| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
Namo tassa bhagavato arahato sammāsambuddhassa Verehrung dem Erhabenen, dem Würdigen, dem vollkommen Erwachten. Khuddakanikāye Im Khuddaka-Nikāya Apadāna-aṭṭhakathā Die Erläuterung (Aṭṭhakathā) zum Apadāna (Paṭhamo bhāgo) (Erster Teil) Ganthārambhakathā Einleitungsworte zum Werk Vanditvā [Pg.1] sirasā seṭṭhaṃ, buddhamappaṭipuggalaṃ; Ñeyyasāgaramuttiṇṇaṃ, tiṇṇaṃ saṃsārasāgaraṃ. Nachdem ich mit meinem Haupte den Buddha verehrt habe – den Vorzüglichsten, den Unvergleichlichen, der den Ozean des Wissenswerten überquert hat und den Ozean des Saṃsāra überquert hat. Tatheva paramaṃ santaṃ, gambhīraṃ duddasaṃ aṇuṃ; Bhavābhavakaraṃ suddhaṃ, dhammaṃ sambuddhapūjitaṃ. Ebenso [verehre ich] die reine, vom vollkommen Erwachten verehrte Lehre (Dhamma) – die höchste, friedvolle, tiefe, schwer zu sehende, subtile, die das Werden in den verschiedenen Daseinsformen [beendet]. Tatheva anaghaṃ saṅghaṃ, asaṅgaṃ saṅghamuttamaṃ; Uttamaṃ dakkhiṇeyyānaṃ, santindriyamanāsavaṃ. Ebenso [verehre ich] die edle Gemeinschaft (Sangha) – die makellose, anhaftungsfreie, höchste Gemeinschaft, die Höchste unter den Spendenwürdigen, mit beruhigten Sinnen und frei von Trieben. Katena tassa etassa, paṇāmena visesato; Ratanattaye visesena, visesassādarena me. Durch diese von mir in besonderer Weise dargebrachte Ehrerbietung mit tiefer Ehrfurcht gegenüber diesen Drei Juwelen, Therehi dhīradhīrehi, āgamaññūhi viññubhi; ‘‘Apadānaṭṭhakathā bhante, kātabbā’’ti visesato.Punappunādareneva, yācitohaṃ yasassibhi; Tasmāhaṃ sāpadānassa, apadānassasesato. Da ich von den weisen Älteren (Theras), den Kennern der Überlieferung und Weisen, wieder und wieder mit aufrichtiger Ehrfurcht gebeten wurde: 'Ehrwürdiger, ein Kommentar zum Apadāna sollte im Besonderen verfasst werden!', werde ich daher für das Apadāna samt seinen Entstehungsgeschichten vollständig Visesanayadīpassa, dīpissaṃ piṭakattaye; Yathā pāḷinayeneva, atthasaṃvaṇṇanaṃ subhaṃ. die vorzügliche Erklärung der Bedeutung (Atthasaṃvaṇṇanā) verfassen, welche die besonderen Methoden innerhalb der Drei Körbe (Tipitaka) erhellt, ganz im Einklang mit der Methode des kanonischen Textes (Pāli). Kena [Pg.2] kattha kadā cetaṃ, bhāsitaṃ dhammamuttamaṃ; Kimatthaṃ bhāsitañcetaṃ, etaṃ vatvā vidhiṃ tato. Nachdem dargelegt wurde, von wem, wo, wann und zu welchem Zweck diese höchste Lehre verkündet wurde, und nachdem diese systematische Ordnung aufgezeigt wurde, Nidānesu kosallatthaṃ, sukhuggahaṇadhāraṇaṃ; Tasmā taṃ taṃ vidhiṃ vatvā, pubbāparavisesitaṃ. um die Gewandtheit in Bezug auf die Einleitungen (Nidānas) und ein leichtes Erfassen und Behalten zu fördern, werde ich jene jeweilige Methode, unterschieden nach Früherem und Späterem, darlegen. Purā sīhaḷabhāsāya, porāṇaṭṭhakathāya ca; Ṭhapitaṃ taṃ na sādheti, sādhūnaṃ icchiticchitaṃ. Weil das, was einst in singhalesischer Sprache und in den alten Kommentaren niedergelegt wurde, den Wunsch der Tugendhaften nicht gänzlich erfüllt, Tasmā tamupanissāya, porāṇaṭṭhakathānayaṃ; Vivajjetvā viruddhatthaṃ, visesatthaṃ pakāsayaṃ; Visesavaṇṇanaṃ seṭṭhaṃ, karissāmatthavaṇṇananti. werde ich mich auf die Methode des alten Kommentare stützen, dabei widersprüchliche Bedeutungen meiden, die besonderen Bedeutungen darlegen und somit diese hervorragende, detaillierte Erklärung der Bedeutung (Atthavaṇṇanā) verfassen. Nidānakathā Die Einleitungsgeschichte ‘‘Kena kattha kadā cetaṃ, bhāsitaṃ dhammamuttama’’nti ca, ‘‘karissāmatthavaṇṇana’’nti ca paṭiññātattā sā panāyaṃ apadānassatthavaṇṇanā dūrenidānaṃ, avidūrenidānaṃ, santikenidānanti imāni tīṇi nidānāni dassetvā vaṇṇiyamānā ye naṃ suṇanti, tehi samudāgamato paṭṭhāya viññātattā yasmā suṭṭhu viññātā nāma hoti, tasmā naṃ tāni nidānāni dassetvāva vaṇṇayissāma. Da versprochen wurde: 'Von wem, wo, wann wurde diese höchste Lehre verkündet?' und 'Ich werde die Erklärung der Bedeutung verfassen', wird diese Erklärung der Bedeutung des Apadāna nun dargelegt, indem diese drei Einleitungen aufgezeigt werden: die ferne Einleitung (dūrenidāna), die nicht sehr ferne Einleitung (avidūrenidāna) und die nahe Einleitung (santikenidāna). Da sie auf diese Weise für diejenigen, die sie hören, von ihrem Ursprung an vollkommen verständlich wird, werden wir sie wahrlich unter Darstellung dieser Einleitungen erläutern. Tattha ādito tāva tesaṃ nidānānaṃ paricchedo veditabbo. Dīpaṅkarapādamūlasmiñhi katābhinīhārassa mahāsattassa yāva vessantarattabhāvā cavitvā tusitapure nibbatti, tāva pavatto kathāmaggo dūrenidānaṃ nāma. Tusitabhavanato pana cavitvā yāva bodhimaṇḍe sabbaññutappatti, tāva pavatto kathāmaggo avidūrenidānaṃ nāma. Santikenidānaṃ pana tesu tesu ṭhānesu viharato tasmiṃ tasmiṃyeva ṭhāne labbhatīti. Hierbei ist zuerst die Abgrenzung dieser Einleitungen zu verstehen: Der Bericht, der vom Entschluss des Großen Wesens (Bodhisatta) zu Füßen des Buddha Dīpaṅkara an bis zu seinem Scheiden aus der Vessantara-Existenz und seiner Wiedergeburt im Tusita-Himmel reicht, wird 'die ferne Einleitung' (dūrenidāna) genannt. Der Bericht hingegen, der vom Scheiden aus der Tusita-Existenz bis zum Erlangen der Allwissenheit auf dem Erleuchtungsplatz (Bodhimaṇḍa) reicht, wird 'die nicht sehr ferne Einleitung' (avidūrenidāna) genannt. Die 'nahe Einleitung' (santikenidāna) wiederum ist an den jeweiligen Orten zu finden, an denen der Erhabene verwelte. 1. Dūrenidānakathā 1. Die ferne Einleitung Tatridaṃ dūrenidānaṃ nāma – ito kira kappasatasahassādhikānaṃ catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake amaravatī nāma nagaraṃ ahosi. Tattha sumedho [Pg.3] nāma brāhmaṇo paṭivasati, ubhato sujāto mātito ca pitito ca, saṃsuddhagahaṇiko yāva sattamā kulaparivaṭṭā, akkhitto anupakuṭṭho jātivādena, abhirūpo dassanīyo pāsādiko paramāya vaṇṇapokkharatāya samannāgato. So aññaṃ kammaṃ akatvā brāhmaṇasippameva uggaṇhi. Tassa daharakāleyeva mātāpitaro kālamakaṃsu. Athassa rāsivaḍḍhako amacco āyapotthakaṃ āharitvā suvaṇṇarajatamaṇimuttādibharite gabbhe vivaritvā ‘‘ettakaṃ te, kumāra, mātu santakaṃ, ettakaṃ pitu santakaṃ, ettakaṃ ayyakapayyakāna’’nti yāva sattamā kulaparivaṭṭā dhanaṃ ācikkhitvā ‘‘etaṃ paṭipajjāhī’’ti āha. Sumedhapaṇḍito cintesi – ‘‘imaṃ dhanaṃ saṃharitvā mayhaṃ pitupitāmahādayo paralokaṃ gacchantā ekakahāpaṇampi gahetvā na gatā, mayā pana gahetvā gamanakāraṇaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti, so rañño ārocetvā nagare bheriṃ carāpetvā mahājanassa dānaṃ datvā tāpasapabbajjaṃ pabbaji. Imassa panatthassa āvibhāvatthaṃ imasmiṃ ṭhāne sumedhakathā kathetabbā. Sā panesā kiñcāpi buddhavaṃse nirantaraṃ āgatāyeva, gāthābandhena pana āgatattā na suṭṭhu pākaṭā, tasmā taṃ antarantarā gāthāsambandhadīpakehi vacanehi saddhiṃ kathessāma. Was nun diese sogenannte ferne Einleitung (dūrenidāna) betrifft: Vor vier unzählbaren Zeitaltern (Asaṅkheyya) und einhunderttausend Äonen (Kappa) gab es eine Stadt namens Amaravatī. Dort lebte ein Brahmane namens Sumedha. Er war von beiden Seiten, mütterlicherseits wie väterlicherseits, wohlgeboren, von makelloser Abstammung bis zur siebten Generation zurück, ungetadelt und unbescholten in Fragen der Herkunft. Er war schön, von angenehmem Äußeren, liebreizend und mit vollendeter Anmut der Erscheinung gesegnet. Ohne einer anderen Beschäftigung nachzugehen, erlernte er allein die brahmanische Kunst. Als er noch sehr jung war, starben seine Eltern. Da brachte sein Vermögensverwalter das Rechnungsbuch herbei, öffnete die mit Gold, Silber, Juwelen, Perlen und anderem gefüllten Schatzkammern und sprach, indem er ihm den Reichtum bis zur siebten Generation zurück aufzeigte: 'Dies, junger Herr, ist der Besitz deiner Mutter; dies der deines Vaters; dies der deiner Großväter und Urgroßväter. Nimm dies nun in Besitz!' Der weise Sumedha dachte bei sich: 'Obwohl meine Väter, Großväter und Ahnen diesen Reichtum anhäuften, gingen sie in die jenseitige Welt, ohne auch nur eine einzige Münze mitzunehmen. Ich jedoch sollte so handeln, dass ich [den wahren Reichtum] beim Fortgehen mitnehmen kann.' Er informierte den König, ließ die Trommel in der Stadt schlagen, spendete der Bevölkerung reichlich Gaben und zog als Asket in die Hauslosigkeit. Um diese Begebenheit zu verdeutlichen, soll an dieser Stelle die Geschichte von Sumedha erzählt werden. Obwohl diese im Buddhavaṃsa fortlaufend überliefert ist, ist sie, da sie in Versform abgefasst ist, nicht sogleich leicht verständlich. Daher werden wir sie abschnittsweise zusammen mit Worten darlegen, welche die Verbindung der Verse verdeutlichen. Sumedhakathā Die Geschichte von Sumedha Kappasatasahassādhikānañhi catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake dasahi saddehi avivittaṃ ‘‘amaravatī’’ti ca ‘‘amara’’nti ca laddhanāmaṃ nagaraṃ ahosi, yaṃ sandhāya buddhavaṃse vuttaṃ – Denn vor vier unzählbaren Zeitaltern und einhunderttausend Äonen gab es eine Stadt, die den Namen 'Amaravatī' oder 'Amara' trug und von den zehn Klängen widerhallte, worauf bezogen im Buddhavaṃsa gesagt wurde: ‘‘Kappe ca satasahasse, caturo ca asaṅkhiye; Amaraṃ nāma nagaraṃ, dassaneyyaṃ manoramaṃ; Dasahi saddehi avivittaṃ, annapānasamāyuta’’nti. (bu. vaṃ. 2.1-2); 'Vor einhunderttausend Äonen und vier unzählbaren Zeitaltern gab es eine Stadt namens Amara, herrlich anzusehen und lieblich, widerhallend von den zehn Klängen, reichlich versehen mit Speise und Trank.' (Bu. Vaṃ. 2.1-2) Tattha dasahi saddehi avivittanti hatthisaddena assasaddena rathasaddena bherisaddena mudiṅgasaddena vīṇāsaddena gītasaddena saṅkhasaddena sammasaddena tāḷasaddena ‘‘asnātha pivatha khādathā’’ti dasamena saddenāti [Pg.4] imehi dasahi saddehi avivittaṃ ahosi. Tesaṃ pana saddānaṃ ekadesameva gahetvā – Darin bedeutet 'nicht frei von den zehn Klängen': Es war nicht frei von diesen zehn Klängen, nämlich dem Elefantenruf, dem Pferdegewieher, dem Wagengerassel, dem Trommelschlag, dem Klang der Mudiṅga-Trommel, dem Lautenspiel, dem Gesang, dem Muschelhornklang, dem Beckenklang und als zehntem Klang dem Ruf: 'Esset, trinket, speiset!'. Doch nur einen Teil dieser Klänge aufgreifend [heißt es weiter]: ‘‘Hatthisaddaṃ assasaddaṃ, bherisaṅkharathāni ca; Khādatha pivatha ceva, annapānena ghosita’’nti. – 'Elefantenruf, Pferdegewieher, Trommeln, Muschelhörner und Wagen; sowie "Esset und trinket!" – so erscholl es inmitten von Speise und Trank.' Buddhavaṃse (bu. vaṃ. 2.3-5) imaṃ gāthaṃ vatvā – Nachdem diese Strophe im Buddhavaṃsa gesprochen wurde, heißt es weiter: ‘‘Nagaraṃ sabbaṅgasampannaṃ, sabbakammamupāgataṃ; Sattaratanasampannaṃ, nānājanasamākulaṃ; Samiddhaṃ devanagaraṃva, āvāsaṃ puññakamminaṃ. 'Eine Stadt, mit allen guten Eigenschaften ausgestattet, für jegliches Handwerk gerüstet, reich an den sieben Juwelen, dicht bevölkert von vielerlei Menschen, blühend wie die Götterstadt, eine Wohnstätte für jene, die verdienstvolle Taten vollbringen. ‘‘Nagare amaravatiyā, sumedho nāma brāhmaṇo; Anekakoṭisannicayo, pahūtadhanadhaññavā. In dieser Stadt Amaravatī gab es einen Brahmanen namens Sumedha, der viele Millionen angehäuft hatte und reichen Besitz an Schätzen und Korn besaß. ‘‘Ajjhāyako mantadharo, tiṇṇaṃ vedāna pāragū; Lakkhaṇe itihāse ca, sadhamme pāramiṃ gato’’ti. – vuttaṃ; Er war ein Rezitator, ein Bewahrer der Mantras, der das jenseitige Ufer der drei Veden erreicht hatte; in der Zeichenlehre, den alten Chroniken und in seiner eigenen Lehre hatte er Vollkommenheit erlangt.' – so wurde gesagt. Athekadivasaṃ so sumedhapaṇḍito uparipāsādavaratale rahogato hutvā pallaṅkaṃ ābhujitvā nisinno evaṃ cintesi – ‘‘punabbhave, paṇḍita, paṭisandhiggahaṇaṃ nāma dukkhaṃ, tathā nibbattanibbattaṭṭhāne sarīrassa bhedanaṃ, ahañca jātidhammo, jarādhammo, byādhidhammo, maraṇadhammo, evaṃbhūtena mayā ajātiṃ ajaraṃ abyādhiṃ amaraṇaṃ adukkhaṃ sukhaṃ sītalaṃ amatamahānibbānaṃ pariyesituṃ vaṭṭati. Avassaṃ bhavato muccitvā nibbānagāminā ekena maggena bhavitabba’’nti. Tena vuttaṃ – Da dachte der weise Sumedha eines Tages, als er sich an einen einsamen Ort auf der obersten Terrasse seines prächtigen Palastes zurückgezogen hatte, im Kreuzsitz sitzend, wie folgt: ‚O Weiser, eine erneute Existenz ist wahrlich leidvoll, ebenso wie das Vergehen des Körpers an jedem Ort der Wiedergeburt. Ich bin dem Gesetz von Geburt, Alter, Krankheit und Tod unterworfen. Als ein solcher Mensch geziemt es mir, das Ungeborene, Unalternde, Krankheitslose, Unsterbliche, Leidlose, Glückselige, Kühle, das unsterbliche große Nibbāna zu suchen. Wahrlich, es muss einen einzigen Pfad geben, der aus dem Werden herausführt und zu Nibbāna geleitet.‘ Daher wurde gesagt: ‘‘Rahogato nisīditvā, evaṃ cintesahaṃ tadā; Dukkho punabbhavo nāma, sarīrassa ca bhedanaṃ. „Als ich mich an einen einsamen Ort zurückgezogen hatte und mich niedersetzte, dachte ich damals so: ‚Leidvoll ist wahrlich eine erneute Geburt und ebenso das Vergehen des Körpers.‘ ‘‘Jātidhammo jarādhammo, byādhidhammo sahaṃ tadā; Ajaraṃ amaraṃ khemaṃ, pariyesissāmi nibbutiṃ. „Ich, der ich damals der Geburt, dem Altern und der Krankheit unterworfen war, will das unalternde, unsterbliche und sichere Erlöschen (Nibbāna) suchen.“ ‘‘Yaṃnūnimaṃ pūtikāyaṃ, nānākuṇapapūritaṃ; Chaḍḍayitvāna gaccheyyaṃ, anapekkho anatthiko. „Wie wäre es, wenn ich diesen fauligen Körper, der voll von verschiedenen Unreinheiten ist, hinter mir ließe und fortginge, ohne Verlangen und ohne Verhaftung daran?“ ‘‘Atthi hehiti so maggo, na so sakkā na hetuye; Pariyesissāmi taṃ maggaṃ, bhavato parimuttiyā’’ti. „Es gibt diesen Pfad, und es wird ihn geben; es ist unmöglich, dass er nicht existiert. Ich werde diesen Pfad suchen, um Befreiung aus dem Werden zu erlangen.“ Tato [Pg.5] uttaripi evaṃ cintesi – ‘‘yathā hi loke dukkhassa paṭipakkhabhūtaṃ sukhaṃ nāma atthi, evaṃ bhave sati tappaṭipakkhena vibhavenāpi bhavitabbaṃ. Yathā ca uṇhe sati tassa vūpasamabhūtaṃ sītalampi atthi, evaṃ rāgaggiādīnaṃ vūpasamena nibbānenāpi bhavitabbaṃ. Yathā nāma pāpassa lāmakassa dhammassa paṭipakkhabhūto kalyāṇo anavajjabhūto dhammopi atthiyeva, evameva pāpikāya jātiyā sati sabbajātikhepanato ajātisaṅkhātena nibbānenāpi bhavitabbamevā’’ti. Tena vuttaṃ – Darüber hinaus dachte er wie folgt: ‚Ebenso wie es in der Welt das sogenannte Glück gibt, das das Gegenteil von Leiden ist, so muss es, wenn es das Werden gibt, auch das Nicht-Werden (vibhava) als dessen Gegenteil geben. Und wie es bei Hitze auch Kälte gibt, die diese besänftigt, so muss es beim Lodern des Feuers der Gier usw. auch das Nibbāna geben, das deren Erlöschen bewirkt. Genauso wie es gewiss heilsame, tadellose Zustände gibt, die das Gegenteil von unheilsamen, schlechten Zuständen sind, ebenso muss es, da es die leidvolle Geburt gibt, auch das Nibbāna geben, das als das Ungeborene bezeichnet wird und alle Geburten beendet.‘ Daher wurde gesagt: ‘‘Yathāpi dukkhe vijjante, sukhaṃ nāmapi vijjati; Evaṃ bhave vijjamāne, vibhavopicchitabbako. „Wie auch beim Vorhandensein von Leiden das sogenannte Glück existiert, ebenso sollte bei vorhandenem Werden auch das Nicht-Werden ersehnt werden. ‘‘Yathāpi uṇhe vijjante, aparaṃ vijjati sītalaṃ; Evaṃ tividhaggi vijjante, nibbānampicchitabbakaṃ. „Wie auch beim Vorhandensein von Hitze eine andere Sache, die Kälte, existiert, ebenso sollte beim Vorhandensein des dreifachen Feuers das Nibbāna ersehnt werden. ‘‘Yathāpi pāpe vijjante, kalyāṇamapi vijjati; Evameva jāti vijjante, ajātipicchitabbaka’’nti. „Wie auch beim Vorhandensein des Bösen das Gute existiert, ebenso sollte beim Vorhandensein von Geburt das Ungeborene ersehnt werden.“ Aparampi cintesi – ‘‘yathā nāma gūtharāsimhi nimuggena purisena dūratova pañcavaṇṇapadumasañchannaṃ mahātaḷākaṃ disvā ‘katarena nu kho maggena ettha gantabba’nti taṃ taḷākaṃ gavesituṃ yuttaṃ. Yaṃ tassa agavesanaṃ, na so taḷākassa doso, purisasseva doso. Evaṃ kilesamaladhovane amatamahānibbānataḷāke vijjante yaṃ tassa agavesanaṃ, na so amatamahānibbānataḷākassa doso, purisasseva doso. Yathā ca corehi samparivārito puriso palāyanamagge vijjamānepi sace na palāyati, na so maggassa doso, purisasseva doso. Evameva kilesehi parivāretvā gahitassa purisassa vijjamāneyeva nibbānagāmimhi sive magge maggassa agavesanaṃ nāma na maggassa doso, purisasseva doso. Yathā ca byādhipīḷito puriso vijjamāne byādhitikicchake vejje sace taṃ vejjaṃ gavesitvā byādhiṃ na tikicchāpeti, na so vejjassa doso, purisasseva doso. Evameva yo kilesabyādhipīḷito kilesavūpasamamaggakovidaṃ vijjamānameva ācariyaṃ na gavesati, tasseva doso, na kilesavināsakassa ācariyassa doso’’ti. Tena vuttaṃ – Er dachte noch weiter nach: ‚Genauso wie ein Mann, der in einem Misthaufen versunken ist, von weitem einen großen Teich erblickt, der mit fünffarbigen Lotusblumen bedeckt ist, und sich aufmachen sollte, diesen Teich zu suchen, indem er denkt: „Auf welchem Weg kann ich dorthin gelangen?“. Wenn er ihn nicht sucht, liegt die Schuld nicht am Teich, sondern allein bei dem Mann. Genauso verhält es sich, wenn der Teich des großen, unsterblichen Nibbāna existiert, der den Schmutz der Befleckungen abwäscht: Wenn man ihn nicht sucht, liegt die Schuld nicht an diesem Teich des unsterblichen Nibbāna, sondern allein bei dem Mann. Und wie ein Mann, der von Räubern umstellt ist, selbst wenn ein Fluchtweg vorhanden ist, nicht flieht, so liegt die Schuld nicht am Weg, sondern allein bei dem Mann. Ebenso verhält es sich, wenn für einen von Befleckungen umgebenen und gefangenen Menschen ein friedvoller Pfad existiert, der zum Nibbāna führt: Wenn er diesen Pfad nicht sucht, liegt die Schuld nicht am Pfad, sondern allein bei dem Mann. Und wie ein von Krankheit geplagter Mann, wenn ein Arzt existiert, der Krankheiten heilt, diesen Arzt nicht aufsucht und seine Krankheit nicht behandeln lässt, so liegt die Schuld nicht am Arzt, sondern allein bei dem Mann. Genauso verhält es sich, wenn jemand, der von der Krankheit der Befleckungen gequält wird, den existierenden Lehrer nicht aufsucht, der den Pfad zur Beruhigung der Befleckungen genau kennt: Dann liegt die Schuld allein bei ihm, nicht bei dem Lehrer, der die Befleckungen vernichtet.‘ Daher wurde gesagt: ‘‘Yathā [Pg.6] gūthagato puriso, taḷākaṃ disvāna pūritaṃ; Na gavesati taṃ taḷākaṃ, na doso taḷākassa so. „Wie ein Mann, der in den Mist geraten ist und einen vollen Teich sieht, diesen Teich nicht aufsucht – das ist nicht die Schuld des Teiches. ‘‘Evaṃ kilesamaladhove, vijjante amatantaḷe; Na gavesati taṃ taḷākaṃ, na doso amatantaḷe. „Ebenso, wenn der unsterbliche Teich, der den Schmutz der Befleckungen abwäscht, existiert, und man diesen Teich nicht aufsucht – das ist nicht die Schuld des unsterblichen Teiches. ‘‘Yathā arīhi pariruddho, vijjante gamanampathe; Na palāyati so puriso, na doso añjasassa so. „Wie ein Mann, der von Feinden umstellt ist, obwohl ein Fluchtweg existiert, nicht flieht – das ist nicht die Schuld des Weges. ‘‘Evaṃ kilesapariruddho, vijjamāne sive pathe; Na gavesati taṃ maggaṃ, na doso sivamañjase. „Ebenso, wenn einer von Befleckungen umstellt ist, obwohl ein friedvoller Pfad existiert, diesen Pfad nicht sucht – das ist nicht die Schuld des friedvollen Weges. ‘‘Yathāpi byādhito puriso, vijjamāne tikicchake; Na tikicchāpeti taṃ byādhiṃ, na doso so tikicchake. „Wie auch ein kranker Mann, obwohl ein Arzt da ist, seine Krankheit nicht behandeln lässt – das ist nicht die Schuld des Arztes. ‘‘Evaṃ kilesabyādhīhi, dukkhito paripīḷito; Na gavesati taṃ ācariyaṃ, na doso so vināyake’’ti. „Ebenso, wenn einer, der von den Krankheiten der Befleckungen gequält und bedrängt wird, jenen Lehrer nicht aufsucht – das ist nicht die Schuld des Führers.“ Aparampi cintesi – ‘‘yathā maṇḍanakajātiko puriso kaṇṭhe āsattaṃ kuṇapaṃ chaḍḍetvā sukhaṃ gaccheyya, evaṃ mayāpi imaṃ pūtikāyaṃ chaḍḍetvā anapekkhena nibbānanagaraṃ pavisitabbaṃ. Yathā ca naranāriyo ukkārabhūmiyaṃ uccārapassāvaṃ katvā na taṃ ucchaṅgena vā ādāya, dussantena vā veṭhetvā gacchanti, jigucchamānā pana anapekkhāva, chaḍḍetvā gacchanti, evaṃ mayāpi imaṃ pūtikāyaṃ anapekkhena chaḍḍetvā amatanibbānanagaraṃ pavisituṃ vaṭṭati. Yathā ca nāvikā nāma jajjaraṃ nāvaṃ anapekkhāva chaḍḍetvā gacchanti, evaṃ ahampi imaṃ navahi vaṇamukhehi paggharantaṃ kāyaṃ chaḍḍetvā anapekkho nibbānapuraṃ pavisissāmi. Yathā ca puriso nānāratanāni ādāya corehi saddhiṃ maggaṃ gacchanto attano ratananāsabhayena te chaḍḍetvā khemaṃ maggaṃ gaṇhāti, evaṃ ayampi karajakāyo ratanavilopakacorasadiso. Sacāhaṃ ettha taṇhaṃ karissāmi, ariyamaggakusaladhammaratanaṃ me nassissati, tasmā mayā imaṃ corasadisaṃ kāyaṃ chaḍḍetvā amatamahānibbānanagaraṃ pavisituṃ vaṭṭatī’’ti. Tena vuttaṃ – Er dachte noch weiter nach: ‚Wie ein Mensch, der sich gern schmückt, eine Leiche, die an seinem Hals hängt, abwirft und glücklich seines Weges geht, ebenso muss auch ich diesen fauligen Körper abwerfen und verlangensfrei die Stadt des Nibbāna betreten. Und wie Männer und Frauen, wenn sie Kot und Urin auf einem Misthaufen hinterlassen haben, diesen nicht auf ihrem Schoß tragen oder in den Saum ihres Gewandes wickeln, sondern ihn voller Abscheu und ohne Verlangen zurücklassen und fortgehen, ebenso geziemt es mir, diesen fauligen Körper ohne Verlangen zurückzulassen und die Stadt des unsterblichen Nibbāna zu betreten. Und wie Seeleute ein morsch gewordenes Boot ohne Bedauern zurücklassen und fortgehen, ebenso werde ich diesen Körper, aus dessen neun Wundöffnungen es unaufhörlich tröpfelt, ohne Verlangen zurücklassen und die Stadt des Nibbāna betreten. Und wie ein Mann, der verschiedene Edelsteine mit sich führt und mit Räubern auf einem Weg reist, diese Räuber aus Angst um den Verlust seiner Edelsteine verlässt und einen sicheren Weg einschlägt, ebenso gleicht dieser physische Körper einem Räuber, der Juwelen raubt. Wenn ich an ihm hänge, wird das Edelstein-Juwel der heilsamen Lehren des Edlen Pfades in mir verloren gehen. Deshalb geziemt es mir, diesen räuberischen Körper abzuwerfen und die Stadt des großen, unsterblichen Nibbāna zu betreten.‘ Daher wurde gesagt: ‘‘Yathāpi [Pg.7] kuṇapaṃ puriso, kaṇṭhe baddhaṃ jigucchiya; Mocayitvāna gaccheyya, sukhī serī sayaṃvasī. „Wie ein Mann eine abscheuliche Leiche, die an seinen Hals gebunden ist, voller Ekel löst und dann befreit, glücklich und selbstbestimmt seines Weges geht, ‘‘Tathevimaṃ pūtikāyaṃ, nānākuṇapasañcayaṃ; Chaḍḍayitvāna gaccheyyaṃ, anapekkho anatthiko. „ebenso möchte ich diesen fauligen Körper, eine Ansammlung verschiedenster Unreinheiten, abwerfen und fortgehen – ohne Verlangen und ohne Verhaftung daran. ‘‘Yathā uccāraṭṭhānamhi, karīsaṃ naranāriyo; Chaḍḍayitvāna gacchanti, anapekkhā anatthikā. „Wie Männer und Frauen den Kot auf einer Toilettenstätte zurücklassen und fortgehen – ohne Verlangen und ohne Verhaftung daran, ‘‘Evamevāhaṃ imaṃ kāyaṃ, nānākuṇapapūritaṃ; Chaḍḍayitvāna gacchissaṃ, vaccaṃ katvā yathā kuṭiṃ. „ebenso werde ich diesen Körper, der voll von verschiedenen Unreinheiten ist, abwerfen und fortgehen, so wie man eine Latrine verlässt, nachdem man seine Notdurft verrichtet hat.“ ‘‘Yathāpi jajjaraṃ nāvaṃ, paluggaṃ udagāhiniṃ; Sāmī chaḍḍetvā gacchanti, anapekkhā anatthikā. „Wie Besitzer ein morsches, leckes, Wasser einlassendes Boot zurücklassen und weitergehen, ohne Bedauern und ohne weiteres Interesse daran,“ ‘‘Evamevāhaṃ imaṃ kāyaṃ, navacchiddaṃ dhuvassavaṃ; Chaḍḍayitvāna gacchissaṃ, jiṇṇanāvaṃva sāmikā. „ebenso werde ich diesen Körper mit seinen neun Öffnungen, aus denen es ständig fließt, zurücklassen und fortgehen, wie die Besitzer ihr altes Boot.“ ‘‘Yathāpi puriso corehi, gacchanto bhaṇḍamādiya; Bhaṇḍacchedabhayaṃ disvā, chaḍḍayitvāna gacchati. „Wie ein Mann, der mit Räubern reist und wertvolle Güter bei sich trägt, die Gefahr des Verlustes seiner Güter erkennt, die Räuber zurücklässt und weitergeht,“ ‘‘Evameva ayaṃ kāyo, mahācorasamo viya; Pahāyimaṃ gamissāmi, kusalacchedanā bhayā’’ti. „ebenso ist dieser Körper wie ein großer Räuber; ich werde ihn hinter mir lassen und fortgehen, aus Furcht vor dem Verlust des Heilsamen.“ Evaṃ sumedhapaṇḍito nānāvidhāhi upamāhi imaṃ nekkhammūpasaṃhitaṃ atthaṃ cintetvā sakanivesane aparimitabhogakkhandhaṃ heṭṭhā vuttanayena kapaṇaddhikādīnaṃ vissajjetvā mahādānaṃ datvā vatthukāme ca kilesakāme ca pahāya amaranagarato nikkhamitvā ekakova himavante dhammikaṃ nāma pabbataṃ nissāya assamaṃ katvā tattha paṇṇasālañca caṅkamañca māpetvā pañcahi nīvaraṇadosehi vajjitaṃ ‘‘evaṃ samāhite citte’’tiādinā nayena vuttehi aṭṭhahi kāraṇaguṇehi samupetaṃ abhiññāsaṅkhātaṃ balaṃ āharituṃ tasmiṃ assamapade navadosasamannāgataṃ sāṭakaṃ pajahitvā, dvādasaguṇasamannāgataṃ vākacīraṃ nivāsetvā, isipabbajjaṃ pabbaji. Evaṃ pabbajito aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ taṃ paṇṇasālaṃ pahāya dasaguṇasamannāgataṃ rukkhamūlaṃ upagantvā sabbaṃ dhaññavikatiṃ pahāya pavattaphalabhojano hutvā nisajjaṭṭhānacaṅkamanavaseneva [Pg.8] padhānaṃ padahanto sattāhabbhantareyeva aṭṭhannaṃ samāpattīnaṃ pañcannañca abhiññānaṃ lābhī ahosi. Evaṃ taṃ yathāpatthitaṃ abhiññābalaṃ pāpuṇi. Tena vuttaṃ – Nachdem der weise Sumedha auf diese Weise mittels verschiedener Gleichnisse über diesen mit der Entsagung verbundenen Nutzen nachgedacht hatte, verteilte er den unermesslichen Reichtum in seinem Hause in der zuvor beschriebenen Weise an Arme, Reisende und andere, gab eine große Spende, entsagte den Objekten des Begehrens sowie den Befleckungen des Begehrens, verließ die Stadt Amaravatī und zog ganz allein zum Himalaya-Gebirge. Dort ließ er sich in der Nähe des Berges namens Dhammika nieder, errichtete eine Einsiedelei und legte dort eine Blätterhütte sowie einen Wandelpfad an. Um das als höhere Geisteskräfte bekannte Vermögen zu erlangen, welches frei von den fünf Fehlern der Hemmnisse ist und die acht Eigenschaften besitzt, die in Ausdrücken wie „mit so gesammeltem Geist“ beschrieben werden, legte er an jenem Ort der Einsiedelei sein mit neun Fehlern behaftetes Gewand ab, legte das mit zwölf Vorzügen ausgestattete Rindengewand an und trat in die Hauslosigkeit der Weisen ein. Nachdem er so ordiniert worden war, verließ er jene Blätterhütte, die mit acht Fehlern behaftet war, begab sich an den Fuß eines Baumes, der mit zehn Vorzügen ausgestattet war, entsagte jeglicher Art von Getreide, ernährte sich von selbst herabgefallenen Früchten und widmete sich der Anstrengung, indem er nur saß, stand und ging. Innerhalb von nur sieben Tagen erlangte er die acht Sammlungsstufen und die fünf höheren Geisteskräfte. So erreichte er jene Kraft der höheren Geisteskräfte, wie er sie angestrebt hatte. Deshalb wurde Folgendes gesagt: ‘‘Evāhaṃ cintayitvāna, nekakoṭisataṃ dhanaṃ; Nāthānāthānaṃ datvāna, himavantamupāgamiṃ. „Nachdem ich so nachgedacht hatte, gab ich Reichtum im Werte von vielen hundert Millionen den Schutzbedürftigen und den Schutzlosen und zog zum Himalaya.“ ‘‘Himavantassāvidūre, dhammiko nāma pabbato; Assamo sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā. „Nicht weit vom Himalaya entfernt liegt der Berg namens Dhammika; dort wurde mir eine wohlbereitete Einsiedelei und eine gut errichtete Blätterhütte geschaffen.“ ‘‘Caṅkamaṃ tattha māpesiṃ, pañcadosavivajjitaṃ; Aṭṭhaguṇasamupetaṃ, abhiññābalamāhariṃ. „Dort legte ich einen Wandelpfad an, der frei von den fünf Fehlern war; ich erlangte das mit den acht Vorzügen ausgestattete Vermögen der höheren Geisteskräfte.“ ‘‘Sāṭakaṃ pajahiṃ tattha, navadosamupāgataṃ; Vākacīraṃ nivāsesiṃ, dvādasaguṇamupāgataṃ. „Dort legte ich das feine Gewand ab, das mit neun Mängeln behaftet war, und legte das Rindengewand an, das mit zwölf Vorzügen ausgestattet war.“ ‘‘Aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ, pajahiṃ paṇṇasālakaṃ; Upāgamiṃ rukkhamūlaṃ, guṇe dasahupāgataṃ. „Ich verließ die mit acht Fehlern behaftete Blätterhütte und begab mich an den Fuß eines Baumes, der mit zehn guten Eigenschaften versehen war.“ ‘‘Vāpitaṃ ropitaṃ dhaññaṃ, pajahiṃ niravasesato; Anekaguṇasampannaṃ, pavattaphalamādiyiṃ. „Gesätes und gepflanztes Getreide gab ich vollständig auf und nahm von selbst herabgefallene Früchte an, die mit vielen guten Eigenschaften versehen waren.“ ‘‘Tatthappadhānaṃ padahiṃ, nisajjaṭṭhānacaṅkame; Abbhantaramhi sattāhe, abhiññābala pāpuṇi’’nti. „Dort bemühte ich mich eifrig im Sitzen, Stehen und Gehen; innerhalb von sieben Tagen erlangte ich das Vermögen der höheren Geisteskräfte.“ Tattha ‘‘assamo sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā’’ti imāya pana pāḷiyā sumedhapaṇḍitena assamapaṇṇasālacaṅkamā sahatthā māpitā viya vuttā. Ayaṃ panettha attho – mahāsattañhi ‘‘himavantaṃ ajjhogāhetvā ajja dhammikapabbataṃ pavisissatī’’ti disvā sakko vissakammadevaputtaṃ āmantesi – ‘‘tāta, ayaṃ sumedhapaṇḍito ‘pabbajissāmī’ti nikkhanto, etassa vasanaṭṭhānaṃ māpehī’’ti. So tassa vacanaṃ sampaṭicchitvā ramaṇīyaṃ assamaṃ, suguttaṃ paṇṇasālaṃ, manoramaṃ caṅkamañca māpesi. Bhagavā pana tadā attano puññānubhāvena nipphannaṃ taṃ assamapadaṃ sandhāya ‘‘sāriputta, tasmiṃ dhammikapabbate – In diesem Zusammenhang wird mit der Verszeile „Eine Einsiedelei wurde mir wohlbereitet, eine Blätterhütte gut errichtet“ ausgedrückt, als ob der weise Sumedha die Einsiedelei, die Blätterhütte und den Wandelpfad mit eigenen Händen erschaffen hätte. Doch die Bedeutung hiervon ist wie folgt zu verstehen: Als Sakka, der König der Götter, sah, dass das Große Wesen in den Himalaya eingedrungen war und heute den Berg Dhammika betreten würde, wandte er sich an den Göttersohn Vissakamma: „Mein Lieber, dieser weise Sumedha ist ausgezogen mit dem Entschluss: ‚Ich werde das geistliche Leben wählen.‘ Erschaffe ihm eine Wohnstätte!“ Dieser willigte auf seine Worte hin ein und erschuf eine liebliche Einsiedelei, eine gut geschützte Blätterhütte und einen wunderschönen Wandelpfad. Der Erhabene bezog sich jedoch auf jenen Ort der Einsiedelei, der durch die Macht seiner eigenen Verdienste entstanden war, und sprach: „Sāriputta, auf jenem Berge Dhammika –“ ‘‘Assamo [Pg.9] sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā; Caṅkamaṃ tattha māpesiṃ, pañcadosavivajjita’’’nti. – „‚Eine Einsiedelei wurde mir wohlbereitet, eine Blätterhütte gut errichtet; dort legte ich einen Wandelpfad an, der frei von den fünf Fehlern war.‘ – So sprach er.“ Āha. Tattha sukato mayhanti suṭṭhu kato mayā. Paṇṇasālā sumāpitāti paṇṇacchadanasālāpi me sumāpitā ahosi. „Dabei bedeutet ‚mir wohlbereitet‘ (sukato mayhaṃ): ‚von mir gut hergerichtet‘. ‚Eine Blätterhütte gut errichtet‘ (paṇṇasālā sumāpitā) bedeutet: ‚Auch die mit Blättern gedeckte Hütte wurde für mich gut erschaffen.‘“ Pañcadosavivajjitanti pañcime caṅkamadosā nāma thaddhavisamatā, antorukkhatā, gahanacchannatā, atisambādhatā, ativisālatāti. Thaddhavisamabhūmibhāgasmiñhi caṅkame caṅkamantassa pādā rujjanti, phoṭā uṭṭhahanti, cittaṃ ekaggataṃ na labhati, kammaṭṭhānaṃ vipajjati. Mudusamatale pana phāsuvihāraṃ āgamma kammaṭṭhānaṃ sampajjati. Tasmā thaddhavisamabhūmibhāgatā eko dosoti veditabbo. Caṅkamassa anto vā majjhe vā koṭiyaṃ vā rukkhe sati pamādamāgamma caṅkamantassa nalāṭaṃ vā sīsaṃ vā paṭihaññatīti antorukkhatā dutiyo doso. Tiṇalatādigahanacchanne caṅkame caṅkamanto andhakāravelāyaṃ uragādike pāṇe akkamitvā vā māreti, tehi vā daṭṭho dukkhaṃ āpajjatīti gahanacchannatā tatiyo doso. Atisambādhe caṅkame vitthārato ratanike vā aḍḍharatanike vā caṅkamantassa paricchede pakkhalitvā nakhāpi aṅguliyopi bhijjantīti atisambādhatā catuttho doso. Ativisāle caṅkame caṅkamantassa cittaṃ vidhāvati, ekaggataṃ na labhatīti ativisālatā pañcamo doso. Puthulato pana diyaḍḍharatanaṃ dvīsu passesu ratanamattaṃ anucaṅkamaṃ dīghato saṭṭhihatthaṃ mudutalaṃ samavippakiṇṇavālukaṃ caṅkamaṃ vaṭṭati cetiyagirimhi dīpappasādakamahāmahindattherassa caṅkamaṃ viya, tādisaṃ taṃ ahosi. Tenāha – ‘‘caṅkamaṃ tattha māpesiṃ, pañcadosavivajjita’’nti. „Frei von den fünf Fehlern“ (pañcadosavivajjitaṃ) bezieht sich auf die folgenden fünf Fehler eines Wandelpfads: Härte und Unebenheit des Bodens, Bäume im Weg, dichte Überwucherung, extreme Enge und extreme Breite. Auf einem harten und unebenen Wandelpfad schmerzen nämlich dem Gehenden die Füße, es bilden sich Blasen, der Geist erlangt keine Einspitzigkeit und das Meditationsobjekt verfällt. Auf einem weichen und ebenen Boden hingegen gelingt das Meditationsobjekt aufgrund des angenehmen Verweilens. Daher ist ein harter und unebener Boden als der erste Fehler zu verstehen. Wenn am Anfang, in der Mitte oder am Ende des Wandelpfads ein Baum steht, stößt sich der Gehende bei Unachtsamkeit die Stirn oder den Kopf; somit ist das Vorhandensein von Bäumen auf dem Pfad der zweite Fehler. Auf einem durch Gras und Ranken dicht überwucherten Wandelpfad tritt der Gehende in der Dunkelheit auf Schlangen oder andere Lebewesen und tötet sie, oder er wird von ihnen gebissen und erleidet Schmerz; somit ist die dichte Überwucherung der dritte Fehler. Auf einem zu engen Wandelpfad von nur einer oder einer halben Elle Breite stößt der Gehende beim Gehen an die Ränder, sodass Nägel und Zehen verletzt werden; somit ist extreme Enge der vierte Fehler. Auf einem zu breiten Wandelpfad schweift der Geist des Gehenden umher und erlangt keine Einspitzigkeit; somit ist extreme Breite der fünfte Fehler. Angemessen ist jedoch ein Wandelpfad, der in der Breite anderthalb Ellen misst, an den Seiten je eine Elle Nebenpfad hat, sechzig Ellen lang ist, eine weiche Oberfläche besitzt und gleichmäßig mit Sand bestreut ist – ähnlich dem Wandelpfad des ehrwürdigen Mahā-Mahinda, der die Insel bekehrte, auf dem Cetiyagiri-Berg. Ein solcher war jener Wandelpfad. Deshalb sagte er: „Dort legte ich einen Wandelpfad an, der frei von den fünf Fehlern war.“ Aṭṭhaguṇasamupetanti aṭṭhahi samaṇasukhehi upetaṃ. Aṭṭhimāni samaṇasukhāni nāma dhanadhaññapariggahābhāvo, anavajjapiṇḍapātapariyesanabhāvo, nibbutapiṇḍapātabhuñjanabhāvo, raṭṭhaṃ pīḷetvā dhanasāraṃ vā sīsakahāpaṇādīni vā gaṇhantesu rājakulesu raṭṭhapīḷanakilesābhāvo, upakaraṇesu nicchandarāgabhāvo, coravilope nibbhayabhāvo, rājarājamahāmattehi asaṃsaṭṭhabhāvo, catūsu disāsu appaṭihatabhāvoti[Pg.10]. Idaṃ vuttaṃ hoti – ‘‘yathā tasmiṃ assame vasantena sakkā honti imāni aṭṭha sukhāni vindituṃ, evaṃ aṭṭhaguṇasamupetaṃ taṃ assamaṃ māpesi’’nti. „Mit acht Vorzügen ausgestattet“ (aṭṭhaguṇasamupetaṃ) bedeutet, mit den acht Freuden des Samana versehen zu sein. Diese acht Freuden des Samana sind: das Freisein von Besitz an Geld und Getreide, die Suche nach untadeliger Almosenspeise, der sorgenfreie Genuss der Almosenspeise, das Freisein von der Plackerei, das Volk zu bedrücken, wie es Herrscherfamilien tun, wenn sie Schätze oder Kopfsteuern eintreiben, das Freisein von Begierde und Anhaftung bezüglich der Gebrauchsgegenstände, die Freiheit von Furcht vor Plünderung durch Räuber, der mangelnde Umgang mit Königen und königlichen Ministern sowie die Ungehindertheit in allen vier Himmelsrichtungen. Dies bedeutet folgendes: „So wie es für einen in jener Einsiedelei Lebenden möglich ist, diese acht Freuden zu erfahren, so erschuf er jene mit den acht Vorzügen ausgestattete Einsiedelei.“ Abhiññābalamāharinti pacchā tasmiṃ assame vasanto kasiṇaparikammaṃ katvā abhiññānañca samāpattīnañca uppādanatthāya aniccato ca dukkhato ca vipassanaṃ ārabhitvā thāmappattaṃ vipassanābalaṃ āhariṃ. Yathā tasmiṃ vasanto taṃ balaṃ āharituṃ sakkomi, evaṃ taṃ assamaṃ abhiññatthāya vipassanābalassa anucchavikaṃ katvā māpesinti attho. „‚Ich brachte die Kraft der höheren Erkenntnisse herbei‘ [bedeutet]: Als ich später in jener Einsiedelei wohnte, führte ich die Kasiṇa-Vorbereitungsübungen durch und begann, um sowohl die höheren Erkenntnisse als auch die meditativen Errungenschaften hervorzubringen, die Einsichtsmeditation bezüglich der Unbeständigkeit und des Leidens, und erlangte so die zur vollen Stärke gelangte Kraft der Einsicht. In der Weise, wie ich darin wohnend jene Kraft erlangen kann, ebenso erschuf [Vissakamma] jene Einsiedelei, indem er sie für meine höheren Erkenntnisse und die Kraft der Einsicht angemessen gestaltete – dies ist die Bedeutung.“ Sāṭakaṃ pajahiṃ tattha, navadosamupāgatanti etthāyaṃ anupubbikathā. Tadā kira kuṭileṇacaṅkamādipaṭimaṇḍitaṃ pupphūpagaphalūpagarukkhasañchannaṃ ramaṇīyaṃ madhurasalilāsayaṃ apagatavāḷamigabhiṃsanakasakuṇaṃ pavivekakkhamaṃ assamaṃ māpetvā alaṅkatacaṅkamassa ubhosu antesu ālambanaphalakaṃ saṃvidhāya nisīdanatthāya caṅkamavemajjhe samatalaṃ muggavaṇṇasilaṃ māpetvā anto paṇṇasālāya jaṭāmaṇḍalavākacīratidaṇḍakuṇḍikādike tāpasaparikkhāre maṇḍape pānīyaghaṭapānīyasaṅkhapānīyasarāvāni, aggisālāyaṃ aṅgārakapalladāruādīnīti evaṃ yaṃ yaṃ pabbajitānaṃ upakārāya saṃvattati, taṃ sabbaṃ māpetvā paṇṇasālāya bhittiyaṃ – ‘‘ye keci pabbajitukāmā ime parikkhāre gahetvā pabbajantū’’ti akkharāni chinditvā devalokameva gate vissakammadevaputte sumedhapaṇḍito himavantapāde girikandarānusārena attano nivāsānurūpaṃ phāsukaṭṭhānaṃ olokento nadīnivattane vissakammanimmitaṃ sakkadattiyaṃ ramaṇīyaṃ assamaṃ disvā caṅkamanakoṭiṃ gantvā padavaḷañjaṃ apassanto ‘‘dhuvaṃ pabbajitā dhuragāme bhikkhaṃ pariyesitvā kilantarūpā āgantvā paṇṇasālaṃ pavisitvā nisinnā bhavissantī’’ti cintetvā thokaṃ āgametvā ‘‘ativiya cirāyanti, jānissāmī’’ti paṇṇasāladvāraṃ vivaritvā anto pavisitvā ito cito ca olokento mahābhittiyaṃ akkharāni vācetvā ‘‘mayhaṃ kappiyaparikkhārā ete, ime gahetvā pabbajissāmī’’ti attanā nivatthapārutaṃ sāṭakayugaṃ pajahi. Tenāha ‘‘sāṭakaṃ pajahiṃ tatthā’’ti. Evaṃ paviṭṭho ahaṃ, sāriputta, tassaṃ paṇṇasālāyaṃ sāṭakaṃ pajahiṃ. „‚Dort gab ich das Gewand auf, das mit neun Mängeln behaftet war‘ – hierzu ist die folgende fortlaufende Erzählung: Damals, so heißt es, erschuf der Göttersohn Vissakamma eine liebliche, für die Abgeschiedenheit geeignete Einsiedelei, die mit einer überdachten Wandelbahn und anderem geschmückt, mit blühenden und fruchttragenden Bäumen bewachsen war, über Teiche mit süßem Wasser verfügte und frei von wilden Tieren und furchterregenden Vögeln war. An beiden Enden der hergerichteten Wandelbahn brachte er Stützbretter an, erschuf in der Mitte der Wandelbahn eine ebene, mungobohnengrüne Steinplatte zum Sitzen, stellte im Inneren der Blätterhütte die Utensilien eines Asketen wie Flechtenhaarschmuck, Rindengewand, Dreifuß, Wassertopf und dergleichen bereit, in der Halle Trinkwasserkrüge, Trinkmuscheln und Trinkschalen, und im Feuerhaus Kohlenbecken, Brennholz usw. – kurz: alles, was für das Leben von Ordinierten nützlich ist. Er ritzte an die Wand der Blätterhütte die Worte: ‚Wer immer die Hauslosigkeit anzunehmen wünscht, möge diese Utensilien nehmen und die Hauslosigkeit antreten‘, und kehrte in die Götterwelt zurück. Nachdem der Göttersohn Vissakamma gegangen war, hielt der weise Sumedha am Fuße des Himavanta-Gebirges entlang der Bergschluchten Ausschau nach einem angenehmen, für seinen Aufenthalt geeigneten Ort. An einer Flusskrümmung erblickte er die von Vissakamma erschaffene, von Sakka dargebotene, liebliche Einsiedelei. Er ging zum Ende der Wandelbahn, sah jedoch keine Fußspuren und dachte: ‚Sicherlich sind hier Ordinierte, die in einem fernen Dorf nach Almosen gesucht haben, erschöpft zurückgekehrt, in die Blätterhütte hineingegangen und sitzen nun dort.‘ Er wartete eine kurze Weile und dachte: ‚Sie lassen sich gar zu lange Zeit; ich will nachsehen.‘ Er öffnete die Tür der Blätterhütte, trat ein, blickte hierhin und dorthin, las die Schriftzeichen an der großen Wand und dachte: ‚Dies sind für mich geeignete Requisiten. Ich werde diese nehmen und die Hauslosigkeit antreten.‘ So legte er das Paar Gewänder ab, das er am Leib trug und umgehängt hatte. Daher sprach der Erhabene: ‚Dort gab ich das Gewand auf.‘ So eingetreten, o Sāriputta, legte ich in jener Blätterhütte das Gewand ab.“ Navadosamupāgatanti [Pg.11] sāṭakaṃ pajahanto nava dose disvā pajahinti dīpeti. Tāpasapabbajjaṃ pabbajitānañhi sāṭakasmiṃ nava dosā upaṭṭhahanti. Mahagghabhāvo eko doso, parapaṭibaddhatāya uppajjanabhāvo eko, paribhogena lahuṃ kilissanabhāvo eko, kiliṭṭho hi dhovitabbo ca rajitabbo ca hoti, paribhogena jīraṇabhāvo eko, jiṇṇassa hi tunnaṃ vā aggaḷadānaṃ vā kātabbaṃ hoti, puna pariyesanāya durabhisambhavabhāvo eko, tāpasapabbajjāya asāruppabhāvo eko, paccatthikānaṃ sādhāraṇabhāvo eko, yathā hi naṃ paccatthikā na gaṇhanti, evaṃ gopetabbo hoti, paribhuñjantassa vibhūsanaṭṭhānabhāvo eko, gahetvā vicarantassa khandhabhāramahicchabhāvo ekoti. „‚Das mit neun Mängeln behaftete [Gewand]‘ bedeutet: Er verdeutlicht, dass er das Gewand aufgab, da er darin neun Mängel sah. Denn für jene, die in die Hauslosigkeit der Asketen eingetreten sind, weisen feine Webgewänder neun Mängel auf: Erstens ist der hohe Wert ein Mangel. Zweitens ist die Tatsache, dass es in Abhängigkeit von anderen erlangt werden muss, ein Mangel. Drittens ist das schnelle Anschmutzen durch den Gebrauch ein Mangel; denn wenn es schmutzig ist, muss es gewaschen und gefärbt werden. Viertens ist das Abnutzen durch den Gebrauch ein Mangel; denn wenn es abgenutzt ist, muss es geflickt oder ausgebessert werden. Fünftens ist die schwere Erhältlichkeit bei einer erneuten Suche ein Mangel. Sechstens ist die Unangemessenheit für das mönchische Leben eines Asketen ein Mangel. Siebtens ist die Tatsache, dass es ein Gemeinschaftsgut für Feinde darstellt, ein Mangel; denn man muss es so hüten, dass Feinde es nicht an sich reißen. Achtens ist es für den Benutzer ein Anlass zur Zierde, was ein Mangel ist. Neuntens ist es für denjenigen, der damit umherzieht, eine Last auf den Schultern und ein Objekt großen Begehrens; dies ist ein Mangel.“ Vākacīraṃ nivāsesinti tadāhaṃ, sāriputta, ime nava dose disvā sāṭakaṃ pahāya vākacīraṃ nivāsesiṃ, muñjatiṇaṃ hīraṃ hīraṃ katvā ganthetvā kataṃ vākacīraṃ nivāsanapārupanatthāya ādiyinti attho. „‚Ich legte das Rindengewand an‘ bedeutet: ‚Damals, o Sāriputta, legte ich, nachdem ich diese neun Mängel sah, das feine Webgewand ab und legte das Rindengewand an.‘ Die Bedeutung ist, dass er das Rindengewand, welches aus in Streifen zerteiltem und zusammengeknüpftem Muñja-Gras hergestellt war, zum Bekleiden und Umhüllen annahm.“ Dvādasa guṇamupāgatanti dvādasahi ānisaṃsehi samannāgataṃ. Vākacīrasmiñhi dvādasa ānisaṃsā – appagghaṃ sundaraṃ kappiyanti ayaṃ tāva eko ānisaṃso, sahatthā kātuṃ sakkāti ayaṃ dutiyo, paribhogena saṇikaṃ kilissati, dhoviyamānepi papañco natthīti ayaṃ tatiyo, paribhogena jiṇṇepi sibbitabbābhāvo catuttho, puna pariyesantassa sukhena karaṇabhāvo pañcamo, tāpasapabbajjāya sāruppabhāvo chaṭṭho, paccatthikānaṃ nirupabhogabhāvo sattamo, paribhuñjantassa vibhūsanaṭṭhānābhāvo aṭṭhamo, dhāraṇe sallahukabhāvo navamo, cīvarapaccaye appicchabhāvo dasamo, vākuppattiyā dhammikaanavajjabhāvo ekādasamo, vākacīre naṭṭhepi anapekkhabhāvo dvādasamoti. „‚Das mit zwölf Vorzügen ausgestattete [Rindengewand]‘ bedeutet: mit zwölf heilsamen Wirkungen ausgestaltet. Denn am Rindengewand zeigen sich zwölf Vorteile: Erstens, dass es billig, gut und für Asketen zulässig ist – dies ist zunächst der erste Vorteil. Zweitens, dass man es mit eigenen Händen herstellen kann – dies ist der zweite. Drittens, dass es durch den Gebrauch nur langsam schmutzig wird und beim Waschen kein großer Aufwand entsteht – dies ist der dritte. Viertens, dass es selbst bei Abnutzung durch den Gebrauch nicht genäht werden muss – dies ist der vierte. Fünftens, dass es für jemanden, der danach sucht, leicht herzustellen ist – dies ist der fünfte. Sechstens, dass es für das mönchische Leben eines Asketen angemessen ist – dies ist der sechste. Siebtens, dass es für Feinde unbrauchbar ist – dies ist der siebte. Achtens, dass es für den Benutzer keinen Anlass zur Zierde darstellt – dies ist der achte. Neuntens, dass es beim Tragen sehr leicht ist – dies ist der neunte. Zehntens, dass es Genügsamkeit bezüglich des Gewand-Requisits fördert – dies ist der zehnte. Elftens, dass es, da es aus Pflanzenfasern gewonnen wird, rechtschaffen und tadellos ist – dies ist der elfte. Zwölftens, dass man selbst bei Verlust des Rindengewands keine Sorge empfindet – dies ist der zwölfte.“ Aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ, pajahiṃ paṇṇasālakanti kathaṃ pajahiṃ? So kira varasāṭakayugaṃ omuñcanto cīvaravaṃse laggitaṃ anojapupphadāmasadisaṃ rattaṃ vākacīraṃ gahetvā nivāsetvā tassūpari aparaṃ suvaṇṇavaṇṇaṃ vākacīraṃ paridahitvā punnāgapupphasantharasadisaṃ sakhuraṃ ajinacammaṃ ekaṃsaṃ katvā jaṭāmaṇḍalaṃ [Pg.12] paṭimuñcitvā cūḷāya saddhiṃ niccalabhāvakaraṇatthaṃ sārasūciṃ pavesetvā muttājālasadisāya sikkāya pavāḷavaṇṇaṃ kuṇḍikaṃ odahitvā tīsu ṭhānesu vaṅkaṃ kājaṃ ādāya ekissā kājakoṭiyā kuṇḍikaṃ, ekissā aṅkusapacchitidaṇḍakādīni olaggetvā khārikājaṃ aṃse katvā dakkhiṇena hatthena kattaradaṇḍaṃ gahetvā paṇṇasālato nikkhamitvā saṭṭhihatthe mahācaṅkame aparāparaṃ caṅkamanto attano vesaṃ oloketvā – ‘‘mayhaṃ manoratho matthakaṃ patto, sobhati vata me pabbajjā, buddhapaccekabuddhādīhi sabbehi dhīrapurisehi vaṇṇitā thomitā ayaṃ pabbajjā nāma, pahīnaṃ me gihibandhanaṃ, nikkhantosmi nekkhammaṃ, laddhā me uttamapabbajjā, karissāmi samaṇadhammaṃ, labhissāmi maggaphalasukha’’nti ussāhajāto khārikājaṃ otāretvā caṅkamavemajjhe muggavaṇṇasilāpaṭṭe suvaṇṇapaṭimā viya nisinno divasabhāgaṃ vītināmetvā sāyanhasamayaṃ paṇṇasālaṃ pavisitvā bidalamañcakapasse kaṭṭhattharikāya nipanno sarīraṃ utuṃ gāhāpetvā balavapaccūse pabujjhitvā attano āgamanaṃ āvajjesi – ‘‘ahaṃ gharāvāse ādīnavaṃ disvā amitabhogaṃ anantayasaṃ pahāya araññaṃ pavisitvā nekkhammagavesako hutvā pabbajito. Ito dāni paṭṭhāya pamādacāraṃ carituṃ na vaṭṭati, pavivekañhi pahāya vicarantaṃ micchāvitakkamakkhikā khādanti, idāni mayā vivekamanubrūhetuṃ vaṭṭati, ahañhi gharāvāsaṃ palibodhato disvā nikkhanto, ayañca manāpā paṇṇasālā, beluvapakkavaṇṇā paribhaṇḍakatā bhūmi, rajatavaṇṇā setabhittiyo, kapotapādavaṇṇaṃ paṇṇacchadanaṃ, vicittattharaṇavaṇṇo bidalamañcako, nivāsaphāsukaṃ vasanaṭṭhānaṃ, na etto atirekatarā viya me gehasampadā paññāyatī’’ti paṇṇasālāya dose vicinanto aṭṭha dose passi. „Ich verließ die Blätterhütte, die von acht Fehlern erfüllt war“ – wie verließ er sie? Er legte, so heißt es, sein kostbares Gewandpaar ab, nahm das am Kleiderständer hängende rote Rindenkleid, das einer Girlande aus Anoja-Blüten glich, legte es an und zog darüber ein weiteres, goldfarbenes Rindenkleid an. Dann legte er sich das Antilopenfell samt den Klauen, das wie eine Decke aus Punnāga-Blüten aussah, über eine Schulter. Er band sein langes Haar zu einem Haarknoten zusammen und steckte eine Holznadel hindurch, um es fest mit dem Haarschopf zu verbinden. Er setzte das korallenrote Wassergefäß in ein Tragnetz, das einem Perlennetz glich. Dann nahm er eine an drei Stellen gebogene Tragstange, hängte an das eine Ende der Tragstange das Wassergefäß und an das andere den Haken, den Korb, den Dreifuß-Stab usw., legte sich diese Lastentragstange auf die Schulter, nahm in die rechte Hand einen Wanderstab und verließ die Blätterhütte. Auf dem sechzig Ellen langen großen Wandelpfad ging er hin und her, betrachtete seine Erscheinung und dachte voller Tatendrang: „Mein Wunsch hat seinen Gipfel erreicht! Wie herrlich ist doch mein mönchisches Leben! Dieses mönchische Leben wird wahrlich von allen weisen Männern wie den Buddhas und Paccekabuddhas gepriesen und gerühmt. Meine Fesseln des Hausstands sind abgelegt, ich bin zur Entsagung ausgegangen, ich habe das höchste mönchische Leben erlangt. Ich werde die Pflichten eines Asketen erfüllen und das Glück von Pfad und Frucht erlangen!“ Er setzte die Lastentragstange ab und setzte sich in die Mitte des Wandelpfades auf eine Steinplatte, die die Farbe von grünen Mungbohnen hatte, wie eine goldene Bildsäule nieder und verbrachte so den restlichen Tag. Am Abend betrat er die Blätterhütte, legte sich neben das Bambusbett auf eine Holzunterlage, um dem Körper Akklimatisierung zu gönnen, und erwachte in der frühen Morgendämmerung. Da dachte er über sein Kommen nach: „Ich habe das Elend des Hauslebens erkannt, unermesslichen Reichtum und unendlichen Ruhm aufgegeben, bin in den Wald gegangen, um nach Entsagung zu suchen, und bin Ordinierter geworden. Von nun an geziemt es sich für mich nicht mehr, ein nachlässiges Leben zu führen. Denn wer die Abgeschiedenheit verlässt und umherwandert, den fressen die Fliegen der falschen Gedanken. Jetzt geziemt es sich für mich, die Einsamkeit zu pflegen. Ich bin ja ausgezogen, da ich das Hausleben als ein Hindernis erkannt habe. Und diese Blätterhütte ist zwar lieblich, der geglättete Boden hat die Farbe reifer Bael-Früchte, die weißen Wände sind silberfarben, das Blätterdach hat die Farbe von Taubenfüßen, das geflochtene Bambusbett gleicht einer bunt gedeckten Liege, die Wohnstätte ist bequem zum Verweilen – doch mir scheint diese Pracht des Hauses nicht geringer zu sein als mein früheres Heim.“ Während er so die Mängel der Blätterhütte untersuchte, sah er acht Mängel. Paṇṇasālaparibhogasmiñhi aṭṭha ādīnavā – mahāsamārambhena dabbasambhāre samodhānetvā karaṇapariyesanabhāvo eko ādīnavo, tiṇapaṇṇamattikāsu patitāsu tāsaṃ punappunaṃ ṭhapetabbatāya nibaddhajagganabhāvo dutiyo, senāsanaṃ nāma mahallakassa pāpuṇāti, avelāya vuṭṭhāpiyamānassa cittekaggatā na hotīti uṭṭhāpanīyabhāvo tatiyo, sītuṇhādipaṭighātena kāyassa sukhumālakaraṇabhāvo catuttho[Pg.13], gehaṃ paviṭṭhena yaṃkiñci pāpaṃ sakkā kātunti garahāpaṭicchādanabhāvo pañcamo, ‘‘mayha’’nti pariggahakaraṇabhāvo chaṭṭho, gehassa atthibhāvo nāmesa sadutiyakavāso viyāti sattamo, ūkāmaṅgulagharagoḷikādīnaṃ sādhāraṇatāya bahusādhāraṇabhāvo aṭṭhamo. Iti ime aṭṭha ādīnave disvā mahāsatto paṇṇasālaṃ pajahi. Tenāha – ‘‘aṭṭhadosasamākiṇṇaṃ, pajahiṃ paṇṇasālaka’’nti. Denn im Gebrauch einer Blätterhütte liegen acht Mängel: Erstens der Zustand, dass man Baumaterial mit großem Aufwand beschaffen und zusammenstellen muss, um sie zu bauen. Zweitens der Zustand ständiger Instandhaltung, da herabfallendes Gras, Blätter und Lehm immer wieder ausgebessert werden müssen. Drittens der Zustand, aufstehen zu müssen, da ein fester Wohnsitz einem Älteren gebührt; wenn man zu unpassenden Zeiten aufstehen muss, verliert man die Konzentration des Geistes. Viertens der Zustand der Verweichlichung des Körpers durch den Schutz vor Kälte, Hitze usw. Fünftens der Zustand des Verbergens von Tadelnswertem, da es möglich ist, jegliches Übel im Verborgenen zu tun, wenn man ein Haus betreten hat. Sechstens der Zustand der Aneignung mit dem Gedanken „Mein“. Siebtens der Zustand des Vorhandenseins eines Hauses, der wie das Wohnen mit einem Gefährten ist. Achtens der Zustand, den Ort mit vielen teilen zu müssen, da man ihn mit Läusen, Wanzen, Geckos usw. teilt. Als der Große Weise diese acht Mängel sah, verließ er die Blätterhütte. Darum sagte der Erhabene: „Ich verließ die Blätterhütte, die von acht Fehlern erfüllt war.“ Upāgamiṃ rukkhamūlaṃ, guṇe dasahupāgatanti channaṃ paṭikkhipitvā dasahi guṇehi upetaṃ rukkhamūlaṃ upagatosmīti vadati. Tatrime dasa guṇā – appasamārambhatā eko guṇo, upagamanamattakameva hi tattha hotīti. Appaṭijagganatā dutiyo, tañhi sammaṭṭhampi asammaṭṭhampi paribhogaphāsukaṃ hotiyeva. Anuṭṭhāpanīyabhāvo tatiyo. Garahaṃ nappaṭicchādeti, tattha hi pāpaṃ karonto lajjatīti garahāya appaṭicchannabhāvo catuttho. Abbhokāsavāso viya kāyaṃ na santhambhetīti kāyassa asanthambhanabhāvo pañcamo, pariggahakaraṇābhāvo chaṭṭho, gehālayapaṭikkhepo sattamo. Bahusādhāraṇe gehe viya ‘‘paṭijaggissāmi naṃ, nikkhamathā’’ti nīharaṇakābhāvo aṭṭhamo, vasantassa sappītikabhāvo navamo, rukkhamūlasenāsanassa gatagataṭṭhāne sulabhatāya anapekkhabhāvo dasamoti ime dasaguṇe disvā rukkhamūlaṃ upagatosmīti vadati. „Ich begab mich zum Fuß eines Baumes, der mit zehn Vorzügen ausgestattet war“ – er sagt damit, dass er das Dach abwies und sich an den Fuß eines Baumes begab, der mit zehn Vorzügen ausgestattet war. Hier sind die zehn Vorzüge: Erstens der geringe Aufwand, da man sich lediglich dorthin begeben muss. Zweitens die Freiheit von Pflege, da es, ob gefegt oder ungefegt, stets bequem zu nutzen ist. Drittens der Zustand, nicht für andere aufstehen zu müssen. Viertens das Nicht-Verbergen von Tadelnswertem; wer dort Böses tut, schämt sich, daher wird Tadelnswertes nicht verborgen. Fünftens der Zustand, dass der Körper nicht verweichlicht wird, genau wie beim Leben unter freiem Himmel. Sechstens das Fehlen von Eigentumsdenken. Siebtens die Zurückweisung der Anhaftung an ein Haus. Achtens das Fehlen von Vertreibung wie bei einem gemeinschaftlichen Haus mit den Worten: „Ich werde diesen Ort herrichten, geht hinaus!“ Neuntens ein Zustand der Freude für den dort Wohnenden. Zehntens die Wunschlosigkeit (Freiheit von Sorge), da ein Lagerplatz am Fuße eines Baumes an jedem Ort, an den man gelangt, leicht zu finden ist. Indem er diese zehn Vorzüge sah, sagt er: „Ich habe mich zum Fuß eines Baumes begeben.“ Imāni hi ettakāni kāraṇāni sallakkhetvā mahāsatto punadivase bhikkhāya gāmaṃ pāvisi. Athassa sampattagāme manussā mahantena ussāhena bhikkhaṃ adaṃsu. So bhattakiccaṃ niṭṭhāpetvā assamaṃ āgamma nisīditvā cintesi – ‘‘nāhaṃ ‘āhāraṃ labhāmī’ti pabbajito, siniddhāhāro nāmesa mānamadapurisamade vaḍḍheti, āhāramūlakassa ca dukkhassa anto natthi, yaṃnūnāhaṃ vāpitaropitadhaññanibbattakaṃ āhāraṃ pajahitvā pavattaphalabhojano bhaveyya’’nti. So tato paṭṭhāya tathā katvā ghaṭento vāyamanto sattāhabbhantareyeva aṭṭha samāpattiyo pañca ca abhiññāyo nibbattesi. Tena vuttaṃ – Nachdem der Große Weise diese Gründe erwogen hatte, betrat er am folgenden Tag das Dorf, um Almosen zu sammeln. Die Menschen in dem Dorf, das er erreichte, gaben ihm mit großem Eifer Almosenspeise. Nachdem er sein Mahl beendet hatte, kehrte er zur Einsiedelei zurück, setzte sich nieder und dachte: „Ich bin nicht in die Hauslosigkeit gezogen, um gute Nahrung zu erhalten. Solch feine Speise mehrt nur den Stolz der Einbildung und den Stolz der Männlichkeit. Und dem Leid, das seine Wurzel in der Nahrung hat, ist kein Ende. Wie wäre es, wenn ich die Nahrung, die aus gesätem und gepflanztem Getreide gewonnen wird, gänzlich aufgebe und mich nur noch von wild gewachsenen Früchten ernähre?“ Von da an tat er dies, bemühte sich beharrlich und erlangte innerhalb von nur sieben Tagen die acht Vertiefungen und die fünf höheren Geisteskräfte. Darum wurde gesagt: ‘‘Vāpitaṃ ropitaṃ dhaññaṃ, pajahiṃ niravasesato; Anekaguṇasampannaṃ, pavattaphalamādiyiṃ. „Das gesäte und gepflanzte Getreide gab ich gänzlich auf; ich nahm die von vielen guten Eigenschaften erfüllten, von selbst herabgefallenen Früchte an. ‘‘Tatthappadhānaṃ [Pg.14] padahiṃ, nisajjaṭṭhānacaṅkame; Abbhantaramhi sattāhe, abhiññābala pāpuṇi’’nti. „Dort übte ich die geistige Anstrengung im Sitzen, Stehen und Gehen aus; innerhalb von sieben Tagen erlangte ich die Kraft der höheren Geisteskräfte.“ Dīpaṅkaro buddho Der Buddha Dīpaṅkara Evaṃ abhiññābalaṃ patvā sumedhatāpase samāpattisukhena vītināmente dīpaṅkaro nāma satthā loke udapādi. Tassa paṭisandhijātibodhi dhammacakkappavattanesu sakalāpi dasasahassilokadhātu saṅkampi sampakampi sampavedhi, mahāviravaṃ ravi, dvattiṃsa pubbanimittāni pāturahesuṃ. Sumedhatāpaso samāpattisukhena vītināmento neva taṃ saddamassosi, na ca tāni nimittāni addasa. Tena vuttaṃ – Als der Asket Sumedha auf diese Weise die Kraft der höheren Geisteskräfte erlangt hatte und seine Zeit im Glück der meditativen Erreichungen verbrachte, erschien der Lehrer namens Dīpaṅkara in der Welt. Bei seiner Empfängnis, Geburt, Erleuchtung und dem Ingangsetzen des Rades der Lehre erschütterte, erbebte und erzitterte das gesamte zehntausendfache Weltsystem gewaltig, stieß ein großes Getöse aus, und zweiunddreißig Vorzeichen traten in Erscheinung. Der Asket Sumedha jedoch, der seine Zeit im Glück der meditativen Erreichungen verbrachte, hörte weder jenes Geräusch, noch sah er jene Zeichen. Daher wurde gesagt: ‘‘Evaṃ me siddhippattassa, vasībhūtassa sāsane; Dīpaṅkaro nāma jino, uppajji lokanāyako. „Als ich auf diese Weise zur Vollkommenheit gelangt und der Beherrschung in der Lehre mächtig war, erschien der Sieger namens Dīpaṅkara, der Führer der Welt. ‘‘Uppajjante ca jāyante, bujjhante dhammadesane; Caturo nimitte nāddasaṃ, jhānaratisamappito’’ti. Sowohl bei seiner Empfängnis als auch bei seiner Geburt, seiner Erleuchtung und der Verkündigung der Lehre sah ich die vier Vorzeichen nicht, da ich ganz der Freude der Vertiefung hingegeben war.“ Tasmiṃ kāle dīpaṅkaradasabalo catūhi khīṇāsavasatasahassehi parivuto anupubbena cārikaṃ caramāno rammaṃ nāma nagaraṃ patvā sudassanamahāvihāre paṭivasati. Rammanagaravāsino ‘‘dīpaṅkaro kira samaṇissaro paramābhisambodhiṃ patvā pavattavaradhammacakko anupubbena cārikaṃ caramāno amhākaṃ rammanagaraṃ patvā sudassanamahāvihāre paṭivasatī’’ti sutvā sappinavanītādīni ceva bhesajjāni vatthacchādanāni ca gāhāpetvā gandhamālādihatthā yena buddho, yena dhammo, yena saṅgho, tanninnā tappoṇā tappabbhārā hutvā satthāraṃ upasaṅkamitvā vanditvā gandhamālādīhi pūjetvā ekamantaṃ nisinnā dhammadesanaṃ sutvā svātanāya nimantetvā uṭṭhāyāsanā pakkamiṃsu. Zu jener Zeit wanderte der zehnkräftebegabte Dīpaṅkara, umgeben von vierhunderttausend triebversiegten Heiligen, allmählich umher, erreichte die Stadt namens Ramma und ließ sich im Großen Sudassana-Kloster nieder. Als die Bewohner der Stadt Ramma hörten: ‚Der ehrwürdige Herr der Asketen Dīpaṅkara, der die höchste vollkommene Erleuchtung erlangt und das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt hat, ist auf seiner schrittweisen Wanderung in unserer Stadt Ramma eingetroffen und verweilt im Großen Sudassana-Kloster‘, nahmen sie geklärte Butter, frische Butter und andere Heilmittel sowie Gewänder und Kleidung mit sich. Mit Duftstoffen, Blumen und Ähnlichem in den Händen machten sie sich auf den Weg dorthin, wo der Buddha, die Lehre und die Gemeinschaft waren – ganz auf sie ausgerichtet, ihnen zugewandt und hingegeben. Sie näherten sich dem Lehrer, erwiesen ihm Ehrerbietung, verehrten ihn mit Duftstoffen, Blumen und anderem, setzten sich an eine Seite nieder, hörten die Lehrverkündigung, luden ihn für den folgenden Tag ein, erhoben sich von ihren Sitzen und gingen fort. Te punadivase mahādānaṃ sajjetvā nagaraṃ alaṅkaritvā dasabalassa āgamanamaggaṃ alaṅkarontā udakabhinnaṭṭhānesu paṃsuṃ pakkhipitvā samaṃ bhūmitalaṃ katvā rajatapaṭṭavaṇṇaṃ vālukaṃ ākiranti, lāje ceva pupphāni ca vikiranti, nānāvirāgehi vatthehi dhajapaṭāke ussāpenti, kadaliyo ceva puṇṇaghaṭapantiyo ca patiṭṭhāpenti. Tasmiṃ kāle sumedhatāpaso attano assamapadā ākāsaṃ uggantvā, tesaṃ manussānaṃ uparibhāgena ākāsena gacchanto te haṭṭhatuṭṭhe manusse disvā ‘‘kiṃ nu kho kāraṇa’’nti [Pg.15] ākāsato oruyha ekamantaṃ ṭhito manusse pucchi – ‘‘ambho, kassa tumhe idha visamaṃ maggaṃ alaṅkarothā’’ti? Tena vuttaṃ – Am nächsten Tag bereiteten sie eine große Gabe vor, schmückten die Stadt und richteten den Weg für die Ankunft des Zehnkräftebegabten her, indem sie Erde in die vom Wasser ausgespülten Stellen füllten, den Boden eben machten und silberglänzenden Sand ausstreuten. Sie verstreuten auch Puffreis sowie Blumen, hissten Flaggen und Banner aus verschiedenfarbigen Stoffen und stellten Bananenstauden sowie Reihen von gefüllten Krügen auf. Zu jener Zeit erhob sich der Asket Sumedha von seiner Einsiedelei aus in die Lüfte. Als er am Himmel über jene Menschen hinwegflog, sah er diese freudig erregten Menschen und fragte sich: ‚Was mag wohl der Grund sein?‘ Er stieg vom Himmel herab, stellte sich an eine Seite und fragte die Menschen: ‚Ihr lieben Leute, für wen schmückt ihr hier diesen unwegsamen Pfad?‘ Dazu wurde gesagt: ‘‘Paccantadesavisaye, nimantetvā tathāgataṃ; Tassa āgamanaṃ maggaṃ, sodhenti tuṭṭhamānasā. „Nachdem sie den Tathāgata in das Grenzgebiet eingeladen haben, reinigen sie mit freudigem Herzen den Weg für seine Ankunft. ‘‘Ahaṃ tena samayena, nikkhamitvā sakassamā; Dhunanto vākacīrāni, gacchāmi ambare tadā. Ich verließ zu jener Zeit meine Einsiedelei, schüttelte meine Rindenkleider aus und reiste damals durch den Luftraum. ‘‘Vedajātaṃ janaṃ disvā, tuṭṭhahaṭṭhaṃ pamoditaṃ; Orohitvāna gaganā, manusse pucchi tāvade. Als ich die von Freude erfüllte, glückliche und frohlockende Menge sah, stieg ich vom Himmel herab und fragte sogleich die Menschen: ‘‘‘Tuṭṭhahaṭṭho pamudito, vedajāto mahājano; Kassa sodhīyati maggo, añjasaṃ vaṭumāyana’’’nti. ‚Für wen säubert diese glückliche, hocherfreute und von Entzücken erfüllte Volksmenge diesen Weg, diesen gebahnten Pfad?‘“ Manussā āhaṃsu – ‘‘bhante sumedha, na tvaṃ jānāsi, dīpaṅkaro dasabalo sammāsambuddho sambodhiṃ patvā pavattavaradhammacakko cārikaṃ caramāno amhākaṃ nagaraṃ patvā sudassanamahāvihāre paṭivasati. Mayaṃ taṃ bhagavantaṃ nimantayimha, tassetaṃ buddhassa bhagavato āgamanamaggaṃ alaṅkaromā’’ti. Atha sumedhatāpaso cintesi – ‘‘buddhoti kho ghosamattakampi loke dullabhaṃ, pageva buddhuppādo, mayāpi imehi manussehi saddhiṃ dasabalassa maggaṃ alaṅkarituṃ vaṭṭatī’’ti. So te manusse āha – ‘‘sace, bho, tumhe etaṃ maggaṃ buddhassa alaṅkarotha, mayhampi ekaṃ okāsaṃ detha, ahampi tumhehi saddhiṃ maggaṃ alaṅkarissāmī’’ti. Te ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā ‘‘sumedhatāpaso iddhimā’’ti jānantā udakabhinnokāsaṃ sallakkhetvā – ‘‘tvaṃ imaṃ ṭhānaṃ alaṅkarohī’’ti adaṃsu. Sumedho buddhārammaṇaṃ pītiṃ gahetvā cintesi – ‘‘ahaṃ imaṃ okāsaṃ iddhiyā alaṅkarituṃ pahomi, evaṃ alaṅkato na maṃ paritosessati, ajja mayā kāyaveyyāvaccaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti paṃsuṃ āharitvā tasmiṃ padese pakkhipi. Die Menschen antworteten: ‚Ehrwürdiger Sumedha, weißt du es nicht? Der zehnkräftebegabte Dīpaṅkara, der vollkommen Erleuchtete, der die Erleuchtung erlangt und das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt hat, ist auf seiner Wanderung in unserer Stadt eingetroffen und verweilt im Großen Sudassana-Kloster. Wir haben den Erhabenen eingeladen und schmücken nun diesen Weg für die Ankunft dieses Buddhas, des Erhabenen.‘ Da dachte der Asket Sumedha: ‚Schon der bloße Ruf „Buddha“ ist in der Welt überaus selten zu hören, wie viel mehr noch das Erscheinen eines Buddhas! Es ist angemessen, dass auch ich gemeinsam mit diesen Menschen den Weg für den Zehnkräftebegabten schmücke.‘ Er sprach zu den Menschen: ‚Ihr Herren, wenn ihr diesen Weg für den Buddha schmückt, so gebt auch mir einen Abschnitt; ich will gemeinsam mit euch den Weg herrichten.‘ Sie stimmten mit den Worten ‚Sehr wohl‘ zu, und da sie wussten, dass der Asket Sumedha über übernatürliche Kräfte verfügte, wiesen sie ihm eine vom Wasser ausgespülte, schlammige Stelle zu und sagten: ‚Schmücke du diesen Platz.‘ Sumedha, erfüllt von einer Freude, die auf den Buddha gerichtet war, dachte bei sich: ‚Ich wäre zwar imstande, diesen Platz durch meine Geisteskräfte zu verschönern, doch ein auf diese Weise geschmückter Weg würde mir keine innere Befriedigung schenken. Heute ist es angebracht, dass ich körperliche Arbeit verrichte.‘ So trug er Erde herbei und schüttete sie an jener Stelle auf. Tassa tasmiṃ padese aniṭṭhiteyeva dīpaṅkaradasabalo mahānubhāvānaṃ chaḷabhiññānaṃ khīṇāsavānaṃ catūhi satasahassehi parivuto devatāsu dibbagandhamālādīhi pūjayantāsu dibbaturiyehi vajjantāsu dibbasaṅgītesu pavattentesu manussesu mānusakehi gandhamālādīhi ceva turiyehi [Pg.16] ca pūjayantesu anopamāya buddhalīlāya manosilātale vijambhamāno sīho viya taṃ alaṅkatapaṭiyattaṃ maggaṃ paṭipajji. Sumedhatāpaso akkhīni ummīletvā alaṅkatamaggena āgacchantassa dasabalassa dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitaṃ asītiyā anubyañjanehi anurañjitaṃ byāmappabhāya samparivāritaṃ maṇivaṇṇagaganatale nānappakārā vijjulatā viya āveḷāveḷabhūtā ceva yugaḷayugaḷabhūtā ca chabbaṇṇaghanabuddharasmiyo vissajjentaṃ rūpasobhaggappattaṃ attabhāvaṃ oloketvā – ‘‘ajja mayā dasabalassa jīvitapariccāgaṃ kātuṃ vaṭṭati, mā bhagavā kalalaṃ akkami, maṇiphalakasetuṃ pana akkamanto viya saddhiṃ catūhi khīṇāsavasatasahassehi mama piṭṭhiṃ maddamāno gacchatu, taṃ me bhavissati dīgharattaṃ hitāya sukhāyā’’ti kese mocetvā ajinacammajaṭāmaṇḍalavākacīrāni kāḷavaṇṇe kalale pattharitvā maṇiphalakasetu viya kalalapiṭṭhe nipajji. Tena vuttaṃ – Noch ehe jener Abschnitt von ihm fertiggestellt war, kam der zehnkräftebegabte Dīpaṅkara herbei, umgeben von vierhunderttausend triebversiegten Heiligen von großer Macht und im Besitz der sechs höheren Geisteskräfte. Während die Gottheiten ihn mit himmlischen Düften, Blumen und Ähnlichem verehrten, himmlische Instrumente spielten und himmlische Gesänge anstimmten, und auch die Menschen ihn mit menschlichen Düften, Blumen sowie Musikinstrumenten ehrten, betrat er in unvergleichlicher Buddha-Pracht, gleich einem Löwen, der sich auf einer Zinnoberplatte stolz bewegt, jenen hergerichteten und geschmückten Pfad. Der Asket Sumedha öffnete seine Augen und blickte auf die Gestalt des Zehnkräftebegabten, der auf dem geschmückten Weg heranschritt. Sie war geschmückt mit den zweiunddreißig Merkmalen eines großen Mannes, verschönt durch die achtzig Nebenmerkmale, umgeben von einer fadenbreiten Aura und sandte dichte, sechsfarbige Buddha-Strahlen aus, die wie vielfältige Blitze am saphirblauen Himmel einmal kranzartig, einmal paarweise erstrahlten und von vollendeter körperlicher Schönheit waren. Da dachte er: ‚Heute gebührt es mir, mein Leben für den Zehnkräftebegabten hinzugeben. Der Erhabene soll nicht in den Schlamm treten! Vielmehr soll er, wie auf einer Brücke aus Edelsteinplatten, gemeinsam mit den vierhunderttausend triebversiegten Heiligen über meinen Rücken hinwegschreiten. Dies wird mir lange Zeit zum Heil und Segen gereichen.‘ Er löste sein Haar, breitete seine Antilopenhaut, sein Flechtenhaar und seine Rindenkleider auf dem schwarzen Schlamm aus und legte sich wie eine Brücke aus Edelsteinplatten auf den schlammigen Boden nieder. Dazu wurde gesagt: ‘‘Te me puṭṭhā viyākaṃsu, ‘buddho loke anuttaro; Dīpaṅkaro nāma jino, uppajji lokanāyako; Tassa sodhīyati maggo, añjasaṃ vaṭumāyanaṃ’. „Auf meine Frage hin antworteten sie mir: ‚Ein unvergleichlicher Buddha ist in der Welt erschienen, der Sieger namens Dīpaṅkara, der Führer der Welt. Für ihn wird dieser Weg, dieser gebahnte Pfad, gesäubert.‘ ‘‘Buddhotivacanaṃ sutvāna, pīti uppajji tāvade; Buddho buddhoti kathayanto, somanassaṃ pavedayiṃ. Sobald ich das Wort ‚Buddha‘ gehört hatte, stieg sogleich große Freude in mir auf. Während ich ‚Buddha, Buddha‘ rief, bekundete ich mein großes Entzücken.“ ‘‘Tattha ṭhatvā vicintesiṃ, tuṭṭho saṃviggamānaso; ‘Idha bījāni ropissaṃ, khaṇo ve mā upaccagā’. Dort stehend dachte ich nach, erfreut und mit tief bewegtem Geist: 'Hier will ich die Samen säen; möge der günstige Augenblick mir ja nicht entgehen!' ‘‘Yadi buddhassa sodhetha, ekokāsaṃ dadātha me; Ahampi sodhayissāmi, añjasaṃ vaṭumāyanaṃ. Wenn ihr den Weg des Buddha säubert, gebt mir einen Abschnitt. Auch ich will den Pfad, den Weg, säubern. ‘‘Adaṃsu te mamokāsaṃ, sodhetuṃ añjasaṃ tadā; Buddho buddhoti cintento, maggaṃ sodhemahaṃ tadā. Da gaben sie mir einen Abschnitt, um den Pfad damals zu säubern. 'Buddha, Buddha' denkend, säuberte ich damals den Weg. ‘‘Aniṭṭhite mamokāse, dīpaṅkaro mahāmuni; Catūhi satasahassehi, chaḷabhiññehi tādihi; Khīṇāsavehi vimalehi, paṭipajji añjasaṃ jino. Als mein Abschnitt noch unvollendet war, betrat Dīpaṅkara, der große Weise, der Sieger, mit vierhunderttausend solchen [Heiligen], die die sechs höheren Geisteskräfte besaßen, deren Triebe versiegt waren und die makellos waren, den Pfad. ‘‘Paccuggamanā [Pg.17] vattanti, vajjanti bheriyo bahū; Āmoditā naramarū, sādhukāraṃ pavattayuṃ. Das Entgegengehen fand statt; viele Trommeln wurden geschlagen. Erfreut ließen Menschen und Götter Rufe des Lobes ertönen. ‘‘Devā manusse passanti, manussāpi ca devatā; Ubhopi te pañjalikā, anuyanti tathāgataṃ. Die Götter sahen die Menschen, und auch die Menschen sahen die Götter; und beide folgten dem Tathāgata mit gefalteten Händen. ‘‘Devā dibbehi turiyehi, manussā mānusehi ca; Ubhopi te vajjayantā, anuyanti tathāgataṃ. Die Götter mit himmlischen Musikinstrumenten und die Menschen mit menschlichen; beide folgten dem Tathāgata, während sie spielten. ‘‘Dibbaṃ mandāravaṃ pupphaṃ, padumaṃ pārichattakaṃ; Disodisaṃ okiranti, ākāsanabhagatā marū. Himmlische Mandārava-Blüten, Lotosblüten und Pārichattaka-Blüten streuten die am Himmel befindlichen Götter in alle Richtungen aus. ‘‘Dibbaṃ candanacuṇṇañca, varagandhañca kevalaṃ; Disodisaṃ okiranti, ākāsanabhagatā marū. Himmlischen Sandelholzstaub und reinsten, erlesenen Duft streuten die am Himmel befindlichen Götter in alle Richtungen aus. ‘‘Campakaṃ salalaṃ nīpaṃ, nāgapunnāgaketakaṃ; Disodisaṃ ukkhipanti, bhūmitalagatā narā. Campaka, Salala, Nīpa, Nāga, Punnāga und Ketaka[-Blüten] warfen die auf dem Erdboden befindlichen Menschen in alle Richtungen empor. ‘‘Kese muñcitvāhaṃ tattha, vākacīrañca cammakaṃ; Kalale pattharitvāna, avakujjo nipajjahaṃ. Nachdem ich dort mein Haar gelöst und mein Rindengewand sowie mein Fellgewand im Schlamm ausgebreitet hatte, legte ich mich bäuchlings nieder. ‘‘Akkamitvāna maṃ buddho, saha sissehi gacchatu; Mā naṃ kalale akkamittha, hitāya me bhavissatī’’ti. 'Möge der Buddha, indem er auf mich tritt, zusammen mit seinen Schülern weitergehen; er soll nicht in den Schlamm treten. Das wird mir zum Heile gereichen.' So pana kalalapiṭṭhe nipannakova puna akkhīni ummīletvā dīpaṅkaradasabalassa buddhasiriṃ sampassamāno evaṃ cintesi – ‘‘sace ahaṃ iccheyyaṃ, sabbakilese jhāpetvā saṅghanavako hutvā rammanagaraṃ paviseyyaṃ, aññātakavesena pana me kilese jhāpetvā nibbānappattiyā kiccaṃ natthi, yaṃnūnāhaṃ dīpaṅkaradasabalo viya paramābhisambodhiṃ patvā dhammanāvaṃ āropetvā mahājanaṃ saṃsārasāgarā uttāretvā pacchā parinibbāyeyyaṃ, idaṃ mayhaṃ patirūpa’’nti. Tato aṭṭha dhamme samodhānetvā buddhabhāvāya abhinīhāraṃ katvā nipajji. Tena vuttaṃ – Als er nun auf dem Schlamm lag, öffnete er seine Augen wieder, blickte auf die Buddha-Pracht des zehnkräftebegabten Dīpaṅkara und dachte so: 'Wenn ich wollte, könnte ich, nachdem ich alle Befleckungen verbrannt habe, als neuordinierter Mönch in die Stadt Ramma eintreten. Aber was nützt es mir, in unerkannter Gestalt meine Befleckungen zu verbrennen und das Nirwana zu erlangen? Wie wäre es, wenn ich wie der zehnkräftebegabte Dīpaṅkara die höchste vollkommene Erleuchtung erlangte, die Menschen auf das Schiff der Lehre steigen ließe, sie aus dem Ozean des Samsara hinüberführte und erst danach ins Parinirwana einginge? Dies ist für mich angemessen.' Daraufhin vereinte er die acht Faktoren in sich, fasste den Entschluss zur Erlangung der Buddhaschaft und blieb liegen. Daher wurde gesagt: ‘‘Pathaviyaṃ nipannassa, evaṃ me āsi cetaso; ‘Icchamāno ahaṃ ajja, kilese jhāpaye mama. 'Als ich auf der Erde lag, entstand in mir folgender Gedanke: Wenn ich es heute wollte, könnte ich meine Befleckungen verbrennen. ‘‘‘Kiṃ [Pg.18] me aññātavesena, dhammaṃ sacchikatenidha; Sabbaññutaṃ pāpuṇitvā, buddho hessaṃ sadevake. 'Was nützt es mir, hier in unerkannter Gestalt die Wahrheit zu verwirklichen? Nachdem ich die Allwissenheit erlangt habe, werde ich ein Buddha in der Welt samt den Göttern werden. ‘‘‘Kiṃ me ekena tiṇṇena, purisena thāmadassinā; Sabbaññutaṃ pāpuṇitvā, santāressaṃ sadevakaṃ. 'Was nützt es mir, als ein einzelner Mann, der das Ufer sieht, hinüberzufahren? Nachdem ich die Allwissenheit erlangt habe, werde ich die Welt samt den Göttern hinüberführen. ‘‘‘Iminā me adhikārena, katena purisuttame; Sabbaññutaṃ pāpuṇitvā, tāremi janataṃ bahuṃ. 'Durch dieses mein Verdienst, das ich gegenüber dem Höchsten der Menschen vollbracht habe, will ich nach Erlangung der Allwissenheit die große Menschenmenge erlösen. ‘‘‘Saṃsārasotaṃ chinditvā, viddhaṃsetvā tayo bhave; Dhammanāvaṃ samāruyha, santāressaṃ sadevaka’’’nti. 'Nachdem ich den Strom des Samsara abgeschnitten und die drei Daseinswelten zerstört habe, will ich das Schiff der Lehre besteigen und die Welt samt den Göttern hinüberführen.' Yasmā pana buddhattaṃ patthentassa – Da jedoch für jemanden, der die Buddhaschaft anstrebt— ‘‘Manussattaṃ liṅgasampatti, hetu satthāradassanaṃ; Pabbajjā guṇasampatti, adhikāro ca chandatā; Aṭṭhadhammasamodhānā, abhinīhāro samijjhatī’’ti. '—durch das Zusammenkommen von acht Faktoren der Entschluss erfolgreich ist: Menschsein, das männliche Geschlecht, die Ursache (Eignung), das Sehen eines Meisters, das Hauslosenleben, die Vollkommenheit der Tugenden, die Tat der Hingabe und der starke Wille.' Manussattabhāvasmiṃyeva hi ṭhatvā buddhattaṃ patthentassa patthanā samijjhati, nāgassa vā supaṇṇassa vā devatāya vā sakkassa vā patthanā no samijjhati. Manussattabhāvepi purisaliṅge ṭhitasseva patthanā samijjhati, itthiyā vā paṇḍakanapuṃsakaubhatobyañjanakānaṃ vā no samijjhati. Purisassapi tasmiṃ attabhāve arahattappattiyā hetusampannasseva patthanā samijjhati, no itarassa. Hetusampannassāpi jīvamānabuddhasseva santike patthentasseva patthanā samijjhati, parinibbute buddhe cetiyasantike vā bodhimūle vā patthentassa na samijjhati. Buddhānaṃ santike patthentassapi pabbajjāliṅge ṭhitasseva samijjhati, no gihiliṅge ṭhitassa. Pabbajitassapi pañcābhiññāaṭṭhasamāpattilābhinoyeva samijjhati, na imāya guṇasampattiyā virahitassa. Guṇasampannenapi yena attano jīvitaṃ buddhānaṃ pariccattaṃ hoti, tasseva iminā adhikārena adhikārasampannassa samijjhati, na itarassa. Adhikārasampannassāpi yassa buddhakārakadhammānaṃ atthāya mahanto chando ca ussāho ca vāyāmo ca pariyeṭṭhi ca, tasseva samijjhati, na itarassa. Denn nur für denjenigen, der im Zustand des Menschseins die Buddhaschaft anstrebt, ist der Entschluss erfolgreich; der Wunsch eines Nāga, eines Supaṇṇa, einer Gottheit oder Sakka ist nicht erfolgreich. Selbst im Zustand des Menschseins ist der Entschluss nur für denjenigen erfolgreich, der das männliche Geschlecht besitzt; für eine Frau, einen Eunuchen, einen Hermaphroditen oder einen Intersexuellen ist er nicht erfolgreich. Selbst für einen Mann ist der Entschluss in dieser Existenz nur erfolgreich, wenn er die Ursache zur Erlangung der Arhatschaft besitzt, nicht für einen anderen. Selbst für einen, der diese Ursache besitzt, ist der Entschluss nur erfolgreich, wenn er ihn in Gegenwart eines lebenden Buddhas äußert; wenn er den Wunsch äußert, nachdem der Buddha ins Parinirwana eingegangen ist, sei es vor einem Schrein oder am Fuße des Bodhi-Baumes, ist er nicht erfolgreich. Selbst wenn er ihn in Gegenwart der Buddhas äußert, ist er nur erfolgreich für jemanden, der sich im Stande des Hauslosenlebens befindet, nicht für einen im Laienstand Befindlichen. Selbst für einen Hauslosen ist er nur für denjenigen erfolgreich, der die fünf höheren Geisteskräfte und die acht geistigen Sammlungen erlangt hat, nicht für einen, der dieser Vollkommenheit der Tugenden entbehrt. Selbst für einen, der diese Tugendvollkommenheit besitzt, ist er nur für denjenigen erfolgreich, der durch eine Tat der Hingabe sein eigenes Leben für die Buddhas aufgegeben hat, nicht für einen anderen. Und selbst für einen, der diese Tat der Hingabe vollbracht hat, ist er nur für denjenigen erfolgreich, der ein großes Verlangen, großen Eifer, große Anstrengung und großes Suchen nach den buddha-wirkenden Eigenschaften besitzt, nicht für einen anderen. Tatridaṃ [Pg.19] chandamahantatāya opammaṃ – sace hi evamassa yo sakalacakkavāḷagabbhaṃ ekodakībhūtaṃ attano bāhubalena uttaritvā pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇāti. Yo vā pana sakalacakkavāḷagabbhaṃ veḷugumbasañchannaṃ viyūhitvā madditvā padasā gacchanto pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇāti. Yo vā pana sakalacakkavāḷagabbhaṃ sattiyo ākoṭetvā nirantaraṃ sattiphalasamākiṇṇaṃ padasā akkamamāno pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇāti. Yo vā pana sakalacakkavāḷagabbhaṃ vītaccitaṅgārabharitaṃ pādehi maddamāno pāraṃ gantuṃ samattho, so buddhattaṃ pāpuṇātīti. Yo etesu ekampi attano dukkaraṃ na maññati, ‘‘ahaṃ etampi taritvā vā gantvā vā pāraṃ gamissāmī’’ti evaṃ mahantena chandena ca ussāhena ca vāyāmena ca pariyeṭṭhiyā ca samannāgato hoti, etasseva patthanā samijjhati, na itarassa. Tasmā sumedhatāpaso ime aṭṭha dhamme samodhānetvāva buddhabhāvāya abhinīhāraṃ katvā nipajji. Hierzu ist folgendes Gleichnis für die Größe des Verlangens: Wenn es so wäre, dass derjenige, der das gesamte, ganz von Wasser erfüllte Weltsystem allein durch die Kraft seiner Arme durchschwimmen und das jenseitige Ufer erreichen könnte, die Buddhaschaft erlangt; oder wenn derjenige, der das gesamte, mit einem Bambusdickicht bedeckte Weltsystem durchdringen und niedertreten und zu Fuß gehend das jenseitige Ufer erreichen könnte, die Buddhaschaft erlangt; oder wenn derjenige, der das gesamte Weltsystem, in das Speere dicht an dicht hineingesteckt sind, zu Fuß betretend das jenseitige Ufer erreichen könnte, die Buddhaschaft erlangt; oder wenn derjenige, der das gesamte, mit glühenden Kohlen gefüllte Weltsystem mit den Füßen zertretend das jenseitige Ufer erreichen könnte, die Buddhaschaft erlangt: Wer nun auch nur eine einzige dieser Taten für sich selbst nicht als zu schwer ansieht, sondern mit einem so großen Verlangen, Eifer, Anstrengung und Suchen ausgestattet ist, indem er denkt: 'Selbst dies will ich durchschwimmen oder durchwandern und das jenseitige Ufer erreichen', dessen Entschluss geht in Erfüllung, nicht der eines anderen. Deshalb legte sich der Asket Sumedha erst nieder, nachdem er diese acht Faktoren in sich vereint und den Entschluss zur Erlangung der Buddhaschaft gefasst hatte. Dīpaṅkaropi bhagavā āgantvā sumedhatāpasassa sīsabhāge ṭhatvā maṇisīhapañjaraṃ ugghāṭento viya pañcavaṇṇapasādasampannāni akkhīni ummīletvā kalalapiṭṭhe nipannaṃ sumedhatāpasaṃ disvā ‘‘ayaṃ tāpaso buddhattāya abhinīhāraṃ katvā nipanno, samijjhissati nu kho etassa patthanā, udāhu no’’ti anāgataṃsañāṇaṃ pesetvā upadhārento – ‘‘ito kappasatasahassādhikāni cattāri asaṅkhyeyyāni atikkamitvā ayaṃ gotamo nāma buddho bhavissatī’’ti ñatvā ṭhitakova parisamajjhe byākāsi – ‘‘passatha no tumhe imaṃ uggatapaṃ tāpasaṃ kalalapiṭṭhe nipanna’’nti? ‘‘Evaṃ, bhante’’ti. Ayaṃ buddhattāya abhinīhāraṃ katvā nipanno, samijjhissati imassa patthanā. Ayañhi ito kappasatasahassādhikānaṃ catunnaṃ asaṅkhayeyyānaṃ matthake gotamo nāma buddho bhavissati. Tasmiṃ panassa attabhāve kapilavatthu nāma nagaraṃ nivāso bhavissati, māyā nāma devī mātā, suddhodano nāma rājā pitā, aggasāvako upatisso nāma thero, dutiyasāvako kolito nāma, buddhupaṭṭhāko ānando nāma, aggasāvikā khemā nāma therī, dutiyasāvikā uppalavaṇṇā [Pg.20] nāma therī bhavissati. Ayaṃ paripakkañāṇo mahābhinikkhamanaṃ katvā mahāpadhānaṃ padahitvā nigrodharukkhamūle pāyāsaṃ paṭiggahetvā nerañjarāya tīre paribhuñjitvā bodhimaṇḍaṃ āruyha assattharukkhamūle abhisambujjhissatīti. Tena vuttaṃ – Auch der Erhabene Dīpaṅkara kam herbei, blieb am Kopfende des Asketen Sumedha stehen und öffnete – gleichsam als würde er ein mit Juwelen verziertes Löwenfenster öffnen – seine mit fünffacher farbiger Klarheit ausgestatteten Augen. Als er den auf dem Schlammboden liegenden Asketen Sumedha erblickte, sandte er sein Wissen über die Zukunft aus, um zu prüfen: „Dieser Asket liegt hier, nachdem er den Entschluss zur Erlangung der Buddhaschaft gefasst hat. Wird sein Wunsch in Erfüllung gehen oder nicht?“ Da erkannte er: „Nach dem Vergehen von vier unzählbaren Äonen und weiteren einhunderttausend Äonen von heute an wird dieser hier ein Buddha namens Gotama werden.“ Und noch im Stehen verkündete er inmitten der Versammlung: „Seht ihr diesen Asketen von strenger Askese auf dem Schlammboden liegen?“ „Ja, Herr“, [antworteten sie]. „Er liegt hier, nachdem er den Entschluss zur Buddhaschaft gefasst hat; sein Wunsch wird in Erfüllung gehen. Denn am Ende von vier unzählbaren Äonen und einhunderttausend Äonen von jetzt an wird er ein Buddha namens Gotama sein. In jener Existenz wird seine Wohnstätte die Stadt namens Kapilavatthu sein, die Königin Māyā seine Mutter, der König Suddhodana sein Vater, der führende Jünger der ehrwürdige Upatissa, der zweite Jünger Kolita, der persönliche Diener des Buddha namens Ānanda, die führende Jüngerin die ehrwürdige Nonne Khemā und die zweite Jüngerin die ehrwürdige Nonne Uppalavaṇṇā sein. Wenn seine Erkenntnis vollkommen gereift ist, wird er die Große Entsagung vollziehen, die Große Anstrengung auf sich nehmen, am Fuße des Nigrodha-Baumes eine Milchspeise empfangen, diese am Ufer des Flusses Nerañjarā verzehren, die Stätte der Erleuchtung besteigen und am Fuße des Assattha-Baumes die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ Darum wurde gesagt: ‘‘Dīpaṅkaro lokavidū, āhutīnaṃ paṭiggaho; Ussīsake maṃ ṭhatvāna, idaṃ vacanamabravi. „Dīpaṅkara, der Weltenkenner, der Empfänger von Opfergaben, stellte sich an mein Haupt und sprach diese Worte: ‘‘‘Passatha imaṃ tāpasaṃ, jaṭilaṃ uggatāpanaṃ; Aparimeyye ito kappe, buddho loke bhavissati. „‚Seht diesen Asketen mit geflochtenem Haar, von strenger Askese; in einem unermesslichen Äon von heute an wird er als Buddha in der Welt erscheinen. ‘‘‘Ahu kapilavhayā rammā, nikkhamitvā tathāgato; Padhānaṃ padahitvāna, katvā dukkarakārikaṃ. „‚Aus der lieblichen Stadt namens Kapila wird der Tathāgata ausziehen, eifrige Anstrengung üben und schwer auszuführende Kasteiungen vollziehen. ‘‘‘Ajapālarukkhamūle, nisīditvā tathāgato; Tattha pāyāsaṃ paggayha, nerañjaramupehiti. „‚Am Fuße des Ajapāla-Banyanbaumes wird sich der Tathāgata niedersetzen, dort eine Milchspeise entgegennehmen und sich zum Fluss Nerañjarā begeben. ‘‘‘Nerañjarāya tīramhi, pāyāsaṃ ada so jino; Paṭiyattavaramaggena, bodhimūlamupehiti. „‚Am Ufer der Nerañjarā wird jener Sieger die Milchspeise verzehren. Auf einem herrlich geschmückten Pfad wird er sich zum Fuße des Bodhi-Baumes begeben. ‘‘‘Tato padakkhiṇaṃ katvā, bodhimaṇḍaṃ anuttaro; Assattharukkhamūlamhi, bujjhissati mahāyaso. „‚Nachdem er daraufhin die Stätte der Erleuchtung ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn umwandelt hat, wird der Unvergleichliche von großem Ruhm am Fuße des Assattha-Baumes die Erleuchtung erlangen. ‘‘‘Imassa janikā mātā, māyā nāma bhavissati; Pitā suddhodano nāma, ayaṃ hessati gotamo. „‚Die leibliche Mutter dieses [Buddhas] wird Māyā heißen, sein Vater Suddhodana; er selbst wird Gotama sein. ‘‘‘Anāsavā vītarāgā, santacittā samāhitā; Kolito upatisso ca, aggā hessanti sāvakā; Ānando nāmupaṭṭhāko, upaṭṭhissati taṃ jinaṃ. „‚Frei von Trieben, leidenschaftslos, friedvollen Geistes und gesammelt werden Kolita und Upatissa seine führenden Jünger sein. Ein Diener namens Ānanda wird jenem Sieger dienen. ‘‘‘Khemā uppalavaṇṇā ca, aggā hessanti sāvikā; Anāsavā vītarāgā, santacittā samāhitā; Bodhi tassa bhagavato, assatthoti pavuccatī’’’ti. (bu. vaṃ. 2.60-68); „‚Khemā und Uppalavaṇṇā werden seine führenden Jüngerinnen sein, frei von Trieben, leidenschaftslos, friedvollen Geistes und gesammelt. Der Erleuchtungsbaum dieses Erhabenen wird Assattha genannt.‘“ Taṃ sutvā sumedhatāpaso – ‘‘mayhaṃ kira patthanā samijjhissatī’’ti somanassappatto ahosi. Mahājano dīpaṅkaradasabalassa vacanaṃ sutvā ‘‘sumedhatāpaso kira buddhabījaṃ buddhaṅkuro’’ti haṭṭhatuṭṭho [Pg.21] ahosi. Evañcassa ahosi – ‘‘yathā nāma manussā nadiṃ tarantā ujukena titthena uttarituṃ asakkontā heṭṭhātitthena uttaranti, evameva mayampi dīpaṅkaradasabalassa sāsane maggaphalaṃ alabhamānā anāgate yadā tvaṃ buddho bhavissasi, tadā tava sammukhā maggaphalaṃ sacchikātuṃ samatthā bhaveyyāmā’’ti patthanaṃ ṭhapayiṃsu. Dīpaṅkaradasabalopi bodhisattaṃ pasaṃsitvā aṭṭhapupphamuṭṭhīhi pūjetvā padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi. Tepi catusatasahassasaṅkhā khīṇāsavā bodhisattaṃ gandhehi ca mālāhi ca pūjetvā padakkhiṇaṃ katvā pakkamiṃsu. Devamanussā pana tatheva pūjetvā vanditvā pakkantā. Als der Asket Sumedha dies hörte, war er von Freude erfüllt: „Mein Wunsch wird in der Tat in Erfüllung gehen!“ Die Volksmenge vernahm die Worte des Dīpaṅkara, des Besitzers der zehn Kräfte, und war hocherfreut und dachte: „Der Asket Sumedha ist wahrlich der Same eines Buddhas, ein Buddha-Keim!“ Und sie dachten so: „Wie Menschen, die einen Fluss überqueren wollen und den direkten Übergang nicht erreichen können, den Fluss an einer weiter unten gelegenen Furt überqueren, so mögen auch wir, falls wir unter der Lehre des zehnkräftebesitzenden Dīpaṅkara die Pfade und Früchte nicht erlangen, in der Zukunft, wenn du ein Buddha wirst, in deiner Gegenwart imstande sein, die Pfade und Früchte zu verwirklichen.“ So legten sie diesen Wunsch fest. Auch der zehnkräftebesitzende Dīpaṅkara pries den Bodhisatta, verehrte ihn mit acht Händen voll Blumen, umwandelte ihn ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn und zog weiter. Auch jene vierhunderttausend triebfreien Heiligen verehrten den Bodhisatta mit Wohlgerüchen und Blumengirlanden, umwandelten ihn im Uhrzeigersinn und gingen fort. Die Götter und Menschen taten ebenso, verehrten und grüßten ihn ehrfurchtsvoll und entfernten sich. Bodhisatto sabbesaṃ paṭikkantakāle sayanā vuṭṭhāya ‘‘pāramiyo vicinissāmī’’ti puppharāsimatthake pallaṅkaṃ ābhujitvā nisīdi. Evaṃ nisinne bodhisatte sakaladasasahassacakkavāḷe devatā sādhukāraṃ datvā ‘‘ayya sumedhatāpasa, porāṇakabodhisattānaṃ pallaṅkaṃ ābhujitvā ‘pāramiyo vicinissāmā’ti nisinnakāle yāni pubbanimittāni nāma paññāyanti, tāni sabbānipi ajja pātubhūtāni, nissaṃsayena tvaṃ buddho bhavissasi. Mayametaṃ jānāma ‘yassetāni nimittāni paññāyanti, ekantena so buddho hoti’, tvaṃ attano vīriyaṃ daḷhaṃ katvā paggaṇhā’’ti bodhisattaṃ nānappakārāhi thutīhi abhitthaviṃsu. Tena vuttaṃ – Als alle gegangen waren, erhob sich der Bodhisatta von seinem Lager und setzte sich mit gekreuzten Beinen auf den Blumenhaufen nieder, entschlossen: „Ich will die Vollkommenheiten (pāramī) erforschen.“ Während der Bodhisatta so dasaß, riefen die Gottheiten der gesamten zehntausend Weltsysteme Beifall und lobten den Bodhisatta mit vielfältigen Lobpreisungen: „Edler Asket Sumedha! Die Vorzeichen, die in der Vergangenheit erschienen, wenn frühere Bodhisattas sich mit gekreuzten Beinen niedersetzten, um die Vollkommenheiten zu erforschen, sind heute ausnahmslos eingetreten. Ohne Zweifel wirst du ein Buddha werden. Wir wissen dies: ‚Demjenigen, bei dem diese Zeichen erscheinen, der wird ganz gewiss ein Buddha.‘ Mache deine Tatkraft fest und spanne sie an!“ Darum wurde gesagt: ‘‘Idaṃ sutvāna vacanaṃ, asamassa mahesino; Āmoditā naramarū, buddhabījaṃ kira ayaṃ. „Als sie diese Worte des unvergleichlichen, großen Sehers hörten, frohlockten Menschen und Götter: ‚Dieser ist wahrlich ein Buddha-Keim!‘ ‘‘Ukkuṭṭhisaddā vattanti, apphoṭenti hasanti ca; Katañjalī namassanti, dasasahassī sadevakā. „Jubelrufe ertönten, sie klatschten in die Hände und lachten; mit gefalteten Händen erwiesen sie ihm Ehrerbietung, die zehntausend Welten mitsamt den Göttern. ‘‘Yadimassa lokanāthassa, virajjhissāma sāsanaṃ; Anāgatamhi addhāne, hessāma sammukhā imaṃ. „‚Sollten wir die Lehre dieses Weltenhüters verfehlen, so werden wir in einer zukünftigen Zeit diesem [anderen Buddha] gegenüberstehen. ‘‘Yathā manussā nadiṃ tarantā, paṭititthaṃ virajjhiya; Heṭṭhā titthe gahetvāna, uttaranti mahānadiṃ. „‚Wie Menschen, die einen Fluss überqueren, wenn sie die obere Furt verfehlen, eine weiter unten gelegene Furt nehmen und so den großen Fluss überqueren, ‘‘Evameva mayaṃ sabbe, yadi muñcāmimaṃ jinaṃ; Anāgatamhi addhāne, hessāma sammukhā imaṃ. „‚ebenso werden wir alle, falls wir diesen Sieger verpassen, in einer zukünftigen Zeit diesem [anderen Buddha] gegenüberstehen.‘“ ‘‘Dīpaṅkaro [Pg.22] lokavidū, āhutīnaṃ paṭiggaho; Mama kammaṃ pakittetvā, dakkhiṇaṃ pādamuddhari. „Dīpaṅkara, der Weltenkenner, der Empfänger von Opfergaben, verkündete mein künftiges Wirken und hob seinen rechten Fuß an [um weiterzugehen]. ‘‘Ye tatthāsuṃ jinaputtā, sabbe padakkhiṇamakaṃsu maṃ; Narā nāgā ca gandhabbā, abhivādetvāna pakkamuṃ. „Alle Söhne des Siegers, die dort anwesend waren, umwandelten mich ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn. Menschen, Nāgas und Gandharvas grüßten mich ehrfurchtsvoll und zogen fort. ‘‘Dassanaṃ me atikkante, sasaṅghe lokanāyake; Haṭṭhatuṭṭhena cittena, āsanā vuṭṭhahiṃ tadā. „Als der Weltenführer mitsamt seiner Mönchsgemeinde meinem Blick entschwunden war, erhob ich mich mit freudigem und glücklichem Herzen von meinem Sitz. ‘‘Sukhena sukhito homi, pāmojjena pamodito; Pītiyā ca abhissanno, pallaṅkaṃ ābhujiṃ tadā. „Durch Glückseligkeit beglückt, durch Heiterkeit hocherfreut und von Verzückung überströmt, setzte ich mich da im Meditationssitz nieder. ‘‘Pallaṅkena nisīditvā, evaṃ cintesahaṃ tadā; ‘Vasībhūto ahaṃ jhāne, abhiññāpāramiṃ gato. „Inmitten des Meditationssitzes dachte ich damals folgendes: ‚Ich habe Meisterschaft über die Vertiefungen (jhāna) erlangt und die Vollkommenheit der höheren Geisteskräfte (abhiññā) erreicht. ‘‘‘Dasasahassilokamhi, isayo natthi me samā; Asamo iddhidhammesu, alabhiṃ īdisaṃ sukhaṃ’. „‚In dem zehntausendfachen Weltsystem gibt es keine Seher, die mir gleichkommen. Unvergleichlich bin ich in den Kräften der übernatürlichen Macht. Solch ein Glück habe ich erlangt.‘“ ‘‘Pallaṅkābhujane mayhaṃ, dasasahassādhivāsino; Mahānādaṃ pavattesuṃ, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Als ich mich im Kreuzsitz niederließ, stießen die Bewohner der zehntausend Weltsysteme einen großen Jubelruf aus: 'Sicherlich wirst du ein Buddha werden!' ‘‘Yā pubbe bodhisattānaṃ, pallaṅkavaramābhuje; Nimittāni padissanti, tāni ajja padissare. Welche Zeichen sich auch in der Vergangenheit zeigten, wenn die Bodhisattvas sich in den edlen Kreuzsitz begaben, eben diese Zeichen sind heute zu sehen. ‘‘Sītaṃ byāpagataṃ hoti, uṇhañca upasammati; Tāni ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Kälte weicht und die Hitze legt sich. Diese Zeichen sind heute zu sehen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Dasasahassī lokadhātū, nissaddā honti nirākulā; Tāni ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die zehntausend Weltsysteme sind still und störungsfrei. Diese Zeichen sind heute zu sehen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Mahāvātā na vāyanti, na sandanti savantiyo; Tāni ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Starke Winde wehen nicht, und die Flüsse fließen nicht. Diese Zeichen sind heute zu sehen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Thalajā dakajā pupphā, sabbe pupphanti tāvade; Tepajja pupphitā sabbe, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Sowohl die Blumen des Landes als auch die des Wassers erblühen sogleich. Heute stehen sie alle in voller Blüte: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Latā vā yadi vā rukkhā, phalabhārā honti tāvade; Tepajja phalitā sabbe, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Seien es Schlingpflanzen oder Bäume, sie tragen sogleich reiche Frucht. Heute sind sie alle voller Früchte: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Ākāsaṭṭhā [Pg.23] ca bhūmaṭṭhā, ratanā jotanti tāvade; Tepajja ratanā jotanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Juwelen im Himmel und auf Erden erstrahlen sogleich. Heute leuchten diese Juwelen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Mānusakā ca dibbā ca, turiyā vajjanti tāvade; Tepajjubho abhiravanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Menschliche und himmlische Musikinstrumente erklingen sogleich von selbst. Heute ertönen sie beide lautstark: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Vicittapupphā gaganā, abhivassanti tāvade; Tepi ajja pavassanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Bunte Blumen regnen sogleich vom Himmel herab. Auch heute regnen sie hernieder: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Mahāsamuddo ābhujati, dasasahassī pakampati; Tepajjubho abhiravanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Der große Ozean wirbelt auf, und die zehntausend Weltsysteme beben. Heute ertönen sie beide lautstark: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Nirayepi dasasahasse, aggī nibbanti tāvade; Tepajja nibbutā aggī, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Sogar in den zehntausend Höllen erlöschen die Feuer sogleich. Heute sind diese Feuer erloschen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Vimalo hoti sūriyo, sabbā dissanti tārakā; Tepi ajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Sonne ist makellos und rein, und alle Sterne sind sichtbar. Auch heute zeigen sie sich: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Anovaṭṭhena udakaṃ, mahiyā ubbhijji tāvade; Tampajjubbhijjate mahiyā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Ohne dass es regnet, quillt sogleich Wasser aus der Erde hervor. Auch heute sprudelt dieses Wasser aus der Erde empor: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Tārāgaṇā virocanti, nakkhattā gaganamaṇḍale; Visākhā candimāyuttā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Sternbilder und Konstellationen erstrahlen am Himmelskreis; das Visākhā-Gestirn steht vereint mit dem Mond: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Bilāsayā darīsayā, nikkhamanti sakāsayā; Tepajja āsayā chuddhā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Die Bewohner von Höhlen und Klüften verlassen ihre Behausungen. Heute haben sie ihre Unterschlüpfe verlassen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Na hoti arati sattānaṃ, santuṭṭhā honti tāvade; Tepajja sabbe santuṭṭhā, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Es gibt keine Unzufriedenheit unter den Wesen, sogleich sind sie alle zufrieden. Heute sind sie alle voller Zufriedenheit: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Rogā tadupasammanti, jighacchā ca vinassati; Tānipajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Krankheiten beruhigen sich sogleich, und der Hunger schwindet. Diese Zeichen sind heute zu sehen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Rāgo tadā tanu hoti, doso moho vinassati; Tepajja vigatā sabbe, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Gier wird schwach, und Hass und Verblendung vergehen sogleich. Heute sind sie alle gänzlich verschwunden: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Bhayaṃ tadā na bhavati, ajjapetaṃ padissati; Tena liṅgena jānāma, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Furcht herrscht zu jener Zeit nicht; auch heute ist dies zu erkennen. An diesem Zeichen erkennen wir: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Rajo [Pg.24] nuddhaṃsati uddhaṃ, ajjapetaṃ padissati; Tena liṅgena jānāma, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Kein Staub wirbelt empor; auch heute ist dies zu erkennen. An diesem Zeichen erkennen wir: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Aniṭṭhagandho pakkamati, dibbagandho pavāyati; Sopajja vāyati gandho, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Unangenehmer Geruch verzieht sich, und ein himmlischer Duft verbreitet sich. Auch heute weht dieser Duft: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Sabbe devā padissanti, ṭhapayitvā arūpino; Tepajja sabbe dissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Alle Götter werden sichtbar, mit Ausnahme der formlosen Wesen. Heute sind sie alle zu sehen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Yāvatā nirayā nāma, sabbe dissanti tāvade; Tepajja sabbe dissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Sämtliche Höllenreiche werden sogleich sichtbar. Heute sind sie alle zu sehen: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Kuṭṭā kavāṭā selā ca, na hontāvaraṇā tadā; Ākāsabhūtā tepajja, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Wände, Tore und Felsen bilden damals kein Hindernis mehr. Heute sind sie wie der offene Raum geworden: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Cutī ca upapatti ca, khaṇe tasmiṃ na vijjati; Tānipajja padissanti, dhuvaṃ buddho bhavissasi. Sterben und Wiedergeburt finden in jenem Augenblick nicht statt. Diese Phänomene zeigen sich heute: Sicherlich wirst du ein Buddha werden. ‘‘Daḷhaṃ paggaṇha vīriyaṃ, mā nivatta abhikkama; Mayampetaṃ vijānāma, dhuvaṃ buddho bhavissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.70-107); Entfalte deine Tatkraft fest und entschlossen! Weiche nicht zurück, schreite voran! Auch wir wissen dies: Sicherlich wirst du ein Buddha werden! Bodhisatto dīpaṅkaradasabalassa ca dasasahassacakkavāḷadevatānañca vacanaṃ sutvā bhiyyosomattāya sañjātussāho hutvā cintesi – ‘‘buddhā nāma amoghavacanā, natthi buddhānaṃ kathāya aññathattaṃ. Yathā hi ākāse khittaleḍḍussa patanaṃ dhuvaṃ, jātassa maraṇaṃ, rattikkhaye sūriyuggamanaṃ, āsayā nikkhantasīhassa sīhanādanadanaṃ, garugabbhāya itthiyā bhāramoropanaṃ dhuvaṃ avassambhāvī, evameva buddhānaṃ vacanaṃ nāma dhuvaṃ amoghaṃ, addhā ahaṃ buddho bhavissāmī’’ti. Tena vuttaṃ – Als der Bodhisattva die Worte des Zehnkräftebesitzenden Dīpaṅkara und der Götter der zehntausend Weltsysteme vernahm, erwachte in ihm ein noch weit größerer Eifer, und er dachte: 'Die Buddhas sprechen niemals vergebliche Worte, an der Rede der Buddhas gibt es keinen Zweifel. Ebenso wie der Fall einer in die Luft geworfenen Erdscholle sicher ist, wie der Tod eines jeden geborenen Wesens sicher ist, wie der Aufgang der Sonne am Ende der Nacht sicher ist, wie das Brüllen eines Löwen, der sein Lager verlässt, sicher ist, und wie die Entbindung einer schwangeren Frau von ihrer Last sicher und unvermeidlich ist – ebenso ist das Wort der Buddhas gewiss und niemals vergeblich. Wahrlich, ich werde ein Buddha werden!' Deswegen wurde Folgendes gesagt: ‘‘Buddhassa vacanaṃ sutvā, dasasahassīna cūbhayaṃ; Tuṭṭhahaṭṭho pamodito, evaṃ cintesahaṃ tadā. Nachdem ich das Wort des Buddhas sowie jenes der Bewohner der zehntausend Weltsysteme vernommen hatte, dachte ich damals, voller Freude, Entzücken und Heiterkeit, folgendes: ‘‘Advejjhavacanā buddhā, amoghavacanā jinā; Vitathaṃ natthi buddhānaṃ, dhuvaṃ buddho bhavāmahaṃ. Die Buddhas sprechen keine zweideutigen Worte, die Überwinder reden nicht vergeblich. Es gibt keinen Irrtum bei den Buddhas; ganz gewiss werde ich ein Buddha werden. ‘‘Yathā khittaṃ nabhe leḍḍu, dhuvaṃ patati bhūmiyaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ; Vitathaṃ natthi buddhānaṃ, dhuvaṃ buddho bhavāmahaṃ. Wie eine in die Luft geworfene Erdscholle sicher auf die Erde fällt, ebenso ist das Wort der erhabensten Buddhas ewig gewiss. Es gibt keinen Irrtum bei den Buddhas; ganz gewiss werde ich ein Buddha werden. ‘‘Yathāpi [Pg.25] sabbasattānaṃ, maraṇaṃ dhuvasassataṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. Genauso wie für alle Wesen der Tod ewig gewiss ist, ebenso ist das Wort der erhabensten Buddhas ewig gewiss. ‘‘Yathā rattikkhaye patte, sūriyuggamanaṃ dhuvaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. Wie der Aufgang der Sonne am Ende der Nacht gewiss ist, ebenso ist das Wort der erhabensten Buddhas ewig gewiss. ‘‘Yathā nikkhantasayanassa, sīhassa nadanaṃ dhuvaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassataṃ. Wie das Brüllen eines Löwen, der sein Lager verlässt, gewiss ist, ebenso ist das Wort der erhabensten Buddhas ewig gewiss. ‘‘Yathā āpannasattānaṃ, bhāramoropanaṃ dhuvaṃ; Tatheva buddhaseṭṭhānaṃ, vacanaṃ dhuvasassata’’nti. (bu. vaṃ. 2.108-114); Wie das Niederlegen der Last für schwangere Wesen gewiss ist, ebenso ist das Wort der erhabensten Buddhas ewig gewiss. So ‘‘dhuvāhaṃ buddho bhavissāmī’’ti evaṃ katasanniṭṭhāno buddhakārake dhamme upadhāretuṃ – ‘‘kahaṃ nu kho buddhakārakā dhammā, kiṃ uddhaṃ, udāhu adho, disāvidisāsū’’ti anukkamena sakalaṃ dhammadhātuṃ vicinanto porāṇakabodhisattehi āsevitanisevitaṃ paṭhamaṃ dānapāramiṃ disvā evaṃ attānaṃ ovadi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya paṭhamaṃ dānapāramiṃ pūreyyāsi. Yathā hi nikkujjito udakakumbho nissesaṃ katvā udakaṃ vamatiyeva, na paccāharati, evameva dhanaṃ vā yasaṃ vā puttadāraṃ vā aṅgapaccaṅgaṃ vā anoloketvā sampattayācakānaṃ sabbaṃ icchiticchitaṃ nissesaṃ katvā dadamāno bodhimūle nisīditvā buddho bhavissasī’’ti paṭhamaṃ dānapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Mit dem festen Entschluss 'Ganz gewiss werde ich ein Buddha werden' untersuchte er die buddha-wirkenden Eigenschaften (buddhakārakā dhammā): 'Wo sind wohl die buddha-wirkenden Eigenschaften? Sind sie oben, unten oder in den verschiedenen Richtungen und Zwischenrichtungen?' Während er so das gesamte Phänomenenreich (dhammadhātu) systematisch erforschte, erblickte er als erstes die Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī), die von den Bodhisattvas der Vorzeit geübt und gepflegt worden war. Da ermahnte er sich selbst: 'Weiser Sumedha, von nun an sollst du zuerst die Vollkommenheit des Gebens erfüllen. So wie ein umgestürzter Wasserkrug das Wasser restlos ausgießt und nichts davon zurückbehält, so sollst auch du – ohne Rücksicht auf Besitz, Ansehen, Frau und Kinder oder deine eigenen Glieder – den herbeigekommenen Bittstellern alles Gewünschte restlos hingeben. Wenn du dann am Fuße des Bodhi-Baumes Platz nimmst, wirst du ein Buddha werden!' So fasste er den festen Entschluss, die Vollkommenheit des Gebens fest zu begründen. Deswegen wurde Folgendes gesagt: ‘‘Handa buddhakare dhamme, vicināmi ito cito; Uddhaṃ adho dasa disā, yāvatā dhammadhātuyā. Wohlan, nun erforsche ich hier und dort die Eigenschaften, die einen Buddha ausmachen; nach oben und nach unten, in allen zehn Himmelsrichtungen, so weit das Element der Dinge (Dhammadhātu) reicht. ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, paṭhamaṃ dānapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, anuciṇṇaṃ mahāpathaṃ. Während ich so forschte, sah ich damals als erste die Vollkommenheit des Gebens (Dānapāramī), den großen Pfad, der von den früheren großen Weisen beschritten wurde. ‘‘Imaṃ tvaṃ paṭhamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Dānapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. Nimm zuerst diese fest entschlossen auf dich; gehe hin und vervollkommne die Vollkommenheit des Gebens, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst. ‘‘Yathāpi kumbho sampuṇṇo, yassa kassaci adhokato; Vamatevudakaṃ nissesaṃ, na tattha parirakkhati. Wie ein ganz mit Wasser gefüllter Krug, der umgedreht wird, das Wasser restlos ausgießt und nichts davon darin zurückbehält, ‘‘Tatheva [Pg.26] yācake disvā, hīnamukkaṭṭhamajjhime; Dadāhi dānaṃ nissesaṃ, kumbho viya adhokato’’ti. (bu. vaṃ. 2.115-119); ebenso gib, wenn du Bittsteller siehst – seien sie niedrig, mittel oder edel –, restlos Gaben, gleich dem umgedrehten Krug.“ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato dutiyaṃ sīlapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya sīlapāramimpi pūreyyāsi. Yathā hi camarī migo nāma jīvitaṃ anoloketvā attano vālameva rakkhati, evaṃ tvampi ito paṭṭhāya jīvitampi anoloketvā sīlameva rakkhamāno buddho bhavissasī’’ti dutiyaṃ sīlapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es kann nicht sein, dass dies allein die buddhabewirkenden Eigenschaften sind.“ Als er die zweite Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Tugend (Sīlapāramī), sah, dachte er: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Tugend erfüllen. Denn so wie das sogenannte Yak (Camarī-Wild) ohne Rücksicht auf sein Leben nur seinen eigenen Schweif schützt, ebenso wirst auch du, wenn du von nun an ohne Rücksicht auf dein Leben nur deine Tugend bewahrst, ein Buddha werden.“ So entschloss er sich fest zur zweiten Vollkommenheit der Tugend. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese allein können nicht alle buddhabewirkenden Eigenschaften sein; ich werde auch nach anderen forschen, welche die Erleuchtung zur Reife bringen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, dutiyaṃ sīlapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Während ich so forschte, sah ich damals die zweite Vollkommenheit der Tugend, die von den früheren großen Weisen stets gepflegt und praktiziert wurde.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ dutiyaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Sīlapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm zuerst diese zweite fest entschlossen auf dich; gehe hin und vervollkommne die Vollkommenheit der Tugend, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst.“ ‘‘Yathāpi camarī vālaṃ, kismiñci paṭilaggitaṃ; Upeti maraṇaṃ tattha, na vikopeti vāladhiṃ. „Wie das Yak, wenn sein Schweif an irgendetwas hängenbleibt, lieber dort den Tod erleidet, als dass es seinen Schweif beschädigt,“ ‘‘Tatheva catūsu bhūmīsu, sīlāni paripūraya; Parirakkha sadā sīlaṃ, camarī viya vāladhi’’nti. (bu. vaṃ. 2.120-124); „ebenso erfülle die Tugendregeln vollkommen auf allen vier Ebenen; schütze stets deine Tugend, wie das Yak seinen Schweif.““ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato tatiyaṃ nekkhammapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya nekkhammapāramimpi pūreyyāsi. Yathā hi ciraṃ bandhanāgāre vasamāno puriso na tattha sinehaṃ karoti, atha kho ukkaṇṭhatiyeva, avasitukāmo hoti, evameva tvampi sabbabhave bandhanāgārasadise katvā sabbabhavehi ukkaṇṭhito muccitukāmo hutvā nekkhammābhimukhova hohi. Evaṃ buddho bhavissasī’’ti tatiyaṃ nekkhammapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es kann nicht sein, dass dies allein die buddhabewirkenden Eigenschaften sind.“ Als er die dritte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Entsagung (Nekkhampāramī), sah, dachte er: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Entsagung erfüllen. Denn so wie ein Mann, der lange Zeit in einem Gefängnis lebt, keine Zuneigung zu diesem Ort entwickelt, sondern vielmehr angewidert ist und dort nicht bleiben will, ebenso betrachte auch du alle Daseinsformen als einem Gefängnis gleich; sei von allen Daseinsformen angewidert, wünsche Befreiung und wende dich ganz der Entsagung zu. So wirst du ein Buddha werden.“ So entschloss er sich fest zur dritten Vollkommenheit der Entsagung. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na [Pg.27] hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese allein können nicht alle buddhabewirkenden Eigenschaften sein; ich werde auch nach anderen forschen, welche die Erleuchtung zur Reife bringen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, tatiyaṃ nekkhammapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Während ich so forschte, sah ich damals die dritte Vollkommenheit der Entsagung, die von den früheren großen Weisen gepflegt und praktiziert wurde.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ tatiyaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Nekkhammapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm zuerst diese dritte fest entschlossen auf dich; gehe hin und vervollkommne die Vollkommenheit der Entsagung, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst.“ ‘‘Yathā andughare puriso, ciravuttho dukhaṭṭito; Na tattha rāgaṃ janeti, muttimeva gavesati. „Wie ein mann, der lange Zeit in einem finsteren Kerker lebt und im Leiden verweilt, dort kein Verlangen hegt, sondern nur nach Befreiung sucht,“ ‘‘Tatheva tvaṃ sabbabhave, passa andugharaṃ viya; Nekkhammābhimukho hohi, bhavato parimuttiyā’’ti. (bu. vaṃ. 2.125-129); „ebenso betrachte du alle Daseinsformen wie einen finsteren Kerker; wende dich ganz der Entsagung zu, um dich aus dem Dasein völlig zu befreien.““ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato catutthaṃ paññāpāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya paññāpāramimpi pūreyyāsi. Hīnamajjhimukkaṭṭhesu kañci avajjetvā sabbepi paṇḍite upasaṅkamitvā pañhaṃ puccheyyāsi. Yathā hi piṇḍapātiko bhikkhu hīnādibhedesu kulesu kiñci avajjetvā paṭipāṭiyā piṇḍāya caranto khippaṃ yāpanaṃ labhati, evaṃ tvampi sabbapaṇḍite upasaṅkamitvā pañhaṃ pucchanto buddho bhavissasī’’ti catutthaṃ paññāpāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es kann nicht sein, dass dies allein die buddhabewirkenden Eigenschaften sind.“ Als er die vierte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Weisheit (Paññāpāramī), sah, dachte er: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Weisheit erfüllen. Ohne jemanden unter den Niedrigen, Mittleren oder Edlen auszulassen, sollst du an alle Weisen herantreten und sie um Rat fragen. Denn so wie ein Almosengänger-Mönch, der der Reihe nach von Haus zu Haus um Almosen wandert, ohne irgendeine der niedrigen oder edlen Familien auszulassen, schnell seinen Lebensunterhalt erhält, ebenso wirst auch du, wenn du an alle Weisen herantrittst und sie befragst, ein Buddha werden.“ So entschloss er sich fest zur vierten Vollkommenheit der Weisheit. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese allein können nicht alle buddhabewirkenden Eigenschaften sein; ich werde auch nach anderen forschen, welche die Erleuchtung zur Reife bringen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, catutthaṃ paññāpāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Während ich so forschte, sah ich damals die vierte Vollkommenheit der Weisheit, die von den früheren großen Weisen gepflegt und praktiziert wurde.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ catutthaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Paññāpāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm zuerst diese vierte fest entschlossen auf dich; gehe hin und vervollkommne die Vollkommenheit der Weisheit, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst.“ ‘‘Yathāpi bhikkhu bhikkhanto, hīnamukkaṭṭhamajjhime; Kulāni na vivajjento, evaṃ labhati yāpanaṃ. „Wie ein Mönch auf seinem Almosengang, der keine Familie meidet – ob sie nun niedrig, edel oder mittel ist –, so seinen Lebensunterhalt erhält,“ ‘‘Tatheva [Pg.28] tvaṃ sabbakālaṃ, paripucchaṃ budhaṃ janaṃ; Paññāpāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.130-134); „ebenso wirst auch du, wenn du jederzeit weise Menschen befragst, die Vollkommenheit der Weisheit erlangen und zur vollkommenen Erleuchtung gelangen.““ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato pañcamaṃ vīriyapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya vīriyapāramimpi pūreyyāsi, yathā hi sīho migarājā sabbiriyāpathesu daḷhavīriyo hoti, evaṃ tvampi sabbabhavesu sabbiriyāpathesu daḷhavīriyo anolīnavīriyo samāno buddho bhavissasī’’ti pañcamaṃ vīriyapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er, während er noch weiter erwog: „Es kann nicht sein, dass dies allein die buddhabewirkenden Eigenschaften sind.“ Als er die fünfte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Tatkraft (Vīriyapāramī), sah, dachte er: „O weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Tatkraft erfüllen. Denn so wie der Löwe, der König der Tiere, in allen Körperhaltungen von fester Tatkraft ist, ebenso wirst auch du, wenn du in allen Daseinsformen und in allen Körperhaltungen eine feste, unerschlaffende Tatkraft besitzt, ein Buddha werden.“ So entschloss er sich fest zur fünften Vollkommenheit der Tatkraft. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese allein können nicht alle buddhabewirkenden Eigenschaften sein; ich werde auch nach anderen forschen, welche die Erleuchtung zur Reife bringen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, pañcamaṃ vīriyapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Während ich so forschte, sah ich damals die fünfte Vollkommenheit der Tatkraft, die von den früheren großen Weisen gepflegt und praktiziert wurde.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ pañcamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Vīriyapāramitaṃ gaccha, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Nimm zuerst diese fünfte fest entschlossen auf dich; gehe hin und vervollkommne die Vollkommenheit der Tatkraft, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst.“ ‘‘Yathāpi sīho migarājā, nisajjaṭṭhānacaṅkame; Alīnavīriyo hoti, paggahitamano sadā. „Wie der Löwe, der König der Tiere, beim Sitzen, Stehen und Wandeln von unerschlaffender Tatkraft ist und allzeit einen tatkräftigen Sinn besitzt,“ ‘‘Tatheva tvaṃ sabbabhave, paggaṇha vīriyaṃ daḷhaṃ; Vīriyapāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.135-139); „ebenso spanne auch du in allen Daseinsformen feste Tatkraft an; so wirst du die Vollkommenheit der Tatkraft erlangen und zur vollkommenen Erleuchtung gelangen.““ Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato chaṭṭhaṃ khantipāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya khantipāramimpi pūreyyāsi, sammānanepi avamānanepi khamova bhaveyyāsi. Yathā hi pathaviyaṃ nāma sucimpi nikkhipanti asucimpi, na tena pathavī sinehaṃ paṭighaṃ karoti, khamati sahati adhivāsetiyeva, evameva tvampi sammānanepi avamānanepi khamova samāno buddho bhavissasī’’ti chaṭṭhaṃ khantipāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als er nun weiter nachdachte: „Es darf nicht nur bei diesen den Buddha hervorbringenden Eigenschaften bleiben“, erblickte er die sechste Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Geduld, und dachte bei sich selbst: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Geduld erfüllen. Sowohl bei Ehre als auch bei Verachtung sollst du geduldig sein. Wie man nämlich auf der Erde sowohl Reines als auch Unreines abwirft, die Erde deshalb aber weder Zuneigung noch Abneigung hegt, sondern geduldig ist, erträgt und duldet, ebenso sollst auch du, geduldig bei Ehre und Verachtung, ein Buddha werden.“ So festigte er die sechste Vollkommenheit der Geduld und entschloss sich dazu. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese Eigenschaften, die einen Buddha hervorbringen, können nicht nur diese wenigen sein; ich will auch nach anderen Eigenschaften forschen, die zur Erleuchtung reifen lassen.“ ‘‘Vicinanto [Pg.29] tadā dakkhiṃ, chaṭṭhamaṃ khantipāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals forschte, erblickte ich die sechste Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Geduld, die von den früheren großen Sehern praktiziert und gepflegt worden war.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ chaṭṭhamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tattha advejjhamānaso, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Indem du diese sechste Vollkommenheit zuerst festigst und auf dich nimmst, wirst du darin ungeteilten Geistes die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ ‘‘Yathāpi pathavī nāma, sucimpi asucimpi ca; Sabbaṃ sahati nikkhepaṃ, na karoti paṭighaṃ tayā. „So wie die Erde alles erträgt, was auf sie geworfen wird, sei es Reines oder Unreines, und darüber keinen Ärger gegen dich hegt;“ ‘‘Tatheva tvampi sabbesaṃ, sammānāvamānakkhamo; Khantipāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.140-144); „Ebenso sollst auch du, geduldig gegenüber Ehre und Verachtung von allen, die Vollkommenheit der Geduld erreichen und so die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ So ermahnte er sich selbst. Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato sattamaṃ saccapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya saccapāramimpi pūreyyāsi, asaniyā matthake patamānāyapi dhanādīnaṃ atthāya chandādīnaṃ vasena sampajānamusāvādaṃ nāma mā bhāsi. Yathā hi osadhī tārakā nāma sabbautūsu attano gamanavīthiṃ jahitvā aññāya vīthiyā na gacchati, sakavīthiyāva gacchati, evameva tvampi saccaṃ pahāya musāvādaṃ nāma avadantoyeva buddho bhavissasī’’ti sattamaṃ saccapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als er nun weiter nachdachte: „Es darf nicht nur bei diesen den Buddha hervorbringenden Eigenschaften bleiben“, erblickte er die siebte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit, und dachte bei sich selbst: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit erfüllen. Selbst wenn ein Blitz auf dein Haupt fallen sollte, darfst du um des Reichtums oder anderer Dinge willen, geleitet von Verlangen und anderen Leidenschaften, keine bewusste Lüge sprechen. Wie nämlich der Stern Osadhī zu allen Jahreszeiten seine eigene Bahn nicht verlässt und auf keiner anderen Bahn wandelt, sondern stets auf seiner eigenen Bahn zieht, ebenso wirst auch du, ohne die Wahrheit aufzugeben und niemals eine Lüge zu sprechen, ein Buddha werden.“ So festigte er die siebte Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit und entschloss sich dazu. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese Eigenschaften, die einen Buddha hervorbringen, können nicht nur diese wenigen sein; ich will auch nach anderen Eigenschaften forschen, die zur Erleuchtung reifen lassen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, sattamaṃ saccapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals forschte, erblickte ich die siebte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit, die von den früheren großen Sehern praktiziert und gepflegt worden war.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ sattamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tattha advejjhavacano, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Indem du diese siebte Vollkommenheit zuerst festigst und auf dich nimmst, wirst du darin ohne doppelzüngige Worte die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ ‘‘Yathāpi osadhī nāma, tulābhūtā sadevake; Samaye utuvasse vā, na vokkamati vīthito. „So wie der Stern Osadhī, der für die Welt mitsamt den Göttern wie ein Richtmaß ist, in der heißen Jahreszeit wie in der Regenzeit nicht von seiner Bahn abweicht;“ ‘‘Tatheva tvampi saccesu, mā vokkamasi vīthito; Saccapāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.145-149); „Ebenso sollst auch du in deinen Wahrheiten nicht von der Bahn abweichen; wenn du die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit erreicht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ So ermahnte er sich selbst. Athassa [Pg.30] ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato aṭṭhamaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya adhiṭṭhānapāramimpi pūreyyāsi, yaṃ adhiṭṭhāsi, tasmiṃ adhiṭṭhāne niccalova bhaveyyāsi. Yathā hi pabbato nāma sabbāsu disāsu vātehi pahaṭo na kampati na calati, attano ṭhāneyeva tiṭṭhati, evameva tvampi attano adhiṭṭhāne niccalo hontova buddho bhavissasī’’ti aṭṭhamaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als er nun weiter nachdachte: „Es darf nicht nur bei diesen den Buddha hervorbringenden Eigenschaften bleiben“, erblickte er die achte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Entschlusses, und dachte bei sich selbst: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit des Entschlusses erfüllen. Worauf du dich auch festlegst, in diesem Entschluss sollst du unerschütterlich sein. Wie nämlich ein Berg, der aus allen Himmelsrichtungen von Winden getroffen wird, weder schwankt noch wankt, sondern an seinem eigenen Platz stehen bleibt, ebenso wirst auch du, wenn du in deinem Entschluss unerschütterlich bleibst, ein Buddha werden.“ So festigte er die achte Vollkommenheit des Entschlusses und entschloss sich dazu. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese Eigenschaften, die einen Buddha hervorbringen, können nicht nur diese wenigen sein; ich will auch nach anderen Eigenschaften forschen, die zur Erleuchtung reifen lassen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, aṭṭhamaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals forschte, erblickte ich die achte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Entschlusses, die von den früheren großen Sehern praktiziert und gepflegt worden war.“ ‘‘Imaṃ tvaṃ aṭṭhamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tattha tvaṃ acalo hutvā, sambodhiṃ pāpuṇissasi. „Indem du diese achte Vollkommenheit zuerst festigst und auf dich nimmst, wirst du, darin unerschütterlich geworden, die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ ‘‘Yathāpi pabbato selo, acalo suppatiṭṭhito; Na kampati bhusavātehi, sakaṭṭhāneva tiṭṭhati. „So wie ein felsiger Berg, unerschütterlich und fest gegründet, bei heftigen Winden nicht schwankt, sondern an seinem eigenen Platz stehen bleibt;“ ‘‘Tatheva tvampi adhiṭṭhāne, sabbadā acalo bhava; Adhiṭṭhānapāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.150-154); „Ebenso sollst auch du in deinem Entschluss allezeit unerschütterlich sein; wenn du die Vollkommenheit des Entschlusses erreicht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ So ermahnte er sich selbst. Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato navamaṃ mettāpāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya mettāpāramimpi pūreyyāsi, hitesupi ahitesupi ekacitto bhaveyyāsi. Yathā hi udakaṃ nāma pāpajanassapi kalyāṇajanassapi sītabhāvaṃ ekasadisaṃ katvā pharati, evameva tvampi sabbesu sattesu mettacittena ekacittova honto buddho bhavissasī’’ti navamaṃ mettāpāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als er nun weiter nachdachte: „Es darf nicht nur bei diesen den Buddha hervorbringenden Eigenschaften bleiben“, erblickte er die neunte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der liebenden Güte, und dachte bei sich selbst: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit der liebenden Güte erfüllen. Sowohl jenen, die dir wohlgesinnt sind, als auch jenen, die dir feindlich gesinnt sind, sollst du mit gleichem Geiste begegnen. Wie nämlich das Wasser sowohl dem schlechten als auch dem guten Menschen seine Kühle gleichermaßen schenkt und sich über sie ergießt, ebenso wirst auch du, wenn du allen Wesen gegenüber mit einem Geist der liebenden Güte gleichgesinnt bleibst, ein Buddha werden.“ So festigte er die neunte Vollkommenheit der liebenden Güte und entschloss sich dazu. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese Eigenschaften, die einen Buddha hervorbringen, können nicht nur diese wenigen sein; ich will auch nach anderen Eigenschaften forschen, die zur Erleuchtung reifen lassen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, navamaṃ mettāpāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. „Als ich damals forschte, erblickte ich die neunte Vollkommenheit, die Vollkommenheit der liebenden Güte, die von den früheren großen Sehern praktiziert und gepflegt worden war.“ ‘‘Imaṃ [Pg.31] tvaṃ navamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Mettāya asamo hohi, yadi bodhiṃ pattumicchasi. „Indem du diese neunte Vollkommenheit zuerst festigst und auf dich nimmst, werde unvergleichlich in deiner liebenden Güte, wenn du die Erleuchtung zu erlangen wünschst.“ ‘‘Yathāpi udakaṃ nāma, kalyāṇe pāpake jane; Samaṃ pharati sītena, pavāheti rajomalaṃ. „So wie das Wasser dem guten wie dem schlechten Menschen gleichermaßen mit Kühle begegnet und den Schmutz fortwäscht;“ ‘‘Tatheva tvampi hitāhite, samaṃ mettāya bhāvaya; Mettāpāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.155-159); „Ebenso sollst auch du den Wohlgesinnten und den Feindseligen gleichermaßen mit liebender Güte begegnen; wenn du die Vollkommenheit der liebenden Güte erreicht hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen.“ So ermahnte er sich selbst. Athassa ‘‘na ettakeheva buddhakārakadhammehi bhavitabba’’nti uttarimpi upadhārayato dasamaṃ upekkhāpāramiṃ disvā etadahosi – ‘‘sumedhapaṇḍita, tvaṃ ito paṭṭhāya upekkhāpāramimpi pūreyyāsi, sukhepi dukkhepi majjhattova bhaveyyāsi. Yathā hi pathavī nāma sucimpi asucimpi pakkhipamāne majjhattāva hoti, evameva tvampi sukhadukkhesu majjhattova honto buddho bhavissasī’’ti dasamaṃ upekkhāpāramiṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als er nun weiter nachdachte: „Es darf nicht nur bei diesen den Buddha hervorbringenden Eigenschaften bleiben“, erblickte er die zehnte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gleichmuts, und dachte bei sich selbst: „Weiser Sumedha, von nun an sollst du auch die Vollkommenheit des Gleichmuts erfüllen. Sowohl im Glück als auch im Leid sollst du gleichmütig sein. Wie nämlich die Erde, wenn man Reines oder Unreines auf sie wirft, völlig gleichmütig bleibt, ebenso wirst auch du, wenn du in Glück und Leid gleichmütig bleibst, ein Buddha werden.“ So festigte er die zehnte Vollkommenheit des Gleichmuts und entschloss sich dazu. Darum wurde gesagt: ‘‘Na hete ettakāyeva, buddhadhammā bhavissare; Aññepi vicinissāmi, ye dhammā bodhipācanā. „Diese Eigenschaften, die einen Buddha hervorbringen, können nicht nur diese wenigen sein; ich will auch nach anderen Eigenschaften forschen, die zur Erleuchtung reifen lassen.“ ‘‘Vicinanto tadā dakkhiṃ, dasamaṃ upekkhāpāramiṃ; Pubbakehi mahesīhi, āsevitanisevitaṃ. Als ich damals forschte, sah ich die zehnte Vollkommenheit, die Vollkommenheit des Gleichmuts (upekkhāpāramī), die von den früheren großen Weisen (Buddhas) gepflegt und praktiziert worden war. ‘‘Imaṃ tvaṃ dasamaṃ tāva, daḷhaṃ katvā samādiya; Tulābhūto daḷho hutvā, sambodhiṃ pāpuṇissasi. Nimm diese zehnte [Vollkommenheit] nun fest entschlossen auf; indem du unerschütterlich wie eine Waage wirst, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen. ‘‘Yathāpi pathavī nāma, nikkhittaṃ asuciṃ suciṃ; Upekkhati ubhopete, kopānunayavajjitā. Wie die Erde, auf die Reines wie Unreines geworfen wird, diesen beiden gegenüber gleichmütig bleibt, frei von Abneigung und Zuneigung, ‘‘Tatheva tvampi sukhadukkhe, tulābhūto sadā bhava; Upekkhāpāramitaṃ gantvā, sambodhiṃ pāpuṇissasī’’ti. (bu. vaṃ. 2.160-164); ebenso sei auch du in Glück und Leid allzeit wie eine Waage. Wenn du die Vollkommenheit des Gleichmuts vollendet hast, wirst du die vollkommene Erleuchtung erlangen. Tato cintesi – ‘‘imasmiṃ loke bodhisattehi pūretabbā bodhiparipācanā buddhakārakadhammā ettakāyeva, dasa pāramiyo ṭhapetvā aññe natthi. Imāpi dasa pāramiyo uddhaṃ ākāsepi natthi, heṭṭhā pathaviyampi, puratthimādīsu disāsupi natthi, mayhaṃyeva pana hadayabbhantare patiṭṭhitā’’ti. Evaṃ tāsaṃ hadaye patiṭṭhitabhāvaṃ disvā sabbāpi tā daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāya [Pg.32] punappunaṃ sammasanto anulomapaṭilomaṃ sammasati, pariyante gahetvā ādiṃ pāpeti, ādimhi gahetvā pariyantaṃ pāpeti, majjhe gahetvā ubhato koṭiṃ pāpetvā osāpeti, ubhato koṭīsu gahetvā majjhaṃ pāpetvā osāpeti. Bāhirakabhaṇḍapariccāgo dānapāramī nāma, aṅgapariccāgo dānaupapāramī nāma, jīvitapariccāgo dānaparamatthapāramī nāmāti dasa pāramiyo dasa upapāramiyo dasa paramatthapāramiyoti samattiṃsa pāramiyo telayantaṃ vinivaṭṭento viya mahāmeruṃ matthaṃ katvā cakkavāḷamahāsamuddaṃ āluḷento viya ca sammasati. Tassevaṃ dasa pāramiyo sammasantassa dhammatejena catunahutādhikadviyojanasatasahassabahalā ayaṃ mahāpathavī hatthinā akkantanaḷakalāpo viya, pīḷiyamānaṃ ucchuyantaṃ viya ca mahāviravaṃ viravamānā saṅkampi sampakampi sampavedhi. Kulālacakkaṃ viya telayantacakkaṃ viya ca paribbhami. Tena vuttaṃ – Daraufhin dachte er: „In dieser Welt gibt es nur diese Eigenschaften, die von Bodhisattas zu erfüllen sind, welche die Erleuchtung reifen lassen und einen zum Buddha machen; außer den zehn Vollkommenheiten gibt es keine anderen. Diese zehn Vollkommenheiten existieren weder oben im Luftraum, noch unten auf der Erde, noch in den Himmelsrichtungen wie dem Osten; vielmehr sind sie in meinem eigenen Herzen verankert.“ Als er so sah, dass sie fest in seinem Herzen verankert waren, entschloss er sich fest zu ihnen allen, gelobte sie und untersuchte sie immer wieder in direkter und umgekehrter Reihenfolge. Er ergriff das Ende und führte es zum Anfang, er ergriff den Anfang und führte es zum Ende, er ergriff die Mitte und führte es zu beiden Enden, er ergriff beide Enden und führte es in der Mitte zu Ende. Das Aufgeben von äußerem Besitz wird als die Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī) bezeichnet; das Aufgeben von Gliedmaßen als die mittlere Vollkommenheit des Gebens (dānaupapāramī); das Aufgeben des Lebens als die höchste Vollkommenheit des Gebens (dānaparamatthapāramī) – so untersuchte er die dreißig Vollkommenheiten, bestehend aus zehn gewöhnlichen Vollkommenheiten (pāramī), ten mittleren Vollkommenheiten (upapāramī) und zehn höchsten Vollkommenheiten (paramatthapāramī), wie einer, der eine Ölpresse dreht, oder wie einer, der den Berg Meru als Quirl benutzt und den Ozean des Weltensystems aufwühlt. Während er so die zehn Vollkommenheiten untersuchte, erbebte, erzitterte und erschütterte diese große Erde – die eine Dicke von zweihundertvierzigtausend Yojanas hat – durch die spirituelle Macht (dhammateja) unter lautem Brüllen, wie ein Schilfbündel, auf das ein Elefant tritt, oder wie Zuckerrohr in einer Presse. Sie drehte sich wie eine Töpferscheibe oder wie das Rad einer Ölpresse. Darum wurde gesagt: ‘‘Ettakāyeva te loke, ye dhammā bodhipācanā; Taduddhaṃ natthi aññatra, daḷhaṃ tattha patiṭṭhaha. Genau dies sind in der Welt jene Eigenschaften, die zur Erleuchtung reifen. Darüber hinaus gibt es keine anderen; gründe dich fest darin. ‘‘Ime dhamme sammasato, sabhāvarasalakkhaṇe; Dhammatejena vasudhā, dasasahassī pakampatha. Als er diese Eigenschaften hinsichtlich ihres eigenen Wesens, ihrer Funktion und ihrer Merkmale untersuchte, erbebte die zehntausendfache Erde durch die Macht dieses Dhammas. ‘‘Calati ravati pathavī, ucchuyantaṃva pīḷitaṃ; Telayante yathā cakkaṃ, evaṃ kampati medanī’’ti. (bu. vaṃ. 2.165-167); Die Erde schwankt und dröhnt wie gepresstes Zuckerrohr in einer Presse; wie das Rad in einer Ölpresse, so bebt die Erde. Mahāpathaviyā kampamānāya rammanagaravāsino saṇṭhātuṃ asakkontā yugantavātabbhāhatā mahāsālā viya mucchitā papatiṃsu. Ghaṭādīni kulālabhājanāni pavaṭṭantāni aññamaññaṃ paharantāni cuṇṇavicuṇṇāni ahesuṃ. Mahājano bhītatasito satthāraṃ upasaṅkamitvā ‘‘kiṃ nu kho bhagavā nāgāvaṭṭo ayaṃ, bhūtayakkhadevatāsu aññatarāvaṭṭo vāti na hi mayaṃ etaṃ jānāma, apica kho sabbopi ayaṃ mahājano upadduto, kiṃ nu kho imassa lokassa pāpakaṃ bhavissati, udāhu kalyāṇaṃ, kathetha no etaṃ kāraṇa’’nti āha. Atha satthā tesaṃ kathaṃ sutvā ‘‘tumhe [Pg.33] mā bhāyatha, mā cintayittha, natthi vo itonidānaṃ bhayaṃ. Yo so mayā ajja ‘sumedhapaṇḍito anāgate gotamo nāma buddho bhavissatī’ti byākato, so idāni dasa pāramiyo sammasati, tassa sammasantassa viloḷentassa dhammatejena sakaladasasahassī lokadhātu ekappahārena kampati ceva ravati cā’’ti āha. Tena vuttaṃ – Als die große Erde bebte, konnten die Einwohner der Stadt Ramma nicht standhalten und fielen ohnmächtig um wie riesige Sal-Bäume, die von einem Weltuntergangssturm getroffen wurden. Tongefäße wie Krüge und Töpfe rollten umher, stießen aneinander und wurden vollständig zerschmettert. Die verängstigte und erschrockene Menge lief zum Meister und fragte: „O Herr, ist dies das Wüten der Nāgas, oder das Wüten von Geistern, Yakkhas oder Gottheiten? Wir wissen es wahrlich nicht. Aber all dieses Volk ist in Bedrängnis. Wird dies Unheil über diese Welt bringen oder Segen? Bitte nenne uns den Grund dafür!“ Da hörte der Meister ihre Worte und sprach: „Fürchtet euch nicht, sorgt euch nicht, es besteht für euch hieraus keine Gefahr. Der weise Sumedha, von dem ich heute prophezeit habe: „In der Zukunft wird er ein Buddha namens Gotama sein“, untersucht nun die zehn Vollkommenheiten. Durch die spirituelle Macht (dhammateja) erbebt und dröhnt das gesamte zehntausendfache Weltensystem auf einmal, während er diese untersucht und aufwühlt.“ Darum wurde gesagt: ‘‘Yāvatā parisā āsi, buddhassa parivesane; Pavedhamānā sā tattha, mucchitā sesi bhūmiyā. Wie groß auch die Versammlung bei der Bewirtung des Buddhas war, sie zitterte vor Angst und lag dort ohnmächtig am Boden. ‘‘Ghaṭānekasahassāni, kumbhīnañca satā bahū; Sañcuṇṇamathitā tattha, aññamaññaṃ paghaṭṭitā. Viele tausend Töpfe und viele hundert große Krüge stießen dort aneinander und wurden vollständig zertrümmert. ‘‘Ubbiggā tasitā bhītā, bhantā byathitamānasā; Mahājanā samāgamma, dīpaṅkaramupāgamuṃ. Besorgt, erschrocken, verängstigt, verwirrt und im Herzen erschüttert kam die Menschenmenge zusammen und trat vor Dīpaṅkara. ‘‘Kiṃ bhavissati lokassa, kalyāṇamatha pāpakaṃ; Sabbo upadduto loko, taṃ vinodehi cakkhuma. „Was wird der Welt widerfahren, Segen oder Unheil? Die ganze Welt ist in Bedrängnis; vertreibe diese [Sorge], o Sehender!“ ‘‘Tesaṃ tadā saññāpesi, dīpaṅkaro mahāmuni; Vissatthā hotha mā bhātha, imasmiṃ pathavikampane. Damals beruhigte sie der große Weise Dīpaṅkara und erklärte ihnen: „Seid unbesorgt, fürchtet euch nicht wegen dieses Erdbebens! ‘‘Yamahaṃ ajja byākāsiṃ, ‘buddho loke bhavissati’; Eso sammasati dhammaṃ, pubbakaṃ jinasevitaṃ. Derjenige, von dem ich heute prophezeit habe, dass er ein Buddha in der Welt sein wird, untersucht nun jene Lehre, die von den früheren Siegern gepflegt wurde. ‘‘Tassa sammasato dhammaṃ, buddhabhūmiṃ asesato; Tenāyaṃ kampitā pathavī, dasasahassī sadevake’’ti. (bu. vaṃ. 2.168-174); Weil er diese Eigenschaften, die das Fundament des Buddhatums bilden, vollständig untersucht, erbebt diese zehntausendfache Erde mitsamt den Götterreichen.“ Mahājano tathāgatassa vacanaṃ sutvā haṭṭhatuṭṭho mālāgandhavilepanaṃ ādāya rammanagarā nikkhamitvā bodhisattaṃ upasaṅkamitvā mālāgandhādīhi pūjetvā vanditvā padakkhiṇaṃ katvā rammanagarameva pāvisi. Bodhisattopi dasa pāramiyo sammasitvā vīriyaṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāya nisinnāsanā vuṭṭhāsi. Tena vuttaṃ – Als die Menschenmenge die Worte des Tathāgata hörte, war sie hocherfreut und glücklich. Sie nahmen Blumen, Düfte und Salben, verließen die Stadt Ramma, näherten sich dem Bodhisatta, verehrten ihn mit Blumen und Düften, erwiesen ihm Ehrerbietung, vollzogen die Rechtsumkreisung (padakkhiṇa) und kehrten in die Stadt Ramma zurück. Auch der Bodhisatta erhob sich von seinem Sitz, nachdem er die zehn Vollkommenheiten untersucht, seine Tatkraft fest entschlossen gestärkt und einen festen Entschluss gefasst hatte. Darum wurde gesagt: ‘‘Buddhassa vacanaṃ sutvā, mano nibbāyi tāvade; Sabbe maṃ upasaṅkamma, punāpi abhivandisuṃ. Als sie die Worte des Buddhas hörten, beruhigten sich ihre Herzen sogleich; sie alle näherten sich mir und verneigten sich erneut vor mir. ‘‘Samādiyitvā [Pg.34] buddhaguṇaṃ, daḷhaṃ katvāna mānasaṃ; Dīpaṅkaraṃ namassitvā, āsanā vuṭṭhahiṃ tadā’’ti. (bu. vaṃ. 2.175-176); Fest entschlossen, die Tugenden eines Buddhas aufzunehmen, machte ich meinen Geist unerschütterlich, erwies Dīpaṅkara Ehrerbietung und erhob mich dann von meinem Sitz. Atha bodhisattaṃ āsanā vuṭṭhahantaṃ sakaladasasahassacakkavāḷadevatā sannipatitvā dibbehi mālāgandhehi pūjetvā vanditvā ‘‘ayya sumedhatāpasa, tayā ajja dīpaṅkaradasabalassa pādamūle mahatī patthanā patthitā, sā te anantarāyena samijjhatu, mā te bhayaṃ vā chambhitattaṃ vā ahosi, sarīre appamattakopi rogo mā uppajjatu, khippaṃ pāramiyo pūretvā sammāsambodhiṃ paṭivijjha. Yathā pupphūpagaphalūpagarukkhā samaye pupphanti ceva phalanti ca, tatheva tvampi taṃ samayaṃ anatikkamitvā khippaṃ sambodhimuttamaṃ phusassū’’tiādīni thutimaṅgalāni payirudāhaṃsu. Evañca payirudāhitvā attano attano devaṭṭhānameva agamaṃsu. Bodhisattopi devatāhi abhitthavito – ‘‘ahaṃ dasa pāramiyo pūretvā kappasatasahassādhikānaṃ catunnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake buddho bhavissāmī’’ti vīriyaṃ daḷhaṃ katvā adhiṭṭhāya nabhaṃ abbhuggantvā himavantameva agamāsi. Tena vuttaṃ – Als sich der Bodhisatta von seinem Sitz erhob, versammelten sich die Gottheiten aus allen zehntausend Weltensystemen, verehrten und grüßten ihn mit himmlischen Blumen und Düften und sprachen diese Segens- und Lobpreisungsworte: „O edler Sumedha-Asket, heute hast du zu Füßen des Dīpaṅkara-Zehnkräfte-Besitzers einen großen Entschluss gefasst. Möge dieser dein Entschluss ohne Hindernisse in Erfüllung gehen! Mögest du weder Furcht noch Schrecken empfinden, und möge sich nicht die geringste Krankheit in deinem Körper regen! Erfülle rasch die Vollkommenheiten und verwirkliche die vollkommene Selbst-Erleuchtung! So wie Bäume, die Blüten und Früchte tragen, zu ihrer Zeit blühen und Früchte hervorbringen, so mögest auch du, ohne jene Zeit zu überschreiten, rasch die höchste Erleuchtung erlangen!“ Nachdem sie diese Segensworte gesprochen hatten, kehrten sie alle in ihre jeweiligen Götterreiche zurück. Auch der Bodhisatta, von den Gottheiten so gepriesen, fasste den festen Entschluss: „Ich werde die zehn Vollkommenheiten erfüllen und nach Verlauf von vier unzählbaren Zeitaltern und einhunderttausend Äonen ein Buddha werden.“ Nachdem er diese Entschlossenheit in seinem Geist gefestigt hatte, erhob er sich in die Lüfte und begab sich in den Himavanta-Wald. Deswegen wurde gesagt: ‘‘Dibbaṃ mānusakaṃ pupphaṃ, devā mānusakā ubho; Samokiranti pupphehi, vuṭṭhahantassa āsanā. „Sowohl himmlische als auch menschliche Blumen verstreuten beide, Götter und Menschen, über den Bodhisatta, der sich von seinem Sitz erhob.“ ‘‘Vedayanti ca te sotthiṃ, devā mānusakā ubho; Mahantaṃ patthitaṃ tuyhaṃ, taṃ labhassu yathicchitaṃ. „Sowohl Götter als auch Menschen verkündeten dir Heil und Segen: ‚Mögest du den großen Wunsch, den du ersehnt hast, genau wie gewünscht erlangen!‘“ ‘‘Sabbītiyo vivajjantu, soko rogo vinassatu; Mā te bhavantvantarāyā, phusa khippaṃ bodhimuttamaṃ. „Mögen alle Gefahren abgewendet sein, möge aller Kummer und alle Krankheit vergehen! Möge es keine Hindernisse für dich geben, und mögest du rasch die höchste Erleuchtung erlangen!“ ‘‘Yathāpi samaye patte, pupphanti pupphino dumā; Tatheva tvaṃ mahāvīra, buddhañāṇena pupphasu. „So wie die blühenden Bäume blühen, wenn die richtige Jahreszeit gekommen ist, so blühe auch du, o großer Held, durch das Wissen eines Buddha!“ ‘‘Yathā ye keci sambuddhā, pūrayuṃ dasa pāramī; Tatheva tvaṃ mahāvīra, pūraya dasa pāramī. „Ebenso wie alle jene vollkommen Erleuchteten die zehn Vollkommenheiten erfüllten, so erfülle auch du, o großer Held, die zehn Vollkommenheiten!“ ‘‘Yathā ye keci sambuddhā, bodhimaṇḍamhi bujjhare; Tatheva tvaṃ mahāvīra, bujjhassu jinabodhiyaṃ. „Ebenso wie alle jene vollkommen Erleuchteten auf dem Thron der Erleuchtung erwachten, so erwache auch du, o großer Held, unter dem Bodhi-Baum des Siegers!“ ‘‘Yathā [Pg.35] ye keci sambuddhā, dhammacakkaṃ pavattayuṃ; Tatheva tvaṃ mahāvīra, dhammacakkaṃ pavattaya. „Ebenso wie alle jene vollkommen Erleuchteten das Rad der Lehre in Bewegung setzten, so setze auch du, o großer Held, das Rad der Lehre in Bewegung!“ ‘‘Puṇṇamāye yathā cando, parisuddho virocati; Tatheva tvaṃ puṇṇamano, viroca dasasahassiyaṃ. „Ebenso wie der reine Mond am Vollmondtag erstrahlt, so erstrahle auch du mit erfülltem Herzen in den zehntausend Welten!“ ‘‘Rāhumutto yathā sūriyo, tāpena atirocati; Tatheva lokā muccitvā, viroca siriyā tuvaṃ. „Ebenso wie die Sonne, aus den Fängen von Rāhu befreit, mit ihrer Hitze und ihrem Glanz hell erstrahlt, so befreie dich aus der Welt und erstrahle in deiner herrlichen Pracht!“ ‘‘Yathā yā kāci nadiyo, osaranti mahodadhiṃ; Evaṃ sadevakā lokā, osarantu tavantike. „Ebenso wie all die Flüsse in den großen Ozean fließen, so möge die gesamte Welt samt den Göttern in deiner Gegenwart Zuflucht suchen!“ ‘‘Tehi thutappasattho so, dasa dhamme samādiya; Te dhamme paripūrento, pavanaṃ pāvisī tadā’’ti. (bu. vaṃ. 2.177-187); „Von ihnen überaus gepriesen, nahm jener Bodhisatta Sumedha jene zehn Eigenschaften fest auf sich und zog damals in den Wald, um diese Eigenschaften zu erfüllen.“ Sumedhakathā niṭṭhitā. Hier endet die Geschichte von Sumedha. Rammanagaravāsinopi kho nagaraṃ pavisitvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adaṃsu. Satthā tesaṃ dhammaṃ desetvā mahājanaṃ saraṇādīsu patiṭṭhapetvā rammanagarā nikkhami. Tato uddhampi yāvatāyukaṃ tiṭṭhanto sabbaṃ buddhakiccaṃ katvā anukkamena anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyi. Tattha yaṃ vattabbaṃ, taṃ sabbaṃ buddhavaṃse vuttanayeneva vitthāretabbaṃ. Vuttañhi tattha – Auch die Bewohner von Rammanagara kehrten in ihre Stadt zurück und spendeten der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinschaft eine große Gabe. Nachdem der Meister ihnen die Lehre dargelegt und die Menschenmenge in den Zufluchten und Tugendregeln gefestigt hatte, verließ er Rammanagara. Auch danach wirkte er bis zum Ende seiner Lebensspanne weiter, vollbrachte alle Aufgaben eines Buddha und ging schließlich im Laufe der Zeit in das rückstandslose Erlöschenselement ein. Alles, was hierzu gesagt werden muss, sollte in der Weise ausführlich dargelegt werden, wie es im Buddhavamsa beschrieben ist. Dort heißt es nämlich: ‘‘Tadā te bhojayitvāna, sasaṅghaṃ lokanāyakaṃ; Upagacchuṃ saraṇaṃ tassa, dīpaṅkarassa satthuno. „Nachdem sie damals den Weltenführer samt seiner Mönchsgemeinschaft bewirtet hatten, nahmen jene Menschen Zuflucht zu jenem Meister Dīpaṅkara.“ ‘‘Saraṇagamane kañci, nivesesi tathāgato; Kañci pañcasu sīlesu, sīle dasavidhe paraṃ. „Einige etablierte der Vollendete in der Zufluchtnahme, andere in den fünf Tugendregeln und wieder andere in den zehn Tugendregeln.“ ‘‘Kassaci deti sāmaññaṃ, caturo phalamuttame; Kassaci asame dhamme, deti so paṭisambhidā. „Einigen schenkte er die geistige Askese, die vier höchsten Früchte des Edlen Pfades, und anderen verlieh er die unvergleichlichen Lehren, die analytischen Urteilskräfte.“ ‘‘Kassaci [Pg.36] varasamāpattiyo, aṭṭha deti narāsabho; Tisso kassaci vijjāyo, chaḷabhiññā pavecchati. „Einigen schenkte der Beste der Menschen die acht edlen Sammlungszustände, einigen verlieh er die drei dreifachen Wissensarten und anderen die sechs höheren Geisteskräfte.“ ‘‘Tena yogena janakāyaṃ, ovadati mahāmuni; Tena vitthārikaṃ āsi, lokanāthassa sāsanaṃ. „Mit solchem Mitgefühl wies der große Weise die Menschenmenge an; dadurch wurde die Lehre des Weltenhüters weit verbreitet.“ ‘‘Mahāhanūsabhakkhandho, dīpaṅkarasanāmako; Bahū jane tārayati, parimoceti duggatiṃ. „Mit kräftigem Kiefer und Schultern wie ein Stier befreite jener namens Dīpaṅkara viele Menschen aus dem Sumpf des Daseinskreislaufs und erlöste sie aus den niederen Welten.“ ‘‘Bodhaneyyaṃ janaṃ disvā, satasahassepi yojane; Khaṇena upagantvāna, bodheti taṃ mahāmuni. „Wenn der große Weise ein zur Erleuchtung fähiges Wesen selbst in einer Entfernung von einhunderttausend Yojanas sah, begab er sich in einem Augenblick dorthin und ließ dieses Wesen die Erleuchtung erlangen.“ ‘‘Paṭhamābhisamaye buddho, koṭisatamabodhayi; Dutiyābhisamaye nātho, navutikoṭimabodhayi. „Bei der ersten Erleuchtungsversammlung ließ der Buddha einhundert Millionen Menschen erwachen; bei der zweiten Versammlung ließ der Beschützer neunzig Millionen erwachen.“ ‘‘Yadā ca devabhavanamhi, buddho dhammamadesayi; Navutikoṭisahassānaṃ, tatiyābhisamayo ahu. „Und als der Buddha im Götterhimmel die Lehre verkündete, fand die dritte Erleuchtungsversammlung für neunzigtausend Millionen Gottheiten statt.“ ‘‘Sannipātā tayo āsuṃ, dīpaṅkarassa satthuno; Koṭisatasahassānaṃ, paṭhamo āsi samāgamo. „Es gab drei Versammlungen der Schüler des Meisters Dīpaṅkara; die erste Versammlung bestand aus einhunderttausend Millionen Mönchen.“ ‘‘Puna nāradakūṭamhi, pavivekagate jine; Khīṇāsavā vītamalā, samiṃsu satakoṭiyo. „Als sich der Sieger später auf dem Gipfel des Nārada-Berges in die Einsamkeit zurückzog, versammelten sich einhundert Millionen makellose Mönche, deren Triebe versiegt waren.“ ‘‘Yamhi kāle mahāvīro, sudassanasiluccaye; Navutikoṭisahassehi, pavāresi mahāmuni. „Zu jener Zeit, als der große Held auf dem Gipfel des Sudassana-Berges weilte, hielt der große Weise die Einladungszeremonie mit neunzigtausend Millionen Mönchen ab.“ ‘‘Ahaṃ tena samayena, jaṭilo uggatāpano; Antalikkhamhi caraṇo, pañcābhiññāsu pāragū. „Zu jener Zeit war ich ein Asket mit geflochtenem Haar, der strenge Entbehrungen auf sich nahm, sich durch die Lüfte bewegen konnte und die fünf höheren Geisteskräfte vollkommen beherrschte.“ ‘‘Dasavīsasahassānaṃ, dhammābhisamayo ahu; Ekadvinnaṃ abhisamayā, gaṇanato asaṅkhiyā. „Für zehn- und zwanzigtausend Wesen gab es das Erwachen zur Lehre; die einzelnen Erkenntnisse von ein oder zwei Personen waren unzählbar.“ ‘‘Vitthārikaṃ bāhujaññaṃ, iddhaṃ phītaṃ ahū tadā; Dīpaṅkarassa bhagavato, sāsaraṃ suvisodhitaṃ. „Weit verbreitet, für viele Menschen zugänglich, blühend und gedeihend war damals die wohlgerinigte Lehre des erhabenen Dīpaṅkara.“ ‘‘Cattāri [Pg.37] satasahassāni, chaḷabhiññā mahiddhikā; Dīpaṅkaraṃ lokaviduṃ parivārenti sabbadā. „Vierhunderttausend Mönche mit den sechs höheren Geisteskräften und großer magischer Macht begleiteten stets Dīpaṅkara, den Weltenkenner.“ ‘‘Ye keci tena samayena, jahanti mānusaṃ bhavaṃ; Appattamānasā sekhā, garahitā bhavanti te. „Wer auch immer zu jener Zeit das menschliche Dasein aufgab, ohne das höchste Ziel erreicht zu haben und noch ein Übender war, der wurde damals getadelt.“ ‘‘Supupphitaṃ pāvacanaṃ, arahantehi tādibhi; Khīṇāsavehi vimalehi, upasobhati sabbadā. „Das herrlich erblühte Wort des Buddha, geschmückt mit solchen unerschütterlichen, makellosen Heiligen, deren Triebe versiegt waren, erstrahlte allezeit.“ ‘‘Nagaraṃ rammavatī nāma, sudevo nāma khattiyo; Sumedhā nāma janikā, dīpaṅkarassa satthuno. „Die Stadt des Meisters Dīpaṅkara hieß Rammavatī, der königliche Vater hieß Sudeva und die leibliche Mutter hieß Sumedhā.“ ‘‘Dasavassasahassāni, agāraṃ ajjha so vasi; Haṃsā koñcā mayūrā ca, tayo pāsādamuttamā. „Zehntausend Jahre lang lebte er im Hausstand; er besaß drei hervorragende Paläste namens Haṃsa, Koñca und Mayūra.“ ‘‘Tīṇi satasahassāni, nāriyo samalaṅkatā; Padumā nāma sā nārī, usabhakkhandho atrajo. „Er hatte dreihunderttausend reich geschmückte Frauen; seine Gemahlin hieß Padumā und sein leiblicher Sohn hieß Usabhakkhandha.“ ‘‘Nimitte caturo disvā, hatthiyānena nikkhami; Anūnadasamāsāni, padhāne padahī jino. „Nachdem er die vier Zeichen gesehen hatte, zog er auf einem Elefantenwagen fort; nicht weniger als zehn Monate lang widmete sich der Sieger dem großen Streben.“ ‘‘Padhānacāraṃ caritvāna, abujjhi mānasaṃ muni; Brahmunā yācito santo, dīpaṅkaro mahāmuni. „Nachdem er den Weg des Strebens gegangen war, erlangte der Weise die Erleuchtung des Geistes; daraufhin wurde der große Weise Dīpaṅkara von Brahma gebeten, die Lehre zu verkünden.“ ‘‘Vatti cakkaṃ mahāvīro, nandārāme sirīghare; Nisinno sirīsamūlamhi, akāsi titthiyamaddanaṃ. „Der große Held drehte das Rad der Lehre im Nanda-Hain namens Sirīghara; und als er am Fuße eines Sirīsa-Baumes saß, bezwang er die Andersdenkenden.“ ‘‘Sumaṅgalo ca tisso ca, ahesuṃ aggasāvakā; Sāgato nāmupaṭṭhāko, dīpaṅkarassa satthuno. „Sumaṅgala und Tissa waren seine beiden Hauptschüler; Sāgata war der Name des persönlichen Dieners des Meisters Dīpaṅkara.“ Sunandā ca‘‘nandā ceva sunandā ca, ahesuṃ aggasāvikā; Bodhi tassa bhagavato, pipphalīti pavuccati. Sowohl Nandā als auch Sunandā waren die führenden Schülerinnen; der Bodhi-Baum dieses Erhabenen wird Pipphalī genannt. ‘‘Tapussabhallikā nāma, ahesuṃ aggupaṭṭhakā; Sirimā koṇā upaṭṭhikā, dīpaṅkarassa satthuno. Tapussa und Bhallika waren die führenden Laienunterstützer; Sirimā und Koṇā waren die Laienunterstützerinnen des Lehrers Dīpaṅkara. ‘‘Asītihatthamubbedho, dīpaṅkaro mahāmuni; Sobhati dīparukkhova, sālarājāva phullito. Achtzig Ellen hoch war der große Weise Dīpaṅkara; er strahlte wie ein Lichterbaum, wie ein König der Sāla-Bäume in voller Blüte. ‘‘Pabhā [Pg.38] vidhāvati tassa, samantā dvādasa yojane; Satasahassavassāni, āyu tassa mahesino; Tāvatā tiṭṭhamāno so, tāresi janataṃ bahuṃ. Sein Glanz breitete sich ringsum über zwölf Yojanas aus. Einhunderttausend Jahre betrug die Lebensspanne dieses großen Weisen; solange verweilend rettete er eine große Schar von Menschen. ‘‘Jotayitvāna saddhammaṃ, santāretvā mahājanaṃ; Jalitvā aggikhandhova, nibbuto so sasāvako. Nachdem er die wahre Lehre erleuchtet und die große Volksmenge hinübergerettet hatte, ging er, wie ein lodernder Feuerhaufen flammend, zusammen mit seinen Schülern ins Erlöschen ein. ‘‘Sā ca iddhi so ca yaso, tāni ca pādesu cakkaratanāni; Sabbaṃ tamantarahitaṃ, nanu rittā sabbasaṅkhārāti. Jene übernatürliche Macht, jener Ruhm und jene Rad-Juwelen an den Füßen – all dies ist gänzlich verschwunden. Sind nicht wahrlich alle Gestaltungen leer? ‘‘Dīpaṅkaro jino satthā, nandārāmamhi nibbuto; Tatthetassa jinathūpo, chattiṃsubbedhayojano’’ti. (bu. vaṃ. 3.1-31); Der Überwinder und Lehrer Dīpaṅkara ging im Nandārāma-Kloster ins Erlöschen ein; dort ist das Stupa dieses Überwinders sechsunddreißig Yojanas hoch. Koṇḍañño buddho Der Buddha Koṇḍañña Dīpaṅkarassa pana bhagavato aparabhāge ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā koṇḍañño nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā ahesuṃ. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ, dutiye koṭisahassaṃ, tatiye navutikoṭiyo. Tadā bodhisatto vijitāvī nāma cakkavattī hutvā koṭisatasahassassa buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adāsi. Satthā bodhisattaṃ ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākaritvā dhammaṃ desesi. So satthu dhammakathaṃ sutvā rajjaṃ niyyātetvā pabbaji. So tīṇi piṭakāni uggahetvā aṭṭha samāpattiyo ca pañca abhiññāyo ca uppādetvā aparihīnajjhāno brahmaloke nibbatti. Koṇḍaññabuddhassa pana rammavatī nāma nagaraṃ, sunando nāma khattiyo pitā, sujātā nāma devī mātā, bhaddo ca subhaddo ca dve aggasāvakā, anuruddho nāmupaṭṭhāko, tissā ca upatissā ca dve aggasāvikā, sālakalyāṇirukkho bodhi, aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ sarīraṃ, vassasatasahassaṃ āyuppamāṇaṃ ahosi. Nach der Zeit des erhabenen Dīpaṅkara erhob sich, nach dem Vergehen eines Unzählbaren (Asaṅkheyya), ein Lehrer namens Koṇḍañña. Auch für ihn gab es drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung waren es hunderttausend Koṭis, in der zweiten tausend Koṭis, in der dritten neunzig Koṭis. Zu jener Zeit war der Bodhisatta ein Weltenherrscher namens Vijitāvī und gab der Mönchsgemeinschaft mit dem Buddha an der Spitze, bestehend aus hunderttausend Koṭis Mönchen, eine große Gabe. Der Lehrer prophezeite dem Bodhisatta: \"Er wird ein Buddha werden\" und verkündete die Lehre. Jener hörte die Lehrrede des Lehrers, übergab das Reich und zog in die Hauslosigkeit. Er erlernte die drei Körbe (Piṭakas), erzeugte die acht Errungenschaften (Samāpattis) und die fünf höheren Geisteskräfte (Abhiññās) und wurde mit ungetrübter Vertiefung (Jhāna) in der Brahma-Welt wiedergeboren. Die Stadt des Buddha Koṇḍañña hieß Rammavatī, sein Vater war der Khattiya namens Sunanda, seine Mutter die Königin namens Sujātā, Bhadda und Subhadda waren die beiden führenden Schüler, Anuruddha war sein persönlicher Diener, Tissā und Upatissā die beiden führenden Schülerinnen, der Sālakalyāṇi-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper maß achtundachtzig Ellen in der Höhe und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Dīpaṅkarassa aparena, koṇḍañño nāma nāyako; Anantatejo amitayaso, appameyyo durāsado’’. Nach Dīpaṅkara erschien ein Führer namens Koṇḍañña, von unendlicher Pracht, unermesslichem Ruhm, unschätzbar und schwer bezwingbar. Tassa aparabhāge ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā ekasmiṃ kappeyeva cattāro buddhā nibbattiṃsu – maṅgalo, sumano, revato, sobhitoti. Maṅgalassa bhagavato tīsu sāvakasannipātesu paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ [Pg.39] bhikkhū ahesuṃ, dutiye koṭisatasahassaṃ, tatiye navuṭikoṭiyo. Vemātikabhātā kirassa ānandakumāro nāma navutikoṭisaṅkhāya parisāya saddhiṃ dhammassavanatthāya satthu santikaṃ agamāsi. Satthā tassa anupubbikathaṃ kathesi. So saddhiṃ parisāya saha paṭisambhidāhi arahattaṃ pāpuṇi. Satthā tesaṃ kulaputtānaṃ pubbacaritaṃ olokento iddhimayapattacīvarassa upanissayaṃ disvā dakkhiṇahatthaṃ pasāretvā ‘‘etha bhikkhavo’’ti āha. Sabbe taṅkhaṇaññeva iddhimayapattacīvaradharā saṭṭhivassikatherā viya ākappasampannā hutvā satthāraṃ vanditvā parivārayiṃsu. Ayamassa tatiyo sāvakasannipāto ahosi. Nach seiner Zeit verging ein Unzählbares (Asaṅkheyya), und in ein und demselben Weltalter (Kappa) traten vier Buddhas auf: Maṅgala, Sumana, Revata und Sobhita. Unter den drei Schülerversammlungen des erhabenen Maṅgala gab es in der ersten Versammlung hunderttausend Koṭis von Mönchen, in der zweiten ebenfalls hunderttausend Koṭis und in der dritten neunzig Koṭis. Sein Halbbruder mütterlicherseits, Prinz Ānanda genannt, kam mit einem Gefolge von neunzig Koṭis zum Lehrer, um der Lehre zuzuhören. Der Lehrer hielt ihm eine schrittweise Lehrrede. Er erreichte zusammen mit seinem Gefolge und samt den analytischen Wissenszweigen (Paṭisambhidās) die Arhatschaft. Als der Lehrer das frühere Verhalten dieser Söhne aus gutem Hause betrachtete und ihre Reife für den übernatürlichen Erhalt von Almosenschale und Gewand sah, streckte er seine rechte Hand aus und sprach: \"Kommt, ihr Mönche!\" Im selben Augenblick trugen sie alle durch übernatürliche Kraft entstandene Almosenschalen und Gewänder, besaßen das vollendete Auftreten von sechzigjährigen Älteren, verbeugten sich vor dem Lehrer und umgaben ihn. Dies war seine dritte Schülerversammlung. Yathā pana aññesaṃ buddhānaṃ samantā asītihatthappamāṇāyeva sarīrappabhā ahosi, na evaṃ tassa. Tassa pana bhagavato sarīrappabhā niccakālaṃ dasasahassilokadhātuṃ pharitvā aṭṭhāsi. Rukkhapathavīpabbatasamuddādayo antamaso ukkhaliyādīni upādāya suvaṇṇapaṭṭapariyonaddhā viya ahesuṃ. Āyuppamāṇaṃ panassa navutivassasahassāni ahosi. Ettakaṃ kālaṃ candimasūriyādayo attano pabhāya virocituṃ nāsakkhiṃsu, rattindivaparicchedo na paññāyittha. Divā sūriyālokena viya sattā niccaṃ buddhālokeneva vicariṃsu. Sāyaṃ pupphitakusumānaṃ pāto ca ravanakasakuṇādīnañca vasena loko rattindivaparicchedaṃ sallakkhesi. Während das Körperlicht anderer Buddhas ringsum nur achtzig Ellen maß, war dies bei ihm nicht so. Das Körperlicht dieses Erhabenen breitete sich vielmehr ständig über das zehntausendfache Weltsystem aus und verblieb so. Bäume, Erde, Berge, Ozeane und sogar Töpfe und dergleichen erschienen wie mit Goldplatten überzogen. Seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. Während dieser Zeit konnten Mond, Sonne und andere Himmelskörper nicht mit ihrem eigenen Glanz leuchten, und ein Unterschied zwischen Tag und Nacht war nicht erkennbar. Wie am Tage durch das Sonnenlicht, so wandelten die Wesen stets allein im Lichte des Buddha. Die Welt erkannte die Einteilung von Tag und Nacht nur an den am Abend erblühenden Blumen und am Morgen an den singenden Vögeln. Kiṃ pana aññesaṃ buddhānaṃ ayamānubhāvo natthīti? No natthi. Tepi hi ākaṅkhamānā dasasahassilokadhātuṃ vā tato vā bhiyyo ābhāya phareyyuṃ. Maṅgalassa pana bhagavato pubbapatthanāvasena aññesaṃ byāmappabhā viya sarīrappabhā niccameva dasasahassilokadhātuṃ pharitvā aṭṭhāsi. So kira bodhisattacariyacaraṇakāle vessantarasadise attabhāveṭhito saputtadāro vaṅkapabbatasadise pabbate vasi. Atheko kharadāṭhiko nāma yakkho mahāpurisassa dānajjhāsayataṃ sutvā brāhmaṇavaṇṇena upasaṅkamitvā mahāsattaṃ dve dārake yāci. Mahāsatto ‘‘dadāmi, brāhmaṇa, puttake’’ti vatvā haṭṭhapahaṭṭho udakapariyantaṃ mahāpathaviṃ kampento dvepi dārake adāsi. Yakkho caṅkamanakoṭiyaṃ ālambanaphalakaṃ nissāya ṭhatvā passantasseva mahāsattassa mulālakalāpaṃ viya dārake [Pg.40] khādi. Mahāpurisassa yakkhaṃ oloketvā mukhe vivaṭamatte aggijālaṃ viya lohitadhāraṃ uggiramānaṃ tassa mukhaṃ disvāpi kesaggamattampi domanassaṃ na uppajji. ‘‘Sudinnaṃ vata me dāna’’nti cintayato panassa sarīre mahantaṃ pītisomanassaṃ udapādi. So ‘‘imassa me dānassa nissandena anāgate imināva nīhārena sarīrato rasmiyo nikkhamantū’’ti patthanaṃ akāsi. Tassa taṃ patthanaṃ nissāya buddhabhūtassa sarīrato rasmiyo nikkhamitvā ettakaṃ ṭhānaṃ phariṃsu. Besitzen andere Buddhas etwa diese Macht nicht? Nein, so ist es nicht. Denn auch sie könnten, wenn sie es wünschten, das zehntausendfache Weltsystem oder noch weit darüber hinaus mit ihrem Licht durchdringen. Doch aufgrund des einstigen Gelübdes des erhabenen Maṅgala breitete sich sein Körperlicht, im Gegensatz zur sonst üblichen, eine Klafter weiten Aura anderer Buddhas, stets über das zehntausendfache Weltsystem aus. Als er nämlich das Bodhisatta-Leben führte, lebte er in einer dem Vessantara gleichenden Existenzform zusammen mit Frau und Kindern auf einem dem Vaṅka-Berg ähnelnden Gebirge. Da hörte ein Yakkha namens Kharadāṭhika von der Freigebigkeit des großen Mannes, näherte sich ihm in Gestalt eines Brahmanen und bat das große Wesen um die beiden Kinder. Das große Wesen sprach: \"Ich gebe dir die Kinder, Brahmane!\", und übergab hocherfreut beide Kinder, während er die große Erde bis zu den Grenzen der Gewässer erbeben ließ. Der Yakkha stellte sich an das Ende des Wandelpfades, lehnte sich an die Stützplanke und fraß die Kinder vor den Augen des großen Wesens wie ein Bündel Lotusstängel. Obwohl der große Mensch den Yakkha ansah und sah, wie ein Blutstrom wie eine Feuerflamme aus seinem geöffneten Mund quoll, entstand in ihm nicht einmal um Haaresbreite Unmut. Als er dachte: \"Wahrlich, wohlgegeben ist meine Spende!\", erhob sich in seinem Körper ein großes Entzücken und eine tiefe Freude. Er legte das Gelübde ab: \"Mögen durch die Nachwirkung dieser meiner Gabe in der Zukunft auf eben diese Weise Lichtstrahlen aus meinem Körper hervorgehen!\" Aufgrund dieses Gelübdes gingen, als er zum Buddha geworden war, Lichtstrahlen aus seinem Körper hervor und erfüllten einen so weiten Raum. Aparampissa pubbacariyaṃ atthi. So kira bodhisattakāle ekassa buddhassa cetiyaṃ disvā ‘‘imassa buddhassa mayā jīvitaṃ pariccajituṃ vaṭṭatī’’ti daṇḍakadīpikāveṭhananiyāmena sakalasarīraṃ veṭhāpetvā ratanamattamakuḷaṃ satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ sappissa pūrāpetvā tattha sahassavaṭṭiyo jāletvā taṃ sīsenādāya sakalasarīraṃ jālāpetvā cetiyaṃ padakkhiṇaṃ karonto sakalarattiṃ vītināmeti. Evaṃ yāva aruṇuggamanā vāyamantassāpissa lomakūpamattampi usumaṃ na gaṇhi. Padumagabbhaṃ paviṭṭhakālo viya ahosi. Dhammo hi nāmesa attānaṃ rakkhantaṃ rakkhati. Tenāha bhagavā – Es gibt noch ein weiteres früheres Wirken dieses Bodhasattas. Als er nämlich zur Zeit seiner Existenz als Bodhisatta den Schrein eines Buddhas erblickte, dachte er: ‚Es geziemt sich für mich, mein Leben für diesen Buddha hinzugeben.‘ Er ließ seinen gesamten Körper nach Art einer Fackelsäule umwickeln, füllte eine goldene Schale im Wert von einhunderttausend Kostbarkeiten mit geklärter Butter, entzündete darin tausend Dochte, nahm diese auf sein Haupt, ließ seinen gesamten Körper entzünden und verbrachte die ganze Nacht damit, den Schrein ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn zu umwandeln. Obwohl er sich so bis zum Aufgang der Morgenröte anstrengte, erfasste die Hitze nicht einmal eine einzige seiner Poren. Es war für ihn so, als ob er das Innere einer Lotusblüte betreten hätte. Denn das Dhamma schützt wahrlich den, der das Dhamma schützt. Daher sprach der Erhabene: ‘‘Dhammo have rakkhati dhammacāriṃ, dhammo suciṇṇo sukhamāvahāti; Esānisaṃso dhamme suciṇṇe, na duggatiṃ gacchati dhammacārī’’ti. (theragā. 303; jā. 1.10.102) – „Wahrlich, das Dhamma schützt den, der im Dhamma wandelt; gut geübtes Dhamma bringt Glückseligkeit herbei. Das ist der Segen des wohlgeübten Dhamma: Wer im Dhamma wandelt, geht nicht in ein unglückliches Dasein ein.“ Imassapi kammassa nissandena tassa bhagavato sarīrobhāso dasasahassilokadhātuṃ pharitvā aṭṭhāsi. Als Folge auch dieser Tat durchdrang die körperliche Ausstrahlung jenes Erhabenen das zehntausendfache Weltsystem und verblieb so. Tadā amhākaṃ bodhisatto suruci nāma brāhmaṇo hutvā ‘‘satthāraṃ nimantessāmī’’ti upasaṅkamitvā madhuradhammakathaṃ sutvā ‘‘sve mayhaṃ bhikkhaṃ gaṇhatha, bhante’’ti āha. ‘‘Brāhmaṇa, kittakehi te bhikkhūhi attho’’ti? ‘‘Kittakā pana vo, bhante, parivārabhikkhū’’ti āha. Tadā satthu paṭhamasannipātoyeva hoti, tasmā ‘‘koṭisatasahassa’’nti āha. ‘‘Bhante, sabbehipi saddhiṃ mayhaṃ bhikkhaṃ gaṇhathā’’ti. Satthā adhivāsesi. Brāhmaṇo svātanāya nimantetvā gehaṃ gacchanto cintesi – ‘‘ahaṃ ettakānaṃ [Pg.41] bhikkhūnaṃ yāgubhattavatthādīni dātuṃ sakkomi, nisīdanaṭṭhānaṃ pana kathaṃ bhavissatī’’ti? Damals war unser Bodhisatta ein Brahmane namens Suruci. Mit dem Gedanken ‚Ich werde den Meister einladen‘ trat er an ihn heran, lauschte einer lieblichen Lehrrede und sprach: ‚Ehrwürdiger Herr, nehmt morgen mein Almosen an.‘ Der Erhabene fragte: ‚Brahmane, mit wie vielen Mönchen wünschst du zu spenden?‘ Er entgegnete: ‚Wie viele Gefolgsmönche habt Ihr denn, ehrwürdiger Herr?‘ Da zu jener Zeit gerade die erste Versammlung des Meisters stattfand, antwortete er: ‚Einhunderttausend Koṭis.‘ Daraufhin sagte der Brahmane: ‚Ehrwürdiger Herr, nehmt bitte das Almosen zusammen mit ihnen allen an.‘ Der Meister willigte ein. Nachdem der Brahmane sie für den folgenden Tag eingeladen hatte, dachte er auf dem Heimweg: ‚Ich bin zwar imstande, so vielen Mönchen Reisschleim, Speisen, Gewänder und Ähnliches zu spenden, aber wie soll das mit dem Sitzplatz vonstattengehen?‘ Tassa sā cintā caturāsītiyojanasahassamatthake ṭhitassa devarañño paṇḍukambalasilāsanassa uṇhabhāvaṃ janesi. Sakko ‘‘ko nu kho maṃ imamhā ṭhānā cāvetukāmo’’ti dibbacakkhunā olokento mahāpurisaṃ disvā ‘‘suruci nāma brāhmaṇo buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nimantetvā nisīdanaṭṭhānatthāya cintesi, mayāpi tattha gantvā puññakoṭṭhāsaṃ gahetuṃ vaṭṭatī’’ti vaḍḍhakivaṇṇaṃ nimminitvā vāsipharasuhattho mahāpurisassa purato pāturahosi. ‘‘Atthi nu kho kassaci bhatiyā kattabbakicca’’nti āha. Mahāpuriso taṃ disvā ‘‘kiṃ kammaṃ karissasī’’ti āha. ‘‘Mama ajānanasippaṃ nāma natthi, gehaṃ vā maṇḍapaṃ vā yo yaṃ kāreti, tassa taṃ kātuṃ jānāmī’’ti. ‘‘Tena hi mayhaṃ kammaṃ atthī’’ti. ‘‘Kiṃ, ayyā’’ti? ‘‘Svātanāya me koṭisatasahassabhikkhū nimantitā. Tesaṃ nisīdanamaṇḍapaṃ karissasī’’ti? ‘‘Ahaṃ nāma kareyyaṃ sace me bhatiṃ dātuṃ sakkhissathā’’ti. ‘‘Sakkhissāmi, tātā’’ti. ‘‘Sādhu karissāmī’’ti gantvā ekaṃ padesaṃ olokesi. Dvādasaterasayojanappamāṇo padeso kasiṇamaṇḍalaṃ viya samatalo ahosi. So ‘‘ettake ṭhāne sattaratanamayo maṇḍapo uṭṭhahatū’’ti cintetvā olokesi. Tāvadeva pathaviṃ bhinditvā maṇḍapo uṭṭhahi. Tassa sovaṇṇamayesu thambhesu rajatamayā ghaṭakā ahesuṃ, rajatamayesu sovaṇṇamayā, maṇimayesu thambhesu pavāḷamayā, pavāḷamayesu maṇimayā, sattaratanamayesu thambhesu sattaratanamayā ghaṭakā ahesuṃ. Tato ‘‘maṇḍapassa antarantare kiṅkaṇikajālaṃ olambatū’’ti olokesi. Saha olokaneneva jālaṃ olambi. Yassa mandavāteritassa pañcaṅgikasseva tūriyassa madhurasaddo niccharati. Dibbasaṅgītivattanakālo viya ahosi. ‘‘Antarantarā gandhadāmamālādāmāni olambantū’’ti cintentassa mālādāmāni olambiṃsu. ‘‘Koṭisatasahassasaṅkhānaṃ bhikkhūnaṃ āsanāni ca ādhārakāni ca pathaviṃ bhinditvā uṭṭhahantū’’ti cintesi, tāvadeva uṭṭhahiṃsu. ‘‘Koṇe koṇe ekekā udakacāṭiyo uṭṭhahantū’’ti cintesi, udakacāṭiyo uṭṭhahiṃsu. Jener Gedanke erzeugte Hitze auf dem rötlichen Steinthron des Götterkönigs Sakka, der sich in einer Höhe von vierundachtzigtausend Yojanas befindet. Sakka fragte sich mit göttlichem Auge spähend: ‚Wer will mich wohl von diesem Platz verdrängen?‘ Als er den Großen Mann erblickte, dachte er: ‚Der Brahmane namens Suruci hat die Gemeinde der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eingeladen und sorgt sich um einen Sitzplatz. Auch für mich geziemt es sich, dorthin zu gehen und einen Anteil an diesem Verdienst zu erwerben.‘ So nahm er die Gestalt eines Zimmermanns an, erschien mit Dechsel und Beil in den Händen vor dem Großen Mann und fragte: ‚Gibt es jemanden, der eine Arbeit gegen Lohn zu verrichten hat?‘ Der Große Mann sah ihn und fragte: ‚Welche Arbeit kannst du tun?‘ Er antwortete: ‚Es gibt kein Handwerk, das ich nicht verstehe. Wer auch immer ein Haus oder eine Halle errichten lassen will, dem kann ich dies bauen.‘ Der Große Mann sagte: ‚Wenn dem so ist, dann habe ich eine Arbeit für dich.‘ Er fragte: ‚Was ist es, Herr?‘ Der Große Mann entgegnete: ‚Für morgen habe ich einhunderttausend Koṭis von Mönchen eingeladen. Wirst du für sie eine Versammlungshalle bauen?‘ Er antwortete: ‚Ich würde es gewiss tun, wenn du mir meinen Lohn zahlen kannst.‘ ‚Ich werde dazu imstande sein, mein Lieber‘, sagte er. Daraufhin entgegnete der Zimmermann: ‚Gut, ich werde es tun.‘ Er ging hin und blickte auf eine Stelle. Ein Bereich von zwölf bis dreizehn Yojanas Ausdehnung wurde so eben wie eine Kasiṇa-Scheibe. Er dachte: ‚An dieser Stelle soll eine aus den sieben Edelsteinen bestehende Halle entstehen!‘, und blickte dorthin. Im selben Augenblick brach die Halle aus der Erde hervor. Ihre Säulen aus Gold hatten Kapitelle aus Silber, die silbernen Säulen hatten goldene Kapitelle, die Säulen aus Edelsteinen hatten korallene Kapitelle, die korallenen Säulen hatten edelsteinerne Kapitelle, und die Säulen aus den sieben edlen Stoffen hatten Kapitelle aus den sieben edlen Stoffen. Daraufhin dachte er: ‚In den Zwischenräumen der Halle soll ein Netz aus kleinen Glöckchen herabhängen!‘, und blickte dorthin. Zugleich mit seinem Blick hing das Netz herab, aus dem bei sanftem Wind ein so süßer Klang wie der einer fünfgliedrigen Musikgruppe ertönte. Es war wie die Zeit, in der ein göttliches Konzert dargeboten wird. Während er dachte: ‚In den Zwischenräumen sollen duftende Girlanden und Blumengirlanden herabhängen!‘, hingen die Blumengirlanden herab. Er dachte: ‚Die Sitze und Schalenständer für einhunderttausend Koṭis von Mönchen sollen aus der Erde hervorbrechen!‘, und im selben Augenblick brachen sie hervor. Er dachte: ‚In jeder Ecke soll jeweils ein großer Wasserkrug entstehen!‘, und die Wasserkrüge entstanden. So [Pg.42] ettakaṃ māpetvā brāhmaṇassa santikaṃ gantvā ‘‘ehi, ayya, tava maṇḍapaṃ oloketvā mayhaṃ bhatiṃ dehī’’ti āha. Mahāpuriso gantvā maṇḍapaṃ olokesi. Olokentasseva ca sakalasarīraṃ pañcavaṇṇāya pītiyā nirantaraṃ phuṭaṃ ahosi. Athassa maṇḍapaṃ oloketvā etadahosi – ‘‘nāyaṃ maṇḍapo manussabhūtena kato, mayhaṃ pana ajjhāsayaṃ mayhaṃ guṇaṃ āgamma addhā sakkabhavanaṃ uṇhaṃ bhavissati. Tato sakkena devaraññā ayaṃ maṇḍapo kārito bhavissatī’’ti. ‘‘Na kho pana me yuttaṃ evarūpe maṇḍape ekadivasaṃyeva dānaṃ dātuṃ, sattāhaṃ dassāmī’’ti cintesi. Bāhirakadānañhi tattakampi samānaṃ bodhisattānaṃ tuṭṭhiṃ kātuṃ na sakkoti, alaṅkatasīsaṃ pana chinditvā añjitaakkhīni uppāṭetvā hadayamaṃsaṃ vā ubbaṭṭetvā dinnakāle bodhisattānaṃ cāgaṃ nissāya tuṭṭhi nāma hoti. Amhākampi hi bodhisattassa sivirājajātake devasikaṃ pañcakahāpaṇasatasahassāni vissajjetvā catūsu dvāresu nagaramajjhe ca dānaṃ dentassa taṃ dānaṃ cāgatuṭṭhiṃ uppādetuṃ nāsakkhi. Yadā panassa brāhmaṇavaṇṇena āgantvā sakko devarājā akkhīni yāci, tadā tāni uppāṭetvā dadamānasseva hāso uppajji, kesaggamattampi cittaṃ aññathattaṃ nāhosi. Evaṃ dinnadānaṃ nissāya bodhisattānaṃ titti nāma natthi. Tasmā sopi mahāpuriso ‘‘sattāhaṃ mayā koṭisatasahassasaṅkhānaṃ bhikkhūnaṃ dānaṃ dātuṃ vaṭṭatī’’ti cintetvā tasmiṃ maṇḍape nisīdāpetvā sattāhaṃ gavapānaṃ nāma adāsi. Gavapānanti mahante mahante kolambe khīrassa pūretvā uddhanesu āropetvā ghanapākapakke khīre thoke taṇḍule pakkhipitvā pakkamadhusakkaracuṇṇasappīhi abhisaṅkhatabhojanaṃ vuccati. Manussāyeva pana parivisituṃ nāsakkhiṃsu. Devāpi ekantarikā hutvā parivisiṃsu. Dvādasaterasayojanappamāṇaṃ ṭhānampi bhikkhū gaṇhituṃ nappahosiyeva, te pana bhikkhū attano ānubhāvena nisīdiṃsu. Pariyosānadivase pana sabbabhikkhūnaṃ pattāni dhovāpetvā bhesajjatthāya sappinavanītatelamadhuphāṇitānaṃ pūretvā ticīvarehi saddhiṃ adāsi, saṅghanavakabhikkhunā laddhacīvarasāṭakā satasahassagghanikā ahesuṃ. Nachdem er so viel erschaffen hatte, ging er zu dem Brahmanen und sagte: „Komm, Herr, sieh dir deinen Pavillon an und gib mir meinen Lohn!“ Der Große Mann ging hin und betrachtete den Pavillon. Während er ihn betrachtete, wurde sein ganzer Körper fortlaufend von einer fünffarbigen Verzückung durchdrungen. Da dachte er, als er den Pavillon betrachtete: „Dieser Pavillon wurde nicht von einem menschlichen Wesen erbaut. Vielmehr muss gewiss aufgrund meiner Gesinnung und meiner Tugend der Wohnsitz von Sakka heiß geworden sein. Daraufhin wurde dieser Pavillon von Sakka, dem Götterkönig, errichtet.“ Er überlegte: „Es geziemt sich wahrlich nicht für mich, in einem solchen Pavillon nur einen einzigen Tag lang eine Gabe zu spenden; ich werde sie sieben Tage lang geben.“ Denn eine äußere Gabe, selbst wenn sie so groß ist, vermag den Bodhasattas keine Sättigung zu verschaffen. Erst wenn sie das geschmückte Haupt abschneiden, die gesalbten Augen herausreißen oder das Herzfleisch herausreißen und hergeben, entsteht bei den Bodhasattas Freude aufgrund der Freigebigkeit. Denn auch als unser Bodhisatta im Sivirāja-Jātaka täglich fünfhunderttausend Kahāpaṇas ausgab und an den vier Toren sowie inmitten der Stadt Spenden gab, vermochte diese Spende ihm keine Freude an der Freigebigkeit zu schenken. Als jedoch Sakka, der Götterkönig, in der Gestalt eines Brahmanen kam und ihn um seine Augen bat, da stieg in ihm, während er sie herausriss und hingab, Freude auf, und sein Geist veränderte sich nicht im Geringsten. Eine Sättigung bezüglich der so dargebrachten Gaben gibt es für Bodhisattas nicht. Deshalb dachte auch jener Große Mann: „Es geziemt sich für mich, sieben Tage lang eine Spende an eine unzählbare Schar von Mönchen zu geben“, ließ sie in jenem Pavillon Platz nehmen und gab ihnen sieben Tage lang die Speise namens Gavapāna. Als „Gavapāna“ bezeichnet man eine Speise, die zubereitet wird, indem man sehr große Kessel mit Milch füllt, sie auf die Herde stellt, in die dick eingekochte Milch ein wenig Reis gibt und sie mit reifem Honig, Zuckerpulver und Ghee verfeinert. Die Menschen allein vermochten es jedoch nicht, die Speisen auszuteilen. Auch die Götter halfen abwechselnd beim Bedienen. Selbst ein Raum im Ausmaß von zwölf bis dreizehn Yojanas reichte nicht aus, um die Mönche aufzunehmen; doch diese Mönche setzten sich durch ihre eigene übernatürliche Macht nieder. Am Abschlusstag ließ er die Schalen aller Mönche waschen, füllte sie zu medizinischen Zwecken mit Ghee, Butter, Öl, Honig und Melasse und gab sie ihnen zusammen mit den drei Gewändern. Die von den jüngsten Mönchen der Gemeinde empfangenen Gewänderstoffe hatten einen Wert von einhunderttausend. Satthā anumodanaṃ karonto – ‘‘ayaṃ puriso evarūpaṃ mahādānaṃ adāsi, ko nu kho bhavissatī’’ti upadhārento – ‘‘anāgate kappasatasahassādhikānaṃ [Pg.43] dvinnaṃ asaṅkhyeyyānaṃ matthake gotamo nāma buddho bhavissatī’’ti disvā mahāpurisaṃ āmantetvā ‘‘tvaṃ ettakaṃ nāma kālaṃ atikkamitvā gotamo nāma buddho bhavissasī’’ti byākāsi. Mahāpuriso byākaraṇaṃ sutvā ‘‘ahaṃ kira buddho bhavissāmi, ko me gharāvāsena attho, pabbajissāmī’’ti cintetvā tathārūpaṃ sampattiṃ kheḷapiṇḍaṃ viya pahāya satthu santike pabbajitvā buddhavacanaṃ uggaṇhitvā abhiññāyo ca samāpattiyo ca nibbattetvā āyupariyosāne brahmaloke nibbatti. Als der Meister den Danksegen sprach, dachte er nach: „Dieser Mann hat eine solch große Gabe dargebracht; wer wird er wohl werden?“ Als er sah: „In der Zukunft, nach Ablauf von zwei unzählbaren Zeitaltern und hunderttausend Äonen, wird er ein Buddha namens Gotama werden“, rief er den Großen Mann zu sich und prophezeite ihm: „Nach Ablauf einer solchen Zeit wirst du ein Buddha namens Gotama werden.“ Als der Große Mann die Prophezeiung hörte, dachte er: „Ich werde also ein Buddha werden! Was nützt mir das Leben als Hausvater? Ich werde in die Hauslosigkeit hinausziehen.“ Er gab einen solchen Reichtum wie einen Speichelklumpen auf, trat in die Gegenwart des Meisters ein, lernte das Wort des Buddha, erlangte die höheren Geisteskräfte und die geistigen Sammlungen und wurde am Ende seiner Lebenszeit in der Brahma-Welt wiedergeboren. Maṅgalo buddho Der Buddha Maṅgala Maṅgalassa pana bhagavato nagaraṃ uttaraṃ nāma ahosi, pitāpi uttaro nāma khattiyo, mātāpi uttarā nāma devī, sudevo ca dhammaseno ca dve aggasāvakā, pālito nāmupaṭṭhāko, sīvalī ca asokā ca dve aggasāvikā, nāgarukkho bodhi, aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi. Navuti vassasahassāni ṭhatvā parinibbute pana tasmiṃ ekappahāreneva dasa cakkavāḷasahassāni ekandhakārāni ahesuṃ. Sabbacakkavāḷesu manussānaṃ mahantaṃ ārodanaparidevanaṃ ahosi. Die Stadt des erhabenen Maṅgala hieß Uttara; sein Vater war ein Kṣatriya namens Uttara, seine Mutter die Königin namens Uttarā; Sudeva und Dhammasena waren die beiden Hauptschüler; Pālita war sein persönlicher Diener; Sīvalī und Asokā waren die beiden Hauptschülerinnen; sein Bodhi-Baum war der Nāga-Baum; sein Körper war achtundachtzig Ellen hoch. Er lebte neunzigtausend Jahre, und als er ins Parinibbāna einging, wurden augenblicklich zehntausend Weltsysteme in völlige Dunkelheit gehüllt. In allen Weltsystemen gab es unter den Menschen großes Klagen und Weinen. ‘‘Koṇḍaññassa aparena, maṅgalo nāma nāyako; Tamaṃ loke nihantvāna, dhammokkamabhidhārayī’’ti. (bu. vaṃ. 5.1); „Nach Koṇḍañña erschien ein Führer namens Maṅgala. Nachdem er die Dunkelheit in der Welt vertrieben hatte, hielt er die Fackel des Dhamma empor.“ Sumano buddho Der Buddha Sumana Evaṃ dasasahassilokadhātuṃ andhakāraṃ katvā parinibbutassa tassa bhagavato aparabhāge sumano nāma satthā loke udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ. Dutiye kañcanapabbatamhi navutikoṭisahassāni, tatiye asītikoṭisahassāni. Tadā mahāsatto atulo nāma nāgarājā ahosi mahiddhiko mahānubhāvo. So ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā ñātisaṅghaparivuto nāgabhavanā nikkhamitvā koṭisatasahassabhikkhuparivārassa tassa bhagavato dibbatūriyehi upahāraṃ kāretvā mahādānaṃ pavattetvā paccekaṃ dussayugāni datvā saraṇesu patiṭṭhāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato nagaraṃ mekhalaṃ nāma ahosi, sudatto nāma [Pg.44] rājā pitā, sirimā nāma mātā devī, saraṇo ca bhāvitatto ca dve aggasāvakā, udeno nāmupaṭṭhāko, soṇā ca upasoṇā ca dve aggasāvikā, nāgarukkho bodhi, navutihatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, navutiyeva vassasahassāni āyuppamāṇaṃ ahosi. Nachdem der erhabene [Maṅgala] so das zehntausendfache Weltsystem in Dunkelheit gehüllt hatte und ins Parinibbāna eingegangen war, erschien in späterer Zeit ein Meister namens Sumana in der Welt. Auch er hatte drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es hunderttausend Koṭis von Mönchen. In der zweiten, auf dem Goldenen Berg, neunzigtausend Koṭis, in der dritten achtzigtausend Koṭis. Zu jener Zeit war der Bodhisatta ein Nāga-König namens Atula, von großer übernatürlicher Macht und großem Einfluss. Als er hörte, dass ein Buddha erschienen war, verließ er, umgeben von seiner Verwandtschaft, das Reich der Nāgas. Er brachte dem erhabenen Sumana, der von hunderttausend Koṭis von Mönchen umgeben war, eine Ehrung mit himmlischer Musik dar, richtete eine große Spende aus, schenkte jedem ein Paar Gewänder und nahm Zuflucht zu den Zufluchtsstätten. Auch ihm prophezeite der Meister: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Mekhala, der König namens Sudatta war sein Vater, Sirimā hieß die königliche Mutter; Saraṇa und Bhāvitatta waren die beiden Hauptschüler, Udena war sein Diener, Soṇā und Upasoṇā waren die beiden Hauptschülerinnen; der Bodhi-Baum war der Nāga-Baum; sein Körper war neunzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Maṅgalassa aparena, sumano nāma nāyako; Sabbadhammehi asamo, sabbasattānamuttamo’’ti. (bu. vaṃ. 6.1); „Nach Maṅgala erschien ein Führer namens Sumana, unvergleichlich in allen Dingen, der Höchste aller Wesen.“ Revato buddho Der Buddha Revata Tassa aparabhāge revato nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte gaṇanā natthi, dutiye koṭisatasahassabhikkhū ahesuṃ, tathā tatiye. Tadā bodhisatto atidevo nāma brāhmaṇo hutvā satthu dhammadesanaṃ sutvā saraṇesu patiṭṭhāya sirasi añjaliṃ ṭhapetvā tassa satthuno kilesappahāne vaṇṇaṃ sutvā uttarāsaṅgena pūjaṃ akāsi. Sopi naṃ ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato nagaraṃ sudhaññavatī nāma ahosi, pitā vipulo nāma khattiyo, mātā vipulā nāma, varuṇo ca brahmadevo ca dve aggasāvakā, sambhavo nāmupaṭṭhāko, bhaddā ca subhaddā ca dve aggasāvikā, nāgarukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, āyu saṭṭhi vassasahassānīti. Später erschien der Lehrer namens Revata. Auch er hatte drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es keine (bestimmte) Zahl, in der zweiten gab es hunderttausend Kotis von Mönchen, und ebenso in der dritten. Damals war der Bodhisatta ein Brahmane namens Atideva. Nachdem er die Lehrrede des Lehrers gehört hatte, sich in den Zufluchten gefestigt hatte, die zusammengelegten Hände ehrerbietig an sein Haupt gelegt hatte und das Lob dieses Lehrers bezüglich der Überwindung der Befleckungen vernommen hatte, brachte er ihm seine Oberrobe als Opfergabe dar. Auch jener prophezeite über ihn: „Er wird ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen aber hieß Sudhaññavatī, sein Vater war ein Khattiya namens Vipula, seine Mutter hieß Vipulā, Varuṇa und Brahmadeva waren die zwei Hauptjünger, Sambhava hieß sein persönlicher Diener, Bhaddā und Subhaddā waren die zwei Hauptjüngerinnen, der Nāga-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug sechzigtausend Jahre. ‘‘Sumanassa aparena, revato nāma nāyako; Anūpamo asadiso, atulo uttamo jino’’ti. (bu. vaṃ. 7.1); „Nach Sumana erschien der Führer namens Revata, der Unvergleichliche, Unübertroffene, Unermessliche, der höchste Sieger.“ Sobhito buddho Der Buddha Sobhita Tassa aparabhāge sobhito nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte koṭisataṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto ajito nāma brāhmaṇo hutvā satthu dhammadesanaṃ sutvā saraṇesu patiṭṭhāya buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adāsi. Sopi naṃ ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato nagaraṃ sudhammaṃ nāma ahosi, pitā sudhammo nāma rājā, mātāpi sudhammā nāma devī, asamo ca sunetto ca dve aggasāvakā, anomo nāmupaṭṭhāko, nakulā ca sujātā ca dve aggasāvikā, nāgarukkho bodhi[Pg.45], aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, navuti vassasahassāni āyuppamāṇanti. Später erschien der Lehrer namens Sobhita. Auch er hatte drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es hundert Kotis von Mönchen, in der zweiten neunzig Kotis, in der dritten achtzig Kotis. Damals war der Bodhisatta ein Brahmane namens Ajita. Nachdem er die Lehrrede des Lehrers gehört hatte und in den Zufluchten gefestigt war, spendete er der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinschaft eine große Gabe. Auch jener prophezeite über ihn: „Er wird ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Sudhamma, sein Vater war ein König namens Sudhamma, und seine Mutter war die Königin namens Sudhammā. Asama und Sunetta waren die zwei Hauptjünger, Anoma hieß sein persönlicher Diener, Nakulā und Sujātā waren die zwei Hauptjüngerinnen, der Nāga-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Revatassa aparena, sobhito nāma nāyako; Samāhito santacitto, asamo appaṭipuggalo’’ti. (bu. vaṃ. 8.1); „Nach Revata erschien der Führer namens Sobhita, der Gesammelte von friedvollem Geist, der Unvergleichliche, der Einzigartige.“ Anomadassī buddho Der Buddha Anomadassī Tassa aparabhāge ekaṃ asaṅkhayeyyaṃ atikkamitvā ekasmiṃ kappe tayo buddhā nibbattiṃsu anomadassī, padumo, nāradoti. Anomadassissa bhagavato tayo sāvakasannipātā. Paṭhame aṭṭha bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye satta, tatiye cha. Tadā bodhisatto eko yakkhasenāpati ahosi mahiddhiko mahānubhāvo, anekakoṭisatasahassānaṃ yakkhānaṃ adhipati. So ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā āgantvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ adāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Anomadassissa pana bhagavato candavatī nāma nagaraṃ ahosi, yasavā nāma rājā pitā, yasodharā nāma mātā devī, nisabho ca anomo ca dve aggasāvakā, varuṇo nāmupaṭṭhāko, sundarī ca sumanā ca dve aggasāvikā, ajjunarukkho bodhi, aṭṭhapaññāsahatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyuppamāṇanti. Später, nach dem Verlauf eines unzählbaren Weltalters (Asankheyya), erschienen in einem einzigen Weltalter (Kappa) drei Buddhas: Anomadassī, Paduma und Nārada. Der erhabene Anomadassī hatte drei Schülerversammlungen. In der ersten gab es achthunderttausend Mönche, in der zweiten siebenhunderttausend, in der dritten sechshunderttausend. Damals war der Bodhisatta ein Yakkha-General namens Eka, von großer übernatürlicher Kraft und Macht, der Herrscher über viele hunderttausende Kotis von Yakkhas. Als er hörte, dass ein Buddha erschienen war, kam er herbei und spendete der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinschaft eine große Gabe. Auch jener Lehrer prophezeite über ihn: „In der Zukunft wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt des erhabenen Anomadassī hieß Candavatī, sein Vater war der König namens Yasavā, seine Mutter die Königin namens Yasodharā. Nisabha und Anoma waren die zwei Hauptjünger, Varuṇa hieß sein persönlicher Diener, Sundarī und Sumanā waren die zwei Hauptjüngerinnen, der Ajjuna-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Sobhitassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Anomadassī amitayaso, tejassī duratikkamo’’ti. (bu. vaṃ. 9.1); „Nach Sobhita erschien der vollkommen Erwachte, der Höchste unter den Zweibeinern, Anomadassī von unermesslichem Ruhm, der Machtvolle, der schwer zu Überwindende.“ Padumo buddho Der Buddha Paduma Tassa aparabhāge padumo nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye tīṇi satasahassāni, tatiye agāmake araññe mahāvanasaṇḍavāsīnaṃ bhikkhūnaṃ dve satasahassāni. Tadā bodhisatto sīho hutvā satthāraṃ nirodhasamāpattiṃ samāpannaṃ disvā pasannacitto vanditvā padakkhiṇaṃ katvā pītisomanassajāto tikkhattuṃ sīhanādaṃ naditvā sattāhaṃ buddhārammaṇaṃ pītiṃ avijahitvā pītisukheneva gocarāya apakkamitvā jīvitapariccāgaṃ katvā bhagavantaṃ payirupāsamāno aṭṭhāsi. Satthā sattāhaccayena nirodhā vuṭṭhito sīhaṃ [Pg.46] oloketvā ‘‘bhikkhusaṅghepi cittaṃ pasādetvā saṅghaṃ vandissatī’’ti ‘‘bhikkhusaṅgho āgacchatū’’ti cintesi. Bhikkhū tāvadeva āgamiṃsu. Sīhopi bhikkhusaṅghe cittaṃ pasādeti. Satthā tassa manaṃ oloketvā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Padumassa pana bhagavato campakaṃ nāma nagaraṃ ahosi, asamo nāma rājā pitā, mātā asamā nāma devī, sālo ca upasālo ca dve aggasāvakā, varuṇo nāmupaṭṭhāko, rāmā ca surāmā ca dve aggasāvikā, soṇarukkho nāma bodhi, aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ sarīraṃ ahosi, āyu vassasatasahassanti. Später erschien der Lehrer namens Paduma. Auch er hatte drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es hunderttausend Kotis von Mönchen, in der zweiten dreihunderttausend, in der dritten zweihunderttausend Mönche, die in einem großen Waldgebiet abseits von Dörfern lebten. Damals war der Bodhisatta ein Löwe. Als er sah, dass der Lehrer die Errungenschaft des Erlöschens (nirodhasamāpatti) erlangt hatte, verehrte er ihn mit gläubigem Herzen, umwandelte ihn ehrfurchtsvoll im Uhrzeigersinn (padakkhiṇa) und stieß voller Entzücken und Freude dreimal ein Löwengebrüll aus. Sieben Tage lang gab er die Freude, die den Buddha zum Objekt hatte, nicht auf, wich nicht zur Nahrungssuche ab, war bereit, sein Leben hinzugeben, und verharrte in diesem Zustand des Glücks und des Entzückens, während er dem Erhabenen diente. Nach dem Ablauf von sieben Tagen erhob sich der Lehrer aus dem Erlöschen, blickte den Löwen an und dachte: „Er möge auch sein Herz im Vertrauen auf die Mönchsgemeinschaft klären und die Gemeinschaft verehren; die Mönchsgemeinschaft soll herkommen.“ Sogleich kamen die Mönche herbei. Auch der Löwe klärte sein Herz im Vertrauen auf die Mönchsgemeinschaft. Der Lehrer sah seine Gesinnung und prophezeite: „In der Zukunft wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt des erhabenen Paduma hieß Campaka, sein Vater war der König namens Asama, seine Mutter die Königin namens Asamā. Sāla und Upasāla waren die zwei Hauptjünger, Varuṇa hieß sein persönlicher Diener, Rāmā und Surāmā waren die zwei Hauptjüngerinnen, der Soṇa-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Anomadassissa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Padumo nāma nāmena, asamo appaṭipuggalo’’ti. (bu. va. 10.1); „Nach Anomadassī erschien der vollkommen Erwachte, der Höchste unter den Zweibeinern, Paduma mit Namen, der Unvergleichliche, der Einzigartige.“ Nārado buddho Der Buddha Nārada Tassa aparabhāge nārado nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte koṭisatasahassaṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭisahassāni, tatiye asītikoṭisahassāni. Tadā bodhisatto isipabbajjaṃ pabbajitvā pañcasu abhiññāsu aṭṭhasu ca samāpattīsu ciṇṇavasī hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā lohitacandanena pūjaṃ akāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato dhaññavatī nāma nagaraṃ ahosi, sudevo nāma khattiyo pitā, anomā nāma mātā devī, bhaddasālo ca jitamitto ca dve aggasāvakā, vāseṭṭho nāmupaṭṭhāko, uttarā ca phaggunī ca dve aggasāvikā, mahāsoṇarukkho nāma bodhi, sarīraṃ aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ ahosi, navuti vassasahassāni āyūti. Später erschien der Lehrer namens Nārada. Auch er hatte drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es hunderttausend Kotis von Mönchen, in der zweiten neunzigtausend Kotis, in der dritten achtzigtausend Kotis. Damals trat der Bodhisatta in das Leben eines Asketen (isipabbajjā) ein, erlangte die Meisterschaft in den fünf höheren Geisteskräften (abhiññā) und den acht Errungenschaften (samāpatti) und spendete der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinschaft eine große Gabe und verehrte sie mit rotem Sandelholz. Auch jener Lehrer prophezeite über ihn: „In der Zukunft wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Dhaññavatī, sein Vater war ein Khattiya namens Sudeva, seine Mutter die Königin namens Anomā. Bhaddasāla und Jitamitta waren die zwei Hauptjünger, Vāseṭṭha hieß sein persönlicher Diener, Uttarā und Phaggunī waren die zwei Hauptjüngerinnen, der Mahāsoṇa-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper war achtundachtzig Ellen hoch, und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Padumassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Nārado nāma nāmena, asamo appaṭipuggalo’’ti. (bu. vaṃ. 11.1); „Nach Paduma erschien der vollkommen Erwachte, der Höchste unter den Zweibeinern, Nārada mit Namen, der Unvergleichliche, der Einzigartige.“ Padumuttaro buddho Der Buddha Padumuttaro Nāradabuddhassa pana aparabhāge ito satasahassakappamatthake ekasmiṃ kappe ekova padumuttaro nāma buddho udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhame sannipāte koṭisatasahassaṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye [Pg.47] vebhārapabbate navutikoṭisahassāni, tatiye asītikoṭisahassāni. Tadā bodhisatto jaṭilo nāma mahāraṭṭhiyo hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghasa sacīvaraṃ dānaṃ adāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Padumuttarassa pana bhagavato kāle titthiyā nāma nāhesuṃ. Sabbadevamanussā buddhameva saraṇaṃ agamaṃsu. Tassa nagaraṃ haṃsavatī nāma ahosi, pitā ānando nāma khattiyo, mātā sujātā nāma devī, devalo ca sujāto ca dve aggasāvakā, sumano nāmupaṭṭhāko, amitā ca asamā ca dve aggasāvikā, sālarukkho bodhi, sarīraṃ aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā samantato dvādasayojanāni gaṇhi, vassasatasahassaṃ āyūti. Nach dem Buddha Nārada jedoch, vor einhunderttausend Äonen von diesem [jetzigen Äon] an gerechnet, erschien in einem einzigen Äon ein einziger Buddha namens Padumuttara. Auch bei ihm gab es drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es einhunderttausend Kotis von Mönchen, in der zweiten, auf dem Berg Vebhāra, neunzigtausend Kotis, und in der dritten achtzigtausend Kotis. Damals war der Bodhisatta ein reicher Großkaufmann namens Jaṭila und gab der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine Gabe von Gewändern. Auch jener Meister prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Zur Zeit des erhabenen Padumuttara aber gab es keine Sektierer. Alle Götter und Menschen nahmen Zuflucht allein zum Buddha. Seine Stadt hieß Haṃsavatī, sein Vater war der König namens Ānanda, seine Mutter die Königin namens Sujātā. Devala und Sujāta waren die beiden Hauptschüler, Sumana hieß der persönliche Diener, Amitā und Asamā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der Sāla-Baum war sein Erleuchtungsbaum. Sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch, und das Licht seines Körpers erstreckte sich ringsum über zwölf Yojanas. Seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Nāradassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Padumuttaro nāma jino, akkhobho sāgarūpamo’’ti. (bu. vaṃ. 12.1); „Nach Nārada erschien der vollkommen Erleuchtete, der Höchste der zweibeinigen Wesen, der Sieger namens Padumuttara, unerschütterlich und dem Ozean gleich.“ Sumedho buddho Der Buddha Sumedha Tassa aparabhāge tiṃsa kappasahassāni atikkamitvā sumedho ca sujāto cāti ekasmiṃ kappe dve buddhā nibbattiṃsu. Sumedhassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte sudassananagare koṭisataṃ khīṇāsavā ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto uttaro nāma māṇavo hutvā nidahitvā ṭhapitaṃyeva asītikoṭidhanaṃ vissajjetvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā dhammaṃ sutvā saraṇesu patiṭṭhāya nikkhamitvā pabbaji. Sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Sumedhassa bhagavato sudassanaṃ nāma nagaraṃ ahosi, sudatto nāma rājā pitā, mātāpi sudattā nāma devī, saraṇo ca sabbakāmo ca dve aggasāvakā, sāgaro nāmupaṭṭhāko, rāmā ca surāmā ca dve aggasāvikā, mahānīparukkho bodhi, sarīraṃ aṭṭhāsītihatthubbedhaṃ ahosi, āyu navuti vassasahassanti. Nach ihm, nach dem Verlauf von dreißigtausend Äonen, erschienen zwei Buddhas in einem einzigen Äon: Sumedha und Sujāta. Auch bei Sumedha gab es drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung in der Stadt Sudassana gab es einhundert Kotis von Triebversiegten, in der zweiten neunzig Kotis und in der dritten achtzig Kotis. Damals war der Bodhisatta ein junger Brahmane namens Uttara. Er gab sein angesammeltes Vermögen von achtzig Kotis auf, spendete der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine große Gabe, hörte das Dhamma, gründete sich in den Zufluchten, zog aus dem Hausleben fort und wurde Mönch. Auch jener prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt des erhabenen Sumedha hieß Sudassana, der König namens Sudatta war sein Vater, und auch seine Mutter war die Königin namens Sudattā. Saraṇa und Sabbakāma waren die beiden Hauptschüler, Sāgara hieß der persönliche Diener, Rāmā und Surāmā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der große Nīpa-Baum war sein Erleuchtungsbaum. Sein Körper war achtundachtzig Ellen hoch, seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Padumuttarassa aparena, sumedho nāma nāyako; Durāsado uggatejo, sabbalokuttamo munī’’ti. (bu. vaṃ. 13.1); „Nach Padumuttara erschien der Führer namens Sumedha, schwer bezwingbar, von gewaltiger Pracht, der höchste Weise der ganzen Welt.“ Sujāto buddho Der Buddha Sujāta Tassa [Pg.48] aparabhāge sujāto nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte saṭṭhi bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye paññāsaṃ, tatiye cattālīsaṃ. Tadā bodhisatto cakkavattirājā hutvā ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā upasaṅkamitvā dhammaṃ sutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa saddhiṃ sattahi ratanehi catumahādīparajjaṃ datvā satthu santike pabbaji. Sakalaraṭṭhavāsino raṭṭhuppādaṃ gahetvā ārāmikakiccaṃ sādhentā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa niccaṃ mahādānaṃ adaṃsu. Sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato nagaraṃ sumaṅgalaṃ nāma ahosi, uggato nāma rājā pitā, pabhāvatī nāma mātā, sudassano ca sudevo ca dve aggasāvakā, nārado nāmupaṭṭhāko, nāgā ca nāgasamālā ca dve aggasāvikā, mahāveḷurukkho bodhi. So kira mandacchiddo ghanakkhandho upari niggatāhi mahāsākhāhi morapiñchakalāpo viya virocittha. Tassa bhagavato sarīraṃ paṇṇāsahatthubbedhaṃ ahosi, āyu navuti vassasahassanti. Nach ihm erschien der Meister namens Sujāta in der Welt. Auch bei ihm gab es drei Schülerversammlungen. In der ersten Versammlung gab es sechzigmal hunderttausend Mönche, in der zweiten fünfzigmal [hunderttausend] und in der dritten vierzigmal [hunderttausend]. Damals war der Bodhisatta ein Raddrehender König. Als er hörte, dass ein Buddha erschienen war, suchte er ihn auf, hörte das Dhamma, schenkte der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde die Herrschaft über die vier großen Kontinente mitsamt den sieben Kostbarkeiten und wurde unter dem Meister Mönch. Die Bewohner des ganzen Reiches nahmen die Steuereinnahmen des Landes, verrichteten die Dienste im Kloster und gaben der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde beständig eine große Gabe. Auch jener Meister prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Sumaṅgala, der König namens Uggata war sein Vater, Pabhāvatī hieß seine Mutter. Sudassana und Sudeva waren die beiden Hauptschüler, Nārada hieß der persönliche Diener, Nāgā und Nāgasamālā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der große Bambusbaum war sein Erleuchtungsbaum. Dieser glänzte wahrlich, mit kleinen Öffnungen, einem dichten Stamm und oben weit ausladenden Ästen, wie ein Pfauenschweif. Der Körper dieses Erhabenen war fünfzig Ellen hoch, seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, sujāto nāma nāyako; Sīhahanūsabhakkhandho, appameyyo durāsado’’ti. (bu. vaṃ. 14.1); „In ebendiesem Maṇḍa-Äon erschien der Führer namens Sujāta, mit einem Kiefer wie ein Löwe, Schultern wie ein Stier, unermesslich und schwer bezwingbar.“ Piyadassī buddho Der Buddha Piyadassī Tassa aparabhāge ito aṭṭhārasakappasatamatthake ekasmiṃ kappe piyadassī, atthadassī, dhammadassīti tayo buddhā nibbattiṃsu. Piyadassissapi bhagavato tayo sāvakasannipātā. Paṭhame koṭisatasahassaṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto kassapo nāma māṇavo tiṇṇaṃ vedānaṃ pāraṅgato hutvā satthu dhammadesanaṃ sutvā koṭisatasahassadhanapariccāgena saṅghārāmaṃ kāretvā saraṇesu ca sīlesu ca patiṭṭhāsi. Atha naṃ satthā ‘‘aṭṭhārasakappasataccayena buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato anomaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitā sudinno nāma rājā, mātā candā nāma, pālito ca sabbadassī ca dve aggasāvakā, sobhito nāmupaṭṭhāko, sujātā ca dhammadinnā ca dve aggasāvikā, kakudharukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, navuti vassasahassaṃ āyūti. Nach ihm, vor einhundertachtzehn Äonen von diesem [jetzigen] Äon an gerechnet, erschienen in einem einzigen Äon drei Buddhas: Piyadassī, Atthadassī und Dhammadassī. Auch bei dem erhabenen Piyadassī gab es drei Schülerversammlungen. In der ersten gab es einhunderttausend Kotis von Mönchen, in der zweiten neunzig Kotis und in der dritten achtzig Kotis. Damals war der Bodhisatta ein junger Brahmane namens Kassapa, der die drei Veden vollständig gemeistert hatte. Als er die Lehrrede des Meisters gehört hatte, ließ er unter Verzicht auf ein Vermögen von einhunderttausend Kotis ein Kloster errichten und gründete sich in den Zufluchten und Tugendregeln. Daraufhin prophezeite ihm der Meister: „Nach Ablauf von einhundertachtzehn Äonen wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Anoma, sein Vater war der König namens Sudinna, seine Mutter hieß Candā. Pālita und Sabbadassī waren die beiden Hauptschüler, Sobhita hieß der persönliche Diener, Sujātā und Dhammadinnā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der Kakudha-Baum war sein Erleuchtungsbaum. Sein Körper war achtzig Ellen hoch, seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Sujātassa [Pg.49] aparena, sayambhū lokanāyako; Durāsado asamasamo, piyadassī mahāyaso’’ti. (bu. vaṃ. 15.1); „Nach Sujāta erschien der selbstgewordene Führer der Welt, schwer bezwingbar, unvergleichlich, Piyadassī von großem Ruhm.“ Atthadassī buddho Der Buddha Atthadassī Tassa aparabhāge atthadassī nāma bhagavā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhame aṭṭhanavuti bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye aṭṭhāsītisatasahassāni, tathā tatiye. Tadā bodhisatto susīmo nāma mahiddhiko tāpaso hutvā devalokato mandāravapupphacchattaṃ āharitvā satthāraṃ pūjesi, sopi naṃ ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato sobhanaṃ nāma nagaraṃ ahosi, sāgaro nāma rājā pitā, sudassanā nāma mātā, santo ca upasanto ca dve aggasāvakā, abhayo nāmupaṭṭhāko, dhammā ca sudhammā ca dve aggasāvikā, campakarukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā samantato sabbakālaṃ yojanamattaṃ pharitvā aṭṭhāsi, āyu vassasatasahassanti. Nach ihm erschien der erhabene Atthadassī in der Welt. Auch bei ihm gab es drei Schülerversammlungen. In der ersten gab es achtundneunzigmal hunderttausend Mönche, in der zweiten achtundachtzigmal hunderttausend, ebenso in der dritten. Damals war der Bodhisatta ein Asket von großer Wunderkraft namens Susīma. Er brachte einen Schirm aus Mandārava-Blüten aus der Götterwelt herab und verehrte damit den Meister. Auch jener prophezeite ihm: „In der Zukunft wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Sobhana, der König namens Sāgara war sein Vater, Sudassanā hieß seine Mutter. Santa und Upasanta waren die beiden Hauptschüler, Abhaya hieß der persönliche Diener, Dhammā und Sudhammā waren die beiden Hauptschülerinnen. Der Campaka-Baum war sein Erleuchtungsbaum. Sein Körper war achtzig Ellen hoch. Das Licht seines Körpers breitete sich ringsum zu allen Zeiten über ein Yojana aus und verweilte so. Seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, atthadassī narāsabho; Mahātamaṃ nihantvāna, patto sambodhimuttama’’nti. (bu. vaṃ. 16.1); In eben diesem Mandakappa (Zier-Äon) gelangte Atthadassī, der Edelste unter den Menschen, nachdem er das große Dunkel (der Unwissenheit) vertrieben hatte, zur höchsten Erleuchtung. Dhammadassī buddho Der Buddha Dhammadassī Tassa aparabhāge dhammadassī nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhame koṭisataṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto sakko devarājā hutvā dibbagandhapupphehi ca dibbatūriyehi ca pūjaṃ akāsi, sopi naṃ satthā ‘‘anāgate buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato saraṇaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitā saraṇo nāma rājā, mātā sunandā nāma devī, padumo ca phussadevo ca dve aggasāvakā, sunetto nāmupaṭṭhāko, khemā ca sabbanāmā ca dve aggasāvikā, rattaṅkurarukkho bodhi, ‘‘bimbijālo’’tipi vuccati, sarīraṃ panassa asītihatthubbedhaṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. In der Folgezeit erschien der Lehrer namens Dhammadassī. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten gab es einhundert Koti Mönche, in der zweiten neunzig Koti, in der dritten achtzig Koti. Damals war der Bodhisatta Sakka, der König der Götter, und brachte ihm Verehrung dar mit himmlischen Duftstoffen und Blumen sowie mit himmlischen Musikinstrumenten. Auch jener Lehrer prophezeite über ihn: „In der Zukunft wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Saraṇa, sein Vater war der König namens Saraṇa, seine Mutter die Königin namens Sunandā. Paduma und Phussadeva waren die beiden Hauptjünger, Sunetta war der persönliche Diener, Khemā und Sabbanāmā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Rattaṅkura-Baum war sein Bodhi-Baum, der auch „Bimbijāla“ genannt wird. Sein Körper war achtzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, dhammadassī mahāyaso; Tamandhakāraṃ vidhamitvā, atirocati sadevake’’ti. (bu. vaṃ. 17.1); In eben diesem Mandakappa strahlt Dhammadassī von großem Ruhm, nachdem er das Dunkel vertrieben hat, überaus hell in der Welt samt den Göttern. Siddhattho buddho Der Buddha Siddhattha Tassa [Pg.50] aparabhāge ito catunavutikappamatthake ekasmiṃ kappe ekova siddhattho nāma sammāsambuddho udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte koṭisataṃ bhikkhū ahesuṃ, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto uggatejo abhiññābalasampanno maṅgalo nāma tāpaso hutvā mahājambuphalaṃ āharitvā tathāgatassa adāsi. Satthā taṃ phalaṃ paribhuñjitvā ‘‘catunavutikappamatthake buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato nagaraṃ vebhāraṃ nāma ahosi, pitā jayaseno nāma rājā, mātā suphassā nāma devī, sambalo ca sumitto ca dve aggasāvakā, revato nāmupaṭṭhāko, sīvalā ca surāmā ca dve aggasāvikā, kaṇikārarukkho bodhi, sarīraṃ saṭṭhihatthubbedhaṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. In der Folgezeit, vor vierundneunzig Äonen, erschien in einem einzigen Äon ein einziger vollkommen Erleuchteter namens Siddhattha. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es einhundert Koti Mönche, in der zweiten neunzig Koti, in der dritten achtzig Koti. Damals war der Bodhisatta ein Asket namens Maṅgala von glühender Tatkraft und im Besitz der Kraft der höheren Geisteskräfte; er brachte eine große Jambu-Frucht herbei und darbot sie dem Tathāgata. Der Lehrer genoss die Frucht und prophezeite: „Nach vierundneunzig Äonen wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Vebhāra, sein Vater war der König namens Jayasena, seine Mutter die Königin namens Suphassā. Sambala und Sumitta waren die beiden Hauptjünger, Revata war der persönliche Diener, Sīvalā und Surāmā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Kaṇikāra-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war sechzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Dhammadassissa aparena, siddhattho lokanāyako; Nihanitvā tamaṃ sabbaṃ, sūriyo abbhuggato yathā’’ti. (bu. vaṃ. 18.1); Nach Dhammadassī vertrieb Siddhattha, der Führer der Welt, alle Dunkelheit, gleich der aufgehenden Sonne. Tisso buddho Der Buddha Tissa Tassa aparabhāge ito dvānavutikappamatthake tisso phussoti ekasmiṃ kappe dve buddhā nibbattiṃsu. Tissassa bhagavato tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte bhikkhūnaṃ koṭisataṃ ahosi, dutiye navutikoṭiyo, tatiye asītikoṭiyo. Tadā bodhisatto mahābhogo mahāyaso sujāto nāma khattiyo hutvā isipabbajjaṃ pabbajitvā mahiddhikabhāvaṃ patvā ‘‘buddho uppanno’’ti sutvā dibbamandāravapadumapāricchattakapupphāni ādāya catuparisamajjhe gacchantaṃ tathāgataṃ pūjesi, ākāse pupphavitānaṃ akāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘ito dvenavutikappamatthake buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato khemaṃ nāma nagaraṃ ahosi, pitā janasandho nāma khattiyo, mātā padumā nāma devī, brahmadevo ca udayo ca dve aggasāvakā, sumano nāmupaṭṭhāko, phussā ca sudattā ca dve aggasāvikā, asanarukkho bodhi, sarīraṃ saṭṭhihatthubbedhaṃ ahosi, vassasatasahassaṃ āyūti. In der Folgezeit, vor zweiundneunzig Äonen, traten in einem einzigen Äon zwei Buddhas auf: Tissa und Phussa. Der erhabene Tissa hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es einhundert Koti Mönche, in der zweiten neunzig Koti, in der dritten achtzig Koti. Damals war der Bodhisatta ein Krieger (Khattiya) namens Sujāta von großem Reichtum und großem Ansehen; er ging in die Hauslosigkeit der Seher hinaus, erlangte große magische Macht und als er hörte: „Ein Buddha ist erschienen“, nahm er himmlische Mandārava-, Paduma- und Pāricchattaka-Blumen und verehrte den Tathāgata, der inmitten der vierfachen Gemeinde schritt, und spannte einen Blumenbaldachin am Himmel auf. Auch jener Lehrer prophezeite über ihn: „Zweiundneunzig Äonen von jetzt an wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Khema, sein Vater war der Kṣatriya namens Janasandha, seine Mutter die Königin namens Padumā. Brahmadeva und Udaya waren die beiden Hauptjünger, Sumana war der persönliche Diener, Phussā und Sudattā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Asana-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war sechzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug einhunderttausend Jahre. ‘‘Siddhatthassa aparena, asamo appaṭipuggalo; Anantatejo amitayaso, tisso lokagganāyako’’ti. (bu. vaṃ. 19.1); Nach Siddhattha erschien Tissa, der höchste Führer der Welt, ohnegleichen, ohne Gegenüber, von unendlicher Pracht und unermesslichem Ruhm. Phusso buddho Der Buddha Phussa Tassa [Pg.51] aparabhāge phusso nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte saṭṭhi bhikkhusatasahassāni ahesuṃ, dutiye paṇṇāsa, tatiye dvattiṃsa. Tadā bodhisatto vijitāvī nāma khattiyo hutvā mahārajjaṃ pahāya satthu santike pabbajitvā tīṇi piṭakāni uggahetvā mahājanassa dhammakathaṃ kathesi, sīlapāramiñca pūresi. Sopi naṃ ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato kāsi nāma nagaraṃ ahosi, jayaseno nāma rājā pitā, sirimā nāma mātā, surakkhito ca dhammaseno ca dve aggasāvakā, sabhiyo nāmupaṭṭhāko, cālā ca upacālā ca dve aggasāvikā, āmalakarukkho bodhi, sarīraṃ aṭṭhapaṇṇāsahatthubbedhaṃ ahosi, navuti vassasahassāni āyūti. In der Folgezeit erschien der Lehrer namens Phussa. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es sechzigmal hunderttausend Mönche, in der zweiten fünfzigmal hunderttausend, in der dritten zweiunddreißigmal hunderttausend. Damals war der Bodhisatta ein Krieger (Khattiya) namens Vijitāvī; er gab sein großes Königreich auf, trat unter dem Lehrer in den Orden ein, erlernte die drei Körbe (Tipitaka), verkündete der großen Menschenmenge das Dhamma und erfüllte die Vollkommenheit der Tugend (Sīla-Pāramī). Auch jener Lehrer prophezeite über ihn: „Er wird ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Kāsi, sein Vater war der König namens Jayasena, seine Mutter hieß Sirimā. Surakkhito und Dhammaseno waren die beiden Hauptjünger, Sabhiyo war der persönliche Diener, Cālā und Upacālā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Āmalaka-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtundfünfzig Ellen hoch und seine Lebensspanne betrug neunzigtausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, ahu satthā anuttaro; Anūpamo asamasamo, phusso lokagganāyako’’ti. (bu. vaṃ. 20.1); In eben diesem Mandakappa erschien der unvergleichliche Lehrer Phussa, ohnegleichen, dem Unvergleichlichen gleich, der höchste Führer der Welt. Vipassī buddho Der Buddha Vipassī Tassa aparabhāge ito ekanavutikappe vipassī nāma bhagavā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte aṭṭhasaṭṭhi bhikkhusatasahassaṃ ahosi, dutiye ekasatasahassaṃ, tatiye asītisahassāni. Tadā bodhisatto mahiddhiko mahānubhāvo atulo nāma nāgarājā hutvā sattaratanakhacitaṃ sovaṇṇamayaṃ mahāpīṭhaṃ bhagavato adāsi. Sopi naṃ ‘‘ito ekanavutikappe buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato bandhumatī nāma nagaraṃ ahosi, bandhumā nāma rājā pitā, bandhumatī nāma mātā, khaṇḍo ca tisso ca dve aggasāvakā, asoko nāmupaṭṭhāko, candā ca candamittā ca dve aggasāvikā, pāṭalirukkho bodhi, sarīraṃ asītihatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā sadā satta yojanāni pharitvā aṭṭhāsi, asīti vassasahassāni āyūti. In der Folgezeit, vor einundneunzig Äonen, erschien der Erhabene namens Vipassī. Auch er hatte drei Versammlungen von Jüngern. In der ersten Versammlung gab es achtundsechzigmal hunderttausend Mönche, in der zweiten einhunderttausend, in der dritten achtzigtausend. Damals war der Bodhisatta ein Schlangenkönig namens Atula von großer magischer Macht und Herrlichkeit; er schenkte dem Erhabenen einen mit sieben Juwelen verzierten goldenen Thron. Auch jener prophezeite über ihn: „Einundneunzig Äonen von jetzt an wird er ein Buddha werden.“ Die Stadt dieses Erhabenen hieß Bandhumatī, sein Vater war der König namens Bandhumā, seine Mutter hieß Bandhumatī. Khaṇḍa und Tissa waren die beiden Hauptjünger, Asoka war der persönliche Diener, Candā und Candamittā waren die beiden Hauptjüngerinnen. Der Pāṭali-Baum war sein Bodhi-Baum. Sein Körper war achtzig Ellen hoch, und sein Körperlicht breitete sich stets über sieben Yojanas aus und verblieb so. Seine Lebensspanne betrug achtzigtausend Jahre. ‘‘Phussassa ca aparena, sambuddho dvipaduttamo; Vipassī nāma nāmena, loke uppajji cakkhumā’’ti. (bu. vaṃ. 21.1); Nach Phussa erschien der vollkommen Erleuchtete Vipassī, der Edelste unter den Zweibeinern, der Sehende, in der Welt. Sikhī buddho Der Buddha Sikhī Tassa [Pg.52] aparabhāge ito ekattiṃsakappe sikhī ca vessabhūcāti dve buddhā ahesuṃ. Sikhissāpi bhagavato tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte bhikkhusatasahassaṃ ahosi, dutiye asītisahassāni, tatiye sattatisahassāni. Tadā bodhisatto arindamo nāma rājā hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sacīvaraṃ mahādānaṃ pavattetvā sattaratanapaṭimaṇḍitaṃ hatthiratanaṃ datvā hatthippamāṇaṃ katvā kappiyabhaṇḍaṃ adāsi. Sopi naṃ satthā ‘‘ito ekattiṃsakappe buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato aruṇavatī nāma nagaraṃ ahosi, aruṇo nāma khattiyo pitā, pabhāvatī nāma mātā, abhibhū ca sambhavo ca dve aggasāvakā, khemaṅkaro nāmupaṭṭhāko, sakhilā ca padumā ca dve aggasāvikā, puṇḍarīkarukkho bodhi, sarīraṃ sattatihatthubbedhaṃ ahosi, sarīrappabhā yojanattayaṃ pharitvā aṭṭhāsi, sattati vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm (Vipassī) traten vor einunddreißig Weltzeitaltern von diesem hier aus zwei Buddhas namens Sikhī und Vessabhū auf. Auch für den Erhabenen Sikhī gab es drei Versammlungen der Jünger. Bei der ersten Versammlung gab es einhunderttausend Mönche, bei der zweiten achtzigtausend, bei der dritten siebzigtausend. Damals war der Bodhisatta ein König namens Arindama. Er richtete eine große Gabe, einschließlich Mönchsroben, für die vom Buddha angeführte Mönchsgemeinde aus, schenkte ein mit den sieben Juwelen geschmücktes kostbares Elefantenjuwel und spendete, nachdem er den Gegenwert des Elefanten bestimmt hatte, entsprechende zulässige Güter. Auch jener Meister prophezeite ihm: „Vor einunddreißig Weltzeitaltern von diesem hier aus wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt jenes Erhabenen hieß Aruṇavatī, sein Vater war ein Khattiya namens Aruṇa, seine Mutter hieß Pabhāvatī, Abhibhū und Sambhava waren die beiden Hauptschüler, Khemaṅkara hieß sein persönlicher Diener, Sakhilā und Padumā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Puṇḍarīka-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper hatte eine Höhe von siebzig Ellen, seine Körperstrahlung durchdrang eine Weite von drei Yojanas, und seine Lebensspanne betrug siebzigtausend Jahre. ‘‘Vipassissa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Sikhivhayo āsi jino, asamo appaṭipuggalo’’ti. (bu. vaṃ. 22.1); „Nach Vipassī gab es einen vollkommen Erwachten, den Höchsten unter den Zweibeinern; der Sieger namens Sikhī trat auf, der Unvergleichliche, ohnegleichen.“ Vessabhū buddho Der Buddha Vessabhū Tassa aparabhāge vessabhū nāma satthā udapādi. Tassāpi tayo sāvakasannipātā. Paṭhamasannipāte asīti bhikkhusahassāni ahesuṃ, dutiye sattati, tatiye saṭṭhi. Tadā bodhisatto sudassano nāma rājā hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sacīvaraṃ mahādānaṃ datvā tassa santike pabbajitvā ācāraguṇasampanno buddharatane cittīkārapītibahulo ahosi. Sopi naṃ bhagavā ‘‘ito ekattiṃsakappe buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa pana bhagavato anomaṃ nāma nagaraṃ ahosi, suppatīto nāma rājā pitā, yasavatī nāma mātā, soṇo ca uttaro ca dve aggasāvakā, upasanto nāmupaṭṭhāyo, rāmā ca surāmā ca dve aggasāvikā, sālarukkho bodhi, sarīraṃ saṭṭhihatthubbedhaṃ ahosi, saṭṭhi vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm trat der Meister namens Vessabhū in der Welt auf. Auch für ihn gab es drei Versammlungen der Jünger. Bei der ersten Versammlung gab es achtzigtausend Mönche, bei der zweiten siebzigtausend, bei der dritten sechzigtausend. Damals war der Bodhisatta ein König namens Sudassana. Er gab der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine große Gabe, einschließlich Mönchsroben, trat in seiner Gegenwart in den Orden ein, war vollkommen in tugendhafter Lebensführung und empfand tiefe Ehrfurcht und Freude im Juwel des Buddha. Auch jener Erhabene prophezeite ihm: „Vor einunddreißig Weltzeitaltern von diesem hier aus wirst du ein Buddha werden.“ Die Stadt jenes Erhabenen hieß Anoma, sein Vater war ein König namens Suppatīta, seine Mutter hieß Yasavatī, Soṇa und Uttara waren die beiden Hauptschüler, Upasanta hieß sein persönlicher Diener, Rāmā und Surāmā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Sāla-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper hatte eine Höhe von sechzig Ellen und seine Lebensspanne betrug sechzigtausend Jahre. ‘‘Tattheva maṇḍakappamhi, asamo appaṭipuggalo; Vessabhū nāma nāmena, loke uppajji so jino’’ti. (bu. vaṃ. 23.1); „In eben jenem Maṇḍa-Weltzeitalter erschien jener Sieger namens Vessabhū in der Welt, der Unvergleichliche, ohnegleichen.“ Kakusandho buddho Der Buddha Kakusandha Tassa [Pg.53] aparabhāge imasmiṃ kappe cattāro buddhā nibbattā kakusandho, koṇāgamano, kassapo, amhākaṃ bhagavāti. Kakusandhassa bhagavato ekova sāvakasannipāto, tattha cattālīsa bhikkhusahassāni ahesuṃ. Tadā bodhisatto khemo nāma rājā hutvā buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa sapattacīvaraṃ mahādānañceva añjanādibhesajjāni ca datvā satthu dhammadesanaṃ sutvā pabbaji. Sopi naṃ satthā ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Kakusandhassa pana bhagavato khemaṃ nāma nagaraṃ ahosi, aggidatto nāma brāhmaṇo pitā, visākhā nāma brāhmaṇī mātā, vidhuro ca sañjīvo ca dve aggasāvakā, buddhijo nāmupaṭṭhāko, sāmā ca campā ca dve aggasāvikā, mahāsirīsarukkho bodhi, sarīraṃ cattālīsahatthubbedhaṃ ahosi, cattālīsa vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm traten in diesem Weltzeitalter vier Buddhas auf: Kakusandha, Koṇāgamana, Kassapa und unser Erhabener. Für den erhabenen Kakusandha gab es nur eine einzige Versammlung der Jünger, bei der vierzigtausend Mönche anwesend waren. Damals war der Bodhisatta ein König namens Khema. Er gab der vom Buddha angeführten Mönchsgemeinde eine große Spende, einschließlich Almosenschalen und Mönchsroben, sowie Heilmittel wie Augensalben und anderes mehr, hörte die Lehrrede des Meisters und trat in den Orden ein. Auch jener Meister prophezeite ihm: „Du wirst ein Buddha werden.“ Die Stadt des erhabenen Kakusandha hieß Khema, sein Vater war ein Brahmane namens Aggidatta, seine Mutter war eine Brahmanin namens Visākhā, Vidhura und Sañjīva waren die beiden Hauptschüler, Buddhija hieß sein persönlicher Diener, Sāmā und Campā waren die beiden Hauptschülerinnen, der große Sirīsa-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper hatte eine Höhe von vierzig Ellen und seine Lebensspanne betrug vierzigtausend Jahre. ‘‘Vessabhussa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Kakusandho nāma nāmena, appameyyo durāsado’’ti. (bu. vaṃ. 24.1); „Nach Vessabhū gab es einen vollkommen Erwachten, den Höchsten unter den Zweibeinern; Kakusandha mit Namen, unermesslich und schwer zu bezwingen.“ Koṇāgamano buddho Der Buddha Koṇāgamana Tassa aparabhāge koṇāgamano nāma satthā udapādi. Tassāpi ekova sāvakasannipāto, tattha tiṃsa bhikkhusahassāni ahesuṃ. Tadā bodhisatto pabbato nāma rājā hutvā amaccagaṇaparivuto satthu santikaṃ gantvā dhammadesanaṃ sutvā buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ nimantetvā mahādānaṃ pavattetvā pattuṇṇacīnapaṭakoseyyakambaladukūlāni ceva suvaṇṇapaṭikañca datvā satthu santike pabbaji. Sopi naṃ satthā ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato sobhavatī nāma nagaraṃ ahosi, yaññadatto nāma brāhmaṇo pitā, uttarā nāma brāhmaṇī mātā, bhiyyaso ca uttaro ca dve aggasāvakā, sotthijo nāmupaṭṭhāko, samuddā ca uttarā ca dve aggasāvikā, udumbararukkho bodhi, sarīraṃ tiṃsahatthubbedhaṃ ahosi, tiṃsa vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm trat der Meister namens Koṇāgamana in der Welt auf. Auch für ihn gab es nur eine einzige Versammlung der Jünger, bei der dreißigtausend Mönche anwesend waren. Damals war der Bodhisatta ein König namens Pabbata. Umgeben von seinem Gefolge von Ministern begab er sich zum Meister, hörte dessen Lehrrede, lud die vom Buddha angeführte Mönchsgemeinde ein und richtete ein großes Almosen aus. Er schenkte Stoffe aus Pattuṇṇa, Seidenstoffe aus China, Seidengewebe, Decken, feine Leinenstoffe sowie eine goldbestickte Decke und trat in der Gegenwart des Meisters in den Orden ein. Auch jener Meister prophezeite ihm: „Du wirst ein Buddha werden.“ Die Stadt des Erhabenen hieß Sobhavatī, sein Vater war ein Brahmane namens Yaññadatta, seine Mutter war eine Brahmanin namens Uttarā, Bhiyyasa und Uttara waren die beiden Hauptschüler, Sotthija hieß sein persönlicher Diener, Samuddā und Uttarā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Udumbara-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper hatte eine Höhe von dreißig Ellen und seine Lebensspanne betrug dreißigtausend Jahre. ‘‘Kakusandhassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Koṇāgamano nāma jino, lokajeṭṭho narāsabho’’ti. (bu. vaṃ. 25.1); „Nach Kakusandha gab es einen vollkommen Erwachten, den Höchsten unter den Zweibeinern; der Sieger namens Koṇāgamana, der Höchste der Welt, der Stier unter den Menschen.“ Kassapo buddho Der Buddha Kassapa Tassa [Pg.54] aparabhāge kassapo nāma satthā udapādi. Tassāpi ekova sāvakasannipāto, tattha vīsati bhikkhusahassāni ahesuṃ. Tadā bodhisatto jotipālo nāma māṇavo hutvā tiṇṇaṃ vedānaṃ pāragū bhūmiyañceva antalikkhe ca pākaṭo ghaṭikārassa kumbhakārassa mitto ahosi. So tena saddhiṃ satthāraṃ upasaṅkamitvā dhammakathaṃ sutvā pabbajitvā āraddhavīriyo tīṇi piṭakāni uggahetvā vattāvattasampattiyā buddhasāsanaṃ sobhesi. Sopi naṃ satthā ‘‘buddho bhavissatī’’ti byākāsi. Tassa bhagavato jātanagaraṃ bārāṇasī nāma ahosi, brahmadatto nāma brāhmaṇo pitā, dhanavatī nāma brāhmaṇī mātā, tisso ca bhāradvājo ca dve aggasāvakā, sabbamitto nāmupaṭṭhāko, anuḷā ca uruveḷā ca dve aggasāvikā, nigrodharukkho bodhi, sarīraṃ vīsatihatthubbedhaṃ ahosi, vīsati vassasahassāni āyūti. In der Zeit nach ihm trat der Meister namens Kassapa in der Welt auf. Auch für ihn gab es nur eine einzige Versammlung der Jünger, bei der zwanzigtausend Mönche anwesend waren. Damals war der Bodhisatta ein junger Brahmane namens Jotipāla, der die drei Veden meisterte, auf der Erde wie auch im Luftraum bekannt war und ein Freund des Töpfers Ghaṭīkāra war. Gemeinsam mit diesem begab er sich zum Meister, hörte die Lehrrede, trat in den Orden ein, entfaltete tatkräftige Energie, erlernte die drei Körbe und verschönte die Lehre des Buddha durch die Erfüllung aller großen und kleinen Pflichten. Auch jener Meister prophezeite ihm: „Du wirst ein Buddha werden.“ Die Geburtsstadt dieses Erhabenen hieß Bārāṇasī, sein Vater war ein Brahmane namens Brahmadatta, seine Mutter war eine Brahmanin namens Dhanavatī, Tissa und Bhāradvāja waren die beiden Hauptschüler, Sabbamitta hieß sein persönlicher Diener, Anuḷā und Uruveḷā waren die beiden Hauptschülerinnen, der Nigrodha-Baum war sein Bodhi-Baum, sein Körper hatte eine Höhe von zwänzig Ellen und seine Lebensspanne betrug zwanzigtausend Jahre. ‘‘Koṇāgamanassa aparena, sambuddho dvipaduttamo; Kassapo nāma gottena, dhammarājā pabhaṅkaro’’ti. (bu. vaṃ. 26.1); „Nach Koṇāgamana gab es einen vollkommen Erwachten, den Höchsten unter den Zweibeinern; Kassapa nach seiner Sippe genannt, der König des Dhamma, der Lichtbringer.“ Yasmiṃ pana kappe dīpaṅkaradasabalo udapādi, tasmiṃ aññepi tayo buddhā ahesuṃ. Tesaṃ santike bodhisattassa byākaraṇaṃ natthi, tasmā te idha na dassitā. Aṭṭhakathāyaṃ pana taṇhaṅkarato paṭṭhāya sabbepi buddhe dassetuṃ idaṃ vuttaṃ – In jenem Weltzeitalter jedoch, in dem der Zehnkräftebesitzende Dīpaṅkara auftrat, gab es noch drei andere Buddhas. In deren Gegenwart erhielt der Bodhisatta jedoch keine Prophezeiung, weshalb sie hier nicht aufgeführt sind. Im Kommentar hingegen wurde Folgendes gesagt, um, ausgehend von Taṇhaṅkara, alle Buddhas darzustellen: ‘‘Taṇhaṅkaro medhaṅkaro, athopi saraṇaṅkaro; Dīpaṅkaro ca sambuddho, koṇḍañño dvipaduttamo. „Taṇhaṅkara, Medhaṅkara und auch Saraṇaṅkara; der vollkommen Erwachte Dīpaṅkara und Koṇḍañña, der Höchste der zweibeinigen Wesen.“ ‘‘Maṅgalo ca sumano ca, revato sobhito muni; Anomadassī padumo, nārado padumuttaro. „Maṅgala und Sumana, der Weise (Muni) Revata und Sobhita; Anomadassī, Paduma, Nārada und Padumuttara.“ ‘‘Sumedho ca sujāto ca, piyadassī mahāyaso; Atthadassī dhammadassī, siddhattho lokanāyako. „Sumedha und Sujāta, Piyadassī von großem Ruhm; Atthadassī, Dhammadassī und Siddhattha, der Führer der Welt.“ ‘‘Tisso phusso ca sambuddho, vipassī sikhī vessabhū; Kakusandho koṇāgamano, kassapo cāpi nāyako. „Tissa und Phussa, der vollkommen Erwachte, Vipassī, Sikhī, Vessabhū; Kakusandha, Koṇāgamana und auch Kassapa, der Führer.“ ‘‘Ete ahesuṃ sambuddhā, vītarāgā samāhitā; Sataraṃsīva uppannā, mahātamavinodanā; Jalitvā aggikhandhāva, nibbutā te sasāvakā’’ti. „Diese waren die vollkommen Erwachten, frei von Leidenschaft, geistig gesammelt. Sie erschienen wie die Sonne mit ihren hundert Strahlen, Vertreiber der großen Dunkelheit. Nachdem sie wie gewaltige Feuersäulen aufloderten, sind sie zusammen mit ihren Jüngern vollkommen erloschen.“ Gotamo buddho „Der Buddha Gotama“ Tattha [Pg.55] amhākaṃ bodhisatto dīpaṅkarādīnaṃ catuvīsatiyā buddhānaṃ santike adhikāraṃ karonto kappasatasahassādhikāni cattāri asaṅkhyeyyāni āgato. Kassapassa pana bhagavato orabhāge ṭhapetvā imaṃ sammāsambuddhaṃ añño buddho nāma natthi. Iti dīpaṅkarādīnaṃ catuvīsatiyā buddhānaṃ santike laddhabyākaraṇo pana bodhisatto yenena – „Unter diesen [Buddhas] ging unser Bodhisatta, während er in der Gegenwart der vierundzwanzig Buddhas – angefangen mit Dīpaṅkara – große Verdienste (adhikāra) erwarb, über einen Zeitraum von vier Unzählbaren (Asaṅkhyeyya) und hunderttausend Äonen (Kappa) hinweg seinen Weg. Nach dem erhabenen Kassapa jedoch gibt es – abgesehen von diesem vollkommen Erwachten – keinen anderen Buddha mehr. Der Bodhisatta, der so in der Gegenwart der vierundzwanzig Buddhas, angefangen mit Dīpaṅkara, seine Prophezeiung erhalten hatte, [vollbrachte dies] durch Folgendes:“ ‘‘Manussattaṃ liṅgasampatti, hetu satthāradassanaṃ; Pabbajjā guṇasampatti, adhikāro ca chandatā; Aṭṭhadhammasamodhānā, abhinīhāro samijjhatī’’ti. (bu. vaṃ. 2.59) – „„Das Menschsein, der Besitz des männlichen Geschlechts, die geistige Voraussetzung (hetu), das Erblicken eines Meisters, das Hauslosenleben, die Erlangung spiritueller Vorzüge (guṇa-sampatti), der außergewöhnliche Verdienstdienst (adhikāra) und das starke Verlangen nach Buddhaschaft (chandatā) – durch das Zusammenwirken dieser acht Bedingungen geht der Entschluss [zur Erlangung der Buddhaschaft] in Erfüllung.“ (Bu. Vaṃ. 2.59)“ Ime aṭṭha dhamme samodhānetvā dīpaṅkarapādamūle katābhinīhārena ‘‘handa buddhakare dhamme, vicināmi ito cito’’ti ussāhaṃ katvā ‘‘vicinanto tadā dakkhiṃ, paṭhamaṃ dānapārami’’nti dānapāramitādayo buddhakārakadhammā diṭṭhā, pūrentoyeva yāva vessantarattabhāvo āgami. Āgacchanto ca ye te katābhinīhārānaṃ bodhisattānaṃ ānisaṃsā saṃvaṇṇitā – „Nachdem er diese acht Bedingungen vereint und zu Füßen des Buddha Dīpaṅkara den Entschluss [zur Buddhaschaft] gefasst hatte, strengte er sich an, indem er dachte: ‚Wohlan, ich will hier und da nach den Eigenschaften suchen, die einen Buddha ausmachen.‘ Während er suchte, sah er: ‚Zuerst sah ich die Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī).‘ So erkannte er die die Buddhaschaft bewirkenden Eigenschaften, beginnend mit der Vollkommenheit des Gebens, und erfüllte diese unablässig, bis er die Existenz als Vessantara erreichte. Während er diesen Weg beschritt, wurden die Segnungen (ānisaṃsā) der Bodhisattas, die ihren Entschluss gefasst haben, wie folgt gepriesen:“ ‘‘Evaṃ sabbaṅgasampannā, bodhiyā niyatā narā; Saṃsaraṃ dīghamaddhānaṃ, kappakoṭisatehipi. „„Menschen, die so mit allen Eigenschaften ausgestattet und für die Erleuchtung bestimmt sind, werden, selbst wenn sie für eine lange Zeit durch hunderte von Millionen Äonen im Daseinskreislauf (Saṃsāra) wandern,“ ‘‘Avīcimhi nuppajjanti, tathā lokantaresu ca; Nijjhāmataṇhā khuppipāsā, na honti kālakañjikā. „niemals in der Avīci-Hölle wiedergeboren, und ebenso wenig in den Weltenzwischenräumen (Lokantara); sie werden weder zu von ewigem Durst gequälten Geistern (Nijjhāmataṇhika-Petas) noch zu hungerleidenden Geistern (Khuppipāsika-Petas) oder Kālakañjika-Asuras.“ ‘‘Na honti khuddakā pāṇā, uppajjantāpi duggatiṃ; Jāyamānā manussesu, jaccandhā na bhavanti te. „Selbst wenn sie in einer unglücklichen Welt (duggati) wiedergeboren werden, werden sie keine winzigen Kreaturen; und unter den Menschen geboren, werden sie nicht von Geburt an blind.“ ‘‘Sotavekallatā natthi, na bhavanti mūgapakkhikā; Itthibhāvaṃ na gacchanti, ubhatobyañjanapaṇḍakā. „Es gibt bei ihnen keine Taubheit, und sie werden weder stumm noch gelähmt sein; sie werden nicht als Frauen wiedergeboren, noch werden sie zu Zwittern (ubhatobyañjanaka) oder Eunuchen (paṇḍaka).“ ‘‘Na bhavanti pariyāpannā, bodhiyā niyatā narā; Muttā ānantarikehi, sabbattha suddhagocarā. „Diese für die Erleuchtung bestimmten Menschen verfallen nicht [schwerem Unheilsamen]; sie sind frei von Taten mit unmittelbarer Vergeltung (ānantarika-kamma) und weisen überall einen reinen Verhaltensbereich (suddhagocara) auf.“ ‘‘Micchādiṭṭhiṃ na sevanti, kammakiriyadassanā; Vasamānāpi saggesu, asaññaṃ nupapajjare. „Sie hängen keiner falschen Ansicht (micchādiṭṭhi) an, da sie das Wirken des Kamma (kammakiriya) klar erkennen; und selbst wenn sie in den Himmelswelten weilen, werden sie nicht im Bereich der wahrnehmungslosen Wesen (asaññasatta) geboren.“ ‘‘Suddhāvāsesu devesu, hetu nāma na vijjati; Nekkhammaninnā sappurisā, visaṃyuttā bhavābhave; Caranti lokatthacariyāyo, pūrenti sabbapāramī’’ti. „Es gibt für sie keine Ursache, in den Himmelswelten der Reinen Wohnstätten (Suddhāvāsa) geboren zu werden; diese edlen Menschen neigen zur Entsagung (nekkhamma), sind ungebunden an die verschiedenen Daseinsformen (bhavābhava), handeln stets zum Wohle der Welt (lokatthacariya) und erfüllen alle Vollkommenheiten (pāramī).““ Te [Pg.56] ānisaṃse adhigantvāva āgato. Pāramiyo pūrentassa cassa akittibrāhmaṇakāle, saṅkhabrāhmaṇakāle, dhanañcayarājakāle, mahāsudassanarājakāle, mahāgovindakāle, nimimahārājakāle, candakumārakāle, visayhaseṭṭhikāle, sivirājakāle, vessantararājakāleti dānapāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa sasapaṇḍitajātake – „Nachdem er diese Vorzüge erlangt hatte, schritt er voran. Während er die Vollkommenheiten erfüllte, gab es kein Maß für jene Existenzen, in denen er die Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī) zur Entfaltung brachte – wie in seinen Zeiten als der Brahmane Akitti, der Brahmane Saṅkha, König Dhanañcaya, König Mahāsudassana, der Weise Mahāgovinda, König Nimi, Prinz Candakumāra, der Großkaufmann Visayha, König Sīvi und König Vessantara. Doch ganz besonders in seiner Existenz als der weise Hase (Sasa-Jātaka):“ ‘‘Bhikkhāya upagataṃ disvā, sakattānaṃ pariccajiṃ; Dānena me samo natthi, esā me dānapāramī’’ti. (cariyā. 1.tassuddāna) – „„Als ich jemanden sah, der um Almosen herangetreten war, opferte ich mein eigenes Selbst; es gibt niemanden, der mir im Geben gleichkommt – dies ist meine Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī).“ (Cariyāpiṭaka 1)“ Evaṃ attapariccāgaṃ karontassa dānapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā sīlavanāgarājakāle, campeyyanāgarājakāle, bhūridattanāgarājakāle, chaddantanāgarājakāle, jayaddisarājaputtakāle, alīnasattukumārakāleti sīlapāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa saṅkhapālajātake – „Für ihn, der so das eigene Leben dahingab, wurde die Vollkommenheit des Gebens zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Ebenso gibt es kein Maß für jene Existenzen, in denen er die Vollkommenheit der Tugend (sīlapāramī) erfüllte – wie in seinen Zeiten als Schlangenkönig Sīlava, Schlangenkönig Campeyya, Schlangenkönig Bhūridatta, Elefantenkönig Chaddanta, Königssohn Jayaddisa und Prinz Alīnasattu. Doch ganz besonders in seiner Existenz im Saṅkhapāla-Jātaka:“ ‘‘Sūlehi vijjhayantopi, koṭṭiyantopi sattibhi; Bhojaputte na kuppāmi, esā me sīlapāramī’’ti. (cariyā. 2.91) – „„Selbst wenn sie mich mit Spießen durchbohren oder mit Schwertern zerhacken, werde ich nicht zornig auf die Söhne der Jäger (Bhojaputtas) [die mein Fleisch essen wollen]; dies ist meine Vollkommenheit der Tugend (sīlapāramī).“ (Cariyāpiṭaka 2.91)“ Evaṃ attapariccāgaṃ karontassa sīlapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā somanassakumārakāle, hatthipālakumārakāle, ayogharapaṇḍitakāleti mahārajjaṃ pahāya nekkhammapāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa cūḷasutasomajātake – „Für ihn, der so das eigene Leben hingab, wurde die Vollkommenheit der Tugend zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Ebenso gibt es kein Maß für jene Existenzen, in denen er ein großes Königreich aufgab und die Vollkommenheit der Entsagung (nekkhamma-pāramī) erfüllte – wie in seinen Zeiten als Prinz Somanassa, Prinz Hatthipāla und der Weise Ayoghara. Doch ganz besonders in seiner Existenz im Cūḷasutasoma-Jātaka:“ ‘‘Mahārajjaṃ hatthagataṃ, kheḷapiṇḍaṃva chaḍḍayiṃ; Cajato na hoti lagganaṃ, esā me nekkhammapāramī’’ti. – „„Das große Königreich, das mir bereits in den Händen lag, warf ich weg wie einen Speichelklumpen; beim Aufgeben verspürte ich keinerlei Anhaftung – dies ist meine Vollkommenheit der Entsagung (nekkhamma-pāramī).““ Evaṃ nissaṅgatāya rajjaṃ chaḍḍetvā nikkhamantassa nekkhammapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā vidhurapaṇḍitakāle, mahāgovindapaṇḍitakāle, kuddālapaṇḍitakāle, arakapaṇḍitakāle, bodhiparibbājakakāle, mahosadhapaṇḍitakāleti paññāpāramitāya pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa sattubhastajātake senakapaṇḍitakāle – „Für ihn, der so frei von Anhaftung das Königreich aufgab und in die Hauslosigkeit zog, wurde die Vollkommenheit der Entsagung zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Ebenso gibt es kein Maß für jene Existenzen, in denen er die Vollkommenheit der Weisheit (paññā-pāramī) erfüllte – wie in seinen Zeiten als der Weise Vidhura, der Weise Mahāgovinda, der Weise Kuddāla, der Weise Araka, der Wanderer Bodhi und der Weise Mahosadha. Doch ganz besonders in seiner Existenz als der Weise Senaka im Sattubhasta-Jātaka:“ ‘‘Paññāya [Pg.57] vicinantohaṃ, brāhmaṇaṃ mocayiṃ dukhā; Paññāya me samo natthi, esā me paññāpāramī’’ti. – „„Mit Weisheit prüfend, befreite ich den Brahmanen aus seinem Leid; meiner Weisheit kommt nichts gleich – dies ist meine Vollkommenheit der Weisheit (paññā-pāramī).““ Antobhastagataṃ sappaṃ dassentassa paññāpāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Tathā vīriyapāramitādīnampi pūritattabhāvānaṃ parimāṇaṃ nāma natthi. Ekantena panassa mahājanakajātake – „Für ihn, der die im Sack verborgene Schlange aufzeigte, wurde die Vollkommenheit der Weisheit zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Ebenso gibt es kein Maß für jene Existenzen, in denen er die Vollkommenheit der Tatkraft (vīriya-pāramī) und andere erfüllte. Doch ganz besonders in seiner Existenz im Mahājanaka-Jātaka:“ ‘‘Atīradassī jalamajjhe, hatā sabbeva mānusā; Cittassa aññathā natthi, esā me vīriyapāramī’’ti. – „„Mitten im Wasser, ohne ein Ufer zu sehen, waren alle anderen Menschen umgekommen; doch mein Geist wankte nicht – dies ist meine Vollkommenheit der Tatkraft (vīriya-pāramī).““ Evaṃ mahāsamuddaṃ tarantassa vīriyapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Khantivādijātake – „Für ihn, der so den großen Ozean durchschwamm, wurde die Vollkommenheit der Tatkraft zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Im Khantivāda-Jātaka:“ ‘‘Acetanaṃva koṭṭente, tiṇhena pharasunā mamaṃ; Kāsirāje na kuppāmi, esā me khantipāramī’’ti. – „„Obwohl der König von Kāsi mich mit einer scharfen Axt zerhackte, als wäre ich ein empfindungsloses Ding, wurde ich nicht zornig; dies ist meine Vollkommenheit der Geduld (khanti-pāramī).““ Evaṃ acetanabhāvena viya mahādukkhaṃ adhivāsentassa khantipāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Mahāsutasomajātake – „Für ihn, der so, gleichsam als wäre er ein empfindungsloses Ding, die größten Schmerzen erduldete, wurde die Vollkommenheit der Geduld zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Im Mahāsutasoma-Jātaka:“ ‘‘Saccavācaṃ anurakkhanto, cajitvā mama jīvitaṃ; Mocesiṃ ekasataṃ khattiye, esā me saccapāramī’’ti. – „„Um das wahre Wort zu wahren, gab ich mein Leben hin und befreite einhundertein Könige (khattiya); dies ist meine Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit (sacca-pāramī).““ Evaṃ jīvitaṃ cajitvā saccamanurakkhantassa saccapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Mūgapakkhajātake – „Für ihn, der so unter Preisgabe seines Lebens das wahre Wort hütete, wurde die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit zur Vollkommenheit im höchsten Sinne (paramattha-pāramī). Im Mūgapakkha-Jātaka:“ ‘‘Mātāpitā na me dessā, napi dessaṃ mahāyasaṃ; Sabbaññutaṃ piyaṃ mayhaṃ, tasmā vatamadhiṭṭhahi’’nti. (cariyā. 3.65) – „Weder Mutter noch Vater sind mir verhasst, noch ist mir großer Ruhm verhasst; die Allwissenheit ist mir lieb, darum habe ich das Gelübde fest entschlossen.“ Evaṃ jīvitampi cajitvā vataṃ adhiṭṭhahantassa adhiṭṭhānapāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Suvaṇṇasāmajātake – „Für jenen, der so selbst das Leben aufgebend das Gelübde fest entschlossen einhielt, wurde die Vollkommenheit des Entschlusses zur sogenannten höchsten Vollkommenheit. Im Suvaṇṇasāma-Jātaka –“ ‘‘Na maṃ koci uttasati, napihaṃ bhāyāmi kassaci; Mettābalenupatthaddho, ramāmi pavane tadā’’ti. (cariyā. 3.113) – „Niemand erschreckt mich, und ich fürchte mich vor keinem; gestützt von der Kraft des Wohlwollens, erfreue ich mich damals im großen Walde.“ Evaṃ jīvitampi anoloketvā mettāyantassa mettāpāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Lomahaṃsajātake – „Für jenen, der so ohne Rücksicht auf das eigene Leben Wohlwollen entfaltete, wurde die Vollkommenheit des Wohlwollens zur sogenannten höchsten Vollkommenheit. Im Lomahaṃsa-Jātaka –“ ‘‘Susāne [Pg.58] seyyaṃ kappemi, chavaṭṭhikaṃ upanidhāyahaṃ; Gāmaṇḍalā upāgantvā, rūpaṃ dassentinappaka’’nti. (cariyā. 3.119) – „Auf dem Friedhof bereitete ich mein Lager, indem ich mein Haupt an ein Skelett lehnte; Scharen von Dorfbewohnern kamen herbei und zeigten mir mannigfache Reaktionen.“ Evaṃ gāmadārakesu niṭṭhubhanādīhi ceva mālāgandhūpahārādīhi ca sukhadukkhaṃ uppādentesupi upekkhaṃ anativattentassa upekkhāpāramitā paramatthapāramī nāma jātā. Ayamettha saṅkhepo. Vitthārato panesa attho cariyāpiṭakato gahetabboti. Evaṃ pāramiyo pūretvā vessantarattabhāve ṭhito – „Für jenen, der so, selbst als die Dorfjugend durch Anspucken und Ähnliches sowie durch Darbringung von Kränzen und Düften und Ähnlichem Lust und Schmerz in ihm hervorrief, seine Gleichmut nicht verlor, wurde die Vollkommenheit des Gleichmuts zur sogenannten höchsten Vollkommenheit. Dies ist hier die kurze Zusammenfassung. Der ausführliche Sinn hiervon ist jedoch aus dem Cariyāpiṭaka zu entnehmen. Nachdem er so die Vollkommenheiten erfüllt hatte und in der Existenz als Vessantara verweilte –“ ‘‘Acetanāyaṃ pathavī, aviññāya sukhaṃ dukhaṃ; Sāpi dānabalā mayhaṃ, sattakkhattuṃ pakampathā’’ti. (cariyā. 1.124) – „Diese Erde ist ohne Bewusstsein, sie empfindet weder Glück noch Leid; doch selbst sie bebte durch die Kraft meiner Freigebigkeit siebenmal.“ Evaṃ mahāpathavikampanādīni mahāpuññāni karitvā āyupariyosāne tato cuto tusitabhavane nibbatti. Iti dīpaṅkarapādamūlato paṭṭhāya yāva ayaṃ tusitapure nibbatti, ettakaṃ ṭhānaṃ dūrenidānaṃ nāmāti veditabbaṃ. „Nachdem er so große Verdienste wie das Erschüttern der großen Erde vollbracht hatte, schied er am Ende seiner Lebensspanne von dort dahin und wurde im Tusita-Himmel wiedergeboren. So ist zu wissen, dass dieser gesamte Abschnitt, beginnend bei den Füßen des Dīpaṅkara-Buddhas bis zu seiner Wiedergeburt im Tusita-Reich, als die 'Ferne Vorgeschichte' (Dūrenidāna) bezeichnet wird.“ Dūrenidānakathā niṭṭhitā. „Die Abhandlung über die Ferne Vorgeschichte ist abgeschlossen.“ 2. Avidūrenidānakathā 2. „Die Abhandlung über die Nahe Vorgeschichte“ Tusitapure vasanteyeva pana bodhisatte buddhakolāhalaṃ nāma udapādi. Lokasmiñhi tīṇi kolāhalāni mahantāni uppajjanti kappakolāhalaṃ, buddhakolāhalaṃ, cakkavattikolāhalanti. Tattha ‘‘vassasatasahassaccayena kappuṭṭhānaṃ bhavissatī’’ti lokabyūhā nāma kāmāvacaradevā muttasirā vikiṇṇakesā rudamukhā assūni hatthehi puñchamānā rattavatthanivatthā ativiya virūpavesadhārino hutvā manussapathe vicarantā evaṃ ārocenti – ‘‘mārisā, ito vassasatasahassaccayena kappuṭṭhānaṃ bhavissati, ayaṃ loko vinassissati, mahāsamuddopi sussissati, ayañca mahāpathavī sineru ca pabbatarājā uḍḍayhissanti vinassissanti, yāva brahmalokā lokavināso bhavissati, mettaṃ mārisā, bhāvetha, karuṇaṃ, muditaṃ, upekkhaṃ mārisā, bhāvetha, mātaraṃ [Pg.59] upaṭṭhahatha, pitaraṃ upaṭṭhahatha, kule jeṭṭhāpacāyino hothā’’ti. Idaṃ kappakolāhalaṃ nāma. ‘‘Vassasahassaccayena pana sabbuññubuddho loke uppajjissatī’’ti lokapāladevatā ‘‘ito, mārisā, vassasahassaccayena sabbaññubuddho loke uppajjissatī’’ti ugghosentiyo āhiṇḍanti. Idaṃ buddhakolāhalaṃ nāma. ‘‘Vassasatassaccayena cakkavattirājā uppajjissatī’’ti devatāyo ‘‘ito mārisā vassasataccayena cakkavattirājā loke uppajjissatī’’ti ugghosentiyo āhiṇḍanti. Idaṃ cakkavattikolāhalaṃ nāma. Imāni tīṇi kolāhalāni mahantāni honti. „Als der Bodhisatta nun im Tusita-Reich weilte, entstand der sogenannte Buddha-Aufruhr (buddhakolāhala). In der Welt entstehen nämlich drei große Aufruhre: der Weltzeitalter-Aufruhr (kappakolāhala), der Buddha-Aufruhr und der Universalherrscher-Aufruhr (cakkavattikolāhala). Dabei wandern die sogenannten Lokabyūha-Götter der Sinneswelt, mit der Ankündigung: 'Nach Ablauf von einhunderttausend Jahren wird das Ende des Weltzeitalters stattfinden', mit aufgelöstem Haar, zerzaustem Haar, weinenden Gesichtern, sich die Tränen mit den Händen abwischend, in rote Gewänder gekleidet und in einer höchst seltsamen Gestalt auf den Wegen der Menschen umher und verkünden Folgendes: 'Ihr Lieben, nach Ablauf von einhunderttausend Jahren von heute an wird das Ende des Weltzeitalters stattfinden, diese Welt wird vergehen, auch der große Ozean wird austrocknen, und diese große Erde und Sineru, der König der Berge, werden verbrennen und vernichtet werden, und bis hinauf zur Brahma-Welt wird die Zerstörung der Welt reichen. Entfaltet Wohlwollen, ihr Lieben, entfaltet Mitgefühl, Mitfreude und Gleichmut, ihr Lieben! Sorgt für eure Mutter, sorgt für euren Vater und ehrt die Ältesten in der Familie!' Dies nennt man den Weltzeitalter-Aufruhr. Mit der Ankündigung aber: 'Nach Ablauf von tausend Jahren wird ein allwissender Buddha in der Welt erscheinen', wandern die Weltenhüter-Gottheiten umher und rufen aus: 'Von heute an, ihr Lieben, wird nach Ablauf von tausend Jahren ein allwissender Buddha in der Welt erscheinen.' Dies nennt man den Buddha-Aufruhr. Mit der Ankündigung: 'Nach Ablauf von einhundert Jahren wird ein Universalherrscher erscheinen', wandern die Gottheiten umher und rufen aus: 'Von heute an, ihr Lieben, wird nach Ablauf von einhundert Jahren ein Universalherrscher in der Welt erscheinen.' Dies nennt man den Universalherrscher-Aufruhr. Diese drei Aufruhre sind gewaltig.“ Tesu buddhakolāhalasaddaṃ sutvā sakaladasasahassacakkavāḷadevatā ekato sannipatitvā ‘‘asuko nāma satto buddho bhavissatī’’ti ñatvā taṃ upasaṅkamitvā āyācanti. Āyācamānā ca pubbanimittesu uppannesu āyācanti. Tadā pana sabbāpi tā ekekacakkavāḷe cātumahārājasakkasuyāmasantusitasunimmitavasavattimahābrahmehi saddhiṃ ekacakkavāḷe sannipatitvā tusitabhavane bodhisattassa santikaṃ gantvā ‘‘mārisa, tumhehi dasa pāramiyo pūrentehi na sakkasampattiṃ, na mārabrahmacakkavattisampattiṃ patthentehi pūritā, lokanittharaṇatthāya pana sabbaññutaṃ patthentehi pūritā, so vo dāni kālo, mārisa, buddhattāya, samayo, mārisa, buddhattāyā’’ti yāciṃsu. „Wenn die Gottheiten aus allen zehntausend Weltsystemen unter diesen jenen Ruf des Buddha-Aufruhrs hören, kommen sie alle zusammen und bitten den Bodhisatta, sobald sie erkannt haben: 'Dieses Wesen wird ein Buddha werden', indem sie sich ihm nähern. Und sie bitten ihn wiederholt, wenn die Vorzeichen erscheinen. Zu jener Zeit versammeln sich all jene Gottheiten aus jedem einzelnen Weltsystem zusammen mit den Cātumahārāja-Göttern, Sakka, Suyāma, Santusita, Sunimmita, Vasavatti und den Mahābrahmas in einem einzigen Weltsystem, begeben sich vor den Bodhisatta im Tusita-Himmel und bitten ihn: 'Lieber, als du die zehn Vollkommenheiten erfüllt hast, hast du sie nicht im Streben nach der Herrlichkeit des Sakkas, Māras, Brahmas oder eines Universalherrschers erfüllt, sondern du hast sie im Streben nach der Allwissenheit zur Rettung der Welt erfüllt. Jetzt ist die Zeit für dich gekommen, Lieber, um die Buddhaschaft zu erlangen, es ist der rechte Augenblick, Lieber, zur Erlangung der Buddhaschaft!'“ Atha mahāsatto devatānaṃ paṭiññaṃ adatvāva kāladīpadesakulajanettiāyuparicchedavasena pañcamahāvilokanaṃ nāma vilokesi. Tattha ‘‘kālo nu kho, akālo nu kho’’ti paṭhamaṃ kālaṃ vilokesi. Tattha vassasatasahassato uddhaṃ vaḍḍhitaāyukālo kālo nāma na hoti. Kasmā? Tadā hi sattānaṃ jātijarāmaraṇāni na paññāyanti. Buddhānañca dhammadesanā tilakkhaṇamuttā nāma natthi. Tesaṃ ‘‘aniccaṃ dukkhaṃ anattā’’ti kathentānaṃ ‘‘kiṃ nāmetaṃ kathentī’’ti neva sotabbaṃ na saddhātabbaṃ maññanti, tato abhisamayo na hoti, tasmiṃ asati aniyyānikaṃ sāsanaṃ hoti. Tasmā so akālo. Vassasatato ūnaāyukālopi kālo nāma na hoti. Kasmā? Tadā hi sattā ussannakilesā honti, ussannakilesānañca dinno ovādo [Pg.60] ovādaṭṭhāne na tiṭṭhati, udake daṇḍarāji viya khippaṃ vigacchati. Tasmā sopi akālo. Vassasatasahassato pana paṭṭhāya heṭṭhā, vassasatato paṭṭhāya uddhaṃ āyukālo kālo nāma. Tadā ca vassasatāyukālo, atha mahāsatto ‘‘nibbattitabbakālo’’ti kālaṃ passi. „Daraufhin gab das Große Wesen den Göttern noch keine Zusage, sondern hielt die sogenannten fünf großen Umschauen im Hinblick auf die Zeit, den Kontinent, das Land, die Familie und die Lebensspanne der Mutter. Darunter prüfte er zuerst die Zeit: 'Ist es nun die rechte Zeit oder ist es nicht die rechte Zeit?' Dabei ist eine Zeit, in der die Lebensspanne über einhunderttausend Jahre hinausgeht, nicht die rechte Zeit. Warum? Weil zu jener Zeit Geburt, Alter und Tod den Wesen nicht bewusst sind. Und die Lehrverkündung der Buddhas ist niemals frei von den drei Daseinsmerkmalen. Wenn die Buddhas zu ihnen sprechen: 'Es ist unbeständig, leidvoll und nicht-selbst', meinen jene: 'Was reden sie da eigentlich?', und finden es weder hörenswert noch glaubwürdig; folglich findet kein Durchdringen der Wahrheiten statt, und wenn dieses fehlt, führt die Lehre nicht zur Befreiung. Darum ist dies nicht die rechte Zeit. Auch eine Zeit, in der die Lebensspanne unter einhundert Jahre sinkt, ist nicht die rechte Zeit. Warum? Weil die Wesen zu jener Zeit übermäßig von Befleckungen beherrscht sind. Und eine Unterweisung, die Wesen mit übermäßigen Befleckungen erteilt wird, bleibt nicht an ihrem Platz haften; wie ein Strich, den man ins Wasser zieht, vergeht sie schnell. Darum ist auch dies nicht die rechte Zeit. Die Lebensspanne jedoch, die von einhunderttausend Jahren abwärts und von einhundert Jahren aufwärts reicht, gilt als die rechte Zeit. Zu jenem Zeitpunkt betrug die Lebensspanne einhundert Jahre; da sah das Große Wesen: 'Es ist die Zeit, geboren zu werden.'“ Tato dīpaṃ vilokento saparivāre cattāro dīpe oloketvā ‘‘tīsu dīpesu buddhā na nibbattanti, jambudīpeyeva nibbattantī’’ti dīpaṃ passi. „Als er danach den Kontinent prüfte, blickte er auf die vier Hauptkontinente mitsamt ihren Nebeninseln und sah bezüglich des Kontinents: 'Auf drei Kontinenten werden Buddhas nicht geboren, nur auf Jambudīpa werden sie geboren.'“ Tato ‘‘jambudīpo nāma mahā, dasayojanasahassaparimāṇo, katarasmiṃ nu kho padese buddhā nibbattantī’’ti okāsaṃ vilokento majjhimadesaṃ passi. Majjhimadeso nāma ‘‘puratthimāya disāya gajaṅgalaṃ nāma nigamo, tassa parena mahāsālā, tato parā paccantimā janapadā, orato majjhe. Puratthimadakkhiṇāya disāya sallavatī nāma nadī, tato parā paccantimā janapadā, orato majjhe. Dakkhiṇāya disāya setakaṇṇikaṃ nāma nigamo, tato parā paccantimā janapadā, orato majjhe. Pacchimāya disāya thūṇaṃ nāma brāhmaṇagāmo, tato parā paccantimā janapadā, orato majjhe. Uttarāya disāya usīraddhajo nāma pabbato, tato parā paccantimā janapadā, orato majjhe’’ti evaṃ vinaye (mahāva. 259) vutto padeso. So āyāmato tīṇi yojanasatāni, vitthārato aḍḍhateyyāni, parikkhepato nava yojanasatānīti etasmiṃ padese buddhā, paccekabuddhā, aggasāvakā, asīti mahāsāvakā, cakkavattirājāno, aññe ca mahesakkhā khattiyabrāhmaṇagahapatimahāsālā uppajjanti. Idañcettha kapilavatthu nāma nagaraṃ, tattha mayā nibbattitabbanti niṭṭhaṃ agamāsi. Daraufhin blickte er auf den Ort und dachte: „Der sogenannte Jambudīpa ist groß, er misst zehntausend Yojanas. In welchem Landstrich wohl werden die Buddhas geboren?“, und er erblickte das Mittelland (Majjhimadesa). Das Mittelland is jene Gegend, die im Vinaya (Mahāvagga) wie folgt beschrieben wird: „Im Osten liegt der Marktflecken Gajaṅgala, dahinter befinden sich große Salbäume (Mahāsāla), und dahinter liegen die Grenzgebiete, diesseits davon ist die Mitte. Im Südosten fließt der Fluss Sallavatī, dahinter liegen die Grenzgebiete, diesseits davon ist die Mitte. Im Süden liegt der Marktflecken Setakaṇṇika, dahinter liegen die Grenzgebiete, diesseits davon ist die Mitte. Im Westen liegt das Brahmanendorf Thūṇa, dahinter liegen die Grenzgebiete, diesseits davon ist die Mitte. Im Norden liegt der Berg Usīraddhaja, dahinter liegen die Grenzgebiete, diesseits davon ist die Mitte.“ Dieses Gebiet misst in der Länge dreihundert Yojanas, in der Breite zweihundertfünfzig Yojanas und im Umfang neunhundert Yojanas. In diesem Landstrich werden die Buddhas, Paccekabuddhā, die beiden Hauptschüler, die achtzig großen Schüler, die raddrehenden Könige (Cakkavatti) und andere mächtige, wohlhabende Adlige, Brahmanen und Hausväter (Khattiya-, Brāhmaṇa-, Gahapati-Mahāsāla) geboren. Er kam zu dem Entschluss: „Hier liegt die Stadt namens Kapilavatthu. Dort muss ich geboren werden.“ Tato kulaṃ vilokento ‘‘buddhā nāma vessakule vā suddakule vā na nibbattanti. Lokasammate pana khattiyakule vā brāhmaṇakule vāti dvīsuyeva kulesu nibbattanti. Idāni ca khattiyakulaṃ lokasammataṃ, tattha nibbattissāmi. Suddhodano nāma rājā me pitā bhavissatī’’ti kulaṃ passi. Daraufhin blickte er auf die Familie und dachte bei dieser Betrachtung: „Die Buddhas werden gewiss nicht in einer Händlerfamilie (Vessa) oder in einer Arbeiterfamilie (Sudda) geboren. Vielmehr werden sie nur in zwei vom Volk hochangesehenen Familien geboren: entweder in der Kriegerkaste (Khattiya) oder in der Brahmanenkaste (Brāhmaṇa). Gegenwärtig steht die Kriegerkaste im weltweiten Ansehen; dort werde ich geboren werden. Der König namens Suddhodana wird mein Vater sein.“ So sah er die Familie. Tato [Pg.61] mātaraṃ vilokento ‘‘buddhamātā nāma lolā surādhuttā na hoti, kappasatasahassaṃ pana pūritapāramī jātito paṭṭhāya akhaṇḍapañcasīlāyeva hoti. Ayañca mahāmāyā nāma devī edisī, ayaṃ me mātā bhavissati. Kittakaṃ panassā āyūti dasannaṃ māsānaṃ upari satta divasānī’’ti passi. Daraufhin blickte er auf die Mutter und sah bei dieser Betrachtung: „Die Mutter eines Buddhas ist niemals leichtsinnig oder trunksüchtig. Vielmehr hat sie über hunderttausend Weltalter (Aeonen) hinweg die Vollkommenheiten (Pāramī) erfüllt und hält von Geburt an die fünf Sittlichkeitsregeln makellos ein. Und diese Königin namens Mahāmāyā ist genau so eine; sie wird meine Mutter sein.“ Als er nun sah, wie lange ihre Lebensspanne noch währen würde, erkannte er: „Zehn Monate und sieben Tage.“ Iti imaṃ pañcamahāvilokanaṃ viloketvā ‘‘kālo me, mārisā, buddhabhāvāyā’’ti devatānaṃ saṅgahaṃ karonto paṭiññaṃ datvā ‘‘gacchatha, tumhe’’ti tā devatā uyyojetvā tusitadevatāhi parivuto tusitapure nandanavanaṃ pāvisi. Sabbadevalokesu hi nandanavanaṃ atthiyeva. Tattha naṃ devatā ‘‘ito cuto sugatiṃ gaccha, ito cuto sugatiṃ gacchā’’ti pubbe katakusalakammokāsaṃ sārayamānā vicaranti. So evaṃ devatāhi kusalaṃ sārayamānāhi parivuto tattha vicarantoyeva cavitvā mahāmāyāya deviyā kucchismiṃ paṭisandhiṃ gaṇhi. Nachdem er diese fünf großen Betrachtungen angestellt hatte, sprach er zu den Göttern, um ihnen Gunst zu erweisen, gab sein Versprechen ab und sagte: „Es ist Zeit für mich, ihr Edlen, zur Erlangung der Buddhaschaft.“ Nachdem er diese Götter mit den Worten „Geht nun!“ verabschiedet hatte, betrat er, umgeben von den Tusita-Göttern, den Nandana-Hain in der Tusita-Stadt. Denn in allen Götterwelten gibt es wahrlich einen Nandana-Hain. Dort wandelten die Götter umher und erinnerten ihn an die Gelegenheit seiner früher vollbrachten heilsamen Taten, indem sie riefen: „Scheide von hier und gehe an einen glücklichen Ort! Scheide von hier und gehe an einen glücklichen Ort!“ Während er, von den Göttern umgeben, die ihn so an sein heilsames Wirken erinnerten, dort wandelte, schied er aus jenem Dasein und nahm Empfängnis (Wiedergeburt) im Schoße der Königin Mahāmāyā. Tassa āvibhāvatthaṃ ayaṃ anupubbikathā – tadā kira kapilavatthunagare āsāḷhinakkhattaṃ saṅghuṭṭhaṃ ahosi, mahājano nakkhattaṃ kīḷati. Mahāmāyāpi devī pure puṇṇamāya sattamadivasato paṭṭhāya vigatasurāpānaṃ mālāgandhavibhūtisampannaṃ nakkhattakīḷaṃ anubhavamānā sattame divase pātova uṭṭhāya gandhodakena nhāyitvā cattāri satasahassāni vissajjetvā mahādānaṃ datvā sabbālaṅkāravibhūsitā varabhojanaṃ bhuñjitvā uposathaṅgāni adhiṭṭhāya alaṅkatapaṭiyattaṃ sirigabbhaṃ pavisitvā sirisayane nipannā niddaṃ okkamamānā imaṃ supinaṃ addasa – cattāro kira naṃ mahārājāno sayaneneva saddhiṃ ukkhipitvā himavantaṃ netvā saṭṭhiyojanike manosilātale sattayojanikassa mahāsālarukkhassa heṭṭhā ṭhapetvā ekamantaṃ aṭṭhaṃsu. Atha nesaṃ deviyo āgantvā deviṃ anotattadahaṃ netvā manussamalaharaṇatthaṃ nhāpetvā dibbavatthaṃ nivāsāpetvā gandhehi vilimpāpetvā dibbapupphāni piḷandhāpetvā tato avidūre eko rajatapabbato atthi, tassa anto kanakavimānaṃ atthi, tattha pācīnasīsakaṃ dibbasayanaṃ paññāpetvā nipajjāpesuṃ. Atha bodhisatto setavaravāraṇo hutvā tato avidūre eko suvaṇṇapabbato atthi, tattha vicaritvā tato oruyha rajatapabbataṃ abhiruhitvā uttaradisato āgamma rajatadāmavaṇṇāya soṇḍāya setapadumaṃ gahetvā koñcanādaṃ naditvā kanakavimānaṃ [Pg.62] pavisitvā mātusayanaṃ tikkhattuṃ padakkhiṇaṃ katvā dakkhiṇapassaṃ phāletvā kucchiṃ paviṭṭhasadiso ahosīti. Evaṃ uttarāsāḷhanakkhattena paṭisandhiṃ gaṇhi. Um die Art und Weise seiner Empfängnis zu verdeutlichen, folgt hier die chronologische Erzählung: Damals, so heißt es, wurde in der Stadt Kapilavatthu das Asāḷha-Sternenfest ausgerufen, und die Bevölkerung feierte das Fest. Auch Königin Mahāmāyā genoss ab dem siebten Tag vor dem Vollmond das Festspiel – frei von Rauschgetränken und reich geschmückt mit Blumengirlanden und wohlriechenden Düften. Am siebten Tag erhob sie sich frühmorgens, badete in Duftwasser, spendete vierhunderttausend Geldstücke als großes Almosen, speiste eine vorzügliche Mahlzeit, geschmückt mit allem Zierrat, gelobte die Uposatha-Satzungen, betrat das festlich hergerichtete Prachtgemach, legte sich auf das Prachtbett und sah, während sie einschlief, folgenden Traum: Es hieß, die vier Weltkönige hoben sie samt ihrem Bett empor, trugen sie zum Himavanta (Himalaya) und setzten sie auf einer sechzig Yojanas breiten Zinnober-Felsplatte (Manosilātala) unter einem sieben Yojanas hohen, mächtigen Salbaum ab und stellten sich beiseite. Daraufhin kamen deren Gemahlinnen, geleiteten die Königin zum Anotatta-See, badeten sie dort, um alle menschlichen Unreinheiten abzuwaschen, kleideten sie in göttliche Gewänder, salbten sie mit Düften und schmückten sie mit himmlischen Blumen. Nicht weit von dort gab es einen silbernen Berg, in dessen Innerem sich ein goldener Palast befand. Dort bereiteten sie ein nach Osten ausgerichtetes göttliches Bett und ließen sie sich niederlegen. Da wurde der Bodhisatta zu einem prächtigen weißen Elefanten. Er wandelte auf einem goldenen Berg ganz in der Nähe umher, stieg von diesem herab, erklomm den silbernen Berg, kam aus nördlicher Richtung herbei, hielt mit seinem Rüssel, der wie eine Kette aus Silber glänzte, einen weißen Lotus, stieß einen Schrei wie ein Kranich aus, betrat den goldenen Palast, umwandelte das Bett der Mutter dreimal im Uhrzeigersinn, öffnete scheinbar ihre rechte Seite und schien in ihren Schoß einzutreten. Auf diese Weise nahm er unter dem Sternbild Uttarāsāḷha Empfängnis. Punadivase pabuddhā devī taṃ supinaṃ rañño ārocesi. Rājā catusaṭṭhimatte brāhmaṇapāmokkhe pakkosāpetvā gomayaharitūpalittāya lājādīhi katamaṅgalasakkārāya bhūmiyā mahārahāni āsanāni paññāpetvā tattha nisinnānaṃ brāhmaṇānaṃ sappimadhusakkharābhisaṅkhatassa varapāyāsassa suvaṇṇarajatapātiyo pūretvā suvaṇṇarajatapātīhiyeva paṭikujjitvā adāsi, aññehi ca ahatavatthakapilagāvidānādīhi te santappesi. Atha nesaṃ sabbakāmehi santappitānaṃ brāhmaṇānaṃ supinaṃ ārocāpetvā ‘‘kiṃ bhavissatī’’ti pucchi. Brāhmaṇā āhaṃsu – ‘‘mā cintayi, mahārāja, deviyā te kucchimhi gabbho patiṭṭhito, so ca kho purisagabbho, na itthigabbho, putto te bhavissati, so sace agāraṃ ajjhāvasissati, rājā bhavissati cakkavattī. Sace agārā nikkhamma pabbajissati, buddho bhavissati loke vivaṭacchado’’ti. Am nächsten Tag berichtete die erwachte Königin dem König von diesem Traum. Der König ließ etwa vierundsechzig der angesehensten Brahmanen rufen. Er ließ kostbare Sitze auf einer mit grünem Kuhmist bestrichenen und mit rituellen Festgaben wie Puffreis geschmückten Erde herrichten. Den dort sitzenden Brahmanen reichte er goldene und silberne Schalen, die mit bestem, mit geklärter Butter, Honig und Zucker zubereitetem Milchreis gefüllt und wiederum mit goldenen und silbernen Schalen abgedeckt waren. Er stellte sie zudem mit weiteren Gaben wie ungetragenen Gewändern und braunen Kühen zufrieden. Als die Brahmanen mit all ihren Wünschen zufriedengestellt waren, ließ er ihnen den Traum vortragen und fragte: „Was wird das bedeuten?“ Die Brahmanen sprachen: „Sorge dich nicht, o Großkönig! Im Schoße deiner Königin hat sich eine Frucht eingenistet, und zwar ein Knabe, kein Mädchen. Du wirst einen Sohn erhalten. Wenn er das häusliche Leben führt, wird er ein raddrehender Weltherrscher (Cakkavatti) sein. Wenn er aber aus dem Hause in die Hauslosigkeit hinauszieht, wird er ein Buddha in der Welt sein, einer, der den Schleier der Unwissenheit lüftet.“ Bodhisattassa pana mātukucchimhi paṭisandhiggahaṇakkhaṇeyeva ekappahāreneva sakaladasasahassī lokadhātu saṅkampi sampakampi sampavedhi. Dvattiṃsa pubbanimittāni pāturahesuṃ – dasasu cakkavāḷasahassesu appamāṇo obhāso phari. Tassa taṃ siriṃ daṭṭhukāmā viya andhā cakkhūni paṭilabhiṃsu, badhirā saddaṃ suṇiṃsu, mūgā samālapiṃsu, khujjā ujugattā ahesuṃ, paṅgulā padasā gamanaṃ paṭilabhiṃsu, bandhanagatā sabbasattā andubandhanādīhi mucciṃsu, sabbanirayesu aggī nibbāyiṃsu, pettivisayesu khuppipāsā vūpasamiṃsu, tiracchānānaṃ bhayaṃ nāhosi, sabbasattānaṃ rogo vūpasami, sabbasattā piyaṃvadā ahesuṃ, madhurenākārena assā hasiṃsu, vāraṇā gajjiṃsu, sabbatūriyāni sakaṃ sakaṃ ninnādaṃ muñciṃsu, aghaṭṭitāniyeva manussānaṃ hatthūpagādīni ābharaṇāni viraviṃsu, sabbā disā vippasannā ahesuṃ, sattānaṃ sukhaṃ uppādayamāno mudusītalo vāto vāyi, akālamegho vassi, pathavitopi udakaṃ ubbhijjitvā vissandi, pakkhino ākāsagamanaṃ vijahiṃsu, nadiyo asandamānā aṭṭhaṃsu, mahāsamuddo madhurodako ahosi, sabbatthakameva pañcavaṇṇehi padumehi [Pg.63] sañchannatalo ahosi, thalajajalajādīni sabbapupphāni pupphiṃsu, rukkhānaṃ khandhesu khandhapadumāni, sākhāsu sākhāpadumāni, latāsu latāpadumāni pupphiṃsu, ghanasilātalāni bhinditvā uparūpari satapattāni hutvā daṇḍapadumāni nāma nikkhamiṃsu, ākāse olambakapadumāni nāma nibbattiṃsu, samantato pupphavassāni vassiṃsu. Ākāse dibbatūriyāni vajjiṃsu, sakaladasasahassī lokadhātu vaṭṭetvā vissaṭṭhamālāguḷo viya, uppīḷetvā baddhamālākalāpo viya, alaṅkatapaṭiyattamālāsanaṃ viya ca ekamālāmālinī vipphurantavāḷabījanī pupphadhūpagandhaparivāsitā paramasobhaggappattā ahosi. Im Moment der Empfängnis des Bodhisatta im Schoß seiner Mutter aber erzitterte, erbebte allseitig und schwankte heftig das gesamte zehntausendfache Weltsystem auf einen Schlag. Zweiunddreißig Vorzeichen traten in Erscheinung: In den zehntausend Weltsystemen verbreitete sich ein unermesslicher Glanz. Als ob sie diese seine Pracht zu sehen wünschten, erlangten die Blinden ihre Sehkraft wieder, die Tauben hörten Töne, die Stummen sprachen vernehmlich miteinander, die Buckligen erhielten einen aufrechten Körper, die Lahmen erlangten das Gehen zu Fuß wieder, alle gefesselten Wesen wurden von ihren Fesseln und Banden befreit, in allen Höllen erlosch das Feuer, im Geisterreich schwand Hunger und Durst, den Tieren widerfuhr keine Furcht mehr, die Krankheiten aller Wesen wurden geheilt, alle Wesen sprachen liebevolle Worte, die Pferde wieherten auf liebliche Weise, die Elefanten trompeteten, alle Musikinstrumente ließen von selbst ihren jeweiligen Klang ertönen, der Schmuck wie Armbänder der Menschen erklang, ohne berührt zu werden, alle Himmelsrichtungen wurden vollkommen klar, ein sanfter, kühler Wind wehte, der den Wesen Wohlbefinden brachte, ein unzeitiger Regen goss herab, auch aus der Erde brach Wasser hervor und floss über, die Vögel gaben ihren Flug am Himmel auf, die Flüsse standen still und flossen nicht mehr, der große Ozean wurde zu Süßwasser, überall war die Oberfläche mit fünffarbigen Lotusblumen bedeckt, alle Blumen an Land und im Wasser blühten auf; an den Stämmen der Bäume blühten Stammlotusse, an den Ästen Astlotusse, an den Ranken Rankenlotusse, sie durchbrachen harte Felsplatten und traten übereinander als hundertblättrige Lotusse, sogenannte Stängellotusse, hervor, am Himmel entstanden herabhängende Lotusse, ringsum regnete es Blumenregen. Am Himmel ertönten himmlische Musikinstrumente, und das gesamte zehntausendfache Weltsystem war – gleich einem gedrehten, hingeworfenen Blumenball, einem zusammengepressten und gebundenen Blumenstrauß sowie einem geschmückten, hergerichteten Blumensitz – zu einer einzigen Blumengirlande geworden, wie mit einem wedelnden Schweifhaarfächer gekühlt, durchduftet von Blumenrauch und Wohlgerüchen, und gelangte so in einen Zustand allerhöchster Pracht. Evaṃ gahitapaṭisandhikassa bodhisattassa paṭisandhiggahaṇakālato paṭṭhāya bodhisattassa ceva bodhisattamātuyā ca upaddavanivāraṇatthaṃ khaggahatthā cattāro devaputtā ārakkhaṃ gaṇhiṃsu. Bodhisattassa mātuyā purisesu rāgacittaṃ nuppajji, lābhaggayasaggappattā ca ahosi sukhinī akilantakāyā. Bodhisattañca antokucchigataṃ vippasanne maṇiratane āvutapaṇḍusuttaṃ viya passati. Yasmā ca bodhisattena vasitakucchi nāma cetiyagabbhasadisā hoti, na sakkā aññena sattena āvasituṃ vā paribhuñjituṃ vā, tasmā bodhisattamātā sattāhajāte bodhisatte kālaṃ katvā tusitapure nibbatti. Yathā ca aññā itthiyo dasamāse appatvāpi atikkamitvāpi nisinnāpi nipannāpi vijāyanti, na evaṃ bodhisattamātā. Sā pana bodhisattaṃ dasamāse kucchinā pariharitvā ṭhitāva vijāyati. Ayaṃ bodhisattamātudhammatā. Ab dem Zeitpunkt, da der Bodhisatta auf diese Weise die Empfängnis eingegangen war, übernahmen vier Göttersöhne mit Schwertern in den Händen den Schutz, um Unheil sowohl vom Bodhisatta als auch von der Mutter des Bodhisattas abzuwenden. Bei der Mutter des Bodhisattas stieg kein leidenschaftliches Begehren gegenüber Männern auf, und sie gelangte zu höchstem Gewinn und Ruhm, war glücklich und ohne körperliche Ermüdung. Den in ihrem Schoß befindlichen Bodhisatta sah sie so deutlich wie einen blassgelben Faden, der durch ein vollkommen klares Juwel gezogen ist. Und da der Schoß, in dem ein Bodhisatta gewohnt hat, wie das Innere einer Reliquienkammer ist und von keinem anderen Wesen bewohnt oder gebraucht werden kann, verschied die Mutter des Bodhisattas sieben Tage nach der Geburt des Bodhisattas und wurde im Tusita-Himmel wiedergeboren. Und während andere Frauen gebären, noch ehe zehn Monate vollendet sind oder nachdem diese überschritten wurden, sei es im Sitzen oder im Liegen, so ist es bei der Mutter des Bodhisattas nicht. Sie gebiert vielmehr, nachdem sie den Bodhisatta zehn Monate im Schoß getragen hat, im Stehen. Dies ist die Gesetzmäßigkeit für die Mutter eines Bodhisattas. Mahāmāyāpi devī pattena telaṃ viya dasamāse kucchinā bodhisattaṃ pariharitvā paripuṇṇagabbhā ñātigharaṃ gantukāmā suddhodanamahārājassa ārocesi – ‘‘icchāmahaṃ, deva, kulasantakaṃ devadahanagaraṃ gantu’’nti. Rājā ‘‘sādhū’’ti sampaṭicchitvā kapilavatthuto yāva devadahanagarā maggaṃ samaṃ kāretvā kadalipuṇṇaghaṭadhajapaṭākādīhi alaṅkārehi alaṅkārāpetvā deviṃ sovaṇṇasivikāya nisīdāpetvā amaccasahassena ukkhipāpetvā mahantena parivārena pesesi. Dvinnaṃ pana nagarānaṃ antare ubhayanagaravāsīnampi lumbinīvanaṃ nāma maṅgalasālavanaṃ atthi. Tasmiṃ samaye mūlato paṭṭhāya yāva aggasākhā sabbaṃ ekapāliphullaṃ ahosi, sākhantarehi [Pg.64] ceva pupphantarehi ca pañcavaṇṇā bhamaragaṇā nānappakārā ca sakuṇasaṅghā madhurassarena vikūjantā vicaranti. Sakalaṃ lumbinīvanaṃ cittalatāvanasadisaṃ, mahānubhāvassa rañño susajjitaāpānamaṇḍalaṃ viya ahosi. Deviyā taṃ disvā sālavane kīḷitukāmatā udapādi. Amaccā deviṃ gahetvā sālavanaṃ pavisiṃsu. Sā maṅgalasālamūlaṃ upagantvā sālasākhaṃ gaṇhitukāmā ahosi, sālasākhā suseditavettaggaṃ viya oṇamitvā deviyā hatthasamīpaṃ upagañchi. Sā hatthaṃ pasāretvā sākhaṃ aggahesi. Tāvadeva ca deviyā kammajavātā caliṃsu, athassā sāṇiṃ parikkhipāpetvā mahājano paṭikkami, sālasākhaṃ gahetvā tiṭṭhamānāya eva cassā gabbhavuṭṭhānaṃ ahosi. Taṅkhaṇaññeva cattāro visuddhacittā mahābrahmāno suvaṇṇajālaṃ ādāya sampattā. Te tena suvaṇṇajālena bodhisattaṃ sampaṭicchitvā mātu purato ṭhatvā ‘‘attamanā, devi, hohi, mahesakkho te putto uppanno’’ti āhaṃsu. Auch Königin Mahāmāyā, die den Bodhisatta wie Öl in einer Schale zehn Monate lang im Schoß getragen hatte, wünschte bei vollendeter Schwangerschaft, zum Hause ihrer Verwandten zu reisen, und teilte dies dem Großkönig Suddhodana mit: „Ich wünsche, o Herr, in die Stadt Devadaha zu reisen, die meiner Familie gehört.“ Der König stimmte mit den Worten „Sehr wohl!“ zu. Er ließ den Weg von Kapilavatthu bis zur Stadt Devadaha ebnen, mit Schmuck wie Bananenstauden, gefüllten Krügen, Bannern und Flaggen verzieren, ließ die Königin in einer goldenen Sänfte Platz nehmen, von tausend Ministern emporheben und sandte sie mit großem Gefolge aus. Zwischen den beiden Städten aber lag ein festlicher Sālwald namens Lumbinī-Hain, der den Bewohnern beider Städte gehörte. Zu jener Zeit stand der gesamte Wald von den Wurzeln bis zu den äußersten Ästen in voller Blüte. Zwischen den Zweigen und Blüten schwirrten fünffarbige Bienenschwärme und mancherlei Vogelschwärme umher, die mit süßen Stimmen zwitscherten. Der gesamte Lumbinī-Hain glich dem Cittalatā-Garten der Götter, wie eine festlich hergerichtete Festhalle eines mächtigen Königs. Als die Königin dies sah, entstand in ihr der Wunsch, im Sālwald zu lustwandeln. Die Minister geleiteten die Königin und betraten den Sālwald. Sie begab sich zum Fuß des festlichen Sālbaumes und wollte einen Sāl-Ast ergreifen. Da bog sich der Sāl-Ast wie die biegsame Spitze eines gedämpften Rohrstockes herab und kam in die Nähe der Hand der Königin. Sie streckte die Hand aus und ergriff den Ast. Im selben Augenblick regten sich bei der Königin die Geburtswehen. Da ließ man einen Vorhang um sie spannen, und die Menschenmenge zog sich zurück. Während sie so dastand und den Sāl-Ast hielt, vollzog sich ihre Niederkunft. In genau diesem Augenblick trafen vier reine Großbrahmas ein, die ein goldenes Netz hielten. Sie fingen den Bodhisatta mit diesem goldenen Netz auf, traten vor die Mutter und sprachen: „Sei frohen Mutes, o Königin! Ein Sohn von großer Macht ist dir geboren worden!“ Yathā pana aññe sattā mātukucchito nikkhamantā paṭikūlena asucinā makkhitā nikkhamanti, na evaṃ bodhisatto. So pana dhammāsanato otaranto dhammakathiko viya, nisseṇito otaranto puriso viya ca dve hatthe dve ca pāde pasāretvā ṭhitakova mātukucchisambhavena kenaci asucinā amakkhito suddho visado kāsikavatthe nikkhittamaṇiratanaṃ viya jotento mātukucchito nikkhami. Evaṃ santepi bodhisattassa ca bodhisattamātuyā ca sakkāratthaṃ ākāsato dve udakadhārā nikkhamitvā bodhisattassa ca bodhisattamātuyā ca sarīre utuṃ gāhāpesuṃ. Während andere Wesen, wenn sie aus dem Mutterleib hervorgehen, mit widerwärtigem Schmutz bedeckt zur Welt kommen, so ist es bei dem Bodhisatta nicht. Er vielmehr, wie ein Dhamma-Lehrer, der von der Kanzel herabsteigt, oder wie ein Mann, der eine Leiter hinabsteigt, ging, indem er beide Hände und beide Füße ausstreckte und aufrecht stand, völlig unbefleckt von irgendwelchen im Mutterleib entstehenden Unreinheiten, rein und makellos, strahlend wie ein kostbares Juwel auf einem feinen Tuch aus Kāsī-Seide, aus dem Mutterleib hervor. Und obwohl dem so war, strömten zu Ehren des Bodhisattas und der Mutter des Bodhisattas zwei Wasserstrahlen aus dem Himmel herab, um den Körper des Bodhisattas und der Mutter des Bodhisattas angenehm zu temperieren. Atha naṃ suvaṇṇajālena paṭiggahetvā ṭhitānaṃ brahmānaṃ hatthato cattāro mahārājāno maṅgalasammatāya sukhasamphassāya ajinappaveṇiyā gaṇhiṃsu, tesaṃ hatthato manussā dukūlacumbaṭakena gaṇhiṃsu, manussānaṃ hatthato muccitvā pathaviyaṃ patiṭṭhāya puratthimadisaṃ olokesi, anekāni cakkavāḷasahassāni ekaṅgaṇāni ahesuṃ. Tattha devamanussā gandhamālādīhi pūjayamānā ‘‘mahāpurisa, idha tumhehi sadiso añño natthi, kutettha uttaritaro’’ti āhaṃsu. Evaṃ catasso disā[Pg.65], catasso anudisā ca heṭṭhā, uparīti dasapi disā anuviloketvā attanā sadisaṃ kañci adisvā ‘‘ayaṃ uttarādisā’’ti sattapadavītihārena agamāsi mahābrahmunā setacchattaṃ dhārayamānena, suyāmena vāḷabījaniṃ, aññāhi ca devatāhi sesarājakakudhabhaṇḍahatthāhi anugammamāno. Tato sattamapade ṭhito ‘‘aggohamasmi lokassā’’tiādikaṃ āsabhiṃ vācaṃ nicchārento sīhanādaṃ nadi. Daraufhin nahmen die vier großen Könige ihn aus den Händen der Brahmas, die ihn mit einem goldenen Netz aufgefangen hatten und dastanden, mit einer als glückbringend angesehenen, sich angenehm anfühlenden Decke aus Antilopenfell entgegen. Aus deren Händen nahmen ihn die Menschen mit einer Unterlage aus feiner Seide auf. Nachdem er aus den Händen der Menschen entlassen worden war, stand er fest auf der Erde, blickte in die östliche Himmelsrichtung, und viele tausend Weltensysteme wurden zu einem einzigen offenen Platz. Dort verehrten ihn Devas und Menschen mit Duftstoffen, Blumen und anderem und sprachen: 'O großer Mann, hier bei uns gibt es keinen, der dir gleicht; wie sollte es da einen Höheren geben?' Nachdem er so die vier Haupthimmelsrichtungen, die vier Zwischenrichtungen sowie unten und oben – also alle zehn Richtungen – ringsum betrachtet und niemanden erblickt hatte, der ihm glich, schritt er mit sieben Schritten nach Norden voran, während der Große Brahma den weißen Schirm hielt, Suyama den Wedel aus Schweifhaaren trug und er von anderen Gottheiten begleitet wurde, die die übrigen königlichen Insignien in den Händen hielten. Als er dann beim siebten Schritt stehen blieb, stieß er, seine erhabene Stimme mit den Worten 'Ich bin der Höchste in der Welt' und Ähnlichem erhebend, den Löwenruf aus. Bodhisatto hi tīsu attabhāvesu mātukucchito nikkhantamattova vācaṃ nicchāresi mahosadhattabhāve, vessantarattabhāve, imasmiṃ attabhāve cāti. Mahosadhattabhāve kirassa mātukucchito nikkhamantasseva sakko devarājā āgantvā candanasāraṃ hatthe ṭhapetvā gato. So taṃ muṭṭhiyaṃ katvāva nikkhanto. Atha naṃ mātā ‘‘tāta, kiṃ gahetvā āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Osadhaṃ, ammā’’ti. Iti osadhaṃ gahetvā āgatattā ‘‘osadhadārako’’tvevassa nāmaṃ akaṃsu. Taṃ osadhaṃ gahetvā cāṭiyaṃ pakkhipiṃsu, āgatāgatānaṃ andhabadhirādīnaṃ tadeva sabbarogavūpasamāya bhesajjaṃ ahosi. Tato ‘‘mahantaṃ idaṃ osadhaṃ, mahantaṃ idaṃ osadha’’nti uppannavacanaṃ upādāya ‘‘mahosadho’’tvevassa nāmaṃ jātaṃ. Vessantarattabhāve pana mātukucchito nikkhamanto dakkhiṇahatthaṃ pasāretvāva ‘‘atthi nu kho, amma, kiñci gehasmiṃ, dānaṃ dassāmī’’ti vadanto nikkhami. Athassa mātā ‘‘sadhane kule nibbattosi, tātā’’ti puttassa hatthaṃ attano hatthatale katvā sahassatthavikaṃ ṭhapāpesi. Imasmiṃ pana attabhāve imaṃ sīhanādaṃ nadīti evaṃ bodhisatto tīsu attabhāvesu mātukucchito nikkhantamattova vācaṃ nicchāresi. Yathā ca paṭisandhiggahaṇakkhaṇe tathā jātikkhaṇepissa dvattiṃsa pubbanimittāni pāturahesuṃ. Yasmiṃ pana samaye amhākaṃ bodhisatto lumbinīvane jāto, tasmiṃyeva samaye rāhulamātādevī, ānandatthero,channo amacco, kāḷudāyī amacco, kaṇḍako assarājā, mahābodhirukkho, catasso nidhikumbhiyo ca jātā. Tattha ekā nidhikumbhī gāvutappamāṇā, ekā aḍḍhayojanappamāṇā, ekā tigāvutappamāṇā, ekā yojanappamāṇā. Gambhīrato pathavīpariyantā eva ahosīti. Ime satta sahajātā nāma. Der Bodhisatta stieß nämlich in drei Existenzen sogleich nach dem Verlassen des Mutterschoßes Worte aus: in der Existenz als Mahosadha, in der Existenz als Vessantara und in dieser gegenwärtigen Existenz. In der Existenz als Mahosadha, so heißt es, kam der Götterkönig Sakka genau in dem Moment, als er den Mutterschoß verließ, legte ihm ein Stück bestes Sandelholz in die Hand und ging wieder fort. Er kam heraus, indem er dieses fest in seiner Faust hielt. Daraufhin fragte ihn seine Mutter: 'Mein Kind, was hast du da mitgebracht?' Er antwortete: 'Heilmittel, Mutter.' Weil er mit diesem Heilmittel in der Hand zur Welt gekommen war, gaben sie ihm den Namen 'Osadha-dāraka' (Heilmittelkind). Man nahm dieses Heilmittel und tat es in ein großes Gefäß, und es diente als Medizin zur Heilung aller Krankheiten für die Blinden, Tauben und andere, die herbeiströmten. Aufgrund der daraufhin entstandenen Äußerung 'Großartig ist dieses Heilmittel, großartig ist dieses Heilmittel!' entstand sein Name 'Mahosadha' (Großes Heilmittel). In der Existenz als Vessantara wiederum streckte er beim Verlassen des Mutterschoßes seine rechte Hand aus und trat mit den Worten hervor: 'Mutter, gibt es etwas im Haus? Ich möchte eine Gabe spenden.' Daraufhin sagte seine Mutter: 'In einer wohlhabenden Familie bist du geboren, mein Sohn', legte die Hand des Sohnes auf ihre eigene Handfläche und ließ ihm einen Beutel mit tausend Münzen geben. In dieser Existenz aber stieß er diesen Löwenruf aus. So sprach der Bodhisatta in drei Existenzen sogleich nach dem Verlassen des Mutterschoßes. Und wie im Moment der Empfängnis, so erschienen auch im Moment seiner Geburt zweiunddreißig Vorzeichen. Zu derselben Zeit, als unser Bodhisatta im Lumbinī-Hain geboren wurde, wurden auch die Prinzessin, die Rahulas Mutter werden sollte, der Ehrwürdige Ānanda, der Minister Channa, der Minister Kāḷudāyī, der königliche Hengst Kanthaka, der Große Bodhi-Baum und die vier Schatzkrüge geboren. Darunter hatte ein Schatzkrug das Maß von einem Gāvuta, einer von einer halben Yojana, einer von drei Gāvutas und einer von einer Yojana, tief hinabreichend bis zum Ende der Erde. Diese sieben werden die 'Mitgeborenen' (Sahajātā) genannt. Ubhayanagaravāsino [Pg.66] bodhisattaṃ gahetvā kapilavatthunagarameva agamaṃsu. Taṃ divasaṃyeva ca ‘‘kapilavatthunagare suddhodanamahārājassa putto jāto, ayaṃ kumāro bodhimūle nisīditvā buddho bhavissatī’’ti tāvatiṃsabhavane haṭṭhatuṭṭhā devasaṅghā celukkhepādīni pavattentā kīḷiṃsu. Tasmiṃ samaye suddhodanamahārājassa kulūpako aṭṭhasamāpattilābhī kāladevalo nāma tāpaso bhattakiccaṃ katvā divāvihāratthāya tāvatiṃsabhavanaṃ gantvā tattha divāvihāraṃ nisinno tā devatā tathā kīḷamānā disvā ‘‘kiṃ kāraṇā tumhe evaṃ tuṭṭhamānasā kīḷatha, mayhampetaṃ kāraṇaṃ kathethā’’ti pucchi. Devatā āhaṃsu – ‘‘mārisa, suddhodanamahārājassa putto jāto, so bodhimaṇḍe nisīditvā buddho hutvā dhammacakkaṃ pavattessati, ‘tassa anantaṃ buddhalīḷaṃ daṭṭhuṃ, dhammañca sotuṃ lacchāmā’ti iminā kāraṇena tuṭṭhāmhā’’ti. Tāpaso tāsaṃ vacanaṃ sutvā khippaṃ devalokato oruyha rājanivesanaṃ pavisitvā paññattāsane nisinno ‘‘putto kira te, mahārāja, jāto, passissāmi na’’nti āha. Rājā alaṅkatapaṭiyattaṃ kumāraṃ āharāpetvā tāpasaṃ vandāpetuṃ abhihari. Bodhisattassa pādā parivattitvā tāpasassa jaṭāsu patiṭṭhahiṃsu. Bodhisattassa hi tenattabhāvena vanditabbayuttako nāma añño natthi. Sace hi ajānantā bodhisattassa sīsaṃ tāpasassa pādamūle ṭhapeyyuṃ, sattadhā tassa muddhā phaleyya. Tāpaso ‘‘na me attānaṃ nāsetuṃ yutta’’nti uṭṭhāyāsanā bodhisattassa añjaliṃ paggahesi. Rājā taṃ acchariyaṃ disvā attano puttaṃ vandi. Die Bewohner beider Städte nahmen den Bodhisatta mit und begaben sich direkt in die Stadt Kapilavatthu. Am selben Tag jubelten die Götterscharen in der Tāvatiṃsa-Ebene voller Freude, warfen ihre Gewänder in die Luft und feierten mit den Worten: 'In der Stadt Kapilavatthu ist dem großen König Suddhodana ein Sohn geboren worden; dieser Prinz wird unter dem Bodhi-Baum sitzen und ein Buddha werden!' Zu dieser Zeit ging ein Asket namens Kāladevala, der ein Vertrauter des großen Königs Suddhodana war und die acht meditativen Vertiefungen erlangt hatte, nach dem Einnehmen seiner Mahlzeit zur Mittagsruhe in die Tāvatiṃsa-Ebene. Als er dort zur Mittagsruhe saß und jene Gottheiten so feiern sah, fragte er: 'Aus welchem Grund feiert ihr mit so erfreuten Gemütern? Nennt auch mir diesen Grund!' Die Gottheiten sprachen: 'Werter Herr, dem großen König Suddhodana ist ein Sohn geboren worden. Er wird auf dem Thron der Erleuchtung sitzen, ein Buddha werden und das Rad der Lehre in Bewegung setzen. Wir hoffen, sein unendliches Buddha-Wirken zu sehen und die Lehre zu hören; aus diesem Grund sind wir so erfreut.' Als der Asket ihre Worte vernommen hatte, stieg er sogleich aus der Götterwelt herab, betrat den königlichen Palast und setzte sich auf den für ihn bereitgestellten Sitz. Er sprach: 'Großer König, dir ist wohl ein Sohn geboren worden; ich möchte ihn sehen.' Der König ließ den reich geschmückten Knaben herbeibringen und hielt ihn hin, damit er sich vor dem Asketen verneige. Doch die Füße des Bodhisatta drehten sich um und stellten sich auf das geflochtene Haar des Asketen. Denn es gab in jener Existenz keinen anderen, dem es gebührt hätte, vom Bodhisatta verehrt zu werden. Hätten sie nämlich aus Unwissenheit das Haupt des Bodhisatta zu den Füßen des Asketen gelegt, wäre dessen Kopf in sieben Stücke gespalten worden. Der Asket dachte: 'Es ist für mich nicht ratsam, mich selbst ins Verderben zu stürzen', erhob sich von seinem Sitz und legte ehrerbietig die Hände vor dem Bodhisatta zusammen. Als der König dieses Wunder sah, verneigte er sich vor seinem eigenen Sohn. Tāpaso atīte cattālīsa kappe, anāgate cattālīsāti asīti kappe anussarati. Bodhisattassa lakkhaṇasampattiṃ disvā ‘‘bhavissati nu kho buddho, udāhu no’’ti āvajjetvā upadhārento ‘‘nissaṃsayena buddho bhavissatī’’ti ñatvā ‘‘acchariyapuriso aya’’nti sitaṃ akāsi. Tato ‘‘ahaṃ imaṃ acchariyapurisaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ labhissāmi nu kho, no’’ti upadhārento ‘‘na labhissāmi, antarāyeva kālaṃ katvā buddhasatenapi buddhasahassenapi gantvā bodhetuṃ asakkuṇeyye arūpabhave nibbattissāmī’’ti disvā ‘‘evarūpaṃ nāma acchariyapurisaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ na labhissāmi, mahatī vata me jāni bhavissatī’’ti parodi. Der Asket konnte sich an achtzig Äonen erinnern: vierzig in der Vergangenheit und vierzig in der Zukunft. Als er die Vollkommenheit der körperlichen Merkmale des Bodhisatta sah, überlegte und prüfte er: 'Wird er wohl ein Buddha werden oder nicht?' Als er erkannte: 'Zweifellos wird er ein Buddha werden', lächelte er und dachte: 'Dies ist ein wunderbarer Mensch!' Danach überlegte er: 'Wird es mir wohl vergönnt sein, diesen wunderbaren Menschen als Buddha zu sehen oder nicht?' Da erkannte er: 'Es wird mir nicht vergönnt sein. Ich werde noch dazwischen verscheiden und im formlosen Bereich wiedergeboren werden, wo man selbst dann nicht erwachen kann, wenn hundert oder tausend Buddhas dorthin kämen.' Als er sah: 'Es wird mir nicht vergönnt sein, einen solch wunderbaren Menschen als Buddha zu sehen; wahrlich, das wird ein großer Verlust für mich sein!', weinte er. Manussā [Pg.67] disvā ‘‘amhākaṃ ayyo idāneva hasitvā puna paroditvā patiṭṭhito, kiṃ nu kho, bhante, amhākaṃ ayyaputtassa koci antarāyo bhavissatī’’ti taṃ pucchiṃsu. ‘‘Natthetassa antarāyo, nissaṃsayena buddho bhavissatī’’ti. ‘‘Atha kasmā, bhante, paroditthā’’ti? ‘‘Evarūpaṃ purisaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ na labhissāmi, ‘mahatī vata me jāni bhavissatī’ti attānaṃ anusocanto rodāmī’’ti āha. Tato so ‘‘kiṃ nu kho me ñātakesu koci ekaṃ buddhabhūtaṃ daṭṭhuṃ labhissatī’’ti upadhārento attano bhāgineyyaṃ nālakadārakaṃ addasa. So bhaginiyā gehaṃ gantvā ‘‘kahaṃ te putto nālako’’ti? ‘‘Atthi gehe, ayyā’’ti. ‘‘Pakkosāhi na’’nti pakkosāpetvā attano santikaṃ āgataṃ kumāraṃ āha – ‘‘tāta, suddhodanamahārājassa kule putto jāto, buddhaṅkuro eso, pañcatiṃsa vassāni atikkamitvā buddho bhavissati, tvaṃ etaṃ daṭṭhuṃ labhissasi, ajjeva pabbajāhī’’ti. Sattāsītikoṭidhane kule nibbattadārakopi ‘‘na maṃ mātulo anatthe niyojessatī’’ti cintetvā tāvadeva antarāpaṇato kāsāyāni ceva mattikāpattañca āharāpetvā kesamassuṃ ohāretvā kāsāyāni vatthāni acchādetvā ‘‘yo loke uttamapuggalo, taṃ uddissa mayhaṃ pabbajjā’’ti bodhisattābhimukhaṃ añjaliṃ paggayha pañcapatiṭṭhitena vanditvā pattaṃ thavikāya pakkhipitvā aṃsakūṭe olaggetvā himavantaṃ pavisitvā samaṇadhammaṃ akāsi. So paramābhisambodhippattaṃ tathāgataṃ upasaṅkamitvā nālakapaṭipadaṃ kathāpetvā puna himavantaṃ pavisitvā arahattaṃ patvā ukkaṭṭhapaṭipadaṃ paṭipanno satteva māse āyuṃ pāletvā ekaṃ suvaṇṇapabbataṃ nissāya ṭhitakova anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyi. Die Menschen sahen dies und fragten ihn: „Unser ehrwürdiger Herr hat eben noch gelacht und steht nun wieder da und weint bitterlich. Wird, o Herr, unserem Prinzen irgendeine Gefahr drohen?“ Er antwortete: „Es gibt keine Gefahr für ihn; er wird zweifellos ein Buddha werden.“ Sie fragten: „Aber warum, o Herr, habt Ihr dann geweint?“ Er sprach: „Einen solchen Menschen, wenn er zum Buddha geworden ist, werde ich nicht zu sehen bekommen. ‚Wahrlich, das wird ein großer Verlust für mich sein!‘, so weine ich, indem ich mich selbst beklage.“ Daraufhin überlegte er: „Wird wohl jemand von meinen Verwandten diesen erhabenen Menschen sehen können, wenn er zum Buddha geworden ist?“ Und bei der Untersuchung erblickte er seinen Neffen, den Knaben Nālaka. Er ging zum Hause seiner Schwester und fragte: „Wo ist dein Sohn Nālaka?“ – „Er ist im Haus, o Herr.“ – „Rufe ihn herbei.“ Nachdem er ihn hatte rufen lassen, sprach er zu dem Knaben, der vor ihn getreten war: „Mein Lieber, im Hause des Großkönigs Suddhodana ist ein Sohn geboren worden. Er ist ein Buddha-Spross. Nach Ablauf von fünfunddreißig Jahren wird er ein Buddha werden. Du wirst die Gelegenheit haben, ihn zu sehen. Werde noch heute ein Hausloser!“ Auch der Knabe, der in einer Familie mit einem Vermögen von siebenundachtzig Millionen (Koṭis) geboren worden war, dachte: „Mein Onkel wird mich nicht zu etwas Unheilsamem drängen.“ Sofort ließ er sich vom Markt gelbrote Gewänder und eine Tonschale bringen, schor sich Haar und Bart, legte die gelbroten Gewänder an und sprach: „Demjenigen, der der Höchste in der Welt ist, weihe ich meine Hauslosigkeit.“ Dann erhob er die gefalteten Hände in Richtung des Bodhisatta, verehrte ihn mit der Fünf-Punkte-Niederwerfung, steckte die Schale in eine Tasche, hängte sie sich über die Schulter, zog in den Himalaya (Himavanta) und übte das Asketenleben. Als der Tathāgata die höchste vollkommene Erleuchtung erlangt hatte, suchte er ihn auf, ließ sich die Nālaka-Praxis erklären, zog wieder in den Himalaya, erlangte die Arahatschaft und lebte, während er die höchste Stufe dieser Praxis ausführte, nur noch sieben Monate lang. Schließlich ging er, an einen goldenen Berg gelehnt, im Stehen in das vollkommene Erlöschen ohne verbleibende Daseinsgrundlagen (anupādisesā nibbānadhātu) ein. Bodhisattampi kho pañcamadivase sīsaṃ nhāpetvā ‘‘nāmaggahaṇaṃ gaṇhissāmā’’ti rājabhavanaṃ catujjātiyagandhehi vilimpetvā lājapañcamakāni pupphāni vikiritvā asambhinnapāyāsaṃ sampādetvā tiṇṇaṃ vedānaṃ pāraṅgate aṭṭhasataṃ brāhmaṇe nimantetvā rājabhavane nisīdāpetvā subhojanaṃ bhojāpetvā mahāsakkāraṃ katvā ‘‘kiṃ nu kho bhavissatī’’ti lakkhaṇāni pariggahāpesuṃ. Tesu – Am fünften Tag wusch man auch dem Bodhisatta das Haupt und dachte: „Wir wollen die Namensgebung vollziehen.“ Man ließ den Königspalast mit den vier Arten von Duftstoffen einsalben, streute Blumen aus, unter denen gerösteter Reis die fünfte Art bildete, bereitete reinen, unvermischten Milchreis zu, lud einhundertacht Brahmanen ein, die die drei Veden gemeistert hatten, ließ sie im Königspalast Platz nehmen, bewirtete sie mit vorzüglicher Speise, erwies ihnen große Ehrung und ließ sie die körperlichen Merkmale untersuchen, um zu erfahren: „Was wird wohl aus ihm werden?“ Unter diesen waren: ‘‘Rāmo [Pg.68] dhajo lakkhaṇo cāpi mantī, yañño subhojo suyāmo sudatto; Ete tadā aṭṭha ahesuṃ brāhmaṇā, chaḷaṅgavā mantaṃ viyākariṃsū’’ti. (ma. ni. aṭṭha. 1.284) – „Rāma, Dhaja, Lakkhaṇa und Manti, Yañña, Subhoja, Suyāma und Sudatta; diese acht Brahmanen waren es damals, welche, die sechs Hilfswissenschaften beherrschend, das Mantra deuteten.“ Ime aṭṭheva brāhmaṇā lakkhaṇapariggāhakā ahesuṃ. Paṭisandhiggahaṇadivase supinopi eteheva pariggahito. Tesu satta janā dve aṅguliyo ukkhipitvā dvidhā naṃ byākariṃsu – ‘‘imehi lakkhaṇehi samannāgato sace agāraṃ ajjhāvasissati, rājā bhavissati cakkavattī, sace pabbajissati, buddho bhavissatī’’ti sabbaṃ cakkavattirañño sirivibhavaṃ ācikkhiṃsu. Tesaṃ pana sabbadaharo gottato koṇḍañño nāma māṇavo bodhisattassa varalakkhaṇasampattiṃ oloketvā ‘‘imassa agāramajjhe ṭhānakāraṇaṃ natthi, ekantenesa vivaṭacchado buddho bhavissatī’’ti ekameva aṅguliṃ ukkhipitvā ekaṃsabyākaraṇaṃ byākāsi. Ayañhi katādhikāro pacchimabhavikasatto paññāya itare satta jane abhibhavitvā imehi lakkhaṇehi samannāgatassa bodhisattassa ekantabuddhabhāvasaṅkhātaṃ ekameva gahiṃ addasa, tasmā ekaṃ aṅguliṃ ukkhipitvā evaṃ byākāsi. Athassa nāmaṃ gaṇhantā sabbalokassa atthasiddhikarattā ‘‘siddhattho’’ti nāmaṃ akaṃsu. Diese acht Brahmanen waren es, welche die Merkmale untersuchten. Auch der Traum am Tag der Empfängnis wurde von ebendiesen gedeutet. Unter ihnen erhoben sieben Männer zwei Finger und verkündeten eine zweifache Möglichkeit: „Wenn einer, der mit diesen Merkmalen ausgestattet ist, das Hausleben führt, wird er ein Weltherrscher (Cakkavatti) werden. Wenn er jedoch in die Hauslosigkeit zieht, wird er ein Buddha werden.“ Und sie schilderten die gesamte herrliche Pracht eines Weltherrschers. Der Jüngste von ihnen jedoch, ein junger Brahmane namens Koṇḍañña aus der Familie, betrachtete die Vollkommenheit der erhabenen Merkmale des Bodhisatta und erklärte, indem er nur einen einzigen Finger erhob, mit absoluter Gewissheit: „Für ihn gibt es keinen Grund, im Hausleben zu bleiben. Er wird zweifellos ein Buddha sein, der den Schleier der Unwissenheit weggenommen hat (vivaṭacchado).“ Denn dieser, der in früheren Leben Heilsames vollbracht hatte und sich in seiner letzten Existenz befand, übertraf die anderen sieben Männer an Weisheit und sah nur einen einzigen Weg voraus, nämlich den Zustand der gewissen, unfehlbaren Buddhaschaft des mit diesen Merkmalen ausgestattetem Bodhisatta. Daher erhob er nur einen Finger und verkündete dies so. Als man ihm dann einen Namen gab, nannte man ihn „Siddhattha“, weil er das Wohl der ganzen Welt verwirklicht. Atha kho te brāhmaṇā attano attano gharāni gantvā putte āmantayiṃsu – ‘‘tātā, amhe mahallakā, suddhodanamahārājassa puttaṃ sabbaññutaṃ pattaṃ mayaṃ sambhāveyyāma vā no vā, tumhe tasmiṃ kumāre sabbaññutaṃ patte tassa sāsane pabbajeyyāthā’’ti. Te sattapi janā yāvatāyukaṃ ṭhatvā yathākammaṃ gatā, koṇḍaññamāṇavoyeva pana arogo ahosi. So mahāsatte vuddhimanvāya mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitvā pabbajitvā anakkamena uruvelaṃ gantvā ‘‘ramaṇīyo vata ayaṃ bhūmibhāgo, alaṃ vatidaṃ padhānatthikassa kulaputtassa padhānāyā’’ti cittaṃ uppādetvā tattha vāsaṃ upagate ‘‘mahāpuriso pabbajito’’ti sutvā tesaṃ brāhmaṇānaṃ putte upasaṅkamitvā evamāha – ‘‘siddhatthakumāro kira [Pg.69] pabbajito, so nissaṃsayena buddho bhavissati. Sace tumhākaṃ pitaro arogā assu, ajja nikkhamitvā pabbajeyyuṃ. Sace tumhepi iccheyyātha, etha, mayaṃ taṃ mahāpurisaṃ anupabbajissāmā’’ti. Te sabbe ekacchandā bhavituṃ nāsakkhiṃsu, tesu tayo janā na pabbajiṃsu, koṇḍaññabrāhmaṇaṃ jeṭṭhakaṃ katvā itare cattāro pabbajiṃsu. Te pañcapi janā pañcavaggiyattherā nāma jātā. Daraufhin gingen diese Brahmanen in ihre jeweiligen Häuser und sprachen zu ihren Söhnen: „Liebe Kinder, wir sind alt. Ob wir es noch erleben werden, dass der Sohn des Großkönigs Suddhodana die Allwissenheit erlangt, wissen wir nicht. Ihr aber sollt, wenn dieser Knabe die Allwissenheit erlangt hat, unter seiner Lehre in die Hauslosigkeit ziehen.“ Jene sieben Männer lebten ihre Lebensspanne zu Ende und gingen gemäß ihrem Kamma dahin; nur der junge Brahmane Koṇḍañña blieb gesund und am Leben. Er verfolgte das Heranwachsen des großen Wesens, und als dieser die große Entsagung vollzogen hatte, in die Hauslosigkeit gezogen war und allmählich nach Uruvelā gelangte, dachte jener: „Lieblich ist wahrlich dieses Stück Land! Dies eignet sich vortrefflich für das Streben eines edlen Sohnes, der nach dem Kampf strebt.“ So fasste er den Entschluss und ließ sich dort nieder. Als er hörte: „Der Große Mensch ist in die Hauslosigkeit gezogen“, suchte er die Söhne jener Brahmanen auf und sprach zu ihnen: „Der Prinz Siddhattha ist angeblich in die Hauslosigkeit gezogen. Er wird zweifellos ein Buddha werden. Wenn eure Väter noch am Leben und gesund wären, würden sie heute ausziehen und die Hauslosigkeit erwählen. Wenn auch ihr es wünscht, so kommt, wir wollen diesem Großen Menschen nachfolgen und ebenfalls die Hauslosigkeit erwählen!“ Sie konnten sich jedoch nicht alle einig werden: Drei von ihnen traten nicht in den Orden ein, doch die anderen vier machten den Brahmanen Koṇḍañña zu ihrem Anführer und traten in den Orden ein. Diese fünf Personen wurden als die Älteren der Fünfergruppe (Pañcavaggiyatherā) bekannt. Tadā pana suddhodanarājā – ‘‘kiṃ disvā mayhaṃ putto pabbajissatī’’ti pucchi. ‘‘Cattāri pubbanimittānī’’ti. ‘‘Katarañca katarañcā’’ti? ‘‘Jarājiṇṇaṃ, byādhitaṃ, mataṃ, pabbajita’’nti. Rājā ‘‘ito paṭṭhāya evarūpānaṃ mama puttassa santikaṃ upasaṅkamituṃ mā adattha, mayhaṃ puttassa buddhabhāvena kammaṃ natthi, ahaṃ mama puttaṃ dvisahassadīpaparivārānaṃ, catunnaṃ mahādīpānaṃ, issariyādhipaccaṃ cakkavattirajjaṃ karontaṃ chattiṃsayojanaparimaṇḍalāya parisāya parivutaṃ gaganatale vicaramānaṃ passitukāmo’’ti. Evañca pana vatvā imesaṃ catuppakārānaṃ nimittānaṃ kumārassa cakkhupathe āgamananivāraṇatthaṃ catūsu disāsu gāvute gāvute ārakkhaṃ ṭhapesi. Taṃ divasañca maṅgalaṭṭhāne sannipatitesu asītiyā ñātikulasahassesu ekameko ekamekaṃ puttaṃ paṭijāni – ‘‘ayaṃ buddho vā hotu rājā vā, mayaṃ ekametaṃ puttaṃ dassāma. Sacepi buddho bhavissati, khattiyasamaṇagaṇeheva parivārito vicarissati. Sacepi rājā bhavissati, khattiyakumāreheva purakkhataparivārito vicarissatī’’ti. Rājāpi bodhisattassa uttamarūpasampannā vigatasabbadosā dhātiyo paccupaṭṭhāpesi. Bodhisatto mahantena parivārena mahantena sirisobhaggena vaḍḍhati. Damals aber fragte König Suddhodana: „Was wird mein Sohn sehen, wenn er der Welt entsagt?“ – „Die vier Vorzeichen.“ – „Welche und welche?“ – „Einen altersschwachen Greis, einen Kranken, einen Toten und einen Weltentsager.“ Der König sprach: „Erlaubt von nun an solchen Personen nicht mehr, sich meinem Sohn zu nähern. Mein Sohn hat keine Verwendung für das Dasein als ein Buddha. Ich wünsche meinen Sohn als einen Weltherrscher zu sehen, der über die vier großen Kontinente samt den zweitausend sie umgebenden Inseln herrscht, der von einem Gefolge von sechsunddreißig Yojanas Umfang umgeben ist und am Himmelsgewölbe einherwandert.“ Nachdem er dies gesagt hatte, ließ er in den vier Himmelsrichtungen jeweils im Abstand von einer Meile (Gāvuta) Wachen aufstellen, um das Erscheinen dieser vier Arten von Vorzeichen im Blickfeld des Prinzen zu verhindern. Und an jenem Tag, als sich achtzigtausend Verwandtenfamilien am Festort versammelten, versprach jeder Einzelne je einen Sohn mit den Worten: „Mag dieser Prinz nun ein Buddha oder ein König werden, wir werden ihm jeweils einen Sohn übergeben. Wenn er ein Buddha wird, soll er umgeben von einer Schar von asketischen Kriegern umherziehen. Wenn er ein König wird, soll er umgeben von jungen Kriegern als Gefolge umherziehen.“ Auch stellte der König für den Bodhisatta Ammen bereit, die von vollendeter Schönheit und frei von allen Fehlern waren. Der Bodhisatta wuchs mit einem großen Gefolge und in herrlicher Pracht heran. Athekadivasaṃ rañño vappamaṅgalaṃ nāma ahosi. Taṃ divasaṃ sakalanagaraṃ devanagaraṃ viya alaṅkaronti, sabbe dāsakammakarādayo ahatavatthanivatthā gandhamālādipaṭimaṇḍitā rājakule sannipatanti, rañño kammante naṅgalasahassaṃ yojayanti, tasmiṃ pana divase ekenūnaaṭṭhasatanaṅgalāni saddhiṃ balibaddarasmiyottehi rajataparikkhatāni honti. Rañño ālambananaṅgalaṃ pana rattasuvaṇṇaparikkhataṃ hoti. Balibaddānaṃ siṅgarasmipatodāpi suvaṇṇaparikkhatāva honti. Rājā mahāparivārena nikkhamanto [Pg.70] puttaṃ gahetvāva agamāsi. Kammantaṭṭhāne eko jamburukkho bahalapalāso sandacchāyo ahosi. Tassa heṭṭhā kumārassa sayanaṃ paññāpetvā upari suvaṇṇatārakakhacitavitānaṃ bandhāpetvā sāṇipākārena parikkhipāpetvā ārakkhaṃ ṭhapetvā rājā sabbālaṅkāraṃ alaṅkaritvā amaccagaṇaparivuto naṅgalakaraṇaṭṭhānaṃ agamāsi. Tattha rājā suvaṇṇanaṅgalaṃ gaṇhāti, amaccā ekenūnaaṭṭhasatarajatanaṅgalāni, kassakā sesanaṅgalāni. Te tāni gahetvā ito cito ca kasanti. Rājā pana orato vā pāraṃ gacchati, pārato vā oraṃ āgacchati. Eines Tages fand das sogenannte Fest des ersten Pflügens des Königs statt. An jenem Tag schmückte man die gesamte Stadt wie eine Götterstadt. Alle Diener, Arbeiter und die anderen versammelten sich im Königshof, in neue Gewänder gekleidet und mit Düften und Blumenkränzen geschmückt. Für die Feldarbeit des Königs spannte man tausend Pflüge an. An jenem Tag waren siebenhundertneunundneunzig Pflüge mitsamt den Riemen und Stricken für die Ochsen mit Silber beschlagen. Der Prachtpflug des Königs aber war mit rotem Gold überzogen. Sogar die Hörner, Zügel und Treibstecken der Ochsen waren ganz mit Gold verziert. Als der König mit großem Gefolge aufbrach, nahm er seinen Sohn mit sich und zog aus. Am Arbeitsplatz stand ein Jambu-Baum mit dichtem Laub und kühlem Schatten. Darunter ließ der König ein Lager für den Prinzen herrichten, darüber einen mit goldenen Sternen verzierten Baldachin aufhängen, es ringsum mit einem Vorhang umgeben und Wachen aufstellen. Der König selbst schmückte sich mit allem Schmuck und begab sich, umgeben von der Schar der Minister, zum Pflügungsort. Dort ergriff der König den goldenen Pflug, die Minister die siebenhundertneunundneunzig silbernen Pflüge und die Bauern die übrigen Pflüge. Sie nahmen diese und pflügten hin und her. Der König aber pflügte von dieser Seite zur jenseitigen Seite hinüber und von der jenseitigen Seite wieder zu dieser Seite zurück. Etasmiṃ ṭhāne mahāsampatti ahosi. Bodhisattaṃ parivāretvā nisinnā dhātiyo ‘‘rañño sampattiṃ passāmā’’ti antosāṇito bahi nikkhantā. Bodhisatto ito cito ca olokento kañci adisvāva vegena uṭṭhāya pallaṅkaṃ ābhujitvā ānāpāne pariggahetvā paṭhamajjhānaṃ nibbattesi. Dhātiyo khajjabhojjantare vicaramānā thokaṃ cirāyiṃsu. Sesarukkhānaṃ chāyā vītivattā, tassa pana jamburukkhassa chāyā parimaṇḍalā hutvā aṭṭhāsi. Dhātiyo ‘‘ayyaputto ekako’’ti vegena sāṇiṃ ukkhipitvā anto pavisamānā bodhisattaṃ sayane pallaṅkena nisinnaṃ tañca pāṭihāriyaṃ disvā gantvā rañño ārocesuṃ – ‘‘deva, kumāro evaṃ nisinno, aññesaṃ rukkhānaṃ chāyā vītivattā, jamburukkhassa pana chāyā parimaṇḍalā ṭhitā’’ti. Rājā vegenāgantvā pāṭihāriyaṃ disvā ‘‘ayaṃ te, tāta, dutiyavandanā’’ti puttaṃ vandi. An diesem Ort herrschte große Pracht. Die Ammen, die den Bodhisatta umringten und dort saßen, dachten: „Wir wollen die Pracht des Königs sehen!“, und traten hinter dem Vorhang hervor. Der Bodhisatta blickte hier- und dorthin, und da er niemanden erblickte, stand er rasch auf, setzte sich in den Kreuzsitz, richtete seine Achtsamkeit auf die Ein- und Ausatmung und erlangte die erste vertiefte Betrachtung. Die Ammen, die sich bei den Speisen und Köstlichkeiten aufhielten, verspäteten sich ein wenig. Die Schatten der anderen Bäume waren weitergewandert, doch der Schatten jenes Jambu-Baumes blieb kreisrund über ihm stehen. Die Ammen dachten: „Der junge Herr ist allein!“, hoben rasch den Vorhang an, traten ein und sahen den Bodhisatta im Kreuzsitz auf dem Lager sitzen. Als sie dieses Wunder sahen, eilten sie herbei und berichteten es dem König: „O König, der Prinz sitzt auf diese Weise da; die Schatten der anderen Bäume sind weitergewandert, aber der Schatten des Jambu-Baumes ist kreisrund stehen geblieben.“ Der König eilte herbei, sah das Wunder und verneigte sich vor seinem Sohn mit den Worten: „Dies, mein Lieber, ist meine zweite Ehrerbietung an dich.“ Atha anukkamena bodhisatto soḷasavassuddesiko jāto. Rājā bodhisattassa tiṇṇaṃ utūnaṃ anucchavike tayo pāsāde kāresi – ekaṃ navabhūmikaṃ, ekaṃ sattabhūmikaṃ, ekaṃ pañcabhūmikaṃ, cattālīsasahassā ca nāṭakitthiyo upaṭṭhāpesi. Bodhisatto devo viya accharāsaṅghaparivuto alaṅkatanāṭakitthīhi parivuto nippurisehi tūriyehi paricāriyamāno mahāsampattiṃ anubhavanto utuvārena tīsu pāsādesu vihāsi. Rāhulamātā panassa devī aggamahesī ahosi. Daraufhin wurde der Bodhisatta allmählich sechzehn Jahre alt. Der König ließ für den Bodhisatta drei Paläste erbauen, die den drei Jahreszeiten angemessen waren: einen neunstöckigen, einen siebenstöckigen und einen fünfstöckigen, und stellte vierzigtausend Tänzerinnen für seinen Dienst bereit. Wie ein Gott, umgeben von einer Schar von Nymphen, wurde der Bodhisatta von geschmückten Tänzerinnen umgeben; ohne dass Männer anwesend waren, wurde er von Musikinstrumenten unterhalten, genoss diese große Pracht und weilte je nach Jahreszeit in den drei Palästen. Die Mutter von Rāhula aber war seine königliche Gemahlin, die Hauptkönigin. Tassevaṃ mahāsampattiṃ anubhavantassa ekadivasaṃ ñātisaṅghassa abbhantare ayaṃ kathā udapādi – ‘‘siddhattho kīḷāpasutova vicarati, na kiñci sippaṃ sikkhati, saṅgāme paccupaṭṭhite kiṃ karissatī’’ti? Rājā bodhisattaṃ pakkosāpetvā [Pg.71] ‘‘tāta, tava ñātakā ‘siddhattho kiñci sippaṃ asikkhitvā kīḷāpasutova vicaratī’ti vadanti, ettha kiṃ sattu pattakāle maññasī’’ti? ‘‘Deva, mama sippaṃ sikkhanakiccaṃ natthi, nagare mama sippadassanatthaṃ bheriṃ carāpetha ‘ito sattame divase ñātakānaṃ sippaṃ dassessāmī’’’ti. Rājā tathā akāsi. Bodhisatto akkhaṇavedhivālavedhidhanuggahe sannipātāpetvā mahājanassa majjhe aññehi dhanuggahehi asādhāraṇaṃ ñātakānaṃ dvādasavidhaṃ sippaṃ dassesi. Taṃ sarabhaṅgajātake āgatanayeneva veditabbaṃ. Tadā tassa ñātisaṅgho nikkaṅkho ahosi. Während er so diese große Pracht genoss, entstand eines Tages in der Schar der Verwandten folgendes Gespräch: „Siddhattha lebt nur dem Spiel hingebend dahin und lernt keine Kunstfertigkeit. Wenn ein Krieg ausbricht, was wird er tun?“ Der König ließ den Bodhisatta rufen und sagte: „Mein Lieber, deine Verwandten sagen: ‚Siddhattha hat keine Kunst gelernt und verbringt seine Zeit nur mit Spielen.‘ Was meinst du, was geschehen wird, wenn die Feinde kommen?“ – „O König, für mich besteht keine Notwendigkeit, eine Kunst zu lernen. Lasst in der Stadt die Trommel schlagen, um meine Künste vorzuführen: ‚Am siebten Tag von heute an werde ich den Verwandten meine Kriegskunst zeigen.‘“ Der König tat entsprechend. Der Bodhisatta ließ Bogenschützen versammeln, die imstande waren, blitzschnell zu schießen und ein Haar zu spalten, und inmitten der großen Volksmenge zeigte er den Verwandten die zwölffache Kriegskunst des Bogenschießens, die für andere Bogenschützen unerreichbar war. Dies ist in der Weise zu verstehen, wie es im Sarabhaṅga-Jātaka dargelegt wird. Damals wurde die Schar seiner Verwandten frei von jeglichem Zweifel. Athekadivasaṃ bodhisatto uyyānabhūmiṃ gantukāmo sārathiṃ āmantetvā ‘‘rathaṃ yojehī’’ti āha. So ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā mahārahaṃ uttamarathaṃ sabbālaṅkārena alaṅkaritvā kumudapattavaṇṇe cattāro maṅgalasindhave yojetvā bodhisattassa paṭivedesi. Bodhisatto devavimānasadisaṃ rathaṃ abhiruhitvā uyyānābhimukho agamāsi. Devatā ‘‘siddhatthakumārassa abhisambujjhanakālo āsanno, pubbanimittaṃ dassessāmā’’ti ekaṃ devaputtaṃ jarājiṇṇaṃ khaṇḍadantaṃ palitakesaṃ vaṅkaṃ obhaggasarīraṃ daṇḍahatthaṃ pavedhamānaṃ katvā dassesuṃ. Taṃ bodhisatto ceva sārathi ca passanti. Tato bodhisatto, ‘‘samma, ko nāmesa puriso, kesāpissa na yathā aññesa’’nti mahāpadāne (dī. ni. 2.45) āgatanayena sārathiṃ pucchitvā tassa vacanaṃ sutvā ‘‘dhiratthu vata, bho, jāti, yatra hi nāma jātassa jarā paññāyissatī’’ti saṃviggahadayo tatova paṭinivattitvā pāsādameva abhiruhi. Rājā ‘‘kiṃ kāraṇā mama putto khippaṃ paṭinivattī’’ti pucchi. ‘‘Jiṇṇapurisaṃ disvā, devā’’ti. ‘‘Jiṇṇakaṃ disvā pabbajissatīti āhaṃsu, kasmā maṃ nāsetha, sīghaṃ puttassa nāṭakāni sajjetha, sampattiṃ anubhavanto pabbajjāya satiṃ na karissatī’’ti vatvā ārakkhaṃ vaḍḍhetvā sabbadisāsu addhayojane addhayojane ārakkhaṃ ṭhapesi. Eines Tages wünschte der Bodhisatta, in die Parkanlagen zu fahren. Er rief seinen Wagenlenker und sprach: „Spann den Wagen an!“ Dieser antwortete mit „Sehr wohl!“ und schmückte den kostbaren, herrlichen Wagen mit allerlei Zierrat. Er spannte vier glückbringende Sindh-Pferde an, die so weiß wie die Blütenblätter eines weißen Lotus waren, und meldete es dem Bodhisatta. Der Bodhisatta bestieg den Prachtwagen, der einem Götterpalast glich, und fuhr in Richtung des Parks. Da dachten die Gottheiten: „Die Zeit für die Erleuchtung des Prinzen Siddhattha ist nahe, wir wollen ihm ein Vorzeichen zeigen.“ Sie ließen einen Göttersohn als einen altersschwachen Greis mit abgebrochenen Zähnen, grauem Haar, gekrümmtem und hinfälligem Körper erscheinen, der sich auf einen Stab stützte und zitterte. Diesen erblickten sowohl der Bodhisatta als auch der Wagenlenker. Daraufhin fragte der Bodhisatta den Wagenlenker, gemäß der im Mahāpadāna-Sutta überlieferten Weise: „Freund, wer ist dieser Mann? Selbst seine Haare sind nicht wie die der anderen.“ Nachdem er die Antwort des Wagenlenkers vernommen hatte, sprach er, tief erschüttert im Herzen: „Wehe fürwahr der Geburt! Dass an einem Geborenen doch solches Altern in Erscheinung treten muss!“ Und er kehrte sogleich um und begab sich wieder auf seinen Palast. Der König fragte: „Aus welchem Grund ist mein Sohn so rasch umgekehrt?“ „Er hat einen Greis gesehen, o König“, hieß es. Da sprach der König: „Weil er einen Greis sah, wird er in die Hauslosigkeit ziehen, so sagten sie. Warum wollt ihr mich ins Verderben stürzen? Bereitet rasch die Tänzerinnen für meinen Sohn vor! Wenn er das Glück des Reichtums genießt, wird er nicht an das Ausziehen in die Hauslosigkeit denken.“ Nachdem er dies gesagt hatte, verstärkte er die Bewachung und stellte in allen Richtungen im Abstand von je einer halben Yojana Wachen auf. Punekadivasaṃ bodhisatto tatheva uyyānaṃ gacchanto devatābhinimmitaṃ byādhitaṃ purisaṃ disvā purimanayeneva pucchitvā saṃviggahadayo nivattitvā pāsādaṃ [Pg.72] abhiruhi. Rājāpi pucchitvā heṭṭhā vuttanayeneva saṃvidahitvā puna vaḍḍhetvā samantā tigāvutappamāṇe padese ārakkhaṃ ṭhapesi. Aparampi ekadivasaṃ bodhisatto tatheva uyyānaṃ gacchanto devatābhinimmitaṃ kālaṅkataṃ disvā purimanayeneva pucchitvā saṃviggahadayo puna nivattitvā pāsādaṃ abhiruhi. Rājāpi pucchitvā heṭṭhā vuttanayeneva saṃvidahitvā puna vaḍḍhetvā samantato yojanappamāṇe padese ārakkhaṃ ṭhapesi. Aparaṃ panekadivasaṃ uyyānaṃ gacchanto tatheva devatābhinimmitaṃ sunivatthaṃ supārutaṃ pabbajitaṃ disvā ‘‘ko nāmeso sammā’’hi sārathiṃ pucchi. Sārathi kiñcāpi buddhuppādassa abhāvā pabbajitaṃ vā pabbajitaguṇe vā na jānāti, devatānubhāvena pana ‘‘pabbajito nāmāyaṃ, devā’’ti vatvā pabbajjāya guṇe vaṇṇesi. Bodhisatto pabbajjāya ruciṃ uppādetvā taṃ divasaṃ uyyānaṃ agamāsi. Dīghabhāṇakā panāhu – ‘‘cattāripi nimittāni ekadivaseneva disvā agamāsī’’ti. Wiederum an einem anderen Tag sah der Bodhisatta auf dem Weg zum Park einen von den Göttern erschaffenen kranken Mann. Er fragte in der gleichen Weise wie zuvor, kehrte mit erschüttertem Herzen um und bestieg den Palast. Auch der König fragte nach, traf Vorkehrungen in genau derselben Weise wie zuvor, verstärkte die Wachen noch weiter und stellte sie ringsum im Abstand von drei Gāvutas auf. An einem weiteren Tag sah der Bodhisatta auf dem Weg zum Park einen von den Göttern erschaffenen Toten. Er fragte wie zuvor, kehrte mit erschüttertem Herzen um und bestieg den Palast. Auch der König fragte nach, traf Vorkehrungen in genau derselben Weise wie zuvor, verstärkte die Wachen noch weiter und stellte sie ringsum im Abstand von einer Yojana auf. An einem anderen Tag jedoch sah er auf dem Weg zum Park einen von den Göttern erschaffenen Asketen, der ordentlich gekleidet und verhüllt war. Er fragte den Wagenlenker: „Wer ist dieser Mann, mein Freund?“ Obwohl der Wagenlenker wegen des Ausbleibens des Erscheinens eines Buddhas weder einen Asketen noch die Vorzüge des Asketenlebens kannte, sprach er dennoch durch den Einfluss der Götter: „Dies ist ein in die Hauslosigkeit Gezogener, o Herr!“ und rühmte die Vorzüge des Hauslosenlebens. Der Bodhisatta fand Gefallen am Leben in der Hauslosigkeit und begab sich an jenem Tag in den Park. Die Dīgha-Rezitoren jedoch sagen: „Er sah alle vier Vorzeichen an ein und demselben Tag und ging.“ So tattha divasabhāgaṃ kīḷitvā maṅgalapokkharaṇiyaṃ nhāyitvā atthaṅgate sūriye maṅgalasilāpaṭṭe nisīdi attānaṃ alaṅkārāpetukāmo, athassa paricārakapurisā nānāvaṇṇāni dussāni nānappakārā ābharaṇavikatiyo mālāgandhavilepanāni ca ādāya samantā parivāretvā aṭṭhaṃsu. Tasmiṃ khaṇe sakkassa nisinnāsanaṃ uṇhaṃ ahosi. So ‘‘ko nu kho maṃ imamhā ṭhānā cāvetukāmosī’’ti upadhārento bodhisattassa alaṅkāretukāmataṃ ñatvā vissakammaṃ āmantesi – ‘‘samma vissakamma, siddhatthakumāro ajja aḍḍharattasamaye mahābhinikkhamanaṃ nikkhamissati, ayamassa pacchimo alaṅkāro, tvaṃ uyyānaṃ gantvā mahāpurisaṃ dibbālaṅkārehi alaṅkarohī’’ti. So ‘‘sādhū’’ti paṭissuṇitvā devānubhāvena taṅkhaṇaññeva bodhisattaṃ upasaṅkamitvā tasseva kappakasadiso hutvā dibbadussena bodhisattassa sīsaṃ veṭhesi. Bodhisatto hatthasamphasseneva ‘‘nāmaṃ manusso, devaputto aya’’nti aññāsi. Veṭhanena veṭhitamatte sīse moḷiyaṃ maṇiratanākārena dussasahassaṃ abbhuggañchi, puna veṭhentassa dussasahassanti dasakkhattuṃ veṭhentassa dasa dussasahassāni abbhuggacchiṃsu. ‘‘Sīsaṃ khuddakaṃ, dussāni bahūni[Pg.73], kathaṃ abbhuggatānī’’ti na cintetabbaṃ. Tesu hi sabbamahantaṃ āmalakapupphappamāṇaṃ, avasesāni kadambakapupphappamāṇāni ahesuṃ. Bodhisattassa sīsaṃ kiñjakkhagavacchitaṃ viya kuyyakapupphaṃ ahosi. Er vergnügte sich dort den verbleibenden Teil des Tages, badete im königlichen Prachtteich und setzte sich bei Sonnenuntergang auf die königliche Prachtsteinplatte, um sich schmücken zu lassen. Da umringten ihn seine Diener, die verschiedenfarbige Gewänder, mancherlei feine Schmuckstücke, Blumengirlanden, Wohlgerüche und Salben mitgebracht hatten. In jenem Augenblick wurde der Thron des Götterkönigs Sakka heiß. Er fragte sich: „Wer will mich wohl von dieser Stätte vertreiben?“ Als er die Lage prüfte, erkannte er den Wunsch des Bodhisatta, sich zu schmücken, und rief Vissakamma: „Freund Vissakamma, Prinz Siddhattha wird heute zur Mitternachtsstunde den großen Auszug in die Hauslosigkeit antreten. Dies ist sein letzter Schmuck. Geh in den Park und schmücke den Großen Mann mit himmlischem Schmuck!“ Dieser willigte mit „Sehr wohl!“ ein, begab sich durch die Macht der Götter im selben Augenblick zum Bodhisatta, nahm die Gestalt von dessen Friseur an und wand dem Bodhisatta ein himmlisches Tuch um das Haupt. Allein an der Berührung der Hand erkannte der Bodhisatta: „Dies ist kein Mensch, das ist ein Göttersohn.“ Sobald er den Turban einmal um das Haupt gewunden hatte, stiegen auf dem Haarschopf eintausend Lagen Stoff empor, die wie ein kostbares Juwel glänzten. Als er ihn weiter wand, kamen bei jedem Mal tausend Lagen hinzu, sodass bei zehnmaligem Winden zehntausend Lagen Stoff emporstiegen. Man soll nicht denken: „Das Haupt ist klein, der Stoffe sind viele – wie konnten sie dort emporsteigen?“ Denn die größte Windung hatte nur die Größe einer Myrobalanenblüte, die übrigen die Größe von Kadamba-Blüten. Das Haupt des Bodhisatta glich einer mit Blütenstaub gefüllten Kuyyaka-Blüte. Athassa sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitassa sabbatālāvacaresu sakāni sakāni paṭibhānāni dassayantesu, brāhmaṇesu ‘‘jayanandā’’tiādivacanehi, sutamaṅgalikādīsu ca nānappakārehi maṅgalavacanatthutighosehi sambhāventesu sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ taṃ rathavaraṃ abhiruhi. Tasmiṃ samaye ‘‘rāhulamātā puttaṃ vijātā’’ti sutvā suddhodanamahārājā ‘‘puttassa me tuṭṭhiṃ nivedethā’’ti sāsanaṃ pahiṇi. Bodhisatto taṃ sutvā ‘‘rāhu jāto, bandhanaṃ jāta’’nti āha. Rājā ‘‘kiṃ me putto avacā’’ti pucchitvā taṃ vacanaṃ sutvā ‘‘ito paṭṭhāya me nattā ‘rāhulakumāro’tveva nāma hotū’’ti āha. Als er nun mit allem Schmuck geziert war und all seine Musiker ihre jeweiligen Künste darboten, während die Brahmanen ihn mit Glückwünschen wie „Sieg und Freude!“ und verschiedenen Segenswünschen und Lobpreisungen feierten, bestieg er den prachtvoll geschmückten, vortrefflichen Wagen. Zu jener Zeit vernahm König Suddhodana die Nachricht: „Die Mutter Rāhulas hat einen Sohn geboren“, und sandte eine Botschaft mit den Worten: „Meldet meinem Sohn meine Freude darüber!“ Als der Bodhisatta dies hörte, sprach er: „Ein Rāhu (eine Fessel) ist geboren, eine Fessel ist entstanden!“ Der König fragte: „Was hat mein Sohn gesagt?“, und als er diese Worte hörte, sprach er: „Von heute an soll mein Enkel den Namen ‚Prinz Rāhula‘ tragen!“ Bodhisattopi kho rathavaraṃ āruyha atimahantena yasena atimanoramena sirisobhaggena nagaraṃ pāvisi. Tasmiṃ samaye kisāgotamī nāma khattiyakaññā uparipāsādavaratalagatā nagaraṃ padakkhiṇaṃ kurumānassa bodhisattassa rūpasiriṃ disvā pītisomanassajātā imaṃ udānaṃ udānesi – Auch der Bodhisatta bestieg den Prachtwagen und zog mit überaus großem Gefolge und in entzückender, herrlicher Pracht in die Stadt ein. Zu jener Zeit erblickte eine Kṣatriya-Jungfrau namens Kisāgotamī, die sich auf der obersten Terrasse des prächtigen Palastes befand, die Schönheit der Gestalt des Bodhisatta, der die Stadt umrundete. Von Freude und Heiterkeit erfüllt, stieß sie diesen feierlichen Ausruf aus: ‘‘Nibbutā nūna sā mātā, nibbuto nūna so pitā; Nibbutā nūna sā nārī, yassāyaṃ īdiso patī’’ti. (dha. sa. aṭṭha. nidānakathā); – „Friedvoll ist wahrlich jene Mutter, friedvoll ist wahrlich jener Vater, friedvoll ist wahrlich jene Frau, die einen solchen Gatten hat!“ Bodhisatto taṃ sutvā cintesi – ‘‘ayaṃ evamāha – ‘evarūpaṃ attabhāvaṃ passantiyā mātu hadayaṃ nibbāyati, pitu hadayaṃ nibbāyati, pajāpatiyā hadayaṃ nibbāyatī’ti. Kismiṃ nu kho nibbute hadayaṃ nibbutaṃ nāma hotī’’ti. Athassa kilesesu virattamanassa etadahosi – ‘‘rāgaggimhi nibbute nibbutaṃ nāma hoti, dosaggimhi nibbute nibbutaṃ nāma hoti, mohaggimhi nibbute nibbutaṃ nāma hoti, mānadiṭṭhiādīsu sabbakilesadarathesu nibbutesu nibbutaṃ nāma hotī’’ti. ‘‘Ayaṃ me sussavanaṃ sāveti, ahañhi nibbānaṃ gavesanto vicarāmi, ajjeva mayā gharāvāsaṃ chaḍḍetvā nikkhamma pabbajitvā nibbānaṃ gavesituṃ vaṭṭati, ayaṃ imissā ācariyabhāgo hotū’’ti [Pg.74] kaṇṭhato omuñcitvā kisāgotamiyā satasahassagghanakaṃ muttāhāraṃ pesesi. Sā ‘‘siddhatthakumāro mayi paṭibaddhacitto hutvā paṇṇākāraṃ pesetī’’ti somanassajātā ahosi. Als der Bodhisatta dies hörte, dachte er: „Sie sagt: ‚Beim Anblick einer solchen Gestalt wird das Herz der Mutter friedvoll, wird das Herz des Vaters friedvoll, wird das Herz der Ehefrau friedvoll.‘ Doch was muss erlöschen, damit das Herz wahrlich friedvoll genannt werden kann?“ Da dachte er, dessen Geist bereits von den Befleckungen abgewandt war: „Wenn das Feuer der Gier erloschen ist, wird es wahrlich friedvoll genannt; wenn das Feuer des Hasses erloschen ist, wird es wahrlich friedvoll genannt; wenn das Feuer der Verblendung erloschen ist, wird es wahrlich friedvoll genannt; wenn alle Qualen der Befleckungen wie Dünkel, falsche Ansichten und die übrigen erloschen sind, wird es wahrlich friedvoll genannt. Sie hat mich ein heilsames Wort hören lassen. Da ich auf der Suche nach dem Nibbāna umherwandere, ist es für mich angemessen, noch heute das Hausleben aufzugeben, in die Hauslosigkeit hinauszuziehen und das Nibbāna zu suchen. Dies soll ihr Lohn als meine Lehrerin sein.“ Daraufhin nahm er eine Perlenkette im Wert von einhunderttausend Goldstücken von seinem Hals und sandte sie Kisa Gotami. Sie dachte voller Freude: „Prinz Siddhattha hat sein Herz an mich verloren und sendet mir ein Geschenk.“ Bodhisattopi mahantena sirisobhaggena attano pāsādaṃ abhiruhitvā sirisayane nipajji. Tāvadeva ca naṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitā naccagītādīsu susikkhitā devakaññā viya rūpasobhaggappattā nāṭakitthiyo nānātūriyāni gahetvā samparivāretvā abhiramāpentiyo naccagītavāditāni payojayiṃsu. Bodhisatto kilesesu virattacittatāya naccādīsu anabhirato muhuttaṃ niddaṃ okkami. Tāpi itthiyo ‘‘yassatthāya mayaṃ naccādīni payojema, so niddaṃ upagato, idāni kimatthaṃ kilamissāmā’’ti gahitagahitāni tūriyāni ajjhottharitvā nipajjiṃsu, gandhatelappadīpā jhāyanti. Bodhisatto pabujjhitvā sayanapiṭṭhe pallaṅkena nisinno addasa tā itthiyo tūriyabhaṇḍāni avattharitvā niddāyantiyo – ekaccā paggharitakheḷā, kilinnagattā, ekaccā dante khādantiyo, ekaccā kākacchantiyo, ekaccā vippalapantiyo, ekaccā vivaṭamukhī, ekaccā apagatavatthā pākaṭabībhacchasambādhaṭṭhānā. So tāsaṃ taṃ vippakāraṃ disvā bhiyyosomattāya kāmesu virattacitto ahosi. Tassa alaṅkatapaṭiyattaṃ sakkabhavanasadisampi taṃ mahātalaṃ vividhanānākuṇapabharitaṃ āmakasusānaṃ viya upaṭṭhāsi, tayo bhavā ādittagehasadisā khādiṃsu – ‘‘upaddutaṃ vata, bho, upassaṭṭhaṃ vata, bho’’ti udānaṃ pavattesi, ativiyassa pabbajjāya cittaṃ nami. Auch der Bodhisatta stieg in großem herrschaftlichem Glanz zu seinem Palast hinauf und legte sich auf sein Prachtbett. In diesem Augenblick umringten ihn die Tänzerinnen, die mit allem Schmuck geschmückt, in Tanz und Gesang wohlgeschult und an Schönheit wie Götterjungfrauen waren. Sie hielten verschiedene Musikinstrumente und führten Tänze, Gesänge und Musik auf, um ihn zu erfreuen. Doch der Bodhisatta, dessen Geist von den Befleckungen abgewandt war, fand an Tanz und Musik kein Gefallen und schlief für eine Weile ein. Da dachten jene Frauen: „Derjenige, für den wir tanzen und singen, ist eingeschlafen; warum sollten wir uns jetzt noch abmühen?“ Sie legten die Instrumente, die sie hielten, beiseite und legten sich schlafen, während die Duftöllampen weiterbrannten. Als der Bodhisatta erwachte und sich im Lotossitz auf dem Bett aufrichtete, sah er jene schlafenden Frauen, die ihre Instrumente achtlos beiseite gelegt hatten: Bei einigen floss Speichel herab, der ihre Körper benetzte; einige knirschten mit den Zähnen; einige schnarchten laut; einige redeten wirr im Schlaf; bei einigen stand der Mund weit offen; bei einigen waren die Kleider verrutscht, sodass ihre abstoßenden intimen Körperteile enthüllt waren. Als er diesen unästhetischen Anblick sah, wandte sich sein Geist noch weitaus mehr von den Sinnengenüssen ab. Die prächtig geschmückte, weite Halle, die eigentlich der Wohnstatt des Götterkönigs Sakka glich, erschien ihm nun wie ein von verschiedenen Leichen erfüllter Friedhof, und die drei Welten des Daseins erschienen ihm wie ein brennendes Haus. Er stieß den feierlichen Ruf aus: „Ach, wie bedrängt ist es doch! Ach, wie heimgesucht ist es doch!“ Und sein Geist neigte sich überaus stark dem Hinausziehen in die Hauslosigkeit zu. So ‘‘ajjeva mayā mahābhinikkhamanaṃ nikkhamituṃ vaṭṭatī’’ti sayanā vuṭṭhāya dvārasamīpaṃ gantvā ‘‘ko etthā’’ti āha. Ummāre sīsaṃ katvā nipanno channo – ‘‘ahaṃ, ayyaputta, channo’’ti āha. ‘‘Ajjāhaṃ mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitukāmo, ekaṃ me assaṃ kappehī’’ti āha. So ‘‘sādhu, devā’’ti assabhaṇḍakaṃ gahetvā assasālaṃ gantvā gandhatelappadīpesu jalantesu sumanapaṭṭavitānassa heṭṭhā ramaṇīye bhūmibhāge ṭhitaṃ kaṇḍakaṃ assarājānaṃ disvā ‘‘ajja mayā imameva kappetuṃ vaṭṭatī’’ti kaṇḍakaṃ kappesi. So kappiyamānova aññāsi ‘‘ayaṃ kappanā ativiya gāḷhā, aññesu divasesu uyyānakīḷādigamanakāle kappanā viya na hoti[Pg.75], mayhaṃ ayyaputto ajja mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitukāmo bhavissatī’’ti. Tato tuṭṭhamānaso mahāhasitaṃ hasi, so saddo sakalanagaraṃ pattharitvā gaccheyya. Devatā pana naṃ sannirumbhitvā na kassaci sotuṃ adaṃsu. Er dachte: „Noch heute muss ich den großen Aufbruch wagen“, stand vom Bett auf, trat an die Tür und fragte: „Wer ist da?“ Channa, der seinen Kopf auf die Türschwelle gebettet hatte und dort schlief, antwortete: „Ich bin es, edler Herr, Channa.“ Der Bodhisatta sprach: „Heute will ich den großen Aufbruch wagen. Sattele mir ein Pferd.“ Er erwiderte: „Sehr wohl, mein Herr“, nahm das Pferdegeschirr, ging zum Pferdestall und sah beim Schein der brennenden Duftöllampen unter einem mit Jasminblüten geschmückten Baldachin auf einem schönen Platz Kanthaka, den König der Pferde, stehen. Er dachte: „Heute muss ich genau dieses Pferd satteln“, und schirrte Kanthaka an. Das Pferd merkte schon beim Anschirren: „Dieser Gurt sitzt überaus fest. Es ist nicht wie das Satteln an anderen Tagen, wenn wir in den Lustgarten reiten. Mein Herr will heute wohl den großen Aufbruch wagen.“ Vor Freude stieß er ein lautes Wiehern aus. Dieser Ton hätte die ganze Stadt erschüttern müssen, doch die Gottheiten fingen den Schall ab und ließen ihn von niemandem hören. Bodhisattopi kho channaṃ pesetvāva ‘‘puttaṃ tāva passissāmī’’ti cintetvā nisinnapallaṅkato uṭṭhāya rāhulamātuyā vasanaṭṭhānaṃ gantvā gabbhadvāraṃ vivari. Tasmiṃ khaṇe antogabbhe gandhatelappadīpo jhāyati, rāhulamātā sumanamallikādīnaṃ pupphānaṃ ambaṇamattena abhippakiṇṇe sayane puttassa matthake hatthaṃ ṭhapetvā niddāyati. Bodhisatto ummāre pādaṃ ṭhapetvā ṭhitakova oloketvā ‘‘sacāhaṃ deviyā hatthaṃ apanetvā mama puttaṃ gaṇhissāmi, devī pabujjhissati, evaṃ me gamanantarāyo bhavissati, buddho hutvāva āgantvā puttaṃ passissāmī’’ti pāsādatalato otari. Yaṃ pana jātakaṭṭhakathāyaṃ ‘‘tadā sattāhajāto rāhulakumāro hotī’’ti vuttaṃ, taṃ sesaṭṭhakathāsu natthi, tasmā idameva gahetabbaṃ. Nachdem der Bodhisatta Channa fortgeschickt hatte, dachte er: „Zuerst will ich meinen Sohn sehen.“ Er erhob sich von seinem Sitz, begab sich zum Gemach der Mutter Rāhulas und öffnete die Tür. In diesem Augenblick brannte im Inneren des Gemachs eine Duftöllampe. Die Mutter Rāhulas schlief auf einem mit einer Fülle von Jasmin- und Mallika-Blüten bestreuten Bett und hielt ihre Hand schützend auf dem Kopf ihres Sohnes. Der Bodhisatta blieb auf der Schwelle stehen, blickte hinein und dachte: „Wenn ich die Hand der Prinzessin beiseite schiebe, um meinen Sohn auf den Arm zu nehmen, wird sie aufwachen. Dadurch würde mein Aufbruch behindert. Erst wenn ich ein vollkommen Erwachter geworden bin, werde ich zurückkehren, um meinen Sohn zu sehen.“ Mit diesem Entschluss stieg er vom Palast hinunter. Was jedoch im Jātaka-Kommentar mit den Worten überliefert ist: „Zu jener Zeit war Prinz Rāhula sieben Tage alt“, findet sich in den anderen Kommentaren nicht; daher ist genau diese hier gegebene Darstellung als maßgeblich anzunehmen. Evaṃ bodhisatto pāsādatalā otaritvā assasamīpaṃ gantvā evamāha – ‘‘tāta kaṇḍaka, tvaṃ ajja ekarattiṃ maṃ tāraya, ahaṃ taṃ nissāya buddho hutvā sadevakaṃ lokaṃ tārayissāmī’’ti. Tato ullaṅghitvā kaṇḍakassa piṭṭhiṃ abhiruhi. Kaṇḍako gīvato paṭṭhāya āyāmena aṭṭhārasahattho hoti, tadanucchavikena ubbedhena samannāgato thāmajavasampanno sabbaseto dhotasaṅkhasadiso. So sace haseyya vā padasaddaṃ vā kareyya, saddo sakalanagaraṃ avatthareyya, tasmā devatā attano ānubhāvena tassa yathā na koci suṇāti, evaṃ hasitasaddaṃ sannirumbhitvā akkamanaakkamanapadavāre hatthatalāni upanāmesuṃ. Bodhisatto assavarassa piṭṭhivemajjhagato channaṃ assassa vāladhiṃ gāhāpetvā aḍḍharattasamaye mahādvārasamīpaṃ patto. Tadā pana rājā ‘‘evaṃ mama putto yāya kāyaci velāya nagaradvāraṃ vivaritvā nikkhamituṃ na sakkhissatī’’ti dvīsu dvārakavāṭesu ekekaṃ purisasahassena vivaritabbaṃ kāresi. Bodhisatto pana thāmabalasampanno hatthigaṇanāya koṭisahassahatthīnaṃ balaṃ dhāresi, purisagaṇanāya dasakoṭisahassapurisānaṃ [Pg.76] balaṃ dhāresi. So cintesi – ‘‘sace dvāraṃ na vivariyyati, ajja kaṇḍakassa piṭṭhe nisinnova vāladhiṃ gahetvā ṭhitena channena saddhiṃyeva kaṇḍakaṃ ūruhi nippīḷetvā aṭṭhārasahatthubbedhaṃ pākāraṃ uppatitvā atikkamissāmī’’ti. Channopi cintesi – ‘‘sace dvāraṃ na vivariyyati, ahaṃ attano sāmikaṃ ayyaputtaṃ khandhe nisīdāpetvā kaṇḍakaṃ dakkhiṇena hatthena kucchiyaṃ parikkhipanto upakacchantare katvā pākāraṃ uppatitvā atikkamissāmī’’ti. Kaṇḍakopi cintesi – ‘‘sace dvāraṃ na vivariyyati, ahaṃ attano sāmikaṃ piṭṭhe yathānisinnameva channena vāladhiṃ gahetvā ṭhitena saddhiṃyeva ukkhipitvā pākāraṃ uppatitvā atikkamissāmī’’ti. Sace dvāraṃ na vivareyya, yathācintitameva tesu tīsu janesu aññataro sampādeyya. Dvāre pana adhivatthā devatā dvāraṃ vivari. So stieg der Bodhisatta vom Palastdach herab, ging zu seinem Pferd und sprach so: „Lieber Kaṇḍaka, trage mich heute für eine einzige Nacht hinüber. Indem ich mich auf dich stütze, werde ich ein Buddha werden und die Welt samt den Göttern hinüberretten.“ Danach schwang er sich empor und bestieg den Rücken Kaṇḍakas. Kaṇḍaka war vom Hals an gemessen achtzehn Ellen lang, besaß eine dazu proportionale Höhe, war voll Kraft und Schnelligkeit, vollkommen weiß wie ein poliertes Muschelhorn. Wenn er gewiehert oder ein Hufgeräusch gemacht hätte, hätte dieses Geräusch die ganze Stadt erfüllt. Daher dämpften die Gottheiten durch ihre eigene Macht das Geräusch seines Wieherns, sodass es niemand hören konnte, und hielten bei jedem einzelnen Hufschritt ihre Handflächen unter seine Hufe. Als der Bodhisatta auf der Mitte des Rückens des edlen Pferdes saß, ließ er Channa den Schweif des Pferdes ergreifen und erreichte um Mitternacht die Nähe des großen Tores. Damals aber hatte der König in der Erwägung: „So wird mein Sohn zu keiner Zeit das Stadttor öffnen und entkommen können“, veranlasst, dass jeder der beiden Torflügel von tausend Männern geöffnet werden musste. Der Bodhisatta jedoch, der mit ungeheurer Stärke ausgestattet war, besaß die Kraft von zehn Milliarden Elefanten und nach Menschenzählung die Kraft von hundert Milliarden Männern. Er dachte: „Wenn das Tor nicht geöffnet wird, werde ich heute, während ich auf Kaṇḍakas Rücken sitze, zusammen mit Channa, der den Schweif hält, Kaṇḍaka mit meinen Oberschenkeln fest umklammern und über die achtzehn Ellen hohe Stadtmauer springen, um sie zu überwinden.“ Auch Channa dachte: „Wenn das Tor nicht geöffnet wird, werde ich meinen Herrn, den Prinzen, auf meine Schultern setzen, Kaṇḍaka mit meiner rechten Hand um den Bauch fassen, ihn unter meinen Arm nehmen und über die Stadtmauer springen, um sie zu überwinden.“ Auch Kaṇḍaka dachte: „Wenn das Tor nicht geöffnet wird, werde ich meinen Herrn, so wie er auf meinem Rücken sitzt, samt Channa, der den Schweif hält, emporheben und über die Stadtmauer springen, um sie zu überwinden.“ Wenn das Tor nicht geöffnet worden wäre, hätte gewiss einer dieser drei Akteure genau das vollbracht, was er sich vorgenommen hatte. Die Gottheit jedoch, die das Tor bewachte, öffnete das Tor. Tasmiṃyeva khaṇe māro pāpimā ‘‘bodhisattaṃ nivattessāmī’’ti āgantvā ākāse ṭhito āha – ‘‘mārisa, mā nikkhami, ito te sattame divase cakkaratanaṃ pātubhavissati, dvisahassaparittadīpaparivārānaṃ catunnaṃ mahādīpānaṃ rajjaṃ kāressasi, nivatta, mārisā’’ti. ‘‘Kosi tva’’nti? ‘‘Ahaṃ vasavattī’’ti. ‘‘Māra, jānāmahaṃ mayhaṃ cakkaratanassa pātubhāvaṃ, anatthikohaṃ rajjena, dasasahassilokadhātuṃ unnādetvā buddho bhavissāmī’’ti āha. Māro ‘‘ito dāni te paṭṭhāya kāmavitakkaṃ vā byāpādavitakkaṃ vā vihiṃsāvitakkaṃ vā cintitakāle jānissāmī’’ti otārāpekkho chāyā viya anugacchanto anubandhi. In eben diesem Augenblick kam Mara, der Böse, in der Absicht „Ich werde den Bodhisatta zur Umkehr bewegen“, stellte sich in den Himmel und sprach: „Edler Herr, ziehe nicht aus! Am siebten Tag von heute an wird dir das Rad-Juwel erscheinen. Du wirst die Herrschaft über die vier großen Kontinente, die von zweitausend kleinen Inseln umgeben sind, ausüben. Kehre um, edler Herr!“ „Wer bist du?“, fragte der Bodhisatta. „Ich bin Vasavatti“, antwortete er. „Mara, ich weiß um das Erscheinen meines Rad-Juwels. Doch ich begehre die Herrschaft nicht. Ich werde die zehntausend Weltensysteme erschüttern lassen und ein Buddha werden!“, sprach er. Mara dachte: „Von nun an werde ich aufpassen, wenn du einen Gedanken der Sinnlichkeit, des Übelwollens oder der Grausamkeit hegst“, und lauerte auf eine Schwachstelle, während er ihm wie ein Schatten folgte. Bodhisattopi hatthagataṃ cakkavattirajjaṃ kheḷapiṇḍaṃ viya anapekkho chaḍḍetvā mahantena sakkārena nagarā nikkhami. Āsāḷhipuṇṇamāya uttarāsāḷhanakkhatte vattamāne, nikkhamitvā ca puna nagaraṃ apaloketukāmo jāto. Evañca panassa citte uppannamatteyeva – ‘‘mahāpurisa, na tayā nivattetvā olokanakammaṃ kata’’nti vadamānā viya mahāpathavī kulālacakkaṃ viya chijjitvā parivatti. Bodhisatto nagarābhimukho ṭhatvā nagaraṃ oloketvā tasmiṃ pathavippadese kaṇḍakanivattanacetiyaṭṭhānaṃ dassetvā gantabbamaggābhimukhaṃ kaṇḍakaṃ katvā pāyāsi mahantena sakkārena uḷārena sirisobhaggena. Tadā kirassa devatā purato saṭṭhi ukkāsahassāni dhārayiṃsu, pacchato saṭṭhi[Pg.77], dakkhiṇapassato saṭṭhi, vāmapassato saṭṭhīti. Aparā devatā cakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ aparimāṇā ukkā dhārayiṃsu. Aparā devatā ca nāgasupaṇṇādayo ca dibbehi gandhehi mālāhi cuṇṇehi dhūpehi pūjayamānā gacchanti, pāricchattakapupphehi ceva mandāravapupphehi ca ghanameghavuṭṭhikāle dhārāhi viya nabhaṃ nirantaraṃ ahosi, dibbāni saṃgītāni pavattiṃsu, samantato aṭṭha tūriyāni, saṭṭhi tūriyānīti aṭṭhasaṭṭhi tūriyasatasahassāni pavattayiṃsu. Tesaṃ saddo samuddakucchiyaṃ meghadhanitakālo viya, yugandharakucchiyaṃ sāgaranigghosakālo viya ca vattati. Auch der Bodhisatta warf die ihm greifbar nahe Weltherrschaft wie einen Speichelklumpen achtlos weg und zog unter großen Ehrenbezeugungen aus der Stadt aus. Er zog am Vollmondtag des Monats Āsāḷha aus, während das Uttarāsāḷha-Gestirn am Himmel stand. Nachdem er ausgezogen war, überkam ihn der Wunsch, noch einmal auf die Stadt zurückzublicken. Kaum war dieser Gedanke in seinem Geist entstanden, da drehte sich die große Erde wie die Scheibe eines Töpfers im Kreis, als wolle sie sagen: „O großer Mann, du brauchst dich nicht umzudrehen, um zurückzublicken!“ Der Bodhisatta blieb mit dem Gesicht zur Stadt gewandt stehen, blickte auf die Stadt zurück, wies an jener Stelle der Erde auf den Ort hin, an dem später der Schrein der Umkehr Kaṇḍakas stehen sollte, wendete Kaṇḍaka wieder in Richtung des einzuschlagenden Weges und zog unter großen Ehrenbezeugungen, in erhabener Pracht und Herrlichkeit weiter. Damals, so heißt es, hielten Gottheiten sechzigtausend Fackeln vor ihm, sechzigtausend hinter ihm, sechzigtausend zu seiner Rechten und sechzigtausend zu seiner Linken. Andere Gottheiten hielten unzählige Fackeln auf dem Rand des Weltraums. Wieder andere Gottheiten sowie Nagas, Garudas und andere Wesen zogen einher, während sie ihn mit himmlischen Düften, Blumen, Pulvern und Räucherwerk verehrten. Der Himmel war ununterbrochen von himmlischen Korallenbaumblüten und Mandārava-Blumen erfüllt, ähnlich wie Ströme von Regen bei einem dichten Wolkenbruch. Himmlische Gesänge erklangen, und ringsumher wurden achtundsechzigmal hunderttausend Musikinstrumente zum Klingen gebracht. Ihr Schall war wie das Grollen von Donner im Inneren des Ozeans oder wie das Tosen des Meeres in den Tälern des Yugandhara-Gebirges. Iminā sirisobhaggena gacchanto bodhisatto ekaratteneva tīṇi rajjāni atikkamma tiṃsayojanamatthake anomānadītīraṃ pāpuṇi. Kiṃ pana asso tato paraṃ gantuṃ na sakkotīti? No na sakkoti. So hi ekaṃ cakkavāḷagabbhaṃ nābhiyā ṭhitacakkassa nemivaṭṭiṃ maddanto viya antantena caritvā purepātarāsameva āgantvā attano sampāditaṃ bhattaṃ bhuñjituṃ samattho. Tadā pana devanāgasupaṇṇādīhi ākāse ṭhatvā ossaṭṭhehi gandhamālādīhi yāva ūruppadesā sañchannasarīraṃ ākaḍḍhitvā gandhamālājaṭaṃ chindantassa atipapañco ahosi, tasmā tiṃsayojanamattameva agamāsi. Atha bodhisatto nadītīre ṭhatvā channaṃ pucchi – ‘‘kā nāma ayaṃ nadī’’ti? ‘‘Anomā nāma, devā’’ti. ‘‘Amhākampi pabbajjā anomā bhavissatī’’ti paṇhiyā ghaṭṭento assassa saññaṃ adāsi. Asso ca uppatitvā aṭṭhusabhavitthārāya nadiyā pārimatīre aṭṭhāsi. In dieser Pracht und Herrlichkeit dahinschreitend, durchquerte der Bodhisatta in einer einzigen Nacht drei Königreiche und erreichte in einer Entfernung von dreißig Yojanas das Ufer des Flusses Anomā. Konnte das Pferd etwa nicht weiter als bis dahin laufen? Nein, das ist nicht so; es konnte es durchaus. Denn es wäre imstande gewesen, den gesamten Raum eines Weltensystems zu umrunden – gleichsam wie man den Felgenkranz eines Rades umkreist, dessen Nabe feststeht – und noch vor dem Frühstück zurückzukehren, um sein bereitetes Futter zu fressen. Da jedoch sein Körper durch die von den Gottheiten, Nagas, Garudas und anderen Wesen aus der Luft herabgestreuten Düfte und Blumenkränze bis zu den Oberschenkeln bedeckt war, entstand durch das Durchschneiden dieses dichten Geflechts aus Düften und Blumen eine große Verzögerung. Aus diesem Grund legte er nur genau dreißig Yojanas zurück. Nun blieb der Bodhisatta am Flussufer stehen und fragte Channa: „Wie heißt dieser Fluss?“ „Er heißt Anomā, o Herr“, antwortete er. „Auch unsere Zuflucht zur Hauslosigkeit wird hervorragend sein“, sprach er, gab dem Pferd einen sanften Stoß mit der Ferse und gab ihm so ein Signal. Und das Pferd sprang ab und landete am jenseitigen Ufer des Flusses, der eine Breite von acht Usabhas maß. Bodhisatto assapiṭṭhito oruyha rajatapaṭṭasadise vāḷukāpuline ṭhatvā channaṃ āmantesi – ‘‘samma channa, tvaṃ mayhaṃ ābharaṇāni ceva kaṇḍakañca ādāya gaccha, ahaṃ pabbajissāmī’’ti. ‘‘Ahampi, deva, pabbajissāmī’’ti. Bodhisatto ‘‘na labbhā tayā pabbajituṃ, gaccheva tva’’nti tikkhattuṃ paṭibāhitvā ābharaṇāni ceva kaṇḍakañca paṭicchāpetvā cintesi – ‘‘ime mayhaṃ kesā samaṇasāruppā na honti, añño bodhisattassa kese chindituṃ yuttarūpo natthī’’ti. Tato ‘‘sayameva khaggena chindissāmī’’ti dakkhiṇena hatthena asiṃ gahetvā vāmahatthena moḷiyā saddhiṃ cūḷaṃ gahetvā chindi. Kesā dvaṅgulamattā hutvā dakkhiṇato āvaṭṭamānā sīsaṃ [Pg.78] allīyiṃsu. Tesaṃ yāvajīvaṃ tadeva pamāṇaṃ ahosi, massu ca tadanurūpaṃ, puna kesamassuohāraṇakiccaṃ nāma nāhosi. Bodhisatto saha moḷiyā cūḷaṃ gahetvā ‘‘sacāhaṃ sambuddho bhavissāmi, ākāse tiṭṭhatu. No ce, bhūmiyaṃ patatū’’ti antalikkhe khipi. Sā cūḷā yojanappamāṇaṃ ṭhānaṃ abbhuggantvā ākāse aṭṭhāsi. Sakko devarājā dibbacakkhunā oloketvā yojaniyaratanacaṅkoṭakena sampaṭicchitvā tāvatiṃsabhavane cūḷāmaṇicetiyaṃ nāma patiṭṭhāpesi. Der Bodhisatta stieg vom Rücken des Pferdes herab, stellte sich auf eine Sandbank, die einer Silberplatte glich, und rief Channa: „Mein lieber Channa, nimm meinen Schmuck sowie Kanthaka und geh. Ich werde in die Hauslosigkeit hinausgehen.“ – „Auch ich, o Herr, werde in die Hauslosigkeit hinausgehen“, sprach dieser. Der Bodhisatta wies ihn dreimal ab mit den Worten: „Es ist dir nicht gestattet, in die Hauslosigkeit hinauszugehen. Geh du nur.“ Nachdem er ihm den Schmuck und Kanthaka übergeben hatte, dachte er: „Diese meine Haare sind für einen Asketen nicht angemessen, und es gibt keinen anderen, der geeignet wäre, die Haare des Bodhisatta zu schneiden.“ Daraufhin dachte er: „Ich selbst werde sie mit dem Schwert abschneiden“, ergriff mit der rechten Hand das Schwert, hielt mit der linken Hand das Haarbüschel mitsamt dem Haarknoten fest und schnitt es ab. Die Haare wurden zwei Finger breit lang, drehten sich nach rechts und schmiegten sich an das Haupt. Diese Länge behielten sie lebenslang bei, und auch der Bart passte dazu; ein weiteres Scheren von Haar und Bart war hinfort nicht mehr nötig. Der Bodhisatta ergriff das Haarbüschel samt dem Haarknoten und warf es mit dem Entschluss in die Luft: „Wenn ich ein vollkommen Erwachter sein werde, möge es am Himmel stehen bleiben. Wenn nicht, möge es auf die Erde fallen!“ Dieses Haarbüschel stieg ein Yojana weit empor und verblieb am Himmel. Sakka, der Götterkönig, sah dies mit dem göttlichen Auge, fing das Haarbüschel in einem ein Yojana großen, juwelengeschmückten Korb auf und errichtete im Tāvatiṃsa-Himmel die Cūḷāmaṇi-Pagode. ‘‘Chetvāna moḷiṃ varagandhavāsitaṃ, vehāyasaṃ ukkhipi sakyapuṅgavo; Sahassanetto sirasā paṭiggahi, ratanacaṅkoṭavarena vāsavo’’ti. (ma. ni. aṭṭha. 1.222); „Nachdem er den mit edlem Duft parfümierten Haarknoten abgeschnitten hatte, warf der Stier aus dem Sakya-Geschlecht ihn in die Luft empor; der Tausendäugige Vāsava empfing ihn ehrfurchtsvoll auf seinem Haupt in einem edlen Juwelenkorb.“ Puna bodhisatto cintesi – ‘‘imāni kāsikavatthāni mayhaṃ na samaṇasāruppānī’’ti. Athassa kassapabuddhakāle purāṇasahāyako ghaṭikāramahābrahmā ekaṃ buddhantaraṃ jaraṃ appattena mittabhāvena cintesi – ‘‘ajja me sahāyako mahābhinikkhamanaṃ nikkhanto, samaṇaparikkhāramassa gahetvā gacchissāmī’’ti. Wiederum dachte der Bodhisatta: „Diese kōsischen Gewänder sind für mich als Asketen nicht angemessen.“ Da dachte sein einstiger Gefährte zur Zeit des Buddha Kassapa, der große Brahma Ghaṭīkāra, dessen Freundschaft, die eine ganze Buddha-Zwischenzeit überdauert hatte, nicht gealtert war: „Heute ist mein Freund zum Großen Aufbruch ausgezogen; ich will ihm die Requisiten eines Asketen bringen.“ ‘‘Ticīvarañca patto ca, vāsī sūci ca bandhanaṃ; Parissāvanena aṭṭhete, yuttayogassa bhikkhūno’’ti. – „Die drei Gewänder, die Almosenschale, das Rasiermesser, die Nadel, der Gürtel mitsamt dem Wasserfilter – diese acht sind die Requisiten für einen Bhikkhu, der sich der geistigen Übung widmet.“ Ime aṭṭha parikkhāre āharitvā adāsi. Bodhisato arahaddhajaṃ nivāsetvā uttamapabbajitavesaṃ gaṇhitvā ‘‘channa, tvaṃ mama vacanena mātāpitūnaṃ ārogyaṃ vadehī’’ti vatvā uyyojesi. Channo bodhisattaṃ vanditvā padakkhiṇaṃ katvā pakkāmi. Kaṇḍako pana channena saddhiṃ mantayamānassa bodhisattassa vacanaṃ suṇantova ‘‘natthi dāni mayhaṃ puna sāmino dassana’’nti cintetvā cakkhupathaṃ vijahanto sokaṃ adhivāsetuṃ asakkonto hadayena phalitena kālaṃ katvā tāvatiṃsabhavane kaṇḍako nāma devaputto hutvā nibbatti. Channassa paṭhamaṃ ekova soko ahosi, kaṇḍakassa pana kālakiriyāya dutiyena sokena pīḷito rodanto paridevanto nagaraṃ agamāsi. Er brachte diese acht Requisiten und gab sie ihm. Der Bodhisatta legte das Banner der Arahantschaft an, nahm die edle Gestalt eines in die Hauslosigkeit Hinausgetretenen an und entließ Channa mit den Worten: „Channa, richte meinen Eltern in meinem Namen Grüße aus und melde ihnen, dass es mir gut geht.“ Channa verneigte sich vor dem Bodhisatta, umwandelte ihn ehrfurchtsvoll rechtsherum und ging fort. Kanthaka aber, der den Worten des Bodhisatta lauschte, während dieser mit Channa sprach, dachte: „Nun gibt es für mich kein Wiedersehen mit meinem Herrn mehr.“ Als der Bodhisatta aus seinem Blickfeld entschwand, konnte er den Schmerz nicht ertragen; sein Herz brach, er starb und wurde im Tāvatiṃsa-Himmel als Göttersohn namens Kanthaka wiedergeboren. Channa hatte anfangs nur einen einzigen Schmerz, doch durch das Ableben Kanthakas von einem zweiten Schmerz geplagt, kehrte er weinend und klagend in die Stadt zurück. Bodhisatto [Pg.79] pabbajitvā tasmiṃyeva padese anupiyaṃ nāma ambavanaṃ atthi, tattha sattāhaṃ pabbajjāsukhena vītināmetvā ekadivaseneva tiṃsayojanamaggaṃ padasā gantvā rājagahaṃ pāvisi. Pavisitvā ca sapadānaṃ piṇḍāya cari. Sakalanagaraṃ bodhisattassa rūpadassaneneva dhanapālake paviṭṭhe rājagahaṃ viya ca, asurinde paviṭṭhe devanagaraṃ viya ca saṅkhobhaṃ agamāsi. Rājapurisā gantvā ‘‘deva, evarūpo nāma satto nagare piṇḍāya carati, ‘devo vā manusso vā nāgo vā supaṇṇo vā asuko nāma eso’ti na jānāmā’’ti ārocesuṃ. Rājā pāsādatale ṭhatvā mahāpurisaṃ disvā acchariyabbhutacitto purise āṇāpesi – ‘‘gacchatha, bhaṇe, vīmaṃsatha, sace amanusso bhavissati, nagarā nikkhamitvā antaradhāyissati, sace devatā bhavissati, ākāsena gacchissati, sace nāgo bhavissati, pathaviyaṃ nimujjitvā gamissati, sace manusso bhavissati, yathāladdhaṃ bhikkhaṃ paribhuñjissatī’’ti. Nachdem der Bodhisatta die Hauslosigkeit angetreten hatte, verbrachte er in jener Gegend in einem Mango-Hain namens Anupiya sieben Tage im Glück der Hauslosigkeit. An einem einzigen Tag legte er einen Weg von dreißig Yojana zu Fuß zurück und betrat Rājagaha. Nachdem er hineingegangen war, ging er der Reihe nach von Haus zu Haus um Almosenspeise. Die ganze Stadt geriet allein durch den Anblick der Gestalt des Bodhisatta in Aufruhr – so wie Rājagaha, wenn der Elefant Dhanapālaka eindringt, oder wie die Götterstadt, wenn der Asuren-König eintritt. Die königlichen Boten begaben sich zum König und berichteten: „O König, ein solches Wesen zieht in der Stadt um Almosenspeise umher. Ob es ein Gott, ein Mensch, ein Nāga, ein Supaṇṇa oder wer sonst ist, wissen wir nicht.“ Der König stand auf der Terrasse des Palastes, erblickte den Großen Mann und befahl den Männern voll Staunen und Verwunderung: „Geht, ihr Männer, untersucht es! Wenn es ein Nicht-Mensch ist, wird er nach dem Verlassen der Stadt verschwinden. Wenn es eine Gottheit ist, wird er durch die Luft entweichen. Wenn es ein Nāga ist, wird er in die Erde eintauchen und davonziehen. Wenn es ein Mensch ist, wird er die empfangene Almosenspeise verzehren.“ Mahāpurisopi kho missakabhattaṃ saṃharitvā ‘‘alaṃ me ettakaṃ yāpanāyā’’ti ñatvā paviṭṭhadvāreneva nagarā nikkhamitvā paṇḍavapabbatacchāyāyaṃ puratthimābhimukho nisīditvā āhāraṃ paribhuñjituṃ āraddho. Athassa antāni parivattitvā mukhena nikkhamanākārappattāni ahesuṃ. Tato so tena attabhāvena evarūpassa āhārassa cakkhunāpi adiṭṭhapubbatāya tena paṭikūlāhārena aṭṭīyamānopi evaṃ attanā eva attānaṃ ovadi – ‘‘siddhattha, tvaṃ sulabhaannapāne kule tivassikagandhasālibhojanaṃ nānaggarasehi bhuñjanaṭṭhāne nibbattitvāpi ekaṃ paṃsukūlikaṃ disvā ‘kadā nu kho ahampi evarūpo hutvā piṇḍāya caritvā bhuñjissāmi, bhavissati nu kho me so kālo’ti cintetvā nikkhanto, idāni kinnāmetaṃ karosī’’ti evaṃ attānaṃ ovaditvā nibbikāro hutvā āhāraṃ paribhuñji. Auch der Große Mann sammelte die gemischte Speise und dachte: „Dies reicht für meinen Lebensunterhalt aus.“ Er verließ die Stadt durch dasselbe Tor, durch das er hineingegangen war, setzte sich im Schatten des Paṇḍava-Berges mit dem Gesicht nach Osten gewandt nieder und schickte sich an, die Nahrung zu verzehren. Da drehten sich seine Eingeweide um und schickten sich an, durch den Mund heraustreten zu wollen. Da er in dieser Existenz eine solche Nahrung noch nie zuvor mit Augen gesehen hatte, war er von dieser widerwärtigen Speise angewidert, doch er tadelte sich selbst wie folgt: „Siddhattha, obwohl du in einer Familie geboren wurdest, in der Essen und Trinken leicht im Überfluss zu haben waren, wo du dreijährigen, duftenden Sāli-Reis mit erlesensten Aromen speistest, hast du doch beim Anblick eines Lumpenträgers gedacht: ‚Wann wohl werde auch ich so einer werden, um Almosenspeise umherziehen und essen? Wird diese Zeit wohl für mich kommen?‘ Mit diesem Gedanken bist du ausgezogen. Warum verhältst du dich jetzt so?“ Nachdem er sich so ermahnt hatte, aß er die Nahrung unerschüttert auf. Rājapurisā taṃ pavattiṃ disvā gantvā rañño ārocesuṃ. Rājā dūtavacanaṃ sutvā vegena nagarā nikkhamitvā bodhisattassa santikaṃ gantvā iriyāpathasmiṃyeva pasīditvā bodhisattassa sabbaṃ issariyaṃ niyyātesi. Bodhisatto ‘‘mayhaṃ, mahārāja, vatthukāmehi vā kilesakāmehi vā attho natthi, ahaṃ paramābhisambodhiṃ patthayanto nikkhanto’’ti āha. Rājā anekappakāraṃ yācantopi tassa cittaṃ alabhitvā ‘‘addhā tvaṃ buddho bhavissasi[Pg.80], buddhabhūtena pana tayā paṭhamaṃ mama vijitaṃ āgantabba’’nti paṭiññaṃ gaṇhi. Ayamettha saṅkhepo, vitthāro pana ‘‘pabbajjaṃ kittayissāmi, yathā pabbaji cakkhumā’’ti imaṃ pabbajjāsuttaṃ (su. ni. 407) saddhiṃ aṭṭhakathāya oloketvā veditabbo. Als die königlichen Boten dieses Ereignis sahen, gingen sie und berichteten es dem König. Als der König die Worte der Boten hörte, verließ er eilends die Stadt, begab sich zum Bodhisatta, fand sogleich Wohlgefallen an dessen würdevoller Haltung und bot dem Bodhisatta seine gesamte Herrschaft an. Der Bodhisatta sprach: „O Großkönig, ich habe kein Verlangen nach den Objekten der Sinnlichkeit oder den Befleckungen der Sinnlichkeit. Ich bin ausgezogen, um die höchste vollkommene Erleuchtung anzustreben.“ Obwohl der König ihn auf vielfältige Weise bat, konnte er seinen Sinn nicht ändern. Er sagte schließlich: „Gewiss wirst du ein Buddha werden. Doch wenn du ein Buddha geworden bist, musst du zuerst mein Reich besuchen.“ So erhielt er das Versprechen. Dies ist hier die kurze Zusammenfassung. Die ausführliche Darstellung hingegen ist zu verstehen, indem man dieses Pabbajjā-Sutta („Ich will die Hauslosigkeit preisen, wie der Sehende in die Hauslosigkeit hinausging“) zusammen mit seinem Kommentar liest. Bodhisattopi kho rañño paṭiññaṃ datvā anupubbena cārikaṃ caramāno āḷārañca kālāmaṃ udakañca rāmaputtaṃ upasaṅkamitvā samāpattiyo nibbattetvā ‘‘nāyaṃ maggo bodhāyā’’ti tampi samāpattibhāvanaṃ analaṅkaritvā sadevakassa lokassa attano thāmavīriyasandassanatthaṃ mahāpadhānaṃ padahitukāmo uruvelaṃ gantvā ‘‘ramaṇīyo vatāyaṃ bhūmibhāgo’’ti tattheva vāsaṃ upagantvā mahāpadhānaṃ padahi. Tepi kho koṇḍaññappamukhā pañcavaggiyā gāmanigamarājadhānīsu bhikkhāya carantā tattha bodhisattaṃ sampāpuṇiṃsu. Atha naṃ chabbassāni mahāpadhānaṃ padahantaṃ ‘‘idāni buddho bhavissati, idāni buddho bhavissatī’’ti pariveṇasammajjanādikāya vattapaṭipattiyā upaṭṭhahamānā santikāvacarā ahesuṃ. Bodhisattopi kho ‘‘koṭippattaṃ dukkarakārikaṃ karissāmī’’ti ekatilataṇḍulādīhipi vītināmesi, sabbasopi āhārupacchedanaṃ akāsi. Devatāpi lomakūpehi ojaṃ upasaṃharamānā pakkhipiṃsu. Als der Bodhisattva dem König [Bimbisāra] das Versprechen [zur Rückkehr] gegeben hatte, wanderte er allmählich umher, suchte Āḷāra Kālāma und Udaka, den Sohn Rāmas, auf, erlangte die meditativen Errungenschaften und dachte: "Dies ist nicht der Weg zur Erleuchtung." Ohne sich mit dieser Entfaltung der Errungenschaften zu begnügen, wünschte er, der Welt samt ihren Göttern seine eigene Willensstärke und Tatkraft zu zeigen. Um die große Anstrengung auf sich zu nehmen, begab er sich nach Uruvelā, dachte: "Lieblich wahrlich ist dieser Landstrich!", ließ sich ebendort nieder und übte die große Anstrengung aus. Auch jene fünf Asketen der Gruppe, angeführt von Koṇḍañña, die in den Dörfern, Marktflecken und Königsstädten auf Almosenrunde gingen, trafen dort auf den Bodhisattva. Während er nun sechs Jahre lang die große Anstrengung ausübte, blieben sie in seiner Nähe und dienten ihm mit Pflichten wie dem Fegen seines Hofes und anderen Dienstleistungen, indem sie dachten: "Nun wird er ein Buddha werden, nun wird er ein Buddha werden!" Auch der Bodhisattva dachte: "Ich werde die extreme Askese bis zum Äußersten treiben", und verbrachte seine Zeit, indem er sich nur von einem einzigen Sesamkorn, einem einzigen Reiskorn und Ähnlichem ernährte; schließlich stellte er jegliche Nahrungsaufnahme völlig ein. Doch die Gottheiten führten ihm feine Lebenskraft durch die Poren seiner Haut zu und träufelten sie ein. Athassa tāya nirāhāratāya paramakasirappattatāya suvaṇṇavaṇṇopi kāyo kāḷavaṇṇo ahosi, dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇāni paṭicchannāni ahesuṃ. Appekadā ānāpānakajjhānaṃ jhāyanto mahāvedanābhitunno visaññībhūto caṅkamanakoṭiyaṃ patati. Atha naṃ ekaccā devatā ‘‘kālaṅkato samaṇo gotamo’’ti vadanti. Ekaccā ‘‘vihārotveveso arahata’’nti ca āhaṃsu. Tattha yāsaṃ ‘‘kālaṅkato’’ti saññā ahosi, tā gantvā suddhodanamahārājassa ārocesuṃ – ‘‘tumhākaṃ putto kālaṅkato’’ti. ‘‘Mama putto buddho hutvā kālaṅkato, ahutvā’’ti? ‘‘Buddho bhavituṃ nāsakkhi, padhānabhūmiyaṃyeva patitvā kālaṅkato’’ti. Idaṃ sutvā rājā – ‘‘nāhaṃ saddahāmi, mama [Pg.81] puttassa bodhiṃ appatvā kālakiriyā nāma natthī’’ti paṭikkhipi. ‘‘Kasmā pana rājā na saddahatī’’ti? Kāladevalatāpasavandāpanadivase jamburukkhamūle ca pāṭihāriyānaṃ diṭṭhattā. Aufgrund dieser Nahrungslosigkeit und der dadurch bewirkten äußersten Entbehrung wurde sein goldfarbener Körper schwarz, und die zweiunddreißig Merkmale eines Großen Mannes wurden unsichtbar. Manchmal verlor er, während er die Meditation über Ein- und Ausatmung übte, von heftigsten Schmerzen gepeinigt das Bewusstsein und brach am Ende des Wandelpfades zusammen. Da sagten einige Gottheiten über ihn: "Der Asket Gotama ist gestorben." Andere wiederum sagten: "Dies ist gewiss nur das Verweilen eines Arahants." Unter diesen begaben sich jene, die dachten, er sei gestorben, zum großen König Suddhodana und berichteten ihm: "Euer Sohn ist gestorben." "Ist mein Sohn gestorben, nachdem er ein Buddha geworden ist, oder ohne es zu werden?", fragte der König. "Er konnte kein Buddha werden; er ist mitten auf dem Platz der Anstrengung zusammengebrochen und verstorben." Als der König dies hörte, wies er es zurück und sagte: "Ich glaube das nicht. Es gibt kein Sterben für meinen Sohn, ohne dass er die Erleuchtung erlangt hat." Warum aber glaubte der König es nicht? Weil er am Tag der Huldigung durch den Asketen Kāladevala und unter dem Jambulbaum die Wunderzeichen gesehen hatte. Puna bodhisatte saññaṃ paṭilabhitvā uṭṭhite tā devatā gantvā ‘‘arogo te, mahārāja, putto’’ti ārocesuṃ. Rājā ‘‘jānāmahaṃ mama puttassa amaraṇabhāva’’nti vadati. Mahāsattassa chabbassāni dukkarakārikaṃ karontasseva ākāse gaṇṭhikaraṇakālo viya ahosi. So ‘‘ayaṃ dukkarakārikā nāma bodhāya maggo na hotī’’ti oḷārikaṃ āhāraṃ āhāretuṃ gāmanigamesu piṇḍāya caritvā āhāraṃ āhari. Athassa dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇāni pākatikāni ahesuṃ, kāyopi suvaṇṇavaṇṇo ahosi. Pañcavaggiyā bhikkhū ‘‘ayaṃ chabbassāni dukkarakārikaṃ karontopi sabbaññutaṃ paṭivijjhituṃ nāsakkhi, idāni gāmanigamādīsu piṇḍāya caritvā oḷārikaṃ āhāraṃ āharamāno kiṃ sakkhissati, bāhuliko esa padhānavibbhanto, sīsaṃ nhāyitukāmassa ussāvabindutakkanaṃ viya amhākaṃ etassa santikā visesatakkanaṃ, kiṃ no iminā’’ti mahāpurisaṃ pahāya attano attano pattacīvaraṃ gahetvā aṭṭhārasayojanamaggaṃ gantvā isipatanaṃ pavisiṃsu. Als der Bodhisattva das Bewusstsein wiedererlangt hatte und aufgestanden war, gingen jene Gottheiten wieder hin und berichteten: "Großer König, dein Sohn ist wohlauf." Der König sagte: "Ich wusste wohl, dass mein Sohn nicht stirbt." Die sechs Jahre, in denen das Große Wesen diese extreme Askese betrieb, waren für ihn wie das Knüpfen von Knoten in die Luft. Er erkannte: "Diese extreme Askese ist wahrlich nicht der Weg zur Erleuchtung", und um feste Nahrung zu sich zu nehmen, zog er in Dörfern und Marktflecken auf Almosenrunde und nahm Nahrung zu sich. Da traten die zweiunddreißig Merkmale eines Großen Mannes wieder deutlich hervor, und auch sein Körper erlangte wieder seine goldene Farbe. Die fünf Mönche der Gruppe dachten: "Selbst als er sechs Jahre lang diese extreme Askese ausübte, vermochte er es nicht, die Allwissenheit zu durchdringen. Wie soll er es jetzt vermögen, da er in Dörfern und anderen Orten auf Almosenrunde geht und feste Nahrung zu sich nimmt? Er ist abgewichen und sucht nach Überfluss. Unsere Erwartung, von ihm einen spirituellen Fortschritt zu erlangen, ist so, als wollte jemand, der sein Haupt waschen will, nach Tautropfen suchen. Was nützt uns dieser Mann noch?" Sie verließen den Großen Mann, nahmen jeder ihre Almosenschale und ihr Gewand, legten den achtzehn Meilen langen Weg zurück und begaben sich nach Isipatana. Tena kho pana samayena uruvelāyaṃ senānigame senānikuṭumbikassa gehe nibbattā sujātā nāma dārikā vayappattā ekasmiṃ nigrodharukkhe patthanaṃ akāsi – ‘‘sacāhaṃ samajātikaṃ kulagharaṃ gantvā paṭhamagabbhe puttaṃ labhissāmi, anusaṃvaccharaṃ te satasahassapariccāgena balikammaṃ karissāmī’’ti. Tassā sā patthanā samijjhi. Sā mahāsattassa dukkarakārikaṃ karontassa chaṭṭhe vasse paripuṇṇe visākhāpuṇṇamāyaṃ balikammaṃ kātukāmā hutvā puretaraṃyeva dhenusahassaṃ laṭṭhimadhukavane carāpetvā, tāsaṃ khīraṃ pañca dhenusatāni pāyetvā, tāsaṃ khīraṃ aḍḍhatiyāni ca satānīti evaṃ yāva soḷasannaṃ dhenūnaṃ khīraṃ aṭṭha dhenuyo pivanti, tāva khīrassa bahalatañca madhuratañca ojavantatañca patthayamānā khīraparivattanaṃ nāma akāsi. Sā visākhāpuṇṇamadivase ‘‘pātova balikammaṃ karissāmī’’ti rattiyā paccūsasamayaṃ paccuṭṭhāya tā aṭṭha dhenuyo duhāpesi. Vacchakā dhenūnaṃ [Pg.82] thanamūlaṃ na āgamaṃsu, thanamūle pana navabhājanesu upanītamattesu attano dhammatāya khīradhārā pagghariṃsu. Taṃ acchariyaṃ disvā sujātā sahattheneva khīraṃ gahetvā navabhājane pakkhipitvā sahattheneva aggiṃ katvā pacituṃ ārabhi. Zu jener Zeit nun legte ein Mädchen namens Sujātā, das im Haus des Großgrundbesitzers Senāni im Marktflecken Senāni in Uruvelā geboren und herangewachsen war, an einem Banyanbaum folgendes Gelübde ab: "Wenn ich in eine Familie gleichen Standes einheirate und als ersten Nachkommen einen Sohn gebäre, will ich dir jedes Jahr mit einem Aufwand von hunderttausend Münzen eine Opfergabe darbringen." Ihr Wunsch ging in Erfüllung. Als das sechste Jahr, in dem das Große Wesen die extreme Askese vollbrachte, vollendet war, wollte sie am Vollmondtag des Monats Visākha das Opfer darbringen. Schon im Voraus ließ sie eintausend Kühe im Süßholz-Wald weiden, deren Milch ließ sie fünfhundert Kühe trinken, und deren Milch wiederum zweihundertfünfzig, und so fort, bis schließlich die Milch von sechzehn Kühen von acht Kühen getrunken wurde. Da sie eine besondere Dickflüssigkeit, Süße und Nährkraft der Milch anstrebte, vollzog sie dieses sogenannte "Milch-Veredeln". Am Vollmondtag des Monats Visākha stand sie in der Morgendämmerung der Nacht auf, im Gedanken: "Früh am Morgen will ich das Opfer darbringen", und ließ jene acht Kühe melken. Die Kälber kamen den Eutern der Kühe nicht nahe; doch sobald die neuen Gefäße unter die Euter gehalten wurden, flossen die Milchströme ganz von selbst heraus. Als Sujātā dieses Wunder sah, nahm sie die Milch mit eigenen Händen, goss sie in ein neues Gefäß, entfachte eigenhändig das Feuer und begann, sie zu kochen. Tasmiṃ pāyāse paccamāne mahantā mahantā pubbuḷā uṭṭhahitvā dakkhiṇāvaṭṭā hutvā sañcaranti. Ekaphusitampi bahi na uppatati, uddhanato appamattakopi dhūmo na uṭṭhahati. Tasmiṃ samaye cattāro lokapālā āgantvā uddhane ārakkhaṃ gaṇhiṃsu, mahābrahmā chattaṃ dhāresi, sakko alātāni samānento aggiṃ jālesi. Devatā dvisahassadīpaparivāresu catūsu mahādīpesu devamanussānaṃ upakappanaojaṃ attano devānubhāvena daṇḍakabaddhaṃ madhupaṭalaṃ pīḷetvā madhuṃ gaṇhamānā viya saṃharitvā tattha pakkhipiṃsu. Aññesu hi kālesu devatā kabaḷe kabaḷe ojaṃ pakkhipiṃsu, sambodhippattadivase ca parinibbānadivase ca ukkhaliyaṃyeva pakkhipiṃsu. Sujātā ekadivaseyeva tattha attano pākaṭāni anekāni acchariyāni disvā puṇṇaṃ nāma dāsiṃ āmantesi – ‘‘amma puṇṇe, ajja amhākaṃ devatā ativiya pasannā, mayā hi ettake kāle evarūpaṃ acchariyaṃ nāma na diṭṭhapubbaṃ, vegena gantvā devaṭṭhānaṃ paṭijaggāhī’’ti. Sā ‘‘sādhu, ayye’’ti tassā vacanaṃ sampaṭicchitvā turitaturitā rukkhamūlaṃ agamāsi. Während dieser Milchreis gekocht wurde, stiegen sehr große Blasen auf, die sich im Uhrzeigersinn drehend bewegten. Nicht ein einziger Tropfen spritzte nach draußen, und nicht einmal die geringste Menge Rauch stieg aus der Feuerstelle auf. Zu dieser Zeit kamen die vier Welthüter und hielten Wache an der Feuerstelle; Mahābrahmā hielt den Schirm, und Sakka ordnete die Holzscheite und entfachte das Feuer. Die Gottheiten sammelten aus den vier großen Kontinenten, die von zweitausend Nebeninseln umgeben sind, die Lebensessenz von Göttern und Menschen durch ihre göttliche Macht – gleichsam als pressten sie Honig aus einer an einem Ast hängenden Honigwabe – und gaben sie dort hinein. Zu anderen Zeiten nämlich geben die Gottheiten die Lebensessenz in jeden einzelnen Bissen, doch am Tag der Erlangung der vollkommenen Erleuchtung und am Tag des Parinibbāna geben sie sie direkt in den Kochtopf. Als Sujātā an eben diesem einzigen Tag dort viele offensichtliche Wunder sah, rief sie ihre Magd namens Puṇṇā und sprach: "Liebe Puṇṇā, heute sind uns die Gottheiten überaus wohlgesonnen. Ich habe in all dieser Zeit solch ein Wunder noch nie zuvor gesehen. Geh schnell und bereite den Platz der Gottheit vor!" Sie willigte ein mit den Worten: "Sehr wohl, Herrin!", nahm ihre Worte an und eilte in großer Eile zum Fuße des Baumes. Bodhisattopi kho tasmiṃ rattibhāge pañca mahāsupine (a. ni. 5.196) disvā pariggaṇhanto ‘‘nissaṃsayaṃ ajjāhaṃ buddho bhavissāmī’’ti katasanniṭṭhāno tassā rattiyā accayena katasarīrapaṭijaggano bhikkhācārakālaṃ āgamayamāno pātova āgantvā tasmiṃ rukkhamūle nisīdi, attano pabhāya sakalaṃ rukkhamūlaṃ obhāsayamāno. Atha kho sā puṇṇā āgantvā addasa bodhisattaṃ rukkhamūle pācīnalokadhātuṃ olokayamānaṃ nisinnaṃ, sarīrato cassa nikkhantāhi pabhāhi sakalarukkhaṃ suvaṇṇavaṇṇaṃ. Disvānassā etadahosi – ‘‘ajja amhākaṃ devatā rukkhato oruyha sahattheneva balikammaṃ sampaṭicchituṃ nisinnā maññe’’ti ubbegappattā hutvā vegena āgantvā sujātāya etamatthaṃ ārocesi. Auch der Bodhisatta hatte in jenem Teil der Nacht die fünf großen Träume geschaut, und als er sie untersuchte, fasste er den festen Entschluss: "Zweifellos werde ich heute ein Buddha werden." Nach dem Vergehen jener Nacht reinigte er seinen Körper und kam schon frôh am Morgen, während er auf die Zeit für den Almosengang wartete, um sich am Fuße jenes Baumes niederzulassen, wobei er mit seinem eigenen Glanz den gesamten Bereich um den Fuß des Baumes erleuchtete. Da kam jene Puṇṇā und sah den Bodhisatta am Fuße des Baumes sitzen, wie er nach Osten blickte, während der gesamte Baum durch die aus seinem Körper strahlenden Lichtstrahlen in goldenem Glanz erstrahlte. Als sie dies sah, dachte sie: "Heute ist wohl unsere Gottheit vom Baum herabgestiegen und hat sich niedergelassen, um das Speiseopfer mit eigener Hand entgegenzunehmen." Von tiefem Entzücken ergriffen, eilte sie schnell zurück und berichtete Sujātā von dieser Begebenheit. Sujātā [Pg.83] tassā vacanaṃ sutvā tuṭṭhamānasā hutvā ‘‘ajja dāni paṭṭhāya mama jeṭṭhadhītuṭṭhāne tiṭṭhāhī’’ti dhītu anucchavikaṃ sabbālaṅkāraṃ adāsi. Yasmā pana buddhabhāvaṃ pāpuṇanadivase satasahassagghanikā ekā suvaṇṇapāti laddhuṃ vaṭṭati, tasmā sā ‘‘suvaṇṇapātiyaṃ pāyāsaṃ pakkhipissāmī’’ti cittaṃ uppādetvā satasahassagghanikaṃ suvaṇṇapātiṃ nīharāpetvā tattha pāyāsaṃ pakkhipitukāmā pakkabhājanaṃ āvajjesi. Sabbo pāyāso padumapattato udakaṃ viya vattitvā pātiyaṃ patiṭṭhāsi, ekapātipūramattova ahosi. Sā taṃ pātiṃ aññāya pātiyā paṭikujjitvā odātavatthena veṭhetvā sayaṃ sabbālaṅkārehi attabhāvaṃ alaṅkaritvā taṃ pātiṃ attano sīse ṭhapetvā mahantena ānubhāvena nigrodharukkhamūlaṃ gantvā bodhisattaṃ disvā balavasomanassajātā ‘‘rukkhadevatā’’ti saññāya diṭṭhaṭṭhānato paṭṭhāya onatonatā gantvā sīsato pātiṃ otāretvā vivaritvā suvaṇṇabhiṅgārena gandhapupphavāsitaṃ udakaṃ gahetvā bodhisattaṃ upagantvā aṭṭhāsi. Ghaṭikāramahābrahmunā dinno mattikāpatto ettakaṃ kālaṃ bodhisattaṃ avijahitvā tasmiṃ khaṇe adassanaṃ gato, bodhisatto pattaṃ apassanto dakkhiṇahatthaṃ pasāretvā udakaṃ sampaṭicchi. Sujātā saheva pātiyā pāyāsaṃ mahāpurisassa hatthe ṭhapesi, mahāpuriso sujātaṃ olokesi. Sā ākāraṃ sallakkhetvā ‘‘ayya, mayā tumhākaṃ pariccattā, taṃ gaṇhitvā yathāruci karothā’’ti vanditvā ‘‘yathā mayhaṃ manoratho nipphanno, evaṃ tumhākampi nipphajjatū’’ti vatvā satasahassagghanikampi suvaṇṇapātiṃ purāṇakapaṇṇaṃ viya pariccajitvā anapekkhāva pakkāmi. Als Sujātā ihre Worte hörte, wurde sie hocherfreut im Geiste und sprach: "Von heute an sollst du die Stellung meiner ältesten Tochter einnehmen!", und gab ihr allen Schmuck, der einer Tochter gebôhrt. Da es sich jedoch geziemt, dass am Tag der Erlangung der Buddhaschaft eine goldene Schale im Wert von einhunderttausend Kahāpaṇas erlangt wird, fasste sie den Gedanken: "Ich werde den Milchreis in eine goldene Schale füllen." Sie ließ eine goldene Schale im Wert von einhunderttausend herbeibringen, und in dem Wunsch, den Milchreis hineinzufüllen, neigte sie das Kochgefäß. Der gesamte Milchreis glitt wie Wasser von einem Lotusblatt ab und sammelte sich in der Schale, wobei er genau diese eine Schale füllte. Sie deckte diese Schale mit einer anderen Schale ab, wickelte sie in ein reines weißes Tuch, schmückte ihren eigenen Körper mit allerlei Zierrat, stellte die Schale auf ihr Haupt und begab sich mit großem Prunk zum Fuße des Nigrodha-Baumes. Als sie den Bodhisatta sah, empfand sie große Freude, und in dem Glauben, er sei die Baumgottheit, ging sie von der Stelle an, wo sie ihn erblickt hatte, mit tief geneigtem Körper auf ihn zu. Sie nahm die Schale von ihrem Haupt, öffnete sie, nahm mit einer goldenen Gießkanne mit wohlriechenden Blumen duftendes Wasser, trat an den Bodhisatta heran und blieb stehen. Die Tonschale, die ihm vom Großen Brahmā Ghaṭikāra dargebracht worden war und den Bodhisatta bis zu diesem Zeitpunkt nie verlassen hatte, verschwand in diesem Augenblick. Als der Bodhisatta die Schale nicht sah, streckte er seine rechte Hand aus und empfing das Wasser. Sujātā legte den Milchreis mitsamt der Schale in die Hand des Großen Mannes. Der Großen Mann blickte Suātā an. Sie bemerkte seine Geste und sprach: "Ehrwürdiger Herr, dies wurde von mir für Euch dargebracht; nehmt es und tut damit, wie es Euch beliebt." Sie verneigte sich ehrfurchtsvoll und sprach: "Wie mein Wunsch in Erfüllung gegangen ist, so möge auch Euer Wunsch in Erfüllung gehen!" Nachdem sie dies gesagt hatte, gab sie selbst die goldene Schale im Wert von einhunderttausend wie ein welkes Blatt ohne jegliches Bedauern auf und ging davon. Bodhisattopi kho nisinnaṭṭhānā vuṭṭhāya rukkhaṃ padakkhiṇaṃ katvā pātiṃ ādāya nerañjarāya tīraṃ gantvā anekesaṃ bodhisattasatasahassānaṃ abhisambujjhanadivase otaritvā nhānaṭṭhānaṃ supatiṭṭhitaṃ nāma atthi, tassā tīre pātiṃ ṭhapetvā supatiṭṭhitatitthe otaritvā nhatvā anekabuddhasatasahassānaṃ nivāsanaṃ arahaddhajaṃ nivāsetvā puratthābhimukho nisīditvā ekaṭṭhitālapakkappamāṇe ekūnapaṇṇāsapiṇḍe katvā sabbaṃ appodakamadhupāyāsaṃ paribhuñji. Soyevassa buddhabhūtasa sattasattāhaṃ bodhimaṇḍe vasantassa [Pg.84] ekūnapaṇṇāsadivasāni āhāro ahosi. Ettakaṃ kālaṃ añño āhāro natthi, na nhānaṃ, na mukhadhovanaṃ, na sarīravaḷañjo, jhānasukhena phalasamāpattisukhena ca vītināmesi. Taṃ pana pāyāsaṃ bhuñjitvā suvaṇṇapātiṃ gahetvā ‘‘sacāhaṃ ajja buddho bhavissāmi, ayaṃ pāti paṭisotaṃ gacchatu, no ce bhavissāmi, anusotaṃ gacchatū’’ti vatvā nadīsote pakkhipi. Sā sotaṃ chindamānā nadīmajjhaṃ gantvā majjhaṭṭhāneneva javasampanno asso viya asītihatthamattaṭṭhānaṃ paṭisotaṃ gantvā ekasmiṃ āvaṭṭe nimujjitvā kāḷanāgarājabhavanaṃ gantvā tiṇṇaṃ buddhānaṃ paribhogapātiyo ‘‘kili kilī’’ti ravaṃ kārayamānā paharitvā tāsaṃ sabbaheṭṭhimā hutvā aṭṭhāsi. Kāḷo nāgarājā ta saddaṃ sutvā ‘‘hiyyo eko buddho nibbatti, puna ajja eko nibbatto’’ti vatvā anekehi padasatehi thutiyo vadamāno uṭṭhāsi. Tassa kira mahāpathaviyā ekayojanatigāvutappamāṇaṃ nabhaṃ pūretvā ārohanakālo ajja vā hiyyo vā sadiso ahosi. Auch der Bodhisatta erhob sich von seinem Sitzplatz, umrundete den Baum im Uhrzeigersinn, nahm die Schale und begab sich an das Ufer des Nerañjarā-Flusses. Dort gibt es eine Badestelle namens Supatiṭṭhita, wo viele hunderttausend Bodhisattas am Tag ihrer Erleuchtung hinabgestiegen sind. Er stellte die Schale an deren Ufer ab, stieg an der Supatiṭṭhita-Badestelle ins Wasser hinab, badete und legte das Gewand, das Banner der Arahatschaft, an, welches das Gewand von vielen hunderttausend Buddhas war. Dann setzte er sich mit dem Gesicht nach Osten gewandt nieder, formte den Milchreis zu neunundvierzig Bissen von der Größe einer reifen Palmfrucht und verzehrte den gesamten, völlig wasserfreien Honigmilchreis. Eben diese Speise diente ihm, der als Erleuchteter sieben Wochen lang im Bereich des Bodhi-Baumes verweilte, neunundvierzig Tage lang als Nahrung. In dieser gesamten Zeit gab es keine andere Nahrung, kein Baden, kein Waschen des Gesichts und keine körperlichen Bedürfnisse; er verbrachte die Zeit im Glück der Vertiefung und im Glück der Erlangung der Früchte. Nachdem er diesen Milchreis verzehrt hatte, nahm er die goldene Schale und sprach: "Wenn ich heute ein Buddha werden soll, so möge diese Schale gegen den Strom fließen! Wenn nicht, so möge sie mit dem Strom fließen!" Nach diesen Worten warf er sie in die Strömung des Flusses. Sie schnitt durch die Strömung, gelangte in die Mitte des Flusses und schwamm von der Mitte aus wie ein schnelles Pferd etwa achtzig Ellen weit gegen die Strömung. In einem Strudel versank sie, gelangte in das Reich des Schlangenkönigs Kāḷa und stieß mit einem klirrenden Geräusch ("kili kili") an die von den drei früheren Buddhas benutzten Schalen, woraufhin sie sich ganz unten unter diese Schalen stellte. Als der Schlangenkönig Kāḷa dieses Geräusch hörte, sprach er: "Gestern ist ein Buddha erschienen, und heute ist schon wieder einer erschienen!", und erhob sich, während er Lobpreisungen in Hunderten von Versen sprach. Für ihn, der mitsamt der großen Erde eine Höhe von einer Yojana und drei Gāvutas erfüllte, war die Zeit des Aufsteigens so, als sei es heute oder gestern gewesen. Bodhisattopi nadītīramhi supupphitasālavane divāvihāraṃ katvā sāyanhasamayaṃ pupphānaṃ vaṇṭato muccanakāle devatāhi alaṅkatena aṭṭhūsabhavitthārena maggena sīho viya vijambhamāno bodhirukkhābhimukho pāyāsi. Nāgayakkhasupaṇṇādayo dibbehi gandhapupphādīhi pūjayiṃsu, dibbasaṃgītādīni pavattayiṃsu, dasasahassī lokadhātu ekagandhā ekamālā ekasādhukārā ahosi. Tasmiṃ samaye sotthiyo nāma tiṇahārako tiṇaṃ ādāya paṭipathe āgacchanto mahāpurisassa ākāraṃ ñatvā aṭṭha tiṇamuṭṭhiyo adāsi. Bodhisatto tiṇaṃ gahetvā bodhimaṇḍaṃ āruyha dakkhiṇadisābhāge uttarābhimukho aṭṭhāsi. Tasmiṃ khaṇe dakkhiṇacakkavāḷaṃ osīditvā heṭṭhā avīcisampattaṃ viya ahosi. Uttaracakkavāḷaṃ ullaṅghitvā upari bhavaggappattaṃ viya ahosi. Bodhisatto ‘‘idaṃ sambodhipāpuṇanaṭṭhānaṃ na bhavissati maññe’’ti padakkhiṇaṃ karonto pacchimadisābhāgaṃ gantvā puratthimābhimukho aṭṭhāsi, tato pacchimacakkavāḷaṃ osīditvā heṭṭhā avīcisampattaṃ viya ahosi, puratthimacakkavāḷaṃ ullaṅghitvā upari bhavaggappattaṃ viya ahosi. Ṭhitaṭṭhitaṭṭhāne kirassa nemivaṭṭipariyante akkantaṃ nābhiyā patiṭṭhitamahāsakaṭacakkaṃ viya mahāpathavī onatunnatā [Pg.85] ahosi. Bodhisatto ‘‘idampi sambodhipāpuṇanaṭṭhānaṃ na bhavissati maññe’’ti padakkhiṇaṃ karonto uttaradisābhāgaṃ gantvā dakkhiṇābhimukho aṭṭhāsi. Tato uttaracakkavāḷaṃ osīditvā heṭṭhā avīcisampattaṃ viya ahosi, dakkhiṇacakkavāḷaṃ ullaṅghitvā upari bhavaggappattaṃ viya ahosi. Bodhisatto ‘‘idampi sambodhipāpuṇanaṭṭhānaṃ na bhavissati maññe’’ti padakkhiṇaṃ karonto puratthimadisābhāgaṃ gantvā pacchimābhimukho aṭṭhāsi. Puratthimadisābhāge pana sabbabuddhānaṃ pallaṅkaṭṭhānaṃ ahosi, taṃ neva chambhati, na kampati. Bodhisatto ‘‘idaṃ sabbabuddhānaṃ avijahitaṃ acalaṭṭhānaṃ kilesapañjaraviddhaṃsanaṭṭhāna’’nti ñatvā tāni tiṇāni agge gahetvā cālesi, tāvadeva cuddasahattho pallaṅko ahosi. Tānipi kho tiṇāni tathārūpena saṇṭhānena saṇṭhahiṃsu, yathārūpaṃ sukusalo cittakāro vā potthakāro vā ālikhitumpi samattho natthi. Bodhisatto bodhikkhandhaṃ piṭṭhito katvā puratthābhimukho daḷhamānaso hutvā – Der Bodhisatta aber verbrachte die Tagesruhe am Flussufer im voll erblühten Sal-Wald. Am Abend, zur Zeit, da die Blüten von ihren Stielen abfielen, machte er sich auf den Weg in Richtung des Bodhi-Baumes, majestätisch wie ein Löwe schreitend, auf einem von den Devas geschmückten, acht Usabhas breiten Pfad. Die Nagas, Yakkhas, Garudas und andere Wesen verehrten ihn mit himmlischem Duftwerk, Blumen und anderem, spielten himmlische Musik und anderes, und das zehntausendfache Weltsystem wurde von einem einzigen Duft, einer einzigen Blumenpracht und einem einzigen Jubelruf erfüllt. Zu jener Zeit kam ein Grasträger namens Sotthiya entgegen, der Gras trug, und als er das ehrwürdige Auftreten des Großen Wesens erkannte, schenkte er ihm acht Handvoll Gras. Der Bodhisatta nahm das Gras entgegen, stieg auf das Bodhi-Plateau und stellte sich an der Südseite mit dem Gesicht nach Norden auf. In diesem Augenblick neigte sich das südliche Weltensystem nach unten, als würde es den tiefsten Punkt der Avici-Hölle erreichen, während das nördliche Weltensystem emporstieg, als würde es den höchsten Punkt des Daseins erreichen. Der Bodhisatta dachte: ‚Dies ist wohl nicht der Ort, um die Erleuchtung zu erlangen‘, und ging im Uhrzeigersinn zur Westseite und stellte sich mit dem Gesicht nach Osten auf. Daraufhin neigte sich das westliche Weltensystem nach unten, als würde es den Avici erreichen, während das östliche Weltensystem emporstieg, als würde es das Bhavagga erreichen. An den Stellen, auf die er trat, neigte und hob sich die große Erde wie ein großes Wagenrad, das an seinem äußeren Felgenrand belastet wird und auf seiner Nabe ruht. Der Bodhisatta dachte: ‚Auch dies ist wohl nicht der Ort, um die Erleuchtung zu erlangen‘, ging im Uhrzeigersinn zur Nordseite und stellte sich mit dem Gesicht nach Süden auf. Daraufhin neigte sich das nördliche Weltensystem nach unten zum Avici, während das südliche Weltensystem zum Bhavagga emporstieg. Der Bodhisatta dachte: ‚Auch dies ist wohl nicht der Ort, um die Erleuchtung zu erlangen‘, ging im Uhrzeigersinn zur Ostseite und stellte sich mit dem Gesicht nach Westen auf. Auf der Ostseite jedoch befand sich der Thronsitz aller Buddhas, welcher weder zittert noch bebt. Als der Bodhisatta erkannte: ‚Dies ist der unerschütterliche Ort aller Buddhas, der nicht verlassen wird, der Ort zur Vernichtung des Käfigs der Befleckungen‘, nahm er das Gras an den Spitzen und schüttelte es aus. Sogleich entstand ein vierzehn Ellen hoher Thron. Selbst jene Grashalme ordneten sich in einer solchen Weise an, dass kein noch so geschickter Maler oder Bildhauer imstande gewesen wäre, ein solches Muster zu zeichnen oder nachzubilden. Der Bodhisatta wandte dem Stamm des Bodhi-Baumes den Rücken zu, blickte nach Osten und wurde unerschütterlichen Geistes: ‘‘Kāmaṃ taco ca nhāru ca, aṭṭhi ca avasissatu; Upasussatu nissesaṃ, sarīre maṃsalohitaṃ. (a. ni. 2.5; ma. ni. 2.184) – ‚Mögen von mir aus Haut, Sehnen und Knochen übrig bleiben; mögen Fleisch und Blut in meinem Körper völlig vertrocknen.‘ ‘Na tvevāhaṃ sammāsambodhiṃ appatvā imaṃ pallaṅkaṃ bhindissāmī’’’ti asanisatasannipātenapi abhejjarūpaṃ aparājitapallaṅkaṃ ābhujitvā nisīdi. ‚Ohne jedoch die vollkommene Selbst-Erleuchtung erlangt zu haben, werde ich diesen Meditationssitz nicht auflösen!‘ Mit diesem Entschluss setzte er sich mit gekreuzten Beinen auf diesen unbesiegbaren Thron, der selbst durch das Einschlagen von hunderten von Blitzen unzerstörbar war. Tasmiṃ samaye māro pāpimā – ‘‘siddhatthakumāro mayhaṃ vasaṃ atikkamitukāmo, na dānissa atikkamituṃ dassāmī’’ti mārabalassa santikaṃ gantvā etamatthaṃ ārocetvā māraghosanaṃ nāma ghosāpetvā mārabalaṃ ādāya nikkhami. Sā mārasenā mārassa purato dvādasayojanā hoti, dakkhiṇato ca vāmato ca dvādasayojanā, pacchato cakkavāḷapariyantaṃ katvā ṭhitā, uddhaṃ navayojanubbedhā hoti, yassā unnadantiyā unnādasaddo yojanasahassato paṭṭhāya pathaviundriyanasaddoviya sūyati. Atha māro devaputto diyaḍḍhayojanasatikaṃ girimekhalaṃ nāma hatthiṃ abhiruhitvā bāhusahassaṃ māpetvā nānāvudhāni aggahesi. Avasesāyapi māraparisāya dve janā ekasadisā ekasadisaṃ āvudhaṃ gaṇhantā nāhesuṃ. Nānāvaṇṇā nānappakāramukhā hutvā nānāvudhāni gaṇhantā bodhisattaṃ ajjhottharamānā āgamaṃsu. Zu jener Zeit dachte Māra, der Böse: ‚Der Prinz Siddhattha will sich meiner Macht entziehen; ich werde ihn jetzt nicht entkommen lassen!‘ Er begab sich zu seinem Heer, berichtete ihnen von dieser Angelegenheit, ließ den Kriegsruf des Māra erschallen, nahm sein Heer mit sich und zog aus. Dieses Heer des Māra erstreckte sich vor Māra über zwölf Yojanas, zur Rechten und zur Linken über zwölf Yojanas, im Rücken reichte es bis an den Rand des Weltensystems, und nach oben erhob es sich neun Yojanas hoch. Das tosende Getöse dieses heranstürmenden Heeres war aus einer Entfernung von tausend Yojanas wie das Brüllen einer berstenden Erde zu hören. Daraufhin bestieg der Devasohn Māra seinen einhundertfünfzig Yojanas großen Elefanten namens Girimekhala, erschuf tausend Arme und ergriff verschiedenste Waffen. Unter den übrigen Begleitern Māras gab es keine zwei Personen, die einander glichen oder dieselbe Waffe trugen. In mannigfaltigen Farben und mit verschiedenartigsten Gesichtern rückten sie, unterschiedliche Waffen tragend, heran, um den Bodhisatta zu überwältigen. Dasasahassacakkavāḷadevatā [Pg.86] pana mahāsattassa thutiyo vadamānā aṭṭhaṃsu. Sakko devarājā vijayuttarasaṅkhaṃ dhamamāno aṭṭhāsi. So kira saṅkho vīsahatthasatiko hoti, sakiṃ vātaṃ gāhāpetvā dhamiyamāno cattāro māse saddaṃ karitvā nissaddo hoti. Mahākāḷanāgarājā atirekapadasatena vaṇṇaṃ vaṇṇentova aṭṭhāsi, mahābrahmā setacchattaṃ dhārayamāno aṭṭhāsi. Mārabale pana bodhimaṇḍaṃ upasaṅkamante tesaṃ ekopi ṭhātuṃ nāsakkhi, sammukhasammukhaṭṭhāneneva palāyiṃsu. Kāḷo nāma nāgarājāpi pathaviyaṃ nimujjitvā pañcayojanasatikaṃ mañjerikanāgabhavanaṃ gantvā ubhohi hatthehi mukhaṃ pidahitvā nipanno. Sakko devarājāpi vijayuttarasaṅkhaṃ piṭṭhiyaṃ katvā cakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ aṭṭhāsi, mahābrahmā setacchattaṃ koṭiyaṃ gahetvā brahmalokameva agamāsi. Ekadevatāpi ṭhātuṃ samatthā nāma nāhosi. Mahāpuriso pana ekakova nisīdi. Die Devas aus zehntausend Weltensystemen jedoch standen da und besangen das Lob des Großen Wesens. Sakka, der Götterkönig, stand da und blies das Vijayuttara-Muschelhorn. Dieses Muschelhorn war einhundertzwanzig Ellen lang; wenn es einmal geblasen wurde, ertönte es vier Monate lang, bevor es wieder verstummte. Der große Naga-König Mahākāḷa stand da und besang seine Tugenden in mehr als hundert Strophen; der große Brahma stand da und hielt den weißen Sonnenschirm. Als sich jedoch das Heer des Māra dem Bodhi-Sitz näherte, vermochte kein einziger von ihnen standzuhalten, sondern sie flohen in alle Richtungen, wohin sie blickten. Selbst der Naga-König namens Kāḷa tauchte in die Erde ein, begab sich in das fünfhundert Yojanas große Mañjerika-Naga-Reich, bedeckte sein Gesicht mit beiden Händen und legte sich nieder. Auch Sakka, der Götterkönig, hängte sich das Vijayuttara-Muschelhorn auf den Rücken und stellte sich an den äußersten Rand des Weltensystems. Der große Brahma packte den weißen Sonnenschirm an der Spitze und floh geradewegs in die Brahma-Welt. Nicht eine einzige Gottheit war imstande standzuhalten. Das Große Wesen jedoch saß ganz allein da. Māropi attano parisaṃ āha – ‘‘tātā, suddhodanaputtena siddhatthena sadiso añño puriso nāma natthi, mayaṃ sammukhā yuddhaṃ dātuṃ na sakkhissāma, pacchābhāgena dassāmā’’ti. Mahāpurisopi tīṇi passāni oloketvā sabbadevatānaṃ palātattā suññāni addasa. Puna uttarapassena mārabalaṃ ajjhottharamānaṃ disvā ‘‘ayaṃ ettako jano maṃ ekakaṃ sandhāya mahantaṃ vāyāmaṃ karoti, imasmiṃ ṭhāne mayhaṃ mātā vā pitā vā bhātā vā añño vā koci ñātako natthi, imā pana dasa pāramiyova mayhaṃ dīgharattaṃ puṭṭhaparijanasadisā. Tasmā mayā pāramiyova balaggaṃ katvā pāramisattheneva paharitvā imaṃ balakāyaṃ viddhaṃsetuṃ vaṭṭatī’’ti dasa pāramiyo āvajjamāno nisīdi. Auch Māra sprach zu seinem Gefolge: ‚Ihr Lieben, es gibt keinen anderen Mann, der dem Prinzen Siddhattha, dem Sohn Suddhodanas, gleicht. Wir werden nicht imstande sein, ihm von vorne zu begegnen und zu kämpfen; wir müssen ihn von hinten angreifen!‘ Das Große Wesen blickte nach drei Seiten und sah, dass sie leer waren, weil alle Gottheiten geflohen waren. Als er dann nach Norden blickte und das heranstürmende Heer des Māra sah, dachte er: ‚Diese gewaltige Schar unternimmt eine so große Anstrengung gegen mich ganz allein. An diesem Ort habe ich weder Mutter, Vater, Bruder noch irgendeinen anderen Verwandten. Doch diese zehn Vollkommenheiten sind mir seit langer Zeit wie meine eigenen Kinder und Gefährten. Daher geziemt es sich für mich, die Vollkommenheiten zu meiner Armee zu machen, um mit der Hand der Vollkommenheiten zuzuschlagen und dieses feindliche Heer zu vernichten.‘ So saß er da und betrachtete die zehn Vollkommenheiten. Atha kho māro devaputto – ‘‘vāteneva siddhatthaṃ palāpessāmī’’ti vātamaṇḍalaṃ samuṭṭhāpesi. Taṅkhaṇaññeva puratthimādibhedāvātā samuṭṭhahitvā addhayojanayojanadviyojanatiyojanappamāṇāni pabbatakūṭāni padāletvā vanagaccharukkhādīni uddhaṃmūlāni katvā samantā gāmanigame cuṇṇavicuṇṇe kātuṃ samatthāpi mahāpurisassa puññatejena vihatānubhāvā bodhisattaṃ patvā bodhisattassa cīvarakaṇṇamattampi cāletuṃ nāsakkhiṃsu. Tato – ‘‘udakena [Pg.87] naṃ ajjhottharitvā māressāmī’’ti mahāvassaṃ samuṭṭhāpesi. Tassānubhāvena uparūpari satapaṭalasahassapaṭalādibhedā valāhakā uṭṭhahitvā vassiṃsu. Vuṭṭhidhārāvegena pathavī chiddāvachiddā ahosi. Vanarukkhādīnaṃ uparibhāgena mahāmegho āgantvā mahāsattassa cīvare ussāvabindugahaṇamattampi temetuṃ nāsakkhi. Tato pāsāṇavassaṃ samuṭṭhāpesi. Mahantāni mahantāni pabbatakūṭāni dhūmāyantāni pajjalantāni ākāsenāgantvā bodhisattaṃ patvā dibbamālāguḷabhāvaṃ āpajjiṃsu. Tato paharaṇavassaṃ samuṭṭhāpesi. Ekatodhārā ubhatodhārā asisattikhurappādayo dhūmāyantā pajjalantā ākāsenāgantvā bodhisattaṃ patvā dibbapupphāni ahesuṃ. Tato aṅgāravassaṃ samuṭṭhāpesi. Kiṃsukavaṇṇā aṅgārā ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle dibbapupphāni hutvā vikiriṃsu. Tato kukkuḷavassaṃ samuṭṭhāpesi. Accuṇho aggivaṇṇo kukkuḷo ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle candanacuṇṇaṃ hutvā nipatati. Tato vālukāvassaṃ samuṭṭhāpesi. Atisukhumā vālukā dhūmāyantā pajjalantā ākāsenāgantvā mahāsattassa pādamūle dibbapupphāni hutvā nipatiṃsu. Tato kalalavassaṃ samuṭṭhāpesi, taṃ kalalaṃ dhūmāyantaṃ pajjalantaṃ ākāsenāgantvā bodhisattassa pādamūle dibbavilepanaṃ hutvā nipatati. Tato ‘‘iminā bhiṃsetvā siddhatthaṃ palāpessāmī’’ti andhakāraṃ samuṭṭhāpesi. Taṃ caturaṅgasamannāgataṃ andhakāraṃ viya mahātamaṃ hutvā bodhisattaṃ patvā sūriyappabhāvihataṃ viya andhakāraṃ antaradhāyi. Daraufhin entfesselte der Himmelssohn Mara einen Wirbelwind mit dem Gedanken: „Allein durch den Wind will ich Siddhattha vertreiben.“ In eben jenem Augenblick erhoben sich aus dem Osten und den anderen Himmelsrichtungen Winde, die Berggipfel von einer halben, einer, zwei und drei Yojanas Größe spalteten, Waldgebüsche, Bäume und ähnliches mit den Wurzeln nach oben rissen und fähig gewesen wären, ringsumher Dörfer und Marktflecken völlig zu Pulver zu zermahlen. Doch durch die Kraft des Verdienstes des Großen Mannes war ihre Macht gebrochen, und als sie den Bodhisatta erreichten, vermochten sie nicht einmal den Saum seines Gewandes in Bewegung zu versetzen. Daraufhin entfesselte er einen gewaltigen Regen mit dem Gedanken: „Mit Wasser will ich ihn überschwemmen und töten.“ Durch seine Macht stiegen am Himmel Wolkenmassen Schicht auf Schicht in Hunderten und Tausenden von Lagen empor und regneten herab. Durch die Wucht der Regenschauer wurde die Erde von tiefen Rissen und Spalten durchzogen. Obwohl eine riesige Regenwolke über die Waldbäume hinwegzog, vermochte sie das Gewand des Großen Wesens nicht einmal so weit zu benetzen, wie es die Aufnahme eines einzigen Tautropfens täte. Daraufhin entfesselte er einen Steinregen. Riesige Berggipfel flogen rauchend und brennend durch die Luft, doch als sie den Bodhisatta erreichten, verwandelten sie sich in himmlische Blumengirlanden. Daraufhin entfesselte er einen Waffenregen. Ein- und zweischneidige Schwerter, Lanzen, Pfeile und andere Waffen flogen rauchend und brennend durch die Luft, doch als sie den Bodhisatta erreichten, wurden sie zu himmlischen Blumen. Daraufhin entfesselte er einen Glutregen. Kohlen von der Farbe der Kiṃsuka-Blüten flogen durch die Luft, fielen zu Füßen des Bodhisatta nieder und zerstreuten sich als himmlische Blumen. Daraufhin entfesselte er einen heißen Ascheregen. Extrem heiße, feuerfarbene Asche flog durch die Luft und fiel zu Füßen des Bodhisatta nieder, indem sie sich in feines Sandelholzpulver verwandelte. Daraufhin entfesselte er einen Sandregen. Äußerst feiner Sand flog rauchend und brennend durch die Luft und fiel zu Füßen des Großen Wesens als himmlische Blumen nieder. Daraufhin entfesselte er einen Schlammregen. Jener Schlamm flog rauchend und brennend durch die Luft, verwandelte sich an den Füßen des Bodhisatta in himmlische Duftsalbe und fiel nieder. Daraufhin entfesselte er Finsternis mit dem Gedanken: „Hiermit werde ich Siddhattha in Schrecken versetzen und ihn vertreiben.“ Diese Finsternis, die einer dichten, vierfachen Finsternis glich, wurde zu einem gewaltigen Dunkel. Doch als sie den Bodhisatta erreichte, verschwand sie, als wäre sie vom Sonnenlicht vertrieben worden. Evaṃ so māro imāhi navahi vātavassapāsāṇapaharaṇaaṅgārakukkuḷavālukākalalandhakāravuṭṭhīhi bodhisattaṃ palāpetuṃ asakkonto – ‘‘kiṃ, bhaṇe, tiṭṭhatha, imaṃ siddhatthakumāraṃ gaṇhatha hanatha palāpethā’’ti attano parisaṃ āṇāpetvā sayampi girimekhalassa hatthino khandhe nisinno cakkāvudhaṃ ādāya bodhisattaṃ upasaṅkamitvā ‘‘siddhattha, uṭṭhehi etasmā pallaṅkā, nāyaṃ tuyhaṃ pāpuṇāti, mayhaṃ esa pāpuṇātī’’ti āha. Mahāsatto tassa vacanaṃ sutvā avoca – ‘‘māra, neva tayā dasa pāramiyo pūritā, na upapāramiyo, na paramatthapāramiyo, nāpi pañca mahāpariccāgā pariccattā, na ñātatthacariyā, na lokatthacariyā, na buddhatthacariyā pūritā, sabbā tā mayāyeva pūritā, tasmā nāyaṃ pallaṅko tuyhaṃ pāpuṇāti, mayheveso pāpuṇātī’’ti. Als jener Mara auf diese Weise mit diesen neun Schauern – nämlich Wind, Regen, Steinen, Waffen, glühenden Kohlen, heißer Asche, Sand, Schlamm und Finsternis – den Bodhisatta nicht zur Flucht zu treiben vermochte, befahl er seinem Heer: „He, ihr Leute! Warum steht ihr nur herum? Ergreift diesen Prinzen Siddhattha, tötet ihn, vertreibt ihn!“ Er selbst saß auf dem Rücken des Elefanten Girimekhala, nahm seine Wurfscheibe zur Hand, trat an den Bodhisatta heran und sprach: „Siddhattha, steh auf von diesem Thron! Er steht dir nicht zu, er gehört mir!“ Als das Große Wesen seine Worte hörte, sprach er: „Māra, weder hast du die zehn Vollkommenheiten erfüllt, noch die zehn mittleren Vollkommenheiten, noch die zehn höchsten Vollkommenheiten; noch hast du die fünf großen Opferungen dargebracht; weder hast du das Wirken zum Wohle der Verwandten vollendet, noch das Wirken zum Wohle der Welt, noch das Wirken zum Erlangen der Buddhaschaft. All diese habe ich allein erfüllt. Deshalb steht dieser Thron nicht dir zu, sondern allein mir gehört er.“ Māro [Pg.88] kuddho kodhavegaṃ asahanto mahāpurisassa cakkāvudhaṃ vissajjesi. Taṃ tassa dasa pāramiyo āvajjentasseva uparibhāge mālāvitānaṃ hutvā aṭṭhāsi. Taṃ kira khuradhāraṃ cakkāvudhaṃ aññadā kuddhena vissaṭṭhaṃ ekagghanapāsāṇatthambhe vaṃsakaḷīre viya chindantaṃ gacchati. Idāni pana tasmiṃ mālāvitānaṃ hutvā ṭhite avasesā māraparisā ‘‘idāni siddhattho pallaṅkato vuṭṭhāya palāyissatī’’ti mahantamahantāni selakūṭāni vissajjesuṃ, tānipi mahāpurisassa dasa pāramiyo āvajjentassa mālāguḷabhāvaṃ āpajjitvā bhūmiyaṃ patiṃsu. Devatā cakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ṭhitā gīvaṃ pasāretvā sīsaṃ ukkhipitvā ‘‘naṭṭho vata, bho, siddhatthakumārassa rūpaggappatto attabhāvo, kiṃ nu kho so karissatī’’ti olokenti. Zornig und seinen Zornesausbruch nicht zügelnd, schleuderte Mara seine Wurfscheibe nach dem Großen Mann. Während dieser über seine zehn Vollkommenheiten nachsann, blieb sie über ihm als ein Baldachin aus Blumen hängen. Es heißt, dass diese rasierklingenscharfe Wurfscheibe, wenn sie sonst von dem Erzürnten geschleudert wurde, massive Steinsäulen wie weiche Bambussprossen zerschnitt. Doch als sie nun als ein Blumenbaldachin über ihm verweilte, schleuderte das übrige Gefolge Maras in der Erwartung, „nun wird Siddhattha vom Thron aufstehen und fliehen“, riesige Berggipfel. Doch auch diese verwandelten sich für den über seine zehn Vollkommenheiten nachsinnenden Großen Mann in Blumenbälle und fielen auf die Erde. Die Gottheiten, die am Rand des Weltalters standen, reckten ihre Hälse vor, hoben ihre Köpfe und blickten besorgt hinab: „Ach, wahrlich vernichtet ist der an Schönheit unübertreffliche Körper des Prinzen Siddhattha! Was wird er bloß tun?“ Tato bodhisatto ‘‘pūritapāramīnaṃ bodhisattānaṃ sambujjhanadivase pattapallaṅko mayhaṃ pāpuṇātī’’ti vatvā ṭhitaṃ māraṃ āha – ‘‘māra, tuyhaṃ dānassa dinnabhāve ko sakkhī’’ti. Māro ‘‘ime ettakāva janā sakkhino’’ti mārabalābhimukhaṃ hatthaṃ pasāresi. Tasmiṃ khaṇe māraparisāya ‘‘ahaṃ sakkhi, ahaṃ sakkhī’’ti pavattasaddo pathaviundriyanasaddasadiso ahosi. Atha māro mahāpurisaṃ āha – ‘‘siddhattha, tuyhaṃ dānassa dinnabhāve ko sakkhī’’ti. Mahāpuriso ‘‘tuyhaṃ tāva dānassa dinnabhāve sacetanā sakkhino, mayhaṃ pana imasmiṃ ṭhāne sacetano koci sakkhi nāma natthi, tiṭṭhatu tāva me avasesaattabhāvesu dinnadānaṃ, vessantarattabhāve pana ṭhatvā mayhaṃ sattasatakamahādānassa tāva dinnabhāve acetanāpi ayaṃ ghanamahāpathavī sakkhī’’ti cīvaragabbhantarato dakkhiṇahatthaṃ abhinīharitvā ‘‘vessantarattabhāve ṭhatvā mayhaṃ sattasatakamahādānassa dinnabhāve tvaṃ sakkhi, na sakkhī’’ti mahāpathaviyābhimukhaṃ hatthaṃ pasāresi. Mahāpathavī ‘‘ahaṃ te tadā sakkhī’’ti viravasatena viravasahassena viravasatasahassena mārabalaṃ avattharamānā viya unnadi. Daraufhin sprach der Bodhisatta: „Der Thron, der am Tag der Erleuchtung jenen Bodhisattas zukommt, die ihre Vollkommenheiten erfüllt haben, gebührt mir“, und sagte zu dem dastehenden Mara: „Māra, wer ist der Zeuge dafür, dass deine Gabe gegeben wurde?“ Mara streckte seine Hand in Richtung seines Heeres aus und rief: „All diese Leute hier sind meine Zeugen!“ In jenem Moment erhob sich das Geschrei von Maras Gefolge: „Ich bin Zeuge! Ich bin Zeuge!“, das dem Dröhnen einer berstenden Erde glich. Da sprach Mara zu dem Großen Mann: „Siddhattha, wer ist der Zeuge dafür, dass deine Gabe gegeben wurde?“ Der Große Mann entgegnete: „Für das Geben deiner Gabe hast du beseelte Zeugen, doch ich habe an diesem Ort keinen einzigen beseelten Zeugen. Die Gaben, die ich in meinen anderen Existenzen dargebracht habe, mögen für den Moment beiseitebleiben; doch allein dafür, dass ich in meiner Existenz als Vessantara die große Gabe der siebenhundertfachen Spenden dargebracht habe, ist diese feste, gewaltige Erde, obwohl sie unbeseelt ist, meine Zeugin.“ Dann streckte er seine rechte Hand aus den Falten seines Gewandes hervor, wies auf die große Erde und sprach: „Als ich in der Existenz als Vessantara weilte und meine große Gabe der siebenhundertfachen Spenden darbrachte, warst du da Zeugin oder nicht?“ Die große Erde erbebte und dröhnte mit hundert-, tausend- und hunderttausendfachem Tosen, als wollte sie das Heer Maras überwältigen, und rief gleichsam: „Ich war damals deine Zeugin!“ Tato mahāpurise ‘‘dinnaṃ te, siddhattha, mahādānaṃ uttamadāna’’nti vessantaradānaṃ sammasante diyaḍḍhayojanasatiko girimekhalahatthī jaṇṇukehi pathaviyaṃ patiṭṭhāsi, māraparisā disāvidisā palāyiṃsu, dve ekamaggena gatā nāma natthi, sīsābharaṇāni ceva nivatthavasanāni ca [Pg.89] chaḍḍetvā sammukhasammukhadisāhiyeva palāyiṃsu. Tato devasaṅghā palāyamānaṃ mārabalaṃ disvā ‘‘mārassa parājayo jāto, siddhatthakumārassa jayo jāto, jayapūjaṃ karissāmā’’ti devatā devatānaṃ, nāgā nāgānaṃ, supaṇṇā supaṇṇānaṃ, brahmāno brahmānaṃ ghosetvā gandhamālādihatthā mahāpurisassa santikaṃ bodhipallaṅkaṃ āgamaṃsu. Als der Große Mann sodann über das Vessantara-Opfer nachdachte – „Die von dir dargebrachte große Gabe, Siddhattha, war die höchste Gabe!“ –, sank der einhundertfünfzig Yojanas große Elefant Girimekhala auf die Knie nieder und blieb auf der Erde stehen. Das Gefolge Māras floh in alle Himmelsrichtungen und Zwischenrichtungen; es gab keine zwei, die denselben Weg einschlugen. Sie warfen ihren Kopfschmuck sowie ihre Gewänder ab und flohen in jede Richtung, die gerade vor ihnen lag. Als die Scharen der Götter das fliehende Heer Māras sahen, riefen sie: „Māras Niederlage ist besiegelt, der Sieg des Prinzen Siddhattha ist vollbracht! Wir wollen eine Siegesverehrung darbringen!“ So verkündeten es die Gottheiten den Gottheiten, die Nāgas den Nāgas, die Supaṇṇas den Supaṇṇas, die Brahmās den Brahmās. Mit Wohlgerüchen, Blumenkränzen und anderem in den Händen begaben sie sich zum Bodhi-Thron in die Gegenwart des Großen Mannes. Evaṃ gatesu pana tesu – Als sie sich nun so eingefunden hatten – ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā devagaṇā mahesino. „Wahrlich, dies ist der Sieg des ruhmreichen Buddha, und die Niederlage des sündhaften Māra! So verkündeten erfreut am Sitze der Erleuchtung die Scharen der Götter den Sieg des großen Weisen.“ ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā nāgagaṇā mahesino. „Wahrlich, dies ist der Sieg des ruhmreichen Buddha, und die Niederlage des sündhaften Māra! So verkündeten erfreut am Sitze der Erleuchtung die Scharen der Nāgas den Sieg des großen Weisen.“ ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā supaṇṇasaṅghāpi mahesino. „Wahrlich, dies ist der Sieg des ruhmreichen Buddha, und die Niederlage des sündhaften Māra! So verkündeten erfreut am Sitze der Erleuchtung auch die Scharen der Supaṇṇas den Sieg des großen Weisen.“ ‘‘Jayo hi buddhassa sirīmato ayaṃ, mārassa ca pāpimato parājayo; Ugghosayuṃ bodhimaṇḍe pamoditā, jayaṃ tadā brahmagaṇā mahesino’’ti. – „Wahrlich, dies ist der Sieg des ruhmreichen Buddha, und die Niederlage des sündhaften Māra! So verkündeten erfreut am Sitze der Erleuchtung die Scharen der Brahmās den Sieg des großen Weisen.“ Avasesā dasasu cakkavāḷasahassesu devatā mālāgandhavilepanehi pūjayamānā nānappakārā ca thutiyo vadamānā aṭṭhaṃsu. Evaṃ dharamāneyeva sūriye mahāpuriso mārabalaṃ vidhamitvā cīvarūpari patamānehi bodhirukkhaṅkurehi rattapavāḷadalehi viya pūjiyamāno paṭhamayāme pubbenivāsaṃ anussaritvā majjhimayāme dibbacakkhuṃ visodhetvā pacchimayāme paṭiccasamuppāde ñāṇaṃ otāresi. Athassa dvādasapadikaṃ paccayākāraṃ vaṭṭavivaṭṭavasena anulomapaṭilomato sammasantassa dasasahassī lokadhātu udakapariyantaṃ katvā dvādasakkhattuṃ saṅkampi. Die übrigen Gottheiten in den zehntausend Weltensystemen standen da, während sie mit Blumenkränzen, Wohlgerüchen und Salben Verehrung darbrachten und mannigfache Lobpreisungen aussprachen. Während die Sonne noch schien, vernichtete der Große Mann das Heer Māras. Er wurde gleichsam mit roten korallenähnlichen Trieben des Bodhi-Baumes verehrt, die auf sein Gewand herabfielen. In der ersten Nachtwache erinnerte er sich an frühere Daseinsformen, in der mittleren Nachtwache läuterte er das himmlische Auge, und in der letzten Nachtwache lenkte er seine Erkenntnis auf die Bedingte Entstehung. Als er sodann den zwölfgliedrigen Kausalzusammenhang nach der Weise des Kreislaufs und dessen Beendigung vorwärts und rückwärts betrachtete, erbebte das zehntausendfache Weltsystem bis an die Grenzen seiner Wasserschicht zwölfmal. Mahāpurise [Pg.90] pana dasasahassilokadhātuṃ unnādetvā aruṇuggamanavelāya sabbaññutaññāṇaṃ paṭivijjhante sakalā dasasahassī lokadhātu alaṅkatapaṭiyattā ahosi. Pācīnacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ dhajānaṃ paṭākā pacchimacakkavāḷamukhavaṭṭiṃ paharanti, tathā pacchimacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ dhajānaṃ paṭākā pācīnacakkavāḷamukhavaṭṭiṃ paharanti, dakkhiṇacakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ dhajānaṃ paṭākā uttaracakkavāḷamukhavaṭṭiṃ paharanti, uttaracakkavāḷamukhavaṭṭiyaṃ ussāpitānaṃ dhajānaṃ paṭākā dakkhiṇacakkavāḷamukhavaṭṭiṃ paharanti, pathavitale ussāpitānaṃ dhajānaṃ paṭākā brahmalokaṃ āhacca aṭṭhaṃsu, brahmaloke baddhānaṃ dhajānaṃ paṭākā pathavitale patiṭṭhahiṃsu, dasasahassesu cakkavāḷesu pupphūpagā rukkhā pupphaṃ gaṇhiṃsu, phalūpagā rukkhā phalapiṇḍibhārasahitā ahesuṃ. Khandhesu khandhapadumāni pupphiṃsu, sākhāsu sākhāpadumāni, latāsu latāpadumāni, ākāse olambakapadumāni, ghanasilātalāni bhinditvā uparūpari satapattāni hutvā daṇḍakapadumāni uṭṭhahiṃsu. Dasasahassī lokadhātu vaṭṭetvā vissaṭṭhamālāguḷā viya susanthatapupphasanthāro viya ca pupphābhikiṇṇā ahosi. Cakkavāḷantaresu aṭṭhayojanasahassā lokantarikanirayā sattasūriyappabhāhipianobhāsitapubbā tadā ekobhāsā ahesuṃ. Caturāsītiyojanasahassagambhīro mahāsamuddo madhurodako ahosi, nadiyo na pavattiṃsu, jaccandhā rūpāni passiṃsu, jātibadhirā saddaṃ suṇiṃsu, jātipīṭhasappino padasā gacchiṃsu, andubandhanādīni chijjitvā patiṃsu. Als der Große Mann jedoch das zehntausendfache Weltsystem erbeben ließ und zur Zeit des Morgengrauens die Allwissenheit erlangte, wurde das gesamte zehntausendfache Weltsystem herrlich geschmückt und hergerichtet. Die Flaggen der Banner, die am östlichen Rand der Weltensphäre aufgestellt waren, berührten den westlichen Rand der Weltensphäre; ebenso berührten die Flaggen der Banner, die am westlichen Rand der Weltensphäre aufgestellt waren, den östlichen Rand der Weltensphäre; die Flaggen der Banner, die am südlichen Rand aufgestellt waren, berührten den nördlichen Rand; und die Flaggen der Banner, die am nördlichen Rand aufgestellt waren, berührten den südlichen Rand. Die Flaggen der auf der Erde aufgestellten Banner reichten bis zur Brahmā-Welt empor und standen dort fest; die Flaggen der in der Brahmā-Welt befestigten Banner reichten bis zur Erdoberfläche hinab. In den zehntausend Weltensphären brachen die blütentragenden Bäume in Blüte aus, und die fruchttragenden Bäume wurden schwer von Fruchtbündeln. Auf den Baumstämmen erblühten Stamm-Lotusse, auf den Ästen Ast-Lotusse, an den Ranken Ranken-Lotusse und am Himmel hängende Lotusse. Stängel-Lotusse durchbrachen die harten Felsböden und erhoben sich Schicht um Schicht als hundertblättrige Blüten. Das zehntausendfache Weltsystem was so dicht mit Blüten übersät wie ein herabgeworfener Blumenkranzball oder wie ein kunstvoll ausgebreiteter Blütenteppich. Die achttausend Yojanas weiten Lokantarika-Höllen zwischen den Weltensphären, die zuvor selbst durch das Licht von sieben Sonnen niemals erhellt worden waren, erstrahlten zu jener Zeit in einem einzigen Glanz. Der vierundachtzigtausend Yojanas tiefe Ozean wurde mit süßem Wasser gefüllt, die Flüsse hörten auf zu fließen, die von Geburt an Blinden sahen Gestalten, die von Geburt an Tauben hörten Töne, die von Geburt an Gelähmten gingen zu Fuß, und Fesseln, Ketten und Bande brachen entzwei und fielen ab. Evaṃ aparimāṇena sirivibhavena pūjiyamāno mahāpuriso anekappakāresu acchariyadhammesu pātubhūtesu sabbaññutaṃ paṭivijjhitvā sabbabuddhehi avijahitaṃ udānaṃ udānesi – Während der Große Mann auf diese Weise mit unermesslicher Pracht und Herrlichkeit verehrt wurde und sich mannigfache wunderbare Phänomene offenbarten, erlangte er die Allwissenheit und stieß den feierlichen Ruf aus, der von allen Buddhas niemals ausgelassen wird: ‘‘Anekajātisaṃsāraṃ, sandhāvissaṃ anibbisaṃ; Gahakāraṃ gavesanto, dukkhā jāti punappunaṃ. „Durch den Kreislauf vieler Geburten hindurch bin ich geeilt, ohne Rast und Ruh, den Erbauer des Hauses suchend. Schmerzvoll ist die Geburt immer wieder!“ ‘‘Gahakāraka diṭṭhosi, puna gehaṃ na kāhasi; Sabbā te phāsukā bhaggā, gahakūṭaṃ visaṅkhataṃ; Visaṅkhāragataṃ cittaṃ, taṇhānaṃ khayamajjhagā’’ti. (dha. pa. 153-154); „O Hausbauer, du bist nun gesehen! Du wirst kein Haus mehr bauen. All deine Sparren sind gebrochen, der Dachfirst ist zertrümmert. Mein Geist ist zum Unbedingten gelangt, das Ende aller Begehrlichkeiten ist erreicht!“ Iti [Pg.91] tusitabhavanato paṭṭhāya yāva ayaṃ bodhimaṇḍe sabbaññutappatti, ettakaṃ ṭhānaṃ avidūrenidānaṃ nāmāti veditabbaṃ. So ist dieser Abschnitt, beginnend von der Existenz im Tusita-Himmel bis hin zur Erlangung der Allwissenheit am Sitze der Erleuchtung, als die „Nicht-sehr-ferne Vorgeschichte“ (Avidūrenidāna) zu verstehen. Avidūrenidānakathā niṭṭhitā. Hier endet die Darlegung der Nicht-sehr-fernen Vorgeschichte. 3. Santikenidānakathā 3. Die Darlegung der nahen Vorgeschichte (Santikenidāna) ‘‘Santikenidānaṃ pana ‘ekaṃ samayaṃ bhagavā sāvatthiyaṃ viharati jetavane anāthapiṇḍikassa ārāme’. ‘Vesāliyaṃ viharati mahāvane kūṭāgārasālāya’nti ca evaṃ tasmiṃ tasmiṃ ṭhāneyeva labbhatī’’ti vuttaṃ. Kiñcāpi evaṃ vuttaṃ, atha kho pana tampi ādito paṭṭhāya evaṃ veditabbaṃ – udānañhi udānetvā jayapallaṅke nisinnassa bhagavato etadahosi – ‘‘ahaṃ kappasatasahassādhikāni cattāri asaṅkhyeyyāni imassa pallaṅkassa kāraṇā sandhāviṃ, ettakaṃ me kālaṃ imasseva pallaṅkassa kāraṇā alaṅkatasīsaṃ gīvāya chinditvā dinnaṃ, suañjitāni akkhīni hadayamaṃsañca uppāṭevā dinnaṃ, jālīkumārasadisā puttā, kaṇhājinakumārisadisā dhītaro, maddīdevisadisā bhariyāyo ca paresaṃ dāsatthāya dinnā. Ayaṃ me pallaṅko jayapallaṅko thirapallaṅko, ettha me nisinnassa saṅkappā paripuṇṇā, na tāva ito vuṭṭhahissāmī’’ti anekakoṭisatasahassasamāpattiyo samāpajjanto sattāhaṃ tattheva nisīdi. Yaṃ sandhāya vuttaṃ – ‘‘atha kho bhagavā sattāhaṃ ekapallaṅkena nisīdi vimuttisukhapaṭisaṃvedī’’ti (mahāva. 1; udā. 1). Bezüglich des nahen Ursprungs (santikenidāna) wurde gesagt: „Zu einer Zeit verweilte der Erhabene in Sāvatthī, im Jetavana, im Kloster des Anāthapiṇḍika“ und „Er verweilte in Vesālī, im Großen Wald, in der Giebelhalle“, und so wird dies jeweils an den entsprechenden Orten überliefert. Auch wenn dies so gesagt wurde, so ist es dennoch von Anfang an wie folgt zu verstehen: Als der Erhabene auf dem Siegesthron saß, stieß er einen freudigen Ausruf aus, und es ging ihm folgender Gedanke durch den Sinn: „Wegen dieses Throns bin ich vier unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Äonen lang durch den Daseinskreislauf gewandert. Während dieser ganzen Zeit habe ich um dieses Throns willen mein geschmücktes Haupt vom Halse schneiden lassen und hingegeben, meine wohlgesalbten Augen und das Fleisch meines Herzens herausgerissen und hingegeben; Söhne wie den Prinzen Jāli, Töchter wie die Prinzessin Kaṇhājinā und Gattinnen wie die Königin Maddī habe ich anderen zur Sklaverei überlassen. Dieser mein Thron ist der Siegesthron, der feste Thron. Für mich, der ich hier sitze, sind meine Absichten erfüllt. Ich werde von hier nicht eher aufstehen.“ Und so verweilte er sieben Tage lang genau auf diesem Thron, während er in viele Hunderttausend Koṭis von meditativen Errungenschaften (samāpatti) eintrat. Darauf bezieht sich das Wort: „Da saß der Erhabene sieben Tage lang auf einem einzigen Thron und erlebte das Glück der Befreiung (vimuttisukha).“ Atha ekaccānaṃ devatānaṃ ‘‘ajjāpi nūna siddhatthassa kattabbakiccaṃ atthi, pallaṅkasmiñhi ālayaṃ na vijahatī’’ti parivitakko udapādi. Satthā devatānaṃ parivitakkaṃ ñatvā tāsaṃ vitakkavūpasamatthaṃ vehāsaṃ abbhuggantvā yamakapāṭihāriyaṃ dassesi. Mahābodhimaṇḍe hi katapāṭihāriyañca ñātisamāgame katapāṭihāriyañca pāthikaputtasamāgame katapāṭihāriyañca sabbaṃ kaṇḍambarukkhamūle katayamakapāṭihāriyasadisaṃ ahosi. Da entstand bei einigen Gottheiten der Gedanke: „Gewiss hat Siddhattha auch heute noch eine Pflicht zu erfüllen, denn er gibt seine Anhänglichkeit an den Thron nicht auf.“ Der Meister erkannte den Gedanken der Gottheiten und stieg, um ihre Zweifel zu besänftigen, in die Luft empor und vollbrachte das Doppelwunder (yamakapāṭihāriya). Denn das am Sitz der großen Erleuchtung (mahābodhimaṇḍe) vollbrachte Wunder, das beim Treffen der Verwandten vollbrachte Wunder und das bei der Begegnung mit Pāthikaputta vollbrachte Wunder – all dies war genau so wie das am Fuße des Kaṇḍamba-Mangobaums vollbrachte Doppelwunder. Evaṃ satthā iminā pāṭihāriyena devatānaṃ vitakkaṃ vūpasametvā pallaṅkato īsakaṃ pācīnanissite uttaradisābhāge ṭhatvā ‘‘imasmiṃ vata [Pg.92] me pallaṅke sabbaññutaṃ paṭividdha’’nti cattāri asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca pūritānaṃ pāramīnaṃ balādhigamaṭṭhānaṃ pallaṅkaṃ bodhirukkhañca animisehi akkhīhi olokayamāno sattāhaṃ vītināmesi, taṃ ṭhānaṃ animisacetiyaṃ nāma jātaṃ. Atha satthā pallaṅkassa ca ṭhitaṭṭhānassa ca antarā caṅkamaṃ māpetvā puratthimapacchimato āyate ratanacaṅkame caṅkamanto sattāhaṃ vītināmesi. Taṃ ṭhānaṃ ratanacaṅkamacetiyaṃ nāma jātaṃ. Nachdem der Meister auf diese Weise durch dieses Wunder den Zweifel der Gottheiten beschwichtigt hatte, stellte er sich etwas nordöstlich vom Thron auf und verbrachte sieben Tage damit, mit unbewegten Augen auf den Thron – den Ort, an dem er durch die Kraft der über vier unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Äonen erfüllten Vollkommenheiten (pāramī) die Allwissenheit erlangt hatte – und auf den Bodhi-Baum zu blicken, während er dachte: „Auf diesem Thron fürwahr habe ich die Allwissenheit (sabbaññutā) durchdrungen.“ Dieser Ort wurde als Animisa-Cetiya bekannt. Danach erschuf der Meister zwischen dem Thron und seinem Standplatz einen Wandelpfad und verbrachte sieben Tage damit, auf diesem von Osten nach Westen ausgerichteten Juwelen-Wandelpfad (ratanacaṅkama) auf und ab zu gehen. Dieser Ort wurde als Ratanacaṅkama-Cetiya bekannt. Catutthe pana sattāhe bodhito pacchimuttaradisābhāge devatā ratanagharaṃ māpayiṃsu. Tattha bhagavā pallaṅkena nisīditvā abhidhammapiṭakaṃ visesato cettha anantanayasamantapaṭṭhānaṃ vicinanto sattāhaṃ vītināmesi. Ābhidhammikā panāhu – ‘‘ratanagharaṃ nāma na sattaratanamayaṃ gehaṃ, sattannaṃ pana pakaraṇānaṃ sammasitaṭṭhānaṃ ‘ratanaghara’nti vuccatī’’ti. Yasmā panettha ubhopete pariyāyena yujjanti, tasmā ubhayampetaṃ gahetabbameva. Tato paṭṭhāya pana taṃ ṭhānaṃ ratanagharacetiyaṃ nāma jātaṃ. Evaṃ satthā bodhisamīpeyeva cattāri sattāhāni vītināmetvā pañcame sattāhe bodhirukkhamūlā yena ajapālanigrodho tenupasaṅkami. Tatrāpi dhammaṃ vicinanto vimuttisukhañca paṭisaṃvedento nisīdi. In der vierten Woche erschufen die Gottheiten nordwestlich des Bodhi-Baumes ein Juwelenhaus (ratanaghara). Dort saß der Erhabene mit untergeschlagenen Beinen und verbrachte sieben Tage damit, den Abhidhamma-Piṭaka zu untersuchen, insbesondere das unendliche Methoden umfassende Samantapaṭṭhāna. Die Abhidhamma-Lehrer aber sagten: „Das sogenannte Juwelenhaus ist kein aus den sieben kostbaren Edelsteinen erbautes Haus; vielmehr wird der Ort, an dem die sieben Abhandlungen (pakaraṇa) untersucht wurden, als Juwelenhaus bezeichnet.“ Da hierbei beide Auslegungen im übertragenen Sinne (pariyāyena) zutreffen, sind gewiss beide anzunehmen. Von da an wurde jener Ort als Ratanaghara-Cetiya bekannt. Nachdem der Meister so vier Wochen in der Nähe des Bodhi-Baumes verbracht hatte, begab er sich in der fünften Woche vom Fuße des Bodhi-Baumes zum Ajapāla-Banyanbaum. Auch dort saß er, während er den Dhamma untersuchte und das Glück der Befreiung (vimuttisukha) erlebte. Tasmiṃ samaye māro pāpimā ‘‘ettakaṃ kālaṃ anubandhanto otārāpekkhopi imassa na kiñci khalitaṃ addasaṃ, atikkantodāni esa mama vasa’’nti domanassappatto mahāmagge nisīditvā soḷasa kāraṇāni cintento bhūmiyaṃ soḷasa lekhā ākaḍḍhi – ‘‘ahaṃ eso viya dānapāramiṃ na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti ekaṃ lekhaṃ ākaḍḍhi. Tathā ‘‘ahaṃ eso viya sīlapāramiṃ…pe… nekkhammapāramiṃ, paññāpāramiṃ, vīriyapāramiṃ, khantipāramiṃ, saccapāramiṃ, adhiṭṭhānapāramiṃ, mettāpāramiṃ, upekkhāpāramiṃ na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti dasamaṃ lekhaṃ ākaḍḍhi. Tathā ‘‘ahaṃ eso viya asādhāraṇassa indriyaparopariyattañāṇassa paṭivedhāya upanissayabhūtā dasa pāramiyo na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti ekādasamaṃ lekhaṃ ākaḍḍhi. Tathā ‘‘ahaṃ eso viya asādhāraṇassa āsayānusayañāṇassa…pe… mahākaruṇāsamāpattiñāṇassa, yamakapāṭihāriyañāṇassa, anāvaraṇañāṇassa, sabbaññutaññāṇassa paṭivedhāya upanissayabhūtā dasa [Pg.93] pāramiyo na pūresiṃ, tenamhi iminā sadiso na jāto’’ti soḷasamaṃ lekhaṃ ākaḍḍhi. Evaṃ māro imehi kāraṇehi mahāmagge soḷasa lekhā ākaḍḍhitvā nisīdi. Zu jener Zeit dachte der böse Māra voller Kummer: „Obwohl ich ihm all diese Zeit folgte und nach einer Schwachstelle suchte, konnte ich keinen Fehltritt bei ihm entdecken. Nun ist er meiner Macht entkommen.“ Er setzte sich auf die Hauptstraße, dachte über sechzehn Gründe nach und zog sechzehn Striche auf dem Boden: „Ich habe nicht wie er die Vollkommenheit des Gebens (dānapāramī) erfüllt; deshalb bin ich ihm nicht gleichgeworden“, so zog er den ersten Strich. Ebenso: „Ich habe nicht wie er die Vollkommenheit der Tugend (sīlapāramī) … [und so weiter] … die Vollkommenheit der Entsagung (nekkhammapāramī), die Vollkommenheit der Weisheit (paññāpāramī), die Vollkommenheit der Willenskraft (vīriyapāramī), die Vollkommenheit der Geduld (khantipāramī), die Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit (saccapāramī), die Vollkommenheit der Entschlossenheit (adhiṭṭhānapāramī), die Vollkommenheit der liebenden Güte (mettāpāramī) und die Vollkommenheit des Gleichmutes (upekkhāpāramī) erfüllt; deshalb bin ich ihm nicht gleichgeworden“, so zog er den zehnten Strich. Ebenso: „Ich habe nicht wie er die zehn Vollkommenheiten erfüllt, die als unterstützende Bedingung (upanissaya) dienen zur Durchdringung des unvergleichlichen Wissens um die Reifegrade der geistigen Fähigkeiten anderer Wesen (indriyaparopariyattañāṇa); deshalb bin ich ihm nicht gleichgeworden“, so zog er den elften Strich. Ebenso: „Ich habe nicht wie er die zehn Vollkommenheiten erfüllt, die als unterstützende Bedingung dienen zur Durchdringung des unvergleichlichen Wissens um die Neigungen und latenten Tendenzen der Wesen (āsayānusayañāṇa) … [und so weiter] … des Wissens um das Eingehen in das große Mitgefühl (mahākaruṇāsamāpattiñāṇa), des Wissens um das Doppelwunder (yamakapāṭihāriyañāṇa), des ungehinderten Wissens (anāvaraṇañāṇa) und des Allwissenheitswissens (sabbaññutaññāṇa) erfüllt; deshalb bin ich ihm nicht gleichgeworden“, so zog er den sechzehnten Strich. Auf diese Weise saß Māra da und zog aus diesen Gründen sechzehn Striche auf der Hauptstraße. Tasmiñca samaye taṇhā, arati, ragā cāti tisso māradhītaro (saṃ. ni. 1.161) ‘‘pitā no na paññāyati, kahaṃ nu kho etarahī’’ti olokayamānā taṃ domanassappattaṃ bhūmiṃ lekhamānaṃ nisinnaṃ disvā pitu santikaṃ gantvā ‘‘kasmā, tāta, tvaṃ dukkhī dummano’’ti pucchiṃsu. ‘‘Ammā, ayaṃ mahāsamaṇo mayhaṃ vasaṃ atikkanto, ettakaṃ kālaṃ olokento otāramassa daṭṭhuṃ nāsakkhiṃ, tenamhi dukkhī dummano’’ti. ‘‘Yadi evaṃ mā cintayittha, mayametaṃ attano vase katvā ādāya āgamissāmā’’ti āhaṃsu. ‘‘Na sakkā, ammā, esa kenaci vase kātuṃ, acalāya saddhāya patiṭṭhito esa puriso’’ti. ‘‘Tāta, mayaṃ itthiyo nāma, idāneva naṃ rāgapāsādīhi bandhitvā ānessāma, tumhe mā cintayitthā’’ti vatvā bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ‘‘pāde te, samaṇa, paricāremā’’ti āhaṃsu. Bhagavā neva tāsaṃ vacanaṃ manasi akāsi, na akkhīni ummīletvā olokesi, anuttare upadhisaṅkhaye vimuttiyā vivekasukhaññeva anubhavanto nisīdi. Zu jener Zeit hielten die drei Töchter Māras – Taṇhā, Arati und Rāgā – Ausschau und sprachen: "Unser Vater ist nicht zu sehen. Wo mag er wohl jetzt sein?" Als sie ihn von Kummer erfüllt auf dem Boden sitzend und Striche in die Erde zeichnend sahen, gingen sie zu ihrem Vater und fragten ihn: "Warum, Vater, bist du traurig und bedrückt?" Er antwortete: "Meine Töchter, dieser große Asket hat sich meiner Macht entzogen. Obwohl ich ihn so lange beobachtete, konnte ich keine Schwachstelle an ihm finden; darum bin ich traurig und bedrückt." Sie sagten: "Wenn dem so ist, gräme dich nicht. Wir werden ihn unter unsere Kontrolle bringen und ihn dir herbeiführen." Er sprach: "Es ist unmöglich, meine Töchter, diesen unter jemandes Kontrolle zu bringen. Dieser erhabene Mensch ist in unerschütterlichem Glauben gefestigt." Sie entgegneten: "Vater, wir sind schließlich Frauen! Wir werden diesen Asketen sogleich mit den Fesseln der Leidenschaft binden und herbeibringen. Sorge dich nicht." Nachdem sie dies gesagt hatten, näherten sie sich dem Erhabenen und sprachen: "Zu deinen Füßen, o Asket, wollen wir dir dienen." Der Erhabene schenkte ihren Worten keinerlei Beachtung, noch öffnete er die Augen, um sie anzusehen. Er verweilte einfach, während er das Glück der Abgeschiedenheit durch die Befreiung im unübertrefflichen Erlöschen aller Daseinsgrundlagen erlebte. Puna māradhītaro ‘‘uccāvacā kho purisānaṃ adhippāyā, kesañci kumārikāsu pemaṃ hoti, kesañci paṭhamavaye ṭhitāsu, kesañci majjhimavaye ṭhitāsu, kesañci pacchimavaye ṭhitāsu, yaṃnūna mayaṃ nānappakārehi rūpehi palobhetvā gaṇheyyāmā’’ti ekamekā kumārikavaṇṇādivasena sakaṃ sakaṃ attabhāvaṃ abhinimminitvā kumārikā, avijātā, sakiṃvijātā, duvijātā, majjhimitthiyo, mahitthiyo ca hutvā chakkhattuṃ bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ‘‘pāde te, samaṇa, paricāremā’’ti āhaṃsu. Tampi bhagavā na manasākāsi, yathā taṃ anuttare upadhisaṅkhaye vimutto. Keci panācariyā vadanti – ‘‘tā mahitthibhāvena upagatā disvā bhagavā – ‘etā khaṇḍadantā palitakesā hontū’ti adhiṭṭhāsī’’ti. Taṃ na gahetabbaṃ. Na hi bhagavā evarūpaṃ adhiṭṭhānaṃ akāsi. Bhagavā pana ‘‘apetha tumhe, kiṃ disvā evaṃ vāyamatha, evarūpaṃ nāma avītarāgādīnaṃ purato kātuṃ vaṭṭati. Tathāgatassa pana rāgo pahīno, doso pahīno, moho pahīno’’ti attano kilesappahānaṃ ārabbha – Wiederum dachten die Töchter Māras: "Die Wünsche der Männer sind wahrlich vielfältig. Manche empfinden Liebe für junge Mädchen, manche für Frauen im ersten Lebensalter, manche für Frauen im mittleren Lebensalter und manche für Frauen im fortgeschrittenen Lebensalter. Wie wäre es, wenn wir ihn in verschiedenen Gestalten verführen und für uns gewinnen?" Jede von ihnen erschuf für sich verschiedene Gestalten, wie etwa die von jungen Mädchen usw. Sie näherten sich dem Erhabenen sechsmal in der Gestalt von jungen Mädchen, von Frauen, die noch nicht geboren hatten, von Frauen, die einmal geboren hatten, von Frauen, die zweimal geboren hatten, von Frauen im mittleren Alter und von älteren Frauen, und sprachen: "Zu deinen Füßen, o Asket, wollen wir dir dienen." Doch auch dies beachtete der Erhabene nicht, da er im unübertrefflichen Erlöschen der Daseinsgrundlagen befreit war. Einige Lehrer sagen jedoch: "Als der Erhabene sah, wie sie sich als ältere Frauen näherten, traf er die Willensbestimmung: 'Mögen sie abgebrochene Zähne und graues Haar bekommen!'" Dies sollte man nicht so annehmen. Denn der Erhabene trifft keine solche Willensbestimmung. Vielmehr sprach der Erhabene im Hinblick auf seine eigene Überwindung der Befleckungen: "Weicht zurück! Was seht ihr, dass ihr euch so abmüht? Dergleichen zu tun, schickt sich vor solchen, die nicht frei von Leidenschaft und den anderen Trieben sind. Dem Tathāgata jedoch ist die Leidenschaft geschwunden, der Hass geschwunden, die Verblendung geschwunden." ‘‘Yassa [Pg.94] jitaṃ nāvajīyati, jitamassa noyāti koci loke; Taṃ buddhamanantagocaraṃ, apadaṃ kena padena nessatha. "Dessen Sieg nicht wieder zunichte gemacht werden kann, dessen errungenem Sieg niemand auf der Welt gleichkommt – diesen Buddha von unbegrenztem Bereich, den Spurlosen, auf welchem Pfad wollt ihr ihn führen? ‘‘Yassa jālinī visattikā, taṇhā natthi kuhiñci netave; Taṃ buddhamanantagocaraṃ, apadaṃ kena padena nessathā’’ti. (dha. pa. 179-180) – "In wem das einfangende, giftige Begehren nicht existiert, um ihn irgendwohin zu führen – diesen Buddha von unbegrenztem Bereich, den Spurlosen, auf welchem Pfad wollt ihr ihn führen?" Imā dhammapade buddhavagge dve gāthā vadanto dhammaṃ desesi. Tā ‘‘saccaṃ kira no pitā avoca, ‘arahaṃ sugato loke, na rāgena suvānayo’’’tiādīni (saṃ. ni. 1.161) vatvā pitu santikaṃ āgamiṃsu. Indem er diese zwei Verse aus dem Buddha-Kapitel des Dhammapada sprach, verkündete er die Lehre. Jene Töchter sprachen: "Unser Vater hat wahrlich die Wahrheit gesagt: 'Der Arahat, der Sugata in der Welt, ist durch Leidenschaft nicht leicht zu verführen'", und kehrten nach diesen Worten zu ihrem Vater zurück. Bhagavāpi tattheva sattāhaṃ vītināmetvā tato mucalindamūlaṃ agamāsi. Tattha sattāhavaddalikāya uppannāya sītādipaṭibāhanatthaṃ mucalindena nāma nāgarājena sattakkhattuṃ bhogehi parikkhitto asambādhāya gandhakuṭiyaṃ viharanto viya vimuttisukhaṃ paṭisaṃvediyamāno sattāhaṃ vītināmetvā rājāyatanaṃ upasaṅkamitvā tatthapi vimuttisukhaṃ paṭisaṃvediyamānoyeva sattāhaṃ vītināmesi. Ettāvatā satta sattāhāni paripuṇṇāni. Etthantare neva mukhadhovanaṃ, na sarīrapaṭijagganaṃ, na āhārakiccaṃ ahosi, jhānasukhaphalasukheneva ca vītināmesi. Auch der Erhabene verbrachte ebendort sieben Tage und begab sich danach zum Fuß des Mucalinda-Baumes. Als dort ein siebentägiges Unwetter aufzog, wurde er zum Schutz vor Kälte und anderen Unbilden vom Schlangenkönig namens Mucalinda siebenmal mit seinen Windungen umschlossen. So verbrachte er, das Glück der Befreiung erfahrend, als verweile er unbeengt in einem wohlriechenden Gemach, sieben Tage. Danach suchte er den Rājāyatana-Baum auf und verbrachte auch dort, das Glück der Befreiung erfahrend, sieben Tage. Damit waren die sieben Wochen vollendet. In dieser Zeit gab es weder ein Waschen des Gesichts, noch eine Pflege des Körpers, noch die Einnahme von Nahrung; er verbrachte die Zeit ausschließlich im Glück der Vertiefung und im Glück der Frucht. Athassa tasmiṃ sattasattāhamatthake ekūnapaññāsatime divase tattha nisinnassa ‘‘mukhaṃ dhovissāmī’’ti cittaṃ udapādi. Sakko devānamindo agadaharītakaṃ āharitvā adāsi, satthā taṃ paribhuñji, tenassa sarīravaḷañjo ahosi. Athassa sakkoyeva nāgalatādantakaṭṭhañceva mukhadhovanodakañca adāsi. Satthā taṃ dantakaṭṭhaṃ khāditvāva anotattadahodakena mukhaṃ dhovitvā tattheva rājāyatanamūle nisīdi. Am neunundvierzigsten Tag, am Ende dieser sieben Wochen, entstand in ihm, während er dort saß, der Gedanke: "Ich will mein Gesicht waschen." Sakka, der Herr der Götter, brachte ihm eine heilkräftige Myrobalanen-Frucht und reichte sie ihm dar. Der Meister verzehrte sie, woraufhin sich sein Darm entleerte. Danach gab ihm eben dieser Sakka ein Zahnputzholz aus einer Nāgalatā-Liane sowie Wasser zum Waschen des Gesichts. Der Meister kaute das Zahnputzholz, wusch sein Gesicht mit Wasser aus dem Anotatta-See und setzte sich wieder an den Fuß des Rājāyatana-Baumes. Tasmiṃ samaye tapussa bhallikā nāma dve vāṇijā pañcahi sakaṭasatehi ukkalā janapadā majjhimadesaṃ gacchantā pubbe attano ñātisālohitāya devatāya sakaṭāni sannirumbhitvā satthu āhārasampādane ussāhitā manthañca [Pg.95] madhupiṇḍikañca ādāya – ‘‘paṭiggaṇhātu no, bhante, bhagavā imaṃ āhāraṃ anukampaṃ upādāyā’’ti satthāraṃ upanāmetvā aṭṭhaṃsu. Bhagavā pāyāsapaṭiggahaṇadivaseyeva pattassa antarahitattā ‘‘na kho tathāgatā hatthesu paṭiggaṇhanti, kimhi nu kho ahaṃ paṭiggaṇheyya’’nti cintesi. Athassa cittaṃ ñatvā catūhi disāhi cattāro mahārājāno indanīlamaṇimaye patte upanāmesuṃ, bhagavā te paṭikkhipi. Puna muggavaṇṇaselamaye cattāro patte upanāmesuṃ. Bhagavā catunnampi mahārājānaṃ saddhānurakkhaṇatthāya cattāropi patte paṭiggahetvā uparūpari ṭhapetvā ‘‘eko hotū’’ti adhiṭṭhāsi. Cattāropi mukhavaṭṭiyaṃ paññāyamānalekhā hutvā majjhimappamāṇena ekattaṃ upagamiṃsu. Bhagavā tasmiṃ paccagghe selamaye patte āhāraṃ paṭiggahetvā paribhuñjitvā anumodanaṃ akāsi. Te dve bhātaro vāṇijā buddhañca dhammañca saraṇaṃ gantvā dvevācikā upāsakā ahesuṃ. Atha nesaṃ ‘‘ekaṃ no, bhante, paricaritabbaṭṭhānaṃ dethā’’ti vadantānaṃ dakkhiṇahatthena attano sīsaṃ parāmasitvā kesadhātuyo adāsi. Te attano nagare tā dhātuyo suvaṇṇasamuggassa anto pakkhipitvā cetiyaṃ patiṭṭhāpesuṃ. Zu jener Zeit reisten zwei Kaufleute namens Tapussa und Bhallika mit fünfhundert Wagen aus dem Ukkalā-Land in das Mittelland. Eine Gottheit, die in einem früheren Leben mit ihnen verwandt gewesen war, hielt ihre Wagen an und ermutigte sie, dem Meister Nahrung darzubringen. Sie nahmen Gerstenmehl und Honigklöße mit sich, traten vor den Meister und sprachen: "Möge der Erhabene, o Herr, diese Nahrung aus Mitgefühl von uns annehmen!", und blieben ehrerbietig stehen. Da die Almosenschale des Erhabenen bereits an dem Tag verschwunden war, an dem er den Milchreis angenommen hatte, dachte er: "Die Tathāgatas nehmen Nahrung nicht mit den Händen entgegen. Worin soll ich sie nun entgegennehmen?" Als die vier Himmelskönige seine Gedanken erkannten, kamen sie aus den vier Himmelsrichtungen und reichten ihm vier Schalen aus Saphir dar. Der Erhabene wies diese ab. Daraufhin reichten sie ihm vier Steinschalen von der Farbe grüner Mungobohnen dar. Um das gläubige Vertrauen aller vier Himmelskönige zu bewahren, nahm der Erhabene alle vier Schalen an, stapelte sie übereinander und bestimmt: "Sie soll zu einer einzigen werden!" Da wurden alle vier Schalen zu einer einzigen von mittlerer Größe, wobei am Schalenrand vier Linien sichtbar blieben. Der Erhabene nahm die Nahrung in dieser kostbaren Steinschale entgegen, verzehrte sie und sprach die Worte des Dankes. Die beiden kaufmännischen Brüder nahmen Zuflucht zum Buddha und zur Lehre und wurden so zu Laienanhängern mit der zweifachen Zuflucht. Als sie baten: "O Herr, gib uns ein Objekt zur Verehrung", strich er sich mit der rechten Hand über sein Haupt und schenkte ihnen Haarreliquien. Sie brachten diese Reliquien in ihre Heimatstadt, legten sie in ein goldenes Kästchen und errichteten darüber einen Schrein. Sammāsambuddho pana tato vuṭṭhāya puna ajapālanigrodhameva gantvā nigrodhamūle nisīdi. Athassa tattha nisinnamattasseva attanā adhigatadhammassa gambhīrataṃ paccavekkhantassa sabbabuddhānaṃ āciṇṇo – ‘‘kicchena adhigato kho myāyaṃ dhammo’’ti paresaṃ adesetukāmatākārappatto vitakko udapādi. Atha kho brahmā sahampati ‘‘nassati vata bho loko, vinassati vata bho loko’’ti dasahi cakkavāḷasahassehi sakkasuyāmasantusitanimmānarativasavattimahābrahmāno ādāya satthu santikaṃ āgantvā ‘‘desetu, bhante, bhagavā dhamma’’ntiādinā nayena dhammadesanaṃ āyāci. Der vollkommen Erleuchtete erhob sich von dort, begab sich abermals zum Ajapāla-Banyanbaum und setzte sich am Fuße des Banyanbaumes nieder. Als er dort kaum Platz genommen hatte, dachte er über die Tiefe des von ihm selbst verwirklichten Dhamma nach, und es stieg in ihm ein Gedanke auf – wie es bei allen Buddhas Brauch ist –, der von der Abneigung geprägt war, anderen den Dhamma zu verkünden: „Nur mit großer Mühe habe ich diesen Dhamma wahrlich erlangt.“ Da dachte der Brahma Sahampati: „Wehe, die Welt geht wahrlich verloren! Wehe, die Welt geht wahrlich zugrunde!“, versammelte die Sakka, Suyāma, Santusita, Nimmānarati, Vasavatti und die großen Brahmas aus zehntausend Weltsystemen, trat vor den Meister und bat ihn um die Verkündung des Dhamma mit den Worten: „Möge der Erhabene, o Herr, den Dhamma lehren!“ und so fort. Satthā tassa paṭiññaṃ datvā ‘‘kassa nu kho ahaṃ paṭhamaṃ dhammaṃ deseyya’’nti cintento ‘‘āḷāro paṇḍito, so imaṃ dhammaṃ khippaṃ ājānissatī’’ti cittaṃ uppādetvā puna olokento tassa sattāhakālaṅkatabhāvaṃ ñatvā udakaṃ āvajjesi. Tassāpi abhidosakālaṅkatabhāvaṃ ñatvā ‘‘bahūpakārā kho me pañcavaggiyā bhikkhū’’ti pañcavaggiye ārabbha manasi katvā ‘‘kahaṃ nu kho te etarahi viharantī’’ti āvajjento ‘‘bārāṇasiyaṃ [Pg.96] isipatane migadāye’’ti ñatvā katipāhaṃ bodhimaṇḍasāmantāyeva piṇḍāya caranto viharitvā ‘‘āsāḷhipuṇṇamāyaṃ bārāṇasiṃ gantvā dhammacakkaṃ pavattessāmī’’ti pakkhassa cātuddasiyaṃ paccūsasamaye paccuṭṭhāya pabhātāya rattiyā kālasseva pattacīvaramādāya aṭṭhārasayojanamaggaṃ paṭipanno antarāmagge upakaṃ nāma ājīvakaṃ disvā tassa attano buddhabhāvaṃ ācikkhitvā taṃ divasameva sāyanhasamaye isipatanaṃ sampāpuṇi. Der Meister gab ihm seine Zusage und überlegte: „Wem wohl soll ich zuerst den Dhamma verkünden?“ Er fasste den Gedanken: „Āḷāra ist weise; er wird diesen Dhamma schnell begreifen.“ Als er jedoch hinsah und erkannte, dass dieser bereits vor sieben Tagen verstorben war, dachte er an Udaka. Als er erkannte, dass auch dieser am gestrigen Abend verstorben war, dachte er an die fünf Mönche und überlegte: „Sehr hilfreich waren mir wahrlich die fünf Mönche.“ Er fragte sich: „Wo verweilen sie wohl jetzt?“ und erkannte: „Im Gazellenpark Isipatana bei Benares.“ Nachdem er einige Tage in der unmittelbaren Umgebung des Bodhi-Sitzes verweilt hatte, um Almosen zu sammeln, dachte er: „Am Vollmondtag des Monats Āsāḷha werde ich nach Benares gehen und das Rad des Dhamma in Bewegung setzen.“ Am vierzehnten Tag der zweiwöchigen Mondphase erhob er sich in der Morgendämmerung, und als die Nacht dem lichten Tag wich, nahm er frühmorgens Schale und Gewand, begab sich auf den achtzehn Yojanas langen Weg, erblickte unterwegs den Ājīvaka namens Upaka, verkündete diesem seine eigene Buddhaschaft und erreichte noch am selben Tag zur Abendzeit Isipatana. Pañcavaggiyā tathāgataṃ dūratova āgacchantaṃ disvā ‘‘ayaṃ āvuso, samaṇo gotamo paccayabāhullāya āvattitvā paripuṇṇakāyo pīṇindriyo suvaṇṇavaṇṇo hutvā āgacchati. Imassa vandanādīni na karissāma, mahākulappasuto kho panesa āsanābhihāraṃ arahati, tenassa āsanamattaṃ paññāpessāmā’’ti katikaṃ akaṃsu. Bhagavā sadevakassa lokassa cittācārajānanasamatthena ñāṇena ‘‘kiṃ nu kho ime cintayiṃsū’’ti āvajjetvā cittaṃ aññāsi. Atha tesu sabbadevamanussesu anodissakavasena pharaṇasamatthaṃ mettacittaṃ saṅkhipitvā odissakavasena mettacittena phari. Te bhagavatā mettacittena saṃphuṭṭhā tathāgate upasaṅkamante sakāya katikāya saṇṭhātuṃ asakkontā paccuggantvā abhivādanādīni sabbakiccāni akaṃsu. Sammāsambuddhabhāvaṃ panassa ajānantā kevalaṃ nāmena ca āvusovādena ca samudācariṃsu. Als die fünf Mönche den Tathāgata von weitem herankommen sahen, vereinbarten sie untereinander: „Ihr Brüder, da kommt der Asket Gotama. Er hat sich wieder dem Überfluss an Lebensbedürfnissen zugewandt, hat einen wohlgenährten Körper, gestärkte Sinne und eine goldglänzende Hautfarbe. Wir wollen ihn weder durch Verbeugung noch auf andere Weise begrüßen. Da er jedoch aus einer vornehmen Familie stammt, gebührt ihm ein Sitzplatz; daher wollen wir ihm lediglich einen Sitzplatz bereitstellen.“ Der Erhabene erwog mit seinem Wissen, welches die Geistesregungen der ganzen Welt samt den Göttern zu erkennen vermag: „Was haben sie wohl gedacht?“ und erkannte ihren Geist. Daraufhin zog er seinen Mettā-Geist, der fähig war, alle Götter und Menschen ungerichtet zu durchdringen, zurück und durchdrang sie gezielt mit seinem Mettā-Geist. Als der Tathāgata sich ihnen näherte, wurden sie von der liebevollen Güte des Erhabenen so tief berührt, dass sie sich nicht an ihre Vereinbarung halten konnten. Sie gingen ihm entgegen und verrichteten alle Dienste wie Ehrerbietung und Begrüßung. Da sie jedoch seine vollkommene Buddhaschaft noch nicht erkannten, redeten sie ihn bloß mit seinem Namen und der Anrede „Freund“ an. Atha ne bhagavā – ‘‘mā, bhikkhave, tathāgataṃ nāmena ca āvusovādena ca samudācaratha. Arahaṃ, bhikkhave, tathāgato sammāsambuddho’’ti attano buddhabhāvaṃ ñāpetvā paññattavarabuddhāsane nisinno uttarāsāḷhanakkhattayoge vattamāne aṭṭhārasahi brahmakoṭīhi parivuto pañcavaggiyatthere āmantetvā tiparivaṭṭaṃ dvādasākāraṃ chañāṇavijambhanaṃ anuttaraṃ dhammacakkappavattanasuttantaṃ (mahāva. 13 ādayo; saṃ. ni. 5.1081) desesi. Tesu koṇḍaññatthero desanānusārena ñāṇaṃ pesento suttapariyosāne aṭṭhārasahi brahmakoṭīhi saddhiṃ sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Satthā tattheva vassaṃ upagantvā punadivase vappattheraṃ ovadanto vihāreyeva nisīdi, sesā cattāropi piṇḍāya cariṃsu. Vappatthero pubbaṇheyeva sotāpattiphalaṃ pāpuṇi[Pg.97]. Etenevupāyena punadivase bhaddiyattheraṃ, punadivase mahānāmattheraṃ, punadivase assajittheranti sabbe sotāpattiphale patiṭṭhāpetvā pañcamiyaṃ pakkhassa pañcapi there sannipātetvā anattalakkhaṇasuttantaṃ (mahāva. 20 ādayo; saṃ. ni. 3.59) desesi. Desanāpariyosāne pañcapi therā arahatte patiṭṭhahiṃsu. Atha satthā yasassa kulaputtassa upanissayaṃ disvā taṃ rattibhāge nibbijjitvā gehaṃ pahāya nikkhantaṃ ‘‘ehi yasā’’ti pakkositvā tasmiṃyeva rattibhāge sotāpattiphale, punadivase arahatte patiṭṭhāpetvā, aparepi tassa sahāyake catupaññāsajane ehibhikkhupabbajjāya pabbājetvā arahattaṃ pāpesi. Da sprach der Erhabene zu ihnen: „Sprecht, o Mönche, den Tathāgata nicht mit Namen und der Anrede ‚Freund‘ an. Ein Heiliger, o Mönche, ist der Tathāgata, ein vollkommen Erleuchteter.“ Nachdem er ihnen seine vollkommene Erleuchtung kundgetan hatte, setzte er sich auf den für ihn hergerichteten edlen Buddha-Sitz. Während die Konjunktion mit dem Uttarāsāḷha-Sternbild stattfand, wandte er sich, umgeben von achtzehn Millionen (Koṭis) Brahmas, an die Theras der Gruppe der Fünf und verkündete das unvergleichliche Dhammacakkappavattana-Suttanta, das dreifach Gewendete und in zwölf Facetten Gegliederte, das sich durch die sechs Erkenntnisse entfaltet. Unter ihnen richtete der Thera Koṇḍañña seine Erkenntnis entsprechend der Lehrverkündung aus und gründete sich am Ende der Sutta gemeinsam mit achtzehn Millionen Brahmas in der Frucht des Stromeintritts. Der Meister trat ebendort in die Regenzeitklausur ein. Am folgenden Tag blieb er im Kloster, um den Thera Vappa zu unterweisen, während die anderen vier Mönche zur Almosensammlung ausgingen. Der Thera Vappa erlangte noch am Vormittag die Frucht des Stromeintritts. Auf dieselbe Weise gründete er am nächsten Tag den Thera Bhaddiya, am darauffolgenden Tag den Thera Mahānāma und am Tag darauf den Thera Assaji in der Frucht des Stromeintritts. Am fünften Tag der schwindenden Mondphase versammelte er alle fünf Theras und verkündete das Anattalakkhaṇa-Suttanta. Am Ende der Lehrverkündung gründeten sich alle fünf Theras in der Arahatschaft. Danach sah der Meister die starken Heilsbedingungen des edlen Jünglings Yasa. Als dieser in jener Nacht voller Überdruss sein Haus verlassen hatte und fortgegangen war, rief ihn der Meister mit den Worten: „Komm, Yasa!“ Er gründete ihn noch in derselben Nacht in der Frucht des Stromeintritts und am darauffolgenden Tag in der Arahatschaft. Auch dessen andere vierundfünfzig Gefährten ließ er durch die „Ehi-Bhikkhu“-Ordination das Hauslosenleben antreten und führte sie zur Arahatschaft. Evaṃ loke ekasaṭṭhiyā arahantesu jātesu satthā vuṭṭhavasso pavāretvā ‘‘caratha bhikkhave cārika’’nti saṭṭhibhikkhū disāsu pesetvā sayaṃ uruvelaṃ gacchanto antarāmagge kappāsikavanasaṇḍe tiṃsabhaddavaggiyakumāre vinesi. Tesu sabbapacchimako sotāpanno, sabbuttamo anāgāmī ahosi. Tepi sabbe ehibhikkhubhāveneva pabbājetvā disāsu pesetvā uruvelaṃ gantvā aḍḍhuḍḍhapāṭihāriyasahassāni dassetvā uruvelakassapādayo sahassajaṭilaparivāre tebhātikajaṭile vinetvā ehibhikkhubhāvena pabbājetvā gayāsīse nisīdāpetvā ādittapariyāyadesanāya (mahāva. 54) arahatte patiṭṭhāpetvā tena arahantasahassena parivuto ‘‘bimbisārarañño dinnapaṭiññaṃ mocessāmī’’ti rājagahanagarūpacāre laṭṭhivanuyyānaṃ agamāsi. Rājā uyyānapālassa santikā ‘‘satthā āgato’’ti sutvā dvādasanahutehi brāhmaṇagahapatikehi parivuto satthāraṃ upasaṅkamitvā cakkavicittatalesu suvaṇṇapaṭṭavitānaṃ viya pabhāsamudayaṃ vissajjentesu tathāgatassa pādesu sirasā nipatitvā ekamantaṃ nisīdi saddhiṃ parisāya. Als auf diese Weise einundsechzig Arahats in der Welt entstanden waren, beendete der Meister die Regenzeitklausur, hielt die Pavāraṇā-Zeremonie ab und sandte die sechzig Mönche in alle Himmelsrichtungen aus mit den Worten: „Wandert aus, o Mönche, auf Lehrwanderung!“ Er selbst begab sich auf den Weg nach Uruvelā. Unterwegs im Baumwollwaldhain bekehrte er die dreißig Prinzen der Bhaddavaggiya-Gruppe. Unter ihnen wurde der Geringste von ihnen ein Stromeingetretener und der Fortgeschrittenste ein Nie-Wiederkehrender. Auch sie alle ordinierte er allein durch die „Ehi-Bhikkhu“-Formel, sandte sie in die Himmelsrichtungen aus, zog weiter nach Uruvelā, zeigte dreieinhalbtausend Wunder und bekehrte die drei Haarflechter-Brüder (Jaṭilas), angeführt von Uruvela-Kassapa, mitsamt ihrem Gefolge von tausend Haarflechtern. Er ordinierte sie alle durch das „Ehi-Bhikkhu“-Wort, ließ sie auf dem Gayāsīsa-Hügel Platz nehmen und gründete sie durch die Verkündung der Feuerpredigt (Ādittapariyāya-Sutta) in der Arahatschaft. Umgeben von diesen tausend Arahats dachte er: „Ich will mein dem König Bimbisāra gegebenes Versprechen einlösen“ und begab sich zum Laṭṭhivana-Hain in der Umgebung der Stadt Rājagaha. Als der König durch den Parkwächter erfuhr, dass der Meister angekommen war, begab er sich, umgeben von einhundertzwanzigtausend Brahmanen und Hausvätern, zum Meister. Er warf sich vor dem Tathāgata nieder, dessen Fußsohlen mit den kunstvollen Radsymbolen wie ein goldener Baldachin strahlten und Glanz verbreiteten, berührte dessen Füße mit seinem Haupt und setzte sich gemeinsam mit seinem Gefolge an einer Seite nieder. Atha kho tesaṃ brāhmaṇagahapatikānaṃ etadahosi – ‘‘kiṃ nu kho mahāsamaṇo uruvelakassape brahmacariyaṃ carati, udāhu uruvelakassapo mahāsamaṇe’’ti. Bhagavā tesaṃ cetassā cetoparivitakkamaññāya uruvelakassapaṃ gāthāya ajjhabhāsi – Da dachten jene Brahmanen und Hausväter Folgendes: „Lebt wohl der große Asket unter Uruvela-Kassapa das heilige Leben, oder lebt Uruvela-Kassapa unter dem großen Asketen?“ Der Erhabene, der den Gedanken ihres Geistes mit seinem eigenen Geist erkannt hatte, sprach zu Uruvela-Kassapa in einer Strophe: ‘‘Kimeva [Pg.98] disvā uruvelavāsi, pahāsi aggiṃ kisakovadāno; Pucchāmi taṃ kassapa etamatthaṃ, kathaṃ pahīnaṃ tava aggihutta’’nti. – „Was hast du gesehen, o Bewohner von Uruvela, dass du das Feueropfer aufgegeben hast, du, der du deine Askese verkündest? Ich frage dich nach diesem Grund, Kassapa: Wie wurde dein Feueropfer von dir aufgegeben?“ Theropi bhagavato adhippāyaṃ viditvā – Auch der Ehrwürdige (Thera), der die Absicht des Erhabenen erkannt hatte, [antwortete mit einer Strophe]: ‘‘Rūpe ca sadde ca atho rase ca, kāmitthiyo cābhivadanti yaññā; Etaṃ malantī upadhīsu ñatvā, tasmā na yiṭṭhe na hute arañji’’nti. (mahāva. 55) – „Die Opfer rühmen Gestalten, Töne, Geschmäcker sowie begehrenswerte Frauen. Da ich dies als einen Makel unter den Grundlagen der Existenz (Upadhi) erkannte, fand ich kein Gefallen mehr an Opfern und Gaben.“ Imaṃ gāthaṃ vatvā attano sāvakabhāvappakāsanatthaṃ tathāgatassa pādapiṭṭhe sīsaṃ ṭhapetvā ‘‘satthā me, bhante bhagavā, sāvakohamasmī’’ti vatvā ekatālaṃ dvitālaṃ titālanti yāva sattatālappamāṇaṃ sattakkhattuṃ vehāsaṃ abbhuggantvā oruyha tathāgataṃ vanditvā ekamantaṃ nisīdi. Taṃ pāṭihāriyaṃ disvā mahājano ‘‘aho mahānubhāvā buddhā, evañhi thāmagatadiṭṭhiko nāma ‘arahā’ti maññamāno uruvelakassapopi diṭṭhijālaṃ bhinditvā tathāgatena damito’’ti satthu guṇakathaṃyeva kathesi. Bhagavā ‘‘nāhaṃ idāniyeva uruvelakassapaṃ damemi, atītepi esa mayā damito’’ti vatvā imissā aṭṭhuppattiyā mahānāradakassapajātakaṃ (jā. 2.22.1153 ādayo) kathetvā cattāri saccāni pakāsesi. Rājā ekādasahi nahutehi saddhiṃ sotāpattiphale patiṭṭhāsi, ekanahutaṃ upāsakattaṃ paṭivedesi. Rājā satthu santike nisinnoyeva pañca assāsake pavedetvā saraṇaṃ gantvā svātanāya nimantetvā uṭṭhāyāsanā bhagavantaṃ padakkhiṇaṃ katvā pakkami. Nachdem er diese Strophe gesprochen hatte, legte er, um seinen Zustand als Schüler kundzutun, sein Haupt auf den Fußspann des Vollendeten und sagte: „Der Erhabene ist mein Lehrer, o Herr, ich bin sein Schüler.“ Er stieg siebenmal in die Luft empor, auf die Höhe von einer Palme, zwei Palmen, drei Palmen, bis zu einer Höhe von sieben Palmen, stieg wieder herab, erwies dem Vollendeten Ehrfurcht und setzte sich zur Seite nieder. Als die Volksmenge dieses Wunder sah, pries sie die Tugenden des Meisters mit den Worten: „O wie großartig ist die Macht der Buddhas! Denn selbst Uruvela-Kassapa, der eine so festgewurzelte falsche Ansicht besaß und sich selbst für einen Arahant hielt, hat das Netz der falschen Ansichten zerrissen und wurde vom Vollendeten gezähmt.“ Der Erhabene sprach: „Nicht erst jetzt zähme ich Uruvela-Kassapa, auch in der Vergangenheit wurde er von mir gezähmt“, und aus diesem Anlass erzählte er das Mahānāradakassapa-Jātaka und verkündete die Vier Edlen Wahrheiten. Der König etablierte sich zusammen mit elf Myriaden [von Menschen] in der Frucht des Stromeintritts, und eine weitere Myriade erklärte sich als Laienanhänger. Noch während er in der Gegenwart des Meisters saß, äußerte der König seine fünf Wünsche, nahm Zuflucht, lud den Erhabenen für den nächsten Tag ein, erhob sich von seinem Sitz, umwandelte den Erhabenen ehrfurchtsvoll rechtsherum und ging fort. Punadivase yehi ca bhagavā hiyyo diṭṭho, yehi ca adiṭṭho, te sabbepi rājagahavāsino aṭṭhārasakoṭisaṅkhā manussā tathāgataṃ daṭṭhukāmā pātova rājagahato laṭṭhivanuyyānaṃ agamaṃsu. Tigāvuto maggo nappahosi, sakalalaṭṭhivanuyyānaṃ nirantaraṃ phuṭaṃ ahosi. Mahājano dasabalassa rūpasobhaggappattaṃ attabhāvaṃ passantopi tittiṃ kātuṃ nāsakkhi. Vaṇṇabhūmi nāmesā. Evarūpesu hi ṭhānesu bhagavato lakkhaṇānubyañjanādippabhedā [Pg.99] sabbāpi rūpakāyasirī vaṇṇetabbā. Evaṃ rūpasobhaggappattaṃ dasabalassa sarīraṃ passamānena mahājanena nirantaraṃ phuṭe uyyāne ca gamanamagge ca ekabhikkhussapi nikkhamanokāso nāhosi. Taṃ divasaṃ kira bhagavato bhattaṃ chinnaṃ bhaveyya, tasmā ‘‘taṃ mā ahosī’’ti sakkassa nisinnāsanaṃ uṇhākāraṃ dassesi. So āvajjamāno taṃ kāraṇaṃ ñatvā māṇavakavaṇṇaṃ abhinimminitvā buddhadhammasaṅghapaṭisaṃyuttā thutiyo vadamāno dasabalassa purato otaritvā devānubhāvena okāsaṃ katvā – Am nächsten Tag machten sich alle Einwohner von Rājagaha, sowohl diejenigen, die den Erhabenen am Vortag gesehen hatten, als auch jene, die ihn nicht gesehen hatten – insgesamt achtzehn Crore (180 Millionen) Menschen –, frühmorgens auf den Weg von Rājagaha zum Laṭṭhivana-Hain, um den Vollendeten zu sehen. Der drei Gāvutas lange Weg reichte nicht aus, und der gesamte Laṭṭhivana-Hain war dicht gedrängt voll. Obwohl die Volksmenge den Körper des Zehnkräftigen betrachtete, der die höchste körperliche Schönheit erreicht hatte, konnte sie sich nicht sattsehen. Dies wird wahrlich als „Ort des Lobpreises“ (Vaṇṇabhūmi) bezeichnet. Denn an solchen Orten muss die gesamte Pracht des physischen Körpers des Erhabenen mit all seinen Haupt- und Nebenmerkmalen gepriesen werden. Da die Volksmenge den so wunderbar schönen Körper des Zehnkräftigen betrachtete, gab es in dem dicht gedrängten Park und auf dem Weg nicht einmal für einen einzigen Mönch Platz, um hinauszugehen. An diesem Tag, so heißt es, hätte das Mahl des Erhabenen ausfallen können; um dies zu verhindern, wurde der Sitz Sakkas heiß. Als Sakka darüber nachdachte und den Grund dafür erkannte, nahm er die Gestalt eines Jünglings an. Er sang Loblieder auf Buddha, Dhamma und Sangha, stieg vor dem Zehnkräftigen herab und schuf mit göttlicher Macht Platz, indem er sprach: ‘‘Danto dantehi saha purāṇajaṭilehi, vippamutto vippamuttehi; Siṅgīnikkhasavaṇṇo, rājagahaṃ pāvisi bhagavā. „Der Gezähmte mit den Gezähmten, den ehemaligen Haarflechten-Asketen, der Befreite mit den Befreiten, glänzend wie feinstes Gold – so zog der Erhabene in Rājagaha ein. ‘‘Mutto muttehi…pe…. „Der Erlöste mit den Erlösten … [wie oben] … ‘‘Tiṇṇo tiṇṇehi…pe…. „Der Hinübergeschrittene mit den Hinübergeschrittenen … [wie oben] … ‘‘Santo santehi…pe… rājagahaṃ pāvisi bhagavā. „Der Friedvolle mit den Friedvollen … zog der Erhabene in Rājagaha ein. ‘‘Dasavāso dasabalo, dasadhammavidū dasabhi cupeto; So dasasataparivāro, rājagahaṃ pāvisi bhagavā’’ti. (mahāva. 58) – „Der in den zehn edlen Zuständen weilt, der Zehnkräftige, der die zehnfachen Lehren kennt und mit den zehn Eigenschaften ausgestattet ist, er, umgeben von tausend Begleitern, so zog der Erhabene in Rājagaha ein.“ Imāhi gāthāhi satthu vaṇṇaṃ vadamāno purato pāyāsi. Tadā mahājano māṇavakassa rūpasiriṃ disvā ‘‘ativiya abhirūpo vatāyaṃ māṇavako, na kho pana amhehi diṭṭhapubbo’’ti cintetvā ‘‘kuto ayaṃ māṇavako, kassa vā aya’’nti āha. Taṃ sutvā māṇavo – Während er mit diesen Strophen das Lob des Meisters verkündete, schritt er vor ihm her. Da sah die Volksmenge die Schönheit des Jünglings und dachte: „Wahrlich, dieser Jüngling ist überaus schön, doch wir haben ihn noch nie zuvor gesehen!“ Und sie fragten: „Woher kommt dieser Jüngling und wessen Sohn ist er?“ Als der Jüngling dies hörte, sprach er folgende Strophe: ‘‘Yo dhīro sabbadhi danto, suddho appaṭipuggalo; Arahaṃ sugato loke, tassāhaṃ paricārako’’ti. – gāthamāha; „Wer weise ist, in jeder Hinsicht gezähmt, rein und ohnegleichen, der Würdige (Arahant), der Wohlgegangene in der Welt – dessen Diener bin ich.“ Satthā [Pg.100] sakkena katokāsaṃ maggaṃ paṭipajjitvā bhikkhusahassaparivuto rājagahaṃ pāvisi. Rājā buddhappamukhassa saṅghassa mahādānaṃ datvā ‘‘ahaṃ, bhante, tīṇi ratanāni vinā vasituṃ na sakkhissāmi, velāya vā avelāya vā bhagavato santikaṃ āgamissāmi, laṭṭhivanuyyānañca nāma atidūre, idaṃ pana amhākaṃ veḷuvanuyyānaṃ nātidūraṃ naccāsannaṃ gamanāgamanasampannaṃ buddhārahaṃ senāsanaṃ. Idaṃ me, bhante, bhagavā paṭiggaṇhātū’’ti suvaṇṇabhiṅgārena pupphagandhavāsitaṃ maṇivaṇṇaṃ udakamādāya veḷuvanuyyānaṃ pariccajanto dasabalassa hatthe udakaṃ pātesi. Tasmiṃ ārāme paṭiggahiteyeva ‘‘buddhasāsanassa mūlāni otiṇṇānī’’ti mahāpathavī kampi. Jambudīpatalasmiñhi ṭhapetvā veḷuvanaṃ aññaṃ mahāpathaviṃ kampetvā gahitasenāsanaṃ nāma natthi. Tambapaṇṇidīpepi ṭhapetvā mahāvihāraṃ aññaṃ pathaviṃ kampetvā gahitasenāsanaṃ nāma natthi. Satthā veḷuvanārāmaṃ paṭiggahetvā rañño anumodanaṃ katvā uṭṭhāyāsanā bhikkhusaṅghaparivuto veḷuvanaṃ agamāsi. Der Meister beschritt den von Sakka freigemachten Weg und zog, von tausend Mönchen umgeben, in Rājagaha ein. Der König spendete der Gemeinschaft der Mönche mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe und sagte: „Herr, ich werde nicht in der Lage sein, ohne die Drei Juwelen zu leben. Ich werde zu passender und zu unpassender Zeit in die Gegenwart des Erhabenen kommen. Der Laṭṭhivana-Hain ist jedoch sehr weit weg; dieser unser Bambushain (Veḷuvana) hingegen ist weder zu weit noch zu nah, er ist leicht zugänglich und eine für einen Buddha angemessene Wohnstätte. Möge der Erhabene diese Wohnstätte von mir annehmen, o Herr!“ Er nahm eine goldene Kanne mit duftendem, juwelenfarbenem Wasser und goss, während er den Veḷuvana-Hain übergab, das Wasser auf die Hand des Zehnkräftigen. Sobald dieser Park angenommen worden war, bebte die große Erde, als ob sie sagen wollte: „Die Wurzeln der Lehre des Buddha haben festen Boden gefasst.“ Denn auf dem Boden von Jambudīpa gibt es, abgesehen vom Veḷuvana, keine andere Wohnstätte, bei deren Entgegennahme die große Erde bebte. Auch auf der Insel Tambapaṇṇi gibt es, abgesehen vom Mahāvihāra, keine andere Wohnstätte, bei deren Entgegennahme die Erde bebte. Der Meister nahm den Veḷuvana-Hain an, hielt die Dankesrede (Anumodanā) für den König, erhob sich von seinem Sitz und begab sich, von der Mönchsgemeinschaft umgeben, in den Veḷuvana-Hain. Tasmiṃ kho pana samaye sāriputto ca moggallāno cāti dve paribbājakā rājagahaṃ upanissāya viharanti amataṃ pariyesamānā. Tesu sāriputto assajittheraṃ piṇḍāya paviṭṭhaṃ disvā pasannacitto payirupāsitvā ‘‘ye dhammā hetuppabhavā’’tiādigāthaṃ (mahāva. 60; apa. thera 1.1.286) sutvā sotāpattiphale patiṭṭhāya attano sahāyakassa moggallānassapi tameva gāthaṃ abhāsi. Sopi sotāpattiphale patiṭṭhahi. Te ubhopi sañcayaṃ oloketvā attano parisāya saddhiṃ bhagavato santike pabbajiṃsu. Tesu moggallāno sattāhena arahattaṃ pāpuṇi, sāriputto aḍḍhamāsena. Ubhopi te satthā aggasāvakaṭṭhāne ṭhapesi. Sāriputtattherena ca arahattaṃ pattadivaseyeva sannipātaṃ akāsi. Zu jener Zeit nun lebten die beiden Wanderer Sāriputta und Moggallāna in der Nähe von Rājagaha auf der Suche nach dem Todeslosen. Unter ihnen sah Sāriputta den ehrwürdigen Ältesten Assaji, der auf Almosengang war. Von vertrauensvollem Geist erfüllt, wartete er auf ihn und hörte die Strophe, die mit „ye dhammā hetuppabhavā“ beginnt. Er gründete sich in der Frucht des Stromeintritts und sprach eben diese Strophe auch zu seinem Gefährten Moggallāna. Auch dieser gründete sich in der Frucht des Stromeintritts. Beide verließen Sañcaya und nahmen zusammen mit ihrer Gefolgschaft in der Gegenwart des Erhabenen das Hauslosenleben auf. Unter ihnen erlangte Moggallāna in einer Woche die Arahantschaft, Sāriputta in einem halben Monat. Der Meister setzte beide in die Stellung der Hauptjünger ein. Und an eben dem Tag, an dem der ehrwürdige Älteste Sāriputta die Arahantschaft erlangte, hielt der Meister die Versammlung ab. Tathāgate pana tasmiññeva veḷuvanuyyāne viharante suddhodanamahārājā ‘‘putto kira me chabbassāni dukkarakārikaṃ caritvā paramābhisambodhiṃ patvā pavattavaradhammacakko rājagahaṃ upanissāya veḷuvane viharatī’’ti sutvā aññataraṃ amaccaṃ āmantesi – ‘‘ehi bhaṇe, tvaṃ purisasahassaparivāro rājagahaṃ gantvā mama vacanena ‘pitā te suddhodanamahārājā daṭṭhukāmo’ti vatvā mama puttaṃ gaṇhitvā ehī’’ti āha. So [Pg.101] ‘‘evaṃ, devā’’ti rañño vacanaṃ sirasā sampaṭicchitvā purisasahassaparivāro khippameva saṭṭhiyojanamaggaṃ gantvā dasabalassa catuparisamajjhe nisīditvā dhammadesanāvelāyaṃ vihāraṃ pāvisi. So ‘‘tiṭṭhatu tāva raññā pahitasāsana’’nti parisapariyante ṭhito satthu dhammadesanaṃ sutvā yathāṭhitova saddhiṃ purisasahassena arahattaṃ patvā pabbajjaṃ yāci. Bhagavā ‘‘etha bhikkhavo’’ti hatthaṃ pasāresi. Sabbe taṅkhaṇaññeva iddhimayapattacīvaradharā saṭṭhivassikattherā viya ahesuṃ. Arahattaṃ pattakālato paṭṭhāya pana ariyā nāma majjhattāva hontīti, so raññā pahitasāsanaṃ dasabalassa na kathesi. Rājā – ‘‘neva gato āgacchati, na sāsanaṃ suyyatī’’ti ‘‘ehi bhaṇe, tvaṃ gacchā’’ti eteneva niyāmena aññaṃ amaccaṃ pesesi. Sopi gantvā purimanayeneva saddhiṃ parisāya arahattaṃ patvā tuṇhī ahosi. Puna rājā ‘‘ehi bhaṇe, tvaṃ gaccha, tvaṃ gacchā’’ti eteneva niyāmena aparepi satta amacce pesesi. Te sabbe nava purisasahassaparivārā nava amaccā attano kiccaṃ niṭṭhāpetvā tuṇhībhūtā tattheva vihariṃsu. Während der Tathāgata in eben jenem Veḷuvana-Hain verweilte, hörte der Großkönig Suddhodana: „Mein Sohn soll sechs Jahre lang schwere Entsagungen auf sich genommen haben, hat die höchste vollkommene Erleuchtung erlangt, das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt und verweilt nun in der Nähe von Rājagaha im Veḷuvana.“ Da rief er einen seiner Minister und sprach: „Komm, mein Lieber, geh mit einer Gefolgschaft von tausend Männern nach Rājagaha und sprich in meinem Namen: ‚Dein Vater, der Großkönig Suddhodana, wünscht dich zu sehen.‘ Bring dann meinen Sohn mit zurück.“ Dieser empfing das Wort des Königs ehrerbietig mit dem Haupt, sprach: „So sei es, o Herr“, und reiste mit einer Gefolgschaft von tausend Männern rasch den sechzig Yojanas langen Weg. Er setzte sich mitten in die vierfache Versammlung des Zehnkräftigen und betrat zur Zeit der Lehrverkündung das Kloster. Er dachte: „Die Botschaft des Königs mag erst einmal warten“, stand am Rand der Versammlung, hörte die Lehrverkündung des Meisters und erlangte noch im Stehen zusammen mit den tausend Männern die Arahantschaft und bat um die Aufnahme in den Orden. Der Erhabene streckte die Hand aus und sprach: „Kommt, ihr Mönche!“ In eben diesem Augenblick waren sie alle, ausgestattet mit übernatürlichen Schalen und Gewändern, wie Älteste von sechzig Jahren Amtszeit. Da jedoch die Edlen von Natur aus gleichmütig sind, überbrachte er dem Zehnkräftigen die Botschaft des Königs nicht. Der König dachte: „Wer gegangen ist, kehrt nicht zurück, und man hört keine Nachricht“, und sandte in derselben Weise einen anderen Minister: „Komm, mein Lieber, geh du!“ Auch dieser ging hin, erlangte auf dieselbe Weise wie der vorige zusammen mit seiner Begleitung die Arahantschaft und verhielt sich still. Abermals sandte der König in genau derselben Weise weitere sieben Minister. Sie alle, die neun Minister mit ihren Gefolgschaften von jeweils tausend Männern, vollendeten ihr Werk, wurden still und blieben genau dort verweilen. Rājā sāsanamattampi āharitvā ācikkhantaṃ alabhitvā cintesi – ‘‘ettakāpi janā mayi sinehābhāvena sāsanamattampi na paccāhariṃsu, ko nu kho me sāsanaṃ karissatī’’ti sabbaṃ rājabalaṃ olokento kāḷudāyiṃ addasa. So kira rañño sabbatthasādhako abbhantariko ativiya vissāsiko amacco bodhisattena saddhiṃ ekadivase jāto sahapaṃsukīḷako sahāyo. Atha naṃ rājā āmantesi – ‘‘tāta kāḷudāyi, ahaṃ mama puttaṃ daṭṭhukāmo navapurisasahassaparivārena nava amacce pesesiṃ, tesu ekopi āgantvā sāsanamattaṃ ārocento nāma natthi. Dujjāno kho pana me jīvitantarāyo, jīvamānoyevāhaṃ puttaṃ daṭṭhukāmo. Sakkhissasi nu kho me puttaṃ dassetu’’nti? ‘‘Sakkhissāmi, deva, sace pabbajituṃ labhissāmī’’ti. ‘‘Tāta, tvaṃ pabbajito vā apabbajito vā mayhaṃ puttaṃ dassehī’’ti. So ‘‘sādhu, devā’’ti rañño sāsanaṃ ādāya rājagahaṃ gantvā satthu dhammadesanāvelāya parisapariyante ṭhito dhammaṃ sutvā saparivāro arahattaṃ patvā ehibhikkhubhāvena pabbajitvā vihāsi. Da der König niemanden fand, der auch nur eine Nachricht überbrachte und Bericht erstattete, dachte er: „Selbst so viele Menschen haben mir aus Mangel an Zuneigung nicht einmal eine Nachricht zurückgebracht. Wer wohl wird meine Botschaft ausrichten?“ Er blickte über das gesamte Gefolge des Königs und erblickte Kāḷudāyī. Dieser war nämlich der für alle Angelegenheiten nützliche, vertraute und überaus verlässliche Minister des Königs, der am selben Tag wie der Bodhisatta geboren und sein Spielgefährte im Sande gewesen war. Da sprach der König zu ihm: „Mein lieber Kāḷudāyī, ich wünschte meinen Sohn zu sehen und habe neun Minister mit einer Gefolgschaft von neuntausend Männern ausgesandt. Unter ihnen ist auch nicht ein einziger zurückgekehrt, um mir auch nur eine Nachricht zu überbringen. Die Gefahr für mein Leben ist jedoch schwer vorauszusehen; ich möchte meinen Sohn sehen, solange ich noch am Leben bin. Wirst du wohl in der Lage sein, mir meinen Sohn zu zeigen?“ – „Ich werde es vermögen, o Herr, wenn ich die Erlaubnis erhalte, das Hauslosenleben aufzunehmen.“ – „Mein Lieber, ob als Ordinierter oder als Nichtordinierter, zeige mir nur meinen Sohn!“ Er antwortete: „Sehr wohl, o Herr“, nahm die Botschaft des Königs entgegen, reiste nach Rājagaha und stand zur Zeit der Lehrverkündung des Meisters am Rande der Versammlung. Als er die Lehre gehört hatte, erlangte er zusammen mit seiner Gefolgschaft die Arahantschaft, trat durch das „Komm, Mönch!“-Wort in den Orden ein und verweilte dort. Satthā [Pg.102] buddho hutvā paṭhamaṃ antovassaṃ isipatane vasitvā vuṭṭhavasso pavāretvā uruvelaṃ gantvā tattha tayo māse vasanto tebhātikajaṭile vinetvā bhikkhusahassaparivāro phussamāsapuṇṇamāyaṃ rājagahaṃ gantvā dve māse vasi. Ettāvatā bārāṇasito nikkhantassa pañca māsā jātā, sakalo hemanto atikkanto. Kāḷudāyittherassa āgatadivasato sattaṭṭhadivasā vītivattā. Thero phagguṇamāsapuṇṇamāyaṃ cintesi – ‘‘atikkanto dāni hemanto, vasantasamayo anuppatto, manussehi sassādīni uddharitvā sammukhasammukhaṭṭhānehi maggā dinnā, haritatiṇasañchannā pathavī, supupphitā vanasaṇḍā, paṭipajjanakkhamā maggā, kālo dasabalassa ñātisaṅgahaṃ kātu’’nti. Atha bhagavantaṃ upasaṅkamitvā – Nachdem der Meister zum Buddha geworden war, verbrachte er die erste Regenzeit in Isipatana. Nach Beendigung der Regenzeit und dem Vollzug der Pavāraṇā-Feier ging er nach Uruvelā, verweilte dort drei Monate lang, bekehrte die drei Brüder mit geflochtenem Haar und reiste, von tausend Mönchen begleitet, am Vollmondtag des Monats Phussa nach Rājagaha, wo er zwei Monate blieb. Damit waren seit seinem Aufbruch aus Bārāṇasī fünf Monate vergangen, und der gesamte Winter war vorüber. Seit dem Tag der Ankunft des ehrwürdigen Ältesten Kāḷudāyī waren sieben oder acht Tage vergangen. Am Vollmondtag des Monats Phagguṇa dachte der Älteste: „Nun ist der Winter vorüber und die Frühlingszeit hat begonnen. Die Menschen haben das Getreide eingebracht und die Wege in alle Richtungen freigegeben. Die Erde ist mit grünem Gras bedeckt, die Waldungen stehen in voller Blüte, die Wege sind gut begehbar. Es ist Zeit für den Zehnkräftigen, seinen Verwandten Beistand zu leisten.“ Daraufhin trat er an den Erhabenen heran und sprach: ‘‘Aṅgārino dāni dumā bhadante, phalesino chadanaṃ vippahāya; Te accimantova pabhāsayanti, samayo mahāvīra bhāgī rasānaṃ…pe…. (theragā. 527); „Wie glühende Kohlen stehen nun die Bäume da, o Herr, Früchte suchend, nachdem sie ihr Laub abgeworfen haben; wie Flammen leuchten sie weithin auf. Es ist die rechte Zeit, o großer Held, teilzuhaben an den süßen Säften...“ ‘‘Nātisītaṃ nātiuṇhaṃ, nātidubbhikkhachātakaṃ; Saddalā haritā bhūmi, esa kālo mahāmunī’’ti. – „Weder zu kalt noch zu heiß ist es, keine Hungersnot und kein zehrender Durst herrschen. Grün von frischem Gras ist die Erde. Dies ist die rechte Zeit, o großer Weiser!“ Saṭṭhimattāhi gāthāhi dasabalassa kulanagaragamanavaṇṇaṃ vaṇṇesi. Atha naṃ satthā – ‘‘kiṃ nu kho, udāyi, madhurassarena gamanavaṇṇaṃ vaṇṇesī’’ti āha. ‘‘Tumhākaṃ, bhante, pitā suddhodanamahārājā tumhe passitukāmo, karotha ñātakānaṃ saṅgaha’’nti. ‘‘Sādhu, udāyi, karissāmi ñātakānaṃ saṅgahaṃ, bhikkhusaṅghassa ārocehi, gamiyavattaṃ paripūressantī’’ti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti thero tesaṃ ārocesi. Mit rund sechzig Strophen besang er die Vorzüge der Reise in die Heimatsstadt der Familie des Zehnkräftigen. Da sprach der Meister zu ihm: „Warum nur, Udāyī, besingst du mit so lieblicher Stimme die Vorzüge der Reise?“ – „Ehrwürdiger Herr, Euer Vater, der Großkönig Suddhodana, wünscht Euch zu sehen. Bitte erweist Euren Verwandten Euren Beistand.“ – „Gut, Udāyī, ich werde meinen Verwandten Beistand erweisen. Informiere die Mönchsgemeinschaft, sie sollen die Pflichten für die Reise erfüllen.“ – „Sehr wohl, ehrwürdiger Herr“, antwortete der Älteste und informierte sie. Bhagavā aṅgamagadhavāsīnaṃ kulaputtānaṃ dasahi sahassehi, kapilavatthuvāsīnaṃ dasahi sahassehīti sabbeheva vīsatisahassehi khīṇāsavabhikkhūhi parivuto rājagahā nikkhamitvā divase divase yojanaṃ gacchati. ‘‘Rājagahato saṭṭhiyojanaṃ kapilavatthuṃ dvīhi māsehi pāpuṇissāmī’’ti aturitacārikaṃ pakkāmi. Theropi ‘‘bhagavato nikkhantabhāvaṃ rañño ārocessāmī’’ti vehāsaṃ abbhuggantvā rañño nivesane pāturahosi. Rājā theraṃ disvā tuṭṭhacitto mahārahe pallaṅke nisīdāpetvā [Pg.103] attano paṭiyāditassa nānaggarasabhojanassa pattaṃ pūretvā adāsi. Thero uṭṭhāya gamanākāraṃ dassesi. ‘‘Nisīditvā bhuñja, tātā’’ti. ‘‘Satthu santikaṃ gantvā bhuñjissāmi, mahārājā’’ti. ‘‘Kahaṃ pana, tāta, satthā’’ti? ‘‘Vīsatisahassabhikkhuparivāro tumhākaṃ dassanatthāya cārikaṃ nikkhanto, mahārājā’’ti. Rājā tuṭṭhamānaso āha – ‘‘tumhe imaṃ paribhuñjitvā yāva mama putto imaṃ nagaraṃ pāpuṇāti, tāvassa itova piṇḍapātaṃ pariharathā’’ti. Thero adhivāsesi. Rājā theraṃ parivisitvā pattaṃ gandhacuṇṇena ubbaṭṭetvā uttamassa bhojanassa pūretvā ‘‘tathāgatassa dethā’’ti therassa hatthe patiṭṭhāpesi. Thero sabbesaṃ passantānaṃyeva pattaṃ ākāse khipitvā sayampi vehāsaṃ abbhuggantvā piṇḍapātaṃ āharitvā satthu hatthe ṭhapesi. Satthā taṃ paribhuñji. Eteneva upāyena thero divase divase piṇḍapātaṃ āhari. Satthāpi antarāmagge raññoyeva piṇḍapātaṃ paribhuñji. Theropi bhattakiccāvasāne divase divase ‘‘ajja bhagavā ettakaṃ āgato, ajja ettaka’’nti buddhaguṇapaṭisaṃyuttāya ca kathāya sakalaṃ rājakulaṃ satthudassanaṃ vināyeva satthari sañjātappasādaṃ akāsi. Teneva naṃ bhagavā ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ kulappasādakānaṃ yadidaṃ kāḷudāyī’’ti (a. ni. 1.219, 225) etadagge ṭhapesi. Der Erhabene, umgeben von insgesamt zwanzigtausend triebfreien Mönchen – zehntausend Söhnen edler Familien aus Anga und Magadha und zehntausend Söhnen edler Familien aus Kapilavatthu –, brach von Rājagaha auf und legte Tag für Tag eine Yojana zurück. Mit dem Gedanken: "Ich werde das sechzig Yojanas entfernte Kapilavatthu in zwei Monaten erreichen", reiste er in gemächlichem Tempo. Auch der Thera dachte: "Ich werde dem König die Nachricht von dem Aufbruch des Erhabenen bringen", stieg in die Luft empor und erschien im Palast des Königs. Als der König den Thera sah, wurde sein Herz von Freude erfüllt. Er ließ ihn auf einem kostbaren Thronsitz Platz nehmen, füllte seine Almosenschale mit vorzüglichen, für ihn selbst zubereiteten Speisen verschiedenster Geschmacksrichtungen und bot sie ihm an. Der Thera erhob sich und machte Anstalten aufzubrechen. "Setz dich und iss, mein Lieber", sagte der König. "O Großer König, ich werde erst essen, wenn ich zum Meister zurückgekehrt bin", entgegnete er. "Wo aber, mein Lieber, ist der Meister?", fragte der König. "O Großer König, er ist in Begleitung von zwanzigtausend Mönchen aufgebrochen und befindet sich auf dem Weg hierher, um euch zu sehen." Da sprach der König mit erfreutem Gemüt: "Esst diese Speise, und solange mein Sohn diese Stadt noch nicht erreicht hat, bringt ihm bitte von hier aus die Almosenspeise!" Der Thera willigte ein. Nachdem der König den Thera bedient hatte, ließ er die Schale mit Duftpulver ausreiben, füllte sie mit erlesener Speise und legte sie dem Thera in die Hand mit den Worten: "Überreicht dies dem Tathāgata!" Vor den Augen aller warf der Thera die Schale in die Luft, stieg selbst in die Luft empor, brachte die Speise herbei und legte sie dem Meister in die Hand. Der Meister nahm diese Nahrung zu sich. Auf diese Weise brachte der Thera Tag für Tag die Almosenspeise. Auch der Erhabene speiste auf dem Weg dorthin nur die Almosenspeise duftenden Ursprungs vom König. Und der Thera weckte jeden Tag nach Beendigung des Mahls durch Reden über die Vorzüge des Buddha in der gesamten königlichen Familie tiefes Vertrauen in den Meister, noch bevor sie ihn überhaupt gesehen hatten, indem er sprach: "Heute ist der Erhabene so weit gekommen, heute so weit." Aus eben diesem Grund setzte ihn der Erhabene auf den höchsten Ehrenplatz und sprach: "Dies ist der Vorzüglichste unter meinen jüngernden Mönchen, ihr Mönche, die Vertrauen in den Familien stiften, nämlich Kāḷudāyī." Sākiyāpi kho anuppatte bhagavati ‘‘amhākaṃ ñātiseṭṭhaṃ passissāmā’’ti sannipatitvā bhagavato vasanaṭṭhānaṃ vīmaṃsamānā ‘‘nigrodhasakkassa ārāmo ramaṇīyo’’ti sallakkhetvā tattha sabbaṃ paṭijagganavidhiṃ kāretvā gandhapupphahatthā paccuggamanaṃ karontā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍite daharadahare nāgaradārake ca nāgaradārikāyo ca paṭhamaṃ pahiṇiṃsu, tato rājakumāre ca rājakumārikāyo ca, tesaṃ anantarā sāmaṃ gandhapupphādīhi pūjayamānā bhagavantaṃ gahetvā nigrodhārāmameva agamaṃsu. Tattha bhagavā vīsatisahassakhīṇāsavaparivuto paññattavarabuddhāsane nisīdi. Sākiyā nāma mānajātikā mānatthaddhā, te ‘‘siddhatthakumāro amhehi daharataro, amhākaṃ kaniṭṭho, bhāgineyyo, putto, nattā’’ti cintetvā daharadahare rājakumāre āhaṃsu – ‘‘tumhe vandatha, mayaṃ tumhākaṃ piṭṭhito nisīdissāmā’’ti. Als der Erhabene angekommen war, kamen auch die Sakyer mit dem Gedanken zusammen: "Wir wollen unseren vorzüglichsten Verwandten sehen." Sie suchten nach einem Aufenthaltsort für den Erhabenen, befanden, dass "der Hain des Sakyers Nigrodha lieblich ist", ließen dort alle Vorbereitungen treffen und gingen ihm mit Duftwerk und Blumen in den Händen entgegen. Zuerst schickten sie die ganz jungen Knaben und Mädchen der Stadt vor, die mit jeglichem Schmuck verziert waren; danach die Prinzen und Prinzessinnen. Direkt dahinter folgten sie selbst, verehrten den Erhabenen mit Duftpulver, Blumen und anderem, geleiteten ihn und begaben sich zum Nigrodha-Hain. Dort setzte sich der Erhabene, umgeben von zwanzigtausend triebfreien Mönchen, auf den hergerichteten erhabenen Buddhasitz. Die Sakyer jedoch sind von stolzer Natur und starrsinnig vor Hochmut. Sie dachten bei sich: "Prinz Siddhattha ist jünger als wir; er ist unser jüngerer Bruder, unser Neffe, unser Sohn, unser Enkel", und sagten zu den ganz jungen Prinzen: "Verbeugt euch ihr vor ihm! Wir werden uns hinter euch setzen." Tesu [Pg.104] evaṃ avanditvā nisinnesu bhagavā tesaṃ ajjhāsayaṃ oloketvā ‘‘na maṃ ñātayo vandanti, handa dāni te vandāpessāmī’’ti abhiññāpādakaṃ catutthaṃ jhānaṃ samāpajjitvā tato vuṭṭhāya ākāsaṃ abbhuggantvā tesaṃ sīse pādapaṃsuṃ okiramāno viya kaṇḍambarukkhamūle yamakapāṭihāriyasadisaṃ pāṭihāriyaṃ akāsi. Rājā taṃ acchariyaṃ disvā āha – ‘‘bhante, tumhākaṃ jātadivase kāladevalassa vandanatthaṃ upanītānaṃ vopāde parivattetvā brāhmaṇassa matthake patiṭṭhite disvāpi ahaṃ tumhākaṃ pāde vandiṃ, ayaṃ me paṭhamavandanā. Vappamaṅgaladivase ca jambucchāyāya sirisayane nipannānaṃ vojambucchāyāya aparivattanaṃ disvāpi pāde vandiṃ, ayaṃ me dutiyavandanā. Idāni pana imaṃ adiṭṭhapubbaṃ pāṭihāriyaṃ disvāpi ahaṃ tumhākaṃ pāde vandāmi, ayaṃ me tatiyavandanā’’ti. Raññā pana vandite bhagavantaṃ avanditvā ṭhātuṃ samattho nāma ekasākiyopi nāhosi, sabbe vandiṃsuyeva. Als jene so dasaßen, ohne sich zu verbeugen, erkannte der Erhabene ihre Gesinnung und dachte: "Meine Verwandten verbeugen sich nicht vor mir. Wohlan, nun werde ich sie dazu bringen, sich zu verbeugen!" Er trat in die vierte Vertiefung ein, die die Grundlage für die höheren Geisteskräfte bildet, erhob sich daraus, stieg in die Luft empor und vollbrachte – gleichsam als würde er den Staub seiner Füße auf ihre Häupter streuen – ein Wunder, das dem Doppelwunder am Fuße des Kaṇḍamba-Mangobaums glich. Als der König dieses Wunder sah, sprach er: "Herr, an Eurem Geburtstag, als man Euch herbeibrachte, damit Ihr Euch vor dem Asketen Kāladevala verbeugtet, sah ich, wie sich Eure Füße umkehrten und sich auf das Haupt des Asketen stellten. Da verbeugte ich mich vor Euren Füßen. Dies war meine erste Verbeugung. Und am Tag des feierlichen Pflügens, als Ihr auf dem Prachtlager im Schatten des Jambulbaums lagt, sah ich, dass der Schatten des Jambulbaums nicht gewichen war, und verbeugte mich vor Euren Füßen. Dies war meine zweite Verbeugung. Nun aber, da ich dieses noch nie zuvor gesehene Wunder schaue, verbeuge ich mich vor Euren Füßen. Dies ist meine dritte Verbeugung." Als sich jedoch der König verbeugt hatte, gab es keinen einzigen Sakyer mehr, der imstande gewesen wäre, ungebeugt stehenzubleiben. Sie alle verbeugten sich. Iti bhagavā ñātayo vandāpetvā ākāsato otaritvā paññattāsane nisīdi. Nisinne bhagavati sikhāpatto ñātisamāgamo ahosi, sabbe ekaggacittā hutvā nisīdiṃsu. Tato mahāmegho pokkharavassaṃ vassi. Tambavaṇṇaṃ udakaṃ heṭṭhā viravantaṃ gacchati, temitukāmova temeti, atemitukāmassa sarīre ekabindumattampi na patati. Taṃ disvā sabbe acchariyabbhutacittā jātā ‘‘aho acchariyaṃ, aho abbhuta’’nti kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ. Satthā ‘‘na idāneva mayhaṃ ñātisamāgame pokkharavassaṃ vassati, atītepi vassī’’ti imissā aṭṭhuppattiyā vessantarajātakaṃ (jā. 2.22.1655 ādayo) kathesi. Dhammakathaṃ sutvā sabbe uṭṭhāya vanditvā pakkamiṃsu. Ekopi rājā vā rājamahāmatto vā ‘‘sve amhākaṃ bhikkhaṃ gaṇhathā’’ti vatvā gato nāma natthi. Nachdem der Erhabene so seine Verwandten dazu gebracht hatte, sich vor ihm zu verbeugen, stieg er aus der Luft herab und setzte sich auf den hergerichteten Sitz. Als der Erhabene Platz genommen hatte, erreichte die Versammlung der Verwandten ihren glanzvollen Höhepunkt. Alle saßen mit friedvollem und geeintem Geist da. Da ließ eine gewaltige Wolke einen Pokkhara-Regen herabregnen. Das kupferfarbene Wasser floss rauschend am Boden dahin; es benetzte nur denjenigen, der benetzt werden wollte, während auf den Körper dessen, der nicht benetzt werden wollte, nicht ein einziger Tropfen fiel. Als sie dies sahen, gerieten alle in staunende Verwunderung und riefen aus: "O wie wunderbar, o wie unerhört!" Der Meister sprach: "Nicht erst heute regnet es bei der Versammlung meiner Verwandten diesen Pokkhara-Regen, auch in der Vergangenheit hat es schon so geregnet", und erzählte aus diesem Anlass das Vessantara-Jātaka. Nachdem sie die Lehrrede gehört hatten, erhoben sich alle, verbeugten sich und gingen fort. Doch kein einziger, weder ein König noch ein königlicher Minister, ging weg, nachdem er zuvor gesagt hätte: "Nehmt morgen unsere Almosenspeise an!" Satthā punadivase vīsatibhikkhusahassaparivuto kapilavatthuṃ piṇḍāya pāvisi. Taṃ na koci gantvā nimantesi, na pattaṃ vā aggahesi. Bhagavā indakhīle ṭhitova āvajjesi – ‘‘kathaṃ nu kho pubbabuddhā kulanagare piṇḍāya cariṃsu, kiṃ uppaṭipāṭiyā issarajanānaṃ gharāni agamaṃsu, udāhu sapadānacārikaṃ cariṃsū’’ti? Tato ekabuddhassapi uppaṭipāṭiyā gamanaṃ adisvā ‘‘mayāpi dāni ayameva tesaṃ vaṃso paggahetabbo, āyatiñca mama sāvakā [Pg.105] mamaññeva anusikkhantā piṇḍacārikavattaṃ paripūressantī’’ti koṭiyaṃ niviṭṭhagehato paṭṭhāya sapadānaṃ piṇḍāya cari. ‘‘Ayyo kira siddhatthakumāro piṇḍāya caratī’’ti dvibhūmikatibhūmikādīsu pāsādesu sīhapañjaraṃ vivaritvā mahājano dassanabyāvaṭo ahosi. Am folgenden Tag betrat der Lehrer, begleitet von zwanzigtausend Mönchen, Kapilavatthu für den Almosengang. Niemand ging hin, um ihn einzuladen, noch nahm jemand seine Almosenschale entgegen. Da blieb der Erhabene an der Torschwelle der Stadt stehen und überlegte: „Wie sind wohl die früheren Buddhas in der Stadt ihrer Verwandten um Almosen gegangen? Gingen sie ohne feste Reihenfolge zu den Häusern der Vornehmen oder zogen sie von Haus zu Haus?“ Da er selbst bei keinem einzigen Buddha ein Gehen ohne feste Reihenfolge sah, dachte er: „Auch ich muss nun diese ihre Tradition bewahren, und in Zukunft werden meine Schüler, indem sie mir nacheifern, die Pflicht des Almosengangs erfüllen.“ So ging er, beginnend mit dem Haus am äußersten Rand, der Reihe nach von Haus zu Haus um Almosen. „Der edle Prinz Siddhattha geht angeblich um Almosen!“, dachten die Menschen, und indem sie die Löwenfenster der zwei- und dreistöckigen Paläste öffneten, blickten sie eifrig hinab. Rāhulamātāpi devī – ‘‘ayyaputto kira imasmiṃyeva nagare mahantena rājānubhāvena suvaṇṇasivikādīhi vicaritvā idāni kesamassuṃ ohāretvā kāsāyavatthanivāsano kapālahattho piṇḍāya carati, sobhati nu kho’’ti sīhapañjaraṃ vivaritvā olokayamānā bhagavantaṃ nānāvirāgasamujjalāya sarīrappabhāya nagaravīthiyo obhāsetvā byāmappabhāparikkhepasamupabyūḷhāya asītānubyañjanappabhāsitāya dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitāya anopamāya buddhasiriyā virocamānaṃ disvā uṇhīsato paṭṭhāya yāva pādatalā – Auch die Königin, die Mutter Rāhulas, dachte: „Der edle Prinz, der einst in genau dieser Stadt mit großer königlicher Pracht in goldenen Sänften umherreiste, hat sich nun Haar und Bart geschoren, trägt die ockerfarbenen Roben, hält eine Almosenschale in der Hand und geht um Almosen. Sieht das wohl gut aus?“ Sie öffnete das Löwenfenster und blickte hinab. Da sah sie den Erhabenen, der die Straßen der Stadt mit seiner in mannigfaltigen Farben erstrahlenden Körperglorie erleuchtete, umgeben von einer Aura von einer Klafter Weite, erglänzend durch die achtzig Nebenmerkmale, geschmückt mit den zweiunddreißig Merkmalen eines großen Mannes und in unvergleichlicher Buddha-Pracht erstrahlend, und betrachtete ihn vom Scheitel bis hinab zu den Fußsohlen: ‘‘Siniddhanīlamudukuñcitakeso, sūriyanimmalatalābhinalāṭo; Yuttatuṅgamudukāyatanāso, raṃsijālavikasito narasīho’’ti. – „Er mit dem geschmeidigen, tiefblauen, weichen und gelockten Haar, mit einer Stirn, glänzend wie die reine Sonnenscheibe, mit einer wohlgeformten, hohen, weichen und geraden Nase, der Löwe unter den Menschen, erstrahlend im Netz seiner Lichtstrahlen.“ Evamādikāhi dasahi narasīhagāthāhi abhitthavitvā ‘‘tumhākaṃ putto piṇḍāya caratī’’ti rañño ārocesi. Rājā saṃviggahadayo hatthena sāṭakaṃ saṇḍapento turitaturito nikkhamitvā vegena gantvā bhagavato purato ṭhatvā āha – ‘‘kinnu kho, bhante, amhe lajjāpetha, kimatthaṃ piṇḍāya caratha, kiṃ ‘ettakānaṃ bhikkhūnaṃ na sakkā bhattaṃ laddhu’nti saññaṃ karitthā’’ti? ‘‘Vaṃsacārittametaṃ, mahārāja, amhāka’’nti. ‘‘Nanu, bhante, amhākaṃ vaṃso nāma mahāsammatakhattiyavaṃso, ettha ca ekakhattiyopi bhikkhācarako nāma natthī’’ti. ‘‘Ayaṃ, mahārāja, khattiyavaṃso nāma tava vaṃso. Amhākaṃ pana ‘dīpaṅkaro koṇḍañño…pe… kassapo’ti ayaṃ buddhavaṃso nāma. Ete ca aññe ca anekasahassasaṅkhā buddhā bhikkhācāreneva jīvikaṃ kappesu’’nti antaravīthiyaṃ ṭhitova – Nachdem sie ihn mit diesen zehn Strophen des Menschenlöwen gepriesen hatte, berichtete sie dem König: „Euer Sohn geht um Almosen!“ Der König, im Herzen tief erschüttert, raffte mit der Hand sein Gewand zusammen, eilte eiligst hinaus, lief geschwind hin, stellte sich vor den Erhabenen und sprach: „Warum, o Herr, beschämt Ihr uns? Warum geht Ihr um Almosen? Dachtet Ihr etwa, es sei unmöglich, für so viele Mönche Speise zu erhalten?“ „Das ist die Tradition unserer Ahnenreihe, o Großkönig.“ „Aber, o Herr, unsere Linie ist doch die königliche Linie des Mahāsammata, und in dieser Linie gibt es nicht einen einzigen Krieger, der jemals um Almosen gebettelt hätte!“ „Diese königliche Linie, o Großkönig, ist deine Linie. Unsere Linie jedoch – beginnend mit Dīpaṅkara, Koṇḍañña ... und so weiter ... bis Kassapa – ist die Linie der Buddhas. Diese und andere viele Tausende von Buddhas bestritten ihren Lebensunterhalt ausschließlich durch den Almosengang.“ So sprach er, während er mitten auf der Straße stand, und verkündete diese Strophe: ‘‘Uttiṭṭhe [Pg.106] nappamajjeyya, dhammaṃ sucaritaṃ care; Dhammacārī sukhaṃ seti, asmiṃ loke paramhi cā’’ti. (dha. pa. 168) – „Sei nicht säumig beim Aufstehen, übe das Dhamma rechtmäßig aus! Wer das Dhamma praktiziert, lebt glücklich, in dieser Welt und in der nächsten.“ Imaṃ gāthamāha. Gāthāpariyosāne rājā sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Diese Strophe sprach er. Am Ende der Strophe erlangte der König die Frucht des Stromeintritts. ‘‘Dhammañcare sucaritaṃ, na naṃ duccaritaṃ care; Dhammacārī sukhaṃ seti, asmiṃ loke paramhi cā’’ti. (dha. pa. 169) – „Übe das Dhamma rechtmäßig aus, praktiziere es nicht unrechtmäßig! Wer das Dhamma praktiziert, lebt glücklich, in dieser Welt und in der nächsten.“ Imaṃ gāthaṃ sutvā sakadāgāmiphale patiṭṭhāsi, mahādhammapālajātakaṃ (jā. 1.10.92 ādayo) sutvā anāgāmiphale patiṭṭhāsi, maraṇasamaye setacchattassa heṭṭhā sirisayane nipannoyeva arahattaṃ pāpuṇi. Araññavāsena padhānānuyogakiccaṃ rañño nāhosi. So sotāpattiphalaṃ sacchikatvāyeva pana bhagavato pattaṃ gahetvā saparisaṃ bhagavantaṃ mahāpāsādaṃ āropetvā paṇītena khādanīyena bhojanīyena parivisi. Bhattakiccapariyosāne sabbaṃ itthāgāraṃ āgantvā bhagavantaṃ vandi ṭhapetvā rāhulamātaraṃ. Sā pana ‘‘gaccha, ayyaputtaṃ vandāhī’’ti parijanena vuccamānāpi ‘‘sace mayhaṃ guṇo atthi, sayameva mama santikaṃ ayyaputto āgamissati, āgatameva naṃ vandissāmī’’ti vatvā na agamāsi. Als er diese Strophe hörte, erlangte er die Frucht der Einmalkehr; als er das Mahādhammapāla-Jātaka hörte, erlangte er die Frucht der Nichtkehr, und zur Zeit seines Todes erlangte er, unter dem weißen Prachtschirm auf dem herrschaftlichen Lager liegend, die Arhatschaft. Ein Leben im Wald zur meditativen Anstrengung war für den König somit nicht nötig gewesen. Nachdem er jedoch die Frucht des Stromeintritts verwirklicht hatte, nahm er die Almosenschale des Erhabenen, führte den Erhabenen mitsamt seiner Gefolgschaft in den großen Palast hinauf und bediente sie mit erlesenen festen und weichen Speisen. Nach Beendigung des Mahls kamen alle Frauen des Hofstaates herbei und erwiesen dem Erhabenen ihre Ehrerbietung, mit Ausnahme der Mutter Rāhulas. Sie selbst aber, obwohl sie von ihren Dienerinnen gedrängt wurde: „Geh hin und erweise dem edlen Prinzen deine Ehrerbietung!“, entgegnete: „Wenn ich irgendwelche Tugenden besitze, wird der edle Prinz von selbst zu mir kommen. Erst wenn er gekommen ist, werde ich ihn verehren“, und sie ging nicht hin. Bhagavā rājānaṃ pattaṃ gāhāpetvā dvīhi aggasāvakehi saddhiṃ rājadhītāya sirigabbhaṃ gantvā ‘‘rājadhītā yathāruci vandamānā na kiñci vattabbā’’ti vatvā paññattāsane nisīdi. Sā vegenāgantvā gopphakesu gahetvā pādapiṭṭhiyaṃ sīsaṃ parivattetvā yathājjhāsayaṃ vandi. Rājā rājadhītāya bhagavati sinehabahumānādiguṇasampattiṃ kathesi – ‘‘bhante, mama dhītā ‘tumhehi kāsāyāni vatthāni nivāsitānī’ti sutvā tato paṭṭhāya kāsāyavatthanivatthā jātā, tumhākaṃ ekabhattikabhāvaṃ sutvā ekabhattikāva jātā, tumhehi mahāsayanassa chaḍḍitabhāvaṃ sutvā paṭṭikāmañcakeyeva nipannā, tumhākaṃ mālāgandhādīhi viratabhāvaṃ ñatvā viratamālāgandhāva jātā, attano ñātakehi ‘mayaṃ paṭijaggissāmā’ti sāsane pesitepi tesu ekañātakampi na olokesi, evaṃ guṇasampannā me, bhante, dhītā’’ti. ‘‘Anacchariyaṃ, mahārāja, ayaṃ idāni tayā rakkhiyamānā rājadhītā paripakke ñāṇe attānaṃ rakkheyya, esā pubbe anārakkhā pabbatapāde vicaramānā aparipakkepi ñāṇe attānaṃ rakkhī’’ti vatvā candakinnarījātakaṃ (jā. 1.14.18 ādayo) kathetvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Der Erhabene ließ den König seine Almosenschale tragen, begab sich zusammen mit den beiden Hauptschülern in das Prachtgemach der Königstochter und wies sie an: „Wenn die Königstochter mich nach ihrem Wunsch verehrt, soll man ihr nichts entgegnen.“ Dann setzte er sich auf den vorbereiteten Sitz. Sie kam eilends herbei, ergriff seine Knöchel, legte ihr Haupt auf seine Fußrücken und verehrte ihn ganz nach ihrem Herzenswunsch. Der König berichtete dem Erhabenen von der tiefen Liebe, Ehrfurcht und den vorzüglichen Tugenden der Königstochter: „O Herr, als meine Tochter hörte: ‚Ihr tragt ockerfarbene Gewänder‘, hat sie von da an selbst ockerfarbene Gewänder getragen; als sie hörte, dass Ihr nur eine Mahlzeit am Tag einnehmt, hat sie ebenfalls nur eine Mahlzeit am Tag eingenommen; als sie hörte, dass Ihr auf prunkvolle Lager verzichtet habt, hat sie nur auf einem einfachen Holzrahmenbett geschlafen; als sie hörte, dass Ihr auf Blumen und Düfte verzichtet, hat auch sie auf Blumen und Düfte verzichtet. Selbst als ihre eigenen Verwandten ihr Botschaften sandten: ‚Wir wollen für dich sorgen‘, hat sie keinen einzigen Verwandten auch nur angesehen. Von solch vollkommenen Tugenden, o Herr, ist meine Tochter erfüllt.“ „Das ist nicht verwunderlich, o Großkönig, dass diese Königstochter, die nun von dir beschützt wird und deren Erkenntnis gereift ist, sich selbst schützt. Schon in der Vergangenheit, als sie schutzlos am Fuße der Berge umherwanderte und ihre Erkenntnis noch nicht ausgereift war, hat sie sich selbst geschützt.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erzählte er das Canda-Kinnarī-Jātaka, erhob sich von seinem Sitz und ging fort. Punadivase [Pg.107] pana nandassa rājakumārassa abhisekagehappavesanavivāhamaṅgalesu vattamānesu tassa gehaṃ gantvā kumāraṃ pattaṃ gāhāpetvā pabbājetukāmo maṅgalaṃ vatvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Janapadakalyāṇī kumāraṃ gacchantaṃ disvā ‘‘tuvaṭaṃ kho, ayyaputta, āgaccheyyāsī’’ti vatvā gīvaṃ pasāretvā olokesi. So bhagavantaṃ ‘‘pattaṃ gaṇhathā’’ti vattuṃ avisahamāno vihāraṃyeva agamāsi. Taṃ anicchamānaṃyeva bhagavā pabbājesi. Iti bhagavā kapilavatthuṃ gantvā tatiyadivase nandaṃ pabbājesi. Am folgenden Tag jedoch, als die feierlichen Zeremonien der Thronbesteigung, des Einzugs ins Haus und der Hochzeit des Prinzen Nanda stattfanden, begab sich der Erhabene zu dessen Haus, ließ den Prinzen seine Almosenschale tragen und sprach, da er ihn ordinieren wollte, Segenswünsche, erhob sich von seinem Sitz und ging fort. Als Janapadakalyāṇī den Prinzen fortgehen sah, rief sie ihm nach: „Komm recht bald wieder zurück, edler Prinz!“, streckte ihren Hals aus und blickte ihm nach. Dieser aber wagte es nicht, zum Erhabenen zu sagen: „Nehmt bitte Eure Almosenschale zurück“, und folgte ihm so bis zum Kloster. Obwohl er es gar nicht wünschte, ordinierte ihn der Erhabene. So ordinierte der Erhabene am dritten Tag nach seiner Ankunft in Kapilavatthu den Prinzen Nanda. Sattame divase rāhulamātāpi kumāraṃ alaṅkaritvā bhagavato santikaṃ pesesi – ‘‘passa, tāta, etaṃ vīsatisahassasamaṇaparivutaṃ suvaṇṇavaṇṇaṃ brahmarūpavaṇṇaṃ samaṇaṃ, ayaṃ te pitā, etassa mahantā nidhayo ahesuṃ tyassa nikkhamanakālato paṭṭhāya na passāma, gaccha, naṃ dāyajjaṃ yācāhi – ‘ahaṃ, tāta, kumāro abhisekaṃ patvā cakkavattī bhavissāmi, dhanena me attho, dhanaṃ me dehi. Sāmiko hi putto pitusantakassā’’’ti. Kumāro ca bhagavato santikaṃ gantvāva pitusinehaṃ labhitvā haṭṭhacitto ‘‘sukhā te, samaṇa, chāyā’’ti vatvā aññañca bahuṃ attano anurūpaṃ vadanto aṭṭhāsi. Bhagavā katabhattakicco anumodanaṃ vatvā uṭṭhāyāsanā pakkāmi. Kumāropi ‘‘dāyajjaṃ me, samaṇa, dehi, dāyajjaṃ me, samaṇa, dehī’’ti bhagavantaṃ anubandhi. Na bhagavā kumāraṃ nivattāpesi, parijanopi bhagavatā saddhiṃ gacchantaṃ nivattetuṃ nāsakkhi. Iti so bhagavatā saddhiṃ ārāmameva agamāsi. Am siebten Tag schmückte auch die Mutter von Rāhula den Prinzen und schickte ihn in die Nähe des Erhabenen, indem sie sprach: „Sieh, mein Lieber, diesen Asketen, der von zwanzigtausend Asketen umgeben ist, von goldener Farbe und brahma-gleicher Gestalt; dieser ist dein Vater. Er besaß große Schätze, die wir seit dem Zeitpunkt seines Fortgehens in die Hauslosigkeit nicht mehr gesehen haben. Geh hin und fordere dein Erbe von ihm, indem du sagst: ‚Ich, mein Vater, werde als Prinz nach Erhalt der Salbung ein raddrehender Monarch sein. Ich benötige Reichtum; gib mir Reichtum. Denn der Sohn ist der rechtmäßige Erbe des väterlichen Eigentums.‘“ Und der Prinz ging zum Erhabenen, empfand sogleich väterliche Zuneigung, wurde frohen Herzens und sagte: „Angenehm ist dein Schatten, o Asket!“, und blieb stehen, während er noch vieles andere sprach, das für ihn angemessen war. Nachdem der Erhabene das Mahl eingenommen und die Dankesworte gesprochen hatte, erhob er sich von seinem Sitz und ging fort. Auch der Prinz folgte dem Erhabenen auf dem Fuße und bat: „Gib mir mein Erbe, o Asket! Gib mir mein Erbe, o Asket!“ Der Erhabene wies den Prinzen nicht zurück, und auch die Gefolgsleute vermochten den Knaben, der mit dem Erhabenen ging, nicht zurückzuhalten. So gelangte er zusammen mit dem Erhabenen direkt bis zum Kloster. Tato bhagavā cintesi – ‘‘yaṃ ayaṃ pitusantakaṃ dhanaṃ icchati, taṃ vaṭṭānugataṃ savighātaṃ, handassa me bodhimaṇḍe paṭiladdhaṃ sattavidhaṃ ariyadhanaṃ demi, lokuttaradāyajjassa naṃ sāmikaṃ karomī’’ti āyasmantaṃ sāriputtaṃ āmantesi – ‘‘tena hi, sāriputta, rāhulaṃ pabbājehī’’ti. Thero taṃ pabbājesi. Pabbajite ca pana kumāre rañño adhimattaṃ dukkhaṃ uppajji, taṃ adhivāsetuṃ asakkonto bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ‘‘sādhu, bhante, ayyā mātāpitūhi ananuññātaṃ puttaṃ na pabbājeyyu’’nti varaṃ yāci. Bhagavā ca tassa varaṃ datvā punekadivase rājanivesane katabhattakicco ekamantaṃ nisinnena raññā ‘‘bhante, tumhākaṃ dukkarakārikakāle ekā devatā maṃ upasaṅkamitvā ‘putto te kālaṅkato’ti āha, tassā vacanaṃ asaddahanto ‘na mayhaṃ putto sambodhiṃ appatvā kālaṃ karotī’ti taṃ [Pg.108] paṭikkhipi’’nti vutte ‘‘tumhe idāni kiṃ saddahissatha, ye tumhe pubbepi aṭṭhikāni dassetvā ‘putto te mato’ti vutte na saddahitthā’’ti imissā aṭṭhuppattiyā mahādhammapālajātakaṃ kathesi. Kathāpariyosāne rājā anāgāmiphale patiṭṭhahi. Da dachte der Erhabene: „Dieser Reichtum, der dem Vater gehört und den er wünscht, ist an den Kreislauf des Leidens gebunden und mit Drangsal verbunden. Wohlan, ich werde ihm das siebenfache edle Erbe geben, das ich am Fuße des Bodhi-Baumes erlangt habe, und ihn zum Erben des überweltlichen Erbes machen.“ Daraufhin wandte er sich an den Ehrwürdigen Sāriputta: „Nun denn, Sāriputta, ordiniere Rāhula.“ Der Thera ordinierte ihn. Als der Prinz jedoch ordiniert war, entstand im König übermäßiger Schmerz. Da er diesen nicht ertragen konnte, suchte er den Erhabenen auf und bat um eine Vergünstigung: „Es wäre gut, o Herr, wenn die Ehrwürdigen keinen Sohn ordinieren würden, der nicht die Erlaubnis seiner Eltern hat.“ Nachdem der Erhabene ihm diese Vergünstigung gewährt hatte, wurde er an einem anderen Tag, als er im königlichen Palast das Mahl beendet hatte und beiseite saß, vom König angesprochen: „Herr, zur Zeit Eurer schweren Kasteiungen kam eine Gottheit zu mir und sagte: ‚Dein Sohn ist gestorben.‘ Ich glaubte ihren Worten nicht, wies sie ab und sagte: ‚Mein Sohn stirbt nicht, bevor er die vollkommene Erleuchtung erlangt hat.‘“ Als der König dies gesagt hatte, sprach der Erhabene: „Wie solltet Ihr jetzt daran zweifeln, da Ihr doch schon in einer früheren Existenz, als man Euch Knochen zeigte und sagte: ‚Dein Sohn ist tot‘, nicht daran geglaubt habt?“ Und aus diesem Anlass erzählte er das Mahādhammapāla-Jātaka. Am Ende der Erzählung wurde der König in der Frucht der Nichtwiederkehr gefestigt. Iti bhagavā pitaraṃ tīsu phalesu patiṭṭhāpetvā bhikkhusaṅghaparivuto punadeva rājagahaṃ gantvā sītavane vihāsi. Tasmiṃ samaye anāthapiṇḍiko gahapati pañcahi sakaṭasatehi bhaṇḍaṃ ādāya rājagahaṃ gantvā attano piyasahāyakassa seṭṭhino gehaṃ gantvā tattha buddhassa bhagavato uppannabhāvaṃ sutvā balavapaccūse devatānubhāvena vivaṭena dvārena satthāraṃ upasaṅkamitvā dhammaṃ sutvā sotāpattiphale patiṭṭhāya, dutiye divase buddhappamukhassa saṅghassa mahādānaṃ datvā sāvatthiṃ āgamanatthāya satthu paṭiññaṃ gahetvā antarāmagge pañcacattālīsayojanaṭṭhāne satasahassaṃ datvā yojanike yojanike vihāraṃ kāretvā jetavanaṃ koṭisanthārena aṭṭhārasahi hiraññakoṭīhi kiṇitvā navakammaṃ paṭṭhapesi. So majjhe dasabalassa gandhakuṭiṃ kāresi, taṃ parivāretvā asītiyā mahātherānaṃ pāṭiyekkaṃ ekasannivesane āvāse ekakuṭikadvikuṭikahaṃsavaṭṭakadīgharassasālāmaṇḍapādivasena sesasenāsanāni pokkharaṇicaṅkamanarattiṭṭhānadivāṭṭhānāni cāti aṭṭhārasakoṭipariccāgena ramaṇīye bhūmibhāge manoramaṃ vihāraṃ kāretvā dasabalassa āgamanatthāya dūtaṃ pāhesi. Satthā tassa vacanaṃ sutvā mahābhikkhusaṅghaparivāro rājagahā nikkhamitvā anupubbena sāvatthinagaraṃ pāpuṇi. So festigte der Erhabene seinen Vater in den drei Früchten, reiste, umgeben von der Mönchsgemeinde, erneut nach Rājagaha und verwelkte im Sītavana. Zu jener Zeit reiste der Hausvater Anāthapiṇḍika mit fünfhundert Wagen voller Waren nach Rājagaha, ging zum Haus seines lieben Freundes, des dortigen Großkaufmanns, hörte dort vom Erscheinen des erleuchteten Erhabenen, suchte in der Morgendämmerung durch ein von der Macht einer Gottheit geöffnetes Tor den Meister auf, hörte die Lehre, wurde in der Frucht des Stromeintritts gefestigt, gab am folgenden Tag der Mönchsgemeinde mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe, erhielt das Versprechen des Meisters, nach Sāvatthi zu kommen, spendete auf dem fünfundvierzig Meilen langen Zwischenweg jeweils einhunderttausend Münzen, ließ Meile für Meile Klöster errichten, kaufte den Jetavana-Hain für achtzehn Millionen Goldstücke, indem er den Boden mit Münzen auslegte, und begann mit den Bauarbeiten. Er ließ in der Mitte eine wohlriechende Kammer für den Zehnkräftigen errichten. Um diese herum baute er für die achtzig großen Schüler jeweils eigene Wohnungen in einer Gesamtanlage, und mit den übrigen Wohnstätten, bestehend aus Einzelhütten, Doppelhütten, Schwanen- und Entenhäusern, langen und kurzen Hallen, Pavillons usw., Teichen, Wandelgängen, Plätzen für die Nacht und Plätzen für den Tag, schuf er unter Aufwendung von achtzehn Millionen Münzen ein wunderschönes Kloster auf einem lieblichen Gelände und sandte einen Boten, um den Zehnkräftigen zur Ankunft einzuladen. Als der Meister seine Nachricht hörte, brach er, umgeben von einer großen Mönchsgemeinde, von Rājagaha auf und erreichte nacheinander die Stadt Sāvatthi. Mahāseṭṭhipi kho vihāramahaṃ sajjetvā tathāgatassa jetavanaṃ pavisanadivase puttaṃ sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitaṃ katvā alaṅkatapaṭiyatteheva pañcahi kumārasatehi saddhiṃ pesesi. So saparivāro pañcavaṇṇavatthasamujjalāni pañca dhajasatāni gahetvā dasabalassa purato ahosi, tesaṃ pacchato mahāsubhaddā cūḷasubhaddāti dve seṭṭhidhītaro pañcahi kumārikāsatehi saddhiṃ puṇṇaghaṭe gahetvā nikkhamiṃsu, tāsaṃ pacchato seṭṭhibhariyā sabbālaṅkārapaṭimaṇḍitā pañcahi mātugāmasatehi saddhiṃ puṇṇapātiyo gahetvā nikkhami, sabbesaṃ pacchato mahāseṭṭhi [Pg.109] ahatavatthanivattho ahatavatthanivattheheva pañcahi seṭṭhisatehi saddhiṃ bhagavantaṃ abbhuggañchi. Bhagavā imaṃ upāsakaparisaṃ purato katvā mahābhikkhusaṅghaparivuto attano sarīrappabhāya suvaṇṇarasasekasiñcanāni viya vanantarāni kurumāno anantāya buddhalīlāya aparimāṇāya buddhasiriyā jetavanavihāraṃ pāvisi. Auch der Großkaufmann bereitete das Fest zur Einweihung des Klosters vor. Am Tag des Einzugs des Tathāgata in das Jetavana schmückte er seinen Sohn mit allem Schmuck und sandte ihn zusammen mit fünfhundert ebenfalls geschmückten und festlich hergerichteten Knaben voraus. Dieser ging mit seinem Gefolge, fünfhundert in fünf Farben glänzende Banner tragend, vor dem Zehnkräftigen her. Hinter ihnen zogen die beiden Töchter des Großkaufmanns, Mahāsubhaddā und Cūḷasubhaddā, zusammen mit fünfhundert Mädchen aus, die gefüllte Krüge trugen. Hinter ihnen zog die Gattin des Großkaufmanns, reich geschmückt, zusammen mit fünfhundert Frauen aus, die gefüllte Schalen trugen. Ganz hinten ging der Großkaufmann selbst, in neue, ungewaschene Gewänder gekleidet, zusammen mit fünfhundert ebenfalls in neue Gewänder gekleideten Kaufleuten dem Erhabenen entgegen. Der Erhabene ließ diese Schar von Laienanhängern vorangehen, schritt inmitten einer großen Mönchsgemeinde einher, während er die Zwischenräume des Waldes mit seiner Körperstrahlung wie mit flüssigem Gold übergoss, und zog in unendlicher Buddha-Würde und unermesslicher Buddha-Pracht in das Jetavana-Kloster ein. Atha naṃ anāthapiṇḍiko āpucchi – ‘‘kathāhaṃ, bhante, imasmiṃ vihāre paṭipajjāmī’’ti? ‘‘Tena hi, gahapati, imaṃ vihāraṃ āgatānāgatassa cātuddisassa bhikkhusaṅghassa patiṭṭhāpehī’’ti. ‘‘Sādhu, bhante’’ti mahāseṭṭhi suvaṇṇabhiṅgāraṃ ādāya dasabalassa hatthe udakaṃ pātetvā ‘‘imaṃ jetavanavihāraṃ āgatānāgatassa cātuddisassa buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa dammī’’ti adāsi. Satthā vihāraṃ paṭiggahetvā anumodanaṃ karonto – Da fragte ihn Anāthapiṇḍika: „Wie, o Herr, soll ich mich bezüglich dieses Klosters verhalten?“ „Nun denn, Hausvater, weih dieses Kloster der Gemeinschaft der Mönche aus den vier Himmelsrichtungen, den gegenwärtigen und zukünftigen!“ „Sehr wohl, o Herr“, sprach der Großkaufmann, nahm ein goldenes Gießgefäß, ließ Wasser über die Hand des Zehnkräftigen gießen und übergab das Kloster mit den Worten: „Dieses Jetavana-Kloster schenke ich der Gemeinschaft der Mönche aus den vier Himmelsrichtungen, den gegenwärtigen und zukünftigen, mit dem Buddha an der Spitze.“ Der Meister nahm das Kloster an und sprach zur Segnung die folgenden Verse: ‘‘Sītaṃ uṇhaṃ paṭihanti, tato vāḷamigāni ca; Sarīsape ca makase, sisire cāpi vuṭṭhiyo. „Es hält Kälte und Hitze ab, und ebenso wilde Tiere, schleichende Tiere und Stechmücken, und auch die Regengüsse im Winter. ‘‘Tato vātātapo ghoro, sañjāto paṭihaññati; Leṇatthañca sukhatthañca, jhāyituñca vipassituṃ. Auch starker Wind und heftige Hitze, die entstehen, werden dadurch abgehalten. Es dient als Zufluchtsort und zum Wohlbefinden, um zu meditieren und Einsicht zu entfalten.“ ‘‘Vihāradānaṃ saṅghassa, aggaṃ buddhena vaṇṇitaṃ; Tasmā hi paṇḍito poso, sampassaṃ atthamattano. „Die Schenkung eines Klosters an den Saṅgha wird vom Buddha als das Höchste gepriesen; daher sollte ein weiser Mensch, der sein eigenes Wohl im Auge hat,“ ‘‘Vihāre kāraye ramme, vāsayettha bahussute; Tesaṃ annañca pānañca, vatthasenāsanāni ca. „schöne Klöster bauen lassen und darin Vielwissende wohnen lassen. Er sollte ihnen Speise, Trank, Kleidung und Lagerstätten“ ‘‘Dadeyya ujubhūtesu, vippasannena cetasā; Te tassa dhammaṃ desenti, sabbadukkhāpanūdanaṃ; Yaṃ so dhammaṃ idhaññāya, parinibbāti anāsavo’’ti. (cūḷava. 295) – „mit vertrauensvollem Geist gegenüber jenen geben, die aufrecht leben. Diese lehren ihn das Dhamma, welches alles Leiden vertreibt; wenn er dieses Dhamma hier erkennt, erlischt er völlig, frei von den Trieben.“ Vihārānisaṃsaṃ kathesi. Anāthapiṇḍiko dutiyadivasato paṭṭhāya vihāramahaṃ ārabhi. Visākhāya vihāramaho catūhi māsehi niṭṭhito, anāthapiṇḍikassa [Pg.110] pana vihāramaho navahi māsehi niṭṭhāsi. Vihāramahepi aṭṭhāraseva koṭiyo pariccāgaṃ agamaṃsu. Iti ekasmiṃyeva vihāre catupaṇṇāsakoṭisaṅkhaṃ dhanaṃ pariccaji. So verkündete der Erhabene den Nutzen des Klosters für Anāthapiṇḍika. Vom zweiten Tag an begann Anāthapiṇḍika mit der Einweihungsfeier für das Kloster. Während das Einweihungsfest von Visākhās Palast nach vier Monaten beendet war, dauerte das Einweihungsfest von Anāthapiṇḍikas Kloster neun Monate. Auch für das Einweihungsfest selbst wurden achtzehn Kotis (Millionen) ausgegeben. So wendete er für ein einziges Kloster ein Vermögen im Wert von vierundfünfzig Kotis auf. Atīte pana vipassissa bhagavato kāle punabbasumitto nāma seṭṭhi suvaṇṇiṭṭhakāsanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne yojanappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Sikhissa pana bhagavato kāle sirivaḍḍho nāma seṭṭhi suvaṇṇaphālasanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne tigāvutappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Vessabhussa bhagavato kāle sotthiyo nāma seṭṭhi suvaṇṇahatthipadasanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne aḍḍhayojanappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Kakusandhassa bhagavato kāle accuto nāma seṭṭhi suvaṇṇiṭṭhakāsanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne gāvutappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Koṇāgamanassa bhagavato kāle uggo nāma seṭṭhi suvaṇṇakacchapasanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne aḍḍhagāvutappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Kassapassa bhagavato kāle sumaṅgalo nāma seṭṭhi suvaṇṇayaṭṭhisanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne soḷasakarīsappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Amhākaṃ pana bhagavato kāle anāthapiṇḍiko nāma seṭṭhi kahāpaṇakoṭisanthārena kiṇitvā tasmiṃyeva ṭhāne aṭṭhakarīsappamāṇaṃ saṅghārāmaṃ kāresi. Idaṃ kira ṭhānaṃ sabbabuddhānaṃ avijahitaṭṭhānameva. In der Vergangenheit aber, zur Zeit des erhabenen Vipassī, erwarb ein Großkaufmann namens Sumitta den Boden, indem er ihn mit goldenen Ziegeln auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von einer Yojana Größe errichten. Zur Zeit des erhabenen Sikhī aber erwarb ein Großkaufmann namens Sīrivaḍḍhana den Boden, indem er ihn mit goldenen Pflugscharen auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von drei Gāvutas Größe errichten. Zur Zeit des erhabenen Vessabhū erwarb ein Großkaufmann namens Sotthiya den Boden, indem er ihn mit goldenen Elefantenfuß-Abbildern auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von einer halben Yojana Größe errichten. Zur Zeit des erhabenen Kakusandha erwarb ein Großkaufmann namens Accuta den Boden, indem er ihn mit goldenen Ziegeln auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von einem Gāvuta Größe errichten. Zur Zeit des erhabenen Koṇāgamana erwarb ein Großkaufmann namens Ugga den Boden, indem er ihn mit goldenen Schildkröten-Abbildern auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von einem halben Gāvuta Größe errichten. Zur Zeit des erhabenen Kassapa erwarb ein Großkaufmann namens Sumaṅgala den Boden, indem er ihn mit goldenen Barren auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von sechzehn Karīsas Größe errichten. Zur Zeit unseres erhabenen Buddhas aber erwarb der Großkaufmann namens Anāthapiṇḍika den Boden, indem er ihn mit einer Schicht von Kahāpaṇa-Münzen auslegte, und ließ an eben dieser Stelle ein Kloster von acht Karīsas Größe errichten. Dieser Ort ist wahrlich ein von allen Buddhas niemals verlassener Ort. Iti mahābodhimaṇḍe sabbaññutappattito yāva mahāparinibbānamañcā yasmiṃ yasmiṃ ṭhāne bhagavā vihāsi, idaṃ santikenidānaṃ nāmāti veditabbaṃ. So ist alles, was den Ort betrifft, an dem der Erhabene verweilte – vom Erreichen der Allwissenheit am Fuße des Mahābodhi-Baumes bis hin zu Seinem Sterbebett des großen Parinibbāna –, als die „nahe Vorgeschichte“ (Santike-nidāna) zu verstehen. Santikenidānakathā niṭṭhitā. Die Abhandlung über die nahe Vorgeschichte (Santike-nidāna-kathā) ist abgeschlossen. Nidānakathā niṭṭhitā. Die Abhandlung über die Vorgeschichte (Nidāna-kathā) ist abgeschlossen. Therāpadānaṃ Therāpadāna (Die Lebensgeschichten der älteren Mönche) 1. Buddhavaggo 1. Buddhavagga (Das Kapitel über den Buddha) Abbhantaranidānavaṇṇanā Die Erklärung der inneren Vorgeschichte (Abbhantara-nidāna-vaṇṇanā) 5. 5. ‘‘Atha [Pg.111] buddhāpadānāni, suṇātha suddhamānasā; Tiṃsapāramisampuṇṇā, dhammarājā asaṅkhiyā’’ti. – „Nun hört mit reinem Geist von den Lebensgeschichten (Apadānas) der Buddhas, den unzähligen Königen des Dhamma, welche die dreißig Vollkommenheiten (Pāramīs) erfüllt haben.“ Ettha athāti adhikārantarūpadassanatthe nipātapadaṃ, vibhattiyuttāyuttanipātadvayesu vibhattiyuttanipātapadaṃ. Atha vā – Hierin ist das Wort „atha“ eine Partikel (Nipāta) in der Bedeutung des Aufzeigens eines Übergangs zu einem neuen Thema; unter den beiden Arten von Partikeln, nämlich den mit Kasusendungen verbundenen und unverbundenen, ist es eine mit einer Kasusendung verbundene Partikel. Oder aber: ‘‘Adhikāre maṅgale ceva, nipphannatthevadhāraṇe; Anantarepagamane, atha-saddo pavattati’’. „In den Bedeutungen von Einleitung, Segen, Vollendung, Hervorhebung, unmittelbarer Folge und Weggehen wird das Wort ‚atha‘ verwendet.“ Tathā hi – Denn in der Tat: ‘‘Adhikiccaṃ adhiṭṭhānaṃ, adhiatthaṃ vibhāsati; Seṭṭhajeṭṭhakabhāvena, adhikāro vidhīyate’’ti. – „Es beleuchtet das besonders zu Tuende (adhikicca), die feste Grundlage (adhiṭṭhāna) und die erhabene Bedeutung (adhiattha). Wegen des Charakters des Vorzüglichsten und Besten wird die Einleitung (adhikāra) dargelegt.“ Vuttattā buddhānaṃ samattiṃsapāramidhammānaṃ adhikiccato, seṭṭhajeṭṭhato adhikāraṭṭhena atha-saddena yuttamapadānānīti. Tividhabodhisattānaṃ pūjāmaṅgalasabhāvato ‘‘pūjā ca pūjaneyyānaṃ, etaṃ maṅgalamuttama’’nti vacanato (khu. pā. 5.3; su. ni. 262) maṅgalaṭṭhena atha-saddena yuttamapadānānīti. Buddhādīnaṃ bhagavantānaṃ sampattikiccassa arahattamaggena nipphannato nipphannaṭṭhena atha-saddena yuttamapadānānīti. Buddhādīnaṃ arahattamaggādikusalato aññakusalānaṃ abhāvato avadhāraṇaṭṭhena nivāraṇaṭṭhena atha-saddena yuttamapadānānīti. Khuddakapāṭhasaṅgahānantaraṃ saṅgahitanti anantaraṭṭhena atha-saddena yuttamapadānānīti. Ito khuddakapāṭhato paṭṭhāyāti apagamanaṭṭhena atha-saddena yuttamapadānānīti. „Da gesagt wurde, dass [das Wort ‚atha‘ diese Bedeutungen hat], sind die Lebensgeschichten (Apadānas) mit dem Wort ‚atha‘ in der Bedeutung von ‚Einleitung‘ (adhikāra) verbunden, wegen der vorzüglichen Wichtigkeit und des Vorrangs der Ausübung der dreißig vollkommenen Eigenschaften durch die Buddhas. Sie sind mit dem Wort ‚atha‘ in der Bedeutung von ‚Segen‘ (maṅgala) verbunden, aufgrund der Natur der Verehrung und des Segens der drei Arten von Bodhisattas, gemäß dem Wort des Erhabenen: ‚Die Verehrung derer, die der Verehrung würdig sind – das ist der höchste Segen.‘ Sie sind mit dem Wort ‚atha‘ in der Bedeutung von ‚Vollendung‘ (nipphanna) verbunden, da das Werk der Erlangung der erhabenen Buddhas usw. durch den Pfad der Arahatschaft (Arahattamagga) vollendet ist. Sie sind mit dem Wort ‚atha‘ in den Bedeutungen von ‚Einschränkung‘ (avadhāraṇa) und ‚Ausschluss‘ (nivāraṇa) verbunden, weil es außer dem heilsamen Zustand des Pfades der Arahatschaft usw. bei den Buddhas keine anderen [noch zu erlangenden] heilsamen Zustände gibt. Sie sind mit dem Wort ‚atha‘ in der Bedeutung von ‚unmittelbarer Folge‘ (anantara) verbunden, weil sie unmittelbar nach der Sammlung des Khuddakapāṭha eingegliedert wurden. Und sie sind mit dem Wort ‚atha‘ in der Bedeutung von ‚Weggang‘ (apagamaṇa) verbunden, im Sinne von ‚beginnend von diesem Khuddakapāṭha an‘.“ Buddhoti ettha bujjhitā saccānīti buddho, bodhetā pajāyāti buddho, sabbaññutāya buddho, sabbadassāvitāya buddho, anaññaneyyatāya buddho, visavitāya [Pg.112] buddho, khīṇāsavasaṅkhātena buddho, nirupakkilesasaṅkhātena buddho, pabbajjāsaṅkhātena buddho, adutiyaṭṭhena buddho, taṇhāpahānaṭṭhena buddho, ekāyanamaggaṃ gatoti buddho, eko anuttaraṃ sammāsambodhiṃ abhisambuddhoti buddho, abuddhivihatattā buddhipaṭilābhā buddho, buddhi buddhaṃ bodhoti anatthantarametaṃ. Yathā nīlādivaṇṇayogato paṭo ‘‘nīlo paṭo, ratto paṭo’’ti vuccati, evaṃ buddhaguṇayogato buddho. Atha vā ‘‘bodhi’’vuccati catūsu maggesu ñāṇaṃ, tena ñāṇena sakaladiyaḍḍhasahassakilesārigaṇe khepetvā nibbānādhigamanato ñāṇaṃ ‘‘bodhī’’ti vuccati. Tena sampayutto samaṅgīpuggalo buddho. Teneva ñāṇena paccekabuddhopi sabbakilese khepetvā nibbānamadhigacchati. Buddhānaṃ pana catūsu asaṅkhyeyyesu kappasatasahassesu ca pāramiyo pūretvā bodhiñāṇassādhigatattā ca indriyaparopariyattañāṇamahākaruṇāsamāpattiñāṇayamakapāṭihīrañāṇasabbaññutaññāṇa- anāvaraṇaāsayānusayādiasādhāraṇañāṇānaṃ samadhigatattā ca ekāyapi dhammadesanāya asaṅkhyeyyāsattanikāye dhammāmataṃ pāyetvā nibbānassa pāpanato ca tadeva ñāṇaṃ buddhānamevādhikabhāvato tesameva sambuddhānaṃ apadānaṃ kāraṇaṃ buddhāpadānaṃ. Tañhi duvidhaṃ kusalākusalavasena. Paccekabuddhā pana na tathā kātuṃ samatthā, annādipaccayadāyakānaṃ saṅgahaṃ karontāpi – „In dem Begriff ‚buddho‘ bedeutet ‚buddho‘: Er ist der Erkenner der Wahrheiten (saccāni); Er ist derjenige, der die Wesenheiten (pajā) erkennen lässt; Er ist Buddha durch Allwissenheit (sabbaññutā); Er ist Buddha durch das Allsehen (sabbadassāvitā); Er ist Buddha, weil er nicht von anderen geführt werden muss (anaññaneyyatā); Er ist Buddha durch die Durchdringung der Erkenntnis (visavitā); Er ist Buddha, weil Er als einer gilt, dessen Triebe versiegt sind (khīṇāsava); Er ist Buddha, weil Er als einer gilt, der frei von trübenden Verunreinigungen ist (nirupakkilesa); Er ist Buddha durch das Verlassen des weltlichen Lebens (pabbajjā); Er ist Buddha in der Bedeutung, dass Er keinen Zweiten neben sich hat (adutiya); Er ist Buddha in der Bedeutung des Aufgebens des Begehrens (taṇhā); Er ist Buddha, weil Er den Pfad gegangen ist, der der einzige Weg ist (ekāyanamagga); Er ist Buddha, weil Er allein die unübertreffliche, vollkommene Erleuchtung (sammāsambodhi) vollkommen erkannt hat; Er ist Buddha, weil Er das Nichtwissen vertrieben und die Erkenntnis erlangt hat. Die Begriffe ‚buddhi‘ (Erkenntnis), ‚buddha‘ (der Erleuchtete) und ‚bodhi‘ (Erleuchtung) sind von gleicher Bedeutung, ohne Bedeutungsunterschied. Wie ein Tuch aufgrund der Verbindung mit blauer oder roter Farbe als ‚blaues Tuch‘ oder ‚rotes Tuch‘ bezeichnet wird, so wird Er wegen der Verbindung mit der Eigenschaft der Erkenntnis (buddhi) als ‚Buddha‘ bezeichnet. Oder aber: Unter ‚bodhi‘ versteht man das Wissen auf den vier Pfaden. Dasjenige Wissen, das nach der Vernichtung der gesamten Schar der eintausendfünfhundert Verunreinigungen zur Erlangung des Nibbānas führt, wird ‚bodhi‘ genannt. Das damit verbundene und damit ausgestattete Individuum ist der ‚Buddha‘. Durch eben dieses Wissen erlangt auch ein Paccekabuddha nach der Vernichtung aller Verunreinigungen das Nibbāna. Für die vollkommenen Buddhas jedoch gilt, dass sie in vier unzählbaren Äonen (Asaṅkhyeyyas) und hunderttausend Äonen (Kappas) die Vollkommenheiten (Pāramīs) erfüllt und das Erleuchtungswissen (Bodhiñāṇa) erlangt haben; und weil sie die außergewöhnlichen Erkenntnisse vollkommen erlangt haben, wie das Wissen über die Reife der geistigen Fähigkeiten anderer (indriyaparopariyattañāṇa), das Wissen über das Verweilen im großen Mitgefühl (mahākaruṇāsamāpattiñāṇa), das Wissen über das Zwillingswunder (yamakapāṭihīrañāṇa), das Allwissenheitswissen (sabbaññutañāṇa), das ungehinderte Wissen (anāvaraṇañāṇa) sowie das Wissen über die Neigungen und schlummernden Tendenzen der Wesen (āsayānusayañāṇa) und andere; und weil sie durch eine einzige Lehrverkündigung unzählbaren Scharen von Lebewesen den Nektar des Dhamma zu trinken geben und sie zum Nibbāna führen, gehört eben dieses Wissen in seiner überragenden Fülle allein den Buddhas. Die Vorgeschichte der Taten dieser vollkommen Erleuchteten wird ‚Buddhopadāna‘ (Lebensgeschichte des Buddha) genannt. Diese ist zweifach, nach Maßgabe von heilsamen und unheilsamen Handlungen. Die Paccekabuddhas hingegen sind nicht in der Lage, dies in dieser Weise zu lehren, selbst wenn sie den Spendern von Speise und anderen Erfordernissen Beistand leisten und sagen:“ ‘‘Icchitaṃ patthitaṃ tuyhaṃ, khippameva samijjhatu; Pūrentu cittasaṅkappā, cando pannaraso yathā. „Was immer du wünschst und ersehnst, möge schnell in Erfüllung gehen! Mögen all deine Geistesabsichten sich erfüllen, so wie der Vollmond am fünfzehnten Tag!“ ‘‘Icchitaṃ patthitaṃ tuyhaṃ, khippameva samijjhatu; Pūrentu cittasaṅkappā, maṇi jotiraso yathā’’ti. (dī. ni. aṭṭha. 2.95 pubbūpanissayasampattikathā; a. ni. aṭṭha. 1.1.192; dha. pa. aṭṭha. 1.sāmāvatīvatthu) – Was du wünschst und ersehnst, möge sich schnell erfüllen; mögen alle Absichten deines Geistes in Erfüllung gehen, so wie der wunscherfüllende Edelstein (Maṇijotirasa) [mit seinem Glanz leuchtet]. Imāhi dvīhiyeva gāthāhi dhammaṃ desenti. Desentāpi asaṅkhyeyyasattanikāye bodhetuṃ na sakkuṇanti, tasmā na sabbaññubuddhasadisā hutvā pāṭiekkaṃ visuṃ buddhāti paccekabuddhā. Tesaṃ apadānaṃ kāraṇaṃ paccekabuddhāpadānaṃ. Nur mit diesen zwei Strophen verkünden sie die Lehre. Obwohl sie die Lehre verkünden, sind sie nicht in der Lage, die unzählbaren Scharen der Lebewesen zur Erkenntnis [der vier Wahrheiten] zu führen. Darum sind sie, da sie nicht wie ein allwissender Buddha sind, sondern jeder für sich allein und unabhängig erwacht sind, Einzelbuddhas (Paccekabuddhas). Deren Lebensbeschreibung (die Ursache ihres Erwachens) ist das Paccekabuddhāpadāna. Ciraṃ [Pg.113] ṭhitāti therā. Atha vā thiratarasīlācāramaddavādiguṇehi yuttāti therā. Atha vā thiravarasīlasamādhipaññāvimuttivimuttiñāṇadassanaguṇehi yuttāti therā. Atha vā thiratarasaṅkhātapaṇītānuttarasantinibbānamadhigatāti therā, therānaṃ apadānāni therāpadānāni. Tathā tādiguṇehi yuttāti therī, therīnaṃ apadānāni therīpadānāni. Tesu buddhāpadāne pañceva apadānāni, pañceva suttantā. Tenāhu porāṇā – Weil sie lange gefestigt sind, werden sie Älteste (Theras) genannt. Oder: jene, die mit den Eigenschaften von standhafter Tugend, rechtem Lebenswandel, Sanftmut und anderem ausgestattet sind, sind Theras. Oder: jene, die mit den hervorragenden, unerschütterlichen Eigenschaften von Tugend, Sammlung, Weisheit, Befreiung sowie dem Wissen und Schauen der Befreiung ausgestattet sind, sind Theras. Oder: jene, die das feste, erhabene und unübertreffliche friedvolle Verlöschen, das Nibbāna, erlangt haben, sind Theras. Die Lebensgeschichten (die Ursachen ihres Wirkens) der Theras sind die Therāpadānas. Ebenso sind jene [Nonnen], die mit solchen Tugenden ausgestattet sind, Therīs. Die Lebensgeschichten der Therīs sind die Therīpadānas. Unter diesen befinden sich im Buddhāpadāna genau fünf Lebensgeschichten und genau fünf Suttantas. Daher sagten die Alten (Porāṇas): ‘‘Pañceva apadānāni, pañca suttāni yassa ca; Idaṃ buddhāpadānanti, paṭhamaṃ anulomato’’ti. „Genau fünf Lebensgeschichten und fünf Suttas hat dieses [Werk]; dies ist das Buddhāpadāna, das erste in der regelmäßigen Reihenfolge.“ Paccekabuddhāpadānepi pañceva apadānāni, pañceva suttantā. Tenāhu porāṇā – Auch im Paccekabuddhāpadāna gibt es genau fünf Lebensgeschichten und genau fünf Suttantas. Daher sagten die Alten: ‘‘Pañceva apadānāni, pañca suttāni yassa ca; Idaṃ paccekabuddhāpadānanti, dutiyaṃ anulomato’’ti. „Genau fünf Lebensgeschichten und fünf Suttas hat dieses [Werk]; dies ist das Paccekabuddhāpadāna, das zweite in der regelmäßigen Reihenfolge.“ Therāpadānesu dasādhikapañcasatāpadānāni, vaggato ekapaññāsa vaggā. Tenāhu porāṇā – In den Therāpadānas gibt es fünfhundertzehn Lebensgeschichten, eingeteilt in einundfünfzig Kapitel (Vaggas). Daher sagten die Alten: ‘‘Pañcasatadasapadānāni, ekapaññāsa vaggato; Idaṃ therāpadānanti, tatiyaṃ anulomato’’ti. „Fünfhundertzehn Lebensgeschichten, eingeteilt in einundfünfzig Kapitel; dies ist das Therāpadāna, das dritte in der regelmäßigen Reihenfolge.“ Therīapadānesu cattālīsaṃ apadānāni, vaggato caturo vaggā. Tenāhu porāṇā – In den Therīpadānas gibt es vierzig Lebensgeschichten, eingeteilt in vier Kapitel (Vaggas). Daher sagten die Alten: ‘‘Cattālīsaṃpadānāni, catuvaggāni yassa ca; Idaṃ therīpadānanti, catutthaṃ anulomato’’ti. „Vierzig Lebensgeschichten hat dieses [Werk], eingeteilt in vier Kapitel; dies ist das Therīpadāna, das vierte in der regelmäßigen Reihenfolge.“ Apadānanti ettha apadāna-saddo kāraṇagahaṇaapagamanapaṭipāṭiakkosanādīsu dissati. Tathā hi esa ‘‘khattiyānaṃ apadānaṃ, brāhmaṇānaṃ apadāna’’ntiādīsu kāraṇe dissati, khattiyānaṃ kāraṇaṃ brāhmaṇānaṃ kāraṇanti attho. ‘‘Upāsakānaṃ apadāna’’ntiādīsu gahaṇe dissati, saṃsuṭṭhu gahaṇanti attho. ‘‘Vāṇijānaṃ apadānaṃ, suddānaṃ apadāna’’ntiādīsu apagamane dissati, tato tato tesaṃ apagamananti attho. ‘‘Piṇḍapātiko [Pg.114] bhikkhu sapadānacāravasena piṇḍāya caratī’’tiādīsu paṭipāṭiyā dissati, gharapaṭipāṭiyā caratīti attho. ‘‘Apagatā ime sāmaññā, apagatā ime brahmaññāti apadānetī’’tiādīsu akkosane dissati, akkosati paribhāsatīti attho. Idha pana kāraṇe dissati. Tasmā buddhānaṃ apadānāni buddhāpadāni, buddhakāraṇānīti attho. Gaṅgāvālukūpamānaṃ anekesaṃ buddhānaṃ dānapāramitādisamattiṃsapāramitā kāraṇanti daṭṭhabbaṃ. Atha adhikārādīsu yuttaapadānāni suddhamānasā suṇāthāti sambandho. In dem Begriff 'Apadāna' zeigt sich das Wort 'Apadāna' in den Bedeutungen von Ursache (kāraṇa), Ergreifen (gahaṇa), Weggehen (apagamana), Reihenfolge (paṭipāṭi), Beschimpfung (akkosana) und so weiter. So zeigt es sich im Sinne von 'Ursache' in Passagen wie 'esa khattiyānaṃ apadānaṃ, brāhmaṇānaṃ apadānaṃ' (dies ist die Ursache der Krieger, die Ursache der Brahmanen), was bedeutet: die Ursache der Krieger, die Ursache der Brahmanen. Es zeigt sich im Sinne von 'Ergreifen' in Passagen wie 'upāsakānaṃ apadānaṃ', was 'völliges Ergreifen [der Zuflucht]' bedeutet. Es zeigt sich im Sinne von 'Weggehen' in Passagen wie 'vāṇijānaṃ apadānaṃ, suddānaṃ apadānaṃ', was das Weggehen von diesem oder jenem Ort bedeutet. Es zeigt sich im Sinne von 'Reihenfolge' in Passagen wie 'der Almosengänger-Mönch geht gemäß dem geordneten Almosengang (sapadānacāravasena) auf Almosengang', was bedeutet, dass er von Haus zu Haus (gharapaṭipāṭiyā) geht. Es zeigt sich im Sinne von 'Beschimpfung' in Passagen wie 'diese Asketen sind abgewichen, diese Priester sind abgewichen – so beschimpft (apadāneti) er sie', was bedeutet, dass er sie beschimpft und schmäht. Hier jedoch ist es im Sinne von 'Ursache' zu verstehen. Daher sind die Apadānas der Buddhas die Buddhāpadānas, was 'die Ursachen der Buddhas' bedeutet. Dies ist als die Ursache in Gestalt der dreißig Vollkommenheiten (samatisaṃpāramitā), wie der Vollkommenheit des Gebens (dānapāramitā) etc., von unzähligen Buddhas, deren Zahl dem Sand des Ganges gleicht, zu verstehen. Nun ist der Satzbau wie folgt zu verbinden: 'Hört mit reinem Herzen (suddhamānasā suṇātha) die Lebensgeschichten, die mit den verdienstvollen Taten (adhikāra) etc. verknüpft sind.' Tattha suddhamānasāti arahattamaggañāṇena diyaḍḍhakilesasahassaṃ khepetvā ṭhitattā suddhamānasā parisuddhacittā suddhahadayā pañcasatā khīṇāsavā imasmiṃ dhammasabhāye sannisinnā suṇātha, ohitasotā manasi karothāti attho. Dabei bedeutet 'suddhamānasā' (mit reinem Geist): Weil sie durch das Pfadwissen der Arahatschaft die eintausendfünfhundert Befleckungen vollständig vernichtet haben und so verweilen, sind sie von reinem Geist, von völlig reinem Bewusstsein, von reinem Herzen. Die fünfhundert triebversiegten Heiligen (Khīṇāsavas), die in dieser Lehrversammlung versammelt sind, sollen hören; das bedeutet: Sie sollen mit geneigtem Ohr lauschen und es sich zu Herzen nehmen. Ettha pana ‘‘apadānānī’’ti avatvā paccekabuddhāpadānatherāpadānatherīapadānesu vijjamānesupi ‘‘atha buddhāpadānānī’’ti vacanaṃ khandhayamakaāyatanadhātusaccasaṅkhāraanusayayamakesu vijjamānesupi padhānavasena ādivasena ca ‘‘mūlayamaka’’nti vacanaṃ viya, terasasaṅghādisesadveaniyatatiṃsanissaggiyesu vijjamānesupi padhānavasena ādivasena ca ‘‘pārājikakaṇḍo’’ti vacanaṃ viya ca idhāpi padhānavasena ādivasena ca vuttanti daṭṭhabbaṃ. Hierbei ist jedoch Folgendes zu verstehen: Ohne einfach allgemein 'Apadānas' zu sagen, wird, obwohl auch Paccekabuddhāpadānas, Therāpadānas und Therīpadānas vorhanden sind, der Begriff 'Buddhāpadānas' gebraucht. Dies geschieht aufgrund der Vorzüglichkeit (padhānavasena) und des Anfangscharakters (ādivasena), ähnlich wie man trotz des Vorhandenseins von Khandha-, Āyatana-, Dhātu-, Sacca-, Saṅkhāra- und Anusayayamakas den Begriff 'Mūlayamaka' verwendet, oder wie man trotz des Vorhandenseins der dreizehn Saṅghādisesas, die zwei Aniyatas und die dreißig Nissaggiyas den Begriff 'Pārājikakaṇḍa' (Abschnitt über die Pārājika-Vergehen) verwendet. So wurde es auch hier aufgrund der Vorzüglichkeit und des Anfangscharakters so ausgedrückt. ‘‘Sammāsambuddhāpadānānī’’ti vattabbe ‘‘vaṇṇāgamo…pe… pañcavidhaṃ nirutta’’nti niruttinayena vā ‘‘tesu vuddhilopāgamavikāraviparītādesā cā’’ti suttena vā tatiyatthavācakassa sammātinipātapadassa, sayaṃsaddatthavācakassa sa-ntiupasaggapadassa ca lopaṃ katvā kitantavācībuddhasaddameva gahetvā gāthābandhasukhatthaṃ ‘‘buddhāpadānānī’’ti vuttaṃ. Tasmā sammāsambuddhāpadānānīti attho. Während man eigentlich 'Sammāsambuddhāpadānāni' hätte sagen müssen, wurde entweder nach der grammatischen Methode (Nirutti) gemäß 'vaṇṇāgamo... [pe... pañcavidhaṃ niruttaṃ]' oder nach der Regel 'tesu vuddhilopāgamavikāraviparītādesā ca' das Partikelwort (Nipāta) 'sammā', welches die Bedeutung des vollkommenen Erwachens ausdrückt, und die Vorsilbe (Upasarga) 'saṃ', welche die Bedeutung von 'selbst' (sayaṃ) ausdrückt, weggelassen. Man hat nur das Wort 'Buddha', das eine krt-Endung aufweist, genommen und zum Zweck des leichteren Versmaßes (gāthābandhasukhatthaṃ) 'Buddhāpadānāni' gesagt. Daher ist die Bedeutung als 'Sammāsambuddhāpadānāni' (die Lebensbeschreibungen der vollkommen Erwachten) zu verstehen. Iti visuddhajanavilāsiniyā apadāna-aṭṭhakathāya Hier endet in der Visuddhajanavilāsinī, dem Kommentar zum Apadāna, Abbhantaranidānavaṇṇanā niṭṭhitā. die Erklärung der inneren Einleitung (Abbhantaranidāna). 1. Buddhaapadānavaṇṇanā 1. Die Erklärung des Buddhāpadāna Idāni [Pg.115] abbhantaranidānānantaraṃ apadānaṭṭhakathaṃ kathetukāmo – Nun wünscht der Kommentator im Anschluss an die innere Einleitung, den Apadāna-Kommentar darzulegen: ‘‘Sapadānaṃ apadānaṃ, vicitranayadesanaṃ; Yaṃ khuddakanikāyasmiṃ, saṅgāyiṃsu mahesayo; Tassa dāni anuppatto, atthasaṃvaṇṇanākkamo’’ti. „Das Apadāna, das mitsamt seinen Ursachen reich an vielfältigen Weisen der Verkündigung ist, welches die großen Weisen im Khuddakanikāya zusammengetragen haben – für dieses ist nun die Reihe an der Erläuterung seiner Bedeutung gekommen.“ Tattha yaṃ apadānaṃ tāva ‘‘sakalaṃ buddhavacanaṃ ekavimuttirasa’’nti vuttattā ekarase saṅgahaṃ gacchati, dhammavinayavasena dvidhāsaṅgahe dhamme saṅgahaṃ gacchati, paṭhamamajjhimapacchimabuddhavacanesu majjhimabuddhavacane saṅgahaṃ gacchati, vinayābhidhammasuttantapiṭakesu suttantapiṭake saṅgahaṃ gacchati, dīghanikāyamajjhimasaṃyuttaaṅguttarakhuddakanikāyesu pañcasu khuddakanikāye saṅgahaṃ gacchati, suttaṃ geyyaṃ veyyākaraṇaṃ gāthā udānaṃ itivuttakaṃ jātakaṃ abbhutadhammaṃ vedallanti navasu sāsanaṅgesu gāthāya saṅgahitaṃ. Darin fällt das Apadāna zunächst unter den Begriff des 'einzigen Geschmacks' (ekarasa), weil gesagt wurde: 'Das gesamte Wort des Buddha hat nur einen Geschmack, nämlich den Geschmack der Befreiung (vimuttirasa)'. Unter der zweifachen Einteilung nach Lehre und Disziplin (Dhamma-Vinaya) fällt es unter die Lehre (Dhamma). Unter den ersten, mittleren und letzten Worten des Buddha fällt es unter die mittleren Worte des Buddha. Unter den Körben Vinaya, Abhidhamma und Suttanta fällt es unter das Suttantapiṭaka. Unter den pfünf Sammlungen Dīgha-, Majjhima-, Saṃyutta-, Aṅguttara- und Khuddakanikāya fällt es unter den Khuddakanikāya. Unter den neun Gliedern der Lehre (Sutta, Geyya, Veyyākaraṇa, Gāthā, Udāna, Itivuttaka, Jātaka, Abbhutadhamma, Vedalla) ist es in die Gliederungsform der Strophen (Gāthā) eingeordnet. ‘‘Dvāsīti buddhato gaṇhiṃ, dvesahassāni bhikkhuto; Caturāsītisahassāni, yeme dhammā pavattino’’ti. – „Zweiundachtzigtausend [Lehrgruppen] empfing ich vom Buddha, zweitausend von den Mönchen; diese vierundachtzigtausend Lehrgruppen sind mir geläufig.“ Evaṃ vuttacaturāsītisahassadhammakkhandhesu katipayadhammakkhandhasaṅgahitaṃ hotīti. Unter den so genannten vierundachtzigtausend Lehrgruppen (Dhammakkhandhas) umfasst dieses [Werk] einige tausend dieser Lehrgruppen. Idāni taṃ apadānaṃ dassento ‘‘tiṃsapāramisampuṇṇā, dhammarājā asaṅkhiyā’’ti āha. Tattha dasapāramitāva pacchimamajjhimukkaṭṭhavasena dasapāramīdasaupapāramīdasaparamatthapāramīnaṃ vasena samattiṃsapāramī. Tāhi saṃsuṭṭhu puṇṇā sampuṇṇā samannāgatā samaṅgībhūtā ajjhāpannā saṃyuttāti tiṃsapāramisampuṇṇā. Sakalalokattayavāsine sattanikāye mettākaruṇāmuditāupekkhāsaṅkhātāhi catūhi brahmavihārasamāpattīhi vā phalasamāpattivihārena vā ekacittabhāvena attano ca kāye rañjenti allīyāpentīti rājāno, dhammena rājāno dhammarājā, itthambhūtā buddhā. Dasasataṃ sahassaṃ dasasahassaṃ satasahassaṃ dasasatasahassaṃ koṭi pakoṭi koṭippakoṭi nahutaṃ ninnahutaṃ akkhobhiṇi bindu abbudaṃ nirabbudaṃ ahahaṃ ababaṃ aṭaṭaṃ sogandhikaṃ uppalaṃ kumudaṃ puṇḍarikaṃ padumaṃ kathānaṃ mahākathānaṃ asaṅkhyeyyānaṃ vasena asaṅkhiyā saṅkhārahitā dhammarājāno atītā vigatā niruddhā abbhatthaṃ gatāti adhippāyo. Um nun dieses Apadāna (Lebensgeschichte) darzulegen, sprach der Erhabene: 'Die mit den dreißig Vollkommenheiten Erfüllten, die unzähligen Könige des Dhamma...' Darin sind die zehn Vollkommenheiten selbst, gemäß der Einteilung in die niedrigen, mittleren und höchsten Stufen, als zehn Vollkommenheiten, zehn mittlere Vollkommenheiten und zehn höchste Vollkommenheiten die dreißig Vollkommenheiten insgesamt. Mit diesen bestens erfüllt, vollkommen ausgestattet, versehen, vollendet vereinigt, durchdrungen, verbunden – dies bedeutet 'mit den dreißig Vollkommenheiten erfüllt'. Weil sie die Scharen der Lebewesen, die in allen drei Welten weilen, entweder durch die vier erhabenen Verweilungszustände, bekannt als Wohlwollen, Mitgefühl, Mitfreude und Gleichmut, oder durch das Verweilen in der Erreichung der Frucht mit einem geeinten Geisteszustand in ihrem eigenen Körper erfreuen und anziehen, sind sie Könige; Könige durch das Dhamma sind Könige des Dhamma. Solcherart sind die Buddhas. Gemäß den Bezeichnungen zehn, hundert, tausend, zehntausend, hunderttausend, eine Million (koṭi), pakoṭi, koṭippakoṭi, nahuta, ninnahuta, akkhobhiṇi, bindu, abbuda, nirabbuda, ahaha, ababa, aṭaṭa, sogandhika, uppala, kumuda, puṇḍarika, paduma, kathāna, mahākathāna und Unzählbare (asaṅkhyeyya) – sind sie 'unzählbar', also ohne Zahl. Die vergangenen, erloschenen, geschwundenen Könige des Dhamma sind zur Vergänglichkeit eingegangen; dies ist die Absicht. 6. Tesu [Pg.116] atītabuddhesu katādhikārañca attanā bodhisattabhūtena cakkavattiraññā hutvā katasambhārañca ānandattherena puṭṭho bhagavā ‘‘sambodhiṃ buddhaseṭṭhāna’’ntiādimāha. Bho ānanda, mama apadānaṃ suṇohīti adhippāyo. Ānanda, ahaṃ pubbe bodhisambhārapūraṇakāle cakkavattirājā hutvā seṭṭhānaṃ pasaṭṭhānaṃ paṭividdhacatusaccānaṃ buddhānaṃ sambodhiṃ catusaccamaggañāṇaṃ sabbaññutaññāṇaṃ vā sirasā abhivādayeti sambandho. Sasaṅghe sāvakasaṅghasahite lokanāyake lokajeṭṭhe buddhe dasahi aṅgulīhi ubhohi hatthapuṭehi namassitvā vanditvā sirasā sīsena abhivādaye ādarena thomanaṃ katvā paṇāmaṃ karomīti attho. 6. Vom Thera Ānanda nach den Verdiensten, die er gegenüber jenen vergangenen Buddhas erworben hatte, und nach den Voraussetzungen, die er selbst als Bodhisatta in der Existenz eines raddrehenden Königs vollbracht hatte, gefragt, sprach der Erhabene: 'Die Erleuchtung der erhabensten Buddhas...' usw. 'O Ānanda, höre meine Lebensgeschichte' – dies ist die Absicht. 'Ānanda, als ich in der Vergangenheit, zur Zeit der Erfüllung der Bodhi-Voraussetzungen, ein raddrehender König war, verehrte ich mit dem Haupte die vollkommene Erleuchtung – das Pfadwissen der vier Wahrheiten oder das Allwissenheitswissen – der edelsten, gepriesenen Buddhas, welche die vier Wahrheiten durchdrungen hatten'; so ist die Verknüpfung herzustellen. 'Die Buddhas, die Führer der Welt, die Ältesten der Welt, zusammen mit ihrer Jüngerschar (saṅgha) verehrte ich, indem ich mit den zehn Fingern und beiden gefalteten Händen huldigte und mich verbeugte, ehrerbietig mit dem Haupte, und ich erwies ihnen mit Lobpreisungen Ehrerbietung' – dies ist der Sinn. 7. Yāvatā buddhakhettesūti dasasahassacakkavāḷesu buddhakhettesu, ākāsaṭṭhā ākāsagatā, bhūmaṭṭhā bhūmitalagatā, veḷuriyādayo satta ratanā asaṅkhiyā saṅkhārahitā, yāvatā yattakā, vijjanti. Tāni sabbāni manasā cittena samāhare, saṃ suṭṭhu cittena adhiṭṭhahitvā āharissāmīti attho, mama pāsādassa sāmantā rāsiṃ karomīti attho. 7. 'Yāvatā buddhakhettesu' bedeutet: in den Buddha-Feldern der zehntausend Weltsysteme existieren unzählbare, unermessliche sieben Arten von Juwelen wie Lapislazuli usw., sei es im Luftraum schwebend oder auf dem Erdboden befindlich, so viele es auch sein mögen. 'All diese möchte ich im Geiste herbeiholen' – dies bedeutet: 'Ich werde sie herbeiholen, indem ich meinen Geist vollkommen darauf ausrichte'; dies bedeutet: 'Ich mache daraus einen Haufen rings um meinen Palast'. 8. Tattha rūpiyabhūmiyanti tasmiṃ anekabhūmimhi pāsāde rūpiyamayaṃ rajatamayaṃ bhūmiṃ nimmitanti attho. Ahaṃ ratanamayaṃ sattahi ratanehi nimmitaṃ anekasatabhūmikaṃ pāsādaṃ ubbiddhaṃ uggataṃ nabhamuggataṃ ākāse jotamānaṃ māpayinti attho. 8. Darin bedeutet 'rūpiyabhūmiyaṃ' (auf silbernem Boden): in jenem vielstöckigen Palast ist ein Boden geschaffen worden, der aus Silber besteht – dies ist der Sinn. 'Ich erschuf einen aus den sieben Juwelen bestehenden, vielhundertstöckigen Palast, der hoch emporragte, in den Himmel ragte und am Himmel erglänzte' – dies ist der Sinn. 9. Tameva pāsādaṃ vaṇṇento ‘‘vicittathambha’’ntyādimāha. Vicittehi anekehi masāragallādivaṇṇehi thambhehi ussāpitaṃ sukataṃ suṭṭhu kataṃ lakkhaṇayuttaṃ ārohapariṇāhavasena suṭṭhu vibhattaṃ anekakoṭisatagghanatoraṇanimmitattā mahārahaṃ. Punapi kiṃ visiṭṭhaṃ? Kanakamayasaṅghāṭaṃ suvaṇṇehi katatulāsaṅghāṭavalayehi yuttaṃ, tattha ussāpitakontehi ca chattehi ca maṇḍitaṃ sobhitaṃ pāsādanti sambandho. 9. Eben diesen Palast beschreibend, sagte er: 'Bunte Säulen...' usw. Errichtet mit bunten Säulen in verschiedenen Farben wie Katzenauge-Edelstein usw., wohlgebaut – d.h. hervorragend gearbeitet –, mit den Merkmalen versehen, in Bezug auf Höhe und Umfang harmonisch aufgeteilt, und wegen der Errichtung von Torwegen im Wert von vielen hundert Millionen von unschätzbarem Wert. Und wie zeichnete er sich weiter aus? Er war mit goldenen Verbindungsbalken versehen, die mit tragenden Balken, Verbindungsrahmen und Ringen aus Gold gefertigt waren. Zudem war er geschmückt und verschönt mit dort aufgestellten Bannern und Schirmen – so ist die Verknüpfung mit 'Palast' herzustellen. 10. Punapi pāsādasseva sobhaṃ vaṇṇento ‘‘paṭhamā veḷuriyā bhūmī’’tyādimāha. Tassa anekasatabhūmipāsādassa subhā iṭṭhā kantā manāpā [Pg.117] abbhasamā valāhakapaṭalasadisā vimalā nimmalā veḷuriyamaṇimayā nīlavaṇṇā paṭhamā bhūmi ahosīti attho. Jalajanaḷinapadumehi ākiṇṇā samaṅgībhūtā varāya uttamāya kañcanabhūmiyā suvaṇṇabhūmiyāva sobhatīti attho. 10. Erneut die Pracht desselben Palastes beschreibend, sagte er: 'Das erste Stockwerk war aus Lapislazuli...' usw. Der Sinn ist: Das erste Stockwerk dieses vielhundertstöckigen Palastes war herrlich, erwünscht, lieblich, ansprechend, einer Wolke gleich – ähnlich einer dichten Wolkendecke –, makellos, rein, aus Lapislazuli-Edelsteinen gefertigt und von blauer Farbe. Es war übersät mit im Wasser geborenen roten und weißen Lotusblumen, harmonisch gefügt, und glänzte auf einem edlen, vortrefflichen goldenen Boden. 11. Tasseva pāsādassa kāci bhūmi pavāḷaṃsā pavāḷakoṭṭhāsā pavāḷavaṇṇā, kāci bhūmi lohitakā lohitavaṇṇā, kāci bhūmi subhā manoharā indagopakavaṇṇābhā rasmiyo niccharamānā, kāci bhūmi dasa disā obhāsatīti attho. 11. Der Sinn ist: Manche Etage dieses Palastes hatte die Beschaffenheit von Korallen, bestand aus Korallenteilen und hatte Korallenfarbe; manche Etage war rötlich von roter Farbe; manche Etage war wunderschön, lieblich, von der schimmernden Farbe von Indagopaka-Insekten und strahlte Lichtstrahlen aus; manche Etage erleuchtete die zehn Himmelsrichtungen. 12. Tasmiṃyeva pāsāde niyyūhā niggatapamukhasālā ca suvibhattā suṭṭhu vibhattā koṭṭhāsato visuṃ visuṃ katā sīhapañjarā sīhadvārā ca. Caturo vedikāti catūhi vedikāvalayehi jālakavāṭehi ca manoramā manaallīyanakā gandhāveḷā gandhadāmā ca olambantīti attho. 12. Ebenfalls in diesem Palast befanden sich wohleingeteilte – d.h. hervorragend gegliederte, abschnittsweise getrennt errichtete – Alane und vorspringende Vorhallen, Löwenfenster und Löwentore. 'Die vier Geländer' bedeutet: sie waren lieblich und anziehend durch vier Geländerreihen und Gitternetzfenster, und es hingen Duftkränze und Blumengirlanden daran herab. 13. Tasmiṃyeva pāsāde sattaratanabhūsitā sattaratanehi sobhitā kūṭāgārā. Kiṃ bhūtā? Nīlā nīlavaṇṇā, pītā pītavaṇṇā suvaṇṇavaṇṇā, lohitakā lohitakavaṇṇā rattavaṇṇā, odātā odātavaṇṇā setavaṇṇā, suddhakāḷakā amissakāḷavaṇṇā, kūṭāgāravarūpetā kūṭāgāravarehi kaṇṇikakūṭāgāravarehi upeto samannāgato so pāsādoti attho. 13. Ebenfalls in diesem Palast befanden sich mit den sieben Juwelen geschmückte, durch die sieben Juwelen glänzende Giebelhäuser. Von welcher Art waren sie? Einige waren blau von blauer Farbe; gelb von gelber, goldener Farbe; rötlich von roter, rötlicher Farbe; weiß von weißer, heller Farbe; rein schwarz von unvermischter schwarzer Farbe. Der Sinn ist: Jener Palast war mit vortrefflichen Giebelhäusern versehen, d.h. ausgestattet und versehen mit den edelsten Giebelhäusern und Dachstuhlgiebeln. 14. Tasmiṃyeva pāsāde olokamayā uddhammukhā padumā supupphitā padumā sobhanti, sīhabyagghādīhi vāḷamigagaṇehi ca haṃsakoñcamayūrādipakkhisamūhehi ca sobhito so pāsādoti attho. Atiucco hutvā nabhamuggatattā nakkhattatārakāhi ākiṇṇo candasūrehi candasūriyarūpehi ca maṇḍito so pāsādoti attho. 14. Ebenfalls in diesem Palast glänzten aufwärtsgerichtete Lotusblüten und voll erblühte Lotusse. Der Sinn ist: Jener Palast war verschönt durch Scharen von Raubtieren wie Löwen, Tigern usw. sowie durch Vogelschwärme wie Gänse, Kraniche, Pfauen usw. Aufgrund seiner enormen Höhe ragte er in den Himmel empor, weshalb er wie mit Sternen und Sternbildern übersät erschien, und jener Palast war mit Mond und Sonne bzw. mit Abbildern von Sonne und Mond geschmückt – dies ist der Sinn. 15. So eva cakkavattissa pāsādo hemajālena suvaṇṇajālena sañchannā, soṇṇakiṅkaṇikāyuto suvaṇṇakiṅkaṇikajālehi yuto samannāgatoti attho. Manoramā manallīyanakā soṇṇamālā suvaṇṇapupphapantiyo vātavegena vātappahārena kūjanti saddaṃ karontīti attho. 15. Eben jener Palast des raddrehenden Königs war mit einem goldenen Netz bedeckt, 'mit goldenen Glöckchen versehen' bedeutet: er war mit Netzen aus goldenen Glöckchen ausgestattet und versehen. Der Sinn ist: Die lieblichen, herzerfreuenden goldenen Kränze – die Reihen goldener Blüten – klangen durch die Kraft des Windes, durch den Windhauch, und erzeugten einen süßen Klang. 16. Mañjeṭṭhakaṃ [Pg.118] mañjiṭṭhavaṇṇaṃ, lohitakaṃ lohitavaṇṇaṃ, pītakaṃ pītavaṇṇaṃ, haripiñjaraṃ jambonadasuvaṇṇavaṇṇaṃ pañjaravaṇṇañca dhajaṃ nānāraṅgehi anekehi vaṇṇehi, sampītaṃ rañjitaṃ dhajaṃ, ussitaṃ tasmiṃ pāsāde ussāpitaṃ. Dhajamālinīti liṅgavipallāsavasena vuttaṃ, dhajamālāyutto so pāsādoti attho. 16. Eine krapprote, rote, gelbe und goldgelbe – d.h. von der Farbe des Jambonada-Goldes und von gelblicher Farbe – Fahne, die mit mancherlei Farben, mit vielfältigen Tönen, eingefärbt und bunt bemalt war, wurde an jenem Palast hoch aufgerichtet. Der Ausdruck 'dhajamālinī' (mit Fahnengirlanden versehen) ist unter Vertauschung des grammatikalischen Geschlechts gebraucht; der Sinn ist, dass jener Palast mit Fahnengirlanden versehen war. 17. Tasmiṃ pāsāde attharaṇādayo vaṇṇento ‘‘na naṃ bahū’’tyādimāha. Tattha naṃ pāsādaṃ bahūhi avijjamānaṃ nāma natthīti attho, nānāsayanavicittā anekehi attharaṇehi vicittā sobhitā mañcapīṭhādisayanā anekasatā anekasatasaṅkhyā, kiṃ bhūtā? Phalikā phalikamaṇimayā phalikāhi katā, rajatāmayā rajatehi katā, maṇimayā nīlamaṇīhi katā, lohitaṅgā rattajātimaṇīhi katā, masāragallamayā kabaravaṇṇamaṇīhi katā, saṇhakāsikasanthatā saṇhehi sukhumehi kāsikavatthehi atthatā. 17. Indem er die Decken und Lager in jenem Palast rühmte, sprach er die Worte beginnend mit 'na naṃ bahū'. Darin bedeutet 'na naṃ', dass es in diesem Palast nichts gibt, was nicht in großer Menge vorhanden wäre. 'Nānāsayanavicittā' bedeutet: Die Lager wie Betten und Sessel, die mit mannigfaltigen Decken geschmückt und verschönert sind, waren viele Hunderte, das heißt, sie zählten nach Hunderten. Von welcher Art waren sie? Einige waren aus Kristall (phalikā), hergestellt aus Kristall-Edelsteinen; einige aus Silber (rajatāmayā), hergestellt aus Silber; einige aus Edelsteinen (maṇimayā), hergestellt aus blauen Saphiren; einige aus roten Steinen (lohitaṅgā), hergestellt aus natürlich roten Rubinen; einige aus Masāragalla (masāragallamayā), hergestellt aus bunten Edelsteinen; und 'saṇhakāsikasanthatā' bedeutet: mit weichen, feinen Stoffen aus Kāsī bedeckt. 18. Pāvurāti pāvuraṇā. Kīdisā? Kambalā lomasuttehi katā, dukūlā dukūlapaṭehi katā, cīnā cīnapaṭehi katā, pattuṇṇā pattuṇṇadese jātapaṭehi katā, paṇḍu paṇḍuvaṇṇā, vicittattharaṇaṃ anekehi attharaṇehi pāvuraṇehi ca vicittaṃ, sabbaṃ sayanaṃ, manasā cittena, ahaṃ paññapesinti attho. 18. 'Pāvurā' bedeutet Decken (Überwürfe). Von welcher Art waren sie? Sie waren aus Wolle (kambalā), hergestellt aus wollenen Fäden; aus Dukūla-Stoffen (dukūlā), hergestellt aus feinen Dukūla-Geweben; aus China-Seide (cīnā), hergestellt aus chinesischen Stoffen; aus Pattuṇṇa-Wolle (pattuṇṇā), hergestellt aus im Pattuṇṇa-Land erzeugten Stoffen; und 'paṇḍu' bedeutet von weißer Farbe. 'Vicittattharaṇaṃ' bedeutet: geschmückt mit mannigfaltigen Decken und Überwürfen. 'Sabbaṃ sayanaṃ, manasā cittena, ahaṃ paññapesi' hat die Bedeutung: 'Ich breitete das gesamte Lager im Geiste, durch meine Gedankenkraft, aus'. 19. Tadeva pāsādaṃ vaṇṇento ‘‘tāsu tāsveva bhūmīsū’’tiādimāha. Tattha ratanakūṭalaṅkatanti ratanamayakūṭehi ratanakaṇṇikāhi alaṅkataṃ sobhitanti attho. Maṇiverocanā ukkāti verocanamaṇīhi rattamaṇīhi katā, ukkā daṇḍapadīpā. Dhārayantā sutiṭṭhareti ākāse suṭṭhu dhārayantā gaṇhantā anekasatajanā suṭṭhu tiṭṭhantīti attho. 19. Diesen selben Palast rühmend, sprach er die Worte beginnend mit 'tāsu tāsveva bhūmīsū'. Darin bedeutet 'ratanakūṭalaṅkataṃ': geschmückt und verschönert mit Spitzen aus Edelsteinen und Dachornamenten aus Juwelen. 'Maṇiverocanā ukkā' bedeutet Fackeln, die aus leuchtenden Edelsteinen, nämlich roten Rubinen, gefertigt sind; 'ukkā' sind Stabfackeln (Lampenständer). 'Dhārayantā sutiṭṭhare' bedeutet: Viele Hunderte von Menschen stehen wohlgeordnet da, während sie diese Fackeln hoch in der Luft halten und tragen; dies ist der Sinn. 20. Puna tadeva pāsādaṃ vaṇṇento ‘‘sobhanti esikāthambhā’’tiādimāha. Tattha esikāthambhā nāma nagaradvāre sobhanatthāya nikhātā [Pg.119] thambhā, subhā iṭṭhā, kañcanatoraṇā suvaṇṇamayā, jambonadā jambonadasuvaṇṇamayā ca, sāramayā khadirarukkhasāramayā ca rajatamayā ca toraṇā sobhanti, esikā ca toraṇā ca taṃ pāsādaṃ sobhayantīti attho. 20. Wiederum denselben Palast rühmend, sprach er die Worte beginnend mit 'sobhanti esikāthambhā'. Darin sind die sogenannten 'esikāthambhā' Säulen, die zur Verschönerung am Stadttor aufgerichtet sind; 'subhā' bedeutet herrlich (begehrenswert). Die goldenen Tore (kañcanatoraṇā) sind aus Gold, nämlich aus feinstem Jambonada-Gold, gefertigt; und es glänzen Tore aus Kernholz (sāramayā), hergestellt aus dem Kernholz des Khadira-Baumes, sowie Tore aus Silber (rajatamayā). Die Säulen und Tore verschönern jenen Palast; dies ist der Sinn. 21. Tasmiṃ pāsāde suvibhattā anekā sandhī kavāṭehi ca aggaḷehi ca cittitā sobhitā sandhiparikkhepā sobhayantīti attho, ubhatoti tassa pāsādassa ubhosu passesu, puṇṇaghaṭā anekehi padumehi anekehi ca uppalehi, saṃyutā puṇṇā taṃ pāsādaṃ sobhayantīti attho. 21. In jenem Palast verschönern die wohlaufgeteilten, zahlreichen Verbindungsfugen (Öffnungen), die mit Türflügeln und Riegeln kunstvoll gestaltet und geschmückt sind, als Einfassungen der Öffnungen jenen Palast; dies ist der Sinn. 'Ubhato' bedeutet auf beiden Seiten dieses Palastes. 'Puṇṇaghaṭā...' bedeutet: Mit vielen roten Lotosblüten und vielen blauen Lotosblüten versehene, gefüllte Krüge verschönern jenen Palast; dies ist der Sinn. 22-23. Evaṃ pāsādassa sobhaṃ vaṇṇetvā ratanamayaṃ pāsādañca sakkārasammānañca pakāsento ‘‘atīte sabbabuddhe cā’’tiādimāha. Tattha atīteti atikkante vigate kāle jāte bhūte, sasaṅghe sāvakasamūhasahite, sabbe lokanāyake buddhe sabhāvena pakativaṇṇena rūpena saṇṭhānena ca, sasāvake sāvakasahite, buddhe nimminitvā yena dvārena pāsādo pavisitabbo hoti, tena dvārena pavisitvā sasāvakā sabbe buddhā sabbasoṇṇamaye sakalasuvaṇṇamaye, pīṭhe nisinnā ariyamaṇḍalā ariyasamūhā ahesunti attho. 22-23. Nachdem er so die Pracht des Palastes gepriesen hatte, sprach er die Worte beginnend mit 'atīte sabbabuddhe ca', um den aus Juwelen bestehenden Palast sowie die Ehrung und Ehrerbietung zu offenbaren. Darin bedeutet 'atīte': in der vergangenen, verflossenen Zeit entstanden und dagewesen. 'Sasaṅghe' bedeutet zusammen mit der Schar der Jünger. 'Sabbe lokanāyake buddhe' meint alle Buddhas, die Führer der Welt, in ihrer natürlichen Gestalt, ihrer ureigenen Farbe und äußeren Form. 'Sasāvake' bedeutet zusammen mit den Jüngern. Nachdem er die Buddhas manifestiert hatte, betraten alle Buddhas mitsamt ihren Jüngern den Palast durch das Tor, durch das man den Palast betreten muss, und nahmen auf gänzlich goldenen Sitzen (pīṭha) Platz; sie bildeten einen edlen Kreis (ariyamaṇḍala), eine edle Gemeinschaft (ariyasamūha); dies ist der Sinn. 24-25. Etarahi vattamāne kāle anuttarā uttaravirahitā ye ca buddhā atthi saṃvijjanti, te ca paccekabuddhe anekasate sayambhū sayameva bhūte aññācariyarahite, aparājite khandhakilesābhisaṅkhāramaccudevaputtamārehi aparājite, jayamāpanne santappesinti attho. Bhavanaṃ mayhaṃ pāsādaṃ atītakāle ca vattamānakāle ca, sabbe buddhā samāruhuṃ saṃ suṭṭhu āruhiṃsūti attho. 24-25. In der gegenwärtigen, jetzt laufenden Zeit erfreute er jene unübertrefflichen, von nichts Höherem übertroffenen Buddhas (und Paccekabuddhas), die existieren und anzutreffen sind – viele Hunderte von jenen Paccekabuddhas, die selbstgeworden (sayambhū) sind, d. h. ohne einen anderen Lehrer existieren, und die unbesiegt (aparājite) sind, nämlich unbesiegt von den Māras der Daseinsgruppen (khandha), der Befleckungen (kilesa), der gestaltenden Kräfte (abhisaṅkhāra), des Todes (maccu) und des Göttersohnes (devaputta) – und die den Sieg errungen haben; dies ist der Sinn. 'Bhavanaṃ mayhaṃ...' bedeutet: Meinen Wohnsitz, diesen Palast, haben sowohl in der Vergangenheit als auch in der Gegenwart alle Buddhas betreten, das heißt, sie sind feierlich in ihn hinaufgestiegen; dies ist der Sinn. 26. Ye dibbā divi bhavā dibbā devaloke jātā, ye ca bahū kapparukkhā atthi. Ye ca mānusā manusse jātā ye ca bahū kapparukkhā atthi, tato sabbaṃ dussaṃ samāhantvā saṃ suṭṭhu āharitvā tecīvarāni kāretvā te paccekabuddhe ticīvarehi acchādemīti sambandho. 26. Der Zusammenhang (sambandha) ist wie folgt: 'Welche himmlischen Wunschbäume (kapparukkhā) auch immer im Himmel, in der Götterwelt entstanden sind, und welche menschlichen Wunschbäume auch immer unter den Menschen entstanden sind und zahlreich existieren – von all diesen trug ich alle Stoffe zusammen, ließ dreifache Gewänder anfertigen und bekleidete jene Paccekabuddhas mit diesen dreifachen Gewändern'. 27. Evaṃ [Pg.120] ticīvarehi acchādetvā pārupāpetvā tesaṃ nisinnānaṃ paccekabuddhānaṃ sampannaṃ madhuraṃ khajjaṃ khāditabbaṃ pūvādi kiñci, madhuraṃ bhojjaṃ bhuñjitabbaṃ āhārañca, madhuraṃ sāyanīyaṃ lehanīyañca, sampannaṃ madhuraṃ pivitabbaṃ aṭṭhapānañca, bhojanaṃ bhuñjitabbaṃ āhārañca, subhe sundare maṇimaye selamaye patte saṃ suṭṭhu pūretvā adāsiṃ paṭiggahāpesinti attho. 27. Nachdem ich sie so mit den dreifachen Gewändern bekleidet und eingehüllt hatte, füllte ich für diese sitzenden Paccekabuddhas köstliche, süße feste Speise (khajja) wie Kuchen und Ähnliches, süße weiche Speise (bhojja) als Nahrung, süße Leck- und Schlürfspeisen sowie köstliche, süße Getränke wie die acht Arten von Fruchtsäften (aṭṭhapāna) und genießbare Nahrung in wunderschöne, herrliche Almosenschalen, die aus Edelsteinen und Stein gefertigt waren, füllte sie reichlich an, gab sie ihnen hin und ließ sie diese annehmen; dies ist der Sinn. 28. Sabbe te ariyamaṇḍalā sabbe te ariyasamūhā, dibbacakkhu samā hutvā maṭṭhāti dibbacakkhusamaṅgino hutvā maṭṭhā kilesehi rahitattā siliṭṭhā sobhamānā cīvarasaṃyutā ticīvarehi samaṅgībhūtā madhurasakkharāhi ca telena ca madhuphāṇitehi ca paramannena uttamena annena ca mayā tappitā appitā paripūritā ahesunti attho. 28. All jene aus der edlen Gemeinschaft (ariyasamūha) – die mit dem himmlischen Auge ausgestattet waren und glänzten (maṭṭhā), das heißt, sie besaßen das himmlische Auge, waren makellos und rein, da sie frei von Befleckungen (kilesa) waren, lieblich anzusehen, wohlbekleidet, das heißt mit den dreifachen Gewändern versehen –, wurden von mir mit süßem Zucker, Öl, Honig, Melasse und feinster Opferspeise (paramanna), der allerbesten Speise, gesättigt, erfreut und vollkommen zufriedengestellt; dies ist der Sinn. 29. Te evaṃ santappitā ariyamaṇḍalā ratanagabbhaṃ sattahi ratanehi nimmitagabbhaṃ gehaṃ, pavisitvā guhāsayā guhāyaṃ sayamānā, kesarīva kesarasīhā iva, mahārahamhi sayane anagghe mañce, sīhaseyyamakappayuṃ yathā sīho migarājā dakkhiṇapassena sayanto pāde pādaṃ accādhāya dakkhiṇahatthaṃ sīsūpadhānaṃ katvā vāmahatthaṃ ujukaṃ ṭhapetvā vāladhiṃ antarasatthiyaṃ katvā niccalo sayati, evaṃ seyyaṃ kappayuṃ kariṃsūti attho. 29. Nachdem sie so gesättigt worden waren, betrat diese edle Gemeinschaft das Juwelenzimmer (ratanagabbha) – das aus den sieben Arten von Edelsteinen geschaffene Gemach – und nahm dort, wie in einer Höhle ruhende Mähnenlöwen (kesarasīha), auf einem kostbaren Lager, einem unschätzbar wertvollen Bett, das Löwenlager (sīhaseyya) ein. So wie der Löwe, der König der Tiere, auf seiner rechten Seite ruht, indem er einen Fuß über den anderen legt, die rechte Hand als Kopfkissen benutzt, die linke Hand gerade ausstreckt, den Schwanz zwischen die Schenkel legt und sich völlig unbeweglich niederlegt – ebenso nahmen sie diese Liegehaltung ein und lagerten sich nieder; dies ist der Sinn. 30. Te evaṃ sīhaseyyaṃ kappetvā sampajānā satisampajaññasampannā. Samuṭṭhāya saṃ suṭṭhu uṭṭhahitvā sayane pallaṅkamābhujuṃ ūrubaddhāsanaṃ kariṃsūti attho. 30. Nachdem sie so das Löwenlager eingenommen hatten, blieben sie voller klarer Bewusstheit und waren mit Achtsamkeit und Wissensklarheit (satisampajañña) ausgestattet. Sie erhoben sich wohlbehalten und nahmen auf dem Lager den Kreuzsitz (pallaṅka) ein, das heißt, sie setzten sich mit verschränkten Schenkeln nieder; dies ist der Sinn. 31. Gocaraṃ sabbabuddhānanti sabbesaṃ atītānāgatānaṃ buddhānaṃ gocaraṃ ārammaṇabhūtaṃ jhānaratisamappitā jhānaratiyā saṃ suṭṭhu appitā samaṅgībhūtā ahesunti attho, aññe dhammāni desentīti tesu paccekabuddhesu aññe ekacce dhamme desenti, aññe ekacce iddhiyā paṭhamādijjhānakīḷāya kīḷanti ramanti. 31. 'Gocaraṃ sabbabuddhānaṃ' bedeutet: Es ist der Wirkungsbereich, das heißt das Meditationsobjekt (ārammaṇabhūta) aller vergangenen und zukünftigen Buddhas. 'Jhānaratisamappitā' bedeutet: Sie waren völlig in die Freude an den Vertiefungen (jhānarati) versunken, das heißt vollkommen damit ausgestattet; dies ist der Sinn. 'Aññe dhammāni desenti' bedeutet: Unter jenen Paccekabuddhas verkündeten einige die Lehre (dhamma), während andere mittels übernormaler Kräfte (iddhi) mit dem Spiel der Vertiefungen, beginnend mit der ersten Vertiefung (jhāna), spielten und darin verwelkten. 32. Aññe ekacce abhiññā pañca abhiññāyo vasibhāvitā vasīkariṃsu, pañcasu abhiññāsu āvajjanasamāpajjanavuṭṭhānaadhiṭṭhānapaccavekkhaṇasaṅkhātāhi pañcavasitāhi vasībhāvaṃ itā gatā pattā abhiññāyo[Pg.121], appenti samāpajjanti. Aññe ekacce anekasahassiyo vikubbanāni ekopi hutvā bahudhā hoti, bahudhāpi hutvā eko hotīti evamādīni iddhivikubbanāni vikubbanti karontīti attho. 32. Einige andere [Paccekabuddhas] haben die fünf höheren Geisteskräfte (abhiññā) gemeistert und unter ihre Kontrolle gebracht; gelangt zur Beherrschung (vasībhāva) durch die fünf Arten der Meisterschaft (vasī) – namentlich das Aufmerken (āvajjana), das Eintreten (samāpajjana), das Verweilen bzw. Austreten (vuṭṭhāna), das Entschließen (adhiṭṭhāna) und das Rückschauen (paccavekkhaṇa) in Bezug auf die fünf höheren Geisteskräfte –, vertiefen sie sich in diese Geisteskräfte und erlangen sie. Einige andere wiederum vollführen viele Tausende von übernatürlichen Verwandlungen (vikubbana), wie etwa: obwohl er einer ist, wird er vielfältig, und obwohl er vielfältig ist, wird er einer; dies bedeutet, dass sie solche übernatürlichen Verwandlungen (iddhivikubbana) ausführen. 33. Buddhāpi buddheti evaṃ sannipatitesu paccekabuddhesu sabbaññutaññāṇassa visayaṃ ārammaṇabhūtaṃ pañhaṃ buddhā buddhe pucchantīti attho. Te buddhā atthagambhīratāya gambhīraṃ nipuṇaṃ sukhumaṃ, ṭhānaṃ kāraṇaṃ, paññāya vinibujjhare visesena niravasesato bujjhanti. 33. Der Ausdruck 'Buddhas [fragen] Buddhas' bedeutet: Unter den so versammelten Paccekabuddhas fragen die Buddhas andere Buddhas nach Fragen, die den Bereich und das Objekt des Allwissenheits-Wissens (sabbaññutaññāṇa) betreffen. Diese Buddhas verstehen aufgrund der Tiefe des Sinnes diese tiefgründige, feine und subtile Angelegenheit und Ursache durch ihre Weisheit ganz besonders und ohne jeden Rest. 34. Tadā mama pāsāde sannipatitā sāvakāpi buddhe pañhaṃ pucchanti, buddhā sāvake sisse pañhaṃ pucchanti, te buddhā ca sāvakā ca aññamaññaṃ pañhaṃ pucchitvā aññamaññaṃ byākaronti vissajjenti. 34. Zu jener Zeit fragen auch die in meinem Palast versammelten Jünger (sāvaka) die Buddhas nach Fragen, und die Buddhas fragen die Jünger, ihre Schüler, nach Fragen. Jene Buddhas und Jünger fragen einander gegenseitig Fragen und beantworten sowie erklären sie einander. 35. Puna te sabbe ekato dassento ‘‘buddhā paccekabuddhā cā’’tiādimāha. Tattha buddhā sammāsambuddhā, paccekabuddhā ca sāvakā ca sissā paricārakā nissitakā ete sabbe, sakāya sakāya ratiyā ramamānā sallīnā mama pāsāde abhiramantīti attho. 35. Um sie alle wieder zusammen zu zeigen, sprach er die Worte: 'Buddhā paccekabuddhā cā' und so weiter. Darin bedeutet 'Buddhā' die vollkommen Erleuchteten (sammāsambuddha); und die Paccekabuddhas sowie die Jünger, welche Schüler, Diener und Abhängige sind – sie alle erfreuen sich an ihren jeweiligen Freuden, weilen in Zurückgezogenheit und finden großen Gefallen in meinem Palast. 36. Evaṃ tasmiṃ vejayantapāsāde paccekabuddhānaṃ ācārasampattiṃ dassetvā idāni attano ānubhāvaṃ dassento so tilokavijayo cakkavattirājā ‘‘chattā tiṭṭhantu ratanā’’tiādimāha. Tattha ratanā sattaratanamayā, chattā kañcanāveḷapantikā suvaṇṇajālehi olambitā tiṭṭhantu. Muttājālaparikkhittā muttājālehi parivāritā, sabbe chattā mama matthake muddhani, dhārentūti cintitamatteyeva chattā pātubhūtā hontīti attho. 36. Nachdem er so die Vollkommenheit des Aufenthaltsorts der Paccekabuddhas in jenem Vejayanta-Palast gezeigt hatte, sprach der Weltherrscher (cakkavattirājā) namens Tilokavijaya, um nun seine eigene Macht zu zeigen: 'Die Schirme aus Juwelen mögen aufgestellt sein' und so weiter. Darin bedeutet 'ratanā': aus den sieben Juwelen gefertigt. Die goldenen Schirme, behängt mit goldenen Netzen und Reihen von goldenem Bambuszierrat, mögen dastehen. Umgeben von Perlennetzwerken, das heißt von Perlennetzen umschlossen, sollen all diese Schirme über meinem Haupt, auf meinem Scheitel, getragen werden – dies bedeutet, dass allein durch bloßes Denken diese Schirme sogleich in Erscheinung treten. 37. Soṇṇatārakacittitā suvaṇṇatārakāhi daddallamānā celavitānā bhavantu nibbattantu. Vicittā anekavaṇṇā, malyavitatā pupphapatthaṭā, sabbe anekavitānā, matthake nisīdanaṭṭhānassa uparibhāge dhārentūti attho. 37. Mit goldenen Sternen verzierte, von goldenen Sternen glänzende Stoffbaldachine sollen entstehen und hervortreten. Bunt und vielfarbig, mit Blumengirlanden behängt und mit Blumen bestreut, sollen all diese vielfältigen Baldachine über dem Haupt, im oberen Bereich des Sitzplatzes, gehalten werden; dies ist die Bedeutung. 38-40. Malyadāmehi anekasugandhapupphadāmehi vitatā parikiṇṇā, gandhadāmehi candanakuṅkumatagarādisugandhadāmehi, sobhitā pokkharaṇīti sambandho[Pg.122]. Dussadāmehi pattuṇṇacīnādianagghadussadāmehi, parikiṇṇā sattaratanadāmehi bhūsitā alaṅkatā pokkharaṇī, pupphābhikiṇṇā campakasaḷalasogandhikādisugandhapupphehi abhikiṇṇā suṭṭhu vicittā sobhitā. Punarapi kiṃ bhūtā pokkharaṇī? Surabhigandhasugandhehi bhūsitā vāsitā. Samantato gandhapañcaṅgulalaṅkatā pañcahi aṅgulehi limpitagandhehi alaṅkatā, hemacchadanachāditā suvaṇṇachadanehi suvaṇṇavitānehi chāditā, pāsādassa cātuddisā pokkharaṇiyo padumehi ca uppalehi ca suṭṭhu santhatā patthaṭā suvaṇṇarūpe suvaṇṇavaṇṇā, khāyantu, padmareṇurajuggatā padumareṇūhi dhūlīhi ca ākiṇṇā pokkharaṇiyo sobhantūti attho. 38-40. Die Verbindung lautet: Der Lotusteich (pokkharaṇī) ist bespannt und umgeben mit Blumengirlanden, nämlich mit vielen wohlriechenden Blumengirlanden, und geschmückt mit Duftgirlanden, bestehend aus Sandelholz, Safran, Tagara und anderen Riechstoffen. Er ist umgeben von Stoffbändern, nämlich von unschätzbaren Stoffbändern aus Seide, feiner Baumwolle und anderem, und geschmückt und verziert mit Girlanden aus den sieben Juwelen. Der Teich ist reichlich bestreut mit Blumen, nämlich übersät mit duftenden Blüten wie Campaka, Salala und roten Lotosblumen, und ist überaus prächtig und schön. Wie beschaffen ist dieser Teich ferner? Er ist mit lieblichen Düften parfümiert und geschmückt. Ringsherum ist er mit dem Fünf-Finger-Duftmal (gandhapañcaṅgula) verziert, also mit Duftstoffen bemalt, die mit den fünf Fingern aufgetragen wurden. Er ist mit einer goldenen Bedachung bedeckt, das heißt mit goldenen Dächern und goldenen Baldachinen überspannt. Die Lotusteiche an den vier Seiten des Palastes sind dicht bedeckt und ausgebreitet mit roten (paduma) und blauen (uppala) Lotosblüten; sie mögen in goldenen Gestalten von goldener Farbe erstrahlen. Diese mit Lotusstaub und Blütenpollen erfüllten Teiche mögen in voller Pracht erglänzen; dies ist die Bedeutung. 41. Mama vejayantapāsādassa samantato pādapā campakādayo rukkhā sabbe pupphantu ete puppharukkhā. Sayameva pupphā muñcitvā vigaḷitvā gantvā bhavanaṃ okiruṃ, okiṇṇā pāsādassa upari karontūti attho. 41. Rings um meinen Vejayanta-Palast herum sollen all die Bäume, wie etwa Campaka-Bäume, erblühen; dies sind die Blütenbäume. Sie sollen von selbst ihre Blüten abwerfen, sodass diese herabfallen und den Palastboden bestreuen und das Dach des Palastes bedecken; dies ist die Bedeutung. 42. Tattha tasmiṃ mama vejayantapāsāde sikhino mayūrā naccantū, dibbahaṃsā devatāhaṃsā, pakūjare saddaṃ karontu, karavīkā ca madhurasaddā kokilā gāyantu gītavākyaṃ karontu, apare anuttā ca dijasaṅghā pakkhino samūhā pāsādassa samantato madhuraravaṃ ravantūti attho. 42. Dort, in jenem meinen Vejayanta-Palast, mögen die Pfauen (sikhino) tanzen; die himmlischen Gänse (dibbahaṃsā), die Gänse der Götter, mögen singen und ihre Stimmen erschallen lassen; die Karavīka-Vögel und die süßstimmigen Kuckucke (kokila) mögen singen und Lieder anstimmen; und andere, unerschrockene Vogelscharen (dijasaṅgha) mögen rings um den Palast ihre süßen Melodien singen; dies ist die Bedeutung. 43. Pāsādassa samantako sabbā ātatavitatādayo bheriyo vajjantu haññantu, sabbā tā anekatantiyo vīṇā rasantu saddaṃ karontu, sabbā anekappakārā saṅgītiyo pāsādassa samantato vattantu pavattantu gāyantūti attho. 43. Rings um den Palast herum sollen all die verschiedenen Trommeln (ātatavitata) geschlagen und ertönt werden; all jene vielsaitigen Lauten (vīṇā) sollen erklingen und ihren Klang vernehmen lassen; und all die vielfältigen Arten von Konzerten und Gesängen (saṅgīti) sollen rings um den Palast stattfinden, im Gange sein und dargeboten werden; dies ist die Bedeutung. 44-5. Yāvatā yattake ṭhāne buddhakhettamhi dasasahassicakkavāḷe tato pare cakkavāḷe, jotisampannā pabhāsampannā acchinnā mahantā samantato ratanāmayā sattahi ratanehi katā khacitā soṇṇapallaṅkā suvaṇṇapallaṅkā tiṭṭhantu, pāsādassa samantato dīparukkhā padīpadhāraṇā telarukkhā jalantu, padīpehi pajjalantu, dasasahassiparamparā dasasahassīnaṃ paramparā dasasahassiyo ekapajjotā ekapadīpā viya bhavantu ujjotantūti attho. 44-5. Soweit der Bereich reicht, im Buddha-Gefilde (buddhakhetta) der zehntausend Weltensysteme (cakkavāḷe) und in den Weltensystemen darüber hinaus, mögen glanzvolle, strahlende, makellose, gewaltige goldene Throne (suvaṇṇapallaṅka), die ringsherum aus den sieben Juwelen gefertigt und mit ihnen verziert sind, aufgestellt sein. Rings um den Palast mögen Lampenbäume, Leuchterhalter und Ölbäume brennen und mit Lichtern hell erstrahlen. Die Abfolge der zehntausend Weltensysteme möge wie ein einziges gewaltiges Licht, wie eine einzige große Lampe, in hellem Glanz erstrahlen; dies ist die Bedeutung. 46. Naccagītesu [Pg.123] chekā gaṇikā naccitthiyo ca lāsikā mukhena saddakārikā ca pāsādassa samantato naccantu, accharāgaṇā devitthisamūhā naccantu, nānāraṅgā anekavaṇṇā nānāraṅgamaṇḍalā pāsādassa samantato naccantu, padissantu pākaṭā hontūti attho. 46. Tänzerinnen (naccitthī) und Kurtisanen (gaṇikā), die im Tanz und Gesang geschickt sind und mit ihren lächelnden Gesichtern liebliche Klänge erzeugen, mögen rings um den Palast tanzen. Scharen von himmlischen Nymphen (accharāgaṇā), die Scharen der Göttinnen, mögen tanzen. Vielfarbige und bunt geschmückte Gruppen von Tänzerinnen (nānāraṅgamaṇḍalā) mögen rings um den Palast tanzen und sich überall deutlich zeigen; dies ist die Bedeutung. 47. Tadā ahaṃ tilokavijayo nāma cakkavattirājā hutvā sakalacakkavāḷe dumagge rukkhagge pabbatagge himavantacakkavāḷapabbatādīnaṃ agge sinerūpabbatamuddhani ca sabbaṭṭhānesu vicittaṃ anekavaṇṇavicittaṃ pañcavaṇṇikaṃ nīlapītādipañcavaṇṇaṃ sabbaṃ dhajaṃ ussāpemīti attho. 47. Zu jener Zeit werde ich, nachdem ich der Weltherrscher (cakkavattirājā) namens Tilokavijaya geworden bin, auf den Wipfeln aller Bäume im gesamten Weltensystem, auf den Gipfeln der Berge, auf den Höhen des Himavanta-Gebirges und der Weltenrandberge sowie auf dem Gipfel des Berges Sineru, ja an allen Orten, bunte, in vielen Farben glänzende, fünfdoppelt gefärbte (wie blau, gelb usw.) Banner (dhaja) aufstellen; dies ist die Bedeutung. 48. Narā lokantarā narā ca nāgalokato nāgā ca devalokato gandhabbā ca devā ca sabbe upentu upagacchantu, te narādayo namassantā mama namakkāraṃ karontā pañjalikā katahatthapuṭā mama vejayantaṃ pāsādaṃ parivārayunti attho. 48. Menschen, Wesen aus den Weltenzwischenräumen (lokantarā), Nāgas aus der Nāga-Welt, Gandhabbas und Götter (devā) aus der Götterwelt – sie alle mögen herbeikommen und sich nahen. All diese Menschen und anderen Wesen mögen Ehrbezeugung erweisen, mir ihre Ehrerbietung darbringen und mit ehrfürchtig zusammengelegten Händen (añjali) meinen Vejayanta-Palast umringen; dies ist die Bedeutung. 49. Evaṃ so tilokavijayo cakkavattirājā pāsādassa ca attano ca ānubhāvaṃ vaṇṇetvā idāni attanā sampattikatapuññaphalaṃ samādapento ‘‘yaṃ kiñci kusalaṃ kamma’’ntiādimāha. Yaṃ kiñci kusalakammasaṅkhātaṃ kiriyaṃ kattabbaṃ atthi, taṃ sabbaṃ mama mayā kāyena vā vācāya vā manasā vā tīhi dvārehi kataṃ tidase sukataṃ suṭṭhu kataṃ, tāvatiṃsabhavane uppajjanārahaṃ katanti attho. 49. Nachdem der Radkönig Tilokavijaya so die Macht des Palastes und seine eigene Macht gepriesen hatte, sprach er nun, um die Früchte des von ihm selbst erworbenen und vollbrachten Verdienstes aufzuzeigen, die Verse beginnend mit: „Was auch immer für eine heilsame Tat...“ Dies bedeutet: „Was auch immer an heilsamem Werk, das als heilsames Karma gilt, zu tun ist, all das wurde von mir durch die drei Tore – Körper, Rede und Geist – wohlgetan und im Reich der Dreiunddreißig (Tāvatiṃsa) so vollbracht, dass es eine Wiedergeburt dort bewirkt.“ 50. Puna samādapento ‘‘ye sattā saññino’’tiādimāha. Tattha ye sattā manussā vā devā vā brahmāno vā saññino saññāsahitā atthi, ye ca sattā asaññino saññārahitā asaññā sattā santi, te sabbe sattā mayhaṃ mayā kataṃ puññaphalaṃ, bhāgī bhavantu puññavantā hontūti attho. 50. Um dies weiter zu verdeutlichen, sprach er den Vers beginnend mit: „Die Wesen, die wahrnehmend sind...“ Das bedeutet: „Unter jenen Wesen, die als Menschen, Götter (Devas) oder Brahmas wahrnehmend, also mit Wahrnehmung versehen sind, und jenen Wesen, die nicht-wahrnehmend, also ohne Wahrnehmung (die asañña-sattā) sind – mögen all diese Wesen an der Frucht des von mir vollbrachten Verdienstes teilhaben und mit Verdienst gesegnet sein.“ 51. Punapi samādapento bodhisatto ‘‘yesaṃ kata’’ntiādimāha. Mayā kataṃ puññaṃ yehi naranāgagandhabbadevehi suviditaṃ ñātaṃ, tesaṃ mayā dinnaṃ puññaphalaṃ, tasmiṃ mayā kate puññe dinnabhāvaṃ ye narādayo na jānanti, devā gantvā tesaṃ taṃ nivedayuṃ ārocayunti attho. 51. Um dies nochmals zu verdeutlichen, sprach der Bodhisatta den Vers beginnend mit: „Denen, für die es vollbracht wurde...“ Das bedeutet: „Möge die Frucht des von mir vollbrachten Verdienstes denen zuteilwerden – Menschen, Nāgas, Gandharvas und Devas –, denen es wohlbekannt ist. Und jenen Menschen und anderen Wesen, die nichts davon wissen, dass dieses Verdienst von mir dargebracht wurde, mögen die Devas hingehen und es ihnen verkünden und mitteilen.“ 52. Sabbalokamhi [Pg.124] ye sattā āhāranissitā jīvanti, te sabbe sattā manuññaṃ bhojanaṃ sabbaṃ mama cetasā mama cittena labhantu, mama puññiddhiyā labhantūti attho. 52. Dies bedeutet: „Mögen alle Wesen in der ganzen Welt, die von Nahrung abhängig leben, all diese köstliche Nahrung durch meinen Willen, durch meinen Geist und durch die übernatürliche Macht meines Verdienstes erhalten.“ 53. Manasā pasannena cittena yaṃ dānaṃ mayā dinnaṃ tasmiṃ dāne cittena pasādaṃ āvahiṃ uppādesiṃ. Sabbasambuddhā ca paccekā paṭiekkā jinasāvakā ca mayā cakkavattiraññā pūjitā. 53. Mit einem reinen und vertrauensvollen Geist brachte ich jene Gabe dar und erweckte tiefe Freude im Geist über diese Gabe. Alle vollkommen Erleuchteten, jeder einzelne Einzelbuddha (Paccekabuddha) und die Jünger des Siegers (Jina-Sāvakā) wurden von mir, dem Radkönig, verehrt. 54. Sukatena tena kammena saddahitvā katena kusalakammena, cetanāpaṇidhīhi ca cittena katapatthanāhi ca, mānusaṃ dehaṃ manussasarīraṃ, jahitvā chaḍḍetvā, ahaṃ tāvatiṃsaṃ devalokaṃ agacchiṃ agamāsiṃ, suttappabuddho viya tattha uppajjinti attho. 54. Dies bedeutet: „Durch jene wohlgetane Tat, durch dieses im Glauben vollbrachte heilsame Karma, sowie durch die Absichten und Wünsche, die ich im Geist formte, verließ und legte ich den menschlichen Körper ab und gelangte in die Götterwelt der Dreiunddreißig (Tāvatiṃsa). Dort wurde ich wiedergeboren wie einer, der aus dem Schlaf erwacht.“ 55. Tato tilokavijayo cakkavattirājā kālaṅkato, tato paṭṭhāya āgate duve bhave dve jātiyo pajānāmi devatte devattabhāve mānuse manussattabhāve ca, tato jātidvayato aññaṃ gatiṃ aññaṃ upapattiṃ na jānāmi na passāmi, manasā cittena patthanāphalaṃ patthitapatthanāphalanti attho. 55. Dies bedeutet: „Danach verstarb der Radkönig Tilokavijaya. Von dieser Zeit an kenne ich in meinen zukünftigen Existenzen nur zwei Arten der Wiedergeburt: das Dasein als Gott (Deva) und das Dasein als Mensch. Außer diesen beiden Geburten kenne ich keine andere Bestimmung und keinen anderen Ort der Wiedergeburt und sehe sie auch nicht. Dies ist die Frucht des im Geiste geäußerten Wunsches.“ 56. Devānaṃ adhiko homīti yadi devesu jāto, āyuvaṇṇabalatejehi devānaṃ adhiko jeṭṭho seṭṭho ahosinti attho. Yadi manussesu jāto, manujādhipo manussānaṃ adhipati issaro bhavāmi, tathā rājabhūto abhirūpena rūpasampattiyā ca lakkhaṇena ārohapariṇāhādilakkhaṇena ca sampanno sampuṇṇo uppannuppannabhave paññāya paramatthajānanapaññāya asamo samarahito, mayā sadiso koci natthīti attho. 56. Dies bedeutet: „„Ich übertreffe die Götter“ bedeutet: Wenn ich unter den Göttern geboren wurde, übertraf ich sie an Lebensdauer, Schönheit, Kraft und Ausstrahlung und war der Höchste und Beste. Wenn ich unter den Menschen geboren wurde, war ich ein Herrscher über die Menschen, ihr Gebieter. Als König war ich reich an Schönheit, besaß die Vollkommenheit der äußeren Erscheinung und war mit den physischen Merkmalen hervorragender Proportionen ausgestattet. In jedem Dasein, in dem ich geboren wurde, war ich in meiner Weisheit – der Weisheit, die das höchste Ziel erkennt – unvergleichlich, und es gab niemanden, der mir glich.“ 57. Mayā katapuññasambhārena puññaphalena uppannuppannabhave seṭṭhaṃ pasaṭṭhaṃ madhuraṃ vividhaṃ anekappakāraṃ bhojanañca anappakaṃ bahusattaratanañca vividhāni, anekappakārāni pattuṇṇakoseyyādivatthāni ca nabhā ākāsato maṃ mama santikaṃ khippaṃ sīghaṃ upenti upagacchanti. 57. Aufgrund der von mir angesammelten Verdienste und als Frucht meines Verdienstes kamen in jedem Dasein, in dem ich wiedergeboren wurde, erlesene, vorzügliche, süße und vielfältige Speisen in Hülle und Fülle sowie die sieben Kostbarkeiten in großer Zahl und verschiedene edle Gewänder wie Seide und Wolle rasch und ohne Zögern vom Himmel zu mir herab. 58-66. Pathabyā [Pg.125] pathaviyā pabbate ca ākāse ca udake ca vane ca yaṃ yaṃ yattha yattha hatthaṃ pasāremi nikkhipāmi, tato tato dibbā bhakkhā dibbā āhārā maṃ mama santikaṃ upenti upagacchanti, pātubhavantīti attho. Tathā yathākkamaṃ sabbe ratanā. Sabbe candanādayo gandhā. Sabbe yānā vāhanā. Sabbe campakanāgapunnāgādayo mālā pupphā. Sabbe alaṅkārā ābharaṇā. Sabbā dibbakaññā. Sabbe madhusakkharā. Sabbe pūpādayo khajjā khāditabbā maṃ mama santikaṃ upenti upagacchanti. 58-66. Dies bedeutet: „Wo auch immer auf der Erde, auf Bergen, in der Luft, im Wasser oder im Wald ich meine Hand ausstrecke, von dort eilen himmlische Speisen und göttliche Nahrung herbei und erscheinen vor mir.“ Ebenso kamen der Reihe nach alle Juwelen, alle Düfte wie Sandelholz, alle Wagen und Fahrzeuge, alle Blumenkränze und Blüten wie Champaka, Nāga und Punnāga, alle Schmuckstücke und Zierden, alle himmlischen Nymphen (Dibbakaññā), aller Honig und Zucker sowie alle essbaren Kuchen und Speisen zu mir. 67-68. Sambodhivarapattiyāti uttamacatumaggañāṇapattiyā pāpuṇanatthāya. Mayā yaṃ uttamadānaṃ kataṃ pūritaṃ, tena uttamadānena selasaṅkhātaṃ pabbataṃ sakalaṃ ekaninnādaṃ karonto bahalaṃ giraṃ puthulaṃ ghosaṃ gajjento, sadevakaṃ lokaṃ sakalaṃ manussadevalokaṃ hāsayanto somanassappattaṃ karonto loke sakalalokattaye vivaṭṭacchado buddho ahaṃ bhavāmīti attho. 67-68. „Um das Erlangen der höchsten Erleuchtung“ bedeutet: Zum Erlangen des Wissens der vier edlen Pfade. Durch jene höchste Gabe, die von mir vollbracht und vollendet wurde, werde ich den gesamten Berg aus Fels erbeben und als ein einziges Echo ertönen lassen; ich werde eine mächtige Stimme und ein weithin hörbares Donnern erzeugen, die gesamte Welt mitsamt den Göttern, die gesamte Menschen- und Götterwelt erfreuen und in Glückseligkeit versetzen, und im gesamten dreifachen Kosmos werde ich ein Buddha werden, der den Schleier des Daseinskreislaufs (Vaṭṭa) zerrissen hat. Dies ist die Bedeutung. 69. Disā dasavidhā loketi cakkavāḷaloke dasavidhā dasakoṭṭhāsā disā honti, tattha koṭṭhāse yāyato yāyantassa gacchantassa antakaṃ natthīti attho, cakkavattikāle tasmiṃ mayā gatagataṭṭhāne disābhāge vā buddhakhettā buddhavisayā asaṅkhiyā saṅkhārahitā. 69. „In den zehn Himmelsrichtungen der Welt“ bedeutet: In der Welt der Kosmen (Cakkavāḷa) gibt es zehn Himmelsrichtungen bzw. Bereiche. Wer auch immer durch diese Bereiche wandert, für den gibt es kein Ende. Zu jener Zeit, als ich ein Radkönig war, waren an jedem Ort und in jeder Himmelsrichtung, wohin ich auch ging, die Buddha-Felder (Buddhakhetta) und die Bereiche des Buddha unzählig und unermesslich. 70. Pabhā pakittitāti tadā cakkavattirājakāle mayhaṃ pabhā cakkaratanamaṇiratanādīnaṃ pabhā ālokā yamakā yugaḷayugaḷā hutvā raṃsivāhanā raṃsiṃ muñcamānā pakittitā pākaṭā, etthantare dasasahassicakkavāḷantare raṃsijālaṃ raṃsisamūhaṃ, āloko vipulo bahutaro bhave ahosīti attho. 70. „Das Licht ist weithin verkündet“ bedeutet: Zu jener Zeit, als ich Radkönig war, strahlte mein Glanz – das Licht des Rad-Juwels, des Juwelen-Schatzes usw. – paarweise aus, sandte Lichtstrahlen aus und wurde weithin bekannt. Dies bedeutet, dass inmitten dieses Bereichs von zehntausend Weltsystemen ein dichtes Netz von Lichtstrahlen und ein unermessliches, überaus helles Licht entstand. 71. Ettake lokadhātumhīti dasasahassicakkavāḷesu sabbe janā maṃ passantu dakkhantūti attho. Sabbe devā yāva brahmanivesanā yāva brahmalokā maṃ anuvattantu anukūlā bhavantu. 71. „In diesem Weltsystem“ bedeutet: In zehntausend Weltsystemen mögen alle Menschen mich sehen. Dies ist die Bedeutung. Mögen alle Götter bis hinauf zum Reich der Brahmas mir folgen und mir wohlgesinnt sein. 72. Visiṭṭhamadhunādenāti [Pg.126] visaṭṭhena madhurena nādena, amatabherimāhaninti amatabheriṃ devadundubhiṃ pahariṃ, etthantare etasmiṃ dasasahassicakkavāḷabbhantare sabbe janā mana madhuraṃ giraṃ saddaṃ suṇantu manasi karontu. 72. „Mit einer ausgezeichneten, süßen Stimme“ bedeutet: Mit einem außergewöhnlich lieblichen Klang. „Ich schlug die Trommel der Unsterblichkeit“ bedeutet: Ich schlug die Trommel der Unsterblichkeit (die himmlische Trommel). Mögen alle Menschen in diesem Bereich von zehntausend Weltsystemen meine liebliche Stimme vernehmen und sie sich zu Herzen nehmen. 73. Dhammameghena vassante dhammadesanāmayena nādena tabbohāraparamatthagambhīramadhurasukhumatthavasse vassante vassamāne sammāsambuddhānubhāvena sabbe bhikkhubhikkhunīādayo anāsavā nikkilesā hontu bhavantu. Yettha pacchimakā sattāti ettha etesu rāsibhūtesu catūsu parisasattesu ye sattā pacchimakā guṇavasena heṭṭhimakā, te sabbe sotāpannā bhavantūti adhippāyo. 73. Wenn es aus der Wolke des Dhamma regnet – d.h. wenn durch den Klang der Dhamma-Lehre jener Regen von höchster, tiefgründiger, süßer und feinsinniger Bedeutung herabregnet –, mögen durch die Macht des vollkommen Erleuchteten alle Mönche, Nonnen und andere frei von den Trieben (Āsavas) und frei von jeglichen Befleckungen (Kilesas) werden. „Und jene Wesen, die hier die Letzten sind“ bedeutet: Unter den in den vier Versammlungen versammelten Wesen mögen all jene Wesen, die hinsichtlich ihrer spirituellen Qualitäten am geringsten (die Letzten) sind, den Strom betreten (Sotāpannas werden). Dies ist die Absicht. 74. Tadā tilokavijayacakkavattirājakāle dātabbakaṃ dātabbayuttakaṃ, dānaṃ katvā, asesato nissesena, sīlaṃ sīlapāramiṃ, pūretvā nekkhamme nekkhammapāramitāya, pāramiṃ koṭiṃ patvā, uttamaṃ sambodhiṃ catumaggañāṇaṃ, patto bhavāmi bhaveyyaṃ. 74. Damals, zur Zeit des Weltherrschers namens Tilokavijaya, gab ich das zu Gebende, was zu geben angemessen war, und nachdem ich rückhaltlos die Vollkommenheit der Tugend (sīlapāramī) erfüllt und durch die Vollkommenheit der Entsagung (nekkhammapāramī) den Gipfel der Vollkommenheit erreicht hatte, möge ich die höchste Erleuchtung, das Wissen der vier Pfade, erlangen. 75. Paṇḍite paññavante medhāvino paripucchitvā ‘‘kiṃ, bhante, kattabbaṃ? Kiṃ na kattabbaṃ? Kiṃ kusalaṃ? Kiṃ akusalaṃ? Kiṃ katvā saggamokkhadvayassa bhāgī hotī’’ti pucchitvā, evaṃ paññāpāramiṃ pūretvāti attho. Katvā vīriyamuttamanti uttamaṃ seṭṭhaṃ ṭhānanisajjādīsu avicchinnaṃ vīriyaṃ katvā, vīriyapāramiṃ pūretvāti attho. Sakalaviruddhajanehi kataanādarādhivāsanākhantiyā pāramiṃ koṭiṃ gantvā khantipāramiṃ pūretvā uttamaṃ sambodhiṃ uttamaṃ sambuddhattaṃ patto bhavāmi bhaveyyaṃ. 75. Nachdem ich die Weisen, die Verständigen und Klugen wiederholt gefragt hatte: ‚Ehrwürdige, was soll getan werden? Was soll nicht getan werden? Was ist heilsam? Was ist unheilsam? Durch welches Tun wird man Teilhaber der beiden Welten, des Himmels und der Befreiung?‘ und so gefragt hatte – dies ist die Bedeutung von: ‚erfüllte er die Vollkommenheit der Weisheit‘. Zu ‚nachdem er die höchste Tatkraft entfaltet hatte‘ (katvā vīriyamuttamaṃ): indem er ununterbrochene Tatkraft beim Stehen, Sitzen usw. aufbrachte und die Vollkommenheit der Tatkraft (vīriyapāramī) erfüllte – dies ist die Bedeutung. Indem ich den Gipfel der Vollkommenheit durch die Geduld des Ertragens von Respektlosigkeit seitens aller gegnerischen Personen erreichte und die Vollkommenheit der Geduld (khantipāramī) erfüllte, möge ich die höchste Erleuchtung, die höchste Buddhaschaft, erlangen. 76. Katvā daḷhamadhiṭṭhānanti ‘‘mama sarīrajīvitesu vinassantesupi puññakammato na viramissāmī’’ti acalavasena daḷhaṃ adhiṭṭhānapāramiṃ katvā ‘‘sīse chijjamānepi musāvādaṃ na kathessāmī’’ti saccapāramitāya koṭiṃ pūriya pūretvā ‘‘sabbe sattā sukhī averā’’tiādinā mettāpāramitāya koṭiṃ patvā uttamaṃ sambodhiṃ pattoti attho. 76. Zu ‚nachdem er einen festen Entschluss gefasst hatte‘ (katvā daḷhamadhiṭṭhānaṃ): Indem er mit unerschütterlicher Kraft den festen Entschluss der Vollkommenheit des Entschlusses (adhiṭṭhānapāramī) fasste: ‚Selbst wenn mein Körper und mein Leben vergehen, werde ich nicht von heilsamen Taten ablassen‘, und indem er dachte: ‚Selbst wenn mir der Kopf abgeschnitten wird, werde ich keine Lüge sprechen‘, und so den Gipfel der Vollkommenheit der Wahrhaftigkeit (saccapāramī) erfüllte, und indem er mit den Worten ‚Mögen alle Wesen glücklich und frei von Feindschaft sein‘ usw. den Gipfel der Vollkommenheit der liebenden Güte (mettāpāramī) erreichte, erlangte er die höchste Erleuchtung – dies ist die Bedeutung. 77. Sajīvakājīvakavatthūnaṃ lābhe ca tesaṃ alābhe ca kāyikacetasikasukhe ceva tathā dukkhe ca sādarajanehi kate, sammāne [Pg.127] ceva omāne, ca sabbattha samako samānamānaso upekkhāpāramiṃ pūretvā uttamaṃ sambodhiṃ patto pāpuṇeyyanti attho. 77. Sowohl beim Gewinn von belebten und unbelebten Dingen als auch bei deren Verlust, sowohl bei körperlichem und geistigem Glück als auch bei Schmerz, sowie bei Verehrung und Missachtung, die von den Menschen entgegengebracht werden – in allen Dingen von gleichem Geist und gleichmütig gestimmt, erfüllte er die Vollkommenheit des Gleichmuts (upekkhāpāramī) und erlangte die höchste Erleuchtung – dies ist die Bedeutung. 78. Kosajjaṃ kusītabhāvaṃ, bhayato bhayavasena ‘‘apāyadukkhabhāgī’’ti disvā ñatvā akosajjaṃ akusītabhāvaṃ alīnavuttiṃ, vīriyaṃ khemato khemavasena ‘‘nibbānagāmī’’ti disvā ñatvā āraddhavīriyā hotha bhavatha. Esā buddhānusāsanī esā buddhānaṃ anusiṭṭhi. 78. Indem man Trägheit (kosajja), das heißt den Zustand der Faulheit, als eine Gefahr ansieht und mit dem Wissen erkennt: ‚Es führt zum Leid der niederen Welten (apāya)‘, und indem man Nicht-Trägheit (akosajja), das heißt den Zustand der Unverdrossenheit und des unerschlafften Verhaltens, als Sicherheit ansieht und mit dem Wissen erkennt: ‚Es führt zum Nibbāna‘ – seid von tatkräftigem Bemühen, entfaltet eure Tatkraft! Dies ist die Unterweisung der Buddhas, dies ist die Lehre der Buddhas. 79. Vivādaṃ bhayato disvāti vivādaṃ kalahaṃ bhayato disvā ‘‘apāyabhāgī’’ti disvā ñatvā avivādaṃ vivādato viramaṇaṃ ‘‘nibbānappattī’’ti, khemato disvā ñatvā samaggā ekaggacittā sakhilā siliṭṭhā mettāya dhuragatāya sobhamānā hothāti attho. Esā kathā mantanā udīraṇā buddhānaṃ anusāsanī ovādadānaṃ. 79. Zu ‚indem er Streit als Gefahr ansah‘ (vivādaṃ bhayato disvā): Indem er Streit und Zwist als Gefahr ansah und mit dem Wissen erkannte: ‚Es führt in die niederen Welten (apāya)‘, und indem er die Abwesenheit von Streit, das heißt die Enthaltung von Konflikten, als Sicherheit ansah und mit dem Wissen erkannte: ‚Sie führt zum Erlangen des Nibbāna‘ – seid einträchtig, von einhelligem Geist, freundlich, sanftmütig und glänzend durch die im Vordergrund stehende liebende Güte – dies ist die Bedeutung. Diese Rede, diese vertrauliche Ansprache, diese Äußerung ist die Unterweisung der Buddhas, das Erteilen von Rat. 80. Pamādaṃ ṭhānanisajjādīsu sativippavāsena viharaṇaṃ bhayato ‘‘nibbattanibbattaṭṭhānesu dukkhitadurūpaappannapānatādisaṃvattanakaṃ apāyādigamanañcā’’ti disvā ñatvā, appamādaṃ sabbakiriyāsu satiyā viharaṇaṃ, khemato vaḍḍhito ‘‘nibbānasampāpuṇana’’nti disvā paccakkhato ñatvā aṭṭhaṅgikaṃ maggaṃ sammādiṭṭhi sammāsaṅkappo sammāvācā sammākammanto sammāājīvo sammāvāyāmo sammāsati sammāsamādhīti aṭṭhaavayavaṃ sammāsambodhiyā maggaṃ adhigamūpāyaṃ bhāvetha vaḍḍhetha manasi karotha, esā kathā bhāsanā udīraṇā buddhānusāsanī buddhānaṃ anusiṭṭhīti attho. 80. Nachdem man Nachlässigkeit (pamāda) – das Verweilen in Achtsamkeitslosigkeit beim Stehen, Sitzen usw. – als Gefahr ansieht und mit dem Wissen erkennt: ‚Sie führt an den jeweiligen Orten der Wiedergeburt zu Leiden, hässlichem Aussehen, Mangel an Speise und Trank usw. sowie zum Gang in die niederen Welten (apāya)‘, und nachdem man Wachsamkeit (appamāda) – das Verweilen in Achtsamkeit bei allen heilsamen Taten – als Sicherheit ansieht und durch eigene Anschauung erkennt: ‚Sie führt zum Erlangen des Nibbāna‘, entfaltet, vermehrt und beherzigt den achtfachen Pfad: rechte Erkenntnis, rechter Entschluss, rechte Rede, rechtes Handeln, rechter Lebensunterhalt, rechte Anstrengung, rechte Achtsamkeit und rechte Sammlung – diesen aus acht Gliedern bestehenden Pfad, das Mittel zur Erlangung der vollkommenen Erleuchtung. Diese Rede, dieses Sprechen, diese Äußerung ist die Unterweisung der Buddhas, die Lehre der Buddhas – dies ist die Bedeutung. 81. Samāgatā bahū buddhāti anekasatasahassasaṅkhyā paccekabuddhā samāgatā rāsibhūtā, sabbaso sabbappakārena arahantā ca khīṇāsavā anekasatasahassā samāgatā rāsibhūtā. Tasmā te buddhe ca arahante ca vandamāne vandanārahe namassatha aṅgapaccaṅganamakkārena namassatha vandatha. 81. Zu ‚viele Buddhas kamen zusammen‘ (samāgatā bahū buddhā): Viele Hunderttausende von Paccekabuddhas und vollkommen Erleuchteten sind zusammengekommen und haben sich versammelt, und in jeder Weise sind auch viele Hunderttausende von Arahants, deren Triebe versiegt sind (khīṇāsava), zusammengekommen und haben sich versammelt. Darum erweist diesen Buddhas und Arahants, die der Verehrung würdig sind, eure Ehrerbietung, verehrt sie mit der Verbeugung aller Glieder, erweist ihnen Ehre und huldigt ihnen! 82. Evaṃ iminā mayā vuttappakārena acintiyā cintetuṃ asakkuṇeyyā, buddhā, buddhadhammāti buddhehi desitā cattāro satipaṭṭhānā…pe… aṭṭhaṅgiko [Pg.128] maggo, pañcakkhandhā, hetupaccayo ārammaṇapaccayotiādayo dhammā, buddhānaṃ vā sabhāvā acintiyā cintetuṃ asakkuṇeyyā, acintiye cintāvisayātikkante pasannānaṃ devamanussānaṃ vipāko devamanussasampattinibbānasampattisaṅkhāto cintetuṃ asakkuṇeyyo saṅkhyātikkanto hoti bhavati. 82. Auf diese von mir beschriebene Weise sind die Buddhas unvorstellbar (acintiyā), unfassbar zu ergründen. Unter den Lehren der Buddhas (buddhadhammā) versteht man die von den Buddhas dargelegten vier Grundlagen der Achtsamkeit (satipaṭṭhāna) ... [usw.] ... den achtfachen Pfad, die fünf Daseinsgruppen (khandhā), die Bedingung durch Ursache (hetupaccayo), die Bedingung durch das Objekt (ārammaṇapaccayo) und so weiter; oder aber das Wesen der Buddhas ist unvorstellbar, unmöglich zu erdenken. Für die Götter und Menschen, die Vertrauen in das Unvorstellbare, das den Bereich des Denkens übersteigt, gefasst haben, ist die Frucht – die als das göttliche und menschliche Glück sowie das Glück des Nibbāna bezeichnet wird – unvorstellbar und geht über jede Berechnung hinaus. Iti ettāvatā ca yathā addhānagāmino ‘‘maggaṃ no ācikkhā’’ti puṭṭhena ‘‘vāmaṃ muñcitvā dakkhiṇaṃ gaṇhathā’’ti vutte tena maggena gāmanigamarājadhānīsu kattabbakiccaṃ niṭṭhāpetvā puna muñcitena aparena vāmamaggena gatāpi gāmanigamādīsu kattabbakiccaṃ niṭṭhāpenti, evameva buddhāpadānaṃ kusalāpadānavasena niṭṭhāpetvā tadeva akusalāpadānavasena vitthāretuṃ idaṃ pañhakammaṃ – So weit nun hierzu: Wie wenn Reisende, die fragen: ‚Zeigt uns den Weg!‘, zur Antwort erhalten: ‚Meidet den linken Weg und schlagt den rechten ein!‘, und sie auf jenem Weg gehen und in Dörfern, Marktflecken und Hauptstädten ihre zu verrichtenden Angelegenheiten vollenden; und selbst wenn andere auf dem gemiedenen linken Weg gehen, vollenden sie dennoch ihre Angelegenheiten in den Dörfern, Marktflecken usw. Ebenso ist es hier: Nachdem das Wirken der Buddhas anhand ihrer heilsamen Taten (kusalāpadāna) dargelegt wurde, dient das Folgende dazu, ebendieses Wirken im Hinblick auf unheilsame Ursachen (akusalāpadāna) ausführlich darzulegen – diese Aufgabe der Fragen: ‘‘Dukkarañca abbhakkhānaṃ, abbhakkhānaṃ punāparaṃ; Abbhakkhānaṃ silāvedho, sakalikāpi ca vedanā. Das Ausüben schwerer Kasteiung, die falsche Anschuldigung, eine weitere falsche Anschuldigung und noch eine andere falsche Anschuldigung; das Herabrollen eines Felsens und der Schmerz durch einen herabfliegenden Steinsplitter, ‘‘Nāḷāgiri sattacchedo, sīsadukkhaṃ yavakhādanaṃ; Piṭṭhidukkhamatīsāro, ime akusalakāraṇā’’ti. der Angriff des Elefanten Nālāgiri, der Schnitt mit einer Klinge, die Kopfschmerzen, das Essen von Gerstenfutter, die Rückenschmerzen und der Durchfall – diese zwölf Leiden sind die Wirkungen unheilsamer Ursachen. Attha paṭhamapañhe – dukkaranti chabbassāni dukkarakārikā. Atīte kassapasammāsambuddhakāle bodhisatto jotipālo nāma brāhmaṇamāṇavo hutvā nibbatto brāhmaṇajātivasena sāsane appasanno tassa bhagavato pilotikakammanissandena ‘‘kassapo bhagavā’’ti sutvā ‘‘kuto muṇḍakassa samaṇassa bodhi, bodhi paramadullabhā’’ti āha. So tena kammanissandena anekajātisatesu narakādidukkhamanubhavitvā tasseva bhagavato anantaraṃ teneva laddhabyākaraṇena kammena jātisaṃsāraṃ khepetvā pariyosāne vessantarattabhāvaṃ patvā tato cuto tusitabhavane nibbatto. Devatāyācanena tato cavitvā sakyakule nibbatto ñāṇassa paripākattā sakalajambudīparajjaṃ pahāya anomānadītīre sunisitenāsinā samakuṭakesakalāpaṃ chinditvā brahmunā ānīte iddhimaye kappassa saṇṭhānakāle padumagabbhe nibbatte aṭṭha parikkhāre paṭiggahetvā pabbajitvā bodhiñāṇadassanassa tāva aparipakkattā [Pg.129] buddhabhāvāya maggāmaggaṃ ajānitvā chabbassāni uruvelajanapade ekāhāraekālopaekapuggalaekamaggaekāsanabhojanavasena aṭṭhicammanahārusesaṃ nimmaṃsarudhirapetarūpasadisasarīro padhānasutte (su. ni. 427 ādayo) vuttanayeneva padhānaṃ mahāvīriyaṃ dukkarakārikaṃ akāsi. So imaṃ dukkarakārikaṃ ‘‘sambodhiyā maggaṃ na hotī’’ti cintetvā gāmanigamarājadhānīsu paṇītāhāraṃ paribhuñjitvā pīṇindriyo paripuṇṇadvattiṃsamahāpurisalakkhaṇo kamena bodhimaṇḍamupagantvā pañca māre jinitvā buddho jātoti. Hierbei bezieht sich in der ersten Frage das Wort „Dukkara“ (schwer zu tun) auf die sechs Jahre lang ausgeübten extremen Kasteiungen. In der Vergangenheit, zur Zeit des vollkommen Erleuchteten Kassapa, wurde der Bodhisatta als ein junger Brahmanen-Schüler namens Jotipāla geboren. Aufgrund seiner Zugehörigkeit zur Brahmanenkaste war er ohne Vertrauen in die Lehre. Durch den unheilsamen Karma-Nachhall jener Taten sagte er, als er „Kassapa, der Erhabene“ hörte: „Woher soll dem kahlgeschorenen Asketen die Erleuchtung kommen? Die Erleuchtung ist überaus schwer zu erlangen!“ Aufgrund dieses Karma-Nachhalls erlitt er über viele hunderte von Existenzen hinweg Leiden in den Höllen und anderen leidvollen Welten. Unmittelbar im Anschluss an jenen Erhabenen beendete er durch das Karma der erhaltenen Prophezeiung den Kreislauf der Wiedergeburten, erlangte am Ende die Existenz als König Vessantara, verschied von dort und wurde im Tusita-Himmel wiedergeboren. Auf Bitten der Gottheiten schied er von dort und wurde im Geschlecht der Sakyer wiedergeboren. Da seine Erkenntnis ausgereift war, gab er die Herrschaft über das gesamte Jambudīpa auf. Am Ufer des Flusses Anomā schnitt er mit einem sehr scharfen Schwert sein Haar samt der Krone ab. Er nahm die acht Requisiten entgegen, die von einem Brahma-Gott dargebracht worden waren und die durch magische Kraft zu Beginn des Weltzeitalters im Inneren einer Lotusblüte entstanden waren, und trat in die Hauslosigkeit ein. Da die Schau des Erleuchtungswissens noch nicht ausgereift war, verstand er den wahren Pfad und den Nicht-Pfad zur Buddhaschaft noch nicht. Sechs Jahre lang übte er im Landstrich Uruvelā extreme Kasteiungen aus, indem er sich nur einmal am Tag, von einem einzigen Bissen, als einzelner Mensch, auf einem einzigen Weg, auf einem einzigen Sitzplatz ernährte. Sein Körper bestand nur noch aus Knochen, Haut und Sehnen, ohne Fleisch und Blut, so dass er der Gestalt eines Gespensts (Peta) glich. Genau wie es in der Padhāna-Sutta dargelegt wird, übte er ein gewaltiges Streben mit großer Willenskraft aus und vollzog diese schwer durchzuführenden Kasteiungen. Als er dachte: „Diese extremen Kasteiungen sind nicht der Weg zur vollkommenen Erleuchtung“, nahm er in Dörfern, Marktflecken und Königsstädten nahrhafte Speisen zu sich. Seine Sinne wurden wieder gekräftigt, er besaß wieder die vollkommenen zweiunddreißig Merkmale eines großen Mannes, suchte allmählich den Sitz der Erleuchtung auf, bezwang die fünf Māras und wurde zum Buddha. So ist dies zu verstehen. ‘‘Avacāhaṃ jotipālo, sugataṃ kassapaṃ tadā; Kuto nu bodhi muṇḍassa, bodhi paramadullabhā. „Ich selbst, als Jotipāla, sprach damals zum Sugata Kassapa: ‚Woher soll dem Kahlgeschorenen die Erleuchtung kommen? Die Erleuchtung ist überaus schwer zu erlangen!‘“ ‘‘Tena kammavipākena, acariṃ dukkaraṃ bahuṃ; Chabbassānuruvelāyaṃ, tato bodhimapāpuṇiṃ. „Infolge jener Karma-Reifung vollzog ich viele schwere Kasteiungen sechs Jahre lang in Uruvelā; erst danach erlangte ich die Erleuchtung.“ ‘‘Nāhaṃ etena maggena, pāpuṇiṃ bodhimuttamaṃ; Kummaggena gavesissaṃ, pubbakammena vārito. „Nicht durch jenen Pfad erlangte ich die höchste Erleuchtung; auf einem Irrweg musste ich danach suchen, gehindert durch mein früheres Karma.“ ‘‘Puññapāpaparikkhīṇo, sabbasantāpavajjito; Asoko anupāyāso, nibbāyissamanāsavo’’ti. (apa. thera 1.39.92-95); „Da nun Verdienst und Übel aufgezehrt sind, bin ich frei von allem Fieber; kummerlos, frei von Erschöpfung und ohne Triebe werde ich ins Parinibbāna eingehen.“ Dutiyapañhe – abbhakkhānanti abhi akkhānaṃ paribhāsanaṃ. Atīte kira bodhisatto suddakule jāto apākaṭo appasiddho munāḷi nāma dhutto hutvā paṭivasati. Tadā mahiddhiko mahānubhāvo surabhi nāma paccekabuddho kenaci karaṇīyena tassa samīpaṭṭhānaṃ pāpuṇi. So taṃ disvāva ‘‘dussīlo pāpadhammo ayaṃ samaṇo’’tiādinā abbhācikkhi. So tena akusalanissandena narakādīsu anekavassasahassāni dukkhamanubhavitvā imasmiṃ pacchimattabhāve yadā titthiyā paṭhamataraṃ bhagavato tusitabhavane vasanasamaye ca pākaṭā hutvā sakalajanaṃ vañcetvā dvāsaṭṭhidiṭṭhiyo dīpetvā vicaranti, tadā tusitapurā cavitvā sakyarājakule nibbattitvā kamena buddho jāto. Titthiyā sūriyuggamane khajjopanakā viya vihatalābhasakkārā bhagavati āghātaṃ bandhitvā vicaranti. Tasmiṃ samaye rājagahaseṭṭhi gaṅgāya jālaṃ bandhitvā kīḷanto rattacandanaghaṭikaṃ disvā amhākaṃ gehe candanāni bahūni, imaṃ bhamaṃ āropetvā tena bhamakārehi [Pg.130] pattaṃ likhāpetvā veḷuparamparāya laggetvā ‘‘ye imaṃ pattaṃ iddhiyā āgantvā gaṇhanti, tesaṃ bhattiko bhavissāmī’’ti bheriṃ carāpesi. In der zweiten Frage bedeutet „Abbhakkhāna“ eine böswillige Anschuldigung oder Schmähung. In der Vergangenheit, so heißt es, wurde der Bodhisatta in einer Shudra-Familie geboren, blieb unbekannt und ungebildet. Als ein böswilliger Schlingel namens Munāḷi lebte er dort. Zu jener Zeit kam ein Paccekabuddha namens Surabhi, der von großer übernatürlicher Kraft und Macht war, wegen einer Angelegenheit in seine Nähe. Sobald er ihn sah, verleumdete er ihn mit Worten wie: „Dieser Asket ist sittenlos und von schlechtem Charakter!“ Aufgrund dieses unheilsamen Karma-Nachhalls erlitt er viele tausend Jahre lang Leiden in den Höllen und anderen Welten. In dieser letzten Existenz, als die Sektierer – die bereits bekannt geworden waren, als der Erhabene noch im Tusita-Himmel verweilte, und die die Menschen täuschten, indem sie die zweiundsechzig philosophischen Ansichten lehrten und umherzogen – sahen, dass er aus der Tusita-Stadt herabgestiegen, im königlichen Geschlecht der Sakyer geboren und allmählich zum Buddha geworden war, verloren sie bei Seinem Erscheinen all ihre Gewinne und Ehrerbietungen, geradeso wie Glühwürmchen bei Sonnenaufgang, und zogen mit tiefem Groll gegen den Erhabenen umher. Zu jener Zeit sah ein Großkaufmann aus Rājagaha, der sich beim Auswerfen von Netzen im Ganges vergnügte, ein Stück rotes Sandelholz. Er dachte: „In unserem Haus gibt es bereits viel Sandelholz. Ich werde dieses Stück auf eine Drechselbank spannen, daraus eine Almosenschale drechseln lassen und sie an einer Reihe von Bambusstangen aufhängen lassen.“ Er ließ die Trommel rühren mit der Ankündigung: „Wer auch immer diese Schale mittels übernatürlicher Kraft herabholt, dessen ergebener Unterstützer will ich werden!“ Tadā titthiyā ‘‘naṭṭhamhā dāni naṭṭhamhā dānī’’ti mantetvā nigaṇṭho nāṭaputto sakaparisaṃ evamāha – ‘‘ahaṃ veḷusamīpaṃ gantvā ākāse ullaṅganākāraṃ karomi, ‘tumhe chavadārumayaṃ pattaṃ paṭicca mā iddhiṃ karothā’ti maṃ khandhe gahetvā vārethā’’ti, te tathā gantvā tathā akaṃsu. Da beratschlagten die Sektierer und sagten: „Wir sind verloren! Nun sind wir verloren!“ Nigaṇṭha Nāṭaputta sprach zu seiner Anhängerschaft: „Ich werde mich in die Nähe der Bambusstangen begeben und so tun, als ob ich in die Luft emporfliegen wollte. Ihr aber sollt mich an den Schultern festhalten und mich zurückhalten, indem ihr sagt: ‚Wegen einer Almosenschale aus totem Holz sollt ihr keine übernatürlichen Kräfte demonstrieren!‘“ Sie gingen hin und handelten genau so. Tadā piṇḍolabhāradvājo ca moggallāno ca tigāvute selapabbatamatthake ṭhatvā piṇḍapātagaṇhanatthāya cīvaraṃ pārupantā taṃ kolāhalaṃ suṇiṃsu. Tesu moggallāno piṇḍolabhāradvājaṃ ‘‘tvaṃ ākāsena gantvā taṃ pattaṃ gaṇhāhī’’ti āha. So ‘‘bhante, tumheyeva bhagavatā iddhimantānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapitā, tumheva gaṇhathā’’ti āha. Tathāpi ‘‘mayā āṇatto tvameva gaṇhāhī’’ti āṇatto attanā ṭhitaṃ tigāvutaṃ selapabbataṃ pādatale laggetvā ukkhaliyā pidhānaṃ viya sakalarājagahanagaraṃ chādesi, tadā nagaravāsino phaḷikapabbate āvutaṃ rattasuttamiva taṃ theraṃ passitvā ‘‘bhante bhāradvāja, amhe rakkhathā’’ti ugghosayiṃsu, bhītā suppādīni sīse akaṃsu. Tadā thero taṃ pabbataṃ ṭhitaṭṭhāne vissajjetvā iddhiyā gantvā taṃ pattaṃ aggahesi, tadā nagaravāsino mahākolāhalamakaṃsu. Zu dieser Zeit standen Piṇḍola-Bhāradvāja und Moggallāna auf dem Gipfel eines drei Meilen hohen Felsberges. Während sie ihre Roben anlegten, um Almosen zu sammeln, hörten sie den Lärm. Moggallāna sprach zu Piṇḍola-Bhāradvāja: „Gehe du durch die Luft und hole diese Schale!“ Er antwortete: „Ehrwürdiger Herr, Ihr selbst seid vom Erhabenen an die Spitze derer gestellt worden, die über magische Kräfte verfügen; holt Ihr sie doch!“ Obwohl er dies sagte, wies Moggallāna ihn an: „Da ich es dir auftrage, hole du sie!“ Daraufhin hob er den drei Meilen hohen Felsberg, auf dem er stand, mit seinen Zehen an und deckte damit die gesamte Stadt Rājagaha ab wie ein Deckel einen Kochtopf. Als die Stadtbewohner den Thera sahen, der wie ein roter Faden wirkte, der um einen Kristallberg gewickelt ist, riefen sie laut: „Ehrwürdiger Bhāradvāja, beschützt uns!“ Voller Angst hielten sie sich geflochtene Körbe und Siebe über die Köpfe. Da setzte der Thera den Berg wieder an seinen ursprünglichen Platz zurück, schwebte mit übernatürlicher Kraft herbei, nahm die Schale an sich, und die Stadtbewohner veranstalteten ein riesiges Spektakel. Bhagavā veḷuvanārāme nisinno taṃ saddaṃ sutvā ‘‘kiṃ eso saddo’’ti ānandaṃ pucchi. ‘‘Bhāradvājena, bhante, pattassa gahitattā santuṭṭhā nagaravāsino ukkuṭṭhisaddamakaṃsū’’ti āha. Tadā bhagavā āyatiṃ parūpavādamocanatthaṃ taṃ pattaṃ āharāpetvā bhedāpetvā añjanupapisanaṃ katvā bhikkhūnaṃ dāpesi, dāpetvā ca pana ‘‘na, bhikkhave, iddhivikubbanā kātabbā, yo kareyya, āpatti dukkaṭassā’’ti (cūḷava. 252 thokaṃ visadisaṃ) sikkhāpadaṃ paññāpesi. Als der Erhabene im Veḷuvana-Kloster saß und diesen Lärm hörte, fragte er Ānanda: „Was ist das für ein Lärm?“ Er antwortete: „Ehrwürdiger Herr, weil Bhāradvāja die Schale geholt hat, haben die hocherfreuten Stadtbewohner einen großen Jubelschrei ausgestoßen.“ Da ließ der Erhabene, um künftige Anschuldigungen von anderen abzuwenden, die Schale herbeibringen, ließ sie zertrümmern, zu Augensalben-Pulver zerreiben und an die Mönche verteilen. Nachdem er dies veranlasst hatte, legte er die Ordensregel fest: „Ihr Mönche dürft keine übernatürlichen Wunderkräfte vorführen. Wer dies tut, begeht ein Vergehen des Fehlverhaltens (Dukkaṭa).“ Tato titthiyā ‘‘samaṇena kira gotamena sāvakānaṃ sikkhāpadaṃ paññattaṃ, te jīvitahetupi taṃ nātikkamanti, mayaṃ iddhipāṭihāriyaṃ karissāmā’’ti tattha tattha rāsibhūtā kolāhalamakaṃsu. Atha rājā bimbisāro taṃ sutvā bhagavato santikaṃ gantvā vanditvā ekamantaṃ nisinno bhagavantamevamāha [Pg.131] – ‘‘titthiyā, bhante, ‘iddhipāṭihāriyaṃ karissāmā’ti ugghosentī’’ti. ‘‘Ahampi, mahārāja, karissāmī’’ti. ‘‘Nanu, bhante, bhagavatā sāvakānaṃ sikkhāpadaṃ paññatta’’nti. ‘‘Tameva, mahārāja, pucchissāmi, tavuyyāne ambaphalādīni khādantānaṃ ‘ettako daṇḍo’ti daṇḍaṃ ṭhapento tavāpi ekato katvā ṭhapesī’’ti. ‘‘Na mayhaṃ, bhante, daṇḍo’’ti. ‘‘Evaṃ, mahārāja, na mayhaṃ sikkhāpadaṃ paññattaṃ atthī’’ti. ‘‘Kattha, bhante, pāṭihāriyaṃ bhavissatī’’ti? ‘‘Sāvatthiyā samīpe kaṇḍambarukkhamūle, mahārājā’’ti. ‘‘Sādhu, bhante, taṃ passissāmā’’ti. Tato titthiyā ‘‘kaṇḍambarukkhamūle kira pāṭihāriyaṃ bhavissatī’’ti sutvā nagarassa sāmantā ambarukkhe chedāpesuṃ, nāgarā mahāaṅgaṇaṭṭhāne mañcātimañcaṃ aṭṭādayo bandhiṃsu, sakalajambudīpavāsino rāsibhūtā puratthimadisāyameva dvādasayojanāni pharitvā aṭṭhaṃsu. Sesadisāsupi tadanurūpenākārena sannipatiṃsu. Daraufhin machten die Sektierer hier und dort in Gruppen großen Lärm, indem sie sagten: ‚Vom Asketen Gotama wurde wohl eine Übungsregel für seine Jünger festgelegt, und selbst um ihres Lebens willen übertreten sie diese nicht. Wir aber werden ein Wunder an übernatürlicher Macht vollbringen!‘ Als nun König Bimbisāra dies hörte, begab er sich zum Erhabenen, erwies ihm die Ehrung, setzte sich seitlich nieder und sprach zum Erhabenen: ‚Ehrwürdiger Herr, die Sektierer rufen laut aus: „Wir werden ein Wunder an übernatürlicher Macht vollbringen!“‘ – ‚Auch ich, o Großkönig, werde eines vollbringen.‘ – ‚Aber, ehrwürdiger Herr, hat der Erhabene nicht eine Übungsregel für seine Jünger festgelegt?‘ – ‚Eben darüber, o Großkönig, will ich dich fragen. Wenn du für diejenigen, die die Mangofrüchte in deinem Garten essen, eine Strafe festlegst mit den Worten: „Dies ist die Strafe“, schließt diese Strafe dann auch dich selbst ein?‘ – ‚Nein, ehrwürdiger Herr, die Strafe gilt für mich nicht.‘ – ‚Ebenso, o Großkönig, gibt es für mich keine festlegte Übungsregel.‘ – ‚Wo, ehrwürdiger Herr, wird das Wunder stattfinden?‘ – ‚In der Nähe von Sāvatthī, am Fuße des Kaṇḍamba-Mangobaumes, o Großkönig.‘ – ‚Gut, ehrwürdiger Herr, wir werden es ansehen.‘ Daraufhin ließen die Sektierer, als sie hörten: ‚Das Wunder soll am Fuße des Kaṇḍamba-Mangobaumes stattfinden‘, rings um die Stadt die Mangobäume fällen. Die Stadtbewohner errichteten auf dem großen Platz Tribünen über Tribünen, Gerüste und Ähnliches. Die Bewohner des gesamten Jambudīpa strömten in großen Massen herbei und standen allein in östlicher Richtung zwölf Yojana weit ausgebreitet. Auch in den übrigen Himmelsrichtungen versammelten sie sich in entsprechender Weise. Bhagavāpi kāle sampatte āsāḷhipuṇṇamāsiyaṃ pātova kattabbakiccaṃ niṭṭhāpetvā taṃ ṭhānaṃ gantvā nisīdi. Tasmiṃ khaṇe kaṇḍo nāma uyyānapālo kipillikapuṭe supakkaṃ ambaphalaṃ disvā ‘‘sacāhaṃ imaṃ rañño dadeyyaṃ, kahāpaṇādisāraṃ labheyyaṃ, bhagavato upanāmite pana idhalokaparalokesu sampatti bhavissatī’’ti bhagavato upanāmesi. Bhagavā taṃ paṭiggahetvā ānandattheraṃ āṇāpesi – ‘‘imaṃ phalaṃ madditvā pānaṃ dehī’’ti. Thero tathā akāsi. Bhagavā ambarasaṃ pivitvā ambaṭṭhiṃ uyyānapālassa datvā ‘‘imaṃ ropehī’’ti āha. So vālukaṃ viyūhitvā taṃ ropesi, ānandatthero kuṇḍikāya udakaṃ āsiñci. Tasmiṃ khaṇe ambaṅkuro uṭṭhahitvā mahājanassa passantasseva sākhāviṭapapupphaphalapallavabharito paññāyittha. Patitaṃ ambaphalaṃ khādantā sakalajambudīpavāsino khayaṃ pāpetuṃ nāsakkhiṃsu. Auch der Erhabene begab sich, als die Zeit gekommen war, am Vollmondtag des Monats Āsāḷha frühmorgens nach der Erledigung seiner täglichen Pflichten an jenen Ort und setzte sich nieder. In diesem Augenblick sah ein Gärtner namens Kaṇḍa eine wohlreife Mango in einem Nest von roten Ameisen und dachte: ‚Wenn ich diese dem König gäbe, würde ich wertvolle Geschenke wie Kahāpaṇas und Ähnliches erhalten. Wenn ich sie jedoch dem Erhabenen darbiete, wird mir das Glück in dieser Welt und in der jenseitigen Welt bringen.‘ Und so bot er sie dem Erhabenen dar. Der Erhabene nahm sie an und wies den Ehrwürdigen Ānanda an: ‚Zerdrücke diese Frucht und bereite einen Trank daraus!‘ Der Ehrwürdige tat dies. Nachdem der Erhabene den Saft der Mango getrunken hatte, gab er den Mangokern dem Gärtner und sprach: ‚Pflanze diesen ein!‘ Jener scharrte den Sand beiseite und pflanzte ihn ein, und der Ehrwürdige Ānanda goss Wasser aus einem Krug darüber. In jenem Augenblick trieb ein Mangospross aus und wurde vor den Augen der großen Menschenmenge sichtbar, reich beladen mit Ästen, Zweigen, Blüten, Früchten und jungen Blättern. Selbst die Bewohner des gesamten Jambudīpa, die von den herabgefallenen Mangofrüchten aßen, konnten sie nicht aufbrauchen. Atha bhagavā puratthimacakkavāḷato yāva pacchimacakkavāḷaṃ, tāva imasmiṃ cakkavāḷe mahāmerumuddhani ratanacaṅkamaṃ māpetvā anekaparisāhi sīhanādaṃ nadāpento dhammapadaṭṭhakathāyaṃ vuttanayena mahāiddhipāṭihāriyaṃ katvā titthiye madditvā te vippakāraṃ pāpetvā pāṭihīrāvasāne purimabuddhāciṇṇavasena tāvatiṃsabhavanaṃ gantvā tattha vassaṃvuṭṭho nirantaraṃ temāsaṃ [Pg.132] abhidhammaṃ desetvā mātuppamukhānaṃ anekadevatānaṃ sotāpattimaggādhigamanaṃ katvā, vuṭṭhavasso devorohanaṃ katvā anekadevabrahmagaṇaparivuto saṅkassapuradvāraṃ oruyha lokānuggahaṃ akāsi. Tadā bhagavato lābhasakkāro jambudīpamajjhottharamāno pañcamahāgaṅgā viya ahosi. Daraufhin erschuf der Erhabene in diesem Weltsystem auf dem Gipfel des Berges Meru einen Juwelen-Wandelgang, der sich vom östlichen Weltsystem bis zum westlichen Weltsystem erstreckte. Er ließ vor einer großen Zuhörerschaft einen Löwenruf erschallen, vollbrachte ein großes Wunder an übernatürlicher Macht auf die im Dhammapada-Kommentar beschriebene Weise, demütigte die Sektierer und trieb sie in die Enge. Am Ende des Wunders begab er sich gemäß dem Brauch früherer Buddhas in den Tāvatiṃsa-Himmel. Dort verbrachte er die Regenzeit, lehrte ununterbrochen drei Monate lang das Abhidhamma und bewirkte, dass zahlreiche Gottheiten, angeführt von seiner Mutter, den Pfad des Stromeintritts erlangten. Nach Beendigung der Regenzeit vollzog er den Herabstieg aus der Götterwelt und stieg, umgeben von einem großen Gefolge aus Göttern und Brahmas, am Stadttor von Saṅkassa herab, um der Welt zum Segen zu gereichen. Zu jener Zeit überfluteten die Gaben und Ehrungen für den Erhabenen ganz Jambudīpa wie die pfünf großen Ströme. Atha titthiyā parihīnalābhasakkārā dukkhī dummanā pattakkhandhā adhomukhā nisīdiṃsu. Tadā tesaṃ upāsikā ciñcamāṇavikā nāma ativiya rūpaggappattā te tathā nisinne disvā ‘‘kiṃ, bhante, evaṃdukkhī dummanā nisinnā’’ti pucchi. ‘‘Kiṃ pana tvaṃ, bhagini, appossukkāsī’’ti? ‘‘Kiṃ, bhante’’ti? ‘‘Bhagini, samaṇassa gotamassa uppādakālato paṭṭhāya mayaṃ hatalābhasakkārā, nagaravāsino amhe na kiñci maññantī’’ti. ‘‘Mayā ettha kiṃ kātabba’’nti? ‘‘Tayā samaṇassa gotamassa avaṇṇaṃ uppādetuṃ vaṭṭatī’’ti. Sā ‘‘na mayhaṃ bhāro’’ti vatvā tattha ussāhaṃ karontī vikāle jetavanavihāraṃ gantvā titthiyānaṃ upassaye vasitvā pāto nagaravāsīnaṃ gandhādīni gahetvā bhagavantaṃ vandanatthāya gamanasamaye jetavanā viya nikkhantā, ‘‘kattha sayitā’’ti puṭṭhā ‘‘kiṃ tumhākaṃ mama sayitaṭṭhānenā’’ti vatvā pakkāmi. Sā kamena gacchante kāle pucchitā ‘‘samaṇenāhaṃ gotamena ekagandhakuṭiyaṃ sayitvā nikkhantā’’ti āha. Taṃ bālaputhujjanā saddahiṃsu, paṇḍitā sotāpannādayo na saddahiṃsu. Ekadivasaṃ sā dārumaṇḍalaṃ udare bandhitvā upari rattapaṭaṃ paridahitvā gantvā sarājikāya parisāya dhammadesanatthāya nisinnaṃ bhagavantaṃ evamāha – ‘‘bho samaṇa, tvaṃ dhammaṃ desesi, tuyhaṃ paṭicca uppannadārakagabbhiniyā mayhaṃ lasuṇamaricādīni na vicāresī’’ti? ‘‘Tathābhāvaṃ, bhagini, tvañceva pajānāsi, ahañcā’’ti. Sā ‘‘evameva methunasaṃsaggasamayaṃ dveyeva jānanti, na aññe’’ti āha. Da saßen die Sektierer, deren Gaben und Ehrungen geschwunden waren, traurig, niedergeschlagen, mit hängenden Schultern und gesenktem Blick da. Zu jener Zeit sah ihre Anhängerin namens Ciñcamāṇavikā, die von außerordentlicher Schönheit war, sie so dasitzen und fragte: ‚Warum, ehrwürdige Herren, sitzt ihr so traurig und niedergeschlagen da?‘ – ‚Warum aber, Schwester, bist du so unbesorgt?‘ – ‚Wie meint ihr das, ehrwürdige Herren?‘ – ‚Schwester, seit dem Auftreten des Asketen Gotama haben wir unsere Gaben und Ehrungen verloren, und die Stadtbewohner achten uns gar nicht mehr.‘ – ‚Was soll ich in dieser Sache tun?‘ – ‚Du solltest über den Asketen Gotama üble Nachrede verbreiten.‘ Sie sagte: ‚Überlasst das mir!‘ und bemühte sich fortan darum. Am Abend ging sie zum Jetavana-Kloster, übernachtete in der Herberge der Sektierer und kam am Morgen, zu der Zeit, als die Stadtbewohner mit Riechstoffen und anderem zum Jetavana aufbrachen, um den Erhabenen zu verehren, scheinbar aus dem Jetavana heraus. Als sie gefragt wurde: ‚Wo hast du geschlafen?‘, sagte sie: ‚Was geht euch mein Schlafplatz an?‘ und ging weiter. Im Laufe der Zeit sagte sie auf wiederholte Nachfragen: ‚Ich habe beim Asketen Gotama in derselben Duftkammer geschlafen und bin von dort gekommen.‘ Die törichten Weltlinge glaubten dies; die Weisen aber, die Stromeingetretenen und die anderen, glaubten es nicht. Eines Tages band sie sich eine hölzerne Scheibe um den Bauch, bedeckte sie mit einem roten Tuch, ging zu dem inmitten einer Versammlung samt dem König zur Lehrverkündigung sitzenden Erhabenen und sagte zu ihm: ‚O Asket, du predigst zwar die Lehre, aber du kümmerst dich nicht um Knoblauch, Pfeffer und Ähnliches für mich, die durch dich schwanger geworden ist!‘ – ‚Ob dem so ist, Schwester, das weißt nur du allein und ich.‘ Da sagte sie: ‚Ganz genau, zur Zeit der geschlechtlichen Vereinigung wissen es nur zwei Personen, keine anderen.‘ Tasmiṃ khaṇe sakkassa paṇḍukambalasilāsanaṃ uṇhākāraṃ dassesi. Sakko āvajjento taṃ kāraṇaṃ ñatvā dve devaputte āṇāpesi – ‘‘tumhesu eko mūsikavaṇṇaṃ māpetvā tassā dārumaṇḍalassa bandhanaṃ chindatu, eko vātamaṇḍalaṃ samuṭṭhāpetvā pārutapaṭaṃ uddhaṃ khipatū’’ti. Te gantvā tathā akaṃsu. Dārumaṇḍalaṃ patamānaṃ tassā pādapiṭṭhiṃ bhindi. Dhammasabhāyaṃ sannipatitā puthujjanā sabbe ‘‘are, duṭṭhacori, tvaṃ evarūpassa lokattayasāmino [Pg.133] evarūpaṃ abbhakkhānaṃ akāsī’’ti uṭṭhahitvā ekekamuṭṭhipahāraṃ datvā sabhāya nīhariṃsu, dassanātikkantāya pathavī vivaramadāsi. Tasmiṃ khaṇe avīcito jālā uṭṭhahitvā kuladattikena rattakambaleneva taṃ acchādetvā avīcimhi pakkhipi, bhagavato lābhasakkāro atirekataro ahosi. Tena vuttaṃ – In diesem Moment zeigte der rötliche Steinthron Sakkas (der Paṇḍukambala-Stein) Anzeichen von Hitze. Als Sakka darüber nachsann und den Grund dafür erkannte, befahl er zwei Göttersöhnen: „Einer von euch soll die Gestalt einer Maus annehmen und die Schnur ihrer Holzscheibe durchbeißen, und einer soll einen Wirbelwind entfachen und ihr Obergewand nach oben wehen.“ Sie gingen hin und taten dies. Als die Holzscheibe herabfiel, verletzte sie den Rücken ihres Fußes. Alle in der Dhamma-Halle versammelten Weltlinge riefen aus: „O du boshafte Betrügerin, du hast eine solche falsche Anschuldigung gegen den Herrn der drei Welten erhoben!“, erhoben sich, versetzten ihr jeweils einen Faustschlag und warfen sie aus der Halle. Als sie sich außerhalb des Sichtfeldes befand, tat sich die Erde auf. In diesem Augenblick schlug eine Flamme aus der Avīci-Hölle empor, hüllte sie ein wie eine von der Familie geschenkte rote Decke und stürzte sie in die Avīci-Hölle. Die Gaben und die Verehrung für den Erhabenen nahmen daraufhin noch weiter zu. Dazu wurde Folgendes gesagt: ‘‘Sabbābhibhussa buddhassa, nando nāmāsi sāvako; Taṃ abbhakkhāya niraye, ciraṃ saṃsaritaṃ mayā. „Der allüberwindende Buddha hatte einen Jünger namens Nanda. Weil ich diesen fälschlich beschuldigte, wanderte ich lange Zeit in der Hölle umher. ‘‘Dasavassasahassāni, niraye saṃsariṃ ciraṃ; Manussabhāvaṃ laddhāhaṃ, abbhakkhānaṃ bahuṃ labhiṃ. „Zehntausend Jahre lang wanderte ich durch die Hölle; als ich das menschliche Dasein erlangte, erfuhr ich viele falsche Anschuldigungen. ‘‘Tena kammāvasesena, ciñcamāṇavikā mamaṃ; Abbhācikkhi abhūtena, janakāyassa aggato’’ti. (apa. thera 1.39.70-72); „Aufgrund des verbliebenen Rests jenes Wirkens beschuldigte mich die junge Frau Ciñcā fälschlicherweise vor den Augen der Menschenmenge.“ Tatiyapañhe – abbhakkhānanti abhi akkhānaṃ akkosanaṃ. Atīte kira bodhisatto apākaṭajātiyaṃ uppanno munāḷi nāma dhutto hutvā dujjanasaṃsaggabalena surabhiṃ nāma paccekabuddhaṃ ‘‘dussīlo pāpadhammo ayaṃ bhikkhū’’ti akkosi. So tena akusalena vacīkammena bahūni vassasahassāni niraye paccitvā imasmiṃ pacchimattabhāve dasapāramitāsaṃsiddhibalena buddho jāto lābhaggayasaggappatto ahosi. Puna titthiyā ussāhajātā – ‘‘kathaṃ nu kho samaṇassa gotamassa ayasaṃ uppādessāmā’’ti dukkhī dummanā nisīdiṃsu. Tadā sundarī nāmekā paribbājikā te upasaṅkamitvā vanditvā ṭhitā tuṇhībhūte kiñci avadante disvā ‘‘kiṃ mayhaṃ doso’’ti pucchi. ‘‘Samaṇena gotamena amhe viheṭhiyamāne tvaṃ appossukkā viharissasi, idaṃ tava doso’’ti. ‘‘Evamahaṃ tattha kiṃ karissāmī’’ti? ‘‘Tvaṃ samaṇassa gotamassa avaṇṇaṃ uppādetuṃ sakkhissasī’’ti? ‘‘Sakkhissāmi, ayyā’’ti vatvā tato paṭṭhāya vuttanayena diṭṭhadiṭṭhānaṃ ‘‘samaṇena gotamena ekagandhakuṭiyaṃ sayitvā nikkhantā’’ti vatvā akkosati paribhāsati. Titthiyāpi ‘‘passatha, bho, samaṇassa gotamassa kamma’’nti akkosanti paribhāsanti. Vuttañhetaṃ – In der dritten Frage: „Falsche Anschuldigung“ (Abbhakkhāna) bedeutet eine schwerwiegende Anschuldigung oder Schmähung. In der Vergangenheit wurde der Bodhisatta in einer unbedeutenden Familie geboren, wurde zu einem Wüstling namens Munāḷi und schmähte unter dem Einfluss des Umgangs mit schlechten Menschen einen Paccekabuddha namens Surabhi mit den Worten: „Dieser Mönch ist tugendlos und von bösem Charakter.“ Durch diese unheilsame verbale Tat schmorte er viele tausend Jahre lang in der Hölle. In dieser seiner letzten Existenz wurde er durch die Kraft der Vollendung der zehn Vollkommenheiten als Buddha geboren und erreichte den Gipfel an Gewinn und Ruhm. Später wurden die Sektierer unruhig und saßen betrübt und niedergeschlagen da, während sie dachten: „Wie können wir dem Asketen Gotama nur Schande bereiten?“ Da trat eine Wanderin namens Sundarī an sie heran, verneigte sich und blieb stehen. Als sie sah, dass sie schwiegen und nichts sagten, fragte sie: „Was ist meine Schuld?“ – „Während wir von dem Asketen Gotama bedrängt werden, lebst du gleichgültig dahin. Das ist deine Schuld.“ – „Was soll ich denn dort tun?“ – „Wirst du in der Lage sein, den Ruf des Asketen Gotama zu schädigen?“ – „Ich werde es können, edle Herren“, sagte sie. Von da an ging sie auf die beschriebene Weise an Orte, an denen sie gesehen wurde, und rief schmähend und lästernd aus: „Ich habe mit dem Asketen Gotama in derselben Duftkammer geschlafen und komme gerade von dort.“ Auch die Sektierer schmähten und lästerten: „Seht nur, ihr Herren, das Tun des Asketen Gotama!“ Dies wurde nämlich gesagt: ‘‘Munāḷi nāmahaṃ dhutto, pubbe aññāsu jātisu; Paccekabuddhaṃ surabhiṃ, abbhācikkhiṃ adūsakaṃ. „In früheren Leben war ich ein Wüstling namens Munāḷi; ich beschuldigte fälschlicherweise den unschuldigen Paccekabuddha Surabhi. ‘‘Tena [Pg.134] kammavipākena, niraye saṃsariṃ ciraṃ; Bahū vassasahassāni, dukkhaṃ vedesi vedanaṃ. „Aufgrund dieser Kamma-Reifung wanderte ich lange Zeit in der Hölle umher; viele tausend Jahre lang erlitt ich schmerzvolle Empfindungen. ‘‘Tena kammāvasesena, idha pacchimake bhave; Abbhakkhānaṃ mayā laddhaṃ, sundarikāya kāraṇā’’ti. (apa. thera 1.39.67-69); „Aufgrund des verbliebenen Rests jenes Wirkens habe ich hier in meinem letzten Dasein falsche Anschuldigungen wegen Sundarī erfahren.“ Catutthapañhe – abbhakkhānaṃ abhi visesena akkosanaṃ paribhāsanaṃ. Atīte kira bodhisatto brāhmaṇakule uppanno bahussuto bahūhi sakkato pūjito tāpasapabbajjaṃ pabbajitvā himavante vanamūlaphalāhāro bahumāṇave mante vācento vāsaṃ kappesi. Eko pañcābhiññāaṭṭhasamāpattilābhī tāpaso tassa santikaṃ agamāsi. So taṃ disvāva issāpakato taṃ adūsakaṃ isiṃ ‘‘kāmabhogī kuhako ayaṃ isī’’ti abbhācikkhi, attano sisse ca āha – ‘‘ayaṃ isi evarūpo anācārako’’ti. Tepi tatheva akkosiṃsu paribhāsiṃsu. So tena akusalakammavipākena vassasahassāni niraye dukkhamanubhavitvā imasmiṃ pacchimattabhāve buddho hutvā lābhaggayasaggappatto ākāse puṇṇacando viya pākaṭo jāto. Tatheva titthiyā abbhakkhānenapi asantuṭṭhā punapi sundariyā abbhakkhānaṃ kāretvā surādhutte pakkosāpetvā lañjaṃ datvā ‘‘tumhe sundariṃ māretvā jetavanadvārasamīpe mālākacavarena chādethā’’ti āṇāpesuṃ. Te tathā kariṃsu. Tato titthiyā ‘‘sundariṃ na passāmā’’ti rañño ārocesuṃ. Rājā ‘‘pariyesathā’’ti āha. Te attanā pātitaṭṭhānato gahetvā mañcakaṃ āropetvā rañño dassetvā ‘‘passatha, bho, samaṇassa gotamassa sāvakānaṃ kamma’’nti bhagavato bhikkhusaṅghassa ca sakalanagare avaṇṇaṃ ugghosentā vicariṃsu. Sundariṃ āmakasusāne aṭṭake ṭhapesuṃ. Rājā ‘‘sundarimārake pariyesathā’’ti āṇāpesi. Tadā dhuttā suraṃ pivitvā ‘‘tvaṃ sundariṃ māresi, tvaṃ māresī’’ti kalahaṃ kariṃsu. Rājapurisā te dhutte gahetvā rañño dassesuṃ. Rājā ‘‘kiṃ, bhaṇe, tumhehi sundarī māritā’’ti? ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Kehi āṇattā’’ti? ‘‘Titthiyehi, devā’’ti. Rājā titthiye āharāpetvā bandhāpetvā ‘‘gacchatha, bhaṇe, ‘buddhassa avaṇṇatthāya amhehi sayameva sundarī mārāpitā, bhagavā tassa sāvakā ca akārakā’ti ugghosathā’’ti āha. Te tathā akaṃsu[Pg.135]. Sakalanagaravāsino nikkaṅkhā ahesuṃ. Rājā titthiye ca dhutte ca mārāpetvā chaḍḍāpeti. Tato bhagavato bhiyyosomattāya lābhasakkāro vaḍḍhi. Tena vuttaṃ – In der vierten Frage: „Falsche Anschuldigung“ bedeutet insbesondere heftige Schmähung und übles Nachreden. In der Vergangenheit wurde der Bodhisatta in einer Brahmanenfamilie geboren, war sehr gelehrt, wurde von vielen geehrt und verehrt, und nachdem er in den Stand eines Asketen eingetreten war, lebte er im Himalaya, ernährte sich von wilden Wurzeln und Früchten und lehrte viele junge Brahmanen die Veden. Ein Asket, der die fünd übernormalen Wissenskräfte und die acht Errungenschaften erlangt hatte, kam zu ihm. Als der Bodhisatta ihn sah, beschuldigte er aus Neid den unschuldigen Seher fälschlicherweise mit den Worten: „Dieser Seher ist ein Sinnenlüstling und Heuchler!“, und sagte auch zu seinen Schülern: „Dieser Seher führt ein solches Fehlverhalten.“ Auch diese schmähten und lästerten ihn auf dieselbe Weise. Durch die Reifung dieses unheilsamen Wirkens erlitt er jahrtausendelang Qualen in der Hölle. In dieser seiner letzten Existenz wurde er Buddha, erreichte den Gipfel an Gewinn und Ruhm und wurde so berühmt wie der Vollmond am Himmel. Dennoch gaben sich die Sektierer selbst mit dieser falschen Anschuldigung nicht zufrieden. Sie inszenierten erneut eine falsche Anschuldigung unter Verwendung von Sundarī, riefen trunkene Wüstlinge herbei, gaben ihnen ein Bestechungsgeld und befahlen: „Tötet Sundarī und bedeckt sie in der Nähe des Tors von Jetavana mit Blumenabfällen.“ Sie taten dies. Daraufhin meldeten die Sektierer dem König: „Wir können Sundarī nicht finden.“ Der König sagte: „Sucht nach ihr.“ Sie holten sie von dem Ort, an dem sie abgelegt worden war, legten sie auf eine Trage, zeigten sie dem König und zogen durch die ganze Stadt, wobei sie lautstark den Ruf des Erhabenen und des Bhikkhu-Saṅgha schädigten: „Seht nur, ihr Herren, das Tun der Jünger des Asketen Gotama!“ Sie legten Sundarī auf einer Plattform auf dem Leichenacker ab. Der König befahl: „Sucht nach den Mördern von Sundarī.“ Da tranken die Wüstlinge Alkohol und begannen zu streiten: „Du hast Sundarī getötet!“, „Nein, du hast sie getötet!“ Die königlichen Wachen nahmen diese Wüstlinge fest und führten sie vor den König. Der König fragte: „Sagt, habt ihr Sundarī getötet?“ – „Ja, Majestät.“ – „Von wem wurdet ihr beauftragt?“ – „Von den Sektierern, Majestät.“ Der König ließ die Sektierer herbeiholen, fesseln und befahl: „Geht, ihr Männer, und verkündet laut: ‚Um den Buddha in Verruf zu bringen, haben wir selbst Sundarī töten lassen; der Erhabene und seine Jünger haben damit nichts zu tun.‘“ Sie taten dies. Alle Einwohner der Stadt wurden frei von jedem Zweifel. Der König ließ die Sektierer und die Wüstlinge hinrichten und ihre Körper wegwerfen. Danach nahmen die Gaben und die Verehrung für den Erhabenen noch viel mehr zu. Dazu wurde Folgendes gesagt: ‘‘Brāhmaṇo sutavā āsiṃ, ahaṃ sakkatapūjito; Mahāvane pañcasate, mante vācemi māṇave. „Ich war ein gelehrter Brahmane, geachtet und verehrt; im großen Wald lehrte ich fünfhundert junge Brahmanen die heiligen Sprüche. ‘‘Tatthāgato isi bhīmo, pañcābhiñño mahiddhiko; Tañcāhaṃ āgataṃ disvā, abbhācikkhiṃ adūsakaṃ. „Dorthin kam der mächtige Seher Bhīma, der die fünd übernormalen Wissenskräfte besaß und von großer Macht war. Als ich ihn ankommen sah, beschuldigte ich den Unschuldigen fälschlicherweise. ‘‘Tatohaṃ avacaṃ sisse, kāmabhogī ayaṃ isi; Mayhampi bhāsamānassa, anumodiṃsu māṇavā. „Daraufhin sagte ich zu meinen Schülern: ‚Dieser Seher ist ein Sinnenlüstling.‘ Und als ich so sprach, stimmten mir die jungen Brahmanen zu.“ ‘‘Tato māṇavakā sabbe, bhikkhamānaṃ kule kule; Mahājanassa āhaṃsu, kāmabhogī ayaṃ isi. Daraufhin sagten alle Jünglinge zu den Menschen bei den Familien, bei denen um Almosen gebettelt wurde: „Dieser Seher ist einer, der den Sinnenlüsten nachgeht.“ ‘‘Tena kammavipākena, pañcabhikkhusatā ime; Abbhakkhānaṃ labhuṃ sabbe, sundarikāya kāraṇā’’ti. (apa. thera 1.39.73-77); Durch die Reifung dieses Kamma wurden alle diese fünfhundert Mönche wegen Sundarikā verleumdet. Pañcame pañhe – silāvedhoti āhatacitto silaṃ pavijjhi. Atīte kira bodhisatto ca kaniṭṭhabhātā ca ekapituputtā ahesuṃ. Te pitu accayena dāse paṭicca kalahaṃ karontā aññamaññaṃ viruddhā ahesuṃ. Bodhisatto attano balavabhāvena kaniṭṭhabhātaraṃ ajjhottharitvā tassupari pāsāṇaṃ pavijjhesi. So tena kammavipākena narakādīsu anekavassasahassāni dukkhamanubhavitvā imasmiṃ pacchimattabhāve buddho jāto. Devadatto rāhulakumārassa mātulo pubbe serivāṇijakāle bodhisattena saddhiṃ vāṇijo ahosi, te ekaṃ paṭṭanagāmaṃ patvā ‘‘tvaṃ ekavīthiṃ gaṇhāhi, ahampi ekavīthiṃ gaṇhāmī’’ti dvepi paviṭṭhā. Tesu devadattassa paviṭṭhavīthiyaṃ jiṇṇaseṭṭhibhariyā ca nattā ca dveyeva ahesuṃ, tesaṃ mahantaṃ suvaṇṇathālakaṃ malaggahitaṃ bhājanantare ṭhapitaṃ hoti, taṃ suvaṇṇathālakabhāvaṃ ajānantī ‘‘imaṃ thālakaṃ gahetvā piḷandhanaṃ dethā’’ti āha. So taṃ gahetvā sūciyā lekhaṃ kaḍḍhitvā suvaṇṇathālakabhāvaṃ ñatvā ‘‘thokaṃ datvā gaṇhissāmī’’ti cintetvā gato. Atha bodhisattaṃ dvārasamīpaṃ āgataṃ disvā ‘‘nattā, ayye[Pg.136], mayhaṃ kacchapuṭaṃ piḷandhanaṃ dethā’’ti. Sā taṃ pakkosāpetvā nisīdāpetvā taṃ thālakaṃ datvā ‘‘imaṃ gahetvā mayhaṃ nattāya kacchapuṭaṃ piḷandhanaṃ dethā’’ti. Bodhisatto taṃ gahetvā suvaṇṇathālakabhāvaṃ ñatvā ‘‘tena vañcitā’’ti ñatvā attano pasibbakāya ṭhapitaaṭṭhakahāpaṇe avasesabhaṇḍañca datvā kacchapuṭaṃ piḷandhanaṃ kumārikāya hatthe piḷandhāpetvā agamāsi. So vāṇijo punāgantvā pucchi. ‘‘Tāta, tvaṃ na gaṇhittha, mayhaṃ putto idañcidañca datvā taṃ gahetvā gato’’ti. So taṃ sutvāva hadayena phālitena viya dhāvitvā anubandhi. Bodhisatto nāvaṃ āruyha pakkhandi. So ‘‘tiṭṭha, mā palāyi mā palāyī’’ti vatvā ‘‘nibbattanibbattabhave taṃ nāsetuṃ samattho bhaveyya’’nti patthanaṃ akāsi. Zur fünften Frage – „silāvedho“ [das Werfen eines Steins] bedeutet, dass er mit zornigem Geist einen Stein schleuderte. In der Vergangenheit, so heißt es, waren der Bodhisatta und sein jüngerer Bruder Söhne desselben Vaters. Nach dem Tod des Vaters gerieten sie wegen der Sklaven in Streit und wurden miteinander verfeindet. Der Bodhisatta überwältigte aufgrund seiner größeren Stärke den jüngeren Bruder, unterdrückte ihn und schleuderte einen Stein auf ihn. Durch die Reifung dieses Kamma erlitt er viele tausend Jahre lang Leid in den Höllen und anderen niederen Welten und wurde in dieser letzten Existenz als Buddha geboren. Devadatta, der Onkel des Prinzen Rāhula, war früher in der Zeit des Händlers von Seriva zusammen mit dem Bodhisatta ein Händler. Sie kamen in eine Hafenstadt und vereinbarten: „Nimm du die eine Straße, ich nehme auch eine Straße“, und so traten beide ein. Unter ihnen gab es auf der von Devadatta betretenen Straße nur die alte Frau eines verarmten Großkaufmanns und ihre Enkelin. Sie besaßen eine große goldene Schale, die angelaufen zwischen anderen Gefäßen stand. Da sie nicht wussten, dass es eine goldene Schale war, sagte die Großmutter: „Nimm diese Schale und gib uns dafür einen Schmuck.“ Jener nahm sie, ritzte mit einer Nadel eine Linie hinein, erkannte, dass es eine goldene Schale war, dachte jedoch: „Ich werde sie für einen geringen Preis nehmen“, und ging weg. Als die Enkelin danach den Bodhisatta in der Nähe der Tür ankommen sah, sagte sie: „Edler Herr, gib mir einen Schmuck.“ Die Großmutter ließ ihn rufen, sich setzen, gab ihm die Schale und sagte: „Nimm diese und gib meiner Enkelin dafür einen Schmuck.“ Der Bodhisatta nahm sie, erkannte, dass es eine goldene Schale war, und begriff: „Sie wurden von jenem getäuscht.“ Er gab ihnen die acht Kahāpaṇas, die er in seinem Beutel hatte, sowie seine restlichen Waren, legte dem Mädchen den Schmuck in die Hand und ging weg. Jener Händler kam wieder und fragte danach. Die Großmutter sagte: „Lieber Sohn, du hast sie nicht genommen; ein anderer Händler hat dies und jenes gegeben, sie genommen und ist gegangen.“ Sobald er das hörte, lief er los, als ob sein Herz zerspringen würde, und verfolgte ihn. Der Bodhisatta hatte bereits ein Boot bestiegen und war losgefahren. Jener rief: „Halt! Lauf nicht weg! Lauf nicht weg!“ und legte den Wunsch ab: „Möge ich in jeder Existenz, in der ich wiedergeboren werde, in der Lage sein, dich zu vernichten!“ So patthanāvasena anekesu jātisatasahassesu aññamaññaṃ viheṭhetvā imasmiṃ attabhāve sakyakule nibbattitvā kamena bhagavati sabbaññutaṃ patvā rājagahe viharante anuruddhādīhi saddhiṃ bhagavato santikaṃ gantvā pabbajitvā jhānalābhī hutvā pākaṭo bhagavantaṃ varaṃ yāci – ‘‘bhante, sabbo bhikkhusaṅgho piṇḍapātikādīni terasa dhutaṅgāni samādiyatu, sakalo bhikkhusaṅgho mama bhāro hotū’’ti. Bhagavā na anujāni. Devadatto veraṃ bandhitvā parihīnajjhāno bhagavantaṃ māretukāmo ekadivasaṃ vebhārapabbatapāde ṭhitassa bhagavato upari ṭhito pabbatakūṭaṃ paviddhesi. Bhagavato ānubhāvena aparo pabbatakūṭo taṃ patamānaṃ sampaṭicchi. Tesaṃ ghaṭṭanena uṭṭhitā papaṭikā āgantvā bhagavato pādapiṭṭhiyaṃ pahari. Tena vuttaṃ – Durch die Kraft dieses Wunsches quälten sie sich gegenseitig in vielen hunderttausend Existenzen. Nachdem er in diesem Dasein im Sakya-Geschlecht wiedergeboren worden war, ging er, als der Erhabene allmählich die Allwissenheit erlangt hatte und in Rājagaha verweilte, zusammen mit Anuruddha und anderen zum Erhabenen, trat in den Orden ein, erlangte die Vertiefungen und wurde berühmt. Er bat den Erhabenen um eine Gunst: „Ehrwürdiger Herr, möge die gesamte Mönchsgemeinschaft die dreizehn asketischen Übungen, wie das Almosensammeln usw., auf sich nehmen. Möge die gesamte Mönchsgemeinschaft unter meine Sorge gestellt werden.“ Der Erhabene erlaubte es nicht. Devadatta hegte Groll, verlor seine Vertiefungen und wollte den Erhabenen töten. Eines Tages stand er oben auf dem Vebhāra-Berg und schleuderte einen Berggipfel herab auf den Erhabenen, der sich an dessen Fuß aufhielt. Durch die Macht des Erhabenen fing ein anderer Berggipfel den herabstürzenden Gipfel auf. Ein durch deren Zusammenprall entstandener Splitter flog herab und traf den Fußrücken des Erhabenen. Darum wurde gesagt: ‘‘Vemātubhātaraṃ pubbe, dhanahetu haniṃ ahaṃ; Pakkhipiṃ giriduggasmiṃ, silāya ca apiṃsayiṃ. „Meinen Halbbruder tötete ich einst um des Geldes willen; ich stürzte ihn in eine Bergschlucht und zerquetschte ihn mit einem Stein.“ ‘‘Tena kammavipākena, devadatto silaṃ khipi; Aṅguṭṭhaṃ piṃsayī pāde, mama pāsāṇasakkharā’’ti. (apa. thera 1.39.78-79); „Durch die Reifung jenes Kamma schleuderte Devadatta einen Felsen; ein Steinsplitter verletzte den Zeh an meinem Fuß.“ Chaṭṭhapañhe – sakalikāvedhoti sakalikāya ghaṭṭanaṃ. Atīte kira bodhisatto ekasmiṃ kule nibbatto daharakāle mahāvīthiyaṃ kīḷamāno vīthiyaṃ piṇḍāya caramānaṃ paccekabuddhaṃ disvā ‘‘ayaṃ muṇḍako samaṇo kuhiṃ gacchatī’’ti pāsāṇasakalikaṃ gahetvā tassa pādapiṭṭhiyaṃ khipi[Pg.137]. Pādapiṭṭhicammaṃ chinditvā ruhiraṃ nikkhami. So tena pāpakammena anekavassasahassāni niraye mahādukkhaṃ anubhavitvā buddhabhūtopi kammapilotikavasena pādapiṭṭhiyaṃ pāsāṇasakalikaghaṭṭanena ruhiruppādaṃ labhi. Tena vuttaṃ – Zur sechsten Frage – „sakalikāvedho“ bedeutet das Treffen mit einem Splitter. Einst wurde der Bodhisatta in einer bestimmten Familie geboren. Als er im Kindesalter auf der Hauptstraße spielte, sah er einen Paccekabuddha, der auf der Straße um Almosen ging. Er dachte: „Wohin geht dieser kahlköpfige Samana?“ und nahm einen Steinsplitter und warf ihn auf dessen Fußrücken. Er zerschnitt die Haut des Fußrückens, so dass Blut heraustrat. Durch diese böse Tat erlitt er viele tausend Jahre lang großes Leid in der Hölle, und selbst als er zum Buddha geworden war, floss infolge dieses verbleibenden Kamma Blut an seinem Fußrücken, nachdem dieser von einem Steinsplitter getroffen worden war. Darum wurde gesagt: ‘‘Purehaṃ dārako hutvā, kīḷamāno mahāpathe; Paccekabuddhaṃ disvāna, magge sakalikaṃ khipiṃ. „Als ich früher ein Knabe war und auf der Hauptstraße spielte, sah ich einen Paccekabuddha und warf auf dem Weg einen Steinsplitter nach ihm.“ ‘‘Tena kammavipākena, idha pacchimake bhave; Vadhatthaṃ maṃ devadatto, abhimāre payyojayī’’ti. (apa. thera 1.39.80-81); „Durch die Reifung jenes Kamma stiftete Devadatta in dieser letzten Existenz Mörder an, um mich zu töten.“ Sattamapañhe – nāḷāgirīti dhanapālako hatthī māraṇatthāya pesito. Atīte kira bodhisatto hatthigopako hutvā nibbatto hatthiṃ āruyha vicaramāno mahāpathe paccekabuddhaṃ disvā ‘‘kuto āgacchati ayaṃ muṇḍako’’ti āhatacitto khilajāto hatthinā āsādesi. So tena kammena apāyesu anekavassasahassāni dukkhaṃ anubhavitvā pacchimattabhāve buddho jāto. Devadatto ajātasatturājānaṃ sahāyaṃ katvā ‘‘tvaṃ, mahārāja, pitaraṃ ghātetvā rājā hohi, ahaṃ buddhaṃ māretvā buddho bhavissāmī’’ti saññāpetvā ekadivasaṃ rañño anuññātāya hatthisālaṃ gantvā – ‘‘sve tumhe nāḷāgiriṃ soḷasasurāghaṭe pāyetvā bhagavato piṇḍāya caraṇavelāyaṃ pesethā’’ti hatthigopake āṇāpesi. Sakalanagaraṃ mahākolāhalaṃ ahosi, ‘‘buddhanāgena hatthināgassa yuddhaṃ passissāmā’’ti ubhato rājavīthiyaṃ mañcātimañcaṃ bandhitvā pātova sannipatiṃsu. Bhagavāpi katasarīrapaṭijaggano bhikkhusaṅghaparivuto rājagahaṃ piṇḍāya pāvisi. Tasmiṃ khaṇe vuttaniyāmeneva nāḷāgiriṃ vissajjesuṃ. So vīthicaccarādayo vidhamento āgacchati. Tadā ekā itthī dārakaṃ gahetvā vīthito vīthiṃ gacchati, hatthī taṃ itthiṃ disvā anubandhi. Bhagavā ‘‘nāḷāgiri, na taṃ hanatthāya pesito, idhāgacchāhī’’ti āha. So taṃ saddaṃ sutvā bhagavantābhimukho dhāvi. Bhagavā aparimāṇesu cakkavāḷesu anantasattesu pharaṇārahaṃ mettaṃ ekasmiṃyeva nāḷāgirimhi phari. So bhagavato mettāya phuṭo [Pg.138] nibbhayo hutvā bhagavato pādamūle nipati. Bhagavā tassa matthake hatthaṃ ṭhapesi. Tadā devabrahmādayo acchariyabbhutajātacittā pupphaparāgādīhi pūjesuṃ. Sakalanagare jaṇṇukamattā dhanarāsayo ahesuṃ. Rājā ‘‘pacchimadvāre dhanāni nagaravāsīnaṃ hontu, puratthimadvāre dhanāni rājabhaṇḍāgāre hontū’’ti bheriṃ carāpesi. Sabbe tathā kariṃsu. Tadā nāḷāgiri dhanapālo nāma ahosi. Bhagavā veḷuvanārāmaṃ agamāsi. Tena vuttaṃ – In der siebten Frage: Über Nāḷāgiri – der Elefant Dhanapālaka wurde ausgesandt, um [den Buddha] zu töten. In der Vergangenheit, so heißt es, wurde der Bodhisatta als Elefantenwärter geboren. Als er auf einem Elefanten ritt und umherzog, sah er auf der Hauptstraße einen Paccekabuddha. Mit zornigem Geist und feindseliger Haltung dachte er: „Woher kommt dieser Kahlkopf?“, und trieb den Elefanten an, ihn zu attackieren. Durch diese Tat erlitt er viele tausend Jahre lang Leid in den niederen Welten und wurde in seiner letzten Existenz zum Buddha. Devadatta machte sich den König Ajātasattu zum Verbündeten, überzeugte ihn mit den Worten: „Großer König, töte deinen Vater und werde König; ich werde den Buddha töten und Buddha werden“, und ging eines Tages mit Erlaubnis des Königs zum Elefantenstall. Er befahl den Elefantenpflegern: „Morgen sollt ihr Nāḷāgiri sechzehn Krüge Branntwein zu trinken geben und ihn freilassen, wenn der Erhabene zur Almosenrunde geht.“ In der ganzen Stadt entstand ein großer Aufruhr, und die Menschen dachten: „Wir wollen den Kampf zwischen dem Elefanten-Buddha und dem edlen königlichen Elefanten sehen.“ Sie bauten auf beiden Seiten der Königsstraße Tribünen auf und versammelten sich schon am frühen Morgen. Auch der Erhabene, nachdem er seine morgendlichen Verrichtungen erledigt hatte, betrat in Begleitung der Jüngergemeinschaft Rājagaha für die Almosenrunde. In diesem Moment ließen sie Nāḷāgiri genau wie angewiesen frei. Er kam heran und verwüstete die Straßen, Kreuzungen und andere Orte. Da lief eine Frau mit ihrem Kind auf dem Arm von einer Straße zur anderen. Als der Elefant die Frau sah, verfolgte er sie. Der Erhabene sprach: „Nāḷāgiri, man hat dich nicht ausgesandt, um jene Frau zu töten. Komm hierher zu mir!“ Als er diese Stimme hörte, rannte er auf den Erhabenen zu. Der Erhabene durchdrang den einen Elefanten Nāḷāgiri mit seiner liebevollen Güte, die sich sonst über unzählige Lebewesen in unermesslichen Weltsystemen erstrecken kann. Vom Geist der Liebe des Erhabenen berührt, verlor er alle Furcht und legte sich dem Erhabenen zu Füßen nieder. Der Erhabene legte seine Hand auf sein Haupt. Da gerieten Götter, Brahmas und andere Wesen in Staunen und Entzücken und verehrten ihn mit himmlischem Blütenstaub und anderem. In der ganzen Stadt bildeten sich kniehohe Schätze an Reichtümern. Der König ließ die Trommel schlagen und verkünden: „Die Reichtümer am Westtor sollen den Stadtbewohnern gehören, die Reichtümer am Osttor sollen in die königliche Schatzkammer fließen!“ Alle taten genau so. Da wurde der Elefant Nāḷāgiri als Dhanapāla bekannt. Der Erhabene begab sich zum Veḷuvana-Kloster. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Hatthāroho pure āsiṃ, paccekamunimuttamaṃ; Piṇḍāya vicarantaṃ taṃ, āsādesiṃ gajenahaṃ. „In einer früheren Geburt war ich ein Elefantenreiter. Als ein erhabener Paccekabuddha auf Almosenrunde ging, trieb ich meinen Elefanten an, ihn zu attackieren.“ ‘‘Tena kammavipākena, bhanto nāḷāgirī gajo; Giribbaje puravare, dāruṇo samupāgamī’’ti. (apa. thera 1.39.82-83); „Infolge der Reifung jener Tat kam der wilde, schreckliche Elefant Nāḷāgiri in der herrlichen Stadt Giribbaja auf mich zu.“ Aṭṭhamapañhe – satthacchedoti satthena gaṇḍaphālanaṃ kuṭhārāya satthena chedo. Atīte kira bodhisatto paccantadese rājā ahosi. So dujjanasaṃsaggavasena paccantadese vāsavasena ca dhutto sāhasiko ekadivasaṃ khaggahattho pattikova nagare vicaranto nirāparādhe jane khaggena phālento agamāsi. So tena pāpakammavipākena bahūni vassasahassāni niraye paccitvā tiracchānādīsu dukkhamanubhavitvā pakkāvasesena pacchimattabhāve buddhabhūtopi heṭṭhā vuttanayena devadattena khittapāsāṇasakkhalikapahārena uṭṭhitagaṇḍo ahosi. Jīvako mettacittena taṃ gaṇḍaṃ phālesi. Vericittassa devadattassa ruhiruppādakammaṃ anantarikaṃ ahosi, mettacittassa jīvakassa gaṇḍaphālanaṃ puññameva ahosi. Tena vuttaṃ – In der achten Frage: „Satthacchedo“ (Einschnitt mit einem Werkzeug) bedeutet das Aufschneiden eines Geschwürs mit einem Messer oder das Schneiden mit einer Axt. In der Vergangenheit, so heißt es, war der Bodhisatta ein König in einem Grenzgebiet. Durch den Umgang mit schlechten Menschen und den Aufenthalt in jenem Grenzland wurde er zu einem gewalttätigen Schurken. Eines Tages zog er mit einem Schwert in der Hand zu Fuß durch die Stadt und verletzte unschuldige Menschen, indem er sie mit dem Schwert aufschlitzte. Durch die Reifung dieser schlechten Tat schmorte er viele tausend Jahre lang in der Hölle und erlitt Leid als Tier und in anderen Bereichen. Aufgrund der verbleibenden Reste dieses Karmas entstand bei ihm in seiner letzten Existenz, obwohl er bereits zum Buddha geworden war, ein Geschwür, nachdem Devadatta nach der zuvor beschriebenen Weise einen Stein nach ihm geworfen hatte, der zersplitterte. Jīvaka schnitt dieses Geschwür mit liebevollem Geist auf. Für den feindseligen Devadatta war die Tat, das Blut des Buddhas zu vergießen, ein anantarika-Kamma (eine Tat mit sofortiger Wirkung nach dem Tod), während für Jīvaka das Aufschneiden des Geschwürs mit liebevollem Geist ein rein verdienstvolles Werk war. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Rājāhaṃ pattiko āsiṃ, sattiyā purise haniṃ; Tena kammavipākena, niraye paccisaṃ bhusaṃ. „Ich war ein zu Fuß gehender König und verletzte Menschen mit einer Waffe. Durch die Reifung jener Tat schmorte ich heftig in der Hölle.“ ‘‘Kammuno tassa sesena, idāni sakalaṃ mama; Pāde chaviṃ pakappesi, na hi kammaṃ vinassatī’’ti. (apa. thera 1.39.84-85); „Aufgrund des verbleibenden Restes jener Tat schnitt man mir jetzt am Fuß die Haut auf; denn eine Tat geht niemals verloren.“ Navame pañhe – ‘‘sīsadukkhanti sīsābādho sīsavedanā. Atīte kira bodhisatto kevaṭṭagāme kevaṭṭo hutvā nibbatti. So ekadivasaṃ kevaṭṭapurisehi [Pg.139] saddhiṃ macchamāraṇaṭṭhānaṃ gantvā macche mārente disvā tattha somanassaṃ uppādesi, sahagatāpi tatheva somanassaṃ uppādayiṃsu. So tena akusalakammena caturāpāye dukkhamanubhavitvā imasmiṃ pacchimattabhāve tehi purisehi saddhiṃ sakyarājakule nibbattitvā kamena buddhattaṃ pattopi sayaṃ sīsābādhaṃ paccanubhosi. Te ca sakyarājāno dhammapadaṭṭhakathāyaṃ (dha. pa. aṭṭha. 1.viḍaḍūbhavatthu) vuttanayena viḍaḍūbhasaṅgāme sabbe vināsaṃ pāpuṇiṃsu. Tena vuttaṃ – In der neunten Frage: „Sīsadukkhaṃ“ bedeutet Kopfschmerzen oder Kopfleiden. In der Vergangenheit, so heißt es, wurde der Bodhisatta als Fischer in einem Fischerdorf geboren. Als er eines Tages zusammen mit anderen Fischern an den Ort des Fischfangs ging und sah, wie die Fische getötet wurden, empfand er darüber Freude. Auch seine Begleiter empfanden gleichermaßen Freude. Durch dieses unheilsame Karma erlitt er Leid in den vier niederen Welten. In seiner letzten Existenz wurde er zusammen mit jenen Männern im königlichen Geschlecht der Sakyer wiedergeboren. Obwohl er nach und nach die Buddhaschaft erlangt hatte, litt er selbst unter Kopfschmerzen. Und jene sakyischen Könige fanden alle, wie in der Dhammapada-Atthakathā beschrieben, im Krieg gegen Viṭaṭūbha ihren Untergang. Deshalb wurde gesagt: ‘‘Ahaṃ kevaṭṭagāmasmiṃ, ahuṃ kevaṭṭadārako; Macchake ghātite disvā, janayiṃ somanassakaṃ. „Ich war ein Fischerjunge in einem Fischerdorf. Als ich sah, wie Fische getötet wurden, empfand ich Freude darüber.“ ‘‘Tena kammavipākena, sīsadukkhaṃ ahū mama; Sabbe sakkā ca haññiṃsu, yadā hani viṭaṭūbho’’ti. (apa. thera 1.39.86-87); „Durch die Reifung dieser Tat erlitt ich Kopfschmerzen, und alle Sakyer wurden getötet, als Viṭaṭūbha sie vernichtete.“ Dasamapañhe – yavakhādananti verañjāyaṃ yavataṇḍulakhādanaṃ. Atīte kira bodhisatto aññatarasmiṃ kule nibbatto jātivasena ca andhabālabhāvena ca phussassa bhagavato sāvake madhurannapāne sālibhojanādayo ca bhuñjamāne disvā ‘‘are muṇḍakasamaṇā, yavaṃ khādatha, mā sālibhojanaṃ bhuñjathā’’ti akkosi. So tena akusalakammavipākena anekavassasahassāni caturāpāye dukkhamanubhavitvā imasmiṃ pacchimattabhāve kamena buddhattaṃ patvā lokasaṅgahaṃ karonto gāmanigamarājadhānīsu caritvā ekasmiṃ samaye verañjabrāhmaṇagāmasamīpe sākhāviṭapasampannaṃ pucimandarukkhamūlaṃ pāpuṇi. Verañjabrāhmaṇo bhagavantaṃ upasaṅkamitvā anekapariyāyena bhagavantaṃ jinituṃ asakkonto sotāpanno hutvā ‘‘bhante, idheva vassaṃ upagantuṃ vaṭṭatī’’ti ārocesi. Bhagavā tuṇhībhāvena adhivāsesi. Atha punadivasato paṭṭhāya māro pāpimā sakalaverañjabrāhmaṇagāmavāsīnaṃ mārāvaṭṭanaṃ akāsi. Piṇḍāya paviṭṭhassa bhagavato mārāvaṭṭanavasena ekopi kaṭacchubhikkhāmattaṃ dātā nāhosi. Bhagavā tucchapattova bhikkhusaṅghaparivuto punāgañchi. Tasmiṃ evaṃ āgate tattheva nivuṭṭhā assavāṇijā taṃ divasaṃ dānaṃ datvā tato paṭṭhāya bhagavantaṃ pañcasatabhikkhuparivāraṃ nimantetvā pañcannaṃ assasatānaṃ bhattato vibhāgaṃ katvā yavaṃ koṭṭetvā bhikkhūnaṃ pattesu pakkhipiṃsu[Pg.140]. Sakalassa sahassacakkavāḷadevatā sujātāya pāyāsapacanadivase viya dibbojaṃ pakkhipiṃsu. Bhagavā paribhuñji, evaṃ temāsaṃ yavaṃ paribhuñji. Temāsaccayena mārāvaṭṭane vigate pavāraṇādivase verañjo brāhmaṇo saritvā mahāsaṃvegappatto buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ datvā vanditvā khamāpesi. Tena vuttaṃ – Bei der zehnten Frage – "Das Essen von Gerste" bedeutet das Essen von Gerstenkörnern in Verañjā. Einst wurde der Bodhisatta in einer bestimmten Familie geboren. Aufgrund seiner Herkunft und seiner verblendeten Torheit sah er die Jünger des erhabenen Phussa, wie sie süße Speisen und Getränke sowie Sāli-Reis und anderes verzehrten, und beschimpfte sie: "He, ihr kahlschornen Asketen, esst doch Gerste! Esst keinen Sāli-Reis!" Durch die Reifung dieses unheilsamen Kamma erlitt er viele tausend Jahre lang Leid in den vier niederen Welten und erlangte in dieser seiner letzten Existenz allmählich die Buddhaschaft. Während er zum Wohle der Welt wirkte, zog er durch Dörfer, Marktflecken und Königsstädte und gelangte zu einer Zeit in die Nähe des Brahmanendorfes Verañjā, an den Fuß eines Neem-Baumes, der reich an Ästen und Zweigen war. Der Brahmane von Verañjā suchte den Erhabenen auf, und obwohl er anfangs unfähig war, den Erhabenen auf vielfältige Weise zu erkennen, wurde er ein Stromeingetretener und bat ihn: "Ehrwürdiger Herr, es schickt sich, die Regenzeit genau hier bei uns zu verbringen." Der Erhabene stimmte durch Schweigen zu. Doch vom nächsten Tag an bewirkte der böse Māra eine Täuschung unter allen Bewohnern des Brahmanendorfes Verañjā. Als der Erhabene zum Almosengang hineinging, gab es aufgrund dieser mārischen Täuschung niemanden, der auch nur eine einzige Kelle voll Almosen spendete. Der Erhabene kehrte mit leerer Almosenschale, umgeben von der Mönchsgemeinschaft, zurück. Als er so zurückgekehrt war, luden die dort ansässigen Pferdehändler, nachdem sie an jenem Tag eine Gabe dargebracht hatten, von da an den Erhabenen und die ihn begleitenden fünfhundert Mönche ein. Sie zweigten einen Teil des Futters für ihre fünfhundert Pferde ab, zerstampften die Gerste und gaben sie in die Almosenschalen der Mönche. Die Gottheiten aus dem gesamten zehntausendfachen Weltenraum fügten göttliche Essenz hinzu, ähnlich wie am Tag, als Sujātā den Milchreis kochte. Der Erhabene verzehrte sie, und so aß er drei Monate lang Gerste. Nach Ablauf der drei Monate, als die Täuschung des Māra gewichen war, erinnerte sich der Brahmane von Verañjā am Tag der Pavāraṇā daran, geriet in tiefe Bestürzung, brachte der Mönchsgemeinschaft mit dem Buddha an der Spitze eine große Gabe dar, erwies Ehrerbietung und bat um Verzeihung. Deswegen wurde gesagt – ‘‘Phussassāhaṃ pāvacane, sāvake paribhāsayiṃ; Yavaṃ khādatha bhuñjatha, mā ca bhuñjatha sālayo. "Unter der Lehre des Phussa schmähte ich die Jünger: 'Esst Gerste, verzehrt sie! Und esst keinen Sāli-Reis!'" ‘‘Tena kammavipākena, temāsaṃ khāditaṃ yavaṃ; Nimantito brāhmaṇena, verañjāyaṃ vasiṃ tadā’’ti. (apa. thera 1.39.88-89); "Durch die Reifung dieses Kamma aß ich drei Monate lang Gerste, als ich, vom Brahmanen eingeladen, damals in Verañjā verweilte." Ekādasamapañhe – piṭṭhidukkhanti piṭṭhiābādho. Atīte kira bodhisatto gahapatikule nibbatto thāmasampanno kiñci rassadhātuko ahosi. Tena samayena eko mallayuddhayodho sakalajambudīpe gāmanigamarājadhānīsu mallayuddhe vattamāne purise pātetvā jayappatto kamena bodhisattassa vasananagaraṃ patvā tasmimpi jane pātetvā gantumāraddho. Tadā bodhisatto ‘‘mayhaṃ vasanaṭṭhāne esa jayaṃ patvā gacchatī’’ti tattha nagaramaṇḍalamāgamma appoṭetvā āgaccha mayā saddhiṃ yujjhitvā gacchāti. So hasitvā ‘‘ahaṃ mahante purise pātesiṃ, ayaṃ rassadhātuko vāmanako mama ekahatthassāpi nappahotī’’ti appoṭetvā naditvā āgacchi. Te ubhopi aññamaññaṃ hatthaṃ parāmasiṃsu, bodhisatto taṃ ukkhipitvā ākāse bhamitvā bhūmiyaṃ pātento khandhaṭṭhiṃ bhinditvā pātesi. Sakalanagaravāsino ukkuṭṭhiṃ karontā appoṭetvā vatthābharaṇādīhi bodhisattaṃ pūjesuṃ. Bodhisatto taṃ mallayodhaṃ ujuṃ sayāpetvā khandhaṭṭhiṃ ujukaṃ katvā ‘‘gaccha ito paṭṭhāya evarūpaṃ mā karosī’’ti vatvā uyyojesi. So tena kammavipākena nibbattanibbattabhave sarīrasīsādi dukkhamanubhavitvā imasmiṃ pacchimattabhāve buddhabhūtopi piṭṭhirujādidukkhamanubhosi. Tasmā kadāci piṭṭhidukkhe uppanne sāriputtamoggallāne ‘‘ito paṭṭhāya dhammaṃ desethā’’ti vatvā sayaṃ sugatacīvaraṃ paññāpetvā sayati, kammapilotikaṃ nāma buddhamapi na muñcati. Vuttañhetaṃ – Bei der elften Frage – "Rückenschmerz" bedeutet eine Erkrankung des Rückens. Einst wurde der Bodhisatta in einer Hausvaterfamilie geboren; er war kraftvoll, jedoch von etwas kleiner Statur. Zu jener Zeit zog ein Ringkämpfer durch ganz Jambudīpa, warf in Dörfern, Marktflecken und Königsstädten die Männer im Ringkampf nieder und errang stets den Sieg. Allmählich gelangte er in die Stadt, in welcher der Bodhisatta wohnte, und schickte sich an, auch dort die Leute niederzuwerfen und wieder abzuziehen. Da dachte der Bodhisatta: "Dieser Mann soll nicht als Sieger aus meinem Wohnort fortgehen." Er begab sich zum städtischen Kampfplatz, klopfte sich auf die Schenkel und rief: "Komm her, kämpfe mit mir und geh dann erst weg!" Jener lachte und sagte: "Ich habe große Männer niedergeworfen, dieser kleine Zwerg ist nicht einmal einer meiner Hände gewachsen." So klopfte er sich auf die Schenkel, stieß ein Brüllen aus und trat heran. Beide packten einander an den Händen. Der Bodhisatta hob ihn hoch, wirbelte ihn in der Luft herum und warf ihn so zu Boden, dass er sein Rückgrat brach. Alle Stadtbewohner stießen Jubelrufe aus, klopften sich vor Freude auf die Schenkel und ehrten den Bodhisatta mit Gewändern, Schmuck und anderem. Der Bodhisatta ließ den Ringkämpfer flach hinlegen, richtete sein Rückgrat wieder gerade und entließ ihn mit den Worten: "Geh, und tu so etwas von nun an nicht wieder!" Durch die Reifung dieses Kamma erlitt er in jeder künftigen Existenz Schmerzen im Körper, am Kopf und an anderen Stellen. In dieser seiner letzten Existenz erlitt er, obwohl er zum Buddha geworden war, ebenfalls Leiden wie Rückenschmerzen. Wenn daher gelegentlich Rückenschmerzen auftraten, sprach er zu Sāriputta und Moggallāna: "Verkündet von jetzt an das Dhamma!", ließ sich selbst das Gewand des Sugata ausbreiten und legte sich hin. Das sogenannte 'Kammaband' (die verbleibende Spur des Kamma) lässt selbst einen Buddha nicht los. Und dies wurde gesagt – ‘‘Nibbuddhe [Pg.141] vattamānamhi, mallaputtaṃ niheṭhayiṃ; Tena kammavipākena, piṭṭhidukkhaṃ ahū mamā’’ti. (apa. thera 1.39.90); "Als ein Ringkampf stattfand, verletzte ich den Sohn des Ringkämpfers. Durch die Reifung dieses Kamma entstand mir dieser Rückenschmerz." Dvādasamapañhe – atisāroti lohitapakkhandikāvirecanaṃ. Atīte kira bodhisatto gahapatikule nibbatto vejjakammena jīvikaṃ kappesi. So ekaṃ seṭṭhiputtaṃ rogena vicchitaṃ tikicchanto bhesajjaṃ katvā tikicchitvā tassa deyyadhammadāne pamādamāgamma aparaṃ osadhaṃ datvā vamanavirecanaṃ akāsi. Seṭṭhi bahudhanaṃ adāsi. So tena kammavipākena nibbattanibbattabhave lohitapakkhandikābādhena vicchito ahosi. Imasmimpi pacchimattabhāve parinibbānasamaye cundena kammāraputtena pacitasūkaramaddavassa sakalacakkavāḷadevatāhi pakkhittadibbojena āhārena saha bhuttakkhaṇe lohitapakkhandikāvirecanaṃ ahosi. Koṭisatasahassānaṃ hatthīnaṃ balaṃ khayamagamāsi. Bhagavā visākhapuṇṇamāyaṃ kusinārāyaṃ parinibbānatthāya gacchanto anekesu ṭhānesu nisīdanto pipāsito pānīyaṃ pivitvā mahādukkhena kusināraṃ patvā paccūsasamaye parinibbāyi. Kammapilotikaṃ evarūpaṃ lokattayasāmimpi na vijahati. Tena vuttaṃ – Bei der zwölften Frage – "Durchfall" bedeutet das Ausscheiden durch die rote Ruhr (Blutruhr). Einst wurde der Bodhisatta in einer Hausvaterfamilie geboren und verdiente seinen Lebensunterhalt mit der ärztlichen Kunst. Als er den Sohn eines Großkaufmanns, der an einer Krankheit litt, behandelte, bereitete er Medizin vor und kurierte ihn. Als jener jedoch bei der Entrichtung des Honorars nachlässig wurde, gab er ihm eine andere Medizin und bewirkte so Erbrechen und Durchfall. Der Großkaufmann gab ihm daraufhin viel Geld. Durch die Reifung dieses Kamma war er in jeder künftigen Existenz von der Krankheit der Blutruhr geplagt. Auch in dieser seiner letzten Existenz, zur Zeit seines Parinibbāna, kam es in dem Moment, als er das von Cunda, dem Goldschmiedesohn, zubereitete Sūkaramaddava zusammen mit der von den Gottheiten aller Weltenräume hinzugefügten göttlichen Nahrung verzehrte, zu Durchfall durch Blutruhr. Die Kraft von hunderttausend Millionen Elefanten schwand dahin. Der Erhabene, der am Vollmondtag des Monats Visākha auf dem Weg nach Kusinārā war, um das Parinibbāna einzugehen, setzte sich an vielen Stellen nieder, war durstig, trank Wasser, erreichte unter großem Schmerz Kusinārā und ging in der Morgendämmerung ins Parinibbāna ein. Eine solche Restwirkung des Kamma verlässt selbst den Herrn der drei Welten nicht. Deshalb wurde gesagt – ‘‘Tikicchako ahaṃ āsiṃ, seṭṭhiputtaṃ virecayiṃ; Tena kammavipākena, hoti pakkhandikā mamāti. "Ich war ein Arzt und verabreichte dem Sohn des Großkaufmanns ein Abführmittel. Durch die Reifung dieses Kamma leide ich an der Ruhr." ‘‘Evaṃ jino viyākāsi, bhikkhusaṅghassa aggato; Sabbābhiññābalappatto, anotatte mahāsare’’ti. (apa. thera 1.39.91, 96); "So erklärte es der Sieger vor der Mönchsgemeinschaft, er, der alle höheren Geisteskräfte und Fähigkeiten erlangt hatte, am großen See Anotatta." Evaṃ paṭiññātapañhānaṃ, mātikāṭhapanavasena akusalāpadānaṃ samattaṃ nāma hotīti vuttaṃ itthaṃ sudanti itthaṃ iminā pakārena heṭṭhā vuttanayena. Sudanti nipāto padapūraṇatthe āgato. Bhagavā bhāgyasampanno pūritapāramimahāsatto – So ist das Wirken unheilsamen Kamma durch die Darlegung der Matrix der eingestandenen Fragen abgeschlossen. Die Worte "itthaṃ sudaṃ" bedeuten "auf diese Weise", in der oben dargelegten Art. Das Wort "sudaṃ" ist eine Partikel zur Versfüllung. Der Erhabene, der vom Glück Gesegnete, das große Wesen, das die Vollkommenheiten erfüllt hat – ‘‘Bhāgyavā bhaggavā yutto, bhagehi ca vibhattavā; Bhattavā vantagamano, bhavesu bhagavā tato’’ti. – „Der Segenreiche (bhāgyavā), der Zerstörer [der Befleckungen] (bhaggavā), der mit den [sechs] Herrlichkeiten Ausgestattete (bhagehi ca yutto), der Analytiker [der Lehre] (vibhattavā), der Teilhabende (bhattavā), der den Lauf [durch die Daseinsbereiche] Erbrochene (vantagamano) – wegen dieses Erbrechens des Gehens in den Daseinsbereichen (bhavesu) wird er ‚Bhagavā‘ (der Erhabene) genannt.“ Evamādiguṇayutto devātidevo sakkātisakko brahmātibrahmā buddhātibuddho so mahākāruṇiko bhagavā attano buddhacariyaṃ buddhakāraṇaṃ [Pg.142] sambhāvayamāno pākaṭaṃ kurumāno buddhāpadāniyaṃ nāma buddhakāraṇapakāsakaṃ nāma dhammapariyāyaṃ dhammadesanaṃ suttaṃ abhāsittha kathesīti. Ausgestattet mit solchen und weiteren Qualitäten, Gott der Götter, Sakka über den Sakkas, Brahma über den Brahmas, Buddha über den Buddhas, sprach und verkündete jener überaus mitfühlende Erhabene (Bhagavā) – während er sein eigenes Wirken als Buddha und die Ursachen der Buddhaschaft aufzeigte und offenlegte – diese Lehrdarlegung (dhammapariyāya), die Lehrverkündigung, das Sutta namens ‚Buddhāpadāniya‘, welches die Ursachen der Erlangung der Buddhaschaft darlegt. Iti visuddhajanavilāsiniyā apadāna-aṭṭhakathāya Hier endet in der ‚Visuddhajanavilāsinī‘, dem Kommentar zum Apadāna, Buddhaapadānasaṃvaṇṇanā samattā. die Erläuterung der Taten des Buddha (Buddha-apadāna-saṃvaṇṇanā). 2.Paccekabuddhaapadānavaṇṇanā 2. Erläuterung der Taten der Paccekabuddhas Tato anantaraṃ apadānaṃ saṅgāyanto ‘‘paccekabuddhāpadānaṃ, āvuso ānanda, bhagavatā kattha paññatta’’nti puṭṭho ‘‘atha paccekabuddhāpadānaṃ suṇāthā’’ti āha. Tesaṃ apadānattho heṭṭhā vuttoyeva. Gleich im Anschluss daran sprach der Ehrwürdige Ānanda, als er bei der Rezitation des Apadāna gefragt wurde: „Wo, Freund Ānanda, wurde das Paccekabuddha-Apadāna vom Erhabenen dargelegt?“, dies: „Nun hört das Paccekabuddha-Apadāna.“ Die Bedeutung ihres Apadāna wurde bereits oben erklärt. 83. ‘‘Suṇāthā’’ti vuttapadaṃ uppattinibbattivasena pakāsento ‘‘tathāgataṃ jetavane vasanta’’ntiādimāha. Tattha jetakumārassa nāmavasena tathāsaññite vihāre catūhi iriyāpathavihārehi dibbabrahmaariyavihārehi vā vasantaṃ viharantaṃ yathā purimakā vipassiādayo buddhā samattiṃsapāramiyo pūretvā āgatā, tathā amhākampi bhagavā āgatoti tathāgato. Taṃ tathāgataṃ jetavane vasantanti sambandho. Vedehamunīti vedeharaṭṭhe jātā vedehī, vedehiyā putto vedehiputto. Monaṃ vuccati ñāṇaṃ, tena ito gato pavattoti muni. Vedehiputto ca so muni ceti ‘‘vedehiputtamunī’’ti vattabbe ‘‘vaṇṇāgamo’’tiādinā niruttinayena i-kārassa attaṃ putta-saddassa ca lopaṃ katvā ‘‘vedehamunī’’ti vuttaṃ. ‘‘Etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ satimantānaṃ dhitimantānaṃ gatimantānaṃ bahussutānaṃ upaṭṭhākānaṃ yadidaṃ ānando’’ti (a. ni. 1.219-223) etadagge ṭhapito āyasmā ānando nataṅgo namanakāyaṅgo añjaliko hutvā ‘‘bhante, paccekabuddhā nāma kīdisā hontī’’ti apucchīti sambandho. Te paccekabuddhā kehi hetubhi kehi kāraṇehi bhavanti uppajjanti. Vīrāti bhagavantaṃ ālapati. 83. Um das gesprochene Wort „Hört!“ (suṇātha) hinsichtlich ihres Entstehens und Hervortretens zu erklären, sagte er: „Dem im Jetavana weilenden Tathāgata...“ und so weiter. Darin bedeutet „weilend“ (vasantaṃ/viharantaṃ), dass er sich in dem nach dem Prinzen Jeta benannten Kloster mittels der vier Körperhaltungen oder den göttlichen, erhabenen und edlen Verweilungen aufhielt. „Tathāgata“ (der so Gekommene) bedeutet: Wie die früheren Buddhas, beginnend mit Vipassī, die dreißig Vollkommenheiten (pāramiyo) erfüllt haben und so gekommen sind (āgata), so ist auch unser Erhabener gekommen; daher heißt er Tathāgata. Der syntaktische Bezug lautet: „dem im Jetavana weilenden Tathāgata“. „Vedehamuni“ (der Weise aus Vedeha): „Vedehī“ ist eine in dem Land Vedeha Geborene; der Sohn der Vedehī ist „Vedehiputto“. Als „mona“ wird das Wissen (ñāṇa) bezeichnet; derjenige, der damit fortgeschritten ist, ist ein „muni“ (Weiser). Da er sowohl der Sohn der Vedehī als auch ein Weiser ist, müsste es eigentlich „Vedehiputtamuni“ heißen, doch nach den Regeln der Grammatik (niruttinaya) wurde durch die Änderung des i-Vokals und die Elision des Wortes „putta“ der Begriff „Vedehamuni“ gebildet. Der ehrwürdige Ānanda, der unter meinen Jünger-Mönchen als der Achtsamste, Willensstärkste, Kursbehaltendste, Gelehrteste und treueste Diener auf den ersten Platz (etadagga) gestellt wurde (A. I, 219–223), verbeugte sich mit ehrfürchtig zusammengelegten Händen (añjaliko) und fragte: „Ehrwürdiger Herr, wie beschaffen sind die Paccekabuddhas?“ Dies ist die Verknüpfung. Aus welchen Gründen (hetu) und durch welche Ursachen (kāraṇa) entstehen sie? Mit dem Wort „Held“ (vīra) redet er den Erhabenen an. 84-85. Tato paraṃ vissajjitākāraṃ dassento ‘‘tadāha sabbaññuvaro mahesī’’tiādimāha. Sabbaṃ atītādibhedaṃ hatthāmalakaṃ viya jānātīti [Pg.143] sabbaññū, sabbaññū ca so varo uttamo ceti sabbaññuvaro. Mahantaṃ sīlakkhandhaṃ, samādhikkhandhaṃ, paññākkhandhaṃ, vimuttikkhandhaṃ, mahantaṃ vimuttiñāṇadassanakkhandhaṃ esati gavesatīti mahesi. Ānandabhaddaṃ madhurena sarena tadā tasmiṃ pucchitakāle āha kathesīti sambandho. Bho ānanda, ye paccekabuddhā pubbabuddhesu pubbesu atītabuddhesu katādhikārā katapuññasambhārā jinasāsanesu aladdhamokkhā appattanibbānā. Te sabbe paccekabuddhā dhīrā idha imasmiṃ loke saṃvegamukhena ekapuggalaṃ padhānaṃ katvā paccekabuddhā jātāti attho. Sutikkhapaññā suṭṭhu tikkhapaññā. Vināpi buddhehi buddhānaṃ ovādānusāsanīhi rahitā api. Parittakenapi appamattakenapi ārammaṇena paccekabodhiṃ paṭiekkaṃ bodhiṃ sammāsambuddhānantaraṃ bodhiṃ anupāpuṇanti paṭivijjhanti. 84-85. Danach sprach er, um die Art und Weise der Beantwortung aufzuzeigen, die Worte: „Da sprach der Allwissende, der Höchste, der große Weise (mahesī)...“ und so weiter. Jemand, der alles in seinen verschiedenen Ausprägungen wie Vergangenheit usw. so klar erkennt wie eine Myrobalan-Frucht auf der eigenen Handfläche, ist „allwissend“ (sabbaññū); und da er allwissend und zugleich der Höchste (vara) ist, heißt er „sabbaññuvaro“. Jemand, der die große Gruppe der Tugend (sīlakkhandha), der Sammlung (samādhikkhandha), der Weisheit (paññākkhandha), der Befreiung (vimuttikkhandha) und der Erkenntnis und Schau der Befreiung (vimuttiñāṇadassanakkhandha) sucht und anstrebt (esati/gavesati), ist ein „großer Weiser“ (mahesī). Der Bezug lautet: Er sprach und verkündete dies dem edlen Ānanda mit süßer Stimme zur Zeit der Fragestellung. „O Ānanda, jene Paccekabuddhas, die unter den früheren, vergangenen Buddhas ihren Entschluss gefasst (katādhikāra) und heilsame Voraussetzungen angesammelt (katapuññasambhārā) hatten, jedoch in den Lehren der Sieger die Befreiung noch nicht erlangt (aladdhamokkhā) und das Nibbāna noch nicht erreicht hatten – alle diese weisen Paccekabuddhas sind in dieser Welt durch das Tor der heilsamen Erschütterung (saṃvegamukhena) und durch einsames, entschlossenes Streben (ekapuggalaṃ padhānaṃ katvā) zu Paccekabuddhas geworden.“ Dies ist die Bedeutung. „Von schärfster Weisheit“ (sutikkhapaññā) meint: von überaus scharfer Weisheit. „Selbst ohne die Buddhas“ (vināpi buddhehi) meint: auch ohne die Unterweisung und Anleitung der Buddhas. Selbst durch ein ganz geringfügiges, unbedeutendes Meditationsobjekt (parittakenapi ārammaṇena) erlangen und durchdringen sie die Paccekabodhi – das ist die individuelle Erleuchtung, die Erleuchtung in der Zeit nach einem vollkommen Erleuchteten (Sammāsambuddha). 86. Sabbamhi lokamhi sakalasmiṃ lokattaye mamaṃ ṭhapetvā maṃ vihāya pacekabuddhehi samova sadiso eva natthi, tesaṃ mahāmunīnaṃ paccekabuddhānaṃ imaṃ vaṇṇaṃ imaṃ guṇaṃ padesamattaṃ saṅkhepamattaṃ ahaṃ tumhākaṃ sādhu sādhukaṃ vakkhāmi kathessāmīti attho. 86. „In der ganzen Welt, in den drei Welten, gibt es – mich ausgenommen – niemanden, der den Paccekabuddhas gleich oder ähnlich ist. Ich werde euch den Lobpreis, die Tugend dieser großen Weisen, der Paccekabuddhas, in Auszügen und in Kürze wohl und gründlich verkünden. Dies ist die Bedeutung.“ 87. Anācariyakā hutvā sayameva buddhānaṃ attanāva paṭividdhānaṃ isīnaṃ antare mahāisīnaṃ madhūvakhuddaṃ khuddakamadhupaṭalaṃ iva sādhūni madhurāni vākyāni udānavacanāni anuttaraṃ uttaravirahitaṃ bhesajaṃ osadhaṃ nibbānaṃ patthayantā icchantā sabbe tumhe supasannacittā suppasannamanā suṇātha manasi karothāti attho. 87. „Sie hatten keinen Lehrer (anācariyakā) und sind selbstständig zu Buddhas geworden; unter diesen Weisen (isīnaṃ), den großen Sehern (mahāisīnaṃ), die die Wahrheit aus eigener Kraft durchdrungen haben, sind ihre trefflichen und süßen Worte, ihre inspirierten Ausprüche (udāna), wie süßer Honig aus einer kleinen Wabe. Ihr alle, die ihr nach dem unübertrefflichen Heilmittel, der Medizin des Nibbāna, strebt und verlangt, sollt mit reinem und vertrauensvollem Geist zuhören und dies verinnerlichen. Dies ist die Bedeutung.“ 88-89. Paccekabuddhānaṃ samāgatānanti rāsibhūtānaṃ uppannānaṃ paccekabuddhānaṃ. Ariṭṭho, upariṭṭho, tagarasikhi, yasassī, sudassano, piyadassī, gandhāro, piṇḍolo, upāsabho, nitho, tatho, sutavā, bhāvitatto, sumbho, subho, methulo, aṭṭhamo, sumedho, anīgho, sudāṭho, hiṅgu, hiṅgo, dvejālino, aṭṭhako, kosalo, subāhu, upanemiso, nemiso, santacitto, sacco, tatho, virajo, paṇḍito, kālo, upakālo, vijito, jito, aṅgo, paṅgo, guttijjito, passī, jahī, upadhiṃ, dukkhamūlaṃ, aparājito, sarabhaṅgo, lomahaṃso[Pg.144], uccaṅgamāyo, asito, anāsavo, manomayo, mānacchido, bandhumā, tadādhimutto, vimalo, ketumā, kotumbaraṅgo, mātaṅgo, ariyo, accuto, accutagāmi, byāmako, sumaṅgalo, dibbilo cātiādīnaṃ paccekabuddhasatānaṃ yāni apadānāni paramparaṃ paccekaṃ byākaraṇāni yo ca ādīnavo yañca virāgavatthuṃ anallīyanakāraṇaṃ yathā ca yena kāraṇena bodhiṃ anupāpuṇiṃsu catumaggañāṇaṃ paccakkhaṃ kariṃsu. Sarāgavatthusūti suṭṭhu allīyitabbavatthūsu vatthukāmakilesakāmesu virāgasaññī virattasaññavanto rattamhi lokamhi allīyanasabhāvaloke viratacittā anallīyanamanā hitvā papañceti rāgo papañcaṃ doso papañcaṃ sabbakilesā papañcāti papañcasaṅkhāte kilese hitvā jiya phanditānīti phanditāni dvāsaṭṭhi diṭṭhigatāni jinitvā tatheva tena kāraṇena evaṃ bodhiṃ anupāpuṇiṃsu paccekabodhiñāṇaṃ paccakkhaṃ kariṃsūti attho. 88-89. „‚Der versammelten Paccekabuddhas‘ (paccekabuddhānaṃ samāgatānaṃ) bedeutet: der zusammengekommenen, erschienenen Paccekabuddhas. Ariṭṭha, Upariṭṭha, Tagarasikhī, Yasassī, Sudassana, Piyadassī, Gandhāra, Piṇḍola, Upāsabha, Nitha, Tatha, Sutavā, Bhāvitatta, Sumbha, Subha, Methula, Aṭṭhama, Sumedha, Anīgha, Sudāṭha, Hiṅgu, Hiṅgo, die beiden Jālins, Aṭṭhaka, Kosala, Subāhu, Upanemisa, Nemisa, Santacitta, Sacca, Tatha, Viraja, Paṇḍita, Kāla, Upakāla, Vijito, Jito, Aṅga, Paṅga, Guttijita, Passī, Jahī, Upadhi, die Wurzel des Leidens (dukkhamūla), Aparājita, Sarabhaṅgo, Lomahaṃsa, Uccaṅgamāya, Asita, Anāsava, Manomaya, Mānacchida, Bandhumā, Tadādhimutta, Vimalo, Ketumā, Kotumbaraṅgo, Mātaṅgo, Ariya, Accuta, Accutagāmī, Byāmako, Sumaṅgala, Dibbila und so weiter – von diesen Hunderten von Paccekabuddhas ihre Taten (apadānāni), ihre aufeinanderfolgenden individuellen Darlegungen (byākaraṇāni), was das Elend [der Welt] (ādīnava) war, was das Objekt der Entsagung (virāgavatthu) war, welches die Ursache des Nicht-Anhaftens (anallīyanakāraṇa) ist, und wie und durch welche Ursache sie die Erleuchtung (bodhi) erlangten und das Wissen der vier Pfade (catumaggañāṇa) direkt verwirklichten. ‚In den Dingen, die mit Leidenschaft behaftet sind‘ (sarāgavatthusū) bedeutet: in den Objekten, an denen man stark anhaftet, nämlich in den Begierden nach Sinnesobjekten und den geistigen Befleckungen (vatthukāmakilesakāma). ‚Wahrnehmer der Leidenschaftslosigkeit‘ (virāgasaññī) bedeutet: jene, die die Wahrnehmung der Entsagung besitzen, also leidenschaftlos sind. ‚In der leidenschaftlichen Welt‘ (rattamhi lokamhi), in dieser Welt, deren Natur das Anhaften ist, haben sie den Geist von ihr abgewandt, einen nicht anhaftenden Geist bewahrt und diese Bindungen aufgegeben. ‚Geistige Wucherung‘ (papañca): Gier ist ein Hemmnis, Hass ist ein Hemmnis, alle Befleckungen sind Hemmnisse. Nachdem sie die als Hemmnisse bekannten Befleckungen aufgegeben hatten. ‚Nachdem sie die zitternden Regungen besiegt hatten‘ (jiya phanditāni) bedeutet: nachdem sie die zitternden Regungen, nämlich die zweiundsechzig spekulativen Ansichten (dvāsaṭṭhi diṭṭhigatāni), überwunden hatten. Und auf genau diese Weise, durch jene Ursache, erlangten sie die Erleuchtung (bodhi) und verwirklichten das Wissen der Paccekabodhi. Dies ist die Bedeutung.“ 90-91. Sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍanti tajjanaphālanavadhabandhanaṃ nidhāya ṭhapetvā tesaṃ sabbasattānaṃ antare aññataraṃ kañci ekampi sattaṃ aviheṭhayaṃ aviheṭhayanto adukkhāpento mettena cittena ‘‘sabbe sattā sukhitā hontū’’ti mettāsahagatena cetasā hitānukampī hitena anukampanasabhāvo. Atha vā sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍanti sabbesūti sabbena sabbaṃ sabbathā sabbaṃ asesaṃ nissesaṃ pariyādiyanavacanametaṃ. Bhūtesūti bhūtā vuccanti tasā ca thāvarā ca. Yesaṃ tasiṇā taṇhā appahīnā, yesañca bhayabheravā appahīnā, te tasā. Kiṃ kāraṇā vuccanti tasā? Tasanti uttasanti paritasanti bhāyanti santāsaṃ āpajjanti, taṃ kāraṇā vuccanti tasā. Yesaṃ tasiṇā taṇhā pahīnā, yesañca bhayabheravā pahīnā, te thāvarā. Kiṃ kāraṇā vuccanti thāvarā? Thiranti na tasanti na uttasanti na paritasanti na bhāyanti na santāsaṃ āpajjanti, taṃ kāraṇā vuccanti thāvarā. 90-91. „Die Gewalt gegenüber allen Wesen abgelegt habend“ (sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍaṃ) bedeutet: Nachdem man das Einschüchtern, Schlagen, Töten und Fesseln abgelegt und beiseitegelegt hat, schädigt und verletzt man kein einziges Wesen unter all diesen Lebewesen, fügt ihnen kein Leiden zu und verweilt mit liebevollem Geist: „Mögen alle Wesen glücklich sein!“ – mit einem von liebender Güte begleiteten Geist, auf das Wohl bedacht und von der Natur des Mitgefühls geleitet. Oder aber: „Gegenüber allen Wesen, die Gewalt abgelegt habend“ – hierbei ist „allen“ (sabbesu) ein Begriff der vollständigen Erfassung: ganz und gar, auf jede Weise, restlos und ohne Ausnahme. Mit „Wesen“ (bhūtesu) sind die Beweglichen (tasā) und die Festen (thāvarā) gemeint. Jene, bei denen das durstige Verlangen (taṇhā) nicht überwunden ist und bei denen Furcht und Schrecken nicht überwunden sind, sind die Beweglichen. Aus welchem Grund werden sie „die Beweglichen“ genannt? Sie zittern, erschrecken, geraten in Angst, fürchten sich und verfallen in Bestürzung; aus diesem Grund werden sie „die Beweglichen“ genannt. Jene, bei denen das durstige Verlangen überwunden ist und bei denen Furcht und Schrecken überwunden sind, sind die Festen. Aus welchem Grund werden sie „die Festen“ genannt? Sie stehen fest, zittern nicht, erschrecken nicht, geraten nicht in Angst, fürchten sich nicht und verfallen nicht in Bestürzung; aus diesem Grund werden sie „die Festen“ genannt. Tayo daṇḍā – kāyadaṇḍo, vacīdaṇḍo, manodaṇḍoti. Tividhaṃ kāyaduccaritaṃ kāyadaṇḍo, catubbidhaṃ vacīduccaritaṃ vacīdaṇḍo, tividhaṃ manoduccaritaṃ manodaṇḍo. Sabbesu sakalesu bhūtesu sattesu taṃ tividhaṃ daṇḍaṃ nidhāya nidahitvā oropayitvā samoropayitvā nikkhipitvā [Pg.145] paṭippassambhetvā hiṃsanatthaṃ agahetvāti sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍaṃ. Aviheṭhayaṃ aññatarampi tesanti ekamekampi sattaṃ pāṇinā vā leḍḍunā vā daṇḍena vā satthena vā anduyā vā rajjuyā vā aviheṭhayanto, sabbepi satte pāṇinā vā leḍḍunā vā daṇḍena vā satthena vā anduyā vā rajjuyā vā aviheṭhayaṃ aviheṭhayanto aññatarampi tesaṃ. Na puttamiccheyya kuto sahāyanti nāti paṭikkhepo. Puttanti cattāro puttā atrajo putto, khettajo, dinnako, antevāsiko putto. Sahāyanti sahāyo vuccati yena saha āgamanaṃ phāsu, gamanaṃ phāsu, ṭhānaṃ phāsu, nisajjā phāsu, ālapanaṃ phāsu, sallapanaṃ phāsu, samullapanaṃ phāsu. Na puttamiccheyya kuto sahāyanti puttampi na iccheyya na sādiyeyya na pattheyya na pihayeyya nābhijappeyya, kuto mittaṃ vā sandiṭṭhaṃ vā sambhattaṃ vā sahāyaṃ vā iccheyya sādiyeyya pattheyya pihayeyya abhijappeyyāti na puttamiccheyya kuto sahāyaṃ. Eko care khaggavisāṇakappoti so paccekasambuddho pabbajjāsaṅkhātena eko, adutiyaṭṭhena eko, taṇhāya pahānaṭṭhena eko, ekantavītarāgoti eko, ekantavītadosoti eko, ekantavītamohoti eko, ekantanikkilesoti eko, ekāyanamaggaṃ gatoti eko, eko anuttaraṃ paccekasambodhiṃ abhisambuddhoti eko. Es gibt drei Arten von Gewalt (daṇḍa): körperliche Gewalt, sprachliche Gewalt und geistige Gewalt. Das dreifache körperliche Fehlverhalten ist körperliche Gewalt; das vierfache sprachliche Fehlverhalten ist sprachliche Gewalt; das dreifache geistige Fehlverhalten ist geistige Gewalt. Gegenüber allen, jeglichen Wesen diese dreifache Gewalt abgelegt, weggeworfen, niedergelegt, beiseitegelegt und zur Ruhe gebracht habend – sie also nicht zum Zweck der Schädigung ergreifend –, das bedeutet: „Gegenüber allen Wesen die Gewalt abgelegt habend“. „Kein einziges Wesen unter ihnen verletzend“ bedeutet, dass man nicht ein einziges Wesen verletzt, sei es mit der Hand, einem Erdkloß, einem Stock, einer Waffe, einer Fessel oder einem Seil; alle Wesen nicht verletzend, sei es mit der Hand, einem Erdkloß, einem Stock, einer Waffe, einer Fessel oder einem Seil – das meint „kein einziges Wesen unter ihnen verletzend“. „Er sollte sich keinen Sohn wünschen, wie viel weniger einen Gefährten“ – „nicht“ (na) drückt eine Zurückweisung aus. Unter „Sohn“ (putta) versteht man vier Arten von Söhnen: den leiblichen Sohn, den auf dem eigenen Feld geborenen Sohn, den adoptierten Sohn und den im Hause lebenden Schüler-Sohn. Als „Gefährte“ (sahāya) wird derjenige bezeichnet, mit dem zusammen das Kommen angenehm ist, das Gehen angenehm, das Stehen angenehm, das Sitzen angenehm, das Ansprechen angenehm, das Unterhalten angenehm und das gemeinsame Plaudern angenehm ist. „Er sollte sich keinen Sohn wünschen, wie viel weniger einen Gefährten“ bedeutet: Er sollte sich selbst einen Sohn nicht wünschen, keinen Gefallen an ihm finden, ihn nicht ersehnen, nicht begehren und nicht nach ihm schmachten; wie viel weniger sollte er sich einen Freund, einen Bekannten, einen vertrauten Genossen oder einen Gefährten wünschen, Gefallen an ihm finden, ihn ersehnen, begehren oder nach ihm schmachten. „Er wandere allein wie das Horn eines Nashorns“: Dieser Paccekabuddha ist „allein“ (eko) im Sinne der Weihe der Hauslosigkeit (pabbajjā), allein aufgrund des Fehlens eines zweiten Gefährten, allein durch das Aufgeben des Verlangens, allein als einer, der gänzlich frei von Gier ist, allein als einer, der gänzlich frei von Hass ist, allein als einer, der gänzlich frei von Verblendung ist, allein als einer, der gänzlich frei von geistigen Trübungen ist, allein als einer, der den Pfad zum einzigen Ziel gegangen ist, und allein als einer, der die unübertreffliche Paccekaselbsterleuchtung vollkommen verwirklicht hat. Kathaṃ so paccekasambuddho pabbajjāsaṅkhātena eko? So hi paccekasambuddho sabbaṃ gharāvāsapalibodhaṃ chinditvā, puttadārapalibodhaṃ chinditvā, ñātipalibodhaṃ, mittāmaccapalibodhaṃ, sannidhipalibodhaṃ chinditvā kesamassuṃ ohāretvā kāsāyāni vatthāni acchādetvā agārasmā nikkhamma anagāriyaṃ pabbajitvā akiñcanabhāvaṃ upagantvā ekova carati viharati iriyati vattati pāleti yapeti yāpetīti evaṃ so paccekasambuddho pabbajjāsaṅkhātena eko. Wie ist dieser Paccekabuddha im Sinne der Weihe der Hauslosigkeit (pabbajjā) allein? Dieser Paccekabuddha schneidet nämlich alle Hindernisse des Haushaltslebens ab, schneidet das Hindernis von Frau und Kindern ab, das Hindernis von Verwandten, das Hindernis von Freunden und Gefährten, das Hindernis von Vorratsansammlungen, schert Haare und Bart ab, legt die fahlgelben Gewänder an, zieht aus dem Hause fort in die Hauslosigkeit, gelangt in den Zustand der völligen Besitzlosigkeit und wandert, verweilt, bewegt sich, lebt, schützt sich, erhält und fristet sein Leben ganz allein. Auf diese Weise ist dieser Paccekabuddha im Sinne der Weihe der Hauslosigkeit allein. Kathaṃ so paccekasambuddho adutiyaṭṭhena eko? So evaṃ pabbajito samāno eko araññavanapatthāni pantāni senāsanāni paṭisevati appasaddāni appanigghosāni vijanavātāni manussarāhasseyyakāni paṭisallānasāruppāni. So eko tiṭṭhati, eko gacchati, eko nisīdati, eko seyyaṃ kappeti, eko gāmaṃ piṇḍāya pavisati, eko paṭikkamati, eko raho [Pg.146] nisīdati, eko caṅkamati, eko carati viharati iriyati vattati pāleti yapeti yāpetīti evaṃ so adutiyaṭṭhena eko. Wie ist dieser Paccekabuddha im Sinne des Fehlens eines zweiten Gefährten allein? Er, der so in die Hauslosigkeit Aufgenommene, sucht ganz allein einsame Einsiedeleien in den Wäldern und Dschungeln auf, die geräuscharm und frei von Lärm sind, von menschenleeren Winden umweht, von Menschen abgeschieden und für die Zurückgezogenheit geeignet. Er steht allein, geht allein, sitsen allein, bereitet sein Lager allein, betritt das Dorf allein für die Almosenspeise, kehrt allein zurück, sitzt allein an einem verborgenen Ort, geht allein auf und ab, wandert, verweilt, bewegt sich, lebt, schützt sich, erhält und fristet sein Leben allein. Auf diese Weise ist er im Sinne des Fehlens eines zweiten Gefährten allein. Kathaṃ so paccekasambuddho taṇhāya pahānaṭṭhena eko? So eko adutiyo appamatto ātāpī pahitatto viharanto mahāpadhānaṃ padahanto māraṃ sasenakaṃ namuciṃ kaṇhaṃ pamattabandhuṃ vidhametvā ca taṇhājāliniṃ visaritaṃ visattikaṃ pajahi vinodesi byantiṃ akāsi anabhāvaṃ gamesi. Wie ist dieser Paccekabuddha im Sinne der Überwindung des Verlangens (taṇhā) allein? Er, allein und ohne Gefährten, achtsam, eifrig und entschlossenen Geistes verweilend, übt die große Anstrengung aus; nachdem er Māra mitsamt seinem Heer, den Namuci, den Dunklen, den Freund der Nachlässigen, vernichtet hat, gab er das netzartige, sich ausbreitende und anhaftende Verlangen auf, vertrieb es, vernichtete es und brachte es zum Erlöschen. ‘‘Taṇhādutiyo puriso, dīghamaddhāna saṃsaraṃ; Itthabhāvaññathābhāvaṃ, saṃsāraṃ nātivattati. „Der Mensch, der das Verlangen als seinen Gefährten hat, wandert für lange Zeit im Daseinskreislauf umher; er überwindet diesen Kreislauf nicht, der aus dem Hiersein und dem Anderswerden besteht. ‘‘Etamādīnavaṃ ñatvā, taṇhaṃ dukkhassa sambhavaṃ; Vītataṇho anādāno, sato bhikkhu paribbaje’’ti. (itivu. 15, 105; mahāni. 191) – Dieses Elend erkennend, dass das Verlangen die Quelle des Leidens ist, sollte der Mönch, frei von Verlangen und ohne Anklammerung, achtsam umherziehen.“ Evaṃ so paccekasambuddho taṇhāya pahānaṭṭhena eko. Auf diese Weise ist dieser Paccekabuddha im Sinne der Überwindung des Verlangens allein. Kathaṃ so paccekasambuddho ekantavītarāgoti eko? Rāgassa pahīnattā ekantavītarāgoti eko, dosassa pahīnattā ekantavītadosoti eko, mohassa pahīnattā ekantavītamohoti eko, kilesānaṃ pahīnattā ekantanikkilesoti eko, evaṃ so paccekasambuddho ekantavītarāgoti eko. Wie ist dieser Paccekabuddha allein als einer, der gänzlich frei von Gier (ekantavītarāgo) ist? Da die Gier überwunden ist, ist er allein als einer, der gänzlich frei von Gier ist; da der Hass überwunden ist, ist er allein als einer, der gänzlich frei von Hass ist; da die Verblendung überwunden ist, ist er allein als einer, der gänzlich frei von Verblendung ist; da die Befleckungen überwunden sind, ist er allein als einer, der gänzlich frei von Befleckungen ist. Auf diese Weise ist dieser Paccekabuddha allein als einer, der gänzlich frei von Gier ist. Kathaṃ so paccekasambuddho ekāyanamaggaṃ gatoti eko? Ekāyanamaggo vuccati cattāro satipaṭṭhānā, cattāro sammappadhānā, cattāro iddhipādā, pañcindriyāni, pañca balāni, satta bojjhaṅgā, ariyo aṭṭhaṅgiko maggo. Wie ist dieser Paccekabuddha allein als einer, der den Pfad gegangen ist, der zum einzigen Ziel führt (ekāyanamagga)? Als der Pfad, der zum einzigen Ziel führt, werden bezeichnet: die vier Grundlagen der Achtsamkeit, die vier rechten Anstrengungen, die vier Grundlagen der übernatürlichen Macht, die fünf Fähigkeiten, die fünf Kräfte, die sieben Erleuchtungsglieder und der edle achtfache Pfad. ‘‘Ekāyanaṃ jātikhayantadassī, maggaṃ pajānāti hitānukampī; Etena maggena tariṃsu pubbe, tarissanti ye ca taranti ogha’’nti. (saṃ. ni. 5.384; mahāni. 191) – „Den Pfad zum einzigen Ziel, der das Ende der Geburt schaut, kennt jener, der auf das Wohl bedacht und voller Mitgefühl ist. Auf diesem Pfad überquerten sie in der Vergangenheit, werden sie in der Zukunft überqueren und überqueren sie in der Gegenwart die Flut.“ Evaṃ so ekāyanamaggaṃ gatoti eko. Auf diese Weise ist er allein als einer, der den Pfad zum einzigen Ziel gegangen ist. Kathaṃ so paccekasambuddho eko anuttaraṃ paccekasambodhiṃ abhisambuddhoti eko? Bodhi vuccati catūsu maggesu ñāṇaṃ (mahāni. 191; cūḷani. khaggavisāṇasuttaniddesa 121). Paññā paññindriyaṃ paññābalaṃ [Pg.147] dhammavicayasambojjhaṅgo vīmaṃsā vipassanā sammādiṭṭhi. So paccekasambuddho tena paccekabodhiñāṇena ‘‘sabbe saṅkhārā aniccā’’ti bujjhi, ‘‘sabbe saṅkhārā dukkhā’’ti bujjhi, ‘‘sabbe dhammā anattā’’ti bujjhi. ‘‘Avijjāpaccayā saṅkhārā’’ti bujjhi, ‘‘saṅkhārapaccayā viññāṇa’’nti bujjhi, ‘‘viññāṇapaccayā nāmarūpa’’nti bujjhi, ‘‘nāmarūpapaccayā saḷāyatana’’nti bujjhi, ‘‘saḷāyatanapaccayā phasso’’ti bujjhi, ‘‘phassapaccayā vedanā’’ti bujjhi, ‘‘vedanāpaccayā taṇhā’’ti bujjhi, ‘‘taṇhāpaccayā upādāna’’nti bujjhi, ‘‘upādānapaccayā bhavo’’ti bujjhi, ‘‘bhavapaccayā jātī’’ti bujjhi, ‘‘jātipaccayā jarāmaraṇa’’nti bujjhi. ‘‘Avijjānirodhā saṅkhāranirodho’’ti bujjhi, ‘‘saṅkhāranirodhā viññāṇanirodho’’ti bujjhi…pe… ‘‘bhavanirodhā jātinirodho’’ti bujjhi, ‘‘jātinirodhā jarāmaraṇanirodho’’ti bujjhi. ‘‘Idaṃ dukkha’’nti bujjhi, ‘‘ayaṃ dukkhasamudayo’’ti bujjhi, ‘‘ayaṃ dukkhanirodho’’ti bujjhi, ‘‘ayaṃ dukkhanirodhagāminipaṭipadā’’ti bujjhi. ‘‘Ime āsavā’’ti bujjhi, ‘‘ayaṃ āsavasamudayo’’ti bujjhi…pe… ‘‘paṭipadā’’ti bujjhi, ‘‘ime dhammā abhiññeyyā’’ti bujjhi, ‘‘ime dhammā pahātabbā’’ti bujjhi, ‘‘ime dhammā sacchikātabbā’’ti bujjhi, ‘‘ime dhammā bhāvetabbā’’ti bujjhi. Channaṃ phassāyatanānaṃ samudayañca atthaṅgamañca assādañca ādīnavañca nissaraṇañca bujjhi, pañcannaṃ upādānakkhandhānaṃ samudayañca…pe… nissaraṇañca bujjhi, catunnaṃ mahābhūtānaṃ samudayañca atthaṅgamañca assādañca ādīnavañca nissaraṇañca bujjhi, ‘‘yaṃ kiñci samudayadhammaṃ, sabbaṃ taṃ nirodhadhamma’’nti bujjhi. Wie ist jener Einzelbuddha (Paccekabuddha) allein zur unübertrefflichen Einzelerleuchtung (Paccekabodhi) erwacht, weshalb er 'allein' genannt wird? Erleuchtung (Bodhi) nennt man das Wissen auf den vier Pfaden: Weisheit, die Fähigkeit der Weisheit, die Kraft der Weisheit, das Erleuchtungsglied der Lehruntersuchung, die Prüfung, die Hellsicht (Vipassanā), die rechte Anschauung. Jener Einzelbuddha erkannte durch jenes Einzelerleuchtungswissen: 'Alle gestalteten Dinge sind unbeständig', er erkannte: 'Alle gestalteten Dinge sind leidvoll', er erkannte: 'Alle Phänomene sind unpersönlich'. Er erkannte: 'Bedingt durch Unwissenheit entstehen die Gestaltungen', er erkannte: 'Bedingt durch Gestaltungen entsteht das Bewusstsein', er erkannte: 'Bedingt durch das Bewusstsein entsteht Geist-und-Körper', er erkannte: 'Bedingt durch Geist-und-Körper entstehen die sechs Sinnesbereiche', er erkannte: 'Bedingt durch die sechs Sinnesbereiche entsteht Kontakt', er erkannte: 'Bedingt durch Kontakt entsteht Gefühl', er erkannte: 'Bedingt durch Gefühl entsteht Begehren', er erkannte: 'Bedingt durch Begehren entsteht Anhaften', er erkannte: 'Bedingt durch Anhaften entsteht Werden', er erkannte: 'Bedingt durch Werden entsteht Geburt', er erkannte: 'Bedingt durch Geburt entstehen Altern und Tod'. Er erkannte: 'Durch das Erlöschen der Unwissenheit erlöschen die Gestaltungen', er erkannte: 'Durch das Erlöschen der Gestaltungen erlischt das Bewusstsein' ...und so weiter... er erkannte: 'Durch das Erlöschen des Werdens erlischt die Geburt', er erkannte: 'Durch das Erlöschen der Geburt erlöschen Altern und Tod'. Er erkannte: 'Dies ist das Leiden', er erkannte: 'Dies ist die Entstehung des Leidens', er erkannte: 'Dies ist das Erlöschen des Leidens', er erkannte: 'Dies ist der zum Erlöschen des Leidens führende Pfad'. Er erkannte: 'Dies sind die Triebe', er erkannte: 'Dies ist die Entstehung der Triebe' ...und so weiter... er erkannte: 'Pfad', er erkannte: 'Diese Dinge sind vollkommen zu erkennen', er erkannte: 'Diese Dinge sind aufzugeben', er erkannte: 'Diese Dinge sind zu verwirklichen', er erkannte: 'Diese Dinge sind zu entfalten'. Er erkannte die Entstehung, das Vergehen, den Genuss, das Elend und das Entkommen der sechs Berührungsbereiche; er erkannte die Entstehung ...und so weiter... das Entkommen der fünf Gruppen des Anhaftens; er erkannte die Entstehung, das Vergehen, den Genuss, das Elend und das Entkommen der vier großen Elemente; er erkannte: 'Alles, was der Natur des Entstehens unterliegt, unterliegt ganz der Natur des Erlöschens'. Atha vā yaṃ bujjhitabbaṃ anubujjhitabbaṃ paṭibujjhitabbaṃ sambujjhitabbaṃ adhigantabbaṃ phassitabbaṃ sacchikātabbaṃ, sabbaṃ taṃ tena paccekabodhiñāṇena bujjhi anubujjhi paṭibujjhi sambujjhi adhigañchi phassesi sacchākāsīti, evaṃ so paccekasambuddho eko anuttaraṃ paccekasambodhiṃ abhisambuddhoti eko. Oder vielmehr: Was immer zu erkennen, nachträglich zu erkennen, zu durchdringen, vollkommen zu erkennen, zu erreichen, zu erfahren und zu verwirklichen ist, das alles hat er durch jenes Einzelerleuchtungswissen erkannt, nachträglich erkannt, durchdrungen, vollkommen erkannt, erreicht, erfahren und verwirklicht. Auf diese Weise ist jener Einzelbuddha allein zur unübertrefflichen Einzelerleuchtung erwacht, weshalb er 'allein' genannt wird. Careti aṭṭha cariyāyo (cūḷani. khaggavisāṇasuttaniddesa 121) – iriyāpathacariyā, āyatanacariyā, saticariyā, samādhicariyā, ñāṇacariyā, maggacariyā, patticariyā, lokatthacariyā. Iriyāpathacariyāti catūsu iriyāpathesu, āyatanacariyāti chasu ajjhattikabāhiresu āyatanesu, saticariyāti catūsu satipaṭṭhānesu, samādhicariyāti catūsu jhānesu, ñāṇacariyāti catūsu ariyasaccesu, maggacariyāti catūsu ariyamaggesu, patticariyāti catūsu [Pg.148] sāmaññaphalesu, lokatthacariyāti tathāgatesu arahantesu sammāsambuddhesu, padesato paccekasambuddhesu, padesato sāvakesu. Er übt die acht Verhaltensweisen aus – das Verhalten bezüglich der Körperhaltungen, das Verhalten bezüglich der Sinnesbereiche, das Verhalten bezüglich der Achtsamkeit, das Verhalten bezüglich der Sammlung, das Verhalten bezüglich des Wissens, das Verhalten bezüglich des Pfades, das Verhalten bezüglich der Erlangung, das Verhalten zum Wohle der Welt. 'Das Verhalten bezüglich der Körperhaltungen' bezieht sich auf die vier Körperhaltungen; 'das Verhalten bezüglich der Sinnesbereiche' bezieht sich auf die sechs inneren und äußeren Sinnesbereiche; 'das Verhalten bezüglich der Achtsamkeit' bezieht sich auf die vier Grundlagen der Achtsamkeit; 'das Verhalten bezüglich der Sammlung' bezieht sich auf die vier jhānas (Vertiefungen); 'das Verhalten bezüglich des Wissens' bezieht sich auf die vier edlen Wahrheiten; 'das Verhalten bezüglich des Pfades' bezieht sich auf die vier edlen Pfade; 'das Verhalten bezüglich der Erlangung' bezieht sich auf die vier Früchte des Asketentums; 'das Verhalten zum Wohle der Welt' findet sich vollständig bei den Tathāgatas, den Arahants, den vollkommen Erwachten, und teilweise bei den Einzelbuddhas sowie teilweise bei den Jüngern. Iriyāpathacariyā ca paṇidhisampannānaṃ, āyatanacariyā ca indriyesu guttadvārānaṃ, saticariyā ca appamādavihārīnaṃ, samādhicariyā ca adhicittamanuyuttānaṃ, ñāṇacariyā ca buddhisampannānaṃ, maggacariyā ca sammāpaṭipannānaṃ, patticariyā ca adhigataphalānaṃ, lokatthacariyā ca tathāgatānaṃ arahantānaṃ sammāsambuddhānaṃ, padesato paccekasambuddhānaṃ, padesato sāvakānaṃ. Imā aṭṭha cariyāyo. Und das Verhalten bezüglich der Körperhaltungen gehört jenen, die vollkommen entschlossen sind; das Verhalten bezüglich der Sinnesbereiche gehört jenen, deren Sinnespforten gezügelt sind; das Verhalten bezüglich der Achtsamkeit gehört jenen, die in Unermüdlichkeit verweilen; das Verhalten bezüglich der Sammlung gehört jenen, die dem höheren Geist hingegeben sind; das Verhalten bezüglich des Wissens gehört jenen, die mit Weisheit ausgestattet sind; das Verhalten bezüglich des Pfades gehört jenen, die richtig praktizieren; das Verhalten bezüglich der Erlangung gehört jenen, die die Früchte erlangt haben; das Verhalten zum Wohle der Welt gehört den Tathāgatas, den Arahants, den vollkommen Erwachten, und in Teilen den Einzelbuddhas und in Teilen den Jüngern. Dies sind die acht Verhaltensweisen. Aparāpi aṭṭha cariyāyo – adhimuccanto saddhāya carati, paggaṇhanto vīriyena carati, upaṭṭhapento satiyā carati, avikkhepaṃ karonto samādhinā carati, pajānanto paññāya carati, vijānanto viññāṇacariyāya carati, evaṃ paṭipannassa kusalā dhammā āyatananti āyatanacariyāya carati. Evaṃ paṭipanno visesamadhigacchatīti visesacariyāya carati. Imā aṭṭha cariyāyo. Es gibt noch weitere acht Verhaltensweisen: Entschlossenheit fassend wandelt er durch Vertrauen; anspornend wandelt er durch Tatkraft; gegenwärtig machend wandelt er durch Achtsamkeit; Unabgelenktheit bewirkend wandelt er durch Sammlung; klar erkennend wandelt er durch Weisheit; unterscheidend wandelt er im Verhalten des Bewusstseins; für einen so Praktizierenden weiten sich die heilsamen Geisteszustände aus, daher wandelt er im Verhalten des Ausweitens; ein so Praktizierender erlangt das Besondere, daher wandelt er im Verhalten des Besonderen. Dies sind die acht Verhaltensweisen. Aparāpi aṭṭha cariyāyo – dassanacariyā ca sammādiṭṭhiyā, abhiniropanacariyā ca sammāsaṅkappassa, pariggahacariyā ca sammāvācāya, samuṭṭhānacariyā ca sammākammantassa, vodānacariyā ca sammāājīvassa, paggahacariyā ca sammāvāyāmassa, upaṭṭhānacariyā ca sammāsatiyā, avikkhepacariyā ca sammāsamādhissa. Imā aṭṭha cariyāyo. Es gibt noch weitere acht Verhaltensweisen: das Verhalten des Sehens durch rechte Anschauung; das Verhalten des Ausrichtens durch rechten Entschluss; das Verhalten des Erfassens durch rechte Rede; das Verhalten des Hervorbringens durch rechtes Handeln; das Verhalten des Reinigens durch rechten Lebensunterhalt; das Verhalten des Anspornens durch rechte Anstrengung; das Verhalten des Gegenwärtigmachens durch rechte Achtsamkeit; das Verhalten der Unabgelenktheit durch rechte Sammlung. Dies sind die acht Verhaltensweisen. Khaggavisāṇakappoti yathā khaggassa nāma visāṇaṃ ekameva hoti, adutiyaṃ, evameva so paccekasambuddho takkappo tassadiso tappaṭibhāgo. Yathā atiloṇaṃ vuccati loṇakappo, atitittakaṃ vuccati tittakappo, atimadhuraṃ vuccati madhurakappo, atiuṇhaṃ vuccati aggikappo, atisītaṃ vuccati himakappo, mahāudakakkhandho vuccati samuddakappo, mahābhiññābalappatto sāvako vuccati satthukappoti. Evameva so paccekasambuddho khaggavisāṇakappo, khaggavisāṇasadiso khaggavisāṇapaṭibhāgo eko adutiyo muttabandhano sammā loke carati viharati iriyati vattati pāleti yapeti yāpetīti eko care khaggavisāṇakappo. Tenāhu paccekasambuddhā – Khaggavisāṇakappo (dem Horn eines Nashorns gleichend): Wie das Horn des Nashorns fürwahr nur eines ist, ohne ein zweites, ebenso ist jener Einzelbuddha diesem gleichend, ihm ähnlich, sein Gegenpart. Wie man das extrem Salzige 'salzähnlich' nennt, das extrem Bittere 'bitterähnlich', das extrem Süße 'süßähnlich', das extrem Heiße 'feuerähnlich', das extrem Kalte 'schneeähnlich', eine riesige Wassermasse 'ozeanähnlich' und einen Jünger, der große Geisteskräfte und Macht erlangt hat, 'lehrerähnlich' nennt. Ebenso ist jener Einzelbuddha dem Horn eines Nashorns gleich, dem Horn eines Nashorns ähnlich, dem Horn eines Nashorns entsprechend, allein, ohne Gefährten, frei von Fesseln; er wandelt recht in der Welt, verweilt, bewegt sich, lebt, schützt sich, fristet sein Leben und erhält sich am Leben; [daher heißt es]: 'Allein soll er wandeln, dem Horn des Nashorns gleich.' Darum sagten die Einzelbuddhas: ‘‘Sabbesu [Pg.149] bhūtesu nidhāya daṇḍaṃ, aviheṭhayaṃ aññatarampi tesaṃ; Na puttamiccheyya kuto sahāyaṃ, eko care khaggavisāṇakappo. „Gegenüber allen Lebewesen die Gewalt ablegend, keines von ihnen verletzend, soll er sich nicht nach einem Sohn sehnen, geschweige denn nach einem Gefährten. Allein soll er wandeln, dem Horn des Nashorns gleich.“ ‘‘Saṃsaggajātassa bhavanti snehā, snehanvayaṃ dukkhamidaṃ pahoti; Ādīnavaṃ snehajaṃ pekkhamāno; Eko care khaggavisāṇakappo. „Dem, der in Gesellschaft lebt, entstehen Zuneigungen; diesem Zuneigung-Folgen entspringt dieses Leiden. Das Elend erkennend, das aus Zuneigung entspringt, soll er allein wandeln, dem Horn des Nashorns gleich.“ ‘‘Mitte suhajje anukampamāno, hāpeti atthaṃ paṭibaddhacitto; Etaṃ bhayaṃ santhave pekkhamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Wer Mitgefühl mit Freunden und Gefährten hat, schädigt sein eigenes Wohl, da sein Geist an sie gebunden ist. Sieht man diese Gefahr in der Geselligkeit, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Vaṃso visālova yathā visatto, puttesu dāresu ca yā apekkhā; Vaṃse kaḷīrova asajjamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Wie ein weit ausgebreitetes Bambusgebüsch verheddert ist, so ist die Anhänglichkeit an Söhne und Ehefrauen. Wie ein junger Bambusschössling, der sich nicht verheddert, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Migo araññamhi yathā abaddho, yenicchakaṃ gacchati gocarāya; Viññū naro seritaṃ pekkhamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Wie ein ungebundenes Wild im Walde dorthin zur Weide geht, wohin es will, so wandere der weise Mensch, der die Unabhängigkeit vor Augen hat, allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Āmantanā hoti sahāyamajjhe, vāse ca ṭhāne gamane cārikāya; Anabhijjhitaṃ seritaṃ pekkhamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Inmitten von Gefährten gibt es Absprachen beim Rasten, Stehen, Gehen und Reisen. Sieht man auf die ungebundene Freiheit, die von anderen nicht beansprucht wird, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Khiḍḍā ratī hoti sahāyamajjhe, puttesu pemaṃ vipulañca hoti; Piyavippayogaṃ vijigucchamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Inmitten von Gefährten gibt es Spiel und Vergnügen, und zu den Söhnen ist die Liebe groß. Da man die Trennung von dem, was man liebt, verabscheut, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Cātuddiso [Pg.150] appaṭigho ca hoti, santussamāno itarītarena; Parissayānaṃ sahitā achambhī, eko care khaggavisāṇakappo. Nach allen vier Himmelsrichtungen hin offen und frei von Groll, zufrieden mit allem, was man erhält, Gefahren ertragend und ohne Furcht, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Dussaṅgahā pabbajitāpi eke, atho gahaṭṭhā gharamāvasantā; Appossukko paraputtesu hutvā, eko care khaggavisāṇakappo. Schwer zufriedenzustellen sind manche Hauslose, und ebenso auch Hausväter, die im Hause leben. Unbesorgt um die Kinder anderer, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Oropayitvā gihibyañjanāni, sañchinnapatto yathā koviḷāro; Chetvāna vīro gihibandhanāni, eko care khaggavisāṇakappo. Nachdem man die Abzeichen eines Hausvaters abgelegt hat, wie ein Kovilara-Baum, dessen Blätter abgefallen sind, zerschneide der Tatkräftige die Fesseln des Hauslebens und wandere allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Sace labhetha nipakaṃ sahāyaṃ, saddhiṃ caraṃ sādhuvihāridhīraṃ; Abhibhuyya sabbāni parissayāni, careyya tenattamano satīmā. Findet man einen klugen Gefährten, einen weisen Wanderer von gutem Lebenswandel, so wandere man mit ihm, alle Gefahren überwindend, erfreuten Geistes und achtsam. ‘‘No ce labhetha nipakaṃ sahāyaṃ, saddhiṃ caraṃ sādhuvihāridhīraṃ; Rājāva raṭṭhaṃ vijitaṃ pahāya, eko care mātaṅgaraññeva nāgo. Findet man jedoch keinen klugen Gefährten, keinen weisen Wanderer von gutem Lebenswandel, so wandere man allein, wie ein König, der sein erobertes Reich verlässt, oder wie ein Matanga-Elefant einsam im Walde. ‘‘Addhā pasaṃsāma sahāyasampadaṃ, seṭṭhā samā sevitabbā sahāyā; Ete aladdhā anavajjabhojī, eko care khaggavisāṇakappo. Wahrlich, wir preisen das Erlangen von Gefährten; bessere oder gleiche Gefährten soll man aufsuchen. Findet man diese nicht, so genieße man tadellose Nahrung und wandere allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Disvā suvaṇṇassa pabhassarāni, kammāraputtena suniṭṭhitāni; Saṅghaṭṭamānāni duve bhujasmiṃ, eko care khaggavisāṇakappo. Sieht man zwei glänzende, vom Goldschmied wohlgemachte goldene Armringe an einem einzigen Arm, so klingen sie aneinander; darum wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Evaṃ [Pg.151] dutīyena sahā mamassa, vācābhilāpo abhisajjanā vā; Etaṃ bhayaṃ āyatiṃ pekkhamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Ebenso gibt es für mich, wenn ich mit einem Zweiten zusammenlebe, Reden oder Streit. Sieht man diese Gefahr für die Zukunft, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Kāmā hi citrā madhurā manoramā, virūparūpena mathenti cittaṃ; Ādīnavaṃ kāmaguṇesu disvā, eko care khaggavisāṇakappo. Die Sinnengenüsse sind wahrlich vielfältig, süß und entzückend; in mancherlei Gestalt verwirren sie den Geist. Sieht man das Elend in den Sinnengenüssen, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Ītī ca gaṇḍo ca upaddavo ca, rogo ca sallañca bhayañca metaṃ; Etaṃ bhayaṃ kāmaguṇesu disvā, eko care khaggavisāṇakappo. Sie sind für mich eine Plage, ein Geschwür, ein Unheil, eine Krankheit, ein Pfeil und eine Gefahr. Sieht man diese Gefahr in den Sinnengenüssen, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Sītañca uṇhañca khudaṃ pipāsaṃ, vātātape ḍaṃsasarīsape ca; Sabbānipetāni abhibbhavitvā, eko care khaggavisāṇakappo. Kälte und Hitze, Hunger und Durst, Wind und Sonne, Stechfliegen und Kriechtiere – all dies überwindend, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Nāgova yūthāni vivajjayitvā, sañjātakhandho padumī uḷāro; Yathābhirantaṃ viharaṃ araññe, eko care khaggavisāṇakappo. Wie der edle, lotosgleiche Elefant mit mächtigem Körper, der die Herden verlässt und im Walde weilt, wie es ihm gefällt, so wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Aṭṭhānataṃ saṅgaṇikāratassa, yaṃ phassaye sāmayikaṃ vimuttiṃ; Ādiccabandhussa vaco nisamma, eko care khaggavisāṇakappo. Für einen, der die Geselligkeit liebt, ist es unmöglich, die zeitweilige Befreiung zu erlangen. Bedenkt man die Worte des Sonnenverwandten, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Diṭṭhīvisūkāni upātivatto, patto niyāmaṃ paṭiladdhamaggo; Uppannañāṇomhi anaññaneyyo, eko care khaggavisāṇakappo. Die Verwirrung falscher Ansichten überwunden, die Gewissheit erlangt, den Pfad gefunden habend, in der entstandenen Erkenntnis von keinem anderen mehr abhängig, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Nillolupo [Pg.152] nikkuho nippipāso, nimmakkha niddhantakasāvamoho; Nirāsayo sabbaloke bhavitvā, eko care khaggavisāṇakappo. Frei von Gier, frei von Betrug, ohne Durst, ohne Heuchelei, den Schmutz der Verblendung ausgeblasen habend, wunschlos in der ganzen Welt, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Pāpaṃ sahāyaṃ parivajjayetha, anatthadassiṃ visame niviṭṭhaṃ; Sayaṃ na seve pasutaṃ pamattaṃ, eko care khaggavisāṇakappo. Einen schlechten Gefährten meide man, der das Unheil zeigt und im Unrechten verankert ist. Man geselle sich nicht selbst zu einem, der dem Genuss hingegeben und nachlässig ist, sondern wandere allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Bahussutaṃ dhammadharaṃ bhajetha, mittaṃ uḷāraṃ paṭibhānavantaṃ; Aññāya atthāni vineyya kaṅkhaṃ, eko care khaggavisāṇakappo. Einen vielerfahrenen, das Dhamma bewahrenden, edlen und scharfsinnigen Freund suche man auf. Erkennt man die Ziele und vertreibt die Zweifel, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Khiḍḍaṃ ratiṃ kāmasukhañca loke, analaṅkaritvā anapekkhamāno; Vibhūsaṭṭhānā virato saccavādī, eko care khaggavisāṇakappo. Spiel, Vergnügen und Sinnenglück in der Welt unbeachtet lassend, ohne Verlangen danach, frei von Zierrat, der Wahrheit treu, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Puttañca dāraṃ pitarañca mātaraṃ, dhanāni dhaññāni ca bandhavāni; Hitvāna kāmāni yathodhikāni, eko care khaggavisāṇakappo. Sohn und Frau, Vater und Mutter, Reichtum, Getreide und Verwandte – all diese Sinnengenüsse, wie weit sie auch reichen, hinter sich lassend, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Saṅgo eso parittamettha sokhyaṃ, appassādo dukkhamevettha bhiyyo; Gaḷo eso iti ñatvā matimā, eko care khaggavisāṇakappo. Eine Fessel ist dies, gering ist das Glück darin, wenig der Genuss, vielmehr ist das Leiden reichlich; ein Geschwür ist dies – dies erkennend, wandere der Weise allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Sandālayitvāna saṃyojanāni, jālaṃva bhetvā salilambucārī,Aggīva daḍḍhaṃ anivattamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Die Fesseln zerreißend, wie ein Fisch im Wasser das Netz durchbricht, und wie das Feuer nicht zu dem zurückkehrt, was bereits verbrannt ist, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Okkhittacakkhū [Pg.153] na ca pādalolo, guttindriyo rakkhitamānasāno; Anavassuto apariḍayhamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Mit gesenktem Blick, nicht unstet beim Gehen, die Sinne gezügelt, den Geist gehütet, unbefleckt von Trieben und nicht brennend vor Leidenschaft, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Ohārayitvā gihibyañjanāni, sañchannapatto yathā pārichatto; Kāsāyavattho abhinikkhamitvā, eko care khaggavisāṇakappo. Nachdem man die Abzeichen eines Hausvaters abgelegt hat, wie ein Parichatta-Baum, dessen Blätter abgefallen sind, und bekleidet mit dem gelb-roten Gewand in die Hauslosigkeit hinausgezogen ist, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Rasesu gedhaṃ akaraṃ alolo, anaññaposī sapadānacārī; Kule kule appaṭibaddhacitto, eko care khaggavisāṇakappo. Keine Gier nach Wohlgeschmack entwickelnd, nicht begehrlich, keinen anderen nährend, von Haus zu Haus auf Almosengang gehend, an keine Familie gebunden, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Pahāya pañcāvaraṇāni cetaso, upakkilese byapanujja sabbe; Anissito chejja sinehadosaṃ, eko care khaggavisāṇakappo. Die fünf Hemmnisse des Geistes aufgebend, alle Trübungen vertreibend, unabhängig, das Übel der Anhänglichkeit abschneidend, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Vipiṭṭhikatvāna sukhañca dukkhaṃ, pubbeva somanassadomanassaṃ; Laddhānupekkhaṃ samathaṃ visuddhaṃ, eko care khaggavisāṇakappo. Freude und Leid hinter sich lassend, ebenso wie schon zuvor Frohsinn und Trübsinn, die durch Gleichmut gereinigte, erlangte Ruhe bewahrend, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Āraddhavīriyo paramatthapattiyā, alīnacitto akusītavutti; Daḷhanikkamo thāmabalūpapanno, eko care khaggavisāṇakappo. Tatkräftig strebend nach der Erlangung des höchsten Zieles, mit unerschlafftem Geist, nicht träge im Wandel, von festem Entschluss, mit Kraft und Stärke ausgestattet, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Paṭisallānaṃ jhānamariñcamāno, dhammesu niccaṃ anudhammacārī; Ādīnavaṃ sammasitā bhavesu, eko care khaggavisāṇakappo. Der Einsamkeit und der Vertiefung nicht entsagend, stets dem Gesetz entsprechend in den Dingen wandelnd, das Elend in den Daseinsformen erwägend, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Taṇhakkhayaṃ [Pg.154] patthayamappamatto, aneḷamūgo sutavā satīmā; Saṅkhātadhammo niyato padhānavā, eko care khaggavisāṇakappo. Die Vernichtung des Begehrens ersehnend, unermüdlich, weise, vielerfahren und achtsam, das Gesetz durchschaut habend, gefestigt und voller Tatkraft, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Sīhova saddesu asantasanto, vātova jālamhi asajjamāno; Padumaṃva toyena alimpamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Wie ein Löwe, der vor Geräuschen nicht erschrickt, wie der Wind, der sich nicht im Netz verfängt, wie die Lotosblüte, die vom Wasser unbefleckt bleibt, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Sīho yathā dāṭhabalī pasayha, rājā migānaṃ abhibhuyya cārī; Sevetha pantāni senāsanāni, eko care khaggavisāṇakappo. Wie ein Löwe mit starken Zähnen, der König der Tiere, der kraftvoll alles bezwingend umherstreift, so suche man einsame Lagerstätten auf und wandere allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Mettaṃ upekkhaṃ karuṇaṃ vimuttiṃ, āsevamāno muditañca kāle; Sabbena lokena avirujjhamāno, eko care khaggavisāṇakappo. Güte, Gleichmut, Mitgefühl, Erlösung und Mitfreude zur rechten Zeit entfaltend, mit der ganzen Welt in keinem Widerstreit liegend, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Rāgañca dosañca pahāya mohaṃ, sandālayitvāna saṃyojanāni; Asantasaṃ jīvitasaṅkhayamhi, eko care khaggavisāṇakappo. Gier, Hass und Verblendung aufgebend, die Fesseln zerreißend, furchtlos beim Erlöschen des Lebens, wandere man allein wie das Horn eines Nashorns. ‘‘Bhajanti sevanti ca kāraṇatthā, nikkāraṇā dullabhā ajja mittā; Attatthapaññā asucīmanussā, eko care khaggavisāṇakappo’’ti. „Aus Eigennutz schließen sie sich an und pflegen Umgang; uneigennützige Freunde sind heute schwer zu finden. Die Menschen sind unrein und weise nur für den eigenen Vorteil; man wandere einsam wie das Horn eines Nashorns.“ Tattha sabbesu bhūtesūti khaggavisāṇapaccekabuddhāpadānasuttaṃ. Kā uppatti? Sabbasuttānaṃ catubbidhā uppatti – attajjhāsayato, parajjhāsayato, aṭṭhuppattito, pucchāvasitoti. Tattha khaggavisāṇasuttassa avisesena pucchāvasito uppatti. Visesena pana yasmā ettha kāci gāthā tena [Pg.155] tena paccekabuddhena puṭṭhena vuttā, kāci apuṭṭhena attanā adhigatamagganayānurūpaṃ udānaṃyeva udānentena, tasmā kāyaci gāthāya pucchāvasito, kāyaci attajjhāsayato uppatti. Tattha yā ayaṃ avisesena pucchāvasito uppatti, sā ādito pabhuti evaṃ veditabbā – Hierbei bezieht sich ‚sabbesu bhūtesu‘ (unter allen Wesen) auf das Khaggavisāṇa-Paccekabuddha-Apadāna-Sutta. Was ist der Anlass für sein Entstehen? Das Entstehen aller Suttas ist vierfacher Art: aus eigenem Entschluss, aus dem Entschluss anderer, aufgrund eines besonderen Ereignisses oder aufgrund einer Frage. Unter diesen ist das Entstehen des Khaggavisāṇa-Suttas im Allgemeinen auf eine Frage zurückzuführen. Im Speziellen jedoch, da hierin einige Strophen von diesem oder jenem Paccekabuddha auf Befragung gesprochen wurden, einige wiederum ungefragt, indem sie einfach einen feierlichen Ausspruch (Udāna) taten, welcher dem von ihnen selbst erlangten Pfad entsprach, deshalb liegt manchen Strophen eine Frage zugrunde, während andere aus eigenem Entschluss entstanden sind. Was nun diese Entstehung aufgrund einer Frage im Allgemeinen betrifft, so ist sie von Anfang an wie folgt zu verstehen: Ekaṃ samayaṃ bhagavā sāvatthiyaṃ viharati. Atha kho āyasmato ānandassa rahogatassa paṭisallīnassa evaṃ cetaso parivitakko udapādi – ‘‘buddhānaṃ patthanā ca abhinīhāro ca dissati, tathā sāvakānaṃ, paccekabuddhānaṃ na dissati, yaṃnūnāhaṃ bhagavantaṃ upasaṅkamitvā puccheyya’’nti? So paṭisallānā vuṭṭhito bhagavantaṃ upasaṅkamitvā yathākkamena etamatthaṃ pucchi. Athassa bhagavā pubbayogāvacarasuttaṃ abhāsi – Einmal weilte der Erhabene in Sāvatthī. Da erhob sich im Geist des ehrwürdigen Ānanda, als er sich an einen einsamen Ort zurückgezogen hatte und in Meditation vertieft war, folgender Gedanke: „Das Streben und der feste Entschluss der Buddhas sind bekannt, ebenso wie die der Jünger; doch die der Paccekabuddhas sind nicht bekannt. Wie wäre es, wenn ich mich zum Erhabenen begäbe und ihn danach befragte?“ Er erhob sich aus seiner Meditation, begab sich zum Erhabenen und fragte ihn der Reihe nach nach dieser Angelegenheit. Da sprach der Erhabene zu ihm das Pubbayogāvacara-Sutta: ‘‘Pañcime, ānanda, ānisaṃsā pubbayogāvacare diṭṭheva dhamme paṭikacceva aññaṃ ārādheti. No ce diṭṭheva dhamme paṭikacceva aññaṃ ārādheti, atha maraṇakāle aññaṃ ārādheti. Atha devaputto samāno aññaṃ ārādheti. Atha buddhānaṃ sammukhībhāve khippābhiñño hoti. Atha pacchime kāle paccekasambuddho hotī’’ti. „Es gibt, Ānanda, diese fünf Vorteile für jemanden, der sich zuvor in der geistigen Praxis geübt hat (pubbayogāvacare): Er erlangt die höchste Erkenntnis (Arhatschaft) schon in diesem gegenwärtigen Leben, und zwar frühzeitig. Wenn er sie nicht schon in diesem Leben frühzeitig erlangt, so erlangt er die höchste Erkenntnis zur Zeit des Todes. Wenn nicht dann, so erlangt er die höchste Erkenntnis, wenn er ein Göttersohn (Devaputta) geworden ist. Wenn nicht dann, so erlangt er in der Gegenwart der Buddhas rasche Geistesvollkraft (khippābhiñño). Wenn nicht dann, so wird er in seinem letzten Leben ein Paccekasambuddha.“ Evaṃ vatvā puna āha – Nachdem er dies gesagt hatte, sprach er erneut: ‘‘Paccekasambuddhā nāma, ānanda, abhinīhārasampannā pubbayogāvacarā honti, tasmā paccekabuddhabuddhasāvakānaṃ sabbesaṃ patthanā ca abhinīhāro ca icchitabbo’’ti. „Die Paccekasambuddhas, Ānanda, sind wahrlich solche, die mit einem festen Entschluss ausgestattet sind und sich zuvor in der geistigen Praxis geübt haben. Daher ist für sie alle – für die Buddhas, die Paccekabuddhas und die Jünger der Buddhas – das Streben und der feste Entschluss erforderlich.“ So āha – ‘‘buddhānaṃ, bhante, patthanā kīva ciraṃ vaṭṭatī’’ti. Buddhānaṃ, ānanda, heṭṭhimaparicchedena cattāri asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca, majjhimaparicchedena aṭṭha asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca, uparimaparicchedena soḷasa asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca. Ete ca bhedā paññādhikasaddhādhikavīriyādhikānaṃ vasena ñātabbā. Paññādhikānañhi saddhā mandā hoti, paññā tikkhā. Saddhādhikānaṃ paññā majjhimā hoti, saddhā tikkhā. Vīriyādhikānaṃ saddhā paññā mandā hoti, vīriyaṃ tikkhanti. Appatvā pana cattāri asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca divase divase vessantaradānasadisaṃ dānaṃ dentopi tadanurūpe sīlādipāramidhamme ācinantopi antarā [Pg.156] buddho bhavissatīti netaṃ ṭhānaṃ vijjati. Kasmā? Ñāṇaṃ gabbhaṃ na gaṇhāti, vepullaṃ nāpajjati, paripākaṃ na gacchatīti. Yathā nāma timāsacatumāsapañcamāsaccayena nipphajjanakaṃ sassaṃ taṃ taṃ kālaṃ appatvā divase divase satakkhattuṃ sahassakkhattuṃ keḷāyantopi udakena siñcantopi antarā pakkhena vā māsena vā nipphādessatīti netaṃ ṭhānaṃ vijjati. Kasmā? Sassaṃ gabbhaṃ na gaṇhāti, vepullaṃ nāpajjati, paripākaṃ na gacchatīti. Evamevaṃ appatvā cattāri asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca antarā buddho bhavissatīti netaṃ ṭhānaṃ vijjati. Tasmā yathāvuttameva kālaṃ pāramipūraṇaṃ kātabbaṃ ñāṇaparipākatthāya. Ettakenāpi ca kālena buddhattaṃ patthayato abhinīhārakaraṇe aṭṭha sampattiyo icchitabbā. Ayañhi – Er fragte: „Herr, wie lange muss das Streben der Buddhas andauern?“ „Für Buddhas, Ānanda, beträgt es im Mindestmaß vier unzählbare Zeitalter (Asankheyya) und einhunderttausend Weltalter (Kappa), im mittleren Maß acht unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Weltalter, und im Höchstmaß sechzehn unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Weltalter. Diese Unterschiede sind entsprechend jenen zu verstehen, bei denen Weisheit überwiegt (paññādhika), Glauben überwiegt (saddhādhika) oder Willenskraft überwiegt (vīriyādhika). Denn bei jenen, bei denen die Weisheit überwiegt, ist der Glaube schwach und die Weisheit scharf. Bei jenen, bei denen der Glaube überwiegt, ist die Weisheit mittelmäßig und der Glaube scharf. Bei jenen, bei denen die Willenskraft überwiegt, sind Glaube und Weisheit schwach, doch die Willenskraft ist scharf. Ohne jedoch vier unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Weltalter erreicht zu haben, ist es unmöglich, dass jemand dazwischen ein Buddha wird, selbst wenn er Tag für Tag Gaben spendet, die den Gaben des Königs Vessantara gleichen, und die entsprechenden Vollkommenheiten wie die Tugend (sīla) und anderes praktiziert. Warum? Weil die Erkenntnis noch nicht empfangen wird, keine Fülle erlangt und nicht zur Reife gelangt. So wie eine Saat, die erst nach Ablauf von drei, vier oder fielen Monaten reift, unmöglich dazwischen, etwa in einer halben oder in einer ganzen Woche oder in einem Monat reifen kann, selbst wenn man sie Tag für Tag hundert- oder tausendfach pflegt und mit Wasser gießt, solange die jeweilige Zeit noch nicht erreicht ist. Warum? Weil die Saat noch nicht empfangen wird, keine Fülle erlangt und nicht zur Reife gelangt. Ebenso ist es unmöglich, dass jemand dazwischen ein Buddha wird, ohne vier unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Weltalter erreicht zu haben. Deshalb muss man die Vollkommenheiten genau über die genannte Zeitspanne hinweg erfüllen, damit die Erkenntnis ausreift. Und für jemanden, der in dieser Zeitspanne nach der Buddhaschaft strebt und den festen Entschluss fasst, sind acht vollkommene Bedingungen (sampatti) erforderlich. Diese sind:“ ‘‘Manussattaṃ liṅgasampatti, hetu satthāradassanaṃ; Pabbajjā guṇasampatti, adhikāro ca chandatā; Aṭṭhadhammasamodhānā, abhinīhāro samijjhati’’. (bu. vaṃ. 2.59); „Das menschliche Dasein, die Erlangung des männlichen Geschlechts, die geistige Voraussetzung (hetu), das Zusammentreffen mit dem Meister, die Hauslosigkeit, die Erlangung von Tugendqualitäten (guṇasampatti), eine außerordentliche Tat des Dienstes (adhikāro) und starkes Wollen (chandatā) – durch das Zusammentreffen dieser acht Bedingungen wird der feste Entschluss zur Erleuchtung erfolgreich.“ (Bu. Vaṃ. 2.59) Abhinīhāroti mūlapaṇidhānassetaṃ adhivacanaṃ. Tattha manussattanti manussajāti. Aññatra hi manussajātiyā avasesajātīsu devajātiyampi ṭhitassa paṇidhi na ijjhati, tattha ṭhitena pana buddhattaṃ patthayantena dānādīni puññakammāni katvā manussattaṃyeva patthetabbaṃ, tattha ṭhatvā paṇidhi kātabbo. Evañhi samijjhati. Liṅgasampattīti purisabhāvo. Mātugāmanapuṃsakaubhatobyañjanakānañhi manussajātiyaṃ ṭhitānampi paṇidhi na ijjhati. Tattha ṭhitena pana buddhattaṃ patthentena dānādīni puññakammāni katvā purisabhāvoyeva patthetabbo, tattha ṭhatvā paṇidhi kātabbo. Evañhi samijjhati. Hetūti arahattassa upanissayasampatti. Yo hi tasmiṃ attabhāve vāyamanto arahattaṃ pāpuṇituṃ samattho, tassa paṇidhi samijjhati, no itarassa yathā sumedhapaṇḍitassa. So hi dīpaṅkarapādamūle pabbajitvā tenattabhāvena arahattaṃ pāpuṇituṃ samattho ahosi. Satthāradassananti buddhānaṃ sammukhādassanaṃ. Evañhi ijjhati, no aññathā yathā sumedhapaṇḍitassa. So hi dīpaṅkaraṃ sammukhā disvā paṇidhiṃ akāsi. Pabbajjāti anagāriyabhāvo. So ca kho sāsane vā kammavādikiriyavāditāpasaparibbājakanikāye vā vaṭṭati yathā sumedhapaṇḍitassa. So hi sumedho nāma tāpaso hutvā paṇidhiṃ akāsi. Guṇasampattīti jhānādiguṇapaṭilābho[Pg.157]. Pabbajitassapi hi guṇasampannasseva ijjhati, no itarassa yathā sumedhapaṇḍitassa. So hi pañcābhiñño ca aṭṭhasamāpattilābhī ca hutvā paṇidhesi. Adhikāroti adhikakāro, pariccāgoti attho. Jīvitādipariccāgañhi katvā paṇidahatoyeva ijjhati, no itarassa yathā sumedhapaṇḍitassa. So hi – „Aspiration“ (abhinīhāra) ist eine Bezeichnung für den ursprünglichen Entschluss (mūlapaṇidhāna). Darin bedeutet „Menschsein“ (manussatta) die menschliche Geburt (manussajāti). Denn außer in der menschlichen Geburt gelingt bei den übrigen Geburtsformen, selbst wenn man als Deva existiert, der Entschluss nicht. Wer jedoch in jener (menschlichen) Form nach der Buddhaschaft strebt, muss, nachdem er verdienstvolle Taten wie das Geben und so weiter vollbracht hat, eben das Menschsein herbeiwünschen und in diesem Zustand verweilend die Aspiration fassen. Nur so gelingt es. „Die Vollkommenheit des Geschlechts“ (liṅgasampatti) bedeutet das Mannsein (purisabhāvo). Denn für Frauen, Eunuchen und Zwitter gelingt der Entschluss nicht, selbst wenn sie als Menschen geboren sind. Wer jedoch in jener Form nach der Buddhaschaft strebt, muss, nachdem er verdienstvolle Taten wie Geben und so weiter vollbracht hat, eben das Mannsein herbeiwünschen und in diesem Zustand verweilend die Aspiration fassen. Nur so gelingt es. „Die Ursache“ (hetu) bedeutet das Vorhandensein der starken unterstützenden Bedingung (upanissayasampatti) für die Arahatschaft. Denn wer sich in eben dieser Existenz anstrengt und fähig ist, die Arahatschaft zu erlangen, dessen Aspiration gelingt; bei einem anderen nicht, wie im Fall des weisen Sumedha. Denn dieser war, nachdem er zu Füßen des Buddhas Dīpaṅkara in die Hauslosigkeit gezogen war, fähig, in genau jener Existenz die Arahatschaft zu erlangen. „Das Sehen des Lehrers“ (satthāradassana) bedeutet das persönliche Zusammentreffen mit den Buddhas (sammukhādassana). Denn nur so gelingt es, nicht anders, wie im Fall des weisen Sumedha. Denn dieser fasste die Aspiration, nachdem er Dīpaṅkara persönlich von Angesicht zu Angesicht gesehen hatte. „Die Hauslosigkeit“ (pabbajjā) bedeutet den Zustand der Heimatlosigkeit (anagāriyabhāvo). Und dieser ist angemessen entweder in der Lehre oder in einer Gemeinschaft von Asketen und Wanderbendlern, welche die Lehre von der Wirksamkeit der Taten (kammavāda-kiriyavāda) vertreten, wie im Fall des weisen Sumedha. Denn dieser fasste die Aspiration, nachdem er der Asket namens Sumedha geworden war. „Die Vollkommenheit der Tugenden“ (guṇasampatti) bedeutet das Erlangen von geistigen Qualitäten wie den Vertiefungen (jhāna) und so weiter. Denn selbst unter den in die Hauslosigkeit Gezogenen gelingt es nur demjenigen, der mit solchen Tugenden ausgestattet ist, nicht einem anderen, wie im Fall des weisen Sumedha. Denn dieser fasste die Aspiration, nachdem er die fünf höheren Geisteskräfte (pañcābhiññā) erlangt hatte und die acht Sammlungsstufen (aṭṭhasamāpatti) beherrschte. „Die Aufopferung“ (adhikāro) bedeutet eine außerordentliche Tat, nämlich das Aufgeben (pariccāgo). Denn nur für denjenigen, der die Aspiration fasst, nachdem er sein Leben und so weiter geopfert hat, gelingt es; bei einem anderen nicht, wie im Fall des weisen Sumedha. Er nämlich [sprach]: ‘‘Akkamitvāna maṃ buddho, saha sissehi gacchatu; Mā naṃ kalale akkamittha, hitāya me bhavissatī’’ti. (bu. vaṃ. 2.53); „Möge der Buddha, indem er über mich hinwegschreitet, zusammen mit seinen Jüngern vorübergehen; möge er nicht in den Schlamm treten, das wird mir zum langfristigen Heil gereichen.“ Evaṃ attapariccāgaṃ katvā paṇidhesi. Chandatāti kattukamyatā. Sā yassa balavatī hoti, tassa ijjhati paṇidhi. Sā ca sace koci vadeyya ‘‘ko cattāri asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca niraye paccitvā buddhattaṃ icchatī’’ti. Taṃ sutvā yo ‘‘aha’’nti vattuṃ ussahati, tassa balavatīti veditabbā. Tathā yadi koci vadeyya ‘‘ko sakalacakkavāḷaṃ vītaccikānaṃ aṅgārānaṃ pūraṃ akkamitvā buddhattaṃ icchati, ko sakalacakkavāḷaṃ sattisūlehi ākiṇṇaṃ akkamanto atikkamitvā buddhattaṃ icchati, ko sakalacakkavāḷaṃ samatittikaṃ udakapuṇṇaṃ uttaritvā buddhattaṃ icchati, ko sakalacakkavāḷaṃ nirantaraṃ veḷugumbasañchannaṃ maddanto atikkamitvā buddhattaṃ icchatī’’ti, taṃ sutvā yo ‘‘aha’’nti vattuṃ ussahati, tassa balavatīti veditabbā. Evarūpena ca kattukamyatāchandena samannāgato sumedhapaṇḍito paṇidhesīti. Auf diese Weise fasste er die Aspiration, nachdem er sein eigenes Leben hingegeben hatte. „Eifer“ (chandatā) bedeutet den Wunsch zu handeln (kattukamyatā). Bei wem dieser stark ausgeprägt ist, dessen Aspiration gelingt. Und diese Willenskraft ist als stark anzusehen bei demjenigen, der – falls jemand sagen würde: „Wer wünscht die Buddhaschaft unter der Bedingung, vier Unzählbare (asaṅkhyeyya) und einhunderttausend Weltzeitalter (kappa) in der Hölle gepeinigt zu werden?“ – dies hört und den Mut aufbringt zu sagen: „Ich!“. Ebenso, wenn jemand sagen würde: „Wer wünscht die Buddhaschaft, indem er über ein ganzes Weltensystem schreitet, das mit flammenloser, glühender Kohle gefüllt ist? Wer wünscht die Buddhaschaft, indem er über ein ganzes Weltensystem geht und es durchquert, das mit Speeren und Lanzen besät ist? Wer wünscht die Buddhaschaft, indem er ein ganzes Weltensystem durchquert, das bis zum Rand mit Wasser gefüllt ist? Wer wünscht die Buddhaschaft, indem er ein ganzes Weltensystem durchschreitet und bezwingt, das lückenlos von Bambusdickicht überwuchert ist?“ – wer dies hört und den Mut aufbringt zu sagen: „Ich!“, dessen Eifer ist als stark zu erkennen. Und ausgestattet mit einer solchen eifrigen Entschlossenheit zu handeln, fasste der weise Sumedha die Aspiration. Evaṃ samiddhābhinīhāro ca bodhisatto imāni aṭṭhārasa abhabbaṭṭhānāni na upeti. So hi tato pabhuti na jaccandho hoti na jaccapadhiro, na ummattako, na eḷamugo, na pīṭhasappi, na milakkhesu uppajjati, na dāsiyā kucchimhi nibbattati, na niyatamicchādiṭṭhiko hoti, nāssa liṅgaṃ parivattati, na pañcānantariyakammāni karoti, na kuṭṭhī hoti, na tiracchānayoniyaṃ vaṭṭakato pacchimattabhāvo hatthito adhikattabhāvo hoti, na khuppipāsikanijjhāmataṇhikapetesu uppajjati, na kālakañcikāsuresu, na avīciniraye, na lokantarikesu uppajjati. Kāmāvacaresu pana na māro hoti, rūpāvacaresu na asaññībhave, na suddhāvāsesu uppajjati, na arūpabhavesu, na aññaṃ cakkavāḷaṃ saṅkamati. Ein Bodhisatta, dessen Aspiration auf diese Weise erfolgreich vollzogen ist, gerät nicht in diese achtzehn ungeeigneten Zustände (abhabbaṭṭhāna). Denn von jener Zeit an wird er weder blindgeboren noch taubgeboren; er wird nicht verrückt, nicht stumm, nicht gelähmt; er wird nicht unter Barbaren geboren; er wird nicht im Schoß einer Sklavin empfangen; er hat keine feste falsche Anschauung; sein Geschlecht wechselt nicht; er begeht nicht die fünf Taten mit unmittelbarer Vergeltung (pañcānantariyakamma); er wird kein Aussätziger; bei einer Geburt als Tier wird er weder kleiner als eine Wachtel noch größer als ein Elefant; er wird weder als ein gequälter Geist geboren, der an Hunger und brennendem Durst leidet (khuppipāsika-nijjhāmataṇhika-peta), noch unter den Kālakañjika-Asuras, noch in der Avīci-Hölle, noch in den Lokantarika-Höllen. Unter den Devas der Sinnenwelt (kāmāvacara) wird er nicht als Māra geboren; unter den Devas der feinstofflichen Welt (rūpāvacara) wird er weder im Bereich der unbewussten Wesen (asaññībhava) noch in den Reinen Wohnstätten (suddhāvāsa) geboren; er wird nicht in den formlosen Welten (arūpabhava) geboren und er wechselt nicht in ein anderes Weltensystem über. Yā [Pg.158] cimā ussāho ca ummaṅgo ca avatthānañca hitacariyā cāti catasso buddhabhūmiyo, tāhi samannāgato hoti. Tattha – Er ist mit diesen vier Grundlagen der Buddhaschaft (buddhabhūmi) ausgestattet, nämlich: Tatkraft (ussāha), Scharfsinn (ummaṅga), Standhaftigkeit (avatthāna) und segensreiches Handeln (hitacariyā). Darunter gilt: ‘‘Ussāho vīriyaṃ vuttaṃ, ummaṅgo paññā pavuccati; Avatthānaṃ adhiṭṭhānaṃ, hitacariyā mettābhāvanā’’ti. – „Unter ‚Tatkraft‘ (ussāha) wird Energie (vīriya) verstanden, ‚Scharfsinn‘ (ummaṅga) wird als Weisheit (paññā) bezeichnet; ‚Standhaftigkeit‘ (avatthāna) ist die Entschlossenheit (adhiṭṭhāna) und ‚segensreiches Handeln‘ (hitacariyā) ist die Entfaltung von liebevoller Güte (mettābhāvanā).“ – So ist dies zu verstehen. Veditabbā. Ye ca ime nekkhammajjhāsayo, pavivekajjhāsayo, alobhajjhāsayo, adosajjhāsayo, amohajjhāsayo, nissaraṇajjhāsayoti cha ajjhāsayā bodhiparipākāya saṃvattanti, yehi samannāgatattā nekkhammajjhāsayā ca bodhisattā kāmesu dosadassāvino, pavivekajjhāsayā ca bodhisattā saṅgaṇikāya dosadassāvino, alobhajjhāsayā ca bodhisattā lobhe dosadassāvino, adosajjhāsayā ca bodhisattā dose dosadassāvino, amohajjhāsayā ca bodhisattā mohe dosadassāvino, nissaraṇajjhāsayā ca bodhisattā sabbabhavesu dosadassāvinoti vuccanti, tehi ca samannāgato hoti. Und er ist mit jenen sechs Neigungen (ajjhāsaya) ausgestattet, die zur Reifung der Erleuchtung (bodhiparipāka) führen, nämlich: die Neigung zur Entsagung (nekkhammajjhāsaya), die Neigung zur Abgeschiedenheit (pavivekajjhāsaya), die Neigung zur Gierlosigkeit (alobhajjhāsaya), die Neigung zur Hasslosigkeit (adosajjhāsaya), die Neigung zur Täuschungslosigkeit (amohajjhāsaya) und die Neigung zur Befreiung (nissaraṇajjhāsaya). Weil sie mit diesen ausgestattet sind, sagt man: Die Bodhisattas mit der Neigung zur Entsagung sehen die Mängel in den Sinnengenüssen; die Bodhisattas mit der Neigung zur Abgeschiedenheit sehen die Mängel in der Vergesellschaftung; die Bodhisattas mit der Neigung zur Gierlosigkeit sehen die Mängel in der Gier; die Bodhisattas mit der Neigung zur Hasslosigkeit sehen die Mängel im Hass; die Bodhisattas mit der Neigung zur Täuschungslosigkeit sehen die Mängel in der Verblendung; und die Bodhisattas mit der Neigung zur Befreiung sehen die Mängel in allen Daseinsformen. Mit diesen sechs Neigungen ist er ausgestattet. Paccekabuddhānaṃ pana kīva ciraṃ patthanā vaṭṭatīti? Paccekabuddhānaṃ dve asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca, tato oraṃ na sakkā, pubbe vuttanayenevettha kāraṇaṃ veditabbaṃ. Ettakenāpi ca kālena paccekabuddhattaṃ patthayato abhinīhārakaraṇe pañca sampattiyo icchitabbā. Tesañhi – Wie lange aber muss das Streben (patthanā) für Paccekabuddhas andauern? Für Paccekabuddhas sind es zwei Unzählbare (asaṅkhyeyya) und einhunderttausend Äonen (kappa), weniger als das ist nicht möglich; der Grund dafür ist hier auf genau dieselbe Weise zu verstehen, wie zuvor erklärt. Und für jemanden, der während einer solchen Zeitspanne nach der Paccekabuddhaschaft strebt, sind bei der Vollziehung der Aspiration (abhinīhāra) fünf Voraussetzungen (sampattiyo) erforderlich. Für sie gilt nämlich: ‘‘Manussattaṃ liṅgasampatti, vigatāsavadassanaṃ; Adhikāro ca chandatā, ete abhinīhārakāraṇā’’. „Das Menschsein, die Vollkommenheit des Geschlechts (Mannsein), das Sehen eines von Trieben Befreiten (vigatāsava), die hingebungsvolle Tat (adhikāra) und der eifrige Wille (chandatā) – dies sind die Ursachen für die Aspiration.“ Tattha vigatāsavadassananti buddhapaccekabuddhabuddhasāvakānaṃ yassa kassaci dassananti attho. Sesaṃ vuttanayameva. Darin bedeutet „das Sehen eines von Trieben Befreiten“ (vigatāsavadassana) das Sehen eines Buddhas, eines Paccekabuddhas oder eines Jüngers eines Buddhas. Der Rest ist genau so zu verstehen, wie bereits zuvor erklärt. Atha ‘‘sāvakānaṃ patthanā kittakaṃ vaṭṭatī’’ti? Dvinnaṃ aggasāvakānaṃ ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ kappasatasahassañca, asītimahāsāvakānaṃ kappasatasahassameva. Tathā buddhassa mātāpitūnaṃ upaṭṭhākassa puttassa cāti, tato oraṃ na sakkā, tattha kāraṇaṃ vuttanayameva. Imesaṃ pana sabbesampi adhikāro ca chandatāti dvaṅgasamannāgatoyeva abhinīhāro hoti. Was nun die Frage betrifft: 'Wie lange muss das Streben der Jünger dauern?', so gilt: Für die zwei Hauptjünger ein unzählbares Zeitalter (Asankheyya) und einhunderttausend Äonen, für die achtzig großen Jünger genau einhunderttausend Äonen. Ebenso verhält es sich für die Mutter und den Vater eines Buddha, für seinen Diener und seinen Sohn; weniger als dies ist nicht möglich. Der Grund dafür ist genau wie bereits erklärt. Für sie alle jedoch gilt, dass ihr ernsthafter Vorsatz und ihr starkes Verlangen die beiden Faktoren sind, die einen wirksamen Entschluss ausmachen. Evaṃ imāya patthanāya iminā ca abhinīhārena yathāvuttappabhedaṃ kālaṃ pāramiyo pūretvā buddhā loke uppajjantā khattiyakule vā brāhmaṇakule vā uppajjanti, paccekabuddhā khattiyabrāhmaṇagahapatikulānaṃ aññatarasmiṃ, aggasāvakā [Pg.159] pana buddhā viya khattiyabrāhmaṇakulesveva. Sabbabuddhā saṃvaṭṭamāne kappe na uppajjanti, vivaṭṭamāne kappe uppajjanti, tathā paccekabuddhā. Te pana buddhānaṃ uppajjanakāle na uppajjanti. Buddhā sayañca bujjhanti, pare ca bodhenti. Paccekabuddhā sayameva bujjhanti, na pare bodhenti. Attharasameva paṭivijjhanti, na dhammarasaṃ. Na hi te lokuttaradhammaṃ paññattiṃ āropetvā desetuṃ sakkonti, mūgena diṭṭhasupino viya vanacarakena nagare sāyitabyañjanaraso viya ca nesaṃ dhammābhisamayo hoti. Sabbaṃ iddhisamāpattipaṭisambhidāpabhedaṃ pāpuṇanti. Guṇavisiṭṭhatāya buddhānaṃ heṭṭhā sāvakānaṃ upari honti, na aññe pabbājetvā ābhisamācārikaṃ sikkhāpenti, ‘‘cittasallekho kātabbo, vosānaṃ nāpajjitabba’’nti iminā uddesena uposathaṃ karonti, ajja uposathoti vacanamattena vā, uposathaṃ karontā ca gandhamādane mañjūsakarukkhamūle ratanamāḷe sannipatitvā karontīti. Evaṃ bhagavā āyasmato ānandassa paccekabuddhānaṃ sabbākāraparipūraṃ patthanañca abhinīhārañca kathetvā idāni imāya patthanāya iminā ca abhinīhārena samudāgate te te paccekabuddhe kathetuṃ ‘‘sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍa’’ntiādinā nayena imaṃ khaggavisāṇasuttaṃ abhāsi. Ayaṃ tāva avisesena pucchāvasito khaggavisāṇasuttassa uppatti. Wenn Buddhas auf diese Weise durch dieses Streben und diesen Entschluss, nachdem sie die Vollkommenheiten während der jeweils genannten Zeiträume erfüllt haben, in der Welt erscheinen, werden sie entweder in einer Krieger- oder einer Brahmanenfamilie geboren. Einzelbuddhas werden in einer der Familien von Kriegern, Brahmanen oder Hausvätern geboren; die Hauptjünger jedoch werden, wie die Buddhas, ausschließlich in Krieger- oder Brahmanenfamilien geboren. Alle Buddhas erscheinen nicht in einem schrumpfenden Weltalter, sondern in einem sich entfaltenden Weltalter; ebenso verhält es sich mit den Einzelbuddhas. Diese erscheinen jedoch nicht zur Zeit des Wirkens von Buddhas. Die Buddhas erwachen selbst und führen auch andere zum Erwachen. Die Einzelbuddhas erwachen selbst, führen aber andere nicht zum Erwachen. Sie dringen nur in den Sinn der Bedeutung ein, nicht in den Sinn der Lehre. Denn sie sind nicht in der Lage, die überweltliche Wahrheit in begriffliche Bezeichnungen zu kleiden und zu lehren. Ihr Verständnis des Dhamma gleicht einem Traum, den ein Stummer gesehen hat, oder dem Geschmack einer gewürzten Speise, die ein Waldbewohner in der Stadt gekostet hat. Sie erreichen alle Arten von übernatürlichen Kräften, geistigen Errungenschaften und analytischem Wissen. Aufgrund ihrer besonderen Tugendhaftigkeit stehen sie unter den Buddhas, aber über den Jüngern. Sie ordinieren keine anderen und lehren sie nicht die Regeln des guten Verhaltens. Sie begehen den Uposatha mit der kurzen Unterweisung: 'Die Läuterung des Geistes ist zu üben, die Anstrengung darf nicht vorzeitig aufgegeben werden', oder bloß mit den Worten: 'Heute ist der Uposatha-Tag'. Und wenn sie den Uposatha begehen, versammeln sie sich am Fuße des Mañjūsaka-Baumes auf der Juwelen-Terrasse auf dem Berg Gandhamādana. Nachdem der Erhabene dem ehrwürdigen Ānanda so den in jeder Hinsicht vollkommenen Wunsch und Entschluss der Einzelbuddhas dargelegt hatte, verkündete er nun, um über die verschiedenen Einzelbuddhas zu sprechen, die durch diesen Wunsch und Entschluss hervorgegangen sind, dieses Khaggavisāṇa-Sutta, beginnend mit: 'Indem er die Gewalt gegenüber allen Wesen ablegt...'. Dies ist die allgemeine Entstehungsgeschichte des Khaggavisāṇa-Suttas auf eine Frage hin. Idāni visesena vattabbā. Tattha imissā tāva gāthāya evaṃ uppatti veditabbā – ayaṃ kira paccekabuddho paccekabodhisattabhūmiṃ ogāhanto dve asaṅkhyeyyāni kappasatasahassañca pāramiyo pūretvā kassapassa bhagavato sāsane pabbajitvā āraññiko hutvā gatapaccāgatavattaṃ pūrento samaṇadhammaṃ akāsi. Etaṃ kira vattaṃ aparipūretvā paccekabodhiṃ pāpuṇanto nāma natthi. Kiṃ panetaṃ gatapaccāgatavattaṃ nāma? Haraṇapaccāharaṇanti. Taṃ yathā vibhūtaṃ hoti, tathā kathessāma. Nun muss sie im Einzelnen dargelegt werden. Was diese Strophe betrifft, so ist ihre Entstehungsgeschichte wie folgt zu verstehen: Dieser Einzelbuddha soll, als er in die Stufe eines künftigen Einzelbuddhas eintrat, zwei unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Äonen lang die Vollkommenheiten erfüllt, unter der Lehre des erhabenen Kassapa die Hauslosigkeit angetreten, als Waldbewohner gelebt und die Pflicht des Gehens und Zurückkehrens erfüllend die Pflichten eines Asketen geübt haben. Es heißt, dass es niemanden gibt, der die Einzelbuddhaschaft erlangt, ohne diese Pflicht erfüllt zu haben. Was aber ist diese 'Pflicht des Gehens und Zurückkehrens'? Sie besteht im Hintragen und Zurückbringen des Meditationsobjekts. Wie dies im Einzelnen beschaffen ist, wollen wir erklären. Idha ekacco bhikkhu harati na paccāharati, ekacco paccāharati na harati, ekacco neva harati na paccāharati, ekacco harati ca paccāharati ca. Tattha yo bhikkhu pageva vuṭṭhāya cetiyaṅgaṇabodhiyaṅgaṇavattaṃ katvā bodhirukkhe udakaṃ āsiñcitvā pānīyaghaṭaṃ pūretvā pānīyamāḷe ṭhapetvā ācariyavattaṃ upajjhāyavattaṃ katvā dveasīti khandhakavattāni ca cuddasa mahāvattāni samādāya vattati. So sarīraparikammaṃ katvā senāsanaṃ pavisitvā yāva bhikkhācāravelā, tāva vivittāsane vītināmetvā velaṃ [Pg.160] ñatvā nivāsetvā kāyabandhanaṃ bandhitvā uttarāsaṅgaṃ katvā saṅghāṭiṃ khandhe karitvā pattaṃ aṃse ālaggetvā kammaṭṭhānaṃ manasi karonto cetiyaṅgaṇaṃ gantvā cetiyañca bodhiñca vanditvā gāmasamīpe cīvaraṃ pārupitvā pattaṃ ādāya gāmaṃ piṇḍāya pavisati. Evaṃ paviṭṭho ca lābhī bhikkhu puññavā upāsakehi sakkato garukato upaṭṭhākakule vā paṭikkamanasālāyaṃ vā paṭikkamitvā upāsakehi taṃ taṃ pañhaṃ pucchiyamāno tesaṃ pañhavissajjanena dhammadesanāvikkhepena ca taṃ manasikāraṃ chaḍḍetvā nikkhamati. Vihāraṃ āgatopi bhikkhūhi pañhaṃ puṭṭho katheti, dhammaṃ bhaṇati, taṃ taṃ byāpārañca āpajjati. Pacchābhattampi purimayāmampi majjhimayāmampi evaṃ bhikkhūhi saddhiṃ papañcetvā kāyaduṭṭhullābhibhūto pacchimayāmepi sayati, neva kammaṭṭhānaṃ manasi karoti. Ayaṃ vuccati ‘‘harati na paccāharatī’’ti. Hierbei trägt ein bestimmter Mönch das Meditationsobjekt beim Gehen hin, bringt es aber nicht zurück; ein anderer bringt es zurück, trägt es aber nicht hin; ein anderer trägt es weder hin noch bringt es zurück; und ein anderer trägt es hin und bringt es auch zurück. Unter diesen ist jener Mönch, der früh am Morgen aufsteht, die Pflichten auf dem Cetiya-Hof und dem Bodhi-Baum-Hof verrichtet, den Bodhi-Baum gießt, das Trinkwassergefäß füllt und auf dem Trinkwassergestell aufstellt, die Pflichten gegenüber dem Lehrer und dem Präzeptor verrichtet und die zweiundachtzig Pflichten der Abschnitte sowie die vierzehn großen Pflichten auf sich nimmt und ausführt. Nachdem er seine Körperpflege verrichtet hat, betritt er seine Unterkunft und verbringt die Zeit bis zur Stunde des Almosengangs an einem einsamen Ort. Sobald er merkt, dass es Zeit ist, legt er das Untergewand an, bindet den Gürtel um, legt das Obergewand an, nimmt die Doppelrobe auf die Schulter, hängt die Almosenschale über die Schulter und lenkt, sein Meditationsobjekt im Geist bewahrend, seine Schritte zum Cetiya-Hof, verehrt das Cetiya und den Bodhi-Baum, hüllt sich nahe dem Dorf in seine Robe, nimmt die Almosenschale und betritt das Dorf für den Almosengang. Der so eingetretene, verdienstvolle Mönch, der leicht Gaben erhält, wird von den gläubigen Laien geehrt und respektiert. Er kehrt im Hause einer Unterstützerfamilie oder in einer Speisehalle ein. Da er von den Laien nach dieser oder jener Frage gefragt wird, vernachlässigt er durch das Beantworten ihrer Fragen und durch die Ablenkung beim Predigen der Lehre jene geistige Sammlung und geht wieder fort. Auch wenn er zum Kloster zurückgekehrt ist, beantwortet er Fragen, die ihm von anderen Mönchen gestellt werden, lehrt das Dhamma und widmet sich verschiedenen geschäftigen Aufgaben. Sowohl nach dem Essen als auch während der ersten Nachtwache und der mittleren Nachtwache verweilt er so im Austausch mit den Mönchen in Geschäftigkeit, schläft schließlich in der letzten Nachtwache, von körperlicher Erschöpfung überwältigt, und richtet sein Gemüt überhaupt nicht auf das Meditationsobjekt. Von diesem sagt man: 'Er trägt es hin, bringt es aber nicht zurück.' Yo pana byādhibahulo hoti, bhuttāhāro paccūsasamaye na sammā pariṇamati. Pageva vuṭṭhāya yathāvuttaṃ vattaṃ kātuṃ na sakkoti kammaṭṭhānaṃ vā manasi kātuṃ, aññadatthu yāguṃ vā khajjakaṃ vā bhesajjaṃ vā bhattaṃ vā patthayamāno kālasseva pattacīvaramādāya gāmaṃ pavisati. Tattha yāguṃ vā khajjakaṃ vā bhesajjaṃ vā bhattaṃ vā laddhā pattaṃ nīharitvā bhattakiccaṃ niṭṭhāpetvā paññattāsane nisinno kammaṭṭhānaṃ manasi karitvā visesaṃ patvā vā apatvā vā vihāraṃ āgantvā teneva manasikārena viharati. Ayaṃ vuccati ‘‘paccāharati na haratī’’ti. Edisā hi bhikkhū yāguṃ pivitvā vipassanaṃ vaḍḍhetvā buddhasāsane arahattaṃ pattā gaṇanapathaṃ vītivattā, sīhaḷadīpeyeva tesu tesu gāmesu āsanasālāyaṃ taṃ āsanaṃ natthi, yattha bhikkhū nisinnā yāguṃ pivitvā arahattaṃ appattā. Wer aber von vielen Krankheiten geplagt ist, bei dem verdaut sich die aufgenommene Nahrung in der Morgendämmerung nicht richtig. Er kann nicht früh aufstehen und die zuvor erwähnten Pflichten verrichten oder sein Meditationsobjekt im Geist bewahren. Stadtessen geht er, verlangend nach Reisschleim, fester Nahrung, Heilmitteln oder Reis, sehr früh am Morgen mit Schale und Robe in das Dorf. Nachdem er dort Reisschleim, feste Nahrung, Heilmittel oder Reis erhalten hat, packt er die Schale aus, beendet sein Mahl, setzt sich auf den vorbereiteten Sitz, richtet seinen Geist auf das Meditationsobjekt, erlangt entweder die besondere Stufe oder erlangt sie noch nicht, kehrt zum Kloster zurück und verweilt in eben dieser geistigen Ausrichtung. Von diesem sagt man: 'Er bringt es zurück, trägt es aber nicht hin.' Denn solche Mönche, die Reisschleim tranken, die Einsichtsmeditation entfalteten und in der Lehre des Buddha die Arhatschaft erlangten, sind unzählbar weit über jede Berechnung hinausgegangen. Allein auf der Insel Sīhala gibt es in den verschiedenen dörflichen Speisehallen keinen Sitzplatz, auf dem ein Mönch saß, der Reisschleim trank, ohne die Arhatschaft zu erlangen. Yo pana pamādavihārī hoti nikkhittadhuro, sabbavattāni bhinditvā pañcavidhacetokhilavinibandhanabaddhacitto viharanto kammaṭṭhānamanasikāramananuyutto gāmaṃ piṇḍāya pavisitvā gihīhi saddhiṃ kathāpapañcena papañcito tucchakova nikkhamati. Ayaṃ vuccati ‘‘neva harati na paccāharatī’’ti. Wer jedoch nachlässig verweilt, die Last der Übung abgelegt hat, alle Pflichten vernachlässigt und mit einem Geist lebt, der an die fünffache geistige Öde und Fesselung gebunden ist, und wer sich nicht der Aufmerksamkeit auf das Meditationsobjekt (Kammaṭṭhāna) widmet, sondern das Dorf für den Almosengang betritt, durch weitschweifiges Gespräch mit Hausleuten aufgehalten wird und völlig leer wieder herausgeht – von diesem wird gesagt: „Er bringt das Meditationsobjekt weder hin, noch bringt er es zurück.“ Yo pana pageva vuṭṭhāya purimanayeneva sabbavattāni paripūretvā yāva bhikkhācāravelā, tāva pallaṅkaṃ ābhujitvā kammaṭṭhānaṃ manasi karoti. Kammaṭṭhānaṃ nāma duvidhaṃ – sabbatthakañca pārihāriyañca. Tattha sabbatthakaṃ nāma mettā ca maraṇānussati ca. Tañhi sabbattha atthayitabbaṃ icchitabbanti ‘‘sabbatthaka’’nti vuccati. Mettā nāma āvāsādīsu sabbattha icchitabbā. Āvāsesu [Pg.161] hi mettāvihārī bhikkhu sabrahmacārīnaṃ piyo hoti manāpo, tena phāsu asaṅghaṭṭho viharati. Devatāsu mettāvihārī devatāhi rakkhitagopito sukhaṃ viharati. Rājarājamahāmattādīsu mettāvihārī tehi mamāyito sukhaṃ viharati. Gāmanigamādīsu mettāvihārī sabbattha bhikkhācariyādīsu manussehi sakkato garukato sukhaṃ viharati. Maraṇānussatibhāvanāya jīvitanikantiṃ pahāya appamatto viharati. Wer jedoch frühzeitig aufsteht, auf die zuvor beschriebene Weise alle Pflichten erfüllt und sich bis zur Zeit des Almosengangs mit gekreuzten Beinen niedersetzt und das Meditationsobjekt im Geiste erwägt. Das Meditationsobjekt ist nämlich zweifach: das allseitig nützliche (sabbatthaka) und das stets zu hütende (pārihāriya). Darunter versteht man unter dem allseitig nützlichen die liebende Güte (mettā) und die Vergegenwärtigung des Todes (maraṇānussati). Denn da dieses überall gesucht und gewünscht werden sollte, wird es „allseitig nützlich“ genannt. Die liebende Güte ist in Bezug auf Wohnstätten und anderes überall wünschenswert. Denn in den Wohnstätten ist ein Mönch, der in liebender Güte verweilt, seinen Gefährten im heiligen Leben lieb und angenehm, und dadurch lebt er behaglich und ohne Konflikte. Gegenüber den Gottheiten in liebender Güte verweilend, lebt er von den Gottheiten beschützt und behütet glücklich. Gegenüber Königen, königlichen Ministern und anderen in liebender Güte verweilend, wird er von ihnen geschätzt und lebt glücklich. In Dörfern, Marktflecken und anderen Orten in liebender Güte verweilend, lebt er glücklich, indem er überall beim Almosengang von den Menschen geehrt und geachtet wird. Durch die Entfaltung der Achtsamkeit auf den Tod gibt er das Verlangen nach dem Leben auf und verweilt achtsam. Yaṃ pana sadā pariharitabbaṃ cariyānukūlena gahitaṃ. Taṃ dasāsubhakasiṇānussatīsu aññataraṃ, catudhātuvavatthānameva vā, taṃ sadā pariharitabbato rakkhitabbato bhāvetabbato ca ‘‘pārihāriya’’nti vuccati, mūlakammaṭṭhānantipi tadeva. Atthakāmā hi kulaputtā sāsane pabbajitvā dasapi vīsampi tiṃsampi cattālīsampi paññāsampi satampi ekato vasantā katikavattaṃ katvā viharanti – ‘‘āvuso, tumhe na iṇaṭṭā na bhayaṭṭā na jīvikāpakatā pabbajitā, dukkhā muccitukāmā panettha pabbajitā. Tasmā gamane uppannakilese gamaneyeva niggaṇhatha, ṭhāne, nisajjāya, sayane uppannakilese sayaneyeva niggaṇhathā’’ti. Was aber das betrifft, das stets bewahrt werden muss und entsprechend dem eigenen Temperament gewählt wurde – sei es eines aus den zehn Unreinheiten, den Kasiṇa-Übungen und den Vergegenwärtigungen, oder die Analyse der vier Elemente –, so wird es, weil es stets bewahrt, gehütet und entfaltet werden muss, als „das stets zu hütende“ (pārihāriya) bezeichnet; und genau dies wird auch „Hauptmeditationsobjekt“ (mūlakammaṭṭhāna) genannt. Denn Söhne guter Familie, die das Heil suchen, nachdem sie in dieser Lehre die Hauslosigkeit angetreten haben, leben oft zehn, zwanzig, dreißig, vierzig, fünfzig oder gar hundert Jahre lang gemeinsam, nachdem sie folgendes Gelübde abgelegt haben: „Ihr Ehrwürdigen, ihr seid nicht wegen Schulden, nicht aus Furcht und nicht zur Sicherung des Lebensunterhalts ins heimatlose Leben gezogen, sondern ihr seid hier eingetreten, weil ihr euch vom Leiden befreien wollt. Darum solltet ihr beim Gehen aufsteigende Leidenschaften (kilesa) genau während des Gehens bezwingen, und beim Stehen, Sitzen oder Liegen aufsteigende Leidenschaften genau während des Stehens, Sitzens oder Liegens bezwingen!“ Te evaṃ katikavattaṃ katvā bhikkhācāraṃ gacchantā aḍḍhausabhausabhaaḍḍhagāvutagāvutantaresu pāsāṇā honti, tāya saññāya kammaṭṭhānaṃ manasikarontāva gacchanti. Sace kassaci gamane kileso uppajjati, so tattheva naṃ niggaṇhāti. Tathā asakkonto tiṭṭhati, athassa pacchato āgacchantopi tiṭṭhati. So ‘‘ayaṃ bhikkhu tuyhaṃ uppannaṃ vitakkaṃ jānāti, ananucchavikaṃ te eta’’nti attānaṃ paṭicodetvā vipassanaṃ vaḍḍhetvā tattheva ariyabhūmiṃ okkamati. Tathā asakkonto nisīdati. Athassa pacchato āgacchantopi nisīdatīti. Soyeva nayo ariyabhūmiṃ okkamituṃ asakkontopi taṃ kilesaṃ vikkhambhetvā kammaṭṭhānaṃ manasikarontova gacchati, na kammaṭṭhānavippayuttena cittena pādaṃ uddharati. Uddharati ce, paṭinivattitvā purimapadeseyeva tiṭṭhati. Ālindakavāsī mahāphussadevatthero viya. Nachdem sie diese Vereinbarung getroffen hatten, gab es auf dem Weg zum Almosengang in Abständen von einem halben Usabha, einem Usabha, einem halben Gāvuta oder einem Gāvuta Steinplatten; mit Hilfe dieser Markierungen gingen sie voran, während sie nur das Meditationsobjekt im Geiste erwogen. Wenn sich bei jemandem auf dem Weg eine Leidenschaft regte, bezwang er sie genau an Ort und Stelle. Gelingt ihm dies nicht im Gehen, bleibt er stehen. Daraufhin bleibt auch der hinter ihm Gehende stehen. Sich selbst ermahnend: „Dieser Mönch kennt deine aufgestiegenen Gedanken; das schickt sich nicht für dich“, entfaltet jener die Einsicht (Vipassanā) und betritt genau dort den Boden der Edlen (Ariyabhūmi). Gelingt ihm dies nicht, setzt er sich nieder. Daraufhin setzt sich auch der hinter ihm Gehende nieder. Dies ist die Methode. Selbst wenn er den Boden der Edlen nicht betreten kann, unterdrückt er jene Leidenschaft und geht weiter, während er das Meditationsobjekt im Geiste erwägt; er hebt den Fuß nicht mit einem Geist, der vom Meditationsobjekt getrennt ist. Wenn er ihn dennoch anhebt, kehrt er um und bleibt genau an der vorherigen Stelle stehen. Ebenso wie der ältere Mönch Mahāphussadeva, der in Ālindaka wohnte. So kira ekūnavīsativassāni gatapaccāgatavattaṃ pūrento evaṃ vihāsi. Manussāpi sudaṃ antarāmagge kasantā ca vapantā ca maddantā ca kammāni karontā ca theraṃ tathā gacchantaṃ disvā ‘‘ayaṃ thero punappunaṃ nivattitvā [Pg.162] gacchati, kiṃ nu kho maggamūḷho, udāhu kiñci pamuṭṭho’’ti samullapanti. So taṃ anādiyitvā kammaṭṭhānayuttena citteneva samaṇadhammaṃ karonto vīsativassabbhantare arahattaṃ pāpuṇi. Arahattapattadivaseyevassa caṅkamanakoṭiyaṃ adhivatthā devatā aṅgulīhi dīpaṃ ujjāletvā aṭṭhāsi, cattāropi mahārājāno sakko ca devānamindo brahmā ca sahampati upaṭṭhānaṃ āgamiṃsu. Tañca obhāsaṃ disvā vanavāsī mahātissatthero taṃ dutiyadivase pucchi – ‘‘rattibhāge āyasmato santike obhāso ahosi, kiṃ so’’ti? Thero vikkhepaṃ karonto ‘‘obhāso nāma dīpobhāsopi hoti maṇiobhāsopī’’ti evamādimāha. So ‘‘paṭicchādetha tumhe’’ti nibaddho ‘‘āmā’’ti paṭijānitvā ārocesi. Jener verweilte angeblich neunzehn Jahre lang so, während er die Pflicht des Hin- und Zurückgehens (Gatapaccāgata-Vatta) erfüllte. Auch die Menschen, die am Wegesrand pflügten, säten, droschen und ihre Arbeiten verrichteten, sahen den älteren Mönch so gehen und sagten zueinander: „Dieser Ältere kehrt immer wieder um und geht zurück. Ist er etwa vom Weg abgekommen oder hat er etwas vergessen?“ Er schenkte dem keine Beachtung, übte die mönchischen Pflichten (Samaṇadhamma) mit einem fest mit dem Meditationsobjekt verbundenen Geist aus und erlangte innerhalb von zwanzig Jahren die Arahatschaft. Genau an dem Tag, an dem er die Arahatschaft erlangte, stand eine Gottheit, die am Ende seines Wandelpfades wohnte, da und ließ aus ihren Fingern ein Licht leuchten. Auch die vier Großen Könige, Sakka, der Herr der Götter, und der Brahma Sahampati kamen, um ihm aufzuwarten. Als der im Wald lebende ältere Mönch Mahātissa dieses Leuchten sah, fragte er ihn am folgenden Tag: „In der Nacht gab es ein Leuchten in der Nähe des Ehrwürdigen; was war das?“ Der Ältere, der ausweichen wollte, sagte: „Unter Leuchten versteht man das Leuchten einer Lampe oder das Leuchten eines Edelsteins“ und so weiter. Als jener darauf drängte: „Ihr verheimlicht es doch!“, gab er es schließlich zu und berichtete davon. Kāḷavallimaṇḍapavāsī mahānāgatthero viya ca. Sopi kira gatapaccāgatavattaṃ pūrento ‘‘paṭhamaṃ tāva bhagavato mahāpadhānaṃ pūjessāmī’’ti satta vassāni ṭhānacaṅkamameva adhiṭṭhāsi, puna soḷasa vassāni gatapaccāgatavattaṃ pūretvā arahattaṃ pāpuṇi. Evaṃ kammaṭṭhānamanuyuttacitteneva pādaṃ uddharanto vippayuttena cittena uddhaṭe paṭinivattanto gāmasamīpaṃ gantvā ‘‘gāvī nu kho pabbajito nu kho’’ti āsaṅkanīyappadese ṭhatvā saṅghāṭiṃ pārupitvā pattaṃ gahetvā gāmadvāraṃ patvā kacchakantarato udakaṃ gahetvā gaṇḍūsaṃ katvā gāmaṃ pavisati ‘‘bhikkhaṃ vā dātuṃ vandituṃ vā upagate manusse ‘dīghāyukā hothā’ti vacanamattenāpi mā me kammaṭṭhānavikkhepo ahosī’’ti. Sace pana naṃ ‘‘ajja, bhante, kiṃ sattamī, udāhu aṭṭhamī’’ti divasaṃ pucchanti, udakaṃ gilitvā āroceti. Sace divasapucchakā na honti, nikkhamanavelāyaṃ gāmadvāre niṭṭhubhitvāva yāti. Ebenso wie der ältere Mönch Mahānāga, der in Kāḷavallimaṇḍapa wohnte. Auch er erfüllte, so heißt es, die Pflicht des Hin- und Zurückgehens. Mit dem Gedanken: „Zuerst will ich das große Bemühen (Mahāpadhāna) des Erhabenen ehren“, gelobte er sieben Jahre lang ausschließlich das Stehen und Gehen. Danach erfüllte er sechzehn Jahre lang die Pflicht des Hin- und Zurückgehens und erlangte die Arahatschaft. So hob er den Fuß nur mit einem dem Meditationsobjekt zugewandten Geist an; wurde der Fuß mit einem davon abgelenkten Geist angehoben, kehrte er um. In die Nähe des Dorfes gelangt, blieb er an einer Stelle stehen, an der kein Zweifel aufkommen konnte, ob er eine Kuh oder ein Ordinierter sei, legte sein Obergewand (Saṅghāṭi) an, nahm seine Almosenschale, erreichte das Dorftor, nahm Wasser aus seinem Behälter unter dem Arm und behielt einen Mundvoll Wasser (Gaṇḍūsa) im Mund. So betrat er das Dorf im Gedanken: „Wenn Menschen herbeikommen, um Almosen zu geben oder mich zu verehren, soll mir nicht einmal durch das bloße Aussprechen von Worten wie ‚Möget ihr lange leben!‘ eine Ablenkung vom Meditationsobjekt entstehen.“ Wenn man ihn jedoch fragte: „Ehrwürdiger, ist heute der siebte oder der achte Tag?“, schluckte er das Wasser hinunter und gab Auskunft. Fragte niemand nach dem Tag, spuckte er beim Verlassen des Dorfes am Dorftor das Wasser einfach aus und ging weiter. Sīhaḷadīpe kalambatitthavihāre vassūpagatā paññāsa bhikkhū viya ca. Te kira vassūpanāyikauposathadivase katikavattaṃ akaṃsu – ‘‘arahattaṃ appatvā na aññamaññaṃ ālapissāmā’’ti. Gāmañca piṇḍāya pavisantā gāmadvāre udakagaṇḍūsaṃ katvā pavisiṃsu, divase pucchite udakaṃ gilitvā ārocesuṃ, apucchite gāmadvāre niṭṭhubhitvā vihāraṃ āgamaṃsu. Tattha manussā niṭṭhubhanaṭṭhānaṃ disvā jāniṃsu – ‘‘ajja eko āgato, ajja dve’’ti. Evañca cintesuṃ – ‘‘kiṃ nu kho ete amheheva saddhiṃ na sallapanti[Pg.163], udāhu aññamaññampi, yadi aññamaññampi na sallapanti, addhā vivādajātā bhavissanti, handa nesaṃ aññamaññaṃ khamāpessāmā’’ti. Sabbe vihāraṃ agamaṃsu. Tattha paññāsāya bhikkhūsu vassaṃ upagatesu dve bhikkhū ekokāse nāddasaṃsu. Tato tesu yo cakkhumā puriso, so evamāha – ‘‘na, bho, kalahakārakānaṃ vasanokāso īdiso hoti, susammaṭṭhaṃ cetiyaṅgaṇaṃ bodhiyaṅgaṇaṃ, sunikkhittā sammajjaniyo, sūpaṭṭhapitaṃ pānīyaparibhojanīya’’nti, te tato nivattā. Tepi bhikkhū antovasseyeva vipassanaṃ vaḍḍhetvā arahattaṃ patvā mahāpavāraṇāya visuddhipavāraṇaṃ pavāresuṃ. Und ebenso wie die fünfzig Mönche, die auf der Insel Ceylon im Kalambatittha-Kloster die Regenzeit verbrachten. Diese trafen, so heißt es, am Uposatha-Tag zu Beginn der Regenzeit eine Vereinbarung: „Ohne die Arhatschaft erlangt zu haben, wollen wir nicht miteinander sprechen.“ Und wenn sie das Dorf zum Almosengang betraten, nahmen sie am Dorfeingang einen Schluck Wasser in den Mund und traten ein. Wurden sie nach dem Tag gefragt, schluckten sie das Wasser hinunter und gaben Auskunft; wurden sie nicht gefragt, spuckten sie das Wasser am Dorfeingang aus und kehrten zum Kloster zurück. Die Menschen dort sahen die Stelle, an der ausgespuckt worden war, und erkannten: „Heute ist einer gekommen, heute zwei.“ Und sie dachten so: „Sprechen diese wohl nicht mit uns, oder sprechen sie etwa auch nicht untereinander? Wenn sie auch untereinander nicht sprechen, haben sie gewiss einen Streit. Wohlan, wir wollen sie einander um Vergebung bitten lassen!“ Alle gingen zum Kloster. Unter den fünfzig Mönchen, die dort die Regenzeit verbrachten, sahen sie an keinem Ort zwei Mönche zusammen. Daraufhin sagte ein weiser Mann unter ihnen: „Nein, ihr Lieben, die Wohnstätte von Streitenden sieht nicht so aus! Der Hof des Schreins und der Hof des Bodhi-Baums sind wohlgefegt, die Besen ordentlich weggelegt, Trinkwasser und Brauchwasser sind gut bereitgestellt.“ Daraufhin kehrten sie um. Auch jene Mönche entfalteten noch während der Regenzeit die Einsicht, erlangten die Arhatschaft und hielten zur großen Pavāraṇa-Zeremonie die reine Pavāraṇa ab. Evaṃ kāḷavallimaṇḍapavāsī mahānāgatthero viya kalambatitthavihāre vassūpagatā bhikkhū viya ca kammaṭṭhānayutteneva cittena pādaṃ uddharanto gāmasamīpaṃ gantvā udakagaṇḍūsaṃ katvā vīthiyo sallakkhetvā yattha surāsoṇḍadhuttādayo kalahakārakā caṇḍahatthiassādayo vā natthi, taṃ vīthiṃ paṭipajjati. Tattha ca piṇḍāya caranto na turitaturito javena gacchati, javanapiṇḍapātikadhutaṅgaṃ nāma natthi, visamabhūmibhāgappattaṃ pana udakabharitasakaṭamiva niccalo hutvā gacchati. Anugharaṃ paviṭṭho ca dātukāmaṃ vā adātukāmaṃ vā sallakkhetuṃ tadanurūpaṃ kālaṃ āgamento bhikkhaṃ gahetvā patirūpe okāse nisīditvā kammaṭṭhānaṃ manasikaronto āhāre paṭikkūlasaññaṃ upaṭṭhapetvā akkhabbhañjanavaṇālepanaputtamaṃsūpamāvasena paccavekkhanto aṭṭhaṅgasamannāgataṃ āhāraṃ āhāreti neva davāya na madāya…pe… bhuttāvī ca udakakiccaṃ katvā muhuttaṃ bhattakilamathaṃ vinodetvā yathā purebhattaṃ, evaṃ pacchābhattaṃ, purimayāmaṃ pacchimayāmañca kammaṭṭhānaṃ manasi karoti. Ayaṃ vuccati ‘‘harati ca paccāharati cā’’ti. Evametaṃ haraṇapaccāharaṇaṃ gatapaccāgatavattanti vuccati. Ebenso wie der im Kāḷavallimaṇḍapa wohnende ehrwürdige Mahānāga-Thera und wie die Mönche, die die Regenzeit im Kalambatittha-Kloster verbrachten, hebt er, den Geist stets mit dem Meditationsobjekt verbunden, den Fuß, geht in die Nähe des Dorfes, nimmt einen Schluck Wasser in den Mund, beobachtet die Straßen und schlägt jenen Weg ein, auf dem es keine Trunkenbolde, Gauner oder andere Streitsüchtige oder wilde Elefanten, Pferde usw. gibt. Und während er dort für Almosenspeise umhergeht, geht er nicht übermäßig hastig oder schnell; ein asketisches Gelübde namens „schneller Almosengang“ gibt es nämlich nicht. Vielmehr geht er, wenn er auf unebenes Gelände gerät, ruhig wie ein mit Wasser gefüllter Wagen. Und wenn er von Haus zu Haus geht, wartet er, um zu bemerken, ob jemand geben will oder nicht, eine angemessene Zeit ab, nimmt die Almosenspeise entgegen, setzt sich an einem geeigneten Ort nieder, lenkt seine Aufmerksamkeit auf das Meditationsobjekt, erzeugt die Vorstellung vom Widerwärtigen in der Nahrung und betrachtet sie anhand der Gleichnisse vom Schmieren einer Wagenachse, dem Salben einer Wunde und dem Essen des Fleisches des eigenen Sohnes, und nimmt die mit den acht Eigenschaften ausgestattete Nahrung zu sich, nicht zum Vergnügen, nicht zum Berauschen... und nach dem Essen verrichtet er seine Wasserpflichten, vertreibt für einen Moment die Trägheit nach dem Essen und lenkt – genau wie vor dem Essen, so auch nach dem Essen – in der ersten Nachtwache und in der letzten Nachtwache den Geist auf sein Meditationsobjekt. Dies wird als „er trägt hin und bringt zurück“ bezeichnet. Daher wird dieses Hin- und Zurücktragen als „die Pflicht des Gehens und Wiederkehrens“ (gatapaccāgata-vatta) bezeichnet. Etaṃ pūrento yadi upanissayasampanno hoti, paṭhamavaye eva arahattaṃ pāpuṇāti. No ce paṭhamavaye pāpuṇāti, atha majjhimavaye pāpuṇāti. No ce majjhimavaye pāpuṇāti, atha maraṇasamaye pāpuṇāti. No ce maraṇasamaye pāpuṇāti, atha devaputto hutvā pāpuṇāti. No ce devaputto hutvā pāpuṇāti, atha paccekasambuddho hutvā parinibbāti. No ce paccekasambuddho hutvā parinibbāti, atha buddhānaṃ sammukhībhāve [Pg.164] khippābhiñño hoti seyyathāpi thero bāhiyo, mahāpañño vā hoti seyyathāpi thero sāriputtoti. Wenn man diese Pflicht erfüllt und mit den nötigen unterstützenden Bedingungen ausgestattet ist, erlangt man bereits im ersten Lebensalter die Arhatschaft. Wenn man sie nicht im ersten Lebensalter erlangt, dann erlangt man sie im mittleren Lebensalter. Wenn man sie nicht im mittleren Lebensalter erlangt, dann erlangt man sie im Moment des Todes. Wenn man sie nicht im Moment des Todes erlangt, dann erlangt man sie, nachdem man als Göttersohn wiedergeboren wurde. Wenn man sie nicht als Göttersohn erlangt, dann erlischt man völlig, nachdem man ein Einzelbuddha geworden ist. Wenn man nicht als Einzelbuddha völlig erlischt, dann wird man in der Gegenwart der Buddhas von schneller Erkenntnisfähigkeit sein, wie der Thera Bāhiya, oder von großer WISheit, wie der Thera Sāriputta. Ayaṃ pana paccekabodhisatto kassapassa bhagavato sāsane pabbajitvā āraññiko hutvā vīsati vassasahassāni etaṃ gatapaccāgatavattaṃ pūretvā kālaṃ katvā kāmāvacaradevaloke uppajji. Tato cavitvā bārāṇasirañño aggamahesiyā kucchimhi paṭisandhiṃ aggahesi. Kusalā itthiyo tadaheva gabbhasaṇṭhānaṃ jānanti. Sā ca tāsaṃ aññatarā, tasmā esāpi taṃ gabbhapatiṭṭhānaṃ rañño nivedesi. Dhammatā esā, yaṃ puññavante satte gabbhe uppanne mātugāmo gabbhaparihāraṃ labhati. Tasmā rājā tassā gabbhaparihāraṃ adāsi. Sā tato pabhuti nāccuṇhaṃ kiñci ajjhoharituṃ labhati, nātisītaṃ nāccambilaṃ nātiloṇaṃ nātikaṭukaṃ nātitittakaṃ. Accuṇhe hi mātarā ajjhohaṭe gabbhassa lohakumbhivāso viya hoti, atisīte lokantarikavāso viya, accambilaloṇakaṭukatittakesu bhuttesu satthena phāletvā ambilādīhi sittāni viya dārakassa aṅgāni tibbavedanāni honti. Aticaṅkamanaṭṭhānanisajjasayanatopi naṃ nivārenti ‘‘kucchigatassa sañcalanadukkhaṃ mā ahosī’’ti. Mudukattharaṇatthatāya bhūmiyā caṅkamanādīni mattāya kātuṃ labhati, vaṇṇagandhādisampannaṃ sāduṃ sappāyaṃ annapānaṃ bhuñjituṃ labhati. Pariggahetvāva naṃ caṅkamāpenti nisīdāpenti vuṭṭhāpenti. Dieser angehende Einzelbuddha aber, nachdem er in der Lehre des erhabenen Kassapa die Hauslosigkeit angetreten hatte, im Wald lebend zwanzigtausend Jahre lang diese Pflicht des Gehens und Wiederkehrens erfüllt hatte, verschied er und wurde in einer der sinnesbestimmten Götterwelten wiedergeboren. Nachdem er von dort geschieden war, nahm er Empfängnis im Schoß der Hauptgemahlin des Königs von Bārāṇasī. Erfahrene Frauen erkennen noch am selben Tag die Entstehung einer Schwangerschaft. Da sie eine von ihnen war, meldete auch sie diese Empfängnis dem König. Es ist ein Naturgesetz, dass eine Frau, wenn ein verdienstvolles Wesen im Schoß empfangen wird, besonderen Schutz für die Schwangerschaft erhält. Daher gewährte ihr der König Schutz für die Schwangerschaft. Von da an durfte sie nichts allzu Heißes zu sich nehmen, nichts allzu Kaltes, nichts allzu Saures, nichts allzu Salziges, nichts allzu Scharfes und nichts allzu Bitteres. Denn wenn die Mutter allzu Heißes herunterschluckt, ist es für das Kind im Mutterleib wie ein Aufenthalt in der Hölle der glühenden Kessel; bei allzu Kaltem wie ein Aufenthalt in den Zwischenwelt-Höllen; wenn allzu Saures, Salziges, Scharfes oder Bitteres gegessen wird, erleiden die Glieder des Kindes heftige Schmerzen, als ob sie mit einem Messer aufgeschlitzt und mit Saurem usw. begossen worden wären. Man hielt sie auch von übermäßigem Gehen, Stehen, Sitzen und Liegen ab, damit dem Kind im Mutterleib kein Schmerz durch Erschütterung widerfahre. Auf einem weich ausgelegten Boden durfte sie Gehen und andere Aktivitäten in rechtem Maße ausüben, und sie erhielt wohlschmeckende, zuträgliche Speisen und Getränke, die reich an Farbe, Duft usw. waren. Unter ständiger Fürsorge ließ man sie umhergehen, sich setzen und aufstehen. Sā evaṃ parihariyamānā gabbhaparipākakāle sūtigharaṃ pavisitvā paccūsasamaye puttaṃ vijāyi pakkatelamadditamanosilāpiṇḍisadisaṃ dhaññapuññalakkhaṇūpetaṃ. Tato naṃ pañcamadivase alaṅkatapaṭiyattaṃ rañño dassesuṃ, rājā tuṭṭho chasaṭṭhiyā dhātīhi upaṭṭhāpesi. So sabbasampattīhi vaḍḍhamāno nacirasseva viññutaṃ pāpuṇi. Soḷasavassuddesikaṃ naṃ rājā rajjena abhisiñci, vividhanāṭakāhi ca upaṭṭhāpesi. Abhisitto rājaputto rajjaṃ kāresi nāmena brahmadatto, sakalajambudīpe vīsatiyā nagarasahassesu. Jambudīpe kira pubbe caturāsīti nagarasatasahassāni ahesuṃ, tāni parihāyantāni saṭṭhi ahesuṃ, tato parihāyantāni cattālīsaṃ, sabbaparihāyanakāle pana vīsatisahassāni honti. Ayañca brahmadatto sabbaparihāyanakāle uppajji, tenassa [Pg.165] vīsati nagarasahassāni ahesuṃ vīsati pāsādasahassāni, vīsati hatthisahassāni, vīsati assasahassāni, vīsati rathasahassāni, vīsati pattisahassāni, vīsati itthisahassāni orodhā ca nāṭakitthiyo ca, vīsati amaccasahassāni. Als sie so in Ehren umsorgt wurde, betrat sie zur Zeit der Reife ihrer Schwangerschaft das Geburtshaus und gebar in der Morgendämmerung einen Sohn, der einem Klumpen aus mit gekochtem Öl geknetetem Realgar glich und mit den glücksverheißenden Zeichen des Verdienstes ausgestattet war. Daraufhin zeigten sie ihn am fünften Tag, festlich geschmückt und hergerichtet, dem König. Der erfreute König ließ ihn von sechsundsechzig Ammen pflegen. Inmitten allen Wohlstands heranwachsend, erlangte er schon bald das Alter der Verständigkeit. Als er etwa sechzehn Jahre alt war, weihte ihn der König mit der Herrschaft über das Reich und ließ ihn von verschiedenen Tänzerinnen bedienen. Der geweihte Königssohn übte unter dem Namen Brahmadatta die Herrschaft im gesamten Jambudīpa über zwanzigtausend Städte aus. In Jambudīpa gab es nämlich früher, wie man hört, vierundachtzig Hunderttausende von Städten. Als diese abnahmen, wurden es sechzig Hunderttausende; als sie weiter abnahmen, vierzig Hunderttausende, und in der Zeit des völligen Verfalls sind es schließlich zwanzigtausend. Und dieser Brahmadatta wurde zur Zeit des völligen Verfalls geboren; deshalb gehörten ihm zwanzigtausend Städte, zwanzigtausend Paläste, zwanzigtausend Elefanten, zwanzigtausend Pferde, zwanzigtausend Wagen, zwanzigtausend Fußsoldaten, zwanzigtausend Frauen – sowohl im Harem als auch als Tänzerinnen – und zwanzigtausend Minister. So mahārajjaṃ kārayamānoyeva kasiṇaparikammaṃ katvā pañca abhiññāyo, aṭṭha samāpattiyo ca nibbattesi. Yasmā pana abhisittaraññā nāma avassaṃ aṭṭakaraṇe nisīditabbaṃ, tasmā ekadivasaṃ pageva pātarāsaṃ bhuñjitvā vinicchayaṭṭhāne nisīdi. Tattha uccāsaddamahāsaddaṃ akaṃsu, so ‘‘ayaṃ saddo samāpattiyā upakkileso’’ti pāsādatalaṃ abhiruhitvā ‘‘samāpattiṃ appemī’’ti nisinno nāsakkhi appetuṃ rajjavikkhepena samāpatti parihīnā. Tato cintesi – ‘‘kiṃ rajjaṃ varaṃ, udāhu samaṇadhammo’’ti? Tato ‘‘rajjasukhaṃ parittaṃ anekādīnavaṃ, samaṇadhammasukhaṃ pana vipulaṃ anekānisaṃsaṃ uttamapurisehi sevitañcā’’ti ñatvā aññataraṃ amaccaṃ āṇāpesi ‘‘imaṃ rajjaṃ dhammena samena anusāsa, mā kho adhammakāraṃ kāresī’’ti sabbaṃ tassa niyyātetvā pāsādaṃ abhiruhitvā samāpattisukhena vītināmesi, na koci upasaṅkamituṃ labhati aññatra mukhadhovanadantakaṭṭhadāyakabhattanīhārakādīhi. Während er noch das Großreich regierte, vollzog er die vorbereitenden Übungen für die Kasina-Meditation und erlangte die fünf höheren Geisteskräfte sowie die acht Meditationszustände. Da sich jedoch ein geweihter König unvermeidlich zur Rechtsprechung setzen muss, nahm er eines Tages schon früh am Morgen sein Frühstück ein und setzte sich an den Ort der Gerichtsbarkeit. Dort machten die Menschen lauten und großen Lärm. Er dachte: „Dieses Geräusch ist eine Trübung für die meditative Erreichung“, stieg auf die Ebene des Palastes hinauf und setzte sich hin mit dem Gedanken: „Ich will in die meditative Erreichung eintreten“, doch er vermochte nicht einzutreten. Durch die Zerstreuung der Herrschaft ging die meditative Erreichung verloren. Daraufhin dachte er nach: „Ist das Königtum besser oder das Leben als Asket?“ Als er daraufhin erkannte: „Das Glück des Königtums ist gering und bringt viele Gefahren mit sich; das Glück des Asketenlebens hingegen ist unermesslich, bringt vielfältigen Segen und wird von edlen Menschen gepflegt“, befahl er einem bestimmten Minister: „Führe dieses Reich mit Gerechtigkeit und Unparteilichkeit, und lass ja keine Ungerechtigkeit geschehen!“ Nachdem er ihm alles übergeben hatte, stieg er zum Palast hinauf und verbrachte seine Zeit im Glück der Meditationszustände. Niemand durfte sich ihm nähern, ausgenommen jene, die ihm Wasser zum Waschen des Gesichts und Zahnputzhölzer brachten oder das Essen servierten und wegtrugen. Tato addhamāsamatte vītikkante mahesī pucchi – ‘‘rājā uyyānagamanabaladassananāṭakādīsu katthaci na dissati, kuhiṃ gato’’ti? Tassā tamatthaṃ ārocesuṃ. Sā amaccassa pāhesi – ‘‘rajje paṭicchite ahampi paṭicchitā homi, etu mayā saddhiṃ saṃvāsaṃ kappetū’’ti. So ubho kaṇṇe thaketvā ‘‘asavanīyameta’’nti paṭikkhipi. Sā punapi dvattikkhattuṃ pesetvā anicchamānaṃ santajjāpesi ‘‘yadi na karosi, ṭhānāpi taṃ cāvemi. Jīvitāpi taṃ voropemī’’ti. So bhīto ‘‘mātugāmo nāma daḷhanicchayo, kadāci evampi kārāpeyyā’’ti. Ekadivasaṃ raho gantvā tāya saddhiṃ sirisayane saṃvāsaṃ kappesi. Sā puññavatī sukhasamphassā, so tassā samphassarāgena ratto tattha abhikkhaṇaṃ saṅkitasaṅkitova agamāsi. Anukkamena attano gharasāmiko viya nibbisaṅko pavisitumāraddho. Als daraufhin etwa ein halber Monat vergangen war, fragte die Königin: „Der König ist nirgends zu sehen bei den Ausfahrten in den Park, bei den Truppenschauen, bei den Tanzspielen oder Ähnlichem. Wohin ist er gegangen?“ Sie berichteten ihr diese Angelegenheit. Da sandte sie eine Botschaft an den Minister: „Da das Reich übernommen wurde, bin auch ich übernommen worden. Er soll kommen und mit mir Gemeinschaft pflegen.“ Er hielt sich beide Ohren zu und wies es ab mit den Worten: „Dies ist unerhört!“ Sie sandte noch zwei- oder dreimal zu ihm, und da er nicht wollte, drohte sie ihm: „Wenn du es nicht tust, werde ich dich von deinem Amt entheben und dich sogar deines Lebens berauben!“ Da fürchtete er sich und dachte: „Frauen haben wahrlich einen festen Entschluss; sie könnte dies tatsächlich so geschehen lassen.“ Eines Tages ging er im Geheimen zu ihr und pflegte mit ihr Gemeinschaft auf dem Prachtbett. Sie war verdienstvoll und von angenehmer Berührung. Er verfiel dem Begehren nach ihrer Berührung und ging dorthin, stets von großer Angst und Sorge geplagt. Nach und nach begann er jedoch, wie ein Hausherr im eigenen Heim, ganz ohne Scheu hineinzugehen. Tato [Pg.166] rājamanussā taṃ pavattiṃ rañño ārocesuṃ. Rājā na saddahati. Dutiyampi tatiyampi ārocesuṃ, tato rājā nilīno sayameva disvā sabbe amacce sannipātāpetvā ārocesi. Te ‘‘ayaṃ rājāparādhiko hatthacchedaṃ arahati, pādacchedaṃ arahatī’’ti yāva sūle uttāsanaṃ, tāva sabbakammakāraṇāni niddisiṃsu. Rājā ‘‘etassa vadhabandhanatāḷane mayhaṃ vihiṃsā uppajjeyya, jīvitā voropane pāṇātipāto bhaveyya, dhanaharaṇe adinnādānaṃ bhaveyya, alaṃ evarūpehi katehi, imaṃ mama rajjā nikkaḍḍhathā’’ti āha. Amaccā taṃ nibbisayaṃ akaṃsu. So attano dhanasārañca puttadārañca gahetvā paravisayaṃ agamāsi. Tattha rājā sutvā ‘‘kiṃ āgatosī’’ti pucchi. ‘‘Deva, icchāmi taṃ upaṭṭhātu’’nti. So taṃ sampaṭicchi. Amacco katipāhaccayena laddhavissāso taṃ rājānaṃ etadavoca – ‘‘mahārāja, amakkhikaṃ madhuṃ passāmi, taṃ khādanto natthī’’ti. Rājā ‘‘kiṃ etaṃ uppaṇḍetukāmo bhaṇatī’’ti na suṇāti. So antaraṃ labhitvā punapi suṭṭhutaraṃ vaṇṇetvā avoca. Rājā ‘‘kiṃ eta’’nti pucchi. ‘‘Bārāṇasirajjaṃ, devā’’ti. Rājā ‘‘kiṃ maṃ netvā māretukāmosī’’ti āha. So ‘‘mā, deva, evaṃ avaca, yadi na saddahasi, manusse pesehī’’ti. So manusse pesesi. Te gantvā gopuraṃ khaṇitvā rañño sayanaghare uṭṭhahiṃsu. Daraufhin berichteten die königlichen Diener dem König diesen Vorfall. Der König glaubte ihnen nicht. Auch ein zweites und drittes Mal berichteten sie es. Daraufhin versteckte sich der König, sah es mit eigenen Augen, ließ alle Minister zusammenrufen und teilte es ihnen mit. Diese sagten: „Dieser Mann hat ein Verbrechen gegen den König begangen; er verdient das Abhauen der Hände, er verdient das Abhauen der Füße“, und sie schlugen alle Arten von Folterstrafen bis hin zum Aufspießen auf einen Pfahl vor. Der König aber sprach: „Wenn ich ihn töten, fesseln oder schlagen lasse, würde in mir Grausamkeit aufsteigen. Wenn ich ihn seines Lebens beraube, wäre es das Töten von Lebewesen. Wenn ich ihm seinen Besitz nehme, wäre es das Nehmen von Nichtgegebenem. Genug derlei Taten! Vertreibt diesen Mann aus meinem Reich!“ Die Minister verbannten ihn aus dem Land. Er nahm seine wertvollsten Besitztümer sowie Frau und Kinder und zog in ein fremdes Land. Dort hörte der König von ihm und fragte: „Warum bist du gekommen?“ Er antwortete: „Herr, ich wünsche, Euch zu dienen.“ Der König nahm ihn auf. Als der Minister nach einigen Tagen Vertrauen gewonnen hatte, sprach er zu jenem König: „Großer König, ich sehe Honig ohne Bienen, und es gibt niemanden, der ihn isst.“ Der König dachte: „Will er mich etwa verspotten, dass er so redet?“ und schenkte dem keine Beachtung. Als er eine Gelegenheit fand, pries er es noch viel mehr an und sprach erneut davon. Da fragte der König: „Was ist das?“ „Das Reich von Bārāṇasī, o Herr!“, erwiderte er. Der König fragte: „Willst du mich dorthin führen, um mich töten zu lassen?“ Er entgegnete: „Sprich nicht so, o Herr! Wenn du mir nicht glaubst, sende Männer aus!“ Da sandte er Männer aus. Diese gingen hin, untergruben das Tor und drangen bis in das Schlafgemach des Königs vor. Rājā disvā ‘‘kissa āgatatthā’’ti pucchi. ‘‘Corā mayaṃ, mahārājā’’ti. Rājā tesaṃ dhanaṃ dāpetvā ‘‘mā puna evaṃ akatthā’’ti ovaditvā vissajjesi. Te āgantvā tassa rañño ārocesuṃ. So punapi dvattikkhattuṃ tatheva vīmaṃsitvā ‘‘sīlavā rājā’’ti caturaṅginiṃ senaṃ sannayhitvā sīmantare ekaṃ nagaraṃ upagamma tattha amaccassa pāhesi ‘‘nagaraṃ vā me dehi, yuddhaṃ vā’’ti. So brahmadattassa rañño tamatthaṃ ārocāpesi – ‘‘āṇāpetu, deva, ‘kiṃ yujjhāmi, udāhu nagaraṃ demī’’’ti. Rājā ‘‘na yujjhitabbaṃ, nagaraṃ datvā idhāgacchā’’ti pesesi. So tathā akāsi. Paṭirājāpi taṃ nagaraṃ gahetvā avasesanagaresupi tatheva dūtaṃ pesesi. Tepi amaccā tatheva brahmadattassa ārocetvā tena ‘‘na yujjhitabbaṃ, idhāgantabba’’nti vuttā bārāṇasiṃ āgamaṃsu. Als der König sie sah, fragte er: „Weshalb seid ihr gekommen?“ Sie antworteten: „Wir sind Diebe, großer König!“ Der König ließ ihnen Schätze geben, ermahnte sie: „Tut so etwas nicht wieder!“, und ließ sie frei. Sie kehrten zurück und berichteten dies jenem König. Als dieser es noch zwei- oder dreimal auf dieselbe Weise geprüft hatte und erkannte: „Der König ist tugendhaft“, rüstete er sein viergliedriges Heer aus, marschierte zu einer Stadt an der Landesgrenze und sandte eine Botschaft an den dortigen Minister: „Übergib mir entweder die Stadt oder stelle dich dem Kampf!“ Dieser ließ dem König Brahmadatta diese Angelegenheit mitteilen: „Gebt Eure Anweisung, o Herr: Soll ich kämpfen oder die Stadt übergeben?“ Der König sandte die Antwort: „Es soll nicht gekämpft werden. Übergib die Stadt und komm hierher zurück!“ Er handelte dementsprechend. Auch der gegnerische König nahm jene Stadt ein und sandte auf dieselbe Weise Boten zu den verbleibenden Städten. Auch diese Minister benachrichtigten Brahmadatta auf dieselbe Weise und kamen, nachdem ihnen von ihm befohlen worden war: „Es soll nicht gekämpft werden, kommt hierher!“, nach Bārāṇasī. Tato amaccā brahmadattaṃ āhaṃsu – ‘‘mahārāja, tena saha yujjhamā’’ti. Rājā ‘‘mama pāṇātipāto bhavissatī’’ti vāresi. Amaccā [Pg.167] ‘‘mayaṃ, mahārāja, taṃ jīvaggāhaṃ gahetvā idheva ānessāmā’’ti nānāupāyehi rājānaṃ saññāpetvā ‘‘ehi, mahārājā’’ti gantumāraddhā. Rājā ‘‘sace sattamāraṇappaharaṇavilumpanakammaṃ na karotha, gacchāmī’’ti bhaṇati. Amaccā ‘‘na, deva, karoma, bhayaṃ dassetvā palāpemā’’ti caturaṅginiṃ senaṃ sannayhitvā ghaṭesu dīpe pakkhipitvā rattiṃ gacchiṃsu. Paṭirājā taṃ divasaṃ bārāṇasisamīpe nagaraṃ gahetvā idāni kinti rattiṃ sannāhaṃ mocāpetvā pamatto niddaṃ okkami saddhiṃ balakāyena. Tato amaccā brahmadattarājānaṃ ādāya paṭirañño khandhāvāraṃ gantvā sabbaghaṭehi dīpe nīharāpetvā ekapajjotaṃ katvā ukkuṭṭhiṃ akaṃsu. Paṭirañño amacco mahābalakāyaṃ disvā bhīto attano rājānaṃ upasaṅkamitvā ‘‘uṭṭhehi amakkhikaṃ madhuṃ khādāhī’’ti mahāsaddaṃ akāsi. Tathā dutiyopi tatiyopi. Paṭirājā tena saddena paṭibujjhitvā bhayaṃ santāsaṃ āpajji. Ukkuṭṭhisatāni pavattiṃsu. So ‘‘paravacanaṃ saddahitvā amittahatthaṃ pattomhī’’ti sabbarattiṃ taṃ taṃ vippalapitvā dutiyadivase ‘‘dhammiko rājā, uparodhaṃ na kareyya gantvā khamāpemī’’ti cintetvā rājānaṃ upasaṅkamitvā jaṇṇukehi patiṭṭhahitvā ‘‘khama, mahārāja, mayhaṃ aparādha’’nti āha. Rājā taṃ ovaditvā ‘‘uṭṭhehi, khamāmi te’’ti āha. So raññā evaṃ vuttamatteyeva paramassāsappatto ahosi. Bārāṇasirañño samīpeyeva janapade rajjaṃ labhi. Te aññamaññaṃ sahāyakā ahesuṃ. Daraufhin sagten die Minister zu Brahmadatta: „Großer König, lasst uns mit ihm kämpfen!“ Der König hielt sie davon ab, indem er sagte: „Das würde für mich das Töten von Lebewesen bedeuten.“ Die Minister beruhigten den König mit verschiedenen Mitteln, indem sie sagten: „Großer König, wir werden ihn lebendig gefangen nehmen und genau hierher bringen“, und forderten ihn auf: „Kommt, großer König!“, um sich auf den Weg zu machen. Der König sagte: „Wenn ihr keine Taten des Tötens, Schlagens und Plünderns von Lebewesen begeht, gehe ich mit.“ Die Minister sagten: „Nein, o Herr, das werden wir nicht tun. Wir werden ihnen Furcht einflößen und sie in die Flucht treiben.“ Sie rüsteten das viergliedrige Heer aus, legten Lampen in Tonkrüge und brachen in der Nacht auf. Der feindliche König hatte an jenem Tag eine Stadt in der Nähe von Bārāṇasī eingenommen. Er dachte nun: „Was soll's?“, ließ die nächtliche Rüstung ablegen und schlief sorglos zusammen mit seinem Heer ein. Daraufhin nahmen die Minister den König Brahmadatta mit sich, gingen zum Lager des feindlichen Königs, ließen die Lampen aus allen Krügen herausnehmen, erzeugten so ein einziges großes Lichtmeer und erhoben ein großes Geschrei. Der Minister des feindlichen Königs sah die gewaltige Streitmacht, bekam Angst, ging zu seinem König und rief mit lauter Stimme: „Steht auf! Esst den Honig ohne Bienen!“ Ebenso ein zweites und ein drittes Mal. Der feindliche König erwachte durch diese Stimme und geriet in Furcht und Schrecken. Hunderte von Schreien ertönten. Er klagte die ganze Nacht hindurch und dachte: „Weil ich den Worten anderer vertraut habe, bin ich in die Hände des Feindes gefallen.“ Am nächsten Tag dachte er: „Der König ist gerecht, er wird mir kein Leid antun. Ich werde zu ihm gehen und ihn um Verzeihung bitten.“ Er suchte den König auf, kniete sich nieder und sagte: „Verzeih mir meinen Fehler, o großer König!“ Der König wies ihn an und sprach: „Steh auf, ich verzeihe dir.“ Sobald der König dies gesagt hatte, empfand er die größte Erleichterung. Er erhielt das Königreich in einem Grenzgebiet ganz in der Nähe des Königs von Bārāṇasī. Sie wurden enge Freunde miteinander. Atha brahmadatto dvepi senā sammodamānā ekato ṭhitā disvā ‘‘mamevekassa cittānurakkhaṇāya asmiṃ mahājanakāye khuddakamakkhikāya pivanamattampi lohitabindu na uppannaṃ, aho sādhu, aho suṭṭhu, sabbe sattā sukhitā hontu, averā hontu, abyāpajjā hontū’’ti mettājhānaṃ uppādetvā tadeva pādakaṃ katvā saṅkhāre sammasitvā paccekabodhiñāṇaṃ sacchikatvā sayambhutaṃ pāpuṇi. Taṃ maggaphalasukhena sukhitaṃ hatthikkhandhe nisinnaṃ amaccā paṇipātaṃ katvā āhaṃsu – ‘‘yānakālo, mahārāja, vijitabalakāyassa sakkāro kātabbo, parājitabalakāyassa bhattaparibbayo dātabbo’’ti. So āha – ‘‘nāhaṃ, bhaṇe, rājā, paccekabuddho nāmāha’’nti. ‘‘Kiṃ devo bhaṇati, na edisā paccekabuddhā hontī’’ti. ‘‘Kīdisā, bhaṇe, paccekabuddhā’’ti? ‘‘Paccekabuddhā nāma dvaṅgulakesamassū aṭṭhaparikkhārayuttā bhavantī’’ti. So dakkhiṇahatthena [Pg.168] sīsaṃ parāmasi, tāvadeva gihiliṅgaṃ antaradhāyi, pabbajitaveso pāturahosi. Dvaṅgulakesamassu aṭṭhaparikkhārasamannāgato vassasatikattherasadiso ahosi. So catutthajjhānaṃ samāpajjitvā hatthikkhandhato vehāsaṃ abbhuggantvā padumapupphe nisīdi. Amaccā vanditvā ‘‘kiṃ, bhante, kammaṭṭhānaṃ, kathaṃ adhigatosī’’ti pucchiṃsu. So yato assa mettājhānakammaṭṭhānaṃ ahosi, tañca vipassanaṃ vipassitvā adhigato, tasmā tamatthaṃ dassento udānagāthañca byākaraṇagāthañca imaṃyeva gāthaṃ abhāsi ‘‘sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍa’’nti. Daraufhin sah Brahmadatta die beiden Heere friedlich vereint dastehen und dachte: „Nur um mein eigenes Herz zu schützen, ist in dieser großen Menschenmenge nicht ein einziger Blutstropfen vergossen worden, nicht einmal so viel, wie eine kleine Fliege trinken könnte! O wie wunderbar! O wie herrlich! Mögen alle Wesen glücklich sein, mögen sie frei von Feindseligkeit sein, mögen sie frei von Bedrängnis sein!“ So erzeugte er die meditative Vertiefung der liebevollen Güte. Indem er diese zur Grundlage machte, untersuchte er die Gestaltungen, verwirklichte das Wissen eines Paccekabuddha und erlangte die Erleuchtung aus sich selbst heraus. Als er, beglückt durch das Glück von Pfad und Frucht, auf dem Nacken des Elefanten saß, verbeugten sich die Minister vor ihm und sagten: „Es ist Zeit zum Aufbruch, o großer König. Dem siegreichen Heer gebührt eine Belohnung, und dem besiegten Heer muss Verpflegung gegeben werden.“ Er antwortete: „Ihr Lieben, ich bin kein König mehr, ich bin ein Paccekabuddha.“ – „Was sagt der König da? Solche wie Ihr sind doch keine Paccekabuddhas!“ – „Wie sind denn Paccekabuddhas, ihr Lieben?“ – „Paccekabuddhas haben zwei Fingerbreit langes Haar und Bart und besitzen die acht Requisiten.“ Er strich sich mit der rechten Hand über das Haupt. Im selben Augenblick verschwand das Zeichen des Laien und die Gestalt eines Mönchs erschien. Er hatte nun zwei Fingerbreit langes Haar und Bart, besaß die acht Requisiten und sah aus wie ein ehrwürdiger Ältester von hundert Rains. Er trat in das vierte Jhāna ein, erhob sich vom Nacken des Elefanten in die Luft und setzte sich auf eine Lotusblüte. Die Minister verbeugten sich vor ihm und fragten: „Ehrwürdiger Herr, welches Meditationsobjekt habt Ihr genutzt und wie habt Ihr diesen Zustand erreicht?“ Da sein Meditationsobjekt die meditative Vertiefung der liebevollen Güte gewesen war, und er diesen Zustand durch die Einsichtsmeditation erlangt hatte, verkündete er, um diese Bedeutung aufzuzeigen, diese feierliche Äußerung und die darlegende Strophe, nämlich diese Strophe: „Wer gegenüber allen Wesen den Stock niederlegt...“ Tattha sabbesūti anavasesesu. Bhūtesūti sattesu. Ayamettha saṅkhepo, vitthāraṃ pana ratanasuttavaṇṇanāyaṃ vakkhāma. Nidhāyāti nikkhipitvā. Daṇḍanti kāyavacīmanodaṇḍaṃ, kāyaduccaritādīnametaṃ adhivacanaṃ. Kāyaduccaritañhi daṇḍayatīti daṇḍaṃ, bādheti anayabyasanaṃ pāpetīti vuttaṃ hoti. Evaṃ vacīduccaritaṃ manoduccaritañca. Paharaṇadaṇḍo eva vā daṇḍo, taṃ nidhāyātipi vuttaṃ hoti. Aviheṭhayanti aviheṭhayanto. Aññatarampīti yaṃkiñci ekampi. Tesanti tesaṃ sabbabhūtānaṃ. Na puttamiccheyyāti atrajo, khettajo, dinnako, antevāsikoti imesu catūsu puttesu yaṃkiñci puttaṃ na iccheyya. Kuto sahāyanti sahāyaṃ pana iccheyyāti kuto eva etaṃ. Darin bedeutet „gegenüber allen“ (sabbesu): ohne Ausnahme. „Wesen“ (bhūtesu) bedeutet: gegenüber den Lebewesen. Dies ist hier die kurze Zusammenfassung; die ausführliche Erklärung jedoch werden wir in der Erläuterung zum Ratana-Sutta darlegen. „Niederlegen“ (nidhāya) bedeutet: ablegen. „Den Stock“ (daṇḍaṃ) bezeichnet den Stock von Körper, Rede und Geist; dies ist eine Bezeichnung für körperliches Fehlverhalten usw. Denn körperliches Fehlverhalten bestraft, daher wird es „Stock“ genannt; es schädigt und führt ins Verderben und Elend, so lautet die Erklärung. Ebenso verhält es sich mit verbalem Fehlverhalten und gedanklichem Fehlverhalten. Oder aber „Stock“ bezeichnet den tatsächlichen Schlagstock; auch darauf bezieht sich das Wort „niederlegen“. „Ohne zu verletzen“ (aviheṭhayaṃ) bedeutet: nicht schädigend. „Auch nur irgendeines“ (aññataraṃ pi) bedeutet: irgendeines, auch nur ein einziges. „Von ihnen“ (tesaṃ) bedeutet: von jenen allen Wesen. „Er sollte sich keinen Sohn wünschen“ (na puttam iccheyya) bedeutet: Unter den vier Arten von Söhnen – dem leiblichen Sohn, dem im eigenen Feld geborenen Sohn, dem adoptierten Sohn und dem Schüler-Sohn – sollte er sich keinen dieser Söhne wünschen. „Wie viel weniger einen Gefährten“ (kuto sahāyaṃ): Wie sollte er sich denn da erst einen Gefährten wünschen? Woher sollte dieser kommen? Ekoti pabbajjāsaṅkhātena eko, adutiyaṭṭhena eko, taṇhāya pahānaṭṭhena eko, ekantavigatakilesoti eko, eko paccekasambodhiṃ abhisambuddhoti eko. Samaṇasahassassāpi hi majjhe vattamāno gihisaṃyojanassa chinnattā eko, evaṃ pabbajjāsaṅkhātena eko. Eko tiṭṭhati, eko gacchati, eko nisīdati, eko seyyaṃ kappeti, eko iriyati vattatīti evaṃ adutiyaṭṭhena eko. „Allein“ (eko) bedeutet: allein im Sinne des Hinausziehens in die Hauslosigkeit; allein im Sinne des Fehlens eines Zweiten; allein im Sinne des Überwindens des Begehrens; allein im Sinne des völligen Schwindens der Befleckungen; allein im Sinne des Erlangens der Erleuchtung eines Paccekabuddha. Denn selbst wenn er inmitten von tausend Asketen weilt, ist er dennoch allein, weil die Bindungen an das Laienleben durchtrennt sind; so ist er allein im Sinne des Hinausziehens in die Hauslosigkeit. Er steht allein, er geht allein, er sitzt allein, er schläft allein, er bewegt und verhält sich allein; so ist er allein im Sinne des Fehlens eines Zweiten. ‘‘Taṇhādutiyo puriso, dīghamaddhānasaṃsaraṃ; Itthabhāvaññathābhāvaṃ, saṃsāraṃ nātivattati. „Ein Mensch, der das Begehren zum Gefährten hat, wandert für lange Zeit im Daseinskreislauf umher; er überwindet den Daseinskreislauf nicht, der aus diesem Dasein und dem Anderswerden besteht. ‘‘Etamādīnavaṃ ñatvā, taṇhaṃ dukkhassa sambhavaṃ; Vītataṇho anādāno, sato bhikkhu paribbaje’’ti. (itivu. 15, 105; mahāni. 191; cūḷani.pārāyanānugītigāthāniddesa 107) – „Nachdem er dieses Elend erkannt hat, und dass das Begehren der Ursprung des Leidens ist, sollte ein Mönch, frei von Begehren und ohne Anhaftung, achtsam umherziehen.“ Evaṃ [Pg.169] taṇhāpahānaṭṭhena eko. Sabbakilesāssa pahīnā ucchinnamūlā tālāvatthukatā anabhāvaṃkatā āyatiṃ anuppādadhammāti evaṃ ekantavigatakilesoti eko. Anācariyako hutvā sayambhū sāmaṃyeva paccekasambodhiṃ abhisambuddhoti evaṃ eko paccekasambodhiṃ abhisambuddhoti eko. So ist er „allein“ im Sinne des Aufgebens des Begehrens. Da alle seine Befleckungen überwunden sind, an der Wurzel abgeschnitten, wie ein abgeschnittener Palmenstumpf gemacht, vernichtet und für die Zukunft dem Nicht-Wiedererstehen verfallen sind, ist er „allein“ im Sinne des völligen Schwindens der Befleckungen. Da er ohne Lehrer, aus sich selbst heraus, ganz allein die Erleuchtung eines Paccekabuddha verwirklicht hat, ist er „allein“ im Sinne des Erlangens der Erleuchtung eines Paccekabuddha. Careti yā imā aṭṭha cariyāyo. Seyyathidaṃ – paṇidhisampannānaṃ catūsu iriyāpathesu iriyāpathacariyā, indriyesu guttadvārānaṃ chasu ajjhattikāyatanesu āyatanacariyā, appamādavihārīnaṃ catūsu satipaṭṭhānesu saticariyā, adhicittamanuyuttānaṃ catūsu jhānesu samādhicariyā, buddhisampannānaṃ catūsu ariyasaccesu ñāṇacariyā, sammāpaṭipannānaṃ catūsu ariyasaccesu maggacariyā, adhigatapphalānaṃ catūsu sāmaññaphalesu patticariyā, tiṇṇaṃ buddhānaṃ sabbasattesu lokatthacariyā, tattha padesato paccekabuddhabuddhasāvakānanti. Yathāha – ‘‘cariyāti aṭṭha cariyāyo iriyāpathacariyā’’ti (paṭi. ma. 1.197; 3.28) vitthāro. Tāhi cariyāhi samannāgato bhaveyyāti attho. Atha vā yā imā adhimuccanto saddhāya carati, paggaṇhanto vīriyena carati, upaṭṭhahanto satiyā carati, avikkhitto samādhinā carati, pajānanto paññāya carati, vijānanto viññāṇena carati, evaṃ paṭipannassa kusalā dhammā āyatantīti āyatanacariyāya carati, evaṃ paṭipanno visesaṃ adhigacchatīti visesacariyāya caratīti (paṭi. ma. 1.197; 3.28) evaṃ aparāpi aṭṭha cariyāyo vuttā, tāhipi samannāgato bhaveyyāti attho. Khaggavisāṇakappoti ettha khaggavisāṇaṃ nāma khaggamigasiṅgaṃ. Kappa-saddassa atthaṃ vitthārato maṅgalasuttavaṇṇanāyaṃ pakāsayissāma, idha panāyaṃ ‘‘satthukappena vata, bho, kira sāvakena saddhiṃ mantayamānā’’ti evamādīsu (ma. ni. 1.260) viya paṭibhāgo veditabbo. Khaggavisāṇakappoti khaggavisāṇasadisoti vuttaṃ hoti. Ayaṃ tāvettha padato atthavaṇṇanā. „Er übt aus (careti)“ bezieht sich auf diese acht Verhaltensweisen (cariyā). Diese sind: das Verhalten bezüglich der Körperhaltungen (iriyāpathacariyā) in den vier Körperhaltungen für jene, die mit festem Entschluss ausgestattet sind; das Verhalten bezüglich der Sinnenbereiche (āyatanacariyā) in den sechs inneren Sinnenbereichen für jene, deren Sinnentore bezüglich der Fähigkeiten gezügelt sind; das Verhalten der Achtsamkeit (saticariyā) in den vier Grundlagen der Achtsamkeit für jene, die im Zustand der Wachsamkeit verweilen; das Verhalten der Konzentration (samādhicariyā) in den vier Vertiefungen (jhāna) für jene, die dem höheren Geist hingegeben sind; das Verhalten des Wissens (ñāṇacariyā) in den vier edlen Wahrheiten für jene, die mit Weisheit ausgestattet sind; das Verhalten des Pfades (maggacariyā) in den vier edlen Pfaden für jene, die richtig praktizieren; das Verhalten der Erlangung (patticariyā) in den vier Früchten des Asketentums für jene, die die Früchte erlangt haben; das Verhalten zum Wohle der Welt (lokatthacariyā) bezüglich aller Lebewesen für die drei Arten von Buddhas; und darin haben die Paccekabuddhas und die Buddha-Schüler diese Verhaltensweisen teilweise (padesato). Wie es heißt: „Verhalten bedeutet die acht Verhaltensweisen, das Verhalten in den Körperhaltungen“ usw. in ausführlicher Form. Die Bedeutung ist: Möge er mit diesen Verhaltensweisen ausgestattet sein. Oder aber: Wer diese Faktoren verinnerlicht, übt sie mit Vertrauen aus (saddhāya carati); wer sie fördert, übt sie mit Tatkraft aus (vīriyena carati); wer sie gegenwärtig macht, übt sie mit Achtsamkeit aus (satiyā carati); wer unzerstreut ist, übt sie mit Konzentration aus (samādhinā carati); wer versteht, übt sie mit Weisheit aus (paññāya carati); wer erkennt, übt sie mit dem Bewusstsein aus (viññāṇena carati). Da sich für einen so Praktizierenden die heilsamen Geisteszustände weiten (āyatanti), übt er das Verhalten der Sinnenbereiche aus. Da ein so Praktizierender die Besonderheit erlangt, übt er das Verhalten der Besonderheit aus. Auf diese Weise wurden weitere acht Verhaltensweisen dargelegt, und die Bedeutung ist, dass er auch mit diesen ausgestattet sein möge. „Khaggavisāṇakappo“ (dem Horn des Nashorns gleich): Hier bedeutet „khaggavisāṇa“ das Horn des Nashorns (khaggamigasiṅga). Die Bedeutung des Wortes „kappa“ werden wir ausführlich in der Erklärung des Maṅgala Sutta darlegen; hier jedoch ist sie als Ähnlichkeit oder Analogie (paṭibhāgo) zu verstehen, wie in Passagen wie: „Wahrlich, ihr Herren, wie ein Lehrer (satthukappena) beratschlagte er sich mit einem Schüler“ usw. „Khaggavisāṇakappo“ bedeutet „dem Horn eines Nashorns ähnlich“. Dies ist zunächst die Worterklärung in dieser Passage. Adhippāyānusandhito pana evaṃ veditabbo – yvāyaṃ vuttappakāro daṇḍo bhūtesu pavattiyamāno ahito hoti, taṃ tesu appavattanena tappaṭipakkhabhūtāya mettāya parahitūpasaṃhārena ca sabbesu bhūtesu nidhāya daṇḍaṃ, nihitadaṇḍattā eva ca yathā anihitadaṇḍā sattā bhūtāni [Pg.170] daṇḍena vā satthena vā pāṇinā vā leḍḍunā vā viheṭhayanti, tathā aviheṭhayaṃ, aññatarampi tesaṃ imaṃ mettākammaṭṭhānamāgamma yadeva tattha vedanāgataṃ saññāsaṅkhāraviññāṇagataṃ tañca tadanusāreneva tadaññañca saṅkhāragataṃ vipassitvā imaṃ paccekabodhiṃ adhigatomhīti ayaṃ tāva adhippāyo. Aus dem Zusammenhang der Absicht (adhieppāyānusandhi) ist es jedoch so zu verstehen: Jene erwähnte Art von Gewalt (daṇḍa), die, wenn sie gegenüber Lebewesen angewendet wird, unheilsam (ahito) ist; indem man diese ihnen gegenüber nicht anwendet, sondern stattdessen deren Gegenteil, nämlich Liebende Güte (mettā) und das Bringen von Wohl für andere (parahitūpasaṃhāra), hat man die Gewalt gegenüber allen Lebewesen abgelegt (nidhāya daṇḍaṃ). Und eben weil man die Gewalt abgelegt hat (nihitadaṇḍattā), fügt man ihnen keinen Schaden zu, so wie Wesen, die die Gewalt nicht abgelegt haben, Lebewesen mit Stock, Waffe, Hand oder Erdkloß verletzen. Auf diese Weise, gestützt auf dieses Meditationsobjekt der Liebenden Güte (mettākammaṭṭhāna) für jedes dieser Wesen, hat man das darin entstandene Gefühl (vedanāgata), die Wahrnehmung, die Gestaltungen, das Bewusstsein (saññā-saṅkhāra-viññāṇagata) sowie, diesem folgend, das Übrige, was zu den Gestaltungen gehört (tadaññañca saṅkhāragataṃ), mit Einsicht betrachtet (vipassitvā) und gedacht: „Ich habe diese Paccekabodhi (Einzelerleuchtung) erlangt.“ Dies ist zunächst die Absicht. Ayaṃ pana anusandhi – evaṃ vutte te amaccā āhaṃsu – ‘‘idāni, bhante, kuhiṃ gacchathā’’ti? Tato tena ‘‘pubbe paccekabuddhā kattha vasantī’’ti āvajjetvā ñatvā ‘‘gandhamādanapabbate’’ti vutte puna āhaṃsu – ‘‘amhe dāni, bhante, pajahatha na icchathā’’ti. Atha paccekasambuddho āha ‘‘na puttamiccheyyā’’ti sabbaṃ. Tatrādhippāyo – ahaṃ idāni atrajādīsu yaṃkiñci puttampi na iccheyyaṃ, kuto pana tumhādisaṃ sahāyaṃ. Tasmā tumhesupi yo mayā saddhiṃ gantuṃ mādiso vā hotuṃ icchati, so eko care khaggavisāṇakappo. Atha vā tehi ‘‘amhe dāni, bhante, pajahatha na icchathā’’ti vutte so paccekasambuddho ‘‘na puttamiccheyya kuto sahāya’’nti vatvā attano yathāvuttenatthena ekacariyāya guṇaṃ disvā pamudito pītisomanassajāto imaṃ udānaṃ udānesi – ‘‘eko care khaggavisāṇakappo’’ti. Evaṃ vatvā pekkhamānasseva mahājanassa ākāse uppatitvā gandhamādanaṃ agamāsi. Dies aber ist die Verknüpfung (der Kontext): Als dies gesagt wurde, fragten jene Minister: „Wohin geht Ihr nun, Ehrwürdiger Herr?“ Daraufhin erwog er: „Wo wohnen die früheren Paccekabuddhas?“, und nachdem er es erkannt hatte und sagte: „Auf dem Berg Gandhamādana“, sagten sie wiederum: „Ehrwürdiger Herr, verlasst Ihr uns nun und wollt uns nicht mehr?“ Da sprach der Paccekabuddha das gesamte Versglied: „Man sollte sich keinen Sohn wünschen“ usw. Die Absicht darin ist: „Ich wünsche mir jetzt nicht einmal irgendeinen eigenen leiblichen Sohn (atrajā); wie sollte ich mir da einen Gefährten wie euch wünschen? Wer daher unter euch mit mir gehen oder so werden will wie ich, der soll allein wandern, dem Horn des Nashorns gleich.“ Oder aber: Als sie sagten: „Verlasst Ihr uns nun, Ehrwürdiger Herr, und wollt uns nicht mehr?“, sprach jener Paccekabuddha: „Man sollte sich keinen Sohn wünschen, woher also einen Gefährten?“, erkannte den Wert des Alleinwanderns (ekacariyā) gemäß der besprochenen Bedeutung, war hocherfreut und von freudiger Begeisterung erfüllt (pītisomanassajātā) und stieß diesen feierlichen Ausspruch (udāna) aus: „Er soll allein wandern, dem Horn des Nashorns gleich.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erhob er sich vor den Augen der großen Menschenmenge in die Luft und flog zum Berg Gandhamādana. Gandhamādano nāma himavati cūḷakāḷapabbataṃ mahākāḷapabbataṃ nāgapaliveṭhanaṃ candagabbhaṃ sūriyagabbhaṃ suvaṇṇapassaṃ himavantapabbatanti satta pabbate atikkamma hoti. Tattha nandamūlakaṃ nāma pabbhāraṃ paccekabuddhānaṃ vasanokāso, tisso ca guhāyo – suvaṇṇaguhā, maṇiguhā, rajataguhāti. Tattha maṇiguhādvāre mañjūsako nāma rukkho yojanaṃ ubbedhena, yojanaṃ vitthārena. So yattakāni udake vā thale vā pupphāni, sabbāni tāni pupphayati, visesena paccekabuddhāgamanadivase. Tassūparito sabbaratanamāḷo hoti. Tattha sammajjanakavāto kacavaraṃ chaḍḍeti, samakaraṇavāto sabbaratanamayavālukaṃ samaṃ karoti, siñcanakavāto anotattadahato ānetvā udakaṃ siñcati, sugandhakaraṇavāto himavantato sabbesaṃ sugandharukkhānaṃ gandhe āneti, ocinakavāto pupphāni ocinitvā pāteti, santharakavāto sabbattha santharati. Sadā supaññattāneva cettha [Pg.171] āsanāni honti, yesu paccekabuddhuppādadivase, uposathadivase ca sabbe paccekabuddhā sannipatitvā nisīdanti. Ayaṃ tattha pakati. Ayaṃ paccekabuddho tattha gantvā paññattāsane nisīdati. Tato sace tasmiṃ kāle aññepi paccekabuddhā saṃvijjanti, tepi taṅkhaṇeyeva sannipatitvā paññattāsanesu nisīdanti. Nisīditvā ca kiñcideva samāpattiṃ samāpajjitvā vuṭṭhahanti. Tato saṅghatthero adhunāgatapaccekabuddhaṃ sabbesaṃ anumodanatthāya ‘‘kathamadhigata’’nti evaṃ kammaṭṭhānaṃ pucchati, tadāpi so tameva attano udānabyākaraṇagāthaṃ bhāsati. Puna bhagavāpi āyasmatā ānandena puṭṭho tameva gāthaṃ bhāsati. Ānandopi saṅgītiyanti evaṃ ekekā gāthā paccekasambodhiabhisambuddhaṭṭhāne, mañjūsakamāḷe, ānandena pucchitakāle, saṅgītiyanti catukkhattuṃ bhāsitā hotīti. Der Berg Gandhamādana befindet sich im Himavant (Himalaya), nachdem man sieben Berge überquert hat, nämlich den Cūḷakāḷa-Berg, den Mahākāḷa-Berg, den Nāgapaliveṭhana-Berg, den Candagabbha-Berg, den Sūriyagabbha-Berg, den Suvaṇṇapassa-Berg und den Himavanta-Berg. Dort ist der Berghang namens Nandamūlaka der Wohnort der Paccekabuddhas, und es gibt dort drei Höhlen: die Goldene Höhle (suvaṇṇaguhā), die Juwelenhöhle (maṇiguhā) und die Silberne Höhle (rajataguhā). Dort, am Eingang der Juwelenhöhle, steht der Mañjūsaka genannte Baum, eine Yojane hoch und eine Yojane breit. Dieser bringt alle Arten von Blumen hervor, die im Wasser oder auf dem Land wachsen, ganz besonders am Tag der Ankunft eines Paccekabuddha. Über ihm befindet sich ein Baldachin aus allerlei Juwelen. Dort bläst der fegende Wind den Schmutz weg; der ebnende Wind macht den Sand, der aus lauter Edelsteinen besteht, eben; der sprengende Wind bringt Wasser aus dem Anotatta-See und besprengt den Boden; der duftende Wind bringt Düfte von allen Duftbäumen aus dem Himavant herbei; der pflückende Wind pflückt Blumen und lässt sie herabregnen; der ausbreitende Wind breitet sie überall aus. Und an diesem Ort sind stets Sitze wohlvorbereitet, auf denen sich am Tag des Erscheinens eines Paccekabuddha sowie am Uposatha-Tag alle Paccekabuddhas versammeln und niedersetzen. Das ist dort die Regel (pakati). Dieser Paccekabuddha begibt sich dorthin und setzt sich auf einen vorbereiteten Sitz. Wenn zu jener Zeit noch andere Paccekabuddhas anwesend sind, versammeln auch sie sich in genau jenem Augenblick und setzen sich auf die vorbereiteten Sitze. Nachdem sie sich gesetzt haben, treten sie in eine beliebige meditative Errungenschaft (samāpatti) ein und erheben sich wieder daraus. Daraufhin fragt der Ordensälteste (saṅghatthera) den neu angekommenen Paccekabuddha nach seinem Meditationsobjekt (kammaṭṭhāna), um die Freude aller zu wecken: „Wie wurde es erlangt?“ Auch in jenem Moment rezitiert dieser eben jene Strophe seiner eigenen freudigen Erklärung (udānabyākaraṇagāthā). Später rezitierte auch der Erhabene, vom ehrwürdigen Ānanda befragt, genau dieselbe Strophe. Und auch Ānanda rezitierte sie beim Konzil (saṅgīti). So wurde jede einzelne Strophe viermal gesprochen: am Ort der Erlangung der Einzelerleuchtung, auf der Terrasse des Mañjūsaka-Baumes (mañjūsakamāḷe), als Ānanda danach fragte und schließlich beim Konzil (saṅgīti). Paṭhamagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der ersten Strophe ist abgeschlossen. 92. Saṃsaggajātassāti gāthā kā uppatti? Ayampi paccekabodhisatto kassapassa bhagavato sāsane vīsati vassasahassāni purimanayeneva samaṇadhammaṃ karonto kasiṇaparikammaṃ katvā paṭhamaṃ jhānaṃ nibbattetvā nāmarūpaṃ vavatthapetvā lakkhaṇasammasanaṃ katvā ariyamaggaṃ anadhigamma brahmaloke nibbatti. So tato cuto bārāṇasirañño aggamahesiyā kucchimhi uppajjitvā purimanayeneva vaḍḍhamāno yato pabhuti ‘‘ayaṃ itthī, ayaṃ puriso’’ti visesaṃ aññāsi. Tadupādāya itthīnaṃ hatthe na ramati, ucchādananhāpanamaṇḍanādimattampi na sādiyati. Taṃ purisā eva posenti. Thaññapāyanakāle dhātiyo kañcukaṃ paṭimuñcitvā purisavesena thaññaṃ pāyenti. So itthīnaṃ gandhaṃ ghāyitvā saddaṃ vā sutvā rodati, viññutaṃ pattopi itthiyo passituṃ na icchati. Tena taṃ anitthigandhotveva sañjāniṃsu. 92. Was ist die Entstehungsgeschichte der Strophe, die mit 'saṃsaggajātassa' beginnt? Auch dieser Paccekabodhisatta übte in der Lehre des Erhabenen Kassapa zwanzigtausend Jahre lang in der zuvor beschriebenen Weise die Pflichten eines Asketen aus. Nachdem er die Vorbereitungen für die Meditationsobjekte (Kasiṇa) getroffen, die erste Vertiefung (Jhāna) erlangt, Geist und Materie (Nāmarūpa) bestimmt und die Betrachtung der Merkmale durchgeführt hatte, wurde er, ohne den edlen Pfad erlangt zu haben, in der Brahma-Welt wiedergeboren. Von dort verschieden, wurde er im Schoss der Hauptkönigin des Königs von Bārāṇasī wiedergeboren. Als er in der zuvor beschriebenen Weise heranwuchs, erkannte er von dem Zeitpunkt an den Unterschied: 'Dies ist eine Frau, dies ist un ein Mann.' Von da an fand er kein Gefallen daran, von Frauen auf den Armen getragen zu werden, und er duldete nicht einmal das Salben, Baden, Schmücken und Ähnliches durch sie. Nur Männer zogen ihn auf. Zur Zeit des Stillens zogen die Ammen ein Obergewand an und gaben ihm die Brust in der Gestalt eines Mannes. Wenn er den Geruch von Frauen wahrnahm oder ihre Stimme hörte, weinte er. Selbst als er das Alter der Vernunft erreicht hatte, wollte er keine Frauen sehen. Daher nannte man ihn 'Anitthigandha' (der den Geruch von Frauen meidet). Tasmiṃ soḷasavassuddesike jāte rājā ‘‘kulavaṃsaṃ saṇṭhapessāmī’’ti nānākulehi tassa anurūpā kaññāyo ānetvā aññataraṃ amaccaṃ āṇāpesi ‘‘kumāraṃ ramāpehī’’ti. Amacco upāyena taṃ ramāpetukāmo tassa avidūre sāṇipākāraṃ parikkhipāpetvā nāṭakāni payojāpesi. Kumāro gītavāditasaddaṃ sutvā ‘‘kasseso saddo’’ti āha. Amacco ‘‘taveso, deva[Pg.172], nāṭakitthīnaṃ saddo, puññavantānaṃ īdisāni nāṭakāni honti. Abhirama, deva, mahāpuññosi tva’’nti āha. Kumāro amaccaṃ daṇḍena tāḷāpetvā nikkaḍḍhāpesi. So rañño ārocesi. Rājā kumārassa mātarā saha gantvā kumāraṃ khamāpetvā puna amaccaṃ āṇāpesi. Kumāro tehi atinippīḷiyamāno seṭṭhasuvaṇṇaṃ datvā suvaṇṇakāre āṇāpesi ‘‘sundaraṃ itthirūpaṃ karothā’’ti. Te vissakammunā nimmitasadisaṃ sabbālaṅkāravibhūsitaṃ itthirūpaṃ karitvā dassesuṃ. Kumāro disvā vimhayena sīsaṃ cāletvā mātāpitūnaṃ pesesi – ‘‘yadi īdisiṃ itthiṃ labhissāmi, gaṇhissāmī’’ti. Mātāpitaro ‘‘amhākaṃ putto mahāpuñño, avassaṃ tena saha katapuññā kāci dārikā loke uppannā bhavissatī’’ti taṃ suvaṇṇarūpaṃ rathaṃ āropetvā amaccānaṃ appesuṃ – ‘‘gacchatha, īdisiṃ dārikaṃ gavesathā’’ti. Te taṃ gahetvā soḷasamahājanapade vicarantā taṃ taṃ gāmaṃ gantvā udakatitthādīsu yattha yattha janasamūhaṃ passanti, tattha tattha devataṃ viya suvaṇṇarūpaṃ ṭhapetvā nānāpupphavatthālaṅkārehi pūjaṃ katvā vitānaṃ bandhitvā ekamantaṃ tiṭṭhanti ‘‘yadi kenaci evarūpā diṭṭhapubbā bhavissati, so kathaṃ samuṭṭhāpessatī’’ti? Etenupāyena aññatra maddaraṭṭhā sabbajanapade āhiṇḍitvā taṃ ‘‘khuddakaraṭṭha’’nti avamaññamānā tattha paṭhamaṃ agantvā nivattiṃsu. Als er etwa sechzehn Jahre alt war, dachte der König: 'Ich will das Fortbestehen des Herrschergeschlechts sichern.' Er liess standesgemässe junge Frauen aus verschiedenen Familien herbeibringen und befahl einem Minister: 'Bringe dem Prinzen Vergnügen!' Der Minister, der ihn mit einer List erfreuen wollte, liess unweit von ihm eine Vorhangwand errichten und veranstaltete Aufführungen von Schauspielern. Als der Prinz den Klang von Gesang und Instrumentalmusik hörte, fragte er: 'Wessen Stimme ist das?' Der Minister antwortete: 'Mein Herr, das ist der Gesang Deiner Tänzerinnen. Menschen mit grossem Verdienst haben solche Darbietungen. Erfreue Dich daran, mein Herr, Du bist von grossem Verdienst!' Der Prinz liess den Minister mit einem Stock schlagen und vertreiben. Dieser meldete es dem König. Der König ging zusammen mit der Mutter des Prinzen hin, besänftigte den Prinzen und gab dem Minister erneut den Befehl. Da der Prinz von ihnen sehr bedrängt wurde, gab er feinstes Gold und befahl den Goldschmieden: 'Erschafft das wunderschöne Bildnis einer Frau.' Diese fertigten eine goldene Frauenstatue an, die reich mit allerlei Schmuck verziert war und aussah, als sei sie vom Götterbaumeister Vissakamma geschaffen worden, und zeigten sie ihm. Als der Prinz sie sah, schüttelte er staunend den Kopf und sandte sie an seine Eltern mit den Worten: 'Wenn ich eine solche Frau bekomme, werde ich sie heiraten.' Die Eltern dachten: 'Unser Sohn ist von grossem Verdienst. Sicherlich ist ein Mädchen auf der Welt geboren worden, das gemeinsam mit ihm Verdienste erworben hat.' Sie liessen das goldene Bildnis auf einen Wagen heben, übergaben es den Ministern und befahlen: 'Geht und sucht ein solches Mädchen.' Diese nahmen das Bildnis und reisten durch die sechzehn grossen Königreiche. Sie gingen von Dorf zu Dorf, und überall, wo sie an Wasserstellen und ähnlichen Orten eine Menschenmenge sahen, stellten sie das goldene Bildnis wie eine Gottheit auf, verehrten es mit verschiedenen Blumen, Kleidern und Schmuckstücken, spannten einen Baldachin auf und stellten sich beiseite, indem sie dachten: 'Wenn jemand zuvor eine solche Gestalt gesehen hat, wie wird er sich wohl verhalten?' Mit dieser List durchwanderten sie alle Königreiche ausser dem Madda-Reich, das sie verächtlich als ein 'kleines Reich' ansahen, und kehrten zuerst um, ohne dorthin gegangen zu sein. Tato nesaṃ etadahosi – ‘‘maddaraṭṭhampi tāva gacchāma, mā no bārāṇasiṃ paviṭṭhepi rājā puna pesesī’’ti maddaraṭṭhe sāgalanagaraṃ agamaṃsu. Sāgalanagare ca maddavo nāma rājā. Tassa dhītā soḷasavassuddesikā abhirūpā ahosi. Tassā vaṇṇadāsiyo nhānodakatthāya titthaṃ gacchanti. Tattha amaccehi ṭhapitaṃ taṃ suvaṇṇarūpaṃ dūratova disvā ‘‘amhe udakatthāya pesetvā rājaputtī sayameva āgatā’’ti bhaṇantiyo samīpaṃ gantvā ‘‘nāyaṃ sāminī, amhākaṃ sāminī ito abhirūpatarā’’ti āhaṃsu. Amaccā taṃ sutvā rājānaṃ upasaṅkamitvā anurūpena nayena dārikaṃ yāciṃsu. Sopi adāsi. Te bārāṇasirañño pāhesuṃ – ‘‘laddhā, deva, kumārikā, sāmaṃ āgacchatha, udāhu amheva ānemā’’ti. So ‘‘mayi āgacchante janapadapīḷā bhavissati, tumheva naṃ ānethā’’ti pesesi. Daraufhin dachten sie: 'Lasst uns zuerst auch in das Madda-Reich gehen, damit uns der König nicht erneut dorthin schickt, selbst wenn wir bereits in Bārāṇasī eingetroffen sind.' So reisten sie in die Stadt Sāgala im Madda-Reich. In Sāgala herrschte ein König namens Maddava. Seine Tochter war etwa sechzehn Jahre alt und von aussergewöhnlicher Schönheit. Ihre Dienerinnen gingen zum Flussufer, um Badewasser zu holen. Als sie das von den Ministern dort aufgestellte goldene Bildnis von Weitem sahen, dachten sie: 'Die Prinzessin hat uns losgeschickt, um Wasser zu holen, und ist nun selbst hergekommen.' Sie näherten sich und sagten: 'Das ist nicht unsere Herrin, unsere Herrin ist noch weitaus schöner als diese!' Die Minister hörten dies, suchten den König auf und hielten in angemessener Weise um die Hand des Mädchens an. Auch er gab sie ihnen. Daraufhin sandten sie eine Botschaft an den König von Bārāṇasī: 'Mein Herr, das Mädchen wurde gefunden. Kommst Du selbst oder sollen wir sie bringen?' Er antwortete: 'Wenn ich reise, wird das Land zu sehr belastet werden. Bringt Ihr sie selbst her.' Amaccāpi dārikaṃ gahetvā nagarā nikkhamitvā kumārassa pāhesuṃ – ‘‘laddhā suvaṇṇarūpasadisā kumārikā’’ti. Kumāro sutvāva rāgena abhibhūto [Pg.173] paṭhamajjhānā parihāyi. So dūtaparamparāya pesesi – ‘‘sīghaṃ ānetha, sīghaṃ ānethā’’ti. Te sabbattha ekarattivāsena bārāṇasiṃ patvā bahinagare ṭhitā rañño pesesuṃ – ‘‘ajjeva pavisitabbaṃ, no’’ti. Rājā ‘‘seṭṭhakulā ānītā dārikā, maṅgalakiriyaṃ katvā mahāsakkārena pavesessāma, uyyānaṃ tāva naṃ nethā’’ti āha. Te tathā akaṃsu. Sā accantasukhumālā kumārikā yānugghāṭena ubbāḷhā addhānaparissamena uppannavātarogā milātamālā viya hutvā rattibhāge kālamakāsi. Amaccā ‘‘sakkārā paribhaṭṭhamhā’’ti parideviṃsu. Rājā ca nāgarā ca ‘‘kulavaṃso vinaṭṭho’’ti parideviṃsu. Sakalanagaraṃ kolāhalaṃ ahosi. Kumārassa sutamatteyeva mahāsoko udapādi. Auch die Minister machten sich mit dem Mädchen auf den Weg, verliessen die Stadt und sandten dem Prinzen die Nachricht: 'Ein Mädchen, das dem goldenen Bildnis gleicht, ist gefunden worden.' Sobald der Prinz dies hörte, wurde er von leidenschaftlicher Begierde überwältigt und verlor die erste Vertiefung (Jhāna). Er sandte einen Boten nach dem anderen mit der Nachricht: 'Bringt sie schnell, bringt sie schnell!' Sie reisten, indem sie überall nur eine Nacht verbrachten, erreichten Bārāṇasī und sandten vor den Toren der Stadt eine Botschaft an den König: 'Sollen wir noch heute einziehen oder nicht?' Der König sprach: 'Das Mädchen stammt aus einer edlen Familie. Nach der Hochzeitsfeier wollen wir sie mit grossen Ehren einziehen lassen. Bringt sie vorerst in den königlichen Park.' Sie taten wie geheissen. Das überaus zarte Mädchen wurde jedoch durch das Rütteln des Wagens und die Erschöpfung der langen Reise von einer Windkrankheit befallen. Wie eine verwelkte Blumengirlande verstarb sie noch in derselben Nacht. Die Minister wehklagten: 'Wir sind um unseren Lohn gebracht worden!' Auch der König und die Bürger wehklagten: 'Das Herrschergeschlecht ist dem Untergang geweiht!' Die ganze Stadt geriet in Aufruhr. Sobald der Prinz davon hörte, ergriff ihn tiefer Schmerz. Tato kumāro sokassa mūlaṃ khanituṃ āraddho. So evaṃ cintesi – ‘‘ayaṃ soko nāma na ajātassa hoti, jātassa pana hoti. Tasmā jātiṃ paṭicca soko. Jāti pana kiṃ paṭiccāti? Bhavaṃ paṭicca jātī’’ti. Evaṃ pubbabhāvanānubhāvena yoniso manasikaronto anulomapaṭilomaṃ paṭiccasamuppādaṃ disvā puna anulomañca saṅkhāre sammasanto tattheva nisinno paccekasambodhiṃ sacchākāsi. Amaccā taṃ maggaphalasukhena sukhitaṃ santindriyaṃ santamānasaṃ nisinnaṃ disvā paṇipātaṃ katvā āhaṃsu – ‘‘mā soci, deva, mahanto jambudīpo, aññaṃ tato sundarataraṃ kaññaṃ ānessāmā’’ti. So āha – ‘‘na socāmi, nissoko paccekabuddho aha’’nti. Ito paraṃ sabbaṃ vuttapurimagāthāsadisameva ṭhapetvā gāthāvaṇṇanaṃ. Daraufhin begann der Prinz, die Wurzel des Schmerzes auszugraben. Er überlegte wie folgt: 'Dieser sogenannte Schmerz entsteht nicht für einen Ungeborenen, sondern nur für einen, der geboren ist. Daher gilt: In Abhängigkeit von der Geburt (jāti) entsteht Schmerz. Wovon aber hängt die Geburt ab? In Abhängigkeit vom Werden (bhava) entsteht Geburt.' Indem er auf diese Weise durch die Kraft seiner früheren Meditationspraxis gründliche Aufmerksamkeit (yoniso manasikāra) walten liess, erkannte er das Entstehen in Abhängigkeit (paṭiccasamuppāda) in direkter und umgekehrter Reihenfolge. Als er die gestalteten Dinge (saṅkhāra) nochmals in direkter Reihenfolge untersuchte, verwirklichte er genau dort sitzend die Einzelbuddhaschaft (paccekasambodhi). Als die Minister ihn sahen, wie er voller Glück im Frieden von Pfad und Frucht dasass, mit beruhigten Sinnen und friedvollem Geist, verbeugten sie sich tief und sprachen: 'Gräme Dich nicht, mein Herr, Jambudīpa ist gross. Wir werden ein anderes Mädchen bringen, das noch schöner ist als sie!' Er antwortete: 'Ich gräme mich nicht mehr. Ich bin frei von Schmerz, ein Paccekabuddha.' Alles Weitere gleicht dem zuvor Erklärten, abgesehen von der Worterklärung der Strophen. Gāthāvaṇṇanā pana evaṃ veditabbā – saṃsaggajātassāti jātasaṃsaggassa. Tattha dassanasavanakāyasamullapanasambhogasaṃsaggavasena pañcavidho saṃsaggo. Tattha aññamaññaṃ disvā cakkhuviññāṇavīthivasena uppannarāgo dassanasaṃsaggo nāma. Tattha sīhaḷadīpe kāḷadīghavāpī gāme piṇḍāya carantaṃ kalyāṇavihāravāsidīghabhāṇakadaharabhikkhuṃ disvā paṭibaddhacittā kenaci upāyena taṃ alabhitvā kālaṅkatā kuṭumbiyadhītā ca tassā nivāsanacoḷakhaṇḍaṃ disvā ‘‘evarūpaṃ vatthaṃ dhāriniyā nāma saddhiṃ saṃvāsaṃ nālabhi’’nti phalitahadayo kālaṅkato. So eva daharo ca nidassanaṃ. Die Erklärung der Strophe ist nun wie folgt zu verstehen: 'saṃsaggajātassa' bedeutet 'für einen, in dem Verbindung entstanden ist'. Darin gibt es fünf Arten von Verbindung: durch Sehen, Hören, körperlichen Kontakt, Gespräch und gemeinsamen Gebrauch. Darunter ist die Leidenschaft, die durch das gegenseitige Sehen im Prozess des Sehbewusstseins entsteht, als 'Verbindung durch Sehen' bekannt. Ein Beispiel hierfür ereignete sich auf der Insel Sīhaḷa: Im Dorf Kāḷadīghavāpī sah die Tochter eines Hausvaters einen jungen Mönch, der im Kalyāṇa-Vihāra lebte und den Dīgha-Nikāya rezitierte, als dieser auf Almosengang war. Ihr Geist wurde von Liebe zu ihm gefesselt, und da sie ihn durch kein Mittel gewinnen konnte, verstarb sie. Und auch jener junge Mönch sah ein Stück ihres Obergewandes und dachte: 'Ich habe keine Gemeinschaft mit derjenigen erlangt, die ein solches Gewand trägt', woraufhin sein Herz brach und er starb. Eben dieser junge Mönch ist das Beispiel. Parehi [Pg.174] pana kathiyamānaṃ rūpādisampattiṃ attanā vā hasitalapitagītasaddaṃ sutvā sotaviññāṇavīthivasena uppannarāgo savanasaṃsaggo nāma. Tatrāpi girigāmavāsikammāradhītāya pañcahi kumārikāhi saddhiṃ padumassaraṃ gantvā nhatvā mālaṃ āropetvā uccāsaddena gāyantiyā saddaṃ sutvā ākāsena gacchanto kāmarāgena visesā parihāyitvā byasanaṃ patto pañcaggaḷaleṇavāsī tissadaharo nidassanaṃ. Die Leidenschaft hingegen, die entsteht, wenn man andere über die Vollkommenheit der äußeren Gestalt und so weiter sprechen hört, oder wenn man selbst das Geräusch von Lachen, Plaudern oder Gesang hört und dies über den Prozess des Hörbewusstseins wahrnimmt, wird 'Verbindung durch Hören' genannt. Ein Beispiel hierfür ist der junge Mönch Tissa, der in der Pañcaggaḷa-Höhle lebte: Als die Tochter eines Schmieds aus dem Dorf Girigāma zusammen mit fünf Mädchen zum Lotussee ging, badete, Lotusblumen auflegte und mit lauter Stimme sang, hörte er im Fliegen durch die Luft ihre Stimme. Durch Sinnenlust verlor er seine besonderen geistigen Errungenschaften und geriet ins Verderben. Er ist das Beispiel. Aññamaññaṃ aṅgaparāmasanena uppannarāgo kāyasaṃsaggo nāma. Dhammabhāsanadaharabhikkhu ca rājadhītā cettha nidassanaṃ. Mahāvihāre kira daharabhikkhu dhammaṃ bhāsati. Tattha mahājano āgato, rājāpi aggamahesiyā rājadhītāya ca saddhiṃ agamāsi. Tato rājadhītāya tassa rūpañca sarañca āgamma balavarāgo uppanno, tassa daharassāpi. Taṃ disvā rājā sallakkhetvā sāṇipākārena parikkhipāpesi. Te aññamaññaṃ parāmasitvā āliṅgiṃsu. Puna sāṇipākāraṃ apanetvā passantā dvepi kālaṅkateyeva addasaṃsūti. Die Leidenschaft, die durch das gegenseitige Berühren der Glieder entsteht, wird 'körperliche Verbindung' genannt. Der das Dhamma predigende junge Mönch und die Königstochter sind hier das Beispiel. Es heißt, im Mahāvihāra predigte ein junger Mönch das Dhamma. Eine große Menschenmenge strömte herbei, und auch der König ging zusammen mit der Hauptkönigin und der Königstochter dorthin. Da entstand in der Königstochter aufgrund seiner Gestalt und seiner Stimme eine heftige Leidenschaft, und ebenso in dem jungen Mönch. Als der König dies bemerkte, ließ er sie mit einer Vorhangwand umgeben. Sie berührten und umarmten einander. Als man später die Vorhangwand wieder wegnahm und nachsah, erblickte man beide nur noch als Verstorbene. Aññamaññaṃ ālapanasamullapanavasena uppannarāgo pana samullapanasaṃsaggo nāma. Bhikkhu bhikkhunīhi saddhiṃ paribhogakaraṇe uppannarāgo sambhogasaṃsaggo nāma. Dvīsupi etesu pārājikappatto bhikkhu ca bhikkhunī ca nidassanaṃ. Maricavaṭṭināmamahāvihāramahe kira duṭṭhagāmaṇiabhayarājā mahādānaṃ paṭiyādetvā ubhatosaṅghaṃ parivisati. Tattha uṇhayāguyā dinnāya saṅghanavakasāmaṇerī anādhārakassa saṅghanavakassa sāmaṇerassa dantavalayaṃ datvā samullapanamakāsi. Te ubhopi upasampajjitvā saṭṭhivassā hutvā paratīraṃ gatā aññamaññaṃ samullapanena pubbasaññaṃ paṭilabhitvā tāvadeva sañjātasinehā sikkhāpadaṃ vītikkamitvā pārājikā ahesunti. Evaṃ pañcavidhe saṃsagge yena kenaci saṃsaggena jātasaṃsaggassa bhavati sneho, purimarāgapaccayo balavarāgo uppajjati. Tato snehanvayaṃ dukkhamidaṃ pahoti tameva snehaṃ anugacchantaṃ sandiṭṭhikasamparāyikaṃ sokaparidevādinānappakārakaṃ idaṃ dukkhaṃ pahoti pabhavati jāyati. Die Leidenschaft hingegen, die durch gegenseitiges Ansprechen und Plaudern entsteht, wird 'Verbindung durch Gespräch' genannt. Die Leidenschaft, die beim gemeinsamen Nutzen von Dingen eines Mönchs mit Nonnen entsteht, wird 'Verbindung durch gemeinsamen Gebrauch' genannt. In beiden Fällen sind ein Mönch und eine Nonne, die ein Pārājika-Vergehen begingen, das Beispiel. Es heißt, beim Einweihungsfest des großen Maricavaṭṭi-Vihāra richtete König Duṭṭhagāmaṇi Abhaya ein großes Almosengeben aus und bediente den Orden beiderlei Geschlechts. Als dort heiße Reissuppe dargeboten wurde, zeigte eine junge Novizin einem jungen Novizen namens Anādhāraka lächelnd ihre Zähne und sprach zu ihm. Später wurden beide voll ordiniert, erreichten ein Alter von sechzig Jahren im Orden und reisten an das jenseitige Ufer. Als sie dort miteinander sprachen, gewannen sie die frühere Erinnerung zurück, und im selben Augenblick entstand Zuneigung; sie übertraten die Trainingsregel und begingen ein Pārājika-Vergehen. Wenn auf diese Weise bei den fünf Arten von Verbindung durch irgendeine Art der Verbindung Zuneigung in einem entsteht, der sich verbindet, so erwächst aus der Bedingung der früheren Leidenschaft eine heftige Leidenschaft. Daraus entspringt dieses mit Zuneigung verbundene Leid. Folgt man eben dieser Zuneigung, entspringt, entsteht und gebiert sich dieses sichtbare und zukünftige Leid in seinen vielfältigen Formen wie Kummer, Wehklagen und so weiter. Apare ‘‘ārammaṇe cittassa vossaggo saṃsaggo’’ti bhaṇanti. Tato sneho, snehadukkhamidanti. Evamatthappabhedaṃ imaṃ aḍḍhagāthaṃ vatvā so paccekabuddho āha – ‘‘svāyaṃ yamidaṃ snehanvayaṃ sokādidukkhaṃ pahoti, tameva snehaṃ anugatassa dukkhassa mūlaṃ khananto paccekabodhiṃ adhigato’’ti. Andere Lehrer sagen: 'Das Überlassen des Geistes an ein Sinnenobjekt ist Verbindung.' Daraus entsteht Zuneigung, und daraus dieses Leid der Zuneigung. Nachdem jener Paccekabuddha diese halbe Strophe mit ihren Bedeutungsnuancen gesprochen hatte, sagte er: 'Eben dieses Leid wie Kummer und so weiter, das aus der Nachfolge der Zuneigung entspringt – während ich die Wurzel des Leides für einen, der eben dieser Zuneigung nachgeht, ausgrub, habe ich die Paccekabodhi erlangt.' Evaṃ [Pg.175] vutte te amaccā āhaṃsu – ‘‘amhehi dāni, bhante, kiṃ kattabba’’nti? Tato so āha – ‘‘tumhe vā aññataro vā imamhā dukkhā muccitukāmo, so sabbopi ādīnavaṃ snehajaṃ pekkhamāno, eko care khaggavisāṇakappo’’ti. Ettha ca yaṃ taṃ ‘‘snehanvayaṃ dukkhamidaṃ pahotī’’ti vuttaṃ, tadeva sandhāya ‘‘ādīnavaṃ snehajaṃ pekkhamāno’’ti idaṃ vuttanti veditabbaṃ. Atha vā yathāvuttena saṃsaggena ‘saṃsaggajātassa bhavati sneho, snehanvayaṃ dukkhamidaṃ pahoti’, evaṃ yathābhūtaṃ ādīnavaṃ snehajaṃ pekkhamāno ahamadhigatoti evaṃ sambandhitvā catutthapādo pubbe vuttanayeneva snehavasena vuttoti veditabbo. Tato paraṃ sabbaṃ purimagāthāya vuttasadisamevāti. Als dies gesagt wurde, fragten jene Minister: 'Ehrwürdiger Herr, was müssen wir nun tun?' Daraufhin sagte er: 'Ob ihr oder ein anderer – wer immer sich von diesem Leid befreien will, der soll, das aus Zuneigung entstehende Elend betrachtend, einsam wandern wie das Horn eines Nashorns.' Und hierbei ist zu verstehen, dass sich der Ausdruck 'das aus Zuneigung entstehende Elend betrachtend' eben auf das bezieht, was zuvor mit 'dieses mit Zuneigung verbundene Leid entsteht' gesagt wurde. Oder es ist wie folgt zu verstehen: 'Durch die besagte Verbindung entsteht Zuneigung in dem, der sich verbindet, und dieses mit Zuneigung verbundene Leid entsteht.' Indem ich dieses aus Zuneigung entstandene Elend der Wirklichkeit entsprechend betrachtete, habe ich die Erleuchtung erlangt. In dieser Verknüpfung ist der vierte Versfuß, wie bereits zuvor erklärt, als durch die Macht der Zuneigung gesprochen zu verstehen. Alles Weitere gleicht vollkommen der Erklärung der vorherigen Strophe. Saṃsaggagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Verbindung ist abgeschlossen. 93. Mitte suhajjeti kā uppatti? Ayaṃ paccekabodhisatto purimagāthāya vuttanayeneva uppajjitvā bārāṇasiyaṃ rajjaṃ kārento paṭhamajjhānaṃ nibbattetvā ‘‘kiṃ samaṇadhammo varo, rajjaṃ vara’’nti vīmaṃsitvā amaccānaṃ rajjaṃ niyyātetvā samaṇadhammaṃ akāsi. Amaccā ‘‘dhammena samena karothā’’ti vuttāpi lañjaṃ gahetvā adhammena karonti. Te lañjaṃ gahetvā sāmike parājayantā ekadā aññataraṃ rājavallabhaṃ parājesuṃ. So rañño bhattakārakehi saddhiṃ pavisitvā sabbaṃ ārocesi. Rājā dutiyadivase sayaṃ vinicchayaṭṭhānaṃ agamāsi. Tato mahājanā – ‘‘amaccā, deva, sāmike asāmike karontī’’ti uccāsaddaṃ karontā mahāyuddhaṃ viya akaṃsu. Atha rājā vinicchayaṭṭhānā vuṭṭhāya pāsādaṃ abhiruhitvā samāpattiṃ appetuṃ nisinno. Tena saddena vikkhittacitto na sakkoti appetuṃ. So ‘‘kiṃ me rajjena, samaṇadhammo vara’’nti rajjasukhaṃ pahāya puna samāpattiṃ nibbattetvā pubbe vuttanayeneva vipassitvā paccekasambodhiṃ sacchākāsi. Kammaṭṭhānañca pucchito imaṃ gāthaṃ abhāsi. 93. Was ist der Ursprung der Strophe, die mit 'Mitte suhajje' beginnt? Dieser künftige Paccekabuddha wurde auf genau dieselbe Weise geboren, wie es in der vorherigen Strophe beschrieben wurde. Während er die Herrschaft in Bārāṇasī ausübte, erlangte er die erste Vertiefung. Er überlegte: 'Ist das Leben eines Asketen besser oder die Königsherrschaft?', übergab die Herrschaft seinen Ministern und widmete sich der asketischen Praxis. Obwohl den Ministern gesagt worden war: 'Regiert mit Gerechtigkeit und Unparteilichkeit', nahmen sie Bestechungsgelder an und regierten ungerecht. Indem sie Bestechungsgelder annahmen, ließen sie die rechtmäßigen Eigentümer ihre Prozesse verlieren, und einmal brachten sie auch einen Günstling des Königs um sein Recht. Dieser trat zusammen mit den königlichen Speisemeistern beim König ein und berichtete alles. Am folgenden Tag begab sich der König selbst zur Gerichtsstätte. Da erhob die Volksmenge ein lautes Geschrei wie bei einer großen Schlacht und rief: 'O König, die Minister machen die rechtmäßigen Eigentümer zu Nichteigentümern!' Da erhob sich der König von der Gerichtsstätte, stieg zum Palast empor und setzte sich nieder, um in die meditative Errungenschaft einzutreten. Doch durch jenen Lärm war sein Geist abgelenkt, und er konnte nicht darin verweilen. Er dachte: 'Was nützt mir die Herrschaft? Das Leben eines Asketen ist besser!', entsagte dem königlichen Glück, erlangte die meditative Errungenschaft von Neuem, übte wie zuvor beschrieben die Einsichtsschau und verwirklichte die Paccekabodhi. Und als er nach seinem Meditationsobjekt gefragt wurde, sprach er diese Strophe. Tattha mettāyanavasena mittā. Suhadayabhāvena suhajjā. Keci ekantahitakāmatāya mittāva honti na suhajjā. Keci gamanāgamanaṭṭhānanisajjāsamullāpādīsu, hadayasukhajananena suhajjāva honti, na mittā. Keci tadubhayavasena suhajjā ceva mittā ca honti. Te duvidhā agāriyā [Pg.176] ca anagāriyā ca. Tattha agāriyā tividhā honti upakāro samānasukhadukkho anukampakoti. Anagāriyā visesena atthakkhāyino eva. Te catūhi aṅgehi samannāgatā honti. Yathāha – Hierbei bezeichnet man sie wegen ihrer Freundlichkeit als 'Freunde' (mittā). Wegen ihrer Gutherzigkeit nennt man sie 'Wohlwollende' (suhajjā). Einige sind allein wegen des ausschließlichen Wunsches nach dem Wohl des anderen bloß Freunde, nicht aber Wohlwollende. Andere wiederum sind beim Gehen, Kommen, Stehen, Sitzen, Plaudern usw., indem sie Freude im Herzen bewirken, zwar Wohlwollende, aber keine Freunde. Manche sind in beiderlei Hinsicht sowohl Wohlwollende als auch Freunde. Diese sind von zweierlei Art: Hausbewohner und Hauslose. Unter diesen sind die Hausbewohner von dreifacher Art: der Behilfliche, der in Freud und Leid Gleiche und der Mitfühlende. Die Hauslosen sind insbesondere jene, die den Nutzen weisen. Sie sind mit jeweils vier Faktoren ausgestattet. Wie gesagt wurde: ‘‘Catūhi kho, gahapatiputta, ṭhānehi upakāro mitto suhado veditabbo. Pamattaṃ rakkhati, pamattassa sāpateyyaṃ rakkhati, bhītassa saraṇaṃ hoti, uppannesu kiccakaraṇīyesu taddiguṇaṃ bhogaṃ anuppadeti’’ (dī. ni. 3.261). 'In viererlei Hinsicht, Hausvatersohn, ist der behilfliche Freund als ein Wohlwollender zu erkennen: Er beschützt den Unachtsamen, er beschützt den Besitz des Unachtsamen, er ist eine Zuflucht für den Verängstigten, und bei anstehenden Verpflichtungen stellt er das Doppelte der benötigten Mittel zur Verfügung.' Tathā – Ebenso: ‘‘Catūhi kho, gahapatiputta, ṭhānehi samānasukhadukkho mitto suhado veditabbo. Guyhamassa ācikkhati, guyhamassa parigūhati, āpadāsu na vijahati, jīvitaṃpissa atthāya pariccattaṃ hoti’’ (dī. ni. 3.262). 'In viererlei Hinsicht, Hausvatersohn, ist der in Freud und Leid gleiche Freund als ein Wohlwollender zu erkennen: Er vertraut ihm sein Geheimnis an, er bewahrt dessen Geheimnis, er verlässt ihn nicht in der Not, und selbst sein Leben gibt er für dessen Wohl hin.' Tathā – Ebenso: ‘‘Catūhi kho, gahapatiputta, ṭhānehi anukampako mitto suhado veditabbo. Abhavenassa na nandati, bhavenassa nandati, avaṇṇaṃ bhaṇamānaṃ nivāreti, vaṇṇaṃ bhaṇamānaṃ pasaṃsati’’ (dī. ni. 3.264). 'In viererlei Hinsicht, Hausvatersohn, ist der mitfühlende Freund als ein Wohlwollender zu erkennen: Er freut sich nicht über dessen Missgeschick, er freut sich über dessen Wohlergehen, er hält andere davon ab, schlecht über ihn zu sprechen, und er lobt denjenigen, der Gutes über ihn spricht.' Tathā – Ebenso: ‘‘Catūhi kho, gahapatiputta, ṭhānehi atthakkhāyī mittā suhado veditabbo. Pāpā nivāreti, kalyāṇe niveseti, assutaṃ sāveti, saggassa maggaṃ ācikkhatī’’ti (dī. ni. 3.263). 'In viererlei Hinsicht, Hausvatersohn, ist der den Nutzen weisende Freund als ein Wohlwollender zu erkennen: Er hält vom Bösen ab, er gründet im Guten, er lässt hören, was noch nicht gehört wurde, und er zeigt den Weg zum Himmel.' Tesvidha agāriyā adhippetā, atthato pana sabbepi yujjanti. Te mitte suhajje anukampamānoti anudayamāno, tesaṃ sukhaṃ upasaṃharitukāmo dukkhaṃ apaharitukāmo ca. Unter diesen sind hier die Hausbewohner gemeint, aber dem Sinne nach treffen sie alle zu. 'Mitfühlend mit diesen wohlwollenden Freunden' (mitte suhajje anukampamāno) bedeutet: mitfühlend, willens, ihnen Glück zu bringen und Leid von ihnen abzuwenden. Hāpeti atthanti diṭṭhadhammikasamparāyikaparamatthavasena tividhaṃ, tathā attatthaparatthaubhayatthavasenāpi tividhaṃ atthaṃ laddhavināsanena aladdhānuppādanenāti dvidhāpi hāpeti vināseti. Paṭibaddhacittoti ‘‘ahaṃ imaṃ vinā na jīvāmi, esa me gati, esa me parāyaṇa’’nti evaṃ attānaṃ nīce [Pg.177] ṭhāne ṭhapentopi paṭibaddhacitto hoti. ‘‘Ime maṃ vinā na jīvanti, ahaṃ tesaṃ gati, ahaṃ tesaṃ parāyaṇa’’nti evaṃ attānaṃ ucce ṭhāne ṭhapentopi paṭibaddhacitto hoti. Idha pana evaṃ paṭibaddhacitto adhippeto. Etaṃ bhayanti etaṃ atthahāpanabhayaṃ, attano samāpattihāniṃ sandhāyāha. Santhaveti tividho santhavo taṇhādiṭṭhimittasanthavavasena. Tattha aṭṭhasatapabhedāpi taṇhā taṇhāsanthavo, dvāsaṭṭhibhedāpi diṭṭhi diṭṭhisanthavo, paṭibaddhacittatāya mittānukampanā mittasanthavo. Tesu so idha adhippeto. Tena hissa samāpatti parihīnā. Tenāha – ‘‘etaṃ bhayaṃ santhave pekkhamāno ahaṃ adhigato’’ti. Sesaṃ vuttasadisamevāti. Die Wendung 'Er lässt das Wohl schmälern' (hāpeti atthaṃ) bezieht sich auf das dreifache Wohl in Form des sichtbaren Erdenlebens, des zukünftigen Lebens und des höchsten Wohls; ebenso ist das Wohl dreifach unterteilt in das eigene Wohl, das Wohl anderer und das Wohl beider. Auf zweierlei Weise, nämlich durch die Zerstörung des bereits Erlangten oder durch das Nichterzeugen des noch nicht Erlangten, schmälert oder vernichtet er es. 'Einer mit gebundenem Geist' (paṭibaddhacitto): Jemand, der sich selbst in eine niedrige Position bringt, indem er denkt: 'Ohne diesen kann ich nicht leben, er ist meine Zuflucht, er ist mein Hort', hat einen gebundenen Geist. Ebenso hat jemand, der sich selbst in eine hohe Position bringt, indem er denkt: 'Ohne mich können diese nicht leben, ich bin ihre Zuflucht, ich bin ihr Hort', einen gebundenen Geist. Hier ist jedoch ein solchermaßen gebundener Geist gemeint. 'Diese Gefahr' (etaṃ bhayaṃ) meint die Gefahr, das eigene Wohl zu schmälern, was im Hinblick auf den Verlust der eigenen Errungenschaften (samāpatti-hāni) gesagt wurde. 'Geselligkeit' (santhava): Es gibt eine dreifache Geselligkeit, nämlich die Verbindung durch Begehren (taṇhā), durch Ansichten (diṭṭhi) und durch Freunde. Darunter ist die Geselligkeit des Begehrens das in 108 Arten unterteilte Begehren; die Geselligkeit der Ansichten sind die in 62 Arten unterteilten Ansichten; und die Geselligkeit der Freunde ist das Mitgefühl mit Freunden aufgrund eines gebundenen Geistes. Unter diesen ist hier Letzteres gemeint. Denn dadurch gingen seine Errungenschaften verloren. Daher sagte er: 'Diese Gefahr in der Geselligkeit sehend, bin ich gelangt [zu...]'. Der Rest ist genau so wie bereits erklärt zu verstehen. Mittasuhajjagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über Freunde und Wohlwollende ist abgeschlossen. 94. Vaṃso visāloti kā uppatti? Pubbe kira kassapassa bhagavato sāsane tayo paccekabodhisattā pabbajitvā vīsati vassasahassāni gatapaccāgatavattaṃ pūretvā devaloke uppannā. Tato cavitvā tesaṃ jeṭṭhako bārāṇasirājakule nibbatto, itare dve paccantarājakulesu. Te ubhopi kammaṭṭhānaṃ uggahetvā rajjaṃ pahāya pabbajitvā anukkamena paccekabuddhā hutvā nandamūlakapabbhāre vasantā ekadivasaṃ samāpattito vuṭṭhāya ‘‘mayaṃ kiṃ kammaṃ katvā imaṃ lokuttarasukhaṃ anuppattā’’ti āvajjetvā paccavekkhamānā kassapabuddhakāle attano attano cariyaṃ addasaṃsu. Tato ‘‘tatiyo kuhi’’nti āvajjentā bārāṇasirajjaṃ kārentaṃ disvā tassa guṇe saritvā ‘‘so pakatiyāva appicchatādiguṇasamannāgato hoti, amhākaṃyeva ovādako vattā vacanakkhamo pāpagarahī, handa, naṃ ārammaṇaṃ dassetvā ārocemā’’ti okāsaṃ gavesantā taṃ ekadivasaṃ sabbālaṅkāravibhūsitaṃ uyyānaṃ gacchantaṃ disvā ākāsenāgantvā uyyānadvāre veḷugumbamūle aṭṭhaṃsu. Mahājano atitto rājadassanena rājānaṃ ulloketi. Tato rājā ‘‘atthi nu kho koci mama dassane byāpāraṃ na karotī’’ti olokento paccekabuddhe addakkhi. Saha dassaneneva cassa tesu sineho uppajji. So hatthikkhandhā oruyha santena ācārena upasaṅkamitvā ‘‘bhante, kiṃ nāma tumhe’’ti pucchi. Te ‘‘mayaṃ, mahārāja, asajjamānā nāmā’’ti āhaṃsu[Pg.178]. ‘‘Bhante, asajjamānāti etassa ko attho’’ti? ‘‘Alagganattho, mahārājā’’ti. Tato veḷugumbaṃ dassetvā āhaṃsu – ‘‘seyyathāpi, mahārāja, imaṃ veḷugumbaṃ sabbaso mūlakhandhasākhānusākhāhi saṃsibbitvā ṭhitaṃ asihattho puriso mūle chetvā āviñchanto na sakkuṇeyya uddharituṃ, evameva tvaṃ anto ca bahi ca jaṭāya jaṭito āsattavisatto tattha vilaggo. Seyyathāpi vā panassa vemajjhagatopi ayaṃ vaṃsakaḷīro asañjātasākhattā kenaci alaggova ṭhito, sakkā ca pana agge vā mūle vā chetvā uddharituṃ, evameva mayaṃ katthaci asajjamānā sabbā disā gacchāmā’’ti tāvadeva catutthajjhānaṃ samāpajjitvā passato eva rañño ākāsena nandamūlakapabbhāraṃ agamaṃsu. Tato rājā cintesi – ‘‘kadā nu kho ahampi evaṃ asajjamāno bhaveyya’’nti tattheva ṭhito vipassanto paccekabodhiṃ sacchākāsi. Purimanayeneva kammaṭṭhānaṃ pucchito imaṃ gāthaṃ abhāsi. 94. Was ist der Ursprung der Strophe 'Vaṃso visālo' ('Ein weit verzweigter Bambus')? Es heißt, dass einst in der Lehre des erhabenen Kassapa drei angehende Paccekabuddhas (Paccekabodhisattas) das Hausleben verließen, zwanzigtausend Jahre lang die Praxis des Gehens und Zurückkehrens (gatapaccāgata-vatta) erfüllten und daraufhin in der Götterwelt wiedergeboren wurden. Nach dem Verscheiden von dort wurde der älteste unter ihnen in der königlichen Familie von Bārāṇasī geboren, die anderen beiden in königlichen Familien der Grenzgebiete. Diese beiden lernten das Meditationsobjekt (kammaṭṭhāna), gaben das Königreich auf, ordinierten und wurden im Laufe der Zeit Paccekabuddhas. Als sie in der Nandamūla-Berghöhle lebten, erhoben sie sich eines Tages aus der Vertiefung (samāpatti) und dachten nach: 'Durch welche Tat haben wir dieses überweltliche Glück erlangt?' Als sie zurückblickten, sahen sie ihre jeweilige Lebensweise zur Zeit des Kassapa-Buddha. Daraufhin dachten sie nach: 'Wo ist der Dritte?' Sie sahen ihn das Königreich Bārāṇasī regieren, erinnerten sich an seine guten Qualitäten und dachten: 'Er besitzt von Natur aus Eigenschaften wie Genügsamkeit (appicchatā), er war unser Ratgeber, er spricht leicht verständlich, erträgt Ermahnungen und verabscheut das Böse. Wohlan, wir wollen ihm ein Objekt zeigen und es ihm mitteilen!' Auf der Suche nach einer Gelegenheit sahen sie ihn eines Tages, geschmückt mit allem königlichen Schmuck, in den Park gehen. Sie kamen durch die Luft herbei und stellten sich am Parktor an der Wurzel eines Bambusbüschels auf. Die Volksmenge blickte den König unersättlich an, um ihn zu sehen. Daraufhin blickte der König umher und dachte: 'Gibt es wohl jemanden, der sich nicht darum bemüht, mich zu sehen?' Da erblickte er die Paccekabuddhas. Sogleich beim Anblick entstand in ihm Zuneigung zu ihnen. Er stieg vom Rücken des Elefanten herab, näherte sich ihnen mit friedvollem Betragen und fragte: 'Ehrwürdige, wie ist euer Name?' Sie sagten: 'O großer König, wir heißen die Ungebundenen (asajjamāna).' 'Ehrwürdige, was ist die Bedeutung von die Ungebundenen?' 'Es bedeutet nicht anhaftend, o großer König.' Daraufhin wiesen sie auf den Bambusbüschel und sagten: 'Wie, o großer König, ein Mann mit einem Schwert in der Hand diesen Bambusbüschel, der gänzlich durch Wurzeln, Stämme, Äste und Zweige miteinander verflochten ist, an der Wurzel abschneiden und herausziehen wollte, dies aber nicht vermöchte, ebenso bist du innen und außen von einem Gewirr umgarnt, verstrickt, angehaftet und darin gefangen. Oder wie dieser junge Bambustrieb, selbst wenn er sich mitten darin befindet, weil er noch keine Zweige gebildet hat, an nichts haftet, und man ihn, wenn man ihn an der Spitze oder an der Wurzel abschneidet, leicht herausziehen kann; ebenso gehen wir, an nichts haftend, in alle Himmelsrichtungen.' Alsbald traten sie in die vierte meditative Vertiefung (jhāna) ein und schwebten vor den Augen des Königs durch die Luft zurück zur Nandamūla-Berghöhle. Daraufhin dachte der König: 'Wann werde wohl auch ich so ungebunden sein?' Genau dort stehend übte er Einsicht (vipassanā) und verwichtigte die Paccekabodhi. Als er auf dieselbe Weise wie zuvor nach seinem Meditationsobjekt gefragt wurde, sprach er diese Strophe. Tattha vaṃsoti veḷu. Visāloti vitthiṇṇo. Va-kāro avadhāraṇattho, eva-kāro vā ayaṃ, sandhivasena ettha e-kāro naṭṭhā. Tassa parapadena sambandho. Taṃ pacchā yojessāma. Yathāti paṭibhāge. Visattoti laggo jaṭito saṃsibbito. Puttesu dāresu cāti puttadhītubhariyāsu. Yā apekkhāti yā taṇhā yo sineho. Vaṃsakkaḷīrova asajjamānoti vaṃsakaḷīro viya alaggamāno. Kiṃ vuttaṃ hoti? Yathā vaṃso visālo visatto eva hoti, puttesu dāresu ca yā apekkhā, sāpi evaṃ tāni vatthūni, saṃsibbitvā ṭhitattā visattā eva. Svāhaṃ tāya apekkhāya apekkhavā visālo vaṃso viya visattoti evaṃ apekkhāya ādīnavaṃ disvā taṃ apekkhaṃ maggañāṇena chindanto ayaṃ vaṃsakaḷīrova rūpādīsu vā lābhādīsu vā kāmabhavādīsu vā diṭṭhādīsu vā taṇhāmānadiṭṭhivasena asajjamāno paccekabodhiṃ adhigatoti. Sesaṃ purimanayeneva veditabbaṃ. Darin bedeutet „vaṃso“ Bambus. „Visālo“ bedeutet weit verzweigt. Der Buchstabe „va“ hat die Bedeutung einer Einschränkung, oder dies ist das Wort „eva“; aufgrund von Sandhi ist hier der Buchstabe „e“ weggefallen. Seine Verbindung erfolgt mit dem folgenden Wort. Wir werden dies später anwenden. „Yathā“ drückt einen Vergleich aus. „Visatto“ bedeutet hängengeblieben, verstrickt, verflochten. „An Söhnen und Ehefrauen“ bedeutet an Söhnen, Töchtern und Ehefrauen. „Welche Sorge auch immer“ bedeutet welches Begehren, welche Zuneigung auch immer. „Wie ein junger Bambusspross nicht anhaftend“ bedeutet wie ein Bambusspross nicht hängengeblieben. Was ist damit gesagt? Wie ein großer Bambus verflochten ist, so ist auch die Zuneigung, die man zu Söhnen und Ehefrauen hat; weil sie an diesen Objekten haftet und darin verstrickt bleibt, ist sie wahrlich verflochten. „Ich, der ich durch diese Sorge voller Verlangen bin, bin verflochten wie ein großer Bambus“ – indem er so das Elend dieser Zuneigung sah, diese Zuneigung mit dem Pfad-Wissen abschnitt, wie ein junger Bambusspross nicht an Sinnesobjekten wie Formen usw., Gewinn usw., Daseinsbereichen der Sinnlichkeit usw. oder Ansichten usw. anhaftete und unberührt von Begehren, Dünkel und falschen Ansichten blieb, erlangte er die Einzelbuddhaschaft. Der Rest ist auf dieselbe Weise wie zuvor zu verstehen. Vaṃsakkaḷīragāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung des Verses über den jungen Bambusspross ist abgeschlossen. 95. Migo araññamhīti kā uppatti? Eko kira bhikkhu kassapassa bhagavato sāsane yogāvacaro kālaṃ katvā bārāṇasiyaṃ seṭṭhikule uppanno [Pg.179] aḍḍhe mahaddhane mahābhoge. So subhago ahosi, tato paradāriko hutvā kālaṅkato niraye nibbatto tattha paccitvā pakkāvasesena seṭṭhibhariyāya kucchimhi itthī hutvā paṭisandhiṃ gaṇhi. Nirayato āgatānaṃ sattānaṃ gattāni uṇhāni honti. Tena seṭṭhibhariyā ḍayhamānena udarena kicchena kasirena taṃ gabbhaṃ dhāretvā kālena dārikaṃ vijāyi. Sā jātadivasato pabhuti mātāpitūnaṃ sesabandhuparijanānañca dessā ahosi. Vayappattā ca yamhi kule dinnā, tatthāpi sāmikasassusasurānaṃ dessāva ahosi appiyā amanāpā. Atha nakkhatte ghosite seṭṭhiputto tāya saddhiṃ kīḷituṃ anicchanto vesiṃ ānetvā kīḷati. Sā taṃ dāsīnaṃ santikā sutvā seṭṭhiputtaṃ upasaṅkamitvā nānappakārehi anunayitvā ca āha – ‘‘ayyaputta, itthī nāma sacepi dasannaṃ rājūnaṃ kaniṭṭhā hoti, cakkavattino vā dhītā, tathāpi sāmikassa pesanakarā hoti. Sāmike anālapante sūle āropitā viya dukkhaṃ paṭisaṃvedeti. Sace ahaṃ anuggahārahā anuggahetabbā, no ce, vissajjetabbā. Attano ñātikulaṃ gamissāmī’’ti. Seṭṭhiputto – ‘‘hotu, bhadde, mā soci kīḷanasajjā hohi, nakkhattaṃ kīḷissāmā’’ti āha. Seṭṭhidhītā tāvattakena sallāpamattena ussāhajātā ‘‘sve nakkhattaṃ kīḷissāmī’’ti bahuṃ khajjabhojjaṃ paṭiyādeti. Seṭṭhiputto dutiyadivase anārocetvāva kīḷanaṭṭhānaṃ gato. Sā ‘‘idāni pesessati, idāni pesessatī’’ti maggaṃ olokentī nisinnā ussūraṃ disvā manusse pesesi. Te paccāgantvā ‘‘seṭṭhiputto gato’’ti ārocesuṃ. Sā taṃ sabbaṃ paṭiyāditaṃ ādāya yānaṃ abhiruhitvā uyyānaṃ gantuṃ āraddhā. 95. „Ein Wildtier im Wald“ – was ist der Anlass? Es heißt, ein Mönch, ein Yoga-Praktizierender in der Lehre des erhabenen Kassapa, verstarb und wurde in Bārāṇasī in einer reichen Kaufmannsfamilie geboren, die wohlhabend, von großem Vermögen und großem Besitz war. Er war sehr gutaussehend, beging jedoch Ehebruch, verstarb und wurde in der Hölle wiedergeboren. Nachdem er dort gequält worden war, nahm er aufgrund der verbleibenden Wirkung des Karmas im Schoß einer Kaufmannsgattin als Frau Wiedergeburt an. Die Körper von Wesen, die aus der Hölle kommen, sind heiß. Deshalb trug die Kaufmannsgattin diesen Fötus unter Qualen und Mühen wegen ihres brennenden Bauches und brachte nach einiger Zeit ein Mädchen zur Welt. Vom Tag ihrer Geburt an war sie ihren Eltern sowie den übrigen Verwandten und Bediensteten verhasst. Und als sie das heiratsfähige Alter erreicht hatte und einer Familie gegeben wurde, war sie auch dort ihrem Ehemann, ihrer Schwiegermutter und ihrem Schwiegervater verhasst, ungeliebt und unwillkommen. Als nun ein Fest ausgerufen wurde, wollte der Kaufmannssohn sich nicht mit ihr vergnügen, holte eine Kurtisane herbei und vergnügte sich mit dieser. Als sie dies von den Dienerinnen hörte, ging sie zum Kaufmannssohn, besänftigte ihn auf vielfältige Weise und sagte: „Edler Herr, selbst wenn eine Frau die jüngere Schwester von zehn Königen oder die Tochter eines Weltherrschers ist, ist sie dennoch die Dienerin ihres Ehemanns. Wenn der Ehemann nicht mit ihr spricht, leidet sie Schmerzen, als wäre sie auf einen Pfahl gespießt worden. Wenn ich der Gunst würdig bin, sollte mir Gunst erwiesen werden; wenn nicht, entlasse mich. Ich werde zur Familie meiner eigenen Verwandten zurückkehren.“ Der Kaufmannssohn sagte: „Es sei so, Werte. Gräme dich nicht. Bereite dich auf das Fest vor, wir werden das Fest feiern.“ Die Kaufmannstochter, ermutigt durch dieses bloße Gespräch, bereitete in der Vorfreude „Morgen werde ich das Fest feiern“ reichlich feste und weiche Speisen vor. Am zweiten Tag ging der Kaufmannssohn jedoch fort, ohne ihr Bescheid zu geben, an den Ort des Vergnügens. Sie saß da und hielt Ausschau nach dem Weg, im Gedanken: „Jetzt wird er nach mir schicken, jetzt wird er nach mir schicken.“ Als sie sah, dass es schon spät am Tag war, sandte sie Leute aus. Diese kehrten zurück und berichteten: „Der Kaufmannssohn ist weggegangen.“ Da nahm sie all die zubereiteten Speisen, bestieg einen Wagen und schickte sich an, in den Park zu fahren. Atha nandamūlakapabbhāre paccekasambuddho sattame divase nirodhā vuṭṭhāya nāgalatādantakaṭṭhaṃ khāditvā anotattadahe mukhaṃ dhovitvā ‘‘kattha ajja bhikkhaṃ carissāmā’’ti āvajjento taṃ seṭṭhidhītaraṃ disvā ‘‘mayi imissā saddhākāraṃ kāretvā taṃ kammaṃ parikkhayaṃ gamissatī’’ti ñatvā pabbhārasamīpe saṭṭhiyojanamanosilātale ṭhatvā pattacīvaramādāya abhiññāpādakaṃ jhānaṃ samāpajjitvā ākāsenāgantvā tassā paṭipathe oruyha bārāṇasiṃ abhimukho agamāsi. Taṃ disvāva dāsiyo seṭṭhidhītāya [Pg.180] ārocesuṃ. Sā yānā oruyha sakkaccaṃ vanditvā pattaṃ sabbarasasampannena khādanīyena bhojanīyena pūretvā padumapupphena paṭicchādetvā heṭṭhāpi padumapupphaṃ katvā pupphakalāpaṃ hatthena gahetvā paccekabuddhassa hatthe pattaṃ datvā vanditvā pupphakalāpahatthā patthanaṃ akāsi – ‘‘bhante, yathā idaṃ pupphaṃ, evāhaṃ yattha yattha upapajjāmi, tattha tattha mahājanassa piyā bhaveyyaṃ manāpā’’ti. Evaṃ patthetvā dutiyampi patthesi – ‘‘bhante, dukkho gabbhavāso, taṃ anupagamma padumapupphe eva paṭisandhi bhaveyyā’’ti. Tatiyampi patthesi – ‘‘bhante, jeguccho mātugāmo, cakkavattidhītāpi paravasaṃ gacchati. Tasmā ahaṃ itthibhāvaṃ anupagamma puriso bhaveyya’’nti. Catutthampi patthesi – ‘‘bhante, imaṃ saṃsāradukkhaṃ atikkamma pariyosāne tumhehi pattaṃ amataṃ pāpuṇeyya’’nti. Evaṃ caturo paṇidhī katvā taṃ padumapupphakalāpaṃ pūjetvā pañcapatiṭṭhitena vanditvā ‘‘pupphasadiso eva me gandho ceva vaṇṇo ca hotū’’ti imaṃ pañcamaṃ paṇidhiṃ akāsi. Da erhob sich in der Nandamūlaka-Bergschlucht ein Einzelbuddha am siebten Tag aus dem Zustand des Erlöschens, kaute ein Nagalatā-Zahnhölzchen, wusch sein Gesicht im Anotatta-See und dachte nach: „Wo soll ich heute auf Almosengang gehen?“ Dabei erblickte er jene Kaufmannstochter. Er erkannte: „Wenn ich bei ihr Vertrauen zu mir erwecke, wird jenes Karma versiegen.“ Er stellte sich auf die sechzig Meilen große Zinnober-Felsplatte nahe der Bergschlucht, nahm Almosenschale und Gewand, trat in die Absorption ein, die als Grundlage für die höheren Geisteskräfte dient, reiste durch die Luft, stieg ihr entgegen herab und ging in Richtung Bārāṇasī. Als die Dienerinnen ihn sahen, berichteten sie es der Kaufmannstochter. Sie stieg vom Wagen herab, erwies ihm respektvoll Ehrerbietung, füllte die Almosenschale mit köstlichen festen und weichen Speisen von bestem Geschmack, bedeckte sie oben mit einer Lotusblüte und legte auch darunter eine Lotusblüte. Sie nahm ein ganzes Blumenbündel in die Hand, übergab die Almosenschale in die Hände des Einzelbuddhas, verbeugte sich und legte, mit dem Blumenbündel in der Hand, folgenden Wunsch ab: „Ehrwürdiger Herr, so wie diese Blüte ist, so möge ich, wo auch immer ich wiedergeboren werde, den Menschen lieb und angenehm sein.“ Nachdem sie diesen Wunsch geäußert hatte, wünschte sie sich ein zweites Mal: „Ehrwürdiger Herr, schmerzhaft ist das Verweilen im Mutterschoß. Möge ich, ohne diesen betreten zu müssen, in einer Lotusblüte wiedergeboren werden.“ Ein drittes Mal wünschte sie sich: „Ehrwürdiger Herr, abscheulich ist das Dasein als Frau. Selbst die Tochter eines Weltherrschers gerät in die Abhängigkeit anderer. Möge ich daher, ohne Weiblichkeit anzunehmen, ein Mann werden.“ Ein viertes Mal wünschte sie sich: „Ehrwürdiger Herr, möge ich dieses Leiden des Samsara überwinden und am Ende das Todlose, das ihr erlangt habt, erreichen.“ Nachdem sie so diese vier Wünsche geäußert hatte, brachte sie das Lotusblumenbündel dar, verneigte sich mit der Fünf-Punkte-Ehrerbietung und äußerte diesen fünften Wunsch: „Möge mein Körperduft und auch meine Hautfarbe genau wie die dieser Blüte sein.“ Tato paccekabuddho pattañca pupphakalāpañca gahetvā ākāse ṭhatvā – Daraufhin nahm der Einzelbuddha die Almosenschale und das Blumenbündel, erhob sich in die Luft und sprach: ‘‘Icchitaṃ patthitaṃ tuyhaṃ, khippameva samijjhatu; Sabbe pūrentu saṅkappā, cando pannaraso yathā’’ti. – „Was du dir wünschst und ersehnst, möge dir schnell in Erfüllung gehen; mögen all deine Absichten sich erfüllen, so wie der Vollmond am fünfzehnten Tag.“ Imāya gāthāya seṭṭhidhītāya anumodanaṃ katvā ‘‘seṭṭhidhītā maṃ gacchantaṃ passatū’’ti adhiṭṭhahitvā ākāsena nandamūlakapabbhāraṃ agamāsi. Seṭṭhidhītāya taṃ passantiyā mahatī pīti uppajji. Bhavantare kataṃ akusalaṃ kammaṃ anokāsatāya parikkhīṇaṃ ciñcambiladhotatambalohabhājanamiva suddhā jātā. Tāvadevassā patikule ñātikule ca sabbo jano tuṭṭho. ‘‘Kiṃ karomā’’ti piyavacanāni ca paṇṇākārāni ca pesesi. Sāmikopi manusse pesesi – ‘‘seṭṭhidhītaraṃ sīghaṃ ānetha, ahaṃ vissaritvā uyyānaṃ āgato’’ti. Tato pabhuti ca naṃ ure vilittacandanaṃ viya āmuttamuttāhāraṃ viya pupphamālā viya ca piyāyanto parihari. Sā tattha yāvatāyukaṃ issariyabhogayuttasukhaṃ anubhavitvā kālaṃ katvā purisabhāvena devaloke padumapupphe uppajji. So devaputto gacchantopi padumapupphagabbhe eva gacchati, tiṭṭhantopi nisīdantopi sayantopi padumapupphagabbheyeva sayati. ‘‘Mahāpadumadevaputto’’ti ca naṃ vohariṃsu. Evaṃ [Pg.181] so tena iddhānubhāvena anulomapaṭilomaṃ cha devaloke eva saṃsarati. Nachdem der Paccekabuddha mit dieser Strophe den Segen für die Kaufmannstochter gesprochen hatte, fasste er den Entschluss: "Möge die Kaufmannstochter mich fortgehen sehen", und reiste durch die Luft zur Nandamūlaka-Bergschlucht. Als die Kaufmannstochter ihn beim Fortgehen sah, entstand in ihr große Freude. Wegen des Mangels an Gelegenheit erlosch das in einer früheren Existenz begangene unheilsame Karma gänzlich, sodass sie rein wurde wie ein mit saurem Tamarindensaft gereinigtes Gefäß aus rotem Kupfer. Sogleich waren alle Menschen in der Familie ihres Gatten und in der Familie ihrer eigenen Verwandten erfreut. Sie sandten ihr liebevolle Worte wie "Was können wir für dich tun?" sowie Geschenke. Auch ihr Ehemann sandte Leute aus und ließ sagen: "Bringt die Kaufmannstochter schnell her; ich bin in Vergesslichkeit allein in den Park gegangen." Von da an pflegte und schätzte er sie, als wäre sie auf die Brust aufgetragenes Sandelholz, eine angelegte Perlenkette oder ein Blumenkranz. Nachdem sie dort bis an ihr Lebensende das mit Macht und Genuss verbundene Glück erfahren hatte, starb sie und wurde als Mann in einer Lotusblüte in der Götterwelt wiedergeboren. Wenn dieser Göttersohn ging, ging er nur im Inneren einer Lotusblüte; selbst wenn er stand, saß oder lag, ruhte er stets nur im Inneren einer Lotusblüte. Und man nannte ihn "Göttersohn Mahāpaduma". Auf diese Weise wanderte er durch jene übernatürliche Kraft in direkter und umgekehrter Reihenfolge durch die sechs Götterwelten. Tena ca samayena bārāṇasirañño vīsati itthisahassāni honti. Tāsu ekāpi puttaṃ na labhati. Amaccā rājānaṃ viññāpesuṃ – ‘‘deva, kulavaṃsānupālako putto icchitabbo, atraje avijjamāne khettajopi kulavaṃsadharo hotī’’ti. Atha rājā ‘‘ṭhapetvā mahesiṃ avasesā itthiyo sattāhaṃ dhammanāṭakaṃ karothā’’ti yathākāmaṃ bahi carāpesi, tathāpi puttaṃ nālattha. Puna amaccā āhaṃsu – ‘‘mahārāja, mahesī nāma puññena ca paññāya ca sabbaitthīnaṃ aggā, appeva nāma devo mahesiyā kucchimhi puttaṃ labheyyā’’ti. Rājā mahesiyā etamatthaṃ ārocesi. Sā āha – ‘‘mahārāja, yā itthī sīlavatī saccavādinī, sā puttaṃ labheyya, hirottapparahitāya kuto putto’’ti pāsādaṃ abhiruhitvā pañca sīlāni samādiyitvā punappunaṃ āvajjesi, sīlavatiyā rājadhītāya pañca sīlāni āvajjentiyā puttapatthanācitte uppannamatte sakkassa āsanaṃ saṃkampi. Zu jener Zeit hatte der König von Bārāṇasī zwanzigtausend Frauen. Unter ihnen empfing keine einzige einen Sohn. Die Minister wandten sich an den König: "O Herr, ein Sohn, der die Familienlinie bewahrt, ist begehrenswert. Wenn kein leiblicher Sohn vorhanden ist, kann auch ein auf eigenem Boden geborener Sohn (khettaja) die Familienlinie fortführen." Daraufhin ließ der König alle übrigen Frauen, mit Ausnahme der Hauptkönigin, mit den Worten: "Veranstaltet sieben Tage lang ein Tugendspiel!", nach Belieben draußen umhergehen. Doch selbst so erlangte er keinen Sohn. Erneut sprachen die Minister: "Großer König, die Hauptkönigin ist wahrlich durch Verdienst und Weisheit die vorzüglichste aller Frauen. Möge der König doch im Schoß der Hauptkönigin einen Sohn erlangen!" Der König teilte dies der Hauptkönigin mit. Sie sprach: "Großer König, eine Frau, die tugendhaft und wahrheitsliebend ist, mag einen Sohn erlangen. Woher sollte eine Frau ohne Scheu und Scham vor dem Bösen einen Sohn bekommen?" Dann stieg sie auf den Palast hinauf, nahm die fünf Tugendregeln auf sich und betrachtete sie immer wieder. Als die tugendhafte Königstochter über die fielen Tugendregeln nachdachte und in ihr der bloße Gedanke des Wunsches nach einem Sohn aufkam, erzitterte der Thron Sakkas. Atha sakko āvajjento etamatthaṃ viditvā – ‘‘sīlavatiyā rājadhītāya puttavaraṃ demī’’ti ākāsenāgantvā deviyā sammukhe ṭhito ‘‘kiṃ varesi, devī’’ti? ‘‘Puttaṃ, mahārājā’’ti. ‘‘Dammi te, devi, puttaṃ, mā cintayī’’ti vatvā devalokaṃ gantvā ‘‘atthi nu kho ettha khīṇāyuko’’ti āvajjento ‘‘ayaṃ mahāpadumo uparidevalokaṃ gantukāmo ca bhavissatī’’ti ñatvā tassa vimānaṃ gantvā ‘‘tāta mahāpaduma, manussalokaṃ gacchāhī’’ti yāci. So ‘‘mā evaṃ, mahārāja, bhaṇa, jegucchito manussaloko’’ti. ‘‘Tāta, tvaṃ manussaloke puññaṃ katvā idhūpapanno, tattheva ṭhatvā pāramiyo pūretabbā, gaccha, tātā’’ti. ‘‘Dukkho, mahārāja, gabbhavāso, na sakkomi tattha vasitu’’nti. ‘‘Tāta, te gabbhavāso natthi, tathā hi tvaṃ kammamakāsi, yathā padumagabbheyeva nibbattissasi, gaccha, tātā’’ti punappunaṃ vuccamāno adhivāsesi. Da erwog Sakka den Grund dafür, erkannte diesen Sachverhalt und dachte: "Ich will der tugendhaften Königstochter einen edlen Sohn gewähren." Er kam durch die Luft herab, trat vor die Königin und fragte: "Was erbittest du dir als Gabe, Königin?" "Einen Sohn, o großer König", antwortete sie. "Ich gewähre dir einen Sohn, Königin, sorge dich nicht", sprach er, begab sich in die Götterwelt und hielt Umschau: "Gibt es hier wohl jemanden, dessen Lebenszeit abgelaufen ist?" Als er erkannte: "Dieser Mahāpaduma steht vor dem Verscheiden aus dieser Welt und möchte in eine höhere Götterwelt gelangen", ging er zu dessen Himmelspalast und bat ihn: "Lieber Mahāpaduma, geh in die Menschenwelt!" Er erwiderte: "Sprich nicht so, großer König! Abscheulich ist die Menschenwelt." Sakka sprach: "Lieber, du hast in der Menschenwelt heilsame Taten vollbracht und bist hier wiedergeboren worden. Genau dort musst du verweilen und die Vollkommenheiten (pāramīs) erfüllen. Geh, mein Lieber!" Er entgegnete: "Schmerzhaft, großer König, ist der Aufenthalt im Mutterschoß. Ich vermag dort nicht zu leben." "Lieber, für dich wird es kein Verweilen im Mutterschoß geben; denn du hast ein solches Karma gewirkt, dass du unmittelbar im Inneren einer Lotusblüte geboren wirst. Geh, mein Lieber!" Da er immer wieder so gedrängt wurde, willigte er schließlich ein. So devalokā cavitvā bārāṇasirañño uyyāne silāpaṭṭapokkharaṇiyaṃ padumagabbhe nibbatto. Tañca rattiṃ paccūsasamaye mahesī supinantena [Pg.182] vīsatiitthisahassaparivutā uyyānaṃ gantvā silāpaṭṭapokkharaṇiyaṃ padumagabbhe puttaṃ laddhā viya ahosi. Sā pabhātāya rattiyā sīlāni rakkhamānā tattha gantvā ekaṃ padumapupphaṃ addasa, taṃ neva tīre hoti na gambhīre. Saha dassaneneva cassā tattha puttasineho uppajji. Sā sayaṃ eva otaritvā taṃ pupphaṃ aggahesi, pupphe gahitamatteyeva pattāni vikasiṃsu. Tattha suvaṇṇapaṭimaṃ viya dārakaṃ addasa, disvāva ‘‘putto me laddho’’ti saddaṃ nicchāresi. Mahājano sādhukārasahassāni pavattesi. Rañño ca pesesi. Rājā sutvā ‘‘kattha laddho’’ti pucchitvā laddhokāsaṃ sutvā ‘‘uyyānañca pokkharaṇiyaṃ padumañca amhākaṃyeva, tasmā amhākaṃ khette jātattā khettajo nāmāyaṃ putto’’ti vatvā nagaraṃ pavesetvā vīsatisahassaitthiyo dhātikiccaṃ kāresi. Yā yā kumārassa ruciṃ ñatvā patthitaṃ patthitaṃ khādanīyaṃ khādāpeti, sā sā sahassaṃ labhati. Sakalabārāṇasī calitā, sabbo jano kumārassa paṇṇākārasahassāni pesesi. Kumāro taṃ taṃ atinetvā ‘‘imaṃ khāda, imaṃ bhuñjā’’ti vuccamāno bhojanena ubbāḷho ukkaṇṭhito hutvā gopuradvāraṃ gantvā lākhāguḷakena kīḷati. Nachdem er aus der Götterwelt geschieden war, wurde er im Park des Königs von Bārāṇasī im Inneren einer Lotusblüte in einem mit Steinplatten eingefassten Teich geboren. Und in jener Nacht, zur Stunde der Morgendämmerung, träumte die Hauptkönigin, dass sie, umgeben von zwanzigtausend Frauen, in den Park ging und im Inneren einer Lotusblüte in dem mit Steinplatten eingefassten Teich einen Sohn erlangte. Als die Nacht vergangen war, ging sie, während sie ihre Tugendregeln hütete, dorthin und erblickte eine Lotusblüte, die weder ganz am Ufer noch im tiefen Wasser stand. Sogleich bei deren Anblick erwachte in ihr mütterliche Liebe zu ihm. Sie stieg selbst hinab und ergriff die Blüte. Kaum hatte sie die Blüte ergriffen, entfalteten sich die Blütenblätter. Darin erblickte sie einen Knaben, der wie eine goldene Statue aussah. Sobald sie ihn sah, rief sie laut aus: „Ich habe einen Sohn erlangt!“ Die Volksmenge ließ tausendfache Sādhu-Rufe erschallen. Auch dem König sandte sie Nachricht. Als der König dies hörte, fragte er: „Wo wurde er gefunden?“ Und als er den Fundort erfuhr, sprach er: „Der Park, der Teich und der Lotus gehören allein uns. Weil er auf unserem eigenen Grund und Boden geboren wurde, soll dieser Sohn ‚auf eigenem Boden geboren‘ (khettaja) heißen.“ Er ließ ihn in die Stadt bringen und betraute die zwanzigtausend Frauen mit dem Ammendienst. Jede Frau, die die Wünsche des Knaben erriet und ihm genau die Speise gab, nach der es ihn verlangte, erhielt tausend Münzen. Ganz Bārāṇasī war in Aufregung, und alle Leute sandten dem Knaben tausendfache Geschenke. Als man dem Knaben all diese Geschenke brachte und man ihn beständig drängte: „Iss dies, verzehre jenes!“, fühlte er sich von der Fülle der Speisen bedrängt und gelangweilt, ging zum Torturm und spielte dort mit einer Kugel aus rotem Lack. Tadā aññataro paccekabuddho bārāṇasiṃ nissāya isipatane vasati. So kālasseva vuṭṭhāya senāsanavattasarīraparikammamanasikārādīni sabbakiccāni katvā paṭisallānā vuṭṭhito ‘‘ajja kattha bhikkhaṃ gahessāmī’’ti āvajjento kumārassa sampattiṃ disvā ‘‘esa pubbe kiṃ kammaṃ karī’’ti vīmaṃsanto ‘‘mādisassa piṇḍapātaṃ datvā catasso patthanā patthesi, tattha tisso siddhā, ekā tāva na sijjhati, tassa upāyena ārammaṇaṃ dassemī’’ti bhikkhācāravasena kumārassa santikaṃ agamāsi. Kumāro taṃ disvā ‘‘samaṇa, mā idha āgacchi, ime hi tampi ‘imaṃ khāda, imaṃ bhuñjā’ti vadeyyu’’nti āha. So ekavacaneneva tato nivattitvā attano senāsanaṃ agamāsi. Kumāro parijanaṃ āha – ‘‘ayaṃ samaṇo mayā vuttamattova nivatto, kuddho nu kho mamā’’ti. So tehi ‘‘pabbajitā nāma na kodhaparāyaṇā honti, parena pasannamanena yaṃ dinnaṃ, tena yāpentī’’ti vuccamānepi ‘‘duṭṭho evarūpo nāma [Pg.183] samaṇo, khamāpessāmi na’’nti mātāpitūnaṃ ārocetvā hatthiṃ abhiruhitvā mahatā rājānubhāvena isipatanaṃ gantvā migayūthaṃ disvā pucchi – ‘‘kinnāmete’’ti? ‘‘Ete, sāmi, migā nāmā’’ti. ‘‘Etesaṃ ‘imaṃ khādatha, imaṃ bhuñjatha, imaṃ sāyathā’ti vatvā paṭijaggantā atthī’’ti? ‘‘Natthi, sāmi, yattha tiṇodakaṃ sulabhaṃ tattha vasantī’’ti. Zu jener Zeit lebte ein gewisser Paccekabuddha nahe Bārāṇasī in Isipatana. Frühmorgens erhob er sich, verrichtete alle seine Pflichten wie die Pflege der Unterkunft, die Körperpflege, die Ausrichtung der Aufmerksamkeit und so weiter, erhob sich aus der Zurückgezogenheit und dachte nach: „Wo werde ich heute Almosen empfangen?“ Als er den Wohlstand des Prinzen sah und untersuchte: „Welches Kamma hat dieser in der Vergangenheit gewirkt?“, erkannte er: „Er gab einem wie mir eine Almosenspende und äußerte vier Wünsche; davon sind drei in Erfüllung gegangen, einer jedoch ist noch nicht erfüllt. Ich werde ihm durch ein Mittel ein Betrachtungsobjekt aufzeigen.“ So begab er sich auf seiner Almosensammlungsrunde in die Nähe des Prinzen. Als der Prinz ihn sah, sagte er: „Asket, komm nicht hierher! Denn diese Leute könnten auch zu dir sagen: ‚Iss dies, verzehre jenes!‘“ Nach nur diesem einen Wort kehrte er von dort um und ging zu seiner eigenen Unterkunft zurück. Der Prinz sagte zu seinem Gefolge: „Dieser Asket ist umgekehrt, sobald ich gesprochen habe. Ist er etwa zornig auf mich?“ Obwohl sie zu ihm sagten: „Die Heimatlosen pflegen nicht dem Zorn anzuhängen; womit auch immer sie von anderen mit gläubigem Geist beschenkt werden, damit fristen sie ihr Leben“, dachte er: „Ein solcher Asket ist gewiss verstimmt, ich werde ihn um Verzeihung bitten.“ Er teilte dies seinen Eltern mit, bestieg einen Elefanten und reiste mit großer königlicher Macht nach Isipatana. Er sah eine Herde Hirsche und fragte: „Wie heißen diese Tiere?“ Sie antworteten: „Herr, diese werden Hirsche genannt.“ Er fragte: „Gibt es jemanden, der sie pflegt und zu ihnen sagt: ‚Esst dies, verzehrt jenes, kostet dieses‘?“ Sie antworteten: „Nein, Herr, wo immer Gras und Wasser leicht zu finden sind, dort leben sie.“ Kumāro ‘‘yathā ime arakkhiyamānāva yattha icchanti, tattha vasanti, kadā nu kho ahampi evaṃ vaseyya’’nti etaṃ ārammaṇaṃ aggahesi. Paccekabuddhopi tassa āgamanaṃ ñatvā senāsanamaggañca caṅkamanañca sammajjitvā maṭṭhaṃ katvā ekadvattikkhattuṃ caṅkamitvā padanikkhepaṃ dassetvā divāvihārokāsañca paṇṇasālañca sammajjitvā maṭṭhaṃ katvā pavisanapadanikkhepaṃ dassetvā nikkhamanapadanikkhepaṃ adassetvā aññatra agamāsi. Kumāro tattha gantvā taṃ padesaṃ sammajjitvā maṭṭhakataṃ disvā ‘‘vasati maññe ettha so paccekabuddho’’ti parijanena bhāsitaṃ sutvā āha – ‘‘pātopi so samaṇo dussati, idāni hatthiassādīhi attano okāsaṃ akkantaṃ disvā suṭṭhutaraṃ dusseyya, idheva tumhe tiṭṭhathā’’ti hatthikkhandhā oruyha ekakova senāsanaṃ paviṭṭho vattasīsena susammaṭṭhokāse padanikkhepaṃ disvā ‘‘so dānāyaṃ samaṇo ettha caṅkamanto na vaṇijjādikammaṃ cintesi, addhāyaṃ attano hitameva cintesi maññe’’ti pasannamānaso caṅkamaṃ abhiruhitvā dūrīkataputhuvitakko gantvā pāsāṇaphalake nisīditvā sañjātaekaggo hutvā paṇṇasālaṃ pavisitvā vipassanto paccekabodhiñāṇaṃ adhigantvā purimanayeneva purohitena kammaṭṭhānaṃ pucchito gaganatale nisinno imaṃ gāthamabhāsi. Der Prinz ergriff dies als Betrachtungsobjekt: „So wie diese Tiere unbewacht leben, wo immer sie wollen, wann werde ich wohl auch so leben?“ Auch der Paccekabuddha, der sein Kommen wusste, fegte den Weg zur Unterkunft und den Wandelpfad, machte sie glatt, ging ein- oder zweimal auf und ab, hinterließ sichtbare Fußspuren, fegte den Ort für den Aufenthalt am Tag sowie die Blätterhütte, machte sie ebenmäßig, zeigte die Fußabdrücke beim Eintreten, ließ jedoch keine Fußabdrücke beim Verlassen zurück und begab sich an einen anderen Ort. Als der Prinz dort ankam, den gefegten und glatt gemachten Platz sah und die Worte seines Gefolges hörte: „Ich glaube, hier lebt jener Paccekabuddha“, sagte er: „Schon am Morgen könnte jener Asket verärgert gewesen sein; wenn er nun sieht, dass sein Platz von Elefanten, Pferden und anderen Tieren zertrampelt wurde, würde er sich noch viel mehr ärgern. Bleibt genau hier!“ Er stieg vom Nacken des Elefanten herab, betrat ganz allein die Unterkunft, sah die Fußspuren auf dem ordnungsgemäß gefegten Platz und dachte: „Dieser Asket, der hier auf und ab ging, dachte nicht an Handel oder andere Geschäfte; gewiss dachte er, so glaube ich, nur an sein eigenes Heil.“ Mit gläubigem Herzen betrat er den Wandelpfad, legte die vielfältigen weltlichen Gedanken ab, ging hin, setzte sich auf eine Steinplatte, erlangte Einspitzigkeit des Geistes, betrat die Blätterhütte, übte Einsichtsmeditation (vipassanā) und erlangte das Wissen eines Paccekabuddha (paccekabodhiñāṇa). Auf dieselbe Weise wie zuvor wurde er vom Hofpriester (purohita) nach seinem Meditationsobjekt gefragt, woraufhin er in der Luft sitzend diese Strophe sprach: Tattha migoti dve migā – eṇīmigo ca pasadamigo ca. Apica sabbesaṃ āraññikānaṃ catuppadānaṃ etaṃ adhivacanaṃ. Idha pana pasadamigo adhippetoti vadanti. Araññamhīti gāmañca gāmūpacārañca ṭhapetvā avasesaṃ araññaṃ, idha pana uyyānaṃ adhippetaṃ, tasmā ‘‘uyyānamhī’’ti vuttaṃ hoti. Yathāti paṭibhāge. Abaddhoti rajjubandhanādīhi abaddho, etena vissatthacariyaṃ dīpeti. Yenicchakaṃ gacchati vocarāyāti yena yena disābhāgena gantumicchati, tena tena disābhāgena gocarāya gacchati. Vuttampi cetaṃ bhagavatā – Darin bedeutet „migo“ (Hirsch/Wild) zweierlei: den schwarzen Antilopenhirsch (eṇīmigo) und den gefleckten Hirsch (pasadamigo). Zudem ist dies eine Bezeichnung für alle vierbeinigen Waldbewohner. Hier jedoch, so sagt man, ist der gefleckte Hirsch gemeint. „Araññamhi“ (im Wald) bedeutet: Ausgenommen das Dorf und die Umgebung des Dorfes ist der verbleibende Teil der Wald; hier jedoch ist der königliche Park gemeint, weshalb es im Sinne von „uyyānamhi“ (im Park) gesagt ist. „Yathā“ steht im Sinne von „entsprechend“ (im Vergleich). „Abaddho“ bedeutet ungebunden durch Seile oder ähnliche Fesseln; damit wird das freie, ungebundene Verhalten verdeutlicht. „Yenicchakaṃ gacchati gocarāya“ bedeutet: In welche Richtung auch immer er zu gehen wünscht, in jene Richtung geht er zur Nahrungssuche. Und dies wurde auch vom Erhabenen gesagt: ‘‘Seyyathāpi[Pg.184], bhikkhave, āraññako migo araññe pavane caramāno vissattho gacchati, vissattho tiṭṭhati, vissattho nisīdati, vissattho seyyaṃ kappeti. Taṃ kissa hetu? Anāpāthagato, bhikkhave, luddassa, evameva kho, bhikkhave, bhikkhu vivicceva kāmehi…pe… paṭhamaṃ jhānaṃ upasampajja viharati. Ayaṃ vuccati, bhikkhave, bhikkhu antamakāsi māraṃ apadaṃ, vadhitvā māracakkhuṃ adassanaṃ gato pāpimato’’ti (ma. ni. 1.287; cūḷani. khaggavisāṇasuttaniddesa 125) vitthāro. „Gleichwie, ihr Mönche, ein wilder Hirsch, der im tiefen Wald umherstreift, unbesorgt geht, unbesorgt steht, unbesorgt sitzt und sich unbesorgt niederlegt. Aus welchem Grund? Weil er, ihr Mönche, sich außerhalb der Reichweite des Jägers befindet. Ebenso nun, ihr Mönche, verweilt ein Mönch, abgeschieden von den Sinnengütern... [usw.]... nachdem er die erste Vertiefung (jhāna) erreicht hat. Ein solcher Mönch, ihr Mönche, wird als einer bezeichnet, der dem Māra ein Ende gesetzt hat, der Māras Spur vernichtet hat und, nachdem er das Auge des Bösen geblendet hat, für ihn unsichtbar geworden ist.“ Dies ist die ausführliche Erklärung. Seritanti sacchandavuttitaṃ aparāyattataṃ vā, idaṃ vuttaṃ hoti – yathā migo araññamhi abaddho yenicchakaṃ gacchati gocarāya, tathā kadā nu kho ahampi taṇhābandhanaṃ chinditvā evaṃ gaccheyyanti. Viññū paṇḍito naro seritaṃ pekkhamāno eko careti. „Seritaṃ“ bedeutet das Leben nach eigenem Willen oder die Unabhängigkeit von anderen. Damit ist Folgendes gesagt: Wie ein Hirsch im Wald ungebunden dorthin geht, wo er zur Nahrungssuche hinmöchte, ebenso: Wann werde ich wohl auch das Band des Begehrens (taṇhābandhana) durchschneiden und so umherwandern? Ein weiser, verständiger Mensch, der diese Unabhängigkeit vor Augen hat, sollte einsam wandern. Migoaraññagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erläuterung der Strophe „Migo araññe“ ist abgeschlossen. 96. Āmantanā hotīti kā uppatti? Bārāṇasirañño kira mahāupaṭṭhānasamaye amaccā upasaṅkamiṃsu. Tesu eko amacco ‘‘deva, sotabbaṃ atthī’’ti ekamantaṃ gamanaṃ yāci. So uṭṭhāyāsanā agamāsi. Puna eko mahāupaṭṭhāne nisinnaṃ yāci, eko hatthikkhandhe nisinnaṃ, eko assapiṭṭhiyaṃ nisinnaṃ, eko suvaṇṇarathe nisinnaṃ, eko sivikāya nisīditvā uyyānaṃ gacchantaṃ yāci. Rājā tato orohitvā agamāsi. Aparo janapadacārikaṃ gacchantaṃ yāci, tassapi vacanaṃ sutvā hatthikkhandhato oruyha ekamantaṃ agamāsi. Evaṃ so tehi nibbinno hutvā pabbaji. Amaccā issariyena vaḍḍhanti. Tesu eko gantvā rājānaṃ āha – ‘‘asukaṃ nāma, mahārāja, janapadaṃ mayhaṃ dehī’’ti. Rājā taṃ ‘‘itthannāmo bhuñjatī’’ti bhaṇati. So rañño vacanaṃ anādiyitvā ‘‘gacchāmahaṃ taṃ janapadaṃ gahetvā bhuñjāmī’’ti tattha gantvā kalahaṃ katvā puna ubhopi rañño santikaṃ āgantvā aññamaññassa dosaṃ ārocenti. Rājā ‘‘na sakkā ime tosetu’’nti tesaṃ lobhe ādīnavaṃ disvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchākāsi. So purimanayena imaṃ udānaṃ abhāsi. 96. Was ist der Ursprung von „Es gibt eine Aufforderung“ (āmantanā hoti)? Es heißt, dass sich dem König von Bārāṇasī zur Zeit einer großen Audienz die Minister näherten. Unter ihnen bat ein Minister: „O Herr, es gibt etwas Hörenswertes“, und bat darum, beiseite zu gehen. Er erhob sich von seinem Sitz und ging hin. Wiederum bat einer [ihn], als er in der großen Audienz saß; einer, als er auf dem Nacken eines Elefanten saß; einer, als er auf dem Rücken eines Pferdes saß; einer, als er im goldenen Streitwagen saß; einer bat [ihn], als er in einer Sänfte sitzend in den Park fuhr. Der König stieg von dort herab und ging hin. Ein anderer bat [ihn], als er auf Landreise ging; auch dessen Wort vernehmend stieg er vom Elefantenrücken herab und ging beiseite. Auf diese Weise wurde er ihrer überdrüssig und ging in die Hauslosigkeit. Die Minister wuchsen an Macht. Einer von ihnen ging hin und sagte zum König: „O Großkönig, gib mir den und den Bezirk.“ Der König sprach: „Der und der soll ihn genießen.“ Er [der Minister] missachtete das Wort des Königs, dachte: „Ich werde gehen, diesen Bezirk an mich reißen und ihn genießen“, ging dorthin, zettelte einen Streit an, und schließlich kamen beide wieder vor den König und beschuldigten sich gegenseitig ihrer Verfehlungen. Der König dachte: „Es ist unmöglich, diese zufriedenzustellen“, sah das Elend in ihrer Gier, entfaltete Einsicht und verwirklichte die Einzelbuddhaschaft. Er sprach auf die zuvor erwähnte Weise diesen feierlichen Ausspruch. Tassattho [Pg.185] – sahāyamajjhe ṭhitassa divāseyyasaṅkhāte vāse ca, mahāupaṭṭhānasaṅkhāte ṭhāne ca, uyyānagamanasaṅkhāte gamane ca, janapadacārikasaṅkhātāya cārikāya ca, ‘‘idaṃ me suṇa, idaṃ me dehī’’tiādinā nayena tathā tathā āmantanā hoti, tasmā ahaṃ tattha nibbijjitvā yāyaṃ ariyajanasevitā anekānisaṃsā ekantasukhā, evaṃ santepi lobhābhibhūtehi sabbakāpurisehi anabhipatthitā pabbajjā, taṃ anabhijjhitaṃ paresaṃ avasavattanena bhabbapuggalavasena seritañca pekkhamāno vipassanaṃ ārabhitvā anukkamena paccekabodhiṃ adhigatosmi. Sesaṃ vuttanayamevāti. Dessen Bedeutung ist: Für einen, der inmitten von Gefährten steht, gibt es auf diese und jene Weise eine Aufforderung wie „Höre dies von mir, gib mir dies“ und so weiter – sei es im Aufenthalt, der als Mittagsschlaf bezeichnet wird, sei es an dem Ort, der als große Audienz bezeichnet wird, sei es beim Gehen, das als Fahrt in den Park bezeichnet wird, oder auf der Reise, die als Landreise bezeichnet wird. Darum wurde ich dort angewidert; und das Hauslosenleben betrachtend, welches von edlen Menschen gepflegt wird, vielfältigen Segen bringt und lauter Glück ist, das aber, obwohl dem so ist, von all den gemeinen, von Gier überwältigten Menschen nicht ersehnt wird, und welches – weil es unbegehrt ist, nicht unter der Herrschaft anderer steht und der Natur von fähigen Personen entspricht – die Einsamkeit verkörpert, habe ich Einsicht entfaltet und der Reihe nach die Einzelbuddhaschaft erlangt. Der Rest ist genau wie bereits erklärt. Āmantanāgāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Aufforderung ist abgeschlossen. 97. Khiḍḍāratīti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira ekaputtakabrahmadatto nāma rājā ahosi. So tassa ekaputtako piyo ahosi manāpo pāṇasamo, rājā sabbairiyāpathesu puttakaṃ gahetvāva vattati. So ekadivasaṃ uyyānaṃ gacchanto taṃ ṭhapetvā gato. Kumāropi taṃ divasaṃyeva uppannena byādhinā mato. Amaccā ‘‘puttasinehena rañño hadayampi phaleyyā’’ti anārocetvāva naṃ jhāpesuṃ. Rājā uyyāne surāmadena matto puttaṃ neva sarati, tathā dutiyadivasepi nhānabhojanavelāsu. Atha bhuttāvī nisinno saritvā ‘‘puttaṃ me ānethā’’ti āha. Tassa anurūpena vidhānena taṃ pavattiṃ ārocesuṃ. Tato sokābhibhūto nisinno evaṃ yoniso manasākāsi – ‘‘imasmiṃ sati idaṃ hoti, imassuppādā idaṃ uppajjatī’’ti. Evaṃ anukkamena anulomapaṭilomaṃ paṭiccasamuppādaṃ sammasanto paccekasambodhiṃ sacchākāsi. Sesaṃ saṃsaggagāthāvaṇṇanāyaṃ vuttasadisameva ṭhapetvā gāthāyatthavaṇṇanaṃ. 97. Was ist der Ursprung von „Spiel und Lust“ (khiḍḍārati)? Es heißt, dass es in Bārāṇasī einen König namens Brahmadatta gab, der einen einzigen Sohn hatte. Dieser einzige Sohn war ihm lieb, gefällig und teuer wie das eigene Leben; der König verbrachte seine Zeit damit, den kleinen Sohn bei allen Körperhaltungen bei sich zu haben. Als er eines Tages in den Park fuhr, ließ er ihn zurück und ging fort. Der Prinz aber starb noch am selben Tag an einer plötzlich aufgetretenen Krankheit. Die Minister dachten: „Aus Liebe zu seinem Sohn könnte das Herz des Königs zerreißen“, und bestatteten ihn durch Verbrennung, ohne es dem König zu melden. Der König, im Park vom Rausch des Alkohols berauscht, dachte gar nicht an seinen Sohn, ebenso wenig am zweiten Tag zur Zeit des Badens und Speisens. Schließlich erinnerte er sich nach dem Essen im Sitzen daran und sagte: „Bringt mir meinen Sohn!“ Da berichteten sie ihm den Vorfall in angemessener Weise. Davon vom Kummer überwältigt, saß er da und richtete seine Aufmerksamkeit in weiser Weise so aus: „Wenn dies ist, ist das; durch das Entstehen dieses entsteht jenes.“ Indem er so der Reihe nach das Bedingte Entstehen in direkter und umgekehrter Reihenfolge untersuchte, verwirklichte er die Einzelbuddhaschaft. Der Rest – abgesehen von der Worterklärung der Strophe – ist genau wie in der Erklärung der Strophe über die Geselligkeit beschrieben. Atthavaṇṇanā pana – khiḍḍāti kīḷanā. Sā duvidhā hoti kāyikā ca vācasikā ca. Tattha kāyikā nāma hatthīhipi kīḷanti, assehipi rathehipi dhanūhipi tharūhipīti evamādi. Vācasikā nāma gītaṃ silokabhaṇanaṃ mukhabheriālambarabherīti evamādi. Ratīti pañcakāmaguṇarati. Vipulanti yāva aṭṭhimiñjaṃ ahacca ṭhānena sakalattabhāvabyāpakaṃ. Sesaṃ pākaṭameva[Pg.186]. Anusandhiyojanāpi cettha saṃsaggagāthāya vuttanayeneva veditabbā, tato parañca sabbaṃ. Die Worterklärung ist wie folgt: „khiḍḍā“ bedeutet Spielen. Dieses ist zweifach: körperlich und sprachlich. Das körperliche [Spielen] besteht darin, dass sie mit Elefanten spielen, mit Pferden, mit Wagen, mit Bogen, mit Schwertgriffen und so weiter. Das sprachliche besteht aus Gesang, dem Rezitieren von Versen, Mundtrommeln, Ālambara-Trommeln und so weiter. „rati“ ist die Lust an den pfirsichfarbenen fünf Strängen der Sinnlichkeit. „vipula“ (reichlich/groß) bedeutet den gesamten Körper durchdringend, indem es bis ins Knochenmark vordringt. Der Rest ist offensichtlich. Auch die Verbindung der Abschnitte ist hier auf diese Weise zu verstehen, wie sie bei der Strophe über die Geselligkeit dargelegt wurde, und ebenso alles Folgende. Khiḍḍāratigāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über Spiel und Lust ist abgeschlossen. 98. Cātuddisoti kā uppatti? Pubbe kira kassapassa bhagavato sāsane pañca paccekabodhisattā pabbajitvā vīsati vassasahassāni gatapaccāgatavattaṃ pūretvā devaloke nibbattā. Tato cavitvā tesaṃ jeṭṭhako bārāṇasirājā ahosi, sesā pākatikarājāno. Te cattāropi kammaṭṭhānaṃ uggaṇhitvā rajjaṃ pahāya pabbajitvā anukkamena paccekabuddhā hutvā nandamūlakapabbhāre vasantā ekadivasaṃ samāpattito vuṭṭhāya vaṃsakkaḷīragāthāyaṃ vuttanayeneva attano kammañca sahāyañca āvajjetvā ñatvā bārāṇasirañño upāyena ārammaṇaṃ dassetuṃ okāsaṃ gavesanti. So ca rājā tikkhattuṃ rattiyā ubbijjati, bhīto vissaraṃ karoti, mahātale dhāvati. Purohitena kālasseva vuṭṭhāya sukhaseyyaṃ pucchitopi ‘‘kuto me, ācariya, sukha’’nti sabbaṃ taṃ pavattiṃ ārocesi. Purohitopi ‘‘ayaṃ rogo na sakkā yena kenaci uddhaṃ virecanādinā bhesajjakammena vinetuṃ, mayhaṃ pana khādanūpāyo uppanno’’ti cintetvā ‘‘rajjahānijīvitantarāyādīnaṃ pubbanimittaṃ etaṃ, mahārājā’’ti rājānaṃ suṭṭhutaraṃ ubbejetvā ‘‘tassa vūpasamanatthaṃ ettake ca ettake ca hatthiassarathādayo hiraññasuvaṇṇañca dakkhiṇaṃ datvā yañño yajitabbo’’ti yaññayajane samādapesi. 98. Was ist der Ursprung von „In den vier Himmelsrichtungen zu Hause“ (cātuddiso)? Es heißt, dass einst unter der Lehre des erhabenen Kassapa fielen fünf zukünftige Einzelbuddhas in die Hauslosigkeit gingen, zwanzigtausend Jahre lang die Pflicht des Gehens und Zurückkehrens erfüllten und in der Götterwelt wiedergeboren wurden. Als sie von dort verschieden, wurde der Älteste von ihnen König von Bārāṇasī, die übrigen wurden gewöhnliche Könige. Auch diese vier erlernten das Meditationsobjekt, gaben die Königsherrschaft auf, gingen in die Hauslosigkeit, wurden der Reihe nach Einzelbuddhas und lebten in der Nandamūlaka-Steingrotte. Eines Tages erhoben sie sich aus ihrer Vertiefung, besannen sich auf die in der Strophe über den Bambussprössling beschriebene Weise auf ihr eigenes Karma und ihren Gefährten, erkannten die Situation und suchten nach einer Gelegenheit, um dem König von Bārāṇasī durch ein geeignetes Mittel ein Objekt [zur Erweckung spiritueller Dringlichkeit] zu zeigen. Und jener König erschrak dreimal in der Nacht, schrie angstvoll auf und lief auf dem Flachdach des Palastes umher. Als er am frühen Morgen vom Hauspriester nach seinem wohltuenden Schlaf gefragt wurde, erwiderte er: „Woher sollte mir, o Lehrer, Wohlbefinden kommen?“ und berichtete ihm das gesamte Geschehen. Der Hofpriester dachte: „Diese Krankheit kann nicht durch irgendeine medizinische Behandlung wie Abführen oder Ähnliches behoben werden, aber mir bietet sich hier eine Gelegenheit zum Gewinn.“ Er dachte so und sprach: „O Großkönig, dies ist ein Vorzeichen für den Verlust des Reiches, Lebensgefahr oder Ähnliches“, erschreckte den König dadurch noch viel mehr und spornte ihn zur Darbringung eines Opfers an, indem er sagte: „Um dies zu besänftigen, müssen so und so viele Elefanten, Pferde, Streitwagen und so weiter sowie Gold und Silber als Gabe dargebracht und ein Opfer gefeiert werden.“ Tato paccekabuddhā anekāni pāṇasahassāni yaññatthāya sampiṇḍiyamānāni disvā ‘‘etasmiṃ kamme kate dubbodhaneyyo bhavissati, handa naṃ paṭikacceva gantvā pekkhāmā’’ti vaṃsakkaḷīragāthāyaṃ vuttanayena āgantvā piṇḍāya caramānā rājaṅgaṇe paṭipāṭiyā agamaṃsu. Rājā sīhapañjare ṭhito rājaṅgaṇaṃ olokayamāno te addakkhi, saha dassaneneva cassa sineho uppajji. Tato te pakkosāpetvā ākāsatale paññattāsane nisīdāpetvā sakkaccaṃ bhojetvā katabhattakicce ‘‘ke tumhe’’ti pucchi. ‘‘Mayaṃ, mahārāja, cātuddisā nāmā’’ti. ‘‘Bhante, cātuddisāti imassa ko attho’’ti? ‘‘Catūsu disāsu katthaci [Pg.187] kutoci bhayaṃ vā cittutrāso vā amhākaṃ natthi, mahārājā’’ti. ‘‘Bhante, tumhākaṃ taṃ bhayaṃ kiṃ kāraṇā na hotī’’ti? ‘‘Mayaṃ, mahārāja, mettaṃ bhāvema, karuṇaṃ bhāvema, muditaṃ bhāvema, upekkhaṃ bhāvema. Tena no taṃ bhayaṃ na hotī’’ti vatvā uṭṭhāyāsanā attano vasanaṭṭhānaṃ agamaṃsu. Daraufhin sahen die Paccekabuddhas viele tausend Lebewesen, die für das Opfer zusammengetrieben wurden, und dachten: "Wenn diese Tat vollzogen ist, wird er nur schwer zu belehren sein. Wohlan, lasst uns rechtzeitig zu ihm gehen und ihn davon abhalten", kamen gemäß der in der Vaṃsakkaḷīra-Strophe dargelegten Weise herbei und gingen, um Almosen bittend, nacheinander auf den königlichen Hof. Der König, der am Löwenfenster stand und auf den Hof blickte, sah sie, und sogleich bei ihrem Anblick entstand in ihm Zuneigung. Daraufhin ließ er sie herbeirufen, setzte sie auf vorbereitete Sitze auf der Terrasse unter freiem Himmel, bewirtete sie ehrerbietig, und als das Mahl beendet war, fragte er: "Wer seid ihr?" – "Großer König, wir werden 'die in den vier Himmelsrichtungen Verweilenden' (Cātuddisā) genannt." – "Ehrwürdige Herren, was ist die Bedeutung von 'Cātuddisā'?" – "Großer König, in den vier Himmelsrichtungen gibt es für uns nirgends und vor nichts Furcht oder Bestürzung des Geistes." – "Ehrwürdige Herren, aus welchem Grund habt ihr diese Furcht nicht?" – "Großer König, wir entfalten liebende Güte (mettā), wir entfalten Mitgefühl (karuṇā), wir entfalten Mitfreude (muditā), wir entfalten Gleichmut (upekkhā). Dadurch entsteht für uns diese Furcht nicht." Nachdem sie dies gesagt hatten, erhoben sie sich von ihren Sitzen und begaben sich an ihren eigenen Aufenthaltsort. Tato rājā cintesi – ‘‘ime samaṇā ‘mettādibhāvanāya bhayaṃ na hotī’ti bhaṇanti, brāhmaṇā pana anekasahassapāṇavadhaṃ vaṇṇayanti, kesaṃ nu kho vacanaṃ sacca’’nti? Athassa etadahosi – ‘‘samaṇā suddhena asuddhaṃ dhovanti, brāhmaṇā pana asuddhena asuddhaṃ. Na sakkā kho pana asuddhena asuddhaṃ dhovituṃ, pabbajitānaṃ eva vacanaṃ sacca’’nti. So ‘‘sabbe sattā sukhitā hontū’’tiādinā nayena mettādayo cattāropi brahmavihāre bhāvetvā hitapharaṇena cittena amacce āṇāpesi – ‘‘sabbe pāṇe muñcatha, sītāni pānīyāni pivantu, haritāni tiṇāni khādantu, sīto ca vāto tesaṃ upavāyatū’’ti. Te tathā akaṃsu. Daraufhin dachte der König: "Diese Asketen sagen: 'Durch die Entfaltung von liebender Güte usw. entsteht keine Furcht', die Brahmanen jedoch preisen das Töten vieler tausend Lebewesen. Wessen Wort ist wohl wahr?" Da kam ihm dieser Gedanke: "Die Asketen waschen Unreines mit Reinem ab, die Brahmanen aber Unreines mit Unreinem. Es ist jedoch unmöglich, Unreines mit Unreinem abzuwaschen; nur das Wort der Heimatlosen ist wahr." Er entfaltete daraufhin alle vier göttlichen Verweilungszustände (brahmavihāras) – liebende Güte usw. – in der Weise beginnend mit: "Mögen alle Wesen glücklich sein", und mit einem von Wohlwollen erfüllten Geist befahl er den Ministern: "Lasst alle Lebewesen frei! Mögen sie kühles Wasser trinken, grünes Gras fressen und möge ihnen ein kühler Wind wehen!" Sie taten wie geheißen. Tato rājā ‘‘kalyāṇamittānaṃ vacanena pāpakammato muttomhī’’ti tattheva nisinno vipassitvā paccekabodhiṃ sacchākāsi. Amaccehi ca bhojanavelāyaṃ ‘‘bhuñja, mahārāja, kālo’’ti vutte ‘‘nāhaṃ rājā’’ti purimanayeneva sabbaṃ vatvā imaṃ udānabyākaraṇagāthaṃ abhāsi. Daraufhin dachte der König: "Durch die Worte edler Freunde bin ich von heillosem Kamma befreit", und während er genau dort saß, übte er Einsicht (vipassanā) und verwirklichte die Paccekabodhi (Einzelerleuchtung). Und als die Minister zur Essenszeit sagten: "Iss, großer König, es ist Zeit!", sprach er: "Ich bin nicht der König", wobei er alles in derselben Weise wie zuvor darlegte, und sprach diese feierliche Ausspruchs- und Offenbarungsstrophe (udāna-byākaraṇa-gāthā). Tattha cātuddisoti catūsu disāsu yathāsukhavihārī, ‘‘ekaṃ disaṃ pharitvā viharatī’’tiādinā vā nayena brahmavihārabhāvanāya pharitā catasso disā assa santīti cātuddiso. Tāsu catūsu disāsu katthaci satte vā saṅkhāre vā bhayena na paṭihanatīti appaṭigho. Santussamānoti dvādasavidhassa santosassa vasena santussako ca. Itarītarenāti uccāvacena paccayena. Parissayānaṃ sahitā achambhīti ettha parissayanti kāyacittāni, parihāpenti vā tesaṃ sampattiṃ, tāni vā paṭicca sayantīti parissayā, bāhirānaṃ sīhabyagghādīnaṃ abbhantarānañca kāmacchandādīnaṃ kāyacittupaddavānaṃ etaṃ adhivacanaṃ. Te parissaye adhivāsanakhantiyā ca vīriyādīhi dhammehi ca sahatīti parissayānaṃ sahitā. Thaddhabhāvakarabhayābhāvena achambhī. Kiṃ vuttaṃ hoti? Yathā te cattāro samaṇā, evaṃ itarītarena paccayena santussamāno ettha paṭipattipadaṭṭhāne santose ṭhito catūsu disāsu mettādibhāvanāya cātuddiso, sattasaṅkhāresu [Pg.188] paṭihananabhayābhāvena appaṭigho ca hoti. So cātuddisattā vuttappakārānaṃ parissayānaṃ sahitā, appaṭighattā achambhī ca hotīti evaṃ paṭipattiguṇaṃ disvā yoniso paṭipajjitvā paccekabodhiṃ adhigatomhīti. Atha vā te samaṇā viya santussamāno itarītarena vuttanayena cātuddiso hotīti ñatvā evaṃ cātuddisabhāvaṃ patthayanto yoniso paṭipajjitvā adhigatomhi. Tasmā aññopi īdisaṃ ṭhānaṃ patthayanto cātuddisatāya parissayānaṃ sahitā appaṭighatāya ca achambhī hutvā eko care khaggavisāṇakappoti. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bedeutet "cātuddiso" (der zu den vier Himmelsrichtungen Gehörende): einer, der in den vier Himmelsrichtungen nach Wunsch verweilt; oder, in der Weise wie "er verweilt, indem er eine Himmelsrichtung durchdringt...", hat er durch die Entfaltung der göttlichen Verweilungszustände die vier Himmelsrichtungen durchdrungen, daher ist er "cātuddiso". Dass er in diesen vier Himmelsrichtungen nirgends mit Wesen oder Gestaltungen (saṅkhāra) aus Furcht aneinandergerät (nicht kollidiert), macht ihn "appaṭigho" (unwiderstrebend/unbeschwert). "Santussamāno" (zufrieden seiend) bedeutet: zufrieden kraft der zwölffachen Genügsamkeit. "Itarītarena" (mit dem jeweils Vorhandenen) meint: mit hohen oder niedrigen (groben oder feinen) Lebensbedürfnissen. Bezüglich "parissayānaṃ sahitā achambhī" (der Gefahren Bezwinger, unerschrocken): Hier nennt man sie "parissayā" (Gefahren/Bedrängnisse), weil sie Körper und Geist quälen (parissayanti) oder deren Gedeihen mindern, oder weil sie sich an sie anlehnen (paṭicca sayanti); dies ist eine Bezeichnung für äußere körperliche und geistige Heimsuchungen wie Löwen, Tiger usw. sowie für innere wie Sinnenlust (kāmacchanda) usw. Weil er diese Gefahren durch duldende Geduld (adhivāsanakhanti) und Eigenschaften wie Tatkraft (vīriya) usw. erträgt (sahati), ist er "parissayānaṃ sahitā" (der Gefahren Bezwinger). "Achambhī" (unerschrocken) meint: frei von jener Furcht, die Erstarrung bewirkt. Was ist damit gesagt? Wie jene vier Asketen, so ist auch er, zufrieden mit jedem beliebigen Lebensbedürfnis, fest verankert in dieser Genügsamkeit, die das Fundament der Praxis bildet, durch die Entfaltung von liebender Güte usw. in den vier Himmelsrichtungen ein "cātuddiso" und wegen des Fehlens der Furcht vor dem Aneinandergeraten mit Wesen und Gestaltungen "appaṭigho". Da er "cātuddiso" ist, ist er ein Bezwinger der erwähnten Gefahren, und da er "appaṭigho" ist, ist er unerschrocken; so hat er, den Wert der Praxis erkennend und weise übend, die Paccekabodhi erlangt. Oder aber: Erkannt habend, dass man wie jene Asketen, zufrieden mit dem jeweils Vorhandenen, in der beschriebenen Weise zu einem "cātuddiso" wird, und diesen Zustand des In-allen-vier-Richtungen-Zuhause-Seins erstrebend, hat er weise geübt und die Erleuchtung erlangt. Daher soll auch ein anderer, der einen solchen Zustand anstrebt, indem er zu allen vier Richtungen gehört, Gefahren erträgt, frei von Widerstreben und unerschrocken ist, "einsam wandern wie das Horn eines Nashorns" (eko care khaggavisāṇakappo). Der Rest versteht sich ganz wie zuvor dargelegt. Cātuddisagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Cātuddisa-Strophe ist abgeschlossen. 99. Dussaṅgahāti kā uppatti? Bārāṇasirañño kira aggamahesī kālamakāsi. Tato vītivattesu sokadivasesu ekadivasaṃ amaccā ‘‘rājūnaṃ nāma tesu tesu kiccesu aggamahesī avassaṃ icchitabbā, sādhu devo aññampi deviṃ ānetū’’ti yāciṃsu. Rājā ‘‘tena hi, bhaṇe, jānāthā’’ti āha. Te pariyesantā sāmantarajje rājā mato, tassa devī rajjaṃ anusāsati, sā ca gabbhinī ahosi, amaccā ‘‘ayaṃ rañño anurūpā’’ti ñatvā taṃ yāciṃsu. Sā ‘‘gabbhinī nāma manussānaṃ amanāpā hoti. Sace āgametha, yāva vijāyāmi, evaṃ sādhu. No ce, aññaṃ pariyesathā’’ti āha. Te raññopi etamatthaṃ ārocesuṃ. Rājā ‘‘gabbhinīpi hotu, ānethā’’ti āha. Te ānesuṃ. Rājā taṃ abhisiñcitvā sabbaṃ mahesiyā bhogaṃ adāsi, tassā parijanānañca nānāvidhehi paṇṇākārehi saṅgaṇhāti. Sā kālena puttaṃ vijāyi. Rājā taṃ attano puttaṃ viya sabbiriyāpathesu aṅke ca ure ca katvā viharati. Tadā deviyā parijanā cintesuṃ – ‘‘rājā ativiya saṅgaṇhāti, kumāre ativissāsaṃ karoti, handa, naṃ paribhindissāmā’’ti. 99. Was ist der Anlass für die Entstehung der Strophe "Dussaṅgaha" (Schwer zu gewinnen)? Es heißt, die Hauptgemahlin des Königs von Bārāṇasī verstarb. Als danach die Tage der Trauer vergangen waren, baten die Minister eines Tages den König: "Für Könige ist bei ihren verschiedenen Aufgaben eine Hauptgemahlin unentbehrlich. Es wäre gut, wenn der Herrscher eine andere Königin heimführen würde." Der König sprach: "Nun gut, meine Herren, findet eine!" Auf ihrer Suche erfuhren sie, dass im Nachbarreich der König gestorben war und dessen Königin das Reich regierte, welche schwanger war. Da die Minister erkannten: "Diese ist für unseren König geeignet", hielten sie um sie an. Sie entgegnete: "Eine Schwangere ist den Menschen gewöhnlich kein erfreulicher Anblick. Wenn ihr warten könnt, bis ich niederkomme, so ist es gut. Wenn nicht, sucht eine andere." Sie berichteten dem König von dieser Angelegenheit. Der König sprach: "Mag sie auch schwanger sein, bringt sie her!" Sie brachten sie. Der König weihte sie, übergab ihr den gesamten Besitz einer Hauptgemahlin und bedachte auch ihr Gefolge mit mannigfachen Geschenken. Zu ihrer Zeit gebar sie einen Sohn. Der König behandelte ihn wie seinen eigenen Sohn und verbrachte seine Zeit damit, ihn in allen Körperhaltungen auf seinem Schoß und an seiner Brust zu halten. Da dachte das Gefolge der Königin: "Der König begünstigt den Knaben überaus und bringt ihm großes Vertrauen entgegen. Wohlan, lasst uns Zwietracht zwischen ihnen säen!" Tato kumāraṃ āhaṃsu – ‘‘tvaṃ, tāta, amhākaṃ rañño putto, na imassa rañño putto. Mā ettha vissāsaṃ āpajjī’’ti. Atha kumāro ‘‘ehi puttā’’ti raññā vuccamānopi hatthena ākaḍḍhiyamānopi pubbe [Pg.189] viya rājānaṃ na allīyati. Rājā ‘‘kiṃ kāraṇa’’nti vīmaṃsanto taṃ pavattiṃ ñatvā ‘‘ete mayā saṅgahitāpi paṭikkūlavuttino evā’’ti nibbijjitvā rajjaṃ pahāya pabbajito. ‘‘Rājā pabbajito’’ti amaccaparijanāpi bahū pabbajiṃsu. Saparijano rājā pabbajitopi manussā paṇīte paccaye upanenti, rājā paṇīte paccaye yathāvuḍḍhaṃ dāpesi. Tattha ye sundaraṃ labhanti, te tussanti. Itare ujjhāyanti ‘‘mayaṃ pariveṇādīni sammajjantā sabbakiccāni karonti, lūkhabhattaṃ jiṇṇavatthañca labhāmā’’ti. So tampi ñatvā ‘‘ime yathāvuḍḍhaṃ dīyamānāpi ujjhāyanti, aho dussaṅgahā parisā’’ti pattacīvaramādāya ekova araññaṃ pavisitvā vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchākāsi. Tattha āgatehi ca kammaṭṭhānaṃ pucchito imaṃ gāthamabhāsi. Sā atthato pākaṭā eva. Ayaṃ pana yojanā – dussaṅgahā pabbajitāpi eke, ye asantosābhibhūtā, tathāvidhā eva ca atho gahaṭṭhā gharamāvasantā. Etāhaṃ dussaṅgahabhāvaṃ jigucchanto vipassanaṃ ārabhitvā adhigatoti. Sesaṃ purimanayeneva veditabbanti. Daraufhin sagten sie zu dem Prinzen: „Mein Lieber, du bist der Sohn unseres Königs, nicht der Sohn dieses Königs hier. Fasse kein Vertrauen zu ihm!“ Obgleich der Prinz daraufhin vom König mit den Worten „Komm, mein Sohn!“ gerufen und an der Hand gezogen wurde, suchte er nicht wie zuvor die Nähe des Königs. Der König ging der Sache nach, indem er sich fragte: „Was ist der Grund?“, und als er den Sachverhalt erfuhr, wurde er ernüchtert und dachte: „Obwohl diese von mir unterstützt wurden, verhalten sie sich feindselig.“ Er gab das Königreich auf und trat in den Hauslosenstand. Als es hieß: „Der König ist in den Hauslosenstand getreten“, traten auch viele Minister und Gefolgsleute in den Hauslosenstand. Obgleich der König mitsamt seinem Gefolge nun in den Hauslosenstand getreten war, brachten die Menschen ihnen vorzügliche Requisiten dar. Der König ließ diese vorzüglichen Requisiten gemäß dem Dienstalter verteilen. Dabei freuten sich jene, die Gutes erhielten. Die anderen jedoch beschwerten sich: „Wir fegen den Hofbereich und verrichten alle Pflichten, erhalten aber nur minderwertige Nahrung und abgetragene Gewänder!“ Als er auch dies erfuhr, dachte er: „Selbst wenn die Gaben gemäß dem Dienstalter verteilt werden, beschweren sie sich; ach, wie schwer zufriedenzustellen ist diese Gemeinschaft!“ Er nahm Almosenschale und Gewand, ging ganz allein in den Wald, begann mit der Einsichtspraxis und verwirklichte die Einzelbuddhaschaft. Als er dort von herbeigekommenen Personen nach dem Meditationsobjekt gefragt wurde, sprach er diesen Vers. Dieser ist von der Bedeutung her ganz offensichtlich. Die syntaktische Verknüpfung aber lautet wie folgt: Schwer zufriedenzustellen sind selbst manche Ordinierte, die von Unzufriedenheit überwältigt sind, sowie auch Laien, die im Hause leben. „Da ich diesen Zustand des Schwer-Zufriedenzustellens verabscheute, begann ich mit der Einsichtspraxis und erlangte die Erkenntnis“ – so ist es zu verstehen. Der Rest ist in derselben Weise wie zuvor zu verstehen. Dussaṅgahagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über das Schwer-Zufriedenzustellen ist abgeschlossen. 100. Oropayitvāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira cātumāsikabrahmadatto nāma rājā gimhānaṃ paṭhame māse uyyānaṃ gato. Tattha ramaṇīye bhūmibhāge nīlaghanapattasañchannaṃ koviḷārarukkhaṃ disvā ‘‘koviḷāramūle mama sayanaṃ paññāpethā’’ti vatvā uyyāne kīḷitvā sāyanhasamayaṃ tattha seyyaṃ kappesi. Puna gimhānaṃ majjhime māse uyyānaṃ gato, tadā koviḷāro pupphito hoti, tadāpi tatheva akāsi. Punapi gimhānaṃ pacchime māse gato, tadā koviḷāro sañchinnapatto sukkharukkho viya hoti, tadāpi rājā adisvāva taṃ rukkhaṃ pubbaparicayena tattheva seyyaṃ āṇāpesi. Amaccā jānantāpi rañño āṇattiyā tattha sayanaṃ paññāpesuṃ. So uyyāne kīḷitvā sāyanhasamaye tattha seyyaṃ kappento taṃ rukkhaṃ disvā ‘‘are, ayaṃ pubbe sañchannapatto maṇimayo viya abhirūpadassano ahosi, tato maṇivaṇṇasākhantare ṭhapitapavāḷaṅkurasadisehi pupphehi [Pg.190] sassirikadassano ahosi, muttajālasadisavālikākiṇṇo cassa heṭṭhābhūmibhāgo bandhanā pavuttapupphasañchanno rattakambalasanthato viya ahosi. So nāmajja sukkharukkho viya sākhāmattāvaseso ṭhito, aho jarāya upahato koviḷāro’’ti cintetvā ‘‘anupādiṇṇampi tāya jarāya haññati, kimaṅgaṃ pana upādiṇṇa’’nti aniccasaññaṃ paṭilabhi. Tadanusāreneva sabbasaṅkhāre dukkhato anattato ca vipassantova ‘‘aho vatāhampi sañchinnapatto koviḷāro viya apagatagihibyañjano bhaveyya’’nti patthayamāno anupubbena tasmiṃ sayanatale dakkhiṇena passena nipannoyeva vipassitvā paccekabodhiṃ sacchākāsi. Tato gamanakāle amaccehi ‘‘kālo, deva, gantu’’nti vutte ‘‘nāhaṃ rājā’’tiādīni vatvā purimanayeneva imaṃ gāthamabhāsi. 100. Was ist der Anlass für den Vers, der mit „Nachdem er abgelegt hat“ (oropayitvā) beginnt? Es heißt, dass in Bārāṇasī einst ein König namens Cātumāsika-Brahmadatta im ersten Monat des Sommers in den Park ging. Dort sah er auf einem lieblichen Stück Land einen Koviḷāra-Baum, der dicht mit dunkelgrünen Blättern bedeckt war. Er sagte: „Bereitet mein Lager unter dem Koviḷāra-Baum vor!“, vergnügte sich im Park und legte sich am Abend dort zur Ruhe. Als er im mittleren Monat des Sommers erneut in den Park ging, stand der Koviḷāra-Baum in voller Blüte. Auch damals tat er dasselbe. Als er im letzten Monat des Sommers abermals dorthin ging, hatte der Koviḷāra-Baum all seine Blätter verloren und glich einem verdorrten Baum. Doch der König sah den Baum gar nicht genau an, sondern befahl aus Gewohnheit, das Lager genau an jener Stelle herzurichten. Obwohl die Minister den Zustand des Baumes bemerkten, bereiteten sie auf Befehl des Königs das Lager dort vor. Als er sich im Park vergnügt hatte und sich am Abend dort zur Ruhe bettete, erblickte er den Baum und dachte: „Ach! Dieser Baum war zuvor dicht belaubt und bot einen wunderschönen Anblick wie aus Edelsteinen gefertigt. Zudem glänzte er prachtvoll mit Blüten, die wie zwischen den saphirfarbenen Zweigen drapierte Korallensprossen wirkten, und der Boden darunter, der mit Sand wie mit einem Perlennetz bedeckt war, glich durch die von ihren Stielen abgefallenen Blüten einem ausgebreiteten roten Wolldecken-Teppich. Nun aber steht er da wie ein verdorrter Baum, von dem nur die kahlen Äste übrig geblieben sind. Ach, wie der Koviḷāra-Baum doch vom Verfall gezeichnet ist!“ So dachte er: „Wenn selbst das Unbeseelte von solchem Verfall heimgesucht wird, wie viel mehr erst das Beseelte!“ Und er erlangte die Wahrnehmung der Vergänglichkeit. Indem er in Entsprechung dazu alle Gestaltungen als leidvoll und selbstlos betrachtete, wünschte er sich: „O dass doch auch ich wie dieser entlaubte Koviḷāra-Baum frei von allen Merkmalen des Laienlebens wäre!“ Während er der Reihe nach auf diesem Lager auf seiner rechten Seite lag, übte er Einsichtspraxis und verwirklichte die Einzelbuddhaschaft. Als es danach für ihn Zeit war aufzubrechen und die Minister sagten: „Majestät, es ist Zeit zu gehen“, sprach er: „Ich bin nicht mehr der König“ und so weiter, und trug in derselben Weise wie zuvor diesen Vers vor. Tattha oropayitvāti apanetvā. Gihibyañjanānīti kesamassuodātavatthālaṅkāramālāgandhavilepanaputtadāradāsidāsādīni. Etāni gihibhāvaṃ byañjayanti, tasmā ‘‘gihibyañjanānī’’ti vuccanti. Sañchinnapattoti patitapatto. Chetvānāti maggañāṇena chinditvā. Vīroti maggavīriyena samannāgato. Gihibandhanānīti kāmabandhanāni. Kāmā hi gihīnaṃ bandhanāni. Ayaṃ tāva padattho. Ayaṃ pana adhippāyo – ‘‘aho vatāhampi oropayitvā gihibyañjanāni sañchinnapatto yathā koviḷāro bhaveyya’’nti evaṃ cintayamāno vipassanaṃ ārabhitvā adhigatoti. Sesaṃ purimanayeneva veditabbanti. Darin bedeutet „oropayitvā“: abgelegt habend. „Gihibyañjanāni“ (die Merkmale des Laienlebens) bezeichnet Kopfhaar, Bart, weiße Kleidung, Schmuck, Blumenkränze, Duftstoffe, Salben, Kinder, Ehefrauen, Sklavinnen, Sklaven und so weiter. Diese bringen den Zustand eines Laien zum Ausdruck, darum werden sie „Merkmale des Laienlebens“ genannt. „Sañchinnapatto“ bedeutet: dessen Blätter abgefallen sind. „Chetvānā“ bedeutet: mit dem Pfad-Wissen abgeschnitten habend. „Vīro“ bedeutet: mit der Pfad-Anstrengung ausgestattet. „Gihibandhanāni“ (die Fesseln der Laien) bezeichnet die Fesseln der Sinnlichkeit. Denn die Sinnendinge sind die Fesseln der Laien. Dies ist zunächst die Wortbedeutung. Die Absicht dahinter aber ist: „O dass doch auch ich, nachdem ich die Merkmale des Laienlebens abgelegt habe, wie der entlaubte Koviḷāra-Baum sein möge!“ – so denkend begann er mit der Einsichtspraxis und erlangte die Erkenntnis; so ist es zu verstehen. Der Rest ist in derselben Weise wie zuvor zu verstehen. Koviḷāragāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Koviḷāra-Baum ist abgeschlossen. Paṭhamavaggo niṭṭhito. Das erste Kapitel ist abgeschlossen. 101-2. Sace labhethāti kā uppatti? Pubbe kira kassapassa bhagavato sāsane dve paccekabodhisattā pabbajitvā vīsati vassasahassāni gatapaccāgatavattaṃ pūretvā devaloke uppannā. Tato cavitvā tesaṃ jeṭṭhako bārāṇasirañño putto, kaniṭṭho purohitassa putto ahosi. Te ekadivasaṃyeva paṭisandhiṃ gahetvā ekadivasameva mātu kucchito nikkhamitvā sahapaṃsukīḷakā sahāyakā ahesuṃ. Purohitaputto paññavā ahosi. So rājaputtaṃ āha – ‘‘samma, tvaṃ tava [Pg.191] pituno accayena rajjaṃ labhissasi, ahaṃ purohitaṭṭhānaṃ, susikkhitena ca rajjaṃ anusāsituṃ sakkā, ehi sippaṃ uggaṇhissāmā’’ti. Tato ubhopi yaññopacitā hutvā gāmanigamādīsu bhikkhaṃ caramānā paccantajanapadagāmaṃ gatā. Tañca gāmaṃ pañca paccekabuddhā bhikkhācāravelāya pavisiṃsu. Tattha manussā paccekabuddhe disvā ussāhajātā āsanāni paññāpetvā paṇītaṃ khādanīyaṃ vā bhojanīyaṃ vā upanāmetvā pūjenti. Tesaṃ etadahosi – ‘‘amhehi sadisā uccākulikā nāma natthi, api ca panime manussā yadi icchanti, amhākaṃ bhikkhaṃ denti, yadi nicchanti, na denti, imesaṃ pana pabbajitānaṃ evarūpaṃ sakkāraṃ karonti, addhā ete kiñci sippaṃ jānanti, handa, nesaṃ santike sippaṃ uggaṇhāmā’’ti. Te manussesu paṭikkantesu okāsaṃ labhitvā ‘‘yaṃ, bhante, tumhe sippaṃ jānātha, taṃ amhehi sikkhāpethā’’ti yāciṃsu. Paccekabuddhā ‘‘na sakkā apabbajitena sikkhitu’’nti āhaṃsu. Te pabbajjaṃ yācitvā pabbajiṃsu. Tato nesaṃ paccekabuddhā ‘‘evaṃ vo nivāsetabbaṃ, evaṃ pārupitabba’’ntiādinā nayena ābhisamācārikaṃ ācikkhitvā ‘‘imassa sippassa ekībhāvābhirati nipphatti, tasmā ekeneva nisīditabbaṃ, ekena caṅkamitabbaṃ, ekena ṭhātabbaṃ, ekena sayitabba’’nti pāṭiyekkaṃ paṇṇasālaṃ adaṃsu, tato te attano attano paṇṇasālaṃ pavisitvā nisīdiṃsu. Purohitaputto nisinnakālato pabhuti cittasamādhānaṃ laddhā jhānaṃ paṭilabhi. Rājaputto muhutteneva ukkaṇṭhito tassa santikaṃ āgato. So taṃ disvā ‘‘kiṃ, sammā’’ti pucchi. ‘‘Ukkaṇṭhitomhī’’ti āha. ‘‘Tena hi idha nisīdā’’ti. So tattha muhuttaṃ nisīditvā āha – ‘‘imassa kira, samma, sippassa ekībhāvābhirati nipphattī’’ti? Purohitaputto ‘‘evaṃ, samma, tena hi tvaṃ attano nisinnokāsaṃ eva gaccha, uggaṇhissāmi imassa sippassa nipphatti’’nti āha. So gantvā punapi muhuttakeneva ukkaṇṭhito purimanayeneva tikkhattuṃ āgato. 101-2. Was ist der Anlass für das Erscheinen des Verses, der mit 'Sace labhetha' (Wenn man erhalten sollte) beginnt? Einst, so heißt es, ordinierten zwei zukünftige Paccekabuddhas (Paccekabodhisattas) zur Zeit der Lehre des Erhabenen Kassapa, erfüllten zwanzigtausend Jahre lang die Pflicht des Gehens und Zurückkehrens (gatapaccāgata-vatta) und wurden danach in einer Götterwelt wiedergeboren. Nach dem Verscheiden von dort wurde der ältere von ihnen als Sohn des Königs von Bārāṇasī und der jüngere als Sohn des Haushofpriesters (Purohita) geboren. Sie nahmen am selben Tag die Wiederverkörperung an, traten am selben Tag aus dem Mutterleib aus und wurden Gefährten, die im Staub miteinander spielten. Der Sohn des Purohita war weise. Er sagte zum Prinzen: 'Freund, nach dem Hinscheiden deines Vaters wirst du das Königreich erhalten, und ich das Amt des Purohita. Ein wohlausgebildeter Mann vermag das Reich gut zu regieren; komm, lass uns die Künste erlernen.' Daraufhin begaben sich beide, als sie herangewachsen waren, auf Almosengang durch Dörfer und Kleinstädte und gelangten in ein Grenzdorf. In dieses Dorf traten fünf Paccekabuddhas zur Zeit des Almosengangs ein. Dort sahen die Menschen die Paccekabuddhas, wurden voller Tatkraft, bereiteten Sitze vor, boten vorzügliche harte und weiche Speisen an und verehrten sie. Da dachten jene beiden: 'Es gibt niemanden von so edler Geburt wie uns. Und doch: Wenn diese Menschen wollen, geben sie uns Almosenspeise; wenn sie nicht wollen, geben sie uns nichts. Diesen Ordinierten aber erweisen sie eine solche Ehrerbietung. Sicherlich kennen diese irgendeine Kunst. Wohlan, wir wollen in ihrer Gegenwart diese Kunst erlernen.' Als die Menschen weggegangen waren, fanden sie eine Gelegenheit und baten: 'Ehrwürdige Herren, lehrt uns die Kunst, die ihr kennt!' Die Paccekabuddhas sagten: 'Als Nicht-Ordinierter kann man dies nicht erlernen.' Sie baten um die Ordination und ordinierten. Daraufhin erklärten ihnen die Paccekabuddhas die Regeln des guten Benehmens (ābhisamācārika) auf folgende Weise: 'So müsst ihr das Untergewand anlegen, so das Obergewand umwerfen' und so weiter, und sagten: 'Die Vollendung dieser Kunst besteht in der Freude an der Einsamkeit. Daher soll man allein sitzen, allein auf und ab gehen, allein stehen und allein liegen.' Sie gaben ihnen jeweils eine eigene Blätterhütte. Daraufhin betraten sie ihre jeweiligen Blätterhütten und setzten sich hin. Der Sohn des Purohita erlangte von dem Moment an, als er sich niedersetzte, geistige Sammlung und gewann die Vertiefung (Jhāna). Der Prinz aber wurde schon nach einem Augenblick unruhig und ging zu ihm. Als jener ihn sah, fragte er: 'Was ist, mein Freund?' Er antwortete: 'Ich bin unruhig geworden.' – 'Nun, dann setz dich hierher.' Er saß dort für einen Moment und sagte: 'Stimmt es, mein Freund, dass die Vollendung dieser Kunst in der Freude an der Einsamkeit liegt?' Der Sohn des Purohita sagte: 'So ist es, mein Freund. Geh deshalb zu deinem eigenen Sitzplatz zurück. Ich werde die Vollendung dieser Kunst erlernen.' Er ging zurück, wurde aber wiederum nach nur einem Augenblick unruhig und kam auf dieselbe Weise wie zuvor dreimal zurück. Tato naṃ purohitaputto tatheva uyyojetvā tasmiṃ gate cintesi – ‘‘ayaṃ attano ca kammaṃ hāpeti mama ca, idhābhikkhaṇaṃ āgacchatī’’ti. So paṇṇasālato nikkhamma araññaṃ paviṭṭho. Itaro attano paṇṇasālāyeva nisinno punapi muhuttakeneva ukkaṇṭhito tassa santikaṃ [Pg.192] āgantvā ito cito ca maggantopi taṃ adisvā cintesi – ‘‘yo gahaṭṭhakāle paṇṇākāraṃ ādāya āgatopi maṃ daṭṭhuṃ na labhati, so dāni mayi āgate dassanampi adātukāmo apakkami. Aho are, citta, na lajjasi, yaṃ maṃ catukkhattuṃ idhānesi, na so dāni te vase vattissāmi, aññadatthu taṃyeva mama vase vattāpessāmī’’ti attano senāsanaṃ pavisitvā vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchikatvā ākāsena nandamūlakapabbhāraṃ agamāsi. Itaropi araññaṃ pavisitvā vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchikatvā tattheva agamāsi. Te ubhopi manosilātale nisīditvā pāṭiyekkaṃ pāṭiyekkaṃ imā udānagāthāyo abhāsiṃsu. Daraufhin schickte ihn der Sohn des Purohita in gleicher Weise weg, und als er gegangen war, dachte er: 'Dieser vernachlässigt seine eigene Arbeit und auch meine, da er ständig hierher kommt.' Er verließ die Blätterhütte und ging in den Wald. Der andere, der in seiner eigenen Blätterhütte saß, wurde wiederum nach nur einem Augenblick unruhig, kam zu dessen Blätterhütte und suchte hier und dort nach ihm. Da er ihn jedoch nicht fand, dachte er: 'Wer in der Zeit als Laie, selbst wenn er mit Geschenken kam, mich nicht zu sehen bekam, der ist jetzt, da ich gekommen bin, weggegangen, weil er mir nicht einmal seinen Anblick gewähren wollte. O Geist, schämst du dich denn nicht, dass du mich viermal hierher geführt hast? Ich werde mich jetzt nicht mehr von dir beherrschen lassen; vielmehr werde ich dich unter meine Kontrolle bringen!' Er betrat seine eigene Wohnstätte, begann mit der Einsichtmeditation (Vipassanā), verwirklichte die Paccekabodhi (Einzelerleuchtung) und flog durch die Luft zur Berghöhle Nandamūlaka. Auch der andere ging in den Wald, begann mit der Einsichtmeditation, verwirklichte die Paccekabodhi und gelangte ebenso dorthin. Sie saßen beide auf der Felsterrasse aus rotem Arsenik (Manosilātala) und sprachen unabhängig voneinander diese feierlichen Verse (Udāna-Strophen) aus. Tattha nipakanti pakatinipakaṃ paṇḍitaṃ kasiṇaparikammādikusalaṃ. Sādhuvihārinti appanāvihārena vā upacārena vā samannāgataṃ. Dhīranti dhitisampannaṃ. Tattha nipakattena dhitisampadā vuttā. Idha pana dhitisampannamevāti attho. Dhiti nāma asithilaparakkamatā, ‘‘kāmaṃ taco ca nhāru cā’’ti (ma. ni. 2.184; a. ni. 2.5; mahāni. 196) evaṃ pavattavīriyassetaṃ adhivacanaṃ. Apica dhikkatapāpotipi dhīro. Rājāva raṭṭhaṃ vijitaṃ pahāyāti yathā pakatirājā ‘‘vijitaṃ raṭṭhaṃ anatthāvaha’’nti ñatvā rajjaṃ pahāya eko carati, evaṃ bālasahāyaṃ pahāya eko care. Atha vā rājāva raṭṭhanti yathā sutasomo rājā raṭṭhaṃ vijitaṃ pahāya eko cari, yathā ca mahājanako rājā, evaṃ eko carīti ayampi tassa attho. Sesaṃ vuttānusārena sakkā jānitunti na vitthāritanti. Darin bedeutet 'nipaka' (besonnen) einen von Natur aus klugen, weisen Menschen, der in den vorbereitenden Übungen für die Kasina-Meditation (kasiṇa-parikamma) und Ähnlichem geschickt ist. 'Sādhuvihārin' (heilsam lebend) bedeutet einen, der mit dem Verweilen in der Vollsammlung (appanā-vihāra) oder der Nahesammlung (upacāra) ausgestattet ist. 'Dhīra' (standhaft) bedeutet mit Standhaftigkeit (dhiti-sampanna) ausgestattet. Dabei wird durch den Zustand der Besonnenheit (nipakatta) die Vollkommenheit der Standhaftigkeit ausgedrückt. Hier aber ist die Bedeutung einfach 'mit Standhaftigkeit ausgestattet'. Standhaftigkeit (dhiti) bedeutet unerschlaffende Willenskraft; dies ist eine Bezeichnung für die aufgebotene Tatkraft (vīriya), wie es heißt: 'Mögen gerne Haut und Sehnen [übrig bleiben]...'. Zudem ist ein 'Dhīra' auch einer, der das Böse verabscheut (dhikkata-pāpo). 'Wie ein König das eroberte Reich verlässt': So wie ein gewöhnlicher König erkennt, dass 'das eroberte Reich Unheil bringt', die Königsherrschaft aufgibt und allein umherwandert, so sollte man den törichten Gefährten meiden und allein wandern. Oder aber 'wie ein König das Reich': Wie der König Sutasoma das eroberte Reich verließ und allein wanderte, und ebenso der König Mahājanaka allein wanderte – auch dies ist die Bedeutung davon. Der Rest kann gemäß dem bereits Gesagten verstanden werden, weshalb er nicht weiter ausgeführt wird. Sahāyagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophen über den Gefährten (Sahāya-gāthā-vaṇṇanā) ist abgeschlossen. 103. Addhā pasaṃsāmāti imissā gāthāya yāva ākāsatale paññattāsane paccekabuddhānaṃ nisajjā, tāva cātuddisagāthāya uppattisadisā eva uppatti. Ayaṃ pana viseso – yathā so rājā rattiyā tikkhattuṃ ubbijji, na tathā ayaṃ, nevassa yañño paccupaṭṭhito ahosi. So ākāsatale paññattesu āsanesu paccekabuddhe nisīdāpetvā ‘‘ke tumhe’’ti pucchi. ‘‘Mayaṃ, mahārāja, anavajjabhojino nāmā’’ti. ‘‘Bhante[Pg.193], anavajjabhojinoti imassa ko attho’’ti? ‘‘Sundaraṃ vā asundaraṃ vā laddhā nibbikārā bhuñjāma, mahārājā’’ti. Taṃ sutvā rañño etadahosi – ‘‘yaṃnūnāhaṃ ime upaparikkheyyaṃ ‘edisā vā no vā’’’ti? Taṃ divasaṃ kaṇājakena bilaṅgadutiyena parivisi. Taṃ paccekabuddhā amataṃ viya nibbikārā bhuñjiṃsu. Rājā ‘‘ime paṭiññātattā ekadivasaṃ nibbikārā honti, puna sve jānissāmī’’ti svātanāya nimantesi. Dutiyadivasepi tathevākāsi. Tepi tatheva paribhuñjiṃsu. Atha rājā ‘‘sundaraṃ datvā vīmaṃsissāmī’’ti punapi nimantetvā dve divase mahāsakkāraṃ katvā paṇītena ativicitrena khādanīyena bhojanīyena parivisi. Tepi tatheva nibbikārā paribhuñjitvā rañño maṅgalaṃ vatvā pakkamiṃsu. Rājā acirapakkantesu tesu ‘‘anavajjabhojino ete, aho vatāhampi anavajjabhojī bhaveyya’’nti cintetvā mahārajjaṃ pahāya pabbajjaṃ samādāya vipassanaṃ ārabhitvā paccekabuddho hutvā mañjūsakarukkhamūle paccekabuddhānaṃ majjhe attano ārammaṇaṃ vibhāvento imaṃ gāthamabhāsi. Sā padatthato uttānameva. Kevalaṃ pana sahāyasampadanti ettha asekhehi sīlādikkhandhehi sampannā sahāyā eva sahāyasampadāti veditabbā. 103. Bezüglich [der Strophe] 'Addhā pasaṃsāma' ('Gewiss preisen wir'): Bis zum Niedersitzen der Paccekabuddhas auf den im Luftraum hergerichteten Sitzen ist die Entstehungsgeschichte genau dieselbe wie bei der Cātuddisa-Strophe. Dies ist jedoch der Unterschied: So wie jener König in der Nacht dreimal erschrak, so war es bei diesem nicht, und es war für ihn auch kein Opfer vorbereitet. Er ließ die Paccekabuddhas auf den im Luftraum hergerichteten Sitzen Platz nehmen und fragte: 'Wer seid ihr?' 'Wir, o großer König, werden „Esser von tadelloser Speise“ (Anavajjabhojino) genannt.' 'Ehrwürdige Herrschaften, was ist die Bedeutung von „Anavajjabhojino“?' 'Ob wir Vorzügliches oder Schlechtes erhalten, o großer König, wir essen es ohne Regung.' Als der König dies hörte, dachte er: 'Wie wäre es, wenn ich sie prüfen würde, ob sie so sind oder nicht?' An jenem Tag bediente er sie mit Bruchreisbrei, zu dem saure Brühe gereicht wurde. Die Paccekabuddhas aßen dies unberührt, wie Götterspeise. Der König dachte: 'Aufgrund ihres Rufes sind sie für einen Tag unberührt; morgen werde ich es genauer wissen', und lud sie für den nächsten Tag ein. Auch am zweiten Tag tat er genau dasselbe. Auch sie aßen in genau derselben Weise. Da dachte der König: 'Ich werde ihnen etwas Vorzügliches geben und sie prüfen.' Er lud sie erneut ein, erwies ihnen an zwei Tagen große Ehre und bediente sie mit erlesener, äußerst vielfältiger fester und weicher Speise. Auch sie aßen dies auf dieselbe Weise unberührt, sprachen dem König Segen aus und gingen fort. Als sie kurz darauf weggegangen waren, dachte der König: 'Sie sind wahrlich Esser von tadelloser Speise. Oh, dass doch auch ich ein Esser von tadelloser Speise sein könnte!' Er gab das große Königreich auf, trat in den Hauslosenstand ein, begann die Einsichtsmeditation, wurde ein Paccekabuddha und sprach, während er unter dem Mañjūsaka-Baum inmitten der Paccekabuddhas sein eigenes Meditationsobjekt verdeutlichte, diese Strophe. Diese ist bezüglich der Wortbedeutung ganz offensichtlich. Nur ist hierbei unter 'Vollkommenheit an Gefährten' (sahāyasampadā) zu verstehen: Gefährten, die mit den vollendeten (asekha) Gruppen von Tugend usw. ausgestattet sind – eben dies ist die Vollkommenheit an Gefährten. Ayaṃ panettha yojanā – yā ayaṃ vuttā sahāyasampadā, taṃ sahāyasampadaṃ addhā pasaṃsāma, ekaṃseneva thomemāti vuttaṃ hoti. Kathaṃ? Seṭṭhā samā sevitabbā sahāyāti. Kasmā? Attano sīlādīhi seṭṭhe sevamānassa sīlādayo dhammā anuppannā uppajjanti, uppannā ca vuddhiṃ virūḷhiṃ vepullaṃ pāpuṇanti. Same sevamānassa aññamaññaṃ sādhāraṇena kukkuccassa vinodanena ca laddhā na parihāyanti. Ete pana sahāyake seṭṭhe ca same ca aladdhā kuhanādimicchājīvaṃ pahāya dhammena samena uppannaṃ bhojanaṃ bhuñjanto tattha ca paṭighānunayaṃ anuppādento anavajjabhojī hutvā atthakāmo kulaputto eko care khaggavisāṇakappo. Ahampi evaṃ caranto imaṃ sampattiṃ adhigatomhīti. Dies ist hierbei die syntaktische Verbindung: Was diese erwähnte Vollkommenheit an Gefährten betrifft, so heißt das: 'Diese Vollkommenheit an Gefährten loben wir wahrlich, wir rühmen sie ganz zweifellos.' Wie? 'Hervorragende und gleichgestellte Gefährten sollte man aufsuchen.' Warum? Für jemanden, der einen aufsucht, der ihm selbst an Tugend usw. überlegen ist, entstehen noch ungeborene heilsame Eigenschaften wie Tugend usw., und die bereits entstandenen gelangen zu Wachstum, Entfaltung und Fülle. Für jemanden, der einen Gleichgestellten aufsucht, gehen die erlangten Eigenschaften nicht verloren, da man sich gegenseitig unterstützt und Gewissensbisse vertreibt. Wenn man jedoch solche hervorragenden oder gleichgestellten Gefährten nicht erlangt, soll der das Wohl suchende Sohn aus guter Familie, indem er falschen Lebensunterhalt wie Heuchelei usw. meidet, in gerechter und ausgewogener Weise erhaltene Speise zu sich nehmen, dabei weder Abneigung noch Verlangen entstehen lassen, so ein Esser von tadelloser Speise sein und allein wandern wie das Horn eines Nashorns. 'Auch ich erlangte diese Errungenschaft, indem ich so wandelte' – so ist dies zu verstehen. Addhāpasaṃsāgāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe 'Addhā pasaṃsāma' ist abgeschlossen. 104. Disvā suvaṇṇassāti kā uppatti? Aññataro kira bārāṇasiyaṃ rājā gimhasamaye divāseyyaṃ upagato ahosi, santike cassa [Pg.194] vaṇṇadāsī gosītacandanaṃ pisati. Tassā ekabāhāya ekaṃ suvaṇṇavalayaṃ, ekabāhāya dve. Tāni saṅghaṭṭenti, itaraṃ na saṅghaṭṭati. Rājā taṃ disvā ‘‘evameva gaṇavāse saṅghaṭṭanā, ekavāse asaṅghaṭṭanā’’ti cintetvā punappunaṃ dāsiṃ olokesi. Tena ca samayena sabbālaṅkāravibhūsitā devī taṃ bījayantī ṭhitā hoti. Sā ‘‘vaṇṇadāsiyā paṭibaddhacitto maññe rājā’’ti cintetvā taṃ dāsiṃ uṭṭhāpetvā sayameva pisitumāraddhā. Athassā ca ubhosu bāhāsu aneke suvaṇṇavalayā, te saṅghaṭṭayantā mahāsaddaṃ janayiṃsu. Rājā atisuṭṭhutaraṃ nibbindo dakkhiṇapassena nipannoyeva vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchākāsi. Taṃ anuttarasukhena sukhitaṃ nipannaṃ candanahatthā devī upasaṅkamitvā ‘‘ālimpāmi, mahārājā’’ti āha. So ‘‘apehi, mā ālimpāhī’’ti āha. Sā ‘‘kissa, mahārājā’’ti? So ‘‘nāhaṃ, rājā’’ti. Evametesaṃ kathāsallāpaṃ sutvā amaccā upasaṅkamiṃsu, tehipi mahārājavādena ālapito ‘‘nāhaṃ, bhaṇe, rājā’’ti āha. Sesaṃ paṭhamagāthāya vuttasadisameva. 104. 'Nachdem er [die Ringe] aus Gold gesehen hatte' (Disvā suvaṇṇassa) – was ist die Entstehung? Es heißt, ein gewisser König in Bārāṇasī hatte sich zur Sommerzeit am Tage zur Ruhe gelegt, und in seiner Nähe zerrieb eine hübsche Sklavin weißes Sandelholz. An ihrem einen Arm trug sie einen goldenen Armreif, am anderen Arm zwei. Diese stießen aneinander; der andere stieß nicht an. Als der König dies sah, dachte er: 'Ebenso gibt es Reibung beim Zusammenleben in einer Gruppe; lebt man allein, gibt es keine Reibung', und blickte die Sklavin immer wieder an. Zu jener Zeit stand die Königin, geschmückt mit allem Schmuck, da und fächelte ihm Luft zu. Sie dachte: 'Der König hat wohl sein Herz an die hübsche Sklavin gehängt', schickte die Sklavin weg und begann selbst das Sandelholz zu zerreiben. Da stießen die zahlreichen goldenen Armreife an ihren beiden Armen aneinander und erzeugten ein lautes Geräusch. Der König, der dadurch zutiefst ernüchtert war, begann, während er auf der rechten Seite lag, die Einsichtsmeditation und verwirklichte die Erkenntnis eines Paccekabuddha. Zu dem König, der glücklich in unübertrefflicher Glückseligkeit dalag, trat die Königin mit Sandelholz an den Händen heran und sagte: 'Ich möchte dich salben, o großer König.' Er sagte: 'Geh weg, salbe mich nicht.' Sie fragte: 'Warum, o großer König?' Er sagte: 'Ich bin kein König.' Als die Minister dieses Gespräch hörten, traten sie heran, und als sie ihn mit dem Titel 'Großer König' ansprachen, sagte er: 'Ihr Lieben, ich bin kein König.' Der Rest ist genau wie bei der ersten Strophe beschrieben. Ayaṃ pana gāthāvaṇṇanā – tattha disvāti oloketvā. Suvaṇṇassāti kañcanassa. ‘‘Valayānī’’ti pāṭhaseso. Sāvasesapadattho hi ayaṃ attho. Pabhassarānīti pabhāsanasīlāni, jutimantānīti vuttaṃ hoti. Sesaṃ uttānapadatthameva. Ayaṃ pana yojanā – disvā bhujasmiṃ suvaṇṇassa valayāni ‘‘gaṇavāse sati saṅghaṭṭanā, ekavāse asaṅghaṭṭanā’’ti evaṃ cintetvā vipassanaṃ ārabhitvā adhigatomhīti. Sesaṃ suviññeyyamevāti. Dies ist jedoch die Erklärung der Strophe – dabei bedeutet 'disvā': blickend. 'Suvaṇṇassa' bedeutet: des Goldes. 'Valayāni' ist der verbleibende Text. Denn diese Bedeutung ergibt sich aus dem verbleibenden Wortlaut. 'Pabhassarāni' bedeutet: von glänzender Natur, das heißt leuchtend. Der Rest hat eine ganz offensichtliche Bedeutung. Dies ist die syntaktische Verbindung: Nachdem er am Arm die Armreife aus Gold gesehen hatte und dachte: 'Wenn man in einer Gruppe lebt, gibt es Reibung; lebt man allein, gibt es keine Reibung', begann er die Einsichtsmeditation und dachte: 'Ich habe [die Erkenntnis] erlangt.' Der Rest ist leicht verständlich. Suvaṇṇavalayagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die goldenen Armringe ist abgeschlossen. 105. Evaṃ dutiyenāti kā uppatti? Aññataro kira bārāṇasirājā daharova pabbajitukāmo amacce āṇāpesi – ‘‘deviṃ gahetvā rajjaṃ pariharatha, ahaṃ pabbajissāmī’’ti. Amaccā – ‘‘mahārāja, arājakaṃ rajjaṃ amhehi na sakkā rakkhituṃ sāmantarājāno āgamma vilumpissanti, yāva ekopi putto uppajjati, tāva āgamehī’’ti saññāpesuṃ. Muducitto rājā adhivāsesi. Atha devī gabbhaṃ gaṇhi. Rājā puna te āṇāpesi – ‘‘devī gabbhinī, puttaṃ jātaṃ rajje abhisiñcitvā rajjaṃ pariharatha, ahaṃ pabbajissāmī’’ti. Amaccā [Pg.195] ‘‘dujjānaṃ, mahārāja, etaṃ, yaṃ devī puttaṃ vā vijāyissati, dhītaraṃ vāti, tāva vijāyanakālaṃ āgamehī’’ti punapi rājānaṃ saññāpesuṃ. Atha sā puttaṃ vijāyi. Tadāpi rājā tatheva amacce āṇāpesi. Amaccā punapi rājānaṃ – ‘‘āgamehi, mahārāja, yāva paṭibalo hotī’’ti bahūhi kāraṇehi saññāpesuṃ. Tato kumāre paṭibale jāte amacce sannipātāpetvā ‘‘paṭibalo dāni ayaṃ, taṃ rajje abhisiñcitvā paṭipajjathā’’ti amaccānaṃ okāsaṃ adatvā antarāpaṇato kāsāyavatthādayo sabbaparikkhāre āharāpetvā antepure eva pabbajitvā mahājanako viya nikkhamitvā gato. Sabbaparijano nānappakāraṃ paridevamāno rājānaṃ anubandhi. So rājā yāva attano rajjasīmā, tāva gantvā kattaradaṇḍena lekhaṃ ākaḍḍhitvā – ‘‘ayaṃ lekhā nātikkamitabbā’’ti āha. Mahājano lekhāya sīsaṃ katvā bhūmiyaṃ nipanno paridevamāno ‘‘tuyhaṃ dāni, tāta, rañño āṇā, kiṃ karissatī’’ti kumāraṃ lekhaṃ atikkamāpesi. Kumāro ‘‘tāta, tātā’’ti dhāvitvā rājānaṃ sampāpuṇi. Rājā kumāraṃ disvā ‘‘etaṃ mahājanaṃ pariharanto rajjaṃ kāresiṃ, kiṃ dāni ekaṃ dārakaṃ pariharituṃ na sakkhissa’’nti kumāraṃ gahetvā araññaṃ paviṭṭho, tattha pubbapaccekabuddhehi vasitapaṇṇasālaṃ disvā vāsaṃ kappesi saddhiṃ puttena. 105. „So mit einem zweiten“ – was ist die Entstehung (dieser Strophe)? Ein gewisser König von Bārāṇasī, so heißt es, der schon in jungen Jahren den Wunsch hatte, in die Hauslosigkeit zu ziehen, befahl den Ministern: „Nehmt die Königin und verwaltet das Reich, ich werde in die Hauslosigkeit ziehen.“ Die Minister machten ihm begreiflich: „Großer König, ein königsloses Reich können wir nicht beschützen. Die Grenznachbarkönige werden kommen und es ausrauben. Warte, bis zumindest ein Sohn geboren wird.“ Der milde gestimmte König willigte ein. Daraufhin empfing die Königin ein Kind. Der König befahl jenen erneut: „Die Königin ist schwanger. Wenn der Sohn geboren ist, salbt ihn für das Reich und verwaltet das Reich, ich werde in die Hauslosigkeit ziehen.“ Die Minister machten dem König erneut begreiflich: „Großer König, das ist schwer zu wissen, ob die Königin einen Sohn oder eine Tochter gebären wird. Warte zumindest bis zur Zeit der Geburt.“ Daraufhin gebar sie einen Sohn. Auch damals befahl der König den Ministern dasselbe. Die Minister machten dem König wiederum mit vielen Gründen begreiflich: „Warte, großer König, bis er fähig ist.“ Als der Prinz schließlich fähig geworden war, ließ er die Minister versammeln, gab den Ministern jedoch keine Gelegenheit (zum Einwand) mehr, sondern sagte: „Dieser ist nun fähig, salbt ihn für das Reich und folgt ihm.“ Er ließ ockergelbe Gewänder und alle Utensilien aus dem Markt herbeibringen, weihte sich noch im inneren Palast selbst ein und zog fort wie Mahājanaka. Das gesamte Gefolge folgte dem König unter vielfältigem Wehklagen. Jener König ging bis zur Grenze seines Reiches, zog mit seinem Wanderstab eine Linie und sagte: „Diese Linie darf nicht überschritten werden!“ Die Volksmenge machte am Anfang der Linie halt, warf sich auf die Erde, klagte und sagte: „Was nützt dir nun der Befehl des Königs, mein Lieber?“, und sie brachten den Prinzen dazu, die Linie zu überschreiten. Der Prinz lief und rief: „Vater, Vater!“, und holte den König ein. Als der König den Prinzen sah, dachte er: „Ich habe dieses Reich regiert, indem ich mich um diese große Volksmenge gekümmert habe; wie sollte ich nun nicht in der Lage sein, mich um ein einzelnes Kind zu kümmern?“ Er nahm den Prinzen und betrat den Wald. Dort sah er eine von früheren Paccekabuddhas bewohnte Blätterhütte und ließ sich dort zusammen mit seinem Sohn nieder. Tato kumāro varasayanādīsu kataparicayo tiṇasanthārake vā rajjumañcake vā sayamāno rodati. Sītavātādīhi phuṭṭho samāno – ‘‘sītaṃ tāta uṇhaṃ tāta makasā tāta ḍaṃsanti. Chātomhi tāta, pipāsitomhi tātā’’ti vadati. Rājā taṃ saññāpentoyeva rattiṃ vītināmesi. Divāpissa piṇḍāya caritvā bhattaṃ upanāmesi, kumāro missakabhattaṃ kaṅguvarakamuggādibahulaṃ acchādentampi taṃ jighacchāvasena bhuñjamāno katipāhaccayena uṇhe ṭhapitapadumaṃ viya milāyi. Rājā pana paṭisaṅkhānabalena nibbikāro bhuñjati. Tato so kumāraṃ saññāpento āha – ‘‘nagare, tāta, paṇītāhāro labbhati, tattha gacchāmā’’ti. Kumāro ‘‘āma, tātā’’ti. Tato naṃ purakkhatvā āgatamaggeneva nivatti. Kumāramātāpi devī ‘‘na dāni rājā kumāraṃ gaṇhitvā araññe ciraṃ vasissati, katipāheneva nivattissatī’’ti cintetvā raññā [Pg.196] kattaradaṇḍena likhitaṭṭhāneyeva vatiṃ kārāpetvā vāsaṃ kappesi. Rājā tassā vatiyā avidūre ṭhatvā ‘‘ettha te, tāta, mātā nisinnā, gacchāhī’’ti pesesi. Yāva so taṃ ṭhānaṃ pāpuṇāti, tāva udikkhanto aṭṭhāsi – ‘‘mā heva naṃ koci viheṭheyyā’’ti. Kumāro mātu santikaṃ dhāvanto agamāsi. Daraufhin weinte der Prinz, der an vorzügliche Betten und Ähnliches gewöhnt war, wenn er auf einer Grasstreu oder einem Seilbett lag. Wenn er von kaltem Wind und Ähnlichem berührt wurde, sagte er: „Mir ist kalt, Vater! Mir ist heiß, Vater! Die Mücken stechen mich, Vater! Ich bin hungrig, Vater! Ich bin durstig, Vater!“ Der König brachte die Nacht damit zu, ihn zu beruhigen. Auch am Tag ging er für ihn auf Almosengang und brachte ihm Speise. Obwohl der Prinz die gemischte Speise, die reich an Hirse, Hülsenfrüchten, Mungobohnen und Ähnlichem war und die ihm missfiel, getrieben von Hunger verzehrte, welkte er nach wenigen Tagen wie ein Lotus, den man in die Hitze gelegt hat. Der König jedoch aß dank der Kraft der weisen Betrachtung völlig ungerührt. Daraufhin sagte er, um den Prinzen zu beruhigen: „In der Stadt, mein Sohn, erhält man vorzügliche Speise, lass uns dorthin gehen.“ Der Prinz antwortete: „Ja, Vater!“ Daraufhin kehrte er um, indem er jenen vorangehen ließ, auf genau dem Weg, den sie gekommen waren. Auch die Königin, die Mutter des Prinzen, dachte sich: „Der König wird nun, da er den Prinzen bei sich hat, nicht lange im Wald bleiben, sondern in wenigen Tagen umkehren.“ Sie ließ genau an der Stelle, die der König mit dem Wanderstab markiert hatte, eine Umzäunung errichten und schlug dort ihr Lager auf. Der König blieb unweit dieser Umzäunung stehen und schickte den Prinzen voran mit den Worten: „Dort, mein Sohn, sitzt deine Mutter, geh hin!“ Er blieb stehen und blickte ihm nach, bis er jenen Ort erreicht hatte, aus Sorge: „Dass ihm nur niemand ein Leid antut.“ Der Prinz lief eilig zu seiner Mutter. Ārakkhapurisā kumāraṃ āgacchantaṃ disvā deviyā ārocesi. Devī vīsatināṭakitthisahassaparivutā paccuggantvā paṭiggahesi. Rañño ca pavattiṃ pucchi. ‘‘Pacchato āgacchatī’’ti sutvā manusse pesesi. Rājāpi tāvadeva sakavasanaṭṭhānaṃ agamāsi. Manussā rājānaṃ adisvā nivattiṃsu. Tato devī nirāsāva hutvā puttaṃ gahetvā nagaraṃ gantvā rajje abhisiñci. Rājāpi attano vasanaṭṭhāne nisinno vipassitvā paccekabodhiṃ patvā mañjūsakarukkhamūle paccekabuddhānaṃ majjhe imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. Sā atthato uttānā eva. Die Wachmänner sahen den herannahenden Prinzen und meldeten es der Königin. Die Königin, umgeben von zwanzigtausend Tänzerinnen, ging ihm entgegen und nahm ihn in Empfang. Sie erkundigte sich nach dem Ergehen des Königs. Als sie hörte: „Er kommt hinterher“, sandte sie Leute aus. Doch der König kehrte augenblicklich zu seinem eigenen Aufenthaltsort zurück. Da die Männer den König nicht sahen, kehrten sie um. Daraufhin gab die Königin die Hoffnung (auf seine Rückkehr) auf, nahm ihren Sohn mit sich, zog in die Stadt und salbte ihn zum König. Auch der König übte an seinem Aufenthaltsort sitzend Einsichtsmeditation, verwirklichte die Einzelerleuchtung (Paccekabodhi) und sprach am Fuße des Mañjūsaka-Baumes inmitten der Paccekabuddhas diese feierliche Strophe aus. Diese ist von der Bedeutung her ganz offensichtlich. Ayaṃ panetthādhippāyo – yvāyaṃ ekena dutiyena kumārena sītuṇhādīhi nivedentena sahavāsena taṃ saññāpentassa mama vācābhilāpo tasmiṃ sinehavasena abhisajjanā vā jātā. Sacāhaṃ imaṃ na pariccajāmi, tato āyatimpi tatheva hessati, yathā idāni, evaṃ dutiyena saha mamassa vācābhilāpo abhisajjanā vā. ‘‘Ubhayampetaṃ antarāyakaraṃ visesādhigamassā’’ti etaṃ bhayaṃ āyatiṃ pekkhamāno taṃ chaḍḍetvā yoniso paṭipajjitvā paccekabodhimadhigatomhīti. Sesaṃ vuttanayamevāti. Dies aber ist hier die Bedeutung: Durch das Zusammenleben mit dem Prinzen als meinem einzigen Gefährten, der mir von Kälte, Hitze und Ähnlichem klagte, und durch meine Worte, mit denen ich ihn zu beruhigen versuchte, entstand eine liebevolle Anhänglichkeit an ihn. Wenn ich diesen Prinzen nicht aufgebe, dann wird es auch in Zukunft so sein; genau wie jetzt wird es auch künftig beim Zusammensein mit einem Gefährten zu Gesprächen und zu dieser Anhänglichkeit kommen. „Beides aber ist ein Hindernis für die Erlangung der edlen Errungenschaften (der Pfade und Früchte)“ – diese Gefahr für die Zukunft voraussehend, habe ich ihn verlassen, mit weiser Aufmerksamkeit geübt und die Einzelerleuchtung (Paccekabodhi) erlangt. Der Rest versteht sich wie bereits dargelegt. Āyatibhayagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die zukünftige Gefahr ist abgeschlossen. 106. Kāmā hi citrāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira seṭṭhiputto daharova seṭṭhiṭṭhānaṃ labhi. Tassa tiṇṇaṃ utūnaṃ anucchavikā tayo pāsādā ahesuṃ. So sabbasampattīhi devakumāro viya paricāreti. Atha so daharova samāno ‘‘pabbajissāmī’’ti mātāpitaro āpucchi, te naṃ nivārenti. So tatheva nibandhati. Punapi naṃ mātāpitaro ‘‘tvaṃ, tāta, sukhumālo, dukkarā pabbajjā, khuradhārāya upari caṅkamanasadisā’’ti nānappakārehi nivārenti. So [Pg.197] tatheva nibandhati. Te cintesuṃ – ‘‘sacāyaṃ pabbajati, amhākaṃ domanassaṃ hoti. Sace naṃ nivārema, etassa domanassaṃ hoti. Apica amhākaṃ domanassaṃ hotu, mā ca etassā’’ti anujāniṃsu. Tato so sabbaṃ parijanaṃ paridevamānaṃ anādiyitvā isipatanaṃ gantvā paccekabuddhānaṃ santike pabbaji. Tassa uḷārasenāsanaṃ na pāpuṇāti, mañcake taṭṭikaṃ attharitvā sayi. So varasayane kataparicayo sabbarattiṃ atidukkhito ahosi. Pabhāte sarīraparikammaṃ katvā pattacīvaramādāya paccekabuddhehi saddhiṃ piṇḍāya pāvisi. Tattha vuḍḍhā aggāsanañca aggapiṇḍañca labhanti, navakā yaṃkiñcideva āsanalūkhaṃ bhojanañca. So tena lūkhabhojanenāpi atidukkhito ahosi. So katipāhaṃyeva kiso dubbaṇṇo hutvā nibbijji, yathā taṃ aparipakkagate samaṇadhamme. Tato mātāpitūnaṃ dūtaṃ pesetvā uppabbaji. So katipāhaṃyeva balaṃ gahetvā punapi pabbajitukāmo ahosi, tato dutiyampi pabbajitvā punapi uppabbaji. Tatiyavāre pana pabbajitvā sammā paṭipanno vipassitvā paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ vatvā puna paccekabuddhānaṃ majjhe imameva byākaraṇagāthampi abhāsi. 106. Was ist die Entstehungsgeschichte der Strophe, die mit ‚Kāmā hi citrā‘ (Denn die Sinnenfreuden sind mannigfaltig) beginnt? Es heißt, dass in Bārāṇasī der Sohn eines Großkaufmanns schon in jungen Jahren das Amt des Großkaufmanns erhielt. Er besaß drei Paläste, die für die drei Jahreszeiten geeignet waren. Mit allem Reichtum ausgestattet, vergnügte er sich wie ein Göttersohn. Als er noch jung war, bat er seine Eltern: ‚Ich will das Hausleben verlassen‘. Sie hielten ihn davon ab. Doch er beharrte darauf. Wieder hielten ihn seine Eltern auf verschiedene Weise ab: ‚Lieber Sohn, du bist zart und empfindlich; das mönchische Leben ist schwer zu führen, es ist wie das Gehen auf der Schneide einer Rasierklinge.‘ Er beharrte jedoch darauf. Da dachten sie: ‚Wenn er das Hausleben verlässt, wird es uns Kummer bringen. Wenn wir ihn davon abhalten, wird es ihm Kummer bringen. Möge aber lieber uns Kummer treffen und nicht ihn!‘, und gaben ihr Einverständnis. Daraufhin schenkte er dem Weinen seiner gesamten Verwandtschaft keine Beachtung, ging nach Isipatana und trat vor den Paccekabuddhas in den Orden ein. Ihm stand keine vorzügliche Unterkunft zu; er musste auf einer kleinen Pritsche schlafen, auf der er eine Bastmatte ausbreitete. Da er an ein vorzügliches Lager gewöhnt war, litt er die ganze Nacht hindurch große Pein. Am Morgen verrichtete er seine Körperpflege, nahm Schale und Gewand und ging zusammen mit den Paccekabuddhas auf Almosengang. Dort erhielten die Älteren den Ehrenplatz und die beste Almosenspeise, die Neulinge jedoch irgendeinen kärglichen Platz und dürftige Nahrung. Auch durch diese dürftige Nahrung litt er große Not. Nach nur wenigen Tagen wurde er mager und unansehnlich und wurde desillusioniert, da seine mönchische Praxis noch nicht ausgereift war. Daraufhin sandte er einen Boten zu seinen Eltern und trat aus dem Orden aus. Nach nur wenigen Tagen kam er wieder zu Kräften und wünschte erneut, das Hausleben zu verlassen. Daraufhin trat er ein zweites Mal in den Orden ein und trat wiederum aus. Beim dritten Mal jedoch, nachdem er das Hausleben verlassen hatte, übte er sich rechtmäßig, übte Einsicht und verwirklichte die Paccekabodhi, sprach diese Udāna-Strophe und verkündete inmitten der Paccekabuddhas eben diese Erklärungsstrophe. Tattha kāmāti dve kāmā vatthukāmo ca kilesakāmo ca. Tattha vatthukāmo nāma piyarūpādiārammaṇadhammo, kilesakāmo nāma sabbo rāgappabhedo. Idha pana vatthukāmo adhippeto. Rūpādianekappakāravasena citrā. Lokassādavasena madhurā. Bālaputhujjanānaṃ manaṃ ramāpentīti manoramā. Virūparūpenāti vividhena rūpena, anekavidhena sabhāvenāti vuttaṃ hoti. Te hi rūpādivasena citrā, rūpādīsupi nīlādivasena vividharūpā. Evaṃ tena tena virūparūpena tathā tathā assādaṃ dassetvā mathenti cittaṃ, pabbajjāya abhiramituṃ na dentīti. Sesamettha pākaṭameva. Nigamanampi dvīhi tīhi vā padehi yojetvā purimagāthāsu vuttanayeneva veditabbanti. Darin bezeichnet ‚kāmā‘ (Sinnenfreuden) zwei Arten von Begehren: das Begehren nach Objekten (vatthukāma) und das Befleckungs-Begehren (kilesakāma). Darunter versteht man unter ‚Begehren nach Objekten‘ die angenehmen Objekte wie Formen und so weiter; unter ‚Befleckungs-Begehren‘ versteht man jegliche Art von Gier. Hier jedoch ist das Begehren nach Objekten gemeint. ‚Citrā‘ (mannigfaltig) bedeutet: aufgrund der verschiedenen Arten von Formen und so weiter. ‚Madhurā‘ (süß) bedeutet: wegen des weltlichen Genusses. Sie erfreuen den Geist der törichten Weltlinge, daher heißen sie ‚manoramā‘ (herzerfreuend). ‚Virūparūpena‘ bedeutet: mit vielfältiger Gestalt, von mannigfacher Natur – so ist es gemeint. Denn sie sind mannigfaltig durch Formen und so weiter, und selbst unter den Formen sind sie von verschiedener Gestalt durch Farben wie Blau und so weiter. Auf diese Weise verwirren sie den Geist, indem sie durch diese verschiedenen Gestalten auf die eine oder andere Weise Vergnügen vorgaukeln, und lassen sie keine Freude am mönchischen Leben finden. Das Übrige ist hierbei offensichtlich. Auch die Schlussfolgerung ist zu verstehen, indem man sie mit zwei oder drei Worten verknüpft, genau in der Weise, wie es in den vorhergehenden Strophen erklärt wurde. Kāmagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Sinnenfreuden ist abgeschlossen. 107. Ītī cāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira rañño gaṇḍo udapādi, bāḷhā vedanā vaḍḍhanti. Vejjā ‘‘satthakammena vinā phāsu na hotī’’ti bhaṇanti[Pg.198]. Rājā tesaṃ abhayaṃ datvā satthakammaṃ kārāpesi. Te taṃ phāletvā pubbalohitaṃ nīharitvā nivedanaṃ katvā vaṇaṃ pilotikena bandhiṃsu. Lūkhamaṃsāhāresu ca naṃ sammā ovadiṃsu. Rājā lūkhabhojanena kisasarīro ahosi, gaṇḍo cassa milāyi. So phāsukasaññī hutvā siniddhāhāraṃ bhuñji, tena sañjātabalo visayeyeva paṭisevi, tassa gaṇḍo purimasabhāvameva sampāpuṇi. Evaṃ yāva tikkhattuṃ satthakammaṃ kārāpetvā vejjehi parivajjito nibbinditvā mahārajjaṃ pahāya pabbajitvā araññaṃ pavisitvā vipassanaṃ ārabhitvā sattahi vassehi paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ bhāsitvā nandamūlakapabbhāraṃ agamāsi. 107. Was ist die Entstehungsgeschichte der Strophe, die mit ‚Ītī ca‘ (Und eine Plage) beginnt? Es heißt, dass dem König von Bārāṇasī ein Geschwür wuchs; heftige Schmerzen nahmen zu. Die Ärzte sagten: ‚Ohne einen operativen Eingriff wird es keine Besserung geben.‘ Der König gewährte ihnen Schutz vor Strafe und ließ den Eingriff durchführen. Sie schnitten es auf, holten Eiter und Blut heraus, linderten den Schmerz und verbanden die Wunde mit einem Leinentuch. Sie wiesen ihn nachdrücklich an, nur kärgliche Speisen zu sich zu nehmen. Durch die kärgliche Nahrung wurde der König mager, doch sein Geschwür schrumpfte. Da er glaubte, er sei genesen, nahm er fette Speisen zu sich, und als er dadurch wieder zu Kräften gekommen war, gab er sich den Sinnenfreuden hin. Dadurch kehrte sein Geschwür genau in den früheren Zustand zurück. Nachdem er sich auf diese Weise bis zu dreimal operieren lassen musste und schließlich von den Ärzten aufgegeben worden war, wurde er desillusioniert, gab sein großes Königreich auf, trat in den Orden ein, zog in den Wald, begann mit der Einsichtspraxis und verwirklichte nach sieben Jahren die Paccekabodhi. Nachdem er diese Udāna-Strophe gesprochen hatte, begab er sich zur Nandamūlaka-Bergschlucht. Tattha etīti īti, āgantukānaṃ akusalabhāgīnaṃ byasanahetūnaṃ etaṃ adhivacanaṃ. Tasmā kāmaguṇāpi ete anekabyasanāvahaṭṭhena anatthānaṃ sannipātaṭṭhena ca īti. Gaṇḍopi asuciṃ paggharati, uddhumātaparipakkaparibhinno hoti. Tasmā ete kilesāsucipaggharaṇato uppādajarābhaṅgehi uddhumātaparipakkaparibhinnabhāvato ca gaṇḍo. Upaddavatīti upaddavo, anatthaṃ janento abhibhavati ajjhottharatīti attho, rāgagaṇḍādīnametamadhivacanaṃ. Tasmā kāmaguṇāpete aviditanibbānatthāvahahetutāya sabbupaddavakammaparivatthutāya ca upaddavo. Yasmā panete kilesāturabhāvaṃ janentā sīlasaṅkhātaṃ ārogyaṃ loluppaṃ vā uppādentā pākatikameva ārogyaṃ vilumpanti, tasmā iminā ārogyavilumpanaṭṭhena rogo. Abbhantaramanupaviṭṭhaṭṭhena pana antotudanaṭṭhena ca dunnīharaṇīyaṭṭhena ca sallaṃ. Diṭṭhadhammikasamparāyikabhayāvahanato bhayaṃ. Me etanti metaṃ. Sesamettha pākaṭameva. Nigamanampi vuttanayeneva veditabbanti. Darin bezeichnet ‚ītī‘ eine Plage; dies ist eine Bezeichnung für die von außen kommenden, dem Unheilsamen zugehörigen Ursachen des Verderbens. Daher sind auch diese Fesseln der Sinnenlust eine Plage (īti), weil sie vielfältiges Verderben herbeiführen und eine Ansammlung von Unheil darstellen. Auch ein Geschwür sondert Unreinheit ab, schwillt an, reift und bricht auf. Ebenso sind diese Befleckungen ein Geschwür, weil sie Unreinheit absondern und aufgrund von Entstehen, Altern und Vergehen im Zustand des Anschwellens, Reifens und Aufbrechens sind. ‚Upaddavo‘ (Unglück) bedeutet ‚das, was herbeistürzt‘; es bedeutet, dass es Unheil erzeugt, überwältigt und überschwemmt. Dies ist eine Bezeichnung für das Geschwür der Gier und so weiter. Daher ist der Sinnenhauch ein Unglück, weil er die Unwissenheit über das Erlangen des Nibbāna herbeiführt und die Grundlage für alle unheilvollen Handlungen bildet. Da aber diese Befleckungen einen Zustand der Krankheit erzeugen, indem sie Gier hervorrufen und die als Tugend bekannte Gesundheit zerstören, und so die natürliche Gesundheit rauben, nennt man sie wegen dieses Zerstörens der Gesundheit ‚Krankheit‘ (roga). Wegen des Eindringens ins Innere, des inneren Schmerzzufügens und der schweren Entfernbarkeit nennt man sie ‚Pfeil‘ (salla). Weil sie Schrecken in der gegenwärtigen und in der zukünftigen Welt herbeiführen, nennt man sie ‚Furcht‘ (bhaya). ‚Metaṃ‘ steht für ‚me etaṃ‘ (dies ist mir...). Das Übrige ist hierbei offensichtlich. Auch die Schlussfolgerung ist in der bereits erwähnten Weise zu verstehen. Ītigāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Plage ist abgeschlossen. 108. Sītañcāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira sītālukabrahmadatto nāma rājā ahosi. So pabbajitvā araññe tiṇakuṭikāya viharati. Tasmiñca padese sīte sītaṃ, uṇhe daṇhameva hoti abbhokāsattā padesassa. Gocaragāme bhikkhā yāvadatthaṃ na labbhati, pānīyampi dullabhaṃ, vātātapaḍaṃsasarīsapāpi bādhenti. Tassa etadahosi – ‘‘ito [Pg.199] aḍḍhayojanamatte sampanno padeso, tattha sabbepi ete parissayā natthi, yaṃnūnāhaṃ tattha gaccheyyaṃ, phāsukaṃ viharantena sakkā sukhamadhigantu’’nti? Tassa puna ahosi – ‘‘pabbajitā nāma na paccayagiddhā honti, evarūpañca cittaṃ attano vase vattāpenti, na cittassa vase vattanti, nāhaṃ gamissāmī’’ti evaṃ paccavekkhitvā na agamāsi. Evaṃ yāvatatiyakaṃ uppannacittaṃ paccavekkhitvā nivattesi. Tato tattheva satta vassāni vasitvā sammā paṭipajjamāno paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ bhāsitvā nandamūlakapabbhāraṃ agamāsi. 108. Was ist das Vorkommnis für die Strophe beginnend mit 'Sītañca' ('Und die Kälte')? In Bārāṇasī gab es einst, so heißt es, einen König namens Sītāluka-Brahmadatta. Dieser entsagte der Welt, zog in die Hauslosigkeit und lebte in einer Grashütte im Wald. In jener Gegend war es in der kalten Jahreszeit extrem kalt und in der heißen Jahreszeit extrem heiß, weil dieses Gebiet völlig offen unter freiem Himmel lag. Im Almosendorf erhielt er nicht genügend Almosen zum Lebensunterhalt, auch Trinkwasser war nur schwer zu bekommen, und zudem quälten ihn Wind, Hitze, Bremsen und Kriechtiere. Da kam ihm folgender Gedanke: 'Nur eine halbe Yojana von hier entfernt gibt es eine reich ausgestattete Gegend; dort existieren all diese Gefahren nicht. Wie wäre es, wenn ich dorthin ginge? Wenn ich dort in angenehmer Weise lebe, wird es mir möglich sein, das Glück des Pfades und der Frucht zu erlangen.' Doch dann dachte er wiederum: 'Diejenigen, die der Welt entsagt haben, dürfen wahrlich nicht nach den Requisiten gieren. Sie bringen einen solchen Geist unter ihre eigene Kontrolle und folgen nicht der Kontrolle des Geistes. Ich werde nicht gehen.' Nachdem er so reflektiert hatte, ging er nicht. Als dieser Gedanke bis zu dreimal in ihm aufstieg, wies er ihn durch diese Reflexion ab. Daraufhin lebte er genau dort sieben Jahre lang, praktizierte pflichtbewusst, verwirklichte die Einzelbuddhaschaft, sprach diese Udāna-Strophe und begab sich zur Nandamūla-Berghöhle. Tattha sītañcāti sītaṃ duvidhaṃ abbhantaradhātukkhobhapaccayañca bāhiradhātukkhobhapaccayañca, tathā uṇhampi. Ḍaṃsāti piṅgalamakkhikā. Sarīsapāti ye keci dīghajātikā sarantā gacchanti. Sesaṃ pākaṭameva. Nigamanampi vuttanayeneva veditabbanti. Darin bedeutet: 'Sītañca' (Und die Kälte): Die Kälte ist zweifacher Art, nämlich die durch die Störung der inneren Elemente verursachte und die durch die Störung der äußeren Elemente verursachte; ebenso verhält es sich mit der Hitze. 'Ḍaṃsā' bezeichnet gelbbraune Fliegen (Bremsen). 'Sarīsapā' sind alle Kriechtiere mit langem Körper, die kriechend vorankommen. Der Rest ist völlig offensichtlich. Die Schlussfolgerung ist ebenfalls in der bereits beschriebenen Weise zu verstehen. Sītālukagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über Sītāluka ist abgeschlossen. 109. Nāgovāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira aññataro rājā vīsati vassāni rajjaṃ kāretvā kālaṅkato niraye vīsati vassāni eva paccitvā, himavantappadese hatthiyoniyaṃ uppajjitvā sañjātakkhandho padumavaṇṇasakalasarīro uḷāro yūthapati mahānāgo ahosi. Tassa obhaggobhaggasākhābhaṅgāni hatthichāpāva khādanti, ogāhepi naṃ hatthiniyo kaddamena vilimpiṃsu, sabbaṃ pālileyyakanāgasseva ahosi. So yūthā nibbijjitvā pakkāmi. Tato naṃ padānusārena yūthā anubandhanti, evaṃ yāvatatiyaṃ pakkantampi anubandhiṃsuyeva. Tato cintesi ‘‘idāni mayhaṃ nattako bārāṇasiyaṃ rajjaṃ kāreti, yaṃnūnāhaṃ attano purimajātiyā uyyānaṃ gaccheyyaṃ. Tatra so maṃ rakkhissatī’’ti. Tato rattiyaṃ niddupagate yūthe yūthaṃ pahāya tameva uyyānaṃ pāvisi. Uyyānapālo disvā rañño ārocesi. Rājā ‘‘hatthiṃ gahessāmī’’ti senāya parivāresi. Hatthī rājānameva abhimukho gacchati. Rājā ‘‘maṃ abhimukho etī’’ti khurappaṃ sannayhitvā aṭṭhāsi. Tato hatthī ‘‘vijjheyyāpi maṃ eso’’ti mānusikāya vācāya ‘‘brahmadatta, mā maṃ vijjha, ahaṃ te ayyako’’ti āha. Rājā ‘‘kiṃ bhaṇasī’’ti sabbaṃ pucchi. Hatthīpi rajje ca narake ca hatthiyoniyañca pavattiṃ sabbaṃ [Pg.200] ārocesi. Rājā ‘‘sundaraṃ mā bhāyi, mā kañci bhiṃsāpehī’’ti hatthino vaṭṭañca ārakkhake ca hatthibhaṇḍe ca upaṭṭhāpesi. 109. Was ist das Vorkommnis für die Strophe beginnend mit 'Nāgovā' ('Wie ein Elefant')? In Bārāṇasī regierte einst, so heißt es, ein gewisser König zwanzig Jahre lang das Reich. Nach seinem Tod litt er genau zwanzig Jahre lang in der Hölle, wurde danach im Himavanta-Gebiet im Schoß eines Elefanten wiedergeboren und wuchs zu einem edlen, großartigen Herdenführer heran – einem riesigen Elefanten mit wohlgeformtem Körper und einer Hautfarbe wie ein Lotus. Die jungen Elefanten fraßen ihm die heruntergebogenen Zweige und Äste weg, und selbst wenn er ins Wasser stieg, beschmierten ihn die Elefantenkühe mit Schlamm. Alles erging ihm genau wie dem Elefanten Pālileyyaka. Der Herde überdrüssig geworden, ging er fort. Daraufhin folgte ihm die Herde anhand seiner Fußspuren; selbst als er bis zu dreimal weglief, folgten sie ihm dennoch. Da dachte er: 'Jetzt regiert mein Enkel das Reich in Bārāṇasī. Wie wäre es, wenn ich in den königlichen Park meines früheren Lebens ginge? Dort wird er mich beschützen.' Als die Herde in der Nacht eingeschlafen war, verließ er sie und betrat genau jenen Park. Als der Parkwächter ihn sah, meldete er es dem König. Der König dachte: 'Ich werde den Elefanten fangen', und umstellte ihn mit seinem Heer. Der Elefant ging direkt auf den König zu. Der König sah, dass er auf ihn zukam, hielt seinen hufförmigen Pfeil bereit und blieb stehen. Da dachte der Elefant: 'Er könnte auf mich schießen', und sprach mit menschlicher Stimme: 'Brahmadatta, schieß nicht auf mich, ich bin dein Großvater!' Der König fragte erstaunt: 'Was sagst du da?' und befragte ihn eingehend. Der Elefant berichtete ihm alles über seine frühere Herrschaft, sein Dasein in der Hölle und seine Wiedergeburt im Elefantenkörper. Der König sprach: 'Es ist gut, fürchte dich nicht, und erschrecke niemanden!', und stellte Futter, Wächter und Elefantenpfleger für den Elefanten bereit. Athekadivasaṃ rājā hatthikkhandhavaragato ‘‘ayaṃ vīsati vassāni rajjaṃ kāretvā niraye paccitvā pakkāvasesena tiracchānayoniyaṃ uppanno, tatthāpi gaṇasaṃvāsasaṅghaṭṭanaṃ asahanto idhāgatosi, aho dukkhova gaṇasaṃvāso, ekībhāvo eva pana sukho’’ti cintetvā tattheva vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchākāsi. Taṃ lokuttarasukhena sukhitaṃ amaccā upasaṅkamitvā paṇipātaṃ katvā ‘‘yānakālo, mahārājā’’ti āhaṃsu. Tato ‘‘nāhaṃ, rājā’’ti vatvā purimanayeneva imaṃ gāthamabhāsi. Sā padatthato pākaṭā eva. Eines Tages dachte der König, der auf dem edlen Nacken des Elefanten ritt: 'Dieser hier hat zwanzig Jahre lang die Herrschaft ausgeübt, litt in der Hölle und wurde aufgrund der verbleibenden Kamma-Wirkungen im Schoß eines Tieres wiedergeboren. Doch selbst dort konnte er die Reibung und Bedrängnis des Zusammenlebens in der Herde nicht ertragen und ist hierhergekommen. Ach, wahrlich leidvoll ist das Zusammenleben in einer Gemeinschaft, allein zu sein aber ist glückselig!' Nachdem er so nachgedacht hatte, leitete er genau dort die Einsichtsmeditation ein und verwirklichte die Einzelbuddhaschaft. Als er so im überweltlichen Glück verweilte, näherten sich ihm die Minister, erwiesen ihm Ehrerbietung und sagten: 'Es ist Zeit für den Aufbruch, o großer König.' Daraufhin sagte er: 'Ich bin kein König mehr', und sprach in der bereits erwähnten Weise diese Strophe. Sie ist nach der Wortbedeutung völlig klar. Ayaṃ panettha adhippāyayojanā – sā ca kho yuttivaseneva, na anussavavasena. Yathā ayaṃ hatthī ariyakantesu sīlesu dantattā adantabhūmiṃ nāgacchatīti vā, sarīramahantatāya vā nāgo, evaṃ kudāssu nāmāhampi ariyakantesu sīlesu dantattā adantabhūmiṃ nāgamanena, āgumakaraṇena, puna itthattaṃ anāgamanena ca guṇasarīramahantatāya vā nāgo bhaveyyaṃ. Yathā cesa yūthāni vivajjayitvā ekacariyasukhena yathābhirantaṃ viharaṃ araññe eko care khaggavisāṇakappo, kudāssu nāmāhampi evaṃ gaṇaṃ vivajjetvā ekavihārasukhena yathābhirantaṃ viharaṃ araññe attano yathā yathā sukhaṃ, tathā tathā yattakaṃ vā icchāmi, tattakaṃ araññe nivāsaṃ eko care khaggavisāṇakappo eko careyyanti attho. Yathā cesa susaṇṭhitakkhandhamahantatāya sañjātakkhandho, kudāssu nāmāhampi evaṃ asekhasīlakkhandhamahantatāya sañjātakkhandho bhaveyyaṃ. Yathā cesa padumasadisagattatāya vā, padumakule uppannatāya vā padumī, kudāssu nāmāhampi evaṃ padumasadisaujukatāya vā, ariyajātipadume uppannatāya vā padumī bhaveyyaṃ. Yathā cesa thāmabalādīhi uḷāro, kudāssu nāmāhampi evaṃ parisuddhakāyasamācāratādīhi sīlasamādhinibbedhikapaññādīhi vā uḷāro bhaveyyanti. Evaṃ cintento vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ adhigatomhīti. Dies ist hierbei die Verknüpfung der Absicht – und diese beruht wahrlich auf Vernunftgründen und nicht auf bloßer Überlieferung. Ebenso wie dieser Elefant aufgrund seiner Gezähmtheit in den von den Edlen geliebten Tugenden nicht auf ungezähmten Boden gelangt, oder wegen der Größe seines Körpers ein 'Nāga' genannt wird, ebenso möge auch ich eines Tages durch Gezähmtheit in den von den Edlen geliebten Tugenden nicht auf ungezähmten Boden gelangen, indem ich keine Sünden begehe, nicht wieder in dieses irdische Dasein zurückkehre und aufgrund der Größe meines Tugendkörpers ein wahrer 'Nāga' sein. Und ebenso wie dieser Elefant, nachdem er die Herden gemieden hat, im Glück des Alleinwanderns nach Belieben im Wald verweilt – 'er wandere allein wie das Horn eines Nashorns' –, ebenso möge auch ich eines Tages die Gemeinschaft meiden, im Glück des Alleinseins nach Belieben im Wald verweilen, und wie es mir jeweils gefällt, so lange ich es wünsche, meinen Aufenthalt im Wald nehmen und als Einzelgänger wandern wie das Horn eines Nashorns – das ist die Bedeutung von 'eko care khaggavisāṇakappo'. Und ebenso wie dieser Elefant aufgrund seines wohlgeformten, mächtigen Rumpfes als 'sañjātakkhandha' bezeichnet wird, ebenso möge auch ich eines Tages aufgrund der Fülle der Tugendgruppe des Unerschütterlichen ein 'sañjātakkhandha' sein. Und ebenso wie dieser Elefant wegen seiner lotosgleichen Glieder oder wegen seiner Geburt in einer Lotos-Familie 'padumī' genannt wird, ebenso möge auch ich eines Tages wegen meiner lotosgleichen Aufrichtigkeit oder wegen meiner Geburt in der edlen Familie 'padumī' sein. Und ebenso wie dieser Elefant an Kraft und Stärke überragend ist, ebenso möge auch ich eines Tages durch völlig reines körperliches Verhalten sowie durch Tugend, Konzentration und durchdringende Weisheit überragend und edel sein. Indem er so dachte und die Einsichtsmeditation einleitete, erlangte er die Einzelbuddhaschaft – so ist es zu verstehen. Nāgagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Elefanten (Nāga) ist abgeschlossen. 110. Aṭṭhānatanti [Pg.201] kā uppatti? Bārāṇasirañño kira putto daharo eva samāno pabbajitukāmo mātāpitaro yāci. Mātāpitaro naṃ nivārenti. So nivāriyamānopi nibandhatiyeva ‘‘pabbajissāmī’’ti. Tato pubbe vuttaseṭṭhiputtaṃ viya sabbaṃ vatvā anujāniṃsu. ‘‘Pabbajitvā ca uyyāneyeva vasitabba’’nti paṭijānāpesuṃ, so tathā akāsi. Tassa mātā pātova vīsatisahassanāṭakitthiparivutā uyyānaṃ gantvā puttaṃ yāguṃ pāyetvā antarā khajjakādīni ca khādāpetvā yāva majjhanhikasamayā tena saddhiṃ samullapitvā nagaraṃ pavisati. Pitāpi majjhanhike āgantvā taṃ bhojetvā attanāpi bhuñjitvā divasaṃ tena saddhiṃ samullapitvā sāyanhasamayaṃ paṭijagganakapurise ṭhapetvā nagaraṃ pavisati. So evaṃ rattindivaṃ avivitto viharati. 110. Was ist die Entstehung der Strophe 'Aṭṭhānaṃ taṃ'? Es heißt, der Sohn des Königs von Bārāṇasī bat, als er noch jung war, seine Eltern darum, das Hausleben verlassen zu dürfen. Die Eltern hielten ihn davon ab. Obwohl er zurückgehalten wurde, bestand er beharrlich darauf und sagte: 'Ich werde das Hausleben verlassen.' Danach sprachen sie zu ihm in der Weise wie im Fall des zuvor erwähnten Kaufmannssohnes alles aus und gaben schließlich ihre Erlaubnis. Sie ließen ihn versprechen: 'Nach dem Hinausgehen in die Hauslosigkeit musst du im königlichen Park wohnen', und er tat dies. Seine Mutter ging am frühen Morgen, umgeben von zwanzigtausend Tänzerinnen, in den Park, ließ ihren Sohn Reisbrei trinken, reichte ihm zwischendurch Knabbereien und andere Speisen zum Essen, unterhielt sich mit ihm bis zum Mittag und kehrte dann in die Stadt zurück. Auch der Vater kam am Mittag, speiste ihn, aß selbst ebenfalls, unterhielt sich mit ihm den ganzen Tag lang, stellte am Abend Wächter auf und kehrte in die Stadt zurück. So lebte er Tag und Nacht ohne Abgeschiedenheit. Tena kho pana samayena ādiccabandhu nāma paccekabuddho nandamūlakapabbhāre viharati. So āvajjento taṃ addasa – ‘‘ayaṃ kumāro pabbajituṃ asakkhi, jaṭaṃ chindituṃ na sakkotī’’ti. Tato paraṃ āvajji – ‘‘attano dhammatāya nibbijjissati nu kho, no’’ti. Atha ‘‘dhammatāya nibbindanto aticiraṃ bhavissatī’’ti ñatvā ‘‘tassa ārammaṇaṃ dassessāmī’’ti purimanayeneva manosilātalato āgantvā uyyāne aṭṭhāsi. Rājaparisā disvā ‘‘paccekabuddho āgato, mahārājā’’ti ārocesi. Rājā ‘‘idāni me putto paccekabuddhena saddhiṃ anukkaṇṭhito vasissatī’’ti pamuditamano hutvā paccekabuddhaṃ sakkaccaṃ upaṭṭhahitvā tattheva vāsaṃ yācitvā paṇṇasālādivāvihāracaṅkamādisabbaṃ kāretvā vāsesi. So tattha vasanto ekadivasaṃ okāsaṃ labhitvā kumāraṃ pucchi – ‘‘kosi tva’’nti? ‘‘Ahaṃ pabbajito’’ti. ‘‘Pabbajitā nāma na īdisā hontī’’ti. Atha ‘‘bhante, kīdisā honti, kiṃ mayhaṃ ananucchavika’’nti vutte ‘‘tvaṃ attano ananucchavikaṃ na pekkhasi, nanu te mātā vīsatisahassitthīti saddhiṃ pubbaṇhasamaye āgacchantī uyyānaṃ avivittaṃ karoti, pitā cassa mahatā balakāyena sāyanhasamaye jagganakaparisā sakalaṃ rattiṃ, pabbajitā nāma tava sadisā na honti, īdisā pana hontī’’ti tattha ṭhitasseva iddhiyā himavante aññataraṃ vihāraṃ dassesi. So tattha paccekabuddhe ālambanaphalakaṃ nissāya ṭhite ca caṅkamante ca rajanakakammasūcikammādīni karonte ca disvā āha – ‘‘tumhe idha nāgacchatha, pabbajjā ca tumhehi anuññātā’’ti[Pg.202]? ‘‘Āma, pabbajjā anuññātā, pabbajitakālato paṭṭhāya samaṇā nāma attano nissaraṇaṃ kātuṃ, padesañca icchitaṃ patthitaṃ gantuṃ labhanti, ettakaṃva vaṭṭatī’’ti vatvā ākāse ṭhatvā aṭṭhāna taṃ saṅgaṇikāratassa, yaṃ phassaye sāmayikaṃ vimuttinti imaṃ upaḍḍhugāthaṃ vatvā dissamānoyeva ākāsena nandamūlakapabbhāraṃ agamāsi. Evaṃ gate paccekabuddhe so attano paṇṇasālaṃ pavisitvā nipajji. Ārakkhapurisopi ‘‘sayito kumāro, idāni kuhiṃ gamissatī’’ti pamatto niddaṃ okkami. So tassa pamattabhāvaṃ ñatvā pattacīvaramādāya araññaṃ pāvisi. Tatra ca ṭhito vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchikatvā paccekabuddhaṭṭhānaṃ gato. Tatra ca ‘‘kathamadhigata’’nti pucchito ādiccabandhunā vuttaṃ upaḍḍhagāthaṃ paripuṇṇaṃ katvā abhāsi. Zu jener Zeit lebte ein Paccekabuddha namens Ādiccabandhu in der Nandamūla-Berghöhle. Als er seine Aufmerksamkeit darauf richtete, sah er jenen Prinzen und dachte: 'Dieser Prinz konnte das Hausleben verlassen, aber er kann das Dickicht [des Begehrens] nicht durchschneiden.' Danach dachte er nach: 'Wird er durch seine eigene Natur der Dinge ernüchtert werden oder nicht?' Als er erkannte: 'Wenn er durch die bloße eigene Natur ernüchtert wird, wird es allzu lange dauern', dachte er: 'Ich werde ihm ein Objekt zur Anregung zeigen.' Wie zuvor beschrieben kam er von der Manosilā-Felsplatte und stellte sich im Park auf. Das Gefolge des Königs sah ihn und berichtete dem König: 'Ein Paccekabuddha ist gekommen, o großer König!' Der König dachte freudigen Herzens: 'Nun wird mein Sohn ohne Überdruss mit dem Paccekabuddha zusammenleben.' Er diente dem Paccekabuddha ehrerbietig, bat ihn, genau dort zu verweilen, ließ eine Blätterhütte, einen Ort für den Tagaufenthalt, einen Gehweg und alles andere herrichten und ließ ihn dort wohnen. Während jener dort wohnte, ergriff er eines Tages die Gelegenheit und fragte den Prinzen: 'Wer bist du?' 'Ich bin einer, der das Hausleben verlassen hat.' 'Diejenigen, die das Hausleben verlassen haben, sind wahrlich nicht so wie du.' Als er daraufhin fragte: 'Ehrwürdiger Herr, wie sind sie denn? Was wäre für mich angemessen?', sprach der Paccekabuddha: 'Du siehst nicht, was für dich angemessen ist. Kommt nicht deine Mutter am Vormittag mit zwanzigtausend Frauen hierher und nimmt dem Park die Abgeschiedenheit? Und dein Vater kommt am Abend mit einem großen Gefolge, und die Wächter nehmen dem Park die ganze Nacht hindurch die Abgeschiedenheit. Diejenigen, die das Hausleben verlassen haben, sind nicht wie du. Sie sind vielmehr so.' Und während er dort stand, zeigte er ihm durch magische Kraft ein bestimmtes Kloster im Himālaya. Als der Prinz dort die Paccekabuddhas sah, wie sie sich an ein Anlehnebrett lehnten, auf- und abgingen, Färbearbeiten, Näharbeiten und dergleichen verrichteten, fragte er: 'Kommt ihr nicht hierher? Ist euch das Hinausgehen in die Hauslosigkeit erlaubt?' 'Ja, das Hinausgehen in die Hauslosigkeit ist erlaubt. Von der Zeit des Hinausgehens an ist es für Asketen angemessen, für ihre eigene Befreiung zu wirken und an jeden gewünschten, ersehnten Ort zu gehen; so viel ist erlaubt.' Nach diesen Worten erhob er sich in die Luft und sprach diese halbe Strophe: 'Es ist unmöglich für einen, der die Gesellschaft schätzt, dass er die zeitweilige Befreiung erlangt.' Und während er noch sichtbar war, reiste er durch die Luft zur Nandamūla-Berghöhle zurück. Nachdem der Paccekabuddha so gegangen war, betrat der Prinz seine Blätterhütte und legte sich hin. Auch der Wächter dachte unachtsam: 'Der Prinz schläft; wohin sollte er jetzt gehen?', und schlief ein. Als der Prinz dessen Unachtsamkeit bemerkte, nahm er Almosenschale und Gewänder und ging in den Wald. Dort verweilend begann er mit der Einsichtsmeditation, verwirklichte die Einzelbuddhaschaft und begab sich zum Aufenthaltsort der Paccekabuddhas. Als er dort gefragt wurde: 'Wie hast du es erlangt?', trug er die von Ādiccabandhu gesprochene halbe Strophe in vollendeter Form vor. Tassattho – aṭṭhāna tanti aṭṭhānaṃ taṃ, akāraṇaṃ tanti vuttaṃ hoti. Anunāsikalopo kato ‘‘ariyasaccāna dassana’’ntiādīsu (khu. pā. 5.11; su. ni. 270) viya. Saṅgaṇikāratassāti gaṇābhiratassa. Yanti kāraṇavacanametaṃ ‘‘yaṃ hirīyati hirīyitabbenā’’tiādīsu (dha. sa. 30) viya. Phassayeti adhigacche. Sāmayikaṃ vimuttinti lokiyasamāpattiṃ. Sā hi appitappitasamaye eva paccatthikehi vimuccanato ‘‘sāmayikā vimuttī’’ti vuccati. Taṃ sāmayikaṃ vimuttiṃ. Aṭṭhānaṃ taṃ, na taṃ kāraṇaṃ vijjati saṅgaṇikāratassa, yena kāraṇena vimuttiṃ phassaye iti etaṃ ādiccabandhussa paccekabuddhassa vaco nisamma saṅgaṇikāratiṃ pahāya yoniso paṭipajjanto adhigatomhīti āha. Sesaṃ vuttanayamevāti. Der Sinn davon ist: 'aṭṭhāna taṃ' bedeutet 'dies ist unmöglich', das heißt, es gibt keinen Grund dafür. Der Ausfall des Nasalvokals wurde vorgenommen, wie in Passagen wie 'ariyasaccāna dassanaṃ' und anderen. 'Saṅgaṇikāratassā' bedeutet: für jemanden, der Freude an der Gesellschaft hat. 'Yaṃ' ist ein Wort, das den Grund bezeichnet, wie in Passagen wie 'yaṃ hirīyati hirīyitabbena' und anderen. 'Phassaye' bedeutet: er möge erlangen. 'Sāmayikaṃ vimuttiṃ' bedeutet: die weltliche Errungenschaft. Denn diese wird 'zeitweilige Befreiung' genannt, weil man genau im Moment der Vertiefung von den gegnerischen Zuständen befreit ist. Er sagte: 'Diese zeitweilige Befreiung – das ist unmöglich; es gibt keinen solchen Grund für jemanden, der die Gesellschaft schätzt, wodurch er die Befreiung erlangen könnte.' Nachdem er diese Worte des Paccekabuddha Ādiccabandhu vernommen, die Freude an der Gesellschaft aufgegeben und weise praktiziert hatte, sprach er: 'Ich habe es erlangt.' Der Rest ist genau wie zuvor erklärt zu verstehen. Aṭṭhānagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Aṭṭhāna-Strophe ist abgeschlossen. Dutiyavaggo niṭṭhito. Das zweite Kapitel ist abgeschlossen. 111. Diṭṭhīvisūkānīti kā uppatti? Aññataro kira bārāṇasirājā rahogato cintesi – ‘‘yathā sītādīnaṃ paṭighātakāni uṇhādīni atthi, atthi nu kho evaṃ vaṭṭapaṭighātakaṃ vivaṭṭaṃ, no’’ti? So amacce pucchi – ‘‘vivaṭṭaṃ jānāthā’’ti? Te ‘‘jānāma, mahārājā’’ti āhaṃsu. Rājā ‘‘kiṃ ta’’nti? Tato ‘‘antavā loko’’tiādinā nayena sassatucchedaṃ kathesuṃ. Rājā ‘‘ime na jānanti, sabbepime diṭṭhigatikā’’ti [Pg.203] sayameva tesaṃ vilomatañca ayuttatañca disvā ‘‘vaṭṭapaṭighātakaṃ vivaṭṭaṃ atthi, taṃ gavesitabba’’nti cintetvā rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchākāsi. Imañca udānagāthaṃ abhāsi paccekabuddhānaṃ majjhe byākaraṇagāthañca. 111. Was ist die Entstehung der Strophe 'Diṭṭhīvisūkāni'? Es heißt, ein gewisser König von Bārāṇasī zog sich an einen einsamen Ort zurück und dachte nach: 'So wie es Wärme und andere Dinge gibt, die Kälte und Ähnliches vertreiben, gibt es da nicht ebenso ein Aufhören der Runden der Wiedergeburten, das den Kreislauf des Leidens durchbricht, oder nicht?' Er fragte seine Minister: 'Kennt ihr das Aufhören des Kreislaufs?' Sie antworteten: 'Wir kennen es, o großer König!' Der König fragte: 'Was ist es?' Daraufhin erklärten sie die Ansichten vom Ewigen und von der Vernichtung in der Weise wie 'Die Welt ist endlich' und so weiter. Der König erkannte selbst deren Widersprüchlichkeit und Unangemessenheit und dachte: 'Diese Männer wissen es nicht; sie alle sind Gefangene von falschen Ansichten.' Nachdem er dachte: 'Es gibt ein Aufhören der Runden der Wiedergeburten, das den Kreislauf durchbricht, und nach diesem muss gesucht werden', gab er das Königreich auf, verließ das Hausleben, übte Einsichtsmeditation und verwirklichte die Einzelbuddhaschaft. Und er sprach diese feierliche Ausspruchsstrophe und inmitten der Paccekabuddhas auch die Erklärungsstrophe. Tassattho – diṭṭhīvisūkānīti dvāsaṭṭhidiṭṭhigatāni. Tāni hi maggasammādiṭṭhiyā visūkaṭṭhena vijjhanaṭṭhena vilomaṭṭhena ca visūkāni, evaṃ diṭṭhiyā visūkāni, diṭṭhi eva vā visūkāni diṭṭhivisūkāni. Upātivattoti dassanamaggena atikkanto. Patto niyāmanti avinipātadhammatāya sambodhiparāyaṇatāya ca niyatabhāvaṃ adhigato, sammattaniyāmasaṅkhātaṃ vā paṭhamamagganti. Ettāvatā paṭhamamaggakiccanipphatti ca tassa paṭilābho ca vutto. Idāni paṭiladdhamaggoti iminā sesamaggapaṭilābhaṃ dasseti. Uppannañāṇomhīti uppannapaccekabodhiñāṇo amhi. Etena phalaṃ dasseti. Anaññaneyyoti aññehi idaṃ saccanti na netabbo. Etena sayambhutaṃ dasseti, patte vā paccekabodhiñāṇe aññaneyyatāya abhāvā sayaṃvasitaṃ. Samathavipassanāya vā diṭṭhivisūkāni upātivatto, ādimaggena niyāmaṃ patto, sesehi paṭiladdhamaggo, phalañāṇena uppannañāṇo, taṃ sabbaṃ attanāva adhigatoti anaññaneyyoti. Sesaṃ vuttanayeneva veditabbanti. Die Bedeutung davon ist: „diṭṭhīvisūkānī“ bezieht sich auf die zweiundsechzig falschen Ansichten. Denn diese sind im Sinne eines Scheingefechts, im Sinne des Durchbohrens und im Sinne des Widerstreits in Bezug auf die rechte Ansicht des Pfades Scheingefechte; so sind sie Scheingefechte der Ansicht, oder die Ansicht selbst ist ein Scheingefecht, daher „Scheingefechte der Ansichten“ (diṭṭhivisūkāni). „Upātivatto“ bedeutet: durch den Pfad des Sehens überwunden. „Patto niyāmaṃ“ bedeutet: den Zustand der Gewissheit erlangt zu haben, da man nicht mehr dem Verfall in niedere Welten unterworfen ist und die Erleuchtung das Endziel ist, oder den ersten Pfad, der als die Gewissheit der Richtigkeit bezeichnet wird. Damit ist die Erfüllung der Aufgabe des ersten Pfades und dessen Erlangung dargelegt. Nun zeigt er mit den Worten „der den Pfad erlangt hat“ (paṭiladdhamaggo) die Erlangung der übrigen Pfade. „Uppannañāṇomhi“ bedeutet: „Ich bin einer, in dem das Wissen der Einzel-Erleuchtung entstanden ist“. Damit zeigt er die Frucht. „Anaññaneyyo“ bedeutet: er muss nicht von anderen zu der Erkenntnis „Dies ist die Wahrheit“ geführt werden. Damit zeigt er das selbst-erlangte Wissen; oder beim Erreichen des Einzel-Erleuchtungswissens ist man wegen des Fehlens einer Führung durch andere selbstbestimmt. Oder: Durch Ruhe und Einsicht hat er die Scheingefechte der Ansichten überwunden, durch den ersten Pfad hat er die Gewissheit erlangt, durch die übrigen Pfade hat er den Pfad erlangt, durch das Frucht-Wissen ist das Wissen in ihm entstanden; da er dies alles selbst erlangt hat, wird er „nicht von anderen zu führen“ genannt. Der Rest ist in genau der bereits beschriebenen Weise zu verstehen. Diṭṭhīvisūkagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über das Scheingefecht der Ansichten (diṭṭhivisūka) ist abgeschlossen. 112. Nillolupoti kā uppatti? Bārāṇasirañño kira sūdo antarabhattaṃ pacitvā upanāmesi manuññadassanaṃ sādurasaṃ ‘‘appeva nāma me rājā dhanamanuppādeyyā’’ti. Taṃ rañño gandheneva bhottukamyataṃ janesi, mukhe kheḷaṃ uppādeti. Paṭhamakabaḷe pana mukhe pakkhittamatte sattarasaharaṇisahassāni amateneva phusitāni ahesuṃ. Sūdo ‘‘idāni me dassati, idāni me dassatī’’ti cintesi. Rājāpi ‘‘sakkārāraho sūdo’’ti cintesi, ‘‘rasaṃ sāyitvā pana sakkarontaṃ maṃ pāpako kittisaddo abbhuggaccheyya ‘lolo ayaṃ rājā rasagaruko’’’ti na kiñci abhaṇi. Evaṃ yāva bhojanapariyosānaṃ, tāva sūdo ‘‘idāni dassati, idāni dassatī’’ti cintesi. Rājāpi avaṇṇabhayena na kiñci abhaṇi. Tato sūdo [Pg.204] ‘‘natthi maññe imassa rañño jivhāviññāṇa’’nti. Dutiyadivase asādurasaṃ upanāmesi. Rājā bhuñjanto ‘‘niggahāraho vata, bho, ajja sūdo’’ti jānantopi pubbe viya paccavekkhitvā avaṇṇabhayena na kiñci abhaṇi. Tato sūdo ‘‘rājā neva sundaraṃ nāsundaraṃ jānātī’’ti cintetvā sabbaṃ paribbayaṃ attanāva gahetvā kiñcideva pacitvā rañño deti. Rājā ‘‘aho vata lobho, ahaṃ nāma vīsati nagarasahassāni bhuñjanto imassa lobhena bhattamattampi na labhāmī’’ti nibbijjitvā rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchākāsi. Purimanayeneva imaṃ gāthaṃ abhāsi. 112. Was ist der Anlass für das Entstehen der Strophe „Nillolupo“? Es heißt, der Koch des Königs von Bārāṇasī bereitete eine exquisite Mahlzeit zu und servierte sie, die herrlich anzusehen und von köstlichem Geschmack war, in der Hoffnung: „Möge der König mir wohl Reichtum schenken!“ Allein schon durch ihren Duft erweckte sie im König das Verlangen zu essen und ließ ihm das Wasser im Munde zusammenlaufen. Als der erste Bissen in seinen Mund gelangte, wurden die siebentausend Geschmacksnerven wie von Nektar berührt. Der Koch dachte: „Jetzt wird er mir etwas geben, jetzt wird er mir etwas geben!“ Auch der König dachte: „Der Koch verdient eine Ehrung.“ Doch er dachte weiter: „Wenn ich ihn belohne, während ich den Geschmack genieße, könnte ein schlechter Ruf über mich verbreitet werden: „Dieser König ist gierig, er ist dem Geschmack verfallen.““ Deshalb sagte er überhaupt nichts. So dachte der Koch bis zum Ende des Essens fortwährend: „Jetzt wird er mir etwas geben, jetzt wird er mir etwas geben!“ Auch der König sagte aus Angst vor Tadel nichts. Daraufhin dachte der Koch: „Ich glaube, dieser König hat überhaupt kein Geschmacksempfinden.“ Am zweiten Tag servierte er ihm eine schlecht schmeckende Speise. Obwohl der König beim Essen erkannte: „Wahrlich, dieser Koch verdient heute Bestrafung!“, besann er sich wie zuvor und sagte aus Angst vor Tadel nichts. Da dachte der Koch: „Der König unterscheidet weder Gutes noch Schlechtes“, behielt das gesamte Haushaltsgeld für sich, kochte nur irgendetwas Beliebiges und gab es dem König. Der König dachte: „O wie schrecklich ist doch die Gier! Obwohl ich zwanzigtausend Städte beherrsche, bekomme ich wegen der Gier dieses Mannes nicht einmal eine anständige Mahlzeit!“ Er wurde dessen überdrüssig, gab sein Königreich auf, ging in die Hauslosigkeit, übte Einsichtsmeditation und verwirklichte die Einzel-Erleuchtung. In genau derselben Weise wie zuvor sprach er diese Strophe. Tattha nillolupoti alolupo. Yo hi rasataṇhābhibhūto hoti, so bhusaṃ luppati punappunaṃ luppati, tena ‘‘lolupo’’ti vuccati. Tasmā esa taṃ paṭikkhipanto ‘‘nillolupo’’ti āha. Nikkuhoti ettha kiñcāpi yassa tividhaṃ kuhanavatthu natthi, so ‘‘nikkuho’’ti vuccati. Imissā pana gāthāya manuññabhojanādīsu vimhayamanāpajjanato nikkuhoti ayamadhippāyo. Nippipāsoti ettha pātumicchā pipāsā, tassā abhāvena nippipāso, sādurasalobhena bhottukamyatāvirahitoti attho. Nimmakkhoti ettha paraguṇavināsanalakkhaṇo makkho, tassa abhāvena nimmakkho. Attano gihikāle sūdassa guṇamakkhanābhāvaṃ sandhāyāha. Niddhantakasāvamohoti ettha rāgādayo tayo kāyaduccaritādīni ca tīṇīti cha dhammā yathāsambhavaṃ appasannaṭṭhena sakabhāvaṃ vijahāpetvā parabhāvaṃ gaṇhāpanaṭṭhena kasaṭaṭṭhena ca ‘‘kasāvā’’ti veditabbā. Yathāha – Dabei bedeutet „nillolupo“: frei von Gier (alolupo). Denn wer vom Verlangen nach Geschmack überwältigt ist, der begehrt heftig und immer wieder; deshalb wird er „lolupo“ (gierig) genannt. Da er dies zurückweist, sagte er „nillolupo“. Zu „nikkuho“ (ohne Heuchelei) gilt hier: Obwohl jemand, der keine der drei Arten von Heuchelei besitzt, „nikkuho“ genannt wird, ist die Absicht in dieser Strophe vielmehr: „frei von Heuchelei“ wegen des Nicht-Zeigens von Begeisterung angesichts köstlicher Speisen und Ähnlichem. Zu „nippipāso“ (durstlos): „Pipāsā“ ist das Verlangen zu trinken; wegen des Fehlens desselben ist er „nippipāso“. Die Bedeutung ist: frei von dem Verlangen zu essen aufgrund von Gier nach köstlichem Geschmack. Zu „nimmakkho“ (frei von Gehässigkeit): „Makkha“ hat die Eigenschaft, die Vorzüge anderer herabzusetzen; wegen des Fehlens davon ist er „nimmakkho“. Er sagte dies in Bezug auf das Ausbleiben des Herabsetzens der Vorzüge des Kochs während seiner eigenen Zeit als Hausvater. Zu „niddhantakasāvamoho“ (der die Trübungen und die Verblendung ausgemerzt hat): Hierbei sind die sechs Dinge – nämlich die drei wie Gier usw. und die drei wie körperliches Fehlverhalten usw. – entsprechend ihrem Auftreten wegen ihrer Unreinheit, weil sie einen dazu bringen, das eigene gute Wesen aufzugeben und ein anderes anzunehmen, und wegen ihres schmutzigen Charakters als „Trübungen“ (kasāva) zu verstehen. Wie gesagt wurde: ‘‘Tattha katame tayo kasāvā? Rāgakasāvo, dosakasāvo, mohakasāvo. Ime tayo kasāvā. Tattha katame aparepi tayo kasāvā? Kāyakasāvo, vacīkasāvo, manokasāvo’’ti (vibha. 924). „Welches sind darin die drei Trübungen? Die Trübung der Gier, die Trübung des Hasses, die Trübung der Verblendung. Dies sind die drei Trübungen. Welches sind darin die anderen drei Trübungen? Die Trübung des Körpers, die Trübung der Rede, die Trübung des Geistes.“ (Vibha. 924) Tesu mohaṃ ṭhapetvā pañcannaṃ kasāvānaṃ tesañca sabbesaṃ mūlabhūtassa mohassa niddhantattā niddhantakasāvamoho. Tiṇṇaṃ eva vā kāyavacīmanokasāvānaṃ mohassa ca niddhantattā niddhantakasāvamoho. Itaresu nillolupatādīhi [Pg.205] rāgakasāvassa, nimmakkhatāya dosakasāvassa niddhantabhāvo siddho eva. Nirāsayoti nittaṇho. Sabbaloke bhavitvāti sakalaloke, tīsu bhavesu dvādasasu vā āyatanesu bhavavibhavataṇhāvirahito hutvāti attho. Sesaṃ vuttanayeneva veditabbaṃ. Atha vā tayopi pāde vatvā eko careti eko carituṃ sakkuṇeyyāti evampettha sambandho kātabbo. Unter diesen wird er „niddhantakasāvamoho“ genannt, weil er – abgesehen von der Verblendung – die fünf Trübungen ausgemerzt hat, und auch die Verblendung, die die Wurzel von ihnen allen ist. Oder: weil er die drei Trübungen von Körper, Rede und Geist sowie die Verblendung ausgemerzt hat, wird er „niddhantakasāvamoho“ genannt. Unter den übrigen Eigenschaften ist durch Gierlosigkeit etc. das Ausmerzen der Trübung der Gier bereits erwiesen, und durch das Freisein von Gehässigkeit das Ausmerzen der Trübung des Hasses. „Nirāsayoti“ bedeutet: frei von Begehren (nittaṇho). Die Worte „in der ganzen Welt existierend“ (sabbaloke bhavitvā) bedeuten: in der gesamten Welt, in den drei Daseinsformen oder den zwölf Sinnenbereichen frei von dem Begehren nach Dasein und Nicht-Dasein zu sein. Der Rest ist in genau der bereits beschriebenen Weise zu verstehen. Oder aber, nachdem man die drei Zeilen gesprochen hat, kann die Verknüpfung hier auch so hergestellt werden: „er möge allein wandern“ (eko care), was bedeutet, er ist in der Lage, allein zu wandern. Nillolupagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Gierlosen (nillolupa) ist abgeschlossen. 113. Pāpaṃ sahāyanti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira aññataro rājā mahaccarājānubhāvena nagaraṃ padakkhiṇaṃ karonto manusse koṭṭhāgārato purāṇadhaññādīni bahiddhā nīharante disvā ‘‘kiṃ, bhaṇe, ida’’nti amacce pucchi. Amaccā ‘‘idāni, mahārāja, navadhaññādīni uppajjissanti, tesaṃ okāsaṃ kātuṃ ime manussā purāṇadhaññādīni chaḍḍentī’’ti āhaṃsu. Rājā ‘‘kiṃ, bhaṇe, itthāgārabalakāyādīnaṃ vattaṃ paripuṇṇa’’nti āha. ‘‘Āma, mahārāja, paripuṇṇa’’nti. ‘‘Tena hi, bhaṇe, dānasālaṃ kāretha, dānaṃ dassāmi, mā imāni dhaññāni anupakārāni vinassantū’’ti. Tato naṃ aññataro diṭṭhigatiko amacco ‘‘mahārāja, natthi dinna’’nti ārabbha yāva ‘‘bāle ca paṇḍite ca sandhāvitvā saṃsaritvā dukkhassantaṃ karissantī’’ti vatvā nivāresi. Rājā dutiyampi tatiyampi koṭṭhāgāre vilumpante disvā tatheva āṇāpesi. Sopi tatiyampi naṃ ‘‘mahārāja, dattupaññattaṃ yadidaṃ dāna’’ntiādīni vatvā nivāresi. So ‘‘are, ahaṃ attano santakampi na labhāmi dātuṃ, kiṃ me imehi pāpasahāyehī’’ti nibbinno rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchākāsi. Tañca pāpasahāyaṃ garahanto imaṃ udānagāthamāha. 113. „Einen schlechten Gefährten“ (pāpaṃ sahāyaṃ) – was ist der Anlass für diese Strophe? Es heißt, einst umrundete ein gewisser König in Bārāṇasī mit großem königlichen Prunk die Stadt im Uhrzeigersinn. Als er sah, wie Menschen altes Getreide und Ähnliches aus den Kornspeichern nach draußen schafften, fragte er seine Minister: „He, ihr Männer, was ist das?“ Die Minister sagten: „O großer König, jetzt wird das neue Getreide und Ähnliches herankommen; um Platz für dieses zu schaffen, werfen diese Menschen das alte Getreide weg.“ Der König sprach: „He, ihr Männer, ist denn der Bedarf des Frauenhauses, des Heeres und so weiter gedeckt?“ – „Ja, großer König, er ist gedeckt.“ – „Wenn dem so ist, ihr Männer, dann lasst eine Almosenhalle errichten. Ich will Almosen geben; lasst dieses Getreide nicht nutzlos verderben!“ Daraufhin hielt ihn ein gewisser, von falscher Ansicht geleiteter Minister davon ab, indem er anfing mit: „Großer König, Geben hat keinen Nutzen…“ und so fort bis zu: „Toren wie auch Weise werden durch den Daseinskreislauf wandern und kreisen und schließlich dem Leiden ein Ende bereiten.“ Als der König auch ein zweites und drittes Mal sah, wie die Kornspeicher ausgeräumt wurden, gab er denselben Befehl. Auch jener Minister hielt ihn zum dritten Mal davon ab, indem er sprach: „Großer König, dieses sogenannte Geben ist eine Verordnung von Toren“ und so weiter. Dieser dachte: „Ach, ich bekomme nicht einmal die Erlaubnis, meinen eigenen Besitz zu verschenken! Was nützen mir diese schlechten Gefährten?“, wurde dessen überdrüssig, gab das Königreich auf, ging in die Hauslosigkeit, entwickelte Einsicht und verwirklichte die Einzel-Buddhaschaft. Und jenen schlechten Gefährten tadelnd, sprach er diese Udāna-Strophe. Tassāyaṃ saṅkhepattho – yvāyaṃ dasavatthukāya pāpadiṭṭhiyā samannāgatattā pāpo, paresampi anatthaṃ passatīti anatthadassī, kāyaduccaritādimhi ca visame niviṭṭho, taṃ atthakāmo kulaputto pāpaṃ sahāyaṃ parivajjayetha, anatthadassiṃ visame niviṭṭhaṃ. Sayaṃ na seveti attano vasena taṃ na seveyya. Yadi pana parassa vaso hoti, kiṃ sakkā kātunti vuttaṃ hoti. Pasutanti pasaṭaṃ, diṭṭhivasena tattha tattha lagganti attho. Pamattanti kāmaguṇesu vossaṭṭhacittaṃ, kusalabhāvanārahitaṃ vā. Taṃ [Pg.206] evarūpaṃ sahāyaṃ na seve na bhaje na payirupāse, aññadatthu eko care khaggavisāṇakappoti. Dies ist die kurze Bedeutung davon: Wer auch immer aufgrund des Besitzes der zehnfachen falschen Anschauung „schlecht“ ist, und weil er auch anderen Schaden bringt, ein „Schadensstifter“ ist, und der im Unrechten wie körperlichem Fehlverhalten und so weiter verstrickt ist – einen solchen schlechten Gefährten sollte ein das Wohl erstrebender edler Sohn meiden, nämlich einen, der Schaden bringt und im Unrechten verstrickt ist. „Selbst gesellt er sich nicht zu ihm“ bedeutet: Aus eigenem Willen sollte man sich nicht zu ihm gesellen. Wenn man jedoch unter der Gewalt eines anderen steht, was kann man da tun? – so ist es gemeint. „Hingebend“ (pasutaṃ) bedeutet ausgebreitet; die Bedeutung ist: aufgrund von Ansichten hier und dort anhaftend. „Nachlässig“ (pamattaṃ) bedeutet ein Geist, der an die Objekte der Sinnengenüsse verloren ist, oder einer, der frei von heilsamer Entfaltung ist. Zu einem solchen Gefährten sollte man sich nicht gesellen, ihn nicht verehren, ihn nicht aufsuchen; vielmehr sollte man allein wandern, dem Horn des Nashorns gleich. Pāpasahāyagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den schlechten Gefährten ist beendet. 114. Bahussutanti kā uppatti? Pubbe kira kassapassa bhagavato sāsane aṭṭha paccekabodhisattā pabbajitvā gatapaccāgatavattaṃ pūretvā devaloke uppannātiādi sabbaṃ anavajjabhojīgāthāya vuttasadisameva. Ayaṃ pana viseso – paccekabuddhe nisīdāpetvā rājā āha – ‘‘ke tumhe’’ti? Te āhaṃsu – ‘‘mayaṃ, mahārāja, bahussutā nāmā’’ti. Rājā ‘‘ahaṃ sutabrahmadatto nāma, sutena tittiṃ na gacchāmi, handa, nesaṃ santike vicitranayadhammadesanaṃ sossāmī’’ti attamano dakkhiṇodakaṃ datvā parivisitvā bhattakiccapariyosāne saṅghattherassa santike nisīditvā ‘‘dhammakathaṃ, bhante, kathethā’’ti āha. So ‘‘sukhito hotu, mahārāja, rāgakkhayo hotū’’ti vatvā uṭṭhito. Rājā ‘‘ayaṃ na bahussuto, dutiyo bahussuto bhavissati, sve tassa vicitradhammadesanaṃ sossāmī’’ti svātanāya nimantesi. Evaṃ yāva sabbesaṃ paṭipāṭi gacchati, tāva nimantesi, te sabbepi ‘‘dosakkhayo hotu, mohakkhayo, gatikkhayo, bhavakkhayo, vaṭṭakkhayo, upadhikkhayo, taṇhakkhayo hotū’’ti evaṃ ekekapadaṃ visesetvā sesaṃ paṭhamasadisameva vatvā uṭṭhahiṃsu. 114. „Großes Wissen besitzend“ (bahussutaṃ) – was ist der Anlass? Es heißt, in der Vergangenheit, in der Lehre des Erhabenen Kassapa, gingen acht künftige Einzel-Buddhas in die Hauslosigkeit, erfüllten die Pflicht des Gehens und Wiederkehrens und wurden in der Götterwelt wiedergeboren; all dies ist genau so, wie es in der Erklärung zur Strophe über den Genuss makelloser Speise gesagt wurde. Dies ist jedoch der Unterschied: Nachdem er die Einzel-Buddhas hatte Platz nehmen lassen, fragte der König: „Wer seid ihr?“ Sie sagten: „Großer König, wir sind bekannt als 'die über großes Wissen Verfügenden'.“ Der König dachte freudigen Herzens: „Ich heiße Suta-Brahmadatta. Ich werde des Hörens nicht müde. Wohlan, ich will in ihrer Gegenwart eine Dhamma-Lehre von vielfältiger Methode hören.“ Er reichte das Weihwasser, bediente sie, setzte sich am Ende des Mahles nahe dem Ältesten der Gemeinde nieder und sagte: „Ehrwürdiger Herr, tragt eine Dhamma-Rede vor!“ Dieser sprach: „Mögest du glücklich sein, o großer König! Möge die Vernichtung der Gier geschehen!“, und erhob sich. Der König dachte: „Dieser ist nicht vielwissend. Der zweite wird vielwissend sein. Morgen werde ich seine vielfältige Dhamma-Lehre hören“, und lud ihn für den nächsten Tag ein. So lud er sie der Reihe nach alle ein, bis die Reihe an jedem war. Sie alle aber sprachen, indem sie jeweils einen Begriff besonders hervorhoben: „Möge die Vernichtung des Hasses geschehen!“, „… der Verblendung!“, „… der Wiedergeburtsbahnen!“, „… des Werdens!“, „… des Daseinskreislaufs!“, „… der Anhaftungsgrundlagen!“, „… des Begehrens!“, sagten im Übrigen dasselbe wie der erste und erhoben sich. Tato rājā – ‘‘ime ‘bahussutā maya’nti bhaṇanti, na ca tesaṃ vicitrakathā, kimetehi vutta’’nti tesaṃ vacanatthaṃ upaparikkhitumāraddho. Atha ‘‘rāgakkhayo hotū’’ti upaparikkhanto ‘‘rāge khīṇe dosopi mohopi aññataraññatarepi kilesā khīṇā hontī’’ti ñatvā attamano ahosi ‘‘nippariyāyabahussutā ime samaṇā. Yathāpi hi purisena mahāpathaviṃ vā ākāsaṃ vā aṅguliyā niddisantena na aṅgulimattova padeso niddiṭṭho hoti. Api ca kho pana sakalapathavī ākāsā eva niddiṭṭhā honti. Evaṃ imehi ekekaṃ atthaṃ niddisantehi aparimāṇā atthā niddiṭṭhā hontī’’ti. Tato so ‘‘kudāssu nāmāhampi evaṃ bahussuto bhavissāmī’’ti tathārūpaṃ bahussutabhāvaṃ patthento [Pg.207] rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthamabhāsi. Daraufhin begann der König über die Bedeutung ihrer Worte nachzusinnen: „Diese sagen: 'Wir sind vielwissend', doch ihre Rede ist nicht vielfältig. Was haben sie damit gemeint?“ Als er dann über „Möge die Vernichtung der Gier geschehen“ nachsann, erkannte er: „Wenn die Gier vernichtet ist, sind auch Hass, Verblendung und jede andere Art von Befleckungen vernichtet.“ Da wurde er frohen Herzens: „Diese Asketen besitzen im absoluten Sinne großes Wissen! Denn wie wenn ein Mensch mit dem Finger auf die große Erde oder den Himmel zeigt, nicht bloß ein fingerbreiter Fleck gezeigt wird, sondern vielmehr die gesamte Erde und der ganze Himmel gezeigt sind; ebenso sind von diesen, indem sie jeweils eine einzige Bedeutung aufzeigten, unermessliche Bedeutungen aufgezeigt worden.“ Daraufhin dachte er: „Wann wohl werde auch ich ein solcher Vielwissender sein?“, und während er einen solchen Zustand des Vielwissens herbeisehnte, gab er das Königreich auf, ging in die Hauslosigkeit, entwickelte Einsicht und verwirklichte die Einzel-Buddhaschaft. Dann sprach er diese Udāna-Strophe. Tatthāyaṃ saṅkhepattho – bahussutanti duvidho bahussuto tīsu piṭakesu atthato nikhilo pariyattibahussuto ca, maggaphalavijjābhiññāpaṭivedhako paṭivedhabahussuto ca. Āgatāgamo dhammadharo. Uḷārehi pana kāyavacīmanokammehi samannāgato uḷāro. Yuttapaṭibhāno ca muttapaṭibhāno ca yuttamuttapaṭibhāno ca paṭibhānavā. Pariyattiparipucchādhigamavasena vā tividho paṭibhānavā veditabbo. Yassa hi pariyatti paṭibhāti, so pariyattipaṭibhānavā. Yassa atthañca ñāṇañca lakkhaṇañca ṭhānāṭṭhānañca paripucchantassa paripucchā paṭibhāti, so paripucchāpaṭibhānavā. Yassa maggādayo paṭividdhā honti, so adhigamapaṭibhānavā. Taṃ evarūpaṃ bahussutaṃ dhammadharaṃ bhajetha mittaṃ uḷāraṃ paṭibhānavantaṃ. Tato tassānubhāvena attatthaparatthaubhayatthabhedato vā diṭṭhadhammikasamparāyikaparamatthabhedato vā anekappakārāni aññāya atthāni, tato ‘‘ahosiṃ nu kho ahaṃ atītamaddhāna’’ntiādīsu (ma. ni. 1.18; saṃ. ni. 2.20) kaṅkhāṭṭhāniyesu vineyya kaṅkhaṃ vicikicchaṃ vinetvā vināsetvā evaṃ katasabbakicco eko care khaggavisāṇakappoti. Darin ist dies die kurze Bedeutung: „Großes Wissen besitzend“ – zweifach ist der Vielwissende: derjenige, der die drei Piṭakas dem Sinne nach lückenlos beherrscht (pariyattibahussuto), und derjenige, der das Durchdringen der Pfade, Früchte, des Wissens und der höheren Geisteskräfte verwirklicht hat (paṭivedhabahussuto). „Der die Überlieferung erlangt hat“ (āgatāgamo) ist ein „Bewahrer des Dhamma“ (dhammadharo). „Edel“ (uḷāro) ist einer, der mit edlen Taten des Körpers, der Rede und des Geistes ausgestattet ist. Ein „Beredter“ (paṭibhānavā) ist einer mit angemessener Beredsamkeit, freier Beredsamkeit oder mit angemessener und freier Beredsamkeit. Oder man versteht den Beredten als dreifach, nämlich nach Maßgabe des Studiums, des Befragens und der Verwirklichung. Denn wem das Studium der heiligen Schriften einleuchtet, der ist beredsam im Studium. Wem, wenn er nach der Bedeutung, dem Wissen, dem Merkmal sowie nach dem, was möglich und unmöglich ist, fragt, das Befragen leichtfällt, der ist beredsam im Befragen. Wer die Pfade und so weiter durchdrungen hat, der ist beredsam in der Verwirklichung. Einem solchen vielwissenden Dhamma-Bewahrer, einem edlen und beredten Freund, soll man sich anschließen. Wenn man dann durch dessen Einfluss die vielfältigen Nutzen erkennt — sei es unterschieden nach dem eigenen Wohl, dem Wohl anderer und dem Wohl beider, oder unterschieden nach dem gegenwärtigen Wohl, dem künftigen Wohl und dem höchsten Wohl — und man sodann den Zweifel bezüglich der Anlässe des Zweifels wie „War ich wohl in vergangener Zeit?“ und so weiter vertreibt, und nachdem man Zweifel und Unsicherheit beseitigt und vernichtet hat, sollte man als einer, der all seine Pflichten erfüllt hat, allein wandern, dem Horn des Nashorns gleich. Bahussutagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Vielwissenden ist beendet. 115. Khiḍḍaṃ ratinti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira vibhūsakabrahmadatto nāma rājā pātova yāguṃ vā bhattaṃ vā bhuñjitvā nānāvidhavibhūsanehi attānaṃ vibhūsāpetvā mahāādāse sakalaṃ sarīraṃ disvā yaṃ na icchati, taṃ apanetvā aññena vibhūsanena vibhūsāpeti. Tassa ekadivasaṃ evaṃ karontassa bhattavelā majjhanhikā sampattā. Vippakatavibhūsitova dussapaṭṭena sīsaṃ veṭhetvā bhuñjitvā divāseyyaṃ upagañchi. Punapi uṭṭhahitvā tatheva karoto sūriyo oggato. Evaṃ dutiyadivasepi tatiyadivasepi. Athassa evaṃ maṇḍanappasutassa piṭṭhirogo udapādi. Tassa etadahosi – ‘‘aho re, ahaṃ sabbathāmena vibhūsantopi imasmiṃ kappake vibhūsane asantuṭṭho lobhaṃ uppādesiṃ, lobho ca nāmesa apāyagamanīyo [Pg.208] dhammo, handāhaṃ lobhaṃ niggaṇhāmī’’ti rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthamabhāsi. 115. „Spiel und Vergnügen“ (khiḍḍaṃ ratiṃ) – was ist der Ursprung? Es heißt, in Bārāṇasī regierte ein König namens Vibhūsaka-Brahmadatta. Dieser aß schon am frühen Morgen entweder Reisschleim oder feste Nahrung, ließ sich mit verschiedenen Arten von Schmuck schmücken, betrachtete seinen ganzen Körper in einem großen Spiegel und ließ das, was ihm nicht gefiel, entfernen, um sich mit anderem Schmuck schmücken zu lassen. Während er dies eines Tages so tat, brach die Mittagszeit zur Speise herein. Da sein Schmücken noch unvollendet war, umwand er sein Haupt mit einem Tuchstreifen, speiste und begab sich zur Mittagsruhe. Als er wieder aufstand und dasselbe tat, ging bereits die Sonne unter. Ebenso geschah es am zweiten und am dritten Tag. Da entstand bei ihm, der so sehr dem Schmücken hingegeben war, ein Rückenschmerz. Da dachte er: „Ach, obwohl ich mich mit aller Kraft schmücke, bin ich mit dem Schmuck an diesem Ellbogen unzufrieden und habe Gier erzeugt. Diese Gier ist wahrlich ein Zustand, der in die Leidenswelten führt. Wohlan, ich will die Gier bezwingen!“ Er gab das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Einsicht (vipassanā) und verwirklichte die Einzelbuddhaschaft (Paccekabodhi). Daraufhin sprach er diese feierliche Strophe. Tattha khiḍḍā ca rati ca pubbe vuttāva. Kāmasukhanti vatthukāmasukhaṃ. Vatthukāmāpi hi sukhassa visayādibhāvena ‘‘sukha’’nti vuccanti. Yathāha – ‘‘atthi rūpaṃ sukhaṃ sukhānupatita’’nti (saṃ. ni. 3.60). Evametaṃ khiḍḍaṃ ratiṃ kāmasukhañca imasmiṃ okāsaloke analaṅkaritvā alanti akatvā, etaṃ tappakanti vā sārabhūtanti vā evaṃ aggahetvā. Anapekkhamānoti tena analaṅkaraṇena anapekkhaṇasīlo apihāluko nittaṇho. Vibhūsaṭṭhānā virato saccavādīti tattha vibhūtā duvidhā – agārikavibhūsā ca anagārikavibhūsā ca. Sāṭakaveṭhanamālāgandhādivibhūsā agārikavibhūsā nāma. Pattamaṇḍanādivibhūsā anagārikavibhūsā. Vibhūsā eva vibhūsaṭṭhānaṃ, tasmā vibhūsaṭṭhānā tividhāya viratiyā virato. Avitathavacanato saccavādīti evamattho daṭṭhabbo. Darin sind „Spiel“ (khiḍḍā) und „Vergnügen“ (rati) bereits zuvor erklärt worden. „Sinnliches Glück“ (kāmasukha) bezeichnet das Glück durch materielle Sinnesobjekte (vatthukāma). Denn auch die materiellen Sinnesobjekte werden, weil sie die Objekte des Glücks usw. sind, als „Glück“ bezeichnet. Wie es heißt: „Es gibt eine Form, die glücklich ist und von Glück begleitet wird“ (Saṃ. Ni. 3.60). Indem man auf diese Weise dieses Spiel, dieses Vergnügen und dieses sinnliche Glück in dieser Welt der Orte (okāsaloka) nicht ausschmückt – das heißt, sie nicht als ausreichend betrachtet –, und sie weder als befriedigend noch als das Wesentliche ergreift. „Ohne Verlangen habend“ (anapekkhamāno) bedeutet: durch dieses Nicht-Ausschmücken ohne Verlangen zu sein, frei von Sehnsucht und frei von Durst (taṇhā). „Vom Anlass zur Ausschmückung Abstand nehmend, die Wahrheit sprechend“: Darin ist das Schmücken zweifach: das Schmücken der Hausbewohner (Laien) und das Schmücken der Hauslosen (Mönche). Das Schmücken mit Gewändern, Kopftüchern, Blumenkränzen, Wohlgerüchen und dergleichen wird „Schmücken der Hausbewohner“ genannt. Das Verzieren der Almosenschale und Ähnliches ist das „Schmücken der Hauslosen“. Das Schmücken selbst ist der „Anlass zur Ausschmückung“. Daher hat er durch die dreifache Enthaltung Abstand vom Anlass zur Ausschmückung genommen. „Wahrheit sprechend“ (saccavādī) bedeutet: wegen des Sprechens unfehlbarer Worte. So ist die Bedeutung zu verstehen. Vibhūsaṭṭhānagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erläuterung der Strophe über den Anlass zur Ausschmückung ist abgeschlossen. 116. Puttañca [Pg.209] dāranti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira rañño putto daharakāleyeva abhisitto rajjaṃ kāresi. So paṭhamagāthāya vuttapaccekabodhisatto viya rajjasiriṃ anubhavanto ekadivasaṃ cintesi – ‘‘ahaṃ rajjaṃ kārento bahūnaṃ dukkhaṃ karomi, kiṃ me ekabhattatthāya iminā pāpena, handa, sukhamuppādemī’’ti rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 116. „Söhne und Ehefrau“ (puttañca dāraṃ) – was ist der Ursprung? Es heißt, in Bārāṇasī regierte der Sohn des Königs, der noch in seiner Jugend geweiht worden war. Während er die königliche Pracht genoss, ähnlich dem in der ersten Strophe erwähnten künftigen Einzelbuddha (Paccekabodhisatta), dachte er eines Tages: „Wenn ich das Königreich regiere, füge ich vielen Wesen Leid zu. Was nützt mir dieses Übel um einer einzigen Mahlzeit willen? Wohlan, ich will wahres Glück erzeugen!“ Er gab das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Einsicht (vipassanā), verwirklichte die Einzelbuddhaschaft (Paccekabodhi) und sprach diese feierliche Strophe. Tattha dhanānīti muttāmaṇiveḷuriyasaṅkhasilāpavāḷarajatajātarūpādīni ratanāni. Dhaññānīti sālivīhiyavagodhumakaṅguvarakakudrūsakappabhedāni satta sesāparaṇṇāni ca. Bandhavānīti ñātibandhugottabandhumittabandhusippabandhuvasena catubbidhabandhave. Yathodhikānīti sakasakaodhivasena ṭhitāniyeva. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bedeutet „Reichtümer“ (dhanāni) Kostbarkeiten wie Perlen, Edelsteine, Beryll, Muscheln, Quarz, Korallen, Silber, Gold und so weiter. „Getreidesorten“ (dhaññāni) bezieht sich auf die sieben Arten wie Sāli-Reis, ungeschälter Reis, Gerste, Weizen, Hirse, Varaka-Hirse und Kudrūsaka-Hirse sowie die übrigen Hülsenfrüchte. „Verwandte“ (bandhavā) bezeichnet die vier Arten von Verwandten, nämlich Verwandte durch Familie, durch Sippe, durch Freundschaft und durch denselben Beruf. „Entsprechend ihren Grenzen“ (yathodhikāni) bedeutet: genau in ihren jeweiligen Grenzen verbleibend. Das Übrige ist ebenso wie bereits erklärt zu verstehen. Puttadāragāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erläuterung der Strophe über Söhne und Ehefrau ist abgeschlossen. 117. Saṅgo esoti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira pādalolabrahmadatto nāma rājā ahosi. So pātova yāguṃ vā bhattaṃ vā bhuñjitvā tīsu pāsādesu tividhāni nāṭakāni passati. Tividhā nāma nāṭakā pubbarājato āgataṃ, anantararājato āgataṃ, attano kāle uṭṭhitanti. So ekadivasaṃ pātova daharanāṭakapāsādaṃ gato. Tā nāṭakitthiyo ‘‘rājānaṃ ramāpessāmā’’ti sakkassa devānamindassa accharāyo viya atimanoharaṃ naccagītavāditaṃ payojesuṃ. Rājā ‘‘anacchariyametaṃ daharāna’’nti asantuṭṭho hutvā majjhimanāṭakapāsādaṃ gato, tāpi nāṭakitthiyo tatheva akaṃsu. So tatthapi tatheva asantuṭṭho hutvā mahallakanāṭakapāsādaṃ gato, tāpi tatheva akaṃsu. Rājā dve tayo rājaparivaṭṭe atītānaṃ tāsaṃ mahallakabhāvena aṭṭhikīḷanasadisaṃ naccaṃ disvā gītañca amadhuraṃ sutvā punadeva daharanāṭakapāsādaṃ, puna majjhimanāṭakapāsādanti evampi vicaritvā katthaci asantuṭṭho cintesi – ‘‘imā nāṭakitthiyo sakkaṃ devānamindaṃ accharāyo viya maṃ ramāpetukāmā sabbathāmena naccagītavāditaṃ payojesuṃ. Svāhaṃ katthaci asantuṭṭho lobhaṃ vaḍḍhemi. Lobho ca nāmesa apāyagamanīyo dhammo, handāhaṃ lobhaṃ niggaṇhāmī’’ti rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 117. „Dies ist eine Fessel“ (saṅgo eso) – was ist der Ursprung? Es heißt, in Bārāṇasī gab es einen König namens Pādalola-Brahmadatta. Dieser aß schon am frühen Morgen entweder Reisschleim oder feste Nahrung und sah sich in drei Palästen drei Arten von Tänzerinnen-Ensembles an. Die drei Arten von Ensembles stammten von früheren Königen, vom unmittelbar vorhergehenden König oder waren zu seiner eigenen Zeit zusammengestellt worden. Eines Tages ging er am frühen Morgen zum Palast der jungen Tänzerinnen. Diese Tänzerinnen dachten: „Wir wollen den König erheitern“, und führten einen überaus bezaubernden Tanz, Gesang und Instrumentalmusik auf, wie die Nymphen von Sakka, dem Herrscher der Götter. Der König dachte: „Das ist bei jungen Frauen nicht verwunderlich“, blieb unbefriedigt und ging zum Palast der mittelalten Tänzerinnen. Auch jene Tänzerinnen taten genau dasselbe. Auch dort blieb er unbefriedigt und ging zum Palast der alten Tänzerinnen. Auch sie taten dasselbe. Als der König deren Tanz sah, der wegen ihres hohen Alters – sie hatten bereits zwei oder drei Thronwechsel miterlebt – dem Klappern von Knochen glich, und ihren unmelodischen Gesang hörte, ging er wieder zum Palast der jungen Tänzerinnen zurück, dann wieder zum Palast der mittelalten Tänzerinnen. Obwohl er so umherging, blieb er überall unbefriedigt und dachte: „Diese Tänzerinnen wollten mich erheitern wie die Nymphen von Sakka, dem Herrscher der Götter, und haben mit all ihrer Kraft Tanz, Gesang und Musik dargeboten. Doch ich bin nirgends zufrieden und vermehre nur meine Gier. Und diese Gier ist wahrlich ein Zustand, der in die Leidenswelten führt. Wohlan, ich werde die Gier bezwingen!“ Er gab das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Einsicht (vipassanā), verwirklichte die Einzelbuddhaschaft (Paccekabodhi) und sprach diese feierliche Strophe. Tassattho – saṅgo esoti attano upabhogaṃ niddisati. So hi sajjanti tattha pāṇino kaddame paviṭṭho hatthī viyāti saṅgo. Parittamettha sokhyanti ettha pañcakāmaguṇūpabhogakāle viparītasaññāya uppādetabbato kāmāvacaradhammapariyāpannato vā lāmakaṭṭhena sokhyaṃ parittaṃ, vijjuppabhāya obhāsitanaccadassanasukhaṃ iva ittaraṃ, tāvakālikanti vuttaṃ hoti. Appassādo dukkhamevettha bhiyyoti ettha ca yvāyaṃ ‘‘yaṃ kho, bhikkhave, ime pañca kāmaguṇe paṭicca uppajjati sukhaṃ somanassaṃ, ayaṃ kāmānaṃ assādo’’ti (ma. ni. 1.166) vutto, so yamidaṃ ‘‘ko ca, bhikkhave, kāmānaṃ ādīnavo, idha, bhikkhave, kulaputto yena sippaṭṭhānena jīvikaṃ kappeti, yadi muddāya yadi gaṇanāyā’’ti evamādinā (ma. ni. 1.167) nayenettha dukkhaṃ vuttaṃ, taṃ upanidhāya appo udakabindumatto hoti, atha kho dukkhameva bhiyyo bahu, catūsu samuddesu udakasadisaṃ hoti. Tena vuttaṃ ‘‘appassādo dukkhamevettha [Pg.210] bhiyyo’’ti. Gaḷo esoti assādaṃ dassetvā ākaḍḍhanavasena baḷiso viya eso, yadidaṃ pañcakāmaguṇā. Iti ñatvā matimāti evaṃ jānitvā buddhimā paṇḍito puriso sabbametaṃ pahāya eko care khaggavisāṇakappoti. Die Bedeutung davon ist: „Dies ist eine Anhaftung (saṅgo esoti)“ bezieht sich auf den eigenen Genuss. Denn darin verfangen sich die Lebewesen wie ein Elefant, der im Schlamm versunken ist, daher heißt es „Anhaftung“. „Gering ist hier das Glück (parittamettha sokhyam)“: Da es zur Zeit des Genusses der fünf Sinnesfreuden durch eine verkehrte Vorstellung erzeugt wird oder da es, weil es dem Sinnbereich angehört, von minderwertiger Natur ist, ist das Glück gering; es wird gesagt, dass es vergänglich und nur von kurzer Dauer ist, wie das flüchtige Vergnügen, eine Tanzvorführung zu sehen, die nur vom Aufblitzen eines Blitzes erhellt wird. Bei der Passage „Wenig Genuss, vielmehr Leiden gibt es hier“ (appassādo dukkhamevettha bhiyyo) ist folgendes gemeint: Was gesagt wurde mit: „Welches Glück und welche Freude, ihr Mönche, in Abhängigkeit von diesen fünf Sinnesfreuden entsteht, das ist der Genuss der Sinnesfreuden“ (M. I, 166), das ist im Vergleich zu dem Leiden, das auf diese Weise beschrieben wurde: „Und was, ihr Mönche, ist das Elend der Sinnesfreuden? Da verdient ein Sohn aus gutem Hause seinen Lebensunterhalt durch irgendein Handwerk, sei es durch Siegelkunde, sei es durch Rechnen...“ usw. (M. I, 167) – im Vergleich dazu ist jener Genuss geringfügig, bloß wie ein Wassertropfen. Das Leiden hingegen ist weit mehr und reichlicher, wie das Wasser in den vier Weltmeeren. Daher wurde gesagt: „Wenig Genuss, vielmehr Leiden gibt es hier“. „Dies ist ein Schlund [bzw. eine Angel] (gaḷo eso)“: Dies zeigt den Genuss; wegen des Hineinziehens ist dies wie ein Angelhaken, nämlich die fünf Sinnesfreuden. „Dies erkennend, der Weise (iti ñatvā matimā)“: Dies bedeutet, dass der kluge, weise Mensch, nachdem er dies so erkannt hat, all dies aufgeben und allein wandern soll, dem Horn des Nashorns gleich. Saṅgagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Anhaftung (Saṅgagāthāvaṇṇanā) ist abgeschlossen. 118. Sandālayitvānāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira anivattabrahmadatto nāma rājā ahosi. So saṅgāmaṃ otiṇṇo ajinitvā aññaṃ vā kiccaṃ āraddho aniṭṭhapetvā na nivattati, tasmā naṃ evaṃ sañjāniṃsu. So ekadivasaṃ uyyānaṃ gacchati. Tena ca samayena davaḍāho uṭṭhāsi. So aggi sukkhāni ceva haritāni ca tiṇādīni dahanto anivattamāno eva gacchati. Rājā taṃ disvā tappaṭibhāganimittaṃ uppādesi. ‘‘Yathāyaṃ davaḍāho, evameva ekādasavidho aggi sabbe satte dahanto anivattamāno gacchati mahādukkhaṃ uppādento, kudāssu nāmāhampi imassa dukkhassa nivattanatthaṃ ayaṃ aggi viya ariyamaggañāṇagginā kilese dahanto anivattamāno gaccheyya’’nti? Tato muhuttaṃ gantvā kevaṭṭe addasa nadiyaṃ macche gaṇhante. Tesaṃ jālantare paviṭṭho eko mahāmaccho jālaṃ bhetvā palāyi. Te ‘‘maccho jālaṃ bhetvā gato’’ti saddamakaṃsu. Rājā tampi vacanaṃ sutvā tappaṭibhāganimittaṃ uppādesi – ‘‘kudāssu nāmāhampi ariyamaggañāṇena taṇhādiṭṭhijālaṃ bhetvā asajjamāno gaccheyya’’nti? So rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchākāsi, imañca udānagāthamabhāsi. 118. Was ist die Entstehungsgeschichte zu „Nachdem er zerrissen hat“ (sandālayitvāna)? In Bārāṇasī gab es, so heißt es, einen König namens Anivattabrahmadatta (der unumkehrbare Brahmadatta). Wenn er in eine Schlacht zog, kehrte er nicht um, ohne zu siegen, oder wenn er eine andere Aufgabe begann, kehrte er nicht um, ohne sie vollendet zu haben; darum war er unter diesem Namen bekannt. Eines Tages ging er in den königlichen Park. Zu jener Zeit brach ein Waldbrand aus. Dieses Feuer breitete sich, sowohl trockenes als auch grünes Gras und anderes verbrennend, unaufhaltsam aus. Der König sah dies und nahm es als ein entsprechendes Gleichnis: „Ebenso wie dieser Waldbrand, so schreitet das elffache Feuer unaufhaltsam fort, verbrennt alle Lebewesen und erzeugt großes Leiden. Wann wohl werde auch ich, um dieses Leiden zu beenden, gleich diesem Feuer mit dem Feuer des Wissens um den edlen Pfad die Befleckungen verbrennen und unaufhaltsam voranschreiten?“ Nachdem er von dort ein Stück weitergegangen war, sah er Fischer, die in einem Fluss Fische fingen. Ein großer Fisch, der in ihr Netz geraten war, zerriss das Netz und entkam. Sie schrien: „Der Fisch hat das Netz zerrissen und ist entwischt!“ Als der König diese Worte hörte, nahm er auch dies als ein entsprechendes Gleichnis: „Wann wohl werde auch ich mit dem Wissen um den edlen Pfad das Netz von Begehren und Ansichten zerreißen und, ohne anzuhaften, voranschreiten?“ Er gab sein Königtum auf, trat in den Mönchsstand ein, entfaltete die Einsichtsmeditation, verwirklichte die Einzelbuddhaschaft (Paccekabodhi) und sprach diese Udāna-Strophe: Tassā dutiyapāde jālanti suttamayaṃ vuccati. Ambūti udakaṃ, tattha caratīti ambucārī, macchassetaṃ adhivacanaṃ. Salile ambucārī salilambucārī. Tasmiṃ nadīsalile jālaṃ bhetvā gataambucārīvāti vuttaṃ hoti. Tatiyapāde daḍḍhanti daḍḍhaṭṭhānaṃ vuccati. Yathā aggi daḍḍhaṭṭhānaṃ puna na nivattati, na tattha bhiyyo āgacchati, evaṃ maggañāṇagginā daḍḍhakāmaguṇaṭṭhānaṃ anivattamāno tattha bhiyyo anāgacchantoti vuttaṃ hoti. Sesaṃ vuttanayamevāti. Im zweiten Versfuß dieser Strophe wird mit „Netz“ (jāla) das aus Fäden Gefertigte bezeichnet. Mit „ambu“ wird Wasser bezeichnet; wer sich darin bewegt, ist ein Wasserbewohner (ambucārī) – dies ist eine Bezeichnung für einen Fisch. „Salilambucārī“ ist ein im Wasser lebender Wasserbewohner. Es bedeutet: wie ein Wasserbewohner, der das Netz im Flusswasser zerrissen hat und entkommen ist. Im dritten Versfuß bezeichnet „daḍḍha“ die verbrannte Stätte. Wie ein Feuer nicht wieder zu der verbrannten Stätte umkehrt und nicht mehr dorthin zurückkehrt, ebenso kehrt man, wenn die Stätte der Sinnesfreuden durch das Feuer des Pfadwissens verbrannt ist, nicht um und gelangt nicht wieder dorthin; dies ist damit gemeint. Der Rest ist wie bereits erklärt. Sandālagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über das Zerreißen (Sandālagāthāvaṇṇanā) ist abgeschlossen. 119. Okkhittacakkhūti [Pg.211] kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira cakkhulolabrahmadatto nāma rājā pādalolabrahmadatto viya nāṭakadassanaṃ anuyutto hoti. Ayaṃ pana viseso – so asantuṭṭho tattha tattha gacchati. Ayaṃ taṃ taṃ nāṭakaṃ disvā atīva abhinanditvā nāṭakadassanaparivattanena taṇhaṃ vaḍḍhento vicarati. So kira nāṭakadassanatthaṃ āgataṃ aññataraṃ kuṭumbiyabhariyaṃ disvā rāgaṃ uppādesi. Tato saṃvegaṃ āpajjitvā puna ‘‘are, ahaṃ imaṃ taṇhaṃ vaḍḍhento apāyaparipūrako bhavissāmi, handa, naṃ niggaṇhāmī’’ti pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā attano purimapaṭipattiṃ garahanto tappaṭipakkhaguṇadīpikaṃ imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 119. Was ist die Entstehungsgeschichte zu „Mit gesenktem Blick“ (okkhittacakkhu)? In Bārāṇasī gab es, so heißt es, einen König namens Cakkhulolabrahmadatta (der augen-unruhige Brahmadatta), der ähnlich wie Pādalolabrahmadatta dem Anschauen von Tanz- und Theaterdarbietungen hingegeben war. Dies jedoch war der Unterschied: Unersättlich reiste er hierhin und dorthin. Er erfreute sich übermäßig am Anblick dieser und jener Aufführung und zog umher, während er sein Begehren durch das ständige Anschauen von Aufführungen nährte. Es heißt, dass er beim Erblicken der Frau eines bestimmten Hausvaters, die gekommen war, um der Aufführung beizuwohnen, Leidenschaft für sie entwickelte. Daraufhin von heilsamem Schrecken (saṃvega) ergriffen, dachte er: „Wehe, wenn ich dieses Begehren weiter vermehre, werde ich die Leidenswelten füllen. Wohlan, ich will es bezähmen!“ Er ging in die Hauslosigkeit, übte Einsicht, verwirklichte die Einzelbuddhaschaft und sprach, sein früheres Verhalten tadelnd, diese Udāna-Strophe, die die entgegengesetzten Tugenden preist: Tattha okkhittacakkhūti heṭṭhākhittacakkhu, sattagīvaṭṭhikāni paṭipāṭiyā ṭhapetvā parivajjanagahetabbadassanatthaṃ yugamattaṃ pekkhamānoti vuttaṃ hoti. Na tu hanukaṭṭhinā hadayaṭṭhiṃ saṅghaṭṭento. Evañhi okkhittacakkhutā na samaṇasāruppā hoti. Na ca pādaloloti ekassa dutiyo, dvinnaṃ tatiyoti evaṃ gaṇamajjhaṃ pavisitukāmatāya kaṇḍūyamānapādo viya abhavanto, dīghacārikaanivattacārikavirato. Guttindriyoti chasu indriyesu idha manindriyassa visuṃ vuttattā vuttāvasesavasena ca gopitindriyo. Rakkhitamānasānoti mānasaṃ eva mānasānaṃ, taṃ rakkhitamassāti rakkhitamānasāno. Yathā kilesehi na viluppati, evaṃ rakkhitacittoti vuttaṃ hoti. Anavassutoti imāya paṭipattiyā tesu tesu ārammaṇesu kilesaanvassavavirahito. Apariḍayhamānoti kilesaggīhi apariḍayhamāno. Bahiddhā vā anavassuto, ajjhattaṃ apariḍayhamāno. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bedeutet „mit gesenktem Blick“ (okkhittacakkhu): den Blick nach unten gerichtet zu haben, wobei die sieben Halswirbel gerade ausgerichtet sind, und nur eine Jochlänge weit vorauszublicken, um zu erkennen, was zu meiden und was anzunehmen ist; dies ist damit gemeint. Doch nicht so, dass das Kinn den Brustknochen berührt. Denn eine solche Art des gesenkten Blicks ist für einen Asketen (samaṇa) nicht angemessen. „Und nicht unruhig mit den Füßen“ (na ca pādalolo) bedeutet: nicht wie jemand mit juckenden Füßen umherzurennen, weil er sich in eine Gruppe drängen will nach der Devise „zu einem Gesellten gesellt sich ein zweiter, zu zweien ein dritter“, sondern frei zu sein von langen Wanderungen und ziellosem Umherschweifen. „Mit behüteten Sinnen“ (guttindriyo) bedeutet: Da von den sechs Sinnen hier der Geist (manas) gesondert genannt wird, bezieht es sich auf das Behüten der übrigen Sinne. „Mit geschütztem Geist“ (rakkhitamānasāno) leitet sich von „mānasa“ (Geist) ab; es ist einer, dessen Geist geschützt ist. Es bedeutet: ein geschützter Geist, so dass er nicht von den Befleckungen (kilesa) geplündert [verdorben] wird. „Frei von Einströmungen“ (anavassuto) bedeutet: durch diese Praxis ist er frei vom Einströmen der Befleckungen angesichts der verschiedenen Sinnesobjekte. „Nicht brennend“ (apariḍayhamāno) bedeutet: nicht brennend durch die Feuer der Befleckungen. Nach außen hin ist er frei von Einströmungen, im Innern brennt er nicht. Der Rest ist wie bereits erklärt. Okkhittacakkhugāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den gesenkten Blick (Okkhittacakkhugāthāvaṇṇanā) ist abgeschlossen. 120. Ohārayitvāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira aññopi cātumāsikabrahmadatto nāma rājā catumāse catumāse uyyānakīḷaṃ gacchati. So ekadivasaṃ gimhānaṃ majjhimamāse uyyānaṃ pavisanto uyyānadvāre pattasañchannaṃ pupphālaṅkatasākhāviṭapaṃ pāricchattakakoviḷāraṃ disvā ekaṃ pupphaṃ gahetvā uyyānaṃ pāvisi. Tato ‘‘raññā aggapupphaṃ gahita’’nti aññataropi amacco hatthikkhandhe ṭhito ekameva pupphaṃ aggahesi. Etenevupāyena sabbo [Pg.212] balakāyo aggahesi. Pupphehi anassādentā pattampi gaṇhiṃsu. So rukkho nippattapuppho khandhamattova ahosi. Rājā sāyanhasamaye uyyānā nikkhamanto taṃ disvā ‘‘kiṃ kato ayaṃ rukkho, mamāgamanavelāya maṇivaṇṇasākhantaresu pavāḷasadisapupphālaṅkato ahosi, idāni nippattapuppho jāto’’ti cintento tasseva avidūre apupphitarukkhaṃ sañchannapalāsaṃ addasa. Disvā cassa etadahosi – ‘‘ayaṃ rukkho pupphabharitasākhattā bahujanassa lobhanīyo ahosi, tena muhutteneva byasanaṃ patto. Ayaṃ panañño alobhanīyattā tatheva ṭhito. Idañcāpi rajjaṃ pupphitarukkho viya lobhanīyaṃ, bhikkhubhāvo pana apupphitarukkho viya alobhanīyo. Tasmā yāva idampi ayaṃ rukkho viya na viluppati, tāva ayamañño sañchannapatto yathā pāricchattako, evaṃ kāsāvena sañchanno hutvā pabbajeyya’’nti. So rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 120. Was ist der Anlass für das Wort ‚Ohārayitvā‘ [nachdem man abgelegt hat]? Es heißt, in Bārāṇasī begab sich ein anderer König namens Cātumāsikabrahmadatta alle vier Monate zur Erholung in den königlichen Park. Als er an einem Tag im mittleren Sommermonat den Park betrat, sah er am Parktor einen Pāricchattaka-Koviḷāra-Baum, dessen Zweige und Äste reich belaubt und mit Blüten geschmückt waren; er pflückte eine einzige Blüte ab und betrat den Park. Daraufhin dachte ein anderer Minister, der auf dem Nacken eines Elefanten saß: ‚Vom König wurde die oberste Blüte genommen‘, und pflückte ebenfalls nur eine Blüte ab. Auf dieselbe Weise pflückte das ganze Heer [Blüten]. Da sie keine Blüten mehr fanden, nahmen sie sogar die Blätter ab. Jener Baum verlor alle Blätter und Blüten und bestand nur noch aus dem bloßen Stamm. Als der König am Abend aus dem Park heraustrat und ihn erblickte, dachte er: ‚Was wurde mit diesem Baum gemacht? Zur Zeit meiner Ankunft war er im Geäst von der Farbe von Juwelen mit korallenartigen Blüten geschmückt, nun ist er blatt- und blütenlos geworden.‘ Während er so nachdachte, erblickte er unweit davon einen nicht-blühenden Baum mit dichtem Laubwerk. Als er ihn sah, kam ihm folgender Gedanke: ‚Dieser Baum war, weil seine Zweige voller Blüten waren, für die Volksmenge begehrenswert, weshalb er in einem einzigen Augenblick ins Verderben gestürzt wurde. Jener andere hingegen steht, da er nicht begehrenswert ist, noch genau so da. Auch diese Königsherrschaft ist wie der blühende Baum begehrenswert; das Mönchsleben hingegen ist wie der nicht-blühende Baum unbegehrt. Deshalb will ich, bevor auch dieses [Königreich] wie dieser Baum zerstört wird, wie jener andere dicht belaubte Baum – so wie der Pāricchattaka – mit dem gelb-roten Gewand bedeckt, in die Hauslosigkeit ziehen.‘ Er gab das Königreich auf, trat in den Mönchsorden ein, übte Vipassanā, verwirklichte die Einzelerleuchtung (Paccekabodhi) und sprach diesen Udāna-Vers. Tattha kāsāyavattho abhinikkhamitvāti imassa pādassa gehā nikkhamitvā kāsāyavatthanivattho hutvāti evamattho veditabbo. Sesaṃ vuttanayeneva sakkā viññātunti na vitthāritanti. Darin ist die Bedeutung des Versfußes ‚kāsāyavattho abhinikkhamitvā‘ wie folgt zu verstehen: ‚aus dem Haus heraustretend und in das gelb-rote Gewand gekleidet‘. Das Übrige kann nach der bereits erklärten Weise verstanden werden, weshalb es hier nicht weiter ausgeführt wird. Pāricchattakagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Pāricchattaka-Baum ist abgeschlossen. Tatiyavaggo niṭṭhito. Das dritte Kapitel ist abgeschlossen. 121. Rasesūti kā uppatti? Aññataro kira bārāṇasirājā uyyāne amaccaputtehi parivuto silāpaṭṭapokkharaṇiyaṃ kīḷati. Tassa sūdo sabbamaṃsānaṃ rasaṃ gahetvā atīva susaṅkhataṃ amatakappaṃ antarabhattaṃ pacitvā upanāmesi. So tattha gedhamāpanno kassaci kiñci adatvā attanāva bhuñji. Udakaṃ kīḷanto ativikāle nikkhanto sīghaṃ sīghaṃ bhuñji. Yehi saddhiṃ pubbe bhuñjati, na tesaṃ kañci sari. Atha pacchā paṭisaṅkhānaṃ uppādetvā ‘‘aho! Mayā pāpaṃ kataṃ, yvāyaṃ rasataṇhābhibhūto sabbajanaṃ vissaritvā ekakova bhuñjiṃ, handa, naṃ rasataṇhaṃ niggaṇhāmī’’ti rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā attano purimapaṭipattiṃ garahanto tappaṭipakkhaguṇadīpikaṃ imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 121. Was ist der Anlass für das Wort ‚Rasesu‘ [Bezüglich der Geschmäcker]? Es heißt, ein gewisser König von Bārāṇasī vergnügte sich, umgeben von den Söhnen der Minister, im königlichen Park in einem mit Steinplatten ausgestatteten Lotusteich. Sein Koch extrahierte den Geschmack von allerlei Fleischsorten, bereitete eine überaus wohlschmeckende, dem Göttertrank gleichende Zwischenmahlzeit zu und servierte sie ihm. Jener verfiel in Gier danach, gab niemandem etwas davon und aß sie ganz alleine. Während er im Wasser spielte, kam er erst sehr spät am Nachmittag heraus und speiste in aller Eile. An jene, mit denen er zuvor gemeinsam zu speisen pflegte, dachte er überhaupt nicht. Später jedoch erzeugte er weise Überlegung: ‚Ach, welch Unheilvolles habe ich getan! Überwältigt von der Gier nach Geschmack habe ich alle Menschen vergessen und ganz alleine gegessen. Wohlan, ich werde diese Gier nach Geschmack bezwingen!‘ Er gab das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Vipassanā und verwirklichte die Einzelerleuchtung. Indem er sein früheres Verhalten tadelte und die dem entgegengesetzte Tugend darlegte, sprach er diese Udāna-Strophe. Tattha [Pg.213] rasesūti ambilamadhuratittakakaṭukaloṇakhārikakasāvādibhedesu sāyanīyesu. Gedhaṃ akaranti giddhiṃ akaronto, taṇhaṃ anuppādentoti vuttaṃ hoti. Aloloti ‘‘idaṃ sāyissāmi, idaṃ sāyissāmī’’ti evaṃ rasavisesesu anākulo. Anaññaposīti posetabbakasaddhivihārikādivirahito. Kāyasandhāraṇamattena santuṭṭhoti vuttaṃ hoti. Yathā vā pubbe uyyāne rasesu gedhakaraṇasīlo aññaposī āsiṃ, evaṃ ahutvā yāya taṇhāya lolo hutvā rasesu gedhaṃ karoti, taṃ taṇhaṃ hitvā āyatiṃ taṇhāmūlakassa aññassa attabhāvassānibbattāpanena anaññaposīti vuttaṃ hoti. Atha vā atthabhañjanakaṭṭhena kilesā ‘‘aññe’’ti vuccanti, tesaṃ aposanena anaññaposīti ayamettha attho. Sapadānacārīti avokkammacārī anupubbacārī, gharapaṭipāṭiṃ achaḍḍetvā aḍḍhakulañca daliddakulañca nirantaraṃ piṇḍāya pavisamānoti attho. Kule kule appaṭibaddhacittoti khattiyakulādīsu yattha katthaci kilesavasena alaggacitto, candopamo niccanavako hutvāti attho. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bedeutet ‚rasesu‘: in Bezug auf die schmeckbaren Dinge, die sich in sauer, süß, bitter, scharf, salzig, alkalisch, herb usw. unterteilen. ‚Gedhaṃ akaraṃ‘ [keine Gier entwickelnd] bedeutet: keine Gier hegend, kein Begehren [taṇhā] entstehen lassend. ‚Alolo‘ [nicht gierig/unerschüttert] bedeutet: unbeunruhigt bezüglich besonderer Geschmäcker, ohne zu denken: ‚Dies will ich schmecken, das will ich schmecken‘. ‚Anaññaposī‘ [nicht andere nährend] bedeutet: frei von der Pflicht, Mitschüler oder andere, die zu versorgen sind, zu nähren. Es bedeutet, dass er mit dem bloßen Erhalt des Körpers zufrieden ist. Oder aber: Anders als früher, als er die Gewohnheit hatte, im Park Gier nach Geschmäcken zu entwickeln und andere zu versorgen, hat er jenes Begehren aufgegeben, durch das er gierig wurde und Gier nach Geschmäcken entwickelte. Weil er in Zukunft keine weitere, im Begehren wurzelnde Existenzform [attabhāva] entstehen lässt, wird er ‚anaññaposī‘ genannt. Oder aber: Wegen ihrer Eigenschaft, das Wohl zu zerstören, werden die Trübungen [kilesā] als ‚die Anderen‘ [aññā] bezeichnet. Weil er diese nicht nährt, ist er ein ‚anaññaposī‘. Dies ist hier die Bedeutung. ‚Sapadānacārī‘ [von Haus zu Haus gehend] bedeutet: ohne Auslassung gehend, der Reihe nach gehend; es meint das ununterbrochene Betreten sowohl reicher als auch armer Familien der Reihe nach, ohne Häuser zu überspringen, um Almosenspeise zu empfangen. ‚Kule kule appaṭibaddhacitto‘ [mit einem Geist, der an keine Familie gebunden ist] bedeutet: mit einem Geist, der durch die Macht der Trübungen an keine Familie wie die der Kṣatriyas usw. gebunden ist, sondern wie der Mond zu sein, der stets neu erscheint. Das Übrige ist in genau der bereits beschriebenen Weise zu verstehen. Rasagedhagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Gier nach Geschmack ist abgeschlossen. 122. Pahāya pañcāvaraṇānīti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira aññataro rājā paṭhamajjhānalābhī ahosi. So jhānānurakkhaṇatthaṃ rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ patvā attano paṭipattisampadaṃ dīpento imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 122. Was ist der Anlass für das Wort ‚pahāya pañcāvaraṇāni‘ [nachdem man die fünf Hindernisse abgelegt hat]? Es heißt, in Bārāṇasī erlangte ein gewisser König die erste feinstoffliche Vertiefung [Jhāna]. Um diese Vertiefung zu bewahren, gab er das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Vipassanā und erlangte die Einzelerleuchtung. Um die Vollkommenheit seiner Praxis aufzuzeigen, sprach er diese Udāna-Strophe. Tattha pañcāvaraṇānīti pañca nīvaraṇāni eva, tāni uragasutte (su. ni. 1 ādayo) atthato vuttāni. Tāni pana yasmā abbhādayo viya candasūriye ceto āvaranti, tasmā ‘‘āvaraṇāni cetaso’’ti vuttāni. Tāni upacārena vā appanāya vā pahāya vijahitvāti attho. Upakkileseti upagamma cittaṃ vibādhente akusaladhamme, vatthopamādīsu (ma. ni. 1.70 ādayo) vutte abhijjhādayo vā. Byapanujjāti panuditvā, vipassanāmaggena pajahitvāti attho. Sabbeti anavasese. Evaṃ samathavipassanāsampanno paṭhamamaggena diṭṭhinissayassa pahīnattā anissito, sesamaggehi chetvā tedhātukaṃ [Pg.214] sinehadosaṃ, taṇhārāganti vuttaṃ hoti. Sineho eva hi guṇapaṭipakkhato sinehadosoti vutto. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bezeichnet ‚pañcāvaraṇāni‘ die die fünf Hemmnisse [nīvaraṇāni]; diese sind in ihrer Bedeutung im Uraga-Sutta dargelegt. Weil sie aber den Geist blockieren, so wie Wolken und ähnliches Mond und Sonne verdecken, werden sie als ‚Hemmnisse des Geistes‘ [āvaraṇāni cetaso] bezeichnet. ‚Pahāya‘ bedeutet: nachdem man sie entweder durch die Annäherungskonzentration [upacāra] oder die Vollkonzentration [appanā] abgelegt und überwunden hat. Unter ‚Trübungen‘ [upakkilese] versteht man unheilsame Geisteszustände, die an den Geist herantreten und ihn bedrängen, wie etwa die im Vatthūpama-Sutta und anderen Lehrreden erwähnte Habsucht [abhijjhā] und so weiter. ‚Byapanujja‘ bedeutet: vertrieben habend, durch den Pfad der Einsicht [vipassanāmagga] überwunden habend. ‚Sabbe‘ bedeutet: ohne Ausnahme. Wer so mit Ruhe und Einsicht [samatha-vipassanā] ausgestattet ist, ist ‚unabhängig‘ [anissito], da er durch den ersten Pfad [paṭhamamagga] die Stütze der falschen Ansichten [diṭṭhinissaya] aufgegeben hat, und er hat durch die übrigen Pfade die Anhänglichkeit [sinehadosa], d. h. die gierige Leidenschaft [taṇhā-rāga], die sich auf die drei Daseinsbereiche erstreckt, abgeschnitten – so ist es gemeint. Denn die Anhänglichkeit selbst wird wegen ihrer Gegnerschaft zu den heilsamen Eigenschaften als ‚Makel der Anhänglichkeit‘ [sinehadosa] bezeichnet. Das Übrige ist in genau der bereits beschriebenen Weise zu verstehen. Āvaraṇagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Hemmnisse ist abgeschlossen. 123. Vipiṭṭhikatvānāti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira aññataro rājā catutthajjhānalābhī ahosi. Sopi jhānānurakkhaṇatthaṃ rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā attano paṭipattisampadaṃ dīpento imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 123. Was ist der Anlass für das Wort ‚vipiṭṭhikatvāna‘ [nachdem man den Rücken zugewandt hat]? Es heißt, in Bārāṇasī erlangte ein gewisser König die vierte feinstoffliche Vertiefung [Jhāna]. Auch er gab, um diese Vertiefung zu bewahren, das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Vipassanā, verwirklichte die Einzelerleuchtung und sprach, um die Vollkommenheit seiner Praxis aufzuzeigen, diese Udāna-Strophe. Tattha vipiṭṭhikatvānāti piṭṭhito katvā, chaḍḍetvā vijahitvāti attho. Sukhañca dukkhanti kāyikaṃ sātāsātaṃ. Somanassadomanassanti cetasikaṃ sātāsātaṃ. Upekkhanti catutthajjhānupekkhaṃ. Samathanti catutthajjhānasamādhiṃ eva. Visuddhanti pañcanīvaraṇavitakkavicārapītisukhasaṅkhātehi navahi paccanīkadhammehi vimuttattā atisuddhaṃ, niddhantasuvaṇṇamiva vigatūpakkilesanti attho. Hierbei bedeutet „vipiṭṭhikatvāna“ (hinter sich gelassen): hinter sich gebracht, weggeworfen, aufgegeben. „Sukhañca dukkhañca“ (Freude und Schmerz) bedeutet körperlich Angenehmes und Unangenehmes. „Somanassadomanassaṃ“ (geistige Freude und Trübsal) bedeutet geistig Angenehmes und Unangenehmes. „Upekkha“ bezieht sich auf die Gleichmut des vierten Jhāna. „Samatha“ bezeichnet die Konzentration (samādhi) des vierten Jhāna selbst. „Visuddha“ (gereinigt) bedeutet: äußerst rein, weil befreit von den neun gegnerischen Zuständen, namentlich den fünf Hemmnissen sowie vitakka (Anwendung des Geistes), vicāra (Erwägung), pīti (Verzückung) und sukha (Glückseligkeit); frei von Trübungen wie geläutertes Gold, so lautet die Bedeutung. Ayaṃ pana yojanā – vipiṭṭhikatvāna sukhañca dukkhañca pubbeva, paṭhamajjhānūpacāreyeva dukkhaṃ tatiyajjhānūpacāreyeva sukhanti adhippāyo. Puna ādito vuttaṃ ca-kāraṃ parato netvā ‘‘somanassaṃ domanassañca vipiṭṭhikatvāna pubbevā’’ti adhikāro. Tena somanassaṃ catutthajjhānūpacāre, domanassañca dutiyajjhānūpacāreyevāti dīpeti. Etāni hi etesaṃ pariyāyato pahānaṭṭhānāni. Nippariyāyato pana dukkhassa paṭhamajjhānaṃ, domanassassa dutiyajjhānaṃ, sukhassa tatiyajjhānaṃ, somanassassa catutthajjhānaṃ pahānaṭṭhānaṃ. Yathāha – ‘‘paṭhamaṃ jhānaṃ upasampajja viharati etthuppannaṃ dukkhindriyaṃ aparisesaṃ nirujjhatī’’tiādikaṃ (saṃ. ni. 5.510) sabbaṃ aṭṭhasāliniyā dhammasaṅgahaṭṭhakathāyaṃ (dha. sa. aṭṭha. 165) vuttaṃ. Yathā pubbevāti tīsu paṭhamajjhānādīsu dukkhadomanassasukhāni vipiṭṭhikatvā evamettha catutthajjhāne somanassaṃ vipiṭṭhikatvā imāya paṭipadāya laddhānupekkhaṃ samathaṃ visuddhaṃ eko careti. Sesaṃ vuttanayamevāti. Dies ist jedoch die syntaktische Verknüpfung (yojanā): „Nachdem man Freude und Schmerz bereits zuvor hinter sich gelassen hat“ – die Absicht dabei ist: den körperlichen Schmerz bereits im Bereich des Zugangs (upacāra) zum ersten Jhāna und die körperliche Freude im Bereich des Zugangs zum dritten Jhāna. Wenn man das zuvor genannte Wort „ca“ (und) nach hinten zieht, ergibt sich der Bezug: „Nachdem man geistige Freude (somanassa) und geistigen Schmerz (domanassa) bereits zuvor hinter sich gelassen hat“. Damit wird aufgezeigt, dass geistige Freude im Zugang zum vierten Jhāna und geistiger Schmerz im Zugang zum zweiten Jhāna aufgegeben werden. Dies sind nämlich ihre Orte des Aufgebens im übertragenen Sinne (pariyāyato). Im direkten Sinne (nippariyāyato) jedoch ist der Ort des Überwindens von körperlichem Schmerz das erste Jhāna, von geistigem Schmerz das zweite Jhāna, von körperlicher Freude das dritte Jhāna und von geistiger Freude das vierte Jhāna. Wie es heißt: „Er verweilt, nachdem er das erste Jhāna erreicht hat; die hier entstandene Schmerzfähigkeit (dukkhindriya) erlischt restlos“ usw. – all dies wird im Kommentar zum Dhammasaṅgaha, der Atthasālinī, dargelegt. Wie es heißt „bereits zuvor“, so sollte man verstehen: Nachdem man in den drei Stufen, beginnend mit dem ersten Jhāna, körperlichen Schmerz, geistigen Schmerz und körperliche Freude hinter sich gelassen hat, und ebenso hier im vierten Jhāna die geistige Freude hinter sich gelassen hat, pflegt man durch diesen Praxisweg die erlangte Gleichmut, die reine Stille (samatha), und wandert einsam. Das Übrige entspricht der bereits erklärten Weise. Vipiṭṭhigāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Vipiṭṭhi-Strophe ist abgeschlossen. 124. Āraddhavīriyoti [Pg.215] kā uppatti? Aññataro kira paccantarājā sahassayodhabalakāyo rajjena khuddako, paññāya mahanto ahosi. So ekadivasaṃ ‘‘kiñcāpi ahaṃ khuddako rajjena, paññavatā pana sakkā sakalajambudīpaṃ gahetu’’nti cintetvā sāmantarañño dūtaṃ pāhesi – ‘‘sattāhabbhantare me rajjaṃ vā detu yuddhaṃ vā’’ti. Tato so attano amacce sannipātāpetvā āha – ‘‘mayā tumhe anāpucchāyeva sāhasaṃ kammaṃ kataṃ, amukassa rañño evaṃ pesitaṃ, kiṃ kātabba’’nti? Te āhaṃsu – ‘‘sakkā, mahārāja, so dūto nivattetu’’nti. ‘‘Na sakkā, gato bhavissatī’’ti. ‘‘Yadi evaṃ vināsitamhā tayā, tena hi dukkhaṃ aññassa satthena marituṃ, handa, mayaṃ aññamaññaṃ paharitvā marāma, attānaṃ paharitvā marāma, ubbandhāma, visaṃ khādāmā’’ti. Evaṃ etesu ekameko maraṇameva saṃvaṇṇeti. Tato rājā ‘‘kiṃ me imehi, atthi, bhaṇe, mayhaṃ yodhā’’ti āha. Atha ‘‘ahaṃ mahārāja yodho, ahaṃ mahārāja yodho’’ti yodhasahassaṃ uṭṭhahi. 124. Was ist die Entstehungsgeschichte zu „Āraddhavīriyo“ (der Tatkraft entfaltet hat)? Einst gab es, wie man sagt, einen Grenzkönig, dessen Streitmacht aus tausend Kriegern bestand; sein Reich war klein, doch an Weisheit war er groß. Eines Tages dachte er: „Obwohl ich ein kleines Reich habe, ist es einem Weisen dennoch möglich, ganz Jambudīpa einzunehmen.“ Er sandte einen Boten an den benachbarten König mit der Nachricht: „Übergib mir binnen sieben Tagen dein Reich oder stelle dich dem Kampf!“ Daraufhin berief er seine Minister ein und sprach: „Ohne euch zu fragen, habe ich eine kühne Tat begangen und eine solche Nachricht an jenen König gesandt. Was ist nun zu tun?“ Sie antworteten: „O Großkönig, man kann diesen Boten zurückrufen.“ Er erwiderte: „Das ist nicht möglich, er wird bereits angekommen sein.“ – „Wenn dem so ist, hast du uns ins Verderben gestürzt! Es ist qualvoll, durch die Waffe eines anderen zu sterben. Wohlan, lasst uns einander erschlagen und sterben, lasst uns uns selbst töten, lasst uns erhängen oder Gift einnehmen!“ So pries jeder von ihnen nur den Tod. Da sprach der König: „Was nützen mir diese Leute? Sagt mir, habe ich keine Krieger?“ Daraufhin erhoben sich tausend Krieger und riefen: „Ich bin ein Krieger, o Großkönig! Ich bin ein Krieger, o Großkönig!“ Rājā ‘‘ete upaparikkhissāmī’’ti mahantaṃ citakaṃ sajjāpetvā āha – ‘‘mayā, bhaṇe, idaṃ sāhasaṃ kataṃ, taṃ me amaccā paṭikkosanti, svāhaṃ citakaṃ pavisissāmi. Ko mayā saddhiṃ pavisissati, kena mayhaṃ jīvitaṃ pariccatta’’nti? Evaṃ vutte pañcasatā yodhā uṭṭhahiṃsu ‘‘mayaṃ, mahārāja, pavisissāmā’’ti. Tato rājā itare pañcasate āha – ‘‘tumhe dāni, tātā, kiṃ karissathā’’ti? Te āhaṃsu – ‘‘nāyaṃ, mahārāja, purisakāro, itthicariyā esā, apica mahārājena paṭirañño dūto pesito, te mayaṃ tena raññā saddhiṃ yujjhitvā marissāmā’’ti. Tato rājā ‘‘pariccattaṃ tumhehi mama jīvita’’nti caturaṅginiṃ senaṃ sannayhitvā tena yodhasahassena parivuto gantvā rajjasīmāya nisīdi. Der König dachte: „Ich will sie auf die Probe stellen.“ Er ließ einen großen Scheiterhaufen errichten und sprach: „Ihr Männer, ich habe diese kühne Tat begangen, doch meine Minister missbilligen sie. Daher werde ich diesen Scheiterhaufen betreten. Wer wird mit mir hineingehen? Wer ist bereit, sein Leben für mich hinzugeben?“ Als dies gesagt war, erhoben sich fünfhundert Krieger und sprachen: „O Großkönig, wir werden mit dir hineingehen!“ Daraufhin sprach der König zu den anderen fünfhundert: „Und ihr, meine Lieben, was werdet ihr nun tun?“ Sie antworteten: „O Großkönig, dies ist keine Tat, die eines Mannes würdig ist; das ist das Verhalten von Frauen. Zudem hat der Großkönig einen Boten an den gegnerischen König gesandt. Daher wollen wir mit jenem König kämpfen und im Kampf sterben!“ Da dachte der König: „Ihr habt euer Leben für mich hingegeben.“ Er rüstete sein viergliedriges Heer aus, zog in Begleitung jener tausend Krieger aus und ließ sich an der Landesgrenze nieder. Sopi paṭirājā taṃ pavattiṃ sutvā ‘‘are, so khuddakarājā mama dāsassāpi nappahotī’’ti dussitvā sabbaṃ balakāyaṃ ādāya yujjhituṃ nikkhami. Khuddakarājā taṃ abbhuyyātaṃ disvā balakāyaṃ āha – ‘‘tātā, tumhe na bahukā, sabbe sampiṇḍitvā asicammaṃ gahetvā sīghaṃ imassa rañño purato ujukaṃ eva gacchathā’’ti. Te tathā akaṃsu. Athassa [Pg.216] sā senā dvidhā bhinditvā antaramadāsi. Te taṃ rājānaṃ jīvaggāhaṃ gahetvā attano rañño ‘‘taṃ māressāmī’’ti āgacchantassa adaṃsu. Paṭirājā taṃ abhayaṃ yāci. Rājā tassa abhayaṃ datvā sapathaṃ kārāpetvā attano vase katvā tena saha aññaṃ rājānaṃ abbhuggantvā tassa rajjasīmāya ṭhatvā pesesi – ‘‘rajjaṃ vā me detu yuddhaṃ vā’’ti. So ‘‘ahaṃ ekayuddhampi na sahāmī’’ti rajjaṃ niyyādesi. Etenupāyena sabbe rājāno gahetvā ante bārāṇasirājānampi aggahesi. Auch jener feindliche König hörte diese Nachricht, freute sich höhnisch und dachte: „Ha! Dieser kleine König reicht nicht einmal an meinen Sklaven heran!“, und zog mit seiner gesamten Streitmacht in die Schlacht. Als der kleine König das heranrückende Heer sah, sprach er zu seinen Truppen: „Meine Lieben, ihr seid nicht viele. Schließt euch eng zusammen, nehmt Schwert und Schild und marschiert schnell und geradewegs vor die Augen dieses Königs!“ Sie taten wie geheißen. Da teilte sich das gegnerische Heer in zwei Hälften und gab den Weg frei. Sie nahmen jenen König lebendig gefangen und übergaben ihn ihrem eigenen König, der heranzog, um ihn zu töten. Der feindliche König bat um Gnade (abhaya). Der König gewährte ihm Gnade, ließ ihn einen Eid schwören, unterwarf ihn seiner Herrschaft und zog gemeinsam mit ihm gegen einen anderen König. An dessen Landesgrenze angekommen, sandte er eine Botschaft: „Übergib mir entweder das Reich oder stelle dich dem Kampf!“ Jener antwortete: „Ich halte nicht einmal einem einzigen Kampf stand“, und übergab das Reich. Auf diese Weise unterwarf er alle Könige und nahm schließlich auch den König von Bārāṇasī gefangen. So ekasatarājaparivuto sakalajambudīparajjaṃ anusāsanto cintesi – ‘‘ahaṃ pubbe khuddako ahosiṃ, somhi idāni attano ñāṇasampattiyā sakalajambudīpamaṇḍalassa issaro rājā jāto. Taṃ kho pana me ñāṇaṃ lokiyavīriyasampayuttaṃ, neva nibbidāya na virāgāya saṃvattati, yaṃnūnāhaṃ iminā ñāṇena lokuttaradhammaṃ gaveseyya’’nti. Tato bārāṇasirañño rajjaṃ datvā puttadārañca sakajanapadeyeva ṭhapetvā sabbaṃ pahāya pabbajitvā vipassanaṃ ārabhitvā paccekabodhiṃ sacchikatvā attano vīriyasampattiṃ dīpento imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. Umgeben von einhunderteins Königen und das gesamte Reich von Jambudīpa regierend, dachte er: „Früher war ich unbedeutend, doch nun bin ich dank der Vollkommenheit meines Wissens zum Herrscher und König über den gesamten Kreis von Jambudīpa geworden. Doch dieses mein Wissen ist mit weltlicher Tatkraft verbunden; es führt weder zur Abkehr (nibbidā) noch zur Begierdelosigkeit (virāga). Was wäre, wenn ich mit diesem Wissen die überweltliche Wahrheit (lokuttaradhamma) erstreben würde?“ Daraufhin gab er dem König von Bārāṇasī sein Reich zurück, brachte Frau und Kinder in ihrer Heimat unter, gab alles auf, weihte sich dem asketischen Leben (pabbajjā), begann mit der Einsichtsmeditation (vipassanā), verwirklichte die Paccekabodhi (Einzelbuddhaschaft) und drückte, um die Vollkommenheit seiner Tatkraft zu zeigen, diesen Udāna-Vers aus. Tattha āraddhaṃ vīriyaṃ assāti āraddhavīriyo. Etena attano mahāvīriyataṃ dasseti. Paramattho vuccati nibbānaṃ, paramatthassa patti paramatthapatti, tassā paramatthapattiyā. Etena vīriyārambhena pattabbaṃ phalaṃ dasseti. Alīnacittoti etena vīriyūpatthambhānaṃ cittacetasikānaṃ alīnataṃ dasseti. Akusītavuttīti etena ṭhānacaṅkamādīsu kāyassa anavasīdanaṃ dasseti. Daḷhanikkamoti etena ‘‘kāmaṃ taco ca nhāru cā’’ti (ma. ni. 2.184; a. ni. 2.5; mahāni. 196) evaṃ pavattaṃ padahanavīriyaṃ dasseti, yaṃ taṃ anupubbasikkhādīsu padahanto ‘‘kāyena ceva paramatthasaccaṃ sacchikarotī’’ti vuccati. Atha vā etena maggasampayuttaṃ vīriyaṃ dasseti. Tampi daḷhañca bhāvanāpāripūrigatattā, nikkamo ca sabbaso paṭipakkhā nikkhantattā, tasmā taṃsamaṅgīpuggalopi daḷho nikkamo assāti ‘‘daḷhanikkamo’’ti vuccati. Thāmabalūpapannoti maggakkhaṇe kāyathāmena ca ñāṇabalena ca upapanno. Atha vā thāmabhūtena balena [Pg.217] upapanno, thirañāṇabalūpapannoti vuttaṃ hoti. Etena tassa vīriyassa vipassanāñāṇasampayogaṃ dīpento yogapadhānabhāvaṃ sādheti. Pubbabhāgamajjhimaukkaṭṭhavīriyavasena vā tayopi pādā yojetabbā. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin ist ein "tatkräftig Strebender" (āraddhavīriyo) jemand, dessen Tatkraft (vīriya) entfaltet (āraddha) ist. Damit zeigt er seine eigene große Willensstärke. Das höchste Ziel (paramattho) wird Nibbāna genannt; das Erlangen des höchsten Ziels ist das Erlangen des Paramattha; "für dieses Erlangen des höchsten Ziels" (tassā paramatthapattiyā). Damit zeigt er die Frucht, die durch diese Entfaltung der Tatkraft zu erlangen ist. Mit "unverzagten Geistes" (alīnacitto) zeigt er die Unerschlafftheit der durch Tatkraft unterstützten Geisteszustände und Geistesfaktoren (citta-cetasika). Mit "nicht träge im Verhalten" (akusītavuttī) zeigt er das Nicht-Erschlaffen des Körpers beim Stehen, Gehen usw. Mit "von festem Entschluss" (daḷhanikkamo) zeigt er die Anstrengung im Streben (padahanavīriya), die sich gemäß dem Wortlaut "Mögen gerne Haut und Sehnen [schwinden]..." entfaltet, und von der man sagt, wenn man sich in der stufenweisen Schulung usw. anstrengt: "Mit dem Körper selbst verwirklicht er die höchste Wahrheit." Oder aber er zeigt damit die mit dem Pfad verbundene Tatkraft. Auch diese ist fest (daḷha), weil sie zur Vollendung der Entfaltung gelangt ist, und sie ist ein Hinausgehen (nikkama), da sie vollständig von allen gegnerischen Zuständen entwichen ist; daher wird auch die damit ausgestattete Person als jemand bezeichnet, dessen Entschluss fest ist, also als "von festem Entschluss" (daḷhanikkamo). Mit "ausgestattet mit Willenskraft und Stärke" (thāmabalūpapanno) ist gemeint, dass er im Pfad-Moment mit der Willenskraft des Körpers und der Stärke des Wissens ausgestattet ist. Oder aber er ist mit einer Kraft ausgestattet, die aus Willenskraft besteht; damit ist gemeint, dass er mit der Stärke eines unerschütterlichen Wissens ausgestattet ist. Indem er damit die Verbindung jener Tatkraft mit der Einsichtserkenntnis (vipassanāñāṇa) verdeutlicht, begründet er das Wesen des eifrigen Strebens. Oder die drei Phrasen sollten entsprechend der Tatkraft der Anfangsphase, der mittleren Phase und der höchsten Phase zugeordnet werden. Das Übrige ist genau wie bereits erklärt. Āraddhavīriyagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Tatkräftigen (āraddhavīriya) ist abgeschlossen. 125. Paṭisallānanti kā uppatti? Imissā gāthāya āvaraṇagāthāya viya uppatti, natthi koci viseso. Atthavaṇṇanāya panassā paṭisallānanti tehi tehi sattasaṅkhārehi paṭinivattitvā sallānaṃ, ekamantasevitā ekībhāvo kāyavivekoti attho. Jhānanti paccanīkajhāpanato ārammaṇalakkhaṇūpanijjhānato ca cittaviveko vuccati. Tattha aṭṭha samāpattiyo nīvaraṇādipaccanīkajhāpanato kasiṇādiārammaṇūpanijjhānato ca ‘‘jhāna’’nti vuccati. Vipassanāmaggaphalāni sattasaññādipaccanīkajhāpanato lakkhaṇūpanijjhānato ca ‘‘jhāna’’ni vuccati. Idha pana ārammaṇūpanijjhānameva adhippetaṃ. Evametaṃ paṭisallānañca jhānañca ariñcamāno ajahamāno anissajjamāno. Dhammesūti vipassanūpagesu pañcakkhandhādidhammesu. Niccanti satataṃ samitaṃ abbokiṇṇaṃ. Anudhammacārīti te dhamme ārabbha pavattanena anugataṃ vipassanādhammaṃ caramāno. Atha vā dhammesūti ettha dhammāti navalokuttaradhammā, tesaṃ dhammānaṃ anulomo dhammoti anudhammo, vipassanāyetaṃ adhivacanaṃ. Tattha ‘‘dhammānaṃ niccaṃ anudhammacārī’’ti vattabbe gāthābandhasukhatthaṃ vibhattibyattayena ‘‘dhammesū’’ti vuttaṃ siyā. Ādīnavaṃ sammasitā bhavesūti tāya anudhammacāritāsaṅkhātāya vipassanāya aniccākārādidosaṃ tīsu bhavesu samanupassanto evaṃ imāya kāyacittavivekasikhāpattavipassanāsaṅkhātāya paṭipadāya adhigatoti vattabbo eko careti evaṃ yojanā veditabbā. 125. "Zurückgezogenheit" (paṭisallāna) – was ist der Anlass ihrer Entstehung? Der Anlass für diese Strophe ist derselbe wie bei der Āvaraṇa-Strophe; es gibt keinen Unterschied. In der Erklärung ihrer Bedeutung jedoch: "Paṭisallāna" bedeutet das Zurückziehen von den verschiedenen Wesen und Gestaltungen (sattasaṅkhāra) und das Verweilen an einem einsamen Ort, das Alleinsein, d. h. die körperliche Absonderung (kāyaviveka). "Vertiefung" (jhāna) wird geistige Absonderung (cittaviveka) genannt, weil es die gegnerischen Zustände verbrennt (jhāpanato) und weil es eine feste Betrachtung des Objekts und der Merkmale (ārammaṇalakkhaṇūpanijjhāna) ist. Darunter werden die acht Errungenschaften (samāpatti) "Vertiefung" (jhāna) genannt, weil sie die Hemmnisse und andere gegnerische Zustände verbrennen und weil sie sich eng an ein Kasiṇa-Objekt usw. heften. Die Einsicht, die Pfade und die Früchte werden "Vertiefung" (jhāna) genannt, weil sie gegnerische Zustände wie die Vorstellung eines Wesens (sattasaññā) usw. verbrennen und weil sie die Merkmale eng betrachten. Hier jedoch ist nur die feste Betrachtung des Objekts (ārammaṇūpanijjhāna) gemeint. Dieses Zurückgezogensein und diese Vertiefung "nicht aufgebend" bedeutet: nicht im Stich lassend (ariñcamāno), nicht vernachlässigend (ajahamāno), nicht preisgebend (anissajjamāno). "In den Dingen" (dhammesu) bezieht sich auf die fife Daseinsgruppen (pañcakkhandha) usw., die der Einsicht dienen. "Beständig" (niccaṃ) bedeutet: fortwährend, unaufhörlich, ununterbrochen. "Gemäß der Lehre wandelnd" (anudhammacārī) bedeutet: die Praxis der Einsicht ausübend, die sich in Bezug auf diese Dinge entfaltet. Oder aber in "dhammesu" sind mit "dhammā" die neun überweltlichen Phänomene gemeint; das diesen Phänomenen entsprechende Gesetz ist das "angemessene Gesetz" (anudhamma) – dies ist eine Bezeichnung für die Einsicht (vipassanā). Da man eigentlich sagen müsste "stets dem Gesetz der Gesetze entsprechend wandelnd" (dhammānaṃ niccaṃ anudhammacārī), steht hier aus metrischen Gründen mit Kasusvertauschung "dhammesu". "Das Elend in den Daseinsformen erwägend" bedeutet: durch diese Einsicht, die als das dem Gesetz gemäße Wandeln bezeichnet wird, betrachtet er das Übel der Unbeständigkeit usw. in den drei Daseinsformen richtig. So ist die Satzkonstruktion zu verstehen: "Er ist durch diesen Übungsweg der Einsicht, die den Gipfel der körperlichen und geistigen Absonderung erreicht hat, angelangt, [daher] soll er einsam wandern." Paṭisallānagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Zurückgezogenheit (paṭisallāna) ist abgeschlossen. 126. Taṇhakkhayanti [Pg.218] kā uppatti? Aññataro kira bārāṇasirājā mahaccarājānubhāvena nagaraṃ padakkhiṇaṃ karoti. Tassa sarīrasobhāya āvajjitahadayā sattā purato gacchantāpi nivattitvā tameva ullokenti, pacchato gacchantāpi, ubhohi passehi gacchantāpi. Pakatiyā eva hi buddhadassane puṇṇacandasamuddarājadassane ca atitto loko. Atha aññatarā kuṭumbiyabhariyāpi uparipāsādagatā sīhapañjaraṃ vivaritvā olokayamānā aṭṭhāsi. Rājā taṃ disvā paṭibaddhacitto hutvā amaccaṃ āṇāpesi – ‘‘jānāhi tāva, bhaṇe, ‘ayaṃ itthī sasāmikā vā asāmikā vā’’’ti? So ñatvā ‘‘sasāmikā, devā’’ti ārocesi. Atha rājā cintesi – ‘‘imā vīsatisahassanāṭakitthiyo devaccharāyo viya maṃ eva ekaṃ abhiramāpenti, so dānāhaṃ etāpi atussitvā parassa itthiyā taṇhaṃ uppādesiṃ. Sā uppannā apāyameva ākaḍḍhatī’’ti taṇhāya ādīnavaṃ disvā ‘‘handa, naṃ niggaṇhāmī’’ti rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 126. "Die Vernichtung des Begehrens" (taṇhakkhaya) – was ist der Anlass? Es heißt, ein gewisser König von Bārāṇasī umschritt einst die Stadt in großer königlicher Pracht. Die Wesen, deren Herzen von der Schönheit seines Körpers gefesselt waren, wandten sich um und blickten ihn an, selbst wenn sie vor ihm gingen, ebenso wenn sie hinter ihm gingen oder an seinen beiden Seiten gingen. Denn für gewöhnlich wird die Welt niemals satt beim Anblick eines Buddhas, beim Anblick des Vollmonds, des Ozeans oder eines Königs. Da stand eine gewisse Ehefrau eines Hausvaters oben auf ihrem Palast, öffnete das Löwenfenster (sīhapañjara) und schaute herab. Als der König sie sah, verliebte sich sein Geist in sie und er befahl einem Minister: "Finde erst einmal heraus, mein Lieber, ob diese Frau verheiratet oder unverheiratet ist." Jener fand es heraus und meldete: "Sie ist verheiratet, o König." Da dachte der König: "Diese zwanzigtausend Tänzerinnen erfreuen mich allein wie Himmelsnymphen, und doch habe ich nun, unzufrieden mit ihnen, Begehren nach der Frau eines anderen entwickelt. Sobald dieses Begehren entsteht, zieht es einen direkt in die Leidenswelten (apāya) hinab." Als er so das Elend des Begehrens erkannte, dachte er: "Wohlan, ich werde es bezwingen!" Er gab das Königreich auf, trat in die Hauslosigkeit ein, übte Einsichtsmeditation, verwirklichte die Einzelbuddhaschaft (paccekabodhi) und sprach diese feierliche Strophe. Tattha taṇhakkhayanti nibbānaṃ, evaṃ diṭṭhādīnavāya vā taṇhāya appavattiṃ. Appamattoti sātaccakārī, sakkaccakārī. Aneḷamūgoti alālāmukho. Atha vā aneḷo ca amūgo ca, paṇḍito byattoti vuttaṃ hoti. Hitasukhasampāpakaṃ sutamassa atthīti sutavā, āgamasampannoti vuttaṃ hoti. Satīmāti cirakatādīnaṃ anussaritā. Saṅkhātadhammoti dhammūpaparikkhāya pariññātadhammo. Niyatoti ariyamaggena niyatabhāvappatto. Padhānavāti sammappadhānavīriyasampanno. Uppaṭipāṭiyā esa pāṭho yojetabbo. Evameva tehi appamādādīhi samannāgato niyāmasampāpakena padhānena padhānavā, tena padhānena sampattaniyāmato niyato, tato arahattappattiyā saṅkhātadhammo. Arahā hi puna saṅkhātabbābhāvato ‘‘saṅkhātadhammo’’ti vuccati. Yathāha – ‘‘ye ca saṅkhātadhammāse, ye ca sekhā puthū idhā’’ti (su. ni. 1044; cūḷani. ajitamāṇavapucchāniddesa 7). Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bedeutet "die Vernichtung des Begehrens" (taṇhakkhaya) Nibbāna, oder das Nicht-mehr-Entstehen des Begehrens, dessen Elend so erkannt wurde. "Achtsam" (appamatto) bedeutet: beharrlich handelnd (sātaccakārī), respektvoll handelnd (sakkaccakārī). "Nicht dumm und stumm" (aneḷamūgo) bedeutet: nicht speichelfließend. Oder aber "nicht dumm und nicht stumm" bedeutet: weise und geschickt. "Wer ein Gehörtes besitzt, das zu Nutzen und Glück führt, ist ein Gelehrter" (sutavā); damit ist gemeint, dass er mit den überlieferten Texten (āgama) ausgestattet ist. "Achtsam" (satīmā) bedeutet: ein Erinnerer an längst Getanes usw. "Der die Dinge begriffen hat" (saṅkhātadhammo) bedeutet: einer, der die Phänomene durch die Untersuchung der Lehren (dhammūpaparikkhā) gründlich erkannt hat. "Bestimmt" (niyato) bedeutet: einer, der durch den edlen Pfad den Zustand der Gewissheit (niyatabhāva) erreicht hat. "Strebsam" (padhānavā) bedeutet: ausgestattet mit der Tatkraft des rechten Strebens (sammappadhāna). Dieser Textabschnitt sollte in umgekehrter Reihenfolge konstruiert werden. Ebenso ist er, ausgestattet mit jener Wachsamkeit usw., "strebsam" (padhānavā) aufgrund des Strebens, das zur Gewissheit führt; durch dieses Streben ist er "bestimmt" (niyato), da er die feste Gewissheit erlangt hat; und folglich ist er durch das Erlangen der Arahatschaft ein "saṅkhātadhammo" (einer, der die Phänomene begriffen hat). Denn ein Arahat wird "saṅkhātadhammo" genannt, weil für ihn nichts mehr zu untersuchen (saṅkhātabba) übrig ist. Wie es heißt: "Diejenigen, die die Dinge begriffen haben, und die vielen Lernenden hier..." Das Übrige ist genau wie bereits erklärt. Taṇhakkhayagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Vernichtung des Begehrens (taṇhakkhaya) ist abgeschlossen. 127. Sīhovāti [Pg.219] kā uppatti? Aññatarassa kira bārāṇasirañño dūre uyyānaṃ hoti, so pageva uṭṭhāya uyyānaṃ gacchanto antarāmagge yānā oruyha udakaṭṭhānaṃ upagato ‘‘mukhaṃ dhovissāmī’’ti. Tasmiñca padese sīhī sīhapotakaṃ janetvā gocarāya gatā. Rājapuriso taṃ disvā ‘‘sīhapotako, devā’’ti ārocesi. Rājā ‘‘sīho kira kassaci na bhāyatī’’ti taṃ upaparikkhituṃ bheriādīni ākoṭāpesi, sīhapotako taṃ saddaṃ sutvāpi tatheva sayi. Atha yāvatatiyaṃ ākoṭāpesi. So tatiyavāre sīsaṃ ukkhipitvā sabbaṃ parisaṃ oloketvā tatheva sayi. Atha rājā ‘‘yāvassa mātā nāgacchati, tāva gacchāmā’’ti vatvā gacchanto cintesi – ‘‘tadahujātopi sīhapotako na santasati na bhāyati, kudāssu nāmāhampi taṇhādiṭṭhiparitāsaṃ chaḍḍetvā na santaseyyaṃ na bhāyeyya’’nti? So taṃ ārammaṇaṃ gahetvā gacchanto puna kevaṭṭehi macche gahetvā sākhāsu bandhitvā pasārite jāle vātaṃ asaṅgaṃyeva gacchamānaṃ disvā tasmiṃ nimittaṃ aggahesi – ‘‘kudāssu nāmāhampi taṇhādiṭṭhimohajālaṃ phāletvā evaṃ asajjamāno gaccheyya’’nti? 127. „Wie ein Löwe“ – was ist der Anlass (für diesen Vers)? Es heißt, ein König von Bārāṇasī hatte einen weit entfernten Park. Als er am frühen Morgen aufstand und zum Park reiste, stieg er unterwegs von seinem Wagen ab und begab sich zu einer Wasserstelle mit dem Gedanken: „Ich will mir das Gesicht waschen.“ In jener Gegend hatte eine Löwin ein Löwenjunges geboren und war auf Nahrungssuche gegangen. Ein königlicher Diener sah es und meldete: „O König, ein Löwenjunges!“ Da der König dachte: „Ein Löwe fürchtet sich ja vor niemandem“, ließ er, um dies zu prüfen, Trommeln und andere Instrumente schlagen. Das Löwenjunge hörte diesen Schall, blieb aber einfach so liegen. Daraufhin ließ er sie bis zu dreimal schlagen. Beim dritten Mal hob es den Kopf, blickte die ganze Menge an und legte sich wieder so hin. Da sagte der König: „Solange seine Mutter noch nicht kommt, wollen wir gehen“, und während des Gehens dachte er nach: „Selbst ein am heutigen Tage geborenes Löwenjunges erschrickt nicht, fürchtet sich nicht. Oh, wann werde auch ich das durch Begehren und falsche Ansicht bedingte Zittern abwerfen und weder erschrecken noch mich fürchten?“ Während er diesen Gedanken als Meditationsobjekt erfasste und weiterging, sah er Fischer, die Fische gefangen, sie an Zweigen aufgehängt und Netze aufgespannt hatten, durch die der Wind völlig ungehindert hindurchging, und erfasste darin ein Zeichen: „Oh, wann werde auch ich das Netz von Begehren, falscher Ansicht und Verblendung zerreißen und so anhaftungslos dahingehen?“ Atha uyyānaṃ gantvā silāpaṭṭapokkharaṇiyā tīre nisinno vātabbhāhatāni padumāni onamitvā udakaṃ phusitvā vātavigame puna yathāṭhāne ṭhitāni udakena anupalittāni disvā tasmiṃ nimittaṃ aggahesi – ‘‘kudāssu nāmāhampi yathā etāni udake jātāni udakena anupalittāni tiṭṭhanti. Evaṃ loke jāto lokena anupalitto tiṭṭheyya’’nti. So punappunaṃ ‘‘yathā sīho vāto padumāni, evaṃ asantasantena asajjamānena anupalittena bhavitabba’’nti cintetvā rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. Daraufhin ging er in den Park und setzte sich an das Ufer eines Lotusteichs mit steinerner Einfassung. Er beobachtete die vom Wind bewegten Lotusblüten, die sich herabneigten, das Wasser berührten und sich nach dem Abflauen des Windes wieder an ihrer Stelle aufrichteten, ohne vom Wasser benetzt worden zu sein, und erfasste darin ein Zeichen: „Oh, wann werde auch ich, so wie diese im Wasser geborenen Lotusblüten unbenetzt vom Wasser dastehen, ebenso in der Welt geboren, von der Welt unbefleckt bleiben?“ Indem er immer wieder dachte: „Wie der Löwe, der Wind und die Lotusblüten, so muss man frei von Schrecken, frei von Anhaftung und unbefleckt sein“, gab er das Königreich auf, zog in die Hauslosigkeit, und während er Einsichtsentfaltung (vipassanā) übte, verwirklichte er die Einzelbuddhaschaft (paccekabodhi) und sprach diesen feierlichen Ausspruch (Udāna-Vers). Tattha sīhoti cattāro sīhā – tiṇasīho, paṇḍusīho, kāḷasīho, kesarasīhoti. Tesaṃ kesarasīho aggamakkhāyati. So idha adhippeto. Vāto puratthimādivasena anekavidho. Padumaṃ rattasetādivasena. Tesu yo koci vāto yaṃ kiñci padumañca vaṭṭatiyeva. Tattha yasmā santāso nāma attasinehena hoti, attasineho [Pg.220] ca nāma taṇhālepo, sopi diṭṭhisampayuttena vā diṭṭhivippayuttena vā lobhena hoti, sopi ca taṇhāyeva. Sajjanaṃ pana tattha upaparikkhādivirahitassa mohena hoti, moho ca avijjā. Tattha samathena taṇhāya pahānaṃ, vipassanāya avijjāya. Tasmā samathena attasinehaṃ pahāya sīhova saddesu aniccadukkhādīsu asantasanto, vipassanāya mohaṃ pahāya vātova jālamhi khandhāyatanādīsu asajjamāno, samatheneva lobhaṃ lobhasampayuttadiṭṭhiñca pahāya, padumaṃva toyena sabbabhavabhogalobhena alippamāno. Ettha ca samathassa sīlaṃ padaṭṭhānaṃ, samatho samādhissa, samādhi vipassanāyāti evaṃ dvīsu dhammesu siddhesu tayo khandhā siddhāva honti. Tattha sīlakkhandhena sūro hoti. So sīhova saddesu āghātavatthūsu kujjhitukāmatāya na santasati, paññākkhandhena paṭividdhasabhāvo vātova jālamhi khandhādidhammabhede na sajjati, samādhikkhandhena vītarāgo padumaṃva toyena rāgena na lippati. Evaṃ samathavipassanāhi sīlasamādhipaññākkhandhehi ca yathāsambhavaṃ taṇhāvijjānaṃ tiṇṇañca akusalamūlānaṃ pahānavasena asantasanto asajjamāno alippamāno ca veditabbo. Sesaṃ vuttanayamevāti. Darin bedeutet „Löwe“ vier Arten von Löwen: den Graslöwen, den gelblich-grauen Löwen, den schwarzen Löwen und den Mähnenlöwen. Unter diesen gilt der Mähnenlöwe als der vorzüglichste. Dieser ist hier gemeint. Der Wind ist gemäß der Himmelsrichtungen wie Osten usw. von vielfältiger Art. Die Lotusblüte ist gemäß den Farben Rot, Weiß usw. vielfältig. Unter diesen ist jeder beliebige Wind und jede beliebige Lotusblüte gemeint. Hierbei entsteht Erschrecken aufgrund von Selbstliebe. Selbstliebe wiederum ist das Anhaften von Begehren. Dieses entsteht wiederum durch Gier, die entweder mit falscher Ansicht verbunden oder nicht mit falscher Ansicht verbunden ist. Und auch das ist nichts anderes als Begehren. Das Anhaften hingegen entsteht bei einem Menschen, dem es an weiser Untersuchung fehlt, durch Verblendung, und Verblendung ist Unwissenheit. Dabei erfolgt die Überwindung des Begehrens durch Ruhe (samatha) und die der Unwissenheit durch Einsicht (vipassanā). Deshalb soll man durch Ruhe die Selbstliebe überwinden und wie ein Löwe angesichts von Geräuschen gegenüber den Phänomenen von Vergänglichkeit, Leidvolligkeit usw. unerschrocken sein; durch Einsicht die Verblendung überwinden und wie der Wind im Netz an den Konstituenten (khandha), Sinnesbereichen (āyatana) usw. nicht anhaften; und allein durch Ruhe die Gier sowie die mit Gier verbundene falsche Ansicht überwinden und wie eine Lotusblüte im Wasser durch die Gier nach jeglichem Dasein und Genuss unbefleckt bleiben. Und hierbei ist die Tugend (sīla) die nahe Ursache für die Ruhe, die Ruhe für die Konzentration (samādhi), und die Konzentration für die Einsicht. Wenn diese zwei Qualitäten verwirklicht sind, sind die drei Gruppen (khandha: Tugend, Konzentration, Weisheit) ebenfalls verwirklicht. Darin wird man durch die Gruppe der Tugend heldenhaft. Wie ein Löwe erschrickt man nicht angesichts von Geräuschen, die Anlass zu Ärger geben, um Zorn zu empfinden. Durch die Gruppe der Weisheit dringt man in die wahre Natur ein und haftet nicht an den verschiedenen Phänomenen wie den Daseinsgruppen usw., wie der Wind im Netz. Durch die Gruppe der Konzentration wird man leidenschaftslos und wird durch Gier nicht befleckt, wie die Lotusblüte durch das Wasser. So soll man ihn verstehen als einen, der durch Ruhe und Einsicht sowie durch die Gruppen der Tugend, Konzentration und Weisheit – je nach Gegebenheit – durch die Überwindung von Unwissenheit und Begehren sowie der drei unheilsamen Wurzeln frei von Schrecken, frei von Anhaftung und unbefleckt ist. Der Rest ist genau wie bereits erklärt zu verstehen. Sīhādigāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophen beginnend mit „Wie ein Löwe“ ist abgeschlossen. 128. Sīho yathāti kā uppatti? Aññataro kira bārāṇasirājā paccantaṃ kupitaṃ vūpasametuṃ gāmānugāmimaggaṃ chaḍḍetvā ujuṃ aṭavimaggaṃ gahetvā mahatiyā senāya gacchati. Tena ca samayena aññatarasmiṃ pabbatapāde sīho bālasūriyātapaṃ tappamāno nipanno hoti. Taṃ disvā rājapurisā rañño ārocesuṃ. Rājā ‘‘sīho kira na santasatī’’ti bheripaṇavādisaddaṃ kārāpesi, sīho tatheva nipajji. Dutiyampi kārāpesi, sīho tatheva nipajji. Tatiyampi kārāpesi, tadā ‘‘sīho mama paṭisattu atthī’’ti catūhi pādehi suppatiṭṭhitaṃ patiṭṭhahitvā sīhanādaṃ nadi. Taṃ sutvā hatthārohādayo hatthiādīhi orohitvā tiṇagahanāni paviṭṭhā, hatthiassagaṇā disāvidisā palātā. Rañño hatthīpi rājānaṃ gahetvā vanagahanāni pothayamāno palāyi[Pg.221]. Rājā taṃ sandhāretuṃ asakkonto rukkhasākhāya olambitvā pathaviṃ patitvā ekapadikamaggena gacchanto paccekabuddhānaṃ vasanaṭṭhānaṃ pāpuṇi. Tattha paccekabuddhe pucchi – ‘‘api, bhante, saddamassutthā’’ti? ‘‘Āma, mahārājā’’ti. ‘‘Kassa saddaṃ, bhante’’ti? ‘‘Paṭhamaṃ bherisaṅkhādīnaṃ, pacchā sīhassā’’ti. ‘‘Na bhāyittha, bhante’’ti. ‘‘Na mayaṃ, mahārāja, kassaci saddassa bhāyāmā’’ti. ‘‘Sakkā pana, bhante, mayhampi edisaṃ kātu’’nti? ‘‘Sakkā, mahārāja, sace pabbajissasī’’ti. ‘‘Pabbajāmi, bhante’’ti. Tato naṃ pabbājetvā pubbe vuttanayeneva ābhisamācārikaṃ sikkhāpesuṃ. Sopi pubbe vuttanayeneva vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 128. „Wie ein Löwe“ – was ist der Anlass (für diesen Vers)? Es heißt, ein König von Bārāṇasī zog mit einem großen Heer aus, um einen Aufruhr im Grenzgebiet zu befrieden. Er mied den Weg von Dorf zu Dorf und nahm stattdessen den direkten Weg durch den Urwald. Zu jener Zeit lag am Fuße eines Berges ein Löwe, der sich in der Wärme der Morgensonne sonnte. Als die königlichen Diener ihn sahen, meldeten sie es dem König. Der König dachte: „Ein Löwe erschrickt ja nicht“, und ließ Trommeln und andere Instrumente schlagen. Der Löwe blieb einfach so liegen. Auch ein zweites Mal ließ er sie schlagen; der Löwe blieb einfach so liegen. Auch ein drittes Mal ließ er sie schlagen. Da dachte der Löwe: „Ich habe einen Gegner“, stellte sich fest auf seine vier Füße und stieß das Gebrüll eines Löwen aus. Als die Elefantenreiter und die anderen dies hörten, stiegen sie von den Elefanten usw. herab und flüchteten in das dichte Gras. Die Scharen von Elefanten und Pferden flohen in alle Himmelsrichtungen. Selbst der Elefant des Königs packte den König und floh, wobei er durch das dichte Unterholz des Waldes preschte. Da der König ihn nicht zügeln konnte, klammerte er sich an einen Baumast, ließ sich auf den Boden herabfallen und erreichte, auf einem Fußpfad gehend, den Aufenthaltsort von Einzelbuddhas (Paccekabuddhas). Dort fragte er die Einzelbuddhas: „Ehrwürdige Herren, habt ihr das Geräusch nicht gehört?“ „Doch, o großer König.“ „Wessen Geräusch war es, ehrwürdige Herren?“ „Zuerst das der Trommeln, Muscheln usw., danach das des Löwen.“ „Habt ihr euch nicht gefürchtet, ehrwürdige Herren?“ „O großer König, wir fürchten uns vor keinem Geräusch.“ „Ehrwürdige Herren, wäre es auch mir möglich, solch eine Furchtlosigkeit zu erlangen?“ „Es ist möglich, o großer König, wenn du in die Hauslosigkeit ziehst.“ „Ich ziehe in die Hauslosigkeit, ehrwürdige Herren.“ Daraufhin ließen sie ihn die Hauslosigkeit antreten und unterwiesen ihn in den Regeln des schicklichen Verhaltens, genau wie zuvor beschrieben. Auch er erlangte, während er wie zuvor beschrieben die Einsichtsentfaltung (vipassanā) übte, die Einzelbuddhaschaft (paccekabodhi) und sprach diesen feierlichen Ausspruch (Udāna-Vers). Tattha sahanā ca hananā ca sīghajavattā ca sīho. Kesarasīhova idha adhippeto. Dāṭhā balamassa atthīti dāṭhabalī. Pasayha abhibhuyyāti ubhayaṃ cārī-saddena saha yojetabbaṃ pasayhacārī abhibhuyyacārīti. Tattha pasayha niggahetvā caraṇena pasayhacārī, abhibhavitvā santāsetvā vasīkatvā caraṇena abhibhuyyacārī. Svāyaṃ kāyabalena pasayhacārī, tejasā abhibhuyyacārī, tattha sace koci vadeyya – ‘‘kiṃ pasayha abhibhuyya cārī’’ti, tato migānanti sāmivacanaṃ upayogatthe katvā ‘‘mige pasayha abhibhuyya cārī’’ti paṭivattabbaṃ. Pantānīti dūrāni. Senāsanānīti vasanaṭṭhānāni. Sesaṃ vuttanayeneva sakkā jānitunti na vitthāritanti. Darin bezeichnet „sīha“ (Löwe) ein Wesen aufgrund seines Ertragens (sahanā), seines Tötens (hananā) und seiner schnellen Fortbewegung (sīghajavatta). Hier ist der Mähnenlöwe (kesarasīha) gemeint. Weil er Reißzähne als Stärke besitzt, wird er „dāṭhabalī“ (reißzahngewaltig) genannt. Die beiden Wörter „pasayha“ (gewaltsam bezwingend) und „abhibhuyya“ (überwältigend) sind mit dem Wort „cārī“ (wandelnd) zu verbinden, woraus sich „pasayhacārī“ und „abhibhuyyacārī“ ergeben. Dabei ist er ein „pasayhacārī“, weil er wandelt, nachdem er [andere Tiere] gewaltsam bezwungen hat (niggahetvā), und ein „abhibhuyyacārī“, weil er wandelt, nachdem er sie überwältigt, in Schrecken versetzt und sich gefügig gemacht hat. Ersteres tut er durch körperliche Kraft (kāyabala), Letzteres durch seine Pracht (tejas). Wenn hierzu jemand fragen sollte: „Wen wandelt er gewaltsam bezwingend und überwältigend?“, so ist zu antworten, indem man den Genitiv „migānaṃ“ im Sinne eines Akkusativs auffasst: „Er wandelt, die Wildtiere gewaltsam bezwingend und überwältigend.“ „Pantāni“ bedeutet entlegene. „Senāsanāni“ bedeutet Wohnstätten. Der Rest kann in der bereits beschriebenen Weise verstanden werden, weshalb er hier nicht weiter ausgeführt wird. Dāṭhabalīgāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über den Reißzahngewaltigen ist abgeschlossen. 129. Mettaṃ upekkhanti kā uppatti? Aññataro kira rājā mettādijhānalābhī ahosi. So ‘‘jhānasukhantarāyo rajja’’nti jhānānurakkhaṇatthaṃ rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 129. Was ist der Anlass für die Strophe, die mit „Mettaṃ upekkhā“ beginnt? Es heißt, ein gewisser König erlangte die Vertiefung der liebenden Güte und so weiter (mettādijhāna). Er dachte: „Die Königsherrschaft ist ein Hindernis für das Glück der Vertiefung“, und gab, um die Vertiefung zu schützen, das Königreich auf. Er ging in die Hauslosigkeit (pabbajitvā), übte Einsicht (vipassanto), verwirklichte die Einzelerleuchtung (paccekabodhi) und sprach dieses feierliche Wort (udānagātha). Tattha ‘‘sabbe sattā sukhitā bhavantū’’tiādinā nayena hitasukhūpanayanakāmatā mettā. ‘‘Aho vata imamhā dukkhā mucceyyu’’ntiādinā nayena ahitadukkhāpanayanakāmatā karuṇā. ‘‘Modanti vata bhonto sattā, modanti sādhu suṭṭhū’’tiādinā nayena hitasukhāvippayogakāmatā muditā. ‘‘Paññāyissanti sakena kammenā’’ti sukhadukkhaajjhupekkhanatā upekkhā. Gāthābandhasukhatthaṃ pana uppaṭipāṭiyā mettaṃ vatvā upekkhā [Pg.222] vuttā, muditā ca pacchā. Vimuttinti catassopi etā attano paccanīkadhammehi vimuttattā vimuttiyo. Tena vuttaṃ – ‘‘mettaṃ upekkhaṃ karuṇaṃ vimuttiṃ, āsevamāno muditañca kāle’’ti. Darin ist „mettā“ (liebende Güte) der Wunsch, Wohlbefinden und Glück herbeizuführen, gemäß der Weise: „Mögen alle Wesen glücklich sein“ und so weiter. „Karuṇā“ (Mitgefühl) ist der Wunsch, Unheil und Leiden zu beseitigen, gemäß der Weise: „O dass sie doch von diesem Leiden befreit würden!“. „Muditā“ (Mitfreude) ist der Wunsch nach der Nicht-Trennung von Wohlergehen und Glück, gemäß der Weise: „Mögen die werten Wesen sich wahrlich freuen, mögen sie sich gar wohl freuen!“. „Upekkhā“ (Gleichmut) ist das unbeteiligte Betrachten von Glück und Leid [mit dem Wissen]: „Sie werden durch ihr eigenes Karma in Erscheinung treten“. Um des Wohlklangs des Versmaßes willen wurde jedoch entgegen der üblichen Reihenfolge nach der liebenden Güte der Gleichmut genannt, und die Mitfreude erst danach. „Vimuttiṃ“ (Befreiung) bezieht sich auf alle vier [Zustände], da sie Befreiungen (vimuttiyo) sind, weil sie von ihren jeweiligen gegnerischen Geisteszuständen befreit sind. Daher wurde gesagt: „Wer liebende Güte, Gleichmut, Mitgefühl als Befreiung pflegt und Mitfreude zur rechten Zeit“. Tattha āsevamānoti tisso tikacatukkajjhānavasena, upekkhaṃ catutthajjhānavasena bhāvayamāno. Kāleti mettaṃ āsevitvā tato vuṭṭhāya karuṇaṃ, tato vuṭṭhāya muditaṃ, tato itarato vā nippītikajjhānato vuṭṭhāya upekkhaṃ āsevamāno eva ‘‘kāle āsevamāno’’ti vuccati, āsevituṃ vā phāsukakāle. Sabbena lokena avirujjhamānoti dasasu disāsu sabbena sattalokena avirujjhamāno. Mettādīnañhi bhāvitattā sattā appaṭikūlā honti, sattesu ca virodhibhūto paṭigho vūpasammati. Tena vuttaṃ – ‘‘sabbena lokena avirujjhamāno’’ti. Ayamettha saṅkhepo, vitthāro pana mettādikathā aṭṭhasāliniyā dhammasaṅgahaṭṭhakathāyaṃ (dha. sa. aṭṭha. 251) vuttā. Sesaṃ vuttasadisamevāti. Darin bedeutet „āsevamāno“ (pflegend): er entfaltet die ersten drei [Zustände] mittels der dreifachen oder vierfachen Vertiefung, und den Gleichmut mittels der vierten Vertiefung. „Kāle“ (zur rechten Zeit) bedeutet: nachdem er die liebende Güte gepflegt hat und daraus aufgestanden ist, pflegt er das Mitgefühl; nachdem er daraus aufgestanden ist, die Mitfreude; und danach, oder auf andere Weise, nach dem Aufstehen aus einer Vertiefung ohne Verzückung (nippītikajjhāna), pflegt er den Gleichmut – so pflegend wird gesagt „zur rechten Zeit pflegend“, oder zu Zeiten, in denen es für die Pflege angenehm ist. „Sabbena lokena avirujjhamāno“ (mit der ganzen Welt nicht im Streit liegend) bedeutet, dass er in den zehn Himmelsrichtungen mit der gesamten Welt der Lebewesen nicht im Widerstreit steht. Denn durch die Entfaltung von liebender Güte und den anderen Zuständen werden die Wesen einem nicht mehr zuwider, und der feindselige Widerwille (paṭigha) gegenüber den Wesen kommt zur Ruhe. Daher wurde gesagt: „mit der ganzen Welt nicht im Streit liegend“. Dies ist hier die Zusammenfassung; die ausführliche Darlegung der Abhandlung über die liebende Güte und die anderen Zustände findet sich jedoch in der Atthasālinī, dem Kommentar zum Dhammasaṅgaṇī. Der Rest gleicht dem bereits Erklärten. Appamaññāgāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über die Unermesslichen ist abgeschlossen. 130. Rāgañca dosañcāti kā uppatti? Rājagahaṃ kira nissāya mātaṅgo nāma paccekabuddho viharati sabbapacchimo paccekabuddhānaṃ. Atha amhākaṃ bodhisatte uppanne devatāyo bodhisattassa pūjanatthāya āgacchantiyo taṃ disvā ‘‘mārisā, mārisā, buddho loke uppanno’’ti bhaṇiṃsu. So nirodhā vuṭṭhahanto taṃ sutvā attano jīvitakkhayaṃ disvā himavante mahāpapāto nāma pabbato paccekabuddhānaṃ parinibbānaṭṭhānaṃ. Tattha ākāsena gantvā pubbe parinibbutapaccekabuddhassa aṭṭhisaṅghātaṃ papāte pakkhipitvā silātale nisīditvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 130. Was ist der Anlass für die Strophe, die mit „Rāgañca dosañca“ beginnt? Es heißt, nahe Rājagaha weilte ein Einzelerleuchteter namens Mātaṅga, der allerletzte der Einzelerleuchteten. Als nun unser Bodhisatta [in seiner letzten Existenz im Mutterleib] erschien, sahen ihn die Gottheiten, die herbeigekommen waren, um dem Bodhisatta Verehrung zu erweisen, und sprachen zueinander: „Ihr Lieben, ihr Lieben, ein Buddha ist in der Welt erschienen!“. Als er aus der Erlöschung (nirodha) aufstand und dies hörte, sah er sein eigenes Lebensende voraus. Im Himalaya-Gebirge gibt es einen Berg namens Mahāpapāta (Großer Abgrund), welcher der Ort des Parinibbāna der Einzelerleuchteten ist. Er reiste durch die Luft dorthin, warf das Gebein eines zuvor erloschenen Einzelerleuchteten in den Abgrund, setzte sich auf eine Felsplatte und sprach dieses feierliche Wort. Tattha rāgadosamohā uragasutte vuttāva. Saṃyojanānīti dasa saṃyojanāni, tāni ca tena tena maggena sandālayitvā. Asantasaṃ jīvitasaṅkhayamhīti jīvitasaṅkhayo vuccati cuticittassa paribhedo. Tasmiñca jīvitasaṅkhaye jīvitanikantiyā pahīnattā asantasanti. Ettāvatā sopādisesaṃ [Pg.223] nibbānadhātuṃ attano dassetvā gāthāpariyosāne anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyīti. Darin wurden Gier, Hass und Verblendung (rāga-dosa-moha) bereits im Uraga-Sutta erklärt. „Saṃyojanāni“ bedeutet die zehn Fesseln; diese hat er mit dem jeweiligen Pfad gänzlich zerschnitten (sandālayitvā). „Asantasaṃ jīvitasaṅkhayamhi“: Als Lebensende (jīvitasaṅkhaya) wird das Zerfallen des Sterbebewusstseins (cuticitta) bezeichnet. Angesichts dieses Lebensendes ist er „ohne Zittern“ (asantasaṃ), weil das Verlangen nach dem Leben (jīvitanikanti) überwunden ist. Indem er hiermit das Erlöschenselement mit verbleibendem Lebenssubstrat (sopādisesa-nibbānadhātu) von sich aufzeigte, ging er am Ende der Strophe durch das Erlöschenselement ohne verbleibendes Lebenssubstrat (anupādisesa-nibbānadhātu) ins Parinibbāna ein. Jīvitasaṅkhayagāthāvaṇṇanā niṭṭhitā. Die Erklärung der Strophe über das Lebensende ist abgeschlossen. 131. Bhajantīti kā uppatti? Bārāṇasiyaṃ kira aññataro rājā ādigāthāya vuttappakārameva phītaṃ rajjaṃ samanusāsati. Tassa kharo ābādho uppajji, dukkhā vedanā pavattanti. Vīsatisahassitthiyo taṃ parivāretvā hatthapādasambāhanādīni karonti. Amaccā ‘‘na dānāyaṃ rājā jīvissati, handa, mayaṃ attano saraṇaṃ gavesāmā’’ti cintetvā aññatarassa rañño santikaṃ gantvā upaṭṭhānaṃ yāciṃsu. Te tattha upaṭṭhahantiyeva, na kiñci labhanti. Rājā ābādhā vuṭṭhahitvā pucchi – ‘‘itthannāmo ca itthannāmo ca kuhi’’nti? Tato taṃ pavattiṃ sutvāva sīsaṃ cāletvā tuṇhī ahosi. Tepi amaccā ‘‘rājā vuṭṭhito’’ti sutvā tattha kiñci alabhamānā paramena pārijuññena pīḷitā punadeva āgantvā rājānaṃ vanditvā ekamantaṃ aṭṭhaṃsu. Tena ca raññā ‘‘kuhiṃ, tātā, tumhe gatā’’ti vuttā āhaṃsu – ‘‘devaṃ dubbalaṃ disvā ājīvikabhayenamhā asukaṃ nāma janapadaṃ gatā’’ti. Rājā sīsaṃ cāletvā cintesi – ‘‘yaṃnūnāhaṃ tameva ābādhaṃ dassessaṃ, kiṃ punapi evaṃ kareyyuṃ, no’’ti? So pubbe rogena phuṭṭho viya bāḷhaṃ vedanaṃ dassento gilānālayaṃ akāsi. Itthiyo samparivāretvā pubbasadisameva sabbaṃ akaṃsu. Tepi amaccā tatheva puna bahutaraṃ janaṃ gahetvā pakkamiṃsu. Evaṃ rājā yāvatatiyaṃ sabbaṃ pubbasadisaṃ akāsi, tepi tatheva pakkamiṃsu. Tato catutthampi te āgate disvā rājā – ‘‘aho! Ime dukkaraṃ akaṃsu, ye maṃ byādhitaṃ pahāya anapekkhā pakkamiṃsū’’ti nibbinno rajjaṃ pahāya pabbajitvā vipassanto paccekabodhiṃ sacchikatvā imaṃ udānagāthaṃ abhāsi. 131. Was ist der Anlass für die Strophe, die mit „Bhajanti“ beginnt? Es heißt, in Bārāṇasī regierte ein gewisser König über ein blühendes Reich, genau wie in der ersten Strophe beschrieben. Ihn befiel eine schwere Krankheit, und heftige Schmerzen setzten ein. Zwanzigtausend Frauen umringten ihn und rieben ihm Hände und Füße und dergleichen. Die Minister dachten: „Dieser König wird nicht am Leben bleiben. Wohlan, suchen wir uns selbst eine Zuflucht!“, gingen zu einem anderen König und baten darum, ihm dienen zu dürfen. Während sie dort dienten, erhielten sie jedoch überhaupt nichts. Als der König von seiner Krankheit genesen war, fragte er: „Wo sind der und der geblieben?“. Als er daraufhin von den Vorkommnissen erfuhr, schüttelte er nur den Kopf und schwieg. Auch jene Minister erfuhren: „Der König ist genesen“. Da sie dort [beim anderen König] nichts erlangt hatten und von äußerstem Verlust geplagt waren, kamen sie abermals zurück, verneigten sich vor dem König und stellten sich auf eine Seite. Als der König sie fragte: „Wohin seid ihr gegangen, meine Lieben?“, sprachen sie: „Als wir sahen, dass der König schwach war, gingen wir aus Sorge um unseren Lebensunterhalt in jenes und jenes Landgebiet.“ Der König schüttelte den Kopf und dachte: „Wie wäre es, wenn ich dieselbe Krankheit vortäuschte? Würden sie sich wohl wieder so verhalten oder nicht?“ Wie zuvor von der Krankheit befallen, zeigte er heftige Schmerzen und tat so, als sei er krank. Die Frauen umringten ihn und taten alles genau wie zuvor. Auch jene Minister machten sich daraufhin wieder davon und nahmen noch eine größere Anzahl von Leuten mit sich. So täuschte der König bis zu dreimal alles genau wie zuvor vor, und jene machten sich jedes Mal auf dieselbe Weise davon. Als der König sie daraufhin ein viertes Mal kommen sah, dachte er voller Enttäuschung: „O weh! Diese haben ein schweres Unrecht begangen, indem sie mich krank zurückließen und ohne Rücksicht davongingen.“ Er gab die Königsherrschaft auf, ging in die Hauslosigkeit, übte Einsicht, verwirklichte die Einzelerleuchtung und sprach dieses feierliche Wort. Tattha bhajantīti sarīrena allīyantā payirupāsanti. Sevantīti añjalikammādīhi kiṃkārapaṭissāvitāya ca paricaranti. Kāraṇaṃ attho etesanti kāraṇatthā, bhajanāya ca sevanāya ca nāññaṃ kāraṇamatthi, attho eva nesaṃ kāraṇaṃ, atthahetu sevantīti vuttaṃ hoti. Nikkāraṇā [Pg.224] dullabhā ajja mittāti ‘‘ito kiñci lacchāmā’’ti evaṃ attapaṭilābhakāraṇena nikkāraṇā, kevalaṃ – Darin bedeutet 'sie gesellen sich zu' (bhajanti): sie schließen sich physisch an und pflegen den Umgang. 'Sie pflegen Umgang' (sevanti) bedeutet: sie dienen ihnen mit Ehrerweisung wie dem Zusammenlegen der Hände und durch Dienstbarkeit. 'Ihre Ursache ist der Nutzen' (kāraṇatthā) bedeutet, dass ihr Grund (kāraṇa) der eigene Vorteil (attha) ist; es gibt keinen anderen Grund für ihr Gesellen und ihren Umgang. Allein der eigene Vorteil ist ihr Beweggrund; sie pflegen den Umgang nur um des Nutzens willen, so ist es gesagt. 'Freunde ohne eigennützigen Grund sind heute schwer zu finden' (nikkāraṇā dullabhā ajja mittā) bedeutet: sie denken 'von diesem Menschen werden wir etwas erhalten', und so sind sie aufgrund des Erlangens eines eigenen Vorteils nicht uneigennützig, sondern bloß... ‘‘Upakāro ca yo mitto, yo mitto sukhadukkhako; Atthakkhāyī ca yo mitto, yo mitto anukampako’’ti. (dī. ni. 3.265) – „Ein Freund, der ein Helfer ist; ein Freund, der in Freud und Leid derselbe bleibt; ein Freund, der den Nutzen aufzeigt; und ein Freund, der Mitgefühl zeigt.“ Evaṃ vuttena ariyena mittabhāvena samannāgatā dullabhā ajja mittā. Attaṭṭhapaññāti attani ṭhitā etesaṃ paññā. Attānameva oloketi, na aññanti attho. ‘‘Attatthapaññā’’tipi pāṭho, tassa attano atthameva oloketi, na paratthanti attho. ‘‘Diṭṭhatthapaññā’’ti ayampi kira porāṇapāṭho, tassa sampati diṭṭheyeva atthe etesaṃ paññā, na āyatinti attho. Diṭṭhadhammikatthaṃyeva oloketi, na samparāyikatthanti vuttaṃ hoti. Asucīti asucinā anariyena kāyavacīmanokammena samannāgatā. Freunde, die mit solch einer edlen Freundschaft, wie sie hier beschrieben wurde, ausgestattet sind, sind heute schwer zu finden. 'Attaṭṭhapaññā' [auf sich selbst bezogene Weisheit] bedeutet: ihre Weisheit gründet in sich selbst; das heißt, sie blicken nur auf sich selbst, nicht auf andere. Auch 'attatthapaññā' [Weisheit bezüglich des eigenen Nutzens] ist eine Lesart; dies bedeutet, dass sie nur auf ihren eigenen Nutzen blicken, nicht auf den Nutzen anderer. Auch 'diṭṭhatthapaññā' [Weisheit des gegenwärtig Sichtbaren] ist angeblich eine alte Lesart; dies bedeutet, dass sich ihre Weisheit nur auf den gegenwärtig sichtbaren Nutzen bezieht, nicht auf die Zukunft. Das besagt: Sie schauen nur auf den Nutzen in diesem Leben, nicht auf den Nutzen im zukünftigen Leben. 'Asucī' [unrein] bedeutet: sie sind mit unreinen, unedlen körperlichen, sprachlichen und geistigen Handlungen ausgestattet. Khaggavisāṇakappoti khaggena rukkhādayo chindanto viya sakasiṅgena pabbatādayo cuṇṇavicuṇṇaṃ kurumāno vicaratīti khaggavisāṇo. Visasadisā āṇāti visāṇā. Khaggaṃ viyāti khaggaṃ. Khaggaṃ visāṇaṃ yassa migassa soyaṃ migo khaggavisāṇo, tassa khaggavisāṇassa kappo khaggavisāṇakappo. Khaggavisāṇasadiso paccekabuddho eko adutiyo asahāyo careyya vihareyya vatteyya yapeyya yāpeyyāti attho. 'Khaggavisāṇakappo' [dem Horn des Nashorns gleichend]: Das Nashorn (khaggavisāṇa) ist so genannt, weil es umherstreift und wie mit einem Schwert (khagga) Bäume und Ähnliches fällend, mit seinem eigenen Horn (siṅga) Berge und Ähnliches zu feinstem Staub zermalmt. Eine Herrschaft (āṇā), die dem Gift (visa) gleicht, ist ein Horn (visāṇā). 'Khagga' bedeutet: wie ein Schwert. Das Tier, dessen Horn (visāṇa) wie ein Schwert (khagga) ist, ist dieses Tier, das Nashorn (khaggavisāṇa). Was dem Horn des Nashorns gleicht, ist 'khaggavisāṇakappa'. Dies bedeutet: Dem Horn des Nashorns gleich soll der Paccekabuddha einzeln (eko), ohne Gefährten (adutiyo), ohne Begleiter (asahāyo) wandeln, verweilen, leben und sein Leben fristen. 132. Visuddhasīlāti visesena suddhasīlā, catupārisuddhiyā suddhasīlā. Suvisuddhapaññāti suṭṭhu visuddhapaññā, rāgādivirahitattā parisuddhamaggaphalapaṭisambhidādipaññā. Samāhitāti saṃ suṭṭhu āhitā, santike ṭhapitacittā. Jāgariyānuyuttāti jāgaraṇaṃ jāgaro, niddātikkamoti attho. Jāgarassa bhāvo jāgariyaṃ, jāgariye anuyuttā jāgariyānuyuttā. Vipassakāti ‘‘aniccaṃ dukkhaṃ anattā’’ti visesena passanasīlā, vipassanaṃ paṭṭhapetvā viharantīti attho. Dhammavisesadassīti dasakusaladhammānaṃ [Pg.225] catusaccadhammassa navalokuttaradhammassa vā visesena passanasīlā. Maggaṅgabojjhaṅgagateti sammādiṭṭhādīhi maggaṅgehi satisambojjhaṅgādīhi bojjhaṅgehi gate sampayutte ariyadhamme. Vijaññāti visesena jaññā, jānantāti attho. 132. 'Visuddhasīlā' [von geläuterter Tugend] bedeutet: von besonders reiner Sittlichkeit, rein durch die vierfache Läuterung der Sittlichkeit. 'Suvisuddhapaññā' [von vollkommen reiner Weisheit] bedeutet: eine höchst reine Weisheit; aufgrund des Freiseins von Gier und anderen Befleckungen ist es die ganz reine Weisheit des Pfades, der Frucht, der analytischen Urteilskraft (paṭisambhidā) usw. 'Samāhitā' [gesammelt] bedeutet: gut begründet, das heißt mit einem in der Nähe verankerten Geist. 'Jāgariyānuyuttā' [der Wachsamkeit hingebend]: Wachsein ist Wachsamkeit, was das Überwinden des Schlafes bedeutet. Der Zustand des Wachens ist 'jāgariya'; jene, die dieser Wachsamkeit hingegeben sind, sind 'jāgariyānuyuttā'. 'Vipassakā' [Einsicht übend] bedeutet: jene, die die Natur haben, die Dinge besonders als 'vergänglich, leidvoll, unpersönlich' (anicca, dukkha, anattā) zu sehen; das heißt, sie verweilen, nachdem sie die Einsichtsmeditation (vipassanā) begründet haben. 'Dhammavisesadassī' [die Besonderheit der Lehre sehend] bedeutet: jene, die es gewohnt sind, besonders die zehn heilsamen Handlungsweisen, die vier edlen Wahrheiten oder die neun überweltlichen Zustände zu schauen. 'Maggaṅgabojjhaṅgagate' bedeutet: in den edlen Lehren, die mit den Pfadgliedern wie der rechten Anschauung usw. und den Erleuchtungsgliedern wie dem Erleuchtungsglied der Achtsamkeit usw. verbunden sind. 'Vijaññā' bedeutet: man soll besonders erkennen, das heißt, erkennend. 133. Suññatāppaṇihitañcānimittanti anattānupassanāvasena suññatavimokkhañca dukkhānupassanāvasena appaṇihitavimokkhañca, aniccānupassanāvasena animittavimokkhañca. Āsevayitvāti vaḍḍhetvā. Ye katasambhārā dhīrā janā jinasāsanamhi sāvakattaṃ sāvakabhāvaṃ na vajanti na pāpuṇanti, te dhīrā katasambhārā sayambhū sayameva bhūtā paccekajinā paccekabuddhā bhavanti. 133. 'Suññatāppaṇihitañcānimittaṃ' [das Leere, das Wunschlose und das Merkmallose] bezieht sich auf die Befreiung durch die Leere (suññatavimokkha) kraft der Betrachtung der Nicht-Selbstheit (anattānupassanā), die wunschlose Befreiung (appaṇihitavimokkha) kraft der Betrachtung des Leidens (dukkhānupassanā) und die merkmallose Befreiung (animittavimokkha) kraft der Betrachtung der Vergänglichkeit (aniccānupassanā). 'Āsevayitvā' bedeutet: entfaltet. Jene weisen Menschen, die ihre geistigen Voraussetzungen (sambhāra) angesammelt haben und in der Lehre des Siegers (jinasāsana) nicht in den Zustand eines Jüngers (sāvakatta) eintreten, d. h. ihn nicht erlangen, diese weisen Menschen, die ihre Voraussetzungen erfüllt haben, werden zu selbstgewordenen, aus sich selbst heraus erwachten Einzel-Siegern, zu Paccekabuddhas. 134. Kiṃ bhūtā? Mahantadhammā pūritamahāsambhārā bahudhammakāyā anekadhammasabhāvasarīrā. Punapi kiṃ bhūtā? Cittissarā cittagatikā jhānasampannāti attho. Sabbadukkhoghatiṇṇā sakalasaṃsāraoghaṃ tiṇṇā atikkantā udaggacittā kodhamānādikilesavirahitattā somanassacittā santamanāti attho. Paramatthadassī pañcakkhandhadvādasāyatanadvattiṃsākārasaccapaṭiccasamuppādādivasena paramatthaṃ uttamatthaṃ dassanasīlā. Acalābhītaṭṭhena sīhopamā sīhasadisāti attho. Khaggavisāṇakappā khaggavisāṇamigasiṅgasadisā gaṇasaṅgaṇikābhāvenāti attho. 134. Wie beschaffen sind sie? Sie sind von 'großer Natur' (mahantadhammā), da sie die großen Voraussetzungen (mahāsambhāra) erfüllt haben, einen großen Körper der Lehre (dhammakāya) besitzen und einen Körper von vielfältiger Wesensart der Lehre haben. Wie sind sie ferner beschaffen? Sie sind Herren über ihren Geist (cittissarā), ihr Geist folgt ihrem Willen (cittagatikā), das heißt, sie sind mit den Vertiefungen (jhāna) ausgestattet. 'Sabbadukkhoghatiṇṇā' [die den Strom allen Leidens überquert haben] bedeutet: sie haben den gesamten Strom des Daseinskreislaufs (saṃsāraogha) überquert und überwunden. Sie sind von erhabenem Geist (udaggacittā); da sie von Befleckungen wie Zorn, Dünkel usw. frei sind, haben sie einen von Freude erfüllten Geist (somanassacittā) und ein friedvolles Gemüt (santamanā) – dies ist die Bedeutung. 'Paramatthadassī' [den höchsten Sinn schauend] bedeutet: sie pflegen den höchsten Sinn, das höchste Ziel (paramattha/uttamattha) zu schauen, und zwar mittels der fünf Daseinsgruppen, der zwölf Sinnesbereiche, der zweiunddreißig Körperteile, der Wahrheiten, des Entstehens in Abhängigkeit usw. 'Sīhopamā' [dem Löwen vergleichbar] bedeutet: sie gleichen einem Löwen aufgrund ihrer Unerschütterlichkeit und Furchtlosigkeit. 'Khaggavisāṇakappā' bedeutet: sie gleichen dem Horn des Nashorns, da sie die Vergesellschaftung mit einer Gruppe meiden. 135. Santindriyāti cakkhundriyādīnaṃ sakasakārammaṇe appavattanato santasabhāvaindriyā. Santamanāti santacittā, nikkilesabhāvena santasabhāvacittasaṅkappāti attho. Samādhīti suṭṭhu ekaggacittā. Paccantasattesu patippacārāti paccantajanapadesu sattesu dayākaruṇādīhi paticaraṇasīlā. Dīpā parattha idha vijjalantāti sakalalokānuggahakaraṇena paraloke ca idhaloke ca vijjalantā dīpā padīpasadisāti attho. Paccekabuddhā satataṃ hitāmeti ime paccekabuddhā satataṃ sabbakālaṃ sakalalokahitāya paṭipannāti attho. 135. 'Santindriyā' [von friedvollen Sinnen] bedeutet: sie haben von Natur aus friedvolle Sinne, da das Auge und die anderen Sinnesorgane nicht mehr nach ihren jeweiligen Objekten ausschweifen. 'Santamanā' [von friedvollem Geist] bedeutet: sie haben einen friedvollen Geist; das heißt, sie haben aufgrund ihrer Befleckungsfreiheit von Natur aus friedvolle Gedanken und Absichten. 'Samādhī' [Sammlung] bedeutet: sie sind von vollkommen einspitzigem Geist. 'Paccantasattesu patippacārā' bedeutet: sie pflegen den Wesen in den Grenzgebieten (paccantajanapada) mit Mitleid, Mitgefühl usw. zu begegnen. 'Dīpā parattha idha vijjalantā' [als Leuchten, die im Jenseits und Hier erstrahlen] bedeutet: sie sind wie Lampen, die sowohl in der jenseitigen Welt als auch in dieser Welt erstrahlen, indem sie die gesamte Welt begünstigen. 'Paccekabuddhā satataṃ hitāmā' [die Paccekabuddhas sind beständig auf das Wohl bedacht] bedeutet: diese Paccekabuddhas haben sich beständig und zu jeder Zeit dem Wohl der gesamten Welt gewidmet. 136. Pahīnasabbāvaraṇā [Pg.226] janindāti te paccekabuddhā janānaṃ indā uttamā kāmacchandanīvaraṇādīnaṃ sabbesaṃ pañcāvaraṇānaṃ pahīnattā pahīnasabbāvaraṇā. Ghanakañcanābhāti rattasuvaṇṇajambonadasuvaṇṇapabhā sadisaābhāvantāti attho. Nissaṃsayaṃ lokasudakkhiṇeyyāti ekantena lokassa sudakkhiṇāya aggadānassa paṭiggahetuṃ arahā yuttā, nikkilesattā sundaradānapaṭiggahaṇārahāti attho. Paccekabuddhā satatappitāmeti ime paccekañāṇādhigamā buddhā satataṃ niccakālaṃ appitā suhitā paripuṇṇā, sattāhaṃ nirāhārāpi nirodhasamāpattiphalasamāpattivasena paripuṇṇāti attho. 136. 'Pahīnasabbāvaraṇā janindā' [die alle Hindernisse überwunden haben, die Führer der Menschen]: Diese Paccekabuddhas sind die Führer, die Höchsten unter den Menschen (janinda); sie haben alle Hindernisse überwunden (pahīnasabbāvaraṇa), weil sie die fünf Hindernisse wie das Verlangen nach Sinnengenuss (kāmacchandanīvaraṇa) usw. abgelegt haben. 'Ghanakañcanābhā' [von der Ausstrahlung massiven Goldes] bedeutet: sie besitzen einen Glanz, der dem Glanz von rotem Gold, dem Jambonada-Gold, gleicht. 'Nissaṃsayaṃ lokasudakkhiṇeyyā' [ohne Zweifel der Welt würdigste Gabe-Empfänger] bedeutet: sie sind absolut würdig und geeignet, die erhabenste Gabe (sudakkhiṇā) der Welt entgegenzunehmen; das heißt, aufgrund ihrer Befleckungsfreiheit sind sie würdig, hervorragende Gaben zu empfangen. 'Paccekabuddhā satatappitāmā' bedeutet: diese Buddhas, die das Einzel-Erwachen (paccekañāṇa) erlangt haben, sind beständig und für alle Zeit gefestigt, vollkommen erfüllt; selbst wenn sie sieben Tage lang ohne Nahrung sind, sind sie durch die Errungenschaft des Erlöschens (nirodhasamāpatti) und die Errungenschaft der Frucht (phalasamāpatti) vollkommen erfüllt. 137. Patiekā visuṃ sammāsambuddhato visadisā aññe asādhāraṇabuddhā paccekabuddhā. Atha vā – 137. Sie sind 'Einzel-Buddhas' (paccekabuddhā), weil sie einzeln (patiekaṃ), gesondert (visuṃ), unabhängig von dem vollkommen Erleuchteten (sammāsambuddha) und nicht mit anderen gemein erwacht sind. Oder aber: ‘‘Upasaggā nipātā ca, paccayā ca ime tayo; Nekenekatthavisayā, iti neruttikābravu’’nti. – „Präfixe (upasagga), Partikeln (nipāta) und Suffixe (paccaya) – diese drei haben jeweils vielfältige Bedeutungen; so sagen die Etymologen.“ Vuttattā patisaddassa ekaupasaggatā pati padhāno hutvā sāmibhūto anekesaṃ dāyakānaṃ appamattakampi āhāraṃ paṭiggahetvā saggamokkhassa pāpuṇanato. Tathā hi annabhārassa bhattabhāgaṃ paṭiggahetvāpassantasseva bhuñjitvā devatāhi sādhukāraṃ dāpetvā tadaheva taṃ duggataṃ seṭṭhiṭṭhānaṃ pāpetvā koṭisaṅkhadhanuppādanena ca, khadiraṅgārajātake (jā. aṭṭha. 1.1.khadiraṅgārajātakavaṇṇanā) mārena nimmitakhadiraṅgārakūpopariuṭṭhitapadumakaṇṇikaṃ madditvā bodhisattena dinnaṃ piṇḍapātaṃ paṭiggahetvā tassa passantasseva ākāsagamanena somanassuppādanena ca, padumavatīaggamahesīputtānaṃ mahājanakarañño deviyā ārādhanena gandhamādanato ākāsena āgamma dānapaṭiggahaṇena mahājanakabodhisattassa ca deviyā ca somanassuppādanena ca, tathā abuddhuppāde chātakabhaye sakalajambudīpe uppanne bārāṇasiseṭṭhino chātakabhayaṃ paṭicca pūretvā rakkhite saṭṭhisahassakoṭṭhāgāre vīhayo khepetvā bhūmiyaṃ nikhātadhaññāni ca cāṭisahassesu pūritadhaññāni ca khepetvā sakalapāsādabhittīsu mattikāhi madditvā limpitadhaññāni ca khepetvā tadā nāḷimattamevāvasiṭṭhaṃ ‘‘idaṃ bhuñjitvā ajja marissāmā’’ti [Pg.227] cittaṃ uppādetvā sayantassa gandhamādanato eko paccekabuddho āgantvā gehadvāre aṭṭhāsi. Seṭṭhi taṃ disvā pasādaṃ uppādetvā jīvitaṃ pariccajamāno paccekabuddhassa patte okiri. Paccekabuddho vasanaṭṭhānaṃ gantvā attano ānubhāvena passantasseva seṭṭhissa pañcapaccekabuddhasatehi saha paribhuñji. Tadā bhattapacitaukkhaliṃ, pidahitvā ṭhapesuṃ. Weil dies so gesagt wurde, steht das Präfix „pati“ im Vordergrund und fungiert als Herr, da es selbst eine geringfügige Gabe von Nahrung von zahlreichen Spendern entgegennimmt und sie zu Himmel und Befreiung führt. Dies ist in der Tat so: Nachdem er die Essensportion von Annabhāra entgegengenommen, sie vor dessen Augen verzehrt, die Gottheiten veranlasst hatte, Beifall zu rufen, und diesen armen Mann noch am selben Tag in den Stand eines Großkaufmanns erhoben hatte, indem er ihm ein Vermögen im Wert von zehn Millionen verschaffte; und wie im Khadiraṅgāra-Jātaka, wo der Bodhisatta die Almosenspeise darbrachte, indem er auf die Lotusblätter trat, die über einer von Māra erschaffenen Grube voller glühender Akazienkohlen emporragten, und der Paccekabuddha diese entgegennahm und vor dessen Augen durch den Himmel davonflog, was große Freude erweckte; und durch die Söhne der Königin Padumavatī, die auf Bitten der Königin des Königs Mahājanaka vom Berg Gandhamādana durch die Luft herbeigeflogen kamen, die Gabe entgegennahmen und so im Bodhisatta Mahājanaka und der Königin große Freude erweckten; ebenso, als in einer Ära ohne Buddha eine Hungersnot über ganz Jambudīpa hereinbrach, verbrauchte der Großkaufmann von Bārāṇasī aufgrund der Hungersnot den gesamten Reis in seinen sechzigtausend Speicherhallen, die er gefüllt und bewacht hatte. Er verbrauchte das im Boden vergrabene Getreide, das in tausenden von Krügen gelagert war, und das mit Lehm vermischte Getreide, das an den Wänden all seiner Palastgebäude verstrichen war, bis schließlich nur noch ein einziges Maß übrig war. Mit dem Gedanken: „Nachdem wir dies gegessen haben, werden wir heute sterben“, legte er sich schlafen. Da kam ein Paccekabuddha vom Berg Gandhamādana herbei und trat vor seine Haustür. Als der Großkaufmann ihn sah, schöpfte er Vertrauen, gab sein eigenes Leben auf und goss die Speise in die Almosenschale des Paccekabuddha. Der Paccekabuddha kehrte an seinen Aufenthaltsort zurück und verzehrte die Speise durch seine übernatürliche Macht vor den Augen des zusehenden Großkaufmanns zusammen mit fünfhundert anderen Paccekabuddhas. Zu jener Zeit deckten sie den Topf, in dem der Reis gekocht worden war, zu und stellten ihn beiseite. Niddamokkantassa seṭṭhino chātatte uppanne so vuṭṭhahitvā bhariyaṃ āha – ‘‘bhatte ācāmakabhattamattaṃ olokehī’’ti. Susikkhitā sā ‘‘sabbaṃ dinnaṃ nanū’’ti avatvā ukkhaliyā pidhānaṃ vivari. Sā ukkhali taṅkhaṇeva sumanapupphamakuḷasadisassa sugandhasālibhattassa pūritā ahosi. Sā ca seṭṭhi ca santuṭṭhā sayañca sakalagehavāsino ca sakalanagaravāsino ca bhuñjiṃsu. Dabbiyā gahitagahitaṭṭhānaṃ puna pūritaṃ. Sakalasaṭṭhisahassakoṭṭhāgāresu sugandhasāliyo pūresuṃ. Sakalajambudīpavāsino seṭṭhissa gehatoyeva dhaññabījāni gahetvā sukhitā jātā. Evamādīsu anekasattanikāyesu sukhotaraṇaparipālanasaggamokkhapāpanesu pati sāmibhūto buddhoti paccekabuddho. Paccekabuddhānaṃ subhāsitānīti paccekabuddhehi ovādānusāsanīvasena suṭṭhu bhāsitāni kathitāni vacanāni. Caranti lokamhi sadevakamhīti devalokasahite sattaloke caranti pavattantīti attho. Sutvā tathā ye na karonti bālāti tathārūpaṃ paccekabuddhānaṃ subhāsitavacanaṃ ye bālā janā na karonti na manasi karonti, te bālā dukkhesu saṃsāradukkhesu punappunaṃ uppattivasena caranti pavattanti, dhāvantīti attho. Als der in Schlaf gesunkene Großkaufmann erwachte und heftiger Hunger in ihm aufkam, sagte er zu seiner Frau: „Liebe Frau, sieh doch nach, ob noch etwas Reisschleim vorhanden ist!“ Die gut erzogene Frau sagte nicht: „Wurde nicht bereits alles weggegeben?“, sondern öffnete den Deckel des Reistopfes. In genau diesem Augenblick war dieser Topf mit duftendem Sāli-Reis gefüllt, der wie Jasminblütenknospen aussah. Sie und der Großkaufmann waren voller Freude, und sie selbst, alle Hausbewohner und die gesamte Stadtbevölkerung speisten davon. Jedes Mal, wenn eine Schöpfkelle voll entnommen wurde, füllte sich die Stelle sofort wieder auf. Alle sechzigtausend Speicherhallen füllten sich wieder mit duftendem Sāli-Reis. Sämtliche Bewohner von Jambudīpa holten sich Saatgut direkt aus dem Haus des Großkaufmanns und wurden dadurch glücklich. Da er in solchen Angelegenheiten, wie der Führung der unzähligen Klassen von Wesen zum Glück, ihrer Bewahrung und ihrer Geleitung zu Himmel und Befreiung, als Herr und Meister fungiert, wird er ein selbständig Erleuchteter (Paccekabuddha) genannt. „Die wohlgesprochenen Worte der Paccekabuddhas“ bezeichnet jene Worte, die von den Paccekabuddhas in Form von Ratschlägen und Unterweisungen vortrefflich gesprochen und verkündet wurden. „Sie verbreiten sich in der Welt samt den Göttern“ bedeutet, dass sie in der von Göttern bewohnten Welt der Lebewesen existieren und wirksam sind. „Die Toren, die sie hören und nicht danach handeln“ bedeutet: Die törichten Menschen, die ein solches wohlgesprochenes Wort der Paccekabuddhas nicht befolgen und es sich nicht zu Herzen nehmen, diese Toren wandern, kreisen und hasten aufgrund wiederholter Wiedergeburt immer wieder in den Leiden des Daseinskreislaufs umher. 138. Paccekabuddhānaṃ subhāsitānīti suṭṭhu bhāsitāni caturāpāyato muccanatthāya bhāsitāni vacanāni. Kiṃ bhūtāni? Avassavantaṃ pagghantaṃ khuddaṃ madhuṃ yathā madhuravacanānīti attho. Ye paṭipattiyuttā paṇḍitajanāpi paṭipattīsu vuttānusārena pavattantā tathārūpaṃ madhuravacanaṃ sutvā vacanakarā bhavanti, te paṇḍitajanā saccadasā catusaccadassino sapaññā paññāsahitā bhavantīti attho. 138. „Die wohlgesprochenen Worte der Paccekabuddhas“ bezieht sich auf die vortrefflich gesprochenen Worte, die zum Zweck der Befreiung aus den vier niederen Daseinsbereichen verkündet wurden. Welcher Art sind sie? Sie sind wie herabtröpfelnder, fließender, süßer Wildhonig – das bedeutet, sie sind von überaus süßer und lieblicher Natur. Und jene weisen Menschen, die sich der Praxis widmen und gemäß den dargelegten Unterweisungen in ihrer Praxis wandeln, werden, wenn sie eine solche süße Rede vernehmen, zu Ausführenden dieser Worte; diese Weisen werden zu Wahrheitssehern – d. h. sie schauen die Vier Edlen Wahrheiten –, und sie sind mit Weisheit ausgestattet. 139. Paccekabuddhehi [Pg.228] jinehi bhāsitāti kilese jinanti jiniṃsūti jinā, tehi jinehi paccekabuddhehi vuttā bhāsitā kathitā. Kathā uḷārā ojavantā pākaṭā santi pavattanti. Tā, kathā sakyasīhena sakyarājavaṃsasīhena gotamena tathāgatena abhinikkhamitvā buddhabhūtena naruttamena narānaṃ uttamena seṭṭhena pakāsitā pākaṭīkatā desitāti sambandho. Kimatthanti āha ‘‘dhammavijānanattha’’nti. Navalokuttaradhammaṃ visesena jānāpanatthanti attho. 139. „Gesprochen von den Paccekabuddhas, den Siegern“: Sie werden Sieger genannt, weil sie die Verunreinigungen des Geistes besiegen und besiegt haben; von diesen siegreichen Paccekabuddhas wurden diese Worte geäußert, gesprochen und verkündet. Diese erhabenen, kraftvollen und weithin bekannten Reden existieren und bleiben bestehen. Die Verknüpfung lautet: Diese Reden wurden vom Löwen aus dem Sakya-Geschlecht, dem königlichen Sakya-Löwen Gotama, dem Tathāgata, der in die Hauslosigkeit zog, ein Buddha wurde und der Höchste unter den Menschen, der Vortrefflichste ist, offenbart, bekannt gemacht und dargelegt. Zu welchem Zweck? Es heißt: „Um das Dhamma zu verstehen“. Das bedeutet: Insbesondere um die neun überweltlichen Wahrheiten verständlich zu machen. 140. Lokānukampāya imāni tesanti lokānukampatāya lokassa anukampaṃ paṭicca imāni vacanāni imā gāthāyo. Tesaṃ paccekabuddhānaṃ vikubbitāni visesena kubbitāni bhāsitānīti attho. Saṃvegasaṅgamativaḍḍhanatthanti paṇḍitānaṃ saṃvegavaḍḍhanatthañca asaṅgavaḍḍhanatthaṃ ekībhāvavaḍḍhanatthañca mativaḍḍhanatthaṃ paññāvaḍḍhanatthañca sayambhusīhena anācariyakena hutvā sayameva bhūtena jātena paṭividdhena sīhena abhītena gotamena sammāsambuddhena imāni vacanāni pakāsitāni, imā gāthāyo pakāsitā vivaritā uttānīkatāti attho. Itīti parisamāpanatthe nipāto. 140. „Aus Mitgefühl für die Welt sind diese von ihnen“: Dies bedeutet, dass aus Mitgefühl für die Welt, basierend auf dem Mitgefühl für die Menschen, diese Worte und Strophen entstanden sind. Es bezieht sich auf die übernatürlichen Schöpfungen bzw. die besonders vollbrachten und gesprochenen Worte jener Paccekabuddhas. „Um die heilsame Erschütterung, die Bindungslosigkeit und die Einsicht zu mehren“ bedeutet: Um bei den Weisen die heilsame Erschütterung zu mehren, das Freisein von Anhaftung zu fördern, das Alleinsein zu stärken und die geistige Einsicht sowie die Weisheit zu mehren, wurden diese Worte vom selbständig erleuchteten Löwen – der ohne Lehrer aus sich selbst heraus zu dem wurde, was er ist, dem furchtlosen Löwen Gotama, dem vollkommen Erleuchteten –, verkündet; das bedeutet, diese Strophen wurden dargelegt, enthüllt und klar verständlich gemacht. Das Wort „iti“ ist eine Partikel im Sinne des Abschlusses. Iti visuddhajanavilāsiniyā apadāna-aṭṭhakathāya So endet [die Einleitung] im Visuddhajanavilāsinī, dem Kommentar zum Apadāna. Paccekabuddhāpadānasaṃvaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Legende der Paccekabuddhas ist abgeschlossen. 3-1. Sāriputtattheraapadānavaṇṇanā 3-1. Die Erklärung der Legende des ehrwürdigen Thera Sāriputta. Tadanantaraṃ therāpadānasaṅgahagāthāyo saṃvaṇṇetuṃ ‘‘atha therāpadānaṃ suṇāthā’’ti āha. Atha-apadāna-saddānamattho heṭṭhā vuttova. Ettha thera-saddo panāyaṃ kālathirapaññattināmadheyyajeṭṭhādīsu anekesu atthesu vattati. Tathā hi ‘‘therovassikāni pūtīni cuṇṇakajātānī’’tiādīsu (dī. ni. 2.379; ma. ni. 1.112) kāle, therovassikāni cirakālaṃ ovassikānīti attho. ‘‘Theropi tāva mahā’’iccādīsu thire thirasīloti attho. ‘‘Therako ayamāyasmā mahallako’’tiādīsu paññattiyaṃ[Pg.229], lokapaññattimattoti attho. ‘‘Cundatthero phussatthero’’tiādīsu nāmadheyye, evaṃ katanāmoti attho. ‘‘Thero cāyaṃ kumāro mama puttesū’’tiādīsu jeṭṭhe, jeṭṭho kumāroti attho. Idha panāyaṃ kāle ca thire ca vattati. Tasmā ciraṃ kālaṃ ṭhitoti thero, thiratarasīlācāramaddavādiguṇābhiyutto vā theroti vuccati. Thero ca thero ceti therā, therānaṃ apadānaṃ kāraṇaṃ therāpadānaṃ, taṃ therāpadānaṃ suṇāthāti sambandho. Himavantassa avidūre, lambako nāma pabbatotiādi āyasmato sāriputtattherassa apadānaṃ, tassāyasmato mahāmoggallānattherassa ca vatthu evaṃ veditabbaṃ – Unmittelbar danach sprach er, um die zusammenfassenden Strophen des Therāpadāna zu erklären: „Nun hört das Therāpadāna.“ Die Bedeutung der Wörter atha und apadāna wurde bereits oben erklärt. Hier jedoch kommt das Wort thera in vielen Bedeutungen vor, wie Zeit, Beständigkeit, Bezeichnung, Name, der Ältere usw. Denn in Passagen wie „therovassikāni pūtīni cuṇṇakajātānī“ bezieht es sich auf die Zeit; „therovassikāni“ bedeutet „über lange Zeit hinweg verregnet“. In Passagen wie „Theropi tāva mahā“ bedeutet es „beständig“, d. h. von beständiger Tugend. In Passagen wie „Therako ayamāyasmā mahallako“ bezieht es sich auf die Bezeichnung, d. h. bloß eine weltliche Bezeichnung. In Passagen wie „Cundatthero phussatthero“ bezieht es sich auf den Namen, d. h. „jemand, dem dieser Name gegeben wurde“. In Passagen wie „Thero cāyaṃ kumāro mama puttesū“ bedeutet es „der Ältere“, d. h. der ältere Prinz. Hier jedoch bezieht es sich sowohl auf die Zeit als auch auf die Beständigkeit. Daher wird einer, der lange Zeit verweilt hat, „Thera“ genannt, oder einer, der mit den festesten Eigenschaften wie Tugend, gutem Verhalten und Milde ausgestattet ist, wird „Thera“ genannt. „Thera und Thera“ sind „Therā“ (Plural); das Apadāna (die Lebensgeschichte) der Theras ist das „Therāpadāna“; die Verknüpfung lautet: „Hört dieses Therāpadāna.“ Die Geschichte des ehrwürdigen Thera Sāriputta, beginnend mit „Nicht weit vom Himavanta entfernt liegt der Berg namens Lambaka...“, sowie die Geschichte des ehrwürdigen Thera Mahāmoggallāna ist wie folgt zu verstehen – Atīte kira ito kappato satasahassakappādhike ekaasaṅkhyeyyamatthake āyasmā sāriputto brāhmaṇamahāsālakule nibbattitvā nāmena saradamāṇavo nāma ahosi. Mahāmoggallāno gahapatimahāsālakule nibbattitvā nāmena sirivaḍḍhanakuṭumbiko nāma ahosi. Te ubhopi sahapaṃsukīḷanasahāyā ahesuṃ. Tesu saradamāṇavo pitu accayena kulasantakaṃ dhanaṃ paṭipajjitvā ekadivasaṃ rahogato cintesi – ‘‘imesaṃ sattānaṃ maraṇaṃ nāma ekantikaṃ, tasmā mayā ekaṃ pabbajjaṃ upagantvā vimokkhamaggo gavesitabbo’’ti sahāyaṃ upasaṅkamitvā ‘‘samma, ahaṃ pabbajitukāmo. Kiṃ tvaṃ pabbajituṃ sakkhissasī’’ti vatvā tena ‘‘na sakkhissāmī’’ti vutte ‘‘hotu ahameva pabbajissāmī’’ti ratanakoṭṭhāgārāni vivarāpetvā kapaṇaddhikādīnaṃ mahādānaṃ datvā pabbatapādaṃ gantvā isipabbajjaṃ pabbaji. Tassa pabbajitassa anupabbajjaṃ pabbajitā catusattatisahassamattā brāhmaṇaputtā ahesuṃ. So pañca abhiññāyo aṭṭha ca samāpattiyo nibbattetvā tesampi jaṭilānaṃ kasiṇaparikammaṃ ācikkhi. Te sabbepi pañcābhiññā aṭṭha ca samāpattiyo nibbattisuṃ. In der Vergangenheit, so heißt es, ein Unzählbares (Asankheyya) und einhunderttausend Äonen (Kappas) von diesem Äon an gerechnet, wurde der ehrwürdige Sāriputta in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie wiedergeboren und war unter dem Namen Sarada-Māṇava bekannt. Mahāmoggallāna wurde in einer wohlhabenden Hausvaterfamilie wiedergeboren und war unter dem Namen Sirivaḍḍhana-Kuṭumbika bekannt. Beide waren von Jugend an Gefährten beim gemeinsamen Spielen im Staub. Unter ihnen übernahm Sarada-Māṇava nach dem Tod seines Vaters das überlieferte Familienvermögen. Eines Tages dachte er an einem einsamen Ort nach: „Für diese Wesen ist der Tod wahrlich gewiss. Deshalb sollte ich in die Hauslosigkeit ziehen und den Weg der Befreiung suchen.“ Er ging zu seinem Gefährten und sagte: „Mein Freund, ich möchte als Asket hinausziehen. Wirst du in der Lage sein, ebenfalls hinauszuziehen?“ Als dieser antwortete: „Ich werde es nicht können“, sagte er: „Es sei drum, ich selbst werde hinausziehen.“ Er ließ die Schatzhäuser öffnen, spendete den Armen, Reisenden und anderen ein großes Almosen, ging zum Fuß der Berge und trat in das Leben eines Seher-Asketen ein. Ihm folgten etwa 74.000 Brahmanensöhne in die Hauslosigkeit nach. Er brachte die fünf höheren Geisteskräfte und die acht Vertiefungen hervor und lehrte diese Asketen mit geflochtenem Haar das Vorbereitungszeichen für die Kasiṇa-Meditation. Sie alle brachten die fünf höheren Geisteskräfte und die acht Vertiefungen hervor. Tena samayena anomadassī nāma sammāsambuddho loke uppajjitvā pavattitavaradhammacakko satte saṃsāramahoghato tāretvā ekadivasaṃ saradatāpasassa ca antevāsikānañca saṅgahaṃ kattukāmo eko [Pg.230] adutiyo pattacīvaramādāya ākāsena gantvā ‘‘buddhabhāvaṃ me jānātū’’ti tāpasassa passantasseva ākāsato otaritvā pathaviyaṃ patiṭṭhāsi. Saradatāpaso satthu sarīre mahāpurisalakkhaṇāni upadhāretvā ‘‘sabbaññubuddhoyevāya’’nti niṭṭhaṃ gantvā paccuggamanaṃ katvā āsanaṃ paññāpetvā adāsi. Nisīdi bhagavā paññatte āsane. Saradatāpaso satthu santike ekamantaṃ nisīdi. Zu jener Zeit erschien ein vollkommen Erleuchteter namens Anomadassī in der Welt. Er setzte das edle Rad der Lehre in Bewegung, rettete die Wesen aus der großen Flut des Saṃsāra und dachte eines Tages: „Ich will dem Asketen Sarada und seinen Schülern Beistand leisten.“ Allein und ohne Gefährten nahm er seine Almosenschale und seine Robe, reiste durch die Luft und dachte: „Er möge meine Buddhaschaft erkennen.“ Während der Asket zusah, stieg er aus der Luft herab und trat auf die Erde. Der Asket Sarada betrachtete die Merkmale eines großen Mannes am Körper des Meisters, kam zu dem sicheren Entschluss: „Dies ist wahrlich ein allwissender Buddha“, ging ihm entgegen, bereitete einen Sitz und bot ihn an. Der Erhabene setzte sich auf den vorbereiteten Sitz. Der Asket Sarada setzte sich seitlich in die Nähe des Meisters. Tasmiṃ samaye tassa antevāsikā catusattatisahassamattā jaṭilā paṇītapaṇītāni ojavantāni phalāphalāni gahetvā āgatā satthāraṃ disvā sañjātapasādā attano ācariyassa satthu ca nisinnākāraṃ oloketvā ‘‘ācariya, mayaṃ pubbe ‘tumhehi mahantataro koci natthī’ti maññāma, ayaṃ pana puriso tumhehi mahantataro maññe’’ti āhaṃsu. Kiṃ vadetha, tātā, sāsapena saddhiṃ aṭṭhasaṭṭhiyojanasatasahassubbedhaṃ sineruṃ samaṃ kātuṃ icchatha, sabbaññubuddhena maṃ tulaṃ mā karitthāti. Atha te tāpasā ācariyassa vacanaṃ sutvā ‘‘yāva mahā vatāyaṃ purisuttamo’’ti sabbeva pādesu nipatitvā satthāraṃ vandiṃsu. Zu jener Zeit kamen seine Schüler, etwa 74.000 Asketen mit geflochtenem Haar, zurück, nachdem sie die feinsten und nahrhaftesten Früchte gesammelt hatten. Als sie den Meister sahen, entstand in ihnen tiefes Vertrauen. Sie betrachteten die Art und Weise, wie ihr eigener Lehrer und der Meister dasaßen, und sagten: „Lehrer, wir dachten früher, es gäbe niemanden, der größer ist als Ihr. Aber dieser Mann, so glauben wir, ist noch viel größer als Ihr.“ Er antwortete: „Was sagt ihr da, meine Lieben? Wollt ihr den Berg Sineru, der 168.000 Yojanas hoch ist, mit einem Senfkorn vergleichen? Vergleicht mich nicht mit einem allwissenden Buddha!“ Als die Asketen die Worte ihres Lehrers hörten, dachten sie: „Wie großartig ist doch dieser höchste aller Menschen!“, warfen sich alle zu seinen Füßen nieder und verehrten den Meister. Atha te ācariyo āha – ‘‘tātā, satthu anucchaviko no deyyadhammo natthi, satthā ca bhikkhācaravelāya idhāgato, handa, mayaṃ deyyadhammaṃ yathābalaṃ dassāma. Tumhehi yaṃ yaṃ paṇītaṃ phalāphalaṃ ābhataṃ, taṃ taṃ āharathā’’ti āharāpetvā hatthe dhovitvā sayaṃ tathāgatassa patte patiṭṭhāpesi. Satthārā phalāphale paṭiggahitamatte devatā dibbojaṃ pakkhipiṃsu. Tāpaso udakampi sayameva parissāvetvā adāsi. Tato bhojanakiccaṃ niṭṭhāpetvā satthari nisinne sabbe antevāsike pakkosāpetvā satthu santike sāraṇīyaṃ kathaṃ kathento nisīdi. Satthā ‘‘dve aggasāvakā bhikkhusaṅghena saddhiṃ āgacchantū’’ti cintesi. Tāvadeva satasahassakhīṇāsavaparivārā aggasāvakā āgantvā bhagavantaṃ vanditvā ekamantaṃ aṭṭhaṃsu. Daraufhin sagte ihr Lehrer zu ihnen: „Meine Lieben, wir haben kein Opfergeschenk, das des Meisters würdig ist, und der Meister ist zur Zeit des Almosengangs hierhergekommen. Wohlan, wir wollen ein Opfergeschenk nach besten Kräften darbringen. Bringt all die erlesenen Früchte herbei, die ihr gesammelt habt!“ Nachdem er sie herbringen ließ, wusch er seine Hände und legte sie selbst in die Almosenschale des Tathāgata. Sobald der Meister die Früchte entgegengenommen hatte, träufelten die Gottheiten göttliche Essenz hinein. Der Asket filterte auch selbst Wasser und reichte es ihm. Nachdem das Mahl beendet war und der Meister saß, rief er alle Schüler zusammen und setzte sich in der Nähe des Meisters nieder, um ein freundschaftliches Gespräch zu führen. Der Meister dachte: „Mögen die beiden Hauptschüler zusammen mit der Bhikkhu-Gemeinschaft herkommen.“ Sofort trafen die beiden Hauptschüler, umgeben von einhunderttausend Triebversiegten, ein, erwiesen dem Erhabenen ihre Ehrfurcht und stellten sich seitlich auf. Tato saradatāpaso antevāsike āmantesi – ‘‘tātā, satthu bhikkhusaṅghassa ca pupphāsanena pūjā kātabbā, tasmā pupphāni āharathā’’ti. Te tāvadeva iddhiyā vaṇṇagandhasampannāni pupphāni āharitvā buddhassa yojanappamāṇaṃ pupphāsanaṃ paññāpesuṃ, ubhinnaṃ aggasāvakānaṃ tigāvutaṃ[Pg.231], sesabhikkhūnaṃ aḍḍhayojanikādibhedaṃ, saṅghanavakassa usabhamattaṃ paññāpesuṃ. Evaṃ paññattesu āsanesu saradatāpaso tathāgatassa purato añjaliṃ paggayha ‘‘bhante, mayhaṃ anuggahatthāya imaṃ pupphāsanaṃ atiruhathā’’ti āha. Nisīdi bhagavā pupphāsane. Satthari nisinne dve aggasāvakā sesabhikkhū ca attano attano pattāsane nisīdiṃsu. Satthā ‘‘tesaṃ mahapphalaṃ hotū’’ti nirodhaṃ samāpajji. Satthu samāpannabhāvaṃ ñatvā dve aggasāvakāpi sesabhikkhūpi nirodhaṃ samāpajjiṃsu. Tāpaso sattāhaṃ nirantaraṃ satthu pupphacchattaṃ dhārento aṭṭhāsi. Itare vanamūlaphalaṃ paribhuñjitvā sesakāle añjaliṃ paggayha aṭṭhaṃsu. Satthā sattāhassa accayena nirodhato vuṭṭhahitvā aggasāvakaṃ nisabhattheraṃ āmantesi – ‘‘tāpasānaṃ pupphāsanānumodanaṃ karohī’’ti. Thero sāvakapāramīñāṇe ṭhatvā tesaṃ pupphāsanānumodanaṃ akāsi. Tassa desanāvasāne satthā dutiyaṃ aggasāvakaṃ anomattheraṃ āmantesi – ‘‘tvampi imesaṃ dhammaṃ desehī’’ti. Sopi tepiṭakaṃ buddhavacanaṃ sammasitvā tesaṃ dhammaṃ kathesi. Dvinnampi desanāya dhammābhisamayo nāhosi. Atha satthā buddhavisaye ṭhatvā dhammadesanaṃ ārabhi. Desanāvasāne ṭhapetvā saradatāpasaṃ avasesā sabbepi catusattatisahassajaṭilā arahattaṃ pāpuṇiṃsu. Satthā te ‘‘etha bhikkhavo’’ti hatthaṃ pasāresi. Te tāvadeva antarahitatāpasavesā aṭṭhaparikkhāradharā saṭṭhivassikatthero viya ahesuṃ. Daraufhin wandte sich der Asket Sarada an seine Schüler: „Ihr Lieben, dem Meister und dem Bhikkhu-Saṅgha gebührt Verehrung durch einen Blumensitz; darum bringt Blumen herbei!“ Im selben Augenblick brachten jene mittels ihrer übernatürlichen Kräfte an Farbe und Duft vollkommene Blumen herbei und bereiteten für den Buddha einen Blumensitz von einer Yojana Ausdehnung, für die beiden Hauptschüler einen von drei Gāvutas, für die übrigen Mönche von einer halben Yojana und abnehmend, und für den jüngsten Mönch der Gemeinschaft einen von der Größe eines Stieres. Als die Sitze so bereitet waren, erhob der Asket Sarada vor dem Tathāgata die ehrerbietig gefalteten Hände und sprach: „Ehrwürdiger Herr, geruht zu meinem Beistand diesen Blumensitz zu besteigen.“ Der Erhabene setzte sich auf den Blumensitz. Als der Meister Platz genommen hatte, setzten sich auch die beiden Hauptschüler und die übrigen Mönche auf ihre jeweiligen ihnen zugewiesenen Sitze. Der Meister trat mit dem Gedanken „Möge dies für sie von großem Nutzen sein!“ in die Errungenschaft des Erlöschens ein. Als die beiden Hauptschüler und auch die übrigen Mönche erkannten, dass der Meister in die Errungenschaft eingetreten war, traten auch sie in die Errungenschaft des Erlöschens ein. Der Asket blieb sieben Tage lang ununterbrochen stehen und hielt einen Blumenschirm über den Meister. Die anderen verzehrten Wurzeln und Früchte des Waldes und standen in der übrigen Zeit mit ehrerbietig gefalteten Händen da. Nach Ablauf von sieben Tagen erhob sich der Meister aus der Errungenschaft des Erlöschens und wandte sich an den Hauptschüler, den ehrwürdigen Nisabha: „Sprich den Asketen den Dank für die Bereitung des Blumensitzes aus!“ Der Thera verweilte im Wissen um die Vollkommenheit eines Jüngers und sprach den Dank für die Bereitung des Blumensitzes aus. Am Ende seiner Lehrrede wandte sich der Meister an den zweiten Hauptschüler, den ehrwürdigen Anoma: „Verkünde auch du ihnen die Lehre!“ Auch dieser untersuchte das dreifach gegliederte Buddha-Wort und verkündete ihnen die Lehre. Trotz der Lehrreden von beiden fand bei den Asketen kein Durchdringen der Lehre statt. Daraufhin gründete sich der Meister auf den Erkenntnisbereich eines Buddha und begann, die Lehre zu verkünden. Am Ende der Lehrrede erlangten alle übrigen vierundsiebzigtausend geflochtenhaarigen Asketen, mit Ausnahme des Asketen Sarada, die Arahatschaft. Der Meister streckte seine Hand aus und sprach zu ihnen: „Kommt, ihr Bhikkhus!“ Im selben Augenblick verschwand ihr Asketengewand, und sie standen da, ausgestattet mit den acht Requisiten, wie sechzigjährige Theras. Saradatāpaso pana ‘‘aho vatāhampi ayaṃ nisabhatthero viya anāgate ekassa buddhassa sāvako bhaveyya’’nti desanākāle uppannaparivitakkatāya aññavihito hutvā maggaphalāni paṭivijjhituṃ nāsakkhi. Atha satthāraṃ vanditvā tathā paṇidhānaṃ akāsi. Satthā anantarāyena samijjhanabhāvaṃ disvā ‘‘ito kappasatasahassādhikaṃ ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ atikkamitvā gotamassa nāma sammāsambuddhassa aggasāvako sāriputto nāma bhavissatī’’ti byākaritvā dhammakathaṃ vatvā bhikkhusaṅghaparivāro ākāsaṃ pakkhandi. Saradatāpasopi sahāyassa sirivaḍḍhassa santikaṃ gantvā ‘‘samma, mayā anomadassissa bhagavato pādamūle anāgate uppajjanakassa gotamasammāsambuddhassa aggasāvakaṭṭhānaṃ patthitaṃ, tvampi tassa dutiyasāvakaṭṭhānaṃ [Pg.232] patthehī’’ti. Sirivaḍḍho taṃ upadesaṃ sutvā attano nivesanadvāre aṭṭhakarīsamattaṃ ṭhānaṃ samatalaṃ kāretvā lājapañcamāni pupphāni vikiritvā nīluppalacchadanaṃ maṇḍapaṃ kāretvā buddhāsanaṃ paññāpetvā bhikkhūnampi āsanāni paññāpetvā mahantaṃ sakkārasammānaṃ sajjetvā saradatāpasena satthāraṃ nimantāpetvā sattāhaṃ mahādānaṃ pavattetvā buddhappamukhaṃ bhikkhusaṅghaṃ mahārahehi vatthehi acchādetvā dutiyasāvakabhāvāya paṇidhānaṃ akāsi. Satthā tassa anantarāyena samijjhanabhāvaṃ disvā vuttanayena byākaritvā bhattānumodanaṃ katvā pakkāmi. Sirivaḍḍho haṭṭhapahaṭṭho yāvajīvaṃ kusalakammaṃ katvā dutiyacittavāre kāmāvacaradevaloke nibbatti. Saradatāpaso cattāro brahmavihāre bhāvetvā brahmaloke nibbatti. Der Asket Sarada jedoch dachte: „O möge ich doch in der Zukunft wie dieser ehrwürdige Nisabha der Hauptschüler eines Buddhas werden!“ Weil er durch diesen während der Lehrrede aufkommenden Gedanken abgelenkt war, vermochte er es nicht, die Pfade und Früchte zu durchdringen. Daraufhin verneigte er sich vor dem Meister und legte dieses feierliche Gelübde ab. Der Meister sah mit ungestörtem Blick die künftige Erfüllung voraus und prophezeite: „Nach Ablauf eines unzählbaren Weltzeitalters und weiteren hunderttausend Weltzeitaltern von heute an wirst du unter dem vollkommen Erwachten namens Gotama der erste Hauptschüler namens Sāriputta sein.“ Nachdem er diese Lehrrede gehalten hatte, erhob er sich, umgeben vom Bhikkhu-Saṅgha, in die Luft. Auch der Asket Sarada begab sich zu seinem Freund Sirivaḍḍha und sprach: „Mein Freund, ich habe zu den Füßen des erhabenen Anomadassī den Rang des ersten Hauptschülers des in der Zukunft erscheinenden vollkommen erwachten Gotama ersehnt; strebe auch du nach dem Rang des zweiten Hauptschülers jenes Buddhas!“ Als Sirivaḍḍha diesen Rat vernahm, ließ er vor dem Tor seines Hauses ein Gelände von etwa acht Karīsa einebnen, streute Blumen aus, darunter Puffreis als fünftes Element, ließ einen mit blauen Lotusblumen gedeckten Pavillon errichten, bereitete den Buddhasitz und auch die Sitze für die Mönche vor. Nachdem er eine große Ehrung und Bewirtung vorbereitet hatte, ließ er den Meister durch den Asketen Sarada einladen, spendete sieben Tage lang eine große Gabe, kleidete die Mönchsgemeinschaft mit dem Buddha an der Spitze in kostbare Gewänder und legte das Gelübde ab, der zweite Hauptschüler zu werden. Der Meister sah, dass sich dieser Wunsch hindernisfrei erfüllen würde, verkündete die Prophezeiung in der bereits beschriebenen Weise, hielt die Dankesrede für das Mahl und reiste ab. Sirivaḍḍha, hocherfreut und glücklich, tat zeitlebens heilsame Taten und wurde nach dem zweiten Gedankenmoment in der Sphäre der feinstofflichen Götterwelt wiedergeboren. Der Asket Sarada entfaltete die vier göttlichen Verweilungszustände und wurde in der Brahma-Welt wiedergeboren. Tato paṭṭhāya tesaṃ ubhinnampi antarā kammaṃ na kathitaṃ. Amhākaṃ pana bhagavato uppattito puretarameva saradatāpaso rājagahassa avidūre upatissāgāme rūpasāriyā brāhmaṇiyā kucchimhi paṭisandhiṃ gaṇhi. Taṃdivasamevassa sahāyopi rājagahasseva avidūre kolitagāme moggaliyā brāhmaṇiyā kucchimhi paṭisandhiṃ gaṇhi. Tasmā moggallāno moggaliyā brāhmaṇiyā puttoti moggallāno. Moggaligottena jātoti vā moggallāno. Atha vā mātukumārikakāle tassā mātāpitūhi vuttaṃ – ‘‘mā uggali mā uggalī’’ti vacanamupādāya ‘‘muggalī’’ti nāmaṃ. Tassā muggaliyā puttoti moggallāno. Atha vā sotāpattimaggādimaggassa lābhe ādāne paṭivijjhane alaṃ samatthoti moggallānoti. Tāni kira dve kulāni yāva sattamā kulaparivaṭṭā ābaddhasahāyāneva. Tesaṃ dvinnaṃ ekadivasameva gabbhaparihāramadaṃsu. Dasamāsaccayena jātānampi tesaṃ chasaṭṭhi dhātiyo paṭṭhapesuṃ. Nāmaggahaṇadivase rūpasārībrāhmaṇiyā puttassa upatissagāme jeṭṭhakulassa puttattā upatissoti nāmaṃ kariṃsu. Itarassa kolitagāme jeṭṭhakulassa puttattā kolitoti nāmaṃ kariṃsu. Te ubhopi mahatā parivārena vaḍḍhantā vuddhimanvāya sabbasippānaṃ pāraṃ agamaṃsu. Von jener Zeit an wird über das dazwischenliegende Karma dieser beiden nichts berichtet. Doch noch vor der Geburt unseres Erhabenen nahm der Asket Sarada im Dorf Upatissa, unweit von Rājagaha, im Schoß der Brahmanin Rūpasārī Wiedergeburt an. Am selben Tag nahm auch sein Freund im Dorf Kolita, ebenfalls unweit von Rājagaha, im Schoß der Brahmanin Moggallī Wiedergeburt an. Darum wurde er Moggallāna genannt: Weil er der Sohn der Brahmanin Moggallī war, hieß er Moggallāna, oder weil er in der Moggaliga-Sippe geboren wurde, hieß er Moggallāna. Oder aber, als seine Mutter noch ein junges Mädchen war, sagten ihre Eltern zu ihr: „Rutscheng, gleite nicht aus!“ Aufgrund dieses Ausspruchs entstand der Name Muggalī. Da er der Sohn dieser Muggalī war, hieß er Moggallāna. Oder aber, weil er fähig und stark genug war, die Pfade, beginnend mit dem Pfad des Stromeintritts, zu erlangen, anzunehmen und zu durchdringen, wurde er Moggallāna genannt. Jene zwei Familien waren nämlich über sieben Generationen hinweg eng miteinander befreundet. Man gab den Müttern der beiden am selben Tag die Schwangerschaftspflege. Als sie nach Ablauf von zehn Monaten geboren wurden, stellte man für sie sechsundsechzig Ammen ein. Am Tag der Namensgebung gaben sie dem Sohn der Brahmanin Rūpasārī den Namen Upatissa, da er der Sohn der führenden Familie im Dorf Upatissa war. Dem anderen gaben sie den Namen Kolita, da er der Sohn der führenden Familie im Dorf Kolita war. Beide wuchsen inmitten eines großen Gefolges auf, und als sie herangewachsen waren, gelangten sie zur Meisterschaft in allen Künsten und Wissenschaften. Athekadivasaṃ [Pg.233] te rājagahe giraggasamajjaṃ passantā mahājanaṃ sannipatitaṃ disvā ñāṇassa paripākaṃ gatattā yoniso ummujjantā ‘‘sabbepime oraṃ vassasatāva maccumukhaṃ pavisantī’’ti saṃvegaṃ paṭilabhitvā ‘‘amhehi mokkhadhammo pariyesitabbo, tañca pariyesantehi ekā pabbajjā laddhuṃ vaṭṭatī’’ti nicchayaṃ katvā pañcamāṇavakasatehi saddhiṃ sañcayassa paribbājakassa santike pabbajiṃsu. Tesaṃ pabbajitakālato paṭṭhāya sañcayo lābhaggayasaggappatto ahosi. Te katipāheneva sabbaṃ sañcayassa samayaṃ parimajjitvā tattha sāraṃ adisvā tato nibbijjitvā tattha tattha paṇḍitasammate samaṇabrāhmaṇe pañhaṃ pucchanti, te tehi puṭṭhā na sampādenti. Aññadatthu teyeva tesaṃ pañhaṃ vissajjenti. Evaṃ te mokkhaṃ pariyesantā katikaṃ akaṃsu – ‘‘amhesu yo paṭhamaṃ amataṃ adhigacchati, so itarassa ārocetū’’ti. Und eines Tages, als sie in Rājagaha dem Bergspitzenfest beiwohnten, sahen sie die große versammelte Volksmenge. Da ihre Erkenntnis zur Reife gelangt war, dachten sie weise darüber nach und empfanden tiefe Erschütterung: "Sie alle werden noch vor Ablauf von hundert Jahren in den Rachen des Todes geraten. Wir müssen nach der Lehre der Befreiung suchen; und für jene, die danach suchen, schickt es sich, die Hauslosigkeit anzunehmen." Nachdem sie diesen Entschluss gefasst hatten, traten sie zusammen mit fünfhundert Jünglingen bei dem Wanderasketen Sañcaya in den Orden ein. Von der Zeit ihres Eintritts an erlangte Sañcaya die höchste Stufe an Gewinn und Ruhm. Schon nach wenigen Tagen hatten sie die gesamte Lehre Sañcayas durchdrungen; da sie darin jedoch keinen wahren Kern fanden, wandten sie sich enttäuscht davon ab und befragten hier und da Asketen und Brahmanen, die als weise galten. Doch diese konnten auf ihre Fragen keine Antwort geben. Vielmehr waren sie es selbst, die jenen ihre Fragen beantworteten. Während sie so nach Befreiung suchten, trafen sie eine Vereinbarung: "Wer von uns zuerst das Todlose erlangt, soll es dem anderen mitteilen." Tena ca samayena amhākaṃ satthari paṭhamābhisambodhiṃ patvā pavattitavaradhammacakke anupubbena uruvelakassapādike sahassajaṭile dametvā rājagahe viharante ekadivasaṃ upatisso paribbājako paribbājakārāmaṃ gacchanto āyasmantaṃ assajittheraṃ rājagahe piṇḍāya carantaṃ disvā ‘‘na mayā evarūpo ākappasampanno pabbajito diṭṭhapubbo, santadhammena nāma ettha bhavitabba’’nti sañjātapasādo pañhaṃ pucchituṃ āyasmantaṃ udikkhanto piṭṭhito piṭṭhito anubandhi. Theropi laddhapiṇḍapāto paribhuñjituṃ patirūpaṃ okāsaṃ gato. Paribbājako attano paribbājakapīṭhaṃ paññāpetvā adāsi. Bhattakiccapariyosāne cassa attano kuṇḍikāya udakaṃ adāsi. Evaṃ so ācariyavattaṃ katvā katabhattakiccena therena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā – ‘‘ko vā te satthā, kassa vā tvaṃ dhammaṃ rocesī’’ti pucchi. Thero sammāsambuddhaṃ apadisi. Puna tena ‘‘kiṃ vādī panāyasmato satthā’’ti puṭṭho ‘‘imassa sāsanassa gambhīrataṃ dassessāmī’’ti attano navakabhāvaṃ pavedetvā saṅkhepavasena cassa sāsanadhammaṃ kathento ‘‘ye dhammā hetuppabhavā’’ti (mahāva. 60; apa. thera 1.1.286) gāthamāha. Paribbājako paṭhamapadadvayameva sutvā sahassanayasampanne sotāpattimaggaphale patiṭṭhahi. Itaraṃ padadvayaṃ sotāpannakāle niṭṭhāsi. Gāthāpariyosāne pana sotāpanno hutvā uparivisese apavattante ‘‘bhavissati ettha kāraṇa’’nti sallakkhetvā [Pg.234] theraṃ āha – ‘‘mā, bhante, upari dhammadesanaṃ vaḍḍhayittha, ettakameva alaṃ, kahaṃ amhākaṃ satthā vasatī’’ti? ‘‘Veḷuvane’’ti. ‘‘Bhante, tumhe purato gacchatha, ahaṃ mayhaṃ sahāyassa katapaṭiññaṃ mocetvā taṃ gahetvā āgamissāmī’’ti pañcapatiṭṭhitena vanditvā padakkhiṇaṃ katvā theraṃ uyyojetvā paribbājakārāmaṃ agamāsi. Zu jener Zeit nun, als unser Lehrer die höchste vollkommene Erleuchtung erlangt, das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt, nacheinander die tausend Haarflechten-Asketen mit Uruvela-Kassapa an der Spitze gezähmt hatte und in Rājagaha verweilte, ging der Wanderasket Upatissa eines Tages zum Park der Wanderasketen. Als er den ehrwürdigen Älteren Assaji in Rājagaha auf Almosengang gehen sah, dachte er: "Noch nie habe ich einen solchen Ordinierten von so vollkommenem Benehmen gesehen. Wahrlich, in diesem muss der Zustand des Friedens wohnen." Da erwachte in ihm tiefes Vertrauen, und um ihm eine Frage zu stellen, folgte er dem Ehrwürdigen Schritt für Schritt und wartete auf eine Gelegenheit. Als der Ältere, der seine Almosenspeise erhalten hatte, an einen geeigneten Ort ging, um sie zu verzehren, breitete der Wanderasket seinen eigenen Wanderasketen-Sitz aus und bot ihn ihm an. Nach Beendigung des Essens reichte er ihm Wasser aus seinem eigenen Wasserkrug. Nachdem er ihm so die für einen Lehrer gebührenden Dienste erwiesen hatte, wechselte er mit dem Älteren, der sein Mahl beendet hatte, freundliche Worte und fragte: "Wer ist dein Lehrer, oder wessen Lehre schätzt du?" Der Ältere wies auf den vollkommen Erleuchteten hin. Als er daraufhin erneut gefragt wurde: "Was aber lehrt der Meister des Ehrwürdigen?", dachte dieser: "Ich will ihm die Tiefe dieser Lehre zeigen", erklärte jedoch zunächst, dass er erst kurz ordiniert sei, und verkündete ihm die Lehre in Kürze mit der Strophe: "Die Dinge, die aus einer Ursache entstehen..." Schon beim Hören der ersten beiden Zeilen gründete sich der Wanderasket in der mit tausend Methoden versehenen Frucht des Stromeintritts-Pfades. Die anderen beiden Zeilen wurden vollendet, als er bereits ein Stromeingetretener war. Als er am Ende des Verses ein Stromeingetretener geworden war, sich jedoch keine höhere Stufe einstellte, erkannte er: "Dafür muss es einen Grund geben", und sagte zum Älteren: "Ehrwürdiger Herr, führt die Lehrverkündigung nicht weiter fort. Das ist genug. Wo weilt unser Lehrer?" – "Im Bambushain." – "Ehrwürdiger Herr, geht ihr voraus. Ich werde mein Versprechen gegenüber meinem Gefährten einlösen, ihn mitnehmen und dann kommen." Nachdem er ihn mit den fünf Berührungspunkten verehrt und ihn dreimal im Uhrzeigersinn umkreist hatte, verabschiedete er den Älteren und kehrte zum Park der Wanderasketen zurück. Kolitaparibbājako taṃ dūratova āgacchantaṃ disvā ‘‘mukhavaṇṇo na aññadivasesu viya addhānena amataṃ adhigataṃ bhavissatī’’ti tenevassa visesādhigamaṃ sambhāvetvā amatādhigamaṃ pucchi. Sopissa ‘‘āvuso, amatamadhigata’’nti paṭijānitvā tameva gāthaṃ abhāsi. Gāthāpariyosāne kolito sotāpattiphale patiṭṭhahitvā āha – ‘‘kahaṃ no satthā’’ti? ‘‘Veḷuvane’’ti. ‘‘Tena hi, āvuso, āyāma, satthāraṃ passissāmā’’ti. Upatisso sabbakālampi ācariyapūjakova, tasmā sañcayassa satthu guṇe pakāsetvā tampi satthu santikaṃ netukāmo ahosi. So lābhāsāpakato antevāsikabhāvaṃ anicchanto ‘‘na sakkomi cāṭi hutvā udakasiñcanaṃ hotu’’nti paṭikkhipi. Te anekehi kāraṇehi taṃ saññāpetuṃ asakkontā attano ovāde vattamānehi aḍḍhuteyyasatehi antevāsikehi saddhiṃ veḷuvanaṃ agamaṃsu. Satthā te dūratova āgacchante disvā ‘‘etaṃ me sāvakayugaṃ bhavissati, aggaṃ bhaddayuga’’nti vatvā tesaṃ parisāya cariyavasena dhammaṃ desetvā arahatte patiṭṭhāpetvā ehibhikkhubhāvena upasampadaṃ adāsi. Yathā tesaṃ evaṃ aggasāvakānampi iddhimayapattacīvaraṃ āgatameva. Uparimaggattayakiccaṃ pana na niṭṭhāsi. Kasmā? Sāvakapāramīñāṇassa mahantatāya. Als der Wanderasket Kolita ihn von Weitem kommen sah, dachte er: "Seine Gesichtsfarbe ist nicht wie an anderen Tagen; gewiss hat er das Todlose erlangt." So erkannte er dessen Erreichung einer höheren Stufe und fragte ihn nach der Erlangung des Todlosen. Jener bestätigt ihm: "Freund, das Todlose ist erlangt!", und sprach ebendiese Strophe. Am Ende der Strophe gründete sich Kolita in der Frucht des Stromeintritts und fragte: "Wo ist unser Lehrer?" – "Im Bambushain." – "Nun denn, Freund, lass uns gehen und den Lehrer aufsuchen!" Upatissa war allezeit einer, der seinen Lehrer verehrte; deshalb wollte er Sañcaya die Vorzüge des Lehrers darlegen und auch ihn zum Lehrer führen. Dieser jedoch, an Gewinn und Ruhm gewöhnt, wollte nicht wieder in die Rolle eines Schülers schlüpfen und lehnte ab mit den Worten: "Ich kann nicht, nachdem ich wie ein großer Krug war, nun ein kleiner Wasserschöpfer sein." Als sie ihn mit vielen Argumenten nicht überzeugen konnten, machten sie sich zusammen mit zweieinhundert Schülern, die sich von ihnen leiten ließen, auf den Weg zum Bambushain. Als der Lehrer sie von Weitem kommen sah, sprach er: "Dies wird mein Schülerpaar sein, das oberste, vortrefflichste Paar." Er verkündete ihnen der Veranlagung ihrer Gefolgschaft entsprechend die Lehre, gründete sie in der Arahatschaft und erteilte ihnen durch den Ruf "Komm, Mönch!" die höhere Ordination. Wie für sie, so erschienen auch für diese beiden Hauptschüler übernatürlich geschaffene Almosenschalen und Gewänder von selbst. Das Werk der drei höheren Pfade war bei ihnen jedoch noch nicht vollendet. Warum? Wegen der Größe des Wissens um die Vollkommenheit eines Jüngers. Tesu āyasmā mahāmoggallāno pabbajitato sattame divase magadharaṭṭhe kallavālagāme samaṇadhammaṃ karonto thinamiddhe okkamante satthārā saṃvejito thinamiddhaṃ vinodetvā dhātukammaṭṭhānaṃ suṇanto eva uparimaggattayaṃ adhigantvā sāvakapāramīñāṇassa matthakaṃ pāpuṇi. Āyasmā sāriputto pabbajjāya addhamāsaṃ atikkamitvā satthārā saddhiṃ rājagahe sūkarakhataleṇe viharanto attano bhāgineyyassa dīghanakhaparibbājakassa [Pg.235] vedanāpariggahasuttante (ma. ni. 2.201 ādayo) desiyamāne desanānusārena ñāṇaṃ pesetvā parassa vaḍḍhitaṃ bhattaṃ bhuñjanto viya sāvakapāramīñāṇassa matthakaṃ pāpuṇi. Iti dvinnaṃ aggasāvakānaṃ satthu samīpe eva sāvakapāramīñāṇaṃ matthakaṃ pattaṃ. Unter ihnen übte der ehrwürdige Mahāmoggallāna am siebten Tage nach seiner Ordination im Dorfe Kallavālagāma im Lande Magadha die Pflichten eines Asketen aus. Als ihn Starrheit und Trägheit überkamen, rüttelte ihn der Lehrer auf. Nachdem er Starrheit und Trägheit vertrieben hatte und der Darlegung des Meditationsobjekts der Elemente lauschte, erlangte er die drei höheren Pfade und erreichte den Gipfel des Wissens um die Vollkommenheit eines Jüngers. Der ehrwürdige Sāriputta verweilte einen halben Monat nach seiner Ordination zusammen mit dem Lehrer in Rājagaha in der Höhle Sūkarakhatalena. Während dieser seinem Neffen, dem Wanderasketen Dīghanakha, die Lehrrede über das Erfassen der Gefühle verkündete, lenkte er seinen Geist dem Gang der Lehrverkündigung folgend dorthin und erreichte – gleichsam wie einer, der Speise genießt, die für einen anderen bereitet wurde – den Gipfel des Wissens um die Vollkommenheit eines Jüngers. So gelangten beide Hauptschüler in der unmittelbaren Nähe des Lehrers zur Vollendung des Wissens um die Vollkommenheit eines Jüngers. Evaṃ pattasāvakapāramīñāṇo āyasmā sāriputto ‘‘kena kammena ayaṃ sampatti laddhā’’ti āvajjento taṃ ñatvā pītisomanassavasena udānaṃ udānento ‘‘himavantassa avidūre’’tiādimāha. Tena vuttaṃ – Der ehrwürdige Sāriputta, der so das Wissen um die Vollkommenheit eines Jüngers erlangt hatte, dachte darüber nach: "Durch welches heilsame Wirken wurde dieses Glück erlangt?" Als er dies erkannte, rief er voller Entzücken und Freude einen feierlichen Ausruf aus, der mit den Worten "Nicht weit vom Himalaja" beginnt. Daher wurde folgendes gesagt: 141. 141. ‘‘Himavantassa avidūre, lambako nāma pabbato; Assamo sukato mayhaṃ, paṇṇasālā sumāpitā’’ti. "Nicht weit vom Himalaja erhebt sich ein Berg namens Lambaka; dort wurde mir eine Einsiedelei wohlbereitet und eine Blätterhütte wohlgebaut." Tattha himavantassāti himo assa atthīti himavā, tassa himavantassa avidūre samīpe, himālayapaṭibaddhavanehi attho. Lambako nāma pabbatoti evaṃnāmako paṃsumissakapabbato. Assamo sukato mayhanti tasmiṃ lambake pabbate mayhaṃ mamatthāya kato assamo araññavāso āsamantato samoti assamo. Natthi paviṭṭhānaṃ samo parissamo etthāti vā assamo, so itthambhūto araññavāso suṭṭhu kato, rattiṭṭhānadivāṭṭhānakuṭimaṇḍapādivasena sundarenākārena katoti attho. Paṇṇasālāti usīrapabbajādīhi paṇṇehi chāditā nivasanapaṇṇasālāti attho. In Bezug auf das Wort ‚himavantassa‘: Weil er Schnee (hima) besitzt (atthi), wird er ‚Himavā‘ (der Schneereiche) genannt; ‚in dessen Nähe‘ bedeutet nahe bei diesem Himavā, in den an den Himālaya grenzenden Wäldern. ‚Der Berg namens Lambaka‘ bezeichnet einen so benannten Berghügel, der mit Erde vermischt ist. ‚Eine gut gemachte Einsiedelei für mich‘ bedeutet: Auf jenem Berg namens Lambaka wurde eine Einsiedelei für mich, zu meinem Nutzen, errichtet. Ein Waldesaufenthalt, der ringsherum friedvoll und ebenmäßig ist, wird als Einsiedelei (assama) bezeichnet. Oder aber es gibt dort keinen unwegsamen Ort (oder kein Hindernis, parissama) – daher ist es eine Einsiedelei. Dieser so beschriebene Waldesaufenthalt ist wohlgerichtet, das heißt, er wurde in vortrefflicher Weise mit Nachtlagern, Taglagern, Hütten, Pavillons und Ähnlichem hergerichtet. ‚Blätterhütte‘ bedeutet eine Wohnhütte, die mit Blättern von Usīra-Gras, Birana-Gras und anderem gedeckt ist. 142. 142. ‘‘Uttānakūlā nadikā, supatitthā manoramā; Susuddhapulinākiṇṇā, avidūre mamassamaṃ’’. „Ein Flüsschen mit flachen Ufern, mit guten Badestellen und lieblich, übersät mit ganz reinem Sand, floss nahe bei meiner Einsiedelei.“ Tattha uttānakūlāti agambhīrā nadī. Supatitthāti sundarapatitthā. Manoramā manallīnā manāpā. Susuddhapulinākiṇṇāti suṭṭhu dhavalamuttādalasadisavālukākiṇṇā gahanībhūtāti attho. Sā itthambhūtā nadikā kunnadī mamassamaṃ mayhaṃ assamassa avidūre samīpe ahosīti attho. ‘‘Assama’’nti ca sattamyatthe upayogavacananti veditabbaṃ. In Bezug auf das Wort ‚uttānakūlā‘: Ein Fluss, der nicht tief ist (mit flachen Ufern). ‚Supatiṭṭhā‘ bedeutet mit vortrefflichen Badestellen. ‚Manoramā‘ bedeutet den Geist anziehend, gefällig. ‚Susuddhapulinākiṇṇā‘ bedeutet dicht bedeckt mit Sand, der wie rein weiße Perlen glänzt. Dieses so beschriebene Flüsschen, ein kleiner Fluss, war in der Nähe, unweit meiner Einsiedelei – das ist die Bedeutung. Und es ist zu verstehen, dass das Wort ‚assamaṃ‘ im Akkusativ hier im Sinne des Lokativs gebraucht wird. 143. 143. ‘‘Asakkharā apabbhārā, sādu appaṭigandhikā; Sandatī nadikā tattha, sobhayantā mamassamaṃ’’. „Frei von Kieselsteinen, ohne steile Abgründe, wohlschmeckend und frei von üblem Geruch fließt dort das Flüsschen und verschönert meine Einsiedelei.“ Tattha [Pg.236] asakkharāti ‘‘pulinākiṇṇā’’ti vuttattā asakkharā sakkharavirahitā. Apabbhārāti pabbhāravirahitā, agambhīrakūlāti attho. Sādu appaṭigandhikāti sādurasodakā duggandharahitā mayhaṃ assamapadaṃ sobhayantī nadikā khuddakanadī sandati pavattatīti attho. Dabei bedeutet ‚asakkharā‘: frei von Kieselsteinen, weil bereits gesagt wurde, dass es ‚mit Sand übersät‘ ist. ‚Apabbhārā‘ bedeutet frei von steilen Abgründen, das heißt mit flachen Ufern. ‚Sādu appaṭigandhikā‘ bedeutet mit süß schmeckendem Wasser und frei von üblem Geruch. Das Flüsschen, ein kleiner Fluss, fließt und strömt dahin, während es die Stätte meiner Einsiedelei verschönert – das ist die Bedeutung. 144. 144. ‘‘Kumbhīlā makarā cettha, susumārā ca kacchapā; Sandati nadikā tattha, sobhayantā mamassamaṃ’’. „Krokodile, Seeungeheuer (makaras) und auch Alligatoren sowie Schildkröten tummeln sich darin; das Flüsschen fließt dort und verschönert meine Einsiedelei.“ Tattha kumbhīlamacchā makaramacchā ca susumārā caṇḍamacchā ca kacchapamacchā ca ettha etissaṃ nadiyaṃ kīḷantā ahesunti sambandho. Mamassamaṃ sobhayantā nadikā khuddakanadī sandati pavattatīti sambandho. Hierbei ist der Zusammenhang: Krokodil-Fische, Makara-Fische, Alligatoren (grimmige Fische) und Schildkröten-Fische spielten hier in diesem Fluss. Das Flüsschen, ein kleiner Fluss, fließt und strömt dahin, während es meine Einsiedelei verschönert – das ist die Bedeutung. 145. 145. ‘‘Pāṭhīnā pāvusā macchā, balajā muñjarohitā; Vaggaḷā papatāyantā, sobhayanti mamassamaṃ’’. „Pāṭhīnā-Fische, Pāvusa-Fische, Balaja-Fische, Muñja- und Rohita-Fische sowie Vaggaḷa-Fische schwimmen flink hin und her und verschönern meine Einsiedelei.“ Pāṭhīnamacchā ca pāvusā macchā ca balajamacchā ca muñjamacchā rohitamacchā ca vaggaḷamacchā ca ete sabbe macchajātikā ito cito ca papatāyantā nadiyā saddhiṃ pavattantā mama assamapadaṃ sobhayantīti attho. Pāṭhīna-Fische, Pāvusa-Fische, Balaja-Fische, Muñja-Fische, Rohita-Fische und Vaggaḷa-Fische – all diese Arten von Fischen schwimmen hierhin und dorthin, ziehen mit dem Fluss dahin und verschönern die Stätte meiner Einsiedelei – das ist die Bedeutung. 146. 146. ‘‘Ubho kūlesu nadiyā, pupphino phalino dumā; Ubhato abhilambantā, sobhayanti mamassamaṃ’’. „An beiden Ufern des Flusses stehen blühende und fruchttragende Bäume; von beiden Seiten herabhängend verschönern sie meine Einsiedelei.“ Tattha ubho kūlesūti tassā nadiyā ubhosu passesu dhuvapupphino dhuvaphalino rukkhā ubhato abhilambantā nadiyā ubho tīre heṭṭhā onamantā mama assamaṃ sobhayantīti attho. Hierbei bedeutet ‚an beiden Ufern‘: An beiden Seiten dieses Flusses hängen Bäume, die ständig blühen und ständig Früchte tragen, von beiden Seiten herab, indem sie sich über die beiden Ufer des Flusses nach unten neigen, und verschönern meine Einsiedelei – das ist die Bedeutung. 147. 147. ‘‘Ambā sālā ca tilakā, pāṭalī sinduvārakā; Dibbagandhā sampavanti, pupphitā mama assame’’. „Mangobäume, Salbäume, Tilaka-Bäume, Pāṭalī-Bäume und Sinduvāra-Bäume blühen in meiner Einsiedelei und verströmen einen himmlischen Duft.“ Tattha ambāti madhupiṇḍiambā ca sālarukkhā ca tilakarukkhā ca pāṭalirukkhā ca sinduvārakarukkhā ca ete rukkhā niccakālaṃ pupphitā pupphantā. Dibbā gandhā iva mama assame sugandhā sampavanti samantato pavāyantīti attho. In diesem Zusammenhang bezieht sich ‚ambā‘ auf süße Mangobäume; diese Bäume sowie Salbäume, Tilaka-Bäume, Pāṭalī-Bäume und Sinduvāra-Bäume blühen zu allen Zeiten. Sie verströmen in meiner Einsiedelei wie ein himmlischer Duft einen köstlichen Wohlgeruch, der sich ringsum ausbreitet – das ist die Bedeutung. 148. 148. ‘‘Campakā [Pg.237] saḷalā nīpā, nāgapunnāgaketakā; Dibbagandhā sampavanti, pupphitā mama assame’’. „Campaka-Bäume, Saḷala-Kiefern, Nīpa-Bäume, Nāga-, Punnāga- und Ketaka-Bäume blühen in meiner Einsiedelei und verströmen einen himmlischen Duft.“ Tattha campakarukkhā ca saḷalarukkhā ca suvaṇṇavaṭṭalasadisapupphā nīparukkhā ca nāgarukkhā ca punnāgarukkhā ca sugandhayantā ketakarukkhā ca ete sabbe rukkhā dibbā gandhāriva mama assame pupphitā phullitā sampavanti sugandhaṃ suṭṭhu pavāyantīti attho. In diesem Zusammenhang: Campaka-Bäume, Saḷala-Bäume, Nīpa-Bäume (mit Blüten wie goldene Kugeln), Nāga-Bäume, Punnāga-Bäume und wohlriechende Ketaka-Sträucher – all diese Bäume blühen und gedeihen, verströmen wie ein himmlischer Duft einen köstlichen Wohlgeruch in der Nähe meiner Einsiedelei und verschönern sie – das ist die Bedeutung. 149. 149. Asokā ca‘‘adhimuttā asokā ca, bhaginīmālā ca pupphitā; Aṅkolā bimbijālā ca, pupphitā mama assame’’. „Blühende Adhimuttaka-Pflanzen, Asoka-Bäume, Bhaginīmālā-Pflanzen, blühende Aṅkola- und Bimbijāla-Bäume verschönern meine Einsiedelei.“ Tattha pupphitā adhimuttakarukkhā ca pupphitā asokarukkhā ca pupphitā bhaginīmālā ca pupphitā aṅkolā ca pupphitā bimbijālā ca ete rukkhā mama assame phullitā sobhayantīti sambandho. Dabei ist der Zusammenhang: Die blühenden Adhimuttaka-Bäume (bzw. Kletterpflanzen), die blühenden Asoka-Bäume, die blühenden Bhaginīmālā-Pflanzen, die blühenden Aṅkola-Bäume und die blühenden Bimbijāla-Bäume blühen in meiner Einsiedelei und verschönern sie. 150. 150. ‘‘Ketakā kandali ceva, godhukā tiṇasūlikā; Dibbagandhaṃ sampavantā, sobhayanti mamassamaṃ’’. „Ketaka-Sträucher, Kandali-Bäume, Godhuka-Pflanzen und Tiṇasūlika-Sträucher verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine Einsiedelei.“ Tattha ketakāti sugandhaketakagacchā ca. Kandalirukkhā ca godhukarukkhā ca tiṇasūlikagacchā ca ete sabbe rukkhajātikā dibbagandhaṃ pavāyamānā mama assamaṃ sakalaṃ sobhayantīti attho. Hierbei bezieht sich ‚ketakā‘ auf wohlriechende Ketaka-Sträucher; diese, Kandali-Bäume, Godhuka-Bäume sowie Tiṇasūlika-Sträucher – all diese Pflanzenarten verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine gesamte Einsiedelei – das ist die Bedeutung. 151. 151. ‘‘Kaṇikārā kaṇṇikā ca, asanā ajjunā bahū; Dibbagandhaṃ sampavantā, sobhayanti mamassamaṃ’’. „Zahlreiche Kaṇikāra-Bäume, Kaṇṇikā-Bäume, Asana-Bäume und Arjuna-Bäume verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine Einsiedelei.“ Ete kaṇikārādayo rukkhā mama assamaṃ sakalaṃ sobhayantā dibbagandhaṃ sampavāyantīti sambandho. Diese Bäume wie Kaṇikāra usw. verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine gesamte Einsiedelei – so lautet der Zusammenhang. 152. 152. ‘‘Punnāgā giripunnāgā, koviḷārā ca pupphitā; Dibbagandhaṃ sampavantā, sobhayanti mamassamaṃ’’. „Blühende Punnāga-Bäume, Berg-Punnāga-Bäume und Koviḷāra-Bäume verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine Einsiedelei.“ Punnāgādayo rukkhā dibbagandhaṃ pavāyamānā mama assamaṃ sobhayantīti attho. Bäume wie Punnāga usw. verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine Einsiedelei – das ist die Bedeutung. 153. 153. ‘‘Uddālakā ca kuṭajā, kadambā vakulā bahū; Dibbagandhaṃ sampavantā, sobhayanti mamassamaṃ’’. „Zahlreiche Uddālaka-Bäume, Kuṭaja-Bäume, Kadamba-Bäume und Vakula-Bäume verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine Einsiedelei.“ Uddālakādayo [Pg.238] rukkhā dibbagandhaṃ vāyamānā mama assamaṃ sobhayantīti sambandho. Bäume wie Uddālaka usw. verströmen einen himmlischen Duft und verschönern meine Einsiedelei – so lautet der Zusammenhang. 154. 154. ‘‘Āḷakā isimuggā ca, kadalimātuluṅgiyo; Gandhodakena saṃvaḍḍhā, phalāni dhārayanti te’’. „Āḷaka-Kletterpflanzen, Isimugga-Kletterpflanzen, Bananenstauden und Citronat-Zitronen, die mit duftendem Wasser genährt wurden, tragen Früchte.“ Tattha ete āḷakādayo gacchā candanādisugandhagandhodakena vaḍḍhitvā suvaṇṇaphalāni dhārentā mama assamaṃ sobhayantīti attho. Hierbei bedeutet es: Diese Sträucher wie Āḷaka usw., nachdem sie mit wohlriechendem Duftwasser aus Sandelholz und anderen wohlriechenden Substanzen genährt wurden, tragen goldene Früchte und verschönern meine Einsiedelei. 155. 155. ‘‘Aññe pupphanti padumā, aññe jāyanti kesarī; Aññe opupphā padumā, pupphitā taḷāke tadā’’. „Einige Lotosblumen blühen, andere entwickeln Staubfäden, wieder andere haben bereits abgeblühte Blütenblätter – so blühten sie damals im See.“ Tattha aññe pupphanti padumāti mama assamassa avidūre taḷāke aññe ekacce padumā pupphanti, ekacce kesarī padumā jāyanti nibbattanti, ekacce padumā opupphā vigalitapattakesarāti attho. In Bezug auf den Satz ‚Einige Lotosblumen blühen‘: In dem See unweit meiner Einsiedelei blühen einige Lotosblumen; einige Lotosblumen entwickeln Staubfäden und wachsen heran, und bei einigen Lotosblumen sind die Blütenblätter und Staubfäden bereits abgefallen (abgeblüht) – das ist die Bedeutung. 156. 156. ‘‘Gabbhaṃ gaṇhanti padumā, niddhāvanti muḷāliyo; Siṅghāṭipattamākiṇṇā, sobhanti taḷāke tadā’’. „Einige Lotosblumen bilden Knospen, andere treiben Lotoswurzeln aus; übersät mit den Blättern der Wassernuss verschönern sie damals den See.“ Tattha gabbhaṃ gaṇhanti padumāti tadā tāpasena hutvā mama vasanasamaye ekacce padumā taḷākabbhantare makuḷapupphādayo gaṇhanti. Muḷāliyo padumamūlā niddhāvanti ito kaddamabbhantarato hatthidāṭhā viya gacchantīti attho. Pattapupphamākiṇṇā gahanībhūtā siṅghāṭiyo sobhayantīti attho. Hierbei bedeutet 'gabbhaṃ gaṇhanti padumā' (die Lotosblüten tragen Knospen): Damals, als ich als Asket lebte, trieben zur Zeit meines Verweilens einige Lotosblüten inmitten des Teiches Knospen und Blüten. Die Lotoswurzeln (muḷāliyo) sprossen hervor; sie wachsen von hier und da aus dem Schlamm heraus wie Stoßzähne von Elefanten. Dies ist die Bedeutung. Die mit Blättern und Blüten übersäten, dicht gewordenen Wassernuss-Pflanzen (siṅghāṭikā) verschönern den Teich. Dies ist die Bedeutung. 157. 157. ‘‘Nayitā ambagandhī ca, uttalī bandhujīvakā; Dibbagandhā sampavanti, pupphitā taḷāke tadā’’. „Damals wuchsen am Teich die blühenden Nayitā-Schlingpflanzen, die nach Mango duftenden Ambagandhī-Sträucher, die Uttalī- und die Bandhujīvaka-Sträucher; blühend verströmten sie einen himmlischen Duft.“ Tadā mama vasanasamaye taḷākassa samīpe nayitā ca gacchā ambagandhī ca gacchā uttalī nāma gacchā ca bandhujīvakā ca ete sabbe gacchā pupphitā pupphadhāritā sugandhavāhakā taḷākaṃ sobhayantīti attho. Damals, zur Zeit meines Verweilens, blühten nahe dem Teich die Nayitā-Sträucher, die Ambagandhī-Sträucher, die Uttalī-Sträucher und die Bandhujīvaka-Sträucher; all diese Sträucher trugen Blüten, verbreiteten einen wohlriechenden Duft durch den Wind und verschönerten den Teich. Dies ist die Bedeutung. 158. 158. ‘‘Pāṭhīnā pāvusā macchā, balajā muñjarohitā; Saṃgulā maggurā ceva, vasanti taḷāke tadā’’. „Damals lebten im Teich Pāṭhīna-Fische, Pāvusa-Fische, im Wasser geborene Fische, Muñja- und Rohita-Fische, Saṃgula- und Maggura-Fische.“ Tadā [Pg.239] mama vasanasamaye nibbhītā pāṭhīnādayo macchā taḷāke vasantīti sambandho. Damals, zur Zeit meines Verweilens, lebten die Pāṭhīna-Fische und die anderen Fischarten furchtlos im Teich. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 159. 159. ‘‘Kumbhīlā susumārā ca, tantigāhā ca rakkhasā; Oguhā ajagarā ca, vasanti taḷāke tadā’’. „Damals lebten im Teich Krokodile, Kaimane, Riesenwelse, Wassermonster, Oguhas und Pythons.“ Tadā mama vasanasamaye mama assamasamīpe taḷāke ete kumbhīlādayo macchā nibbhītā nirūpaddavā vasantīti sambandho. Damals, zur Zeit meines Verweilens, lebten diese Krokodile und anderen Wassertiere im Teich nahe meiner Einsiedelei furchtlos und frei von Gefahren. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 160. 160. ‘‘Pārevatā ravihaṃsā, cakkavākā nadīcarā; Kokilā sukasāḷikā, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Tauben, Sonnen-Gänse, Rotschilde (Cakkavāka), Flussvögel, Kokila-Kuckucke, Papageien und Beos (Sāḷikā) leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Tattha mama assamasamīpe saraṃ nissāya pārevatāpakkhī ca ravihaṃsāpakkhī ca nadīcarā cakkavākapakkhī ca kokilāpakkhī ca sukapakkhī ca sāḷikāpakkhī ca taṃ saraṃ upanissāya jīvantīti sambandho. Hierbei ist der Zusammenhang wie folgt zu verstehen: Nahe meiner Einsiedelei lebten die Taubenvögel, Sonnen-Gänsevögel, die im Fluss lebenden Cakkavāka-Vögel, die Kokila-Kuckucksvögel, die Papageienvögel und die Beovögel in Abhängigkeit von jenem See in dessen Nähe. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 161. 161. ‘‘Kukutthakā kuḷīrakā, vane pokkharasātakā; Dindibhā suvapotā ca, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Kukutthaka-Vögel, Kuḷīraka-Vögel, Lotos-Vögel im Wald, Diṇḍibha-Vögel und junge Papageien leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Tattha kukutthakāti evaṃnāmikā pakkhī ca. Kuḷīrakāti evaṃnāmikā pakkhī ca. Vane pokkharasātakā pakkhī ca dindibhā pakkhī ca suvapotā pakkhī ca ete sabbe pakkhino taṃ mama assamasamīpe saraṃ nissāya jīvantīti sambandho. Hierbei bezieht sich 'kukutthakā' auf Vögel dieses Namens; 'kuḷīrakā' auf Vögel dieses Namens; die Lotos-Vögel im Wald, die Diṇḍibha-Vögel und die jungen Papageien; all diese Vögel lebten nahe meiner Einsiedelei in Abhängigkeit von jenem See. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 162. 162. ‘‘Haṃsā koñcā mayūrā ca, kokilā tambacūḷakā; Pammakā jīvaṃjīvā ca, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Gänse, Kraniche, Pfauen, Kokila-Kuckucke, Tambacūḷaka-Vögel, Lampaka-Vögel und Jīvañjīvaka-Vögel leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Sabbe ete haṃsādayo pakkhino taṃ saraṃ upanissāya jīvanti jīvikaṃ pālentīti attho. All diese Vögel, wie Gänse und andere, leben nahe jenem See bzw. erhalten ihr Leben in Abhängigkeit von ihm. Dies ist die Bedeutung. 163. 163. ‘‘Kosikā poṭṭhasīsā ca, kurarā senakā bahū; Mahākāḷā ca sakuṇā, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Eulen, Poṭṭhasīsa-Vögel, Fischadler (Kurara), Falken und viele Mahākāḷa-Vögel leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Tattha kosikā ca pakkhī poṭṭhasīsā ca pakkhī kurarā ca pakkhī senakā ca pakkhī mahākāḷā ca pakkhī thale bahū pakkhino taṃ saraṃ tassa sarassa samīpe jīvanti jīvikaṃ kappentīti attho. Darin bedeutet es: Eulen, Poṭṭhasīsa-Vögel, Fischadler, Falken, Mahākāḷa-Vögel und viele andere Vögel des Festlandes leben und bestreiten ihren Lebensunterhalt nahe diesem See bzw. in seiner Umgebung. Dies ist die Bedeutung. 164. 164. ‘‘Pasadā [Pg.240] ca varāhā ca, camarā gaṇḍakā bahū; Rohiccā sukapotā ca, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Plexishirsche (Pasada), Wildschweine, Yaks (Camara), Nashörner, rote Hirsche (Rohicca) und viele Sukapota-Tiere leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Tattha pasadādayo ete migā taṃ saraṃ tasmiṃ sarasamīpe, bhummatthe upayogavacanaṃ, jīvitaṃ paripālentā viharantīti attho. Hierbei bedeutet es: Diese Wildtiere wie Pasada-Hirsche und andere wandern zu diesem See; der Akkusativ ('taṃ saraṃ') steht hierbei im Sinne des Lokativs ('nahe dem See'). Dort verweilen sie und erhalten ihr Leben. Dies ist die Bedeutung. 165. 165. ‘‘Sīhabyagghā ca dīpī ca, acchakokataracchakā; Tidhā pabhinnamātaṅgā, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Löwen, Tiger, Leoparden, Bären, Hyänen (Taraccha) und an drei Stellen brünstige Elefantenbullen leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Ete sīhādayo catuppadā sarasamīpe upaddavarahitā jīvantīti sambandho. Diese vierbeinigen Tiere wie Löwen und andere lebten frei von Gefahren in der Nähe des Sees. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 166. 166. ‘‘Kinnarā vānarā ceva, athopi vanakammikā; Cetā ca luddakā ceva, upajīvanti taṃ saraṃ’’. „Kinnaras, Affen sowie Waldarbeiter, Ceta-Jäger und grausame Wilderer leben in Abhängigkeit von diesem See.“ Ettha ete evaṃnāmikā kinnarādayo sattā tasmiṃ sarasamīpe vasantīti attho. Hierbei bedeutet es: Diese so benannten Wesen wie Kinnaras und andere lebten nahe diesem See. Dies ist die Bedeutung. 167. 167. ‘‘Tindukāni piyālāni, madhukekā sumāriyo; Dhuvaṃ phalāni dhārenti, avidūre mamassamaṃ’’. „Tinduka-Bäume, Piyāla-Bäume, Madhuka-Bäume, Ekā-Bäume und Sumāriya-Bäume tragen beständig Früchte, unweit von meiner Einsiedelei.“ Tattha ete tindukādayo rukkhā dhuvaṃ hemantagimhavassānasaṅkhāte kālattaye mama assamato avidūre ṭhāne madhuraphalāni dhārentīti sambandho. Hierbei ist der Zusammenhang wie folgt zu verstehen: Diese Tinduka-Bäume und andere trugen beständig, in den drei Jahreszeiten namens Winter, Sommer und Regenzeit, unweit von meiner Einsiedelei süße Früchte. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 168. 168. ‘‘Kosambā saḷalā nimbā, sāduphalasamāyutā; Dhuvaṃ phalāni dhārenti, avidūre mamassamaṃ’’. „Kosamba-Bäume, Kiefern (Saḷala) und Niem-Bäume (Nimba), reich an wohlschmeckenden Früchten, tragen beständig Früchte, unweit von meiner Einsiedelei.“ Tattha ete kosambādayo rukkhā sāraphalā madhuraphalā uttamaphalā samāyutā saṃ suṭṭhu āyutā samaṅgībhūtā niccaṃ phaladhārino mama assamasamīpe sobhantīti attho. Hierbei bedeutet es: Diese Kosamba-Bäume und andere trugen reichlich nahrhafte, süße und hervorragende Früchte ('samāyutā' bedeutet hierbei gut verbunden bzw. reichlich ausgestattet) und verschönerten, als immergrüne Fruchtträger, die Umgebung meiner Einsiedelei. Dies ist die Bedeutung. 169. 169. ‘‘Harītakā āmalakā, ambajambuvibhītakā; Kolā bhallātakā billā, phalāni dhārayanti te’’. „Myrobalanen (Harītaka), Āmalaka-Bäume, Mango- und Rosenapfelbäume (Jambu), Vibhītaka-Bäume, Jujuben (Kola), Bhallātaka- und Billa-Bäume tragen Früchte.“ Te harītakādayo rukkhā mama assamasamīpe jātā niccaṃ phalāni dhārayantīti sambandho. Diese Harītaka- und anderen Bäume, die nahe meiner Einsiedelei wuchsen, trugen stets Früchte. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 170. 170. ‘‘Āluvā [Pg.241] ca kaḷambā ca, biḷālītakkaḷāni ca; Jīvakā sutakā ceva, bahūkā mama assame’’. „Āluva- und Kaḷamba-Knollen, Biḷālī- und Takkaḷa-Wurzeln, Jīvaka- und Sutaka-Pflanzen gibt es in großer Zahl nahe meiner Einsiedelei.“ Ete āluvādayo mūlaphalā khuddā madhurasā mama assamasamīpe bahū santīti sambandho. Diese essbaren Wurzeln und Knollen wie Āluva und andere, die süß im Geschmack sind, gibt es in großer Menge nahe meiner Einsiedelei. So ist der Zusammenhang zu verstehen. 171. 171. ‘‘Assamassāvidūramhi, taḷākāsuṃ sunimmitā; Acchodakā sītajalā, supatitthā manoramā’’. „Unweit der Einsiedelei gab es wohlangelegte Teiche mit klarem Wasser, kühlen Fluten, guten Zugängen und von erfreulicher Gestalt.“ Tattha assamassāvidūramhi assamassa samīpe sunimmitā suṭṭhu ārohanaorohanakkhamaṃ katvā nimmitā acchodakā vippasannodakā sītajalā sītodakā supatitthā sundaratitthā manoramā somanassakarā taḷākā āsuṃ ahesunti attho. Darin bedeutet 'assamassāvidūramhi' (unweit der Einsiedelei): nahe der Einsiedelei gab es Teiche, die mit guten, leicht zu begehenden Stufen angelegt waren, mit klarem Wasser, kühlem Nass, schönen Uferzugängen und von anmutiger, erfreulicher Natur. Dies ist die Bedeutung. 172. 172. ‘‘Padumuppalasañchannā, puṇḍarīkasamāyutā; Mandālakehi sañchannā, dibbagandhopavāyati’’. „Bedeckt mit roten und blauen Lotusblüten, voll von weißen Lotusblüten (Puṇḍarīka) und bewachsen mit Mandālaka-Pflanzen, verströmen sie ringsum einen himmlischen Duft.“ Tattha padumehi ca uppalehi ca sañchannā paripuṇṇā puṇḍarīkehi samāyutā samaṅgībhūtā mandālakehi ca sañchannā gahanībhūtā taḷākā dibbagandhāni upavāyanti samantato vāyantīti attho. Hierbei bedeutet es: Die mit roten und blauen Lotosblüten bedeckten und gefüllten, reichlich mit weißen Lotosblüten (Puṇḍarīka) versehenen und dicht mit Mandālaka-Pflanzen bewachsenen Teiche verströmen überallhin himmlische Wohlgerüche. Dies ist die Bedeutung. 173. 173. ‘‘Evaṃ sabbaṅgasampanne, pupphite phalite vane; Sukate assame ramme, viharāmi ahaṃ tadā’’. „In diesem in jeder Hinsicht vollkommenen, blühenden und fruchttragenden Wald, in einer wohlgefertigten, lieblichen Einsiedelei, verweilte ich damals.“ Tattha evaṃ sabbaṅgasampanneti abbehi nadikādiavayavehi sampanne paripuṇṇe pupphaphalarukkhehi gahanībhūte vane sukate ramaṇīye assame araññāvāse tadā tāpasabhūtakāle ahaṃ viharāmīti attho. Hierbei bedeutet 'sabbaṅgasampanne' (in jeder Hinsicht vollkommen): In dem mit allen Merkmalen wie Flüssen und so weiter ausgestatteten, dichten Wald voller blühender und fruchttragender Bäume, in einer wohlgefertigten, lieblichen Einsiedelei im Wald, verweilte ich damals zur Zeit meiner Existenz as Asket. Dies ist die Bedeutung. Ettāvatā assamasampattiṃ dassetvā idāni attano sīlādiguṇasampattiṃ dassento – Nachdem er bis hierher die Vorzüglichkeit der Einsiedelei dargelegt hat, sprach er nun Folgendes, um die Vollkommenheit seiner eigenen Tugenden wie der Sittlichkeit und so weiter darzulegen: 174. 174. ‘‘Sīlavā vatasampanno, jhāyī jhānarato sadā; Pañcābhiññābalappatto, suruci nāma tāpaso’’ti. – āha; „Ein tugendhafter Asket namens Suruci, der seine Pflichten erfüllte, meditierte, stets in der Vertiefung verweilte und die Kraft der fūnf höheren Geisteskräfte erlangt hatte.“ – So sprach er. Tattha [Pg.242] sīlavāti jhānasampayuttacatupārisuddhisīlasadisehi pañcahi sīlehi sampuṇṇoti attho. Vatasampannoti ‘‘ito paṭṭhāya gharāvāsaṃ pañca kāmaguṇe vā na sevissāmī’’ti vatasamādānena sampanno. Jhāyīti lakkhaṇūpanijjhānaārammaṇūpanijjhānehi jhāyī jhāyanasīlo. Jhānaratoti etesu jhānesu rato allīno sadā sampuṇṇo. Pañcābhiññābalappattoti iddhividhadibbasotaparacittavijānanapubbenivāsānussatidibbacakkhusaṅkhātāhi pañcahi abhiññāhi visesapaññāhi balasampanno, paripuṇṇoti attho. Nāmena suruci nāma tāpaso hutvā viharāmīti sambandho. Darin bedeutet „tugendhaft“ (sīlavā): vollkommen ausgestattet mit den fünf Tugenden, welche der mit Vertiefung verbundenen vierfachen vollkommen reinen Tugend gleichen. „Vollkommen in den Gelübden“ (vatasampanno) bedeutet: ausgestattet mit der auf sich genommenen Verpflichtung: „Von nun an werde ich weder das Hausleben führen noch mich den fünf Arten von Sinnenlüsten hingeben.“ „Meditierend“ (jhāyī) bedeutet: einer, der mittels der Vertiefung in die Merkmale und der Vertiefung in das Objekt meditiert, einer, dessen Natur das Meditieren ist. „An den Vertiefungen erfreut“ (jhānaratoti) bedeutet: an diesen Vertiefungen erfreut, ihnen hingegeben, allezeit vollkommen. „Der die Macht der f開放ünf höheren Geisteskräfte erlangt hat“ (pañcābhiññābalappatto) bedeutet: ausgestattet mit Kraft, vollkommen erfüllt von den fünf höheren Geisteskräften, die als besondere Erkenntnisse bezeichnet werden, nämlich: den magischen Kräften, dem himmlischen Gehör, der Erkenntnis fremder Geister, der Erinnerung an frühere Existenzen und dem himmlischen Auge. Die Verknüpfung lautet: „Ich verweile, indem ich ein Asket namens Suruci geworden bin.“ Ettakena attano guṇasampattiṃ dassetvā parisasampattiṃ dassento – Nachdem er hiermit die Vollkommenheit seiner eigenen Qualitäten dargelegt hat, sprach er Folgendes, um die Vollkommenheit seines Gefolges aufzuzeigen: 175. 175. ‘‘Catuvīsasahassāni, sissā mayhaṃ upaṭṭhahuṃ; Sabbe maṃ brāhmaṇā ete, jātimanto yasassino’’ti. – ādimāha; „„Vierundzwanzigtausend Schüler dienten mir; all diese Brahmanen waren von edler Geburt und ruhmvoll“, so sprach er zu Beginn.“ Tattha ete sabbe catuvīsatisahassabrāhmaṇā mayhaṃ sissā jātimanto jātisampannā yasassino parivārasampannā maṃ upaṭṭhahunti sambandho. Darin lautet die Verknüpfung: All diese vierundzwanzigtausend Brahmanen, meine Schüler, die von edler Geburt (mit einer edlen Abstammung ausgestattet) und ruhmvoll (mit Gefolge ausgestattet) waren, dienten mir. 176. 176. ‘‘Lakkhaṇe itihāse ca, sanighaṇḍusakeṭubhe; Padakā veyyākaraṇā, sadhamme pāramiṃ gatā’’. „„In der Zeichenlehre und der Überlieferung, mitsamt dem Nighaṇḍu und dem Keṭubha; sie kannten die Wortanalyse, waren Grammatiker und hatten die Vollendung in ihrer eigenen Lehre erreicht.““ Tattha lakkhaṇeti lakkhaṇasatthe. Sabbalokiyānaṃ itthipurisānaṃ ‘‘imehi lakkhaṇehi samannāgatā dukkhitā bhavanti, imehi sukhitā bhavantī’’ti lakkhaṇaṃ jānāti. Tappakāsako gantho lakkhaṇaṃ, tasmiṃ lakkhaṇe ca. Itihāseti ‘‘itiha āsa itiha āsā’’ti vuttavacanapaṭidīpake ganthe. Lakkhaṇe ca itihāse ca pāramiṃ pariyosānaṃ gatāti sambandho. Rukkhapabbatādīnaṃ nāmappakāsakaganthaṃ ‘‘nighaṇḍū’’ti vuccati. Keṭūbheti kiriyākappavikappānaṃ kavīnaṃ upakārako gantho. Nighaṇḍuyā saha vattatīti sanighaṇḍu, keṭubhena saha vattatīti sakeṭubhaṃ, tasmiṃ sanighaṇḍusakeṭubhe vedattaye pāramiṃ gatāti sambandho. Padakāti nāmapadasamāsataddhitākhyātakitakādipadesu chekā[Pg.243]. Veyyākaraṇāni candapāṇinīyakalāpādibyākaraṇe chekā. Sadhamme pāramiṃ gatāti attano dhamme brāhmaṇadhamme vedattaye pāramiṃ pariyosānaṃ gatā pattāti attho. Darin bedeutet „in der Zeichenlehre“ (lakkhaṇe): im Lehrwerk über Körpermerkmale. Es zeigt auf, woran man die Merkmale aller weltlichen Frauen und Männer erkennt: „Wer mit diesen Merkmalen ausgestattet ist, wird unglücklich sein; wer mit jenen ausgestattet ist, wird glücklich sein.“ Das Buch, das dies darlegt, ist die Zeichenlehre (Lakkhaṇa); und in dieser Zeichenlehre. „In der Überlieferung“ (itihāse) bezieht sich auf ein Werk, das mündlich tradierte Aussprüche wie „So ist es gewesen, so war es“ verdeutlicht. Die Verknüpfung lautet: „Sie haben die Vollendung (das Ende) in der Zeichenlehre und der Überlieferung erreicht.“ Das Werk, das die Namen von Bäumen, Bergen und Ähnlichem erklärt, wird „Nighaṇḍu“ genannt. „Keṭubha“ ist ein Hilfswerk für Dichter bezüglich der Gestaltung und Ausarbeitung von Handlungen. Was zusammen mit dem Nighaṇḍu existiert, heißt „sa-nighaṇḍu“; was zusammen mit dem Keṭubha existiert, heißt „sa-keṭubha“. Die Verknüpfung lautet: „Sie haben in den drei Veden mitsamt dem Nighaṇḍu und dem Keṭubha die Vollendung erreicht.“ „Die Wortanalyse kennend“ (padakā) bedeutet: kundig in den Worten wie Nomen, Komposita, Taddhita-Derivaten, Verben, Kita-Suffixen und so weiter. „Grammatiker“ (veyyākaraṇā) bedeutet: kundig in den Grammatiken wie jenen von Candra, Pāṇini, Kalāpa und anderen. „Haben die Vollendung in ihrer eigenen Lehre erreicht“ (sadhamme pāramiṃ gatā) bedeutet: Sie haben die Vollendung, das äußerste Ende, in ihrer eigenen Lehre, nämlich der Lehre der Brahmanen, den drei Veden, erlangt und erreicht. 177. 177. ‘‘Uppātesu nimittesu, lakkhaṇesu ca kovidā; Pathabyā bhūmantalikkhe, mama sissā susikkhitā’’. „„In ungewöhnlichen Naturerscheinungen, in Vorzeichen und in Körpermerkmalen waren sie bewandert; auf der Erde, auf dem Boden und in der Luft waren meine Schüler wohlunterwiesen.““ Tattha ukkāpātabhūmikampādikesu uppātesu ca subhanimittāsubhanimittesu ca itthilakkhaṇapurisalakkhaṇamahāpurisalakkhaṇesu ca kovidā chekā. Pathaviyā ca bhūmiyā ca sakalaloke ca antalikkhe ākāse cāti sabbattha mama sissā susikkhitā. Darin bedeutet „bewandert“ (kovidā): kundig bei ungewöhnlichen Naturerscheinungen wie Meteoriteneinschlägen, Erdbeben und Ähnlichem, bei günstigen und ungünstigen Vorzeichen sowie bei den Körpermerkmalen von Frauen, Männern und den Merkmalen eines großen Mannes. Auf der Erde, auf dem Boden, in der ganzen Welt und in der Luft, im Himmel – also überall – waren meine Schüler wohlunterwiesen. 178. 178. ‘‘Appicchā nipakā ete, appāhārā alolupā; Lābhālābhena santuṭṭhā, parivārenti maṃ sadā’’. „„Wenig begehrend, weise sind sie, essen wenig, sind frei von Gier; zufrieden mit Gewinn und Verlust umgeben sie mich allezeit.““ Tattha appicchāti appakenāpi yāpentā. Nipakāti nepakkasaṅkhātāya paññāya samannāgatā. Appāhārāti ekāhārā ekabhattikāti attho. Alolupāti lolupataṇhāya appavattanakā. Lābhālābhenāti lābhena alābhena ca santuṭṭhā somanassā ete mama sissā sadā niccakālaṃ maṃ parivārenti upaṭṭhahantīti attho. Darin bedeutet „wenig begehrend“ (appicchā): ihr Leben mit nur ganz wenig fristend. „Weise“ (nipakā) bedeutet: ausgestattet mit jener Weisheit, die man Klugheit nennt. „Wenig essen“ (appāhārā) bedeutet: sie nehmen nur einmal am Tag Nahrung zu sich, sie essen nur eine Mahlzeit am Tag. „Frei von Gier“ (alolupā) bedeutet: jene, die keine gierige Begierde aufkommen lassen. „Mit Gewinn und Verlust“ (lābhālābhena) bedeutet: sie sind sowohl bei Gewinn als auch bei Verlust zufrieden und freudigen Sinnes. Dies bedeutet: Diese meine Schüler umgeben mich allezeit, zu jeder Zeit, und dienen mir. 179. 179. ‘‘Jhāyī jhānaratā dhīrā, santacittā samāhitā; Ākiñcaññaṃ patthayantā, parivārenti maṃ sadā’’. „„Meditierend, an der Vertiefung erfreut, standhaft, mit friedvollem Geist, konzentriert; nach der Besitzlosigkeit strebend, umgeben sie mich allezeit.““ Tattha jhāyīti lakkhaṇūpanijjhānaārammaṇūpanijjhānehi samannāgatā. Jhāyanasīlā vā. Jhānaratāti tesu ca jhānesu ratā allīnā. Dhīrāti dhitisampannā. Santacittāti vūpasantamanā. Samāhitāti ekaggacittā. Ākiñcaññanti nippalibodhabhāvaṃ. Patthayantāti icchantā. Itthambhūtā me sissā sadā maṃ parivārentīti sambandho. Darin bedeutet „meditierend“ (jhāyī): ausgestattet mit der Vertiefung in die Merkmale und der Vertiefung in das Objekt; oder von meditierender Natur. „An der Vertiefung erfreut“ (jhānaratā) bedeutet: an ebendiesen Vertiefungen erfreut, ihnen hingegeben. „Standhaft“ (dhīrā) bedeutet: mit Entschlossenheit ausgestattet. „Mit friedvollem Geist“ (santacittā) bedeutet: mit beruhigtem Geist. „Konzentriert“ (samāhitā) bedeutet: mit auf einen Punkt gerichtetem Geist. „Besitzlosigkeit“ (ākiñcaññaṃ) bedeutet: den Zustand der Freiheit von jeglichen Hindernissen. „Strebend“ (patthayantā) bedeutet: begehrend. Die Verknüpfung lautet: Meine so beschaffenen Schüler umgeben mich allezeit. 180. 180. ‘‘Abhiññāpāramippattā, pettike gocare ratā; Antalikkhacarā dhīrā, parivārenti maṃ sadā’’. „„Die die Vollendung der höheren Geisteskräfte erlangt haben, erfreut am väterlichen Weidegebiet, durch die Luft wandelnd, standhaft, umgeben sie mich allezeit.““ Tattha abhiññāpāramippattāti pañcasu abhiññāsu pāramiṃ pariyosānaṃ pattā pūritāti attho. Pettike gocare ratāti buddhānuññātāya aviññattiyā [Pg.244] laddhe āhāre ratāti attho. Antalikkhacarāti antalikkhena ākāsena gacchantā āgacchantā cāti attho. Dhīrāti thirabhūtā sīhabyagghādiparissaye acchambhitasabhāvāti attho. Evaṃbhūtā mama tāpasā sadā maṃ parivārentīti attho. Darin bedeutet „die die Vollendung der höheren Geisteskräfte erlangt haben“ (abhiññāpāramippattā): die Vollendung, das äußerste Ende, in den fünf höheren Geisteskräften erlangt und erfüllt habend. „Erfreut am väterlichen Weidegebiet“ (pettike gocare ratā) bedeutet: erfreut an jener Nahrung, die ohne direkte Aufforderung im Einklang mit den Erlaubnissen des Buddhas erhalten wurde. „Durch die Luft wandelnd“ (antalikkhacarā) bedeutet: durch den Luftraum, den Himmel, gehend und kommend. „Standhaft“ (dhīrā) bedeutet: gefestigt, von einer Natur, die angesichts von Gefahren durch Löwen, Tiger und Ähnlichem unerschrocken bleibt. Dies bedeutet: Meine so beschaffenen Asketen umgeben mich allezeit. 181. 181. ‘‘Saṃvutā chasu dvāresu, anejā rakkhitindriyā; Asaṃsaṭṭhā ca te dhīrā, mama sissā durāsadā’’. „„Gezügelt an den sechs Sinnenpforten, begehrenslos, mit behüteten Sinnen; ungesellig sind jene Standhaften, meine Schüler, unnahbar.““ Tattha cakkhādīsu chasu dvāresu rūpādīsu chasu ārammaṇesu saṃvutā pihitā paṭicchannā, rakkhitagopitadvārāti attho. Anejā nittaṇhā rakkhitindriyā gopitacakkhādiindriyā asaṃsaṭṭhā ñātīhi gahaṭṭhehi amissībhūtāti attho. Durāsadāti duṭṭhu āsadā, āsādetuṃ ghaṭṭetuṃ asakkuṇeyyā ayoggāti attho. Darin bedeutet „gezügelt“ (saṃvutā): an den sechs Sinnenpforten wie dem Auge und so weiter, sowie gegenüber den sechs Objekten wie den Formen und so weiter gezügelt, verschlossen, bedeckt; das heißt, mit behüteten und gesicherten Toren. „Begehrenslos“ (anejā) bedeutet: frei von Durst. „Mit behüteten Sinnen“ (rakkhitindriyā) bedeutet: mit geschützten Sinnesorganen wie dem Auge und so weiter. „Ungesellig“ (asaṃsaṭṭhā) bedeutet: sich nicht mit Verwandten und Hausleuten vermischend. „Unnahbar“ (durāsadā) bedeutet: schwer heranzukommen; unfähig und ungeeignet, angegriffen oder belästigt zu werden. 182. 182. ‘‘Pallaṅkena nisajjāya, ṭhānacaṅkamanena ca; Vītināmenti te rattiṃ, mama sissā durāsadā’’. „„Im Meditationssitz, im Sitzen, im Stehen und im Gehmeditieren; so verbringen sie die Nacht, meine unnahbaren Schüler.““ Tattha mama sissā pallaṅkena ūrubaddhāsanena seyyaṃ vihāya nisajjāya ca ṭhānena ca caṅkamena ca sakalaṃ rattiṃ visesena atināmenti atikkāmentīti sambandho. Darin lautet die Verknüpfung: Meine Schüler verbringen die ganze Nacht auf besondere Weise, indem sie das Liegen meiden und die Zeit im Meditationssitz (dem Sitz mit verschränkten Schenkeln), im Sitzen, im Stehen sowie im Gehmeditieren zubringen. 183. 183. ‘‘Rajanīye na rajjanti, dussanīye na dussare; Mohanīye na muyhanti, mama sissā durāsadā’’. „„Sie haften nicht an dem, was Lust erzeugt, sie zürnen nicht über das, was Ärger erregt; sie lassen sich nicht täuschen von dem, was Verwirrung stiftet, meine unnahbaren Schüler.““ Te itthambhūtā mama sissā tāpasā rajanīye rajjitabbe vatthusmiṃ na rajjanti rajjaṃ na uppādenti. Dussanīye dussitabbe dosaṃ uppādetuṃ yutte vatthumhi na dussare dosaṃ na karonti. Mohanīye mohituṃ yutte vatthumhi na muyhanti mohaṃ na karonti, paññāsampayuttā bhavantīti attho. Diese meine so beschaffenen Schüler, die Asketen, haften nicht an Dingen, die geeignet sind, Leidenschaft zu erregen, sie bringen keine Leidenschaft hervor. Sie zürnen nicht über Objekte, die geeignet sind, Zorn oder Missfallen hervorzurufen, sie bringen keinen Hass hervor. Sie lassen sich nicht täuschen von Objekten, die Verblendung stiften können, sie bringen keine Verblendung hervor; das bedeutet, sie sind mit Weisheit ausgestattet. 184. 184. ‘‘Iddhiṃ vīmaṃsamānā te, vattanti niccakālikaṃ; Pathaviṃ te pakampenti, sārambhena durāsadā’’. „„Ihre übernatürlichen Kräfte erprobend, verweilen sie allezeit; sie bringen die Erde zum Beben durch ihre Tatkraft, diese Unnahbaren.““ Te mama sissā ‘‘ekopi hutvā bahudhā hoti, bahudhāpi hutvā eko hotī’’tiādikaṃ (paṭi. ma. 1.102) iddhivikubbanaṃ niccakālikaṃ vīmaṃsamānā vattantīti [Pg.245] sambandho. Te mama sissā ākāsepi udakepi pathaviṃ nimminitvā iriyāpathaṃ pakampentīti attho. Sārambhena yugaggāhena kalahakaraṇena na āsādetabbāti attho. Der Zusammenhang ist wie folgt: „Diese meine Schüler verweilen, indem sie fortwährend jene übernatürliche Verwandlung (iddhi-vikubbana) erproben, welche so beginnt: ‚Obwohl er einer ist, wird er zu vielen, und obwohl er viele ist, wird er zu einem‘ und so weiter.“ Der Sinn ist: Diese meine Schüler erschaffen festen Boden sowohl in der Luft als auch im Wasser und erschüttern so die Bewegungsweise. Der Sinn ist: Man sollte sie nicht durch Feindseligkeit, Wetteifer oder Streitigkeiten bedrängen. 185. 185. ‘‘Kīḷamānā ca te sissā, kīḷanti jhānakīḷitaṃ; Jambuto phalamānenti, mama sissā durāsadā’’. „Und wenn jene Schüler spielen, spielen sie das Spiel der Vertiefung (jhāna); sie bringen Früchte vom Jambu-Baum herbei – meine Schüler sind unnahbar.“ Te mama sissā kīḷamānā paṭhamajjhānādikīḷaṃ kīḷanti laḷanti ramantīti attho. Jambuto phalamānentīti himavantamhi satayojanubbedhajamburukkhato ghaṭappamāṇaṃ jambuphalaṃ iddhiyā gantvā ānentīti attho. Der Sinn ist: Wenn diese meine Schüler spielen, so spielen, vergnügen und erfreuen sie sich am Spiel der ersten Vertiefung und so weiter. „Sie bringen Früchte vom Jambu-Baum herbei“ bedeutet: Sie reisen mit übernatürlicher Kraft (iddhi) zum Jambu-Baum im Himavanta-Gebirge, der eine Höhe von einhundert Yojanas hat, und bringen von dort eine Jambu-Frucht von der Größe eines Kruges herbei. 186. 186. ‘‘Aññe gacchanti goyānaṃ, aññe pubbavidehakaṃ; Aññe ca uttarakuruṃ, esanāya durāsadā’’. „Einige gehen nach Goyāna, andere nach Pubbavideha, und wieder andere nach Uttarakuru, um Nahrung zu suchen – sie sind unnahbar.“ Tesaṃ mama sissānaṃ antare aññe ekacce goyānaṃ aparagoyānaṃ dīpaṃ gacchanti, ekacce pubbavidehakaṃ dīpaṃ gacchanti, ekacce uttarakuruṃ dīpaṃ gacchanti, te durāsadā etesu ṭhānesu esanāya gavesanāya paccayapariyesanāya gacchantīti sambandho. Der Zusammenhang ist wie folgt: Unter diesen meinen Schülern gehen einige zur Insel Goyāna (Aparagoyāna), einige gehen zur Insel Pubbavideha, und einige gehen zur Insel Uttarakuru; sie, die Unnahbaren, gehen an diese Orte zur Suche, zum Aufspüren und zum Ausfindigmachen von Lebensbedürfnissen (paccaya). 187. 187. ‘‘Purato pesenti khāriṃ, pacchato ca vajanti te; Catuvīsasahassehi, chāditaṃ hoti ambaraṃ’’. „Sie senden ihre Traglast (khāri) voraus und folgen selbst hintennach; durch vierundzwanzigtausend (Asketen) wird das Himmelsgewölbe verdeckt.“ Te mama sissā ākāsena gacchamānā khāriṃ tāpasaparikkhārabharitaṃ kājaṃ purato pesenti paṭhamaṃ abhimukhañca taṃ pesetvā sayaṃ tassa pacchato gacchantīti attho. Evaṃ gacchamānehi catuvīsasahassehi tāpasehi ambaraṃ ākāsatalaṃ chāditaṃ paṭicchannaṃ hotīti sambandho. Der Sinn ist: Wenn diese meine Schüler durch die Luft reisen, senden sie ihre Traglast (khāri) – eine mit den Utensilien eines Asketen beladene Tragstange – voraus; sie senden sie zuerst nach vorne und gehen dann selbst hinterher. Der Zusammenhang ist wie folgt: Durch vierundzwanzigtausend Asketen, die auf diese Weise reisen, wird das Himmelsgewölbe, das heißt die Luftschicht, verdeckt und verhüllt. 188. 188. ‘‘Aggipākī anaggī ca, dantodukkhalikāpi ca; Asmena koṭṭitā keci, pavattaphalabhojanā’’. „Einige kochen mit Feuer, andere kochen nicht mit Feuer; manche benutzen ihre Zähne als Mörser, manche zermalmen (die Nahrung) mit einem Stein, und wieder andere ernähren sich von selbst herabgefallenen Früchten.“ Tattha keci ekacce mama sissā aggipākī phalāphalapaṇṇādayo pacitvā khādanti, ekacce anaggī aggīhi apacitvā āmakameva khādanti, ekacce dantikā dantehiyeva tacaṃ uppāṭetvā khādanti. Ekacce udukkhalikā udukkhalehi koṭṭetvā khādanti. Ekacce asmena koṭṭitā pāsāṇena koṭṭetvā khādanti. Ekacce sayaṃpatitaphalāhārāti sambandho. Der Zusammenhang ist wie folgt: Unter ihnen kochen einige meiner Schüler (ihre Nahrung) mit Feuer, indem sie verschiedene Früchte, Blätter und so weiter zubereiten und essen; einige kochen nicht mit Feuer, sondern essen sie roh und ungekocht; einige nutzen ihre Zähne, indem sie die Schale allein mit den Zähnen abziehen und essen; einige benutzen Mörser, indem sie die Nahrung mit Mörsern zerstoßen und essen; einige zermalmen sie mit einem Stein, indem sie sie mit einem Stein zerklopfen und essen; und einige ernähren sich ausschließlich von selbst herabgefallenen Früchten. 189. 189. ‘‘Udakorohaṇā [Pg.246] keci, sāyaṃ pāto sucīratā; Toyābhisecanakarā, mama sissā durāsadā’’. „Einige steigen abends und morgens ins Wasser hinab, da sie die Reinheit lieben; andere üben sich im Übergießen mit Wasser – meine Schüler sind unnahbar.“ Durāsadā mama sissā keci sucīratā suddhikāmā sāyaṃ pāto ca udakorohaṇā udakapavesakāti attho. Keci toyābhisecanakarā udakena attani abhisiñcanakarāti attho. Der Sinn ist: Einige dieser unnahbaren Schüler von mir, die die Reinheit lieben und nach Reinheit streben, steigen abends und morgens ins Wasser hinab, das heißt, sie gehen ins Wasser hinein. Einige üben sich im Übergießen mit Wasser, das heißt, sie vollziehen an sich selbst eine Begießung mit Wasser. 190. 190. ‘‘Parūḷhakacchanakhalomā, paṅkadantā rajassirā; Gandhitā sīlagandhena, mama sissā durāsadā’’. „Mit wild gewachsenem Haar in den Achselhöhlen und langen Nägeln, mit schmutzigen Zähnen und staubbedeckten Häuptern, doch duftend vom Duft der Tugend – meine Schüler sind unnahbar.“ Tattha te durāsadā mama sissā kacchesu ubhayakacchesu ca hatthapādesu ca parūḷhā sañjātā, dīghanakhalomāti attho. Khurakammarahitattā amaṇḍitā apasādhitāti adhippāyo. Paṅkadantāti iṭṭhakacuṇṇakhīrapāsāṇacuṇṇādīhi dhavalamakatattā malaggahitadantāti attho. Rajassirāti telamakkhanādirahitattā dhūlīhi makkhitasīsāti attho. Gandhitā sīlagandhenāti jhānasamādhisamāpattīhi sampayuttasīlena samaṅgībhūtattā lokiyasīlagandhena sabbattha sugandhībhūtāti attho. Mama sissā durāsadāti imehi vuttappakāraguṇehi samannāgatattā āsādetuṃ ghaṭṭetuṃ asakkuṇeyyā mama sissāti sambandho. Hierbei ist der Sinn von „mit wild gewachsenem Haar in den Achselhöhlen und langen Nägeln“: Bei diesen unnahbaren Schülern von mir sind in beiden Achselhöhlen sowie an Händen und Füßen lange Nägel und Haare wild gewachsen. Die Absicht (des Kommentators) ist: Weil sie frei von der Arbeit mit dem Schermesser sind, sind sie ungeschmückt und ungeschminkt. „Mit schmutzigen Zähnen“ bedeutet: Da sie ihre Zähne nicht mit Ziegelpulver, Kalksteinpulver oder ähnlichem gereinigt und weiß gemacht haben, sind ihre Zähne von Schmutz bedeckt. „Mit staubbedeckten Häuptern“ bedeutet: Da sie frei vom Salben mit Öl und ähnlichem sind, sind ihre Köpfe mit Staub bedeckt. „Duftend vom Duft der Tugend“ bedeutet: Weil sie eins sind mit der Tugend (sīla), die mit den Vertiefungen (jhāna), der Konzentration (samādhi) und den Errungenschaften (samāpatti) verbunden ist, sind sie durch den weltlichen Duft der Tugend überall wohlriechend geworden. Der Zusammenhang mit „meine Schüler sind unnahbar“ ist wie folgt: Da meine Schüler mit den auf diese Weise beschriebenen Tugenden ausgestattet sind, kann man sich ihnen nicht feindselig nähern oder sie bedrängen. 191. 191. ‘‘Pātova sannipatitvā, jaṭilā uggatāpanā; Lābhālābhaṃ pakittetvā, gacchanti ambare tadā’’. „Nachdem sie sich frühmorgens versammelt haben, reisen diese Asketen mit Flechthaar, die strenge Kasteiungen üben, und nachdem sie Gewinn und Verlust verkündet haben, dann durch das Himmelsgewölbe.“ Tattha pātova sannipatitvāti sattamyatthe topaccayo, pātarāsakāleyeva mama santike rāsibhūtāti attho. Uggatāpanā pākaṭatapā patthaṭatapā jaṭilā jaṭādhārino tāpasā. Lābhālābhaṃ pakittetvā khuddake ca mahante ca lābhe pākaṭe katvā tadā tasmiṃ kāle ambare ākāsatale gacchantīti sambandho. Hierbei ist „nachdem sie sich frühmorgens versammelt haben“ im Sinne eines Lokativs zu verstehen (mit dem Suffix -to); der Sinn ist: gerade zur Zeit des Frühstücks haben sie sich in meiner Gegenwart angesammelt. „Asketen mit Flechthaar, die strenge Kasteiungen üben“ bezieht sich auf die Flechthaarträger (jaṭādhārino), deren Kasteiung offenkundig und weithin bekannt ist. Der Zusammenhang mit „nachdem sie Gewinn und Verlust verkündet haben, [reisen sie] dann zu jener Zeit durch das Himmelsgewölbe“ ist wie folgt: Nachdem sie sowohl geringen als auch großen Gewinn offengelegt haben, reisen sie zu jener Zeit im Himmelsgewölbe, das heißt in der Luftschicht. 192. Puna tesaṃyeva guṇe pakāsento etesaṃ pakkamantānantiādimāha. Tattha ākāse vā thale vā pakkamantānaṃ gacchantānaṃ etesaṃ tāpasānaṃ vākacīrajanito mahāsaddo pavattatīti attho. Muditā honti devatāti evaṃ mahāsaddaṃ pavattetvā gacchantānaṃ ajinacammasaddena [Pg.247] santuṭṭhā ‘‘sādhu sādhu, ayyā’’ti somanassajātā devatā muditā santuṭṭhā hontīti sambandho. 192. Um die Tugenden eben dieser Asketen weiter zu offenbaren, sprach der Lehrer des Kommentars die Worte: „Wenn diese aufbrechen ...“ und so weiter. Der Sinn darin ist: Wenn diese Asketen entweder durch die Luft oder über das Land aufbrechen, das heißt gehen, entsteht durch das Tragen ihrer Rindenkleidung (vākacīra) ein lautes Geräusch. Der Zusammenhang mit „Die Gottheiten freuen sich“ ist wie folgt: Die Gottheiten, die durch das Geräusch ihrer Antilopenhäute (ajinacamma) erfreut sind, während die Asketen unter lautem Geräusch dahingehen, rufen voller Heiterkeit: „Heilsam, heilsam, ihr Ehrwürdigen!“ und sind somit hocherfreut und zufrieden. 193. Disodisanti te isayo antalikkhacarā ākāsacārino dakkhiṇādisānudisaṃ pakkamanti gacchantīti sambandho. Sake balenupatthaddhāti attano sarīrabalena vā jhānabalena vā samannāgatā yadicchakaṃ yattha yattha gantukāmā, tattha tattheva gacchantīti sambandho. 193. Der Zusammenhang mit „von Himmelsrichtung zu Himmelsrichtung“ ist wie folgt: Diese Seher (isayo), die durch den Luftraum wandern, das heißt durch die Luft fliegen, brechen auf und gehen in die südliche Himmelsrichtung sowie in die Zwischenrichtungen. Der Zusammenhang mit „durch ihre eigene Kraft gestützt“ ist wie folgt: Ausgestattet mit ihrer eigenen körperlichen Kraft oder der Kraft der Vertiefung (jhāna), gehen sie genau dorthin, wohin auch immer sie nach eigenem Wunsch reisen wollen. 194. Puna tesamevānubhāvaṃ pakāsento pathavīkampakā etetiādimāha. Tadā ete sabbattha icchācārā pathavīkampakā medanīsañcalanajātikā nabhacārino ākāsacārino. Uggatejāti uggatatejā patthaṭatejā duppasahā pasayha abhibhavitvā pavattituṃ asakkuṇeyyāti duppasahā. Sāgarova akhobhiyāti aññehi akhobhiyo anāluḷito sāgaro iva samuddo viya aññehi akhobhiyā kampetuṃ asakkuṇeyyā hontīti sambandho. 194. Um die übernatürliche Macht eben dieser Asketen weiter zu offenbaren, sprach er die Worte: „Diese erschüttern die Erde ...“ und so weiter. Zu jener Zeit sind diese Asketen, die sich überall nach Belieben bewegen, Erderschütterer, das heißt von der Natur, die Erde (medanī) ins Wanken zu bringen, und Luftwandler, das heißt solche, die sich durch den Raum bewegen. „Von gewaltiger Glut (uggateja)“ bedeutet: Sie besitzen eine emporsteigende und sich ausbreitende feurige Kraft (teja) und sind schwer zu bezwingen (duppasaha); sie sind „schwer zu bezwingen“, weil es unmöglich ist, sie mit Gewalt zu überwältigen und zu beherrschen. Der Zusammenhang mit „wie der Ozean unerschütterlich“ ist wie folgt: Wie der Ozean, das Meer, von anderen unerschütterlich und unaufgewühlt ist, so sind auch sie von anderen unerschütterlich, das heißt, man kann sie nicht ins Wanken bringen. 195. Ṭhānacaṅkamino kecīti tesaṃ mama sissānaṃ antare ekacce isayo ṭhāniriyāpathacaṅkamaniriyāpathasampannā, ekacce isayo nesajjikā nisajjiriyāpathasampannā, ekacce isayo pavattabhojanā sayaṃpatitapaṇṇāhārā evarūpehi guṇehi yuttattā durāsadāti sambandho. 195. Der Zusammenhang mit „Einige stehen und wandeln im Geiste“ ist wie folgt: Unter diesen meinen Schülern sind einige Seher (isayo) mit der Körperhaltung des Stehens und des Gehmeditierens (caṅkamana) ausgestattet; einige Seher sind dem Sitzen hingegeben und mit der Körperhaltung des Sitzens ausgestattet; einige Seher ernähren sich von herabgefallenem Essen, das heißt von selbst herabgefallenen Blättern; und weil sie mit solchen Tugenden ausgestattet sind, sind sie unnahbar (durāsada). 196. Te sabbe thomento mettāvihārinotiādimāha. Tattha ‘‘aparimāṇesu cakkavāḷesu aparimāṇā sattā sukhī hontū’’tiādinā sinehalakkhaṇāya mettāya pharitvā viharanti, attabhāvaṃ pavattentīti mettāvihārino ete mama sissāti attho. Sabbe te isayo sabbapāṇinaṃ sabbesaṃ sattānaṃ hitesī hitagavesakā. Anattukkaṃsakā attānaṃ na ukkaṃsakā amānino kassaci kañci puggalaṃ na vambhenti nīcaṃ katvā na maññantīti attho. 196. Er sprach die Worte beginnend mit „mettāvihārin“ („die in liebender Güte Weilenden“), um sie alle zu preisen. Darin bedeutet „die in liebender Güte Weilenden“: „Diese meine Schüler verweilen, indem sie alle unermesslichen Wesen in unermesslichen Weltsystemen mit jener liebenden Güte (mettā), deren Merkmal die Zuneigung (sineha) ist, durchdringen, gemäß dem Wunsch: „Mögen unermessliche Wesen glücklich sein!“; so führen sie ihre Existenz fort.“ Das ist die Bedeutung. Alle diese Weisen (isayo) suchen das Wohl aller lebenden Wesen, aller Kreaturen. „Anattukkaṃsakā“ bedeutet, dass sie sich selbst nicht rühmen (erhöhen), frei von Stolz sind, niemanden herabsetzen und niemanden geringschätzig behandeln. 197. Te mama sissā sīlasamādhisamāpattiguṇayuttattā sīharājā iva acchambhītā nibbhayā, gajarājā iva hatthirājā viya thāmavā sarīrabalajhānabalasampannā byaggharājā iva, durāsadā ghaṭṭetumasakkuṇeyyā mama santike āgacchantīti sambandho. 197. Die Verknüpfung der Worte lautet: „Diese meine Schüler kommen in meine Gegenwart, da sie aufgrund ihrer Ausstattung mit den Vorzügen von Tugend (sīla), Konzentration (samādhi) und geistigen Erreichungen (samāpatti) furchtlos und unerschrocken wie ein Löwenkönig sind, kraftvoll wie ein Elefantenkönig – ausgestattet mit körperlicher Kraft und der Kraft der Vertiefungen (jhāna) –, und unnahbar wie ein Tigerkönig, so dass niemand sie bedrängen kann.“ 198. Tato [Pg.248] attano ānubhāvassa dassanalesena pakāsento vijjādharātiādimāha. Tattha mantasajjhāyādivijjādharā ca rukkhapabbatādīsu vasantā bhummadevatā ca bhūmaṭṭhathalaṭṭhā nāgā ca gandhabbadevā ca caṇḍā rakkhasā ca kumbhaṇḍā devā ca dānavā devā ca icchiticchitanimmānasamatthā garuḷā ca taṃ saraṃ upajīvantīti sambandho, tasmiṃ sare sarassa samīpe vasantīti attho. 198. Danach sprach er die Worte beginnend mit „vijjādharā“, um andeutungsweise seine eigene Macht zu zeigen. Die Verknüpfung der Worte darin lautet: „Sowohl die Träger des Wissens (vijjādharā), die Mantras rezitieren, als auch die auf Bäumen und Bergen lebenden Erdgottheiten (bhummadevatā), die auf dem Land lebenden Nāgas, die Gandhabbas, die wilden Rakkhasas, die Kumbhaṇḍa-Gottheiten, die Dānava-Dämonen und die Garuḷas, die fähig sind, alles nach Wunsch zu erschaffen, hängen von jenem See ab (beziehen ihr Leben aus ihm).“ Dies bedeutet, dass sie an jenem See, in der Nähe des Sees, wohnen. 199. Punapi tesaṃyeva attano sissatāpasānaṃ guṇe vaṇṇento te jaṭā khāribharitātiādimāha. Taṃ sabbaṃ uttānatthameva. Khāribhāranti udañcanakamaṇḍaluādikaṃ tāpasaparikkhāraṃ. 199. Um wiederum die Tugenden eben dieser seiner asketischen Schüler zu preisen, sprach er die Worte beginnend mit „te jaṭā khāribharitā“ („jene mit Flechtenhaar und Traglasten“). All dies hat eine ganz offensichtliche Bedeutung. „Khāribhāra“ bezeichnet die Ausrüstungsgegenstände eines Asketen, wie Schöpfgefäße, Wasserkrüge und Ähnliches. 207. Punapi attano guṇe pakāsento uppāte supine cāpītiādimāha. Tattha brāhmaṇasippesu nipphattiṃ gatattā nakkhattapāṭhe ca chekattā ‘‘imassa rājakumārassa uppannanakkhattaṃ subhaṃ asubha’’nti uppātalakkhaṇe ca supine ca pavattiṃ pucchitena ‘‘idaṃ supinaṃ subhaṃ, idaṃ asubha’’nti supinanipphattikathane ca sabbesaṃ itthipurisānaṃ hatthapādalakkhaṇakathane ca suṭṭhu sikkhito sakalajambudīpe pavattamānaṃ mantapadaṃ lakkhaṇamantakoṭṭhāsaṃ sabbaṃ ahaṃ tadā mama tāpasakāle dhāremīti sambandho. 207. Um wiederum seine eigenen Qualitäten aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit „uppāte supine cāpi“ („auch bei Vorzeichen und Träumen“). Die Verknüpfung der Worte darin lautet: „Da ich in den brahmanischen Künsten vollendet und im Lesen der Gestirne (Nakkhattapāṭha) geschickt war, und da ich – wenn ich nach den Vorzeichen (uppāta) und Träumen gefragt wurde – gut geschult darin war, zu erklären: „Das Geburtsgestirn dieses Königsohnes ist günstig oder ungünstig“, oder bei der Deutung von Träumen: „Dieser Traum ist gut, jener ist schlecht“, sowie in der Deutung der Hand- und Fußmerkmale aller Frauen und Männer, bewahrte (beherrschte) ich damals, zu meiner Zeit als Asket, alle im gesamten Jambudīpa verbreiteten Mantras und den gesamten Bereich der Merkmals- und Mantrawissenschaft.“ 208. Attano byākaraṇaṃ buddhaguṇapubbaṅgamaṃ pakāsento anomadassītiādimāha. Tattha na omakanti anomaṃ. Maṃsacakkhudibbacakkhusamantacakkhudhammacakkhubuddhacakkhūhi sabbasattānaṃ passanaṃ dassanaṃ nāma, anomaṃ dassanaṃ yassa bhagavato so bhagavā anomadassī. Bhāgyavantatādīhi kāraṇehi bhagavā lokassa jeṭṭhaseṭṭhattā lokajeṭṭho usabho nisabho āsabhoti tayo gavajeṭṭhakā. Tattha gavasatajeṭṭhako usabho, gavasahassajeṭṭhako nisabho, gavasatasahassajeṭṭhako āsabho, narānaṃ āsabho narāsabho paṭividdhasabbadhammo, sambuddho vivekakāmo ekībhāvaṃ icchanto himavantaṃ himālayapabbataṃ upāgamīti sambandho. 208. Um seine eigene Prophezeiung (byākaraṇa) zu verkünden, die von den Tugenden des Buddha eingeleitet wird, sprach er die Worte beginnend mit „anomadassī“ („der von erhabener Vision“). Darin bedeutet „anoma“ nicht geringwertig (na omakaṃ). „Dassana“ (Sehen) bezeichnet das Schauen aller Wesen mit dem physischen Auge (maṃsacakkhu), dem himmlischen Auge (dibbacakkhu), dem allsehenden Auge (samantacakkhu), dem Dhamma-Auge (dhammacakkhu) und dem Buddha-Auge (buddhacakkhu). Derjenige Erhabene, dessen Vision nicht geringwertig ist, ist „Anomadassī“. Aufgrund von Eigenschaften wie dem Besitz von Glück (bhāgyavantatā) usw. ist der Erhabene der Älteste und Beste der Welt (lokajeṭṭho). „Usabha“, „nisabha“ und „āsabha“ sind die drei Bezeichnungen für Leitbullen in der Welt: Ein „usabha“ ist der Führer von hundert Rindern, ein „nisabha“ der Führer von tausend und ein „āsabha“ der Führer von einhunderttausend. Die Verknüpfung der Worte lautet: „Der Stier unter den Menschen (narāsabha), der alle Phänomene durchdrungen hat, der vollkommen Erwachte, der nach Abgeschiedenheit (viveka) strebte und die Einsamkeit wünschte, begab sich zum Himālaya-Gebirge.“ 209. Ajjhogāhetvā himavantanti himavantasamīpaṃ ogāhetvā pavisitvāti attho. Sesaṃ uttānatthameva. 209. „Ajjhogāhetvā himavantaṃ“ („in den Himālaya eingedrungen“) bedeutet, dass er die Nähe des Himālaya betrat und sich dorthin begab. Der Rest hat eine ganz offensichtliche Bedeutung. 210-1. Jalitaṃ [Pg.249] jalamānaṃ indīvarapupphaṃ iva, hutāsanaṃ homassa āsanaṃ, ādittaṃ ābhāyutaṃ aggikkhandhaṃ iva, gagane ākāse jotamānaṃ vijju iva, suṭṭhu phullaṃ sālarājaṃ iva, nisinnaṃ lokanāyakaṃ addasanti sambandho. 210-1. Die Verknüpfung der Worte lautet: „Sie sahen den Führer der Welt (lokanāyaka) dasitzen, gleich einer leuchtenden blauen Lotusblüte (indīvara), gleich einem Opferfeuer (hutāsana) – dem Sitz des Brandopfers –, gleich einer entflammten, von Licht erfüllten Feuersäule, gleich einem am Himmel aufblitzenden Blitz und gleich einem in voller Blüte stehenden königlichen Sāla-Baum.“ 213. Devānaṃ devo devadevo, taṃ devadevaṃ disvāna tassa lakkhaṇaṃ dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇasañjānanakāraṇaṃ. ‘‘Buddho nu kho na vā buddho’’ti upadhārayiṃ vicāresiṃ. Cakkhumaṃ pañcahi cakkhūhi cakkhumantaṃ jinaṃ kena kāraṇena passāmīti sambandho. 213. Der Gott der Götter ist „devadevo“. Die Verknüpfung der Worte lautet: „Nachdem ich jenen Gott der Götter gesehen hatte, was der Anlass zur Erkennung seiner zweiunddreißig Merkmale eines großen Mannes (mahāpurisalakkhaṇa) war, überlegte und prüfte ich: „Ist er wohl ein Buddha oder nicht?“ Aus welchem Grund schaue ich den Sieger (jina), der mit den fūnf Augen sehend ist?“ 214. Caraṇuttame uttamapādatale sahassārāni cakkalakkhaṇāni dissanti, ahaṃ tassa bhagavato tāni lakkhaṇāni disvā tathāgate niṭṭhaṃ gacchiṃ sanniṭṭhānaṃ agamāsi, nissandeho āsinti attho. Sesaṃ uttānatthameva. 214. „Auf seinen edlen Fußsohlen (caraṇuttame) zeigen sich die Radmerkmale mit tausend Speichen. Als ich diese Merkmale des Erhabenen sah, gelangte ich zu einer Gewissheit (niṭṭhaṃ gacchiṃ) in Bezug auf den Tathāgata“ – das bedeutet, ich wurde völlig zweifelsfrei. Der Rest hat eine ganz offensichtliche Bedeutung. 218. Sayambhū sayameva bhūtā. Amitodaya amitānaṃ aparimāṇānaṃ guṇānaṃ udaya uṭṭhānaṭṭhāna, idaṃ padadvayaṃ ālapanameva. Imaṃ lokaṃ imaṃ sattalokaṃ saṃ suṭṭhu uddharasi saṃsārato uddharitvā nibbānathalaṃ pāpesīti attho. Te sabbe sattā tava dassanaṃ āgamma āgantvā kaṅkhāsotaṃ vicikicchāmahoghaṃ taranti atikkamantīti sambandho. 218. „Sayambhū“ bedeutet aus sich selbst heraus entstanden. „Amitodaya“ bedeutet der Quellort unermesslicher, unbegrenzter Tugenden. Diese beiden Wörter stehen im Vokativ (als Anrede). „Du rettest diese Welt, diese Welt der Lebewesen, gründlich, was bedeutet: Du befreist sie aus dem Daseinskreislauf (saṃsāra) und führst sie zum Boden des Nibbāna.“ Die Verknüpfung der Worte lautet: „All jene Wesen überwinden und überschreiten den Strom des Zweifels, die gewaltige Flut der Unsicherheit (vicikicchāmahogha), indem sie zu Deiner Anschauung gelangen.“ 219. Bhagavantaṃ thomento tāpaso tuvaṃ satthātiādimāha. Tattha, bhante, sabbaññu tuvaṃ sadevakassa lokassa satthā ācariyo uttamaṭṭhena tvameva ketu ucco, sakalaloke pakāsanaṭṭhena tvameva dhajo, lokattaye uggatattā tvameva yūpo ussāpitathambhasadiso, pāṇinaṃ sabbasattānaṃ tvameva parāyaṇo uttamagamanīyaṭṭhānaṃ tvameva patiṭṭhā patiṭṭhaṭṭhānaṃ lokassa mohandhakāravidhamanato tvameva dīpo telapadīpo viya, dvipaduttamo dvipadānaṃ devabrahmamanussānaṃ uttamo seṭṭhoti sambandho. 219. Um den Erhabenen zu preisen, sprach der Asket die Worte beginnend mit „tuvaṃ satthā“ („Du bist der Lehrer“). Darin lautet die Verknüpfung: „O Herr, Du, der Allwissende, bist der Lehrer und Meister (satthā) der Welt samt den Göttern. Aufgrund Deiner Erhabenheit bist Du allein das erhabene Banner (ketu); im Sinne der Erleuchtung der gesamten Welt bist Du allein die Flagge (dhajo). Aufgrund Deines Hervorragens in den drei Welten bist Du allein die Opfersäule (yūpo), vergleichbar mit einem aufgerichteten Pfeiler. Für die atmenden Wesen, für alle Geschöpfe, bist Du allein die Zuflucht (parāyaṇo), die höchste Stätte, zu der man geht. Du allein bist der Halt (patiṭṭhā), der Ort der Festigkeit. Weil Du die Finsternis der Verblendung der Welt vertreibst, bist Du allein das Licht (dīpo), gleich einer Öllampe. Du bist der Höchste der Zweibeiner (dvipaduttamo), der Vortrefflichste unter Göttern, Brahmas und Menschen.“ 220. Puna bhagavantaṃyeva thomento sakkā samudde udakantiādimāha. Tattha caturāsītiyojanasahassagambhīre samudde udakaṃ āḷhakena [Pg.250] pametuṃ minituṃ sakkā bhaveyya, bhante, sabbaññu tava ñāṇaṃ ‘‘ettakaṃ pamāṇa’’nti pametave minituṃ na tveva sakkāti attho. 220. Um wiederum den Erhabenen zu preisen, sprach er die Worte beginnend mit „sakkā samudde udakaṃ“ („Es ist möglich, das Wasser im Meer zu messen“). Darin ist die Bedeutung: „O Herr, Allwissender, es mag zwar möglich sein, das Wasser in den Meeren, die vierundachtzigtausend Yojanas tief sind, mit einem Hohlmaß (āḷhaka) abzumessen, doch es ist keineswegs möglich, Dein Wissen zu ermessen und zu sagen: „Es hat dieses Ausmaß“.“ 221. Tulamaṇḍale tulapañjare ṭhapetvā pathaviṃ medaniṃ dhāretuṃ sakkā, bhante, sabbaññu tava ñāṇaṃ dhāretuṃ na tu eva sakkāti sambandho. 221. Die Verknüpfung der Worte lautet: „O Herr, Allwissender, es ist wohl möglich, die Erde auf eine Waagschale zu legen und zu wiegen, doch Dein allwissendes Wissen zu wiegen (zu erfassen), ist gewiss unmöglich.“ 222. Bhante, sabbaññu ākāso sakalantalikkhaṃ rajjuyā vā aṅgulena vā minituṃ sakkā bhaveyya, tava pana ñāṇaṃ ñāṇākāsaṃ na tu eva pametave minituṃ sakkāti attho. 222. Die Bedeutung ist: „O Herr, Allwissender, es mag zwar möglich sein, den unendlichen Raum, den gesamten Luftraum, mit einem Seil oder mit dem Finger auszumessen, doch Dein Wissen, das einem Raum gleicht, kann man keinesfalls ermessen oder auswiegen.“ 223. Mahāsamudde udakanti caturāsītiyojanasahassagambhīre sāgare akhilaṃ udakañca, catunahutādhikadviyojanasatasahassabahalaṃ akhilaṃ pathaviñca jahe jaheyya atikkameyya samaṃ kareyya buddhassa ñāṇaṃ upādāya gahetvā tuleyya samaṃ kareyya. Upamāto upamāvasena na yujjare na yojeyyuṃ. Ñāṇameva adhikanti attho. 223. „Das Wasser im großen Ozean“: Wenn man das gesamte Wasser im 84.000 Yojanas tiefen Ozean und die gesamte, 240.000 Yojanas dicke Erde wegnähme (bzw. überschreiten oder gleichmachen würde), um sie mit dem Wissen des Buddha zu vergleichen, abzuwägen oder gleichzusetzen, so ließe sich dies im Wege des Vergleichs nicht vereinbaren. Die Bedeutung ist, dass das Wissen [des Buddha] weitaus größer ist. 224. Cakkhuma pañcahi cakkhūhi cakkhumanta, ālapanametaṃ. Saha devehi pavattassa lokassa, bhummatthe sāmivacanaṃ. Sadevake lokasmiṃ antare yesaṃ yattakānaṃ sattānaṃ cittaṃ pavattati. Ete tattakā sacittakā sattā tava ñāṇamhi antojālagatā ñāṇajālasmiṃ anto paviṭṭhāti sambandho, ñāṇajālena sabbasatte passasīti attho. 224. „O Sehender“ ist eine Anrede an denjenigen, der mit den fünf Augen ausgestattet ist. „Der Welt samt den Göttern“ steht als Genitiv in der Bedeutung des Lokativs. In dieser Welt mit den Göttern existieren Wesen, insofern sie ein Bewusstsein haben. Der Zusammenhang ist: All diese fühlenden Wesen sind in das Netz Deines Wissens eingegangen (befinden sich darin). Das bedeutet: Mit dem Netz Deines Wissens siehst Du alle Wesen. 225. Bhante, sabbaññu sabbadhammajānanaka, tvaṃ yena ñāṇena catumaggasampayuttena sakalaṃ uttamaṃ bodhiṃ nibbānaṃ patto adhigato asi bhavasi, tena ñāṇena paratitthiye aññatitthiye maddasī abhibhavasīti sambandho. 225. „Herr, Allwissender, Kenner aller Phänomene! Mit jenem Wissen, das mit den vier Pfaden verbunden ist, durch welches Du die vollständige, höchste Erleuchtung, das Nibbāna, erlangt hast – mit diesem Wissen bezwingst und überwindest Du die Andersgläubigen (Häretiker).“ Dies ist der Zusammenhang. 226. Tena tāpasena thomitākāraṃ pakāsentā dhammasaṅgāhakā therā imā gāthā thavitvānāti āhaṃsu. Tattha imā gāthāti ettakāhi gāthāhi thavitvāna thomanaṃ katvāna nāmena suruci nāma tāpaso sesaṭṭhakathāsu (a. ni. aṭṭha. 1.1.189-190; dha. pa. aṭṭha. 1.sāriputtattheravatthu) pana ‘‘saradamāṇavo’’ti āgato. So aṭṭhakathānayato pāṭhoyeva pamāṇaṃ, atha vā sundarā ruci ajjhāsayo nibbānālayo assāti suruci. Sarati gacchati indriyadamanāya [Pg.251] pavattatīti sarado, iti dvayampi tasseva nāmaṃ. So surucitāpaso ajinacammaṃ pattharitvāna pathaviyaṃ nisīdi, accāsannādayo cha nisajjadose vajjetvā sarado nisīdīti attho. 226. Um die Art und Weise des Lobpreises durch jenen Asketen zu verdeutlichen, sprachen die das Dhamma rezitierenden Theras diese Verse: „Nachdem er [ihn] gepriesen hatte...“ Hierbei bedeutet „diese Verse“: nachdem er mit so vielen Versen Lob dargebracht hatte. Der Asket namens Suruci wird in den übrigen Kommentaren jedoch als „Sarada-Māṇava“ bezeichnet. Nach der Methode der Kommentare ist der überlieferte Text maßgeblich; alternativ: „Suruci“ ist derjenige, dessen Neigung (ruci) rein bzw. auf das Nibbāna gerichtet ist. „Sarada“ ist derjenige, der wandelt, um seine Sinne zu zügeln. Somit sind beide Bezeichnungen Namen derselben Person. Jener Asket Suruci breitete ein Antilopenfell auf der Erde aus und setzte sich nieder; das bedeutet, Sarada setzte sich nieder, wobei er die sechs Fehler des Sitzens (wie etwa zu nahe zu sitzen usw.) vermied. 227. Tattha nisinno tāpaso tassa bhagavato ñāṇameva thomento cullāsītisahassānītiādimāha. Tattha cullāsītisahassānīti caturāsītisahassāni, girirājā merupabbatarājā, mahaṇṇave sāgare ajjhogāḷho adhiogāḷho paviṭṭho, tāvadeva tattakāni caturāsītisahassāni accuggato atiuggato idāni pavuccatīti sambandho. 227. Dort sitzend sprach der Asket, um das Wissen des Erhabenen zu preisen, die Verse beginnend mit: „Vierundachtzigtausend...“. Darin bedeutet „cullāsītisahassāni“: 84.000 [Yojanas]; der König der Berge, der Bergkönig Meru, ist in den tiefen Ozean eingetaucht, und genau um dieses Maß von 84.000 [Yojanas] ragt er empor. Dies ist der Zusammenhang mit dem, was nun ausgedrückt wird. 228. Tāva accuggato tathā atiuggato neru, so mahāneru āyato uccato ca vitthārato ca evaṃ mahanto nerurājā koṭisatasahassiyo saṅkhāṇubhedena cuṇṇito cuṇṇavicuṇṇaṃ kato asi. 228. Ebenso weit emporragend ist der Neru, jener große Neru, in seiner Länge, Höhe und Breite. Ein so gewaltiger Bergkönig Meru wurde in hunderttausend Millionen Teile zermalmt und zu feinstem Staub zerrieben. 229. Bhante, sabbaññu tava ñāṇaṃ lakkhe ṭhapiyamānamhi ñāṇe sataṃ vā sahassaṃ vā satasahassaṃ vā ekekaṃ binduṃ katvā ṭhapite tadeva mahānerussa cuṇṇaṃ khayaṃ gaccheyya, tava ñāṇaṃ pametave pamāṇaṃ kātuṃ eva na sakkāti sambandho. 229. „Herr, Allwissender! Wenn man Dein Wissen als Maßstab anlegt und für jeden Teil dieses Wissens – seien es hundert, tausend oder hunderttausend Teile – jeweils ein einzelnes Staubkorn [des Berges Meru] hinlegen würde, so würde selbst jener Staub des großen Meru zur Neige gehen. Es ist jedoch unmöglich, Dein Wissen auf diese Weise zu ermessen oder zu vergleichen.“ Dies ist der Zusammenhang. 230. Sukhumacchikena sukhumacchiddena jālena yo sakalamahāsamudde udakaṃ parikkhipe samantato parikkhaṃ kareyya, evaṃ parikkhite ye keci pāṇā udake jātā sabbe te antojālagatā siyuṃ bhaveyyunti attho. 230. Wenn jemand mit einem engmaschigen Netz mit feinen Öffnungen das gesamte Wasser des großen Ozeans umschließen und ringsum einhegen würde, so würden alle im Wasser geborenen Wesen, welche auch immer es sein mögen, in diesem Netz gefangen sein. Dies ist der Sinn. 231. Tamupameyyaṃ dassento tatheva hītiādimāha. Tattha yathā udajā pāṇā antojālagatā honti, tatheva mahāvīra mahābodhiadhigamāya vīriyakara. Ye keci puthu anekā titthiyā micchā titthakarā diṭṭhigahanapakkhandā diṭṭhisaṅkhātagahanaṃ paviṭṭhā parāmāsena sabhāvato parato āmasanalakkhaṇāya diṭṭhiyā mohitā pihitā santi. 231. Um dieses zu Vergleichende aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Ebenso gewiss...“. Darin bedeutet es: Ebenso wie die im Wasser lebenden Wesen im Netz gefangen sind, genau so verhält es sich, o großer Held, der Du Tatkraft anwendest, um die große Erleuchtung zu erlangen. Die vielen verschiedenen Andersgläubigen und falschen Lehrer, die in das Dickicht der falschen Ansichten geraten sind, sind von der falschen Ansicht, die das Merkmal des dogmatischen Festhaltens hat, verblendet und verhüllt. 232. Tava [Pg.252] suddhena nikkilesena ñāṇena anāvaraṇadassinā sabbadhammānaṃ āvaraṇarahitadassanasīlena ete sabbe titthiyā antojālagatā ñāṇajālassanto pavesitā vā tathevāti sambandho. Ñāṇaṃ te nātivattareti tava ñāṇaṃ te titthiyā nātikkamantīti attho. 232. Durch Dein reines, von Befleckungen freies Wissen, das ungehindert sieht und die Eigenschaft besitzt, alle Phänomene ohne Schleier wahrzunehmen, sind all diese Andersgläubigen im Netz gefangen bzw. in das Netz Deines Wissens eingeschlossen. „Sie überschreiten Dein Wissen nicht“ bedeutet, dass jene Andersgläubigen Dein Wissen nicht übertreffen können. 233. Evaṃ vuttathomanāvasāne bhagavato attano byākaraṇārabbhaṃ dassetuṃ bhagavā tamhi samayetiādimāha. Tattha yasmiṃ samaye tāpaso bhagavantaṃ thomesi, tasmiṃ thomanāya pariyosānakāle saṅkhyātikkantaparivāratāya mahāyaso anomadassī bhagavā kilesamārādīnaṃ jitattā jino. Samādhimhā appitasamādhito vuṭṭhahitvā sakalajambudīpaṃ dibbacakkhunā olokesīti sambandho. 233. Am Ende dieses so dargebrachten Lobpreises sprach der Erhabene die Worte beginnend mit: „Der Erhabene zu jener Zeit...“, um den Beginn seiner Prophezeiung für ihn aufzuzeigen. Darin bedeutet es: Zu jener Zeit, als der Asket den Erhabenen pries, am Ende dieses Lobpreises, erhob sich der ruhmreiche Erhabene Anomadassī – der aufgrund seines unermesslich großen Gefolges hochangesehen war und als Sieger galt, da er die Befleckungen und den Māra bezwungen hatte – aus der tiefen Konzentration (Samādhi) und blickte mit dem göttlichen Auge über das gesamte Jambudīpa. Dies ist der Zusammenhang. 234-5. Tassa anomadassissa bhagavato munino monasaṅkhātena ñāṇena samannāgatassa nisabho nāma sāvako santacittehi vūpasantakilesamānasehi tādīhi iṭṭhāniṭṭhesu akampiyasabhāvattā, tādibhi khīṇāsavehi suddhehi parisuddhakāyakammādiyuttehi chaḷabhiññehi tādīhi aṭṭhahi lokadhammehi akampanasabhāvehi satasahassehi parivuto buddhassa cittaṃ, aññāya jānitvā lokanāyakaṃ upesi, tāvadeva samīpaṃ agamāsīti sambandho. 234-5. Dem Erhabenen Anomadassī, dem Weisen, der mit dem als Weisheit bezeichneten Wissen ausgestattet war, näherte sich sein Hauptschüler namens Nisabha, umgeben von einhunderttausend Arahats. Diese besaßen einen friedvollen Geist, da ihre Herzen von den Befleckungen beruhigt waren; sie waren unerschütterlich gegenüber dem Angenehmen und Unangenehmen, rein und mit vollkommen lauteren körperlichen Handlungen usw. ausgestattet, besaßen die sechs höheren Geisteskräfte und blieben unbewegt von den acht weltlichen Gegebenheiten (Lokadhamma). Nachdem er den Geist des Buddha erkannt hatte, trat er sogleich vor den Führer der Welt und begab sich in seine Nähe. Dies ist der Zusammenhang. 236. Te tathā āgatā samānā tattha bhagavato samīpe. Antalikkhe ākāse ṭhitā bhagavantaṃ padakkhiṇaṃ akaṃsu. Te sabbe pañjalikā namassamānā ākāsato buddhassa santike otaruṃ orohiṃsūti sambandho. 236. Nachdem sie auf diese Weise in die Nähe des Erhabenen gelangt waren, verweilten sie in der Luft (im Raum) und umrundeten den Erhabenen ehrerbietig von rechts. Sie alle stiegen mit ehrfürchtig gefalteten Händen aus der Luft herab in die Gegenwart des Buddha. Dies ist der Zusammenhang. 237. Puna byākaraṇadānassa pubbabhāgakāraṇaṃ pakāsento sitaṃ pātukarītiādimāha. Taṃ sabbaṃ uttānatthameva. 237. Um wiederum die vorbereitende Ursache für die Gewährung der Prophezeiung aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Er ließ ein Lächeln erscheinen...“. All dies hat eine ganz offensichtliche Bedeutung. 241. Yo maṃ pupphenāti yo tāpaso mayi cittaṃ pasādetvā anekapupphena maṃ pūjesi, ñāṇañca me anu punappunaṃ thavi thomesi, tamahanti taṃ tāpasaṃ ahaṃ kittayissāmi pākaṭaṃ karissāmi, mama bhāsato bhāsantassa vacanaṃ suṇotha savanavisayaṃ karotha manasi karotha. 241. „Wer mich mit einer Blume [ehrt]“: jener Asket, der seinen Geist voller Vertrauen auf mich richtete, mich mit zahlreichen Blumen verehrte und mein Wissen immer wieder pries. „Ihn werde ich [verkünden]“: Ich werde diesen Asketen rühmen und bekannt machen. Während ich spreche, hört meine Worte, macht sie zum Gegenstand eures Gehörs und nehmt sie euch zu Herzen. 250. Pacchime [Pg.253] bhavasampatteti byākaraṇaṃ dadamāno bhagavā āha. Tattha pacchime pariyosānabhūte bhave sampatte sati. Manussattaṃ manussajātiṃ gamissati, manussaloke uppajjissatīti attho. Rūpasāradhanasāravayasārakulasārabhogasārapuññasārādīhi sārehi sāravantatāya sārī nāma brāhmaṇī kucchinā dhārayissati. 250. Indem er die Prophezeiung erteilte, sprach der Erhabene diese Worte. Darin bedeutet „wenn das letzte Dasein erreicht ist“: Wenn das letzte, abschließende Dasein eingetreten ist, wird er das Menschentum erlangen, das heißt, er wird in der Menschenwelt geboren werden. Eine Brahmanin namens Sārī wird ihn in ihrem Schoß tragen, da sie reich an Vorzügen (Essenzen) ist, wie der Vollkommenheit der äußeren Gestalt, des Reichtums, des Alters, der Familie, des Besitzes, der Verdienste und anderer Qualitäten. 253. Byākaraṇamūlamārabhi aparimeyye ito kappeti. Ettha dvinnaṃ aggasāvakānaṃ ekaṃ asaṅkhyeyyaṃ kappasatasahassañca pāramī pūritā, tathāpi gāthābandhasukhatthaṃ antarakappāni upādāya evaṃ vuttanti daṭṭhabbaṃ. 253. Er begann das Fundament für die Weissagung mit den Worten: 'In unermesslichen Weltzeitaltern von diesem Weltzeitalter an'. Hierbei wurden die Vollkommenheiten (Pāramī) der zwei Hauptschüler während eines unzählbaren Weltzeitalters (Asaṅkhyeyya) und einhunderttausend Weltzeitaltern (Kappasatasahassa) erfüllt; dennoch ist anzusehen, dass dies so gesagt wurde, um das Verfassen der Verse zu erleichtern, indem auf die Zwischen-Weltzeitalter (Antarakappa) Bezug genommen wurde. 254. ‘‘Sāriputtoti nāmena, hessati aggasāvako’’ti byākaraṇamadāsi, byākaraṇaṃ datvā taṃ thomento so bhagavā ayaṃ bhāgīrathītiādimāha. Gaṅgā, yamunā, sarabhū, mahī, aciravatīti imāsaṃ pañcannaṃ gaṅgānaṃ antare ayaṃ bhāgīrathī nāma paṭhamamahāgaṅgā himavantā pabhāvitā himavantato āgatā anotattadahato pabhavā, mahodadhiṃ mahāudakakkhandhaṃ appayanti pāpuṇanti, mahāsamuddaṃ mahāsāgaraṃ appeti upagacchati yathā, tathā eva ayaṃ sāriputto sake tīsu visārado attano kule pavattamānesu tīsu vedesu visārado apakkhalitañāṇo patthaṭañāṇo. Paññāya pāramiṃ gantvā attano sāvakañāṇassa pariyosānaṃ gantvā, pāṇine sabbasatte tappayissati santappessati suhittabhāvaṃ karissatīti attho. 254. Er gab die Weissagung: 'Unter dem Namen Sāriputta wird er der Hauptschüler sein.' Nachdem er diese Weissagung gegeben hatte, sprach der Erhabene, um ihn zu preisen, die Worte, die mit 'Diese Bhāgīrathī...' beginnen. So wie unter den fünf Flüssen Gaṅgā, Yamunā, Sarabhū, Mahī und Acīravatī dieser erste große Fluss namens Bhāgīrathī, der im Himavanta entspringt, vom Himavanta herabkommt, seinen Ursprung im Anotatta-See hat und in den Ozean mündet, die große Wassermasse dorthin fließen lässt und den großen Ozean erreicht – ebenso ist dieser Sāriputta bewandert in seinen eigenen drei Veden, bewandert in den drei Veden, die in seiner eigenen Familie gepflegt werden, von unfehlbarem Wissen und weitreichendem Wissen. Nachdem er die Vollkommenheit der Weisheit erreicht und die Vollendung seines eigenen Schüler-Wissens (sāvakañāṇa) erlangt hat, wird er alle lebenden Wesen sättigen, sie gänzlich zufriedenstellen und für ihr Wohlbefinden sorgen – dies ist die Bedeutung. 257. Himavantamupādāyāti himālayapabbataṃ ādiṃ katvā mahodadhiṃ mahāsamuddaṃ udakabhāraṃ sāgaraṃ pariyosānaṃ katvā etthantare etesaṃ dvinnaṃ pabbatasāgarānaṃ majjhe yaṃ pulinaṃ yattakā vālukarāsi atthi, gaṇanāto gaṇanavasena asaṅkhiyaṃ saṅkhyātikkantaṃ. 257. Die Worte 'Vom Himavanta an' bedeuten: Ausgehend vom Himālaya-Gebirge bis hin zum großen Ozean, dem Meer voller Wassermassen, sind die Sandbänke und Sandmengen, die sich in diesem Zwischenraum zwischen diesen beiden – dem Gebirge und dem Ozean – befinden, nach der Zählung unzählbar, da sie jede Berechnung übersteigen. 258. Tampi sakkā asesenāti taṃ pulinampi nisesena saṅkhātuṃ sakkā sakkuṇeyya bhaveyya, sā gaṇanā yathā hotīti sambandho. Tathā sāriputtassa paññāya anto pariyosānaṃ na tveva bhavissatīti attho. 258. Die Worte 'Selbst dies gänzlich [zu zählen] ist möglich' bedeuten: Es könnte möglich sein, selbst jenen Sand lückenlos zu zählen; dies ist der Zusammenhang bezüglich jener Berechnung. Ebenso jedoch wird es für das Ende oder die Grenze der Weisheit Sāriputtas niemals eine Begrenzung geben – dies ist die Bedeutung. 259. Lakkhe…pe… [Pg.254] bhavissatīti lakkhe ñāṇalakkhe ñāṇassa ekasmiṃ kale ṭhapiyamānamhi ṭhapite sati gaṅgāya vālukā khīye parikkhayaṃ gaccheyyāti attho. 259. Die Worte 'In Hunderttausenden... wird sein' bedeuten: Wenn Hunderttausende Teile des Wissens zu einer einzigen Zeit dargelegt werden, würde der Sand der Gaṅgā eher schwinden und zur Neige gehen – dies ist die Bedeutung. 260. Mahāsamuddeti caturāsītiyojanasahassagambhīre catumahāsāgare ūmiyo gāvutādibhedā taraṅgarāsayo gaṇanāto asaṅkhiyā saṅkhyāvirahitā yathā honti, tatheva sāriputtassa paññāya anto pariyosānaṃ na hessati na bhavissatīti sambandho. 260. Die Worte 'Im großen Ozean' beziehen sich auf den vierundachtzigtausend Yojanas tiefen, viergeteilten großen Ozean: So wie die Wellen, die sich in Abständen von einer Meile (Gāvuta) und mehr brechen, und die Massen der Wogen nach der Zählung unzählbar und bar jeder Zahl sind, ebenso wird es für das Ende und die Grenze von Sāriputtas Weisheit kein Erreichen geben – dies ist der Zusammenhang. 261. So evaṃ paññavā sāriputto gotamagottattā gotamaṃ sakyakule jeṭṭhakaṃ sakyapuṅgavaṃ sambuddhaṃ ārādhayitvā vattapaṭipattisīlācārādīhi cittārādhanaṃ katvā paññāya sāvakañāṇassa pāramiṃ pariyosānaṃ gantvā tassa bhagavato aggasāvako hessatīti sambandho. 261. Der so weise Sāriputta wird – da er zur Gotama-Sippe gehört – den Gotama, den Besten im Sakya-Geschlecht, den vortrefflichen Sakya-Stier, den vollkommen Erleuchteten (Sambuddha), erfreuen, indem er durch die Pflichten, die Praxis, die Tugend und das gute Verhalten das Herz des Meisters erfreut. Nachdem er durch seine Weisheit das Äußerste und die Vollendung des Schüler-Wissens (sāvakañāṇa) erreicht hat, wird er der Hauptschüler dieses Erhabenen werden – dies ist der Zusammenhang. 262. So evaṃ aggasāvakaṭṭhānaṃ patto sakyaputtena bhagavatā iṭṭhāniṭṭhesu akampiyasabhāvena pavattitaṃ pākaṭaṃ kataṃ dhammacakkaṃ saddhammaṃ anuvattessati avinassamānaṃ dhāressati. Dhammavuṭṭhiyo dhammadesanāsaṅkhātā vuṭṭhiyo vassento desento pakāsento vivaranto vibhajanto uttānīkaronto pavattissatīti attho. 262. Nachdem er die Stellung des Hauptschülers erlangt hat, wird er das vom Erhabenen, dem Sakya-Sohn, in Gang gesetzte, angesichts von Angenehmem und Unangenehmem unerschütterliche und offenkundig gemachte Rad der Lehre (Dhammacakka), die wahre Lehre, weiterdrehen und sie unverdorben bewahren. Indem er die Regenströme der Lehre – nämlich die Lehrverkündigungen – herabregnen lässt, sie predigt, offenbart, entschlüsselt, analysiert und verdeutlicht, wird er sie in Gang halten – dies ist die Bedeutung. 263. Gotamo sakyapuṅgavo bhagavā etaṃ sabbaṃ abhiññāya visesena ñāṇena jānitvā bhikkhusaṅghe ariyapuggalamajjhe nisīditvā aggaṭṭhāne sakalapaññādiguṇagaṇābhirame uccaṭṭhāne ṭhapessatīti sambandho. 263. Der Erhabene Gotama, der vortreffliche Sakya-Stier, wird, nachdem er all dies durch sein höheres Wissen erkannt und mit besonderer Erkenntnis gewusst hat, inmitten der Mönchsgemeinde (Bhikkhusaṅgha), im Kreise der edlen Personen (Ariyapuggala), sitzen und ihn auf den höchsten Platz stellen, auf den erhabenen Platz, der durch die Fülle aller Tugenden wie Weisheit und dergleichen erfreulich ist – dies ist der Zusammenhang. 264. Evaṃ so laddhabyākaraṇo somanassappatto pītisomanassavasena udānaṃ udānento aho me sukataṃ kammantiādimāha. Tattha ahoti vimhayatthe nipāto. Anomadassissa bhagavato satthuno garuno sukataṃ suṭṭhu kataṃ saddahitvā kataṃ kammaṃ puññakoṭṭhāsaṃ aho vimhayaṃ acinteyyānubhāvanti attho. Yassa bhagavato ahaṃ kāraṃ puññasambhāraṃ katvā sabbattha sakalaguṇagaṇe pāramiṃ pariyosānaṃ gato paramaṃ koṭiṃ sampatto, so bhagavā aho vimhayoti sambandho. 264. Nachdem er so die Weissagung erhalten hatte und von Heiterkeit erfüllt war, sprach er voller Freude und Entzücken diesen feierlichen Ausruf (Udāna), der mit 'O, meine wohlgetane Tat...' beginnt. Darin ist 'aho' eine Partikel im Sinne des Staunens. 'Wohlgetane Tat' bezeichnet das heilsame Verdienstwerk, das im Vertrauen auf das Gesetz von Kamma und Frucht gegenüber dem Erhabenen Anomadassī, dem Meister und Lehrer, wohlgerichtet vollbracht wurde; 'o Staunen! Seine Macht ist unvorstellbar!' – dies ist die Bedeutung. Zu welchem Erhabenen hin ich die Ehrung und das Ansammeln von Verdiensten vollbrachte, wodurch ich in jeder Hinsicht das Äußerste der Vollkommenheit aller Tugenden erreichte und den höchsten Gipfel erlangte – o, wie staunenswert ist jener Erhabene! – dies ist der Zusammenhang. 265. Aparimeyyeti [Pg.255] saṅkhyātikkantakālasmiṃ kataṃ kusalakammaṃ, me mayhaṃ idha imasmiṃ pacchimattabhāve phalaṃ vipākaṃ dassesi. Sumutto suṭṭhu vimutto chekena dhanuggahena khitto saravego iva ahaṃ tena puññaphalena kilese jhāpayiṃ jhāpesinti attho. 265. Die Worte 'In unermesslichen [Weltzeitaltern]' bedeuten: Das heilsame Kamma (kusalakamma), das in einer die Berechnung übersteigenden Zeit vollbracht wurde, hat mir hier, in dieser meiner letzten Existenz, seine Frucht und Reifung gezeigt. Wie die Wucht eines Pfeils, der von einem geschickten Bogenschützen wohlgezielt abgeschossen wurde, so habe ich durch jene Verdienstfrucht die Befleckungen (Kilesa) verbrannt und restlos vernichtet – dies ist die Bedeutung. 266. Attano eva vīriyaṃ pakāsento asaṅkhatantiādimāha. Tattha asaṅkhatanti na saṅkhataṃ, paccayehi samāgamma na katanti attho. Taṃ asaṅkhataṃ nibbānaṃ kilesakālussiyābhāvena acalaṃ katasambhārānaṃ patiṭṭhaṭṭhena padaṃ gavesanto pariyesanto sabbe titthiye sakale titthakare diṭṭhuppādake puggale vicinaṃ upaparikkhanto esāhaṃ eso ahaṃ bhave kāmabhavādike bhave saṃsariṃ paribbhaminti sambandho. 266. Um seine eigene Tatkraft zu offenbaren, sprach er die Worte, die mit 'Das Unbedingte...' beginnen. Darin bedeutet 'unbedingt' (asaṅkhata): nicht gestaltet, das heißt, nicht durch das Zusammenkommen von Bedingungen hervorgebracht. Während ich nach jenem unbedingten Nibbāna suchte – der Stätte, die wegen der Abwesenheit von Trübungen durch Befleckungen unerschütterlich ist und den Ort des Bestandes für jene bildet, die die spirituellen Voraussetzungen erlangt haben –, suchte und prüfte ich alle Sektierer, all jene Lehrer von Irrlehren, die falsche Ansichten hervorbringen, und wanderte so ('ich, eben dieser') im Daseinskreislauf, im Begehrens-Dasein und den anderen Daseinsbereichen umher – dies ist der Zusammenhang. 267-8. Attano adhippāyaṃ pakāsento yathāpi byādhito posotiādimāha. Tattha byādhitoti byādhinā pīḷito poso puriso osadhaṃ pariyeseyya yathā, tathā ahaṃ asaṅkhataṃ amataṃ padaṃ nibbānaṃ gavesanto abbokiṇṇaṃ avicchinnaṃ nirantaraṃ, pañcasataṃ jātipañcasatesu attabhāvesu isipabbajjaṃ pabbajinti sambandho. 267-8. Um seine Absicht zu bekunden, sprach er die Worte, die mit 'Wie ein kranker Mensch...' beginnen. Darin heißt es: So wie ein Mensch, der von einer Krankheit geplagt wird, nach Medizin sucht, ebenso habe ich auf der Suche nach dem unbedingten, todlosen Zustand des Nibbāna – ununterbrochen, ungestört und fortlaufend – in fünfhundert Existenzen die Hauslosigkeit eines Weisen (isipabbajjā) auf mich genommen – dies ist der Zusammenhang. 271. Kutitthe sañcariṃ ahanti lāmake titthe gamanamagge ahaṃ sañcariṃ. 271. Die Worte 'Ich wanderte an schlechten Fährten' bedeuten: Ich irrte auf verwerflichen Pfaden und Irrwegen umher. 272. Sāratthiko poso sāragavesī puriso. Kadaliṃ chetvāna phālayeti kadalikkhandhaṃ chetvā dvedhā phāleyya. Na tattha sāraṃ vindeyyāti phāletvā ca pana tattha kadalikkhandhe sāraṃ na vindeyya na labheyya, so puriso sārena rittako tucchoti sambandho. 272. Ein 'nach Kernholz verlangender Mensch' ist ein Mann, der nach dem Wesentlichen (sāra) sucht. 'Wenn er eine Bananenstaude fällen und spalten würde' bedeutet, dass er den Stamm einer Bananenstaude umhauen und in zwei Hälften spalten würde. 'Er würde darin kein Kernholz finden' bedeutet, dass er selbst nach dem Spalten im Stamm der Bananenstaude kein Kernholz finden und erlangen würde, sodass dieser Mann leer und bar jedes Kernholzes bleibt – dies ist der Zusammenhang. 273. Yathā kadalikkhandho sārena ritto tuccho, tatheva tathā eva loke titthiyā nānādiṭṭhigatikā bahujjanā asaṅkhatena nibbānena rittā tucchāti sambandho. Seti nipātamattaṃ. 273. Ebenso wie der Stamm einer Bananenstaude leer und ohne Kernholz ist, genau so sind in dieser Welt die Sektierer und die vielen Menschen, die unterschiedlichen falschen Ansichten folgen, leer und bar des unbedingten Nibbāna – dies ist der Zusammenhang. Das Wort 'se' ist bloß eine Partikel. 274. Pacchimabhave pariyosānajātiyaṃ brahmabandhu brāhmaṇakule jāto ahaṃ ahosinti attho. Mahābhogaṃ chaḍḍetvānāti mahantaṃ bhogakkhandhaṃ [Pg.256] kheḷapiṇḍaṃ iva chaḍḍetvā, anagāriyaṃ kasivāṇijjādikammavirahitaṃ tāpasapabbajjaṃ pabbajiṃ paṭipajjinti attho. 274. Die Worte 'In meiner letzten Existenz' bedeuten: In meiner allerletzten Geburt wurde ich in einer angesehenen Brahmanenfamilie geboren – dies ist die Bedeutung. 'Nachdem ich großen Reichtum aufgegeben hatte' bedeutet: Nachdem ich eine gewaltige Menge an Besitzgütern wie einen Speichelklumpen weggeworfen hatte, zog ich in die Hauslosigkeit (anagāriya) aus – was bedeutet, dass ich die Entsagung eines Asketen auf mich nahm, die frei von weltlichen Beschäftigungen wie Ackerbau, Handel und dergleichen ist – dies ist die Bedeutung. Paṭhamabhāṇavāravaṇṇanā samattā. Die Erkl$rung des ersten Rezitationsabschnitts (Paሐhamabhāቇavāra) ist abgeschlossen. 275-7. Ajjhāyako…pe… muniṃ mone samāhitanti monaṃ vuccati ñāṇaṃ, tena monena samannāgato muni, tasmiṃ mone sammā āhitaṃ ṭhapitaṃ samāhitaṃ cittanti attho. Āgusaṅkhātaṃ pāpaṃ na karotīti nāgo, assajitthero, taṃ mahānāgaṃ suṭṭhu phullaṃ vikasitapadumaṃ yathā virocamānanti attho. 275-7. „‘Ajjhāyako …pe… muniቃ mone samāhitaቃ’: Als ‘mona’ wird das Wissen ($āቇa) bezeichnet. Derjenige, der mit diesem ‘mona’ ausgestattet ist, ist ein Weiser (muni). ‘Samāhita’ bedeutet, dass der Geist in diesem ‘mona’ wohlbegr%ndet, das hei!t fest verankert (ሐhapita) ist. Er begeht kein als ‘āgu’ bezeichnetes "bel (pāpa), daher wird er ‘Nāga’ genannt; dies bezieht sich auf den $lteren Assaji. ‘Taቃ mahānāgaቃ’ bedeutet: jenen gro!en Nāga, der wie eine herrlich erbl%hte, voll entfaltete Lotusbl%te erstrahlt.“ 278-281. Disvā me…pe… pucchituṃ amataṃ padanti uttānatthameva. 278-281. „‘Disvā me …pe… pucchituቃ amataቃ padaቃ’: Dies hat eine leicht verst$ndliche Bedeutung.“ 282. Vīthintareti vīthiantare anuppattaṃ sampattaṃ upagataṃ taṃ theraṃ upagantvāna samīpaṃ gantvā ahaṃ pucchinti sambandho. 282. „‘Vġthintare’ (mitten auf der Stra!e) bedeutet: den auf der Stra!e angekommenen, dort eingetroffenen und anwesenden $lteren. ‘Upagantvāna’ bedeutet: nachdem ich in seine N$he getreten war, fragte ich ihn; so ist die Verkn%pfung der Worte.“ 284. Kīdisaṃ te mahāvīrāti sakaladhitipurisasāsane arahantānamantare paṭhamaṃ dhammacakkapavattane, arahattappattamahāvīra, anujātaparivārabahulatāya mahāyasa te tava buddhassa kīdisaṃ sāsanaṃ dhammaṃ dhammadesanāsaṅkhātaṃ sāsananti sambandho. So bhadramukha, me mayhaṃ sādhu bhaddakaṃ sāsanaṃ kathayassu kathehīti attho. 284. „‘Kġdisaቃ te mahāvġra’ (Wie ist deine Lehre, o gro!er Held?): Unter den Arahants in der gesamten Lehre des standhaften Mannes, der als Erster das Rad der Lehre in Bewegung setzte; o gro!er Held, der das Arahanttuch erlangt hat; o Ruhmreicher aufgrund der F%lle deiner treuen Gefolgschaft – wie ist deine, dieses Buddhas, Lehre (sāsana), das hei!t die Lehre, die als Verk%ndigung des Dhamma bekannt ist? So ist der Zusammenhang. ‘So bhadramukha, me mayhaቃ sādhu bhaddakaቃ sāsanaቃ kathayassu’ bedeutet: O du mit dem g%tigen Antlitz, verk%nde mir g%tigerweise diese vortreffliche Lehre; das ist die Bedeutung.“ 285. Tato kathitākāraṃ dassento so me puṭṭhotiādimāha. Tattha soti assajitthero, me mayā puṭṭho ‘‘sāsanaṃ kīdisa’’nti kathito sabbaṃ kathaṃ kathesi. Sabbaṃ sāsanaṃ satthagambhīratāya gambhīraṃ desanādhammapaṭivedhagambhīratāya gambhīraṃ paramatthasaccavibhāvitādivasena nipuṇaṃ padaṃ nibbānaṃ taṇhāsallassa hantāraṃ vināsakaraṃ sabbassa saṃsāradukkhassa apanudanaṃ khepanakaraṃ dhammanti sambandho. 285. „Um die Art und Weise des daraufhin Gesagten zu zeigen, sprach er: ‘So me puሐሐho’ (Er, von mir gefragt) und so weiter. Darin bedeutet ‘so’: der $ltere Assaji. Von mir gefragt mit den Worten ‘Wie ist die Lehre?’, erz$hlte er die gesamte Darlegung. Die Verkn%pfung lautet: Er verk%ndete den gesamten Dhamma, der aufgrund der Tiefe seiner Bedeutung tief ist, der aufgrund der Tiefe der Verk%ndigung, des Dhamma und der Durchdringung tief ist, der feinsinnig (nipuቇa) ist, da er die absolute Wahrheit verdeutlicht, der zum Zustand des Nibbāna f%hrt, der den Pfeil des Begehrens vernichtet, und der das gesamte Leiden im Kreislauf der Wiedergeburten (saቃsāra) vertreibt und beendet.“ 286. Tena kathitākāraṃ dassento ye dhammātiādimāha. Hetuppabhavā hetuto kāraṇato uppannā jātā bhūtā sañjātā nibbattā abhinibbattā, ye dhammā ye sappaccayā sabhāvadhammā santi saṃvijjanti upalabhantīti [Pg.257] sambandho. Tesaṃ dhammānaṃ hetuṃ kāraṇaṃ tathāgato āha kathesi. Tesañca yo nirodhoti tesaṃ hetudhammānaṃ yo nirodho nirujjhanasabhāvo, evaṃvādī mahāsamaṇoti sīlasamādhipaññādiguṇaparivāramahantatāya samitapāpattā viddhaṃsitapāpattā ca mahāsamaṇo bhagavā evaṃvādī hetuvūpasamanādivadanasīlo kathetāti attho. 286. „Um die Art und Weise dessen aufzuzeigen, was von jenem dargelegt wurde, sprach er: ‘Ye dhammā’ (Welche Dinge) und so weiter. ‘Hetuppabhavā’ bedeutet: aus einer Ursache, aus einem Grund entstanden, geboren, geworden, hervorgebracht, entsprungen, herbeigef%hrt. Die Verkn%pfung lautet: Welche bedingten Ph$nomene der Natur existieren, vorkommen und wahrnehmbar sind – deren Ursache, deren Grund hat der Tathāgata dargelegt. ‘Tesa!ca yo nirodho’ bedeutet: und welches das Aufh!ren dieser urs$chlichen Ph$nomene ist, also ihre Natur des Vergehens. ‘Evaቃvādġ mahāsamaቇo’ bedeutet: Der gro!e Asket (mahāsamaቇo), der Erhabene, der aufgrund der Gr!e!e seines Gefolges an Tugenden wie Sittlichkeit, Konzentration und Weisheit das B%se zur Ruhe gebracht und vernichtet hat, lehrt auf diese Weise, das hei!t, er pflegt die Beruhigung der Ursachen und $hnliches zu verk%nden; das ist die Bedeutung.“ 287. Tato vuttadhammaṃ sutvā attanā paccakkhakatappakāraṃ dassento sohantiādimāha. Taṃ uttānameva. 287. „Um sodann die Art und Weise zu zeigen, wie er den verk%ndeten Dhamma h!rte und ihn selbst direkt erkannte, sprach er: ‘Sohaቃ’ (Ich nun) und so weiter. Dies ist leicht verst$ndlich.“ 289. Eseva dhammo yaditāvadevāti sacepi ito uttariṃ natthi, ettakameva idaṃ sotāpattiphalameva pattabbaṃ. Tathā eso eva dhammoti attho. Paccabyatha paṭividdhatha tumhe asokaṃ padaṃ nibbānaṃ. Amhehi nāma idaṃ padaṃ bahukehi kappanahutehi adiṭṭhameva abbhatītaṃ. 289. „‘Eseva dhammo yaditāvadeva’ (Dies selbst ist die Lehre, wenn es auch nur so viel ist) bedeutet: Selbst wenn es dar%ber hinaus nichts Weiteres g$be, ist eben dieses Ausma!, n$mlich die Frucht des Stromeintritts (sotāpattiphala), zu erlangen. Ebenso ist dies selbst die Lehre; das ist die Bedeutung. ‘Paccabyatha’ bedeutet: Ihr habt den kummerfreien Zustand, das Nibbāna, durchdrungen. Wahrlich, dieser Zustand ist von uns %ber viele hunderttausend Weltzeitalter (kappa) hinweg ungesehen geblieben und an uns vorbeigegangen.“ 290. Yvāhaṃ dhammaṃ gavesantoti yo ahaṃ dhammaṃ santipadaṃ gavesanto pariyesanto kutitthe kucchitatitthe ninditabbatitthe sañcariṃ paribbhaminti attho. So me attho anuppattoti so pariyesitabbo attho mayā anuppatto sampatto, idāni pana me mayhaṃ nappamajjituṃ appamādena bhavituṃ kāloti attho. 290. „‘Yvāhaቃ dhammaቃ gavesanto’ (Ich, der ich nach der Lehre suchte) bedeutet: Ich, der ich nach der Lehre, dem Zustand des Friedens, suchte und forschte, bin an schlechten Orten (kutitthe), verwerflichen und tadelnswerten Sektenst$tten, umhergewandert und umhergezogen; das ist die Bedeutung. ‘So me attho anuppatto’ bedeutet: Dieses Ziel, das gesucht werden musste, ist von mir erreicht und erlangt worden. ‘Idāni pana me nappamajjituቃ’ bedeutet: Nun aber ist f%r mich die Zeit, nicht nachl$ssig zu sein, sondern in Achtsamkeit zu verweilen; das ist die Bedeutung.“ 291. Ahaṃ assajinā therena tosito katasomanasso, acalaṃ niccalaṃ nibbānapadaṃ, patvāna pāpuṇitvā sahāyakaṃ kolitamāṇavaṃ gavesanto pariyesanto assamapadaṃ agamāsinti attho. 291. „‘Ich, durch den $lteren Assaji erfreut und in Heiterkeit versetzt, habe den unersch%tterlichen, unbeweglichen Zustand des Nibbāna erreicht, und w$hrend ich meinen Gef$hrten, den jungen Kolita, suchte und nach ihm forschte, begab ich mich zur Einsiedelei’; das ist die Bedeutung.“ 292. Dūratova mamaṃ disvāti assamapadato dūratova āgacchantaṃ mamaṃ disvā susikkhito me mama sahāyo ṭhānanisajjādiiriyāpathehi sampanno samaṅgībhūto idaṃ upari vuccamānavacanaṃ abravi kathesīti attho. 292. „‘Dšratova mamaቃ disvā’ (Als er mich schon von weitem sah) bedeutet: Als er mich von der Einsiedelei aus von weitem herannahen sah, sprach und verk%ndete mein wohlgeschulter Gef$hrte, der mit den richtigen Verhaltensweisen des Stehens, Sitzens usw. vollkommen ausgestattet und harmonisch war, diese im Folgenden genannten Worte; das ist die Bedeutung.“ 293. Bho sahāya, pasannamukhanettāsi pasannehi sobhanehi daddallamānehi mukhanettehi samannāgato asi. Munibhāvo iva te dissati paññāyati. Itthambhūto tvaṃ amatādhigato amataṃ nibbānaṃ adhigato asi, kacci accutaṃ nibbānapadaṃ adhigato adhigacchīti pucchāmīti attho. 293. „‘Bho sahāya, pasannamukhanettāsi’ (O Gef$hrte, du hast ein heiteres Antlitz und klare Augen) bedeutet: Du bist mit einem heiteren, sch!nen und strahlenden Antlitz und ebensolchen Augen ausgestattet. Ein Zustand des Weisen (munibhāva) gleichsam zeigt sich an dir, ist an dir zu erkennen. Da du so beschaffen bist, hast du das Todlose erlangt, das todlose Nibbāna erreicht. ‘Hast du etwa den unverg$nglichen Zustand des Nibbāna erlangt?’ – so frage ich; das ist die Bedeutung.“ 294. Subhānurūpo [Pg.258] āyāsīti subhassa pasannavaṇṇassa anurūpo hutvā āyāsi āgacchasi. Āneñjakārito viyāti tomarādīhi kārito āneñjo hatthī viya dantova tīhi māsehi susikkhito iva bāhitapāpattā, brāhmaṇa dantadamatho sikkhitasikkho nibbānapade upasanto asīti pucchi. 294. „‘Subhānuršpo āyāsi’ bedeutet: Dem Sch!nen, dem heiteren Aussehen entsprechend kommst du daher. ‘Wie ein unersch%tterlich Gemachter’ (āne!jakārito viya) bedeutet: wie ein unersch%tterlicher Elefant, der durch Lanzenst!!e und $hnliches gez$hmt wurde; wie einer, der in drei Monaten wohlgeschult wurde; o Brahmane, da du das B%se von dir gewiesen hast, bist du gez$hmt und diszipliniert, in der Schulung geschult und im Zustand des Nibbāna zur Ruhe gekommen. So fragte er.“ 295. Tena puṭṭho amataṃ mayātiādimāha. Taṃ uttānatthameva. 295. „Von jenem gefragt, sprach er: ‘Amataቃ mayā’ (Das Todlose ist von mir...) und so weiter. Dies hat eine leicht verst$ndliche Bedeutung.“ 299. Apariyositasaṅkappoti ‘‘anāgate ekassa buddhassa aggasāvako bhaveyya’’nti patthitapatthanāya koṭiṃ appattasaṅkappoti attho. Kutitthe agantabbamagge ahaṃ sañcariṃ paribbhamiṃ. Bhante gotama, lokajeṭṭha tava dassanaṃ āgamma patvā, mama saṅkappo mayhaṃ patthanā pūrito arahattamaggādhigamena sāvakapāramīñāṇassa pāpuṇanena paripuṇṇoti adhippāyo. 299. „‘Apariyositasaቃkappo’ (dessen Entschluss nicht zu Ende gef%hrt ist) bedeutet: ein Entschluss, der das "u!erste (die Erf%llung) des gehegten Wunsches ‘Mđge ich in der Zukunft der Hauptsch%ler eines Buddhas werden’ noch nicht erreicht hat. ‘Kutitthe’ bedeutet: Auf unheilsamen Wegen, auf Pfaden, die man nicht begehen sollte, bin ich umhergewandert und umhergezogen. ‘O ehrw%rdiger Gotama, Welt$ltester! Indem ich zu deinem Anblick gelangt bin, ist mein Entschluss, mein Wunsch, durch das Erlangen des Pfades der Arahantschaft und das Erreichen des Wissens um die Vollkommenheit eines J%ngers erf%llt und vollkommen gemacht worden’; das ist der Sinn.“ 300. Pathaviyaṃ patiṭṭhāyāti pathaviyaṃ nibbattā samaye hemantakāle pupphanti vikasanti, dibbagandhā sugandhā suṭṭhu pavanti pavāyanti, sabbapāṇinaṃ sabbe devamanusse tosenti somanassayutte karonti yathā. 300. „‘Pathaviyaቃ patiṭṭhāya’ (auf der Erde stehend/gegr%ndet) bedeutet: Wie jene Pflanzen, die auf der Erde entspringen, zur Winterzeit erbl%hen und sich entfalten, g!ttliche und liebliche D%fte weithin verstr%men und alle Lebewesen, alle G!tter und Menschen, erfreuen und in Heiterkeit versetzen.“ 301. Tathevāhaṃ mahāvīrāti mahāvīriyavantasakyakulapasutamahāparivāra te tava sāsane patiṭṭhāya ahaṃ patiṭṭhahitvā pupphituṃ arahattamaggañāṇena vikasituṃ samayaṃ kālaṃ esāmi gavesāmi tathevāti sambandho. 301. „‘Tathevāhaቃ mahāvġra’ (Ebenso ich, o gro!er Held) bedeutet: O Tatkr$ftiger, im Geschlecht der Sakyer Geborener mit gro!em Gefolge! Nachdem ich mich in deiner Lehre fest verankert habe, suche ich nach der rechten Zeit und dem rechten Augenblick, um zu erbl%hen, das hei!t, mich durch das Wissen des Pfades der Arahantschaft zu entfalten; ‘ebenso’ ist der grammatikalische Zusammenhang.“ 302. Vimuttipupphanti sabbakilesehi vimuccanato vimocanato vā vimutti arahattaphalavimuttisaṅkhātaṃ pupphaṃ esanto gavesento, tañca kho bhavasaṃsāramocanaṃ kāmabhavādibhavesu saṃsaraṇaṃ gamanaṃ bhavasaṃsāraṃ, tato mocanaṃ bhavasaṃsāramocanaṃ. Vimuttipupphalābhenāti vimuccanaṃ vimuccanti vā katasambhārā etāyāti vimutti, aggaphalaṃ. Pupphanti vikasanti veneyyā etenāti pupphaṃ. Vimutti eva pupphaṃ vimuttipupphaṃ. Labhanaṃ lābho, vimuttipupphassa lābho vimuttipupphalābho. Tena vimuttipupphalābhena adhigamanena sabbapāṇinaṃ sabbasatte tosemi somanassaṃ pāpemīti attho. 302. „Befreiungsblüte“ (vimuttipuppha): „Befreiung“ (vimutti) ist das Befreitsein oder Befreien von allen Befleckungen; die Blüte, bekannt als die Befreiung der Frucht der Arhatschaft, suchend und nachstrebend (esanto gavesento). Und diese ist fürwahr die Befreiung vom Kreislauf des Daseins. Das Wandern, das Gehen im Sinnenbereich und den anderen Daseinsbereichen ist der Kreislauf des Daseins (bhavasaṃsāra); die Befreiung davon ist die Befreiung vom Kreislauf des Daseins. „Durch das Erlangen der Befreiungsblüte“ bedeutet: Die Befreiung oder das, wodurch jene, die die Voraussetzungen angesammelt haben, befreit werden, ist „Befreiung“ (vimutti), das heißt die höchste Frucht (aggaphala). „Sie blühen“: Die zu Führenden entfalten sich dadurch, daher wird es „Blüte“ (puppha) genannt. Die Befreiung selbst ist die Blüte, [darum] „Befreiungsblüte“. Das Erlangen ist der Gewinn (lābho), das Erlangen der Befreiungsblüte ist der „Gewinn der Befreiungsblüte“. „Durch diesen Gewinn der Befreiungsblüte“, also durch diese Erlangung, erfreue ich alle Lebewesen, alle Wesen, und führe sie zur Freude – dies ist die Bedeutung. 303. ‘‘Yāvatā [Pg.259] buddhakhettamhī’’tiādīsu cakkhuma pañcahi cakkhūhi cakkhumanta yattake ṭhāne ratanasuttādīnaṃ parittānaṃ āṇā ānubhāvo pavattati, tattake satasahassakoṭicakkavāḷasaṅkhāte buddhakhette ṭhapetvāna mahāmuniṃ sammāsambuddhaṃ vajjetvā avasesesu sattesu añño koci tava puttassa tuyhaṃ puttena mayā paññāya sadiso samo natthīti sambandho. Sesaṃ uttānameva. 303. In den Versen beginnend mit „Soweit im Buddha-Bereich...“ bedeutet „O Sehender“ (cakkhuma): derjenige, der mit den fünf Augen Sehende. An welchem Ort die Autorität und Macht der Schutztexte (paritta) wie des Ratana-Suttas und anderer wirksam ist, in einem so großen Buddha-Bereich, der aus hunderttausend Koṭi von Weltensystemen besteht, gibt es – unter Ausschluss des Großen Weisen, des vollkommen Erleuchteten, ihn also beiseite lassend – unter den verbleibenden Wesen niemanden sonst, der an Weisheit deinem Sohn, mir, gleicht oder gleichkommt – so ist die Verknüpfung. Der Rest ist leicht verständlich. 308. Paṭipannāti catumaggasamaṅgino ca phalaṭṭhā arahattaphale ṭhitā ca sekhā phalasamaṅgino heṭṭhimehi tīhi phalehi samannāgatā ca ete aṭṭha ariyabhikkhū, uttamatthaṃ nibbānaṃ āsīsakā gavesakā, taṃ paññavantaṃ parivārenti sadā sabbakālaṃ sevanti bhajanti payirupāsantīti attho. 308. „Die Praktizierenden“ (paṭipannā) bezieht sich auf die mit den vier Pfaden Ausgestatteten und die in den Früchten Stehenden, die in der Frucht der Arhatschaft Gefestigten, sowie die Übenden (sekhā), die mit den Früchten ausgestattet sind, nämlich versehen mit den drei niederen Früchten – diese acht edlen Mönche (ariya-bhikkhū), welche das höchste Wohl, das Nibbāna, erhoffen und suchen, umgeben jenen Weisheitsvollen und dienen, verehren und pflegen Umgang mit ihm allezeit, zu allen Zeiten – dies ist die Bedeutung. 310. Kāyavedanācittadhammānupassanāsaṅkhātānaṃ catunnaṃ satipaṭṭhānānaṃ kusalā chekā satisambojjhaṅgādīnaṃ sattannaṃ sambojjhaṅgānaṃ bhāvanāyavaḍḍhanāya ratā allīnā. 310. geschickt und erfahren in den vier Grundlagen der Achtsamkeit, die als Betrachtung des Körpers, der Gefühle, des Geistes und der Geistesobjekte bekannt sind; hingegeben an und vertieft in die Entfaltung und Mehrung der sieben Erleuchtungsglieder, beginnend mit dem Achtsamkeits-Erleuchtungsglied. 314 . Uḷurājāva tārakarājā iva ca sobhasi. . Wie der König der Gestirne und wie der König der Sterne glänzt du. 315. Rukkhapabbataratanasattādayo dhāretīti dharaṇī, dharaṇiyaṃ ruhā sañjātā vaḍḍhitā cāti dharaṇīruhā rukkhā. Pathaviyaṃ patiṭṭhāya ruhanti vaḍḍhanti vuddhiṃ virūḷhiṃ āpajjanti. Vepullataṃ vipulabhāvaṃ paripūrabhāvaṃ pāpuṇanti, te rukkhā kamena phalaṃ dassayanti phaladhārino honti. 315. „Trägerin“ (dharaṇī) wird sie genannt, weil sie Bäume, Berge, Juwelen, Wesen usw. trägt. „Auf der Erde Wachsende“ (dharaṇīruhā) sind Bäume, weil sie auf der Erde entspringen und wachsen. Auf der Erde gegründet sprießen sie, wachsen sie und gelangen zu Gedeihen und Wachstum. Sie erreichen Fülle, d.h. einen Zustand der Größe und Vollkommenheit; jene Bäume zeigen allmählich Früchte und werden zu fruchttragenden [Bäumen]. 317-9. Punapi bhagavantameva thomento sindhu sarassatītiādimāha. Tattha sindhuvādi nāma gaṅgā ca sarassatī nāma gaṅgā ca nandiyagaṅgā ca candabhāgāgaṅgā ca gaṅgā nāma gaṅgā ca yamunā nāma gaṅgā ca sarabhū nāma gaṅgā ca mahī nāma gaṅgā ca. Sandamānānaṃ gacchantīnaṃ etāsaṃ gaṅgānaṃ sāgarova samuddo eva sampaṭicchati paṭiggaṇhāti dhāreti. Tadā etā sabbagaṅgā purimaṃ nāmaṃ sindhuvādigaṅgātyādikaṃ purimaṃ nāmapaññattivohāraṃ jahanti chaḍḍenti sāgaroteva sāgaro iti eva ñāyati pākaṭā bhavati yathā. Tatheva tathā eva ime [Pg.260] catubbaṇṇā khattiyabrāhmaṇavessasuddasaṅkhātā cattāro kulā tavantike tava antike samīpe pabbajitvā pattakāsāyacīvaradhārino paricarantā purimaṃ nāmaṃ khattiyādināmadheyyaṃ paññattivohāraṃ jahanti cajanti, buddhaputtāti buddhassa orasāti ñāyare pākaṭā bhaveyyuṃ. 317-9. Indem er den Erhabenen nochmals preist, sprach er die Worte beginnend mit „Sindhu, Sarassatī...“. Darin sind der Fluss namens Sindhuvādī, der Fluss namens Sarassatī, der Nandiyā-Fluss, der Candabhāgā-Fluss, der Gaṅgā-Fluss, der Yamunā-Fluss, der Sarabhū-Fluss und der Mahī-Fluss gemeint. Von diesen fließenden, dahinströmenden Flüssen nimmt der Ozean, ja der Ozean allein, sie auf, empfängt sie und hält sie. Dann legen all diese Flüsse ihren früheren Namen wie „Sindhuvādī-Fluss“ usw. ab, geben diese frühere Namensbezeichnung und den sprachlichen Gebrauch auf und werden nur noch als „Ozean“ bezeichnet und bekannt, so wie dies der Fall ist. Ebenso, genau so, legen diese vier Stände, bekannt als Kṣatriyas, Brāhmaṇas, Vaiśyas und Śūdras, nachdem sie in deiner Gegenwart, in deiner Nähe, die Hauslosigkeit angetreten haben und das Safrangewand tragen und umherwandern, ihren früheren Namen, die Bezeichnung und den sprachlichen Gebrauch als „Kṣatriya“ usw. ab und werden als „Buddhasöhne“, d.h. als die leibhaftigen Söhne des Buddha, bekannt und offenbar. 320-4. Cando candamaṇḍalo abbhā mahikā rajo dhumo rāhūti pañcahi upakkilesehi virahitattā vimalo vigatamalo nimmalo, ākāsadhātuyā ākāsagabbhe gacchaṃ gacchanto, sabbe tārakasamūhe ābhāya maddamāno loke atirocati daddallati yathā. Tatheva tathā eva tvaṃ…pe…. 320-4. Der Mond, d.h. die Mondscheibe, der frei von den pfünf Trübungen wie Wolken, Nebel, Staub, Rauch und Rāhu ist und daher fleckenlos, frei von Makel und rein ist, wenn er sich durch das Element des Raumes, inmitten des Himmelsgewölbes, fortbewegt, alle Sternenhaufen mit seinem Glanz überstrahlt und in der Welt hervorragt und erstrahlt, wie dies geschieht. Ebenso, genau so du... usw. 325-7. Udake jātā udake saṃvaḍḍhā kumudā mandālakā ca bahū saṅkhātikkantā, toyena udakena kaddamakalalena ca upalimpanti allīyanti yathā, tatheva bahukā sattā aparimāṇā sattā loke jātā saṃvaḍḍhā rāgena ca dosena ca aṭṭitā bandhitā virūhare viruhanti. Kaddame kumudaṃ yathā viruhati sañjāyati. Kesarīti padumaṃ. 325-7. Im Wasser geborene, im Wasser herangewachsene weiße Lilien und rote Seerosen, die überaus zahlreich sind, werden vom Wasser und vom Schlamm benetzt und haften daran, so wie dies der Fall ist; ebenso wachsen und gedeihen viele Wesen, unzählige Wesen, die in der Welt geboren und herangewachsen sind, bedrängt und gebunden von Gier und Hass. Wie eine weiße Seerose im Schlamm wächst und entsteht. „Kesarī“ bezeichnet den Lotus. 329-30. Rammake māseti kattikamāse ‘‘komudiyā cātumāsiniyā’’ti vuttattā. Vārijā padumapupphādayo bahū pupphā pupphanti vikasanti, taṃ māsaṃ taṃ kattikamāsaṃ nātivattanti vārijāti sambandho. Samayo pupphanāya soti so kattikamāso pupphanāya vikasanāya samayo kāloti attho. Yathā pupphanti tatheva tvaṃ, sakyaputta, pupphito vikasito asi. Pupphito te vimuttiyāti te tuyhaṃ sissā katasambhārā bhikkhū vimuttiyā arahattaphalañāṇena pupphito vikasito. Yathā vārijaṃ padumaṃ pupphanasamayaṃ nātikkamati, tathā te sāsanaṃ ovādānusāsaniṃ nātivattanti nātikkamantīti attho. 329-30. „Im lieblichen Monat“ bedeutet: im Kattika-Monat, da gesagt wurde: „am Komudī-Tag, dem Vollmondtag des vierten Monats [der Regenzeit]“. Die im Wasser Geborenen, d.h. Lotusblüten und viele andere Blumen, blühen, entfalten sich; „sie überschreiten diesen Monat, jenen Kattika-Monat nicht, die im Wasser Geborenen“ – so ist die Verknüpfung. „Die Zeit des Blühens ist jene“ bedeutet: jener Kattika-Monat ist die Zeit, die Periode für das Blühen, für das Aufblühen. Wie sie blühen, ebenso bist du, o Sakyer-Sohn, erblüht und entfaltet. „Erblüht durch deine Befreiung“ bedeutet: deine Schüler, jene Mönche, die die Voraussetzungen angesammelt haben, sind durch die Befreiung, durch das Wissen um die Frucht der Arhatschaft, erblüht und entfaltet. Oder wie der im Wasser geborene Lotus die Blütezeit nicht überschreitet, ebenso überschreiten sie deine Lehre, deine Ermahnung und Unterweisung nicht – dies ist die Bedeutung. 333-4. Yathāpi selo himavāti himavā nāma selamayapabbato. Sabbapāṇinaṃ sabbesaṃ byādhitānaṃ sattānaṃ osadho osadhavanto sabbanāgānaṃ sabbaasurānaṃ sabbadevānañca ālayo agārabhūto yathā, tatheva tvaṃ, mahāvīra, sabbapāṇinaṃ jarābyādhimaraṇādīhi pamocanato osadho viya. Yathā so himavā nāgādīnaṃ ālayo, tathā [Pg.261] tevijjāya ca chaḷabhiññāya ca iddhiyā ca pāramiṃ pariyosānaṃ gatā pattā tuvaṃ nissāya vasantīti sambandho. Heṭṭhā vā upari vā upamāupameyyavasena gāthānaṃ sambandhanayā suviññeyyāva. 333-4. „Wie auch der felsige Himavā“ bedeutet: das felsige Gebirge namens Himavā. Wie er eine Medizin für alle lebenden Wesen, für alle kranken Wesen ist, reich an Heilkräutern, und eine Zuflucht, eine Wohnstätte für alle Nāgas, alle Asuras und alle Devas ist, ebenso bist du, o großer Held, wie eine Medizin für alle Lebewesen, da du sie von Alter, Krankheit, Tod usw. befreist. Wie jener Himavā die Zuflucht der Nāgas usw. ist, ebenso leben jene, die das Ende und die Vollendung des dreifachen Wissens, der sechs höheren Geisteskräfte und der übernatürlichen Kräfte erlangt und erreicht haben, in Abhängigkeit von dir – so ist die Verknüpfung. Ob unten oder oben, die Weise der Verknüpfung der Strophen durch das Verhältnis von Gleichnis und dem zu Vergleichenden ist leicht verständlich. 342. Āsayānusayaṃ ñatvāti ettha āsayoti ajjhāsayo cariyā, anusayoti thāmagatakileso. ‘‘Ayaṃ rāgacarito, ayaṃ dosacarito, ayaṃ mohacarito’’tiādinā āsayañca anusayaṃ kilesapavattiñca jānitvāti attho. Indriyānaṃ balābalanti saddhindriyādīnaṃ pañcannaṃ indriyānaṃ tikkhindriyo mudindriyo svākāro dvākāro suviññāpayo duviññāpayoti evaṃ balābalaṃ jānitvā. Bhabbābhabbe viditvānāti ‘‘mayā desitaṃ dhammaṃ paṭivijjhituṃ ayaṃ puggalo bhabbo samattho, ayaṃ puggalo abhabbo’’ti viditvā paccakkhaṃ katvā, bhante, sabbaññu tvaṃ cātuddīpikamahāmegho viya dhammadesanāsīhanādena abhītanādena gajjasi sakalaṃ cakkavāḷaṃ ekaninnādaṃ karosi. 342. In Bezug auf „āsayānusayaṃ ñatvā“ bedeutet „āsayo“ die Absicht oder das Verhalten (ajjhāsayo), und „anusayo“ bedeutet die festsitzenden Verunreinigungen (thāmagatakileso). Der Sinn ist: nachdem man die Neigung, die latenten Tendenzen und das Entstehen der Verunreinigungen erkannt hat durch Ausdrücke wie: „Dieser Mensch ist von gieriger Natur, dieser ist von hasserfüllter Natur, dieser ist von verblendeter Natur“. „Indriyānaṃ balābalaṃ“ bedeutet: nachdem man die Stärke und Schwäche der fünf Fähigkeiten wie der Glaubensfähigkeit usw. erkannt hat, nämlich ob jemand scharfe Fähigkeiten (tikkhindriyo) oder stumpfe Fähigkeiten (mudindriyo) hat, von guter Natur (svākāro) oder schlechter Natur (dvākāro) ist, leicht zu belehren (suviññāpayo) oder schwer zu belehren (duviññāpayo) ist. „Bhabbābhabbe viditvānā“ bedeutet: nachdem man erkannt und direkt vor Augen geführt hat: „Dieser Mensch ist fähig und tauglich, die von mir gelehrte Lehre zu durchdringen, dieser Mensch ist unfähig“. Oh Herr, Du, der Allwissende, brüllst wie eine große, die vier Kontinente überspannende Regenwolke mit dem Löwenbrüllen der Lehrverkündigung, einem furchtlosen Brüllen, und lässt die gesamte Weltkuppel in einem einzigen Echo widerhallen. 343-4. Cakkavāḷapariyantāti samantā cakkavāḷagabbhaṃ pūretvā parisā nisinnā bhaveyya. Te evaṃ nisinnā nānādiṭṭhī anekadassanagāhino vivadamānā dveḷhakajātā vivadanti, taṃ tesaṃ vimaticchedanāya dubuddhichindanatthāya sabbesaṃ sattānaṃ cittamaññāya cittācāraṃ ñatvā opammakusalo upamāupameyyesu dakkho tvaṃ, muni, ekaṃ pañhaṃ kathentova ekeneva pañhakathanena sakalacakkavāḷagabbhe nisinnānaṃ pāṇīnaṃ vimatiṃ saṃsayaṃ chindasi nikkaṅkhaṃ karotīti attho. 343-4. „Cakkavāḷapariyantā“ bedeutet: Die Versammlung mag ringsum sitzen und das Innere des Weltensystems ausfüllen. Die so Dasitzenden, die verschiedene Ansichten haben, vielfältige Anschauungen vertreten, streiten und von Zweifel gespalten sind (dveḷhakajātā), debattieren miteinander. Um deren Unschlüssigkeit zu beseitigen und falsche Ansichten zu zertrümmern, hast Du, o Weiser, der Du den Geist aller Wesen durchschaust und die Bewegungen ihrer Gedanken kennst, der Du geschickt im Gebrauch von Vergleichen (opammakusalo) und erfahren in Gleichnissen und deren Anwendung bist, durch das Beantworten nur einer einzigen Frage, ja, durch diese eine Fragenbeantwortung allein, die Unschlüssigkeit und den Zweifel aller im gesamten Weltensystem befindlichen Lebewesen abgeschnitten und sie zweifelsfrei gemacht. Dies ist der Sinn. 345. Upadisasadisehevāti ettha udakassa upari dissanti pākaṭā hontīti upadisā, sevālā. Upadisehi sadisā upadisasadisā, manussā. Yathā hi upadisā sevālā udakaṃ adissamānaṃ katvā tassupari pattharitvā ṭhitā honti, tathā vasudhā pathavī tehi upadisasadisehi eva manussehi nirantaraṃ pattharitvā ṭhitehi pūritā bhaveyya. Te sabbeva pathaviṃ pūretvā ṭhitā manussā pañjalikā sirasi añjaliṃ paggahitā kittayuṃ lokanāyakaṃ lokanāyakassa buddhassa guṇaṃ katheyyuṃ. 345. In Bezug auf „upadisasadisehi“: Hierbei sind jene, die auf der Wasseroberfläche erscheinen und sichtbar sind, „upadisā“, d. h. Algen oder Wasserlinsen (sevālā). Diejenigen, die den Wasserlinsen gleichen, sind „upadisasadisā“, nämlich die Menschen. Denn so wie die Algen das Wasser unsichtbar machen, indem sie sich darüber ausbreiten und darauf lagern, so könnte diese Erde vollkommen von Menschen ausgefüllt sein, die wie jene Algen die Erde lückenlos bedecken. Wenn all diese Menschen, welche die Erde ausfüllen, mit ehrerbietig über dem Haupte zusammengelegten Händen (pañjalikā) den Weltenführer preisen und die Tugenden des Buddhas, des Weltenführers, rühmen würden... 346. Te [Pg.262] sabbe devamanussā kappaṃ vā sakalaṃ kappaṃ kittayantā guṇaṃ kathentāpi nānāvaṇṇehi nānappakārehi guṇehi kittayuṃ. Tathāpi te sabbe parimetuṃ guṇapamāṇaṃ kathetuṃ na pappeyyuṃ na sampāpuṇeyyuṃ na sakkuṇeyyuṃ. Appameyyo tathāgato sammāsambuddho aparimeyyo guṇātireko. Etena guṇamahantataṃ dīpeti. 346. Selbst wenn all jene Götter und Menschen ein ganzes Weltalter lang lobpreisen und seine Tugenden rühmen würden, indem sie die Tugenden auf vielfältige Weise und in verschiedenen Facetten besingen, so könnten sie dennoch alle das Maß seiner Tugenden weder ermessen noch erschöpfend beschreiben, noch würden sie es jemals erreichen. Der Tathāgata, der vollkommen Erwachte, ist unermesslich (appameyyo), grenzenlos und von überragender Tugendfülle. Damit verdeutlicht er die Erhabenheit seiner Tugenden. 347. Sakena thāmena attano balena heṭṭhā upamāupameyyavasena jino jitakileso buddho mayā kittito thomito yathā ahosi, evameva sabbe devamanussā kappakoṭīpi kappakoṭisatepi kittentā pakittayuṃ katheyyunti attho. 347. Der Sinn ist: So wie der Sieger – der die Verunreinigungen besiegt hat –, der Buddha, von mir mit meiner eigenen Geisteskraft durch die obigen Gleichnisse und Vergleiche gepriesen und gerühmt wurde, ebenso würden alle Götter und Menschen, selbst wenn sie ihn über zehn Millionen Weltalter oder über Milliarden von Weltaltern hinweg lobpreisen würden, ihn auf ebendiese Weise preisen und rühmen. 348. Punapi guṇānaṃ appamāṇataṃ dīpetuṃ sace hi koci devo vātiādimāha. Pūritaṃ parikaḍḍheyyāti mahāsamudde pūritaudakaṃ samantato ākaḍḍheyya. So puggalo vighātaṃ dukkhameva labheyya pāpuṇeyyāti attho. 348. Um die Unermesslichkeit der Tugenden nochmals zu verdeutlichen, sprach er die Worte, beginnend mit: „Sace hi koci devo...“. „Pūritaṃ parikaḍḍheyya“ bedeutet: Wenn man das im großen Ozean befindliche Wasser von allen Seiten her herausschöpfen wollte. Eine solche Person würde dadurch nur Erschöpfung und Mühsal (vighātaṃ) erfahren und erleiden. Dies ist der Sinn. 350. Vattemi jinasāsananti jinena bhāsitaṃ sakalaṃ piṭakattayaṃ vattemi pavattemi rakkhāmīti attho. Dhammasenāpatīti dhammena paññāya bhagavato catuparisasaṅkhātāya parisāya pati padhānoti dhammasenāpati. Sakyaputtassa bhagavato sāsane ajja imasmiṃ vattamānakāle cakkavattirañño jeṭṭhaputto viya sakalaṃ buddhasāsanaṃ pālemīti attho. 350. „Vattemi jinasāsanaṃ“ (Ich führe die Lehre des Siegers fort) bedeutet: „Ich halte aufrecht, führe fort und schütze die gesamte vom Sieger verkündete dreifache Korb-Sammlung (piṭakattayaṃ)“. „Dhammasenāpati“ (Feldherr der Lehre) bedeutet: Durch die Lehre und durch Weisheit ist er das Oberhaupt und der Anführer (pati padhāno) der vierfachen Gemeinde des Erhabenen. Der Sinn ist: In der Lehre des Erhabenen, des Sakyer-Sohnes, beschütze ich heute in dieser gegenwärtigen Zeit die gesamte Lehre des Buddhas wie der älteste Sohn eines Weltherrschers (cakkavattirañño jeṭṭhaputto). 352-3. Attano saṃsāraparibbhamaṃ dassento yo koci manujo bhārantiādimāha. Yo koci manujo mānuso bhāraṃ sīsabhāraṃ matthake sīse ṭhapetvā dhāreyya vaheyya, sadā sabbakālaṃ so manujo tena bhārena dukkhito pīḷito atibhūto assa bhaveyya. Bhāro bharitabhāro bharito atīva bhārito. Tathā tena pakārena ahaṃ rāgaggidosaggimohaggisaṅkhātehi tīhi aggīhi ḍayhamāno, giriṃ uddharito yathā mahāmerupabbataṃ uddharitvā ukkhipitvā sīse ṭhapito bhavabhārena bhavasaṃsāruppattibhārena, bharito dukkhito bhavesu saṃsariṃ paribbhaminti sambandho. 352-3. Um sein eigenes Umherirren im Kreislauf der Wiedergeburten (saṃsāra) aufzuzeigen, sprach er die Worte, beginnend mit: „Yo koci manujo bhāraṃ...“. Wenn irgendein Mensch eine Last, eine Kopflast, auf sein Haupt setzt und trägt, so wäre dieser Mensch allzeit und immerdar durch diese Last geplagt, bedrückt und überwältigt. „Bhāro bharitabhāro...“ bedeutet: eine beladene Last, überaus schwer beladen. Ebenso verhält es sich im übertragenen Sinne: „Ich, brennend im dreifachen Feuer von Gier, Hass und Verblendung (rāgaggi-dosaggi-mohaggi), wanderte und irrte durch die Daseinsbereiche, gepeinigt und schwer beladen von der Last des Daseins – welche im Entstehen im Daseinskreislauf besteht –, so als hätte man den großen Berg Meru ausgerissen, emporgehoben und auf mein Haupt gesetzt.“ Dies ist die Verknüpfung (sambandho). 354. Oropito [Pg.263] ca me bhāroti idāni pabbajitakālato paṭṭhāya so bhavabhāro mayā oropito nikkhitto. Bhavā ugghāṭitā mayāti sabbe nava bhavā mayā viddhaṃsitā. Sakyaputtassa bhagavato sāsane yaṃ karaṇīyaṃ kattabbaṃ maggapaṭipāṭiyā kilesaviddhaṃsanakammaṃ atthi, taṃ sabbaṃ mayā katanti attho. 354. „Oropito ca me bhāro“ (Und meine Last wurde abgelegt) bedeutet: Nun, von der Zeit meiner Ordination an, wurde jene Daseinslast von mir abgelegt und beiseitegelegt. „Bhavā ugghāṭitā mayā“ (Die Daseinsformen wurden von mir entwurzelt) bedeutet: Alle neun Daseinsbereiche (nava bhavā) wurden von mir vernichtet. Der Sinn ist: Was auch immer in der Lehre des Erhabenen, des Sakyer-Sohnes, an Pflichten zu tun war, nämlich das Werk der Vernichtung der Verunreinigungen auf dem stufenweisen Pfad (maggapaṭipāṭiyā), all das ist von mir vollbracht worden. 355. Puna attano visesaṃ dassento yāvatā buddhakhettamhītiādimāha. Tattha yāvatā yattake dasasahassacakkavāḷasaṅkhāte buddhakhette sakyapuṅgavaṃ sakyakulajeṭṭhakaṃ bhagavantaṃ ṭhapetvā avasesasattesu kocipi paññāya me mayā samo natthīti dīpeti. Tenāha – ‘‘ahaṃ aggomhi paññāya, sadiso me na vijjatī’’ti. 355. Um seine besondere Auszeichnung erneut aufzuzeigen, sprach er die Worte, beginnend mit: „Yāvatā buddhakhettamhi...“. Darin bedeutet „yāvatā“: in dem Maße wie. Es verdeutlicht: Ausgenommen den Erhabenen, den Stier der Sakyer, das älteste Haupt des Sakyer-Geschlechts, gibt es im gesamten Buddha-Bereich, der zehntausend Weltensysteme umfasst, unter den übrigen Wesen niemanden, der mir an Weisheit gleichkommt. Deshalb sagte er: „Ich bin der Höchste an Weisheit, meinesgleichen gibt es nicht.“ 356. Puna attano ānubhāvaṃ pakāsento samādhimhītyādimāha. Taṃ suviññeyyameva. 356. Um seine eigene geistige Macht (ānubhāva) aufs Neue zu bekunden, sprach er die Worte, beginnend mit: „Samādhimhi...“. Dies ist leicht verständlich. 360. Jhānavimokkhānakhippapaṭilābhīti paṭhamajjhānādīnaṃ jhānānaṃ lokato vimuccanato ‘‘vimokkha’’nti saṅkhaṃ gatānaṃ aṭṭhannaṃ lokuttaravimokkhānañca khippalābhī sīghaṃ pāpuṇātīti attho. 360. „Jhānavimokkhānakhippapaṭilābhī“ (Einer, der die Vertiefungen und Befreiungen schnell erlangt) bedeutet: Er erlangt rasch die Vertiefungen, beginnend mit der ersten Vertiefung (jhāna), sowie die acht überweltlichen Befreiungen (lokuttaravimokkha), welche deshalb als „Befreiungen“ (vimokkha) bezeichnet werden, weil sie aus der Welt befreien; er erreicht sie in aller Schnelligkeit. Dies ist der Sinn. 362. Evaṃ mahānubhāvassāpi attano sabrahmacārīsu gāravabahumānataṃ pakāsento uddhatavisovātiādimāha. Tattha uddhataviso uppāṭitaghoraviso sappo iva chinnavisāṇova chinditasiṅgo usabho iva ahaṃ idāni nikkhittamānadappova chaḍḍitagottamadādimānadappova gaṇaṃ saṅghassa santikaṃ garugāravena ādarabahumānena upemi upagacchāmi. 362. Um seine tiefe Ehrerbietung und große Wertschätzung gegenüber seinen Gefährten im heiligen Leben (sabrahmacārī) trotz seiner derartigen geistigen Macht aufzuzeigen, sprach er die Worte, beginnend mit: „Uddhataviso...“ (Wie eine Schlange, deren Gift entzogen ist...). Darin bedeutet „uddhataviso“: wie eine Schlange, deren schreckliches Gift entzogen wurde (uppāṭitaghoraviso), oder wie ein Stier (usabho), dessen Hörner abgebrochen wurden (chinditasiṅgo); so trete ich nun vor die Gemeinschaft, vor den Sangha, mit tiefer Ehrerbietung und innigster Wertschätzung, nachdem ich jeglichen Stolz und Dünkel gänzlich abgelegt (nikkhittamānadappo) und den Hochmut in Bezug auf meine Abstammung (gotta) und ähnliches von mir geworfen habe. 363. Idāni attano paññāya mahattataṃ pakāsento yadirūpinītiādimāha. Evarūpā me mahatī paññā arūpinī samānā yadi rūpinī bhaveyya, tadā me mama paññā vasupatīnaṃ pathavissarānaṃ rājūnaṃ sameyya samā bhaveyyāti adhippāyo. Evaṃ attano paññāya mahattabhāvaṃ dassetvā tato pubbenivāsānussatiñāṇena pubbe kammaṃ saritvā anomadassissātiādimāha. Tattha anomadassissa bhagavato mayā katāya ñāṇathomanāya phalaṃ etaṃ mama paññāmahattanti attho. 363. Nun sprach er, um die Größe seiner eigenen Weisheit zu verkünden, die Worte beginnend mit yadirūpinī. Die Absicht ist: 'Wenn meine derartige große formlose Weisheit eine materielle Form besäße, dann würde meine Weisheit der der Könige, der Herrscher der Erde, gleichkommen.' Nachdem er so die Großartigkeit seiner eigenen Weisheit dargelegt hatte, erinnerte er sich durch das Wissen über die Erinnerung an frühere Existenzen an sein früheres Karma und sprach die Worte beginnend mit anomadassissa. Darin ist die Bedeutung: 'Dies, nämlich die Größe meiner Weisheit, ist die Frucht des Lobpreises der Weisheit des erhabenen Anomadassī, den ich vollbrachte.' 364. Pavattitaṃ [Pg.264] dhammacakkanti ettha cakka-saddo panāyaṃ ‘‘catucakkayāna’’ntiādīsu vāhane vattati. ‘‘Pavattite ca pana bhagavatā dhammacakke’’tiādīsu (mahāva. 17; saṃ. ni. 5.1081) desanāyaṃ. ‘‘Cakkaṃ vattaya sabbapāṇina’’ntiādīsu (jā. 1.7.149) dānamayapuññakiriyāyaṃ. ‘‘Cakkaṃ vatteti ahoratta’’ntiādīsu iriyāpathe. ‘‘Icchāhatassa posassa, cakkaṃ bhamati matthake’’tiādīsu (jā. 1.1.104; 1.5.103) khuracakke ‘‘rājā cakkavattī cakkānubhāvena vattanako’’tiādīsu (itivu. 22; dī. ni. 1.258) ratanacakke. Idha panāyaṃ desanāyaṃ. Tādinā tādiguṇasamannāgatena sakyaputtena gotamasambuddhena pavattitaṃ desitaṃ piṭakattayasaṅkhātaṃ dhammacakkaṃ ahaṃ sammā aviparītena anuvattemi anugantvā vattemi, desemi desanaṃ karomi. Idaṃ anuvattanaṃ desitassa anugantvā pacchā desanaṃ purimabuddhānaṃ katāya ñāṇathomanāya phalanti sambandho. 364. In der Passage „pavattitaṃ dhammacakkaṃ“ bezieht sich das Wort „cakka“ (Rad) in Beispielen wie „catucakkayānaṃ“ auf ein Fahrzeug (Tragen). In Passagen wie „pavattite ca pana bhagavatā dhammacakke“ bezieht es sich auf die Lehrverkündigung. In Passagen wie „cakkaṃ vattaya sabbapāṇinaṃ“ bezieht es sich auf das durch Geben bewirkte heilsame Werk. In Passagen wie „cakkaṃ vatteti ahorattaṃ“ bezieht es sich auf die Körperhaltung. In Passagen wie „icchāhatassa posassa, cakkaṃ bhamati matthake“ bezieht es sich auf ein Rasiermesserrad. In Passagen wie „rājā cakkavattī cakkānubhāvena vattanako“ bezieht es sich auf das Juwelenrad. Hier jedoch bezieht es sich auf die Lehrverkündigung. Ich drehe das Rad der Lehre, welches aus den drei Körben besteht, das vom vollkommen erwachten Gotama, dem Sohn der Sakyas, der mit solchen edlen Eigenschaften ausgestattet ist, in Gang gesetzt und gelehrt wurde, rechtmäßig und ohne Abweichung weiter (anuvattemi) – das heißt, ich folge ihm nach, halte es in Bewegung und verkünde die Lehre. Diese Weiterführung der Lehre durch das Nachfolgen in der Verkündigung des Gelehrten ist die Frucht des Lobpreises der Weisheit, der gegenüber früheren Buddhas dargebracht wurde; so ist die Verknüpfung. 365. Tato sappurisūpanissayayonisomanasikārādipuññaphalaṃ dassento mā me kadāci pāpicchotiādimāha. Tattha pāpiccho lāmakāya icchāya samannāgato pāpacārī puggalo ca ṭhānanisajjādīsu vattapaṭivattakaraṇe kusīto ca jhānasamādhimaggabhāvanādīsu hīnavīriyo ca ganthadhuravipassanādhuravirahitattā appassuto ca ācariyupajjhāyādīsu ācāravirahitattā anācāro ca puggalo kadāci kāle katthaci ṭhāne me mayā saha sameto samāgato mā ahu mā bhavatūti sambandho. 365. Danach sprach er, um die Frucht von Verdiensten wie dem Aufsuchen edler Menschen, weiser Aufmerksamkeit und so weiter aufzuzeigen, die Worte beginnend mit mā me kadāci pāpiccho. Darin bedeutet es: Ein Mensch mit schlechten Wünschen (pāpiccho) ist ein Übeltäter, der mit niedrigen Begierden ausgestattet ist; ein Träger (kusīto) ist jemand, der träge ist in der Erfüllung der Pflichten beim Stehen, Sitzen usw.; einer mit geringer Tatkraft (hīnavīriyo) ist träge bezüglich der Entfaltung von Vertiefung, Sammlung und dem Pfad usw.; ein Unwissender (appassuto) ist jemand, dem es aufgrund des Fehlens der Pflicht des Studiums (ganthadhura) und der Pflicht der Einsicht (vipassanādhura) an Wissen mangelt; und ein zuchtloser Mensch (anācāro) ist einer, dem es an rechtem Verhalten gegenüber Lehrern und geistlichen Lehrern mangelt. Möge ein solcher Mensch zu keiner Zeit und an keinem Ort mit mir zusammentreffen oder sich mir hinzugesellen; so ist die Verknüpfung. 366. Bahussutoti pariyattipaṭivedhavasena duvidho bahussuto ca puggalo. Medhāvīti medhāya paññāya samannāgato ca. Sīlesu susamāhitoti catupārisuddhisīlamaggasampayuttasīlaaṭṭhaṅguposathasīlādīsu suṭṭhu āhito ṭhapitacitto ca. Cetosamathānuyuttoti cittassa ekībhāvamanuyutto ca puggalo. Api muddhani tiṭṭhatu evarūpo puggalo mayhaṃ muddhani sirasi api tiṭṭhatūti attho. 366. „Vielwissend“ (bahussuto) bezeichnet einen Menschen, der in zweifacher Hinsicht vielwissend ist: durch das Studium der Schriften (pariyatti) und durch die Durchdringung der Lehre (paṭivedha). „Weise“ (medhāvī) ist einer, der mit Weisheit ausgestattet ist. „In den Tugendregeln fest gegründet“ (sīlesu susamāhito) bedeutet, dass der Geist fest verankert und gerichtet ist in den vierfachen Tugenden der Reinheit, den mit dem Pfad verbundenen Tugendregeln, den achtgliedrigen Uposatha-Regeln und so weiter. „Der geistigen Ruhe hingegeben“ (cetosamathānuyuttoti) bezeichnet jemanden, der der Einspitzigkeit des Geistes hingegeben ist. „Möge er auf meinem Haupte stehen“ bedeutet: Ein solcher Mensch möge wahrlich auf meinem Haupte, meinem Kopf, verweilen. 367. Attano laddhaphalānisaṃsaṃ vatvā tatthaññe niyojento taṃ vo vadāmi bhaddantetiādimāha. Taṃ suviññeyyameva. 367. Nachdem er den Nutzen der von ihm erlangten Früchte dargelegt hatte, sprach er, um andere dazu anzuhalten, die Worte beginnend mit taṃ vo vadāmi bhaddante. Dies ist leicht verständlich. 368-9. Yamahanti [Pg.265] yaṃ assajittheraṃ ahaṃ paṭhamaṃ ādimhi disvā sotāpattimaggapaṭilābhena sakkāyadiṭṭhādīnaṃ kilesānaṃ pahīnattā vimalo malarahito ahuṃ ahosi, so assajitthero me mayhaṃ ācariyo lokuttaradhammasikkhāpako ahuṃ. Ahaṃ tassa savanāya anusāsanena ajja dhammasenāpati ahuṃ. Sabbattha sabbesu guṇesu pāramiṃ patto pariyosānaṃ patto anāsavo nikkileso viharāmi. 368-9. „Den ich sah“ (yamahaṃ) bedeutet: Jenen Thera Assaji, den ich zuerst, ganz am Anfang, sah und durch das Erlangen des Pfades des Stromeintritts und durch das Aufgeben der Befleckungen wie des Persönlichkeitsglaubens makellos und frei von Flecken wurde; jener Thera Assaji war mein Lehrer, der mich in der überweltlichen Lehre unterwies. Ich wurde heute durch das Hören seiner Unterweisung zum Feldherrn der Lehre (dhammasenāpati). Ich verweile frei von Trieben und frei von Befleckungen, nachdem ich in allen Belangen, in allen edlen Eigenschaften, die Vollendung, das Äußerste, erreicht habe. 370. Attano ācariye sagāravaṃ dassento yo me ācariyotiādimāha. Yo assaji nāma thero satthu sāvako me mayhaṃ ācariyo āsi ahosi, so thero yassaṃ disāyaṃ yasmiṃ disābhāge vasati, ahaṃ taṃ disābhāgaṃ ussīsamhi sīsuparibhāge karomīti sambandho. 370. Um seine Ehrerbietung gegenüber seinem Lehrer zu zeigen, sprach er die Worte beginnend mit yo me ācariyo. Der Thera namens Assaji, ein Jünger des Meisters, war mein Lehrer; in welcher Himmelsgegend, in welchem Himmelsstrich jener Thera auch verweilt, dorthin richte ich mein Haupt; so ist die Verknüpfung. 371. Tato attano ṭhānantarappattabhāvaṃ dassento mama kammantiādimāha. Gotamo bhagavā sakyapuṅgavo sakyakulaketu sabbaññutaññāṇena mama pubbe katakammaṃ saritvāna ñatvā bhikkhusaṅghamajjhe nisinno aggaṭṭhāne aggasāvakaṭṭhāne maṃ ṭhapesīti sambandho. 371. Danach sprach er, um das Erreichen seiner besonderen Stellung aufzuzeigen, die Worte beginnend mit mama kammaṃ. Der erhabene Gotama, der Stier unter den Sakyas, das Banner des Sakya-Geschlechts, hat sich durch sein Allwissenheitswissen an mein früheres Werk erinnert, es erkannt und mich, inmitten der Mönchsgemeinde sitzend, in die höchste Stellung, die Stellung des Hauptschülers, eingesetzt; so ist die Verknüpfung. 374. Atthapaṭisambhidā, dhammapaṭisambhidā, niruttipaṭisambhidā, paṭibhānapaṭisambhidāti imā catasso paṭisambhidā ca, tāsaṃ bhedo paṭisambhidāmagge (paṭi. ma. 1.76; vibha. 718) vuttoyeva. Catumaggacatuphalavasena vā rūpārūpajhānavasena vā aṭṭha vimokkhā saṃsāravimuccanadhammā ca iddhividhādayo cha abhiññāyo ca sacchikatā paccakkhaṃ katā. Kataṃ buddhassa sāsananti buddhassa anusiṭṭhi ovādasaṅkhātaṃ sāsanaṃ kataṃ arahattamaggañāṇena nipphāditanti attho. 374. Die analytische Urteilskraft bezüglich der Bedeutung (atthapaṭisambhidā), bezüglich der Lehre (dhammapaṭisambhidā), bezüglich der Sprache (niruttipaṭisambhidā) und bezüglich des Scharfsinns (paṭibhānapaṭisambhidā) – dies sind die vier analytischen Urteilskräfte, und ihre Einteilung ist bereits im Paṭisambhidāmagga dargelegt. Die acht Befreiungen (vimokkhā), die den Daseinskreislauf überwindende Geisteszustände sind – sei es durch die vier Pfade und vier Früchte oder durch die feinstofflichen und immateriellen Vertiefungen – und die sechs höheren Geisteskräfte (abhiññā) beginnend mit den übernatürlichen Kräften wurden verwirklicht, das heißt unmittelbar erfahren. „Die Lehre des Buddha ist befolgt worden“ bedeutet: Die Lehre, die aus den Unterweisungen und Ermahnungen des Buddha besteht, wurde befolgt und durch das Pfadwissen der Arhatschaft vollendet; das ist die Bedeutung. Itthaṃ sudanti ettha itthanti nidassanatthe nipāto, iminā pakārenāti attho. Tena sakalasāriputtāpadānaṃ nidasseti. Sudanti padapūraṇe nipāto. Āyasmāti garugāravādhivacanaṃ. Sāriputtoti mātu nāmavasena katanāmadheyyo thero. Imā gāthāyoti imā sakalā [Pg.266] sāriputtattherāpadānagāthāyo abhāsi kathesi. Itisaddo parisamāpanatthe nipāto, sakalaṃ sāriputtāpadānaṃ niṭṭhitanti attho. In dem Ausdruck „itthaṃ sudaṃ“ ist „itthaṃ“ eine Partikel, die hinweisend verwendet wird; die Bedeutung ist „auf diese Weise“. Damit wird auf das gesamte Sāriputta-Apadāna verwiesen. „Sudaṃ“ ist eine Partikel zur Versfüllung. „Ehrwürdig“ (āyasmā) ist eine respektvolle Anrede. „Sāriputta“ ist der Thera, dessen Name nach dem Namen seiner Mutter gegeben wurde. „Diese Verse“ bedeutet, dass er all diese Verse des Sāriputtatthera-Apadāna sprach und verkündete. Das Wort „iti“ ist eine abschließende Partikel; die Bedeutung ist, dass das gesamte Sāriputta-Apadāna beendet ist. Sāriputtattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung des Sāriputtatthera-Apadāna ist abgeschlossen. 3-2. Mahāmoggallānattheraapadānavaṇṇanā 3-2. Die Erklärung des Mahāmoggallānatthera-Apadāna Anomadassī bhagavātyādikaṃ āyasmato moggallānattherassa apadānaṃ. Ayañca thero purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto anomadassissa bhagavato kāletiādi sāriputtattherassa dhammasenāpatino vatthumhi vuttameva. Thero hi pabbajitadivasato paṭṭhāya sattame divase magadharaṭṭhe kallavālagāmakaṃ upanissāya samaṇadhammaṃ karonto thinamiddhe okkamante satthārā ‘‘moggallāna, mā tuccho tava vāyāmo’’tiādinā saṃvejito thinamiddhaṃ vinodetvā bhagavatā vuccamānaṃ dhātukammaṭṭhānaṃ suṇanto eva vipassanāpaṭipāṭiyā uparimaggattayaṃ adhigantvā aggaphalakkhaṇe sāvakañāṇassa matthakaṃ pāpuṇi. „Anomadassī bhagavā“ (Der erhabene Anomadassī) und so weiter ist die Lebensbeschreibung (Apadāna) des ehrwürdigen Thera Moggalāna. Dieser Thera hatte unter früheren Buddhas Verdienste erworben, indem er in verschiedenen Daseinsformen heilsame Taten anhäufte, die als Stütze für das Entkommen aus dem Daseinskreislauf (vivaṭṭa) dienten. Was seine Erlebnisse zur Zeit des erhabenen Anomadassī betrifft, so ist dies bereits in der Geschichte des ehrwürdigen Sāriputta, des Generals der Lehre, dargelegt worden. Der Thera praktizierte nämlich ab dem siebten Tag nach seiner Ordination im Land Magadha nahe dem Dorf Kallavāḷagāmaka die Pflichten eines Asketen (samaṇadhamma). Als ihn Trägheit und Schläfrigkeit (thinamiddha) überkamen, wurde er vom Meister mit den Worten aufgerüttelt: „Moggalāna, lass deine Anstrengung nicht vergeblich sein!“ und so weiter. Nachdem er Trägheit und Schläfrigkeit vertrieben hatte, lauschte er dem vom Erhabenen dargelegten Meditationsobjekt über die Elemente (dhātukammaṭṭhāna), entfaltete die Einsicht (vipassanā) und erlangte stufenweise die drei höheren Pfade. Im Moment der höchsten Frucht erreichte er den Gipfel des Wissens eines Jüngers (sāvakañāṇa). 375. Evaṃ dutiyasāvakabhāvaṃ patvā āyasmā mahāmoggallānatthero attano pubbakammaṃ saritvā somanassavasena pubbacariyaṃ apadānaṃ pakāsento anomadassī bhagavātiādimāha. Tattha na omaṃ alāmakaṃ dassanaṃ passanaṃ assāti anomadassī. Tassa hi dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitasarīrattā sakalaṃ divasaṃ sakalaṃ māsaṃ sakalaṃ saṃvaccharaṃ saṃvaccharasatasahassampi passantānaṃ devamanussānaṃ atittikaraṃ dassananti, anomaṃ alāmakaṃ nibbānaṃ dassanasīloti vā ‘‘anomadassī’’ti laddhanāmo bhāgyavantatādīhi kāraṇehi bhagavā. Lokajeṭṭhoti sakalasattalokassa jeṭṭho padhāno. Āsabhasadisattā āsabho, narānaṃ āsabho narāsabho. So lokajeṭṭho narāsabho anomadassī bhagavā devasaṅghapurakkhato devasamūhehi parivārito. Himavantamhi vihāsīti sambandho. 375. Nachdem der ehrwürdige Thera Mahāmoggalāna auf diese Weise die Stellung des zweiten Hauptjüngers erlangt hatte, erinnerte er sich an seine früheren Taten und verkündete mit Freude seine einstige Lebensführung (Apadāna) mit den Worten: „Der erhabene Anomadassī“ und so weiter. Darin bedeutet „Anomadassī“: Er, dessen Anblick (dassana) nicht unvollkommen (na oma), das heißt nicht geringwertig ist. Weil sein Körper nämlich mit den zweiunddreißig Merkmalen eines großen Mannes geschmückt war, war sein Anblick für Götter und Menschen, selbst wenn sie ihn einen ganzen Tag, einen ganzen Monat, ein ganzes Jahr oder gar hunderttausend Jahre lang betrachteten, niemals sättigend. Oder er hat den Namen „Anomadassī“ erhalten, weil er das vollkommene, nicht fehlerhafte Nibbāna zu sehen pflegt. Aufgrund seiner glückhaften Eigenschaften wird er „Bhagavā“ (der Erhabene) genannt. „Lokajeṭṭha“ bedeutet der Älteste und Vorzüglichste der gesamten Welt der Wesen. Wegen seiner Ähnlichkeit mit einem Leitbullen (āsabha) ist er ein Leitbulle unter den Menschen (narāsabha). Jener Weltenälteste, der Leitbulle der Menschen, der erhabene Anomadassī, wurde von Scharen von Göttern geehrt und von Göttergruppen umgeben. „Er verweilte im Himavanta“ ist die syntaktische Verknüpfung (sambandha). 376. Yadā [Pg.267] dutiyasāvakabhāvāya dutiyavāre patthanaṃ akāsi, tadā nāmena varuṇo nāma ahaṃ nāgarājā hutvā nibbatto ahosinti attho. Tena vuttaṃ – ‘‘varuṇo nāma nāmena, nāgarājā ahaṃ tadā’’ti. Kāmarūpīti yadicchitakāmanimmānasīlo. Vikubbāmīti vividhaṃ iddhivikubbanaṃ karomi. Mahodadhinivāsahanti mañjerikā nāgā, bhūmigatā nāgā, pabbataṭṭhā nāgā, gaṅgāvaheyyā nāgā, sāmuddikā nāgāti imesaṃ nāgānaṃ antare sāmuddikanāgo ahaṃ mahodadhimhi samudde nivāsiṃ, vāsaṃ kappesinti attho. 376. „Als ich zum zweiten Mal den Wunsch äußerte, der zweite Hauptjünger zu werden, da wurde ich als ein Schlangenkönig namens Varuṇa geboren“ – dies ist die Bedeutung. Daher wurde gesagt: „Damals war ich ein Schlangenkönig namens Varuṇa.“ „Kāmarūpī“ bedeutet, dass er die Eigenschaft hat, jede beliebige Gestalt nach Wunsch zu erschaffen. „Vikubbāmi“ bedeutet: Ich vollbringe verschiedene übernatürliche Verwandlungen (iddhi-vikubbana). „Ein Bewohner des großen Ozeans (mahodadhinivāsa)“ bedeutet: Unter den verschiedenen Nāgas – wie den Mañjerika-Nāgas, den Erd-Nāgas, den Berg-Nāgas, den Fluss-Nāgas und den Meeres-Nāgas – war ich ein Meeres-Nāga und lebte im großen Ozean, wo ich meine Wohnung aufschlug; das ist die Bedeutung. 377. Saṅgaṇiyaṃ gaṇaṃ hitvāti niccaparivārabhūtaṃ sakaparivāraṃ nāgasamūhaṃ hitvā vinā hutvā. Tūriyaṃ paṭṭhapesahanti ahaṃ tūriyaṃ paṭṭhapesiṃ, vajjāpesinti attho. Sambuddhaṃ parivāretvāti anomadassisambuddhaṃ samantato sevamānā accharā nāgamāṇavikā vādesuṃ dibbavādehi gītā vākyādīhi vādesuṃ laddhānurūpato vajjesuṃ tadāti attho. 377. „Die gesellige Schar verlassend (saṅgaṇiyaṃ gaṇaṃ hitvā)“ bedeutet, dass er die eigene Nāga-Schar, die sein ständiges Gefolge bildete, verließ und ohne sie war. „Ich ließ Musik erklingen (tūriyaṃ paṭṭhapesahaṃ)“ bedeutet: Ich veranlasste das Spielen von Musikinstrumenten. „Den vollkommen Erwachten umgebend (sambuddhaṃ parivāretvā)“ bedeutet: Die Nāga-Mädchen, die wie Nymphen (accharā) waren, umschlossen den vollkommen Erwachten Anomadassī von allen Seiten, dienten ihm und spielten damals, wie es ihrer Natur entsprach, mit himmlischen Klängen, Gesängen und Vorträgen Musik. Dies ist die Bedeutung. 378. Vajjamānesu tūresūti manussanāgatūriyesu pañcaṅgikesu vajjamānesu. Devā tūrāni vajjayunti cātumahārājikā devā dibbatūriyāni vajjiṃsu vādesunti attho. Ubhinnaṃ saddaṃ sutvānāti ubhinnaṃ devamanussānaṃ bherisaddaṃ sutvā. Tilokagarusamānopi buddho sampabujjhatha jānāti suṇātīti attho. 378. „Während die Instrumente erklangen (vajjamānesu tūresu)“ bedeutet, dass die fünfteiligen Musikinstrumente der Menschen und Nāgas gespielt wurden. „Die Götter ließen Instrumente ertönen (devā tūrāni vajjayuṃ)“ bedeutet, dass die Götter der Himmelswelt der vier Großkönige (cātumahārājikā) himmlische Musikinstrumente spielten. Dies ist die Bedeutung. „Als er den Schall von beiden hörte (ubhinnaṃ saddaṃ sutvāna)“ bedeutet, als er den Trommelschall von beiden – den Göttern und den Menschen – vernahm. „Auch der Buddha, der der Lehrer der drei Welten ist, erwachte völlig (sampabujjhatha)“, das heißt, er erkannte und hörte es; dies ist die Bedeutung. 379. Nimantetvāna sambuddhanti sasāvakasaṅghaṃ sambuddhaṃ svātanāya nimantetvā parivāretvā. Sakabhavananti attano nāgabhavanaṃ upāgamiṃ. Gantvā ca āsanaṃ paññapetvānāti rattiṭṭhānadivāṭṭhānakuṭimaṇḍapasayananisīdanaṭṭhānāni paññāpetvā sajjetvāti attho. Kālamārocayiṃ ahanti evaṃ katapubbavidhāno ahaṃ ‘‘kālo, bhante, niṭṭhitaṃ bhatta’’nti kālaṃ ārocayiṃ viññāpesiṃ. 379. „Nachdem ich den vollkommen Erwachten eingeladen hatte (nimantetvāna sambuddhaṃ)“ bedeutet, dass er den vollkommen Erwachten mitsamt der Jüngerschar für den folgenden Tag eingeladen und bewirtet hatte. „Zu meiner eigenen Stätte (sakabhavanaṃ)“ bedeutet: Ich kehrte in mein eigenes Nāga-Heim zurück. „Und dorthin gegangen, bereitete ich die Sitze vor (gantvā ca āsanaṃ paññapetvāna)“ bedeutet, dass er Plätze für den Aufenthalt bei Nacht und Tag, Hütten, Pavillons, Schlafstätten und Sitze herrichtete und vorbereitete. Dies ist die Bedeutung. „Ich verkündete die Zeit (kālamārocayiṃ ahaṃ)“ bedeutet: Nachdem ich die notwendigen Vorbereitungen getroffen hatte, verkündete ich die Zeit und ließ ihn wissen: „Es ist Zeit, o Herr, das Mahl ist bereit.“ 380. Khīṇāsavasahassehīti tadā so bhagavā arahantasahassehi parivuto lokanāyako sabbā disā obhāsento me bhavanaṃ upāgami sampattoti attho. 380. „Mit tausend Triebversiegten (khīṇāsavasahassehi)“ bedeutet: Damals kam jener Erhabene, umgeben von tausend Arahants, der Weltenlenker, alle Himmelsrichtungen erleuchtend, zu meiner Wohnung und traf dort ein; dies ist die Bedeutung. 381. Attano [Pg.268] bhavanaṃ paviṭṭhaṃ bhagavantaṃ bhojanākāraṃ dassento upaviṭṭhaṃ mahāvīrantiādimāha. Taṃ suviññeyyameva. 381. Um die Art und Weise zu zeigen, wie er den Erhabenen, der sein Nāga-Heim betreten hatte, mit Speise bediente, sprach er die Worte: „Den sitzenden großen Helden (upaviṭṭhaṃ mahāvīraṃ)“ und so weiter. Dies ist leicht zu verstehen. 386. Okkākakulasambhavoti okkākarañño paramparāgatarājakule uppanno sakalajambudīpe pākaṭarājakule uppanno vā gottena gottavasena gotamo nāma satthā manussaloke bhavissati. 386. „Aus dem Geschlecht des Okkāka entsprungen (okkākakulasambhava)“ bedeutet, dass in der vom König Okkāka abstammenden königlichen Linie oder in einer auf ganz Jambudīpa weithin bekannten königlichen Familie ein Meister namens Gotama seiner Abstammung (gotta) nach in der Menschenwelt erscheinen wird. 388. So pacchā pabbajitvānāti so nāgarājā pacchā pacchimabhave kusalamūlena puññasambhārena codito uyyojito sāsane pabbajitvā gotamassa bhagavato dutiyo aggasāvako hessatīti byākaraṇamakāsi. 388. „Er wird später in die Hauslosigkeit ziehen (so pacchā pabbajitvāna)“ bedeutet: Jener Schlangenkönig wird sich später, in seiner letzten Existenz, angetrieben und angespornt durch seine heilsamen Wurzeln (kusalamūla) und seine anhäufung von Verdiensten (puññasambhāra), in der Lehre ordinieren lassen und der zweite Hauptjünger des erhabenen Gotama werden. Auf diese Weise gab er (der Buddha) die Prophezeiung (byākaraṇa). 389. Āraddhavīriyoti ṭhānanisajjādīsu iriyāpathesu vīriyavā. Pahitattoti nibbāne pesitacitto. Iddhiyā pāramiṃ gatoti ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ iddhimantānaṃ yadidaṃ mahāmoggallāno’’ti (a. ni. 1.180, 190) adhiṭṭhāniddhivikubbaniddhikammavipākajiddhiādīsu pāramiṃ pariyosānaṃ gato patto. Sabbāsaveti ā samantato savanato pavattanato ‘‘āsavā’’ti laddhanāme kāmabhavadiṭṭhiavijjādhamme sabbe pariññāya samantato aññāya jānitvā pajahitvā anāsavo nikkileso. Nibbāyissatīti kilesakhandhaparinibbānena nibbāyissatīti sambandho. 389. „Von unermüdlicher Tatkraft (āraddhavīriya)“ bedeutet voller Energie in den Körperhaltungen wie Stehen, Sitzen und so weiter. „Entschlossenen Geistes (pahitatta)“ bedeutet, dass sein Geist auf das Nibbāna gerichtet ist. „Der die Vollendung in den Geisteskräften erlangt hat (iddhiyā pāramiṃ gato)“ bezieht sich auf die Aussage: „Dies ist der Vorzüglichste, ihr Mönche, unter meinen Jünger-Mönchen, die über Geisteskräfte verfügen, nämlich Mahāmoggalāna“; er hat das Äußerste, den Gipfel der Vollendung in Kräften wie der Willensmacht (adhiṭṭhāniddhi), der Verwandlungskraft (vikubbaniddhi), der karmisch bedingten Geisteskraft (kammavipākajiddhi) und so weiter erreicht. „Alle Triebe (sabbāsave)“: Da sie von allen Seiten herbeiströmen (ā-savana), haben die Faktoren von Sinneslust (kāma), Dasein (bhava), Ansichten (diṭṭhi) und Unwissenheit (avijjā) den Namen „āsava“ erhalten; nachdem er all diese Triebe vollkommen verstanden, allseitig erkannt und aufgegeben hat, wird er triebfrei (anāsavo) und makellos (nikkileso). „Er wird erlöschen (nibbāyissati)“ bedeutet, dass er durch das Verlöschen der Befleckungen und der Daseinsgruppen (kilesa- und khandha-parinibbāna) völlig erlöschen wird. So ist die syntaktische Beziehung zu verstehen. 390. Evaṃ thero attano puññavasena laddhabyākaraṇaṃ vatvā puna pāpacariyaṃ pakāsento pāpamittopanissāyātiādimāha. Tattha pāpamitte pāpake lāmake mitte upanissāya nissaye katvā tehi saṃsaggo hutvāti attho. 390. Nachdem der Thera auf diese Weise die Prophezeiung dargelegt hatte, die er aufgrund seiner Verdienste erhalten hatte, offenbarte er erneut sein früheres Vergehen und sprach die Worte: „Weil ich mich an schlechte Freunde hängte (pāpamittopanissāya)“ und so weiter. Darin bedeutet „schlechte Freunde“: indem er sich auf schlechte, minderwertige Freunde stützte und mit ihnen Umgang pflegte; dies ist die Bedeutung. Tatrāyamanupubbī kathā – ekasmiṃ samaye titthiyā sannipatitvā mantesuṃ – ‘‘jānāthāvuso, kena kāraṇena samaṇassa gotamassa lābhasakkāro mahā hutvā nibbatto’’ti? ‘‘Na jānāma’’. ‘‘Tumhe pana na jānāthā’’ti? ‘‘Āma, jānāma’’ – moggallānaṃ nāma ekaṃ bhikkhuṃ nissāya uppanno[Pg.269]. So hi devalokaṃ gantvā devatāhi katakammaṃ pucchitvā āgantvā manussānaṃ kathesi – ‘‘idaṃ nāma katvā evarūpaṃ sampattiṃ labhantī’’ti. Niraye nibbattānampi kammaṃ pucchitvā āgantvā manussānaṃ kathesi – ‘‘idaṃ nāma katvā evarūpaṃ dukkhaṃ anubhavantī’’ti. Manussā tassa kathaṃ sutvā mahantaṃ lābhasakkāraṃ abhiharanti. Sace taṃ māretuṃ sakkhissāma, so lābhasakkāro amhākaṃ nibbattissati, attheso upāyoti sabbe ekacchandā hutvā ‘‘yaṃkiñci katvā taṃ māressāmā’’ti attano upaṭṭhāke samādapetvā kahāpaṇasahassaṃ labhitvā purisaghātake core pakkosāpetvā ‘‘mahāmoggallānatthero nāma samaṇassa gotamassa sāvako kāḷasilāyaṃ vasati, tumhe tattha gantvā taṃ mārethā’’ti tesaṃ taṃ sahassaṃ adaṃsu. Corā dhanalābhena sampaṭicchitvā ‘‘theraṃ māressāmā’’ti gantvā tassa vasanaṭṭhānaṃ parivāresuṃ. Thero tehi parikkhittabhāvaṃ ñatvā kuñcikacchiddena nikkhamitvā pakkāmi. Corā taṃ divasaṃ theraṃ adisvā punekadivasaṃ tassa vasanaṭṭhānaṃ parikkhipiṃsu. Thero ñatvā kaṇṇikāmaṇḍalaṃ bhinditvā ākāsaṃ pakkhandi. Evaṃ te paṭhamamāsepi, majjhimamāsepi theraṃ gahetuṃ nāsakkhiṃsu. Pacchimamāse pana sampatte thero attanā katakammassa ākaḍḍhanabhāvaṃ ñatvā na apagacchi. Corā taṃ paharantā taṇḍulakamattāni aṭṭhīni karontā bhindiṃsu. Atha naṃ ‘‘mato’’ti saññāya ekasmiṃ gumbapiṭṭhe khipitvā pakkamiṃsu. Hierzu ist die folgende aufeinanderfolgende Geschichte (anupubbī kathā): Zu einer Zeit versammelten sich die Sektierer und berieten sich: „Wisst ihr, Brüder, aus welchem Grund der Gewinn und die Ehrerbietung (lābhasakkāro) für den Asketen Gotama so reichlich entstanden sind?“ – „Wir wissen es nicht.“ – „Wisst ihr es denn?“ – „Ja, wir wissen es: Es entstand in Abhängigkeit von einem Mönch namens Moggallāna. Denn dieser geht in die Götterwelt, befragt die Gottheiten nach den von ihnen vollbrachten Taten (kamma), kehrt zurück und berichtet den Menschen: ‚Weil sie diese und jene Tat vollbracht haben, erlangen sie ein solches Glück (sampatti).‘ Auch befragt er jene, die in der Hölle (niraya) wiedergeboren wurden, nach ihren Taten, kehrt zurück und berichtet den Menschen: ‚Weil sie diese und jene Tat vollbracht haben, erfahren sie ein solches Leiden (dukkha).‘ Wenn die Menschen seine Worte hören, bringen sie reichlich Gewinn und Ehrerbietung dar. Wenn wir ihn töten können, wird uns dieser Gewinn und diese Ehrerbietung zufallen. Dies ist die List (upāya).‘ So wurden alle einmütig, dachten: ‚Was auch immer nötig ist, wir werden ihn töten‘, stifteten ihre eigenen Unterstützer an, erhielten tausend Kahāpanas, riefen Räuber herbei, die als Mörder arbeiteten, und gaben ihnen jene tausend Münzen mit den Worten: ‚Der ehrwürdige Mahā-Moggallāna, ein Schüler des Asketen Gotama, weilt bei Kāḷasila. Geht dorthin und tötet ihn.‘ Die Räuber willigten wegen des Geldgewinns ein, dachten: ‚Wir werden den Thera töten‘, gingen hin und umstellten seinen Wohnort. Als der Thera merkte, dass er umstellt war, entkam er durch das Schlüsselloch und ging fort. Da die Räuber den Thera an jenem Tag nicht sahen, umstellten sie an einem anderen Tag wieder seinen Wohnort. Als der Thera dies merkte, durchbrach er die Dachspitze (kaṇṇikāmaṇḍala) und flog empor in den Himmel. So konnten sie den Thera weder im ersten Monat noch im mittleren Monat fassen. Als jedoch der letzte Monat herbeikam, erkannte der Thera das Herbeiziehen seines eigenen zuvor begangenen Kammas und floh nicht mehr. Die Räuber schlugen auf ihn ein, zerschmetterten seine Knochen, bis sie wie Reiskörner waren, und brachen sie. Dann dachten sie, er sei tot, warfen ihn in ein Gebüsch und gingen davon. Thero, ‘‘satthāraṃ passitvā vanditvāva parinibbāyissāmī’’ti attabhāvaṃ jhānaveṭhanena veṭhetvā ākāsena satthu santikaṃ gantvā satthāraṃ vanditvā ‘‘bhante, parinibbāyissāmī’’ti āha. ‘‘Parinibbāyissasi, moggallānā’’ti? ‘‘Āma, bhante’’ti. ‘‘Kattha gantvā parinibbāyissasī’’ti? ‘‘Kāḷasilāpadesaṃ, bhante’’ti. ‘‘Tena hi, moggallāna, mayhaṃ dhammaṃ kathetvā yāhi. Tādisassa hi me sāvakassa na dāni dassanaṃ atthī’’ti. So ‘‘evaṃ karissāmi, bhante’’ti satthāraṃ vanditvā ākāsaṃ uppatitvā sāriputtatthero viya parinibbānadivase nānappakārā iddhiyo katvā dhammaṃ kathetvā satthāraṃ vanditvā kāḷasilāpadesaṃ gantvā parinibbāyi. ‘‘Theraṃ kira corā māresu’’nti ayaṃ kathā sakalajambudīpe patthari. Der Thera dachte: ‚Ich will das vollkommene Verlöschen (parinibbāna) erst erlangen, nachdem ich den Meister gesehen und verehrt habe.‘ Er festigte seinen Körper durch die Kraft der meditativen Versenkung (jhāna), flog durch die Luft in die Gegenwart des Meisters, erwies dem Meister Ehrerbietung und sagte: ‚Ehrwürdiger Herr, ich werde ins Parinibbāna eingehen.‘ – ‚Wirst du ins Parinibbāna eingehen, Moggallāna?‘ – ‚Ja, ehrwürdiger Herr.‘ – ‚Wohin wirst du gehen, um ins Parinibbāna einzugehen?‘ – ‚In die Gegend von Kāḷasila, ehrwürdiger Herr.‘ – ‚Nun denn, Moggallāna, verkündige mir die Lehre (dhamma), bevor du gehst. Denn für mich gibt es nun keinen Anblick mehr von einem solchen Schüler wie dir.‘ Er sprach: ‚So will ich es tun, ehrwürdiger Herr‘, erwies dem Meister Ehrerbietung, stieg in den Himmel empor und vollbrachte – wie der ehrwürdige Sāriputta an seinem Parinibbāna-Tag – übernatürliche Kräfte (iddhiyo) verschiedenster Art. Nachdem er die Lehre verkündet hatte, erwies er dem Meister Ehrerbietung, ging in die Gegend von Kāḷasila und ging ins Parinibbāna ein. Die Nachricht ‚Räuber haben angeblich den Thera getötet‘ verbreitete sich im gesamten Jambudīpa. Rājā [Pg.270] ajātasattu core pariyesanatthāya carapurise payojesi. Tesu coresu surāpāne suraṃ pivantesu maddesu eko ekassa piṭṭhiṃ paharitvā pātesi. So taṃ santajjento ‘‘ambho dubbinīta tvaṃ, kasmā me piṭṭhiṃ paharitvā pātesi, kiṃ pana, are duṭṭhacora, tayā mahāmoggallānatthero paṭhamaṃ pahato’’ti āha. ‘‘Kiṃ pana tvaṃ mayā paṭhamaṃ pahatabhāvaṃ na jānāsī’’ti? Evaṃ etesaṃ ‘‘mayā pahato, mayā pahato’’ti vadantānaṃ sutvā te carapurisā sabbe te core gahetvā rañño ārocesuṃ. Rājā te core pakkosāpetvā pucchi – ‘‘tumhehi thero mārito’’ti? ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Kehi tumhe uyyojitā’’ti? ‘‘Naggasamaṇehi, devā’’ti. Rājā pañcasate naggasamaṇe gāhāpetvā pañcasatehi corehi saddhiṃ rājaṅgaṇe nābhipamāṇesu āvāṭesu nikhaṇāpetvā palālehi paṭicchādetvā aggiṃ dāpesi. Atha nesaṃ jhāmabhāvaṃ jānitvā ayanaṅgalehi kasāpetvā sabbe khaṇḍākhaṇḍaṃ kārāpesi. Tadā bhikkhū dhammasabhāyaṃ kathaṃ samuṭṭhāpesuṃ – ‘‘mahāmoggallānatthero attano ananurūpamaraṇaṃ patto’’ti. Satthā āgantvā ‘‘kāya nuttha, bhikkhave, etarahi kathāya sannisinnā’’ti pucchitvā ‘‘imāya nāma, bhante’’ti vutte ‘‘moggallānassa, bhikkhave, imasseva attabhāvassa ananurūpaṃ maraṇaṃ, pubbe pana tena katakammassa anurūpamevā’’ti vatvā ‘‘kiṃ panassa, bhante, pubbakamma’’nti puṭṭho taṃ vitthāretvā kathesi. König Ajātasattu sandte Kundschafter aus, um nach den Räubern zu suchen. Während diese Räuber in einer Schänke Alkohol tranken und berauscht waren, schlug einer von ihnen einem anderen auf den Rücken und brachte ihn zu Fall. Dieser bedrohte ihn und sprach: ‚He, du Ungezogener, warum hast du mir auf den Rücken geschlagen und mich zu Fall gebracht? Bist du etwa, du böser Räuber, derjenige, der den ehrwürdigen Mahā-Moggallāna zuerst geschlagen hat?‘ – ‚Weißt du denn nicht, dass er von mir zuerst geschlagen wurde?‘ Als die Kundschafter hörten, wie sie so stritten: ‚Von mir wurde er geschlagen! Von mir wurde er geschlagen!‘, nahmen sie all diese Räuber fest und meldeten es dem König. Der König ließ die Räuber rufen und fragte: ‚Habt ihr den Thera getötet?‘ – ‚Ja, o König.‘ – ‚Wer hat euch dazu angestiftet?‘ – ‚Die nackten Asketen (naggasamaṇa), o König.‘ Da ließ der König die fünfhundert nackten Asketen festnehmen, sie zusammen mit den fünfhundert Räubern auf dem Königshof bis zum Nabel in Gruben eingraben, mit Stroh bedecken und Feuer legen. Als er erkannte, dass sie verbrannt waren, ließ er den Boden mit eisernen Pflügen umpflügen und sie alle in Stücke reißen. Zu jener Zeit begannen die Mönche in der Versammlungshalle (dhammasabhā) ein Gespräch: ‚Der ehrwürdige Mahā-Moggallāna hat einen für ihn unpassenden Tod erlitten.‘ Als der Meister herbeitrat, fragte er: ‚Mit welchem Gespräch, ihr Mönche, seid ihr hier gerade versammelt?‘ Und als sie antworteten: ‚Mit diesem, ehrwürdiger Herr‘, sprach er: ‚Mönche, für dieses gegenwärtige Dasein (attabhāva) war der Tod Moggallānas zwar unpassend, doch in Bezug auf das von ihm in der Vergangenheit begangene Kamma war er vollkommen angemessen.‘ Auf die Frage: ‚Was aber, ehrwürdiger Herr, war sein früheres Kamma?‘, erzählte er es ihnen im Detail. Atīte, bhikkhave, bārāṇasiyaṃ eko kulaputto sayameva koṭṭanapacanādīni karonto mātāpitaro paṭijaggi. Athassa mātāpitaro ‘‘tāta, tvaṃ ekakova gehe ca araññe ca kammaṃ karonto kilamasi, ekaṃ te kumārikaṃ ānessāmā’’ti vatvā ‘‘ammatātā, yāva tumhe jīvatha, tāva vo sahatthā upaṭṭhahissāmī’’ti tena paṭikkhittāpi punappunaṃ yācitvā kumārikaṃ ānesuṃ. Sā katipāhameva te upaṭṭhahitvā pacchā tesaṃ dassanamapi anicchantī – ‘‘na sakkā tava mātāpitūhi saddhiṃ ekaṭṭhāne vasitu’’nti ujjhāyitvā tasmiṃ attano kathaṃ aggaṇhante tassa bahigatakāle makacivākakhaṇḍāni ca yāgupheṇake ca gahetvā tattha tattha ākiritvā tenāgantvā ‘‘kiṃ ida’’nti puṭṭhā ‘‘imesaṃ [Pg.271] mahallakaandhānaṃ etaṃ kammaṃ, sabbaṃ gehaṃ kiliṭṭhā karontā vicaranti, na sakkā etehi saddhiṃ ekaṭṭhāne vasitu’’nti evaṃ tāya punappunaṃ kathiyamānāya evarūpopi pūritapāramī satto mātāpitūhi saddhiṃ bhijji. So ‘‘hotu, jānissāmi nesaṃ kattabbakamma’’nti te bhojetvā ‘‘ammatātā, asukaṭṭhāne nāma tumhākaṃ ñātakā āgamanaṃ paccāsīsanti, tattha gamissāmā’’ti te yānakaṃ āropetvā ādāya gacchanto aṭavimajjhaṃ pattakāle ‘‘tāta, rasmiyo gaṇhatha, goṇā daṇḍasaññāya gamissanti, imasmiṃ ṭhāne corā vasanti, ahaṃ otaritvā carāmī’’ti pitu hatthe rasmiyo datvā otaritvā gacchanto saddaṃ parivattetvā corānaṃ uṭṭhitasaddamakāsi. Mātāpitaro saddaṃ sutvā ‘‘corā uṭṭhitā’’ti saññāya ‘‘tāta, corā uṭṭhitā, mahallakā mayaṃ, tvaṃ attānameva rakkhāhī’’ti āhaṃsu. So mātāpitaro viravantepi corasaddaṃ karonto koṭṭetvā māretvā aṭaviyaṃ khipitvā paccāgami. In der Vergangenheit, ihr Mönche, gab es in Bārāṇasī einen Sohn aus guter Familie, der selbst das Stampfen, Kochen und andere Arbeiten verrichtete und für seine Eltern sorgte. Da sprachen seine Eltern zu ihm: „Lieber Sohn, du plagst dich ganz allein ab, indem du sowohl im Hause als auch im Walde die Arbeit verrichtest; wir wollen dir ein Mädchen bringen.“ Obwohl er dies ablehnte und sprach: „Liebe Mutter, lieber Vater, solange ihr lebt, werde ich euch mit meinen eigenen Händen dienen“, baten sie ihn wieder und wieder und brachten schließlich ein Mädchen herbei. Diese diente ihnen nur wenige Tage lang, wollte sie danach aber nicht einmal mehr sehen. Sie dachte klagend: „Es ist unmöglich, mit deinen Eltern an einem Ort zusammenzuleben.“ Als er nicht auf ihre Worte hörte, nahm sie, während er abwesend war, Hanffasern, Rindenstücke und den Schaum von Reisschleim, verstreute sie hier und da, und als er zurückkehrte, antwortete sie auf seine Frage „Was ist das?“: „Das ist das Werk dieser blinden Alten! Sie laufen umher und beschmutzen das ganze Haus. Es ist unmöglich, mit ihnen an einem Ort zusammenzuleben.“ Da sie dies wieder und wieder zu ihm sagte, überwarf sich selbst ein solches Wesen, das die Vollkommenheiten (pāramī) erfüllt hatte, mit seinen Eltern. Er dachte: „Es sei so, ich werde mich um das kümmern, was mit ihnen zu tun ist.“ Er gab ihnen zu essen und sprach: „Liebe Mutter, lieber Vater, an jenem Ort erwarten eure Verwandten eure Ankunft; wir wollen dorthin reisen.“ Er ließ sie auf einen kleinen Wagen steigen, nahm sie mit sich, und als sie die Mitte des Waldes erreicht hatten, sprach er: „Lieber Vater, nimm die Zügel! Die Rinder werden auf das Zeichen des Treibsteckens hin weitergehen. An diesem Ort lauern Räuber, ich werde absteigen und zu Fuß gehen.“ Er legte die Zügel in die Hand des Vaters, stieg ab, ging ein Stück, verstellte seine Stimme und erzeugte ein Geräusch, als ob Räuber heranstürmten. Als die Eltern das Geräusch hörten und glaubten, dass Räuber heranstürmten, sagten sie: „Lieber Sohn, Räuber stürmen heran! Wir sind alt; rette du nur dich selbst!“ Obwohl die Eltern so schrien, erzeugte er weiterhin das Räubergeräusch, schlug sie nieder, tötete sie, warf sie im Wald weg und kehrte nach Hause zurück. Satthā idaṃ tassa pubbakammaṃ kathetvā ‘‘bhikkhave, moggallāno ettakaṃ kammaṃ katvā anekavassasatasahassāni niraye paccitvā tāva pakkāvasesena attabhāvasate evameva koṭṭetvā saṃcuṇṇo maraṇaṃ patto, evaṃ moggallānena attano kammānurūpameva maraṇaṃ laddhaṃ. Pañcahi corasatehi saddhiṃ pañcatitthiyasatānipi mama puttaṃ appaduṭṭhaṃ dussetvā anurūpameva maraṇaṃ labhiṃsu. Appaduṭṭhesu hi padussanto dasahi kāraṇehi anayabyasanaṃ pāpuṇātiyevā’’ti anusandhiṃ ghaṭetvā dhammaṃ desento imā gāthā abhāsi – Nachdem der Meister diese frühere Tat von ihm erzählt hatte, sprach er: „Ihr Mönche, nachdem Moggallāna ein solches Werk vollbracht hatte, schmorte er viele hunderttausend Jahre in der Hölle, und durch den verbleibenden Rest der Reifung des Karmas wurde er in hundert Existenzen auf genau diese Weise zerschlagen, zu Staub zerrieben und fand den Tod. So erlitt Moggallāna einen Tod, der genau seinem eigenen Karma entsprach. Auch die fünfhundert Ketzer erlitten zusammen mit den fünfhundert Räubern einen angemessenen Tod, weil sie meinen Sohn, der völlig schuldlos war, verletzt hatten. Denn wer sich an einem Schuldlose vergeht, erleidet unweigerlich aus zehn Gründen Verderben und Untergang.“ Nachdem er so den Zusammenhang hergestellt hatte, verkündete er die Lehre und sprach diese Verse: ‘‘Yo daṇḍena adaṇḍesu, appaduṭṭhesu dussati; Dasannamaññataraṃ ṭhānaṃ, khippameva nigacchati. „Wer mit Gewalt jene verletzt, die gewaltlos sind und völlig schuldlos, der verfällt schnell einer von zehn leidvollen Zuständen.“ ‘‘Vedanaṃ pharusaṃ jāniṃ, sarīrassa va bhedanaṃ; Garukaṃ vāpi ābādhaṃ, cittakkhepaṃ va pāpuṇe. „Er erfährt grausamen Schmerz, Verlust des Besitzes oder die Zerstörung des Körpers, eine schwere Krankheit oder gar geistige Verwirrung.“ ‘‘Rājato vā upasaggaṃ, abbhakkhānaṃ va dāruṇaṃ; Parikkhayaṃ va ñātīnaṃ, bhogānaṃ va pabhaṅgunaṃ. „Oder Bedrängnis durch den König, eine schreckliche Verleumdung, den Verlust von Verwandten oder die Zerstörung des Wohlstands.“ ‘‘Athavassa [Pg.272] agārāni, aggi ḍahati pāvako; Kāyassa bhedā duppañño, nirayaṃ sopapajjatī’’ti. (dha. pa. 137-140); „Oder aber das lodernde Feuer verbrennt seine Häuser. Nach dem Zerfall des Körpers wird der Unweise in der Hölle wiedergeboren.“ 393. Pavivekamanuyuttoti pakārena vivekaṃ ekībhāvaṃ anuyutto yojito yuttappayutto. Samādhibhāvanāratoti paṭhamajjhānādibhāvanāya rato allīno ca. Sabbāsave sakalakilese, pariññāya jānitvā pajahitvā, anāsavo nikkileso viharāmīti sambandho. 393. „Dem Rückzug geweiht“ (pavivekamanuyutto) bedeutet, der Abgeschiedenheit, dem Alleinsein in vielfältager Weise hingegeben, verbunden und wiederholt darauf ausgerichtet zu sein. „An der Entfaltung der Sammlung Gefallen findend“ (samādhibhāvanārato) bedeutet, an der Entfaltung des ersten Jhana (der ersten Vertiefung) usw. Gefallen zu finden und daran anzuhaften. „Alle Triebe“ (sabbāsave) meint alle Befleckungen (kilesa). Der Zusammenhang lautet: „Indem ich sie mit vollkommener Erkenntnis erkannt und vollständig aufgegeben habe, verweile ich triebfrei (anāsavo) und ohne Befleckungen.“ 394. Idāni attano puññasambhāravasena pubbacaritassa phalaṃ dassento dharaṇimpi sugambhīrantiādimāha. 394. Nun sprach er, um die Frucht seines früheren Wirkens kraft der Anhäufung seines heilsamen Verdienstes aufzuzeigen, die Worte, die mit „Selbst die tiefe Erde...“ (dharaṇimpi sugambhīraṃ) beginnen. Tatrāyamanupubbīkathā – buddhena coditoti sammāsambuddhena codito uyyojito. Bhikkhusaṅghassa pekkhatoti mahato bhikkhusaṅghassa passantassa. Migāramātupāsādaṃ, pādaṅguṭṭhena kampayīti pubbārāme visākhāya mahāupāsikāya kāritaṃ sahassatthambhapaṭimaṇḍitaṃ mahāpāsādaṃ attano pādaṅguṭṭhena kampesiṃ. Ekasmiñhi samaye pubbārāme yathāvuttapāsāde bhagavati viharante sambahulā navakatarā bhikkhū uparipāsāde nisinnā satthārampi acintetvā tiracchānakathaṃ kathetumāraddhā. Taṃ sutvā bhagavā te saṃvejetvā attano dhammadesanāya bhājanabhūte kātukāmo āyasmantaṃ mahāmoggallānattheraṃ āmantesi – ‘‘passasi tvaṃ, moggallāna, nave bhikkhū tiracchānakathamanuyutte’’ti taṃ sutvā thero satthu ajjhāsayaṃ ñatvā abhiññāpādakaṃ āpokasiṇārammaṇaṃ catutthajjhānaṃ samāpajjitvā vuṭṭhāya ‘‘pāsādassa patiṭṭhitokāsaṃ udakaṃ hotū’’ti adhiṭṭhāya pāsādamatthake thupikaṃ pādaṅguṭṭhena pahari, pāsādo onamitvā ekena passena aṭṭhāsi. Punapi pahari, aparenapi passena aṭṭhāsi. Te bhikkhū bhītā saṃviggā pāsādassa patanabhayena tato nikkhamitvā bhagavato samīpe aṭṭhaṃsu. Satthā tesaṃ ajjhāsayaṃ oloketvā dhammaṃ desesi. Taṃ sutvā tesu keci sotāpattiphale patiṭṭhahiṃsu, keci sakadāgāmiphale, keci anāgāmiphale, keci arahattaphale patiṭṭhahiṃsu. Svāyamattho pāsādakampanasuttena dīpetabbo. Hierbei ist dies die fortlaufende Erzählung: „Vom Buddha gedrängt“ (buddhena codito) bedeutet vom vollkommen Erleuchteten angespornt und aufgefordert. „Vor den Augen der Mönchsgemeinde“ (bhikkhusaṅghassa pekkhato) bedeutet, während die große Mönchsgemeinde zusah. „Brachte er den Palast der Mutter Migāras mit der großen Zehe zum Beben“ (migāramātupāsādaṃ pādaṅguṭṭhena kampayī) bedeutet: „Ich brachte mit meiner großen Zehe den großen Palast zum Beben, der von der großen Laienanhängerin Visākhā im Östlichen Kloster (Pubbārāma) errichtet worden war und mit tausend Räumen geschmückt war.“ Zu jener Zeit nämlich, als der Erhabene in dem besagten Palast im Östlichen Kloster verweilte, begannen zahlreiche sehr junge Mönche, die im oberen Stockwerk des Palastes saßen, gänzlich ohne Rücksicht auf den Meister profanes Gerede (tiracchānakatha) zu führen. Als der Erhabene dies hörte, wollte er in ihnen geistigen Schauder (saṃvega) erwecken und sie zu tauglichen Gefäßen für seine Lehrverkündigung machen. Daher rief er den ehrwürdigen Mahāmoggallāna und sprach: „Siehst du, Moggallāna, wie sich die jungen Mönche profanem Gerede hingeben?“ Als der ältere Mönch dies hörte, erkannte er die Absicht des Meisters. Er trat in die vierte Vertiefung (jhāna) ein, die das Wasserkasiṇa zum Meditationsobjekt hat und als Grundlage für die höheren Geisteskräfte (abhiññā) dient. Nach dem Verlassen dieses Zustands lenkte er seinen Geist darauf: „Der Boden, auf dem der Palast steht, werde zu Wasser“, und stieß mit seiner großen Zehe gegen die Kuppelspitze auf dem Dach des Palastes. Da neigte sich der Palast und stand schief auf der einen Seite. Er stieß ihn erneut an, und er stand schief auf der anderen Seite. Die Mönche liefen aus Angst vor dem Einsturz des Palastes erschrocken und zutiefst aufgewühlt von dort weg und stellten sich nahe beim Erhabenen auf. Der Meister blickte auf ihre innere Bereitschaft und verkündete ihnen die Lehre. Als sie diese gehört hatten, gründeten sich einige von ihnen in der Frucht des Stromeintritts (sotāpattiphala), einige in der Frucht der Einmalwiederkehr (sakadāgāmiphala), einige in der Frucht der Nichtwiederkehr (anāgāmiphala) und einige in der Frucht der Arhatschaft (arahattaphala). Dieser Sachverhalt sollte anhand des Pāsādakampana-Suttas dargelegt werden. Vejayantapāsādanti [Pg.273] so vejayantapāsādo tāvatiṃsabhavane yojanasahassubbedho anekasahassaniyyūhakūṭāgārapaṭimaṇḍito devāsurasaṅgāme asure jinitvā sakke devānaminde nagaramajjhe ṭhite uṭṭhito vijayantena nibbattattā ‘‘vejayanto’’ti laddhanāmo pāsādo, taṃ sandhāyāha – ‘‘vejayantapāsāda’’nti, tampi ayaṃ thero pādaṅguṭṭhena kampeti. Ekasmiñhi samaye bhagavantaṃ pubbārāme viharantaṃ sakko devarājā upasaṅkamitvā taṇhāsaṅkhayavimuttiṃ pucchi. Tassa bhagavā vissajjesi. So taṃ sutvā attamano pamudito abhivādetvā padakkhiṇaṃ katvā attano devalokameva gato. Athāyasmā mahāmoggallāno evaṃ cintesi – ‘‘ayaṃ sakko bhagavantaṃ upasaṅkamitvā evarūpaṃ gambhīranibbānapaṭisaṃyuttaṃ pañhaṃ pucchi, bhagavatā ca pañho vissajjito, kiṃ nu kho jānitvā gato, udāhu ajānitvā. Yaṃnūnāhaṃ devalokaṃ gantvā tamatthaṃ jāneyya’’nti? So tāvadeva tāvatiṃsabhavanaṃ gantvā sakkaṃ devānamindaṃ tamatthaṃ pucchi. Sakko dibbasampattiyā pamatto hutvā vikkhepaṃ akāsi. Thero tassa saṃvegajananatthaṃ vejayantapāsādaṃ pādaṅguṭṭhena kampesi. Tena vuttaṃ – „Vejayantapāsādanti“: Dieser Vejayanta-Palast ist ein Palast im Tāvatiṃsa-Himmelreich, der tausend Yojanas hoch und mit vielen tausenden Giebelhäusern und verzierten Spitzen geschmückt ist. Er erhielt den Namen „Vejayanta“ (Siegespalast), weil er sich durch den Sieg erhob, als Sakka, der Herrscher der Götter, nach dem Sieg über die Asuras im Kampf zwischen Göttern und Asuras inmitten der Götterstadt stand. Darauf bezieht sich das Wort „vejayantapāsādaṃ“. Auch diesen ließ jener Thera mit seiner großen Zehe erbeben. Zu einer Zeit nämlich, als der Erhabene im Pubbārāma-Kloster weilte, suchte Sakka, der König der Götter, den Erhabenen auf und fragte ihn nach der Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens. Der Erhabene beantwortete ihm die Frage. Als er dies gehört hatte, erfreut und beglückt, verneigte er sich ehrfurchtsvoll, umrundete ihn rechtsherum und kehrte in seine eigene Götterwelt zurück. Da dachte der ehrwürdige Mahāmoggallāna so: „Dieser Sakka suchte den Erhabenen auf und stellte eine solch tiefe, mit dem Nibbāna verbundene Frage, und der Erhabene hat die Frage beantwortet. Ist er nun weggegangen, nachdem er sie verstanden hat, oder ohne sie verstanden zu haben? Wie wäre es, wenn ich in die Götterwelt ginge und diese Sache herausfände?“ Er ging sogleich in das Tāvatiṃsa-Himmelreich und fragte Sakka, den Herrscher der Götter, nach dieser Angelegenheit. Sakka jedoch, berauscht von seiner himmlischen Pracht, wich der Frage aus. Um in ihm heilsamen Schauer zu erzeugen, ließ der Thera den Vejayanta-Palast mit seiner großen Zehe erbeben. Deswegen wurde gesagt: ‘‘Yo vejayantapāsādaṃ, pādaṅguṭṭhena kampayi; Iddhibalenupatthaddho, saṃvejesi ca devatā’’ti. (ma. ni. 1.513); „Der den Vejayanta-Palast mit der großen Zehe erbeben ließ, gestützt auf die Macht seiner übernatürlichen Kräfte, und die Gottheiten in Erschütterung versetzte.“ Ayaṃ panattho – cūḷataṇhāsaṅkhayavimuttisuttena (ma. ni. 1.390 ādayo) dīpetabbo. Kampitākāro heṭṭhā vuttoyeva. ‘‘Sakkaṃ so paripucchatī’’ti (ma. ni. 1.513) yathāvuttameva therassa taṇhāsaṅkhayavimuttipucchaṃ sandhāya vuttaṃ. Tenāha – ‘‘apāvuso, jānāsi, taṇhakkhayavimuttiyo’’ti? Tassa sakko viyākāsi. Idaṃ therena pāsādakampane kate saṃviggahadayena pamādaṃ pahāya yoniso manasi karitvā pañhassa byākatabhāvaṃ sandhāya vuttaṃ. Satthārā desitaniyāmeneva hi so tadā kathesi. Tenāha – ‘‘pañhaṃ puṭṭho yathātatha’’nti (ma. ni. 1.513). Tattha sakkaṃ so paripucchatīti sakkaṃ devarājaṃ mahāmoggallānatthero satthārā desitāya taṇhāsaṅkhayavimuttiyā sammadeva gahitabhāvaṃ pucchi. Atītatthe hi idaṃ vattamānavacanaṃ. Apāvuso, jānāsīti āvuso, api jānāsi, kiṃ jānāsi? Taṇhakkhayavimuttiyoti (ma. ni. 1.513) taṇhāsaṅkhayavimuttiyo satthārā tuyhaṃ desitā, tathā ‘‘kiṃ [Pg.274] jānāsī’’ti pucchati. Taṇhakkhayavimuttiyoti vā taṇhāsaṅkhayavimuttisuttassa desanaṃ pucchati. Diese Bedeutung nun ist anhand des Cūḷataṇhāsaṅkhayavimutti-Sutta zu erklären. Die Art des Erbebenlassens wurde bereits weiter unten dargelegt. „Er befragt Sakka“ bezieht sich genau auf die bereits erwähnte Frage des Thera bezüglich der Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens. Deshalb sagte er: „Nicht wahr, Freund, weißt du Bescheid über die Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens?“ Und Sakka erklärte es ihm. Dies wurde im Hinblick darauf gesagt, dass Sakka, nachdem der Thera den Palast erschüttert hatte, mit erschrecktem Herzen seine Nachlässigkeit aufgab, weise reflektierte und die Beantwortung der Frage darlegte. Denn er sprach damals genau in der Weise, wie es der Meister gelehrt hatte. Deswegen heißt es: „Befragt nach der Frage, wie es der Wahrheit entspricht“. Darin bedeutet „Er befragt Sakka“: Der Thera Mahāmoggallāna befragte Sakka, den König der Götter, ob er die vom Meister gelehrte Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens auch richtig erfasst habe. Denn dieses Präsens-Verb steht hier im Sinne der Vergangenheit. „Apāvuso, jānāsi“ bedeutet: „Freund, weißt du es etwa? Was weißt du?“ „Bezüglich der Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens“ bedeutet: Er fragt: „Weißt du auf diese Weise Bescheid über die Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens, die der Meister dir gelehrt hat?“ Oder mit „Bezüglich der Befreiung durch die Vernichtung des Begehrens“ fragt er nach der Darlegung des Taṇhāsaṅkhayavimutti-Sutta. Brahmānanti mahābrahmānaṃ. Sudhammāyābhito sabhanti (ma. ni. 1.513) sudhammāya sabhāya. Ayaṃ pana brahmaloke sudhammā sabhā, na tāvatiṃsabhavane. Sudhammāsabhāvirahito devaloko nāma natthi. ‘‘Ajjāpi te, āvuso, sā diṭṭhi, yā te diṭṭhi pure ahū’’ti imaṃ brahmalokaṃ upagantuṃ samattho natthi koci samaṇo vā brāhmaṇo vā. Satthu idhāgamanato pubbe yā tuyhaṃ diṭṭhi ahosi, kiṃ ajjāpi idānipi sā diṭṭhi na vigatāti? Passasi vītivattantaṃ brahmaloke pabhassaranti brahmaloke vītipatantaṃ mahākappinamahākassapādīhi sāvakehi parivāritassa tejodhātuṃ samāpajjitvā nisinnassa sasāvakassa bhagavato okāsaṃ passasīti attho. Ekasmiñhi samaye bhagavā brahmaloke sudhammāya sabhāya sannipatitvā sannisinnassa ‘‘atthi nu kho koci samaṇo vā brāhmaṇo vā evaṃmahiddhiko, so idha āgantuṃ sakkuṇeyyā’’ti cintentassa brahmuno cittamaññāya tattha gantvā brahmuno matthake ākāse nisinno tejodhātuṃ samāpajjitvā obhāsaṃ muñcanto mahāmoggallānādīnaṃ āgamanaṃ cintesi. Saha cintanena tepi tattha gantvā satthāraṃ vanditvā satthu ajjhāsayaṃ ñatvā tejodhātuṃ samāpajjitvā paccekadisāsu nisīditvā obhāsaṃ vissajjesuṃ. Sakalabrahmaloko ekobhāso ahosi. Satthā brahmuno kallacittataṃ ñatvā catusaccapakāsanaṃ dhammaṃ desesi. Desanāpariyosāne anekāni brahmasahassāni maggaphalesu patiṭṭhahiṃsu. Taṃ sandhāya codento ajjāpi te, āvuso, sā diṭṭhīti gāthamāha. Ayaṃ panattho bakabrahmasuttena (saṃ. ni. 1.175) dīpetabbo. Vuttaṃ hetaṃ (saṃ. ni. 1.176) – „Der Brahmās“ bedeutet „der Mahābrahmās“. „Die Versammlung nahe der Sudhammā-Halle“ bedeutet „in der Sudhammā-Halle“. Diese Sudhammā-Versammlungshalle befindet sich jedoch in der Brahmā-Welt, nicht im Reich der Tāvatiṃsa-Götter. Es gibt nämlich keine Götterwelt, die ohne eine Sudhammā-Versammlungshalle wäre. „Hast du, o Freund, noch immer jene Ansicht, die du früher hattest?“ – dies bezieht sich auf die Ansicht: „Es gibt keinen Asketen oder Brahmanen, der fähig ist, in diese Brahmā-Welt zu gelangen.“ Die Ansicht, die du vor der Ankunft des Meisters hier hattest – ist jene Ansicht etwa auch heute, selbst jetzt noch, nicht gewichen? „Siehst du den Glänzenden, der die Brahmā-Welt durchstreift?“ bedeutet: „Siehst du den Raum des von seinen Schülern wie Mahākappina, Mahākassapa und anderen umgebenen Erhabenen, der, nachdem er in das Feuerelement eingetreten ist, mitsamt seinen Schülern dasitzt?“ Zu einer Zeit nämlich erkannte der Erhabene den Gedanken eines Brahmā, der in der Sudhammā-Versammlungshalle in der Brahmā-Welt saß und dachte: „Gibt es wohl irgendeinen Asketen oder Brahmanen von so großer magischer Macht, der imstande wäre, hierher zu gelangen?“ Da ging er dorthin, setzte sich in der Luft direkt über dem Kopf des Brahmā nieder, trat in das Feuerelement ein, strahlte Licht aus und dachte an das Kommen von Mahāmoggallāna und den anderen Schülern. Sogleich dachten auch sie daran, gingen dorthin, erwiesen dem Meister ihre Ehrerbietung, erkannten die Absicht des Meisters, traten ebenfalls in das Feuerelement ein, setzten sich in den verschiedenen Himmelsrichtungen nieder und strahlten Licht aus. Die gesamte Brahmā-Welt wurde zu einem einzigen Lichtermeer. Der Meister, der die Bereitschaft des Geistes des Brahmā erkannte, verkündete die Lehre, welche die Vier Edlen Wahrheiten offenbart. Am Ende der Lehrrede wurden viele tausend Brahmās in den Pfaden und Früchten gefestigt. Darauf Bezug nehmend und ihn tadelnd sprach er die Strophe: „Hast du, o Freund, noch immer jene Ansicht...“ Diese Bedeutung ist anhand des Bakabrahma-Sutta zu erklären. Es wurde nämlich gesagt: ‘‘Ekaṃ samayaṃ bhagavā sāvatthiyaṃ viharati jetavane anāthapiṇḍikassa ārāme. Tena kho pana samayena aññatarassa brahmuno evarūpaṃ pāpakaṃ diṭṭhigataṃ uppannaṃ hoti – ‘natthi samaṇo vā brāhmaṇo vā yo idha āgaccheyyā’ti. Atha kho bhagavā tassa brahmuno cetasā cetoparivitakkamaññāya seyyathāpi nāma balavā puriso samiñjitaṃ vā bāhaṃ pasāreyya[Pg.275], pasāritaṃ vā bāhaṃ samiñjeyya; evameva jetavane antarahito tasmiṃ brahmaloke pāturahosi. Atha kho bhagavā tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisīdi tejodhātuṃ samāpajjitvā. „Zu einer Zeit weilte der Erhabene in Sāvatthī im Jeta-Hain, im Kloster des Anāthapiṇḍika. Zu jener Zeit nun war in einem gewissen Brahmā folgende schlechte Ansicht entstanden: ‚Es gibt keinen Asketen oder Brahmanen, der hierher gelangen könnte.‘ Da erkannte der Erhabene mit seinem eigenen Geist den Gedanken im Geist dieses Brahmā. So wie ein starker Mann seinen gebeugten Arm ausstrecken oder seinen ausgestreckten Arm beugen würde, ebenso verschwand er im Jeta-Hain und erschien in jener Brahmā-Welt. Da setzte sich der Erhabene im Schneidersitz in der Luft über diesem Brahmā nieder, nachdem er in das Feuerelement eingetreten war.“ ‘‘Atha kho āyasmato mahāmoggallānassa etadahosi ‘kahaṃ nu kho bhagavā etarahi viharatī’ti? Addasa kho āyasmā mahāmoggallāno bhagavantaṃ dibbena cakkhunā visuddhena atikkantamānusakena tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisinnaṃ tejodhātuṃ samāpannaṃ. Disvāna seyyathāpi nāma balavā puriso samiñjitaṃ vā bāhaṃ pasāreyya, pasāritaṃ vā bāhaṃ samiñjeyya; evameva jetavane antarahito tasmiṃ brahmaloke pāturahosi. Atha kho āyasmā mahāmoggallāno puratthimaṃ disaṃ nissāya tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisīdi tejodhātuṃ samāpajjitvā nīcataraṃ bhagavato. Da dachte der Ehrwürdige Mahāmoggallāna: „Wo weilt wohl der Erhabene jetzt?“ Der Ehrwürdige Mahāmoggallāna sah mit dem göttlichen Auge, dem reinen, das das menschliche Auge übertrifft, den Erhabenen über jenem Brahma am Himmel mit verschränkten Beinen sitzen, in das Element des Feuers vertieft. Als er ihn sah – gleichwie ein starker Mann seinen gebeugten Arm ausstrecken oder seinen ausgestreckten Arm beugen würde –, verschwand er im Jetavana und erschien in jener Brahma-Welt. Da setzte sich der Ehrwürdige Mahāmoggallāna in östlicher Richtung, über jenem Brahma am Himmel, mit verschränkten Beinen nieder, nachdem er in das Element des Feuers eingetreten war, tiefer als der Erhabene. ‘‘Atha kho āyasmato mahākassapassa etadahosi – ‘kahaṃ nu kho bhagavā etarahi viharatī’ti? Addasa kho āyasmā mahākassapo bhagavantaṃ dibbena cakkhunā visuddhena atikkantamānusakena tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisinnaṃ tejodhātuṃ samāpannaṃ. Disvāna seyyathāpi nāma balavā puriso…pe… evameva jetavane antarahito tasmiṃ brahmaloke pāturahosi. Atha kho āyasmā mahākassapo dakkhiṇaṃ disaṃ nissāya tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisīdi tejodhātuṃ samāpajjitvā nīcataraṃ bhagavato. Da dachte der Ehrwürdige Mahākassapa: „Wo weilt wohl der Erhabene jetzt?“ Der Ehrwürdige Mahākassapa sah mit dem göttlichen Auge, dem reinen, das das menschliche Auge übertrifft, den Erhabenen über jenem Brahma am Himmel mit verschränkten Beinen sitzen, in das Element des Feuers vertieft. Als er ihn sah – gleichwie ein starker Mann ... ebenso – verschwand er im Jetavana und erschien in jener Brahma-Welt. Da setzte sich der Ehrwürdige Mahākassapa in südlicher Richtung, über jenem Brahma am Himmel, mit verschränkten Beinen nieder, nachdem er in das Element des Feuers eingetreten war, tiefer als der Erhabene. ‘‘Atha kho āyasmato mahākappinassa etadahosi – ‘kahaṃ nu kho bhagavā etarahi viharatī’ti? Addasa kho āyasmā mahākappino bhagavantaṃ dibbena cakkhunā visuddhena atikkantamānusakena tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisinnaṃ tejodhātuṃ samāpannaṃ. Disvāna seyyathāpi nāma balavā puriso…pe… evameva jetavane antarahito tasmiṃ brahmaloke [Pg.276] pāturahosi. Atha kho āyasmā mahākappino pacchimaṃ disaṃ nissāya tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisīdi tejodhātuṃ samāpajjitvā nīcataraṃ bhagavato. Da dachte der Ehrwürdige Mahākappina: „Wo weilt wohl der Erhabene jetzt?“ Der Ehrwürdige Mahākappina sah mit dem göttlichen Auge, dem reinen, das das menschliche Auge übertrifft, den Erhabenen über jenem Brahma am Himmel mit verschränkten Beinen sitzen, in das Element des Feuers vertieft. Als er ihn sah – gleichwie ein starker Mann ... ebenso – verschwand er im Jetavana und erschien in jener Brahma-Welt. Da setzte sich der Ehrwürdige Mahākappina in westlicher Richtung, über jenem Brahma am Himmel, mit verschränkten Beinen nieder, nachdem er in das Element des Feuers eingetreten war, tiefer als der Erhabene. ‘‘Atha kho āyasmato anuruddhassa etadahosi – ‘kahaṃ nu kho bhagavā etarahi viharatī’ti? Addasa kho āyasmā anuruddho bhagavantaṃ dibbena cakkhunā visuddhena atikkantamānusakena tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisinnaṃ tejodhātuṃ samāpannaṃ. Disvāna seyyathāpi nāma balavā puriso…pe… evameva jetavane antarahito tasmiṃ brahmaloke pāturahosi. Atha kho āyasmā anuruddho uttaraṃ disaṃ nissāya tassa brahmuno uparivehāsaṃ pallaṅkena nisīdi tejodhātuṃ samāpajjitvā nīcataraṃ bhagavato’’. Da dachte der Ehrwürdige Anuruddha: „Wo weilt wohl der Erhabene jetzt?“ Der Ehrwürdige Anuruddha sah mit dem göttlichen Auge, dem reinen, das das menschliche Auge übertrifft, den Erhabenen über jenem Brahma am Himmel mit verschränkten Beinen sitzen, in das Element des Feuers vertieft. Als er ihn sah – gleichwie ein starker Mann ... ebenso – verschwand er im Jetavana und erschien in jener Brahma-Welt. Da setzte sich der Ehrwürdige Anuruddha in nördlicher Richtung, über jenem Brahma am Himmel, mit verschränkten Beinen nieder, nachdem er in das Element des Feuers eingetreten war, tiefer als der Erhabene. Atha kho āyasmā mahāmoggallāno taṃ brahmānaṃ gāthāya ajjhabhāsi – Da sprach der Ehrwürdige Mahāmoggallāna zu jenem Brahma in einer Strophe: ‘‘Ajjāpi te āvuso sā diṭṭhi, yā te diṭṭhi pure ahu; Passasi vītivattantaṃ, brahmaloke pabhassara’’nti. „Besteht auch heute noch bei dir, o Freund, jene Ansicht, die du früher hattest? Siehst du das die Brahma-Welt überstrahlende, glänzende Licht?“ ‘‘Na me mārisa sā diṭṭhi, yā me diṭṭhi pure ahu; Passāmi vītivattantaṃ, brahmaloke pabhassaraṃ; Svāhaṃ ajja kathaṃ vajjaṃ, ahaṃ niccomhi sassato’’ti. „Ich habe diese Ansicht nicht mehr, o Herr, die ich früher hatte. Ich sehe das die Brahma-Welt überstrahlende, glänzende Licht. Wie könnte ich heute behaupten: ‚Ich bin beständig, ich bin ewig‘?“ ‘‘Atha kho bhagavā taṃ brahmānaṃ saṃvejetvā seyyathāpi nāma balavā puriso…pe… evameva tasmiṃ brahmaloke antarahito jetavane pāturahosi. Atha kho so brahmā aññataraṃ brahmapārisajjaṃ āmantesi – ‘ehi tvaṃ, mārisa, yenāyasmā mahāmoggallāno tenupasaṅkama, upasaṅkamitvā āyasmantaṃ mahāmoggallānaṃ evaṃ vadehi – ‘‘atthi nu kho, mārisa moggallāna, aññepi tassa bhagavato sāvakā evaṃmahiddhikā evaṃmahānubhāvā seyyathāpi bhavaṃ moggallāno kassapo kappino anuruddho’’ti? ‘Evaṃ, mārisā’ti kho so brahmapārisajjo tassa brahmuno paṭissutvā yenāyasmā mahāmoggallāno tenupasaṅkami, upasaṅkamitvā āyasmantaṃ mahāmoggallānaṃ [Pg.277] etadavoca – ‘atthi nu kho, mārisa moggallāna, aññepi tassa bhagavato sāvakā evaṃmahiddhikā evaṃmahānubhāvā seyyathāpi bhavaṃ moggallāno kassapo kappino anuruddho’ti? Atha kho āyasmā mahāmoggallāno taṃ brahmapārisajjaṃ gāthāya ajjhabhāsi – Da erschütterte der Erhabene jenen Brahma, und gleichwie ein starker Mann ... ebenso verschwand er in jener Brahma-Welt und erschien im Jetavana wieder. Darauf wandte sich jener Brahma an einen gewissen Brahma-Gefährten: „Komm, mein Lieber, begib dich dorthin, wo der Ehrwürdige Mahāmoggallāna verweilt, und nach deiner Ankunft sprich so zum Ehrwürdigen Mahāmoggallāna: ‚Gibt es wohl, o werter Moggallāna, noch andere Schüler jenes Erhabenen, die so überaus machtvoll und von so großer Geisteskraft sind wie der werte Moggallāna, Kassapa, Kappina und Anuruddha?‘“ – „Ja, o Herr“, antwortete jener Brahma-Gefährte dem Brahma, begab sich dorthin, wo der Ehrwürdige Mahāmoggallāna verweilt, und nach seiner Ankunft sprach er zum Ehrwürdigen Mahāmoggallāna: „Gibt es wohl, o werter Moggallāna, noch andere Schüler jenes Erhabenen, die so überaus machtvoll und von so großer Geisteskraft sind wie der werte Moggallāna, Kassapa, Kappina und Anuruddha?“ Da sprach der Ehrwürdige Mahāmoggallāna zu jenem Brahma-Gefährten in einer Strophe: ‘‘Tevijjā iddhipattā ca, cetopariyāyakovidā; Khīṇāsavā arahanto, bahū buddhassa sāvakā’’ti. „Das dreifache Wissen besitzend, der Geisteskräfte mächtig, im Lesen fremder Gedanken wohlbewandert, versiegten Einflusses, die Heiligen (Arahants) – zahlreich sind solche Schüler des Buddhas.“ ‘‘Atha kho so brahmapārisajjo āyasmato mahāmoggallānassa bhāsitaṃ abhinanditvā anumoditvā yena so brahmā tenupasaṅkami, upasaṅkamitvā taṃ brahmānaṃ etadavoca – ‘āyasmā mārisa mahāmoggallāno evamāha – Da freute sich jener Brahma-Gefährte über die Worte des Ehrwürdigen Mahāmoggallāna, stimmte ihnen dankbar zu, begab sich dorthin, wo jener Brahma war, und nach seiner Ankunft sprach er zu jenem Brahma: „Der ehrwürdige werte Mahāmoggallāna hat Folgendes gesagt: ‘‘‘Tevijjā iddhipattā ca, cetopariyāyakovidā; Khīṇāsavā arahanto, bahū buddhassa sāvakā’’’ti. – „‚Das dreifache Wissen besitzend, der Geisteskräfte mächtig, im Lesen fremder Gedanken wohlbewandert, versiegten Einflusses, die Heiligen (Arahants) – zahlreich sind solche Schüler des Buddhas.‘“ Idamavoca so brahmapārisajjo. Attamano ca so brahmā tassa brahmapārisajjassa bhāsitaṃ abhinandīti (saṃ. ni. 1.176). Dies sprach jener Brahma-Gefährte. Und jener Brahma war hocherfreut und hieß die Worte des Brahma-Gefährten willkommen. Idaṃ sandhāya vuttaṃ – ‘‘ayaṃ panattho bakabrahmasuttena dīpetabbo’’ti. Diesbezüglich wurde gesagt: „Dieser Sinn ist jedoch anhand der Baka-Brahma-Sutta zu erläutern.“ Mahāneruno kūṭanti (ma. ni. 1.513) kūṭasīsena sakalameva sinerupabbatarājaṃ vadasi. Vimokkhena apassayīti (ma. ni. 1.513) jhānavimokkhena nissayena abhiññāyena passayīti adhippāyo. Vananti (ma. ni. 1.513) jambudīpaṃ. So hi vanabāhullatāya ‘‘vana’’nti vutto. Tenāha ‘‘jambumaṇḍassa issaro’’ti. Pubbavidehānanti (ma. ni. 1.513) pubbavidehaṭṭhānañca pubbavidehanti attho. Ye ca bhūmisayā narāti (ma. ni. 1.513) bhūmisayā narā nāma aparagoyānauttarakurukā ca manussā. Te hi gehābhāvato ‘‘bhūmisayā’’ti vuttā. Tepi sabbe apassayīti sambandho. Ayaṃ panattho nandopanandadamanena dīpetabbo – ekasmiṃ kira samaye anāthapiṇḍiko gahapati bhagavato dhammadesanaṃ sutvā ‘‘sve, bhante, pañcahi bhikkhusatehi saddhiṃ mayhaṃ gehe bhikkhaṃ gaṇhathā’’ti nimantetvā pakkāmi. Taṃdivasañca bhagavato paccūsasamaye dasasahassilokadhātuṃ olokentassa nandopanando nāma [Pg.278] nāgarājā ñāṇamukhe āpāthaṃ āgacchi. Bhagavā ‘‘ayaṃ nāgarājā mayhaṃ ñāṇamukhe āpāthaṃ āgacchati, kiṃ nu kho bhavissatī’’ti āvajjento saraṇagamanassa upanissayaṃ disvā ‘‘ayaṃ micchādiṭṭhiko tīsu ratanesu appasanno, ko nu kho imaṃ micchādiṭṭhiko vimoceyyā’’ti āvajjento mahāmoggallānattheraṃ addasa. Tato pabhātāya rattiyā sarīrapaṭijagganaṃ katvā āyasmantaṃ ānandaṃ āmantesi – ‘‘ānanda, pañcannaṃ bhikkhusatānaṃ ārocehi – ‘tathāgato devacārikaṃ gacchatī’’’ti. Taṃdivasañca nandopanandassa āpānabhūmiṃ sajjayiṃsu. So dibbaratanapallaṅke dibbena setacchattena dhāriyamāno tividhanāṭakehi ceva nāgaparisāya ca parivuto dibbabhājanesu upaṭṭhāpitaannapānaṃ olokayamāno nisinno hoti. Atha kho bhagavā yathā nāgarājā passati, tathā katvā tassa vimānamatthakeneva pañcahi bhikkhusatehi saddhiṃ tāvatiṃsadevalokābhimukho pāyāsi. „Mahāneruno kūṭaṃ“ (der Gipfel des großen Sineru): Mit „Gipfelkrone“ meint er den gesamten König der Berge, den Sineru. „Vimokkhena apassayī“ (er stützte sich auf die Befreiung): Dies bedeutet, dass er sich auf die Befreiung durch die Vertiefung (jhāna-vimokkha) stützte und mit höherem Wissen sah. „Vanaṃ“ (Wald) bezeichnet den Jambudīpa (Südkontinent). Dieser wird nämlich wegen seiner Fülle an Wäldern als „Wald“ bezeichnet. Daher heißt es: „Herrscher des Jambumaṇḍala“. „Pubbavidehānaṃ“ (von Pubbavideha): Dies bezeichnet sowohl den Ort Pubbavideha als auch die Bewohner von Pubbavideha. „Ye ca bhūmisayā narā“ (und die auf dem Boden schlafenden Menschen): Unter „auf dem Boden schlafenden Menschen“ versteht man die Bewohner von Aparagoyāna und Uttarakuru sowie Götter und Menschen. Weil sie keine Häuser haben (gehābhāvato), werden sie als „auf dem Boden schlagend“ bezeichnet. „Auch sie alle sah er“ (tepi sabbe apassayi) ist die logische Verknüpfung. Diese Bedeutung soll nun durch die Zähmung von Nandopananda verdeutlicht werden: Es heißt, dass einst der Hausvater Anāthapiṇḍika, nachdem er eine Lehrrede des Erhabenen gehört hatte, diesen einlud: „Mögest Du, o Herr, morgen zusammen mit fünfhundert Mönchen in meinem Hause Speise annehmen“, und dann wegging. An jenem Tag erblickte der Erhabene zur Zeit der Morgendämmerung (paccūsasamaye), als er das zehntausendfache Weltsystem (dasasahassilokadhātu) betrachtete, den Schlangenkönig namens Nandopananda, der in den Bereich seiner Erkenntnis trat. Der Erhabene überlegte: „Dieser Schlangenkönig erscheint im Bereich meiner Erkenntnis. Was wird wohl geschehen?“ Als er die starke Ursache (upanissaya) für dessen Zufluchtnahme sah, dachte er: „Dieser Falschgläubige hat kein Vertrauen zu den Drei Juwelen. Wer wohl könnte diesen von seiner falschen Ansicht befreien?“ Bei dieser Überlegung sah er den Ehrwürdigen Mahāmoggallāna. Als die Nacht vorüber war und der Morgen graute, vollzog er seine Körperpflege und wandte sich an den Ehrwürdigen Ānanda: „Ānanda, verkünde den fünfhundert Mönchen: ‚Der Tathāgata begibt sich auf eine Reise in die Götterwelten (devacārikaṃ).‘“ An jenem Tag hatten sie auch den Festplatz (āpānabhūmi) des Nandopananda hergerichtet. Dieser saß auf einem himmlischen Juwelenthron, über ihm ein himmlischer weißer Schirm, umgeben von dreierlei Arten von Tänzerinnen sowie seinem Gefolge von Nāgas, und blickte auf die Speisen und Getränke, die in himmlischen Gefäßen dargeboten wurden. Da machte sich der Erhabene, so handelnd, dass der Schlangenkönig ihn sehen konnte, zusammen mit fünfhundert Mönchen direkt über dessen Palast auf den Weg in Richtung der Götterwelt der Dreiunddreißig (Tāvatiṃsa). Tena kho pana samayena nandopanandassa nāgarājassa evarūpaṃ pāpakaṃ diṭṭhigataṃ uppannaṃ hoti ‘‘ime hi nāma muṇḍasamaṇakā amhākaṃ uparibhavanena devānaṃ tāvatiṃsānaṃ bhavanaṃ pavisantipi nikkhamantipi, na dāni ito paṭṭhāya imesaṃ amhākaṃ matthake pādapaṃsuṃ okirantānaṃ gantuṃ dassāmī’’ti uṭṭhāya sinerupādaṃ gantvā taṃ attabhāvaṃ vijahitvā sineruṃ sattakkhattuṃ bhogehi parikkhipitvā upari phaṇaṃ katvā tāvatiṃsabhavanaṃ avakujjena phaṇena pariggahetvā adassanaṃ gamesi. Zu jener Zeit nun war in dem Schlangenkönig Nandopananda eine solche schlechte Ansicht entstanden: „Diese kahlgeschorenen Möchtegern-Mönche (muṇḍasamaṇakā) betreten und verlassen das Reich der Götter der Dreiunddreißig, indem sie über unser Reich hinwegziehen. Ich werde ihnen von nun an nicht mehr erlauben, über unsere Köpfe hinwegzuziehen und uns mit dem Staub ihrer Füße zu bestreuen.“ Da erhob er sich, ging zum Fuße des Sineru-Berges, legte seine eigene Gestalt ab, umschlang den Sineru siebenmal mit seinen Windungen, breitete oben seine Haube aus, bedeckte das Reich der Dreiunddreißig mit seiner herabgesenkten Haube und entzog es so den Blicken. Atha kho āyasmā raṭṭhapālo bhagavantaṃ etadavoca – ‘‘pubbe, bhante, imasmiṃ padese ṭhito sineruṃ passāmi, sineruparibhaṇḍaṃ passāmi, tāvatiṃsaṃ passāmi, vejayantaṃ passāmi, vejayantassa pāsādassa uparidhajaṃ passāmi. Ko nu kho, bhante, hetu ko paccayo, yaṃ etarahi neva sineruṃ passāmi…pe… na vejayantassa pāsādassa uparidhajaṃ passāmī’’ti. ‘‘Ayaṃ, raṭṭhapāla, nandopanando nāma nāgarājā tumhākaṃ kupito sineruṃ sattakkhattuṃ bhogehi parikkhipitvā upari phaṇena paṭicchādetvā andhakāraṃ katvā ṭhito’’ti. ‘‘Damemi naṃ, bhante’’ti. Na bhagavā naṃ anujāni. Atha kho āyasmā bhaddiyo, āyasmā rāhuloti anukkamena sabbepi bhikkhū uṭṭhahiṃsu. Bhagavā anujāni. Da sprach der Ehrwürdige Raṭṭhapāla zum Erhabenen: „Früher, o Herr, wenn ich an dieser Stelle stand, sah ich den Sineru, sah ich den Sineru-Gürtel, sah ich die Dreiunddreißig, sah ich den Vejayanta-Palast und sah die Flagge oben auf dem Vejayanta-Palast. Was ist wohl der Grund, o Herr, was die Ursache, dass ich jetzt weder den Sineru sehe … und so weiter … noch die Flagge oben auf dem Vejayanta-Palast sehe?“ – „Dieser Schlangenkönig namens Nandopananda, Raṭṭhapāla, ist zornig auf euch; er hat den Sineru siebenmal mit seinen Windungen umschlungen, ihn oben mit seiner Haube verdeckt und verweilt dort, indem er Dunkelheit erzeugt hat.“ – „Ich werde ihn zähmen, o Herr!“ Doch der Erhabene allowed es ihm nicht. Daraufhin erhoben sich der Ehrwürdige Bhaddiya, der Ehrwürdige Rāhula und nacheinander alle Mönche. Doch der Erhabene erlaubte es ihnen nicht. Avasāne [Pg.279] mahāmoggallānatthero – ‘‘ahaṃ, bhante, damemi na’’nti āha. ‘‘Damehi, moggallānā’’ti bhagavā anujāni. Thero attabhāvaṃ vijahitvā mahantaṃ nāgarājavaṇṇaṃ abhinimminitvā nandopanandaṃ cuddasakkhattuṃ bhogehi parikkhipitvā tassa phaṇamatthake attano phaṇaṃ ṭhapetvā sinerunā saddhiṃ abhinippīḷesi. Nāgarājā dhūmāyi. Theropi ‘‘na tuyhaṃyeva sarīre dhūmo atthi, mayhampi atthī’’ti dhūmāyi. Nāgarājassa dhūmo theraṃ na bādhati, therassa pana dhūmo nāgarājaṃ bādhati. Tato nāgarājā pajjali, theropi ‘‘na tuyhaṃyeva sarīre aggi atthi, mayhampi atthī’’ti pajjali. Nāgarājassa tejo theraṃ na bādhati, therassa pana tejo nāgarājānaṃ bādhati. Nāgarājā – ‘‘ayaṃ maṃ sinerunā abhinippīḷetvā dhūmāyati ceva pajjalati cā’’ti cintetvā ‘‘bho, tuvaṃ kosī’’ti paṭipucchi. ‘‘Ahaṃ kho, nanda, moggallāno’’ti. ‘‘Bhante, attano bhikkhubhāvena tiṭṭhāhī’’ti. Schließlich sagte der Ehrwürdige Mahāmoggallāna: „Ich, o Herr, werde ihn zähmen.“ – „Zähme ihn, Moggallāna!“, erlaubte es der Erhabene. Der Thera legte seine Gestalt ab, erschuf durch Geistesmacht die Erscheinung eines riesigen Schlangenkönigs, umschlang Nandopananda vierzehnmal mit seinen Windungen, legte seine eigene Haube auf dessen Haubengipfel und presste ihn fest gegen den Sineru-Berg. Der Schlangenkönig begann Rauch auszuspeien. Auch der Thera spie Rauch aus und dachte: „Nicht nur in deinem Körper gibt es Rauch, auch in meinem gibt es ihn.“ Der Rauch des Schlangenkönigs quälte den Thera nicht, doch der Rauch des Theras quälte den Schlangenkönig. Daraufhin spie der Schlangenkönig Flammen aus. Auch der Thera spie Flammen aus und dachte: „Nicht nur in deinem Körper gibt es Feuer, auch in meinem gibt es ihn.“ Die Glut des Schlangenkönigs verletzte den Thera nicht, doch die Glut des Theras verletzte den Schlangenkönig. Der Schlangenkönig dachte: „Dieser presst mich gegen den Sineru, speit Rauch und Flammen aus“, und fragte: „Wer bist du, Werter?“ – „Ich bin Moggallāna, o Nanda.“ – „O Herr, zeige dich in deiner wahren Gestalt als Mönch!“ Thero taṃ attabhāvaṃ vijahitvā tassa dakkhiṇakaṇṇasotena pavisitvā vāmakaṇṇasotena nikkhami, vāmakaṇṇasotena pavisitvā dakkhiṇakaṇṇasotena nikkhami. Tathā dakkhiṇanāsasotena pavisitvā vāmanāsasotena nikkhami, vāmanāsasotena pavisitvā dakkhiṇanāsasotena nikkhami. Tato nāgarājā mukhaṃ vivari, thero mukhena pavisitvā antokucchiyaṃ pācīnena ca pacchimena ca caṅkamati. Bhagavā – ‘‘moggallāna, manasi karohi, mahiddhiko nāgo’’ti āha. Thero ‘‘mayhaṃ kho, bhante, cattāro iddhipādā bhāvitā bahulīkatā yānīkatā vatthukatā anuṭṭhitā paricitā susamāraddhā, tiṭṭhatu, bhante, nandopanando, ahaṃ nandopanandasadisānaṃ nāgarājānaṃ satampi sahassampi dameyya’’ntiādimāha. Der Thera legte jene Gestalt ab, ging durch dessen rechte Ohröffnung hinein und kam durch die linke Ohröffnung wieder heraus; er ging durch die linke Ohröffnung hinein und kam durch die rechte Ohröffnung heraus. Ebenso ging er durch das rechte Nasenloch hinein und kam durch das linke Nasenloch heraus; er ging durch das linke Nasenloch hinein und kam durch das rechte Nasenloch heraus. Daraufhin öffnete der Schlangenkönig sein Maul; der Thera trat durch das Maul ein und wandelte im Inneren seines Bauches von Osten nach Westen auf und ab. Der Erhabene rief: „Moggallāna, sei achtsam! Der Nāga besitzt große übernatürliche Kräfte!“ Der Thera entgegnete: „O Herr, ich habe die vier Grundlagen der übernatürlichen Macht (iddhipāda) entfaltet, häufig geübt, zu meinem Fahrzeug gemacht, zu meiner Grundlage gemacht, gefestigt, vertraut gemacht und wohl begonnen. Lass es gut sein, o Herr! Selbst wenn es hundert oder tausend Schlangenkönige wie Nandopananda gäbe, so würde ich sie alle zähmen!“ So und in dieser Weise sprach er. Nāgarājā cintesi – ‘‘pavisanto tāva me na diṭṭho, nikkhamanakāle dāni naṃ dāṭhantare pakkhipitvā khādissāmī’’ti cintetvā ‘‘nikkhamatha, bhante, mā maṃ antokucchiyaṃ aparāparaṃ caṅkamanto bādhayitthā’’ti āha. Thero nikkhamitvā bahi aṭṭhāsi. Nāgarājā ‘‘ayaṃ so’’ti disvā nāsavātaṃ vissajji, thero catutthajjhānaṃ samāpajji, lomakūpampissa vāto cāletuṃ nāsakkhi. Avasesā bhikkhū kira ādito paṭṭhāya sabbapāṭihāriyāni kātuṃ sakkuṇeyyuṃ, imaṃ pana ṭhānaṃ patvā evaṃ khippanisantino [Pg.280] hutvā samāpajjituṃ na sakkhissantīti nesaṃ bhagavā nāgarājadamanaṃ nānujāni. Der Schlangenkönig dachte: „Als er hineinging, habe ich ihn nicht gesehen. Wenn er nun herauskommt, werde ich ihn zwischen meine Reißzähne nehmen und ihn zerbeißen.“ Nachdem er dies gedacht hatte, sagte er: „Kommt heraus, Ehrwürdiger! Bedrängt mich nicht, indem Ihr in meinem Bauch hin und her wandert!“ Der Thera kam heraus und stellte sich nach draußen. Als der Schlangenkönig sah: „Das ist er“, stieß er einen heißen Atemzug aus den Nüstern aus. Der Thera trat in die vierte Vertiefung (Jhāna) ein, und der Wind vermochte nicht einmal ein Haar an seinem Körper zu bewegen. Es heißt, dass die übrigen Mönche zwar von Anfang an in der Lage gewesen wären, all diese Wunder zu vollbringen, aber an dieser Stelle angekommen, hätten sie nicht so schnell die Beherrschung erlangt, um in die Vertiefung einzutreten. Aus diesem Grund erlaubte der Erhabene ihnen nicht, den Schlangenkönig zu bezwingen. Nāgarājā ‘‘ahaṃ imassa samaṇassa nāsavātena lomakūpampi cāletuṃ nāsakkhi, mahiddhiko so samaṇo’’ti cintesi. Thero attabhāvaṃ vijahitvā supaṇṇarūpaṃ abhinimminitvā supaṇṇavātaṃ dassento nāgarājānaṃ anubandhi. Nāgarājā taṃ attabhāvaṃ vijahitvā māṇavakavaṇṇaṃ abhinimminitvā ‘‘bhante, tumhākaṃ saraṇaṃ gacchāmī’’ti vadanto therassa pāde vandi. Thero ‘‘satthā, nanda, āgato, ehi gamissāmā’’ti nāgarājānaṃ dametvā nibbisaṃ katvā gahetvā bhagavato santikaṃ agamāsi. Nāgarājā bhagavantaṃ vanditvā ‘‘bhante, tumhākaṃ saraṇaṃ gacchāmī’’ti āha. Bhagavā ‘‘sukhī hohi, nāgarājā’’ti vatvā bhikkhusaṅghaparivuto anāthapiṇḍikassa nivesanaṃ agamāsi. Der Schlangenkönig dachte: „Ich konnte mit dem Atem aus meinen Nüstern nicht einmal ein Haar dieses Asketen bewegen. Dieser Asket besitzt große magische Macht.“ Der Thera legte seine Gestalt ab, erschuf die Gestalt eines Garudas (Supaṇṇa) und verfolgte den Schlangenkönig, während er den heftigen Wind eines Garudas entfesselte. Der Schlangenkönig legte jene Gestalt ab, nahm die Gestalt eines jungen Mannes an, verneigte sich vor den Füßen des Theras und sagte: „Ehrwürdiger, ich nehme Zuflucht zu Euch.“ Der Thera sagte: „Nanda, der Meister ist gekommen. Komm, wir wollen gehen!“ Nachdem er den Schlangenkönig bezwungen, ihn ungiftig gemacht und mitgenommen hatte, begab er sich in die Gegenwart des Erhabenen. Der Schlangenkönig verneigte sich vor dem Erhabenen und sagte: „Herr, ich nehme Zuflucht zu Euch.“ Der Erhabene sprach: „Mögest du glücklich sein, Schlangenkönig!“, und begab sich, von der Mönchsgemeinschaft umgeben, zum Haus von Anāthapiṇḍika. Anāthapiṇḍiko ‘‘kiṃ, bhante, atidivā āgatatthā’’ti āha. ‘‘Moggallānassa ca nandopanandassa ca saṅgāmo ahosī’’ti. ‘‘Kassa pana, bhante, jayo, kassa parājayo’’ti? ‘‘Moggallānassa jayo, nandassa parājayo’’ti. Anāthapiṇḍiko ‘‘adhivāsetu me, bhante, bhagavā sattāhaṃ ekapaṭipāṭiyā bhattaṃ sattāhaṃ therassa sakkāraṃ karissāmī’’ti vatvā sattāhaṃ buddhappamukhānaṃ pañcannaṃ bhikkhusatānaṃ mahāsakkāraṃ akāsi. Tena vuttaṃ – ‘‘nandopanandadamanena dīpetabbo’’ti. Anāthapiṇḍika fragte: „Warum, Herr, seid Ihr so spät am Tag gekommen?“ – „Es gab einen Kampf zwischen Moggallāna und Nandopananda.“ – „Wer aber, Herr, hat gesiegt und wer hat verloren?“ – „Moggallāna hat gesiegt, Nanda hat verloren.“ Anāthapiṇḍika sagte: „Möge der Erhabene, Herr, sieben Tage lang hintereinander mein Mahl annehmen; ich werde dem Thera sieben Tage lang Ehrung erweisen.“ Nachdem er dies gesagt hatte, erwies er der Gemeinschaft von fünfhundert Mönchen mit dem Buddha an der Spitze sieben Tage lang große Ehrung. Deswegen wurde gesagt: „Dies soll durch die Bezähmung von Nandopananda verdeutlicht werden.“ Ekasmiñhi samaye pubbārāme visākhāya mahāupāsikāya kāritasahassagabbhapaṭimaṇḍite pāsāde bhagavati viharante…pe… saṃvejesi ca devatāti. Tena vuttaṃ – Zu einer bestimmten Zeit nämlich, als der Erhabene im Pubbārāma verweilte, in dem von der großen Laienanhängerin Visākhā errichteten Palast, der mit tausend Gemächern geschmückt war... (und so weiter) ... „und er rüttelte die Gottheiten auf.“ Deswegen wurde gesagt: ‘‘Dharaṇimpi sugambhīraṃ, bahalaṃ duppadhaṃsiyaṃ; Vāmaṅguṭṭhena khobheyyaṃ, iddhiyā pāramiṃ gato’’ti. „Sogar die Erde, die so tief, so mächtig und unzerstörbar ist, könnte ich mit dem linken großen Zeh erschüttern, da ich die Vollendung der magischen Kräfte erlangt habe.“ Tattha iddhiyā pāramiṃ gatoti vikubbaniddhiādiiddhiyā pariyosānaṃ gato patto. Dabei bedeutet „die Vollendung der magischen Kräfte erlangt“ (iddhiyā pāramiṃ gato): das Äußerste der magischen Kräfte wie der Verwandlungskraft erreicht zu haben. 395. Asmimānanti ahamasmi paññāsīlasamādhisampannotiādi asmimānaṃ na passāmi na akkhāmīti attho. Tadeva dīpento māno mayhaṃ na vijjatīti āha. Sāmaṇere upādāyāti sāmaṇere ādiṃ [Pg.281] katvā sakale bhikkhusaṅghe garucittaṃ gāravacittaṃ ādarabahumānaṃ ahaṃ karomīti attho. 395. „Ich-Dünkel“ (asmimāna) bedeutet: Ich sehe bei mir keinen solchen Ich-Dünkel wie „Ich bin mit Weisheit, Tugend und Konzentration ausgestattet“. Um ebendies zu verdeutlichen, sagte er: „Dünkel existiert bei mir nicht.“ „Angefangen bei den Novizen“ (sāmaṇere upādāyā) bedeutet: Angefangen bei den Novizen erweise ich der gesamten Mönchsgemeinschaft tiefe Achtung, Ehrerbietung und große Wertschätzung. 396. Aparimeyye ito kappeti ito amhākaṃ uppannakappato antarakappādīhi aparimeyye ekaasaṅkhyeyyassa upari satasahassakappamatthaketi attho. Yaṃ kammamabhinīharinti aggasāvakabhāvassa padaṃ puññasampattiṃ pūresiṃ. Tāhaṃ bhūmimanuppattoti ahaṃ taṃ sāvakabhūmiṃ anuppatto āsavakkhayasaṅkhātaṃ nibbānaṃ patto asmi amhīti attho. 396. „In unermesslichen Weltaltern von hier an“ (aparimeyye ito kappe) bedeutet: von unserem gegenwärtigen Weltalter an gerechnet, unermesslich durch Zwischenweltalter usw., über ein unzählbares Zeitalter (Asaṅkheyya) und einhunderttausend Weltalter hinaus. „Welches Werk ich auch ausführte“ bedeutet: Ich erfüllte die Fülle an Verdiensten, die zur Stufe des führenden Jüngers führt. „Ich habe jene Stufe erreicht“ (tāhaṃ bhūmimanuppatto) bedeutet: Ich habe die Stufe des Jüngers erreicht und das Nirwana erlangt, das als das Versiegen der Triebe (āsavakkhaya) bekannt ist. 397. Atthapaṭisambhidādayo catasso paṭisambhidā sotāpattimaggādayo aṭṭha vimokkhā iddhividhādayo cha abhiññāyo me mayā sacchikatā paccakkhaṃ katā. Buddhassa bhagavato ovādānusāsanīsaṅkhātaṃ sāsanaṃ mayā kataṃ sīlapaṭipattinipphādanavasena pariyosāpitanti attho. 397. Die vier analytischen Wissensarten, beginnend mit der Analyse des Sinns, die acht Befreiungen, beginnend mit dem Pfad des Stromeintritts, und die sechs höheren Geisteskräfte, beginnend mit den magischen Kräften, wurden von mir verwirklicht und direkt erfahren. Die Lehre des erhabenen Buddhas, die aus Ermahnung und Unterweisung besteht, wurde von mir ausgeführt und durch das Erfüllen der Tugendpraxis zum Abschluss gebracht. Itthanti iminā pakārena heṭṭhā vuttakkamena. Evaṃ so ekasseva anomadassībuddhassa santike dvikkhattuṃ byākaraṇaṃ labhi. Kathaṃ? Heṭṭhā vuttanayena seṭṭhi hutvā tassa bhagavato santike laddhabyākaraṇo tato cuto sāmuddike nāgabhavane nibbatto tasseva bhagavato santike dīghāyukabhāvena upahāraṃ katvā nimantetvā bhojetvā mahāpūjaṃ akāsi. Tadāpi bhagavā byākaraṇaṃ kathesi. Sudanti padapūraṇe nipāto. Āyasmāti piyavacanaṃ garugāravādhivacanaṃ. Mahāmoggallānatthero imā apadānagāthāyo abhāsittha kathesi. Itīti parisamāpanatthe nipāto. „Auf diese Weise“ (itthaṃ) bedeutet: in dieser Weise, wie oben beschrieben. So erhielt er in der Gegenwart ein und desselben Buddhas Anomadassī zweimal die Prophezeiung. Wie? Nachdem er, wie oben dargelegt, ein wohlhabender Kaufmann gewesen war und in der Gegenwart dieses Erhabenen die Prophezeiung erhalten hatte, wurde er nach dem Tod von dort im ozeanischen Naga-Reich wiedergeboren. Aufgrund des langen Lebens dieses Erhabenen dachte er in dessen Gegenwart an Gaben, lud ihn ein, speiste ihn und erwies ihm große Verehrung. Auch damals verkündete der Erhabene die Prophezeiung. „Sudaṃ“ ist eine Partikel zur Versfüllung. „Ehrwürdig“ (āyasmā) ist ein liebevoller Ausdruck, ein Wort des tiefen Respekts und der Ehrerbietung. Der Thera Mahāmoggallāna sprach diese Apadāna-Verse. Das Wort „iti“ ist eine Partikel, die den Abschluss anzeigt. Mahāmoggallānattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Apadāna des Theras Mahāmoggallāna ist abgeschlossen. 3-3. Mahākassapattheraapadānavaṇṇanā 3-3. Die Erklärung der Apadāna des Theras Mahākassapa. Padumuttarassa [Pg.282] bhagavatotyādikaṃ āyasmato mahākassapattherassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññasambhārāni upacinanto padumuttarabhagavato kāle haṃsavatīnagare vedeho nāma asītikoṭivibhavo kuṭumbiko ahosi. So buddhamāmako, dhammamāmako, saṅghamāmako, upāsako hutvā viharanto ekasmiṃ uposathadivase pātova subhojanaṃ bhuñjitvā uposathaṅgāni adhiṭṭhāya gandhapupphādīni gahetvā vihāraṃ gantvā satthāraṃ pūjetvā vanditvā ekamantaṃ nisīdi. „Dem erhabenen Padumuttara...“ und so weiter ist das Apadāna des ehrwürdigen Theras Mahākassapa. Auch dieser hatte unter früheren Buddhas heilsame Entschlüsse gefasst und sammelte in verschiedenen Existenzen die Verdienstausstattungen an, die eine starke Stütze für das Entrinnen aus dem Daseinskreislauf bildeten. Zur Zeit des erhabenen Padumuttara war er in der Stadt Haṃsāvatī ein Hausvater namens Vedeha, der über ein Vermögen von achtzig Millionen verfügte. Als ein Laienanhänger (Upāsaka), der den Buddha ehrte, das Dhamma ehrte und den Sangha ehrte, aß er an einem Uposatha-Tag am frühen Morgen eine gute Speise, gelobte die Uposatha-Regeln einzuhalten, nahm Duftstoffe, Blumen und anderes mit sich, ging zum Kloster, verehrte den Meister, verneigte sich vor ihm und setzte sich an eine Seite nieder. Tasmiñca khaṇe satthā mahānisabhattheraṃ nāma tatiyasāvakaṃ ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ dhutavādānaṃ yadidaṃ nisabho’’ti etadagge ṭhapesi. Upāsako taṃ sutvā pasanno dhammakathāvasāne mahājane uṭṭhāya gate satthāraṃ vanditvā ‘‘sve, bhante, mayhaṃ bhikkhaṃ adhivāsethā’’ti nimantesi. ‘‘Mahā kho, upāsaka, bhikkhusaṅgho’’ti. ‘‘Kittako, bhante’’ti? ‘‘Aṭṭhasaṭṭhibhikkhusatasahassa’’nti. ‘‘Bhante, ekaṃ sāmaṇerampi vihāre asesetvā mayhaṃ bhikkhaṃ gaṇhathā’’ti. Satthā adhivāsesi. Upāsako satthu adhivāsanaṃ ñatvā gehaṃ gantvā mahādānaṃ sajjetvā punadivase satthu kālaṃ ārocāpesi. Satthā pattacīvaramādāya bhikkhusaṅghaparivuto upāsakassa gharaṃ gantvā paññattāsane nisinno dakkhiṇodakāvasāne yāguādīni sampaṭicchanto bhattavissaggaṃ akāsi. Upāsakopi satthu santike nisīdi. In diesem Augenblick setzte der Meister den dritten Jünger namens Mahānisabha Thera auf den höchsten Rang mit den Worten: „Unter meinen Jüngern, ihr Mönche, unter den Mönchen, die die Dhutanga-Übungen verfechten, ist Nisabha der Höchste.“ Als der Laienanhänger dies hörte, war er voller Vertrauen. Am Ende der Lehrrede, als die Volksmenge aufgestanden und gegangen war, verneigte er sich vor dem Meister und lud ihn ein: „Möget Ihr, o Herr, morgen mein Almosen annehmen.“ Der Meister sprach: „Die Mönchsgemeinschaft ist wahrlich groß, o Laienanhänger.“ – „Wie groß, o Herr?“ – „Achtundsechzigmal hunderttausend Mönche.“ – „O Herr, nehmt mein Almosen an, ohne auch nur einen einzigen Novizen im Kloster zurückzulassen.“ Der Meister willigte ein. Als der Laienanhänger das Einverständnis des Meisters vernommen hatte, ging er nach Hause, bereitete eine große Spende vor und ließ am folgenden Tag dem Meister verkünden, dass es Zeit sei. Der Meister nahm Almosenschale und Robe, ging in Begleitung der Mönchsgemeinschaft zum Haus des Laienanhängers, setzte sich auf den hergerichteten Sitz, nahm nach dem Gießen des Spendenwassers die Reissuppe und andere Gaben entgegen und hielt das Mahl. Auch der Laienanhänger setzte sich in die Nähe des Meisters. Tasmiṃ antare mahānisabhatthero piṇḍāya caranto tameva vīthiṃ paṭipajji. Upāsako disvā uṭṭhāya gantvā theraṃ vanditvā ‘‘pattaṃ, bhante, dethā’’ti āha. Thero pattaṃ adāsi. ‘‘Bhante, idheva pavisatha, satthāpi gehe nisinno’’ti. ‘‘Na vaṭṭissati, upāsakā’’ti. So therassa pattaṃ gahetvā piṇḍapātassa pūretvā adāsi. Tato theraṃ anugantvā nivatto satthu santike nisīditvā evamāha – ‘‘mahānisabhatthero, bhante, ‘satthāpi gehe nisinno’ti vuttepi pavisituṃ na icchi. Atthi nu kho etassa tumhākaṃ guṇehi atirekaguṇo’’ti? Buddhānañca vaṇṇamaccheraṃ nāma natthi, tasmā satthā evamāha – ‘‘upāsaka, mayaṃ bhikkhaṃ āgamayamānā gehe nisīdāma, so bhikkhu na evaṃ nisīditvā bhikkhaṃ [Pg.283] udikkhati. Mayaṃ gāmantasenāsane vasāma, so araññeyeva vasati. Mayaṃ channe vasāma, so abbhokāseyeva vasatī’’ti bhagavā ‘‘ayañca ayañcetassa guṇo’’ti mahāsamuddaṃ pūrayamāno viya tassa guṇaṃ kathesi. In dieser Zwischenzeit ging der Thera Mahānisabha auf seiner Almosensammlung eben jene Straße entlang. Als der Laienanhänger ihn erblickte, stand er auf, ging zu ihm, verneigte sich vor dem Thera und sagte: „O Herr, gebt mir Eure Almosenschale.“ Der Thera gab ihm die Schale. „O Herr, tretet doch hier ein; auch der Meister sits im Haus.“ – „Das schickt sich nicht, o Laienanhänger.“ Da nahm er die Schale des Thera, füllte sie mit Almosenspeise und reichte sie ihm. Nachdem er den Thera ein Stück begleitet hatte, kehrte er um, setzte sich in die Nähe des Meisters und sprach: „O Herr, obwohl ich zu ihm sagte: ‚Auch der Meister sitzt im Haus‘, wollte der Thera Mahānisabha nicht eintreten. Besitzt er etwa Vorzüge, die selbst Eure Vorzüge übertreffen?“ Da es bei den Buddhas keine Missgunst bezüglich des Lobes anderer gibt, sprach der Meister: „Laienanhänger, wir sitzen im Haus und warten auf Almosenspeisung; jener Mönch aber sitzt nicht so da und blickt nach Speise aus. Wir wohnen in Behausungen nahe der Siedlung; er wohnt nur im Wald. Wir wohnen unter einem Dach; er wohnt nur unter freiem Himmel.“ So pries der Erhabene dessen Tugenden, gleichsam als würde er den großen Ozean füllen, indem er sprach: „Dies ist seine Tugend und jene ist seine Tugend.“ Upāsakopi pakatiyā jalamānadīpo telena āsitto viya suṭṭhutaraṃ pasanno hutvā cintesi – ‘‘kiṃ mayhaṃ aññāya sampattiyā, yaṃnūnāhaṃ anāgate ekassa buddhassa santike dhutavādānaṃ aggabhāvatthāya patthanaṃ karissāmī’’ti. So punapi satthāraṃ nimantetvā teneva niyāmena satta divase mahādānaṃ datvā sattame divase buddhappamukhassa mahābhikkhusaṅghassa ticīvarāni datvā satthu pādamūle nipajjitvā evamāha – ‘‘yaṃ me, bhante, satta divase dānaṃ dentassa mettaṃ kāyakammaṃ mettaṃ vacīkammaṃ mettaṃ manokammaṃ paccupaṭṭhitaṃ, imināhaṃ na aññaṃ devasampattiṃ vā sakkamārabrahmasampattiṃ vā patthemi, idaṃ pana me kammaṃ anāgate ekassa buddhassa santike mahānisabhattherena pattaṭṭhānantaraṃ pāpuṇanatthāya terasadhutaṅgadharānaṃ aggabhāvassa adhikāro hotū’’ti. Satthā ‘‘mahantaṃ ṭhānaṃ iminā patthitaṃ, samijjhissati nu kho, no’’ti olokento samijjhanabhāvaṃ disvā āha – ‘‘manāpaṃ te ṭhānaṃ patthitaṃ, anāgate satasahassakappāvasāne gotamo nāma buddho uppajjissati, tassa tvaṃ tatiyasāvako mahākassapatthero nāma bhavissasī’’ti byākāsi. Taṃ sutvā upāsako ‘‘buddhānaṃ dve kathā nāma natthī’’ti punadivase pattabbaṃ viya taṃ sampattiṃ amaññittha. So yāvatāyukaṃ dānaṃ datvā sīlaṃ samādāya rakkhitvā nānappakāraṃ puññakammaṃ katvā kālaṃkatvā sagge nibbatti. Auch der Laienanhänger wurde, gleich einer ohnehin brennenden Lampe, auf die noch Öl gegossen wird, überaus vertrauensvoll und dachte: „Was nützt mir irgendein anderes Glück? Ich will in der Zukunft im Beisein eines Buddhas den Wunsch äußern, die Spitzenstellung unter den Verfechtern der Dhutanga-Übungen einzunehmen.“ Er lud den Meister erneut ein, spendete auf dieselbe Weise sieben Tage lang ein großes Almosen und überreichte am siebten Tag der Mönchsgemeinschaft mit dem Buddha an der Spitze die drei Roben. Er warf sich zu Füßen des Meisters nieder und sprach: „O Herr, was immer an liebevollen körperlichen, sprachlichen und gedanklichen Handlungen von mir dargebracht wurde, während ich sieben Tage lang Almosen gab – durch dieses Verdienst erstrebe ich weder göttliche Herrlichkeit noch die Herrlichkeit eines Sakka, Māra oder Brahmā. Möge diese meine Tat vielmehr dazu dienen, dass ich in der Zukunft im Beisein eines Buddhas denselben hervorragenden Rang erlange, den der Thera Mahānisabha erreicht hat: die Spitzenstellung unter den Trägern der dreizehn Dhutanga-Übungen.“ Der Meister blickte in die Zukunft und überlegte: „Eine hohe Stellung hat dieser Mann ersehnt; wird sie in Erfüllung gehen oder nicht?“ Als er sah, dass sie in Erfüllung gehen würde, prophezeite er ihm: „Eine erfreuliche Stellung hast du ersehnt. Am Ende von hunderttausend Weltzeitaltern in der Zukunft wird ein Buddha namens Gotama in der Welt erscheinen. Du wirst sein dritter Jünger namens Mahākassapa Thera werden.“ Als der Laienanhänger dies hörte, dachte er bei sich: „Ein zweideutiges Wort gibt es bei den Buddhas nicht“, und er sah dieses Glück so an, als stünde es ihm schon am nächsten Tag bevor. Er spendete zeitlebens, nahm die Tugendregeln auf sich und hütete sie, vollbrachte vielfältige Verdienste und wurde nach seinem Tod im Himmel wiedergeboren. Tato paṭṭhāya devamanussesu sampattiṃ anubhavanto ito ekanavutikappe vipassisammāsambuddhe bandhumatīnagaraṃ upanissāya kheme migadāye viharante devalokā cavitvā aññatarasmiṃ parijiṇṇabrāhmaṇakule nibbatti. Tasmiñca kāle vipassī bhagavā sattame saṃvacchare dhammaṃ kathesi, mahantaṃ kolāhalaṃ ahosi. Sakalajambudīpe devatā ‘‘satthā dhammaṃ kathessatī’’ti ārocesuṃ. Brāhmaṇo taṃ sāsanaṃ assosi. Tassa nivāsanasāṭako ekoyeva, tathā brāhmaṇiyā. Pārupanaṃ pana dvinnampi ekameva. So sakalanagare ‘‘ekasāṭakabrāhmaṇo’’ti paññāyi[Pg.284]. So brāhmaṇo kenacideva kiccena brāhmaṇānaṃ sannipāte sati brāhmaṇiṃ gehe ṭhapetvā sayaṃ taṃ vatthaṃ pārupitvā gacchati, brāhmaṇīnaṃ sannipāte sati sayaṃ gehe acchati, brāhmaṇī taṃ vatthaṃ pārupitvā gacchati. Tasmiṃ pana divase so brāhmaṇiṃ āha – ‘‘bhoti, kiṃ tvaṃ rattiṃ dhammaṃ suṇissasi, udāhu divā’’ti? ‘‘Sāmi, ahaṃ mātugāmo bhīrukajātikā rattiṃ sotuṃ na sakkomi, divā sossāmī’’ti taṃ brāhmaṇaṃ gehe ṭhapetvā taṃ vatthaṃ pārupitvā upāsikāhi saddhiṃ vihāraṃ gantvā satthāraṃ vanditvā ekamantaṃ nisinnā dhammaṃ sutvā upāsikāhi saddhiṃ agamāsi. Atha brāhmaṇo taṃ gehe ṭhapetvā taṃ vatthaṃ pārupitvā vihāraṃ gato. Von da an genoss er das Glück unter Göttern und Menschen. Einundneunzig Weltzeitalter von diesem entfernt, als der vollkommen Erleuchtete Vipassī nahe der Stadt Bandhumatī im sicheren Wildpark verweilte, schied er aus der Götterwelt und wurde in einer verarmten Brahmanenfamilie wiedergeboren. Zu jener Zeit verkündete der Erhabene Vipassī im siebten Jahr die Lehre, woraufhin ein gewaltiger Aufruhr entstand. Auf dem gesamten Kontinent Jambudīpa verkündeten die Gottheiten: „Der Meister wird die Lehre darlegen!“ Der Brahmane vernahm diese Botschaft. Er besaß jedoch nur ein einziges Untergewand, und ebenso seine Frau, die Brahmanin. Das Obergewand zum Umhüllen aber war für beide zusammen nur ein einziges. Daher war er in der gesamten Stadt als „der Brahmane mit dem einen Gewand“ bekannt. Wenn nun wegen irgendeiner Angelegenheit eine Versammlung der Brahmanen stattfand, ließ jener Brahmane die Brahmanin zu Hause zurück, hüllte sich selbst in das Obergewand und ging hin. Gab es eine Versammlung der Brahmaninnen, blieb er selbst zu Hause, und die Brahmanin hüllte sich in das Gewand und ging hin. An jenem Tag aber sprach er zu der Brahmanin: „Werte Dame, wirst du die Lehre in der Nacht hören oder am Tag?“ Sie antwortete: „Mein Herr, als Frau bin ich von furchtsamer Natur. Ich kann in der Nacht nicht zuhören, ich werde sie am Tag hören.“ So ließ sie den Brahmanen zu Hause zurück, hüllte sich in das Gewand, ging zusammen mit den Laienanhängerinnen zum Kloster, verneigte sich vor dem Meister, setzte sich zur Seite nieder, hörte die Lehre und kehrte mit den Laienanhängerinnen heim. Daraufhin ließ der Brahmane sie zu Hause zurück, hüllte sich in das Gewand und begab sich zum Kloster. Tasmiñca samaye satthā parisamajjhe alaṅkatadhammāsane nisinno cittabījaniṃ gahetvā ākāsagaṅgaṃ otārento viya sineruṃ manthaṃ katvā sāgaraṃ nimmanthento viya ca dhammakathaṃ kathesi. Brāhmaṇassa parisapariyantena nisinnassa dhammaṃ suṇantassa paṭhamayāmeyeva sakalasarīraṃ pūrayamānā pañcavaṇṇā pīti uppajji. So pārutavatthaṃ saṅgharitvā ‘‘dasabalassa dassāmī’’ti cintesi. Athassa ādīnavasahassaṃ dassayamānaṃ maccheraṃ uppajji. So ‘‘brāhmaṇiyā tuyhañca ekameva vatthaṃ, aññaṃ kiñci pārupanaṃ nāma natthi, apārupitvā bahi vicarituṃ na sakkomī’’ti sabbathāpi adātukāmo ahosi. Athassa nikkhante paṭhame majjhimayāmeti tatheva pīti uppajji. So tatheva cintetvā tatheva adātukāmo ahosi. Athassa majjhime yāme nikkhante pacchimayāmepi tatheva pīti uppajji. Tadā so maccheraṃ jinitvā vatthaṃ saṅgharitvā satthu pādamūle ṭhapesi. Tato vāmahatthaṃ ābhujitvā dakkhiṇena hatthena apphoṭetvā ‘‘jitaṃ me, jitaṃ me’’ti tikkhattuṃ nadi. Zu jener Zeit saß der Meister inmitten der Versammlung auf dem geschmückten Dhamma-Thron, hielt einen bunten Fächer und hielt eine Dhamma-Lehrrede, gleichsam als ließe er den Himmels-Ganges herabfließen oder als quirlte er den Ozean mit dem Berg Sineru als Quirlstab. Während der Brahmane, der am Rande der Versammlung saß, der Lehre lauschte, stieg in ihm schon in der ersten Nachtwache eine fünffältige Verzückung auf, die seinen ganzen Körper erfüllte. Er legte sein Obergewand zusammen und dachte: „Ich will es dem Zehnkräftigen spenden.“ Da regte sich in ihm Geiz, der ihm tausend Nachteile vor Augen führte. Er dachte: „Für die Brahmanin und dich gibt es nur dieses eine Gewand, es gibt kein anderes Obergewand; ohne ein Obergewand können wir nicht nach draußen gehen.“ So wollte er es keineswegs hergeben. Als die erste Nachtwache vergangen war, stieg in der mittleren Nachtwache auf dieselbe Weise Verzückung in ihm auf. Er dachte ebenso und wollte es wiederum nicht hergeben. Als die mittlere Nachtwache vergangen war, stieg auch in der letzten Nachtwache auf dieselbe Weise Verzückung auf. Da besiegte er seinen Geiz, legte das Gewand zusammen und legte es dem Meister zu Füßen. Daraufhin winkelte er seinen linken Arm an, schlug sich mit der rechten Hand darauf und rief dreimal laut aus: „Ich habe gesiegt! Ich habe gesiegt!“ Tasmiṃ samaye bandhumā rājā dhammāsanassa pacchato antosāṇiyaṃ nisinno dhammaṃ suṇāti. Rañño ca nāma ‘‘jitaṃ me’’ti saddo amanāpo hoti. Rājā purisaṃ āṇāpesi ‘‘gaccha, bhaṇe, etaṃ puccha – ‘kiṃ so vadatī’’’ti? Brāhmaṇo tenāgantvā pucchito ‘‘avasesā hatthiyānādīni āruyha asicammādīni gahetvā parasenaṃ [Pg.285] jinanti, na taṃ acchariyaṃ. Ahaṃ pana pacchato āgacchantassa kūṭagoṇassa muggarena sīsaṃ bhinditvā taṃ palāpento viya maccheracittaṃ jinitvā pārutavatthaṃ dasabalassa adāsiṃ, taṃ me jitaṃ maccheraṃ acchariya’’nti āha. So āgantvā taṃ pavattiṃ rañño ārocesi. Rājā ‘‘amhe, bhaṇe, dasabalassa anurūpaṃ na jānāma, brāhmaṇo jānātī’’ti tassa pasīditvā vatthayugaṃ pesesi. Taṃ disvā brāhmaṇo cintesi – ‘‘rājā mayhaṃ tuṇhī nisinnassa paṭhamaṃ kiñci adatvā satthu guṇe kathentassa adāsi, satthu guṇe paṭicca idaṃ uppannaṃ, satthuyeva anucchavika’’nti tampi vatthayugaṃ dasabalassa adāsi. Rājā ‘‘kiṃ brāhmaṇena kata’’nti pucchitvā ‘‘tampi tena vatthayugaṃ tathāgatasseva dinna’’nti sutvā aññānipi dve vatthayugāni pesesi, so tānipi satthu adāsi. Puna rājā ‘aññānipi cattārī’ti evaṃ vatvā yāva evaṃ dvattiṃsa vatthayugāni pesesi. Atha brāhmaṇo ‘‘idaṃ vaḍḍhetvā vaḍḍhetvā gahaṇaṃ viya hotī’’ti attano atthāya ekaṃ, brāhmaṇiyā ekanti dve vatthayugāni gahetvā, tiṃsa yugāni tathāgatasseva adāsi. Tato paṭṭhāya ca so satthu vissāsiko jāto. Zu jener Zeit hörte der König Bandhumā hinter dem Dhamma-Thron innerhalb eines Vorhangs sitzend die Lehre. Dem König missfiel der Ruf: „Ich habe gesiegt!“ Der König befahl einem Bediensteten: „Geh, mein Lieber, frage ihn: ‚Was sagt er da?‘“ Als der Brahmane von dem dorthin gekommenen Mann gefragt wurde, sagte er: „Andere besteigen Elefanten und dergleichen, ergreifen Schwerter, Schilde und anderes und besiegen ein feindliches Heer. Das ist kein Wunder. Ich aber habe mein geiziges Herz besiegt, so wie man einem tückischen Ochsen, der von hinten heranstürmt, mit einer Keule den Schädel einschlägt und ihn vertreibt, und habe mein Obergewand dem Zehnkräftigen gespendet. Dass ich diesen Geiz besiegt habe, das ist ein Wunder!“ Der Mann kehrte zurück und berichtete dem König diesen Vorfall. Der König sagte: „Wir, mein Lieber, wissen nicht, was dem Zehnkräftigen angemessen ist; der Brahmane aber weiß es.“ Er fand Gefallen an ihm und sandte ihm ein Paar Gewänder. Als der Brahmane dies sah, dachte er: „Der König hat mir, als ich schweigend dasaß, zuerst nichts gegeben, erst als ich die Vorzüge des Meisters rühmte, gab er es mir. Dies ist aufgrund der Vorzüge des Meisters entstanden und gebührt allein dem Meister.“ Und so schenkte er auch dieses Gewandpaar dem Zehnkräftigen. Der König fragte: „Was hat der Brahmane getan?“, und als er hörte: „Er hat auch dieses Gewandpaar dem Tathāgata geschenkt“, sandte er weitere zwei Gewandpaare. Auch diese gab er dem Meister. Wiederum sandte der König vier weitere Paare, und so ging es fort, bis er schließlich zweiunddreißig Gewandpaare sandte. Da dachte der Brahmane: „Das sieht ja aus, als würde ich immer mehr anhäufen.“ Er behielt ein Gewandpaar für sich und eines für die Brahmanin, also zwei Paare, und schenkte die übrigen dreißig Paare dem Tathāgata. Von da an wurde er ein Vertrauter des Meisters. Atha taṃ rājā ekadivasaṃ sītasamaye satthu santike dhammaṃ suṇantaṃ disvā satasahassagghanakaṃ attano pārutaṃ rattakambalaṃ datvā āha – ‘‘ito paṭṭhāya imaṃ pārupitvā dhammaṃ suṇāhī’’ti. So ‘‘kiṃ me iminā kambalena imasmiṃ pūtikāye upanītenā’’ti cintetvā antogandhakuṭiyaṃ tathāgatassa mañcassa upari vitānaṃ katvā agamāsi. Athekadivasaṃ rājā pātova vihāraṃ gantvā antogandhakuṭiyaṃ satthu santike nisīdi. Tasmiṃ khaṇe chabbaṇṇā buddharasmiyo kambale paṭihaññanti, kambalo ativiya virocittha. Rājā ullokento sañjānitvā āha – ‘‘amhākaṃ, bhante, esa kambalo, amhehi ekasāṭakabrāhmaṇassa dinno’’ti. ‘‘Tumhehi, mahārāja, brāhmaṇo pūjito, brāhmaṇena mayaṃ pūjitā’’ti. Rājā ‘‘brāhmaṇo yuttaṃ aññāsi, na maya’’nti pasīditvā yaṃ manussānaṃ upakārabhūtaṃ, taṃ sabbaṃ aṭṭhaṭṭhakaṃ katvā sabbaṭṭhakaṃ nāma dānaṃ datvā purohitaṭṭhāne ṭhapesi. Sopi ‘‘aṭṭhaṭṭhakaṃ nāma catusaṭṭhi hotī’’ti catusaṭṭhisalākabhattāni upaṭṭhapetvā yāvajīvaṃ dānaṃ datvā sīlaṃ rakkhitvā tato cuto sagge nibbatti. Eines Tages, während der kalten Jahreszeit, sah der König ihn in der Gegenwart des Meisters der Lehre lauschen. Da gab er ihm seine eigene rote Wolldecke, die einhunderttausend wert war, und sagte: „Hülle dich von nun an darin ein, wenn du die Lehre hörst.“ Er aber dachte: „Was nützt mir diese Decke, wenn sie über diesen stinkenden Körper gelegt wird?“ Da ging er hin, machte daraus einen Baldachin über dem Bett des Tathāgata in der inneren Duftkammer und ging fort. Eines Tages ging der König frühmorgens zum Kloster und setzte sich in der inneren Duftkammer nahe beim Meister nieder. In diesem Augenblick trafen die sechsfarbigen Buddha-Strahlen auf die Decke, und die Decke erglänzte überaus prächtig. Als der König aufblickte und sie erkannte, sagte er: „Ehrwürdiger Herr, das ist doch unsere Decke, die wir dem Ekasāṭaka-Brahmanen gegeben haben!“ „Großer König, du hast den Brahmanen geehrt, und der Brahmane hat Uns geehrt“, sprach der Erhabene. Der König fand großen Gefallen daran und dachte: „Der Brahmane wusste, was angemessen war, nicht wir!“ Er schenkte ihm daraufhin von allem, was den Menschen von Nutzen ist, jeweils acht Stück, gab diese Gabe namens Sabbaṭṭhaka und setzte ihn in das Amt des Hofpriesters ein. Auch jener dachte: „Die Gabe ‚Acht von jeder Art‘ macht vierundsechzig aus“, richtete vierundsechzig Portionen Speise für Los-Mahlzeiten her, spendete zeitlebens Gaben, hielt die Sittlichkeitsregeln ein und wurde nach seinem Ableben im Himmel wiedergeboren. Puna [Pg.286] tato cuto imasmiṃ kappe bhagavato koṇāgamanassa bhagavato kassapassa cāti dvinnaṃ antare bārāṇasiyaṃ kuṭumbiyakule nibbatto. So vaḍḍhimanvāya gharāvāsaṃ vasanto ekadivasaṃ araññe jaṅghavihāraṃ vicarati. Tasmiñca samaye paccekabuddho nadītīre cīvarakammaṃ karonto anuvāte appahonte saṅgharitvā ṭhapetumāraddho. So taṃ disvā ‘‘kasmā, bhante, saṅgharitvā ṭhapethā’’ti āha. ‘‘Anuvāto nappahotī’’ti. ‘‘Iminā, bhante, karothā’’ti uttarisāṭakaṃ datvā ‘‘nibbattanibbattaṭṭhāne me kāci hāni mā hotū’’ti patthanaṃ akāsi. Als er wiederum von dort verschied, wurde er in diesem Weltalter in der Zeit zwischen den beiden Erhabenen Koṇāgamana und Kassapa in Bārāṇasī in einer Hausvaterfamilie wiedergeboren. Herangewachsen führte er das Leben eines Hausvaters. Eines Tages ging er im Wald spazieren. Zu jener Zeit schneiderte ein Paccekabuddha am Flussufer sein Gewand. Da der Saumstoff nicht ausreichte, schickte er sich an, das Gewand zusammenzulegen und beiseite zu legen. Als jener ihn sah, fragte er: „Ehrwürdiger Herr, warum legt Ihr es zusammen und beiseite?“ „Der Saumstoff reicht nicht aus“, antwortete er. „Ehrwürdiger Herr, macht es mit diesem hier!“, sagte er, reichte ihm sein Obergewand und sprach den Wunsch aus: „Möge mir an jedem Ort, an dem ich wiedergeboren werde, niemals irgendein Mangel widerfahren!“ Gharepissa bhaginiyā saddhiṃ bhariyāya kalahaṃ karontiyā paccekabuddho piṇḍāya pāvisi. Athassa bhaginī paccekabuddhassa piṇḍapātaṃ datvā tassa bhariyaṃ sandhāya – ‘‘evarūpaṃ bālaṃ yojanasate parivajjeyya’’nti patthanaṃ ṭhapesi. Sā gehaṅgaṇe ṭhitā sutvā ‘‘imāya dinnabhattaṃ esa mā bhuñjatū’’ti pattaṃ gahetvā bhattaṃ chaḍḍetvā kalalassa pūretvā adāsi. Itarā disvā ‘‘bāle, maṃ tāva akkosa vā pahara vā, evarūpassa pana dve asaṅkhyeyyāni pūritapāramissa paccekabuddhassa pattato bhattaṃ chaḍḍetvā kalalaṃ dātuṃ na yutta’’nti āha. Athassa bhariyāya paṭisaṅkhānaṃ uppajji. Sā ‘‘tiṭṭhatha, bhante’’ti kalalaṃ chaḍḍetvā pattaṃ dhovitvā gandhacuṇṇena ubbaṭṭetvā paṇītabhattassa catumadhurassa ca pūretvā upari āsittena padumagabbhavaṇṇena sappinā vijjotamānaṃ pattaṃ paccekabuddhassa hatthe ṭhapetvā ‘‘yathā ayaṃ piṇḍapāto obhāsajāto, evaṃ obhāsajātaṃ me sarīraṃ hotū’’ti patthanaṃ akāsi. Paccekabuddho anumoditvā ākāsaṃ pakkhandi. Tepi dve jāyampatikā yāvatāyukaṃ ṭhatvā tato cutā sagge nibbattiṃsu. Puna tato cavitvā upāsako kassapasammāsambuddhakāle bārāṇasiyaṃ asītikoṭivibhavasampanne kule nibbatti, itarāpi tādisasseva seṭṭhino dhītā hutvā nibbatti, tassa vayappattassa tameva seṭṭhidhītaraṃ ānayiṃsu. Tassā pubbe aniṭṭhavipākassa pāpakammassa ānubhāvena patikulaṃ paviṭṭhamattāya ummārantarato paṭṭhāya sakalaṃ gehaṃ ugghāṭitavaccakūpo viya duggandhaṃ jātaṃ. Kumāro ‘‘kassāyaṃ gandho’’ti pucchitvā ‘‘seṭṭhikaññāyā’’ti sutvā ‘‘nīharatha na’’nti tassāyeva kulagharaṃ pesesi. Sā teneva nīhārena sattasu ṭhānesu paṭinivatti. In dem Haus jener Person trat ein Paccekabuddha ein, um Almosen zu sammeln, während seine Ehefrau mit seiner Schwester stritt. Da gab seine Schwester dem Paccekabuddha eine Almosenspeise und legte mit Bezug auf seine Ehefrau den folgenden Wunsch fest: „Möge ich eine solche Närrin über hundert Yojanas hinweg meiden!“ Jene Ehefrau, die im Vorhof des Hauses stand, hörte dies und dachte: „Möge dieser Paccekabuddha die von ihr gespendete Speise nicht essen!“ Sie nahm die Almosenschale, warf die Speise weg, füllte die Schale mit Schlamm und reichte sie ihm. Als die andere dies sah, sagte sie: „Närrin! Du magst mich beschimpfen oder schlagen, aber es geziemt sich nicht, die Speise aus der Almosenschale eines solchen Paccekabuddha, der die Vollkommenheiten über zwei unzählbare Weltzeitalter hinweg erfüllt hat, wegzuwerfen und ihm Schlamm zu geben!“ Da setzte bei seiner Ehefrau die Besinnung ein. Sie sagte: „Wartet, Ehrwürdiger!“, schüttete den Schlamm weg, wusch die Schale, rieb sie mit Duftpulver ab, füllte sie mit vorzüglicher Speise sowie den vier süßen Zutaten und legte die Schale, die von oben aufgegossener, lotoskelchfarbener geklärter Butter erglänzte, in die Hand des Paccekabuddha. Sie sprach den Wunsch aus: „So wie diese Almosenspeise von strahlendem Glanz erfüllt ist, so möge auch mein Körper von strahlendem Glanz erfüllt sein!“ Der Paccekabuddha sprach Segensworte und flog in die Luft empor. Auch jene beiden Ehegatten verwelkten dort bis an ihr Lebensende, starben und wurden in der Götterwelt wiedergeboren. Nachdem er von dort wiederum geschieden war, wurde der Laienanhänger zur Zeit des vollkommen Erleuchteten Kassapa in Bārāṇasī in einer wohlhabenden Familie mit einem Vermögen von achtzig Koṭis wiedergeboren. Und auch jene andere wurde als Tochter eines ebenso reichen Großkaufmanns wiedergeboren. Als er das Erwachsenenalter erreicht hatte, brachte man ihm eben diese Großkaufmannstochter als Ehefrau nach Hause. Doch durch die Nachwirkung ihrer früheren unheilsamen Tat verbreitete sich, sobald sie das Haus des Gatten betreten hatte, von der Türschwelle an im ganzen Haus ein Gestank wie aus einer geöffneten Jauchegrube. Der Jüngling fragte: „Woher kommt dieser Gestank?“, und als er hörte: „Von der Großkaufmannstochter“, sagte er: „Schafft sie fort!“ und schickte sie zurück in das Haus ihrer Familie. Auf dieselbe Weise wurde sie an sieben Orten zurückgewiesen. Tena [Pg.287] samayena kassapadasabalo parinibbāyi. Tassa satasahasagghanikāhi suvaṇṇiṭṭhakāhi yojanubbedhaṃ cetiyaṃ ārabhiṃsu. Tasmiṃ cetiye kariyamāne sā seṭṭhidhītā cintesi – ‘‘ahaṃ sattasu ṭhānesu paṭinivattā, kiṃ me jīvitenā’’ti attano ābharaṇabhaṇḍaṃ bhañjāpetvā suvaṇṇiṭṭhakaṃ kāresi ratanāyataṃ vidatthivitthiṇṇaṃ caturaṅgulubbedhaṃ. Tato haritālamanosilāpiṇḍaṃ gahetvā aṭṭha uppalapupphahatthake ādāya cetiyakaraṇaṭṭhānaṃ gatā. Tasmiñca khaṇe ekā iṭṭhakāpanti parikkhipitvā āgacchamānā ghaṭaniṭṭhakāya ūnā hoti. Seṭṭhidhītā vaḍḍhakiṃ āha ‘‘imaṃ me iṭṭhakaṃ ettha ṭhapethā’’ti. ‘‘Amma bhaddake, kāle āgatāsi, sayameva ṭhapehī’’ti. Sā āruyha telena haritālamanosilāpiṇḍaṃ yojetvā tena bandhanena iṭṭhakaṃ patiṭṭhapetvā upari aṭṭhahi uppalapupphahatthakehi pūjaṃ katvā vanditvā ‘‘nibbattanibbattaṭṭhāne me kāyato candanagandho vāyatu, mukhato uppalagandho’’ti patthanaṃ katvā cetiyaṃ vanditvā padakkhiṇaṃ katvā gehaṃ agamāsi. Zu jener Zeit ging der Kassapa-Zehnkräfte-Besitzer ins Parinibbāna ein. Ihm zu Ehren begann man mit dem Bau einer einen Yojana hohen Cetiya aus goldenen Ziegeln, die jeweils einhunderttausend Münzen wert waren. Während diese Cetiya errichtet wurde, dachte jene Großkaufmannstochter: „Ich bin an sieben Orten zurückgewiesen worden. Was nützt mir noch das Leben?“ Sie ließ ihren Schmuck einschmelzen und daraus einen goldenen Ziegel von einer Elle Länge, einer Spanne Breite und vier Fingern Höhe anfertigen. Danach nahm sie eine Paste aus Orpiment und Realgar, nahm acht Handvoll blauer Lotosblüten und ging zur Baustelle der Cetiya. In diesem Moment, als eine Reihe von Ziegeln rundherum hochgezogen wurde, fehlte ein Verbindungsziegel. Die Großkaufmannstochter sagte zum Baumeister: „Bitte setzt diesen meinen Ziegel hier ein!“ Er antwortete: „Liebe Frau, du kommst genau zur rechten Zeit. Setze ihn selbst ein!“ Sie stieg hinauf, mischte die Paste aus Orpiment und Realgar mit Öl, setzte den Ziegel mit diesem Bindemittel fest ein, brachte oben darauf eine Gabe von acht Handvoll blauer Lotosblüten dar, verneigte sich und sprach den Wunsch aus: „Möge an jedem Ort, an dem ich wiedergeboren werde, mein Körper nach Sandelholz duften und mein Mund nach blauem Lotos!“ Nachdem sie die Cetiya verehrt und im Uhrzeigersinn umrundet hatte, ging sie nach Hause. Tasmiṃyeva khaṇe sā yassa seṭṭhiputtassa paṭhamaṃ gehaṃ nītā, tassa taṃ ārabbha sati udapādi. Nagarepi nakkhattaṃ saṅghuṭṭhaṃ hoti. So upaṭṭhāke āha ‘‘idha ānītā seṭṭhidhītā kuhi’’nti? ‘‘Kulagehe, sāmī’’ti. ‘‘Ānetha naṃ, nakkhattaṃ kīḷissāmī’’ti. Te gantvā taṃ vanditvā ṭhitā. ‘‘Kiṃ, tātā, āgatatthā’’ti tāya puṭṭhā tassā taṃ pavattiṃ ācikkhiṃsu. ‘‘Tātā, mayā ābharaṇabhaṇḍehi cetiyaṃ pūjitaṃ, ābharaṇaṃ me natthī’’ti. Te gantvā seṭṭhiputtassa ārocesuṃ. ‘‘Ānetha naṃ, piḷandhanaṃ labhissatī’’ti. Te taṃ ānayiṃsu. Tassā saha gehapavesanena sakalagehaṃ candanagandho ceva uppalagandho ca vāyi. Seṭṭhiputto taṃ pucchi – ‘‘bhadde, tava sarīrato paṭhamaṃ duggandho vāyi, idāni pana te sarīrato candanagandho, mukhato uppalagandho vāyati, kimeta’’nti? Sā ādito paṭṭhāya attanā katakammaṃ ārocesi. Seṭṭhiputto ‘‘niyyānikaṃ vata buddhasāsana’’nti pasīditvā yojanikaṃ suvaṇṇacetiyaṃ kambalakañcukena paṭicchādetvā tattha tattha rathacakkapamāṇehi suvaṇṇapadumehi alaṅkari. Tesaṃ dvādasahatthā olambakā honti. In genau jenem Augenblick erinnerte sich jener Großkaufmannssohn, in dessen Haus sie zuerst gebracht worden war, an sie. Auch in der Stadt war ein Fest ausgerufen worden. Er fragte seine Diener: „Wo ist die Großkaufmannstochter, die hierher gebracht worden war?“ Sie antworteten: „Im Hause ihrer Familie, Herr.“ Er sagte: „Bringt sie her, ich will das Fest feiern!“ Sie gingen hin, verneigten sich vor ihr und blieben stehen. Als sie von ihr gefragt wurden: „Warum seid ihr gekommen, meine Lieben?“, teilten sie ihr die Nachricht mit. Sie sagte: „Meine Lieben, ich habe die Cetiya mit meinem Schmuck geehrt, ich besitze keinen Schmuck mehr.“ Sie kehrten zurück und berichteten dies dem Großkaufmannssohn. Er sagte: „Bringt sie her, sie wird Schmuck von mir erhalten!“ Da brachten sie sie her. Sobald sie das Haus betrat, erfüllte das gesamte Haus der Duft von Sandelholz und der Duft von blauem Lotos. Der Großkaufmannssohn fragte sie: „Liebe, zuvor ging von deinem Körper ein übler Geruch aus; nun aber duftet dein Körper nach Sandelholz und dein Mund nach blauem Lotos. Wie kommt das?“ Sie erzählte ihm von Anfang an die Tat, die sie selbst vollbracht hatte. Der Großkaufmannssohn war voller Vertrauen und dachte: „Wahrlich, die Lehre des Buddha führt zur Befreiung!“ Er hüllte die einen Yojana hohe goldene Cetiya in eine Decke aus kostbarem Wolltuch und schmückte sie hier und da mit goldenen Lotosblüten von der Größe von Wagenrädern, an denen zwölf Ellen lange Quasten herabhingen. So tattha yāvatāyukaṃ ṭhatvā tato cuto sagge nibbattitvā, puna tato cavitvā bārāṇasito yojanamatte ṭhāne aññatarasmiṃ amaccakule [Pg.288] nibbatti. Bhariyā panassa devalokato cavitvā rājakule jeṭṭharājadhītā hutvā nibbatti. Tesu vayappattesu kumārassa vasanagāme nakkhattaṃ saṅghuṭṭhaṃ. So mātaraṃ āha – ‘‘amma, sāṭakaṃ me dehi, nakkhattaṃ kīḷissāmī’’ti. Sā dhotavatthaṃ nīharitvā adāsi. ‘‘Amma, thūlamida’’nti āha. Sā aññaṃ nīharitvā adāsi. So tampi paṭikkhipi. Atha naṃ mātā āha – ‘‘tāta, yādise gehe mayaṃ jātā, natthi no ito sukhumatarassa paṭilābhāya puñña’’nti. ‘‘Tena hi labhanaṭṭhānaṃ gacchāmi, ammā’’ti. ‘‘Putta, ahaṃ ajjeva tuyhaṃ bārāṇasinagararajjapaṭilābhaṃ icchāmī’’ti. So mātaraṃ vanditvā ‘‘gacchāmi, ammā’’ti. ‘‘Gaccha, tātā’’ti. So pana puññaniyāmena nikkhamitvā bārāṇasiṃ gantvā uyyāne maṅgalasilāpaṭṭe sasīsaṃ pārupitvā nipajji. So ca bārāṇasirañño kālaṅkatassa sattamo divaso hoti. Er lebte dort bis zu seinem Lebensende, schied von dort und wurde in der Götterwelt wiedergeboren. Nachdem er von dort wiederum geschieden war, wurde er in einer Ministerfamilie an einem Ort einen Yojana von Bārāṇasī entfernt wiedergeboren. Seine Ehefrau jedoch schied aus der Götterwelt und wurde im Königshaus als älteste Königstochter wiedergeboren. Als sie das Erwachsenenalter erreicht hatten, wurde im Wohndorf des Jünglings ein Fest ausgerufen. Er sagte zu seiner Mutter: „Mutter, gib mir ein Gewand, ich will am Fest teilnehmen!“ Sie holte ein frisch gewaschenes Tuch hervor und gab es ihm. Er sagte: „Mutter, das ist zu grob!“ Sie holte ein anderes hervor und gab es ihm. Auch dieses wies er zurück. Da sagte seine Mutter zu ihm: „Mein Sohn, in was für einem Haus wir auch geboren sein mögen, wir besitzen kein Verdienst, um ein feineres Gewand als dieses zu erhalten.“ Er erwiderte: „Wenn dem so ist, Mutter, werde ich dorthin gehen, wo man eines erhalten kann!“ Sie sagte: „Mein Sohn, ich wünsche mir, dass du noch heute die Herrschaft über die Stadt Bārāṇasī erlangst!“ Er verneigte sich vor seiner Mutter und sagte: „Ich gehe, Mutter.“ – „Geh, mein Lieber.“ Kraft der Macht seines Verdienstes zog er aus, ging nach Bārāṇasī, hüllte sich im königlichen Park auf der glückverheißenden Steinplatte samt dem Kopf ein und legte sich schlafen. Dies war der siebte Tag nach dem Tod des Königs von Bārāṇasī. Amaccā rañño sarīrakiccaṃ katvā rājaṅgaṇe nisīditvā mantayiṃsu – ‘‘rañño ekā dhītāva atthi, putto natthi, arājakaṃ rajjaṃ nassissati, ko rājā bhavituṃ arahatī’’ti? ‘‘Tvaṃ hohi, tvaṃ hohī’’ti. Purohito āha – ‘‘bahuṃ oloketuṃ na vaṭṭati, phussarathaṃ vissajjessāmā’’ti. Te kumudavaṇṇe cattāro sindhave yojetvā pañcavidharājakakudhabhaṇḍaṃ setacchattañca tasmiṃ ṭhapetvā rathaṃ vissajjetvā pacchato tūriyāni paggaṇhāpesuṃ. Ratho pācīnadvārena nikkhamitvā uyyānābhimukho agamāsi. ‘‘Paricayena uyyānābhimukho gacchati, nivattemā’’ti keci āhaṃsu. Purohito ‘‘mā nivattayitthā’’ti āha. Ratho gantvā kumāraṃ padakkhiṇaṃ katvā āruhanasajjo hutvā aṭṭhāsi. Purohito pārupanakaṇṇaṃ apanetvā pādatalāni olokento ‘‘tiṭṭhatu ayaṃ dīpo, dvisahassaparittadīpavāresu catūsu mahādīpesu esa rajjaṃ kāretuṃ yutto’’ti vatvā ‘‘tūriyāni paggaṇhathā’’ti tikkhattuṃ tūriyāni paggaṇhāpeti. Nachdem die Minister die Bestattungsfeierlichkeiten für den König vollzogen hatten, versammelten sie sich auf dem Schlosshof und beratschlagten: „Der König hat nur eine einzige Tochter, aber keinen Sohn. Ein königsloses Reich wird zugrunde gehen. Wer ist würdig, König zu werden?“ Einige sagten: „Werde du es, werde du es!“ Da sprach der Haushofpriester: „Es ist nicht ratsam, auf viele zu blicken. Lasst uns den Prunkwagen aussenden!“ Sie spannten vier lotusweiße Sindh-Pferde an, legten die fünf königlichen Insignien und den weißen Schirm auf den Wagen, ließen ihn los und hießen die Musikanten hinterherziehen. Der Wagen fuhr durch das Osttor hinaus und hielt direkt auf den königlichen Park zu. Einige sagten: „Aus Gewohnheit fährt er zum Park, lasst uns umkehren!“ Doch der Haushofpriester sprach: „Kehrt nicht um!“ Der Wagen fuhr weiter, umrundete den Prinzen im Uhrzeigersinn und hielt an, bereit zum Aufsteigen. Der Haushofpriester schob den Saum seines Gewandes beiseite, betrachtete seine Fußsohlen und sprach: „Lass diese Insel beiseite; er ist würdig, die Herrschaft über die vier großen Kontinente samt ihren zweitausend kleinen Nebeninseln auszuüben!“ Dann rief er dreimal: „Spielt die Instrumente!“ und ließ die Musik erschallen. Atha kumāro mukhaṃ vivaritvā olokento ‘‘kena kammena āgatatthā’’ti āha. ‘‘Deva, tumhākaṃ rajjaṃ pāpuṇātī’’ti. ‘‘Rājā vo kaha’’nti? ‘‘Devattaṃ gato, sāmī’’ti. ‘‘Kati divasā atikkantā’’ti? ‘‘Ajja sattamo divaso’’ti. ‘‘Putto vā dhītā vā natthī’’ti? ‘‘Dhītā atthi, deva, putto natthī’’ti. ‘‘Tena hi karissāmi rajja’’nti. Te tāvadeva abhisekamaṇḍapaṃ [Pg.289] kāretvā rājadhītaraṃ sabbālaṅkārehi alaṅkaritvā uyyānaṃ ānetvā kumārassa abhisekaṃ akaṃsu. Athassa katābhisekassa satasahassagghanakaṃ vatthaṃ upanayiṃsu. So ‘‘kimidaṃ, tātā’’ti āha. ‘‘Nivāsanavatthaṃ, devā’’ti. ‘‘Nanu, tātā, thūla’’nti? ‘‘Manussaparibhogavatthesu ito mudutaraṃ natthi, devā’’ti. ‘‘Tumhākaṃ rājā evarūpaṃ nivāsesī’’ti? ‘‘Āma, devā’’ti. ‘‘Na maññe puññavā tumhākaṃ rājā’’ti ‘‘suvaṇṇabhiṅgāraṃ āharatha, labhissāmi vattha’’nti suvaṇṇabhiṅgāraṃ āharāpetvā uṭṭhāya hatthe dhovitvā mukhaṃ vikkhāletvā hatthena udakaṃ gahetvā puratthimadisāyaṃ abbhukkiri. Ghanapathaviṃ bhinditvā aṭṭha kapparukkhā uṭṭhahiṃsu. Puna udakaṃ gahetvā dakkhiṇapacchimauttaradisāyanti evaṃ catūsu disāsu abbhukkiri. Sabbadisāsu aṭṭhaaṭṭhakaṃ katvā dvattiṃsa kapparukkhā uṭṭhahiṃsu. So ekaṃ dibbadussaṃ nivāsetvā ekaṃ pārupitvā ‘‘nandarañño vijite suttakantikā itthiyo ‘mā suttaṃ kantiṃsū’ti evaṃ bheriṃ carāpethā’’ti vatvā chattaṃ ussāpetvā alaṅkatapaṭiyatto hatthikkhandhavaragato nagaraṃ pavisitvā pāsādaṃ abhiruyha mahāsampattiṃ anubhavi. Da enthüllte der Prinz sein Gesicht, blickte sie an und fragte: „Aus welchem Anlass seid ihr gekommen?“ – „Majestät, die Herrschaft über das Reich fällt Euch zu.“ – „Wo ist euer König?“ – „Er ist unter die Götter gegangen, Herr.“ – „Wie viele Tage sind vergangen?“ – „Heute ist der siebte Tag.“ – „Gibt es weder Sohn noch Tochter?“ – „Eine Tochter gibt es, Majestät, aber keinen Sohn.“ – „Nun gut, dann werde ich die Herrschaft übernehmen.“ Sie ließen sogleich eine Weihehalle errichten, schmückten die Königstochter mit allem Prunk, brachten sie in den Park und vollzogen die feierliche Königsweihe des Prinzen. Daraufhin brachten sie dem frisch Geweihten ein Gewand im Wert von hunderttausend Münzen. Er fragte: „Was ist das, ihr Lieben?“ – „Ein Gewand zum Anlegen, Majestät.“ – „Ist es nicht gar grob, ihr Lieben?“ – „Unter den Kleidern, die Menschen tragen, gibt es kein feineres als dieses, Majestät.“ – „Hat euer König ein solches getragen?“ – „Ja, Majestät.“ – „Ich glaube nicht, dass euer König von großem Verdienst war“, sprach er. „Bringt mir ein goldenes Wasserkruggefäß, ich werde ein Gewand erhalten.“ Er ließ das goldene Gefäß bringen, stand auf, wusch seine Hände, spülte seinen Mund aus, nahm Wasser in seine Hand und sprengte es in Richtung Osten aus. Die feste Erde spaltend, wuchsen acht Wunschbäume empor. Wieder nahm er Wasser und sprengte es in Richtung Süden, Westen und Norden aus – so in alle vier Himmelsrichtungen. Da sich in jeder Richtung je acht erhoben, wuchsen insgesamt zweiunddreißig Wunschbäume empor. Er legte ein himmlisches Untergewand an, hüllte sich in ein weiteres als Obergewand und sprach: „Lasst im Reich des Königs Nanda die Trommel schlagen mit der Verkündung: ‚Die spinnenden Frauen sollen keinen Faden mehr spinnen!‘“ Nachdem er dies gesagt hatte, ließ er den weißen Schirm über sich erheben, betrat festlich geschmückt auf einem edlen Elefanten reitend die Stadt, stieg zum Palast empor und genoss die große königliche Herrlichkeit. Evaṃ gacchante kāle devī rañño sampattiṃ disvā ‘‘aho vata tapassī’’ti kāruññākāraṃ dassesi. ‘‘Kimidaṃ, devī’’ti puṭṭhā ‘‘atimahatī, deva, te sampatti, atīte buddhānaṃ saddahitvā katakalyāṇassa phalaṃ, idāni anāgatassa paccayaṃ puññaṃ na karothā’’ti āha. Kassa dassāma, sīlavanto natthīti. ‘‘Asuñño, deva, jambudīpo arahantehi; tumhe, deva, dānaṃ sajjetha, ahaṃ arahante lacchāmī’’ti āha. Punadivase rājā pācīnadvāre dānaṃ sajjāpesi. Devī pātova uposathaṅgāni adhiṭṭhāya uparipāsāde puratthābhimukhā urena nipajjitvā ‘‘sace etissāya disāya arahanto atthi, sve āgantvā amhākaṃ bhikkhaṃ gaṇhantū’’ti āha. Tassaṃ disāyaṃ arahanto nāhesuṃ, taṃ sakkāraṃ kapaṇayācakānaṃ adaṃsu. Als nun die Zeit verging, sah die Königin die Herrlichkeit des Königs, empfand tiefes Mitgefühl und sprach klagend: „Ach, wie bedauernswert!“ Auf die Frage des Königs: „Was bedeutet das, Königin?“, antwortete sie: „Sehr groß, o Herr, ist deine Herrlichkeit. Sie ist die Frucht des Guten, das du in der Vergangenheit im Vertrauen auf die Buddhas gewirkt hast. Warum wirkst du nun kein heilsames Verdienst als Grundlage für die Zukunft?“ Der König entgegnete: „Wem sollen wir spenden? Es gibt keine Tugendhaften hier.“ Sie sprach: „Jambudīpa ist nicht leer von Arahants, o Herr. Bereitet nur die Almosengaben vor, o Herr, ich werde Arahants finden.“ Am nächsten Tag ließ der König am Osttor eine Almosenspeisung vorbereiten. Die Königin gelobte schon am frühen Morgen die Uposatha-Satzungen, legte sich im oberen Stockwerk des Palastes mit dem Gesicht nach Osten gewandt flach auf den Boden und sprach: „Wenn es in dieser Himmelsrichtung Arahants gibt, mögen sie morgen herkommen und unser Almosen annehmen.“ In dieser Richtung gab es jedoch keine Arahants, und so gaben sie die dargebrachten Gaben den Armen und Bettlern. Punadivase dakkhiṇadvāre sajjetvā tatheva dakkhiṇeyyaṃ nālattha, punadivasepi pacchimadvāre tatheva. Uttaradvāre sajjitadivasena pana deviyā tatheva nimantentiyā [Pg.290] himavante vasantānaṃ padumavatiyā puttānaṃ pañcasatānaṃ paccekabuddhānaṃ jeṭṭhako mahāpadumapaccekabuddho bhātike āmantesi – ‘‘mārisā, nandarājā tumhe nimanteti, adhivāsetha tassā’’ti. Te adhivāsetvā punadivase anotattadahe mukhaṃ dhovitvā ākāsenāgantvā uttaradvāre otariṃsu. Manussā disvā gantvā ‘‘pañcasatā, deva, paccekabuddhā āgatā’’ti rañño ārocesuṃ. Rājā saddhiṃ deviyā gantvā vanditvā paccekabuddhe pāsādaṃ āropetvā tatra nesaṃ dānaṃ datvā bhattakiccāvasāne rājā saṅghattherassa, devī saṅghanavakassa pādamūle nipatitvā ‘‘ayyā, bhante, paccayehi na kilamissanti, mayañca puññena na parihāyissāmī, amhākaṃ yāvajīvaṃ idha nivāsāya paṭiññaṃ dethā’’ti paṭiññaṃ kāretvā uyyāne pañca paṇṇasālāsatāni, pañca caṅkamanasatānīti sabbākārena nivāsanaṭṭhānāni sampādetvā tattha vasāpesuṃ. Am nächsten Tag bereiteten sie die Gaben am Südtor vor, doch erhielten sie ebenso keinen würdigen Empfänger. Auch am darauffolgenden Tag verfuhren sie am Westtor in gleicher Weise. An dem Tag jedoch, an dem die Gaben am Nordtor bereitgestellt wurden und die Königin ihre Einladung auf dieselbe Weise aussprach, wandte sich der im Himalaja lebende Paccekabuddha Mahāpaduma – der älteste von fünfhundert Brüdern, die allesamt Söhne der Padumavatī und Paccekabuddhas waren – an seine Brüder und sprach: „Ihr Lieben, König Nanda lädt euch ein. Nehmt seine Einladung an!“ Sie willigten ein, wuschen sich am nächsten Morgen am Anotatta-See das Gesicht, kamen durch die Luft herbeigeflogen und ließen sich am Nordtor nieder. Als die Menschen sie sahen, eilten sie zum König und berichteten: „Majestät, fünfhundert Paccekabuddhas sind eingetroffen.“ Der König ging gemeinsam mit der Königin hin, erwies ihnen ehrerbietig Reverenz, geleitete die Paccekabuddhas in den Palast hinauf und reichte ihnen dort die Almosengabe. Nach Beendigung des Mahls warf sich der König zu den Füßen des ältesten Mönchs nieder und die Königin zu den Füßen des jüngsten und baten: „Ehrwürdige Herren, ihr sollt keinen Mangel an den Lebensbedürfnissen leiden, und wir wollen nicht an Verdienst verarmen. Gebt uns das Versprechen, zeit unseres Lebens hier zu verweilen!“ Nachdem sie ihnen dieses Versprechen abgerungen hatten, ließen sie im königlichen Park fünfhundert Blätterhütten und fünfhundert Wandelpfade errichten, statteten die Wohnstätten in jeder Weise vollkommen aus und baten sie, dort zu residieren. Evaṃ kāle gacchante rañño paccante kupite rājā ‘‘ahaṃ paccantaṃ vūpasametuṃ gacchāmi, tvaṃ paccekabuddhesu mā pamajjā’’ti deviṃ ovaditvā gato. Tasmiṃ anāgateyeva paccekabuddhānaṃ āyusaṅkhārā khīṇā. Mahāpadumapaccekabuddho tiyāmarattiṃ jhānakīḷaṃ kīḷitvā aruṇuggamanasamaye ālambanaphalakaṃ ālambitvā ṭhitakova anupādisesāya nibbānadhātuyā parinibbāyi. Etenupāyena sesāpīti sabbeva parinibbutā. Punadivase devī paccekabuddhānaṃ nisīdanaṭṭhānāni sajjetvā pupphāni vikiritvā dhūpaṃ vāsetvā tesaṃ āgamanaṃ olokentī nisinnā āgamanaṃ adisvā purise pesesi – ‘‘gacchatha, tātā, jānātha kiṃ ayyānaṃ aphāsuka’’nti? Te gantvā mahāpadumassa paṇṇasālāya dvāraṃ vivaritvā tattha taṃ apassantā caṅkamanaṃ gantvā ālambanaphalakaṃ nissāya ṭhitaṃ disvā vanditvā ‘‘kālo, bhante’’ti āhaṃsu. Parinibbutasarīraṃ kiṃ kathessati, te ‘‘niddāyati maññe’’ti vatvā piṭṭhipāde hatthena parāmasitvā pādānaṃ sītalatāya ceva thaddhatāya ca parinibbutabhāvaṃ ñatvā dutiyassa santikaṃ gantvā tatheva ñatvā puna tatiyassāti evaṃ sabbepi parinibbutabhāvaṃ ñatvā rājakulaṃ āgamiṃsu. ‘‘Kahaṃ, tātā, paccekabuddhā’’ti puṭṭhā ‘‘parinibbutā, devī’’ti āhaṃsu. Devī kandantī rodantī nikkhamitvā nāgarehi saddhiṃ [Pg.291] tattha gantvā sādhukīḷitaṃ kāretvā paccekabuddhānaṃ sarīrakiccaṃ kāretvā dhātuyo gāhāpetvā cetiyaṃ patiṭṭhāpesi. Mit dem Lauf der Zeit, als das Grenzgebiet des Königs rebellierte, ermahnte der König die Königin mit den Worten: „Ich gehe, um das Grenzgebiet zu befrieden; sei du nicht nachlässig gegenüber den Paccekabuddhas!“, und reiste ab. Noch vor seiner Rückkehr waren die Lebenskräfte der Paccekabuddhas erschöpft. Der Paccekabuddha Mahāpaduma verweilte während der drei Nachtwachen im Spiel der Vertiefungen, stützte sich zur Zeit des Sonnenaufgangs im Stehen an ein Anlehnbrett und ging in das Element des Erlöschens ohne verbleibende Daseinsgrundlagen ein. Auf diese Weise gingen auch alle übrigen Paccekabuddhas in das vollkommene Erlöschen ein. Am folgenden Tag bereitete die Königin die Sitzplätze für die Paccekabuddhas vor, streute Blumen aus, räucherte mit Duftstoffen und saß da, um nach ihrer Ankunft Ausschau zu halten. Als sie ihr Kommen nicht sah, sandte sie Männer aus und sprach: „Geht, ihr Lieben, und findet heraus, ob den Ehrwürdigen ein Unwohlsein widerfahren ist!“ Diese gingen hin, öffneten die Tür der Blätterhütte von Mahāpaduma, und als sie ihn dort nicht sahen, begaben sie sich zum Wandelpfad. Dort sahen sie ihn an das Anlehnbrett gelehnt stehen, verneigten sich und sprachen: „Es ist Zeit, Ehrwürdiger Herr.“ Wie sollte ein Körper, der das Parinibbāna erlangt hat, antworten? Sie dachten: „Er schläft wohl“, berührten seine Fußrücken mit den Händen und erkannten an der Kälte und Starrheit der Füße sein vollkommenes Erlöschen. Daraufhin gingen sie zum zweiten Paccekabuddha, erkannten dort dasselbe, und ebenso beim dritten. Als sie so bei allen das vollkommene Erlöschen erkannt hatten, kehrten sie zum Königshof zurück. Auf die Frage: „Wo, ihr Lieben, sind die Paccekabuddhas?“, antworteten sie: „Sie sind in das Parinibbāna eingegangen, o Königin.“ Die Königin weinte und klagte, verließ den Palast, ging zusammen mit den Stadtbewohnern dorthin, ließ feierliche Ehrenbezeugungen ausrichten, vollzog die Bestattungszeremonie für die Körper der Paccekabuddhas, ließ die Reliquien einsammeln und errichtete eine Stupa. Rājā paccantaṃ vūpasametvā āgato paccuggamanaṃ āgataṃ deviṃ pucchi – ‘‘kiṃ, bhadde, tvaṃ paccekabuddhesu na pamajjasi, nirogā ca ayyā’’ti? ‘‘Parinibbutā, devā’’ti. Taṃ sutvā rājā cintesi – ‘‘evarūpānampi paṇḍitānaṃ maraṇaṃ uppajjati, amhākaṃ kuto mokkhā’’ti? So nagaraṃ apavisitvā uyyānameva gantvā jeṭṭhaputtaṃ pakkosāpetvā tassa rajjaṃ niyyātetvā sayaṃ samaṇapabbajjaṃ pabbaji. Devīpi ‘‘raññe pabbajite ahaṃ kiṃ karissāmī’’ti tatheva uyyāne pabbaji. Dvepi jhānaṃ bhāvetvā tato cutā brahmaloke nibbattiṃsu. Der König kehrte nach der Befriedung des Grenzgebietes zurück und fragte die Königin, die ihm entgegengekommen war: „Meine Liebe, hast du die Paccekabuddhas nicht vernachlässigt? Und sind die Ehrwürdigen frei von Krankheit?“ Sie antwortete: „Sie sind in das Parinibbāna eingegangen, o König.“ Als der König dies hörte, dachte er: „Wenn selbst solchen weisen Menschen der Tod widerfährt, wie sollten wir da Erlösung finden?“ Er betrat die Stadt nicht, sondern begab sich direkt in den Park, ließ seinen ältesten Sohn rufen, übergab ihm die Herrschaft und trat selbst als Asket in den Hauslosenstand ein. Auch die Königin dachte: „Was soll ich tun, da der König in die Hauslosigkeit gezogen ist?“, und trat im selben Park ebenfalls in den Hauslosenstand ein. Beide entfalteten die Vertiefungen und wurden nach ihrem Abscheiden in der Brahma-Welt wiedergeboren. Tesu tattheva vasantesu amhākaṃ satthā loke uppajjitvā pavattitavaradhammacakko anupubbena rājagahaṃ pāpuṇi. Satthari tattha paṭivasante ayaṃ pippalimāṇavo magadharaṭṭhe mahātitthabrāhmaṇagāme kapilabrāhmaṇassa bhariyāya kucchimhi nibbatto. Ayaṃ bhaddakāpilānī maddaraṭṭhe sāgalanagare kosiyagottabrāhmaṇassa bhariyāya kucchimhi nibbattā. Tesaṃ anukkamena vaḍḍhamānānaṃ pippalimāṇavassa vīsatime, bhaddāya soḷasame vaye sampatte mātāpitaro puttaṃ oloketvā ‘‘tāta, tvaṃ vayappatto, kulavaṃsaṃ patiṭṭhapetuṃ yutto’’ti ativiya nippīḷiyiṃsu. Māṇavo āha – ‘‘mayhaṃ sotapathe evarūpaṃ kathaṃ mā kathayittha, ahaṃ yāva tumhe dharatha, tāva paṭijaggissāmi, tumhākaṃ accayena nikkhamitvā pabbajissāmī’’ti. Te katipāhaṃ atikkamitvā puna kathayiṃsu. Sopi puna paṭikkhipi. Tato paṭṭhāya mātā nirantaraṃ kathetiyeva. Während diese dort verweilten, erschien unser Lehrer in der Welt, setzte das vortreffliche Rad der Lehre in Bewegung und erreichte allmählich Rājagaha. Als der Lehrer dort verwelte, wurde dieser junge Mann Pippali im Land Magadha im Brahmanendorf Mahātittha im Schoß der Ehefrau des Brahmanen Kapila geboren. Diese Bhaddā Kāpilānī wurde im Madda-Reich in der Stadt Sāgala im Schoß der Ehefrau des Brahmanen aus der Kosiya-Sippe geboren. Als sie im Laufe der Zeit heranwuchsen und der junge Mann Pippali das zwanzigste und Bhaddā das sechzehnte Lebensjahr erreicht hatte, blickten die Eltern ihren Sohn an und bedrängten ihn sehr, indem sie sagten: „Lieber Sohn, du hast das entsprechende Alter erreicht; es ist an der Zeit, das Geschlecht fortzuführen.“ Der junge Mann sprach: „Sprecht mir gegenüber nicht von solchen Dingen. Solange ihr am Leben seid, werde ich für euch sorgen; nach eurem Verscheiden werde ich fortgehen und in den Hauslosenstand treten.“ Nachdem einige Tage vergangen waren, sprachen sie erneut zu ihm. Auch diesmal wies er es ab. Von da an sprach die Mutter unaufhörlich mit ihm darüber. Māṇavo ‘‘mātaraṃ saññāpessāmī’’ti rattasuvaṇṇassa nikkhasahassaṃ datvā suvaṇṇakārehi itthirūpakaṃ kāretvā tassa majjanaghaṭṭanādikammapariyosāne taṃ rattavatthaṃ nivāsetvā suvaṇṇasampannehi pupphehi ceva nānālaṅkārehi ca alaṅkārāpetvā ‘‘amma, evarūpaṃ ārammaṇaṃ labhanto gehe vasissāmi, alabhanto na vasissāmī’’ti. Paṇḍitā brāhmaṇī cintesi – ‘‘mayhaṃ putto puññavā dinnadāno katābhinīhāro pubbe puññāni karonto na ekakova akāsi, addhā etena saha katapuññā suvaṇṇarūpakapaṭibhāgā bhavissatī’’ti. Aṭṭha brāhmaṇe pakkosāpetvā sabbabhogehi [Pg.292] santappetvā suvaṇṇarūpakaṃ rathe āropetvā ‘‘gacchatha, tātā, yattha amhehi jātigottabhogādisamānakule evarūpaṃ dārikaṃ passatha, tattha idameva suvaṇṇarūpakaṃ saccākāraṃ katvā dethā’’ti uyyojesi. Der junge Mann dachte: „Ich werde meine Mutter überzeugen“, gab tausend Nikkhas aus rotem Gold und ließ von Goldschmieden das Bildnis einer Frau anfertigen. Nach Beendigung des Glättens, Polierens und der übrigen Arbeiten ließ er dem Bildnis ein rotes Gewand anlegen und es mit goldenen Blumen sowie verschiedenen Schmuckstücken verzieren. Dann sprach er: „Mutter, wenn ich ein solches Objekt erhalte, werde ich im Hause leben; wenn ich es nicht erhalte, werde ich nicht im Hause leben.“ Die weise Brahmanin dachte: „Mein Sohn ist verdienstvoll, er hat Gaben dargebracht und tiefe Entschlüsse gefasst. Als er in der Vergangenheit heilsame Taten vollbrachte, tat er dies nicht allein. Gewiss hat eine Frau gemeinsam mit ihm Verdienste erworben, die diesem goldenen Bildnis gleicht.“ Sie ließ acht Brahmanen rufen, stellte sie mit allerlei Genüssen zufrieden, hob das goldene Bildnis auf einen Wagen und sandte sie aus, indem sie sprach: „Geht, ihr Lieben! Wo immer ihr in einer Familie, die uns an Geburt, Sippe und Wohlstand gleich ist, ein solches Mädchen seht, dort gebt dieses goldene Bildnis als Brautgeschenk ab.“ Te ‘‘amhākaṃ nāma etaṃ kamma’’nti nikkhamitvā ‘‘kattha labhissāma, maddaraṭṭhaṃ nāma itthāgāraṃ, maddaraṭṭhaṃ gamissāmā’’ti maddaraṭṭhe sāgalanagaraṃ agamaṃsu. Attha taṃ suvaṇṇarūpakaṃ nhānatitthe ṭhapetvā ekamantaṃ nisīdiṃsu. Atha bhaddāya dhātī bhaddaṃ nhāpetvā alaṅkaritvā sayaṃ nhāyituṃ udakatitthaṃ gantvā suvaṇṇarūpakaṃ disvā ‘‘kissāyaṃ avinītā idhāgantvā ṭhitā’’ti piṭṭhipasse paharitvā suvaṇṇarūpakaṃ ñatvā ‘‘ayyadhītā meti saññaṃ uppādesi, ayaṃ pana ayyadhītāya nivāsanapaṭiggahitāyapi asadisā’’ti āha. Atha naṃ te brāhmaṇā ‘‘evarūpā kira te sāmidhītā’’ti pucchiṃsu. Sā ‘‘imāya suvaṇṇapaṭimāya sataguṇena sahassaguṇena mayhaṃ ayyadhītā abhirūpatarā’’, tathā hi ‘‘appadīpepi dvādasahatthe gabbhe nisinnā sarīrobhāsena tamaṃ vidhamatī’’ti āha. ‘‘Tena hi tassā mātāpitūnaṃ santikaṃ gacchāmā’’ti suvaṇṇarūpakaṃ rathe āropetvā taṃ dhātiṃ anugantvā kosiyagottassa gharadvāre ṭhatvā āgamanaṃ ārocayiṃsu. Sie sprachen: „Das ist wahrlich unsere Aufgabe“, brachen auf und dachten: „Wo werden wir sie finden? Das Madda-Reich ist eine Schatzkammer schöner Frauen; wir wollen in das Madda-Reich reisen.“ So reisten sie nach Sāgala im Madda-Reich. Dort stellten sie das goldene Bildnis an einer Badestelle auf und setzten sich abseits nieder. Da kam Bhaddās Amme, nachdem sie Bhaddā gebadet und geschmückt hatte, selbst zur Badestelle, um zu baden. Als sie das goldene Bildnis erblickte, sprach sie: „Warum steht dieses ungezogene Mädchen hier?“, gab ihr einen Schlag auf den Rücken und erkannte dann, dass es ein goldenes Bildnis war. Sie dachte: „Ich hielt sie für die Tochter meiner Herrschaft, doch selbst in der Art, wie sie ihr Gewand trägt, ist diese mit der Tochter meiner Herrschaft nicht zu vergleichen.“ Da fragten die Brahmanen sie: „Ist die Tochter deines Herrn wirklich von solcher Gestalt?“ Sie antwortete: „Die Tochter meiner Herrschaft ist hundert- und tausendmal schöner als dieses goldene Bildnis; selbst in einer Kammer von zwölf Ellen Weite vertreibt sie, auch ohne Lampe, allein durch den Glanz ihres Körpers die Dunkelheit.“ „Wenn dem so ist, dann wollen wir zu ihren Eltern gehen“, sprachen sie, hoben das goldene Bildnis auf den Wagen, folgten der Amme und blieben vor dem Tor des Hauses des Brahmanen aus der Kosiya-Sippe stehen, um ihre Ankunft zu verkünden. Brāhmaṇo paṭisanthāraṃ katvā ‘‘kuto āgatatthā’’ti pucchi. Te ‘‘magadharaṭṭhe mahātitthagāme kapilabrāhmaṇassa gharato iminā nāma kāraṇena āgatamhā’’ti āhaṃsu. ‘‘Sādhu, tātā, amhehi samajātigottavibhavo so brāhmaṇo, dassāma dārika’’nti paṇṇākāraṃ gaṇhi. Te kapilabrāhmaṇassa sāsanaṃ pahiṇiṃsu – ‘‘laddhā no bhaddā nāma dārikā, kattabbaṃ jānāthā’’ti. Taṃ sāsanaṃ sutvā pippalimāṇavassa ārocayiṃsu ‘‘laddhā dārikā’’ti. Pippalimāṇavo ‘‘ahaṃ ‘na labhissantī’ti cintesiṃ, ime ‘laddhā’ti pesenti, anatthiko hutvā paṇṇaṃ pesessāmī’’ti rahogato paṇṇaṃ likhi ‘‘bhaddā attano jātigottabhogānurūpaṃ patiṃ labhatu, ahaṃ nikkhamitvā pabbajissāmi, mā pacchā vippaṭisārinī ahosī’’ti. Bhaddāpi ‘‘asukassa kira maṃ dātukāmā’’ti sutvā rahogatā paṇṇaṃ likhi – ‘‘ayyaputto attano jātigottabhogānurūpaṃ [Pg.293] dārikaṃ labhatu, ahaṃ pabbajissāmi, mā pacchā vippaṭisārī bhavāhī’’ti. Dvepi paṇṇāni antarāmagge samāgacchiṃsu. ‘‘Idaṃ kassa paṇṇa’’nti? ‘‘Pippalimāṇavena bhaddāya pahita’’nti. ‘‘Idaṃ kassā’’ti? ‘‘Bhaddāya pippalimāṇavassa pahita’’nti ca vutte te dvepi vācetvā ‘‘passatha dārakānaṃ kamma’’nti phāletvā araññe chaḍḍetvā aññaṃ taṃsamānaṃ paṇṇaṃ likhitvā ito etto ca pesesuṃ. Iti kumārassa kumārikāya ca sadisaṃ paṇṇaṃ lokassādarahitamevāti anicchamānānampi tesaṃ dvinnaṃ samāgamo ahosi. Der Brahmane hieß sie freundlich willkommen und fragte: „Woher kommt ihr?“ Sie antworteten: „Aus dem Hause des Brahmanen Kapilabrāhmaṇa im Dorf Mahātittha im Königreich Magadha sind wir aus diesem Grunde hierhergekommen.“ Er sagte: „Gut, ihr Lieben, jener Brahmane ist uns an Geburt, Familie und Wohlstand ebenbürtig; wir werden ihm das Mädchen geben“, und nahm das Hochzeitsgeschenk entgegen. Sie sandten eine Nachricht an den Brahmanen Kapilabrāhmaṇa: „Wir haben das Mädchen namens Bhaddā gewonnen; trefft die nötigen Vorkehrungen.“ Als man diese Nachricht hörte, teilte man sie dem Jüngling Pippali mit: „Das Mädchen ist gewonnen!“ Der Jüngling Pippali dachte: „Ich glaubte, ich würde sie nicht bekommen, doch nun senden diese Leute die Nachricht, sie sei gewonnen. Da ich kein Verlangen danach habe, will ich einen Brief senden.“ Er zog sich an einen einsamen Ort zurück und schrieb einen Brief: „Möge Bhaddā einen Ehemann finden, der ihrer Geburt, ihrer Familie und ihrem Vermögen entspricht. Ich werde hinausgehen und in die Hauslosigkeit ziehen. Mögest du später keine Reue empfinden.“ Auch Bhaddā hörte: „Man will mich wohl dem Soundso geben“, zog sich an einen einsamen Ort zurück und schrieb einen Brief: „Möge der edle Herr eine Gattin finden, die seiner Geburt, seiner Familie und seinem Vermögen entspricht. Ich werde in die Hauslosigkeit ziehen. Mögest du später keine Reue empfinden.“ Beide Briefe trafen auf halbem Weg zusammen. „Wessen Brief ist das?“, wurde gefragt. „Vom Jüngling Pippali an Bhaddā gesandt“, hieß es. „Und wessen ist dieser?“ „Von Bhaddā an den Jüngling Pippali gesandt.“ Als dies so gesagt worden war, lasen die Boten beide Briefe, dachten sich: „Seht nur das Tun dieser beiden Jugendlichen!“, zerrissen sie, warfen sie im Wald weg, schrieben andere, den Umständen entsprechende Briefe und sandten sie hin und her. Da sich die Briefe des Jünglings und des Mädchens glichen, blieb ihr Widerwillen der Welt verborgen, und so geschah die Vereinigung der beiden, obwohl sie es nicht wünschten. Taṃdivasameva pippalimāṇavopi bhaddaṃ ekaṃ pupphadāmaṃ gaṇhāpesi. Bhaddāpi tāni sayanamajjhe ṭhapesi. Ubhopi bhuttasāyamāsā sayanaṃ āruhituṃ ārabhiṃsu. Tesu māṇavo dakkhiṇapassena sayanaṃ āruhi, bhaddā vāmapassena abhiruhitvā āha – ‘‘yassa passe pupphāni milāyanti, tassa rāgacittaṃ uppannanti vijānissāma, imaṃ pupphadāmaṃ na allīyitabba’’nti. Te pana aññamaññaṃ sarīrasamphassabhayena sakalarattiṃ niddaṃ anokkamantāva vītināmesuṃ. Divā pana hasitamattampi nākaṃsu. Te lokāmisena asaṃsaṭṭhā yāva mātāpitaro dharanti, tāva kuṭumbaṃ avicāretvā tesu kālaṅkatesu vicārayiṃsu. Mahatī māṇavassa sampatti. Ekadivasaṃ sarīraṃ ubbaṭṭetvā chaḍḍetabbaṃ suvaṇṇacuṇṇaṃ eva magadhanāḷiyā dvādasanāḷimattaṃ laddhuṃ vaṭṭati. Yantabaddhāni saṭṭhi mahātaḷākāni, kammanto dvādasayojaniko, anurādhapurappamāṇā cuddasagāmā, cuddasa hatthānīkāni, cuddasa assānīkāni, cuddasa rathānīkāni. Am selben Tag noch ließ auch der Jüngling Pippali eine Blumengirlande bringen. Auch Bhaddā legte diese in die Mitte des Bettes. Nachdem sie zu Abend gegessen hatten, schickten sich beide an, das Bett zu besteigen. Unter ihnen stieg der Jüngling von der rechten Seite auf das Bett, Bhaddā stieg von der linken Seite hinauf und sagte: „Auf wessen Seite die Blumen verwelken, dessen Geist ist von Leidenschaft ergriffen – so wollen wir es erkennen. Diese Blumengirlande darf nicht berührt werden.“ Aus Furcht vor gegenseitiger körperlicher Berührung verbrachten sie jedoch die ganze Nacht, ohne in Schlaf zu verfallen. Am Tage aber lachten sie nicht einmal miteinander. Unberührt von weltlichen Sinnesfreuden kümmerten sie sich, solange die Eltern lebten, nicht um das Familienvermögen; erst als diese gestorben waren, nahmen sie es in Augenschein. Groß war der Reichtum des Jünglings: Allein das Goldpulver, das man nach dem Abreiben des Körpers an einem einzigen Tag abstreifen und wegwerfen konnte, betrug etwa zwölf Maß nach dem Maße von Magadha. Es gab sechzig große, künstlich angelegte Teiche, sein Arbeitsbetrieb erstreckte sich über zwölf Meilen, und er besaß vierzehn Dörfer von der Größe Anurādhapuras, vierzehn Truppen von Kriegselefanten, vierzehn Truppen von Pferden und vierzehn Truppen von Streitwagen. So ekadivasaṃ alaṅkataassaṃ āruyha mahājanaparivuto kammantaṭṭhānaṃ gantvā khettakoṭiyaṃ ṭhito naṅgalehi chinnaṭṭhānato kākādayo sakuṇe gaṇḍuppādādike pāṇake uddharitvā khādante disvā ‘‘tātā, ime kiṃ khādantī’’ti pucchi. ‘‘Gaṇḍuppāde, ayyā’’ti. ‘‘Etehi katapāpaṃ kassa hotī’’ti? ‘‘Tumhākaṃ, ayyā’’ti. So cintesi – ‘‘sace etehi katapāpaṃ mayhaṃ hoti, kiṃ me karissati sattaasītikoṭidhanaṃ, dvādasayojanakammanto kiṃ karissati, kiṃ yantabaddhāni taḷākāni, kiṃ cuddasa gāmāni, sabbametaṃ bhaddāya kāpilāniyā niyyātetvā nikkhamma pabbajissāmī’’ti. Eines Tages bestieg er ein festlich geschmücktes Pferd, ritt in Begleitung einer großen Menschenmenge zu den Feldern seines Arbeitsbetriebes und hielt am Rand eines Feldes an. Als er sah, wie Vögel, darunter Krähen, aus der von den Pflügen aufgeworfenen Erde Regenwürmer und andere Kleintiere herausholten und fraßen, fragte er: „Ihr Lieben, was fressen diese da?“ „Regenwürmer, Herr“, antworteten sie. „Auf wen fällt das Übel, das durch sie begangen wird?“ „Auf Euch, Herr“, sagten sie. Da dachte er: „Wenn das von ihnen begangene Übel auf mich fällt, was nützt mir dann das Vermögen von achthundertsiebzig Millionen? Was nützt ein zwölf Meilen weiter Arbeitsbetrieb, was nützen die künstlichen Teiche, was die vierzehn Dörfer? Ich werde all dies Bhaddā Kāpilānī übergeben, das Haus verlassen und in die Hauslosigkeit ziehen.“ Bhaddā [Pg.294] kāpilānī tasmiṃ khaṇe antaravatthusmiṃ tayo tilakumbhe pattharitvā dhātīhi parivutā nisinnā kāke tilapāṇake khādamāne disvā ‘‘ammā, kiṃ ime khādantī’’ti pucchi. ‘‘Pāṇake, ayye’’ti. ‘‘Akusalaṃ kassa hotī’’ti? ‘‘Tumhākaṃ, ayye’’ti. Sā cintesi – ‘‘mayhaṃ catuhatthaṃ vatthaṃ nāḷikodanamattañca laddhuṃ vaṭṭati, yadi panetaṃ etehi kataṃ akusalaṃ mayhaṃ hoti, bhavasahassenapi vaṭṭato sīsaṃ ukkhipituṃ na sakkā, ayyaputte āgatamatteyeva sabbaṃ tassa niyyātetvā nikkhamma pabbajissāmī’’ti. Zu jener Zeit saß Bhaddā Kāpilānī im Innenhof, wo sie drei Töpfe Sesam ausgebreitet hatte, umgeben von ihren Ammen. Als sie sah, wie Krähen die Sesamschädlinge fraßen, fragte sie: „Mutter, was fressen diese da?“ „Insekten, Herrin“, antworteten sie. „Auf wen fällt das Heillose?“ „Auf Euch, Herrin“, sagten sie. Da dachte sie: „Mir genügt ein vier Ellen langes Gewand und ein Maß gekochter Reis. Wenn jedoch dieses von ihnen begangene Heillose auf mich fällt, werde ich selbst in tausend Existenzen meinen Kopf nicht aus dem Kreislauf der Wiedergeburten erheben können. Sobald der edle Herr heimkehrt, werde ich ihm alles übergeben, das Haus verlassen und in die Hauslosigkeit ziehen.“ Māṇavo āgantvā nhatvā pāsādaṃ āruyha mahārahe pallaṅke nisīdi, athassa cakkavattino anucchavikabhojanaṃ upanayiṃsu. Dvepi bhuñjitvā parijane nikkhante rahogatā phāsukaṭṭhāne nisīdiṃsu. Tato māṇavo bhaddaṃ āha – ‘‘bhadde, imaṃ gharaṃ āgacchantī kittakaṃ dhanamāharasī’’ti? ‘‘Pañcapaṇṇāsa sakaṭasahassāni, ayyā’’ti. ‘‘Sabbaṃ taṃ, yā ca imasmiṃ ghare sattāsīti koṭiyo yantabaddhāni saṭṭhi taḷākānīti evamādibhedā sampatti atthi, taṃ sabbaṃ tuyheva niyyātemī’’ti. ‘‘Tumhe pana kuhiṃ gacchatha, ayyā’’ti? ‘‘Ahaṃ pabbajissāmī’’ti. ‘‘Ayya, ahampi tumhākaṃ āgamanaṃ olokayamānā nisinnā, ahampi pabbajissāmī’’ti. Tesaṃ ādittapaṇṇakuṭi viya tayo bhavā upaṭṭhahanti. Te ‘‘pabbajissāmā’’ti vatvā antarāpaṇato kāsāyarasapītāni cīvarāni mattikāpatte ca āharāpetvā aññamaññaṃ kese ohāretvā ‘‘ye loke arahanto atthi, te uddissa amhākaṃ pabbajjā’’ti pabbajitvā thavikāsu patte pakkhipitvā aṃse laggetvā pāsādato otariṃsu. Gehe dāsesu ca kammakāresu ca na koci sañjāni. Als der Jüngling heimkehrte, badete er, stieg zum Palast hinauf und setzte sich auf ein kostbares Prachtbett; da brachte man ihm Speisen, die eines Weltenherrschers würdig waren. Nachdem beide gegessen hatten und die Dienerschaft hinausgegangen war, setzten sie sich an einen ungestörten, angenehmen Ort. Da sprach der Jüngling zu Bhaddā: „Liebe Bhaddā, als du in dieses Haus kamst, wie viel Vermögen hast du mitgebracht?“ „Fünfundfünfzigtausend Wagenladungen, Herr“, antwortete sie. „All dies, und auch den Reichtum, der sich in diesem Haus befindet – nämlich die achthundertsiebzig Millionen, die sechzig künstlichen Teiche und all die anderen Besitztümer –, all das übergebe ich dir.“ „Wohin aber geht Ihr, Herr?“, fragte sie. „Ich werde in die Hauslosigkeit ziehen“, sprach er. „Herr, auch ich saß hier und wartete nur auf Eure Ankunft; auch ich werde in die Hauslosigkeit ziehen.“ Ihnen erschienen die drei Daseinsbereiche wie eine lichterloh brennende Blätterhütte. Sie sagten: „Wir wollen in die Hauslosigkeit ziehen“, ließen sich vom Markt ockerfarbene Gewänder und Tonschalen bringen, schoren einander das Haar und sprachen: „Wer immer in der Welt Heilige sind – ihnen geweiht sei unsere Hausloswerdung!“ So zogen sie in die Hauslosigkeit, legten die Schalen in Tragetaschen, hängten sie sich über die Schultern und stiegen vom Palast herab. Weder die Sklaven noch die Arbeiter im Haus bemerkten es. Atha ne brāhmaṇagāmato nikkhamitvā dāsagāmadvārena gacchante ākappakutavasena dāsagāmavāsino sañjāniṃsu. Te rodantā pādesu patitvā ‘‘kiṃ amhe anāthe karotha, ayyā’’ti āhaṃsu. ‘‘Mayaṃ, bhaṇe, ‘tayo bhavā ādittapaṇṇasālā viyā’ti pabbajimha, sace tumhesu ekekaṃ bhujissaṃ karoma, vassasatampi nappahoti. Tumheva tumhākaṃ sīsaṃ dhovitvā bhujissā hutvā jīvathā’’ti vatvā tesaṃ rodantānaṃyeva pakkamiṃsu. Als die beiden nun aus dem Brahmanendorf aufbrachen und am Tor des Sklavendorfes vorbeigingen, erkannten die Bewohner des Sklavendorfes sie an ihrer Haltung und Erscheinung. Weinend fielen sie ihnen zu Füßen und sagten: „Warum lasst ihr uns schutzlos zurück, Herrschaften?“ Sie antworteten: „Ihr Lieben, wir sind in die Hauslosigkeit hinausgezogen, weil uns die drei Daseinsbereiche wie eine brennende Blätterhütte erscheinen. Wenn wir jeden einzelnen von euch freikaufen wollten, würde selbst ein Jahrhundert nicht ausreichen. Wascht selbst eure Häupter, werdet freie Menschen und lebt so!“ Nach diesen Worten gingen sie fort, während jene noch weinten. Thero [Pg.295] purato gacchanto nivattitvā olokento cintesi – ‘‘ayaṃ bhaddā kāpilānī sakalajambudīpagghanikā itthī mayhaṃ pacchato āgacchati, ṭhānaṃ kho panetaṃ vijjati, yaṃ kocideva evaṃ cinteyya ‘ime pabbajitāpi vinā bhavituṃ na sakkonti, ananucchavikaṃ karontī’ti. Evaṃ koci pāpakena manasā padūsetvā apāyapūrako bhaveyya, imaṃ pahāya mayā gantuṃ vaṭṭatī’’ti cittaṃ uppādetvā purato gacchanto dvedhāpathaṃ disvā tassa matthake aṭṭhāsi. Bhaddāpi āgantvā vanditvā aṭṭhāsi. Atha naṃ āha – ‘‘bhadde, tādisiṃ itthiṃ mama pacchato āgacchantiṃ disvā ‘ime pabbajitāpi vinā bhavituṃ na sakkontī’ti amhesu paduṭṭhacitto mahājano apāyapūrako bhaveyya. Imasmiṃ dvedhāpathe tvaṃ etaṃ gaṇha, ahaṃ ekena gamissāmī’’ti. ‘‘Āma, ayya, mātugāmo ‘pabbajitānaṃ palibodho, pabbajitāpi vinā na bhavantī’ti amhākaṃ dosaṃ dasseyyu’’nti tikkhattuṃ padakkhiṇaṃ katvā catūsu ṭhānesu pañcapatiṭṭhitena vanditvā dasanakhasamodhānasamujjalaṃ añjaliṃ paggayha ‘‘satasahassakappapamāṇe addhāne kato mittasanthavo ajja bhijjati, tumheva dakkhiṇā nāma, tumhākaṃ dakkhiṇamaggo vaṭṭati, mayaṃ mātugāmā nāma vāmajātikā, amhākaṃ vāmamaggo vaṭṭatī’’ti vanditvā maggaṃ paṭipajji. Tesaṃ dvedhābhūtakāle ayaṃ mahāpathavī ‘‘ahaṃ cakkavāḷasinerupabbatādayo dhāretuṃ sakkontīpi tumhākaṃ guṇe dhāretuṃ na sakkomī’’ti vadantī viya viravamānā akampittha. Ākāse asanisaddo viya pavatti, cakkavāḷapabbato unnādi. Der ehrwürdige Thera ging voraus, wandte sich um, blickte zurück und dachte: „Diese Bhaddā Kāpilānī, eine Frau von unschätzbarem Wert im gesamten Jambudīpa, folgt mir nach. Es besteht jedoch die Gefahr, dass irgendjemand denken könnte: ‚Obwohl sie in die Hauslosigkeit hinausgezogen sind, können sie nicht getrennt voneinander leben; sie tun, was ungebührlich ist.‘ Wenn jemand so sein Herz mit bösen Gedanken befleckt, könnte er in den Leidenswelten wiedergeboren werden und diese füllen. Es ist besser, wenn ich sie verlasse und allein weitergehe.“ Mit diesem Gedanken ging er weiter, sah eine Weggabelung und blieb an deren Kreuzungspunkt stehen. Auch Bhaddā kam herbei, erwies ihm Reverenz und blieb stehen. Da sprach er zu ihr: „Werteste Bhaddā, wenn die Menschen eine solche Frau hinter mir hergehen sehen, könnten sie denken: ‚Obwohl sie die Hauslosigkeit gewählt haben, können sie nicht ohne einander leben‘, und indem sie ihre Herzen uns gegenüber mit Missgunst beflecken, würden sie die Leidenswelten füllen. Nimm du an dieser Weggabelung jenen Weg, ich werde diesen hier nehmen.“ Sie antwortete: „Gewiss, Herr, Frauen sind ein Hindernis für die in die Hauslosigkeit Hinausgezogenen. Sie würden uns tadeln und sagen: ‚Selbst nachdem sie dem weltlichen Leben entsagt haben, können sie nicht ohneeinander sein.‘“ Sie umwandelte ihn dreimal im Uhrzeigersinn, verneigte sich an vier Stellen mit den fünf Berührungspunkten, erhob die zum Gruß gefalteten Hände, die durch das Zusammenführen der zehn Fingernägel erstrahlten, und sprach: „Die Gefährtenschaft, die wir über einen Zeitraum von einhunderttausend Äonen gepflegt haben, bricht am heutigen Tage. Ihr seid der Rechte, und so gebührt euch der rechte Weg. Wir Frauen sind von linker Natur, uns gebührt der linke Weg.“ Nach diesen Worten der Ehrerbietung schlug sie ihren Weg ein. Als sich ihre Wege trennten, erbebte diese große Erde und dröhnte gleichsam, als wollte sie sagen: „Obwohl ich imstande bin, die Weltgebirge, den Berg Sineru und andere Berge zu tragen, vermag ich das Gewicht eurer Tugenden nicht zu tragen!“ Am Himmel ertönte es wie ein Donnerschlag, und das Weltgebirge hallte wider. Sammāsambuddhopi veḷuvanamahāvihāre kuṭiyaṃ nisinno pathavīkampanasaddaṃ sutvā ‘‘kissa nu kho pathavī kampatī’’ti āvajjento ‘‘pippalimāṇavo ca bhaddā ca kāpilānī maṃ uddissa appameyyaṃ sampattiṃ pahāya pabbajitā, tesaṃ viyogaṭṭhāne ubhinnaṃ guṇabalena ayaṃ pathavīkampo jāto, mayāpi etesaṃ saṅgahaṃ kātuṃ vaṭṭatī’’ti gandhakuṭito nikkhamma sayameva pattacīvaramādāya asītimahātheresu kañci anāpucchā tigāvutamaggaṃ paccuggamanaṃ katvā rājagahassa ca nālandāya ca antare bahuputtanigrodhamūle pallaṅkaṃ ābhujitvā nisīdi. Nisinno pana aññatarapaṃsukūliko viya anisīditvā buddhavesaṃ gahetvā asītihatthā buddharaṃsiyo vissajjento nisīdi. Iti tasmiṃ khaṇe paṇṇacchattasakaṭacakkakūṭāgārādippamāṇā buddharaṃsiyo ito [Pg.296] cito ca vippharantiyo vidhāvantiyo candasahassasūriyasahassauggamanakālaṃ viya kurumānā taṃ vanantaraṃ ekobhāsaṃ akaṃsu. Dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇasiriyā samujjalatārāgaṇena viya gaganaṃ, supupphitakamalakuvalayena viya salilaṃ vanantaraṃ virocittha. Nigrodharukkhassa khandho pakatiyā seto hoti, pattāni nīlāni pakkāni rattāni. Tasmiṃ pana divase sabbo nigrodho suvaṇṇavaṇṇova ahosi. Auch der vollkommen Erwachte, der in einer Zelle im großen Veḷuvana-Kloster saß, hörte das Beben der Erde. Er dachte nach: „Warum bebt wohl die Erde?“, und erkannte: „Der junge Pippali und Bhaddā Kāpilānī haben meinetwegen unermesslichen Reichtum aufgegeben und sind in die Hauslosigkeit hinausgezogen. An dem Ort ihrer Trennung ist durch die Macht der Tugend dieser beiden dieses Erdbeben entstanden. Es geziemt sich auch für mich, ihnen Beistand zu leisten.“ Er verließ die Duftkammer, nahm ganz allein seine Almosenschale und seine Roben und ging, ohne einen der achtzig großen Theras zu fragen, drei Gāvutas weit ihnen entgegen. Zwischen Rājagaha und Nālandā, am Fuße des Bahuputta-Banyanbaums, ließ er sich mit gekreuzten Beinen nieder. Er setzte sich jedoch nicht wie ein gewöhnlicher Lumpensammler-Mönch hin, sondern nahm seine volle Buddha-Gestalt an und verweilte dort, während er achtzig Ellen weite Buddha-Lichtstrahlen aussandte. In diesem Augenblick breiteten sich die Buddha-Strahlen, die so groß wie Blätterschirme, Wagenräder und Turmspitzen waren, nach allen Seiten aus, huschten hin und her und ließen das Waldgebiet in einem einzigen Glanz erstrahlen, so als gingen tausend Monde und tausend Sonnen gleichzeitig auf. Durch die Pracht der zweiunddreißig Merkmale eines Großen Mannes glänzte das Waldinnere wie ein von Sternen übersäter Himmel oder wie ein Gewässer, das mit herrlich erblühten Lotusblumen und blauen Wasserlilien bedeckt ist. Der Stamm des Banyanbaums ist normalerweise weiß, seine Blätter sind dunkelgrün und die reifen Früchte rot. An jenem Tag jedoch wurde der gesamte Banyanbaum vollkommen goldfarben. Mahākassapatthero taṃ disvā ‘‘ayaṃ amhākaṃ satthā bhavissati, imaṃ ahaṃ uddissa pabbajito’’ti diṭṭhaṭṭhānato paṭṭhāya onato gantvā tīsu ṭhānesu vanditvā ‘‘satthā me, bhante, bhagavā, sāvakohamasmi, satthā me, bhante, bhagavā, sāvakohamasmī’’ti (saṃ. ni. 2.154) āha. Atha naṃ bhagavā āha – ‘‘kassapa, sace tvaṃ imaṃ nipaccakāraṃ mahāpathaviyā kareyyāsi, sāpi dhāretuṃ na sakkuṇeyya. Tathāgatassa pana evaṃ guṇamahantataṃ jānatā tayā kato nipaccakāro mayhaṃ lomampi cāletuṃ na sakkoti. Nisīda, kassapa, dāyajjaṃ te dassāmī’’ti. Athassa bhagavā tīhi ovādehi upasampadaṃ adāsi. Datvā ca bahuputtanigrodhamūlato nikkhamitvā theraṃ pacchāsamaṇaṃ katvā maggaṃ paṭipajji. Satthu sarīraṃ dvattiṃsamahāpurisalakkhaṇavicittaṃ, mahākassapassa sattamahāpurisalakkhaṇapaṭimaṇḍitaṃ, so kañcananāvāya pacchābaddho viya satthu padānupadikaṃ anugañchi. Satthā thokaṃ maggaṃ gantvā maggā okkamma aññatarasmiṃ rukkhamūle nisajjākāraṃ dassesi. Thero ‘‘satthā nisīditukāmo’’ti ñatvā attano paṭapilotikaṃ saṅghāṭiṃ catugguṇaṃ katvā paññapesi. Als der ehrwürdige Thera Mahākassapa ihn sah, dachte er: „Dieser muss mein Lehrer sein. Ihm zuliebe bin ich in die Hauslosigkeit hinausgezogen.“ Von der Stelle an, an der er ihn erblickte, ging er in gebeugter Haltung vorwärts, verneigte sich an drei Stellen und sprach: „Mein Lehrer, o Herr, ist der Erhabene, ich bin der Schüler. Mein Lehrer, o Herr, ist der Erhabene, ich bin der Schüler.“ Da sprach der Erhabene zu ihm: „Kassapa, wenn du der großen Erde eine solche tiefe Ehrerbietung erweisen würdest, könnte selbst sie diese nicht ertragen. Doch die Ehrerbietung, die du erweist, da du die Größe der Tugenden des Tathāgata kennst, vermag nicht einmal ein einziges meiner Körperhaare zu bewegen. Setze dich, Kassapa, ich werde dir dein Erbe geben.“ Daraufhin erteilte ihm der Erhabene die höhere Ordination durch drei Ermahnungen. Nachdem er sie ihm verliehen hatte, verließ er den Fuß des Bahuputta-Banyanbaums und machte den Thera zu seinem Begleitmönch, um den Weg fortzusetzen. Der Körper des Lehrers war mit den zweiunddreißig Merkmalen eines Großen Mannes geschmückt, während jener von Mahākassapa mit sieben Merkmalen eines Großen Mannes geziert war; so folgte er dem Lehrer Schritt für Schritt, wie ein goldenes Boot, das am Heck eines anderen vertäut ist. Nachdem der Lehrer ein kurzes Stück des Weges zurückgelegt hatte, verließ er die Straße und deutete am Fuße eines bestimmten Baumes an, dass er sich niedersetzen wolle. Da der Thera erkannte: „Der Lehrer wünscht sich hinzusetzen“, faltete er seine aus Flicken bestehende Doppelrobe vierfach zusammen und breitete sie für ihn aus. Satthā tattha nisīditvā hatthena cīvaraṃ parimajjanto ‘‘mudukā kho tyāyaṃ, kassapa, paṭapilotikā saṅghāṭī’’ti āha (saṃ. ni. 2.154). So ‘‘satthā me saṅghāṭiyā mudubhāvaṃ kathesi, pārupitukāmo bhavissatī’’ti ñatvā ‘‘pārupatu, bhante, bhagavā saṅghāṭi’’nti āha. ‘‘Kiṃ tvaṃ pārupissasi, kassapā’’ti? ‘‘Tumhākaṃ nivāsanaṃ labhanto pārupissāmi, bhante’’ti. ‘‘Kiṃ pana tvaṃ, kassapa, imaṃ paribhogajiṇṇaṃ paṃsukūlaṃ dhāretuṃ sakkhissasi, mayā hi imassa paṃsukūlassa gahitadivase udakapariyantaṃ katvā mahāpathavī kampi, imaṃ buddhaparibhogajiṇṇacīvaraṃ [Pg.297] nāma na sakkā parittaguṇena dhāretuṃ, paṭibalenevidaṃ paṭipattipūraṇasamatthena jātipaṃsukūlikena dhāretuṃ vaṭṭatī’’ti vatvā therena saddhiṃ cīvaraṃ parivattesi. Der Meister setzte sich dort nieder, strich mit der Hand über das Gewand und sagte: „Weich ist wahrlich dieses dein aus Lumpen zusammengenähte Obergewand, Kassapa.“ (Saṃ. Ni. 2.154). Jener, erkennend: „Der Meister sprach von der Weichheit meines Obergewands; er möchte es wohl anlegen“, sagte: „Möge der Erhabene, o Herr, dieses Obergewand anlegen.“ – „Was wirst du dann anlegen, Kassapa?“ – „Wenn ich das Untergewand des Erhabenen erhalte, werde ich es anlegen, o Herr.“ – „Wirst du denn, Kassapa, dieses durch Gebrauch abgenutzte Schmutzlumpen-Gewand tragen können? Denn an dem Tag, an dem dieses Schmutzlumpen-Gewand von mir aufgehoben wurde, erbebte die große Erde bis an die Grenzen des Wassers. Dieses vom Buddha abgenutzte Gewand kann wahrlich nicht von jemandem mit geringen Tugenden getragen werden. Es geziemt sich nur für einen fähigen, zur Vollendung der Praxis bereiten, geborenen Schmutzlumpen-Träger, dies zu tragen.“ Nachdem er dies gesagt hatte, tauschte er das Gewand mit dem Thera. Evaṃ cīvaraṃ parivattetvā therassa cīvaraṃ bhagavā pārupi, satthu cīvaraṃ thero. Tasmiṃ khaṇe acetanāpi ayaṃ mahāpathavī ‘‘dukkaraṃ, bhante, akattha, attano pārutacīvaraṃ sāvakena parivattitapubbaṃ nāma nāhosi, ahaṃ tumhākaṃ guṇaṃ dhāretuṃ na sakkomī’’ti vadantī viya udakapariyantaṃ katvā kampi. Theropi ‘‘laddhaṃ me buddhānaṃ paribhogacīvaraṃ, kiṃ me idāni uttari kattabba’’nti unnatiṃ akatvā satthu santikeyeva terasa dhutaguṇe samādāya sattadivasamattaṃ puthujjano ahosi. Aṭṭhame divase saha paṭisambhidāhi arahattaṃ pāpuṇi. Atha naṃ satthā ‘‘kassapo, bhikkhave, candūpamo kulāni upasaṅkamati, apakasseva kāyaṃ apakassa cittaṃ niccanavako kulesu appagabbho’’ti (saṃ. ni. 2.146) evamādinā pasaṃsitvā aparabhāge ariyagaṇamajjhe nisinno ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ dhutavādānaṃ yadidaṃ mahākassapo’’ti (a. ni. 1.188, 191) dhutavādānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapesi. Nachdem sie so die Gewänder getauscht hatten, legte der Erhabene das Gewand des Thera an und der Thera das Gewand des Meisters. In jenem Augenblick bebte diese selbst empfindungslose große Erde bis an die Grenzen der Gewässer, gleichsam als würde sie sagen: „Ihr habt etwas schwer zu Vollbringendes getan, o Herr! Noch nie zuvor wurde das eigene getragene Gewand eines Meisters mit einem Schüler getauscht. Ich bin nicht imstande, die Last eurer Tugend zu tragen.“ Auch der Thera wurde nicht hochmütig, sondern dachte: „Ich habe das vom Buddha genutzte Gewand erhalten, was bleibt mir nun noch Höheres zu tun?“, nahm in der Gegenwart des Meisters die dreizehn asketischen Übungen (dhutaguṇa) auf und blieb sieben Tage lang ein Weltling (puthujjana). Am achten Tag erreichte er die Arahatschaft zusammen mit den analytischen Erkenntnissen (paṭisambhidā). Daraufhin lobte ihn der Meister mit den Worten: „Mönche, Kassapa nähert sich den Familien wie der Mond; er hält seinen Körper zurück, hält seinen Geist zurück, verhält sich stets wie ein Neuling und ist unter den Familien nicht aufdringlich.“ Später setzte er ihn, inmitten der Schar der Edlen sitzend, an die höchste Stelle der Verkünder der asketischen Übungen (dhutavāda): „Unter meinen Jüngern, Mönche, die die asketischen Übungen verkünden, ist Mahākassapa der Vorzüglichste.“ 398. Evaṃ bhagavatā etadaggaṭṭhāne ṭhapito āyasmā mahākassapo mahāsāvakabhāvaṃ patto attano pubbakammaṃ saritvā somanassavasenaṃ pubbacaritāpadānaṃ pakāsento padumuttarassa bhagavatotiādimāha. Tattha padumuttarassāti tassa kira bhagavato mātukucchito nikkhamanakālato paṭṭhāya pādānaṃ nikkhepanasamaye akkantakkantapāde satasahassapattā padumā pathaviṃ bhinditvā uṭṭhahiṃsu. Tasmāssa taṃ nāmaṃ ahosi. Sakalasattanikāyesu ekekena satasatapuññe kate tassa puññassa sataguṇapuññānaṃ katattā bhagavatoti attho. Lokajeṭṭhassa tādinoti sattalokassa padhānabhūtassa iṭṭhāniṭṭhesu akampiyabhāvaṃ pattattā tādino. Nibbute lokanāthamhīti sattalokassa paṭisaraṇabhūte bhagavati khandhaparinibbānena parinibbute, adassanaṃ gateti attho. Pūjaṃ kubbanti santhunoti sadevakassa lokassa sāsanato ‘‘satthā’’ti laddhanāmassa bhagavato sādhukīḷaṃ kīḷantā pūjaṃ karontīti sambandho. 398. Als der ehrwürdige Mahākassapa so vom Erhabenen an diese höchste Stelle gesetzt worden war und die Stufe eines großen Jüngers (mahāsāvaka) erreicht hatte, erinnerte er sich an seine früheren Taten und sprach voller Freude, um sein früheres Wirken (apadāna) darzulegen, die Worte: „Des Erhabenen Padumuttara...“ und so weiter. Darin bedeutet „des Padumuttara“: Es heißt, dass von dem Zeitpunkt an, als jener Erhabene den Mutterleib verließ, bei jedem Schritt, den er tat, hunderttausendblättrige Lotosblüten die Erde durchbrachen und emporstiegen, sobald er seine Füße aufsetzte. Daher erhielt er diesen Namen. „Des Erhabenen (bhagavato)“ bedeutet: Während unter allen Scharen von Lebewesen jeder Einzelne jeweils einhundert Verdienste erwarb, hat der Erhabene das Hundertfache dieser Verdienste vollbracht. „Des Weltersten, des Beständigen (tādino)“ bedeutet: desjenigen, der das Oberhaupt der Welt der Lebewesen ist und Unerschütterlichkeit gegenüber dem Erwünschten und Unerwünschten erlangt hat. „Als der Weltenhort erloschen war“ bedeutet: Als der Erhabene, der die Zuflucht der Welt der Lebewesen war, durch das Erlöschen der Daseinsgruppen (khandhaparinibbānena) ins Parinibbāna eingegangen und somit unsichtbar geworden war. „Sie verehren den Meister (satthuno)“ verknüpft sich so, dass sie dem Erhabenen, der in der Welt samt den Göttern gemäß der Lehre den Namen „Meister“ (satthā) trägt, festliche Huldigung darbringen und ihn verehren. 399. Aggiṃ [Pg.298] cinantī janatāti janasamūhā āḷāhanatthāya aggiṃ cinantā rāsiṃ karontā āsamantato moditā santuṭṭhā pakārena moditā santuṭṭhā pūjaṃ karontīti sambandho. Tesu saṃvegajātesūti tesu janasamūhesu saṃvegappattesu utrāsaṃ labhantesu me mayhaṃ pīti hāso udapajjatha pātubhavīti attho. 399. „Die Leute schichten ein Feuer auf“ bedeutet: Die Menschenmenge schichtete für die Feuerbestattung Holz auf, häufte es an, war ringsum erfreut und zufrieden, und erwies in vielfältiger Weise erfreut und zufrieden Verehrung – so ist der syntaktische Zusammenhang. „Als bei ihnen heilsame Erschütterung (saṃvega) und Schauder entstand“ bedeutet: Als jene Menschenmengen von heilsamer Erschütterung ergriffen wurden und Bestürzung empfanden, entstand in mir Freude und Heiterkeit, sie traten in mir hervor. 400. Ñātimitte samānetvāti mama bandhusahāye samānetvā rāsiṃ katvā. Mahāvīro bhagavā parinibbuto adassanaṃ agamāsīti idaṃ vacanaṃ abraviṃ kathesinti sambandho. Handa pūjaṃ karomaseti handāti vossaggatthe nipāto, tena kāraṇena mayaṃ sabbe samāgatā pūjaṃ karomāti attho. Seti nipāto. 400. „Nachdem ich Verwandte und Freunde versammelt hatte“ bedeutet: nachdem ich meine Angehörigen und Gefährten zusammengebracht und in einer Gruppe versammelt hatte. „Der große Held, der Erhabene, ist völlig erloschen und unsichtbar geworden“ – der syntaktische Zusammenhang ist, dass ich diese Worte sprach und verkündete. Bei „Wohlan, lasst uns Verehrung darbringen“ ist „handa“ eine Partikel im Sinne von Aufforderung; die Bedeutung ist demnach: „Aus diesem Grund wollen wir uns alle versammeln und Verehrung darbringen.“ Das Wort „se“ ist eine bloße Partikel. 401. Sādhūti te paṭissutvāti te mama ñātimittā sādhu iti sundaraṃ bhaddakaṃ iti paṭisuṇitvā mama vacanaṃ sampaṭichitvā me mayhaṃ bhiyyo atirekaṃ hāsaṃ pītiṃ janiṃsu uppādesunti attho. 401. „Zustimmend sprachen sie: ‚Gut!‘“ bedeutet: Jene meine Verwandten und Freunde stimmten mit den Worten „Gut!“, „Vortrefflich!“, „Heilsam!“ zu, nahmen meine Worte bereitwillig an und riefen in mir noch größere, überaus reiche Freude und Entzücken hervor. 402. Tato attano katapuññasañcayaṃ dassento buddhasmiṃ lokanāthamhītiādimāha. Satahatthaṃ uggataṃ ubbiddhaṃ diyaḍḍhahatthasataṃ vitthataṃ, vimānaṃ nabhasi ākāse uggataṃ agghiyaṃ, sukataṃ sundarākārena kataṃ, katvā kāretvā ca puññasañcayaṃ puññarāsiṃ kāhāsiṃ akāsinti sambandho. 402. Daraufhin sprach er, um die von ihm vollbrachte Anhäufung von Verdiensten aufzuzeigen, die Worte: „Für den Buddha, den Weltenhort...“ und so weiter. Ein Prachtbau (vimāna), einhundert Ellen hoch emporragend, einhundertfünfzig Ellen breit, der sich in den Himmel erhob, mit einer kunstvoll verzierten Spitze (agghiya), die in schöner Weise gefertigt war; der syntaktische Zusammenhang ist: Nachdem ich diesen errichten ließ, häufte ich eine Fülle an Verdiensten an. 403. Katvāna agghiyaṃ tatthāti tasmiṃ cetiyapūjanaṭṭhāne tālapantīhi tālapāḷīhi cittitaṃ sobhitaṃ agghiyaṃ katvāna kāretvā ca sakaṃ cittaṃ attano cittaṃ pasādetvā cetiyaṃ pūjayuttamanti uttamaṃ buddhadhātunidhāpitaṃ cetiyaṃ pūjayinti sambandho. 403. „Nachdem ich dort eine verzierte Spitze errichtet hatte“ bedeutet: An jenem Ort der Schreinverehrung ließ ich eine mit Reihen von Palmblattmustern bunt verzierte, glänzende Spitze (agghiya) errichten, machte mein eigenes Herz gläubig gestimmt und verehrte den erhabensten Schrein (cetiya), in dem die Reliquien des Buddha hinterlegt waren – so ist der syntaktische Zusammenhang. 404. Tassa cetiyassa mahimaṃ dassento aggikkhandhovātiādimāha. Tattha aggikkhandhovāti ākāse jalamāno aggikkhandhova aggirāsi iva taṃ cetiyaṃ sattahi ratanehi jalati phullito vikasitapuppho sālarukkharājā iva ākāse indalaṭṭhīva indadhanu iva ca catuddisā catūsu disāsu obhāsati vijjotatīti sambandho. 404. Um die Herrlichkeit jenes Schreins aufzuzeigen, sprach er die Worte: „Wie eine Feuersäule...“ und so weiter. Darin bedeutet „wie eine Feuersäule (aggikkhandha)“: Gleich einer am Himmel lodernden Feuersäule, wie eine gewaltige Feuersbrunst, erstrahlte jener Schrein durch die sieben Juwelen. Wie ein königlicher Salbaum in voller Blüte oder wie ein Regenbogen am Himmel erleuchtet und erstrahlt er in allen vier Himmelsrichtungen – so ist der syntaktische Zusammenhang. 405. Tattha [Pg.299] cittaṃ pasādetvāti tasmiṃ jotamānadhātugabbhamhi cittaṃ manaṃ pasādetvā somanassaṃ katvā tena cittappasādena bahuṃ anekappakāraṃ kusalaṃ puññaṃ katvāna ‘‘dhātugabbhe ca sāsane ca ettakāni puññāni mayā katānī’’ti evaṃ puññakammaṃ saritvāna kālaṃkatvā tidasaṃ tāvatiṃsabhavanaṃ suttappabuddho viya ahaṃ upapajjiṃ jātoti sambandho. 405. „Nachdem ich dort mein Herz gläubig gestimmt hatte“ bedeutet: Angesichts jener leuchtenden Reliquienkammer stimmte ich meinen Geist gläubig und empfand tiefe Freude. Durch dieses reine Vertrauen des Geistes vollbrachte ich vielerlei mannigfache heilsame Verdienste. Indem ich mich an diese verdienstvollen Taten erinnerte: „In der Reliquienkammer und in der Lehre habe ich so viele Verdienste vollbracht“, schied ich schließlich aus dem Leben und wurde in der Welt der Dreißigunddreißig Götter (Tāvatiṃsa) wiedergeboren, so mühelos wie ein Mann, der aus dem Schlaf erwacht – so ist der syntaktische Zusammenhang. 406. Attano uppannadevaloke laddhasampattiṃ dassento sahassayuttantiādimāha. Tattha hayavāhiṃ sindhavasahassayojitaṃ dibbarathaṃ adhiṭṭhito. Sattahi bhūmīhi saṃ suṭṭhu uggataṃ ubbiddhaṃ uccaṃ mayhaṃ bhavanaṃ vimānaṃ ahosīti attho. 406. Um den Wohlstand aufzuzeigen, den er in der Götterwelt, in der er wiedergeboren wurde, erlangt hatte, sprach er die Worte: „Mit tausend bespannt...“ und so weiter. Darin bedeutet es: „Auf einem himmlischen Wagen stehend, der mit tausend edlen Sindhu-Pferden bespannt war.“ Mein himmlischer Prachtbau (vimāna) hatte sieben Stockwerke, ragte stattlich empor und erhob sich hoch in die Luft – dies ist die Bedeutung. 407. Tasmiṃ vimāne sabbasovaṇṇamayā sakalasovaṇṇamayāni kūṭāgārasahassāni ahuṃ ahesunti attho. Sakatejena attano ānubhāvena sabbā dasa disā pabhāsayaṃ obhāsentāni jalanti vijjotantīti sambandho. 407. „In jenem Prachtbau gab es tausende von Giebelhäusern, die gänzlich aus Gold gefertigt waren“ – das ist die Bedeutung. Durch ihren eigenen Glanz und ihre eigene Pracht erleuchteten sie alle zehn Himmelsrichtungen und strahlten in hellem Glanz – so ist der syntaktische Zusammenhang. 408. Tasmiṃ mayhaṃ pātubhūtavimāne aññepi niyyūhā pamukhasālāyo santi vijjanti. Kiṃ bhūtā? Lohitaṅgamayā rattamaṇimayā tadā tepi niyyūhā catasso disā ābhāya pabhāya jotantīti sambandho. 408. In jenem Prachtbau, der für mich erschienen war, gab es auch andere herausragende Balkone und Vorhallen. Welcher Art waren sie? Sie waren aus Rubinen (rattamaṇi) gefertigt. Damals erleuchteten auch jene Balkone mit ihrem strahlenden Glanz die vier Himmelsrichtungen – so ist der syntaktische Zusammenhang. 410. Sabbe deve sakalachadevaloke deve abhibhomi abhibhavāmi. Kassa phalanti ce? Mayā katassa puññakammassa idaṃ phalanti attho. 410. „Ich übertraf alle Götter in allen sechs Götterwelten.“ Wenn man fragt: „Wessen Frucht ist das?“, so lautet die Antwort: „Dies ist die Frucht der von mir vollbrachten verdienstvollen Tat“ – das ist die Bedeutung. 411. Tato manussasampattiṃ dassento saṭṭhikappasahassamhītiādimāha. Tattha ito kappato heṭṭhā saṭṭhisahassakappamatthake cāturanto catumahādīpavanto vijitāvī sabbaṃ paccatthikaṃ vijitavanto ahaṃ ubbiddho nāma cakkavattī rājā hutvā pathaviṃ āvasiṃ rajjaṃ kāresinti sambandho. 411. Daraufhin sprach er, um das menschliche Glück zu zeigen, das Verssegment beginnend mit: „Vor sechzigtausend Äonen“. Die Verbindung darin lautet: Sechzigtausend Äonen zurückgerechnet von diesem Äon an war ich ein das Land beherrschender Weltherrscher (cakkavattī) namens Ubbiddha, der die vier großen Kontinente besaß, ein Sieger, der alle Feinde bezwungen hatte, und ich regierte die Erde. 412-4. Tatheva bhaddake kappeti pañcabuddhapaṭimaṇḍitattā bhaddake nāma kappe. Tiṃsakkhattuṃ tiṃsajātiyā catudīpamhi issaro padhāno cakkaratanādīhi [Pg.300] sattahi ratanehi sampanno samaṅgībhūto sakakammābhiraddho attano kamme dasa rājadhamme abhiraddho allīno cakkavattī rājā amhī ahosinti sambandho. Attano cakkavattikāle anubhūtasampattiṃ dassento ‘‘tatthāpi bhavanaṃ mayha’’ntiādimāha. Tattha tasmiṃ cakkavattirajjamhi mayhaṃ bhavanaṃ mama pāsādaṃ indalaṭṭhīva uggataṃ ākāse ṭhitavijjotamānā vijjullatā iva uggataṃ sattabhūmikādibhedehi uccaṃ āyāmato dīghato ca uccato ca catuvīsatiyojanaṃ vitthārato dvādasayojanaṃ ahosīti sambandho. Sabbesaṃ janānaṃ manaṃ allīnabhāvena rammaṇaṃ nāma nagaraṃ ahosīti attho. Daḷhehi dvādasahatthehi vā tiṃsahatthehi vā uccehi pākāratoraṇehi sampannanti dasseti. 412-4. Ebenso im „glücklichen Äon“ (bhaddake kappe), so genannt, weil er von pfünf Buddhas geschmückt ist. Die Verbindung lautet: Dreißigmal war ich in dreißig Existenzen ein Weltherrscher (cakkavattī), ein oberster Herrscher über die vier Kontinente, ausgestattet und versehen mit den sieben Juwelen wie dem Rad-Juwel, erfreut über mein eigenes Handeln, das heißt, den zehn königlichen Tugenden hingegeben und treu ergeben. Um den Wohlstand zu zeigen, den er während seiner Zeit als Weltherrscher genoss, sprach er den Vers beginnend mit: „Auch dort war meine Wohnstätte...“. Darin lautet der Zusammenhang: Während jener Herrschaft als Weltherrscher war meine Wohnstätte, mein Palast, emporragend wie ein Blitzstrahl (indalaṭṭhi), emporragend wie ein am Himmel stehender, leuchtender Blitz, hoch durch die Gliederung in sieben Stockwerke und so weiter, vierundzwanzig Yojanas in der Länge und Höhe, und zwölf Yojanas in der Breite. Der Sinn ist, dass die Stadt namens Rammaka hieß, weil sie den Geist aller Menschen anzog. Es wird gezeigt, dass sie mit starken, zwölf oder dreißig Ellen hohen Mauern und Torwegen ausgestattet war. 415-20. Tadaḍḍhakaṃ tato aḍḍhakaṃ aḍḍhatiyasatayojananti attho. Pakkhittā paṇṇavīsatīti vīsatiāpaṇapakkhittaṃ nirantaraṃ vīthiparicchedanti attho. Brāhmaññakulasambhūtoti brāhmaṇakule sujāto. Sesaṃ vuttanayattā suviññeyyamevāti. 415-20. „Die Hälfte davon“ (tadaḍḍhaka) bedeutet die Hälfte von jener Zahl, nämlich zweihundertfünfzig Yojanas. „Fünfundzwanzig angelegt“ (pakkhittā paṇṇavīsati) bedeutet einen ununterbrochenen Straßenabschnitt, in dem zwanzig Märkte angeordnet sind. „In einer Brahmanenfamilie geboren“ (brāhmaññakulasambhūto) bedeutet in einer Brahmanenfamilie wohlgeboren. Der Rest ist in der bereits dargelegten Weise leicht zu verstehen. Mahākassapattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Legende (apadāna) des ehrwürdigen Mahākassapa ist abgeschlossen. 3-4. Anuruddhattheraapadānavaṇṇanā 3-4. Die Erklärung der Legende (apadāna) des ehrwürdigen Anuruddha. Sumedhaṃ bhagavantāhantiādikaṃ āyasmato anuruddhattherassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato kāle vibhavasampanne kuṭumbikakule nibbatti. Vayappatto ekadivasaṃ vihāraṃ gantvā satthu santike dhammaṃ suṇanto satthārā ekaṃ bhikkhuṃ dibbacakkhukānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapentaṃ disvā sayampi taṃ dānaṃ patthetvā satasahassabhikkhuparivārassa bhagavato sattāhaṃ mahādānaṃ pavattetvā sattame divase bhagavato bhikkhusaṅghassa ca uttamāni vatthāni datvā paṇidhānaṃ akāsi. Satthāpissa anantarāyena samijjhanabhāvaṃ disvā ‘‘anāgate gotamassa sammāsambuddhassa sāsane dibbacakkhukānaṃ aggo bhavissatī’’ti byākāsi. Sopi tattha puññāni karonto satthari parinibbute sattayojanike kanakathūpe [Pg.301] bahukaṃsapātiyo dīparukkhehi dīpakapallikāhi ca ‘‘dibbacakkhuñāṇassa upanissayo hotū’’ti uḷāraṃ dīpapūjaṃ akāsi. Evaṃ yāvajīvaṃ puññāni katvā devamanussesu saṃsaranto kassapassa bhagavato kāle bārāṇasiyaṃ kuṭumbikagehe nibbattitvā viññutaṃ patto satthari parinibbute niṭṭhite yojanike kanakathūpe bahukaṃsapātiyo sappimaṇḍassa pūretvā majjhe ca ekekaṃ guḷapiṇḍaṃ ṭhapetvā mukhavaṭṭiyā mukhavaṭṭiṃ phusāpento cetiyaṃ parikkhipāpesi. Attanā gahitakaṃsapātiṃ sappimaṇḍassa pūretvā sahassavaṭṭiyo jālāpetvā sīse ṭhapetvā sabbarattiṃ cetiyaṃ anupariyāyi. „Zum erhabenen Sumedha...“ (sumedhaṃ bhagavantāhaṃ) und so weiter ist die Legende (apadāna) des ehrwürdigen Thera Anuruddha. Auch er hatte unter früheren Buddhas verdienstvolle Taten vollbracht, indem er in dieser und jener Existenz Verdienste ansammelte, die als unterstützende Bedingungen für die Befreiung dienten, und wurde zur Zeit des Erhabenen Padumuttara in einer wohlhabenden Familie eines Hausvaters geboren. Als er herangewachsen war, ging er eines Tages zum Kloster, und während er die Lehre in der Gegenwart des Meisters hörte, sah er, wie der Meister einen bestimmten Mönch an die Spitze derer stellte, die das himmlische Auge besitzen. Er selbst ersehnte diese Stellung ebenfalls, richtete sieben Tage lang eine große Almosengabe für den Erhabenen aus, der von einhunderttausend Mönchen umgeben war, und nachdem er am siebten Tag dem Erhabenen und dem Sangha der Mönche hervorragende Gewänder dargebracht hatte, fasste er einen Entschluss. Auch der Meister sah, dass sein Wunsch hindernisfrei in Erfüllung gehen würde, und prophezeite: „In der Zukunft, in der Lehre des vollkommen erleuchteten Gotama, wird er der Höchste unter jenen sein, die das himmlische Auge besitzen.“ Er erwarb dort weiterhin Verdienste, und als der Meister ins Parinibbāna eingegangen war, brachte er am sieben Yojanas hohen goldenen Stupa eine großartige Opferung von Lichtern dar, mit zahlreichen Bronzeschalen, Lampenständern und Lampenbecken, und sprach den Wunsch aus: „Möge dies eine unterstützende Bedingung für das Wissen des himmlischen Auges sein.“ Nachdem er so zeitlebens Verdienste erworben hatte und im Kreislauf der Devas und Menschen gewandert war, wurde er zur Zeit des Erhabenen Kassapa in Bārāṇasī im Hause eines Hausvaters geboren und erlangte die Urteilskraft. Als der Meister ins Parinibbāna eingegangen war und der eine Yojana hohe goldene Stupa vollendet war, füllte er viele Bronzeschalen mit geklärter Butter, legte jeweils einen Klumpen Rohrzucker in die Mitte, ließ sie Rand an Rand aneinanderstoßen und umgab den Stupa damit. Er selbst füllte eine von ihm gehaltene Bronzeschale mit geklärter Butter, entzündete tausend Wicks, stellte sie auf sein Haupt und umrundete den Stupa die ganze Nacht hindurch. Evaṃ tasmimpi attabhāve yāvajīvaṃ kusalaṃ katvā devaloke nibbattitvā tattha yāvatāyukaṃ ṭhatvā tato cuto anuppanne buddhe bārāṇasiyaṃyeva duggatakule nibbatti, ‘‘annabhāro’’tissa nāmaṃ ahosi. So sumanaseṭṭhissa nāma gehe kammaṃ karonto jīvati. Ekadivasaṃ so upariṭṭhaṃ nāma paccekabuddhaṃ nirodhasamāpattito vuṭṭhāya gandhamādanapabbatato ākāsenāgantvā bārāṇasīnagaradvāre otaritvā cīvaraṃ pārupitvā nagare piṇḍāya carantaṃ disvā pasannamānaso pattaṃ gahetvā attano atthāya ṭhapitaṃ bhāgabhattaṃ patte pakkhipitvā paccekabuddhassa dātukāmo ārabhi. Bhariyāpissa attano bhāgabhattañca tattheva pakkhipi. So taṃ netvā paccekabuddhassa hatthe ṭhapesi. Paccekabuddho taṃ gahetvā anumodanaṃ katvā pakkāmi. Taṃ divasaṃ sumanaseṭṭhissa chatte adhivatthā devatā – ‘‘aho dānaṃ, paramadānaṃ, upariṭṭhe suppatiṭṭhita’’nti mahāsaddena anumodi. Taṃ sutvā sumanaseṭṭhi – ‘‘evaṃ devatāya anumoditaṃ idameva uttamadāna’’nti cintetvā tattha pattiṃ yāci. Annabhāro pana tassa pattiṃ adāsi. Tena pasannacitto sumanaseṭṭhi tassa sahassaṃ datvā ‘‘ito paṭṭhāya tuyhaṃ sahatthena kammakaraṇakiccaṃ natthi, patirūpaṃ gehaṃ katvā niccaṃ vasāhī’’ti āha. Nachdem er auch in jener Existenz sein Leben lang Heilsames (kusala) getan hatte, wurde er in der Götterwelt geboren, verweilte dort für die Dauer seiner Lebensspanne und wurde nach dem Scheiden von dort, zu einer Zeit, als noch kein Buddha erschienen war, in Bārāṇasī in einer armen Familie wiedergeboren; sein Name war Annabhāra. Er fristete sein Dasein, indem er im Hause des Großkaufmanns Sumana (Sumanaseṭṭhi) Arbeit verrichtete. Eines Tages sah er den Einzelbuddha (paccekabuddha) namens Upariṭṭha, der sich aus der Errungenschaft des Erlöschens (nirodhasamāpatti) erhoben hatte, vom Berge Gandhamādana durch die Luft herbeigekommen war, am Stadttor von Bārāṇasī herabgestiegen war, sein Gewand angelegt hatte und in der Stadt um Almosenspeise ging. Voller Vertrauen nahm er dessen Almosenschale, füllte die für ihn selbst bestimmte Portion Essen in die Schale und schickte sich an, sie dem Einzelbuddha darzubringen. Auch seine Frau füllte ihre eigene Portion Essen genau dort hinein. Er brachte sie hin und legte sie in die Hand des Einzelbuddhas. Der Einzelbuddha nahm sie an, sprach Worte des Dankes (anumodana) und ging fort. An jenem Tag rief die Gottheit, die im Prunkschirm des Großkaufmanns Sumana wohnte, mit lauter Stimme ihre Freude aus: „O welch eine Gabe! Eine höchst vortreffliche Gabe, wohl dargebracht an Upariṭṭha!“ Als der Großkaufmann Sumana dies hörte, dachte er: „Eine Gabe, die von einer Gottheit so gepriesen wird, ist wahrlich die höchste Gabe“, und er bat um einen Anteil an diesem Verdienst (patti). Annabhāra aber gab ihm den Anteil am Verdienst. Sumanaseṭṭhi, dessen Geist dadurch erfreut war, gab ihm tausend [Münzen] und sprach: „Von heute an brauchst du keine Arbeit mehr mit deinen eigenen Händen zu verrichten. Baue dir ein angemessenes Haus und lebe fortan darin.“ Yasmā nirodhasamāpattito vuṭṭhitassa paccekabuddhassa dinnapiṇḍapāto taṃ divasameva uḷāravipāko hoti, tasmā sumanaseṭṭhi rañño santikaṃ gacchanto taṃ gahetvā agamāsi. Rājā pana taṃ ādaravasena olokesi. Seṭṭhi – ‘‘mahārāja, ayaṃ oloketabbayuttoyevā’’ti vatvā [Pg.302] tadā tena katakammaṃ attanāpissa sahassadinnabhāvañca kathesi. Taṃ sutvā rājā tassa tussitvā sahassaṃ datvā ‘‘asukasmiṃ ṭhāne gehaṃ katvā vasāhī’’ti gehaṭṭhānamassa āṇāpesi. Tassa taṃ ṭhānaṃ sodhāpentassa mahantā mahantā nidhikumbhiyo uṭṭhahiṃsu. So tā disvā rañño ārocesi. Rājā sabbaṃ dhanaṃ uddharāpetvā rāsikataṃ disvā – ‘‘ettakaṃ dhanaṃ imasmiṃ nagare kassa gehe atthī’’ti pucchi. ‘‘Na kassaci, devā’’ti. ‘‘Tena hi ayaṃ annabhāro imasmiṃ nagare mahādhanaseṭṭhi nāma hotū’’ti taṃ divasameva tassa seṭṭhichattaṃ ussāpesi. Da die Gabe von Almosenspeise an einen Paccekabuddha, der sich gerade aus der Errungenschaft des Erlöschens erhoben hat, noch am selben Tag eine überaus großartige Frucht trägt, nahm der Großkaufmann Sumana, als er sich zum König begab, jenen Annabhāra mit sich und ging hin. Der König blickte ihn voller Respekt an. Der Großkaufmann sprach: „Großer König, dieser Mann ist wahrlich wert, beachtet zu werden“, und berichtete von der heilsamen Tat, die dieser damals vollbracht hatte, und dass er selbst ihm tausend Münzen gegeben hatte. Als der König dies hörte, freute er sich, gab ihm tausend Münzen und wies ihm ein Grundstück an, indem er sprach: „Baue an jenem Ort ein Haus und wohne dort.“ Als er diesen Platz säubern ließ, kamen riesige Schatzkrüge zum Vorschein. Als er diese sah, meldete er es dem König. Der König ließ den gesamten Schatz ausgraben, sah den aufgehäuften Reichtum und fragte: „In wessen Haus in dieser Stadt gibt es so viel Besitz?“ Sie antworteten: „In niemandes Haus, o Herr!“ Daraufhin sprach der König: „Dann soll dieser Annabhāra in dieser Stadt den Namen des Großkaufmanns Mahādhana tragen“, und noch am selben Tag ließ er für ihn den Schirm des Großkaufmanns errichten. So seṭṭhi hutvā yāvajīvaṃ kalyāṇakammaṃ katvā devaloke nibbatto, dīgharattaṃ devamanussesu saṃsaritvā amhākaṃ bhagavato uppajjanakakāle kapilavatthunagare sukkodanasakkassa gehe paṭisandhiṃ gaṇhi. Tassa jātassa anuruddhoti nāmaṃ akaṃsu. So mahānāmasakkassa kaniṭṭhabhātā bhagavato cūḷapitu putto paramasukhumālo mahāpuñño ahosi. Suvaṇṇapātiyaṃyeva cassa bhattaṃ uppajji. Athassa mātā ekadivasaṃ ‘‘mama putto natthīti padaṃ na jānāti, taṃ jānāpessāmī’’ti cintetvā ekaṃ suvaṇṇapātiṃ tucchakaṃyeva aññāya suvaṇṇapātiyā pidahitvā tassa pesesi, antarāmagge devatā taṃ, dibbapūvehi pūresuṃ. Evaṃ mahāpuñño tiṇṇaṃ utūnaṃ anucchavikesu tīsu pāsādesu alaṅkatanāṭakitthīhi parivuto devo viya mahāsampattiṃ anubhavi. Als er Großkaufmann geworden war, vollbrachte er zeitlebens heilsame Taten und wurde in der Götterwelt wiedergeboren. Nachdem er lange Zeit unter Göttern und Menschen gewandert war, nahm er zur Zeit des Erscheinens unseres Erhabenen im Hause des Sakyers Sukkodana in der Stadt Kapilavatthu Wiedergeburt. Nach seiner Geburt gaben sie ihm den Namen Anuruddha. Er war der jüngere Bruder des Sakyers Mahānāma, der Sohn des Onkels väterlicherseits des Erhabenen, überaus feinsinnig und von großem Verdienst. Seine Speise erschien stets in einer goldenen Schale. Eines Tages dachte seine Mutter: „Mein Sohn weiß nicht, was das Wort ‚Es gibt nichts‘ bedeutet. Ich werde es ihn wissen lassen.“ Sie nahm eine leere goldene Schale, deckte sie mit einer anderen goldenen Schale ab und sandte sie ihm. Auf dem Weg füllten Gottheiten sie mit himmlischen Kuchen. So besaß er großes Verdienst und genoss, gleich einem Gott, herrlichsten Wohlstand in drei Palästen, die den drei Jahreszeiten angepasst waren, umgeben von festlich geschmückten Tänzerinnen. Amhākampi bodhisatto tasmiṃ samaye tusitapurā cavitvā suddhodanamahārājassa aggamahesiyā kucchimhi nibbattitvā anukkamena vuddhippatto ekūnatiṃsa vassāni agāramajjhe vasitvā mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitvā anukkamena paṭividdhasabbaññutaññāṇo bodhimaṇḍe sattasattāhaṃ vītināmetvā isipatane migadāye dhammacakkaṃ pavattetvā lokānuggahaṃ karonto rājagahaṃ gantvā veḷuvane vihāsi. Tadā suddhodanamahārājā – ‘‘putto kira me rājagahaṃ anuppatto; gacchatha, bhaṇe, mama puttaṃ ānethā’’ti sahassasahassaparivāre dasa amacce pesesi. Te sabbe ehibhikkhupabbajjāya pabbajiṃsu. Tesu udāyittherena cārikāgamanaṃ āyācito bhagavā vīsatisahassakhīṇāsavaparivuto rājagahato nikkhamitvā [Pg.303] kapilavatthupuraṃ gantvā ñātisamāgame anekāni pāṭihāriyāni dassetvā pāṭihāriyavicittaṃ dhammadesanaṃ kathetvā mahājanaṃ amatapānaṃ pāyetvā dutiyadivase pattacīvaramādāya nagaradvāre ṭhatvā ‘‘kiṃ nu kho kulanagaraṃ āgatānaṃ sabbabuddhānaṃ āciṇṇa’’nti āvajjamāno ‘‘sapadānaṃ piṇḍāya caraṇaṃ āciṇṇa’’nti ñatvā sapadānaṃ piṇḍāya carati. Rājā ‘‘putto te piṇḍāya caratī’’ti sutvā turitaturito āgantvā antaravīthiyaṃ dhammaṃ sutvā attano nivesanaṃ pavesetvā mahantaṃ sakkārasammānaṃ akāsi. Bhagavā tattha kattabbaṃ ñātisaṅgahaṃ katvā rāhulakumāraṃ pabbājetvā nacirasseva kapilavatthunagarato mallaraṭṭhe cārikaṃ caramāno anupiyambavanaṃ pāpuṇi. Auch unser Bodhisatta schied zu jener Zeit aus der Tusita-Götterwelt, trat in den Schoß der Hauptgemahlin des Großkönigs Suddhodana ein und wuchs allmählich heran. Nachdem er neunundzwanzig Jahre lang im Hausstand gelebt hatte, vollzog er das große Entsagen. Schrittweise erlangte er das Allwissenheitswissen, verbrachte sieben Wochen am Ort der Erleuchtung, setzte im Gazellenpark bei Isipatana das Rad der Lehre in Gang, erwies der Welt sein Mitgefühl, zog nach Rājagaha und verwelte im Veḷuvana-Kloster. Da sandte der Großkönig Suddhodana, als er hörte: „Mein Sohn soll in Rājagaha angekommen sein“, nacheinander zehn Minister, von denen jeder von tausend Gefolgsleuten begleitet war, mit den Worten: „Geht, ihr Männer, bringt meinen Sohn her!“ Sie alle empfingen die Ordination durch den Ruf „Komm, o Mönch“. Als der Erhabene von dem Thera Udāyin unter ihnen gebeten wurde, die Reise anzutreten, brach er, umgeben von zwanzigtausend Triebversiegten, von Rājagaha auf, begab sich nach Kapilavatthu und zeigte bei der Versammlung der Verwandten zahlreiche Wunder. Er hielt eine durch Wunder glänzende Lehrrede, ließ die Volksmenge den Trank der Todeslosigkeit trinken und nahm am zweiten Tag Schale und Gewand. Er verweilte am Stadttor und überlegte: „Was ist wohl die Gewohnheit aller Buddhas, wenn sie in die Stadt ihrer Familie kommen?“ Als er erkannte: „Es ist ihre Gewohnheit, ununterbrochen von Haus zu Haus um Almosenspeise zu gehen“, ging er von Haus zu Haus auf Almosengang. Als der König hörte: „Dein Sohn geht um Almosenspeise“, eilte er rasch herbei, vernahm mitten auf der Straße die Lehre, führte ihn in seinen Palast und erwies ihm große Verehrung. Nachdem der Erhabene dort die den Verwandten gebührende Unterstützung geleistet und den Prinzen Rāhula ordiniert hatte, wanderte er nicht lange danach von Kapilavatthu weiter in das Reich der Mallas und erreichte den Anupiya-Mangohain. Tasmiṃ samaye suddhodanamahārājā sākiyagaṇaṃ sannipātetvā āha – ‘‘sace mama putto agāraṃ ajjhāvasissa, rājā abhavissa cakkavattī sattaratanasampanno khattiyagaṇaparivāro, nattāpi me rāhulakumāro khattiyagaṇena saddhiṃ taṃ parivāretvā acarissa, tumhepi etamatthaṃ jānātha. Idāni pana mama putto buddho jāto, khattiyāvāssa parivārā hontu, tumhe ekekakulato ekekaṃ dārakaṃ dethā’’ti. Evaṃ vutte ekappahāreneva dveasītisahassakhattiyakumārā pabbajiṃsu. Zu jener Zeit versammelte der Großkönig Suddhodana die Schar der Sakyer und sprach: „Wenn mein Sohn das Hausleben geführt hätte, wäre er ein Raddreher-König geworden, reich an den sieben Juwelen und umgeben von einer adligen Gefolgschaft. Auch mein Enkel, Prinz Rāhula, wäre zusammen mit einer adligen Schar in seiner Begleitung umhergezogen; auch ihr wisst um diese Sache. Nun aber ist mein Sohn ein Buddha geworden. Möge sein Gefolge aus Adligen bestehen! Gebt aus jeder einzelnen Familie je einen Jungen.“ Als dies gesagt wurde, traten auf einen Schlag zweiundachtzigtausend adlige Prinzen in den Orden ein. Tasmiṃ samaye mahānāmo sakko kuṭumbasāmiko, so attano kaniṭṭhaṃ anuruddhaṃ sakkaṃ upasaṅkamitvā etadavoca – ‘‘etarahi, tāta anuruddha, abhiññātā abhiññātā sakyakumārā bhagavantaṃ pabbajitaṃ anupabbajanti, amhākañca kulā natthi koci agārasmā anagāriyaṃ pabbajito, tena hi tvaṃ vā pabbajāhi, ahaṃ vā pabbajissāmī’’ti. Taṃ sutvā anuruddho gharāvāse ruciṃ akatvā attasattamo agārasmā anagāriyaṃ pabbajito. Tassa pabbajjānukkamo saṅghabhedakakkhandhake (cūḷava. 330 ādayo) āgatoyeva. Evaṃ anupiyaṃ gantvā pabbajitesu pana tesu tasmiṃyeva antovasse bhaddiyatthero arahattaṃ pāpuṇi, anuruddhatthero dibbacakkhuṃ nibbattesi, devadatto aṭṭha samāpattiyo nibbattesi, ānandatthero sotāpattiphale patiṭṭhāsi, bhagutthero ca kimilatthero ca pacchā arahattaṃ pāpuṇiṃsu. Tesaṃ sabbesampi therānaṃ attano attano āgataṭṭhānesu pubbapatthanābhinīhāro āvi bhavissati. Ayaṃ anuruddhatthero dhammasenāpatissa [Pg.304] santike kammaṭṭhānaṃ gahetvā cetiyaraṭṭhe pācīnavaṃsadāyaṃ gantvā samaṇadhammaṃ karonto satta mahāpurisavitakke vitakkesi, aṭṭhame kilamati. Satthā ‘‘anuruddho aṭṭhame mahāpurisavitakke kilamatī’’ti ñatvā ‘‘tassa saṅkappaṃ pūressāmī’’ti tattha gantvā paññattavarabuddhāsane nisinno aṭṭhamaṃ mahāpurisavitakkaṃ pūretvā catupaccayasantosabhāvanārāmapaṭimaṇḍitaṃ mahāariyavaṃsapaṭipadaṃ kathetvā ākāse uppatitvā bhesakalāvanameva gato. Zu jener Zeit war der Sakyer Mahānāma ein wohlhabender Hausvater. Er ging zu seinem jüngeren Bruder, dem Sakyer Anuruddha, und sprach zu ihm: „Lieber Anuruddha, jetzt entsagen weithin bekannte Sakyer-Prinzen dem weltlichen Leben und folgen dem Erhabenen in die Hauslosigkeit. Aus unserer Familie ist jedoch noch niemand aus dem Haus in die Hauslosigkeit hinausgezogen. Darum ordiniere entweder du, oder ich werde ordinieren.“ Als Anuruddha dies hörte, fand er kein Gefallen am häuslichen Leben und zog als Siebter aus dem Haus in die Hauslosigkeit hinaus. Der Ablauf seiner Ordination ist bereits im Sanghabhedaka-Khandhaka (Cūḷavagga, Kap. 330 ff.) überliefert. Nachdem sie so nach Anupiya gegangen waren und die Ordination empfangen hatten, erlangte noch während desselben Regenzeit-Aufenthalts der ehrwürdige Bhaddiya die Heiligkeit (Arahantschaft), der ehrwürdige Anuruddha entfaltete das himmlische Auge, Devadatta erlangte die acht geistigen Errungenschaften (Samāpattis), der ehrwürdige Ānanda gründete sich in der Frucht des Stromeintritts, und die ehrwürdigen Bhagu und Kimila erlangten später die Heiligkeit. Die früheren Wünsche und Heilsentschlüsse all dieser ehrwürdigen Theras werden an den jeweiligen Stellen ihres Auftretens offenbar werden. Dieser ehrwürdige Anuruddha nahm beim Feldherrn der Lehre (Sāriputta) ein Meditationsobjekt an, begab sich in das Pācīnavaṃsa-Wäldchen im Lande Cetiya und dachte, während er die asketischen Pflichten ausübte, über die sieben Gedanken eines großen Mannes nach; beim achten jedoch stieß er an seine Grenzen. Als der Meister erkannte: „Anuruddha müht sich mit dem achten Gedanken eines großen Mannes ab“, dachte er: „Ich will seine Absicht erfüllen.“ Er begab sich dorthin, setzte sich auf den hergerichteten, edlen Buddha-Sitz, erfüllte den achten Gedanken eines großen Mannes, verkündete die große Praxis des edlen Geschlechts, die durch die Zufriedenheit mit den vier Lebensbedürfnissen und die Freude an der geistigen Entfaltung geschmückt ist, erhob sich in die Luft und kehrte in den Bhesakalā-Hain zurück. Thero tathāgate gatamatteyeva tevijjo mahākhīṇāsavo hutvā ‘‘satthā mayhaṃ manaṃ jānitvā āgantvā aṭṭhamaṃ mahāpurisavitakkaṃ pūretvā adāsi, so ca me manoratho matthakaṃ patto’’ti buddhānaṃ dhammadesanaṃ attano ca paṭivedhadhammaṃ ārabbha imā udānagāthā abhāsi – Sobald der Tathāgata gegangen war, wurde der Thera zu einem mit dem dreifachen Wissen ausgestatteten, großen Triebversiegten (Arahant). Mit dem Gedanken: „Der Meister hat meinen Geist erkannt, ist hergekommen und hat mir den achten Gedanken eines großen Mannes erfüllt und geschenkt; und so hat mein Herzenswunsch seine Vollendung erreicht“, sprach er im Hinblick auf die Lehrverkündigung der Buddhas und sein eigenes Durchdringungswissen diese feierlichen Verse: ‘‘Mama saṅkappamaññāya, satthā loke anuttaro; Manomayena kāyena, iddhiyā upasaṅkami. „Als er meine Absicht erkannte, kam der in der Welt unübertreffliche Meister mit seinem geistgeschaffenen Körper durch seine übernatürliche Kraft zu mir. ‘‘Yadā me ahu saṅkappo, tato uttari desayi; Nippapañcarato buddho, nippapañcamadesayi. „Als ich jene Absicht hatte, lehrte er mich noch darüber hinaus; der Buddha, der an der Freiheit von begrifflicher Vielfalt Gefallen findet, lehrte die Freiheit von begrifflicher Vielfalt. ‘‘Tassāhaṃ dhammamaññāya, vihāsiṃ sāsane rato; Tisso vijjā anuppattā, kataṃ buddhassa sāsana’’nti. (theragā. 901-903); „Als ich seine Lehre verstanden hatte, verwelte ich voller Freude in seiner Lehre; die drei Wissensarten sind erlangt, die Lehre des Buddha ist erfüllt.“ (Theragāthā 901–903) Atha naṃ aparabhāge satthā jetavane mahāvihāre viharanto ‘‘dibbacakkhukānaṃ bhikkhūnaṃ anuruddho aggo’’ti (a. ni. 1.192) aggaṭṭhāne ṭhapesi. Später, als der Meister im großen Jetavana-Kloster verweilte, setzte er ihn mit den Worten: „Unter meinen Mönch-Jüngern, die das himmlische Auge besitzen, ist Anuruddha der Höchste“ (Aṅguttara Nikāya 1.192) auf den ersten Platz. 421. Evaṃ so bhagavato santikā dibbacakkhukānaṃ aggaṭṭhānaṃ labhitvā attano pubbakammaṃ saritvā somanassavasena pubbacaritāpadānaṃ pakāsento sumedhaṃ bhagavantāhantiādimāha. Tattha sundarā upaṭṭhāpanapaññā maggaphalapaññā vipassanāpaññā catupaṭisambhidādisaṅkhātā medhā yassa bhagavato so sumedho, taṃ sumedhaṃ bhāgyasampannattā bhagavantaṃ lokassa jeṭṭhaṃ seṭṭhaṃ padhānabhūtaṃ saṃsārato paṭhamaṃ niggataṃ narānaṃ āsabhaṃ purecārikaṃ vūpakaṭṭhaṃ vivekabhūtaṃ gaṇasaṅgaṇikārāmato apagataṃ viharantaṃ ahaṃ addasanti sambandho. 421. Nachdem er so in der Gegenwart des Erhabenen die höchste Stellung unter den Besitzern des himmlischen Auges erlangt hatte, erinnerte er sich an seine eigenen früheren Taten und verkündete voller Freude seine frühere Lebensgeschichte, beginnend mit den Worten „Zum Erhabenen Sumedha...“. Hierbei bedeutet „Sumedha“ (der von schöner Weisheit ist): der Erhabene, dessen Weisheit, bestehend aus der Weisheit des Pfades und der Frucht, der Einsichtsweisheit sowie den vier analytischen Wissensarten und anderem, trefflich dargeboten ist. Die syntaktische Verknüpfung lautet: „Ich sah jenen Sumedha, den Erhabenen (weil er mit Segen ausgestattet ist), den Ältesten der Welt, den Vorzüglichsten, den Herausragenden, der als Erster aus dem Daseinskreislauf herausgetreten ist, den Stier unter den Menschen, den Wegweiser, der zurückgezogen lebte, einsam verweilend und fern von der Freude an gesellschaftlichem Umgang.“ 422. Sabbadhammānaṃ [Pg.305] sayameva buddhattā sambuddhaṃ, upagantvāna samīpaṃ gantvāti attho. Añjaliṃ paggahetvānāti dasaṅgulipuṭaṃ muddhani katvāti attho. Sesaṃ uttānatthameva. 422. „Den vollkommen Erwachten“ (sambuddha) bedeutet: weil er alle Phänomene selbstständig erkannt hat. „Herangetreten“ (upagantvāna) bedeutet: in die Nähe gegangen zu sein. „Die Hände ehrfurchtsvoll aneinandergelegt“ (añjaliṃ paggahetvāna) bedeutet: die gefalteten zehn Finger an das Haupt gelegt zu haben. Der Rest ist von ganz offensichtlicher Bedeutung. 430. Divā rattiñca passāmīti tadā devaloke ca manussaloke ca uppannakāle maṃsacakkhunā samantato yojanaṃ passāmīti attho. 430. „Ich sehe bei Tag und bei Nacht“ (divā rattiñca passāmi) bedeutet: Zu jener Zeit, als er in der Götterwelt oder in der Menschenwelt wiedergeboren wurde, konnte er mit dem physischen Auge ringsumher eine Meile (Yojana) weit sehen. 431. Sahassalokaṃ ñāṇenāti paññācakkhunā sahassacakkavāḷaṃ passāmīti attho. Satthu sāsaneti idāni gotamassa bhagavato sāsane. Dīpadānassa dīpapūjāya idaṃ phalaṃ, iminā phalena dibbacakkhuṃ anuppatto paṭiladdho uppādesinti attho. 431. „Die tausendfache Welt durch Wissen“ (sahassalokaṃ ñāṇena) bedeutet: Mit dem Auge der Weisheit sieht er tausend Weltsysteme (Cakkavāḷa). „In der Lehre des Meisters“ (satthu sāsane) bezieht sich auf die gegenwärtige Lehre des erhabenen Gotama. „Dies ist die Frucht der Lampenspende“ bedeutet: Durch diese Frucht der Opferung von Lampen hat er das himmlische Auge erlangt, empfangen und hervorgebracht. Anuruddhattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Lebensgeschichte des ehrwürdigen Anuruddha (Anuruddhatthera-apadāna-vaṇṇanā) ist abgeschlossen. 3-5. Puṇṇamantāṇiputtattheraapadānavaṇṇanā 3-5. Die Erklärung der Lebensgeschichte des ehrwürdigen Puṇṇa Mantāṇiputta Ajjhāyako mantadharotiādikaṃ āyasmato puṇṇassa mantāṇiputtattherassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato uppattito puretarameva haṃsavatīnagare brāhmaṇamahāsālakule nibbattitvā anukkamena viññutaṃ patto. Aparabhāge padumuttare bhagavati uppajjitvā bodhaneyyānaṃ dhammaṃ desente heṭṭhā vuttanayena mahājanena saddhiṃ vihāraṃ gantvā parisapariyante nisīditvā dhammaṃ suṇanto satthāraṃ ekaṃ bhikkhuṃ dhammakathikānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapentaṃ disvā ‘‘mayāpi anāgate evarūpena bhavituṃ vaṭṭatī’’ti cintetvā desanāvasāne uṭṭhitāya parisāya satthāraṃ upasaṅkamitvā nimantetvā heṭṭhā vuttanayena mahāsakkāraṃ katvā bhagavantaṃ evamāha – ‘‘bhante, ahaṃ iminā adhikārena na aññaṃ sampattiṃ patthemi, yathā paneso bhikkhu sattamadivasamatthake tumhehi dhammakathikānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapito, evaṃ ahampi anāgate ekassa buddhassa sāsane dhammakathikānaṃ aggo bhaveyya’’nti patthanaṃ akāsi. Satthā anāgataṃ oloketvā tassa patthanāya samijjhanabhāvaṃ disvā ‘‘anāgate [Pg.306] kappasatasahassamatthake gotamo nāma buddho uppajjissati, tassa sāsane pabbajitvā tvaṃ dhammakathikānaṃ aggo bhavissasī’’ti byākāsi. Die Lebensgeschichte, welche mit den Worten „Ein Schriftgelehrter, der die Hymnen bewahrt...“ (ajjhāyako mantadharo) beginnt, ist die des ehrwürdigen Puṇṇa Mantāṇiputta. Auch dieser hatte unter früheren Buddhas Heilsentschlüsse gefasst und häufte in verschiedenen Existenzen heilsame Verdienste an, die als Bedingungen für die Befreiung vom Daseinskreislauf dienten. Noch vor dem Erscheinen des erhabenen Padumuttara wurde er in der Stadt Haṃsāvatī in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie geboren und erlangte im Laufe der Zeit das Alter der Verständigkeit. Später, als der erhabene Padumuttara erschienen war und jenen, die der Belehrung fähig waren, die Lehre verkündete, ging er auf die oben beschriebene Weise zusammen mit der Volksmenge zum Kloster. Am Rande der Versammlung sitzend hörte er die Lehre und sah, wie der Meister einen bestimmten Mönch auf den ersten Platz unter den Lehrpredigern (Dhammakathikas) setzte. Da dachte er: „Auch für mich schickt es sich, in der Zukunft so zu werden.“ Nach dem Ende der Lehrrede, als die Versammlung aufbrach, trat er an den Meister heran, lud ihn ein, erwies ihm nach der oben beschriebenen Weise große Ehrerbietung und sprach zum Erhabenen: „Ehrwürdiger Herr, durch dieses verdienstvolle Werk ersehne ich kein anderes Glück. Doch so, wie dieser Mönch am Ende des siebten Tages von Euch auf den ersten Platz unter den Lehrpredigern gesetzt wurde, so möchte auch ich in der Zukunft in der Lehre eines Buddhas der Höchste unter den Lehrpredigern werden!“ Der Meister blickte in die Zukunft, sah die Erfüllung seines Wunsches und verkündete: „In der Zukunft, nach Ablauf von einhunderttausend Äonen, wird ein Buddha namens Gotama erscheinen. Wenn du in seiner Lehre das Ordensleben aufnimmst, wirst du der Höchste unter den Lehrpredigern sein.“ So yāvatāyukaṃ kalyāṇakammaṃ katvā tato cuto kappasatasahassaṃ puññasambhāraṃ sambharanto devamanussesu saṃsaritvā amhākaṃ bhagavato kāle kapilavatthunagarassa avidūre doṇavatthunāmake brāhmaṇagāme brāhmaṇamahāsālakule aññāsikoṇḍaññattherassa bhāgineyyo hutvā nibbatti. Tassa puṇṇoti nāmaṃ akaṃsu. So satthari abhisambodhiṃ patvā pavattitavaradhammacakke anukkamena rājagahaṃ upanissāya viharante aññāsikoṇḍaññassa santike pabbajitvā laddhūpasampado padhānamanuyuñjanto sabbaṃ pabbajitakiccaṃ matthakaṃ pāpetvā ‘‘dasabalassa santikaṃ gamissāmī’’ti mātulattherena saddhiṃ satthu santikaṃ āgantvā kapilavatthusāmantāyeva ohiyitvā yoniso manasikāre kammaṃ karonto nacirasseva vipassanaṃ ussukkāpetvā arahattaṃ pāpuṇi. Nachdem er zeitlebens heilsame Taten vollbracht hatte, schied er aus jenem Leben dahin, häufte über hunderttausend Äonen hinweg die Ansammlung von Verdiensten an, wanderte im Kreislauf der Daseinsformen unter Göttern und Menschen umher und wurde zur Zeit unseres Erhabenen in einem Brahmanendorf namens Doṇavatthu, unweit der Stadt Kapilavatthu, in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie als Neffe des Ehrwürdigen Aññāsikoṇḍañña wiedergeboren. Sie gaben ihm den Namen Puṇṇa. Als der Meister die vollkommene Erleuchtung erlangt, das vortreffliche Rad der Lehre in Bewegung gesetzt hatte und im Laufe der Zeit in Abhängigkeit von Rājagaha verwelte, trat er in der Gegenwart des Ehrwürdigen Aññāsikoṇḍañña in den Orden ein. Nachdem er die höhere Ordination erhalten hatte, widmete er sich eifrig dem Streben und führte alle Pflichten des Mönchseins zur Vollendung. Mit dem Gedanken: „Ich werde mich in die Gegenwart des Zehnkraft-Besitzers begeben“, kam er zusammen mit seinem Onkel, dem Thera, in die Nähe des Meisters, blieb jedoch in der unmittelbaren Umgebung von Kapilavatthu zurück. Indem er dort weise Betrachtung (yoniso manasikāra) übte, entfaltete er bald darauf die Einsichtsmeditation (vipassanā) und erlangte die Arahatschaft. Tassa pana puṇṇattherassa santike pabbajitā kulaputtā pañcasatā ahesuṃ. Thero te dasakathāvatthūhi ovadi. Tepi sabbe dasakathāvatthūhi ovaditā tassa ovāde ṭhatvā arahattaṃ pāpuṇitvā attano pabbajitakiccaṃ matthakappattaṃ ñatvā upajjhāyaṃ upasaṅkamitvā āhaṃsu – ‘‘bhante, mayaṃ pabbajitakiccassa matthakaṃ pattā, dasannañca kathāvatthūnaṃ lābhino, samayo dāni no dasabalaṃ passitu’’nti, thero tesaṃ vacanaṃ sutvā cintesi – ‘‘mayhaṃ dasakathāvatthulābhitaṃ satthā jānāti. Ahaṃ dhammaṃ desento dasakathāvatthūni amuñcitvāva desemi, mayi ca gacchante sabbepime bhikkhū maṃ parivāretvā gacchissanti, evaṃ me gaṇena saddhiṃ gantvā ayuttaṃ dasabalaṃ passituṃ, ime tāva dasabalaṃ passituṃ gacchantū’’ti. Atha te evamāha – ‘‘āvuso, tumhe purato gantvā dasabalaṃ passatha, mama vacanena tathāgatassa pāde vandatha, ahampi tumhākaṃ gatamaggena āgacchissāmī’’ti. Tepi therā sabbe dasabalassa jātibhūmiraṭṭhavāsino sabbe khīṇāsavā sabbe dasakathāvatthulābhino upajjhāyassa ovādaṃ acchinditvā theraṃ vanditvā anupubbena cārikaṃ carantā saṭṭhiyojanamaggaṃ [Pg.307] atikkamma rājagahe veḷuvanamahāvihāraṃ gantvā dasabalassa pāde vanditvā ekamantaṃ nisīdiṃsu. Āciṇṇaṃ kho panetaṃ buddhānaṃ bhagavantānaṃ āgantukehi bhikkhūhi saddhiṃ paṭisammoditunti bhagavā tehi saddhiṃ ‘‘kacci, bhikkhave, khamanīya’’ntiādinā nayena madhurapaṭisanthāraṃ katvā ‘‘kuto ca tumhe, bhikkhave, āgatatthā’’ti pucchitvā puna tehi ‘‘jātibhūmito’’ti vutte ‘‘ko nu kho, bhikkhave, jātibhūmiyaṃ jātibhūmakānaṃ bhikkhūnaṃ sabrahmacārīnaṃ evaṃ sambhāvito ‘attanā ca appiccho appicchakathañca bhikkhūnaṃ kattā’’’ti (ma. ni. 1.252) dasakathāvatthulābhiṃ bhikkhuṃ pucchi. Tepi ‘‘puṇṇo nāma, bhante, āyasmā mantāṇiputto’’ti ārocayiṃsu. Unter jenem Thera Puṇṇa traten fünfhundert Söhne aus gutem Hause in den Orden ein. Der Thera unterwies sie in den zehn Themen der Rede (dasakathāvatthu). Und sie alle, durch die zehn Themen der Rede unterwiesen, verharrten in seiner Lehre, erlangten die Arahatschaft und erkannten, dass das Ziel ihres Mönchseins erreicht war. Sie traten vor ihren Upajjhāya-Lehrer und sprachen: „Ehrwürdiger Herr, wir haben den Gipfel der mönchischen Pflichten erreicht und sind im Besitz der zehn Themen der Rede. Nun ist es für uns an der Zeit, den Zehnkraft-Besitzer zu sehen.“ Als der Thera ihre Worte hörte, dachte er: „Der Meister weiß, dass ich die zehn Themen der Rede besitze. Wenn ich die Lehre verkünde, tue ich dies, ohne die zehn Themen der Rede auszulassen. Wenn ich reise, werden mich alle diese Mönche begleiten und umgeben. So in einer großen Schar zu reisen, um den Zehnkraft-Besitzer zu sehen, ist für mich unschicklich. Mögen sie erst einmal vorausgehen, um den Zehnkraft-Besitzer zu sehen.“ Daraufhin sprach er zu ihnen: „Freunde, geht ihr voraus und seht den Zehnkraft-Besitzer! Erweist dem Tathāgata in meinem Namen Ehrfurcht an seinen Füßen. Auch ich werde auf dem Weg, den ihr gegangen seid, nachfolgen.“ Da verneigten sich alle jene Theras – die aus dem Heimatland des Zehnkraft-Besitzers stammten, allesamt Triebbefreite (khīṇāsavā) waren und die zehn Themen der Rede beherrschten –, ohne die Unterweisung ihres Upajjhāya-Lehrers zu vernachlässigen, vor dem Thera, wanderten allmählich von Ort zu Ort, legten eine Wegstrecke von sechzig Yojanas zurück, erreichten das Veḷuvana-Großkloster in Rājagaha, erwiesen den Füßen des Zehnkraft-Besitzers Ehrfurcht und setzten sich auf eine Seite. Es ist die Gewohnheit der erhabenen Buddhas, neu angekommene Mönche freundlich zu begrüßen; so hielt der Erhabene mit ihnen ein süßes, freundliches Gespräch, indem er fragte: „Geht es euch gut, o Mönche? Ist es erträglich?“ und so weiter, und fragte sie schließlich: „Und woher kommt ihr, o Mönche?“ Als sie antworteten: „Aus der Heimatregion“, fragte er nach dem Mönch, der die zehn Themen der Rede beherrscht: „Wer ist wohl, o Mönche, in der Heimatregion unter den dort lebenden Mönchen, den Gefährten im heiligen Leben, so hoch angesehen, dass er selbst genügsam ist und zu den Mönchen über Genügsamkeit spricht...?“ Sie antworteten: „Ehrwürdiger Herr, es ist der Ehrwürdige Puṇṇa, der Sohn der Mantāṇi.“ Tesaṃ kathaṃ sutvā āyasmā sāriputto theraṃ dassanakāmo ahosi. Atha satthā rājagahato sāvatthiṃ agamāsi. Puṇṇattheropi dasabalassa tattha āgatabhāvaṃ sutvā ‘‘satthāraṃ passissāmī’’ti gantvā antogandhakuṭiyaṃyeva tathāgataṃ sampāpuṇi. Satthā tassa dhammaṃ desesi. Thero dhammaṃ sutvā dasabalaṃ vanditvā paṭisallānatthāya andhavanaṃ gantvā aññatarasmiṃ rukkhamūle divāvihāraṃ nisīdi. Sāriputtattheropi tassāgamanaṃ sutvā sīsānulokiko gantvā okāsaṃ sallakkhetvā tasmiṃ rukkhamūle nisinnakaṃ upasaṅkamitvā therena saddhiṃ sammoditvā taṃ visuddhikkamaṃ (ma. ni. 1.257) pucchi. Sopissa pucchitapucchitaṃ byākaronto rathavinītūpamāya ativiya cittaṃ ārādhesi. Te aññamaññassa subhāsitaṃ samanumodiṃsu. Als der Ehrwürdige Sāriputta diese Rede hörte, wünschte er den Thera zu sehen. Danach begab sich der Meister von Rājagaha nach Sāvatthī. Auch der Thera Puṇṇa erfuhr, dass der Zehnkraft-Besitzer dorthin gekommen war. Mit dem Gedanken „Ich will den Meister sehen“ reiste er dorthin und traf den Tathāgata direkt in der Duftkammer (gandhakuṭi) an. Der Meister verkündete ihm die Lehre. Nachdem der Thera die Lehre gehört hatte, verneigte er sich vor dem Zehnkraft-Besitzer, begab sich zwecks Abgeschiedenheit in den Andhavana-Wald und setzte sich am Fuße eines Baumes für die Mittagsruhe nieder. Auch der Thera Sāriputta hörte von dessen Ankunft, hielt Ausschau (indem er die Köpfe betrachtete), ersah die Gelegenheit, begab sich zu dem am Fuße des Baumes Sitzenden und befragte ihn, nach einem freundlichen Austausch mit dem Thera, über den Weg der Reinheit (visuddhikkama). Dieser beantwortete jede seiner Fragen im Detail und erfreute dessen Geist überaus durch das Gleichnis von den Postwagen (rathavinītūpama). So erfreuten sie sich gegenseitig an den wohlgesprochenen Worten des anderen. 434. Atha naṃ satthā aparabhāge bhikkhusaṅghassa majjhe nisinno theraṃ ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ dhammakathikānaṃ yadidaṃ puṇṇo’’ti (a. ni. 1.188, 196) etadagge ṭhapesi. So pubbakammaṃ saritvā somanassavasena pubbacaritāpadānaṃ vibhāvento ajjhāyakotiādimāha. Tattha ajjhāyakoti anekabrāhmaṇānaṃ vācetā sikkhāpetā. Mantadharoti mantānaṃ dhāretāti attho, vedasaṅkhātassa catutthavedassa sajjhāyanasavanadānānaṃ vasena dhāretāti vuttaṃ hoti. Tiṇṇaṃ vedānanti iruvedayajuvedasāmavedasaṅkhātānaṃ tiṇṇaṃ vedānaṃ ñāṇena dhāretabbatā ‘‘vedo’’ti laddhanāmesu tīsu vedaganthesu pāraṃ pariyosānaṃ gatoti attho[Pg.308]. Purakkhatomhi sissehīti mama niccaparivārabhūtehi sissehi parivuto ahaṃ amhi. Upagacchiṃ naruttamanti narānaṃ uttamaṃ bhagavantaṃ upasaṅkamiṃ, samīpaṃ gatoti attho. Sesaṃ suviññeyyameva. 434. Daraufhin setzte ihn der Meister zu einem späteren Zeitpunkt, als er inmitten der Mönchsgemeinschaft saß, auf den höchsten Rang (etadagga) mit den Worten: „Dies ist der Höchste, o Mönche, unter meinen mönchischen Jüngern, die Verkünder der Lehre (dhammakathikā) sind, nämlich Puṇṇa.“ Dieser erinnerte sich an seine früheren Taten und legte, bewegt von tiefer Freude, sein früheres Wirken (apadāna) dar, beginnend mit den Worten: „Ein Lehrer (ajjhāyako) ...“ und so weiter. Darin bedeutet „ajjhāyako“: einer, der viele Brahmanen rezitieren lässt und sie unterweist. „Mantadharo“ bedeutet: ein Bewahrer der Mantras (heiligen Texte); damit ist gemeint, dass er den als Veda bezeichneten vierten Veda durch Rezitation, Anhören und Weitergeben bewahrt. „Tiṇṇaṃ vedānaṃ“ bezieht sich auf die drei Vedas, bekannt als Iru-Veda (Rigveda), Yaju-Veda (Yajurveda) und Sāma-Veda (Samaveda). Weil diese mit Wissen bewahrt werden müssen, erhielten sie den Namen „Veda“; in diesen drei Veda-Schriften war er zur Meisterschaft und Vollendung gelangt (pāraṃ pariyosānaṃ gato) – so lautet die Bedeutung. „Purakkhatomhi sissehi“ bedeutet: Ich war von meinen Schülern umgeben, die meine ständige Begleitschar bildeten. „Upagacchiṃ naruttamaṃ“ bedeutet: Ich trat vor den Höchsten der Menschen, den Erhabenen; das heißt, ich begab mich in seine Nähe. Der Rest ist leicht verständlich. 438. Abhidhammanayaññūhanti ahaṃ tadā tassa buddhassa kāle abhidhammanayakovidoti attho. Kathāvatthuvisuddhiyāti kathāvatthuppakaraṇe visuddhiyā cheko, appicchasantuṭṭhikathādīsu dasasu kathāvatthūsu vā cheko, tāya kathāvatthuvisuddhiyā sabbesaṃ yatijanānaṃ paṇḍitānaṃ viññāpetvāna bodhetvāna anāsavo nikkileso viharāmi vāsaṃ kappemi. 438. „Abhidhammanayaññū“ bedeutet: Ich war damals zur Zeit jenes Buddhas erfahren in den Methoden des Abhidhamma (abhidhammanayakovido) – so lautet die Bedeutung. „Kathāvatthuvisuddhiyā“ bedeutet: erfahren in der Reinheit des Kathāvatthu-Werks (kathāvatthuppakaraṇa) oder erfahren in den zehn Themen der Rede (dasasu kathāvatthūsu), wie der Rede über Genügsamkeit (appiccha-kathā), Zufriedenheit (santuṭṭhi-kathā) und so weiter. Durch diese Reinheit der Rede-Themen (kathāvatthuvisuddhi) klärte ich alle Asketen und Weisen auf, belehrte sie, und so lebe ich triebfrei (anāsavo), frei von Befleckungen (nikkileso), und verbringe mein Dasein. 439. Ito pañcasate kappeti ito pañcabuddhapaṭimaṇḍitato bhaddakappato pañcasate kappe suppakāsakā suṭṭhu pākaṭā cakkaratanādi sattahi ratanehi sampannā jambudīpādicatudīpamhi issarā padhānā caturo cattāro cakkavattirājāno ahesunti attho. Sesaṃ vuttanayamevāti. 439. „Vor fünfhundert Äonen von hier aus“ (ito pañcasate kappe) bedeutet: in einem Äon, das fünfhundert Äonen von diesem mit fünf Buddhas geschmückten glücklichen Äon (bhaddakappa) entfernt ist. Dort gab es vier weitberühmte (suppakāsakā), mit den sieben Kostbarkeiten – beginnend mit dem Rad-Juwel (cakkaratana) – ausgestattete, auf den vier Kontinenten wie Jambudīpa herrschende universelle Monarchen (cakkavattirājāno) – so lautet die Bedeutung. Der Rest ist in der bereits erklärten Weise zu verstehen. Puṇṇamantāṇiputtattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Lebensgeschichte des ehrwürdigen Puṇṇa Mantāṇiputta ist abgeschlossen. 3-6. Upālittheraapadānavaṇṇanā 3-6. Die Erklärung der Lebensgeschichte des ehrwürdigen Upāli (Upālitthera-apadāna-vaṇṇanā) Nagare haṃsavatiyātiādikaṃ āyasmato upālittherassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato kāle haṃsavatīnagare vibhavasampanne brāhmaṇakule nibbatto. Ekadivasaṃ satthu santike dhammakathaṃ suṇanto satthāraṃ ekaṃ bhikkhuṃ vinayadharānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapentaṃ disvā satthu adhikārakammaṃ katvā taṃ ṭhānantaraṃ patthesi. Mit den Worten „In der Stadt Haṃsāvatī“ beginnt das Apadāna des ehrwürdigen Thera Upāli. Auch er hatte unter früheren Buddhas ein Gelübde abgelegt und in verschiedenen Existenzen heilsame Verdienste angesammelt, die zur Grundlage für die Befreiung aus dem Daseinskreislauf wurden. Zur Zeit des erhabenen Padumuttara wurde er in der Stadt Haṃsāvatī in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie geboren. Als er eines Tages in der Gegenwart des Meisters einer Lehrrede lauschte, sah er, wie der Meister einen Mönch auf den höchsten Rang derer setzte, die die Ordensregeln bewahren. Er vollbrachte eine verdienstvolle Tat für den Meister und ersehnte eben diesen Rang. So yāvajīvaṃ kusalaṃ katvā devamanussesu saṃsaranto imasmiṃ buddhuppāde kappakagehe nibbatto. Upālītissa nāmaṃ akaṃsu. So vayappatto anuruddhādīnaṃ channaṃ khattiyānaṃ piyasahāyo hutvā tathāgate anupiyambavane viharante pabbajjāya nikkhamantehi chahi khattiyehi saddhiṃ nikkhamitvā pabbaji. Tassa pabbajjāvidhānaṃ pāḷiyaṃ (cūḷava. 330 ādayo) āgatameva. So pabbajitvā upasampanno [Pg.309] hutvā satthu santike kammaṭṭhānaṃ gahetvā ‘‘mayhaṃ, bhante, araññavāsaṃ anujānāthā’’ti āha. ‘‘Bhikkhu araññe vasantassa ekameva dhuraṃ vaḍḍhissati, mayhaṃ pana santike vasantassa vipassanādhurañca ganthadhurañca paripūressatī’’ti. So satthu vacanaṃ sampaṭicchitvā vipassanāya kammaṃ karonto nacirasseva arahattaṃ pāpuṇi. Satthāpi naṃ sayameva sakalaṃ vinayapiṭakaṃ uggaṇhāpesi. So aparabhāge bhārukacchavatthuṃ ajjukavatthuṃ kumārakassapavatthunti imāni tīṇi vatthūni vinicchini. Satthā ekekasmiṃ vinicchaye sādhukāraṃ datvā tayo vinicchaye aṭṭhuppattiṃ katvā theraṃ vinayadharānaṃ aggaṭṭhāne ṭhapesi. Nachdem er zeit seines Lebens heilsame Taten vollbracht hatte und im Kreislauf der Wiedergeburten unter Göttern und Menschen umhergewandert war, wurde er in dieser jetzigen Buddha-Ära im Hause eines Barbiers wiedergeboren. Sie gaben ihm den Namen Upāli. Als er das reife Alter erreicht hatte, wurde er der geliebte Gefährte der sechs Kṣatriya-Prinzen, angeführt von Anuruddha. Als der Erhabene im Mango-Hain von Anupiya verweilte, zog er zusammen mit den sechs Kṣatriyas aus, die das Haus verließen, um die Hauslosigkeit anzunehmen, und trat in den Orden ein. Der Ablauf seiner Ordination ist im Pāḷi-Kanon überliefert. Nachdem er ordiniert worden war und die höhere Weihe erhalten hatte, empfing er in der Gegenwart des Meisters ein Meditationsobjekt und sagte: „Ehrwürdiger Herr, erlaubt mir bitte das Leben im Wald.“ Der Meister sprach: „Mönch, wenn du im Wald lebst, wird sich nur eine einzige Pflicht entfalten. Wenn du jedoch in meiner Nähe verweilst, wirst du sowohl die Pflicht der Einsichtsmeditation als auch die Pflicht des Schriftenstudiums erfüllen.“ Er nahm die Worte des Meisters an, widmete sich der Einsichtspraxis und erlangte schon bald die Arahatschaft. Der Meister selbst ließ ihn das gesamte Vinaya-Piṭaka erlernen. Zu einer späteren Zeit entschied er diese drei Rechtsfälle: den Fall von Bhārukaccha, den Fall von Ajjuka und den Fall von Kumārakassapa. Bei jeder einzelnen Entscheidung spendete der Meister Beifall, machte diese drei Entscheidungen zum Anlass für eine Lehrdarlegung und setzte den Thera an die höchste Stelle jener Mönche, die den Vinaya bewahren. 441. Evaṃ so etadaggaṭṭhānaṃ patvā attano pubbakammaṃ saritvā somanassappatto taṃ pubbacaritāpadānaṃ pakāsento nagare haṃsavatiyātiādimāha. Tattha haṃsavatiyāti haṃsāvaṭṭaākārena vati pākāraparikkhepo yasmiṃ nagare, taṃ nagaraṃ haṃsavatī. Atha vā anekasaṅkhā haṃsā taḷākapokkharaṇīsarapallalādīsu nivasantā ito cito ca vidhāvamānā vasanti etthāti haṃsavatī, tassā haṃsavatiyā. Sujāto nāma brāhmaṇoti suṭṭhu jātoti sujāto, ‘‘akkhitto anupakuṭṭho’’ti vacanato agarahito hutvā jātoti attho. Asītikoṭinicayoti asītikoṭidhanarāsiko pahūtadhanadhaññavā asaṅkhyeyyadhanadhaññavā brāhmaṇo sujāto nāma ahosinti sambandho. 441. Als er so diese höchste Auszeichnung erlangt hatte, erinnerte er sich an seine früheren Taten, geriet in freudige Erregung und sprach, um die Taten seines früheren Lebens zu offenbaren, die Verse beginnend mit „In der Stadt Haṃsāvatī“. Darin bedeutet „in Haṃsāvatī“: Die Stadt, deren schützende Stadtmauer kreisförmig angelegt ist wie der Flug von Gänsen, heißt Haṃsāvatī. Oder aber: Weil unzählige Gänse in den Teichen, Lotusteichen, Seen und Sümpfen leben und dort von einer Seite zur anderen fliegen, heißt sie Haṃsāvatī; der Genitiv bezieht sich auf jene Stadt Haṃsāvatī. „Ein Brāhmāne namens Sujāta“: Er war wohlgeboren (su-jāto), das heißt, gemäß dem Ausdruck „ungetadelt und makellos“ wurde er frei von jedem Tadel geboren. „Ein Schatz von achtzig Millionen“: Er besaß ein Vermögen von achtzig Millionen, hatte im Überfluss Getreide und Schätze und war unermesslich reich. Der Satzzusammenhang ist: „Es gab einen Brāhmanen namens Sujāta [der über diesen Reichtum verfügte].“ 442. Punapi tasseva mahantabhāvaṃ dassento ajjhāyakotiādimāha. Tattha ajjhāyakoti paresaṃ vedattayādiṃ vācetā. Mantadharoti mantā vuccati paññā, athabbanavedabyākaraṇādijānanapaññavāti attho. Tiṇṇaṃ vedāna pāragūti iruvedayajuvedasāmavedasaṅkhātānaṃ tiṇṇaṃ vedānaṃ pariyosānaṃ pattoti attho. Lakkhaṇeti lakkhaṇasatthe, buddhapaccekabuddhacakkavattiitthipurisānaṃ hatthapādādīsu dissamānalakkhaṇapakāsanakaganthe cāti attho. Itihāseti ‘‘itiha āsa itiha āsā’’ti porāṇakathāppakāsake ganthe. Sadhammeti sakadhamme brāhmaṇadhamme pāramiṃ gato pariyosānaṃ koṭiṃ gato pattoti attho. 442. Um erneut seine große Bedeutung aufzuzeigen, sprach er die Verse beginnend mit „ajjhāyako“. Darin bedeutet „ajjhāyako“: einer, der andere in den drei Veden unterweist. „Mantadharo“: Als „mantā“ wird die Weisheit bezeichnet; gemeint ist einer, der die Weisheit besitzt, den Atharvaveda, die Grammatik und andere Wissenschaften zu verstehen. „Der die drei Veden meisterhaft beherrscht“: Einer, der das Ende (die vollständige Beherrschung) der drei Veden – namentlich des Rigveda, Yajurveda und Sāmaveda – erreicht hat. „In den Merkmalen“: In der Wissenschaft von den Körpermerkmalen, das heißt in jenen Schriften, welche die sichtbaren Merkmale an Händen, Füßen usw. von Buddhas, Paccekabuddhas, Cakkavatti-Königen, Frauen und Männern deuten. „In den Chroniken“: In jenen Werken, die alte Überlieferungen („So ist es wahrlich gewesen“) darlegen. „In der eigenen Lehre“: Er hat die Vollendung, den äußersten Gipfel in seiner eigenen Lehre, der Lehre der Brāhmanen, erreicht. 443. Paribbājāti ye nigaṇṭhasāvakā, te sabbe nānādiṭṭhikā tadā mahiyā pathavītale carantīti sambandho. 443. „Die Wanderer“: Dies bezieht sich auf die Jünger der Nigaṇṭhas; sie alle, die unterschiedliche Ansichten vertraten, wanderten damals auf der Erdoberfläche umher – dies ist der Satzzusammenhang. 445. Yāva [Pg.310] yattakaṃ kālaṃ jino nuppajjati, tāva tattakaṃ kālaṃ buddhoti vacanaṃ natthīti attho. 445. Solange der Sieger (der Buddha) nicht in der Welt erscheint, so lange gibt es auch das Wort „Buddha“ nicht; dies ist die Bedeutung. 446. Accayena ahorattanti aho ca ratti ca ahorattaṃ, bahūnaṃ saṃvaccharānaṃ atikkamenāti attho. Sesaṃ suviññeyyameva. 446. „Mit dem Vergehen von Tag und Nacht“: Tag und Nacht bilden „Tag-und-Nacht“; gemeint ist „mit dem Vergehen von vielen Jahren“. Der Rest ist leicht verständlich. 454. Mantāṇiputtoti mantāṇīnāmāya kappakadhītuyā putto, māsapuṇṇatāya divasapuṇṇatāya puṇṇoti laddhanāmoti attho. Tassa satthussa sāvako hessati bhavissatīti sambandho. 454. „Der Sohn der Mantāṇī“: Der Sohn der Tochter eines Barbiers namens Mantāṇī. „Puṇṇa“ bedeutet, dass er diesen Namen („der Volle“) wegen der Vollendung der Monate, der Vollendung der Tage oder der Fülle an Besitztümern erhielt. Der Satzzusammenhang lautet: „Er wird ein Jünger jenes Meisters werden.“ 455. Evaṃ kittayi so buddhoti so padumuttaro bhagavā evaṃ iminā pakārena sunandaṃ sundarākārena somanassadāyakaṃ kittayi byākaraṇamadāsīti attho. Sabbaṃ janaṃ sakalajanasamūhaṃ sādhukaṃ hāsayanto somanassaṃ karonto sakaṃ balaṃ attano balaṃ dassayanto pākaṭaṃ karontoti sambandho. 455. „So verkündete jener Buddha“: Jener erhabene Padumuttara pries auf diese Weise Sunanda, der auf vortreffliche Weise Freude und Heiterkeit schenkte, und gab ihm die Prophezeiung. Der Satzzusammenhang lautet: Er erfreute das gesamte Volk auf vortreffliche Weise, schenkte ihm Freude, zeigte seine eigene Kraft und machte sie offenkundig. 456. Tato anantaraṃ attano ānubhāvaṃ aññāpadesena dassento katañjalītiādimāha. Tadā tasmiṃ buddhuppādato purimakāle sunandaṃ tāpasaṃ katañjalipuṭā sabbe janā namassantīti sambandho. Buddhe kāraṃ karitvānāti evaṃ so sabbajanapūjitopi samāno ‘‘pūjitomhī’’ti mānaṃ akatvā buddhasāsane adhikaṃ kiccaṃ katvā attano gatiṃ jātiṃ sodhesi parisuddhamakāsīti attho. 456. Gleich danach sprach er, um seine eigene Macht indirekt aufzuzeigen, die Verse beginnend mit „katañjalī“. Damals, in der Zeit vor dem Erscheinen des Buddha, verehrten alle Menschen den Asketen Sunanda mit ehrerbietig zusammengelegten Händen; dies ist der Satzzusammenhang. „Nachdem er dem Buddha Ehrung erwiesen hatte“: Obwohl er von allen Menschen so verehrt wurde, wurde er nicht stolz im Sinne von „Ich werde verehrt“, sondern vollbrachte eine herausragende Tat in der Lehre des Buddha und reinigte so seinen künftigen Daseinsweg und seine Wiedergeburt vollständig; dies ist die Bedeutung. 457. Sutvāna munino vacanti tassa sammāsambuddhassa vācaṃ, gāthābandhasukhatthaṃ ā-kārassa rassaṃ katvā ‘‘vaca’’nti vuttaṃ. ‘‘Anāgatamhi addhāne gotamo nāma nāmena satthā loke bhavissatī’’ti imaṃ munino vacanaṃ sutvā yathā yena pakārena gotamaṃ bhagavantaṃ passāmi, tathā tena pakārena kāraṃ adhikakiccaṃ puññasambhāraṃ kassāmi karissāmīti me mayhaṃ saṅkappo cetanāmanasikāro ahu ahosīti sambandho. 457. „Nachdem er die Worte des Weisen gehört hatte“: Dies bezieht sich auf die Worte des vollkommen Erleuchteten. Um des Versmaßes willen wurde das lange „ā“ gekürzt und als „vaca“ ausgedrückt. Nachdem er diese Worte des Weisen gehört hatte: „In einer zukünftigen Epoche wird ein Meister namens Gotama in der Welt erscheint“, entstand in mir der Entschluss, die Willensabsicht und die geistige Ausrichtung: „Auf welche Weise auch immer ich dem erhabenen Gotama begegnen kann, auf diese Weise will ich eine herausragende Tat vollbringen und die Anhäufung von Verdiensten bewirken.“ Dies ist der Satzzusammenhang. 458. Evāhaṃ cintayitvānāti ‘‘ahaṃ kāraṃ karissāmī’’ti evaṃ cintetvā. Kiriyaṃ cintayiṃ mamāti ‘‘mayā kīdisaṃ puññaṃ kattabbaṃ nu kho’’ti kiriyaṃ kattabbakiccaṃ cintayinti attho. Kyāhaṃ kammaṃ ācarāmīti ahaṃ [Pg.311] kīdisaṃ puññakammaṃ ācarāmi pūremi nu khoti attho. Puññakkhette anuttareti uttaravirahite sakalapuññassa bhājanabhūte ratanattayeti attho. 458. „Als ich so dachte“: Nachdem er so gedacht hatte: „Ich werde dieses Verdienstwerk vollbringen.“ „Ich überlegte mein Tun“: Dies bedeutet: „Welche Art von heilsamer Tat sollte ich wohl vollbringen?“, so überlegte er das zu tuende Werk. „Welche Tat soll ich ausführen?“: Dies bedeutet: „Welcherlei verdienstvolles Wirken soll ich praktizieren und erfüllen?“ „Im unübertrefflichen Feld der Verdienste“: Dies bezieht sich auf die Drei Juwelen, die ohnegleichen und das Gefäß für alles Verdienstvolle sind – so ist der Satzzusammenhang herzustellen. 459. Ayañca pāṭhiko bhikkhūti ayaṃ bhikkhu sarabhaññavasena ganthapāṭhapaṭhanato vācanato ‘‘pāṭhiko’’ti laddhanāmo bhikkhu. Buddhasāsane sabbesaṃ pāṭhīnaṃ pāṭhakavācakānaṃ antare vinaye ca agganikkhitto aggo iti ṭhapito. Taṃ ṭhānaṃ tena bhikkhunā pattaṭṭhānantaraṃ ahaṃ patthaye patthemīti attho. 459. „Und dieser rezitierende Mönch“: Dieser Mönch erhielt aufgrund seiner Fähigkeit, die Lehrtexte in melodiöser Weise vorzutragen, zu rezitieren und zu lehren, den Namen „pāṭhika“ (Rezitator). Er wurde in der Lehre des Buddha unter allen Rezitatoren und Lehrern an die Spitze gestellt und im Vinaya als der Höchste eingesetzt. Dies bedeutet: „Ich ersehne eben jene Stellung, jene hohe Würde, die von diesem Mönch erlangt wurde.“ 460. Tato paraṃ attano puññakaraṇūpāyaṃ dassento idaṃ me amitaṃ bhogantiādimāha. Me mayhaṃ amitaṃ pamāṇavirahitaṃ bhogarāsiṃ akkhobhaṃ khobhetuṃ asakkuṇeyyaṃ sāgarūpamaṃ sāgarasadisaṃ tena bhogena tādisena dhanena buddhassa ārāmaṃ māpayeti sambandho. Sesaṃ uttānatthameva. 460. Danach sprach er, um die Vortrefflichkeit seines eigenen Verdienstwirkens aufzuzeigen, die Worte beginnend mit „Idaṃ me amitaṃ bhogaṃ“ („Dies ist mein unermesslicher Reichtum“). Die syntaktische Verknüpfung lautet: „Mit diesem Reichtum, einem solchen Vermögen, das dem Ozean gleicht, unerschütterlich ist und das niemand aufzuwühlen vermag, ließ er für den Buddha ein Kloster errichten.“ „Me“ bedeutet „mein“; „amitaṃ“ bedeutet „unermesslich, ohne Maß“; „bhogarāsiṃ“ bedeutet „Reichtumsanhäufung“. Das Übrige ist von ganz offensichtlicher Bedeutung. 474. Bhikkhusaṅghe nisīditvā sambuddho tena suṭṭhu māpitaṃ kāritaṃ saṅghārāmaṃ paṭiggahetvā tassārāmassānisaṃsadīpakaṃ idaṃ vacanaṃ abravi kathesīti sambandho. 474. Nachdem der vollkommen Erwachte inmitten der Mönchsgemeinde Platz genommen und das von jenem Asketen wohlgebaute und errichtete Kloster für die Gemeinde angenommen hatte, sprach und verkündete er diese Worte, die den Nutzen jenes Klosters aufzeigen. Dies ist die syntaktische Verknüpfung. 475. Kathaṃ? Yo soti yo saṅghārāmadāyako tāpaso sumāpitaṃ kuṭileṇamaṇḍapapāsādahammiyapākārādinā suṭṭhu sajjitaṃ saṅghārāmaṃ buddhassa pādāsi pa-kārena somanassasampayuttacittena adāsi. Tamahaṃ kittayissāmīti taṃ tāpasaṃ ahaṃ pākaṭaṃ karissāmi, uttāniṃ karissāmīti attho. Suṇātha mama bhāsatoti bhāsantassa mayhaṃ vacanaṃ suṇātha, ohitasotā avikkhittacittā manasi karothāti attho. 475. Wie ist das zu verstehen? „Yo so“ („Wer jener“) bezieht sich auf jenen Asketen, den Spender des Klosters, der das wohlgebaute, mit Hallen, Pavillons, Palästen, Mansarden, Mauern usw. herrlich ausgestattete Kloster der Gemeinde und dem Buddha übergab; er gab es in vorzüglicher Weise mit einem von Freude begleiteten Geist. „Tamahaṃ kittayissāmi“ („Ihn werde ich rühmen“) bedeutet: „Ihn, jenen Asketen, werde ich bekannt machen, ich werde ihn offenbaren, ich werde ihn verkünden und verständlich machen“. „Suṇātha mama bhāsato“ („Hört mir zu, während ich spreche“) bedeutet: „Hört auf die Worte von mir, während ich spreche; neigt eure Ohren herzu, hört mit unzerstreutem Geist zu und nehmt es euch zu Herzen“. 476. Tena dinnārāmassa phalaṃ dassento hatthī assā rathā pattītiādimāha. Taṃ suviññeyyameva. 476. Um die Frucht des gespendeten Klosters aufzuzeigen, sprach er deshalb die Worte beginnend mit „hatthī assā rathā pattī“ („Elefanten, Pferde, Streitwagen, Fußsoldaten“). Dies ist leicht zu verstehen. 477. Saṅghārāmassidaṃ phalanti idaṃ āyatiṃ anubhavitabbasampattisaṅkhātaṃ iṭṭhaphalaṃ saṅghārāmadānassa phalaṃ vipākanti attho. 477. „Saṅghārāmassidaṃ phalaṃ“ („Dies ist die Frucht des Klosters“) bedeutet: Dies ist die erwünschte Frucht, verstanden als die in der Zukunft zu erfahrende Fülle von Wohlstand, nämlich die Frucht und Reifung der Gabe eines Klosters an die Gemeinde. 478. Chaḷāsītisahassānīti [Pg.312] chasahassāni asītisahassāni samalaṅkatā suṭṭhu alaṅkatā sajjitā nāriyo itthiyo vicittavatthābharaṇāti vicittehi anekarūpehi vatthehi ābharaṇehi ca samannāgatā. Āmuttamaṇikuṇḍalāti olambitamuttāhāramaṇikañcitakaṇṇāti attho. 478. „Chaḷāsītisahassāni“ („Sechsundachtzigtausend“) bedeutet: sechstausend und achtzigtausend. „Samalaṅkatā“ bedeutet: wohlgeschmückt und herrlich hergerichtet. „Nāriyo“ bedeutet: Frauen. „Vicittavatthābharaṇā“ („mit bunten Gewändern und Schmuck versehen“) bedeutet: ausgestattet mit bunten, vielfältigen Gewändern und Schmuckgegenständen. „Āmuttamaṇikuṇḍalā“ („mit Perlenschmuck und Juwelen-Ohrringen geschmückt“) bedeutet: behängt mit Perlenhalsketten und Ohrringen, die mit Edelsteinen verziert sind. 479. Tāsaṃ itthīnaṃ rūpasobhātisayaṃ vaṇṇento āḷārapamhātiādimāha. Tattha āḷārāni mahantāni akkhīni maṇiguḷasadisāni yāsaṃ itthīnaṃ tā āḷārapamhā bhamarānamiva mandalocanāti attho. Hasulā hāsapakati, līlāvilāsāti attho. Susaññāti sundarasaññitabbasarīrāvayavā. Tanumajjhimāti khuddakaudarapadesā. Sesaṃ uttānameva. 479. Um die außerordentliche Schönheit der Gestalt jener Frauen zu preisen, sprach er die Worte beginnend mit „āḷārapamhā“ („mit geschwungenen Wimpern“). Darin bezieht sich „āḷārapamhā“ auf jene Frauen, deren Wimpern fein geschwungen sind und die große, klare Augen besitzen, welche Perlenkugeln gleichen; dies bedeutet, dass sie sanfte Augen haben wie Bienen. „Hasulā“ bedeutet von heiterer Natur, was eine anmutige und verspielte Ausstrahlung meint. „Susaññā“ bedeutet mit einem wohlgeformten Körperbau versehen. „Tanumajjhimā“ bedeutet mit einer schlanken Taille (einer kleinen Bauchgegend). Das Übrige ist ganz offensichtlich. 484. Tassa dhammesu dāyādoti tassa gotamassa bhagavato dhammesu dāyādo dhammakoṭṭhāsabhāgī. Orasoti urasi jāto, sithiladhanitādidasavidhabyañjanabuddhisampannaṃ kaṇṭhatāluoṭṭhādipañcaṭṭhāne ghaṭṭetvā desitadhammaṃ sutvā sotāpattimaggādimaggapaṭipāṭiyā sabbakilese khepetvā arahatte ṭhitabhāvena urasi jātaputtoti attho. Dhammanimmitoti dhammena samena adaṇḍena asatthena nimmito pākaṭo bhavissasīti attho. Upāli nāma nāmenāti kiñcāpi so mātu nāmena mantāṇiputtanāmo, anuruddhādīhi pana saha gantvā pabbajitattā khattiyānaṃ upasamīpe allīno yutto kāyacittehi samaṅgībhūtoti upālīti nāmena satthu sāvako hessati bhavissatīti attho. 484. „Tassa dhammesu dāyādo“ („Erbe seiner Lehren“) bedeutet: Erbe der Lehren jener erhabenen Gotama, ein Teilhaber an der Schatzkammer des Dhamma. „Oraso“ („an der Brust geboren“) bedeutet: an der Brust geboren; nachdem er die dargelegte Lehre gehört hatte, die unter Berührung der fünf Artikulationsstellen (wie Kehle, Gaumen, Lippen etc.) und vollkommen ausgestattet mit den zehn Lautqualitäten (wie weichen und harten Lauten) verkündet wurde, hat er durch die Abfolge der Pfade beginnend mit dem Pfad des Stromeintritts alle Befleckungen vernichtet, verweilt nun im Zustand der Arhatschaft und ist somit ein an der Brust geborener Sohn. „Dhammanimmito“ („durch die Lehre geschaffen“) bedeutet: durch den Dhamma, durch Gerechtigkeit, ohne Strafe und ohne Waffen gezähmt und geformt; er wird weithin bekannt werden. „Upāli nāma nāmena“ („Upāli mit Namen“) bedeutet: Obwohl er nach dem Namen seiner Mutter eigentlich Mantāṇiputta hieß, ging er zusammen mit Anuruddha und den anderen Fürsten fort und ordinierte; weil er sich den Kṣatriyas anschloss, ihnen nahestand und in Körper und Geist vollkommen mit ihnen vereint war, wird er unter dem Namen Upāli ein Schüler des Meisters werden. 485. Vinaye pāramiṃ patvāti vinayapiṭake koṭiṃ pariyosānaṃ patvā pāpuṇitvā. Ṭhānāṭṭhāne ca kovidoti kāraṇākāraṇe ca dakkho chekoti attho. Jinasāsanaṃ dhārentoti jinena vuttānusāsaniṃ jinassa piṭakattayaṃ vācanasavanacintanadhāraṇādivasena dhārento, sallakkhentoti attho. Viharissatināsavoti nikkileso catūhi iriyāpathehi aparipatantaṃ attabhāvaṃ harissati pavattessatīti attho. 485. „Vinaye pāramiṃ patvā“ („die Vollendung im Vinaya erreicht habend“) bedeutet: das Äußerste und das Ende im Vinaya-Piṭaka erreicht und erlangt habend. „Ṭhānāṭṭhāne ca kovido“ („kundig im Möglichen und Unmöglichen“) bedeutet: geschickt und weise in Bezug auf Ursache und Nicht-Ursache. „Jinasāsanaṃ dhārento“ („die Lehre des Siegers bewahrend“) bedeutet: die vom Sieger verkündete Unterweisung, das dreifache Körbchen (Piṭaka) des Siegers, durch Rezitation, Zuhören, Nachdenken und Einprägen bewahrend und verinnerlichend. „Viharissatināsavo“ („Er wird frei von Trieben verweilen“) bedeutet: frei von Befleckungen (nikkileso) wird er seine Existenz in den vier Körperhaltungen ununterbrochen fortführen und aufrechterhalten. 487. Aparimeyyupādāyāti [Pg.313] anekasatasahasse ādiṃ katvā. Patthemi tava sāsananti ‘‘gotamassa bhagavato sāsane vinayadharānaṃ aggo bhaveyya’’nti tuyhaṃ sāsanaṃ patthemi icchāmīti attho. So me atthoti so etadaggaṭṭhānantarasaṅkhāto attho me mayā anuppattoti attho. Sabbasaṃyojanakkhayoti sabbesaṃ saṃyojanānaṃ khayo mayā anuppattoti sambandho, nibbānaṃ adhigatanti attho. 487. „Aparimeyyupādāya“ („beginnend mit Unermesslichem“) bedeutet: beginnend mit vielen Hunderttausenden (von Äonen). „Patthemi tava sāsanaṃ“ („Ich erbitte in deiner Lehre“) bedeutet: „Ich wünsche und erbitte in deiner Lehre: ‚Möge ich der Vorzüglichste unter den Bewahrern des Vinaya in der Lehre des erhabenen Gotama sein‘“. „So me attho“ („Dieses mein Ziel“) bedeutet: Dieses Ziel, das in der Erlangung jener höchsten Stellung (etadagga) besteht, wurde von mir erreicht. „Sabbasaṃyojanakkhayo“ („die Vernichtung aller Fesseln“) ist syntaktisch zu verknüpfen mit: „wurde von mir erreicht“, was bedeutet, dass das Nirvāna erlangt wurde. 488. Rājadaṇḍena tajjito pīḷito sūlāvuto sūle āvuto āvuṇito poso puriso sūle sātaṃ madhurasukhaṃ avindanto nānubhavanto parimuttiṃva parimocanameva icchati yathāti sambandho. 488. Die syntaktische Verknüpfung lautet: „Ebenso wie ein Mensch, der durch königliche Strafe bedroht und gepeinigt und an einen Pfahl gespießt ist, am Pfahl keinerlei Linderung, angenehmes oder süßes Glück erfährt und empfindet, sondern einzig und allein nach der Befreiung verlangt...“ 489-90. Mahāvīra vīrānamantare vīruttama ahaṃ bhavadaṇḍena jātidaṇḍena, tajjito pīḷito kammasūlāvuto kusalākusalakammasūlasmiṃ āvuto santo saṃvijjamāno, pipāsāvedanāya pipāsāturabhāvena aṭṭito abhibhūto dukkhāpito bhave sātaṃ saṃsāre madhuraṃ sukhaṃ na vindāmi na labhāmi. Rāgaggidosaggimohaggisaṅkhātehi, narakaggikappuṭṭhānaggidukkhaggisaṅkhātehi vā tīhi aggīhi ḍayhanto parimuttiṃ parimuccanupāyaṃ gavesāmi pariyesāmi tathevāti sambandho. Yathā rājadaṇḍaṃ ito gato patto parimuttiṃ gavesati, tathā ahaṃ bhavadaṇḍappatto parimuttiṃ gavesāmīti sambandho. 489-90. Die syntaktische Verknüpfung lautet: „O großer Held, Höchster unter den Helden! Ich bin bedroht und gepeinigt durch die Strafe des Werdens (Daseins) und die Strafe der Geburt; aufgespießt auf den Pfahl des Kamma – festgehalten am Pfahl heilsamer und unheilsamer Taten –, gequält, überwältigt und leidend durch die Empfindung des Durstes (der Begierde) und durch den Zustand des Durstleidens, erfahre und erlange ich im Werden, im Kreislauf des Saṃsāra, keinerlei Linderung, süßes Glück. Während ich von den drei Feuern verbrannt werde – den Feuern von Gier, Hass und Verblendung, oder alternativ den Feuern der Begierde, des Weltenbrandes und des Leidens –, suche und begehre ich auf ebendiese Weise nach Befreiung, nach dem Weg zur Befreiung. Ebenso wie jemand, der von der königlichen Strafe betroffen ist, nach Befreiung sucht, so suche ich, der ich von der Strafe des Daseins betroffen bin, nach Befreiung.“ 491-2. Puna saṃsārato mocanaṃ upamopameyyavasena dassento yathā visādotiādimāha. Tattha visena sappavisena ā samantato daṃsīyittha daṭṭho hotīti visādo, sappadaṭṭhoti attho. Atha vā visaṃ halāhalavisaṃ adati gilatīti visādo, visakhādakoti attho. Yo puriso visādo, tena tādisena visena paripīḷito, tassa visassa vighātāya vināsāya upāyanaṃ upāyabhūtaṃ agadaṃ osadhaṃ gaveseyya pariyeseyya, taṃ gavesamāno visaghātakaṃ visanāsakaṃ agadaṃ osadhaṃ passeyya dakkheyya. So taṃ attano diṭṭhaṃ osadhaṃ pivitvā visamhā visato parimuttiyā parimocanakāraṇā sukhī assa bhaveyya yathāti sambandho. 491-2. Um wiederum die Befreiung aus dem Saṃsāra mittels eines Gleichnisses und dessen Anwendung aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit „yathā visādo“ („wie einer, der von Gift betroffen ist“). Darin bedeutet „visādo“ einen, der von Gift, nämlich Schlangengift, von allen Seiten gebissen, d. h. von einer Schlange gebissen wurde. Oder aber „visādo“ bedeutet einen, der Gift, nämlich das tödliche Halāhala-Gift, schluckt, d. h. einen Giftesser. Welcher Mensch auch immer von Gift betroffen und durch solches Gift gepeinigt ist, der sollte zur Beseitigung und Vernichtung dieses Giftes nach einem Gegenmittel, einer Medizin, suchen. Während er danach sucht, mag er ein giftzerstörendes, giftvernichtendes Gegenmittel, eine Medizin, finden und erblicken. Die syntaktische Verknüpfung lautet: „Ebenso wie jener, nachdem er dieses von ihm gefundene Heilmittel getrunken hat, zur Befreiung vom Gift glücklich sein mag...“ 493. Tathevāhanti [Pg.314] yathā yena pakārena so naro visahato, savisena sappena daṭṭho visakhādako vā osadhaṃ pivitvā sukhī bhaveyya, tatheva tena pakārena ahaṃ avijjāya mohena saṃ suṭṭhu pīḷito. Saddhammāgadamesahanti ahaṃ saddhammasaṅkhātaṃ osadhaṃ esaṃ pariyesantoti attho. 493. „Tathevāhaṃ“ („Ebenso ich“) bedeutet: Ebenso wie jener vom Gift betroffene Mensch, sei er von einer giftigen Schlange gebissen oder ein Giftesser, nach dem Trinken der Medizin gesund werden würde, ebenso bin ich auf ebendiese Weise durch Nichtwissen und Verblendung völlig gequält und leidend gemacht. „Saddhammāgadamesaṃ“ („Ich suche das Heilmittel der wahren Lehre“) bedeutet: „Ich bin einer, der nach dem Heilmittel sucht, welches als die wahre Lehre (Saddhamma) bekannt ist“. 494-5. Dhammāgadaṃ gavesantoti saṃsāradukkhavisassa vināsāya dhammosadhaṃ gavesanto. Addakkhiṃ sakyasāsananti sakyavaṃsapabhavassa gotamassa sāsanaṃ saddakkhinti attho. Aggaṃ sabbosadhānaṃ tanti sabbesaṃ osadhānaṃ antare taṃ sakyasāsanasaṅkhātaṃ dhammosadhaṃ aggaṃ uttamanti attho. Sabbasallavinodananti rāgasallādīnaṃ sabbesaṃ sallānaṃ vinodanaṃ vūpasamakaraṃ dhammosadhaṃ dhammasaṅkhātaṃ osadhaṃ pivitvā sabbaṃ visaṃ sakalasaṃsāradukkhavisaṃ samūhaniṃ nāsesinti sambandho. Ajarāmaranti taṃ dukkhavisaṃ samūhanitvā ajaraṃ jarāvirahitaṃ amaraṃ maraṇavirahitaṃ sītibhāvaṃ rāgapariḷāhādivirahitattā sītalabhūtaṃ nibbānaṃ ahaṃ phassayiṃ paccakkhamakāsinti sambandho. 494-5. „Auf der Suche nach der Medizin des Dhamma“ (dhammāgadaṃ gavesanto) bedeutet: auf der Suche nach der Dhamma-Heilmedizin zur Vernichtung des Giftes des Leidens im Samsara. „Ich sah die Lehre der Sakyas“ (addakkhiṃ sakyasāsanaṃ) bedeutet: Ich sah die Lehre Gotamas, der aus dem Geschlecht der Sakyas stammt. „Sie ist die beste aller Heilmedizinen“ (aggaṃ sabbosadhānaṃ taṃ) bedeutet: Unter allen Heilmedizinen ist jene Dhamma-Heilmedizin, die als die Lehre der Sakyas bekannt ist, die vorzüglichste, die höchste. „Alle Pfeile vertreibend“ (sabbasallavinodanaṃ) bedeutet: Nachdem man diese als Dhamma bezeichnete Heilmedizin getrunken hat, welche alle Pfeile wie den Pfeil der Gier (rāgasalla) vertreibt und beschwichtigt, hat man das gesamte Gift, das ganze Gift des Leidens im Samsara, völlig vernichtet; so ist die Verknüpfung. „Das Alterungs- und Todeslose“ (ajarāmaraṃ) bedeutet: Nachdem man jenes Gift des Leidens völlig vernichtet hat, habe ich das Nibbāna berührt – das heißt, ich habe es verwirklicht –, welches alterungslos (frei von Altern), todeslos (frei von Tod) und abgekühlt (sītibhūtaṃ) ist, weil es frei vom Entflammen der Gier und dergleichen ist; so ist der Zusammenhang. 496. Puna kilesatamassa upamaṃ dassento yathā bhūtaṭṭitotiādimāha. Tattha yathā yena pakārena bhūtaṭṭito bhūtena yakkhena aṭṭito pīḷito poso puriso bhūtaggāhena yakkhaggāhena pīḷito dukkhito bhūtasmā yakkhaggāhato parimuttiyā mocanatthāya bhūtavejjaṃ gaveseyya. 496. Um wiederum ein Gleichnis für die Finsternis der Verunreinigungen (kilesatama) zu zeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Wie ein von Geistern Besessener“ (yathā bhūtaṭṭito). Darin bedeutet „wie“ (yathā): in welcher Weise auch immer ein Mensch, der von einem Geist oder Yaksha geplagt, das heißt bedrängt ist (bhūtaṭṭito), durch den Griff eines Geistes gepeinigt und leidend ist, zur Befreiung, das heißt zur Erlösung von diesem Geistergriff, einen Geisterarzt (Exorzisten, bhūtavejja) suchen würde. 497. Taṃ gavesamāno ca bhūtavijjāya suṭṭhu kovidaṃ chekaṃ bhūtavejjaṃ passeyya, so bhūtavejjo tassa yakkhaggahitassa purisassa āvesabhūtaṃ vihane vināseyya, samūlañca mūlena saha āyatiṃ anāsevakaṃ katvā vināsaye viddhaṃseyyāti sambandho. 497. Und während er diesen sucht, würde er einen Geisterarzt erblicken, der in der Geisterbeschwörungskunst (bhūtavijjā) überaus kundig und geschickt ist. Dieser Geisterarzt würde das Besessensein jener vom Yaksha ergriffenen Person vernichten und beseitigen, und er würde es samt der Wurzel (samūlaṃ) zerstören und zunichte machen, sodass es für die Zukunft wirkungslos (nicht wiederkehrend) bleibt; so ist die Verknüpfung. 498. Mahāvīra vīruttama tamaggāhena kilesandhakāraggāhena pīḷito ahaṃ tatheva tena pakāreneva tamato kilesandhakārato parimuttiyā mocanatthāya ñāṇālokaṃ paññāālokaṃ gavesāmīti sambandho. 498. „O großer Held, Höchster an Tatkraft“ (mahāvīra vīruttama): Ich, der ich vom Griff der Finsternis, dem Griff der Finsternis der Verunreinigungen (kilesandhakāra), gepeinigt bin, suche ebenso, genau in jener Weise, das Licht der Erkenntnis, das Licht der Weisheit (ñāṇāloka / paññāāloka), um der Befreiung, das heißt der Erlösung aus der Finsternis der Verunreinigungen willen; so ist der Zusammenhang. 499. Atha [Pg.315] tadanantaraṃ kilesatamasodhanaṃ kilesandhakāranāsakaṃ sakyamuniṃ addasanti attho. So sakyamuni me mayhaṃ tamaṃ andhakāraṃ kilesatimiraṃ bhūtavejjova bhūtakaṃ yakkhaggahitaṃ iva vinodesi dūrī akāsīti sambandho. 499. Daraufhin, unmittelbar im Anschluss daran, bedeutet „Ich sah den Sakya-Weisen“ (sakyamuniṃ addasaṃ): Ich sah den Weisen der Sakyas, der den Schmutz der Verunreinigungen reinigt beziehungsweise die Finsternis der Verunreinigungen vernichtet. Jener Sakya-Weise hat meine Finsternis, das Dunkel der Verunreinigungen, vertrieben, das heißt weit weggeschafft, so wie ein Geisterarzt den Geist bei einem vom Yaksha Besessenen vertreibt; so ist die Verknüpfung. 500. So ahaṃ evaṃ vimutto saṃsārasotaṃ saṃsārapavāhaṃ saṃ suṭṭhu chindiṃ chedesiṃ, taṇhāsotaṃ taṇhāmahoghaṃ nivārayiṃ niravasesaṃ appavattiṃ akāsinti attho. Bhavaṃ ugghāṭayiṃ sabbanti kāmabhavādikaṃ sabbaṃ navabhavaṃ ugghāṭayiṃ vināsesinti attho. Mūlato vināsento bhūtavejjo iva mūlato ugghāṭayinti sambandho. 500. Ich, der ich auf diese Weise befreit bin, habe den Strom des Samsara (saṃsārasota), den Fluss des Samsara, gänzlich durchschnitten. Ich habe den Strom des Begehrens (taṇhāsota), die große Flut des Begehrens, abgewehrt, das heißt restlos zum Erlöschen gebracht; so ist die Bedeutung. „Ich habe alle Existenz entwurzelt“ (bhavaṃ ugghāṭayiṃ sabbaṃ) bedeutet: Ich habe jede neue Existenz, beginnend mit der Sinnesexistenz (kāmabhava) und so weiter, entwurzelt, das heißt vernichtet. Wie ein Geisterarzt, der das Übel von der Wurzel her vernichtet, habe ich es von der Wurzel her entwurzelt; so ist der Zusammenhang. 501. Tato nibbānapariyesanāya upamaṃ dassento yathātiādimāha. Tattha garuṃ bhāriyaṃ nāgaṃ gilatīti garuḷo. Garuṃ vā nāgaṃ lāti ādadātīti garuḷo, garuḷarājā. Attano bhakkhaṃ sakagocaraṃ pannagaṃ pakārena parahatthaṃ na gacchatīti pannagoti laddhanāmaṃ nāgaṃ gahaṇatthāya opatati avapatati, samantā samantato yojanasataṃ satayojanappamāṇaṃ mahāsaraṃ mahāsamuddaṃ attano pakkhavātehi vikkhobheti āloḷeti yathāti sambandho. 501. Um danach ein Gleichnis für die Suche nach dem Nibbāna zu zeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Wie“ (yathā). Darin ist ein „Garuda“ (garuḷo) einer, der eine schwere Last, nämlich eine Schlange (nāga), verschlingt; oder einer, der eine schwere Schlange ergreift, also der Garuda-König. Um die Schlange zu fangen, die den Namen „Pannaga“ (Kriecher) trägt – weil sie auf besondere Weise nicht in die Hände anderer gelangt – und die seine eigene Nahrung und sein Jagdrevier darstellt, stürzt er herab (opatati / avapatati). So wie er dabei mit dem Windstoß seiner Flügel den großen See, das heißt den großen Ozean, im Umkreis von hundert Yojanahs in Aufruhr versetzt, das heißt aufwühlt; so ist der Zusammenhang. 502. So supaṇṇo vihaṅgamo vehāsagamanasīlo pannagaṃ nāmaṃ gahetvā adhosīsaṃ olambetvā viheṭhayaṃ tattha tattha vividhena heṭhanena heṭhento ādāya daḷhaṃ gahetvā yena kāmaṃ yattha gantukāmo, tattha pakkamati gacchatīti sambandho. 502. Jener schöne Vogel (supaṇṇa), dessen Natur das Fliegen am Himmel ist, ergreift die Schlange namens Pannaga, lässt sie kopfüber herabhängen, quält sie hier und da mit vielfältiger Plage, packt sie fest und fliegt dorthin davon, wohin er zu fliegen wünscht; so ist der Zusammenhang. 503. Bhante mahāvīra, yathā garuḷo balī balavā pannagaṃ gahetvā pakkamati, tathā eva ahaṃ asaṅkhataṃ paccayehi akataṃ nibbānaṃ gavesanto paṭipattipūraṇavasena pariyesanto dose sakaladiyaḍḍhakilesasahasse vikkhālayiṃ visesena samucchedappahānena sodhesiṃ ahanti sambandho. 503. Ehrwürdiger Herr, großer Held! Ebenso wie der mächtige, kraftvolle Garuda die Schlange packt und davonfliegt, genau so habe ich – auf der Suche nach dem Unkonditionierten (asaṅkhata), dem durch Bedingungen Ungeschaffenen, dem Nibbāna, und danach strebend durch die Erfüllung der Praxis (paṭipatti) – meine Fehler, nämlich die gesamten eintausendfünfhundert Verunreinigungen (kilesa), abgewaschen (vikkhālayiṃ) und insbesondere durch das Aufgeben mittels Abschneidens (samucchedappahāna) völlig gereinigt; so ist der Zusammenhang. 504. Yathā garuḷo pannagaṃ gahetvā bhuñjitvā viharati, tathā ahaṃ dhammavaraṃ uttamadhammaṃ diṭṭho passanto etaṃ santipadaṃ nibbānapadaṃ anuttaraṃ uttaravirahitaṃ maggaphalehi ādāya gahetvā vaḷañjetvā viharāmīti sambandho. 504. Ebenso wie der Garuda die Schlange ergreift, sie verzehrt und verweilt, genau so verweile ich, indem ich das vortreffliche Dhamma, das höchste Dhamma sehe, diesen friedvollen Zustand, die Stätte des Nibbāna, welche unübertrefflich (anuttara) ist, mittels der Pfade und Früchte (maggaphala) ergreife, erfahre und genieße; so ist der Zusammenhang. 505. Idāni [Pg.316] nibbānassa dullabhabhāvaṃ dassento āsāvatī nāma latātiādimāha. Tattha sabbesaṃ devānaṃ āsā icchā etissaṃ latāyaṃ atthīti āsāvatī nāma latā, cittalatāvane anekavicittāhi latāhi gahanībhūte vane uyyāne jātā nibbattāti attho. Tassā latāya vassasahassena vassasahassaccayena ekaṃ phalaṃ nibbattate ekaṃ phalaṃ gaṇhāti. 505. Um nun die Schwererlangbarkeit (dullabhabhāva) des Nibbāna zu zeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Die Schlingpflanze namens Āsāvatī“ (āsāvatī nāma latā). Darin bedeutet „die Schlingpflanze namens Āsāvatī“: Weil die Hoffnung, das heißt das Begehren (āsā / icchā) aller Götter auf diese Schlingpflanze gerichtet ist, entspross sie im Cittalatā-Hain, einem Gartenwald, der von vielen bunten Schlingpflanzen dicht bewachsen ist. An dieser Schlingpflanze reift nach dem Ablauf von tausend Jahren (vassasahassa) nur eine einzige Frucht heran, sie bringt nur eine einzige Frucht hervor. 506. Taṃ devāti taṃ āsāvatiṃ lataṃ tāva dūraphalaṃ tattakaṃ cirakālaṃ atikkamitvā phalaṃ gaṇhantaṃ saṃvijjamānaṃ devā tāvatiṃsadevatā payirupāsanti bhajanti, sā āsāvatī nāma latuttamā latānaṃ antare uttamalatā evaṃ devānaṃ piyā ahosīti sambandho. 506. „Jene Götter“ (taṃ devā) bedeutet: Die Götter der Tāvatiṃsa-Ebene verehren und pflegen jene Āsāvatī-Schlingpflanze, welche erst nach dem Vergehen einer solch langen Zeit eine Frucht hervorbringt und trägt. Jene edle Schlingpflanze namens Āsāvatī, die vortrefflichste unter allen Schlingpflanzen, war den Göttern auf diese Weise lieb und teuer; so ist der Zusammenhang. 507. Satasahassupādāyāti satasahassasaṃvaccharaṃ ādiṃ katvā. Tāhaṃ paricare munīti monaṃ vuccati ñāṇaṃ, bhante, muni ñāṇavanta sabbaññu, ahaṃ taṃ bhagavantaṃ paricare payirupāsāmi. Sāyaṃpātaṃ namassāmīti sāyanhasamayañca pubbaṇhasamayañcāti dvikkhattuṃ namassāmi paṇāmaṃ karomi. Yathā devā tāvatiṃsā devā viya āsāvatīlataṃ sāyaṃpātañca payirupāsantīti sambandho. 507. „Beginnend mit einhunderttausend“ (satasahassupādāya) bedeutet: beginnend mit einhunderttausend Jahren. „Diesen Weisen verehre ich“ (tāhaṃ paricare muni): „Mona“ bezeichnet die Erkenntnis (ñāṇa); ein Weise (muni), ehrwürdiger Herr, ist der Allwissende, der diese Erkenntnis besitzt. Ich verehre, das heißt diene jenem Erhabenen. „Abends und morgens verneige ich mich“ (sāyaṃpātaṃ namassāmi) bedeutet: Ich erweise ihm am Abend und am Morgen, also zweimal täglich, meine Ehrerbietung. So wie die Tāvatiṃsa-Götter abends und morgens die Āsāvatī-Schlingpflanze verehren; so ist der Zusammenhang. 508. Avañjhā pāricariyāti yasmā buddhadassanahetu nibbānappatti ahosi, tasmā buddhapāricariyā vattapaṭipattikiriyā avañjhā atucchā namassanā paṇāmakiriyā ca amoghā atucchā. Tathā hi dūrāgataṃ dūrato saṃsāraddhānato āgatampi, santaṃ saṃvijjamānaṃ khaṇoyaṃ ayaṃ buddhuppādakkhaṇo na virādhayi nātikkami, maṃ atikkamitvā na gatoti attho. 508. „Nicht vergeblich ist der Dienst“ (avañjhā pāricariyā) bedeutet: Da die Begegnung mit dem Buddha zur Erlangung des Nibbāna führte, ist der Dienst am Buddha – das Ausführen der Pflichten und der Praxis – nicht vergeblich und nicht leer (avañjhā atucchā), und auch das Erweisen der Ehrerbietung ist nicht fruchtlos oder inhaltslos (amoghā). Denn wahrlich, dieser gegenwärtige, günstige Moment des Erscheinens eines Buddhas (buddhuppādakkhaṇa), obwohl er aus weiter Ferne, aus der langen Dauer des Samsara herbeigekommen ist, hat mich nicht verfehlt und ist nicht an mir vorbeigegangen; so ist die Bedeutung. 509. Buddhadassanahetu nibbānappatto ahaṃ āyatiṃ uppajjanakabhave mama paṭisandhiṃ vicinanto upaparikkhanto na passāmīti sambandho. Nirūpadhi khandhūpadhikilesūpadhīhi virahito vippamutto sabbakilesehi vinābhūto upasanto kilesapariḷāhābhāvena santamānaso carāmi ahanti sambandho. 509. „Durch die Begegnung mit dem Buddha habe ich das Nibbāna erlangt“: Wenn ich nach meiner zukünftigen Wiedergeburt (paṭisandhi) in den kommenden Daseinsformen suche und diese untersuche, sehe ich keine; so ist der Zusammenhang. „Frei von Grundlagen“ (nirūpadhi) bedeutet: frei von der Grundlage der Daseinsgruppen (khandhūpadhi) und der Grundlage der Verunreinigungen (kilesūpadhi), erlöst, von allen Verunreinigungen geschieden, friedvoll, wandle ich mit einem beruhigten Geist (santamānaso), da das Brennen der Verunreinigungen erloschen ist; so ist der Zusammenhang. 510. Puna attano buddhadassanāya upamaṃ dassento yathāpi padumaṃ nāmātiādimāha. Sūriyaraṃsena sūriyaraṃsisamphassena yathā padumaṃ nāma [Pg.317] api pupphati vikasati mahāvīra vīruttama ahaṃ tathā eva buddharaṃsena buddhena bhagavatā desitadhammaraṃsippabhāvena pupphitoti attho. 510. Um wiederum ein Gleichnis für seine eigene Begegnung mit dem Buddha darzulegen, sprach er die Worte beginnend mit 'yathāpi padumaṃ' ('Wie eine Lotusblüte...'). Die Bedeutung ist: O großer Held, Höchster der Helden! So wie eine Lotusblüte durch die Sonnenstrahlen, das heißt durch die Berührung der Sonnenstrahlen, erblüht und sich öffnet, ebenso bin ich durch die Buddha-Strahlen erblüht, das heißt durch den Glanz der Strahlen des Dhamma, der vom Erhabenen, dem Buddha, verkündet wurde. 511-12. Puna buddhadassanena nibbānadassanaṃ dīpento yathā balākātiādimāha. Tattha balākayonimhi balākajātiyaṃ sadā sabbasmiṃ kāle pumā puriso yathā na vijjati. Pume avijjamāne kathaṃ balākānaṃ gabbhaggahaṇaṃ hotīti ce? Meghesu gajjamānesu saddaṃ karontesu meghagajjanaṃ sutvā tā balākiniyo sadā sabbakāle gabbhaṃ gaṇhanti aṇḍaṃ dhārentīti attho. Yāva yattakaṃ kālaṃ megho na gajjati megho saddaṃ na karoti, tāva tattakaṃ kālaṃ ciraṃ cirakālena gabbhaṃ aṇḍaṃ dhārenti. Yadā yasmiṃ kāle megho pavassati pakārena gajjitvā vassati vuṭṭhidhāraṃ paggharati, tadā tasmiṃ kāle bhārato gabbhadhāraṇato parimuccanti aṇḍaṃ pātentīti attho. 511-12. Um wiederum zu zeigen, wie man durch das Sehen des Buddha das Nibbāna schaut, sprach er die Worte beginnend mit 'yathā balākā'. Darin bedeutet es: Wie in der Gattung der Kraniche (balākayonimhi) zu keiner Zeit ein männliches Tier existiert. Wenn nun gefragt wird: 'Wie empfangen die Kranichweibchen eine Trächtigkeit, wenn kein Männchen existiert?', so lautet die Antwort: Wenn die Wolken donnern und Getöse machen, hören jene Kranichweibchen das Donnern der Wolken und empfangen so zu allen Zeiten eine Trächtigkeit und tragen ein Ei; das ist die Bedeutung. Solange die Wolke nicht donnert und kein Geräusch macht, solange tragen sie das Ei über eine lange Zeit hinweg im Mutterleib. Wenn aber die Wolke herabregnet, das heißt heftig donnernd regnet und Regenströme vergießt, dann befreien sie sich von der Last des Tragens der Trächtigkeit und legen das Ei ab; das ist die Bedeutung. 513. Tato paraṃ upameyyasampadaṃ dassento padumuttarabuddhassātiādimāha. Padumuttarassa buddhassa dhammameghena vohāraparamatthadesanāsaṅkhātameghena gajjato gajjantassa desentassa dhammameghassa saddena ghosānusārena ahaṃ tadā dhammagabbhaṃ vivaṭṭūpanissayaṃ dānasīlādipuññasambhāragabbhaṃ agaṇhiṃ gahesiṃ tathāti sambandho. 513. Um danach die Anwendung des Gleichnisses auf das zu Vergleichende zu zeigen, sprach er die Worte beginnend mit 'padumuttarassa buddhassa'. Die syntaktische Verbindung lautet: Dem Hall des Tones der Dhamma-Wolke des Buddha Padumuttara folgend, während dieser donnerte – das heißt die Dhamma-Wolke verkündete, welche aus der konventionellen und der absoluten Lehrrede besteht –, empfing ich damals den Schoß des Dhamma, welcher die unterstützende Bedingung für das Aufhören des Kreislaufs (vivaṭṭa) ist und den Schoß der Ansammlung von Verdiensten wie Freigiebigkeit, Tugendhaftigkeit und so weiter darstellt. 514. Satasahassupādāya kappasatasahassaṃ ādiṃ katvā puññagabbhaṃ dānasīlādipuññasambhāraṃ ahaṃ dharemi pūremi. Yāva dhammamegho dhammadesanā na gajjati buddhena na desīyati, tāva ahaṃ bhārato saṃsāragabbhabhārato nappamuccāmi na mocemi na visuṃ bhavāmīti sambandho. 514. Die Verbindung lautet: Beginnend vor einhunderttausend Weltzeitaltern (kappasatasahassaṃ) trug und erfüllte ich den Schoß des Verdienstes, das heißt die Ansammlung von Verdiensten wie Freigiebigkeit, Tugendhaftigkeit und so weiter. Solange die Dhamma-Wolke, das heißt die Dhamma-Verkündung, nicht donnert – also vom Buddha nicht gepredigt wird –, solange werde ich von der Last, nämlich der Last des Schoßes des Samsāra, nicht befreit, entkomme ihr nicht und werde nicht unabhängig davon. 515. Bhante, sakyamuni sakyavaṃsappabhava yadā yasmiṃ kāle suddhodanamahārājassa tava pitu ramme ramaṇīye kapilavatthave kapilavatthunāmake nagare tuvaṃ dhammameghena gajjati ghoseti, tadā tasmiṃ kāle ahaṃ bhārato saṃsāragabbhabhārato parimucciṃ mutto ahosinti sambandho. 515. Die Verbindung lautet: O Herr, Sakya-Weiser, Spross der Sakya-Dynastie! Als du in der lieblichen, angenehmen Stadt namens Kapilavatthu deines Vaters, des Großkönigs Suddhodana, mit der Dhamma-Wolke donnertest und sie verkündetest, da wurde ich von der Last, nämlich der Last des Schoßes des Samsāra, vollständig befreit und erlöst. 516. Tato paraṃ attanā adhigate maggaphale dassento suññatantiādimāha. Tattha attaattaniyādīnaṃ abhāvato suññataṃ vimokkhañca rāgadosamohasabbakilesanimittānaṃ abhāvato, animittaṃ vimokkhañca [Pg.318] taṇhāpaṇidhissa abhāvato, appaṇihitaṃ vimokkhañca ariyamaggaṃ adhigañchiṃ bhāvesinti sambandho. Caturo ca phale sabbeti cattāri sāmaññaphalāni sabbāni sacchi akāsinti attho. Dhammevaṃ vijaṭayiṃ ahanti ahaṃ evaṃ sabbadhamme jaṭaṃ gahanaṃ vijaṭayiṃ viddhaṃsesinti attho. 516. Danach sprach er, um die von ihm selbst erlangten Pfade und Früchte aufzuzeigen, die Worte beginnend mit 'suññataṃ'. Die syntaktische Verbindung darin lautet: Aufgrund der Abwesenheit von einem Selbst (attā), etwas zu einem Selbst Gehörigem (attaniya) und so weiter erlangte und entfaltete ich den edlen Pfad als die Befreiung durch die Leere (suññatavimokkha); aufgrund der Abwesenheit der Merkmale von Gier, Hass, Verblendung und allen Befleckungen als die merkmallose Befreiung (animittavimokkha); und aufgrund der Abwesenheit des Begehrens durch Durst als die wunschlose Befreiung (appaṇihitavimokkha). Der Ausdruck 'und alle vier Früchte' bedeutet: Ich habe alle vier Früchte des Asketentums (sāmaññaphala) verwirklicht. Die Worte 'So entwirrte ich die Phänomene' bedeuten: Ich habe auf diese Weise das Gestrüpp, das Dickicht in allen Phänomenen entwirrt und vernichtet. Dutiyabhāṇavāravaṇṇanā samattā. Die Erklärung des zweiten Rezitationsabschnitts (Bhāṇavāra) ist abgeschlossen. 517. Tato paraṃ attanā adhigatavisesameva dassento aparimeyyupādāyātiādimāha. Tattha na parimeyyoti aparimeyyo, saṃvaccharagaṇanavasena pametuṃ saṅkhātuṃ asakkuṇeyyoti attho. Taṃ aparimeyyaṃ kappaṃ upādāya ādiṃ katvā tava sāsanaṃ tuyhaṃ sāsanaṃ ‘‘anāgate gotamassa bhagavato sāsane vinayadharānaṃ aggo bhaveyya’’nti evaṃ patthemi. Atītatthe vattamānavacanaṃ, patthesinti attho. So me atthoti so patthanāsaṅkhāto attho me mayā anuppatto nipphāditoti attho. Anuttaraṃ santipadaṃ nibbānaṃ anuppattaṃ adhigatanti sambandho. 517. Danach sprach er, um eben jene hervorragende Errungenschaft aufzuzeigen, die von ihm selbst erlangt worden war, die Worte beginnend mit 'aparimeyyaṃ upādāya'. Darin bedeutet 'unermesslich' (aparimeyyo): nicht messbar, das heißt unmöglich durch die Zählung von Jahren zu bemessen oder zu berechnen. Beginnend mit jenem unermesslichen Zeitalter wünschte ich mir in deiner Lehre: 'Möge ich in der zukünftigen Lehre des Erhabenen Gotama der Höchste der Ordensregel-Kundigen (Vinayadhara) sein.' Hier steht das Präsens für die Vergangenheit; die Bedeutung ist: 'ich wünschte mir'. Die Worte 'dieses mein Ziel' bedeuten: Dieses Ziel, das in meinem Wunsch bestand, wurde von mir erreicht und verwirklicht. Die syntaktische Verbindung lautet: Das unübertreffliche Reich des Friedens, das Nibbāna, wurde erreicht und erlangt. 518. So ahaṃ adhigatattā vinaye vinayapiṭake pāramiṃ patto pariyosānappatto. Yathāpi pāṭhiko isīti yathā padumuttarassa bhagavato sāsane vinayadharānaṃ aggo isi bhikkhu pāṭhiko pākaṭo ahosi, tathevāhanti attho. Na me samasamo atthīti vinayadhāritāya me mayā samasamo samāno añño na atthīti attho. Sāsanaṃ ovādānusāsanīsaṅkhātaṃ sāsanaṃ dhāremi pūremīti attho. 518. Eben dieser ich habe aufgrund dieses Erreichens die Vollendung, das heißt das äußerste Ende im Vinaya, dem Vinaya-Piṭaka, erlangt. Die Worte 'wie der Weise Pāṭhika' bedeuten: Wie in der Lehre des Erhabenen Padumuttara der Weise, der Mönch Pāṭhika, als der Höchste unter den Vinaya-Kundigen bekannt war, ebenso bin ich es. Die Worte 'Es gibt niemanden, der mir gleichkommt' bedeuten: Hinsichtlich der Meisterschaft im Vinaya gibt es keinen anderen, der mir gleichkommt oder ebenbürtig ist. 'Die Lehre' bedeutet: Ich bewahre und erfülle die Lehre, die aus Ermahnung und Unterweisung besteht. 519. Punapi attano visesaṃ dassento vinaye khandhake cāpītiādimāha. Tattha vinayeti ubhatovibhaṅge. Khandhaketi mahāvaggacūḷavagge. Tikacchede cāti tikasaṅghādisesatikapācittiyādike ca. Pañcameti parivāre ca. Ettha etasmiṃ sakale vinayapiṭake mayhaṃ vimati dveḷhakaṃ natthi na saṃvijjati. Akkhareti vinayapiṭakapariyāpanne a-kārādike akkhare. Byañjaneti ka-kārādike byañjane vā me vimati saṃsayo natthīti sambandho. 519. Um wiederum seine eigene Besonderheit aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit 'Sowohl im Vinaya als auch in den Khandhakas...'. Darin bedeutet 'im Vinaya': in den beiden Vibhaṅgas (ubhatovibhaṅga). 'In den Khandhakas' bedeutet: im Mahāvagga und Cūḷavagga. 'Und in den Dreier-Analysen' (tikacchede) bedeutet: in den Dreier-Kategorien der Saṅghādisesa- und Pācittiya-Regeln und so weiter. 'Im Fünften' (pañcame) bedeutet: im Parivāra. Hier, in diesem gesamten Vinaya-Piṭaka, gibt es für mich keinen Zweifel und kein Schwanken. Die Verbindung lautet: Weder bei den im Vinaya-Piṭaka enthaltenen Buchstaben (akkhara), beginnend mit 'a', noch bei den Konsonanten (byañjana), beginnend mit 'ka', gibt es für mich irgendeinen Zweifel oder eine Unklarheit. 520. Niggahe [Pg.319] paṭikamme cāti pāpabhikkhūnaṃ niggahe ca sāpattikānaṃ bhikkhūnaṃ parivāsadānādike paṭikamme ca ṭhānāṭṭhāne ca kāraṇe ca akāraṇe ca kovido chekoti attho. Osāraṇe ca tajjanīyādikammassa paṭippassaddhivasena osāraṇe pavesane ca. Vuṭṭhāpane ca āpattito vuṭṭhāpane nirāpattikaraṇe ca chekoti sambandho. Sabbattha pāramiṃ gatoti sabbasmiṃ vinayakamme pariyosānaṃ patto, dakkho chekoti attho. 520. Die Worte 'In der Zurechtweisung und dem Sühneverfahren' bedeuten: sowohl bei der Zurechtweisung schlechter Mönche als auch beim Sühneverfahren (paṭikamma), wie der Erteilung der Bewährungsfrist (parivāsa) an Mönche, die ein Vergehen begangen haben, sowie bezüglich dessen, was angemessen und unangemessen ist (ṭhānāṭṭhāna), und hinsichtlich Ursache und Nicht-Ursache (kāraṇākāraṇa) erfahren und geschickt zu sein. Die Verbindung lautet: geschickt zu sein sowohl beim Wiederaufnehmen (osāraṇa) – das heißt beim Wiederhineinführen in die Gemeinschaft durch das Aufheben von Rechtsverfahren wie dem Tadelungsbeschluss (tajjanīyakamma) – als auch beim Rehabilitieren (vuṭṭhāpana), das heißt beim Befreien aus einem Vergehen und dem Wieder-Vergehenslos-Machen. Die Worte 'Überall zur Vollendung gelangt' bedeuten: Er hat in allen rechtlichen Angelegenheiten des Vinaya das Äußerste erreicht, er ist fähig und geschickt. 521. Vinaye khandhake cāpīti vuttappakāre vinaye ca khandhake ca, padaṃ suttapadaṃ nikkhipitvā paṭṭhapetvā. Ubhato viniveṭhetvāti vinayato khandhakato cāti ubhayato nibbattetvā vijaṭetvā nayaṃ āharitvā. Rasatoti kiccato. Osareyyaṃ osāraṇaṃ karomīti attho. 521. Die Worte 'Sowohl im Vinaya als auch in den Khandhakas' bedeuten: im oben beschriebenen Vinaya und in den Khandhakas, nachdem man eine Textstelle, eine Sutta-Passage, dargelegt und etabliert hat. 'Von beiden Seiten her entwirrt habend' bedeutet: nachdem man es sowohl aus dem Vinaya (den Vibhaṅgas) als auch aus den Khandhakas hergeleitet und entwirrt hat und so die Methode angewandt hat. 'Hinsichtlich des Geschmacks' bedeutet hinsichtlich der Funktion. 'Ich würde wiederaufnehmen' bedeutet: 'Ich führe das Verfahren der Wiederaufnahme durch'. 522. Niruttiyā ca kusaloti ‘‘rukkho paṭo kumbho mālā citta’’ntiādīsu vohāresu cheko. Atthānatthe ca kovidoti atthe vaḍḍhiyaṃ anatthe hāniyañca kovido dakkhoti attho. Anaññātaṃ mayā natthīti vinayapiṭake sakale vā piṭakattaye mayā anaññātaṃ aviditaṃ apākaṭaṃ kiñci natthīti attho. Ekaggo satthu sāsaneti buddhasāsane ahameva eko vinayadharānaṃ aggo seṭṭho uttamoti attho. 522. „‚Und geschickt in der Sprache‘ (niruttiyā ca kusalo) bedeutet geschickt in alltäglichen Ausdrücken wie ‚Baum‘, ‚Tuch‘, ‚Topf‘, ‚Kranz‘, ‚Bild‘ und so weiter. ‚Und kundig in Nutzen und Schaden‘ (atthānatthe ca kovido) bedeutet kundig, das heißt geschickt, im Nutzen, dem Gedeihen, und im Schaden, dem Verlust. ‚Nichts ist mir unbekannt‘ (anaññātaṃ mayā natthi) bedeutet, dass es im Vinaya-Piṭaka oder in den gesamten drei Piṭakas nichts gibt, was mir unbekannt, unbemerkt oder unklar wäre. ‚Einzigartig in der Lehre des Meisters‘ (ekaggo satthu sāsane) bedeutet: In der Lehre des Buddha bin ich allein der Erste, Beste und Vorzüglichste unter den Vinaya-Hütern.“ 523. Rūpadakkhe ahaṃ ajjāti ajja etarahi kāle sakyaputtassa bhagavato sāsane pāvacane ahaṃ rūpadakkhe rūpadassane vinayavinicchayadassane sabbaṃ kaṅkhaṃ sakalaṃ saṃsayaṃ vinodemi vināsemīti sambandho. Chindāmi sabbasaṃsayanti ‘‘ahosiṃ nu kho ahamatītamaddhāna’’ntiādikaṃ (ma. ni. 1.18; saṃ. ni. 2.20; mahāni. 174) kālattayaṃ ārabbha uppannaṃ sabbaṃ soḷasavidhaṃ kaṅkhaṃ chindāmi vūpasamemi sabbaso viddhaṃsemīti attho. 523. „‚Heute bin ich ein Betrachter der Formen‘ (rūpadakkhe ahaṃ ajja) bedeutet: Heute, in dieser gegenwärtigen Zeit, vertreibe und vernichte ich in der Lehre, dem heiligen Wort des erhabenen Sakyer-Sohnes, als ein Betrachter der Formen, das heißt als einer, der die Disziplinregeln und die Entscheidungen der Disziplin sieht, allen Zweifel vollständig; dies ist die Verknüpfung. ‚Ich schneide allen Zweifel ab‘ (chindāmi sabbasaṃsayaṃ) bedeutet: Ich schneide alle sechzehn Arten von Zweifeln ab, die sich auf die drei Zeiten beziehen und entstehen wie ‚War ich wohl in der Vergangenheit?‘ und so weiter, bringe sie zur Ruhe und vernichte sie gänzlich.“ 524. Padaṃ anupadañcāpīti padaṃ pubbapadañca anupadaṃ parapadañca akkharaṃ ekekamakkharañca byañjanaṃ sithiladhanitādidasavidhaṃ byañjanavidhānañca. Nidāneti tena samayenātiādike nidāne ca. Pariyosāneti nigamane. Sabbattha kovidoti sabbesu chasu ṭhānesu chekoti attho. 524. „‚Das Wort und auch das nachfolgende Wort‘ (padaṃ anupadañcāpi) bezieht sich auf das Wort, das heißt das vorherige Wort, und das nachfolgende Wort, sowie auf jeden einzelnen Buchstaben (akkhara) und die zehnfache Art der Konsonanten (byañjana) wie sithila (schwach behaucht), dhanita (stark behaucht) und so weiter. ‚Im Ursprung‘ (nidāne) bezieht sich auf die Einleitung wie ‚Zu jener Zeit...‘ und so weiter. ‚Am Ende‘ (pariyosāne) bezieht sich auf den Schluss. ‚In allem kundig‘ (sabbattha kovido) bedeutet geschickt in allen sechs Bereichen.“ 525. Tato [Pg.320] paraṃ bhagavatoyeva guṇe pakāsento yathāpi rājā balavātiādimāha. Tattha yathā balavā thāmabalasampanno senābalasampanno vā rājā, paraṃ paresaṃ paṭirājūnaṃ senaṃ niggaṇhitvā nissesato gahetvā palāpetvā vā, tape tapeyya santapeyya dukkhāpeyya. Vijinitvāna saṅgāmanti saṅgāmaṃ parasenāya samāgamaṃ yuddhaṃ vijinitvā visesena jinitvā jayaṃ patvā. Nagaraṃ tattha māpayeti tattha tasmiṃ vijitaṭṭhāne nagaraṃ pāsādahammiyādivibhūsitaṃ vasanaṭṭhānaṃ māpaye kārāpeyyāti attho. 525. „Danach sprach er, um die Tugenden des Erhabenen zu offenbaren, die Worte beginnend mit: ‚Wie ein starker König...‘ (yathāpi rājā balavā). Darin bedeutet ‚wie ein starker‘ ein mit Tatkraft und Heereskraft ausgestatteter König, der das Heer der gegnerischen Könige bezwingt, sie restlos gefangen nimmt oder in die Flucht schlägt und sie peinigt, quält und leiden lässt. ‚Nachdem er die Schlacht gewonnen hat‘ (vijinitvāna saṅgāmaṃ) bedeutet, nachdem er die Schlacht, das Aufeinandertreffen mit dem gegnerischen Heer, den Kampf, siegreich bestanden, ihn im Besonderen gewonnen und den Sieg errungen hat. ‚Erbaut er dort eine Stadt‘ (nagaraṃ tattha māpaye) bedeutet, dass er dort, an jenem Ort des Sieges, eine Stadt erbauen, das heißt einen mit Palästen, großen Gebäuden und so weiter verzierten Wohnort errichten lässt.“ 526. Pākāraṃ parikhañcāpīti tattha māpitanagare pākāraṃ sudhādhavalaiṭṭhakāmayapākārañca kārayeti sambandho. Parikhañcāpi kaddamaparikhaṃ, udakaparikhaṃ, sukkhaparikhañca api kāraye. Esikaṃ dvārakoṭṭhakanti nagarasobhanatthaṃ ussāpitaesikāthambhañca mahantaṃ koṭṭhakañca catubhūmakādidvārakoṭṭhakañca kāraye. Aṭṭālake ca vividheti catubhūmakādibhede atiuccaaṭṭālake ca vividhe nānappakārake bahū kāraye kārāpeyyāti sambandho. 526. „‚Eine Stadtmauer und auch einen Graben‘ (pākāraṃ parikhañcāpi) bedeutet: In jener erbauten Stadt lässt er eine Stadtmauer errichten, eine mit weißem Stuck verputzte Ziegelmauer; dies ist die Verknüpfung. ‚Und auch einen Graben‘ (parikhañcāpi) bedeutet, dass er auch einen Schlammgraben, einen Wassergraben und einen Trockengraben anlegen lässt. ‚Eine Säule und ein Torhaus‘ (esikaṃ dvārakoṭṭhakaṃ) bedeutet, dass er zur Verschönerung der Stadt eine aufgerichtete Torsäule und ein großes Torhaus, wie ein vierstöckiges Torhaus, errichten lässt. ‚Und vielerlei Wachtürme‘ (aṭṭālake ca vividhe) bedeutet, dass er viele verschiedene, sehr hohe Wachtürme, wie vierstöckige und andere Arten, bauen lässt; dies ist die Verknüpfung.“ 527. Siṅghāṭakaṃ caccarañcāti na kevalaṃ pākārādayo kāraye, siṅghāṭakaṃ catumaggasandhiñca caccaraṃ antarāvīthiñca kārayeti sambandho. Suvibhattantarāpaṇanti suṭṭhu vibhattaṃ vibhāgato koṭṭhāsavantaṃ antarāpaṇaṃ anekāpaṇasahassaṃ kārāpeyyāti attho. Kārayeyya sabhaṃ tatthāti tasmiṃ māpitanagare sabhaṃ dhammādhikaraṇasālaṃ kāraye. Atthānatthavinicchayaṃ vaḍḍhiñca avaḍḍhiñca vinicchayakaraṇatthaṃ vinicchayasālaṃ kārayeti sambandho. 527. „‚Einen Platz mit vier Kreuzungswegen und einen Marktplatz‘ (siṅghāṭakaṃ caccaraṃ ca) bedeutet, dass er nicht nur Stadtmauern und Ähnliches errichten lässt, sondern auch eine Kreuzung von vier Straßen und eine Zwischenstraße (caccara) anlegen lässt; dies ist die Verknüpfung. ‚Mit wohlaufgeteilten Marktständen‘ (suvibhattantarāpaṇaṃ) bedeutet, dass er einen gut aufgeteilten Marktplatz mit vielen tausend Verkaufsständen erbauen lässt. ‚Er ließe dort eine Halle errichten‘ (kārayeyya sabhaṃ tattha) bedeutet, dass er in jener erbauten Stadt eine Versammlungshalle, das heißt eine Gerichtshalle, errichten lässt. ‚Zur Entscheidung über Nutzen und Schaden‘ (atthānatthavinicchayaṃ) bedeutet, dass er zur Entscheidung über Gedeihen und Nicht-Gedeihen eine Gerichtshalle errichten lässt; dies ist die Verknüpfung.“ 528. Nigghātatthaṃ amittānanti paṭirājūnaṃ paṭibāhanatthaṃ. Chiddāchiddañca jānitunti dosañca adosañca jānituṃ. Balakāyassa rakkhāyāti hatthiassarathapattisaṅkhātassa balakāyassa senāsamūhassa ārakkhaṇatthāya so nagarasāmiko rājā, senāpaccaṃ senāpatiṃ senānāyakaṃ mahāmattaṃ ṭhapeti ṭhānantare patiṭṭhapetīti attho. 528. „‚Zur Abwehr der Feinde‘ (nigghātatthaṃ amittānaṃ) bedeutet zur Abwehr gegnerischer Könige. ‚Um die Schwachstellen und Nicht-Schwachstellen zu erkennen‘ (chiddāchiddañca jānituṃ) bedeutet, um Mängel und Mängellosigkeit zu erkennen. ‚Zum Schutz der Streitkräfte‘ (balakāyassa rakkhāya) bedeutet: Zum Schutz der Heeresgruppe, bestehend aus Elefanten, Reitern, Streitwagen und Fußsoldaten, setzt jener König, der Herr der Stadt, einen Feldherrn, das heißt einen General und Heeresführer, als obersten Minister ein, beziehungsweise setzt ihn in dieses hohe Amt ein.“ 529. Ārakkhatthāya [Pg.321] bhaṇḍassāti jātarūparajatamuttāmaṇiādirājabhaṇḍassa ārakkhaṇatthāya samantato gopanatthāya me mayhaṃ bhaṇḍaṃ mā vinassīti nidhānakusalaṃ rakkhaṇe kusalaṃ chekaṃ naraṃ purisaṃ bhaṇḍarakkhaṃ bhaṇḍarakkhantaṃ so rājā bhaṇḍāgāre ṭhapetīti sambandho. 529. „‚Zum Schutz der Güter‘ (ārakkhatthāya bhaṇḍassa) bedeutet: Zum Schutz und zur allseitigen Bewachung der königlichen Schätze wie Gold, Silber, Perlen, Edelsteine und so weiter, damit meine Schätze nicht verloren gehen, setzt jener König einen im Verwahren geschickten, das heißt in der Bewachung klugen und kundigen Mann als Schatzhüter im Schatzhaus ein; dies ist die Verknüpfung.“ 530. Mamatto hoti yo raññoti yo paṇḍito rañño mamatto māmako pakkhapāto hoti. Vuddhiṃ yassa ca icchatīti assa rañño vuddhiñca virūḷhiṃ yo icchati kāmeti, tassa itthambhūtassa paṇḍitassa rājā adhikaraṇaṃ vinicchayādhipaccaṃ deti mittassa mittabhāvassa paṭipajjitunti sambandho. 530. „‚Der dem König treu ergeben ist‘ (mamatto hoti yo rañño) bedeutet: Welcher Weise dem König treu ergeben, ihm zugetan und gewogen ist. ‚Und dessen Gedeihen er wünscht‘ (vuddhiṃ yassa ca icchati) bedeutet: Wer das Wachstum und das Gedeihen dieses Königs wünscht und ersehnt. Einem solchen Weisen gibt der König das Amt der Rechtsprechung, das heißt die Autorität über Gerichtsentscheidungen, um sich als treuer Freund zu verhalten; dies ist die Verknüpfung.“ 531. Uppātesūti ukkāpātadisāḍāhādiuppātesu ca. Nimittesūti mūsikacchinnādīsu ‘‘idaṃ nimittaṃ subhaṃ, idaṃ nimittaṃ asubha’’nti evaṃ nimittajānanasatthesu ca. Lakkhaṇesu cāti itthipurisānaṃ hatthapādalakkhaṇajānanasatthesu ca kovidaṃ chekaṃ ajjhāyakaṃ anekesaṃ sissānaṃ byākaraṇavācakaṃ mantadharaṃ vedattayasaṅkhātamantadhārakaṃ paṇḍitaṃ so rājā porohicce purohitaṭṭhānantare ṭhapetīti sambandho. 531. „‚Bei Himmelserscheinungen‘ (uppātesu) bezieht sich auf Naturereignisse wie den Fall von Meteoren, das Glühen der Himmelsrichtungen und so weiter. ‚Bei Omen‘ (nimittesu) bezieht sich auf Zeichen wie von Mäusen angenagte Gegenstände und so weiter, und auf die Wissenschaften der Zeichendeutung wie ‚Dieses Zeichen ist günstig, jenes Zeichen ist ungünstig‘. ‚Und bei Merkmalen‘ (lakkhaṇesu ca) bezieht sich auf die Wissenschaften der Deutung von Hand- und Fußmerkmalen bei Frauen und Männern. Einen in diesen Dingen kundigen, geschickten Weisen, der ein Lehrer der Grammatik für viele Schüler ist und die Mantras bewahrt, das heißt die als die drei Veden bekannten Mantras im Gedächtnis trägt, setzt jener König in das Amt des Hofpriesters (porohicca) ein; dies ist die Verknüpfung.“ 532. Etehaṅgehi sampannoti etehi vuttappakārehi aṅgehi avayavehi sampanno samaṅgībhūto so rājā ‘‘khattiyo’’ti pavuccati kathīyatīti sambandho. Sadā rakkhanti rājānanti ete senāpaccādayo amaccā sadā sabbakālaṃ taṃ rājānaṃ rakkhanti gopenti. Kimiva? Cakkavākova dukkhitaṃ dukkhappattaṃ sakañātiṃ rakkhanto cakkavāko pakkhī ivāti attho. 532. „‚Mit diesen Gliedern ausgestattet‘ (etehaṅgehi sampanno) bedeutet: Ausgestattet und versehen mit diesen oben beschriebenen Gliedern, das heißt Teilen, wird jener König als ‚Krieger‘ (khattiyo) bezeichnet; dies ist die Verknüpfung. ‚Sie beschützen den König allezeit‘ (sadā rakkhanti rājānaṃ) bedeutet, dass jene Minister, wie der Feldherr und andere, jenen König allezeit, zu jeder Zeit, beschützen und bewahren. Wie was? Wie der Cakkavāka-Vogel, der seinen in Not geratenen, leidenden Artgenossen beschützt; dies ist der Sinn.“ 533. Tatheva tvaṃ mahāvīrāti vīruttama, yathā so rājā senāpaccādiaṅgasampanno nagaradvāraṃ thaketvā paṭivasati, tatheva tuvaṃ hatāmitto nihatapaccatthiko khattiyo iva sadevakassa lokassa saha devehi pavattamānassa lokassa dhammarājā dhammena samena rājā dasapāramitādhammaparipūraṇena rājabhūtattā ‘‘dhammarājā’’ti pavuccati kathīyatīti sambandho. 533. „‚Ebenso Du, o großer Held‘ (tatheva tvaṃ mahāvīra) bedeutet: O erhabenster Held, so wie jener König, ausgestattet mit den Gliedern wie dem Feldherrn und so weiter, das Stadttor sichert und darin wohnt, ebenso wirst Du, der die Feinde vernichtet und die Widersacher bezwungen hat, gleich einem Kriegerkönig, für die Welt mitsamt den Göttern – also die Welt, die mitsamt den Göttern existiert – als ‚König der Lehre‘ (dhammarājā) bezeichnet, da Du ein König gemäß der Lehre und Gerechtigkeit bist und durch die Erfüllung der Lehren der zehn Vollkommenheiten zum König geworden bist; dies ist die Verknüpfung.“ 534. Titthiye nīharitvānāti dhammarājabhāvena paṭipakkhabhūte sakalatitthiye nīharitvā nissesena haritvā nibbisevanaṃ katvā sasenakaṃ dhārañcāpi senāya saha vasavattimārampi nīharitvā. Tamandhakāraṃ vidhamitvāti [Pg.322] tamasaṅkhātaṃ mohandhakāraṃ vidhamitvā viddhaṃsetvā. Dhammanagaraṃ sattatiṃsabodhipakkhiyadhammasaṅkhātaṃ, khandhāyatanadhātupaṭiccasamuppādabalabojjhaṅgagambhīranayasamantapaṭṭhānadhammasaṅkhātaṃ vā nagaraṃ amāpayi nimmini patiṭṭhāpesīti attho. 534. „Nachdem er die Sektierer vertrieben hatte“ bedeutet: Durch seine Natur als König des Dhamma (Dhammarāja) hat er alle gegnerischen Sektierer (Titthiyas) gänzlich vertrieben, sie restlos entfernt und jeglichen Umgang mit ihnen unterbunden, und er hat auch den Mara samt seinem Heer vertrieben. „Nachdem er jene Dunkelheit vertrieben hatte“ bedeutet: Er hat die Dunkelheit der Verblendung (Mohandhakāra), welche als Finsternis bezeichnet wird, vertrieben und vernichtet. „Die Dhamma-Stadt“ bedeutet: Er hat die Dhamma-Stadt erschaffen, erbaut und gegründet, die aus den siebenunddreißig Voraussetzungen der Erleuchtung (Bodhipakkhiyadhamma) besteht, oder die Stadt, welche aus dem tiefgründigen System der Aggregate, Sinnesbereiche, Elemente, der bedingten Entstehung, der Kräfte, der Erleuchtungsglieder und dem umfassenden System des Paṭṭhāna besteht. 535. Sīlaṃ pākārakaṃ tatthāti tasmiṃ patiṭṭhāpite dhammanagare catupārisuddhisīlaṃ pākāraṃ. Ñāṇaṃ te dvārakoṭṭhakanti te tuyhaṃ sabbaññutaññāṇaāsayānusayañāṇaanāgataṃsañāṇaatītaṃsañāṇādikameva ñāṇaṃ dvārakoṭṭhakanti attho. Saddhā te esikā vīrāti, bhante, asithilaparakkama te tuyhaṃ dīpaṅkarapādamūlato pabhuti sabbaññutaññāṇakāraṇā saddahanasaddhā ussāpitaalaṅkāraalaṅkatathambhoti attho. Dvārapālo ca saṃvaroti te tuyhaṃ chadvārikasaṃvaro rakkhāvaraṇagutti dvārapālo dvārarakkhakoti attho. 535. „Die Tugend ist dort die Mauer“ bedeutet: In jener gegründeten Dhamma-Stadt ist die vierfache reine Tugend (Catupārisuddhisīla) die Ringmauer. „Deine Erkenntnis ist das Torhaus“ bedeutet: Deine Erkenntnis – nämlich die Allwissenheit, das Wissen um die Neigungen und Tendenzen der Wesen, das Wissen um Vergangenheit und Zukunft und so weiter – diese Erkenntnis allein ist das Torhaus. „Dein Glaube ist der heldenhafte Pfeiler“ bedeutet: Oh Ehrwürdiger von unermüdlicher Tatkraft, dein gläubiges Vertrauen (Saddhā), das seit den Füßen des Buddhas Dīpaṅkara zum Zweck der Erlangung der Allwissenheit gepflegt wurde, ist der aufgerichtete, reich verzierte Festungspfeiler. „Und der Wächter ist die Zügelung“ bedeutet: Die Zügelung deiner sechs Sinnentore (Chadvārikasaṃvara), welche Schutz, Schirm und Bewachung ist, ist der Torwächter. 536. Satipaṭṭhānamaṭṭālanti te tuyhaṃ catusatipaṭṭhānaaṭṭālamuṇḍacchadanaṃ. Paññā te caccaraṃ muneti, bhante, mune ñāṇavanta te tuyhaṃ pāṭihāriyādianekavidhā paññā caccaraṃ maggasamodhānaṃ nagaravīthīti attho. Iddhipādañca siṅghāṭanti tuyhaṃ chandavīriyacittavīmaṃsasaṅkhātā cattāro iddhipādā siṅghāṭaṃ catumaggasanti. Dhammavīthi sumāpitanti sattatiṃsabodhipakkhiyadhammasaṅkhātāya vīthiyā suṭṭhu māpitaṃ sajjitaṃ, taṃ dhammanagaranti attho. 536. „Die Grundlagen der Achtsamkeit sind der Wachturm“ bedeutet: Deine vier Grundlagen der Achtsamkeit (Catusatipaṭṭhāna) sind der Wachturm und die obere Plattform. „Weisheit ist deine Kreuzung, oh Weiser“ bedeutet: Oh weiser, erkenntnisreicher Herr, deine vielfältige Weisheit, wie die der Wunderkräfte, ist die Kreuzung, der Treffpunkt der Wege, die Straßen der Stadt. „Die Grundlagen der magischen Macht sind die Straßengabelung“ bedeutet: Deine vier Grundlagen der magischen Macht (Iddhipāda) – bestehend aus Willen, Energie, Geist und Erforschung – sind die Gabelung, die Kreuzung von vier Straßen. „Die Dhamma-Straße ist wohlgestaltet“ bedeutet: Jene Dhamma-Stadt ist wohlgebaut und hergerichtet mit den Straßen, welche die siebenunddreißig Voraussetzungen der Erleuchtung (Bodhipakkhiyadhamma) genannt werden. 537. Suttantaṃ abhidhammañcāti tava tuyhaṃ ettha dhammanagare suttantaṃ abhidhammaṃ vinayañca kevalaṃ sakalaṃ suttageyyādikaṃ navaṅgaṃ buddhavacanaṃ dhammasabhā dhammādhikaraṇasālāti attho. 537. „Die Lehrreden (Suttanta) und der Abhidhamma“ bedeutet: In dieser deiner Dhamma-Stadt ist das gesamte neunteilige Buddha-Wort (Navaṅga-Buddhavacana), bestehend aus Suttas, Geyyas usw., sowie Suttanta, Abhidhamma und Vinaya, die Dhamma-Halle, die Halle der Rechtsprechung des Dhamma. 538. Suññataṃ animittañcāti anattānupassanāvasena paṭiladdhaṃ suññatavihārañca, aniccānupassanāvasena paṭiladdhaṃ animittavihārañca. Vihārañcappaṇihitanti dukkhānupassanāvasena paṭiladdhaṃ appaṇihitavihārañca. Āneñjañcāti acalaṃ aphanditaṃ catusāmaññaphalasaṅkhātaṃ āneñjavihārañca. Nirodho cāti sabbadukkhanirodhaṃ nibbānañca. Esā dhammakuṭī tavāti esā sabbanavalokuttaradhammasaṅkhātā tava tuyhaṃ dhammakuṭi vasanagehanti attho. 538. „Das Leere und das Zeichenlose“ bedeutet: Das Verweilen in der Leerheit (Suññatavihāra), erlangt durch die Betrachtung des Nicht-Selbst (Anattānupassanā), und das Verweilen im Zeichenlosen (Animittavihāra), erlangt durch die Betrachtung der Vergänglichkeit (Aniccānupassanā). „Und das begehrenlose Verweilen“ bedeutet: Das Verweilen im Begehrenlosen (Appaṇihitavihāra), erlangt durch die Betrachtung des Leidens (Dukkhānupassanā). „Und das Unerschütterliche“ bedeutet: Das unbewegliche, unerschütterliche Verweilen (Āneñjavihāra), welches aus den vier Früchten des Asketentums (Catusāmaññaphala) besteht. „Und das Erlöschen“ bedeutet: Das Erlöschen allen Leidens, das Nibbāna. „Dies ist deine Dhamma-Hütte“ bedeutet: Dies ist deine Dhamma-Hütte, deine Wohnstätte, die aus den neun überweltlichen Zuständen (Navalokuttaradhamma) besteht. 539. Paññāya [Pg.323] aggo nikkhittoti paññāvasena paññavantānaṃ aggo. Iti bhagavatā nikkhitto ṭhapito thero paṭibhāne ca paññāya kattabbe kicce, yuttamuttapaṭibhāne vā kovido cheko nāmena sāriputtoti pākaṭo tava tuyhaṃ dhammasenāpati tayā desitassa piṭakattayadhammasamūhassa dhāraṇato pati padhāno hutvā senākiccaṃ karotīti attho. 539. „Als Höchster an Weisheit eingesetzt“ bedeutet: Aufgrund seiner Weisheit ist er der Höchste unter den Weisen. Der so vom Erhabenen eingesetzte und bestimmte Ältere – der im Bereich der Geistesgegenwart (Paṭibhāna), bei den mit Weisheit auszuführenden Aufgaben und in treffender, fließender Beredsamkeit geschickt und erfahren ist und unter dem Namen Sāriputta bekannt ist – ist dein Dhamma-Feldherr (Dhammasenāpati). Da er die Gesamtheit des von dir verkündeten Dhamma der drei Körbe (Piṭakatraya) bewahrt, verrichtet er als Anführer und Oberhaupt die Pflichten des Feldherrn. 540. Cutūpapātakusaloti bhante muni, cutūpapāte cutiyā upapattiyā ca kusalo cheko. Iddhiyā pāramiṃ gatoti ‘‘ekopi hutvā bahudhā hoti, bahudhāpi hutvā eko hotī’’tiādinā (dī. ni. 1.238; paṭi. ma. 1.102) vuttāya iddhippabhedāya pāramiṃ pariyosānaṃ gato patto nāmena kolito nāma moggallānatthero porohicco tava tuyhaṃ purohitoti sambandho. 540. „Erfahren im Verscheiden und Wiedererscheinen“ bedeutet: Oh Weiser, er ist geschickt und bewandert im Hinscheiden (Cuti) und in der Wiedergeburt (Upapatti) der Wesen. „Der zur Vollendung der übernatürlichen Kräfte gelangt ist“ bedeutet: Er hat das Äußerste, die Vollkommenheit in den verschiedenen Arten der magischen Kräfte (Iddhi) erreicht, von denen es heißt: „Obwohl er einer ist, wird er zu vielen; obwohl er viele ist, wird er zu einem“ und so weiter. Der Ältere Moggallāna, mit Namen Kolita, steht in der Stellung des Hofpriesters (Purohita) für dich. Dies ist der Satzzusammenhang. 541. Porāṇakavaṃsadharoti bhante mune, ñāṇavantaṃ porāṇassa vaṃsassa dhārako, paramparajānanako vā uggatejo pākaṭatejo, durāsado āsādetuṃ ghaṭṭetuṃ dukkho asakkuṇeyyoti attho. Dhutavādiguṇenaggoti tecīvarikaṅgādīni terasa dhutaṅgāni vadati ovadatīti dhutavādīguṇena dhutaṅgaguṇena aggo seṭṭho mahākassapatthero tava tuyhaṃ akkhadasso vohārakaraṇe padhānoti attho. 541. „Der die alte Ahnenlinie bewahrt“ bedeutet: Oh Weiser, Erkenntnisreicher, er bewahrt die Ahnenlinie der früheren Buddhas oder kennt die traditionelle Nachfolge. Er besitzt überragende Pracht, offenbare Macht, ist schwer zugänglich, schwer anzugreifen oder zu stören und von anderen unüberwindbar. „Der Höchste in der Tugend der Askese-Verkünder“ bedeutet: Er lehrt und rät zu den dreizehn asketischen Übungen (Dhutaṅga), wie dem Tragen von nur drei Gewändern; durch diese Tugend des Askese-Verkünders, die Tugend der Dhutaṅgas, ist der Ältere Mahākassapa der Höchste und Vorzüglichste. Er ist dein Richter (Akkhadassa) und der Führende bei der Durchführung rechtlicher Angelegenheiten. 542. Bahussuto dhammadharoti bhante mune, bahūnaṃ caturāsītidhammakkhandhasahassānaṃ sutattā bhagavatā bhikkhusaṅghato ca uggahitattā bahussuto anekesaṃ chasatasahassasaṅkhyānaṃ āgamadhammānaṃ satipaṭṭhānādīnañca paramatthadhammānaṃ dhāraṇato dhammadharo ānando. Sabbapāṭhī ca sāsaneti buddhasāsane sabbesaṃ pāṭhīnaṃ paṭhantānaṃ sajjhāyantānaṃ bhikkhūnaṃ aggo seṭṭhoti sabbapāṭhī nāmena ānando nāma thero. Dhammārakkho tavāti tava tuyhaṃ dhammassa piṭakattayadhammabhaṇḍassa ārakkho rakkhako pālako, dhammabhaṇḍāgārikoti attho. 542. „Von reichem Wissen, ein Bewahrer des Dhamma“ bedeutet: Oh Weiser, weil er viel gehört hat – nämlich die vierundachtzigtausend Abschnitte des Dhamma – und sie vom Erhabenen und der Gemeinschaft der Mönche gelernt hat, ist er „von großem Wissen“ (Bahussuta). Weil er die zahlreichen Lehren, die sechshunderttausend übersteigen, wie die Grundlagen der Achtsamkeit (Satipaṭṭhāna) und die Wahrheiten der höchsten Realität (Paramatthadhamma) bewahrt, ist Ānanda der „Bewahrer des Dhamma“ (Dhammadharo). „Und der Rezitator von allem in der Lehre“ bedeutet: In der Lehre des Buddha ist er der Höchste und Beste unter allen Rezitatoren, den Mönchen, die lesen und rezitieren; so ist der Ältere namens Ānanda der Rezitator von allem. „Dein Hüter des Dhamma“ bedeutet: Er ist der Wächter, Beschützer und Bewahrer deines Dhamma, der Schatzkammer des Dhamma der drei Körbe (Piṭaka); er ist der Schatzmeister des Dhamma (Dhammabhaṇḍāgārika). 543. Ete [Pg.324] sabbe atikkammāti bhagavā bhagyavā sammāsambuddho ete sāriputtādayo mahānubhāvepi there atikkamma vajjetvā mamaṃyeva pamesi pamāṇaṃ akāsi, manasi akāsīti attho. Vinicchayaṃ me pādāsīti vinayaññūhi paṇḍitehi desitaṃ pakāsitaṃ vinaye vinicchayaṃ dosavicāraṇaṃ me mayhaṃ bhagavā pādāsi pakārena adāsi, mayhameva bhāraṃ akāsīti sambandho. 543. „All diese übergehend“ bedeutet: Der Erhabene, der Glückhafte, der vollkommen Erwachte, hat selbst diese Älteren von großer Macht wie Sāriputta übergangen und beiseitegelassen, und hat mich allein eingesetzt, mich zum Maßstab gemacht und mich im Sinn gehabt. „Er gab mir die Entscheidungsgewalt“ bedeutet: Der Erhabene hat mir in umfassender Weise die Entscheidungsgewalt im Vinaya (der Ordensdisziplin) übertragen, welcher von den weisen Vinaya-Kennern verkündet und dargelegt wurde, um Vergehen zu untersuchen; er hat diese Last mir allein übertragen. Dies ist der Satzzusammenhang. 544. Yo koci vinaye pañhanti yo koci bhikkhu buddhasāvako vinayanissitaṃ pañhaṃ maṃ pucchati, tattha tasmiṃ pucchitapañhe me mayhaṃ cintanā vimati kaṅkhā natthi. Tañhevatthaṃ taṃ eva pucchitaṃ atthaṃ ahaṃ kathemīti sambandho. 544. „Welche Frage auch immer zur Ordensdisziplin“ bedeutet: Welcher Mönch auch immer, ein Jünger des Buddha, mir eine Frage bezüglich der Ordensdisziplin (Vinaya) stellt – bei dieser gestellten Frage gibt es bei mir kein Nachsinnen, keinen Zweifel und keine Unsicherheit. Ich erkläre genau jenen Sinn, nach dem gefragt wurde. Dies ist der Satzzusammenhang. 545. Yāvatā buddhakhettamhīti yāvatā yattake ṭhāne buddhassa āṇākhette taṃ mahāmuniṃ sammāsambuddhaṃ ṭhapetvā vinaye vinayapiṭake vinayavinicchayakaraṇe vā mādiso mayā sadiso natthi, ahameva aggo, bhiyyo mamādhiko kuto bhavissatīti sambandho. 545. „Soweit der Bereich des Buddha reicht“ bedeutet: Soweit das Gebiet reicht, in dem die Autorität des Buddha gilt, gibt es – wenn man jenen Großen Weisen, den vollkommen Erwachten, ausnimmt – im Vinaya-Piṭaka oder beim Treffen von Entscheidungen bezüglich der Ordensdisziplin niemanden wie mich, der mir gleicht. Ich allein bin der Höchste; woher sollte einer kommen, der noch über mir steht? Dies ist der Satzzusammenhang. 546. Bhikkhusaṅghe nisīditvā bhikkhusaṅghamajjhe nisinno gotamo bhagavā evaṃ gajjati sīhanādaṃ karoti. Kathaṃ? Vinaye ubhatovibhaṅge, khandhakesu mahāvaggacūḷavaggesu, ca-saddena parivāre, upālissa upālinā samo sadiso natthīti evaṃ gajjati. 546. „‚Inmitten der Bhikkhu-Gemeinschaft sitzend‘ (bhikkhusaṅghe nisīditvā) bedeutet: Inmitten der Mönchsgemeinde sitzend stößt der erhabene Gotama auf diese Weise ein Gebrüll aus, tut einen Löwenruf. Wie? ‚In der Disziplin‘ (vinaye), das heißt in den beiden Vibhaṅgas, in den Khandhakas (dem Mahāvagga und dem Cūḷavagga) und – durch das Wort ‚und‘ (ca) impliziert – im Parivāra, gibt es keinen, der Upāli gleich oder ähnlich ist; so brüllt er.“ 547. Yāvatāti yattakaṃ buddhabhaṇitaṃ buddhena desitaṃ navaṅgaṃ suttageyyādisatthusāsanaṃ satthunā pakāsitaṃ sabbaṃ vinayogadhaṃ taṃ vinaye antopaviṭṭhaṃ vinayamūlakaṃ iccevaṃ passino passantassa. 547. „Soweit“: Was auch immer vom Buddha gesprochen und verkündet wurde – die neunfache Lehre des Meisters, bestehend aus Sutta, Geyya usw., die vom Meister dargelegt wurde –, all dies ist im Vinaya enthalten, ist tief in den Vinaya eingegangen und hat den Vinaya als Grundlage. Für einen, der dies so sieht. 548. Mama kammaṃ saritvānāti gotamo sakyapuṅgavo sakyavaṃsappadhāno, mama kammaṃ mayhaṃ pubbapatthanākammaṃ atītaṃsañāṇena saritvāna paccakkhato ñatvā bhikkhusaṅghamajjhe gato ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ vinayadharānaṃ yadidaṃ upālī’’ti (a. ni. 1.219, 228) maṃ etadagge ṭhāne ṭhapesīti sambandho. 548. „‚Sich an meine Tat erinnernd‘ (mama kammaṃ saritvāna): Der Gotama, der Vorzüglichste der Sakyer und das Haupt des Sakyer-Geschlechts, erinnerte sich mit seinem Wissen an meine Tat – mein früheres Streben –, erkannte dies direkt und setzte mich, nachdem er in die Mitte der Mönchsgemeinschaft getreten war, mit den Worten: ‚Dies ist der Vorzüglichste, ihr Mönche, unter meinen Jüngermönchen, die den Vinaya bewahren, nämlich Upāli‘, auf diese Position des Vorzüglichsten (etadagga). Dies ist die Verknüpfung.“ 549. Satasahassupādāyāti satasahassakappe ādiṃ katvā yaṃ imaṃ ṭhānaṃ apatthayiṃ patthesiṃ, so me attho mayā anuppatto adhigato paṭiladdho vinaye pāramiṃ gato koṭiṃ pattoti attho. 549. „‚Beginnend vor einhunderttausend Äonen‘ (satasahassupādāya): Beginnend vor einhunderttausend Äonen strebte ich nach dieser besonderen Stellung; dieses mein Ziel wurde von mir erreicht, erlangt und empfangen, indem ich im Vinaya die Vollendung erlangte und den Gipfel erreichte. Dies ist die Bedeutung.“ 550. Sakyānaṃ [Pg.325] sakyavaṃsarājūnaṃ nandijanano somanassakārako ahaṃ pure pubbe kappako āsiṃ ahosiṃ, taṃ jātiṃ taṃ kulaṃ taṃ yoniṃ vijahitvā visesena jahitvā chaḍḍetvā mahesino sammāsambuddhassa putto jāto sakyaputtoti saṅkhyaṃ gato sāsanadhāraṇatoti attho. 550. „‚Der Sakyer‘ (sakyānaṃ), das heißt der Könige des Sakyer-Geschlechts: Freude erzeugend und Heiterkeit bewirkend war ich ehemals, in der Vergangenheit, ein Barbier. Nachdem ich diese Geburt, diese Sippe und diesen Schoß gänzlich aufgegeben und hinter mir gelassen hatte, wurde ich als Sohn des großen Weisen, des vollkommen Erleuchteten, geboren und gelangte so – aufgrund des Bewahrens der Lehre – zu der Bezeichnung ‚Sohn der Sakyer‘ (sakyaputta). Dies ist die Bedeutung.“ 551. Tato paraṃ attano dāsakule nibbattanāpadānaṃ dassento ito dutiyake kappetiādimāha. Tattha ito bhaddakappato heṭṭhā dutiye kappe nāmena añjaso nāma khattiyo eko rājā anantatejo saṅkhyātikkantatejo amitayaso pamāṇātikkantaparivāro mahaddhano anekakoṭisatasahassadhanavā bhūmipālo pathavīpālako rakkhako ahosīti sambandho. 551. „Danach sprach er, um sein eigenes verdienstvolles Wirken (apadāna) bei der Wiedergeburt in einer Dienerschaft aufzuzeigen, die Worte beginnend mit: ‚Im zweiten Äon von diesem an‘ (ito dutiyake kappe). Darin ist die Verknüpfung wie folgt: Zurückgerechnet vom heutigen glückbringenden Äon (bhaddakappa) gab es im zweiten Äon einen Kriegerkönig namens Añjasa, der von unendlicher, jenseits aller Berechnung liegender Macht war, von unermesslichem Ruhm und einer die Maße übersteigenden Gefolgschaft, von großem Reichtum, der viele Hunderttausende von Kotis an Schätzen besaß, ein Herrscher und Schützer der Erde.“ 552. Tassa raññoti tassa tādisassa rājino putto ahaṃ candano nāma khattiyo khattiyakumāro ahosinti sambandho. So ahaṃ jātimadena ca yasamadena ca bhogamadena ca upatthaddho thambhito unnatoti attho. 552. „‚Dieses Königs‘ (tassa rañño): Der Sohn dieses eben genannten Königs war ich, ein Kriegerprinz namens Candana. Dies ist die Verknüpfung. Als dieser war ich durch den Stolz auf meine Geburt, den Stolz auf meinen Ruhm und den Stolz auf meinen Besitz verhärtet, hochmütig und stolz. Dies ist die Bedeutung.“ 553. Nāgasatasahassānīti satasahassahatthino mātaṅgā mātaṅgakule jātā tidhā pabhinnā akkhikaṇṇakosasaṅkhātehi tīhi ṭhānehi pabhinnā madagaḷitā sabbālaṅkārabhūsitā sabbehi hatthālaṅkārehi alaṅkatā sadā sabbakālaṃ maṃ parivārentīti sambandho. 553. „‚Einhunderttausend Elefanten‘ (nāgasatasahassāni): Einhunderttausend Elefanten der edlen Mātaṅga-Rasse, die an drei Stellen – nämlich den Augen, den Ohren und den Schläfensekretdrüsen – die Brunst absonderten, mit jeglichem Elefantschmuck reich verziert waren, umgaben mich allezeit und ständig. Dies ist die Verknüpfung.“ 554. Sabalehi paretohanti tadā tasmiṃ kāle ahaṃ sabalehi attano senābalehi pareto parivārito uyyānaṃ gantukāmako icchanto sirikaṃ nāma nāgaṃ hatthiṃ āruyha abhiruhitvā nagarato nikkhaminti sambandho. 554. „‚Von Streitkräften umgeben‘ (sabalehi pareto): Damals, zu jener Zeit, zog ich, umgeben von meinen eigenen Heereskräften und willens, in den königlichen Park zu gehen, auf dem königlichen Elefanten namens Sirika reitend, aus der Stadt aus. Dies ist die Verknüpfung.“ 555. Caraṇena ca sampannoti sīlasaṃvarādipannarasacaraṇadhammena samannāgato guttadvāro pihitacakkhādichadvāro susaṃvuto suṭṭhu rakkhitakāyacitto devalo nāma sambuddho paccekasambuddho, mama mayhaṃ purato sammukhe āgacchi pāpuṇīti attho. 555. „‚Und im Verhalten vollendet‘ (caraṇena ca sampanno): Ein Paccekabuddha namens Devala, der mit den fünfzehn Verhaltensregeln (caraṇadhamma) wie der Zügelung der Sittlichkeit und so weiter ausgestattet war, dessen Sinnestore bewacht waren – da die sechs Tore wie das Auge geschlossen waren –, dessen Körper und Geist vollkommen gezügelt und beschützt waren, trat mir von vorne direkt entgegen. Dies ist die Bedeutung.“ 556. Pesetvā [Pg.326] sirikaṃ nāganti taṃ āgataṃ paccekabuddhaṃ disvā ahaṃ sirikaṃ nāma nāgaṃ abhimukhaṃ pesetvā buddhaṃ āsādayiṃ ghaṭṭesiṃ padussesinti attho. Tato sañjātakopo soti tato tasmā mayā atīva pīḷetvā pesitattā so hatthināgo mayi sañjātakopo padaṃ attano pādaṃ nuddharate na uddharati, niccalova hotīti attho. 556. „‚Nachdem ich den Elefanten Sirika angetrieben hatte‘ (pesetvā sirikaṃ nāgaṃ): Als ich jenen herannahenden Paccekabuddha sah, trieb ich den Elefanten namens Sirika ihm entgegen, bedrängte und beleidigte den Buddha. ‚Daraufhin geriet er in Zorn‘ (tato sañjātakopo so): Da er von mir so heftig bedrängt und angetrieben worden war, wurde jener königliche Elefant zornig auf mich und hob seinen Fuß nicht an; er blieb vielmehr völlig regungslos stehen. Dies ist die Bedeutung.“ 557. Nāgaṃ duṭṭhamanaṃ disvāti duṭṭhamanaṃ kuddhacittaṃ nādaṃ disvā ahaṃ buddhe paccekabuddhe kopaṃ akāsiṃ dosaṃ uppādesinti attho. Vihesayitvā sambuddhanti devalaṃ paccekasambuddhaṃ vihesayitvā viheṭhetvā ahaṃ uyyānaṃ agamāsinti sambandho. 557. „‚Als ich sah, dass der Elefant übelgesinnt war‘ (nāgaṃ duṭṭhamanaṃ disvā): Als ich den Elefanten mit zornigem Gemüt sah, richtete ich meinen Zorn gegen den Erleuchteten, den Paccekabuddha, und ließ Hass in mir aufsteigen. ‚Nachdem ich den vollkommen Erleuchteten bedrängt hatte‘ (vihesayitvā sambuddhaṃ): Nachdem ich den Paccekasammābuddha Devala bedrängt und gequält hatte, begab ich mich in den königlichen Park. Dies ist die Verknüpfung.“ 558. Sātaṃ tattha na vindāmīti tasmiṃ āsādane sātaṃ na vindāmi. Āsādananimittaṃ madhuraṃ sukhaṃ na labhāmīti attho. Siro pajjalito yathāti siro mama sīsaṃ pajjalito yathā pajjalamānaṃ viya hotīti attho. Pariḷāhena ḍayhāmīti paccekabuddhe kopassa katattā pacchānutāpapariḷāhena ḍayhāmi uṇhacitto homīti attho. 558. „‚Ich fand dort kein Behagen‘ (sātaṃ tattha na vindāmi): Aufgrund jenes Angriffs empfand ich kein Behagen; das heißt, ich erlangte kein süßes Glück, das aus diesem Angriff hätte entspringen können. ‚Als ob mein Haupt in Flammen stünde‘ (siro pajjalito yathā): Mein Haupt brannte gleichsam, als stünde es in hellen Flammen. ‚Ich verbrenne vor Qual‘ (pariḷāhena ḍayhāmi): Weil ich Zorn gegen den Paccekabuddha gehegt hatte, verbrannte ich vor der Hitze der Reue und mein Geist war voller Glut. Dies ist die Bedeutung.“ 559. Sasāgarantāti teneva pāpakammabalena sasāgarantā sāgarapariyosānā sakalamahāpathavī me mayhaṃ ādittā viya jalitā viya hoti khāyatīti attho. Pitu santikupāgammāti evaṃ bhaye uppanne ahaṃ attano pitu rañño santikaṃ upāgamma upagantvā idaṃ vacanaṃ abraviṃ kathesinti attho. 559. „‚Einschließlich der Ozeane‘ (sasāgarantā): Durch die Kraft eben jener unheilsamen Tat erschien mir die ganze große Erde bis hin zu den Grenzen der Ozeane wie lichterloh brennend und in Flammen stehend. ‚Nachdem ich mich zu meinem Vater begeben hatte‘ (pitu santikupāgamma): Als diese Furcht in mir aufstieg, begab ich mich in die Gegenwart meines Vaters, des Königs, und sprach diese Worte zu ihm. Dies ist die Bedeutung.“ 560. Āsīvisaṃva kupitanti āsīvisaṃ sabbaṃ kupitaṃ kuddhaṃ iva jalamānaṃ aggikkhandhaṃ iva mattaṃ tidhā pabhinnaṃ dantiṃ dantavantaṃ kuñjaraṃ uttamaṃ hatthiṃ iva ca āgataṃ yaṃ paccekabuddhaṃ sayambhuṃ sayameva buddhabhūtaṃ ahaṃ āsādayiṃ ghaṭṭesinti sambandho. 560. „‚Wie eine zornige Giftschlange‘ (āsīvisaṃ va kupitaṃ): Den herannahenden Paccekabuddha, der wie eine ergrimmte Giftschlange, wie eine lodernde Feuersbrunst und wie ein mächtiger, brunstgeladener Stoßzahnelefant war, den aus sich selbst heraus Erleuchteten – ihn habe ich angegriffen und bedrängt. Dies ist die Verknüpfung.“ 561. Āsādito mayā buddhoti so paccekabuddho mayā āsādito ghaṭṭito ghoro aññehi ghaṭṭetuṃ asakkuṇeyyattā ghoro, uggatapo pākaṭatapo jino pañca māre jitavā evaṃguṇasampanno [Pg.327] paccekabuddho mayā ghaṭṭitoti attho. Purā sabbe vinassāmāti tasmiṃ paccekabuddhe kataanādarena sabbe mayaṃ vinassāma vividhenākārena nassāma, bhasmā viya bhavāmāti attho. Khamāpessāma taṃ muninti taṃ paccekabuddhaṃ muniṃ yāva na vinassāma, tāva khamāpessāmāti sambandho. 561. „„Der Buddha wurde von mir angegriffen“ (āsādito mayā buddho): Jener Paccekabuddha wurde von mir bedrängt; er ist furchterregend, weil andere ihn nicht ungestraft bedrängen können, er besitzt glühende Askese, ist ein Sieger, der die fünf Māras bezwungen hat – diesen so tugendhaften Paccekabuddha habe ich bedrängt. „Bevor wir alle vergehen“ (purā sabbe vinassāma): Durch die diesem Paccekabuddha erwiesene Respektlosigkeit werden wir alle auf vielfältige Weise vernichtet werden und wie Asche vergehen. „Wir wollen diesen Weisen um Verzeihung bitten“ (khamāpessāma taṃ muniṃ): Solange wir noch nicht vernichtet sind, wollen wir diesen weisen Paccekabuddha um Vergebung bitten. Dies ist die Verknüpfung.“ 562. No ce taṃ nijjhāpessāmāti attadantaṃ damitacittaṃ samāhitaṃ ekaggacittaṃ taṃ paccekabuddhaṃ no ce nijjhāpessāma khamāpessāma. Orena sattadivasā sattadivasato orabhāge sattadivase anatikkamitvā sampuṇṇaṃ raṭṭhaṃ me sabbaṃ vidhamissati vinassissati. 562. „‚Wenn wir ihn nicht besänftigen‘ (no ce taṃ nijjhāpessāma): Wenn wir jenen selbstbezähmten, im Geist gezügelten und tief gesammelten Paccekabuddha nicht besänftigen und um Vergebung bitten, wird innerhalb von sieben Tagen, ohne dass dieser Zeitraum überschritten wird, mein gesamtes Reich völlig vernichtet werden.“ 563. Sumekhalo kosiyo cāti ete sumekhalādayo cattāro rājāno isayo āsādayitvā ghaṭṭetvā anādaraṃ katvā saraṭṭhakā saha raṭṭhajanapadavāsīhi duggatā vināsaṃ gatāti attho. 563. „‚Sumekhala und Kosiya‘ (sumekhalo kosiyo ca): Diese vier Könige, beginnend mit Sumekhala, gingen, nachdem sie die Seher angegriffen, bedrängt und respektlos behandelt hatten, mitsamt ihren Reichen und der Bevölkerung ihrer Länder elendig zugrunde. Dies ist die Bedeutung.“ 564. Yadā kuppanti isayoti yadā yasmiṃ kāle saññatā kāyasaññamādīhi saññatā santā brahmacārino uttamacārino seṭṭhacārino isayo kuppanti domanassā bhavanti, tadā sasāgaraṃ sapabbataṃ sadevakaṃ lokaṃ vināsentīti sambandho. 564. "Wenn die Seher zornig werden" bedeutet: Wenn – zu welcher Zeit – die Gezügelten (gezügelt durch die Zügelung des Körpers usw.), die Friedvollen, die den heiligen Lebenswandel Führenden (die den höchsten, den edelsten Lebenswandel Führenden), die Seher zornig werden, d. h. missgestimmt sind, dann zerstören sie die Welt samt den Ozeanen, den Bergen und den Göttern (devas) – so ist die Verknüpfung zu verstehen. 565. Tiyojanasahassamhīti tesaṃ isīnaṃ ānubhāvaṃ ñatvā te khamāpetuṃ accayaṃ aparādhaṃ desanatthāya pakāsanatthāya tiyojanasahassappamāṇe padese purise sannipātayinti sambandho. Sayambhuṃ upasaṅkaminti sayambhuṃ paccekabuddhaṃ upasaṅkamiṃ samīpaṃ agamāsinti attho. 565. "Auf dreitausend Yojanas" bedeutet: Nachdem man die Macht jener Seher erkannt hatte, ließ man die Menschen in einem Gebiet von dreitausend Yojanas Größe zusammenkommen, um sie um Vergebung zu bitten, um das Vergehen, die Verfehlung einzugestehen und offenzulegen – so ist die Verknüpfung zu verstehen. "Sie näherten sich dem Selbstgewordenen" bedeutet: Er näherte sich dem Selbstgewordenen, dem Paccekabuddha, das heißt, er begab sich in seine Nähe. 566. Allavatthāti mayā saddhiṃ rāsibhūtā sabbe janā allavatthā udakena tintavatthauttarāsaṅgā allasirā tintakesā pañjalīkatā muddhani kataañjalipuṭā buddhassa paccekamunino pāde pādasamīpe nipatitvā nipajjitvā idaṃ vacanamabravunti ‘‘khamassu tvaṃ, mahāvīrā’’tiādikaṃ vacanaṃ abravuṃ kathesunti attho. 566. "In nassen Kleidern" bedeutet: Alle Menschen, die sich mit mir versammelt hatten, hatten nasse Kleider (durch Wasser durchnässte Gewänder und Obergewänder), nasse Köpfe (nasses Haar) und falteten ehrerbietig die Hände (die gefalteten Hände auf das Haupt gelegt); sie fielen nieder (warfen sich nieder) zu den Füßen – in die Nähe der Füße – des Buddhas, des Paccekamuni, und sprachen diese Worte: "Vergib du uns, o großer Held" und so weiter – das ist die Bedeutung. 567. Mahāvīra vīruttama bhante paccekabuddha, mayā tumhesu aññāṇena kataṃ aparādhaṃ khamassu tvaṃ vinodehi, mā manasi karohīti attho[Pg.328]. Jano janasamūho taṃ bhagavantaṃ abhi visesena yācati. Pariḷāhaṃ dosamohehi katacittadukkhapariḷāhaṃ amhākaṃ vinodehi tanuṃ karohi, no amhākaṃ raṭṭhaṃ sakalaraṭṭhajanapadavāsino mā vināsaya mā vināsehīti attho. 567. "O großer Held" bedeutet: "O Höchster der Helden, ehrwürdiger Paccekabuddha! Vergib das Vergehen, das ich aus Unwissenheit dir gegenüber begangen habe, vertreibe es und nimm es dir nicht zu Herzen" – das ist die Bedeutung. Die Volksmenge bat jenen Erhabenen überaus inständig. "Das Brennen": "Vertreibe und mindere für uns das durch Hass und Verblendung entstandene schmerzhafte Brennen des Geistes; zerstöre nicht unser Land, richte die Bewohner des gesamten Reiches und der Provinzen nicht zugrunde" – das ist die Bedeutung. 568. Sadevamānusā sabbeti sabbe mānusā sadevā sadānavā pahārādādīhi asurehi saha sarakkhasā ayomayena kūṭena mahāmuggarena sadā sabbakālaṃ me siraṃ mayhaṃ matthakaṃ bhindeyyuṃ padāleyyuṃ. 568. "Alle samt den Göttern und Menschen" bedeutet: Alle Menschen mitsamt den Göttern (devas), den Dānavas (Asuras wie Pahārāda und anderen) und den Rakkhasas mögen mit einem eisernen Hammer (einer großen eisernen Keule) allzeit und immerdar mein Haupt – meinen Kopf – zerschmettern und spalten. 569. Tato paraṃ buddhānaṃ khamitabhāvañca kopābhāvañca pakāsento dake aggi na saṇṭhātītiādimāha. Tattha yathā udake aggi na saṇṭhāti na patiṭṭhāti, yathā bījaṃ sele silāmaye pabbate na viruhati, yathā agade osadhe kimi pāṇako na saṇṭhāti. Tathā kopo cittappakopo dummanatā buddhe paṭividdhasacce paccekabuddhe na jāyati na uppajjatīti attho. 569. Danach sprach er, um die Vergebungsbereitschaft und die Zornlosigkeit der Buddhas zu offenbaren, die Verse beginnend mit: "Im Wasser brennt kein Feuer" usw. Darin bedeutet "wie im Wasser kein Feuer brennt": Wie im Wasser kein Feuer Bestand hat oder verweilt, wie ein Samen auf einem nackten Felsen (einem steinernen Berg) nicht wächst, wie in einem heilsamen Gegengift (einer Medizin) kein Wurm oder Lebewesen existieren kann, ebenso entsteht kein Zorn – kein Zorn des Geistes, kein Missmut – im Buddha, im Paccekabuddha, der die Wahrheiten durchdrungen hat, er kommt in ihm nicht auf – das ist die Bedeutung. 570. Punapi buddhānaṃ ānubhāvaṃ pakāsento yathā ca bhūmītiādimāha. Tattha yathā ca bhūmi pathavī acalā niccalā, tathā buddho acaloti attho. Yathā sāgaro mahāsamuddo appameyyo pametuṃ pamāṇaṃ gahetuṃ asakkuṇeyyo, tathā buddho appameyyoti attho. Yathā ākāso aphuṭṭhākāso anantako pariyosānarahito, evaṃ tathā buddho akkhobhiyo khobhetuṃ āloḷetuṃ asakkuṇeyyoti attho. 570. Um wiederum die Macht der Buddhas zu offenbaren, sprach er die Verse beginnend mit: "Und wie die Erde" usw. Darin bedeutet "wie die Erde": Wie die Erde (die Erdscheibe) unbeweglich und fest ist, so ist auch der Buddha unerschütterlich. Wie der Ozean (das große Meer) unermesslich ist, sodass es unmöglich ist, sein Maß zu bestimmen, so ist der Buddha unermesslich. Wie der Raum (der unberührte Luftraum) unendlich und grenzenlos ist, ebenso ist der Buddha unerschütterlich, man kann ihn nicht erschüttern oder in Verwirrung bringen – das ist die Bedeutung. 571. Tato paraṃ paccekabuddhassa khamanavacanaṃ dassento sadā khantā mahāvīrātiādimāha. Tattha mahāvīrā uttamavīriyavantā buddhā tapassino pāpānaṃ tapanato ‘‘tapo’’ti laddhanāmena vīriyena samannāgatā khantā ca khantiyā ca sampannā khamitā ca paresaṃ aparādhaṃ khamitā sahitā sadā sabbakālaṃ bhavantīti sambandho. Khantānaṃ khamitānañcāti tesaṃ buddhānaṃ khantānaṃ khantiyā yuttānaṃ khamitānaṃ parāparādhakhamitānaṃ sahitānañca gamanaṃ chandādīhi agatigamanaṃ na vijjatīti attho. 571. Danach sprach er, um das geduldige Ertragen des Paccekabuddhas aufzuzeigen, die Verse beginnend mit: "Stets geduldig sind die großen Helden" usw. Darin ist der Zusammenhang wie folgt: Die großen Helden (die Buddhas von höchster Tatkraft), die Asketen (ausgestattet mit Tatkraft, die den Namen "Tapo" trägt, weil sie die Sünden verbrennt), sind stets und allezeit geduldig, mit Geduld ausgestattet, und ertragen sowie verzeihen die Verfehlungen anderer. "Der Geduldigen und Nachsichtigen" bedeutet: Bei jenen Buddhas, die geduldig (mit Geduld erfüllt) und nachsichtig (die Verfehlungen anderer ertragend) sind, gibt es kein Abweichen vom rechten Pfad durch Voreingenommenheit (wie Begierde, Hass usw.) – das ist die Bedeutung. 572. Iti [Pg.329] idaṃ vacanaṃ vatvā sambuddho paccekasambuddho pariḷāhaṃ sattānaṃ uppannadāhaṃ vinodayaṃ vinodayanto mahājanassa purato sannipatitassa sarājakassa mahato janakāyassa sammukhato tadā tasmiṃ kāle nabhaṃ ākāsaṃ abbhuggami uggañchīti attho. 572. Nachdem er diese Worte gesprochen hatte, erhob sich der Sambuddha (der Paccekasambuddha), während er das entstandene brennende Leiden der Wesen linderte, vor den Augen der versammelten großen Volksmenge samt dem König – direkt vor der großen Menschenmenge – zu jener Zeit in den Himmel (den Luftraum) empor – das ist die Bedeutung. 573. Tena kammenahaṃ dhīrāti dhīra dhitisampanna ahaṃ tena kammena paccekabuddhe katena anādarakammena imasmiṃ pacchimattabhave hīnattaṃ lāmakabhāvaṃ rājūnaṃ kappakakammakaraṇajātiṃ ajjhupāgato sampattoti attho. Samatikkamma taṃ jātinti taṃ parāyattajātiṃ saṃ suṭṭhu atikkamma atikkamitvā. Pāvisiṃ abhayaṃ puranti bhayarahitaṃ nibbānapuraṃ nibbānamahānagaraṃ pāvisiṃ paviṭṭho āsinti attho. 573. "Durch jene Tat, o Weiser" bedeutet: "O Weiser (mit Standhaftigkeit Ausgestatteter), durch jene Tat – die Tat der Respektlosigkeit gegenüber dem Paccekabuddha – habe ich in dieser meiner letzten Existenz einen niederen Zustand (einen geringen Status) erreicht, nämlich die Geburt als Barbier und Diener von Königen." "Nachdem ich jene Geburt überwunden hatte" bedeutet: Nachdem ich diese von anderen abhängige Geburt gänzlich überwunden hatte. "Ich betrat die furchtlose Stadt" bedeutet: Ich betrat die von Furcht freie Stadt des Nibbāna, die große Stadt des Nibbāna – das ist die Bedeutung. 574. Tadāpi maṃ mahāvīrāti vīruttama tadāpi tasmiṃ paccekabuddhassa āsādanasamaye api sayambhū paccekabuddho pariḷāhaṃ āsādanahetu uppannaṃ kāyacittadarathaṃ vinodesi dūrīakāsi. Ḍayhamānaṃ tato eva pacchānutāpena kukkuccena ḍayhamānaṃ santapantaṃ maṃ susaṇṭhitaṃ dosaṃ dosato dassane suṭṭhu saṇṭhitaṃ disvā khamāpayi taṃ aparādhaṃ adhivāsesīti sambandho. 574. "Auch damals mich, o großer Held" bedeutet: "O Höchster der Helden! Auch damals, zur Zeit der Kränkung des Paccekabuddhas, linderte der Selbstgewordene (der Paccekabuddha) das Brennen – die durch die Kränkung entstandene Qual an Körper und Geist – und vertrieb sie. Als er mich sah, wie ich danach vor Reue und Gewissensbissen brannte (gequält wurde), und sah, dass mein Zorn gänzlich abgeklungen war (ich den Fehler klar eingesehen hatte), gewöhnte er sich daran, mir zu vergeben, das heißt, er erduldete dieses Vergehen" – so ist der Zusammenhang zu verstehen. 575. Ajjāpi maṃ mahāvīrāti vīruttama, ajjāpi tuyhaṃ samāgamakāle api, tihaggībhi rāgaggidosaggimohaggisaṅkhātehi vā nirayaggipetaggisaṃsāraggisaṅkhātehi vā tīhi aggīhi ḍayhamānaṃ dukkhamanubhavantaṃ maṃ bhagavā sītibhāvaṃ domanassavināsena santakāyacittasaṅkhātaṃ sītibhāvaṃ nibbānameva vā apāpayi sampāpesi. Tayo aggī vuttappakāre te tayo aggī nibbāpesi vūpasamesīti sambandho. 575. "Auch heute mich, o großer Held" bedeutet: "O Höchster der Helden! Auch heute, zur Zeit der Begegnung mit dir, hat der Erhabene mich, der ich von den drei Feuern – bestehend aus dem Feuer der Gier, dem Feuer des Hasses und dem Feuer der Verblendung, oder auch dem Höllenfeuer, dem Geisterfeuer und dem Feuer des Daseinskreislaufs – verbrannt wurde und Leiden ertrug, zur Kühle geführt (zur Beruhigung von Körper und Geist durch die Vernichtung des Missmutes), das heißt, er hat mich zum Nibbāna selbst geführt. Er hat die drei Feuer der genannten Art gelöscht und gestillt" – so ist der Zusammenhang zu verstehen. 576. Evaṃ attano hīnāpadānaṃ bhagavato dassetvā idāni aññepi tassa savane niyojetvā ovadanto ‘‘yesaṃ sotāvadhānatthī’’tiādimāha. Tattha yesaṃ tumhākaṃ sotāvadhānaṃ sotassa avadhānaṃ ṭhapanaṃ atthi vijjati, te tumhe bhāsato sāsantassa mama vacanaṃ suṇātha manasi karotha. Atthaṃ tumhaṃ pavakkhāmīti yathā yena pakārena mama mayā diṭṭhaṃ padaṃ nibbānaṃ, tathā tena pakārena nibbānasaṅkhātaṃ paramatthaṃ tumhākaṃ pavakkhāmīti sambandho. 576. Nachdem er dem Erhabenen so seine eigene niedere Lebensgeschichte (apadāna) dargelegt hatte, sprach er nun, um auch die anderen zum Zuhören anzuhalten und sie zu belehren, die Verse beginnend mit: "Wer ein offenes Ohr hat" usw. Darin bedeutet "die ihr das Gehör neigt": Ihr alle, bei denen ein Schenken des Gehörs (ein Aufrichten des Ohrs) vorhanden ist, hört auf meine Worte, da ich zu euch spreche und lehre, und nehmt sie euch zu Herzen. "Ich werde euch das Heilsame verkünden": Auf welche Weise von mir die Stätte – das Nibbāna – geschaut wurde, auf genau diese Weise werde ich euch das höchste Wohl, das Nibbāna genannt wird, verkünden – so ist die Verknüpfung zu verstehen. 577. Taṃ [Pg.330] dassento sayambhuṃ taṃ vimānetvātiādimāha. Tattha sayambhuṃ sayameva bhūtaṃ ariyāya jātiyā jātaṃ santacittaṃ samāhitaṃ paccekabuddhaṃ vimānetvā anādaraṃ katvā tena kammena katenākusalena ajja imasmiṃ vattamānakāle ahaṃ nīcayoniyaṃ parāyattajātiyaṃ kappakajātiyaṃ jāto nibbatto amhi bhavāmi. 577. Um dies zu zeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Den Selbstgewordenen verachtend...“ (sayambhuṃ taṃ vimānetvā). Darin bedeutet „den Selbstgewordenen“ (sayambhuṃ): der aus sich selbst heraus durch die edle Geburt geboren ist. Indem man diesen Paccekabuddha von friedvollem Geist und gesammelter Konzentration verachtete, d. h. ihm gegenüber Respektlosigkeit zeigte, bin ich durch diese Tat, durch das begangene Unheilsame, heute in dieser gegenwärtigen Zeit in einer niederen Geburt geboren worden, in einer von anderen abhängigen Geburt, in der Kaste der Haarschneider (kappaka). 578. Mā vo khaṇaṃ virādhethāti buddhuppādakkhaṇaṃ vo tumhe mā virādhetha gaḷitaṃ mā karotha, hi saccaṃ khaṇātītā buddhuppādakkhaṇaṃ atītā atikkantā sattā socare socanti, ‘‘mayaṃ alakkhikā dummedhā bhavāmā’’ti evaṃ socantīti attho. Sadatthe attano atthe vuḍḍhiyaṃ vāyameyyātha vīriyaṃ karotha. Vo tumhehi khaṇo buddhuppādakkhaṇo samayo paṭipādito nipphādito pattoti attho. 578. „Verpasst nicht den günstigen Moment“ (mā vo khaṇaṃ virādhetha) bedeutet: Ihr sollt den günstigen Moment des Erscheinens eines Buddha nicht verpassen, lasst ihn nicht ungenutzt verstreichen. Denn wahrlich, jene Wesen, die den günstigen Moment – den Moment des Erscheinens eines Buddha – verpasst und überschritten haben, trauern und klagen, indem sie denken: „Wir sind unglücklich und unverständig.“ Dies ist die Bedeutung. Bemüht euch um euer eigenes Wohl, strengt euch für das eigene Wachstum an. Für euch ist der günstige Moment, die Zeit des Erscheinens eines Buddha, herbeigeführt, vollendet und erreicht. Dies ist die Bedeutung. 579. Tato paraṃ saṃsāragatānaṃ ādīnavaṃ upamāupameyyavasena dassento ekaccānañca vamanantiādimāha. Ekaccānaṃ kesañci puggalānaṃ vamanaṃ uddhaṃ uggiraṇaṃ ekaccānaṃ virecanaṃ adhopaggharaṇaṃ eke ekaccānaṃ halāhalaṃ visaṃ mucchākaraṇavisaṃ, ekaccānaṃ puggalānaṃ osadhaṃ rakkhanupāyaṃ bhagavā evaṃ paṭipāṭiyā akkhāsīti sambandho. 579. Danach sprach er, um das Elend jener, die im Daseinskreislauf (saṃsāra) gefangen sind, mittels Gleichnis und dem Verglichenen aufzuzeigen, die Verse beginnend mit: „Und für manche das Erbrechen...“ (ekaccānañca vamanaṃ). Die Verbindung ist wie folgt: Der Erhabene verkündete in dieser Reihenfolge für einige Personen ein Brechmittel (vamana) – das Ausstoßen nach oben –, für manche ein Abführmittel (virecana) – das Ausscheiden nach unten –, für einige das tödliche Halāhala-Gift, ein Gift, das Bewusstlosigkeit verursacht, und für manche Personen eine Medizin (osadha), ein Mittel zum Schutz. 580. Vamanaṃ paṭipannānanti paṭipannānaṃ maggasamaṅgīnaṃ vamanaṃ saṃsārachaḍḍanaṃ saṃsāramocanaṃ bhagavā akkhāsīti sambandho. Phalaṭṭhānaṃ phale ṭhitānaṃ virecanaṃ saṃsārapaggharaṇaṃ akkhāsi. Phalalābhīnaṃ phalaṃ labhitvā ṭhitānaṃ nibbānaosadhaṃ akkhāsi. Gavesīnaṃ manussadevanibbānasampattiṃ gavesīnaṃ pariyesantānaṃ puññakhettabhūtaṃ saṅghaṃ akkhāsīti sambandho. 580. „Ein Brechmittel für die Praktizierenden“ (vamanaṃ paṭipannānaṃ): Die Verbindung besagt, dass der Erhabene für die Praktizierenden, d. h. diejenigen, die den Pfad betreten haben, das Erbrechen als das Aufgeben des Saṃsāra und die Befreiung aus dem Saṃsāra verkündete. Für die in den Früchten Verweilenden (phalaṭṭhāna) verkündete er das Abführen als das Herausfließenlassen des Saṃsāra. Für die Frucht-Erlangenden (phalalābhī), die nach dem Erreichen der Frucht verweilen, verkündete er Nibbāna als Medizin (nibbānaosadha). Für die Suchenden, die nach dem Glück unter Menschen, Göttern und dem Nibbāna streben, verkündete er den Saṅgha, der das Feld des Verdienstes (puññakhetta) darstellt. Dies ist der Zusammenhang. 581. Sāsanena viruddhānanti sāsanassa paṭipakkhānaṃ halāhalaṃ kutūhalaṃ pāpaṃ akusalaṃ akkhāsīti sambandho. Yathā āsīvisoti assaddhānaṃ katapāpānaṃ puggalānaṃ saṃsāre dukkhāvahanato āsīvisasadisaṃ yathā āsīviso diṭṭhamattena bhasmakaraṇato diṭṭhaviso sappo attanā daṭṭhaṃ naraṃ jhāpeti ḍayhati dukkhāpeti. Taṃ naraṃ taṃ assaddhaṃ katapāpaṃ naraṃ halāhalavisaṃ evaṃ jhāpeti catūsu apāyesu ḍayhati sosesīti sambandho. 581. „Für die der Lehre Feindseligen“ (sāsanena viruddhānaṃ): Die Verbindung besagt, dass er für die Gegner der Lehre das tödliche Halāhala-Gift, d. h. das sündhafte Unheilsame verkündete, welches Schrecken erzeugt. „Wie eine Giftnatter“ (yathā āsīviso) bedeutet: Weil es den vertrauenslosen Menschen, die Sünden begangen haben, im Saṃsāra Leid bringt, gleicht es einer Giftnatter. Wie eine Giftnatter, die allein durch ihren Blick zu Asche verbrennt – eine Schlange mit Blickgift (diṭṭhaviso) –, den von ihr gebissenen Menschen verbrennt, versengt und ihm Schmerz zufügt; ebenso verbrennt das Halāhala-Gift diesen Menschen, diesen vertrauenslosen, sündigen Menschen, sodass er in den vier niederen Welten (apāya) brennt und dahingerafft wird. Dies ist der Zusammenhang. 582. Sakiṃ [Pg.331] pītaṃ halāhalanti visaṃ halāhalaṃ pītaṃ sakiṃ ekavāraṃ jīvitaṃ uparundhati nāseti. Sāsanena sāsanamhi virajjhitvā aparādhaṃ katvā puggalo kappakoṭimhi koṭisaṅkhye kappepi ḍayhati nijjhāyatīti attho. 582. „Einmal getrunkenes Halāhala“ (sakiṃ pītaṃ halāhalanti): Das Halāhala-Gift, wenn es auch nur einmal (sakiṃ) getrunken wird, vernichtet das Leben und zerstört es. Ebenso brennt und verzehrt sich eine Person, die sich an der Lehre vergangen hat, indem sie ein Vergehen gegen die Lehre beging, für eine Crore von Weltzeitaltern (kappakoṭi), ja selbst für zahllose Weltzeitalter. Dies ist die Bedeutung. 583. Evaṃ assaddhānaṃ puggalānaṃ phalavipākaṃ dassetvā idāni buddhānaṃ ānubhāvaṃ dassento khantiyātiādimāha. Tattha yo buddho vamanādīni akkhāsi, so buddho khantiyā khamanena ca avihiṃsāya sattānaṃ avihiṃsanena ca mettacittavatāya ca mettacittavantabhāvena ca sadevakaṃ saha devehi vattamānaṃ lokaṃ tāreti atikkamāpeti nibbāpeti, tasmā kāraṇā buddhā vo tumhehi avirādhiyā virujjhituṃ na sakkuṇeyyā, buddhasāsane paṭipajjeyyāthāti attho. 583. Nachdem er so die Frucht und das Ergebnis für die vertrauenslosen Personen dargelegt hat, spricht er nun, um die Macht der Buddhas aufzuzeigen, die Verse beginnend mit: „Durch Geduld...“ (khantiyā). Darin gilt: Jener Buddha, der das Brechmittel und die anderen Dinge verkündete, dieser Buddha führt die Welt samt den Götterwelten (sadevaka) hinüber, lässt sie den Kreislauf überschreiten und löscht ihr Leiden aus – und zwar durch Geduld (khanti), d. h. durch Nachsicht, durch Gewaltlosigkeit (avihiṃsā), d. h. das Nicht-Schädigen der Wesen, und durch das Besitzen eines Geistes voll liebevoller Güte (mettacittatā). Aus diesem Grund sollt ihr den Buddhas nicht zuwiderhandeln, ihr sollt nicht in Widerstreit mit ihnen geraten, sondern sollt der Lehre des Buddha folgen. Dies ist die Bedeutung. 584. Lābhe ca alābhe ca na sajjanti na bhajanti na lagganti. Sammānane ādarakaraṇe ca vimānane anādarakaraṇe ca acalā pathavīsadisā buddhā bhavanti, tasmā kāraṇā te buddhā tumhehi na virodhiyā na virodhetabbā virujjhituṃ asakkuṇeyyāti attho. 584. Weder bei Gewinn (lābha) noch bei Verlust (alābha) haften sie an, hängen sie an oder binden sie sich. Ob bei Verehrung (sammānana), d. h. ehrfürchtiger Behandlung, oder bei Missachtung (vimānana), d. h. respektloser Behandlung – die Buddhas bleiben unerschütterlich wie die Erde. Aus diesem Grund sollt ihr euch diesen Buddhas nicht widersetzen, man darf sich ihnen nicht widersetzen, es ist unmöglich, sich ihnen feindselig entgegenzustellen. Dies ist die Bedeutung. 585. Buddhānaṃ majjhattataṃ dassento devadattetiādimāha. Tattha vadhakāvadhakesu sabbesu sattesu samako samamānaso muni buddhamunīti attho. 585. Um die Gleichmut der Buddhas aufzuzeigen, sprach er die Worte beginnend mit: „Gegenüber Devadatta...“ (devadatte). Darin bedeutet: Gegenüber allen Wesen, ob Mörder oder Nicht-Mörder, hat der Weise – der Buddha-Weise (buddhamuni) – den gleichen Sinn, denselben unerschütterlichen Geist. Dies ist die Bedeutung. 586. Etesaṃ paṭigho natthīti etesaṃ buddhānaṃ paṭigho caṇḍikkaṃ dosacittataṃ natthi na saṃvijjati. Rāgomesaṃ na vijjatīti imesaṃ buddhānaṃ rāgopi rajjanaṃ allīyanaṃ na vijjati, na upalabbhati, tasmā kāraṇā, vadhakassa ca orasassa cāti sabbesaṃ samako samacitto buddho hotīti sambandho. 586. „Bei diesen gibt es keinen Groll“ (etesaṃ paṭigho natthi): Bei diesen Buddhas gibt es keinen Groll, keine Härte oder feindselige Gesinnung; sie existiert nicht. „Gier ist bei ihnen nicht zu finden“ (rāgomesaṃ na vijjati): Bei diesen Buddhas ist auch keine Gier vorhanden, kein Anhaften oder Verlangen; es ist nicht auffindbar. Aus diesem Grund ist der Buddha gegenüber allen, sei es ein Mörder oder der eigene leibliche Sohn (orasa), gleichermaßen gesinnt und von gleichem Geist. Dies ist der Zusammenhang. 587. Punapi buddhānaṃyeva ānubhāvaṃ dassento panthe disvāna kāsāvantiādimāha. Tattha mīḷhamakkhitaṃ gūthasammissaṃ kāsāvaṃ kasāvena rajitaṃ cīvaraṃ isiddhajaṃ ariyānaṃ dhajaṃ parikkhāraṃ, panthe magge chaḍḍitaṃ disvāna passitvā añjaliṃ katvā dasaṅgulisamodhānaṃ añjalipuṭaṃ sirasi katvā [Pg.332] sirasā sirena vanditabbaṃ isiddhajaṃ arahattaddhajaṃ buddhapaccekabuddhasāvakadīpakaṃ cīvaraṃ namassitabbaṃ mānetabbaṃ pūjetabbanti attho. 587. Um nochmals die Macht eben dieser Buddhas aufzuzeigen, sprach er die Verse beginnend mit: „Sieht man auf dem Weg das ockerfarbene Gewand...“ (panthe disvāna kāsāvaṃ). Darin bedeutet: Wenn man ein mit Kot beschmutztes, mit Fäkalien vermischtes ockerfarbenes (kāsāva) Gewand – ein mit rötlich-braunem Farbstoff gefärbtes Gewand, welches das Banner der Seher (isiddhaja), das Banner und die Utensilien der Edlen darstellt – auf dem Weg oder Pfad weggeworfen sieht (disvāna), soll man ehrerbietig grüßen (añjaliṃ katvā), indem man die gefalteten Hände mit allen zehn Fingern an das Haupt legt, und dieses Gewand mit dem Haupt (sirasā) verehren. Dieses Gewand stellt das Banner der Seher, das Banner der Arhatschaft dar, welches auf die Buddhas, Paccekabuddhas und deren Jünger hinweist; man soll es ehrfürchtig grüßen, achten und verehren. Dies ist die Bedeutung. 588. Abbhatītāti abhi atthaṅgatā nibbutā. Ye ca buddhā vattamānā idāni jātā ca ye buddhā anāgatā ajātā abhūtā anibbattā apātubhūtā ca ye buddhā. Dhajenānena sujjhantīti anena isiddhajena cīvarena ete buddhā sujjhanti visuddhā bhavanti sobhanti. Tasmā tena kāraṇena ete buddhā namassiyā namassitabbā vanditabbāti attho. ‘‘Etaṃ namassiya’’ntipi pāṭho, tassa etaṃ isiddhajaṃ namassitabbanti attho. 588. „Die Dahingegangenen“ (abbhatītā) bedeutet: Völlig erloschen, ins Nibbāna eingegangen. Und jene Buddhas, die gegenwärtig (vattamāna) jetzt geboren sind, sowie jene Buddhas der Zukunft (anāgata), die noch nicht geboren, noch nicht entstanden, noch nicht hervorgetreten und noch nicht erschienen sind – alle diese Buddhas reinigen sich durch dieses Banner (dhajenānena sujjhanti): Durch dieses Banner der Weisen, das dreifache Gewand (ticīvara), reinigen sich diese Buddhas, werden rein und erglänzen. Aus diesem Grund sind diese Buddhas zu verehren, ehrerbietig zu grüßen und zu besingen. Dies ist die Bedeutung. Es gibt auch die Lesart „etaṃ namassiyaṃ“, was bedeutet: Dieses Banner der Weisen ist zu verehren. 589. Tato paraṃ attano guṇaṃ dassento satthukappantiādimāha. Tattha satthukappaṃ buddhasadisaṃ suvinayaṃ sundaravinayaṃ sundarākārena dvārattayadamanaṃ hadayena cittena ahaṃ dhāremi savanadhāraṇādinā paccavekkhāmīti attho. Vinayaṃ vinayapiṭakaṃ namassamāno vandamāno vinaye ādaraṃ kurumāno viharissāmi sabbadā sabbasmiṃ kāle vāsaṃ kappemīti attho. 589. Danach sprach er, um seine eigenen Tugenden aufzuzeigen, die Verse beginnend mit: „Dem Lehrer gleich...“ (satthukappaṃ). Darin bedeutet „dem Lehrer gleich“ (satthukappaṃ): dem Buddha ähnlich. „Die hervorragende Disziplin“ (suvinayaṃ): die vortreffliche Disziplin, die Bändigung der drei Tore (Körper, Rede und Geist) auf vollkommene Weise. „Ich trage im Herzen“ (hadayena ahaṃ dhāremi): Ich bewahre mit dem Geist, durch Hören, Einprägen usw., und betrachte es gründlich. „Ich werde verweilen, indem ich die Disziplin verehre“ (vinayaṃ namassamāno): Ich werde leben, indem ich den Vinaya-Piṭaka ehrerbietig grüße und dem Vinaya stets tiefe Ehrfurcht erweise, und ich werde zu allen Zeiten (sabbadā) mein Leben führen. Dies ist die Bedeutung. 590. Vinayo āsayo mayhanti vinayapiṭakaṃ mayhaṃ okāsabhūtaṃ savanadhāraṇamanasikaraṇauggahaparipucchāpavattanavasena okāsabhūtaṃ gehabhūtanti attho. Vinayo ṭhānacaṅkamanti vinayo mayhaṃ savanādikiccakaraṇena ṭhitaṭṭhānañca caṅkamanaṭṭhānañca. Kappemi vinaye vāsanti vinayapiṭake vinayatantiyā savanadhāraṇapavattanavasena vāsaṃ sayanaṃ kappemi karomi. Vinayo mama gocaroti vinayapiṭakaṃ mayhaṃ gocaro āhāro bhojanaṃ niccaṃ dhāraṇamanasikaraṇavasenāti attho. 590. „Der Vinaya ist meine Wohnstätte“ (vinayo āsayo mayhaṃ) bedeutet: Der Vinaya-Piṭaka ist mein Zufluchtsort; er ist wie ein Haus (gehabhūtaṃ) durch das Hören, Bewahren, Aufmerksamsein, Aneignen, Befragen und Fortführen. „Der Vinaya ist mein Stand- und Wandelort“ (vinayo ṭhānacaṅkamaṃ) bedeutet: Der Vinaya ist mein Ort des Stehens und Gehens durch das Verrichten von Pflichten wie dem Hören und so weiter. „Ich nehme meinen Aufenthalt im Vinaya“ (kappemi vinaye vāsaṃ) bedeutet: Im Vinaya-Piṭaka nehme ich meinen Aufenthalt bzw. mein Lager durch das Hören, Bewahren und Fortführen der Vinaya-Leitlinien (vinayatantiyā). „Der Vinaya ist mein Weidegebiet“ (vinayo mama gocaro) bedeutet: Der Vinaya-Piṭaka ist mein Weidegebiet, meine Nahrung und Speise durch das beständige Bewahren und Vergegenwärtigen. 591. Vinaye pāramippattoti sakale vinayapiṭake pāramiṃ pariyosānaṃ patto. Samathe cāpi kovidoti pārājikādisattāpattikkhandhānaṃ samathe vūpasame ca vuṭṭhāne ca kovido cheko, adhikaraṇasamathe vā – 591. „Im Vinaya zur Vollendung gelangt“ (vinaye pāramippatto) bedeutet: Er hat im gesamten Vinaya-Piṭaka die Vollendung, das Äußerste, erreicht. „Auch in der Schlichtung erfahren“ (samathe cāpi kovido) bedeutet: Er ist geschickt und erfahren in der Schlichtung, Beruhigung und dem Entsühnen (vuṭṭhāna) der sieben Gruppen von Vergehen, beginnend mit den Pārājika-Vergehen, oder in der Schlichtung von Streitfragen (adhikaraṇasamatha) – ‘‘Vivādaṃ anuvādañca, āpattādhikaraṇaṃ tathā; Kiccādhikaraṇañceva, caturādhikaraṇā matā’’ti. – „Streitigkeiten, Anschuldigungen, sowie Vergehen-Rechtsfälle; und ebenso Pflichten-Rechtsfälle – dies sind die vier als Rechtsfälle bekannten Angelegenheiten.“ Vuttādhikaraṇesu ca – Und bezüglich dieser genannten Rechtsfälle – ‘‘Sammukhā [Pg.333] sativinayo, amūḷhapaṭiññākaraṇaṃ; Yebhuyya tassapāpiyya, tiṇavatthārako tathā’’ti. – „Verfahren in Gegenwart, Verfahren wegen Erinnerung, Verfahren wegen Unzurechnungsfähigkeit, Verfahren nach Geständnis; Mehrheitsentscheidung, Verfahren wegen beharrlicher Sünde, und ebenso das Zudecken mit Gras.“ Evaṃ vuttesu ca sattasu adhikaraṇasamathesu atikovido chekoti attho. Upāli taṃ mahāvīrāti bhante mahāvīra, catūsu asaṅkhyeyyesu kappasatasahassesu sabbaññutaññāṇādhigamāya vīriyavanta satthuno devamanussānaṃ anusāsakassa taṃ tava pāde pādayuge upāli bhikkhu vandati paṇāmaṃ karotīti attho. „In diesen so genannten sieben Schlichtungsverfahren für Rechtsfälle ist er überaus erfahren und geschickt“, so lautet die Bedeutung. „Upāli verehrt dich, o großer Held“ (upāli taṃ mahāvīra) bedeutet: O ehrwürdiger großer Held, vor deinen Füßen, den Füßen des Lehrers – der über vier unzählbare Zeitalter und einhunderttausend Äonen hinweg Tatkraft für das Erreichen des Allwissensheitswissens bewiesen hat und der Unterweiser von Göttern und Menschen ist –, verneigt sich der Mönch Upāli und erweist dir seine Ehrerbietung. 592. So ahaṃ pabbajitvā sambuddhaṃ namassamāno paṇāmaṃ kurumāno dhammassa ca tena bhagavatā desitassa navalokuttaradhammassa sudhammataṃ sundaradhammabhāvaṃ jānitvā dhammañca namassamāno gāmato gāmaṃ purato punaṃ nagarato nagaraṃ vicarissāmīti sambandho. 592. Dies ist der syntaktische Zusammenhang: „Ich, der ich hinausgezogen bin, werde den vollkommen Erwachten verehren und ihm Ehrerbietung erweisen; und nachdem ich die Vortrefflichkeit des vom Erhabenen gelehrten Dhamma – des neunfachen überweltlichen Dhamma – erkannt habe, werde ich, auch den Dhamma verehrend, von Dorf zu Dorf, von Stadt zu Stadt wandern.“ 593. Kilesā jhāpitā mayhanti mayā paṭividdhaarahattamaggañāṇena mayhaṃ cittasantānagatā sabbe diyaḍḍhasahassasaṅkhā kilesā jhāpitā sositā visositā viddhaṃsitā. Bhavā sabbe samūhatāti kāmabhavādayo sabbe nava bhavā mayā samūhatā saṃ suṭṭhu ūhatā khepitā viddhaṃsitā. Sabbāsavā parikkhīṇāti kāmāsavo, bhavāsavo, diṭṭhāsavo, avijjāsavoti sabbe cattāro āsavā parikkhīṇā parisamantato khayaṃ pāpitā. Idāni imasmiṃ arahattappattakāle punabbhavo punuppattisaṅkhāto bhavo bhavanaṃ jāti natthīti attho. 593. „Die Befleckungen sind von mir verbrannt worden“ (kilesā jhāpitā mayhaṃ) bedeutet: Durch das von mir durchdrungene Wissen des Pfades der Arhatschaft (arahattamaggañāṇa) sind alle in meinem Geistesstrom befindlichen eintausendfünfhundert Befleckungen verbrannt, ausgetrocknet, völlig verdorrt und vernichtet worden. „Alle Daseinsformen sind entwurzelt“ (bhavā sabbe samūhatā) bedeutet: Alle neun Daseinsbereiche, beginnend mit dem Sinnesdasein (kāmabhava), wurden von mir gänzlich entwurzelt, völlig vernichtet, aufgezehrt und zerschlagen. „Alle Triebe sind gänzlich versiegt“ (sabbāsavā parikkhīṇā) bedeutet: Der Sinnentrieb, der Daseinstrieb, der Ansichtentrieb und der Unwissenheitstrieb – alle vier Triebe sind gänzlich erschöpft und rundum zum Erlöschen gebracht worden. Nun, im Moment des Erreichens der Arhatschaft, gibt es kein erneutes Dasein mehr, das als Wiedergeburt bekannt ist, kein Werden und keine Geburt. 594. Uttari somanassavasena udānaṃ udānento svāgatantiādimāha. Tattha buddhaseṭṭhassa uttamabuddhassa santike samīpe ekanagare vā mama āgamanaṃ svāgataṃ suṭṭhu āgamanaṃ sundarāgamanaṃ vata ekantena āsi ahosīti sambandho. Tisso vijjāti pubbenivāsadibbacakkhuāsavakkhayavijjā anuppattā sampattā, paccakkhaṃ katāti attho. Kataṃ buddhassa sāsananti buddhena bhagavatā desitaṃ anusiṭṭhi sāsanaṃ kataṃ nipphāditaṃ vattapaṭipattiṃ pūretvā kammaṭṭhānaṃ manasi karitvā arahattamaggañāṇādhigamena sampāditanti attho. 594. Weiterhin sprach er voller Freude ein feierliches Wort der Inspiration aus, beginnend mit: „Willkommen ist...“ (svāgataṃ). Hierbei ist der syntaktische Zusammenhang: In der Gegenwart des edelsten Buddha, des allerhöchsten Buddha, oder in derselben Stadt, war meine Ankunft wahrlich ein Segen, ein gutes Kommen, ein wahrhaft schönes Kommen. „Die drei klaren Wissen“ (tisso vijjā) – nämlich das Wissen um die Erinnerung an frühere Dasein, das himmlische Auge und das Wissen um die Vernichtung der Triebe – wurden erlangt und verwirklicht. „Vollbracht ist die Lehre des Buddha“ (kataṃ buddhassa sāsanaṃ) bedeutet: Die vom Buddha, dem Erhabenen, dargelegte Unterweisung und Lehre wurde erfüllt und vollendet, indem die Pflichten der Praxis erfüllt, das Meditationsobjekt (kammaṭṭhāna) verinnerlicht und dies durch das Erlangen des Wissens um den Pfad der Arhatschaft verwirklicht wurde. 595. Paṭisambhidā catassoti atthapaṭisambhidādayo catasso paññāyo sacchikatā paccakkhaṃ katā. Vimokkhāpi ca aṭṭhimeti cattāri [Pg.334] maggañāṇāni cattāri phalañāṇānīti ime aṭṭha vimokkhā saṃsārato muccanūpāyā sacchikatāti sambandho. Chaḷabhiññā sacchikatāti – 595. „Die vier analytischen Erkenntnisse“ (paṭisambhidā catasso) bedeutet: Die vier Weisheiten, beginnend mit der analytischen Erkenntnis der Bedeutung (atthapaṭisambhidā), wurden verwirklicht und direkt erfahren. „Auch diese acht Befreiungen“ (vimokkhāpi ca aṭṭhime) bezieht sich auf die vier Pfad-Erkenntnisse und die vier Frucht-Erkenntnisse; der syntaktische Zusammenhang lautet: Diese acht Befreiungen, welche die Mittel zur Befreiung aus dem Kreislauf des Daseins (saṃsāra) sind, wurden verwirklicht. „Die sechs höheren Geisteskräfte wurden verwirklicht“ (chaḷabhiññā sacchikatā) – ‘‘Iddhividhaṃ dibbasotaṃ, cetopariyañāṇakaṃ; Pubbenivāsañāṇañca, dibbacakkhāsavakkhaya’’nti. – „Die Arten der übernatürlichen Kräfte, das himmlische Gehör, das Wissen um die Gedanken anderer; das Wissen um die Erinnerung an frühere Leben, das himmlische Auge und die Vernichtung der Triebe.“ Imā cha abhiññā sacchikatā paccakkhaṃ katā. Imesaṃ ñāṇānaṃ sacchikaraṇena buddhassa sāsanaṃ katanti attho. Diese sechs höheren Geisteskräfte wurden verwirklicht und direkt erfahren. Durch die Verwirklichung dieser Erkenntnisse wurde die Lehre des Buddha vollbracht, so lautet die Bedeutung. Itthanti iminā heṭṭhā vuttappakārena. Sudanti padapūraṇamatte nipāto. Āyasmā upāli theroti thirasīlādiguṇayutto sāvako imā pubbacaritāpadānadīpikā gāthāyo abhāsittha kathayitthāti attho. „So“ (itthaṃ) bedeutet: auf diese oben dargelegte Weise. „Wahrlich“ (sudaṃ) ist eine bloße Partikel zur Versfüllung. „Der ehrwürdige Elder Upāli“ (āyasmā upāli thero) bedeutet: Der Jünger, der mit festen sittlichen Eigenschaften und anderen Vorzügen ausgestattet ist, hat diese Strophen, die das Abenteuer seines früheren Wandels (apadāna) erhellen, gesprochen und dargelegt. Upālittheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Lebensgeschichte (apadāna) des Elders Upāli ist abgeschlossen. 3-7. Aññāsikoṇḍaññattheraapadānavaṇṇanā 3-7. Die Erklärung der Lebensgeschichte (apadāna) des Elders Aññāsikoṇḍañña. Padumuttarasambuddhantiādikaṃ āyasmato aññāsikoṇḍaññattherassa apadānaṃ. Ayaṃ kira purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato kāle haṃsavatīnagare gahapatimahāsālakule nibbattitvā viññutaṃ patvā ekadivasaṃ satthu santike dhammaṃ suṇanto satthāraṃ ekaṃ bhikkhuṃ attano sāsane paṭhamaṃ paṭividdhadhammarattaññūnaṃ aggaṭṭhāne ṭhapentaṃ disvā sayampi taṃ ṭhānantaraṃ patthento satasahassabhikkhuparivārassa bhagavato sattāhaṃ mahādānaṃ pavattetvā paṇidhānaṃ akāsi. Satthāpissa anantarāyataṃ disvā bhāviniṃ sampattiṃ byākāsi. So yāvajīvaṃ puññāni karonto satthari parinibbute cetiye patiṭṭhāpiyamāne antocetiye ratanagharaṃ kārāpesi, cetiyaṃ parivāretvā sahassaratanagghikāni ca kāresi. Die mit „Dem vollkommen Erwachten Padumuttara...“ (padumuttarasambuddhassa...) beginnenden Verse sind die Lebensgeschichte (apadāna) des ehrwürdigen Elders Aññāsikoṇḍañña. Dieser hatte – so heißt es – unter früheren Buddhas heilsame Absichten gefasst und in verschiedenen Existenzen Verdienste angesammelt, die eine unterstützende Bedingung für die Befreiung (vivaṭṭūpanissaya) bildeten. Zur Zeit des erhabenen Padumuttara wurde er in der Stadt Haṃsāvatī in einer wohlhabenden Großgrundbesitzerfamilie (gahapatimahāsāla) geboren. Als er das Alter der Einsicht erreicht hatte, hörte er eines Tages in der Gegenwart des Meisters den Dhamma. Er sah, wie der Meister einen bestimmten Mönch auf den obersten Rang derjenigen setzte, die als Erste den Dhamma durchdrungen hatten und von langer Zugehörigkeit (rattaññū) waren. Da er dieselbe Stellung für sich selbst erstrebte, spendete er dem Erhabenen, der von einem Gefolge von einhunderttausend Mönchen umgeben war, sieben Tage lang eine große Gabe (mahādāna) und legte dieses Gelübde (paṇidhāna) ab. Auch der Meister sah, dass ihm kein Hindernis im Wege stand, und prophezeite ihm seine künftige Erfüllung. Er wirkte zeitlebens heilsame Taten. Als der Meister ins Parinibbāna eingegangen war und ein Schrein (cetiya) errichtet wurde, ließ er im Inneren des Schreins ein Schatzhaus (ratanaghara) erbauen und umgab den Schrein mit Verzierungen im Wert von je tausend Juwelen. So evaṃ puññāni katvā tato cavitvā devamanussesu saṃsaranto vipassissa bhagavato kāle mahākālo nāma kuṭumbiko hutvā aṭṭhakarīsamatte khette sāligabbhaṃ phāletvā gahitasālitaṇḍulehi asambhinnakhīrapāyāsaṃ sampādetvā tattha madhusappisakkarādayo pakkhipitvā buddhappamukhassa saṅghassa adāsi. Sāligabbhaṃ phāletvā gahitagahitaṭṭhānaṃ [Pg.335] puna pūrati. Puthukakāle puthukaggaṃ nāma adāsi. Lāyane lāyanaggaṃ, veṇikaraṇe veṇaggaṃ, kalāpādikaraṇe kalāpaggaṃ, khalaggaṃ, bhaṇḍaggaṃ, minaggaṃ koṭṭhagganti evaṃ ekasasse nava vāre aggadānaṃ adāsi, tampi sassaṃ atirekataraṃ sampannaṃ ahosi. Nachdem er so heilsame Taten vollbracht hatte, schied er von dort dahingeschieden und wanderte unter Göttern und Menschen. Zur Zeit des erhabenen Vipassī wurde er ein Hausvater namens Mahākāla. Auf einem Feld von etwa acht Karīsa-Maß spaltete er die unreifen Hülsen des Sāli-Reises auf, entnahm die Reiskörner, bereitete daraus eine reine, unvermischte Milchspeise, fügte Honig, Butterschmalz, Zucker und anderes hinzu und spendete sie der Gemeinde mit dem Buddha an der Spitze. Die Stelle, an der die Reisspelzen aufgespalten und entnommen worden waren, füllte sich sogleich wieder auf. Zur Zeit des unreifen Reises gab er die ersten Früchte des unreifen Reises (puthukagga). Zur Erntezeit gab er die ersten Früchte der Ernte; beim Binden der Garben die ersten Früchte des Bindens; beim Aufschichten der Garben die ersten Früchte des Aufschichtens; auf der Tenne die ersten Früchte der Tenne; beim Einpacken die ersten Früchte des Einpackens; beim Abmessen die ersten Früchte des Abmessens und beim Einlagern in den Speicher die ersten Früchte des Speichers. Auf diese Weise spendete er von einer einzigen Ernte neunmal die Erstlingsgaben (aggadāna), und dennoch geriet diese Ernte überaus reichlich und üppig. Evaṃ yāvajīvaṃ puññāni katvā tato cuto devaloke nibbattitvā devesu ca manussesu ca saṃsaranto amhākaṃ bhagavato uppattito puretarameva kapilavatthunagarassa avidūre doṇavatthunāmake brāhmaṇagāme brāhmaṇamahāsālakule nibbatti. Tassa koṇḍaññoti gottato āgataṃ nāmaṃ ahosi. So vayappatto tayo vede uggahetvā lakkhaṇamantesu ca pāraṃ agamāsi. Tena samayena amhākaṃ bodhisatto tusitapurato cavitvā kapilavatthupure suddhodanamahārājassa gehe nibbatti. Tassa nāmaggahaṇadivase aṭṭhuttarasatesu brāhmaṇesu upanītesu ye aṭṭha brāhmaṇā lakkhaṇapariggahaṇatthaṃ mahātalaṃ upanītā. So tesu sabbanavako hutvā mahāpurisassa lakkhaṇanipphattiṃ disvā ‘‘ekaṃsena ayaṃ buddho bhavissatī’’ti niṭṭhaṃ gantvā mahāsattassa abhinikkhamanaṃ udikkhanto vicarati. Nachdem er so zeit seines Lebens verdienstvolle Taten vollbracht hatte, schied er von dort, wurde in der Götterwelt wiedergeboren und wanderte unter Göttern und Menschen umher. Noch vor dem Erscheinen unseres Erhabenen wurde er unweit der Stadt Kapilavatthu im Brahmanendorf namens Doṇavatthu in einer wohlhabenden Brahmanenfamilie geboren. Seiner Abstammung nach erhielt er den Namen Koṇḍañña. Als er das Mannesalter erreicht hatte, erlernte er die drei Veden und erlangte die Meisterschaft in der Wissenschaft der Körpermerkmale. Zu jener Zeit schied unser Bodhisatta aus der Tusita-Stadt und wurde im Hause des Großkönigs Suddhodana in der Stadt Kapilavatthu geboren. Am Tag seiner Namensgebung wurden einhundertacht Brahmanen herbeigerufen, von denen acht Brahmanen, die zur Untersuchung der Merkmale fähig waren, in das obere Stockwerk geführt wurden. Er, der jüngste unter ihnen, sah die Vollkommenheit der Merkmale des Großen Mannes, gelangte zu der Gewissheit: „Zweifellos wird dieser ein Buddha werden“, und lebte fortan in Erwartung des großen Auszugs des Großen Wesens. Bodhisattopi kho mahatā parivārena vaḍḍhamāno anukkamena vuddhippatto ñāṇaparipākaṃ gantvā ekūnatiṃsatime vasse mahābhinikkhamanaṃ nikkhamanto anomānadītīre pabbajitvā anukkamena uruvelaṃ gantvā padhānaṃ padahi. Tadā koṇḍañño māṇavo mahāsattassa pabbajitabhāvaṃ sutvā lakkhaṇapariggāhakabrāhmaṇānaṃ puttehi vappamāṇavādīhi saddhiṃ attapañcamo pabbajitvā anukkamena bodhisattassa santikaṃ upasaṅkamitvā chabbassāni taṃ upaṭṭhahanto tassa oḷārikāhāraparibhogena nibbinno apakkamitvā isipatanaṃ agamāsi. Atha kho bodhisatto oḷārikāhāraparibhogena laddhakāyabalo vesākhapuṇṇamāyaṃ bodhirukkhamūle aparājitapallaṅke nisinno tiṇṇaṃ mārānaṃ matthakaṃ madditvā abhisambuddho hutvā sattasattāhaṃ bodhimaṇḍeyeva vītināmetvā pañcavaggiyānaṃ ñāṇaparipākaṃ ñatvā āsāḷhīpuṇṇamāyaṃ isipatanaṃ gantvā tesaṃ dhammacakkapavattanasuttantaṃ (mahāva. 13 ādayo; saṃ. ni. 5.1081) kathesi. Desanāpariyosāne koṇḍaññatthero [Pg.336] aṭṭhārasahi brahmakoṭīhi saddhiṃ sotāpattiphale patiṭṭhāsi. Atha pañcamiyaṃ pakkhassa anattalakkhaṇasuttantadesanāya (mahāva. 20 ādayo; saṃ. ni. 3.59) arahattaṃ sacchākāsi. Auch der Bodhisatta wuchs in einer großen Gefolgschaft heran, erreichte allmählich das reife Alter sowie die Reife des Wissens und vollzog in seinem neunundzwanzigsten Jahr den großen Auszug. Er weihte sich am Ufer des Flusses Anomā dem asketischen Leben, begab sich allmählich nach Uruvelā und bemühte sich dort im extremen Streben. Damals hörte der junge Koṇḍañña, dass das Große Wesen in die Hauslosigkeit gezogen war, und zog zusammen mit den Söhnen der merkmallesenden Brahmanen, angeführt von Vappa, als fünfter seiner Gruppe ebenfalls in die Hauslosigkeit. Er suchte allmählich die Nähe des Bodhisatta auf und diente ihm sechs Jahre lang. Doch als er darüber enttäuscht war, dass dieser wieder feste Nahrung zu sich nahm, verließ er ihn und begab sich nach Isipatana. Daraufhin erlangte der Bodhisatta durch den Genuss fester Nahrung wieder körperliche Kraft, setzte sich am Vollmondtag des Monats Vesākha am Fuße des Bodhi-Baumes auf den unbesiegbaren Thron, bezwang das Haupt der drei Māras und erlangte die vollkommene Erleuchtung. Nachdem er sieben mal sieben Tage genau dort am Orte der Erleuchtung verbracht hatte, erkannte er die Reife des Wissens der Fünfergruppe und begab sich am Vollmondtag des Monats Āsāḷhī nach Isipatana, wo er ihnen das Dhammacakkapavattana-Suttanta verkündete. Am Ende dieser Lehrrede wurde der ehrwürdige Koṇḍañña zusammen mit achtzehn Millionen Brahmās in der Frucht des Stromeintritts gefestigt. Daraufhin verwirklichte er am fünften Tag der Monatshälfte durch die Verkündung des Anattalakkhaṇa-Suttanta die Arahatschaft. 596. Evaṃ so arahattaṃ patvā ‘‘kiṃ kammaṃ katvā ahaṃ lokuttarasukhaṃ adhigatomhī’’ti upadhārento attano pubbakammaṃ paccakkhato ñatvā somanassavasena pubbacaritāpadānaṃ udānavasena dassento padumuttarasambuddhantiādimāha. Tassattho heṭṭhā vuttoyeva. Lokajeṭṭhaṃ vināyakanti sakalassa sattalokassa jeṭṭhaṃ padhānanti attho. Visesena veneyyasatte saṃsārasāgarassa paratīraṃ amatamahānibbānaṃ neti sampāpetīti vināyako, taṃ vināyakaṃ. Buddhabhūmimanuppattanti buddhassa bhūmi patiṭṭhānaṭṭhānanti buddhabhūmi, sabbaññutaññāṇaṃ, taṃ anuppatto paṭividdhoti buddhabhūmimanuppatto, taṃ buddhabhūmimanuppattaṃ, sabbaññutappattaṃ buddhabhūtanti attho. Paṭhamaṃ addasaṃ ahanti paṭhamaṃ vesākhapuṇṇamiyā rattiyā paccūsasamaye buddhabhūtaṃ padumuttarasambuddhaṃ ahaṃ addakkhinti attho. 596. Nachdem er so die Arahatschaft erlangt hatte, überlegte er: „Durch welche Tat habe ich dieses weltübersteigende Glück erlangt?“, erkannte sein eigenes früheres Karma unmittelbar und sprach voller Freude, indem er sein früheres Leben in Form eines feierlichen Ausspruchs darlegte, die Worte beginnend mit: „Padumuttarasambuddhaṃ...“. Deren Bedeutung wurde bereits oben erklärt. Die Formulierung „lokajeṭṭhaṃ vināyakaṃ“ bedeutet: das Oberhaupt, den Vorzüglichsten der gesamten Welt der Lebewesen. Er, der die belehrbaren Wesen insbesondere über den Ozean des Saṃsāra zum jenseitigen Ufer, dem todlosen großen Nibbāna, führt und dorthin gelangen lässt, wird „Führer“ genannt; auf diesen Führer bezieht sich das Wort. „Buddhabhūmimanuppattaṃ“: „Buddhabhūmi“ bezeichnet den Boden, die Grundlage des Buddha, nämlich das Allwissenheits-Wissen; wer dieses erreicht und durchdrungen hat, ist „buddhabhūmimanuppatto“; „taṃ buddhabhūmimanuppattaṃ“ bedeutet also: denjenigen, der das Allwissenheits-Wissen erlangt hat, den zum Buddha Gewordenen. „Paṭhamaṃ addasaṃ ahaṃ“ bedeutet: Ich sah als Erster in der Morgendämmerung der Vollmondnacht des Monats Vesākha den zum Buddha gewordenen Padumuttara, den vollkommen Erleuchteten. 597. Yāvatā bodhiyā mūleti yattakā bodhirukkhasamīpe yakkhā samāgatā rāsibhūtā sambuddhaṃ buddhabhūtaṃ taṃ buddhaṃ pañjalīkatā dasaṅgulisamodhānaṃ añjalipuṭaṃ sirasi ṭhapetvā vandanti namassantīti sambandho. 597. „Yāvatā bodhiyā mūle“ bedeutet: So viele Yakkhas sich auch in der Nähe des Bodhi-Baumes versammelt und zusammengeschart hatten, sie erwiesen dem vollkommen Erleuchteten, dem zum Buddha Gewordenen, Ehrerbietung, indem sie mit gefalteten Händen – die zehn Finger zusammengelegt – die Geste der Ehrfurcht an ihr Haupt legten und ihn verehrten; so lautet die Verknüpfung. 598. Sabbe devā tuṭṭhamanāti buddhabhūtaṭṭhānaṃ āgatā te sabbe devā tuṭṭhacittā ākāse sañcarantīti sambandho. Andhakāratamonudoti ativiya andhakāraṃ mohaṃ nudo khepano ayaṃ buddho anuppattoti attho. 598. „Sabbe devā tuṭṭhamanā“ bedeutet: Alle diese Götter, die an den Ort der Erleuchtung gekommen waren, zogen mit zufriedenem Herzen am Himmel umher; so lautet die Verknüpfung. „Andhakāratamonudo“ bedeutet: Dieser Buddha, der die dichte Finsternis der Verblendung vertreibt und vernichtet, ist erschienen. 599. Tesaṃ hāsaparetānanti hāsehi pītisomanassehi samannāgatānaṃ tesaṃ devānaṃ mahānādo mahāghoso avattatha pavattati, sammāsambuddhasāsane kilese saṃkilese dhamme jhāpayissāmāti sambandho. 599. „Tesaṃ hāsaparetānaṃ“ bedeutet: Von jenen Göttern, die mit Freude und Heiterkeit erfüllt waren, ertönte ein lauter Ruf, ein gewaltiger Schall, der anhält, mit dem Gedanken: „In der Lehre des vollkommen Erleuchteten werden wir die Befleckungen und die verunreinigenden Dinge verbrennen“; so lautet die Verknüpfung. 600. Devānaṃ giramaññāyāti vācāya thutivacanena saha udīritaṃ devānaṃ saddaṃ jānitvā haṭṭho haṭṭhena cittena somanassasahagatena cittena ādibhikkhaṃ paṭhamaṃ āhāraṃ buddhabhūtassa ahaṃ adāsinti sambandho. 600. „Devānaṃ giramaññāya“ bedeutet: Nachdem ich die Stimme der Götter vernommen hatte, die sich in Lobpreisungen geäußert hatte, gab ich freudig und mit einem von Heiterkeit erfüllten Herzen dem zum Buddha Gewordenen die erste Speise, die erste Nahrung; so lautet die Verknüpfung. 602. Sattāhaṃ [Pg.337] abhinikkhammāti mahābhinikkhamanaṃ nikkhamitvā sattāhaṃ padhānaṃ katvā sabbaññutaññāṇapadaṭṭhānaṃ arahattamaggañāṇasaṅkhātaṃ bodhiṃ ajjhagamaṃ adhigañchiṃ ahanti attho. Idaṃ me paṭhamaṃ bhattanti idaṃ bhattaṃ sarīrayāpanaṃ brahmacārissa uttamacārissa me mayhaṃ iminā devaputtena paṭhamaṃ dinnaṃ ahosīti attho. 602. „Sattāhaṃ abhinikkhammā“ bedeutet: Nachdem ich den großen Auszug vollzogen und sieben Tage lang gestrebt hatte, erlangte und erreichte ich die Erleuchtung, welche als das Pfad-Wissen der Arahatschaft definiert ist und die Grundlage für das Allwissenheits-Wissen bildet; dies ist die Bedeutung. „Idaṃ me paṭhamaṃ bhattant“ bedeutet: Diese Nahrung, die der Erhaltung des Körpers dient, wurde mir, der ich das erhabene heilige Leben führe, von diesem Göttersohn als erstes dargebracht; dies ist die Bedeutung. 603. Tusitā hi idhāgantvāti tusitabhavanato idha manussaloke āgantvā yo devaputto me mama bhikkhaṃ upānayi adāsi, taṃ devaputtaṃ kittayissāmi kathessāmi pākaṭaṃ karissāmi. Bhāsato bhāsantassa mama vacanaṃ suṇāthāti sambandho. Ito paraṃ anuttānapadameva vaṇṇayissāma. 603. „Tusitā hi idhāgantvā“ bedeutet: Den Göttersohn, der aus dem Tusita-Himmel hierher in die Menschenwelt kam und mir meine Almosenspeise darbrachte und überreichte, diesen Göttersohn werde ich rühmen, besingen und weithin bekannt machen. „Hört meine Worte, während ich spreche“; so lautet die Verknüpfung. Von hier an werden wir nur noch die unklaren Begriffe kommentieren. 607. Tidasāti tāvatiṃsabhavanā. Agārāti attano uppannabrāhmaṇagehato nikkhamitvā pabbajitvā cha saṃvaccharāni dukkarakārikaṃ karontena bodhisattena saha vasissatīti sambandho. 607. „Tidasā“ bedeutet: aus der Tāvatiṃsa-Götterwelt. „Agārā“ bedeutet: nachdem er aus seinem heimatlichen Brahmanenhaus ausgezogen war und die Hauslosigkeit angetreten hatte, wird er sechs Jahre lang zusammen mit dem Bodhisatta leben, welcher schwierige Askeseübungen vollzieht; so lautet die Verknüpfung. 608. Tato sattamake vasseti tato pabbajitakālato paṭṭhāya sattame saṃvacchare. Buddho saccaṃ kathessatīti chabbassāni dukkarakārikaṃ katvā sattamasaṃvacchare buddho hutvā bārāṇasiyaṃ isipatane migadāye dhammacakkapavattanasuttantadesanāya dukkhasamudayanirodhamaggasaccasaṅkhātaṃ catusaccaṃ kathessatīti attho. Koṇḍañño nāma nāmenāti nāmena gottanāmavasena koṇḍañño nāma. Paṭhamaṃ sacchikāhitīti pañcavaggiyānamantare paṭhamaṃ ādito eva sotāpattimaggañāṇaṃ sacchikāhiti paccakkhaṃ karissatīti attho. 608. „Danach, im siebten Jahr“ bedeutet: beginnend mit dem Zeitpunkt seiner Hausloswerdung, im siebten Jahr. „Als Buddha wird er die Wahrheit verkünden“ bedeutet: Nachdem er sechs Jahre lang schwerste Kasteiungen (dukkarakārikā) auf sich genommen hatte, wurde er im siebten Jahr zum Buddha und wird in Bārāṇasī, in Isipatana im Wildpark, durch die Verkündigung der Dhammacakkapavattana-Lehrrede die Lehre der vier Wahrheiten verkünden, welche als die Wahrheiten von Leiden, Ursprung, Erlöschen und dem Pfad bekannt sind; dies ist die Bedeutung. „Koṇḍañña mit Namen“ bedeutet: Koṇḍañña mit Namen aufgrund seines Sippennamens (gotta). „Er wird als Erster verwirklichen“ bedeutet: Er wird als Erster inmitten der Gruppe der fünf Mönche (pañcavaggiyā) von allem Anfang an das Wissen des Pfades des Stromeintritts (sotāpattimaggañāṇa) verwirklichen, das heißt, direkt erfahren; dies ist die Bedeutung. 609. Nikkhantenānupabbajinti nikkhantena bodhisattena saha nikkhamitvā anupabbajinti attho. Tathā anupabbajitvā mayā padhānaṃ vīriyaṃ sukataṃ suṭṭhu kataṃ daḷhaṃ katvā katanti attho. Kilese jhāpanatthāyāti kilese sosanatthāya viddhaṃsanatthāya anagāriyaṃ agārassa ahitaṃ kasivaṇijjādikammavirahitaṃ sāsanaṃ pabbajiṃ paṭipajjinti attho. 609. „Sie zogen nach seinem Auszug ebenfalls in die Hauslosigkeit“ bedeutet: Nachdem sie zusammen mit dem ausziehenden Bodhisatta das Haus verlassen hatten, folgten sie ihm in die Hauslosigkeit nach; dies ist die Bedeutung. „Ebenso bin ich ihm nachgefolgt“ und „die Anstrengung des Strebens habe ich wohlgetan“ bedeutet: Ich habe die Anstrengung gut ausgeführt, fest entschlossen und beharrlich getan; so ist die Verknüpfung herzustellen. „Um die Befleckungen auszubrennen“ bedeutet: Um die Befleckungen auszutrocknen und zu vernichten, zog ich aus in die Hauslosigkeit – die dem häuslichen Leben entgegengesetzt und frei von Beschäftigungen wie Ackerbau und Handel ist – in die Lehre (sāsana) des Erhabenen; dies ist die Bedeutung. 610. Abhigantvāna [Pg.338] sabbaññūti sabbaṃ atītānāgatapaccuppannaṃ vā saṅkhāravikāralakkhaṇanibbānapaññattisaṅkhātaṃ ñeyyaṃ vā jānanto devehi saha vattamāne satta loke buddho migāraññaṃ migadāya vihāraṃ abhigantvā upasaṅkamitvā me mayā sacchikatena iminā sotāpattimaggañāṇena amatabheriṃ amatamahānibbānabheriṃ ahari pahari dassesīti attho. 610. „Nachdem er an den Allwissenden herangetreten war“ bedeutet: Er, der alles Erkennbare – sei es vergangen, zukünftig oder gegenwärtig, bestehend aus den Gestaltungen (saṅkhāra), deren Veränderungen (vikāra), Merkmalen (lakkhaṇa), dem Nibbāna und den begrifflichen Bezeichnungen (paññatti) – erkannte, trat an den Buddha in dieser von Göttern begleiteten Welt der Lebewesen heran. Er erreichte den Wildpark, das Migadāya-Kloster (hierbei ist die Akkusativ-Endung im Sinne des Lokativs zu verstehen, d. h. im Wildpark-Kloster). „Durch mich“ bedeutet: Durch das von mir verwirklichte Wissen des Pfades des Stromeintritts schlug ich die Trommel der Todeslosigkeit, die große Trommel des todlosen, erhabenen Nibbāna, das heißt, ich ließ sie ertönen; dies ist die Bedeutung. 611. So dānīti so ahaṃ paṭhamaṃ sotāpanno idāni arahattamaggañāṇena amataṃ santaṃ vūpasantasabhāvaṃ padaṃ pajjitabbaṃ pāpuṇitabbaṃ, anuttaraṃ uttaravirahitaṃ nibbānaṃ patto adhigatoti attho. Sabbāsave pariññāyāti kāmāsavādayo sabbe āsave pariññāya pahānapariññāya pajahitvā anāsavo nikkileso viharāmi iriyāpathavihārena vāsaṃ kappemi. Paṭisambhidā catassotyādayo gāthāyo vuttatthāyeva. 611. „Er nun“ bedeutet: Ich, der ich zuerst ein Stromeingetretener (sotāpanna) war, habe nun durch das Wissen des Pfades der Heiligkeit (arahattamagga) den todlosen, friedvollen, von Natur aus gestillten Zustand, das zu erreichende, unübertreffliche Nibbāna, erlangt und verwirklicht; dies ist die Bedeutung. „Nachdem er alle Triebe vollkommen erkannt hat“ bedeutet: Nachdem ich alle Triebe, wie den Sinnestrieb (kāmāsava) usw., durch das durchdringende Wissen des Überwindens (pahānapariññā) vollkommen erkannt und aufgegeben habe, verweile ich frei von Trieben und frei von Befleckungen; ich führe mein Leben in den vier Körperhaltungen. Die Verse beginnend mit „Die vier analytischen Wissenszweige“ (paṭisambhidā catasso) und so weiter haben dieselbe bereits erklärte Bedeutung. Atha naṃ satthā aparabhāge jetavanamahāvihāre bhikkhusaṅghamajjhe paññattavarabuddhāsane nisinno paṭhamaṃ paṭividdhadhammabhāvaṃ dīpento ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ rattaññūnaṃ yadidaṃ aññāsikoṇḍañño’’ti (a. ni. 1.188) etadagge ṭhapesi. So dvīhi aggasāvakehi attani kariyamānaṃ paramanipaccakāraṃ, gāmantasenāsane ākiṇṇavihārañca pariharitukāmo, vivekābhiratiyā viharitukāmo ca attano santikaṃ upagatānaṃ gahaṭṭhapabbajitānaṃ paṭisanthārakaraṇampi papañcaṃ maññamāno satthāraṃ āpucchitvā himavantaṃ pavisitvā chaddantehi nāgehi upaṭṭhiyamāno chaddantadahatīre dvādasa vassāni vasi. Evaṃ tattha vasantaṃ theraṃ ekadivasaṃ sakko devarājā upasaṅkamitvā vanditvā ṭhito evamāha ‘‘sādhu me, bhante, ayyo dhammaṃ desetū’’ti. Thero tassa catusaccagabbhaṃ tilakkhaṇāhataṃ suññatāpaṭisaṃyuttaṃ nānānayavicittaṃ amatogadhaṃ buddhalīlāya dhammaṃ desesi. Taṃ sutvā sakko attano pasādaṃ pavedento – Danach setzte ihn der Meister zu einer späteren Zeit im großen Jetavana-Kloster inmitten der Bhikkhu-Gemeinde, auf dem hergerichteten edlen Buddha-Sitz sitzend, an die Spitze, um dessen Eigenschaft, die Lehre als Erster durchdrungen zu haben, aufzuzeigen: „Dies ist der Vorzüglichste, ihr Mönche, unter meinen jüngernden Mönchen, die von langer Erfahrung (rattaññū) sind, nämlich Aññāsikoṇḍañña“; so setzte er ihn auf diesen Ehrenplatz. Da jener die ihm von den beiden Hauptschülern dargebrachte höchste Ehrerbietung sowie das unruhige und geschäftige Verweilen in dorfnahen Einsiedeleien meiden wollte, und weil er aus Liebe zur Abgeschiedenheit leben wollte, betrachtete er selbst das freundliche Empfangen und Bewirten der zu ihm kommenden Hausleute und Ordinierten als eine Verzögerung (papañca). Er verabschiedete sich beim Meister, zog in den Himavanta-Wald und lebte zwölf Jahre lang am Ufer des Chaddanta-Sees, wobei er von den Chaddanta-Elefanten bedient wurde. Als der Thera so dort verweilte, trat eines Tages Sakka, der König der Götter, an ihn heran, verneigte sich vor ihm, blieb aufrecht stehen und sprach: „Ehrwürdiger Herr, es wäre gut, wenn der Ehrwürdige mir die Lehre verkünden würde.“ Der Thera verkündete ihm in majestätischer Buddha-Weise die Lehre, welche die vier edlen Wahrheiten in sich birgt, von den drei Daseinsmerkmalen geprägt ist, mit der Leerheit (suññatā) verbunden, in vielfältigen Methoden mannigfaltig ist und in das Todlose mündet. Als Sakka dies hörte, gab er seiner tiefen Verehrung mit folgenden Worten Ausdruck: ‘‘Esa bhiyyo pasīdāmi, sutvā dhammaṃ mahārasaṃ; Virāgo desito dhammo, anupādāya sabbaso’’ti. (theragā. 673) – „Umso mehr gewinne ich Vertrauen, nachdem ich die Lehre von köstlichstem Geschmack gehört habe; verkündet wurde die Lehre der Leidenschaftslosigkeit, die gänzlich zum Erlöschen ohne Anhaften führt.“ Thutiṃ [Pg.339] akāsi. Thero chaddantadahatīre dvādasa vassāni vasitvā upakaṭṭhe parinibbāne satthāraṃ upasaṅkamitvā parinibbānaṃ anujānāpetvā tattheva gantvā parinibbāyīti. So sprach er sein Lob aus. Nachdem der Thera zwölf Jahre lang am Ufer des Chaddanta-Sees gelebt hatte und sein Parinibbāna nahte, suchte er den Meister auf, bat um die Erlaubnis zum Verlöschen (Parinibbāna), kehrte genau dorthin zurück und ging in das Parinibbāna ein. Aññāsikoṇḍaññattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Lebensbeschreibung (Apadāna-Erklärung) des Ehrwürdigen Aññāsikoṇḍañña ist abgeschlossen. 3-8. Piṇḍolabhāradvājattheraapadānavaṇṇanā 3-8. Die Erklärung der Lebensbeschreibung (Apadāna-Erklärung) des Ehrwürdigen Piṇḍolabhāradvāja Padumuttaro nāma jinotiādikaṃ āyasmato piṇḍolabhāradvājassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato kāle sīhayoniyaṃ nibbattitvā pabbatapāde guhāyaṃ vihāsi. Bhagavā tassa anuggahaṃ kātuṃ gocarāya pakkantakāle tassa sayanaguhaṃ pavisitvā nirodhaṃ samāpajjitvā nisīdi. Sīho gocaraṃ gahetvā nivatto guhadvāre ṭhatvā bhagavantaṃ disvā haṭṭhatuṭṭho jalajathalajapupphehi pūjaṃ katvā cittaṃ pasādento bhagavato ārakkhaṇatthāya aññe vāḷamige apanetuṃ tīsu velāsu sīhanādaṃ nadanto buddhagatāya satiyā aṭṭhāsi. Yathā paṭhamadivase, evaṃ sattāhaṃ pūjesi. Bhagavā ‘‘sattāhaccayena nirodhā vuṭṭhahitvā vaṭṭissati imassa ettako upanissayo’’ti tassa passantasseva ākāsaṃ pakkhanditvā vihārameva gato. Das Apadāna, das mit den Worten „Padumuttara, so lautet der Name des Siegers“ beginnt, ist die Lebensbeschreibung des Ehrwürdigen Piṇḍolabhāradvāja. Auch dieser hatte unter früheren Buddhas verdienstvolle Taten vollbracht. Während er in verschiedenen Existenzen heilsame Taten ansammelte, die als unterstützende Bedingungen für die Befreiung aus dem Daseinskreislauf (vivaṭṭa) dienten, wurde er zur Zeit des erhabenen Padumuttara im Schoße eines Löwen wiedergeboren und lebte in einer Höhle am Fuße eines Berges. Um ihm Gunst zu erweisen, betrat der Erhabene, als der Löwe zur Nahrungssuche ausgegangen war, dessen Schlafhöhle, trat in den Zustand des Erlöschens (nirodhasamāpatti) ein und setzte sich nieder. Als der Löwe mit Nahrung zurückkehrte, am Höhleneingang haltmachte und den Erhabenen erblickte, wurde er von Freude und Entzücken erfüllt. Er verehrte ihn mit Wasser- und Landblumen, klärte seinen Geist und verweilte mit auf den Buddha gerichteter Achtsamkeit, wobei er zu den drei Tageszeiten ein mächtiges Löwengebrüll ausstieß, um den Erhabenen zu schützen und andere Raubtiere fernzuhalten. Wie am ersten Tag, so verehrte er ihn sieben Tage lang. Der Erhabene dachte: „Nach Ablauf von sieben Tagen, wenn ich mich aus dem Zustand des Erlöschens erhebe, wird er fortgehen; so groß ist die unterstützende Bedingung (upanissaya) dieses Löwen.“ Und vor den Augen des zusehenden Löwen erhob sich der Erhabene in die Luft und kehrte in sein Kloster zurück. Sīho buddhaviyogadukkhaṃ adhivāsetuṃ asakkonto kālaṃ katvā haṃsavatīnagare mahābhogakule nibbattitvā vayappatto nagaravāsīhi saddhiṃ vihāraṃ gantvā satthu dhammadesanaṃ sutvā pasanno sattāhaṃ buddhappamukhassa bhikkhusaṅghassa mahādānaṃ pavattetvā yāvajīvaṃ puññāni katvā aparāparaṃ devamanussesu saṃsaranto amhākaṃ bhagavato kāle kosambiyaṃ rañño udenassa purohitassa putto hutvā nibbatti. Bhāradvājotissa nāmaṃ ahosi. So vayappato tayo vede uggahetvā pañca māṇavakasatāni mante vācento mahagghasabhāvena ananurūpācārattā [Pg.340] tehi pariccatto rājagahaṃ gantvā bhagavato bhikkhusaṅghassa ca lābhasakkāraṃ disvā sāsane pabbajitvā bhojane amattaññū hutvā viharati. Satthārā upāyena mattaññutāya patiṭṭhāpento vipassanaṃ paṭṭhapetvā nacirasseva chaḷabhiñño ahosi. Chaḷabhiñño pana hutvā bhagavato sammukhā ‘‘yaṃ sāvakehi pattabbaṃ, taṃ mayā anuppatta’’nti, bhikkhusaṅghe ca ‘‘yassa magge vā phale vā kaṅkhā atthi, so maṃ pucchatū’’ti sīhanādaṃ nadi. Tena taṃ bhagavā – ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ sīhanādikānaṃ yadidaṃ piṇḍolabhāradvājo’’ti (a. ni. 1.188, 195) etadagge ṭhapesi. Ein Löwe, der den Schmerz über die Trennung vom Buddha nicht ertragen konnte, verstarb und wurde in der Stadt Haṃsāvatī in einer sehr wohlhabenden Familie wiedergeboren. Als er das Erwachsenenalter erreicht hatte, ging er zusammen mit den Stadtbewohnern zum Kloster, hörte die Lehrverkündigung des Meisters, gewann Vertrauen und spendete der aus dem Buddha und dem Saṅgha bestehenden Gemeinde sieben Tage lang ein großes Almosen. Zeitlebens tat er heilsame Taten, wanderte fortlaufend im Kreislauf der Devas und Menschen umher und wurde zur Zeit unseres Erhabenen in Kosambī als Sohn des Purohita (Hofpriesters) des Königs Udena geboren. Sein Name war Bhāradvāja. Als er herangewachsen war, erlernte er die drei Veden und lehrte fünfhundert Jünglinge die Hymnen. Da er jedoch sehr viel aß und sein Verhalten unangemessen war, wurde er von ihnen verlassen. Er ging nach Rājagaha, sah den Gewinn und die Ehrungen des Erhabenen und des Bhikkhu-Saṅgha, trat in die Lehre ein und ordiniert, lebte jedoch zunächst ohne Maß beim Essen zu kennen. Vom Meister geschickt zur Mäßigung geführt, entfaltete er die Hellbesehung (vipassanā) und erlangte bald die sechs höheren Geisteskräfte (chaḷabhiñño). Als er die sechs höheren Geisteskräfte erlangt hatte, stieß er in Gegenwart des Erhabenen das Löwenbrüllen aus: „Was von Jüngern zu erreichen ist, das ist von mir erreicht worden!“, und inmitten des Bhikkhu-Saṅgha: „Wer einen Zweifel bezüglich des Pfades oder der Frucht hat, der möge mich fragen!“ Aufgrund dieses Löwenbrüllens setzte ihn der Erhabene auf den höchsten Rang mit den Worten: „Unter meinen Jüngern, o Mönche, unter den Mönchen, die das Löwenbrüllen ausstoßen, ist Piṇḍola Bhāradvāja der Höchste.“ 613. Evaṃ etadaggaṃ ṭhānaṃ patvā pubbe katapuññasambhāraṃ saritvā somanassavasena attano puññakammāpadānaṃ vibhāvento padumuttarotiādimāha. Tassattho heṭṭhā vuttova. Purato himavantassāti himālayapabbatato pubbadisābhāgeti attho. Cittakūṭe vasī tadāti yadā ahaṃ sīho migarājā hutvā himavantapabbatasamīpe vasāmi, tadā padumuttaro nāma satthā anekehi ca osadhehi, anekehi ca ratanehi cittavicittatāya cittakūṭe cittapabbatasikhare vasīti sambandho. 613. Nachdem er so diesen höchsten Rang erlangt hatte, erinnerte er sich an seine in der Vergangenheit angesammelten Verdienste und erklärte voller Freude sein früheres Wirken mit den Worten beginnend mit: „Padumuttaro“ (der Buddha Padumuttara). Der Sinn davon wurde bereits weiter oben dargelegt. „Purato himavantassa“ bedeutet: im östlichen Teil des Himalaya-Gebirges. „Cittakūṭe vasī tadā“ bedeutet: Wenn (yadā) ich als Löwe, der König der Tiere, in der Nähe des Himalaya-Gebirges lebte, dann (tadā) wohnte der Meister namens Padumuttara auf dem Cittakūṭa, dem Gipfel des bunten Berges, der durch viele Heilkräuter und viele Juwelen von bunter Vielfalt geprägt war – so ist die Verknüpfung herzustellen. 614. Abhītarūpo tatthāsinti abhītasabhāvo nibbhayasabhāvo migarājā tattha āsiṃ ahosinti attho. Catukkamoti catūhi disāhi kamo gantuṃ samattho. Yassa saddaṃ suṇitvānāti yassa migarañño sīhanādaṃ sutvā bahujjanā bahusattā vikkhambhanti visesena khambhanti bhāyanti. 614. „Abhītarūpo tatthāsiṃ“ bedeutet: Ich war dort furchtlos und unerschrocken als König der Tiere. „Catukkamo“ bedeutet: fähig, in alle vier Himmelsrichtungen zu schreiten. „Yassa saddaṃ suṇitvāna“ bedeutet: beim Hören des Löwenbrüllens dieses Tierkönigs erschrecken viele Menschen und viele Wesen, sie zittern heftig und fürchten sich. 615. Suphullaṃ padumaṃ gayhāti bhagavati pasādena supupphitapadumapupphaṃ ḍaṃsitvā. Narāsabhaṃ narānaṃ āsabhaṃ uttamaṃ seṭṭhaṃ sambuddhaṃ upagacchiṃ, samīpaṃ agaminti attho. Vuṭṭhitassa samādhimhāti nirodhasamāpattito vuṭṭhitassa buddhassa taṃ pupphaṃ abhiropayiṃ pūjesinti attho. 615. „Suphullaṃ padumaṃ gayha“ bedeutet: Er ergriff mit dem Maul eine herrlich erblühte Lotusblüte aus Vertrauen zum Erhabenen. „Narāsabhaṃ“ bedeutet: Er näherte sich dem Stier unter den Menschen, dem Höchsten, dem Vortrefflichsten, dem vollkommen Erwachten. „Vuṭṭhitassa samādhimhā“ bedeutet: Er brachte diese Blume dem Buddha dar, der sich aus dem Zustand der Erlöschungsmeditation (nirodhasamāpatti) erhoben hatte, um ihn zu verehren. 616. Catuddisaṃ namassitvāti catūsu disāsu namassitvā sakaṃ cittaṃ attano cittaṃ pasādetvā ādarena patiṭṭhapetvā sīhanādaṃ abhītanādaṃ anadiṃ ghosesinti attho. 616. „Catuddisaṃ namassitvā“ bedeutet: Er erwies den vier Himmelsrichtungen Ehrerbietung, erfreute seinen eigenen Geist, festigte ihn voller Respekt und stieß ein furchtloses Brüllen, ein Löwenbrüllen, aus. 617. Tato [Pg.341] buddhena dinnabyākaraṇaṃ pakāsento padumuttarotiādimāha. Taṃ uttānatthameva. 617. Daraufhin sprach er die Verse beginnend mit „Padumuttaro“, um die vom Buddha gegebene Vorhersage (byākaraṇaṃ) kundzutun. Der Sinn davon ist ganz offensichtlich. 618. Vadataṃ seṭṭhoti ‘‘mayaṃ buddhā, mayaṃ buddhā’’ti vadantānaṃ aññatitthiyānaṃ seṭṭho uttamo buddho āgatoti sambandho. Tassa āgatassa bhagavato taṃ dhammaṃ sossāma suṇissāmāti attho. 618. „Vadataṃ seṭṭho“ bedeutet in Verbindung: Der Buddha, der Höchste unter jenen Andersdenkenden, die da sagen „Wir sind Buddhas, wir sind Buddhas“, ist gekommen. „Tassa dhammaṃ sossāma“ bedeutet: Wir wollen die Lehre dieses gekommenen Erhabenen hören. 619. Tesaṃ hāsaparetānanti hāsehi somanassehi paretānaṃ abhibhūtānaṃ samannāgatānaṃ tesaṃ devamanussānaṃ. Lokanāyakoti lokassa nāyako saggamokkhasampāpako mama saddaṃ mayhaṃ sīhanādaṃ pakittesi pakāsesi kathesi, dīghadassī anāgatakāladassī mahāmuni munīnamantare mahanto muni. Sesagāthā suviññeyyameva. 619. „Tesaṃ hāsaparetānaṃ“ bezieht sich auf jene Devas und Menschen, die von Freude und Heiterkeit erfüllt (überwältigt) dorthin gekommen waren. „Lokanāyako“ bedeutet: Der Führer der Welt, derjenige, der Himmel und Befreiung herbeiführt, pries meine Stimme, mein Löwenbrüllen. „Dīghadassī“ bedeutet: der in die Zukunft Sehende, der große Weise (mahāmuni) unter den Weisen. Die übrigen Strophen sind leicht verständlich. 622. Nāmena padumo nāma cakkavattī hutvā catusaṭṭhiyā jātiyā issariyaṃ issarabhāvaṃ rajjaṃ kārayissatīti attho. 622. „Nāmena padumo nāma“ bedeutet: Er wird ein Raddreher-König (cakkavattī) namens Paduma werden und in vierundsechzig Geburten die Herrschaft und Königsherrschaft ausüben. 623. Kappasatasahassamhīti sāmyatthe bhummavacanaṃ, kappasatasahassānaṃ pariyosāneti attho. 623. „Kappasatasahassamhi“ – hier ist der Lokativ im Sinne des Genitivs zu verstehen; es bedeutet: am Ende von hunderttausend Äonen. 624. Pakāsite pāvacaneti tena gotamena bhagavatā piṭakattaye pakāsite desiteti attho. Brahmabandhu bhavissatīti tadā gotamassa bhagavato kāle ayaṃ sīho migarājā brāhmaṇakule nibbattissatīti attho. Brahmaññā abhinikkhammāti brāhmaṇakulato nikkhamitvā tassa bhagavato sāsane pabbajissatīti sambandho. 624. „Pakāsite pāvacane“ bedeutet: Wenn die drei Körbe (piṭakattaye) von jenem erhabenen Gotama verkündet und dargelegt werden. „Brahmabandhu bhavissatīti“ bedeutet: Zu jener Zeit des erhabenen Gotama wird dieser Löwenkönig in einer Brahmanenfamilie wiedergeboren werden. „Brahmaññā abhinikkhammā“ bedeutet: Er wird aus der Brahmanenfamilie ausziehen und in der Lehre dieses Erhabenen die Hauslosigkeit (pabbajjā) antreten – so ist die Verknüpfung herzustellen. 625. Padhānapahitattoti vīriyakaraṇatthaṃ pesitacitto. Upadhisaṅkhātānaṃ kilesānaṃ abhāvena nirupadhi. Kilesadarathānaṃ abhāvena upasanto. Sabbāsave sakalāsave pariññāya pahāya anāsavo nikkileso nibbāyissati khandhaparinibbānena nibbuto bhavissatīti attho. 625. „Padhānapahitatto“ bedeutet: jemand, dessen Geist auf die Anstrengung des Strebens gerichtet ist. „Nirupadhi“ bedeutet: frei von den Befleckungen (kilesas), die als Daseinsgrundlagen (upadhi) bezeichnet werden. „Upasanto“ bedeutet: friedvoll aufgrund der Abwesenheit der Qualen der Befleckungen. „Sabbāsave... nibbāyissati“ bedeutet: Er wird alle Triebe (āsavas) vollkommen durchschauen und ablegen, triebfrei und frei von Befleckungen werden, und schließlich durch das völlige Verlöschen der Daseinsgruppen (khandhaparinibbāna) erloschen sein. 626. Vijane pantaseyyamhīti janasambādharahite dūrāraññasenāsaneti attho. Vāḷamigasamākuleti kāḷasīhādīhi caṇḍamigasaṅgehi ākule saṃkiṇṇeti attho. Sesaṃ vuttatthamevāti. 626. „Vijane pantaseyyamhi“ bedeutet: an einer von Menschengedränge freien, abgelegenen Waldeinsiedelei. „Vāḷamigasamākule“ bedeutet: bevölkert und dicht besiedelt mit wilden Tieren wie schwarzen Löwen und wilden Bestien. „Sesaṃ vuttatthamevāti“ bedeutet: Der Rest hat dieselbe bereits erklärte Bedeutung. Piṇḍolabhāradvājattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung des Apadāna des älteren Piṇḍola Bhāradvāja ist abgeschlossen. 3-9. Khadiravaniyattheraapadānavaṇṇanā 3-9. Die Erklärung des Apadāna des älteren Khadiravaniya. Gaṅgā [Pg.342] bhāgīrathī nāmātiādikaṃ āyasmato khadiravaniyattherassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato kāle haṃsavatīnagare titthanāvikakule nibbattitvā mahāgaṅgāya payāgatitthe titthanāvāya kammaṃ karonto ekadivasaṃ sasāvakasaṅghaṃ bhagavantaṃ gaṅgātīraṃ upagataṃ disvā pasannamānaso nāvāsaṅghāṭaṃ yojetvā mahantena pūjāsakkārena paratīraṃ pāpetvā aññataraṃ bhikkhuṃ satthārā āraññakānaṃ bhikkhūnaṃ aggaṭṭhāne ṭhapiyamānaṃ disvā taṃ ṭhānantaraṃ patthetvā bhagavato bhikkhusaṅghassa ca mahādānaṃ pavattetvā paṇidhānaṃ akāsi. Bhagavā tassa patthanāya avañjhabhāvaṃ byākāsi. Die Strophen beginnend mit „Gaṅgā bhāgīrathī nāmā“ bilden das Apadāna des ehrwürdigen Khadiravaniya Thera. Auch dieser hatte unter früheren Buddhas Verdienste erworben. Als er in verschiedenen Daseinsformen heilsame Taten ansammelte, die als Stütze für die Befreiung aus dem Kreislauf (vivaṭṭūpanissayāni) dienen, wurde er zur Zeit des erhabenen Padumuttara in der Stadt Haṃsāvatī in einer Familie von Fährschiffern geboren. Er verrichtete seine Arbeit auf der Fähre an der Payāga-Anlegestelle des großen Ganges. Als er eines Tages den Erhabenen zusammen mit seiner Jüngerschar am Ufer des Ganges ankommen sah, verband er mit gläubigem Herzen mehrere Boote zu einem Floß, setzte sie unter großen Ehrungen und Opfergaben an das jenseitige Ufer über. Als er sah, wie ein anderer Mönch vom Meister auf den höchsten Rang der im Wald lebenden Mönche (āraññakānaṃ bhikkhūnaṃ aggaṭṭhāne) gesetzt wurde, strebte er nach dieser Stellung, spendete dem Erhabenen und dem Bhikkhu-Saṅgha ein großes Almosen und legte sein feierliches Gelübde (paṇidhānaṃ) ab. Der Erhabene verkündete die Gewissheit, dass sein Wunsch nicht vergeblich sein würde. So tato paṭṭhāya puññāni upacinanto devamanussesu saṃsaranto ubhayasampattiyo anubhavitvā imasmiṃ buddhuppāde magadharaṭṭhe nālakagāme rūpasāriyā nāma brāhmaṇiyā kucchimhi nibbatti. Taṃ vayappattaṃ mātāpitaro gharabandhanena bandhitukāmā hutvā tassa ārocesuṃ. So sāriputtattherassa pabbajitabhāvaṃ sutvā ‘‘mayhaṃ jeṭṭhabhātā ayyo upatisso imaṃ vibhavaṃ chaḍḍetvā pabbajito, tena vantaṃ kheḷapiṇḍaṃ kathāhaṃ anubhavissāmī’’ti jātasaṃvego pāsaṃ anupagacchamānamigo viya ñātake vañcetvā hetusampattiyā codiyamāno bhikkhūnaṃ santikaṃ gantvā dhammasenāpatino kaniṭṭhabhāvaṃ nivedetvā attano pabbajjāya chandaṃ ārocesi. Bhikkhū taṃ pabbājetvā paripuṇṇavīsativassaṃ upasampādetvā kammaṭṭhāne niyojesuṃ. So kammaṭṭhānaṃ gahetvā khadiravanaṃ pavisitvā vissamanto ghaṭento vāyamanto ñāṇassa paripākaṃ gatattā nacirasseva chaḷabhiñño arahā ahosi. So arahā hutvā satthāraṃ dhammasenāpatiñca vandituṃ senāsanaṃ saṃsāmetvā pattacīvaramādāya nikkhamitvā anupubbena sāvatthiṃ patvā jetavanaṃ pavisitvā satthāraṃ dhammasenāpatiñca vanditvā katipāhaṃ jetavane vihāsi. Atha naṃ satthā ariyagaṇamajjhe nisinno āraññakānaṃ bhikkhūnaṃ aggaṭṭhāne ṭhapesi – ‘‘etadaggaṃ, bhikkhave, mama sāvakānaṃ bhikkhūnaṃ āraññakānaṃ yadidaṃ revato’’ti (a. ni. 1.198, 203). Von da an häufte er Verdienste an, wanderte im Kreislauf der Wiedergeburten unter Göttern und Menschen, erfuhr beide Arten von Glück und wurde schließlich bei der jetzigen Entstehung eines Buddhas im Reich Magadha, im Dorf Nālaka, im Schoß einer Brahmanin namens Rūpasāri geboren. Als er das Erwachsenenalter erreicht hatte, wollten seine Eltern ihn mit den Fesseln des Haushaltslebens binden und teilten ihm dies mit. Als er hörte, dass der ältere Mönch Sāriputta die Hauslosigkeit angetreten hatte, dachte er: „Mein älterer Bruder, der ehrwürdige Upatissa, hat diesen großen Wohlstand aufgegeben und ist in die Hauslosigkeit gezogen. Wie könnte ich das genießen, was er wie einen Speichelklumpen ausgespuckt hat?“ Von tiefer Ergreifung erfüllt, überlistete er seine Verwandten wie ein Wild, das der Schlinge entgeht. Angetrieben von der Fülle seiner heilsamen Bedingungen ging er zu den Mönchen, gab sich als der jüngste Bruder des Heerführers der Lehre zu erkennen und äußerte seinen Wunsch nach der Hauslosenweihe. Die Mönche gaben ihm die Novizenweihe, gewährten ihm nach Vollendung des zwanzigsten Lebensjahres die höhere Weihe und wiesen ihn in ein Meditationsobjekt ein. Er nahm das Meditationsobjekt an, zog in den Akazienwald, und während er dort verweilte, sich unermüdlich anstrengte und bemühte, erlangte er aufgrund der Reife seiner Erkenntnis nach kurzer Zeit die Arahatschaft mitsamt den sechs höheren Geisteskräften. Nachdem er ein Arahat geworden war, räumte er seine Lagerstätte auf, nahm Schale und Gewand, brach auf und erreichte nach und nach Sāvatthi. Er betrat das Jetavana, erwies dem Meister und dem Heerführer der Lehre seine Ehrerbietung und verweilte einige Tage im Jetavana. Danach setzte ihn der Meister, inmitten der Schar der Edlen sitzend, an die Spitze der im Wald lebenden Mönche mit den Worten: „Unter meinen Mönchsjüngern, o Mönche, die im Walde leben, ist dieser der Herausragendste, nämlich Revata.“ 628. Evaṃ [Pg.343] etadaggaṭṭhānaṃ patvā attano pubbakammaṃ saritvā pītisomanassavasena pubbacaritāpadānaṃ pakāsento gaṅgā bhāgīrathītiādimāha. Tattha gaṅgāti gāyamānā ghosaṃ kurumānā gacchatīti gaṅgā. Atha vā go vuccati pathavī, tasmiṃ gatā pavattāti gaṅgā. Anotattadahaṃ tikkhattuṃ padakkhiṇaṃ katvā gataṭṭhāne āvaṭṭagaṅgāti ca pabbatamatthakena gataṭṭhāne bahalagaṅgāti ca tiracchānapabbataṃ vijjhitvā gataṭṭhāne umaṅgagaṅgāti ca tato bahalapabbataṃ paharitvā pañcayojanaṃ ākāsena gataṭṭhāne ākāsagaṅgāti ca tassā patitaṭṭhānaṃ bhinditvā jātaṃ pañca yojanaṃ pokkharaṇīkūlaṃ bhinditvā tattha pana pañcaṅguli viya pañca dhārā hutvā gaṅgā yamunā sarabhū mahī aciravatīti pañca nāmā hutvā jambudīpaṃ pañca bhāgaṃ pañca koṭṭhāsaṃ katvā pañca bhāge pañca koṭṭhāse itā gatā pavattāti bhāgīrathī. Gaṅgā ca sā bhāgīrathī ceti gaṅgābhāgīrathī. ‘‘Bhāgīrathī gaṅgā’’ti vattabbe gāthābandhasukhatthaṃ pubbacariyavasena vuttanti daṭṭhabbaṃ. Himavantā pabhāvitāti satte hiṃsati sītena hanati matheti āloḷetīti himo, himo assa atthīti himavā, tato himavantato paṭṭhāya pabhāvitā pavattā sandamānāti himavantapabhāvitā. Kutitthe nāviko āsinti tassā gaṅgāya caṇḍasotasamāpanne visamatitthe kevaṭṭakule uppanno nāviko āsiṃ ahosinti attho. Orime ca tariṃ ahanti sampattasampattamanusse pārimā tīrā orimaṃ tīraṃ ahaṃ tariṃ tāresinti attho. 628. Nachdem er so diese höchste Stellung erlangt hatte, erinnerte er sich an seine früheren Taten, und um aus Freude und Entzücken seine frühere Lebensgeschichte zu offenbaren, sprach er die Verse beginnend mit: „Gaṅgā bhāgīrathī...“ Darunter bedeutet „Gaṅgā“: Sie fließt singend, das heißt ein Geräusch erzeugend, daher heißt sie Gaṅgā. Oder aber „go“ bezeichnet die Erde; weil sie auf dieser fließt und verläuft, heißt sie Gaṅgā. Wo sie den Anotatta-See dreimal im Uhrzeigersinn umkreist hat und weiterfließt, wird sie „Āvaṭṭa-Gaṅgā“ (wirbelnde Ganges) genannt; wo sie über die Berggipfel herabströmt, „Bahala-Gaṅgā“ (dichte Ganges); wo sie durch den querliegenden Berg bricht, „Umaṅga-Gaṅgā“ (unterirdische Ganges); wo sie danach gegen das Felsmassiv prallt und und fünf Yojanas weit durch die Luft fließt, „Ākāsa-Gaṅgā“ (Himmels-Ganges); wo sie die Aufprallstelle auf der Erde durchbricht, den Rand des entstandenen fünf Yojanas breiten Teiches durchbricht, teilt sie sich wie fünf Finger einer Hand in fünf Ströme und nimmt fünf Namen an: Gaṅgā, Yamunā, Sarabhū, Mahī und Aciravatī. Da sie Jambudīpa in fünf Teile oder Abschnitte teilt und in diese fließt, verläuft und dort strömt, wird sie „Bhāgīrathī“ genannt. Sie ist sowohl die Gaṅgā als auch die Bhāgīrathī, daher „Gaṅgābhāgīrathī“. Es ist zu verstehen, dass, obwohl es eigentlich „Bhāgīrathī Gaṅgā“ heißen sollte, es aufgrund des Metrums des Verses und im Einklang mit der Tradition der früheren Lehrer so ausgedrückt wurde. „Himavantā pabhāvitā“ (vom Himalaya entsprungen): „Hima“ ist das, was die Wesen durch Kälte verletzt, schlägt, quält und verwirrt. Was diese Kälte besitzt, ist der „Himavā“ (der Schneereiche / Himalaya). Von diesem Himavā ausgehend entsprungen, fließend und strömend, heißt „himavantapabhāvitā“. „Kutitthe nāviko āsiṃ“ (An einer schlechten Anlegestelle war ich ein Fährmann) bedeutet, dass er an einer rauen, gefährlichen Furt jener Ganges, die von reißenden Strömungen gepeitscht wurde, als Fährmann geboren wurde, der aus einer Fischerfamilie stammte. „Orime ca tariṃ ahaṃ“ (Und ich setzte sie ans diesseitige Ufer über) bedeutet: „Ich brachte die herbeiströmenden Menschen vom jenseitigen Ufer an das diesseitige Ufer und setzte sie über.“ 629. Padumuttaro nāyakoti dvipadānaṃ uttamo satte nibbānaṃ nāyako pāpanako padumuttarabuddho mama puññasampattiṃ nipphādento. Vasīsatasahassehi khīṇāsavasatasahassehi gaṅgāsotaṃ tarituṃ titthaṃ pattoti sambandho. 629. „Padumuttaro nāyako“ bedeutet: Der Erhabene Padumuttara, der Höchste unter den Zweibeinern, der Führer, der die Wesen zum Nibbāna führt, wollte meine Fülle an Verdiensten zur Reife bringen. Der Zusammenhang ist: Begleitet von einhunderttausend Beherrschern der Sinne, das heißt einhunderttausend triebversiegten Arahats, kam er an die Anlegestelle, um den Strom des Ganges zu überqueren. 630. Bahū nāvā samānetvāti sampattaṃ taṃ sammāsambuddhaṃ disvā vaḍḍhakīhi suṭṭhu saṅkhataṃ kataṃ nipphāditaṃ bahū nāvāyo samānetvā dve dve nāvāyo ekato katvā tassā nāvāya upari maṇḍapachadanaṃ katvā narāsabhaṃ padumuttarasambuddhaṃ paṭimāniṃ pūjesinti attho. 630. „Bahū nāvā samānetvā“ (Nachdem ich viele Boote zusammengebracht hatte) bedeutet: Als ich den herangenahten vollkommen Erleuchteten sah, brachte ich viele Boote herbei, die von Zimmerleuten kunstvoll gezimmert und gefertigt worden waren. Ich verband je zwei Boote miteinander, errichtete ein Zeltdach über diesen Booten und verehrte so ehrfurchtsvoll den Padumuttara, den vollkommen Erleuchteten, den besten unter den Menschen. 631. Āgantvāna [Pg.344] ca sambuddhoti evaṃ saṅghaṭitāya nāvāya tattha āgantvāna tañca nāvakaṃ nāvamuttamaṃ āruhīti sambandho. Vārimajjhe ṭhito satthāti nāvamārūḷho satthā gaṅgājalamajjhe ṭhito samāno imā somanassapaṭisaṃyuttagāthā abhāsatha kathesīti sambandho. 631. „Āgantvāna ca sambuddho“ bedeutet: Nachdem der vollkommen Erleuchtete zu den so zusammengefügten Booten herangetreten war, bestieg er dieses hervorragende Boot. Dies ist die Verknüpfung. „Vārimajjhe ṭhito satthā“ bedeutet: Der auf das Boot gestiegene Meister verweilte inmitten der Fluten des Ganges und sprach diese mit Freude verbundenen Verse. Dies ist die Verknüpfung. 632. Yo so tāresi sambuddhanti yo so nāviko gaṅgāsotāya sambuddhaṃ atāresi. Saṅghañcāpi anāsavanti na kevalameva sambuddhaṃ tāresi, anāsavaṃ nikkilesaṃ saṅghañcāpi tāresīti attho. Tena cittapasādenāti tena nāvāpājanakāle uppannena somanassasahagatacittapasādena devaloke chasu kāmasaggesu ramissati dibbasampattiṃ anubhavissatīti attho. 632. „Yo so tāresi sambuddhaṃ“ bedeutet: Jener Fährmann, der den vollkommen Erleuchteten über den Strom der Ganges setzte. „Saṅghañcāpi anāsavaṃ“ bedeutet: Er setzte nicht nur den vollkommen Erleuchteten über, sondern auch die triebfreie, von allen Befleckungen gereinigte Gemeinschaft der Mönche (Saṅgha). „Tena cittapasādena“ bedeutet: Durch jene freudige Hingabe des Geistes, die in ihm aufkam, während er das Boot steuerte, wird er in der Götterwelt an den sechs Stätten der Sinnengenüsse frohlocken und göttliche Herrlichkeit erfahren. 633. Nibbattissati te byamhanti devaloke uppannassa te tuyhaṃ byamhaṃ vimānaṃ sukataṃ suṭṭhu nibbattaṃ nāvasaṇṭhitaṃ nāvāsaṇṭhānaṃ nibbattissati pātubhavissatīti attho. Ākāse pupphachadananti nāvāya uparimaṇḍapakatakammassa nissandena sabbadā gatagataṭṭhāne ākāse pupphachadanaṃ dhārayissatīti sambandho. 633. „Nibbattissati te byamhaṃ“ bedeutet: Dir, wenn du in der Götterwelt wiedergeboren wirst, wird ein prächtiges, wohlgestaltetes Himmelsschloss (Vimāna) entstehen, das die Gestalt eines Schiffes hat; es wird sich manifestieren. „Ākāse pupphachadanaṃ“ bedeutet: Als Frucht des Erbauens des Zeltdaches über dem Boot wird sich im Himmel über jedem Ort, den du betrittst, stets ein schützendes Dach aus Blumen entfalten. Dies ist die Verknüpfung. 634. Aṭṭhapaññāsakappamhīti ito puññakaraṇakālato paṭṭhāya aṭṭhapaṇṇāsakappaṃ atikkamitvā nāmena tārako nāma cakkavattī khattiyo cāturanto catūsu dīpesu issaro vijitāvī jitavanto bhavissatīti sambandho. Sesagāthā uttānatthāva. 634. „Aṭṭhapaññāsakappamhi“ (Im achtundfünfzigsten Weltalter) bedeutet: Von der Zeit dieser verdienstvollen Tat an gerechnet, wird er nach Ablauf von achtundfünfzig Weltaltern ein kriegerischer Herrscher (Khattiya) namens Tārako sein, ein Weltenherrscher (Cakkavattī), der über die vier Kontinente herrscht und siegreich sein wird. Dies ist der Zusammenhang. Die übrigen Verse haben eine ganz offensichtliche Bedeutung. 637. Revato nāma nāmenāti revatīnakkhattena jātattā ‘‘revato’’ti laddhanāmo brahmabandhu brāhmaṇaputtabhūto bhavissati brāhmaṇakule uppajjissatīti attho. 637. „Revato nāma nāmena“ bedeutet: Weil er unter dem Sternbild Revatī geboren wurde, wird er den Namen „Revata“ erhalten. Er wird als Sohn eines Brahmanen geboren werden und somit aus einer Brahmanenfamilie stammen. 639. Nibbāyissatināsavoti nikkileso khandhaparinibbānena nibbāyissati. 639. „Nibbāyissatināsavo“ bedeutet: Erloschen von allen Befleckungen, wird er durch das endgültige Erlöschen der Daseinsgruppen (khandhaparinibbāna) ins Nibbāna eingehen. 640. Vīriyaṃ me dhuradhorayhanti evaṃ padumuttarena bhagavatā byākato ahaṃ kamena pāramitākoṭiṃ patvā me mayhaṃ vīriyaṃ asithilavīriyaṃ dhuradhorayhaṃ dhuravāhaṃ dhurādhāraṃ yogehi khemassa nibbhayassa nibbānassa adhivāhanaṃ [Pg.345] āvahanaṃ ahosīti attho. Dhāremi antimaṃ dehanti idānāhaṃ sammāsambuddhasāsane pariyosānasarīraṃ dhāremīti sambandho. 640. „Meine Tatkraft ist das Tragen der Last am Joch“ bedeutet: Ich, dem vom erhabenen Padumuttara auf diese Weise prophezeit worden war, erreichte schrittweise den Gipfel der Vollkommenheiten (pāramī). Meine Tatkraft, die eine unermüdliche Tatkraft war, glich dem Tragen einer schweren Last am Joch und bewirkte das Gelangen zur Sicherheit vor den Banden (yogakkhema), dem furchtlosen Nibbāna; dies ist die Bedeutung. „Ich trage meinen letzten Körper“ bedeutet: Nun trage ich in der Lehre des vollkommen Erwachten meinen letzten Körper; so ist die syntaktische Verknüpfung. So aparabhāge attano jātagāmaṃ gantvā ‘‘cālā, upacālā, sīsūpacālā’’ti tissannaṃ bhaginīnaṃ putte ‘‘cālā, upacālā, sīsūpacālā’’ti tayo bhāgineyye ānetvā pabbājetvā kammaṭṭhāne niyojesi. Te kammaṭṭhānaṃ anuyuttā vihariṃsu. Zu einer späteren Zeit ging er in sein Geburtsdorf, holte seine drei Neffen namens Cāla, Upacāla und Sīsūpacāla – die Söhne seiner drei Schwestern namens Cālā, Upacālā und Sīsūpacālā –, ließ sie ordinieren und wies sie in die Meditationsobjekte (kammaṭṭhāna) ein. Sie verweilten fortan der Meditationspraxis hingegeben. Tasmiñca samaye therassa kocideva ābādho uppanno, taṃ sutvā sāriputtatthero – ‘‘revatassa gilānapucchanaṃ adhigamapucchanañca karissāmī’’ti upagañchi. Revatatthero dhammasenāpatiṃ dūratova āgacchantaṃ disvā tesaṃ sāmaṇerānaṃ satuppādavasena ovadiyamāno cāletigāthaṃ abhāsittha. Tattha cāle upacāle sīsūpacāleti tesaṃ ālapanaṃ. Cālā, upacālā, sīsūpacālāti hi itthiliṅgavasena laddhanāmā tayo dārakā pabbajitāpi tathā vohariyyanti. ‘‘Cālī, upacālī, sīsūpacālīti tesaṃ nāmānī’’ti ca vadanti. Yadatthaṃ ‘‘cāle’’tiādinā āmantanaṃ kataṃ, taṃ dassento ‘‘patissatā nu kho viharathā’’ti vatvā tattha kāraṇaṃ āha – ‘‘āgato vo vālaṃ viya vedhī’’ti. Patissatāti patissatikā. Khoti avadhāraṇe. Āgatoti āgañchi. Voti tumhākaṃ. Vālaṃ viya vedhīti vālavedhi viya. Ayañhettha saṅkhepattho – tikkhajavananibbedhikapaññatāya vālavedhirūpo satthukappo tumhākaṃ mātulatthero āgato, tasmā samaṇasaññaṃ upaṭṭhapetvā satisampajaññayuttā eva hutvā viharatha, yathādhigate vihāre appamattā bhavathāti. Und zu jener Zeit entstand dem ehrwürdigen Revata eine gewisse Krankheit. Als der ehrwürdige Sāriputta davon hörte, dachte er: „Ich werde mich nach der Krankheit Revatas und nach seinen Errungenschaften erkundigen“, und begab sich dorthin. Als der ehrwürdige Revata den Feldherrn der Lehre von weitem herannahen sah, sprach er, um jene Novizen zur Achtsamkeit anzuhalten, die Strophe, die mit „Cāle“ beginnt. Darin ist „Cāle, Upacāle, Sīsūpacāle“ die Anrede an sie. Denn drei Knaben, die weibliche Namen erhalten hatten – nämlich Cālā, Upacālā und Sīsūpacālā –, wurden auch nach ihrer Ordination weiterhin so genannt. Manche sagen auch: „Ihre Namen waren Cālī, Upacālī und Sīsūpacālī.“ Um den Zweck zu zeigen, zu dem die Anrede mit „Cāle“ usw. erfolgte, sagte er: „Lebt doch gewiss achtsam!“, und nannte den Grund dafür: „Euer Onkel, der wie ein Haarschütze ist, ist gekommen.“ „Patissatā“ bedeutet achtsam. „Kho“ dient der Bekräftigung. „Āgato“ bedeutet gekommen. „Vo“ bedeutet euer. „Vālaṃ viya vedhī“ bedeutet wie ein Haarschütze. Dies ist hier die kurze Bedeutung: Euer Onkel, der ältere Mönch, der aufgrund seiner scharfen, schnellen und durchdringenden Weisheit einem Haarschützen gleicht und dem Meister ebenbürtig ist, ist gekommen. Richtet daher das Bewusstsein eines Samana auf, verweilt stets in Achtsamkeit und klarer Wissensklarheit und seid unlässig in dem von euch erreichten Zustand. Taṃ sutvā te sāmaṇerā dhammasenāpatissa paccuggamanādivattaṃ katvā ubhinnaṃ mātulattherānaṃ paṭisanthāravelāyaṃ nātidūre samādhiṃ samāpajjitvā nisīdiṃsu. Dhammasenāpati revatattherena saddhiṃ paṭisanthāraṃ katvā uṭṭhāyāsanā te sāmaṇere upasaṅkami. Te tathā kālaparicchedassa katattā there upasaṅkamante uṭṭhahitvā vanditvā aṭṭhaṃsu. Thero – ‘‘katarakataravihārena viharathā’’ti pucchitvā tehi ‘‘imāya imāyā’’ti vutte dārakepi evaṃ vinento – ‘‘mayhaṃ bhātiko saccavādī vata [Pg.346] dhammassa anudhammacāri’’nti theraṃ pasaṃsanto pakkāmi. Sesamettha uttānatthamevāti. Als jene Novizen dies hörten, erwiesen sie dem Feldherrn der Lehre die gebührende Ehrerbietung, wie das Entgegengehen, und setzten sich während des freundschaftlichen Gesprächs der beiden Onkel-Mönche nicht weit entfernt nieder, nachdem sie in tiefe Sammlung eingetreten waren. Der Feldherr der Lehre führte mit dem ehrwürdigen Revata ein freundschaftliches Gespräch, erhob sich von seinem Sitz und trat an jene Novizen heran. Da für sie kein bestimmter Zeitraum festgesetzt worden war, erhoben sie sich, als der Ehrwürdige herantrat, verneigten sich ehrfurchtsvoll und blieben stehen. Der Ehrwürdige fragte sie: „In welchem Verweilen verweilt ihr?“, und als sie antworteten: „In diesem und jenem“, lobte er, indem er die Knaben auf diese Weise anleitete, den Ehrwürdigen mit den Worten: „Mein Bruder ist wahrlich ein Wahrhaftiger, einer, der der Lehre gemäß wandelt“, und ging fort. Der Rest ist hier von leicht verständlicher Bedeutung. Khadiravaniyattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Legende des ehrwürdigen Khadiravaniya Revata ist abgeschlossen. 3-10. Ānandattheraapadānavaṇṇanā 3-10. Die Erklärung der Legende des ehrwürdigen Ānanda. Ārāmadvārā nikkhammātiādikaṃ āyasmato ānandattherassa apadānaṃ. Ayampi purimabuddhesu katādhikāro tattha tattha bhave vivaṭṭūpanissayāni puññāni upacinanto padumuttarassa bhagavato kāle haṃsavatīnagare satthu vemātikabhātā hutvā nibbatti. Sumanotissa nāmaṃ ahosi. Pitā panassa nandarājā nāma. So attano puttassa sumanakumārassa vayappattassa haṃsavatīnagarato vīsayojanasate ṭhāne bhoganagaraṃ adāsi. So kadāci kadāci āgantvā satthārañca pitarañca passati. Tadā rājā satthārañca satasahassaparimāṇaṃ bhikkhusaṅghañca sayameva sakkaccaṃ upaṭṭhahi, aññesaṃ upaṭṭhātuṃ na deti. Die Erzählung, die mit „Ārāmadvārā nikkhamma“ beginnt, ist die Legende des ehrwürdigen Ānanda. Auch dieser hatte unter früheren Buddhas verdienstvolle Taten vollbracht. Während er in verschiedenen Existenzen heilsame Taten anhäufte, die als Stütze für die Befreiung dienten, wurde er zur Zeit des erhabenen Padumuttara in der Stadt Haṃsavatī als Halbbruder des Meisters geboren. Sein Name war Sumana. Sein Vater war der König namens Nanda. Als sein Sohn, der Prinz Sumana, das Erwachsenenalter erreichte, gab ihm der König eine Lehensstadt an einem Ort, der zweihundert Yojanas von der Stadt Haṃsavatī entfernt war. Von Zeit zu Zeit kam er, um den Meister und seinen Vater zu besuchen. Damals diente der König dem Meister und der aus einhunderttausend Mönchen bestehenden Sangha selbst mit größter Ehrerbietung und erlaubte anderen nicht, ihnen aufzuwarten. Tena samayena paccanto kupito ahosi. Kumāro tassa kupitabhāvaṃ rañño anārocetvā sayameva taṃ vūpasamesi. Taṃ sutvā rājā tuṭṭhamānaso ‘‘varaṃ te tāva dammi, gaṇhāhī’’ti āha. Kumāro ‘‘satthāraṃ bhikkhusaṅghañca temāsaṃ upaṭṭhahanto jīvitaṃ avañjhaṃ kātuṃ icchāmī’’ti āha. ‘‘Etaṃ na sakkā, aññaṃ vadehī’’ti. ‘‘Deva, khattiyānaṃ dve kathā nāma natthi, etaṃ me dehi, na mayhaṃ aññenattho, sace satthā anujānāti, dinnamevā’’ti. So ‘‘satthu cittaṃ jānissāmī’’ti vihāraṃ gato. Tena ca samayena bhagavā gandhakuṭiṃ paviṭṭho hoti. So bhikkhū upasaṅkamitvā ‘‘ahaṃ, bhante, bhagavantaṃ dassanāya āgato, dassetha ma’’nti. Bhikkhū ‘‘sumano nāma thero satthu upaṭṭhāko, tassa santikaṃ gacchāhī’’ti āhaṃsu. So therassa santikaṃ gantvā ‘‘satthāraṃ, bhante, dassethā’’ti āha. Atha thero tassa passantasseva pathaviyaṃ nimujjitvā bhagavantaṃ upasaṅkamitvā ‘‘rājaputto, bhante, tumhākaṃ dassanāya āgato’’ti āha. ‘‘Tena hi bhikkhu bahi āsanaṃ [Pg.347] paññapehī’’ti. Thero punapi buddhāsanaṃ gahetvā antogandhakuṭiyaṃ nimujjitvā tassa passantassa bahipariveṇe pātubhavitvā gandhakuṭipariveṇe āsanaṃ paññāpesi. Kumāro taṃ disvā ‘‘mahanto vatāyaṃ bhikkhū’’ti cittaṃ uppādesi. Zu jener Zeit geriet das Grenzgebiet in Aufruhr. Der Prinz befriedete dieses Grenzgebiet selbst, ohne die Unruhen dem König zu melden. Als der König davon hörte, sprach er erfreuten Herzens: „Ich gewähre dir eine Gunst, wähle sie!“ Der Prinz antwortete: „Ich wünsche, dem Meister und der Mönchsgemeinschaft drei Monate lang aufzuwarten, um mein Leben fruchtbringend zu machen.“ Der König sagte: „Das ist unmöglich, wähle etwas anderes!“ Der Prinz entgegnete: „Majestät, für Könige gibt es kein zweifaches Wort. Gewährt mir dies, ich habe kein Verlangen nach einer anderen Gunst. Wenn der Meister es erlaubt, ist es mir bereits gewährt.“ Er dachte: „Ich will den Geist des Meisters ergründen“, und ging zum Kloster. Zu jener Zeit hatte sich der Erhabene in die Duftkammer zurückgezogen. Der Prinz trat an die Mönche heran und sagte: „Ehrwürdige Herren, ich bin gekommen, um den Erhabenen zu sehen. Bitte zeigt ihn mir!“ Die Mönche sagten: „Ein Mönch namens Sumana ist der persönliche Diener des Meisters. Geh zu ihm!“ Er ging zu dem Ehrwürdigen und sagte: „Ehrwürdiger Herr, zeigt mir den Meister!“ Da tauchte der ältere Mönch vor seinen Augen in die Erde ein, trat vor den Erhabenen und sagte: „Ehrwürdiger Herr, der Prinz ist gekommen, um Euch zu sehen.“ Der Buddha sprach: „Wohlan, Mönch, bereite draußen einen Sitz vor!“ Da nahm der Mönch erneut den Sitz des Buddha, tauchte im Inneren der Duftkammer ein, erschien vor seinen Augen im äußeren Vorhof und bereitete den Sitz im Hof der Duftkammer vor. Als der Prinz dies sah, dachte er: „Wie großartig ist doch dieser Mönch!“ Bhagavāpi gandhakuṭito nikkhamitvā paññattāsane nisīdi. Rājaputto satthāraṃ vanditvā paṭisanthāraṃ katvā ‘‘ayaṃ, bhante, thero tumhākaṃ sāsane vallabho maññe’’ti? ‘‘Āma, kumāra, vallabho’’ti. ‘‘Kiṃ katvā, bhante, esa vallabho’’ti? ‘‘Dānādīni puññāni katvā’’ti. ‘‘Bhagavā, ahampi ayaṃ thero viya anāgate buddhasāsane vallabho hotukāmo’’ti so buddhappamukhassa saṅghassa sattāhaṃ khandhāvāre bhattaṃ datvā sattame divase, ‘‘bhante, mayā pitu santikā tumhākaṃ temāsaṃ paṭijagganavaro laddho, temāsaṃ me vassāvāsaṃ adhivāsethā’’ti vatvā satthu adhivāsanaṃ viditvā saparivāraṃ bhagavantaṃ gahetvā yojane yojane satthu bhikkhusaṅghassa ca vasanānucchavike vihāre kāretvā tattha tattha vasāpento attano vasanaṭṭhānasamīpe satasahassena kīte sobhananāmake uyyāne satasahassena kāritaṃ vihāraṃ pavesāpetvā – Auch der Erhabene trat aus der Duftkammer (gandhakuṭī) und setzte sich auf den vorbereiteten Sitz. Der Königssohn verneigte sich vor dem Meister, grüßte ihn ehrerbietig und fragte: „Ehrwürdiger Herr, ich glaube, dieser ältere Mönch ist in Eurer Lehre sehr beliebt, nicht wahr?“ – „Ja, Prinz, er ist beliebt.“ – „Ehrwürdiger Herr, was hat er getan, um so beliebt zu werden?“ – „Er hat verdienstvolle Taten wie das Geben von Almosen und Ähnliches vollbracht.“ – „O Erhabener, auch ich möchte wie dieser ältere Mönch in der zukünftigen Lehre eines Buddha beliebt sein!“ Daraufhin spendete er der Sangha mit dem Buddha an der Spitze sieben Tage lang Speise in einem provisorischen Blätterhüttencamp. Am siebten Tag sagte er: „Ehrwürdiger Herr, ich habe von meinem Vater die Erlaubnis erhalten, Euch während der dreimonatigen Regenzeit zu dienen. Bitte gewährt mir, dass Ihr die dreimonatige Regenzeit bei mir verbringt.“ Als er das Einverständnis des Meisters vernommen hatte, nahm er den Erhabenen samt Gefolge mit sich. In Abständen von jeweils einer Yojana ließ er für den Meister und die Sangha der Mönche angemessene Klöster errichten, ließ sie hier und da verweilen und führte sie schließlich in ein Kloster, das er für einhunderttausend Münzen in dem nahe seiner eigenen Residenz gelegenen, für einhunderttausend erworbenen Park namens Sobhana hatte erbauen lassen. ‘‘Satasahassena me kītaṃ, satasahassena kāritaṃ; Sobhanaṃ nāma uyyānaṃ, paṭiggaṇha mahāmunī’’ti. – „Für einhunderttausend wurde er von mir erworben, für einhunderttausend wurde er erbaut; den Park namens Sobhana nimm an, o großer Weiser!“ Udakaṃ pātesi. So vassūpanāyikadivase satthu mahādānaṃ pavattetvā ‘‘iminā nīhārena dānaṃ dadeyyāthā’’ti puttadāre amacce ca dāne kiccakaraṇe ca niyojetvā sayaṃ sumanattherassa vasanaṭṭhānasamīpeyeva vasanto evaṃ attano vasanaṭṭhāne satthāraṃ temāsaṃ upaṭṭhahi. Upakaṭṭhāya pana pavāraṇāya gāmaṃ pavisitvā sattāhaṃ mahādānaṃ pavattetvā sattame divase satthu bhikkhusaṅghassa ca pādamūle ticīvare ṭhapetvā vanditvā ‘‘bhante, yadetaṃ mayā khandhāvārato paṭṭhāya puññaṃ kataṃ, na taṃ sakkasampattiādīnaṃ atthāya kataṃ, atha kho ahampi sumanatthero viya anāgate ekassa buddhassa upaṭṭhāko vallabho bhaveyya’’nti patthanaṃ akāsi. Satthā tassa anantarāyataṃ disvā byākaritvā pakkāmi. Er goss das Spendenwasser aus. Am Tag des Eintritts in die Regenzeit spendete er dem Meister eine große Gabe und wies seine Frau, seine Kinder sowie seine Minister an, sich an den Pflichten des Almosengebens zu beteiligen, indem er sprach: „In dieser Weise solltet ihr Almosen geben.“ Er selbst wohnte ganz in der Nähe der Unterkunft des ehrwürdigen Sumana und diente dem Meister auf diese Weise drei Monate lang an seinem eigenen Wohnort. Als die Pavāraṇā-Zeremonie herannahte, ging er in das Dorf, hielt sieben Tage lang eine große Almosenspende ab, legte am siebten Tag ein Dreifach-Robe-Set (ticīvara) vor den Füßen des Meisters und der Sangha der Mönche nieder, verneigte sich und sprach den Wunsch aus: „Ehrwürdiger Herr, welches Verdienst ich auch immer, angefangen bei dem Blätterhüttencamp, vollbracht habe, dies wurde nicht zum Zweck des Erlangens der Herrlichkeit Sakkas oder Ähnlichem getan. Vielmehr möge ich, genau wie der ehrwürdige Sumana, in der Zukunft ein beliebter persönlicher Diener eines Buddha werden!“ Der Meister sah voraus, dass sein Wunsch ohne Hindernisse in Erfüllung gehen würde, verkündete die Prophezeiung und reiste ab. So [Pg.348] tasmiṃ buddhuppāde vassasatasahassaṃ puññāni katvā tato parampi tattha tattha bhave uḷārāni puññakammāni upacinitvā devamanussesu saṃsaranto kassapabhagavato kāle kulagehe nibbatto viññutaṃ patvā ekassa therassa piṇḍāya carato pattaggahaṇatthaṃ uttarasāṭakaṃ katvā pūjaṃ akāsi. Puna sagge nibbattitvā tato cuto bārāṇasirājā hutvā aṭṭha paccekabuddhe disvā te bhojetvā attano maṅgaluyyāne aṭṭha paṇṇasālāyo kāretvā tesaṃ nisīdanatthāya aṭṭha sabbaratanamayapīṭhe ceva maṇiādhārake ca paṭiyādetvā dasavassasahassāni upaṭṭhānaṃ akāsi, etāni pākaṭāni. Er vollbrachte während jener Buddha-Ära einhunderttausend Jahre lang verdienstvolle Taten. Auch danach häufte er in verschiedenen Existenzen erhabene verdienstvolle Taten an, wanderte im Kreislauf der Wiedergeburten unter Göttern und Menschen umher, wurde zur Zeit des erhabenen Kassapa in einer angesehenen Familie geboren und brachte, als er die Mündigkeit erlangt hatte, einem älteren Mönch, der auf Almosengang war, ein Obergewand dar, um dessen Almosenschale entgegenzunehmen, und erwies ihm so seine Verehrung. Nachdem er erneut im Himmel wiedergeboren und von dort geschieden war, wurde er König von Bārāṇasī. Er erblickte acht Paccekabuddhas, bewirtete sie mit Speisen, ließ in seinem königlichen Garten (maṅgaluyyāna) acht Blätterhütten errichten, bereitete für ihr Sitzen acht Sitze aus allerlei Edelsteinen sowie juwelenbesetzte Schalenständer vor und diente ihnen zehntausend Jahre lang. Diese Taten sind allbekannt. Kappasatasahassaṃ pana tattha tattha bhave puññāni upacinanto amhākaṃ bodhisattena saddhiṃ tusitapure nibbattitvā tato cuto amitodanasakkassa gehe nibbattitvā sabbe ñātake ānandite karonto jātoti ānandotveva nāmaṃ labhi. So anukkamena vayappatto katābhinikkhamane sammāsambodhiṃ patvā pavattitavaradhammacakke paṭhamaṃ kapilavatthuṃ gantvā tato nikkhamante bhagavati tassa parivāratthaṃ pabbajituṃ nikkhamantehi bhaddiyādīhi saddhiṃ nikkhamitvā bhagavato santike pabbajitvā āyasmato puṇṇassa mantāṇiputtassa santike dhammakathaṃ sutvā sotāpattiphale patiṭṭhahi. Während er aber einhunderttausend Weltzeitalter hindurch in verschiedenen Existenzen Verdienste anhäufte, wurde er zusammen mit unserem Bodhisatta im Tusita-Himmel geboren. Von dort schied er und wurde im Hause des Sakyers Amitodana geboren. Weil er bei seiner Geburt alle Verwandten in große Freude versetzte, erhielt er den Namen Ānanda („der Freudebringende“). Als er heranwuchs und das Erwachsenenalter erreichte, zog er aus der Hauslosigkeit fort, nachdem der Erhabene die große Entsagung vollzogen, die vollkommene Erleuchtung erlangt und das edle Rad der Lehre in Bewegung gesetzt hatte. Zuerst ging der Erhabene nach Kapilavatthu. Als der Erhabene von dort aufbrach, zog Ānanda zusammen mit Bhaddiya und anderen Adligen aus, um sich ihm als Gefolge anzuschließen und die Ordination zu empfangen. Er ordinierte in der Gegenwart des Erhabenen, hörte nicht lange danach eine Lehrrede von dem ehrwürdigen Puṇṇa Mantāniputta und gründete sich in der Frucht des Stromeintritts. Tena ca samayena bhagavato paṭhamabodhiyaṃ vīsativassāni anibaddhā upaṭṭhākā ahesuṃ. Ekadā nāgasamālo pattacīvaraṃ gahetvā vicarati, ekadā nāgito, ekadā upavāno, ekadā sunakkhatto, ekadā cundo samaṇuddeso, ekadā sāgato, ekadā meghiyo, te yebhuyyena satthu cittaṃ nārādhayiṃsu. Athekadivasaṃ bhagavā gandhakuṭipariveṇe paññattavarabuddhāsane bhikkhusaṅghaparivuto nisinno bhikkhū āmantesi – ‘‘ahaṃ, bhikkhave, idāni mahallako ekacce bhikkhū ‘iminā maggena gacchāmī’ti vutte aññena maggena gacchanti, ekacce mayhaṃ pattacīvaraṃ bhūmiyaṃ nikkhipanti, mayhaṃ nibaddhupaṭṭhākaṃ ekaṃ bhikkhuṃ vijānathā’’ti. Taṃ sutvā bhikkhūnaṃ dhammasaṃvego udapādi. Athāyasmā sāriputto uṭṭhāya bhagavantaṃ vanditvā ‘‘ahaṃ, bhante, tumhe upaṭṭhahissāmī’’ti āha. Taṃ bhagavā paṭikkhipi. Etenupāyena mahāmoggallānaṃ ādiṃ katvā sabbe mahāsāvakā ‘‘ahaṃ upaṭṭhahissāmi[Pg.349], ahaṃ upaṭṭhahissāmī’’ti uṭṭhahiṃsu ṭhapetvā āyasmantaṃ ānandaṃ. Tepi bhagavā paṭikkhipi. Zu jener Zeit, während der ersten zwanzig Jahre nach der Erleuchtung des Erhabenen, gab es keine festen persönlichen Diener (upaṭṭhākā). Einmal trug der ehrwürdige Nāgasamāla die Schale und die Robe des Erhabenen und begleitete ihn, ein andermal Nāgita, ein andermal Upavāna, ein andermal Sunakkhatta, ein andermal der Novize Cunda, ein andermal Sāgata, ein andermal Meghiya. Sie stellten den Meister in den meisten Fällen nicht zufrieden. Da rief der Erhabene eines Tages, als er im Hof der Duftkammer auf dem für ihn vorbereiteten edlen Buddha-Sitz im Kreise der Sangha der Mönche saß, die Mönche zu sich: „Ihr Mönche, ich bin nun alt und hinfällig. Wenn ich zu manchen Mönchen sage: „Ich will diesen Weg gehen“, so gehen sie einen anderen Weg. Einige werfen meine Almosenschale und meine Robe auf die Erde. Bestimmt mir einen festen persönlichen Diener!“ Als die Mönche dies hörten, ergriff sie heilsamer Schrecken (dhammasaṃvego). Da erhob sich der ehrwürdige Sāriputta, verneigte sich vor dem Erhabenen und sagte: „Ehrwürdiger Herr, ich will Euch dienen.“ Der Erhabene wies ihn ab. Auf diese Weise erhoben sich nacheinander alle großen Jünger, angefangen bei Mahāmoggallāna – mit Ausnahme des ehrwürdigen Ānanda – und sagten: „Ich will dienen, ich will dienen!“ Doch auch sie wies der Erhabene ab. Ānando pana tuṇhīyeva nisīdi. Atha naṃ bhikkhū āhaṃsu – ‘‘āvuso, tvampi satthu upaṭṭhākaṭṭhānaṃ yācāhī’’ti. ‘‘Yācitvā laddhupaṭṭhānaṃ nāma kīdisaṃ hoti? Sace ruccati, satthā sayameva vakkhatī’’ti. Atha bhagavā – ‘‘na, bhikkhave, ānando aññehi ussāhetabbo, sayameva jānitvā maṃ upaṭṭhahissatī’’ti āha. Tato bhikkhū ‘‘uṭṭhehi, āvuso ānanda, satthāraṃ upaṭṭhākaṭṭhānaṃ yācāhī’’ti āhaṃsu. Thero uṭṭhahitvā ‘‘sace me, bhante, bhagavā attanā laddhaṃ paṇītaṃ cīvaraṃ na dassati, paṇītaṃ piṇḍapātaṃ na dassati, ekagandhakuṭiyaṃ vasituṃ na dassati, nimantanaṃ gahetvā na gamissati, evāhaṃ bhagavantaṃ upaṭṭhahissāmī’’ti āha. ‘‘Ettake guṇe labhato satthu upaṭṭhānaṃ ko bhāro’’ti upavādamocanatthaṃ ime cattāro paṭikkhepā, ‘‘sace, bhante, bhagavā mayā gahitaṃ nimantanaṃ gamissati, sacāhaṃ desantarato āgatāgate tāvadeva dassetuṃ labhāmi, yadā me kaṅkhā uppajjati, tāvadeva bhagavantaṃ upasaṅkamitvā pucchituṃ labhāmi, sace bhagavā parammukhā desitaṃ dhammaṃ puna mayhaṃ byākarissasi, evāhaṃ bhagavantaṃ upaṭṭhahissāmi’’. ‘‘Ettakampi satthu santike anuggahaṃ na labhatī’’ti upavādamocanatthañceva dhammabhaṇḍāgārikabhāvaparipūraṇatthañca imā catasso yācanāti ime aṭṭha vare gahetvā nibaddhupaṭṭhāko ahosi. Tasseva ṭhānantarassa atthāya kappasatasahassaṃ pūritānaṃ pāramīnaṃ phalaṃ pāpuṇi. Ānanda aber saß schweigend da. Daraufhin sprachen die Mönche zu ihm: „Freund, bitte auch du den Meister um das Amt des Dieners!“ Er antwortete: „Was taugt ein Dienertum, das man erst erbitten muss? Wenn es ihm gefällt, wird der Meister selbst es mir sagen.“ Daraufhin sagte der Erhabene: „Mönche, Ānanda muss nicht von anderen gedrängt werden; er wird von selbst wissen, was zu tun ist, und mir dienen.“ Danach sagten die Mönche: „Steh auf, Freund Ānanda, und bitte den Meister um das Amt des Dieners!“ Der Thera erhob sich und sprach: „Ehrwürdiger Herr, wenn mir der Erhabene nicht das kostbare Gewand gibt, das er selbst erhält, wenn er mir nicht die kostbare Almosenspeise gibt, wenn er mir nicht gestattet, in derselben Riechkammer zu wohnen, und wenn er nicht mitgeht, wenn ich eine Einladung annehme – nur unter diesen Bedingungen werde ich dem Erhabenen dienen.“ Die Absicht dahinter war: „Welche Last wäre es schon, dem Meister zu dienen, wenn man all diese Vorzüge erhielte?“ Um diesen Tadel abzuwenden, stellte er diese vier Ablehnungen auf. Weiter bat er: „Wenn der Erhabene, ehrwürdiger Herr, eine Einladung annimmt, die ich entgegengenommen habe; wenn ich Besucher, die aus anderen Regionen anreisen, sogleich zu einer Audienz vorführen darf; wenn ich, wann immer mir Zweifel aufkommen, sogleich vor den Erhabenen treten darf, um ihn zu fragen; und wenn der Erhabene mir die Lehre, die er in meiner Abwesenheit verkündet hat, nachträglich nochmals darlegt – nur unter diesen Bedingungen werde ich dem Erhabenen dienen.“ Mit dem Gedanken: „Er erhält nicht einmal so viel Gunst in der Gegenwart des Meisters“ – um diesen Tadel abzuwenden und um die Rolle des Bewahrers der Schatzkammer der Lehre vollkommen auszufüllen, stellte er diese vier Bitten auf. Nachdem er diese acht Vorrechte erhalten hatte, wurde er sein ständiger Diener. Für eben diese hervorragende Stellung erlangte er die Frucht der über hunderttausend Weltzeitalter hinweg erfüllten Vollkommenheiten. So upaṭṭhākaṭṭhānaṃ laddhadivasato paṭṭhāya dasabalaṃ duvidhena udakena tividhena dantakaṭṭhena hatthapādaparikammena piṭṭhiparikammena gandhakuṭipariveṇasammajjanenāti evamādīhi kiccehi upaṭṭhahanto – ‘‘imāya nāma velāya satthu idaṃ nāma laddhuṃ vaṭṭati, idaṃ nāma kātuṃ vaṭṭatī’’ti divasabhāgaṃ santikāvacaro hutvā rattibhāge mahantaṃ daṇḍadīpikaṃ gahetvā gandhakuṭipariveṇaṃ navavāre anupariyāyati satthari pakkosante paṭivacanadānāya, thinamiddhavinodanatthaṃ. Atha naṃ satthā jetavane ariyagaṇamajjhe nisinno anekapariyāyena pasaṃsitvā bahussutānaṃ satimantānaṃ gatimantānaṃ dhitimantānaṃ upaṭṭhākānañca bhikkhūnaṃ aggaṭṭhāne ṭhapesi. Von dem Tag an, an dem er das Amt des Dieners erhielt, diente er dem Zehnkraft-Besitzer mit zweierlei Wasser, dreierlei Zahnputzhölzern, dem Massieren von Händen und Füßen, dem Massieren des Rückens, dem Fegen des Bereichs um die Duftkammer und mit anderen solchen Pflichten. Er dachte bei sich: „Zu dieser Zeit gebührt es dem Meister, dies zu erhalten; zu jener Zeit gebührt es ihm, dies zu tun.“ So verbrachte er den Tag stets in seiner Nähe. In der Nacht nahm er eine große Fackel und umrundete neunmal den Bereich um die Duftkammer, um sogleich antworten zu können, falls der Meister ihn rief, und um Schläfrigkeit und Trägheit zu vertreiben. Daraufhin rühmte ihn der Meister, als er inmitten einer Schar von Edlen im Jetavana-Kloster saß, auf vielfältige Weise und setzte ihn an die erste Stelle unter den Mönchen, die sehr belesen, achtsam, von rascher Auffassungsgabe, entschlossen und Diener waren. Evaṃ [Pg.350] satthārā pañcasu ṭhānesu etadagge ṭhapito catūhi acchariyabbhūtadhammehi samannāgato satthu dhammakosārakkho ayaṃ mahāthero sekhova samāno satthari parinibbute heṭṭhā vuttanayena bhikkhūhi samuttejito devatāya ca saṃvejito ‘‘sveyeva ca dāni dhammasaṅgīti kātabbā, na kho pana metaṃ patirūpaṃ, yvāyaṃ sekho sakaraṇīyo asekhehi therehi saddhiṃ dhammaṃ gāyituṃ sannipātaṃ gantu’’nti sañjātussāho vipassanaṃ paṭṭhapetvā bahudeva rattiṃ vipassanāya kammaṃ karonto caṅkame vīriyasamataṃ alabhitvā tato vihāraṃ pavisitvā sayane nisīditvā sayitukāmo kāyaṃ āvaṭṭesi. Apattañca sīsaṃ bimbohanaṃ, pādā ca bhūmito muttamattā, ekasmiṃ antare anupādāya āsavehi cittaṃ vimucci, chaḷabhiñño ahosi. So wurde er vom Meister in fünf Bereichen an die Spitze gestellt. Er war mit den vier erstaunlichen und wunderbaren Eigenschaften ausgestattet. Als dieser große Thera, der Hüter der Schatzkammer der Lehre des Meisters, der noch ein Lernender war, nach dem Erlöschen des Meisters in der oben erwähnten Weise von den Mönchen angespornt und von einer Gottheit wachgerüttelt wurde, erwachte in ihm großer Eifer. Er dachte: „Morgen schon soll das Konzil zur Rezitation der Lehre stattfinden. Es schickt sich jedoch nicht für mich, der ich noch ein Lernender bin und noch Arbeit vor mir habe, mit den Arahant-Theras, die ihr Werk vollendet haben, zur Versammlung zu gehen, um die Lehre zu rezitieren.“ Er leitete die Einsichtsmeditation ein, bemühte sich fast die ganze Nacht hindurch um die Einsichtspraxis, fand jedoch auf dem Gehmeditationspfad keine Ausgewogenheit der Tatkraft. Daraufhin betrat er das Kloster, setzte sich auf das Bett und legte den Körper zurück, um zu schlafen. Noch ehe sein Kopf das Kissen berührte und als seine Füße sich gerade vom Boden gelöst hatten – genau in diesem Zwischenmoment befreite sich sein Geist ohne jegliches Ergreifen von den Trieben. Er wurde zu einem Besitzer der sechs höheren Geisteskräfte. 644. Evaṃ chaḷabhiññādiguṇapaṭimaṇḍito upaṭṭhākādiguṇehi etadaggaṭṭhānaṃ patto attano pubbakammaṃ saritvā somanassavasena pubbacaritāpadānaṃ dassento ārāmadvārā nikkhammātiādimāha. Tattha ārāmadvārāti sabbasattānaṃ dhammadesanatthāya vihāradvārato nikkhamitvā bahidvārasamīpe katamaṇḍapamajjhe supaññattavarabuddhāsane nisinno padumuttaro nāma mahāmuni sammāsambuddho. Vassanto amataṃ vuṭṭhinti dhammadesanāmahāamatadhārāhi dhammavassaṃ vassanto. Nibbāpesi mahājananti mahājanassa cittasantānagatakilesaggiṃ nibbāpesi vūpasamesi, mahājanaṃ nibbānāmatapānena santiṃ sītibhāvaṃ pāpesīti attho. 644. So, geschmückt mit den sechs höheren Geisteskräften und anderen Vorzügen, erlangte er aufgrund seiner Qualitäten als Diener diese höchste Stellung. Er erinnerte sich an seine früheren Taten und sprach voller Freude über sein früheres Wirken, beginnend mit den Worten: „Aus dem Klostertor heraustretend...“ Darin bedeutet „ārāmadvārā“ (aus dem Klostertor): Der vollkommen Erleuchtete namens Padumuttara, der große Weise, der aus dem Klostertor heraustrat, um allen Wesen die Lehre zu verkünden, und sich in der Mitte einer nahe dem äußeren Tor errichteten Halle auf einem wohlbereiteten, erhabenen Buddha-Thron niedergelassen hatte. „vassanto amataṃ vuṭṭhiṃ“ (den Regen des Todeslosen herabregnen lassend) bedeutet, dass er den Regen der Lehre durch die großen Ströme der todeslosen Lehre herabregnen ließ. „nibbāpesi mahājanaṃ“ (er kühlte die große Menge) bedeutet, dass er das Feuer der Befleckungen im Geistesstrom der großen Menge löschte und besänftigte; das heißt, er führte die große Menge durch das Trinken des todeslosen Nibbāna zum Frieden und zur Kühle. 645. Satasahassaṃ te dhīrāti parivārasampattiṃ dassento āha. Chahi abhiññāhi iddhividhādiñāṇakoṭṭhāsehi samannāgatā anekasatasahassacakkavāḷesu khaṇena gantuṃ samatthāhi iddhīhi samannāgatattā mahiddhikāte dhīrā satasahassakhīṇāsavā chāyāva anapāyinīti katthaci anapagatā chāyā iva taṃ sambuddhaṃ padumuttaraṃ bhagavantaṃ parivārenti parivāretvā dhammaṃ suṇantīti attho. 645. „Hunderttausend jener Standhaften“, dies sagte er, um die Fülle seines Gefolges aufzuzeigen. Sie waren ausgestattet mit den sechs höheren Geisteskräften, wie den verschiedenen Arten von übersinnlichen Fähigkeiten und Wissenszweigen. Wegen ihrer Ausstattung mit großen Kräften, durch die sie imstande waren, in einem Augenblick zu vielen Hunderttausenden von Weltsystemen zu reisen, waren sie von großer Macht. Jene standhaften hunderttausend Triebeversiegten umgaben wie ein unweigerlicher Schatten, der niemals weicht, den vollkommen Erleuchteten Padumuttara, den Erhabenen, und lauschten der Lehre; das ist die Bedeutung. 646. Hatthikkhandhagato āsinti tadā bhagavato dhammadesanāsamaye ahaṃ hatthipiṭṭhe nisinno āsiṃ ahosinti attho. Setacchattaṃ varuttamanti patthetabbaṃ uttamaṃ setacchattaṃ mama matthake dhārayanto hatthipiṭṭhe [Pg.351] nisinnoti sambandho. Sucārurūpaṃ disvānāti sundaraṃ cāruṃ manohararūpavantaṃ dhammaṃ desiyamānaṃ sambuddhaṃ disvā me mayhaṃ vitti santuṭṭhi somanassaṃ udapajjatha uppajjatīti attho. 646. „Ich war auf dem Nacken des Elefanten“: Das bedeutet, dass ich damals zur Zeit der Lehrverkündung des Erhabenen auf dem Rücken des Elefanten saß. „setacchattaṃ varuttamaṃ“ (den erhabenen, besten weißen Schirm) verbindet sich damit, dass er, einen begehrenswerten, hervorragenden weißen Schirm über seinem Haupt haltend, auf dem Rücken des Elefanten saß. „sucārurūpaṃ disvānā“ (nachdem ich die überaus liebliche Gestalt erblickt hatte) bedeutet: Als ich den vollkommen Erleuchteten sah, der die wunderschöne, liebliche und herzerfreuende Lehre verkündete, entstand in mir Freude, Zufriedenheit und Glückseligkeit; das ist die Bedeutung. 647. Oruyha hatthikkhandhamhāti taṃ bhagavantaṃ nisinnaṃ disvā hatthipiṭṭhito oruyha orohitvā narāsabhaṃ naravasabhaṃ upagacchiṃ samīpaṃ gatoti attho. Ratanamayachattaṃ meti ratanabhūsitaṃ me mayhaṃ chattaṃ buddhaseṭṭhassa matthake dhārayinti sambandho. 647. „Vom Nacken des Elefanten herabgestiegen“: Als ich den Erhabenen dort sitzen sah, stieg ich vom Rücken des Elefanten herab und trat an den Besten unter den Menschen heran, das heißt, ich begab mich in seine Nähe; das ist die Bedeutung. „ratanamayachattaṃ me“ (mein juwelenbesetzter Schirm) verbindet sich mit: „Ich hielt meinen mit Juwelen verzierten Schirm über das Haupt des edelsten der Buddhas.“ 648. Mama saṅkappamaññāyāti mayhaṃ pasādena uppannaṃ saṅkappaṃ ñatvā isīnaṃ antare mahantabhūto so padumuttaro bhagavā. Taṃ kathaṃ ṭhapayitvānāti taṃ attanā desiyamānaṃ dhammakathaṃ ṭhapetvā mama byākaraṇatthāya imā gāthā abhāsatha kathesīti attho. 648. „Meinen Entschluss erkennend“: Der Erhabene Padumuttara, der unter den Weisen der Größte war, erkannte den Entschluss, der in meinem von Vertrauen erfüllten Geist entstanden war. „taṃ kathaṃ ṭhapayitvānā“ (jene Rede beiseite lassend) bedeutet, dass er die von ihm selbst dargelegte Lehrrede unterbrach, um mir eine Prophezeiung zu verkünden, und diese Verse sprach; das ist die Bedeutung. 649. Kathanti ce? Yo sotiādimāha. Soṇṇālaṅkārabhūsitaṃ chattaṃ yo so rājakumāro me matthake dhāresīti sambandho. Tamahaṃ kittayissāmīti taṃ rājakumāraṃ ahaṃ kittayissāmi pākaṭaṃ karissāmi. Suṇotha mama bhāsatoti bhāsantassa mama vacanaṃ suṇotha ohitasotā manasi karothāti attho. 649. Wenn man fragt: „Wie?“, so sprach Er die Worte, die mit „Yo so“ beginnen. Die Verbindung ist wie folgt: „Jener Königssohn hielt über meinem Haupte den mit goldenem Schmuck verzierten Schirm.“ „Ihn werde ich preisen“ bedeutet: „Ich werde jenen Königssohn rühmen, ich werde ihn bekannt machen.“ „Hört mir zu, während ich spreche“ bedeutet: „Hört meine Worte, während ich spreche; neigt eure Ohren und nehmt es euch zu Herzen“ – dies ist der Sinn. 650. Ito gantvā ayaṃ posoti ayaṃ rājakumāro ito manussalokato cuto tusitaṃ gantvā āvasissati tattha viharissati. Tattha accharāhi purakkhato parivārito tusitabhavanasampattiṃ anubhossatīti sambandho. 650. „Von hier fortgehend, dieser Mensch“ bedeutet: „Dieser Königssohn wird, wenn er aus dieser Menschenwelt verscheidet, in die Tusita-Welt gehen und dort wohnen, dort verweilen.“ Die Verbindung ist so zu verstehen: „Dort wird er, von himmlischen Nymphen angeführt und umgeben, die Herrlichkeit des Tusita-Reiches genießen.“ 651. Catuttiṃsakkhattunti tusitabhavanato cavitvā tāvatiṃsabhavane uppanno catuttiṃsavāre devindo devarajjaṃ karissatīti sambandho. Balādhipo aṭṭhasatanti tāvatiṃsabhavanato cuto manussaloke uppanno balādhipo caturaṅginiyā senāya adhipo padhāno aṭṭhasatajātīsu padesarājā hutvā vasudhaṃ anekaratanavaraṃ pathaviṃ āvasissati puthabyaṃ viharissatīti attho. 651. „Vierunddreißigmal“ bezieht sich auf die Verbindung: „Nach dem Verscheiden aus dem Tusita-Reich wurde er im Tāvatiṃsa-Reich wiedergeboren und wird vierunddreißigmal als Herrscher der Götter die Götterherrschaft ausüben.“ „Ein Heerführer in achthundert [Existenzen]“ bedeutet: „Aus dem Tāvatiṃsa-Reich verschieden und in der Menschenwelt wiedergeboren, wird er als Heerführer – als oberster Befehlshaber eines viergliedrigen Heeres – in achthundert Existenzen ein Regionalkönig sein und die Erde, diese mit vielen edlen Juwelen ausgestattete Welt, bewohnen, d. h. auf dieser Erde verweilen“ – dies ist der Sinn. 652. Aṭṭhapaññāsakkhattunti aṭṭhapaññāsajātīsu cakkavattī rājā bhavissatīti attho. Mahiyā sakalajambudīpapathaviyā vipulaṃ asaṅkhyeyyaṃ padesarajjaṃ kārayissati. 652. „Achtundfünfzigmal“ bedeutet, dass er in achtundfünfzig Existenzen ein Radkönig sein wird. Er wird auf der Erde, nämlich auf dem gesamten Boden von Jambudīpa, eine weitreichende, unzählbare Herrschaft als Regionalkönig ausüben. 654. Sakyānaṃ [Pg.352] kulaketussāti sakyarājūnaṃ kulassa dhajabhūtassa buddhassa ñātako bhavissatīti attho. 654. „Des Banners des Geschlechts der Sakyer“ bedeutet, dass er ein Verwandter des Buddhas sein wird, welcher wie eine Flagge für das Geschlecht der Sakyer-Könige ist – dies ist der Sinn. 655. Ātāpīti vīriyavā. Nipakoti nepakkasaṅkhātāya paññāya samannāgato. Bāhusaccesu bahussutabhāvesu piṭakattayadhāraṇesu kovido cheko. Nivātavutti anavaññattiko athaddho kāyapāgabbiyādithaddhabhāvavirahito sabbapāṭhī sakalapiṭakattayadhārī bhavissatīti sambandho. 655. „Eifrig“ bedeutet tatkräftig. „Besonnen“ bedeutet ausgestattet mit jener Weisheit, die man Klugheit nennt. „In großer Gelehrsamkeit“ bedeutet in Bezug auf den Zustand des viel Gehörten, d. h. im Bewahren der drei Körbe, geschickt und kundig. Die Verbindung lautet, dass er von demütiger Lebensart, frei von Verachtung anderer, nicht starrsinnig, frei von körperlicher Grobheit und Stolz, ein Kenner aller Texte und ein Bewahrer des gesamten Dreikorb-Kanons sein wird. 656. Padhānapahitatto soti so ānandatthero vīriyakaraṇāya pesitacitto. Upasanto nirūpadhīti rāgūpadhidosūpadhimohūpadhīhi virahito, sotāpattimaggena pahātabbakilesānaṃ pahīnattā upasanto santakāyacitto. 656. „Er ist eifrig und entschlossen“ bedeutet: Jener Ehrwürdige Ānanda hat seinen Geist auf die Entfaltung von Tatkraft gerichtet. „Friedvoll, frei von weltlichen Bindungen“ bedeutet: Er ist frei von den Bindungen der Gier, des Hasses und der Verblendung; er ist friedvoll und von besänftigtem Körper und Geist, weil er die Befleckungen, die durch den Pfad des Stromeintritts zu überwinden sind, aufgegeben hat. 657. Santi āraññakāti araññe bhavā mahāvane jātā. Saṭṭhihāyanāti saṭṭhivassakāle hāyanabalā. Tidhā pabhinnāti akkhikaṇṇakosasaṅkhātehi tīhi ṭhānehi bhinnamadā. Mātaṅgāti mātaṅgahatthikule jātā. Īsādantāti rathīsāsadisadantā. Urūḷhavā rājavāhanā. Kuñjarasaṅkhātā nāgā hatthirājāno santi saṃvijjanti yathā, tathā satasahassasaṅkhyā khīṇāsavasaṅkhātā paṇḍitā mahiddhikā arahantanāgā santi, sabbe te arahantanāgā buddhanāgarājassa. Na honti paṇidhimhi teti te paṇidhimhi tādisā na honti, kiṃ sabbe te bhayabhītā sakabhāvena saṇṭhātuṃ asamatthāti attho. Sesaṃ vuttanayattā uttānatthamevāti. 657. „Es gibt Waldelefanten“ bedeutet: Sie leben im Wald, sie sind im großen Wald geboren. „Sechzigjährige“ bedeutet, dass ihre Kraft im Alter von sechzig Jahren abnimmt. „Dreifach gespalten“ bedeutet, dass ihr Brunstsaft aus drei Stellen fließt, die als Augen, Ohren und Schläfen bezeichnet werden. „Mātaṅgas“ bedeutet, dass sie in der Mātaṅga-Elefantenfamilie geboren sind. „Mit Deichselzähnen“ bedeutet, dass sie Stoßzähne haben, die so gerade wie Wagendeichseln sind. Sie sind edle Reittiere für Könige. So wie solche Elefantenkönige, die man auch Trompeter nennt, existieren und anzutreffen sind, ebenso gibt es hunderttausend weise, hochmütige Arahant-Elefanten, deren Triebe versiegt sind. Doch all diese Arahant-Elefanten kommen dem Buddha-Elefantenkönig nicht gleich. „Sie kommen ihm in Bezug auf sein Gelübde nicht gleich“ bedeutet: Sie sind ihm in ihrem Streben nicht ebenbürtig; sind sie etwa alle von Furcht ergriffen und unfähig, in ihrem eigenen Wesen festzustehen? – dies ist der Sinn. Der Rest ist aufgrund der bereits dargelegten Methode von leicht verständlicher Bedeutung. Ānandattheraapadānavaṇṇanā samattā. Die Erklärung der Legende des Ehrwürdigen Thera Ānanda ist abgeschlossen. Ettāvatā paṭhamā buddhavaggavaṇṇanā samattā. Damit ist die Erklärung des ersten Kapitels über die Buddhas abgeschlossen. Paṭhamo bhāgo niṭṭhito. Der erste Teil ist beendet. | |||
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| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
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| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |