍito pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung so dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka: „Damals war der betrügerische Asket dieser betrügerische Mönch, der frühere, tugendhafte Asket war Sāriputta, die weise Eidechse aber war ich selbst.“ Godhājātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erklärung des Godha-Jātaka ist die achte.
[139] 9. Ubhatobhaṭṭhajātakavaṇṇanā [139] 9. Die Erklärung des Ubhatobhaṭṭha-Jātaka Akkhī bhinnā paṭo naṭṭhoti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattaṃ ārabbha kathesi. Tadā kira dhammasabhāyaṃ bhikkhū kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, seyyathāpi nāma chavālātaṃ ubhatopadittaṃ majjhe gūthagataṃ nevāraññe kaṭṭhatthaṃ pharati, na gāme kaṭṭhatthaṃ pharati, evameva devadatto evarūpe niyyānikasāsane pabbajitvā ubhato bhaṭṭho ubhato paribāhiro jāto, gihiparibhogā ca parihīno, sāmaññatthañca na paripūretī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva ubhato bhaṭṭho hoti, atītepi ubhato bhaṭṭho ahosiyevā’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Die Augen zerstört, das Gewand verloren“ – dies erzählte der Meister, als er im Veluvana-Kloster weilte, bezüglich Devadattas. Damals nämlich regten die Mönche in der Versammlungshalle folgendes Gespräch an: „Freunde, wie ein Holzscheit von einem Scheiterhaufen, das an beiden Enden brennt und in der Mitte mit Kot beschmiert ist, weder im Wald als Holz dient noch im Dorf als Holz dient, ebenso ist Devadatta, nachdem er in einer solchen erlösenden Lehre die Hauslosigkeit angetreten hat, von beidem abgefallen und von beidem ausgeschlossen worden; er ist des Genusses eines Hausvaters verlustig gegangen und erfüllt auch nicht den Zweck des Mönchtums.“ Als der Meister herbeikam, fragte er: „Mit welchem Gespräch, ihr Mönche, sitzt ihr jetzt hier zusammen?“ Als sie antworteten: „Mit diesem“, sprach er: „Nicht nur jetzt, ihr Mönche, ist Devadatta von beidem abgefallen; auch in der Vergangenheit ist er bereits von beidem abgefallen“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto rukkhadevatā hutvā nibbatti. Tadā ekasmiṃ gāmake bāḷisikā vasanti. Atheko bāḷisiko baḷisaṃ ādāya daharena puttena saddhiṃ yasmiṃ sobbhe pakatiyāpi bāḷisikā macche gaṇhanti, tattha gantvā baḷisaṃ khipi. Baḷiso udakapaṭicchanne ekasmiṃ khāṇuke laggi. Bāḷisiko taṃ ākaḍḍhituṃ asakkonto cintesi ‘‘ayaṃ baḷiso mahāmacche laggo bhavissati, puttakaṃ mātu santikaṃ pesetvā paṭivissakehi saddhiṃ kalahaṃ kārāpemi, evaṃ ito na koci koṭṭhāsaṃ paccāsīsissatī’’ti. So puttaṃ āha ‘‘gaccha, tāta, amhehi mahāmacchassa laddhabhāvaṃ mātu ācikkhāhi, ‘paṭivissakehi [Pg.509] kira saddhiṃ kalahaṃ karohī’ti vadehī’’ti. So puttaṃ pesetvā baḷisaṃ ākaḍḍhituṃ asakkonto rajjucchedanabhayena uttarisāṭakaṃ thale ṭhapetvā udakaṃ otaritvā macchalobhena macchaṃ upadhārento khāṇukehi paharitvā dvepi akkhīni bhindi. Thale ṭhapitasāṭakaṃpissa coro hari. So vedanāppatto hutvā hatthena akkhīni uppīḷayamāno gahetvā udakā uttaritvā kampamāno sāṭakaṃ pariyesati. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als Baumgottheit wiedergeboren. Damals lebten in einem kleinen Dorf Fischer. Da nahm ein Fischer eine Angel und ging zusammen mit seinem jungen Sohn zu einer Schlucht, in der die Fischer normalerweise Fische fingen, und warf dort die Angel aus. Der Angelhaken verfing sich an einem vom Wasser verdeckten Baumstumpf. Da der Fischer ihn nicht herausziehen konnte, dachte er: „Dieser Haken muss sich an einem großen Fisch verfangen haben. Ich werde den kleinen Sohn zu seiner Mutter schicken und sie veranlassen, Streit mit den Nachbarn anzufangen. Wenn dies geschehen ist, wird niemand erwarten, einen Anteil an diesem Fang zu bekommen.“ Er sagte zu seinem Sohn: „Geh, mein Lieber, erzähle deiner Mutter, dass wir einen großen Fisch gefangen haben, und sag ihr: ‚Du sollst angeblich Streit mit den Nachbarn anfangen.‘“ Nachdem er den Sohn weggeschickt hatte, stieg er, unfähig, den Haken herauszuziehen, aus Angst vor dem Reißen der Schnur, nachdem er sein Obergewand am Ufer abgelegt hatte, ins Wasser hinab. Aus Gier nach dem Fisch suchte er nach dem Fisch, stieß dabei gegen Baumstümpfe und verletzte sich beide Augen. Auch sein am Ufer abgelegtes Gewand nahm ein Dieb mit. Von heftigem Schmerz gepeinigt, drückte er seine Augen mit den Händen zu, stieg aus dem Wasser und suchte zitternd nach seinem Gewand. Sāpissa bhariyā ‘‘kalahaṃ katvā kassaci apaccāsīsanabhāvaṃ karissāmī’’ti ekasmiṃyeva kaṇṇe tālapaṇṇaṃ piḷandhitvā ekaṃ akkhiṃ ukkhalimasiyā añjetvā kukkuraṃ aṅkenādāya paṭivissakagharaṃ agamāsi. Atha naṃ ekā sahāyikā evamāha ‘‘ekasmiṃyeva te kaṇṇe tālapaṇṇaṃ piḷandhitaṃ, ekaṃ akkhi añjitaṃ, piyaputtaṃ viya kukkuraṃ aṅkenādāya gharato gharaṃ gacchasi, kiṃ ummattikāsi jātā’’ti. ‘‘Nāhaṃ ummattikā, tvaṃ pana maṃ akāraṇena akkosasi paribhāsasi, idāni taṃ gāmabhojakassa santikaṃ gantvā aṭṭha kahāpaṇe daṇḍāpessāmī’’ti evaṃ kalahaṃ katvā ubhopi gāmabhojakassa santikaṃ agamaṃsu. Kalahe visodhiyamāne tassāyeva matthake daṇḍo pati. Atha naṃ bandhitvā ‘‘daṇḍaṃ dehī’’ti pothetuṃ ārabhiṃsu. Auch seine Frau dachte: „Ich will einen Streit anfangen, damit niemand mit einem Anteil rechnet“, steckte sich ein Palmblatt in nur ein Ohr, schminkte sich ein Auge mit Ruß aus dem Topf, nahm einen Hund auf den Schoß und ging zum Haus der Nachbarin. Da sprach eine Freundin zu ihr: „In nur einem deiner Ohren steckt ein Palmblatt, nur ein Auge ist geschminkt, und du gehst von Haus zu Haus, während du einen Hund wie einen geliebten Sohn im Arm hältst; bist du etwa verrückt geworden?“ „Ich bin nicht verrückt, aber du beschimpfst und bedrohst mich ohne Grund. Nun werde ich zum Dorfvorsteher gehen und dich mit acht Kahāpaṇas bestrafen lassen.“ Nachdem sie so gestritten hatten, gingen beide zum Dorfvorsteher. Als der Streit untersucht wurde, fiel die Strafe auf das Haupt eben dieser Frau. Da fesselten sie sie und begannen sie zu schlagen, wobei sie forderten: „Zahle die Geldstrafe!“ Rukkhadevatā gāme tassā imaṃ pavattiṃ, araññe cassā patino taṃ byasanaṃ disvā khandhantare ṭhitā ‘‘bho purisa, tuyhaṃ udakepi kammanto paduṭṭho thalepi, ubhatobhaṭṭho jāto’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als die Baumgottheit dieses Schicksal von ihr im Dorf und das Verderben ihres Mannes im Wald sah, stellte sie sich in eine Astgabel und sprach: „O Mann, dein Werk ist sowohl im Wasser als auch auf dem Land misslungen; du bist von beidem abgefallen“, und sie sprach diese Strophe: 139. 139. ‘‘Akkhī bhinnā paṭo naṭṭho, sakhigehe ca bhaṇḍanaṃ; Ubhato paduṭṭhā kammantā, udakamhi thalamhi cā’’ti. „Die Augen zerstört, das Gewand verloren, und im Haus der Freundin herrscht Streit; in beiden Bereichen sind die Vorhaben misslungen, im Wasser wie auch auf dem Land.“ Tattha sakhigehe ca bhaṇḍananti sakhī nāma sahāyikā, tassā ca gehe tava bhariyāya bhaṇḍanaṃ kataṃ, bhaṇḍanaṃ katvā bandhitvā pothetvā daṇḍaṃ dāpiyati. Ubhato paduṭṭhā kammantāti evaṃ tava dvīsupi ṭhānesu kammantā paduṭṭhāyeva bhinnāyeva. Kataresu dvīsu? Udakamhi thalamhi cāti, akkhibhedena paṭanāsena ca udake kammantā paduṭṭhā, sakhigehe bhaṇḍanena thale kammantā paduṭṭhāti. Darin bedeutet „sakhigehe ca bhaṇḍanaṃ“ (und im Haus der Freundin herrscht Streit): Eine „sakhī“ ist eine Freundin. In deren Haus wurde von deiner Frau Streit angefangen. Nach dem Streit wurde sie gefesselt, geschlagen und gezwungen, eine Geldstrafe zu zahlen. „Ubhato paduṭṭhā kammantā“ (in beiden Bereichen sind die Vorhaben misslungen) bedeutet: So sind an deinen beiden Orten die Vorhaben gänzlich misslungen und zerstört. An welchen beiden? „Udakamhi thalamhi ca“ (im Wasser wie auch auf dem Land). Durch die Zerstörung der Augen und den Verlust des Gewandes sind die Vorhaben im Wasser misslungen; durch den Streit im Haus der Freundin sind die Vorhaben auf dem Land misslungen. Satthā [Pg.510] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi ‘‘tadā bāḷisiko devadatto ahosi, rukkhadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, führte er die Geburtsgeschichte zusammen: „Damals war der Fischer Devadatta, die Baumgottheit aber war ich selbst.“ Ubhatobhaṭṭhajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Ubhatobhaṭṭha-Jātaka ist die neunte.
[140] 10. Kākajātakavaṇṇanā [140] 10. Die Erklärung des Kāka-Jātaka Niccaṃ ubbiggahadayāti idaṃ satthā jetavane viharanto ñātatthacariyaṃ ārabbha kathesi. Paccuppannavatthu dvādasakanipāte bhaddasālajātake (jā. 1.12.13 ādayo) āvi bhavissati. „Mit stets ängstlichem Herzen“ – dies erzählte der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich des Wirkens zum Wohle der Verwandten. Die Geschichte der Gegenwart wird im Bhaddasāla-Jātaka im Zwölften Buch (Dvādasakanipāta) deutlich werden. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kākayoniyaṃ nibbatti. Athekadivasaṃ rañño purohito bahinagare nadiyaṃ nhāyitvā gandhe vilimpitvā mālaṃ piḷandhitvā varavatthanivattho nagaraṃ pāvisi. Nagaradvāratoraṇe dve kākā nisinnā honti. Tesu eko ekaṃ āha – ‘‘samma, ahaṃ imassa brāhmaṇassa matthake sarīravaḷañjaṃ pātessāmī’’ti. Itaro ‘‘mā te etaṃ rucci, ayaṃ brāhmaṇo issaro, issarajanena ca saddhiṃ veraṃ nāma pāpakaṃ. Ayañhi kuddho sabbepi kāke vināseyyā’’ti. ‘‘Na sakkā mayā na kātu’’nti. ‘‘Tena hi paññāyissasī’’ti vatvā itaro kāko palāyi. So toraṇassa heṭṭhābhāgaṃ sampatte brāhmaṇe olambakaṃ cālento viya tassa matthake vaccaṃ pātesi. Brāhmaṇo kujjhitvā kākesu veraṃ bandhi. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoße einer Krähe wiedergeboren. Da badete eines Tages der Hofpriester des Königs im Fluss außerhalb der Stadt, salbte sich mit Duftstoffen, schmückte sich mit einer Blumengirlande, kleidete sich in prächtige Gewänder und betrat die Stadt. Auf dem Torbogen des Stadttors saßen zwei Krähen. Eine von ihnen sagte zur anderen: „Freund, ich werde diesem Brahmanen Kot auf den Kopf fallen lassen.“ Die andere sprach: „Lass dir dies nicht gefallen! Dieser Brahmane ist mächtig. Feindseligkeit mit mächtigen Personen ist wahrlich etwas Übles. Wenn er nämlich zornig wird, könnte er alle Krähen vernichten.“ „Ich kann nicht anders, ich muss es tun.“ „Dann wirst du ja sehen, was geschieht!“, sprach die andere Krähe und flog davon. Als der Brahmane den Bereich unter dem Torbogen erreichte, ließ jene Krähe, wie um ein herabhängendes Etwas zu schütteln, Kot auf seinen Kopf fallen. Der Brahmane geriet in Zorn und hegte fortan Groll gegen die Krähen. Tasmiṃ kāle ekā bhatiyā vīhikoṭṭikadāsī vīhiṃ gehadvāre ātape pattharitvā rakkhantī nisinnāva niddaṃ okkami. Tassā pamādaṃ ñatvā eko dīghalomako eḷako āgantvā vīhiṃ khādi, sā pabujjhitvā taṃ disvā palāpesi. Eḷako dutiyampi, tatiyampi tassā tatheva niddāyanakāle āgantvā vīhiṃ khādi. Sāpi taṃ tikkhattuṃ palāpetvā cintesi ‘‘ayaṃ punappunaṃ khādanto upaḍḍhavīhiṃ khādissati, bahu me chedo bhavissati, idānissa puna anāgamanakāraṇaṃ karissāmī’’ti. Sā alātaṃ gahetvā niddāyamānā viya nisīditvā vīhikhādanatthāya eḷake sampatte uṭṭhāya alātena [Pg.511] eḷakaṃ pahari, lomāni aggiṃ gaṇhiṃsu. So sarīre jhāyante ‘‘aggiṃ nibbāpessāmī’’ti vegena gantvā hatthisālāya samīpe ekissā tiṇakuṭiyā sarīraṃ ghaṃsi, sā pajjali. Tato uṭṭhitā jālā hatthisālaṃ gaṇhi. Hatthisālāsu jhāyantīsu hatthipiṭṭhāni jhāyiṃsu, bahū hatthī vaṇitasarīrā ahesuṃ. Vejjā hatthī aroge kātuṃ asakkontā rañño ārocesuṃ. Rājā purohitaṃ āha ‘‘ācariya, hatthivejjā hatthī tikicchituṃ na sakkonti, api kiñci bhesajjaṃ jānāsī’’ti. ‘‘Jānāmi, mahārājā’’ti. ‘‘Kiṃ laddhuṃ vaṭṭatī’’ti? ‘‘Kākavasā, mahārājā’’ti. Rājā ‘‘tena hi kāke māretvā vasaṃ āharathā’’ti āha. Tato paṭṭhāya kāke māretvā vasaṃ alabhitvā tattha tattheva rāsiṃ karonti, kākānaṃ mahābhayaṃ uppajji. Zu jener Zeit breitete eine für Lohn arbeitende Sklavin, die Reis drosch, den Reis vor der Haustür in der Sonne aus und schlief, während sie dasitzend darüber wachte, ein. Als ein langhaariger Schafbock ihre Nachlässigkeit bemerkte, kam er herbei und fraß von dem Reis. Sie wachte auf, sah ihn und verjagte ihn. Auch ein zweites und ein drittes Mal kam der Schafbock in genau derselben Weise während ihrer Schlafenszeit herbei und fraß von dem Reis. Nachdem sie ihn dreimal verjagt hatte, dachte sie: „Wenn dieser immer wieder davon frisst, wird er die Hälfte des Reises auffressen, und ich werde einen großen Lohnabzug erleiden. Nun werde ich dafür sorgen, dass er nicht wiederkommt.“ Sie nahm ein brennendes Holzscheit, setzte sich hin, als ob sie schliefe, und als der Schafbock herbeikam, um den Reis zu fressen, stand sie auf und schlug das Tier mit dem brennenden Holzscheit. Seine Wolle fing Feuer. Während sein Körper brannte, dachte er: „Ich will das Feuer löschen“, rannte eilig davon und rieb seinen Körper an einer Grashütte nahe dem Elefantenstall. Diese ging in Flammen auf. Die lodernde Flamme, die von dort aufstieg, ergriff den Elefantenstall. Als die Elefantenställe brannten, verbrannten auch die Rücken der Elefanten, und viele Elefanten erlitten Brandwunden am Körper. Da die Elefantenärzte unfähig waren, sie zu heilen, berichteten sie es dem König. Der König sprach zum Hofpriester: „Lehrer, die Elefantenärzte können die Elefanten nicht heilen. Kennst du irgendein Heilmittel?“ „Ich kenne eines, o großer König.“ „Was muss herbeigeholt werden?“ „Krähenfett, o großer König.“ Der König sprach: „Nun, dann tötet Krähen und bringt das Fett herbei.“ Von da an töteten sie Krähen, erhielten jedoch kein Fett und häuften sie genau dort auf. Da entstand eine große Angst unter den Krähen. Tadā bodhisatto asītikākasahassaparivāro mahāsusāne vasati. Atheko kāko gantvā kākānaṃ uppannabhayaṃ bodhisattassa ārocesi. So cintesi ‘‘ṭhapetvā maṃ añño mayhaṃ ñātakānaṃ uppannabhayaṃ harituṃ samattho nāma natthi, harissāmi na’’nti dasa pāramiyo āvajjetvā mettāpāramiṃ purecārikaṃ katvā ekavegena pakkhanditvā vivaṭamahāvātapānena pavisitvā rañño āsanassa heṭṭhā pāvisi. Atha naṃ eko manusso gahitukāmo ahosi. Rājā ‘‘saraṇaṃ paviṭṭho, mā gaṇhī’’ti vāresi. Mahāsatto thokaṃ vissamitvā mettāpāramiṃ āvajjetvā heṭṭhāsanā nikkhamitvā rājānaṃ āha – ‘‘mahārāja, raññā nāma chandādivasena agantvā rajjaṃ kāretuṃ vaṭṭati. Yaṃ yaṃ kammaṃ kattabbaṃ hoti, sabbaṃ nisamma upadhāretvā kātuṃ vaṭṭati. Yañca kayiramānaṃ nipphajjati, tadeva kātuṃ vaṭṭati, na itaraṃ. Sace hi rājāno yaṃ kayiramānaṃ na nipphajjati, taṃ karonti, mahājanassa maraṇabhayapariyosānaṃ mahābhayaṃ uppajjati. Purohito veravasiko hutvā musāvādaṃ abhāsi, kākānaṃ vasā nāma natthī’’ti. Taṃ sutvā rājā pasannacitto bodhisattassa kañcanabhaddapīṭhaṃ dāpetvā tattha nisinnassa pakkhantarāni satapākasahassapākatelehi makkhāpetvā kañcanataṭṭake rājārahaṃ subhojanaṃ bhojāpetvā pānīyaṃ pāyetvā suhitaṃ vigatadarathaṃ mahāsattaṃ etadavoca ‘‘paṇḍita, tvaṃ ‘kākānaṃ vasā nāma natthī’ti vadesi, kena kāraṇena nesaṃ vasā na hotī’’ti bodhisatto ‘‘iminā [Pg.512] ca iminā ca kāraṇenā’’ti sakalanivesanaṃ ekaravaṃ katvā dhammaṃ desento imaṃ gāthamāha – Damals lebte der Bodhisatta in Begleitung von achtzigtausend Krähen auf einem großen Friedhof. Da ging eine Krähe hin und berichtete dem Bodhisatta von der Gefahr, die den Krähen drohte. Er dachte: „Außer mir gibt es niemanden, der fähig ist, die meinen Verwandten drohende Gefahr abzuwenden. Ich werde sie abwenden.“ Er besann sich auf die zehn Vollkommenheiten (pāramī), stellte die Vollkommenheit der liebenden Güte (mettā-pāramī) voran, flog mit einem einzigen raschen Schwung davon, drang durch ein offenes großes Fenster ein und schlüpfte unter den Thron des Königs. Da wollte ein Mann ihn einfangen. Der König hielt ihn zurück und sprach: „Er hat Zuflucht gesucht, fangt ihn nicht!“ Nachdem sich das Große Wesen ein wenig ausgeruht hatte, besann er sich auf die Vollkommenheit der liebenden Güte, kam unter dem Thron hervor und sprach zum König: „O großer König, wer ein König ist, sollte das Reich regieren, ohne sich von Voreingenommenheit (wie Zuneigung und dergleichen) leiten zu lassen. Was auch immer für eine Tat zu tun ist, sie sollte erst nach gründlicher Überlegung und Prüfung ausgeführt werden. Nur das, was, wenn es getan wird, zum Erfolg führt, sollte getan werden, kein anderes. Denn wenn Könige etwas tun, das, wenn es getan wird, keinen Erfolg bringt, entsteht für das Volk eine große Gefahr, die mit der Todesangst endet. Der Hofpriester hat aus Feindseligkeit eine Lüge gesprochen; es gibt kein sogenanntes Krähenfett.“ Als der König dies hörte, war er im Geiste erfreut, ließ dem Bodhisatta einen prächtigen goldenen Sitz geben, ließ die Flügel des dort sitzenden Bodhisatta mit Öl salben, das hundert- und tausendmal gekocht worden war, speiste ihn von einer goldenen Schale mit einer dem König würdigen, köstlichen Speise, gab ihm Wasser zu trinken und fragte das gesättigte und von aller Ermüdung befreite Große Wesen: „Weiser, du sagst: ‚Es gibt kein Krähenfett.‘ Aus welchem Grund haben sie kein Fett?“ Der Bodhisatta sprach: „Aus diesem und jenem Grund“, und um die Lehre zu verkünden, ließ er den gesamten Palast mit einer einzigen Stimme widerhallen und sprach diese Strophe: 140. 140. ‘‘Niccaṃ ubbiggahadayā, sabbalokavihesakā; Tasmā nesaṃ vasā natthi, kākānamhāka ñātina’’nti. „Stets voll Furcht im Herzen, Peiniger der ganzen Welt; darum gibt es kein Fett bei ihnen, den Krähen, unseren Verwandten.“ Tatrāyaṃ saṅkhepattho – mahārāja, kākā nāma niccaṃ ubbiggamānasā bhayappattāva viharanti, sabbalokassa ca vihesakā, khattiyādayo manussepi itthipurisepi kumārakumārikādayopi viheṭhentā kilamentāva vicaranti, tasmā imehi dvīhi kāraṇehi nesaṃ amhākaṃ ñātīnaṃ kākānaṃ vasā nāma natthi. Atītepi na bhūtapubbā, anāgatepi na bhavissatīti. Hierbei ist dies die kurze Bedeutung: O großer König, Krähen leben stets mit ängstlichem Gemüt, in ständiger Furcht, und sie sind Peiniger der ganzen Welt. Sie ziehen umher, indem sie Menschen wie Krieger (Khattiyas) und andere, Männer und Frauen, Knaben und Mädchen quälen und ermüden. Darum gibt es aus diesen beiden Gründen kein Fett bei ihnen, den Krähen, unseren Verwandten. Dies war weder in der Vergangenheit je der Fall, noch wird es in der Zukunft so sein. Evaṃ mahāsatto imaṃ kāraṇaṃ uttānaṃ katvā ‘‘mahārāja, raññā nāma anisamma anupadhāretvā kammaṃ na kattabba’’nti rājānaṃ bodhesi. Rājā tussitvā bodhisattaṃ rajjena pūjesi. Bodhisatto rajjaṃ raññoyeva paṭidatvā rājānaṃ pañcasu sīlesu patiṭṭhāpetvā sabbasattānaṃ abhayaṃ yāci. Rājā tassa dhammadesanaṃ sutvā sabbasattānaṃ abhayaṃ datvā kākānaṃ nibaddhadānaṃ paṭṭhapesi. Divase divase taṇḍulambaṇassa bhattaṃ pacitvā nānaggarasehi omadditvā kākānaṃ dīyati, mahāsattassa pana rājabhojanameva dīyittha. So machte das Große Wesen diesen Grund deutlich und belehrte den König: „O großer König, ein König sollte niemals handeln, ohne vorher gründlich zu überlegen und zu prüfen.“ Der König war hocherfreut und ehrte den Bodhisatta, indem er ihm das Königreich anbot. Der Bodhisatta gab das Königreich dem König zurück, etablierte den König in den fünf Tugendregeln (pañcasīla) und erbat Schutz vor Gefahr für alle Lebewesen. Als der König seine Lehrrede gehört hatte, gewährte er allen Lebewesen Schutz vor Gefahr und stiftete eine regelmäßige Spende für die Krähen. Tag für Tag wurde Reis aus einem Ambaṇa-Maß Getreide gekocht, mit verschiedenen erlesenen Geschmacksstoffen vermengt und den Krähen dargeboten. Dem Großen Wesen aber wurde ausschließlich die königliche Speise gereicht. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā bārāṇasirājā ānando ahosi, kākarājā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte, führte er die Geburtsgeschichte zusammen: „Damals war der König von Bārāṇasī Ānanda, der Krähenkönig aber war ich selbst.“ Kākajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Kāka-Jātaka ist die zehnte. Asampadānavaggo cuddasamo. Das vierzehnte Kapitel ist das Asampadāna-Kapitel (Asampadānavagga). Tassuddānaṃ – Dessen Zusammenfassung lautet: Asampadānabhīrukaṃ, ghatāsanajhānasodhaṃ; Candābhaṃ suvaṇṇahaṃsaṃ, babbugodhubhatobhaṭṭhaṃ; Kākarājāti te dasāti. Asampadāna- [Jātaka], Bhīruka- [Jātaka], Ghaṭāsana-, Jhānasodhana- [Jātaka], Candābha- [Jātaka], Suvaṇṇahaṃsa- [Jātaka], Babbu- [Jātaka], Godha- [Jātaka], Ubhatobhaṭṭha- [Jātaka] und der Krähenkönig (Kāka-Jātaka) – das sind die zehn. 15. Kakaṇṭakavaggo 15. Das Kakaṇṭaka-Kapitel.
[141] 1. Godhājātakavaṇṇanā [141] 1. Die Erklärung des Godha-Jātaka. Na [Pg.513] pāpajanasaṃsevīti idaṃ satthā veḷuvane viharanto ekaṃ vipakkhaseviṃ bhikkhuṃ ārabbha kathesi. Paccuppannavatthu mahiḷāmukhajātake kathitasadisameva. „Geselle dich nicht zu einem bösen Menschen“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verwelkte, in Bezug auf einen Mönch, der sich mit der gegnerischen Partei abgab. Die Geschichte der Gegenwart gleicht genau derjenigen, die im Mahiḷāmukha-Jātaka erzählt wurde. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto godhāyoniyaṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. So vayappatto nadītīre mahābile anekagodhāsataparivāro vāsaṃ kappesi. Tassa putto godhāpillako ekena kakaṇṭakena saddhiṃ santhavaṃ katvā tena saddhiṃ sammodamāno viharanto ‘‘kakaṇṭakaṃ parissajissāmī’’ti avattharati. Tassa tena saddhiṃ vissāsaṃ godhārājassa ārocesuṃ. Godhārājā puttaṃ pakkosāpetvā ‘‘tāta, tvaṃ aṭṭhāne vissāsaṃ karosi, kakaṇṭakā nāma nīcajātikā, tehi saddhiṃ vissāso na kattabbo. Sace tvaṃ tena saddhiṃ vissāsaṃ karissasi, taṃ kakaṇṭakaṃ nissāya sabbampetaṃ godhākulaṃ vināsaṃ pāpuṇissati, ito paṭṭhāya etena saddhiṃ vissāsaṃ mā akāsī’’ti āha. So karotiyeva. Bodhisatto punappunaṃ kathentopi tassa tena saddhiṃ vissāsaṃ vāretuṃ asakkonto ‘‘avassaṃ amhākaṃ etaṃ kakaṇṭakaṃ nissāya bhayaṃ uppajjissati, tasmiṃ uppanne palāyanamaggaṃ sampādetuṃ vaṭṭatī’’ti ekena passena vātabilaṃ kārāpesi. Als einst Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta im Schoße eines Warans wiedergeboren. Als er herangewachsen war, ließ er sich an einem Flussufer in einer großen Höhle nieder, umgeben von Hunderten anderer Warane. Sein Sohn, ein junger Waran, schloss Freundschaft mit einer Schönechse. Er verbrachte die Zeit in freudigem Umgang mit ihr, und mit dem Gedanken „Ich will die Schönechse umarmen“ warf er sich auf sie. Man berichtete dem Warankönig von seiner Vertrautheit mit dieser Schönechse. Der Warankönig ließ seinen Sohn rufen und sprach: „Mein Lieber, du gehst Vertrautheit an einer ungeeigneten Stelle ein. Schönechsen sind von niederer Herkunft. Mit ihnen sollte man keine Vertrautheit pflegen. Wenn du dich mit ihr einlässt, wird wegen dieser Schönechse unsere gesamte Waransippe im Verderben enden. Lass von heute an jegliche Vertrautheit mit ihr sein!“ Doch jener machte einfach so weiter. Obwohl der Bodhisatta wiederholt zu ihm sprach, war er nicht in der Lage, die Vertrautheit seines Sohnes mit der Schönechse zu verhindern. Er dachte: „Unweigerlich wird uns wegen dieser Schönechse Gefahr drohen. Wenn diese Gefahr eintritt, ist es ratsam, einen Fluchtweg bereit zu haben.“ So ließ er auf einer Seite eine Luftöffnung graben. Puttopissa anukkamena mahāsarīro ahosi, kakaṇṭako pana purimappamāṇoyeva. Itaro ‘‘kakaṇṭakaṃ parissajissāmī’’ti antarantarā avattharatiyeva, kakaṇṭakassa pabbatakūṭena avattharaṇakālo viya hoti. So kilamanto cintesi ‘‘sace ayaṃ aññāni katipayāni divasāni maṃ evaṃ parissajissati, jīvitaṃ me natthi, ekena luddakena saddhiṃ ekato hutvā imaṃ godhākulaṃ vināsessāmī’’ti. Athekadivasaṃ nidāghasamaye meghe vuṭṭhe vammikamakkhikā uṭṭhahiṃsu, tato tato godhā nikkhamitvā makkhikāyo khādanti. Eko godhāluddako godhābilaṃ bhindanatthāya kuddālaṃ gahetvā sunakhehi saddhiṃ araññaṃ pāvisi. Kakaṇṭako taṃ disvā ‘‘ajja attano manorathaṃ pūressāmī’’ti taṃ upasaṅkamitvā avidūre nipajjitvā ‘‘bho purisa, kasmā araññe vicarasī’’ti pucchi. So ‘‘godhānaṃ [Pg.514] atthāyā’’ti āha. ‘‘Ahaṃ anekasatānaṃ godhānaṃ āsayaṃ jānāmi, aggiñca palālañca ādāya ehī’’ti taṃ tattha netvā ‘‘imasmiṃ ṭhāne palālaṃ pakkhipitvā aggiṃ datvā dhūmaṃ katvā samantā sunakhe ṭhapetvā sayaṃ mahāmuggaraṃ gahetvā nikkhantā nikkhantā godhā paharitvā māretvā rāsiṃ katvā yāhī’’ti evañca pana vatvā ‘‘ajja paccāmittassa piṭṭhiṃ passissāmī’’ti ekasmiṃ ṭhāne sīsaṃ ukkhipitvā nipajji. Luddakopi palāladhūmaṃ akāsi, dhūmo bilaṃ pāvisi, godhā dhūmandhā maraṇabhayatajjitā nikkhamitvā palāyituṃ āraddhā. Luddako nikkhantaṃ nikkhantaṃ paharitvā māresi, tassa hatthato muttā sunakhā gaṇhiṃsu. Godhānaṃ mahāvināso uppajji. Auch sein Sohn entwickelte im Laufe der Zeit einen riesigen Körper, während die Schönechse ihre ursprüngliche Größe behielt. Der andere warf sich von Zeit zu Zeit auf sie, um sie zu umarmen, was für die Schönechse so war, als würde sie von einer Bergspitze erdrückt. Erschöpft dachte die Schönechse: „Wenn mich dieser Waran noch einige Tage lang so bedrängt, werde ich mein Leben verlieren. Ich werde mich mit einem Jäger verbünden und diese ganze Waransippe vernichten.“ Als es nun eines Tages in der heißen Jahreszeit regnete, kamen Termiten aus ihren Hügeln hervor. Die Warane kamen von überall her heraus und fraßen die Termiten. Ein Waranjäger betrat den Wald mit Hunden und einer Hacke, um den Waranbau aufzugraben. Als die Schönechse ihn sah, dachte sie: „Heute werde ich meinen Wunsch erfüllen.“ Sie näherte sich ihm, legte sich nicht weit entfernt nieder und fragte: „Werter Mann, warum streifst du im Wald umher?“ Er antwortete: „Wegen der Warane.“ Die Schönechse sagte: „Ich kenne den Schlupfwinkel von Hunderten von Waranen. Nimm Feuer und Stroh und komm mit.“ Sie führte den Jäger dorthin und sagte: „Wirf an dieser Stelle Stroh hinein, zünde es an, erzeuge Rauch, stelle die Hunde ringsherum auf, nimm selbst eine große Keule und erschlage und töte jeden einzelnen Waran, der herauskommt, mache einen Haufen daraus und ziehe dann deiner Wege.“ Nach diesen Worten legte sie sich an einer Stelle nieder, hob den Kopf und dachte: „Heute werde ich den Untergang meines Feindes sehen.“ Auch der Jäger entfachte den Strohrauch. Der Rauch drang in den Bau ein. Die Warane, vom Rauch geblendet und von Todesangst gepeinigt, kamen heraus und versuchten zu fliehen. Der Jäger erschlug und tötete jeden einzelnen, der herauskam, und diejenigen, die seinen Händen entkamen, wurden von den Hunden gepackt. Den Waranen widerfuhr ein großes Verderben. Bodhisatto ‘‘kakaṇṭakaṃ nissāya bhayaṃ uppanna’’nti ñatvā ‘‘pāpapurisasaṃsaggo nāma na kattabbo, pāpe nissāya hitasukhaṃ nāma natthi, ekassa pāpakakaṇṭakassa vasena ettakānaṃ godhānaṃ vināso jāto’’ti vātabilena palāyanto imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta erkannte, dass wegen der Schönechse Gefahr entstanden war, dachte er: „Umgang mit einem schlechten Wesen sollte man meiden; im Vertrauen auf das Böse gibt es kein Wohl und kein Glück. Durch den Einfluss einer einzigen schlechten Schönechse ist all diesen Waranen Verderben widerfahren.“ Während er durch die Luftöffnung entkam, sprach er diese Strophe: 141. 141. ‘‘Na pāpajanasaṃsevī, accantasukhamedhati; Godhākulaṃ kakaṇṭāva, kaliṃ pāpeti attāna’’nti. „Wer mit schlechten Menschen Umgang pflegt, erlangt kein dauerhaftes Glück. Wie die Waransippe durch die Schönechse bringt er sich selbst ins Verderben.“ Tatrāyaṃ saṅkhepattho – pāpajanasaṃsevī puggalo accantasukhaṃ ekantasukhaṃ nirantarasukhaṃ nāma na edhati na vindati na paṭilabhati. Yathā kiṃ? Godhākulaṃ kakaṇṭāva. Yathā kakaṇṭakato godhākulaṃ sukhaṃ na labhati, evaṃ pāpajanasaṃsevī puggalo sukhaṃ na labhati. Pāpajanaṃ pana sevanto ekanteneva kaliṃ pāpeti attānaṃ, kali vuccati vināso, ekanteneva pāpasevī attānañca aññe ca attanā saddhiṃ vasante vināsaṃ pāpeti. Pāḷiyaṃ pana ‘‘phalaṃ pāpeyyā’’ti likhanti. Taṃ byañjanaṃ aṭṭhakathāyaṃ natthi, atthopissa na yujjati. Tasmā yathāvuttameva gahetabbaṃ. Hier ist die kurze Erklärung dazu: Eine Person, die mit schlechten Menschen Umgang pflegt (pāpajanasaṃsevī), erlangt, erfährt oder empfängt kein dauerhaftes Glück (accantasukhaṃ), das heißt kein absolutes, ununterbrochenes Glück. Wie was? Wie die Waransippe durch die Schönechse. So wie die Waransippe durch die Schönechse kein Glück fand, so findet auch eine Person, die mit schlechten Menschen Umgang pflegt, kein Glück. Wer sich jedoch mit schlechten Menschen einlässt, bringt sich selbst unweigerlich ins Verderben (kaliṃ pāpeti); „kali“ bedeutet Verderben oder Zerstörung. Wer sich mit dem Bösen einlässt, bringt ganz gewiss sich selbst und auch andere, die mit ihm zusammenleben, ins Verderben. Im Pali-Text schreibt man jedoch „phalaṃ pāpeyyā“. Dieses Wort kommt im Kommentar nicht vor, und auch seine Bedeutung ist unpassend. Daher sollte man nur die oben genannte Lesart akzeptieren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kakaṇṭako devadatto ahosi, bodhisattassa putto anovādako godhāpillako vipakkhasevī bhikkhu, godhārājā pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, verknüpfte er das Jātaka wie folgt: „Damals war die Schönechse Devadatta, der unbelehrbare junge Waran, der Sohn des Bodhisatta, war der Mönch, der sich mit dem Feind einließ, und der Warankönig war ich selbst.“ Godhājātakavaṇṇanā paṭhamā. Die Erklärung des Godhā-Jātaka ist die erste.
[142] 2. Siṅgālajātakavaṇṇanā [142] 2. Die Erklärung des Siṅgāla-Jātaka Etañhi [Pg.515] te durājānanti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattassa vadhāya parisakkanaṃ ārabbha kathesi. Dhammasabhāyañhi bhikkhūnaṃ kathaṃ sutvā satthā ‘‘na, bhikkhave, devadatto idāneva mayhaṃ vadhāya parisakkati, pubbepi parisakkiyeva, na ca maṃ māretuṃ asakkhi, sayameva pana kilanto’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Etañhi te durājānaṃ“ – diese Lehrrede sprach der Meister, während er im Veḷuvana-Kloster verweilte, bezugnehmend auf Devadattas Versuche, ihn zu töten. Als der Meister nämlich in der Versammlungshalle das Gespräch der Mönche hörte, sprach er: „Mönche, Devadatta versucht nicht erst jetzt, mich zu töten; auch in der Vergangenheit hat er dies bereits versucht, doch er konnte mich nicht töten und hat sich nur selbst erschöpft.“ Nach diesen Worten erzählte er die Begebenheit aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto siṅgālayoniyaṃ nibbattitvā siṅgālarājā hutvā siṅgālagaṇaparivuto susānavane vihāsi. Tena samayena rājagahe ussavo ahosi, yebhuyyena manussā suraṃ pivanti, surāchaṇoyeva kireso. Athettha sambahulā dhuttā bahuṃ surañca maṃsañca āharāpetvā maṇḍitapasādhitā gāyitvā gāyitvā surañca pivanti, maṃsañca khādanti. Tesaṃ paṭhamayāmāvasāne maṃsaṃ khīyi, surā pana bahukāva. Atheko dhutto ‘‘maṃsakhaṇḍaṃ dehī’’ti āha. ‘‘Maṃsaṃ khīṇa’’nti ca vutte ‘‘mayi ṭhite maṃsakkhayo nāma natthī’’ti vatvā ‘‘āmakasusāne matamanussamaṃsaṃ khādanatthāya āgate siṅgāle māretvā maṃsaṃ āharissāmī’’ti muggaraṃ gahetvā niddhamanamaggena nagarā nikkhamitvā susānaṃ gantvā muggaraṃ gahetvā matako viya uttāno nipajji. Tasmiṃ khaṇe bodhisatto siṅgālagaṇaparivuto tattha gato taṃ disvā ‘‘nāyaṃ matako’’ti ñatvāpi ‘‘suṭṭhutaraṃ upaparikkhissāmī’’ti tassa adhovātena gantvā sarīragandhaṃ ghāyitvā tathatovassa amatakabhāvaṃ ñatvā ‘‘lajjāpetvā naṃ uyyojessāmī’’ti gantvā muggarakoṭiyaṃ ḍaṃsitvā ākaḍḍhi, dhutto muggaraṃ na vissaji, upasaṅkamantampi na olokento naṃ gāḷhataraṃ aggahesi. Bodhisatto paṭikkamitvā ‘‘bho purisa, sace tvaṃ matako bhaveyyāsi, na mayi muggaraṃ ākaḍḍhante gāḷhataraṃ gaṇheyyāsi, iminā kāraṇena tava matakabhāvo vā amatakabhāvo vā dujjāno’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als einst in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī die Herrschaft ausübte, wurde der Bodhisatta im Schoße eines Schakals wiedergeboren, wurde zum Schakalkönig und lebte, umgeben von einer Schakalschar, im Friedhofswald. Zu jener Zeit fand in Rājagaha ein Fest statt, und die Menschen tranken zumeist berauschenden Trank; dieses Fest war, so heißt es, ein reines Trinkgelage. Da ließen zahlreiche Trunkenbolde viel berauschenden Trank und Fleisch herbeibringen, schmückten und putzten sich heraus, sangen ein Lied nach dem anderen, tranken den Trank und aßen das Fleisch. Am Ende der ersten Nachtwache war ihr Fleisch aufgezehrt, des Trankes jedoch war noch reichlich vorhanden. Da sagte ein Trunkenbold: „Gib mir ein Stück Fleisch!“ Und als ihm gesagt wurde: „Das Fleisch ist ausgegangen“, sprach er: „Solange ich hier bin, gibt es wahrlich keinen Mangel an Fleisch!“ Er dachte: „Ich werde auf dem Leichenfeld die Schakale töten, die dorthin kommen, um das Fleisch von toten Menschen zu fressen, und so Fleisch beschaffen.“ Er nahm eine Keule, verließ die Stadt durch den Abwasserkanal, ging zum Friedhof und legte sich, die Keule haltend, rücklings wie eine Leiche nieder. In diesem Augenblick kam der Bodhisatta, umgeben von seiner Schakalschar, dorthin. Als er jenen sah, erkannte er zwar: „Dieser ist kein Toter“, dachte jedoch: „Ich will ihn noch genauer prüfen.“ Er ging auf seine Leeseite, roch seinen Körpergeruch und erkannte so gewiss, dass er kein Toter war. Er dachte: „Ich will ihn beschämen und fortschicken.“ Er ging hin, biss in das Ende der Keule und zog daran. Der Trunkenbold ließ die Keule nicht los; ohne den herannahenden Schakal anzusehen, hielt er die Keule nur noch fester umklammert. Der Bodhisatta wich zurück und sprach: „He, Mann! Wenn du eine Leiche wärst, würdest du, während ich an der Keule ziehe, sie nicht noch fester umklammern. Aus diesem Grund lässt sich schwer erkennen, ob du ein Toter oder kein Toter bist.“ Und er sprach folgende Strophe: 142. 142. ‘‘Etañhi te durājānaṃ, yaṃ sesi matasāyikaṃ; Yassa te kaḍḍhamānassa, hatthā daṇḍo na muccatī’’ti. „Schwer zu erkennen ist dies an dir, dass du daliegst wie ein Toter; denn obwohl man an dir zieht, weicht der Stock nicht aus deiner Hand.“ Tattha [Pg.516] etañhi te durājānanti etaṃ kāraṇaṃ tava duviññeyyaṃ. Yaṃ sesi matasāyikanti yena kāraṇena tvaṃ matasāyikaṃ sesi, matako viya hutvā sayasi. Yassa te kaḍḍhamānassāti yassa tava daṇḍakoṭiyaṃ gahetvā kaḍḍhiyamānassa hatthato daṇḍo na muccati, so tvaṃ tathato matako nāma na hosīti. Darin bedeutet „etañhi te durājānaṃ“: Dieser Umstand ist bei dir schwer zu begreifen. „yaṃ sesi matasāyikaṃ“ bedeutet: Aus welchem Grund du den Schlaf eines Toten schläfst, indem du daliegst, als wärst du eine Leiche. „yassa te kaḍḍhamānassa“ bedeutet: Dir, der du am Stockende gepackt und gezogen wirst, entgleitet der Stock nicht aus der Hand; du bist daher in Wahrheit keineswegs das, was man eine Leiche nennt. Evaṃ vutte so dhutto ‘‘ayaṃ mama amatakabhāvaṃ jānātī’’ti uṭṭhāya daṇḍaṃ khipi, daṇḍo virajjhi. Dhutto ‘‘gaccha, viraddho dānisi mayā’’ti āha. Bodhisatto nivattitvā ‘‘bho purisa, maṃ virajjhantopi tvaṃ aṭṭha mahāniraye soḷasa ca ussadaniraye aviraddhoyevā’’ti vatvā pakkāmi. Dhutto kiñci alabhitvā susānā nikkhamitvā parikhāyaṃ nhāyitvā āgatamaggeneva nagaraṃ pāvisi. Als dies gesagt wurde, dachte jener Trunkenbold: „Dieser Schakal weiß, dass ich kein Toter bin.“ Er stand auf und schleuderte den Stock, doch der Stock verfehlte ihn. Der Trunkenbold sprach: „Geh nur! Jetzt bist du mir entwischt.“ Der Bodhisatta wandte sich um und sprach: „He, Mann! Wenn du mich auch verfehlt hast, so hast du die acht großen Höllen und die sechzehn Nebenhöllen gewiss nicht verfehlt!“ Nach diesen Worten ging er davon. Ohne irgendetwas erlangt zu haben, verließ der Trunkenbold den Friedhof, badete im Stadtgraben und betrat die Stadt auf demselben Weg, auf dem er gekommen war. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā dhutto devadatto ahosi, siṅgālarājā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und verknüpfte das Jātaka: „Damals war der Trunkenbold Devadatta, der Schakalkönig aber war ich selbst.“ Siṅgālajātakavaṇṇanā dutiyā. Die Erklärung des Siṅgāla-Jātakas ist die zweite.
[143] 3. Virocajātakavaṇṇanā [143] 3. Die Erklärung des Viroca-Jātakas Lasī ca te nipphalitāti idaṃ satthā veḷuvane viharanto devadattassa gayāsīse sugatālayassa dassitabhāvaṃ ārabbha kathesi. Devadatto hi parihīnajjhāno lābhasakkāraparihīno ‘‘attheko upāyo’’ti cintetvā satthāraṃ pañca vatthūni yācitvā alabhamāno dvinnaṃ aggasāvakānaṃ saddhivihārike adhunā pabbajite dhammavinayamhi akovide pañcasate bhikkhū gahetvā gayāsīsaṃ gantvā saṅghaṃ bhinditvā ekasīmāyaṃ āveṇikaṃ saṅghakammaṃ akāsi. Satthā tesaṃ bhikkhūnaṃ ñāṇaparipākakālaṃ ñatvā dve aggasāvake pesesi. Te disvā devadatto tuṭṭhamānaso rattiṃ dhammaṃ desayamāno ‘‘buddhalīlaṃ karissāmī’’ti sugatālayaṃ dassento ‘‘vigatathinamiddho kho, āvuso sāriputta, bhikkhusaṅgho, paṭibhātu taṃ bhikkhūnaṃ dhammīkathā, piṭṭhi me āgilāyati, tamahaṃ āyamissāmī’’ti vatvā niddaṃ upagato[Pg.517]. Dve aggasāvakā tesaṃ bhikkhūnaṃ dhammaṃ desetvā maggaphalehi pabodhetvā sabbe ādāya veḷuvanameva paccāgamiṃsu. „Deine Gehirnmasse ist herausgesprungen“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verweilte, bezugnehmend darauf, dass Devadatta auf dem Gayāsīsa-Hügel die Haltung des Erhabenen nachahmte. Devadatta nämlich, dessen Vertiefungen geschwunden waren und der an Gewinn und Ehre Einbuße erlitten hatte, dachte: „Es gibt einen Ausweg.“ Er bat den Meister um pflegliche fünf Dinge, und als er sie nicht erhielt, nahm er fünfhundert Mönche mit sich, die Schüler der beiden Hauptschüler, erst kürzlich ordiniert und in Dhamma und Vinaya unerfahren waren. Er ging zum Gayāsīsa-Hügel, spaltete den Orden und vollzog innerhalb einer einzigen Weihegrenze eine abgesonderte Ordenshandlung. Als der Meister die Zeit der Reife des Wissens jener Mönche erkannte, sandte er die beiden Hauptschüler aus. Als Devadatta sie sah, war er hocherfreut. Während er in der Nacht den Dhamma verkündete, dachte er: „Ich will mich wie ein Buddha verhalten“, ahmte die Haltung des Erhabenen nach und sagte: „Freund Sāriputta, die Mönchsgemeinde ist frei von Trägheit und Starrheit. Möge dir eine Dhamma-Rede für die Mönche einfallen. Mein Rücken schmerzt, ich will ihn ausstrecken.“ Nach diesen Worten schlief er ein. Die beiden Hauptschüler verkündeten jenen Mönchen den Dhamma, erweckten sie durch die Pfade und Früchte und kehrten, sie alle mit sich nehmend, zum Veḷuvana-Kloster zurück. Kokāliko vihāraṃ tucchaṃ disvā devadattassa santikaṃ gantvā ‘‘āvuso devadatta, parisaṃ te bhinditvā dve aggasāvakā vihāraṃ tucchaṃ katvā gatā, tvaṃ pana niddāyasiyevā’’ti vatvā uttarāsaṅgamassa apanetvā bhittiyaṃ piṭṭhikaṇṭakaṃ phusanto viya paṇhiyā naṃ hadaye pahari. Tāvadevassa mukhato lohitaṃ uggañchi. So tato paṭṭhāya gilāno ahosi. Satthā theraṃ pucchi ‘‘sāriputta, tumhākaṃ gatakāle devadatto kiṃ akāsī’’ti? Bhante, devadatto amhe disvā ‘‘buddhalīlaṃ karissāmī’’ti sugatālayaṃ dassetvā mahāvināsaṃ pattoti. Satthā ‘‘na kho sāriputta, devadatto idāneva mama anukaronto vināsaṃ patto, pubbepi pattoyevā’’ti vatvā therena yācito atītaṃ āhari. Als Kokālika das Kloster leer sah, ging er zu Devadatta und sprach: „Freund Devadatta, die beiden Hauptschüler haben deine Gefolgschaft weggelockt, das Kloster leer zurückgelassen und sind gegangen; du aber schläfst nur!“ Nach diesen Worten zog er ihm sein Obergewand weg und versetzte ihm mit der Ferse einen Tritt in die Brust, gleichsam als würde er das Rückgrat an der Wand zerdrücken. Im selben Augenblick quoll Blut aus seinem Mund hervor. Von da an war er krank. Der Meister fragte den Thera: „Sāriputta, was tat Devadatta, als ihr gingt?“ „Ehrwürdiger Herr, als Devadatta uns sah, dachte er: ‚Ich will mich wie ein Buddha verhalten‘, ahmte die Haltung des Erhabenen nach und ist in großes Verderben geraten.“ Der Meister sprach: „Nicht nur jetzt, Sāriputta, ist Devadatta ins Verderben geraten, indem er mich nachahmte; auch in der Vergangenheit ist er bereits darin geraten.“ Und auf die Bitte des Theras hin erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto kesarasīho hutvā himavantappadese kañcanaguhāyaṃ vāsaṃ kappesi. So ekadivasaṃ kañcanaguhāya nikkhamitvā vijambhitvā catuddisaṃ oloketvā sīhanādaṃ naditvā gocarāya pakkanto mahāmahiṃsaṃ vadhitvā varamaṃsaṃ khāditvā ekaṃ saraṃ otaritvā maṇivaṇṇassa udakassa kucchiṃ pūretvā guhaṃ sandhāya pāyāsi. Atheko siṅgālo gocarappasuto sahasāva sīhaṃ disvā palāyituṃ asakkonto sīhassa purato pādesu patitvā nipajji. ‘‘Kiṃ, jambukā’’ti ca vutte ‘‘ahaṃ te, sāmi, pāde upaṭṭhātukāmo’’ti āha. Sīho ‘‘sādhu ehi, maṃ upaṭṭhaha, varamaṃsāni taṃ khādāpessāmī’’ti vatvā siṅgālaṃ ādāya kañcanaguhaṃ agamāsi. Siṅgālo tato paṭṭhāya sīhavighāsaṃ khādati. So katipāhaccayeneva thūlasarīro ahosi. Als einst in der Vergangenheit Brahmadatta in Bārāṇasī die Herrschaft ausübte, wurde der Bodhisatta als Mähnenlöwe geboren und schlug seinen Wohnsitz in einer goldenen Höhle im Himalayagebiet auf. Eines Tages verließ er die goldene Höhle, streckte sich, blickte in die vier Himmelsrichtungen, stieß sein Löwengebrüll aus und machte sich auf die Nahrungssuche. Er tötete einen großen Büffel, fraß das beste Fleisch, stieg in einen See hinab, füllte seinen Bauch mit juwelenfarbenem Wasser und machte sich auf den Weg zurück zu seiner Höhle. Da sah ein Schakal, der auf Nahrungssuche war, plötzlich den Löwen. Da er nicht zu fliehen vermochte, warf er sich vor den Füßen des Löwen nieder. Und als er gefragt wurde: „Was gibt es, Schakal?“, sprach er: „Herr, ich möchte dir zu Diensten sein.“ Der Löwe sprach: „Gut, komm! Diene mir, ich werde dich mit bestem Fleisch füttern.“ Er nahm den Schakal mit sich und ging zur goldenen Höhle. Von da an fraß der Schakal die Reste des Löwen. Schon nach wenigen Tagen war sein Körper feist geworden. Atha naṃ ekadivasaṃ guhāya nipannakova sīho āha ‘‘gaccha jambuka, pabbatasikhare ṭhatvā pabbatapāde sañcarantesu hatthiassamahiṃsādīsu yassa maṃsaṃ khāditukāmosi, taṃ oloketvā āgantvā ‘asukamaṃsaṃ khāditukāmomhī’ti vatvā maṃ vanditvā ‘viroca, sāmī’ti vadāhi, ahaṃ taṃ vadhitvā madhuramaṃsaṃ khāditvā tuyhampi dassāmī’’ti. Siṅgālo pabbatasikharaṃ abhiruhitvā nānappakāre mige oloketvā yasseva maṃsaṃ khāditukāmo hoti, kañcanaguhaṃ pavisitvā tameva sīhassa [Pg.518] ārocetvā pādesu patitvā ‘‘viroca, sāmī’’ti vadati. Sīho vegena pakkhanditvā sacepi mattavaravāraṇo hoti, tattheva naṃ jīvitakkhayaṃ pāpetvā sayampi varamaṃsaṃ khādati, siṅgālassapi deti. Siṅgālo kucchipūraṃ maṃsaṃ khāditvā guhaṃ pavisitvā niddāyati. So gacchante gacchante kāle mānaṃ vaḍḍhesi ‘‘ahampi catuppadova, kiṃkāraṇā divase divase parehi posiyamāno viharāmi, ito paṭṭhāya ahampi hatthiādayo hanitvā maṃsaṃ khādissāmi, sīhopi migarājā ‘viroca, sāmī’ti vuttameva padaṃ nissāya varavāraṇe vadheti, ahampi sīhena ‘viroca, jambukā’ti maṃ vadāpetvā ekaṃ varavāraṇaṃ vadhitvā maṃsaṃ khādissāmī’’ti. Eines Tages sprach der Löwe, der in seiner Höhle lag, zu ihm: „Geh, o Schakal! Stelle dich auf den Berggipfel, halte Ausschau unter den Elefanten, Pferden, Büffeln und anderen Tieren, die am Fuße des Berges umherstreifen, nach jenem, dessen Fleisch du zu essen wünschst. Komm dann zurück und sprich: ‚Ich wünsche das Fleisch dieses bestimmten Tieres zu essen.‘ Erweise mir Ehrerbietung und sprich: ‚Erstrahle, o Herr!‘ Ich werde das Tier töten, sein köstliches Fleisch essen und auch dir davon geben.“ Der Schakal stieg auf den Berggipfel, blickte auf die verschiedenen Wildtiere und kehrte, wann immer er das Fleisch eines bestimmten Tieres zu essen wünschte, in die goldene Höhle zurück, berichtete dem Löwen genau davon, fiel ihm zu Füßen und sprach: „Erstrahle, o Herr!“ Der Löwe stürzte mit großer Schnelligkeit herab und brachte das Tier – selbst wenn es ein mächtiger, wilder Elefant war – auf der Stelle um, aß selbst das vorzügliche Fleisch und gab auch dem Schakal davon. Der Schakal füllte seinen Bauch mit Fleisch, ging in die Höhle und schlief. Mit der Zeit wurde er immer stolzer und dachte: „Auch ich bin ein Vierbeiner. Warum sollte ich Tag für Tag von anderen ernährt werden? Von nun an werde auch ich Elefanten und andere Tiere töten und ihr Fleisch essen. Sogar der Löwe, der König der Tiere, tötet die mächtigen Elefanten nur, indem er sich auf die gesprochenen Worte ‚Erstrahle, o Herr!‘ stützt. Ich werde den Löwen ebenfalls dazu bringen, zu mir zu sagen: ‚Erstrahle, o Schakal!‘, werde dann einen mächtigen Elefanten töten und sein Fleisch essen.“ So sīhaṃ upasaṅkamitvā etadavoca ‘‘sāmi, mayā dīgharattaṃ tumhehi vadhitavaravāraṇānaṃ maṃsaṃ khāditaṃ, ahampi ekaṃ varavāraṇaṃ māretvā maṃsaṃ khāditukāmo, tasmā tumhehi nipannaṭṭhāne kañcanaguhāyaṃ nipajjissāmi, tumhe pabbatapāde vicarantaṃ varavāraṇaṃ oloketvā mama santikaṃ āgantvā ‘viroca, jambukā’ti vadetha, ettakamattasmiṃ maccheraṃ mā karitthā’’ti. Atha naṃ sīho āha ‘‘na, tvaṃ jambuka, vāraṇe vadhituṃ samatthe sīhakule uppanno, vāraṇaṃ vadhitvā maṃsaṃ khādanasamattho siṅgālo nāma loke natthi, mā te etaṃ rucci, mayā vadhitavaravāraṇānaññeva maṃsaṃ khāditvā vasā’’ti. So evaṃ vuttepi viramituṃ na icchi, punappunaṃ yāciyeva. Sīho taṃ vāretuṃ asakkonto sampaṭicchitvā ‘‘tena hi mama vasanaṭṭhānaṃ pavisitvā nipajjā’’ti jambukaṃ kañcanaguhāyaṃ nipajjāpetvā sayaṃ pabbatapāde mattavaravāraṇaṃ oloketvā guhādvāraṃ gantvā ‘‘viroca, jambukā’’ti āha. Siṅgālo kañcanaguhāya nikkhamitvā vijambhitvā catuddisaṃ oloketvā tikkhattuṃ vassitvā ‘‘mattavaravāraṇassa kumbhe patissāmī’’ti pakkhanditvā virajjhitvā pādamūle pati. Vāraṇo dakkhiṇapādaṃ ukkhipitvā tassa sīsaṃ akkami, sīsaṭṭhīni cuṇṇavicuṇṇāni ahesuṃ. Athassa sarīraṃ vāraṇo pādena saṅgharitvā rāsiṃ katvā upari laṇḍaṃ pātetvā koñcanādaṃ nadanto araññaṃ pāvisi. Er trat an den Löwen heran und sprach: „O Herr, ich habe lange Zeit das Fleisch der von euch getöteten mächtigen Elefanten gegessen. Auch ich möchte einen mächtigen Elefanten töten und sein Fleisch essen. Deshalb werde ich mich an eurem Ruheplatz in der goldenen Höhle niederlegen. Haltet ihr am Fuße des Berges Ausschau nach einem umherstreifenden mächtigen Elefanten, kommt zu mir und sprecht: ‚Erstrahle, o Schakal!‘ Seid in dieser kleinen Angelegenheit nicht missgünstig.“ Da sprach der Löwe zu ihm: „Nein, o Schakal, du bist nicht in der Löwenfamilie geboren, die imstande ist, Elefanten zu töten. Es gibt auf der Welt keinen Schakal, der fähig wäre, einen Elefanten zu töten und sein Fleisch zu essen. Lass dieses Begehren fallen! Lebe weiter so, dass du das Fleisch der von mir getöteten mächtigen Elefanten isst.“ Doch obwohl ihm dies gesagt wurde, wollte er nicht davon ablassen und bat immer wieder darum. Da der Löwe ihn nicht davon abhalten konnte, willigte er schließlich ein und sagte: „Wenn dem so ist, betritt meine Wohnstätte und lege dich nieder.“ Er ließ den Schakal in der goldenen Höhle liegen, hielt am Fuße des Berges selbst Ausschau nach einem wilden, mächtigen Elefanten, ging zum Eingang der Höhle und sagte: „Erstrahle, o Schakal!“ Der Schakal trat aus der goldenen Höhle hervor, streckte sich, blickte in die vier Himmelsrichtungen, heulte dreimal und sprang mit dem Gedanken: „Ich werde auf den Stirnhöcker des wilden, mächtigen Elefanten springen“ ab, verfehlte jedoch sein Ziel und stürzte direkt vor dessen Füße. Der Elefant hob seinen rechten Fuß und trat auf den Kopf des Schakals, sodass dessen Schädelknochen völlig zertrümmert wurden. Daraufhin schob der Elefant den Körper des Schakals mit dem Fuß zu einem Haufen zusammen, ließ seinen Mist darauf fallen, stieß einen lauten, trompetenartigen Schrei aus und ging in den Wald. Bodhisatto imaṃ pavattiṃ disvā ‘‘idāni viroca, jambukā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Als der Bodhisatta diesen Vorfall sah, sagte er: „Nun erstrahle, o Schakal!“, und sprach folgende Strophe: 143. 143. ‘‘Lasī [Pg.519] ca te nipphalitā, matthako ca padālito; Sabbā te phāsukā bhaggā, ajja kho tvaṃ virocasī’’ti. „Dein Gehirn ist herausgequollen, und dein Schädel ist gespalten; all deine Rippen sind gebrochen – heute wahrlich erstrahlst du!“ Tattha lasīti matthaluṅgaṃ. Nipphalitāti nikkhantā. Evaṃ bodhisatto imaṃ gāthaṃ vatvā yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gato. Dabei bedeutet ‚lasī‘ das Gehirn. ‚Nipphalitā‘ bedeutet herausgetreten. Nachdem der Bodhisatta so diese Strophe gesprochen hatte, lebte er seine Lebensspanne zu Ende und ging gemäß seinen Taten dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā siṅgālo devadatto ahosi, sīho pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte, verknüpfte er das Jātaka: „Damals war der Schakal Devadatta, der Löwe aber war ich selbst.“ Virocajātakavaṇṇanā tatiyā. Die Erklärung des Viroca-Jātaka ist die dritte.
[144] 4. Naṅguṭṭhajātakavaṇṇanā [144] 4. Die Erklärung des Naṅguṭṭha-Jātaka Bahumpetaṃ asabbhi jātavedāti idaṃ satthā jetavane viharanto ājīvakānaṃ micchātapaṃ ārabbha kathesi. Tadā kira ājīvakā jetavanapiṭṭhiyaṃ nānappakāraṃ micchātapaṃ caranti. Sambahulā bhikkhū tesaṃ ukkuṭikappadhānavaggulivatakaṇṭakāpassayapañcātapatapanādibhedaṃ micchātapaṃ disvā bhagavantaṃ pucchiṃsu ‘‘atthi nu kho, bhante, imaṃ micchātapaṃ nissāya kusalaṃ vā vuḍḍhi vā’’ti. Satthā ‘‘na, bhikkhave, evarūpaṃ micchātapaṃ nissāya kusalaṃ vā vuḍḍhi vā atthi, pubbe paṇḍitā ‘evarūpaṃ tapaṃ nissāya kusalaṃ vā vuḍḍhi vā bhavissatī’ti saññāya jātaggiṃ gahetvā araññaṃ pavisitvā aggijuhanādivasena kiñci vuḍḍhiṃ apassantā aggiṃ udakena nibbāpetvā kasiṇaparikammaṃ katvā abhiññā ca samāpattiyo ca nibbattetvā brahmalokaparāyaṇā ahesu’’nti vatvā atītaṃ āhari. „Vieles davon ist unedel, o Feuererzeuger“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich der falschen Askese der Ājīvakas. Damals, so heißt es, praktizierten die Ājīvakas hinter dem Jetavana-Kloster verschiedene Arten falscher Askese. Viele Mönche sahen deren falsche Askese, die sich in Praktiken wie dem dauernden Verharren in der Hocke, dem Hängen wie Fledermäuse, dem Liegen auf Dornenbetten, der Kasteiung durch die Silicon- oder Fünf-Feuer-Praktiken und Ähnlichem äußerte, und fragten den Erhabenen: „Gibt es, o Herr, durch das Stützen auf diese falsche Askese irgendeinen heilsamen Verdienst oder einen geistigen Fortschritt?“ Der Meister sprach: „Nein, ihr Mönche, gestützt auf eine solche falsche Askese gibt es weder Heilsames noch einen Fortschritt. Einst nahmen Weise in der Vorstellung, dass sich durch eine solche Kasteiung Heilsames oder ein Fortschritt einstellen würde, das bei ihrer Geburt entzündete Opferfeuer, gingen in den Wald, und als sie durch das Darbringen von Feueropfern und ähnlichen Praktiken keinerlei Fortschritt erkannten, löschten sie das Feuer mit Wasser, übten die Kasiṇa-Vorbereitungsübungen, erlangten die höheren Geisteskräfte sowie die meditativen Errungenschaften und gingen schließlich in die Brahma-Welt ein.“ Nachdem er dies gesagt hatte, trug er eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbatti. Tassa jātadivase mātāpitaro jātaggiṃ gahetvā ṭhapesuṃ. Atha naṃ soḷasavassakāle etadavocuṃ ‘‘mayaṃ te, putta, jātadivase aggiṃ gaṇhimha. Sacesi agāraṃ ajjhāvasitukāmo, tayo vede uggaṇha. Atha brahmalokaṃ gantukāmo, aggiṃ gahetvā araññaṃ pavisitvā aggiṃ paricaranto mahābrahmānaṃ ārādhetvā brahmalokaparāyaṇo hohī’’ti. So ‘‘na mayhaṃ agārena attho’’ti aggiṃ gahetvā araññaṃ pavisitvā assamapadaṃ māpetvā aggiṃ paricaranto araññe vihāsi. So ekadivasaṃ paccantagāmake godakkhiṇaṃ labhitvā taṃ goṇaṃ [Pg.520] assamapadaṃ netvā cintesi ‘‘aggibhagavantaṃ gomaṃsaṃ khādāpessāmī’’ti. Athassa etadahosi ‘‘idha loṇaṃ natthi, aggibhagavā aloṇaṃ khādituṃ na sakkhissati, gāmato loṇaṃ āharitvā aggibhagavantaṃ saloṇakaṃ khādāpessāmī’’ti. So taṃ tattheva bandhitvā loṇatthāya gāmakaṃ agamāsi. Tasmiṃ gate sambahulā luddakā taṃ ṭhānaṃ āgatā. Goṇaṃ disvā vadhitvā maṃsaṃ pacitvā khāditvā naṅguṭṭhañca jaṅghañca cammañca tattheva chaḍḍetvā avasesamaṃsaṃ ādāya agamaṃsu. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī die Herrschaft ausübte, wurde der Bodhisatta in einer hochgeborenen Brahmanenfamilie wiedergeboren. An seinem Geburtstag nahmen seine Eltern das Geburtsfeuer auf und bewahrten es auf. Als er sechzehn Jahre alt war, sprachen sie zu ihm: „Mein Sohn, an deinem Geburtstag haben wir das Feuer entgegengenommen. Wenn du das Hausleben führen willst, erlerne die drei Veden. Wenn du jedoch in die Brahma-Welt gelangen willst, so nimm das Feuer, geh in den Wald, diene dem Feuer, stelle den Großen Brahma zufrieden und sei einer, dessen Endziel die Brahma-Welt ist.“ Er sprach: „Ich habe keine Verwendung für das Hausleben“, nahm das Feuer, ging in den Wald, errichtete eine Einsiedelei, diente dem Feuer und lebte im Wald. Eines Tages erhielt er in einem Grenzdorf ein Geschenk in Form eines Ochsen. Er führte den Ochsen zur Einsiedelei und dachte: „Ich will dem erhabenen Feuer Rindfleisch zu essen geben.“ Da dachte er: „Hier im Wald gibt es kein Salz. Das erhabene Feuer wird das ungesalzene Fleisch nicht essen können. Ich will Salz aus dem Dorf holen und dem erhabenen Feuer das Fleisch gesalzen zu essen geben.“ Er band den Ochsen genau dort fest und ging für Salz in ein kleines Dorf. Während er fort war, kamen viele Jäger an diesen Ort. Sie sahen den Ochsen, töteten ihn, kochten das Fleisch, aßen es auf und ließen nur den Schwanz, den Unterschenkelknochen und das Fell genau dort zurück, nahmen das restliche Fleisch und gingen fort. Brāhmaṇo āgantvā naṅguṭṭhādimattameva disvā cintesi ‘‘ayaṃ aggibhagavā attano santakampi rakkhituṃ na sakkoti, maṃ pana kadā rakkhissati. Iminā aggiparicaraṇena niratthakena bhavitabbaṃ, natthi itonidānaṃ kusalaṃ vā vuḍḍhi vā’’ti. So aggiparicariyāya vigatacchando ‘‘hambho aggibhagavā, tvaṃ attanopi santakaṃ rakkhituṃ asakkonto maṃ kadā rakkhissasi, maṃsaṃ natthi, ettakenapi tussāhī’’ti naṅguṭṭhādīni aggimhi pakkhipanto imaṃ gāthamāha – Als der Brahmane zurückkehrte, sah er nur noch den Schwanz und die übrigen Reste und dachte: „Dieses erhabene Feuer kann nicht einmal sein eigenes Eigentum schützen; wie soll es dann jemals mich schützen? Dieses Dienen des Feuers muss nutzlos sein; daraus entspringt weder heilsames Verdienst noch Fortschritt.“ Da er das Verlangen nach dem Dienst des Feuers verloren hatte, rief er aus: „He, erhabenes Feuer! Wenn du nicht einmal dein eigenes Eigentum schützen kannst, wie willst du dann mich schützen? Fleisch ist keines da, begnüge dich mit diesem hier!“, und während er den Schwanz und die anderen Reste ins Feuer warf, sprach er diese Strophe: 144. 144. ‘‘Bahumpetaṃ asabbhi jātaveda, yaṃ taṃ vāladhinābhipūjayāma; Maṃsārahassa natthajja maṃsaṃ, naṅguṭṭhampi bhavaṃ paṭiggahātū’’ti. „Sogar das ist viel, o unedles Feuer, dass wir dich mit diesem Schwanz verehren. Für dich, der du Fleisch verdienst, gibt es heute kein Fleisch; möge der Herr auch nur diesen Schwanz annehmen!“ Tattha bahumpetanti ettakampi bahuṃ. Asabbhīti asappurisa asādhujātika. Jātavedāti aggiṃ ālapati. Aggi hi jātamattova vediyati paññāyati pākaṭo hoti, tasmā ‘‘jātavedo’’ti vuccati. Yaṃ taṃ vāladhinābhipūjayāmāti yaṃ ajja mayaṃ attanopi santakaṃ rakkhituṃ asamatthaṃ bhagavantaṃ vāladhinā abhipūjayāma, etampi tava bahumevāti dasseti. Maṃsārahassāti maṃsaṃ arahassa tuyhaṃ natthi ajja maṃsaṃ. Naṅguṭṭhampi bhavaṃ paṭiggahātūti attano santakaṃ rakkhituṃ asakkonto bhavaṃ imaṃ sajaṅghacammaṃ naṅguṭṭhampi paṭiggaṇhātūti. Darin bedeutet „bahumpetaṃ“: Selbst so viel ist reichlich. „Asabbhi“ bedeutet: unedel, von schlechter Natur. Mit „jātavedā“ spricht er das Feuer an. Denn das Feuer wird, sobald es entstanden ist, wahrgenommen, erkannt und offenbart; darum wird es „Jātaveda“ genannt. „Yaṃ taṃ vāladhinābhipūjayāma“ zeigt Folgendes: Dass wir heute das erhabene Feuer, das nicht einmal sein eigenes Eigentum zu schützen vermag, mit dem Schwanz verehren – selbst das ist überaus reichlich für dich. „Maṃsārahassa“ bedeutet: Für dich, der du Fleisch verdienst, gibt es heute kein Fleisch. „Naṅguṭṭhampi bhavaṃ paṭiggahātu“ bedeutet: Möge der Herr, der sein eigenes Eigentum nicht zu schützen vermag, diesen Schwanz zusammen mit dem Schenkelknochen und dem Fell annehmen. Evaṃ vatvā mahāsatto aggiṃ udakena nibbāpetvā isipabbajjaṃ pabbajitvā abhiññā ca samāpattiyo ca nibbattetvā brahmalokaparāyaṇo ahosi. Nachdem das Große Wesen dies gesagt hatte, löschte er das Feuer mit Wasser, trat in die Hauslosigkeit eines Einsiedlers ein, brachte die höheren Geisteskräfte und die Sammlungsstufen hervor und ging nach dem Tod in die Brahma-Welt ein. Satthā [Pg.521] imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘nibbutaggitāpaso ahameva tena samayenā’’ti. Nachdem der Meister diese Lehrrede dargelegt hatte, stellte er die Verbindung zum Jātaka her: „Der Asket, der das Feuer löschte, war zu jener Zeit ich selbst.“ Naṅguṭṭhajātakavaṇṇanā catutthā. Die Erklärung des Naṅguṭṭha-Jātaka ist die vierte.
[145] 5. Rādhajātakavaṇṇanā [145] 5. Die Erklärung des Rādha-Jātaka. Na tvaṃ rādha vijānāsīti idaṃ satthā jetavane viharanto purāṇadutiyikāpalobhanaṃ ārabbha kathesi. Paccuppannavatthu indriyajātake āvi bhavissati. Satthā pana taṃ bhikkhuṃ āmantetvā ‘‘bhikkhu mātugāmo nāma arakkhiyo, ārakkhaṃ ṭhapetvā rakkhantāpi rakkhituṃ na sakkonti. Tvampi pubbe etaṃ ārakkhaṃ ṭhapetvā rakkhantopi rakkhituṃ nāsakkhi, idāni kathaṃ rakkhissasī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Du weißt es nicht, o Rādha“ – dies sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster weilte, bezüglich der Verführung durch eine frühere Ehefrau. Die gegenwärtige Geschichte wird im Indriya-Jātaka deutlich werden. Der Meister wandte sich jedoch an jenen Mönch und sprach: „Mönch, Frauen sind wahrlich unbeschützbar. Selbst diejenigen, die Wachen aufstellen und sie beschützen, können sie nicht bewahren. Auch du hast in der Vergangenheit, obwohl du eine Bewachung eingerichtet und sie beschützt hast, sie nicht zu beschützen vermocht; wie willst du sie nun beschützen?“, und erzählte die Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto sukayoniyaṃ nibbatti. Kāsiraṭṭhe eko brāhmaṇo bodhisattañca kaniṭṭhabhātarañcassa puttaṭṭhāne ṭhapetvā posesi. Tesu bodhisattassa ‘‘poṭṭhapādo’’ti nāmaṃ ahosi, itarassa ‘‘rādho’’ti. Tassa pana brāhmaṇassa bhariyā anācārā hoti dussīlā. So vohāratthāya gacchanto ubhopi bhātaro āha – ‘‘tātā, sace vo mātā brāhmaṇī anācāraṃ ācarati, vāreyyātha na’’nti. Bodhisatto āha ‘‘sādhu, tāta, vāretuṃ sakkontā vāreyyāma, asakkontā tuṇhī bhavissāmā’’ti. Evaṃ brāhmaṇo brāhmaṇiṃ sukānaṃ niyyādetvā vohāratthāya gato. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī die Herrschaft ausübte, wurde der Bodhisatta im Schoß eines Papageis wiedergeboren. Ein Brahmane im Lande Kāsi zog den Bodhisatta und dessen jüngeren Bruder an Sohnes statt auf. Unter ihnen war der Name des Bodhisatta „Poṭṭhapāda“, der des anderen „Rādha“. Die Ehefrau dieses Brahmanen jedoch war von schlechtem Verhalten und ohne Tugend. Als er auf Geschäftsreise ging, sprach er zu den beiden Brüdern: „Meine lieben Söhne, falls sich eure Mutter, die Brahmanin, ungebührlich verhält, so haltet sie zurück.“ Der Bodhisatta sprach: „Es ist gut, Vater. Wenn wir imstande sind, sie zurückzuhalten, werden wir sie zurückhalten. Wenn nicht, werden wir schweigen.“ So vertraute der Brahmane die Brahmanin den Papageien an und reiste zu seinen Geschäften ab. Tassa pana gatadivasato paṭṭhāya brāhmaṇī aticarituṃ āraddhā, pavisantānañca nikkhamantānañca anto natthi, tassā kiriyaṃ disvā rādho bodhisattaṃ āha – ‘‘bhātika, amhākaṃ pitā ‘sace vo mātā anācāraṃ ācarati, vāreyyāthā’ti vatvā gato, idāni cesā anācāraṃ ācarati, vārema na’’nti. Bodhisatto ‘‘tāta, tvaṃ attano abyattatāya bālabhāvena evaṃ vadesi, mātugāmaṃ nāma ukkhipitvā carantāpi rakkhituṃ na sakkonti. Yaṃ kammaṃ kātuṃ na sakkā, na taṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Doch von dem Tag seiner Abreise an begann die Brahmanin, Ehebruch zu begehen. Es gab kein Ende derer, die ein- und ausgingen. Als Rādha ihr Verhalten sah, sprach er zum Bodhisatta: „Lieber Bruder, unser Vater ging fort und sagte: ‚Wenn eure Mutter sich ungebührlich verhält, so haltet sie zurück.‘ Nun verhält sie sich ungebührlich; lasst uns sie zurückhalten.“ Der Bodhisatta sprach: „Mein lieber Bruder, du sprichst so aus eigener Unbeholfenheit und Torheit. Selbst jene, die Frauen auf den Schultern umhertragen, können sie nicht beschützen. Eine Tat, die man nicht vollbringen kann, die sollte man auch nicht zu tun versuchen“, und sprach folgende Strophe: 145. 145. ‘‘Na [Pg.522] tvaṃ rādha vijānāsi, aḍḍharatte anāgate; Abyayataṃ vilapasi, virattā kosiyāyane’’ti. „Du weißt es nicht, o Rādha, noch ehe die Mitternacht gekommen ist; du klagst unverständig, denn die Brahmanin aus dem Hause Kosiya hat sich von unserem Vater abgewandt.“ Tattha na tvaṃ rādha vijānāsi, aḍḍharatte anāgateti tāta rādha, tvaṃ na jānāsi, aḍḍharatte anāgate paṭhamayāmeyeva ettakā janā āgatā, idāni ko jānāti, kittakāpi āgamissanti. Abyayataṃ vilapasīti tvaṃ abyattavilāpaṃ vilapasi. Virattā kosiyāyaneti mātā no kosiyāyanī brāhmaṇī virattā amhākaṃ pitari nippemā jātā. Sacassā tasmiṃ sineho vā pemaṃ vā bhaveyya, na evarūpaṃ anācāraṃ kareyyāti imamatthaṃ etehi byañjanehi pakāsesi. Darin bedeutet „na tvaṃ rādha vijānāsi, aḍḍharatte anāgate“: Lieber Rādha, du weißt es nicht. Noch ehe die Mitternacht gekommen ist, schon in der ersten Nachtwache, sind so viele Menschen gekommen. Wer weiß jetzt, wie viele noch kommen werden? „Abyayataṃ vilapasi“ bedeutet: Du jammerst in ungelenker, unverständiger Weise. „Virattā kosiyāyane“ bedeutet: Unsere Mutter, die Brahmanin aus der Kosiya-Sippe, hat sich von unserem Vater abgewandt, ist lieblos geworden. Wenn sie Zuneigung oder Liebe zu ihm gehabt hätte, würde sie ein solches ungebührliches Verhalten nicht an den Tag legen. Diesen Sinn machte er durch diese Worte deutlich. Evaṃ pakāsetvā ca pana brāhmaṇiyā saddhiṃ rādhassa vattuṃ na adāsi. Sāpi yāva brāhmaṇassa anāgamanā yathāruciyā vicari. Brāhmaṇo āgantvā poṭṭhapādaṃ pucchi – ‘‘tāta, kīdisī vo mātā’’ti. Bodhisatto brāhmaṇassa sabbaṃ yathābhūtaṃ kathetvā ‘‘kiṃ te, tāta, evarūpāya dussīlāyā’’ti vatvā ‘‘tāta, amhehi mātuyā dosassa kathitakālato paṭṭhāya na sakkā idha vasitu’’nti brāhmaṇassa pāde vanditvā saddhiṃ rādhena uppatitvā araññaṃ agamāsi. Nachdem er dies offenbart hatte, gestattete er dem Bodhisatta Rādha nicht mehr, mit der Brahmin zu sprechen. Und auch diese trieb es nach ihrem Belieben, solange der Brahmane noch nicht zurückgekehrt war. Als der Brahmane zurückkehrte, fragte er Poṭṭhapāda: „Mein Lieber, wie verhält sich eure Mutter?“ Der Bodhisatta erzählte dem Brahmanen alles der Wahrheit entsprechend und sagte: „Lieber Vater, was fängst du nur mit einer so tugendlosen Frau an?“ und fügte hinzu: „Lieber Vater, seitdem wir die Verfehlungen der Mutter offengelegt haben, können wir nicht mehr hier wohnen.“ Da verehrte er die Füße des Brahmanen, flog zusammen mit Rādha empor und begab sich in den Wald. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā saccāni pakāsesi, saccapariyosāne ukkaṇṭhitabhikkhu sotāpattiphale patiṭṭhahi. ‘‘Tadā brāhmaṇo ca brāhmaṇī ca eteyeva dve janā ahesuṃ, rādho ānando, poṭṭhapādo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, verkündete er die Wahrheiten. Am Ende der Wahrheiten erlangte der unzufriedene Mönch die Frucht des Stromeintritts. „Damals waren jener Brahmane und jene Brahmin diese beiden Personen. Rādha war Ānanda, Poṭṭhapāda aber war ich selbst.“ Rādhajātakavaṇṇanā pañcamā. Die Erklärung des Rādhā-Jātaka ist die fünfte.
[146] 6. Samuddakākajātakavaṇṇanā [146] 6. Die Erklärung des Samuddakāka-Jātaka. Api nu hanukā santāti idaṃ satthā jetavane viharanto sambahule mahallake bhikkhū ārabbha kathesi. Te kira gihikāle sāvatthiyaṃ kuṭumbikā aḍḍhā mahaddhanā aññamaññasahāyakā ekato hutvā puññāni karontā satthu dhammadesanaṃ sutvā ‘‘mayaṃ mahallakā, kiṃ no gharāvāsena, satthu santike ramaṇīye buddhasāsane pabbajitvā dukkhassantaṃ karissāmā’’ti [Pg.523] sabbaṃ sāpateyyaṃ puttadhītādīnaṃ datvā assumukhaṃ ñātisaṅghaṃ pahāya satthāraṃ pabbajjaṃ yācitvā pabbajiṃsu. Pabbajitvā pana pabbajjānurūpaṃ samaṇadhammaṃ na kariṃsu, mahallakabhāvena dhammampi na pariyāpuṇiṃsu, gihikāle viya pabbajitakālepi vihārapariyante paṇṇasālaṃ kāretvā ekatova vasiṃsu. Piṇḍāya carantāpi aññattha agantvā yebhuyyena attano puttadārasseva gehaṃ gantvā bhuñjiṃsu. Tesu ekassa purāṇadutiyikā sabbesampi mahallakattherānaṃ upakārā ahosi, tasmā sesāpi attanā laddhaṃ āhāraṃ gahetvā tassāyeva gehe nisīditvā bhuñjanti. Sāpi tesaṃ yathāsannihitaṃ sūpabyañjanaṃ deti. Sā aññatarena rogena phuṭṭhā kālamakāsi. Atha te mahallakattherā vihāraṃ gantvā aññamaññaṃ gīvāsu gahetvā ‘‘madhurahattharasā upāsikā kālakatā’’ti vihārapaccante rodantā vicariṃsu. Tesaṃ saddaṃ sutvā ito cito ca bhikkhū sannipatitvā ‘‘āvuso, kasmā rodathā’’ti pucchiṃsu. Te ‘‘amhākaṃ sahāyassa purāṇadutiyikā madhurahattharasā kālakatā amhākaṃ ativiya upakārā, ‘idāni kuto tathārūpiṃ labhissāmā’ti iminā kāraṇena rodimhā’’ti āhaṃsu. „Sind unsere Kiefer auch ermüdet“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, im Hinblick auf zahlreiche alte Mönche. Diese waren, so heißt es, zur Zeit ihres Laienlebens wohlhabende Hausväter in Sāvatthī gewesen, reich und von großem Vermögen, die miteinander befreundet waren. Sie taten gemeinsam verdienstvolle Taten, und als sie die Lehrverkündigung des Meisters hörten, dachten sie: „Wir sind alt; was nützt uns das Leben als Hausvater? Wir wollen unter dem Meister in der lieblichen Lehre des Buddha die Hauslosigkeit antreten und dem Leiden ein Ende bereiten.“ Sie gaben ihren gesamten Besitz ihren Söhnen und Töchtern, verließen ihre weinende Verwandtschaft, baten den Meister um die Ordination und traten in den Orden ein. Nach ihrem Eintritt in den Orden übten sie jedoch nicht die dem mönchischen Leben entsprechende mönchische Praxis aus. Wegen ihres hohen Alters lernten sie auch die Lehre nicht. Wie zur Zeit ihres Laienlebens, so ließen sie sich auch nach ihrem Eintritt in den Orden am Rande des Klosters eine Blätterhütte errichten und wohnten dort gemeinsam. Selbst wenn sie auf Almosenrunde gingen, gingen sie nirgendwo anders hin, sondern sucheten meist das Haus der eigenen Familie auf, um dort zu essen. Die frühere Ehefrau eines dieser Mönche war allen diesen alten Theras sehr behilflich. Daher nahmen auch die übrigen die Speise, die sie erhalten hatten, setzten sich in ihr Haus und aßen dort. Sie gab ihnen auch stets sorgfältig zubereitete Suppe und Beilagen. Schließlich erkrankte sie an einer bestimmten Krankheit und starb. Da gingen jene alten Theras in das Kloster, hielten sich gegenseitig an den Hälsen umschlungen und liefen am Rande des Klosters weinend umher, indem sie riefen: „Die Laienanhängerin mit den so wohlschmeckenden, von eigener Hand bereiteten Speisen ist gestorben!“ Als andere Mönche ihr Weinen hörten, kamen sie von überall her zusammen und fragten: „Ihr Brüder, warum weint ihr?“ Sie antworteten: „Die frühere Ehefrau unseres Gefährten, die so wohlschmeckende, von eigener Hand zubereitete Speisen reichte, ist gestorben. Sie war uns überaus behilflich. ‚Woher sollen wir nun eine solche Frau bekommen?‘ Aus diesem Grunde weinen wir.“ Tesaṃ taṃ vippakāraṃ disvā bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, iminā nāma kāraṇena mahallakattherā aññamaññaṃ gīvāsu gahetvā vihārapaccante rodantā vicarantī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idānevete tassā kālakiriyāya rodantā vicaranti, pubbepete imaṃ kākayoniyaṃ nibbattitvā samudde mataṃ nissāya ‘samuddaudakaṃ ussiñcitvā etaṃ nīharissāmā’ti vāyamantā paṇḍite nissāya jīvitaṃ labhiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. Als die Mönche dieses ungebührliche Verhalten sahen, warfen sie in der Versammlungshalle das Thema auf: „Ihr Brüder, aus diesem Grund halten sich die alten Theras gegenseitig an den Hälsen umschlungen und laufen am Rande des Klosters weinend umher.“ Der Meister kam herbei, fragte: „Zu welchem Thema, o Mönche, habt ihr euch hier versammelt?“, und als sie antworteten: „Zu diesem Thema“, sagte er: „Nicht erst jetzt, o Mönche, laufen diese weinend wegen des Todes dieser Frau umher. Schon in der Vergangenheit wurden sie im Schoß von Krähen wiedergeboren und versuchten, wegen der im Meer ertrunkenen Krähenfrau, das Meerwasser auszuschöpfen, um sie herauszuholen. Durch die Hilfe eines Weisen retteten sie damals ihr Leben.“ Nach diesen Worten erzählte er die Geschichte aus der Vergangenheit: Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto samuddadevatā hutvā nibbatti. Atheko kāko attano bhariyaṃ kākiṃ ādāya gocaraṃ pariyesamāno samuddatīraṃ agamāsi. Tasmiṃ kāle manussā samuddatīre khīrapāyāsamacchamaṃsasurādīhi nāgabalikammaṃ katvā pakkamiṃsu. Atha so kāko balikammaṭṭhānaṃ gantvā khīrādīni disvā saddhiṃ kākiyā khīrapāyāsamacchamaṃsādīni bhuñjitvā bahuṃ suraṃ pivi. Te ubhopi surāmadamattā ‘‘samuddakīḷaṃ kīḷissāmā’’ti velante nisīditvā nhāyituṃ ārabhiṃsu [Pg.524] athekā ūmi āgantvā kākiṃ gahetvā samuddaṃ pavesesi. Tameko maccho maṃsaṃ khāditvā ajjhohari. Kāko ‘‘bhariyā me matā’’ti rodi paridevi. Athassa paridevanasaddaṃ sutvā bahū kākā sannipatitvā ‘‘kiṃkāraṇā rodasī’’ti pucchiṃsu. ‘‘Sahāyikā vo velante nhāyamānā ūmiyā haṭā’’ti. Te sabbepi ekaravaṃ ravantā rodiṃsu. Atha nesaṃ etadahosi ‘‘idaṃ samuddaudakaṃ nāma amhākaṃ kiṃ pahosi, udakaṃ ussiñcitvā samuddaṃ tucchaṃ katvā sahāyikaṃ nīharissāmā’’ti. Te mukhaṃ pūretvā pūretvā udakaṃ bahi chaḍḍenti, loṇūdakena ca gale sussamāne uṭṭhāyuṭṭhāya thalaṃ gantvā vissamanti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta als Meeresgottheit wiedergeboren. Damals begab sich eine Krähe zusammen mit ihrer Frau, der Krähenhenne, auf Nahrungssuche an das Meeresufer. Zu dieser Zeit hatten Menschen am Meeresufer eine Opfergabe für die Nāgas dargebracht – bestehend aus Milchspeise, Milchreis, Fisch, Fleisch, Branntwein und anderem – und waren weggegangen. Da ging die Krähe zum Opferplatz, erblickte die Milchspeise und anderes, aß zusammen mit der Krähenhenne von der Milchspeise, dem Milchreis, Fisch, Fleisch usw. und trank viel Branntwein. Beide waren vom Branntwein berauscht und beschlossen: „Wir wollen im Meer spielen.“ Sie ließen sich am Ufer nieder und begannen sich zu waschen. Da kam eine Welle, erfasste die Krähenhenne und zog sie ins Meer. Ein Fisch fraß ihr Fleisch und verschlang sie. Die Krähe weinte und jammerte: „Meine Frau ist tot!“ Als viele andere Krähen ihren Wehruf hörten, kamen sie zusammen und fragten: „Aus welchem Grund weinst du?“ Sie antwortete: „Eure Gefährtin wurde, als sie sich am Ufer wusch, von einer Welle fortgerissen.“ Da weinten sie alle mit lautem Geschrei. Daraufhin dachten sie: „Was bedeutet dieses Meerwasser schon für uns? Wir wollen das Wasser ausschöpfen, das Meer leer machen und unsere Gefährtin herausbringen.“ Sie füllten immer wieder ihren Schnabel mit Wasser und spuckten es außerhalb des Meeres aus. Doch da ihre Kehlen vom Salzwasser austrockneten, flogen sie immer wieder auf, flogen ans Land und ruhten sich aus. Te hanūsu kilantesu mukhesu sukkhantesu akkhīsu rattesu dīnā kilantā hutvā aññamaññaṃ āmantetvā ‘‘ambho, mayaṃ samuddaudakaṃ gahetvā bahi pātema, gahitagahitaṭṭhānaṃ puna udakena pūrati, samuddaṃ tucchaṃ kātuṃ na sakkhissāmā’’ti vatvā imaṃ gāthamāhaṃsu – Als ihre Kiefer ermüdeten, ihre Schnäbel austrockneten, ihre Augen rot wurden und sie elend und erschöpft waren, riefen sie einander zu: „Freunde, wir schöpfen das Meerwasser aus und gießen es draußen hin, doch jede Stelle, von der wir es nehmen, füllt sich sogleich wieder mit Wasser. Wir werden nicht imstande sein, das Meer leer zu machen.“ Nach diesen Worten sprachen sie folgende Strophe: 146. 146. ‘‘Api nu hanukā santā, mukhañca parisussati; Oramāma na pārema, pūrateva mahodadhī’’ti. „Sind unsere Kiefer auch ermüdet, und der Mund trocknet uns aus; wir mühen uns ab, doch wir vermögen es nicht – der große Ozean füllt sich immerfort wieder.“ Tattha api nu hanukā santāti api no hanukā santā, api amhākaṃ hanukā kilantā. Oramāma na pāremāti mayaṃ attano balena mahāsamuddaudakaṃ ākaḍḍhāma osārema, tucchaṃ pana naṃ kātuṃ na sakkoma. Ayañhi pūrateva mahodadhīti. Darin bedeutet: „Sind unsere Kiefer auch ermüdet“: Unsere Kiefer sind ermüdet, unsere Kiefer sind erschöpft. „Wir mühen uns ab, doch wir vermögen es nicht“: Wir schöpfen das Wasser aus dem großen Ozean mit unserer eigenen Kraft aus und gießen es weg, doch wir können ihn nicht leer machen. Denn „der große Ozean füllt sich immerfort wieder“. Evañca pana vatvā sabbepi te kākā ‘‘tassā kākiyā evarūpaṃ nāma tuṇḍaṃ ahosi, evarūpāni vaṭṭakkhīni, evarūpaṃ chavisaṇṭhānaṃ, evarūpo madhurasaddo. Sā no imaṃ corasamuddaṃ nissāya naṭṭhā’’ti bahuṃ vippalapiṃsu. Te evaṃ vippalapamāne samuddadevatā bheravarūpaṃ dassetvā palāpesi, evaṃ tesaṃ sotthi ahosi. Nachdem sie dies gesagt hatten, wehklagten alle diese Krähen ausgiebig: „Eine solche Gestalt hatte der Schnabel jener Krähenhenne, solche runden Augen, eine solche Färbung und Gestalt, eine solche süße Stimme! Und sie ist uns wegen dieses räuberischen Meeres verloren gegangen!“ Während sie so klagten, zeigte sich die Meeresgottheit in einer schreckenerregenden Gestalt und trieb sie in die Flucht. Auf diese Weise wurden sie gerettet. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā kākī ayaṃ purāṇadutiyikā ahosi, kāko mahallakatthero, sesakākā sesamahallakattherā, samuddadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und verknüpfte das Jātaka: „Damals war das Krähenweibchen diese frühere Ehefrau, die männliche Krähe war der alte Mönch, die übrigen Krähen waren die übrigen alten Mönche und die Meeresgottheit war ich selbst.“ Samuddakākajātakavaṇṇanā chaṭṭhā. Die Erläuterung zum Samuddakāka-Jātaka ist die sechste.
[147] 7. Puppharattajātakavaṇṇanā [147] 7. Die Erläuterung zum Puppharatta-Jātaka Nayidaṃ [Pg.525] dukkhaṃ aduṃ dukkhanti idaṃ satthā jetavane viharanto ekaṃ ukkaṇṭhitabhikkhuṃ ārabbha kathesi. So hi bhagavatā ‘‘saccaṃ kira tvaṃ bhikkhu ukkaṇṭhito’’ti vutte ‘‘sacca’’nti vatvā ‘‘kena ukkaṇṭhāpitosī’’ti ca puṭṭho ‘‘purāṇadutiyikāyā’’ti vatvā ‘‘madhurahattharasā, bhante, sā itthī, na sakkomi taṃ vinā vasitu’’nti āha. Atha naṃ satthā ‘‘esā te bhikkhu anatthakārikā, pubbepi tvaṃ etaṃ nissāya sūle uttāsito etaññeva patthayamāno kālaṃ katvā niraye nibbatto, idāni naṃ kasmā puna patthesī’’ti vatvā atītaṃ āhari. „Dies ist kein Leid, jenes ist Leid“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Jetavana-Kloster verweilte, bezüglich eines unzufriedenen Mönchs. Als dieser nämlich vom Erhabenen gefragt wurde: „Ist es wahr, Mönch, dass du unzufrieden bist?“, antwortete er: „Es ist wahr“; und auf die Frage: „Durch wen bist du unzufrieden geworden?“, sagte er: „Durch meine frühere Ehefrau“, und fügte hinzu: „Herr, diese Frau bereitet mit ihren Händen köstliche Speisen zu; ohne sie kann ich nicht leben.“ Da sprach der Meister zu ihm: „Mönch, diese Frau bringt dir Unheil. Schon in der Vergangenheit wurdest du ihretwegen auf einen Pfahl gespießt, und während du dich nach eben dieser Frau sehntest, starbst du und wurdest in der Hölle wiedergeboren. Warum sehnst du dich jetzt wieder nach ihr?“, und er erzählte eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto ākāsaṭṭhadevatā ahosi. Atha bārāṇasiyaṃ kattikarattivārachaṇo sampatto hoti, nagaraṃ devanagaraṃ viya alaṅkariṃsu. Sabbo jano khaṇakīḷānissito ahosi. Ekassa pana duggatamanussassa ekameva ghanasāṭakayugaṃ ahosi. So taṃ sudhotaṃ dhovāpetvā obhañjāpetvā satavalikaṃ sahassavalikaṃ kāretvā ṭhapesi. Atha naṃ bhariyā evamāha ‘‘icchāmahaṃ, sāmi, ekaṃ kusumbharattaṃ nivāsetvā ekaṃ pārupitvā tava kaṇṭhe laggā kattikarattivāraṃ caritu’’nti. ‘‘Bhadde, kuto amhākaṃ daliddānaṃ kusumbhaṃ, suddhavatthaṃ nivāsetvā kīḷāhī’’ti? ‘‘Kusumbharattaṃ alabhamānā chaṇakīḷaṃ na kīḷissāmi, tvaṃ aññaṃ itthiṃ gahetvā kīḷassū’’ti. ‘‘Bhadde, kiṃ maṃ pīḷesi, kuto amhākaṃ kusumbha’’nti? ‘‘Sāmi, purisassa icchāya sati kiṃ nāma natthi, nanu rañño kusumbhavatthusmiṃ bahu kusumbha’’nti. ‘‘Bhadde, taṃ ṭhānaṃ rakkhasapariggahitapokkharaṇisadisaṃ, balavārakkhā, na sakkā upasaṅkamituṃ, mā te etaṃ rucci, yathāladdheneva tussassū’’ti. ‘‘Sāmi, rattibhāge andhakāre sati purisassa agamanīyaṭṭhānaṃ nāma natthī’’ti. Iti so tāya punappunaṃ kathentiyā kilesavasena tassā vacanaṃ gahetvā ‘‘hotu bhadde, mā cintayitthā’’ti taṃ samassāsetvā rattibhāge jīvitaṃ pariccajitvā nagarā nikkhamitvā rañño kusumbhavatthuṃ gantvā vatiṃ madditvā antovatthuṃ pāvisi. Ārakkhamanussā vatisaddaṃ sutvā ‘‘coro coro’’ti parivāretvā gahetvā paribhāsitvā koṭṭetvā bandhitvā pabhātāya rattiyā rañño dassesuṃ. Rājā [Pg.526] ‘‘gacchatha, naṃ sūle uttāsethā’’ti āha. Atha naṃ pacchābāhaṃ bandhitvā vajjhabheriyā vajjamānāya nagarā nikkhamāpetvā sūle uttāsesuṃ. Balavavedanā pavattanti, kākā sīse nilīyitvā kaṇayaggasadisehi tuṇhehi akkhīni vijjhanti. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, war der Bodhisatta eine im Luftraum weilende Gottheit. Damals stand in Bārāṇasī das Kattikā-Vollmondfest bevor, und sie schmückten die Stadt wie eine Götterstadt. Alle Menschen gaben sich dem Festtrubel hin. Einem armen Mann jedoch gehörte nur ein einziges Paar dicker Gewänder. Er ließ es gut waschen, glätten und mit hundert oder tausend Falten versehen und legte es beiseite. Da sprach seine Frau zu ihm: „Mein Herr, ich wünsche mir, ein mit Färberdistel rot gefärbtes Gewand anzuziehen, eines umzuwerfen, mich an deinen Hals zu hängen und so am Kattikā-Nachtfest teilzunehmen.“ – „Meine Liebe, woher sollten wir Armen ein rotes Kusumbha-Gewand bekommen? Zieh ein sauberes weißes Gewand an und feiere!“ – „Wenn ich kein rot gefärbtes Kusumbha-Gewand bekomme, werde ich nicht am Fest teilnehmen. Nimm du dir eine andere Frau und feiere!“ – „Meine Liebe, warum quälst du mich? Woher sollten wir ein Kusumbha-Gewand bekommen?“ – „Mein Herr, wenn ein Mann will, gibt es nichts, was unmöglich ist. Gibt es auf dem Kusumbha-Feld des Königs nicht reichlich Färberdisteln?“ – „Meine Liebe, dieser Ort ist wie ein von einem Dämon bewachter Teich; er wird streng bewacht und man kann sich ihm nicht nähern. Begehre das nicht, gib dich mit dem zufrieden, was du hast!“ – „Mein Herr, in der Dunkelheit der Nacht gibt es für einen Mann keinen Ort, den er nicht erreichen kann.“ Da er von ihr immer wieder gedrängt wurde, folgte er unter dem Einfluss der Leidenschaft ihren Worten, tröstete sie mit den Worten: „Es sei so, meine Liebe, sorge dich nicht!“, riskierte in der Nacht sein Leben, verließ die Stadt, ging zum Kusumbha-Feld des Königs, trat den Zaun nieder und drang in das Feld ein. Die Wächter hörten das Geräusch am Zaun, umzingelten ihn mit den Rufen „Dieb, Dieb!“, nahmen ihn fest, beschimpften ihn, schlugen ihn, fesselten ihn und führten ihn bei Tagesanbruch dem König vor. Der König sagte: „Geht, spießt ihn auf einen Pfahl auf!“ Da fesselten sie seine Hände auf dem Rücken, führten ihn unter dem Schlagen der Hinrichtungstrommel aus der Stadt hinaus und spießten ihn auf einen Pfahl. Heftige Schmerzen überkamen ihn; Krähen ließen sich auf seinem Kopf nieder und hackten ihm mit ihren Schnäbeln, die wie Speerspitzen waren, die Augen aus. So tathārūpampi dukkhaṃ amanasikaritvā tameva itthiṃ anussaritvā ‘‘tāya nāmamhi ghanapuppharattavatthanivatthāya kaṇṭhe āsattabāhuyugaḷāya saddhiṃ kattikarattivārato parihīno’’ti cintetvā imaṃ gāthamāha – Ohne auf diesen so schrecklichen Schmerz zu achten, dachte er nur an jene Frau und überlegte: „Ich bin nun von der Teilnahme am Kattikā-Nachtfest mit ihr ausgeschlossen – mit ihr, die in ein dichtes, rot gefärbtes Blumengewand gekleidet war und ihre beiden Arme um meinen Hals gelegt hatte.“ In diesem Sinne sprach er folgende Strophe: 147. 147. ‘‘Nayidaṃ dukkhaṃ aduṃ dukkhaṃ, yaṃ maṃ tudati vāyaso; Yaṃ sāmā puppharattena, kattikaṃ nānubhossatī’’ti. „Dies ist kein Leid, jenes ist Leid, dass die Krähe mich hackt; dass Sāmā, im roten Blumengewand, das Kattikā-Fest nicht miterleben wird.“ Tattha nayidaṃ dukkhaṃ aduṃ dukkhaṃ, yaṃ maṃ tudati vāyasoti yañca idaṃ sūle lagganapaccayaṃ kāyikacetasikadukkhaṃ, yañca lohamayehi viya tuṇḍehi vāyaso tudati, idaṃ sabbampi mayhaṃ na dukkhaṃ, aduṃ dukkhaṃ etaṃyeva pana me dukkhanti attho. Kataraṃ? Yaṃ sāmā puppharattena, kattikaṃ nānubhossatīti, yaṃ sā piyaṅgusāmā mama bhariyā ekaṃ kusumbharattaṃ nivāsetvā ekaṃ pārupitvā evaṃ ghanapuppharattena vatthayugena acchannā mama kaṇṭhe gahetvā kattikarattivāraṃ nānubhavissati, idaṃ mayhaṃ dukkhaṃ, etadeva hi maṃ bādhatīti? So evaṃ mātugāmaṃ ārabbha vippalapantoyeva kālaṃ katvā niraye nibbatti. Darin bedeutet „Dies ist kein Leid, jenes ist Leid, dass die Krähe mich hackt“: Sowohl dieser körperliche und geistige Schmerz, der durch das Aufgespießtsein auf dem Pfahl verursacht wird, als auch das Hacken der Krähe mit ihren eisengleichen Schnäbeln – all dies ist kein Leid für mich. „Jenes ist Leid“, das allein ist mein Leid, so ist der Sinn. Welches? „Dass Sāmā im roten Blumengewand das Kattikā-Fest nicht miterleben wird“: Dass jene, meine Frau, die eine goldbraune Schönheit wie die Piyaṅgu-Pflanze besitzt, bekleidet und verhüllt mit diesem intensiv roten Gewandpaar – indem sie ein mit Färberdistel rot gefärbtes Gewand anzieht und eines umwirft –, meinen Hals umschlingt und so das Kattikā-Nachtfest nicht miterleben wird, das ist mein Leid; denn genau dies quält mich. Indem er so, wegen einer Frau jammernd, verstarb, wurde er in der Hölle wiedergeboren. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā jayampatikāva idāni jayampatikā, taṃ kāraṇaṃ paccakkhaṃ katvā ṭhitā ākāsaṭṭhadevatā pana ahameva ahosi’’nti. Der Meister trug diese Lehrrede vor und verknüpfte das Jātaka: „Das damalige Ehepaar ist das heutige Ehepaar; die im Luftraum weilende Gottheit aber, die als Augenzeuge dieses Vorfalls zugegen war, war ich selbst.“ Puppharattajātakavaṇṇanā sattamā. Die Erläuterung zum Puppharatta-Jātaka ist die siebte.
[148] 8. Siṅgālajātakavaṇṇanā [148] 8. Die Erläuterung zum Siṅgāla-Jātaka Nāhaṃ punaṃ na ca punanti idaṃ satthā jetavane viharanto kilesaniggahaṃ ārabbha kathesi. Sāvatthiyaṃ kira pañcasatamattā sahāyakā mahāvibhavā seṭṭhiputtā satthu dhammadesanaṃ sutvā sāsane uraṃ datvā pabbajitvā jetavane antokoṭisanthāre vihariṃsu. Athekadivasaṃ tesaṃ aḍḍharattasamaye kilesanissito saṅkappo uppajji. Te ukkaṇṭhitvā [Pg.527] attanā jahitakilese puna gaṇhituṃ cittaṃ uppādayiṃsu. Atha satthā aḍḍharattasamanantare sabbaññutaññāṇadaṇḍadīpakaṃ ukkhipitvā ‘‘katarāya nu kho ratiyā jetavane bhikkhū viharantī’’ti bhikkhūnaṃ ajjhāsayaṃ olokento tesaṃ bhikkhūnaṃ abbhantare kāmarāgasaṅkappassa uppannabhāvaṃ aññāsi. Satthā ca nāma ekaputtikā itthī attano puttaṃ viya, ekacakkhuko puriso cakkhuṃ viya attano sāvake rakkhati. Pubbaṇhādīsu yasmiṃ yasmiṃ samaye tesaṃ kilesā uppajjanti, te tesaṃ kilese tato paraṃ vaḍḍhituṃ adatvā tasmiṃ tasmiṃyeva samaye niggaṇhāti. Tenassa etadahosi ‘‘ayaṃ cakkavattirañño antonagareyeva corānaṃ uppannakālo viya vattati, idāneva tesaṃ dhammadesanaṃ katvā te kilese niggaṇhitvā arahattaṃ dassāmī’’ti. So surabhigandhakuṭito nikkhamitvā madhurassarena ‘‘ānandā’’ti āyasmantaṃ dhammabhaṇḍāgārikaṃ ānandattheraṃ āmantesi. Thero ‘‘kiṃ, bhante’’ti āgantvā vanditvā aṭṭhāsi. ‘‘Ānanda, yattakā bhikkhū antokoṭisanthāre viharanti, sabbeva gandhakuṭipariveṇe sannipātehī’’ti. Evaṃ kirassa ahosi ‘‘sacāhaṃ teyeva pañcasate bhikkhū pakkosāpessāmi. ‘Satthārā no abbhantare kilesānaṃ uppannabhāvo ñāto’ti saṃviggamānasā dhammadesanaṃ sampaṭicchituṃ na sakkhissantī’’ti. Tasmā ‘‘sabbe sannipātehī’’ti āha. Thero ‘‘sādhu, bhante’’ti avāpuraṇaṃ ādāya pariveṇena pariveṇaṃ āhiṇḍitvā sabbe bhikkhū gandhakuṭipariveṇe sannipātetvā buddhāsanaṃ paññapesi. Der Meister verkündete, während er im Jetavana verweilte, diesen Lehrvortrag, beginnend mit „Nāhaṃ punaṃ na ca punaṃ“, bezüglich der Bezwingung der geistigen Befleckungen (Kilesas). In Sāvatthi hörten einst etwa fünfhundert befreundete Kaufmannssöhne von unermesslichem Reichtum die Lehrverkündung des Meisters. Sie weihten ihr Leben der Lehre, wurden Mönche und lebten im Jetavana-Kloster, innerhalb des mit Goldmünzen gepflasterten Bereichs. Da stieg in ihnen eines Tages zur Mitternachtsstunde ein von den Befleckungen geleiteter Gedanke auf. Sie wurden unzufrieden und ließen das Verlangen aufkommen, die Befleckungen, die sie selbst bereits aufgegeben hatten, erneut zu ergreifen. Da erhob der Meister gleich nach Mitternacht die Fackel seines Allwissensheitswissens und blickte auf die Gesinnung der Mönche, indem er dachte: „In welcherlei Freude verweilen die Mönche wohl im Jetavana?“ Dabei erkannte er, dass im Inneren dieser Mönche Gedanken an Sinnenlust aufgestiegen waren. Der Meister schützt nämlich seine Schüler so, wie eine Mutter mit nur einem einzigen Sohn ihren Sohn behütet oder wie ein Einäugiger sein verbliebenes Auge schützt. Zu welcher Zeit auch immer – am Vormittag oder zu anderen Stunden –, wenn in ihnen Befleckungen aufsteigen, lässt er nicht zu, dass diese Befleckungen danach weiter anwachsen, sondern bezwingt sie genau in jenem Moment. Daher dachte er bei sich: „Dies gleicht dem Erscheinen von Räubern mitten in der Königsstadt eines Weltherrschers. Ich werde ihnen sogleich die Lehre verkünden, diese Befleckungen bezwingen und ihnen die Arhatschaft verleihen.“ Er trat aus der wohlriechenden Duftkammer heraus und rief mit wohlklingender Stimme den ehrwürdigen Ānanda, den Schatzmeister der Lehre: „Ānanda!“ Der Thera kam herbei, verneigte sich ehrfurchtsvoll, fragte: „Was gibt es, o Herr?“ und blieb stehen. „Ānanda, versammle alle Mönche, so viele ihrer im inneren, goldgepflasterten Bereich verweilen, im Hofe der Duftkammer.“ Es heißt, er dachte sich nämlich: „Wenn ich nur jene fünfhundert Mönche rufen lasse, werden sie erschrockenen Herzens denken: ‚Der Meister hat das Aufkommen der Befleckungen in unserem Inneren erkannt‘, und sie werden nicht fähig sein, die Lehrverkündung aufzunehmen.“ Deshalb sagte er: „Versammle alle.“ Der Thera antwortete: „Sehr wohl, o Herr“, nahm den Schlüssel, ging von Wohnhof zu Wohnhof, versammelte alle Mönche im Hof der Duftkammer und bereitete den Buddhasitz vor. Satthā pallaṅkaṃ ābhujitvā ujuṃ kāyaṃ paṇidhāya silāpathaviyaṃ patiṭṭhahamāno sineru viya paññatte buddhāsane nisīdi āveḷāveḷā yamakayamakā chabbaṇṇaghanabuddharasmiyo vissajjento. Tāpi rasmiyo pātimattā chattamattā kūṭāgārakucchimattā chijjitvā chijjitvā gaganatale vijjulatā viya sañcariṃsu, aṇṇavakucchiṃ khobhetvā bālasūriyuggamanakālo viya ahosi. Bhikkhusaṅghopi satthāraṃ vanditvā garucittaṃ paccupaṭṭhapetvā rattakambalasāṇiyā parikkhipanto viya parivāretvā nisīdi. Satthā brahmassaraṃ nicchārento bhikkhū āmantetvā ‘‘na, bhikkhave, bhikkhunā nāma kāmavitakkaṃ byāpādavitakkaṃ vihiṃsāvitakkanti ime [Pg.528] tayo akusalavitakke vitakketuṃ vaṭṭati. Anto uppannakileso hi ‘parittako’ti avamaññituṃ na vaṭṭati, kileso nāma paccāmittasadiso. Paccāmitto ca khuddako nāma natthi, okāsaṃ labhitvā vināsameva pāpeti, evameva appamattakopi kileso uppajjitvā vaḍḍhituṃ labhanto mahāvināsaṃ pāpeti. Kileso nāmesa halāhalavisūpamo uppāṭitacchavigaṇḍasadiso āsīvisapaṭibhāgo asaniaggisadiso allīyituṃ na yutto āsaṅkitabbo. Uppannuppannakkhaṇeyeva paṭisaṅkhānabalena bhāvanābalena yathā muhuttampi hadaye aṭṭhatvā paduminipattā udakabindu viya vivaṭṭati, evaṃ pajahitabbo. Porāṇakapaṇḍi tāpi appamattakampi kilesaṃ garahitvā yathā puna abbhantare nuppajjati, evaṃ niggaṇhiṃsū’’ti vatvā atītaṃ āhari. Der Meister setzte sich mit gekreuzten Beinen nieder, hielt den Oberkörper aufrecht, thronte auf dem vorbereiteten Buddhasitz wie der majestätische Berg Sineru, der fest auf felsigem Boden steht, und entsandte dichte, sechsfarbige Buddha-Strahlen, die sich in Wogen und paarweise ausbreiteten. Jene Strahlen – von der Größe von Opferschalen, von Sonnenschirmen oder gar vom Inneren eines Turmhauses – zuckten in ununterbrochener Folge wie Blitze am Himmelsgewölbe umher. Sie wühlten die Tiefen des Ozeans auf, und es war, als ginge gerade die junge Morgensonne auf. Auch die Mönchsgemeinschaft verneigte sich vor dem Meister, erfüllte ihren Geist mit tiefer Ehrfurcht und setzte sich im Kreis um ihn herum, gleichsam als würden sie ihn mit einer roten Decke umgeben. Der Meister ließ seine erhabene, reine Stimme ertönen, wandte sich an die Mönche und sprach: „Ihr Mönche, es geziemt sich für einen Mönch wahrlich nicht, diese drei unheilsamen Gedanken zu hegen: Gedanken an Sinnenlust, Gedanken an Böswilligkeit und Gedanken an Grausamkeit. Denn man darf eine im Inneren aufsteigende Befleckung nicht mit den Worten ‚sie ist nur geringfügig‘ geringachten. Eine Befleckung gleicht nämlich einem Feind. Und einen geringfügigen Feind gibt es nicht; bietet sich ihm die Gelegenheit, bringt er gewiss das Verderben. Ebenso verhält es sich mit einer noch so geringen Befleckung: Wenn sie entsteht und Raum zum Wachsen findet, führt sie zu großem Verderben. Diese Befleckung gleicht dem tödlichen Halāhala-Gift, sie ist wie ein schmerzhaft aufgerissenes Geschwür, gleicht einer giftigen Schlange und dem Feuer eines Blitzeinschlags. Es ist unangebracht, sich an sie zu klammern; man muss sich vor ihr in Acht nehmen. In genau dem Moment, in dem sie aufsteigt, muss sie durch die Kraft der weisen Betrachtung und durch die Kraft der geistigen Entfaltung so überwunden werden, dass sie nicht einmal für einen Augenblick im Herzen verweilt, sondern abgleitet wie ein Wassertropfen auf einem Lotusblatt. Auch die Weisen vergangener Zeiten tadelten selbst eine geringe Befleckung und bezwangen sie so, dass sie im Inneren nicht wieder aufstieg.“ Nach diesen Worten trug er eine Geschichte aus der Vergangenheit vor. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto siṅgālayoniyaṃ paṭisandhiṃ gahetvā araññe nadītīre nivāsaṃ kappesi. Atheko jarahatthī gaṅgātīre kālamakāsi. Siṅgālo gocarappasuto taṃ matahatthisarīraṃ disvā ‘‘mahā me gocaro uppanno’’ti gantvā taṃ soṇḍe ḍaṃsi, naṅgalīsāya daṭṭhakālo viya ahosi. So ‘‘natthettha khāditabbayuttaka’’nti dantesu ḍaṃsi, thambhe daṭṭhakālo viya ahosi. Kaṇṇe ḍaṃsi, suppakoṭiyaṃ daṭṭhakālo viya ahosi. Udare ḍaṃsi, kusūle daṭṭhakālo viya ahosi. Pāde ḍaṃsi, udukkhale daṭṭhakālo viya ahosi. Naṅguṭṭhe ḍaṃsi, musale daṭṭhakālo viya ahosi. So ‘‘etthāpi natthi khāditabbayuttaka’’nti sabbattha assādaṃ alabhanto vaccamagge ḍaṃsi, mudupūve daṭṭhakālo viya ahosi. So ‘‘laddhaṃ dāni me imasmiṃ sarīre mudu khāditabbayuttakaṭṭhāna’’nti tato paṭṭhāya khādanto antokucchiṃ pavisitvā vakkahadayādīni khāditvā pipāsitakāle lohitaṃ pivitvā nipajjitukāmakāle udaraṃ pattharitvā nipajjati. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, nahm der Bodhisatta Wiedergeburt im Schoße eines Schakals und lebte im Wald an einem Flussufer. Damals starb am Ufer des Ganges ein alter Elefant. Als der Schakal auf Nahrungssuche umherstreifte, erblickte er den Elefantenkadaver und dachte: „Da ist mir ja eine gewaltige Beute zuteilgeworden!“ Er ging hin und biss in dessen Rüssel. Es war jedoch, als bisse er in die hölzerne Deichsel eines Pfluges. Da er dachte: „Hier gibt es nichts Genießbares“, biss er in die Stoßzähne. Es war jedoch, als bisse er in einen festen Pfosten. Er biss in die Ohren. Es war, als bisse er in den Rand einer Worfschale. Er biss in den Bauch. Es war, als bisse er in einen Getreidespeicher. Er biss in die Beine. Es war, als bisse er in einen hölzernen Mörser. Er biss in den Schwanz. Es war, als bisse er in einen hölzernen Stampfer. Da er dachte: „Auch hier gibt es nichts Genießbares“, fand er nirgends Wohlgeschmack und biss schließlich in den After. Da war es, als bisse er in einen weichen Kuchen. Er dachte: „Nun habe ich an diesem Körper endlich eine weiche, genießbare Stelle gefunden!“ Von dort an fraß er sich vorwärts, drang in das Innere des Bauches ein, fraß Nieren, Herz und die anderen Eingeweide, trank das Blut, wenn er durstig war, und wenn er schlafen wollte, machte er es sich im ausgehöhlten Bauchraum bequem und legte sich nieder. Athassa etadahosi – ‘‘idaṃ hatthisarīraṃ mayhaṃ nivāsasukhatāya gehasadisaṃ, khāditukāmatāya sati pahūtamaṃsaṃ, kiṃ dāni me aññattha kamma’’nti [Pg.529] so aññattha agantvā hatthikucchiyaṃyeva maṃsaṃ khāditvā vasati. Gacchante gacchante kāle nidāghe vātasamphassena ceva sūriyarasmisantāpena ca taṃ kuṇapaṃ sussitvā valiyo gaṇhi, siṅgālassa paviṭṭhadvāraṃ pihitaṃ, antokucchiyaṃ andhakāro ahosi. Siṅgālassa lokantarikanivāso viya jāto. Kuṇape sussante maṃsampi sussi, lohitampi pacchijji. So nikkhamanadvāraṃ alabhanto bhayappatto hutvā sandhāvanto ito cito ca paharitvā nikkhamanadvāraṃ pariyesamāno vicarati. Evaṃ tasmiṃ ukkhaliyaṃ piṭṭhapiṇḍi viya antokucchiyaṃ paccamāne katipāhaccayena mahāmegho pāvassi. Atha naṃ kuṇapaṃ temetvā uṭṭhāya pakatisaṇṭhānena aṭṭhāsi. Vaccamaggo vivaṭo hutvā tārakā viya paññāyi. Siṅgālo taṃ chiddaṃ disvā ‘‘idāni me jīvitaṃ laddha’’nti yāva hatthisīsā paṭikkamitvā vegena pakkhanditvā vaccamaggaṃ sīsena paharitvā nikkhami. Tassa sañchannasarīrattā sabbalomāni vaccamagge allīyiṃsu. So tālakkhandhasadisena nillomena sarīrena ubbiggacitto muhuttaṃ dhāvitvā nivattitvā nisinno sarīraṃ oloketvā ‘‘idaṃ dukkhaṃ mayhaṃ na aññena kataṃ, lobhahetu pana lobhakāraṇā lobhaṃ nissāya mayā etaṃ kataṃ, ito dāni paṭṭhāya na lobhavasiko bhavissāmi, puna hatthisarīraṃ nāma na pavisissāmī’’ti saṃviggahadayo hutvā imaṃ gāthamāha – Da dachte er (der Schakal): „Dieser Elefantenkadaver ist für mich wegen der Bequemlichkeit des Wohnens wie ein Haus. Da ich fressen will, gibt es hier reichlich Fleisch. Was habe ich jetzt noch anderswo zu tun?“ Ohne anderswohin zu gehen, blieb er genau im Bauch des Elefanten und fraß das Fleisch. Als die Zeit verging, trocknete dieser Kadaver im Sommer durch die Berührung mit dem Wind und die Hitze der Sonnenstrahlen aus und schrumpfte zusammen. Die Eintrittsöffnung des Schakals schloss sich, und im Inneren des Bauches wurde es finster. Für den Schakal war es, als befinde er sich in der Lokantarika-Hölle. Während der Kadaver vertrocknete, vertrocknete auch das Fleisch und das Blut versiegte. Da er keinen Ausgang fand, geriet er in Angst, lief im Inneren umher, stieß hierhin und dorthin und suchte unablässig nach einer Öffnung zum Entkommen. Während er so im Inneren des Bauches wie ein Teigkloß in einem Kochtopf geschmort wurde, fiel nach einigen Tagen ein heftiger Regenguss. Da feuchtete der Regen den Kadaver an, sodass dieser aufquoll und seine ursprüngliche Form wieder annahm. Der After öffnete sich und erschien wie ein Stern. Als der Schakal diese Öffnung sah, dachte er: „Nun ist mein Leben gerettet!“, wich bis zum Kopf des Elefanten zurück, stürmte mit voller Wucht vorwärts, stieß mit dem Kopf durch den After und entkam. Weil sein Körper so eng umschlossen war, blieben all seine Haare im After hängen. Mit einem haarlosen Körper, der einem Palmyrapalmenstamm glich, lief er mit aufgeregtem Geist einen Augenblick lang davon, kehrte dann um, setzte sich hin, betrachtete seinen Körper und dachte mit erschüttertem Herzen: „Dieses Leiden wurde mir nicht von einem anderen angetan, sondern durch Gier, aufgrund von Gier, in Abhängigkeit von Gier habe ich mir das selbst angetan. Von nun an werde ich mich nicht mehr von der Gier beherrschen lassen und nie wieder in den Körper eines Elefanten eindringen!“ Und so sprach er diese Strophe: 148. 148. ‘‘Nāhaṃ punaṃ na ca punaṃ, na cāpi apunappunaṃ; Hatthibondiṃ pavekkhāmi, tathā hi bhayatajjito’’ti. „Nicht werde ich wieder, und nicht nochmals, und auch nicht immer wieder in den Körper des Elefanten eindringen; denn wahrlich, ich bin von Todesangst gepeinigt!“ Tattha na cāpi apunappunanti a-kāro nipātamatto. Ayaṃ panetissā sakalāyapi gāthāya attho – ahañhi ito puna, tato ca punāti vuttavārato puna tatopi ca punappunaṃ vāraṇasarīrasaṅkhātaṃ hatthibondiṃ na pavekkhāmi. Kiṃkāraṇā? Tathā hi bhayatajjito, tathā hi ahaṃ imasmiññeva pavesane bhayatajjito maraṇabhayena santāsaṃ saṃvegaṃ āpāditoti. Hierbei ist in den Worten „na cāpi apunappunaṃ“ der Buchstabe „a“ bloß ein unbedeutendes Partikel. Dies aber ist der Sinn dieser gesamten Strophe: „Ich werde fürwahr weder nach diesem Mal wieder, noch danach nochmals, noch – wie es in den verschiedenen Wiederholungen heißt – immer wieder in den als Elefantenleib bezeichneten Elefantenkörper eindringen.“ Aus welchem Grund? „Denn wahrlich, ich bin von Todesangst gepeinigt“; das bedeutet: „Weil ich nämlich bei eben diesem Eindringen von Todesangst gepeinigt wurde, bin ich durch die Todesfurcht in Schrecken und tiefe Erschütterung versetzt worden.“ Evañca [Pg.530] pana vatvā tatova palāyitvā puna taṃ vā aññaṃ vā hatthisarīraṃ nivattitvāpi na olokesi. Tato paṭṭhāya na lobhavasiko ahosi. Nachdem er dies gesprochen hatte, floh er sogleich von jenem Ort und blickte weder auf jenen noch auf einen anderen Elefantenkadaver zurück, selbst nicht im Umdrehen. Von da an war er nicht mehr von Gier beherrscht. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘bhikkhave, anto uppannakilesassa nāma vaḍḍhituṃ adatvā tattha tattheva naṃ niggaṇhituṃ vaṭṭatī’’ti vatvā saccāni pakāsetvā jātakaṃ samodhānesi. Saccapariyosāne pañcasatāpi te bhikkhū arahatte patiṭṭhahiṃsu, avasesesu keci sotāpannā, keci sakadāgāmino, keci anāgāmino ahesuṃ. Tadā siṅgālo ahameva ahosinti. Nachdem der Meister diese Lehrverkündigung dargelegt hatte, sprach er: „Ihr Mönche, man darf den im Inneren entstandenen Befleckungen kein Wachstum gewähren, sondern muss sie genau dort, wo sie entstehen, bezwingen.“ Nachdem er so gesprochen und die edlen Wahrheiten verkündet hatte, stellte er die Verbindung zum Jātaka her. Am Ende der Verkündigung der Wahrheiten erlangten alle fünfhundert Mönche die Frucht der Arhatschaft; von den übrigen wurden einige Stromeingetretene, einige Einmalwiederkehrer und einige Nichtwiederkehrer. „Damals war der Schakal ich selbst“ – so schloss er das Jātaka ab. Siṅgālajātakavaṇṇanā aṭṭhamā. Die Erläuterung des Siṅgāla-Jātaka ist die achte.
[149] 9. Ekapaṇṇajātakavaṇṇanā [149] 9. Die Erläuterung des Ekapaṇṇa-Jātaka. Ekapaṇṇo ayaṃ rukkhoti idaṃ satthā vesāliṃ upanissāya mahāvane kūṭāgārasālāyaṃ viharanto vesālikaṃ duṭṭhalicchavikumāraṃ ārabbha kathesi. Tasmiñhi kāle vesālinagaraṃ gāvutagāvutantare tīhi pākārehi parikkhittaṃ tīsu ṭhānesu gopuraṭṭālakayuttaṃ paramasobhaggappattaṃ. Tattha niccakālaṃ rajjaṃ kāretvā vasantānaññeva rājūnaṃ satta sahassāni satta satāni satta ca rājāno honti, tattakāyeva uparājāno, tattakā senāpatino, tattakā bhaṇḍāgārikā. Tesaṃ rājakumārānaṃ antare eko duṭṭhalicchavikumāro nāma ahosi kodhano caṇḍo pharuso sāhasiko, daṇḍena ghaṭṭitaāsīviso viya niccaṃ pajjalito kodhena. Tassa purato dve tīṇi vacanāni kathetuṃ samattho nāma natthi. Taṃ neva mātāpitaro, na ñātayo, na mittasuhajjā sikkhāpetuṃ sakkhiṃsu. Athassa mātāpitūnaṃ etadahosi ‘‘ayaṃ kumāro atipharuso sāhasiko, ṭhapetvā sammāsambuddhaṃ añño imaṃ vinetuṃ samattho nāma natthi, buddhaveneyyena bhavitabba’’nti. Te taṃ ādāya satthu santikaṃ gantvā vanditvā āhaṃsu ‘‘bhante, ayaṃ kumāro caṇḍo pharuso kodhena pajjalati, imassa ovādaṃ dethā’’ti. „Ein einziges Blatt hat dieser Baum“ – diese Lehrrede verkündete der Meister, als er in der Nähe von Vesālī im Großen Wald in der Halle mit dem Spitzdach wohnte, bezüglich des bösartigen Licchavi-Prinzen aus Vesālī. Zu jener Zeit nämlich war die Stadt Vesālī in Abständen von je einer Meile von drei Ringmauern umgeben, an drei Stellen mit Toren und Wachtürmen versehen und von höchster Pracht erfüllt. Dort gab es stets siebentausendsiebenhundertsieben Könige, die das Reich regierten und dort wohnten, ebenso viele Vizekönige, ebenso viele Generäle und ebenso viele Schatzmeister. Unter diesen Prinzen gab es einen namens Duṭṭhalicchavi, der jähzornig, wild, grob und gewalttätig war, stets vor Zorn entbrannt wie eine mit einem Stock geschlagene Giftschlange. Es gab niemanden, der es wagte, in seiner Gegenwart auch nur zwei oder drei Worte zu sprechen. Weder seine Eltern noch seine Verwandten noch seine vertrauten Freunde vermochten ihn zu erziehen. Da dachten seine Eltern: „Dieser Prinz ist überaus grob und gewalttätig. Außer dem vollkommen Erleuchteten gibt es niemanden, der ihn zähmen könnte; er muss einer sein, der durch den Buddha zu bekehren ist.“ Sie nahmen ihn mit sich, gingen zum Meister, erwiesen ihm Ehrung und sprachen: „Ehrwürdiger Herr, dieser Prinz ist wild, grob und brennt vor Zorn. Bitte erteilt ihm eine Unterweisung.“ Satthā [Pg.531] taṃ kumāraṃ ovadi – ‘‘kumāra, imesu nāma sattesu caṇḍena pharusena sāhasikena viheṭhakajātikena na bhavitabbaṃ, pharusavāco ca nāma vijātamātuyāpi pitunopi puttadārassapi bhātibhaginīnampi pajāpatiyāpi mittabandhavānampi appiyo hoti amanāpo, ḍaṃsituṃ āgacchanto sappo viya, aṭaviyaṃ uṭṭhitacoro viya, khādituṃ āgacchanto yakkho viya ca ubbejanīyo hutvā dutiyacittavāre nirayādīsu nibbattati. Diṭṭheyeva ca dhamme kodhano puggalo maṇḍitapasādhitopi dubbaṇṇova hoti, puṇṇacandasassirikampissa mukhaṃ jālābhihatapadumaṃ viya malaggahitakañcanādāsamaṇḍalaṃ viya ca virūpaṃ hoti duddasikaṃ. Kodhaṃ nissāya hi sattā satthaṃ ādāya attanāva attānaṃ paharanti, visaṃ khādanti, rajjuyā ubbandhanti, papātā papatanti. Evaṃ kodhavasena kālaṃ katvā nirayādīsu uppajjanti, viheṭhakajātikāpi diṭṭheva dhamme garahaṃ patvā kāyassa bhedā nirayādīsu uppajjanti, puna manussattaṃ labhitvā vijātakālato paṭṭhāya rogabahulāva honti. Cakkhurogo sotarogotiādīsu ca rogesu ekato uṭṭhāya ekasmiṃ patanti, rogena aparimuttāva hutvā niccaṃ dukkhitāva honti, tasmā sabbesu sattesu mettacittena hitacittena muducittena bhavitabbaṃ. Evarūpo hi puggalo nirayādibhayehi na parimuccatī’’ti. So kumāro satthu ovādaṃ sutvā ekovādeneva nihatamāno danto nibbisevano mettacitto muducitto ahosi. Aññaṃ akkosantampi paharantampi nivattitvā na olokesi, uddhaṭadāṭho viya sappo, aḷacchinno viya kakkaṭako, chinnavisāṇo viya ca usabho ahosi. Der Meister wies jenen Prinzen zurecht: „Prinz, unter diesen Lebewesen hier soll man nicht wild, unbarmherzig, gewalttätig oder von schädigender Natur sein. Wer nämlich von rauer Rede ist, ist selbst für die eigene leibliche Mutter, den Vater, die Kinder und die Ehefrau, die Brüder und Schwestern, die Gemahlin sowie für Freunde und Verwandte unbeliebt und missfällig. Wie eine Schlange, die herbeikommt, um zu beißen, wie ein Räuber, der im dichten Wald lauert, und wie ein Yakkha, der kommt, um zu fressen, erregt er Schrecken und wird im nächsten Leben in den Höllen und anderen niederen Welten wiedergeboren. Schon im gegenwärtigen Leben ist ein zorniger Mensch, selbst wenn er geschmückt und herausgeputzt ist, von hässlichem Aussehen. Sein Antlitz, selbst wenn es sonst die Pracht des Vollmonds besitzt, wird hässlich und widerwärtig anzusehen, wie ein von Flammen versengter Lotus oder wie ein schmutzbefleckter goldener Spiegel. Denn aufgrund von Zorn greifen die Lebewesen zu Waffen und verletzen sich selbst, nehmen Gift, erhängen sich mit einem Strick oder stürzen sich von Klippen hinab. Wenn sie so unter dem Einfluss des Zorns sterben, werden sie in den Höllen und anderen niederen Welten wiedergeboren. Auch jene, die von schädigender Natur sind, ernten schon im gegenwärtigen Leben Tadel und werden nach dem Zerfall des Körpers in den Höllen und anderen niederen Welten wiedergeboren. Wenn sie danach wieder das menschliche Dasein erlangen, sind sie von Geburt an von vielen Krankheiten geplagt. Leiden wie Augenkrankheiten, Ohrenkrankheiten und andere brechen alle zugleich aus und befallen eben diesen einen Menschen. Niemals von Krankheit befreit, leiden sie beständig. Darum soll man allen Lebewesen gegenüber einen Geist voller liebender Güte, voller Wohlwollen und voller Sanftmut hegen. Denn ein solcher Mensch wird von den Schrecken der Hölle und anderer Leiden nicht befreit.“ Als der Prinz diese Unterweisung des Meisters gehört hatte, wurde er allein durch diese eine Lehre demütig, gezähmt, frei von schlechten Angewohnheiten, von liebender Güte erfüllt und sanftmütig im Geist. Selbst wenn ihn ein anderer beschimpfte oder schlug, wandte er sich nicht um, um hinzusehen. Er wurde wie eine Schlange, deren Giftzähne gezogen sind, wie eine Krabbe, deren Scheren abgebrochen sind, und wie ein Stier, dessen Hörner abgebrochen sind. Tassa taṃ pavattiṃ ñatvā bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, duṭṭhalicchavikumāraṃ sucirampi ovaditvā neva mātāpitaro, na ñātimittādayo dametuṃ sakkhiṃsu, sammāsambuddho pana taṃ ekovādeneva dametvā nibbisevanaṃ katvā mattavaravāraṇaṃ viya samuggahitāneñjakāraṇaṃ akāsi. Yāva subhāsitaṃ cidaṃ – ‘hatthidamakena, bhikkhave, hatthidammo sārito ekaṃyeva disaṃ dhāvati puratthimaṃ vā pacchimaṃ vā uttaraṃ vā dakkhiṇaṃ vā. Assadamakena…pe… godamakena…pe… dakkhiṇaṃ vā. Tathāgatena hi, bhikkhave, arahatā sammāsambuddhena purisadammo sārito aṭṭha disā vidhāvati, rūpī rūpāni passati. Ayamekā disā…pe… so [Pg.532] vuccati ‘yoggācariyānaṃ anuttaro purisadammasārathī’ti (ma. ni. 3.312). Na hi, āvuso, sammāsambuddhena sadiso purisadammasārathī nāma atthī’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, idānevesa mayā ekovādeneva damito, pubbepāhaṃ imaṃ ekovādeneva damesi’’nti vatvā atītaṃ āhari. Als die Mönche diese Verhaltensänderung erkannten, begannen sie in der Lehrhalle folgendes Gespräch: „Ihr Brüder, obwohl sie den bösen Licchavi-Prinzen lange Zeit ermahnten, vermochten weder seine Eltern noch seine Verwandten und Freunde ihn zu zähmen. Der vollkommen Erwachte jedoch hat ihn mit nur einer einzigen Unterweisung gezähmt, ihn von seinen schlechten Angewohnheiten befreit und ihn so friedvoll gemacht wie einen wilden Elefantenbullen, der die Kunst der Unerschütterlichkeit vollkommen erlernt hat. Wie trefflich gesprochen ist doch dies: ‚Mönche, ein vom Elefantenbändiger disziplinierter Elefant läuft, wenn er angetrieben wird, nur in eine einzige Richtung: nach Osten, Westen, Norden oder Süden. Ein vom Pferdebändiger [diszipliniertes Pferd]... [ebenso]... ein vom Rinderbändiger [diszipliniertes Rind]... [ebenso]. Ein vom Tathāgata, dem Würdigen, dem vollkommen Erwachten, disziplinierter Mensch jedoch läuft, wenn er angetrieben wird, in alle acht Himmelsrichtungen: Er, der Form besitzt, sieht Formen. Dies ist die erste Richtung... [und so weiter]... Er wird genannt: „Der unübertreffliche Lenker der zu bändigenden Menschen unter allen Meistern der Schulung“‘. Denn, ihr Brüder, es gibt keinen Lenker der zu bändigenden Menschen, der dem vollkommen Erwachten gleicht.“ Als der Meister herbeikam und fragte: „Mönche, worüber habt ihr gerade gesprochen, während ihr hier zusammensaßt?“, und sie antworteten: „Über dieses Thema“, sprach er: „Mönche, nicht erst jetzt habe ich ihn mit nur einer einzigen Unterweisung gezähmt; auch in der Vergangenheit habe ich ihn mit nur einer einzigen Unterweisung gezähmt.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto udiccabrāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto takkasilāyaṃ tayo vede sabbasippāni ca uggahetvā kiñci kālaṃ gharāvāsaṃ vasitvā mātāpitūnaṃ accayena isipabbajjaṃ pabbajitvā abhiññā ca samāpattiyo ca nibbattetvā himavante vāsaṃ kappesi. Tattha ciraṃ vasitvā loṇambilasevanatthāya janapadaṃ gantvā bārāṇasiṃ patvā rājuyyāne vasitvā punadivase sunivattho supāruto tāpasākappasampanno bhikkhāya nagaraṃ pavisitvā rājaṅgaṇaṃ pāpuṇi. Rājā sīhapañjarena olokento taṃ disvā iriyāpathe pasīditvā ‘‘ayaṃ tāpaso santindriyo santamānaso yugamattadaso, padavāre padavāre sahassatthavikaṃ ṭhapento viya sīhavijambhitena āgacchati. Sace santadhammo nāmeko atthi, imassa tenabbhantare bhavitabba’’nti cintetvā ekaṃ amaccaṃ olokesi. So ‘‘kiṃ karomi, devā’’ti āha. Etaṃ ‘‘tāpasaṃ ānehī’’ti. So ‘‘sādhu, devā’’ti bodhisattaṃ upasaṅkamitvā vanditvā hatthato bhikkhābhājanaṃ gahetvā ‘‘kiṃ, mahāpuññā’’ti vutte ‘‘bhante, rājā taṃ pakkosatī’’ti āha. Bodhisatto ‘‘na mayaṃ rājakulūpakā, hemavantikā nāmamhā’’ti āha. Amacco gantvā tamatthaṃ rañño ārocesi. Rājā ‘‘añño amhākaṃ kulūpako natthi, ānehi na’’nti āha. Amacco gantvā bodhisattaṃ vanditvā yācitvā rājanivesanaṃ pavesesi. Einst, als Brahmadatta in Bārāṇasī regierte, wurde der Bodhisatta in einer hochangesehenen Brahmanenfamilie geboren. Als er das Erwachsenenalter erreicht hatte, erlernte er in Takkasilā die drei Veden sowie alle Künste und Wissenschaften. Nachdem er eine Zeit lang das Leben eines Hausvaters geführt hatte, trat er nach dem Tod seiner Eltern in den Orden der Weisen ein. Er erlangte die höheren Geisteskräfte und die meditativen Vertiefungen und schlug seinen Wohnsitz im Himavanta-Gebirge auf. Nachdem er lange dort gelebt hatte, wanderte er ins bewohnte Land, um salzige und saure Speisen zu sich zu nehmen. Er erreichte Bārāṇasī, ließ sich im königlichen Park nieder und betrat am folgenden Tag – ordentlich gekleidet und umhüllt, vollkommen in der würdevollen Haltung eines Asketen – die Stadt auf der Suche nach Almosen und gelangte zum königlichen Hofplatz. Als der König aus dem Löwenfenster blickte, sah er ihn, fand Wohlgefallen an seiner würdevollen Haltung und dachte: „Dieser Asket hat gezähmte Sinne und einen friedvollen Geist. Er blickt nur eine Jochlänge weit vor sich hin und schreitet mit der Erhabenheit eines Löwen einher, als würde er bei jedem einzelnen Schritt einen Beutel mit tausend Münzen niederlegen. Wenn es so etwas wie wahren inneren Frieden gibt, dann muss er im Inneren dieses Mannes wohnen.“ Mit diesem Gedanken blickte er einen Minister an. Dieser fragte: „Was soll ich tun, o König?“ – „Bringe diesen Asketen her.“ Der Minister antwortete: „Sehr wohl, o König“, ging auf den Bodhisatta zu, verneigte sich vor ihm und nahm die Almosenschale aus seiner Hand. Als der Bodhisatta fragte: „Was gibt es, o Verdienstvoller?“, sprach er: „Ehrwürdiger, der König lässt Euch rufen.“ Der Bodhisatta sprach: „Wir sind keine Asketen, die den königlichen Hof aufsuchen; wir sind Bewohner des Himavanta.“ Der Minister ging zurück und berichtete dies dem König. Der König sprach: „Wir haben keinen anderen Hauslehrer; bringe ihn her.“ Da ging der Minister wieder hin, verneigte sich vor dem Bodhisatta, bat ihn inständig und geleitete ihn in den königlichen Palast. Rājā bodhisattaṃ vanditvā samussitasetacchatte kañcanapallaṅke nisīdāpetvā attano paṭiyattaṃ nānaggarasabhojanaṃ bhojetvā ‘‘kahaṃ, bhante, vasathā’’ti pucchi. ‘‘Hemavantikā mayaṃ, mahārājā’’ti. ‘‘Idāni kahaṃ gacchathā’’ti? ‘‘Vassārattānurūpaṃ senāsanaṃ upadhārema, mahārājā’’ti. ‘‘Tena hi, bhante, amhākaññeva uyyāne vasathā’’ti paṭiññaṃ gahetvā sayampi [Pg.533] bhuñjitvā bodhisattaṃ ādāya uyyānaṃ gantvā paṇṇasālaṃ māpetvā rattiṭṭhānadivāṭṭhānāpi kāretvā pabbajitaparikkhāre datvā uyyānapālaṃ paṭicchāpetvā nagaraṃ pāvisi. Tato paṭṭhāya bodhisatto uyyāne vasati. Rājāpissa divase divase dvattikkhattuṃ upaṭṭhānaṃ gacchati. Der König verneigte sich vor dem Bodhisatta, hieß ihn auf einem goldenen Thron unter einem aufgespannten weißen Schirm Platz nehmen und bewirtete ihn mit köstlichen Speisen von erlesenstem Geschmack, die für ihn selbst zubereitet worden waren. Dann fragte er: „Ehrwürdiger, wo wohnt Ihr?“ – „Wir wohnen im Himavanta, o großer König.“ – „Und wohin geht Ihr nun?“ – „Wir halten Ausschau nach einer Unterkunft, die für die Regenzeit geeignet ist, o großer König.“ – „Wenn dem so ist, Ehrwürdiger, dann wohnt in unserem eigenen Park.“ Nachdem der König sein Einverständnis erlangt hatte, speiste er selbst, begleitete den Bodhisatta in den Park, ließ eine Blätterhütte errichten, Plätze für den Aufenthalt bei Nacht und Tag anlegen, schenkte ihm die Utensilien eines Asketen, vertraute ihn der Obhut des Parkwächters an und kehrte in die Stadt zurück. Von da an wohnte der Bodhisatta im Park. Und auch der König suchte ihn täglich zwei- bis dreimal auf, um ihm seine Aufwartung zu machen. Tassa pana rañño duṭṭhakumāro nāma putto ahosi caṇḍo pharuso, neva naṃ rājā dametuṃ asakkhi, na sesañātakā. Amaccāpi brāhmaṇagahapatikāpi ekato hutvā ‘‘sāmi, mā evaṃ kari, evaṃ kātuṃ na labbhā’’ti kujjhitvā kathentāpi kathaṃ gāhāpetuṃ nāsakkhiṃsu. Rājā cintesi ‘‘ṭhapetvā mama ayyaṃ himavantatāpasaṃ añño imaṃ kumāraṃ dametuṃ samattho nāma natthi, soyeva naṃ damessatī’’ti. So kumāraṃ ādāya bodhisattassa santikaṃ gantvā ‘‘bhante, ayaṃ kumāro caṇḍo pharuso, mayaṃ imaṃ dametuṃ na sakkoma, tumhe naṃ ekena upāyena sikkhāpethā’’ti kumāraṃ bodhisattassa niyyādetvā pakkāmi. Bodhisatto kumāraṃ gahetvā uyyāne vicaranto ekato ekena, ekato ekenāti dvīhiyeva pattehi ekaṃ nimbapotakaṃ disvā kumāraṃ āha – ‘‘kumāra, etassa tāva rukkhapotakassa paṇṇaṃ khāditvā rasaṃ jānāhī’’ti? So tassa ekaṃ pattaṃ khāditvā rasaṃ ñatvā ‘‘dhī’’ti saha kheḷena bhūmiyaṃ nuṭṭhābhi. ‘‘Kiṃ etaṃ, kumārā’’ti vutte ‘‘bhante, idānevesa rukkho halāhalavisūpamo, vaḍḍhanto pana bahū manusse māressatī’’ti taṃ nimbapotakaṃ uppāṭetvā hatthehi parimadditvā imaṃ gāthamāha – Dieser König hatte jedoch einen Sohn namens Prinz Duṭṭha, welcher wild und jähzornig war. Weder der König noch die übrigen Verwandten vermochten ihn zu bändigen. Selbst als die Minister sowie die Brahmanen und Hausväter sich vereinten und ihn im Zorn ermahnten: „Herr, tu das nicht! So etwas darf man nicht tun!“, gelang es ihnen nicht, ihn auf ihre Worte hören zu lassen. Da dachte der König: „Abgesehen von meinem verehrten Lehrer, dem Einsiedler im Himavanta, gibt es niemanden, der imstande wäre, diesen Prinzen zu bändigen. Nur er allein wird ihn zähmen.“ Er nahm den Prinzen mit sich, ging zum Bodhisatta und sprach: „Ehrwürdiger Herr, dieser Prinz ist wild und jähzornig, wir vermögen ihn nicht zu bändigen. Bitte lehrt ihn durch ein geeignetes Mittel.“ Nachdem er den Prinzen dem Bodhisatta übergeben hatte, ging er fort. Der Bodhisatta nahm den Prinzen mit sich und erblickte, als er im Garten umherging, einen jungen Nimba-Baum, der an jeder Seite nur ein einziges Blatt trug, also insgesamt nur zwei Blätter hatte. Er sprach zum Prinzen: „Prinz, iss einmal ein Blatt dieses jungen Baumes und lerne seinen Geschmack kennen.“ Dieser kaute auf einem seiner Blätter, erkannte den bitteren Geschmack, rief „Pfui!“ und spie es mitsamt dem Speichel auf die Erde aus. Auf die Frage: „Was ist das, Prinz?“, antwortete er: „Ehrwürdiger Herr, schon jetzt gleicht dieser junge Baum dem tödlichen Halāhala-Gift. Wenn er erst groß wird, wird er gewiss viele Menschen töten.“ Daraufhin riss er den jungen Nimba-Baum aus, zerrieb ihn mit den Händen und sprach diese Strophe: 149. 149. ‘‘Ekapaṇṇo ayaṃ rukkho, na bhūmyā caturaṅgulo; Phalena visakappena, mahāyaṃ kiṃ bhavissatī’’ti. „Dieser Baum hat nur ein einziges Blatt auf jeder Seite und ragt noch keine vier Finger breit aus der Erde empor. Wenn er erst groß ist, was wird er dann wohl sein, da seine Früchte wie tödliches Gift sein werden?“ Tattha ekapaṇṇoti ubhosu passesu ekekapaṇṇo. Na bhūmyā caturaṅguloti bhūmito caturaṅgulamattampi na vaḍḍhito. Phalenāti phalarasena. Visakappenāti halāhalavisasadisena. Evaṃ khuddakopi samāno evarūpena tittakena paṇṇena samannāgatoti attho. Mahāyaṃ kiṃ bhavissatīti yadā panāyaṃ vuddhippatto mahā bhavissati, tadā kiṃ nāma bhavissati, addhā manussamārako bhavissatīti etaṃ uppāṭetvā madditvā chaḍḍesinti āha. Darin bedeutet „ekapaṇṇo“ (einblättrig), dass er auf beiden Seiten jeweils nur ein einziges Blatt hat. „na bhūmyā caturaṅgulo“ (nicht vier Finger breit aus der Erde) bedeutet, dass er von der Erde aus noch nicht einmal um das Maß von vier Fingern gewachsen ist. „phalena“ (durch die Frucht) meint durch den Geschmack der Frucht. „visakappenā“ (giftähnlich) bedeutet ähnlich dem tödlichen Halāhala-Gift. Der Sinn ist: Obwohl er so klein ist, ist er bereits mit einem solch bitteren Blatt ausgestattet. „mahāyaṃ kiṃ bhavissatī“ (was wird dieser sein, wenn er groß ist?) bedeutet: Wenn dieser Baum einmal ausgewachsen und groß sein wird, was wird er dann wohl tun? Er wird gewiss ein Menschenmörder werden. In diesem Sinne sagte er, dass er ihn ausgerissen, zerrieben und weggeworfen habe. Atha [Pg.534] naṃ bodhisatto etadavoca ‘‘kumāra, tvaṃ imaṃ nimbapotakaṃ ‘idāneva evaṃtittako, mahallakakāle kiṃ bhavissati, kuto imaṃ nissāya vuḍḍhī’ti uppāṭetvā madditvā chaḍḍesi? Yathā tvaṃ etasmiṃ paṭipajji, evameva tava raṭṭhavāsinopi ‘ayaṃ kumāro daharakāleyeva evaṃ caṇḍo pharuso, mahallakakāle rajjaṃ patvā kiṃ nāma karissati, kuto amhākaṃ etaṃ nissāya vuḍḍhī’ti tava kulasantakaṃ rajjaṃ adatvā nimbapotakaṃ viya taṃ uppāṭetvā raṭṭhā pabbājanīyakammaṃ karissanti, tasmā nimbarukkhapaṭibhāgataṃ hitvā ito paṭṭhāya khantimettānuddayasampanno hohī’’ti. So tato paṭṭhāya nihatamāno nibbisevano khantimettānuddayasampanno hutvā bodhisattassa ovāde ṭhatvā pitu accayena rajjaṃ patvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ agamāsi. Da sprach der Bodhisatta zu ihm: „Prinz, du hast diesen jungen Nimba-Baum mit dem Gedanken ausgerissen, zerrieben und weggeworfen: ‚Schon jetzt ist er so bitter, was wird er dann erst im Alter sein? Wie soll durch ihn Gutes erwachsen?‘ Ebenso wie du an diesem Baum gehandelt hast, so werden auch die Einwohner deines Reiches denken: ‚Dieser Prinz ist schon in seiner Jugend so wild und jähzornig. Was wird er erst tun, wenn er im Alter die Herrschaft erlangt? Wie soll uns durch ihn Gutes erwachsen?‘ Sie werden dir das Königreich deiner Familie nicht übergeben, sondern dich wie diesen jungen Nimba-Baum ausreißen und aus dem Reich verbannen. Lege daher von heute an die Ähnlichkeit mit dem Nimba-Baum ab und sei voller Geduld, Güte und Mitgefühl.“ Von da an war sein Stolz gebrochen, er gab böse Gewohnheiten auf, wurde geduldig, gütig und mitfühlend, hielt sich an die Unterweisung des Bodhisatta und erlangte nach dem Tod seines Vaters die Königsherrschaft. Nachdem er heilsame Taten wie das Geben von Almosen vollbracht hatte, ging er gemäß seinem Karma fort. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā ‘‘na, bhikkhave, idānevesa duṭṭhalicchavikumāro mayā damito, pubbepāhaṃ etaṃ damesiṃyevā’’ti vatvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā duṭṭhakumāro ayaṃ licchavikumāro ahosi, rājā ānando, ovādadāyakatāpaso pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrrede vorgetragen hatte, sprach er: „Nicht erst jetzt, ihr Mönche, wurde dieser böse Licchavi-Prinz von mir gebändigt, schon in der Vergangenheit habe ich ihn gezähmt“, und verband die Wiedergeburten: „Damals war der böse Prinz dieser Licchavi-Prinz, der König war Ānanda, und der die Unterweisung erteilende Einsiedler war ich selbst.“ Ekapaṇṇajātakavaṇṇanā navamā. Die Erklärung des Ekapaṇṇa-Jātaka, die neunte, ist abgeschlossen.
[150] 10. Sañjīvajātakavaṇṇanā [150] 10. Die Erklärung des Sañjīva-Jātaka. Asantaṃ yo paggaṇhātīti idaṃ satthā veḷuvane viharanto ajātasattussa rañño asantapaggahaṃ ārabbha kathesi. So hi buddhānaṃ paṭikaṇṭakabhūte dussīle pāpadhamme devadatte pasīditvā taṃ asantaṃ asappurisaṃ paggayha ‘‘tassa sakkāraṃ karissāmī’’ti bahuṃ dhanaṃ pariccajitvā gayāsīse vihāraṃ kāretvā tasseva vacanaṃ gahetvā pitaraṃ dhammarājānaṃ sotāpannaṃ ariyasāvakaṃ ghātetvā attano sotāpattimaggassa upanissayaṃ bhinditvā mahāvināsaṃ patto. So hi ‘‘devadatto pathaviyaṃ paviṭṭho’’ti sutvā ‘‘kacci nu kho mampi pathavī gileyyā’’ti bhītatasito rajjasukhaṃ na labhati, sayane assādasukhaṃ na vindati, tibbakāraṇābhitunno hatthipoto viya kampamāno vicarati. So pathaviṃ phalamānaṃ [Pg.535] viya, avīcijālaṃ nikkhamantiṃ viya, pathaviyā attānaṃ giliyamānaṃ viya, ādittāya lohapathaviyā uttānakaṃ nipajjāpetvā ayasūlehi koṭiyamānaṃ viya ca samanupassi. Tenassa pahaṭakukkuṭasseva muhuttampi kampamānassa avatthānaṃ nāma nāhosi. So sammāsambuddhaṃ passitukāmo khamāpetukāmo pañhaṃ pucchitukāmo ahosi, attano pana aparādhamahantatāya upasaṅkamituṃ na sakkoti. „Wer den Unwürdigen begünstigt“ – diese Lehrrede sprach der Meister, als er im Veḷuvana-Kloster verweilte, bezüglich der Begünstigung eines Unwürdigen durch den König Ajātasattu. Dieser nämlich hatte Vertrauen zu Devadatta gefasst, der ein Widersacher der Buddhas, tugendlos und von schlechtem Charakter war. Er begünstigte diesen unwürdigen, schlechten Menschen und dachte: „Ich will ihm Ehrung erweisen“, gab viel Geld aus, ließ auf dem Gayāsīsa ein Kloster errichten, befolgte dessen Worte, tötete seinen Vater, einen gerechten König, der ein Stromeingetretener und edler Jünger war, zerstörte dadurch seine eigene Unterstützung für den Pfad des Stromeintritts und geriet in tiefes Verderben. Als er nämlich hörte, dass Devadatta in die Erde versunken war, überkam ihn Furcht und Schrecken, und er dachte: „Wird mich die Erde vielleicht auch verschlingen?“ Er fand kein Glück mehr in der Königsherrschaft und keine Freude auf seinem Lager, sondern wanderte zitternd umher wie ein junger Elefant, der von heftigen Qualen geplagt wird. Es kam ihm so vor, als ob sich die Erde spaltete, als ob die Flammen der Avīci-Hölle herausschlügen, als ob die Erde ihn selbst verschlänge und als ob er rücklings auf einer glühenden Eisenfläche hingelegt und mit eisernen Spießen erstochen würde. Deshalb fand er, der zitterte wie ein geschlagener Hahn, nicht einmal für einen Augenblick Ruhe. Er wünschte, den vollkommen Erleuchteten zu sehen, ihn um Vergebung zu bitten und ihm Fragen zu stellen; doch aufgrund der Schwere seiner eigenen Schuld war er nicht imstande, sich ihm zu nähern. Athassa rājagahanagare kattikarattivāre sampatte devanagaraṃ viya nagare alaṅkate mahātale amaccagaṇaparivutassa kañcanāsane nisinnassa jīvakaṃ komārabhaccaṃ avidūre nisinnaṃ disvā etadahosi ‘‘jīvakaṃ gahetvā sammāsambuddhassa santikaṃ gamissāmi, na kho pana sakkā mayā ujukameva vattuṃ ‘ahaṃ, samma jīvaka, sayaṃ gantuṃ na sakkomi, ehi maṃ satthu santikaṃ nehī’ti, pariyāyena pana rattisampadaṃ vaṇṇetvā ‘kaṃ nu khvajja mayaṃ samaṇaṃ vā brāhmaṇaṃ vā payirupāseyyāma, yaṃ no payirupāsataṃ cittaṃ pasīdeyyā’ti vakkhāmi, taṃ sutvā amaccā attano attano satthārānaṃ vaṇṇaṃ kathessanti, jīvakopi sammāsambuddhassa vaṇṇaṃ kathessati. Atha naṃ gahetvā satthu santikaṃ gamissāmī’’ti. So pañcahi padehi rattiṃ vaṇṇesi ‘‘lakkhaññā vata bho dosinā ratti, abhirūpā vata bho dosinā ratti, dassanīyā vata bho dosinā ratti, pāsādikā vata bho dosinā ratti, ramaṇīyā vata bho dosinā ratti, kaṃ nu khvajja mayaṃ samaṇaṃ vā brāhmaṇaṃ vā payirupāseyyāma, yaṃ no payirupāsataṃ cittaṃ pasīdeyyā’’ti (dī. ni. 1.150). Als nun in der Stadt Rājagaha das Fest der Kattikā-Vollmondnacht herangekommen war und die Stadt wie eine Götterstadt geschmückt war, dachte König Ajātasattu, der auf einem goldenen Thron auf der oberen Terrasse des Palastes saß, umgeben von einer Schar von Ministern, als er Jīvaka Komārabhacca unweit von sich sitzen sah: „Ich werde Jīvaka mitnehmen und mich zum Erhabenen, dem vollkommen Erwachten, begeben. Doch es schickt sich für mich nicht, direkt zu sagen: ‚Mein lieber Jīvaka, ich selbst kann nicht gehen; komm und bringe mich in die Gegenwart des Meisters.‘ Vielmehr werde ich auf indirekte Weise die Vollkommenheit der Nacht preisen und sagen: ‚Welchen Asketen oder Brahmanen sollten wir heute aufsuchen, durch dessen Aufsuchen unser Geist heiter gestimmt würde?‘ Wenn die Minister dies hören, werden sie das Lob ihrer jeweiligen Lehrer verkünden, und auch Jīvaka wird das Lob des vollkommen Erwachten verkünden. Dann werde ich ihn mitnehmen und mich in die Gegenwart des Meisters begeben.“ Er pries die Nacht mit pfirsichfarbenen, fünf Sätzen: „Wahrlich, ihr Herren, wie glanzvoll ist diese mondhelle Nacht! Wahrlich, ihr Herren, wie wunderschön ist diese mondhelle Nacht! Wahrlich, ihr Herren, wie lieblich anzusehen ist diese mondhelle Nacht! Wahrlich, ihr Herren, wie herzerfreuend ist diese mondhelle Nacht! Wahrlich, ihr Herren, wie entzückend ist diese mondhelle Nacht! Welchen Asketen oder Brahmanen sollten wir heute aufsuchen, durch dessen Aufsuchen unser Geist heiter gestimmt würde?“ Atheko amacco pūraṇakassapassa vaṇṇaṃ kathesi, eko makkhaligosālassa, eko ajitakesakambalassa, eko pakudhakaccāyanassa, eko sañcayassa belaṭṭhaputtassa, eko nāṭaputtanigaṇṭhassāti. Rājā tesaṃ kathaṃ sutvā tuṇhī ahosi. So hi jīvakasseva mahāamaccassa kathaṃ paccāsīsati. Jīvakopi ‘‘raññā maṃ ārabbha kathiteyeva jānissāmī’’ti avidūre tuṇhī nisīdi. Atha naṃ rājā āha ‘‘tvaṃ pana, samma jīvaka, kiṃ tuṇhī’’ti? Tasmiṃ khaṇe jīvako uṭṭhāyāsanā yena bhagavā tenañjaliṃ paṇāmetvā ‘‘eso, deva, bhagavā [Pg.536] arahaṃ sammāsambuddho amhākaṃ ambavane viharati saddhiṃ aḍḍhateḷasehi bhikkhusatehi. Taṃ kho pana bhagavantaṃ evaṃ kalyāṇo kittisaddo abbhuggato’’ti nava arahādiguṇe vatvā jātito paṭṭhāya pubbanimittādibhedaṃ bhagavato ānubhāvaṃ pakāsetvā ‘‘taṃ bhagavantaṃ devo payirupāsatu, dhammaṃ suṇātu, pañhaṃ pucchatū’’ti āha. Da verkündete ein Minister das Lob von Pūraṇa Kassapa, einer das von Makkhali Gosāla, einer das von Ajita Kesakambala, einer das von Pakudha Kaccāyana, einer das von Sañjaya Belaṭṭhaputta und einer das von Nigaṇṭha Nātaputta. Als der König ihre Worte hörte, schwieg er. Denn er erwartete nur die Worte des großen Ministers Jīvaka. Auch Jīvaka saß schweigend unweit von ihm und dachte: „Erst wenn der König sich auf mich bezieht und spricht, werde ich antworten.“ Da sprach der König zu ihm: „Und du, mein lieber Jīvaka, warum schweigst du?“ In diesem Moment erhob sich Jīvaka von seinem Sitz, neigte seine zusammengelegten Hände ehrfurchtsvoll in die Richtung, in der sich der Erhabene befand, und sprach: „O König, jener Erhabene, der Würdige, der vollkommen Erwachte, weilt in unserem Mango-Hain zusammen mit zwölfhundertfünfzig Mönchen. Über diesen Erhabenen ist folgender herrliche Ruf erschollen ...“ Indem er so die neun Eigenschaften, beginnend mit ‚arahaṃ‘, pries und die Erhabenheit des Erhabenen von seiner Geburt an, einschließlich der Vorzeichen und anderer Wunder, offenbarte, sagte er: „Möge der König diesen Erhabenen aufsuchen, der Lehre lauschen und ihm Fragen stellen.“ Rājā sampuṇṇamanoratho hutvā ‘‘tena hi, samma jīvaka, hatthiyānāni kappāpehī’’ti yānāni kappāpetvā mahantena rājānubhāvena jīvakambavanaṃ gantvā tattha maṇḍalamāḷe bhikkhusaṅghaparivutaṃ tathāgataṃ disvā santavīcimajjhe mahānāvaṃ viya niccalaṃ bhikkhusaṅghaṃ ito cito ca anuviloketvā ‘‘evarūpā nāma me parisā na diṭṭhapubbā’’ti iriyāpatheyeva pasīditvā saṅghassa añjaliṃ paggaṇhitvā thutiṃ katvā bhagavantaṃ vanditvā ekamantaṃ nisinno sāmaññaphalapañhaṃ pucchi. Athassa bhagavā dvīhi bhāṇavārehi paṭimaṇḍitaṃ sāmaññaphalasuttaṃ (dī. ni. 1.150 ādayo) kathesi. So suttapariyosāne attamano bhagavantaṃ khamāpetvā uṭṭhāyāsanā padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi. Satthā acirapakkantassa rañño bhikkhū āmantetvā ‘‘khatāyaṃ, bhikkhave, rājā, upahatāyaṃ, bhikkhave, rājā. Sacāyaṃ, bhikkhave, rājā issariyassa kāraṇā pitaraṃ dhammikaṃ dhammarājānaṃ jīvitā na voropessatha, imasmiṃyeva āsane virajaṃ vītamalaṃ dhammacakkhuṃ uppajjissatha. Devadattaṃ nissāya asantapaggahaṃ katvā sotāpattiphalā parihīno’’ti āha. Da war der König mit erfülltem Herzen erfreut und sprach: „Nun denn, mein lieber Jīvaka, lass die Reitelefanten bereiten!“ Nachdem er die Reittiere bereiten gelassen hatte, begab er sich in großer königlicher Pracht zum Mango-Hain Jīvakas. Als er dort in der Rundhalle den vom Orden der Mönche umgebenen Vollendeten sah, blickte er auf die Mönchsgemeinschaft, die völlig regungslos wie ein großes Schiff inmitten sanfter Wellen war, schaute hierhin und dorthin und dachte: „Eine solche Versammlung habe ich wahrlich noch nie zuvor gesehen.“ Allein durch ihre würdevolle Haltung fasste er tiefes Vertrauen, erhob die zusammengelegten Hände ehrfurchtsvoll vor der Mönchsgemeinschaft, sprach Worte des Lobes, erwies dem Erhabenen seine Ehrerbietung, setzte sich zur Seite nieder und stellte die Frage nach den Früchten des Asketentums. Da verkündete ihm der Erhabene die Sāmaññaphala-Lehrrede, geschmückt mit zwei Rezitationsabschnitten. Am Ende der Lehrrede war der König hocherfreut, bat den Erhabenen um Vergebung, erhob sich von seinem Sitz, umwandelte ihn ehrfurchtsvoll rechtsherum und ging davon. Kurz nach dem Fortgehen des Königs sprach der Meister zu den Mönchen: „Verdorben ist dieser König, o Mönche; zugrunde gerichtet ist dieser König, o Mönche! Wenn dieser König nicht um der Herrschaft willen seinen gerechten Vater, den König des Rechts, um das Leben gebracht hätte, so wäre in ihm noch auf eben diesem Sitz das staubfreie, makellose Auge der Lehre entstanden. Doch weil er sich an Devadatta hielt und den Unwürdigen ehrte, ist er um die Frucht des Stromeintritts gebracht worden.“ Punadivase bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ ‘‘āvuso, ajātasattu kira asantapaggahaṃ katvā dussīlaṃ pāpadhammaṃ devadattaṃ nissāya pitughātakakammassa katattā sotāpattiphalā parihīno, devadattena nāsito rājā’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāmā’’ti vutte ‘‘na, bhikkhave, ajātasattu idāneva asantapaggahaṃ katvā mahāvināsaṃ patto, pubbepesa asantapaggaheneva attānaṃ nāsesī’’ti vatvā atītaṃ āhari. Am folgenden Tag brachten die Mönche in der Versammlungshalle folgendes Gespräch in Gang: „Ihr Brüder, man sagt, dass König Ajātasattu, weil er den Unwürdigen ehrte und sich an den tugendlosen, bösartigen Devadatta hielt, durch die Tat des Vatermords um die Frucht des Stromeintritts gebracht wurde. Der König wurde durch Devadatta ins Verderben gestürzt!“ Als der Meister herzutrat, fragte er: „Zu welchem Gespräch habt ihr euch hier versammelt, o Mönche?“ Als sie antworteten: „Zu diesem und jenem“, sprach er: „Nicht erst jetzt, o Mönche, hat Ajātasattu durch die Ehrung des Unwürdigen großes Verderben erlitten; schon in der Vergangenheit hat er sich durch die Ehrung des Unwürdigen selbst ins Verderben gestürzt.“ Nach diesen Worten erzählte er eine Geschichte aus der Vergangenheit. Atīte bārāṇasiyaṃ brahmadatte rajjaṃ kārente bodhisatto mahāvibhave brāhmaṇakule nibbattitvā vayappatto takkasilaṃ gantvā sabbasippāni [Pg.537] uggaṇhitvā bārāṇasiyaṃ disāpāmokkho ācariyo hutvā pañca māṇavakasatāni sippaṃ vācesi. Tesu māṇavesu eko sañjīvo nāma māṇavo atthi, bodhisatto tassa matakuṭṭhāpanakamantaṃ adāsi. So uṭṭhāpanakamantameva gahetvā paṭibāhanamantaṃ pana aggahetvāva ekadivasaṃ māṇavehi saddhiṃ dāruatthāya araññaṃ gantvā ekaṃ matabyagghaṃ disvā māṇave āha ‘‘bho, imaṃ matabyagghaṃ uṭṭhāpessāmī’’ti. Māṇavā ‘‘na sakkhissasī’’ti āhaṃsu. ‘‘Passantānaññeva vo taṃ uṭṭhāpessāmī’’ti. ‘‘Sace, māṇava, sakkosi, uṭṭhāpehī’’ti. Evañca pana vatvā te māṇavā rukkhaṃ abhiruhiṃsu. Sañjīvo mantaṃ parivattetvā matabyagghaṃ sakkharāhi pahari, byaggho uṭṭhāya vegenāgantvā sañjīvaṃ galanāḷiyaṃ ḍaṃsitvā jīvitakkhayaṃ pāpetvā tattheva pati, sañjīvopi tattheva pati. Ubhopi ekaṭṭhāneyeva matā nipajjiṃsu. In der Vergangenheit, als Brahmadatta in Bārāṇasī herrschte, wurde der Bodhisatta in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie geboren. Als er herangewachsen war, begab er sich nach Takkasilā, erlernte alle Künste und wurde in Bārāṇasī zu einem weltberühmten Lehrer, der fünfhundert junge Brahmanen in den Künsten unterrichtete. Unter diesen Schülern gab es einen namens Sañjīva. Der Bodhisatta lehrte ihn ein Mantra, das Tote wieder zum Leben erwecken konnte. Da jener zwar das Mantra zum Erwecken gelernt hatte, nicht aber das Mantra zur Abwehr, ging er eines Tages mit den anderen Schülern in den Wald, um Holz zu sammeln. Als er einen toten Tiger sah, sagte er zu den Schülern: „Ihr Herren, ich werde diesen toten Tiger wieder zum Leben erwecken!“ Die Schüler sagten: „Das wirst du nicht vermögen.“ Er erwiderte: „Vor euren Augen werde ich ihn auferstehen lassen!“ – „Wenn du es kannst, junger Mann, dann erwecke ihn zum Leben!“, sagten sie. Nach diesen Worten kletterten die Schüler auf einen Baum. Sañjīva rezitierte das Mantra und bewarf den toten Tiger mit Kieselsteinen. Der Tiger erhob sich, stürzte im Nu herbei, biss Sañjīva in die Kehle, tötete ihn auf der Stelle und brach genau dort zusammen. Auch Sañjīva stürzte genau dort nieder. Beide lagen tot an ein und derselben Stelle. Māṇavā dārūni ādāya āgantvā taṃ pavattiṃ ācariyassa ārocesuṃ. Ācariyo māṇave āmantetvā ‘‘tātā, asantapaggahakārā nāma ayuttaṭṭhāne sakkārasammānaṃ karontā evarūpaṃ dukkhaṃ paṭilabhantiyevā’’ti vatvā imaṃ gāthamāha – Die Schüler sammelten das Holz, kehrten zurück und berichteten dem Lehrer von diesem Vorfall. Der Lehrer wandte sich an die Schüler und sprach: „Ihr Lieben, diejenigen, welche die Unwürdigen ehren und an ungeeigneter Stelle Verehrung und Achtung erweisen, erleiden wahrlich ein solches Leid.“ Daraufhin sprach er diese Strophe: 150. 150. ‘‘Asantaṃ yo paggaṇhāti, asantaṃ cūpasevati; Tameva ghāsaṃ kurute, byaggho sañjīviko yathā’’ti. „Wer den Unwürdigen begünstigt und dem Unwürdigen dient, der macht eben diesen zu seinem eigenen Verzehrer, so wie der Tiger den Sañjīva.“ Tattha asantanti tīhi duccaritehi samannāgataṃ dussīlaṃ pāpadhammaṃ. Yo paggaṇhātīti khattiyādīsu yo koci evarūpaṃ dussīlaṃ pabbajitaṃ vā cīvarādisampadānena, gahaṭṭhaṃ vā uparajjasenāpatiṭṭhānādisampadānena paggaṇhāti, sakkārasammānaṃ karotīti attho. Asantaṃ cūpasevatīti yo ca evarūpaṃ asantaṃ dussīlaṃ upasevati bhajati payirupāsati. Tameva ghāsaṃ kuruteti tameva asantapaggaṇhakaṃ so dussīlo pāpapuggalo ghasati saṃkhādati vināsaṃ pāpeti. Kathaṃ? Byaggho sañjīviko yathāti, yathā sañjīvena māṇavena mantaṃ parivattetvā matabyaggho sañjīviko jīvitasampadānena sampaggahito attano jīvitadāyakaṃ sañjīvameva jīvitā voropetvā tattheva pātesi, evaṃ aññopi yo asantapaggahaṃ karoti, so dussīlo taṃ attano sampaggāhakameva vināseti. Evaṃ asantasampaggāhakā vināsaṃ pāpuṇantīti. Darin bedeutet 'den Schlechten' (asantaṃ): einen, der mit den drei schlechten Verhaltensweisen behaftet, sittenlos und von bösem Charakter ist. 'Wer ihn unterstützt' (yo paggaṇhāti) bedeutet: wer auch immer unter den Kṣatriyas und so weiter einen solchen Sittenlosen unterstützt – sei es einen Ordinierten durch die Gabe von Roben und so weiter, oder einen Hausvater durch das Verleihen von Ämtern wie dem des Vizekönigs oder des Generals –, wer ihm also Ehre und Respekt erweist; das ist die Bedeutung. 'Und dem Schlechten dient' (asantaṃ cūpasevati) bedeutet: wer sich mit einem solchen schlechten, Sittenlosen einlässt, sich ihm anschließt und ihn verehrt. 'Macht eben diesen zu seinem Fraß' (tameva ghāsaṃ kurute) bedeutet: eben diesen, der den Schlechten unterstützt, verschlingt, zermalmt und vernichtet dieser sittenlose, böse Mensch. Wie? 'Wie der Tiger durch Sañjīva' (byaggho sañjīviko yathā): Wie der tote Tiger, der durch den Jüngling Sañjīva, welcher ein Mantra rezitierte, zum Leben erweckt und durch das Schenken des Lebens begünstigt wurde, eben diesen Sañjīva, seinen Lebensspender, des Lebens beraubte und genau dort niederstreckte; ebenso vernichtet auch bei jedem anderen, der einen Schlechten unterstützt, dieser Sittenlose eben seinen eigenen Unterstützer. So geraten diejenigen, die die Schlechten unterstützen, ins Verderben. Bodhisatto [Pg.538] imāya gāthāya māṇavānaṃ dhammaṃ desetvā dānādīni puññāni katvā yathākammaṃ gato. Nachdem der Bodhisatta den Jünglingen mit dieser Strophe die Lehre dargelegt und verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosen und anderes vollbracht hatte, ging er gemäß seinem Karma dahin. Satthā imaṃ dhammadesanaṃ āharitvā jātakaṃ samodhānesi – ‘‘tadā matabyagghuṭṭhāpanako māṇavo ajātasattu ahosi, disāpāmokkho ācariyo pana ahameva ahosi’’nti. Nachdem der Meister diese Lehrdarlegung vorgetragen hatte, verknüpfte er das Jātaka: „Damals war der Jüngling, der den toten Tiger zum Leben erweckte, Ajātasattu, der weltberühmte Lehrer aber war ich selbst.“ Sañjīvajātakavaṇṇanā dasamā. Die Erklärung des Sañjīva-Jātaka, die zehnte, ist beendet. Kakaṇṭakavaggo pannarasamo. Das Kakaṇṭaka-Kapitel, das fünfzehnte. Tassuddānaṃ – Die Inhaltsübersicht dazu: Godhasiṅgālavirocaṃ, naṅguṭṭharādhakākañca; Puppharattañca siṅgālaṃ, ekapaṇṇañca sañjīvaṃ. Die Jātakas über die Eidechse (Godha), den Schakal (Siṅgāla), Virocana, das Schwanzende (Naṅguṭṭha), Rādhā und die Krähe (Kāka), ferner über die rotgefärbte Blume (Puppharatta), den Schakal, das eine Blatt (Ekapaṇṇa) und Sañjīva. Atha vagguddānaṃ – Nun folgt die Zusammenfassung des Kapitels: Apaṇṇako sīlavaggo, kuruṅgo ca kulāvako; Atthakāmo ca āsīso, itthīvaruṇapāyimhā. Das Apaṇṇaka-Kapitel, das Sīla-Kapitel, das Kuruṅga- und das Kulāvaka-Kapitel; das Atthakāma- und das Āsīsa-Kapitel, das Itthī-, das Varuṇa- und das Apāyimha-Kapitel. Litto parosataṃ haṃci, kusanāḷā sampadāno; Kakaṇṭako pannarasa, satapaṇṇāsa jātakāti. Das Litta-, das Parosata-, das Hāri-, das Kusanāḷi-, das Sampadāna- und das Kakaṇṭaka-Kapitel; dies sind fünfzehn Kapitel mit einhundertfünfzig Jātakas. Ekakanipātavaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung des Einer-Buchs (Ekakanipāta) ist abgeschlossen. (Paṭhamo bhāgo niṭṭhito). (Der erste Teil ist abgeschlossen.) | |||
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| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |