| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස उन भगवान, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। ඛුද්දකනිකායෙ खुद्दकनिकाय में। ඉතිවුත්තක-අට්ඨකථා इतिवुत्तक-अट्ठकथा। ගන්ථාරම්භකථා ग्रन्थारम्भ कथा (प्रस्तावना)। මහාකාරුණිකං [Pg.1] නාථං, ඤෙය්යසාගරපාරගුං; වන්දෙ නිපුණගම්භීර-විචිත්රනයදෙසනං. महाकारुणिक नाथ, ज्ञेय-सागर के पारगामी और निपुण, गम्भीर एवं विचित्र नय (पद्धति) से उपदेश देने वाले की मैं वन्दना करता हूँ। විජ්ජාචරණසම්පන්නා, යෙන නිය්යන්ති ලොකතො; වන්දෙ තමුත්තමං ධම්මං, සම්මාසම්බුද්ධපූජිතං. विद्या और चरण से सम्पन्न (बुद्ध) जिसके द्वारा लोक से निवृत्त (मुक्त) होते हैं, सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा पूजित उस उत्तम धर्म की मैं वन्दना करता हूँ। සීලාදිගුණසම්පන්නො, ඨිතො මග්ගඵලෙසු යො; වන්දෙ අරියසඞ්ඝං තං, පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං අනුත්තරං. जो शील आदि गुणों से सम्पन्न हैं और मार्ग एवं फलों में स्थित हैं, उस अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आर्य संघ की मैं वन्दना करता हूँ। වන්දනාජනිතං පුඤ්ඤං, ඉති යං රතනත්තයෙ; හතන්තරායො සබ්බත්ථ, හුත්වාහං තස්ස තෙජසා. इस प्रकार रत्नत्रय की वन्दना से जो पुण्य उत्पन्न हुआ है, उसके तेज से मैं सब जगह विघ्नों से रहित होकर... එකකාදිප්පභෙදෙන, දෙසිතානි මහෙසිනා; ලොභාදීනං පහානානි, දීපනානි විසෙසතො. महर्षि (बुद्ध) द्वारा एकक आदि के भेद से उपदिष्ट, जो विशेष रूप से लोभ आदि के प्रहाण (त्याग) को प्रकाशित करने वाले हैं। සුත්තානි එකතො කත්වා, ඉතිවුත්තපදක්ඛරං; ධම්මසඞ්ගාහකා ථෙරා, සඞ්ගායිංසු මහෙසයො. उन सूत्रों को एकत्र कर, 'इतिवुत्त' पदों और अक्षरों के साथ, धर्म-संग्राहक महर्षि स्थविरों ने संगायन किया। ඉතිවුත්තකමිච්චෙව, නාමෙන වසිනො පුරෙ; යං ඛුද්දකනිකායස්මිං, ගම්භීරත්ථපදක්කමං. प्राचीन काल में जितेन्द्रिय (स्थविरों) द्वारा 'इतिवुत्तक' नाम से प्रसिद्ध, जो खुद्दकनिकाय में गम्भीर अर्थ और पद-क्रम वाला है। තස්ස ගම්භීරඤාණෙහි, ඔගාහෙතබ්බභාවතො; කිඤ්චාපි දුක්කරා කාතුං, අත්ථසංවණ්ණනා මයා. गम्भीर ज्ञान के द्वारा ही अवगाहन (समझने) योग्य होने के कारण, यद्यपि मेरे द्वारा इसकी अर्थ-वर्णना (व्याख्या) करना कठिन है। සහසංවණ්ණනං [Pg.2] යස්මා, ධරතෙ සත්ථු සාසනං; පුබ්බාචරියසීහානං, තිට්ඨතෙව විනිච්ඡයො. क्योंकि व्याख्या के साथ ही शास्ता का शासन टिका रहता है, और पूर्वाचार्यों रूपी सिंहों का निश्चय (निर्णय) विद्यमान ही है। තස්මා තං අවලම්බිත්වා, ඔගාහෙත්වාන පඤ්චපි; නිකායෙ උපනිස්සාය, පොරාණට්ඨකථානයං. इसलिए उसका अवलम्बन लेकर, पाँचों निकायों का अवगाहन कर और पुरानी अट्ठकथाओं की पद्धति का आश्रय लेकर। නිස්සිතං වාචනාමග්ගං, සුවිසුද්ධං අනාකුලං; මහාවිහාරවාසීනං, නිපුණත්ථවිනිච්ඡයං. महाविहारवासियों के सुविशुद्ध, व्याकुलता रहित और निपुण अर्थ-विनिश्चय वाली वाचना-मार्ग के आश्रित होकर। පුනප්පුනාගතං අත්ථං, වජ්ජයිත්වාන සාධුකං; යථාබලං කරිස්සාමි, ඉතිවුත්තකවණ්ණනං. बार-बार आए हुए अर्थों को भली-भांति छोड़कर, मैं अपनी शक्ति के अनुसार 'इतिवुत्तक' की व्याख्या करूँगा। ඉති ආකඞ්ඛමානස්ස, සද්ධම්මස්ස චිරට්ඨිතිං; විභජන්තස්ස තස්සත්ථං, නිසාමයථ සාධවොති. इस प्रकार सद्धर्म की चिर-स्थिति की आकांक्षा करते हुए, मेरे द्वारा विभक्त किए जा रहे इसके अर्थ को हे साधुजनो! श्रवण करें। තත්ථ ඉතිවුත්තකං නාම එකකනිපාතො, දුකනිපාතො, තිකනිපාතො, චතුක්කනිපාතොති චතුනිපාතසඞ්ගහං. තම්පි විනයපිටකං, සුත්තන්තපිටකං, අභිධම්මපිටකන්ති තීසු පිටකෙසු සුත්තන්තපිටකපරියාපන්නං; දීඝනිකායො මජ්ඣිමනිකායො, සංයුත්තනිකායො, අඞ්ගුත්තරනිකායො, ඛුද්දකනිකායොති පඤ්චසු නිකායෙසු ඛුද්දකනිකායපරියාපන්නං; සුත්තං, ගෙය්යං, වෙය්යාකරණං, ගාථා, උදානං, ඉතිවුත්තකං, ජාතකං, අබ්භුතධම්මං, වෙදල්ලන්ති නවසු සාසනඞ්ගෙසු ඉතිවුත්තකඞ්ගභූතං. वहाँ 'इतिवुत्तक' नाम का ग्रन्थ एकक-निपात, दुक-निपात, तिक-निपात और चतुक्क-निपात—इन चार निपातों का संग्रह है। वह भी विनयपिटक, सुत्तन्तपिटक और अभिधम्मपिटक—इन तीन पिटकों में सुत्तन्तपिटक के अन्तर्गत है; दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय, संयुत्तनिकाय, अङ्गुत्तरनिकाय और खुद्दकनिकाय—इन पाँच निकायों में खुद्दकनिकाय के अन्तर्गत है; सुत्त, गेय्य, वेय्याकरण, गाथा, उदान, इतिवुत्तक, जातक, अब्भुतधम्म और वेदल्ल—इन नौ शासनाङ्गों में 'इतिवुत्तक' अङ्ग स्वरूप है। ‘‘ද්වාසීති බුද්ධතො ගණ්හිං, ද්වෙසහස්සානි භික්ඛුතො; චතුරාසීති සහස්සානි, යෙ මෙ ධම්මා පවත්තිනො’’ති. (ථෙරගා. 1027) – “मैंने बयासी हजार (धर्मस्कन्ध) बुद्ध से ग्रहण किए और दो हजार भिक्षुओं से; इस प्रकार ये चौरासी हजार धर्म मेरे प्रवर्तन में हैं।” එවං ධම්මභණ්ඩාගාරිකෙන පටිඤ්ඤාතෙසු චතුරාසීතියා ධම්මක්ඛන්ධසහස්සෙසු කතිපයධම්මක්ඛන්ධසඞ්ගහං. සුත්තතො එකකනිපාතෙ තාව සත්තවීසති සුත්තානි, දුකනිපාතෙ ද්වාවීසති, තිකනිපාතෙ පඤ්ඤාස, චතුක්කනිපාතෙ තෙරසාති ද්වාදසාධිකසුත්තසතසඞ්ගහං. තස්ස නිපාතෙසු එකකනිපාතො ආදි, වග්ගෙසු පාටිභොගවග්ගො, සුත්තෙසු ලොභසුත්තං. තස්සාපි ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා’’තිආදිකං ආයස්මතා ආනන්දෙන පඨමමහාසඞ්ගීතිකාලෙ වුත්තං නිදානමාදි. සා පනායං පඨමමහාසඞ්ගීති විනයපිටකෙ තන්තිමාරුළ්හා එව. යො පනෙත්ථ නිදානකොසල්ලත්ථං වත්තබ්බො කථාමග්ගො[Pg.3], සොපි සුමඞ්ගලවිලාසිනියා දීඝනිකාය-අට්ඨකථාය විත්ථාරතො වුත්තොයෙවාති තත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. इस प्रकार धर्म-भाण्डागारिक (आनन्द) द्वारा प्रतिज्ञात चौरासी हजार धर्मस्कन्धों में से कुछ धर्मस्कन्धों का यह संग्रह है। सूत्रों की दृष्टि से, एकक-निपात में सत्ताईस सूत्र, दुक-निपात में बाईस, तिक-निपात में पचास और चतुक्क-निपात में तेरह—इस प्रकार यह एक सौ बारह सूत्रों का संग्रह है। इसके निपातों में एकक-निपात आदि है, वग्गों में पािटभोग-वग्ग और सूत्रों में लोभ-सुत्त। इसका भी 'वुत्तञ्हेतं भगवता' (ऐसा भगवान द्वारा कहा गया है) आदि निदान (प्रस्तावना) आयुष्मान आनन्द द्वारा प्रथम महासंगीति के समय कहा गया था। वह यह प्रथम महासंगीति विनयपिटक में परम्परागत रूप से आरूढ़ ही है। यहाँ निदान के कौशल के लिए जो कथा-मार्ग कहना चाहिए, वह सुमङ्गलविलासिनी (दीघनिकाय-अट्ठकथा) में विस्तार से कहा ही गया है, अतः उसे उसी रीति से समझना चाहिए। නිදානවණ්ණනා निदान-वर्णना (प्रस्तावना की व्याख्या)। යං පනෙතං වුත්තඤ්හෙතං භගවතාතිආදිකං නිදානං. එකධම්මං, භික්ඛවෙ, පජහථාතිආදිකං සුත්තං. තත්ථ වුත්තං භගවතාතිආදීනි නාමපදානි. ඉතීති නිපාතපදං. පජහථාති එත්ථ ප-ඉති උපසග්ගපදං, ජහථා-ති ආඛ්යාතපදං. ඉමිනා නයෙන සබ්බත්ථ පදවිභාගො වෙදිතබ්බො. जो यह 'वुत्तञ्हेतं भगवता' आदि निदान है और 'एकधम्मं, भिक्खवे, पजहथ' आदि सूत्र है। वहाँ 'वुत्तं', 'भगवता' आदि नाम-पद हैं। 'इति' निपात-पद है। 'पजहथ' में 'प' उपसर्ग-पद है और 'जहथ' आख्यात-पद (क्रिया) है। इसी रीति से सर्वत्र पद-विभाजन समझना चाहिए। අත්ථතො පන වුත්තසද්දො තාව සඋපසග්ගො අනුපසග්ගො ච වපනෙ වාපසමකරණෙ කෙසොහාරණෙ ජීවිතවුත්තියං පවුත්තභාවෙ පාවචනභාවෙන පවත්තිතෙ අජ්ඣෙසනෙ කථනෙති එවමාදීසු දිස්සති. තථා හෙස – अर्थ की दृष्टि से 'वुत्त' शब्द उपसर्ग के साथ और बिना उपसर्ग के—बोने (वपन), शान्त करने (वपशमन), केश काटने, जीविका-वृत्ति, बन्धनमुक्त होने, प्रवचन के रूप में प्रवृत्त होने, अध्ययन और कहने आदि अर्थों में देखा जाता है। जैसे कि— ‘‘ගාවො තස්ස පජායන්ති, ඛෙත්තෙ වුත්තං විරූහති; වුත්තානං ඵලමස්නාති, යො මිත්තානං න දුබ්භතී’’ති. – “उसकी गाएँ बढ़ती हैं, खेत में बोया हुआ (वुत्तं) उगता है; जो मित्रों से द्रोह नहीं करता, वह बोए हुए का फल भोगता है।” ආදීසු (ජා. 2.22.19) වපනෙ ආගතො. ‘‘නො ච ඛො පටිවුත්ත’’න්තිආදීසු (පාරා. 289) අට්ඨදන්තකාදීහි වාපසමකරණෙ. ‘‘කාපටිකො මාණවො දහරො වුත්තසිරො’’තිආදීසු (ම. නි. 2.426) කෙසොහාරණෙ. ‘‘පන්නලොමො පරදත්තවුත්තො මිගභූතෙන චෙතසා විහරතී’’තිආදීසු (චූළව. 332) ජීවිතවුත්තියං. ‘‘සෙය්යථාපි නාම පණ්ඩුපලාසො බන්ධනා පවුත්තො අභබ්බො හරිතත්ථායා’’තිආදීසු (පාරා. 92; පාචි. 666; මහාව. 129) බන්ධනතො පවුත්තභාවෙ. ‘‘යෙසමිදං එතරහි, බ්රාහ්මණා, පොරාණං මන්තපදං ගීතං පවුත්තං සමිහිත’’න්තිආදීසු පාවචනභාවෙන පවත්තිතෙ. ලොකෙ පන – ‘‘වුත්තො ගණො වුත්තො පාරායනො’’තිආදීසු අජ්ඣෙනෙ. ‘‘වුත්තං ඛො පනෙතං භගවතා ධම්මදායාදා මෙ, භික්ඛවෙ, භවථ, මා ආමිසදායාදා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.30) කථනෙ. ඉධාපි කථනෙ දට්ඨබ්බො. තස්මා වුත්තං කථිතං භාසිතන්ති අත්ථො. आदि में (जातक २.२२.१९) यह 'बोने' (वपन) के अर्थ में आया है। 'नो च खो पटिवुत्तं' आदि में (पाराजिक २८९) हड्डी-दाँत आदि से शान्त करने (वपशमन) के अर्थ में। 'कापटिको माणवो दहरो वुत्तसिरो' आदि में (मज्झिम निकाय २.४२६) केश काटने के अर्थ में। 'पन्नलोमो परदत्तवुत्तो मिगभूतेन चेतसा विहरति' आदि में (चुल्लवग्ग ३३२) जीविका-वृत्ति के अर्थ में। 'सेय्यथापि नाम पण्डुपलासो बन्धना पवुत्तो अभब्बो हरितत्थाय' आदि में (पाराजिक ९२ आदि) बन्धन से मुक्त होने के अर्थ में। 'येसमिदं एतरहि, ब्राह्मणा, पोराणं मन्तपदं गीतं पवुत्तं समिहितं' आदि में प्रवचन के रूप में प्रवृत्त होने के अर्थ में। लोक में— 'वुत्तो गणो वुत्तो पारायनो' आदि में अध्ययन के अर्थ में। 'वुत्तं खो पनेतं भगवता धम्मदायादा मे, भिक्खवे, भवथ, मा आमिसदायादा' आदि में (मज्झिम निकाय १.३०) कहने के अर्थ में। यहाँ भी 'कहने' के अर्थ में ही देखना चाहिए। इसलिए 'वुत्तं' का अर्थ 'कहा गया', 'भाषित' है। දුතියො [Pg.4] පන වුත්තසද්දො වචනෙ චිණ්ණභාවෙ ච වෙදිතබ්බො. හි-ඉති ජාතු විබ්යත්තන්ති එතස්මිං අත්ථෙ නිපාතො. සො ඉදානි වුච්චමානසුත්තස්ස භගවතො විබ්යත්තං භාසිතභාවං ජොතෙති. වාචකසද්දසන්නිධානෙ හි පයුත්තා නිපාතා. තෙහි වත්තබ්බමත්ථං ජොතෙන්ති. එතන්ති අයං එතසද්දො – दूसरा 'वुत्त' (vutta) शब्द वचन और अभ्यास (आचरण) के अर्थ में समझना चाहिए। 'हि' (hi) यह निपात 'निश्चित रूप से' (jātu) और 'स्पष्ट' (vibyatta) के अर्थ में है। वह अब कहे जाने वाले सूत्र के भगवान द्वारा स्पष्ट रूप से कहे जाने के भाव को प्रकाशित करता है। वाचक शब्दों के सान्निध्य में ही निपात प्रयुक्त होते हैं। वे उनके द्वारा कहे जाने वाले अर्थ को प्रकाशित करते हैं। 'एतं' (etaṃ) यह 'एत' शब्द है — ‘‘යො ච බුද්ධඤ්ච ධම්මඤ්ච, සඞ්ඝඤ්ච සරණං ගතො; චත්තාරි අරියසච්චානි, සම්මප්පඤ්ඤාය පස්සති. “जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में गया है; वह चार आर्य सत्यों को सम्यक् प्रज्ञा से देखता है। ‘‘දුක්ඛං දුක්ඛසමුප්පාදං, දුක්ඛස්ස ච අතික්කමං; අරියඤ්චට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං, දුක්ඛූපසමගාමිනං. “दुःख, दुःख की उत्पत्ति, दुःख का अतिक्रमण (निरोध) और दुःख की शांति तक ले जाने वाले आर्य अष्टांगिक मार्ग को (देखता है)। ‘‘එතං ඛො සරණං ඛෙමං, එතං සරණමුත්තමං; එතං සරණමාගම්ම, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. (ධ. ප. 190-192) – “यही क्षेम (सुरक्षित) शरण है, यही उत्तम शरण है; इस शरण में आकर (मनुष्य) सब दुखों से मुक्त हो जाता है।” (धम्मपद १९०-१९२) — ආදීසු යථාවුත්තෙ ආසන්නපච්චක්ඛෙ ආගතො. ‘‘අප්පමත්තකං ඛො පනෙතං, භික්ඛවෙ, ඔරමත්තකං සීලමත්තකං, යෙන පුථුජ්ජනො තථාගතස්ස වණ්ණං වදමානො වදෙය්යා’’තිආදීසු (දී. නි. 1.7) පන වක්ඛමානෙ ආසන්නපච්චක්ඛෙ. ඉධාපි වක්ඛමානෙයෙව දට්ඨබ්බො. සඞ්ගායනවසෙන වක්ඛමානඤ්හි සුත්තං ධම්මභණ්ඩාගාරිකෙන බුද්ධියං ඨපෙත්වා තදා ‘‘එත’’න්ති වුත්තං. आदि (गाथाओं) में जैसा कहा गया है, वह निकटवर्ती प्रत्यक्ष (आसन्न-प्रत्यक्ष) के अर्थ में आया है। “भिक्षुओं! यह तो अल्पमात्र, तुच्छ और केवल शील मात्र है, जिसके द्वारा पृथग्जन तथागत की प्रशंसा करता हुआ कहेगा” (दी. नि. १.७) इत्यादि में यह 'एतं' शब्द भविष्य में कहे जाने वाले (वक्खमान) निकटवर्ती प्रत्यक्ष के अर्थ में है। यहाँ भी भविष्य में कहे जाने वाले के अर्थ में ही देखना चाहिए। संगायन के वश से कहे जाने वाले सूत्र को धर्म-भाण्डागारिक (आनन्द) ने बुद्धि में स्थापित करके तब 'एतं' (यह) ऐसा कहा। භගවතාති එත්ථ භගවාති ගරුවචනං. ගරුං හි ලොකෙ භගවාති වදන්ති. තථාගතො ච සබ්බගුණවිසිට්ඨතාය සත්තානං ගරු, තස්මා භගවාති වෙදිතබ්බො. පොරාණෙහිපි වුත්තං – 'भगवता' (भगवान द्वारा) यहाँ 'भगवा' यह गौरववाचक शब्द है। लोक में गुरु (पूजनीय) को 'भगवान' कहते हैं। तथागत सभी गुणों की विशिष्टता के कारण प्राणियों के गुरु (पूजनीय) हैं, इसलिए उन्हें 'भगवान' समझना चाहिए। प्राचीन आचार्यों द्वारा भी कहा गया है — ‘‘භගවාති වචනං සෙට්ඨං, භගවාති වචනමුත්තමං; ගරු ගාරවයුත්තො සො, භගවා තෙන වුච්චතී’’ති. “'भगवान' यह शब्द श्रेष्ठ है, 'भगवान' यह शब्द उत्तम है; वे गुरु (पूजनीय) और गौरव से युक्त हैं, इसलिए उन्हें 'भगवान' कहा जाता है।” සෙට්ඨවාචකඤ්හි වචනං සෙට්ඨගුණසහචරණතො සෙට්ඨන්ති වුත්තං. අථ වා වුච්චතීති වචනං, අත්ථො. තස්මා භගවාති වචනං සෙට්ඨන්ති භගවාති ඉමිනා වචනෙන වචනීයො යො අත්ථො, සො සෙට්ඨොති අත්ථො. භගවාති වචනමුත්තමන්ති එත්ථාපි එසෙව නයො. ගාරවයුත්තොති ගරුභාවයුත්තො ගරුගුණයොගතො, ගරුකරණං වා සාතිසයං අරහතීති ගාරවයුත්තො, ගාරවාරහොති අත්ථො. එවං ගුණවිසිට්ඨසත්තුත්තමගරුගාරවාධිවචනමෙතං යදිදං භගවාති. අපිච – श्रेष्ठ गुणों के साथ होने के कारण श्रेष्ठ का वाचक वचन 'श्रेष्ठ' कहा गया है। अथवा 'वुच्चति' (कहा जाता है) इति 'वचनं' अर्थात् अर्थ। इसलिए 'भगवान यह वचन श्रेष्ठ है' का अर्थ है कि 'भगवान' इस शब्द के द्वारा जो अर्थ कहा जाता है, वह श्रेष्ठ है। 'भगवान यह वचन उत्तम है' यहाँ भी यही नियम है। 'गौरवयुक्त' का अर्थ है गुरु-भाव से युक्त, गुरु-गुणों के योग से, अथवा जो अतिशय आदर (गुरुकरण) के योग्य है, वह गौरवयुक्त है, अर्थात् गौरव का पात्र है। इस प्रकार गुणों से विशिष्ट, प्राणियों में उत्तम, गुरु और गौरव का यह अधिवाचन (नाम) है, जो यह 'भगवान' है। और भी — ‘‘භගී [Pg.5] භජී භාගී විභත්තවා ඉති,අකාසි භග්ගන්ති ගරූති භාග්යවා; බහූහි ඤායෙහි සුභාවිතත්තනො,භවන්තගො සො භගවාති වුච්චතී’’ති. – “वे भगी (ऐश्वर्यवान), भजी (भजने वाले), भागी (हिस्सेदार), विभक्तवा (विभाजन करने वाले) हैं; उन्होंने (क्लेशों को) भग्न किया, वे गुरु और भाग्यवान हैं; अनेक विधियों से स्वयं को सुभावित करने वाले और भव के पार जाने वाले वे 'भगवान' कहे जाते हैं।” — නිද්දෙසෙ ආගතනයෙන – निद्देस में आए हुए नियम के अनुसार — ‘‘භාග්යවා භග්ගවා යුත්තො, භගෙහි ච විභත්තවා; භත්තවා වන්තගමනො, භවෙසු භගවා තතො’’ති. “वे भाग्यवान हैं, क्लेशों को नष्ट करने वाले (भग्नवा) हैं, (छह) भगों (ऐश्वर्यों) से युक्त हैं, (धर्मों का) विभाग करने वाले हैं; वे (धर्मों के) सेवन करने वाले (भक्तवा) हैं और भवों में गमन का वमन (त्याग) कर चुके हैं, इसलिए वे 'भगवान' हैं।” ඉමිස්සා ගාථාය ච වසෙන භගවාති පදස්ස අත්ථො වත්තබ්බො. සො පනායං අත්ථො සබ්බාකාරෙන විසුද්ධිමග්ගෙ බුද්ධානුස්සතිනිද්දෙසෙ වුත්තොති. තත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බො. इस गाथा के अनुसार 'भगवान' पद का अर्थ कहना चाहिए। वह यह अर्थ सभी प्रकार से विशुद्धिमार्ग के बुद्धानुस्मृति-निर्देश में कहा गया है। वहाँ कहे गए नियम के अनुसार ही इसे समझना चाहिए। අපරො නයො – භාගවාති භගවා, භතවාති භගවා, භාගෙ වනීති භගවා, භගෙ වනීති භගවා, භත්තවාති භගවා, භගෙ වමීති භගවා, භාගෙ වමීති භගවා. दूसरा तरीका — 'भागावा' होने से भगवान हैं, 'भतवा' होने से भगवान हैं, 'भागे वनी' होने से भगवान हैं, 'भगे वनी' होने से भगवान हैं, 'भत्तवा' होने से भगवान हैं, 'भगे वमी' होने से भगवान हैं, 'भागे वमी' होने से भगवान हैं। ‘‘භාගවා භතවා භාගෙ, භගෙ ච වනි භත්තවා; භගෙ වමි තථා භාගෙ, වමීති භගවා ජිනො’’. “जिन (बुद्ध) भागावा, भतवा हैं, जिन्होंने भागों और भगों का सेवन (वनि) किया है, जो भक्तवा हैं; जिन्होंने भगों और भागों का वमन (वमी) कर दिया है, वे 'भगवान' हैं।” තත්ථ කථං භාගවාති භගවා? යෙ තෙ සීලාදයො ධම්මක්ඛන්ධා ගුණකොට්ඨාසා, තෙ අනඤ්ඤසාධාරණා නිරතිසයා තථාගතස්ස අත්ථි උපලබ්භන්ති. තථා හිස්ස සීලං, සමාධි, පඤ්ඤා, විමුත්ති, විමුත්තිඤාණදස්සනං, හිරී, ඔත්තප්පං, සද්ධා, වීරියං, සති, සම්පජඤ්ඤං, සීලවිසුද්ධි, චිත්තවිසුද්ධි, දිට්ඨිවිසුද්ධි, සමථො, විපස්සනා, තීණි කුසලමූලානි, තීණි සුචරිතානි, තයො සම්මාවිතක්කා, තිස්සො අනවජ්ජසඤ්ඤා, තිස්සො ධාතුයො, චත්තාරො සතිපට්ඨානා, චත්තාරො සම්මප්පධානා, චත්තාරො ඉද්ධිපාදා, චත්තාරො අරියමග්ගා, චත්තාරි අරියඵලානි, චතස්සො පටිසම්භිදා, චතුයොනිපරිච්ඡෙදකඤාණානි, චත්තාරො අරියවංසා, චත්තාරි වෙසාරජ්ජඤාණානි, පඤ්ච පධානියඞ්ගානි, පඤ්චඞ්ගිකො සම්මාසමාධි, පඤ්චඤාණිකො සම්මාසමාධි, පඤ්චින්ද්රියානි, පඤ්ච බලානි, පඤ්ච නිස්සාරණීයා ධාතුයො, පඤ්ච විමුත්තායතනඤාණානි, පඤ්ච විමුත්තිපරිපාචනීයා සඤ්ඤා, ඡ අනුස්සතිට්ඨානානි, ඡ ගාරවා, ඡ නිස්සාරණීයා ධාතුයො, ඡ සතතවිහාරා, ඡ අනුත්තරියානි, ඡ නිබ්බෙධභාගියා [Pg.6] සඤ්ඤා, ඡ අභිඤ්ඤා, ඡ අසාධාරණඤාණානි, සත්ත අපරිහානියා ධම්මා, සත්ත අරියධනානි, සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා, සත්ත සප්පුරිසධම්මා, සත්ත නිජ්ජරවත්ථූනි, සත්ත සඤ්ඤා, සත්ත දක්ඛිණෙය්යපුග්ගලදෙසනා, සත්ත ඛීණාසවබලදෙසනා, අට්ඨ පඤ්ඤාපටිලාභහෙතුදෙසනා, අට්ඨසම්මත්තානි, අට්ඨ ලොකධම්මාතික්කමො, අට්ඨ ආරම්භවත්ථූනි, අට්ඨ අක්ඛණදෙසනා, අට්ඨ මහාපුරිසවිතක්කා, අට්ඨ අභිභායතනදෙසනා, අට්ඨ විමොක්ඛා, නව යොනිසොමනසිකාරමූලකා ධම්මා, නව පාරිසුද්ධිපධානියඞ්ගානි, නව සත්තාවාසදෙසනා, නව ආඝාතප්පටිවිනයා, නව සඤ්ඤා, නව නානත්තා, නව අනුපුබ්බවිහාරා, දස නාථකරණා ධම්මා, දස කසිණායතනානි, දස කුසලකම්මපථා, දස සම්මත්තානි, දස අරියවාසා, දස අසෙක්ඛා ධම්මා, දස තථාගතබලානි, එකාදස මෙත්තානිසංසා, ද්වාදස ධම්මචක්කාකාරා, තෙරස ධුතගුණා, චුද්දස බුද්ධඤාණානි, පඤ්චදස විමුත්තිපරිපාචනීයා ධම්මා, සොළසවිධා ආනාපානස්සති, සොළස අපරන්තපනීයා ධම්මා, අට්ඨාරස බුද්ධධම්මා, එකූනවීසති පච්චවෙක්ඛණඤාණානි, චතුචත්තාලීස ඤාණවත්ථූනි, පඤ්ඤාස උදයබ්බයඤාණානි, පරොපණ්ණාස කුසලධම්මා, සත්තසත්තති ඤාණවත්ථූනි, චතුවීසතිකොටිසතසහස්සසමාපත්තිසඤ්චාරිමහාවජිරඤාණං, අනන්තනයසමන්තපට්ඨානපවිචයපච්චවෙක්ඛණදෙසනාඤාණානි, තථා අනන්තාසු ලොකධාතූසු අනන්තානං සත්තානං ආසයාදිවිභාවනඤාණානි චාති, එවමාදයො අනන්තා අපරිමාණභෙදා අනඤ්ඤසාධාරණා නිරතිසයා ගුණභාගා ගුණකොට්ඨාසා විජ්ජන්ති උපලබ්භන්ති. තස්මා යථාවුත්තවිභාගා ගුණභාගා අස්ස අත්ථීති භාගවාති වත්තබ්බෙ. ආකාරස්ස රස්සත්තං කත්වා ‘‘භගවා’’ති වුත්තො. එවං තාව භාගවාති භගවා. वहाँ 'भागावा' (हिस्से वाला) के रूप में 'भगवान' कैसे हैं? जो वे शील आदि धर्मस्कन्ध और गुणों के भाग हैं, वे तथागत में अनन्य-साधारण (अद्वितीय) और निरतिशय (सर्वोच्च) रूप में विद्यमान हैं। जैसे कि उनके शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति, विमुक्तिज्ञानदर्शन, ह्री (लज्जा), ओत्तप्प (भय), श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, सम्प्रजन्य, शीलविशुद्धि, चित्तविशुद्धि, दृष्टिविशुद्धि, शमथ, विपश्यना, तीन कुशलमूल, तीन सुचरित, तीन सम्यक्-वितर्क, तीन अनवद्य-संज्ञा, तीन धातु, चार स्मृतिप्रस्थान, चार सम्यक्-प्रधान, चार ऋद्धिपाद, चार आर्यमार्ग, चार आर्यफल, चार प्रतिसम्भिदा, चार योनि-परिच्छेदक ज्ञान, चार आर्यवंश, चार वैशारद्य-ज्ञान, पाँच प्रधानियंग, पंच-अंगिक सम्यक्-समाधि, पंच-ज्ञान-विषयक सम्यक्-समाधि, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच बल, पाँच निस्सरणीय धातु, पाँच विमुक्तायतन-ज्ञान, पाँच विमुक्ति-परिपचनीय संज्ञा, छह अनुस्मृति-स्थान, छह गौरव, छह निस्सरणीय धातु, छह सतत-विहार, छह अनुत्तरिय, छह निर्वेध-भागीय संज्ञा, छह अभिज्ञा, छह असाधारण ज्ञान, सात अपरिहाणीय धर्म, सात आर्यधन, सात बोध्यंग, सात सत्पुरुष-धर्म, सात निर्जरा-वस्तु, सात संज्ञा, सात दक्षिणेय-पुद्गल-देशना, सात क्षीणासव-बल-देशना, आठ प्रज्ञा-प्रतिलाभ-हेतु-देशना, आठ सम्यक्त्व, आठ लोकधर्म-अतिक्रमण, आठ आरम्भ-वस्तु, आठ अक्षण-देशना, आठ महापुरुष-वितर्क, आठ अभिभायतन-देशना, आठ विमोक्ष, नौ योनिशोमनसिकार-मूलक धर्म, नौ पारिशुद्धि-प्रधानियंग, नौ सत्त्वावास-देशना, नौ आघात-प्रतिविनय, नौ संज्ञा, नौ नानात्व, नौ अनुपूर्व-विहार, दस नाथकरण धर्म, दस कसिणायतन, दस कुशल-कर्मपथ, दस सम्यक्त्व, दस आर्यवास, दस अशैक्ष धर्म, दस तथागत-बल, ग्यारह मैत्री-अनुशंस, बारह धर्मचक्र-आकार, तेरह धुतगुण, चौदह बुद्ध-ज्ञान, पन्द्रह विमुक्ति-परिपचनीय धर्म, सोलह प्रकार की आनापानस्मृति, सोलह अपरितापनीय धर्म, अठारह बुद्ध-धर्म, उन्नीस प्रत्यवेक्षण-ज्ञान, चौवालीस ज्ञान-वस्तु, पचास उदय-व्यय-ज्ञान, पचास से अधिक कुशल धर्म, सतहत्तर ज्ञान-वस्तु, चौबीस कोटि-शत-सहस्र समापत्तियों में संचार करने वाला महावज्र-ज्ञान, अनन्त नय वाले समन्त-पट्ठान के प्रविचय और प्रत्यवेक्षण-देशना-ज्ञान, तथा अनन्त लोकधातुओं में अनन्त सत्त्वों के आशय आदि का विभावन करने वाले ज्ञान—इस प्रकार के अनन्त, अपरिमेय भेदों वाले, अनन्य-साधारण और निरतिशय गुण-भाग और गुण-अंश विद्यमान हैं। इसलिए, जैसा कहा गया है, उन गुण-भागों के होने के कारण उन्हें 'भागावा' कहना चाहिए। 'आ' कार को ह्रस्व (छोटा) करके 'भगवान' कहा गया है। इस प्रकार 'भागावा' के अर्थ में 'भगवान' हैं। ‘‘යස්මා සීලාදයො සබ්බෙ, ගුණභාගා අසෙසතො; විජ්ජන්ති සුගතෙ තස්මා, භගවාති පවුච්චති’’. चूँकि शील आदि सभी गुण-भाग सुगत में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं, इसलिए उन्हें 'भगवान' कहा जाता है। කථං භතවාති භගවා? යෙ තෙ සබ්බලොකහිතාය උස්සුක්කමාපන්නෙහි මනුස්සත්තාදිකෙ අට්ඨ ධම්මෙ සමොධානෙත්වා සම්මාසම්බොධියා කතමහාභිනීහාරෙහි මහාබොධිසත්තෙහි පරිපූරෙතබ්බා දානපාරමී, සීලනෙක්ඛම්මපඤ්ඤාවීරියඛන්තිසච්චඅධිට්ඨානමෙත්තාඋපෙක්ඛාපාරමීති දස පාරමියො, දස උපපාරමියො, දස පරමත්ථපාරමියොති සමතිංස [Pg.7] පාරමියො, දානාදීනි චත්තාරි සඞ්ගහවත්ථූනි, චත්තාරි අධිට්ඨානානි, අත්තපරිච්චාගො, නයනධනරජ්ජපුත්තදාරපරිච්චාගොති පඤ්ච මහාපරිච්චාගා, පුබ්බයොගො, පුබ්බචරියා, ධම්මක්ඛානං, ලොකත්ථචරියා, ඤාතත්ථචරියා, බුද්ධත්ථචරියාති එවමාදයො සඞ්ඛෙපතො වා පුඤ්ඤසම්භාරඤාණසම්භාරා බුද්ධකරධම්මා, තෙ මහාභිනීහාරතො පට්ඨාය කප්පානං සතසහස්සාධිකානි චත්තාරි අසඞ්ඛ්යෙය්යානි යථා හානභාගියා, සංකිලෙසභාගියා, ඨිතිභාගියා, වා න හොන්ති; අථ ඛො උත්තරුත්තරි විසෙසභාගියාව හොන්ති; එවං සක්කච්චං නිරන්තරං අනවසෙසතො භතා සම්භතා අස්ස අත්ථීති භතවාති භගවා; නිරුත්තිනයෙන තකාරස්ස ගකාරං කත්වා. අථ වා භතවාති තෙයෙව යථාවුත්තෙ බුද්ධකරධම්මෙ වුත්තනයෙන භරි සම්භරි පරිපූරෙසීති අත්ථො. එවම්පි භතවාති භගවා. 'भतवा' (धारण करने वाले) के रूप में 'भगवान' कैसे हैं? जो वे समस्त लोक के हित के लिए उत्सुक, मनुष्यत्व आदि आठ धर्मों को एकत्रित कर सम्यक्-सम्बोधन के लिए महाभिनिहार (महान संकल्प) करने वाले महाबोधिसत्त्वों द्वारा परिपूर्ण की जाने वाली दान-पारमिता, शील-नैष्क्रम्य-प्रज्ञा-वीर्य-क्षान्ति-सत्य-अधिष्ठान-मैत्री-उपेक्षा पारमिता—ये दस पारमिताएँ, दस उप-पारमिताएँ, दस परमार्थ-पारमिताएँ—इस प्रकार तीस पारमिताएँ हैं; दान आदि चार संग्रह-वस्तुएँ, चार अधिष्ठान, आत्म-परित्याग, नेत्र-धन-राज्य-पुत्र-पत्नी का परित्याग—ये पाँच महापरित्याग हैं; पूर्व-योग, पूर्व-चर्या, धर्म-आख्यान, लोक-अर्थ-चर्या, ज्ञाति-अर्थ-चर्या, बुद्ध-अर्थ-चर्या आदि संक्षेप में पुण्य-सम्भार और ज्ञान-सम्भार रूपी बुद्ध-कारक धर्म हैं, वे महाभिनिहार से लेकर चार असंख्य और एक लाख कल्पों तक इस प्रकार (पुष्ट किए गए) कि वे हीन-भागीय, संक्लेश-भागीय या स्थिति-भागीय न हों; बल्कि वे उत्तरोत्तर विशेष-भागीय ही हों; इस प्रकार आदरपूर्वक, निरन्तर और पूर्ण रूप से जिन्हें धारण (भत) और संचित (सम्भत) किया गया है, उनके होने के कारण वे 'भतवा' हैं, और वही 'भगवान' हैं; निरुक्ति के नियम से 'त' कार को 'ग' कार करके। अथवा 'भतवा' का अर्थ है कि उन्होंने उन बुद्ध-कारक धर्मों को उक्त विधि से धारण किया, संचित किया और परिपूर्ण किया। इस प्रकार भी 'भतवा' के अर्थ में 'भगवान' हैं। ‘‘යස්මා සම්බොධියා සබ්බෙ, දානපාරමිආදිකෙ; සම්භාරෙ භතවා නාථො, තස්මාපි භගවා මතො’’. चूँकि नाथ (बुद्ध) ने सम्बोधि के लिए दान-पारमिता आदि सभी सम्भारों को धारण (भत) किया है, इसलिए भी उन्हें 'भगवान' माना गया है। කථං භාගෙ වනීති භගවා? යෙ තෙ චතුවීසතිකොටිසතසහස්සසඞ්ඛා දෙවසිකං වළඤ්ජනකසමාපත්තිභාගා, තෙ අනවසෙසතො ලොකහිතත්ථං අත්තනො දිට්ඨධම්මසුඛවිහාරත්ථඤ්ච නිච්චකප්පං වනි භජි සෙවි බහුලමකාසීති භාගෙ වනීති භගවා. අථ වා අභිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු කුසලාදීසු ඛන්ධාදීසු ච යෙ තෙ පරිඤ්ඤෙය්යාදිවසෙන සඞ්ඛෙපතො වා චතුබ්බිධා අභිසමයභාගා, විත්ථාරතො පන ‘‘චක්ඛු පරිඤ්ඤෙය්යං …පෙ… ජරාමරණං පරිඤ්ඤෙය්ය’’න්තිආදිනා (පටි. ම. 1.21) අනෙකෙ පරිඤ්ඤෙය්යභාගා, ‘‘චක්ඛුස්ස සමුදයො පහාතබ්බො…පෙ… ජරාමරණස්ස සමුදයො පහාතබ්බො’’තිආදිනා පහාතබ්බභාගා, ‘‘චක්ඛුස්ස නිරොධො සච්ඡිකාතබ්බො…පෙ… ජරාමරණස්ස නිරොධො සච්ඡිකාතබ්බො’’තිආදිනා සච්ඡිකාතබ්බභාගා, ‘‘චක්ඛුනිරොධගාමිනීපටිපදා භාවෙතබ්බා…පෙ… චත්තාරො සතිපට්ඨානා භාවෙතබ්බා’’තිආදිනා ච අනෙකභෙදා භාවෙතබ්බභාගා ච ධම්මා, තෙ සබ්බෙ වනි භජි යථාරහං ගොචරභාවනාසෙවනානං වසෙන සෙවි. එවම්පි භාගෙ වනීති භගවා. අථ වා යෙ ඉමෙ සීලාදයො ධම්මක්ඛන්ධා සාවකෙහි සාධාරණා ගුණකොට්ඨාසා ගුණභාගා, කින්ති නු ඛො තෙ වෙනෙය්යසන්තානෙසු පතිට්ඨපෙය්යන්ති මහාකරුණාය වනි අභිපත්ථයි. සා [Pg.8] චස්ස අභිපත්ථනා යථාධිප්පෙතඵලාවහා අහොසි. එවම්පි භාගෙ වනීති භගවා. भगवान् 'भागों' का सेवन करने वाले कैसे हैं? जो वे चौबीस लाख करोड़ की संख्या वाले प्रतिदिन सेवन किए जाने वाले समापत्ति-भाग हैं, उन सबका उन्होंने लोक-कल्याण के लिए और अपने दृष्टधर्म-सुख-विहार के लिए निरंतर सेवन किया, भजन किया, अभ्यास किया और उन्हें बहुलीकृत किया; इसलिए 'भागों' का सेवन करने के कारण वे 'भगवान्' हैं। अथवा, अभिज्ञेय धर्मों (कुशल आदि और स्कन्ध आदि) में जो संक्षेप में चार प्रकार के अभिसमय-भाग हैं, और विस्तार से 'चक्षु परिज्ञेय है... बुढ़ापा और मृत्यु परिज्ञेय है' इत्यादि रूप में अनेक परिज्ञेय-भाग हैं; 'चक्षु का समुदय प्रहातव्य है... बुढ़ापा और मृत्यु का समुदय प्रहातव्य है' इत्यादि रूप में प्रहातव्य-भाग हैं; 'चक्षु का निरोध साक्षात्करणीय है... बुढ़ापा और मृत्यु का निरोध साक्षात्करणीय है' इत्यादि रूप में साक्षात्करणीय-भाग हैं; और 'चक्षु-निरोध-गामिनी प्रतिपदा भावनीय है... चार स्मृतिप्रस्थान भावनीय हैं' इत्यादि रूप में अनेक प्रकार के भावनीय-भाग रूपी धर्म हैं, उन सबका उन्होंने यथायोग्य गोचर, भावना और सेवन के वश से सेवन किया और भजन किया। इस प्रकार भी 'भागों' का सेवन करने के कारण वे 'भगवान्' हैं। अथवा, जो ये शील आदि धर्मस्कन्ध हैं, जो श्रावकों के साथ साझा गुण-अंश या गुण-भाग हैं, 'वे विनेय जनों की सन्तानों में कैसे प्रतिष्ठित हों'—ऐसी महाकरुणा से उन्होंने उनकी इच्छा की। और उनकी वह इच्छा इच्छित फल को देने वाली हुई। इस प्रकार भी 'भागों' की इच्छा करने के कारण वे 'भगवान्' हैं। ‘‘යස්මා ඤෙය්යසමාපත්ති-ගුණභාගෙ තථාගතො; භජි පත්ථයි සත්තානං, හිතාය භගවා තතො’’. चूँकि तथागत ने प्राणियों के हित के लिए ज्ञेय, समापत्ति और गुणों के भागों का सेवन किया और उनकी इच्छा की, इसलिए वे 'भगवान्' कहे जाते हैं। කථං භගෙ වනීති භගවා? සමාසතො තාව කතපුඤ්ඤෙහි පයොගසම්පන්නෙහි යථාවිභවං භජීයන්තීති භගා, ලොකියලොකුත්තරා සම්පත්තියො. තත්ථ ලොකියෙ තාව තථාගතො සම්බොධිතො පුබ්බෙ බොධිසත්තභූතො පරමුක්කංසගතෙ වනි භජි සෙවි, යත්ථ පතිට්ඨාය නිරවසෙසතො බුද්ධකරධම්මෙ සමන්නානෙන්තො බුද්ධධම්මෙ පරිපාචෙසි. බුද්ධභූතො පන තෙ නිරවජ්ජසුඛූපසංහිතෙ අනඤ්ඤසාධාරණෙ ලොකුත්තරෙපි වනි භජි සෙවි. විත්ථාරතො පන පදෙසරජ්ජඉස්සරියචක්කවත්තිසම්පත්තිදෙවරජ්ජසම්පත්තිආදිවසෙන ඣානවිමොක්ඛසමාධිසමාපත්තිඤාණදස්සනමග්ගභාවනාඵල- සච්ඡිකිරියාදිඋත්තරිමනුස්සධම්මවසෙන ච අනෙකවිහිතෙ අනඤ්ඤසාධාරණෙ භගෙ වනි භජි සෙවි. එවං භගෙ වනීති භගවා. भगवान् 'भग' (ऐश्वर्य) का सेवन करने वाले कैसे हैं? संक्षेप में, कृतपुण्य और उद्योग-सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा अपनी सामर्थ्य के अनुसार जिनका सेवन किया जाता है, वे लौकिक और लोकोत्तर सम्पत्तियाँ 'भग' कहलाती हैं। उनमें से लौकिक सम्पत्तियों का तथागत ने सम्बोधि से पूर्व बोधिसत्त्व अवस्था में परम उत्कर्ष के साथ सेवन किया, भजन किया और अभ्यास किया, जिनमें प्रतिष्ठित होकर उन्होंने बिना किसी शेष के बुद्धकारक धर्मों का सम्पादन करते हुए बुद्ध-धर्मों को परिपक्व किया। बुद्ध होने के बाद, उन्होंने उन निर्दोष सुख से युक्त और अन्यों के लिए असाधारण लोकोत्तर (भगों) का भी सेवन और भजन किया। विस्तार से, प्रादेशिक राज्य, ऐश्वर्य, चक्रवर्ती सम्पत्ति, देवराज सम्पत्ति आदि के रूप में, तथा ध्यान, विमोक्ष, समाधि, समापत्ति, ज्ञान-दर्शन, मार्ग-भावना और फल-साक्षात्कार आदि उत्तर-मनुष्य धर्मों के रूप में अनेक प्रकार के असाधारण 'भगों' का उन्होंने सेवन और भजन किया। इस प्रकार 'भग' का सेवन करने के कारण वे 'भगवान्' हैं। ‘‘යා තා සම්පත්තියො ලොකෙ, යා ච ලොකුත්තරා පුථූ; සබ්බා තා භජි සම්බුද්ධො, තස්මාපි භගවා මතො’’. लोक में जो भी सम्पत्तियाँ हैं और जो अनेक लोकोत्तर सम्पत्तियाँ हैं, सम्यक्सम्बुद्ध ने उन सबका सेवन किया, इसलिए भी वे 'भगवान्' माने जाते हैं। කථං භත්තවාති භගවා? භත්තා දළ්හභත්තිකා අස්ස බහූ අත්ථීති භගවා. තථාගතො හි මහාකරුණාසබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණාදිඅපරිමිතනිරුපමප්පභාවගුණවිසෙසසමඞ්ගිභාවතො සබ්බසත්තුත්තමො, සබ්බානත්ථපරිහාරපුබ්බඞ්ගමාය නිරවසෙසහිතසුඛවිධානතප්පරාය නිරතිසයාය පයොගසම්පත්තියා සදෙවමනුස්සාය පජාය අච්චන්තූපකාරිතාය ද්වත්තිංසමහාපුරිසලක්ඛණඅසීතිඅනුබ්යඤ්ජනබ්යාමප්පභාදි- අනඤ්ඤසාධාරණගුණවිසෙසපටිමණ්ඩිතරූපකායතාය, යථාභුච්චගුණාධිගතෙන ‘‘ඉතිපි සො භගවා’’තිආදිනයප්පවත්තෙන ලොකත්තයබ්යාපිනා සුවිපුලෙන සුවිසුද්ධෙන ච ථුතිඝොසෙන සමන්නාගතත්තා උක්කංසපාරමිප්පත්තාසු අප්පිච්ඡතාසන්තුට්ඨිතාදීසු සුප්පතිට්ඨිතභාවතො දසබලචතුවෙසාරජ්ජාදිනිරතිසයගුණවිසෙසසමඞ්ගිභාවතො ච රූපප්පමාණො රූපප්පසන්නො, ඝොසප්පමාණො ඝොසප්පසන්නො, ලූඛප්පමාණො ලූඛප්පසන්නො, ධම්මප්පමාණො ධම්මප්පසන්නොති [Pg.9] එවං චතුප්පමාණිකෙ ලොකසන්නිවාසෙ සබ්බථාපි පසාදාවහභාවෙන සමන්තපාසාදිකත්තා අපරිමාණානං සත්තානං සදෙවමනුස්සානං ආදරබහුමානගාරවායතනතාය පරමපෙමසම්භත්තිට්ඨානං. යෙ ච තස්ස ඔවාදෙ පතිට්ඨිතා අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගතා හොන්ති, කෙනචි අසංහාරියා තෙසං සම්භත්ති සමණෙන වා බ්රාහ්මණෙන වා දෙවෙන වා මාරෙන වා බ්රහ්මුනා වා. තථා හි තෙ අත්තනො ජීවිතපරිච්චාගෙපි තත්ථ පසාදං න පරිච්චජන්ති, තස්ස වා ආණං දළ්හභත්තිභාවතො. තෙනෙවාහ – भगवान् 'भक्तवान्' (भक्तों वाले) कैसे हैं? जिनके बहुत से 'भक्त' (दृढ़ भक्ति वाले) हों, वे 'भगवान्' हैं। तथागत महाकरुणा और सर्वज्ञता-ज्ञान आदि अपरिमित और अनुपम प्रभाव वाले विशेष गुणों से युक्त होने के कारण सभी प्राणियों में उत्तम हैं। वे सभी अनर्थों के परिहार को प्रमुख रखते हुए, सम्पूर्ण हित और सुख के विधान में तत्पर, निरतिशय उद्योग-सम्पत्ति के द्वारा देवों और मनुष्यों सहित प्रजा के लिए अत्यन्त उपकारी हैं। उनका रूप-काय बत्तीस महापुरुष लक्षणों, अस्सी अनुव्यंजनों और व्याम-प्रभा आदि असाधारण विशेष गुणों से अलंकृत है। वे यथार्थ गुणों से प्राप्त 'इतिपि सो भगवा' इत्यादि विधि से प्रवृत्त, तीनों लोकों में व्याप्त, अत्यन्त विशाल और परम शुद्ध स्तुति-घोष से युक्त हैं। वे उत्कर्ष की पारमिताओं को प्राप्त अल्पेच्छता और सन्तुष्टि आदि गुणों में सुप्रतिष्ठित होने के कारण तथा दस बल और चार वैशारद्य आदि निरतिशय विशेष गुणों से युक्त होने के कारण 'रूप-प्रमाण' के लिए रूप-प्रसन्न, 'घोष-प्रमाण' के लिए घोष-प्रसन्न, 'लूख-प्रमाण' के लिए लूख-प्रसन्न और 'धर्म-प्रमाण' के लिए धर्म-प्रसन्न हैं। इस प्रकार चार प्रकार के प्रमाणों वाले संसार में सर्वथा प्रसन्नता लाने वाले होने के कारण वे 'समन्तप्रासादिक' हैं। वे देवों और मनुष्यों सहित असंख्य प्राणियों के लिए आदर, बहुमान और गौरव के स्थान होने के कारण परम प्रेम और भक्ति के पात्र हैं। जो उनके उपदेश में प्रतिष्ठित हैं और अचल श्रद्धा (अवेच्च-प्रसाद) से युक्त हैं, उनकी वह भक्ति किसी भी श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार या ब्रह्मा द्वारा विचलित नहीं की जा सकती। वे अपने प्राणों के त्याग की स्थिति में भी उन (बुद्ध) के प्रति श्रद्धा या उनकी आज्ञा का त्याग नहीं करते, क्योंकि उनकी भक्ति दृढ़ है। इसीलिए कहा गया है— ‘‘යො වෙ කතඤ්ඤූ කතවෙදි ධීරො; කල්යාණමිත්තො දළ්හභත්ති ච හොතී’’ති. (ජා. 2.17.78); जो कृतज्ञ, कृतवेदी, धीर, कल्याणमित्र और दृढ़ भक्ति वाला होता है। ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, මහාසමුද්දො ඨිතධම්මො වෙලං නාතිවත්තති; එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යං මයා සාවකානං සික්ඛාපදං පඤ්ඤත්තං, තං මම සාවකා ජීවිතහෙතුපි නාතික්කමන්තී’’ති (අ. නි. 8.20; උදා. 45; චූළව. 385) ච. जैसे, भिक्षुओं! महासमुद्र स्थिर स्वभाव वाला होता है और अपनी मर्यादा को नहीं लाँघता; वैसे ही, भिक्षुओं! मेरे द्वारा श्रावकों के लिए जो शिक्षापद प्रज्ञप्त किए गए हैं, मेरे श्रावक प्राणों के संकट में भी उनका उल्लंघन नहीं करते। එවං භත්තවාති භගවා නිරුත්තිනයෙන එකස්ස තකාරස්ස ලොපං කත්වා ඉතරස්ස ගකාරං කත්වා. इस प्रकार, निरुक्ति की विधि से एक 'त' कार का लोप करके और दूसरे को 'ग' कार में बदलकर वे 'भक्तवान्' होने के कारण 'भगवान्' हैं। ‘‘ගුණාතිසයයුත්තස්ස, යස්මා ලොකහිතෙසිනො; සම්භත්තා බහවො සත්ථු, භගවා තෙන වුච්චතී’’ති. चूँकि गुणों के अतिशय से युक्त और लोक-हितैषी शास्ता के बहुत से भक्त हैं, इसलिए वे 'भगवान्' कहे जाते हैं। කථං භගෙ වමීති භගවා? යස්මා තථාගතො බොධිසත්තභූතොපි පුරිමාසු ජාතීසු පාරමියො පූරෙන්තො භගසඞ්ඛාතං සිරිං ඉස්සරියං යසඤ්ච වමි උග්ගිරි ඛෙළපිණ්ඩං විය අනපෙක්ඛො ඡඩ්ඩයි. තථා හිස්ස සොමනස්සකුමාරකාලෙ, හත්ථිපාලකුමාරකාලෙ, අයොඝරපණ්ඩිතකාලෙ, මූගපක්ඛපණ්ඩිතකාලෙ, චූළසුතසොමකාලෙති එවමාදීසු නෙක්ඛම්මපාරමිපූරණවසෙන දෙවරජ්ජසදිසාය රජ්ජසිරියා පරිච්චත්තත්තභාවානං පරිමාණං නත්ථි. චරිමත්තභාවෙපි හත්ථගතං චක්කවත්තිසිරිං දෙවලොකාධිපච්චසදිසං චතුද්දීපිස්සරියං චක්කවත්තිසම්පත්තිසන්නිස්සයං සත්තරතනසමුජ්ජලං යසඤ්ච තිණායපි අමඤ්ඤමානො නිරපෙක්ඛො පහාය අභිනික්ඛමිත්වා සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො. තස්මා ඉමෙ සිරිආදිකෙ භගෙ වමීති භගවා. අථ වා භානි නාම නක්ඛත්තානි, තෙහි සමං ගච්ඡන්ති පවත්තන්තීති භගා[Pg.10], සිනෙරුයුගන්ධරඋත්තරකුරුහිමවන්තාදිභාජනලොකවිසෙසසන්නිස්සයා සොභා කප්පට්ඨිතියභාවතො. තෙපි භගවා වමි තංනිවාසිසත්තාවාසසමතික්කමනතොතප්පටිබද්ධඡන්දරාගප්පහානෙන පජහීති. එවම්පි භගෙ වමීති භගවා. 'भगवान्' शब्द की व्याख्या 'भगे वमी' (ऐश्वर्यों को वमन करने वाले) के रूप में कैसे की जाती है? क्योंकि तथागत ने बोधिसत्व रहते हुए भी पिछली योनियों में पारमिताओं को पूर्ण करते हुए ऐश्वर्य, ईश्वरीय शक्ति और यश को थूक के समान बिना किसी आसक्ति के त्याग दिया था। जैसे सोमनास कुमार, हत्थिपाल कुमार, अयोग्घर पण्डित, मूगपक्ख पण्डित, चुलसुतसोम कुमार आदि के समय में नैष्क्रम्य पारमिता पूर्ण करने के लिए देवराज के समान राज्य-लक्ष्मी का त्याग करने वाले उनके आत्मभावों की कोई सीमा नहीं है। अंतिम जन्म में भी हाथ में आई चक्रवर्ती लक्ष्मी, जो देवलोक के आधिपत्य के समान थी, चारों द्वीपों का ऐश्वर्य, चक्रवर्ती संपत्ति का आधार और सात रत्नों से प्रज्वलित यश को तिनके के समान मानकर, बिना किसी आसक्ति के छोड़कर, अभिनिष्क्रमण कर सम्यक्सम्बुद्धि प्राप्त की। इसलिए इन श्री आदि ऐश्वर्यों (भगे) को वमन करने के कारण वे 'भगवान्' हैं। अथवा 'भा' नक्षत्रों के नाम हैं, उनके साथ जो चलते हैं वे 'भग' कहलाते हैं, जो सिनेरु, युगन्धर, उत्तरकुरु, हिमवन्त आदि भाजन-लोक के विशेष आश्रय वाली शोभा है क्योंकि वह कल्प भर स्थित रहती है। भगवान् ने उन्हें भी वमन कर दिया, वहाँ रहने वाले सत्त्वों के आवासों का अतिक्रमण करने से और उनसे संबंधित छन्द-राग के प्रहाण से उन्हें त्याग दिया। इस प्रकार भी 'भगे वमी' होने से वे 'भगवान्' हैं। ‘‘චක්කවත්තිසිරිං යස්මා, යසං ඉස්සරියං සුඛං; පහාසි ලොකචිත්තඤ්ච, සුගතො භගවා තතො’’. 'चक्रवर्ती लक्ष्मी, यश, ऐश्वर्य और सुख को क्योंकि उन्होंने त्याग दिया और लोक-चित्त को भी, इसलिए सुगत 'भगवान्' हैं।' කථං භාගෙ වමීති භගවා? භාගා නාම කොට්ඨාසා. තෙ ඛන්ධායතනධාතාදිවසෙන, තත්ථාපි රූපවෙදනාදිවසෙන, අතීතාදිවසෙන ච අනෙකවිධා. තෙ ච භගවා සබ්බං පපඤ්චං, සබ්බං යොගං, සබ්බං ගන්ථං, සබ්බං සංයොජනං, සමුච්ඡින්දිත්වා අමතධාතුං සමධිගච්ඡන්තො වමි උග්ගිරි අනපෙක්ඛො ඡඩ්ඩයි, න පච්චාගමි. තථා හෙස සබ්බත්ථකමෙව පථවිං, ආපං, තෙජං, වායං, චක්ඛුං, සොතං, ඝානං, ජීව්හං, කායං, මනං, රූපෙ, සද්දෙ, ගන්ධෙ, රසෙ, ඵොට්ඨබ්බෙ, ධම්මෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනොවිඤ්ඤාණං, චක්ඛුසම්ඵස්සං …පෙ… මනොසම්ඵස්සං, චක්ඛුසම්ඵස්සජං වෙදනං…පෙ… මනොසම්ඵස්සජං වෙදනං, චක්ඛුසම්ඵස්සජං සඤ්ඤං…පෙ… මනොසම්ඵස්සජං සඤ්ඤං; චක්ඛුසම්ඵස්සජං චෙතනං…පෙ… මනොසම්ඵස්සජං චෙතනං; රූපතණ්හං …පෙ… ධම්මතණ්හං; රූපවිතක්කං…පෙ… ධම්මවිතක්කං; රූපවිචාරං…පෙ… ධම්මවිචාරන්තිආදිනා අනුපදධම්මවිභාගවසෙනපි සබ්බෙව ධම්මකොට්ඨාසෙ අනවසෙසතො වමි උග්ගිරි අනපෙක්ඛපරිච්චාගෙන ඡඩ්ඩයි. වුත්තඤ්හෙතං – 'भगवान्' शब्द की व्याख्या 'भागे वमी' (भागों को वमन करने वाले) के रूप में कैसे की जाती है? 'भाग' का अर्थ है हिस्से या विभाग। वे स्कन्ध, आयतन, धातु आदि के भेद से, और उनमें भी रूप, वेदना आदि के भेद से, तथा अतीत आदि के भेद से अनेक प्रकार के हैं। भगवान् ने उन सभी प्रपंचों, सभी योगों, सभी ग्रन्थों, सभी संयोजनों को समूल काटकर अमृत धातु (निर्वाण) को प्राप्त करते हुए उन्हें वमन कर दिया, उगल दिया, बिना आसक्ति के छोड़ दिया और पुनः उनकी ओर नहीं लौटे। उन्होंने सर्वत्र ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय, मन, रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श, धर्म, चक्षु-विज्ञान... पे... मनो-विज्ञान, चक्षु-स्पर्श... पे... मनो-स्पर्श, चक्षु-स्पर्श से उत्पन्न वेदना... पे... मनो-स्पर्श से उत्पन्न वेदना, चक्षु-स्पर्श से उत्पन्न संज्ञा... पे... मनो-स्पर्श से उत्पन्न संज्ञा, चक्षु-स्पर्श से उत्पन्न चेतना... पे... मनो-स्पर्श से उत्पन्न चेतना, रूप-तृष्णा... पे... धर्म-तृष्णा, रूप-वितर्क... पे... धर्म-वितर्क, रूप-विचार... पे... धर्म-विचार आदि अनुपद-धर्म-विभाजन के अनुसार भी सभी धर्म-भागों को पूर्णतः वमन कर दिया, उगल दिया और बिना आसक्ति के त्याग दिया। जैसा कि कहा गया है— ‘‘යං තං, ආනන්ද, චත්තං වන්තං මුත්තං පහීනං පටිනිස්සට්ඨං, තං තථාගතො පුන පච්චාගමිස්සතීති නෙතං ඨානං විජ්ජතී’’ති. (දී. නි. 2.183) – 'आनन्द! जो वह त्यक्त है, वमन किया हुआ है, मुक्त है, प्रहीण है, प्रतिनिसृष्ट (छोड़ा हुआ) है, उसे तथागत पुनः ग्रहण करेंगे—यह संभव नहीं है।' එවම්පි භාගෙ වමීති භගවා. අථ වා භාගෙ වමීති සබ්බෙපි කුසලාකුසලෙ සාවජ්ජානවජ්ජෙ හීනප්පණීතෙ කණ්හසුක්කසප්පටිභාගෙ ධම්මෙ අරියමග්ගඤාණමුඛෙන වමි උග්ගිරි අනපෙක්ඛො පරිච්චජි පජහි, පරෙසඤ්ච තථත්තාය ධම්මං දෙසෙසි. වුත්තම්පි චෙතං – इस प्रकार भी 'भागे वमी' होने से वे 'भगवान्' हैं। अथवा 'भागे वमी' का अर्थ है कि सभी कुशल-अकुशल, सावद्य-अनवद्य (दोषयुक्त-दोषरहित), हीन-प्रणीत, कृष्ण-शुक्ल के समान प्रतिपक्षी धर्मों को आर्यमार्ग-ज्ञान के मुख से वमन कर दिया, उगल दिया, बिना आसक्ति के त्याग दिया, छोड़ दिया और दूसरों को भी वैसा ही करने के लिए धर्म का उपदेश दिया। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ධම්මාපි වො, භික්ඛවෙ, පහාතබ්බා පගෙව අධම්මා, කුල්ලූපමං, වො භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි, නිත්ථරණත්ථාය නො ගහණත්ථායා’’තිආදි. (ම. නි. 1.240) – 'भिक्षुओं! तुम्हें धर्मों (अच्छी अवस्थाओं) को भी छोड़ना होगा, अधर्मों (बुरी अवस्थाओं) की तो बात ही क्या! भिक्षुओं! मैं तुम्हें बेड़े (नाव) के समान धर्म का उपदेश दूँगा, जो पार उतरने के लिए है, पकड़े रहने के लिए नहीं।' එවම්පි [Pg.11] භාගෙ වමීති භගවා. इस प्रकार भी 'भागे वमी' होने से वे 'भगवान्' हैं। ‘‘ඛන්ධායතනධාතාදි-ධම්මභෙදා මහෙසිනා; කණ්හසුක්කා යතො වන්තා, තතොපි භගවා මතො’’. 'चूँकि महर्षि द्वारा स्कन्ध, आयतन, धातु आदि धर्म-भेद और कृष्ण-शुक्ल (धर्म) वमन कर दिए गए हैं, इसलिए भी वे 'भगवान्' माने जाते हैं।' තෙන වුත්තං – इसलिए कहा गया है— ‘‘භාගවා භතවා භාගෙ, භගෙ ච වනි භත්තවා; භගෙ වමි තථා භාගෙ, වමීති භගවා ජිනො’’ති. 'वे भाग्यवान हैं, (गुणों के) धारक हैं, भागों और ऐश्वर्यों के विभाजक हैं; उन्होंने ऐश्वर्यों और भागों को वमन कर दिया है, इसलिए वे विजेता भगवान् हैं।' තෙන භගවතා. අරහතාති කිලෙසෙහි ආරකත්තා, අනවසෙසානං වා කිලෙසාරීනං හතත්තා, සංසාරචක්කස්ස වා අරානං හතත්තා, පච්චයාදීනං අරහත්තා, පාපකරණෙ රහාභාවාති ඉමෙහි කාරණෙහි අරහතා. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො. විත්ථාරො පන විසුද්ධිමග්ගෙ වුත්තනයෙන වෙදිතබ්බො. उन भगवान् के द्वारा। 'अरिहन्त' (अराहता) इसलिए हैं क्योंकि वे क्लेशों से दूर हैं, अथवा समस्त क्लेश-रूपी शत्रुओं का हनन करने के कारण, अथवा संसार-चक्र के अरों (तीलियों) को नष्ट करने के कारण, अथवा प्रत्यय (दान) आदि के योग्य होने के कारण, अथवा पाप करने में एकान्त (रहस्य) का अभाव होने के कारण—इन कारणों से वे अरिहन्त हैं। यहाँ यह संक्षेप है। विस्तार तो विशुद्धिमार्ग में बताए गए तरीके से जानना चाहिए। එත්ථ ච භගවතාති ඉමිනාස්ස භාග්යවන්තතාදීපනෙන කප්පානං අනෙකෙසු අසඞ්ඛ්යෙය්යෙසු උපචිතපුඤ්ඤසම්භාරභාවතො සතපුඤ්ඤලක්ඛණධරස්ස ද්වත්තිංසමහාපුරිසලක්ඛණඅසීතිඅනුබ්යඤ්ජන- බ්යාමප්පභාකෙතුමාලාදිපටිමණ්ඩිතා අනඤ්ඤසාධාරණා රූපකායසම්පත්තිදීපිතා හොති. අරහතාති ඉමිනාස්ස අනවසෙසකිලෙසප්පහානදීපනෙන ආසවක්ඛයපදට්ඨානසබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණාධිගමපරිදීපනතො දසබලචතුවෙසාරජ්ජඡඅසාධාරණඤාණඅට්ඨාරසාවෙණිකබුද්ධධම්මාදි- අචින්තෙය්යාපරිමෙය්යධම්මකායසම්පත්ති දීපිතා හොති. තදුභයෙනපි ලොකියසරික්ඛකානං බහුමතභාවො, ගහට්ඨපබ්බජිතෙහි අභිගමනීයතා, තථා අභිගතානඤ්ච තෙසං කායිකචෙතසිකදුක්ඛාපනයනෙ පටිබලභාවො, ආමිසදානධම්මදානෙහි උපකාරිතා, ලොකියලොකුත්තරෙහි ගුණෙහි සංයොජනසමත්ථතා ච පකාසිතා හොති. यहाँ 'भगवता' (भगवान् के द्वारा) इस शब्द से उनकी भाग्यवत्ता को दर्शाने के कारण, अनेक असंख्य कल्पों में संचित पुण्य-सम्भार होने से, सौ पुण्यों के लक्षणों को धारण करने वाले, बत्तीस महापुरुष लक्षणों, अस्सी अनुव्यंजनों, व्यामप्रभा और केतुमाला आदि से अलंकृत, असाधारण रूप-काय की सम्पत्ति प्रदर्शित होती है। 'अराहता' (अरिहन्त के द्वारा) इस शब्द से उनके समस्त क्लेशों के प्रहाण को दर्शाने के कारण, आस्रवों के क्षय को आधार बनाकर सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति को सूचित करने से, दस बल, चार वैशारद्य, छह असाधारण ज्ञान, अठारह आवेणिक बुद्ध-धर्म आदि अचिन्त्य और अपरिमेय धर्म-काय की सम्पत्ति प्रदर्शित होती है। इन दोनों के द्वारा लौकिक जनों के लिए उनके आदरणीय होने का भाव, गृहस्थों और प्रव्रजितों द्वारा उनके पास जाने की योग्यता, और उनके पास आए हुए लोगों के कायिक और चैतसिक दुखों को दूर करने में उनकी सामर्थ्य, आमिष-दान और धर्म-दान द्वारा उपकारिता, तथा लौकिक और लोकोत्तर गुणों से जोड़ने की क्षमता प्रकाशित होती है। තථා භගවතාති ඉමිනා චරණධම්මෙසු මුද්ධභූතදිබ්බවිහාරාදිවිහාරවිසෙසසමායොගපරිදීපනෙන චරණසම්පදා දීපිතා හොති. අරහතාති ඉමිනා සබ්බවිජ්ජාසු සිඛාප්පත්තආසවක්ඛයඤාණාධිගමපරිදීපනෙන විජ්ජාසම්පදා දීපිතා හොති. පුරිමෙන වා අන්තරායිකනිය්යානිකධම්මානං අවිපරීතවිභත්තභාවදීපනෙන පච්ඡිමවෙසාරජ්ජද්වයසමායොගො, පච්ඡිමෙන සවාසනනිරවසෙසකිලෙසප්පහානදීපනෙන [Pg.12] පුරිමවෙසාරජ්ජද්වයසමායොගො විභාවිතො හොති. उसी प्रकार 'भगवा' इस पद के द्वारा चरण-धर्मों में श्रेष्ठ दिव्य-विहार आदि विशेष विहारों के संयोग को प्रकाशित करने से चरण-सम्पदा प्रकाशित होती है। 'अरहं' इस पद के द्वारा समस्त विद्याओं में शिखर पर पहुँचे हुए आस्रवक्षय-ज्ञान की प्राप्ति को प्रकाशित करने से विद्या-सम्पदा प्रकाशित होती है। अथवा, पूर्व पद के द्वारा अन्तरायिक और नैर्याणिक धर्मों के अविपरीत विभाग के भाव को प्रकाशित करने से बाद के दो वैशारद्य का संयोग, और बाद के पद के द्वारा वासना सहित समस्त क्लेशों के प्रहाण को प्रकाशित करने से पूर्व के दो वैशारद्य का संयोग स्पष्ट होता है। තථා පුරිමෙන තථාගතස්ස පටිඤ්ඤාසච්චවචීසච්චඤාණසච්චපරිදීපනෙන, කාමගුණලොකියාධිපච්චයසලාභසක්කාරාදිපරිච්චාගපරිදීපනෙන, අනවසෙසකිලෙසාභිසඞ්ඛාරපරිච්චාගපරිදීපනෙන, ච සච්චාධිට්ඨානචාගාධිට්ඨානපාරිපූරි පකාසිතා හොති; දුතියෙන සබ්බසඞ්ඛාරූපසමසමධිගමපරිදීපනෙන, සම්මාසම්බොධිපරිදීපනෙන ච, උපසමාධිට්ඨානපඤ්ඤාධිට්ඨානපාරිපූරි පකාසිතා හොති. තථා හි භගවතො බොධිසත්තභූතස්ස ලොකුත්තරගුණෙ කතාභිනීහාරස්ස මහාකරුණායොගෙන යථාපටිඤ්ඤං සබ්බපාරමිතානුට්ඨානෙන සච්චාධිට්ඨානං, පාරමිතාපටිපක්ඛපරිච්චාගෙන චාගාධිට්ඨානං, පාරමිතාගුණෙහි චිත්තවූපසමෙන උපසමාධිට්ඨානං, පාරමිතාහි එව පරහිතූපායකොසල්ලතො පඤ්ඤාධිට්ඨානං පාරිපූරිගතං. उसी प्रकार पूर्व पद के द्वारा तथागत की प्रतिज्ञा-सत्य, वचन-सत्य और ज्ञान-सत्य के प्रकाशन से, तथा कामगुण, लौकिक आधिपत्य, लाभ-सत्कार आदि के परित्याग के प्रकाशन से, और अवशेषरहित क्लेशों एवं अभिसंस्कारों के परित्याग के प्रकाशन से सत्याधिष्ठान और त्यागाधिष्ठान की परिपूर्णता प्रकाशित होती है; दूसरे पद के द्वारा समस्त संस्कारों के उपशम की प्राप्ति के प्रकाशन से और सम्यक्सम्बोध के प्रकाशन से उपशमाधिष्ठान और प्रज्ञाधिष्ठान की परिपूर्णता प्रकाशित होती है। क्योंकि भगवान् जब बोधिसत्व थे और लोकोत्तर गुणों के लिए संकल्पित थे, तब महाकरुणा के योग से प्रतिज्ञा के अनुसार समस्त पारमिताओं के अनुष्ठान से सत्याधिष्ठान, पारमिताओं के प्रतिपक्ष के परित्याग से त्यागाधिष्ठान, पारमिता-गुणों के द्वारा चित्त के उपशम से उपशमाधिष्ठान, और पारमिताओं के द्वारा ही परहित के उपाय-कौशल से प्रज्ञाधिष्ठान परिपूर्णता को प्राप्त हुआ। තථා ‘යාචකජනං අවිසංවාදෙත්වා දස්සාමී’ති පටිජානනෙන පටිඤ්ඤං අවිසංවාදෙත්වා දානෙන ච සච්චාධිට්ඨානං, දෙය්යපරිච්චාගතො චාගාධිට්ඨානං, දෙය්යපටිග්ගාහකදානදෙය්යපරික්ඛයෙසු ලොභදොසමොහභයවූපසමෙන උපසමාධිට්ඨානං, යථාරහං යථාකාලං යථාවිධි ච දානෙන පඤ්ඤුත්තරතාය ච පඤ්ඤාධිට්ඨානං පාරිපූරිගතං. ඉමිනා නයෙන සෙසපාරමීසුපි චතුරාධිට්ඨානපාරිපූරි වෙදිතබ්බා. සබ්බා හි පාරමියො සච්චප්පභාවිතා චාගාභිබ්යඤ්ජිතා උපසමානුබ්රූහිතා පඤ්ඤාපරිසුද්ධාති එවං චතුරාධිට්ඨානසමුදාගතස්ස තථාගතස්ස සච්චාධිට්ඨානං සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සීලවිසුද්ධි, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන ආජීවවිසුද්ධි, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන චිත්තවිසුද්ධි, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන දිට්ඨිවිසුද්ධි. තථා සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙනස්ස සංවාසෙන සීලං වෙදිතබ්බං, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සංවොහාරෙන සොචෙය්යං වෙදිතබ්බං, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන ආපදාසු ථාමො වෙදිතබ්බො, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සාකච්ඡාය පඤ්ඤා වෙදිතබ්බා. उसी प्रकार 'याचक जनों को बिना विमुख किए दूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके, प्रतिज्ञा को बिना तोड़े दान देने से सत्याधिष्ठान, देय वस्तु के परित्याग से त्यागाधिष्ठान, देय वस्तु, प्रतिग्राहक, दान और देय वस्तु के क्षय होने पर लोभ, द्वेष, मोह और भय के उपशम से उपशमाधिष्ठान, तथा यथायोग्य, यथाकाल और यथाविधि दान देने से एवं प्रज्ञा की श्रेष्ठता से प्रज्ञाधिष्ठान परिपूर्णता को प्राप्त हुआ। इसी पद्धति से शेष पारमिताओं में भी चारों अधिष्ठानों की परिपूर्णता जाननी चाहिए। क्योंकि सभी पारमिताएँ सत्य से प्रभावित, त्याग से अभिव्यक्त, उपशम से संवर्धित और प्रज्ञा से परिशुद्ध होती हैं; इस प्रकार चारों अधिष्ठानों से युक्त तथागत का सत्याधिष्ठान के समुदाय से शील-विशुद्धि, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से आजीव-विशुद्धि, उपशमाधिष्ठान के समुदाय से चित्त-विशुद्धि और प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से दृष्टि-विशुद्धि होती है। उसी प्रकार सत्याधिष्ठान के समुदाय से उनके साथ रहने से शील जानना चाहिए, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से व्यवहार से शुचिता जाननी चाहिए, उपशमाधिष्ठान के समुदाय से आपदाओं में धैर्य जानना चाहिए, और प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से चर्चा से प्रज्ञा जाननी चाहिए। තථා සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අදුට්ඨො අධිවාසෙති, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අලුද්ධො පටිසෙවති, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අභීතො පරිවජ්ජෙති, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අමූළ්හො විනොදෙති. තථා [Pg.13] සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙන චස්ස නෙක්ඛම්මසුඛප්පත්ති, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන පවිවෙකසුඛප්පත්ති, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන උපසමසුඛප්පත්ති, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සම්බොධිසුඛප්පත්ති දීපිතා හොති. සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙන වා විවෙකජපීතිසුඛප්පත්ති, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සමාධිජපීතිසුඛප්පත්ති, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අපීතිජකායසුඛප්පත්ති, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සතිපාරිසුද්ධිජඋපෙක්ඛාසුඛප්පත්ති. තථා සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙන පරිවාරසම්පත්තිලක්ඛණපච්චයසුඛසමායොගො පරිදීපිතො හොති අවිසංවාදනතො, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන සන්තුට්ඨිලක්ඛණසභාවසුඛසමායොගො අලොභභාවතො, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන කතපුඤ්ඤතාලක්ඛණහෙතුසුඛසමායොගො කිලෙසෙහි අනභිභූතභාවතො, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන විමුත්තිසම්පත්තිලක්ඛණදුක්ඛූපසමසුඛසමායොගො පරිදීපිතො හොති, ඤාණසම්පත්තියා නිබ්බානාධිගමනතො. उसी प्रकार सत्याधिष्ठान के समुदाय से वह द्वेषरहित होकर सहन करता है, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से लोभरहित होकर सेवन करता है, उपशमाधिष्ठान के समुदाय से भयरहित होकर वर्जन करता है, और प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से मोहरहित होकर दूर करता है। उसी प्रकार सत्याधिष्ठान के समुदाय से उसकी नैष्क्रम्य-सुख की प्राप्ति, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से प्रविवेक-सुख की प्राप्ति, उपशमाधिष्ठान के समुदाय से उपशम-सुख की प्राप्ति और प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से सम्बोध-सुख की प्राप्ति प्रकाशित होती है। अथवा सत्याधिष्ठान के समुदाय से विवेकज प्रीति-सुख की प्राप्ति, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से समाधिज प्रीति-सुख की प्राप्ति, उपशमाधिष्ठान के समुदाय से अपीतिज काय-सुख की प्राप्ति और प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से स्मृति-परिशुद्धि-जन्य उपेक्षा-सुख की प्राप्ति होती है। उसी प्रकार सत्याधिष्ठान के समुदाय से विसंवादन न होने के कारण परिवार-सम्पत्ति लक्षण वाले प्रत्यय-सुख का संयोग प्रकाशित होता है, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से अलोभ होने के कारण सन्तुष्टि लक्षण वाले स्वभाव-सुख का संयोग, उपशमाधिष्ठान के समुदाय से क्लेशों द्वारा अभिभूत न होने के कारण कृतपुण्यता लक्षण वाले हेतु-सुख का संयोग, और प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से ज्ञान-सम्पत्ति द्वारा निर्वाण की प्राप्ति होने से विमुक्ति-सम्पत्ति लक्षण वाले दुःखोपशम-सुख का संयोग प्रकाशित होता है। තථා සච්චාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අරියස්ස සීලක්ඛන්ධස්ස අනුබොධප්පටිවෙධසිද්ධි, චාගාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අරියස්ස සමාධික්ඛන්ධස්ස, පඤ්ඤාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අරියස්ස පඤ්ඤාක්ඛන්ධස්ස, උපසමාධිට්ඨානසමුදාගමෙන අරියස්ස විමුත්තික්ඛන්ධස්ස අනුබොධප්පටිවෙධසිද්ධි දීපිතා හොති. සච්චාධිට්ඨානපරිපූරණෙන ච තපසිද්ධි, චාගාධිට්ඨානපරිපූරණෙන සබ්බනිස්සග්ගසිද්ධි, උපසමාධිට්ඨානපරිපූරණෙන ඉන්ද්රියසංවරසිද්ධි, පඤ්ඤාධිට්ඨානපරිපූරණෙන බුද්ධිසිද්ධි, තෙන ච නිබ්බානසිද්ධි. තථා සච්චාධිට්ඨානපරිපූරණෙන චතුඅරියසච්චාභිසමයප්පටිලාභො, චාගාධිට්ඨානපරිපූරණෙන චතුඅරියවංසප්පටිලාභො, 0.උපසමාධිට්ඨානපරිපූරණෙන චතුඅරියවිහාරප්පටිලාභො, පඤ්ඤාධිට්ඨානපරිපූරණෙන චතුඅරියවොහාරප්පටිලාභො දීපිතො හොති. उसी प्रकार सत्याधिष्ठान के समुदाय से आर्य शील-स्कन्ध के अनुबोध और प्रतिवेध की सिद्धि, त्यागाधिष्ठान के समुदाय से आर्य समाधि-स्कन्ध की, प्रज्ञाधिष्ठान के समुदाय से आर्य प्रज्ञा-स्कन्ध की, और उपशमाधिष्ठान के समुदाय से आर्य विमुक्ति-स्कन्ध के अनुबोध और प्रतिवेध की सिद्धि प्रकाशित होती है। सत्याधिष्ठान की परिपूर्णता से तप-सिद्धि, त्यागाधिष्ठान की परिपूर्णता से सर्व-निसर्ग-सिद्धि, उपशमाधिष्ठान की परिपूर्णता से इन्द्रिय-संवर-सिद्धि, प्रज्ञाधिष्ठान की परिपूर्णता से बुद्धि-सिद्धि और उससे निर्वाण-सिद्धि होती है। उसी प्रकार सत्याधिष्ठान की परिपूर्णता से चार आर्य सत्यों के अभिसमय का लाभ, त्यागाधिष्ठान की परिपूर्णता से चार आर्य वंशों का लाभ, उपशमाधिष्ठान की परिपूर्णता से चार आर्य विहारों का लाभ और प्रज्ञाधिष्ठान की परिपूर्णता से चार आर्य व्यवहारों का लाभ प्रकाशित होता है। අපරො නයො – භගවතාති එතෙන සත්තානං ලොකියලොකුත්තරසම්පත්තිඅභිකඞ්ඛාදීපනෙන තථාගතස්ස මහාකරුණා පකාසිතා හොති. අරහතාති එතෙන පහානසම්පත්තිදීපනෙන පහානපඤ්ඤා පකාසිතා හොති. තත්ථ පඤ්ඤායස්ස ධම්මරජ්ජපත්ති, කරුණාය ධම්මසංවිභාගො; පඤ්ඤාය සංසාරදුක්ඛනිබ්බිදා, කරුණාය සංසාරදුක්ඛසහනං; පඤ්ඤාය පරදුක්ඛපරිජානනං, කරුණාය පරදුක්ඛප්පටිකාරාරම්භො. පඤ්ඤාය පරිනිබ්බානාභිමුඛභාවො[Pg.14], කරුණාය තදධිගමො; පඤ්ඤාය සයං තරණං, කරුණාය පරෙසං තාරණං; පඤ්ඤාය බුද්ධභාවසිද්ධි, කරුණාය බුද්ධකිච්චසිද්ධි. කරුණාය වා බොධිසත්තභූමියං සංසාරාභිමුඛභාවො, පඤ්ඤාය තත්ථ අනභිරති. තථා කරුණාය පරෙසං අවිහිංසනං, පඤ්ඤාය සයං පරෙහි අභායනං; කරුණාය පරං රක්ඛන්තො අත්තානං රක්ඛති, පඤ්ඤාය අත්තානං රක්ඛන්තො පරං රක්ඛති. තථා කරුණාය අපරන්තපො, පඤ්ඤාය අනත්තන්තපො. තෙන අත්තහිතාය පටිපන්නාදීසු චතුත්ථපුග්ගලභාවො සිද්ධො හොති. दूसरा प्रकार - 'भगवा' (भगवान) इस शब्द से प्राणियों की लौकिक और लोकोत्तर संपत्ति की अभिलाषा को प्रकाशित करने के कारण तथागत की महाकरुणा प्रकट होती है। 'अरहता' (अर्हत्) इस शब्द से प्रहाण-संपत्ति को प्रकाशित करने के कारण प्रहाण-प्रज्ञा प्रकट होती है। वहाँ प्रज्ञा से उन्हें धर्म-राज्य की प्राप्ति होती है, करुणा से धर्म का संविभाग (वितरण) होता है; प्रज्ञा से संसार के दुखों से निर्वेद (वैराग्य) होता है, करुणा से संसार के दुखों को सहना होता है; प्रज्ञा से दूसरों के दुखों का परिज्ञान होता है, करुणा से दूसरों के दुखों के प्रतिकार का आरम्भ होता है। प्रज्ञा से परिनिर्वाण के प्रति अभिमुखता होती है, करुणा से उसकी प्राप्ति होती है; प्रज्ञा से स्वयं तरना होता है, करुणा से दूसरों को तारना होता है; प्रज्ञा से बुद्धत्व की सिद्धि होती है, करुणा से बुद्ध-कृत्यों की सिद्धि होती है। अथवा करुणा से बोधिसत्व भूमि में संसार के प्रति अभिमुखता होती है, प्रज्ञा से वहाँ अनासक्ति होती है। वैसे ही करुणा से दूसरों की अहिंसा होती है, प्रज्ञा से स्वयं दूसरों से निर्भयता होती है; करुणा से दूसरे की रक्षा करते हुए अपनी रक्षा करता है, प्रज्ञा से अपनी रक्षा करते हुए दूसरे की रक्षा करता है। वैसे ही करुणा से वह दूसरों को नहीं तपाता, प्रज्ञा से वह स्वयं को नहीं तपाता। इससे आत्महित के लिए प्रतिपन्न आदि चार प्रकार के पुद्गलों में चौथे पुद्गल का भाव सिद्ध होता है। තථා කරුණාය ලොකනාථතා, පඤ්ඤාය අත්තනාථතා; කරුණාය චස්ස නින්නතාභාවො, පඤ්ඤාය උන්නතාභාවො. තථා කරුණාය සබ්බසත්තෙසු ජනිතානුග්ගහො, පඤ්ඤානුගතත්තා න ච න සබ්බත්ථ විරත්තචිත්තො; පඤ්ඤාය සබ්බධම්මෙසු විරත්තචිත්තො, කරුණානුගතත්තා න ච න සබ්බසත්තානුග්ගහාය පවත්තො. යථා හි කරුණා තථාගතස්ස සිනෙහසොකවිරහිතා, එවං පඤ්ඤා අහංකාරමමංකාරවිනිමුත්තාති අඤ්ඤමඤ්ඤං විසොධිතා පරමවිසුද්ධාති දට්ඨබ්බා. තත්ථ පඤ්ඤාඛෙත්තං බලානි, කරුණාඛෙත්තං වෙසාරජ්ජානි. තෙසු බලසමායොගෙන පරෙහි න අභිභුය්යති, වෙසාරජ්ජසමායොගෙන පරෙ අභිභවති. බලෙහි සත්ථුසම්පදාසිද්ධි, වෙසාරජ්ජෙහි සාසනසම්පදාසිද්ධි. තථා බලෙහි බුද්ධරතනසිද්ධි, වෙසාරජ්ජෙහි ධම්මරතනසිද්ධීති අයමෙත්ථ ‘‘භගවතා අරහතා’’ති පදද්වයස්ස අත්ථයොජනාය මුඛමත්තදස්සනං. वैसे ही करुणा से लोकनाथता और प्रज्ञा से आत्मनाथता होती है; करुणा से उनकी विनम्रता और प्रज्ञा से उनकी उच्चता होती है। वैसे ही करुणा से सभी प्राणियों पर अनुग्रह उत्पन्न होता है, और प्रज्ञा के अनुगत होने के कारण वे सर्वत्र विरक्त चित्त वाले नहीं होते ऐसा नहीं है; प्रज्ञा से सभी धर्मों में विरक्त चित्त वाले होते हैं, और करुणा के अनुगत होने के कारण वे सभी प्राणियों के अनुग्रह के लिए प्रवृत्त नहीं होते ऐसा नहीं है। जैसे तथागत की करुणा स्नेह और शोक से रहित है, वैसे ही प्रज्ञा अहंकार और ममकार से मुक्त है - इस प्रकार वे एक-दूसरे को शुद्ध करने वाली और परम विशुद्ध समझनी चाहिए। वहाँ प्रज्ञा का क्षेत्र 'बल' हैं, करुणा का क्षेत्र 'वैशारद्य' हैं। उनमें बलों के संयोग से वे दूसरों द्वारा पराजित नहीं होते, वैशारद्य के संयोग से वे दूसरों को पराजित करते हैं। बलों से शास्ता की संपदा की सिद्धि होती है, वैशारद्य से शासन की संपदा की सिद्धि होती है। वैसे ही बलों से बुद्ध-रत्न की सिद्धि और वैशारद्य से धर्म-रत्न की सिद्धि होती है - यह यहाँ 'भगवता अरहता' इन दो पदों की अर्थ-योजना का केवल संक्षिप्त परिचय है। කස්මා පනෙත්ථ ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා’’ති වත්වා පුන ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං? අනුස්සවපටික්ඛෙපෙන නියමදස්සනත්ථං. යථා හි කෙනචි පරතො සුත්වා වුත්තං යදිපි ච ජානන්තෙන වුත්තං, න තෙනෙව වුත්තං පරෙනපි වුත්තත්තා. න ච තං තෙන වුත්තමෙව, අපිච ඛො සුතම්පි, න එවමිධ. භගවතා හි පරතො අසුත්වා සයම්භුඤාණෙන අත්තනා අධිගතමෙව වුත්තන්ති ඉමස්ස විසෙසස්ස දස්සනත්ථං ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. ඉදං වුත්තං හොති – ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා’’ තඤ්ච ඛො භගවතාව වුත්තං, න අඤ්ඤෙන, වුත්තමෙව ච, න සුතන්ති. අධිකවචනඤ්හි අඤ්ඤමත්ථං බොධෙතීති න පුනරුත්තිදොසො. එස නයො ඉතො පරෙසුපි. यहाँ 'वुत्तञ्हेतं भगवता' (भगवान द्वारा यह कहा गया है) कहकर फिर से 'वुत्तं' (कहा गया) क्यों कहा गया है? अनुश्रुति के प्रतिषेध द्वारा नियम दिखाने के लिए। जैसे किसी ने दूसरे से सुनकर कहा हो, यद्यपि वह जानते हुए कह रहा है, फिर भी वह केवल उसी के द्वारा नहीं कहा गया है क्योंकि वह दूसरे के द्वारा भी कहा गया है। और वह केवल उसके द्वारा कहा ही नहीं गया है, बल्कि सुना भी गया है, यहाँ ऐसा नहीं है। भगवान ने दूसरों से न सुनकर स्वयं के स्वयंभू-ज्ञान से प्राप्त किए हुए को ही कहा है - इस विशेषता को दिखाने के लिए दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। इसका अर्थ यह है - 'भगवान द्वारा यह कहा गया है' और वह भगवान द्वारा ही कहा गया है, किसी अन्य द्वारा नहीं, और वह कहा ही गया है, सुना नहीं गया है। अतिरिक्त शब्द अन्य अर्थ का बोध कराते हैं, इसलिए यहाँ पुनरुक्ति दोष नहीं है। यही नियम इसके बाद वालों में भी लागू होता है। තථා [Pg.15] පුබ්බරචනාභාවදස්සනත්ථං ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. භගවා හි සම්මාසම්බුද්ධතාය ඨානුප්පත්තිකප්පටිභානෙන සම්පත්තපරිසාය අජ්ඣාසයානුරූපං ධම්මං දෙසෙති, න තස්ස කාරණා දානාදීනං විය පුබ්බරචනාකිච්චං අත්ථි. තෙනෙතං දස්සෙති – ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා, තඤ්ච ඛො න පුබ්බරචනාවසෙන තක්කපරියාහතං වීමංසානුචරිතං, අපිච ඛො වෙනෙය්යජ්ඣාසයානුරූපං ඨානසො වුත්තමෙවා’’ති. वैसे ही पूर्व-रचना के अभाव को दिखाने के लिए दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। भगवान सम्यक्संबुद्ध होने के कारण तत्काल उत्पन्न होने वाली प्रतिभा से उपस्थित परिषद के आशय के अनुरूप धर्म का उपदेश देते हैं, उनके लिए दान आदि की तरह पूर्व-रचना का कार्य नहीं होता। इससे यह दिखाते हैं - 'भगवान द्वारा यह कहा गया है, और वह पूर्व-रचना के वश में तर्क से आहत या मीमांसा के पीछे चलने वाला नहीं है, बल्कि विनेय के आशय के अनुरूप तत्काल कहा गया ही है'। අප්පටිවත්තියවචනභාවදස්සනත්ථං වා ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. යඤ්හි භගවතා වුත්තං, වුත්තමෙව තං, න කෙනචි පටික්ඛිපිතුං සක්කා අක්ඛරසම්පත්තියා අත්ථසම්පත්තියා ච. වුත්තං හෙතං – अथवा वचन की अटल स्थिति को दिखाने के लिए दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। क्योंकि भगवान ने जो कहा है, वह कहा ही गया है, उसे अक्षर-संपत्ति और अर्थ-संपत्ति के कारण किसी के द्वारा नकारा नहीं जा सकता। जैसा कि कहा गया है - ‘‘එතං භගවතා බාරාණසියං ඉසිපතනෙ මිගදායෙ අනුත්තරං ධම්මචක්කං පවත්තිතං අප්පටිවත්තියං කෙනචි සමණෙන වා බ්රාහ්මණෙන වා’’තිආදි (සං. නි. 5.1081; මහාව. 17). 'भगवान द्वारा वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में यह अनुत्तर धर्मचक्र प्रवर्तित किया गया, जिसे किसी श्रमण या ब्राह्मण द्वारा बदला नहीं जा सकता' इत्यादि। අපරම්පි වුත්තං – अन्य भी कहा गया है - ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, ආගච්ඡෙය්ය සමණො වා බ්රාහ්මණො වා ‘න යිදං දුක්ඛං අරියසච්චං, යං සමණෙන ගොතමෙන පඤ්ඤත්තං, අහමිදං දුක්ඛං අරියසච්චං ඨපෙත්වා අඤ්ඤං දුක්ඛං අරියසච්චං පඤ්ඤාපෙස්සාමී’ති, නෙතං ඨානං විජ්ජතී’’තිආදි. – 'भिक्षुओं! यहाँ कोई श्रमण या ब्राह्मण आए और कहे - यह दुःख आर्यसत्य नहीं है जिसे श्रमण गौतम ने प्रज्ञप्त किया है, मैं इस दुःख आर्यसत्य को छोड़कर दूसरा दुःख आर्यसत्य प्रज्ञप्त करूँगा, यह संभव नहीं है' इत्यादि। තස්මා අප්පටිවත්තියවචනභාවදස්සනත්ථම්පි ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. इसलिए वचन की अटल स्थिति को दिखाने के लिए भी दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। අථ වා සොතූනං අත්ථනිප්ඵාදකභාවදස්සනත්ථං ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. යඤ්හි පරෙසං ආසයාදිං අජානන්තෙන අසබ්බඤ්ඤුනා අදෙසෙ අකාලෙ වා වුත්තං, තං සච්චම්පි සමානං සොතූනං අත්ථනිප්ඵාදනෙ අසමත්ථතාය අවුත්තං නාම සියා, පගෙව අසච්චං. භගවතා පන සම්මාසම්බුද්ධභාවතො සම්මදෙව පරෙසං ආසයාදිං දෙසකාලං අත්ථසිද්ධිඤ්ච ජානන්තෙන වුත්තං එකන්තෙන සොතූනං යථාධිප්පෙතත්ථනිප්ඵාදනතො වුත්තමෙව, නත්ථි තස්ස අවුත්තතාපරියායො. තස්මා සොතූනං අත්ථනිප්ඵාදකභාවදස්සනත්ථම්පි ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. අපිච යථා න තං සුතං නාම, යං න විඤ්ඤාතත්ථං යඤ්ච න තථත්තාය පටිපන්නං, එවං න තං වුත්තං නාම, යං න සම්මා පටිග්ගහිතං. භගවතො පන වචනං චතස්සොපි පරිසා සම්මදෙව පටිග්ගහෙත්වා [Pg.16] තථත්තාය පටිපජ්ජන්ති. තස්මා සම්මදෙව පටිග්ගහිතභාවදස්සනත්ථම්පි ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. अथवा श्रोताओं के अर्थ-निष्पादन (प्रयोजन की सिद्धि) को दिखाने के लिए दो बार 'वुत्तं' (कहा गया) कहा गया है। क्योंकि जो दूसरों के आशय आदि को न जानने वाले असर्वज्ञ द्वारा अनुचित स्थान या अनुचित काल में कहा जाता है, वह सत्य होते हुए भी श्रोताओं के अर्थ-निष्पादन में असमर्थ होने के कारण 'अवुत्त' (न कहा गया) के समान ही होता है, असत्य की तो बात ही क्या। परन्तु भगवान द्वारा सम्यक्सम्बुद्ध होने के कारण दूसरों के आशय आदि, देश-काल और अर्थ-सिद्धि को भली-भाँति जानते हुए जो कहा गया है, वह श्रोताओं के अभिप्रेत अर्थ को निश्चित रूप से सिद्ध करने वाला होने के कारण 'वुत्त' (कहा गया) ही है, उसमें 'अवुत्त' होने का कोई अवसर नहीं है। इसलिए श्रोताओं के अर्थ-निष्पादन को दिखाने के लिए भी दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। इसके अतिरिक्त, जैसे वह 'श्रुत' (सुना हुआ) नहीं कहलाता जो अर्थतः न समझा गया हो और जिसके अनुसार आचरण न किया गया हो, वैसे ही वह 'वुत्त' (कहा गया) नहीं कहलाता जो सम्यक् रूप से ग्रहण न किया गया हो। भगवान के वचन को तो चारों परिषदें भली-भाँति ग्रहण कर उसके अनुसार प्रतिपन्न (आचरण) होती हैं। इसलिए सम्यक् रूप से ग्रहण किए जाने के भाव को दिखाने के लिए भी दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। අථ වා අරියෙහි අවිරුද්ධවචනභාවදස්සනත්ථං ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. යථා හි භගවා කුසලාකුසලසාවජ්ජානවජ්ජභෙදෙ ධම්මෙ පවත්තිනිවත්තියො සම්මුතිපරමත්ථෙ ච අවිසංවාදෙන්තො වදති, එවං ධම්මසෙනාපතිප්පභුතයො අරියාපි භගවති ධරමානෙ පරිනිබ්බුතෙ ච තස්සෙව දෙසනං අනුගන්ත්වා වදන්ති, න තත්ථ නානාවාදතා. තස්මා වුත්තමරහතා තතො පරභාගෙ අරහතා අරියසඞ්ඝෙනාපීති එවං අරියෙහි අවිරුද්ධවචනභාවදස්සනත්ථම්පි එවං වුත්තං. अथवा आर्यों के अविरुद्ध (अविरोधी) वचन होने को दिखाने के लिए दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। जैसे भगवान कुशल-अकुशल, सावद्य-अनवद्य के भेद वाले धर्मों, प्रवृत्ति-निवृत्ति और सम्मति-परमार्थ के विषय में बिना किसी विसंवाद (विरोध) के बोलते हैं, वैसे ही धर्मसेनापति (सारिपुत्र) आदि आर्य भी भगवान के रहते हुए और उनके परिनिर्वाण के बाद भी उन्हीं की देशना का अनुसरण करते हुए बोलते हैं, वहाँ कोई मतभेद (नानावाद) नहीं होता। इसलिए अर्हन्त (बुद्ध) द्वारा कहा गया और उसके बाद अर्हन्त आर्य संघ द्वारा भी (कहा गया), इस प्रकार आर्यों के अविरुद्ध वचन होने को दिखाने के लिए भी ऐसा कहा गया है। අථ වා පුරිමෙහි සම්මාසම්බුද්ධෙහි වුත්තනයභාවදස්සනත්ථං ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. සතිපි හි ජාතිගොත්තායුප්පමාණාදිවිසෙසෙ දසබලාදිගුණෙහි විය ධම්මදෙසනාය බුද්ධානං විසෙසො නත්ථි, අඤ්ඤමඤ්ඤං අත්තනා ච තෙ පුබ්බෙනාපරං අවිරුද්ධමෙව වදන්ති. තස්මා වුත්තඤ්හෙතං යථා බුද්ධෙහි අත්තනා ච පුබ්බෙ, ඉදානිපි අම්හාකං භගවතා තථෙව වුත්තං අරහතාති එවං පුරිමබුද්ධෙහි අත්තනා ච සුත්තන්තරෙසු වුත්තනයභාවදස්සනත්ථම්පි ද්වික්ඛත්තුං ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. තෙන බුද්ධානං දෙසනාය සබ්බත්ථ අවිරොධො දීපිතො හොති. अथवा पूर्ववर्ती सम्यक्सम्बुद्धों द्वारा कहे गए नय (विधि) को दिखाने के लिए दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। यद्यपि जाति, गोत्र, आयु-प्रमाण आदि में भेद होता है, फिर भी दशबल आदि गुणों के समान बुद्धों की धर्म-देशना में कोई भेद नहीं होता; वे एक-दूसरे के और स्वयं के भी पूर्व और अपर वचनों के अविरुद्ध ही बोलते हैं। इसलिए, जैसे पूर्व में बुद्धों द्वारा स्वयं कहा गया था, वैसे ही अब हमारे भगवान अर्हन्त द्वारा भी कहा गया है - इस प्रकार पूर्व बुद्धों द्वारा और स्वयं के द्वारा अन्य सुत्तों में कहे गए नय को दिखाने के लिए भी दो बार 'वुत्तं' कहा गया है। इससे बुद्धों की देशना का सर्वत्र अविरोध प्रदर्शित होता है। අථ වා ‘‘වුත්ත’’න්ති යදෙතං දුතියං පදං, තං අරහන්තවුත්තභාවවචනං දට්ඨබ්බං. ඉදං වුත්තං හොති – වුත්තඤ්හෙතං භගවතා අරහතාපි වුත්තං – ‘‘එකධම්මං, භික්ඛවෙ’’තිආදිකං ඉදානි වුච්චමානං වචනන්ති. අථ වා ‘‘වුත්ත’’න්ති යදෙතං දුතියං පදං, තං න වචනත්ථං, අථ ඛො වපනත්ථං දට්ඨබ්බං. තෙනෙතං දස්සෙති – ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා, තඤ්ච ඛො න වුත්තමත්තං, න කථිතමත්තං; අථ ඛො වෙනෙය්යානං කුසලමූලං වපිත’’න්ති අත්ථො. අථ වා යදෙතං වුත්තන්ති දුතියං පදං, තං වත්තනත්ථං. අයං හිස්ස අත්ථො – වුත්තඤ්හෙතං භගවතා අරහතා, තඤ්ච ඛො න වුත්තමත්තං, අපිච තදත්ථජාතං වුත්තං චරිතන්ති. තෙන ‘‘යථා වාදී භගවා තථා කාරී’’ති දස්සෙති. අථ වා වුත්තං භගවතා, වුත්තවචනං අරහතා වත්තුං යුත්තෙනාති අත්ථො. अथवा 'वुत्तं' यह जो दूसरा पद है, उसे अर्हन्त द्वारा कहे जाने के अर्थ में देखना चाहिए। इसका अर्थ यह है - भगवान द्वारा कहा गया और अर्हन्त द्वारा भी कहा गया - 'भिक्षुओं, एक धर्म' इत्यादि वचन जो अब कहा जा रहा है। अथवा 'वुत्तं' यह जो दूसरा पद है, वह 'वचन' (बोलने) के अर्थ में नहीं, बल्कि 'वपन' (बोने) के अर्थ में देखना चाहिए। इससे यह दिखाया गया है - 'भगवान द्वारा यह कहा गया है, और वह केवल कहा मात्र नहीं गया, केवल बोला मात्र नहीं गया; बल्कि विनेय जनों (शिष्यों) के कुशल-मूल को बोया गया है' - यह अर्थ है। अथवा यह जो 'वुत्तं' दूसरा पद है, वह 'वर्तन' (आचरण) के अर्थ में है। इसका यह अर्थ है - भगवान अर्हन्त द्वारा यह कहा गया है, और वह केवल कहा मात्र नहीं गया, बल्कि उस अर्थ-समूह को आचरण में लाया गया है। इससे यह प्रदर्शित होता है कि 'भगवान जैसा बोलते हैं, वैसा ही करते हैं'। अथवा भगवान द्वारा कहा गया, और अर्हन्त (वक्ता) द्वारा कहे जाने योग्य वचन कहा गया - यह अर्थ है। අථ [Pg.17] වා ‘‘වුත්ත’’න්ති සඞ්ඛෙපකථාඋද්දිසනං සන්ධායාහ, පුන ‘‘වුත්ත’’න්ති විත්ථාරකථානිදස්සනං. භගවා හි සඞ්ඛෙපතො විත්ථාරතො ච ධම්මං දෙසෙති. අථ වා භගවතො දුරුත්තවචනාභාවදස්සනත්ථං ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා’’ති වත්වා පුන ‘‘වුත්ත’’න්ති වුත්තං. සබ්බදා ඤාණානුගතවචීකම්මතාය හි භගවතො සවාසනපහීනසබ්බදොසස්ස අක්ඛලිතබ්යප්පථස්ස කදාචිපි දුරුත්තං නාම නත්ථි. යථා කෙචි ලොකෙ සතිසම්මොසෙන වා දවා වා රවා වා කිඤ්චි වත්වා අථ පටිලද්ධසඤ්ඤා පුබ්බෙ වුත්තං අවුත්තං වා කරොන්ති පටිසඞ්ඛරොන්ති වා, න එවං භගවා. භගවා පන නිච්චකාලං සමාහිතො. අසම්මොසධම්මො අසම්මොහධම්මො ච සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණසමුපබ්යූළ්හාය පටිභානපටිසම්භිදාය උපනීතමත්ථං අපරිමිතකාලං සම්භතපුඤ්ඤසම්භාරසමුදාගතෙහි අනඤ්ඤසාධාරණෙහි විසදවිසුද්ධෙහි කරණවිසෙසෙහි සොතායතනරසායනභූතං සුණන්තානං අමතවස්සං වස්සන්තො විය සොතබ්බසාරං සවනානුත්තරියං චතුසච්චං පකාසෙන්තො කරවීකරුතමඤ්ජුනා සරෙන සභාවනිරුත්තියා වෙනෙය්යජ්ඣාසයානුරූපං වචනං වදති, නත්ථි තත්ථ වාලග්ගමත්තම්පි අවක්ඛලිතං, කුතො පන දුරුත්තාවකාසො. තස්මා ‘‘යං භගවතා වුත්තං, තං වුත්තමෙව, න අවුත්තං දුරුත්තං වා කදාචි හොතී’’ති දස්සනත්ථං – ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා’’ති වත්වා පුන – ‘‘වුත්තමරහතා’’ති වුත්තන්ති න එත්ථ පුනරුත්තිදොසොති. එවමෙත්ථ පුනරුත්තසද්දස්ස සාත්ථකතා වෙදිතබ්බා. अथवा 'वुत्तं' संक्षिप्त कथा के निर्देश के लिए कहा गया है, और पुनः 'वुत्तं' विस्तृत कथा के प्रदर्शन के लिए। क्योंकि भगवान संक्षेप और विस्तार से धर्म की देशना करते हैं। अथवा भगवान के वचनों में 'दुरुक्त' (गलत कथन) के अभाव को दिखाने के लिए 'वुत्तञ्हेतं भगवता' कहकर पुनः 'वुत्तं' कहा गया है। क्योंकि भगवान का वाक्-कर्म सदैव ज्ञान के अनुगामी होता है, उनके सभी दोष वासना सहित क्षीण हो चुके हैं, उनकी वाणी स्खलन रहित है, इसलिए उनमें कभी 'दुरुक्त' (बुरा वचन) नहीं होता। जैसे लोक में कुछ लोग स्मृति-भ्रम से, हँसी-मजाक में या व्यर्थ ही कुछ कहकर, बाद में होश आने पर पहले कहे हुए को 'न कहा हुआ' कर देते हैं या उसमें सुधार करते हैं, भगवान वैसे नहीं हैं। भगवान तो सदा समाहित रहते हैं। वे स्मृति-भ्रम और सम्मोह से रहित हैं। वे सर्वज्ञता-ज्ञान से पुष्ट प्रतिभा-प्रतिसम्भिदा द्वारा प्रस्तुत अर्थ को, असीमित काल तक संचित पुण्य-सम्भार से प्राप्त, अन्यों के लिए असाधारण, स्पष्ट और विशुद्ध स्वर-यन्त्रों (करण) के विशेष प्रयोग से, श्रोताओं के लिए कान के रसायन के समान अमृत-वर्षा करते हुए, सुनने योग्य सार-भूत, श्रवण-अनुत्तरिय, चतुरार्य सत्य को प्रकाशित करते हुए, करविक पक्षी के समान मधुर स्वर में स्वाभाविक निरुक्ति (भाषा) के साथ विनेय जनों के आशय के अनुरूप वचन बोलते हैं। वहाँ बाल के अग्र भाग के बराबर भी स्खलन नहीं होता, फिर दुरुक्त (गलत बोलने) का अवसर ही कहाँ? इसलिए 'जो भगवान द्वारा कहा गया है, वह कहा ही गया है, वह कभी न कहा हुआ या गलत कहा हुआ नहीं होता' - यह दिखाने के लिए 'वुत्तञ्हेतं भगवता' कहकर पुनः 'वुत्तं अरहता' कहा गया है, इसमें पुनरुक्ति का दोष नहीं है। इस प्रकार यहाँ पुनरुक्त शब्द की सार्थकता समझनी चाहिए। ඉති මෙ සුතන්ති එත්ථ ඉතීති අයං ඉතිසද්දො හෙතුපරිසමාපනාදිපදත්ථවිපරියායපකාරනිදස්සනාවධාරණාදිඅනෙකත්ථප්පභෙදො. තථා හෙස – ‘‘රුප්පතීති ඛො, භික්ඛවෙ, තස්මා රූපන්ති වුච්චතී’’තිආදීසු (සං. නි. 3.79) හෙතුඅත්ථෙ දිස්සති. ‘‘තස්මාතිහ මෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මදායාදා භවථ, මා ආමිසදායාදා. අත්ථි මෙ තුම්හෙසු අනුකම්පා – කින්ති මෙ සාවකා ධම්මදායාදා භවෙය්යුං, නො ආමිසදායාදා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.30) පරිසමාපනෙ. ‘‘ඉති වා ඉති එවරූපා විසූකදස්සනා පටිවිරතො’’තිආදීසු (දී. නි. 1.10) ආදිඅත්ථෙ. ‘‘මාගණ්ඩියොති වා තස්ස බ්රාහ්මණස්ස සඞ්ඛා සමඤ්ඤා පඤ්ඤත්ති වොහාරො නාමං නාමකම්මං නාමධෙය්යං නිරුත්ති බ්යඤ්ජනං අභිලාපො’’තිආදීසු (මහානි. 75) පදත්ථවිපරියායෙ. ‘‘ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, සප්පටිභයො බාලො, අප්පටිභයො පණ්ඩිතො; සඋපද්දවො බාලො, අනුපද්දවො පණ්ඩිතො; සඋපසග්ගො බාලො[Pg.18], අනුපසග්ගො පණ්ඩිතො’’තිආදීසු (අ. නි. 3.1) පකාරෙ. ‘‘සබ්බමත්ථීති ඛො, කච්චාන, අයමෙකො අන්තො, සබ්බං නත්ථීති ඛො, කච්චාන, අයං දුතියො අන්තො’’තිආදීසු (සං. නි. 2.15) නිදස්සනෙ. ‘‘අත්ථි ඉදප්පච්චයා ජරාමරණන්ති ඉති පුට්ඨෙන සතා, ආනන්ද, අත්ථීතිස්ස වචනීයං. කිංපච්චයා ජරාමරණන්ති ඉති චෙ වදෙය්ය, ජාතිපච්චයා ජරාමරණන්ති ඉච්චස්ස වචනීය’’න්තිආදීසු (දී. නි. 2.96) අවධාරණෙ, සන්නිට්ඨානෙති අත්ථො. ස්වායමිධ පකාරනිදස්සනාවධාරණෙසු දට්ඨබ්බො. "इति मे सुतं" (ऐसा मैंने सुना) - यहाँ 'इति' शब्द हेतु (कारण), परिसमापन (समाप्ति), पदार्थ-विपर्याय (शब्दार्थ का परिवर्तन), प्रकार (विधि), निदर्शन (उदाहरण), अवधारण (निश्चय) आदि अनेक अर्थों के भेदों वाला है। जैसे कि - "भिक्खुओं! रूपित होता है, इसलिए इसे रूप कहा जाता है" (सं. नि. 3.79) आदि में यह 'हेतु' के अर्थ में देखा जाता है। "इसलिए भिक्खुओं! तुम धर्म के उत्तराधिकारी बनो, आमिष (सांसारिक वस्तुओं) के नहीं। तुम्हारे प्रति मेरी अनुकम्पा है - कैसे मेरे श्रावक धर्म के उत्तराधिकारी हों, आमिष के नहीं" (म. नि. 1.30) आदि में 'परिसमापन' के अर्थ में। "इस प्रकार या इस प्रकार के विसूक-दर्शन (तमाशा देखने) से विरत है" (दी. नि. 1.10) आदि में 'आदि' (प्रकार) के अर्थ में। "मागण्डिय! उस ब्राह्मण की यह संज्ञा, समाज्ञा, प्रज्ञप्ति, व्यवहार, नाम, नामकर्म, नामधेय, निरुक्ति, व्यंजन और अभिलाप है" (महानि. 75) आदि में 'पदार्थ-विपर्याय' के अर्थ में। "भिक्खुओं! इस प्रकार बाल (मूर्ख) सप्रतिभय (भययुक्त) होता है, पण्डित अप्रतिभय होता है..." (अ. नि. 3.1) आदि में 'प्रकार' के अर्थ में। "कच्चान! 'सब कुछ है', यह एक अन्त (अति) है; 'सब कुछ नहीं है', यह दूसरा अन्त है" (सं. नि. 2.15) आदि में 'निदर्शन' के अर्थ में। "आनन्द! 'क्या इस प्रत्यय (कारण) से जरामरण होता है?' ऐसा पूछने पर 'होता है' ऐसा कहना चाहिए। 'किस प्रत्यय से जरामरण होता है?' यदि ऐसा पूछे, तो 'जाति के प्रत्यय से जरामरण होता है' ऐसा कहना चाहिए" (दी. नि. 2.96) आदि में 'अवधारण' (निश्चय) के अर्थ में। यहाँ इसे प्रकार, निदर्शन और अवधारण के अर्थ में देखना चाहिए। තත්ථ පකාරත්ථෙන ඉතිසද්දෙන එතමත්ථං දීපෙති – නානානයනිපුණමනෙකජ්ඣාසයසමුට්ඨානං අත්ථබ්යඤ්ජනසම්පන්නං විවිධපාටිහාරියං ධම්මත්ථදෙසනාපටිවෙධගම්භීරං සබ්බසත්තානං සකසකභාසානුරූපතො සොතපථමාගච්ඡන්තං තස්ස භගවතො වචනං සබ්බප්පකාරෙන කො සමත්ථො විඤ්ඤාතුං, සබ්බථාමෙන පන සොතුකාමතං ජනෙත්වාපි ඉති මෙ සුතං, මයාපි එකෙන පකාරෙන සුතන්ති. वहाँ 'प्रकार' अर्थ वाले 'इति' शब्द से इस अर्थ को प्रकाशित करता है - "नाना नयों (विधियों) में निपुण, अनेक आशयों (रुचियों) से उत्पन्न, अर्थ और व्यंजनों (शब्दों) से सम्पन्न, विविध प्रातिहार्यों (चमत्कारों) से युक्त, धर्म, अर्थ, देशना और प्रतिवेध में गम्भीर, सभी सत्त्वों की अपनी-अपनी भाषा के अनुरूप श्रोत्र-पथ (कानों) में आने वाले उस भगवान् के वचन को सभी प्रकार से जानने में कौन समर्थ है? परन्तु पूरी शक्ति से सुनने की इच्छा जगाकर भी 'इति मे सुतं' (ऐसा मैंने सुना), मेरे द्वारा भी एक प्रकार से सुना गया है।" එත්ථ ච එකත්තනානත්තඅබ්යාපාරඑවංධම්මතාසඞ්ඛාතා නන්දියාවත්තතිපුක්ඛලසීහවික්කීළිතදිසාලොචනඅඞ්කුසසඞ්ඛාතා ච විසයාදිභෙදෙන නානාවිධා නයා නානානයා. නයා වා පාළිගතියො, තා ච පඤ්ඤත්තිඅනුපඤ්ඤත්තිආදිවසෙන සංකිලෙසභාගියාදිලොකියාදිතදුභයවොමිස්සතාදිවසෙන, කුසලාදිවසෙන, ඛන්ධාදිවසෙන, සඞ්ගහාදිවසෙන, සමයවිමුත්තාදිවසෙන, ඨපනාදිවසෙන, කුසලමූලාදිවසෙන, තිකපට්ඨානාදිවසෙන ච නානප්පකාරාති නානානයා. තෙහි නිපුණං සණ්හං සුඛුමන්ති නානානයනිපුණං. यहाँ 'नाना नय' का अर्थ है - एकत्व, नानात्व, अव्यापार और एवं-धम्मता के रूप में ज्ञात, तथा नन्द्यावर्त, तिपुक्खल, सिंहविक्रीड़ित, दिशालोकन और अंकुश के रूप में ज्ञात, विषय आदि के भेद से विविध प्रकार के नय। अथवा नय का अर्थ है पालि की गतियाँ (पद्धतियाँ), और वे प्रज्ञप्ति-अनुप्रज्ञप्ति आदि के वश से, संक्लेशभागीय-व्यवदानभागीय, लौकिक-लोकोत्तर, उन दोनों के मिश्रण आदि के वश से, कुशल आदि के वश से, स्कन्ध आदि के वश से, संग्रह आदि के वश से, समय-विमुक्त आदि के वश से, स्थापन आदि के वश से, कुशलमूल आदि के वश से, और त्रिक-प्रस्थान आदि के वश से अनेक प्रकार के होने के कारण 'नाना नय' हैं। उनके द्वारा जो निपुण, श्लक्ष्ण (कोमल) और सूक्ष्म है, वह 'नाना-नय-निपुण' है। ආසයොව අජ්ඣාසයො, සො ච සස්සතාදිභෙදෙන අප්පරජක්ඛතාදිභෙදෙන ච අනෙකවිධො. අත්තජ්ඣාසයාදිකො එව වා අනෙකො අජ්ඣාසයො අනෙකජ්ඣාසයො. සො සමුට්ඨානං උප්පත්තිහෙතු එතස්සාති අනෙකජ්ඣාසයසමුට්ඨානං. आशय ही 'अध्याशय' है, और वह शाश्वत आदि के भेद से तथा अल्प-रजस्क (कम दोष वाले) आदि के भेद से अनेक प्रकार का है। अथवा आत्म-अध्याशय आदि ही अनेक अध्याशय हैं। वह जिसके उत्पन्न होने का हेतु है, वह 'अनेक-अध्याशय-समुत्थान' है। කුසලාදිඅත්ථසම්පත්තියා තබ්බිභාවනබ්යඤ්ජනසම්පත්තියා සඞ්කාසනපකාසනවිවරණවිභජනඋත්තානීකරණපඤ්ඤත්තිවසෙන ඡහි අත්ථපදෙහි අක්ඛරපදබ්යඤ්ජනාකාරනිරුත්තිනිද්දෙසවසෙන ඡහි බ්යඤ්ජනපදෙහි ච සමන්නාගතත්තා අත්ථබ්යඤ්ජනසම්පන්නං. कुशल आदि अर्थों की सम्पत्ति के कारण और उनके स्पष्टीकरण के लिए व्यंजन (शब्द) की सम्पत्ति के कारण; संकासन (संक्षेप में कहना), प्रकाशन, विवरण (खोलना), विभाजन, उत्तानीकरण (स्पष्ट करना) और प्रज्ञप्ति के वश से छह 'अर्थ-पदों' द्वारा, तथा अक्षर, पद, व्यंजन, आकार, निरुक्ति और निर्देश के वश से छह 'व्यंजन-पदों' द्वारा समन्वित होने के कारण 'अर्थ-व्यंजन-सम्पन्न' है। ඉද්ධිආදෙසනානුසාසනීභෙදෙන [Pg.19] තෙසු ච එකෙකස්ස විසයාදිභෙදෙන විවිධං බහුවිධං වා පාටිහාරියං එතස්සාති විවිධපාටිහාරියං. තත්ථ පටිපක්ඛහරණතො රාගාදිකිලෙසාපනයනතො පටිහාරියන්ති අත්ථෙ සති භගවතො පටිපක්ඛා රාගාදයො න සන්ති යෙ හරිතබ්බා, පුථුජ්ජනානම්පි විගතූපක්කිලෙසෙ අට්ඨගුණසමන්නාගතෙ චිත්තෙ හතපටිපක්ඛෙ ඉද්ධිවිධං පවත්තති. තස්මා තත්ථ පවත්තවොහාරෙන ච න සක්කා ඉධ පාටිහාරියන්ති වත්තුං. යස්මා පන මහාකාරුණිකස්ස භගවතො වෙනෙය්යගතා ච කිලෙසා පටිපක්ඛා, තස්මා තෙසං හරණතො පාටිහාරියං. අථ වා භගවතො සාසනස්ස ච පටිපක්ඛා තිත්ථියා, තෙසං හරණතො පාටිහාරියං. තෙ හි දිට්ඨිහරණවසෙන දිට්ඨිප්පකාසනෙ අසමත්ථභාවෙන ච ඉද්ධිආදෙසනානුසාසනීහි හරිතා අපනීතා හොන්ති. පටීති වා පච්ඡාති අත්ථො. තස්මා සමාහිතෙ චිත්තෙ විගතූපක්කිලෙසෙ කතකිච්චෙන පච්ඡා හරිතබ්බං පවත්තෙතබ්බන්ති පටිහාරියං. අත්තනො වා උපක්කිලෙසෙසු චතුත්ථජ්ඣානමග්ගෙහි හරිතෙසු පච්ඡා හරණං පටිහාරියං. ඉද්ධිආදෙසනානුසාසනියො ච විගතූපක්කිලෙසෙන කතකිච්චෙන සත්තහිතත්ථං පුන පවත්තෙතබ්බා, හරිතෙසු ච අත්තනො උපක්කිලෙසෙසු පරසන්තානෙ උපක්කිලෙසහරණානි හොන්තීති පටිහාරියානි භවන්ති. පටිහාරියමෙව පාටිහාරියං, පටිහාරියෙ වා ඉද්ධිආදෙසනානුසාසනිසමුදායෙ භවං එකෙකං පාටිහාරියන්ති වුච්චති. පටිහාරියං වා චතුත්ථජ්ඣානං මග්ගො ච පටිපක්ඛහරණතො, තත්ථ ජාතං, තස්මිං වා නිමිත්තභූතෙ, තතො වා ආගතන්ති පාටිහාරියං. ऋद्धि, आदेशना और अनुशासनी के भेद से, और उनमें से एक-एक के विषय आदि के भेद से जिसमें विविध या बहुविध 'प्रातिहार्य' (चमत्कार) हैं, वह 'विविध-प्रातिहार्य' है। वहाँ 'प्रतिपक्ष' (विपक्ष/दोष) को हरने के कारण या राग आदि क्लेशों को दूर करने के कारण 'प्रातिहार्य' अर्थ होने पर, भगवान् के वे राग आदि प्रतिपक्ष नहीं हैं जिन्हें हरा (दूर किया) जाना चाहिए; पृथग्जनों के भी उपक्लेश-रहित, आठ गुणों से युक्त चित्त में प्रतिपक्ष के नष्ट हो जाने पर ऋद्धि-विधि प्रवृत्त होती है। इसलिए वहाँ प्रयुक्त व्यवहार के अनुसार यहाँ 'प्रातिहार्य' नहीं कहा जा सकता। परन्तु चूँकि महाकारुणिक भगवान् के लिए विनेय जनों (शिष्यों) के क्लेश ही प्रतिपक्ष हैं, अतः उनके हरण (निवारण) के कारण 'प्रातिहार्य' है। अथवा भगवान् और शासन के प्रतिपक्ष तीर्थिक (अन्य मतावलम्बी) हैं, उनके हरण के कारण 'प्रातिहार्य' है। वे दृष्टि-हरण के द्वारा और दृष्टि-प्रकाशन में असमर्थ होने के कारण ऋद्धि, आदेशना और अनुशासनी द्वारा हृत (पराजित) या अपनीत हो जाते हैं। 'प्रति' का अर्थ 'पश्चात्' (बाद में) भी है। इसलिए समाहित चित्त में, उपक्लेशों के दूर हो जाने पर, कृतकृत्य (कार्य पूर्ण करने वाले) द्वारा बाद में जो हरण करने योग्य (प्रवृत्त करने योग्य) है, वह 'प्रातिहार्य' है। अथवा अपने उपक्लेशों के चतुर्थ ध्यान और मार्गों द्वारा हृत (नष्ट) हो जाने पर, बाद में जो हरण (प्रवर्तन) है, वह 'प्रातिहार्य' है। ऋद्धि, आदेशना और अनुशासनी को उपक्लेश-रहित कृतकृत्य व्यक्ति द्वारा सत्त्वों के हित के लिए पुनः प्रवृत्त किया जाना चाहिए, और अपने उपक्लेशों के हृत हो जाने पर दूसरों की सन्तान (चित्त-परम्परा) में उपक्लेशों का हरण करने वाले होने के कारण वे 'प्रातिहार्य' होते हैं। प्रातिहार्य ही 'पातिहारिय' है, अथवा ऋद्धि, आदेशना और अनुशासनी के समूह रूप प्रातिहार्य में होने वाले एक-एक को 'प्रातिहार्य' कहा जाता है। अथवा चतुर्थ ध्यान और मार्ग प्रतिपक्ष का हरण करने के कारण 'प्रातिहार्य' हैं, उनमें उत्पन्न, या उनके निमित्त होने पर, या उनसे आने के कारण 'प्रातिहार्य' (पातिहारिय) कहलाता है। යස්මා පන තන්තිඅත්ථදෙසනාතබ්බොහාරාභිසමයසඞ්ඛාතා හෙතුහෙතුඵලතදුභයපඤ්ඤත්තිපටිවෙධසඞ්ඛාතා වා ධම්මත්ථදෙසනාපටිවෙධා ගම්භීරා, අනුපචිතසම්භාරෙහි සසාදීහි විය මහාසමුද්දො දුක්ඛොගාළ්හා අලබ්භනෙය්යප්පතිට්ඨා ච. තස්මා තෙහි චතූහි ගම්භීරභාවෙහි යුත්තන්ති ධම්මත්ථදෙසනාපටිවෙධගම්භීරං. चूँकि आगम, अर्थ, देशना और व्यवहार-अभिसमय के रूप में कहे गए, अथवा हेतु, हेतु-फल, उन दोनों की प्रज्ञप्ति और प्रतिवेध के रूप में कहे गए धर्म, अर्थ, देशना और प्रतिवेध गम्भीर हैं, और अपर्याप्त पुण्य-संभार वाले व्यक्तियों के लिए वे खरगोशों के लिए महासागर की तरह कठिनता से प्रवेश करने योग्य और आधार न पाने योग्य हैं। इसलिए, उन चार प्रकार की गम्भीरताओं से युक्त होने के कारण, इसे धर्म, अर्थ, देशना और प्रतिवेध में गम्भीर कहा गया है। එකො එව භගවතො ධම්මදෙසනාඝොසො එකස්මිං ඛණෙ පවත්තමානො නානාභාසානං සත්තානං අත්තනො අත්තනො භාසාවසෙන අපුබ්බං අචරිමං ගහණූපගො හුත්වා අත්ථාධිගමාය හොති. අචින්තෙය්යො හි [Pg.20] බුද්ධානං බුද්ධානුභාවොති සබ්බසත්තානං සකසකභාසානුරූපතො සොතපථමාගච්ඡතීති වෙදිතබ්බං. भगवान् की धर्म-देशना की एक ही ध्वनि, एक ही क्षण में प्रवर्तित होते हुए, विभिन्न भाषाओं वाले सत्त्वों के लिए अपनी-अपनी भाषा के अनुसार, बिना किसी पूर्व-अपर क्रम के ग्रहण करने योग्य होकर अर्थ-बोध के लिए होती है। बुद्धों का बुद्ध-अनुभाव अचिन्त्य है, इसलिए यह समझना चाहिए कि वह सभी सत्त्वों की अपनी-अपनी भाषा के अनुरूप श्रवण-पथ में आती है। නිදස්සනත්ථෙන – ‘‘නාහං සයම්භූ, න මයා ඉදං සච්ඡිකත’’න්ති අත්තානං පරිමොචෙන්තො – ‘‘ඉති මෙ සුතං, මයාපි එවං සුත’’න්ති ඉදානි වත්තබ්බං සකලං සුත්තං නිදස්සෙති. निदर्शन के अर्थ में—'मैं स्वयंभू नहीं हूँ, यह मेरे द्वारा साक्षात्कार नहीं किया गया है'—इस प्रकार स्वयं को मुक्त करते हुए—'ऐसा मैंने सुना है, मेरे द्वारा भी ऐसा सुना गया है'—इस प्रकार अब कहे जाने वाले सम्पूर्ण सुत्त का निदर्शन करते हैं। අවධාරණත්ථෙන – ‘‘එතදග්ගං, භික්ඛවෙ, මම සාවකානං භික්ඛූනං බහුස්සුතානං යදිදං ආනන්දො, ගතිමන්තානං, සතිමන්තානං, ධිතිමන්තානං, උපට්ඨාකානං යදිදං ආනන්දො’’ති (අ. නි. 1.219-223) එවං භගවතා, ‘‘ආයස්මා ආනන්දො අත්ථකුසලො ධම්මකුසලො බ්යඤ්ජනකුසලො නිරුත්තිකුසලො පුබ්බාපරකුසලො’’ති (අ. නි. 5.169) එවං ධම්මසෙනාපතිනා ච පසත්ථභාවානුරූපං අත්තනො ධාරණබලං දස්සෙන්තො සත්තානං සොතුකම්යතං ජනෙති – ‘‘ඉති මෙ සුතං, තඤ්ච ඛො අත්ථතො වා බ්යඤ්ජනතො වා අනූනමනධිකං, එවමෙව, න අඤ්ඤථා, දට්ඨබ්බ’’න්ති. අඤ්ඤථාති භගවතො සම්මුඛා සුතාකාරතො අඤ්ඤථා, න පන භගවතා දෙසිතාකාරතො. අචින්තෙය්යානුභාවා හි භගවතො දෙසනා, සා න සබ්බාකාරෙන සක්කා විඤ්ඤාතුන්ති වුත්තොවායමත්ථො. සුතාකාරාවිරුජ්ඣනමෙව හි ධාරණබලං. න හෙත්ථ අත්ථන්තරතාපරිහාරො ද්වින්නම්පි අත්ථානං එකවිසයත්තා. ඉතරථා හි ථෙරො භගවතො දෙසනාය සබ්බථා පටිග්ගහණෙ සමත්ථො අසමත්ථොති වා ආපජ්ජෙය්යාති. अवधारण (निश्चय) के अर्थ में—'भिक्षुओं, मेरे बहुश्रुत श्रावक भिक्षुओं में यह आनन्द अग्र है, गतिमानों में, स्मृतिमानों में, धृतिमानों में और उपस्थाकों में यह आनन्द अग्र है'—इस प्रकार भगवान् द्वारा, और 'आयुष्मान आनन्द अर्थ-कुशल, धर्म-कुशल, व्यंजन-कुशल, निरुक्ति-कुशल और पूर्वापर-कुशल हैं'—इस प्रकार धर्मसेनापति द्वारा की गई प्रशंसा के अनुरूप अपनी धारण-शक्ति को प्रदर्शित करते हुए सत्त्वों में सुनने की इच्छा जागृत करते हैं—'ऐसा मैंने सुना है, और वह अर्थ से या व्यंजन से न कम है न अधिक, वह वैसा ही है, अन्यथा नहीं, ऐसा देखा जाना चाहिए'। 'अन्यथा' का अर्थ है भगवान् के सम्मुख सुनने के प्रकार से भिन्न, न कि भगवान् द्वारा देशित प्रकार से भिन्न। क्योंकि भगवान् की देशना अचिन्त्य प्रभाव वाली है, उसे सभी प्रकार से जानना संभव नहीं है—यही अर्थ यहाँ कहा गया है। सुनने के प्रकार से विरोध न होना ही धारण-शक्ति है। यहाँ अर्थान्तरता का परिहार नहीं है क्योंकि दोनों ही अर्थों का विषय एक ही है। अन्यथा, यह आपत्ति होगी कि स्थविर भगवान् की देशना को सभी प्रकार से ग्रहण करने में समर्थ थे या असमर्थ। මෙ-සද්දො තීසු අත්ථෙසු දිස්සති. තථා හිස්ස – ‘‘ගාථාභිගීතං මෙ අභොජනෙය්ය’’න්තිආදීසු (සං. නි. 1.194; සු. නි. 81) මයාති අත්ථො. ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතූ’’තිආදීසු (සං. නි. 4.88; 5.381; අ. නි. 4.257) මය්හන්ති අත්ථො. ‘‘ධම්මදායාදා මෙ, භික්ඛවෙ, භවථා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.29) මමාති අත්ථො. ඉධ පන ‘‘මයා සුත’’න්ති ච ‘‘මම සුත’’න්ති ච අත්ථද්වයෙ යුජ්ජති. 'मे' शब्द तीन अर्थों में देखा जाता है। जैसे—'गाथाभिगीतं मे अभोजनेय्यं' आदि में 'मया' (मेरे द्वारा) यह अर्थ है। 'साधु मे, भन्ते, भगवा संखित्तेन धम्मं देसेतु' आदि में 'मय्हं' (मेरे लिए) यह अर्थ है। 'धम्मदायादा मे, भिक्खवे, भवथ' आदि में 'मम' (मेरा) यह अर्थ है। यहाँ तो 'मया सुतं' और 'मम सुतं' इन दोनों अर्थों में यह उपयुक्त है। එත්ථ ච යො පරො න හොති, සො අත්තාති එවං වත්තබ්බෙ නියකජ්ඣත්තසඞ්ඛාතෙ සකසන්තානෙ වත්තනතො තිවිධොපි මෙ-සද්දො යදිපි එකස්මිංයෙව අත්ථෙ දිස්සති, කරණසම්පදානාදිවිසෙසසඞ්ඛාතො පනස්ස විජ්ජතෙවායං අත්ථභෙදොති ආහ – ‘‘මෙ-සද්දො තීසු අත්ථෙසු දිස්සතී’’ති. और यहाँ जो 'पर' (दूसरा) नहीं है, वह 'आत्मा' है—इस प्रकार कहे जाने वाले अपने ही भीतर स्थित अपने सन्तान में प्रवृत्त होने के कारण, यद्यपि 'मे' शब्द इन तीनों ही अर्थों में एक ही अर्थ में देखा जाता है, फिर भी करण, सम्प्रदान आदि के विशेष भेद से इसका यह अर्थ-भेद विद्यमान ही है, इसीलिए कहा—''मे' शब्द तीन अर्थों में देखा जाता है'। සුතන්ති [Pg.21] අයං සුත-සද්දො සඋපසග්ගො අනුපසග්ගො ච ගමනවිස්සුතකිලින්නූපචිතානුයොගසොතවිඤ්ඤෙය්යසොතද්වාරානුසාරවිඤ්ඤාතාදිඅනෙකත්ථප්පභෙදො. කිඤ්චාපි හි කිරියාවිසෙසකො උපසග්ගො, ජොතකභාවතො පන සතිපි තස්මිං සුත-සද්දො එව තං තං අත්ථං වදතීති අනුපසග්ගස්ස සුතසද්දස්ස අත්ථුද්ධාරෙ සඋපසග්ගොපි උදාහරීයති. 'सुतं'—यह 'सुत' शब्द उपसर्ग के साथ और उपसर्ग के बिना गमन, विख्यात, क्लिन्न, उपचित, अनुयोग, श्रोत्र-विज्ञेय और श्रोत्र-द्वार के अनुसार विज्ञात आदि अनेक अर्थ-भेदों वाला है। यद्यपि उपसर्ग क्रिया का विशेषक होता है, फिर भी द्योतक होने के कारण उसके होने पर भी 'सुत' शब्द ही उन-उन अर्थों को कहता है; इसलिए बिना उपसर्ग वाले 'सुत' शब्द के अर्थ-उद्धरण में उपसर्ग युक्त उदाहरण भी दिए जाते हैं। තත්ථ ‘‘සෙනාය පසුතො’’තිආදීසු ගච්ඡන්තොති අත්ථො. ‘‘සුතධම්මස්ස පස්සතො’’තිආදීසු (උදා. 11) විස්සුතධම්මස්සාති අත්ථො. ‘‘අවස්සුතා අවස්සුතස්සා’’තිආදීසු (පාචි. 657) කිලින්නා කිලින්නස්සාති අත්ථො. ‘‘තුම්හෙහි පුඤ්ඤං පසුතං අනප්පක’’න්තිආදීසු (ඛු. පා. 7.12) උපචිතන්ති අත්ථො. ‘‘යෙ ඣානප්පසුතා ධීරා’’තිආදීසු (ධ. ප. 181) ඣානානුයුත්තාති අත්ථො. ‘‘දිට්ඨං සුතං මුත’’න්තිආදීසු (ම. නි. 1.241) සොතවිඤ්ඤෙය්යන්ති අත්ථො. ‘‘සුතධරො සුතසන්නිචයො’’තිආදීසු (ම. නි. 1.339) සොතද්වාරානුසාරවිඤ්ඤාතධරොති අත්ථො. ඉධ පනස්ස ‘‘සොතද්වාරානුසාරෙන උපධාරිත’’න්ති වා ‘‘උපධාරණ’’න්ති වා අත්ථො. මෙ-සද්දස්ස හි මයාති අත්ථෙ සති ‘‘ඉති මෙ සුතං, මයා සොතද්වාරානුසාරෙන උපධාරිත’’න්ති අත්ථො. මමාති අත්ථෙ සති ‘‘ඉති මම සුතං සොතද්වාරානුසාරෙන උපධාරණ’’න්ති අත්ථො. वहाँ 'सेनाय पसुतो' आदि में 'जाता हुआ' अर्थ है। 'सुतधम्मस्स पस्सतो' आदि में 'विख्यात धर्म' अर्थ है। 'अवस्सुता अवस्सुतस्स' आदि में 'क्लिन्न' अर्थ है। 'तुम्हेहि पुञ्ञं पसुतं अनप्पकं' आदि में 'उपचित' अर्थ है। 'ये झानप्पसुता धीरा' आदि में 'ध्यान में लगे हुए' अर्थ है। 'दिट्ठं सुतं मुतं' आदि में 'श्रोत्र-विज्ञेय' अर्थ है। 'सुतधरो सुतसन्निचयो' आदि में 'श्रोत्र-द्वार के अनुसार विज्ञात को धारण करने वाला' अर्थ है। यहाँ तो इसका अर्थ 'श्रोत्र-द्वार के अनुसार अवधारित' या 'अवधारण' है। 'मे' शब्द का 'मया' अर्थ होने पर—'ऐसा मैंने सुना है, मेरे द्वारा श्रोत्र-द्वार के अनुसार अवधारित किया गया है'—यह अर्थ होता है। 'मम' अर्थ होने पर—'ऐसा मेरा श्रुत है, श्रोत्र-द्वार के अनुसार अवधारण है'—यह अर्थ होता है। එවමෙතෙසු තීසු පදෙසු යස්මා සුතසද්දසන්නිධානෙ පයුත්තෙන ඉතිසද්දෙන සවනකිරියාජොතකෙන භවිතබ්බං. තස්මා ඉතීති සොතවිඤ්ඤාණාදිවිඤ්ඤාණකිච්චනිදස්සනං. මෙති වුත්තවිඤ්ඤාණසමඞ්ගිපුග්ගලනිදස්සනං. සබ්බානිපි වාක්යානි එවකාරත්ථසහිතානියෙව අවධාරණඵලත්තා. තෙන සුතන්ති අස්සවනභාවප්පටික්ඛෙපතො අනූනාවිපරීතග්ගහණනිදස්සනං. යථා හි සුතං සුතමෙවාති වත්තබ්බතං අරහති, තං සම්මා සුතං අනූනග්ගහණං අවිපරීතග්ගහණඤ්ච හොතීති. අථ වා සද්දන්තරත්ථාපොහනවසෙන සද්දො අත්ථං වදතීති, යස්මා සුතන්ති එතස්ස අසුතං න හොතීති අයමත්ථො, තස්මා සුතන්ති අස්සවනභාවප්පටික්ඛෙපතො අනූනාවිපරීතග්ගහණනිදස්සනං. ඉදං වුත්තං හොති – ඉති මෙ සුතං, න දිට්ඨං, න සයම්භුඤාණෙන සච්ඡිකතං, න අඤ්ඤථා වා උපලද්ධං, අපිච සුතංව, තඤ්ච ඛො සම්මදෙවාති. අවධාරණත්ථෙ වා ඉතිසද්දෙ අයමත්ථයොජනාති තදපෙක්ඛස්ස සුත-සද්දස්ස නියමත්ථො [Pg.22] සම්භවතීති අස්සවනභාවප්පටික්ඛෙපො, අනූනාවිපරීතග්ගහණනිදස්සනතා ච වෙදිතබ්බා. එවං සවනහෙතුසවනවිසෙසවසෙන පදත්තයස්ස අත්ථයොජනා කතාති දට්ඨබ්බං. इस प्रकार इन तीन पदों में, क्योंकि 'सुत' शब्द के सान्निध्य में प्रयुक्त 'इति' शब्द को श्रवण-क्रिया का द्योतक होना चाहिए। इसलिए 'इति' श्रोत्र-विज्ञान आदि विज्ञान-कृत्यों का निदर्शन है। 'मे' उक्त विज्ञान से युक्त पुद्गल का निदर्शन है। सभी वाक्य 'एव' (ही) के अर्थ सहित ही होते हैं क्योंकि वे अवधारणा (निश्चय) के फल वाले होते हैं। उससे 'सुत' (सुना गया) अश्रवण-भाव के प्रतिषेध से अनून (पूर्ण) और अविपरीत (यथार्थ) ग्रहण का निदर्शन है। जैसे जो सुना गया है वह 'सुना ही गया' कहने योग्य होता है, वह सम्यक् रूप से सुना गया, अनून ग्रहण और अविपरीत ग्रहण होता है। अथवा, अन्य शब्दों के अर्थ के अपोहन (व्यावृत्ति) के वश से शब्द अर्थ को कहता है, क्योंकि 'सुत' इसका अर्थ 'असुत' (नहीं सुना गया) नहीं है, इसलिए 'सुत' अश्रवण-भाव के प्रतिषेध से अनून और अविपरीत ग्रहण का निदर्शन है। यह कहा गया है - 'इति मे सुतं' (ऐसा मैंने सुना), देखा नहीं, स्वयंभू ज्ञान से साक्षात्कार नहीं किया, न ही अन्यथा उपलब्ध किया, अपितु सुना ही है, और वह भी सम्यक् प्रकार से ही। अथवा 'इति' शब्द के अवधारणा अर्थ में यह अर्थ-योजना है कि उसकी अपेक्षा रखने वाले 'सुत' शब्द का नियम-अर्थ सम्भव होता है, अतः अश्रवण-भाव का प्रतिषेध और अनून-अविपरीत ग्रहण की निदर्शनता जाननी चाहिए। इस प्रकार श्रवण के हेतु और श्रवण के विशेष के वश से तीन पदों की अर्थ-योजना की गई है, ऐसा देखना चाहिए। තථා ඉතීති සොතද්වාරානුසාරෙන පවත්තාය විඤ්ඤාණවීථියා නානත්ථබ්යඤ්ජනග්ගහණතො නානප්පකාරෙන ආරම්මණෙ පවත්තිභාවප්පකාසනං ආකාරත්ථො ඉතිසද්දොති කත්වා. මෙති අත්තප්පකාසනං. සුතන්ති ධම්මප්පකාසනං යථාවුත්තාය විඤ්ඤාණවීථියා පරියත්තිධම්මාරම්මණත්තා. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපො – නානප්පකාරෙන ආරම්මණෙ පවත්තාය විඤ්ඤාණවීථියා කාරණභූතාය මයා න අඤ්ඤං කතං, ඉදං පන කතං, අයං ධම්මො සුතොති. उसी प्रकार 'इति' श्रोत्र-द्वार के अनुसार प्रवृत्त विज्ञान-वीथि द्वारा नाना अर्थों और व्यंजनों के ग्रहण से नाना प्रकार से आलम्बन में प्रवृत्ति-भाव का प्रकाशन है, क्योंकि 'इति' शब्द आकार-अर्थ (प्रकार-अर्थ) वाला है। 'मे' आत्म-प्रकाशन (स्वयं का निर्देश) है। 'सुत' धर्म-प्रकाशन है क्योंकि यथाोक्त विज्ञान-वीथि द्वारा पर्यत्ति-धर्म आलम्बन होता है। यहाँ यह संक्षेप है - नाना प्रकार से आलम्बन में प्रवृत्त विज्ञान-वीथि के कारणभूत मेरे द्वारा अन्य कुछ नहीं किया गया, बल्कि यह किया गया कि यह धर्म सुना गया। තථා ඉතීති නිදස්සිතබ්බප්පකාසනං නිදස්සනත්ථො ඉති-සද්දොති කත්වා නිදස්සෙතබ්බස්ස නිදස්සිතබ්බත්තාභාවාභාවතො. තස්මා ඉතිසද්දෙන සකලම්පි සුතං පච්චාමට්ඨන්ති වෙදිතබ්බං. මෙති පුග්ගලප්පකාසනං. සුතන්ති පුග්ගලකිච්චප්පකාසනං. සුත-සද්දෙන හි ලබ්භමානා සවනකිරියා සවනවිඤ්ඤාණප්පබන්ධප්පටිබද්ධා, තත්ථ ච පුග්ගලවොහාරො. න හි පුග්ගලවොහාරරහිතෙ ධම්මප්පබන්ධෙ සවනකිරියා ලබ්භති. තස්සායං සඞ්ඛෙපත්ථො – යං සුත්තං නිද්දිසිස්සාමි, තං මයා ඉති සුතන්ති. उसी प्रकार 'इति' निदर्शितव्य (दिखाने योग्य) का प्रकाशन है, क्योंकि 'इति' शब्द निदर्शन-अर्थ वाला है, निदर्शितव्य के निदर्शितव्यत्व के अभाव के न होने से। इसलिए 'इति' शब्द द्वारा सम्पूर्ण श्रुत (सुने हुए) का परामर्श किया गया है, ऐसा जानना चाहिए। 'मे' पुद्गल-प्रकाशन है। 'सुत' पुद्गल-कृत्य का प्रकाशन है। क्योंकि 'सुत' शब्द से प्राप्त होने वाली श्रवण-क्रिया श्रवण-विज्ञान के प्रबन्ध (प्रवाह) से प्रतिबद्ध है, और वहाँ पुद्गल-व्यवहार होता है। पुद्गल-व्यवहार से रहित धर्म-प्रबन्ध में श्रवण-क्रिया प्राप्त नहीं होती। उसका यह संक्षेप अर्थ है - जिस सूत्र का मैं निर्देश करूँगा, वह मेरे द्वारा इस प्रकार सुना गया है। තථා ඉතීති යස්ස චිත්තසන්තානස්ස නානාරම්මණප්පවත්තියා නානත්ථබ්යඤ්ජනග්ගහණං හොති, තස්ස නානාකාරනිද්දෙසො ආකාරත්ථො ඉතිසද්දොති කත්වා. ඉතීති හි අයං ආකාරපඤ්ඤත්ති ධම්මානං තං තං පවත්තිආකාරං උපාදාය පඤ්ඤාපෙතබ්බසභාවත්තා. මෙති කත්තුනිද්දෙසො. සුතන්ති විසයනිද්දෙසො. සොතබ්බො හි ධම්මො සවනකිරියාකත්තුපුග්ගලස්ස සවනකිරියාවසෙන පවත්තිට්ඨානං හොති. එත්තාවතා නානප්පකාරප්පවත්තෙන චිත්තසන්තානෙන තංසමඞ්ගිනො කත්තු විසයෙ ගහණසන්නිට්ඨානං දස්සිතං හොති. उसी प्रकार 'इति' जिस चित्त-सन्तान की नाना आलम्बनों में प्रवृत्ति से नाना अर्थों और व्यंजनों का ग्रहण होता है, उसका नाना प्रकार से निर्देश है, क्योंकि 'इति' शब्द आकार-अर्थ वाला है। 'इति' यह आकार-प्रज्ञप्ति है क्योंकि धर्मों के उन-उन प्रवृत्ति-आकारों को लेकर प्रज्ञप्त किए जाने का स्वभाव है। 'मे' कर्ता का निर्देश है। 'सुत' विषय का निर्देश है। क्योंकि श्रोतव्य धर्म श्रवण-क्रिया के कर्ता पुद्गल के लिए श्रवण-क्रिया के वश से प्रवृत्ति का स्थान होता है। इतने से नाना प्रकार से प्रवृत्त चित्त-सन्तान द्वारा उस (चित्त-सन्तान) से युक्त कर्ता का विषय में ग्रहण का विनिश्चय दिखाया गया है। අථ වා ඉතීති පුග්ගලකිච්චනිද්දෙසො. සුතානඤ්හි ධම්මානං ගහිතාකාරස්ස නිදස්සනස්ස අවධාරණස්ස වා පකාසනභාවෙන ඉතිසද්දෙන තදාකාරාදිධාරණස්ස පුග්ගලවොහාරූපාදානධම්මබ්යාපාරභාවතො පුග්ගලකිච්චං [Pg.23] නාම නිද්දිට්ඨං හොතීති. සුතන්ති විඤ්ඤාණකිච්චනිද්දෙසො. පුග්ගලවාදිනොපි හි සවනකිරියා විඤ්ඤාණනිරපෙක්ඛා න හොතීති. මෙති උභයකිච්චයුත්තපුග්ගලනිද්දෙසො. මෙති හි සද්දප්පවත්ති එකන්තෙනෙව සත්තවිසෙසවිසයා, විඤ්ඤාණකිච්චඤ්ච තත්ථෙව සමොදහිතබ්බන්ති. අයං පනෙත්ථ සඞ්ඛෙපො – මයා සවනකිච්චවිඤ්ඤාණසමඞ්ගිනා පුග්ගලෙන විඤ්ඤාණවසෙන ලද්ධස්සවනකිච්චවොහාරෙන සුතන්ති. अथवा 'इति' पुद्गल-कृत्य का निर्देश है। क्योंकि सुने हुए धर्मों के गृहीत आकार के निदर्शन या अवधारणा के प्रकाशन भाव से 'इति' शब्द द्वारा उस आकार आदि के धारण का पुद्गल-व्यवहार के उपादान धर्म के व्यापार रूप होने से 'पुद्गल-कृत्य' निर्दिष्ट होता है। 'सुत' विज्ञान-कृत्य का निर्देश है। क्योंकि पुद्गलवादी के लिए भी श्रवण-क्रिया विज्ञान-निरपेक्ष नहीं होती। 'मे' दोनों कृत्यों से युक्त पुद्गल का निर्देश है। क्योंकि 'मे' इस शब्द की प्रवृत्ति एकान्ततः सत्त्व-विशेष के विषय में होती है, और विज्ञान-कृत्य का भी वहीं समावेश होना चाहिए। यहाँ यह संक्षेप है - मुझ श्रवण-कृत्य-विज्ञान से युक्त पुद्गल द्वारा, विज्ञान के वश से प्राप्त श्रवण-कृत्य-व्यवहार से, सुना गया है। තථා ඉතීති ච මෙති ච සච්චිකට්ඨපරමත්ථවසෙන අවිජ්ජමානපඤ්ඤත්ති. සබ්බස්ස හි සද්දාධිගමනීයස්ස අත්ථස්ස පඤ්ඤත්තිමුඛෙනෙව පටිපජ්ජිතබ්බත්තා සබ්බපඤ්ඤත්තීනඤ්ච විජ්ජමානාදීසු ඡස්වෙව පඤ්ඤත්තීසු අවරොධො, තස්මා යො මායාමරීචිආදයො විය අභූතත්ථො, අනුස්සවාදීහි ගහෙතබ්බො විය අනුත්තමත්ථො ච න හොති. සො රූපසද්දාදිකො රුප්පනානුභවනාදිකො ච පරමත්ථසභාවො සච්චිකට්ඨපරමත්ථවසෙන විජ්ජති. යො පන ඉතීති ච මෙති ච වුච්චමානො ආකාරාදිඅපරමත්ථසභාවො සච්චිකට්ඨපරමත්ථවසෙන අනුපලබ්භමානො අවිජ්ජමානපඤ්ඤත්ති නාම, කිමෙත්ථ තං පරමත්ථතො අත්ථි, යං ඉතීති වා මෙති වා නිද්දෙසං ලභෙථ. සුතන්ති විජ්ජමානපඤ්ඤත්ති. යඤ්හි තං සොතෙන උපලද්ධං, තං පරමත්ථතො විජ්ජමානන්ති. उसी प्रकार 'इति' और 'मे' सच्चिकट्ठ-परमत्थ (सत्य और परमार्थ) के वश से अविद्यमान-प्रज्ञप्ति हैं। क्योंकि शब्द से अधिगम करने योग्य सभी अर्थों को प्रज्ञप्ति के मुख से ही प्रतिपन्न (प्राप्त) किया जाना चाहिए और सभी प्रज्ञप्तियों का विद्यमान आदि छह प्रज्ञप्तियों में ही अवरोध (अन्तर्भाव) होता है, इसलिए जो माया-मरीचिका आदि के समान अभूत-अर्थ (असत्य अर्थ) वाला नहीं है, और अनुश्रव आदि द्वारा ग्रहण करने योग्य के समान अनुत्तम-अर्थ वाला नहीं है। वह रूप-शब्द आदि और रूपण-अनुभवन आदि परमार्थ-स्वभाव सच्चिकट्ठ-परमत्थ के वश से विद्यमान है। किन्तु जो 'इति' और 'मे' कहा जाने वाला आकार आदि अपरमार्थ-स्वभाव सच्चिकट्ठ-परमत्थ के वश से उपलब्ध नहीं होता, वह 'अविद्यमान-प्रज्ञप्ति' नाम वाला है; यहाँ परमार्थतः वह क्या है, जो 'इति' या 'मे' इस निर्देश को प्राप्त करे? 'सुत' विद्यमान-प्रज्ञप्ति है। क्योंकि जो वह कान से उपलब्ध किया गया है, वह परमार्थतः विद्यमान है। තථා ඉතීති සොතපථමාගතෙ ධම්මෙ උපාදාය තෙසං උපධාරිතාකාරාදීනං පච්චාමසනවසෙන. මෙති සසන්තතිපරියාපන්නෙ ඛන්ධෙ කරණාදිවිසෙසවිසිට්ඨෙ උපාදාය වත්තබ්බතො උපාදාපඤ්ඤත්ති. සුතන්ති දිට්ඨාදීනි උපනිධාය වත්තබ්බතො උපනිධාපඤ්ඤත්ති. දිට්ඨාදිසභාවරහිතෙ සද්දායතනෙ පවත්තමානොපි සුතවොහාරො දුතියං, තතියන්ති ආදිකො විය පඨමාදිං නිස්සාය ‘‘යං න දිට්ඨමුතවිඤ්ඤාතනිරපෙක්ඛං, තං සුත’’න්ති විඤ්ඤෙය්යත්තා දිට්ඨාදීනි උපනිධාය වත්තබ්බො හොති. අසුතං න හොතීති හි සුතන්ති පකාසිතොයමත්ථොති. तथा 'इति' शब्द श्रोत्र-पथ में आए हुए धर्मों को ग्रहण कर उनके अवधारित (निश्चित) आकार आदि के प्रत्यवेक्षण (परामर्श) के वश से है। 'मे' (मेरे द्वारा) यह अपनी सन्तान में अन्तर्भूत, करण आदि विशेषों से विशिष्ट स्कन्धों को उपादान (आधार) बनाकर कहे जाने के कारण 'उपादा-प्रज्ञप्ति' है। 'सुतं' (सुना गया) यह दृष्ट आदि की अपेक्षा से कहे जाने के कारण 'उपनिधा-प्रज्ञप्ति' है। दृष्ट आदि के स्वभाव से रहित शब्दायातन में प्रवृत्त होते हुए भी 'श्रुत' (सुना हुआ) यह व्यवहार, द्वितीय और तृतीय आदि के समान प्रथम आदि के आश्रय से, 'जो दृष्ट, मुत और विज्ञात की अपेक्षा के बिना है, वह श्रुत है'—इस प्रकार ज्ञेय होने के कारण दृष्ट आदि की अपेक्षा से कहा जाता है। 'जो अश्रुत नहीं है, वह श्रुत है'—यही अर्थ यहाँ प्रकाशित किया गया है। එත්ථ ච ඉතීති වචනෙන අසම්මොහං දීපෙති. පටිවිද්ධා හි අත්ථස්ස පකාරවිසෙසා ඉතීති ඉධ ආයස්මතා ආනන්දෙන පච්චාමට්ඨා, තෙනස්ස අසම්මොහො දීපිතො. න හි සම්මූළ්හො නානප්පකාරප්පටිවෙධසමත්ථො හොති, ලොභප්පහානාදිවසෙන නානප්පකාරා දුප්පටිවිද්ධා ච සුත්තත්ථා නිද්දිසීයන්ති[Pg.24]. සුතන්ති වචනෙන අසම්මොසං දීපෙති සුතාකාරස්ස යාථාවතො දස්සියමානත්තා යස්ස හි සුතං සම්මුට්ඨං හොති, න සො කාලන්තරෙ මයා සුතන්ති පටිජානාති. ඉච්චස්ස අසම්මොහෙන සම්මොහාභාවෙන පඤ්ඤාය එව වා සවනකාලසම්භූතාය තදුත්තරිකාලපඤ්ඤාසිද්ධි, තථා අසම්මොසෙන සතිසිද්ධි. තත්ථ පඤ්ඤාපුබ්බඞ්ගමාය සතියා බ්යඤ්ජනාවධාරණසමත්ථතා. බ්යඤ්ජනානඤ්හි පටිවිජ්ඣිතබ්බො ආකාරො නාතිගම්භීරො, යථාසුතධාරණමෙව තත්ථ කරණීයන්ති සතියා බ්යාපාරො අධිකො, පඤ්ඤා තත්ථ ගුණීභූතා හොති පඤ්ඤාය පුබ්බඞ්ගමාති කත්වා. සතිපුබ්බඞ්ගමාය පඤ්ඤාය අත්ථප්පටිවෙධසමත්ථතා. අත්ථස්ස හි පටිවිජ්ඣිතබ්බො ආකාරො ගම්භීරොති පඤ්ඤාය බ්යාපාරො අධිකො, සති තත්ථ ගුණීභූතා හොති සතියා පුබ්බඞ්ගමාති කත්වා. තදුභයසමත්ථතායොගෙන අත්ථබ්යඤ්ජනසම්පන්නස්ස ධම්මකොසස්ස අනුපාලනසමත්ථතාය ධම්මභණ්ඩාගාරිකත්තසිද්ධි. और यहाँ 'इति' शब्द से असंमोह (मोह-रहित अवस्था) को दीप्यमान करते हैं। क्योंकि अर्थ के प्रतिविद्ध (साक्षात्कृत) प्रकार-विशेष यहाँ आयुष्मान् आनन्द द्वारा 'इति' इस शब्द से परामृष्ट (स्पर्शित) किए गए हैं, उससे उनका असंमोह प्रकट होता है। क्योंकि सम्मूढ़ व्यक्ति नाना प्रकार के प्रतिवेध (साक्षात्कार) में समर्थ नहीं होता, और लोभ-प्रहाण आदि के वश से सूत्रों के अर्थ नाना प्रकार के और कठिनता से प्रतिवेध करने योग्य निर्दिष्ट किए जाते हैं। 'सुतं' शब्द से असंमोष (विस्मृति-रहित अवस्था) को दीप्यमान करते हैं, क्योंकि श्रवण के आकार को यथार्थ रूप से दिखाया गया है; जिसका सुना हुआ विस्मृत हो जाता है, वह कालान्तर में 'मेरे द्वारा सुना गया' ऐसा स्वीकार नहीं करता। इस प्रकार, असंमोह से या मोह के अभाव से, श्रवण काल में उत्पन्न प्रज्ञा से ही उसके उत्तरवर्ती काल की प्रज्ञा की सिद्धि होती है, तथा असंमोष से स्मृति की सिद्धि होती है। वहाँ प्रज्ञा-पुरंगमा स्मृति के द्वारा व्यंजनों (शब्दों) के अवधारण की समर्थता होती है। क्योंकि व्यंजनों का प्रतिवेध करने योग्य आकार बहुत गम्भीर नहीं होता, वहाँ जैसा सुना गया है वैसा ही धारण करना करणीय होता है, इसलिए वहाँ स्मृति का व्यापार अधिक होता है और प्रज्ञा वहाँ 'प्रज्ञा-पुरंगमा' होने के कारण गौण हो जाती है। स्मृति-पुरंगमा प्रज्ञा के द्वारा अर्थ-प्रतिवेध की समर्थता होती है। क्योंकि अर्थ का प्रतिवेध करने योग्य आकार गम्भीर होता है, इसलिए वहाँ प्रज्ञा का व्यापार अधिक होता है और स्मृति वहाँ 'स्मृति-पुरंगमा' होने के कारण गौण हो जाती है। उन दोनों (स्मृति और प्रज्ञा) की समर्थता के योग से, अर्थ और व्यंजन से सम्पन्न धर्म-कोष के अनुपालन की समर्थता होने से 'धर्म-भाण्डागारिकत्व' (धम्म-भण्डागारिक पद) की सिद्धि होती है। අපරො නයො – ඉතීති වචනෙන යොනිසොමනසිකාරං දීපෙති. තෙන වුච්චමානානං ආකාරනිදස්සනාවධාරණත්ථානං උපරි වක්ඛමානානං නානප්පකාරප්පටිවෙධජොතකානං අවිපරීතසද්ධම්මවිසයත්තා. න හි අයොනිසො මනසිකරොතො නානප්පකාරප්පටිවෙධො සම්භවති. සුතන්ති වචනෙන අවික්ඛෙපං දීපෙති, නිදානපුච්ඡාවසෙන පකරණප්පත්තස්ස වක්ඛමානස්ස සුත්තස්ස සවනං න සමාධානමන්තරෙන සම්භවති වික්ඛිත්තචිත්තස්ස සවනාභාවතො. තථා හි වික්ඛිත්තචිත්තො පුග්ගලො සබ්බසම්පත්තියා වුච්චමානොපි ‘‘න මයා සුතං, පුන භණථා’’ති වදති. යොනිසොමනසිකාරෙන චෙත්ථ අත්තසම්මාපණිධිං පුබ්බෙකතපුඤ්ඤතඤ්ච සාධෙති, සම්මා අප්පණිහිතත්තස්ස පුබ්බෙ අකතපුඤ්ඤස්ස වා තදභාවතො. අවික්ඛෙපෙන සද්ධම්මස්සවනං සප්පුරිසූපනිස්සයඤ්ච සාධෙති, අස්සුතවතො සප්පුරිසූපනිස්සයරහිතස්ස ච තදභාවතො. න හි වික්ඛිත්තචිත්තො සද්ධම්මං සොතුං සක්කොති, න ච සප්පුරිසෙ අනුපස්සයමානස්ස සවනං අත්ථි. दूसरा प्रकार—'इति' शब्द से योनिशो-मनसिकार को दीप्यमान करते हैं। क्योंकि उसके द्वारा कहे जाने वाले आकारों के निदर्शन और अवधारण के अर्थ, जो आगे कहे जाने वाले नाना प्रकार के प्रतिवेध के द्योतक हैं, अविपरीत सद्धर्म के विषय वाले हैं। क्योंकि अयोनिशो-मनसिकार करने वाले को नाना प्रकार का प्रतिवेध सम्भव नहीं होता। 'सुतं' शब्द से अविक्षेप (एकाग्रता) को दीप्यमान करते हैं, क्योंकि निदान-पृच्छा के वश से प्रकरण-प्राप्त कहे जाने वाले सूत्र का श्रवण समाधि के बिना सम्भव नहीं है, क्योंकि विक्षिप्त चित्त वाले का श्रवण नहीं होता। तथा ही, विक्षिप्त चित्त वाला पुद्गल सब प्रकार की सम्पत्ति (स्पष्टता) के साथ कहे जाने पर भी 'मैंने नहीं सुना, पुनः कहें' ऐसा कहता है। यहाँ योनिशो-मनसिकार से 'आत्म-सम्यक्-प्रणिधि' (अपने को सही मार्ग पर लगाना) और 'पूर्व-कृत-पुण्यता' को सिद्ध करते हैं, क्योंकि जिसका चित्त सम्यक् रूप से प्रणिहित नहीं है या जिसने पूर्व में पुण्य नहीं किया है, उसमें उसका अभाव होता है। अविक्षेप से सद्धर्म-श्रवण और सत्पुरुष-उपनिश्रय (सत्पुरुषों का आश्रय) को सिद्ध करते हैं, क्योंकि जो अश्रुतवान् है और सत्पुरुष-उपनिश्रय से रहित है, उसमें उसका अभाव होता है। क्योंकि विक्षिप्त चित्त वाला सद्धर्म को सुनने में समर्थ नहीं होता, और न ही सत्पुरुषों का आश्रय न लेने वाले के लिए श्रवण सम्भव है। අපරො නයො – ‘‘යස්ස චිත්තසන්තානස්ස නානාකාරප්පවත්තියා නානත්ථබ්යඤ්ජනග්ගහණං හොති, තස්ස නානාකාරනිද්දෙසො’’ති වුත්තං. යස්මා ච සො භගවතො වචනස්ස අත්ථබ්යඤ්ජනප්පභෙදපරිච්ඡෙදවසෙන සකලසාසනසම්පතිඔගාහනෙන නිරවසෙසපරහිතපාරිපූරිකාරණභූතො එවංභද්දකො [Pg.25] ආකාරො න සම්මා අප්පණිහිතත්තනො පුබ්බෙ අකතපුඤ්ඤස්ස වා හොති, තස්මා ඉතීති ඉමිනා භද්දකෙන ආකාරෙන පච්ඡිමචක්කද්වයසම්පත්තිමත්තනො දීපෙති, සුතන්ති සවනයොගෙන පුරිමචක්කද්වයසම්පත්තිං. න හි අප්පතිරූපෙ දෙසෙ වසතො සප්පුරිසූපනිස්සයරහිතස්ස වා සවනං අත්ථි. ඉච්චස්ස පච්ඡිමචක්කද්වයසිද්ධියා ආසයසුද්ධි සිද්ධා හොති, සම්මා පණිහිතත්තො පුබ්බෙ ච කතපුඤ්ඤො විසුද්ධාසයො හොති, තදවිසුද්ධිහෙතූනං කිලෙසානං දූරීභාවතො. තථා හි වුත්තං – ‘‘සම්මා පණිහිතං චිත්තං, සෙය්යසො නං තතො කරෙ’’ති (ධ. ප. 43) ‘‘කතපුඤ්ඤොසි ත්වං, ආනන්ද, පධානමනුයුඤ්ජ, ඛිප්පං හොහිසි අනාසවො’’ති (දී. නි. 2.207) ච. පුරිමචක්කද්වයසිද්ධියා පයොගසුද්ධි. පතිරූපදෙසවාසෙන හි සප්පුරිසූපනිස්සයෙන ච සාධූනං දිට්ඨානුගතිආපජ්ජනෙනපි විසුද්ධප්පයොගො හොති. තාය ච ආසයසුද්ධියා අධිගමබ්යත්තිසිද්ධි, පුබ්බෙ එව තණ්හාදිට්ඨිසංකිලෙසානං විසොධිතත්තා පයොගසුද්ධියා ආගමබ්යත්තිසිද්ධි. සුපරිසුද්ධකායවචීපයොගො හි විප්පටිසාරාභාවතො අවික්ඛිත්තචිත්තො පරියත්තියං විසාරදො හොති. ඉති පයොගාසයසුද්ධස්ස ආගමාධිගමසම්පන්නස්ස වචනං අරුණුග්ගමනං විය සූරියස්ස උදයතො, යොනිසොමනසිකාරො විය ච කුසලධම්මස්ස, අරහති භගවතො වචනස්ස පුබ්බඞ්ගමං භවිතුන්ති ඨානෙ නිදානං ඨපෙන්තො ඉති මෙ සුතන්තිආදිමාහ. दूसरा प्रकार—'जिस चित्त-सन्तान की नाना प्रकार की प्रवृत्ति से नाना अर्थों और व्यंजनों का ग्रहण होता है, उसका नाना प्रकार से निर्देश है'—ऐसा कहा गया है। और चूँकि भगवान् के वचन के अर्थ और व्यंजन के प्रभेद और परिच्छेद के वश से, सकल शासन की सम्प्राप्ति में अवगाहन करने से, निरवशेष परहित की परिपूर्णता का कारणभूत ऐसा कल्याणकारी आकार, सम्यक् रूप से अप्रणिहित-चित्त वाले या पूर्व में पुण्य न करने वाले का नहीं होता, इसलिए 'इति' इस कल्याणकारी आकार से अपनी 'पश्चिम-चक्र-द्वय' (अन्तिम दो चक्रों) की सम्पत्ति को दीप्यमान करते हैं, और 'सुतं' इस श्रवण-योग से 'पूर्व-चक्र-द्वय' (प्रथम दो चक्रों) की सम्पत्ति को। क्योंकि अ-प्रतिरूप देश में रहने वाले या सत्पुरुष-उपनिश्रय से रहित व्यक्ति के लिए श्रवण सम्भव नहीं है। इस प्रकार, पश्चिम-चक्र-द्वय की सिद्धि से 'आशय-शुद्धि' सिद्ध होती है; जो सम्यक् रूप से प्रणिहित-चित्त वाला और पूर्व-कृत-पुण्य वाला होता है, वह विशुद्ध आशय वाला होता है, क्योंकि उसकी अशुद्धि के हेतुभूत क्लेश दूर हो जाते हैं। तथा ही कहा गया है—'सम्यक् प्रणिहित चित्त उसे (मनुष्य को) उससे (माता-पिता से भी) श्रेष्ठतर बना देता है' (धम्मपद ४३) और 'आनन्द! तुम कृत-पुण्य हो, प्रधान (पुरुषार्थ) में लगो, शीघ्र ही अनास्रव हो जाओगे' (दी.नि. २.२०७)। पूर्व-चक्र-द्वय की सिद्धि से 'प्रयोग-शुद्धि' होती है। प्रतिरूप देश-वास और सत्पुरुष-उपनिश्रय से साधुओं के दृष्टानुगति (आचरण का अनुकरण) को प्राप्त होने से भी प्रयोग विशुद्ध होता है। उस आशय-शुद्धि से 'अधिगम-व्युत्पत्ति' (साक्षात्कार की कुशलता) की सिद्धि होती है, क्योंकि पहले ही तृष्णा और दृष्टि रूपी संक्लेशों को शोधित कर लिया गया है; और प्रयोग-शुद्धि से 'आगम-व्युत्पत्ति' (शास्त्र-ज्ञान की कुशलता) की सिद्धि होती है। क्योंकि सुविशुद्ध काय-वचन वाला प्रयोग, विप्रतिसार (पश्चात्ताप) के अभाव के कारण अविक्षिप्त चित्त होकर पर्यप्ति (शास्त्र) में विशारद होता है। इस प्रकार, प्रयोग और आशय की शुद्धि वाले, आगम और अधिगम से सम्पन्न व्यक्ति का वचन, सूर्य के उदय के लिए अरुणोदय के समान और कुशल धर्मों के लिए योनिशो-मनसिकार के समान, भगवान् के वचन का पुरोगामी होने के योग्य है—ऐसा मानकर स्थान (प्रकरण) में निदान स्थापित करते हुए 'इति मे सुतं' आदि कहा। අපරො නයො – ඉතීති ඉමිනා පුබ්බෙ වුත්තනයෙන නානප්පකාරප්පටිවෙධදීපකෙන අත්තනො අත්ථපටිභානපටිසම්භිදාසම්පත්තිසබ්භාවං දීපෙති. සුතන්ති ඉමිනා ඉතිසද්දසන්නිධානතො වක්ඛමානාපෙක්ඛාය වා සොතබ්බභෙදප්පටිවෙධදීපකෙන ධම්මනිරුත්තිපටිසම්භිදාසම්පත්තිසබ්භාවං දීපෙති. ඉතීති ච ඉදං වුත්තනයෙනෙව යොනිසොමනසිකාරදීපකං වචනං භාසමානො ‘‘එතෙ මයා ධම්මා මනසානුපෙක්ඛිතා දිට්ඨියා සුප්පටිවිද්ධා’’ති දීපෙති. පරියත්තිධම්මා හි ‘‘ඉධ සීලං කථිතං, ඉධ සමාධි, ඉධ පඤ්ඤා, එත්තකා එත්ථ අනුසන්ධියො’’තිආදිනා නයෙන මනසා අනුපෙක්ඛිතා අනුස්සවාකාරපරිවිතක්කසහිතාය ධම්මනිජ්ඣානක්ඛන්තිභූතාය ඤාතපරිඤ්ඤාසඞ්ඛාතාය වා දිට්ඨියා තත්ථ තත්ථ වුත්තරූපාරූපධම්මෙ ‘‘ඉති රූපං, එත්තකං රූප’’න්තිආදිනා නයෙන සුට්ඨු වවත්ථපෙත්වා පටිවිද්ධා අත්තනො පරෙසඤ්ච හිතසුඛාවහා හොන්තීති. සුත්තන්ති ඉදං සවනයොගපරිදීපකවචනං භාසමානො ‘‘බහූ [Pg.26] මයා ධම්මා සුතා ධාතා වචසා පරිචිතා’’ති දීපෙති. සොතාවධානප්පටිබද්ධා හි පරියත්තිධම්මස්ස සවනධාරණපරිචයා. තදුභයෙනපි ධම්මස්ස ස්වාක්ඛාතභාවෙන අත්ථබ්යඤ්ජනපාරිපූරිං දීපෙන්තො සවනෙ ආදරං ජනෙති. අත්ථබ්යඤ්ජනපරිපුණ්ණඤ්හි ධම්මං ආදරෙන අස්සුණන්තො මහතා හිතා පරිබාහිරො හොතීති ආදරං ජනෙත්වා සක්කච්චං ධම්මො සොතබ්බො. दूसरा तरीका - 'इति' इस शब्द के द्वारा, पूर्व में कहे गए तरीके से, जो विभिन्न प्रकार के प्रतिवेध (बोध) को प्रकाशित करता है, वह अपनी अर्थ-प्रतिभान-प्रतिसम्भिदा की प्राप्ति के अस्तित्व को दर्शाता है। 'सुतं' (सुना) इस शब्द के द्वारा, 'इति' शब्द के सान्निध्य से या आगे कहे जाने वाले की अपेक्षा से, जो सुनने योग्य भेदों के प्रतिवेध को प्रकाशित करता है, वह धर्म-निरुक्ति-प्रतिसम्भिदा की प्राप्ति के अस्तित्व को दर्शाता है। 'इति' यह वचन, पूर्वोक्त रीति से ही योनिशो मनसिकार को प्रकाशित करते हुए, यह दर्शाता है कि 'ये धर्म मेरे द्वारा मन से अनुपेक्षित (चिन्तित) हैं और दृष्टि से सुप्रतिविद्ध (भली-भाँति समझे हुए) हैं'। क्योंकि पर्यप्ति धर्म 'यहाँ शील कहा गया है, यहाँ समाधि, यहाँ प्रज्ञा, यहाँ इतने अनुसन्धि (सम्बन्ध) हैं' आदि रीति से मन से अनुपेक्षित होते हैं; अनुश्रव के आकार वाले वितर्क सहित, धर्म-निध्यान-क्षान्ति स्वरूप या ज्ञात-परिज्ञा संज्ञक दृष्टि के द्वारा, वहाँ-वहाँ कहे गए रूप और अरूप धर्मों को 'यह रूप है, इतना रूप है' आदि रीति से भली-भाँति व्यवस्थित कर प्रतिविद्ध (साक्षात्कृत) किए जाने पर वे अपने और दूसरों के लिए हित और सुख लाने वाले होते हैं। 'सुतं' यह वचन श्रवण के योग (अभ्यास) को प्रकाशित करते हुए, यह दर्शाता है कि 'मेरे द्वारा बहुत से धर्म सुने गए, धारण किए गए और वचनों से परिचित किए गए हैं'। क्योंकि पर्यप्ति धर्म का श्रवण, धारण और परिचय कान लगाने (ध्यान देने) पर निर्भर है। इन दोनों के द्वारा भी धर्म के स्वाख्यात (सुन्दर ढंग से कहे गए) होने के कारण अर्थ और व्यंजन की परिपूर्णता को दर्शाते हुए, वह श्रवण में आदर उत्पन्न करता है। क्योंकि अर्थ और व्यंजन से परिपूर्ण धर्म को आदरपूर्वक न सुनने वाला महान हित से वंचित रह जाता है, इसलिए आदर उत्पन्न कर सत्कारपूर्वक धर्म सुनना चाहिए। ඉති මෙ සුතන්ති ඉමිනා පන සකලෙන වචනෙන ආයස්මා ආනන්දො තථාගතප්පවෙදිතං ධම්මවිනයං අත්තනො අදහන්තො අසප්පුරිසභූමිං අතික්කමති, සාවකත්තං පටිජානන්තො සප්පුරිසභූමිං ඔක්කමති. තථා අසද්ධම්මා චිත්තං වුට්ඨාපෙති, සද්ධම්මෙ චිත්තං පතිට්ඨාපෙති. ‘‘කෙවලං සුතමෙවෙතං මයා, තස්සෙව පන භගවතො වචන’’න්ති දීපෙන්තො අත්තානං පරිමොචෙති, සත්ථාරං අපදිසති, ජිනවචනං අප්පෙති, ධම්මනෙත්තිං පතිට්ඨාපෙති. परन्तु 'इति मे सुतं' (ऐसा मैंने सुना) इस सम्पूर्ण वचन के द्वारा आयुष्मान् आनन्द, तथागत द्वारा प्रवेदित धर्म और विनय को अपना न मानते हुए, असत्पुरुष-भूमि का अतिक्रमण करते हैं, और श्रावकत्व को स्वीकार करते हुए सत्पुरुष-भूमि में प्रवेश करते हैं। उसी प्रकार असद्धर्म से चित्त को हटाते हैं और सद्धर्म में चित्त को प्रतिष्ठित करते हैं। 'यह मेरे द्वारा केवल सुना गया है, परन्तु यह उन भगवान् का ही वचन है' - ऐसा दर्शाते हुए वे स्वयं को (दोष से) मुक्त करते हैं, शास्ता का निर्देश करते हैं, जिन-वचन को अर्पित करते हैं और धर्म-नेत्री (धर्म-मार्ग) को प्रतिष्ठित करते हैं। අපිච ඉති මෙ සුතන්ති අත්තනා උප්පාදිතභාවං අප්පටිජානන්තො පුරිමස්සවනං විවරන්තො සම්මුඛා පටිග්ගහිතමිදං මයා තස්ස භගවතො චතුවෙසාරජ්ජවිසාරදස්ස දසබලධරස්ස ආසභට්ඨානට්ඨායිනො සීහනාදනාදිනො සබ්බසත්තුත්තමස්ස ධම්මිස්සරස්ස ධම්මරාජස්ස ධම්මාධිපතිනො ධම්මදීපස්ස ධම්මසරණස්ස සද්ධම්මවරචක්කවත්තිනො සම්මාසම්බුද්ධස්ස. න එත්ථ අත්ථෙ වා ධම්මෙ වා පදෙ වා බ්යඤ්ජනෙ වා කඞ්ඛා වා විමති වා කාතබ්බාති සබ්බදෙවමනුස්සානං ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ අස්සද්ධියං විනාසෙති, සද්ධාසම්පදං උප්පාදෙති. තෙනෙතං වුච්චති – इसके अतिरिक्त, 'इति मे सुतं' कहते हुए, स्वयं द्वारा उत्पादित होने का दावा न करते हुए और पूर्व श्रवण को प्रकट करते हुए (वे कहते हैं) - 'यह मेरे द्वारा उन भगवान् के सम्मुख ग्रहण किया गया है, जो चार वैशारद्यों में विशारद हैं, दस बलों के धारक हैं, श्रेष्ठ स्थान (ऋषभ स्थान) पर स्थित हैं, सिंहनाद करने वाले हैं, सभी सत्त्वों में उत्तम हैं, धर्म के ईश्वर हैं, धर्मराज हैं, धर्माधिपति हैं, धर्म-द्वीप हैं, धर्म-शरण हैं, सद्धर्म रूपी श्रेष्ठ चक्र के प्रवर्तक हैं और सम्यक्सम्बुद्ध हैं। यहाँ न अर्थ में, न धर्म में, न पद में और न ही व्यंजन में कोई शंका या विमति (द्विधा) करनी चाहिए' - इस प्रकार वे सभी देवों और मनुष्यों के इस धर्म-विनय में अश्रद्धा का विनाश करते हैं और श्रद्धा-सम्पदा को उत्पन्न करते हैं। इसीलिए यह कहा गया है - ‘‘විනාසයති අස්සද්ධං, සද්ධං වඩ්ඪෙති සාසනෙ; ඉති මෙ සුතමිච්චෙවං, වදං ගොතමසාවකො’’ති. 'इति मे सुतं' ऐसा कहते हुए गौतम (बुद्ध) के श्रावक अश्रद्धा का विनाश करते हैं और शासन (धर्म) में श्रद्धा को बढ़ाते हैं। එත්ථාහ – ‘‘කස්මා පනෙත්ථ යථා අඤ්ඤෙසු සුත්තෙසු ‘එවං මෙ සුතං, එකං සමයං භගවා’තිආදිනා කාලදෙසෙ අපදිසිත්වාව නිදානං භාසිතං, එවං න භාසිත’’න්ති? අපරෙ තාව ආහු – න පන ථෙරෙන භාසිතත්තා. ඉදඤ්හි නිදානං න ආයස්මතා ආනන්දෙන පඨමං භාසිතං ඛුජ්ජුත්තරාය පන භගවතා උපාසිකාසු බහුස්සුතභාවෙන එතදග්ගෙ ඨපිතාය සෙක්ඛප්පටිසම්භිදාප්පත්තාය අරියසාවිකාය සාමාවතිප්පමුඛානං පඤ්චන්නං ඉත්ථිසතානං පඨමං භාසිතං. यहाँ कोई कहता है - 'परन्तु यहाँ अन्य सूत्रों की तरह 'एवं मे सुतं, एकं समयं भगवा' (ऐसा मैंने सुना, एक समय भगवान्...) आदि के द्वारा काल और देश का निर्देश करके निदान (प्रस्तावना) क्यों नहीं कहा गया, इस प्रकार क्यों नहीं कहा गया?' दूसरे (आचार्य) तो कहते हैं - क्योंकि यह स्थविर (आनन्द) द्वारा नहीं कहा गया है। यह निदान आयुष्मान् आनन्द द्वारा पहले नहीं कहा गया था, बल्कि खुज्जुत्तरा द्वारा, जिन्हें भगवान् ने उपासिकाओं में बहुश्रुत होने के कारण 'एतदग्ग' (सर्वश्रेष्ठ) पद पर स्थापित किया था, जो शैक्ष-प्रतिसम्भिदा प्राप्त आर्या श्राविका थीं, उनके द्वारा सामावती आदि पाँच सौ स्त्रियों को पहले कहा गया था। තත්රායං [Pg.27] අනුපුබ්බීකථා – ඉතො කිර කප්පසතසහස්සමත්ථකෙ පදුමුත්තරො නාම සම්මාසම්බුද්ධො ලොකෙ උප්පජ්ජිත්වා පවත්තිතවරධම්මචක්කො හංසවතියං විහරති. අථෙකදිවසං හංසවතියං එකා කුලධීතා සත්ථු ධම්මදෙසනං සොතුං ගච්ඡන්තීහි උපාසිකාහි සද්ධිං ආරාමං ගතා. සත්ථාරං එකං උපාසිකං බහුස්සුතානං එතදග්ගෙ ඨපෙන්තං දිස්වා අධිකාරං කත්වා තං ඨානන්තරං පත්ථෙසි. සත්ථාපි නං බ්යාකාසි ‘‘අනාගතෙ ගොතමස්ස නාම සම්මාසම්බුද්ධස්ස සාවිකානං උපාසිකානං බහුස්සුතානං අග්ගා භවිස්සතී’’ති. තස්සා යාවජීවං කුසලං කත්වා දෙවලොකෙ නිබ්බත්තිත්වා පුන මනුස්සෙසූති එවං දෙවමනුස්සෙසු සංසරන්තියා කප්පසතසහස්සං අතික්කන්තං. අථ ඉමස්මිං භද්දකප්පෙ අම්හාකං භගවතො කාලෙ සා දෙවලොකතො චවිත්වා ඝොසකසෙට්ඨිස්ස ගෙහෙ දාසියා කුච්ඡිස්මිං පටිසන්ධිං ගණ්හි, උත්තරාතිස්සා නාමං අකංසු. සා ජාතකාලෙ ඛුජ්ජා අහොසීති ඛුජ්ජුත්තරාත්වෙව පඤ්ඤායිත්ථ. සා අපරභාගෙ ඝොසකසෙට්ඨිනා රඤ්ඤො උතෙනස්ස සාමාවතියා දින්නකාලෙ තස්සා පරිචාරිකභාවෙන දින්නා රඤ්ඤො උතෙනස්ස අන්තෙපුරෙ වසති. वहाँ यह आनुपूर्वी कथा (क्रमवार कथा) है - कहते हैं कि यहाँ से एक लाख कल्प पूर्व पदुमुत्तर नामक सम्यक्सम्बुद्ध लोक में उत्पन्न हुए और श्रेष्ठ धर्मचक्र का प्रवर्तन कर हंसवती में विहार कर रहे थे। तब एक दिन हंसवती में एक कुल-पुत्री शास्ता की धर्म-देशना सुनने जाने वाली उपासिकाओं के साथ आराम (विहार) गई। शास्ता को एक उपासिका को बहुश्रुत लोगों में 'एतदग्ग' पद पर स्थापित करते देख, उसने पुण्य-कर्म (अधिकार) करके उस पद की प्रार्थना की। शास्ता ने भी उसे व्याकरण (भविष्यवाणी) किया - 'भविष्य में गौतम नामक सम्यक्सम्बुद्ध की श्राविका उपासिकाओं में तुम बहुश्रुत लोगों में अग्र (सर्वश्रेष्ठ) होगी'। उसने जीवन भर कुशल कर्म किए और देवलोक में उत्पन्न होकर पुनः मनुष्यों में - इस प्रकार देवों और मनुष्यों में संसरण करते हुए एक लाख कल्प बीत गए। फिर इस भद्रकल्प में हमारे भगवान् के समय में, वह देवलोक से च्युत होकर घोषक सेठ के घर में एक दासी की कोख में उत्पन्न हुई, उसका नाम उत्तरा रखा गया। वह जन्म के समय कुबड़ी (खुज्जा) थी, इसलिए वह 'खुज्जुत्तरा' के नाम से ही जानी गई। बाद में जब घोषक सेठ ने उसे राजा उदयन की (रानी) सामावती को दिया, तब वह उसकी परिचारिका के रूप में राजा उदयन के अन्तःपुर में रहने लगी। තෙන ච සමයෙන කොසම්බියං ඝොසකසෙට්ඨිකුක්කුටසෙට්ඨිපාවාරිකසෙට්ඨිනො භගවන්තං උද්දිස්ස තයො විහාරෙ කාරෙත්වා ජනපදචාරිකං චරන්තෙ තථාගතෙ කොසම්බිනගරං සම්පත්තෙ බුද්ධප්පමුඛස්ස භික්ඛුසඞ්ඝස්ස විහාරෙ නිය්යාදෙත්වා මහාදානානි පවත්තෙසුං, මාසමත්තං අතික්කමි. අථ නෙසං එතදහොසි – ‘‘බුද්ධා නාම සබ්බලොකානුකම්පකා, අඤ්ඤෙසම්පි ඔකාසං දස්සාමා’’ති කොසම්බිනගරවාසිනොපි ජනස්ස ඔකාසං අකංසු. තතො පට්ඨාය නාගරා වීථිසභාගෙන ගණසභාගෙන මහාදානං දෙන්ති. අථෙකදිවසං සත්ථා භික්ඛුසඞ්ඝපරිවුතො මාලාකාරජෙට්ඨකස්ස ගෙහෙ නිසීදි. තස්මිං ඛණෙ ඛුජ්ජුත්තරා සාමාවතියා පුප්ඵානි ගහෙතුං අට්ඨ කහාපණෙ ආදාය තං ගෙහං අගමාසි. මාලාකාරජෙට්ඨකො තං දිස්වා ‘‘අම්ම උත්තරෙ, අජ්ජ තුය්හං පුප්ඵානි දාතුං ඛණො නත්ථි, අහං බුද්ධප්පමුඛං භික්ඛුසඞ්ඝං පරිවිසාමි, ත්වම්පි පරිවෙසනාය සහායිකා හොහි, එවං ඉතො පරෙසං වෙය්යාවච්චකරණතො මුච්චිස්සසී’’ති ආහ. තතො ඛුජ්ජුත්තරා බුද්ධානං භත්තග්ගෙ වෙය්යාවච්චං අකාසි. සා සත්ථාරා උපනිසින්නකථාවසෙන කථිතං සබ්බමෙව ධම්මං උග්ගණ්හි, අනුමොදනං පන සුත්වා සොතාපත්තිඵලෙ පතිට්ඨාසි. उस समय कौशाम्बी में घोषक सेठ, कुक्कुट सेठ और पावारिक सेठ ने भगवान के लिए तीन विहार बनवाए। जब तथागत जनपद-चारिका करते हुए कौशाम्बी नगर पहुँचे, तो उन्होंने बुद्ध प्रमुख भिक्षु-संघ को विहार समर्पित कर दिए और महादान दिया। एक महीना बीत गया। तब उन्हें यह विचार आया— "बुद्ध समस्त लोक पर अनुकम्पा करने वाले होते हैं, हम दूसरों को भी अवसर देंगे।" ऐसा सोचकर उन्होंने कौशाम्बी नगर के निवासियों को भी अवसर दिया। तब से नगरवासी गलियों और समूहों के अनुसार महादान देने लगे। एक दिन शास्ता भिक्षु-संघ के साथ मालाकार (माली) के मुखिया के घर बैठे थे। उसी समय खुज्जुत्तरा सामावती के लिए फूल लेने के लिए आठ कहापण लेकर उस घर गई। मालाकार के मुखिया ने उसे देखकर कहा— "अम्मा उत्तरे! आज तुम्हें फूल देने का समय नहीं है, मैं बुद्ध प्रमुख भिक्षु-संघ की सेवा कर रहा हूँ, तुम भी सेवा में सहायिका बनो, इस प्रकार तुम दूसरों की सेवा करने (दासी भाव) से मुक्त हो जाओगी।" तब खुज्जुत्तरा ने बुद्धों के भोजन-शाला में सेवा की। उसने शास्ता द्वारा उपदेश के रूप में कहे गए सम्पूर्ण धर्म को ग्रहण किया और अनुमोदन सुनकर स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हो गई। සා [Pg.28] අඤ්ඤෙසු දිවසෙසු චත්තාරොව කහාපණෙ දත්වා පුප්ඵානි ගහෙත්වා ගච්ඡති, තස්මිං පන දිවසෙ දිට්ඨසච්චභාවෙන පරසන්තකෙ චිත්තං අනුප්පාදෙත්වා අට්ඨපි කහාපණෙ දත්වා පච්ඡිං පූරෙත්වා පුප්ඵානි ගහෙත්වා සාමාවතියා සන්තිකං අගමාසි. අථ නං සා පුච්ඡි ‘‘අම්ම උත්තරෙ, ත්වං අඤ්ඤෙසු දිවසෙසු න බහූනි පුප්ඵානි ආහරසි, අජ්ජ පන බහුකානි, කිං නො රාජා උත්තරිතරං පසන්නො’’ති? සා මුසා වත්තුං අභබ්බතාය අතීතෙ අත්තනා කතං අනිගූහිත්වා සබ්බං කථෙසි. අථ ‘‘කස්මා අජ්ජ බහූනි ආහරසී’’ති ච වුත්තා ‘‘අජ්ජාහං සම්මාසම්බුද්ධස්ස ධම්මං සුත්වා අමතං සච්ඡාකාසිං, තස්මා තුම්හෙ න වඤ්චෙමී’’ති ආහ. තං සුත්වා ‘‘අරෙ දුට්ඨදාසි, එත්තකං කාලං තයා ගහිතෙ කහාපණෙ දෙහී’’ති අතජ්ජෙත්වා පුබ්බහෙතුනා චොදියමානා ‘‘අම්ම, තයා පීතං අමතං, අම්හෙපි පායෙහී’’ති වත්වා ‘‘තෙන හි මං න්හාපෙහී’’ති වුත්තෙ සොළසහි ගන්ධොදකඝටෙහි න්හාපෙත්වා ද්වෙ මට්ඨසාටකෙ දාපෙසි. සා එකං නිවාසෙත්වා එකං පාරුපිත්වා ආසනං පඤ්ඤාපෙත්වා ආසනෙ නිසීදිත්වා විචිත්රබීජනිං ආදාය නීචාසනෙසු නිසින්නානි පඤ්ච මාතුගාමසතානි ආමන්තෙත්වා සෙඛප්පටිසම්භිදාසු ඨත්වා සත්ථාරා දෙසිතනියාමෙනෙව තාසං ධම්මං දෙසෙසි. දෙසනාවසානෙ තා සබ්බා සොතාපත්තිඵලෙ පතිට්ඨහිංසු. තා සබ්බාපි ඛුජ්ජුත්තරං වන්දිත්වා ‘‘අම්ම, අජ්ජ පට්ඨාය ත්වං කිලිට්ඨකම්මං මා කරි, අම්හාකං මාතුට්ඨානෙ ආචරියට්ඨානෙ ච පතිට්ඨාහී’’ති ගරුට්ඨානෙ ඨපයිංසු. वह अन्य दिनों में केवल चार कहापण देकर फूल लेकर जाती थी, परन्तु उस दिन सत्य का दर्शन (स्रोतापन्न) हो जाने के कारण, पराई वस्तु (धन) में चित्त न लगाते हुए, आठों कहापण देकर टोकरी भरकर फूल लेकर सामावती के पास गई। तब उसने (सामावती ने) उससे पूछा— "अम्मा उत्तरे! तुम अन्य दिनों में इतने अधिक फूल नहीं लाती थी, आज इतने अधिक क्यों हैं? क्या राजा हम पर अधिक प्रसन्न हो गए हैं?" झूठ बोलने में असमर्थ होने के कारण उसने अतीत में अपने द्वारा किए गए कार्य को न छिपाते हुए सब कुछ कह दिया। फिर "आज इतने अधिक क्यों लाई हो?" पूछे जाने पर उसने कहा— "आज मैंने सम्यक्सम्बुद्ध का धर्म सुनकर अमृत का साक्षात्कार किया है, इसलिए मैं तुम्हें धोखा नहीं देती।" यह सुनकर (सामावती ने) "अरे दुष्ट दासी! इतने समय तक तेरे द्वारा लिए गए कहापण दे" ऐसा कहकर उसे नहीं डराया, बल्कि पूर्व हेतु से प्रेरित होकर कहा— "अम्मा! तुमने जो अमृत पिया है, हमें भी पिलाओ।" तब (खुज्जुत्तरा ने) कहा— "तो फिर मुझे स्नान कराओ।" तब सोलह सुगन्धित जल के घड़ों से उसे स्नान कराकर दो महीन वस्त्र दिए गए। उसने एक पहना और एक ओढ़ा, आसन बिछाया और आसन पर बैठकर विचित्र पंखा लेकर नीचे के आसनों पर बैठी पाँच सौ स्त्रियों को सम्बोधित किया। शैक्ष-प्रतिसम्भिदाओं में स्थित होकर शास्ता द्वारा उपदिष्ट विधि से ही उन्हें धर्म का उपदेश दिया। देशना के अन्त में वे सभी स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हो गईं। उन सभी ने खुज्जुत्तरा की वन्दना की और कहा— "अम्मा! आज से तुम नीच कर्म (दासी का कार्य) मत करो, हमारे लिए माता के स्थान और आचार्य के स्थान पर प्रतिष्ठित हो।" इस प्रकार उसे गौरवपूर्ण स्थान पर स्थापित किया। කස්මා පනෙසා දාසී හුත්වා නිබ්බත්තාති? සා කිර කස්සපසම්මාසම්බුද්ධකාලෙ බාරාණසියං සෙට්ඨිධීතා හුත්වා නිබ්බත්තා. එකාය ඛීණාසවත්ථෙරියා උපට්ඨාකකුලං ගතාය ‘‘එතං මෙ අය්යෙ, පසාධනපෙළිකං දෙථා’’ති වෙය්යාවච්චං කාරෙසි. ථෙරීපි ‘‘අදෙන්තියා මයි ආඝාතං උප්පාදෙත්වා නිරයෙ නිබ්බත්තිස්සති, දෙන්තියා පරෙසං දාසී හුත්වා නිබ්බත්තිස්සති, නිරයසන්තාපතො දාසිභාවො සෙය්යො’’ති අනුද්දයං පටිච්ච තස්සා වචනං අකාසි. සා තෙන කම්මෙන පඤ්ච ජාතිසතානි පරෙසං දාසීයෙව හුත්වා නිබ්බත්ති. वह दासी होकर क्यों उत्पन्न हुई? वह काश्यप सम्यक्सम्बुद्ध के काल में वाराणसी में सेठ की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थी। एक क्षीणासव (अर्हत्) थेरी के उसके उपस्थाक कुल में आने पर उसने कहा— "आर्ये! यह मेरा श्रृंगार-पेटी मुझे दे दो" और उससे सेवा करवाई। थेरी ने भी यह सोचा— "यदि मैं नहीं दूँगी तो यह मुझ पर क्रोध करके नरक में उत्पन्न होगी, यदि दे दूँगी तो दूसरों की दासी होकर उत्पन्न होगी; नरक के संताप से दासी होना बेहतर है।" ऐसा सोचकर करुणावश उसकी बात मान ली। उस कर्म के कारण वह पाँच सौ जन्मों तक दूसरों की दासी ही होकर उत्पन्न हुई। කස්මා පන ඛුජ්ජා අහොසි? අනුප්පන්නෙ කිර බුද්ධෙ අයං බාරාණසිරඤ්ඤො ගෙහෙ වසන්තී එකං රාජකුලූපකං පච්චෙකබුද්ධං ථොකං ඛුජ්ජධාතුකං දිස්වා අත්තනා [Pg.29] සහවාසීනං මාතුගාමානං පුරතො පරිහාසං කරොන්තී යථාවජ්ජං කෙළිවසෙන ඛුජ්ජාකාරං දස්සෙසි, තස්මා ඛුජ්ජා හුත්වා නිබ්බත්ති. वह कुबड़ी क्यों हुई? बुद्ध के उत्पन्न न होने के समय, वह वाराणसी के राजा के घर में रहती थी। उसने राजकुल में आने वाले एक प्रत्येकबुद्ध को थोड़ा कुबड़ा देखा और अपने साथ रहने वाली स्त्रियों के सामने परिहास करते हुए खेल-खेल में कुबड़ा होने का अभिनय करके दिखाया। इस कारण वह कुबड़ी होकर उत्पन्न हुई। කිං පන කත්වා පඤ්ඤවන්තී ජාතාති? අනුප්පන්නෙ කිර බුද්ධෙ අයං බාරාණසිරඤ්ඤො ගෙහෙ වසන්තී අට්ඨ පච්චෙකබුද්ධෙ රාජගෙහතො උණ්හපායාසස්ස පූරිතෙ පත්තෙ පරිවත්තිත්වා පරිවත්තිත්වා ගණ්හන්තෙ දිස්වා අත්තනො සන්තකානි අට්ඨ දන්තවලයානි ‘‘ඉධ ඨපෙත්වා ගණ්හථා’’ති අදාසි. තෙ තථා කත්වා ඔලොකෙසුං. ‘‘තුම්හාකඤ්ඤෙව තානි පරිච්චත්තානි, ගහෙත්වා ගච්ඡථා’’ති ආහ. තෙ නන්දමූලකපබ්භාරං අගමංසු. අජ්ජාපි තානි වලයානි අරොගානෙව. සා තස්ස නිස්සන්දෙන පඤ්ඤවන්තී ජාතා. वह क्या करके प्रज्ञावान हुई? बुद्ध के उत्पन्न न होने के समय, वह वाराणसी के राजा के घर में रहती थी। उसने आठ प्रत्येकबुद्धों को राजभवन से गर्म खीर से भरे पात्रों को (हाथ जलने के कारण) बदल-बदल कर पकड़ते देखा, तो उसने अपने आठ हाथी-दाँत के कंगन उन्हें यह कहकर दिए— "इन्हें यहाँ (पात्र के नीचे) रखकर पकड़ें।" उन्होंने वैसा ही किया और उसकी ओर देखा। उसने कहा— "ये आप ही के लिए त्यागे गए हैं, इन्हें लेकर जाएँ।" वे नन्दमूलक पर्वत की गुफा में चले गए। आज भी वे कंगन वैसे ही सुरक्षित हैं। उस (पुण्य) के फल से वह प्रज्ञावान हुई। අථ නං සාමාවතිප්පමුඛානි පඤ්ච ඉත්ථිසතානි ‘‘අම්ම, ත්වං දිවසෙ දිවසෙ සත්ථු සන්තිකං ගන්ත්වා භගවතා දෙසිතං ධම්මං සුත්වා අම්හාකං දෙසෙහී’’ති වදිංසු. සා තථා කරොන්තී අපරභාගෙ තිපිටකධරා ජාතා. තස්මා නං සත්ථා – ‘‘එතදග්ගං, භික්ඛවෙ, මම සාවිකානං බහුස්සුතානං උපාසිකානං යදිදං ඛුජ්ජුත්තරා’’ති එතදග්ගෙ ඨපෙසි. ඉති උපාසිකාසු බහුස්සුතභාවෙන සත්ථාරා එතදග්ගෙ ඨපිතා පටිසම්භිදාප්පත්තා ඛුජ්ජුත්තරා අරියසාවිකා සත්ථරි කොසම්බියං විහරන්තෙ කාලෙන කාලං සත්ථු සන්තිකං ගන්ත්වා ධම්මං සුත්වා අන්තෙපුරං ගන්ත්වා සාමාවතිප්පමුඛානං පඤ්චන්නං ඉත්ථිසතානං අරියසාවිකානං සත්ථාරා දෙසිතනියාමෙන යථාසුතං ධම්මං කථෙන්තී අත්තානං පරිමොචෙත්වා සත්ථු සන්තිකෙ සුතභාවං පකාසෙන්තී ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතා වුත්තමරහතාති මෙ සුත’’න්ති නිදානං ආරොපෙසි. तब सामावती प्रमुख पाँच सौ स्त्रियों ने उससे कहा— "अम्मा! तुम प्रतिदिन शास्ता (बुद्ध) के पास जाकर भगवान द्वारा उपदिष्ट धर्म को सुनकर हमें सुनाया करो।" वह वैसा ही करती हुई बाद में त्रिपिटक-धरा हो गई। इसलिए शास्ता ने उसे— "भिक्षुओं! मेरी बहुश्रुत उपासिका श्राविकाओं में यह खुज्जुत्तरा सर्वश्रेष्ठ है"—इस प्रकार एतदग्र (सर्वश्रेष्ठ स्थान) पर स्थापित किया। इस प्रकार उपासिकाओं में बहुश्रुत होने के कारण शास्ता द्वारा एतदग्र पर स्थापित, प्रतिसंविदा-प्राप्त खुज्जुत्तरा आर्यश्राविका ने, जब शास्ता कोसम्बी में विहार कर रहे थे, समय-समय पर शास्ता के पास जाकर धर्म सुनकर और अन्तःपुर में जाकर सामावती प्रमुख पाँच सौ आर्यश्राविका स्त्रियों को शास्ता द्वारा उपदिष्ट विधि के अनुसार यथाश्रुत धर्म कहते हुए, स्वयं को मुक्त कर, शास्ता के पास से सुनने के तथ्य को प्रकट करते हुए— "यह भगवान द्वारा कहा गया है, अर्हत् द्वारा कहा गया है, ऐसा मैंने सुना है"—इस प्रकार निदान (प्रस्तावना) का आरोपण किया। යස්මා පන තස්මිංයෙව නගරෙ භගවතො සම්මුඛා සුත්වා තදහෙව තාය තාසං භාසිතං, තස්මා ‘‘එකං සමයං භගවා කොසම්බියං විහරතී’’ති කාලදෙසං අපදිසිතුං පයොජනසම්භවොව නත්ථි සුපාකටභාවතො. භික්ඛුනියො චස්සා සන්තිකෙ ඉමානි සුත්තානි ගණ්හිංසු. එවං පරම්පරාය භික්ඛූසුපි තාය ආරොපිතං නිදානං පාකටං අහොසි. අථ ආයස්මා ආනන්දො තථාගතස්ස පරිනිබ්බානතො අපරභාගෙ සත්තපණ්ණිගුහායං අජාතසත්තුනා කාරාපිතෙ සද්ධම්මමණ්ඩපෙ මහාකස්සපප්පමුඛස්ස වසීගණස්ස මජ්ඣෙ නිසීදිත්වා ධම්මං සඞ්ගායන්තො ඉමෙසං සුත්තානං නිදානස්ස [Pg.30] ද්වෙළ්හකං පරිහරන්තො තාය ආරොපිතනියාමෙනෙව නිදානං ආරොපෙසීති. चूँकि उसी नगर में भगवान के सम्मुख सुनकर उसी दिन उसके द्वारा उन्हें (स्त्रियों को) यह कहा गया था, इसलिए "एक समय भगवान कोसम्बी में विहार कर रहे थे" इस प्रकार काल और देश का निर्देश करने का कोई प्रयोजन नहीं था, क्योंकि यह सुस्पष्ट था। भिक्षुणियों ने भी उसके पास से इन सूत्रों को ग्रहण किया। इस प्रकार परम्परा से भिक्षुओं में भी उसके द्वारा आरोपित निदान प्रसिद्ध हो गया। तब आयुष्मान् आनन्द ने तथागत के परिनिर्वाण के पश्चात् सप्तपर्णी गुफा में अजातशत्रु द्वारा निर्मित सद्धर्म-मण्डप में महाकस्सप प्रमुख वशी-गण (जितेन्द्रिय भिक्षुओं) के मध्य बैठकर धर्म का संगायन करते हुए, इन सूत्रों के निदान के विषय में किसी भी संशय को दूर करते हुए, उसके द्वारा आरोपित विधि के अनुसार ही निदान का आरोपण किया। කෙචි පනෙත්ථ බහුප්පකාරෙ පපඤ්චෙන්ති. කිං තෙහි? අපිච නානානයෙහි සඞ්ගීතිකාරා ධම්මවිනයං සඞ්ගායිංසු. අනුබුද්ධා හි ධම්මසඞ්ගාහකමහාථෙරා, තෙ සම්මදෙව ධම්මවිනයස්ස සඞ්ගායනාකාරං ජානන්තා කත්ථචි ‘‘එවං මෙ සුත’’න්තිආදිනා, කත්ථචි ‘‘තෙන සමයෙනා’’තිආදිනා, කත්ථචි ගාථාබන්ධවසෙන නිදානං ඨපෙන්තා, කත්ථචි සබ්බෙන සබ්බං නිදානං අට්ඨපෙන්තා වග්ගසඞ්ගහාදිවසෙන ධම්මවිනයං සඞ්ගායිංසු. තත්ථ ඉධ වුත්තඤ්හෙතන්තිආදිනා නිදානං ඨපෙත්වා සඞ්ගායිංසු, කිඤ්චි සුත්තගෙය්යාදිවසෙන නවඞ්ගමිදං බුද්ධවචනං. යථා චෙතං, එවං සබ්බෙසම්පි සම්මාසම්බුද්ධානං. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘අප්පකඤ්ච නෙසං අහොසි සුත්තං ගෙය්ය’’න්තිආදි. තත්ථ ඉතිවුත්තකඞ්ගස්ස අඤ්ඤං කිඤ්චි න පඤ්ඤායති තබ්භාවනිමිත්තං ඨපෙත්වා ‘‘වුත්තඤ්හෙතං…පෙ… මෙ සුත’’න්ති ඉදං වචනං. තෙනාහු අට්ඨකථාචරියා ‘‘වුත්තඤ්හෙතං භගවතාති ආදිනයප්පවත්තා ද්වාදසුත්තරසතසුත්තන්තා ඉතිවුත්තක’’න්ති. තස්මා සත්ථු අධිප්පායං ජානන්තෙහි ධම්මසඞ්ගාහකෙහි අරියසාවිකාය වා ඉමෙසං සුත්තානං ඉතිවුත්තකඞ්ගභාවඤාපනත්ථං ඉමිනාව නයෙන නිදානං ඨපිතන්ති වෙදිතබ්බං. यहाँ कुछ लोग बहुत प्रकार से प्रपंच (विस्तार) करते हैं। उनसे क्या प्रयोजन? अपितु संगीतिकारों ने अनेक विधियों से धर्म और विनय का संगायन किया। धर्म-संग्राहक महास्थविर अनुबुद्ध थे, वे धर्म और विनय के संगायन की विधि को भली-भाँति जानते हुए, कहीं "ऐसा मैंने सुना है" आदि के द्वारा, कहीं "उस समय" आदि के द्वारा, कहीं गाथा-बन्ध के रूप में निदान स्थापित करते हुए, और कहीं पूर्णतः निदान स्थापित न करते हुए, वर्ग-संग्रह आदि के माध्यम से धर्म और विनय का संगायन किया। वहाँ यहाँ "वुत्तञ्हेतं" (यह कहा गया है) आदि के द्वारा निदान स्थापित कर संगायन किया गया, यह नौ अंगों वाला बुद्ध-वचन कुछ सूत्र, गेय आदि के रूप में है। जैसा यह है, वैसा ही सभी सम्यक्सम्बुद्धों का भी है। जैसा कि कहा गया है— "उनका सूत्र और गेय अल्प था" आदि। वहाँ 'इतिवुत्तक' अंग का इसके अतिरिक्त और कुछ प्रतीत नहीं होता, सिवाय इसके कि "वुत्तञ्हेतं... पे... मे सुतं" (यह कहा गया है... ऐसा मैंने सुना है) यह वचन इसके होने का निमित्त (कारण) है। इसीलिए अट्ठकथाचार्यों ने कहा है— "वुत्तञ्हेतं भगवता आदि विधि से प्रवृत्त एक सौ बारह सूत्रान्त 'इतिवुत्तक' हैं।" इसलिए शास्ता के अभिप्राय को जानने वाले धर्म-संग्राहकों द्वारा अथवा आर्यश्राविका द्वारा इन सूत्रों के 'इतिवुत्तक' अंग होने का ज्ञान कराने के लिए इसी विधि से निदान स्थापित किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। කිමත්ථං පන ධම්මවිනයසඞ්ගහෙ කයිරමානෙ නිදානවචනං? නනු භගවතා භාසිතවචනස්සෙව සඞ්ගහො කාතබ්බොති? වුච්චතෙ – දෙසනාය ඨිතිඅසම්මොසසද්ධෙය්යභාවසම්පාදනත්ථං. කාලදෙසදෙසකපරිසාපදෙසෙහි උපනිබන්ධිත්වා ඨපිතා හි දෙසනා චිරට්ඨිතිකා හොති අසම්මොසධම්මා සද්ධෙය්යා ච දෙසකාලකත්තුහෙතුනිමිත්තෙහි උපනිබද්ධො විය වොහාරවිනිච්ඡයො. තෙනෙව ච ආයස්මතා මහාකස්සපෙන බ්රහ්මජාලමූලපරියායසුත්තාදීනං දෙසාදිපුච්ඡාසු කතාසු තාසං විස්සජ්ජනං කරොන්තෙන ධම්මභණ්ඩාගාරිකෙන ‘‘එවං මෙ සුත’’න්තිආදිනා නිදානං භාසිතං. ඉධ පන දෙසකාලස්ස අග්ගහණෙ කාරණං වුත්තමෙව. धर्म और विनय का संग्रह करते समय निदान-वचन किसलिए (कहा जाता है)? क्या केवल भगवान द्वारा भाषित वचनों का ही संग्रह नहीं किया जाना चाहिए? कहा जाता है— देशना की स्थिति (निरन्तरता), असम्मोह (भ्रम-रहित होना) और श्रद्धा-योग्यता को सिद्ध करने के लिए। काल, देश, उपदेशक, परिषद् और स्थान के साथ निबद्ध कर स्थापित की गई देशना चिरस्थायी, असम्मोह-धर्मी और विश्वसनीय होती है, जैसे देश, काल, कर्ता, हेतु और निमित्त से निबद्ध व्यवहार-विनिश्चय (कानूनी निर्णय) होता है। इसीलिए आयुष्मान् महाकस्सप द्वारा ब्रह्मजाल, मूलपरियाय सूत्र आदि के देश आदि के विषय में पूछे जाने पर, उनका उत्तर देते हुए धर्म-भाण्डागारिक (आनन्द) ने "ऐसा मैंने सुना है" आदि के द्वारा निदान कहा। यहाँ काल और देश को ग्रहण न करने का कारण पहले ही कहा जा चुका है। අපිච සත්ථු සම්පත්තිප්පකාසනත්ථං නිදානවචනං. තථාගතස්ස හි භගවතො පුබ්බරචනානුමානාගමතක්කාභාවතො සම්මාසම්බුද්ධභාවසිද්ධි. න හි සම්මාසම්බුද්ධස්ස [Pg.31] පුබ්බරචනාදීහි අත්ථො අත්ථි සබ්බත්ථ අප්පටිහතඤාණාචාරතාය එකප්පමාණත්තා ච ඤෙය්යධම්මෙසු. තථා ආචරියමුට්ඨිධම්මමච්ඡරියසාසනසාවකානුරාගාභාවතො ඛීණාසවභාවසිද්ධි. න හි සබ්බසො ඛීණාසවස්ස තෙ සම්භවන්තීති සුවිසුද්ධස්ස පරානුග්ගහපවත්ති. එවං දෙසකසංකිලෙසභූතානං දිට්ඨිසීලසම්පදාදූසකානං අවිජ්ජාතණ්හානං අච්චන්තාභාවසංසූචකෙහි ඤාණසම්පදාපහානසම්පදාභිබ්යඤ්ජකෙහි ච සම්බුද්ධවිසුද්ධභාවෙහි පුරිමවෙසාරජ්ජද්වයසිද්ධි, තතො ච අන්තරායිකනිය්යානිකධම්මෙසු අසම්මොහභාවසිද්ධිතො පච්ඡිමවෙසාරජ්ජද්වයසිද්ධීති භගවතො චතුවෙසාරජ්ජසමන්නාගමො අත්තහිතපරහිතපටිපත්ති ච නිදානවචනෙන පකාසිතා හොති, තත්ථ තත්ථ සම්පත්තපරිසාය අජ්ඣාසයානුරූපං ඨානුප්පත්තිකප්පටිභානෙන ධම්මදෙසනාදීපනතො. ඉධ පන අනවසෙසතො කාමදොසප්පහානං විධාය දෙසනාදීපනතො චාති යොජෙතබ්බං. තෙන වුත්තං ‘‘සත්ථු සම්පත්තිප්පකාසනත්ථං නිදානවචන’’න්ති. එත්ථ ච ‘‘භගවතා අරහතා’’ති ඉමෙහි පදෙහි යථාවුත්තඅත්ථවිභාවනතා හෙට්ඨා දස්සිතා එව. इसके अतिरिक्त, शास्ता (बुद्ध) की संपदा (पूर्णता) को प्रकट करने के लिए निदान-वचन है। तथागत भगवान के लिए पूर्व-रचना, अनुमान, आगम और तर्क का अभाव होने से सम्यक्सम्बुद्धत्व की सिद्धि होती है। सम्यक्सम्बुद्ध के लिए पूर्व-रचना आदि का कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि उनकी ज्ञान-चर्या सर्वत्र अप्रतिहत (बाधारहित) है और ज्ञेय धर्मों में वे एकमात्र प्रमाण हैं। उसी प्रकार, आचार्य-मुष्टि (ज्ञान को छिपाकर रखना), धर्म-मत्सर्य और शासन के श्रावकों के प्रति अनुराग के अभाव से क्षीणास्रव-भाव की सिद्धि होती है। पूर्णतः क्षीणास्रव व्यक्ति में ये (दोष) संभव नहीं हैं, अतः यह परम शुद्ध परानुग्रह की प्रवृत्ति है। इस प्रकार, देशक (उपदेशक) के संक्लेश स्वरूप, दृष्टि और शील की संपदा को दूषित करने वाले अविद्या और तृष्णा के आत्यंतिक अभाव को सूचित करने वाले तथा ज्ञान-संपदा और प्रहाण-संपदा को अभिव्यक्त करने वाले बुद्ध की विशुद्धि से प्रथम दो वैशारद्य (निर्भयता) की सिद्धि होती है, और उसके बाद अंतरायिक और नैर्याणिक धर्मों में असम्मोह (भ्रमरहितता) की सिद्धि से अंतिम दो वैशारद्य की सिद्धि होती है। इस प्रकार भगवान का चतुर्वैशारद्य-सम्पन्न होना और आत्महित-परहित की प्रतिपत्ति निदान-वचन द्वारा प्रकाशित होती है, क्योंकि वहाँ-वहाँ उपस्थित परिषद् के आशय के अनुरूप तात्कालिक प्रतिभा (स्फूर्ति) से धर्म-देशना का प्रकाशन होता है। यहाँ तो पूर्णतः काम-दोष के प्रहाण का विधान करके देशना का प्रकाशन होने से (निदान-वचन) को जोड़ना चाहिए। इसीलिए कहा गया है— 'शास्ता की संपदा को प्रकट करने के लिए निदान-वचन है'। और यहाँ 'भगवता अरहता' इन पदों द्वारा यथाोक्त अर्थ का स्पष्टीकरण पहले ही दिखाया जा चुका है। තථා සාසනසම්පත්තිප්පකාසනත්ථං නිදානවචනං. ඤාණකරුණාපරිග්ගහිතසබ්බකිරියස්ස හි භගවතො නත්ථි නිරත්ථකා පටිපත්ති අත්තහිතා වා. තස්මා පරෙසංයෙවත්ථාය පවත්තසබ්බකිරියස්ස සම්මාසම්බුද්ධස්ස සකලම්පි කායවචීමනොකම්මං යථාපවත්තං වුච්චමානං දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකපරමත්ථෙහි යථාරහං සත්තානං අනුසාසනත්ථෙන සාසනං, න කබ්බරචනා. තයිදං සත්ථු චරිතං කාලදෙසදෙසකපරිසාපදෙසෙහි තත්ථ තත්ථ නිදානවචනෙහි යථාරහං පකාසියති. ඉධ පන දෙසකපරිසාපදෙසෙහීති යොජෙතබ්බං. තෙන වුත්තං ‘‘සාසනසම්පත්තිප්පකාසනත්ථං නිදානවචන’’න්ති. उसी प्रकार, शासन (शिक्षा) की संपदा को प्रकट करने के लिए निदान-वचन है। ज्ञान और करुणा से युक्त समस्त क्रियाओं वाले भगवान की कोई भी प्रतिपत्ति (आचरण) निरर्थक नहीं होती, चाहे वह आत्महित के लिए हो (या परहित के लिए)। इसलिए, दूसरों के ही हित के लिए प्रवृत्त समस्त क्रियाओं वाले सम्यक्सम्बुद्ध के यथावत् कहे गए संपूर्ण काय-वचन-मन के कर्म, दृष्टधार्मिक (वर्तमान), साम्परायिक (परलोक) और परमार्थ के अनुसार सत्त्वों के अनुशासन (शिक्षा) के अर्थ में 'शासन' हैं, न कि कोई काव्य-रचना। वह शास्ता का चरित काल, देश, देशक और परिषद् के प्रदेशों (विवरणों) के साथ वहाँ-वहाँ निदान-वचनों द्वारा यथायोग्य प्रकाशित किया जाता है। यहाँ तो देशक और परिषद् के विवरणों के साथ इसे जोड़ना चाहिए। इसीलिए कहा गया है— 'शासन की संपदा को प्रकट करने के लिए निदान-वचन है'। අපිච සත්ථුනො පමාණභාවප්පකාසනෙන සාසනස්ස පමාණභාවදස්සනත්ථං නිදානවචනං. තඤ්චස්ස පමාණභාවදස්සනං හෙට්ඨා වුත්තනයානුසාරෙන ‘‘භගවතා අරහතා’’ති ඉමෙහි පදෙහි විභාවිතන්ති වෙදිතබ්බං. ඉදමෙත්ථ නිදානවචනප්පයොජනස්ස මුඛමත්තනිදස්සනන්ති. इसके अतिरिक्त, शास्ता की प्रमाणिकता को प्रकट करने के माध्यम से शासन की प्रमाणिकता को दिखाने के लिए निदान-वचन है। उनकी वह प्रमाणिकता पहले बताए गए तरीके के अनुसार 'भगवता अरहता' इन पदों से स्पष्ट की गई है, ऐसा समझना चाहिए। यहाँ यह निदान-वचन के प्रयोजन का केवल मुख्य उदाहरण मात्र दिखाया गया है। නිදානවණ්ණනා නිට්ඨිතා. निदान-वर्णना समाप्त हुई। 1. එකකනිපාතො १. एकक निपात 1. පඨමවග්ගො १. प्रथम वर्ग 1. ලොභසුත්තවණ්ණනා १. लोभ-सुत्त की वर्णना 1. ඉදානි [Pg.32] එකධම්මං, භික්ඛවෙ, පජහථාතිආදිනා නයෙන භගවතා නික්ඛිත්තස්ස සුත්තස්ස වණ්ණනාය ඔකාසො අනුප්පත්තො. සා පනෙසා අත්ථවණ්ණනා යස්මා සුත්තනික්ඛෙපං විචාරෙත්වා වුච්චමානා පාකටා හොති, තස්මා සුත්තනික්ඛෙපං තාව විචාරෙස්සාම. චත්තාරො හි සුත්තනික්ඛෙපා – අත්තජ්ඣාසයො, පරජ්ඣාසයො, පුච්ඡාවසිකො, අට්ඨුප්පත්තිකොති. යථා හි අනෙකසතඅනෙකසහස්සභෙදානිපි සුත්තන්තානි සංකිලෙසභාගියාදිපට්ඨානනයෙන සොළසවිධතං නාතිවත්තන්ති, එවං අත්තජ්ඣාසයාදිසුත්තනික්ඛෙපවසෙන චතුබ්බිධතං නාතිවත්තන්තීති. තත්ථ යථා අත්තජ්ඣාසයස්ස අට්ඨුප්පත්තියා ච පරජ්ඣාසයපුච්ඡාවසිකෙහි සද්ධිං සංසග්ගභෙදො සම්භවති අත්තජ්ඣාසයො ච පරජ්ඣාසයො ච, අත්තජ්ඣාසයො ච පුච්ඡාවසිකො ච, අට්ඨුප්පත්තිකො ච පරජ්ඣාසයො ච, අට්ඨුප්පත්තිකො ච පුච්ඡාවසිකො චාති අජ්ඣාසයපුච්ඡානුසන්ධිසම්භවතො; එවං යදිපි අට්ඨුප්පත්තියා අත්තජ්ඣාසයෙනපි සංසග්ගභෙදො සම්භවති, අත්තජ්ඣාසයාදීහි පන පුරතො ඨිතෙහි අට්ඨුප්පත්තියා සංසග්ගො නත්ථීති නිරවසෙසො පට්ඨානනයො න සම්භවති. තදන්තොගධත්තා වා සම්භවන්තානං සෙසනික්ඛෙපානං මූලනික්ඛෙපවසෙන චත්තාරො සුත්තනික්ඛෙපා වුත්තාති වෙදිතබ්බං. १. अब 'भिक्षुओं, एक धर्म का त्याग करो' इत्यादि विधि से भगवान द्वारा प्रस्तुत सुत्त की व्याख्या का अवसर प्राप्त हुआ है। वह अर्थ-व्याख्या, क्योंकि सुत्त के निक्षेप (प्रस्तुति के कारण) पर विचार करने के बाद कही जाने पर स्पष्ट होती है, इसलिए पहले सुत्त-निक्षेप पर विचार करेंगे। सुत्त-निक्षेप चार प्रकार के होते हैं— आत्म-अध्याशय (स्वयं की इच्छा से), पर-अध्याशय (दूसरों की इच्छा से), पृच्छा-वश (प्रश्न के कारण), और अर्थोत्पत्ति (किसी घटना के कारण)। जैसे अनेक सौ और अनेक हजार भेदों वाले होने पर भी सुत्तन्त संक्लेश-भागी आदि के आधार पर सोलह प्रकार की विधि का उल्लंघन नहीं करते, वैसे ही आत्म-अध्याशय आदि सुत्त-निक्षेप के अनुसार वे चार प्रकार की विधि का उल्लंघन नहीं करते। वहाँ जैसे आत्म-अध्याशय और अर्थोत्पत्ति का पर-अध्याशय और पृच्छा-वश के साथ संसर्ग-भेद संभव है—जैसे आत्म-अध्याशय और पर-अध्याशय, आत्म-अध्याशय और पृच्छा-वश, अर्थोत्पत्ति और पर-अध्याशय, तथा अर्थोत्पत्ति और पृच्छा-वश, क्योंकि अध्याशय और प्रश्न के अनुसन्धान का मेल संभव है; वैसे ही यद्यपि अर्थोत्पत्ति का आत्म-अध्याशय के साथ भी संसर्ग-भेद संभव है, किंतु आत्म-अध्याशय आदि के पहले विद्यमान होने पर अर्थोत्पत्ति के साथ संसर्ग नहीं होता, इसलिए पूर्ण प्रस्थान-नय संभव नहीं होता। अथवा, उनके अंतर्गत होने के कारण संभव होने वाले शेष निक्षेपों को मूल निक्षेप के आधार पर चार सुत्त-निक्षेप कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। තත්රායං වචනත්ථො – නික්ඛිපීයතීති නික්ඛෙපො, සුත්තං එව නික්ඛෙපො සුත්තනික්ඛෙපො. අථ වා නික්ඛිපනං නික්ඛෙපො, සුත්තස්ස නික්ඛෙපො සුත්තනික්ඛෙපො, සුත්තදෙසනාති අත්ථො. අත්තනො අජ්ඣාසයො අත්තජ්ඣාසයො, සො අස්ස අත්ථි කාරණභූතොති අත්තජ්ඣාසයො, අත්තනො අජ්ඣාසයො එතස්සාති වා අත්තජ්ඣාසයො. පරජ්ඣාසයෙපි එසෙව නයො. පුච්ඡාය වසොති පුච්ඡාවසො. සො එතස්ස අත්ථීති පුච්ඡාවසිකො. සුත්තදෙසනාය වත්ථුභූතස්ස අත්ථස්ස උප්පත්ති අත්ථුප්පත්ති, අත්ථුප්පත්ති එව අට්ඨුප්පත්ති ථ-කාරස්ස ඨ-කාරං කත්වා, සා එතස්ස අත්ථීති අට්ඨුප්පත්තිකො[Pg.33]. අථ වා නික්ඛිපීයති සුත්තං එතෙනාති නික්ඛෙපො, අත්තජ්ඣාසයාදි එව. එතස්මිං පන අත්ථවිකප්පෙ අත්තනො අජ්ඣාසයො අත්තජ්ඣාසයො. පරෙසං අජ්ඣාසයො පරජ්ඣාසයො. පුච්ඡීයතීති පුච්ඡා, පුච්ඡිතබ්බො අත්ථො, පුච්ඡාවසෙන පවත්තං ධම්මප්පටිග්ගාහකානං වචනං පුච්ඡාවසං, තදෙව නික්ඛෙපසද්දාපෙක්ඛාය පුච්ඡාවසිකොති පුල්ලිඞ්ගවසෙන වුත්තං. තථා අට්ඨුප්පත්ති එව අට්ඨුප්පත්තිකොති එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. वहाँ यह शब्दार्थ है— जो निक्षिप्त (प्रस्तुत) किया जाता है, वह 'निक्षेप' है; सुत्त ही निक्षेप है, वह 'सुत्त-निक्षेप' है। अथवा, निक्षिप्त करना (प्रस्तुत करना) 'निक्षेप' है, सुत्त का निक्षेप 'सुत्त-निक्षेप' है, जिसका अर्थ सुत्त-देशना है। अपना अध्याशय (अभिप्राय) 'आत्म-अध्याशय' है, वह जिसका कारण स्वरूप है, वह 'आत्म-अध्याशय' है; अथवा अपना अध्याशय जिसका है, वह 'आत्म-अध्याशय' है। पर-अध्याशय में भी यही विधि है। प्रश्न का वश (प्रभाव) 'पृच्छा-वश' है। वह जिसका है, वह 'पृच्छा-वशिको' है। सुत्त-देशना की वस्तु (विषय) बने अर्थ की उत्पत्ति 'अर्थोत्पत्ति' (अत्थुप्पत्ति) है; 'थ' कार को 'ठ' कार करके 'अत्थुप्पत्ति' ही 'अट्ठुप्पत्ति' है, वह जिसका है, वह 'अट्ठुप्पत्तिको' है। अथवा, जिसके द्वारा सुत्त निक्षिप्त किया जाता है, वह 'निक्षेप' है, जैसे आत्म-अध्याशय आदि। इस अर्थ-विकल्प में अपना अध्याशय 'आत्म-अध्याशय' है। दूसरों का अध्याशय 'पर-अध्याशय' है। जो पूछा जाता है, वह 'पृच्छा' है, अर्थात् पूछने योग्य अर्थ; पृच्छा के वश में प्रवृत्त धर्म-प्रतिग्राहकों (श्रोताओं) का वचन 'पृच्छा-वश' है, वही 'निक्षेप' शब्द की अपेक्षा से 'पृच्छा-वशिको' इस प्रकार पुल्लिंग में कहा गया है। उसी प्रकार 'अट्ठुप्पत्ति' ही 'अट्ठुप्पत्तिको' है—इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। අපිච පරෙසං ඉන්ද්රියපරිපාකාදිකාරණනිරපෙක්ඛත්තා අත්තජ්ඣාසයස්ස විසුං සුත්තනික්ඛෙපභාවො යුත්තො, කෙවලං අත්තනො අජ්ඣාසයෙනෙව ධම්මතන්තිඨපනත්ථං පවත්තිතදෙසනත්තා. පරජ්ඣාසයපුච්ඡාවසිකානං පන පරෙසං අජ්ඣාසයපුච්ඡානං දෙසනාපවත්තිහෙතුභූතානං උප්පත්තියං පවත්තිතානං කථං අට්ඨුප්පත්තියං අනවරොධො, පුච්ඡාවසිකට්ඨුප්පත්තිකානං වා පරජ්ඣාසයානුරොධෙන පවත්තිතානං කථං පරජ්ඣාසයෙ අනවරොධොති? න චොදෙතබ්බමෙතං. පරෙසඤ්හි අභිනීහාරපරිපුච්ඡාදිවිනිමුත්තස්සෙව සුත්තදෙසනාකාරණුප්පාදස්ස අට්ඨුප්පත්තිභාවෙන ගහිතත්තා පරජ්ඣාසයපුච්ඡාවසිකානං විසුං ගහණං. තථා හි බ්රහ්මජාලධම්මදායාදසුත්තාදීනං (දී. න. 1.1 ආදයො) වණ්ණාවණ්ණආමිසුප්පාදාදිදෙසනානිමිත්තං අට්ඨුප්පත්ති වුච්චති. පරෙසං පුච්ඡං විනා අජ්ඣාසයමෙව නිමිත්තං කත්වා දෙසිතො පරජ්ඣාසයො, පුච්ඡාවසෙන දෙසිතො පුච්ඡාවසිකොති පාකටොයමත්ථොති. इसके अतिरिक्त, दूसरों की इन्द्रियों की परिपक्वता आदि कारणों की अपेक्षा न रखते हुए, केवल अपने ही आशय (इच्छा) से धर्म-मर्यादा स्थापित करने के लिए प्रवृत्त उपदेश होने के कारण, 'आत्म-आशय' (अत्तज्झासय) के रूप में सूत्र का पृथक वर्गीकरण उचित है। परन्तु, दूसरों के आशय और प्रश्नों के अधीन रहने वाले, जो दूसरों के आशय और प्रश्नों के कारण उपदेश की प्रवृत्ति के हेतु बनते हैं, उनका 'अर्थोत्पत्ति' (अट्ठुप्पत्ति) में समावेश क्यों नहीं होता? अथवा दूसरों के आशय के अनुरूप प्रवृत्त होने वाले 'प्रश्नावश' (पुच्छावसिक) सूत्रों का 'पर-आशय' (परज्झासय) में समावेश क्यों नहीं होता? ऐसा आक्षेप नहीं करना चाहिए। क्योंकि दूसरों के विशेष प्रयास और परिपृच्छा आदि से रहित सूत्र-उपदेश के कारण की उत्पत्ति को ही 'अर्थोत्पत्ति' के रूप में ग्रहण किया गया है, इसलिए 'पर-आशय' और 'प्रश्नावश' का पृथक ग्रहण किया गया है। जैसे कि ब्रह्मजाल और धम्मदायाद आदि सूत्रों में प्रशंसा-निंदा और आमिष की उत्पत्ति आदि को उपदेश का निमित्त होने के कारण 'अर्थोत्पत्ति' कहा जाता है। दूसरों के प्रश्न के बिना केवल उनके आशय को ही निमित्त बनाकर जो उपदेश दिया गया वह 'पर-आशय' है, और प्रश्न के वश में होकर जो उपदेश दिया गया वह 'प्रश्नावश' है - यह अर्थ स्पष्ट है। යානි භගවා පරෙහි අනජ්ඣිට්ඨො කෙවලං අත්තනො අජ්ඣාසයෙනෙව කථෙති, සෙය්යථිදං – ආකඞ්ඛෙය්යසුත්තං, තුවට්ටකසුත්තන්තිඑවමාදීනි (සු. නි. 921 ආදයො; ම. නි. 1.64 ආදයො), තෙසං අත්තජ්ඣාසයො නික්ඛෙපො. भगवान दूसरों के द्वारा बिना प्रार्थना किए, केवल अपने ही आशय से जो कहते हैं, जैसे कि - आकङ्खेय्य सुत्त, तुवट्टक सुत्तन्त आदि, उनका वर्गीकरण 'आत्म-आशय' (अत्तज्झासय निक्खेप) है। යානි පන ‘‘පරිපක්කා ඛො රාහුලස්ස විමුත්තිපරිපාචනීයා ධම්මා, යංනූනාහං රාහුලං උත්තරිං ආසවානං ඛයෙ විනෙය්ය’’න්ති එවං පරෙසං අජ්ඣාසයං ඛන්තිං අභිනීහාරං බුජ්ඣනභාවඤ්ච ඔලොකෙත්වා පරජ්ඣාසයවසෙන කථිතානි, සෙය්යථිදං – රාහුලොවාදසුත්තං, ධම්මචක්කප්පවත්තනසුත්තන්තිඑවමාදීනි (ම. නි. 2.107 ආදයො; 3.416 ආදයො; සං. නි. 3.59; මහාව. 19-20), තෙසං පරජ්ඣාසයො නික්ඛෙපො. परन्तु, 'राहुल के विमुक्ति को परिपक्व करने वाले धर्म परिपक्व हो गए हैं, क्यों न मैं राहुल को आस्रवों के क्षय के लिए और अधिक प्रशिक्षित करूँ' - इस प्रकार दूसरों के आशय, रुचि, संकल्प और बोध-क्षमता को देखकर जो दूसरों के आशय के वश में होकर कहे गए हैं, जैसे कि - राहुलवाद सुत्त, धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्तन्त आदि, उनका वर्गीकरण 'पर-आशय' (परज्झासय निक्खेप) है। භගවන්තං පන උපසඞ්කමිත්වා දෙවා මනුස්සා චතස්සො පරිසා චත්තාරො වණ්ණා ච තථා තථා පඤ්හං පුච්ඡන්ති ‘‘බොජ්ඣඞ්ගා බොජ්ඣඞ්ගාති, භන්තෙ, වුච්චන්ති, නීවරණා [Pg.34] නීවරණාති වුච්චන්තී’’තිආදිනා, එවං පුට්ඨෙන භගවතා යානි කථිතානි බොජ්ඣඞ්ගසංයුත්තාදීනි (සං. නි. 5.186) තෙසං පුච්ඡාවසිකො නික්ඛෙපො. भगवान के पास आकर देव, मनुष्य, चारों परिषदें और चारों वर्ण इस प्रकार प्रश्न पूछते हैं - 'भन्ते, बोध्यङ्ग-बोध्यङ्ग कहे जाते हैं, नीवरण-नीवरण कहे जाते हैं' आदि। इस प्रकार पूछे जाने पर भगवान द्वारा जो बोध्यङ्गसंयुत्त आदि कहे गए हैं, उनका वर्गीकरण 'प्रश्नावश' (पुच्छावसिक निक्खेप) है। යානි පන තානි උප්පන්නං කාරණං පටිච්ච කථිතානි, සෙය්යථිදං – ධම්මදායාදං, පුත්තමංසූපමං, දාරුක්ඛන්ධූපමන්තිඑවමාදීනි (ම. නි. 1.29; සං. නි. 2.63), තෙසං අට්ඨුප්පත්තිකො නික්ඛෙපො. परन्तु जो उत्पन्न हुए किसी कारण (घटना) को लेकर कहे गए हैं, जैसे कि - धम्मदायाद, पुत्तमंसूपम, दारुक्खन्धूपम आदि, उनका वर्गीकरण 'अर्थोत्पत्ति' (अट्ठुप्पत्तिक निक्खेप) है। එවමිමෙසු චතූසු සුත්තනික්ඛෙපෙසු ඉමස්ස සුත්තස්ස පරජ්ඣාසයො නික්ඛෙපො. පරජ්ඣාසයවසෙන හෙතං නික්ඛිත්තං. කෙසං අජ්ඣාසයෙන? ලොභෙ ආදීනවදස්සීනං පුග්ගලානං. කෙචි පන ‘‘අත්තජ්ඣාසයො’’ති වදන්ති. इस प्रकार इन चार सूत्र-निक्षेपों (वर्गीकरणों) में से इस सूत्र का वर्गीकरण 'पर-आशय' है। क्योंकि यह दूसरों के आशय के वश में होकर कहा गया है। किसके आशय से? लोभ में दोष देखने वाले व्यक्तियों के आशय से। परन्तु कुछ लोग इसे 'आत्म-आशय' कहते हैं। තත්ථ එකධම්මං, භික්ඛවෙතිආදීසු එකසද්දො අත්ථෙව අඤ්ඤත්ථෙ ‘‘සස්සතො අත්තා ච ලොකො ච, ඉදමෙව සච්චං මොඝමඤ්ඤන්ති ඉත්ථෙකෙ අභිවදන්තී’’තිආදීසු (ම. නි. 3.27). අත්ථි සෙට්ඨෙ ‘‘චෙතසො එකොදිභාව’’න්තිආදීසු (දී. නි. 1.228; පාරා. 11). අත්ථි අසහායෙ ‘‘එකො වූපකට්ඨො’’තිආදීසු (දී. නි. 1.405). අත්ථි සඞ්ඛායං ‘‘එකොව ඛො, භික්ඛවෙ, ඛණො ච සමයො ච බ්රහ්මචරියවාසායා’’තිආදීසු (අ. නි. 8.29). ඉධාපි සඞ්ඛායමෙව දට්ඨබ්බො. वहाँ 'एकधम्मं भिक्खवे' आदि में 'एक' शब्द 'अन्य' के अर्थ में भी है, जैसे - 'शाश्वत आत्मा और लोक है, यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं' आदि में। 'श्रेष्ठ' के अर्थ में है, जैसे - 'चित्त की एकाग्रता' (चेतसो एकोदिभावं) आदि में। 'असहाय' (अकेले) के अर्थ में है, जैसे - 'एकान्त में रहने वाला' (एको वूपकट्ठो) आदि में। 'संख्या' के अर्थ में है, जैसे - 'भिक्षुओं, ब्रह्मचर्य वास के लिए एक ही क्षण और समय है' आदि में। यहाँ भी इसे 'संख्या' के अर्थ में ही देखना चाहिए। ධම්ම-සද්දො පරියත්තිසච්චසමාධිපඤ්ඤාපකතිපුඤ්ඤාපත්තිසුඤ්ඤතාඤෙය්යසභාවාදීසු දිස්සති. තථා හිස්ස ‘‘ඉධ භික්ඛු ධම්මං පරියාපුණාතී’’තිආදීසු (අ. නි. 5.73) පරියත්ති අත්ථො. ‘‘දිට්ඨධම්මො’’තිආදීසු (දී. නි. 1.299) සච්චානි. ‘‘එවංධම්මා තෙ භගවන්තො අහෙසු’’න්තිආදීසු (දී. නි. 2.13; 3.142) සමාධි. ‘‘සච්චං ධම්මො ධිති චාගො, සවෙ පෙච්ච න සොචතී’’තිආදීසු (ජා. 1.1.57) පඤ්ඤා. ‘‘ජාතිධම්මානං, භික්ඛවෙ, සත්තානං එවං ඉච්ඡා උප්පජ්ජතී’’තිආදීසු (දී. නි. 2.398) පකති. ‘‘ධම්මො හවෙ රක්ඛති ධම්මචාරි’’න්තිආදීසු (ජා. 1.10.102) පුඤ්ඤං. ‘‘තිණ්ණං ධම්මානං අඤ්ඤතරෙන වදෙය්ය පාරාජිකෙන වා සඞ්ඝාදිසෙසෙන වා පාචිත්තියෙන වා’’තිආදීසු (පාරා. 444) ආපත්ති. ‘‘තස්මිං ඛො පන සමයෙ ධම්මා හොන්තී’’තිආදීසු (ධ. ස. 121) සුඤ්ඤතා. ‘‘සබ්බෙ ධම්මා සබ්බාකාරෙන බුද්ධස්ස භගවතො ඤාණමුඛෙ ආපාථං ආගච්ඡන්තී’’තිආදීසු (මහානි. 156; චූළනි. මොඝරාජමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 85) ඤෙය්යො. ‘‘කුසලා ධම්මා අකුසලා ධම්මා’’තිආදීසු (ධ. ස. තිකමාතිකා 1) සභාවො අත්ථො[Pg.35]. ඉධාපි සභාවො. තස්මා එකධම්මන්ති එකං සංකිලෙසසභාවන්ති අධිප්පායො. එකො ච සො ධම්මො චාති එකධම්මො, තං එකධම්මං. 'धम्म' शब्द पर्यप्ति, सत्य, समाधि, प्रज्ञा, प्रकृति, पुण्य, आपत्ति, शून्यता, ज्ञेय और स्वभाव आदि अर्थों में देखा जाता है। जैसे कि 'यहाँ भिक्षु धर्म (धम्मं) की पर्यप्ति करता है' आदि में 'पर्यप्ति' अर्थ है। 'दृष्टधर्म' (दिट्ठधम्मो) आदि में 'सत्य' अर्थ है। 'वे भगवान ऐसे धर्म (एवं धम्मा) वाले थे' आदि में 'समाधि' अर्थ है। 'सत्य, धर्म, धृति और त्याग, वह परलोक में शोक नहीं करता' आदि में 'प्रज्ञा' अर्थ है। 'भिक्षुओं, जन्म-धर्मा (जातिधम्मानं) सत्त्वों में ऐसी इच्छा उत्पन्न होती है' आदि में 'प्रकृति' अर्थ है। 'धर्म ही धर्मचारी की रक्षा करता है' आदि में 'पुण्य' अर्थ है। 'तीन धर्मों (धम्मानं) में से किसी एक के द्वारा कहे - पाराजिक, संघादिशेष या पाचित्तिय' आदि में 'आपत्ति' अर्थ है। 'उस समय धर्म (धम्मा) होते हैं' आदि में 'शून्यता' अर्थ है। 'सभी धर्म (सब्बे धम्मा) सभी प्रकार से बुद्ध भगवान के ज्ञान के समक्ष आते हैं' आदि में 'ज्ञेय' अर्थ है। 'कुशल धर्म, अकुशल धर्म' आदि में 'स्वभाव' अर्थ है। यहाँ भी 'स्वभाव' ही अर्थ है। इसलिए 'एकधम्मं' का अर्थ 'एक संक्लेश स्वभाव' है। वह एक भी है और धर्म भी, इसलिए 'एकधम्म' है, उस 'एकधम्म' को। භික්ඛවෙති භික්ඛූ ආලපති. කිමත්ථං පන භගවා ධම්මං දෙසෙන්තො භික්ඛූ ආලපති, න ධම්මමෙව දෙසෙතීති? සතිජනනත්ථං. භික්ඛූ හි අඤ්ඤං චින්තෙන්තාපි ධම්මං පච්චවෙක්ඛන්තාපි කම්මට්ඨානං මනසි කරොන්තාපි නිසින්නා හොන්ති. තෙ පඨමං අනාලපිත්වා ධම්මෙ දෙසියමානෙ ‘‘අයං දෙසනා කිංනිදානා, කිංපච්චයා’’ති සල්ලක්ඛෙතුං න සක්කොන්ති. ආලපිතෙ පන සතිං උපට්ඨපෙත්වා සල්ලක්ඛෙතුං සක්කොන්ති, තස්මා සතිජනනත්ථං ‘‘භික්ඛවෙ’’ති ආලපති. තෙන ච තෙසං භික්ඛනසීලතාදිගුණයොගසිද්ධෙන වචනෙන හීනාධිකජනසෙවිතං වුත්තිං පකාසෙන්තො උද්ධතදීනභාවනිග්ගහං කරොති. ‘‘භික්ඛවෙ’’ති ඉමිනා කරුණාවිප්ඵාරසොම්මහදයනයනනිපාතපුබ්බඞ්ගමෙන වචනෙන තෙ අත්තනො මුඛාභිමුඛෙ කරොන්තො තෙන ච කථෙතුකම්යතාදීපකෙන වචනෙන නෙසං සොතුකම්යතං ජනෙති. තෙනෙව ච සම්බොධනත්ථෙන සාධුකං සවනමනසිකාරෙපි නියොජෙති. සාධුකං සවනමනසිකාරායත්තා හි සාසනසම්පත්ති. "भिक्षुओं" (भिक्खवे) कहकर वे भिक्षुओं को संबोधित करते हैं। भगवान धर्म का उपदेश देते समय भिक्षुओं को क्यों संबोधित करते हैं, केवल धर्म का ही उपदेश क्यों नहीं देते? स्मृति उत्पन्न करने के लिए। क्योंकि भिक्षु अन्य विषयों का चिन्तन करते हुए, धर्म का प्रत्यवेक्षण करते हुए या कर्मस्थान का मनन करते हुए भी बैठे होते हैं। उन्हें पहले संबोधित किए बिना, उपदेश दिए जाने पर वे यह नहीं समझ पाते कि "यह देशना किस निदान (कारण) से है, किस प्रत्यय से है"। संबोधित किए जाने पर वे स्मृति उपस्थित कर समझने में समर्थ होते हैं, इसलिए स्मृति उत्पन्न करने के लिए "भिक्षुओं" कहकर संबोधित करते हैं। और उन भिक्षुओं के भिक्षण-शीलता आदि गुणों के योग से सिद्ध उस वचन के द्वारा, हीन और अधिक जनों द्वारा सेवित वृत्ति को प्रकाशित करते हुए, वे उनके उद्धत और दीन भाव का निग्रह करते हैं। "भिक्षुओं" इस करुणा के प्रसार से युक्त, सौम्य हृदय और नेत्रों के निपात (दृष्टि) पूर्वक कहे गए वचन से उन्हें अपने सम्मुख करते हुए और उस कहने की इच्छा आदि को प्रकट करने वाले वचन से उनमें सुनने की इच्छा उत्पन्न करते हैं। उसी संबोधन के अर्थ से वे उन्हें भली-भांति सुनने और मनन करने में भी नियोजित करते हैं। क्योंकि शासन की सम्पत्ति भली-भांति सुनने और मनन करने पर ही आश्रित है। අඤ්ඤෙසුපි දෙවමනුස්සෙසු පරිසපරියාපන්නෙසු විජ්ජමානෙසු කස්මා භික්ඛූ එව ආමන්තෙසීති? ජෙට්ඨසෙට්ඨාසන්නසදාසන්නිහිතභාවතො. සබ්බපරිසසාධාරණා හි භගවතො ධම්මදෙසනා, පරිසාය ච ජෙට්ඨා භික්ඛූ පඨමුප්පන්නත්තා, සෙට්ඨා අනගාරියභාවං ආදිං කත්වා සත්ථු චරියානුවිධායකත්තා සකලසාසනපටිග්ගාහකත්තා ච, ආසන්නා තත්ථ නිසින්නෙසු සමීපවුත්තියා, සදාසන්නිහිතා සත්ථුසන්තිකාවචරත්තා. අපිච තෙ ධම්මදෙසනාය භාජනං යථානුසිට්ඨං පටිපත්තිසබ්භාවතො, විසෙසතො ච එකච්චෙ භික්ඛූ සන්ධාය අයං දෙසනාති තෙ එව ආලපි. अन्य देवों और मनुष्यों के सभा में उपस्थित होने पर भी केवल भिक्षुओं को ही क्यों आमंत्रित किया? ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, आसन्न (निकट) और सदा सन्निहित होने के कारण। भगवान की धर्म-देशना सभी सभाओं के लिए साधारण है, और सभा में भिक्षु पहले उत्पन्न होने के कारण 'ज्येष्ठ' हैं, अनागारिक भाव (प्रव्रज्या) को आदि मानकर शास्ता की चर्या का अनुकरण करने के कारण और सकल शासन को ग्रहण करने वाले होने के कारण 'श्रेष्ठ' हैं, वहाँ बैठे हुओं में समीप होने के कारण 'आसन्न' हैं, और शास्ता के समीप रहने के कारण 'सदा सन्निहित' हैं। इसके अतिरिक्त, वे धर्म-देशना के पात्र हैं क्योंकि वे उपदेश के अनुसार प्रतिपत्ति (आचरण) में संलग्न रहते हैं, और विशेष रूप से कुछ भिक्षुओं को लक्ष्य करके यह देशना है, इसलिए उन्हें ही संबोधित किया। පජහථාති එත්ථ පහානං නාම තදඞ්ගප්පහානං, වික්ඛම්භනප්පහානං, සමුච්ඡෙදප්පහානං, පටිප්පස්සද්ධිප්පහානං, නිස්සරණප්පහානන්ති පඤ්චවිධං. තත්ථ යං දීපාලොකෙනෙව තමස්ස පටිපක්ඛභාවතො අලොභාදීහි ලොභාදිකස්ස, නාමරූපපරිච්ඡෙදාදිවිපස්සනාඤාණෙහි තස්ස තස්ස අනත්ථස්ස පහානං. සෙය්යථිදං – පරිච්චාගෙන ලොභාදිමලස්ස, සීලෙන පාණාතිපාතාදිදුස්සීල්යස්ස, සද්ධාදීහි අස්සද්ධියාදිකස්ස, නාමරූපවවත්ථානෙන සක්කායදිට්ඨියා, පච්චයපරිග්ගහෙන අහෙතුවිසමහෙතුදිට්ඨීනං, තස්සෙව අපරභාගෙන කඞ්ඛාවිතරණෙන කථංකථීභාවස්ස, කලාපසම්මසනෙන ‘‘අහං [Pg.36] මමා’’ති ගාහස්ස, මග්ගාමග්ගවවත්ථානෙන අමග්ගෙ මග්ගසඤ්ඤාය, උදයදස්සනෙන උච්ඡෙදදිට්ඨියා, වයදස්සනෙන සස්සතදිට්ඨියා, භයදස්සනෙන සභයෙසු අභයසඤ්ඤාය, ආදීනවදස්සනෙන අස්සාදසඤ්ඤාය, නිබ්බිදානුපස්සනෙන අභිරතිසඤ්ඤාය, මුච්චිතුකම්යතාඤාණෙන අමුච්චිතුකම්යතාය උපෙක්ඛාඤාණෙන අනුපෙක්ඛාය, අනුලොමෙන ධම්මට්ඨිතියා, නිබ්බානෙන පටිලොමභාවස්ස, ගොත්රභුනා සඞ්ඛාරනිමිත්තග්ගාහස්ස පහානං, එතං තදඞ්ගප්පහානං නාම. "त्याग करो" (पजहथ) यहाँ प्रहाण पाँच प्रकार का है—तदङ्ग प्रहाण, विष्खम्भन प्रहाण, समुच्छेद प्रहाण, प्रतिप्रश्रब्धि प्रहाण और निस्सरण प्रहाण। उनमें से, जैसे दीपक के प्रकाश से अंधकार का नाश होता है, वैसे ही प्रतिपक्ष होने के कारण अलोभ आदि के द्वारा लोभ आदि का, और नाम-रूप परिच्छेद आदि विपश्यना ज्ञानों के द्वारा उन-उन अनर्थों का जो प्रहाण होता है (वह तदङ्ग प्रहाण है)। जैसे कि—परित्याग द्वारा लोभ आदि मल का, शील द्वारा प्राणातिपात आदि दुःशील भाव का, श्रद्धा आदि द्वारा अश्रद्धा आदि का, नाम-रूप के निर्धारण द्वारा सत्काय-दृष्टि का, प्रत्यय-परिग्रह द्वारा अहेतु और विषम-हेतु दृष्टियों का, उसी के बाद के भाग में 'काङ्क्षा-वितरण' द्वारा संशय का, 'कलाप-सम्मसन' द्वारा "मैं और मेरा" इस ग्रहण का, 'मार्गामार्ग-व्यवस्थान' द्वारा अमार्ग में मार्ग की संज्ञा का, 'उदय-दर्शन' द्वारा उच्छेद-दृष्टि का, 'वय-दर्शन' द्वारा शाश्वत-दृष्टि का, 'भय-दर्शन' द्वारा भयरहित वस्तुओं में अभय की संज्ञा का, 'आदीनव-दर्शन' द्वारा आस्वाद की संज्ञा का, 'निर्विदा-अनुपश्यना' द्वारा अभिरति की संज्ञा का, 'मुञ्चितुकम्यता-ज्ञान' द्वारा मुक्त न होने की इच्छा का, 'उपेक्षा-ज्ञान' द्वारा अनपेक्षा का, 'अनुलोम' द्वारा धर्म-स्थिति का, और 'निर्वाण' द्वारा प्रतिलोम भाव का, 'गोत्रभू' ज्ञान द्वारा संस्कार-निमित्तों के ग्रहण का जो प्रहाण है, इसे 'तदङ्ग प्रहाण' कहते हैं। යං පන උපචාරප්පනාභෙදෙන සමාධිනා පවත්තිභාවනිවාරණතො ඝටප්පහාරෙනෙව උදකපිට්ඨෙ සෙවාලස්ස තෙසං තෙසං නීවරණාදිධම්මානං පහානං, එතං වික්ඛම්භනප්පහානං නාම. යං චතුන්නං අරියමග්ගානං භාවිතත්තා තංතංමග්ගවතො අත්තනො සන්තානෙ ‘‘දිට්ඨිගතානං පහානායා’’තිආදිනා (ධ. ස. 277; විභ. 628) නයෙන වුත්තස්ස සමුදයපක්ඛියස්ස කිලෙසගණස්ස අච්චන්තං අප්පවත්තිභාවෙන සමුච්ඡින්දනං, ඉදං සමුච්ඡෙදප්පහානං නාම. යං පන ඵලක්ඛණෙ පටිප්පස්සද්ධත්තං කිලෙසානං, එතං පටිප්පස්සද්ධිප්පහානං නාම. යං පන සබ්බසඞ්ඛතනිස්සටත්තා පහීනසබ්බසඞ්ඛතං නිබ්බානං, එතං නිස්සරණප්පහානං නාම. එවං පඤ්චවිධෙ පහානෙ අනාගාමිකභාවකරස්ස පහානස්ස අධිප්පෙතත්තා ඉධ සමුච්ඡෙදප්පහානන්ති වෙදිතබ්බං. තස්මා පජහථාති පරිච්චජථ, සමුච්ඡින්දථාති අත්ථො. जो उपचार और अर्पणा के भेद वाले समाधि के द्वारा प्रवृत्ति को रोकने से, जैसे जल की सतह पर घड़े के प्रहार से शैवाल हट जाती है, वैसे ही उन-उन नीवरण आदि धर्मों का जो प्रहाण होता है, उसे 'विष्खम्भन प्रहाण' कहते हैं। चार आर्यमार्गों की भावना के कारण, उस-उस मार्ग वाले के अपने सन्तान में "दृष्टिगतों के प्रहाण के लिए" इत्यादि विधि से कहे गए समुदय-पक्षीय क्लेश-समूह का जो अत्यंत अप्रवृत्ति भाव से समूलोन्मूलन है, यह 'समुच्छेद प्रहाण' कहलाता है। जो फल के क्षण में क्लेशों की शान्ति है, वह 'प्रतिप्रश्रब्धि प्रहाण' है। जो सभी संस्कृतों से निकल जाने के कारण सभी संस्कृतों का प्रहाण रूप 'निर्वाण' है, वह 'निस्सरण प्रहाण' है। इस प्रकार पाँच प्रकार के प्रहाणों में, अनागामी भाव उत्पन्न करने वाले प्रहाण के अभिप्रेत होने से, यहाँ 'समुच्छेद प्रहाण' समझना चाहिए। इसलिए "पजहथ" का अर्थ है—परित्याग करो, समूलोन्मूलन करो। අහන්ති භගවා අත්තානං නිද්දිසති. වොති අයං වොසද්දො පච්චත්තඋපයොගකරණසාමිවචනපදපූරණසම්පදානෙසු දිස්සති. තථා හි ‘‘කච්චි, පන වො අනුරුද්ධා, සමග්ගා සම්මොදමානා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.326) පච්චත්තෙ ආගතො. ‘‘ගච්ඡථ, භික්ඛවෙ, පණාමෙමි වො’’තිආදීසු (ම. නි. 2.157) උපයොගෙ. ‘‘න වො මම සන්තිකෙ වත්ථබ්බ’’න්තිආදීසු (ම. නි. 2.157) කරණෙ. ‘‘සබ්බෙසං වො, සාරිපුත්ත, සුභාසිත’’න්තිආදීසු (ම. නි. 1.345) සාමිවචනෙ. ‘‘යෙ හි වො අරියා පරිසුද්ධකායකම්මන්තා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.35) පදපූරණෙ. ‘‘වනපත්ථපරියායං වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමී’’තිආදීසු (ම. නි. 1.190) සම්පදානෙ. ඉධාපි සම්පදානෙ එව දට්ඨබ්බො. "अहं" के द्वारा भगवान स्वयं को निर्दिष्ट करते हैं। "वो" यह 'वो' शब्द कर्ता, कर्म, करण, सम्बन्ध, पद-पूरण और सम्प्रदान में देखा जाता है। जैसे कि—"कच्चि, पन वो अनुरुद्धा, समग्गा सम्मोदमाना" इत्यादि में यह कर्ता में आया है। "गच्छथ, भिक्खवे, पणामेमि वो" इत्यादि में कर्म में। "न वो mama सन्तिके वत्थब्बं" इत्यादि में करण में। "सब्बेसं वो, सारिपुत्त, सुभासितं" इत्यादि में सम्बन्ध में। "ये हि वो अरिया परिसुद्धकायकमन्ता" इत्यादि में पद-पूरण में। "वनपत्थपरियायं वो, भिक्खवे, देसेस्सामि" इत्यादि में सम्प्रदान में। यहाँ भी इसे सम्प्रदान में ही देखना चाहिए। පාටිභොගොති පටිභූ. සො හි ධාරණකං පටිච්ච ධනිකස්ස, ධනිකං පටිච්ච ධාරණකස්ස පටිනිධිභූතො ධනිකසන්තකස්ස තතො හරණාදිසඞ්ඛාතෙන භුඤ්ජනෙන [Pg.37] භොගොති පටිභොගො, පටිභොගො එව පාටිභොගො. අනාගාමිතායාති අනාගාමිභාවත්ථාය. පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන හි කාමභවස්ස අනාගමනතො අනාගාමී. යො යස්ස ධම්මස්ස අධිගමෙන අනාගාමීති වුච්චති, සඵලො සො තතියමග්ගො අනාගාමිතා නාම. ඉති භගවා වෙනෙය්යදමනකුසලො වෙනෙය්යජ්ඣාසයානුකූලං තතියමග්ගාධිගමං ලහුනා උපායෙන එකධම්මපූරණතාමත්තෙන ථිරං කත්වා දස්සෙසි යථා තං සම්මාසම්බුද්ධො. භින්නභූමිකාපි හි පටිඝසංයොජනාදයො තතියමග්ගවජ්ඣා කිලෙසා කාමරාගප්පහානං නාතිවත්තන්තීති. 'पाटिभोगो' का अर्थ है 'प्रतिभू' (गारंटी देने वाला)। वह ऋणी के प्रति धनी का और धनी के प्रति ऋणी का प्रतिनिधि होता है, धनी की संपत्ति के वहाँ से हरण आदि के रूप में उपभोग के कारण 'प्रतिभोग' कहलाता है, और 'प्रतिभोग' ही 'पाटिभोग' है। 'अनागामिताय' का अर्थ है अनागामी भाव के लिए। प्रतिसन्धि ग्रहण करने के वश से काम-भव में पुनः न आने के कारण 'अनागामी' कहा जाता है। जिस धर्म की प्राप्ति से (व्यक्ति) अनागामी कहलाता है, वह फल सहित तीसरा मार्ग 'अनागामिता' नाम से जाना जाता है। इस प्रकार विनेय जनों के दमन में कुशल भगवान ने विनेय जनों के आशय के अनुकूल तीसरे मार्ग की प्राप्ति को, एक धर्म की पूर्ति मात्र के लघु उपाय से, स्थिर करके दिखाया, जैसा कि सम्यक्सम्बुद्ध करते हैं। क्योंकि भिन्न भूमि वाले होने पर भी प्रतिघ-संयोजन आदि तीसरे मार्ग द्वारा वध करने योग्य क्लेश काम-राग के प्रहाण का अतिक्रमण नहीं करते हैं। කස්මා පනෙත්ථ භගවා අත්තානං පාටිභොගභාවෙ ඨපෙසි? තෙසං භික්ඛූනං අනාගාමිමග්ගාධිගමාය උස්සාහජනනත්ථං. පස්සති හි භගවා ‘‘මයා ‘එකධම්මං, භික්ඛවෙ, පජහථ, අහං වො පාටිභොගො අනාගාමිතායා’ති වුත්තෙ ඉමෙ භික්ඛූ අද්ධා තං එකධම්මං පහාය සක්කා තතියභූමිං සමධිගන්තුං, යතො ධම්මස්සාමි පඨමමාහ ‘අහං පාටිභොගො’ති උස්සාහජාතා තදත්ථාය පටිපජ්ජිතබ්බං මඤ්ඤිස්සන්තී’’ති. තස්මා උස්සාහජනනත්ථං අනාගාමිතාය තෙසං භික්ඛූනං අත්තානං පාටිභොගභාවෙ ඨපෙසි. यहाँ भगवान ने स्वयं को 'पाटिभोग' (गारंटी देने वाला) के रूप में क्यों स्थापित किया? उन भिक्षुओं में अनागामी मार्ग की प्राप्ति के लिए उत्साह उत्पन्न करने के लिए। क्योंकि भगवान देखते हैं कि "मेरे द्वारा 'भिक्षुओं, एक धर्म को छोड़ो, मैं तुम्हारे अनागामी होने के लिए पाटिभोग हूँ' ऐसा कहने पर, ये भिक्षु निश्चित रूप से उस एक धर्म को छोड़कर तीसरी भूमि (अनागामी पद) को प्राप्त कर सकेंगे; क्योंकि धर्म के स्वामी ने पहले ही कहा है 'मैं पाटिभोग हूँ', इसलिए वे उत्साहित होकर उसके लिए प्रतिपत्ति (साधना) करना आवश्यक समझेंगे।" इसलिए उत्साह उत्पन्न करने के लिए उन भिक्षुओं की अनागामिता के लिए स्वयं को पाटिभोग के रूप में स्थापित किया। කතමං එකධම්මන්ති එත්ථ කතමන්ති පුච්ඡාවචනං. පුච්ඡා ච නාමෙසා පඤ්චවිධා – අදිට්ඨජොතනාපුච්ඡා, දිට්ඨසංසන්දනාපුච්ඡා, විමතිච්ඡෙදනාපුච්ඡා, අනුමතිපුච්ඡා, කථෙතුකම්යතාපුච්ඡාති. තත්ථ පකතියා ලක්ඛණං අඤ්ඤාතං හොති අදිට්ඨං අතුලිතං අතීරිතං අවිභූතං අවිභාවිතං, තස්ස ඤාණාය දස්සනාය තුලනාය තීරණාය විභූතත්ථාය විභාවනත්ථාය පඤ්හං පුච්ඡති, අයං අදිට්ඨජොතනාපුච්ඡා. පකතියා ලක්ඛණං ඤාතං හොති දිට්ඨං තුලිතං තීරිතං විභූතං විභාවිතං. සො අඤ්ඤෙහි පණ්ඩිතෙහි සද්ධිං සංසන්දනත්ථාය පඤ්හං පුච්ඡති, අයං දිට්ඨසංසන්දනාපුච්ඡා. පකතියා සංසයපක්ඛන්දො හොති විමතිපක්ඛන්දො ද්වෙළ්හකජාතො – ‘‘එවං නු ඛො, න නු ඛො, කිං නු ඛො, කථං නු ඛො’’ති, සො විමතිච්ඡෙදනත්ථාය පඤ්හං පුච්ඡති, අයං විමතිච්ඡෙදනාපුච්ඡා. භගවා හි අනුමතිග්ගහණත්ථං පඤ්හං පුච්ඡති – ‘‘තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, රූපං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’තිආදිනා (සං. නි. 3.59; මහාව. 21), අයං අනුමතිපුච්ඡා. භගවා භික්ඛූනං කථෙතුකම්යතාය පඤ්හං පුච්ඡති – ‘‘චත්තාරොමෙ, භික්ඛවෙ, ආහාරා භූතානං [Pg.38] වා සත්තානං ඨිතියා සම්භවෙසීනං වා අනුග්ගහාය. කතමෙ චත්තාරො’’ති (සං. නි. 2.11) අයං කථෙතුකම්යතාපුච්ඡා. 'कतमं एकधम्मं' (कौन सा एक धर्म) यहाँ 'कतमं' प्रश्नवाचक शब्द है। प्रश्न पाँच प्रकार के होते हैं - अदृष्ट-जोतना-पृच्छा (अनदेखे को प्रकट करने वाला प्रश्न), दृष्ट-संसन्दन-पृच्छा (देखे हुए की तुलना करने वाला प्रश्न), विमतिच्छेदना-पृच्छा (संदेह दूर करने वाला प्रश्न), अनुमति-पृच्छा (सहमति लेने वाला प्रश्न), और कथेतुकाम्यता-पृच्छा (कहने की इच्छा से किया गया प्रश्न)। वहाँ स्वभाव से लक्षण अज्ञात, अदृष्ट, अतुलित, अतीरित, अविभूत और अविभावित होता है, उसके ज्ञान, दर्शन, तुलना, निर्णय, स्पष्टता और प्रकटीकरण के लिए जो प्रश्न पूछा जाता है, वह 'अदृष्ट-जोतना-पृच्छा' है। स्वभाव से लक्षण ज्ञात, दृष्ट, तुलित, तीरित, विभूत और विभावित होता है। वह अन्य पंडितों के साथ तुलना करने के लिए जो प्रश्न पूछता है, वह 'दृष्ट-संसन्दन-पृच्छा' है। स्वभाव से संशय में पड़ा हुआ, विमति में पड़ा हुआ, दुविधा में पड़ा हुआ होता है - "क्या ऐसा है, क्या ऐसा नहीं है, क्या है, कैसे है", वह संशय दूर करने के लिए जो प्रश्न पूछता है, वह 'विमतिच्छेदना-पृच्छा' है। भगवान अनुमति प्राप्त करने के लिए प्रश्न पूछते हैं - "भिक्षुओं, तुम क्या सोचते हो, रूप नित्य है या अनित्य?" आदि, यह 'अनुमति-पृच्छा' है। भगवान भिक्षुओं को बताने की इच्छा से प्रश्न पूछते हैं - "भिक्षुओं, ये चार आहार उत्पन्न प्राणियों की स्थिति के लिए या उत्पन्न होने की इच्छा रखने वालों के अनुग्रह के लिए हैं। वे चार कौन से हैं?" यह 'कथेतुकाम्यता-पृच्छा' है। තත්ථ පුරිමා තිස්සො පුච්ඡා බුද්ධානං නත්ථි. කස්මා? තීසු හි අද්ධාසු කිඤ්චි සඞ්ඛතං අද්ධාවිමුත්තං වා අසඞ්ඛතං සම්මාසම්බුද්ධානං අදිට්ඨං අතුලිතං අතීරිතං අවිභූතං අවිභාවිතං නාම නත්ථි. තෙන නෙසං අදිට්ඨජොතනාපුච්ඡා නත්ථි. යං පන තෙහි අත්තනො ඤාණෙන පටිවිද්ධං, තස්ස අඤ්ඤෙන සමණෙන වා බ්රාහ්මණෙන වා දෙවෙන වා මාරෙන වා බ්රහ්මුනා වා සද්ධිං සංසන්දනකිච්චං නත්ථි, තෙන නෙසං දිට්ඨසංසන්දනාපුච්ඡාපි නත්ථි. යස්මා පන බුද්ධා භගවන්තො අකථංකථී තිණ්ණවිචිකිච්ඡා සබ්බධම්මෙසු විගතසංසයා, තෙන නෙසං විමතිච්ඡෙදනාපුච්ඡාපි නත්ථි. ඉතරා පන ද්වෙ පුච්ඡා අත්ථි, තාසු අයං කථෙතුකම්යතාපුච්ඡාති වෙදිතබ්බා. उनमें से पहले तीन प्रश्न बुद्धों के लिए नहीं होते। क्यों? क्योंकि तीनों कालों में कोई भी संस्कृत (संस्कारित), काल-मुक्त या असंस्कृत धर्म सम्यक्सम्बुद्धों के लिए अदृष्ट, अतुलित, अतीरित, अविभूत या अविभावित नहीं है। इसलिए उनके लिए 'अदृष्ट-जोतना-पृच्छा' नहीं है। जो उन्होंने अपने ज्ञान से साक्षात् किया है, उसकी किसी अन्य श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार या ब्रह्मा के साथ तुलना करने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए उनके लिए 'दृष्ट-संसन्दन-पृच्छा' भी नहीं है। चूँकि बुद्ध भगवान संशय-रहित, पार की गई विचिकित्सा वाले और सभी धर्मों में संशय-मुक्त होते हैं, इसलिए उनके लिए 'विमतिच्छेदना-पृच्छा' भी नहीं है। शेष दो प्रश्न होते हैं, उनमें से इसे 'कथेतुकाम्यता-पृच्छा' समझना चाहिए। ඉදානි තාය පුච්ඡාය පුට්ඨමත්ථං සරූපතො දස්සෙන්තො ‘‘ලොභං, භික්ඛවෙ, එකධම්ම’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ ලුබ්භන්ති තෙන, සයං වා ලුබ්භති, ලුබ්භනමත්තමෙව වා තන්ති ලොභො. ස්වායං ආරම්මණග්ගහණලක්ඛණො මක්කටාලෙපො විය, අභිසඞ්ගරසො තත්තකපාලෙ පක්ඛිත්තමංසපෙසි විය, අපරිච්චාගපච්චුපට්ඨානො තෙලඤ්ජනරාගො විය, සංයොජනියෙසු ධම්මෙසු අස්සාදදස්සනපදට්ඨානො, තණ්හානදිභාවෙන වඩ්ඪමානො යත්ථ සමුප්පන්නො, සීඝසොතා නදී විය මහාසමුද්දං අපායමෙව තං සත්තං ගහෙත්වා ගච්ඡතීති දට්ඨබ්බො. කිඤ්චාපි අයං ලොභසද්දො සබ්බලොභසාමඤ්ඤවචනො, ඉධ පන කාමරාගවචනොති වෙදිතබ්බො. සො හි අනාගාමිමග්ගවජ්ඣො. अब उस प्रश्न द्वारा पूछे गए अर्थ को साक्षात् दिखाते हुए "भिक्षुओं, लोभ एक धर्म है" आदि कहा। वहाँ जिससे लुब्ध होते हैं, या स्वयं लुब्ध होता है, या केवल लुब्ध होना ही है, वह 'लोभ' है। वह आलम्बन को ग्रहण करने के लक्षण वाला है जैसे बंदर को पकड़ने वाला गोंद (मक्कटालेप), चिपकने के स्वभाव वाला है जैसे गर्म तवे पर डाली गई मांस की पेशी, न छोड़ने के रूप में उपस्थित होने वाला है जैसे तेल का रंग, संयोजन (बन्धन) वाले धर्मों में आस्वाद देखने के पदस्थान वाला है, तृष्णा रूपी नदी के भाव से बढ़ता हुआ जहाँ उत्पन्न होता है, तीव्र प्रवाह वाली नदी के समान महासमुद्र की तरह उस प्राणी को लेकर अपाय (दुर्गति) में ही जाता है, ऐसा देखना चाहिए। यद्यपि यह 'लोभ' शब्द सामान्य रूप से सभी प्रकार के लोभ का वाचक है, तथापि यहाँ इसे 'काम-राग' का वाचक समझना चाहिए। क्योंकि वह अनागामी मार्ग द्वारा वध करने योग्य (नष्ट करने योग्य) है। පුන භික්ඛවෙති ආලපනං ධම්මස්ස පටිග්ගාහකභාවෙන අභිමුඛීභූතානං තත්ථ ආදරජනනත්ථං. පජහථාති ඉමිනා පහානාභිසමයො විහිතො, සො ච පරිඤ්ඤාසච්ඡිකිරියාභාවනාභිසමයෙහි සද්ධිං එව පවත්තති, න විසුන්ති චතුසච්චාධිට්ඨානානි චත්තාරිපි සම්මාදිට්ඨියා කිච්චානි විහිතානෙව හොන්ති. යථා ච ‘‘ලොභං පජහථා’’ති වුත්තෙ පහානෙකට්ඨභාවතො දොසාදීනම්පි පහානං අත්ථතො වුත්තමෙව හොති, එවං සමුදයසච්චවිසයෙ සම්මාදිට්ඨිකිච්චෙ පහානාභිසමයෙ වුත්තෙ තස්සා සහකාරීකාරණභූතානං සම්මාසඞ්කප්පාදීනං සෙසමග්ගඞ්ගානම්පි සමුදයසච්චවිසයකිච්චං අත්ථතො වුත්තමෙව හොතීති පරිපුණ්ණො අරියමග්ගබ්යාපාරො ඉධ [Pg.39] කථිතොති දට්ඨබ්බො. ඉමිනා නයෙන සතිපට්ඨානාදීනම්පි බොධිපක්ඛියධම්මානං බ්යාපාරස්ස ඉධ වුත්තභාවො යථාරහං විත්ථාරෙතබ්බො. पुनः 'भिक्षुओं' यह संबोधन धर्म के ग्रहण करने के लिए अभिमुख हुए लोगों में आदर उत्पन्न करने के लिए है। 'त्याग करो' (पजहथ) इससे प्रहाण-अभिसमय का विधान किया गया है, और वह परिज्ञा, साक्षात्करण और भावना-अभिसमयों के साथ ही प्रवृत्त होता है, अलग नहीं; चारों सत्यों के अधिष्ठान (कार्य) सम्यक्-दृष्टि के कार्यों के रूप में ही विहित होते हैं। जैसे 'लोभ का त्याग करो' कहने पर प्रहाण के एकार्थ होने से द्वेष आदि का त्याग भी अर्थतः कह ही दिया गया होता है, वैसे ही समुदय-सत्य के विषय में सम्यक्-दृष्टि के कार्य रूप प्रहाण-अभिसमय के कहे जाने पर, उसके सहकारी कारण बने सम्यक्-संकल्प आदि शेष मार्गांगों का भी समुदय-सत्य विषयक कार्य अर्थतः कह ही दिया गया होता है, इस प्रकार यहाँ पूर्ण आर्यमार्ग का व्यापार कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। इसी न्याय से स्मृतिप्रस्थान आदि बोधिपाक्षिक धर्मों के व्यापार का भी यहाँ कहा जाना यथायोग्य विस्तार से समझना चाहिए। අපිචෙත්ථ ලොභං පජහථාති එතෙන පහානපරිඤ්ඤා වුත්තා. සා ච තීරණපරිඤ්ඤාධිට්ඨානා, තීරණපරිඤ්ඤා ච ඤාතපරිඤ්ඤාධිට්ඨානාති අවිනාභාවෙන තිස්සොපි පරිඤ්ඤා බොධිතා හොන්ති. එවමෙත්ථ සහ ඵලෙන චතුසච්චකම්මට්ඨානං පරිපුණ්ණං කත්වා පකාසිතන්ති දට්ඨබ්බං. අථ වා ලොභං පජහථාති සහ ඵලෙන ඤාණදස්සනවිසුද්ධි දෙසිතා. සා ච පටිපදාඤාණදස්සනවිසුද්ධිසන්නිස්සයා…පෙ… චිත්තවිසුද්ධිසීලවිසුද්ධිසන්නිස්සයා චාති නානන්තරිකභාවෙන සහ ඵලෙන සබ්බාපි සත්ත විසුද්ධියො විභාවිතාති වෙදිතබ්බං. इसके अतिरिक्त, यहाँ 'लोभ का त्याग करो' इससे प्रहाण-परिज्ञा कही गई है। वह तीरण-परिज्ञा पर आधारित है, और तीरण-परिज्ञा ज्ञात-परिज्ञा पर आधारित है, इस प्रकार अविनाभाव (अनिवार्य संबंध) से तीनों परिज्ञाएँ बोधित होती हैं। इस प्रकार यहाँ फल के साथ चतुःसत्य-कर्मस्थान को पूर्ण करके प्रकाशित किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। अथवा 'लोभ का त्याग करो' इससे फल के साथ ज्ञानदर्शन-विशुद्धि देशित की गई है। और वह प्रतिपदा-ज्ञानदर्शन-विशुद्धि के आश्रित है... पे... चित्त-विशुद्धि और शील-विशुद्धि के आश्रित है, इस प्रकार निरंतरता के कारण फल के साथ सभी सातों विशुद्धियाँ स्पष्ट की गई हैं, ऐसा जानना चाहिए। එවමෙතාය විසුද්ධික්කමභාවනාය පරිඤ්ඤාත්තයසම්පාදනෙන ලොභං පජහිතුකාමෙන – इस प्रकार इस विशुद्धि-क्रम की भावना द्वारा तीन परिज्ञाओं को सिद्ध करते हुए लोभ का त्याग करने के इच्छुक व्यक्ति को— ‘‘අනත්ථජනනො ලොභො, ලොභො චිත්තප්පකොපනො; භයමන්තරතො ජාතං, තං ජනො නාවබුජ්ඣති. 'लोभ अनर्थ उत्पन्न करने वाला है, लोभ चित्त को क्षुब्ध करने वाला है; भीतर से उत्पन्न हुए इस भय को लोग नहीं जानते। ‘‘ලුද්ධො අත්ථං න ජානාති, ලුද්ධො ධම්මං න පස්සති; අන්ධතමං තදා හොති, යං ලොභො සහතෙ නරං’’. (ඉතිවු. 88); 'लोभी अर्थ (हित) को नहीं जानता, लोभी धर्म को नहीं देखता; जब लोभ मनुष्य को अभिभूत कर लेता है, तब वह घोर अंधकार (अज्ञान) के समान होता है' (इतिवृत्तक ८८)। රත්තො ඛො, ආවුසො, රාගෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො පාණම්පි හනති, අදින්නම්පි ආදියති, සන්ධිම්පි ඡින්දති, නිල්ලොපම්පි හරති, එකාගාරිකම්පි කරොති, පරිපන්ථෙපි තිට්ඨති, පරදාරම්පි ගච්ඡති, මුසාපි භණති. තදපි තෙසං භවතං සමණබ්රාහ්මණානං අජානතං අපස්සතං අවෙදයතං තණ්හානුගතානං පරිතස්සිතං විප්ඵන්දිතමෙව (අ. නි. 3.54). हे आयुष्मानों! राग से रंगा हुआ, राग से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला व्यक्ति प्राणी की हत्या भी करता है, बिना दिया हुआ (चोरी) भी लेता है, सेंध भी लगाता है, लूटपाट भी करता है, डकैती भी करता है, राहजनी भी करता है, परस्त्री-गमन भी करता है और झूठ भी बोलता है। वह उन अजानकार, न देखने वाले, अनुभव न करने वाले, तृष्णा के पीछे चलने वाले श्रमण-ब्राह्मणों का केवल संताप और छटपटाहट ही है (अंगुत्तर निकाय ३.५४)। ‘‘තණ්හාදුතියො පුරිසො, දීඝමද්ධාන සංසරං; ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවං, සංසාරං නාතිවත්තති’’. (ඉතිවු. 15, 105); 'तृष्णा को साथी बनाने वाला पुरुष, दीर्घकाल तक संसार में भटकता हुआ, इस जन्म और अन्य जन्मों वाले संसार का अतिक्रमण नहीं कर पाता' (इतिवृत्तक १५, १०५)। ‘‘නත්ථි රාගසමො අග්ගි, නත්ථි දොසසමො කලි’’. (ධ. ප. 202, 251); 'राग के समान कोई अग्नि नहीं है, द्वेष के समान कोई पाप (कलि) नहीं है' (धम्मपद २०२, २५१)। ‘‘කාමරාගෙන ඩය්හාමි, චිත්තං මෙ පරිඩය්හති’’. (සං. නි. 1.212); 'मैं काम-राग से जल रहा हूँ, मेरा चित्त जल रहा है' (संयुत्त निकाय १.२१२)। ‘‘යෙ රාගරත්තානුපතන්ති සොතං, සයංකතං මක්කටකොව ජාල’’න්ති. (ධ. ප. 347) ච – 'जो राग में रंगे हुए हैं, वे (तृष्णा के) स्रोत में गिरते हैं, जैसे मकड़ी अपने द्वारा बनाए गए जाले में' (धम्मपद ३४७) और— එවමාදිසුත්තපදානුසාරෙන [Pg.40] නානානයෙහි ලොභස්ස ආදීනවං පච්චවෙක්ඛිත්වා තස්ස පහානාය පටිපජ්ජිතබ්බං. इन आदि सूत्र-पदों के अनुसार अनेक विधियों से लोभ के दोषों का प्रत्यवेक्षण (अवलोकन) करके उसके प्रहाण के लिए प्रतिपन्न (प्रयत्नशील) होना चाहिए। අපිච ඡ ධම්මා කාමරාගස්ස පහානාය සංවත්තන්ති, අසුභනිමිත්තස්ස උග්ගහො, අසුභභාවනානුයොගො, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරතා, භොජනෙ මත්තඤ්ඤුතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. දසවිධඤ්හි අසුභනිමිත්තං උග්ගණ්හන්තස්සාපි කාමරාගො පහීයති, කායගතාසතිභාවනාවසෙන සවිඤ්ඤාණකෙ උද්ධුමාතකාදිවසෙන අවිඤ්ඤාණකෙ අසුභෙ අසුභභාවනානුයොගමනුයුත්තස්සාපි, මනච්ඡට්ඨෙසු ඉන්ද්රියෙසු සංවරණවසෙන සතිකවාටෙන පිහිතද්වාරස්සාපි, චතුන්නං පඤ්චන්නං වා ආලොපානං ඔකාසෙ සති උදකං පිවිත්වා යාපනසීලතාය භොජනෙ මත්තඤ්ඤුනොපි. තෙනෙවාහ – इसके अतिरिक्त, छह धर्म काम-राग के प्रहाण के लिए होते हैं: अशुभ-निमित्त का उद्ग्रहण (सीखना), अशुभ-भावना का अभ्यास, इंद्रियों में गुप्तद्वारता (संयम), भोजन में मात्राज्ञता, कल्याण-मित्रता और उपयुक्त कथा। दस प्रकार के अशुभ-निमित्तों को ग्रहण करने वाले का भी काम-राग क्षीण होता है; सविज्ञान (सजीव) शरीर में 'उद्धुमातक' (सूजा हुआ) आदि के रूप में और अविज्ञान (निर्जीव) में अशुभ-भावना के अभ्यास में लगे हुए व्यक्ति का भी; मन सहित छह इंद्रियों में संवर के द्वारा स्मृति रूपी किवाड़ से द्वार बंद रखने वाले का भी; और चार या पाँच ग्रास की जगह होने पर पानी पीकर निर्वाह करने वाले भोजन में मात्राज्ञ व्यक्ति का भी। इसीलिए कहा है— ‘‘චත්තාරො පඤ්ච ආලොපෙ, අභුත්වා උදකං පිවෙ; අලං ඵාසුවිහාරාය, පහිතත්තස්ස භික්ඛුනො’’ති. (ථෙරගා. 983); 'चार या पाँच ग्रास कम खाकर पानी पीना चाहिए; यह प्रयत्नशील भिक्षु के सुखपूर्वक विहार के लिए पर्याप्त है' (थेरगाथा ९८३)। අසුභකම්මට්ඨානභාවනාරතෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි, ඨානනිසජ්ජාදීසු දසඅසුභනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙනෙවාහ – अशुभ-कर्मस्थान की भावना में लगे हुए कल्याण-मित्रों का सेवन करने वाले का, और खड़े होने या बैठने आदि के समय दस अशुभों से संबंधित उपयुक्त कथा करने वाले का भी (राग) क्षीण होता है। इसीलिए कहा है— ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, අසුභනිමිත්තං, තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො, අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා කාමච්ඡන්දස්ස අනුප්පාදාය උප්පන්නස්ස වා කාමච්ඡන්දස්ස පහානායා’’ති. 'भिक्षुओं! अशुभ-निमित्त है, वहाँ योनिशः मनस्कार की बहुलता, यह अनुत्पन्न कामछंद की अनुत्पत्ति के लिए और उत्पन्न कामछंद के प्रहाण के लिए आहार (कारण) है'। එවං පුබ්බභාගෙ කාමරාගසඞ්ඛාතස්ස ලොභස්ස පහානාය පටිපන්නො විපස්සනං උස්සුක්කාපෙත්වා තතියමග්ගෙන තං අනවසෙසතො සමුච්ඡින්දති. තෙන වුත්තං ‘‘ලොභං, භික්ඛවෙ, එකධම්මං පජහථ, අහං වො පාටිභොගො අනාගාමිතායා’’ති. इस प्रकार पूर्वभाग में काम-राग संज्ञक लोभ के प्रहाण के लिए प्रतिपन्न (साधक) विपश्यना को बढ़ाकर तृतीय मार्ग (अनागामी मार्ग) द्वारा उसे पूर्णतः समूल नष्ट कर देता है। इसीलिए कहा गया है— 'भिक्षुओं! लोभ नामक एक धर्म का त्याग करो, मैं तुम्हें अनागामी पद की प्राप्ति का विश्वास दिलाता हूँ'। එත්ථාහ ‘‘කො පනෙත්ථ ලොභො පහීයති, කිං අතීතො, අථ අනාගතො, උදාහු පච්චුප්පන්නො’’ති? කිඤ්චෙත්ථ – න තාව අතීතො ලොභො පහීයෙය්ය, න අනාගතො වා තෙසං අභාවතො. න හි නිරුද්ධං අනුප්පන්නං වා අත්ථීති වුච්චති, වායාමො ච අඵලො ආපජ්ජති. අථ පච්චුප්පන්නො, එවම්පි අඵලො වායාමො තස්ස සරසභඞ්ගත්තා, සංකිලිට්ඨා ච මග්ගභාවනා [Pg.41] ආපජ්ජති, චිත්තවිප්පයුත්තො වා ලොභො සියා, න චායං නයො ඉච්ඡිතොති. වුච්චතෙ – න වුත්තනයෙන අතීතානාගතපච්චුප්පන්නො ලොභො පහීයති. සෙය්යථාපි ඉධ තරුණරුක්ඛො අසඤ්ජාතඵලො, තං පුරිසො කුඨාරියා මූලෙ ඡින්දෙය්ය, තස්ස රුක්ඛස්ස ඡෙදෙ අසති යානි ඵලානි නිබ්බත්තෙය්යුං, තානි රුක්ඛස්ස ඡින්නත්තා අජාතානි එව න ජායෙය්යුං, එවමෙව අරියමග්ගාධිගමෙ අසති උප්පජ්ජනාරහො ලොභො අරියමග්ගාධිගමෙන පච්චයඝාතස්ස කතත්තා න උප්පජ්ජති. අයඤ්හි අට්ඨකථාසු ‘‘භූමිලද්ධුප්පන්නො’’ති වුච්චති. විපස්සනාය හි ආරම්මණභූතා පඤ්චක්ඛන්ධා තස්ස උප්පජ්ජනට්ඨානතාය භූමි නාම. සා භූමි තෙන ලද්ධාති කත්වා භූමිලද්ධුප්පන්නො. ආරම්මණාධිග්ගහිතුප්පන්නො අවික්ඛම්භිතුප්පන්නො අසමූහතුප්පන්නොති ච අයමෙව වුච්චති. यहाँ कहा गया है - "यहाँ कौन सा लोभ प्रहीण होता है, क्या अतीत, अथवा अनागत, या प्रत्युत्पन्न?" यहाँ क्या है - न तो अतीत लोभ प्रहीण होगा, न ही अनागत, उनके अभाव के कारण। क्योंकि जो निरुद्ध हो चुका है या जो अभी उत्पन्न नहीं हुआ है, उसे 'विद्यमान' नहीं कहा जाता, और (उसे नष्ट करने का) प्रयास निष्फल हो जाता है। यदि प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) लोभ प्रहीण होता है, तो भी प्रयास निष्फल होगा क्योंकि वह स्वयं क्षणभंगुर (सरसभङ्गत्ता) है, और मार्ग-भावना संक्लिष्ट (मलिन) हो जाएगी, अथवा लोभ चित्त-विप्रयुक्त हो जाएगा, और यह पद्धति इष्ट नहीं है। उत्तर दिया जाता है - उक्त पद्धति से अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न लोभ प्रहीण नहीं होता। जैसे यहाँ एक तरुण वृक्ष हो जिसमें फल न लगे हों, उसे कोई पुरुष कुल्हाड़ी से जड़ से काट दे, तो उस वृक्ष के न कटने पर जो फल उत्पन्न होते, वे वृक्ष के कट जाने के कारण अनुत्पन्न ही रह जाते हैं, उत्पन्न नहीं होते; वैसे ही आर्यमार्ग की प्राप्ति न होने पर जो लोभ उत्पन्न होने योग्य होता, वह आर्यमार्ग की प्राप्ति से प्रत्यय (कारण) का घात हो जाने के कारण उत्पन्न नहीं होता। इसे ही अट्ठकथाओं में 'भूमिलद्धुप्पन्न' (भूमि प्राप्त कर उत्पन्न होने वाला) कहा गया है। विपश्यना के आलम्बन बने हुए पाँच स्कन्ध ही उसके उत्पन्न होने का स्थान होने के कारण 'भूमि' कहलाते हैं। वह भूमि उसके द्वारा प्राप्त कर ली गई है, इसलिए वह 'भूमिलद्धुप्पन्न' है। इसे ही 'आरम्मणाधिग्गहितुप्पन्न', 'अविखम्भितुप्पन्न' और 'असमूहतुप्पन्न' भी कहा जाता है। තත්ථාති තස්මිං සුත්තෙ. එතන්ති එතං අත්ථජාතං. ඉදානි ගාථාබන්ධවසෙන වුච්චමානං. ඉති වුච්චතීති කෙන පන වුච්චති? භගවතා ව. අඤ්ඤෙසු හි තාදිසෙසු ඨානෙසු සඞ්ගීතිකාරෙහි උපනිබන්ධගාථා හොන්ති, ඉධ පන භගවතා ව ගාථාරුචිකානං පුග්ගලානං අජ්ඣාසයවසෙන වුත්තමෙවත්ථං සඞ්ගහෙත්වා ගාථා භාසිතා. 'तत्थ' (वहाँ) का अर्थ है उस सुत्त में। 'एतं' का अर्थ है यह अर्थ-समूह। अब गाथा-बन्ध के रूप में कहा जा रहा है। 'इति वुच्चति' (ऐसा कहा जाता है) - किसके द्वारा कहा जाता है? भगवान के द्वारा ही। अन्य ऐसे स्थानों पर संगीतिकारों द्वारा रचित गाथाएँ होती हैं, किन्तु यहाँ भगवान के द्वारा ही गाथा-प्रेमी व्यक्तियों के आशय के अनुसार कहे गए अर्थ को ही संगृहीत कर गाथा कही गई है। තත්ථ යෙන ලොභෙන ලුද්ධාසෙ, සත්තා ගච්ඡන්ති දුග්ගතින්ති යෙන ආරම්මණග්ගහණලක්ඛණෙන තතො එව අභිසඞ්ගරසෙන ලොභෙන ලුද්ධා අජ්ඣත්තිකබාහිරෙසු ආයතනෙසු ගිද්ධා ගධිතා. සෙති හි නිපාතමත්තං. අක්ඛරචින්තකා පන ඊදිසෙසු ඨානෙසු සෙ-කාරාගමං ඉච්ඡන්ති. තථා ලුද්ධත්තා එව කායසුචරිතාදීසු කිඤ්චි සුචරිතං අකත්වා කායදුච්චරිතාදීනි ච උපචිනිත්වා රූපාදීසු සත්තවිසත්තතාය සත්තාති ලද්ධනාමා පාණිනො දුක්ඛස්ස නිබ්බත්තිට්ඨානතාය දුග්ගතීති සඞ්ඛං ගතං නිරයං තිරච්ඡානයොනිං පෙත්තිවිසයඤ්ච පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන ගච්ඡන්ති උපපජ්ජන්ති. वहाँ 'येन लोभेन लुद्धासे, सत्ता गच्छन्ति दुग्गतिं' का अर्थ है - जिस आलम्बन-ग्रहण-लक्षण वाले और उसी से अभिनिवेश-रस वाले लोभ के द्वारा लुब्ध होकर, आध्यात्मिक और बाह्य आयतनों में आसक्त और ग्रथित होकर। 'से' यहाँ केवल निपात है। व्याकरण के विद्वान ऐसे स्थानों पर 'से'-कार का आगम मानते हैं। वैसे लुब्ध होने के कारण ही काय-सुचरित आदि किसी सुचरित को न करके और काय-दुश्चरित आदि का संचय करके, रूपादि में आसक्त होने के कारण 'सत्त' (प्राणी) नाम प्राप्त प्राणी, दुःख की उत्पत्ति का स्थान होने के कारण 'दुर्गति' संज्ञा को प्राप्त नरक, तिर्यक-योनि और प्रेत-लोक में प्रतिसन्धि ग्रहण करने के कारण जाते हैं, उत्पन्न होते हैं। තං ලොභං සම්මදඤ්ඤාය, පජහන්ති විපස්සිනොති තං යථාවුත්තං ලොභං සභාවතො සමුදයතො අත්ථඞ්ගමතො අස්සාදතො ආදීනවතො නිස්සරණතොති ඉමෙහි ආකාරෙහි සම්මා අවිපරීතං හෙතුනා ඤායෙන අඤ්ඤාය ඤාතතීරණපරිඤ්ඤාසඞ්ඛාතාය පඤ්ඤාය ජානිත්වා රූපාදිකෙ පඤ්චුපාදානක්ඛන්ධෙ අනිච්චාදීහි විවිධෙහි ආකාරෙහි පස්සනතො විපස්සිනො අවසිට්ඨකිලෙසෙ විපස්සනාපඤ්ඤාපුබ්බඞ්ගමාය මග්ගපඤ්ඤාය සමුච්ඡෙදප්පහානවසෙන පජහන්ති, න පුන අත්තනො සන්තානෙ උප්පජ්ජිතුං දෙන්ති. පහාය [Pg.42] න පුනායන්ති, ඉමං ලොකං කුදාචනන්ති එවං සහජෙකට්ඨපහානෙකට්ඨෙහි අවසිට්ඨකිලෙසෙහි සද්ධිං තං ලොභං අනාගාමිමග්ගෙන පජහිත්වා පුන පච්ඡා ඉමං කාමධාතුසඞ්ඛාතං ලොකං පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන කදාචිපි න ආගච්ඡන්ති ඔරම්භාගියානං සංයොජනානං සුප්පහීනත්තා. ඉති භගවා අනාගාමිඵලෙන දෙසනං නිට්ඨාපෙසි. 'तं लोभं सम्मदञ्ञाय, पजहन्ति विपस्सिनो' का अर्थ है - उस यथोक्त लोभ को स्वभाव, समुदय, अस्तंगम, अस्वाद, आदीनव और निस्सरण - इन आकारों से सम्यक्, अविपरीत, हेतु और न्याय से जानकर, ज्ञात-तीरण-परिज्ञा संज्ञक प्रज्ञा से जानकर, रूपादि पाँच उपादान-स्कन्धों को अनित्य आदि विविध आकारों से देखने वाले विपश्यना-युक्त योगी, शेष क्लेशों को विपश्यना-प्रज्ञा-पूर्वक मार्ग-प्रज्ञा के द्वारा समुच्छेद-प्रहाण के वश से त्याग देते हैं, पुनः अपनी सन्तान (चित्त-धारा) में उत्पन्न नहीं होने देते। 'पहाय न पुनायन्ति, इमं लोकं कुदाचनं' - इस प्रकार सहजात और एकार्थ प्रहाण के कारण शेष क्लेशों के साथ उस लोभ को अनागामी मार्ग से त्याग कर, पुनः बाद में इस कामधातु संज्ञक लोक में प्रतिसन्धि ग्रहण करने के लिए कभी नहीं आते, क्योंकि ओरामभागीय संयोजनों का भली-भाँति प्रहाण हो चुका है। इस प्रकार भगवान ने अनागामी फल के साथ देशना समाप्त की। අයම්පි අත්ථොති නිදානාවසානතො පභුති යාව ගාථාපරියොසානා ඉමිනා සුත්තෙන පකාසිතො අත්ථො. අපි-සද්දො ඉදානි වක්ඛමානසුත්තත්ථසම්පිණ්ඩනො. සෙසං වුත්තනයමෙව. ඉමස්මිං සුත්තෙ සමුදයසච්චං සරූපෙනෙව ආගතං, පහානාපදෙසෙන මග්ගසච්චං. ඉතරං සච්චද්වයඤ්ච තදුභයහෙතුතාය නිද්ධාරෙතබ්බං. ගාථාය පන දුක්ඛසමුදයමග්ගසච්චානි යථාරුතවසෙනෙව ඤායන්ති, ඉතරං නිද්ධාරෙතබ්බං. එසෙව නයො ඉතො පරෙසුපි සුත්තෙසු. 'अयम्पि अत्थो' का अर्थ है - निदान के आरम्भ से लेकर गाथा की समाप्ति तक इस सुत्त द्वारा प्रकाशित अर्थ। 'अपि' शब्द यहाँ अब कहे जाने वाले सुत्त के अर्थ के संकलन के लिए है। शेष पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। इस सुत्त में समुदय-सत्य अपने स्वरूप में ही आया है, प्रहाण के निर्देश से मार्ग-सत्य। अन्य दो सत्यों (दुःख और निरोध) को उन दोनों के हेतु के रूप में निर्धारित करना चाहिए। गाथा में तो दुःख, समुदय और मार्ग सत्य शब्दशः ही ज्ञात होते हैं, अन्य (निरोध) को निर्धारित करना चाहिए। यही नियम इसके बाद के सुत्तों में भी है। පරමත්ථදීපනියා ඛුද්දකනිකාය-අට්ඨකථාය परमत्थदीपनी खुद्दकनिकाय-अट्ठकथा में। ඉතිවුත්තකවණ්ණනාය පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इतिवुत्तक-वर्णना में प्रथम सुत्त की वर्णना समाप्त हुई। 2. දොසසුත්තවණ්ණනා २. दोस-सुत्त (द्वेष-सूत्र) की वर्णना। 2. වුත්තඤ්හෙතං …පෙ… දොසන්ති දුතියසුත්තං. තත්රායං අපුබ්බපදවණ්ණනා. යථා එත්ථ, එවං ඉතො පරෙසුපි සබ්බත්ථ අපුබ්බපදවණ්ණනංයෙව කරිස්සාම. යස්මා ඉදං සුත්තං දොසබහුලානං පුග්ගලානං අජ්ඣාසයං ඔලොකෙත්වා දොසවූපසමනත්ථං දෙසිතං, තස්මා ‘‘දොසං, භික්ඛවෙ, එකධම්මං පජහථා’’ති ආගතං. තත්ථ දොසන්ති ‘‘අනත්ථං මෙ අචරීති ආඝාතො ජායතී’’තිආදිනා (විභ. 960) නයෙන සුත්තෙ වුත්තානං නවන්නං, ‘‘අත්ථං මෙ නාචරී’’තිආදීනඤ්ච තප්පටිපක්ඛතො සිද්ධානං නවන්නමෙවාති අට්ඨාරසන්නං ඛාණුකණ්ටකාදිනා අට්ඨානෙන සද්ධිං එකූනවීසතියා අඤ්ඤතරාඝාතවත්ථුසම්භවං ආඝාතං. සො හි දුස්සන්ති තෙන, සයං වා දුස්සති, දුස්සනමත්තමෙව වා තන්ති දොසොති වුච්චති. සො චණ්ඩික්කලක්ඛණො පහටාසීවිසො විය, විසප්පනරසො විසනිපාතො විය, අත්තනො නිස්සයදහනරසො වා දාවග්ගි විය, දුස්සනපච්චුපට්ඨානො [Pg.43] ලද්ධොකාසො විය සපත්තො, යථාවුත්තආඝාතවත්ථුපදට්ඨානො විසසංසට්ඨපූතිමුත්තං විය දට්ඨබ්බො. පජහථාති සමුච්ඡින්දථ. තත්ථ යෙ ඉමෙ – २. यह कहा गया है... 'दोष' (द्वेष) यह दूसरा सूत्र है। यहाँ यह अपूर्व पद-व्याख्या है। जैसे यहाँ, वैसे ही इसके बाद भी सब जगह हम अपूर्व पद-व्याख्या ही करेंगे। चूँकि यह सूत्र द्वेष-प्रधान व्यक्तियों के आशय को देखकर द्वेष के शमन के लिए उपदिष्ट है, इसलिए 'भिक्षुओं, द्वेष नामक एक धर्म को त्यागो' ऐसा आया है। वहाँ 'दोष' (द्वेष) का अर्थ है—'उसने मेरा अनर्थ किया' इत्यादि विधि से सूत्र में कहे गए नौ, और 'उसने मेरा भला नहीं किया' इत्यादि उसके विपरीत सिद्ध नौ—इस प्रकार अठारह, तथा खूँटे, काँटे आदि अस्थानों के साथ उन्नीस प्रकार के आघात-वस्तुओं (क्रोध के कारणों) से उत्पन्न होने वाला आघात (क्रोध)। वह इसके द्वारा दूषित होता है, या स्वयं दूषित होता है, या केवल दूषित होना ही वह 'दोष' कहलाता है। वह विषैले साँप के समान उग्रता के लक्षण वाला है, विष के फैलने के समान फैलने के स्वभाव वाला है, अथवा दावानल के समान अपने आश्रय को जलाने के स्वभाव वाला है, अवसर प्राप्त शत्रु के समान दूषित होने के रूप में उपस्थित होता है, और पूर्वोक्त आघात-वस्तुओं के कारण विष-मिश्रित सड़े हुए मूत्र के समान देखा जाना चाहिए। 'पजहथ' (त्यागो) का अर्थ है—समुच्छेद करो। वहाँ जो ये हैं— ‘‘පඤ්චිමෙ, භික්ඛවෙ, ආඝාතපටිවිනයා, යත්ථ භික්ඛුනො උප්පන්නො ආඝාතො සබ්බසො පටිවිනෙතබ්බො. කතමෙ පඤ්ච? යස්මිං, භික්ඛවෙ, පුග්ගලෙ ආඝාතො ජායෙථ, මෙත්තා තස්මිං පුග්ගලෙ භාවෙතබ්බා…පෙ… කරුණා…පෙ… උපෙක්ඛා, අසතිඅමනසිකාරො තස්මිං පුග්ගලෙ ආපජ්ජිතබ්බො, එවං තස්මිං පුග්ගලෙ ආඝාතො පටිවිනෙතබ්බො. යස්මිං, භික්ඛවෙ, පුග්ගලෙ ආඝාතො ජායෙථ, කම්මස්සකතා තස්මිං පුග්ගලෙ අධිට්ඨාතබ්බා ‘කම්මස්සකො අයමායස්මා කම්මදායාදො…පෙ… භවිස්සතී’’ති (අ. නි. 5.161) – 'भिक्षुओं, ये पाँच आघात-प्रतिविनय (क्रोध दूर करने के उपाय) हैं, जहाँ भिक्षु को उत्पन्न हुए क्रोध को पूरी तरह से दूर करना चाहिए। कौन से पाँच? भिक्षुओं, जिस व्यक्ति के प्रति क्रोध उत्पन्न हो, उस व्यक्ति के प्रति मैत्री की भावना करनी चाहिए... करुणा... उपेक्षा, उस व्यक्ति का स्मरण न करना और मन में न लाना चाहिए, इस प्रकार उस व्यक्ति के प्रति क्रोध को दूर करना चाहिए। भिक्षुओं, जिस व्यक्ति के प्रति क्रोध उत्पन्न हो, उस व्यक्ति के प्रति कर्म-स्वकीयता का निश्चय करना चाहिए कि 'यह आयुष्मान अपने कर्मों का स्वामी है, कर्मों का उत्तराधिकारी है... होगा'— එවං පඤ්ච ආඝාතප්පටිවිනයා වුත්තායෙව. इस प्रकार पाँच आघात-प्रतिविनय कहे ही गए हैं। ‘‘පඤ්චිමෙ, ආවුසො, ආඝාතපටිවිනයා, යත්ථ භික්ඛුනො උප්පන්නො ආඝාතො සබ්බසො පටිවිනෙතබ්බො. කතමෙ පඤ්ච? ඉධාවුසො, එකච්චො පුග්ගලො අපරිසුද්ධකායසමාචාරො හොති පරිසුද්ධවචීසමාචාරො; එවරූපෙපි, ආවුසො, පුග්ගලෙ ආඝාතො පටිවිනෙතබ්බො’’ති (අ. නි. 5.162) – 'आयुष्मन्, ये पाँच आघात-प्रतिविनय हैं, जहाँ भिक्षु को उत्पन्न हुए क्रोध को पूरी तरह से दूर करना चाहिए। कौन से पाँच? यहाँ, आयुष्मन्, कोई व्यक्ति अशुद्ध शारीरिक आचरण वाला होता है, किन्तु शुद्ध वाणी के आचरण वाला होता है; आयुष्मन्, ऐसे व्यक्ति के प्रति भी क्रोध को दूर करना चाहिए'— එවමාදිනාපි නයෙන පඤ්ච ආඝාතපටිවිනයා වුත්තා, තෙසු යෙන කෙනචි ආඝාතපටිවිනයවිධිනා පච්චවෙක්ඛිත්වා. අපිච යො – इस प्रकार की विधि से भी पाँच आघात-प्रतिविनय कहे गए हैं, उनमें से किसी भी आघात-प्रतिविनय की विधि से प्रत्यवेक्षण करके। और भी जो— ‘‘උභතොදණ්ඩකෙන චෙපි, භික්ඛවෙ, කකචෙන චොරා ඔචරකා අඞ්ගමඞ්ගානි ඔකන්තෙය්යුං, තත්රාපි යො මනො පදූසෙය්ය, න මෙ සො තෙන සාසනකරො’’ති (ම. නි. 1.232) සත්ථු ඔවාදො. 'भिक्षुओं, यदि चोर और डाकू दोनों ओर हत्थे वाली आरी से अंगों को काटें, वहाँ भी जो मन को दूषित करता है, वह मेरा शासन (शिक्षा) मानने वाला नहीं है'—यह शास्ता का उपदेश है। ‘‘තස්සෙව තෙන පාපියො, යො කුද්ධං පටිකුජ්ඣති; කුද්ධං අප්පටිකුජ්ඣන්තො, සඞ්ගාමං ජෙති දුජ්ජයං. 'जो क्रुद्ध व्यक्ति के प्रति प्रति-क्रोध करता है, उसका वह कार्य उससे भी बुरा है; क्रुद्ध के प्रति प्रति-क्रोध न करने वाला उस संग्राम को जीत लेता है जिसे जीतना कठिन है। ‘‘උභින්නමත්ථං චරති, අත්තනො ච පරස්ස ච; පරං සඞ්කුපිතං ඤත්වා, යො සතො උපසම්මති. (සං. නි. 1.188); 'वह अपने और दूसरे—दोनों के कल्याण के लिए आचरण करता है; जो दूसरे को कुपित जानकर स्मृतिवान होकर शांत हो जाता है। (सं. नि. 1.188); ‘‘සත්තිමෙ[Pg.44], භික්ඛවෙ, ධම්මා සපත්තකන්තා සපත්තකරණා කොධනං ආගච්ඡන්ති ඉත්ථිං වා පුරිසං වා. කතමෙ සත්ත? ඉධ, භික්ඛවෙ, සපත්තො සපත්තස්ස එවං ඉච්ඡති, ‘අහො වතායං දුබ්බණ්ණො අස්සා’ති. තං කිස්ස හෙතු? න, භික්ඛවෙ, සපත්තො සපත්තස්ස වණ්ණවතාය නන්දති. කොධනොයං, භික්ඛවෙ, පුරිසපුග්ගලො කොධාභිභූතො කොධපරෙතො කිඤ්චාපි සො හොති සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු ඔදාතවත්ථවසනො, අථ ඛො සො දුබ්බණ්ණොව හොති කොධාභිභූතො. අයං, භික්ඛවෙ, පඨමො ධම්මො සපත්තකන්තො සපත්තකරණො කොධනං ආගච්ඡති ඉත්ථිං වා පුරිසං වා. 'भिक्षुओं, ये सात धर्म शत्रु को प्रिय और शत्रु का काम करने वाले हैं, जो क्रोधी स्त्री या पुरुष को प्राप्त होते हैं। कौन से सात? यहाँ, भिक्षुओं, शत्रु अपने शत्रु के लिए ऐसी इच्छा करता है—'अहो! यह कुरूप हो जाए'। वह किस कारण से? भिक्षुओं, शत्रु अपने शत्रु की सुन्दरता से प्रसन्न नहीं होता। भिक्षुओं, यह क्रोधी व्यक्ति क्रोध से अभिभूत और क्रोध से व्याप्त होकर, चाहे वह अच्छी तरह स्नान किया हुआ, सुलेपित, कटे हुए बाल-दाढ़ी वाला और श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हो, फिर भी वह क्रोध से अभिभूत होने के कारण कुरूप ही होता है। भिक्षुओं, यह पहला धर्म है जो शत्रु को प्रिय और शत्रु का काम करने वाला है, जो क्रोधी स्त्री या पुरुष को प्राप्त होता है। ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, සපත්තො සපත්තස්ස එවං ඉච්ඡති ‘අහො වතායං දුක්ඛං සයෙය්යා’ති…පෙ… න පචුරත්ථො අස්සාති…පෙ… න භොගවා අස්සාති…පෙ… න යසවා අස්සාති…පෙ… න මිත්තවා අස්සාති…පෙ… කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජෙය්යාති. තං කිස්ස හෙතු? න, භික්ඛවෙ, සපත්තො සපත්තස්ස සුගතිගමනෙ නන්දති. කොධනොයං, භික්ඛවෙ, පුරිසපුග්ගලො කොධාභිභූතො කොධපරෙතො කායෙන දුච්චරිතං චරති, වාචාය දුච්චරිතං චරති, මනසා දුච්චරිතං චරති. සො කායෙන දුච්චරිතං චරිත්වා වාචාය දුච්චරිතං චරිත්වා මනසා දුච්චරිතං චරිත්වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා…පෙ… නිරයං උපපජ්ජති කොධාභිභූතො’’ති (අ. නි. 7.64). 'फिर, भिक्षुओं, शत्रु अपने शत्रु के लिए ऐसी इच्छा करता है—'अहो! यह दुःख से सोए'... 'यह प्रचुर लाभ वाला न हो'... 'यह धनवान न हो'... 'यह यशस्वी न हो'... 'यह मित्रवान न हो'... 'काया के भेद होने पर मृत्यु के बाद यह अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न हो'। वह किस कारण से? भिक्षुओं, शत्रु अपने शत्रु की सुगति-गमन से प्रसन्न नहीं होता। भिक्षुओं, यह क्रोधी व्यक्ति क्रोध से अभिभूत और क्रोध से व्याप्त होकर काया से दुश्चरित करता है, वाणी से दुश्चरित करता है, मन से दुश्चरित करता है। वह काया से दुश्चरित करके, वाणी से दुश्चरित करके, मन से दुश्चरित करके, काया के भेद होने पर मृत्यु के बाद... क्रोध से अभिभूत होकर नरक में उत्पन्न होता है' (अं. नि. 7.64)। ‘‘කුද්ධො අත්ථං න ජානාති, කුද්ධො ධම්මං න පස්සති…පෙ…. (අ. නි. 7.64); 'क्रुद्ध व्यक्ति हित को नहीं जानता, क्रुद्ध व्यक्ति धर्म को नहीं देखता...। (अं. नि. 7.64); ‘‘කොධං ජහෙ විප්පජහෙය්ය මානං, සංයොජනං සබ්බමතික්කමෙය්ය. (ධ. ප. 221); 'क्रोध को त्यागे, मान का परित्याग करे, सभी संयोजनों को पार कर जाए। (ध. प. 221); ‘‘අනත්ථජනනො කොධො, කොධො චිත්තප්පකොපනො…පෙ…. (අ. නි. 7.64); 'क्रोध अनर्थ उत्पन्न करने वाला है, क्रोध चित्त को प्रकुपित करने वाला है...। (अं. नि. 7.64); ‘‘කොධං ඡෙත්වා සුඛං සෙති, කොධං ඡෙත්වා න සොචති; කොධස්ස විසමූලස්ස, මධුරග්ගස්ස බ්රාහ්මණා’’ති. (සං. නි. 1.187); 'क्रोध को काटकर सुख से सोता है, क्रोध को काटकर शोक नहीं करता; हे ब्राह्मणों! विषैली जड़ वाले और मधुर अग्र भाग वाले क्रोध का (नाश करना श्रेष्ठ है)। (सं. नि. 1.187); ‘‘එකාපරාධං [Pg.45] ඛම භූරිපඤ්ඤ,න පණ්ඩිතා කොධබලා භවන්තී’’ති. – 'हे प्रचुर प्रज्ञा वाले! एक अपराध को क्षमा करें, पंडित क्रोध के वश में नहीं होते'— එවමාදිනා නයෙන දොසෙ ආදීනවෙ වුත්තප්පටිපක්ඛතො දොසප්පහානෙ ආනිසංසෙ ච පච්චවෙක්ඛිත්වා පුබ්බභාගෙ දොසං තදඞ්ගප්පහානාදිවසෙන පජහිත්වා විපස්සනං උස්සුක්කාපෙත්වා තතියමග්ගෙන සබ්බසො දොසං සමුච්ඡින්දථ, පජහථාති තෙසං භික්ඛූනං තත්ථ නියොජනං. තෙන වුත්තං ‘‘දොසං, භික්ඛවෙ, එකධම්මං පජහථා’’ති. දුට්ඨාසෙති ආඝාතෙන දූසිතචිත්තතාය පදුට්ඨා. සෙසමෙත්ථ යං වත්තබ්බං, තං පඨමසුත්තවණ්ණනායං වුත්තනයමෙව. इस प्रकार की विधि से द्वेष में दोषों (आदीनवों) को और उसके विपरीत द्वेष के त्याग में लाभों (नृशंसों) को देखकर, पूर्व भाग में तदङ्ग-प्रहाण आदि के द्वारा द्वेष को त्यागकर, विपश्यना में उत्साह बढ़ाकर, तृतीय मार्ग (अनागामी मार्ग) के द्वारा द्वेष को पूरी तरह से समूच्छेद करें, त्याग दें - यह उन भिक्षुओं के लिए वहाँ नियोजन है। इसीलिए कहा गया है - "भिक्षुओं, द्वेष नामक एक धर्म को त्याग दो।" 'दुट्ठासे' (दुष्ट) का अर्थ है आघात (क्रोध) के कारण दूषित चित्त वाले। यहाँ शेष जो कुछ कहना है, वह प्रथम सूत्र की व्याख्या में बताए गए तरीके के समान ही है। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. මොහසුත්තවණ්ණනා ३. मोह सूत्र की व्याख्या 3. තතියෙ මොහන්ති අඤ්ඤාණං. තඤ්හි දුක්ඛෙ අඤ්ඤාණං, දුක්ඛසමුදයෙ අඤ්ඤාණං, දුක්ඛනිරොධෙ අඤ්ඤාණං, දුක්ඛනිරොධගාමිනියා පටිපදාය අඤ්ඤාණන්තිආදිනා නයෙන විභාගෙන අනෙකප්පභෙදම්පි මුය්හන්ති. තෙන සයං වා මුය්හති මුය්හනමත්තමෙව වා තන්ති මොහොති වුච්චති. සො චිත්තස්ස අන්ධභාවලක්ඛණො, අඤ්ඤාණලක්ඛණො වා, අසම්පටිවෙධරසො, ආරම්මණසභාවච්ඡාදනරසො වා, අසම්මාප්පටිපත්තිපච්චුපට්ඨානො, අන්ධකාරපච්චුපට්ඨානො වා, අයොනිසොමනසිකාරපදට්ඨානො, සබ්බාකුසලානං මූලන්ති දට්ඨබ්බො. ඉධාපි පජහථාති පදස්ස – ३. तीसरे (सूत्र) में 'मोह' का अर्थ अज्ञान है। वह दुःख में अज्ञान, दुःख-समुदय में अज्ञान, दुःख-निरोध में अज्ञान, दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा में अज्ञान - इस प्रकार के विभाजन से अनेक प्रकार का होने पर भी (जीवों को) मोहित करता है। उससे स्वयं मोहित होता है या वह केवल मोहित होना ही है, इसलिए उसे 'मोह' कहा जाता है। वह चित्त के अंधेपन के लक्षण वाला है, या अज्ञान के लक्षण वाला है; उसका कृत्य (रस) अप्रतिवेध (न समझ पाना) है, या आलम्बन के स्वभाव को ढंकना है; वह अनुचित प्रतिपत्ति (गलत आचरण) के रूप में प्रकट होता है, या अंधकार के रूप में प्रकट होता है; उसका निकटतम कारण (पदट्ठान) अयोनिशो मनसिकार है, और उसे सभी अकुशल धर्मों की जड़ समझना चाहिए। यहाँ भी 'त्याग दो' (पजहथ) इस पद के लिए - ‘‘මූළ්හො අත්ථං න ජානාති, මූළ්හො ධම්මං න පස්සති; අන්ධතමං තදා හොති, යං මොහො සහතෙ නරං’’. (ඉතිවු. 88); “मोहित व्यक्ति अर्थ को नहीं जानता, मोहित व्यक्ति धर्म को नहीं देखता; जब मोह मनुष्य को अभिभूत कर लेता है, तब घोर अंधकार छा जाता है।” (इतिवृत्तक 88); ‘‘අනත්ථජනනො මොහො…පෙ…. (ඉතිවු. 88); “मोह अनर्थ को उत्पन्न करने वाला है... आदि।” (इतिवृत्तक 88); ‘‘අවිජ්ජා, භික්ඛවෙ, පුබ්බඞ්ගමා අකුසලානං ධම්මානං සමාපත්තියා’’ (ඉතිවු. 40); “भिक्षुओं, अकुशल धर्मों की प्राप्ति में अविद्या ही अगुआ (पूर्वगामी) है।” (इतिवृत्तक 40); ‘‘මොහසම්බන්ධනො ලොකො, භබ්බරූපොව දිස්සති’’; (උදා. 70); “लोक मोह के बंधन में बंधा हुआ है, और वह भव्य (सुंदर) रूप जैसा दिखाई देता है।” (उदान 70); ‘‘මොහො [Pg.46] නිදානං කම්මානං සමුදයාය’’ (අ. නි. 3.34); “मोह कर्मों की उत्पत्ति का कारण (निदान) है।” (अंगुत्तर निकाय 3.34); ‘‘මූළ්හො ඛො, බ්රාහ්මණ, මොහෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො දිට්ඨධම්මිකම්පි භයං වෙරං පසවති, සම්පරායිකම්පි භයං වෙරං පසවතී’’ති ච – “हे ब्राह्मण, मोह से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला मूढ़ व्यक्ति इस जन्म (दृष्टधर्म) में भी भय और वैर उत्पन्न करता है, और परलोक (साम्परायिक) में भी भय और वैर उत्पन्न करता है” - ආදිනා නයෙන ‘‘යො කොචි ධම්මො කාමච්ඡන්දාදිසංකිලෙසධම්මෙහි නිබ්බත්තෙතබ්බො, අත්ථතො සබ්බො සො මොහහෙතුකො’’ති ච මොහෙ ආදීනවං තප්පටිපක්ඛතො මොහප්පහානෙ ආනිසංසඤ්ච පච්චවෙක්ඛිත්වා කාමච්ඡන්දාදිප්පහානක්කමෙනෙව පුබ්බභාගෙ තදඞ්ගාදිවසෙන මොහං පජහන්තා තතියමග්ගෙන යථාවුත්තලොභදොසෙකට්ඨං මොහං සමුච්ඡෙදවසෙන පජහථාති අත්ථො දට්ඨබ්බො. අනාගාමිමග්ගවජ්ඣො එව හි මොහො ඉධාධිප්පෙතොති. මූළ්හාසෙති කුසලාකුසලසාවජ්ජානවජ්ජාදිභෙදෙ අත්තනො හිතාහිතෙ සම්මූළ්හා. සෙසං වුත්තනයමෙව. इस प्रकार की विधि से “जो कोई भी धर्म कामछन्द आदि संक्लेश धर्मों से उत्पन्न होने वाला है, वह वास्तव में मोह के कारण ही है” - इस प्रकार मोह में दोषों को और उसके विपरीत मोह के त्याग में लाभों को देखकर, कामछन्द आदि के त्याग के क्रम से ही पूर्व भाग में तदङ्ग आदि के द्वारा मोह को त्यागते हुए, तृतीय मार्ग (अनागामी मार्ग) के द्वारा पूर्वोक्त लोभ और द्वेष के साथ रहने वाले मोह को समूच्छेद के द्वारा त्याग दें - ऐसा अर्थ समझना चाहिए। क्योंकि यहाँ अनागामी मार्ग द्वारा वध (त्याग) किए जाने योग्य मोह ही अभिप्रेत है। 'मूळ्हासे' (मूढ़) का अर्थ है कुशल-अकुशल, सावद्य-अनवद्य आदि के भेद में अपने हित और अहित के प्रति मोहित। शेष (व्याख्या) पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही है। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. කොධසුත්තවණ්ණනා ४. क्रोध सूत्र की व्याख्या 4. චතුත්ථෙ කොධන්ති දොසං. දොසො එව හි කොධපරියායෙන බුජ්ඣනකානං පුග්ගලානං අජ්ඣාසයවසෙන එවං වුත්තො. තස්මා දුතියසුත්තෙ වුත්තනයෙනෙවෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. අපිච කුජ්ඣනලක්ඛණො කොධො, ආඝාතකරණරසො, චිත්තස්ස බ්යාපත්තිභාවපච්චුපට්ඨානො, චෙතසො පූතිභාවොති දට්ඨබ්බොති අයම්පි විසෙසො වෙදිතබ්බො. ४. चौथे (सूत्र) में 'क्रोध' का अर्थ द्वेष है। द्वेष को ही क्रोध के पर्याय से समझने वाले व्यक्तियों के आशय के अनुसार ऐसा कहा गया है। इसलिए द्वितीय सूत्र में बताए गए तरीके से ही यहाँ अर्थ समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त, क्रोध चिढ़ने (क्रुद्ध होने) के लक्षण वाला है, उसका कृत्य आघात करना है, वह चित्त की विकृति (व्यापत्ति) के रूप में प्रकट होता है, और उसे मन की सड़न (पूतिभाव) समझना चाहिए - यह विशेषता भी जाननी चाहिए। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. මක්ඛසුත්තවණ්ණනා ५. म्रक्ष (मक्ख) सूत्र की व्याख्या 5. පඤ්චමෙ මක්ඛන්ති පරගුණමක්ඛනං. යදිපි හි සො ගූථං ගහෙත්වා පරං පහරන්තො විය අත්තනො කරං පඨමතරං මක්ඛතියෙව, තථාපි පරෙසං ගුණමක්ඛනාධිප්පායෙන පවත්තෙතබ්බත්තා ‘‘පරගුණමක්ඛනො’’ති වුච්චති. තථා හි [Pg.47] සො උදකපුඤ්ඡනමිව න්හාතස්ස සරීරගතං උදකං පරෙසං ගුණෙ මක්ඛෙති පුඤ්ඡති විනාසෙති, පරෙහි වා කතානං මහන්තානම්පි කාරානං ඛෙපනතො ධංසනතො මක්ඛොති වුච්චති. සො පරගුණමක්ඛනලක්ඛණො, තෙසං විනාසනරසො, තදවච්ඡාදනපච්චුපට්ඨානො. අත්ථතො පන පරෙසං ගුණමක්ඛනාකාරෙන පවත්තො දොමනස්සසහගතචිත්තුප්පාදොති දට්ඨබ්බං. පජහථාති තත්ථ වුත්තප්පභෙදං දොසං, දොසෙ ච වුත්තනයං ආදීනවං, පහානෙ චස්ස ආනිසංසං පච්චවෙක්ඛිත්වා පුබ්බභාගෙ තදඞ්ගාදිවසෙන පජහන්තා විපස්සනං උස්සුක්කාපෙත්වා තතියමග්ගෙන අනවසෙසං සමුච්ඡින්දථාති අත්ථො. මක්ඛාසෙති මක්ඛිතා මක්ඛිතපරගුණා, පරෙසං ගුණානං මක්ඛිතාරො, තතො එව අත්තනොපි ධංසිතගුණාති අත්ථො. සෙසං වුත්තනයමෙව. ५. पाँचवें (सूत्र) में 'म्रक्ष' (मक्ख) का अर्थ दूसरों के गुणों को ढंकना (मिटाना) है। यद्यपि वह विष्ठा लेकर दूसरे पर प्रहार करने वाले के समान अपने हाथ को ही पहले गंदा (मक्खति) करता है, फिर भी दूसरों के गुणों को ढंकने के अभिप्राय से प्रवृत्त होने के कारण उसे 'पर-गुण-म्रक्षण' कहा जाता है। जैसे तौलिया स्नान किए हुए व्यक्ति के शरीर के पानी को पोंछ देता है, वैसे ही वह दूसरों के गुणों को ढंकता है, पोंछता है, नष्ट करता है; अथवा दूसरों द्वारा किए गए महान उपकारों को भी नकारने और नष्ट करने के कारण उसे 'म्रक्ष' कहा जाता है। वह दूसरों के गुणों को ढंकने के लक्षण वाला है, उन्हें नष्ट करने के कृत्य वाला है, और उन्हें छिपाने के रूप में प्रकट होता है। वास्तव में, इसे दूसरों के गुणों को ढंकने के आकार में प्रवृत्त दौर्मनस्य-युक्त चित्तोत्पाद समझना चाहिए। 'त्याग दो' का अर्थ है - वहाँ बताए गए विभिन्न प्रकार के द्वेष को, द्वेष में बताए गए दोषों को और उसके त्याग में लाभों को देखकर, पूर्व भाग में तदङ्ग आदि के द्वारा त्यागते हुए, विपश्यना में उत्साह बढ़ाकर, तृतीय मार्ग द्वारा पूर्णतः समूच्छेद कर दें। 'मक्खासे' का अर्थ है म्रक्षित (ढंकने वाले), जिन्होंने दूसरों के गुणों को ढंका है, दूसरों के गुणों को मिटाने वाले, और इसी कारण स्वयं के गुणों को भी नष्ट करने वाले। शेष (व्याख्या) पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही है। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पंचम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. මානසුත්තවණ්ණනා ६. मान सूत्र की व्याख्या 6. ඡට්ඨෙ මානන්ති ජාතිආදිවත්ථුකං චෙතසො උන්නමනං. සො හි ‘‘සෙය්යොහමස්මී’’තිආදිනා නයෙන මඤ්ඤන්ති තෙන, සයං වා මඤ්ඤති, මානනං සම්පග්ගහොති වා මානොති වුච්චති. ස්වායං සෙය්යොහමස්මීති මානො, සදිසොහමස්මීති මානො, හීනොහමස්මීති මානොති එවං තිවිධො. පුන සෙය්යස්ස සෙය්යොහමස්මීති මානො, සෙය්යස්ස සදිසො, සෙය්යස්ස හීනො; සදිසස්ස සෙය්යො, සදිසස්ස සදිසො, සදිසස්ස හීනො; හීනස්ස සෙය්යො, හීනස්ස සදිසො, හීනස්ස හීනොහමස්මීති මානොති එවං නවවිධොපි උන්නතිලක්ඛණො, අහංකාරරසො, සම්පග්ගහරසො වා, උද්ධුමාතභාවපච්චුපට්ඨානො, කෙතුකම්යතාපච්චුපට්ඨානො වා, දිට්ඨිවිප්පයුත්තලොභපදට්ඨානො උම්මාදො වියාති දට්ඨබ්බො. පජහථාති තස්ස සබ්බස්සපි අත්තුක්කංසනපරවම්භනනිමිත්තතා, ගරුට්ඨානියෙසු අභිවාදනපච්චුපට්ඨානඅඤ්ජලිකම්මසාමීචිකම්මාදීනං අකරණෙ කාරණතා, ජාතිමදපුරිසමදාදිභාවෙන පමාදාපත්තිහෙතුභාවොති එවමාදිභෙදං ආදීනවං තප්පටිපක්ඛතො නිරතිමානතාය ආනිසංසඤ්ච පච්චවෙක්ඛිත්වා රාජසභං අනුප්පත්තො චණ්ඩාලො විය සබ්රහ්මචාරීසු නීචචිත්තතං පච්චුපට්ඨපෙත්වා පුබ්බභාගෙ තදඞ්ගාදිවසෙන තං පජහන්තා විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අනාගාමිමග්ගෙන සමුච්ඡින්දථාති [Pg.48] අත්ථො. අනාගාමිමග්ගවජ්ඣො එව හි මානො ඉධාධිප්පෙතො. මත්තාසෙති ජාතිමදපුරිසමදාදිවසෙන මානෙන පමාදාපත්තිහෙතුභූතෙන මත්තා අත්තානං පග්ගහෙත්වා චරන්තා. සෙසං වුත්තනයමෙව. ६. छठे (सूत्र) में 'मान' का अर्थ है जाति आदि वस्तुओं के आधार पर चित्त का उन्नत होना। वह 'मैं श्रेष्ठ हूँ' आदि विधि से इसके द्वारा मानते हैं, या स्वयं मानता है, मानना या गर्व करना 'मान' कहलाता है। वह 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा मान, 'मैं समान हूँ' ऐसा मान, 'मैं हीन हूँ' ऐसा मान—इस प्रकार तीन प्रकार का है। पुनः श्रेष्ठ का 'मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा मान, श्रेष्ठ का 'मैं समान हूँ', श्रेष्ठ का 'मैं हीन हूँ'; समान का 'मैं श्रेष्ठ हूँ', समान का 'मैं समान हूँ', समान का 'मैं हीन हूँ'; हीन का 'मैं श्रेष्ठ हूँ', हीन का 'मैं समान हूँ', हीन का 'मैं हीन हूँ'—इस प्रकार नौ प्रकार का भी उन्नति के लक्षण वाला, अहंकार के कार्य वाला, या गर्व के कार्य वाला, फूले हुए भाव के रूप में उपस्थित होने वाला, या ध्वजा की इच्छा के रूप में उपस्थित होने वाला, दृष्टि-विप्रयुक्त लोभ के पदस्थान वाला और उन्माद के समान देखना चाहिए। 'त्याग दो' का अर्थ है—उस (मान) के सभी प्रकार के आत्म-प्रशंसा और पर-निंदा के कारण होने, गुरुजनों के प्रति अभिवादन, प्रत्युत्थान, अंजलि-कर्म, सामीचि-कर्म आदि न करने के कारण होने, जाति-मद, पुरुष-मद आदि के भाव से प्रमाद की आपत्ति का हेतु होने आदि भेदों वाले दोषों को, और उसके विपरीत निरभिमानता के लाभों को विचार कर, राजसभा में पहुँचे हुए चाण्डाल के समान सब्रह्मचारियों के प्रति विनम्रता स्थापित कर, पूर्व भाग में तदंग आदि के वश से उसे त्यागते हुए, विपश्यना बढ़ाकर अनागामी मार्ग से समूल नष्ट कर दो। यहाँ अनागामी मार्ग द्वारा नष्ट करने योग्य मान ही अभिप्रेत है। 'मत्तासे' का अर्थ है जाति-मद, पुरुष-मद आदि के वश से मान के द्वारा, जो प्रमाद की आपत्ति का हेतु है, मत्त होकर अपने आप को बढ़ा-चढ़ाकर चलते हुए। शेष पहले कहे गए अनुसार ही है। ඉමෙසු පන පටිපාටියා ඡසු සුත්තෙසු ගාථාසු වා අනාගාමිඵලං පාපෙත්වා දෙසනා නිට්ඨාපිතා. තත්ථ යෙ ඉමෙ අවිහා අතප්පා සුදස්සා සුදස්සී අකනිට්ඨාති උපපත්තිභවවසෙන පඤ්ච අනාගාමිනො, තෙසු අවිහෙසු උපපන්නා අවිහා නාම. තෙ අන්තරාපරිනිබ්බායී, උපහච්චපරිනිබ්බායී, අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී, සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී, උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමීති පඤ්චවිධා, තථා අතප්පා, සුදස්සා, සුදස්සිනො. අකනිට්ඨෙසු පන උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී පරිහායති. තත්ථ යො අවිහාදීසු උප්පජ්ජිත්වා ආයුවෙමජ්ඣං අනතික්කමිත්වා අරහත්තප්පත්තියා කිලෙසපරිනිබ්බානෙන පරිනිබ්බායති, අයං අන්තරාපරිනිබ්බායී නාම. යො පන අවිහාදීසු ආදිතො පඤ්චකප්පසතාදිභෙදං ආයුවෙමජ්ඣං අතික්කමිත්වා පරිනිබ්බායති, අයං උපහච්චපරිනිබ්බායී නාම. යො අසඞ්ඛාරෙන අධිමත්තප්පයොගං අකත්වා අප්පදුක්ඛෙන අකසිරෙන පරිනිබ්බායති, අයං අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී නාම. යො පන සසඞ්ඛාරෙන අධිමත්තප්පයොගං කත්වා දුක්ඛෙන කිච්ඡෙන කසිරෙන පරිනිබ්බායති, අයං සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායී නාම. ඉතරො පන අවිහාදීසු උද්ධංවාහිතභාවෙන උද්ධමස්ස තණ්හාසොතං, වට්ටසොතං, මග්ගසොතමෙව වාති උද්ධංසොතො. අවිහාදීසු උප්පජ්ජිත්වා අරහත්තං පත්තුං අසක්කොන්තො තත්ථ තත්ථ යාවතායුකං ඨත්වා පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන අකනිට්ඨං ගච්ඡතීති අකනිට්ඨගාමී. इन क्रमवार छह सूत्रों या गाथाओं में अनागामी फल तक पहुँचाकर देशना समाप्त की गई है। वहाँ जो ये अविह, अतप्प, सुदस्स, सुदस्सी और अकनिठ—उत्पत्ति-भव के वश से पाँच अनागामी हैं, उनमें से जो अविह लोक में उत्पन्न हुए हैं, वे 'अविह' कहलाते हैं। वे अंतरापरिनिब्बायी, उपहच्चपरिनिब्बायी, असंखारपरिनिब्बायी, ससंखारपरिनिब्बायी और उद्धंसोत-अकनिठगामी—इस प्रकार पाँच प्रकार के हैं; वैसे ही अतप्प, सुदस्स और सुदस्सी भी। अकनिठों में तो उद्धंसोत-अकनिठगामी कम हो जाता है। वहाँ जो अविह आदि में उत्पन्न होकर आयु के मध्य को पार किए बिना अर्हत् पद की प्राप्ति द्वारा क्लेश-परिनिर्वाण से परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'अंतरापरिनिब्बायी' कहलाता है। जो अविह आदि में आदि से पाँच सौ कल्प आदि के भेद वाली आयु के मध्य को पार करके परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'उपहच्चपरिनिब्बायी' कहलाता है। जो बिना संस्कार के अत्यधिक प्रयोग न करते हुए, अल्प दुःख से, बिना कठिनाई के परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'असंखारपरिनिब्बायी' कहलाता है। जो संस्कार के साथ अत्यधिक प्रयोग करके, दुःख से, कठिनाई से परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'ससंखारपरिनिब्बायी' कहलाता है। दूसरा, जो अविह आदि में ऊपर की ओर बहने के भाव के कारण, जिसका तृष्णा-स्रोत, वट्ट-स्रोत या मार्ग-स्रोत ऊपर की ओर है, वह 'उद्धंसोत' है। अविह आदि में उत्पन्न होकर अर्हत् पद प्राप्त करने में असमर्थ होकर, वहाँ-वहाँ आयु पर्यन्त रहकर प्रतिसंधि ग्रहण करने के वश से जो अकनिठ लोक को जाता है, वह 'अकनिठगामी' है। එත්ථ ච උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී, උද්ධංසොතො න අකනිට්ඨගාමී, න උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී, න උද්ධංසොතො න අකනිට්ඨගාමීති චතුක්කං වෙදිතබ්බං. කථං? යො අවිහතො පට්ඨාය චත්තාරො දෙවලොකෙ සොධෙත්වා අකනිට්ඨං ගන්ත්වා පරිනිබ්බායති, අයං උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී නාම. යො පන හෙට්ඨා තයො දෙවලොකෙ සොධෙත්වා සුදස්සීදෙවලොකෙ ඨත්වා පරිනිබ්බායති, අයං උද්ධංසොතො න අකනිට්ඨගාමී නාම. යො ඉතො අකනිට්ඨමෙව ගන්ත්වා පරිනිබ්බායති, අයං න උද්ධංසොතො අකනිට්ඨගාමී නාම. යො පන හෙට්ඨා චතූසු දෙවලොකෙසු තත්ථ තත්ථෙව පරිනිබ්බායති, අයං න උද්ධංසොතො, න අකනිට්ඨගාමී නාමාති. और यहाँ 'उद्धंसोत अकनिठगामी', 'उद्धंसोत जो अकनिठगामी नहीं है', 'जो उद्धंसोत नहीं है वह अकनिठगामी', 'जो न उद्धंसोत है और न अकनिठगामी'—इस प्रकार चतुष्क जानना चाहिए। कैसे? जो अविह से लेकर चार देवलोकों को पार कर अकनिठ जाकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'उद्धंसोत अकनिठगामी' कहलाता है। जो नीचे के तीन देवलोकों को पार कर सुदस्सी देवलोक में रहकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'उद्धंसोत जो अकनिठगामी नहीं है' कहलाता है। जो यहाँ से सीधे अकनिठ ही जाकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'जो उद्धंसोत नहीं है वह अकनिठगामी' कहलाता है। जो नीचे के चार देवलोकों में वहीं-वहीं परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'जो न उद्धंसोत है और न अकनिठगामी' कहलाता है। තත්ථ [Pg.49] අවිහෙසු උප්පජ්ජිත්වා කප්පසතතො උද්ධං පරිනිබ්බායිකො, ද්වින්නං කප්පසතානං මත්ථකෙ පරිනිබ්බායිකො, පඤ්චකප්පසතෙ අසම්පත්තෙ පරිනිබ්බායිකොති තයො අන්තරාපරිනිබ්බායිනො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘උපපන්නං වා සමනන්තරා අප්පත්තං වා වෙමජ්ඣ’’න්ති (පු. ප. 36). වා-සද්දෙන හි පත්තමත්තොපි සඞ්ගහිතොති. එවං තයො අන්තරාපරිනිබ්බායිනො, එකො උපහච්චපරිනිබ්බායී එකො උද්ධංසොතො. තෙසු අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනො පඤ්ච, සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනො පඤ්චාති දස හොන්ති. තථා අතප්පාසුදස්සාසුදස්සීසූති චත්තාරො දසකා චත්තාරීසං අකනිට්ඨෙ පන උද්ධංසොතස්ස අභාවතො තයො අන්තරාපරිනිබ්බායිනො, එකො උපහච්චපරිනිබ්බායීති අසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනො චත්තාරො, සසඞ්ඛාරපරිනිබ්බායිනො චත්තාරොති අට්ඨ, එවමෙතෙ අට්ඨචත්තාරීසං අනාගාමිනො. තෙ සබ්බෙපි ඉමෙසු සුත්තෙසු අවිසෙසවචනෙන ගහිතාති දට්ඨබ්බං. वहाँ अविह लोक में उत्पन्न होकर सौ कल्पों के बाद परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला, दो सौ कल्पों के अंत में परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला, और पाँच सौ कल्प पूरे न होने पर परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला—ये तीन 'अंतरापरिनिब्बायी' हैं। जैसा कि कहा गया है—'उत्पन्न होते ही या उसके तुरंत बाद या मध्य को प्राप्त न होने पर' (पुग्गलपञ्ञत्ति ३६)। 'वा' शब्द से प्राप्त मात्र भी संगृहीत है। इस प्रकार तीन अंतरापरिनिब्बायी, एक उपहच्चपरिनिब्बायी और एक उद्धंसोत। उनमें पाँच असंखारपरिनिब्बायी और पाँच ससंखारपरिनिब्बायी—इस प्रकार दस होते हैं। इसी प्रकार अतप्प, सुदस्स और सुदस्सी में चार दशक (चालीस) होते हैं। अकनिठ में तो उद्धंसोत के अभाव के कारण तीन अंतरापरिनिब्बायी और एक उपहच्चपरिनिब्बायी—इस प्रकार चार असंखारपरिनिब्बायी और चार ससंखारपरिनिब्बायी—कुल आठ होते हैं। इस प्रकार ये अड़तालीस अनागामी हैं। वे सभी इन सूत्रों में सामान्य कथन द्वारा ग्रहण किए गए हैं, ऐसा देखना चाहिए। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. සබ්බපරිඤ්ඤාසුත්තවණ්ණනා ७. सब्बपरिञ्ञा सूत्र की व्याख्या। 7. සත්තමෙ සබ්බන්ති අනවසෙසං. අනවසෙසවාචකො හි අයං සබ්බ-සද්දො. සො යෙන යෙන සම්බන්ධං ගච්ඡති, තස්ස තස්ස අනවසෙසතං දීපෙති; යථා ‘‘සබ්බං රූපං, සබ්බා වෙදනා, සබ්බසක්කායපරියාපන්නෙසු ධම්මෙසූ’’ති. සො පනායං සබ්බ-සද්දො සප්පදෙසනිප්පදෙසවිසයතාය දුවිධො. තථා හෙස සබ්බසබ්බං, පදෙසසබ්බං, ආයතනසබ්බං, සක්කායසබ්බන්ති චතූසු විසයෙසු දිට්ඨප්පයොගො. තත්ථ ‘‘සබ්බෙ ධම්මා සබ්බාකාරෙන බුද්ධස්ස භගවතො ඤාණමුඛෙ ආපාථමාගච්ඡන්තී’’තිආදීසු (චූළනි. මොඝරාජමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 85) සබ්බසබ්බස්මිං ආගතො. ‘‘සබ්බෙසං වො, සාරිපුත්තා, සුභාසිතං පරියායෙනා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.345) පදෙසසබ්බස්මිං. ‘‘සබ්බං වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි, චක්ඛුඤ්චෙව රූපඤ්ච…පෙ…. මනඤ්චෙව ධම්මෙ චා’’ති (සං. නි. 4.23-25) එත්ථ ආයතනසබ්බස්මිං. ‘‘සබ්බධම්මමූලපරියායං වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමී’’තිආදීසු (ම. නි. 1.1) සක්කායසබ්බස්මිං. තත්ථ සබ්බසබ්බස්මිං ආගතො නිප්පදෙසවිසයො, ඉතරෙසු තීසුපි ආගතො සප්පදෙසවිසයො[Pg.50]. ඉධ පන සක්කායසබ්බස්මිං වෙදිතබ්බො. විපස්සනාය ආරම්මණභූතා තෙභූමකධම්මා හි ඉධ ‘‘සබ්බ’’න්ති අනවසෙසතො ගහිතා. ७. सातवें (सुत्त) में 'सब्ब' (सब) का अर्थ 'अनवशेष' (बिना किसी शेष के) है। वास्तव में यह 'सब्ब' शब्द अनवशेष का वाचक है। वह जिसके साथ भी संबंध बनाता है, उसकी अनवशेषता को प्रकट करता है; जैसे 'सब रूप, सब वेदना, सब सत्काय-पर्यापन्न धर्मों में'। वह यह 'सब्ब' शब्द सप्रदेश और निःप्रदेश विषय के भेद से दो प्रकार का है। उसी प्रकार इसका प्रयोग चार विषयों में देखा जाता है: सर्व-सर्व (सब्ब-सब्ब), प्रदेश-सर्व, आयतन-सर्व और सत्काय-सर्व। वहाँ 'सब धर्म बुद्ध भगवान के ज्ञान-मुख में सभी प्रकार से आते हैं' आदि में 'सर्व-सर्व' आया है। 'हे सारिपुत्र, तुम सबका (भाषण) पर्याय से सुभाषित है' आदि में 'प्रदेश-सर्व' आया है। 'भिक्षुओं, मैं तुम्हें सब का उपदेश दूँगा, चक्षु और रूप... मन और धर्म' यहाँ 'आयतन-सर्व' आया है। 'भिक्षुओं, मैं तुम्हें सब धर्मों के मूल पर्याय का उपदेश दूँगा' आदि में 'सत्काय-सर्व' आया है। वहाँ 'सर्व-सर्व' में आया शब्द निःप्रदेश विषय वाला है, शेष तीनों में आया शब्द सप्रदेश विषय वाला है। यहाँ इसे 'सत्काय-सर्व' के रूप में समझना चाहिए। क्योंकि यहाँ विपश्यना के आलम्बन भूत त्रिभूमिक धर्मों को ही 'सब' के रूप में बिना किसी शेष के ग्रहण किया गया है। අනභිජානන්ති ‘‘ඉමෙ ධම්මා කුසලා, ඉමෙ අකුසලා, ඉමෙ සාවජ්ජා, ඉමෙ අනවජ්ජා’’තිආදිනා ‘‘ඉමෙ පඤ්චක්ඛන්ධා, ඉමානි ද්වාදසායතනානි, ඉමා අට්ඨාරස ධාතුයො, ඉදං දුක්ඛං අරියසච්චං, අයං දුක්ඛසමුදයො අරියසච්ච’’න්ති ච ආදිනා සබ්බෙ අභිඤ්ඤෙය්යෙ ධම්මෙ අවිපරීතසභාවතො අනභිජානන්තො අභිවිසිට්ඨෙන ඤාණෙන න ජානන්තො. අපරිජානන්ති න පරිජානන්තො. යො හි සබ්බං තෙභූමකධම්මජාතං පරිජානාති, සො තීහි පරිඤ්ඤාහි පරිජානාති – ඤාතපරිඤ්ඤාය, තීරණපරිඤ්ඤාය, පහානපරිඤ්ඤාය. තත්ථ කතමා ඤාතපරිඤ්ඤා? සබ්බං තෙභූමකං නාමරූපං – ‘‘ඉදං රූපං, එත්තකං රූපං, න ඉතො භිය්යො. ඉදං නාමං, එත්තකං නාමං, න ඉතො භිය්යො’’ති භූතප්පසාදාදිප්පභෙදං රූපං, ඵස්සාදිප්පභෙදං නාමඤ්ච, ලක්ඛණරසපච්චුපට්ඨානපදට්ඨානතො වවත්ථපෙති. තස්ස අවිජ්ජාදිකඤ්ච පච්චයං පරිග්ගණ්හාති. අයං ඤාතපරිඤ්ඤා. කතමා තීරණපරිඤ්ඤා? එවං ඤාතං කත්වා තං සබ්බං තීරෙති අනිච්චතො දුක්ඛතො රොගතොති ද්වාචත්තාලීසාය ආකාරෙහි. අයං තීරණපරිඤ්ඤා. කතමා පහානපරිඤ්ඤා? එවං තීරයිත්වා අග්ගමග්ගෙන සබ්බස්මිං ඡන්දරාගං පජහති. අයං පහානපරිඤ්ඤා. 'ये धर्म कुशल हैं, ये अकुशल हैं, ये सदोष हैं, ये निर्दोष हैं' आदि के द्वारा तथा 'ये पाँच स्कन्ध हैं, ये बारह आयतन हैं, ये अठारह धातुएँ हैं, यह दुःख आर्यसत्य है, यह दुःख-समुदय आर्यसत्य है' आदि के द्वारा सभी अभिज्ञेय (जानने योग्य) धर्मों को उनके यथार्थ स्वभाव से न जानते हुए, विशिष्ट ज्ञान से न जानते हुए 'अनभिजानन्ति' कहा गया है। 'अपरीजानन्ति' का अर्थ है पूर्णतः न जानना। जो सभी त्रिभूमिक धर्म-समूह को पूर्णतः जानता है, वह तीन परिज्ञाओं से जानता है - ज्ञात-परिज्ञा, तीरण-परिज्ञा और प्रहाण-परिज्ञा। वहाँ ज्ञात-परिज्ञा क्या है? समस्त त्रिभूमिक नाम-रूप को - 'यह रूप है, इतना ही रूप है, इससे अधिक नहीं; यह नाम है, इतना ही नाम है, इससे अधिक नहीं' - इस प्रकार भूत-प्रसाद आदि के भेद वाले रूप को और स्पर्श आदि के भेद वाले नाम को लक्षण, रस, प्रत्युपस्थान और पदस्थान के द्वारा निर्धारित करता है। वह उसके अविद्या आदि प्रत्ययों (कारणों) को भी ग्रहण करता है। यह ज्ञात-परिज्ञा है। तीरण-परिज्ञा क्या है? इस प्रकार ज्ञात करके, उन सबको अनित्य, दुःख, रोग आदि बयालीस आकारों से विचारता है। यह तीरण-परिज्ञा है। प्रहाण-परिज्ञा क्या है? इस प्रकार विचार कर अग्र-मार्ग के द्वारा सबमें छन्द-राग का त्याग करता है। यह प्रहाण-परिज्ञा है। දිට්ඨිවිසුද්ධිකඞ්ඛාවිතරණවිසුද්ධියොපි ඤාතපරිඤ්ඤා. මග්ගාමග්ගපටිපදාඤාණදස්සනවිසුද්ධියො කලාපසම්මසනාදිඅනුලොමපරියොසානා වා පඤ්ඤා තීරණපරිඤ්ඤා. අරියමග්ගෙන පජහනං පහානපරිඤ්ඤා. යො සබ්බං පරිජානාති, සො ඉමාහි තීහි පරිඤ්ඤාහි පරිජානාති. ඉධ පන විරාගප්පහානානං පටික්ඛෙපවසෙන විසුං ගහිතත්තා ඤාතපරිඤ්ඤාය තීරණපරිඤ්ඤාය ච වසෙන පරිජානනා වෙදිතබ්බා. යො පනෙවං න පරිජානාති, තං සන්ධාය වුත්තං ‘‘අපරිජාන’’න්ති. दृष्टि-विशुद्धि और काङ्क्षा-वितरण-विशुद्धि भी ज्ञात-परिज्ञा ही हैं। मार्ग-अमार्ग-प्रतिपदा-ज्ञानदर्शन-विशुद्धि और कलाप-सम्मसन से लेकर अनुलोम के अंत तक की प्रज्ञा तीरण-परिज्ञा है। आर्यमार्ग के द्वारा त्याग करना प्रहाण-परिज्ञा है। जो सबको पूर्णतः जानता है, वह इन तीन परिज्ञाओं से जानता है। परन्तु यहाँ विराग और प्रहाण के निषेध के कारण, उन्हें अलग से ग्रहण किए जाने से, ज्ञात-परिज्ञा और तीरण-परिज्ञा के द्वारा जानना समझना चाहिए। जो इस प्रकार नहीं जानता, उसके संदर्भ में 'अपरीजानं' कहा गया है। තත්ථ චිත්තං අවිරාජයන්ති තස්මිං අභිඤ්ඤෙය්යවිසෙසෙ පරිඤ්ඤෙය්යෙ අත්තනො චිත්තසන්තානං න විරාජයං, න විරජ්ජන්තො; යථා තත්ථ රාගො න හොති, එවං විරාගානුපස්සනං න උප්පාදෙන්තොති අත්ථො. අප්පජහන්ති විපස්සනාපඤ්ඤාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය තත්ථ පහාතබ්බයුත්තකං කිලෙසවට්ටං අනවසෙසතො [Pg.51] න පජහන්තො. යථා චෙතං, එවං අභිජානනාදයොපි මිස්සකමග්ගවසෙන වෙදිතබ්බා. පුබ්බභාගෙ හි නානාචිත්තවසෙන ඤාතතීරණපහානපරිඤ්ඤාහි කමෙන අභිජානනාදීනි සම්පාදෙත්වා මග්ගකාලෙ එකක්ඛණෙනෙව කිච්චවසෙන තං සබ්බං නිප්ඵාදෙන්තං එකමෙව ඤාණං පවත්තතීති. අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයායාති නිබ්බානාය සකලස්ස වට්ටදුක්ඛස්ස ඛෙපනාය න භබ්බො, නාලං න සමත්ථොති අත්ථො. वहाँ 'चित्तं अविराजयन्ति' का अर्थ है - उस अभिज्ञेय और परिज्ञेय विशेष में अपनी चित्त-सन्तति को विरक्त न करना, विरक्त न होते हुए; अर्थात् वहाँ राग न हो, इस प्रकार विराग-अनुपश्यना को उत्पन्न न करना। 'अप्पजहन्ति' का अर्थ है - विपश्यना-प्रज्ञा युक्त मार्ग-प्रज्ञा के द्वारा वहाँ त्यागने योग्य क्लेश-चक्र को पूरी तरह से न त्यागना। जैसे यह है, वैसे ही अभिज्ञान आदि को भी मिश्रित-मार्ग के वश से समझना चाहिए। क्योंकि पूर्व भाग में विभिन्न चित्तों के द्वारा ज्ञात, तीरण और प्रहाण परिज्ञाओं से क्रमशः अभिज्ञान आदि को सिद्ध करके, मार्ग के समय एक ही क्षण में कृत्य के वश से उन सबको निष्पन्न करता हुआ एक ही ज्ञान प्रवृत्त होता है। 'अभव्वो दुक्खक्खयाय' का अर्थ है - निर्वाण के लिए, समस्त वट्ट-दुःख के क्षय के लिए भव्य न होना, अर्थात् समर्थ न होना। සබ්බඤ්ච ඛොති එත්ථ ච-සද්දො බ්යතිරෙකෙ, ඛො-සද්දො අවධාරණෙ. තදුභයෙන අභිජානනාදිතො ලද්ධබ්බං විසෙසං දුක්ඛක්ඛයස්ස ච එකන්තකාරණං දීපෙති. අභිජානනාදීසු යං වත්තබ්බං, තං වුත්තමෙව. තත්ථ පන පටික්ඛෙපවසෙන වුත්තං, ඉධ විධානවසෙන වෙදිතබ්බං. අයමෙව විසෙසො. අපිච අභිජානන්ති උපාදානක්ඛන්ධපඤ්චකසඞ්ඛාතං සක්කායසබ්බං සරූපතො පච්චයතො ච ඤාණස්ස අභිමුඛීකරණවසෙන අභිජානන්තො හුත්වා අභාවාකාරාදිපරිග්ගහෙන තං අනිච්චාදිලක්ඛණෙහි පරිච්ඡිජ්ජමානවසෙන පරිජානන්තො. විරාජයන්ති සම්මදෙවස්ස අනිච්චතාදිඅවබොධෙන උප්පන්නභයාදීනවනිබ්බිදාදිඤාණානුභාවෙන අත්තනො චිත්තං විරත්තං කරොන්තො තත්ථ අණුමත්තම්පි රාගං අනුප්පාදෙන්තො. පජහන්ති වුට්ඨානගාමිනිවිපස්සනාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය සමුදයපක්ඛියං කිලෙසවට්ටං පජහන්තො සමුච්ඡින්දන්තො. භබ්බො දුක්ඛක්ඛයායාති එවං කිලෙසමලප්පහානෙනෙව සබ්බස්ස කම්මවට්ටස්ස පරික්ඛීණත්තා අනවසෙසවිපාකවට්ටඛෙපනාය සකලසංසාරවට්ටදුක්ඛපරික්ඛයභූතාය වා අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා භබ්බො එකන්තෙනෙතං පාපුණිතුන්ති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. "सब्बञ्च खो" यहाँ 'च' शब्द व्यतिरेक (भेद) के अर्थ में है, 'खो' शब्द अवधारण (निश्चय) के अर्थ में है। उन दोनों के द्वारा अभिज्ञान आदि से प्राप्त होने वाले विशेष और दुःख के क्षय के एकान्त कारण को प्रकाशित करता है। अभिज्ञान आदि के विषय में जो कहना चाहिए, वह कहा ही जा चुका है। वहाँ प्रतिषेध के रूप में कहा गया था, यहाँ विधान के रूप में समझना चाहिए। यही विशेषता है। इसके अतिरिक्त, 'अभिजानान्ति' का अर्थ है—उपादानस्कन्ध रूपी पाँच प्रकार के 'सक्काय' (सत्काय) को उसके स्वरूप और प्रत्यय (कारण) से ज्ञान के सम्मुख करने के द्वारा अभिज्ञान करते हुए, और अभाव के आकार आदि के परिग्रह से उसे अनित्य आदि लक्षणों द्वारा परिच्छिन्न (निश्चित) करने के द्वारा 'परिजानान्ति' (परिज्ञान करते हुए)। 'विराजयन्ति' का अर्थ है—अनित्यता आदि के सम्यक् बोध से उत्पन्न भय, आदिनाथ और निर्वेद आदि ज्ञान के प्रभाव से अपने चित्त को विरक्त करते हुए, वहाँ अणुमात्र भी राग उत्पन्न न होने देना। 'पजहन्ति' का अर्थ है—उत्थानगामिनी विपश्यना सहित मार्ग-प्रज्ञा के द्वारा समुदय-पक्षीय क्लेश-चक्र को त्यागते हुए और समूच्छेद करते हुए। 'भब्बो दुक्खक्खयाय' का अर्थ है—इस प्रकार क्लेश-मल के प्रहाण से ही समस्त कर्म-चक्र के क्षीण हो जाने के कारण, अवशेष रहित विपाक-चक्र को समाप्त करने के लिए अथवा सकल संसार-चक्र के दुःख के परिक्षय स्वरूप अनुपधिशेष निर्वाण-धातु को प्राप्त करने के लिए वह एकान्ततः समर्थ है—ऐसा यहाँ अर्थ समझना चाहिए। යො සබ්බං සබ්බතො ඤත්වාති යො යුත්තයොගො ආරද්ධවිපස්සකො සබ්බං තෙභූමකධම්මජාතං සබ්බතො සබ්බභාගෙන කුසලාදික්ඛන්ධාදිවිභාගතො දුක්ඛාදිපීළනාදිවිභාගතො ච. අථ වා සබ්බතොති සබ්බස්මා කක්ඛළඵුසනාදිලක්ඛණාදිතො අනිච්චාදිතො චාති සබ්බාකාරතො ජානිත්වා විපස්සනාපුබ්බඞ්ගමෙන මග්ගඤාණෙන පටිවිජ්ඣිත්වා, විපස්සනාඤාණෙනෙව වා ජානනහෙතු. සබ්බත්ථෙසු න රජ්ජතීති සබ්බෙසු අතීතාදිවසෙන අනෙකභෙදභින්නෙසු සක්කායධම්මෙසු න රජ්ජති, අරියමග්ගාධිගමෙන රාගං න ජනෙති. ඉමිනාස්ස තණ්හාගාහස්ස අභාවං දස්සෙන්තො තං නිමිත්තත්තා දිට්ඨමානග්ගාහානං ‘‘එතං මම එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’ති ඉමස්ස මිච්ඡාගාහත්තයස්සපි [Pg.52] අභාවං දස්සෙති. ස වෙති එත්ථ ස-ඉති නිපාතමත්තං. වෙ-ති බ්යත්තං, එකංසෙනාති වා එතස්මිං අත්ථෙ නිපාතො. සබ්බපරිඤ්ඤාති සබ්බපරිජානනතො, යථාවුත්තස්ස සබ්බස්ස අභිසමයවසෙන පරිජානනතො. සොති යථාවුත්තො යොගාවචරො, අරියො එව වා. සබ්බදුක්ඛමුපච්චගාති සබ්බං වට්ටදුක්ඛං අච්චගා අතික්කමි, සමතික්කමීති අත්ථො. "यो सब्बं सब्बतो ञत्वा" का अर्थ है—जो युक्तयोगी आरब्ध-विपश्यक है, वह समस्त त्रैभूमिक धर्मों को 'सब्बतो' अर्थात् सब प्रकार से—कुशल आदि स्कन्धों के विभाग से और दुःख आदि पीड़न के विभाग से। अथवा 'सब्बतो' का अर्थ है—कठोरता, स्पर्श आदि लक्षणों से और अनित्यता आदि से, अर्थात् सब प्रकार से जानकर, विपश्यना-पूर्वक मार्ग-ज्ञान से प्रतिवेध करके, अथवा विपश्यना-ज्ञान से ही जानने के कारण। "सब्बत्थेसु न रज्जति" का अर्थ है—अतीत आदि के भेद से अनेक प्रकार के सत्काय-धर्मों में आसक्त नहीं होता, आर्यमार्ग की प्राप्ति से राग उत्पन्न नहीं करता। इसके द्वारा उसके तृष्णा-ग्राह के अभाव को दिखाते हुए, उसके निमित्त से होने वाले दृष्टि और मान के ग्राह—"यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरा आत्मा है"—इस त्रिविध मिथ्या ग्राह के अभाव को भी दिखाता है। "स वे" यहाँ 'स' केवल निपात है। 'वे' का अर्थ स्पष्ट रूप से या एकान्ततः है। "सब्बपरिञ्ञा" का अर्थ है—सबका परिज्ञान करने से, यथावक्त (कहे गए) सबका अभिसमय के द्वारा परिज्ञान करने से। "सो" का अर्थ है—यथोक्त योगावचर, अथवा आर्य ही। "सब्बदुक्खमुपच्चगा" का अर्थ है—समस्त वट्ट-दुःख (संसार-दुःख) को पार कर गया, अतिक्रमण कर गया। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 8. මානපරිඤ්ඤාසුත්තවණ්ණනා ८. मान-परिज्ञा सूत्र की व्याख्या 8. අට්ඨමෙ අපුබ්බං නත්ථි, කෙවලං මානවසෙන දෙසනා පවත්තා. ගාථාසු පන මානුපෙතා අයං පජාති කම්මකිලෙසෙහි පජායතීති පජාති ලද්ධනාමා ඉමෙ සත්තා මඤ්ඤනලක්ඛණෙන මානෙන උපෙතා උපගතා. මානගන්ථා භවෙ රතාති කිමිකීටපටඞ්ගාදිඅත්තභාවෙපි මානෙන ගන්ථිතා මානසංයොජනෙන සංයුත්තා. තතො එව දීඝරත්තං පරිභාවිතාහංකාරවසෙන ‘‘එතං මමා’’ති සඞ්ඛාරෙසු අජ්ඣොසානබහුලත්තා තත්ථ නිච්චසුඛඅත්තාදිවිපල්ලාසවසෙන ච කාමාදිභවෙ රතා. මානං අපරිජානන්තාති මානං තීහි පරිඤ්ඤාහි න පරිජානන්තා. අරහත්තමග්ගඤාණෙන වා අනතික්කමන්තා, ‘‘මානං අපරිඤ්ඤායා’’ති කෙචි පඨන්ති. ආගන්තාරො පුනබ්භවන්ති පුන ආයාතිං උපපත්තිභවං. පුනප්පුනං භවනතො වා පුනබ්භවසඞ්ඛාතං සංසාරං අපරාපරං පරිවත්තනවසෙන ගන්තාරො උපගන්තාරො හොන්ති, භවතො න පරිමුච්චන්තීති අත්ථො. යෙ ච මානං පහන්ත්වාන, විමුත්තා මානසඞ්ඛයෙති යෙ පන අරහත්තමග්ගෙන සබ්බසො මානං පජහිත්වා මානස්ස අච්චන්තසඞ්ඛයභූතෙ අරහත්තඵලෙ නිබ්බානෙ වා තදෙකට්ඨසබ්බකිලෙසවිමුත්තියා විමුත්තා සුට්ඨු මුත්තා. තෙ මානගන්ථාභිභුනො, සබ්බදුක්ඛමුපච්චගුන්ති තෙ පරික්ඛීණභවසංයොජනා අරහන්තො සබ්බසො මානගන්ථං මානසංයොජනං සමුච්ඡෙදප්පහානෙන අභිභවිත්වා ඨිතා, අනවසෙසං වට්ටදුක්ඛං අතික්කමිංසූති අත්ථො. එවමෙතස්මිං සත්තමසුත්තෙ ච අරහත්තං කථිතන්ති. ८. आठवें में कुछ भी अपूर्व नहीं है, केवल मान के वश में देशना प्रवृत्त हुई है। गाथाओं में "मानुपेता अयं पजा" का अर्थ है—कर्म और क्लेशों से जो उत्पन्न होती है वह 'प्रजा' कहलाती है, ये सत्त्व 'मनन' लक्षण वाले मान से उपेत (युक्त) हैं। "मानगन्था भवे रता" का अर्थ है—कृमि, कीट, पतंग आदि के आत्मभाव में भी मान से ग्रथित, मान-संयोजन से संयुक्त। उसी कारण से दीर्घकाल से भावित अहंकार के वश में "यह मेरा है" इस प्रकार संस्कारों में अभिनिवेश की बहुलता के कारण और वहाँ नित्य, सुख, आत्मा आदि विपर्यास के वश में कामादि भवों में रत हैं। "मानं अपरिजानन्ता" का अर्थ है—मान का तीन परिज्ञाओं से परिज्ञान न करने वाले। अथवा अर्हत् मार्ग-ज्ञान से अतिक्रमण न करने वाले; कुछ लोग "मानं अपरिञ्ञाय" ऐसा पाठ पढ़ते हैं। "आगन्तारो पुनब्बवन्ति" का अर्थ है—पुनः भविष्य में उत्पत्ति रूपी भव को प्राप्त होने वाले। अथवा बार-बार उत्पन्न होने के कारण 'पुनर्भव' संज्ञक संसार में बार-बार भ्रमण करने के कारण जाने वाले होते हैं, भव से मुक्त नहीं होते—यह अर्थ है। "ये च मानं पहन्त्वान, विमुत्ता मानसङ्खये" का अर्थ है—जो अर्हत् मार्ग के द्वारा पूर्णतः मान को त्यागकर, मान के आत्यन्तिक क्षय स्वरूप अर्हत् फल या निर्वाण में, उसी के साथ रहने वाले समस्त क्लेशों की विमुक्ति से विमुक्त हैं, भली-भाँति मुक्त हैं। "ते मानगन्थाभिभुनो, सब्बदुक्खमुपच्चगुं" का अर्थ है—वे क्षीण-भव-संयोजन वाले अर्हन्त पूर्णतः मान-ग्रन्थ (मान-संयोजन) को समूच्छेद-प्रहाण से अभिभूत करके स्थित हैं, उन्होंने अवशेष रहित वट्ट-दुःख का अतिक्रमण कर लिया है। इस प्रकार इस सातवें सूत्र में अर्हत्त्व कहा गया है। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9-10. ලොභදොසපරිඤ්ඤාසුත්තද්වයවණ්ණනා ९-१०. लोभ-दोष-परिज्ञा सूत्रों के युगल की व्याख्या 9-10. නවමදසමෙසු [Pg.53] අපුබ්බං නත්ථි. දෙසනාවිලාසවසෙන තථා බුජ්ඣනකානං වෙනෙය්යානං අජ්ඣාසයවසෙන වා තථා දෙසිතානීති දට්ඨබ්බං. ९-१०. नौवें और दसवें सूत्रों में कुछ भी अपूर्व नहीं है। देशना के विलास के वश में अथवा उस प्रकार समझने वाले विनेय जनों के आशय के वश में उस प्रकार उपदेश दिया गया है—ऐसा समझना चाहिए। නවමදසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें और दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। පඨමවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। 2. දුතියවග්ගො २. द्वितीय वर्ग 1-3. මොහපරිඤ්ඤාදිසුත්තවණ්ණනා १-३. मोह-परिज्ञा आदि सूत्रों की व्याख्या 11-13. දුතියවග්ගෙපි පඨමාදීනි තීණි සුත්තානි වුත්තනයානෙව, තථා දෙසනාකාරණම්පි වුත්තමෙව. ११-१३. द्वितीय वर्ग में भी पहले आदि तीन सूत्र कहे गए तरीके से ही हैं, उसी प्रकार देशना का कारण भी कहा ही जा चुका है। 4. අවිජ්ජානීවරණසුත්තවණ්ණනා ४. अविद्या-नीवरण सूत्र की व्याख्या 14. චතුත්ථෙ – ‘‘නාහං, භික්ඛවෙ’’තිආදීසු න-කාරො පටිසෙධත්ථො. අහන්ති භගවා අත්තානං නිද්දිසති. අඤ්ඤන්ති ඉදානි වත්තබ්බඅවිජ්ජානීවරණතො අඤ්ඤං. එකනීවරණම්පීති එකනීවරණධම්මම්පි. සමනුපස්සාමීති ද්වෙ සමනුපස්සනා – දිට්ඨිසමනුපස්සනා ච ඤාණසමනුපස්සනා ච. තත්ථ ‘‘රූපං අත්තතො සමනුපස්සතී’’තිආදිනා (අ. නි. 4.200; පටි. ම. 1.130) ආගතා අයං දිට්ඨිසමනුපස්සනා නාම. ‘‘අනිච්චතො සමනුපස්සති, නො නිච්චතො’’තිආදිනා (පටි. ම. 3.35) පන ආගතා අයං ඤාණසමනුපස්සනා නාම. ඉධාපි ඤාණසමනුපස්සනාව අධිප්පෙතා. ‘‘සමනුපස්සාමී’’ති ච පදස්ස න-කාරෙන සම්බන්ධො. ඉදං වුත්තං හොති – ‘‘අහං, භික්ඛවෙ, සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණසඞ්ඛාතෙන සමන්තචක්ඛුනා සබ්බධම්මෙ හත්ථාමලකං විය ඔලොකෙන්තොපි අඤ්ඤං එකනීවරණම්පි න සමනුපස්සාමී’’ති. १४. चौथे (सुत्त) में - 'नाहं, भिक्खवे' इत्यादि में 'न' शब्द निषेध के अर्थ में है। 'अहं' से भगवान स्वयं को निर्दिष्ट करते हैं। 'अञ्ञं' का अर्थ है वर्तमान में कहे जाने वाले अविद्या-निवारण से अन्य। 'एकनीवरणम्पि' का अर्थ है एक निवारण धर्म भी। 'समनुपस्सामि' से दो प्रकार की समनुपश्यना अभिप्रेत है - दृष्टि-समनुपश्यना और ज्ञान-समनुपश्यना। वहाँ 'रूप को आत्मा के रूप में देखता है' इत्यादि (अं. नि. 4.200; पटि. म. 1.130) के माध्यम से जो आई है, वह 'दृष्टि-समनुपश्यना' है। 'अनित्य के रूप में देखता है, न कि नित्य के रूप में' इत्यादि (पटि. म. 3.35) के माध्यम से जो आई है, वह 'ज्ञान-समनुपश्यना' है। यहाँ भी ज्ञान-समनुपश्यना ही अभिप्रेत है। 'समनुपस्सामि' पद का 'न' शब्द के साथ सम्बन्ध है। यह कहा गया है - 'हे भिक्षुओं! मैं सर्वज्ञता-ज्ञान रूपी समन्तचक्षु से सभी धर्मों को हाथ में रखे आँवले के समान देखते हुए भी, (अविद्या के समान) किसी अन्य एक निवारण को भी नहीं देखता हूँ'। යෙන නීවරණෙන නිවුතා පජා දීඝරත්තං සන්ධාවන්ති සංසරන්තීති යෙන නීවරණකසභාවත්තා නීවරණෙන ධම්මසභාවං ජානිතුං පස්සිතුං පටිවිජ්ඣිතුං අදත්වා [Pg.54] ඡාදෙත්වා පරියොනන්ධිත්වා ඨානෙන අන්ධකාරෙන නිවුතා සත්තා අනාදිමතසංසාරෙ අපරිමාණෙ කප්පෙ මහන්තෙසු චෙව ඛුද්දකෙසු ච භවාදීසු අපරාපරුප්පත්තිවසෙන සබ්බතො ධාවන්ති චෙව සංසරන්ති, ච. ආරම්මණන්තරසඞ්කමනවසෙන වා සන්ධාවනං, භවන්තරසඞ්කමනවසෙන සංසරණං. කිලෙසානං බලවභාවෙන වා සන්ධාවනං, දුබ්බලභාවෙන සංසරණං. ඛණිකමරණවසෙන වා එකජාතියං සන්ධාවනං, වොහාරමරණවසෙන අනෙකාසු ජාතීසු සංසරණං. චිත්තවසෙන වා සන්ධාවනං, ‘‘චිත්තමස්ස විධාවතී’’ති හි වුත්තං, කම්මවසෙන සංසරණං. එවං සන්ධාවනසංසරණානං විසෙසො වෙදිතබ්බො. जिस निवारण से ढकी हुई प्रजा दीर्घकाल तक भटकती है और संसरण करती है - यहाँ निवारण के स्वभाव के कारण, धर्म-स्वभाव को जानने, देखने और साक्षात्कार करने न देकर, उसे ढँककर और आच्छादित करके, अन्धकार से ढके हुए सत्त्व अनादि संसार में, अपरिमित कल्पों में, बड़े और छोटे भवों आदि में बार-बार जन्म लेने के कारण सब ओर भटकते हैं और संसरण करते हैं। एक आलम्बन से दूसरे आलम्बन में जाने के कारण 'सन्धावन' (भटकना) है, और एक भव से दूसरे भव में जाने के कारण 'संसरण' है। अथवा क्लेशों की प्रबलता के कारण 'सन्धावन' है, और उनकी दुर्बलता के कारण 'संसरण' है। अथवा क्षणिक मरण के कारण एक ही जन्म में 'सन्धावन' है, और व्यावहारिक मरण के कारण अनेक जन्मों में 'संसरण' है। अथवा चित्त के कारण 'सन्धावन' है, क्योंकि कहा गया है 'उसका चित्त दौड़ता है', और कर्म के कारण 'संसरण' है। इस प्रकार सन्धावन और संसरण का भेद समझना चाहिए। යථයිදන්ති යථා ඉදං. ය-කාරො පදසන්ධිකරො, සන්ධිවසෙන රස්සත්තං. අවිජ්ජානීවරණන්ති එත්ථ පූරෙතුං අයුත්තට්ඨෙන කායදුච්චරිතාදි අවින්දියං නාම, අලද්ධබ්බන්ති අත්ථො. තං අවින්දියං වින්දතීති අවිජ්ජා. විපරීතතො කායසුචරිතාදි වින්දියං නාම, තං වින්දියං න වින්දතීති අවිජ්ජා. ඛන්ධානං රාසට්ඨං, ආයතනානං ආයතනට්ඨං, ධාතූනං සුඤ්ඤට්ඨං, ඉන්ද්රියානං ආධිපතෙය්යට්ඨං, සච්චානං තථට්ඨං දුක්ඛාදීනං පීළනාදිවසෙන වුත්තං චතුබ්බිධං අත්ථං අවිදිතං කරොතීතිපි අවිජ්ජා. අන්තවිරහිතෙ සංසාරෙ සත්තෙ ජවාපෙතීති වා අවිජ්ජා, පරමත්ථතො වා අවිජ්ජමානෙසු ඉත්ථිපුරිසාදීසු ජවති පවත්තති, විජ්ජමානෙසු ඛන්ධාදීසු න ජවති, න පවත්තතීති අවිජ්ජා. අපිච චක්ඛුවිඤ්ඤාණාදීනං වත්ථාරම්මණානං පටිච්චසමුප්පාදපටිච්චසමුප්පන්නානඤ්ච ධම්මානං ඡාදනතොපි අවිජ්ජා. අවිජ්ජාව නීවරණන්ති අවිජ්ජානීවරණං. 'यथयिदं' का अर्थ है 'यथा इदं'। 'य' अक्षर पद-सन्धि करने वाला है, सन्धि के कारण वह ह्रस्व हो गया है। 'अविज्जानिवरणं' यहाँ - पूर्ण करने के अयोग्य होने के कारण काय-दुश्चरित आदि 'अविन्दिय' (न प्राप्त करने योग्य) कहलाते हैं। उस अविन्दिय को जो प्राप्त करता है, वह 'अविद्या' है। इसके विपरीत काय-सुचरित आदि 'विन्दिय' (प्राप्त करने योग्य) कहलाते हैं, उस विन्दिय को जो प्राप्त नहीं करता, वह 'अविद्या' है। स्कन्धों के राशि-अर्थ को, आयतनों के आयतन-अर्थ को, धातुओं के शून्य-अर्थ को, इन्द्रियों के आधिपत्य-अर्थ को, और सत्यों के यथार्थ-अर्थ को - दुःख आदि के माध्यम से कहे गए चार प्रकार के अर्थों को जो अज्ञात बनाती है, वह भी 'अविद्या' है। अथवा जो अन्त-रहित संसार में सत्त्वों को दौड़ाती है, वह 'अविद्या' है। अथवा जो परमार्थतः अविद्यमान स्त्री-पुरुष आदि में प्रवृत्त होती है, और विद्यमान स्कन्ध आदि में प्रवृत्त नहीं होती, वह 'अविद्या' है। इसके अतिरिक्त, चक्षु-विज्ञान आदि के वस्तु-आलम्बन और प्रतीत्यसमुत्पाद-प्रतीत्यसमुत्पन्न धर्मों को ढँकने के कारण भी 'अविद्या' है। अविद्या ही निवारण है, इसलिए 'अविद्या-निवारण' है। අවිජ්ජානීවරණෙන හි, භික්ඛවෙ, නිවුතා පජා දීඝරත්තං සන්ධාවන්ති සංසරන්තීති ඉදං පුරිමස්සෙව දළ්හීකරණත්ථං වුත්තං. පුරිමං වා – ‘‘යථයිදං, භික්ඛවෙ, අවිජ්ජානීවරණ’’න්ති එවං ඔපම්මදස්සනවසෙන වුත්තං, ඉදං නීවරණානුභාවදස්සනවසෙන. කස්මා පනෙත්ථ අවිජ්ජාව එවං වුත්තා, න අඤ්ඤෙ ධම්මාති? ආදීනවපටිච්ඡාදනෙන කාමච්ඡන්දාදීනං විසෙසප්පච්චයභාවතො. තථා හි තාය පටිච්ඡාදිතාදීනවෙ විසයෙ කාමච්ඡන්දාදයො පවත්තන්ති. 'हे भिक्षुओं! अविद्या-निवारण से ढकी हुई प्रजा दीर्घकाल तक भटकती है और संसरण करती है' - यह पहले कही गई बात को दृढ़ करने के लिए कहा गया है। अथवा पहले 'यथयिदं, भिक्खवे, अविज्जानिवरणं' इस प्रकार उपमा दिखाने के लिए कहा गया था, और यह निवारण के प्रभाव को दिखाने के लिए। यहाँ केवल अविद्या को ही ऐसा क्यों कहा गया है, अन्य धर्मों को क्यों नहीं? क्योंकि दोषों (आदीनव) को ढँक लेने से यह काम-छन्द आदि के लिए विशेष प्रत्यय बन जाती है। क्योंकि इसके द्वारा दोषों के ढँक दिए जाने पर ही विषयों में काम-छन्द आदि प्रवृत्त होते हैं। නත්ථඤ්ඤොති ආදිකා ගාථා වුත්තස්ස අවුත්තස්ස ච අත්ථස්ස සඞ්ගණ්හනවසෙන භාසිතා. තත්ථ නිවුතාති නිවාරිතා පලිගුණ්ඨිතා, පටිච්ඡාදිතාති අත්ථො. අහොරත්තන්ති දිවා චෙව රත්තිඤ්ච, සබ්බකාලන්ති වුත්තං හොති. යථා [Pg.55] මොහෙන ආවුතාති යෙන පකාරෙන අවිජ්ජානීවරණසඞ්ඛාතෙන මොහෙන ආවුතා පටිච්ඡාදිතා සුවිඤ්ඤෙය්යම්පි අජානන්තියො පජා සංසාරෙ සංසරන්ති, තථාරූපො අඤ්ඤො එකධම්මොපි එකනීවරණම්පි නත්ථීති යොජෙතබ්බං. යෙ ච මොහං පහන්ත්වාන, තමොඛන්ධං පදාලයුන්ති යෙ පන අරියසාවකා පුබ්බභාගෙ තදඞ්ගාදිප්පහානවසෙන, හෙට්ඨිමමග්ගෙහි වා තංතංමග්ගවජ්ඣං මොහං පජහිත්වා අග්ගමග්ගෙන වජිරූපමඤාණෙන මොහසඞ්ඛාතමෙව තමොරාසිං පදාලයිංසු, අනවසෙසතො සමුච්ඡින්දිංසු. න තෙ පුන සංසරන්තීති තෙ අරහන්තො – 'नत्थञ्ञो' इत्यादि गाथा कहे गए और अनकहे अर्थों के संग्रह के रूप में कही गई है। वहाँ 'निवुता' का अर्थ है निवारित, आच्छादित। 'अहोरत्तं' का अर्थ है दिन और रात, अर्थात् सदा। 'यथा मोहेन आवुता' - जिस प्रकार अविद्या-निवारण रूपी मोह से ढकी हुई, सुविज्ञेय को भी न जानने वाली प्रजा संसार में संसरण करती है, वैसा कोई अन्य एक धर्म या एक निवारण नहीं है - ऐसा अर्थ जोड़ना चाहिए। 'ये च मोहं पहन्त्वान, तमोखन्धं पदालयुं' - जो आर्य श्रावक पूर्व भाग में तदङ्ग-प्रहाण आदि के द्वारा, अथवा निचले मार्गों के द्वारा उस-उस मार्ग से वध्य मोह को त्यागकर, अग्र मार्ग के वज्र-तुल्य ज्ञान से मोह रूपी अन्धकार की राशि को विदीर्ण कर देते हैं, उसे पूर्णतः समूल नष्ट कर देते हैं। 'न ते पुन संसरन्ति' - वे अर्हत् फिर संसरण नहीं करते— ‘‘ඛන්ධානඤ්ච පටිපාටි, ධාතුආයතනාන ච; අබ්බොච්ඡින්නං වත්තමානා, සංසාරොති පවුච්චතී’’ති. – 'स्कन्धों, धातुओं और आयतनों की अटूट रूप से चलती रहने वाली परम्परा ही संसार कहलाती है'। එවං වුත්තෙ ඉමස්මිං සංසාරෙ න සංසරන්ති න පරිබ්භමන්ති. කිං කාරණා? හෙතු තෙසං න විජ්ජති, යස්මා සංසාරස්ස හෙතු මූලකාරණං අවිජ්ජා, සා තෙසං න විජ්ජති, සබ්බසො නත්ථි සමුච්ඡින්නත්තාති. ऐसा कहे जाने पर, वे इस संसार में संसरण नहीं करते, भटकते नहीं हैं। किस कारण से? उनका हेतु विद्यमान नहीं है; क्योंकि संसार का हेतु, मूल कारण अविद्या है, वह उनके लिए विद्यमान नहीं है, क्योंकि वह पूरी तरह से समूल नष्ट हो चुकी है। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चौथे सुत्त का वर्णन समाप्त हुआ। 5. තණ්හාසංයොජනසුත්තවණ්ණනා ५. तण्हासंयोजनसुत्त (तृष्णा-संयोजन सुत्त) का वर्णन। 15. පඤ්චමෙ යස්ස විජ්ජති, තං පුග්ගලං දුක්ඛෙහි, කම්මං වා විපාකෙහි, භවයොනිගතිවිඤ්ඤාණට්ඨිතිසත්තාවාසෙ වා භවන්තරාදීහි සංයොජෙතීති සංයොජනං. තණ්හායනට්ඨෙන තණ්හා, තසති සයං පරිතසති, තසන්ති වා එතායාති තණ්හා. සඤ්ඤුත්තාති චක්ඛාදීසු අභිනිවෙසවත්ථූසු බද්ධා. සෙසං වුත්තනයමෙව. කාමඤ්චෙත්ථ අවිජ්ජායපි සංයොජනභාවො තණ්හාය ච නීවරණභාවො අත්ථියෙව, තථාපි අවිජ්ජාය පටිච්ඡාදිතාදීනවෙහි භවෙහි තණ්හා සත්තෙ සංයොජෙතීති ඉමස්ස විසෙසස්ස දස්සනත්ථං පුරිමසුත්තෙ අවිජ්ජා නීවරණභාවෙන, ඉධ ච තණ්හා සංයොජනභාවෙනෙව වුත්තා. කිඤ්ච නීවරණසංයොජනප්පධානස්ස දස්සනත්ථං. යථා හි නීවරණභාවෙන අවිජ්ජා සංකිලෙසධම්මානං පධානභූතා පුබ්බඞ්ගමා ච, එවං සංයොජනභාවෙන නෙසං තණ්හාති තදධීනප්පධානභාවං දස්සෙතුං සුත්තද්වයෙ එවමෙතෙ ධම්මා වුත්තා. අපිච විසෙසෙන අවිජ්ජා නිබ්බානසුඛං නිවාරෙතීති [Pg.56] ‘‘නීවරණ’’න්ති වුත්තා, තණ්හා සංසාරදුක්ඛෙන සත්තෙ සංයොජෙතීති ‘‘සංයොජන’’න්ති. १५. पाँचवें (सूत्र) में, जिसके होने पर वह पुद्गल को दुखों से, अथवा कर्म को विपाकों से, अथवा भव, योनि, गति, विज्ञानस्थिति और सत्त्वावास में भवान्तर आदि से जोड़ता है, इसलिए वह 'संयोजन' है। तृष्णा करने के अर्थ में 'तृष्णा' है; वह स्वयं त्रस्त होती है (काँपती है), अथवा इसके द्वारा (सत्त्व) त्रस्त होते हैं, इसलिए 'तृष्णा' है। 'संयुत्त' का अर्थ है चक्षु आदि अभिनिवेश की वस्तुओं में बँधे हुए। शेष पूर्वोक्त रीति से ही है। यद्यपि यहाँ अविद्या में भी संयोजन-भाव और तृष्णा में भी नीवरण-भाव है ही, फिर भी अविद्या द्वारा दोषों के ढके होने पर तृष्णा सत्त्वों को भवों में संयोजित करती है - इस विशेषता को दिखाने के लिए पिछले सूत्र में अविद्या को नीवरण-भाव से और यहाँ तृष्णा को संयोजन-भाव से ही कहा गया है। और नीवरण एवं संयोजन की प्रधानता दिखाने के लिए भी। जैसे नीवरण-भाव से अविद्या संक्लेश धर्मों में प्रधान और पूर्वगामी है, वैसे ही संयोजन-भाव से तृष्णा उनकी प्रधान है - इस अधीनता और प्रधानता को दिखाने के लिए इन दो सूत्रों में ये धर्म इस प्रकार कहे गए हैं। इसके अतिरिक्त, विशेष रूप से अविद्या निर्वाण-सुख को रोकती है, इसलिए उसे 'नीवरण' कहा गया है, और तृष्णा सत्त्वों को संसार-दुख से जोड़ती है, इसलिए उसे 'संयोजन' कहा गया है। දස්සනගමනන්තරායකරණතො වා විජ්ජාචරණවිපක්ඛතො ද්වයං ද්විධා වුත්තං. විජ්ජාය හි උජුවිපච්චනීකභූතා අවිජ්ජා නිබ්බානදස්සනස්ස අවිපරීතදස්සනස්ස ච විසෙසතො අන්තරායකරා, චරණධම්මානං උජුවිපච්චනීකභූතා තණ්හා ගමනස්ස සම්මාපටිපත්තියා අන්තරායකරාති; එවමයං අවිජ්ජාය නිවුතො අන්ධීකතො තණ්හාය සංවුතො බද්ධො අස්සුතවා පුථුජ්ජනො අන්ධො විය බද්ධො මහාකන්තාරං, සංසාරකන්තාරං නාතිවත්තති. අනත්ථුප්පත්තිහෙතුද්වයදස්සනත්ථම්පි ද්වයං ද්විධා වුත්තං. අවිජ්ජාගතො හි පුග්ගලො බාලභාවෙන අත්ථං පරිහාපෙති, අනත්ථඤ්ච අත්තනො කරොති, අකුසලො විය ආතුරො අසප්පායකිරියාය. ජානන්තොපි බාලො බාලභාවෙන අත්ථං පරිහාපෙති, අනත්ථඤ්ච කරොති ජානන්තො විය රොගී අසප්පායසෙවී. මක්කටාලෙපොපමසුත්තං චෙතස්ස අත්ථස්ස සාධකං. दर्शन और गमन में अन्तराय (बाधा) उत्पन्न करने के कारण अथवा विद्या और चरण के विपक्ष होने के कारण इन दोनों को दो प्रकार से कहा गया है। क्योंकि विद्या की साक्षात् विरोधी अविद्या निर्वाण-दर्शन और अविपरीत-दर्शन (यथार्थ दर्शन) में विशेष रूप से अन्तराय करने वाली है, और चरण-धर्मों की साक्षात् विरोधी तृष्णा गमन (सम्यक् प्रतिपत्ति) में अन्तराय करने वाली है; इस प्रकार अविद्या से ढका हुआ, अंधा किया हुआ, तृष्णा से घिरा हुआ और बँधा हुआ यह अश्रुतवान् पृथग्जन, अंधे व्यक्ति के समान जो बँधा हुआ हो, महाकान्तार रूपी संसार-कान्तार को पार नहीं कर पाता। अनर्थ की उत्पत्ति के दो कारणों को दिखाने के लिए भी इन दोनों को दो प्रकार से कहा गया है। अविद्याग्रस्त पुद्गल बाल-भाव (मूर्खता) के कारण अर्थ (हित) को खो देता है और अपना अनर्थ करता है, जैसे कोई अकुशल रोगी अनुपयुक्त उपचार करता है। जानते हुए भी बाल (मूर्ख) अपने बाल-भाव के कारण अर्थ को खो देता है और अनर्थ करता है, जैसे जानते हुए भी कोई रोगी अपथ्य का सेवन करता है। 'मक्कटालेपोपम सुत्त' इस अर्थ का साधक है। පටිච්චසමුප්පාදස්ස මූලකාරණදස්සනත්ථම්පෙත්ථ ද්වයං ද්විධා වුත්තං. විසෙසෙන හි සම්මොහස්ස බලවභාවතො අවිජ්ජාඛෙත්තං අතීතො අද්ධා, පත්ථනාය බලවභාවතො තණ්හාඛෙත්තං අනාගතො අද්ධා. තථා හි බාලජනො සම්මොහබහුලො අතීතමනුසොචති, තස්ස අවිජ්ජාපච්චයා සඞ්ඛාරාති සබ්බං නෙතබ්බං. පත්ථනාබහුලො අනාගතං පජප්පති, තස්ස තණ්හාපච්චයා උපාදානන්තිආදි සබ්බං නෙතබ්බං. තෙනෙව තාසං පුබ්බන්තාහරණෙන අපරන්තපටිසන්ධානෙන චස්ස යථාක්කමං මූලකාරණතා දස්සිතාති වෙදිතබ්බන්ති. यहाँ प्रतीत्यसमुत्पाद के मूल कारणों को दिखाने के लिए भी इन दोनों को दो प्रकार से कहा गया है। विशेष रूप से सम्मोह की प्रबलता के कारण अविद्या का क्षेत्र अतीत काल है, और प्रार्थना (तृष्णा) की प्रबलता के कारण तृष्णा का क्षेत्र अनागत (भविष्य) काल है। क्योंकि अज्ञानी जन सम्मोह की अधिकता के कारण अतीत का शोक करता है, उसके लिए 'अविद्या प्रत्यय संस्कार' आदि सब लागू होता है। प्रार्थना की अधिकता के कारण वह अनागत की लालसा करता है, उसके लिए 'तृष्णा प्रत्यय उपादान' आदि सब लागू होता है। उसी से, उनके द्वारा पूर्वान्त (अतीत) को खींचने और अपरान्त (भविष्य) को जोड़ने से, उनकी यथाक्रम मूल कारणता दिखाई गई है, ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු තණ්හාදුතියොති තණ්හාසහායො. තණ්හා හි නිරුදකකන්තාරෙ මරීචිකාය උදකසඤ්ඤා විය පිපාසාභිභූතං අප්පටිකාරදුක්ඛාභිභූතම්පි සත්තං අස්සාදසන්දස්සනවසෙන සහායකිච්චං කරොන්තී භවාදීසු අනිබ්බින්දං කත්වා පරිබ්භමාපෙති, තස්මා තණ්හා පුරිසස්ස ‘‘දුතියා’’ති වුත්තා. නනු ච අඤ්ඤෙපි කිලෙසාදයො භවාභිනිබ්බත්තියා පච්චයාව? සච්චමෙතං, න පන තථා විසෙසප්පච්චයො යථා තණ්හා. තථා හි සා කුසලෙහි විනා [Pg.57] අකුසලෙහි, කාමාවචරාදිකුසලෙහි ච විනා රූපාවචරාදිකුසලෙහි භවනිබ්බත්තියා විසෙසප්පච්චයො, යතො සමුදයසච්චන්ති වුච්චතීති. ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවන්ති ඉත්ථභාවො ච අඤ්ඤථාභාවො ච ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවො. සො එතස්ස අත්ථීති ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවො සංසාරො, තං තත්ථ ඉත්ථභාවො මනුස්සත්තං, අඤ්ඤථාභාවො තතො අවසිට්ඨසත්තාවාසා. ඉත්ථභාවො වා තෙසං තෙසං සත්තානං පච්චුප්පන්නො අත්තභාවො, අඤ්ඤථාභාවො අනාගතත්තභාවො. එවරූපො වා අඤ්ඤොපි අත්තභාවො ඉත්ථභාවො, න එවරූපො අඤ්ඤථාභාවො. තං ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවං සංසාරං ඛන්ධධාතුආයතනපටිපාටිං නාතිවත්තති, න අතික්කමති. गाथाओं में 'तृष्णा-द्वितीय' का अर्थ है तृष्णा जिसका साथी है। क्योंकि तृष्णा, जलरहित मरुस्थल में मरीचिका में जल की संज्ञा के समान, प्यास से अभिभूत और असाध्य दुख से पीड़ित सत्त्व को भी आस्वाद दिखाने के माध्यम से साथी का कार्य करती हुई, भवों आदि में वैराग्य न होने देकर भटकाती रहती है, इसलिए तृष्णा को पुरुष की 'द्वितीया' (साथी) कहा गया है। क्या अन्य क्लेश आदि भी भव की उत्पत्ति के प्रत्यय नहीं हैं? यह सत्य है, किन्तु वे उस प्रकार विशेष प्रत्यय नहीं हैं जैसे तृष्णा है। क्योंकि वह (तृष्णा) कुशल के बिना अकुशल कर्मों से, और कामावचर आदि कुशल के बिना रूपावचर आदि कुशल कर्मों से भव की उत्पत्ति में विशेष प्रत्यय है, इसीलिए इसे 'समुदय सत्य' कहा जाता है। 'इत्थभाव-अञ्ञथाभाव' का अर्थ है इस प्रकार का होना और अन्य प्रकार का होना। वह जिसमें है, वह 'इत्थभाव-अञ्ञथाभाव' रूपी संसार है; वहाँ 'इत्थभाव' मनुष्यत्व है, और 'अञ्ञथाभाव' उससे शेष बचे हुए सत्त्वावास हैं। अथवा 'इत्थभाव' उन-उन सत्त्वों का वर्तमान आत्मभाव है, और 'अञ्ञथाभाव' भविष्य का आत्मभाव है। अथवा इस रूप वाला अन्य भी आत्मभाव 'इत्थभाव' है, और इस रूप वाला नहीं वह 'अञ्ञथाभाव' है। उस इत्थभाव-अञ्ञथाभाव रूपी संसार को, जो स्कन्ध-धातु-आयतन की परम्परा है, वह पार नहीं करता, अतिक्रमण नहीं करता। එතමාදීනවං ඤත්වා, තණ්හං දුක්ඛස්ස සම්භවන්ති එතං සකලවට්ටදුක්ඛස්ස සම්භවං සමුදයං තණ්හං ආදීනවං ආදීනවතො ඤත්වාති අත්ථො. අථ වා එතමාදීනවං ඤත්වාති එතං යථාවුත්තං සංසාරනාතිවත්තනං ආදීනවං දොසං ඤත්වා. තණ්හං දුක්ඛස්ස සම්භවන්ති තණ්හඤ්ච වුත්තනයෙන වට්ටදුක්ඛස්ස පධානකාරණන්ති ඤත්වා. වීතතණ්හො අනාදානො, සතො භික්ඛු, පරිබ්බජෙති එවං තීහි පරිඤ්ඤාහි පරිජානන්තො විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා මග්ගපටිපාටියා තණ්හං විගමෙන්තො අග්ගමග්ගෙන සබ්බසො වීතතණ්හො විගතතණ්හො, තතො එව චතූසු උපාදානෙසු කස්සචිපි අභාවෙන ආයතිං පටිසන්ධිසඞ්ඛාතස්ස වා ආදානස්ස අභාවෙන අනාදානො, සතිවෙපුල්ලප්පත්තියා සබ්බත්ථ සතොකාරිතාය සතො භින්නකිලෙසො භික්ඛු පරිබ්බජෙ චරෙය්ය, ඛන්ධපරිනිබ්බානෙන වා සඞ්ඛාරප්පවත්තිතො අපගච්ඡෙය්යාති අත්ථො. 'इस दोष को जानकर, तृष्णा दुख की उत्पत्ति है' - इसका अर्थ है कि इस सम्पूर्ण वट्ट-दुख (संसार-चक्र के दुख) की उत्पत्ति और समुदय रूप तृष्णा को दोष के रूप में जानकर। अथवा 'इस दोष को जानकर' का अर्थ है - इस यथोक्त संसार को पार न कर पाने के दोष को जानकर। 'तृष्णा दुख की उत्पत्ति है' का अर्थ है - तृष्णा को पूर्वोक्त रीति से वट्ट-दुख का प्रधान कारण जानकर। 'वीततृष्ण, अनादान, स्मृतिमान् भिक्षु विचरण करे' - इस प्रकार तीन परिज्ञाओं से भली-भाँति जानते हुए, विपश्यना को बढ़ाकर, मार्ग-क्रम से तृष्णा को दूर करते हुए, अग्र मार्ग (अर्हत् मार्ग) द्वारा पूर्णतः वीततृष्ण होकर, उसी कारण चारों उपादानों में से किसी के भी न होने से, अथवा भविष्य में प्रतिसन्धि रूपी 'आदान' (ग्रहण) के न होने से 'अनादान' होकर, स्मृति की प्रचुरता प्राप्त होने से सर्वत्र स्मृतिपूर्वक कार्य करने के कारण 'स्मृतिमान्' होकर, क्लेशों को नष्ट करने वाला भिक्षु विचरण करे, अथवा स्कन्ध-परिनिर्वाण द्वारा संस्कारों की प्रवृत्ति से दूर हो जाए - यह अर्थ है। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. පඨමසෙඛසුත්තවණ්ණනා ६. प्रथम शैक्ष सूत्र की व्याख्या। 16. ඡට්ඨෙ සෙඛස්සාති එත්ථ කෙනට්ඨෙන සෙඛො? සෙක්ඛධම්මපටිලාභතො සෙඛො. වුත්තඤ්හෙතං – १६. छठे (सूत्र) में 'शैक्ष का' - यहाँ किस अर्थ में 'शैक्ष' है? शैक्ष-धर्मों की प्राप्ति होने से 'शैक्ष' है। ऐसा कहा भी गया है - ‘‘කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, සෙඛො හොතීති? ඉධ, භික්ඛු, සෙඛාය සම්මාදිට්ඨියා සමන්නාගතො හොති…පෙ… සෙඛෙන සම්මාසමාධිනා [Pg.58] සමන්නාගතො හොති. එත්තාවතා ඛො, භික්ඛු, සෙඛො හොතී’’ති (සං. නි. 5.13). ‘‘भन्ते! किस सीमा तक (कोई) शैक्ष (सीखने वाला) होता है? यहाँ, भिक्षु! (वह) शैक्ष सम्यक्-दृष्टि से युक्त होता है... (पेय्याल)... शैक्ष सम्यक्-समाधि से युक्त होता है। भिक्षु! इतनी सीमा तक (वह) शैक्ष होता है’’ (सं. नि. 5.13)। අපිච සික්ඛතීති සෙඛො. වුත්තම්පි චෙතං – इसके अतिरिक्त, जो सीखता है वह शैक्ष है। यह कहा भी गया है— ‘‘සික්ඛතීති ඛො, භික්ඛු, තස්මා සෙඛොති වුච්චති. කිඤ්ච සික්ඛති? අධිසීලම්පි සික්ඛති, අධිචිත්තම්පි සික්ඛති, අධිපඤ්ඤම්පි සික්ඛති. සික්ඛතීති ඛො, භික්ඛු, තස්මා සෙඛොති වුච්චතී’’ති (අ. නි. 3.86). ‘‘भिक्षु! क्योंकि वह सीखता है, इसलिए उसे 'शैक्ष' कहा जाता है। वह क्या सीखता है? वह अधिशील की भी शिक्षा लेता है, अधिचित्त की भी शिक्षा लेता है, और अधिप्रज्ञा की भी शिक्षा लेता है। भिक्षु! क्योंकि वह सीखता है, इसलिए उसे 'शैक्ष' कहा जाता है’’ (अ. नि. 3.86)। යොපි කල්යාණපුථුජ්ජනො අනුලොමප්පටිපදාය පරිපූරකාරී සීලසම්පන්නො ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ ජාගරියානුයොගමනුයුත්තො පුබ්බරත්තාපරරත්තං බොධිපක්ඛියානං ධම්මානං භාවනානුයොගමනුයුත්තො විහරති – ‘‘අජ්ජ වා ස්වෙ වා අඤ්ඤතරං සාමඤ්ඤඵලං අධිගමිස්සාමී’’ති, සොපි වුච්චති සික්ඛතීති සෙඛොති. ඉමස්මිං අත්ථෙ න පටිවිජ්ඣන්තොව සෙඛො අධිප්පෙතො, අථ ඛො කල්යාණපුථුජ්ජනොපි. අප්පත්තං මානසං එතෙනාති අප්පත්තමානසො. මානසන්ති ‘‘අන්තලික්ඛචරො පාසො, ය්වායං චරති මානසො’’ති (සං. නි. 1.151; මහාව. 33) එත්ථ රාගො මානසන්ති වුත්තො. ‘‘චිත්තං මනො මානස’’න්ති (ධ. ස. 63, 65) එත්ථ චිත්තං. ‘‘අප්පත්තමානසො සෙඛො, කාලං කයිරා ජනෙ සුතා’’ති (සං. නි. 1.159) එත්ථ අරහත්තං. ඉධාපි අරහත්තමෙව අධිප්පෙතං. තෙන අප්පත්තඅරහත්තස්සාති වුත්තං හොති. जो कल्याण-पृथग्जन भी अनुलोम-प्रतिपदा (अनुकूल मार्ग) को पूर्ण करने वाला, शील-सम्पन्न, इन्द्रियों में सुरक्षित द्वारों वाला, भोजन में मात्रा जानने वाला, जागरण के अभ्यास में लगा हुआ, रात्रि के पूर्व भाग और उत्तर भाग में बोधिपक्षीय धर्मों की भावना के अभ्यास में लगा हुआ विहार करता है—'आज या कल मैं किसी न किसी श्रामण्य-फल को प्राप्त करूँगा', वह भी 'सीखता है' इस अर्थ में 'शैक्ष' कहा जाता है। इस अर्थ में केवल (आर्य मार्ग का) वेधन करने वाला ही शैक्ष अभिप्रेत नहीं है, बल्कि कल्याण-पृथग्जन भी है। 'जिसके द्वारा मानस (लक्ष्य) प्राप्त नहीं किया गया है' वह 'अप्राप्तमानस' है। 'मानस' के विषय में—'आकाश में विचरने वाला पाश, जो यह मानस विचरता है' (सं. नि. 1.151; महाव. 33) यहाँ राग को 'मानस' कहा गया है। 'चित्त, मन, मानस' (ध. सं. 63, 65) यहाँ चित्त (मानस) है। 'अप्राप्तमानस शैक्ष, लोगों में श्रुत होकर काल करे' (सं. नि. 1.159) यहाँ अर्हत्व (मानस) है। यहाँ भी अर्हत्व ही अभिप्रेत है। इसलिए 'जिसने अर्हत्व प्राप्त नहीं किया है' यह कहा गया है। අනුත්තරන්ති සෙට්ඨං, අසදිසන්ති අත්ථො. චතූහි යොගෙහි ඛෙමං අනුපද්දුතන්ති යොගක්ඛෙමං, අරහත්තමෙව අධිප්පෙතං. පත්ථයමානස්සාති ද්වෙ පත්ථනා තණ්හාපත්ථනා, කුසලච්ඡන්දපත්ථනා ච. ‘‘පත්ථයමානස්ස හි ජප්පිතානි, පවෙධිතං වාපි පකප්පිතෙසූ’’ති (සු. නි. 908; මහානි. 137) එත්ථ තණ්හාපත්ථනා. 'अनुत्तर' का अर्थ श्रेष्ठ, अद्वितीय है। चार योगों (आस्रवों) से क्षेम (सुरक्षित) और उपद्रव रहित होना 'योगक्षेम' है, यहाँ अर्हत्व ही अभिप्रेत है। 'प्रार्थना करने वाले का' (पत्थयमानस्स) यहाँ दो प्रकार की प्रार्थनाएँ हैं—तृष्णा-प्रार्थना और कुशल-छन्द-प्रार्थना। 'प्रार्थना करने वाले की जो जल्पनाएँ हैं, या कल्पित वस्तुओं में जो कंपन है' (सु. नि. 908; महानि. 137) यहाँ तृष्णा-प्रार्थना है। ‘‘ඡින්නං පාපිමතො සොතං, විද්ධස්තං විනළීකතං; පාමොජ්ජබහුලා හොථ, ඛෙමං පත්ථෙථ භික්ඛවො’’ති. (ම. නි. 1.352); ‘‘पापी (मार) का स्रोत छिन्न हो गया है, विध्वस्त और नष्ट हो गया है; भिक्षुओं! अत्यधिक प्रमुदित होओ और क्षेम (निर्वाण) की प्रार्थना करो’’ (म. नि. 1.352)। එත්ථ කත්තුකම්යතාකුසලච්ඡන්දපත්ථනා, අයමෙව ඉධාධිප්පෙතා. තෙන පත්ථයමානස්සාති තං යොගක්ඛෙමං ගන්තුකාමස්ස තන්නින්නස්ස තප්පොණස්ස තප්පබ්භාරස්සාති අත්ථො. විහරතොති එකං ඉරියාපථදුක්ඛං අඤ්ඤෙන ඉරියාපථෙන විච්ඡින්දිත්වා අපරිපතන්තං අත්තභාවං හරතො. අථ වා ‘‘සබ්බෙ [Pg.59] සඞ්ඛාරා අනිච්චාති අධිමුච්චන්තො සද්ධාය විහරතී’’තිආදිනා නිද්දෙසනයෙන චෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. අජ්ඣත්තිකන්ති නියකජ්ඣත්තසඞ්ඛාතෙ අජ්ඣත්තෙ භවං අජ්ඣත්තිකං. අඞ්ගන්ති කාරණං. ඉති කරිත්වාති එවං කත්වා. න අඤ්ඤං එකඞ්ගම්පි සමනුපස්සාමීති එත්ථ අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – භික්ඛවෙ, අජ්ඣත්තං අත්තනො සන්තානෙ සමුට්ඨිතං කාරණන්ති කත්වා අඤ්ඤං එකකාරණම්පි න සමනුපස්සාමි යං එවං බහූපකාරං, යථයිදං යොනිසො මනසිකාරොති උපායමනසිකාරො, පථමනසිකාරො, අනිච්චාදීසු අනිච්චාදිනයෙනෙව මනසිකාරො, අනිච්චානුලොමිකෙන වා චිත්තස්ස ආවට්ටනා අන්වාවට්ටනා ආභොගො සමන්නාහාරො මනසිකාරො. අයං යොනිසො මනසිකාරො. यहाँ 'कर्तुकम्यता-कुशल-छन्द-प्रार्थना' (करने की इच्छा रूपी कुशल छन्द) ही अभिप्रेत है। इसलिए 'प्रार्थना करने वाले का' का अर्थ है—उस योगक्षेम को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले का, उसकी ओर झुके हुए का, उसकी ओर प्रवृत्त का, उसकी ओर प्रवण का। 'विहार करने वाले का' का अर्थ है—एक ईर्यापथ के दुःख को दूसरे ईर्यापथ से काटकर, इस शरीर को गिरने न देते हुए धारण करने वाले का। अथवा 'सभी संस्कार अनित्य हैं—ऐसा निश्चय करते हुए श्रद्धा के साथ विहार करता है' आदि निर्देश के अनुसार यहाँ अर्थ देखना चाहिए। 'आध्यात्मिक' का अर्थ है—अपने भीतर होने वाला। 'अंग' का अर्थ है—कारण। 'इति करित्वा' का अर्थ है—ऐसा करके। 'मैं अन्य एक भी अंग नहीं देखता' यहाँ यह संक्षिप्त अर्थ है—भिक्षुओं! अपने भीतर की संतान में उत्पन्न होने वाले कारणों में मैं अन्य एक भी ऐसा कारण नहीं देखता जो इतना बहु-उपकारक हो, जैसा कि यह 'योनिशो मनसिकार' है। योनिशो मनसिकार का अर्थ है—उपाय-मनसिकार, सही मार्ग का मनसिकार, अनित्य आदि में अनित्य आदि के रूप में ही मनसिकार, अथवा अनित्यता के अनुकूल चित्त का आवर्तन, अनुवर्तन, आभोग, समन्नाहार और मनसिकार। यह योनिशो मनसिकार है। ඉදානි යොනිසො මනසිකාරස්ස ආනුභාවං දස්සෙතුං ‘‘යොනිසො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මනසි කරොන්තො අකුසලං පජහති, කුසලං භාවෙතී’’ති වුත්තං. තත්ථ යොනිසො මනසි කරොන්තොති ‘‘ඉදං දුක්ඛං අරියසච්චං, අයං දුක්ඛසමුදයො අරියසච්චං, අයං දුක්ඛනිරොධො අරියසච්චං, අයං දුක්ඛනිරොධගාමිනී පටිපදා අරියසච්ච’’න්ති චතූසු අරියසච්චෙසු යොනිසො මනසිකාරං පවත්තෙන්තො. अब योनिशो मनसिकार के प्रभाव को दिखाने के लिए कहा गया है—'भिक्षुओं! योनिशो मनसिकार करता हुआ भिक्षु अकुशल को त्यागता है और कुशल की भावना करता है।' वहाँ 'योनिशो मनसिकार करता हुआ' का अर्थ है—'यह दुःख आर्यसत्य है, यह दुःख-समुदय आर्यसत्य है, यह दुःख-निरोध आर्यसत्य है, यह दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य है'—इन चार आर्यसत्यों में योनिशो मनसिकार को प्रवृत्त करता हुआ। තත්රායං අත්ථවිභාවනා – යදිපි ඉදං සුත්තං අවිසෙසෙන සෙක්ඛපුග්ගලවසෙන ආගතං, චතුමග්ගසාධාරණවසෙන පන සඞ්ඛෙපෙනෙව කම්මට්ඨානං කථයිස්සාම. යො චතුසච්චකම්මට්ඨානිකො යොගාවචරො ‘‘තණ්හාවජ්ජා තෙභූමකා ඛන්ධා දුක්ඛං, තණ්හා සමුදයො, උභින්නං අප්පවත්ති නිරොධො, නිරොධසම්පාපකො මග්ගො’’ති එවං පුබ්බෙ එව ආචරියසන්තිකෙ උග්ගහිතචතුසච්චකම්මට්ඨානො. සො අපරෙන සමයෙන විපස්සනාමග්ගං සමාරුළ්හො සමානො තෙභූමකෙ ඛන්ධෙ ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්ති යොනිසො මනසි කරොති, උපායෙන පථෙන සමන්නාහරති චෙව විපස්සති ච. විපස්සනා හි ඉධ මනසිකාරසීසෙන වුත්තා. යා පනායං තස්ස දුක්ඛස්ස සමුට්ඨාපිකා පුරිමභවිකා තණ්හා, අයං දුක්ඛසමුදයොති යොනිසො මනසි කරොති. යස්මා පන ඉදං දුක්ඛං, අයඤ්ච සමුදයො ඉදං ඨානං පත්වා නිරුජ්ඣන්ති න පවත්තන්ති, තස්මා යදිදං නිබ්බානං නාම, අයං දුක්ඛනිරොධොති යොනිසො මනසි කරොති. නිරොධසම්පාපකං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං, ‘‘අයං දුක්ඛනිරොධගාමිනී පටිපදා’’ති යොනිසො මනසි කරොති, උපායෙන පථෙන සමන්නාහරති චෙව විපස්සති ච. वहाँ यह अर्थ-विभावन (व्याख्या) है—यद्यपि यह सूत्र सामान्य रूप से शैक्ष पुद्गल के विषय में आया है, फिर भी चार मार्गों के साधारण होने के कारण हम संक्षेप में कर्मस्थान (साधना) को कहेंगे। जो चार सत्यों के कर्मस्थान वाला योगावचर है, जिसने पहले ही आचार्य के पास 'तृष्णा को छोड़कर तीनों भूमियों के स्कन्ध दुःख हैं, तृष्णा समुदय है, दोनों की अप्रवृत्ति निरोध है, और निरोध तक पहुँचाने वाला मार्ग है'—इस प्रकार चार सत्यों के कर्मस्थान को ग्रहण किया है। वह बाद के समय में विपश्यना-मार्ग पर आरूढ़ होकर तीनों भूमियों के स्कन्धों को 'यह दुःख है'—ऐसा योनिशो मनसिकार करता है, उपाय और मार्ग से युक्त करता है और विपश्यना करता है। यहाँ विपश्यना को 'मनसिकार' के शीर्षक से कहा गया है। जो उस दुःख को उत्पन्न करने वाली पूर्व जन्म की तृष्णा है, वह 'दुःख-समुदय' है—ऐसा योनिशो मनसिकार करता है। क्योंकि यह दुःख और यह समुदय इस स्थान (निर्वाण) को प्राप्त कर निरुद्ध हो जाते हैं, प्रवृत्त नहीं होते, इसलिए जो यह निर्वाण है, वह 'दुःख-निरोध' है—ऐसा योनिशो मनसिकार करता है। निरोध तक पहुँचाने वाले अष्टांगिक मार्ग को 'यह दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा है'—ऐसा योनिशो मनसिकार करता है, उपाय और मार्ग से युक्त करता है और विपश्यना करता है। තත්රායං [Pg.60] උපායො – අභිනිවෙසො නාම ඛන්ධෙ හොති, න විවට්ටෙ, තස්මා අයමත්ථො – ‘‘ඉමස්මිං කායෙ පථවීධාතු, ආපොධාතූ’’තිආදිනා (දී. නි. 2.378) නයෙන චත්තාරි මහාභූතානි තදනුසාරෙන උපාදාරූපානි ච පරිග්ගහෙත්වා ‘‘අයං රූපක්ඛන්ධො’’ති වවත්ථපෙති. තං වවත්ථාපයතො උප්පන්නෙ තදාරම්මණෙ චිත්තචෙතසිකධම්මෙ ‘‘ඉමෙ චත්තාරො අරූපක්ඛන්ධා’’ති වවත්ථපෙති. තතො ‘‘ඉමෙ පඤ්චක්ඛන්ධා දුක්ඛ’’න්ති වවත්ථපෙති. තෙ පන සඞ්ඛෙපතො නාමඤ්ච රූපඤ්චාති ද්වෙ භාගා හොන්ති. ඉදඤ්ච නාමරූපං සහෙතු සප්පච්චයං උප්පජ්ජති, තස්ස අයං අවිජ්ජාභවතණ්හාදිකො හෙතු, අයං ආහාරාදිකො පච්චයොති හෙතුප්පච්චයෙ වවත්ථපෙති. සො තෙසං පච්චයානඤ්ච පච්චයුප්පන්නානඤ්ච යාථාවසරසලක්ඛණං වවත්ථපෙත්වා ‘‘ඉමෙ ධම්මා අහුත්වා භවන්ති, හුත්වා නිරුජ්ඣන්ති, තස්මා අනිච්චා’’ති අනිච්චලක්ඛණං ආරොපෙති, ‘‘උදයබ්බයපටිපීළිතත්තා දුක්ඛා’’ති දුක්ඛලක්ඛණං ආරොපෙති, ‘‘අවසවත්තනතො අනත්තා’’ති අනත්තලක්ඛණං ආරොපෙති. वहाँ यह उपाय है - अभिनिवेश (आसक्ति) स्कन्धों में होता है, विवर्त (निर्वाण) में नहीं, इसलिए यह अर्थ है - "इस काय में पृथ्वीधातु, आपोधातु" आदि (दी. नि. 2.378) विधि से चार महाभूतों और उनके अनुसार उपादा-रूपों को ग्रहण कर "यह रूपस्कन्ध है" ऐसा व्यवस्थित करता है। उसे व्यवस्थित करते हुए उत्पन्न हुए उस आलम्बन वाले चित्त-चैतसिक धर्मों को "ये चार अरूपस्कन्ध हैं" ऐसा व्यवस्थित करता है। उसके बाद "ये पाँच स्कन्ध दुःख हैं" ऐसा व्यवस्थित करता है। वे संक्षेप में नाम और रूप - ये दो भाग होते हैं। और यह नाम-रूप हेतु सहित और प्रत्यय सहित उत्पन्न होता है, इसका यह अविद्या-भव-तृष्णा आदि हेतु है, यह आहार आदि प्रत्यय है - इस प्रकार हेतु-प्रत्ययों को व्यवस्थित करता है। वह उन प्रत्ययों और प्रत्यय-उत्पन्न धर्मों के यथार्थ स्वलक्षण को व्यवस्थित कर "ये धर्म न होकर होते हैं, होकर निरुद्ध हो जाते हैं, इसलिए अनित्य हैं" - ऐसा अनित्य लक्षण आरोपित करता है, "उदय-व्यय से पीड़ित होने के कारण दुःख हैं" - ऐसा दुःख लक्षण आरोपित करता है, "वश में न रहने के कारण अनात्मा हैं" - ऐसा अनात्म लक्षण आरोपित करता है। එවං තිලක්ඛණානි ආරොපෙත්වා විපස්සන්තො උදයබ්බයඤාණුප්පත්තියා උප්පන්නෙ ඔභාසාදිකෙ විපස්සනුපක්කිලෙසෙ ‘අමග්ගො’ති උදයබ්බයඤාණමෙව ‘‘අරියමග්ගස්ස උපායභූතො පුබ්බභාගමග්ගො’’ති මග්ගාමග්ගං වවත්ථපෙත්වා පුන උදයබ්බයඤාණං පටිපාටියා භඞ්ගඤාණාදීනි ච උප්පාදෙන්තො සොතාපත්තිමග්ගාදයො පාපුණාති. තස්මිං ඛණෙ චත්තාරි සච්චානි එකප්පටිවෙධෙනෙව පටිවිජ්ඣති, එකාභිසමයෙන අභිසමෙති. තත්ථ දුක්ඛං පරිඤ්ඤාපටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣන්තො, සමුදයං පහානප්පටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣන්තො සබ්බං අකුසලං පජහති, නිරොධං සච්ඡිකිරියාපටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣන්තො මග්ගං භාවනාපටිවෙධෙන පටිවිජ්ඣන්තො සබ්බං කුසලං භාවෙති. අරියමග්ගො හි නිප්පරියායතො කුච්ඡිතසලනාදිඅත්ථෙන කුසලො, තස්මිඤ්ච භාවිතෙ සබ්බෙපි කුසලා අනවජ්ජබොධිපක්ඛියධම්මා භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්තීති. එවං යොනිසො මනසි කරොන්තො අකුසලං පජහති, කුසලං භාවෙති. තථා හි වුත්තං – ‘‘ඉදං දුක්ඛන්ති යොනිසො මනසි කරොති, අයං දුක්ඛසමුදයොති යොනිසො මනසි කරොතී’’තිආදි (ම. නි. 1.21). අපරම්පි වුත්තං ‘‘යොනිසො මනසිකාරසම්පන්නස්සෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො පාටිකඞ්ඛං – අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං භාවෙස්සති, අරියං අට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං බහුලීකරිස්සතී’’ති (සං. නි. 5.55). इस प्रकार त्रिलक्षणों को आरोपित कर विपश्यना करते हुए, उदय-व्यय ज्ञान की उत्पत्ति से उत्पन्न हुए ओभास (प्रकाश) आदि विपश्यना-उपक्लेशों को 'अमार्ग' और उदय-व्यय ज्ञान को ही "आर्यमार्ग का उपायभूत पूर्वभाग-मार्ग" - इस प्रकार मार्ग-अमार्ग को व्यवस्थित कर, पुनः उदय-व्यय ज्ञान के क्रम से भंग-ज्ञान आदि को उत्पन्न करते हुए स्रोतापत्ति-मार्ग आदि को प्राप्त करता है। उस क्षण में चार सत्यों को एक ही प्रतिवेध से प्रतिवेध करता है, एक ही अभिसमय से अभिसमय करता है। वहाँ दुःख को परिज्ञा-प्रतिवेध से प्रतिवेध करते हुए, समुदय को प्रहाण-प्रतिवेध से प्रतिवेध करते हुए सब अकुशल को त्यागता है, निरोध को साक्षात्क्रिया-प्रतिवेध से प्रतिवेध करते हुए और मार्ग को भावना-प्रतिवेध से प्रतिवेध करते हुए सब कुशल की भावना करता है। क्योंकि आर्यमार्ग निष्पर्याय रूप से कुत्सितों के कम्पन आदि अर्थ में कुशल है, और उसके भावित होने पर सभी कुशल, अनवद्य बोधिपाक्षिक धर्म भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार योनिशो मनसिकार करते हुए अकुशल को त्यागता है, कुशल की भावना करता है। वैसा ही कहा गया है - "यह दुःख है - ऐसा योनिशो मनसिकार करता है, यह दुःख-समुदय है - ऐसा योनिशो मनसिकार करता है" आदि (म. नि. 1.21)। अन्यत्र भी कहा गया है - "भिक्षुओं! योनिशो मनसिकार से सम्पन्न इस भिक्षु से यह अपेक्षित है कि वह आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना करेगा, आर्य अष्टांगिक मार्ग का बहुलीकरण करेगा" (सं. नि. 5.55)। යොනිසො [Pg.61] මනසිකාරොති ගාථාය අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – සික්ඛති, සික්ඛාපදානි තස්ස අත්ථි, සික්ඛනසීලොති වා සෙඛො. සංසාරෙ භයං ඉක්ඛතීති භික්ඛු. තස්ස සෙඛස්ස භික්ඛුනො උත්තමත්ථස්ස අරහත්තස්ස පත්තියා අධිගමාය යථා යොනිසො මනසිකාරො, එවං බහුකාරො බහූපකාරො අඤ්ඤො කොචි ධම්මො නත්ථි. කස්මා? යස්මා යොනිසො උපායෙන මනසිකාරං පුරක්ඛත්වා පදහං චතුබ්බිධසම්මප්පධානවසෙන පදහන්තො, ඛයං දුක්ඛස්ස පාපුණෙ සංකිලෙසවට්ටදුක්ඛස්ස පරික්ඛයං පරියොසානං නිබ්බානං පාපුණෙ අධිගච්ඡෙය්ය, තස්මා යොනිසො මනසිකාරො බහුකාරොති. 'योनिशो मनसिकार' इस गाथा का यह संक्षिप्त अर्थ है - जो सीखता है, जिसके पास शिक्षापद हैं, अथवा जिसका स्वभाव सीखना है, वह 'शैक्ष' (सेख) है। संसार में भय को देखता है, वह 'भिक्षु' है। उस शैक्ष भिक्षु के लिए उत्तम अर्थ (अर्हत्व) की प्राप्ति और अधिगम के लिए जैसा योनिशो मनसिकार है, वैसा बहुकारक (अत्यधिक उपकारी) अन्य कोई धर्म नहीं है। क्यों? क्योंकि योनिशो उपाय से मनसिकार को आगे रखकर प्रयत्न करते हुए, चार प्रकार के सम्यक् प्रधान के वश से प्रयत्न करते हुए, दुःख के क्षय को प्राप्त करे, संक्लेश-वर्त-दुःख के परिक्षय, पर्यवसान रूप निर्वाण को प्राप्त करे, अधिगत करे, इसलिए योनिशो मनसिकार बहुकारक है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की वर्णना समाप्त हुई। 7. දුතියසෙඛසුත්තවණ්ණනා ७. द्वितीय शैक्ष-सूत्र की वर्णना। 17. සත්තමෙ බාහිරන්ති අජ්ඣත්තසන්තානතො බහි භවං. කල්යාණමිත්තතාති යස්ස සීලාදිගුණසම්පන්නො අඝස්ස ඝාතා, හිතස්ස විධාතා සබ්බාකාරෙන උපකාරකො මිත්තො හොති, සො පුග්ගලො කල්යාණමිත්තො, තස්ස භාවො කල්යාණමිත්තතා. තත්රායං කල්යාණමිත්තො පකතියා සද්ධාසම්පන්නො හොති සීලසම්පන්නො සුතසම්පන්නො චාගසම්පන්නො වීරියසම්පන්නො සතිසම්පන්නො සමාධිසම්පන්නො පඤ්ඤාසම්පන්නො. තත්ථ සද්ධාසම්පත්තියා සද්දහති තථාගතස්ස බොධිං, තෙන සම්මාසම්බොධිහෙතුභූතං සත්තෙසු හිතසුඛෙසිතං න පරිච්චජති, සීලසම්පත්තියා සබ්රහ්මචාරීනං පියො හොති ගරු ච භාවනීයො චොදකො පාපගරහී වත්තා වචනක්ඛමො, සුතසම්පත්තියා ඛන්ධායතනසච්චපටිච්චසමුප්පාදාදිකානං ගම්භීරානං කථානං කත්තා හොති, චාගසම්පත්තියා අප්පිච්ඡො හොති සන්තුට්ඨො පවිවිත්තො අසංසට්ඨො, වීරියසම්පත්තියා අත්තනො පරෙසඤ්ච හිතප්පටිපත්තියං ආරද්ධවීරියො හොති, සතිසම්පත්තියා උපට්ඨිතස්සති හොති පරමෙන සතිනෙපක්කෙන සමන්නාගතො චිරකතම්පි චිරභාසිතම්පි සරිතා අනුස්සරිතා, සමාධිසම්පත්තියා අවික්ඛිත්තො හොති සමාහිතො එකග්ගචිත්තො, පඤ්ඤාසම්පත්තියා අවිපරීතං පජානාති. සො [Pg.62] සතියා කුසලාකුසලානං ධම්මානං ගතියො සමන්වෙසන්තො පඤ්ඤාය සත්තානං හිතසුඛං යථාභූතං ජානිත්වා සමාධිනා තත්ථ අබ්යග්ගචිත්තො හුත්වා වීරියෙන සත්තෙ අහිතතො නිසෙධෙත්වා එකන්තහිතෙ නියොජෙති. තෙනෙවාහ – १७. सातवें (सूत्र) में 'बाह्य' का अर्थ है - आध्यात्मिक सन्तान से बाहर होने वाला। 'कल्याणमित्रता' का अर्थ है - जिसका शील आदि गुणों से सम्पन्न, पाप का नाशक, हित का विधाता, सब प्रकार से उपकारक मित्र होता है, वह पुद्गल कल्याणमित्र है, उसका भाव कल्याणमित्रता है। वहाँ यह कल्याणमित्र स्वभाव से श्रद्धा-सम्पन्न, शील-सम्पन्न, श्रुत-सम्पन्न, त्याग-सम्पन्न, वीर्य-सम्पन्न, स्मृति-सम्पन्न, समाधि-सम्पन्न और प्रज्ञा-सम्पन्न होता है। वहाँ श्रद्धा-सम्पत्ति से वह तथागत की बोधि पर श्रद्धा करता है, उससे सम्यक्सम्बोध के हेतुभूत सत्त्वों के हित-सुख की इच्छा का परित्याग नहीं करता; शील-सम्पत्ति से वह सब्रह्मचारियों का प्रिय, गुरु, माननीय, उपदेशक (चोदक), पाप की निन्दा करने वाला, वक्ता और वचनों को सहने वाला होता है; श्रुत-सम्पत्ति से वह स्कन्ध, आयतन, सत्य, प्रतीत्यसमुत्पाद आदि गम्भीर कथाओं को कहने वाला होता है; त्याग-सम्पत्ति से वह अल्पेच्छ, सन्तुष्ट, प्रविविक्त (एकान्तप्रिय) और असंसृष्ट होता है; वीर्य-सम्पत्ति से वह अपने और दूसरों के हित की प्रतिपत्ति में आरब्ध-वीर्य (उद्यमी) होता है; स्मृति-सम्पत्ति से वह उपस्थित-स्मृति वाला, परम स्मृति और निपुणता से युक्त, बहुत समय पहले किए गए और बहुत समय पहले कहे गए को भी स्मरण करने वाला और अनुस्मरण करने वाला होता है; समाधि-सम्पत्ति से वह अविक्षिप्त, समाहित और एकाग्रचित्त होता है; प्रज्ञा-सम्पत्ति से वह अविपरीत (यथार्थ) जानता है। वह स्मृति से कुशल और अकुशल धर्मों की गतियों का अन्वेषण करते हुए, प्रज्ञा से सत्त्वों के हित-सुख को यथाभूत जानकर, समाधि से वहाँ अव्यग्रचित्त होकर, वीर्य से सत्त्वों को अहित से रोककर एकान्त हित में नियोजित करता है। इसीलिए कहा गया है - ‘‘පියො ගරු භාවනීයො, වත්තා ච වචනක්ඛමො; ගම්භීරඤ්ච කථං කත්තා, නො චාට්ඨානෙ නියොජකො’’ති. (නෙත්ති. 113); "प्रिय, गुरु, माननीय, वक्ता और वचनों को सहने वाला; गम्भीर कथा को कहने वाला और अस्थान (अनुचित कार्य) में न लगाने वाला होता है।" (नेत्ति. 113); කල්යාණමිත්තො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අකුසලං පජහති, කුසලං භාවෙතීති කල්යාණමිත්තො පුග්ගලො කල්යාණමිත්තං නිස්සාය කම්මස්සකතාඤාණං උප්පාදෙති, උප්පන්නං සද්ධං ඵාතිං කරොති, සද්ධාජාතො උපසඞ්කමති උපසඞ්කමිත්වා ධම්මං සුණාති. තං ධම්මං සුත්වා තථාගතෙ සද්ධං පටිලභති, තෙන සද්ධාපටිලාභෙන ඝරාවාසං පහාය පබ්බජ්ජං අනුතිට්ඨති, චතුපාරිසුද්ධිසීලං සම්පාදෙති, යථාබලං ධුතධම්මෙ සමාදාය වත්තති, දසකථාවත්ථුලාභී හොති, ආරද්ධවීරියො විහරති උපට්ඨිතස්සති සම්පජානො පුබ්බරත්තාපරරත්තං බොධිපක්ඛියානං ධම්මානං භාවනානුයොගමනුයුත්තො, නචිරස්සෙව විපස්සනං උස්සුක්කාපෙත්වා අරියමග්ගාධිගමෙන සබ්බං අකුසලං සමුච්ඡින්දති, සබ්බඤ්ච කුසලං භාවනාපාරිපූරිං ගමෙන්තො වඩ්ඪෙති. වුත්තඤ්හෙතං – भिक्षुओं, कल्याणमित्र वाला भिक्षु अकुशल का त्याग करता है और कुशल की भावना करता है। कल्याणमित्र वाला पुद्गल कल्याणमित्र के आश्रय से कर्मस्वकीयता ज्ञान उत्पन्न करता है, उत्पन्न श्रद्धा की वृद्धि करता है, श्रद्धावान होकर (गुरु के) समीप जाता है, समीप जाकर धर्म सुनता है। उस धर्म को सुनकर तथागत में श्रद्धा प्राप्त करता है, उस श्रद्धा की प्राप्ति से घर-गृहस्थी त्याग कर प्रव्रज्या ग्रहण करता है, चतुष्पारिशुद्धि शील को पूर्ण करता है, यथाशक्ति धुतधर्मों को स्वीकार कर आचरण करता है, दस कथावस्तुओं को प्राप्त करने वाला होता है, आरब्धवीर्य होकर विहार करता है, उपस्थित स्मृति और सम्प्रजन्य से युक्त होकर रात्रि के पूर्व और उत्तर भाग में बोधिपक्षीय धर्मों की भावना के अभ्यास में लगा रहता है, और शीघ्र ही विपश्यना को बढ़ाकर आर्यमार्ग की प्राप्ति से समस्त अकुशल का समूच्छेद करता है और समस्त कुशल को भावना की परिपूर्णता तक पहुँचाते हुए बढ़ाता है। ऐसा कहा गया है— ‘‘කල්යාණමිත්තස්සෙතං, මෙඝිය, භික්ඛුනො පාටිකඞ්ඛං කල්යාණසහායස්ස කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස ‘යං සීලවා භවිස්සති, පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතො විහරිස්සති ආචාරගොචරසම්පන්නො, අණුමත්තෙසු වජ්ජෙසු, භයදස්සාවී සමාදාය සික්ඛිස්සති, සික්ඛාපදෙසු’. “मेघिय! कल्याणमित्र, कल्याणसहायक और कल्याणसंगति वाले भिक्षु से यह अपेक्षित है कि वह शीलवान होगा, पातिमोक्ख संवर से संवृत होकर विहार करेगा, आचार और गोचर से सम्पन्न होगा, और सूक्ष्म दोषों में भी भय देखने वाला होकर शिक्षापदों को ग्रहण कर शिक्षा प्राप्त करेगा।” ‘‘කල්යාණමිත්තස්සෙතං…පෙ… කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස ‘යං යායං කථා අභිසල්ලෙඛිකා චෙතොවිවරණසප්පායා එකන්තනිබ්බිදාය…පෙ… නිබ්බානාය සංවත්තති. සෙය්යථිදං – අප්පිච්ඡකථා, සන්තුට්ඨිකථා, පවිවෙකකථා, අසංසග්ගකථා, වීරියාරම්භකථා, සීලකථා, සමාධිකථා…පෙ… විමුත්තිඤාණදස්සනකථා. එවරූපාය කථාය නිකාමලාභී භවිස්සති අකිච්ඡලාභී අකසිරලාභී’. “कल्याणमित्र... पे... कल्याणसंगति वाले (भिक्षु) से यह (अपेक्षित है) कि जो यह कथा अत्यन्त संलेख (चित्त की शुद्धि) करने वाली, चित्त के आवरणों को खोलने में सहायक, एकान्त निर्वेद (वैराग्य)... पे... निर्वाण के लिए संवर्तित होती है। जैसे कि— अल्पेच्छता की कथा, सन्तुष्टि की कथा, प्रविवेक (एकान्त) की कथा, असंसर्ग (अमिश्रण) की कथा, वीर्यारम्भ (पुरुषार्थ) की कथा, शील की कथा, समाधि की कथा... पे... विमुक्तिज्ञानदर्शन की कथा। इस प्रकार की कथा को वह इच्छानुसार प्राप्त करने वाला, बिना कठिनाई के प्राप्त करने वाला और बिना कष्ट के प्राप्त करने वाला होगा।” ‘‘කල්යාණමිත්තස්සෙතං [Pg.63] …පෙ… කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස ‘යං ආරද්ධවීරියො විහරිස්සති අකුසලානං ධම්මානං පහානාය කුසලානං ධම්මානං උපසම්පදාය ථාමවා දළ්හපරක්කමො අනික්ඛිත්තධුරො කුසලෙසු ධම්මෙසු’. “कल्याणमित्र... पे... कल्याणसंगति वाले (भिक्षु) से यह (अपेक्षित है) कि वह अकुशल धर्मों के प्रहाण (त्याग) के लिए और कुशल धर्मों की उपसम्पदा (प्राप्ति) के लिए आरब्धवीर्य होकर विहार करेगा, वह कुशल धर्मों में सामर्थ्यवान, दृढ़ पराक्रमी और उत्तरदायित्व (धुरा) को न छोड़ने वाला होगा।” ‘‘කල්යාණමිත්තස්සෙතං…පෙ… කල්යාණසම්පවඞ්කස්ස ‘යං පඤ්ඤවා භවිස්සති, උදයත්ථගාමිනියා පඤ්ඤාය සමන්නාගතො අරියාය නිබ්බෙධිකාය සම්මා දුක්ඛක්ඛයගාමිනියා’’’ති (උදා. 31). “कल्याणमित्र... पे... कल्याणसंगति वाले (भिक्षु) से यह (अपेक्षित है) कि वह प्रज्ञावान होगा, उदय और व्यय (उत्पत्ति और विनाश) को जानने वाली प्रज्ञा से युक्त होगा, जो आर्य और भेदन करने वाली (वेधक) है तथा सम्यक् रूप से दुःख के क्षय तक ले जाने वाली है।” (उदान ३१) එවං සකලවට්ටදුක්ඛපරිමුච්චනනිමිත්තං කල්යාණමිත්තතාති වෙදිතබ්බං. තෙනෙවාහ – इस प्रकार, कल्याणमित्रता को समस्त वट्ट (संसार) के दुखों से मुक्ति का निमित्त समझना चाहिए। इसीलिए उन्होंने कहा— ‘‘මමඤ්හි, ආනන්ද, කල්යාණමිත්තං ආගම්ම ජාතිධම්මා සත්තා ජාතියා පරිමුච්චන්ති, ජරාධම්මා සත්තා ජරාය පරිමුච්චන්තී’’තිආදි (සං. නි. 1.129). “आनन्द! मुझ कल्याणमित्र का आश्रय लेकर जन्म-धर्मा (जन्म लेने वाले) प्राणी जन्म से मुक्त हो जाते हैं, जरा-धर्मा (वृद्ध होने वाले) प्राणी जरा से मुक्त हो जाते हैं...” आदि। (संयुत्त निकाय १.१२९) තෙන වුත්තං – ‘‘කල්යාණමිත්තො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අකුසලං පජහති, කුසලං භාවෙතී’’ති. इसीलिए कहा गया है— “भिक्षुओं, कल्याणमित्र वाला भिक्षु अकुशल का त्याग करता है और कुशल की भावना करता है।” ගාථාය සප්පතිස්සොති පතිස්සවසඞ්ඛාතෙන සහ පතිස්සෙනාති සප්පතිස්සො, කල්යාණමිත්තස්ස ඔවාදං සිරසා සම්පටිච්ඡකො සුබ්බචොති අත්ථො. අථ වා හිතසුඛෙ පතිට්ඨාපනෙන පති ඉසෙතීති පතිස්සො, ඔවාදදායකො. ගරුආදරයොගෙන තෙන පතිස්සෙන සහ වත්තතීති සප්පතිස්සො, ගරූසු ගරුචිත්තීකාරබහුලො. සගාරවොති ඡබ්බිධෙනපි ගාරවෙන යුත්තො. කරං මිත්තානං වචනන්ති කල්යාණමිත්තානං ඔවාදං කරොන්තො යථොවාදං පටිපජ්ජන්තො. සම්පජානොති සත්තට්ඨානියෙන සම්පජඤ්ඤෙන සමන්නාගතො. පතිස්සතොති කම්මට්ඨානං ඵාතිං, ගමෙතුං සමත්ථාය සතියා පතිස්සතො සතොකාරී. අනුපුබ්බෙනාති සීලාදිවිසුද්ධිපටිපාටියා, තත්ථ ච විපස්සනාපටිපාටියා චෙව මග්ගපටිපාටියා ච. සබ්බසංයොජනක්ඛයන්ති කාමරාගසංයොජනාදීනං සබ්බෙසං සංයොජනානං ඛෙපනතො සබ්බසංයොජනක්ඛයසඞ්ඛාතස්ස අරියමග්ගස්ස පරියොසානභූතං අරහත්තං, තස්ස ආරම්මණභූතං නිබ්බානමෙව වා. පාපුණෙ අධිගච්ඡෙය්යාති අත්ථො. ඉති ඉමෙසු ද්වීසු සුත්තෙසු අරියමග්ගාධිගමස්ස සත්ථාරා පධානඞ්ගං නාම ගහිතන්ති වෙදිතබ්බං. गाथा में 'सप्पतिस्सो' का अर्थ है— प्रतिश्रव (आज्ञापालन) नामक 'प्रतिस्स' के साथ होना, अर्थात् कल्याणमित्र के उपदेश को शिरोधार्य करने वाला, सुवच (आज्ञाकारी)। अथवा, हित और सुख में प्रतिष्ठित करने के कारण 'पति' (स्वामी) के समान जो ईक्षण (देखभाल) करता है, वह 'प्रतिस्स' अर्थात् उपदेश देने वाला है। गुरु के प्रति आदर भाव से उस 'प्रतिस्स' के साथ जो रहता है, वह 'सप्पतिस्सो' है, जिसका अर्थ है गुरुओं के प्रति अत्यधिक गौरव और चित्तीकार (सम्मान) रखने वाला। 'सगारवो' का अर्थ है छह प्रकार के गौरव से युक्त। 'करं मित्तानं वचनं' का अर्थ है कल्याणमित्रों के उपदेश का पालन करते हुए उपदेशानुसार प्रतिपत्ति (आचरण) करना। 'सम्पजानो' का अर्थ है सात स्थानों वाले सम्प्रजन्य से युक्त। 'पतिस्सतो' का अर्थ है कर्मस्थान की वृद्धि करने में समर्थ स्मृति के साथ स्मृतिमान (सचेत) होना। 'अनुपुब्बेन' का अर्थ है शील आदि की विशुद्धि के क्रम से, और वहाँ विपश्यना के क्रम से तथा मार्ग के क्रम से। 'सब्बसंयोजनक्खयं' का अर्थ है कामराग आदि समस्त संयोजनों के क्षय होने से, समस्त संयोजनों के क्षय स्वरूप आर्यमार्ग की पर्यवसान (अन्तिम) अवस्था अर्हत्त्व, अथवा उसका आलम्बन स्वरूप निर्वाण ही। 'पापुणे' का अर्थ है प्राप्त करे। इस प्रकार इन दो सुत्तों में आर्यमार्ग की प्राप्ति के लिए शास्ता (बुद्ध) द्वारा प्रधान अंग को ग्रहण किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सुत्त की वर्णना समाप्त हुई। 8. සඞ්ඝභෙදසුත්තවණ්ණනා ८. संघभेद सुत्त की वर्णना। 18. අට්ඨමෙ [Pg.64] එකධම්මොති කතරොයං සුත්තනික්ඛෙපො? අට්ඨුප්පත්තිකො. තත්රායං සඞ්ඛෙපකථා – දෙවදත්තො හි අජාතසත්තුං දුග්ගහණං ගාහාපෙත්වා තස්ස පිතරං රාජානං බිම්බිසාරං තෙන මාරාපෙත්වාපි අභිමාරෙ පයොජෙත්වාපි සිලාපවිජ්ඣනෙන ලොහිතුප්පාදකම්මං කත්වාපි න තාවතා පාකටො ජාතො, නාළාගිරිං විස්සජ්ජෙත්වා පන පාකටො ජාතො. අථ මහාජනො ‘‘එවරූපම්පි නාම පාපං ගහෙත්වා රාජා විචරතී’’ති කොලාහලං අකාසි, මහාඝොසො අහොසි. තං සුත්වා රාජා අත්තනා දීයමානානි පඤ්ච ථාලිපාකසතානි පච්ඡින්දාපෙසි, උපට්ඨානම්පිස්ස නාගමාසි. නාගරාපි කුලං උපගතස්ස කටච්ඡුභත්තම්පිස්ස නාදංසු. සො පරිහීනලාභසක්කාරො කොහඤ්ඤෙන ජීවිතුකාමො සත්ථාරං උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ච වත්ථූනි යාචිත්වා ‘‘අලං, දෙවදත්ත, යො ඉච්ඡති, සො ආරඤ්ඤිකො හොතූ’’තිආදිනා (පාරා. 409; චූළව. 343) භගවතා පටික්ඛිත්තො තෙහි පඤ්චහි වත්ථූහි බාලං ලූඛප්පසන්නං ජනං සඤ්ඤාපෙන්තො පඤ්චසතෙ වජ්ජිපුත්තකෙ සලාකං ගාහාපෙත්වා සඞ්ඝං භින්දිත්වාව තෙ ආදාය ගයාසීසං අගමාසි. අථ ද්වෙ අග්ගසාවකා සත්ථු ආණාය තත්ථ ගන්ත්වා ධම්මං දෙසෙත්වා තෙ අරියඵලෙ පතිට්ඨාපෙත්වා ආනයිංසු. යෙ පනස්ස සඞ්ඝභෙදාය පරක්කමන්තස්ස ලද්ධිං රොචෙත්වා තථෙව පග්ගය්හ ඨිතා සඞ්ඝෙ භිජ්ජන්තෙ භින්නෙ ච සමනුඤ්ඤා අහෙසුං, තෙසං තං දීඝරත්තං අහිතාය දුක්ඛාය අහොසි. १८. आठवें (सुत्त) में 'एकधम्मो' (एक धर्म) - यह सुत्त का निक्षेप (प्रसंग) क्या है? यह अट्टुप्पत्तिक (घटना-आधारित) है। वहाँ यह संक्षिप्त कथा है - देवदत्त ने अजातशत्रु को गलत धारणा ग्रहण करवाकर, उसके द्वारा उसके पिता राजा बिम्बिसार की हत्या करवाकर भी, हत्यारों को नियुक्त करके भी, और शिला फेंककर (बुद्ध के शरीर से) रक्त निकालने का कर्म करके भी वह उतना प्रसिद्ध (प्रकट) नहीं हुआ, लेकिन नालागिरि (हाथी) को छोड़ने पर वह प्रसिद्ध हो गया। तब महाजन (जनता) ने कोलाहल किया कि "राजा ऐसे पापी को साथ लेकर घूमता है", और बड़ा शोर हुआ। उसे सुनकर राजा ने स्वयं दिए जाने वाले पाँच सौ थाली-पाक (भोजन के पात्र) बंद करवा दिए, और उसकी सेवा में जाना भी छोड़ दिया। नगरवासियों ने भी घर आए हुए उसे एक कड़छी भर भात भी नहीं दिया। वह लाभ और सत्कार से रहित होकर, कुहक (पाखंड) से जीने की इच्छा रखते हुए शास्ता के पास गया और पाँच वस्तुओं (नियमों) की याचना की। "बस देवदत्त, जो चाहता है वह आरण्यक (वनवासी) हो" आदि (पारा. 409; चुलव. 343) कहकर भगवान द्वारा मना किए जाने पर, उन पाँच वस्तुओं से मूर्ख और रूक्ष-प्रसन्न (बाहरी दिखावे से प्रभावित) लोगों को समझाते हुए, पाँच सौ वज्जिपुत्तक भिक्षुओं को शलाका ग्रहण करवाकर, संघ को तोड़कर उन्हें लेकर गयाशीर्ष चला गया। तब शास्ता की आज्ञा से दो अग्रश्रावक वहाँ गए, धर्मोपदेश दिया और उन्हें आर्यफल में प्रतिष्ठित कर वापस ले आए। लेकिन जो उसके संघ-भेद के प्रयास की दृष्टि (लद्धि) को पसंद कर वैसे ही दृढ़ रहे और संघ के टूटने के समय और टूटने के बाद सहमत रहे, उनके लिए वह दीर्घकाल तक अहित और दुःख के लिए हुआ। දෙවදත්තොපි න චිරස්සෙව රොගාභිභූතො බාළ්හගිලානො මරණකාලෙ ‘‘සත්ථාරං වන්දිස්සාමී’’ති මඤ්චකසිවිකාය නීයමානො ජෙතවනපොක්ඛරණිතීරෙ ඨපිතො පථවියා විවරෙ දින්නෙ පතිත්වා අවීචිම්හි නිබ්බත්ති, යොජනසතිකො චස්ස අත්තභාවො අහොසි කප්පට්ඨියො තාලක්ඛන්ධපරිමාණෙහි අයසූලෙහි විනිවිද්ධො. දෙවදත්තපක්ඛිකානි ච පඤ්චමත්තානි කුලසතානි තස්ස ලද්ධියං ඨිතානි සහ බන්ධවෙහි නිරයෙ නිබ්බත්තානි. එකදිවසං භික්ඛූ ධම්මසභායං කථං සමුට්ඨාපෙසුං ‘‘ආවුසො, දෙවදත්තෙන සඞ්ඝං භින්දන්තෙන භාරියං කම්මං කත’’න්ති. අථ සත්ථා ධම්මසභං උපගන්ත්වා ‘‘කාය නුත්ථ, භික්ඛවෙ, එතරහි කථාය සන්නිසින්නා’’ති පුච්ඡිත්වා ‘‘ඉමාය නාමා’’ති වුත්තෙ සඞ්ඝභෙදෙ ආදීනවං දස්සෙන්තො [Pg.65] ඉමං සුත්තං අභාසි. කෙචි පන භණන්ති ‘‘දෙවදත්තස්ස තප්පක්ඛිකානඤ්ච තථා නිරයෙ නිබ්බත්තභාවං දිස්වා සඞ්ඝභෙදෙ ආදීනවං දස්සෙන්තො භගවා අත්තනො අජ්ඣාසයෙනෙව ඉමං සුත්තං දෙසෙසී’’ති. देवदत्त भी शीघ्र ही रोग से अभिभूत होकर अत्यंत बीमार हो गया। मरणकाल में "शास्ता की वंदना करूँगा" कहते हुए मंचक-शिविका (पालकी) में ले जाया जाते समय, जेतवन की पुष्करिणी (पोखरे) के किनारे रखे जाने पर, पृथ्वी के फटने (विवर देने) पर उसमें गिरकर अवीचि (नरक) में उत्पन्न हुआ। उसका शरीर सौ योजन का था, जो कल्प भर रहने वाला था और ताड़ के तने के परिमाण वाले लोहे के शूलों से बिंधा हुआ था। देवदत्त के पक्ष के लगभग पाँच सौ कुल, जो उसकी दृष्टि में स्थित थे, अपने बंधु-बांधवों के साथ नरक में उत्पन्न हुए। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में चर्चा शुरू की - "आयुष्मन्, देवदत्त ने संघ-भेद करके भारी (गंभीर) कर्म किया है।" तब शास्ता ने धर्मसभा में आकर पूछा - "भिक्षुओं, तुम इस समय किस चर्चा के लिए बैठे हो?" और "इस चर्चा के लिए" कहने पर, संघ-भेद के दोष (आदीनव) को दिखाते हुए यह सुत्त कहा। कुछ लोग कहते हैं - "देवदत्त और उसके पक्ष वालों को इस प्रकार नरक में उत्पन्न हुआ देखकर, संघ-भेद के दोष को दिखाने के लिए भगवान ने अपनी इच्छा (अध्याशय) से ही यह सुत्त उपदेशित किया।" තත්ථ එකධම්මොති එකො අකුසලො මහාසාවජ්ජධම්මො. ලොකෙති සත්තලොකෙ. උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජතීති එත්ථ භෙදසංවත්තනිකෙසු භණ්ඩනාදීසු සඞ්ඝෙ උප්පන්නෙසුපි ‘‘ධම්මො අධම්මො’’තිආදීසු අට්ඨාරසභෙදකරවත්ථූසු යස්ස කස්සචි දීපනවසෙන වොහරන්තෙසුපි තත්ථ රුචිජනනත්ථං අනුස්සාවෙන්තෙසුපි අනුස්සාවෙත්වා සලාකාය ගාහිතායපි සඞ්ඝභෙදො උප්පජ්ජමානො නාම හොති, සලාකාය පන ගාහිතාය චත්තාරො වා අතිරෙකා වා යදා ආවෙණිකං උද්දෙසං වා සඞ්ඝකම්මං වා කරොන්ති, තදා සඞ්ඝභෙදො උප්පජ්ජති නාම. කතෙ පන තස්මිං සඞ්ඝභෙදො උප්පන්නො නාම? කම්මං, උද්දෙසො, වොහාරො, අනුස්සාවනා, සලාකග්ගාහොති ඉමෙසු හි පඤ්චසු සඞ්ඝස්ස භෙදකාරණෙසු කම්මං වා උද්දෙසො වා පමාණං, වොහාරානුස්සාවනසලාකග්ගාහා පන පුබ්බභාගාති. वहाँ 'एकधम्मो' का अर्थ है - एक अकुशल और महान दोषयुक्त (सावज्ज) धर्म। 'लोके' का अर्थ है - सत्त्वलोक में। 'उप्पज्जमानो उप्पज्जति' (उत्पन्न होता हुआ उत्पन्न होता है) - यहाँ संघ में भेद उत्पन्न करने वाले झगड़े आदि के उत्पन्न होने पर भी, "यह धर्म है, यह अधर्म है" आदि अठारह भेदकारी वस्तुओं में से किसी को भी स्पष्ट करने के रूप में व्यवहार करने पर भी, और उसमें रुचि जगाने के लिए घोषणा (अनुसावन) करने पर भी, तथा घोषणा करके शलाका ग्रहण करने पर भी संघ-भेद 'उत्पन्न होता हुआ' कहलाता है। लेकिन जब शलाका ग्रहण करने के बाद चार या उससे अधिक (भिक्षु) अलग से पातिमोक्ख-उद्देश या संघ-कर्म करते हैं, तब संघ-भेद 'उत्पन्न' कहलाता है। उसके कर दिए जाने पर संघ-भेद 'उत्पन्न हुआ' कहलाता है। कर्म, उद्देश, व्यवहार, अनुसावन और शलाका-ग्रहण - संघ-भेद के इन पाँच कारणों में से 'कर्म' या 'उद्देश' ही प्रमाण (मुख्य) हैं, जबकि व्यवहार, अनुसावन और शलाका-ग्रहण पूर्व-भाग (प्रारंभिक चरण) हैं। බහුජනාහිතායාතිආදීසු 0.මහාජනස්ස ඣානමග්ගාදිසම්පත්තිනිවාරණෙන අහිතාය, සග්ගසම්පත්තිනිවාරණෙන අසුඛාය, අපායූපපත්තිහෙතුභාවෙන අනත්ථාය. අකුසලධම්මවසෙන වා අහිතාය, හිතමත්තස්සපි අභාවා සුගතියම්පි නිබ්බත්තනකකායිකචෙතසිකදුක්ඛාය උප්පජ්ජතීති සම්බන්ධො. දෙවමනුස්සානන්ති ඉදං ‘‘බහුනො ජනස්සා’’ති වුත්තෙසු උක්කට්ඨපුග්ගලනිද්දෙසො. අපරො නයො – බහුජනාහිතායාති බහුජනස්ස මහතො සත්තකායස්ස අහිතත්ථාය, දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකඅනත්ථායාති අත්ථො. අසුඛායාති දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකඅසුඛත්ථාය, දුවිධදුක්ඛත්ථායාති අත්ථො. අනත්ථායාති පරමත්ථපටික්ඛෙපාය. නිබ්බානඤ්හි පරමත්ථො, තතො උත්තරිං අත්ථො නත්ථි. අහිතායාති මග්ගපටික්ඛෙපාය. නිබ්බානසම්පාපකමග්ගතො හි උත්තරිං හිතං නාම නත්ථි. දුක්ඛායාති අරියසුඛවිරාධනෙන වට්ටදුක්ඛතාය. යෙ හි අරියසුඛතො විරද්ධා තං අධිගන්තුං අභබ්බා, තෙ වට්ටදුක්ඛෙ පරිබ්භමන්ති, අරියසුඛතො ච උත්තරිං සුඛං නාම නත්ථි. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘අයං සමාධි පච්චුප්පන්නසුඛො චෙව ආයතිඤ්ච සුඛවිපාකො’’ති (දී. නි. 3.355; අ. නි. 5.27). 'बहुजनहिताय' आदि में - महाजनों की ध्यान-मार्ग आदि संपत्तियों के निवारण (रोकने) से 'अहित' के लिए, स्वर्ग-संपत्ति के निवारण से 'असुख' के लिए, और अपाय (दुर्गति) में उत्पत्ति का हेतु होने से 'अनर्थ' के लिए। अथवा अकुशल धर्मों के कारण 'अहित' के लिए, हित मात्र के अभाव के कारण सुगति में भी उत्पन्न होने वाले कायिक और चैतसिक दुःख के लिए उत्पन्न होता है - यह संबंध है। 'देवमनुस्सानं' (देवों और मनुष्यों के) - यह 'बहुजन' कहे गए लोगों में श्रेष्ठ पुद्गलों का निर्देश है। दूसरा तरीका - 'बहुजनहिताय' का अर्थ है बहुत से लोगों के, महान सत्त्व-समूह के अहित के लिए, अर्थात् इहलौकिक और पारलौकिक अनर्थ के लिए। 'असुखाय' का अर्थ है इहलौकिक और पारलौकिक असुख के लिए, अर्थात् दो प्रकार के दुखों के लिए। 'अनर्थाय' का अर्थ है परमार्थ के प्रतिषेध (अस्वीकार) के लिए। निर्वाण ही परमार्थ है, उससे बढ़कर कोई अर्थ नहीं है। 'अहिताय' का अर्थ है मार्ग के प्रतिषेध के लिए। निर्वाण प्राप्त कराने वाले मार्ग से बढ़कर कोई हित नहीं है। 'दुक्खाय' का अर्थ है आर्य-सुख से वंचित होने के कारण संसार-दुःख (वट्टदुःख) के लिए। जो आर्य-सुख से वंचित हैं और उसे प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे संसार-दुःख में भटकते हैं, और आर्य-सुख से बढ़कर कोई सुख नहीं है। जैसा कि कहा गया है - "यह समाधि वर्तमान में भी सुखद है और भविष्य में भी सुखद विपाक वाली है" (दी. नि. 3.355; अ. नि. 5.27)। ඉදානි [Pg.66] ‘‘සඞ්ඝභෙදො’’ති සරූපතො දස්සෙත්වා තස්ස අහිතාදීනං එකන්තහෙතුභාවං පකාසෙතුං ‘‘සඞ්ඝෙ ඛො පන, භික්ඛවෙ, භින්නෙ’’තිආදිමාහ. තත්ථ භින්නෙති නිමිත්තත්ථෙ භුම්මං යථා ‘‘අධනානං ධනෙ අනනුප්පදීයමානෙ’’ති (දී. නි. 3.91), භෙදහෙතූති අත්ථො. අඤ්ඤමඤ්ඤං භණ්ඩනානීති චතුන්නං පරිසානං තප්පක්ඛිකානඤ්ච ‘‘එසො ධම්මො, නෙසො ධම්මො’’ති අඤ්ඤමඤ්ඤං විවදනානි. භණ්ඩනඤ්හි කලහස්ස පුබ්බභාගො. පරිභාසාති ‘‘ඉදඤ්චිදඤ්ච වො අනත්ථං කරිස්සාමා’’ති භයුප්පාදනවසෙන තජ්ජනා. පරික්ඛෙපාති ජාතිආදිවසෙන පරිතො ඛෙපා, දසහි අක්කොසවත්ථූහි ඛුංසනවම්භනා. පරිච්චජනාති උක්ඛෙපනියකම්මකරණාදිවසෙන නිස්සාරණා. තත්ථාති තස්මිං සඞ්ඝභෙදෙ, තන්නිමිත්තෙ වා භණ්ඩනාදිකෙ. අප්පසන්නාති රතනත්තයගුණානං අනභිඤ්ඤා. න පසීදන්තීති ‘‘ධම්මචාරිනො සමචාරිනො’’තිආදිනා ය්වායං භික්ඛූසු පසාදනාකාරො, තථා න පසීදන්ති, තෙසං වා සොතබ්බං සද්ධාතබ්බං න මඤ්ඤන්ති. තථා ච ධම්මෙ සත්ථරි ච අප්පසන්නාව හොන්ති. එකච්චානං අඤ්ඤථත්තන්ති පුථුජ්ජනානං අවිරුළ්හසද්ධානං පසාදඤ්ඤථත්තං. अब 'संघ-भेद' को उसके वास्तविक स्वरूप में दिखाकर, उसके अहित आदि का एकमात्र कारण होने को प्रकट करने के लिए 'संघ के भिन्न होने पर, भिक्षुओं' (सङ्घे खो पन, भिक्खवे, भिन्ने) इत्यादि कहा गया है। वहाँ 'भिन्ने' (भिन्न होने पर) निमित्त अर्थ में सप्तमी विभक्ति है, जैसे 'निर्धनों को धन न दिए जाने पर' (अधनानं धने अननुप्पदीयमाने), इसका अर्थ है 'भेद के कारण'। 'परस्पर झगड़े' (अञ्ञमञ्ञं भण्डनानि) का अर्थ है चारों परिषदों और उनके पक्षधरों का 'यह धर्म है, यह धर्म नहीं है' इस प्रकार परस्पर विवाद करना। झगड़ा (भण्डन) वास्तव में कलह का पूर्व भाग है। 'गाली-गलौज' (परिभासा) का अर्थ है 'हम तुम्हारा यह और वह अनिष्ट करेंगे' इस प्रकार भय उत्पन्न करते हुए धमकाना। 'तिरस्कार' (परिक्खेपा) का अर्थ है जाति आदि के आधार पर चारों ओर से आक्षेप करना, दस प्रकार के अक्कोस-वत्थु (गाली के आधारों) से निंदा और अपमान करना। 'त्याग' (परिच्चजना) का अर्थ है उत्क्षेपनीय कर्म करने आदि के माध्यम से बाहर निकालना। 'वहाँ' (तत्थ) का अर्थ है उस संघ-भेद में, अथवा उस निमित्त वाले झगड़े आदि में। 'अश्रद्धालु' (अप्पसन्ना) वे हैं जो रत्नत्रय के गुणों को नहीं जानते। 'प्रसन्न नहीं होते' (न पसीदन्ति) का अर्थ है 'वे धर्मचारी हैं, समचारी हैं' इत्यादि रूप में भिक्षुओं के प्रति जो श्रद्धा का भाव होता है, वैसा वे नहीं रखते, अथवा उनकी बात सुनने योग्य या श्रद्धा करने योग्य नहीं मानते। और इस प्रकार वे धर्म और शास्ता के प्रति भी अश्रद्धालु ही होते हैं। 'कुछ लोगों का अन्यथाभाव' (एकच्चानं अञ्ञथत्तं) का अर्थ है उन पृथग्जनों का, जिनकी श्रद्धा दृढ़ नहीं हुई है, उनकी श्रद्धा का बदल जाना। ගාථායං ආපායිකොතිආදීසු අපායෙ නිබ්බත්තනාරහතාය ආපායිකො. තත්ථපි අවීචිසඞ්ඛාතෙ මහානිරයෙ උප්පජ්ජතීති නෙරයිකො. එකං අන්තරකප්පං පරිපුණ්ණමෙව කත්වා තත්ථ තිට්ඨතීති කප්පට්ඨො. සඞ්ඝභෙදසඞ්ඛාතෙ වග්ගෙ රතොති වග්ගරතො. අධම්මියතාය අධම්මො. භෙදකරවත්ථූහි සඞ්ඝභෙදසඞ්ඛාතෙ එව ච අධම්මෙ ඨිතොති අධම්මට්ඨො. යොගක්ඛෙමා පධංසතීති යොගක්ඛෙමතො හිතතො පධංසති පරිහායති, චතූහි වා යොගෙහි අනුපද්දුතත්තා යොගක්ඛෙමං නාම අරහත්තං නිබ්බානඤ්ච, තතො පනස්ස ධංසනෙ වත්තබ්බමෙව නත්ථි. දිට්ඨිසීලසාමඤ්ඤතො සංහතට්ඨෙන සඞ්ඝං, තතො එව එකකම්මාදිවිධානයොගෙන සමග්ගං සහිතං. භෙත්වානාති පුබ්බෙ වුත්තලක්ඛණෙන සඞ්ඝභෙදෙන භින්දිත්වා. කප්පන්ති ආයුකප්පං. සො පනෙත්ථ අන්තරකප්පොව. නිරයම්හීති අවීචිමහානිරයම්හි. गाथा में 'आपायिको' (अपायगामी) आदि शब्दों में, अपाय में उत्पन्न होने की योग्यता के कारण 'आपायिको' कहा गया है। वहाँ भी अवीचि नामक महानरक में उत्पन्न होने के कारण 'नैरयिको' (नरकगामी) कहा गया है। एक पूरे अन्तरकल्प तक वहाँ रहने के कारण 'कल्पस्थ' (कप्पट्ठो) कहा गया है। संघ-भेद रूपी गुटबाजी में रत होने के कारण 'वग्गरतो' (गुट-रत) कहा गया है। अधार्मिक होने के कारण 'अधर्म' है। भेद करने वाली वस्तुओं के द्वारा संघ-भेद रूपी अधर्म में ही स्थित होने के कारण 'अधम्मट्ठो' (अधर्म-स्थित) कहा गया है। 'योगक्षेम से भ्रष्ट होता है' (योगक्खेमा पदंंसति) का अर्थ है योगक्षेम रूपी हित से भ्रष्ट होता है, पतित होता है; अथवा चार योगों (आस्रवों) से उपद्रवित न होने के कारण अर्हत्व और निर्वाण को 'योगक्षेम' कहते हैं, उससे उसके पतन के बारे में तो कहना ही क्या है। दृष्टि और शील की समानता से संहत होने के कारण 'संघ' है, और उसी कारण एक-कर्म (समान अनुष्ठान) आदि के विधान से युक्त होने के कारण 'समग्र' (एकजुट) और 'सहित' है। 'भेद करके' (भेत्वान) का अर्थ है पूर्वोक्त लक्षणों वाले संघ-भेद के द्वारा विभाजित करके। 'कल्प' (कप्पं) का अर्थ यहाँ आयु-कल्प है। वह यहाँ अन्तरकल्प ही है। 'नरक में' (निरयम्हि) का अर्थ अवीचि महानरक में है। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9. සඞ්ඝසාමග්ගීසුත්තවණ්ණනා ९. संघ-सामग्री सूत्र की व्याख्या 19. නවමෙ [Pg.67] එකධම්මොති එකො කුසලධම්මො අනවජ්ජධම්මො. ‘‘අයං ධම්මො, නායං ධම්මො’’තිආදිනා සචෙ සඞ්ඝෙ විවාදො උප්පජ්ජෙය්ය, තත්ථ ධම්මකාමෙන විඤ්ඤුනා ඉති පටිසඤ්චික්ඛිතබ්බං ‘‘ඨානං ඛො, පනෙතං විජ්ජති, යදිදං විවාදො වඩ්ඪමානො සඞ්ඝරාජියා වා සඞ්ඝභෙදාය වා සංවත්තෙය්යා’’ති. සචෙ තං අධිකරණං අත්තනා පග්ගහෙත්වා ඨිතො, අග්ගිං අක්කන්තෙන විය සහසා තතො ඔරමිතබ්බං. අථ පරෙහි තං පග්ගහිතං සයඤ්චෙතං සක්කොති වූපසමෙතුං, උස්සාහජාතො හුත්වා දූරම්පි ගන්ත්වා තථා පටිපජ්ජිතබ්බං, යථා තං වූපසම්මති. සචෙ පන සයං න සක්කොති, සො ච විවාදො උපරූපරි වඩ්ඪතෙව, න වූපසම්මති. යෙ තත්ථ පතිරූපා සික්ඛාකාමා සබ්රහ්මචාරිනො, තෙ උස්සාහෙත්වා යෙන ධම්මෙන යෙන විනයෙන යෙන සත්ථුසාසනෙන තං අධිකරණං යථා වූපසම්මති, තථා වූපසමෙතබ්බං. එවං වූපසමෙන්තස්ස යො සඞ්ඝසාමග්ගිකරො කුසලො ධම්මො, අයමෙත්ථ එකධම්මොති අධිප්පෙතො. සො හි උභතොපක්ඛියානං ද්වෙළ්හකජාතානං භික්ඛූනං, තෙසං අනුවත්තනවසෙන ඨිතානං භික්ඛුනීනං උපාසකානං උපාසිකානං තෙසං ආරක්ඛදෙවතානං යාවදෙව බ්රහ්මානම්පි උප්පජ්ජනාරහං අහිතං දුක්ඛාවහං සංකිලෙසධම්මං අපනෙත්වා මහතො පුඤ්ඤරාසිස්ස කුසලාභිසන්දස්ස හෙතුභාවතො සදෙවකස්ස ලොකස්ස හිතසුඛාවහො හොති. තෙන වුත්තං ‘‘එකධම්මො, භික්ඛවෙ, ලොකෙ උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති බහුජනහිතායා’’තිආදි. තස්සත්ථො අනන්තරසුත්තෙ වුත්තවිපරියායෙන වෙදිතබ්බො. සඞ්ඝසාමග්ගීති සඞ්ඝස්ස සමග්ගභාවො භෙදාභාවො එකකම්මතා එකුද්දෙසතා ච. १९. नौवें (सूत्र) में 'एक धर्म' (एकधम्मो) का अर्थ है एक कुशल धर्म, निर्दोष धर्म। 'यह धर्म है, यह धर्म नहीं है' इत्यादि के कारण यदि संघ में विवाद उत्पन्न हो जाए, तो वहाँ धर्म-प्रेमी बुद्धिमान व्यक्ति को इस प्रकार विचार करना चाहिए—'यह संभव है कि यह बढ़ता हुआ विवाद संघ में दरार (सङ्घराजि) या संघ-भेद का कारण बन जाए'। यदि वह स्वयं उस विवाद को पकड़कर (पक्ष लेकर) खड़ा है, तो उसे आग पर पैर रखने वाले के समान शीघ्र ही उससे पीछे हट जाना चाहिए। यदि दूसरों ने उसे पकड़ रखा है और वह स्वयं उसे शांत करने में समर्थ है, तो उसे उत्साहित होकर दूर जाकर भी वैसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे वह शांत हो जाए। यदि वह स्वयं समर्थ नहीं है और वह विवाद ऊपर-ऊपर बढ़ता ही जा रहा है, शांत नहीं हो रहा है, तो वहाँ जो योग्य शिक्षा-प्रेमी सब्रह्मचारी हैं, उन्हें उत्साहित करके जिस धर्म, जिस विनय और जिस शास्ता के शासन से वह विवाद यथावत शांत हो सके, वैसे उसे शांत करना चाहिए। इस प्रकार शांत करने वाले का जो संघ में एकता लाने वाला कुशल धर्म है, वही यहाँ 'एक धर्म' के रूप में अभिप्रेत है। वह (धर्म) दोनों पक्षों के दुविधा में पड़े भिक्षुओं, उनके पीछे चलने वाली भिक्षुणियों, उपासकों, उपासिकाओं और उनकी आरक्षक देवताओं, यहाँ तक कि ब्रह्माओं के लिए भी उत्पन्न होने योग्य अहित और दुःख लाने वाले संक्लेश-धर्मों को दूर करके, महान पुण्य-राशि और कुशल-प्रवाह का हेतु होने के कारण, देवों सहित लोक के लिए हित और सुख लाने वाला होता है। इसीलिए कहा गया है—'भिक्षुओं, लोक में उत्पन्न होता हुआ एक धर्म बहुजन हिताय उत्पन्न होता है' इत्यादि। इसका अर्थ पिछले सूत्र में कहे गए के विपरीत समझना चाहिए। 'संघ-सामग्री' (सङ्घसामग्गी) का अर्थ है संघ की एकता, भेद का अभाव, एक-कर्मता और एक-उद्देश्यता। ගාථායං සුඛා සඞ්ඝස්ස සාමග්ගීති සුඛස්ස පච්චයභාවතො සාමග්ගී සුඛාති වුත්තා. යථා ‘‘සුඛො බුද්ධානමුප්පාදො’’ති (ධ. ප. 194). සමග්ගානඤ්චනුග්ගහොති සමග්ගානං සාමග්ගිඅනුමොදනෙන අනුග්ගණ්හනං සාමග්ගිඅනුරූපං, යථා තෙ සාමග්ගිං න විජහන්ති, තථා ගහණං ඨපනං අනුබලප්පදානන්ති අත්ථො. සඞ්ඝං සමග්ගං කත්වානාති භින්නං සඞ්ඝං රාජිපත්තං වා සමග්ගං සහිතං කත්වා. කප්පන්ති ආයුකප්පමෙව. සග්ගම්හි මොදතීති කාමාවචරදෙවලොකෙ අඤ්ඤෙ [Pg.68] දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අභිභවිත්වා දිබ්බසුඛං අනුභවන්තො ඉච්ඡිතනිප්ඵත්තියාව මොදති පමොදති ලලති කීළතීති. गाथा में 'संघ की एकता सुखद है' (सुखा सङ्घस्स सामग्गी) का अर्थ है सुख का कारण होने से एकता को 'सुख' कहा गया है। जैसे 'बुद्धों का उत्पन्न होना सुखद है' (सुखो बुद्धानमुप्पादो)। 'एकजुटों का अनुग्रह' (समग्गानञ्चनुग्गहो) का अर्थ है एकजुट लोगों की एकता का अनुमोदन करके अनुगृहीत करना, जो एकता के अनुरूप हो; जैसे वे एकता को न छोड़ें, वैसे उन्हें ग्रहण करना, स्थापित करना और बल प्रदान करना। 'संघ को एकजुट करके' (सङ्घं समग्गं कत्वान) का अर्थ है भिन्न हुए या दरार पड़े हुए संघ को एकजुट और संगठित करके। 'कल्प' (कप्पं) का अर्थ आयु-कल्प ही है। 'स्वर्ग में आनंदित होता है' (सग्गम्हि मोदति) का अर्थ है कामावचर देवलोक में अन्य देवों को दस स्थानों (विशेषताओं) से अभिभूत कर दिव्य सुख का अनुभव करते हुए, इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति से प्रसन्न होता है, प्रमुदित होता है, विलास करता है और क्रीड़ा करता है। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. පදුට්ඨචිත්තසුත්තවණ්ණනා १०. प्रदुष्ट-चित्त सूत्र की व्याख्या 20. දසමස්ස කා උප්පත්ති? අට්ඨුප්පත්තියෙව. එකදිවසං කිර භික්ඛූ ධම්මසභායං සන්නිසින්නා කථං සමුට්ඨාපෙසුං – ‘‘ආවුසො, ඉධෙකච්චො බහුං පුඤ්ඤකම්මං කරොති, එකච්චො බහුං පාපකම්මං, එකච්චො උභයවොමිස්සකං කරොති. තත්ථ වොමිස්සකාරිනො කීදිසො අභිසම්පරායො’’ති? අථ සත්ථා ධම්මසභං උපගන්වා පඤ්ඤත්තවරබුද්ධාසනෙ නිසින්නො තං කථං සුත්වා ‘‘භික්ඛවෙ, මරණාසන්නකාලෙ සංකිලිට්ඨචිත්තස්ස දුග්ගති පාටිකඞ්ඛා’’ති දස්සෙන්තො ඉමාය අට්ඨුප්පත්තියා ඉදං සුත්තං දෙසෙසි. २०. दसवें (सूत्र) की उत्पत्ति क्या है? अर्थोत्पत्ति ही है। सुना जाता है कि एक दिन भिक्षु धर्मसभा में बैठे हुए इस प्रकार की चर्चा कर रहे थे - "आवुसो, यहाँ कोई बहुत पुण्यकर्म करता है, कोई बहुत पापकर्म, कोई दोनों का मिश्रण करता है। वहाँ मिश्रण करने वाले की परलोक में क्या गति होती है?" तब शास्ता धर्मसभा में आकर श्रेष्ठ बुद्ध-आसन पर विराजमान हुए और उस चर्चा को सुनकर "भिक्षुओं, मरण के समय संक्लिष्ट (मलिन) चित्त वाले की दुर्गति अपेक्षित है" - यह दिखाते हुए इस अर्थोत्पत्ति के साथ यह सूत्र देशित किया। තත්ථ ඉධාති දෙසාපදෙසෙ නිපාතො. ස්වායං කත්ථචි පදෙසං උපාදාය වුච්චති ‘‘ඉධෙව තිට්ඨමානස්ස, දෙවභූතස්ස මෙ සතො’’තිආදීසු (දී. නි. 2.369). කත්ථචි සාසනං උපාදාය ‘‘ඉධෙව, භික්ඛවෙ, සමණො ඉධ දුතියො සමණො’’තිආදීසු (ම. නි. 1.139; අ. නි. 4.241). කත්ථචි පදපූරණමත්තෙ ‘‘ඉධාහං, භික්ඛවෙ, භුත්තාවී අස්සං පවාරිතො’’තිආදීසු (ම. නි. 1.30). කත්ථචි ලොකං උපාදාය වුච්චති ‘‘ඉධ තථාගතො ලොකෙ උප්පජ්ජතී’’තිආදීසු (අ. නි. 3.61). ඉධාපි ලොකෙ එව දට්ඨබ්බො. එකච්චන්ති එකං, අඤ්ඤතරන්ති අත්ථො. පුග්ගලන්ති සත්තං. සො හි යථාපච්චයං කුසලාකුසලානං තබ්බිපාකානඤ්ච පූරණතො මරණවසෙන ගලනතො ච පුග්ගලොති වුච්චති. පදුට්ඨචිත්තන්ති පදොසෙන ආඝාතෙන දුට්ඨචිත්තං. අථ වා පදුට්ඨචිත්තන්ති දොසෙන රාගාදිනා පදූසිතචිත්තං. එත්ථ ච එකච්චන්ති ඉදං පදුට්ඨචිත්තස්ස පුග්ගලස්ස විසෙසනං. යස්ස හි පටිසන්ධිදායකකම්මං ඔකාසමකාසි, සො තථා වුත්තො. යස්ස ච අකුසලප්පවත්තිතො චිත්තං නිවත්තෙත්වා කුසලවසෙන ඔතාරෙතුං න සක්කා, එවං ආසන්නමරණො. එවන්ති ඉදානි වත්තබ්බාකාරං දස්සෙති. චෙතසාති අත්තනො චිත්තෙන චෙතොපරියඤාණෙන. චෙතොති තස්ස පුග්ගලස්ස චිත්තං. පරිච්චාති පරිච්ඡින්දිත්වා පජානාමි[Pg.69]. නනු ච යථාකම්මුපගඤාණස්සායං විසයොති? සච්චමෙතං, තදා පවත්තමානඅකුසලචිත්තවසෙන පනෙතං වුත්තං. वहाँ 'इध' (यहाँ) स्थान के निर्देश में निपात है। वह कहीं प्रदेश के अर्थ में कहा जाता है जैसे "इधेव तिट्ठमानस्स, देवभूतस्स मे सतो" (यहीं स्थित रहते हुए, देव बने हुए मेरे...) आदि में। कहीं शासन (धर्म) के अर्थ में जैसे "इधेव, भिक्खवे, समणो, इध दुतियो समणो" (भिक्षुओं, यहीं श्रमण है, यहीं दूसरा श्रमण है...) आदि में। कहीं केवल पद-पूर्ति के लिए जैसे "इधाहं, भिक्खवे, भुत्तावी अस्सं पवारितो" आदि में। कहीं लोक के अर्थ में कहा जाता है जैसे "इध तथागतो लोके उप्पज्जति" (यहाँ लोक में तथागत उत्पन्न होते हैं) आदि में। यहाँ भी लोक ही समझना चाहिए। 'एकच्चं' का अर्थ है एक, कोई अन्य। 'पुग्गलं' का अर्थ है सत्त्व। वह प्रत्ययों के अनुसार कुशल-अकुशल और उनके विपाकों के पूरण (भरने) से और मरण के वश से गलने (नष्ट होने) के कारण 'पुद्गल' कहा जाता है। 'पदुट्ठचित्तं' का अर्थ है द्वेष या आघात से दूषित चित्त। अथवा 'पदुट्ठचित्तं' का अर्थ है द्वेष, राग आदि से प्रदूषित चित्त। यहाँ 'एकच्चं' यह दूषित चित्त वाले पुद्गल का विशेषण है। जिसके प्रतिसन्धि देने वाले कर्म ने अवसर प्राप्त किया है, उसे वैसा कहा गया है। और जिसके चित्त को अकुशल प्रवृत्ति से हटाकर कुशल की ओर ले जाना संभव नहीं है, वह ऐसा आसन्न-मरण है। 'एवं' से अब कहने के प्रकार को दिखाते हैं। 'चेतसा' का अर्थ है अपने चित्त से, चेतोपरियज्ञान से। 'चेतो' उस पुद्गल का चित्त है। 'परिच्च' का अर्थ है परिच्छेद करके (जानकर) जानता हूँ। क्या यह यथाकम्मूपगज्ञान का विषय नहीं है? यह सत्य है, किन्तु यहाँ उस समय प्रवर्तमान अकुशल चित्त के वश से यह कहा गया है। ඉමම්හි චායං සමයෙති ඉමස්මිං කාලෙ, ඉමායං වා පච්චයසාමග්ගියං, අයං පුග්ගලො ජවනවීථියා අපරභාගෙ කාලං කරෙය්ය චෙති අත්ථො. න හි ජවනක්ඛණෙ කාලංකිරියා අත්ථි. යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙති යථා ආභතං කිඤ්චි ආහරිත්වා ඨපිතං, එවං අත්තනො කම්මුනා නික්ඛිත්තො නිරයෙ ඨපිතො එවාති අත්ථො. කායස්ස භෙදාති උපාදින්නක්ඛන්ධපරිච්චාගා. පරං මරණාති තදනන්තරං අභිනිබ්බත්තක්ඛන්ධග්ගහණෙ. අථ වා කායස්ස භෙදාති ජීවිතින්ද්රියස්ස උපච්ඡෙදා. පරං මරණාති චුතිතො උද්ධං. 'इमम्हि चायं समये' का अर्थ है इस काल में, या इस प्रत्यय-सामग्री में, और यह पुद्गल जवन-वीथि के बाद के भाग में काल (मृत्यु) करे - यह अर्थ है। क्योंकि जवन-क्षण में मृत्यु नहीं होती। 'यथाभतं निक्खित्तो एवं निरये' का अर्थ है जैसे कुछ लाकर रखा गया हो, वैसे ही अपने कर्म द्वारा नरक में रखा गया हो। 'कायस्स भेदा' का अर्थ है उपात्त स्कन्धों का परित्याग। 'परं मरणा' का अर्थ है उसके बाद अभिनिर्वृत्त (उत्पन्न) स्कन्धों के ग्रहण में। अथवा 'कायस्स भेदा' का अर्थ है जीवितिन्द्रिय का उच्छेद। 'परं मरणा' का अर्थ है च्युति (मृत्यु) के बाद। අපායන්තිආදි සබ්බං නිරයස්සෙව වෙවචනං. නිරයො හි අයසඞ්ඛාතා සුඛා අපෙතොති අපායො; සග්ගමොක්ඛහෙතුභූතා වා පුඤ්ඤසම්මතා අයා අපෙතොතිපි අපායො. දුක්ඛස්ස ගති පටිසරණන්ති දුග්ගති; දොසබහුලත්තා වා දුට්ඨෙන කම්මුනා නිබ්බත්තා ගතීතිපි දුග්ගති. විවසා නිපතන්ති එත්ථ දුක්කටකම්මකාරිනො, විනස්සන්තා වා එත්ථ නිපතන්ති සම්භිජ්ජමානඞ්ගපච්චඞ්ගාති විනිපාතො. නත්ථි එත්ථ අස්සාදසඤ්ඤිතො අයොති නිරස්සාදට්ඨෙන නිරයො. අථ වා අපායග්ගහණෙන තිරච්ඡානයොනි වුච්චති. තිරච්ඡානයොනි හි අපායො සුගතිතො අපෙතත්තා, න දුග්ගති මහෙසක්ඛානං නාගරාජාදීනං සම්භවතො. දුග්ගතිග්ගහණෙන පෙත්තිවිසයො. සො හි අපායො චෙව දුග්ගති ච සුගතිතො අපෙතත්තා දුක්ඛස්ස ච ගතිභූතත්තා, න විනිපාතො අසුරසදිසං අවිනිපාතත්තා. විනිපාතග්ගහණෙන අසුරකායො. සො හි යථාවුත්තෙන අත්ථෙන අපායො චෙව දුග්ගති ච, සබ්බසම්පත්තිසමුස්සයෙහි විනිපතිතත්තා විනිපාතොති ච වුච්චති. නිරයග්ගහණෙන අවීචිආදිඅනෙකප්පකාරො නිරයොව වුච්චති. ඉධ පන සබ්බපදෙහිපි නිරයොව වුත්තො. උපපජ්ජන්තීති පටිසන්ධිං ගණ්හන්ති. 'अपाय' आदि सब नरक के ही पर्यायवाची हैं। नरक 'अय' (सुख) से रहित होने के कारण 'अपाय' है; अथवा स्वर्ग और मोक्ष के हेतुभूत पुण्य-सम्मत 'अय' से रहित होने के कारण भी 'अपाय' है। दुःख की गति या शरण होने के कारण 'दुर्गति' है; अथवा दोषों की बहुलता के कारण दूषित कर्म से उत्पन्न गति होने के कारण भी 'दुर्गति' है। यहाँ दुष्कृत कर्म करने वाले विवश होकर गिरते हैं, अथवा यहाँ अंग-प्रत्यंगों के छिन्न-भिन्न होने से विनष्ट होते हुए गिरते हैं, इसलिए 'विनिपात' है। यहाँ 'अय' नामक आस्वाद नहीं है, इसलिए निरास्वाद होने के कारण 'निरय' है। अथवा 'अपाय' शब्द से तिर्यक्-योनि कही जाती है। तिर्यक्-योनि अपाय है क्योंकि वह सुगति से रहित है, किन्तु वह दुर्गति नहीं है क्योंकि वहाँ महेशाख्य नागराज आदि उत्पन्न होते हैं। 'दुर्गति' शब्द से प्रेत-विषय (प्रेत लोक) कहा जाता है। वह अपाय भी है और दुर्गति भी, क्योंकि वह सुगति से रहित है और दुःख की गति है, किन्तु वह विनिपात नहीं है क्योंकि वह असुरों के समान अविनिपात है। 'विनिपात' शब्द से असुर-निकाय कहा जाता है। वह पूर्वोक्त अर्थ में अपाय भी है और दुर्गति भी, और समस्त सम्पत्तियों के विनाश से पतित होने के कारण 'विनिपात' भी कहा जाता है। 'निरय' शब्द से अवीचि आदि अनेक प्रकार के नरक ही कहे जाते हैं। किन्तु यहाँ सभी पदों से नरक ही कहा गया है। 'उपपज्जन्ति' का अर्थ है प्रतिसन्धि ग्रहण करते हैं। ගාථාසු පඨමගාථා සඞ්ගීතිකාලෙ ධම්මසඞ්ගාහකත්ථෙරෙහි ඨපිතා. ඤත්වානාති පුබ්බකාලකිරියා. ඤාණපුබ්බකඤ්හි බ්යාකරණං. හෙතුඅත්ථො වා ත්වා-සද්දො යථා ‘‘සීහං දිස්වා භයං හොතී’’ති, ජානනහෙතූති අත්ථො[Pg.70]. බුද්ධො, භික්ඛූනං සන්තිකෙති බුද්ධො භගවා අත්තනො සන්තිකෙ භික්ඛූනං එතං පරතො ද්වීහි ගාථාහි වුච්චමානං අත්ථං බ්යාකාසි. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथाओं में प्रथम गाथा संगीति के समय धर्म-संग्राहक स्थविरों द्वारा स्थापित की गई है। 'नत्वान' पूर्वकालिक क्रिया है। ज्ञानपूर्वक ही व्याकरण (व्याख्या) होती है। अथवा 'त्वा' प्रत्यय हेतु के अर्थ में है, जैसे "सिंह को देखकर भय होता है", यहाँ 'जानने के कारण' यह अर्थ है। 'बुद्धो, भिक्खूनां सन्तिके' का अर्थ है बुद्ध भगवान ने अपने पास भिक्षुओं के समक्ष इसके बाद की दो गाथाओं में कहे जाने वाले अर्थ की व्याख्या की। शेष पूर्वोक्त रीति से ही है। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। දුතියවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। 3. තතියවග්ගො ३. तृतीय वर्ग। 1. පසන්නචිත්තසුත්තවණ්ණනා १. प्रसन्नचित्त सूत्र की व्याख्या। 21. තතියවග්ගස්ස පඨමෙ පසන්නචිත්තන්ති රතනත්තයසද්ධාය කම්මඵලසද්ධාය ච පසන්නමානසං. සුගතින්ති සුන්දරං ගතිං, සුඛස්ස වා ගතින්ති සුගතිං. සග්ගන්ති රූපාදිසම්පත්තීහි සුට්ඨු අග්ගන්ති සග්ගං. ලොකන්ති ලොකියන්ති එත්ථ පුඤ්ඤපාපඵලානි, ලුජ්ජනට්ඨෙනෙව වා ලොකං. එත්ථ ච සුගතිග්ගහණෙන මනුස්සගතිපි සඞ්ගය්හති, සග්ගග්ගහණෙන දෙවගති එව. සෙසං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. २१. तृतीय वर्ग के प्रथम (सूत्र) में 'प्रसन्नचित्त' का अर्थ है रत्नत्रय में श्रद्धा और कर्म-फल में श्रद्धा के कारण प्रसन्न मन वाला। 'सुगति' का अर्थ है सुन्दर गति, अथवा सुख की गति। 'स्वर्ग' का अर्थ है रूपादि सम्पत्तियों के कारण श्रेष्ठ (अग्र)। 'लोक' का अर्थ है जहाँ पुण्य-पाप के फलों का अनुभव किया जाता है, अथवा लुज्जन (नष्ट होने) के अर्थ में लोक। यहाँ 'सुगति' ग्रहण करने से मनुष्य-गति का भी संग्रह होता है, और 'स्वर्ग' ग्रहण करने से केवल देव-गति का। शेष पूर्वोक्त रीति से ही है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 2. මෙත්තසුත්තවණ්ණනා २. मैत्त सूत्र की व्याख्या। 22. දුතියෙ මා, භික්ඛවෙ, පුඤ්ඤානන්ති එත්ථ මාති පටිසෙධෙ නිපාතො. පුඤ්ඤසද්දො ‘‘කුසලානං, භික්ඛවෙ, ධම්මානං සමාදානහෙතු එවමිදං පුඤ්ඤං පවඩ්ඪතී’’තිආදීසු (දී. නි. 3.380) පුඤ්ඤඵලෙ ආගතො. ‘‘අවිජ්ජාගතොයං, භික්ඛවෙ, පුරිසපුග්ගලො පුඤ්ඤඤ්චෙ සඞ්ඛාරං අභිසඞ්ඛරොතී’’තිආදීසු (සං. නි. 2.51) කාමරූපාවචරසුචරිතෙ. ‘‘පුඤ්ඤූපගං භවති විඤ්ඤාණ’’න්තිආදීසු සුගතිවිසෙසභූතෙ උපපත්තිභවෙ. ‘‘තීණිමානි, භික්ඛවෙ, පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි – දානමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු, සීලමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු, භාවනාමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථූ’’තිආදීසු (ඉතිවු. 60; අ. නි. 8.36) කුසලචෙතනායං. ඉධ පන තෙභූමකකුසලධම්මෙ වෙදිතබ්බො. භායිත්ථාති එත්ථ දුවිධං භයං ඤාණභයං, සාරජ්ජභයන්ති. තත්ථ ‘‘යෙපි තෙ, භික්ඛවෙ, දෙවා දීඝායුකා වණ්ණවන්තො සුඛබහුලා උච්චෙසු විමානෙසු චිරට්ඨිතිකා[Pg.71], තෙපි තථාගතස්ස ධම්මදෙසනං සුත්වා යෙභුය්යෙන භයං සංවෙගං සන්තාසං ආපජ්ජන්තී’’තිආදීසු (අ. නි. 4.33) ආගතං ඤාණභයං. ‘‘අහුදෙව භයං, අහු ඡම්භිතත්තං, අහු ලොමහංසො’’තිආදීසු (දී. නි. 2.318) ආගතං සාරජ්ජභයං. ඉධාපි සාරජ්ජභයමෙව. අයඤ්හෙත්ථ අත්ථො – භික්ඛවෙ, දීඝරත්තං කායවචීසංයමො වත්තපටිවත්තපූරණං එකාසනං, එකසෙය්යං, ඉන්ද්රියදමො, ධුතධම්මෙහි චිත්තස්ස නිග්ගහො, සතිසම්පජඤ්ඤං, කම්මට්ඨානානුයොගවසෙන වීරියාරම්භොති එවමාදීනි යානි භික්ඛුනා, නිරන්තරං පවත්තෙතබ්බානි පුඤ්ඤානි, තෙහි මා භායිත්ථ, මා භයං සන්තාසං ආපජ්ජිත්ථ, එකච්චස්ස දිට්ඨධම්මසුඛස්ස උපරොධභයෙන සම්පරායිකනිබ්බානසුඛදායකෙහි පුඤ්ඤෙහි මා භායිත්ථාති. නිස්සක්කෙ හි ඉදං සාමිවචනං. २२. द्वितीय (वाक्य) में, 'मा, भिक्खवे, पुञ्ञानं' (भिक्षुओं, पुण्यों से मत डरो) यहाँ 'मा' निषेधार्थक निपात है। 'पुण्य' शब्द 'भिक्षुओं, कुशल धर्मों के समादान के कारण इस प्रकार यह पुण्य बढ़ता है' इत्यादि (दी. नि. 3.380) में पुण्य-फल के अर्थ में आया है। 'भिक्षुओं, यह अविद्यागत पुरुष यदि पुण्य रूपी संस्कार का अभिसंस्कार करता है' इत्यादि (सं. नि. 2.51) में कामावचर और रूपावचर सुचरित के अर्थ में है। 'पुण्योंपग विज्ञान होता है' इत्यादि में सुगति-विशेष रूप उपपत्ति-भव के अर्थ में है। 'भिक्षुओं, ये तीन पुण्य-क्रिया-वस्तुएँ हैं - दानमय, शीलमय और भावनामय' इत्यादि (इतिवु. 60; अ. नि. 8.36) में कुशल चेतना के अर्थ में है। किन्तु यहाँ इसे तीनों भूमियों (काम, रूप, अरूप) के कुशल धर्मों के रूप में समझना चाहिए। 'भायित्थ' (डरो) यहाँ दो प्रकार का भय है - ज्ञान-भय और सारज्ज-भय (संकोच या घबराहट का भय)। वहाँ 'भिक्षुओं, जो वे दीर्घायु, वर्णवान, अत्यधिक सुखी, ऊँचे विमानों में चिरकाल तक स्थित रहने वाले देवता हैं, वे भी तथागत की धर्म-देशना सुनकर प्रायः भय, संवेग और संत्रास को प्राप्त होते हैं' इत्यादि (अ. नि. 4.33) में आया हुआ ज्ञान-भय है। 'भय हुआ, चम्भितत्त (स्तब्धता) हुई, लोमहर्ष (रोमांच) हुआ' इत्यादि (दी. नि. 2.318) में आया हुआ सारज्ज-भय है। यहाँ भी सारज्ज-भय ही अभिप्रेत है। यहाँ यह अर्थ है - भिक्षुओं, दीर्घकाल तक काय-वाणी का संयम, व्रत-प्रतिव्रत की पूर्ति, एक आसन, एक शय्या, इन्द्रिय-दमन, धुत-धर्मों द्वारा चित्त का निग्रह, स्मृति-सम्प्रजन्य, कर्मस्थान के अनुयोग के वश में वीर्य का आरम्भ - इस प्रकार के जो पुण्य भिक्षु द्वारा निरन्तर प्रवृत्त किए जाने चाहिए, उनसे मत डरो, भय और संत्रास को प्राप्त मत हो; किसी ऐहिक (दृष्टधर्म) सुख के रुक जाने के भय से पारलौकिक निर्वाण-सुख देने वाले पुण्यों से मत डरो। यहाँ यह षष्ठी विभक्ति (पुञ्ञानं) अपादान (निसक्क) के अर्थ में है। ඉදානි තතො අභායිතබ්බභාවෙ කාරණං දස්සෙන්තො ‘‘සුඛස්සෙත’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ සුඛසද්දො ‘‘සුඛො බුද්ධානං උප්පාදො, සුඛා විරාගතා ලොකෙ’’තිආදීසු (ධ. ප. 194) සුඛමූලෙ ආගතො. ‘‘යස්මා ච ඛො, මහාලි, රූපං සුඛං සුඛානුපතිතං සුඛාවක්කන්ත’’න්තිආදීසු (සං. නි. 3.60) සුඛාරම්මණෙ. ‘‘යාවඤ්චිදං, භික්ඛවෙ, න සුකරං අක්ඛානෙන පාපුණිතුං යාව සුඛා සග්ගා’’තිආදීසු (ම. නි. 3.255) සුඛපච්චයට්ඨානෙ. ‘‘සුඛො පුඤ්ඤස්ස උච්චයො’’තිආදීසු (ධ. ප. 118) සුඛහෙතුම්හි. ‘‘දිට්ඨධම්මසුඛවිහාරා එතෙ ධම්මා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.82) අබ්යාපජ්ජෙ. ‘‘නිබ්බානං පරමං සුඛ’’න්තිආදීසු (ධ. ප. 204; ම. නි. 2.215) නිබ්බානෙ. ‘‘සුඛස්ස ච පහානා’’තිආදීසු (චූළනි. ඛග්ගවිසාණසුත්තනිද්දෙස 125) සුඛවෙදනායං. ‘‘අදුක්ඛමසුඛං සන්තං, සුඛමිච්චෙව භාසිත’’න්තිආදීසු (සං. නි. 4.253; ඉතිවු. 53) උපෙක්ඛාවෙදනායං. ‘‘ද්වෙපි මයා, ආනන්ද, වෙදනා වුත්තා පරියායෙන සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා’’තිආදීසු (ම. නි. 2.89) ඉට්ඨසුඛෙ. ‘‘සුඛො විපාකො පුඤ්ඤාන’’න්තිආදීසු (පෙටකො. 23) සුඛවිපාකෙ. ඉධාපි ඉට්ඨවිපාකෙ එව දට්ඨබ්බො. ඉට්ඨස්සාතිආදීසු එසිතබ්බතො අනිට්ඨපටික්ඛෙපතො ච ඉට්ඨස්ස, කමනීයතො මනස්මිඤ්ච කමනතො පවිසනතො කන්තස්ස, පියායිතබ්බතො සන්තප්පනතො ච පියස්ස, මානනීයතො මනස්ස පවඩ්ඪනතො ච මනාපස්සාති අත්ථො වෙදිතබ්බො. යදිදං පුඤ්ඤානීති ‘‘පුඤ්ඤානී’’ති යදිදං වචනං, එතං සුඛස්ස ඉට්ඨස්ස විපාකස්ස අධිවචනං නාමං, සුඛමෙව තං [Pg.72] යදිදං පුඤ්ඤන්ති ඵලෙන කාරණස්ස අභෙදූපචාරං වදති. තෙන කතූපචිතානං පුඤ්ඤානං අවස්සංභාවිඵලං සුත්වා අප්පමත්තෙන සක්කච්චං පුඤ්ඤානි කාතබ්බානීති පුඤ්ඤකිරියායං නියොජෙති, ආදරඤ්ච නෙසං තත්ථ උප්පාදෙති. अब उससे न डरने के कारण को दिखाते हुए 'सुखस्सेतं' इत्यादि कहा। वहाँ 'सुख' शब्द 'बुद्धों का उत्पन्न होना सुखद है, लोक में विरागता सुखद है' इत्यादि (ध. प. 194) में सुख के मूल के अर्थ में आया है। 'महालि, क्योंकि रूप सुख है, सुखानुगत है, सुखाक्रान्त है' इत्यादि (सं. नि. 3.60) में सुखद आलम्बन के अर्थ में है। 'भिक्षुओं, स्वर्ग के सुखों को वाणी से बताना उतना सुकर (आसान) नहीं है' इत्यादि (म. नि. 3.255) में सुख के प्रत्यय (कारण) के स्थान के अर्थ में है। 'पुण्य का संचय सुखद है' इत्यादि (ध. प. 118) में सुख के हेतु के अर्थ में है। 'ये धर्म दृष्टधर्म-सुख-विहार हैं' इत्यादि (म. नि. 1.82) में अव्यापद्य (दुःख-रहित) के अर्थ में है। 'निर्वाण परम सुख है' इत्यादि (ध. प. 204; म. नि. 2.215) में निर्वाण के अर्थ में है। 'सुख के प्रहाण से' इत्यादि (चूळनि. खग्गविसाणसुत्तनिद्देस 125) में सुख-वेदना के अर्थ में है। 'अदुःख-असुख शान्त को सुख ही कहा गया है' इत्यादि (सं. नि. 4.253; इतिवु. 53) में उपेक्षा-वेदना के अर्थ में है। 'आनन्द, मैंने पर्याय से दो वेदनाएँ कही हैं - सुख वेदना और दुःख वेदना' इत्यादि (म. नि. 2.89) में इष्ट सुख के अर्थ में है। 'पुण्यों का विपाक सुखद है' इत्यादि (पेटको. 23) में सुख-विपाक के अर्थ में है। यहाँ भी इसे इष्ट-विपाक के रूप में ही देखा जाना चाहिए। 'इष्ट' इत्यादि में - खोजे जाने योग्य होने से और अनिष्ट के प्रतिषेध होने से 'इष्ट', कमनीय होने से और मन में कमनीयता पूर्वक प्रवेश करने से 'कान्त', प्रिय होने योग्य होने से और सन्तप्त (तृप्त) करने से 'प्रिय', माननीय होने से और मन को बढ़ाने (प्रसन्न करने) से 'मनाप' - यह अर्थ समझना चाहिए। 'यदिदं पुञ्ञानि' (जो ये पुण्य हैं) - यह जो 'पुण्य' शब्द है, यह सुखद इष्ट विपाक का अधिवाचन (पर्यायवाची) नाम है; 'जो यह पुण्य है वह सुख ही है' - इस प्रकार फल और कारण में अभेद-उपचार (अभेद मान लेना) करके कहा गया है। इससे किए हुए और संचित पुण्यों के अवश्यम्भावी फल को सुनकर, अप्रमाद पूर्वक आदर के साथ पुण्य करने चाहिए - इस प्रकार वह पुण्य-क्रिया में नियोजित करता है और उनके प्रति आदर उत्पन्न करता है। ඉදානි අත්තනා සුනෙත්තකාලෙ කතෙන පුඤ්ඤකම්මෙන දීඝරත්තං පච්චනුභූතං භවන්තරපටිච්ඡන්නං උළාරතමං පුඤ්ඤවිපාකං උදාහරිත්වා තමත්ථං පාකටං කරොන්තො ‘‘අභිජානාමි ඛො පනාහ’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ අභිජානාමීති අභිවිසිට්ඨෙන ඤාණෙන ජානාමි, පච්චක්ඛතො බුජ්ඣාමි. දීඝරත්තන්ති චිරකාලං. පුඤ්ඤානන්ති දානාදිකුසලධම්මානං. සත්ත වස්සානීති සත්ත සංවච්ඡරානි. මෙත්තචිත්තන්ති මිජ්ජතීති මෙත්තා, සිනිය්හතීති අත්ථො. මිත්තෙ භවා, මිත්තස්ස වා එසා පවත්තීතිපි මෙත්තා. ලක්ඛණාදිතො පන හිතාකාරප්පවත්තිලක්ඛණා, හිතූපසංහාරරසා, ආඝාතවිනයපච්චුපට්ඨානා, සත්තානං මනාපභාවදස්සනපදට්ඨානා. බ්යාපාදූපසමො එතිස්සා සම්පත්ති, සිනෙහාසම්භවො විපත්ති. සා එතස්ස අත්ථීති මෙත්තචිත්තං. භාවෙත්වාති මෙත්තාසහගතං චිත්තං, චිත්තසීසෙන සමාධි වුත්තොති මෙත්තාසමාධිං මෙත්තාබ්රහ්මවිහාරං උප්පාදෙත්වා චෙව වඩ්ඪෙත්වා ච. සත්ත සංවට්ටවිවට්ටකප්පෙති සත්ත මහාකප්පෙ. සංවට්ට-විවට්ටග්ගහණෙනෙව හි සංවට්ටට්ඨායි-විවට්ටට්ඨායිනොපි ගහිතා. ඉමං ලොකන්ති කාමලොකං. සංවට්ටමානෙ සුදන්ති සංවට්ටමානෙ. සුදන්ති නිපාතමත්තං විනස්සමානෙති අත්ථො. ‘‘සංවත්තමානෙ සුද’’න්ති ච පඨන්ති. කප්පෙති කාලෙ. කප්පසීසෙන හි කාලො වුත්තො. කාලෙ ඛීයමානෙ කප්පොපි ඛීයතෙව. යථාහ – अब स्वयं के द्वारा सुनेत्त के समय में किए गए पुण्यकर्म के द्वारा दीर्घकाल तक अनुभव किए गए, भवान्तरों में छिपे हुए अत्यंत उदार पुण्य-विपाक का उदाहरण देते हुए उस अर्थ को स्पष्ट करते हुए 'अभिजानामि खो पनाहं' (मैं भली-भाँति जानता हूँ) आदि कहा। वहाँ 'अभिजानामि' का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान से जानता हूँ, प्रत्यक्ष रूप से समझता हूँ। 'दीघरत्तं' का अर्थ है चिरकाल तक। 'पुञ्ञानं' का अर्थ है दान आदि कुशल धर्मों का। 'सत्त वस्सानी' का अर्थ है सात वर्ष। 'मेत्तचित्तं' का अर्थ है - जो स्निग्ध होता है वह 'मेत्ता' (मैत्री) है, अर्थात् स्नेह करता है। मित्रों में होने वाली या मित्र की यह प्रवृत्ति है, इसलिए भी मैत्री है। लक्षणों आदि के दृष्टिकोण से, हित के आकार में प्रवृत्त होना इसका लक्षण है, हित पहुँचाना इसका रस (कार्य) है, आघात (क्रोध) का दमन इसका प्रत्युपस्थान (प्रकटीकरण) है, और प्राणियों के प्रिय भाव को देखना इसका पदस्थान (निकट कारण) है। व्यापाद (द्वेष) का उपशम इसकी सम्पत्ति है, और (रागयुक्त) स्नेह का उत्पन्न होना इसकी विपत्ति है। वह (मैत्री) जिसके चित्त में है, वह 'मेत्तचित्त' है। 'भावेत्वा' का अर्थ है मैत्रीयुक्त चित्त को; यहाँ चित्त के माध्यम से समाधि कही गई है, अतः मैत्री-समाधि और मैत्री-ब्रह्मविहार को उत्पन्न करके और बढ़ाकर। 'सत्त संवट्टविवट्टकप्पे' का अर्थ है सात महाकल्प। संवर्त-विवर्त के ग्रहण से ही संवर्तस्थायी और विवर्तस्थायी का भी ग्रहण हो जाता है। 'इमं लोकं' का अर्थ है कामलोक। 'संवट्टमाने सुदं' का अर्थ है संवर्त (विनाश) होते समय। 'सुदं' केवल निपात है, विनाश होते समय यह अर्थ है। 'संवट्टमाने सुदं' ऐसा भी पढ़ते हैं। 'कप्पे' का अर्थ है काल में। कल्प के माध्यम से काल कहा गया है। काल के क्षीण होने पर कल्प भी क्षीण होता ही है। जैसा कि कहा है – ‘‘කාලො ඝසති භූතානි, සබ්බානෙව සහත්තනා’’ති. (ජා. 1.2.190); “काल सभी प्राणियों को स्वयं के साथ ही निगल जाता है।” (जातक 1.2.190); ‘‘ආභස්සරූපගො හොමී’’ති වුත්තත්තා තෙජොසංවට්ටවසෙනෙත්ථ කප්පවුට්ඨානං වෙදිතබ්බං. ආභස්සරූපගොති තත්ථ පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන ආභස්සරබ්රහ්මලොකං උපගච්ඡාමීති ආභස්සරූපගො හොමි. විවට්ටමානෙති සණ්ඨහමානෙ, ජායමානෙති අත්ථො. සුඤ්ඤං බ්රහ්මවිමානං උපපජ්ජාමීති කස්සචි සත්තස්ස තත්ථ නිබ්බත්තස්ස අභාවතො සුඤ්ඤං, යං පඨමජ්ඣානභූමිසඞ්ඛාතං බ්රහ්මවිමානං ආදිතො නිබ්බත්තං, තං පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන උපපජ්ජාමි උපෙමි. බ්රහ්මාති කාමාවචරසත්තෙහි සෙට්ඨට්ඨෙන තථා තථා බ්රූහිතගුණතාය බ්රහ්මවිහාරතො නිබ්බත්තට්ඨෙන ච බ්රහ්මා. බ්රහ්මපාරිසජ්ජබ්රහ්මපුරොහිතෙහි මහන්තො බ්රහ්මාති මහාබ්රහ්මා. තතො එව තෙ අභිභවිත්වා ඨිතත්තා [Pg.73] අභිභූ. තෙහි කෙනචි ගුණෙන න අභිභූතොති අනභිභූතො. අඤ්ඤදත්ථූති එකංසවචනෙ නිපාතො. දසොති දස්සනසීලො, සො අතීතානාගතපච්චුප්පන්නානං දස්සනසමත්ථො, අභිඤ්ඤාණෙන පස්සිතබ්බං පස්සාමීති අත්ථො. සෙසබ්රහ්මානං ඉද්ධිපාදභාවනාබලෙන අත්තනො චිත්තඤ්ච මම වසෙ වත්තෙමීති වසවත්තී හොමීති යොජෙතබ්බං. තදා කිර බොධිසත්තො අට්ඨසමාපත්තිලාභීපි සමානො තථා සත්තහිතං අත්තනො පාරමිපරිපූරණඤ්ච ඔලොකෙන්තො තාසු එව ද්වීසු ඣානභූමීසු නිකන්තිං උප්පාදෙත්වා මෙත්තාබ්රහ්මවිහාරවසෙන අපරාපරං සංසරි. තෙන වුත්තං ‘‘සත්තවස්සානි…පෙ… වසවත්තී’’ති. 'आभस्सरूपगो होमि' (मैं आभास्वर लोक को प्राप्त होने वाला होता हूँ) ऐसा कहे जाने के कारण यहाँ तेज-संवर्त (अग्नि द्वारा विनाश) के वश से कल्प का उत्थान समझना चाहिए। 'आभस्सरूपगो' का अर्थ है वहाँ प्रतिसन्धि ग्रहण करने के कारण आभास्वर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ, इसलिए 'आभस्सरूपगो होमि' कहा। 'विवट्टमाने' का अर्थ है संस्थित होते समय, अर्थात् उत्पन्न होते समय। 'सुञ्ञं ब्रह्मविमानं उपपज्जामि' का अर्थ है - किसी प्राणी के वहाँ उत्पन्न न होने के कारण शून्य, जो प्रथम ध्यान भूमि संज्ञक ब्रह्मविमान आदि में उत्पन्न हुआ, उसे प्रतिसन्धि ग्रहण करने के कारण प्राप्त होता हूँ। 'ब्रह्मा' का अर्थ है - कामावचर प्राणियों से श्रेष्ठ होने के कारण और उन-उन गुणों की वृद्धि के कारण तथा ब्रह्मविहार से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मा है। ब्रह्मपारिषद्य और ब्रह्मपुरोहितों से महान होने के कारण 'महाब्रह्मा' है। उन्हीं को अभिभूत (पराजित) करके स्थित होने के कारण 'अभिभू' है। उनके द्वारा किसी भी गुण में अभिभूत न होने के कारण 'अनभिभूत' है। 'अञ्ञदत्थु' यह निश्चित अर्थ में निपात है। 'दसो' का अर्थ है देखने के स्वभाव वाला, वह अतीत, अनागत और वर्तमान को देखने में समर्थ है, अभिज्ञान से जो देखा जाना चाहिए उसे देखता हूँ, यह अर्थ है। शेष ब्रह्माओं के ऋद्धिपाद भावना के बल से अपने चित्त को और (उनके चित्त को) अपने वश में करता हूँ, इसलिए 'वसवत्ती होमि' (वशवर्ती होता हूँ) ऐसा जोड़ना चाहिए। उस समय बोधिसत्व आठ समापत्तियों के लाभ होने पर भी, प्राणियों के हित और अपनी पारमिताओं की परिपूर्णता को देखते हुए, उन्हीं दो ध्यान भूमियों में आसक्ति उत्पन्न कर मैत्री-ब्रह्मविहार के वश से बार-बार संसार में रहे। इसीलिए कहा गया - 'सत्तवस्सानी...पे... वसवत्ती' इति। එවං භගවා රූපාවචරපුඤ්ඤස්ස විපාකමහන්තතං පකාසෙත්වා ඉදානි කාමාවචරපුඤ්ඤස්සාපි තං දස්සෙන්තො ‘‘ඡත්තිංසක්ඛත්තු’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ සක්කො අහොසින්ති ඡත්තිංස වාරෙ අඤ්ඤත්ථ අනුපපජ්ජිත්වා නිරන්තරං සක්කො දෙවානමින්දො තාවතිංසදෙවරාජා අහොසි. රාජා අහොසින්තිආදීසු චතූහි අච්ඡරියධම්මෙහි චතූහි ච සඞ්ගහවත්ථූහි ලොකං රඤ්ජෙතීති රාජා. චක්කරතනං වත්තෙති, චතූහි සම්පත්තිචක්කෙහි වත්තති, තෙහි ච පරං වත්තෙති, පරහිතාය ච ඉරියාපථචක්කානං වත්තො එතස්මිං අත්ථීති චක්කවත්තී. රාජාති චෙත්ථ සාමඤ්ඤං, චක්කවත්තීති විසෙසං. ධම්මෙන චරතීති ධම්මිකො. ඤායෙන සමෙන වත්තතීති අත්ථො. ධම්මෙනෙව රජ්ජං ලභිත්වා රාජා ජාතොති ධම්මරාජා. පරහිතධම්මචරණෙන වා ධම්මිකො, අත්තහිතධම්මචරණෙන ධම්මරාජා, චතුරන්තාය ඉස්සරොති චාතුරන්තො, චතුසමුද්දන්තාය චතුබ්බිධදීපවිභූසිතාය ච පථවියා ඉස්සරොති අත්ථො. අජ්ඣත්තං කොපාදිපච්චත්ථිකෙ, බහිද්ධා ච සබ්බරාජානො අදණ්ඩෙන අසත්ථෙන විජෙසීති විජිතාවී. ජනපදෙ ථාවරභාවං ධුවභාවං පත්තො, න සක්කා කෙනචි තතො චාලෙතුං ජනපදො වා තම්හි ථාවරියප්පත්තො අනුයුත්තො සකම්මනිරතො අචලො අසම්පවෙධීති ජනපදත්ථාවරියප්පත්තො. इस प्रकार भगवान ने रूपावचर पुण्य के विपाक की महानता को प्रकाशित कर, अब कामावचर पुण्य की भी उसे दिखाते हुए 'छत्तिंसक्खत्तुं' (छत्तीस बार) आदि कहा। वहाँ 'सक्को अहोंसि' का अर्थ है - छत्तीस बार अन्यत्र उत्पन्न न होकर निरंतर शक्र, देवों के इन्द्र, तावतिंस देवराज हुए। 'राजा अहोंसि' आदि में चार आश्चर्यजनक धर्मों और चार संग्रह-वस्तुओं से लोक को प्रसन्न करता है, इसलिए 'राजा' है। चक्र-रत्न को प्रवर्तित करता है, चार सम्पत्ति-चक्रों से युक्त है, और उनके द्वारा दूसरों को प्रवर्तित करता है, और परहित के लिए ईर्यापथ-चक्रों का वर्तन इसमें है, इसलिए 'चक्कवत्ती' (चक्रवर्ती) है। यहाँ 'राजा' सामान्य शब्द है और 'चक्कवत्ती' विशेष। 'धम्मेन चरति' का अर्थ है 'धम्मिको' (धार्मिक)। न्याय और समता से व्यवहार करता है, यह अर्थ है। धर्म से ही राज्य प्राप्त कर राजा बना, इसलिए 'धम्मराजा' है। अथवा परहित रूप धर्म के आचरण से 'धम्मिक' और आत्महित रूप धर्म के आचरण से 'धम्मराजा' है। चारों दिशाओं का स्वामी होने के कारण 'चातुरन्तो' है, अर्थात् चारों समुद्रों तक फैली हुई और चार प्रकार के द्वीपों से सुशोभित पृथ्वी का स्वामी है। अध्यात्म (भीतर) में क्रोध आदि शत्रुओं को और बाहर सभी राजाओं को बिना दण्ड और बिना शस्त्र के जीत लिया, इसलिए 'विजितावी' (विजेता) है। जनपद में स्थावर भाव (स्थिरता) को प्राप्त हुआ, जिसे किसी के द्वारा वहाँ से विचलित नहीं किया जा सकता, अथवा जनपद जिसमें स्थिरता को प्राप्त, अनुगत, अपने कर्म में निरत, अचल और अकम्प है, वह 'जनपदत्थावरियप्पत्तो' है। චක්කරතනං, හත්ථිරතනං, අස්සරතනං, මණිරතනං, ඉත්ථිරතනං, ගහපතිරතනං, පරිණායකරතනන්ති ඉමෙහි සත්තහි රතනෙහි සමුපෙතොති සත්තරතනසමන්නාගතො. තෙසු හි රාජා චක්කවත්ති චක්කරතනෙන අජිතං ජිනාති, හත්ථිඅස්සරතනෙහි විජිතෙ සුඛෙනෙව අනුවිචරති, පරිණායකරතනෙන විජිතමනුරක්ඛති, සෙසෙහි උපභොගසුඛමනුභවති. පඨමෙන චස්ස උස්සාහසත්තියොගො[Pg.74], පච්ඡිමෙන මන්තසත්තියොගො, හත්ථිඅස්සගහපතිරතනෙහි පභූසත්තියොගො සුපරිපුණ්ණො හොති, ඉත්ථිමණිරතනෙහි තිවිධසත්තියොගඵලං. සො ඉත්ථිමණිරතනෙහි පරිභොගසුඛමනුභවති, සෙසෙහි උපභොගසුඛං. විසෙසතො චස්ස පුරිමානි තීණි අදොසකුසලමූලජනිතකම්මානුභාවෙන සම්පජ්ජන්ති, මජ්ඣිමානි අලොභකුසලමූලජනිතකම්මානුභාවෙන, පච්ඡිමමෙකං අමොහකුසලමූලජනිතකම්මානුභාවෙනාති වෙදිතබ්බං පදෙසරජ්ජස්සාති ඛුද්දකරජ්ජස්ස. चक्ररत्न, हस्तिरत्न, अश्वरत्न, मणिरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतिरत्न और परिणायकरत्न—इन सात रत्नों से युक्त होने के कारण वह 'सप्तरत्न-समन्वागत' कहलाता है। उनमें से चक्रवर्ती राजा चक्ररत्न के द्वारा अविजित को जीतता है, हस्ति और अश्वरत्नों के द्वारा विजित (राज्य) में सुखपूर्वक विचरण करता है, परिणायकरत्न के द्वारा विजित की रक्षा करता है, और शेष रत्नों से उपभोग-सुख का अनुभव करता है। पहले (चक्ररत्न) से उसकी उत्साह-शक्ति का योग, अंतिम (परिणायकरत्न) से मन्त्र-शक्ति का योग, और हस्ति, अश्व तथा गृहपति रत्नों से प्रभु-शक्ति का योग पूर्ण होता है; स्त्री और मणिरत्नों से त्रिविध शक्ति-योग का फल प्राप्त होता है। वह स्त्री और मणिरत्नों से परिभोग-सुख का अनुभव करता है, और शेष से उपभोग-सुख का। विशेष रूप से, उसके पहले तीन रत्न अद्वेष-कुशलमूल से जनित कर्मों के प्रभाव से प्राप्त होते हैं, मध्य के तीन अलोभ-कुशलमूल से जनित कर्मों के प्रभाव से, और अंतिम एक अमोह-कुशलमूल से जनित कर्मों के प्रभाव से—ऐसा प्रादेशिक राज्य (क्षुद्र राज्य) के विषय में समझना चाहिए। එතදහොසීති අත්තනො සම්පත්තියො පච්චවෙක්ඛන්තස්ස පච්ඡිමෙ චක්කවත්තිකාලෙ එතං ‘‘කිස්ස නු ඛො මෙ ඉදං කම්මස්ස ඵල’’න්තිආදිකං අහොසි. සබ්බත්ථකමෙව තස්මිං තස්මිම්පි භවෙ එතදහොසියෙව. තත්ථායං චක්කවත්තිකාලවසෙන යොජනා. එවංමහිද්ධිකොති මණිරතනහත්ථිරතනාදිප්පමුඛාය කොසවාහනසම්පත්තියා ජනපදත්ථාවරියප්පත්තියා ච එවංමහිද්ධිකො. එවංමහානුභාවොති චක්කරතනාදිසමන්නාගමෙන කස්සචිපි පීළං අකරොන්තොව සබ්බරාජූහි සිරසා සම්පටිච්ඡිතසාසනවෙහාසගමනාදීහි එවං මහානුභාවො. දානස්සාති අන්නාදිදෙය්යධම්මපරිච්චාගස්ස. දමස්සාති චක්ඛාදිඉන්ද්රියදමනස්ස චෙව සමාධානවසෙන රාගාදිකිලෙසදමනස්ස ච. සංයමස්සාති කායවචීසංයමස්ස. තත්ථ යං සමාධානවසෙන කිලෙසදමනං, තං භාවනාමයං පුඤ්ඤං, තඤ්ච ඛො මෙත්තාබ්රහ්මවිහාරභූතං ඉධාධිප්පෙතං. තස්මිඤ්ච උපචාරප්පනාභෙදෙන දුවිධෙ යං අප්පනාප්පත්තං, තෙනස්ස යථාවුත්තාසු ද්වීසු ඣානභූමීසු උපපත්ති අහොසි. ඉතරෙන තිවිධෙනාපි යථාරහං පත්තචක්කවත්තිආදිභාවොති වෙදිතබ්බං. ‘ऐसा हुआ’—यह अपनी संपत्तियों का प्रत्यवेक्षण करते हुए अंतिम चक्रवर्ती काल में ‘यह मेरे किस कर्म का फल है’ आदि विचार उत्पन्न हुआ। सभी स्थानों पर और उन-उन भवों में भी ऐसा ही हुआ। यहाँ यह चक्रवर्ती काल के अनुसार योजना है। ‘ऐसा महाऋद्धिमान’—मणिरत्न, हस्तिरत्न आदि प्रमुख कोष और वाहन की संपत्ति से तथा जनपद की स्थिरता प्राप्त करने से वह ऐसा महाऋद्धिमान है। ‘ऐसा महानुभाव’—चक्ररत्न आदि से संपन्न होने के कारण किसी को भी पीड़ा न पहुँचाते हुए सभी राजाओं द्वारा सिर झुकाकर शासन स्वीकार किए जाने और आकाश-गमन आदि के कारण वह ऐसा महानुभाव है। ‘दान का’—अन्न आदि देय वस्तुओं के त्याग का। ‘दम का’—चक्षु आदि इन्द्रियों के दमन का और समाधि के द्वारा राग आदि क्लेशों के दमन का। ‘संयम का’—काय और वाणी के संयम का। वहाँ जो समाधि के द्वारा क्लेशों का दमन है, वह भावनामय पुण्य है, और वह यहाँ मैत्री-ब्रह्मविहार के रूप में अभिप्रेत है। उसमें भी उपचार और अर्पणा के भेद से दो प्रकारों में जो अर्पणा को प्राप्त है, उससे उसकी यथाकथित दो ध्यान-भूमियों में उत्पत्ति हुई। शेष तीन प्रकारों से यथायोग्य चक्रवर्ती आदि भाव की प्राप्ति हुई—ऐसा समझना चाहिए। ඉති භගවා අත්තානං කායසක්ඛි කත්වා පුඤ්ඤානං විපාකමහන්තතං පකාසෙත්වා ඉදානි තමෙවත්ථං ගාථාබන්ධෙන දස්සෙන්තො ‘‘පුඤ්ඤමෙවා’’තිආදිමාහ. තත්ථ පුඤ්ඤමෙව සො සික්ඛෙය්යාති යො අත්ථකාමො කුලපුත්තො, සො පුඤ්ඤඵලනිබ්බත්තනතො, අත්තනො සන්තානං පුනනතො ච ‘‘පුඤ්ඤ’’න්ති ලද්ධනාමං තිවිධං කුසලමෙව සික්ඛෙය්ය නිවෙසෙය්ය උපචිනෙය්ය පසවෙය්යාති අත්ථො. ආයතග්ගන්ති විපුලඵලතාය උළාරඵලතාය ආයතග්ගං, පියමනාපඵලතාය වා ආයතිං උත්තමන්ති ආයතග්ගං, ආයෙන වා යොනිසොමනසිකාරාදිප්පච්චයෙන උළාරතමෙන අග්ගන්ති ආයතග්ගං[Pg.75]. තකාරො පදසන්ධිකරො. අථ වා ආයෙන පුඤ්ඤඵලෙන අග්ගං පධානන්ති ආයතග්ගං. තතො එව සුඛුද්රයං සුඛවිපාකන්ති අත්ථො. इस प्रकार भगवान ने स्वयं को काय-साक्षी बनाकर पुण्यों के विपाक की महानता को प्रकाशित किया और अब उसी अर्थ को गाथा-बद्ध रूप में दिखाते हुए ‘पुण्य ही’ आदि कहा। वहाँ ‘पुण्य ही उसे सीखना चाहिए’—जो अर्थ-कामी कुलपुत्र है, वह पुण्य-फल को उत्पन्न करने के कारण और अपनी संतान (चित्त-संतति) को पवित्र करने के कारण ‘पुण्य’ नाम वाले त्रिविध कुशल का ही अभ्यास करे, उसे प्रतिष्ठित करे, संचित करे और उत्पन्न करे—यह अर्थ है। ‘आयतमग्र’—विपुल फल होने के कारण या उदार फल होने के कारण आयतमग्र है, अथवा प्रिय और मनोनुकूल फल होने के कारण भविष्य में उत्तम होने से आयतमग्र है, अथवा ‘आय’ (कारण) जैसे योनिषो मनसिकार आदि प्रत्ययों के द्वारा अत्यंत उदार होने से अग्र होने के कारण आयतमग्र है। ‘त’ कार पद-संधि के लिए है। अथवा ‘आय’ यानी पुण्य-फल के कारण अग्र (प्रधान) होने से आयतमग्र है। उससे ही ‘सुखुद्रय’ यानी सुखद विपाक वाला—यह अर्थ है। කතමං පන තං පුඤ්ඤං, කථඤ්ච නං සික්ඛෙය්යාති ආහ ‘‘දානඤ්ච සමචරියඤ්ච, මෙත්තචිත්තඤ්ච භාවයෙ’’ති. තත්ථ සමචරියන්ති කායවිසමාදීනි වජ්ජෙත්වා කායසමාදිචරිතං, සුවිසුද්ධං සීලන්ති අත්ථො. භාවයෙති අත්තනො සන්තානෙ උප්පාදෙය්ය වඩ්ඪෙය්ය. එතෙ ධම්මෙති එතෙ දානාදිකෙ සුචරිතධම්මෙ. සුඛසමුද්දයෙති සුඛානිසංසෙ, ආනිසංසඵලම්පි නෙසං සුඛමෙවාති දස්සෙති. අබ්යාපජ්ජං සුඛං ලොකන්ති කාමච්ඡන්දාදිබ්යාපාදවිරහිතත්තා අබ්යාපජ්ජං නිද්දුක්ඛං, පරපීළාභාවෙ පන වත්තබ්බං නත්ථි. ඣානසමාපත්තිවසෙන සුඛබහුලත්තා සුඛං, එකන්තසුඛඤ්ච බ්රහ්මලොකං ඣානපුඤ්ඤානං, ඉතරපුඤ්ඤානං පන තදඤ්ඤං සම්පත්තිභවසඞ්ඛාතං සුඛං ලොකං පණ්ඩිතො සප්පඤ්ඤො උපපජ්ජති උපෙති. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ ගාථාසු ච වට්ටසම්පත්ති එව කථිතා. वह पुण्य कौन सा है और उसे कैसे सीखना चाहिए? इसके लिए कहा—‘दान, समचर्या और मैत्री-चित्त की भावना करे’। वहाँ ‘समचर्या’ का अर्थ है—कायिक विषमता आदि को त्यागकर कायिक समता का आचरण, अर्थात सुविशुद्ध शील। ‘भावना करे’—अपनी चित्त-संतति में उत्पन्न करे और बढ़ाए। ‘इन धर्मों को’—इन दान आदि सुचरित धर्मों को। ‘सुख-समुदय’—सुखद परिणामों वाले, यह दिखाता है कि इनका फल भी सुख ही है। ‘अव्यापज्ज्य सुख लोक’—कामछन्द और व्यापाद से रहित होने के कारण अव्यापज्ज्य (दुःख रहित), दूसरों को पीड़ा न होने के विषय में तो कहना ही क्या है। ध्यान-समापत्ति के कारण सुख की बहुलता होने से ‘सुख’ है, और ब्रह्मलोक ध्यान-पुण्यों का एकांत सुख है; अन्य पुण्यों के लिए उससे भिन्न संपत्ति-भव रूप सुखद लोक को पंडित (बुद्धिमान) प्राप्त करता है। इस प्रकार इस सूत्र और गाथाओं में केवल वट्ट-संपत्ति (संसार की संपत्ति) ही कही गई है। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. උභයත්ථසුත්තවණ්ණනා ३. उभयत्थ सूत्र की व्याख्या 23. තතියෙ භාවිතොති උප්පාදිතො ච වඩ්ඪිතො ච. බහුලීකතොති පුනප්පුනං කතො. අත්ථොති හිතං. තඤ්හි අරණීයතො උපගන්තබ්බතො අත්ථොති වුච්චති. සමධිගය්හ තිට්ඨතීති සම්මා පරිග්ගහෙත්වා අවිජහිත්වා වත්තති. දිට්ඨධම්මිකන්ති දිට්ඨධම්මො වුච්චති පච්චක්ඛභූතො අත්තභාවො, දිට්ඨධම්මෙ භවං දිට්ඨධම්මිකං, ඉධලොකපරියාපන්නන්ති අත්ථො. සම්පරායිකන්ති ධම්මවසෙන සම්පරෙතබ්බතො සම්පරායො, පරලොකො, සම්පරායෙ භවං සම්පරායිකං, පරලොකපරියාපන්නන්ති වුත්තං හොති. २३. तीसरे (सूत्र) में ‘भावित’ का अर्थ है—उत्पन्न किया हुआ और बढ़ाया हुआ। ‘बहुलीकृत’ का अर्थ है—बार-बार किया हुआ। ‘अर्थ’ का अर्थ है—हित। क्योंकि वह प्राप्त करने योग्य होने के कारण ‘अर्थ’ कहलाता है। ‘समधिगृह्य तिष्ठति’—भली-भाँति ग्रहण करके, बिना छोड़े प्रवृत्त होता है। ‘दृष्टधार्मिक’—प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान आत्मभाव (वर्तमान जीवन) को ‘दृष्टधर्म’ कहा जाता है, दृष्टधर्म में होने वाला ‘दृष्टधार्मिक’ है, अर्थात इहलोक से संबंधित। ‘साम्परायिक’—धर्म के अनुसार गमन करने योग्य होने से ‘संपराय’ परलोक है, संपराय में होने वाला ‘साम्परायिक’ है, अर्थात परलोक से संबंधित—यह कहा गया है। කො පනෙස දිට්ඨධම්මිකො නාම අත්ථො, කො වා සම්පරායිකොති? සඞ්ඛෙපෙන තාව යං ඉධලොකසුඛං, යඤ්චෙතරහි ඉධලොකසුඛාවහං, අයං දිට්ඨධම්මිකො අත්ථො. සෙය්යථිදං – ගහට්ඨානං තාව ඉධ යං කිඤ්චි විත්තූපකරණං, අනාකුලකම්මන්තතා, ආරොග්යසංවිධානං, වත්ථුවිසදකිරියායොගවිහිතානි සිප්පායතනවිජ්ජාට්ඨානානි සඞ්ගහිතපරිජනතාති එවමාදි. පබ්බජිතානං පන යෙ ඉමෙ ජීවිතපරික්ඛාරා චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානප්පච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරා. තෙසං අකිච්ඡලාභො, තත්ථ ච සඞ්ඛාය පටිසෙවනා[Pg.76], සඞ්ඛාය පරිවජ්ජනා, වත්ථුවිසදකිරියා, අප්පිච්ඡතා, සන්තුට්ඨි, පවිවෙකො, අසංසග්ගොති එවමාදි. පතිරූපදෙසවාසසප්පුරිසූපනිස්සයසද්ධම්මස්සවනයොනිසොමනසිකාරාදයො පන උභයෙසං සාධාරණා උභයානුරූපා චාති වෙදිතබ්බා. यह 'दृष्टधार्मिक' (वर्तमान जीवन का) अर्थ क्या है, और 'साम्परायिक' (परलोक का) अर्थ क्या है? संक्षेप में, जो इस लोक का सुख है और जो वर्तमान में इस लोक के सुख को लाने वाला है, वह 'दृष्टधार्मिक' अर्थ है। जैसे कि - गृहस्थों के लिए यहाँ जो कुछ भी धन-उपकरण, व्याकुलता रहित कर्म, आरोग्य का विधान, वस्तुओं की निर्मलता की क्रिया के योग से विहित शिल्प-स्थान और विद्या-स्थान, परिजनों का संग्रह आदि। प्रव्रजितों (भिक्षुओं) के लिए जो ये जीवन के परिष्कार हैं - चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार। उनका बिना कठिनाई के लाभ, और वहाँ समझ-बूझकर सेवन करना, समझ-बूझकर वर्जन करना, वस्तुओं की निर्मलता की क्रिया, अल्पेच्छता, संतुष्टि, प्रविवेक, असंसर्ग आदि। प्रतिरूप देश में निवास, सत्पुरुषों का आश्रय, सद्धर्म का श्रवण और योनिषो मनसिकार आदि दोनों के लिए साधारण और दोनों के अनुरूप समझने चाहिए। අප්පමාදොති එත්ථ අප්පමාදො පමාදප්පටිපක්ඛතො වෙදිතබ්බො. කො පනෙස පමාදො නාම? පමජ්ජනාකාරො. වුත්තං හෙතං – 'अप्रमाद' - यहाँ अप्रमाद को प्रमाद के प्रतिपक्ष के रूप में समझना चाहिए। यह 'प्रमाद' क्या है? प्रमाद करने का ढंग। क्योंकि यह कहा गया है - ‘‘තත්ථ කතමො පමාදො? කායදුච්චරිතෙ වා වචීදුච්චරිතෙ වා මනොදුච්චරිතෙ වා පඤ්චසු වා කාමගුණෙසු චිත්තස්ස වොස්සග්ගො වොස්සග්ගානුප්පාදනං කුසලානං වා ධම්මානං භාවනාය අසක්කච්චකිරියතා අසාතච්චකිරියතා අනට්ඨිතකිරියතා ඔලීනවුත්තිතා නික්ඛිත්තඡන්දතා නික්ඛිත්තධුරතා අනාසෙවනා අභාවනා අබහුලීකම්මං අනධිට්ඨානං අනනුයොගොපමාදො. යො එවරූපො පමාදො පමජ්ජනා පමජ්ජිතත්තං. අයං වුච්චති පමාදො’’ති (විභ. 846). “वहाँ प्रमाद क्या है? काय-दुश्चरित में, या वच-दुश्चरित में, या मनो-दुश्चरित में, या पाँच काम-गुणों में चित्त का उत्सर्ग (छोड़ देना), उत्सर्ग का अनुप्रदान, कुशल धर्मों की भावना में अनादरपूर्वक कार्य करना, निरंतरता का अभाव, अनवस्थित कार्य करना, लीन वृत्ति, त्यागा हुआ छन्द, त्यागा हुआ धुर, सेवन न करना, भावना न करना, बहुलीकरण न करना, अधिष्ठान न करना, अनुयोग न करना ही प्रमाद है। जो इस प्रकार का प्रमाद, प्रमाद करना, प्रमाद की अवस्था है। इसे 'प्रमाद' कहा जाता है” (विभंग ८४६)। තස්මා වුත්තප්පටිපක්ඛතො අප්පමාදො වෙදිතබ්බො. අත්ථතො හි සො සතියා අවිප්පවාසො, නිච්චං උපට්ඨිතස්සතියා එතං නාමං. අපරෙ පන ‘‘සතිසම්පජඤ්ඤයොගෙන පවත්තා චත්තාරො අරූපිනො ඛන්ධා අප්පමාදො’’ති වදන්ති. इसलिए, कहे गए (प्रमाद) के प्रतिपक्ष से अप्रमाद को समझना चाहिए। अर्थतः वह स्मृति का विप्रवास न होना है, नित्य उपस्थित स्मृति का ही यह नाम है। दूसरे लोग तो कहते हैं कि 'स्मृति और सम्प्रजन्य के योग से प्रवृत्त चार अरूप स्कन्ध अप्रमाद हैं'। ‘‘භාවිතො බහූලීකතො’’ති වුත්තං, කථං පනායං අප්පමාදො භාවෙතබ්බොති? න අප්පමාදභාවනා නාම විසුං එකභාවනා අත්ථි. යා හි කාචි පුඤ්ඤකිරියා කුසලකිරියා, සබ්බා සා අප්පමාදභාවනාත්වෙව වෙදිතබ්බා. විසෙසතො පන විවට්ටූපනිස්සයං සරණගමනං කායිකවාචසිකසංවරඤ්ච උපාදාය සබ්බා සීලභාවනා, සබ්බා සමාධිභාවනා, සබ්බා පඤ්ඤාභාවනා, සබ්බා කුසලභාවනා, අනවජ්ජභාවනා, අප්පමාදභාවනාති වෙදිතබ්බා. ‘‘අප්පමාදො’’ති හි ඉදං මහන්තං අත්ථං දීපෙති, මහන්තං අත්ථං පරිග්ගහෙත්වා තිට්ඨති. සකලම්පි තෙපිටකං බුද්ධවචනං ආහරිත්වා අප්පමාදපදස්ස අත්ථං කත්වා කථෙන්තො ධම්මකථිකො ‘‘අතිත්ථෙන පක්ඛන්දො’’ති න වත්තබ්බො. කස්මා? අප්පමාදපදස්ස මහන්තභාවතො. තථා හි සම්මාසම්බුද්ධො කුසිනාරායං යමකසාලානමන්තරෙ පරිනිබ්බානසමයෙ නිපන්නො අභිසම්බොධිතො පට්ඨාය පඤ්චචත්තාලීසාය වස්සෙසු අත්තනා භාසිතං ධම්මං [Pg.77] එකෙන පදෙන සඞ්ගහෙත්වා දස්සෙන්තො – ‘‘අප්පමාදෙන සම්පාදෙථා’’ති භික්ඛූනං ඔවාදමදාසි. තථා ච වුත්තං – “भावित और बहुलीकृत” कहा गया है, किन्तु यह अप्रमाद कैसे भावित किया जाना चाहिए? अप्रमाद-भावना नाम की कोई अलग एक भावना नहीं है। जो कोई भी पुण्य-क्रिया या कुशल-क्रिया है, वह सब अप्रमाद-भावना ही समझनी चाहिए। विशेष रूप से विवर्त (निर्वाण) के आश्रित शरणगमन और कायिक-वाचसिक संवर को लेकर सभी शील-भावना, सभी समाधि-भावना, सभी प्रज्ञा-भावना, सभी कुशल-भावना, अनवद्य-भावना को अप्रमाद-भावना समझना चाहिए। क्योंकि यह 'अप्रमाद' शब्द महान अर्थ को प्रकाशित करता है, महान अर्थ को ग्रहण करके स्थित है। सम्पूर्ण त्रिपिटक रूपी बुद्ध-वचन को लाकर अप्रमाद पद का अर्थ करके कहने वाला धर्म-कथक 'बिना घाट के उतरने वाला' नहीं कहा जाना चाहिए। क्यों? अप्रमाद पद की महानता के कारण। क्योंकि सम्यक्सम्बुद्ध ने कुशीनारा में यमक शालों के बीच परिनिर्वाण के समय लेटे हुए, अभिसंबोधि से लेकर पैंतालीस वर्षों में स्वयं द्वारा भाषित धर्म को एक पद में संगृहीत करके दिखाते हुए - “अप्रमाद के साथ सिद्ध करो” - यह भिक्षुओं को उपदेश दिया था। और वैसा ही कहा गया है - ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, යානි කානිචි ජඞ්ගලානං පාණානං පදජාතානි, සබ්බානි තානි හත්ථිපදෙ සමොධානං ගච්ඡන්ති, හත්ථිපදං තෙසං අග්ගමක්ඛායති යදිදං මහන්තට්ඨෙන; එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යෙ කෙචි කුසලා ධම්මා, සබ්බෙතෙ අප්පමාදමූලකා අප්පමාදසමොසරණා, අප්පමාදො තෙසං ධම්මානං අග්ගමක්ඛායතී’’ති (ම. නි. 1.300). “जैसे, भिक्षुओं, जंगली प्राणियों के जो कोई भी पद-चिह्न हैं, वे सभी हाथी के पद-चिह्न में समाहित हो जाते हैं, हाथी का पद-चिह्न उनमें अपनी विशालता के कारण श्रेष्ठ कहा जाता है; इसी प्रकार, भिक्षुओं, जो कोई भी कुशल धर्म हैं, वे सभी अप्रमाद-मूलक हैं, अप्रमाद में ही समाहित होने वाले हैं, अप्रमाद उन धर्मों में श्रेष्ठ कहा जाता है” (म. नि. १.३००)। ගාථාසු අප්පමාදං පසංසන්තීති දානාදිපුඤ්ඤකිරියාසු අප්පමාදං අප්පමජ්ජනං පණ්ඩිතා සප්පඤ්ඤා බුද්ධාදයො පසංසන්ති, වණ්ණෙන්ති ථොමෙන්ති. කස්මා? යස්මා අප්පමත්තො උභො අත්ථෙ අධිගණ්හාති පණ්ඩිතො. කෙ පන තෙ උභො අත්ථාති ආහ – ‘‘දිට්ඨෙ ධම්මෙ ච යො අත්ථො, යො චත්ථො සම්පරායිකො’’ති, එවමෙත්ථ පදයොජනා වෙදිතබ්බා. ඉධාපි දිට්ඨෙ ධම්මෙ ච යො අත්ථොති ගහට්ඨස්ස තාව ‘‘අනවජ්ජානි කම්මානි, අනාකුලා ච කම්මන්තා’’තිආදිනා නයෙන වුත්තො කසිගොරක්ඛාදිවිධිනා ලද්ධබ්බො අත්ථො, පබ්බජිතස්ස පන අවිප්පටිසාරාදිඅත්ථො වෙදිතබ්බො. යො චත්ථො සම්පරායිකොති පන උභයෙසම්පි ධම්මචරියාව වුත්තාති වෙදිතබ්බා. අත්ථාභිසමයාති දුවිධස්සපි අත්ථස්ස හිතස්ස පටිලාභා, ලද්ධබ්බෙන සමිති සඞ්ගති සමොධානන්ති සමයො, ලාභො. සමයො එව අභිසමයො, අභිමුඛභාවෙන වා සමයො අභිසමයොති එවමෙත්ථ අභිසමයො වෙදිතබ්බො. ධිතිසම්පන්නත්තා ධීරො. තතියෙන චෙත්ථ අත්ථ-සද්දෙන පරමත්ථස්ස නිබ්බානස්සාපි සඞ්ගහො වෙදිතබ්බො. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ වට්ටසම්පත්ති එව කථිතා. ගාථායං පන විවට්ටස්සපි සඞ්ගහො දට්ඨබ්බො. තථා හි වුත්තං – गाथाओं में 'अप्रमाद की प्रशंसा करते हैं' का अर्थ है कि दान आदि पुण्य-क्रियाओं में अप्रमाद की पंडित, प्रज्ञावान बुद्ध आदि प्रशंसा करते हैं, वर्णन करते हैं, स्तुति करते हैं। क्यों? क्योंकि अप्रमत्त पंडित व्यक्ति दोनों अर्थों को प्राप्त कर लेता है। वे दोनों अर्थ कौन से हैं? तो कहा - “जो अर्थ इस लोक में है, और जो अर्थ परलोक में है”, इस प्रकार यहाँ पदों की योजना समझनी चाहिए। यहाँ भी 'जो अर्थ दृष्ट धर्म में है' - गृहस्थ के लिए तो “अनवद्य कर्म और व्याकुलता रहित कर्मान्त” आदि के नियम से कृषि-गोरक्षा आदि विधि द्वारा प्राप्त होने वाला अर्थ है, किन्तु प्रव्रजित के लिए अविप्रतिसार आदि अर्थ समझना चाहिए। जो अर्थ साम्परायिक है - वह दोनों के लिए 'धम्मचर्या' ही कही गई है, ऐसा समझना चाहिए। अर्थाभिसमय का अर्थ है - दोनों प्रकार के अर्थ की प्राप्ति। प्राप्त होने योग्य के साथ संगति, मेल और समवधान ही 'समय' है, अर्थात् लाभ। समय ही अभिसमय है, अथवा अभिमुख भाव से समय ही अभिसमय है - इस प्रकार यहाँ अभिसमय को समझना चाहिए। धृति से संपन्न होने के कारण 'धीर' है। यहाँ तीसरे 'अर्थ' शब्द से परमार्थ निर्वाण का भी संग्रह समझना चाहिए। शेष सुविज्ञ ही है। इस प्रकार इस सूत्र में वर्त-सम्पत्ति ही कही गई है। किन्तु गाथा में विवर्त का भी संग्रह देखना चाहिए। क्योंकि वैसा ही कहा गया है - ‘‘අප්පමාදො අමතපදං, පමාදො මච්චුනො පදං; අප්පමත්තා න මීයන්ති, යෙ පමත්තා යථා මතා. “अप्रमाद अमृत-पद है, प्रमाद मृत्यु का पद है; अप्रमत्त मरते नहीं हैं, जो प्रमत्त हैं वे मरे हुए के समान हैं। ‘‘එවං විසෙසතො ඤත්වා, අප්පමාදම්හි පණ්ඩිතා; අප්පමාදෙ පමොදන්ති, අරියානං ගොචරෙ රතා. “इस विशेषता को जानकर, अप्रमाद में स्थित पंडित जन, आर्यों के गोचर में रत होकर अप्रमाद में प्रमोद करते हैं। ‘‘තෙ [Pg.78] ඣායිනො සාතතිකා, නිච්චං දළ්හපරක්කමා; ඵුසන්ති ධීරා නිබ්බානං, යොගක්ඛෙමං අනුත්තර’’න්ති. (ධ. ප. 21-23); “वे ध्यानी, सतत प्रयत्नशील, नित्य दृढ़ पराक्रम वाले धीर पुरुष, अनुत्तर योगक्षेम स्वरूप निर्वाण का स्पर्श करते हैं” (ध. प. २१-२३)। තස්මා ‘‘අත්ථාභිසමයා’’ති එත්ථ ලොකුත්තරත්ථවසෙනපි අත්ථො වෙදිතබ්බො. इसलिए, 'अत्थाभिसमया' (अर्थ-अभिसमय) यहाँ लोकोत्तर अर्थ के वश से भी अर्थ समझना चाहिए। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. අට්ඨිපුඤ්ජසුත්තවණ්ණනා ४. अस्थिपुञ्ज सूत्र की व्याख्या। 24. චතුත්ථෙ එකපුග්ගලස්සාති එත්ථ පුග්ගලොති අයං වොහාරකථා. බුද්ධස්ස හි භගවතො දුවිධා දෙසනා සම්මුතිදෙසනා ච පරමත්ථදෙසනා චාති. තත්ථ ‘‘පුග්ගලො, සත්තො, ඉත්ථී, පුරිසො, ඛත්තියො, බ්රාහ්මණො, දෙවො, මාරො’’ති එවරූපා සම්මුතිදෙසනා. ‘‘අනිච්චං, දුක්ඛං, අනත්තා, ඛන්ධා, ධාතු, ආයතනා, සතිපට්ඨානා’’ති එවරූපා පරමත්ථදෙසනා. තත්ථ භගවා යෙ සම්මුතිවසෙන දෙසනං සුත්වා විසෙසමධිගන්තුං සමත්ථා, නෙසං සම්මුතිදෙසනං දෙසෙති. යෙ පන පරමත්ථවසෙන දෙසනං සුත්වා විසෙසමධිගන්තුං සමත්ථා, තෙසං පරමත්ථදෙසනං දෙසෙති. २४. चौथे (सूत्र) में 'एकपुग्गलस्स' (एक पुद्गल का) यहाँ 'पुद्गल' यह व्यावहारिक कथा (कथन) है। भगवान बुद्ध की देशना दो प्रकार की है - सम्मति-देशना और परमार्थ-देशना। वहाँ 'पुद्गल, सत्त्व, स्त्री, पुरुष, क्षत्रिय, ब्राह्मण, देव, मार' - इस प्रकार की सम्मति-देशना है। 'अनित्य, दुःख, अनात्म, स्कन्ध, धातु, आयतन, स्मृतिप्रस्थान' - इस प्रकार की परमार्थ-देशना है। वहाँ भगवान जो सम्मति के वश से देशना सुनकर विशेष (ज्ञान) प्राप्त करने में समर्थ हैं, उन्हें सम्मति-देशना देते हैं। जो परमार्थ के वश से देशना सुनकर विशेष प्राप्त करने में समर्थ हैं, उन्हें परमार्थ-देशना देते हैं। තත්ථායං උපමා – යථා හි දෙසභාසාකුසලො තිණ්ණං වෙදානං අත්ථසංවණ්ණනකො ආචරියො යෙ දමිළභාසාය වුත්තෙ අත්ථං ජානන්ති, තෙසං දමිළභාසාය ආචික්ඛති. යෙ අන්ධකභාසාදීසු අඤ්ඤතරාය, තෙසං තාය තාය භාසාය. එවං තෙ මාණවකා ඡෙකං බ්යත්තං ආචරියමාගම්ම ඛිප්පමෙව සිප්පං උග්ගණ්හන්ති. තත්ථ ආචරියො විය බුද්ධො භගවා, තයො වෙදා විය කථෙතබ්බභාවෙ ඨිතානි තීණි පිටකානි, දෙසභාසාකොසල්ලමිව සම්මුතිපරමත්ථකොසල්ලං, නානාදෙසභාසා මාණවකා විය සම්මුතිපරමත්ථවසෙන පටිවිජ්ඣනසමත්ථා වෙනෙය්යා, ආචරියස්ස දමිළභාසාදිආචික්ඛනං විය භගවතො සම්මුතිපරමත්ථවසෙන දෙසනා වෙදිතබ්බා. ආහ චෙත්ථ – वहाँ यह उपमा है - जैसे देश-भाषाओं में कुशल, तीन वेदों के अर्थ की व्याख्या करने वाला आचार्य, जो तमिल भाषा में कहे जाने पर अर्थ समझते हैं, उन्हें तमिल भाषा में बताता है। जो अन्धक (आन्ध्र) आदि भाषाओं में से किसी अन्य को समझते हैं, उन्हें उन-उन भाषाओं में। इस प्रकार वे माणवक (विद्यार्थी) चतुर और विद्वान आचार्य के पास आकर शीघ्र ही शिल्प (विद्या) सीख लेते हैं। वहाँ आचार्य के समान बुद्ध भगवान हैं, तीन वेदों के समान कहे जाने योग्य भाव में स्थित तीन पिटक हैं, देश-भाषा-कौशल के समान सम्मति-परमार्थ-कौशल है, नाना देश-भाषा वाले माणवकों के समान सम्मति-परमार्थ के वश से प्रतिवेध (बोध) करने में समर्थ विनेय जन हैं, आचार्य के तमिल आदि भाषाओं में बताने के समान भगवान की सम्मति-परमार्थ के वश से देशना समझनी चाहिए। और यहाँ कहा गया है - ‘‘දුවෙ සච්චානි අක්ඛාසි, සම්බුද්ධො වදතං වරො; සම්මුතිං පරමත්ථඤ්ච, තතියං නූපලබ්භති. "वक्ताओं में श्रेष्ठ सम्बुद्ध ने दो सत्यों का आख्यान किया है; सम्मति और परमार्थ, तीसरा उपलब्ध नहीं होता।" ‘‘සඞ්කෙතවචනං [Pg.79] සච්චං, ලොකසම්මුතිකාරණා; පරමත්ථවචනං සච්චං, ධම්මානං භූතකාරණා. "लोक-सम्मति के कारण संकेत-वचन सत्य है; धर्मों के वास्तविक स्वरूप के कारण परमार्थ-वचन सत्य है।" ‘‘තස්මා වොහාරකුසලස්ස, ලොකනාථස්ස සත්ථුනො; සම්මුතිං වොහරන්තස්ස, මුසාවාදො න ජායතී’’ති. "इसलिए व्यवहार-कुशल लोकनाथ शास्ता के लिए, सम्मति (लोक-व्यवहार) का प्रयोग करते हुए मृषावाद (झूठ) उत्पन्न नहीं होता।" අපිච අට්ඨහි කාරණෙහි භගවා පුග්ගලකථං කථෙති – හිරොත්තප්පදීපනත්ථං, කම්මස්සකතාදීපනත්ථං, පච්චත්තපුරිසකාරදීපනත්ථං,, ආනන්තරියදීපනත්ථං, බ්රහ්මවිහාරදීපනත්ථං, පුබ්බෙනිවාසදීපනත්ථං, දක්ඛිණාවිසුද්ධිදීපනත්ථං, ලොකසම්මුතියා අප්පහානත්ථං, චාති. ‘‘ඛන්ධධාතුආයතනානි හිරියන්ති ඔත්තප්පන්තී’’ති හි වුත්තෙ මහාජනො න ජානාති, සම්මොහං ආපජ්ජති, පටිසත්තු වා හොති – ‘‘කිමිදං ඛන්ධධාතුආයතනානි හිරියන්ති ඔත්තප්පන්ති නාමා’’ති? ‘‘ඉත්ථී හිරියති ඔත්තප්පති, පුරිසො, ඛත්තියො, බ්රාහ්මණො, දෙවො, මාරො’’ති පන වුත්තෙ ජානාති, න සම්මොහං ආපජ්ජති, න පටිසත්තු වා හොති. තස්මා භගවා හිරොත්තප්පදීපනත්ථං පුග්ගලකථං කථෙති. इसके अतिरिक्त, आठ कारणों से भगवान पुद्गल-कथा (व्यक्ति के विषय में चर्चा) करते हैं - ह्री-ओत्तप्प (लज्जा और भय) को प्रकाशित करने के लिए, कर्म-स्वकीयता को प्रकाशित करने के लिए, व्यक्तिगत पुरुषार्थ को प्रकाशित करने के लिए, आनन्तर्य (कर्मों) को प्रकाशित करने के लिए, ब्रह्मविहारों को प्रकाशित करने के लिए, पूर्वनिवास (पूर्व जन्मों) को प्रकाशित करने के लिए, दक्षिणा-विशुद्धि (दान की शुद्धि) को प्रकाशित करने के लिए, और लोक-सम्मति का त्याग न करने के लिए। क्योंकि "स्कन्ध, धातु और आयतन लज्जित होते हैं, डरते हैं" - ऐसा कहने पर जन-साधारण नहीं समझता, सम्मोह (भ्रम) को प्राप्त होता है, या शत्रुवत हो जाता है कि "यह क्या है कि स्कन्ध, धातु और आयतन लज्जित होते हैं और डरते हैं?" परन्तु "स्त्री लज्जित होती है, डरती है, पुरुष, क्षत्रिय, ब्राह्मण, देव, मार (लज्जित होते हैं)" - ऐसा कहने पर वह समझता है, सम्मोह को प्राप्त नहीं होता, और न ही शत्रुवत होता है। इसलिए भगवान ह्री-ओत्तप्प को प्रकाशित करने के लिए पुद्गल-कथा करते हैं। ‘‘ඛන්ධා කම්මස්සකා, ධාතුයො ආයතනානී’’ති වුත්තෙපි එසෙව නයො. තස්මා කම්මස්සකතාදීපනත්ථම්පි පුග්ගලකථං කථෙති. "स्कन्ध अपने कर्मों के स्वामी हैं, धातु और आयतन (स्वामी हैं)" - ऐसा कहने पर भी यही न्याय (तर्क) है। इसलिए कर्म-स्वकीयता को प्रकाशित करने के लिए भी पुद्गल-कथा करते हैं। ‘‘වෙළුවනාදයො මහාවිහාරා ඛන්ධෙහි කාරාපිතා, ධාතූහි ආයතනෙහී’’ති වුත්තෙපි එසෙව නයො. තථා ‘‘ඛන්ධා මාතරං ජීවිතා වොරොපෙන්ති, පිතරං, අරහන්තං, රුහිරුප්පාදකම්මං, සඞ්ඝභෙදකම්මං කරොන්ති, ධාතුයො ආයතනානී’’ති වුත්තෙපි එසෙව නයො. ‘‘ඛන්ධා මෙත්තායන්ති, ධාතුයො ආයතනානී’’ති වුත්තෙපි එසෙව නයො. ‘‘ඛන්ධා පුබ්බෙනිවාසං අනුස්සරන්ති, ධාතුයො ආයතනානී’’ති වුත්තෙපි එසෙව නයො. තස්මා භගවා පච්චත්තපුරිසකාරදීපනත්ථං ආනන්තරියදීපනත්ථං බ්රහ්මවිහාරදීපනත්ථං පුබ්බෙනිවාසදීපනත්ථඤ්ච පුග්ගලකථං කථෙති. "वेणुवन आदि महाविहार स्कन्धों द्वारा बनवाए गए, धातुओं और आयतनों द्वारा" - ऐसा कहने पर भी यही न्याय है। उसी प्रकार "स्कन्ध माता को जीवन से वंचित करते हैं, पिता को, अर्हन्त को, (बुद्ध का) रक्त निकालने का कर्म, संघ-भेद का कर्म करते हैं, धातु और आयतन (करते हैं)" - ऐसा कहने पर भी यही न्याय है। "स्कन्ध मैत्री करते हैं, धातु और आयतन (करते हैं)" - ऐसा कहने पर भी यही न्याय है। "स्कन्ध पूर्वनिवास का अनुस्मरण करते हैं, धातु और आयतन (करते हैं)" - ऐसा कहने पर भी यही न्याय है। इसलिए भगवान व्यक्तिगत पुरुषार्थ, आनन्तर्य, ब्रह्मविहार और पूर्वनिवास को प्रकाशित करने के लिए पुद्गल-कथा करते हैं। ‘‘ඛන්ධා දානං පටිග්ගණ්හන්ති, ධාතුයො ආයතනානී’’ති වුත්තෙපි මහාජනො න ජානාති, සම්මොහං ආපජ්ජති, පටිසත්තු වා හොති ‘‘කිමිදං ඛන්ධා ධාතුයො ආයතනානි පටිග්ගණ්හන්ති නාමා’’ති? ‘‘පුග්ගලා පටිග්ගණ්හන්තී’’ති පන වුත්තෙ ජානාති, න සම්මොහං ආපජ්ජති, න පටිසත්තු වා හොති. තස්මා භගවා දක්ඛිණාවිසුද්ධිදීපනත්ථං පුග්ගලකථං කථෙති. "स्कन्ध दान ग्रहण करते हैं, धातु और आयतन (ग्रहण करते हैं)" - ऐसा कहने पर भी जन-साधारण नहीं समझता, सम्मोह को प्राप्त होता है, या शत्रुवत हो जाता है कि "यह क्या है कि स्कन्ध, धातु और आयतन दान ग्रहण करते हैं?" परन्तु "पुद्गल (व्यक्ति) ग्रहण करते हैं" - ऐसा कहने पर वह समझता है, सम्मोह को प्राप्त नहीं होता, और न ही शत्रुवत होता है। इसलिए भगवान दक्षिणा-विशुद्धि को प्रकाशित करने के लिए पुद्गल-कथा करते हैं। ලොකසම්මුතිඤ්ච [Pg.80] බුද්ධා භගවන්තො න පජහන්ති, ලොකසමඤ්ඤාය ලොකනිරුත්තියා ලොකාභිලාපෙ ඨිතායෙව ධම්මං දෙසෙන්ති. තස්මා භගවා ලොකසම්මුතියා අප්පහානත්ථම්පි පුග්ගලකථං කථෙති. සො ඉධාපි ලොකවොහාරවසෙන දෙසෙතබ්බමත්ථං දස්සෙන්තො ‘‘එකපුග්ගලස්සා’’තිආදිමාහ. और बुद्ध भगवान लोक-सम्मति का त्याग नहीं करते, वे लोक-संज्ञा, लोक-निरुक्ति और लोक-अभिलाप (बोलचाल) में स्थित होकर ही धर्म देशना देते हैं। इसलिए भगवान लोक-सम्मति का त्याग न करने के लिए भी पुद्गल-कथा करते हैं। उन्होंने यहाँ भी लोक-व्यवहार के वश से उपदेश देने योग्य अर्थ को दिखाते हुए 'एकपुग्गलस्स' आदि कहा है। තත්ථ එකපුග්ගලස්සාති එකසත්තස්ස. කප්පන්ති මහාකප්පං. යදිපි අච්චන්තසංයොගෙ ඉදං උපයොගවචනං, යත්ථ පන සත්තානං සන්ධාවනං සංසරණං සම්භවති, තස්ස වසෙන ගහෙතබ්බං. අට්ඨිකඞ්කලොති අට්ඨිභාගො. ‘‘අට්ඨිඛලො’’තිපි පඨන්ති, අට්ඨිසඤ්චයොති අත්ථො. අට්ඨිපුඤ්ජොති අට්ඨිසමූහො. අට්ඨිරාසීති තස්සෙව වෙවචනං. කෙචි පන ‘‘කටිප්පමාණතො හෙට්ඨා සමූහො කඞ්කලො නාම, තතො උපරි යාව තාලප්පමාණං පුඤ්ජො, තතො උපරි රාසී’’ති වදන්ති. තං තෙසං මතිමත්තං. සබ්බමෙතං සමූහස්සෙව පරියායවචනං වෙපුල්ලස්සෙව උපමාභාවෙන ආහටත්තා. वहाँ 'एकपुग्गलस्स' का अर्थ है - एक सत्त्व का। 'कप्पं' का अर्थ है - महाकल्प। यद्यपि यह अत्यन्त-संयोग (निरन्तरता) में द्वितीया विभक्ति है, फिर भी जहाँ सत्त्वों का संधावन (दौड़ना) और संसरण (भटकना) सम्भव है, उसके वश से इसे ग्रहण करना चाहिए। 'अट्ठिकङ्कलो' का अर्थ है - अस्थि-भाग। 'अट्ठिखलो' भी पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है - अस्थि-संचय। 'अट्ठिपुञ्जो' का अर्थ है - अस्थि-समूह। 'अट्ठिरासी' उसी का पर्यायवाची है। किन्तु कुछ लोग कहते हैं - "कमर के प्रमाण से नीचे का समूह 'कङ्कल' कहलाता है, उससे ऊपर ताड़ के प्रमाण तक 'पुञ्ज' है, और उससे ऊपर 'राशि' है।" वह केवल उनका मत मात्र है। यह सब 'समूह' के ही पर्यायवाची शब्द हैं, जो विशालता की उपमा के रूप में यहाँ लाए गए हैं। සචෙ සංහාරකො අස්සාති අවිප්පකිරණවසෙන සංහරිත්වා ඨපෙතා කොචි යදි සියාති පරිකප්පනවසෙන වදති. සම්භතඤ්ච න විනස්සෙය්යාති තථා කෙනචි සම්භතඤ්ච තං අට්ඨිකඞ්කලං අන්තරධානාභාවෙන පූතිභූතං චුණ්ණවිචුණ්ණඤ්ච අහුත්වා සචෙ න විනස්සෙය්යාති පරිකප්පනවසෙනෙව වදති. අයඤ්හෙත්ථ අත්ථො – භික්ඛවෙ, එකස්ස සත්තස්ස කම්මකිලෙසෙහි අපරාපරුප්පත්තිවසෙන එකං මහාකප්පං සන්ධාවන්තස්ස සංසරන්තස්ස එවං මහාඅට්ඨිසඤ්චයො භවෙය්ය, ආරොහපරිණාහෙහි යත්තකොයං වෙපුල්ලපබ්බතො. සචෙ පනස්ස කොචි සංහරිත්වා ඨපෙතා භවෙය්ය, සම්භතඤ්ච තං සචෙ අවිනස්සන්තං තිට්ඨෙය්යාති. අයඤ්ච නයො නිබ්බුතප්පදීපෙ විය භිජ්ජනසභාවෙ කළෙවරනික්ඛෙපරහිතෙ ඔපපාතිකත්තභාවෙ සබ්බෙන සබ්බං අනට්ඨිකෙ ච ඛුද්දකත්තභාවෙ වජ්ජෙත්වා වුත්තො. කෙචි පන ‘‘පරිකප්පනවසෙන ඉමස්ස නයස්ස ආහටත්තා තෙසම්පි යදි සියා අට්ඨිකඞ්කලො, තෙනාපි සහෙව අයං අට්ඨිපුඤ්ජපරිමාණො වුත්තො’’ති වදන්ති. අපරෙ පන ‘‘නයිදමෙවං ලබ්භමානස්සෙව අට්ඨිපුඤ්ජස්ස වසෙන සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණෙන පරිච්ඡින්දිත්වා ඉමස්ස පරිමාණස්ස වුත්තතා. තස්මා වුත්තනයෙනෙව අත්ථො ගහෙතබ්බො’’ති. "यदि कोई संग्रह करने वाला हो" - इस प्रकार बिखराव न होने देने के कारण संग्रह करके रखने वाला कोई यदि हो - ऐसा परिकल्पना के वश से कहते हैं। "और संचित नष्ट न हो" - इस प्रकार किसी के द्वारा संचित वह अस्थि-पंजर अंतर्धान न होने के कारण, सड़-गल कर चूर्ण-विचूर्ण न होकर यदि नष्ट न हो - ऐसा भी परिकल्पना के वश से ही कहते हैं। यहाँ यह अर्थ है - भिक्षुओं, एक सत्त्व के कर्म-क्लेशों के कारण बार-बार उत्पन्न होने के वश से एक महाकल्प तक संसरण करते हुए, घूमते हुए, अस्थियों का इतना बड़ा संचय हो जाए, जितना विस्तार और परिधि में यह वेपुल्ल पर्वत है। यदि उसका कोई संग्रह करके रखने वाला हो, और यदि वह संचित (अस्थि-पुंज) नष्ट न होते हुए टिका रहे। और यह विधि बुझे हुए दीपक के समान भंग होने वाले स्वभाव वाले, शरीर त्याग से रहित औपपातिक आत्मभावों को और पूरी तरह से अस्थि-रहित छोटे आत्मभावों को छोड़कर कही गई है। कुछ लोग तो कहते हैं कि "परिकल्पना के वश से इस विधि के लाए जाने के कारण, यदि उनका भी अस्थि-पंजर हो, तो उसके साथ ही यह अस्थि-पुंज का परिमाण कहा गया है।" दूसरे कहते हैं कि "ऐसा नहीं है, प्राप्त होने वाले अस्थि-पुंज के वश से ही सर्वज्ञता-ज्ञान द्वारा परिच्छेद (निश्चित) करके इस परिमाण को कहा गया है। इसलिए उक्त विधि से ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए।" ගාථාසු [Pg.81] මහෙසිනාති මහන්තෙ සීලක්ඛන්ධාදයො එසති ගවෙසතීති මහෙසී, සම්මාසම්බුද්ධො. ‘‘ඉති වුත්තං මහෙසිනා’’ති ච භගවා ‘‘දසබලසමන්නාගතො, භික්ඛවෙ, තථාගතො’’තිආදීසු විය අත්තානං අඤ්ඤං විය කත්වා දස්සෙති. වෙපුල්ලොති රාජගහං පරිවාරෙත්වා ඨිතෙසු පඤ්චසු පබ්බතෙසු විපුලභාවතො වෙපුල්ලොති ලද්ධනාමො. තතො එව මහා, ඨිතදිසාභාගවසෙන උත්තරො ගිජ්ඣකූටස්ස. ගිරිබ්බජෙති ගිරිබ්බජපුරනාමකස්ස රාජගහස්ස සමීපෙ. गाथाओं में "महेसिना" (महर्षि द्वारा) - महान शील-स्कन्ध आदि को खोजता है, गवेषणा करता है, इसलिए 'महेसी' (महर्षि) बुद्ध हैं। "इति वुत्तं महेसिना" (ऐसा महर्षि ने कहा) - यहाँ भगवान "भिक्षुओं, तथागत दस बलों से युक्त हैं" आदि के समान स्वयं को अन्य की तरह करके दिखाते हैं। "वेपुल्लो" - राजगृह को घेर कर स्थित पाँच पर्वतों में विशाल होने के कारण 'वेपुल्ल' नाम प्राप्त हुआ। वही 'महा' है, स्थित दिशा के भाग के वश से यह गृध्रकूट के उत्तर में है। "गिरिब्बजे" - गिरिव्रज नामक राजगृह नगर के समीप। එත්තාවතා භගවා ‘‘එත්තකෙනාපි කාලෙන අනුපච්ඡින්නභවමූලස්ස අපරිඤ්ඤාතවත්ථුකස්ස පුථුජ්ජනස්ස අයමීදිසී කටසිවඩ්ඪනා’’ති වට්ටෙ ආදීනවං දස්සෙත්වා ඉදානි යෙසං අරියසච්චානං අනනුබොධා අප්පටිවෙධා අන්ධපුථුජ්ජනස්ස එවං කටසිවඩ්ඪනා, තානි අරියසච්චානි දිට්ඨවතො අරියපුග්ගලස්ස අයං නත්ථීති දස්සෙන්තො ‘‘යතො ච අරියසච්චානී’’තිආදිමාහ. इतने से भगवान ने "इतने समय तक भी, जिसके भव का मूल कटा नहीं है और जिसने (दुःख के) आधार को नहीं जाना है, उस पृथग्जन का ऐसा श्मशान-वर्धन (श्मशान को बढ़ाना) होता है" - इस प्रकार संसार में दोष दिखाकर, अब जिन आर्य सत्यों के बोध न होने से और प्रतिवेध न होने से अंधे पृथग्जन का ऐसा श्मशान-वर्धन होता है, उन आर्य सत्यों को देखने वाले आर्य पुद्गल का यह (संसार-भ्रमण) नहीं होता है - यह दिखाते हुए "यतो च अरियसच्चानि" आदि कहा। තත්ථ යතොති යදා. අරියසච්චානීති අරණීයතො අරියානි, අවිතථභාවෙන සච්චානි චාති අරියසච්චානි, අරියභාවකරානි වා සච්චානි අරියසච්චානි, අරියෙහි වා බුද්ධාදීහි පටිවිජ්ඣිතබ්බානි සච්චානි අරියසච්චානි. අථ වා අරියස්ස සච්චානි අරියසච්චානි. සදෙවකෙන හි ලොකෙන සරණන්ති අරණීයතො අරියො භගවා, තෙන සයම්භුඤාණෙන දිට්ඨත්තා තස්ස සච්චානීති අරියසච්චානි. සම්මප්පඤ්ඤාය පස්සතීති සම්මා හෙතුනා ඤායෙන විපස්සනාපඤ්ඤාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය පරිඤ්ඤාපහානසච්ඡිකිරියාභාවනාභිසමයවසෙන පස්සති. දුක්ඛන්තිආදි අරියසච්චානං සරූපදස්සනං. තත්ථ අනෙකූපද්දවාධිට්ඨානතාය කුච්ඡිතභාවතො බාලජනපරිකප්පිතධුවසුභසුඛත්තවිරහෙන තුච්ඡභාවතො ච දුක්ඛං. දුක්ඛං සමුප්පජ්ජති එතෙනාති දුක්ඛසමුප්පාදො, දුක්ඛසමුදයො. දුක්ඛං අතික්කමති එතෙන ආරම්මණප්පච්චයභූතෙන, එත්ථ වාති දුක්ඛස්ස අතික්කමො, නිබ්බානං. ආරකත්තා කිලෙසෙහි අරණීයතො ච අරියො. සම්මාදිට්ඨිආදීනං අට්ඨන්නං අඞ්ගානං වසෙන අට්ඨඞ්ගිකො. මාරෙන්තො කිලෙසෙ ගච්ඡති, නිබ්බානත්ථිකෙහි මග්ගීයති, සයං වා නිබ්බානං මග්ගතීති මග්ගො. තතො එව දුක්ඛස්ස උපසමං නිරොධං ගච්ඡතීති දුක්ඛූපසමගාමී. යතො සම්මප්පඤ්ඤාය පස්සතීති සම්බන්ධො. वहाँ "यतो" का अर्थ है 'जब'। "अरियसच्चानि" (आर्य सत्य) - आदरणीय होने से 'आर्य' और यथार्थ होने से 'सत्य' हैं, इसलिए आर्य सत्य हैं; अथवा आर्य भाव को करने वाले सत्य 'आर्य सत्य' हैं; अथवा बुद्ध आदि आर्यों द्वारा प्रतिवेध (साक्षात्कार) किए जाने योग्य सत्य 'आर्य सत्य' हैं। अथवा आर्य के सत्य 'आर्य सत्य' हैं। देवों सहित लोक द्वारा शरण के रूप में आदरणीय होने से भगवान 'आर्य' हैं, उनके स्वयंभू-ज्ञान द्वारा देखे जाने के कारण उनके सत्य 'आर्य सत्य' हैं। "सम्माप्पञ्ञाय पस्सति" (सम्यक् प्रज्ञा से देखता है) - सम्यक् कारण और न्याय से, विपश्यना प्रज्ञा युक्त मार्ग प्रज्ञा द्वारा परिज्ञा, प्रहाण, साक्षात्करण और भावना रूपी अभिसमय के वश से देखता है। "दुक्खं" आदि आर्य सत्यों का स्वरूप दर्शन है। वहाँ अनेक उपद्रवों का अधिष्ठान होने से, कुत्सित भाव होने से और बाल जनों द्वारा कल्पित ध्रुव, शुभ, सुख और आत्म-भाव से रहित होने के कारण शून्य होने से 'दुःख' है। "दुःखं समुप्पज्जति एतेन" - जिससे दुःख उत्पन्न होता है, वह 'दुःख-समुत्पाद' या 'दुःख-समुदय' है। "दुःखं अतिक्कमति एतेन" - इस आलम्बन-प्रत्यय स्वरूप (निर्वाण) से दुःख का अतिक्रमण करता है, अथवा इसमें (अतिक्रमण करता है), इसलिए यह 'दुःख का अतिक्रमण' अर्थात् निर्वाण है। क्लेशों से दूर होने के कारण और आदरणीय होने के कारण 'आर्य' है। सम्यक् दृष्टि आदि आठ अंगों के कारण 'अष्टांगिक' है। क्लेशों को मारते हुए जाता है, निर्वाण के इच्छुक लोगों द्वारा खोजा जाता है, अथवा स्वयं निर्वाण की ओर जाता है, इसलिए 'मार्ग' है। उसी से दुःख के उपशम (निरोध) को जाता है, इसलिए 'दुःखोपशमगामी' है। "यतो सम्माप्पञ्ञाय पस्सति" - यह संबंध है। ස [Pg.82] සත්තක්ඛත්තුං පරමං, සන්ධාවිත්වාන පුග්ගලොති සො එවං චතුසච්චදස්සාවී අරියපුග්ගලො සොතාපන්නො සබ්බමුදින්ද්රියො සමානො සත්තවාරපරමංයෙව භවාදීසු අපරාපරුප්පත්තිවසෙන සන්ධාවිත්වා සංසරිත්වා. එකබීජී, කොලංකොලො, සත්තක්ඛත්තුපරමොති ඉන්ද්රියානං තික්ඛමජ්ඣිමමුදුභාවෙන තයො හි සොතාපන්නා. තෙසු සබ්බමුදින්ද්රියස්ස වසෙනිදං වුත්තං ‘‘ස සත්තක්ඛත්තුං පරමං, සන්ධාවිත්වානා’’ති. දුක්ඛස්සන්තකරො හොතීති වට්ටදුක්ඛස්ස අන්තකරො පරියොසානකරො හොති. කථං? සබ්බසංයොජනක්ඛයා අනුපුබ්බෙන අග්ගමග්ගං අධිගන්ත්වා නිරවසෙසානං සංයොජනානං ඛෙපනාති අරහත්තඵලෙනෙව දෙසනාය කූටං ගණ්හි. "स सत्तक्खत्तुं परमं, सन्धावित्वान पुग्गलो" - वह इस प्रकार चार सत्यों को देखने वाला आर्य पुद्गल स्रोतापन्न, मृदु इन्द्रिय वाला होकर, अधिक से अधिक सात बार ही भवों आदि में बार-बार उत्पन्न होने के वश से संसरण करके, घूमकर। 'एकबीजी', 'कुलंकुल' और 'सत्तक्खत्तुपरम' - इन्द्रियों के तीक्ष्ण, मध्यम और मृदु होने के कारण तीन प्रकार के स्रोतापन्न होते हैं। उनमें से सबसे मृदु इन्द्रिय वाले के वश से यह कहा गया है - "वह अधिकतम सात बार संसरण करके"। "दुक्खस्सन्तकरो होति" - वट्ट-दुःख (संसार दुःख) का अंत करने वाला, समाप्त करने वाला होता है। कैसे? सभी संयोजनों के क्षय से, क्रमशः अग्र मार्ग (अर्हत् मार्ग) को प्राप्त कर, अवशेष रहित संयोजनों को नष्ट करने से - इस प्रकार अर्हत् फल के द्वारा ही देशना का शिखर ग्रहण किया। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चौथे सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 5. මුසාවාදසුත්තවණ්ණනා ५. मुसावाद (मृषावाद) सुत्त की व्याख्या। 25. පඤ්චමෙ එකධම්මං අතීතස්සාති කා උප්පත්ති? භගවතො භික්ඛුසඞ්ඝස්ස ච මහාලාභසක්කාරො උප්පජ්ජි, තිත්ථියානං පරිහායි. තෙ හතලාභසක්කාරා නිප්පභා නිත්තෙජා ඉස්සාපකතා චිඤ්චමාණවිකං නාම පරිබ්බාජිකං උය්යොජෙසුං – ‘‘එහි, ත්වං භගිනි, සමණං ගොතමං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛස්සූ’’ති. සා භගවන්තං චතුපරිසමජ්ඣෙ ධම්මං දෙසෙන්තං උපගන්ත්වා අභූතෙන අබ්භාචික්ඛිත්වා සක්කෙනස්සා අභූතභාවෙ පකාසිතෙ මහාජනෙන ‘‘ධී කාළකණ්ණී’’ති විහාරතො නික්කඩ්ඪාපිතා පථවියා විවරෙ දින්නෙ අවීචිජාලානං ඉන්ධනං හුත්වාව අවීචිනිරයෙ නිබ්බත්ති, භිය්යොසොමත්තාය තිත්ථියානං ලාභසක්කාරො පරිහායි. භික්ඛූ ධම්මසභායං කථං සමුට්ඨාපෙසුං ‘‘ආවුසො, චිඤ්චමාණවිකා එවං උළාරගුණං අග්ගදක්ඛිණෙය්යං සම්මාසම්බුද්ධං අභූතෙන අක්කොසිත්වා මහාවිනාසං පත්තා’’ති. සත්ථා ආගන්ත්වා ‘‘කාය නුත්ථ, භික්ඛවෙ, එතරහි කථාය සන්නිසින්නා’’ති පුච්ඡිත්වා ‘‘ඉමාය නාමා’’ති වුත්තෙ ‘‘න, භික්ඛවෙ, ඉදානෙව, පුබ්බෙපි සා මං අභූතෙන අක්කොසිත්වා මහාවිනාසං පත්තායෙවා’’ති මහාපදුමජාතකම්පි විත්ථාරෙත්වා උපරි ධම්මං දෙසෙන්තො ඉමිස්සා අට්ඨුප්පත්තියා ‘‘එකධම්මං අතීතස්සා’’ති ඉදං සුත්තං දෙසෙසි. २५. पाँचवें (सूत्र) में 'एकधम्मं अतीतस्स' की उत्पत्ति क्या है? भगवान और भिक्षु संघ को महान लाभ और सत्कार प्राप्त हुआ, जबकि तीर्थिकों का ह्रास हुआ। वे लाभ-सत्कार से रहित, प्रभाहीन, तेजहीन और ईर्ष्यालु होकर चिञ्चामाणविका नामक परिव्राजिका के पास गए और कहा— 'हे भगिनी, आओ और श्रमण गौतम पर झूठा आरोप लगाओ।' उसने चार प्रकार की परिषदों के बीच धर्मोपदेश देते हुए भगवान पर झूठा आरोप लगाया। शक्र द्वारा उसके झूठ को प्रकट करने पर, महाजन ने 'धिक्कार है इस कुलक्षणी को' कहकर उसे विहार से निकाल दिया। पृथ्वी के फटने पर वह अवीचि नरक की ज्वालाओं का ईंधन बनकर अवीचि नरक में उत्पन्न हुई। तीर्थिकों का लाभ-सत्कार और भी अधिक घट गया। भिक्षुओं ने धर्मसभा में चर्चा शुरू की— 'आयुष्मानों, चिञ्चामाणविका ने इस प्रकार महान गुणों वाले, अग्र-दक्षिणेय सम्यक्सम्बुद्ध पर झूठा आरोप लगाकर महान विनाश प्राप्त किया।' शास्ता ने आकर पूछा— 'भिक्षुओं, तुम अभी किस चर्चा में बैठे हो?' उनके बताने पर, शास्ता ने कहा— 'भिक्षुओं, न केवल अभी, बल्कि पहले भी उसने मुझ पर झूठा आरोप लगाकर महान विनाश प्राप्त किया था।' फिर महापदुम जातक का विस्तार से वर्णन कर, आगे धर्मोपदेश देते हुए इस घटना के संदर्भ में 'एकधम्मं अतीतस्स' यह सूत्र उपदेशित किया। තත්ථ එකධම්මන්ති එකං වචීසච්චසඞ්ඛාතං ධම්මං. අතීතස්සාති යා සා අට්ඨ අනරියවොහාරෙ වජ්ජෙත්වා අට්ඨසු අරියවොහාරෙසු පතිට්ඨාපනත්ථං ‘‘සච්චං[Pg.83], භණෙ, නාලික’’න්ති අරියෙහි ඨපිතා මරියාදා, තං අතික්කමිත්වා ඨිතස්ස. පුරිසො එව පුග්ගලොති පුරිසපුග්ගලො, තස්ස. අකරණීයන්ති කාතුං අසක්කුණෙය්යං. සම්පජානමුසාවාදී හි පුග්ගලො කිඤ්චි පාපකම්මං කත්වා ‘‘ඉදං නාම තයා කත’’න්ති වුත්තෙ ‘‘න මයා කත’’න්ති මුසාවාදෙනෙව පරිහරිස්සති. එවඤ්ච පටිපජ්ජන්තො කිඤ්චි පාපකම්මං කරොතියෙව, න තත්ථ ලජ්ජති සච්චමරියාදාය සමතික්කන්තත්තා. තෙන වුත්තං ‘‘කතමං එකධම්මං, යදිදං, භික්ඛවෙ, සම්පජානමුසාවාදො’’ති. वहाँ 'एकधम्मं' का अर्थ है— एक वचन-सत्य नामक धर्म। 'अतीतस्स' का अर्थ है— जो आठ अनार्य व्यवहारों को छोड़कर आठ आर्य व्यवहारों में प्रतिष्ठित करने के लिए आर्यों द्वारा स्थापित 'सत्य बोलो' रूपी मर्यादा का उल्लंघन कर स्थित है। 'पुरिसपुग्गलो' का अर्थ है— पुरुष ही पुद्गल है, उसका। 'अकरणीयं' का अर्थ है— जो न किया जा सके (ऐसा कुछ नहीं है)। क्योंकि जानबूझकर झूठ बोलने वाला व्यक्ति कोई भी पापकर्म करके, 'यह तुम्हारे द्वारा किया गया है' कहे जाने पर, 'मेरे द्वारा नहीं किया गया' ऐसा झूठ बोलकर ही बचाव करेगा। और इस प्रकार आचरण करते हुए वह कोई भी पापकर्म करता ही है, वह उसमें लज्जित नहीं होता क्योंकि उसने सत्य की मर्यादा का उल्लंघन कर दिया है। इसीलिए कहा गया है— 'वह एक धर्म कौन सा है? भिक्षुओं, वह जानबूझकर बोला गया झूठ (संपजानमुसावाद) है।' ගාථායං මුසාවාදිස්සාති මුසා අභූතං අතච්ඡං පරෙසං විඤ්ඤාපනවසෙන වදනසීලස්ස. යස්ස දසසු වචනෙසු එකම්පි සච්චං නත්ථි, එවරූපෙ වත්තබ්බමෙව නත්ථි. ජන්තුනොති සත්තස්ස. සත්තො හි ජායනට්ඨෙන ‘‘ජන්තූ’’ති වුච්චති. විතිණ්ණපරලොකස්සාති විස්සට්ඨපරලොකස්ස. ඊදිසො හි මනුස්සසම්පත්ති දෙවලොකසම්පත්ති අවසානෙ නිබ්බානසම්පත්තීති ඉමා තිස්සොපි සම්පත්තියො න පස්සති. නත්ථි පාපන්ති තස්ස තාදිසස්ස ඉදං නාම පාපං න කත්තබ්බන්ති නත්ථීති. गाथा में 'मुसावादिस' का अर्थ है— दूसरों को सूचित करने के उद्देश्य से मृषा (असत्य), अभूत (जो न हुआ हो), अतच्छ (अयथार्थ) बोलने के स्वभाव वाला। जिसके दस वचनों में एक भी सत्य नहीं है, ऐसे व्यक्ति के लिए कुछ भी कहना शेष नहीं रहता। 'जन्तुनो' का अर्थ है— प्राणी का। प्राणी को जन्म लेने के कारण 'जन्तु' कहा जाता है। 'वितिण्णपरलोकस्स' का अर्थ है— जिसने परलोक को छोड़ दिया है। ऐसा व्यक्ति मनुष्य-सम्पत्ति, देवलोक-सम्पत्ति और अंत में निर्वाण-सम्पत्ति— इन तीनों सम्पत्तियों को नहीं देखता। 'नत्थि पापं' का अर्थ है— उस प्रकार के व्यक्ति के लिए ऐसा कोई पाप नहीं है जो वह न कर सके। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. දානසුත්තවණ්ණනා ६. दान सूत्र की व्याख्या। 26. ඡට්ඨෙ එවඤ්චෙති එත්ථ එවන්ති උපමාකාරෙ නිපාතො, චෙති පරිකප්පනෙ. සත්තාති රූපාදීසු සත්තා විසත්තා. ජානෙය්යුන්ති බුජ්ඣෙය්යුං. දානසංවිභාගස්සාති යාය හි චෙතනාය අන්නාදිදෙය්යධම්මං සංහරිත්වා අනුකම්පාපූජාසු අඤ්ඤතරවසෙන පරෙසං දීයති, තං දානං. යාය පන අත්තනා පරිභුඤ්ජිතබ්බභාවෙන ගහිතවත්ථුස්ස එකදෙසො සංවිභජිත්වා දීයති, අයං සංවිභාගො. විපාකන්ති ඵලං. යථාහං ජානාමීති යථා අහං ජානාමි. ඉදං වුත්තං හොති – තිරච්ඡානගතස්සපි දානං දත්වා අත්තභාවසතෙ පවත්තසුඛවිපච්චනවසෙන සතගුණා දක්ඛිණා හොතීති එවමාදිනා, භික්ඛවෙ, යෙන පකාරෙන අහං දානස්ස සංවිභාගස්ස ච විපාකං කම්මවිපාකං ඤාණබලෙන පච්චක්ඛතො ජානාමි, එවං ඉමෙ සත්තා යදි ජානෙය්යුන්ති. න අදත්වා භුඤ්ජෙය්යුන්ති යං භුඤ්ජිතබ්බයුත්තකං අත්තනො අත්ථි, [Pg.84] තතො පරෙසං න අදත්වා මච්ඡරියචිත්තෙන ච තණ්හාලොභවසෙන ච භුඤ්ජෙය්යුං, දත්වාව භුඤ්ජෙය්යුං. න ච නෙසං මච්ඡෙරමලං චිත්තං පරියාදාය තිට්ඨෙය්යාති අත්තනො සම්පත්තීනං පරෙහි සාධාරණභාවාසහනලක්ඛණං චිත්තස්ස පභස්සරභාවදූසකානං උපක්කිලෙසභූතානං කණ්හධම්මානං අඤ්ඤතරං මච්ඡෙරමලං. අථ වා යථාවුත්තමච්ඡෙරඤ්චෙව අඤ්ඤම්පි දානන්තරායකරං ඉස්සාලොභදොසාදිමලඤ්ච නෙසං සත්තානං චිත්තං යථා දානචෙතනා න පවත්තති, න වා සුපරිසුද්ධා හොති, එවං පරියාදාය පරිතො ගහෙත්වා අභිභවිත්වා න තිට්ඨෙය්ය. කො හි සම්මදෙව දානඵලං ජානන්තො අත්තනො චිත්තෙ මච්ඡෙරමලස්ස ඔකාසං දදෙය්ය. २६. छठे (सूत्र) में 'एवञ्चे' यहाँ 'एवं' उपमा के अर्थ में निपात है, और 'चे' परिकल्पना (यदि) के अर्थ में। 'सत्ता' का अर्थ है— रूप आदि में आसक्त प्राणी। 'जानेय्युं' का अर्थ है— वे जान लें। 'दानसंविभागस्स' का अर्थ है— जिस चेतना से अन्न आदि देय वस्तुओं को इकट्ठा कर अनुकम्पा या पूजा के वशीभूत होकर दूसरों को दिया जाता है, वह 'दान' है। और अपने उपभोग के लिए ली गई वस्तु का एक हिस्सा बाँटकर देना 'संविभाग' है। 'विपाकं' का अर्थ है— फल। 'यथाहं जानामि' का अर्थ है— जैसा मैं जानता हूँ। इसका अर्थ यह है— 'तिर्यक योनि के प्राणी को भी दान देकर सौ जन्मों तक सुख प्राप्त होने के रूप में सौ गुना फल मिलता है' इत्यादि प्रकार से, भिक्षुओं, जिस प्रकार मैं दान और संविभाग के विपाक (कर्म-फल) को ज्ञान के बल से प्रत्यक्ष जानता हूँ, वैसे ही यदि ये प्राणी जान लें। 'न अदत्वा भुञ्जेय्युं' का अर्थ है— जो अपने पास खाने योग्य वस्तु है, उसे दूसरों को दिए बिना मत्सर (कंजूसी) और तृष्णा-लोभ के वश में होकर न खाएं, बल्कि देकर ही खाएं। 'न च नेसं मच्छेरमलं चित्तं परियादाय तिट्ठेय्या' का अर्थ है— अपनी सम्पत्ति को दूसरों के साथ साझा न कर पाने का लक्षण वाला, चित्त की प्रभास्वरता को दूषित करने वाला और उपक्लेश रूपी कृष्ण-धर्मों में से एक 'मत्सर-मल' (कंजूसी का मैल)। अथवा, जैसा कहा गया है वह मत्सर और दान में बाधा डालने वाले अन्य ईर्ष्या, लोभ, द्वेष आदि मल, जिससे प्राणियों के चित्त में दान की चेतना उत्पन्न नहीं होती या शुद्ध नहीं होती, वे उनके चित्त को पूरी तरह घेरकर या दबाकर न रहें। क्योंकि दान के फल को भली-भाँति जानने वाला कौन व्यक्ति अपने चित्त में मत्सर-मल को स्थान देगा? යොපි නෙසං අස්ස චරිමො ආලොපොති නෙසං සත්තානං යො සබ්බපච්ඡිමකො ආලොපො සියා. චරිමං කබළන්ති තස්සෙව වෙවචනං. ඉදං වුත්තං හොති – ඉමෙ සත්තා පකතියා යත්තකෙහි ආලොපෙහි සයං යාපෙය්යුං, තෙසු එකමෙව ආලොපං අත්තනො අත්ථාය ඨපෙත්වා තදඤ්ඤෙ සබ්බෙ ආලොපෙ ආගතාගතානං අත්ථිකානං දත්වා යො ඨපිතො ආලොපො අස්ස, සො ඉධ චරිමො ආලොපො නාම. තතොපි න අසංවිභජිත්වා භුඤ්ජෙය්යුං, සචෙ නෙසං පටිග්ගාහකා අස්සූති නෙසං සත්තානං පටිග්ගාහකා යදි සියුං, තතොපි යථාවුත්තචරිමාලොපතොපි සංවිභජිත්වාව එකදෙසං දත්වාව භුඤ්ජෙය්යුං, යථාහං දානසංවිභාගස්ස විපාකං පච්චක්ඛතො ජානාමි, එවං යදි ජානෙය්යුන්ති. යස්මා ච ඛොතිආදිනා කම්මඵලස්ස අප්පච්චක්ඛභාවතො එවමෙතෙ සත්තා දානසංවිභාගෙසු න පවත්තන්තීති යථාධිප්පෙතමත්ථං කාරණෙන සම්පටිපාදෙති. එතෙනෙව තෙසං තදඤ්ඤපුඤ්ඤෙසු ච අප්පටිපත්තියා අපුඤ්ඤෙසු ච පටිපත්තියා කාරණං දස්සිතන්ති දට්ඨබ්බං. उनका जो अंतिम ग्रास (आलोप) हो - उन प्राणियों का जो सबसे अंतिम ग्रास हो। 'चरिमं कबलं' (अंतिम ग्रास) इसी का पर्यायवाची है। यह कहा गया है - ये प्राणी स्वभावतः जितने ग्रासों से स्वयं का निर्वाह करते हैं, उनमें से केवल एक ग्रास अपने लिए रखकर, अन्य सभी ग्रासों को आए हुए याचकों को देकर, जो रखा हुआ ग्रास हो, वह यहाँ 'चरिम आलोप' (अंतिम ग्रास) कहलाता है। उससे भी बिना बाँटे न खाएं, यदि उनके प्रतिग्राहक (लेने वाले) हों - यदि उन प्राणियों के प्रतिग्राहक हों, तो उस पूर्वोक्त अंतिम ग्रास से भी बाँटकर, एक हिस्सा देकर ही खाएं, 'जैसे मैं दान-संविभाग के विपाक को प्रत्यक्ष जानता हूँ, वैसे यदि वे जानते' - इस प्रकार। 'यस्मा च खो' इत्यादि से कर्मफल के प्रत्यक्ष न होने के कारण इस प्रकार ये प्राणी दान-संविभाग में प्रवृत्त नहीं होते, इस अभिप्रेत अर्थ को कारण सहित प्रतिपादित करते हैं। इसी से उनके अन्य पुण्यों में अप्रवृत्ति और अपुण्यों में प्रवृत्ति का कारण दिखाया गया है, ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු යථාවුත්තං මහෙසිනාති මහෙසිනා භගවතා ‘‘තිරච්ඡානගතෙ දානං දත්වා සතගුණා දක්ඛිණා පාටිකඞ්ඛිතබ්බා’ තිආදිනා, ඉධෙව වා ‘‘එවං චෙ සත්තා ජානෙය්යු’’න්තිආදිනා යථාවුත්තං, ඤාණචාරෙන තං යථාවුත්තං චිත්තං ඤාතන්ති අත්ථො. විපාකං සංවිභාගස්සාති සංවිභාගස්සපි විපාකං, කො පන වාදො දානස්ස. යථා හොති මහප්ඵලන්ති යථා සො විපාකො මහන්තං ඵලං හොති, එවං ඉමෙ සත්තා යදි ජානෙය්යුන්ති සම්බන්ධො. විනෙය්ය මච්ඡෙරමලන්ති මච්ඡරියමලං අපනෙත්වා කම්මඵලසද්ධාය රතනත්තයසද්ධාය [Pg.85] ච විසෙසතො පසන්නෙන චිත්තෙන යෙසු කිලෙසෙහි ආරකත්තා අරියෙසු සීලාදිගුණසම්පන්නෙසු දින්නං අප්පකම්පි දානං මහප්ඵලං හොති, තෙසු යුත්තකාලෙන දජ්ජුං දදෙය්යුං. गाथाओं में 'यथावुत्तं महेसिना' (जैसा महर्षि ने कहा है) - महर्षि भगवान द्वारा 'तिर्यक-योनि के प्राणी को दान देकर सौ गुना दक्षिणा की आकांक्षा करनी चाहिए' इत्यादि के द्वारा, अथवा यहीं 'यदि प्राणी इस प्रकार जानते' इत्यादि के द्वारा जो कहा गया है, ज्ञान के संचार से उस कहे हुए चित्त को जाना गया, यह अर्थ है। 'विपाकं संविभागस्स' - संविभाग (बाँटने) का भी विपाक, तो फिर दान की क्या बात! 'यथा होति महप्फलं' - जैसे वह विपाक महान फल वाला होता है, वैसे 'यदि ये प्राणी जानते' - यह सम्बन्ध है। 'विनेय्य मच्छेरमलं' - मत्सर (कंजूसी) के मल को दूर कर, कर्मफल की श्रद्धा और रत्नत्रय की श्रद्धा से विशेष रूप से प्रसन्न चित्त से, जिन (आर्यों) में क्लेशों से दूर होने के कारण, शील आदि गुणों से संपन्न आर्यों में दिया गया थोड़ा सा भी दान महान फल वाला होता है, उन्हें उचित समय पर दान दें। මහප්ඵලභාවකරණතො දක්ඛිණං අරහන්තීති දක්ඛිණෙය්යා, සම්මාපටිපන්නා, තෙසු දක්ඛිණෙය්යෙසු. දක්ඛිණං පරලොකං සද්දහිත්වා දාතබ්බං දෙය්යධම්මං යථා තං දානං හොති මහාදානං, එවං දත්වා. අථ වා බහුනො අන්නං දත්වා, කථං පන අන්නං දාතබ්බන්ති ආහ ‘‘දක්ඛිණෙය්යෙසු දක්ඛිණ’’න්ති. ඉතො මනුස්සත්තා මනුස්සත්තභාවතො චුතා පටිසන්ධිවසෙන සග්ගං ගච්ඡන්ති දායකා. කාමකාමිනොති කාමෙතබ්බානං උළාරානං දෙවභොගානං පටිලද්ධරූපවිභවෙන කම්මුනා උපගමනෙ සාධුකාරිතාය කාමකාමිනො සබ්බකාමසමඞ්ගිනො. මොදන්ති යථාරුචි පරිචාරෙන්තීති අත්ථො. महान फल देने वाला होने के कारण जो दक्षिणा के योग्य हैं, वे 'दक्षिणेय' (दक्षिणा के पात्र) हैं, जो सम्यक् प्रतिपन्न (सही मार्ग पर चलने वाले) हैं, उन दक्षिणेय पात्रों में। 'दक्षिणा' - परलोक में श्रद्धा रखकर दिया जाने वाला देय-धर्म, जिससे वह दान 'महादान' हो, इस प्रकार देकर। अथवा बहुतों को अन्न देकर, किन्तु अन्न कैसे देना चाहिए? तो कहा - 'दक्षिणेय पात्रों में दक्षिणा'। यहाँ मनुष्यत्व (मनुष्य भाव) से च्युत होकर प्रतिसन्धि के वश से दायक स्वर्ग जाते हैं। 'कामकामिनो' - कामना करने योग्य उदार देव-भोगों के प्राप्त रूप और विभव वाले कर्म के द्वारा पहुँचने में साधुकारिता (अच्छे कर्म) के कारण काम-कामी, सभी कामनाओं से संपन्न। 'मोदन्ति' - अपनी रुचि के अनुसार विहार करते हैं, यह अर्थ है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. මෙත්තාභාවනාසුත්තවණ්ණනා ७. मैत्री भावना सूत्र की व्याख्या 27. සත්තමෙ යානි කානිචීති අනවසෙසපරියාදානං. ඔපධිකානි පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනීති २७. सातवें (सूत्र) में 'यानि कानिचि' (जो कोई भी) - यह बिना किसी शेष के सबको ग्रहण करना है। 'ओपधिकानि पुण्यकिरियवत्थूनि' (उपधि-सम्बन्धी पुण्य-क्रिया-वस्तुएं) - තෙසං නියමනං. තත්ථ උපධි වුච්චන්ති ඛන්ධා, උපධිස්ස කරණං සීලං එතෙසං, උපධිප්පයොජනානි වා ඔපධිකානි. සම්පත්තිභවෙ අත්තභාවජනකානි පටිසන්ධිපවත්තිවිපාකදායකානි. පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනීති පුඤ්ඤකිරියා ච තා තෙසං තෙසං ඵලානිසංසානං වත්ථූනි චාති පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි. තානි පන සඞ්ඛෙපතො දානමයං, සීලමයං, භාවනාමයන්ති තිවිධානි හොන්ති. තත්ථ යං වත්තබ්බං, තං පරතො තිකනිපාතවණ්ණනායං ආවි භවිස්සති. මෙත්තාය චෙතොවිමුත්තියාති මෙත්තාභාවනාවසෙන පටිලද්ධතිකචතුක්කජ්ඣානසමාපත්තියා. ‘‘මෙත්තා’’ති හි වුත්තෙ උපචාරොපි ලබ්භති අප්පනාපි, ‘‘චෙතොවිමුත්තී’’ති පන වුත්තෙ අප්පනාඣානමෙව ලබ්භති. තඤ්හි නීවරණාදිපච්චනීකධම්මතො චිත්තස්ස සුට්ඨු විමුත්තිභාවෙන චෙතොවිමුත්තීති වුච්චති. කලං නාග්ඝන්ති සොළසින්ති මෙත්තාබ්රහ්මවිහාරස්ස සොළසභාගං ඔපධිකානි පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි න අග්ඝන්ති. ඉදං වුත්තං හොති – මෙත්තාය චෙතොවිමුත්තියා යො විපාකො, තං සොළස කොට්ඨාසෙ කත්වා තතො [Pg.86] එකං පුන සොළස කොට්ඨාසෙ කත්වා තත්ථ යො එකකොට්ඨාසො, න තං අඤ්ඤානි ඔපධිකානි පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි අග්ඝන්තීති. අධිග්ගහෙත්වාති අභිභවිත්වා. භාසතෙති උපක්කිලෙසවිසුද්ධියා දිප්පති. තපතෙති තතො එව අනවසෙසෙ පටිපක්ඛධම්මෙ සන්තපති. විරොචතීති උභයසම්පත්තියා විරොචති. මෙත්තා හි චෙතොවිමුත්ති චන්දාලොකසඞ්ඛාතා විගතූපක්කිලෙසා ජුණ්හා විය දිප්පති, ආතපො විය අන්ධකාරං පච්චනීකධම්මෙ විධමන්තී තපති, ඔසධිතාරකා විය විජ්ජොතමානා විරොචති ච. उनका नियमन है। वहाँ 'उपधि' स्कन्धों को कहा जाता है, उपधि का कारण शील इनका है, अथवा उपधि के प्रयोजन वाले 'ओपधिक' हैं। संपत्ति-भव में आत्मभाव (शरीर) को उत्पन्न करने वाले, प्रतिसन्धि और प्रवृत्ति के विपाक देने वाले। 'पुण्यकिरियवत्थूनि' - वे पुण्य क्रियाएं भी हैं और उन-उन फलों और लाभों के आधार (वस्तु) भी हैं, इसलिए पुण्य-क्रिया-वस्तुएं हैं। वे संक्षेप में तीन प्रकार की होती हैं - दानमय, शीलमय और भावनामय। वहाँ जो कहना है, वह आगे तिक-निपात की व्याख्या में स्पष्ट होगा। 'मेत्ताय चेतोविमुत्तिया' - मैत्री भावना के वश से प्राप्त तीन और चार ध्यानों की समापत्ति से। 'मैत्री' कहने पर उपचार (पड़ोस) भी प्राप्त होता है और अर्पणा (पूर्ण एकाग्रता) भी, किन्तु 'चेतोविमुत्ति' कहने पर केवल अर्पणा-ध्यान ही प्राप्त होता है। क्योंकि वह नीवरण आदि प्रतिकूल धर्मों से चित्त के भली-भांति विमुक्त होने के कारण 'चेतोविमुत्ति' (चित्त की विमुक्ति) कहलाती है। 'कलं नाग्घन्ति सोळसिं' - मैत्री ब्रह्मविहार के सोलहवें भाग के बराबर भी ओपधिक पुण्य-क्रिया-वस्तुएं नहीं होतीं। यह कहा गया है - मैत्री चेतोविमुक्ति का जो विपाक है, उसे सोलह भाग करके, फिर उनमें से एक भाग को पुनः सोलह भाग करने पर जो एक भाग होता है, अन्य ओपधिक पुण्य-क्रिया-वस्तुएं उसके बराबर भी नहीं होतीं। 'अधिग्गहेत्वा' - अभिभूत करके (दबाकर)। 'भासते' - उपक्लेशों की शुद्धि से दीप्त होती है। 'तपते' - उसी से समस्त विपक्षी धर्मों को संतप्त करती है। 'विरोचति' - दोनों संपत्तियों से सुशोभित होती है। मैत्री चेतोविमुक्ति चन्द्रमा के प्रकाश के समान उपक्लेश-रहित चाँदनी की तरह दीप्त होती है, धूप की तरह अन्धकार रूपी प्रतिकूल धर्मों का नाश करती हुई तपती है, और ओषधि-तारा (शुक्र तारा) की तरह चमकती हुई सुशोभित होती है। සෙය්යථාපීති ඔපම්මදස්සනත්ථෙ නිපාතො. තාරකරූපානන්ති ජොතීනං. චන්දියාති චන්දස්ස අයන්ති චන්දී, තස්සා චන්දියා, පභාය ජුණ්හායාති අත්ථො. වස්සානන්ති වස්සානං බහුවසෙන ලද්ධවොහාරස්ස උතුනො. පච්ඡිමෙ මාසෙති කත්තිකමාසෙ. සරදසමයෙති සරදකාලෙ. අස්සයුජකත්තිකමාසා හි ලොකෙ ‘‘සරදඋතූ’’ති වුච්චන්ති. විද්ධෙති උබ්බිද්ධෙ, මෙඝවිගමෙන දූරීභූතෙති අත්ථො. තෙනෙවාහ ‘‘විගතවලාහකෙ’’ති. දෙවෙති ආකාසෙ. නභං අබ්භුස්සක්කමානොති උදයට්ඨානතො ආකාසං උල්ලඞ්ඝන්තො. තමගතන්ති තමං. අභිවිහච්චාති අභිහන්ත්වා විධමිත්වා. ඔසධිතාරකාති උස්සන්නා පභා එතාය ධීයති, ඔසධීනං වා අනුබලප්පදායිකත්තා ඔසධීති ලද්ධනාමා තාරකා. ‘सेय्यथापि’ (जैसे कि) यह उपमा दिखाने के अर्थ में निपात है। ‘तारकरूपानं’ का अर्थ है ज्योतियों का। ‘चन्दिया’ का अर्थ है चन्द्रमा की, अर्थात् उसकी प्रभा या चाँदनी का। ‘वस्सानं’ का अर्थ है वर्षा की बहुलता के कारण प्राप्त व्यवहार वाली ऋतु का। ‘पच्छिमे मासे’ का अर्थ है कार्तिक मास में। ‘सरदसमये’ का अर्थ है शरद काल में। लोक में अस्सयुज (आश्विन) और कार्तिक मास ‘शरद ऋतु’ कहे जाते हैं। ‘विद्धे’ का अर्थ है ऊपर उठे हुए, अर्थात् मेघों के हट जाने से दूर हुए। इसीलिए कहा गया है ‘विगतवलाहके’ (मेघ रहित)। ‘देवे’ का अर्थ है आकाश में। ‘नभं अब्भुस्सक्कममानो’ का अर्थ है उदय स्थान से आकाश में ऊपर चढ़ता हुआ। ‘तमगतं’ का अर्थ है अंधकार को। ‘अभिविहच्च’ का अर्थ है प्रहार करके या नष्ट करके। ‘ओसधितारका’ का अर्थ है वह तारा जिससे प्रचुर प्रभा धारण की जाती है, अथवा ओषधियों को बल प्रदान करने के कारण ‘ओषधि’ नाम प्राप्त तारा। එත්ථාහ – කස්මා පන භගවතා සමානෙපි ඔපධිකභාවෙ මෙත්තා ඉතරෙහි ඔපධිකපුඤ්ඤෙහි විසෙසෙත්වා වුත්තාති? වුච්චතෙ – සෙට්ඨට්ඨෙන නිද්දොසභාවෙන ච සත්තෙසු සුප්පටිපත්තිභාවතො. සෙට්ඨා හි එතෙ විහාරා, සබ්බසත්තෙසු සම්මාපටිපත්තිභූතානි යදිදං මෙත්තාඣානානි. යථා ච බ්රහ්මානො නිද්දොසචිත්තා විහරන්ති, එවං එතෙහි සමන්නාගතා යොගිනො බ්රහ්මසමාව හුත්වා විහරන්ති. තථා හිමෙ ‘‘බ්රහ්මවිහාරා’’ති වුච්චන්ති. ඉති සෙට්ඨට්ඨෙන නිද්දොසභාවෙන ච සත්තෙසු සුප්පටිපත්තිභාවතො මෙත්තාව ඉතරෙහි ඔපධිකපුඤ්ඤෙහි විසෙසෙත්වා වුත්තා. यहाँ पूछा गया है—भगवान ने उपधि-सम्बन्धी (सांसारिक फल देने वाले) होने के समान भाव के बावजूद, मैत्री को अन्य उपधि-सम्बन्धी पुण्यों से विशिष्ट क्यों कहा है? उत्तर दिया जाता है—श्रेष्ठ होने के कारण, निर्दोष होने के कारण और प्राणियों के प्रति उत्तम प्रतिपत्ति (व्यवहार) होने के कारण। क्योंकि ये विहार श्रेष्ठ हैं, जो कि सभी प्राणियों के प्रति सम्यक् प्रतिपत्ति स्वरूप ये मैत्री-ध्यान हैं। और जैसे ब्रह्मा निर्दोष चित्त वाले होकर विहार करते हैं, वैसे ही इनसे युक्त योगी ब्रह्मा के समान होकर विहार करते हैं। इसीलिए इन्हें ‘ब्रह्मविहार’ कहा जाता है। इस प्रकार श्रेष्ठ होने के कारण, निर्दोष होने के कारण और प्राणियों के प्रति उत्तम प्रतिपत्ति होने के कारण, मैत्री को ही अन्य उपधि-सम्बन्धी पुण्यों से विशिष्ट कहा गया है। එවම්පි කස්මා මෙත්තාව එවං විසෙසෙත්වා වුත්තා? ඉතරෙසං බ්රහ්මවිහාරානං අධිට්ඨානභාවතො දානාදීනං සබ්බෙසං කල්යාණධම්මානං පරිපූරිකත්තා ච. අයඤ්හි [Pg.87] සත්තෙසු හිතාකාරප්පවත්තිලක්ඛණා මෙත්තා, හිතූපසංහාරසා, ආඝාතවිනයපච්චුපට්ඨානා. යදි අනොධිසො භාවිතා බහුලීකතා, අථ සුඛෙනෙව කරුණාදිභාවනා සම්පජ්ජන්තීති මෙත්තා ඉතරෙසං බ්රහ්මවිහාරානං අධිට්ඨානං. තථා හි සත්තෙසු හිතජ්ඣාසයතාය සති නෙසං දුක්ඛාසහනතා, සම්පත්තිවිසෙසානං චිරට්ඨිතිකාමතා, පක්ඛපාතාභාවෙන සබ්බත්ථ සමප්පවත්තචිත්තතා ච සුඛෙනෙව ඉජ්ඣන්ති. එවඤ්ච සකලලොකහිතසුඛවිධානාධිමුත්තා මහාබොධිසත්තා ‘‘ඉමස්ස දාතබ්බං, ඉමස්ස න දාතබ්බ’’න්ති උත්තමවිචයවසෙන විභාගං අකත්වා සබ්බසත්තානං නිරවසෙසසුඛනිදානං දානං දෙන්ති, හිතසුඛත්ථමෙව නෙසං සීලං සමාදියන්ති, සීලපරිපූරණත්ථං නෙක්ඛම්මං භජන්ති, තෙසං හිතසුඛෙසු අසම්මොහත්ථාය පඤ්ඤං පරියොදපෙන්ති, හිතසුඛාභිවඩ්ඪනත්ථමෙව දළ්හං වීරියමාරභන්ති, උත්තමවීරියවසෙන වීරභාවං පත්තාපි සත්තානං නානප්පකාරං හිතජ්ඣාසයෙනෙව අපරාධං ඛමන්ති, ‘‘ඉදං වො දස්සාම, කරිස්සාමා’’තිආදිනා කතං පටිඤ්ඤාතං න විසංවාදෙන්ති, තෙසං හිතසුඛායෙව අචලාධිට්ඨානා හොන්ති. තෙසු අචලාය මෙත්තාය පුබ්බකාරිනො හිතජ්ඣාසයෙනෙව නෙසං විප්පකාරෙ උදාසීනා හොන්ති, පුබ්බකාරිතායපි න පච්චුපකාරමාසිසන්තීති. එවං තෙ පාරමියො පූරෙත්වා යාව දසබලචතු-වෙසාරජ්ජ-ඡඅසාධාරණඤාණ-අට්ඨාරසාවෙණිකබුද්ධධම්මප්පභෙදෙ සබ්බෙපි කල්යාණධම්මෙ පරිපූරෙන්ති. එවං දානාදීනං සබ්බෙසං කල්යාණධම්මානං පාරිපූරිකා මෙත්තාති ච ඉමස්ස විසෙසස්ස දස්සනත්ථං සා ඉතරෙහි විසෙසෙත්වා වුත්තා. फिर भी मैत्री को ही इस प्रकार विशिष्ट क्यों कहा गया है? अन्य ब्रह्मविहारों का आधार होने के कारण और दान आदि सभी कल्याणकारी धर्मों की परिपूरक होने के कारण। यह मैत्री प्राणियों में हित के आकार में प्रवृत्त होने के लक्षण वाली है, हित पहुँचाने के रस (कार्य) वाली है, और आघात (क्रोध) को दूर करने के रूप में उपस्थित होने वाली है। यदि यह असीम रूप से भावित और बहुलीकृत की जाए, तो करुणा आदि की भावनाएँ सुखपूर्वक सिद्ध हो जाती हैं, इसलिए मैत्री अन्य ब्रह्मविहारों का आधार है। क्योंकि प्राणियों के प्रति हित की भावना होने पर, उनके दुखों को न सह पाना (करुणा), उनकी संपत्तियों के चिरकाल तक बने रहने की इच्छा (मुदिता), और पक्षपात के अभाव के कारण सब जगह समान रूप से प्रवृत्त चित्त होना (उपेक्षा) सुखपूर्वक सिद्ध हो जाते हैं। और इस प्रकार संपूर्ण लोक के हित और सुख के विधान में लगे हुए महाबोधिसत्व ‘इसे देना चाहिए, इसे नहीं देना चाहिए’—इस प्रकार उत्तम विचार के वश में होकर भेदभाव किए बिना सभी प्राणियों को पूर्ण सुख का कारण स्वरूप दान देते हैं, उनके हित और सुख के लिए ही शील ग्रहण करते हैं, शील की परिपूर्णता के लिए नैष्क्रम्य का सेवन करते हैं, उनके हित और सुख में सम्मोह न होने के लिए प्रज्ञा को निर्मल करते हैं, हित और सुख की वृद्धि के लिए ही दृढ़ वीर्य आरम्भ करते हैं, उत्तम वीर्य के कारण वीर भाव को प्राप्त होने पर भी प्राणियों के नाना प्रकार के अपराधों को हित की भावना से ही क्षमा करते हैं, ‘यह हम आपको देंगे, यह करेंगे’ आदि के द्वारा की गई प्रतिज्ञा को झुठलाते नहीं हैं, उनके हित और सुख के लिए ही अचल अधिष्ठान वाले होते हैं। उनमें अचल मैत्री के कारण पहले उपकार करने वाले, हित की भावना से ही उनके द्वारा किए गए अपकारों के प्रति उदासीन रहते हैं, और पहले उपकार करने पर भी बदले में उपकार की आशा नहीं करते। इस प्रकार वे पारमिताओं को पूर्ण करके दस बल, चार वैशारद्य, छह असाधारण ज्ञान और अठारह आवेणिक बुद्ध धर्मों के भेदों सहित सभी कल्याणकारी धर्मों को पूर्ण करते हैं। इस प्रकार मैत्री दान आदि सभी कल्याणकारी धर्मों की परिपूरक है—इस विशेषता को दिखाने के लिए इसे अन्यों से विशिष्ट कहा गया है। අපිච මෙත්තාය ඉතරෙහි ඔපධිකපුඤ්ඤෙහි මහානුභාවතා වෙලාමසුත්තෙන දීපෙතබ්බා. තත්ථ හි යථා නාම මහතා වෙලාමස්ස දානතො එකස්ස සොතාපන්නස්ස දානං මහප්ඵලතරං වුත්තං, එවං සොතාපන්නසතතො එකස්ස සකදාගාමිස්ස දානං…පෙ… පච්චෙකබුද්ධසතතො භගවතො, තතොපි බුද්ධප්පමුඛස්ස සඞ්ඝස්ස දානං, තතොපි චාතුද්දිසස්ස සඞ්ඝස්ස විහාරදානං, තතොපි සරණගමනං, තතොපි සීලසමාදානං, තතොපි ගද්දූහනමත්තං කාලං මෙත්තාභාවනා මහප්ඵලතරා වුත්තා. යථාහ – इसके अतिरिक्त, अन्य उपधि-सम्बन्धी पुण्यों की तुलना में मैत्री की महानुभावता को वेलाम सुत्त के द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए। वहाँ जैसे वेलाम के महान दान की अपेक्षा एक स्रोतआपन्न को दिया गया दान अधिक महाफलदायी कहा गया है, वैसे ही सौ स्रोतआपन्नों की अपेक्षा एक सकृदागामी को दिया गया दान... (पेयालम)... सौ प्रत्येकबुद्धों की अपेक्षा भगवान को, उससे भी बुद्ध प्रमुख संघ को दिया गया दान, उससे भी चारों दिशाओं के संघ के लिए विहार का दान, उससे भी शरणगमन, उससे भी शील ग्रहण करना, और उससे भी ‘गड्डूहन’ (गाय दुहने के समय) मात्र काल के लिए की गई मैत्री-भावना अधिक महाफलदायी कही गई है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘යං [Pg.88] ගහපති වෙලාමො බ්රාහ්මණො දානං අදාසි මහාදානං. යො චෙකං දිට්ඨිසම්පන්නං භොජෙය්ය, ඉදං තතො මහප්ඵලතරං. යො ච සතං දිට්ඨිසම්පන්නං භොජෙය්ය…පෙ… සුරාමෙරයමජ්ජප්පමාදට්ඨානා වෙරමණිං. යො ච අන්තමසො ගද්දූහනමත්තම්පි මෙත්තචිත්තං භාවෙය්ය, ඉදං තතො මහප්ඵලතර’’න්ති (අ. නි. 9.20). ‘हे गृहपति! वेलाम ब्राह्मण ने जो दान दिया, वह महादान था। जो एक दृष्टि-सम्पन्न (स्रोतआपन्न) को भोजन कराए, यह उससे अधिक महाफलदायी है। जो सौ दृष्टि-सम्पन्नों को भोजन कराए... (पेयालम)... सुरा-मेरय-मद्य-प्रमाद के स्थान से विरति। और जो अंततः गड्डूहन मात्र काल के लिए भी मैत्री-चित्त की भावना करे, यह उससे अधिक महाफलदायी है’ (अं. नि. 9.20)। මහග්ගතපුඤ්ඤභාවෙන පනස්සා පරිත්තපුඤ්ඤතො සාතිසයතාය වත්තබ්බමෙව නත්ථි. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘යං පමාණකතං කම්මං, න තං තත්රාවසිස්සති, න තං තත්රාවතිට්ඨතී’’ති (දී. නි. 1.556; සං. නි. 4.360). කාමාවචරකම්මඤ්හි පමාණකතං නාම, මහග්ගතකම්මං පන පමාණං අතික්කමිත්වා ඔධිසකානොධිසකඵරණවසෙන වඩ්ඪිත්වා කතත්තා අප්පමාණකතං නාම. කාමාවචරකම්මං තස්ස මහග්ගතකම්මස්ස අන්තරා ලග්ගිතුං වා තං කම්මං අභිභවිත්වා අත්තනො විපාකස්ස ඔකාසං ගහෙත්වා ඨාතුං වා න සක්කොති, අථ ඛො මහග්ගතකම්මමෙව තං පරිත්තකම්මං මහොඝො විය පරිත්තං උදකං අභිභවිත්වා අත්තනො ඔකාසං ගහෙත්වා තිට්ඨති, තස්ස විපාකං පටිබාහිත්වා සයමෙව බ්රහ්මසහබ්යතං උපනෙතීති අයඤ්හි තස්ස අත්ථොති. महग्गत पुण्य के प्रभाव से, इसके परीत्त (सीमित) पुण्य से श्रेष्ठ होने के कारण, कहने के लिए कुछ शेष नहीं है। जैसा कि कहा गया है— "जो प्रमाणकृत (सीमित) कर्म है, वह वहाँ शेष नहीं रहता, वह वहाँ ठहरता नहीं है" (दी. नि. 1.556; सं. नि. 4.360)। कामावचर कर्म 'प्रमाणकृत' कहलाता है, जबकि महग्गत कर्म प्रमाण का अतिक्रमण कर ओधिसक (सीमित) और अनोधिसक (असीमित) प्रसरण के वश से बढ़ने के कारण 'अप्रमाणकृत' कहलाता है। कामावचर कर्म उस महग्गत कर्म के बीच में बाधा डालने या उस कर्म को दबाकर अपने विपाक के लिए अवसर प्राप्त करने में समर्थ नहीं होता, बल्कि महग्गत कर्म ही उस परीत्त कर्म को, जैसे महाबाढ़ थोड़े से जल को दबा देती है, वैसे ही दबाकर अपना अवसर प्राप्त कर लेता है, उसके विपाक को रोककर स्वयं ही ब्रह्म-सहव्यता (ब्रह्मलोक) तक पहुँचा देता है—यही इसका अर्थ है। ගාථාසු යොති යො කොචි ගහට්ඨො වා පබ්බජිතො වා. මෙත්තන්ති මෙත්තාඣානං. අප්පමාණන්ති භාවනාවසෙන ආරම්මණවසෙන ච අප්පමාණං. අසුභභාවනාදයො විය හි ආරම්මණෙ එකදෙසග්ගහණං අකත්වා අනවසෙසඵරණවසෙන අනොධිසොඵරණවසෙන ච අප්පමාණාරම්මණතාය පගුණභාවනාවසෙන අප්පමාණං. තනූ සංයොජනා හොන්තීති මෙත්තාඣානං පාදකං කත්වා සම්මසිත්වා හෙට්ඨිමෙ අරියමග්ගෙ අධිගච්ඡන්තස්ස සුඛෙනෙව පටිඝසංයොජනාදයො පහීයමානා තනූ හොන්ති. තෙනාහ ‘‘පස්සතො උපධික්ඛය’’න්ති. ‘‘උපධික්ඛයො’’ති හි නිබ්බානං වුච්චති. තඤ්චස්ස සච්ඡිකිරියාභිසමයවසෙන මග්ගඤාණෙන පස්සති. අථ වා තනූ සංයොජනා හොන්තීති මෙත්තාඣානපදට්ඨානාය විපස්සනාය අනුක්කමෙන උපධික්ඛයසඞ්ඛාතං අරහත්තං පත්වා තං පස්සතො පගෙව දසපි සංයොජනා තනූ හොන්ති, පහීයන්තීති අත්ථො. අථ වා තනූ සංයොජනා හොන්තීති පටිඝො චෙව පටිඝසම්පයුත්තසංයොජනා ච තනුකා හොන්ති. පස්සතො උපධික්ඛයන්ති තෙසංයෙව කිලෙසූපධීනං ඛයසඞ්ඛාතං [Pg.89] මෙත්තං අධිගමවසෙන පස්සන්ත ස්සාති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. गाथाओं में 'यो' का अर्थ है—जो कोई भी गृहस्थ या प्रव्रजित। 'मेत्तं' का अर्थ है—मैत्री-ध्यान। 'अप्पमाणं' का अर्थ है—भावना के वश से और आलम्बन के वश से अप्रमाण। जैसे अशुभ-भावना आदि में आलम्बन के एक अंश को ग्रहण किया जाता है, वैसा न करके, पूर्ण प्रसरण और अनोधिसो-प्रसरण (बिना सीमा के फैलाना) के वश से अप्रमाण आलम्बन होने के कारण और अभ्यस्त भावना के वश से यह 'अप्रमाण' है। 'तनू संयोजना होन्तीति'—मैत्री-ध्यान को पादक (आधार) बनाकर, विपश्यना कर निचले आर्यमार्गों को प्राप्त करने वाले के सुखपूर्वक ही प्रतिघ-संयोजन आदि क्षीण होकर तनु (पतले) हो जाते हैं। इसीलिए कहा गया— "उपधिक्षय को देखते हुए"। 'उपधिक्षय' निर्वाण को कहा जाता है। उसे वह साक्षात्कार और अभिसमय के वश से मार्ग-ज्ञान द्वारा देखता है। अथवा, 'तनू संयोजना होन्तीति'—मैत्री-ध्यान को आधार बनाकर विपश्यना के क्रम से उपधिक्षय-संज्ञक अर्हत्व को प्राप्त कर, उसे देखने वाले के पहले ही दसों संयोजन तनु हो जाते हैं, अर्थात् नष्ट हो जाते हैं। अथवा, 'तनू संयोजना होन्तीति'—प्रतिघ और प्रतिघ-सम्प्रयुक्त संयोजन तनु हो जाते हैं। 'पस्सतो उपधिक्खयं' का अर्थ है—उन्हीं क्लेश-उपधियों के क्षय-संज्ञक मैत्री को अधिगम (प्राप्ति) के वश से देखने वाले का—यहाँ ऐसा अर्थ समझना चाहिए। එවං කිලෙසප්පහානං නිබ්බානාධිගමඤ්ච මෙත්තාභාවනාය සිඛාප්පත්තමානිසංසං දස්සෙත්වා ඉදානි අඤ්ඤෙ ආනිසංසෙ දස්සෙතුං ‘‘එකම්පි චෙ’’තිආදිමාහ. තත්ථ අදුට්ඨචිත්තොති මෙත්තාබලෙන සුට්ඨු වික්ඛම්භිතබ්යාපාදතාය බ්යාපාදෙන අදූසිතචිත්තො. මෙත්තායතීති හිතඵරණවසෙන මෙත්තං කරොති. කුසලොති අතිසයෙන කුසලවා මහාපුඤ්ඤො, පටිඝාදිඅනත්ථවිගමෙන වො. ඛෙමී තෙනාති තෙන මෙත්තායිතෙන. සබ්බෙ ච පාණෙති චසද්දො බ්යතිරෙකෙ. මනසානුකම්පන්ති චිත්තෙන අනුකම්පන්තො. ඉදං වුත්තං හොති – එකසත්තවිසයාපි තාව මෙත්තා මහාකුසලරාසි, සබ්බෙ පන පාණෙ අත්තනො පියපුත්තං විය හිතඵරණෙන මනසා අනුකම්පන්තො පහූතං බහුං අනප්පකං අපරියන්තං චතුසට්ඨිමහාකප්පෙපි අත්තනො විපාකප්පබන්ධං පවත්තෙතුං සමත්ථං උළාරපුඤ්ඤං අරියො පරිසුද්ධචිත්තො පුග්ගලො පකරොති නිප්ඵාදෙති. इस प्रकार मैत्री-भावना के शिखर तक पहुँचे हुए क्लेश-प्रहाण और निर्वाण-प्राप्ति के लाभों को दिखाकर, अब अन्य लाभों को दिखाने के लिए "एकम्पि चे" आदि कहा गया है। वहाँ 'अदुट्ठचित्तो' का अर्थ है—मैत्री के बल से व्यापाद (द्वेष) के भली-भाँति दब जाने के कारण व्यापाद से दूषित न हुआ चित्त। 'मेत्तायती' का अर्थ है—हित-प्रसरण के वश से मैत्री करता है। 'कुसलो' का अर्थ है—अत्यधिक कुशल वाला, महापुण्यवान, अथवा प्रतिघ आदि अनर्थों के दूर हो जाने के कारण। 'खेमी तेना' का अर्थ है—उस मैत्री-भाव से। 'सब्बे च पाणे' में 'च' शब्द व्यतिरेक (विशेषता) के लिए है। 'मनसानुकम्पं' का अर्थ है—चित्त से अनुकम्पा करता हुआ। यह कहा गया है—एक सत्त्व के विषय में भी मैत्री महान कुशल-राशि है, किन्तु जो सभी प्राणियों पर अपने प्रिय पुत्र के समान हित-प्रसरण वाले मन से अनुकम्पा करता है, वह आर्य और परिशुद्ध चित्त वाला व्यक्ति प्रचुर, बहुत, अनल्प, अपर्यन्त और चौसठ महाकल्पों तक अपने विपाक की परम्परा को चलाने में समर्थ उदार पुण्य को करता है, निष्पन्न करता है। සත්තසණ්ඩන්ති සත්තසඞ්ඛාතෙන සණ්ඩෙන සමන්නාගතං භරිතං, සත්තෙහි අවිරළං ආකිණ්ණමනුස්සන්ති අත්ථො. විජිත්වාති අදණ්ඩෙන අසත්ථෙන ධම්මෙනෙව විජිනිත්වා. රාජිසයොති ඉසිසදිසා ධම්මිකරාජානො. යජමානාති දානානි දදමානා. අනුපරියගාති විචරිංසු. 'सत्तसण्डं' का अर्थ है—सत्त्व-संज्ञक समूह से युक्त, भरा हुआ, सत्त्वों से सघन, मनुष्यों से व्याप्त। 'विजित्वा' का अर्थ है—बिना दण्ड और बिना शस्त्र के धर्म से ही जीतकर। 'राजिसयो' का अर्थ है—ऋषियों के समान धार्मिक राजा। 'यजमाना' का अर्थ है—दान देते हुए। 'अनुपरियगा' का अर्थ है—विचरण किया। අස්සමෙධන්තිආදීසු පොරාණකරාජකාලෙ කිර සස්සමෙධං, පුරිසමෙධං, සම්මාපාසං, වාචාපෙය්යන්ති චත්තාරි සඞ්ගහවත්ථූනි අහෙසුං, යෙහි රාජානො ලොකං සඞ්ගණ්හිංසු. තත්ථ නිප්ඵන්නසස්සතො දසමභාගග්ගහණං සස්සමෙධං නාම, සස්සසම්පාදනෙ, මෙධාවිතාති අත්ථො. මහායොධානං ඡමාසිකං භත්තවෙතනානුප්පදානං පුරිසමෙධං නාම, පුරිසසඞ්ගණ්හනෙ මෙධාවිතාති අත්ථො. දලිද්දමනුස්සානං පොත්ථකෙ ලෙඛං ගහෙත්වා තීණි වස්සානි විනා වඩ්ඪියා සහස්සද්විසහස්සමත්තධනානුප්පදානං සම්මාපාසං නාම. තඤ්හි සම්මා මනුස්සෙ පාසෙති හදයෙ බන්ධිත්වා විය ඨපෙති, තස්මා ‘‘සම්මාපාස’’න්ති වුච්චති. ‘‘තාත මාතුලා’’තිආදිනා පන සණ්හවාචාය සඞ්ගහණං වාචාපෙය්යං නාම, පෙය්යවජ්ජං පියවාචතාති අත්ථො. එවං චතූහි සඞ්ගහවත්ථූහි සඞ්ගහිතං රට්ඨං ඉද්ධඤ්චෙව හොති ඵීතඤ්ච පහූතඅන්නපානං ඛෙමං නිරබ්බුදං. මනුස්සා මුදා මොදමානා උරෙ පුත්තෙ නච්චෙන්තා අපාරුතඝරා විහරන්ති[Pg.90]. ඉදං ඝරද්වාරෙසු අග්ගළානං අභාවතො ‘‘නිරග්ගළ’’න්ති වුච්චති. අයං පොරාණිකා පවෙණි, අයං පොරාණිකා පකති. 'अस्समेधं' आदि के विषय में—प्राचीन राजाओं के काल में 'सस्समेध', 'पुरिसमेध', 'सम्मापास' और 'वाचापेय्य'—ये चार संग्रह-वस्तुएँ थीं, जिनसे राजाओं ने लोक का संग्रह किया। वहाँ उत्पन्न अनाज का दसवाँ भाग लेना 'सस्समेध' कहलाता है, इसका अर्थ है अनाज के उत्पादन में मेधाविता (बुद्धिमत्ता)। महान योद्धाओं को छह महीने का भोजन और वेतन देना 'पुरिसमेध' कहलाता है, इसका अर्थ है पुरुषों के संग्रह में मेधाविता। निर्धन मनुष्यों के बही-खाते में प्रविष्टि कर तीन वर्ष के लिए बिना ब्याज के एक हजार या दो हजार की राशि देना 'सम्मापास' कहलाता है। वह मनुष्यों को भली-भाँति पाश में बाँधने (हृदय से जोड़ने) के समान है, इसलिए उसे 'सम्मापास' कहा जाता है। "तात, मामा" आदि मधुर वचनों से संग्रह करना 'वाचापेय्य' कहलाता है, इसका अर्थ है पेय्यवज्ज (प्रिय वचन)। इस प्रकार चार संग्रह-वस्तुओं से संगृहीत राष्ट्र समृद्ध, सम्पन्न, प्रचुर अन्न-पान वाला, क्षेमयुक्त और उपद्रव-रहित होता है। मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक आनन्द मनाते हुए, पुत्रों को छाती पर नचाते हुए, खुले घरों में रहते हैं। यह घर के द्वारों पर अर्गला (कुंडी) न होने के कारण 'निरग्गल' कहलाता है। यह प्राचीन परम्परा है, यह प्राचीन प्रकृति (स्वभाव) है। අපරභාගෙ පන ඔක්කාකරාජකාලෙ බ්රාහ්මණා ඉමානි චත්තාරි සඞ්ගහවත්ථූනි ඉමඤ්ච රට්ඨසම්පත්තිං පරිවත්තෙන්තා උද්ධම්මූලං කත්වා අස්සමෙධං පුරිසමෙධන්තිආදිකෙ පඤ්ච යඤ්ඤෙ නාම අකංසු. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා බ්රාහ්මණධම්මියසුත්තෙ – किन्तु बाद के समय में, राजा ओक्काक के काल में, ब्राह्मणों ने इन चार संग्रह-वस्तुओं और इस राष्ट्र-सम्पत्ति को उलटकर, अधर्म को मूल बनाकर 'अश्वमेध', 'पुरुषमेध' आदि पाँच यज्ञ बना दिए। भगवान द्वारा 'ब्राह्मणधम्मिय सुत्त' में यह कहा गया है— ‘‘තෙසං ආසි විපල්ලාසො, දිස්වාන අණුතො අණුං…පෙ…. "उनमें विपर्यास (विपरीत बुद्धि) उत्पन्न हो गया, सूक्ष्म से सूक्ष्म को देखकर... आदि...।" ‘‘තෙ තත්ථ මන්තෙ ගන්ථෙත්වා, ඔක්කාකං තදුපාගමු’’න්ති. (සු. නි. 301-304); "वे वहाँ मन्त्रों की रचना कर ओक्काक के पास पहुँचे।" (सु. नि. 301-304) තත්ථ අස්සමෙත්ථ මෙධන්ති බාධෙන්තීති අස්සමෙධො. ද්වීහි පරියඤ්ඤෙහි යජිතබ්බස්ස එකවීසතියූපස්ස එකස්මිං පච්ඡිමදිවසෙ එව සත්තනවුතිපඤ්චපසුසතඝාතභීසනස්ස ඨපෙත්වා භූමිඤ්ච පුරිසෙ ච අවසෙසසබ්බවිභවදක්ඛිණස්ස යඤ්ඤස්සෙතං අධිවචනං. පුරිසමෙත්ථ මෙධන්ති බාධෙන්තීති පුරිසමෙධො. චතූහි පරියඤ්ඤෙහි යජිතබ්බස්ස සද්ධිංභූමියා අස්සමෙධෙ වුත්තවිභවදක්ඛිණස්ස යඤ්ඤස්සෙතං අධිවචනං. සම්මමෙත්ථ පාසන්ති ඛිපන්තීති සම්මාපාසො. යුගච්ඡිග්ගළෙ පවෙසනදණ්ඩකසඞ්ඛාතං සම්මං ඛිපිත්වා තස්ස පතිතොකාසෙ වෙදිං කත්වා සංහාරිමෙහි යූපාදීහි සරස්සතිනදියා නිමුග්ගොකාසතො පභුති පටිලොමං ගච්ඡන්තෙන යජිතබ්බස්ස සත්රයාගස්සෙතං අධිවචනං වාජමෙත්ථ පිවන්තීති වාජපෙය්යො. එකෙන පරියඤ්ඤෙන සත්තරසහි පසූහි යජිතබ්බස්ස බෙළුවයූපස්ස සත්තරසකදක්ඛිණස්ස යඤ්ඤස්සෙතං අධිවචනං. නත්ථි එත්ථ අග්ගළොති නිරග්ගළො. නවහි පරියඤ්ඤෙහි යජිතබ්බස්ස සද්ධිං භූමියා පුරිසෙහි ච අස්සමෙධෙ වුත්තවිභවදක්ඛිණස්ස සබ්බමෙධපරියායනාමස්ස අස්සමෙධවිකප්පස්සෙතං අධිවචනං. वहाँ घोड़ों को मारा जाता है या पीड़ित किया जाता है, इसलिए वह 'अश्वमेध' है। दो पर्यायों से यज्ञ किए जाने वाले, इक्कीस यूपों (खंभों) वाले, जिसके अंतिम दिन ही पाँच सौ सत्तानवे (597) पशुओं के वध का भीषण दृश्य होता है, और भूमि तथा पुरुषों को छोड़कर शेष समस्त वैभव को दक्षिणा में दे दिया जाता है, उस यज्ञ का यह नाम है। वहाँ पुरुषों को मारा जाता है या पीड़ित किया जाता है, इसलिए वह 'पुरुषमेध' है। चार पर्यायों से यज्ञ किए जाने वाले, भूमि सहित अश्वमेध में कहे गए वैभव की दक्षिणा वाले यज्ञ का यह नाम है। वहाँ सम्यक् रूप से फेंकते हैं, इसलिए वह 'शम्याप्रास' है। जुए के छिद्र में प्रवेश कराने वाले डंडे के समान 'शम्या' को फेंककर उसके गिरने के स्थान पर वेदी बनाकर, संहार्य यूप आदि के साथ सरस्वती नदी के लुप्त होने के स्थान से प्रतिकूल दिशा में जाते हुए किए जाने वाले 'सत्रयाग' का यह नाम है। वहाँ 'वाज' (अन्न/शक्ति) पीते हैं, इसलिए वह 'वाजपेय' है। एक पर्याय से सत्रह पशुओं के साथ यज्ञ किए जाने वाले, बेल के यूप वाले और सत्रह-सत्रह की दक्षिणा वाले यज्ञ का यह नाम है। यहाँ कोई अर्गला (बाधा) नहीं है, इसलिए वह 'निरर्गल' है। नौ पर्यायों से यज्ञ किए जाने वाले, भूमि और पुरुषों सहित अश्वमेध में कहे गए वैभव की दक्षिणा वाले, 'सर्वमेध' पर्याय नाम वाले अश्वमेध के ही एक भेद का यह नाम है। චන්දප්පභාති චන්දප්පභාය. තාරගණාව සබ්බෙති යථා සබ්බෙපි තාරාගණා චන්දිමසොභාය සොළසිම්පි කලං නාග්ඝන්ති, එවං තෙ අස්සමෙධාදයො යඤ්ඤා මෙත්තචිත්තස්ස වුත්තලක්ඛණෙන සුභාවිතස්ස සොළසිම්පි කලං නානුභවන්ති, න පාපුණන්ති, නාග්ඝන්තීති අත්ථො. 'चन्दप्पभा' का अर्थ चन्द्रप्रभा (चाँदनी) से है। 'तारगणाव सब्बे' का अर्थ है जैसे सभी तारागण चन्द्रमा की शोभा के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होते, वैसे ही वे अश्वमेध आदि यज्ञ, उक्त लक्षणों वाली सुभावित मैत्री-चित्त के सोलहवें भाग के बराबर भी अनुभव नहीं करते, प्राप्त नहीं होते या मूल्यवान नहीं होते। ඉදානි [Pg.91] අපරෙපි දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකෙ මෙත්තාභාවනාය ආනිසංසෙ දස්සෙතුං ‘‘යො න හන්තී’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ යොති මෙත්තාබ්රහ්මවිහාරභාවනානුයුත්තො පුග්ගලො. න හන්තීති තෙනෙව මෙත්තාභාවනානුභාවෙන දූරවික්ඛම්භිතබ්යාපාදතාය න කඤ්චි සත්තං හිංසති, ලෙඩ්ඩුදණ්ඩාදීහි න විබාධති වා. න ඝාතෙතීති පරං සමාදපෙත්වා න සත්තෙ හනාපෙති න විබාධාපෙති ච. න ජිනාතීති සාරම්භවිග්ගාහිකකථාදිවසෙන න කඤ්චි ජිනාති සාරම්භස්සෙව අභාවතො, ජානිකරණවසෙන වා අඩ්ඩකරණාදිනා න කඤ්චි ජිනාති. න ජාපයෙති පරෙපි පයොජෙත්වා පරෙසං ධනජානිං න කාරාපෙය්ය. මෙත්තංසොති මෙත්තාමයචිත්තකොට්ඨාසො, මෙත්තාය වා අංසො අවිජහනට්ඨෙන අවයවභූතොති මෙත්තංසො. සබ්බභූතෙසූති සබ්බසත්තෙසු. තතො එව වෙරං තස්ස න කෙනචීති අකුසලවෙරං තස්ස කෙනචිපි කාරණෙන නත්ථි, පුග්ගලවෙරසඞ්ඛාතො විරොධො කෙනචි පුරිසෙන සද්ධිං තස්ස මෙත්තාවිහාරිස්ස නත්ථීති. अब मैत्री भावना के अन्य इहलोक और परलोक संबंधी लाभों को दिखाने के लिए 'यो न हन्ति' आदि कहा गया है। वहाँ 'यो' का अर्थ मैत्री-ब्रह्मविहार की भावना में लगा हुआ व्यक्ति है। 'न हन्ति' का अर्थ है उसी मैत्री भावना के प्रभाव से व्यापाद (द्वेष) के दूर हो जाने के कारण वह किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, अथवा ढेले, डंडे आदि से पीड़ित नहीं करता। 'न घातयति' का अर्थ है दूसरों को प्रेरित कर प्राणियों को नहीं मरवाता और न ही पीड़ित करवाता है। 'न जिनाति' का अर्थ है संरम्भ (क्रोध) और कलहपूर्ण चर्चा आदि के द्वारा किसी को नहीं जीतता क्योंकि उसमें संरम्भ का अभाव होता है, अथवा हानि पहुँचाने के वश से या धन आदि छीनने के द्वारा किसी को नहीं जीतता। 'न जापयेति' का अर्थ है दूसरों को नियुक्त कर दूसरों के धन की हानि नहीं करवाता। 'मेत्तंसो' का अर्थ है मैत्रीमय चित्त वाला, अथवा मैत्री का अंश न छोड़ने के कारण मैत्री जिसका अवयव (अंग) बन गई है, वह 'मेत्तंसो' है। 'सब्बभूतेसू' का अर्थ है सभी प्राणियों में। 'ततो एव वेरं तस्स न केनची' का अर्थ है इसलिए उसका किसी भी कारण से किसी के साथ अकुशल वैर नहीं है, मैत्री विहार करने वाले उस व्यक्ति का किसी भी पुरुष के साथ पुद्गल-वैर नामक विरोध नहीं है। එවමෙතස්මිං එකකනිපාතෙ පටිපාටියා තෙරසසු සුත්තෙසු සික්ඛාසුත්තද්වයෙ චාති පන්නරසසු සුත්තෙසු විවට්ටං කථිතං, නීවරණසුත්තං සංයොජනසුත්තං අප්පමාදසුත්තං අට්ඨිසඤ්චයසුත්තන්ති එතෙසු චතූසු සුත්තෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතං. ඉතරෙසු පන වට්ටමෙව කථිතන්ති. इस प्रकार इस एककनिपात में क्रम से तेरह सूत्रों में और दो शिक्षा सूत्रों में—कुल पन्द्रह सूत्रों में—विवर्त (निर्वाण) की कथा कही गई है। निवारण सूत्र, संयोजन सूत्र, अप्रमाद सूत्र और अस्थिसंचय सूत्र—इन चार सूत्रों में वर्त (संसार) और विवर्त (निर्वाण) दोनों की कथा कही गई है। शेष सूत्रों में केवल वर्त (संसार) की ही कथा कही गई है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। පරමත්ථදීපනියා परमत्थदीपनी ඛුද්දකනිකාය-අට්ඨකථාය खुद्दकनिकाय-अट्ठकथा ඉතිවුත්තකස්ස එකකනිපාතවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इतिवुत्तक की एककनिपात-व्याख्या समाप्त हुई। 2. දුකනිපාතො २. दुकनिपात 1. පඨමවග්ගො १. प्रथम वर्ग 1. දුක්ඛවිහාරසුත්තවණ්ණනා १. दुक्खविहारसुत्त की व्याख्या 28. දුකනිපාතස්ස [Pg.92] පඨමෙ ද්වීහීති ගණනපරිච්ඡෙදො. ධම්මෙහීති පරිච්ඡින්නධම්මනිදස්සනං. ද්වීහි ධම්මෙහීති ද්වීහි අකුසලධම්මෙහි. සමන්නාගතොති යුත්තො. දිට්ඨෙව ධම්මෙති ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ. දුක්ඛං විහරතීති චතූසුපි ඉරියාපථෙසු කිලෙසදුක්ඛෙන චෙව කායිකචෙතසිකදුක්ඛෙන ච දුක්ඛං විහරති. සවිඝාතන්ති චිත්තූපඝාතෙන චෙව කායූපඝාතෙන ච සවිඝාතං. සඋපායාසන්ති කිලෙසූපායාසෙන චෙව සරීරඛෙදෙන ච බලවආයාසවසෙන සඋපායාසං. සපරිළාහන්ති කිලෙසපරිළාහෙන චෙව කායපරිළාහෙන ච සපරිළාහං. කායස්ස භෙදාති උපාදින්නක්ඛන්ධපරිච්චාගා. පරං මරණාති තදනන්තරං අභිනිබ්බත්තක්ඛන්ධග්ගහණෙ. අථ වා කායස්ස භෙදාති ජීවිතින්ද්රියුපච්ඡෙදා. පරං මරණාති චුතිතො උද්ධං. දුග්ගති පාටිකඞ්ඛාති දුග්ගතිසඞ්ඛාතානං චතුන්නං අපායානං අඤ්ඤතරා ගති ඉච්ඡිතබ්බා, අවස්සංභාවිනීති අත්ථො. २८. दुकनिपात के प्रथम सूत्र में 'द्वीहि' यह गणना का निर्धारण है। 'धम्मेहि' यह निर्धारित धर्मों का निर्देश है। 'द्वीहि धम्मेहि' का अर्थ है दो अकुशल धर्मों से। 'समन्नागतो' का अर्थ है युक्त। 'दिट्ठेव धम्मे' का अर्थ है इसी आत्मभाव (जीवन) में। 'दुक्खं विहरति' का अर्थ है चारों ईर्यापथों में क्लेश-दुःख से तथा कायिक और चैतसिक दुःख से दुःखपूर्वक विहार करता है। 'सविघातं' का अर्थ है चित्त के उपघात (कष्ट) और शरीर के उपघात के साथ, सविघात। 'सउपायासं' का अर्थ है क्लेशों के आयास (थकावट/परेशानी) और शरीर के खेद के साथ, प्रबल आयास के कारण सउपायास। 'सपरिळाहं' का अर्थ है क्लेशों के परिदाह और शरीर के परिदाह के साथ, सपरिदाह। 'कायस्स भेदा' का अर्थ है उपादान स्कन्धों का परित्याग करने से। 'परं मरणा' का अर्थ है उसके अनन्तर उत्पन्न होने वाले स्कन्धों के ग्रहण करने पर। अथवा 'कायस्स भेदा' का अर्थ है जीवितिन्द्रिय का उच्छेद होने से। 'परं मरणा' का अर्थ है च्युति (मृत्यु) के बाद। 'दुग्गति पाटिकाङ्खा' का अर्थ है दुर्गति संज्ञक चार अपायों में से किसी एक गति की इच्छा करनी चाहिए, अर्थात् वह अवश्यंभावी है। අගුත්තද්වාරොති අපිහිතද්වාරො. කත්ථ පන අගුත්තද්වාරොති ආහ ‘‘ඉන්ද්රියෙසූ’’ති. තෙන මනච්ඡට්ඨානං ඉන්ද්රියානං අසංවරමාහ. පටිග්ගහණපරිභොගවසෙන භොජනෙ මත්තං න ජානාතීති භොජනෙ අමත්තඤ්ඤූ. ‘‘ඉන්ද්රියෙසු අගුත්තද්වාරතාය භොජනෙ අමත්තඤ්ඤුතායා’’තිපි පඨන්ති. 'अगुत्तद्वारो' का अर्थ है जिसके द्वार ढके (सुरक्षित) नहीं हैं। कहाँ द्वार सुरक्षित नहीं हैं? तो कहा—'इन्द्रियसु' (इन्द्रियों में)। इससे मन सहित छह इन्द्रियों के असंयम को कहा गया है। प्रतिग्रहण और परिभोग के वश से भोजन में मात्रा को नहीं जानता, इसलिए 'भोजने अमत्तञ्ञू' (भोजन में अमात्रज्ञ) है। 'इन्द्रियेसु अगुत्तद्वारताय भोजने अमत्तञ्ञुताया' ऐसा भी पाठ मिलता है। කථං ඉන්ද්රියෙසු අගුත්තද්වාරතා, කථං වා ගුත්තද්වාරතාති? කිඤ්චාපි හි චක්ඛුන්ද්රියෙ සංවරො වා අසංවරො වා නත්ථි. න හි චක්ඛුපසාදං නිස්සාය සති වා මුට්ඨස්සච්චං වා උප්පජ්ජති. අපිච යදා රූපාරම්මණං චක්ඛුස්ස ආපාථං ආගච්ඡති, තදා භවඞ්ගෙ ද්වික්ඛත්තුං උප්පජ්ජිත්වා නිරුද්ධෙ කිරියාමනොධාතු ආවජ්ජනකිච්චං සාධයමානා උප්පජ්ජිත්වා නිරුජ්ඣති, තතො චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දස්සනකිච්චං, තතො විපාකමනොධාතු සම්පටිච්ඡනකිච්චං, තතො විපාකාහෙතුකමනොවිඤ්ඤාණධාතු සන්තීරණකිච්චං, තතො කිරියාහෙතුකමනොවිඤ්ඤාණධාතු වොට්ඨබ්බනකිච්චං සාධයමානා උප්පජ්ජිත්වා නිරුජ්ඣති, තදනන්තරං ජවනං ජවති. තථාපි නෙව භවඞ්ගසමයෙ, න ආවජ්ජනාදීනං අඤ්ඤතරසමයෙ [Pg.93] සංවරො වා අසංවරො වා අත්ථි, ජවනක්ඛණෙ පන සචෙ දුස්සීල්යං වා මුට්ඨස්සච්චං වා අඤ්ඤාණං වා අක්ඛන්ති වා කොසජ්ජං වා උප්පජ්ජති, අසංවරො හොති. එවං හොන්තොපි සො ‘‘චක්ඛුද්වාරෙ අසංවරො’’ති වුච්චති. කස්මා? යස්මා තස්මිං සති ද්වාරම්පි අගුත්තං හොති භවඞ්ගම්පි ආවජ්ජනාදීනි වීථිචිත්තානිපි. යථා කිං? යථා නගරෙ චතූසු ද්වාරෙසු අසංවුතෙසු කිඤ්චාපි අන්තොඝරද්වාරකොට්ඨකගබ්භාදයො සුසංවුතා තථාපි අන්තොනගරෙ සබ්බං භණ්ඩං අරක්ඛිතං අගොපිතමෙව හොති. නගරද්වාරෙහි පවිසිත්වා චොරා යදිච්ඡන්ති, තං හරෙය්යුං. එවමෙව ජවනෙ දුස්සීල්යාදීසු උප්පන්නෙසු තස්මිං අසංවරෙ සතිද්වාරම්පි අගුත්තං හොති, භවඞ්ගම්පි ආවජ්ජනාදීනි වීථිචිත්තානිපි. තස්මිං පන අසති ජවනෙ සීලාදීසු උප්පන්නෙසු ද්වාරම්පි ගුත්තං හොති භවඞ්ගම්පි ආවජ්ජනාදීනි වීථිචිත්තානිපි. යථා කිං? යථා නගරද්වාරෙසු සංවුතෙසු කිඤ්චාපි අන්තොඝරද්වාරාදයො අසංවුතා, තථාපි අන්තොනගරෙ සබ්බං භණ්ඩං සුරක්ඛිතං සුගොපිතමෙව හොති. නගරද්වාරෙසු හි පිහිතෙසු චොරානං පවෙසො නත්ථි. එවමෙව ජවනෙ සීලාදීසු උප්පන්නෙසු ද්වාරම්පි ගුත්තං හොති, භවඞ්ගම්පි, ආවජ්ජනාදීනි වීථිචිත්තානිපි. තස්මා ජවනක්ඛණෙ උප්පජ්ජමානොපි ‘‘චක්ඛුද්වාරෙ සංවරො’’ති වුච්චති. සෙසද්වාරෙසුපි එසෙව නයො. එවං ඉන්ද්රියෙසු අගුත්තද්වාරතා, ගුත්තද්වාරතා ච වෙදිතබ්බා. इन्द्रियों में असंयम (अगुप्तद्वारता) क्या है और संयम (गुप्तद्वारता) क्या है? यद्यपि चक्षु-इन्द्रिय में न तो संवर (संयम) है और न ही असंवर। क्योंकि चक्षु-प्रसाद के आश्रय से न तो स्मृति उत्पन्न होती है और न ही स्मृति-भ्रंश (मुट्ठसच्चं)। फिर भी, जब रूप-आरम्बन चक्षु के मार्ग में आता है, तब भवाङ्ग के दो बार उत्पन्न होकर निरुद्ध होने पर, आवर्जन-कृत्य को सिद्ध करने वाली क्रिया-मनोधातु उत्पन्न होकर निरुद्ध होती है, उसके बाद चक्षु-विज्ञान दर्शन-कृत्य करता है, उसके बाद विपाक-मनोधातु सम्प्रतीच्छन-कृत्य करती है, उसके बाद विपाक-अहेतुक-मनोविज्ञानधातु सन्तीरण-कृत्य करती है, उसके बाद क्रिया-अहेतुक-मनोविज्ञानधातु व्यवस्थापन (वोट्ठब्बन) कृत्य को सिद्ध करती हुई उत्पन्न होकर निरुद्ध होती है, उसके ठीक बाद जवन प्रवृत्त होता है। फिर भी, न तो भवाङ्ग के समय और न ही आवर्जन आदि में से किसी के समय संवर या असंवर होता है, बल्कि जवन के क्षण में यदि दुःशीलता, स्मृति-भ्रंश, अज्ञान, अक्षान्ति या आलस्य उत्पन्न होता है, तो असंवर होता है। ऐसा होने पर भी उसे 'चक्षु-द्वार में असंवर' कहा जाता है। क्यों? क्योंकि उसके होने पर द्वार भी असुरक्षित होता है, भवाङ्ग भी और आवर्जन आदि वीथि-चित्त भी। जैसे क्या? जैसे किसी नगर के चारों द्वारों के खुले रहने पर, भले ही घर के भीतर के द्वार, कोष्ठक और गर्भ आदि अच्छी तरह सुरक्षित हों, फिर भी नगर के भीतर की सारी सामग्री असुरक्षित और अरक्षित ही होती है। नगर के द्वारों से प्रवेश कर चोर जो चाहें, उसे ले जा सकते हैं। इसी प्रकार जवन में दुःशीलता आदि के उत्पन्न होने पर, उस असंवर के होने से द्वार भी असुरक्षित होता है, भवाङ्ग भी और आवर्जन आदि वीथि-चित्त भी। परन्तु उस (असंवर) के न होने पर, जवन में शील आदि के उत्पन्न होने पर द्वार भी सुरक्षित होता है, भवाङ्ग भी और आवर्जन आदि वीथि-चित्त भी। जैसे क्या? जैसे नगर के द्वारों के बंद होने पर, भले ही घर के भीतर के द्वार आदि खुले हों, फिर भी नगर के भीतर की सारी सामग्री सुरक्षित और रक्षित ही होती है। क्योंकि नगर के द्वारों के बंद होने पर चोरों का प्रवेश नहीं होता। इसी प्रकार जवन में शील आदि के उत्पन्न होने पर द्वार भी सुरक्षित होता है, भवाङ्ग भी और आवर्जन आदि वीथि-चित्त भी। इसलिए जवन के क्षण में उत्पन्न होने पर भी उसे 'चक्षु-द्वार में संवर' कहा जाता है। शेष द्वारों में भी यही नियम है। इस प्रकार इन्द्रियों में असंयम और संयम को जानना चाहिए। කථං පන භොජනෙ අමත්තඤ්ඤූ, කථං වා මත්තඤ්ඤූති? යො හි පුග්ගලො මහිච්ඡො හුත්වා පටිග්ගහණෙ මත්තං න ජානාති. මහිච්ඡපුග්ගලො හි යථා නාම කච්ඡපුටවාණිජො පිළන්ධනභණ්ඩකං හත්ථෙන ගහෙත්වා උච්ඡඞ්ගෙපි පක්ඛිපිතබ්බයුත්තකං පක්ඛිපිත්වා මහාජනස්ස පස්සන්තස්සෙව ‘‘අසුකං ගණ්හථ, අසුකං ගණ්හථා’’ති මුඛෙන උග්ඝොසෙති, එවමෙව අප්පමත්තකම්පි අත්තනො සීලං වා ගන්ථං වා ධුතඞ්ගගුණං වා අන්තමසො අරඤ්ඤවාසමත්තකම්පි මහාජනස්ස ජානන්තස්සෙව සම්භාවෙති, සම්භාවෙත්වා ච පන සකටෙහිපි උපනීතෙ පච්චයෙ ‘‘අල’’න්ති අවත්වා පටිග්ගණ්හාති. තයො හි පූරෙතුං න සක්කා අග්ගි උපාදානෙන, සමුද්දො උදකෙන, මහිච්ඡො පච්චයෙහීති – भोजन में मात्रा न जानने वाला (अमत्तञ्ञू) कौन है और मात्रा जानने वाला (मत्तञ्ञू) कौन है? जो व्यक्ति महा-इच्छुक (लोभी) होकर ग्रहण करने में मात्रा को नहीं जानता। महा-इच्छुक व्यक्ति, जैसे कोई फेरीवाला (कच्छपुट-वाणिज) आभूषणों को हाथ में लेकर और गोद में रखने योग्य वस्तुओं को गोद में रखकर, लोगों के देखते हुए ही मुख से घोषणा करता है कि 'इसे लो, उसे लो', उसी प्रकार वह अपने अल्प शील, शास्त्र-ज्ञान, धुतङ्ग-गुण या यहाँ तक कि केवल अरण्य-वास को भी लोगों के जानते हुए ही बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, और बढ़ा-चढ़ाकर बताने के बाद छकड़ों (गाड़ियों) से लाए गए प्रत्ययों (दान-सामग्री) को भी 'बस' न कहकर ग्रहण करता है। क्योंकि इन तीनों को तृप्त नहीं किया जा सकता—अग्नि को ईंधन से, समुद्र को जल से और महा-इच्छुक व्यक्ति को प्रत्ययों से— ‘‘අග්ගික්ඛන්ධො සමුද්දො ච, මහිච්ඡො චාපි පුග්ගලො; බහුකෙ පච්චයෙ දින්නෙ, තයොපෙතෙ න පූරයෙති’’. "अग्नि-पुंज, समुद्र और महा-इच्छुक व्यक्ति; बहुत अधिक प्रत्यय दिए जाने पर भी, ये तीनों नहीं भरते।" මහිච්ඡපුග්ගලො [Pg.94] හි විජාතමාතුයාපි මනං ගණ්හිතුං න සක්කොති. එවරූපො හි අනුප්පන්නං ලාභං න උප්පාදෙති, උප්පන්නලාභතො ච පරිහායති. එවං තාව පටිග්ගහණෙ අමත්තඤ්ඤූ හොති. යො පන ධම්මෙන සමෙන ලද්ධම්පි ආහාරං ගධිතො මුච්ඡිතො අජ්ඣොපන්නො අනාදීනවදස්සාවී අනිස්සරණපඤ්ඤො ආහරහත්ථකඅලංසාටකතත්ථවට්ටකකාකමාසකභුත්තවමිතකබ්රාහ්මණානං අඤ්ඤතරො විය අයොනිසො අනුපායෙන යාවදත්ථං උදරාවදෙහකං පරිභුඤ්ජිත්වා සෙය්යසුඛං පස්සසුඛං මිද්ධසුඛං අනුයුත්තො විහරති. අයං පරිභොගෙ අමත්තඤ්ඤූ නාම. महा-इच्छुक व्यक्ति तो अपनी जन्म देने वाली माता का मन भी नहीं जीत सकता। ऐसा व्यक्ति अनुत्पन्न लाभ को उत्पन्न नहीं कर पाता और उत्पन्न लाभ से भी भ्रष्ट हो जाता है। इस प्रकार वह ग्रहण करने में मात्रा न जानने वाला होता है। और जो धर्मपूर्वक समता से प्राप्त आहार को भी आसक्त, मोहित और लिप्त होकर, दोषों को न देखते हुए और निःसरण की प्रज्ञा के बिना, 'आहरहत्थक', 'अलसाटक', 'तत्थवट्टक', 'काकमासक', 'भुत्तवमितक' ब्राह्मणों में से किसी एक की तरह, अयोनिशः और बिना उपाय के पेट भरने तक उपभोग करके शयन-सुख, पार्श्व-सुख और निद्रा-सुख में लगा रहता है। यह उपभोग में मात्रा न जानने वाला कहलाता है। යො පන ‘‘යදිපි දෙය්යධම්මො බහු හොති, දායකො අප්පං දාතුකාමො, දායකස්ස වසෙන අප්පං ගණ්හාති. දෙය්යධම්මො අප්පො, දායකො බහුං දාතුකාමො, දෙය්යධම්මස්ස වසෙන අප්පං ගණ්හාති. දෙය්යධම්මො බහු, දායකොපි බහුං දාතුකාමො, අත්තනො ථාමං ඤත්වා පමාණයුත්තමෙව ගණ්හාතී’’ති එවං වුත්තස්ස පටිග්ගහණෙ පමාණජානනස්ස චෙව, ‘‘පටිසඞ්ඛා යොනිසො ආහාරං ආහාරෙති, නෙව දවාය, න මදායා’’තිආදිනා (ධ. ස. 1355) ‘‘ලද්ධඤ්ච පිණ්ඩපාතං අගධිතො අමුච්ඡිතො අනජ්ඣොපන්නො ආදීනවදස්සාවී නිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජතී’’ති ච ආදිනා නයෙන වුත්තස්ස පච්චවෙක්ඛිත්වා පටිසඞ්ඛානපඤ්ඤාය ජානිත්වා ආහාරපරිභුඤ්ජනසඞ්ඛාතස්ස පරිභොගෙ පමාණජානනස්ස ච වසෙන භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ හොති, අයං භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ නාම. එවං භොජනෙ අමත්තඤ්ඤුතා මත්තඤ්ඤුතා ච හොතීති වෙදිතබ්බං. और जो 'यदि देय-धर्म (दान की वस्तु) बहुत हो और दायक थोड़ा देना चाहता हो, तो दायक के अनुसार थोड़ा ही ग्रहण करता है। यदि देय-धर्म थोड़ा हो और दायक बहुत देना चाहता हो, तो देय-धर्म के अनुसार थोड़ा ही ग्रहण करता है। यदि देय-धर्म बहुत हो और दायक भी बहुत देना चाहता हो, तो अपनी शक्ति को जानकर उचित मात्रा में ही ग्रहण करता है'—इस प्रकार कहे गए ग्रहण करने में मात्रा को जानने के कारण, तथा 'प्रत्यवेक्षण कर योनिशः आहार ग्रहण करता है, न कि क्रीड़ा के लिए, न मद के लिए...' आदि के द्वारा और 'प्राप्त पिण्डपात को अनासक्त, अमोहित, अलिप्त होकर, दोषों को देखते हुए और निःसरण की प्रज्ञा के साथ उपभोग करता है' आदि विधि से कहे गए प्रत्यवेक्षण और प्रतिसंख्यान-प्रज्ञा से जानकर आहार-उपभोग रूपी उपभोग में मात्रा को जानने के कारण भोजन में मात्रा जानने वाला होता है, वह 'भोजन में मात्रा जानने वाला' कहलाता है। इस प्रकार भोजन में मात्रा न जानना और मात्रा जानना समझना चाहिए। ගාථාසු පන චක්ඛුන්තිආදීසු චක්ඛතීති චක්ඛු, රූපං අස්සාදෙති, සමවිසමං ආචික්ඛන්තං විය හොතීති වා අත්ථො. සුණාතීති සොතං. ඝායතීති ඝානං. ජීවිතනිමිත්තං ආහාරරසො ජීවිතං, තං අව්හායතීති ජිව්හා. කුච්ඡිතානං ආයොති කායො. මනතෙ විජානාතීති මනො. පොරාණා පනාහු මුනාතීති මනො, නාළියා මිනමානො විය මහාතුලාය ධාරයමානො විය ච ආරම්මණං විජානාතීති අත්ථො. එවං තාවෙත්ථ පදත්ථො වෙදිතබ්බො. गाथाओं में 'चक्षु' आदि के विषय में, जो देखता है वह चक्षु है, वह रूप का आस्वादन करता है, अथवा वह सम और विषम को बताने वाले के समान होता है - यह अर्थ है। जो सुनता है वह श्रोत्र है। जो सूंघता है वह घ्राण है। जीवन का निमित्त आहार-रस जीवन है, उसे जो बुलाता है वह जिह्वा है। कुत्सितों (अशुद्धियों) का आय (स्थान) काय है। जो मनन करता है, जानता है वह मन है। प्राचीन आचार्य कहते हैं कि जो जानता है वह मन है, जैसे नाली (मापक पात्र) से मापता हुआ या बड़ी तुला (तराजू) से तौलता हुआ आलम्बन को जानता है - यह अर्थ है। इस प्रकार यहाँ पद-अर्थ समझना चाहिए। භාවත්ථතො පන දුවිධං චක්ඛු – මංසචක්ඛු ච පඤ්ඤාචක්ඛු ච. තෙසු බුද්ධචක්ඛු, සමන්තචක්ඛු, ඤාණචක්ඛු, දිබ්බචක්ඛු, ධම්මචක්ඛූති පඤ්චවිධං පඤ්ඤාචක්ඛු. තත්ථ ‘‘අද්දසං ඛො [Pg.95] අහං, භික්ඛවෙ, බුද්ධචක්ඛුනා ලොකං වොලොකෙන්තො’’ති (ම. නි. 1.283) ඉදං බුද්ධචක්ඛු නාම. ‘‘සමන්තචක්ඛු වුච්චති සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණ’’න්ති (චූළව. ධොතකමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 32) ඉදං සමන්තචක්ඛු නාම. ‘‘චක්ඛුං උදපාදී’’ති (සං. නි. 5.1081; මහාව. 15) ඉදං ඤාණචක්ඛු නාම. ‘‘අද්දසං ඛො අහං, භික්ඛවෙ, දිබ්බෙන චක්ඛුනා විසුද්ධෙනා’’ති (ම. නි. 1.284) ඉදං දිබ්බචක්ඛු නාම. ‘‘විරජං වීතමලං ධම්මචක්ඛුං උදපාදී’’ති (ම. නි. 2.395; මහාව. 16) ඉදං හෙට්ඨිමමග්ගත්තයසඞ්ඛාතං ධම්මචක්ඛු නාම. भावार्थ की दृष्टि से चक्षु दो प्रकार का है - मांस-चक्षु और प्रज्ञा-चक्षु। उनमें बुद्ध-चक्षु, समन्त-चक्षु, ज्ञान-चक्षु, दिव्य-चक्षु और धर्म-चक्षु - ये पाँच प्रकार के प्रज्ञा-चक्षु हैं। वहाँ "भिक्षुओं, मैंने बुद्ध-चक्षु से लोक का अवलोकन करते हुए देखा" - यह बुद्ध-चक्षु है। "सर्वज्ञता-ज्ञान को समन्त-चक्षु कहा जाता है" - यह समन्त-चक्षु है। "चक्षु उत्पन्न हुआ" - यह ज्ञान-चक्षु है। "भिक्षुओं, मैंने विशुद्ध दिव्य-चक्षु से देखा" - यह दिव्य-चक्षु है। "विरज, वीतमल धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ" - यह नीचे के तीन मार्गों (स्रोतापत्ति, सकृदागामी, अनागामी) के रूप में धर्म-चक्षु है। මංසචක්ඛුපි දුවිධං – සසම්භාරචක්ඛු, පසාදචක්ඛූති. තත්ථ ය්වායං අක්ඛිකූපකෙ පතිට්ඨිතො හෙට්ඨා අක්ඛිකූපකට්ඨිකෙන, උපරි භමුකට්ඨිකෙන, උභතො අක්ඛිකූටෙහි, අන්තො මත්ථලුඞ්ගෙන, බහිද්ධා අක්ඛිලොමෙහි පරිච්ඡින්නො මංසපිණ්ඩො, සඞ්ඛෙපතො චතස්සො ධාතුයො – වණ්ණො, ගන්ධො, රසො, ඔජාසම්භවො සණ්ඨානං ජීවිතං භාවො කායපසාදො චක්ඛුපසාදොති චුද්දස සම්භාරා. විත්ථාරතො චතස්සො ධාතුයො තංනිස්සිතා වණ්ණගන්ධරසඔජාසණ්ඨානසම්භවාති ඉමානි දස චතුසමුට්ඨානිකත්තා චත්තාලීසං හොන්ති, ජීවිතං භාවො කායපසාදො චක්ඛුපසාදොති චත්තාරි එකන්තකම්මසමුට්ඨානෙවාති ඉමෙසං චතුචත්තාලීසාය රූපානං වසෙන චතුචත්තාලීස සම්භාරා. යං ලොකෙ ‘‘සෙතං වට්ටං පුථුලං විසටං විපුලං චක්ඛූ’’ති සඤ්ජානන්තො න චක්ඛුං සඤ්ජානාති, වත්ථුං චක්ඛුතො සඤ්ජානාති, යො මංසපිණ්ඩො අක්ඛිකූපකෙ පතිට්ඨිතො න්හාරුසුත්තකෙන මත්ථලුඞ්ගෙන ආබද්ධො, යත්ථ සෙතම්පි අත්ථි කණ්හම්පි ලොහිතකම්පි පථවීපි ආපොපි තෙජොපි වායොපි. යං සෙම්හුස්සදත්තා සෙතං, පිත්තුස්සදත්තා කණ්හං, රුහිරුස්සදත්තා ලොහිතකං, පථවුස්සදත්තා පත්ථද්ධං, ආපුස්සදත්තා පග්ඝරති, තෙජුස්සදත්තා පරිඩය්හති, වායුස්සදත්තා සම්භමති, ඉදං සසම්භාරචක්ඛු නාම. යො පන එත්ථ සිතො එත්ථ පටිබද්ධො චතුන්නං මහාභූතානං උපාදාය පසාදො, ඉදං පසාදචක්ඛු නාම. ඉදඤ්හි චක්ඛුවිඤ්ඤාණාදීනං යථාරහං වත්ථුද්වාරභාවෙන පවත්තති. मांस-चक्षु भी दो प्रकार का है - ससम्भार-चक्षु और प्रसाद-चक्षु। वहाँ जो यह नेत्र-कोटर में स्थित, नीचे नेत्र-कोटर की हड्डी से, ऊपर भौंह की हड्डी से, दोनों ओर नेत्र-कोनों से, भीतर मस्तिष्क से और बाहर पलकों के बालों से परिच्छिन्न मांस का पिण्ड है, संक्षेप में चार धातुएँ और वर्ण, गन्ध, रस, ओजा, उत्पत्ति, संस्थान, जीवित, भाव, काय-प्रसाद और चक्षु-प्रसाद - ये चौदह सम्भार हैं। विस्तार से चार धातुएँ और उन पर आश्रित वर्ण, गन्ध, रस, ओजा, संस्थान, उत्पत्ति - ये दस चार समुत्थानों के कारण चालीस होते हैं, और जीवित, भाव, काय-प्रसाद, चक्षु-प्रसाद - ये चार केवल कर्म-समुत्थान ही हैं, इस प्रकार इन चौवालीस रूपों के कारण चौवालीस सम्भार हैं। जिसे लोक में "सफेद, गोल, चौड़ा, फैला हुआ, विशाल चक्षु" के रूप में जाना जाता है, वह चक्षु को नहीं जानता, बल्कि चक्षु के अधिष्ठान को चक्षु के रूप में जानता है; जो मांस-पिण्ड नेत्र-कोटर में स्थित है, स्नायु-सूत्रों द्वारा मस्तिष्क से जुड़ा है, जहाँ सफेद भी है, काला भी, लाल भी, और पृथ्वी, जल, तेज, वायु भी हैं। जो श्लेष्म की अधिकता से सफेद है, पित्त की अधिकता से काला है, रक्त की अधिकता से लाल है, पृथ्वी की अधिकता से कठोर है, जल की अधिकता से बहता है, तेज की अधिकता से जलता है, वायु की अधिकता से चंचल है, यह ससम्भार-चक्षु है। और जो यहाँ आश्रित, यहाँ सम्बद्ध चार महाभूतों का उपादाय-प्रसाद है, वह प्रसाद-चक्षु है। यही चक्षु-विज्ञान आदि के लिए यथायोग्य वस्तु और द्वार के रूप में प्रवृत्त होता है। සොතාදීසුපි සොතං දිබ්බසොතං, මංසසොතන්ති දුවිධං. එත්ථ ‘‘දිබ්බාය සොතධාතුයා විසුද්ධාය අතික්කන්තමානුසිකාය උභො සද්දෙ සුණාතී’’ති ඉදං දිබ්බසොතං නාම. මංසසොතං පන සසම්භාරසොතං පසාදසොතන්ති දුවිධන්තිආදි සබ්බං චක්ඛුම්හි වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බං, තථා ඝානජිව්හා. කායො පන චොපනකායො, කරජකායො, සමූහකායො, පසාදකායොතිආදිනා බහුවිධො. තත්ථ – श्रोत्र आदि में भी श्रोत्र दो प्रकार का है - दिव्य-श्रोत्र और मांस-श्रोत्र। यहाँ "विशुद्ध, अतीन्द्रिय दिव्य-श्रोत्र धातु से दोनों प्रकार के शब्दों को सुनता है" - यह दिव्य-श्रोत्र है। मांस-श्रोत्र भी ससम्भार-श्रोत्र और प्रसाद-श्रोत्र के रूप में दो प्रकार का है - इत्यादि सब चक्षु के विषय में कहे गए तरीके से ही समझना चाहिए, वैसे ही घ्राण और जिह्वा भी। काय तो चोपन-काय (चेष्टा-काय), करज-काय, समूह-काय, प्रसाद-काय आदि के रूप में अनेक प्रकार का है। वहाँ - ‘‘කායෙන [Pg.96] සංවුතා ධීරා, අථො වාචාය සංවුතා’’ති. (ධ. ප. 234) – "धीर पुरुष काय से संयमित होते हैं, और वाणी से भी संयमित होते हैं।" අයං චොපනකායො නාම. ‘‘ඉමම්හා කායා අඤ්ඤං කායං අභිනිම්මිනාතී’’ති (දී. නි. 1.236; පටි. ම. 3.14) අයං කරජකායො නාම. සමූහකායො පන විඤ්ඤාණාදිසමූහවසෙන අනෙකවිධො ආගතො. තථා හි ‘‘ඡ ඉමෙ, ආවුසො, විඤ්ඤාණකායා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.101) විඤ්ඤාණසමූහො වුත්තො. ‘‘ඡ ඵස්සකායා’’තිආදීසු (දී. නි. 3.323; ම. නි. 1.98) ඵස්සාදිසමූහො. තථා ‘‘කායපස්සද්ධි කායලහුතා’’තිආදීසු (ධ. ස. 114) වෙදනාක්ඛන්ධාදයො. ‘‘ඉධෙකච්චො පථවිකායං අනිච්චතො අනුපස්සති, ආපොකායං තෙජොකායං වායොකායං කෙසකායං ලොමකාය’’න්තිආදීසු (පටි. ම. 3.35) පථවාදිසමූහො. ‘‘කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා’’ති (අ. නි. 3.16) අයං පසාදකායො. ඉධාපි පසාදකායො වෙදිතබ්බො. සො හි කායවිඤ්ඤාණාදීනං යථාරහං වත්ථුද්වාරභාවෙන පවත්තති. මනොති පන කිඤ්චාපි සබ්බං විඤ්ඤාණං වුච්චති, තථාපි ද්වාරභාවස්ස ඉධාධිප්පෙතත්තා ද්වාරභූතං සාවජ්ජනං භවඞ්ගං වෙදිතබ්බං. यह चोपन-काय (चेष्टा-काय) है। "इस काय से दूसरे काय का निर्माण करता है" - यह करज-काय है। समूह-काय तो विज्ञान आदि के समूह के कारण अनेक प्रकार का आया है। जैसे कि "आयुष्मन्, ये छह विज्ञान-काय हैं" आदि में विज्ञान-समूह कहा गया है। "छह स्पर्श-काय हैं" आदि में स्पर्श आदि का समूह। वैसे ही "काय-प्रस्रब्धि, काय-लघुता" आदि में वेदना-स्कन्ध आदि। "यहाँ कोई पृथ्वी-काय को अनित्य के रूप में देखता है, जल-काय, तेज-काय, वायु-काय, केश-काय, रोम-काय" आदि में पृथ्वी आदि का समूह। "काय से स्प्रष्टव्य का स्पर्श करके" - यह प्रसाद-काय है। यहाँ भी प्रसाद-काय ही समझना चाहिए। वह काय-विज्ञान आदि के लिए यथायोग्य वस्तु और द्वार के रूप में प्रवृत्त होता है। 'मन' यद्यपि सभी विज्ञानों को कहा जाता है, फिर भी यहाँ द्वार-भाव अभिप्रेत होने के कारण द्वार-भूत आवर्जन और भवङ्ग को समझना चाहिए। එතානි යස්ස ද්වාරානි අගුත්තානි ච භික්ඛුනොති යස්ස භික්ඛුනො එතානි මනච්ඡට්ඨානි ද්වාරානි සතිවොස්සග්ගෙන පමාදං ආපන්නත්තා සතිකවාටෙන අපිහිතානි. භොජනම්හි…පෙ… අධිගච්ඡතීති සො භික්ඛු වුත්තනයෙන භොජනෙ අමත්තඤ්ඤූ ඉන්ද්රියෙසු ච සංවරරහිතො දිට්ඨධම්මිකඤ්ච රොගාදිවසෙන, සම්පරායිකඤ්ච දුග්ගතිපරියාපන්නං කායදුක්ඛං රාගාදිකිලෙසසන්තාපවසෙන, ඉච්ඡාවිඝාතවසෙන ච චෙතොදුක්ඛන්ති සබ්බථාපි දුක්ඛමෙව අධිගච්ඡති පාපුණාති. යස්මා චෙතදෙවං, තස්මා දුවිධෙනපි දුක්ඛග්ගිනා ඉධලොකෙ ච පරලොකෙ ච ඩය්හමානෙන කායෙන ඩය්හමානෙන චෙතසා දිවා වා යදි වා රත්තිං නිච්චකාලමෙව තාදිසො පුග්ගලො දුක්ඛමෙව විහරති, න තස්ස සුඛවිහාරස්ස සම්භවො, වට්ටදුක්ඛානතික්කමෙ පන වත්තබ්බමෙව නත්ථීති. ‘जिस भिक्षु के ये द्वार असुरक्षित हैं’ का अर्थ है कि जिस भिक्षु के मन सहित ये छह द्वार स्मृति के त्याग और प्रमाद के कारण स्मृति रूपी कपाट से बंद नहीं हैं। ‘भोजन में... आदि... प्राप्त करता है’ का अर्थ है कि वह भिक्षु बताए गए तरीके से भोजन में मात्रा न जानने वाला और इंद्रियों में संयम रहित होकर, इस लोक में रोगों आदि के कारण और परलोक में दुर्गति में पड़ने वाले कायिक दुःख को, तथा राग आदि क्लेशों के संताप और इच्छाओं के विघात के कारण मानसिक दुःख को, इस प्रकार सब प्रकार से दुःख को ही प्राप्त करता है। चूँकि ऐसा है, इसलिए इस लोक और परलोक दोनों में ही दुःखरूपी अग्नि से जलते हुए शरीर और जलते हुए चित्त के साथ, दिन हो या रात, वह व्यक्ति सदा दुःख में ही विहार करता है। उसके लिए सुखपूर्वक विहार की कोई संभावना नहीं है, और संसार-दुःख से पार न होने के विषय में तो कहना ही क्या है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 2. සුඛවිහාරසුත්තවණ්ණනා २. सुखविहार सूत्र की व्याख्या। 29. දුතියෙ [Pg.97] වුත්තවිපරියායෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. २९. दूसरे (सूत्र) में कहे गए के विपरीत अर्थ समझना चाहिए। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. තපනීයසුත්තවණ්ණනා ३. तपनीय सूत्र की व्याख्या। 30. තතියෙ තපනීයාති ඉධ චෙව සම්පරායෙ ච තපන්ති විබාධෙන්ති විහෙඨෙන්තීති තපනීයා. තපනං වා දුක්ඛං දිට්ඨෙ චෙව ධම්මෙ අභිසම්පරායෙ ච තස්ස උප්පාදනෙන චෙව අනුබලප්පදානෙන ච හිතාති තපනීයා. අථ වා තපන්ති තෙනාති තපනං, පච්ඡානුතාපො, විප්පටිසාරොති අත්ථො, තස්ස හෙතුභාවතො හිතාති තපනීයා. අකතකල්යාණොති අකතං කල්යාණං භද්දකං පුඤ්ඤං එතෙනාති අකතකල්යාණො. සෙසපදද්වයං තස්සෙව වෙවචනං. පුඤ්ඤඤ්හි පවත්තිහිතතාය ආයතිංසුඛතාය ච භද්දකට්ඨෙන කල්යාණන්ති ච කුච්ඡිතසලනාදිඅත්ථෙන කුසලන්ති ච දුක්ඛභීරූනං සංසාරභීරූනඤ්ච රක්ඛනට්ඨෙන භීරුත්තාණන්ති ච වුච්චති. කතපාපොති කතං උපචිතං පාපං එතෙනාති කතපාපො. සෙසපදද්වයං තස්සෙව වෙවචනං. අකුසලකම්මඤ්හි ලාමකට්ඨෙන පාපන්ති ච අත්තනො පවත්තික්ඛණෙ විපාකක්ඛණෙ ච ඝොරසභාවතාය ලුද්දන්ති ච කිලෙසෙහි දූසිතභාවෙන කිබ්බිසන්ති ච වුච්චති. ඉති භගවා ‘‘ද්වෙ ධම්මා තපනීයා’’ති ධම්මාධිට්ඨානෙන උද්දිසිත්වා අකතං කුසලං ධම්මං කතඤ්ච අකුසලං ධම්මං පුග්ගලාධිට්ඨානෙන නිද්දිසි. ඉදානි තෙසං තපනීයභාවං දස්සෙන්තො ‘‘සො අකතං මෙ කල්යාණන්තිපි තප්පති, කතං මෙ පාපන්තිපි තප්පතී’’ති ආහ. චිත්තසන්තාසෙන තප්පති අනුතප්පති අනුසොචතීති අත්ථො. ३०. तीसरे (सूत्र) में ‘तपनीय’ का अर्थ है—जो यहाँ (इस लोक में) और परलोक में भी तपाते हैं, बाधा पहुँचाते हैं, पीड़ित करते हैं, वे ‘तपनीय’ हैं। अथवा, तप या दुःख जो इस लोक में और परलोक में भी उसके उत्पन्न होने और उसे बल देने में सहायक होते हैं, वे ‘तपनीय’ हैं। अथवा, जिससे तपते हैं वह ‘तपन’ है, जिसका अर्थ पश्चात्ताप या विप्रतिसार है; उसके हेतु होने के कारण वे ‘तपनीय’ हैं। ‘अकृतकल्याण’ का अर्थ है—जिसने कल्याणकारी, भद्र या पुण्य कार्य नहीं किया है। शेष दो पद इसी के पर्यायवाची हैं। पुण्य को ही भविष्य में हितकारी और सुखकारी होने के कारण ‘कल्याण’, कुत्सित दोषों को दूर करने के कारण ‘कुशल’, और दुःख एवं संसार से डरने वालों की रक्षा करने के कारण ‘भीरुत्राण’ कहा जाता है। ‘कृतपाप’ का अर्थ है—जिसने पाप संचित किया है। शेष दो पद इसी के पर्यायवाची हैं। अकुशल कर्म को ही निकृष्ट होने के कारण ‘पाप’, अपने होने के क्षण में और विपाक के क्षण में घोर स्वभाव वाला होने के कारण ‘लुद्द’ (क्रूर), और क्लेशों से दूषित होने के कारण ‘किल्बिष’ कहा जाता है। इस प्रकार भगवान ने ‘दो धर्म तपनीय हैं’ ऐसा धर्म के आधार पर निर्देश देकर, अकृत कुशल धर्म और कृत अकुशल धर्म का पुद्गल (व्यक्ति) के आधार पर निर्देश किया। अब उनकी तपनीयता को दिखाते हुए कहा—‘वह मैंने कल्याण नहीं किया, इस विचार से भी तपता है, और मैंने पाप किया, इस विचार से भी तपता है’। इसका अर्थ है कि वह चित्त के संताप से तपता है, अनुताप करता है और शोक करता है। ගාථාසු දුට්ඨු චරිතං, කිලෙසපූතිකත්තා වා දුට්ඨං චරිතන්ති දුච්චරිතං. කායෙන දුච්චරිතං, කායතො වා පවත්තං දුච්චරිතං කායදුච්චරිතං. එවං වචීමනොදුච්චරිතානිපි දට්ඨබ්බානි. ඉමානි ච කායදුච්චරිතාදීනි කම්මපථප්පත්තානි අධිප්පෙතානීති යං න කම්මපථප්පත්තං අකුසලජාතං, තං සන්ධායාහ ‘‘යඤ්චඤ්ඤං දොසසඤ්හිත’’න්ති. තස්සත්ථො – යම්පි ච අඤ්ඤං කම්මපථභාවං අප්පත්තත්තා නිප්පරියායෙන කායකම්මාදිසඞ්ඛං න ලභති, රාගාදිකිලෙසසංසට්ඨත්තා දොසසහිතං අකුසලං තම්පි කත්වාති අත්ථො. නිරයන්ති නිරතිඅත්ථෙන නිරස්සාදට්ඨෙන වා නිරයන්ති ලද්ධනාමං සබ්බම්පි දුග්ගතිං, අයසඞ්ඛාතසුඛප්පටික්ඛෙපෙන [Pg.98] වා සබ්බත්ථ සුගතිදුග්ගතීසු නිරයදුක්ඛං. සො තාදිසො පුග්ගලො උපගච්ඡතීති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. गाथाओं में ‘दुष्टु चरित’ (बुरा आचरण) या क्लेशों की दुर्गंध के कारण जो दूषित आचरण है, वह ‘दुश्चरित’ है। शरीर द्वारा किया गया दुश्चरित या शरीर से प्रवृत्त दुश्चरित ‘काय-दुश्चरित’ है। इसी प्रकार वचन और मन के दुश्चरितों को भी समझना चाहिए। यहाँ काय-दुश्चरित आदि से वे कर्म अभिप्रेत हैं जो कर्मपथ (पूर्ण कर्म) की सीमा तक पहुँच चुके हैं। जो अकुशल कर्मपथ तक नहीं पहुँचे हैं, उनके संदर्भ में कहा गया है—‘यञ्चञ्ञं दोससञ्हितं’ (और जो अन्य दोषयुक्त है)। इसका अर्थ है—जो अन्य कर्म, कर्मपथ की अवस्था को प्राप्त न होने के कारण मुख्य रूप से काय-कर्म आदि की संज्ञा नहीं पाते, किंतु राग आदि क्लेशों से संसृष्ट होने के कारण दोषयुक्त अकुशल हैं, उन्हें भी करके। ‘निरयं’ का अर्थ है—रति (सुख) न होने के कारण या स्वाद न होने के कारण जिसे ‘निरय’ नाम मिला है, ऐसी समस्त दुर्गति; अथवा सुख के अभाव के कारण सभी सुगतियों और दुर्गतियों में होने वाला नरक जैसा दुःख। वह वैसा व्यक्ति प्राप्त करता है—यहाँ ऐसा अर्थ समझना चाहिए। එත්ථ ච කායදුච්චරිතස්ස තපනීයභාවෙ නන්දො යක්ඛො නන්දො මාණවකො නන්දො ගොඝාතකො ද්වෙ භාතිකාති එතෙසං වත්ථූනි කථෙතබ්බානි. තෙ කිර ගාවිං වධිත්වා මංසං ද්වෙ කොට්ඨාසෙ අකංසු. තතො කනිට්ඨො ජෙට්ඨං ආහ – ‘‘මය්හං දාරකා බහූ, ඉමානි මෙ අන්තානි දෙහී’’ති. අථ නං ජෙට්ඨො – ‘‘සබ්බං මංසං ද්වෙධා විභත්තං, පුන කිමග්ගහෙසී’’ති පහරිත්වා ජීවිතක්ඛයං පාපෙසි. නිවත්තිත්වා ච නං ඔලොකෙන්තො මතං දිස්වා ‘‘භාරියං වත මයා කතං, ස්වාහං අකාරණෙනෙව නං මාරෙසි’’න්ති චිත්තං උප්පාදෙසි. අථස්ස බලවවිප්පටිසාරො උප්පජ්ජි. සො ඨිතට්ඨානෙපි නිසින්නට්ඨානෙපි තදෙව කම්මං ආවජ්ජෙති, චිත්තස්සාදං න ලභති, අසිතපීතඛායිතම්පිස්ස සරීරෙ ඔජං න ඵරති, අට්ඨිචම්මමත්තමෙව අහොසි. අථ නං එකො ථෙරො පුච්ඡි ‘‘උපාසක, ත්වං අතිවිය කිසො අට්ඨිචම්මමත්තො ජාතො, කීදිසො තෙ රොගො, උදාහු අත්ථි කිඤ්චි තපනීයං කම්මං කත’’න්ති? සො ‘‘ආම, භන්තෙ’’ති සබ්බං ආරොචෙසි. අථස්ස සො ‘‘භාරියං තෙ, උපාසක, කම්මං කතං, අනපරාධට්ඨානෙ අපරද්ධ’’න්ති ආහ. සො තෙනෙව කම්මුනා කාලං කත්වා නිරයෙ නිබ්බත්ති. වචීදුච්චරිතස්ස පන සුප්පබුද්ධසක්කකොකාලිකචිඤ්චමාණවිකාදීනං වත්ථූනි කථෙතබ්බානි, මනොදුච්චරිතස්ස උක්කලජයභඤ්ඤාදීනං. यहाँ काय-दुश्चरित की तपनीयता के विषय में नन्द यक्ष, नन्द माणवक, नन्द गोघातक और दो भाइयों की कथाएँ कहनी चाहिए। कहा जाता है कि उन्होंने एक गाय को मारकर मांस के दो भाग किए। तब छोटे भाई ने बड़े भाई से कहा—‘मेरे बच्चे बहुत हैं, मुझे ये अंतड़ियाँ दे दो।’ तब बड़े भाई ने उसे यह कहकर मारा कि ‘सारा मांस दो भागों में बँट चुका है, फिर तुमने दोबारा क्यों माँगा?’ और उसे जान से मार दिया। लौटकर जब उसने उसे मृत देखा, तो उसके मन में विचार आया—‘अरे! मैंने बहुत भारी (बुरा) काम किया, मैंने उसे बिना कारण ही मार दिया।’ तब उसे भारी पश्चात्ताप हुआ। वह खड़े होने या बैठने की स्थिति में भी उसी कर्म का चिंतन करता रहता, उसे चित्त की शांति नहीं मिलती थी, खाए-पिए और चबाए हुए भोजन का रस भी उसके शरीर में नहीं फैलता था, वह केवल हड्डियों और चमड़े का ढाँचा रह गया। तब एक स्थविर ने उससे पूछा—‘उपासक! तुम बहुत दुबले होकर केवल हड्डियों और चमड़े के रह गए हो, तुम्हें कौन सा रोग है, या तुमने कोई तपनीय (पश्चात्ताप योग्य) कर्म किया है?’ उसने ‘हाँ भन्ते’ कहकर सब बता दिया। तब उन्होंने उससे कहा—‘उपासक! तुमने बहुत भारी कर्म किया है, तुमने निरपराध के प्रति अपराध किया है।’ वह उसी कर्म के कारण मरकर नरक में उत्पन्न हुआ। वचन-दुश्चरित के लिए सुप्रबुद्ध शाक्य, कोकालिक, चिञ्चा माणविका आदि की कथाएँ कहनी चाहिए, और मन-दुश्चरित के लिए उक्कल, जय, भञ्ञ आदि की। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. අතපනීයසුත්තවණ්ණනා ४. अतपनीय सूत्र की व्याख्या। 31. චතුත්ථෙ තතියෙ වුත්තවිපරියායෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. ३१. चौथे (सूत्र) में तीसरे में कहे गए के विपरीत अर्थ समझना चाहिए। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. පඨමසීලසුත්තවණ්ණනා ५. प्रथम शील सूत्र की व्याख्या। 32. පඤ්චමෙ පාපකෙන ච සීලෙනාති පාපකං නාම සීලං සීලභෙදකරො අසංවරොති වදන්ති. තත්ථ යදි අසංවරො අසීලමෙව තංදුස්සීල්යභාවතො, කථං සීලන්ති වුච්චති? තත්ථායං අධිප්පායො සියා [Pg.99] – යථා නාම ලොකෙ අදිට්ඨං ‘‘දිට්ඨ’’න්ති වුච්චති, අසීලවා ‘‘සීලවා’’ති, එවමිධාපි අසීලම්පි අසංවරොපි ‘‘සීල’’න්ති වොහරීයති. අථ වා ‘‘කතමෙ ච, ථපති, අකුසලා සීලා? අකුසලං කායකම්මං, අකුසලං වචීකම්මං, පාපකො ආජීවො’’ති (ම. නි. 2.264) වචනතො අකුසලධම්මෙසුපි අත්ථෙව සීලසමඤ්ඤා, තස්මා පරිචයවසෙන සභාවසිද්ධි විය පකතිභූතො සබ්බො සමාචාරො ‘‘සීල’’න්ති වුච්චති. තත්ථ යං අකොසල්ලසම්භූතට්ඨෙන අකුසලං ලාමකං, තං සන්ධායාහ ‘‘පාපකෙන ච සීලෙනා’’ති. පාපිකාය ච දිට්ඨියාති සබ්බාපි මිච්ඡාදිට්ඨියො පාපිකාව. විසෙසතො පන අහෙතුකදිට්ඨි, අකිරියදිට්ඨි, නත්ථිකදිට්ඨීති ඉමා තිවිධා දිට්ඨියො පාපිකතරා. තත්ථ පාපකෙන සීලෙන සමන්නාගතො පුග්ගලො පයොගවිපන්නො හොති, පාපිකාය දිට්ඨියා සමන්නාගතො ආසයවිපන්නො හොති, එවං පයොගාසයවිපන්නො පුග්ගලො නිරයූපගො හොතියෙව. තෙන වුත්තං ‘‘ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, ද්වීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො පුග්ගලො යථාභතං නික්ඛිත්තො, එවං නිරයෙ’’ති. එත්ථ ච ‘‘ද්වීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො’’ති ඉදං ලක්ඛණවචනං දට්ඨබ්බං, න තන්තිනිද්දෙසො. යථා තං ලොකෙ ‘‘යදිමෙ බ්යාධිතා සියුං, ඉමෙසං ඉදං භෙසජ්ජං දාතබ්බ’’න්ති. අඤ්ඤෙසුපි ඊදිසෙසු ඨානෙසු එසෙව නයො. දුප්පඤ්ඤොති නිප්පඤ්ඤො. ३२. पाँचवें (सूत्र) में 'पापपूर्ण शील से' (पापकेन च सीलेन) का अर्थ है कि पापपूर्ण शील उसे कहते हैं जो शील को तोड़ने वाला असंयम है। वहाँ यदि असंयम दुःशील होने के कारण अशील ही है, तो उसे 'शील' क्यों कहा जाता है? वहाँ यह अभिप्राय हो सकता है - जैसे लोक में जो नहीं देखा गया उसे 'देखा गया' कहा जाता है, अशीलवान को 'शीलवान' कहा जाता है, वैसे ही यहाँ भी अशील और असंयम को भी 'शील' कह दिया जाता है। अथवा "हे स्थपति! अकुशल शील कौन से हैं? अकुशल कायकर्म, अकुशल वचीकर्म और पापपूर्ण आजीविका" (म. नि. 2.264) इस वचन के अनुसार अकुशल धर्मों में भी 'शील' की संज्ञा होती ही है, इसलिए अभ्यास के कारण स्वभाव की सिद्धि की तरह जो स्वभाव बन गया है, उस समस्त आचरण को 'शील' कहा जाता है। वहाँ जो अकुशलता से उत्पन्न होने के कारण अकुशल और नीच है, उसे लक्ष्य करके कहा गया है - 'पापपूर्ण शील से'। 'पापपूर्ण दृष्टि से' (पापिकाय च दिट्ठिया) का अर्थ है कि सभी मिथ्या दृष्टियाँ पापपूर्ण ही हैं। विशेष रूप से अहेतुक दृष्टि, अक्रिया दृष्टि और नास्तिक दृष्टि - ये तीन प्रकार की दृष्टियाँ अधिक पापपूर्ण हैं। वहाँ पापपूर्ण शील से युक्त पुद्गल 'प्रयोग-विपन्न' (आचरण में भ्रष्ट) होता है, पापपूर्ण दृष्टि से युक्त पुद्गल 'आशय-विपन्न' (विचारों में भ्रष्ट) होता है, इस प्रकार प्रयोग और आशय से विपन्न पुद्गल निश्चय ही नरकगामी होता है। इसीलिए कहा गया है - "भिक्षुओं! इन दो धर्मों से युक्त पुद्गल यथा-आहृत (जैसे लाया गया हो वैसे ही) नरक में डाल दिया जाता है।" यहाँ 'दो धर्मों से युक्त' यह लक्षण-वचन समझना चाहिए, न कि आगम का निर्देश। जैसे लोक में कहा जाता है - "यदि ये बीमार हों, तो इन्हें यह औषधि देनी चाहिए।" अन्य ऐसे ही स्थानों पर भी यही न्याय (नियम) है। 'दुष्प्रज्ञ' (दुप्पञ्ञो) का अर्थ है प्रज्ञाहीन। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. දුතියසීලසුත්තවණ්ණනා ६. द्वितीय शील सूत्र की व्याख्या। 33. ඡට්ඨෙ භද්දකෙන ච සීලෙනාති කායසුචරිතාදිචතුපාරිසුද්ධිසීලෙන. තඤ්හි අඛණ්ඩාදිසීලභාවෙන සයඤ්ච කල්යාණං, සමථවිපස්සනාදිකල්යාණගුණාවහං චාති ‘‘භද්දක’’න්ති වුච්චති. භද්දිකාය ච දිට්ඨියාති කම්මස්සකතාඤාණෙන චෙව කම්මපථසම්මාදිට්ඨියා ච. තත්ථ භද්දකෙන සීලෙන පයොගසම්පන්නො හොති, භද්දිකාය දිට්ඨියා ආසයසම්පන්නො. ඉති පයොගාසයසම්පන්නො පුග්ගලො සග්ගූපගො හොති. තෙන වුත්තං – ‘‘ඉමෙහි, ඛො, භික්ඛවෙ, ද්වීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො පුග්ගලො යථාභතං නික්ඛිත්තො, එවං සග්ගෙ’’ති. සප්පඤ්ඤොති පඤ්ඤවා. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. ३३. छठे (सूत्र) में 'भले (कल्याणकारी) शील से' (भद्दकेन च सीलेन) का अर्थ है काय-सुचरित आदि चतुष्पारिशुद्धि शील से। वह अखण्ड आदि शील होने के कारण स्वयं भी कल्याणकारी है और शमथ-विपश्यना आदि कल्याणकारी गुणों को लाने वाला है, इसलिए उसे 'भद्दक' (भला/शुभ) कहा जाता है। 'भली दृष्टि से' (भद्दिकाय च दिट्ठिया) का अर्थ है कर्म-स्वकीयता ज्ञान (कम्मस्सकता ज्ञान) और कर्मपथ-सम्यग्दृष्टि से। वहाँ भले शील से वह 'प्रयोग-सम्पन्न' होता है, और भली दृष्टि से 'आशय-सम्पन्न' होता है। इस प्रकार प्रयोग और आशय से सम्पन्न पुद्गल स्वर्गगामी होता है। इसीलिए कहा गया है - "भिक्षुओं! इन दो धर्मों से युक्त पुद्गल यथा-आहृत स्वर्ग में (रख दिया जाता) है।" 'सप्रज्ञ' (सप्पञ्ञो) का अर्थ है प्रज्ञावान। शेष सब सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. ආතාපීසුත්තවණ්ණනා ७. आतापी सूत्र की व्याख्या। 34. සත්තමෙ [Pg.100] අනාතාපීති කිලෙසානං ආතාපනට්ඨෙන ආතාපො, වීරියං, සො එතස්ස අත්ථීති ආතාපී, න ආතාපී අනාතාපී, සම්මප්පධානවිරහිතො කුසීතොති වුත්තං හොති. ඔත්තාපො වුච්චති පාපුත්රාසො, සො එතස්ස අත්ථීති ඔත්තාපී, න ඔත්තාපී අනොත්තාපී, ඔත්තාපරහිතො. අථ වා ආතාපප්පටිපක්ඛො අනාතාපො, කොසජ්ජං සො අස්ස අත්ථීති අනාතාපී. යං ‘‘න ඔත්තපති ඔත්තප්පිතබ්බෙන, න ඔත්තපති පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං සමාපත්තියා’’ති එවං වුත්තං, තං අනොත්තප්පං අනොත්තාපො. සො අස්ස අත්ථීති අනොත්තාපීති එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. ३४. सातवें (सूत्र) में 'अनातापी' (anātāpī) का अर्थ है - क्लेशों को तपाने के अर्थ में 'आताप' अर्थात् वीर्य (पुरुषार्थ) है, वह जिसका है वह 'आतापी' है; जो आतापी नहीं है वह 'अनातापी' है, अर्थात् सम्यक् प्रधान (प्रयत्न) से रहित आलसी कहा गया है। 'ओत्ताप' (ottāpo) पाप के भय को कहते हैं, वह जिसका है वह 'ओत्तापी' है; जो ओत्तापी नहीं है वह 'अनओत्तापी' है, अर्थात् ओत्ताप (पाप-भीरुता) से रहित। अथवा आताप का प्रतिपक्ष 'अनाताप' अर्थात् आलस्य है, वह जिसका है वह 'अनातापी' है। जो यह कहा गया है कि "जो ओत्तप्प (भय) करने योग्य बातों से भयभीत नहीं होता, पापपूर्ण अकुशल धर्मों की प्राप्ति से भयभीत नहीं होता", वह 'अनओत्तप्प' ही 'अनओत्ताप' है। वह जिसका है वह 'अनओत्तापी' है - इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। අභබ්බොති අනරහො. සම්බොධායාති අරියමග්ගත්ථාය. නිබ්බානායාති කිලෙසානං අච්චන්තවූපසමාය අමතමහානිබ්බානාය. අනුත්තරස්ස යොගක්ඛෙමස්සාති අරහත්තඵලස්ස. තඤ්හි උත්තරිතරස්ස අභාවතො අනුත්තරං, චතූහි යොගෙහි අනුපද්දුතත්තා ඛෙමං නිබ්භයන්ති යොගක්ඛෙමන්ති ච වුච්චති. අධිගමායාති පත්තියා. ආතාපීති වීරියවා. සො හි ‘‘ආරද්ධවීරියො විහරති අකුසලානං ධම්මානං පහානාය, කුසලානං ධම්මානං උපසම්පදාය, ථාමවා දළ්හපරක්කමො අනික්ඛිත්තධුරො කුසලෙසු ධම්මෙසූ’’ති (දී. නි. 3.345) එවං වුත්තෙන වීරියාරම්භෙන සමන්නාගතො කිලෙසානං අච්චන්තමෙව ආතාපනසීලොති ආතාපී. ඔත්තාපීති ‘‘යං ඔත්තපති ඔත්තප්පිතබ්බෙන, ඔත්තපති පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං සමාපත්තියා’’ති (ධ. ස. 31) එවං වුත්තෙන ඔත්තප්පෙන සමන්නාගතත්තා ඔත්තපනසීලොති ඔත්තප්පී. අයඤ්හි ඔත්තාපීති වුත්තො. තදවිනාභාවතො හිරියා ච සමන්නාගතො එව හොතීති හිරොත්තප්පසම්පන්නො අණුමත්තෙපි වජ්ජෙ භයදස්සාවී සීලෙසු පරිපූරකාරී හොති. ඉච්චස්ස සීලසම්පදා දස්සිතා. ආතාපීති ඉමිනා නයෙනස්ස කිලෙසපරිතාපිතාදීපනෙන සමථවිපස්සනාභාවනානුයුත්තතා දස්සිතා. යථාවුත්තඤ්ච වීරියං සද්ධාසතිසමාධිපඤ්ඤාහි විනා න හොතීති විමුත්තිපරිපාචකානි සද්ධාපඤ්චමානි ඉන්ද්රියානි අත්ථතො වුත්තානෙව හොන්ති. තෙසු ච සිද්ධෙසු අනිච්චෙ අනිච්චසඤ්ඤා, අනිච්චෙ දුක්ඛසඤ්ඤා, දුක්ඛෙ අනත්තසඤ්ඤා, පහානසඤ්ඤා, විරාගසඤ්ඤා, නිරොධසඤ්ඤාති ඡ නිබ්බෙධභාගියා සඤ්ඤා සිද්ධා එවාති. එවං ඉමෙහි ද්වීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතස්ස ලොකියානං [Pg.101] සීලසමාධිපඤ්ඤානං සිජ්ඣනතො මග්ගඵලනිබ්බානාධිගමස්ස භබ්බතං දස්සෙන්තො ‘‘ආතාපී ච ඛො…පෙ… අධිගමායා’’ති ආහ. 'अभव्य' (अभब्बो) का अर्थ है अयोग्य। 'संबोधि के लिए' (संबोधाय) का अर्थ है आर्य मार्ग के लिए। 'निर्वाण के लिए' (निब्बानाय) का अर्थ है क्लेशों के अत्यंत उपशम के लिए, अमृत महा-निर्वाण के लिए। 'अनुत्तर योगक्षेम के लिए' (अनुत्तरस्स योगक्खेमस्स) का अर्थ है अर्हत्व फल के लिए। क्योंकि उससे श्रेष्ठ कुछ और न होने के कारण वह 'अनुत्तर' है, और चार योगों (काम, भव, दृष्टि, अविद्या) से उपद्रवित न होने के कारण उसे 'क्षेम' (निर्भय) और 'योगक्षेम' कहा जाता है। 'अधिगम के लिए' (अधिगमाय) का अर्थ है प्राप्ति के लिए। 'आतापी' का अर्थ है वीर्यवान (उद्यमी)। वह "अकुशल धर्मों के प्रहाण के लिए, कुशल धर्मों की प्राप्ति के लिए आरब्ध-वीर्य होकर विहार करता है, कुशल धर्मों में शक्तिमान, दृढ़ पराक्रमी और धुरा न छोड़ने वाला है" (दी. नि. 3.345) - इस प्रकार कहे गए वीर्य-आरम्भ से युक्त होने के कारण, क्लेशों को अत्यंत तपाने के स्वभाव वाला होने से 'आतापी' है। 'ओत्तापी' का अर्थ है "जो ओत्तप्प करने योग्य बातों से भयभीत होता है, पापपूर्ण अकुशल धर्मों की प्राप्ति से भयभीत होता है" (ध. सं. 31) - इस प्रकार कहे गए ओत्तप्प से युक्त होने के कारण, भयभीत होने के स्वभाव वाला होने से 'ओत्तप्पी' है। यहाँ इसे 'ओत्तापी' कहा गया है। उसके अविनाभावी (साथ रहने वाले) होने से वह ह्री (लज्जा) से भी युक्त ही होता है, इसलिए ह्री-ओत्तप्प से सम्पन्न होकर वह अणुमात्र दोषों में भी भय देखने वाला और शीलों को पूर्ण करने वाला होता है। इस प्रकार इसकी शील-सम्पदा दिखाई गई है। 'आतापी' इस पद के द्वारा क्लेशों को तपाने के प्रदर्शन से उसकी शमथ-विपश्यना भावना में संलग्नता दिखाई गई है। और जैसा कि कहा गया है, वीर्य श्रद्धा, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के बिना नहीं होता, इसलिए विमुक्ति को परिपक्व करने वाली श्रद्धा आदि पाँच इन्द्रियाँ अर्थतः कह ही दी गई हैं। और उनके सिद्ध होने पर अनित्य में अनित्य संज्ञा, अनित्य में दुःख संज्ञा, दुःख में अनात्म संज्ञा, प्रहाण संज्ञा, विराग संज्ञा और निरोध संज्ञा - ये छह निर्वेध-भागीय संज्ञाएँ सिद्ध ही हैं। इस प्रकार इन दो धर्मों से युक्त व्यक्ति के लौकिक शील, समाधि और प्रज्ञा के सिद्ध होने से मार्ग, फल और निर्वाण की प्राप्ति की भव्यता (योग्यता) को दिखाते हुए "आतापी च खो... पे... अधिगमाय" कहा गया है। ගාථාසු කුසීතොති මිච්ඡාවිතක්කබහුලතාය කාමබ්යාපාදවිහිංසාවිතක්කසඞ්ඛාතෙහි කුච්ඡිතෙහි පාපධම්මෙහි සිතො සම්බන්ධො යුත්තොති කුසීතො. කුච්ඡිතං වා සීදති සම්මාපටිපත්තිතො අවසීදතීති කුසීතො, ද-කාරස්ස ත-කාරං කත්වා. හීනවීරියොති නිබ්බීරියො, චතූසුපි ඉරියාපථෙසු වීරියකරණරහිතො. අනුස්සාහසංහනනසභාවස්ස චිත්තාලසියස්ස ථිනස්ස, අසත්තිවිඝාතසභාවස්ස කායාලසියස්ස මිද්ධස්ස ච අභිණ්හප්පවත්තියා ථිනමිද්ධබහුලො. පාපජිගුච්ඡනලක්ඛණාය හිරියා අභාවෙන තප්පටිපක්ඛෙන අහිරිකෙන සමන්නාගතත්තා ච අහිරිකො. හිරොත්තප්පවීරියානං අභාවෙනෙව සම්මාපටිපත්තියං නත්ථි එතස්ස ආදරොති අනාදරො. උභයථාපි තථා ධම්මපුග්ගලෙන දුවිධකිරියාකරණෙන අනාදරො. ඵුට්ඨුන්ති ඵුසිතුං. සම්බොධිමුත්තමන්ති සම්බොධිසඞ්ඛාතං උත්තමං අරහත්තං අධිගන්තුං අභබ්බොති අත්ථො. गाथाओं में 'कुसीतो' (आलसी) का अर्थ है - मिथ्या वितर्कों की बहुलता के कारण काम, व्यापाद और विहिंसा वितर्क रूपी कुत्सित पाप धर्मों से सम्बद्ध होना। अथवा कुत्सित रूप से बैठता है या सम्यक् प्रतिपत्ति से नीचे गिरता है, इसलिए 'कुसीतो' है (द-कार को त-कार करके)। 'हीनवीर्य' का अर्थ है वीर्यहीन, चारों ईर्यापथों में वीर्य करने से रहित। उत्साह के हनन स्वभाव वाले चित्त के आलस्य 'थीन' और शक्ति के विघात स्वभाव वाले कायिक आलस्य 'मिद्ध' की निरंतर प्रवृत्ति के कारण 'थीनमिद्धबहुलो' है। पाप से घृणा करने के लक्षण वाली 'ह्री' के अभाव में उसके प्रतिपक्ष 'अहीरिक' से युक्त होने के कारण 'अहीरिको' है। ह्री, ओत्तप्प और वीर्य के अभाव के कारण ही सम्यक् प्रतिपत्ति में जिसका आदर नहीं है, वह 'अनादरो' है। दोनों प्रकार से, अर्थात् धर्म और पुद्गल के प्रति दो प्रकार की क्रिया करने से अनादर है। 'फुट्टुं' का अर्थ है स्पर्श करने के लिए। 'संबोधिमुत्तमं' का अर्थ है संबोधि संज्ञक उत्तम अर्हत्त्व को प्राप्त करने में असमर्थ है, यह अर्थ है। සතිමාති චිරකතචිරභාසිතානං අනුස්සරණෙ සමත්ථස්ස සතිනෙපක්කස්ස භාවෙන චතුසතිපට්ඨානයොගෙන සතිමා. නිපකොති සත්තට්ඨානියසම්පජඤ්ඤසඞ්ඛාතෙන චෙව කම්මට්ඨානපරිහරණපඤ්ඤාසඞ්ඛාතෙන ච නෙපක්කෙන සමන්නාගතත්තා නිපකො. ඣායීති ආරම්මණූපනිජ්ඣානෙන ලක්ඛණූපනිජ්ඣානෙන චාති ද්වීහිපි ඣානෙහි ඣායී. අප්පමත්තොති ‘‘දිවසං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණියෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙතී’’තිආදිනා නයෙන කම්මට්ඨානභාවනාය අප්පමත්තො. සංයොජනං ජාතිජරාය ඡෙත්වාති ජාතියා චෙව ජරාය ච සත්තෙ සංයොජෙතීති සංයොජනන්ති ලද්ධනාමං කාමරාගාදිකං දසවිධම්පි කිලෙසජාතං අනුසයසමුග්ඝාතවසෙන මූලතො ඡින්දිත්වා. අථ වා සංයොජනං ජාතිජරාය ඡෙත්වාති ජාතිජරාය සංයොජනං ඡින්දිත්වා. යස්ස හි සංයොජනානි අච්ඡින්නානි, තස්ස ජාතිජරාය අච්ඡෙදො අසමුග්ඝාතොව. යස්ස පන තානි ඡින්නානි, තස්ස ජාතිජරාපි ඡින්නාව කාරණස්ස සමුග්ඝාතිතත්තා. තස්මා සංයොජනං ඡින්දන්තො එව ජාතිජරාපි ඡින්දති. තෙන වුත්තං ‘‘සංයොජනං ජාතිජරාය [Pg.102] ඡෙත්වා’’ති. ඉධෙව සම්බොධිමනුත්තරං ඵුසෙති ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ අග්ගමග්ගං අරහත්තං වා ඵුසෙ පාපුණෙය්ය. 'सतिमा' का अर्थ है - चिरकाल के किए हुए और चिरकाल के कहे हुए का स्मरण करने में समर्थ स्मृति और नैपक्क (प्रज्ञा) के भाव से, चार स्मृतिप्रस्थानों के योग से युक्त होने के कारण 'सतिमा' है। 'निपको' का अर्थ है - सात स्थानों वाली सम्प्रजन्यता और कर्मस्थान के परिहार की प्रज्ञा रूपी नैपक्क से युक्त होने के कारण 'निपको' है। 'झायी' का अर्थ है - आरम्भण-उपनिध्यान और लक्षण-उपनिध्यान, इन दोनों ध्यानों से ध्यान करने वाला। 'अप्पमत्तो' का अर्थ है - "दिन भर चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को आवरणकारी धर्मों से शुद्ध करता है" इत्यादि विधि से कर्मस्थान की भावना में प्रमाद रहित। 'संयोजनं जातिजराय छेत्वा' का अर्थ है - जो जाति और जरा में सत्त्वों को संयुक्त करते हैं, वे 'संयोजन' नाम वाले कामराग आदि दस प्रकार के क्लेशों को अनुशय के समूद्घात द्वारा जड़ से काटकर। अथवा 'संयोजनं जातिजराय छेत्वा' का अर्थ है - जाति और जरा के संयोजन को काटकर। जिसके संयोजन नहीं कटे हैं, उसकी जाति और जरा का उच्छेद या समूद्घात नहीं होता। जिसके वे कट गए हैं, उसकी जाति और जरा भी कारण के समूद्घात होने से कट ही गई है। इसलिए संयोजन को काटता हुआ ही वह जाति और जरा को भी काटता है। इसीलिए कहा गया है - "संयोजनं जातिजराय छेत्वा"। 'इधेव संबोधिमनुत्तरं फुसेति' का अर्थ है - इसी आत्मभाव (जीवन) में ही अग्र मार्ग या अर्हत्त्व का स्पर्श करे, उसे प्राप्त करे। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र की वर्णना समाप्त हुई। 8. පඨමනකුහනසුත්තවණ්ණනා ८. प्रथम कुहन सूत्र की वर्णना। 35. අට්ඨමෙ නයිදන්ති එත්ථ නඉති පටිසෙධෙ නිපාතො, තස්ස ‘‘වුස්සතී’’ති ඉමිනා සම්බන්ධො, යකාරො පදසන්ධිකරො. ඉදං-සද්දො ‘‘එකමිදාහං, භික්ඛවෙ, සමයං උක්කට්ඨායං විහරාමි සුභගවනෙ සාලරාජමූලෙ’’තිආදීසු (ම. නි. 1.501) නිපාතමත්තං. ‘‘ඉදං ඛො තං, භික්ඛවෙ, අප්පමත්තකං ඔරමත්තකං සීලමත්තක’’න්තිආදීසු (දී. නි. 1.27) යථාවුත්තෙ ආසන්නපච්චක්ඛෙ ආගතො. ३५. आठवें सूत्र में 'नयिदं' यहाँ 'न' प्रतिषेध के अर्थ में निपात है, उसका 'वुस्सति' इसके साथ सम्बन्ध है, 'य' कार पद-सन्धि करने वाला है। 'इदं' शब्द "भिक्खुओं, एक समय मैं उक्कठ्ठा में सुभग वन में सालराज के मूल में विहार कर रहा था" इत्यादि में (म. नि. १.५०१) मात्र निपात है। "भिक्खुओं, यह जो अल्पमात्र, ओरामत्रक, शीलमात्रक है" इत्यादि में (दी. नि. १.२७) कहे गए के अनुसार समीपवर्ती प्रत्यक्ष के अर्थ में आया है। ‘‘ඉදඤ්හි තං ජෙතවනං, ඉසිසඞ්ඝනිසෙවිතං; ආවුත්ථං ධම්මරාජෙන, පීතිසඤ්ජනනං මමා’’ති. – "यह वही जेतवन है, जो ऋषियों के संघ द्वारा सेवित है; धर्मराज द्वारा निवासित है, जो मुझे प्रीति उत्पन्न करने वाला है।" – ආදීසු (සං. නි. 1.48) වක්ඛමානෙ ආසන්නපච්චක්ඛෙ. ඉධාපි වක්ඛමානෙයෙව ආසන්නපච්චක්ඛෙ දට්ඨබ්බො. इत्यादि में (सं. नि. १.४८) कहे जाने वाले समीपवर्ती प्रत्यक्ष के अर्थ में है। यहाँ भी कहे जाने वाले समीपवर्ती प्रत्यक्ष के अर्थ में ही देखना चाहिए। බ්රහ්මචරිය-සද්දො – 'ब्रह्मचर्य' शब्द - ‘‘කිං තෙ වතං කිං පන බ්රහ්මචරියං,කිස්ස සුචිණ්ණස්ස අයං විපාකො; ඉද්ධී ජුතී බලවීරියූපපත්ති,ඉදඤ්ච තෙ නාග මහාවිමානං. "तुम्हारा क्या व्रत था, क्या ब्रह्मचर्य था? किस सुचरित का यह विपाक है? यह ऋद्धि, द्युति, बल और वीर्य की प्राप्ति, और हे नाग! यह तुम्हारा महाविमान। ‘‘අහඤ්ච භරියා ච මනුස්සලොකෙ,සද්ධා උභො දානපතී අහුම්හා; ඔපානභූතං මෙ ඝරං තදාසි,සන්තප්පිතා සමණබ්රාහ්මණා ච. "मैं और मेरी पत्नी मनुष्य लोक में, दोनों ही श्रद्धावान और दानपति थे; तब मेरा घर प्यासों के लिए कुएँ के समान था, और श्रमण-ब्राह्मण वहाँ तृप्त किए जाते थे। ‘‘තං මෙ වතං තං පන බ්රහ්මචරියං,තස්ස සුචිණ්ණස්ස අයං විපාකො; ඉද්ධී ජුතී බලවීරියූපපත්ති,ඉදඤ්ච මෙ ධීර මහාවිමාන’’න්ති. (ජා. 2.22.1592-1593, 1595) – "वही मेरा व्रत था, वही ब्रह्मचर्य था; उसी सुचरित का यह विपाक है; यह ऋद्धि, द्युति, बल और वीर्य की प्राप्ति, और हे धीर! यह मेरा महाविमान।" (जा. २.२२.१५९२-१५९३, १५९५) – ඉමස්මිං [Pg.103] පුණ්ණකජාතකෙ දානෙ ආගතො. इस पुण्णक जातक में यह 'दान' के अर्थ में आया है। ‘‘කෙන පාණි කාමදදො, කෙන පාණි මධුස්සවො; කෙන තෙ බ්රහ්මචරියෙන, පුඤ්ඤං පාණිම්හි ඉජ්ඣති. "किस कारण से तुम्हारा हाथ कामनाओं को देने वाला है, किस कारण से हाथ से मधु टपकता है? किस ब्रह्मचर्य के कारण, तुम्हारे हाथ में यह पुण्य सिद्ध हुआ है? ‘‘තෙන පාණි කාමදදො, තෙන පාණි මධුස්සවො; තෙන මෙ බ්රහ්මචරියෙන, පුඤ්ඤං පාණිම්හි ඉජ්ඣතී’’ති. (පෙ. ව. 275, 277) – "उस कारण से हाथ कामनाओं को देने वाला है, उस कारण से हाथ से मधु टपकता है; उस मेरे ब्रह्मचर्य के कारण, मेरे हाथ में यह पुण्य सिद्ध हुआ है।" (पे. व. २७५, २७७) – ඉමස්මිං අඞ්කුරපෙතවත්ථුස්මිං වෙය්යාවච්චෙ. ‘‘ඉදං ඛො තං, භික්ඛවෙ, තිත්තිරියං නාම බ්රහ්මචරියං අහොසී’’ති (චූළව. 311) ඉමස්මිං තිත්තිරජාතකෙ පඤ්චසික්ඛාපදසීලෙ. ‘‘තං ඛො පන, පඤ්චසිඛ, බ්රහ්මචරියං නෙව නිබ්බිදාය න විරාගාය…පෙ… යාවදෙව බ්රහ්මලොකූපපත්තියා’’ති (දී. නි. 2.329) ඉමස්මිං මහාගොවින්දසුත්තෙ බ්රහ්මවිහාරෙ. ‘‘පරෙ අබ්රහ්මචාරී භවිස්සන්ති, මයමෙත්ථ බ්රහ්මචාරිනො භවිස්සාමා’’ති (ම. නි. 1.83) සල්ලෙඛසුත්තෙ මෙථුනවිරතියං. इस अंकुर पेतवस्तु में यह 'वैयावृत्य' (सेवा) के अर्थ में है। "भिक्खुओं, यह तित्तिरिय नामक ब्रह्मचर्य था" (चूल्लव. ३११) इस तित्तिरि जातक में यह 'पंचशिक्षापद शील' के अर्थ में है। "पंचशिख! वह ब्रह्मचर्य न निर्वेद के लिए, न विराग के लिए... केवल ब्रह्मलोक की उत्पत्ति के लिए था" (दी. नि. २.३२९) इस महागोविन्द सूत्र में यह 'ब्रह्मविहार' के अर्थ में है। "दूसरे अब्रह्मचारी होंगे, हम यहाँ ब्रह्मचारी होंगे" (म. नि. १.८३) सल्लेख सूत्र में यह 'मैथुन विरति' के अर्थ में है। ‘‘මයඤ්ච භරියා නාතික්කමාම,අම්හෙ ච භරියා නාතික්කමන්ති; අඤ්ඤත්ර තාහි බ්රහ්මචරියං චරාම,තස්මා හි අම්හං දහරා න මීයරෙ’’ති. (ජා. 1.10.97) – "हम अपनी पत्नियों का उल्लंघन नहीं करते, और पत्नियाँ हमारा उल्लंघन नहीं करतीं; उनके अतिरिक्त हम ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, इसीलिए हमारे यहाँ युवा नहीं मरते।" (जा. १.१०.९७) – මහාධම්මපාලජාතකෙ සදාරසන්තොසෙ. ‘‘අභිජානාමි ඛො පනාහං, සාරිපුත්ත, චතුරඞ්ගසමන්නාගතං බ්රහ්මචරියං චරිතා – තපස්සී සුදං හොමී’’ති (ම. නි. 1.155) ලොමහංසසුත්තෙ වීරියෙ. महाधम्मपाल जातक में यह 'स्वदार-संतोष' (अपनी पत्नी में संतोष) के अर्थ में है। "सारिपुत्र! मैं जानता हूँ कि मैंने चार अंगों से युक्त ब्रह्मचर्य का पालन किया है - मैं तपस्वी था" (म. नि. १.१५५) लोमहंस सूत्र में यह 'वीर्य' के अर्थ में है। ‘‘හීනෙන බ්රහ්මචරියෙන, ඛත්තියෙ උපපජ්ජති; මජ්ඣිමෙන ච දෙවත්තං, උත්තමෙන විසුජ්ඣතී’’ති. (ජා. 1.8.75) – "हीन ब्रह्मचर्य से क्षत्रिय कुल में जन्म होता है; मध्यम से देवत्व प्राप्त होता है, और उत्तम से मनुष्य विशुद्ध हो जाता है।" (जा. १.८.७५) – නිමිජාතකෙ අත්තදමනවසෙන කතෙ අට්ඨඞ්ගිකඋපොසථෙ. ‘‘ඉදං ඛො පන, පඤ්චසිඛ, බ්රහ්මචරියං එකන්තනිබ්බිදාය විරාගාය…පෙ… අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො’’ති (දී. නි. 2.329) මහාගොවින්දසුත්තෙයෙව අරියමග්ගෙ. ‘‘තයිදං බ්රහ්මචරියං ඉද්ධඤ්චෙව ඵීතඤ්ච විත්ථාරිකං බාහුජඤ්ඤං පුථුභූතං යාව දෙවමනුස්සෙහි සුප්පකාසිත’’න්ති (දී. නි. 3.174) පාසාදිකසුත්තෙ සික්ඛත්තයසඞ්ගහෙ සකලස්මිං සාසනෙ. ඉධාපි අරියමග්ගෙ සාසනෙ ච වත්තති. निमिजातक में आत्म-दमन के वश में किए गए अष्टाङ्गिक उपोसथ में। "हे पञ्चशिख! यह ब्रह्मचर्य एकान्त निर्वेद के लिए, विराग के लिए... यही आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग है" (दी. नि. 2.329) - महागोविन्द सुत्त में आर्य मार्ग के अर्थ में। "यह ब्रह्मचर्य समृद्ध, स्फीत, विस्तृत, बहुजन-हितकारी, पृथुभूत (व्यापक) और देव-मनुष्यों तक सुप्रकाशित है" (दी. नि. 3.174) - पासादिक सुत्त में त्रिशिक्षा के संग्रह रूप सकल शासन के अर्थ में। यहाँ भी आर्य मार्ग और शासन के अर्थ में प्रयुक्त होता है। වුස්සතීති [Pg.104] වසීයති, චරීයතීති අත්ථො. ජනකුහනත්ථන්ති ‘‘අහො අය්යො සීලවා වත්තසම්පන්නො අප්පිච්ඡො සන්තුට්ඨො මහිද්ධිකො මහානුභාවො’’තිආදිනා ජනස්ස සත්තලොකස්ස විම්හාපනත්ථං. ජනලපනත්ථන්ති ‘‘එවරූපස්ස නාම අය්යස්ස දින්නං මහප්ඵලං භවිස්සතී’’ති පසන්නචිත්තෙහි ‘‘කෙනත්ථො, කිං ආහරීයතූ’’ති මනුස්සෙහි වදාපනත්ථං. ලාභසක්කාරසිලොකානිසංසත්ථන්ති ය්වායං ‘‘ආකඞ්ඛෙය්ය චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ‘ලාභී අස්සං චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානප්පච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරාන’න්ති, සීලෙ-ස්වෙවස්ස පරිපූරකාරී’’ති (ම. නි. 1.65) සීලානිසංසභාවෙන වුත්තො චතුපච්චයලාභො, යො ච චතුන්නං පච්චයානං සක්කච්චදානසඞ්ඛාතො ආදරබහුමානගරුකරණසඞ්ඛාතො ච සක්කාරො, යො ච ‘‘සීලසම්පන්නො බහුස්සුතො සුතධරො ආරද්ධවීරියො’’තිආදිනා නයෙන උග්ගතථුතිඝොසසඞ්ඛාතො සිලොකො බ්රහ්මචරියං චරන්තානං දිට්ඨධම්මිකො ආනිසංසො, තදත්ථං. ඉති මං ජනො ජානාතූති ‘‘එවං බ්රහ්මචරියවාසෙ සති ‘අයං සීලවා කල්යාණධම්මො’තිආදිනා මං ජනො ජානාතු සම්භාවෙතූ’’ති අත්තනො සන්තගුණවසෙන සම්භාවනත්ථම්පි න ඉදං බ්රහ්මචරියං වුස්සතීති සම්බන්ධො. 'वुस्सति' (वास किया जाता है) का अर्थ है 'वसीयति' (निवास किया जाता है) या 'चरीयति' (आचरण किया जाता है)। 'जनकुहनत्थं' (लोगों को ठगने के लिए) का अर्थ है - "अहो! यह आर्य शीलवान हैं, व्रत-सम्पन्न हैं, अल्पेच्छ हैं, सन्तुष्ट हैं, महा-ऋद्धिमान हैं, महानुभाव हैं" इत्यादि के द्वारा जन (सत्त्वलोक) को विस्मित करने के लिए। 'जनलपनत्थं' (लोगों को लुभाने के लिए) का अर्थ है - "इस प्रकार के आर्य को दिया गया दान महाफलदायी होगा" - ऐसा प्रसन्न चित्त वाले मनुष्यों से "किसकी आवश्यकता है, क्या लाया जाए?" कहलवाने के लिए। 'लाभसक्कारसिलोकानिसंसत्थं' (लाभ, सत्कार और कीर्ति की प्रशंसा के लिए) का अर्थ है - जैसा कि "भिक्षुओं! यदि भिक्षु यह आकांक्षा करे कि 'मुझे चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार प्राप्त हों', तो उसे शीलों में परिपूर्ण होना चाहिए" (म. नि. 1.65) - इस प्रकार शील के आनृशंस (लाभ) के रूप में कहे गए चार प्रत्ययों का लाभ; और जो चार प्रत्ययों का सत्कारपूर्वक दान है, जो आदर, बहुमान और गुरुकार (सम्मान) है; और जो "शील-सम्पन्न, बहुश्रुत, श्रुतधर, आरब्ध-वीर्य" इत्यादि रीति से उठी हुई स्तुति की ध्वनि रूप कीर्ति है - जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों का दृष्टधर्मिक (इसी जन्म का) लाभ है, उसके लिए। 'इति मं जनो जानातू' (ताकि लोग मुझे इस प्रकार जानें) का अर्थ है - "इस प्रकार ब्रह्मचर्य वास होने पर 'यह शीलवान है, कल्याणधर्मी है' इत्यादि के द्वारा लोग मुझे जानें और मेरा सम्मान करें" - इस प्रकार अपने विद्यमान गुणों के कारण सम्मान पाने के लिए भी यह ब्रह्मचर्य वास नहीं किया जाता है - ऐसा सम्बन्ध है। කෙචි පන ‘‘ජනකුහනත්ථන්ති පාපිච්ඡස්ස ඉච්ඡාපකතස්ස සතො සාමන්තජප්පනඉරියාපථනිස්සිතපච්චයපටිසෙවනසඞ්ඛාතෙන තිවිධෙන කුහනවත්ථුනා කුහනභාවෙන ජනස්ස විම්හාපනත්ථං. ජනලපනත්ථන්ති පාපිච්ඡස්සෙව සතො පච්චයත්ථං පරිකථොභාසාදිවසෙන ලපනභාවෙන උපලාපනභාවෙන වා ජනස්ස ලපනත්ථං. ලාභසක්කාරසිලොකානිසංසත්ථන්ති පාපිච්ඡස්සෙව සතො ලාභාදිගරුතාය ලාභසක්කාරසිලොකසඞ්ඛාතස්ස ආනිසංසඋදයස්ස නිප්ඵාදනත්ථං. ඉති මං ජනො ජානාතූති පාපිච්ඡස්සෙව සතො අසන්තගුණසම්භාවනාධිප්පායෙන ‘ඉති එවං මං ජනො ජානාතූ’ති න ඉදං බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’’ති එවමෙත්ථ අත්ථං වදන්ති. පුරිමොයෙව පන අත්ථො සාරතරො. किन्तु कुछ लोग (आचार्य) इस प्रकार अर्थ कहते हैं - "'जनकुहनत्थं' का अर्थ है पापिच्छ (बुरी इच्छा वाले) और इच्छा के वशीभूत व्यक्ति का सामन्त-जप्पन (चापलूसी), ईर्यापथ-निश्रित और प्रत्यय-प्रतिसेवन नामक तीन प्रकार के कुहन-वस्तुओं (धोखाधड़ी) के द्वारा लोगों को विस्मित करने के लिए। 'जनलपनत्थं' का अर्थ है पापिच्छ व्यक्ति का प्रत्ययों (सामग्री) के लिए परिकथा और ओभास (संकेत) आदि के द्वारा लपन (चापलूसी) या उपलपन (फुसलाना) के माध्यम से लोगों को लुभाने के लिए। 'लाभसक्कारसिलोकानिसंसत्थं' का अर्थ है पापिच्छ व्यक्ति का लाभ आदि की गुरुता (महत्ता) के कारण लाभ, सत्कार और कीर्ति रूपी आनृशंस (फल) की निष्पत्ति के लिए। 'इति मं जनो जानातू' का अर्थ है पापिच्छ व्यक्ति का अविद्यमान गुणों के सम्मान की इच्छा से 'इस प्रकार लोग मुझे जानें' - इस उद्देश्य से यह ब्रह्मचर्य वास नहीं किया जाता है।" किन्तु पूर्वोक्त अर्थ ही अधिक सारगर्भित है। අථ ඛොති එත්ථ අථාති අඤ්ඤදත්ථෙ නිපාතො, ඛොති අවධාරණෙ. තෙන කුහනාදිතො අඤ්ඤදත්ථායෙව පන ඉදං, භික්ඛවෙ, බ්රහ්මචරියං වුස්සතීති දස්සෙති. ඉදානි තං පයොජනං දස්සෙන්තො ‘‘සංවරත්ථඤ්චෙව පහානත්ථඤ්චා’’ති [Pg.105] ආහ. තත්ථ පඤ්චවිධො සංවරො – පාතිමොක්ඛසංවරො, සතිසංවරො, ඤාණසංවරො, ඛන්තිසංවරො, වීරියසංවරොති. 'अथ खो' यहाँ 'अथ' शब्द 'अन्य अर्थ' (इसके विपरीत) में निपात है, और 'खो' शब्द 'अवधारण' (निश्चय) के अर्थ में है। उससे यह दर्शाते हैं कि "हे भिक्षुओं! कुहन (धोखाधड़ी) आदि से भिन्न अन्य अर्थ के लिए ही यह ब्रह्मचर्य वास किया जाता है।" अब उस प्रयोजन को दिखाते हुए "संवरत्थञ्चेव पहानत्थञ्च" (संवर के लिए और प्रहाण के लिए) कहा। वहाँ संवर पाँच प्रकार का है - पातिमोक्ख-संवर, सति-संवर, ञाण-संवर, खन्ति-संवर और वीरिय-संवर। තත්ථ ‘‘ඉමිනා පාතිමොක්ඛසංවරෙන උපෙතො හොති සමුපෙතො’’ති (විභ. 511) හි ආදිනා නයෙන ආගතො අයං පාතිමොක්ඛසංවරො නාම, යො සීලසංවරොති ච පවුච්චති. ‘‘රක්ඛති චක්ඛුන්ද්රියං, චක්ඛුන්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජතී’’ති (දී. නි. 1.213; ම. නි. 1.295; සං. නි. 4.239; අ. නි. 3.16) ආගතො අයං සතිසංවරො. वहाँ "इस पातिमोक्ख-संवर से युक्त होता है, समुपेत होता है" (विभङ्ग 511) इत्यादि रीति से आया हुआ यह 'पातिमोक्ख-संवर' है, जिसे 'शील-संवर' भी कहा जाता है। "चक्षु इन्द्रिय की रक्षा करता है, चक्षु इन्द्रिय में संवर को प्राप्त होता है" (दी. नि. 1.213; म. नि. 1.295; सं. नि. 4.239; अ. नि. 3.16) - इस प्रकार आया हुआ यह 'सति-संवर' (स्मृति-संवर) है। ‘‘යානි සොතානි ලොකස්මිං (අජිතාති භගවා),සති තෙසං නිවාරණං; සොතානං සංවරං බ්රූමි,පඤ්ඤායෙතෙ පිධීයරෙ’’ති. (සු. නි. 1041) – "लोक में जो भी स्रोत (धाराएँ) हैं (हे अजित! - भगवान ने कहा), स्मृति उनका निवारण है; मैं उन स्रोतों का संवर (रोकथाम) कहता हूँ, वे प्रज्ञा के द्वारा बंद किए जाते हैं।" (सु. नि. 1041) - ආගතො අයං ඤාණසංවරො. ‘‘ඛමො හොති සීතස්ස උණ්හස්සා’’තිආදිනා (ම. නි. 1.24; අ. නි. 4.114; 6.58) නයෙන ආගතො අයං ඛන්තිසංවරො. ‘‘උප්පන්නං කාමවිතක්කං නාධිවාසෙතී’’තිආදිනා (ම. නි. 1.26; අ. නි. 4.114; 6.58) නයෙන ආගතො අයං වීරියසංවරො. අත්ථතො පන පාණාතිපාතාදීනං පජහනවසෙන, වත්තපටිවත්තානං කරණවසෙන ච පවත්තා චෙතනා විරතියො ච. සඞ්ඛෙපතො සබ්බො කායවචීසංයමො, විත්ථාරතො සත්තන්නං ආපත්තික්ඛන්ධානං අවීතික්කමො සීලසංවරො. සති එව සතිසංවරො, සතිප්පධානා වා කුසලා ඛන්ධා. ඤාණමෙව ඤාණසංවරො. අධිවාසනවසෙන අදොසො, අදොසප්පධානා වා තථා පවත්තා කුසලා ඛන්ධා ඛන්තිසංවරො, පඤ්ඤාති එකෙ. කාමවිතක්කාදීනං අනධිවාසනවසෙන පවත්තං වීරියමෙව වීරියසංවරො. තෙසු පඨමො කායදුච්චරිතාදිදුස්සීල්යස්ස සංවරණතො සංවරො, දුතියො මුට්ඨස්සච්චස්ස, තතියො අඤ්ඤාණස්ස, චතුත්ථො අක්ඛන්තියා, පඤ්චමො කොසජ්ජස්ස සංවරණතො පිදහනතො සංවරොති වෙදිතබ්බො. එවමෙතස්ස සංවරස්ස අත්ථාය සංවරත්ථං, සංවරනිප්ඵාදනත්ථන්ති අත්ථො. यह 'ञाण-संवर' (ज्ञान-संवर) आया है। "शीत और उष्ण को सहने वाला होता है" (म. नि. 1.24; अ. नि. 4.114; 6.58) इत्यादि रीति से आया हुआ यह 'खन्ति-संवर' (क्षान्ति-संवर) है। "उत्पन्न काम-वितर्क को सहन नहीं करता (अधिवासित नहीं करता)" (म. नि. 1.26; अ. नि. 4.114; 6.58) इत्यादि रीति से आया हुआ यह 'वीरिय-संवर' (वीर्य-संवर) है। अर्थतः, प्राणातिपात आदि के परित्याग के वश में, और व्रत-प्रतिव्रतों के करने के वश में प्रवृत्त चेतना और विरतियाँ (संवर हैं)। संक्षेप में, सम्पूर्ण कायिक और वाचिक संयम, और विस्तार से सात आपत्ति-स्कन्धों का उल्लंघन न करना 'शील-संवर' है। स्मृति ही 'सति-संवर' है, अथवा स्मृति-प्रधान कुशल स्कन्ध। ज्ञान ही 'ञाण-संवर' है। अधिवासन (सहन) के वश में अद्वेष, अथवा अद्वेष-प्रधान उस प्रकार प्रवृत्त कुशल स्कन्ध 'खन्ति-संवर' है; कुछ लोग इसे प्रज्ञा कहते हैं। काम-वितर्क आदि को सहन न करने के वश में प्रवृत्त वीर्य ही 'वीरिय-संवर' है। इनमें से पहला (शील-संवर) काय-दुश्चरित आदि दुःशीलता के संवरण (रोकने) के कारण संवर है, दूसरा मुट्ठसच्च (स्मृति-भ्रंश) का, तीसरा अज्ञान का, चौथा अक्षान्ति (असहनशीलता) का, और पाँचवाँ आलस्य के संवरण (ढकने/रोकने) के कारण संवर जानना चाहिए। इस प्रकार इस संवर के लिए 'संवरत्थं', जिसका अर्थ है संवर की निष्पत्ति के लिए। පහානම්පි පඤ්චවිධං – තදඞ්ගප්පහානං, වික්ඛම්භනප්පහානං, සමුච්ඡෙදප්පහානං, පටිප්පස්සද්ධිප්පහානං, නිස්සරණප්පහානන්ති. තත්ථ යං වත්තබ්බං, තං හෙට්ඨා එකකනිපාතෙ පඨමසුත්තවණ්ණනායං වුත්තමෙව. තස්ස පන පඤ්චවිධස්සපි තථා තථා රාගාදිකිලෙසානං [Pg.106] පටිනිස්සජ්ජනට්ඨෙන සමතික්කමනට්ඨෙන වා පහානස්ස අත්ථාය පහානත්ථං, පහානසාධනත්ථන්ති අත්ථො. තත්ථ සංවරෙන කිලෙසානං චිත්තසන්තානෙ පවෙසනනිවාරණං පහානෙන පවෙසනනිවාරණඤ්චෙව සමුග්ඝාතො චාති වදන්ති. උභයෙනාපි පන යථාරහං උභයං සම්පජ්ජතීති දට්ඨබ්බං. සීලාදිධම්මා එව හි සංවරණතො සංවරො, පජහනතො පහානන්ති. प्रहाण (त्याग) भी पाँच प्रकार का है - तदङ्ग प्रहाण, विष्खम्भन प्रहाण, समुच्छेद प्रहाण, प्रतिप्रश्रब्धि प्रहाण और निस्सरण प्रहाण। वहाँ जो कहना चाहिए, वह नीचे एकक निपात के प्रथम सूत्र की व्याख्या में कहा ही गया है। उस पाँच प्रकार के भी राग आदि क्लेशों के उस-उस प्रकार से परित्याग के अर्थ में या अतिक्रमण के अर्थ में प्रहाण के लिए 'प्रहाणार्थ' (प्रहाण के लिए), प्रहाण के साधन के लिए - यह अर्थ है। वहाँ संवर के द्वारा क्लेशों का चित्त-सन्तान में प्रवेश रोकना और प्रहाण के द्वारा प्रवेश रोकना तथा समून्मूलन (समुद्घात) करना - ऐसा कहते हैं। दोनों के द्वारा भी यथायोग्य दोनों सिद्ध होते हैं - ऐसा देखना चाहिए। शील आदि धर्म ही संवरण करने से 'संवर' हैं और त्यागने से 'प्रहाण' हैं। ගාථාසු අනීතිහන්ති ඊතියො වුච්චන්ති උපද්දවා – දිට්ඨධම්මිකා ච සම්පරායිකා ච. ඊතියො හනති විනාසෙති පජහතීති ඊතිහං, අනු ඊතිහන්ති අනීතිහං, සාසනබ්රහ්මචරියං මග්ගබ්රහ්මචරියඤ්ච. අථ වා ඊතීහි අනත්ථෙහි සද්ධිං හනන්ති ගච්ඡන්ති පවත්තන්තීති ඊතිහා, තණ්හාදිඋපක්කිලෙසා. නත්ථි එත්ථ ඊතිහාති අනීතිහං. ඊතිහා වා යථාවුත්තෙනට්ඨෙන තිත්ථියසමයා, තප්පටිපක්ඛතො ඉදං අනීතිහං. ‘‘අනිතිහ’’න්තිපි පාඨො. තස්සත්ථො – ‘‘ඉතිහාය’’න්ති ධම්මෙසු අනෙකංසග්ගාහභාවතො විචිකිච්ඡා ඉතිහං නාම, සම්මාසම්බුද්ධප්පවෙදිතත්තා යථානුසිට්ඨං පටිපජ්ජන්තානං නික්කඞ්ඛභාවසාධනතො නත්ථි එත්ථ ඉතිහන්ති අනිතිහං, අපරප්පච්චයන්ති අත්ථො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති ‘‘අතක්කාවචරො’’ති ච. ගාථාසුඛත්ථං පන ‘‘අනීතිහ’’න්ති දීඝං කත්වා පඨන්ති. गाथाओं में 'अनीतिह' (anītiha) का अर्थ है - 'ईति' उपद्रवों को कहा जाता है - दृष्टधार्मिक (इहलोक के) और साम्परायिक (परलोक के)। ईतियों को जो हनता (नष्ट करता) है, विनाश करता है, त्यागता है, वह 'ईतिह' है; 'अनु ईतिह' (ईतिह के पीछे/अनुसार) वह 'अनीतिह' है, जो शासन-ब्रह्मचर्य और मार्ग-ब्रह्मचर्य है। अथवा, 'ईति' रूपी अनर्थों के साथ जो हनन करते हैं (जाते हैं, प्रवृत्त होते हैं), वे 'ईतिह' हैं - तृष्णा आदि उपक्लेश। यहाँ 'ईतिह' नहीं है, इसलिए 'अनीतिह' है। अथवा पूर्वोक्त अर्थ में 'ईतिह' तीर्थंकरों के मत हैं, उनके प्रतिपक्ष होने से यह 'अनीतिह' है। 'अनितिह' (anitiha) ऐसा भी पाठ है। उसका अर्थ है - 'इति ह' (ऐसा सुना जाता है) - धर्मों में अनिश्चित ग्रहण होने के कारण विचिकित्सा (संदेह) 'इतिह' कहलाती है; सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा प्रवेदित होने के कारण, उपदेशानुसार प्रतिपन्न होने वालों के लिए निःशङ्क भाव सिद्ध करने से यहाँ 'इतिह' नहीं है, इसलिए 'अनितिह' है; इसका अर्थ 'अपरप्रत्यय' (दूसरे पर निर्भर न होना) है। क्योंकि यह कहा गया है - "विद्वानों द्वारा स्वयं जानने योग्य" और "तर्कावचर (तर्क से परे)"। गाथाओं के छन्द की सुगमता के लिए 'अनीतिह' ऐसा दीर्घ करके पढ़ते हैं। නිබ්බානසඞ්ඛාතං ඔගධං පතිට්ඨං පාරං ගච්ඡතීති නිබ්බානොගධගාමී, විමුත්තිරසත්තා එකන්තෙනෙව නිබ්බානසම්පාපකොති අත්ථො. තං නිබ්බානොගධගාමිනං බ්රහ්මචරියං. සොති යො සො සමතිංස පාරමියො පූරෙත්වා සබ්බකිලෙසෙ භින්දිත්වා අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො, සො භගවා අදෙසයි දෙසෙසි. නිබ්බානොගධොති වා අරියමග්ගො වුච්චති. තෙන විනා නිබ්බානොගාහනස්ස අසම්භවතො තස්ස ච නිබ්බානං අනාලම්බිත්වා අප්පවත්තනතො, තඤ්ච තං එකන්තං ගච්ඡතීති නිබ්බානොගධගාමී. අථ වා නිබ්බානොගධගාමිනන්ති නිබ්බානස්ස අන්තොගාමිනං මග්ගබ්රහ්මචරියං, නිබ්බානං ආරම්මණං කරිත්වා තස්ස අන්තො එව වත්තති පවත්තතීති. මහත්තෙහීති මහාආතුමෙහි උළාරජ්ඣාසයෙහි. මහන්තං නිබ්බානං, මහන්තෙ වා සීලක්ඛන්ධාදිකෙ එසන්ති ගවෙසන්තීති මහෙසිනො බුද්ධාදයො අරියා. තෙහි අනුයාතො පටිපන්නො. යථා බුද්ධෙන දෙසිතන්ති යථා අභිඤ්ඤෙය්යාදිධම්මෙ අභිඤ්ඤෙය්යාදිභාවෙනෙව සම්මාසම්බුද්ධෙන මයා දෙසිතං, එවං යෙ එතං [Pg.107] මග්ගබ්රහ්මචරියං තදත්ථං සාසනබ්රහ්මචරියඤ්ච පටිපජ්ජන්ති. තෙ දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකත්ථෙහි යථාරහං අනුසාසන්තස්ස සත්ථු මය්හං සාසනකාරිනො ඔවාදප්පටිකරා සකලස්ස වට්ටදුක්ඛස්ස අන්තං පරියන්තං අප්පවත්තිං කරිස්සන්ති, දුක්ඛස්ස වා අන්තං නිබ්බානං සච්ඡිකරිස්සන්තීති. निर्वाण संज्ञक ओगाध (प्रतिष्ठा/आधार) और पार को जाता है, इसलिए 'निर्वाणोगाधगामी' है; विमुक्ति-रस होने के कारण एकान्ततः निर्वाण को प्राप्त कराने वाला - यह अर्थ है। वह निर्वाणोगाधगामी ब्रह्मचर्य है। 'स' (वह) - जो वह तीस पारमिताओं को पूर्ण कर, सभी क्लेशों को नष्ट कर, अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि को प्राप्त हुए, उस भगवान् ने 'अदेसयि' (देशना की/उपदेश दिया)। अथवा आर्यमार्ग को 'निर्वाणोगाध' कहा जाता है। उसके बिना निर्वाण में अवगाहन (प्रवेश) असम्भव होने से और उसके निर्वाण को आलम्बन बनाए बिना प्रवृत्त न होने से, और जो उस (निर्वाण) की ओर ही निश्चित रूप से जाता है, वह 'निर्वाणोगाधगामी' है। अथवा 'निर्वाणोगाधगामी' का अर्थ है - निर्वाण के भीतर जाने वाला मार्ग-ब्रह्मचर्य, जो निर्वाण को आलम्बन बनाकर उसके भीतर ही वर्तता (प्रवृत्त होता) है। 'महत्तेहि' (महात्माओं द्वारा) - महान आत्माओं वाले, उदार आशय वालों द्वारा। महान निर्वाण, अथवा महान शीलस्कन्ध आदि की जो 'एषणा' (खोज) करते हैं, वे 'महर्षि' (महेसिनो) बुद्ध आदि आर्य हैं। उनके द्वारा अनुयात (अनुसरण किया गया) प्रतिपन्न। "जैसे बुद्ध द्वारा देशित है" - जैसे अभिज्ञेय आदि धर्मों को अभिज्ञेय आदि भाव से ही सम्यक्सम्बुद्ध मुझ (बुद्ध) द्वारा देशित किया गया है, वैसे ही जो इस मार्ग-ब्रह्मचर्य और उसके लिए शासन-ब्रह्मचर्य का प्रतिपादन करते हैं। वे दृष्टधार्मिक और साम्परायिक अर्थों के साथ यथायोग्य अनुशासन करने वाले मुझ शास्ता के शासनकारी (आज्ञाकारी), ओवाद (उपदेश) का पालन करने वाले, सम्पूर्ण वट्ट-दुःख (संसार दुःख) का अन्त (पर्यन्त/अपुनरावृत्ति) करेंगे, अथवा दुःख के अन्त निर्वाण का साक्षात्कार करेंगे। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9. දුතියනකුහනසුත්තවණ්ණනා ९. द्वितीय नकुहन सूत्र की व्याख्या। 36. නවමෙ අභිඤ්ඤත්ථන්ති කුසලාදිවිභාගෙන ඛන්ධාදිවිභාගෙන ච සබ්බධම්මෙ අභිවිසිට්ඨෙන ඤාණෙන අවිපරීතතො ජානනත්ථං. පරිඤ්ඤත්ථන්ති තෙභූමකධම්මෙ ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්තිආදිනා පරිජානනත්ථං සමතික්කමනත්ථඤ්ච. තත්ථ අභිඤ්ඤෙය්යඅභිජානනා චතුසච්චවිසයා. පරිඤ්ඤෙය්යපරිජානනා පන යදිපි දුක්ඛසච්චවිසයා, පහානසච්ඡිකිරියාභාවනාභිසමයෙහි පන විනා න පවත්තතීති පහානාදයොපි ඉධ ගහිතාති වෙදිතබ්බං. සෙසං අනන්තරසුත්තෙ වුත්තත්ථමෙව. ३६. नौवें (सूत्र) में, 'अभिज्ञार्थ' (अभिञ्ञत्थं) का अर्थ है - कुशल आदि विभाग से और स्कन्ध आदि विभाग से सभी धर्मों को अतिविशिष्ट ज्ञान के द्वारा यथार्थ रूप से जानने के लिए। 'परिज्ञार्थ' (परिञ्ञत्थं) का अर्थ है - त्रैभूमिक धर्मों को "यह दुःख है" आदि प्रकार से परिज्ञान करने के लिए और अतिक्रमण करने के लिए। वहाँ अभिज्ञेय का अभिज्ञान चार सत्यों के विषय में है। यद्यपि परिज्ञेय का परिज्ञान दुःख सत्य के विषय में है, तथापि प्रहाण, साक्षात्करण और भावना के अभिसमय के बिना वह प्रवृत्त नहीं होता, इसलिए यहाँ प्रहाण आदि भी ग्रहण किए गए हैं - ऐसा समझना चाहिए। शेष अर्थ पिछले सूत्र में कहे गए के समान ही है। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. සොමනස්සසුත්තවණ්ණනා १०. सोमनस्य सूत्र की व्याख्या। 37. දසමෙ සුඛසොමනස්සබහුලොති එත්ථ සුඛන්ති කායිකං සුඛං, සොමනස්සන්ති චෙතසිකං. තස්මා යස්ස කායිකං චෙතසිකඤ්ච සුඛං අභිණ්හං පවත්තති, සො සුඛසොමනස්සබහුලොති වුත්තො. යොනීති ‘‘චතස්සො ඛො ඉමා, සාරිපුත්ත, යොනියො’’තිආදීසු (ම. නි. 1.152) ඛන්ධකොට්ඨාසො යොනීති ආගතො. ‘‘යොනි හෙසා, භූමිජ, ඵලස්ස අධිගමායා’’තිආදීසු (ම. නි. 3.226) කාරණං. ३७. दसवें (सूत्र) में, 'सुख-सोमनस्य-बहुल' यहाँ 'सुख' का अर्थ कायिक सुख है, 'सोमनस्य' का अर्थ चैतसिक (मानसिक) सुख है। इसलिए जिसके कायिक और चैतसिक सुख निरन्तर प्रवृत्त होते हैं, वह 'सुख-सोमनस्य-बहुल' कहा गया है। 'योनि' - "हे सारिपुत्र, ये चार योनियाँ हैं" आदि में (म.नि. १.१५२) स्कन्धों का विभाग 'योनि' के रूप में आया है। "हे भूमिज, यह फल की प्राप्ति के लिए योनि (कारण) है" आदि में (म.नि. ३.२२६) 'कारण' अर्थ है। ‘‘න චාහං බ්රාහ්මණං බ්රූමි, යොනිජං මත්තිසම්භව’’න්ති ච. (ම. නි. 2.457; ධ. ප. 396; සු. නි. 625); "और मैं उसे ब्राह्मण नहीं कहता जो योनि से उत्पन्न (योनिज) और माता से सम्भूत है।" (म.नि. २.४५७; ध.प. ३९६; सु.नि. ६२५); ‘‘තමෙනං කම්මජා වාතා නිබ්බත්තිත්වා උද්ධංපාදං අධොසිරං සම්පරිවත්තෙත්වා මාතු යොනිමුඛෙ සම්පටිපාදෙන්තී’’ති ච ආදීසු පස්සාවමග්ගො. ඉධ පන කාරණං [Pg.108] අධිප්පෙතං. අස්සාති අනෙන. ආරද්ධාති පට්ඨපිතා පග්ගහිතා පරිපුණ්ණා සම්පාදිතා වා. "तब उसे कर्मज वायु उत्पन्न होकर, पैर ऊपर और सिर नीचे की ओर घुमाकर माता के योनि-मुख में पहुँचा देती है" आदि में 'प्रस्रव-मार्ग' (जन्म मार्ग) अर्थ है। किन्तु यहाँ 'कारण' अभिप्रेत है। 'अस्स' का अर्थ है - इसके द्वारा। 'आरद्धा' का अर्थ है - प्रस्थापित, प्रगृहीत, परिपूर्ण या सम्पादित। ආසවානං ඛයායාති එත්ථ ආසවන්තීති ආසවා, චක්ඛුතොපි…පෙ… මනතොපි සවන්ති පවත්තන්තීති වුත්තං හොති. ධම්මතො යාව ගොත්රභූ, ඔකාසතො යාව භවග්ගා සවන්තීති වා ආසවා. එතෙ ධම්මෙ එතඤ්ච ඔකාසං අන්තො කරිත්වා පවත්තන්තීති අත්ථො. අන්තොකරණත්ථො හි අයං ආකාරො. චිරපාරිවාසියට්ඨෙන මදිරාදයො ආසවා වියාතිපි ආසවා. ලොකෙ හි චිරපාරිවාසිකා මදිරාදයො ආසවාති වුච්චන්ති. යදි ච චිරපාරිවාසියට්ඨෙන ආසවා, එතෙ එව භවිතුං අරහන්ති. වුත්තං හෙතං – ‘‘පුරිමා, භික්ඛවෙ, කොටි න පඤ්ඤායති අවිජ්ජාය, ඉතො පුබ්බෙ අවිජ්ජා නාහොසී’’තිආදි (අ. නි. 10.61). ආයතං සංසාරදුක්ඛං සවන්ති පසවන්තීතිපි ආසවා. පුරිමානි චෙත්ථ නිබ්බචනානි යත්ථ කිලෙසා ආසවාති ආගතා, තත්ථ යුජ්ජන්ති; පච්ඡිමං කම්මෙපි. න කෙවලඤ්ච කම්මකිලෙසා එව ආසවා, අපිච ඛො නානප්පකාරා උපද්දවාපි. අභිධම්මෙ හි ‘‘චත්තාරො ආසවා – කාමාසවො, භවාසවො, දිට්ඨාසවො, අවිජ්ජාසවො’’ති (ධ. ස. 1102) කාමරාගාදයො කිලෙසා ආසවාති ආගතා. සුත්තෙපි ‘‘නාහං, චුන්ද, දිට්ඨධම්මිකානංයෙව ආසවානං සංවරාය ධම්මං දෙසෙමී’’ති (දී. නි. 3.182) එත්ථ විවාදමූලභූතා කිලෙසා ආසවාති ආගතා. 'आसवानं खयाय' (आस्रवों के क्षय के लिए) यहाँ 'आसवन्ति' (बहते हैं) इसलिए 'आसव' (आस्रव) हैं; चक्षु से भी... पे... मन से भी बहते हैं या प्रवृत्त होते हैं, यह कहा गया है। धर्म की दृष्टि से गोत्रभू तक और स्थान की दृष्टि से भवाग्र तक बहते हैं, इसलिए आस्रव हैं। इन धर्मों और इस स्थान को भीतर (अन्तर्भूत) करके प्रवृत्त होते हैं, यह अर्थ है। यहाँ 'आ' कार 'भीतर करने' (अन्तर्करण) के अर्थ में है। चिरकाल तक रखे रहने के कारण मदिरा आदि के समान होने से भी आस्रव हैं। लोक में चिरकाल तक रखी हुई मदिरा आदि को आस्रव कहा जाता है। यदि चिरकाल तक रखे रहने के अर्थ में आस्रव हैं, तो ये ही होने योग्य हैं। जैसा कि कहा गया है— "भिक्षुओं! अविद्या की पूर्व कोटि नहीं जानी जाती कि इससे पहले अविद्या नहीं थी" आदि (अं. नि. 10.61)। विस्तृत संसार-दुःख को बहाते हैं या उत्पन्न करते हैं, इसलिए भी आस्रव हैं। यहाँ पूर्वोक्त व्युत्पत्तियाँ जहाँ क्लेशों को आस्रव कहा गया है, वहाँ घटित होती हैं; बाद वाली कर्म में भी। न केवल कर्म और क्लेश ही आस्रव हैं, बल्कि अनेक प्रकार के उपद्रव भी। अभिधम्म में "चार आस्रव हैं— कामासव, भवासव, दिट्ठासव, अविज्जासव" (ध. सं. 1102) इस प्रकार काम-राग आदि क्लेशों को आस्रव कहा गया है। सुत्त में भी "चुन्द! मैं केवल दृष्टधार्मिक आस्रवों के संवर के लिए धर्म देशना नहीं करता हूँ" (दी. नि. 3.182) यहाँ विवाद के मूलभूत क्लेशों को आस्रव कहा गया है। ‘‘යෙන දෙවූපපත්යස්ස, ගන්ධබ්බො වා විහඞ්ගමො; යක්ඛත්තං යෙන ගච්ඡෙය්ය, මනුස්සත්තඤ්ච අබ්බජෙ; තෙ මය්හං, ආසවා ඛීණා, විද්ධස්තා විනළීකතා’’ති. (අ. නි. 4.36) – "जिससे देव-योनि में उत्पत्ति हो, या गन्धर्व या आकाशगामी (पक्षी) हो; जिससे यक्षत्व को प्राप्त हो, या मनुष्यता को प्राप्त हो; वे मेरे आस्रव क्षीण हो गए हैं, नष्ट कर दिए गए हैं, जड़ से उखाड़ दिए गए हैं।" (अं. नि. 4.36) — එත්ථ තෙභූමකං කම්මං අවසෙසා ච අකුසලා ධම්මා. ‘‘දිට්ඨධම්මිකානං ආසවානං සංවරාය සම්පරායිකානං ආසවානං පටිඝාතායා’’ති (පාරා. 39) එත්ථ පරූපඝාතවිප්පටිසාරවධබන්ධාදයො චෙව අපායදුක්ඛභූතා නානප්පකාරා උපද්දවා ච. यहाँ तीनों भूमियों के कर्म और शेष अकुशल धर्म (अभिप्रेत हैं)। "दृष्टधार्मिक आस्रवों के संवर के लिए और साम्परायिक (परलोक संबंधी) आस्रवों के प्रतिघात के लिए" (पारा. 39) यहाँ दूसरों द्वारा किया गया उपघात, विप्रतिसार (पछतावा), वध, बन्धन आदि तथा अपाय-दुःख रूप अनेक प्रकार के उपद्रव (आस्रव हैं)। තෙ පනෙතෙ ආසවා විනයෙ ‘‘දිට්ඨධම්මිකානං ආසවානං සංවරාය, සම්පරායිකානං ආසවානං පටිඝාතායා’’ති ද්වෙධා ආගතා. සළායතනෙ ‘‘තයොමෙ, ආවුසො, ආසවා – කාමාසවො, භවාසවො, අවිජ්ජාසවො’’ති [Pg.109] (සං. නි. 4.321) තිධා ආගතා. තථා අඤ්ඤෙසු සුත්තන්තෙසු. අභිධම්මෙ තෙයෙව දිට්ඨාසවෙන සද්ධිං චතුධා ආගතා. නිබ්බෙධිකපරියායෙ පන ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, ආසවා නිරයගමනීයා, අත්ථි ආසවා තිරච්ඡානයොනිගමනීයා, අත්ථි ආසවා පෙත්තිවිසයගමනීයා, අත්ථි ආසවා මනුස්සලොකගමනීයා, අත්ථි ආසවා දෙවලොකගමනීයා’’ති (අ. නි. 6.63) පඤ්චධා ආගතා. කම්මමෙව චෙත්ථ ආසවාති අධිප්පෙතං. ඡක්කනිපාතෙ ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, ආසවා සංවරා පහාතබ්බා’’තිආදිනා (අ. නි. 6.58) නයෙන ඡධා ආගතා. සබ්බාසවපරියායෙ තෙයෙව දස්සනපහාතබ්බෙහි ධම්මෙහි සද්ධිං සත්තධා ආගතා. ඉධ පන අභිධම්මපරියායෙන චත්තාරො ආසවා අධිප්පෙතාති වෙදිතබ්බා. वे ये आस्रव विनय में "दृष्टधार्मिक आस्रवों के संवर के लिए, साम्परायिक आस्रवों के प्रतिघात के लिए" इस प्रकार दो प्रकार से आए हैं। षड़ायतन (संयुत्त) में "आवुस! ये तीन आस्रव हैं— कामासव, भवासव, अविज्जासव" (सं. नि. 4.321) इस प्रकार तीन प्रकार से आए हैं। वैसे ही अन्य सुत्तन्तों में। अभिधम्म में वे ही 'दिट्ठासव' के साथ चार प्रकार से आए हैं। निब्बेधिक-परियाय में "भिक्षुओं! नरकगामी आस्रव हैं, तिर्यक-योनिगामी आस्रव हैं, प्रेत-विषयगामी आस्रव हैं, मनुष्य-लोकगामी आस्रव हैं, देव-लोकगामी आस्रव हैं" (अं. नि. 6.63) इस प्रकार पाँच प्रकार से आए हैं। यहाँ कर्म ही आस्रव के रूप में अभिप्रेत है। छक्कनिपात में "भिक्षुओं! संवर द्वारा प्रहातव्य (त्यागने योग्य) आस्रव हैं" आदि (अं. नि. 6.58) विधि से छह प्रकार से आए हैं। सब्बासव-परियाय में वे ही दर्शन-प्रहातव्य धर्मों के साथ सात प्रकार से आए हैं। किन्तु यहाँ अभिधम्म पद्धति से चार आस्रव अभिप्रेत हैं, ऐसा जानना चाहिए। ඛයායාති එත්ථ පන ‘‘යො ආසවානං ඛයො වයො භෙදො පරිභෙදො අනිච්චතා අන්තරධාන’’න්ති ආසවානං සරසභෙදො ආසවානං ඛයොති වුත්තො. ‘‘ජානතො අහං, භික්ඛවෙ, පස්සතො ආසවානං ඛයං වදාමී’’ති (ම. නි. 1.15) එත්ථ ආසවානං ඛීණාකාරො නත්ථිභාවො අච්චන්තං අසමුප්පාදො ආසවක්ඛයොති වුත්තො. 'खयाय' (क्षय के लिए) यहाँ "जो आस्रवों का क्षय, व्यय, भेद, प्रभेद, अनित्यता, अन्तर्धान है" इस प्रकार आस्रवों के स्वभाव का भंग होना 'आस्रव-क्षय' कहा गया है। "भिक्षुओं! मैं जानते हुए और देखते हुए आस्रवों के क्षय को कहता हूँ" (म. नि. 1.15) यहाँ आस्रवों का क्षीण होना, अभाव होना, अत्यन्त अनुत्पाद होना 'आस्रव-क्षय' कहा गया है। ‘‘සෙඛස්ස සික්ඛමානස්ස, උජුමග්ගානුසාරිනො; ඛයස්මිං පඨමං ඤාණං, තතො අඤ්ඤා අනන්තරා’’ති. (ඉතිවු. 62) – "सीखते हुए (सिक्खमान), सीधे मार्ग का अनुसरण करने वाले शैक्ष (सेख) के लिए; क्षय (मार्ग) में प्रथम ज्ञान होता है, उसके बाद अनन्तर आज्ञा (अहंत्व ज्ञान) होती है।" (इतिवु. 62) — එත්ථ අරියමග්ගො ආසවක්ඛයොති වුත්තො. ‘‘ආසවානං ඛයා සමණො හොතී’’ති (ම. නි. 1.438) එත්ථ ඵලං. यहाँ आर्य मार्ग को 'आस्रव-क्षय' कहा गया है। "आस्रवों के क्षय से श्रमण होता है" (म. नि. 1.438) यहाँ फल (अभिप्रेत है)। ‘‘පරවජ්ජානුපස්සිස්ස, නිච්චං උජ්ඣානසඤ්ඤිනො; ආසවා තස්ස වඩ්ඪන්ති, ආරා සො ආසවක්ඛයා’’ති. (ධ. ප. 253) – "जो दूसरों के दोषों को देखने वाला है, नित्य ही दोषारोपण की संज्ञा वाला है; उसके आस्रव बढ़ते हैं, वह आस्रव-क्षय से दूर है।" (ध. प. 253) — එත්ථ නිබ්බානං. ඉධ පන ඵලං සන්ධාය ‘‘ආසවානං ඛයායා’’ති වුත්තං, අරහත්තඵලත්ථායාති අත්ථො. यहाँ निर्वाण (अभिप्रेत है)। किन्तु यहाँ फल को लक्ष्य करके "आस्रवों के क्षय के लिए" कहा गया है, जिसका अर्थ 'अर्हत्व फल के लिए' है। සංවෙජනීයෙසු ඨානෙසූති සංවෙගජනකෙසු ජාතිආදීසු සංවෙගවත්ථූසු. ජාති, ජරා, බ්යාධි, මරණං, අපායදුක්ඛං, අතීතෙ වට්ටමූලකං දුක්ඛං, අනාගතෙ වට්ටමූලකං දුක්ඛං, පච්චුප්පන්නෙ ආහාරපරියෙට්ඨිමූලකං දුක්ඛන්ති ඉමානි හි සංවෙගවත්ථූනි සංවෙජනීයට්ඨානානි නාම. අපිච ‘‘ආදිත්තො ලොකසන්නිවාසො උය්යුත්තො පයාතො කුම්මග්ගප්පටිපන්නො, උපනීයති ලොකො අද්ධුවො, අතාණො ලොකො අනභිස්සරො, අස්සකො [Pg.110] ලොකො, සබ්බං පහාය ගමනීයං, ඌනො ලොකො අතිත්තො තණ්හාදාසො’’තිඑවමාදීනි (පටි. ම. 1.117) චෙත්ථ සංවෙජනීයට්ඨානානීති වෙදිතබ්බානි. සංවෙජනෙනාති ජාතිආදිසංවෙගවත්ථූනි පටිච්ච උප්පන්නභයසඞ්ඛාතෙන සංවෙජනෙන. අත්ථතො පන සහොත්තප්පඤාණං සංවෙගො නාම. 'संवेजनीयेसु ठानेसु' (संवेगजनक स्थानों में) अर्थात् संवेग उत्पन्न करने वाले जाति (जन्म) आदि संवेग-वस्तुओं में। जाति, जरा, व्याधि, मरण, अपाय-दुःख, अतीत में संसार-मूलक दुःख, अनागत में संसार-मूलक दुःख, वर्तमान में आहार-खोज-मूलक दुःख— ये संवेग-वस्तुएँ 'संवेजनीय स्थान' कहलाती हैं। इसके अतिरिक्त "लोक-सन्निवेश प्रदीप्त है, उद्यत है, प्रस्थित है, कुमार्ग पर स्थित है; लोक ले जाया जा रहा है, अध्रुव है; लोक अशरण है, अनाथ है; लोक अपना नहीं है, सब कुछ छोड़कर जाना है; लोक अपूर्ण है, अतृप्त है, तृष्णा का दास है" इत्यादि (पटि. म. 1.117) भी यहाँ संवेजनीय स्थान जानने चाहिए। 'संवेजनेन' (संवेग द्वारा) अर्थात् जाति आदि संवेग-वस्तुओं के कारण उत्पन्न भय संज्ञक संवेग द्वारा। अर्थतः ओत्तप्प (पाप-भीरुता) युक्त ज्ञान ही संवेग है। සංවිග්ගස්සාති ගබ්භොක්කන්තිකාදිවසෙන අනෙකවිධෙහි ජාතිආදිදුක්ඛෙහි සංවෙගජාතස්ස. ‘‘සංවෙජිත්වා’’ති ච පඨන්ති. යොනිසො පධානෙනාති උපායපධානෙන, සම්මාවායාමෙනාති අත්ථො. සො හි යථා අකුසලා ධම්මා පහීයන්ති, කුසලා ධම්මා භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති, එවං පදහනතො උත්තමභාවසාධනතො ච ‘‘පධාන’’න්ති වුච්චති. තත්ථ සංවෙගෙන භවාදීසු කිඤ්චි තාණං ලෙණං පටිසරණං අපස්සන්තො තත්ථ අනොලීයන්තො අලග්ගමානසො තප්පටිපක්ඛෙන ච විනිවත්තිතවිසඤ්ඤිතො අඤ්ඤදත්ථු නිබ්බානනින්නො හොති නිබ්බානපොණො නිබ්බානපබ්භාරො. සො කල්යාණමිත්තසන්නිස්සයෙන යොනිසොමනසිකාරබහුලො විසුද්ධාසයප්පයොගො සමථවිපස්සනාසු යුත්තප්පයුත්තො සබ්බස්මිම්පි සඞ්ඛාරගතෙ නිබ්බින්දති විරජ්ජති, විපස්සනං උස්සුක්කාපෙති. තත්ථ යදිදං යොනිසොමනසිකාරබහුලො විසුද්ධාසයප්පයොගො සමථවිපස්සනාසු යුත්තප්පයුත්තො, තෙනස්ස දිට්ඨෙව ධම්මෙ සුඛසොමනස්සබහුලතා වෙදිතබ්බා. යං පනායං සමථෙ පතිට්ඨිතො විපස්සනාය යුත්තප්පයුත්තො සබ්බස්මිම්පි සඞ්ඛාරගතෙ නිබ්බින්දති විරජ්ජති, විපස්සනං උස්සුක්කාපෙති, තෙනස්ස යොනි ආරද්ධා ආසවානං ඛයායාති වෙදිතබ්බං. 'संविग्गस्स' का अर्थ है गर्भ में आने आदि के वश से अनेक प्रकार के जाति (जन्म) आदि दुखों से संवेग (वैराग्य/उद्वेग) उत्पन्न होना। 'संवेजित्वा' ऐसा भी पाठ है। 'योनि सो प्रधान' का अर्थ है उपाय-प्रधान, अर्थात् सम्यक् व्यायाम। वह जैसे अकुशल धर्म प्रहीण होते हैं और कुशल धर्म भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं, इस प्रकार प्रयत्न करने से और उत्तम भाव की सिद्धि करने से 'प्रधान' कहा जाता है। वहाँ संवेग के कारण भव आदि में कोई त्राण (रक्षा), लेण (शरण), प्रतिशरण न देखते हुए, वहाँ आसक्त न होते हुए, अनासक्त मन वाला और उसके प्रतिपक्ष से विरक्त संज्ञा वाला, केवल निर्वाण की ओर झुका हुआ, निर्वाण-प्रवण, निर्वाण-प्राग्भार होता है। वह कल्याणमित्र के संसर्ग से, योनि सो मनसिकार की बहुलता से, विशुद्ध आशय और प्रयोग वाला, शमथ और विपश्यना में युक्त-प्रयुक्त होकर समस्त संस्कारों में निर्वेद (वैराग्य) प्राप्त करता है, विरक्त होता है, और विपश्यना में उत्साह बढ़ाता है। वहाँ जो यह योनि सो मनसिकार की बहुलता, विशुद्ध आशय और प्रयोग, शमथ और विपश्यना में युक्त-प्रयुक्त होना है, उससे इसी जन्म (दृष्ट धर्म) में सुख और सोमनस्य की बहुलता जाननी चाहिए। और जो यह शमथ में प्रतिष्ठित होकर विपश्यना में युक्त-प्रयुक्त होकर समस्त संस्कारों में निर्वेद प्राप्त करता है, विरक्त होता है, विपश्यना में उत्साह बढ़ाता है, उससे उसकी 'योनि' (कारण) आस्रवों के क्षय के लिए आरब्ध (प्रारम्भ) हुई जाननी चाहिए। ගාථාසු සංවිජ්ජෙථෙවාති සංවිජ්ජෙය්ය එව සංවෙගං කරෙය්ය එව. ‘‘සංවිජ්ජිත්වානා’’ති ච පඨන්ති. වුත්තනයෙන සංවිග්ගො හුත්වාති අත්ථො. පණ්ඩිතොති සප්පඤ්ඤො, තිහෙතුකපටිසන්ධීති වුත්තං හොති. පඤ්ඤාය සමවෙක්ඛියාති සංවෙගවත්ථූනි සංවිජ්ජනවසෙන පඤ්ඤාය සම්මා අවෙක්ඛිය. අථ වා පඤ්ඤාය සම්මා අවෙක්ඛිත්වාති. සෙසං සබ්බත්ථ උත්තානත්ථමෙව. गाथाओं में 'संविज्जेथ' का अर्थ है संवेग ही करे, संवेग उत्पन्न ही करे। 'संविज्जित्वाना' ऐसा भी पाठ है। पूर्वोक्त रीति से 'संविग्न होकर' यह अर्थ है। 'पण्डित' का अर्थ है प्रज्ञावान, अर्थात् त्रिहेतुक प्रतिसन्धि वाला कहा गया है। 'पञ्ञाय समवेक्खिय' का अर्थ है संवेग के वस्तुओं को संविज्जन (अनुभव) के वश से प्रज्ञा द्वारा सम्यक् प्रकार से देखकर। अथवा प्रज्ञा द्वारा सम्यक् प्रकार से विचार कर। शेष सब जगह अर्थ स्पष्ट ही है। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की वर्णना समाप्त हुई। ඉති පරමත්ථදීපනියා ඉතිවුත්තක-අට්ඨකථාය इस प्रकार परमत्थदीपनी इतिवुत्तक-अट्ठकथा में— දුකනිපාතෙ පඨමවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दुकनिपात में प्रथम वर्ग की वर्णना समाप्त हुई। 2. දුතියවග්ගො २. द्वितीय वर्ग। 1. විතක්කසුත්තවණ්ණනා १. वितर्क सूत्र की वर्णना। 38. දුතියවග්ගස්ස [Pg.111] පඨමෙ තථාගතං, භික්ඛවෙති එත්ථ තථාගත-සද්දො තාව සත්තවොහාරසම්මාසම්බුද්ධාදීසු දිස්සති. තථා හෙස ‘‘හොති තථාගතො පරං මරණා’’තිආදීසු (දී. නි. 1.65) සත්තවොහාරෙ. ३८. द्वितीय वर्ग के प्रथम (सूत्र) में 'तथागतं, भिक्खवे' यहाँ 'तथागत' शब्द पहले सत्त्व-व्यवहार (प्राणी मात्र) और सम्यक्सम्बुद्ध आदि में देखा जाता है। जैसे वह 'होति तथागतो परं मरणा' (मृत्यु के बाद तथागत होते हैं) आदि में सत्त्व-व्यवहार में है। ‘‘තථාගතං දෙවමනුස්සපූජිතං,බුද්ධං නමස්සාම සුවත්ථි හොතූ’’ති. (ඛු. පා. 6.16) – "देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित तथागत बुद्ध को हम नमस्कार करते हैं, स्वस्ति (कल्याण) हो।" — ආදීසු සම්මාසම්බුද්ධෙ. आदि में सम्यक्सम्बुद्ध के अर्थ में। ‘‘තථාගතං දෙවමනුස්සපූජිතං,ධම්මං නමස්සාම සුවත්ථි හොතූ’’ති. (ඛු. පා. 6.17) – "देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित तथागत धर्म को हम नमस्कार करते हैं, स्वस्ति हो।" — ආදීසු ධම්මෙ. आदि में धर्म के अर्थ में। ‘‘තථාගතං දෙවමනුස්සපූජිතං,සඞ්ඝං නමස්සාම සුවත්ථි හොතූ’’ති. (ඛු. පා. 6.18) – "देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित तथागत संघ को हम नमस्कार करते हैं, स्वस्ति हो।" — ආදීසු සඞ්ඝෙ. ඉධ පන සම්මාසම්බුද්ධෙ. තස්මා තථාගතන්ති එත්ථ අට්ඨහි කාරණෙහි භගවා තථාගතොති වුච්චති. කතමෙහි අට්ඨහි? තථා ආගතොති තථාගතො, තථා ගතොති තථාගතො, තථලක්ඛණං ආගතොති තථාගතො, තථධම්මෙ යාථාවතො අභිසම්බුද්ධොති තථාගතො, තථදස්සිතාය තථාගතො, තථවාදිතාය තථාගතො, තථාකාරිතාය තථාගතො, අභිභවනට්ඨෙන තථාගතොති. आदि में संघ के अर्थ में। यहाँ तो सम्यक्सम्बुद्ध के अर्थ में है। इसलिए 'तथागत' यहाँ आठ कारणों से भगवान को 'तथागत' कहा जाता है। वे आठ कौन से हैं? तथा (वैसे ही) आए हैं इसलिए तथागत, तथा (वैसे ही) गए हैं इसलिए तथागत, तथ्य-लक्षण (यथार्थ लक्षण) को प्राप्त हुए हैं इसलिए तथागत, तथ्य-धर्मों को यथार्थ रूप से अभिसम्बुद्ध (साक्षात्कृत) किया है इसलिए तथागत, तथ्य-दर्शिता (यथार्थ दर्शन) के कारण तथागत, तथ्य-वादिता (सत्य बोलने) के कारण तथागत, तथ्य-कारिता (जैसा कहना वैसा करना) के कारण तथागत, और अभिभवन (सबको जीतने) के अर्थ में तथागत। කථං භගවා තථා ආගතොති තථාගතො? යථා යෙන අභිනීහාරෙන දානපාරමිං පූරෙත්වා සීලනෙක්ඛම්මපඤ්ඤාවීරියඛන්තිසච්චඅධිට්ඨානමෙත්තාඋපෙක්ඛාපාරමිං පූරෙත්වා ඉමා දස පාරමියො, දස උපපාරමියො, දස පරමත්ථපාරමියොති සමතිංස පාරමියො පූරෙත්වා අඞ්ගපරිච්චාගං, අත්තපරිච්චාගං, ධනපරිච්චාගං, දාරපරිච්චාගං, රජ්ජපරිච්චාගන්ති ඉමානි පඤ්ච මහාපරිච්චාගානි පරිච්චජිත්වා යථා විපස්සිආදයො සම්මාසම්බුද්ධා ආගතා[Pg.112], තථා අම්හාකං භගවාපි ආගතොති තථාගතො. යථාහ – भगवान 'तथा (वैसे ही) आए हैं' इस कारण तथागत कैसे हैं? जैसे जिस अभिनिहार (संकल्प) से दान पारमिता को पूर्ण कर, शील, नैष्क्रम्य, प्रज्ञा, वीर्य, क्षान्ति, सत्य, अधिष्ठान, मैत्री और उपेक्षा पारमिता को पूर्ण कर, इन दस पारमिताओं, दस उप-पारमिताओं और दस परमार्थ-पारमिताओं—इस प्रकार तीस पारमिताओं को पूर्ण कर, अंग-परित्याग, आत्म-परित्याग, धन-परित्याग, दारा (पत्नी)-परित्याग और राज्य-परित्याग—इन पाँच महापरित्यागों को त्याग कर जैसे विपश्यी आदि सम्यक्सम्बुद्ध आए, वैसे ही हमारे भगवान भी आए, इसलिए 'तथागत' हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘යථෙව ලොකම්හි විපස්සිආදයො,සබ්බඤ්ඤුභාවං මුනයො ඉධාගතා; තථා අයං සක්යමුනීපි ආගතො,තථාගතො වුච්චති තෙන චක්ඛුමා’’ති. – "जैसे इस लोक में विपश्यी आदि मुनि सर्वज्ञता भाव को प्राप्त हुए (यहाँ आए); वैसे ही ये शाक्यमुनि भी आए हैं, इसलिए वे चक्षुमान 'तथागत' कहे जाते हैं।" — එවං තථා ආගතොති තථාගතො. इस प्रकार 'तथा (वैसे ही) आए हैं' इसलिए तथागत हैं। කථං තථා ගතොති තථාගතො? යථා සම්පතිජාතාව විපස්සිආදයො සමෙහි පාදෙහි පථවියං පතිට්ඨාය උත්තරාභිමුඛා සත්තපදවීතිහාරෙන ගතා, තථා අම්හාකං භගවාපි ගතොති තථාගතො. යථාහු – 'तथा (वैसे ही) गए हैं' इस कारण तथागत कैसे हैं? जैसे जन्म लेते ही विपश्यी आदि ने समान पैरों से पृथ्वी पर प्रतिष्ठित होकर उत्तर की ओर मुँह करके सात कदम चलकर गए, वैसे ही हमारे भगवान भी गए, इसलिए 'तथागत' हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘මුහුත්තජාතොව ගවංපතී යථා,සමෙහි පාදෙහි ඵුසී වසුන්ධරං; සො වික්කමී සත්ත පදානි ගොතමො,සෙතඤ්ච ඡත්තං අනුධාරයුං මරූ. "जैसे उत्पन्न होते ही बैलों का स्वामी (वृषभ) समान पैरों से पृथ्वी को स्पर्श करता है, वैसे ही उन गौतम ने सात कदम बढ़ाए और देवताओं ने श्वेत छत्र धारण किया। ‘‘ගන්ත්වාන සො සත්ත පදානි ගොතමො,දිසා විලොකෙසි සමා සමන්තතො; අට්ඨඞ්ගුපෙතං ගිරමබ්භුදීරයි,සීහො යථා පබ්බතමුද්ධනිට්ඨිතො’’ති. – "उन गौतम ने सात कदम जाकर चारों ओर दिशाओं को देखा और पर्वत के शिखर पर स्थित सिंह की तरह आठ अंगों से युक्त वाणी का उच्चारण किया।" — එවං තථා ගතොති තථාගතො. इस प्रकार 'तथा (वैसे ही) गए हैं' इसलिए तथागत हैं। කථං තථලක්ඛණං ආගතොති තථාගතො? සබ්බෙසං රූපාරූපධම්මානං සලක්ඛණං, සාමඤ්ඤලක්ඛණං, තථං, අවිතථං, ඤාණගතියා ආගතො, අවිරජ්ඣිත්වා පත්තො, අනුබුද්ධොති තථාගතො. යථාහ – 'तथ्य-लक्षण को प्राप्त हुए' इस कारण तथागत कैसे हैं? समस्त रूप और अरूप धर्मों के स्व-लक्षण और सामान्य-लक्षण को, जो तथ्य (सत्य) है, अवितथ (अमिथ्या) है, ज्ञान की गति से प्राप्त किया, बिना चूके प्राप्त किया, अनुबुद्ध (जाना), इसलिए 'तथागत' हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘සබ්බෙසං පන ධම්මානං, සකසාමඤ්ඤලක්ඛණං; තථමෙවාගතො යස්මා, තස්මා නාථො තථාගතො’’ති. – "चूँकि वे समस्त धर्मों के स्व-लक्षण और सामान्य-लक्षण को यथार्थ (तथ्य) रूप में ही प्राप्त हुए हैं, इसलिए वे नाथ 'तथागत' हैं।" — එවං තථලක්ඛණං ආගතොති තථාගතො. इस प्रकार 'तथ्य-लक्षण को प्राप्त हुए' इसलिए तथागत हैं। කථං තථධම්මෙ යාථාවතො අභිසම්බුද්ධොති තථාගතො? තථධම්මා නාම චත්තාරි අරියසච්චානි. යථාහ ‘‘චත්තාරිමානි, භික්ඛවෙ, තථානි [Pg.113] අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. කතමානි චත්තාරි? ඉදං දුක්ඛං අරියසච්චන්ති, භික්ඛවෙ, තථමෙතං අවිතථමෙතං අනඤ්ඤථමෙත’’න්ති (සං. නි. 5.1090) විත්ථාරො. තානි ච භගවා අභිසම්බුද්ධො, තස්මාපි තථානං අභිසම්බුද්ධත්තා තථාගතො. අභිසම්බුද්ධත්ථො හි එත්ථ ගත-සද්දො. එවං තථධම්මෙ යාථාවතො අභිසම්බුද්ධොති තථාගතො. तथागत किस प्रकार यथार्थ धर्मों (तथधम्मों) को यथार्थ रूप से अभिसम्बुद्ध होने के कारण 'तथागत' हैं? यथार्थ धर्म (तथधम्म) नाम चार आर्य सत्य हैं। जैसा कि कहा गया है— 'भिक्षुओं! ये चार तथ्य (तथ) हैं, अविथ (असत्य नहीं) हैं, अनन्यथ (अन्यथा नहीं) हैं। कौन से चार? भिक्षुओं! 'यह दुःख आर्य सत्य है', यह तथ्य है, यह अविथ है, यह अनन्यथ है...' विस्तार से। और भगवान् उन्हें अभिसम्बुद्ध हुए, इसलिए भी तथ्यों को अभिसम्बुद्ध होने के कारण 'तथागत' हैं। यहाँ 'गत' शब्द का अर्थ 'अभिसम्बुद्ध' है। इस प्रकार यथार्थ धर्मों को यथार्थ रूप से अभिसम्बुद्ध होने के कारण 'तथागत' हैं। කථං තථදස්සිතාය තථාගතො? යං සදෙවකෙ ලොකෙ…පෙ… සදෙවමනුස්සාය පජාය අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු අපරිමාණානං සත්තානං චක්ඛුද්වාරෙ ආපාථමාගච්ඡන්තං රූපාරම්මණං නාම අත්ථි, තං භගවා සබ්බාකාරතො ජානාති පස්සති. එවං ජානතා පස්සතා චානෙන තං ඉට්ඨාදිවසෙන වා දිට්ඨසුතමුතවිඤ්ඤාතෙසු ලබ්භමානපදවසෙන වා ‘‘කතමං තං රූපං රූපායතනං, යං රූපං චතුන්නං මහාභූතානං උපාදාය වණ්ණනිභා සනිදස්සනං සප්පටිඝං නීලං පීතක’’න්තිආදිනා (ධ. ස. 616) නයෙන අනෙකෙහි නාමෙහි තෙරසහි වාරෙහි ද්වෙපඤ්ඤාසාය නයෙහි විභජ්ජමානං තථමෙව හොති, විතථං නත්ථි. එස නයො සොතද්වාරාදීසු ආපාථමාගච්ඡන්තෙසු සද්දාදීසු. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – तथागत किस प्रकार यथार्थदर्शिता (तथदस्सिता) के कारण 'तथागत' हैं? सदेवक लोक में... पे... सदेवमनुष्य प्रजा में, अपरिमित लोकधातुओं में अपरिमित सत्त्वों के चक्षु-द्वार के मार्ग में जो 'रूपारम्मण' (रूप-आलम्बन) आता है, उसे भगवान् सभी प्रकार से जानते और देखते हैं। इस प्रकार जानते और देखते हुए उनके द्वारा, उस (रूप) को इष्ट आदि के वश से अथवा दृष्ट-श्रुत-मत-विज्ञात में प्राप्त होने वाले पदों के वश से— 'वह रूप, रूपायतन कौन सा है, जो रूप चार महाभूतों को उपादाय (आश्रित) है, वर्ण-आभा वाला है, सनिदर्शन (दृश्य) है, सप्रतिघ (प्रतिघात युक्त) है, नीला है, पीला है' इत्यादि विधि से अनेक नामों से, तेरह बारों से, बावन विधियों से विभक्त किया जाता हुआ वह वैसा ही (तथ) होता है, वितथ (मिथ्या) नहीं होता। यही विधि श्रोत्र-द्वार आदि में आने वाले शब्द आदि के विषय में भी है। भगवान् द्वारा यह कहा गया है— ‘‘යං, භික්ඛවෙ, සදෙවකස්ස ලොකස්ස…පෙ… සදෙවමනුස්සාය දිට්ඨං සුතං මුතං විඤ්ඤාතං පත්තං පරියෙසිතං අනුවිචරිතං මනසා, තමහං ජානාමි…පෙ… තමහං අබ්භඤ්ඤාසිං, තං තථාගතස්ස විදිතං, තං තථාගතො න උපට්ඨාසී’’ති (අ. නි. 4.24). “भिक्षुओं! सदेवक लोक में... पे... सदेवमनुष्य (प्रजा) द्वारा जो कुछ देखा गया, सुना गया, अनुभव किया गया (मत), विज्ञात किया गया, प्राप्त किया गया, खोजा गया, मन से अनुविचारित किया गया, उसे मैं जानता हूँ... पे... उसे मैंने विशेष रूप से जाना है, वह तथागत द्वारा विदित है, (किन्तु) तथागत उसमें स्थित नहीं हुए (आसक्त नहीं हुए)।” එවං තථදස්සිතාය තථාගතො. එත්ථ තථදස්සිඅත්ථෙ තථාගතොති පදස්ස සම්භවො වෙදිතබ්බො. इस प्रकार यथार्थदर्शिता के कारण 'तथागत' हैं। यहाँ यथार्थदर्शन के अर्थ में 'तथागत' पद की सिद्धि समझनी चाहिए। කථං තථවාදිතාය තථාගතො? යං රත්තිං භගවා අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො, යඤ්ච රත්තිං අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා පරිනිබ්බායි, එත්ථන්තරෙ පඤ්චචත්තාලීසවස්සපරිමාණකාලෙ යං භගවතා භාසිතං සුත්තගෙය්යාදි, සබ්බං තං පරිසුද්ධං පරිපුණ්ණං රාගමදාදිනිම්මදනං එකසදිසං තථං අවිතථං. තෙනාහ – तथागत किस प्रकार यथार्थवादिता (तथवादिता) के कारण 'तथागत' हैं? जिस रात्रि को भगवान् ने अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि प्राप्त की, और जिस रात्रि को वे अनुपधिशेष निर्वाण-धातु में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए, इस बीच के पैंतालीस वर्ष के समय में भगवान् द्वारा जो कुछ भी सुत्त, गेय आदि कहा गया, वह सब परिशुद्ध, परिपूर्ण, राग-मद आदि का मर्दन करने वाला, एक समान, तथ्य (सत्य) और अविथ (अमिथ्या) है। इसीलिए कहा है— ‘‘යඤ්ච, චුන්ද, රත්තිං තථාගතො අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුජ්ඣති, යඤ්ච රත්තිං අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා පරිනිබ්බායති, යං [Pg.114] එතස්මිං අන්තරෙ භාසති ලපති නිද්දිසති, සබ්බං තං තථෙව හොති, නො අඤ්ඤථා. තස්මා ‘තථාගතො’ති වුච්චතී’’ති (දී. නි. 3.188; අ. නි. 4.23). “चुन्द! जिस रात्रि को तथागत अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि को प्राप्त करते हैं, और जिस रात्रि को अनुपधिशेष निर्वाण-धातु में परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, इस बीच में वे जो कुछ भी कहते हैं, बोलते हैं, निर्देश करते हैं, वह सब वैसा ही (तथ) होता है, अन्यथा नहीं। इसलिए 'तथागत' कहे जाते हैं।” ගදඅත්ථො හි එත්ථ ගතසද්දො. එවං තථවාදිතාය තථාගතො. අපිච ආගදනං ආගදො, වචනන්ති අත්ථො. තථො අවිපරීතො ආගදො අස්සාති දකාරස්ස තකාරං කත්වා තථාගතොති, එවම්පෙත්ථ පදසිද්ධි වෙදිතබ්බා. यहाँ 'गत' शब्द का अर्थ 'गद' (भाषण/बोलना) है। इस प्रकार यथार्थवादिता के कारण 'तथागत' हैं। इसके अतिरिक्त, 'आगदन' ही 'आगद' है, जिसका अर्थ 'वचन' है। जिनका वचन (आगद) तथ्य (यथार्थ) और अविपरीत है, यहाँ 'द' कार को 'त' कार करके 'तथागत'—इस प्रकार भी यहाँ पद-सिद्धि समझनी चाहिए। කථං තථාකාරිතාය තථාගතො? භගවතො හි වාචාය කායො අනුලොමෙති, කායස්සපි වාචා. තස්මා යථාවාදී තථාකාරී, යථාකාරී තථාවාදී ච හොති. එවංභූතස්ස චස්ස යථා වාචා, කායොපි තථා ගතො පවත්තො. යථා ච කායො, වාචාපි තථා ගතාති තථාගතො. තෙනාහ ‘‘යථාවාදී, භික්ඛවෙ, තථාගතො තථාකාරී, යථාකාරී තථාවාදී. ඉති යථාවාදී තථාකාරී, යථාකාරී තථාවාදී. තස්මා ‘තථාගතො’ති වුච්චතී’’ති. එවං තථාකාරිතාය තථාගතො. तथागत किस प्रकार यथार्थकारिता (तथकारिता) के कारण 'तथागत' हैं? भगवान् की वाणी के अनुसार ही उनका शरीर (काया) प्रवृत्त होता है, और शरीर के अनुसार ही वाणी। इसलिए वे यथावादी तथाकारी और यथाकारी तथावादी होते हैं। ऐसे महापुरुष की जैसी वाणी होती है, वैसी ही काया भी 'गत' (प्रवृत्त) होती है। और जैसी काया होती है, वैसी ही वाणी भी 'गत' होती है, इसलिए 'तथागत' हैं। इसीलिए कहा है— 'भिक्षुओं! तथागत यथावादी तथाकारी और यथाकारी तथावादी हैं। इस प्रकार वे यथावादी तथाकारी और यथाकारी तथावादी हैं। इसलिए तथागत कहे जाते हैं।' इस प्रकार यथार्थकारिता के कारण 'तथागत' हैं। කථං අභිභවනට්ඨෙන තථාගතො? යස්මා භගවා උපරි භවග්ගං හෙට්ඨා අවීචිං පරියන්තං කරිත්වා තිරියං අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු සබ්බසත්තෙ අභිභවති සීලෙනපි සමාධිනාපි පඤ්ඤායපි විමුත්තියාපි විමුත්තිඤාණදස්සනෙනපි, න තස්ස තුලා වා පමාණං වා අත්ථි, අථ ඛො අතුලො අප්පමෙය්යො අනුත්තරො දෙවානං අතිදෙවො සක්කානං අතිසක්කො බ්රහ්මානං අතිබ්රහ්මා සබ්බසත්තුත්තමො, තස්මා තථාගතො. තෙනාහ – तथागत किस प्रकार अभिभवन (अभिभूत करने) के अर्थ में 'तथागत' हैं? क्योंकि भगवान् ऊपर भवग्र से लेकर नीचे अवीचि पर्यन्त और तिरछे अपरिमित लोकधातुओं में सभी सत्त्वों को शील से भी, समाधि से भी, प्रज्ञा से भी, विमुक्ति से भी और विमुक्ति-ज्ञानदर्शन से भी अभिभूत करते हैं; उनकी न कोई तुलना है, न कोई माप है, बल्कि वे अतुलनीय, अप्रमेय, अनुत्तर, देवों के अतिदेव, शक्रों के अतिशक्र, ब्रह्माओं के अतिब्रह्मा और सभी सत्त्वों में उत्तम हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। इसीलिए कहा है— ‘‘සදෙවකෙ, භික්ඛවෙ, ලොකෙ…පෙ… මනුස්සාය තථාගතො අභිභූ අනභිභූතො අඤ්ඤදත්ථු දසො වසවත්තී, තස්මා ‘තථාගතො’ති වුච්චතී’’ති (දී. නි. 3.188; අ. නි. 4.23). “भिक्षुओं! सदेवक लोक में... पे... मनुष्यों में तथागत अभिभूत करने वाले (विजेता) हैं, किसी से अभिभूत न होने वाले, सर्वद्रष्टा और वशवर्ती हैं, इसलिए 'तथागत' कहे जाते हैं।” තත්රායං පදසිද්ධි – අගදො විය අගදො, දෙසනාවිලාසො චෙව පුඤ්ඤුස්සයො ච. තෙන හෙස මහානුභාවො භිසක්කො විය දිබ්බාගදෙන සප්පෙ, සබ්බපරප්පවාදිනො සදෙවකඤ්ච ලොකං අභිභවති. ඉති සබ්බලොකාභිභවනෙ තථො අවිපරීතො යථාවුත්තො අගදො එතස්සාති දකාරස්ස තකාරං කත්වා තථාගතොති වෙදිතබ්බො. එවං අභිභවනට්ඨෙන තථාගතො. वहाँ यह पद-सिद्धि है— 'अगद' (औषधि) के समान 'अगद' है, जो देशना-विलास और पुण्य-समूह है। उससे वे महानुभाव, जैसे कोई वैद्य दिव्य औषधि से सर्पों को (अभिभूत करता है), वैसे ही सभी पर-प्रवादों (दूसरे मतों) को और सदेवक लोक को अभिभूत करते हैं। इस प्रकार समस्त लोक को अभिभूत करने में जिनका 'अगद' (सामर्थ्य) यथार्थ (तथ) और अविपरीत है, यहाँ 'द' कार को 'त' कार करके 'तथागत' समझना चाहिए। इस प्रकार अभिभवन के अर्थ में 'तथागत' हैं। අපිච [Pg.115] තථාය ගතොති තථාගතො, තථං ගතොති තථාගතො. තත්ථ සකලලොකං තීරණපරිඤ්ඤාය තථාය ගතො අවගතොති තථාගතො, ලොකසමුදයං පහානපරිඤ්ඤාය තථාය ගතො අතීතොති තථාගතො, ලොකනිරොධං සච්ඡිකිරියාය තථාය ගතො අධිගතොති තථාගතො. ලොකනිරොධගාමිනිං පටිපදං තථං ගතො පටිපන්නොති තථාගතො. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – इसके अतिरिक्त, 'तथ' (यथार्थ मार्ग) से जाने के कारण 'तथागत' हैं, और 'तथ' (यथार्थ सत्य) को प्राप्त होने के कारण 'तथागत' हैं। वहाँ समस्त लोक को तीरण-परिज्ञा (जाँच-परख) द्वारा यथार्थ रूप से जानने (अवगत होने) के कारण 'तथागत' हैं; लोक-समुदय को प्रहाण-परिज्ञा (त्यागने) द्वारा यथार्थ रूप से पार कर जाने (अतीत होने) के कारण 'तथागत' हैं; लोक-निरोध को साक्षात् करने के कारण यथार्थ रूप से प्राप्त (अधिगत) होने के कारण 'तथागत' हैं; और लोक-निरोध-गामिनी प्रतिपदा (मार्ग) पर यथार्थ रूप से चलने (प्रतिपन्न होने) के कारण 'तथागत' हैं। भगवान् द्वारा यह कहा गया है— ‘‘ලොකො, භික්ඛවෙ, තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධො. ලොකස්මා තථාගතො විසංයුත්තො. ලොකසමුදයො, භික්ඛවෙ, තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධො, ලොකසමුදයො තථාගතස්ස පහීනො. ලොකනිරොධො, භික්ඛවෙ, තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධො, ලොකනිරොධො තථාගතස්ස සච්ඡිකතො. ලොකනිරොධගාමිනී පටිපදා, භික්ඛවෙ, තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධා, ලොකනිරොධගාමිනී පටිපදා තථාගතස්ස භාවිතා. යං, භික්ඛවෙ, සදෙවකස්ස…පෙ… සබ්බං තං තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධං. තස්මා ‘තථාගතො’ති වුච්චතී’’ති (අ. නි. 4.23). भिक्षुओं! तथागत ने लोक को पूर्णतः जान लिया है (अभिसम्बुद्ध)। तथागत लोक से विमुक्त हैं। भिक्षुओं! तथागत ने लोक-समुदय को पूर्णतः जान लिया है, तथागत द्वारा लोक-समुदय का प्रहाण कर दिया गया है। भिक्षुओं! तथागत ने लोक-निरोध को पूर्णतः जान लिया है, तथागत द्वारा लोक-निरोध का साक्षात्कार कर लिया गया है। भिक्षुओं! तथागत ने लोक-निरोध-गामिनी प्रतिपदा को पूर्णतः जान लिया है, तथागत द्वारा लोक-निरोध-गामिनी प्रतिपदा का भावित (अभ्यास) कर लिया गया है। भिक्षुओं! देवलोक सहित... आदि जो कुछ भी है, वह सब तथागत द्वारा अभिसम्बुद्ध है। इसलिए उन्हें 'तथागत' कहा जाता है। අපරෙහිපි අට්ඨහි කාරණෙහි භගවා තථාගතො. තථාය ආගතොති තථාගතො, තථාය ගතොති තථාගතො, තථානි ආගතොති තථාගතො, තථා ගතොති තථාගතො, තථාවිධොති තථාගතො, තථාපවත්තිකොති තථාගතො, තථෙහි ආගතොති තථාගතො, තථා ගතභාවෙන තථාගතොති. अन्य आठ कारणों से भी भगवान 'तथागत' हैं। 'तथा' (सत्य) के साथ आए हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (सत्य) की ओर गए हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (यथार्थ) लक्षणों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (यथार्थ) रूप से गए हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (यथार्थ) स्वभाव वाले हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (यथार्थ) प्रवृत्ति वाले हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (सत्य) वचनों से आए हैं, इसलिए तथागत हैं; 'तथा' (यथार्थ) गति भाव के कारण तथागत हैं। කථං තථාය ආගතොති තථාගතො? යා සා භගවතා සුමෙධභූතෙන දීපඞ්කරදසබලස්ස පාදමූලෙ – 'तथा' (सत्य) के साथ आए हैं, इस अर्थ में तथागत कैसे हैं? जो वह भगवान द्वारा सुमेध (तापस) के रूप में दीपंकर दशबल के चरणों में— ‘‘මනුස්සත්තං ලිඞ්ගසම්පත්ති, හෙතු සත්ථාරදස්සනං; පබ්බජ්ජා ගුණසම්පත්ති, අධිකාරො ච ඡන්දතා; අට්ඨධම්මසමොධානා, අභිනීහාරො සමිජ්ඣතී’’ති. (බු. වං. 2.59) – मनुष्यत्व, लिंग-सम्पत्ति (पुरुष होना), हेतु (अर्हत्व प्राप्ति की सामर्थ्य), शास्ता का दर्शन, प्रव्रज्या, गुण-सम्पत्ति, अधिकार (विशेष सेवा) और छन्दता (तीव्र इच्छा)—इन आठ धर्मों के मिलन से (बुद्धत्व के लिए) अभिनिहार (संकल्प) सिद्ध होता है। එවං වුත්තං අට්ඨඞ්ගසමන්නාගතං අභිනීහාරං සම්පාදෙන්තෙන ‘‘අහං සදෙවකං ලොකං තිණ්ණො තාරෙස්සාමි, මුත්තො මොචෙස්සාමි, දන්තො දමෙස්සාමි, අස්සත්ථො අස්සාසෙස්සාමි, පරිනිබ්බුතො පරිනිබ්බාපෙස්සාමි, සුද්ධො සොධෙස්සාමි[Pg.116], බුද්ධො බොධෙස්සාමී’’ති මහාපටිඤ්ඤා පවත්තිතා. වුත්තං හෙතං – इस प्रकार कहे गए आठ अंगों से युक्त अभिनिहार (संकल्प) को पूरा करते हुए, 'मैं स्वयं पार होकर देवलोक सहित संसार को पार कराऊँगा, स्वयं मुक्त होकर मुक्त कराऊँगा, स्वयं दान्त (संयमित) होकर दमन कराऊँगा, स्वयं आश्वस्त होकर आश्वासन दूँगा, स्वयं परिनिर्वृत होकर परिनिर्वाण प्राप्त कराऊँगा, स्वयं शुद्ध होकर शुद्ध करूँगा, स्वयं बुद्ध होकर बोध कराऊँगा'—ऐसी महाप्रतिज्ञा की गई। जैसा कि कहा गया है— ‘‘කිං මෙ එකෙන තිණ්ණෙන, පුරිසෙන ථාමදස්සිනා; සබ්බඤ්ඤුතං පාපුණිත්වා, සන්තාරෙස්සං සදෙවකං. अपनी शक्ति को जानने वाले मुझ पुरुष के लिए अकेले पार होने से क्या लाभ? सर्वज्ञता को प्राप्त कर मैं देवलोक सहित संसार को पार कराऊँगा। ‘‘ඉමිනා මෙ අධිකාරෙන, කතෙන පුරිසුත්තමෙ; සබ්බඤ්ඤුතං පාපුණිත්වා, තාරෙමි ජනතං බහුං. पुरुषोत्तम (दीपंकर बुद्ध) के प्रति किए गए इस मेरे अधिकार (सेवा) से, सर्वज्ञता को प्राप्त कर मैं बहुत से जनों को पार कराऊँगा। ‘‘සංසාරසොතං ඡින්දිත්වා, විද්ධංසෙත්වා තයො භවෙ; ධම්මනාවං සමාරුය්හ, සන්තාරෙස්සං සදෙවකං. संसार के स्रोत को काटकर, तीनों भवों का विध्वंस कर, धर्म-नौका पर आरूढ़ होकर मैं देवलोक सहित संसार को पार कराऊँगा। ‘‘කිං මෙ අඤ්ඤාතවෙසෙන, ධම්මං සච්ඡිකතෙනිධ; සබ්බඤ්ඤුතං පාපුණිත්වා, බුද්ධො හෙස්සං සදෙවකෙ’’ති. (බු. වං. 55-58); अज्ञात वेश में यहाँ धर्म का साक्षात्कार करने से मुझे क्या लाभ? सर्वज्ञता को प्राप्त कर मैं देवलोक सहित संसार में बुद्ध होऊँगा। තං පනෙතං මහාපටිඤ්ඤං සකලස්සපි බුද්ධකරධම්මසමුදායස්ස පවිචයපච්චවෙක්ඛණසමාදානානං කාරණභූතං අවිසංවාදෙන්තො ලොකනාථො යස්මා මහාකප්පානං සතසහස්සාධිකානි චත්තාරි අසඞ්ඛ්යෙය්යානි සක්කච්චං නිරන්තරං නිරවසෙසතො දානපාරමිආදයො සමතිංසපාරමියො පූරෙත්වා, අඞ්ගපරිච්චාගාදයො පඤ්ච මහාපරිච්චාගෙ පරිච්චජිත්වා, සච්චාධිට්ඨානාදීනි චත්තාරි අධිට්ඨානානි පරිබ්රූහෙත්වා, පුඤ්ඤඤාණසම්භාරෙ සම්භරිත්වා පුබ්බයොගපුබ්බචරියධම්මක්ඛානඤාතත්ථචරියාදයො උක්කංසාපෙත්වා, බුද්ධිචරියං පරමකොටිං පාපෙත්වා අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුජ්ඣි; තස්මා තස්සෙව සා මහාපටිඤ්ඤා තථා අවිතථා අනඤ්ඤථා, න තස්ස වාලග්ගමත්තම්පි විතථං අත්ථි. තථා හි දීපඞ්කරො දසබලො කොණ්ඩඤ්ඤො, මඞ්ගලො…පෙ… කස්සපො භගවාති ඉමෙ චතුවීසති සම්මාසම්බුද්ධා පටිපාටියා උප්පන්නා ‘‘බුද්ධො භවිස්සතී’’ති නං බ්යාකරිංසු. එවං චතුවීසතියා බුද්ධානං සන්තිකෙ ලද්ධබ්යාකරණො යෙ තෙ කතාභිනීහාරෙහි බොධිසත්තෙහි ලද්ධබ්බා ආනිසංසා, තෙ ලභිත්වාව ආගතොති තාය යථාවුත්තාය මහාපටිඤ්ඤාය තථාය අභිසම්බුද්ධභාවං ආගතො අධිගතොති තථාගතො. එවං තථාය ආගතොති තථාගතො. उस महाप्रतिज्ञा को, जो समस्त बुद्धकारक धर्मों के समूह के चयन, प्रत्यवेक्षण और समादान का कारणभूत है, सत्य सिद्ध करते हुए लोकनाथ ने क्योंकि चार असंख्येय और एक लाख महाकल्पों तक आदरपूर्वक, निरंतर और पूर्ण रूप से दान-पारमिता आदि तीस पारमिताओं को पूरा किया, अंग-परित्याग आदि पाँच महापरित्याग किए, सत्य-अधिष्ठान आदि चार अधिष्ठानों को पुष्ट किया, पुण्य और ज्ञान के संभारों को संचित किया, पूर्वयोग, पूर्वचर्या, धर्म-आख्यान और ज्ञातार्थ-चर्या आदि को उत्कृष्ट बनाया, और बुद्धचर्या को परम कोटि तक पहुँचाकर अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि प्राप्त की; इसलिए उनकी वह महाप्रतिज्ञा 'तथा' (सत्य), अवितथ और अनन्यथा (अटल) है, उसमें बाल के अग्र भाग के बराबर भी असत्य नहीं है। क्योंकि दीपंकर दशबल, कौण्डिन्य, मंगल... आदि काश्यप भगवान तक ये चौबीस सम्यक्सम्बुद्ध क्रम से उत्पन्न हुए और उन्होंने 'यह बुद्ध होगा' ऐसी भविष्यवाणी की। इस प्रकार चौबीस बुद्धों के पास से भविष्यवाणी प्राप्त कर, संकल्प करने वाले बोधिसत्वों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले जो लाभ हैं, उन्हें प्राप्त करके ही वे आए हैं, इसलिए उस यथोक्त महाप्रतिज्ञा रूपी 'तथा' (सत्य) के द्वारा अभिसम्बुद्ध भाव को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। इस प्रकार 'तथा' (सत्य) के साथ आए हैं, इसलिए तथागत हैं। කථං තථාය ගතොති තථාගතො? යායං මහාකරුණා ලොකනාථස්ස, යාය මහාදුක්ඛසම්බාධප්පටිපන්නං සත්තනිකායං දිස්වා ‘‘තස්ස [Pg.117] නත්ථඤ්ඤො කොචි පටිසරණං, අහමෙව නං ඉතො සංසාරදුක්ඛතො මුත්තො මොචෙස්සාමී’’ති සමුස්සාහිතමානසො මහාභිනීහාරං අකාසි. කත්වා ච යථාපණිධානං සකලලොකහිතසම්පාදනාය උස්සුක්කමාපන්නො අත්තනො කායජීවිතනිරපෙක්ඛො පරෙසං සොතපථගමනමත්තෙනපි චිත්තුත්රාසසමුප්පාදිකා අතිදුක්කරා දුක්කරචරියා සමාචරන්තො යථා මහාබොධිසත්තානං පටිපත්ති හානභාගියා සංකිලෙසභාගියා ඨිතිභාගියා වා න හොති, අථ ඛො උත්තරි විසෙසභාගියාව හොති, තථා පටිපජ්ජමානො අනුපුබ්බෙන නිරවසෙසෙ බොධිසම්භාරෙ සමානෙත්වා අභිසම්බොධිං පාපුණි. තතො පරඤ්ච තායෙව මහාකරුණාය සඤ්චොදිතමානසො පවිවෙකරතිං පරමඤ්ච සන්තං විමොක්ඛසුඛං පහාය බාලජනබහුලෙ ලොකෙ තෙහි සමුප්පාදිතං සම්මානාවමානවිප්පකාරං අගණෙත්වා වෙනෙය්යජනවිනයනෙන නිරවසෙසං බුද්ධකිච්චං නිට්ඨපෙසි. තත්ර යො භගවතො සත්තෙසු මහාකරුණාය සමොක්කමනාකාරො, සො පරතො ආවි භවිස්සති. යථා බුද්ධභූතස්ස ලොකනාථස්ස සත්තෙසු මහාකරුණා, එවං බොධිසත්තභූතස්සපි මහාභිනීහාරකාලාදීසූති සබ්බත්ථ සබ්බදා ච එකසදිසතාය තථාව සා අවිතථා අනඤ්ඤථා. තස්මා තීසුපි අවත්ථාසු සබ්බසත්තෙසු සමානරසාය තථාය මහාකරුණාය සකලලොකහිතාය ගතො පටිපන්නොති තථාගතො. එවං තථාය ගතොති තථාගතො. 'तथा' (सत्य) की ओर गए हैं, इस अर्थ में तथागत कैसे हैं? लोकनाथ की जो यह महाकरुणा है, जिसके द्वारा महादुःख के संकट में पड़े हुए प्राणी-समूह को देखकर 'इसका अन्य कोई शरण नहीं है, मैं ही स्वयं मुक्त होकर इसे इस संसार-दुःख से मुक्त कराऊँगा'—इस प्रकार उत्साहित मन से उन्होंने महा-अभिनिहार (महान संकल्प) किया। और संकल्प के अनुसार समस्त लोक के हित संपादन के लिए प्रयत्नशील होकर, अपने शरीर और जीवन की परवाह न करते हुए, दूसरों के कानों तक पहुँचने मात्र से ही चित्त में त्रास उत्पन्न करने वाली अत्यंत दुष्कर चर्याओं का आचरण करते हुए, जैसे महाबोधिसत्वों की प्रतिपत्ति (साधना) हीन-भागी, संक्लेश-भागी या स्थिति-भागी नहीं होती, बल्कि उत्तर-विशेष-भागी ही होती है, वैसे ही प्रतिपन्न होते हुए क्रमशः समस्त बोधि-संभारों को पूर्ण कर सम्बोधि प्राप्त की। उसके बाद भी उसी महाकरुणा से प्रेरित मन वाले होकर, प्रविवेक-रति (एकान्त का सुख) और परम शांत विमुक्ति-सुख को छोड़कर, अज्ञानी जनों से भरे संसार में उनके द्वारा किए गए सम्मान और अपमान के विकारों की गणना न करते हुए, विनेय जनों के विनय (शिक्षण) द्वारा समस्त बुद्ध-कृत्यों को संपन्न किया। वहाँ भगवान का प्राणियों के प्रति महाकरुणा में उतरने का जो प्रकार है, वह आगे स्पष्ट होगा। जैसे बुद्ध हुए लोकनाथ की प्राणियों के प्रति महाकरुणा है, वैसे ही बोधिसत्व रूप में महा-अभिनिहार काल आदि में भी थी—इस प्रकार सर्वत्र और सर्वदा एक समान होने के कारण वह 'तथा' (सत्य), अवितथ और अनन्यथा है। इसलिए तीनों अवस्थाओं में सभी प्राणियों के प्रति समान रस वाली 'तथा' (सत्य) महाकरुणा के द्वारा समस्त लोक के हित के लिए प्रवृत्त (गए) हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। इस प्रकार 'तथा' (सत्य) की ओर गए हैं, इसलिए तथागत हैं। කථං තථානි ආගතොති තථාගතො? තථානි නාම චත්තාරි අරියමග්ගඤාණානි. තානි හි ‘‘ඉදං දුක්ඛං, අයං දුක්ඛසමුදයො, අයං දුක්ඛනිරොධො, අයං දුක්ඛනිරොධගාමිනී පටිපදා’’ති එවං සබ්බඤෙය්යසඞ්ගාහකානං පවත්තිනිවත්තිතදුභයහෙතුභූතානං චතුන්නං අරියසච්චානං, දුක්ඛස්ස පීළනට්ඨො සඞ්ඛතට්ඨො සන්තාපට්ඨො විපරිණාමට්ඨො, සමුදයස්ස ආයූහනට්ඨො නිදානට්ඨො සංයොගට්ඨො පලිබොධට්ඨො, නිරොධස්ස නිස්සරණට්ඨො විවෙකට්ඨො අසඞ්ඛතට්ඨො අමතට්ඨො, මග්ගස්ස නිය්යානට්ඨො හෙත්වට්ඨො දස්සනට්ඨො අධිපතෙය්යට්ඨොතිආදීනං තබ්බිභාගානඤ්ච යථාභූතසභාවාවබොධවිබන්ධකස්ස සංකිලෙසපක්ඛස්ස සමුච්ඡින්දනෙන පටිලද්ධාය තත්ථ අසම්මොහාභිසමයසඞ්ඛාතාය අවිපරීතාකාරප්පවත්තියා ධම්මානං සභාවසරසලක්ඛණස්ස අවිසංවාදනතො තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි, තානි [Pg.118] භගවා අනඤ්ඤනෙය්යො සයමෙව ආගතො අධිගතො, තස්මා තථානි ආගතොති තථාගතො. तथागत शब्द का अर्थ 'तथ्यों (सत्य) को प्राप्त करने वाला' कैसे है? 'तथ्य' नाम चार आर्यमार्ग ज्ञानों का है। वे (ज्ञान) 'यह दुःख है, यह दुःख का समुदाय है, यह दुःख का निरोध है, यह दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा है'—इस प्रकार समस्त ज्ञेय वस्तुओं को समाहित करने वाले, प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के हेतुभूत चार आर्य सत्यों के, दुःख के 'पीड़न' अर्थ, 'संस्कृत' अर्थ, 'संताप' अर्थ, 'विपरिणाम' अर्थ; समुदाय के 'आयूहन' (एकत्र करना) अर्थ, 'निदान' अर्थ, 'संयोग' अर्थ, 'पलिबोध' (बाधा) अर्थ; निरोध के 'निस्सरण' अर्थ, 'विवेक' अर्थ, 'असंस्कृत' अर्थ, 'अमृत' अर्थ; मार्ग के 'नैयानिक' (मुक्ति की ओर ले जाने वाला) अर्थ, 'हेतु' अर्थ, 'दर्शन' अर्थ, 'अधिपत्य' अर्थ आदि उनके विभागों के और यथार्थ स्वभाव के बोध में बाधक संक्लेश पक्ष के समूच्छेदन (पूर्ण विनाश) द्वारा प्राप्त, वहाँ मोह-रहित अभिसमय संज्ञक अविपरीत प्रकार की प्रवृत्ति के कारण, धर्मों के स्वभाव और रस-लक्षण के अविसंवाद (अपरिवर्तनीयता) से 'तथ्य' (यथार्थ), 'अवितथ' (सत्य) और 'अनन्यथा' (अपरिवर्तनीय) हैं। भगवान ने उन्हें किसी अन्य के उपदेश के बिना स्वयं ही प्राप्त किया, इसलिए तथ्यों को प्राप्त करने के कारण वे 'तथागत' हैं। යථා ච මග්ගඤාණානි, එවං භගවතො තීසු කාලෙසු අප්පටිහතඤාණානි චතුපටිසම්භිදාඤාණානි චතුවෙසාරජ්ජඤාණානි පඤ්චගතිපරිච්ඡෙදඤාණානි ඡඅසාධාරණඤාණානි සත්තබොජ්ඣඞ්ගවිභාවනඤාණානි අට්ඨමග්ගඞ්ගවිභාවනඤාණානි නවානුපුබ්බවිහාරසමාපත්තිඤාණානි දසබලඤාණානි ච විභාවෙතබ්බානි. जैसे मार्ग-ज्ञानों की व्याख्या की गई है, वैसे ही भगवान के तीनों कालों में अप्रतिहत ज्ञान, चार प्रतिसंविदा ज्ञान, चार वैशारद्य ज्ञान, पाँच गतियों के परिच्छेद का ज्ञान, छह असाधारण ज्ञान, सात बोध्यंगों के विभावण का ज्ञान, आठ मार्गांगों के विभावण का ज्ञान, नौ अनुक्रमिक विहार समापत्तियों का ज्ञान और दस बल ज्ञानों की भी व्याख्या की जानी चाहिए। තත්රායං විභාවනා – යඤ්හි කිඤ්චි අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු අපරිමාණානං සත්තානං හීනාදිභෙදභින්නානං හීනාදිභෙදභින්නාසු අතීතාසු ඛන්ධායතනධාතූසු සභාවකිච්චාදි අවත්ථාවිසෙසාදි ඛන්ධපටිබද්ධනාමගොත්තාදි ච ජානිතබ්බං. අනින්ද්රියබද්ධෙසු ච අතිසුඛුමතිරොහිතවිදූරදෙසෙසු රූපධම්මෙසු යො තංතංපච්චයවිසෙසෙහි සද්ධිං පච්චයුප්පන්නානං වණ්ණසණ්ඨානගන්ධරසඵස්සාදිවිසෙසො, තත්ථ සබ්බත්ථෙව හත්ථතලෙ ඨපිතආමලකො විය පච්චක්ඛතො අසඞ්ගමප්පටිහතං භගවතො ඤාණං පවත්තති, තථා අනාගතාසු පච්චුප්පන්නාසු චාති ඉමානි තීසු කාලෙසු අප්පටිහතඤාණානි නාම. යථාහ – यहाँ यह व्याख्या है—अपरिमित लोकधातुओं में हीन आदि भेदों से भिन्न अपरिमित सत्त्वों के हीन आदि भेदों से भिन्न अतीत के स्कन्धों, आयतनों और धातुओं में स्वभाव-कृत्य आदि, अवस्था-विशेष आदि और स्कन्ध-बद्ध नाम-गोत्र आदि जो कुछ भी जानने योग्य है; तथा अचेतन वस्तुओं में, अत्यंत सूक्ष्म, छिपे हुए और दूरस्थ प्रदेशों के रूप-धर्मों में, उन-उन विशेष प्रत्ययों के साथ प्रत्ययोत्पन्न (कारणों से उत्पन्न) वर्ण, संस्थान, गंध, रस, स्पर्श आदि का जो विशेष है, वहाँ सर्वत्र हथेली पर रखे आँवले के समान प्रत्यक्ष रूप से भगवान का ज्ञान आसक्ति-रहित और अप्रतिहत होकर प्रवृत्त होता है। इसी प्रकार अनागत और वर्तमान काल में भी। इन्हें ही 'तीनों कालों में अप्रतिहत ज्ञान' कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘අතීතංසෙ බුද්ධස්ස භගවතො අප්පටිහතං ඤාණං, අනාගතංසෙ බුද්ධස්ස භගවතො අප්පටිහතං ඤාණං, පච්චුප්පන්නංසෙ බුද්ධස්ස භගවතො අප්පටිහතං ඤාණ’’න්ති (පටි. ම. 3.5). "अतीत काल में बुद्ध भगवान का ज्ञान अप्रतिहत है, अनागत काल में बुद्ध भगवान का ज्ञान अप्रतिहत है, वर्तमान काल में बुद्ध भगवान का ज्ञान अप्रतिहत है।" තානි පනෙතානි තත්ථ තත්ථ ධම්මානං සභාවසරසලක්ඛණස්ස අවිසංවාදනතො තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි, තානි භගවා සයම්භුඤාණෙන අධිගඤ්ඡි. එවං තථානි ආගතොති තථාගතො. वे (ज्ञान) वहाँ-वहाँ धर्मों के स्वभाव और रस-लक्षण के अविसंवाद के कारण तथ्य, अवितथ और अनन्यथा हैं। भगवान ने उन्हें स्वयंभू ज्ञान से प्राप्त किया। इस प्रकार तथ्यों को प्राप्त करने के कारण वे 'तथागत' हैं। තථා අත්ථපටිසම්භිදා, ධම්මපටිසම්භිදා, නිරුත්තිපටිසම්භිදා, පටිභානපටිසම්භිදාති චතස්සො පටිසම්භිදා. තත්ථ අත්ථපභෙදස්ස සල්ලක්ඛණවිභාවනවවත්ථානකරණසමත්ථං අත්ථෙ පභෙදගතං ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා. ධම්මපභෙදස්ස සල්ලක්ඛණවිභාවනවවත්ථානකරණසමත්ථං ධම්මෙ පභෙදගතං ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. නිරුත්තිපභෙදස්ස සල්ලක්ඛණවිභාවනවවත්ථානකරණසමත්ථං නිරුත්තාභිලාපෙ පභෙදගතං ඤාණං නිරුත්තිපටිසම්භිදා. පටිභානපභෙදස්ස [Pg.119] සල්ලක්ඛණවිභාවනවවත්ථානකරණසමත්ථං පටිභානෙ පභෙදගතං ඤාණං පටිභානපටිසම්භිදා. වුත්තඤ්හෙතං – उसी प्रकार अर्थ-प्रतिसंविदा, धर्म-प्रतिसंविदा, निरुक्ति-प्रतिसंविदा और प्रतिभान-प्रतिसंविदा—ये चार प्रतिसंविदाएँ हैं। उनमें अर्थ के भेदों के लक्षण, विभावण और व्यवस्थापन करने में समर्थ, अर्थ के भेदों को प्राप्त ज्ञान 'अर्थ-प्रतिसंविदा' है। धर्म के भेदों के लक्षण, विभावण और व्यवस्थापन करने में समर्थ, धर्म के भेदों को प्राप्त ज्ञान 'धर्म-प्रतिसंविदा' है। निरुक्ति (भाषा) के भेदों के लक्षण, विभावण और व्यवस्थापन करने में समर्थ, निरुक्ति के अभिलाप (अभिव्यक्ति) के भेदों को प्राप्त ज्ञान 'निरुक्ति-प्रतिसंविदा' है। प्रतिभान (प्रतिभा) के भेदों के लक्षण, विभावण और व्यवस्थापन करने में समर्थ, प्रतिभान के भेदों को प्राप्त ज्ञान 'प्रतिभान-प्रतिसंविदा' है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘අත්ථෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, ධම්මෙ ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා, තත්ර ධම්මනිරුත්තාභිලාපෙ ඤාණං නිරුත්තිපටිසම්භිදා, ඤාණෙසු ඤාණං පටිභානපටිසම්භිදා’’ති (විභ. 718). "अर्थ में ज्ञान अर्थ-प्रतिसंविदा है, धर्म में ज्ञान धर्म-प्रतिसंविदा है, वहाँ धर्म और निरुक्ति के अभिलाप में ज्ञान निरुक्ति-प्रतिसंविदा है, ज्ञानों में ज्ञान प्रतिभान-प्रतिसंविदा है।" එත්ථ ච හෙතුඅනුසාරෙන අරණීයතො අධිගන්තබ්බතො ච සඞ්ඛෙපතො හෙතුඵලං අත්ථො නාම. පභෙදතො පන යංකිඤ්චි පච්චයුප්පන්නං, නිබ්බානං, භාසිතත්ථො, විපාකො, කිරියාති ඉමෙ පඤ්ච ධම්මා අත්ථො. තං අත්ථං පච්චවෙක්ඛන්තස්ස තස්මිං අත්ථෙ පභෙදගතං ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා. ධම්මොති සඞ්ඛෙපතො පච්චයො. සො හි යස්මා තං තං අත්ථං විදහති පවත්තෙති චෙව පාපෙති ච, තස්මා ධම්මොති වුච්චති. පභෙදතො පන යො කොචි ඵලනිබ්බත්තකො හෙතු, අරියමග්ගො, භාසිතං, කුසලං, අකුසලන්ති ඉමෙ පඤ්ච ධම්මා ධම්මො, තං ධම්මං පච්චවෙක්ඛන්තස්ස තස්මිං ධම්මෙ පභෙදගතං ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. වුත්තම්පි චෙතං – यहाँ संक्षेप में हेतु के अनुसार प्राप्त होने योग्य होने के कारण हेतु का फल 'अर्थ' कहलाता है। विस्तार से, जो कुछ भी प्रत्ययोत्पन्न (कारण से उत्पन्न) है, निर्वाण, भाषित (वचन) का अर्थ, विपाक और क्रिया—ये पाँच धर्म 'अर्थ' हैं। उस अर्थ का प्रत्यवेक्षण करने वाले का उस अर्थ के भेदों में जो ज्ञान है, वह 'अर्थ-प्रतिसंविदा' है। 'धर्म' संक्षेप में प्रत्यय (कारण) है। क्योंकि वह उस-उस अर्थ का विधान करता है, उसे प्रवृत्त करता है और प्राप्त कराता है, इसलिए उसे 'धर्म' कहा जाता है। विस्तार से, जो कोई भी फल-उत्पादक हेतु है, आर्यमार्ग, भाषित (वचन), कुशल और अकुशल—ये पाँच धर्म 'धर्म' हैं। उस धर्म का प्रत्यवेक्षण करने वाले का उस धर्म के भेदों में जो ज्ञान है, वह 'धर्म-प्रतिसंविदा' है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘දුක්ඛෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, දුක්ඛසමුදයෙ ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා, දුක්ඛනිරොධෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, දුක්ඛනිරොධගාමිනියා පටිපදාය ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා’’ති (විභ. 719). "दुःख में ज्ञान अर्थ-प्रतिसंविदा है, दुःख-समुदय में ज्ञान धर्म-प्रतिसंविदा है, दुःख-निरोध में ज्ञान अर्थ-प्रतिसंविदा है, दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा में ज्ञान धर्म-प्रतिसंविदा है।" අථ වා හෙතුම්හි ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා, හෙතුඵලෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා. යෙ ධම්මා ජාතා භූතා සඤ්ජාතා නිබ්බත්තා අභිනිබ්බත්තා පාතුභූතා, ඉමෙසු ධම්මෙසු ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා. යම්හා ධම්මා තෙ ධම්මා ජාතා භූතා සඤ්ජාතා නිබ්බත්තා අභිනිබ්බත්තා පාතුභූතා, තෙසු ධම්මෙසු ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. ජරාමරණෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, ජරාමරණසමුදයෙ ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. ජරාමරණනිරොධෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, ජරාමරණනිරොධගාමිනියා පටිපදාය ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. ජාතියා, භවෙ, උපාදානෙ, තණ්හාය, වෙදනාය, ඵස්සෙ, සළායතනෙ, නාමරූපෙ, විඤ්ඤාණෙ, සඞ්ඛාරෙසු ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, සඞ්ඛාරසමුදයෙ ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. සඞ්ඛාරනිරොධෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා, සඞ්ඛාරනිරොධගාමිනියා පටිපදාය ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා. अथवा हेतु में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है, हेतु के फल में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है। जो धर्म उत्पन्न हुए, भूत हुए, संजात हुए, निर्वृत्त हुए, अभिनिर्वृत्त हुए, प्रादुर्भूत हुए, इन धर्मों में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है। जिस धर्म से वे धर्म उत्पन्न हुए, भूत हुए, संजात हुए, निर्वृत्त हुए, अभिनिर्वृत्त हुए, प्रादुर्भूत हुए, उन धर्मों में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है। जरामरण में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है, जरामरण के समुदय में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है। जरामरण के निरोध में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है, जरामरण के निरोधगामिनी प्रतिपदा में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है। जाति में, भव में, उपादान में, तृष्णा में, वेदना में, स्पर्श में, षडायतन में, नामरूप में, विज्ञान में, संस्कारों में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है, संस्कारों के समुदय में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है। संस्कारों के निरोध में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है, संस्कारों के निरोधगामिनी प्रतिपदा में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है। ‘‘ඉධ [Pg.120] භික්ඛු ධම්මං ජානාති – සුත්තං, ගෙය්යං…පෙ… වෙදල්ලං. අයං වුච්චති ධම්මපටිසම්භිදා. සො තස්ස තස්සෙව භාසිතස්ස අත්ථං ජානාති – ‘අයං ඉමස්ස භාසිතස්ස අත්ථො, අයං ඉමස්ස භාසිතස්ස අත්ථො’ති, අයං වුච්චති අත්ථපටිසම්භිදා (විභ. 724). यहाँ भिक्षु धर्म को जानता है - सुत्त, गेय... पे... वेदल्ल। यह 'धम्मप्रतिसम्भिदा' कही जाती है। वह उस-उस भाषित (कथन) के अर्थ को जानता है - 'यह इस भाषित का अर्थ है, यह इस भाषित का अर्थ है', यह 'अत्थप्रतिसम्भिदा' कही जाती है (विभङ्ग ७२४)। ‘‘කතමෙ ධම්මා කුසලා? යස්මිං සමයෙ කාමාවචරං කුසලං චිත්තං උප්පන්නං හොති සොමනස්සසහගතං ඤාණසම්පයුත්තං රූපාරම්මණං වා…පෙ… ධම්මාරම්මණං වා යං යං වා පනාරබ්භ, තස්මිං සමයෙ ඵස්සො හොති…පෙ… අවික්ඛෙපො හොති. ඉමෙ ධම්මා කුසලා. ඉමෙසු ධම්මෙසු ඤාණං ධම්මපටිසම්භිදා, තෙසං විපාකෙ ඤාණං අත්ථපටිසම්භිදා’’තිආදි විත්ථාරො (විභ. 725). कौन से धर्म कुशल हैं? जिस समय कामावचर कुशल चित्त उत्पन्न होता है, जो सौमनस्य-सहगत, ज्ञान-सम्प्रयुक्त, रूपावलम्बन वाला... पे... अथवा धर्मावलम्बन वाला, जिसे भी आरम्भ (विषय) बनाकर, उस समय स्पर्श होता है... पे... अविक्षेप होता है। ये धर्म कुशल हैं। इन धर्मों में ज्ञान 'धम्मप्रतिसम्भिदा' है, उनके विपाक में ज्ञान 'अत्थप्रतिसम्भिदा' है - इत्यादि विस्तार है (विभङ्ग ७२५)। තස්මිං අත්ථෙ ච ධම්මෙ ච සභාවනිරුත්ති අබ්යභිචාරවොහාරො අභිලාපො, තස්මිං සභාවනිරුත්තාභිලාපෙ මාගධිකාය සබ්බසත්තානං මූලභාසාය ‘‘අයං සභාවනිරුත්ති, අයං න සභාවනිරුත්තී’’ති පභෙදගතං ඤාණං නිරුත්තිපටිසම්භිදා. යථාවුත්තෙසු තෙසු ඤාණෙසු ගොචරකිච්චාදිවසෙන විත්ථාරතො පවත්තං සබ්බම්පි ඤාණමාරම්මණං කත්වා පච්චවෙක්ඛන්තස්ස තස්මිං ඤාණෙ පභෙදගතං ඤාණං පටිභානපටිසම්භිදා. ඉති ඉමානි චත්තාරි පටිසම්භිදාඤාණානි සයමෙව භගවතා අධිගතානි අත්ථධම්මාදිකෙ තස්මිං තස්මිං අත්තනො විසයෙ අවිසංවාදනවසෙන අවිපරීතාකාරප්පවත්තියා තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. उस अर्थ और धर्म में जो स्वभाव-निरुक्ति (प्राकृतिक अभिव्यक्ति), अव्यभिचारी व्यवहार और अभिलाप (कथन) है, उस स्वभाव-निरुक्ति-अभिलाप में, सभी प्राणियों की मूल भाषा मागधी में, 'यह स्वभाव-निरुक्ति है, यह स्वभाव-निरुक्ति नहीं है' - इस प्रकार का प्रभेदगत ज्ञान 'निरुक्तिप्रतिसम्भिदा' है। यथाकथित उन ज्ञानों में गोचर-कृत्य आदि के वश से विस्तारपूर्वक प्रवृत्त सभी ज्ञानों को आलम्बन बनाकर प्रत्यवेक्षण करने वाले का उस ज्ञान में जो प्रभेदगत ज्ञान है, वह 'प्रतिभानप्रतिसम्भिदा' है। इस प्रकार ये चार प्रतिसम्भिदा-ज्ञान भगवान द्वारा स्वयं ही प्राप्त किए गए हैं, जो अर्थ-धर्म आदि अपने-अपने विषयों में अविसंवादन (सत्यता) के कारण अविपरीत रूप से प्रवृत्त होने से 'तथ' (सत्य), 'अवितथ' (यथार्थ) और 'अनन्यथा' (अपरिवर्तनीय) हैं। इस प्रकार भी भगवान 'तथ' (सत्य) को प्राप्त हुए हैं, इसलिए वे 'तथागत' हैं। තථා යං කිඤ්චි ඤෙය්යං නාම, සබ්බං තං භගවතා සබ්බාකාරෙන ඤාතං දිට්ඨං අධිගතං අභිසම්බුද්ධං. තථා හිස්ස අභිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා අභිඤ්ඤෙය්යතො බුද්ධා, පරිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා පරිඤ්ඤෙය්යතො බුද්ධා, පහාතබ්බා ධම්මා පහාතබ්බතො බුද්ධා, සච්ඡිකාතබ්බා ධම්මා සච්ඡිකාතබ්බතො බුද්ධා, භාවෙතබ්බා ධම්මා භාවෙතබ්බතො බුද්ධා, යතො නං කොචි සමණො වා බ්රාහ්මණො වා දෙවො වා මාරො වා බ්රහ්මා වා ‘‘ඉමෙ නාම තෙ ධම්මා අනභිසම්බුද්ධා’’ති සහ ධම්මෙන අනුයුඤ්ජිතුං සමත්ථො නත්ථි. वैसे ही जो कुछ भी 'ज्ञेय' (जानने योग्य) है, वह सब भगवान द्वारा सभी प्रकार से ज्ञात, दृष्ट, अधिगत और अभिसम्बुद्ध है। क्योंकि उनके द्वारा अभिज्ञेय धर्म अभिज्ञेय रूप में बुद्ध (ज्ञात) हैं, परिज्ञेय धर्म परिज्ञेय रूप में बुद्ध हैं, प्रहातव्य धर्म प्रहातव्य रूप में बुद्ध हैं, साक्षात्कर्तव्य धर्म साक्षात्कर्तव्य रूप में बुद्ध हैं, और भावयितव्य धर्म भावयितव्य रूप में बुद्ध हैं; जिससे कोई भी श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार या ब्रह्मा धर्मपूर्वक यह आक्षेप करने में समर्थ नहीं है कि 'ये धर्म आपके द्वारा अभिसम्बुद्ध नहीं हैं'। යං කිඤ්චි පහාතබ්බං නාම, සබ්බං තං භගවතා අනවසෙසතො බොධිමූලෙයෙව පහීනං අනුප්පත්තිධම්මං, න තස්ස පහානාය උත්තරි කරණීයං අත්ථි[Pg.121]. තථා හිස්ස ලොභදොසමොහවිපරීතමනසිකාරඅහිරිකානොත්තප්පථිනමිද්ධ- කොධූපනාහමක්ඛපලාසඉස්සාමච්ඡරිය- මායාසාඨෙය්යථම්භසාරම්භමානාතිමානමදපමාදතිවිධාකුසලමූලදුච්චරිත- විසමසඤ්ඤාමලවිතක්කපපඤ්චඑසනාතණ්හාචතුබ්බිධවිපරියෙසආසව- ගන්ථඔඝයොගාගතිතණ්හුපාදානපඤ්චාභිනන්දනනීවරණ- චෙතොඛිලචෙතසොවිනිබන්ධඡවිවාදමූලසත්තානුසය- අට්ඨමිච්ඡත්තනවආඝාතවත්ථුතණ්හාමූලකදසඅකුසල- කම්මපථඑකවීසතිඅනෙසනද්වාසට්ඨිදිට්ඨිගතඅට්ඨසතතණ්හාවිචරිතාදිප්පභෙදං දියඩ්ඪකිලෙසසහස්සං සහ වාසනාය පහීනං සමුච්ඡින්නං සමූහතං, යතො නං කොචි සමණො වා…පෙ… බ්රහ්මා වා ‘‘ඉමෙ නාම තෙ කිලෙසා අප්පහීනා’’ති සහ ධම්මෙන අනුයුඤ්ජිතුං සමත්ථො නත්ථි. जो कुछ भी 'प्रहातव्य' (त्यागने योग्य) है, वह सब भगवान द्वारा बोधि-मूल में ही पूर्णतः त्याग दिया गया है और वे पुनः उत्पन्न न होने वाले धर्म बन गए हैं, उनके प्रहाण के लिए आगे कुछ भी करना शेष नहीं है। क्योंकि उनके लोभ, द्वेष, मोह, विपरीत मनसिकार, अहीरिक (निर्लज्जता), अनोत्तप्प (भयहीनता), थिन-मिद्ध (स्त्यान-मिद्ध), क्रोध, उपनाह, म्रक्ष, पलास, ईर्ष्या, मात्सर्य, माया, शाठ्य, स्तम्भ, सारम्भ, मान, अतिमान, मद, प्रमाद, तीन प्रकार के अकुशल मूल, दुश्चरित, विषम संज्ञा, मल, वितर्क, प्रपञ्च, एषणा, तृष्णा, चार प्रकार के विपर्यास, आस्रव, ग्रन्थ, ओघ, योग, गति, तृष्णा-उपादान, पाँच अभिनन्दन, नीवरण, चेतोखिल, चेतोविनिबन्ध, छह विवाद-मूल, सात अनुशय, आठ मिथ्यात्व, नौ आघात-वस्तु, तृष्णा-मूलक दस अकुशल कर्मपथ, इक्कीस अनेषणा, बासठ दृष्टिगत, एक सौ आठ तृष्णा-विचरित आदि भेदों वाले पन्द्रह सौ क्लेश वासनाओं सहित प्रहीण, समुच्छिन्न और समूल नष्ट हो चुके हैं; जिससे कोई भी श्रमण... पे... या ब्रह्मा धर्मपूर्वक यह आक्षेप करने में समर्थ नहीं है कि 'ये क्लेश आपके द्वारा प्रहीण नहीं हुए हैं'। යෙ චිමෙ භගවතා කම්මවිපාකකිලෙසූපවාදආණාවීතික්කමප්පභෙදා අන්තරායිකා ධම්මා වුත්තා, අලමෙව තෙ එකන්තෙන අන්තරායාය, යතො නං කොචි සමණො වා…පෙ… බ්රහ්මා වා ‘‘නාලං තෙ පටිසෙවතො අන්තරායායා’’ති සහ ධම්මෙන අනුයුඤ්ජිතුං සමත්ථො නත්ථි. और भगवान द्वारा जो ये कर्म-विपाक, क्लेश, उपवाद और आज्ञा-व्यतिक्रम आदि भेदों वाले अन्तरायिक (बाधक) धर्म कहे गए हैं, वे निश्चित रूप से अन्तराय (बाधा) उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हैं; जिससे कोई भी श्रमण... पे... या ब्रह्मा धर्मपूर्वक यह आक्षेप करने में समर्थ नहीं है कि 'उनका सेवन करने वाले के लिए वे अन्तराय (बाधा) उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं'। යො ච භගවතා නිරවසෙසවට්ටදුක්ඛනිස්සරණාය සීලසමාධිපඤ්ඤාසඞ්ගහො සත්තකොට්ඨාසිකො සත්තතිංසප්පභෙදො අරියමග්ගපුබ්බඞ්ගමො අනුත්තරො නිය්යානධම්මො දෙසිතො, සො එකන්තෙනෙව නිය්යාති පටිපන්නස්ස වට්ටදුක්ඛතො, යතො නං කොචි සමණො වා…පෙ… බ්රහ්මා වා ‘‘නිය්යානධම්මො තයා දෙසිතො න නිය්යාතී’’ති සහ ධම්මෙන අනුයුඤ්ජිතුං සමත්ථො නත්ථි. වුත්තඤ්හෙතං – ‘‘සම්මාසම්බුද්ධස්ස තෙ පටිජානතො ඉමෙ ධම්මා අනභිසම්බුද්ධා’’ති (ම. නි. 1.150) විත්ථාරො. එවමෙතානි අත්තනො ඤාණප්පහානදෙසනාවිසෙසානං අවිතථභාවාවබොධනතො අවිපරීතාකාරප්පවත්තානි භගවතො චතුවෙසාරජ්ජඤාණානි තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. जो भगवान द्वारा संपूर्ण संसार-दुःख से निस्तरण के लिए शील, समाधि और प्रज्ञा के संग्रह वाला, सात कोटियों वाला, सैंतीस भेदों वाला, आर्य मार्ग जिसका पूर्वगामी है, ऐसा अनुत्तर निर्याण धर्म (मुक्ति का मार्ग) देशित किया गया है, वह प्रतिपन्न (साधक) के लिए एकांततः संसार-दुःख से निस्तार करता है, क्योंकि कोई भी श्रमण... या ब्रह्मा 'तुम्हारे द्वारा देशित निर्याण धर्म निस्तार नहीं करता' ऐसा धर्मपूर्वक दोषारोपण करने में समर्थ नहीं है। जैसा कि कहा गया है - 'सम्यक्सम्बुद्ध होने का प्रतिज्ञा करने वाले तुम्हारे ये धर्म अनभिसम्बुद्ध (अज्ञात) हैं' (म. नि. 1.150) विस्तार से। इस प्रकार अपने ज्ञान, प्रहाण और देशना की विशिष्टताओं के अवितथ (सत्य) भाव के बोध से विपरीत न होने वाले आकार में प्रवृत्त भगवान के चार वैशारद्य ज्ञान तथ्य, अवितथ और अनन्यथा हैं। इस प्रकार भी भगवान तथ्यों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। තථා නිරයගති, තිරච්ඡානගති, පෙතගති, මනුස්සගති, දෙවගතීති පඤ්ච ගතියො. තාසු සඤ්ජීවාදයො අට්ඨ මහානිරයා, කුක්කුළාදයො සොළස උස්සදනිරයා, ලොකන්තරිකනිරයො චාති සබ්බෙපිමෙ එකන්තදුක්ඛතාය නිරස්සාදට්ඨෙන නිරයා ච, සකකම්මුනා ගන්තබ්බතො ගති චාති නිරයගති[Pg.122]. තිබ්බන්ධකාරසීතනරකාපි එතෙස්වෙව අන්තොගධා කිමිකීටපටඞ්ගසරීසපපක්ඛිසොණසිඞ්ගාලාදයො තිරියං අඤ්ඡිතභාවෙන තිරච්ඡානා නාම. තෙ එව ගතීති තිරච්ඡානගති. ඛුප්පිපාසිතපරදත්තූපජීවිනිජ්ඣාමතණ්හිකාදයො දුක්ඛබහුලතාය පකට්ඨසුඛතො ඉතා විගතාති පෙතා, තෙ එව ගතීති පෙතගති. කාලකඤ්චිකාදිඅසුරාපි එතෙස්වෙව අන්තොගධා. පරිත්තදීපවාසීහි සද්ධිං ජම්බුදීපාදිචතුමහාදීපවාසිනො මනසො උස්සන්නතාය මනුස්සා, තෙ එව ගතීති මනුස්සගති. චාතුමහාරාජිකතො පට්ඨාය යාව නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනූපගාති ඉමෙ ඡබ්බීසති දෙවනිකායා දිබ්බන්ති අත්තනො ඉද්ධානුභාවෙන කීළන්ති ජොතෙන්ති චාති දෙවා, තෙ එව ගතීති දෙවගති. उसी प्रकार नरक गति, तिर्यक गति, प्रेत गति, मनुष्य गति और देव गति - ये पाँच गतियाँ हैं। उनमें संजीवादि आठ महानरक, कुक्कुलादि सोलह उत्सदनरक और लोकन्तरिक नरक - ये सभी एकांत दुःख होने के कारण और आस्वाद रहित होने के कारण 'नरक' हैं, और अपने कर्मों के अनुसार जाने योग्य होने के कारण 'गति' हैं, अतः 'नरक गति' हैं। घोर अंधकार और शीत वाले नरक भी इन्हीं में अंतर्निहित हैं। कृमि, कीट, पतंग, सरीसृप, पक्षी, कुत्ते, सियार आदि जो तिरछे चलते हैं, वे 'तिर्यक' कहलाते हैं। वे ही गतियाँ 'तिर्यक गति' हैं। भूख-प्यास से पीड़ित, दूसरों के दिए हुए पर जीवित रहने वाले, दग्ध तृष्णा वाले आदि दुःख की बहुलता के कारण प्रकृष्ट सुख से दूर होने के कारण 'प्रेत' हैं, वे ही गतियाँ 'प्रेत गति' हैं। कालकंजिक आदि असुर भी इन्हीं में अंतर्निहित हैं। छोटे द्वीपों के निवासियों के साथ जम्बूद्वीप आदि चार महाद्वीपों के निवासी मन की प्रधानता (उत्सन्नता) के कारण 'मनुष्य' हैं, वे ही गतियाँ 'मनुष्य गति' हैं। चातुर्महाराजिक से लेकर नैवसंज्ञानासंज्ञायतन तक ये छब्बीस देवनिकाय अपनी ऋद्धि और अनुभाव से क्रीड़ा करते हैं और प्रकाशित होते हैं, इसलिए 'देव' हैं, वे ही गतियाँ 'देव गति' हैं। තා පනෙතා ගතියො යස්මා තංතංකම්මනිබ්බත්තො උපපත්තිභවවිසෙසො, තස්මා අත්ථතො විපාකක්ඛන්ධා කටත්තා ච රූපං. තත්ථ ‘‘අයං නාම ගති නාම ඉමිනා කම්මුනා ජායති, තස්ස කම්මස්ස පච්චයවිසෙසෙහි එවං විභාගභින්නත්තා විසුං එතෙ සත්තනිකායා එවං විභාගභින්නා’’ති යථාසකංහෙතුඵලවිභාගපරිච්ඡින්දනවසෙන ඨානසො හෙතුසො භගවතො ඤාණං පවත්තති. තෙනාහ භගවා – वे ये गतियाँ जिस कारण से उन-उन कर्मों से उत्पन्न उपपत्ति-भव के विशेष हैं, इसलिए अर्थतः वे विपाक स्कन्ध और कृतत्व (काटत्ता) रूप हैं। वहाँ 'यह गति इस कर्म से उत्पन्न होती है, उस कर्म के प्रत्यय-विशेषों से इस प्रकार विभाग-भिन्न होने के कारण ये सत्त्व-निकाय अलग-अलग इस प्रकार विभाग-भिन्न हैं' - इस प्रकार अपने-अपने हेतु और फल के विभाग के परिच्छेद (निश्चय) के वश से भगवान का ज्ञान स्थान और हेतु के अनुसार प्रवृत्त होता है। इसीलिए भगवान ने कहा है - ‘‘පඤ්ච ඛො ඉමා, සාරිපුත්ත, ගතියො. කතමා පඤ්ච? නිරයො, තිරච්ඡානයොනි, පෙත්තිවිසයො, මනුස්සා, දෙවා. නිරයඤ්චාහං, සාරිපුත්ත, පජානාමි, නිරයගාමිඤ්ච මග්ගං, නිරයගාමිනිඤ්ච පටිපදං; යථා පටිපන්නො ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති, තඤ්ච පජානාමී’’තිආදි (ම. නි. 1.153). ‘सारिपुत्र! ये पाँच गतियाँ हैं। कौन सी पाँच? नरक, तिर्यक योनि, प्रेत विषय, मनुष्य और देव। सारिपुत्र! मैं नरक को भी जानता हूँ, नरकगामी मार्ग को भी, और नरकगामी प्रतिपदा (अभ्यास) को भी; जिस प्रकार आचरण करने वाला काया के भेद के बाद मृत्यु के उपरांत अपाय, दुर्गति, विनिपात और नरक में उत्पन्न होता है, उसे भी मैं जानता हूँ’ इत्यादि (म. नि. 1.153)। තානි පනෙතානි භගවතො ඤාණානි තස්මිං තස්මිං විසයෙ අවිපරීතාකාරප්පවත්තියා අවිසංවාදනතො තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. भगवान के वे ये ज्ञान उन-उन विषयों में विपरीत न होने वाले आकार में प्रवृत्त होने से और विसंवाद (असत्य) न होने से तथ्य, अवितथ और अनन्यथा हैं। इस प्रकार भी भगवान तथ्यों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। තථා යං සත්තානං සද්ධාදියොගවිකලභාවාවබොධෙන අප්පරජක්ඛමහාරජක්ඛතාදිවිසෙසවිභාවනං පඤ්ඤාසාය ආකාරෙහි පවත්තං භගවතො ඉන්ද්රියපරොපරියත්තඤාණං. වුත්තඤ්හෙතං – ‘‘සද්ධො පුග්ගලො අප්පරජක්ඛො, අස්සද්ධො පුග්ගලො මහාරජක්ඛො’’ති (පටි. ම. 1.111) විත්ථාරො. उसी प्रकार, सत्त्वों के श्रद्धा आदि के योग और विकल भाव के बोध द्वारा अल्प-रज और महा-रज आदि के विशेषों का प्रतिपादन करने वाला, प्रज्ञा के आकारों में प्रवृत्त भगवान का 'इन्द्रियपरोपरियत्त ज्ञान' (इन्द्रियों की प्रखरता और मंदता का ज्ञान) है। जैसा कि कहा गया है - 'श्रद्धालु पुद्गल अल्प-रज है, अश्रद्धालु पुद्गल महा-रज है' (पटि. म. 1.111) विस्तार से। යඤ්ච [Pg.123] ‘‘අයං පුග්ගලො අප්පරජක්ඛො, අයං සස්සතදිට්ඨිකො, අයං උච්ඡෙදදිට්ඨිකො, අයං අනුලොමිකායං ඛන්තියං ඨිතො, අයං යථාභූතඤාණෙ ඨිතො, අයං කාමාසයො, න නෙක්ඛම්මාදිආසයො, අයං නෙක්ඛම්මාසයො, න කාමාදිආසයො’’තිආදිනා ‘‘ඉමස්ස කාමරාගො අතිවිය ථාමගතො, න පටිඝාදිකො, ඉමස්ස පටිඝො අතිවිය ථාමගතො, න කාමරාගාදිකො’’තිආදිනා ‘‘ඉමස්ස පුඤ්ඤාභිසඞ්ඛාරො අධිකො, න අපුඤ්ඤාභිසඞ්ඛාරො න ආනෙඤ්ජාභිසඞ්ඛාරො, ඉමස්ස අපුඤ්ඤාභිසඞ්ඛාරො අධිකො, න පුඤ්ඤාභිසඞ්ඛාරො න ආනෙඤ්ජාභිසඞ්ඛාරො, ඉමස්ස ආනෙඤ්ජාභිසඞ්ඛාරො අධිකො, න පුඤ්ඤාභිසඞ්ඛාරො න අපුඤ්ඤාභිසඞ්ඛාරො. ඉමස්ස කායසුචරිතං අධිකං, ඉමස්ස වචීසුචරිතං, ඉමස්ස මනොසුචරිතං. අයං හීනාධිමුත්තිකො, අයං පණීතාධිමුත්තිකො, අයං කම්මාවරණෙන සමන්නාගතො, අයං කිලෙසාවරණෙන සමන්නාගතො, අයං විපාකාවරණෙන සමන්නාගතො, අයං න කම්මාවරණෙන සමන්නාගතො, න කිලෙසාවරණෙන, න විපාකාවරණෙන සමන්නාගතො’’තිආදිනා ච සත්තානං ආසයාදීනං යථාභූතං විභාවනාකාරප්පවත්තං භගවතො ආසයානුසයඤාණං. යං සන්ධාය වුත්තං – और जो 'यह पुद्गल अल्प-रज है, यह शाश्वत-दृष्टि वाला है, यह उच्छेद-दृष्टि वाला है, यह अनुलोमिक क्षान्ति में स्थित है, यह यथाभूत ज्ञान में स्थित है, यह कामाशय वाला है, नैष्क्रम्य आदि आशय वाला नहीं, यह नैष्क्रम्य-आशय वाला है, काम आदि आशय वाला नहीं' इत्यादि द्वारा; 'इसका कामराग अत्यंत बलवान है, प्रतिघ आदि नहीं, इसका प्रतिघ अत्यंत बलवान है, कामराग आदि नहीं' इत्यादि द्वारा; 'इसका पुण्याभिसंस्कार अधिक है, अपुण्याभिसंस्कार और आनेञ्जाभिसंस्कार नहीं, इसका अपुण्याभिसंस्कार अधिक है, न पुण्याभिसंस्कार न आनेञ्जाभिसंस्कार, इसका आनेञ्जाभिसंस्कार अधिक है, न पुण्याभिसंस्कार न अपुण्याभिसंस्कार। इसका काय-सुचरित अधिक है, इसका वची-सुचरित, इसका मन-सुचरित। यह हीन-अधिमुक्ति वाला है, यह प्रणीत-अधिमुक्ति वाला है, यह कर्मावरण से युक्त है, यह क्लेशावरण से युक्त है, यह विपाकावरण से युक्त है, यह कर्मावरण से युक्त नहीं है, न क्लेशावरण से, न विपाकावरण से युक्त है' इत्यादि द्वारा सत्त्वों के आशय आदि के यथाभूत विभाग के आकार में प्रवृत्त भगवान का 'आशयानुशय ज्ञान' है। जिसके संदर्भ में कहा गया है - ‘‘ඉධ තථාගතො සත්තානං ආසයං ජානාති, අනුසයං ජානාති, චරිතං ජානාති, අධිමුත්තිං ජානාති, භබ්බාභබ්බෙ සත්තෙ ජානාතී’’තිආදි (පටි. ම. 1.113). ‘यहाँ तथागत सत्त्वों के आशय को जानते हैं, अनुशय को जानते हैं, चरित को जानते हैं, अधिमुक्ति को जानते हैं, भव्य और अभव्य सत्त्वों को जानते हैं’ इत्यादि (पटि. म. 1.113)। යඤ්ච උපරිමහෙට්ඨිමපුරත්ථිමපච්ඡිමකායෙහි දක්ඛිණවාමඅක්ඛිකණ්ණසොතනාසිකාසොතඅංසකූටපස්සහත්ථපාදෙහි අඞ්ගුලඞ්ගුලන්තරෙහි ලොමලොමකූපෙහි ච අග්ගික්ඛන්ධූදකධාරාපවත්තනං අනඤ්ඤසාධාරණං විවිධවිකුබ්බනිද්ධිනිම්මාපනකං භගවතො යමකපාටිහාරියඤාණං. යං සන්ධාය වුත්තං – और जो शरीर के ऊपरी, निचले, पूर्वी, पश्चिमी भागों से, दाहिनी-बाईं आँखों, कानों, नासिका छिद्रों, कंधों, पसलियों, हाथों, पैरों, उंगलियों और उंगलियों के पोरों से, रोमों और रोम-कूपों से अग्निपुंज और जलधाराओं का निकलना है, जो अनन्यसाधारण है और विविध विकुर्वण (ऋद्धि) के निर्माण में समर्थ है, वह भगवान का यमक-प्रातिहार्य ज्ञान है। जिसके संदर्भ में कहा गया है – ‘‘ඉධ තථාගතො යමකපාටිහාරියං කරොති අසාධාරණං සාවකෙහි. උපරිමකායතො අග්ගික්ඛන්ධො පවත්තති, හෙට්ඨිමකායතො උදකධාරා පවත්තති. හෙට්ඨිමකායතො අග්ගික්ඛන්ධො පවත්තති, උපරිමකායතො උදකධාරා පවත්තතී’’තිආදි (පටි. ම. 1.116). "यहाँ तथागत श्रावकों के लिए असाधारण यमक-प्रातिहार्य करते हैं। शरीर के ऊपरी भाग से अग्निपुंज निकलता है, निचले भाग से जलधारा निकलती है। शरीर के निचले भाग से अग्निपुंज निकलता है, ऊपरी भाग से जलधारा निकलती है" इत्यादि (पटि. म. 1.116)। යඤ්ච [Pg.124] රාගාදීහි ජාතිආදීහි ච අනෙකෙහි දුක්ඛධම්මෙහි උපද්දුතං සත්තනිකායං තතො නීහරිතුකාමතාවසෙන නානානයෙහි පවත්තස්ස භගවතො මහාකරුණොක්කමනස්ස පච්චයභූතං මහාකරුණාසමාපත්තිඤාණං. යථාහ – और जो राग आदि तथा जाति (जन्म) आदि अनेक दुःख-धर्मों से पीड़ित सत्त्व-निकाय (प्राणियों के समूह) को उससे बाहर निकालने की इच्छा के कारण अनेक नयों (विधियों) से प्रवृत्त भगवान की महाकरुणा के अवतरण का कारणभूत 'महाकरुणा-समापत्ति ज्ञान' है। जैसा कि कहा गया है – ‘‘කතමං තථාගතස්ස මහාකරුණාසමාපත්තිඤාණං? බහුකෙහි ආකාරෙහි පස්සන්තානං බුද්ධානං භගවන්තානං සත්තෙසු මහාකරුණා ඔක්කමති, ආදිත්තො ලොකසන්නිවාසොති පස්සන්තානං බුද්ධානං භගවන්තානං සත්තෙසු මහාකරුණා ඔක්කමතී’’ති. – "तथागत का महाकरुणा-समापत्ति ज्ञान कौन सा है? बहुत से आकारों से देखते हुए बुद्धों, भगवानों की सत्त्वों पर महाकरुणा उतरती है; 'लोक-सन्निवेश (संसार) प्रदीप्त है' ऐसा देखते हुए बुद्धों, भगवानों की सत्त्वों पर महाकरुणा उतरती है" – ආදිනා (පටි. ම. 1.117) එකූනනවුතියා ආකාරෙහි විභජනං කතං. आदि के द्वारा (पटि. म. 1.117) नवासी (89) आकारों से विभाजन किया गया है। යං පන යාවතා ධම්මධාතු, යත්තකං ඤාතබ්බං සඞ්ඛතාසඞ්ඛතාදි, තස්ස සබ්බස්ස පරොපදෙසෙන විනා සබ්බාකාරතො පටිජානනසමත්ථං ආකඞ්ඛාමත්තප්පටිබද්ධවුත්ති අනඤ්ඤසාධාරණං භගවතො ඤාණං සබ්බථා අනවසෙසසඞ්ඛතාසඞ්ඛතසම්මුතිසච්චාවබොධතො සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං, තත්ථාවරණාභාවතොව නිස්සඞ්ගප්පවත්තිං උපාදාය අනාවරණඤාණන්ති ච වුච්චති. අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන පරතො ආවි භවිස්සති. और जो जहाँ तक धर्मधातु है, जितना कुछ ज्ञातव्य है—संस्कृत, असंस्कृत आदि—उस सबको बिना किसी दूसरे के उपदेश के, सभी प्रकार से जानने में समर्थ, केवल इच्छा मात्र पर निर्भर रहने वाला, भगवान का अनन्यसाधारण ज्ञान है, जो पूरी तरह से समस्त संस्कृत, असंस्कृत और सम्मति-सत्यों के बोध के कारण 'सर्वज्ञता-ज्ञान' कहलाता है; और वहाँ (उस ज्ञान में) आवरण के अभाव के कारण ही आसक्ति-रहित प्रवृत्ति होने से उसे 'अनावरण-ज्ञान' भी कहा जाता है। यहाँ यह संक्षेप है, विस्तार तो आगे स्पष्ट होगा। එවමෙතානි භගවතො ඡ අසාධාරණඤාණානි අවිපරීතාකාරප්පවත්තියා යථාසකංවිසයස්ස අවිසංවාදනතො තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. इस प्रकार भगवान के ये छह असाधारण ज्ञान, विपरीत न होने वाली प्रवृत्ति के कारण अपने-अपने विषयों में विसंवाद (असत्यता) न होने से 'तथ' (सत्य), 'अवितथ' और 'अनन्यथ' (अपरिवर्तनीय) हैं। इस प्रकार भी भगवान 'तथ' (सत्यों) को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। තථා ‘‘සත්තිමෙ, භික්ඛවෙ, බොජ්ඣඞ්ගා – සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගො, වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගො, පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, පස්සද්ධිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, සමාධිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගො’’ති (පටි. ම. 2.17; සං. නි. 5.185) එවං සරූපතො යායං ලොකුත්තරමග්ගක්ඛණෙ උප්පජ්ජමානා ලීනුද්ධච්චපතිට්ඨානායූහනකාමසුඛත්තකිලමථානුයොගඋච්ඡෙදසස්සතාභිනිවෙසාදීනං අනෙකෙසං උපද්දවානං පටිපක්ඛභූතා සතිආදිභෙදා ධම්මසාමග්ගී, යාය අරියසාවකො බුජ්ඣති, කිලෙසනිද්දාය උට්ඨහති, චත්තාරි වා සච්චානි පටිවිජ්ඣති, නිබ්බානමෙව වා සච්ඡිකරොති, සා ධම්මසාමග්ගී ‘‘බොධී’’ති වුච්චති, තස්සා බොධියා අඞ්ගාති බොජ්ඣඞ්ගා. අරියසාවකො වා යථාවුත්තාය ධම්මසාමග්ගියා බුජ්ඣතීති කත්වා ‘‘බොධී’’ති වුච්චති. තස්ස බොධිස්ස අඞ්ගාති බොජ්ඣඞ්ගාති එවං සාමඤ්ඤලක්ඛණතො[Pg.125], උපට්ඨානලක්ඛණො සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, පවිචයලක්ඛණො ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගො, පග්ගහලක්ඛණො වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගො, ඵරණලක්ඛණො පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, උපසමලක්ඛණො පස්සද්ධිසම්බොජ්ඣඞ්ගො, අවික්ඛෙපලක්ඛණො සමාධිසම්බොජ්ඣඞ්ගො පටිසඞ්ඛානලක්ඛණො උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගොති එවං විසෙසලක්ඛණතො. वैसे ही, "भिक्षुओं, ये सात बोध्यंग हैं—स्मृति-संबोध्यंग, धर्मविचय-संबोध्यंग, वीर्य-संबोध्यंग, प्रीति-संबोध्यंग, प्रश्रब्धि-संबोध्यंग, समाधि-संबोध्यंग, उपेक्षा-संबोध्यंग" (पटि. म. 2.17; सं. नि. 5.185)। इस प्रकार अपने स्वरूप से जो लोकोत्तर मार्ग के क्षण में उत्पन्न होने वाली, लीनता (स्त्यान), उद्धत्य, प्रतिष्ठा (आलस्य), आयूहण (प्रयत्न), कामसुख और आत्मक्लमथ के अनुयोग, उच्छेद और शाश्वत के अभिनिवेश आदि अनेक उपद्रवों की प्रतिपक्षभूत स्मृति आदि भेदों वाली 'धर्म-सामग्री' है, जिससे आर्य श्रावक जागता है, क्लेश-निद्रा से उठता है, या चार सत्यों का प्रतिवेध करता है, अथवा निर्वाण का ही साक्षात्कार करता है, वह धर्म-सामग्री 'बोधि' कहलाती है; उस बोधि के अंग होने से 'बोध्यंग' हैं। अथवा आर्य श्रावक पूर्वोक्त धर्म-सामग्री से जागता है, इसलिए उसे 'बोधि' कहा जाता है। उस बोधि के अंग होने से 'बोध्यंग' हैं—इस प्रकार सामान्य लक्षण से। उपस्थान (उपस्थित होना) लक्षण वाला स्मृति-संबोध्यंग है, प्रविचय (चयन) लक्षण वाला धर्मविचय-संबोध्यंग है, प्रग्रह (उत्साह) लक्षण वाला वीर्य-संबोध्यंग है, फरण (व्याप्ति) लक्षण वाला प्रीति-संबोध्यंग है, उपशम लक्षण वाला प्रश्रब्धि-संबोध्यंग है, अविक्षेप (एकाग्रता) लक्षण वाला समाधि-संबोध्यंग है और प्रतिसंख्यान (तटस्थता) लक्षण वाला उपेक्षा-संबोध्यंग है—इस प्रकार विशेष लक्षण से। ‘‘තත්ථ කතමො සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො? ඉධ භික්ඛු සතිමා හොති පරමෙන සතිනෙපක්කෙන සමන්නාගතො, චිරකතම්පි චිරභාසිතම්පි සරිතා හොති අනුස්සරිතා’’තිආදිනා (විභ. 467) සත්තන්නං බොජ්ඣඞ්ගානං අඤ්ඤමඤ්ඤූපකාරවසෙන එකක්ඛණෙ පවත්තිදස්සනතො. ‘‘තත්ථ කතමො සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො? අත්ථි අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු සති, අත්ථි බහිද්ධා ධම්මෙසු සතී’’තිආදිනා (විභ. 469) තෙසං විසයවිභාවනාපවත්තිදස්සනතො. ‘‘තත්ථ කතමො සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං, විරාගනිස්සිතං, නිරොධනිස්සිතං, වොසග්ගපරිණාමි’’න්තිආදිනා (විභ. 471) භාවනාවිධිදස්සනතො. ‘‘තත්ථ කතමෙ සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා? ඉධ භික්ඛු යස්මිං සමයෙ ලොකුත්තරං ඣානං භාවෙති…පෙ… තස්මිං සමයෙ සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා හොන්ති, සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො…පෙ… උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගො. තත්ථ කතමො සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො? යා සති අනුස්සතී’’තිආදිනා (විභ. 478) ඡනවුතියා නයසහස්සවිභාගෙහීති එවං නානාකාරතො පවත්තානි භගවතො බොජ්ඣඞ්ගවිභාවනඤාණානි තස්ස තස්ස අත්ථස්ස අවිසංවාදනතො තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. "वहाँ स्मृति-संबोध्यंग कौन सा है? यहाँ भिक्षु स्मृतिमान होता है, परम स्मृति और निपुणता से युक्त होता है, बहुत समय पहले किए गए और बहुत समय पहले कहे गए को भी स्मरण करने वाला, अनुस्मरण करने वाला होता है" इत्यादि (विभ. 467) के द्वारा सातों बोध्यंगों के एक-दूसरे के उपकारक होने के कारण एक ही क्षण में प्रवृत्ति के दर्शन से। "वहाँ स्मृति-संबोध्यंग कौन सा है? अध्यात्म धर्मों में स्मृति है, बहिर्धा (बाह्य) धर्मों में स्मृति है" इत्यादि (विभ. 469) के द्वारा उनके विषयों के स्पष्टीकरण की प्रवृत्ति के दर्शन से। "वहाँ स्मृति-संबोध्यंग कौन सा है? यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु विवेक-निश्रित, विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित, व्युत्सर्ग-परिणामी स्मृति-संबोध्यंग की भावना करता है" इत्यादि (विभ. 471) के द्वारा भावना-विधि के दर्शन से। "वहाँ सात बोध्यंग कौन से हैं? यहाँ भिक्षु जिस समय लोकोत्तर ध्यान की भावना करता है... पे... उस समय सात बोध्यंग होते हैं—स्मृति-संबोध्यंग... पे... उपेक्षा-संबोध्यंग। वहाँ स्मृति-संबोध्यंग कौन सा है? जो स्मृति, अनुस्मृति है" इत्यादि (विभ. 478) के द्वारा छियानवे हजार (96,000) नयों के विभाजनों से—इस प्रकार अनेक प्रकार से प्रवृत्त भगवान के बोध्यंग-विभावन ज्ञान, उन-उन अर्थों के विसंवाद न होने से 'तथ', 'अवितथ' और 'अनन्यथ' हैं। इस प्रकार भी भगवान 'तथ' (सत्यों) को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। තථා ‘‘තත්ථ කතමං දුක්ඛනිරොධගාමිනී පටිපදා අරියසච්චං? අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි…පෙ… සම්මාසමාධී’’ති (විභ. 205) එවං සරූපතො. සබ්බකිලෙසෙහි ආරකත්තා අරියභාවකරත්තා අරියඵලපටිලාභකරත්තා ච අරියො. අරියානං අට්ඨවිධත්තා නිබ්බානාධිගමාය එකන්තකාරණත්තා ච අට්ඨඞ්ගිකො. කිලෙසෙ මාරෙන්තො ගච්ඡති, අත්ථිකෙහි මග්ගීයති, සයං වා නිබ්බානං මග්ගයතීති මග්ගොති එවං සාමඤ්ඤලක්ඛණතො. ‘‘සම්මාදස්සනලක්ඛණා සම්මාදිට්ඨි, සම්මාඅභිනිරොපනලක්ඛණො සම්මාසඞ්කප්පො, සම්මාපරිග්ගහණලක්ඛණා සම්මාවාචා, සම්මාසමුට්ඨාපනලක්ඛණො සම්මාකම්මන්තො, සම්මාවොදානලක්ඛණො සම්මාආජීවො, සම්මාපග්ගහලක්ඛණො සම්මාවායාමො, සම්මාඋපට්ඨානලක්ඛණා සම්මාසති[Pg.126], සම්මාඅවික්ඛෙපලක්ඛණො සම්මාසමාධී’’ති එවං විසෙසලක්ඛණතො. සම්මාදිට්ඨි තාව අඤ්ඤෙහිපි අත්තනො පච්චනීකකිලෙසෙහි සද්ධිං මිච්ඡාදිට්ඨිං පජහති, නිබ්බානං ආරම්මණං කරොති, තප්පටිච්ඡාදකමොහවිධමනෙන අසම්මොහතො සම්පයුත්තධම්මෙ ච පස්සති, තථා සම්මාසඞ්කප්පාදයොපි මිච්ඡාසඞ්කප්පාදීනි පජහන්ති, නිරොධඤ්ච ආරම්මණං කරොන්ති, සහජාතධම්මානං සම්මාඅභිනිරොපනපරිග්ගහණසමුට්ඨාපනවොදානපග්ගහඋපට්ඨානසමාදහනානි ච කරොන්තීති එවං කිච්චවිභාගතො. සම්මාදිට්ඨි පුබ්බභාගෙ නානක්ඛණා විසුං දුක්ඛාදිආරම්මණා හුත්වා මග්ගකාලෙ එකක්ඛණා නිබ්බානමෙව ආරම්මණං කත්වා කිච්චතො ‘‘දුක්ඛෙ ඤාණ’’න්තිආදීනි චත්තාරි නාමානි ලභති. සම්මාසඞ්කප්පාදයොපි පුබ්බභාගෙ නානක්ඛණා නානාරම්මණා, මග්ගකාලෙ එකක්ඛණා එකාරම්මණා, තෙසු සම්මාසඞ්කප්පො කිච්චතො ‘‘නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පො’’තිආදීනි තීණි නාමානි ලභති. සම්මාවාචාදයො තයො පුබ්බභාගෙ ‘‘මුසාවාදා වෙරමණී’’තිආදිවිභාගා විරතියොපි චෙතනායොපි හුත්වා මග්ගක්ඛණෙ විරතියොව, සම්මාවායාමසතියො කිච්චතො සම්මප්පධානසතිපට්ඨානවසෙන චත්තාරි නාමානි ලභන්ති. සම්මාසමාධි පන මග්ගක්ඛණෙපි පඨමජ්ඣානාදිවසෙන නානා එවාති එවං පුබ්බභාගාපරභාගෙසු පවත්තිවිභාගතො. ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්මාදිට්ඨිං භාවෙති විවෙකනිස්සිත’’න්තිආදිනා (විභ. 489) භාවනාවිධිතො. ‘‘තත්ථ කතමො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො? ඉධ, භික්ඛු, යස්මිං සමයෙ ලොකුත්තරං ඣානං භාවෙති…පෙ… දුක්ඛපටිපදං දන්ධාභිඤ්ඤං, තස්මිං සමයෙ අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො හොති – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො’’තිආදිනා (විභ. 499) චතුරාසීතියා නයසහස්සවිභාගෙහීති එවං අනෙකාකාරතො පවත්තානි භගවතො අරියමග්ගවිභාවනඤාණානි අත්ථස්ස අවිසංවාදනතො සබ්බානිපි තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. तथा 'वहाँ दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य क्या है? यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि - सम्यक् दृष्टि... पे... सम्यक् समाधि' (विभंग २०५) इस प्रकार स्वरूप से। सभी क्लेशों से दूर होने के कारण, आर्य भाव उत्पन्न करने के कारण और आर्य फल की प्राप्ति कराने के कारण 'आर्य' है। आठ अंगों वाला होने के कारण और निर्वाण की प्राप्ति का एकमात्र कारण होने के कारण 'अष्टांगिक' है। क्लेशों को मारते हुए जाता है, अर्थियों (मुमुक्षुओं) द्वारा खोजा जाता है, या स्वयं निर्वाण की खोज करता है, इसलिए 'मार्ग' है - इस प्रकार सामान्य लक्षण से। 'सम्यक् दर्शन जिसका लक्षण है वह सम्यक् दृष्टि है, सम्यक् अभिनिरोपण जिसका लक्षण है वह सम्यक् संकल्प है, सम्यक् परिग्रहण जिसका लक्षण है वह सम्यक् वाचा है, सम्यक् समुत्थापन जिसका लक्षण है वह सम्यक् कर्मान्त है, सम्यक् व्यवदान जिसका लक्षण है वह सम्यक् आजीव है, सम्यक् प्रग्रह जिसका लक्षण है वह सम्यक् व्यायाम है, सम्यक् उपस्थान जिसका लक्षण है वह सम्यक् स्मृति है, सम्यक् अविक्षेप जिसका लक्षण है वह सम्यक् समाधि है' - इस प्रकार विशेष लक्षण से। सम्यक् दृष्टि पहले अन्य अपने प्रतिपक्षी क्लेशों के साथ मिथ्या दृष्टि का प्रहाण करती है, निर्वाण को आलम्बन बनाती है, उसे ढकने वाले मोह के विनाश द्वारा असम्मोह से सम्प्रयुक्त धर्मों को देखती है; उसी प्रकार सम्यक् संकल्प आदि भी मिथ्या संकल्प आदि का प्रहाण करते हैं, निरोध को आलम्बन बनाते हैं, और सहजात धर्मों का सम्यक् अभिनिरोपण, परिग्रहण, समुत्थापन, व्यवदान, प्रग्रह, उपस्थान और समाधान करते हैं - इस प्रकार कृत्य-विभाजन से। सम्यक् दृष्टि पूर्वभाग में विभिन्न क्षणों में अलग-अलग दुःख आदि को आलम्बन बनाने वाली होकर, मार्ग-काल में एक ही क्षण में निर्वाण को ही आलम्बन बनाकर कृत्य के अनुसार 'दुःख में ज्ञान' आदि चार नाम प्राप्त करती है। सम्यक् संकल्प आदि भी पूर्वभाग में विभिन्न क्षणों में विभिन्न आलम्बन वाले होते हैं, मार्ग-काल में एक क्षण वाले और एक आलम्बन वाले होते हैं; उनमें सम्यक् संकल्प कृत्य के अनुसार 'नैष्क्रम्य संकल्प' आदि तीन नाम प्राप्त करता है। सम्यक् वाचा आदि तीनों पूर्वभाग में 'मृषावाद से विरति' आदि विभाग वाली विरतियाँ भी और चेतनाएँ भी होकर, मार्ग-क्षण में विरतियाँ ही होती हैं; सम्यक् व्यायाम और स्मृति कृत्य के अनुसार सम्यक् प्रधान और स्मृति-प्रस्थान के वश से चार-चार नाम प्राप्त करते हैं। किन्तु सम्यक् समाधि मार्ग-क्षण में भी प्रथम ध्यान आदि के भेद से अनेक प्रकार की ही है - इस प्रकार पूर्वभाग और अपरभाग में प्रवृत्ति के विभाग से। 'यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु विवेक-निश्रित सम्यक् दृष्टि की भावना करता है' इत्यादि (विभंग ४८९) भावना-विधि से। 'वहाँ अष्टांगिक मार्ग क्या है? यहाँ, भिक्षु, जिस समय लोकोत्तर ध्यान की भावना करता है... पे... दुःख प्रतिपदा धन्धाभिज्ञा, उस समय अष्टांगिक मार्ग होता है - सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प' इत्यादि (विभंग ४९९) चौरासी हजार नय-विभाजन के माध्यम से - इस प्रकार अनेक प्रकार से प्रवृत्त भगवान् के आर्यमार्ग-विभावन ज्ञान, अर्थ के अविसंवादन से, वे सभी 'तथ', अवितथ और अनन्यथा ही हैं; इस प्रकार भी भगवान् उन तथ्यों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। තථා පඨමජ්ඣානසමාපත්තියා ච නිරොධසමාපත්තීති එතාසු අනුපටිපාටියා විහරිතබ්බට්ඨෙන සමාපජ්ජිතබ්බට්ඨෙන ච අනුපුබ්බවිහාරසමාපත්තීසු සම්පාදනපච්චවෙක්ඛණාදිවසෙන යථාරහං සම්පයොගවසෙන ච පවත්තානි භගවතො ඤාණානි තදත්ථසිද්ධියා තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. තථා ‘‘ඉදං ඉමස්ස ඨානං[Pg.127], ඉදං අට්ඨාන’’න්ති අවිපරීතං තස්ස තස්ස ඵලස්ස කාරණාකාරණජානනං, තෙසං තෙසං සත්තානං අතීතාදිභෙදභින්නස්ස කම්මසමාදානස්ස අනවසෙසතො යථාභූතං විපාකන්තරජානනං, ආයූහනක්ඛණෙයෙව තස්ස තස්ස සත්තස්ස ‘‘අයං නිරයගාමිනී පටිපදා…පෙ… අයං නිබ්බානගාමිනී පටිපදා’’ති යාථාවතො සාසවානාසවකම්මවිභාගජානනං, ඛන්ධායතනානං උපාදින්නානුපාදින්නාදිඅනෙකසභාවං නානාසභාවඤ්ච තස්ස ලොකස්ස ‘‘ඉමාය නාම ධාතුයා උස්සන්නත්තා ඉමස්මිං ධම්මප්පබන්ධෙ අයං විසෙසො ජායතී’’තිආදිනා නයෙන යථාභූතං ධාතුනානත්තජානනං, සද්ධාදිඉන්ද්රියානං තික්ඛමුදුතාජානනං සංකිලෙසාදීහි සද්ධිං ඣානවිමොක්ඛාදිජානනං, සත්තානං අපරිමාණාසු ජාතීසු තප්පටිබන්ධෙන සද්ධිං අනවසෙසතො පුබ්බෙනිවුත්ථක්ඛන්ධසන්තතිජානනං හීනාදිවිභාගෙහි සද්ධිං චුතිපටිසන්ධිජානනං, ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්තිආදිනා හෙට්ඨා වුත්තනයෙනෙව චතුසච්චජානනන්ති ඉමානි භගවතො දසබලඤාණානි අවිරජ්ඣිත්වා යථාසකංවිසයාවගාහනතො යථාධිප්පෙතත්ථසාධනතො ච යථාභූතවුත්තියා තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. වුත්තඤ්හෙතං – उसी प्रकार प्रथम ध्यान की समापत्ति से लेकर निरोध-समापत्ति तक, इन अनुक्रम से विहार करने योग्य होने के कारण और समापन्न होने योग्य होने के कारण, अनुपूर्व-विहार-समापत्तियों में सम्पादन और प्रत्यवेक्षण आदि के वश से तथा यथायोग्य सम्प्रयोग के वश से प्रवृत्त भगवान् के ज्ञान, उस अर्थ की सिद्धि के कारण 'तथ', अवितथ और अनन्यथा हैं। इस प्रकार भी भगवान् उन तथ्यों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। उसी प्रकार 'यह इसका स्थान है, यह अस्थान है' इस प्रकार विपरीत रहित उस-उस फल के कारण और अकारण को जानना; उन-उन सत्त्वों के अतीत आदि भेदों से भिन्न कर्म-समादानों के अवशेष रहित यथाभूत विपाक-अन्तर को जानना; आयूहण के क्षण में ही उस-उस सत्त्व के विषय में 'यह निरय-गामिनी प्रतिपदा है... पे... यह निर्वाण-गामिनी प्रतिपदा है' इस प्रकार यथार्थ रूप से सासव और अनासव कर्मों के विभाग को जानना; उपात्त और अनुपात्त आदि अनेक स्वभाव वाले और नाना स्वभाव वाले इस लोक के स्कन्धों और आयतनों के विषय में 'इस नाम की धातु की प्रधानता के कारण इस धर्म-प्रबन्ध में यह विशेषता उत्पन्न होती है' इत्यादि नय से यथाभूत धातु-नानत्व को जानना; श्रद्धा आदि इन्द्रियों की तीक्ष्णता और मृदुता को जानना; संक्लेश आदि के साथ ध्यान, विमोक्ष आदि को जानना; सत्त्वों की अपरिमित जातियों में उनके प्रतिबन्धों के साथ अवशेष रहित पूर्व-निवास की स्कन्ध-सन्तति को जानना; हीन आदि विभागों के साथ च्युति और प्रतिसन्धि को जानना; 'यह दुःख है' इत्यादि पूर्वोक्त नय से ही चार सत्यों को जानना - भगवान् के ये दस बल-ज्ञान बिना चूके अपने-अपने विषयों में अवगाहन करने के कारण और अभिप्रेत अर्थ की सिद्धि करने के कारण, यथाभूत प्रवृत्ति से 'तथ', अवितथ और अनन्यथा हैं। क्योंकि यह कहा गया है - ‘‘ඉධ තථාගතො ඨානඤ්ච ඨානතො අට්ඨානඤ්ච අට්ඨානතො යථාභූතං පජානාතී’’තිආදි (විභ. 809; අ. නි. 10.21). 'यहाँ तथागत स्थान को स्थान के रूप में और अस्थान को अस्थान के रूप में यथाभूत जानते हैं' इत्यादि (विभंग ८०९; अंगुत्तर निकाय १०.२१)। එවම්පි භගවා තථානි ආගතොති තථාගතො. इस प्रकार भी भगवान् उन तथ्यों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। යථා චෙතෙසම්පි ඤාණානං වසෙන, එවං යථාවුත්තානං සතිපට්ඨානසම්මප්පධානාදිවිභාවනඤාණාදිඅනන්තාපරිමෙය්යභෙදානං අනඤ්ඤසාධාරණානං පඤ්ඤාවිසෙසානං වසෙන භගවා තථානි ඤාණානි ආගතො අධිගතොති තථාගතො, එවම්පි තථානි ආගතොති තථාගතො. जिस प्रकार इन ज्ञानों के वश से, उसी प्रकार पूर्वोक्त सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान), सम्मप्पधान (सम्यक् प्रधान) आदि के विभजन-ज्ञान आदि अनन्त और अपरिमेय भेदों वाले, दूसरों के लिए असाधारण प्रज्ञा-विशेषों के वश से भगवान उन 'तथा' (यथार्थ) ज्ञानों को प्राप्त हुए हैं, इसलिए वे 'तथागत' हैं; इस प्रकार भी 'तथा' (यथार्थ) को प्राप्त होने के कारण वे 'तथागत' हैं। කථං තථා ගතොති තථාගතො? යා තා භගවතො අභිජාතිඅභිසම්බොධිධම්මවිනයපඤ්ඤාපනඅනුපාදිසෙසනිබ්බානධාතුයො, තා තථා. කිං වුත්තං හොති? යදත්ථං තා ලොකනාථෙන අභිපත්ථිතා පවත්තිතා ච, තදත්ථස්ස එකන්තසිද්ධියා අවිසංවාදනතො අවිපරීතත්ථවුත්තියා තථා අවිතථා අනඤ්ඤථා. තථා හි අයං භගවා බොධිසත්තභූතො සමතිංසපාරමිපරිපූරණාදිකං වුත්තප්පකාරං සබ්බබුද්ධත්තහෙතුං සම්පාදෙත්වා [Pg.128] තුසිතපුරෙ ඨිතො බුද්ධකොලාහලං සුත්වා දසසහස්සචක්කවාළදෙවතාහි එකතො සන්නිපතිතාහි උපසඞ්කමිත්වා – 'तथा' (यथार्थ रूप से) जाने के कारण 'तथागत' कैसे हैं? भगवान की जो वे अभिजाति (जन्म), अभिसम्बोधि (ज्ञान-प्राप्ति), धर्म-विनय का प्रज्ञापन और अनुपधिशेष निर्वाण-धातु हैं, वे 'तथा' (यथार्थ) हैं। इसका क्या अर्थ है? जिस प्रयोजन के लिए लोकनाथ द्वारा उनकी प्रार्थना और प्रवर्तन किया गया, उस प्रयोजन की एकान्त सिद्धि के कारण, विसंवादरहित होने से और अविपरीत अर्थ वाली होने से वे 'तथा' (यथार्थ), 'अवितथ' (सत्य) और 'अनन्यथा' (अपरिवर्तनीय) हैं। क्योंकि ये भगवान बोधिसत्व अवस्था में तीस पारमिताओं की परिपूर्णता आदि उक्त प्रकार के सर्व-बुद्धत्व के हेतुओं को सम्पादित कर, तुषितपुर में स्थित होकर, 'बुद्ध-कोलाहल' को सुनकर, एक साथ एकत्रित दस हजार चक्रवालो के देवताओं द्वारा पास आकर प्रार्थना किए जाने पर— ‘‘කාලො ඛො තෙ මහාවීර, උප්පජ්ජ මාතුකුච්ඡියං; සදෙවකං තාරයන්තො, බුජ්ඣස්සු අමතං පද’’න්ති. (බු. වං. 1.67) – "हे महावीर! अब आपके लिए माता की कुक्षि (गर्भ) में उत्पन्न होने का समय है; देवलोक सहित संसार को तारते हुए आप अमृत पद (निर्वाण) को प्राप्त करें।" ආයාචිතො උප්පන්නපුබ්බනිමිත්තො පඤ්ච මහාවිලොකනානි විලොකෙත්වා ‘‘ඉදානි අහං මනුස්සයොනියං උප්පජ්ජිත්වා අභිසම්බුජ්ඣිස්සාමී’’ති ආසාළ්හිපුණ්ණමායං සක්යරාජකුලෙ මහාමායාය දෙවියා කුච්ඡියං පටිසන්ධිං ගහෙත්වා දස මාසෙ දෙවමනුස්සෙහි මහතා පරිහාරෙන පරිහරියමානො විසාඛපුණ්ණමායං පච්චූසසමයෙ අභිජාතිං පාපුණි. प्रार्थना किए जाने पर, पूर्व-निमित्तों के उत्पन्न होने पर, पाँच महा-विलोकनों (अवलोकनों) को देखकर— "अब मैं मनुष्य योनि में उत्पन्न होकर अभिसम्बोधि प्राप्त करूँगा"—ऐसा निश्चय कर आषाढ़ की पूर्णिमा को शाक्य राजकुल में महामाया देवी की कुक्षि में प्रतिसन्धि ग्रहण की और दस महीनों तक देवों एवं मनुष्यों द्वारा महान परिचर्या के साथ सुरक्षित रखे जाते हुए, वैशाख की पूर्णिमा को प्रत्युष (भोर) के समय जन्म (अभिजाति) प्राप्त किया। අභිජාතික්ඛණෙ පනස්ස පටිසන්ධිග්ගහණක්ඛණෙ විය ද්වත්තිංස පුබ්බනිමිත්තානි පාතුරහෙසුං, අයං දසසහස්සිලොකධාතු සංකම්පි සම්පකම්පි සම්පවෙධි, දසසු චක්කවාළසහස්සෙසු අපරිමාණො ඔභාසො ඵරි, තස්ස, තං සිරිං දට්ඨුකාමා විය අන්ධා චක්ඛූනි පටිලභිංසු, බධිරා සද්දං සුණිංසු, මූගා සමාලපිංසු, ඛුජ්ජා උජුගත්තා අහෙසුං, පඞ්ගුලා පදසා ගමනං පටිලභිංසු, බන්ධනගතා සබ්බසත්තා අන්දුබන්ධනාදීහි මුච්චිංසු, සබ්බනරකෙසු අග්ගි නිබ්බායි, පෙත්තිවිසයෙ ඛුප්පිපාසා වූපසමි, තිරච්ඡානානං භයං නාහොසි, සබ්බසත්තානං රොගො වූපසමි, සබ්බසත්තා පියංවදා අහෙසුං, මධුරෙනාකාරෙන අස්සා හසිංසු, වාරණා ගජ්ජිංසු, සබ්බතූරියානි සකසකනින්නාදං මුඤ්චිංසු, අඝට්ටිතානි එව මනුස්සානං හත්ථූපගාදීනි ආභරණානි මධුරෙනාකාරෙන සද්දං මුඤ්චිංසු, සබ්බදිසා විප්පසන්නා අහෙසුං, සත්තානං සුඛං උප්පාදයමානො මුදුසීතලවාතො වායි, අකාලමෙඝො වස්සි, පථවිතොපි උදකං උබ්භිජ්ජිත්වා විස්සන්දි, පක්ඛිනො ආකාසගමනං විජහිංසු, නදියො අසන්දමානා අට්ඨංසු, මහාසමුද්දෙ මධුරං උදකං අහොසි, උපක්කිලෙසවිනිමුත්තෙ සූරියෙ දිප්පමානෙ එව ආකාසගතා සබ්බා ජොතියො ජොතිංසු, ඨපෙත්වා අරූපාවචරෙ දෙවෙ අවසෙසා සබ්බෙ දෙවා සබ්බෙ ච නෙරයිකා දිස්සමානරූපා අහෙසුං, තරුකුට්ටකවාටසෙලාදයො අනාවරණභූතා අහෙසුං, සත්තානං චුතූපපාතා නාහෙසුං, සබ්බං අනිට්ඨගන්ධං අභිභවිත්වා දිබ්බගන්ධො පවායි, සබ්බෙ ඵලූපගා රුක්ඛා ඵලධරා සම්පජ්ජිංසු, මහාසමුද්දො සබ්බත්ථකමෙව පඤ්චවණ්ණෙහි පදුමෙහි සඤ්ඡන්නතලො අහොසි, ථලජජලජාදීනි [Pg.129] සබ්බපුප්ඵානි පුප්ඵිංසු, රුක්ඛානං ඛන්ධෙසු ඛන්ධපදුමානි, සාඛාසු සාඛාපදුමානි, ලතාසු ලතාපදුමානි, පුප්ඵිංසු, මහීතලසිලාතලානි භින්දිත්වා උපරූපරි සත්ත සත්ත හුත්වා දණ්ඩපදුමානි නාම නික්ඛමිංසු, ආකාසෙ ඔලම්බකපදුමානි නිබ්බත්තිංසු, සමන්තතො පුප්ඵවස්සං වස්සි ආකාසෙ දිබ්බතූරියානි වජ්ජිංසු, සකලදසසහස්සිලොකධාතු වට්ටෙත්වා විස්සට්ඨමාලාගුළං විය, උප්පීළෙත්වා පවත්තමාලාකලාපො විය, අලඞ්කතපටියත්තං මාලාසනං විය ච එකමාලාමාලිනී විප්ඵුරන්තවාළබීජනී පුප්ඵධූපගන්ධපරිවාසිතා පරමසොභග්ගප්පත්තා අහොසි, තානි ච පුබ්බනිමිත්තානි උපරි අධිගතානං අනෙකෙසං විසෙසාධිගමානං නිමිත්තභූතානි එව අහෙසුං. එවං අනෙකච්ඡරියපාතුභාවා අයං අභිජාති යදත්ථං තෙන අභිපත්ථිතා, තස්සා අභිසම්බොධියා එකන්තසිද්ධියා තථාව අහොසි අවිතථා අනඤ්ඤථා. जन्म के क्षण में, उनके प्रतिसन्धि ग्रहण के क्षण की भाँति ही, बत्तीस पूर्व-निमित्त प्रकट हुए; यह दस हजार लोकधातु काँप उठी, प्रकम्पित हुई और थरथरा उठी; दस हजार चक्रवालो में अपरिमेय प्रकाश फैल गया; उस शोभा को देखने की इच्छा से मानो अन्धों को चक्षु प्राप्त हो गए, बहरे सुनने लगे, गूँगे बोलने लगे, कुबड़े सीधे हो गए, लँगड़े पैरों से चलने लगे, बन्धन में पड़े सभी प्राणी बेड़ियों आदि के बन्धनों से मुक्त हो गए, सभी नरकों में अग्नि बुझ गई, प्रेतलोक में भूख-प्यास शान्त हो गई, तिर्यक (पशुओं) को भय नहीं रहा, सभी प्राणियों के रोग शान्त हो गए, सभी प्राणी प्रियवादी हो गए, घोड़े मधुर स्वर में हिनहिनाने लगे, हाथी गरजने लगे, सभी वाद्ययंत्र अपने-आप बजने लगे, मनुष्यों के हाथों में पहने हुए आभूषण आदि बिना टकराए ही मधुर स्वर करने लगे, सभी दिशाएँ निर्मल हो गईं, प्राणियों को सुख पहुँचाती हुई मन्द शीतल वायु चलने लगी, अकाल मेघ बरसने लगे, पृथ्वी से भी जल फूटकर बहने लगा, पक्षियों ने आकाश में उड़ना छोड़ दिया, नदियाँ बहना रुक गईं, महासमुद्र का जल मीठा हो गया, उपक्लेशों से मुक्त सूर्य के तपते हुए ही आकाश के सभी ज्योतिपुञ्ज चमकने लगे, अरूपावचर देवों को छोड़कर शेष सभी देव और सभी नारकीय प्राणी एक-दूसरे को दिखाई देने लगे, वृक्ष, दीवारें, किवाड़ और पत्थर आदि पारदर्शी (अनावरण) हो गए, प्राणियों की च्युति और उत्पत्ति रुक गई, सभी दुर्गन्धों को दबाकर दिव्य गन्ध फैल गई, सभी फल देने वाले वृक्ष फलों से लद गए, महासमुद्र का तल पूरी तरह पाँच वर्णों के कमलों से ढँक गया, स्थलज और जलज आदि सभी फूल खिल उठे, वृक्षों के तनों पर तना-कमल, शाखाओं पर शाखा-कमल और लताओं पर लता-कमल खिल गए, पृथ्वी और शिलाओं के तल को फाड़कर सात-सात की कतारों में 'दण्ड-कमल' निकल आए, आकाश में लटकते हुए कमल उत्पन्न हो गए, चारों ओर पुष्प-वर्षा होने लगी, आकाश में दिव्य वाद्य बजने लगे, सम्पूर्ण दस हजार लोकधातु घुमाकर छोड़े गए माला के गोले की भाँति, दबाकर रखे गए मालाओं के गुच्छे की भाँति और अलंकृत एवं सुसज्जित पुष्प-आसन की भाँति एक ही माला से गुँथी हुई, फहराते हुए चँवरों वाली, पुष्पों की धूप और गन्ध से सुवासित एवं परम शोभा को प्राप्त हो गई। और वे पूर्व-निमित्त भविष्य में प्राप्त होने वाली अनेक विशेष उपलब्धियों के निमित्त मात्र ही थे। इस प्रकार अनेक आश्चर्यों के प्राकट्य वाली यह 'अभिजाति' (जन्म) जिस प्रयोजन के लिए उनके द्वारा प्रार्थित थी, उस अभिसम्बोधि की एकान्त सिद्धि के लिए 'तथा' (यथार्थ) ही थी, 'अवितथ' और 'अनन्यथा' थी। තථා යෙ බුද්ධවෙනෙය්යා බොධනෙය්යබන්ධවා, තෙ සබ්බෙපි අනවසෙසතො සයමෙව භගවතා විනීතා. යෙ ච සාවකවෙනෙය්යා ධම්මවෙනෙය්යා ච, තෙපි සාවකාදීහි විනීතා විනයං ගච්ඡන්ති ගමිස්සන්ති චාති යදත්ථං භගවතා අභිසම්බොධි අභිපත්ථිතා, තදත්ථස්ස එකන්තසිද්ධියා අභිසම්බොධි තථා අවිතථා අනඤ්ඤථා. उसी प्रकार जो बुद्ध-वेनेय (बुद्ध द्वारा विनीत किए जाने योग्य) बोधनीय जन थे, वे सभी पूर्ण रूप से स्वयं भगवान द्वारा विनीत किए गए। और जो श्रावक-वेनेय और धर्म-वेनेय थे, वे भी श्रावकों आदि के द्वारा विनीत होकर विनीत हुए हैं और होंगे; इस प्रकार जिस प्रयोजन के लिए भगवान द्वारा अभिसम्बोधि की प्रार्थना की गई थी, उस प्रयोजन की एकान्त सिद्धि के कारण अभिसम्बोधि 'तथा', 'अवितथ' और 'अनन्यथा' है। අපිච යස්ස යස්ස ඤෙය්යධම්මස්ස යො යො සභාවො බුජ්ඣිතබ්බො, සො සො හත්ථතලෙ ඨපිතආමලකං විය ආවජ්ජනමත්තපටිබද්ධෙන අත්තනො ඤාණෙන අවිපරීතං අනවසෙසතො භගවතා අභිසම්බුද්ධොති එවම්පි අභිසම්බොධි තථා අවිතථා අනඤ්ඤථා. इसके अतिरिक्त, जिस-जिस ज्ञेय धर्म का जो-जो स्वभाव जानना चाहिए था, वह सब हथेली पर रखे हुए आँवले के समान, केवल आवर्जन (ध्यान देने) मात्र से सम्बद्ध अपने ज्ञान के द्वारा भगवान द्वारा अविपरीत रूप से और पूर्णतः अभिसम्बुद्ध (ज्ञात) किया गया है; इस प्रकार भी अभिसम्बोधि 'तथा', 'अवितथ' और 'अनन्यथा' है। තථා තෙසං තෙසං ධම්මානං තථා තථා දෙසෙතබ්බප්පකාරං, තෙසං තෙසඤ්ච සත්තානං ආසයානුසයචරියාධිමුත්තිං සම්මදෙව ඔලොකෙත්වා ධම්මතං අවිජහන්තෙනෙව පඤ්ඤත්තිනයං වොහාරමත්තං අනතිධාවන්තෙනෙව ච ධම්මතං විභාවෙන්තෙන යථාපරාධං යථාජ්ඣාසයං යථාධම්මඤ්ච අනුසාසන්තෙන භගවතා වෙනෙය්යා විනීතා අරියභූමිං සම්පාපිතාති ධම්මවිනයපඤ්ඤාපනාපිස්ස තදත්ථසිද්ධියා යථාභූතවුත්තියා ච තථා අවිතථා අනඤ්ඤථා. उसी प्रकार उन-उन धर्मों के उस-उस प्रकार से उपदेश देने के ढंग को, और उन-उन सत्त्वों के आशय, अनुशय, चर्या और अधिमुक्ति को भली-भांति देखकर, धर्मता (स्वभाव) को न छोड़ते हुए ही, प्रज्ञप्ति-नय और व्यवहार-मात्र का उल्लंघन न करते हुए और धर्मता को स्पष्ट करते हुए, अपराध के अनुसार, आशय के अनुसार और धर्म के अनुसार अनुशासन करते हुए भगवान द्वारा विनेय जनों को विनीत किया गया और आर्यभूमि तक पहुँचाया गया - इस प्रकार उनके धर्म और विनय का प्रज्ञापन भी उस अर्थ की सिद्धि के लिए और यथाभूत कथन होने के कारण 'तथा' (सत्य), 'अवितथ' (अमिथ्या) और 'अनन्यथा' (अपरिवर्तनीय) है। තථා [Pg.130] යා සා භගවතා අනුප්පත්තා පථවියාදිඵස්සවෙදනාදිරූපාරූපසභාවනිමුත්තා ලුජ්ජනපලුජ්ජනභාවාභාවතො ලොකසභාවාතීතා තමසා විසංසට්ඨත්තා කෙනචි අනොභාසනීයා ලොකසභාවාභාවතො එව ගතිආදිභාවරහිතා අප්පතිට්ඨා අනාරම්මණා අමතමහානිබ්බානධාතු ඛන්ධසඞ්ඛාතානං උපාදීනං ලෙසමත්තස්සාපි අභාවතො ‘‘අනුපාදිසෙසා’’තිපි වුච්චති. යං සන්ධාය වුත්තං – उसी प्रकार, भगवान द्वारा जो वह प्राप्त की गई है, जो पृथ्वी आदि (महाभूतों) और स्पर्श-वेदना आदि रूप-अरूप स्वभावों से मुक्त है, विनाशशील स्वभाव के अभाव के कारण लोक-स्वभाव से अतीत है, अंधकार (अविद्या) से असंसृष्ट होने के कारण किसी के द्वारा प्रकाशित न की जा सकने वाली है, लोक-स्वभाव के अभाव के कारण ही गति आदि भावों से रहित है, अप्रतिष्ठित है, अनालम्बन है, वह अमृत महापरिनिर्वाण धातु, स्कन्ध-संज्ञक उपादानों के लेशमात्र भी शेष न रहने के कारण 'अनुपादिशेष' भी कही जाती है। जिसके सन्दर्भ में कहा गया है - ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, තදායතනං, යත්ථ නෙව පථවී න ආපො න තෙජො න වායො න ආකාසානඤ්චායතනං න විඤ්ඤාණඤ්චායතනං න ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං න නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං නායං ලොකො න පරො ලොකො න ච උභො චන්දිමසූරියා. තමහං, භික්ඛවෙ, නෙව ආගතිං වදාමි න ගතිං න ඨිතිං න චුතිං න උපපත්තිං; අප්පතිට්ඨං අප්පවත්තං අනාරම්මණමෙවෙතං එසෙවන්තො දුක්ඛස්සා’’ති (උදා. 71). "भिक्षुओं! वह आयतन है, जहाँ न पृथ्वी है, न जल, न तेज, न वायु, न आकाशानन्त्यायतन, न विज्ञानानन्त्यायतन, न आकिंचन्यायतन, न नैवसंज्ञानासंज्ञायतन, न यह लोक है, न परलोक और न ही चन्द्र-सूर्य दोनों हैं। भिक्षुओं! उसे मैं न आना कहता हूँ, न जाना, न ठहरना, न च्युत होना और न उत्पन्न होना; वह अप्रतिष्ठित, अप्रवृत्त और अनालम्बन ही है, यही दुःख का अन्त है।" (उदान ७१) සා සබ්බෙසම්පි උපාදානක්ඛන්ධානං අත්ථඞ්ගමො සබ්බසඞ්ඛාරානං සමථො, සබ්බූපධීනං පටිනිස්සග්ගො, සබ්බදුක්ඛානං වූපසමො, සබ්බාලයානං සමුග්ඝාතො, සබ්බවට්ටානං උපච්ඡෙදො, අච්චන්තසන්තිලක්ඛණාති යථාවුත්තසභාවස්ස කදාචිපි අවිසංවාදනතො තථා අවිතථා අනඤ්ඤථා. එවමෙතා අභිජාතිආදිකා තථා ගතො උපගතො අධිගතො පටිපන්නො පත්තොති තථාගතො. එවං භගවා තථා ගතොති තථාගතො. वह (निर्वाण धातु) सभी उपादान-स्कन्धों का अस्त होना, सभी संस्कारों का शमन, सभी उपधियों का त्याग, सभी दुखों का उपशम, सभी आल्यों (आसक्तियों) का समून्मूलन, सभी वट्टों (संसार-चक्रों) का उच्छेद और अत्यन्त शान्ति के लक्षण वाली है - इस प्रकार कहे गए स्वभाव के कभी भी विसंवादित (झूठा) न होने के कारण वह 'तथा', 'अवितथ' और 'अनन्यथा' है। इस प्रकार इन अभिजाति आदि को 'तथा' (यथार्थ रूप से) प्राप्त होने, उपगत होने, अधिगत होने, प्रतिपन्न होने और पहुँचने के कारण वे 'तथागत' हैं। इस प्रकार भगवान 'तथा' (सत्य) को प्राप्त हुए हैं, इसलिए 'तथागत' हैं। කථං තථාවිධොති තථාගතො? යථාවිධා පුරිමකා සම්මාසම්බුද්ධා, අයම්පි භගවා තථාවිධො. කිං වුත්තං හොති? යථාවිධා තෙ භගවන්තො මග්ගසීලෙන, ඵලසීලෙන, සබ්බෙනපි ලොකියලොකුත්තරසීලෙන, මග්ගසමාධිනා, ඵලසමාධිනා, සබ්බෙනපි ලොකියලොකුත්තරසමාධිනා, මග්ගපඤ්ඤාය, ඵලපඤ්ඤාය, සබ්බායපි ලොකියලොකුත්තරපඤ්ඤාය, දෙවසිකං වළඤ්ජිතබ්බෙහි චතුවීසතිකොටිසතසහස්සසමාපත්තිවිහාරෙහි, තදඞ්ගවිමුත්තියා වික්ඛම්භනවිමුත්තියා සමුච්ඡෙදවිමුත්තියා පටිප්පස්සද්ධිවිමුත්තියා නිස්සරණවිමුත්තියාති සඞ්ඛෙපතො, විත්ථාරතො පන අනන්තාපරිමාණභෙදෙහි අචින්තෙය්යානුභාවෙහි සකලසබ්බඤ්ඤුගුණෙහි, අයම්පි [Pg.131] අම්හාකං භගවා තථාවිධො. සබ්බෙසඤ්හි සම්මාසම්බුද්ධානං ආයුවෙමත්තං, සරීරප්පමාණවෙමත්තං, කුලවෙමත්තං, දුක්කරචරියාවෙමත්තං, රස්මිවෙමත්තන්ති ඉමෙහි පඤ්චහි වෙමත්තෙහි සියා වෙමත්තං, න පන සීලවිසුද්ධිආදීසු විසුද්ධීසු සමථවිපස්සනාපටිපත්තියං අත්තනා පටිවිද්ධගුණෙසු ච කිඤ්චි නානාකරණං අත්ථි, අථ ඛො මජ්ඣෙ භින්නසුවණ්ණං විය අඤ්ඤංමඤ්ඤං නිබ්බිසෙසා තෙ බුද්ධා භගවන්තො. තස්මා යථාවිධා පුරිමකා සම්මාසම්බුද්ධා, අයම්පි භගවා තථාවිධො. එවං තථාවිධොති තථාගතො. විධත්ථො චෙත්ථ ගතසද්දො. තථා හි ලොකියා විධයුත්තගතසද්දෙ පකාරත්ථෙ වදන්ති. 'तथाविध' होने से 'तथागत' कैसे हैं? जैसे पूर्ववर्ती सम्यक्सम्बुद्ध थे, वैसे ही ये भगवान भी 'तथाविध' (उसी प्रकार के) हैं। क्या कहा गया है? जैसे वे भगवान मार्ग-शील, फल-शील और सभी लौकिक-लोकोत्तर शील से, मार्ग-समाधि, फल-समाधि और सभी लौकिक-लोकोत्तर समाधि से, मार्ग-प्रज्ञा, फल-प्रज्ञा और सभी लौकिक-लोकोत्तर प्रज्ञा से, प्रतिदिन सेवन की जाने वाली दो लाख चालीस हजार करोड़ समापत्ति-विहारों से, संक्षेप में तदंग-विमुक्ति, विष्कम्भन-विमुक्ति, समुच्छेद-विमुक्ति, प्रतिप्रश्रब्धि-विमुक्ति और निःसरण-विमुक्ति से, और विस्तार से अनन्त-अपरिमेय भेदों वाले अचिन्त्य अनुभावों वाले सकल सर्वज्ञ गुणों से युक्त थे, वैसे ही हमारे ये भगवान भी 'तथाविध' हैं। सभी सम्यक्सम्बुद्धों में आयु की भिन्नता, शरीर के परिमाण की भिन्नता, कुल की भिन्नता, दुष्कर चर्या की भिन्नता और रश्मि (आभा) की भिन्नता - इन पाँच भिन्नताओं के कारण भिन्नता हो सकती है, किन्तु शील-विशुद्धि आदि विशुद्धियों में, शमथ-विपश्यना की प्रतिपत्ति में और स्वयं द्वारा साक्षात्कृत गुणों में कोई अन्तर नहीं है, बल्कि वे बुद्ध भगवान बीच से टूटे हुए सोने के समान एक-दूसरे से निर्विशेष (समान) हैं। इसलिए जैसे पूर्ववर्ती सम्यक्सम्बुद्ध थे, वैसे ही ये भगवान भी 'तथाविध' हैं। इस प्रकार 'तथाविध' होने से 'तथागत' हैं। यहाँ 'गत' शब्द 'विध' (प्रकार) के अर्थ में है। क्योंकि लौकिक जन 'विध' युक्त 'गत' शब्द को 'प्रकार' के अर्थ में कहते हैं। කථං තථාපවත්තිකොති තථාගතො? අනඤ්ඤසාධාරණෙන ඉද්ධානුභාවෙන සමන්නාගතත්තා අත්ථපටිසම්භිදාදීනං උක්කංසපාරමිප්පත්තියා අනාවරණඤාණපටිලාභෙන ච භගවතො කායප්පවත්තියාදීනං කත්ථචි පටිඝාතාභාවතො යථාරුචි තථා ගතං ගති ගමනං කායවචීචිත්තප්පවත්ති එතස්සාති තථාගතො. එවං තථාපවත්තිකොති තථාගතො. 'तथाप्रवृत्तिक' होने से 'तथागत' कैसे हैं? अनन्य-साधारण ऋद्धि-अनुभाव से समन्वित होने के कारण, अर्थ-प्रतिसंविदा आदि की उत्कृष्ट पारमिता प्राप्त करने के कारण और अनावरण-ज्ञान की प्राप्ति के कारण, भगवान की काय-प्रवृत्ति आदि में कहीं भी कोई रुकावट न होने से, जैसी रुचि हो वैसी ही 'गत' (गति, गमन, काय-वाणी-चित्त की प्रवृत्ति) होने के कारण वे 'तथागत' हैं। इस प्रकार 'तथाप्रवृत्तिक' होने से 'तथागत' हैं। කථං තථෙහි අගතොති තථාගතො? බොධිසම්භාරසම්භරණෙ තප්පටිපක්ඛප්පවත්තිසඞ්ඛාතං නත්ථි එතස්ස ගතන්ති අගතො. සො පනස්ස අගතභාවො මච්ඡෙරදානපාරමිආදීසු අවිපරීතං ආදීනවානිසංසපච්චවෙක්ඛණාදිනයප්පවත්තෙහි ඤාණෙහීති තථෙහි ඤාණෙහි අගතොති තථාගතො. 'तथ' (सत्य) ज्ञानों के द्वारा 'अगत' होने से 'तथागत' कैसे हैं? बोधि-सम्भारों के संचय में उसके प्रतिपक्ष की प्रवृत्ति रूप 'गत' (गमन) इनका नहीं है, इसलिए 'अगत' हैं। उनका वह 'अगत-भाव' मात्सर्य और दान-पारमिता आदि में यथार्थ रूप से दोष और लाभ के प्रत्यवेक्षण आदि के नय से प्रवृत्त ज्ञानों के द्वारा है, इसलिए उन 'तथ' (सत्य) ज्ञानों के द्वारा 'अगत' होने से वे 'तथागत' हैं। අථ වා කිලෙසාභිසඞ්ඛාරප්පවත්තිසඞ්ඛාතං ඛන්ධප්පවත්තිසඞ්ඛාතමෙව වා පඤ්චසුපි ගතීසු ගතං ගමනං එතස්ස නත්ථීති අගතො. සඋපාදිසෙසඅනුපාදිසෙසනිබ්බානප්පත්තියා ස්වායමස්ස අගතභාවො තථෙහි අරියමග්ගඤාණෙහීති එවම්පි භගවා තථෙහි ආගතොති තථාගතො. अथवा, क्लेश और अभिसंस्कार की प्रवृत्ति रूप, या स्कन्धों की प्रवृत्ति रूप पाँचों गतियों में इनका 'गत' (जाना) नहीं है, इसलिए 'अगत' हैं। सउपादिशेष और अनुपादिशेष निर्वाण की प्राप्ति के कारण उनका यह 'अगत-भाव' उन 'तथ' (सत्य) आर्यमार्ग-ज्ञानों के द्वारा है, इस प्रकार भी भगवान उन 'तथ' ज्ञानों के द्वारा 'आगत' (प्राप्त) होने से 'तथागत' हैं। කථං තථාගතභාවෙන තථාගතො? තථාගතභාවෙනාති ච තථාගතස්ස සබ්භාවෙන, අත්ථිතායාති අත්ථො. කො පනෙස තථාගතො, යස්ස අත්ථිතාය භගවා තථාගතොති වුච්චතීති? සද්ධම්මො. සද්ධම්මො හි අරියමග්ගො තාව යථා යුගනද්ධසමථවිපස්සනාබලෙන අනවසෙසකිලෙසපක්ඛං සමූහනන්තෙන සමුච්ඡෙදප්පහානවසෙන ගන්තබ්බං, තථා [Pg.132] ගතො. ඵලධම්මො යථා අත්තනො මග්ගානුරූපං පටිප්පස්සද්ධිප්පහානවසෙන ගන්තබ්බං, තථා ගතො පවත්තො. නිබ්බානධම්මො පන යථා ගතො පඤ්ඤාය පටිවිද්ධො සකලවට්ටදුක්ඛවූපසමාය සම්පජ්ජති, බුද්ධාදීහි තථා ගතො සච්ඡිකතොති තථාගතො. පරියත්තිධම්මොපි යථා පුරිමබුද්ධෙහි සුත්තගෙය්යාදිවසෙන පවත්තිආදිප්පකාසනවසෙන ච වෙනෙය්යානං ආසයාදිඅනුරූපං පවත්තිතො, අම්හාකම්පි භගවතා තථා ගතො ගදිතො පවත්තිතොති වා තථාගතො. යථා භගවතා දෙසිතො, තථා භගවතො සාවකෙහි ගතො අවගතොති තථාගතො. එවං සබ්බොපි සද්ධම්මො තථාගතො. තෙනාහ සක්කො දෙවානමින්දො ‘‘තථාගතං දෙවමනුස්සපූජිතං, ධම්මං නමස්සාම සුවත්ථි හොතූ’’ති (ඛු. පා. 6.17; සු. නි. 240). ස්වාස්ස අත්ථීති භගවා තථාගතො. तथागतभाव से तथागत कैसे हैं? 'तथागतभाव से' का अर्थ है तथागत के सद्भाव (अस्तित्व) से, अर्थात् उनकी विद्यमानता से। वह तथागत कौन है, जिसके अस्तित्व के कारण भगवान को 'तथागत' कहा जाता है? वह सद्धर्म है। सद्धर्म ही आर्यमार्ग है, जो युगनद्ध शमथ-विपश्यना के बल से समस्त क्लेश-पक्ष का समूल नाश करते हुए समुच्छेद-प्रहाण के वश से जिस प्रकार जाना चाहिए, उसी प्रकार गया (तथा गतो) है। फल-धर्म जिस प्रकार अपने मार्ग के अनुरूप प्रतिप्रश्रब्धि-प्रहाण के वश से जाना चाहिए, उसी प्रकार गया (प्रवृत्त हुआ) है। निर्वाण-धर्म जिस प्रकार प्रज्ञा द्वारा प्रतिविद्ध होकर समस्त संसार-दुःख की शांति के लिए होता है, बुद्ध आदि के द्वारा उसी प्रकार प्राप्त (साक्षात्कृत) किया गया है, इसलिए 'तथागत' है। पर्यप्ति-धर्म भी जिस प्रकार पूर्व बुद्धों द्वारा सुत्त-गेय आदि के रूप में और विनेय जनों के आशय आदि के अनुरूप प्रवर्तित किया गया है, हमारे भगवान द्वारा भी उसी प्रकार कहा और प्रवर्तित किया गया है, इसलिए 'तथागत' है। जिस प्रकार भगवान द्वारा उपदिष्ट है, उसी प्रकार भगवान के श्रावकों द्वारा जाना (अवगत) गया है, इसलिए 'तथागत' है। इस प्रकार समस्त सद्धर्म ही तथागत है। इसीलिए देवेन्द्र शक्र ने कहा है— 'देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित तथागत धर्म को हम नमस्कार करते हैं, कल्याण हो'। वह (सद्धर्म) जिसका है, वह भगवान तथागत हैं। යථා ච ධම්මො, එවං අරියසඞ්ඝොපි, යථා අත්තහිතාය පරහිතාය ච පටිපන්නෙහි සුවිසුද්ධං පුබ්බභාගසමථවිපස්සනාපටිපදං පුරක්ඛත්වා තෙන තෙන මග්ගෙන ගන්තබ්බං, තං තං තථා ගතොති තථාගතො. යථා වා භගවතා සච්චපටිච්චසමුප්පාදාදිනයො දෙසිතො, තථා ච බුද්ධත්තා තථා ගදනතො ච තථාගතො. තෙනාහ සක්කො දෙවරාජා – ‘‘තථාගතං දෙවමනුස්සපූජිතං, සඞ්ඝං නමස්සාම සුවත්ථි හොතූ’’ති (ඛු. පා. 6.18; සු. නි. 241), ස්වාස්ස සාවකභූතො අත්ථීති භගවා තථාගතො. එවං තථාගතභාවෙන තථාගතො. जिस प्रकार धर्म है, उसी प्रकार आर्य संघ भी है; जिस प्रकार आत्म-हित और पर-हित में लगे हुए लोगों द्वारा सुविशुद्ध पूर्वभाग शमथ-विपश्यना की प्रतिपदा को सामने रखकर उस-उस मार्ग से जाना चाहिए, वह उस-उस प्रकार गया (तथा गतो) है, इसलिए 'तथागत' है। अथवा जिस प्रकार भगवान द्वारा सत्य और प्रतीत्यसमुत्पाद आदि का नय उपदिष्ट है, उसी प्रकार बुद्ध होने के कारण और उसी प्रकार कहने (गदन) के कारण 'तथागत' है। इसीलिए देवराज शक्र ने कहा है— 'देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित तथागत संघ को हम नमस्कार करते हैं, कल्याण हो'। वह (संघ) जिसका श्रावक रूप में है, वह भगवान तथागत हैं। इस प्रकार तथागतभाव से तथागत हैं। ඉදම්පි තථාගතස්ස තථාගතභාවදීපනෙ මුඛමත්තකමෙව, සබ්බාකාරෙන පන තථාගතොව තථාගතස්ස තථාගතභාවං වණ්ණෙය්ය. ඉදඤ්හි තථාගතපදං මහත්ථං, මහාගතිකං, මහාවිසයං, තස්ස අප්පමාදපදස්ස විය තෙපිටකම්පි බුද්ධවචනං යුත්තිතො අත්ථභාවෙන ආහරන්තො ‘‘අතිත්ථෙන ධම්මකථිකො පක්ඛන්දො’’ති න වත්තබ්බොති. यह तथागत के तथागतभाव को दर्शाने का मात्र एक मुख (प्रारंभ) ही है, पूर्ण रूप से तो तथागत ही तथागत के तथागतभाव का वर्णन कर सकते हैं। यह 'तथागत' पद महान अर्थ वाला, महान गति वाला और महान विषय वाला है; जैसे 'अप्रमाद' पद है, वैसे ही त्रिपिटक रूप बुद्धवचन को युक्तिपूर्वक अर्थभाव से ग्रहण करते हुए 'बिना घाट के धर्मकथक ने छलांग लगा दी' ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए। තත්ථෙතං වුච්චති – वहाँ यह कहा गया है— ‘‘යථෙව ලොකෙ පුරිමා මහෙසිනො,සබ්බඤ්ඤුභාවං මුනයො ඉධාගතා; තථා අයං සක්යමුනීපි ආගතො,තථාගතො වුච්චති තෙන චක්ඛුමා. जैसे इस लोक में पूर्ववर्ती महर्षि मुनि सर्वज्ञता को प्राप्त हुए, वैसे ही ये शाक्यमुनि भी यहाँ आए हैं, इसलिए चक्षुष्मान् (बुद्ध) 'तथागत' कहे जाते हैं। ‘‘පහාය [Pg.133] කාමාදිමලෙ අසෙසතො,සමාධිඤාණෙහි යථා ගතා ජිනා; පුරාතනා සක්යමුනී ජුතින්ධරො,තථා ගතො තෙන තථාගතො මතො. काम आदि मलों को पूर्णतः त्याग कर, जिस प्रकार पूर्ववर्ती विजयी (जिन) समाधि और ज्ञान के माध्यम से गए, वैसे ही ज्योतिर्धर शाक्यमुनि भी गए हैं, इसलिए उन्हें 'तथागत' माना गया है। ‘‘තථඤ්ච ධාතායතනාදිලක්ඛණං,සභාවසාමඤ්ඤවිභාගභෙදතො; සයම්භුඤාණෙන ජිනොයමාගතො,තථාගතො වුච්චති සක්යපුඞ්ගවො. धातु और आयतन आदि के लक्षणों को उनके स्वभाव और सामान्य विभाग के भेद से, इन शाक्यपुंगव (बुद्ध) ने अपने स्वयंभू ज्ञान से यथार्थ रूप में (तथा) जाना है, इसलिए वे 'तथागत' कहे जाते हैं। ‘‘තථානි සච්චානි සමන්තචක්ඛුනා,තථා ඉදප්පච්චයතා ච සබ්බසො; අනඤ්ඤනෙය්යා නයතො විභාවිතා,තථා ගතො තෙන ජිනො තථාගතො. समन्तचक्षु (बुद्ध) ने सत्यों को यथार्थ रूप में (तथा) और इस इदप्रत्ययता (प्रतीत्यसमुत्पाद) को सभी प्रकार से, बिना किसी दूसरे के उपदेश के, युक्तिपूर्वक स्पष्ट किया है; वे उस प्रकार गए (तथा गतो) हैं, इसलिए वे जिन 'तथागत' हैं। ‘‘අනෙකභෙදාසුපි ලොකධාතුසු,ජිනස්ස රූපායතනාදිගොචරෙ; විචිත්තභෙදෙ තථමෙව දස්සනං,තථාගතො තෙන සමන්තලොචනො. अनेक भेदों वाले लोकधातुओं में, जिन (बुद्ध) के रूपायातन आदि विषयों में, विचित्र भेदों के होने पर भी उनका दर्शन वैसा ही (तथा) है, इसलिए वे समन्तलोचन 'तथागत' हैं। ‘‘යතො ච ධම්මං තථමෙව භාසති,කරොති වාචායනුරූපමත්තනො; ගුණෙහි ලොකං අභිභුය්යිරීයති,තථාගතො තෙනපි ලොකනායකො. चूँकि वे धर्म को वैसा ही (तथा) कहते हैं और अपनी वाणी के अनुरूप ही कार्य करते हैं, और गुणों से लोक को अभिभूत कर विचरण करते हैं, इसलिए वे लोकनायक 'तथागत' हैं। ‘‘තථා පරිඤ්ඤාය තථාය සබ්බසො,අවෙදි ලොකං පභවං අතික්කමි; ගතො ච පච්චක්ඛකිරියාය නිබ්බුතිං,අරියමග්ගඤ්ච ගතො තථාගතො. यथार्थ रूप में (तथा) सब प्रकार से परिज्ञा द्वारा लोक को जानकर, उसके उदय (प्रभव) का अतिक्रमण किया, और साक्षात्करण द्वारा निर्वाण को प्राप्त हुए तथा आर्यमार्ग पर चले, इसलिए वे 'तथागत' हैं। ‘‘තථා පටිඤ්ඤාය තථාය සබ්බසො,හිතාය ලොකස්ස යතොයමාගතො; තථාය නාථො කරුණාය සබ්බදා,ගතො ච තෙනාපි ජිනො තථාගතො. यथार्थ रूप में (तथा) प्रतिज्ञा करके, लोक के हित के लिए सब प्रकार से जो यहाँ आए हैं, वे नाथ सदा करुणा के कारण यथार्थ रूप में (तथा) प्रवृत्त हुए हैं, इसलिए वे जिन 'तथागत' हैं। ‘‘තථානි [Pg.134] ඤාණානි යතොයමාගතො,යථාසභාවං විසයාවබොධතො; තථාභිජාතිප්පභුතී තථාගතො,තදත්ථසම්පාදනතො තථාගතො. यथार्थ ज्ञानों को जिस प्रकार उन्होंने प्राप्त किया है, विषयों के यथार्थ स्वभाव के बोध से, वैसे ही उनकी जाति (जन्म) आदि भी यथार्थ (तथा) है, उस अर्थ की सिद्धि करने के कारण वे 'तथागत' हैं। ‘‘යථාවිධා තෙ පුරිමා මහෙසිනො,තථාවිධොයම්පි තථා යථාරුචි; පවත්තවාචා තනුචිත්තභාවතො,තථාගතො වුච්චති අග්ගපුග්ගලො. जिस प्रकार के वे पूर्ववर्ती महर्षि थे, उसी प्रकार के ये भी हैं, और अपनी रुचि के अनुसार वाणी, शरीर और चित्त की प्रवृत्ति होने के कारण, ये अग्रपुद्गल 'तथागत' कहे जाते हैं। ‘‘සම්බොධිසම්භාරවිපක්ඛතො පුරෙ,ගතං න සංසාරගතම්පි තස්ස වා; න චත්ථි නාථස්ස භවන්තදස්සිනො,තථෙහි තස්මා අගතො තථාගතො. संबोधि के संभारों के परिपाक से पूर्व, उनका संसार में जाना (गमन) नहीं था, और भव के अंत को देखने वाले उन नाथ का वह (संसार गमन) अब नहीं है; उन यथार्थ (तथ) कारणों से वे 'अगत' (न गए हुए) होने के कारण 'तथागत' हैं। ‘‘තථාගතො ධම්මවරො මහෙසිනා,යථා පහාතබ්බමලං පහීයති; තථාගතො අරියගණො විනායකො,තථාගතො තෙන සමඞ්ගිභාවතො’’ති. महर्षि (बुद्ध) द्वारा धर्म श्रेष्ठ तथागत (यथार्थ रूप में प्राप्त) है, जिससे त्यागने योग्य मल त्याग दिए जाते हैं; विनायक (बुद्ध) द्वारा आर्य गण (संघ) तथागत है; उनसे युक्त होने के कारण वे 'तथागत' हैं। අරහන්තං සම්මාසම්බුද්ධන්ති එත්ථ අරහාති පදස්ස අත්ථො හෙට්ඨා වුත්තොයෙව. සම්මා සාමඤ්ච සබ්බධම්මානං බුද්ධත්තා සම්මාසම්බුද්ධං. යංකිඤ්චි ඤෙය්යං නාම, තස්ස සබ්බස්සපි සබ්බාකාරතො අවිපරීතතො සයමෙව අභිසම්බුද්ධත්තාති වුත්තං හොති. ඉමිනාස්ස පරොපදෙසරහිතස්ස සබ්බාකාරෙන සබ්බධම්මාවබොධනසමත්ථස්ස ආකඞ්ඛාපටිබද්ධවුත්තිනො අනාවරණඤාණසඞ්ඛාතස්ස සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණස්ස අධිගමො දස්සිතො. 'अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं'—यहाँ 'अरह' पद का अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। सम्यक् और स्वयं ही सभी धर्मों को जानने के कारण 'सम्मासम्बुद्ध' हैं। जो कुछ भी ज्ञेय है, उस सबको सभी प्रकार से, यथार्थ रूप में, स्वयं ही बुद्ध (ज्ञात) कर लेने के कारण ऐसा कहा गया है। इससे उनके परोपदेश-रहित, सभी प्रकार से सभी धर्मों के बोध में समर्थ, इच्छा मात्र पर निर्भर रहने वाले और अनावरण ज्ञान कहे जाने वाले सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति को दर्शाया गया है। නනු ච සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණතො අඤ්ඤං අනාවරණං, අඤ්ඤථා ඡ අසාධාරණානි ඤාණානි බුද්ධඤාණානීති වචනං විරුජ්ඣෙය්යාති? න විරුජ්ඣති, විසයප්පවත්තිභෙදවසෙන අඤ්ඤෙහි අසාධාරණභාවදස්සනත්ථං එකස්සෙව ඤාණස්ස ද්විධා වුත්තත්තා. එකමෙව හි තං ඤාණං අනවසෙසසඞ්ඛතාසඞ්ඛතසම්මුතිධම්මවිසයතාය සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං, තත්ථ ච ආවරණාභාවතො නිස්සඞ්ගචාරමුපාදාය අනාවරණඤාණන්ති වුත්තං. යථාහ පටිසම්භිදායං – क्या सर्वज्ञता-ज्ञान से अनावरण-ज्ञान भिन्न नहीं है? अन्यथा 'छह असाधारण ज्ञान बुद्ध-ज्ञान हैं' यह वचन विरुद्ध हो जाएगा। (उत्तर:) विरुद्ध नहीं होता, क्योंकि विषय की प्रवृत्ति के भेद के कारण दूसरों से असाधारण भाव दिखाने के लिए एक ही ज्ञान को दो प्रकार से कहा गया है। वह ज्ञान एक ही है, जो समस्त संस्कृत, असंस्कृत और सम्मति धर्मों का विषय होने के कारण 'सर्वज्ञता-ज्ञान' है, और वहाँ आवरण के अभाव के कारण निःसंग विचरण के आधार पर 'अनावरण-ज्ञान' कहा गया है। जैसा कि प्रतिसम्भिदामग्ग में कहा गया है— ‘‘සබ්බං [Pg.135] සඞ්ඛතාසඞ්ඛතං අනවසෙසං ජානාතීති සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං. තත්ථ ආවරණං නත්ථීති අනාවරණඤාණ’’න්තිආදි (පටි. ම. 1.119). “जो समस्त संस्कृत और असंस्कृत को पूर्णतः जानता है, वह सर्वज्ञता-ज्ञान है। उसमें आवरण नहीं है, इसलिए वह अनावरण-ज्ञान है” इत्यादि (प्रति. म. 1.119)। තස්මා නත්ථි නෙසං අත්ථතො භෙදො, එකන්තෙනෙවෙතං එවමිච්ඡිතබ්බං. අඤ්ඤථා සබ්බඤ්ඤුතානාවරණඤාණානං සාධාරණතා අසබ්බධම්මාරම්මණතා ච ආපජ්ජෙය්ය. න හි භගවතො ඤාණස්ස අණුමත්තම්පි ආවරණං අත්ථි, අනාවරණඤාණස්ස ච අසබ්බධම්මාරම්මණභාවෙ යත්ථ තං න පවත්තති තත්ථාවරණසබ්භාවතො අනාවරණභාවොයෙව න සියා. අථ වා පන හොතු අඤ්ඤමෙව අනාවරණං සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණතො, ඉධ පන සබ්බත්ථ අප්පටිහතවුත්තිතාය අනාවරණඤාණන්ති සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණමෙව අධිප්පෙතං, තස්සෙවාධිගමෙන භගවා සබ්බඤ්ඤූ සබ්බවිදූ සම්මාසම්බුද්ධොති වුච්චති, න සකිංයෙව සබ්බධම්මාවබොධතො. තථා ච වුත්තං පටිසම්භිදායං – इसलिए अर्थ की दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है, इसे निश्चित रूप से इसी प्रकार स्वीकार किया जाना चाहिए। अन्यथा सर्वज्ञता और अनावरण ज्ञान की साधारणता (सामान्य होना) और सभी धर्मों का आलम्बन न होना प्राप्त होगा। भगवान के ज्ञान में अणुमात्र भी आवरण नहीं है, और यदि अनावरण-ज्ञान सभी धर्मों को आलम्बन न बनाए, तो जहाँ वह प्रवृत्त नहीं होता, वहाँ आवरण की उपस्थिति होने से वह अनावरण-भाव ही नहीं रहेगा। अथवा यदि अनावरण-ज्ञान सर्वज्ञता-ज्ञान से भिन्न भी हो, तो भी यहाँ सर्वत्र अप्रतिहत (बिना रुकावट) प्रवृत्ति होने के कारण अनावरण-ज्ञान से सर्वज्ञता-ज्ञान ही अभिप्रेत है। उसी की प्राप्ति से भगवान 'सर्वज्ञ', 'सर्वविद्' और 'सम्यक्सम्बुद्ध' कहे जाते हैं, न कि एक ही बार में सभी धर्मों के अवबोध से। और वैसा ही प्रतिसम्भिदामग्ग में कहा गया है— ‘‘විමොක්ඛන්තිකමෙතං බුද්ධානං භගවන්තානං බොධියා මූලෙ සහ සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණස්ස පටිලාභා සච්ඡිකා පඤ්ඤත්ති යදිදං බුද්ධො’’ති. “बुद्धों, भगवानों के लिए यह विमोक्ष की पराकाष्ठा है, जो बोधि वृक्ष के मूल में सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के साथ 'बुद्ध' के रूप में साक्षात् प्रज्ञप्ति है।” සබ්බධම්මාවබොධනසමත්ථඤාණසමධිගමෙන හි භගවතො සන්තානෙ අනවසෙසධම්මෙ පටිවිජ්ඣිතුං සමත්ථතා අහොසීති. क्योंकि सभी धर्मों के अवबोध में समर्थ ज्ञान की प्राप्ति से भगवान की संतान (चित्त-परम्परा) में समस्त धर्मों को भेदने (साक्षात्कार करने) की सामर्थ्य उत्पन्न हुई। එත්ථාහ – කිං පනිදං ඤාණං පවත්තමානං සකිංයෙව සබ්බස්මිං විසයෙ පවත්තති, උදාහු කමෙනාති? කිඤ්චෙත්ථ – යදි තාව සකිංයෙව සබ්බස්මිං විසයෙ පවත්තති, අතීතානාගතප්පච්චුපන්නඅජ්ඣත්තබහිද්ධාදිභෙදභින්නානං සඞ්ඛතධම්මානං අසඞ්ඛතසම්මුතිධම්මානඤ්ච එකජ්ඣං උපට්ඨානෙ දූරතො චිත්තපටං පෙක්ඛන්තස්ස විය විසයවිභාගෙනාවබොධො න සියා, තථා ච සති ‘‘සබ්බෙ ධම්මා අනත්තා’’ති විපස්සන්තානං අනත්තාකාරෙන විය සබ්බධම්මා අනිරූපිතරූපෙන භගවතො ඤාණස්ස විසයා හොන්තීති ආපජ්ජති. යෙපි ‘‘සබ්බඤෙය්යධම්මානං ඨිතලක්ඛණවිසයං විකප්පරහිතං සබ්බකාලං බුද්ධානං ඤාණං පවත්තති, තෙන තෙ සබ්බවිදූති වුච්චන්ති. එවඤ්ච කත්වා – यहाँ प्रश्न है—क्या यह ज्ञान प्रवृत्त होते समय एक ही बार में सभी विषयों में प्रवृत्त होता है, अथवा क्रम से? इसमें क्या (दोष) है—यदि यह एक ही बार में सभी विषयों में प्रवृत्त होता है, तो अतीत, अनागत, प्रत्युत्पन्न, आध्यात्मिक, बाह्य आदि भेदों से भिन्न संस्कृत धर्मों और असंस्कृत एवं सम्मति धर्मों के एक साथ उपस्थित होने पर, दूर से चित्रपट को देखने वाले के समान विषयों के विभाग के साथ अवबोध नहीं होगा। और ऐसा होने पर, 'सभी धर्म अनात्मा हैं' ऐसा विपश्यना करने वालों के अनात्म-आकार के समान, सभी धर्म अनिरूपित रूप (अस्पष्ट) में भगवान के ज्ञान के विषय होंगे, ऐसा प्रसंग आता है। जो यह भी कहते हैं कि 'सभी ज्ञेय धर्मों के स्थित-लक्षण को विषय बनाने वाला, विकल्प-रहित ज्ञान बुद्धों का सदा प्रवृत्त रहता है, उससे वे सर्वविद् कहे जाते हैं'। और ऐसा मानकर— ‘‘චරං සමාහිතො නාගො, තිට්ඨන්තොපි සමාහිතො’’ති. – “चलते हुए भी नाग (बुद्ध) समाहित हैं, खड़े हुए भी समाहित हैं।” — ‘‘ඉදම්පි වචනං සුවුත්තං හොතී’’ති වදන්ති, තෙසම්පි වුත්තදොසානාතිවත්ති, ඨිතලක්ඛණාරම්මණතාය ච අතීතානාගතසම්මුතිධම්මානං තදභාවතො, එකදෙසවිසයමෙව [Pg.136] භගවතො ඤාණං සියා. තස්මා සකිංයෙව ඤාණං පවත්තතීති න යුජ්ජති. “यह वचन भी सुभाषित है” ऐसा वे कहते हैं, उनके मत में भी पूर्वोक्त दोष दूर नहीं होता, क्योंकि स्थित-लक्षण को आलम्बन बनाने के कारण अतीत, अनागत और सम्मति धर्मों में उसका अभाव होने से भगवान का ज्ञान एकदेशीय (सीमित) विषय वाला ही होगा। इसलिए 'एक ही बार में ज्ञान प्रवृत्त होता है' यह युक्त नहीं है। අථ කමෙන සබ්බස්මිං විසයෙ ඤාණං පවත්තතීති? එවම්පි න යුජ්ජති. න හි ජාතිභූමිසභාවාදිවසෙන දිසාදෙසකාලාදිවසෙන ච අනෙකභෙදභින්නෙ ඤෙය්යෙ කමෙන ගය්හමානෙ තස්ස අනවසෙසපටිවෙධො සම්භවති අපරියන්තභාවතො ඤෙය්යස්ස. යෙ පන ‘‘අත්ථස්ස අවිසංවාදනතො ඤෙය්යස්ස එකදෙසං පච්චක්ඛං කත්වා සෙසෙපි එවන්ති අධිමුච්චිත්වා වවත්ථාපනෙන සබ්බඤ්ඤූ භගවා, තඤ්ච ඤාණං න අනුමානිකං සංසයාභාවතො. සංසයානුබද්ධඤ්හි ලොකෙ අනුමානඤාණ’’න්ති වදන්ති, තෙසම්පි න යුත්තං. සබ්බස්ස හි අපච්චක්ඛභාවෙ අත්ථස්ස අවිසංවාදනෙන ඤෙය්යස්ස එකදෙසං පච්චක්ඛං කත්වා සෙසෙපි එවන්ති අධිමුච්චිත්වා වවත්ථාපනස්ස අසම්භවතො. යඤ්හි තං සෙසං, තං අපච්චක්ඛන්ති. අථ තම්පි පච්චක්ඛං, තස්ස සෙසභාවො පන න සියාති සබ්බමෙතං අකාරණං. කස්මා? අවිසයවිචාරභාවතො. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – तो क्या क्रम से सभी विषयों में ज्ञान प्रवृत्त होता है? ऐसा भी युक्त नहीं है। क्योंकि जाति, भूमि, स्वभाव आदि के वश से और दिशा, देश, काल आदि के वश से अनेक भेदों में विभक्त ज्ञेय को क्रम से ग्रहण करने पर उसका पूर्ण प्रतिवेध (साक्षात्कार) संभव नहीं है, क्योंकि ज्ञेय अपर्यन्त (अनंत) है। जो लोग यह कहते हैं कि 'अर्थ की अविसंवादिता (सत्यता) के कारण ज्ञेय के एक भाग को प्रत्यक्ष करके शेष में भी ऐसा ही है, ऐसा अधिमुक्ति (निश्चय) पूर्वक व्यवस्थापन करने से भगवान सर्वज्ञ हैं, और वह ज्ञान अनुमानिक नहीं है क्योंकि उसमें संशय का अभाव है। लोक में अनुमान ज्ञान संशय से अनुबद्ध होता है', उनका कहना भी युक्त नहीं है। क्योंकि यदि सब कुछ प्रत्यक्ष नहीं है, तो अर्थ की अविसंवादिता से ज्ञेय के एक भाग को प्रत्यक्ष करके शेष में भी ऐसा ही है, ऐसा अधिमुक्ति पूर्वक व्यवस्थापन करना असंभव है। क्योंकि जो शेष है, वह अप्रत्यक्ष है। यदि वह भी प्रत्यक्ष है, तो उसका 'शेष' होना नहीं रहेगा, इसलिए यह सब अकारण (तर्कहीन) है। क्यों? क्योंकि यह अविषय (बुद्धि से परे) का विचार है। भगवान ने कहा भी है— ‘‘බුද්ධවිසයො, භික්ඛවෙ, අචින්තෙය්යො, න චින්තෙතබ්බො; යො චින්තෙය්ය, උම්මාදස්ස විඝාතස්ස භාගී අස්සා’’ති (අ. නි. 4.77). “भिक्षुओं! बुद्ध का विषय अचिन्त्य है, उसका चिन्तन नहीं करना चाहिए; जो चिन्तन करेगा, वह उन्माद और व्याघात (कष्ट) का भागी होगा” (अं. नि. 4.77)। ඉදං පනෙත්ථ සන්නිට්ඨානං – යංකිඤ්චි භගවතා ඤාතුං ඉච්ඡිතං සකලමෙකදෙසො වා, තත්ථ අප්පටිහතවුත්තිතාය පච්චක්ඛතො ඤාණං පවත්තති, නිච්චසමාධානඤ්ච වික්ඛෙපාභාවතො, ඤාතුං ඉච්ඡිතස්ස සකලස්ස අවිසයභාවතො තස්ස ආකඞ්ඛාපටිබද්ධවුත්තිතා න සියා, එකන්තෙනෙව සා ඉච්ඡිතබ්බා ‘‘සබ්බෙ ධම්මා බුද්ධස්ස භගවතො ආවජ්ජනපටිබද්ධා, ආකඞ්ඛාපටිබද්ධා, මනසිකාරපටිබද්ධා, චිත්තුප්පාදපටිබද්ධා’’ති (මහානි. 69; චූළනි. මොඝරාජමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 85) වචනතො. අතීතානාගතවිසයම්පි භගවතො ඤාණං අනුමානාගමනතක්කග්ගහණවිරහිතත්තා පච්චක්ඛමෙව. यहाँ यह निष्कर्ष है—भगवान जो कुछ भी जानना चाहते हैं, चाहे वह सम्पूर्ण हो या एक अंश, वहाँ अप्रतिहत प्रवृत्ति होने के कारण ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से प्रवृत्त होता है, और विक्षेप के अभाव के कारण वह नित्य समाहित है। जानने के लिए इच्छित सम्पूर्ण के अविषय न होने के कारण उसकी प्रवृत्ति आकांक्षा-प्रतिबद्ध (इच्छा पर निर्भर) नहीं होगी, उसे निश्चित रूप से ऐसा ही माना जाना चाहिए, क्योंकि वचन है— “सभी धर्म बुद्ध भगवान के आवर्जन-प्रतिबद्ध, आकांक्षा-प्रतिबद्ध, मनसिकार-प्रतिबद्ध और चित्तोत्पाद-प्रतिबद्ध हैं” (महा नि. 69; चूल नि. मोघराजमाणवपुच्छानिद्देस 85)। अतीत और अनागत विषयक भगवान का ज्ञान भी अनुमान, आगम और तर्क के ग्रहण से रहित होने के कारण प्रत्यक्ष ही है। නනු ච එතස්මිම්පි පක්ඛෙ යදා සකලං ඤාතුං ඉච්ඡිතං, තදා සකිමෙව සකලවිසයතාය අනිරූපිතරූපෙන භගවතො ඤාණං පවත්තෙය්යාති වුත්තදොසානාතිවත්තියෙවාති? න, තස්ස විසොධිතත්තා. විසොධිතො හි සො බුද්ධවිසයො අචින්තෙය්යොති. අඤ්ඤථා පචුරජනඤාණසමවුත්තිතාය බුද්ධානං භගවන්තානං ඤාණස්ස අචින්තෙය්යතා න සියා, තස්මා සකලධම්මාරම්මණම්පි [Pg.137] තං එකධම්මාරම්මණං විය සුවවත්ථාපිතෙයෙව තෙ ධම්මෙ කත්වා පවත්තතීති ඉදමෙත්ථ අචින්තෙය්යං. යාවතකං ඤෙය්යං, තාවතකං ඤාණං, යාවතකං ඤාණං, තාවතකං ඤෙය්යං, ඤෙය්යපරියන්තිකං ඤාණං, ඤාණපරියන්තිකං ඤෙය්යන්ති එවමෙකජ්ඣං විසුං විසුං සකිං කමෙන ච ඉච්ඡානුරූපං සම්මා සාමඤ්ච සබ්බධම්මානං බුද්ධත්තා සම්මාසම්බුද්ධො භගවා. තං සම්මාසම්බුද්ධං. क्या इस पक्ष में भी जब सब कुछ जानने की इच्छा होती है, तब एक ही बार में समस्त विषयों के होने के कारण अनिर्धारित रूप से भगवान का ज्ञान प्रवृत्त होगा - इस प्रकार कहे गए दोष का उल्लंघन नहीं होता? नहीं, क्योंकि उसका शोधन हो चुका है। वह बुद्ध-विषय अचिन्त्य है। अन्यथा सामान्य जनों के ज्ञान के समान होने के कारण बुद्धों, भगवानों के ज्ञान की अचिन्त्यता नहीं होती, इसलिए समस्त धर्मों को आलम्बन बनाने वाला भी वह (ज्ञान) एक धर्म को आलम्बन बनाने वाले के समान उन धर्मों को सुव्यवस्थित करके ही प्रवृत्त होता है - यह यहाँ अचिन्त्य है। जितना ज्ञेय है, उतना ज्ञान है; जितना ज्ञान है, उतना ज्ञेय है; ज्ञान ज्ञेय की सीमा तक है, ज्ञेय ज्ञान की सीमा तक है - इस प्रकार एक साथ, अलग-अलग, एक बार में और क्रम से इच्छानुसार सभी धर्मों को भली-भाँति स्वयं जान लेने के कारण भगवान सम्यक्सम्बुद्ध हैं। उन सम्यक्सम्बुद्ध को। ද්වෙ විතක්කාති ද්වෙ සම්මා විතක්කා. තත්ථ විතක්කෙන්ති එතෙන, සයං වා විතක්කෙති, විතක්කනමත්තමෙව වාති විතක්කො. ස්වායං ආරම්මණාභිනිරොපනලක්ඛණො, ආහනනපරියාහනනරසො, ආරම්මණෙ චිත්තස්ස ආනයනපච්චුපට්ඨානො. විසයභෙදෙන පන තං ද්විධා කත්වා වුත්තං ‘‘ද්වෙ විතක්කා’’ති. සමුදාචරන්තීති සමං සම්මා ච උද්ධමුද්ධං මරියාදාය චරන්ති. මරියාදත්ථො හි අයමාකාරො, තෙන ච යොගෙන ‘‘තථාගතං අරහන්තං සම්මාසම්බුද්ධ’’න්ති ඉදං සාමිඅත්ථෙ උපයොගවචනං. ඉදං වුත්තං හොති – තථාගතස්ස අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස අත්තනො විසයෙ සමං සම්මා ච අඤ්ඤමඤ්ඤං මරියාදං අනතික්කමන්තා උද්ධමුද්ධං බහුලං අභිණ්හං චරන්ති පවත්තන්තීති. 'दो वितर्क' अर्थात् दो सम्यक् वितर्क। वहाँ 'वितर्क' उसे कहते हैं जिससे वितर्क करते हैं, या स्वयं वितर्क करता है, अथवा केवल वितर्क करना ही वितर्क है। वह आलम्बन पर (चित्त को) आरोपित करने के लक्षण वाला है, आहनन (टकराने) और पर्याहनन (बार-बार टकराने) के रस (कार्य) वाला है, और आलम्बन पर चित्त को ले आने के रूप में उपस्थित होता है। विषय के भेद से उसे दो प्रकार का करके 'दो वितर्क' कहा गया है। 'समुदाचरन्ति' का अर्थ है - समान रूप से और सम्यक् रूप से ऊपर-ऊपर मर्यादापूर्वक चलते हैं। यहाँ 'आ' कार मर्यादा के अर्थ में है, और उस योग से 'तथागतं अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं' यह षष्ठी के अर्थ में द्वितीया विभक्ति है। इसका यह अर्थ है - तथागत, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध के अपने विषय में एक-दूसरे की मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए समान रूप से और सम्यक् रूप से ऊपर-ऊपर बहुत अधिक और बार-बार चलते हैं अर्थात् प्रवृत्त होते हैं। කො පන නෙසං විසයො, කා වා මරියාදා, කථඤ්ච තං අනතික්කමිත්වා තෙ උද්ධමුද්ධං බහුලං අභිණ්හං නිච්චං පවත්තන්තීති? වුච්චතෙ – ඛෙමවිතක්කො, පවිවෙකවිතක්කොති ඉමෙ ද්වෙ විතක්කායෙව. තෙසු ඛෙමවිතක්කො තාව භගවතො විසෙසෙන කරුණාසම්පයුත්තො, මෙත්තාමුදිතාසම්පයුත්තොපි ලබ්භතෙව, තස්මා සො මහාකරුණාසමාපත්තියා මෙත්තාදිසමාපත්තියා ච පුබ්බඞ්ගමො සම්පයුත්තො ච වෙදිතබ්බො. පවිවෙකවිතක්කො පන ඵලසමාපත්තියා පුබ්බඞ්ගමො සම්පයුත්තො ච, දිබ්බවිහාරාදිවසෙනාපි ලබ්භතෙව. ඉති නෙසං විතක්කො විසයො, තස්මා එකස්මිං සන්තානෙ බහුලං පවත්තමානානම්පි කාලෙන කාලං සවිසයස්මිංයෙව චරණතො නත්ථි මරියාදා, න සඞ්කරෙන වුත්ති. उनका विषय क्या है, मर्यादा क्या है, और उसे बिना लांघे वे कैसे ऊपर-ऊपर बहुत अधिक, बार-बार और नित्य प्रवृत्त होते हैं? कहा जाता है - क्षेम-वितर्क और प्रविवेक-वितर्क, ये ही वे दो वितर्क हैं। उनमें से क्षेम-वितर्क तो भगवान की विशेष रूप से करुणा से सम्प्रयुक्त है, मैत्री और मुदिता से सम्प्रयुक्त भी पाया ही जाता है, इसलिए उसे महाकरुणा-समापत्ति और मैत्री आदि समापत्तियों का पूर्वगामी और सम्प्रयुक्त समझना चाहिए। प्रविवेक-वितर्क तो फल-समापत्ति का पूर्वगामी और सम्प्रयुक्त है, दिव्य-विहार आदि के वश से भी पाया ही जाता है। इस प्रकार यह उनका वितर्क-विषय है, इसलिए एक ही सन्तान (प्रवाह) में बहुत अधिक प्रवृत्त होने पर भी समय-समय पर अपने-अपने विषय में ही विचरण करने के कारण कोई मर्यादा (का उल्लंघन) नहीं है, न ही संकर (मिश्रण) रूप में प्रवृत्ति है। තත්ථ ඛෙමවිතක්කො භගවතො කරුණොක්කමනාදිනා විභාවෙතබ්බො, පවිවෙකවිතක්කො සමාපත්තීහි. තත්රායං විභාවනා – ‘‘අයං ලොකො සන්තාපජාතො දුක්ඛපරෙතො’’තිආදිනා රාගග්ගිආදීහි ලොකසන්නිවාසස්ස ආදිත්තතාදිආකාරදස්සනෙහි මහාකරුණාසමාපත්තියා පුබ්බභාගෙ, සමාපත්තියම්පි පඨමජ්ඣානවසෙන වත්තබ්බො. වුත්තඤ්හෙතං (පටි. ම. 1.117-118) – वहाँ क्षेम-वितर्क को भगवान के करुणा में प्रवेश आदि के द्वारा स्पष्ट करना चाहिए, और प्रविवेक-वितर्क को समापत्तियों के द्वारा। वहाँ यह स्पष्टीकरण है - 'यह लोक संताप से उत्पन्न है, दुःख से घिरा है' इत्यादि के द्वारा रागाग्नि आदि से लोक-सन्निवास (संसार) के प्रज्वलित होने आदि के आकार को देखने से महाकरुणा-समापत्ति के पूर्व भाग में, और समापत्ति में भी प्रथम ध्यान के वश से कहना चाहिए। जैसा कि कहा गया है (पटि. म. 1.117-118) - ‘‘බහූහි [Pg.138] ආකාරෙහි පස්සන්තානං බුද්ධානං භගවන්තානං සත්තෙසු මහාකරුණා ඔක්කමති, ආදිත්තො ලොකසන්නිවාසොති පස්සන්තානං බුද්ධානං භගවන්තානං සත්තෙසු මහාකරුණා ඔක්කමති. උය්යුත්තො, පයාතො, කුම්මග්ගපටිපන්නො, උපනීයති ලොකො අද්ධුවො, අතාණො ලොකො අනභිස්සරො, අස්සකො ලොකො, සබ්බං පහාය ගමනීයං, ඌනො ලොකො අතිත්තො තණ්හාදාසො. अनेक आकारों से देखते हुए बुद्धों, भगवानों की सत्त्वों पर महाकरुणा उत्पन्न होती है; 'लोक-सन्निवास प्रज्वलित है' - ऐसा देखते हुए बुद्धों, भगवानों की सत्त्वों पर महाकरुणा उत्पन्न होती है। लोक (संसार) उद्योग में लगा है, प्रस्थान कर चुका है, कुमार्ग पर चल रहा है; लोक ले जाया जा रहा है, अध्रुव (अस्थिर) है; लोक बिना त्राण (रक्षा) के है, बिना स्वामी के है; लोक का अपना कुछ नहीं है, सब कुछ छोड़कर जाना है; लोक अपूर्ण है, अतृप्त है, तृष्णा का दास है। ‘‘අතායනො ලොකසන්නිවාසො, අලෙණො, අසරණො, අසරණීභූතො, උද්ධතො ලොකො අවූපසන්තො, සසල්ලො ලොකසන්නිවාසො විද්ධො පුථුසල්ලෙහි, අවිජ්ජන්ධකාරාවරණො කිලෙසපඤ්ජරපරික්ඛිත්තො, අවිජ්ජාගතො ලොකසන්නිවාසො අණ්ඩභූතො පරියොනද්ධො තන්තාකුලකජාතො කුලාගුණ්ඨිකජාතො මුඤ්ජපබ්බජභූතො අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං සංසාරං නාතිවත්තතීති පස්සන්තානං, අවිජ්ජාවිසදොසසංලිත්තො කිලෙසකලලීභූතො, රාගදොසමොහජටාජටිතො. लोक-सन्निवास रक्षक-रहित है, शरण-रहित है, आश्रय-रहित है, निराश्रय हो गया है; लोक उद्विग्न है, अशान्त है; लोक-सन्निवास शल्य-युक्त है, अनेक शल्यों (तीरों) से बिंधा हुआ है; अविद्या रूपी अन्धकार के आवरण से ढका है, क्लेश रूपी पिंजरे से घिरा है; लोक-सन्निवास अविद्या में पड़ा है, अण्डे के समान (बन्द) है, ढका हुआ है, धागों के समान उलझा हुआ है, धागों की गाँठ के समान उलझा हुआ है, मूँज और बब्बज घास के समान (जटिल) हो गया है, वह अपाय, दुर्गति, विनिपात और संसार का उल्लंघन नहीं कर पाता - ऐसा देखते हुए; अविद्या रूपी विष के दोष से लिप्त है, क्लेश रूपी कीचड़ बन गया है, राग, द्वेष और मोह की जटाओं से उलझा हुआ है। ‘‘තණ්හාසඞ්ඝාටපටිමුක්කො, තණ්හාජාලෙන ඔත්ථටො, තණ්හාසොතෙන වුය්හති, තණ්හාසංයොජනෙන සංයුත්තො, තණ්හානුසයෙන අනුසටො, තණ්හාසන්තාපෙන සන්තප්පති, තණ්හාපරිළාහෙන පරිඩය්හති. तृष्णा रूपी वस्त्र से बँधा है, तृष्णा रूपी जाल से ढका है, तृष्णा रूपी स्रोत में बह रहा है, तृष्णा रूपी संयोजन (बन्धन) से युक्त है, तृष्णा रूपी अनुशय (सुप्त प्रवृत्ति) से अनुगत है, तृष्णा के संताप से तप रहा है, तृष्णा की जलन से जल रहा है। ‘‘දිට්ඨිසඞ්ඝාටපටිමුක්කො, දිට්ඨිජාලෙන ඔත්ථටො, දිට්ඨිසොතෙන වුය්හති, දිට්ඨිසංයොජනෙන සංයුත්තො, දිට්ඨානුසයෙන අනුසටො, දිට්ඨිසන්තාපෙන සන්තප්පති, දිට්ඨිපරිළාහෙන පරිඩය්හති. दृष्टि (मिथ्या दृष्टि) रूपी वस्त्र से बँधा है, दृष्टि रूपी जाल से ढका है, दृष्टि रूपी स्रोत में बह रहा है, दृष्टि रूपी संयोजन से युक्त है, दृष्टि रूपी अनुशय से अनुगत है, दृष्टि के संताप से तप रहा है, दृष्टि की जलन से जल रहा है। ‘‘ජාතියා අනුගතො, ජරාය අනුසටො, බ්යාධිනා අභිභූතො, මරණෙන අබ්භාහතො, දුක්ඛෙ පතිට්ඨිතො. जाति (जन्म) से अनुगत है, जरा (बुढ़ापे) से पीछा किया गया है, व्याधि (रोग) से अभिभूत है, मरण से आहत है, दुःख में स्थित है। ‘‘තණ්හාය ඔඩ්ඩිතො, ජරාපාකාරපරික්ඛිත්තො, මච්චුපාසපරික්ඛිත්තො, මහාබන්ධනබද්ධො, ලොකසන්නිවාසො, රාගබන්ධනෙන, දොසමොහබන්ධනෙන, මානදිට්ඨිකිලෙසදුච්චරිතබන්ධනෙන බද්ධො, මහාසම්බාධපටිපන්නො, මහාපලිබොධෙන පලිබුද්ධො, මහාපපාතෙ පතිතො, මහාකන්තාරපටිපන්නො, මහාසංසාරපටිපන්නො, මහාවිදුග්ගෙ සම්පරිවත්තති, මහාපලිපෙ පලිපන්නො. तृष्णा द्वारा फँसाया गया है, जरा रूपी प्राचीर (दीवार) से घिरा है, मृत्यु के पाश से घिरा है, महान बन्धन में बँधा है; लोक-सन्निवास राग के बन्धन से, द्वेष और मोह के बन्धन से, मान, दृष्टि, क्लेश और दुश्चरित के बन्धन से बँधा है; महान संकट में पड़ा है, महान बाधाओं से बाधित है, महान प्रपात (खाई) में गिरा है, महान कान्तार (जंगल) में पड़ा है, महान संसार में पड़ा है, महान दुर्गम स्थान में भटक रहा है, महान दलदल में फँसा है। ‘‘අබ්භාහතො [Pg.139] ලොකසන්නිවාසො, ආදිත්තො ලොකසන්නිවාසො රාගග්ගිනා, දොසග්ගිනා, මොහග්ගිනා ජාතියා…පෙ… උපායාසෙහි, උන්නීතකො ලොකසන්නිවාසො හඤ්ඤති නිච්චමතාණො පත්තදණ්ඩො තක්කරො, වජ්ජබන්ධනබද්ධො ආඝාතනපච්චුපට්ඨිතො, අනාථො ලොකසන්නිවාසො පරමකාරුඤ්ඤතං පත්තො, දුක්ඛාභිතුන්නො චිරරත්තපීළිතො, නිච්චගධිතො නිච්චපිපාසිතො. लोक-सन्निवेश (संसार के प्राणी) अभिहत (पीड़ित) है, लोक-सन्निवेश राग की अग्नि, द्वेष की अग्नि, मोह की अग्नि, जाति (जन्म)... आदि... और उपायासों (निराशाओं) से प्रज्वलित है। लोक-सन्निवेश (वध के लिए) ले जाया जा रहा है, वह नित्य ही रक्षकहीन होकर मारा जा रहा है, जैसे दण्ड प्राप्त चोर हो, जो वध-बन्धन से बँधा हुआ वध-स्थान पर उपस्थित हो। लोक-सन्निवेश अनाथ है, परम करुणाजनक अवस्था को प्राप्त है, दुःख से अभिभूत है, चिरकाल से पीड़ित है, नित्य आसक्त और नित्य तृषित है। ‘‘අන්ධො, අචක්ඛුකො, හතනෙත්තො, අපරිණායකො, විපථපක්ඛන්දො, අඤ්ජසාපරද්ධො, මහොඝපක්ඛන්දො. वह अंधा है, चक्षुहीन है, नष्ट-नेत्र वाला है, बिना किसी मार्गदर्शक के है, कुमार्ग पर चलने वाला है, सन्मार्ग से भटका हुआ है और महा-ओघ (संसार रूपी बाढ़) में गिरा हुआ है। ‘‘ද්වීහි දිට්ඨිගතෙහි පරියුට්ඨිතො, තීහි දුච්චරිතෙහි විප්පටිපන්නො, චතූහි යොගෙහි යොජිතො, චතූහි ගන්ථෙහි ගන්ථිතො, චතූහි උපාදානෙහි උපාදීයති, පඤ්චගතිසමාරුළ්හො, පඤ්චහි කාමගුණෙහි රජ්ජති, පඤ්චහි නීවරණෙහි ඔත්ථටො, ඡහි විවාදමූලෙහි විවදති, ඡහි තණ්හාකායෙහි රජ්ජති, ඡහි දිට්ඨිගතෙහි පරියුට්ඨිතො, සත්තහි අනුසයෙහි අනුසටො, සත්තහි සංයොජනෙහි සංයුත්තො, සත්තහි මානෙහි උන්නතො, අට්ඨහි ලොකධම්මෙහි සම්පරිවත්තති, අට්ඨහි මිච්ඡත්තෙහි නියතො, අට්ඨහි පුරිසදොසෙහි දුස්සති, නවහි ආඝාතවත්ථූහි ආඝාතිතො, නවහි මානෙහි උන්නතො, නවහි තණ්හාමූලකෙහි ධම්මෙහි රජ්ජති, දසහි කිලෙසවත්ථූහි කිලිස්සති, දසහි ආඝාතවත්ථූහි ආඝාතිතො, දසහි අකුසලකම්මපථෙහි සමන්නාගතො, දසහි සංයොජනෙහි සංයුත්තො, දසහි මිච්ඡත්තෙහි නියතො, දසවත්ථුකාය දිට්ඨියා සමන්නාගතො, දසවත්ථුකාය අන්තග්ගාහිකාය දිට්ඨියා සමන්නාගතො, අට්ඨසතතණ්හාපපඤ්චෙහි පපඤ්චිතො, ද්වාසට්ඨියා දිට්ඨිගතෙහි පරියුට්ඨිතො ලොකසන්නිවාසොති සම්පස්සන්තානං බුද්ධානං භගවන්තානං සත්තෙසු මහාකරුණා ඔක්කමති. दो दृष्टिगतों (शाश्वत और उच्छेद) से घिरा हुआ, तीन दुश्चरितों से भ्रष्ट, चार योगों से युक्त, चार ग्रन्थों से ग्रन्थित, चार उपादानों से पकड़ा हुआ, पाँच गतियों में आरूढ़, पाँच कामगुणों में आसक्त, पाँच नीवरणों से ढका हुआ, छह विवाद-मूलों से विवाद करने वाला, छह तृष्णा-कायों में आसक्त, छह दृष्टिगतों से घिरा हुआ, सात अनुशयों से अनुगत, सात संयोजनों से संयुक्त, सात मानों से उन्नत (अहंकारी), आठ लोक-धर्मों से प्रभावित, आठ मिथ्यात्वों में नियत, आठ पुरुष-दोषों से दूषित, नौ आघात-वस्तुओं से आहत, नौ मानों से उन्नत, नौ तृष्णा-मूलक धर्मों में आसक्त, दस क्लेश-वस्तुओं से क्लिष्ट, दस आघात-वस्तुओं से आहत, दस अकुशल कर्मपथों से युक्त, दस संयोजनों से संयुक्त, दस मिथ्यात्वों में नियत, दस-वस्तुओं वाली (मिथ्या) दृष्टि से युक्त, दस-वस्तुओं वाली अन्तग्राहिका दृष्टि से युक्त, एक सौ आठ तृष्णा-प्रपंचों से प्रपंचित और बासठ दृष्टिगतों से घिरा हुआ यह लोक-सन्निवेश है—ऐसा देखते हुए बुद्धों, भगवानों की सत्त्वों के प्रति महाकरुणा उत्पन्न होती है। ‘‘අහඤ්චම්හි තිණ්ණො, ලොකො ච අතිණ්ණො. අහඤ්චම්හි මුත්තො, ලොකො ච අමුත්තො. අහඤ්චම්හි දන්තො, ලොකො ච [Pg.140] අදන්තො. අහඤ්චම්හි සන්තො, ලොකො ච අසන්තො. අහඤ්චම්හි අස්සත්ථො, ලොකො ච අනස්සත්ථො. අහඤ්චම්හි පරිනිබ්බුතො, ලොකො ච අපරිනිබ්බුතො. පහොමි ඛ්වාහං තිණ්ණො තාරෙතුං, මුත්තො මොචෙතුං, දන්තො දමෙතුං, සන්තො සමෙතුං, අස්සත්ථො අස්සාසෙතුං, පරිනිබ්බුතො පරෙ ච පරිනිබ්බාපෙතුන්ති පස්සන්තානං බුද්ධානං භගවන්තානං සත්තෙසු මහාකරුණා ඔක්කමතී’’ති (පටි. ම. 1.117-118). ‘मैं पार कर गया हूँ, किन्तु लोक पार नहीं कर पाया है। मैं मुक्त हूँ, किन्तु लोक मुक्त नहीं है। मैं दान्त (दमित) हूँ, किन्तु लोक अदान्त है। मैं शान्त हूँ, किन्तु लोक अशान्त है। मैं आश्वस्त हूँ, किन्तु लोक अनाश्वस्त है। मैं परिनिर्वृत हूँ, किन्तु लोक अपरिनिर्वृत है। मैं पार कर चुका हूँ, अतः दूसरों को पार कराने में समर्थ हूँ; मुक्त हूँ, अतः मुक्त कराने में; दान्त हूँ, अतः दमन करने में; शान्त हूँ, अतः शान्त करने में; आश्वस्त हूँ, अतः आश्वासन देने में; और परिनिर्वृत हूँ, अतः दूसरों को परिनिर्वाण प्राप्त कराने में समर्थ हूँ’—ऐसा देखते हुए बुद्धों, भगवानों की सत्त्वों के प्रति महाकरुणा उत्पन्न होती है। ඉමිනාව නයෙන භගවතො සත්තෙසු මෙත්තාඔක්කමනඤ්ච විභාවෙතබ්බං. කරුණාවිසයස්ස හි දුක්ඛස්ස පටිපක්ඛභූතං සුඛං සත්තෙසු උපසංහරන්තී මෙත්තාපි පවත්තතීති ඉධ අබ්යාපාදඅවිහිංසාවිතක්කා ඛෙමවිතක්කො. පවිවෙකවිතක්කො පන නෙක්ඛම්මවිතක්කොයෙව, තස්ස දිබ්බවිහාරඅරියවිහාරෙසු පුබ්බභාගස්ස පඨමජ්ඣානස්ස පච්චවෙක්ඛණාය ච වසෙන පවත්ති වෙදිතබ්බා. තත්ථ යෙ තෙ භගවතො දෙවසිකං වළඤ්ජනකවසෙන චතුවීසතිකොටිසතසහස්සසඞ්ඛා සමාපත්තිවිහාරා, යෙසං පුරෙචරණභාවෙන පවත්තං සමාධිචරියානුගතං ඤාණචරියානුගතං ඤාණං චතුවීසතිකොටිසතසහස්සසමාපත්තිසඤ්චාරිමහාවජිරඤාණන්ති වුච්චති, තෙසං වසෙන භගවතො පවිවෙකවිතක්කස්ස බහුලං පවත්ති වෙදිතබ්බා. අයඤ්ච අත්ථො මහාසච්චකසුත්තෙනපි වෙදිතබ්බො. වුත්තඤ්හි තත්ථ භගවතා – इसी रीति से भगवान की सत्त्वों के प्रति मैत्री के उत्पन्न होने की भी व्याख्या की जानी चाहिए। करुणा के विषयभूत दुःख के प्रतिपक्ष स्वरूप सुख को सत्त्वों में पहुँचाती हुई मैत्री भी प्रवृत्त होती है, इसलिए यहाँ अव्यापाद और अविहिंसा वितर्क ही 'क्षेम-वितर्क' हैं। 'प्रविवेक-वितर्क' तो नैष्क्रम्य-वितर्क ही है, उसकी प्रवृत्ति दिव्य-विहारों और आर्य-विहारों के पूर्वभाग रूप प्रथम ध्यान के प्रत्यवेक्षण के वश से जाननी चाहिए। वहाँ भगवान के जो प्रतिदिन सेवन करने योग्य चौबीस लाख करोड़ समापत्ति-विहार हैं, जिनके पुरोगामी रूप में प्रवृत्त समाधि-चर्यानुगत और ज्ञान-चर्यानुगत ज्ञान को 'चौबीस लाख करोड़ समापत्तियों में संचरण करने वाला महावज्र-ज्ञान' कहा जाता है, उनके वश से भगवान के प्रविवेक-वितर्क की बहुलता से प्रवृत्ति जाननी चाहिए। यह अर्थ महासच्चक सुत्त से भी जानना चाहिए। वहाँ भगवान ने कहा है— ‘‘සො ඛො අහං, අග්ගිවෙස්සන, තස්මිංයෙව පුරිමස්මිං සමාධිනිමිත්තෙ අජ්ඣත්තමෙව චිත්තං සණ්ඨපෙමි, සන්නිසාදෙමි, යෙන සුදං නිච්චකප්පං විහරාමී’’ති (ම. නි. 1.387). ‘हे अग्निवेश्य! मैं उसी पूर्ववर्ती समाधि-निमित्त में ही अपने चित्त को भीतर ही स्थापित करता हूँ, शान्त करता हूँ, जिससे मैं निरन्तर विहार करता हूँ।’ ඉදඤ්හි භගවා ‘‘සමණො ගොතමො අභිරූපො පාසාදිකො සුඵුසිතං දන්තාවරණං, ජිව්හා තනුකා, මධුරං වචනං, තෙන පරිසං රඤ්ජෙන්තො මඤ්ඤෙ විචරති, චිත්තෙ පනස්ස එකග්ගතා නත්ථි, යො එවං සඤ්ඤත්තිබහුලො චරතී’’ති සච්චකෙන නිගණ්ඨපුත්තෙන විතක්කිතෙ අවස්සං සහොඪං චොරං ගණ්හන්තො විය ‘‘න අග්ගිවෙස්සන තථාගතො පරිසං රඤ්ජෙන්තො සඤ්ඤත්තිබහුලො විචරති, චක්කවාළපරියන්තායපි පරිසාය ධම්මං දෙසෙති, අසල්ලීනො අනුපලිත්තො එකත්තං එකවිහාරිසුඤ්ඤතාඵලසමාපත්තිඵලං අනුයුත්තො’’ති දස්සෙතුං ආහරි. भगवान ने यह (वचन) इसलिए कहा क्योंकि निगण्ठपुत्र सच्चक ने ऐसा सोचा था—‘श्रमण गौतम रूपवान हैं, दर्शनीय हैं, उनके दाँत और होंठ सुन्दर हैं, जिह्वा पतली है, वाणी मधुर है, मानो वे इसी से परिषद् को प्रसन्न करते हुए विचरते हैं, किन्तु उनके चित्त में एकाग्रता नहीं है, जो इस प्रकार बहुत समझाने-बुझाने में लगे रहते हैं।’ अतः जैसे रंगे हाथों चोर को पकड़ा जाता है, वैसे ही भगवान ने यह दिखाने के लिए कहा—‘हे अग्निवेश्य! तथागत परिषद् को प्रसन्न करने के लिए या बहुत समझाने-बुझाने के लिए नहीं विचरते हैं; वे चक्रवाल की सीमा तक की परिषद् को भी धर्मोपदेश देते हैं, (किन्तु वे) अप्रमत्त, निर्लिप्त, एकाग्रता और एकाकी विहार रूप शून्यता-फल-समापत्ति के फल में संलग्न रहते हैं।’ භගවා [Pg.141] හි යස්මිං ඛණෙ පරිසා සාධුකාරං දෙති, ධම්මං වා පච්චවෙක්ඛති, තස්මිං ඛණෙ පුබ්බභාගෙන කාලං පරිච්ඡින්දිත්වා ඵලසමාපත්තිං අස්සාසවාරෙ පස්සාසවාරෙ සමාපජ්ජති, සාධුකාරසද්දනිග්ඝොසෙ අවිච්ඡින්නෙයෙව ධම්මපච්චවෙක්ඛණාය ච පරියොසානෙ සමාපත්තිතො වුට්ඨාය ඨිතට්ඨානතො පට්ඨාය ධම්මං දෙසෙති. බුද්ධානඤ්හි භවඞ්ගපරිවාසො ලහුකො, අස්සාසවාරෙ පස්සාසවාරෙ සමාපත්තියො සමාපජ්ජන්ති. එවං යථාවුත්තසමාපත්තීනං සපුබ්බභාගානං වසෙන භගවතො ඛෙමවිතක්කස්ස පවිවෙකවිතක්කස්ස ච බහුලප්පවත්ති වෙදිතබ්බා. भगवान जिस क्षण परिषद् 'साधुकार' (जयकार) देती है या धर्म का प्रत्यवेक्षण करती है, उसी क्षण पहले से ही समय निश्चित कर श्वास लेने और छोड़ने के अन्तराल में फल-समापत्ति को प्राप्त हो जाते हैं। साधुकार की ध्वनि के गूँजते रहने के दौरान और धर्म-प्रत्यवेक्षण की समाप्ति पर वे समापत्ति से उठकर, जहाँ खड़े होते हैं वहीं से धर्मोपदेश देते हैं। बुद्धों का भवाङ्ग-परिवर्तन बहुत लघु (शीघ्र) होता है, वे श्वास लेने और छोड़ने के अन्तराल में भी समापत्तियों को प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार, यथोक्त समापत्तियों और उनके पूर्वभागों के वश से भगवान के क्षेम-वितर्क और प्रविवेक-वितर्क की बहुलता से प्रवृत्ति जाननी चाहिए। තත්ථ යස්ස බ්යාපාදවිහිංසාවිතක්කාදිසංකිලෙසප්පහානස්ස අබ්යාපාදවිතක්කස්ස අවිහිංසාවිතක්කස්ස ච ආනුභාවෙන කුතොචිපි භයාභාවතො තංසමඞ්ගී ඛෙමප්පත්තො ච විහරති, තතො ච සබ්බස්සපි සබ්බදාපි ඛෙමමෙව හොති අභයමෙව. තස්මා දුවිධොපි උභයෙසං ඛෙමඞ්කරොති ඛෙමවිතක්කො. යස්ස පන කාමවිතක්කාදිසංකිලෙසපහානස්ස නෙක්ඛම්මවිතක්කස්ස ආනුභාවෙන කායවිවෙකො, චිත්තවිවෙකො, උපධිවිවෙකොති තිවිධො; තදඞ්ගවිවෙකො, වික්ඛම්භනවිවෙකො, සමුච්ඡෙදවිවෙකො, පටිප්පස්සද්ධිවිවෙකො, නිස්සරණවිවෙකොති පඤ්චවිධො ච විවෙකො පාරිපූරිං ගච්ඡති. සො යථාරහං ආරම්මණතො සම්පයොගතො ච පවිවෙකසහගතො විතක්කොති පවිවෙකවිතක්කො. එතෙ ච ද්වෙ විතක්කා එවං විභත්තවිසයාපි සමානා ආදිකම්මිකානං අඤ්ඤමඤ්ඤූපකාරාය සම්භවන්ති. යථා හි ඛෙමවිතක්කස්ස පවිවෙකවිතක්කො අනුප්පන්නස්ස උප්පාදාය උප්පන්නස්ස භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලාය හොති, එවං පවිවෙකවිතක්කස්සපි ඛෙමවිතක්කො. න හි වූපකට්ඨකායචිත්තානමන්තරෙන මෙත්තාවිහාරාදයො සම්භවන්ති බ්යාපාදාදිප්පහානෙන ච විනා චිත්තවිවෙකාදීනං අසම්භවොයෙවාති අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස බහූපකාරා එතෙ ධම්මා දට්ඨබ්බා. භගවතො පන සබ්බසො පහීනසංකිලෙසස්ස ලොකහිතත්ථාය එවං ඛෙමවිතක්කො ච පවිවෙකවිතක්කො ච අස්සාසවාරමත්තෙපි හිතසුඛමාවහන්තියෙවාති. ඛෙමො ච විතක්කො පවිවෙකො ච විතක්කොති සම්බන්ධිතබ්බං. वहाँ, जिस व्यापाद (द्वेष) और विहिंसा (हिंसा) के वितर्कों आदि संक्लेशों के प्रहाण (त्याग) से, अव्यापाद वितर्क और अविहिंसा वितर्क के प्रभाव से कहीं से भी भय न होने के कारण, वह (साधक) क्षेम (कल्याण/सुरक्षा) को प्राप्त होकर विहार करता है, और उससे सभी के लिए और सदा ही क्षेम और अभय ही होता है। इसलिए दोनों प्रकार से दोनों के लिए क्षेम करने वाला 'क्षेम-वितर्क' है। और जिसके काम-वितर्क आदि संक्लेशों के प्रहाण से, नैष्क्रम्य-वितर्क के प्रभाव से काय-विवेक, चित्त-विवेक और उपधि-विवेक—ये तीन प्रकार के; तथा तदंग-विवेक, विष्खम्भन-विवेक, समुच्छेद-विवेक, प्रतिप्रश्रब्धि-विवेक और निस्सरण-विवेक—ये पाँच प्रकार के विवेक परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं। वह यथायोग्य आलम्बन और सम्प्रयोग से प्रविवेक-युक्त वितर्क 'प्रविवेक-वितर्क' है। ये दोनों वितर्क इस प्रकार भिन्न विषयों वाले होते हुए भी आदिकर्मिकों (आरम्भ करने वालों) के लिए एक-दूसरे के उपकारी होते हैं। जैसे क्षेम-वितर्क के लिए प्रविवेक-वितर्क अनुत्पन्न की उत्पत्ति के लिए और उत्पन्न की वृद्धि एवं विपुलता के लिए होता है, वैसे ही प्रविवेक-वितर्क के लिए क्षेम-वितर्क भी होता है। क्योंकि शरीर और चित्त के विवेक (एकांत) के बिना मैत्री-विहार आदि संभव नहीं हैं, और व्यापाद आदि के प्रहाण के बिना चित्त-विवेक आदि का होना असंभव ही है; अतः इन धर्मों को एक-दूसरे के लिए बहुत उपकारी समझना चाहिए। भगवान के लिए, जिनके संक्लेश पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं, लोक-कल्याण के लिए इस प्रकार क्षेम-वितर्क और प्रविवेक-वितर्क श्वास लेने मात्र के समय में भी हित और सुख ही लाते हैं। 'क्षेम और वितर्क' तथा 'प्रविवेक और वितर्क'—इस प्रकार संबंध जोड़ना चाहिए। එවං උද්දිට්ඨෙ ද්වෙ විතක්කෙ නිද්දිසිතුං ‘‘අබ්යාපජ්ඣාරාමො’’තිආදිමාහ. තත්ථ අබ්යාපජ්ඣනං කස්සචි අදුක්ඛනං අබ්යාපජ්ඣො, සො ආරමිතබ්බතො ආරාමො [Pg.142] එතස්සාති අබ්යාපජ්ඣාරාමො. අබ්යාපජ්ඣෙ රතො සෙවනවසෙන නිරතොති අබ්යාපජ්ඣරතො. එසෙවාති එසො එව. ඉරියායාති කිරියාය, කායවචීපයොගෙනාති අත්ථො. න කඤ්චි බ්යාබාධෙමීති හීනාදීසු කඤ්චිපි සත්තං තණ්හාතසාදියොගතො තසං වා තදභාවතො පහීනසබ්බකිලෙසවිප්ඵන්දිතත්තා ථාවරං වා න බාධෙමි න දුක්ඛාපෙමි. කරුණජ්ඣාසයො භගවා මහාකරුණාසමාපත්තිබහුලො අත්තනො පරමරුචිතකරුණජ්ඣාසයානුරූපමෙවමාහ. තෙන අවිහිංසාවිතක්කං අබ්යාපාදවිතක්කඤ්ච දස්සෙති. ඉදං වුත්තං හොති – ‘අහං ඉමාය ඉරියාය ඉමාය පටිපත්තියා එවං සම්මා පටිපජ්ජන්තො එවං සමාපත්තිවිහාරෙහි විහරන්තො එවං පුඤ්ඤත්ථිකෙහි කතානි සක්කාරගරුකාරමානනවන්දනපූජනානි අධිවාසෙන්තො සත්තෙසු න කඤ්චි බ්යාබාධෙමි, අපිච ඛො දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකපරමත්ථප්පභෙදං හිතසුඛමෙව නෙසං පරිබ්රූහෙමී’ති. इस प्रकार निर्दिष्ट दो वितर्कों का निर्देश करने के लिए "अव्यापज्झाराम" (अव्यापन्न-आराम) आदि कहा गया है। वहाँ, किसी को दुःख न देना 'अव्यापज्झ' (अव्यापन्न) है, वह रमण करने योग्य होने के कारण जिसका आराम (विश्राम स्थल) है, वह 'अव्यापज्झाराम' है। अव्यापन्न में रत, सेवन के कारण निरत (लगा हुआ) 'अव्यापज्झरत' है। 'एसेव' का अर्थ 'एष एव' (यही) है। 'इरियाय' का अर्थ 'क्रिया से', अर्थात् काय और वाणी के प्रयोग से है। 'न कञ्चि ब्याबाधेमि' (किसी को बाधा नहीं पहुँचाता हूँ) का अर्थ है कि हीन आदि किसी भी प्राणी को, तृष्णा और त्रास के योग से 'त्रस' (भयभीत) को या उसके अभाव से और सभी क्लेशों के स्पन्दन के नष्ट हो जाने से 'स्थावर' (स्थिर) को, न मैं बाधा पहुँचाता हूँ और न दुःख देता हूँ। करुणा के आशय वाले, महाकरुणा-समापत्ति में बहुल रहने वाले भगवान ने अपने परम प्रिय करुणा-आशय के अनुरूप ही ऐसा कहा है। इससे वे अविहिंसा-वितर्क और अव्यापाद-वितर्क को दर्शाते हैं। यह कहा गया है— 'मैं इस चर्या से, इस प्रतिपत्ति (साधना) से, इस प्रकार सम्यक् प्रतिपन्न होता हुआ, इस प्रकार समापत्ति-विहारों से विहार करता हुआ, इस प्रकार पुण्यार्थियों द्वारा किए गए सत्कार, गुरुकार, मानन, वन्दन और पूजन को स्वीकार करता हुआ, प्राणियों में किसी को बाधा नहीं पहुँचाता हूँ, अपितु उनके दृष्टधार्मिक (इस लोक के), साम्परायिक (परलोक के) और परमार्थ रूपी भेदों वाले हित-सुख को ही बढ़ाता हूँ'। යං අකුසලං, තං පහීනන්ති යං දියඩ්ඪකිලෙසසහස්සභෙදං අඤ්ඤඤ්ච තංසම්පයුත්තං අනන්තප්පභෙදං අකුසලං, තං සබ්බං බොධිමූලෙයෙව මය්හං පහීනං සමූහතන්ති. ඉමිනා පවිවෙකෙසු මුද්ධභූතෙන සද්ධිං නිස්සරණවිවෙකෙන සමුච්ඡෙදප්පටිප්පස්සද්ධිවිවෙකෙ දස්සෙති. කෙචි පනෙත්ථ තදඞ්ගවික්ඛම්භනවිවෙකෙපි උද්ධරන්ති. ආගමනීයපටිපදාය හි සද්ධිං භගවතා අත්තනො කිලෙසක්ඛයො ඉධ වුත්තොති. "जो अकुशल है, वह प्रहीण (नष्ट) है" का अर्थ है कि जो पंद्रह सौ क्लेशों के भेदों वाला और अन्य उससे सम्प्रयुक्त अनन्त भेदों वाला अकुशल है, वह सब बोधि-वृक्ष के मूल में ही मेरा प्रहीण और समूल नष्ट हो गया है। इसके द्वारा, विवेकों में मूर्धन्य (सर्वोच्च) 'निस्सरण-विवेक' के साथ 'समुच्छेद-विवेक' और 'प्रतिप्रश्रब्धि-विवेक' को दर्शाते हैं। यहाँ कुछ लोग 'तदंग-विवेक' और 'विष्खम्भन-विवेक' को भी उद्धृत करते हैं। क्योंकि आगमनीय प्रतिपदा (आने वाली साधना पद्धति) के साथ भगवान ने यहाँ अपने क्लेशों के क्षय की बात कही है। ඉති භගවා අපරිමිතකප්පපරිචිත්තං අත්තනො පවිවෙකජ්ඣාසයං සද්ධිං නිස්සරණජ්ඣාසයෙන ඉදානි මත්ථකං පාපෙත්වා ඨිතො තමජ්ඣාසයං ඵලසමාපත්තිං සමාපජ්ජිත්වා අත්තනො කිලෙසප්පහානපච්චවෙක්ඛණමුඛෙන විභාවෙති. යදත්ථං පනෙත්ථ සත්ථා ඉමෙ ද්වෙ විතක්කෙ උද්ධරි, ඉදානි තමත්ථං දස්සෙන්තො ‘‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. භගවා හි ඉමස්ස විතක්කද්වයස්ස අත්තනො බහුලසමුදාචාරදස්සනමුඛෙනෙව තත්ථ භික්ඛූ නිවෙසෙතුං ඉමං දෙසනං ආරභි. इस प्रकार भगवान ने अपरिमित कल्पों से संचित अपने प्रविवेक-आशय को, निस्सरण-आशय के साथ अब पराकाष्ठा (शिखर) पर पहुँचाकर स्थित होकर, उस आशय वाली फल-समापत्ति में समापन्न होकर, अपने क्लेश-प्रहाण के प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। जिस प्रयोजन के लिए शास्ता ने यहाँ इन दो वितर्कों को उद्धृत किया, अब उस अर्थ को दर्शाते हुए "तस्मातिह, भिक्खवे" (इसलिए यहाँ, भिक्षुओं) आदि कहा। भगवान ने इन दो वितर्कों के अपने (जीवन में) बहुल अभ्यास को दिखाने के माध्यम से ही भिक्षुओं को उसमें प्रवृत्त करने के लिए यह देशना आरम्भ की। තත්ථ තස්මාති යස්මා අබ්යාපජ්ඣපවිවෙකාභිරතස්ස මෙ ඛෙමපවිවෙකවිතක්කායෙව බහුලං පවත්තන්ති, තස්මා. තිහාති නිපාතමත්තං. අබ්යාපජ්ඣාරාමා [Pg.143] විහරථාති සබ්බසත්තෙසු මෙත්තාවිහාරෙන කරුණාවිහාරෙ න ච අභිරමන්තා විහරථ. තෙන බ්යාපාදස්ස තදෙකට්ඨකිලෙසානඤ්ච දූරීකරණමාහ. තෙසං වොති එත්ථ වොති නිපාතමත්තං. පවිවෙකාරාමා විහරථාති කායාදිවිවෙකඤ්චෙව තදඞ්ගාදිවිවෙකඤ්චාති සබ්බවිවෙකෙ ආරමිතබ්බට්ඨානං කත්වා විහරථ. ඉමාය මයන්තිආදි යථා නෙසං ඛෙමවිතක්කස්ස පවත්තනාකාරදස්සනං, එවං කිං අකුසලන්තිආදි පවිවෙකවිතක්කස්ස පවත්තනාකාරදස්සනං. තත්ථ යථා අනවජ්ජධම්මෙ පරිපූරෙතුකාමෙන කිංකුසලගවෙසිනා හුත්වා කුසලධම්මපරියෙසනා කාතබ්බාව, සාවජ්ජධම්මෙ පජහිතුකාමෙනාපි අකුසලපරියෙසනා කාතබ්බාති ආහ ‘‘කිං අකුසල’’න්තිආදි. අභිඤ්ඤාපුබ්බිකා හි පරිඤ්ඤාපහානසච්ඡිකිරියාභාවනා. තත්ථ කිං අකුසලන්ති අකුසලං නාම කිං, සභාවතො කිමස්ස ලක්ඛණං, කානි වා රසපච්චුපට්ඨානපදට්ඨානානීති අකුසලස්ස සභාවකිච්චාදිතො පච්චවෙක්ඛණවිධිං දස්සෙති. ආදිකම්මිකවසෙන චෙස විතක්කො ආගතො, කිං අප්පහීනං කිං පජහාමාති ඉදං පදද්වයං සෙක්ඛවසෙන. තස්මා කිං අප්පහීනන්ති කාමරාගසංයොජනාදීසු අකුසලෙසු කිං අකුසලං අම්හාකං මග්ගෙන අසමුච්ඡින්නං? කිං පජහාමාති කිං අකුසලං සමුග්ඝාතෙම? අථ වා කිං පජහාමාති වීතික්කමපරියුට්ඨානානුසයෙසු කිං විභාගං අකුසලං ඉදානි මයං පජහාමාති අත්ථො. කෙචි පන ‘‘කිං අප්පහීන’’න්ති පඨන්ති. තෙසං දිට්ඨිසංයොජනාදිවසෙන අනෙකභෙදෙසු අකුසලෙසු කිං කතමං අකුසලං, කෙන කතමෙන පකාරෙන, කතමෙන වා මග්ගෙන අම්හාකං අප්පහීනන්ති වුත්තං හොති. සෙසං වුත්තනයමෙව. वहाँ 'तस्मा' (इसलिए) का अर्थ है - क्योंकि मुझ अव्यापज्झ (अद्वेष) और प्रविवेक (एकान्त) में रमण करने वाले के क्षेम और प्रविवेक सम्बन्धी वितर्क ही बहुलता से प्रवर्तित होते हैं, इसलिए। 'तिहा' मात्र एक निपात है। 'अव्यापज्झारामा विहरथ' (अद्वेष में रमण करते हुए विहार करो) का अर्थ है - सभी सत्त्वों में मैत्री विहार और करुणा विहार में रमण करते हुए विहार करो। इसके द्वारा व्यापाद (द्वेष) और उसके साथ रहने वाले क्लेशों को दूर करने की बात कही गई है। 'तेसं वो' यहाँ 'वो' मात्र एक निपात है। 'पविवेकरामा विहरथ' (प्रविवेक में रमण करते हुए विहार करो) का अर्थ है - काय-विवेक और तदङ्ग-विवेक आदि सभी विवेकों को रमण करने का स्थान बनाकर विहार करो। 'इमाय मयं' इत्यादि के द्वारा जैसे उनके क्षेम-वितर्क की प्रवृत्ति का आकार दिखाया गया है, वैसे ही 'किं अकुसलं' इत्यादि के द्वारा प्रविवेक-वितर्क की प्रवृत्ति का आकार दिखाया गया है। वहाँ जैसे अनवद्य (निर्दोष) धर्मों को परिपूर्ण करने की इच्छा रखने वाले 'किं-कुशल-गवेषी' (क्या कुशल है, यह खोजने वाले) होकर कुशल धर्मों की खोज करनी चाहिए, वैसे ही सावद्य (दोषयुक्त) धर्मों को त्यागने की इच्छा रखने वाले को अकुशल की भी खोज करनी चाहिए, इसलिए 'किं अकुसलं' इत्यादि कहा गया है। क्योंकि अभिज्ञा (विशेष ज्ञान) के बाद ही परिज्ञा, प्रहाण, साक्षात्करण और भावना होती है। वहाँ 'किं अकुसलं' का अर्थ है - अकुशल क्या है, स्वभाव से इसका लक्षण क्या है, अथवा इसके रस (कृत्य), प्रत्युपस्थान (प्रकट होना) और पदस्थान (निकट कारण) क्या हैं - इस प्रकार अकुशल के स्वभाव और कृत्य आदि के द्वारा प्रत्यवेक्षण की विधि को दर्शाता है। यह वितर्क आदिकर्मिक (प्रारम्भ करने वाले) के वश से आया है, 'किं अप्पहीनं' (क्या प्रहीण नहीं हुआ) और 'किं पजहाम' (क्या त्यागें) - ये दो पद शैक्ष (साधकों) के वश से हैं। इसलिए 'किं अप्पहीनं' का अर्थ है - कामराग-संयोजन आदि अकुशल धर्मों में से कौन सा अकुशल हमारे मार्ग द्वारा उच्छिन्न नहीं हुआ है? 'किं पजहाम' का अर्थ है - किस अकुशल का हम समूद्घात (विनाश) करें? अथवा 'किं पजहाम' का अर्थ है - वीतिक्क्रम (उल्लंघन), पर्युत्थान (उठना) और अनुशय (सुप्त क्लेश) में से अकुशल के किस विभाग को अब हम त्यागें। कुछ लोग 'किं अप्पहीनं' ऐसा पाठ पढ़ते हैं। उनके अनुसार दृष्टि-संयोजन आदि के भेद से अनेक प्रकार के अकुशलों में से कौन सा अकुशल, किस प्रकार से, या किस मार्ग से हमारे द्वारा प्रहीण नहीं हुआ है - यह कहा गया है। शेष पहले कहे गए नय के अनुसार ही है। ගාථාසු බුද්ධන්ති චතුන්නං අරියසච්චානං අවිපරීතං සයම්භුඤාණෙන බුද්ධත්තා පටිවිද්ධත්තා බුද්ධං සච්චවිනිමුත්තස්ස ඤෙය්යස්ස අභාවතො. තථා හි වුත්තං – गाथाओं में 'बुद्धं' का अर्थ है - चार आर्य सत्यों को यथार्थ रूप से स्वयंभू ज्ञान के द्वारा जान लेने और प्रतिवेध (साक्षात्) कर लेने के कारण 'बुद्ध' हैं, क्योंकि सत्यों से मुक्त (अलग) कोई अन्य ज्ञेय (जानने योग्य) नहीं है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘අභිඤ්ඤෙය්යං අභිඤ්ඤාතං, භාවෙතබ්බඤ්ච භාවිතං; පහාතබ්බං පහීනං මෙ, තස්මා බුද්ධොස්මි බ්රාහ්මණා’’ති. (සු. නි. 563; ම. නි. 2.399); "जो जानने योग्य था उसे जान लिया गया है, जो भावना करने योग्य था उसकी भावना कर ली गई है, जो त्यागने योग्य था उसे मेरे द्वारा त्याग दिया गया है; इसलिए हे ब्राह्मण! मैं बुद्ध हूँ।" ඨපෙත්වා මහාබොධිසත්තං අඤ්ඤෙහි සහිතුං වහිතුං අසක්කුණෙය්යත්තා අසය්හස්ස සකලස්ස බොධිසම්භාරස්ස මහාකරුණාධිකාරස්ස ච සහනතො වහනතො, තථා අඤ්ඤෙහි සහිතුං අභිභවිතුං දුක්කරත්තා අසය්හානං [Pg.144] පඤ්චන්නං මාරානං සහනතො අභිභවනතො, ආසයානුසයචරියාධිමුත්තිආදිවිභාගාවබොධෙන යථාරහං වෙනෙය්යානං දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකපරමත්ථෙහි අනුසාසනසඞ්ඛාතස්ස අඤ්ඤෙහි අසය්හස්ස බුද්ධකිච්චස්ස සහනතො වහනතො, තත්ථ වා සාධුකාරිභාවතො අසය්හසාහිනං. සමුදාචරන්ති නන්ති එත්ථ නන්ති නිපාතමත්තං, නං තථාගතන්ති වා අත්ථො. महाबोधिसत्व को छोड़कर दूसरों के द्वारा सहन करने और वहन करने में असमर्थ होने के कारण, असह्य (असहनीय) समस्त बोधिसम्भार और महाकरुणा के अधिकार को सहन करने और वहन करने से; तथा दूसरों के द्वारा सहन करने और अभिभूत करने में कठिन होने के कारण, असह्य पाँच मारों को सहन करने और अभिभूत करने से; आशय, अनुशय, चर्या और अधिमुक्ति आदि के विभाग के बोध के द्वारा यथायोग्य विनेय जनों (शिष्यों) को दृष्टधार्मिक (इहलोक), साम्परायिक (परलोक) और परमार्थ के उपदेश रूपी, दूसरों के द्वारा असह्य बुद्ध-कृत्य को सहन करने और वहन करने से, अथवा उसमें भली-भाँति कार्य करने के कारण 'असह्यसाही' (असह्य को सहने वाले) हैं। 'समुदाचरन्ति नन्ति' यहाँ 'नन्ति' मात्र एक निपात है, अथवा 'न' का अर्थ 'उस तथागत को' है। සකපරසන්තානෙසු තමසඞ්ඛාතං මොහන්ධකාරං නුදි ඛිපීති තමොනුදො. පාරං නිබ්බානං ගතොති පාරගතො. අථ වා ‘‘මුත්තො මොචෙය්ය’’න්තිආදිනා නයෙන පවත්තිතස්ස මහාභිනීහාරස්ස සකලස්ස වා සංසාරදුක්ඛස්ස සබ්බඤ්ඤුගුණානං පාරං පරියන්තං ගතොති පාරගතො, තං තමොනුදං පාරගතං. තතො එව පත්තිපත්තං බුද්ධං, සීලාදිං දසබලඤාණාදිඤ්ච සම්මාසම්බුද්ධෙහි පත්තබ්බං සබ්බං පත්තන්ති අත්ථො. වසිමන්ති ඣානාදීසු ආකඞ්ඛාපටිබද්ධො පරමො ආවජ්ජනාදිවසිභාවො, අරියිද්ධිසඞ්ඛාතො අනඤ්ඤසාධාරණො චිත්තවසිභාවො ච අස්ස අත්ථීති වසිමා, තං වසිමං, වසිනන්ති අත්ථො. සබ්බෙසං කාමාසවාදීනං අභාවෙන අනාසවං. කායවිසමාදිකස්ස විසමස්ස වන්තත්තා වා විසසඞ්ඛාතං සබ්බං කිලෙසමලං තරිත්වා වා විසං සකලවට්ටදුක්ඛං සයං තරිත්වා තාරණතො විසන්තරො තං විසන්තරං. තණ්හක්ඛයෙ අරහත්තඵලෙ නිබ්බානෙ වා විමුත්තං, උභයම්හි ගමනතො මොනසඞ්ඛාතෙන ඤාණෙන කායමොනෙය්යාදීහි වා සාතිසයං සමන්නාගතත්තා මුනිං. මුනීති හි අගාරියමුනි, අනගාරියමුනි, සෙක්ඛමුනි, අසෙක්ඛමුනි, පච්චෙකමුනි, මුනිමුනීති අනෙකවිධා මුනයො. තත්ථ ගිහී ආගතඵලො විඤ්ඤාතසාසනො අගාරියමුනි, තථාරූපො පබ්බජිතො අනගාරියමුනි, සත්ත සෙක්ඛා සෙක්ඛමුනි, ඛීණාසවො අසෙක්ඛමුනි, පච්චෙකබුද්ධො පච්චෙකමුනි, සම්මාසම්බුද්ධො මුනිමුනීති. අයමෙව ඉධාධිප්පෙතො. ආයතිං පුනබ්භවාභාවතො අන්තිමං, පච්ඡිමං දෙහං කායං ධාරෙතීති අන්තිමදෙහධාරී, තං අන්තිමදෙහධාරිං. කිලෙසමාරාදීනං සම්මදෙව පරිච්චත්තත්තා මාරඤ්ජහං. තතො එව ජරාහෙතුසමුච්ඡෙදතො අනුපාදිසෙසනිබ්බානප්පත්තිවසෙන පාකටජරාදිසබ්බජරාය පාරගුං. ජරාසීසෙන චෙත්ථ ජාතිමරණසොකාදීනං පාරගමනං වුත්තන්ති දට්ඨබ්බං. තං එවංභූතං තථාගතං දුවෙ විතක්කා සමුදාචරන්තීති බ්රූමීති සම්බන්ධො. अपने और दूसरों के सन्तान (चित्त-धारा) में तमस रूपी मोह-अन्धकार को दूर किया, फेंक दिया, इसलिए 'तमोमुद' हैं। पार (निर्वाण) को प्राप्त हुए, इसलिए 'पारगत' हैं। अथवा "मुक्त होकर मुक्त करूँ" इत्यादि नय से प्रवृत्त महाभिनिहार (महान संकल्प) के, अथवा समस्त संसार-दुःख के, अथवा सर्वज्ञता के गुणों के पार (अन्त) तक पहुँच गए, इसलिए 'पारगत' हैं; उस तमोमुद और पारगत को। उसी कारण से 'प्राप्ति-प्राप्त' बुद्ध को, अर्थात् शील आदि और दशबल-ज्ञान आदि जो कुछ भी सम्यक्सम्बुद्धों द्वारा प्राप्त करने योग्य है, वह सब प्राप्त कर लिया है, यह अर्थ है। 'वसी' का अर्थ है - ध्यान आदि में इच्छा के अनुसार परम आवर्जन (चित्त को मोड़ना) आदि का वशीभाव, और आर्य-ऋद्धि रूपी असाधारण चित्त-वशीभाव जिसका है, वह 'वसी' है; उस वसी को, अर्थात् वश में रखने वाले को। सभी कामासव आदि के अभाव के कारण 'अनास्रव' हैं। काय-विषमता आदि विषमता को त्याग देने के कारण, अथवा 'विष' संज्ञक समस्त क्लेश-मल को पार कर लेने के कारण, अथवा 'विष' रूपी समस्त वट्ट-दुःख (संसार-दुःख) को स्वयं पार कर दूसरों को तारने के कारण 'विसन्तर' हैं; उस विसन्तर को। तृष्णा के क्षय होने पर अर्हत् फल में अथवा निर्वाण में विमुक्त को; दोनों में गमन करने के कारण, 'मौन' संज्ञक ज्ञान से अथवा काय-मौनेय आदि से अतिशय रूप से युक्त होने के कारण 'मुनि' हैं। मुनि अनेक प्रकार के होते हैं - अगारिय-मुनि, अनगारिय-मुनि, शैक्ष-मुनि, अशैक्ष-मुनि, प्रत्येक-मुनि और मुनि-मुनि। वहाँ फल-प्राप्त और शासन को जानने वाला गृहस्थ 'अगारिय-मुनि' है; वैसा ही प्रव्रजित 'अनगारिय-मुनि' है; सात शैक्ष 'शैक्ष-मुनि' हैं; क्षीणास्रव 'अशैक्ष-मुनि' है; प्रत्येक बुद्ध 'प्रत्येक-मुनि' है; और सम्यक्सम्बुद्ध 'मुनि-मुनि' है। यहाँ यही अभिप्रेत है। भविष्य में पुनर्जन्म न होने के कारण अन्तिम (पिछले) देह (शरीर) को धारण करते हैं, इसलिए 'अन्तिमदेहधारी' हैं; उस अन्तिमदेहधारी को। क्लेश-मार आदि का भली-भाँति परित्याग कर देने के कारण 'मारजह' (मार को छोड़ने वाले) हैं। उसी कारण से जरा के हेतु का उच्छेद कर देने से, अनुपधिशेष निर्वाण की प्राप्ति के द्वारा प्रकट जरा आदि सभी प्रकार की जरा के पार पहुँच गए हैं, इसलिए 'जरा-पारगु' हैं। यहाँ 'जरा' शब्द से जाति, मरण, शोक आदि के पार जाने की बात कही गई है, ऐसा समझना चाहिए। उस इस प्रकार के तथागत के प्रति दो वितर्क उत्पन्न होते हैं - ऐसा मैं कहता हूँ, यह सम्बन्ध है। ඉති [Pg.145] භගවා පඨමගාථාය විතක්කද්වයං උද්දිසිත්වා තතො දුතියගාථාය පවිවෙකවිතක්කං දස්සෙත්වා ඉදානි ඛෙමවිතක්කං දස්සෙතුං ‘‘සෙලෙ යථා’’ති තතියගාථමාහ. තත්ථ සෙලෙ යථා පබ්බතමුද්ධනිට්ඨිතොති සෙලෙ සිලාමයෙ එකග්ඝනපබ්බතමුද්ධනි යථා ඨිතො. න හි තත්ථ ඨිතස්ස උද්ධං ගීවුක්ඛිපනපසාරණාදිකිච්චං අත්ථි. තථූපමන්ති තප්පටිභාගං සෙලපබ්බතූපමං. අයං පනෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යථා සෙලපබ්බතමුද්ධනි ඨිතො චක්ඛුමා පුරිසො සමන්තතො ජනතං පස්සෙය්ය, එවමෙව සුමෙධො, සුන්දරපඤ්ඤො සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණෙන සමන්තචක්ඛු භගවා ධම්මමයං පඤ්ඤාමයං පාසාදමාරුය්හ සයං අපෙතසොකො සොකාවතිණ්ණං ජාතිජරාභිභූතඤ්ච ජනතං සත්තකායං අවෙක්ඛති උපධාරයති උපපරික්ඛති. අයං පනෙත්ථ අධිප්පායො – යථා හි පබ්බතපාදෙ සමන්තා මහන්තං ඛෙත්තං කත්වා තත්ථ කෙදාරපාළීසු කුටියො කත්වා රත්තිං අග්ගිං ජාලෙය්ය, චතුරඞ්ගසමන්නාගතඤ්ච අන්ධකාරං භවෙය්ය, අථස්ස පබ්බතස්ස මත්ථකෙ ඨත්වා චක්ඛුමතො පුරිසස්ස භූමිප්පදෙසං ඔලොකයතො නෙව ඛෙත්තං, න කෙදාරපාළියො, න කුටියො, න තත්ථ සයිතමනුස්සා පඤ්ඤායෙය්යුං, කුටීසු පන අග්ගිජාලමත්තමෙව පඤ්ඤායෙය්ය, එවං ධම්මමයං පාසාදමාරුය්හ සත්තකායං ඔලොකයතො තථාගතස්ස යෙ තෙ අකතකල්යාණා සත්තා, තෙ එකවිහාරෙ දක්ඛිණපස්සෙ නිසින්නාපි බුද්ධඤාණස්ස ආපාථං නාගච්ඡන්ති, රත්තිං ඛිත්තසරා විය හොන්ති. යෙ පන කතකල්යාණා වෙනෙය්යපුග්ගලා, තෙ එවස්ස දූරෙපි ඨිතා ආපාථං ආගච්ඡන්ති, සො අග්ගි විය හිමවන්තපබ්බතො විය ච වුත්තම්පි චෙතං – इस प्रकार भगवान ने पहली गाथा में दो वितर्कों का निर्देश कर, फिर दूसरी गाथा में प्रविवेक-वितर्क (एकान्त के विचार) को दिखाकर, अब क्षेम-वितर्क (शांति के विचार) को दिखाने के लिए 'सेले यथा' (जैसे पर्वत पर) यह तीसरी गाथा कही। वहाँ 'सेले यथा' का अर्थ है पर्वत के शिखर पर स्थित, जैसे पत्थर के बने एक ठोस पर्वत के शिखर पर स्थित हो। वहाँ स्थित व्यक्ति को अपनी गर्दन ऊपर उठाने या फैलाने आदि की कोई आवश्यकता नहीं होती। 'तथूपमं' का अर्थ है उसके समान, उस पर्वत के सदृश। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है - जैसे पर्वत के शिखर पर खड़ा चक्षुमान (नेत्रों वाला) पुरुष चारों ओर के लोगों को देख सकता है, वैसे ही सुमेध (उत्तम बुद्धि वाले), सर्वज्ञता-ज्ञान के कारण समन्तचक्षु (सब ओर देखने वाले) भगवान धर्ममय और प्रज्ञामय प्रासाद (महल) पर चढ़कर, स्वयं शोकरहित होकर, शोक में डूबे हुए तथा जन्म और जरा से अभिभूत जनसमूह (प्राणियों) को देखते हैं, उन पर विचार करते हैं और उनका निरीक्षण करते हैं। यहाँ यह अभिप्राय है - जैसे पर्वत की तलहटी में चारों ओर एक बड़ा खेत बनाकर, वहाँ क्यारियों में कुटिया बनाकर रात में आग जलाई जाए, और चारों ओर घना अंधकार हो, तब पर्वत के शिखर पर खड़े होकर नीचे देखने वाले चक्षुमान पुरुष को न तो खेत, न क्यारियाँ, न कुटिया और न ही वहाँ सोए हुए मनुष्य दिखाई देंगे, कुटियों में केवल अग्नि की ज्वाला ही दिखाई देगी; इसी प्रकार धर्ममय प्रासाद पर चढ़कर प्राणियों को देखने वाले तथागत को वे प्राणी जो पुण्यहीन (अकृतकल्याण) हैं, वे एक ही विहार के दाहिने हिस्से में बैठे होने पर भी बुद्ध-ज्ञान के क्षेत्र में नहीं आते, वे रात में छोड़े गए बाणों के समान होते हैं। लेकिन जो पुण्यवान (कृतकल्याण) विनेय पुद्गल (शिक्षा के योग्य व्यक्ति) हैं, वे दूर स्थित होने पर भी उनके ज्ञान के क्षेत्र में आ जाते हैं, वे अग्नि के समान और हिमालय पर्वत के समान होते हैं, जैसा कि कहा भी गया है - ‘‘දූරෙ සන්තො පකාසෙන්ති, හිමවන්තොව පබ්බතො; අසන්තෙත්ථ න දිස්සන්ති, රත්තිං ඛිත්තා යථා සරා’’ති. (ධ. ප. 304; නෙත්ති. 11); “सज्जन पुरुष हिमालय पर्वत की तरह दूर से ही प्रकाशित होते हैं; (किन्तु) दुर्जन यहाँ रात में छोड़े गए बाणों की तरह दिखाई नहीं देते।” එවමෙතස්මිං සුත්තෙ ගාථාසු ච භගවා අත්තානං පරං විය කත්වා දස්සෙසි. इस प्रकार इस सुत्त और गाथाओं में भगवान ने स्वयं को किसी अन्य (तीसरे व्यक्ति) की तरह करके दिखाया है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सुत्त का वर्णन (व्याख्या) समाप्त हुआ। 2. දෙසනාසුත්තවණ්ණනා २. देशना सुत्त का वर्णन 39. දුතියෙ පරියායෙනාති එත්ථ පරියාය-සද්දො ‘‘මධුපිණ්ඩිකපරියායොත්වෙව නං ධාරෙහී’’තිආදීසු (ම. නි. 1.205) දෙසනායං ආගතො. ‘‘අත්ථි ඛ්වෙස[Pg.146], බ්රාහ්මණ, පරියායො, යෙන මං පරියායෙන සම්මා වදමානො වදෙය්ය – අකිරියවාදො සමණො ගොතමො’’තිආදීසු (පාරා. 5; අ. නි. 8.11) කාරණෙ. ‘‘කස්ස නු ඛො, ආනන්ද, අජ්ජ පරියායො භික්ඛුනියො ඔවදිතු’’න්තිආදීසු (ම. නි. 3.398) වාරෙ. ඉධ පන වාරෙපි කාරණෙපි වට්ටති, තස්මා, භික්ඛවෙ, තථාගතස්ස ද්වෙ ධම්මදෙසනා යථාරහං කාරණෙන භවන්ති, වාරෙන වාති අයමෙත්ථ අත්ථො. භගවා හි වෙනෙය්යජ්ඣාසයානුරූපං කදාචි ‘‘ඉමෙ ධම්මා කුසලා, ඉමෙ, ධම්මා අකුසලා. ඉමෙ ධම්මා සාවජ්ජා, ඉමෙ ධම්මා අනවජ්ජා. ඉමෙ සෙවිතබ්බා, ඉමෙ න සෙවිතබ්බා’’තිආදිනා කුසලාකුසලධම්මෙ විභජන්තො කුසලධම්මෙහි අකුසලධම්මෙ අසඞ්කරතො පඤ්ඤාපෙන්තො ‘‘පාපං පාපකතො පස්සථා’’ති ධම්මං දෙසෙති. කදාචි ‘‘පාණාතිපාතො, භික්ඛවෙ, ආසෙවිතො භාවිතො බහුලීකතො නිරයසංවත්තනිකො තිරච්ඡානයොනිසංවත්තනිකො පෙත්තිවිසයසංවත්තනිකො, යො සබ්බලහුකො පාණාතිපාතො, සො අප්පායුකසංවත්තනිකො’’තිආදිනා (අ. නි. 8.40) ආදීනවං පකාසෙන්තො පාපතො නිබ්බිදාදීහි නියොජෙන්තො ‘‘නිබ්බින්දථ විරජ්ජථා’’ති ධම්මං දෙසෙති. ३९. दूसरे (सुत्त) में 'परियायेन' (पर्याय से) यहाँ 'पर्याय' शब्द 'मधुपिण्डिक पर्याय के रूप में इसे धारण करो' आदि में 'देशना' (उपदेश) के अर्थ में आया है। 'हे ब्राह्मण, एक पर्याय (कारण) है जिससे मुझे सही कहते हुए कोई कह सकता है कि श्रमण गौतम अक्रियावादी है' आदि में 'कारण' के अर्थ में आया है। 'आनन्द, आज भिक्षुणियों को उपदेश देने की किसकी पर्याय (बारी) है' आदि में 'वार' (बारी/अवसर) के अर्थ में आया है। यहाँ यह 'बारी' और 'कारण' दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है, इसलिए 'हे भिक्षुओं, तथागत की दो धर्म-देशनाएँ यथायोग्य कारण से या बारी से होती हैं' - यह यहाँ अर्थ है। भगवान विनेय जनों के आशय के अनुरूप कभी 'ये धर्म कुशल हैं, ये धर्म अकुशल हैं; ये धर्म सदोष हैं, ये धर्म निर्दोष हैं; इनका सेवन करना चाहिए, इनका सेवन नहीं करना चाहिए' आदि के द्वारा कुशल और अकुशल धर्मों का विभाजन करते हुए, कुशल धर्मों को अकुशल धर्मों के साथ मिश्रित न करते हुए प्रज्ञापित करते हैं और 'पाप को पाप के रूप में देखो' इस प्रकार धर्म का उपदेश देते हैं। कभी 'भिक्षुओं, प्राणातिपात (हिंसा) का सेवन करने, अभ्यास करने और बार-बार करने से वह नरक, तिर्यक योनि और प्रेत योनि में ले जाने वाला होता है; जो सबसे हल्का प्राणातिपात है, वह अल्पायु बनाने वाला होता है' आदि के द्वारा दोष (आदीनव) को प्रकाशित करते हुए, पाप से निर्वेद (वैराग्य) आदि में नियुक्त करते हुए 'निर्वेद प्राप्त करो, विरक्त हो जाओ' इस प्रकार धर्म का उपदेश देते हैं। භවන්තීති හොන්ති පවත්තන්ති. පාපං පාපකතො පස්සථාති සබ්බං පාපධම්මං දිට්ඨෙව ධම්මෙ ආයතිඤ්ච අහිතදුක්ඛාවහතො ලාමකතො පස්සථ. තත්ථ නිබ්බින්දථාති තස්මිං පාපධම්මෙ ‘‘අච්චන්තහීනභාවතො ලාමකට්ඨෙන පාපං, අකොසල්ලසම්භූතට්ඨෙන අකුසලං, පකතිපභස්සරස්ස පසන්නස්ස ච චිත්තස්ස පභස්සරාදිභාවවිනාසනතො සංකිලෙසිකං, පුනප්පුනං භවදුක්ඛනිබ්බත්තනතො පොනොබ්භවිකං, සහෙව දරථෙහි පරිළාහෙහි වත්තනතො සදරථං, දුක්ඛස්සෙව විපච්චනතො දුක්ඛවිපාකං, අපරිමාණම්පි කාලං අනාගතෙ ජාතිජරාමරණනිබ්බත්තනතො ආයතිං ජාතිජරාමරණියං, සබ්බහිතසුඛවිද්ධංසනසමත්ථ’’න්තිආදිනා නයෙන නානාවිධෙ ආදීනවෙ, තස්ස ච පහානෙ ආනිසංසෙ සම්මපඤ්ඤාය පස්සන්තා නිබ්බින්දථ නිබ්බෙදං ආපජ්ජථ. නිබ්බින්දන්තා ච විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අරියමග්ගාධිගමෙන පාපතො විරජ්ජථ චෙව විමුච්චථ ච. මග්ගෙන වා සමුච්ඡෙදවිරාගවසෙන විරජ්ජථ, තතො ඵලෙන පටිප්පස්සද්ධිවිමුත්තිවසෙන විමුච්චථ. අථ වා පාපන්ති ලාමකතො පාපං. කිං වුත්තං හොති? යං අනිච්චදුක්ඛාදිභාවෙන කුච්ඡිතං අරියෙහි ජිගුච්ඡනීයං [Pg.147] වට්ටදුක්ඛං පාපෙතීති පාපං. කිං පන තං? තෙභූමකධම්මජාතං. යථාවුත්තෙන අත්ථෙන පාපකතො දිස්වා තත්ථ අනිච්චතො, දුක්ඛතො, රොගතො, ගණ්ඩතො, සල්ලතො, අඝතො, ආබාධතොතිආදිනා විපස්සනං වඩ්ඪෙන්තා නිබ්බින්දථ. අයං දුතියාති යාථාවතො අහිතානත්ථවිභාවනං පඨමං උපාදාය තතො විවෙචනං අයං දුතියා ධම්මදෙසනා. 'भवन्ति' का अर्थ है होते हैं, प्रवृत्त होते हैं। 'पाप को पाप के रूप में देखो' का अर्थ है सभी पापमय धर्मों को इसी जन्म में और भविष्य में अहित और दुःख लाने वाले, नीच रूप में देखो। 'वहाँ निर्वेद प्राप्त करो' का अर्थ है उस पापमय धर्म में—'अत्यन्त हीन होने के कारण नीच अर्थ में पाप है, अकुशलता से उत्पन्न होने के कारण अकुशल है, स्वभाव से प्रभास्वर और प्रसन्न चित्त की प्रभास्वरता आदि का विनाश करने के कारण संक्लेशिक है, बार-बार भव-दुःख उत्पन्न करने के कारण पुनब्भविक है, दरथ (पीड़ा) और परिदाह के साथ होने के कारण सदरथ है, दुःख के रूप में ही विपाक देने के कारण दुःखविपाक है, भविष्य में अपरिमेय काल तक जाति-जरा-मरण उत्पन्न करने के कारण भविष्य में जाति-जरा-मरण वाला है, समस्त हित और सुख का विनाश करने में समर्थ है'—इस प्रकार अनेक प्रकार के दोषों को, और उसके प्रहाण में लाभों को सम्यक् प्रज्ञा से देखते हुए निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त करो। निर्वेद प्राप्त करते हुए और विपश्यना को बढ़ाकर आर्यमार्ग की प्राप्ति द्वारा पाप से विरक्त होओ और मुक्त होओ। अथवा मार्ग द्वारा समुच्छेद-विराग के वश से विरक्त होओ, फिर फल द्वारा प्रतिप्रश्रब्धि-विमुक्ति के वश से मुक्त होओ। अथवा 'पाप' का अर्थ है नीच होने के कारण पाप। क्या कहा गया है? जो अनित्य-दुःख आदि भाव के कारण निन्दित है, आर्यों द्वारा घृणा के योग्य है और जो वट्ट-दुःख (संसार चक्र के दुःख) को प्राप्त कराता है, वह पाप है। वह क्या है? तीनों भूमियों (काम, रूप, अरूप) में उत्पन्न धर्म। पूर्वोक्त अर्थ में पाप के रूप में देखकर, वहाँ अनित्य, दुःख, रोग, गण्ड (फोड़ा), शल्य, अघ, आबाध आदि के रूप में विपश्यना बढ़ाते हुए निर्वेद प्राप्त करो। 'यह दूसरी है'—यथार्थ रूप से अहित और अनर्थ का स्पष्टीकरण करने वाली पहली (देशना) को लेकर, उसके बाद उससे पृथक करना यह दूसरी धर्मदेशना है। ගාථාසු බුද්ධස්සාති සබ්බඤ්ඤුබුද්ධස්ස. සබ්බභූතානුකම්පිනොති සබ්බෙපි සත්තෙ මහාකරුණාය අනුකම්පනසභාවස්ස. පරියායවචනන්ති පරියායෙන කථනං දෙසනං. පස්සාති පරිසං ආලපති, පරිසජෙට්ඨකං වා සන්ධාය වුත්තං. කෙචි පනාහු ‘‘අත්තානමෙව සන්ධාය භගවා ‘පස්සා’ති අවොචා’’ති. තත්ථාති තස්මිං පාපකෙ විරජ්ජථ රාගං පජහථාති අත්ථො. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथाओं में 'बुद्धस्य' का अर्थ है सर्वज्ञ बुद्ध का। 'सब्बभूतानुकम्पिनो' का अर्थ है सभी प्राणियों पर महाकरुणा से अनुकम्पा करने वाले स्वभाव वाले का। 'पर्यायवचन' का अर्थ है पर्याय से कथन या देशना। 'देखो' (पस्स) का अर्थ है परिषद् को सम्बोधित करता है, अथवा परिषद् के ज्येष्ठ को लक्ष्य करके कहा गया है। कुछ लोग कहते हैं—"भगवान् ने स्वयं को ही लक्ष्य करके 'देखो' कहा है।" 'वहाँ' का अर्थ है उस पाप में 'विरक्त होओ' अर्थात् राग का त्याग करो। शेष पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. විජ්ජාසුත්තවණ්ණනා ३. विद्या-सूत्र की व्याख्या। 40. තතියෙ පුබ්බඞ්ගමාති සහජාතවසෙන, උපනිස්සයවසෙන චාති ද්වීහි ආකාරෙහි පුබ්බඞ්ගමා පුරස්සරා පධානකාරණං. න හි අවිජ්ජාය විනා අකුසලුප්පත්ති අත්ථි. සමාපත්තියාති සමාපජ්ජනාය සභාවපටිලාභාය, පවත්තියාති අත්ථො. තත්ථ අකුසලප්පවත්තියා ආදීනවප්පටිච්ඡාදනෙන අයොනිසොමනසිකාරස්ස පච්චයභාවෙන අප්පහීනභාවෙන ච අකුසලධම්මානං උපනිස්සයභාවො දිස්සති. ४०. तीसरे (सूत्र) में 'पुब्बङ्गमा' (अग्रगामी) का अर्थ है—सहजात के वश से और उपनिश्रय के वश से, इन दो प्रकारों से अग्रगामी, पुरःसर, प्रधान कारण। क्योंकि अविद्या के बिना अकुशल की उत्पत्ति नहीं होती। 'समापत्तिया' का अर्थ है समापत्ति के लिए, स्वभाव की प्राप्ति के लिए, 'प्रवृत्ति' के लिए। वहाँ अकुशल की प्रवृत्ति में दोषों को छिपाने के कारण, अयोनिशो मनसिकार का प्रत्यय होने के कारण और प्रहीण न होने के कारण अकुशल धर्मों का उपनिश्रय भाव दिखाई देता है। එවං බ්යාධිමරණාදිදුක්ඛස්ස අධිට්ඨානභාවතො සබ්බාපි ගතියො ඉධ දුග්ගතියො. අථ වා රාගාදිකිලෙසෙහි දූසිතා ගතියො කායවචීචිත්තානං පවත්තියොති දුග්ගතියො, කායවචීමනොදුච්චරිතානි. අස්මිං ලොකෙති ඉධ ලොකෙ මනුස්සගතියං වා. පරම්හි චාති තතො අඤ්ඤාසු ගතීසු. අවිජ්ජාමූලිකා සබ්බාති තා සබ්බාපි දුච්චරිතස්ස විපත්තියො වුත්තනයෙන අවිජ්ජාපුබ්බඞ්ගමත්තා අවිජ්ජාමූලිකා එව. ඉච්ඡාලොභසමුස්සයාති අසම්පත්තවිසයපරියෙසනලක්ඛණාය ඉච්ඡාය, සම්පත්තවිසයලුබ්භනලක්ඛණෙන ලොභෙන ච සමුස්සිතා උපචිතාති ඉච්ඡාලොභසමුස්සයා. इस प्रकार व्याधि, मरण आदि दुःख का अधिष्ठान होने के कारण यहाँ सभी गतियाँ 'दुर्गतियाँ' हैं। अथवा राग आदि क्लेशों से दूषित काया, वाणी और चित्त की प्रवृत्तियाँ 'दुर्गतियाँ' हैं, अर्थात् काय-वचन-मन के दुश्चरित। 'इस लोक में' का अर्थ है इस लोक में या मनुष्य गति में। 'परलोक में' का अर्थ है उससे अन्य गतियों में। 'सभी अविद्या-मूलक हैं' का अर्थ है वे सभी दुश्चरित की विपत्तियाँ पूर्वोक्त रीति से अविद्या के अग्रगामी होने के कारण अविद्या-मूलक ही हैं। 'इच्छा-लोभ-समुच्चया' का अर्थ है अप्राप्त विषयों की खोज के लक्षण वाली 'इच्छा' से, और प्राप्त विषयों में लुब्ध होने के लक्षण वाले 'लोभ' से संचित या एकत्रित। යතොති [Pg.148] යස්මා අවිජ්ජාහෙතු අවිජ්ජාය නිවුතො හුත්වා. පාපිච්ඡොති අවිජ්ජාය පටිච්ඡාදිතත්තා පාපිච්ඡතාය ආදීනවෙ අපස්සන්තො අසන්තගුණසම්භාවනවසෙන කොහඤ්ඤාදීනි කරොන්තො පාපිච්ඡො, ලොභෙනෙව අත්රිච්ඡතාපි ගහිතාති දට්ඨබ්බා. අනාදරොති ලොකාධිපතිනො ඔත්තප්පස්ස අභාවෙන සබ්රහ්මචාරීසු ආදරරහිතො. තතොති තස්මා අවිජ්ජාපාපිච්ඡතාඅහිරිකානොත්තප්පහෙතු. පසවතීති කායදුච්චරිතාදිභෙදං පාපං උපචිනති. අපායං තෙන ගච්ඡතීති තෙන තථා පසුතෙන පාපෙන නිරයාදිභෙදං අපායං ගච්ඡති උපපජ්ජති. 'यतो' का अर्थ है जिस कारण से अविद्या के हेतु, अविद्या से ढका हुआ होकर। 'पापिच्छो' (पाप-इच्छा वाला) का अर्थ है अविद्या से ढके होने के कारण पाप-इच्छा के दोषों को न देखते हुए, असत्य गुणों के प्रदर्शन के वश से कुहना (पाखण्ड) आदि करने वाला 'पापिच्छ' है; लोभ के कारण ही अति-इच्छा भी इसमें सम्मिलित समझनी चाहिए। 'अनादरो' का अर्थ है लोक के अधिपति 'ओत्तप्प' (लोक-भय) के अभाव के कारण सब्रह्मचारियों में आदर रहित। 'ततो' का अर्थ है उस अविद्या, पाप-इच्छा, अहीरिक और अनोत्तप्प के कारण। 'प्रसवति' का अर्थ है काय-दुश्चरित आदि रूप पाप का संचय करता है। 'उससे अपाय को जाता है' का अर्थ है उस प्रकार संचित पाप से निरय (नरक) आदि रूप अपाय को जाता है, उत्पन्न होता है। තස්මාති යස්මා එතෙ එවං සබ්බදුච්චරිතමූලභූතා සබ්බදුග්ගතිපරික්කිලෙසහෙතුභූතා ච අවිජ්ජාදයො, තස්මා ඉච්ඡඤ්ච, ලොභඤ්ච, අවිජ්ජඤ්ච, චසද්දෙන අහිරිකානොත්තප්පඤ්ච විරාජයං සමුච්ඡෙදවසෙන පජහං. කථං විරාජෙතීති ආහ? විජ්ජං උප්පාදයන්ති, විපස්සනාපටිපාටියා ච, මග්ගපටිපාටියා ච, උස්සක්කිත්වා අරහත්තමග්ගවිජ්ජං අත්තනො සන්තානෙ උප්පාදයන්තො. සබ්බා දුග්ගතියොති සබ්බාපි දුච්චරිතසඞ්ඛාතා දුග්ගතියො, වට්ටදුක්ඛස්ස වා අධිට්ඨානභාවතො දුක්ඛා, සබ්බා පඤ්චපි ගතියො ජහෙ පජහෙය්ය සමතික්කමෙය්ය. කිලෙසවට්ටප්පහානෙනෙව හි කම්මවට්ටං විපාකවට්ටඤ්ච පහීනං හොතීති. 'तस्मा' का अर्थ है क्योंकि ये अविद्या आदि सभी दुश्चरितों के मूल और सभी दुर्गति-परिक्लेशों के हेतु हैं, इसलिए इच्छा, लोभ और अविद्या को, तथा 'च' शब्द से अहीरिक और अनोत्तप्प को भी 'विराजयं' अर्थात् समुच्छेद के वश से त्यागते हुए। कैसे विरक्त होता है? यह कहा—'विद्या को उत्पन्न करते हुए', विपश्यना के क्रम से और मार्ग के क्रम से, उन्नति कर अपने सन्तान (चित्त-सन्तति) में अर्हत्-मार्ग की विद्या को उत्पन्न करते हुए। 'सभी दुर्गतियों को' अर्थात् दुश्चरित संज्ञक सभी दुर्गतियों को, अथवा वट्ट-दुःख का अधिष्ठान होने के कारण दुःखों को, सभी पाँचों गतियों को 'त्याग दे' अर्थात् छोड़ दे, पार कर ले। क्योंकि क्लेश-वट्ट के प्रहाण से ही कर्म-वट्ट और विपाक-वट्ट प्रहीण हो जाते हैं। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। පඨමභාණවාරවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम भाणवार की व्याख्या समाप्त हुई। 4. පඤ්ඤාපරිහීනසුත්තවණ්ණනා ४. प्रज्ञा-परिहीण सूत्र की व्याख्या। 41. චතුත්ථෙ සුපරිහීනාති සුට්ඨු පරිහීනා. යෙ අරියාය පඤ්ඤාය පරිහීනාති යෙ සත්තා පඤ්චන්නං ඛන්ධානං උදයබ්බයපටිවිජ්ඣනෙන චතුසච්චපටිවිජ්ඣනෙන ච කිලෙසෙහි ආරකා ඨිතත්තා අරියාය පරිසුද්ධාය විපස්සනාපඤ්ඤාය ච මග්ගපඤ්ඤාය ච පරිහීනා, තෙ ලොකියලොකුත්තරාහි සම්පත්තීහි අතිවිය පරිහීනා මහාජානිකා. කෙ පන තෙති? යෙ කම්මාවරණෙන සමන්නාගතා. තෙ හි මිච්ඡත්තනියතභාවතො එකන්තෙන පරිහීනා අපරිපුණ්ණා මහාජානිකා. තෙනාහ ‘‘දුග්ගති පාටිකඞ්ඛා’’ති. විපාකාවරණසමඞ්ගිනොපි පරිහීනා. අථ වා සුක්කපක්ඛෙ අපරිහීනා නාම තිවිධාවරණවිරහිතා [Pg.149] සම්මාදිට්ඨිකා කම්මස්සකතඤාණෙන ච සමන්නාගතා. සෙසං වුත්තනයානුසාරෙන වෙදිතබ්බං. ४१. चौथे (सूत्र) में 'सुपरिहीना' का अर्थ है भली-भांति हीन (वंचित)। जो आर्य प्रज्ञा से हीन हैं, वे प्राणी पाँच स्कन्धों के उदय-व्यय के प्रतिवेध और चार आर्य सत्यों के प्रतिवेध द्वारा क्लेशों से दूर स्थित होने के कारण आर्य परिशुद्ध विपश्यना प्रज्ञा और मार्ग प्रज्ञा से हीन हैं, वे लौकिक और लोकोत्तर सम्पत्तियों से अत्यधिक हीन, महान हानि उठाने वाले हैं। वे कौन हैं? जो कर्मावरण से युक्त हैं। वे मिथ्यात्व में नियत होने के कारण एकान्त रूप से हीन, अपूर्ण और महान हानि वाले हैं। इसीलिए कहा गया है— 'दुर्गति की आशंका है'। विपाकावरण से युक्त भी हीन हैं। अथवा, शुक्ल पक्ष में 'अपरिहीन' वे कहलाते हैं जो त्रिविध आवरणों से रहित, सम्यग्दृष्टि वाले और कर्मस्वकीयता ज्ञान से युक्त हैं। शेष पूर्वोक्त विधि के अनुसार समझना चाहिए। ගාථාසු පඤ්ඤායාති නිස්සක්කවචනං, විපස්සනාඤාණතො මග්ගඤාණතො ච පරිහානෙනාති. සාමිවචනං වා එතං, යථාවුත්තඤාණස්ස පරිහානෙනාති, උප්පාදෙතබ්බස්ස අනුප්පාදනමෙව චෙත්ථ පරිහානං. නිවිට්ඨං නාමරූපස්මින්ති නාමරූපෙ උපාදානක්ඛන්ධපඤ්චකෙ ‘‘එතං මමා’’තිආදිනා තණ්හාදිට්ඨිවසෙන අභිනිවිට්ඨං අජ්ඣොසිතං, තතො එව ඉදං සච්චන්ති මඤ්ඤතීති ‘‘ඉදමෙව සච්චං මොඝමඤ්ඤ’’න්ති මඤ්ඤති. ‘‘සදෙවකෙ ලොකෙ’’ති විභත්ති පරිණාමෙතබ්බා. गाथाओं में 'प्रज्ञाया' (paññāyā) अपादान विभक्ति है, जिसका अर्थ है विपश्यना ज्ञान और मार्ग ज्ञान से हीन होने के कारण। अथवा यह षष्ठी विभक्ति है, अर्थात् पूर्वोक्त ज्ञान से हीन होने के कारण; यहाँ उत्पन्न करने योग्य (ज्ञान) को उत्पन्न न करना ही 'परिहाण' (हानि) है। 'नामरूपस्मिं निविट्ठं' का अर्थ है— नाम-रूप रूपी पाँच उपादान स्कन्धों में 'यह मेरा है' इत्यादि प्रकार से तृष्णा और दृष्टि के वश में होकर अभिनिविष्ट (आसक्त) होना, उसी कारण से 'यही सत्य है' ऐसा मानता है, अर्थात् 'यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है' ऐसा मानता है। 'सदेवक लोके' में विभक्ति का विपरिणाम (परिवर्तन) कर लेना चाहिए। එවං පඨමගාථාය සංකිලෙසපක්ඛං දස්සෙත්වා ඉදානි යස්සා අනුප්පත්තියා නාමරූපස්මිං මඤ්ඤනාභිනිවෙසෙහි කිලෙසවට්ටං වත්තති, තස්සා උප්පත්තියා වට්ටස්ස උපච්ඡෙදොති පඤ්ඤාය ආනුභාවං පකාසෙන්තො ‘‘පඤ්ඤා හි සෙට්ඨා ලොකස්මි’’න්ති ගාථමාහ. इस प्रकार पहली गाथा में संक्लेश पक्ष को दिखाकर, अब जिसकी प्राप्ति न होने से नाम-रूप में मान्यता और अभिनिवेश के कारण क्लेश-वर्त (संसार चक्र) चलता है, उसकी उत्पत्ति से वर्त (चक्र) का उच्छेद होता है— ऐसा प्रज्ञा के अनुभाव को प्रकाशित करते हुए 'पञ्ञा हि सेट्ठा लोकस्मिं' (प्रज्ञा ही लोक में श्रेष्ठ है) यह गाथा कही। තත්ථ ලොකස්මින්ති සඞ්ඛාරලොකස්මිං. සම්මාසම්බුද්ධො විය සත්තෙසු, සඞ්ඛාරෙසු පඤ්ඤාසදිසො ධම්මො නත්ථි. පඤ්ඤුත්තරා හි කුසලා ධම්මා, පඤ්ඤාය ච සිද්ධාය සබ්බෙ අනවජ්ජධම්මා සිද්ධා එව හොන්ති. තථා හි වුත්තං ‘‘සම්මාදිට්ඨිස්ස සම්මාසඞ්කප්පො පහොතී’’තිආදි (ම. නි. 3.141; සං. නි. 5.1). යා පනෙත්ථ පඤ්ඤා අධිප්පෙතා, සා සෙට්ඨාති ථොමිතා. යථා ච සා පවත්තති, තං දස්සෙතුං ‘‘යායං නිබ්බෙධගාමිනී’’තිආදි වුත්තං. තස්සත්ථො – යා අයං පඤ්ඤා අනිබ්බිද්ධපුබ්බං අපදාලිතපුබ්බං ලොභක්ඛන්ධාදිං නිබ්බිජ්ඣන්තී පදාලෙන්තී ගච්ඡති පවත්තතීති නිබ්බෙධගාමිනී, යාය ච තස්මිං තස්මිං භවයොනිගතිවිඤ්ඤාණට්ඨිතිසත්තාවාසෙසු සත්තනිකායෙසු ඛන්ධානං පඨමාභිනිබ්බත්තිසඞ්ඛාතාය ජාතියා තංනිමිත්තස්ස ච කම්මභවස්ස පරික්ඛයං පරියොසානං නිබ්බානං අරහත්තඤ්ච සම්මා අවිපරීතං ජානාති සච්ඡිකරොති, අයං සහවිපස්සනා මග්ගපඤ්ඤා සෙට්ඨා ලොකස්මින්ති. वहाँ 'लोकस्मिं' का अर्थ है संस्कार लोक में। प्राणियों में सम्यक्सम्बुद्ध के समान, संस्कारों में प्रज्ञा के समान कोई धर्म नहीं है। कुशल धर्मों में प्रज्ञा ही प्रधान (उत्कृष्ट) है, और प्रज्ञा के सिद्ध होने पर सभी अनवद्य (निर्दोष) धर्म सिद्ध हो जाते हैं। जैसा कि कहा गया है— 'सम्यग्दृष्टि वाले का सम्यक्संकल्प सिद्ध होता है' इत्यादि। यहाँ जो प्रज्ञा अभिप्रेत है, उसे 'श्रेष्ठ' कहकर प्रशंसा की गई है। वह जैसे प्रवृत्त होती है, उसे दिखाने के लिए 'यायं निब्बेधगामिनी' इत्यादि कहा गया है। उसका अर्थ है— जो यह प्रज्ञा पहले कभी न भेदे गए, पहले कभी न विदीर्ण किए गए लोभ-स्कन्ध आदि को भेदती हुई, विदीर्ण करती हुई जाती है (प्रवृत्त होती है), वह 'निब्बेधगामिनी' (वेधनगामिनी) है; और जिसके द्वारा उन-उन भव, योनि, गति, विज्ञानस्थिति और सत्त्वावासों के सत्त्व-निकायों में स्कन्धों की प्रथम उत्पत्ति रूप 'जाति' को और उसके निमित्त भूत 'कर्म-भव' के परिक्षय (अन्त) रूप निर्वाण और अर्हत्त्व को सम्यक् प्रकार से, यथार्थ रूप से जानता है, साक्षात्कार करता है— यह विपश्यना सहित मार्ग-प्रज्ञा लोक में श्रेष्ठ है। ඉදානි යථාවුත්තපඤ්ඤානුභාවසම්පන්නෙ ඛීණාසවෙ අභිත්ථවන්තො ‘‘තෙසං දෙවා මනුස්සා චා’’ති ඔසානගාථමාහ. තස්සත්ථො – තෙසං චතූසු අරියසච්චෙසු පරිඤ්ඤාදීනං සොළසන්නං කිච්චානං නිට්ඨිතත්තා චතුසච්චසම්බොධෙන සම්බුද්ධානං, සතිවෙපුල්ලප්පත්තියා සතිමතං, වුත්තනයෙන සමුග්ඝාතිතසම්මොහත්තා පඤ්ඤාවෙපුල්ලප්පත්තියා හාසපඤ්ඤානං, පුබ්බභාගෙ වා සීලාදිපාරිපූරිතො [Pg.150] පට්ඨාය යාව නිබ්බානසච්ඡිකිරියාය හාසවෙදතුට්ඨිපාමොජ්ජබහුලතාය හාසපඤ්ඤානං, සබ්බසො පරික්ඛීණභවසංයොජනත්තා අන්තිමසරීරධාරීනං ඛීණාසවානං දෙවා මනුස්සා ච පිහයන්ති පියා හොන්ති, තබ්භාවං අධිගන්තුං ඉච්ඡන්ති ‘‘අහො පඤ්ඤානුභාවො, අහො වත මයම්පි එදිසා එවං නිත්තිණ්ණසබ්බදුක්ඛා භවෙය්යාමා’’ති. अब पूर्वोक्त प्रज्ञा के प्रभाव से सम्पन्न क्षीणास्त्रवों की स्तुति करते हुए 'तेसं देवा मनुस्सा च' यह अन्तिम गाथा कही। उसका अर्थ है— उन चार आर्य सत्यों में परिज्ञा आदि सोलह कृत्यों के पूर्ण हो जाने से चार सत्यों के सम्बोध (ज्ञान) द्वारा सम्बुद्धों के प्रति, स्मृति की विपुलता प्राप्त होने से स्मृतिमानों के प्रति, पूर्वोक्त विधि से सम्मोह के समूच्छेद होने के कारण प्रज्ञा की विपुलता प्राप्त होने से हास्य-प्रज्ञा (प्रसन्न प्रज्ञा) वालों के प्रति, अथवा पूर्व भाग में शीलादि की परिपूर्णता से लेकर निर्वाण के साक्षात्कार तक हास्य, वेद (ज्ञान), तुष्टि और प्रामोद्य की बहुलता के कारण हास्य-प्रज्ञा वालों के प्रति, सभी प्रकार से भव-संयोजनों के क्षीण हो जाने के कारण अन्तिम शरीर धारण करने वाले क्षीणास्त्रवों के प्रति देव और मनुष्य स्पृहा करते हैं, प्रिय मानते हैं, वैसा होने की इच्छा करते हैं कि— 'अहो प्रज्ञा का प्रभाव! अहो, हम भी ऐसे ही सभी दुखों से पार हो जाएँ'। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चौथे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. සුක්කධම්මසුත්තවණ්ණනා ५. शुक्लधर्म सूत्र की व्याख्या। 42. පඤ්චමෙ සුක්කාති න වණ්ණසුක්කතාය සුක්කා, සුක්කභාවාය පන පරමවොදානාය සංවත්තන්තීති නිප්ඵත්තිසුක්කතාය සුක්කා. සරසෙනපි සබ්බෙ කුසලා ධම්මා සුක්කා එව කණ්හභාවපටිපක්ඛතො. තෙසඤ්හි උප්පත්තියා චිත්තං පභස්සරං හොති පරිසුද්ධං. ධම්මාති කුසලා ධම්මා. ලොකන්ති සත්තලොකං. පාලෙන්තීති ආධාරසන්ධාරණෙන මරියාදං ඨපෙන්තා රක්ඛන්ති. හිරී ච ඔත්තප්පඤ්චාති එත්ථ හිරියති හිරියිතබ්බෙන, හිරියන්ති එතෙනාති වා හිරී. වුත්තම්පි චෙතං ‘‘යං හිරියති හිරියිතබ්බෙන, හිරියති පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං සමාපත්තියා, අයං වුච්චති හිරී’’ති (ධ. ස. 30). ඔත්තප්පති ඔත්තප්පිතබ්බෙන, ඔත්තප්පන්ති එතෙනාති වා ඔත්තප්පං. වුත්තම්පිචෙතං ‘‘යං ඔත්තප්පති ඔත්තප්පිතබ්බෙන, ඔත්තප්පති පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං සමාපත්තියා, ඉදං වුච්චති ඔත්තප්ප’’න්ති (ධ. ස. 31). ४२. पाँचवें (सूत्र) में 'शुक्ला' का अर्थ वर्ण (रंग) की सफेदी से शुक्ल नहीं है, बल्कि शुक्ल भाव (शुद्धता) के कारण परम शुद्धि की ओर ले जाने वाले होने से निष्पत्ति-शुक्लता के कारण शुक्ल हैं। स्वभाव से भी सभी कुशल धर्म कृष्ण भाव (अकुशल) के प्रतिपक्ष होने के कारण शुक्ल ही हैं। उनकी उत्पत्ति से चित्त प्रभास्वर और परिशुद्ध होता है। 'धम्मा' अर्थात् कुशल धर्म। 'लोकं' अर्थात् सत्त्व लोक को। 'पालेन्ति' अर्थात् आधार और संधारण द्वारा मर्यादा स्थापित करते हुए रक्षा करते हैं। 'हिरी च ओत्तप्पञ्च' यहाँ जिससे लज्जा की जाती है या जिसके द्वारा लज्जित होते हैं, वह 'हिरी' (ह्री/लज्जा) है। यह कहा भी गया है— 'जो लज्जित होने योग्य (पाप) से लज्जित होता है, पापमय अकुशल धर्मों की प्राप्ति से लज्जित होता है, यह ह्री कहलाती है'। जिससे भयभीत हुआ जाता है या जिसके द्वारा भयभीत होते हैं, वह 'ओत्तप्प' (अपत्राप्य/भय) है। यह भी कहा गया है— 'जो भयभीत होने योग्य (पाप) से भयभीत होता है, पापमय अकुशल धर्मों की प्राप्ति से भयभीत होता है, यह ओत्तप्प कहलाता है'। තත්ථ අජ්ඣත්තසමුට්ඨානා හිරී, බහිද්ධාසමුට්ඨානං ඔත්තප්පං. අත්තාධිපතෙය්යා හිරී, ලොකාධිපතෙය්යං ඔත්තප්පං. ලජ්ජාසභාවසණ්ඨිතා හිරී, භයසභාවසණ්ඨිතං ඔත්තප්පං. සප්පතිස්සවලක්ඛණා හිරී, වජ්ජභීරුකභයදස්සාවිලක්ඛණං ඔත්තප්පං. वहाँ अध्यात्म (आन्तरिक) से समुत्थित 'ह्री' है, बाह्य से समुत्थित 'ओत्तप्प' है। आत्म-अधिपत्य वाली 'ह्री' है, लोक-अधिपत्य वाला 'ओत्तप्प' है। लज्जा के स्वभाव वाली 'ह्री' है, भय के स्वभाव वाला 'ओत्तप्प' है। आदर (सत्कार) के लक्षण वाली 'ह्री' है, दोषों से डरने और भय देखने के लक्षण वाला 'ओत्तप्प' है। තත්ථ අජ්ඣත්තසමුට්ඨානං හිරිං චතූහි කාරණෙහි සමුට්ඨාපෙති – ජාතිං පච්චවෙක්ඛිත්වා, වයං පච්චවෙක්ඛිත්වා, සූරභාවං පච්චවෙක්ඛිත්වා, බාහුසච්චං පච්චවෙක්ඛිත්වා. කථං? ‘‘පාපකරණං නාමෙතං න ජාතිසම්පන්නානං කම්මං, හීනජච්චානං කෙවට්ටාදීනං කම්මං, මාදිසස්ස ජාතිසම්පන්නස්ස ඉදං කම්මං කාතුං න යුත්ත’’න්ති එවං තාව ජාතිං පච්චවෙක්ඛිත්වා පාණාතිපාතාදිපාපකම්මං අකරොන්තො හිරිං [Pg.151] සමුට්ඨාපෙති. තථා ‘‘පාපකරණං නාමෙතං දහරෙහි කත්තබ්බකම්මං, මාදිසස්ස වයෙ ඨිතස්ස ඉදං කම්මං කාතුං න යුත්ත’’න්ති එවං වයං පච්චවෙක්ඛිත්වා පාණාතිපාතාදිපාපකම්මං අකරොන්තො හිරිං සමුට්ඨාපෙති. තථා ‘‘පාපකරණං නාමෙතං දුබ්බලජාතිකානං කම්මං, මාදිසස්ස සූරභාවසම්පන්නස්ස ඉදං කම්මං කාතුං න යුත්ත’’න්ති එවං සූරභාවං පච්චවෙක්ඛිත්වා පාණාතිපාතාදිපාපකම්මං අකරොන්තො හිරිං සමුට්ඨාපෙති. තථා ‘‘පාපකරණං නාමෙතං අන්ධබාලානං කම්මං, න පණ්ඩිතානං, මාදිසස්ස පණ්ඩිතස්ස බහුස්සුතස්ස ඉදං කම්මං කාතුං න යුත්ත’’න්ති එවං බාහුසච්චං පච්චවෙක්ඛිත්වා පාණාතිපාතාදිපාපකම්මං අකරොන්තො හිරිං සමුට්ඨාපෙති. එවං අජ්ඣත්තසමුට්ඨානං හිරිං චතූහි කාරණෙහි සමුට්ඨාපෙති. සමුට්ඨාපෙත්වා ච පන අත්තනො චිත්තෙ හිරිං පවෙසෙත්වා පාපකම්මං න කරොති. එවං හිරී අජ්ඣත්තසමුට්ඨානා නාම හොති. वहाँ आंतरिक रूप से उत्पन्न होने वाली ह्री (लज्जा) चार कारणों से उत्पन्न होती है - जाति का प्रत्यवेक्षण करके, अवस्था (आयु) का प्रत्यवेक्षण करके, शूरता (वीरता) का प्रत्यवेक्षण करके, और बहुश्रुतता का प्रत्यवेक्षण करके। कैसे? 'पाप कर्म करना उच्च कुल में उत्पन्न लोगों का काम नहीं है, यह तो केवट आदि नीच कुल वालों का काम है; मुझ जैसे उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति के लिए यह कार्य करना उचित नहीं है' - इस प्रकार जाति का प्रत्यवेक्षण करते हुए प्राणातिपात आदि पाप कर्म न करता हुआ ह्री को उत्पन्न करता है। वैसे ही 'पाप कर्म करना युवाओं द्वारा किया जाने वाला कार्य है, मुझ जैसे इस अवस्था (आयु) में स्थित व्यक्ति के लिए यह कार्य करना उचित नहीं है' - इस प्रकार अवस्था का प्रत्यवेक्षण करते हुए प्राणातिपात आदि पाप कर्म न करता हुआ ह्री को उत्पन्न करता है। वैसे ही 'पाप कर्म करना दुर्बल स्वभाव वालों का काम है, मुझ जैसे शूरवीर व्यक्ति के लिए यह कार्य करना उचित नहीं है' - इस प्रकार शूरता का प्रत्यवेक्षण करते हुए प्राणातिपात आदि पाप कर्म न करता हुआ ह्री को उत्पन्न करता है। वैसे ही 'पाप कर्म करना अंधे-मूर्खों का काम है, पंडितों का नहीं; मुझ जैसे पंडित और बहुश्रुत व्यक्ति के लिए यह कार्य करना उचित नहीं है' - इस प्रकार बहुश्रुतता का प्रत्यवेक्षण करते हुए प्राणातिपात आदि पाप कर्म न करता हुआ ह्री को उत्पन्न करता है। इस प्रकार आंतरिक रूप से उत्पन्न होने वाली ह्री इन चार कारणों से उत्पन्न होती है। और इसे उत्पन्न कर अपने चित्त में ह्री को प्रविष्ट कराकर वह पाप कर्म नहीं करता है। इस प्रकार ह्री 'आंतरिक-समुत्थान' (अज्झत्तसमुट्ठाना) कहलाती है। කථං ඔත්තප්පං බහිද්ධාසමුට්ඨානං නාම? ‘‘සචෙ ත්වං පාපකම්මං කරිස්සසි, චතූසු පරිසාසු ගරහප්පත්තො භවිස්සසි. बाह्य रूप से उत्पन्न होने वाला ओत्तप्प (भय) कैसा है? 'यदि तुम पाप कर्म करोगे, तो चारों परिषदों में निंदा के पात्र बनोगे'। ‘‘ගරහිස්සන්ති තං විඤ්ඤූ, අසුචිං නාගරිකො යථා; වජ්ජිතො සීලවන්තෙහි, කථං භික්ඛු කරිස්සසී’’ති. – 'विद्वान तुम्हारी निंदा करेंगे, जैसे नगरवासी अशुचि (गंदगी) की करते हैं; शीलवानों द्वारा त्याग दिए जाने पर, हे भिक्षु, तुम क्या करोगे?' පච්චවෙක්ඛන්තො හි බහිද්ධාසමුට්ඨිතෙන ඔත්තප්පෙන පාපකම්මං න කරොති. එවං ඔත්තප්පං බහිද්ධාසමුට්ඨානං නාම හොති. बाह्य रूप से उत्पन्न ओत्तप्प के द्वारा प्रत्यवेक्षण करता हुआ वह पाप कर्म नहीं करता है। इस प्रकार ओत्तप्प 'बाह्य-समुत्थान' (बहिद्धासमुट्ठाना) कहलाता है। කථං හිරී අත්තාධිපතෙය්යා නාම? ඉධෙකච්චො කුලපුත්තො අත්තානං අධිපතිං ජෙට්ඨකං කත්වා ‘‘මාදිසස්ස සද්ධාපබ්බජිතස්ස බහුස්සුතස්ස ධුතවාදිස්ස න යුත්තං පාපකම්මං කාතු’’න්ති පාපකම්මං න කරොති. එවං හිරී අත්තාධිපතෙය්යා නාම හොති. තෙනාහ භගවා – ह्री 'आत्म-अधिपत्य' (स्वयं को प्रधान मानना) कैसे होती है? यहाँ कोई कुलपुत्र स्वयं को अधिपति और श्रेष्ठ मानकर - 'मुझ जैसे श्रद्धापूर्वक प्रव्रजित, बहुश्रुत और धुतवादी के लिए पाप कर्म करना उचित नहीं है' - पाप कर्म नहीं करता है। इस प्रकार ह्री आत्म-अधिपत्य कहलाती है। इसीलिए भगवान ने कहा है - ‘‘සො අත්තානංයෙව අධිපතිං කරිත්වා අකුසලං පජහති, කුසලං භාවෙති, සාවජ්ජං පජහති, අනවජ්ජං භාවෙති, සුද්ධමත්තානං පරිහරතී’’ති (අ. නි. 3.40). 'वह स्वयं को ही अधिपति बनाकर अकुशल का त्याग करता है, कुशल की भावना करता है, सावद्य (दोषयुक्त) का त्याग करता है, अनवद्य (दोषरहित) की भावना करता है, और स्वयं को शुद्ध रखता है' (अं. नि. 3.40)। කථං ඔත්තප්පං ලොකාධිපතෙය්යං නාම? ඉධෙකච්චො කුලපුත්තො ලොකං අධිපතිං ජෙට්ඨකං කත්වා පාපකම්මං න කරොති. යථාහ – ओत्तप्प 'लोक-अधिपत्य' (लोक को प्रधान मानना) कैसे होता है? यहाँ कोई कुलपुत्र लोक को अधिपति और श्रेष्ठ मानकर पाप कर्म नहीं करता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘මහා ඛො පනායං ලොකසන්නිවාසො. මහන්තස්මිං ඛො පන ලොකසන්නිවාසෙ සන්ති සමණබ්රාහ්මණා ඉද්ධිමන්තො දිබ්බචක්ඛුකා පරචිත්තවිදුනො[Pg.152], තෙ දූරතොපි පස්සන්ති, ආසන්නාපි න දිස්සන්ති, චෙතසාපි චිත්තං පජානන්ති, තෙපි මං එවං ජානිස්සන්ති ‘පස්සථ භො ඉමං කුලපුත්තං, සද්ධා අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො සමානො වොකිණ්ණො විහරති පාපකෙහි අකුසලෙහි ධම්මෙහී’ති. සන්ති දෙවතා ඉද්ධිමන්තිනියො දිබ්බචක්ඛුකා පරචිත්තවිදුනියො, තා දූරතොපි පස්සන්ති, ආසන්නාපි න දිස්සන්ති, චෙතසාපි චිත්තං පජානන්ති, තාපි මං එවං ජානිස්සන්ති ‘පස්සථ භො ඉමං, කුලපුත්තං, සද්ධා අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො සමානො වොකිණ්ණො විහරති පාපකෙහි අකුසලෙහි ධම්මෙහී’ති. සො ලොකංයෙව අධිපතිං කත්වා අකුසලං පජහතී’’ති (අ. නි. 3.40). 'यह लोक-सन्निवेश (संसार) बहुत बड़ा है। इस विशाल संसार में ऐसे श्रमण और ब्राह्मण हैं जो ऋद्धिमान हैं, दिव्यचक्षु वाले हैं और दूसरों के चित्त को जानने वाले हैं; वे दूर से भी देखते हैं, पास होने पर भी दिखाई नहीं देते, और अपने चित्त से (दूसरे के) चित्त को जान लेते हैं। वे भी मुझे इस प्रकार जानेंगे - 'देखो भाई, इस कुलपुत्र को, जो श्रद्धापूर्वक घर से बेघर होकर प्रव्रजित हुआ है, वह पापमय अकुशल धर्मों से युक्त होकर विहार कर रहा है'। ऐसी देवियाँ (देवता) भी हैं जो ऋद्धिमान हैं, दिव्यचक्षु वाली हैं और दूसरों के चित्त को जानने वाली हैं; वे भी दूर से देखती हैं, पास होने पर भी दिखाई नहीं देतीं, और अपने चित्त से चित्त को जान लेती हैं। वे भी मुझे इस प्रकार जानेंगी - 'देखो भाई, इस कुलपुत्र को...'। वह लोक को ही अधिपति बनाकर अकुशल का त्याग करता है' (अं. नि. 3.40)। එවං ලොකාධිපතෙය්යං ඔත්තප්පං. इस प्रकार लोक-अधिपत्य ओत्तप्प होता है। ලජ්ජාසභාවසණ්ඨිතාති එත්ථ ලජ්ජාති ලජ්ජනාකාරො, තෙන සභාවෙන සණ්ඨිතා හිරී. භයන්ති අපායභයං, තෙන සභාවෙන සණ්ඨිතං ඔත්තප්පං. තදුභයං පාපපරිවජ්ජනෙ පාකටං හොති. තත්ථ යථා ද්වීසු අයොගුළෙසු එකො සීතලො භවෙය්ය ගූථමක්ඛිතො, එකො උණ්හො ආදිත්තො. තෙසු යථා සීතලං ගූථමක්ඛිතත්තා ජිගුච්ඡන්තො විඤ්ඤුජාතිකො න ගණ්හාති, ඉතරං දාහභයෙන, එවං පණ්ඩිතො ලජ්ජාය ජිගුච්ඡන්තො පාපං න කරොති, ඔත්තප්පෙන අපායභීතො පාපං න කරොති. එවං ලජ්ජාසභාවසණ්ඨිතා හිරී, භයසභාවසණ්ඨිතං ඔත්තප්පං. 'लज्जास्वभावसंस्थिता' यहाँ लज्जा का अर्थ है लज्जित होने का आकार (ढंग), उस स्वभाव से स्थित ह्री है। भय का अर्थ है अपाय (दुर्गति) का भय, उस स्वभाव से स्थित ओत्तप्प है। वे दोनों पाप के वर्जन (त्याग) में प्रकट होते हैं। वहाँ जैसे दो लोहे के गोलों में से एक ठंडा हो और विष्ठा (गंदगी) से लिप्त हो, और दूसरा गर्म और प्रज्वलित हो। उनमें से जैसे विष्ठा से लिप्त होने के कारण घृणा करता हुआ बुद्धिमान व्यक्ति ठंडे गोले को नहीं पकड़ता, और दूसरे (गर्म) गोले को जलने के भय से नहीं पकड़ता; वैसे ही पंडित लज्जा के कारण घृणा करता हुआ पाप नहीं करता, और ओत्तप्प के कारण अपाय से डरता हुआ पाप नहीं करता। इस प्रकार ह्री लज्जा-स्वभाव वाली है और ओत्तप्प भय-स्वभाव वाला है। කථං සප්පතිස්සවලක්ඛණා හිරී, වජ්ජභීරුකභයදස්සාවිලක්ඛණං ඔත්තප්පං? එකච්චො හි ජාතිමහත්තපච්චවෙක්ඛණා, සත්ථුමහත්තපච්චවෙක්ඛණා, දායජ්ජමහත්තපච්චවෙක්ඛණා, සබ්රහ්මචාරිමහත්තපච්චවෙක්ඛණාති චතූහි කාරණෙහි තත්ථ ගාරවෙන සප්පතිස්සවලක්ඛණං හිරිං සමුට්ඨාපෙත්වා පාපං න කරොති, එකච්චො අත්තානුවාදභයං, පරානුවාදභයං, දණ්ඩභයං, දුග්ගතිභයන්ති චතූහි කාරණෙහි වජ්ජතො භායන්තො වජ්ජභීරුකභයදස්සාවිලක්ඛණං ඔත්තප්පං සමුට්ඨාපෙත්වා පාපං න කරොති. එත්ථ ච අජ්ඣත්තසමුට්ඨානාදිතා හිරොත්තප්පානං තත්ථ තත්ථ පාකටභාවෙන වුත්තා, න පන නෙසං කදාචි අඤ්ඤමඤ්ඤවිප්පයොගො. න හි ලජ්ජනං නිබ්භයං, පාපභයං වා අලජ්ජනං අත්ථීති. ह्री सप्रतिश्रव (आदरयुक्त) लक्षणा कैसे है, और ओत्तप्प वज्जभीरुक (दोष से डरने वाला) और भयदशावी (भय देखने वाला) लक्षणा कैसे है? कोई व्यक्ति जाति की महानता के प्रत्यवेक्षण से, शास्ता (गुरु) की महानता के प्रत्यवेक्षण से, दायित्व (विरासत) की महानता के प्रत्यवेक्षण से, और सब्रह्मचारियों की महानता के प्रत्यवेक्षण से - इन चार कारणों से वहाँ गौरव के कारण सप्रतिश्रव-लक्षणा ह्री को उत्पन्न कर पाप नहीं करता है। कोई व्यक्ति आत्म-अनुवाद भय (स्वयं की निंदा का भय), पर-अनुवाद भय (दूसरों द्वारा निंदा का भय), दण्ड भय और दुर्गति भय - इन चार कारणों से दोष से डरता हुआ वज्जभीरुक-भयदशावी-लक्षणा ओत्तप्प को उत्पन्न कर पाप नहीं करता है। और यहाँ ह्री और ओत्तप्प का आंतरिक समुत्थान आदि होना उनके उस-उस स्थान पर प्रकट होने के कारण कहा गया है, न कि उनका कभी एक-दूसरे से वियोग होता है। क्योंकि न तो निर्भय लज्जा होती है और न ही निर्लज्ज पाप-भय होता है। ඉමෙ [Pg.153] චෙ, භික්ඛවෙ, ද්වෙ සුක්කා ධම්මා ලොකං න පාලෙය්යුන්ති භික්ඛවෙ, ඉමෙ ද්වෙ අනවජ්ජධම්මා යදි ලොකං න රක්ඛෙය්යුං, ලොකපාලකා යදි න භවෙය්යුං. නයිධ පඤ්ඤායෙථ මාතාති ඉධ ඉමස්මිං ලොකෙ ජනිකා මාතා ‘‘අයං මෙ මාතා’’ති ගරුචිත්තීකාරවසෙන න පඤ්ඤායෙථ, ‘‘අයං මාතා’’ති න ලබ්භෙය්ය. සෙසපදෙසුපි එසෙව නයො. මාතුච්ඡාති මාතුභගිනී. මාතුලානීති මාතුලභරියා. ගරූනන්ති මහාපිතුචූළපිතුජෙට්ඨභාතුආදීනං ගරුට්ඨානියානං. සම්භෙදන්ති සඞ්කරං, මරියාදභෙදං වා. යථා අජෙළකාතිආදීහි උපමං දස්සෙති. එතෙ හි සත්තා ‘‘අයං මෙ මාතා’’ති වා ‘‘මාතුච්ඡා’’ති වා ගරුචිත්තීකාරවසෙන න ජානන්ති, යං වත්ථුං නිස්සාය උප්පන්නා, තත්ථපි විප්පටිපජ්ජන්ති. තස්මා උපමං ආහරන්තො අජෙළකාදයො ආහරි. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යථා අජෙළකාදයො තිරච්ඡානා හිරොත්තප්පරහිතා මාතාදිසඤ්ඤං අකත්වා භින්නමරියාදා සබ්බත්ථ සම්භෙදෙන වත්තන්ති, එවමයං මනුස්සලොකො යදි ලොකපාලකධම්මා න භවෙය්යුං, සබ්බත්ථ සම්භෙදෙන වත්තෙය්ය. යස්මා පනිමෙ ලොකපාලකධම්මා ලොකං පාලෙන්ති, තස්මා නත්ථි සම්භෙදොති. ‘हे भिक्षुओं, यदि ये दो शुक्ल धर्म लोक की रक्षा न करें’—हे भिक्षुओं, यदि ये दो निर्दोष धर्म लोक की रक्षा न करें, यदि ये लोकपालक न हों। ‘तो यहाँ माता के रूप में न जानी जाए’—यहाँ इस लोक में जन्म देने वाली माता ‘यह मेरी माता है’ इस प्रकार गौरव और सत्कार के वश में न जानी जाए, ‘यह माता है’ ऐसा (भेद) प्राप्त न हो। शेष पदों में भी यही नियम है। ‘मातुच्छा’ का अर्थ है माता की बहन (मौसी)। ‘मातुलानी’ का अर्थ है मामा की पत्नी (मामी)। ‘गरूनं’ का अर्थ है बड़े पिता (ताऊ), छोटे पिता (चाचा), ज्येष्ठ भ्राता आदि गुरुस्थानीय व्यक्तियों की पत्नियाँ। ‘सम्भेदं’ का अर्थ है संकरता (मिश्रण) अथवा मर्यादा का भंग होना। जैसे ‘अजेळका’ (भेड़-बकरी) आदि के द्वारा उपमा दिखाई गई है। ये प्राणी ‘यह मेरी माता है’ अथवा ‘यह मौसी है’ इस प्रकार गौरव और सत्कार के वश में नहीं जानते, जिस वस्तु (योनि) के आश्रय से उत्पन्न हुए हैं, वहाँ भी व्यभिचार करते हैं। इसलिए उपमा देते हुए भेड़-बकरी आदि का उदाहरण दिया गया है। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है—जैसे भेड़-बकरी आदि तिर्यक प्राणी ह्री (लज्जा) और ओत्तप्प (भय) से रहित होने के कारण माता आदि की संज्ञा न कर, मर्यादा को तोड़कर सर्वत्र संकरता (सम्भेद) से व्यवहार करते हैं, इसी प्रकार यह मनुष्य लोक भी यदि लोकपालक धर्म न हों, तो सर्वत्र संकरता से व्यवहार करे। परन्तु चूँकि ये लोकपालक धर्म लोक की रक्षा करते हैं, इसलिए यहाँ संकरता (मर्यादा भंग) नहीं है। ගාථාසු යෙසං චෙ හිරිඔත්තප්පන්ති චෙති නිපාතමත්තං. යෙසං සත්තානං හිරී ච ඔත්තප්පඤ්ච සබ්බදාව සබ්බකාලමෙව න විජ්ජති න උපලබ්භති. වොක්කන්තා සුක්කමූලා තෙති තෙ සත්තා කුසලමූලපච්ඡෙදාවහස්සාපි කම්මස්ස කරණතො කුසලකම්මානං පතිට්ඨානභූතානං හිරොත්තප්පානමෙව වා අභාවතො කුසලතො වොක්කමිත්වා, අපසක්කිත්වා, ඨිතත්තා වොක්කන්තා සුක්කමූලා, පුනප්පුනං ජායනමීයනසභාවත්තා ජාතිමරණගාමිනො සංසාරං නාතිවත්තන්තීති අත්ථො. गाथाओं में ‘येसं चे हिरिओत्तप्पं’ यहाँ ‘चे’ शब्द केवल निपात मात्र है। जिन प्राणियों में ह्री और ओत्तप्प सदा ही, सब काल में विद्यमान नहीं होते, उपलब्ध नहीं होते। ‘वोक्कन्ता सुक्कमूला ते’—वे प्राणी कुशल मूल का उच्छेद करने वाले कर्म को करने से, अथवा कुशल कर्मों के आधारभूत ह्री और ओत्तप्प के ही अभाव के कारण कुशलता से च्युत होकर, हटकर स्थित होने के कारण ‘शुक्ल मूल से च्युत’ कहलाते हैं; बार-बार जन्मने और मरने के स्वभाव वाले होने के कारण वे ‘जाति-मरणगामी’ संसार का अतिक्रमण नहीं करते—यह अर्थ है। යෙසඤ්ච හිරිඔත්තප්පන්ති යෙසං පන පරිසුද්ධමතීනං සත්තානං හිරී ච ඔත්තප්පඤ්චාති ඉමෙ ධම්මා සදා සබ්බකාලං රත්තින්දිවං නවමජ්ඣිමත්ථෙරකාලෙසු සම්මා උපගම්ම ඨිතා පාපා ජිගුච්ඡන්තා භායන්තා තදඞ්ගාදිවසෙන පාපං පජහන්තා. විරූළ්හබ්රහ්මචරියාති සාසනබ්රහ්මචරියෙ මග්ගබ්රහ්මචරියෙ ච විරූළ්හං ආපන්නා, අග්ගමග්ගාධිගමෙන සබ්බසො සන්තකිලෙසතාය සන්තගුණතාය වා සන්තො, පුනබ්භවස්ස ඛෙපිතත්තා ඛීණපුනබ්භවා හොන්තීති. ‘येसञ्च हिरिओत्तप्पं’—परन्तु जिन परिशुद्ध बुद्धि वाले प्राणियों में ह्री और ओत्तप्प—ये धर्म सदा, सब काल, रात-दिन, नवीन, मध्यम और स्थविर अवस्थाओं में सम्यक् रूप से उपस्थित रहते हैं, जो पाप से घृणा करते हुए और डरते हुए तदङ्ग आदि के वश से पाप का परित्याग करते हैं। ‘विरूळ्हब्रह्मचरिया’—वे शासन-ब्रह्मचर्य और मार्ग-ब्रह्मचर्य में वृद्धि को प्राप्त हुए, अग्र मार्ग की प्राप्ति से सभी प्रकार के क्लेशों के शान्त हो जाने के कारण अथवा शान्त गुणों के कारण ‘शान्त’ हैं, और पुनर्जन्म के क्षय हो जाने के कारण ‘क्षीण-पुनर्जन्म’ होते हैं। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 6. අජාතසුත්තවණ්ණනා ६. अजात सुत्त की व्याख्या 43. ඡට්ඨෙ [Pg.154] අත්ථි, භික්ඛවෙති කා උප්පත්ති? එකදිවසං කිර භගවතා අනෙකපරියායෙන සංසාරෙ ආදීනවං පකාසෙත්වා තදුපසමනාදිවසෙන නිබ්බානපටිසංයුත්තාය ධම්මදෙසනාය කතාය භික්ඛූනං එතදහොසි ‘‘අයං සංසාරො භගවතා අවිජ්ජාදීහි කාරණෙහි සහෙතුකො වුත්තො, නිබ්බානස්ස පන තදුපසමස්ස න කිඤ්චි කාරණං වුත්තං, තයිදං අහෙතුකං කථං සච්චිකට්ඨපරමත්ථෙන උපලබ්භතී’’ති. අථ භගවා තෙසං භික්ඛූනං විමතිවිධමනත්ථඤ්චෙව, ‘‘ඉධ සමණබ්රාහ්මණානං ‘නිබ්බානං නිබ්බාන’න්ති වාචාවත්ථුමත්තමෙව, නත්ථි හි පරමත්ථතො නිබ්බානං නාම අනුපලබ්භමානසභාවත්තා’’ති ලොකායතිකාදයො විය විප්පටිපන්නානං බහිද්ධා ච පුථුදිට්ඨිගතිකානං මිච්ඡාවාදභඤ්ජනත්ථඤ්ච, අමතමහානිබ්බානස්ස පරමත්ථතො අත්ථිභාවදීපනත්ථං තස්ස ච නිස්සරණභාවාදිආනුභාවවන්තතාදීපනත්ථං පීතිවෙගෙන උදානවසෙන ඉදං සුත්තං අභාසි. තථා හි ඉදං සුත්තං උදානෙපි (උදා. 72-74) සඞ්ගීතං. ४३. छठे सुत्त में ‘अत्थि, भिक्खवे’ (है, भिक्षुओं)—इसकी उत्पत्ति क्या है? कहा जाता है कि एक दिन भगवान द्वारा अनेक पर्यायों से संसार के दोषों को प्रकाशित कर, उनके उपशमन आदि के वश से निर्वाण से सम्बन्धित धर्मदेशना किए जाने पर भिक्षुओं को यह विचार हुआ—‘यह संसार भगवान द्वारा अविद्या आदि कारणों से सहेतुक (कारण सहित) कहा गया है, परन्तु निर्वाण और उसके उपशमन का कोई कारण नहीं कहा गया, तो वह अहेतुक (बिना कारण का) निर्वाण परमार्थतः सत्य रूप में कैसे उपलब्ध हो सकता है?’ तब भगवान ने उन भिक्षुओं की शंका को दूर करने के लिए, और ‘यहाँ श्रमण-ब्राह्मणों के लिए निर्वाण-निर्वाण केवल वाणी का विषय मात्र है, परमार्थतः निर्वाण नाम का कोई अप्राप्य स्वभाव वाला तत्व नहीं है’—इस प्रकार लोकायतिक आदि के समान विपरीत मार्ग पर चलने वाले बाह्य पृथग्जनों की मिथ्या दृष्टि के खण्डन के लिए, अमृत महानिर्वाण की परमार्थतः सत्ता को दर्शाने के लिए और उसकी निसरण-भाव (मुक्ति) आदि की सामर्थ्य को दर्शाने के लिए प्रीति के वेग से उदान के रूप में यह सुत्त कहा। इसीलिए यह सुत्त उदान (उदान ७२-७४) में भी संगृहीत है। තත්ථ අත්ථීති විජ්ජති පරමත්ථතො උපලබ්භති. අජාතං අභූතං අකතං අසඞ්ඛතන්ති සබ්බානිපි පදානි අඤ්ඤමඤ්ඤවෙවචනානි. අථ වා වෙදනාදයො විය හෙතුපච්චයසමවායසඞ්ඛාතාය කාරණසාමග්ගියා න ජාතං න නිබ්බත්තන්ති අජාතං. කාරණෙන විනා සයමෙව න භූතං න පාතුභූතං න උප්පන්නන්ති අභූතං. එවං අජාතත්තා අභූතත්තා ච යෙන කෙනචි කාරණෙන න කතන්ති අකතං. ජාතභූතකතසභාවො ච නාමරූපාදීනං සඞ්ඛතධම්මානං හොති, න අසඞ්ඛතසභාවස්ස නිබ්බානස්සාති දස්සනත්ථං අසඞ්ඛතන්ති වුත්තං. පටිලොමතො වා සමෙච්ච සම්භුය්ය පච්චයෙහි කතන්ති සඞ්ඛතං, තථා න සඞ්ඛතං, සඞ්ඛතලක්ඛණරහිතන්ති ච අසඞ්ඛතන්ති එවං අනෙකෙහි කාරණෙහි නිබ්බත්තිතභාවෙ පටිසිද්ධෙ ‘‘සියා නු ඛො එකෙනෙව කාරණෙන කත’’න්ති ආසඞ්කායං ‘‘න කෙනචි කත’’න්ති දස්සනත්ථං ‘‘අකත’’න්ති වුත්තං. එවං අප්පච්චයම්පි සමානං ‘‘සයමෙව නු ඛො ඉදං භූතං පාතුභූත’’න්ති ආසඞ්කායං තන්නිවත්තනත්ථං ‘‘අභූත’’න්ති වුත්තං. අයඤ්ච එතස්ස අසඞ්ඛතාකතාභූතභාවො සබ්බෙන සබ්බං අජාතිධම්මත්තාති දස්සෙතුං ‘‘අජාත’’න්ති වුත්තන්ති. එවමෙතෙසං චතුන්නම්පි පදානං සාත්ථකභාවො වෙදිතබ්බො. वहाँ ‘अत्थि’ का अर्थ है—परमार्थतः विद्यमान है, उपलब्ध होता है। ‘अजातं, अभूतं, अकतं, असङ्खतं’—ये सभी पद एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। अथवा, वेदना आदि के समान हेतु और प्रत्ययों के समूह रूप कारण-सामग्री से जो उत्पन्न नहीं हुआ, वह ‘अजातं’ (अजन्मा) है। कारण के बिना स्वयं ही जो उत्पन्न नहीं हुआ, प्रकट नहीं हुआ, वह ‘अभूतं’ (अभूत) है। इस प्रकार अजन्मा और अभूत होने के कारण जो किसी भी कारण से नहीं बनाया गया, वह ‘अकतं’ (अकृत) है। जन्मना, होना और बनाया जाना—यह स्वभाव नाम-रूप आदि संस्कृत (संस्कारित) धर्मों का होता है, असंस्कृत स्वभाव वाले निर्वाण का नहीं—यह दिखाने के लिए ‘असङ्खतं’ (असंस्कृत) कहा गया है। अथवा विलोम क्रम से—प्रत्ययों द्वारा मिलकर जो बनाया गया वह ‘सङ्खतं’ (संस्कृत) है, जो वैसा नहीं है वह ‘असङ्खतं’ है, जो संस्कृत के लक्षणों से रहित है वह असंस्कृत है। इस प्रकार अनेक कारणों से उत्पन्न होने का निषेध करने पर, ‘क्या यह किसी एक कारण से बना है?’ ऐसी आशंका होने पर ‘किसी से नहीं बना’ यह दिखाने के लिए ‘अकतं’ कहा गया। इसी प्रकार प्रत्यय-रहित होने पर भी ‘क्या यह स्वयं ही उत्पन्न या प्रकट हुआ है?’ ऐसी आशंका की निवृत्ति के लिए ‘अभूतं’ कहा गया। और इसका यह असंस्कृत, अकृत और अभूत होना पूर्णतः इसके अजन्मा होने के कारण है, यह दर्शाने के लिए ‘अजातं’ कहा गया। इस प्रकार इन चारों ही पदों की सार्थकता समझनी चाहिए। ඉති [Pg.155] භගවා ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, අජාතං අභූතං අකතං අසඞ්ඛත’’න්ති පරමත්ථතො නිබ්බානස්ස අත්ථිභාවං වත්වා තත්ථ හෙතුං දස්සෙන්තො ‘‘නො චෙතං, භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. තස්සායං සඞ්ඛෙපො – භික්ඛවෙ, යදි අජාතාදිසභාවා අසඞ්ඛතා ධාතු න අභවිස්ස න සියා, ඉධ ලොකෙ ජාතාදිසභාවස්ස රූපාදික්ඛන්ධපඤ්චකසඞ්ඛාතස්ස සඞ්ඛාරගතස්ස නිස්සරණං අනවසෙසවට්ටුපසමො න පඤ්ඤායෙය්ය න උපලබ්භෙය්ය න සම්භවෙය්ය. නිබ්බානඤ්හි ආරම්මණං කත්වා පවත්තමානා සම්මාදිට්ඨිආදයො අරියමග්ගධම්මා අනවසෙසතො කිලෙසෙ සමුච්ඡින්දන්ති, තෙනෙත්ථ සබ්බස්සපි වට්ටදුක්ඛස්ස අප්පවත්ති අපගමො නිස්සරණං පඤ්ඤායති. इस प्रकार भगवान ने "भिक्षुओं, एक अजन्मा, अभूत, अकृत, असंस्कृत है" - इस प्रकार परमार्थतः निर्वाण के अस्तित्व को कहकर, वहाँ हेतु (कारण) दिखाते हुए "भिक्षुओं, यदि यह न होता" आदि कहा। इसका संक्षेप यह है - भिक्षुओं, यदि अजन्मा आदि स्वभाव वाली असंस्कृत धातु न होती, तो इस लोक में जन्म आदि स्वभाव वाले, रूप आदि पाँच स्कन्धों के रूप में संकलित, संस्कारगत (पदार्थों) का निस्सरण (मुक्ति), जो कि अवशेषरहित वट्ट (संसार-चक्र) का उपशम है, न ज्ञात होता, न उपलब्ध होता और न ही संभव होता। क्योंकि निर्वाण को आलम्बन बनाकर प्रवृत्त होने वाले सम्यग्दृष्टि आदि आर्यमार्ग के धर्म क्लेशों का पूर्णतः उच्छेद कर देते हैं, जिससे यहाँ समस्त संसार-दुःख की अप्रवृत्ति, अपगम (निवृत्ति) और निस्सरण ज्ञात होता है। එවං බ්යතිරෙකවසෙන නිබ්බානස්ස අත්ථිභාවං දස්සෙත්වා ඉදානි අන්වයවසෙනපි තං දස්සෙතුං ‘‘යස්මා ච ඛො’’තිආදි වුත්තං, තං වුත්තත්ථමෙව. එත්ථ ච යස්මා ‘‘අපච්චයා ධම්මා, අසඞ්ඛතා ධම්මා (ධ. ස. දුකමාතිකා 7, 8). අත්ථි, භික්ඛවෙ, තදායතනං, යත්ථ නෙව පථවී (උදා. 71). ඉදම්පි ඛො ඨානං දුද්දසං යදිදං සබ්බසඞ්ඛාරසමථො සබ්බූපධිපටිනිස්සග්ගො (මහාව. 7; ම. නි. 1.281). අසඞ්ඛතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි අසඞ්ඛතගාමිනිඤ්ච පටිපද’’න්තිආදීහි (සං. නි. 4.366) අනෙකෙහි සුත්තපදෙහි ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, අජාත’’න්ති ඉමිනාපි සුත්තෙන නිබ්බානධාතුයා පරමත්ථතො සබ්භාවො සබ්බලොකං අනුකම්පමානෙන සම්මාසම්බුද්ධෙන දෙසිතො, තස්මා න පටික්ඛිපිතබ්බං. තත්ථ අප්පච්චක්ඛකාරීනම්පි විඤ්ඤූනං කඞ්ඛා වා විමති වා නත්ථි එව. යෙ පන අබුද්ධිපුග්ගලා, තෙසං විමතිවිනොදනත්ථං අයමෙත්ථ අධිප්පායනිද්ධාරණමුඛෙන යුත්තිවිචාරණා – යථා පරිඤ්ඤෙය්යතාය සඋත්තරානං කාමානං රූපානඤ්ච පටිපක්ඛභූතං තබ්බිධුරසභාවං නිස්සරණං පඤ්ඤායති, එවං තංසභාවානං සබ්බෙසං සඞ්ඛතධම්මානං පටිපක්ඛභූතෙන තබ්බිධුරසභාවෙන නිස්සරණෙන භවිතබ්බං. යඤ්චෙතං නිස්සරණං, සා අසඞ්ඛතා ධාතු. කිඤ්ච භිය්යො, සඞ්ඛතධම්මාරම්මණං විපස්සනාඤාණං අපි අනුලොමඤාණං කිලෙසෙ සමුච්ඡෙදවසෙන පජහිතුං න සක්කොති, තථා සම්මුතිසච්චාරම්මණං පඨමජ්ඣානාදීසු ඤාණං වික්ඛම්භනවසෙනෙව කිලෙසෙ පජහති, න සමුච්ඡෙදවසෙන. ඉති සඞ්ඛතධම්මාරම්මණස්ස සම්මුතිසච්චාරම්මණස්ස ච ඤාණස්ස කිලෙසානං සමුච්ඡෙදප්පහානෙ අසමත්ථභාවතො තෙසං සමුච්ඡෙදප්පහානකරස්ස අරියමග්ගඤාණස්ස තදුභයවිපරීතසභාවෙන ආරම්මණෙන භවිතබ්බං[Pg.156], සා අසඞ්ඛතා ධාතු. තථා ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, අජාතං අභූතං අකතං අසඞ්ඛත’’න්ති ඉදං නිබ්බානස්ස පරමත්ථතො අත්ථිභාවජොතකවචනං අවිපරීතත්ථං භගවතා භාසිතත්තා. යඤ්හි භගවතා භාසිතං, තං අවිපරීතත්ථං පරමත්ථන්ති යථා තං ‘‘සබ්බෙ සඞ්ඛාරා අනිච්චා, සබ්බෙ සඞ්ඛාරා දුක්ඛා, සබ්බෙ ධම්මා අනත්තා’’ති (ධ. ප. 277-279; චූළනි. හෙමකමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 56). තථා නිබ්බානසද්දො කත්ථචි විසයෙ යථාභූතපරමත්ථවිසයො උපචාරවුත්තිසබ්භාවතො සෙය්යථාපි සීහසද්දො. අථ වා අත්ථෙව පරමත්ථතො අසඞ්ඛතාධාතු ඉතරතබ්බිපරීතවිනිමුත්තසභාවත්තා සෙය්යථාපි පථවීධාතු වෙදනාති. එවමාදීහි නයෙහි යුත්තිතොපි අසඞ්ඛතාය ධාතුයා පරමත්ථතො අත්ථිභාවො වෙදිතබ්බො. इस प्रकार व्यतिरेक (negative logic) के माध्यम से निर्वाण के अस्तित्व को दिखाकर, अब अन्वय (positive logic) के माध्यम से भी उसे दिखाने के लिए "चूँकि" आदि कहा गया है, जिसका अर्थ पहले ही बताया जा चुका है। और यहाँ चूँकि "अप्रत्यय धर्म, असंस्कृत धर्म... भिक्षुओं, वह आयतन है जहाँ न पृथ्वी है... यह स्थान भी दुर्दर्श है, जो कि समस्त संस्कारों का शमन, समस्त उपधियों का त्याग है... भिक्षुओं, मैं तुम्हें असंस्कृत धर्म और असंस्कृतगामी प्रतिपदा का उपदेश दूँगा" आदि अनेक सूत्र-पदों के द्वारा और "भिक्षुओं, एक अजन्मा है" इस सूत्र के द्वारा भी, समस्त लोक पर अनुकम्पा करने वाले सम्यक्सम्बुद्ध ने परमार्थतः निर्वाण-धातु के सद्भाव (अस्तित्व) का उपदेश दिया है, इसलिए इसका निषेध नहीं किया जाना चाहिए। वहाँ (निर्वाण के विषय में) प्रत्यक्ष अनुभव न करने वाले विद्वानों को भी कोई शंका या विमति (संदेह) नहीं है। किन्तु जो अबुद्धिमान (अज्ञानी) व्यक्ति हैं, उनके संदेह के निवारण के लिए यहाँ अभिप्राय के निर्धारण के माध्यम से यह युक्ति-विचारणा है - जैसे परिज्ञेय (जानने योग्य) और स-उत्तर (श्रेष्ठतर युक्त) काम और रूप के प्रतिपक्ष रूप में उनसे विपरीत स्वभाव वाला निस्सरण (मुक्ति) ज्ञात होता है, वैसे ही उन (काम-रूप) स्वभाव वाले समस्त संस्कृत धर्मों के प्रतिपक्ष रूप में उनसे विपरीत स्वभाव वाला निस्सरण होना चाहिए। और जो यह निस्सरण है, वही असंस्कृत धातु है। और भी, संस्कृत धर्मों को आलम्बन बनाने वाला विपश्यना ज्ञान और अनुलोम ज्ञान भी क्लेशों को उच्छेद के माध्यम से त्यागने में समर्थ नहीं है; उसी प्रकार सम्मति-सत्य को आलम्बन बनाने वाला प्रथम ध्यान आदि का ज्ञान क्लेशों को केवल विष्कम्भन (दबाने) के माध्यम से त्यागता है, उच्छेद के माध्यम से नहीं। इस प्रकार संस्कृत धर्मों और सम्मति-सत्य को आलम्बन बनाने वाले ज्ञान की क्लेशों के उच्छेद-प्रहाण में असमर्थता के कारण, उन क्लेशों का उच्छेद-प्रहाण करने वाले आर्यमार्ग-ज्ञान का आलम्बन उन दोनों से विपरीत स्वभाव वाला होना चाहिए, और वही असंस्कृत धातु है। इसी प्रकार "भिक्षुओं, एक अजन्मा, अभूत, अकृत, असंस्कृत है" - यह निर्वाण के परमार्थतः अस्तित्व को प्रकाशित करने वाला वचन भगवान द्वारा कहा गया होने के कारण अविपरीत (सत्य) अर्थ वाला है। क्योंकि भगवान द्वारा जो कहा गया है, वह अविपरीत अर्थ वाला और परमार्थ है, जैसे कि "सभी संस्कार अनित्य हैं, सभी संस्कार दुःख हैं, सभी धर्म अनात्म हैं"। उसी प्रकार 'निर्वाण' शब्द किसी विषय में यथार्थ परमार्थ विषयक होता है, क्योंकि वहाँ उपचार-वृत्ति (metaphorical usage) का सद्भाव होता है, जैसे कि 'सिंह' शब्द। अथवा, परमार्थतः असंस्कृत धातु का अस्तित्व है ही, क्योंकि वह अन्य (संस्कृत) से विपरीत और मुक्त स्वभाव वाली है, जैसे कि पृथ्वी-धातु या वेदना। इस प्रकार की युक्तियों से भी असंस्कृत धातु का परमार्थतः अस्तित्व समझना चाहिए। ගාථාසු ජාතන්ති ජායනට්ඨෙන ජාතං, ජාතිලක්ඛණප්පත්තන්ති අත්ථො. භූතන්ති භවනට්ඨෙන භූතං, අහුත්වා සම්භූතන්ති අත්ථො. සමුප්පන්නන්ති සහිතභාවෙන උප්පන්නං, සහිතෙහි ධම්මෙහි ච උප්පන්නන්ති අත්ථො. කතන්ති කාරණභූතෙහි පච්චයෙහි නිබ්බත්තිතං. සඞ්ඛතන්ති තෙහියෙව සමෙච්ච සම්භුය්ය කතන්ති සඞ්ඛතං, සබ්බමෙතං පච්චයනිබ්බත්තස්ස අධිවචනං. නිච්චසාරාදිවිරහිතතො අද්ධුවං. ජරාය මරණෙන ච එකන්තෙනෙව සඞ්ඝටිතං සංසට්ඨන්ති ජරාමරණසඞ්ඝාතං. ‘‘ජරාමරණසඞ්ඝට්ට’’න්තිපි පඨන්ති, ජරාය මරණෙන ච උපද්දුතං පීළිතන්ති අත්ථො. අක්ඛිරොගාදීනං අනෙකෙසං රොගානං නීළං කුලාවකන්ති රොගනීළං. සරසතො උපක්කමතො ච පභඞ්ගුපරමසීලතාය පභඞ්ගුරං. गाथाओं में 'जात' का अर्थ उत्पन्न होने के भाव से 'जात' है, अर्थात् जन्म के लक्षण को प्राप्त। 'भूत' का अर्थ होने के भाव से 'भूत' है, अर्थात् न होकर उत्पन्न हुआ। 'समुत्पन्न' का अर्थ सहित भाव से उत्पन्न, अथवा साथ रहने वाले धर्मों के साथ उत्पन्न। 'कृत' का अर्थ कारणभूत प्रत्ययों (शर्तों) से निर्मित। 'संस्कृत' का अर्थ उन्हीं (प्रत्ययों) के द्वारा मिलकर और एकत्रित होकर किया गया, यह सब प्रत्ययों से निर्मित (पदार्थों) का पर्यायवाची है। नित्य सार आदि से रहित होने के कारण 'अध्रुव' (अनित्य) है। जरा और मरण के साथ निश्चित रूप से संघटित (जुड़ा हुआ) होने के कारण 'जरामरणसंघात' है। 'जरामरणसंघट्ट' भी पाठ मिलता है, जिसका अर्थ है जरा और मरण से उपद्रुत (त्रस्त) या पीड़ित। आँख के रोग आदि अनेक रोगों का नीड़ (घोंसला) या निवास होने के कारण 'रोगनीड़' है। स्वभाव से और प्रहार से भंगुर होने के स्वभाव के कारण 'प्रभंगुर' है। චතුබ්බිධො ආහාරො ච තණ්හාසඞ්ඛාතා නෙත්ති ච පභවො සමුට්ඨානං එතස්සාති ආහාරනෙත්තිප්පභවං. සබ්බොපි වා පච්චයො ආහාරො. ඉධ පන තණ්හාය නෙත්තිග්ගහණෙන ගහිතත්තා තණ්හාවජ්ජා වෙදිතබ්බා. තස්මා ආහාරො ච නෙත්ති ච පභවො එතස්සාති ආහාරනෙත්තිප්පභවං. ආහාරො එව වා නයනට්ඨෙන පවත්තනට්ඨෙන නෙත්තීති එවම්පි ආහාරනෙත්තිප්පභවං. නාලං තදභිනන්දිතුන්ති තං උපාදානක්ඛන්ධපඤ්චකං එවං පච්චයාධීනවුත්තිකං, තතො එව අනිච්චං, දුක්ඛඤ්ච තණ්හාදිට්ඨීහි අභිනන්දිතුං අස්සාදෙතුං න යුත්තං. चार प्रकार के आहार और तृष्णा रूपी 'नेत्ति' (रस्सी/वाहक) इसके प्रभव (उत्पत्ति स्थान) या समुत्थान हैं, इसलिए यह 'आहारनेत्तिप्रभव' है। अथवा सभी प्रत्यय 'आहार' हैं। किन्तु यहाँ तृष्णा को 'नेत्ति' शब्द से ग्रहण किए जाने के कारण, (आहार शब्द से) तृष्णा को छोड़कर अन्य को समझना चाहिए। इसलिए आहार और नेत्ति इसके प्रभव हैं, अतः 'आहारनेत्तिप्रभव' है। अथवा आहार ही ले जाने या प्रवृत्त करने के अर्थ में 'नेत्ति' है, इस प्रकार भी 'आहारनेत्तिप्रभव' है। 'नालं तदभिनन्दितुं' का अर्थ है कि उस पाँच उपादान स्कन्धों को, जो इस प्रकार प्रत्ययों के अधीन रहने वाले हैं और इसी कारण अनित्य और दुःख हैं, तृष्णा और दृष्टि के माध्यम से अभिनन्दित करना या उनका आस्वादन करना उचित नहीं है। තස්ස [Pg.157] නිස්සරණන්ති ‘‘ජාතං භූත’’න්තිආදිනා වුත්තස්ස තස්ස සක්කායස්ස නිස්සරණං නික්කමො අනුපසන්තසභාවස්ස රාගාදිකිලෙසස්ස සබ්බසඞ්ඛාරස්ස ච අභාවෙන තදුපසමභාවෙන පසත්ථභාවෙන ච සන්තං, තක්කඤාණස්ස අගොචරභාවතො අතක්කාවචරං, නිච්චට්ඨෙන ධුවං, තතො එව අජාතං අසමුප්පන්නං, සොකහෙතූනං අභාවතො අසොකං, විගතරාගාදිරජත්තා විරජං, සංසාරදුක්ඛට්ටිතෙහි පටිපජ්ජිතබ්බත්තා පදං, ජාතිආදිදුක්ඛධම්මානං නිරොධහෙතුතාය නිරොධො දුක්ඛධම්මානං, සබ්බසඞ්ඛාරානං උපසමහෙතුතාය සඞ්ඛාරූපසමො, තතො එව අච්චන්තසුඛතාය සුඛොති සබ්බපදෙහි අමතමහානිබ්බානමෙව ථොමෙති. එවං භගවා පඨමගාථාය බ්යතිරෙකවසෙන, දුතියගාථාය අන්වයවසෙන ච නිබ්බානං විභාවෙසි. उसका निस्सरण (निकास) - 'जात भूत' आदि के द्वारा कहे गए उस सक्काय (सत्काय) का निस्सरण, निकास, जो अशान्त स्वभाव वाले रागादि क्लेशों और समस्त संस्कारों के अभाव के कारण, उनके उपशम के कारण और प्रशस्त होने के कारण शान्त है; तर्क-ज्ञान का विषय न होने से अतर्कावचर है; नित्य होने से ध्रुव है; उसी कारण से अजात (अजन्मा) और असमुत्पन्न है; शोक के कारणों के अभाव से अशोक है; रागादि रज (मल) के दूर हो जाने से विरज है; संसार के दुखों में स्थित लोगों द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य होने से 'पद' है; जाति आदि दुःख-धर्मों के निरोध का हेतु होने से दुःख-धर्मों का निरोध है; समस्त संस्कारों के उपशम का हेतु होने से संस्कारोपशम है; और उसी कारण से अत्यन्त सुखमय होने से सुख है - इन सभी पदों से वह अमृत महा-निर्वाण की ही प्रशंसा करता है। इस प्रकार भगवान ने पहली गाथा में व्यतिरेक (अभाव) के माध्यम से और दूसरी गाथा में अन्वय (भाव) के माध्यम से निर्वाण की व्याख्या की है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. නිබ්බානධාතුසුත්තවණ්ණනා ७. निर्वाणधातु सूत्र की व्याख्या 44. සත්තමෙ ද්වෙමාති ද්වෙ ඉමා. වානං වුච්චති තණ්හා, නික්ඛන්තං වානතො, නත්ථි වා එත්ථ වානං, ඉමස්මිං වා අධිගතෙ වානස්ස අභාවොති නිබ්බානං, තදෙව නිස්සත්තනිජ්ජීවට්ඨෙන සභාවධාරණට්ඨෙන ච ධාතූති නිබ්බානධාතු. යදිපි තස්සා පරමත්ථතො භෙදො නත්ථි, පරියායෙන පන පඤ්ඤායතීති තං පරියායභෙදං සන්ධාය ‘‘ද්වෙමා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානධාතුයො’’ති වත්වා යථාධිප්පෙතප්පභෙදං දස්සෙතුං ‘‘සඋපාදිසෙසා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ තණ්හාදීහි ඵලභාවෙන උපාදීයතීති උපාදි, ඛන්ධපඤ්චකං. උපාදියෙව සෙසොති උපාදිසෙසො, සහ උපාදිසෙසෙනාති සඋපාදිසෙසා, තදභාවතො අනුපාදිසෙසා. ४४. सातवें (सूत्र) में 'द्वेमा' का अर्थ है 'ये दो'। 'वान' तृष्णा को कहा जाता है; जो वान से निकल गया है, अथवा जहाँ वान नहीं है, अथवा जिसके प्राप्त होने पर वान का अभाव हो जाता है, वह 'निर्वाण' है। वही सत्त्व-रहित और जीव-रहित होने के कारण तथा अपने स्वभाव को धारण करने के कारण 'धातु' है, अतः 'निर्वाणधातु' है। यद्यपि परमार्थतः उसमें कोई भेद नहीं है, फिर भी पर्याय (विधि) से वह जाना जाता है, उस पर्याय-भेद को ध्यान में रखकर 'भिक्षुओं, ये दो निर्वाण-धातुएँ हैं' ऐसा कहकर, अभिप्रेत भेद को दिखाने के लिए 'सउपादिशेषा' (सोपाधिशेष) आदि कहा गया है। वहाँ तृष्णा आदि के द्वारा फल के रूप में जो ग्रहण किया जाता है, वह 'उपादि' है, अर्थात् पाँच स्कन्ध। उपादि ही शेष है, सो 'उपाधिशेष' है; उपाधिशेष के साथ जो है, वह 'सउपादिशेषा' है; उसके अभाव के कारण 'अनुपादिशेषा' (निरुपाधिशेष) है। අරහන්ති ආරකකිලෙසො, දූරකිලෙසොති අත්ථො. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – 'अर्हत्' का अर्थ है - जिससे क्लेश दूर हो गए हैं, जिससे क्लेश बहुत दूर हैं। भगवान ने भी ऐसा कहा है - ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අරහං හොති, ආරකාස්ස හොන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා, සංකිලෙසිකා පොනොබ්භවිකා, සදරා [Pg.158] දුක්ඛවිපාකා, ආයතිං ජාතිජරාමරණියා. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අරහං හොතී’’ති (ම. නි. 1.434). 'भिक्षुओं, भिक्षु कैसे अर्हत् होता है? उसके पापमय अकुशल धर्म, जो संक्लेशिक (मलिन करने वाले), पुनर्जन्म देने वाले, संतापयुक्त, दुःखविपाकी और भविष्य में जाति-जरा-मरण देने वाले हैं, वे उससे दूर हो जाते हैं। भिक्षुओं, इस प्रकार भिक्षु अर्हत् होता है' (म. नि. 1.434)। ඛීණාසවොති කාමාසවාදයො චත්තාරොපි ආසවා අරහතො ඛීණා සමුච්ඡින්නා පහීනා පටිප්පස්සද්ධා අභබ්බුප්පත්තිකා ඤාණග්ගිනා දඩ්ඪාති ඛීණාසවො. වුසිතවාති ගරුසංවාසෙපි අරියමග්ගෙපි දසසු අරියවාසෙසුපි වසි පරිවසි පරිවුට්ඨො වුට්ඨවාසො චිණ්ණචරණොති වුසිතවා. කතකරණීයොති පුථුජ්ජනකල්යාණකං උපාදාය සත්ත සෙඛා චතූහි මග්ගෙහි කරණීයං කරොන්ති නාම, ඛීණාසවස්ස සබ්බකරණීයානි කතානි පරියොසිතානි, නත්ථි උත්තරිං කරණීයං දුක්ඛක්ඛයාධිගමායාති කතකරණීයො. වුත්තම්පි චෙතං – 'खीणासवो' (क्षीणास्रव) का अर्थ है - कामास्रव आदि चारों ही आस्रव जिस अर्हत् के क्षीण हो गए हैं, समूल् नष्ट हो गए हैं, प्रहीण हो गए हैं, शान्त हो गए हैं और ज्ञान रूपी अग्नि से जल जाने के कारण पुनः उत्पन्न होने के अयोग्य हो गए हैं, वह 'क्षीणास्रव' है। 'वुसितवा' (उशितवा) का अर्थ है - जिसने गुरु-निवास में, आर्य मार्ग में और दसों आर्य-निवासों में वास किया है, जो वास कर चुका है, जिसका वास पूर्ण हो गया है, जिसने चर्या का आचरण कर लिया है, वह 'वुसितवा' है। 'कतकरणीयो' (कृतकरणीय) का अर्थ है - कल्याणकारी पृथग्जन से लेकर सात शैक्ष (साधक) चार मार्गों के द्वारा जो करने योग्य कार्य करते हैं, अर्हत् के वे सभी करने योग्य कार्य पूर्ण हो गए हैं, समाप्त हो गए हैं; दुःख के क्षय की प्राप्ति के लिए अब आगे कुछ भी करना शेष नहीं है, इसलिए वह 'कृतकरणीय' है। यह कहा भी गया है - ‘‘තස්ස සම්මා විමුත්තස්ස, සන්තචිත්තස්ස භික්ඛුනො; කතස්ස පටිචයො නත්ථි, කරණීයං න විජ්ජතී’’ති. (අ. නි. 6.55; මහාව. 244); 'उस सम्यक् रूप से विमुक्त, शान्त चित्त वाले भिक्षु के लिए किए हुए (कर्मों) का संचय नहीं है, और न ही कुछ करने योग्य शेष है' (अ. नि. 6.55; महाव. 244)। ඔහිතභාරොති තයො භාරා – ඛන්ධභාරො, කිලෙසභාරො, අභිසඞ්ඛාරභාරොති. තස්සිමෙ තයොපි භාරා ඔහිතා ඔරොපිතා නික්ඛිත්තා පාතිතාති ඔහිතභාරො. අනුප්පත්තසදත්ථොති අනුප්පත්තො සදත්ථං, සකත්ථන්ති වුත්තං හොති, කකාරස්ස දකාරො කතො. අනුප්පත්තො සදත්ථො එතෙනාති අනුප්පත්තසදත්ථො, සදත්ථොති ච අරහත්තං වෙදිතබ්බං. තඤ්හි අත්තුපනිබන්ධට්ඨෙන අත්තනො අවිජහනට්ඨෙන අත්තනො පරමත්ථෙන ච අත්තනො අත්ථත්තා සකත්ථො හොති. පරික්ඛීණභවසංයොජනොති කාමරාගසංයොජනං, පටිඝසංයොජනං, මානදිට්ඨිවිචිකිච්ඡාසීලබ්බතපරාමාසභවරාගඉස්සාමච්ඡරියඅවිජ්ජාසංයොජනන්ති ඉමානි සත්තෙ භවෙසු. භවං වා භවෙන සංයොජෙන්ති උපනිබන්ධන්තීති භවසංයොජනානි නාම. තානි අරහතො පරික්ඛීණානි, පහීනානි, ඤාණග්ගිනා, දඩ්ඪානීති පරික්ඛීණභවසංයොජනො. සම්මදඤ්ඤා විමුත්තොති එත්ථ සම්මදඤ්ඤාති සම්මා අඤ්ඤාය, ඉදං වුත්තං හොති – ඛන්ධානං ඛන්ධට්ඨං, ආයතනානං ආයතනට්ඨං, ධාතූනං සුඤ්ඤට්ඨං, දුක්ඛස්ස පීළනට්ඨං, සමුදයස්ස පභවට්ඨං, නිරොධස්ස සන්තට්ඨං, මග්ගස්ස දස්සනට්ඨං ‘‘සබ්බෙ සඞ්ඛාරා අනිච්චා’’ති එවමාදිභෙදං වා සම්මා යථාභූතං අඤ්ඤාය ජානිත්වා තීරයිත්වා තුලයිත්වා විභාවෙත්වා විභූතං කත්වා. විමුත්තොති ද්වෙ විමුත්තියො [Pg.159] චිත්තස්ස ච විමුත්ති නිබ්බානඤ්ච. අරහා හි සබ්බකිලෙසෙහි විමුත්තත්තා චිත්තවිමුත්තියාපි විමුත්තො, නිබ්බානෙපි විමුත්තොති. තෙන වුත්තං ‘‘සම්මදඤ්ඤා විමුත්තො’’ති. 'ओहितभारो' का अर्थ है - तीन भार: स्कन्ध-भार, क्लेश-भार और अभिसंस्कार-भार। जिसके ये तीनों ही भार उतार दिए गए हैं, रख दिए गए हैं, त्याग दिए गए हैं, गिरा दिए गए हैं, वह 'ओहितभारो' है। 'अनुप्पत्तसदत्थो' का अर्थ है - जिसने 'सदत्थ' (स्वार्थ/अपना लक्ष्य) प्राप्त कर लिया है; यहाँ 'सकत्थ' (स्व-अर्थ) कहना ही अभिप्रेत है, 'क' के स्थान पर 'द' हो गया है। जिसके द्वारा अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है, वह 'अनुप्पत्तसदत्थो' है; और 'सदत्थ' का अर्थ 'अर्हत्त्व' समझना चाहिए। वह (अर्हत्त्व) स्वयं से सम्बद्ध होने के कारण, स्वयं को न छोड़ने के कारण और स्वयं का परम अर्थ होने के कारण 'स्व-अर्थ' (अपना लक्ष्य) है। 'परिक्खीणभवसंयोजनो' का अर्थ है - कामराग-संयोजन, प्रतिघ-संयोजन, मान, दृष्टि, विचिकित्सा, शीलव्रत-परामर्श, भवराग, ईर्ष्या, मात्सर्य और अविद्या-संयोजन - ये सात (संयोजन) भवों में होते हैं। अथवा जो भव को भव से जोड़ते हैं, बाँधते हैं, वे 'भव-संयोजन' कहलाते हैं। अर्हत् के वे (संयोजन) क्षीण हो गए हैं, प्रहीण हो गए हैं, ज्ञान-अग्नि से जल गए हैं, इसलिए वह 'परिक्खीणभवसंयोजनो' है। 'सम्मदाञ्ञा विमुत्तो' (सम्यक् आज्ञा विमुक्त) में 'सम्मदाञ्ञा' का अर्थ है - सम्यक् रूप से जानकर। इसका अर्थ यह है - स्कन्धों के स्कन्ध-भाव को, आयतनों के आयतन-भाव को, धातुओं के शून्य-भाव को, दुःख के पीड़ा-भाव को, समुदाय के प्रभव-भाव को, निरोध के शान्त-भाव को, मार्ग के दर्शन-भाव को, अथवा 'सभी संस्कार अनित्य हैं' आदि भेदों को सम्यक् रूप से, यथार्थ रूप से जानकर, समझकर, तौलकर, स्पष्ट करके और प्रत्यक्ष करके। 'विमुक्त' का अर्थ है - दो विमुक्तियाँ: चित्त की विमुक्ति और निर्वाण। अर्हत् सभी क्लेशों से विमुक्त होने के कारण चित्त-विमुक्ति से भी विमुक्त है और निर्वाण में भी विमुक्त है। इसीलिए कहा गया है - 'सम्यक् ज्ञान से विमुक्त'। තස්ස තිට්ඨන්තෙව පඤ්චින්ද්රියානීති තස්ස අරහතො චරිමභවහෙතුභූතං කම්මං යාව න ඛීයති, තාව තිට්ඨන්තියෙව චක්ඛාදීනි පඤ්චින්ද්රියානි. අවිඝාතත්තාති අනුප්පාදනිරොධවසෙන අනිරුද්ධත්තා. මනාපාමනාපන්ති ඉට්ඨානිට්ඨං රූපාදිගොචරං. පච්චනුභොතීති වින්දති පටිලභති. සුඛදුක්ඛං පටිසංවෙදෙතීති විපාකභූතං සුඛඤ්ච දුක්ඛඤ්ච පටිසංවෙදෙති තෙහි ද්වාරෙහි පටිලභති. 'तस्स तिट्ठन्तेव पञ्चिन्द्रियानि' का अर्थ है - उस अर्हत् का अन्तिम जन्म का हेतुभूत कर्म जब तक क्षीण नहीं होता, तब तक उसकी चक्षु आदि पाँचों इन्द्रियाँ बनी ही रहती हैं। 'अविघातत्ता' का अर्थ है - अनुत्पाद-निरोध के वश से निरुद्ध न होने के कारण। 'मनापामनापं' का अर्थ है - इष्ट और अनिष्ट रूपादि विषय। 'पच्चनुभोति' का अर्थ है - अनुभव करता है, प्राप्त करता है। 'सुखदुक्खं पटिसंवेदेति' का अर्थ है - विपाक-स्वरूप सुख और दुःख का वेदन करता है, उन (इन्द्रिय) द्वारों से उन्हें प्राप्त करता है। එත්තාවතා උපාදිසෙසං දස්සෙත්වා ඉදානි සඋපාදිසෙසං නිබ්බානධාතුං දස්සෙතුං ‘‘තස්ස යො’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ තස්සාති තස්ස සඋපාදිසෙසස්ස සතො අරහතො. යො රාගක්ඛයොති රාගස්ස ඛයො ඛීණාකාරො අභාවො අච්චන්තමනුප්පාදො. එස නයො සෙසෙසුපි. එත්තාවතා රාගාදික්ඛයො සඋපාදිසෙසා නිබ්බානධාතූති දස්සිතං හොති. इतने से उपादिशेष को दिखाकर, अब स-उपादिशेष निर्वाणधातु को दिखाने के लिए 'तस्स यो' इत्यादि कहा गया है। वहाँ 'तस्स' का अर्थ है उस स-उपादिशेष युक्त अर्हत् का। 'यो रागक्खयो' का अर्थ है राग का क्षय, क्षीण होना, अभाव, अत्यंत अनुत्पाद। यही नियम शेष के लिए भी है। इतने से यह दिखाया गया है कि राग आदि का क्षय ही स-उपादिशेष निर्वाणधातु है। ඉධෙවාති ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ. සබ්බවෙදයිතානීති සුඛාදයො සබ්බා අබ්යාකතවෙදනා, කුසලාකුසලවෙදනා පන පුබ්බෙයෙව පහීනාති. අනභිනන්දිතානීති තණ්හාදීහි න අභිනන්දිතානි. සීතිභවිස්සන්තීති අච්චන්තවූපසමෙන සඞ්ඛාරදරථපටිප්පස්සද්ධියා සීතලී භවිස්සන්ති, අප්පටිසන්ධිකනිරොධෙන නිරුජ්ඣිස්සන්තීති අත්ථො. න කෙවලං වෙදයිතානියෙව, සබ්බෙපි පන ඛීණාසවසන්තානෙ පඤ්චක්ඛන්ධා නිරුජ්ඣිස්සන්ති, වෙදයිතසීසෙන දෙසනා කතා. 'इधेव' का अर्थ है इसी आत्मभाव में। 'सब्बवेदयितानि' का अर्थ है सुख आदि सभी अव्याकृत वेदनाएँ, क्योंकि कुशल और अकुशल वेदनाएँ तो पहले ही प्रहीण हो चुकी हैं। 'अनभिनन्दितानि' का अर्थ है तृष्णा आदि के द्वारा अभिनंदित न की गई। 'सीतिभविसन्ति' का अर्थ है अत्यंत व्युपशम के द्वारा, संस्कारों के संताप की शांति से शीतल हो जाएँगी, अर्थात् प्रतिसन्धि-रहित निरोध से निरुद्ध हो जाएँगी। न केवल वेदनाएँ ही, बल्कि क्षीणास्रव की संतान में सभी पाँचों स्कन्ध निरुद्ध हो जाएँगे; यहाँ वेदना को मुख्य मानकर देशना की गई है। ගාථාසු චක්ඛුමතාති බුද්ධචක්ඛු, ධම්මචක්ඛු, දිබ්බචක්ඛු, පඤ්ඤාචක්ඛු, සමන්තචක්ඛූති පඤ්චහි චක්ඛූහි චක්ඛුමතා. අනිස්සිතෙනාති තණ්හාදිට්ඨිනිස්සයවසෙන කඤ්චි ධම්මං අනිස්සිතෙන, රාගබන්ධනාදීහි වා අබන්ධෙන. තාදිනාති ඡළඞ්ගුපෙක්ඛාවසෙන සබ්බත්ථ ඉට්ඨාදීසු එකසභාවතාසඞ්ඛාතෙන තාදිලක්ඛණෙන තාදිනා. දිට්ඨධම්මිකාති ඉමස්මිං අත්තභාවෙ භවා වත්තමානා. භවනෙත්තිසඞ්ඛයාති භවනෙත්තියා තණ්හාය පරික්ඛයා. සම්පරායිකාති සම්පරායෙ ඛන්ධභෙදතො පරභාගෙ භවා. යම්හීති යස්මිං අනුපාදිසෙසනිබ්බානෙ. භවානීති ලිඞ්ගවිපල්ලාසෙන වුත්තං, උපපත්තිභවා සබ්බසො අනවසෙසා නිරුජ්ඣන්ති, න පවත්තන්ති. गाथाओं में 'चक्खुमता' का अर्थ है बुद्ध-चक्षु, धर्म-चक्षु, दिव्य-चक्षु, प्रज्ञा-चक्षु और सामन्त-चक्षु—इन पाँच चक्षुओं से युक्त। 'अनिसितेन' का अर्थ है तृष्णा और दृष्टि के आश्रय के वश में किसी भी धर्म का आश्रय न लेने वाला, अथवा राग के बंधनों आदि से मुक्त। 'तादिना' का अर्थ है षडंग-उपेक्षा के कारण सभी इष्ट-अनिष्ट विषयों में एक समान स्वभाव वाली 'तादि' लक्षण से युक्त। 'दिट्ठधम्मिका' का अर्थ है इसी आत्मभाव में होने वाले। 'भवनैत्तिसंखया' का अर्थ है भवनैत्ति अर्थात् तृष्णा के पूर्ण क्षय से। 'साम्परायिका' का अर्थ है सम्पराय में, स्कन्धों के भेद के बाद होने वाले। 'यम्हि' का अर्थ है जिस अनुपपादिशेष निर्वाण में। 'भवानि' यहाँ लिंग-विपर्यास के साथ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि उत्पत्ति रूपी भव पूरी तरह से बिना किसी अवशेष के निरुद्ध हो जाते हैं, पुनः प्रवृत्त नहीं होते। තෙති [Pg.160] තෙ එවං විමුත්තචිත්තා. ධම්මසාරාධිගමාති විමුත්තිසාරත්තා ඉමස්ස ධම්මවිනයස්ස, ධම්මෙසු සාරභූතස්ස අරහත්තස්ස අධිගමනතො. ඛයෙති රාගාදික්ඛයභූතෙ නිබ්බානෙ රතා අභිරතා. අථ වා නිච්චභාවතො සෙට්ඨභාවතො ච ධම්මෙසු සාරන්ති ධම්මසාරං, නිබ්බානං. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘විරාගො සෙට්ඨො ධම්මානං (ධ. ප. 273), විරාගො තෙසං අග්ගමක්ඛායතී’’ති (ඉතිවු. 90; අ. නි. 4.34) ච. තස්ස ධම්මසාරස්ස අධිගමහෙතු ඛයෙ සබ්බසඞ්ඛාරපරික්ඛයෙ අනුපාදිසෙසනිබ්බානෙ රතා. පහංසූති පජහිංසු. තෙති නිපාතමත්තං. සෙසං වුත්තනයමෙව. 'ते' का अर्थ है वे इस प्रकार विमुक्त चित्त वाले। 'धम्मसाराधिगमा' का अर्थ है इस धर्म-विनय के विमुक्ति-सार होने के कारण, धर्मों में सारभूत अर्हत्त्व की प्राप्ति से। 'खये' का अर्थ है राग आदि के क्षय रूप निर्वाण में रत, अभिरत। अथवा, नित्य होने और श्रेष्ठ होने के कारण धर्मों में जो सार है, वह 'धम्मसार' अर्थात् निर्वाण है। जैसा कि कहा गया है—'धर्मों में विराग श्रेष्ठ है' और 'विराग उनमें अग्र कहा जाता है'। उस धर्म-सार की प्राप्ति के हेतु, 'खये' अर्थात् सभी संस्कारों के परिक्षय रूप अनुपपादिशेष निर्वाण में रत। 'पहंसु' का अर्थ है त्याग दिया। 'ते' यहाँ केवल एक निपात है। शेष अर्थ पहले बताए गए अनुसार ही है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र की वर्णना समाप्त हुई। 8. පටිසල්ලානසුත්තවණ්ණනා ८. प्रतिसल्लान सूत्र की वर्णना 45. අට්ඨමෙ පටිසල්ලානරාමාති තෙහි තෙහි සත්තසඞ්ඛාරෙහි පටිනිවත්තිත්වා සල්ලානං පටිසල්ලානං, එකවිහාරො එකමන්තසෙවිතා, කායවිවෙකොති අත්ථො. තං පටිසල්ලානං රමන්ති රොචන්තීති පටිසල්ලානරාමා. ‘‘පටිසල්ලානාරාමා’’තිපි පාඨො. යථා වුත්තං පටිසල්ලානං ආරමිතබ්බතො ආරාමො එතෙසන්ති පටිසල්ලානාරාමා. විහරථාති එවංභූතා හුත්වා විහරථාති අත්ථො. පටිසල්ලානෙ රතා නිරතා සම්මුදිතාති පටිසල්ලානරතා. එත්තාවතා ජාගරියානුයොගො, තස්ස නිමිත්තභූතා වූපකට්ඨකායතා ච දස්සිතා. ජාගරියානුයොගො, සීලසංවරො, ඉන්ද්රියෙසු, ගුත්තද්වාරතා, භොජනෙ මත්තඤ්ඤුතා, සතිසම්පජඤ්ඤන්ති ඉමෙහි ධම්මෙහි විනා න වත්තතීති තෙපි ඉධ අත්ථතො වුත්තා එවාති වෙදිතබ්බා. ४५. आठवें में 'पटिसल्लानरामा' का अर्थ है—उन-उन सत्त्वों और संस्कारों से निवृत्त होकर संल्लान करना 'प्रतिसल्लान' है, जिसका अर्थ है एकाकी विहार, एकांत का सेवन, अर्थात् काय-विवेक। उस प्रतिसल्लान में जो रमण करते हैं, उसे पसंद करते हैं, वे 'पटिसल्लानरामा' हैं। 'पटिसल्लानारामा' ऐसा भी पाठ है। यथाोक्त प्रतिसल्लान ही जिनका आराम है, वे 'पटिसल्लानारामा' हैं। 'विहरथ' का अर्थ है—इस प्रकार के होकर विहार करो। प्रतिसल्लान में रत, निरत और प्रसन्न रहने वाले 'पटिसल्लानरता' हैं। इतने से जागरियानुयोग और उसके निमित्त भूत विविक्त-कायता को दिखाया गया है। जागरियानुयोग, शील-संवर, इंद्रियों में गुप्तद्वारता, भोजन में मात्रज्ञता और स्मृति-सम्प्रजन्य—इन धर्मों के बिना यह संभव नहीं है, इसलिए वे भी यहाँ अर्थतः कहे ही गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। අජ්ඣත්තං චෙතොසමථමනුයුත්තාති අත්තනො චිත්තසමථෙ අනුයුත්තා. අජ්ඣත්තං අත්තනොති ච එතං එකත්ථං, බ්යඤ්ජනමෙව නානං. භුම්මත්ථෙ චෙතං සමථන්ති අනුසද්දයොගෙන උපයොගවචනං. අනිරාකතජ්ඣානාති බහි අනීහතජ්ඣානා අවිනාසිතජ්ඣානා වා. නීහරණං විනාසො වාති ඉදං නිරාකතං නාම ‘‘ථම්භං නිරංකත්වා නිවාතවුත්තී’’තිආදීසු (සු. නි. 328) විය. විපස්සනාය සමන්නාගතාති සත්තවිධාය අනුපස්සනාය යුත්තා. සත්තවිධා අනුපස්සනා නාම [Pg.161] අනිච්චානුපස්සනා, දුක්ඛානුපස්සනා, අනත්තානුපස්සනා, නිබ්බිදානුපස්සනා, විරාගානුපස්සනා, නිරොධානුපස්සනා, පටිනිස්සග්ගානුපස්සනා ච, තා විසුද්ධිමග්ගෙ විත්ථාරිතාව. 'अज्झत्तं चेतोसमथमनुयुत्ता' का अर्थ है अपने चित्त के शम में लगे हुए। 'अज्झत्तं' और 'अत्तनो' ये एक ही अर्थ वाले हैं, केवल व्यंजन भिन्न हैं। यहाँ 'समथं' शब्द सप्तमी विभक्ति के अर्थ में है, जो 'अनु' शब्द के योग से द्वितीया विभक्ति में प्रयुक्त हुआ है। 'अनिराकतज्झाना' का अर्थ है—बाहर न निकाले गए ध्यान वाले अथवा नष्ट न किए गए ध्यान वाले। 'निराकृत' का अर्थ है बाहर निकालना या विनाश करना, जैसा कि 'थम्भं निरंकत्वा निवातवुत्ती' आदि में है। 'विपस्सनाय समन्नागता' का अर्थ है सात प्रकार की अनुपश्यनाओं से युक्त। सात प्रकार की अनुपश्यनाएँ हैं—अनित्यानुपश्यना, दुःखानुपश्यना, अनात्मानुपश्यना, निर्विदानुपश्यना, विरागानुपश्यना, निरोधानुपश्यना और प्रतिनिसर्गानुपश्यना; इनका विशुद्धिमार्ग में विस्तार से वर्णन किया गया है। බ්රූහෙතාරො සුඤ්ඤාගාරානන්ති වඩ්ඪෙතාරො සුඤ්ඤාගාරානං. එත්ථ ච ‘‘සුඤ්ඤාගාරාන’’න්ති යංකිඤ්චි විවිත්තං භාවනානුයොගස්ස අනුච්ඡවිකට්ඨානං. සමථවිපස්සනාවසෙන කම්මට්ඨානං ගහෙත්වා රත්තින්දිවං සුඤ්ඤාගාරං පවිසිත්වා භාවනානුයොගවසෙන නිසීදමානා භික්ඛූ ‘‘බ්රූහෙතාරො සුඤ්ඤාගාරාන’’න්ති වෙදිතබ්බා. එකභූමිකාදිපාසාදෙපි පන වාසං කුරුමානා ඣායිනො සුඤ්ඤාගාරානං බ්රූහෙතාරොත්වෙව වෙදිතබ්බා. 'ब्रूहेतारो सुञ्ञागारानं' का अर्थ है शून्यागारों को बढ़ाने वाले। यहाँ 'सुञ्ञागारानं' का अर्थ है भावना के अभ्यास के लिए उपयुक्त कोई भी विविक्त स्थान। शम और विपश्यना के अनुसार कर्मस्थान को ग्रहण कर, रात-दिन शून्यागार में प्रवेश कर भावना के अभ्यास में बैठने वाले भिक्षुओं को 'शून्यागारों को बढ़ाने वाले' समझना चाहिए। एक मंजिला प्रासाद आदि में वास करने वाले ध्यानी भिक्षुओं को भी 'शून्यागारों को बढ़ाने वाले' ही समझना चाहिए। එත්ථ ච යා ‘‘පටිසල්ලානරාමා, භික්ඛවෙ, විහරථ පටිසල්ලානරතා’’ති වූපකට්ඨකායතා විහිතා, සා පරිසුද්ධසීලස්ස, න අසීලස්ස අවිසුද්ධසීලස්ස වා තස්ස රූපාරම්මණාදිතො චිත්තවිනිවත්තනස්සෙව අභාවතොති අත්ථතො සීලවිසුද්ධි දස්සිතාති වුත්තොවායමත්ථො. ‘‘අජ්ඣත්තං චෙතොසමථමනුයුත්තා අනිරාකතජ්ඣානා’’ති පදද්වයෙන සමාධිභාවනා, ‘‘විපස්සනාය සමන්නාගතා’’ති ඉමිනා පඤ්ඤාභාවනා විහිතාති ලොකියා තිස්සො සික්ඛා දස්සිතා. यहाँ जो 'भिक्षुओं! प्रतिसल्लान-राम होकर विहार करो, प्रतिसल्लान-रत होकर' इस प्रकार विविक्त-कायता का विधान किया गया है, वह परिशुद्ध शील वाले के लिए है, अशील या अविशुद्ध शील वाले के लिए नहीं, क्योंकि उसके लिए रूपादि आलम्बनों से चित्त को हटाना संभव नहीं है; अतः यहाँ अर्थतः शील-विशुद्धि दिखाई गई है, यह बात पहले ही कही जा चुकी है। 'अज्झत्तं चेतोसमथमनुयुत्ता अनिराकतज्झाना' इन दो पदों से समाधि-भावना और 'विपस्सनाय समन्नागता' इससे प्रज्ञा-भावना का विधान किया गया है—इस प्रकार यहाँ तीन लौकिक शिक्षाएँ दिखाई गई हैं। ඉදානි තාසු පතිට්ඨිතස්ස අවස්සංභාවිඵලං දස්සෙතුං ‘‘පටිසල්ලානරාමාන’’න්තිආදි වුත්තං. තත්ථ බ්රූහෙතානන්ති වඩ්ඪෙතානං. ද්වින්නං ඵලානන්ති තතියචතුත්ථඵලානං. පාටිකඞ්ඛන්ති ඉච්ඡිතබ්බං අවස්සංභාවී. අඤ්ඤාති අරහත්තං. තඤ්හි හෙට්ඨිමමග්ගඤාණෙහි ඤාතමරියාදං අනතික්කමිත්වා ජානනතො පරිපුණ්ණජානනත්තා උපරි ජානනකිච්චාභාවතො ච ‘‘අඤ්ඤා’’ති වුච්චති. සති වා උපාදිසෙසෙති සති වා කිලෙසූපාදිසෙසෙ, පහාතුං අසක්කුණෙය්යෙ සති. ඤාණෙ හි අපරිපක්කෙ යෙ තෙන පරිපක්කෙන පහාතබ්බකිලෙසා, තෙ න පහීයන්ති. තං සන්ධායාහ ‘‘සති වා උපාදිසෙසෙ’’ති. සති ච කිලෙසෙ ඛන්ධාභිසඞ්ඛාරා තිට්ඨන්ති එව. ඉති ඉමස්මිං සුත්තෙ අනාගාමිඵලං අරහත්තන්ති ද්වෙ ධම්මා දස්සිතා. යථා චෙත්ථ, එවං ඉතො පරෙසු ද්වීසු සුත්තෙසු. अब उनमें प्रतिष्ठित व्यक्ति के अनिवार्य फल को दिखाने के लिए 'प्रतिसंलयनाराम' (एकांतप्रिय) आदि कहा गया है। वहाँ 'ब्रूहेतानं' का अर्थ है 'बढ़ाने वालों का'। 'दो फलों का' का अर्थ है तीसरे और चौथे फल (अनागामी और अर्हत्व) का। 'पाटिकंखा' का अर्थ है अपेक्षित या अनिवार्य। 'अञ्ञा' का अर्थ है अर्हत्व। क्योंकि वह निचले मार्ग-ज्ञानों द्वारा ज्ञात मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए जानने के कारण, परिपूर्ण ज्ञान होने के कारण और ऊपर कोई अन्य जानने योग्य कार्य न होने के कारण 'अञ्ञा' (पूर्ण ज्ञान) कहा जाता है। 'सति वा उपादिसैसे' का अर्थ है क्लेश-उपादि शेष रहने पर, जिसे त्यागना संभव न हो। क्योंकि ज्ञान के अपरिपक्व होने पर, उस परिपक्व ज्ञान द्वारा त्यागे जाने वाले क्लेश नष्ट नहीं होते। उसी के संदर्भ में कहा गया है 'सति वा उपादिसैसे'। और क्लेशों के रहने पर स्कंध-अभिसंस्कार बने ही रहते हैं। इस प्रकार इस सुत्त में अनागामी फल और अर्हत्व - ये दो धर्म दिखाए गए हैं। जैसे यहाँ है, वैसे ही इसके बाद के दो सुत्तों में भी है। ගාථාසු යෙ සන්තචිත්තාති යෙ යොගාවචරා තදඞ්ගවසෙන වික්ඛම්භනවසෙව ච සමිතකිලෙසතාය සන්තචිත්තා. නෙපක්කං වුච්චති පඤ්ඤා, තාය සමන්නාගතත්තා නිපකා. ඉමිනා තෙසං කම්මට්ඨානපරිහරණඤාණං දස්සෙති. සතිමන්තො [Pg.162] ච ඣායිනොති ඨානනිසජ්ජාදීසු කම්මට්ඨානාවිජහනහෙතුභූතාය සතියා සතිමන්තො, ආරම්මණූපනිජ්ඣානලක්ඛණෙන ඣානෙන ඣායිනො. සම්මා ධම්මං විපස්සන්ති, කාමෙසු අනපෙක්ඛිනොති පුබ්බෙයෙව ‘‘අට්ඨිකඞ්කලූපමා කාමා’’තිආදිනා (ම. නි. 1.234; පාචි. 417) වත්ථුකාමෙසු කිලෙසකාමෙසු ච ආදීනවපච්චවෙක්ඛණෙන අනපෙක්ඛිනො අනත්ථිකා තෙ පහාය අධිගතං උපචාරසමාධිං අප්පනාසමාධිං වා පාදකං කත්වා නාමරූපං තස්ස පච්චයෙ ච පරිග්ගහෙත්වා කලාපසම්මසනාදික්කමෙන සම්මා අවිපරීතං පඤ්චක්ඛන්ධධම්මං අනිච්චාදිතො විපස්සන්ති. गाथाओं में 'ये सन्तचित्ता' का अर्थ है वे योगाभ्यासी जो तदंग (अंग विशेष) और विष्कम्भन (दबाने) के वश से क्लेशों के शांत होने के कारण शांत चित्त वाले हैं। 'नैपक्क्य' प्रज्ञा को कहा जाता है, उससे युक्त होने के कारण वे 'निपक' (निपुण) हैं। इससे उनके कर्मस्थान के परिहार (रक्षा) संबंधी ज्ञान को दिखाया गया है। 'सतिमन्तो च झायिनो' का अर्थ है खड़े होने, बैठने आदि में कर्मस्थान को न छोड़ने के कारणभूत स्मृति से युक्त होने के कारण 'स्मृतिमान' हैं, और आलंबन के सूक्ष्म ध्यान (उपनिध्यान) के लक्षण वाले ध्यान के कारण 'ध्यानी' हैं। 'सम्मा धम्मं विपस्सन्ति, कामेसु अनपेक्खिनो' का अर्थ है पहले ही 'काम हड्डियों के ढांचे के समान हैं' आदि के द्वारा वस्तु-काम और क्लेश-काम में दोषों का प्रत्यवेक्षण करने से जो अनपेक्षी (इच्छा रहित) और निष्काम हैं, वे उन्हें त्यागकर प्राप्त किए गए उपचार समाधि या अर्पणा समाधि को आधार बनाकर, नाम-रूप और उसके प्रत्ययों (कारणों) का परिग्रह करके, कलाप-सम्मसन (समूहों के विचार) आदि के क्रम से सम्यक् और अविपरीत रूप से पंचस्कंध रूपी धर्म को अनित्य आदि के रूप में देखते हैं। අප්පමාදරතාති වුත්තප්පකාරාය සමථවිපස්සනාභාවනාය අප්පමජ්ජනෙ රතා අභිරතා තත්ථ අප්පමාදෙනෙව රත්තින්දිවං වීතිනාමෙන්තා. සන්තාති සමානා. ‘‘සත්තා’’තිපි පාඨො, පුග්ගලාති අත්ථො. පමාදෙ භයදස්සිනොති නිරයූපපත්තිආදිකං පමාදෙ භයං පස්සන්තා. අභබ්බා පරිහානායාති තෙ එවරූපා සමථවිපස්සනාධම්මෙහි මග්ගඵලෙහි වා පරිහානාය අභබ්බා. සමථවිපස්සනාතො හි සම්පත්තතො න පරිහායන්ති, ඉතරානි ච අප්පත්තානි පාපුණන්ති. නිබ්බානස්සෙව සන්තිකෙති නිබ්බානස්ස ච අනුපාදාපරිනිබ්බානස්ස ච සන්තිකෙ එව, න චිරස්සෙව නං අධිගමිස්සන්තීති. 'अप्पमादरता' का अर्थ है उक्त प्रकार की शमथ और विपश्यना भावना में प्रमाद न करने में रत, लीन, वहाँ अप्रमाद के साथ ही रात-दिन बिताने वाले। 'सन्ता' का अर्थ है होते हुए। 'सत्ता' भी पाठ है, जिसका अर्थ 'पुद्गल' (व्यक्ति) है। 'पमादे भयदस्सिनो' का अर्थ है प्रमाद में नरक में जन्म लेने आदि के भय को देखने वाले। 'अभव्वा परिहानाय' का अर्थ है वे इस प्रकार के शमथ-विपश्यना धर्मों से या मार्ग-फलों से पतित होने के अयोग्य हैं। क्योंकि वे प्राप्त शमथ-विपश्यना से पतित नहीं होते, और जो अप्राप्त हैं उन्हें प्राप्त कर लेते हैं। 'निब्बानस्सेव सन्तिके' का अर्थ है निर्वाण और अनुपादा-परिनिर्वाण के समीप ही हैं, शीघ्र ही उसे प्राप्त कर लेंगे। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 9. සික්ඛානිසංසසුත්තවණ්ණනා ९. शिक्षानिशंस सुत्त की व्याख्या 46. නවමෙ සික්ඛානිසංසාති එත්ථ සික්ඛිතබ්බාති සික්ඛා, සා තිවිධා අධිසීලසික්ඛා, අධිචිත්තසික්ඛා, අධිපඤ්ඤාසික්ඛාති. තිවිධාපි චෙසා සික්ඛා ආනිසංසා එතෙසං, න ලාභසක්කාරසිලොකාති සික්ඛානිසංසා. විහරථාති සික්ඛානිසංසා හුත්වා විහරථ, තීසු සික්ඛාසු ආනිසංසදස්සාවිනො හුත්වා තාහි සික්ඛාහි ලද්ධබ්බං ආනිසංසමෙව සම්පස්සන්තා විහරථාති අත්ථො. පඤ්ඤුත්තරාති තාසු සික්ඛාසු යා අධිපඤ්ඤාසික්ඛාසඞ්ඛාතා පඤ්ඤා, සා උත්තරා පධානා විසිට්ඨා එතෙසන්ති පඤ්ඤුත්තරා. යෙ හි සික්ඛානිසංසා විහරන්ති, තෙ පඤ්ඤුත්තරා භවන්තීති. විමුත්තිසාරාති [Pg.163] අරහත්තඵලසඞ්ඛාතා විමුත්ති සාරං එතෙසන්ති විමුත්තිසාරා, යථාවුත්තං විමුත්තිංයෙව සාරතො ගහෙත්වා ඨිතාති අත්ථො. යෙ හි සික්ඛානිසංසා පඤ්ඤුත්තරා ච, න තෙ භවවිසෙසං පත්ථෙන්ති, අපිච ඛො විභවං ආකඞ්ඛන්තා විමුත්තිංයෙව සාරතො පච්චෙන්ති. සතාධිපතෙය්යාති ජෙට්ඨකකරණට්ඨෙන සති අධිපතෙය්යං එතෙසන්ති සතාධිපතෙය්යා අධිපති එව අධිපතෙය්යන්ති කත්වා, චතූසු සතිපට්ඨානෙසු සුප්පතිට්ඨිතචිත්තා කායානුපස්සනාදිමුඛෙන සමථවිපස්සනාභාවනානුයුත්තාති අත්ථො. ४६. नौवें (सुत्त) में 'सिक्खानिसंसा' (शिक्षा ही जिनका लाभ है) - यहाँ जो सीखी जानी चाहिए वह 'शिक्षा' है, वह तीन प्रकार की है: अधिशील शिक्षा, अधिचित्त शिक्षा और अधिप्रज्ञा शिक्षा। ये तीनों शिक्षाएँ ही जिनका लाभ (फल) हैं, न कि लाभ, सत्कार और यश - वे 'सिक्खानिसंसा' हैं। 'विहरथ' का अर्थ है शिक्षानिशंस होकर विहार करो, तीनों शिक्षाओं में लाभ देखने वाले होकर, उन शिक्षाओं से प्राप्त होने वाले लाभ को ही देखते हुए विहार करो - यह अर्थ है। 'पञ्ञुत्तरा' का अर्थ है उन शिक्षाओं में जो अधिप्रज्ञा शिक्षा नामक प्रज्ञा है, वह जिनकी उत्तर (प्रधान, विशिष्ट) है, वे 'प्रज्ञोत्तर' हैं। जो शिक्षानिशंस होकर विहार करते हैं, वे प्रज्ञोत्तर होते हैं। 'विमुत्तिसारा' का अर्थ है अर्हत्व फल रूपी विमुक्ति ही जिनका सार है, वे 'विमुक्तिसार' हैं, अर्थात् उक्त विमुक्ति को ही सार रूप में ग्रहण करके स्थित हैं। जो शिक्षानिशंस और प्रज्ञोत्तर हैं, वे किसी विशेष भव (पुनर्जन्म) की इच्छा नहीं करते, बल्कि विभव (भव का अंत) की आकांक्षा करते हुए विमुक्ति को ही सार रूप में प्राप्त करते हैं। 'सताधिपतेय्या' का अर्थ है श्रेष्ठता के अर्थ में स्मृति ही जिनका अधिपति (स्वामी) है, वे 'स्मृत्यधिपति' हैं; अधिपति ही आधिपत्य है, ऐसा मानकर, चारों स्मृतिप्रस्थानों में सुप्रतिष्ठित चित्त वाले, कायानुपश्यना आदि के माध्यम से शमथ-विपश्यना भावना में लगे हुए - यह अर्थ है। අථ වා සික්ඛානිසංසාති භික්ඛවෙ, එවරූපෙ දුල්ලභක්ඛණපටිලාභෙ තිවිධසික්ඛාසික්ඛනමෙව ආනිසංසං කත්වා විහරථ, එවං විහරන්තා ච පඤ්ඤුත්තරා පඤ්ඤාය උත්තරා ලොකුත්තරපඤ්ඤාය සමන්නාගතා හුත්වා විහරථ, එවංභූතා ච විමුත්තිසාරා නිබ්බානසාරා අනඤ්ඤසාරා විහරථ. තථාභාවස්ස චායං උපායො, යං සතාධිපතෙය්යා විහරථ, සතිපට්ඨානභාවනාය යුත්තප්පයුත්තා හොථ, සබ්බත්ථ වා සතාරක්ඛෙන චෙතසා විහරථාති එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. ඉති භගවා තීසු සික්ඛාසු භික්ඛූ නියොජෙන්තො යථා තා සික්ඛිතබ්බා, යෙන ච පාරිපූරිං ගච්ඡන්ති, තං සඞ්ඛෙපෙනෙව දස්සෙත්වා ඉදානි යථානුසිට්ඨං පටිපජ්ජමානානං ඵලවිසෙසදස්සනෙන තස්සා පටිපත්තියා අමොඝභාවං පකාසෙන්තො ‘‘සික්ඛානිසංසාන’’න්තිආදිමාහ. තං වුත්තත්ථමෙව. अथवा 'सिक्खानिसंसा' का अर्थ है - हे भिक्षुओं, इस प्रकार के दुर्लभ क्षण (मनुष्य जन्म) की प्राप्ति होने पर, त्रिविध शिक्षाओं को सीखने को ही अपना लाभ बनाकर विहार करो, और इस प्रकार विहार करते हुए प्रज्ञोत्तर (प्रज्ञा में श्रेष्ठ), लोकोत्तर प्रज्ञा से युक्त होकर विहार करो, और इस प्रकार होकर विमुक्तिसार (निर्वाण ही जिनका सार है, अन्य कुछ नहीं) होकर विहार करो। और वैसा होने का यह उपाय है कि स्मृत्यधिपति होकर विहार करो, स्मृतिप्रस्थान भावना में पूरी तरह लगे रहो, अथवा सर्वत्र स्मृति रूपी रक्षा वाले चित्त से विहार करो - इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। इस प्रकार भगवान भिक्षुओं को तीन शिक्षाओं में नियुक्त करते हुए, वे कैसे सीखी जानी चाहिए और जिससे वे पूर्णता को प्राप्त होती हैं, उसे संक्षेप में दिखाकर, अब उपदेशानुसार प्रतिपत्ति (अभ्यास) करने वालों के लिए फल-विशेष को दिखाने के द्वारा उस प्रतिपत्ति की अमोघता (सफलता) को प्रकाशित करते हुए 'सिक्खानिसंसानं' आदि कहा। उसका अर्थ पहले बताया जा चुका है। ගාථාසු පරිපුණ්ණසික්ඛන්ති අග්ගඵලප්පත්තියා පරිසුද්ධසික්ඛං, අසෙක්ඛන්ති අත්ථො. අපහානධම්මන්ති එත්ථ පහානධම්මා වුච්චන්ති කුප්පා විමුත්තියො. පහානධම්මොති හි හානධම්මො කුප්පධම්මො. න පහානධම්මොති අපහානධම්මො, අකුප්පධම්මො. ‘‘අප්පහානධම්මො’’තිපි පාළි, සො එව අත්ථො. ඛයො එව අන්තොති ඛයන්තො, ජාතියා ඛයන්තො ජාතිඛයන්තො, නිබ්බානං. ඛයො වා මරණං, ජාතිඛයන්තො නිබ්බානමෙව, තස්ස දිට්ඨත්තා ජාතිඛයන්තදස්සී. गाथाओं में 'परिपुण्णसिक्ख' (परिपूर्ण शिक्षा) का अर्थ है अग्रफल (अरहत्व) की प्राप्ति से परिशुद्ध शिक्षा, अर्थात् 'असेख' (अशैक्ष्य)। 'अपहानधम्म' यहाँ 'पहानधम्म' (त्यागने योग्य धर्म) उन्हें कहा जाता है जो 'कुप्प विमुत्ति' (विचलित होने वाली विमुक्ति) हैं। 'पहानधम्म' का अर्थ है 'हानधम्म' (क्षय होने वाला धर्म) या 'कुप्पधम्म' (विचलित होने वाला धर्म)। 'न पहानधम्म' का अर्थ है 'अपहानधम्म', अर्थात् 'अकुप्पधम्म' (अविचलित धर्म)। 'अप्पहानधम्म' भी पाठ है, उसका अर्थ वही है। 'खय' (क्षय) ही अन्त है, इसलिए 'खयन्त' है; जाति का क्षय 'जातिखयन्त' है, जो निर्वाण है। अथवा क्षय का अर्थ मरण है, 'जातिखयन्त' केवल निर्वाण ही है, उसे देखने के कारण 'जातिखयन्तदस्सी' (जाति के क्षय को देखने वाला) कहा गया है। තස්මාති යස්මා සික්ඛාපාරිපූරියා අයං ජරාපාරඞ්ගමනපරියොසානො ආනිසංසො, තස්මා. සදාති සබ්බකාලං. ඣානරතාති ලක්ඛණූපනිජ්ඣානෙ, ආරම්මණූපනිජ්ඣානෙති දුවිධෙපි ඣානෙ රතා, තතො එව [Pg.164] සමාහිතා. මාරං සසෙනං අභිභුය්යාති කිලෙසසෙනාය අනට්ඨසෙනාය ච සසෙනං අනවසිට්ඨං චතුබ්බිධම්පි මාරං අභිභවිත්වා. දෙවපුත්තමාරස්සපි හි ගුණමාරණෙ සහායභාවූපගමනතො කිලෙසා ‘‘සෙනා’’ති වුච්චන්ති. තථා රොගාදයො අනට්ඨා මච්චුමාරස්ස. යථාහ – 'तस्मा' (इसलिए) क्योंकि शिक्षा की परिपूर्णता से यह जरा (बुढ़ापे) के पार जाने वाला अन्तिम लाभ है, इसलिए। 'सदा' अर्थात् सब समय। 'झानरता' (ध्यान में रत) अर्थात् 'लक्खणूपनिज्झान' (लक्षणों का ध्यान/विपश्यना) और 'आरम्मणूपनिज्झान' (आलम्बन का ध्यान/शमथ) - इन दोनों प्रकार के ध्यानों में रत, इसलिए वे समाहित हैं। 'मारं ससेनं अभिभुय्य' (सेना सहित मार को जीतकर) अर्थात् क्लेश-सेना और अनर्थ-सेना के साथ, बिना कुछ शेष छोड़े चारों प्रकार के मारों को जीतकर। देवपुत्र मार के भी गुणों को मारने में सहायक होने के कारण क्लेशों को 'सेना' कहा जाता है। उसी प्रकार रोग आदि अनर्थ मृत्यु-मार (मच्चुमार) की सेना हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘කාමා තෙ පඨමා සෙනා, දුතියා අරති වුච්චති; තතියා ඛුප්පිපාසා තෙ, චතුත්ථී තණ්හා පවුච්චති. “काम तुम्हारी पहली सेना है, दूसरी अरति (अरुचि) कही जाती है; तीसरी तुम्हारी क्षुधा-पिपासा (भूख-प्यास) है, चौथी तृष्णा कही जाती है। ‘‘පඤ්චමී ථිනමිද්ධං තෙ, ඡට්ඨා භීරූ පවුච්චති; සත්තමී විචිකිච්ඡා තෙ, මක්ඛො ථම්භො ච අට්ඨමො. “पाँचवीं तुम्हारी थीन-मिद्ध (आलस्य-तन्द्रा) है, छठी भीरु (डर) कही जाती है; सातवीं तुम्हारी विचिकित्सा (संदेह) है, और आठवां मक्ख (मक्ख - गुणों का नाश) और थम्भ (स्तम्भ - जड़ता) है। ‘‘ලාභො සිලොකො සක්කාරො, මිච්ඡාලද්ධො ච යො යසො; යො චත්තානං සමුක්කංසෙ, පරෙ ච අවජානති. “लाभ, श्लोक (यश), सत्कार और जो मिथ्या रूप से प्राप्त यश है; जो स्वयं की प्रशंसा करता है और दूसरों की अवहेलना करता है। ‘‘එසා නමුචි තෙ සෙනා, කණ්හස්සාභිප්පහාරිනී; න නං අසූරො ජිනාති, ජෙත්වා ච ලභතෙ සුඛ’’න්ති. (සු. නි. 438-441; මහානි. 28); “हे नमुचि (मार)! यह तुम्हारी सेना है, जो कृष्ण (मार) की प्रहार करने वाली है; कोई कायर इसे जीत नहीं सकता, इसे जीतकर ही सुख प्राप्त होता है।” යථා චාහ – जैसा कि कहा गया है - ‘‘අජ්ජෙව කිච්චමාතප්පං, කො ජඤ්ඤා මරණං සුවෙ; න හි නො සඞ්ගරං තෙන, මහාසෙනෙන මච්චුනා’’ති. (ම. නි. 3.280; ජා. 2.22.121); “आज ही पुरुषार्थ (आतप) करना चाहिए, कल मृत्यु होगी यह कौन जानता है? उस महासेना वाले मृत्यु (यम) के साथ हमारा कोई समझौता नहीं है।” භවථ ජාතිමරණස්ස පාරගාති ජාතියා මරණස්ස ච පාරගාමිනො නිබ්බානගාමිනො භවථාති. 'भवथ जातिमरणस्स पारगा' का अर्थ है - जाति और मरण के पार जाने वाले, निर्वाण को प्राप्त करने वाले बनो। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. ජාගරියසුත්තවණ්ණනා १०. जागरिय-सुत्त की व्याख्या 47. දසමෙ ජාගරොති ජාගරකො විගතනිද්දො ජාගරියං අනුයුත්තො, රත්තින්දිවං කම්මට්ඨානමනසිකාරෙ යුත්තප්පයුත්තොති අත්ථො. වුත්තඤ්හෙතං – ४७. दसवें (सूत्र) में 'जागरो' का अर्थ है जागने वाला, निद्रा रहित, जागरण में लगा हुआ, रात-दिन कर्मस्थान (ध्यान) के मनसिकार में पूरी तरह लगा हुआ। यह कहा भी गया है - ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු පුබ්බරත්තාපරරත්තං ජාගරියානුයොගමනුයුත්තො හොති? ඉධ භික්ඛු දිවසං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති, රත්තියා පඨමං යාමං චඞ්කමෙන [Pg.165] නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති, රත්තියා මජ්ඣිමං යාමං දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙති පාදෙ පාදං අච්චාධාය සතො සම්පජානො උට්ඨානසඤ්ඤං මනසි කරිත්වා, රත්තියා පච්ඡිමං යාමං පච්චුට්ඨාය චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. එවං භික්ඛු පුබ්බරත්තාපරරත්තං ජාගරියානුයොගමනුයුත්තො හොතී’’ති (විභ. 519). “और भिक्षुओं, भिक्षु कैसे पूर्व-रात्रि और अपर-रात्रि में जागरण के अभ्यास में लगा होता है? यहाँ भिक्षु दिन में चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को बाधक धर्मों (नीवरणों) से शुद्ध करता है, रात्रि के प्रथम प्रहर में चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को बाधक धर्मों से शुद्ध करता है, रात्रि के मध्यम प्रहर में दाहिनी करवट से, एक पैर पर दूसरा पैर रखकर, स्मृतिवान और सम्प्रजन्य युक्त होकर, उठने की संज्ञा को मन में रखकर सिंह-शय्या ग्रहण करता है, और रात्रि के पश्चिम (अन्तिम) प्रहर में उठकर चंक्रमण और बैठने के द्वारा चित्त को बाधक धर्मों से शुद्ध करता है। इस प्रकार भिक्षु पूर्व-रात्रि और अपर-रात्रि में जागरण के अभ्यास में लगा होता है।” චසද්දො සම්පිණ්ඩනත්ථො, තෙන වක්ඛමානෙ සතාදිභාවෙ සම්පිණ්ඩෙති. අස්සාති සියා, භවෙය්යාති අත්ථො. ‘‘ජාගරො ච භික්ඛු විහරෙය්යා’’ති ච පඨන්ති. සබ්බත්ථ සබ්බදා ච කම්මට්ඨානාවිජහනවසෙන සතිඅවිප්පවාසෙන සතො සම්පජානොති සත්තට්ඨානියස්ස චතුබ්බිධස්සපි සම්පජඤ්ඤස්ස වසෙන සම්පජානො. සමාහිතොති උපචාරසමාධිනා අප්පනාසමාධිනා ච සමාහිතො එකග්ගචිත්තො. පමුදිතොති පටිපත්තියා ආනිසංසදස්සනෙන උත්තරුත්තරි විසෙසාධිගමෙන වීරියාරම්භස්ස ච අමොඝභාවදස්සනෙන පමුදිතො පාමොජ්ජබහුලො. විප්පසන්නොති තතො එව පටිපත්තිභූතාසු තීසු සික්ඛාසු පටිපත්තිදෙසකෙ ච සත්ථරි සද්ධාබහුලතාය සුට්ඨු පසන්නො. සබ්බත්ථ අස්සාති සම්බන්ධො විහරෙය්යාති වා. 'च' शब्द समुच्चय (जोड़ने) के अर्थ में है, उससे आगे कहे जाने वाले स्मृति आदि भावों को जोड़ता है। 'अस्स' का अर्थ है 'होवे' (स्यात्)। 'जागरो च भिक्खु विहरेय्या' ऐसा भी पाठ पढ़ते हैं। सब जगह और सब समय कर्मस्थान को न छोड़ने के कारण स्मृति के न खोने से 'सतो' (स्मृतिवान) है; सात स्थानों वाले चारों प्रकार के सम्प्रजन्य के कारण 'सम्पजानो' (सम्प्रजन्य युक्त) है। 'समाहितो' का अर्थ है उपचार-समाधि और अर्पणा-समाधि के द्वारा एकाग्रचित्त। 'पमुदितो' का अर्थ है प्रतिपत्ति (साधना) के लाभ को देखने से, उत्तरोत्तर विशेष उपलब्धि होने से और वीर्य के आरम्भ के सफल होने को देखने से अत्यधिक प्रसन्न। 'विप्पसन्नो' का अर्थ है उसी प्रतिपत्ति रूप तीनों शिक्षाओं में और प्रतिपत्ति के उपदेशक शास्ता में श्रद्धा की अधिकता के कारण भली-भाँति प्रसन्न। 'सब्बतथ अस्स' (सब जगह होवे) यह सम्बन्ध है, अथवा 'विहरेय्या' (विहार करे)। තත්ථ කාලවිපස්සී ච කුසලෙසු ධම්මෙසූති තස්මිං කාලෙ විපස්සකො, තත්ථ වා කම්මට්ඨානානුයොගෙ කාලවිපස්සී කාලානුරූපං විපස්සකො. කිං වුත්තං හොති? විපස්සනං පට්ඨපෙත්වා කලාපසම්මසනාදිවසෙන සම්මසන්තො ආවාසාදිකෙ සත්ත අසප්පායෙ වජ්ජෙත්වා සප්පායෙ සෙවන්තො අන්තරා වොසානං අනාපජ්ජිත්වා පහිතත්තො චිත්තස්ස සමාහිතාකාරං සල්ලක්ඛෙන්තො සක්කච්චං නිරන්තරං අනිච්චානුපස්සනාදිං පවත්තෙන්තො යස්මිං කාලෙ විපස්සනාචිත්තං ලීනං හොති, තස්මිං ධම්මවිචයවීරියපීතිසඞ්ඛාතෙසු, යස්මිං පන කාලෙ චිත්තං උද්ධතං හොති, තස්මිං පස්සද්ධිසමාධිඋපෙක්ඛාසඞ්ඛාතෙසු කුසලෙසු අනවජ්ජෙසු බොජ්ඣඞ්ගධම්මෙසූති එවං තත්ථ තස්මිං තස්මිං කාලෙ, තස්මිං වා කම්මට්ඨානානුයොගෙ කාලානුරූපං විපස්සකො අස්සාති. සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගො පන සබ්බත්ථෙව ඉච්ඡිතබ්බො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘සතිඤ්ච ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, සබ්බත්ථිකං වදාමී’’ති (සං. නි. 5.234; මි. ප. 2.1.13). එත්තාවතා පුග්ගලාධිට්ඨානාය දෙසනාය ජාගරියං දස්සෙත්වා යෙහි ධම්මෙහි ජාගරියානුයොගො සම්පජ්ජති, තෙ පකාසෙති. वहाँ 'काले विपस्सी च कुसलेसु धम्मेसु' का अर्थ है उस समय में विपश्यना करने वाला, अथवा उस कर्मस्थान के अभ्यास में 'कालविपस्सी' अर्थात् समय के अनुरूप विपश्यना करने वाला। क्या कहा गया है? विपश्यना को स्थापित कर 'कलाप-सम्मसन' (समूहों का सम्मर्शन) आदि के द्वारा विचार करते हुए, आवास आदि सात असुविधाजनक (असप्पाय) बातों को छोड़कर सुविधाजनक (सप्पाय) बातों का सेवन करते हुए, बीच में न रुकते हुए, दृढ़ निश्चयी होकर चित्त की समाधि की अवस्था को देखते हुए, आदरपूर्वक निरन्तर अनित्यानुपश्यना आदि को प्रवृत्त करते हुए; जिस समय विपश्यना-चित्त लीन (सुस्त) होता है, उस समय धर्मविचय, वीर्य और प्रीति नामक (बोध्यंगों) में, और जिस समय चित्त उद्धत (चंचल) होता है, उस समय प्रश्रब्धि, समाधि और उपेक्षा नामक कुशल और निर्दोष बोध्यंग धर्मों में - इस प्रकार वहाँ उस-उस समय में, अथवा उस कर्मस्थान के अभ्यास में समय के अनुरूप विपश्यना करने वाला होवे। 'सति-सम्बोज्झंग' (स्मृति-सम्बोध्यंग) तो सभी जगह अपेक्षित है। यह कहा भी गया है - “भिक्षुओं, मैं स्मृति को सर्वत्र उपयोगी (सब्बत्थिक) कहता हूँ।” इतनी व्याख्या से पुद्गलाधिष्ठान देशना के द्वारा जागरण को दिखाकर, जिन धर्मों से जागरण का अभ्यास सिद्ध होता है, उन्हें प्रकाशित करते हैं। එවං [Pg.166] භගවා ආරද්ධවිපස්සකස්ස භික්ඛුනො සඞ්ඛෙපෙනෙව සද්ධිං උපකාරකධම්මෙහි සම්මසනචාරං දස්සෙත්වා ඉදානි තථා පටිපජ්ජන්තස්ස පටිපත්තියා අවඤ්ඣභාවං දස්සෙන්තො ‘‘ජාගරස්ස, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො’’තිආදිමාහ. තත්ථ ජාගරියානුයොගෙ සතිසම්පජඤ්ඤසමාදානානි සබ්බත්ථකානි සම්මොදපසාදාවහානි, තත්ථ කාලවිපස්සනා නාම විපස්සනාය ගබ්භග්ගහණං පරිපාකගතං. උපක්කිලෙසවිමුත්තෙ හි වීථිපටිපන්නෙ විපස්සනාඤාණෙ තික්ඛෙ සූරෙ වහන්තෙ යොගිනො උළාරං පාමොජ්ජං පසාදො ච හොති, තෙහි ච විසෙසාධිගමස්ස සන්තිකෙයෙව. වුත්තඤ්හෙතං – इस प्रकार भगवान ने विपश्यना आरम्भ करने वाले भिक्षु को संक्षेप में ही सहायक धर्मों के साथ सम्मसन-चर्या (मनन की चर्या) को दिखाकर, अब उस प्रकार साधना करने वाले की साधना की सफलता को दिखाते हुए 'जागरस्स, भिक्खवे, भिक्खुनो' (हे भिक्षुओं, जागृत भिक्षु का) आदि कहा। वहाँ जागृति के अभ्यास में स्मृति और सम्प्रजन्य का ग्रहण सर्वत्र उपयोगी और प्रसन्नता लाने वाला है; वहाँ काल-विपश्यना का अर्थ है विपश्यना का परिपक्व होना। उपक्लेशों से मुक्त और मार्ग पर आरूढ़ तीक्ष्ण और प्रबल विपश्यना-ज्ञान के प्रवृत्त होने पर योगी को महान प्रमोद और प्रसाद होता है, और वे विशेष उपलब्धि के समीप ही होते हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘යතො යතො සම්මසති, ඛන්ධානං උදයබ්බයං; ලභතී පීතිපාමොජ්ජං, අමතං තං විජානතං. जब-जब वह स्कन्धों के उदय और व्यय का मनन करता है, तब-तब वह प्रीति और प्रमोद प्राप्त करता है; जानकारों के लिए वह अमृत है। ‘‘පාමොජ්ජබහුලො භික්ඛු, පසන්නො බුද්ධසාසනෙ; අධිගච්ඡෙ පදං සන්තං, සඞ්ඛාරූපසමං සුඛ’’න්ති. (ධ. ප. 374, 381); प्रमोद-बहुला भिक्षु, जो बुद्ध के शासन में प्रसन्न है, वह शान्त पद (निर्वाण) को प्राप्त करे, जो संस्कारों का उपशम और सुख स्वरूप है। ගාථාසු ජාගරන්තා සුණාථෙතන්ති එතං මම වචනං එකන්තෙනෙව පමාදනිද්දාය අවිජ්ජානිද්දාය පබොධනත්ථං ජාගරන්තා සතිසම්පජඤ්ඤාදිධම්මසමායොගෙන ජාගරියං අනුයුත්තා සුණාථ. යෙ සුත්තා තෙ පබුජ්ඣථාති යෙ යථාවුත්තනිද්දාය සුත්තා සුපනං උපගතා, තෙ තුම්හෙ ජාගරියානුයොගවසෙන ඉන්ද්රියබලබොජ්ඣඞ්ගෙ සඞ්කඩ්ඪිත්වා විපස්සනං උස්සුක්කාපෙන්තා අප්පමාදපටිපත්තියා තතො පබුජ්ඣථ අථ වා ජාගරන්තාති ජාගරනිමිත්තා. ‘‘සුණාථෙත’’න්ති එත්ථ ‘‘එත’’න්ති වුත්තං, කිං තං වචනන්ති ආහ ‘‘යෙ සුත්තා තෙ පබුජ්ඣථා’’තිආදි. තත්ථ යෙ සුත්තාති යෙ කිලෙසනිද්දාය සුත්තා, තෙ තුම්හෙ අරියමග්ගපටිබොධෙන පබුජ්ඣථ. සුත්තා ජාගරිතං සෙය්යොති ඉදං පබොධස්ස කාරණවචනං. යස්මා යථාවුත්තසුපතො වුත්තප්පකාරං ජාගරිතං ජාගරණං අත්ථකාමස්ස කුලපුත්තස්ස සෙය්යො පාසංසතරො හිතසුඛාවහො, තස්මා පබුජ්ඣථ. නත්ථි ජාගරතො භයන්ති ඉදං තත්ථ ආනිසංසදස්සනං. යො හි සද්ධාදීහි ජාගරණධම්මෙහි සමන්නාගමෙන ජාගරො ජග්ගති, පමාදනිද්දං න උපගච්ඡති, තස්ස අත්තානුවාදභයං පරානුවාදභයං දණ්ඩභයං දුග්ගතිභයං ජාතිආදිනිමිත්තං සබ්බම්පි වට්ටභයං නත්ථි. गाथाओं में 'जागते हुए सुनो'—यह मेरा वचन निश्चित रूप से प्रमाद की निद्रा और अविद्या की निद्रा से जगाने के लिए है; स्मृति-सम्प्रजन्य आदि धर्मों के योग से जागृति में लगे हुए सुनो। 'जो सो रहे हैं वे जागें'—जो उक्त निद्रा से सोए हुए हैं, वे तुम जागृति के अभ्यास के वश से इन्द्रियों, बलों और बोध्यंगों को एकत्र कर विपश्यना में उत्साह करते हुए अप्रमाद की साधना से उससे जागो; अथवा 'जागरन्ता' जागृति के निमित्त हैं। 'इसे सुनो' यहाँ 'इसे' कहा गया है, वह वचन क्या है? तो कहा—'जो सो रहे हैं वे जागें' आदि। वहाँ 'जो सो रहे हैं' का अर्थ है जो क्लेशों की निद्रा में सोए हुए हैं, वे तुम आर्यमार्ग के जागरण से जागो। 'सोने से जागना श्रेष्ठ है'—यह जागरण का कारण-वचन है। चूँकि उक्त प्रकार की नींद से उक्त प्रकार का जागना कल्याण चाहने वाले कुलपुत्र के लिए श्रेष्ठ, प्रशंसनीय और हित-सुखकारी है, इसलिए जागो। 'जागने वाले को भय नहीं है'—यह उसमें लाभ का दर्शन है। जो श्रद्धा आदि जागरण-धर्मों से युक्त होकर जागता है, प्रमाद की निद्रा को प्राप्त नहीं होता, उसे आत्म-निन्दा का भय, पर-निन्दा का भय, दण्ड का भय, दुर्गति का भय और जन्म आदि निमित्तक सारा संसार-भय नहीं होता। කාලෙනාති [Pg.167] ආවාසසප්පායාදීනං ලද්ධකාලෙන. සොති නිපාතමත්තං. සම්මා ධම්මං පරිවීමංසමානොති විපස්සනාය ආරම්මණභූතං තෙභූමකධම්මං සම්මා ඤායෙන යථා නිබ්බින්දනවිරජ්ජනාදයො සම්භවන්ති, එවං පරිතො වීමංසන්තො, සබ්බාකාරෙන විපස්සන්තොති අත්ථො. එකොදිභූතොති එකො සෙට්ඨො හුත්වා උදෙතීති එකොදි, සමාධි. සො එකොදි භූතො ජාතො උප්පන්නො එතස්සාති එකොදිභූතො. අග්ගිආහිතාදිසද්දානං විය එත්ථ භූතසද්දස්ස පරවචනං දට්ඨබ්බං. එකොදිං වා භූතො පත්තොති එකොදිභූතො. එත්ථ ච එකොදීති මග්ගසමාධි අධිප්පෙතො, ‘‘සමාහිතො’’ති එත්ථ පන පාදකජ්ඣානසමාධිනා සද්ධිං විපස්සනාසමාධි. අථ වා කාලෙනාති මග්ගපටිවෙධකාලෙන. සම්මා ධම්මං පරිවීමංසමානොති සම්මදෙව චතුසච්චධම්මං පරිඤ්ඤාභිසමයාදිවසෙන වීමංසන්තො, එකාභිසමයෙන අභිසමෙන්තො. එකොදිභූතොති එකො සෙට්ඨො අසහායො වා හුත්වා උදෙතීති එකොදි, චතුකිච්චසාධකො සම්මප්පධානො. සො එකොදි භූතො ජාතොති සබ්බං පුරිමසදිසමෙව. විහනෙ තමං සොති සො එවංභූතො අරියසාවකො අරහත්තමග්ගෙන අවිජ්ජාතමං අනවසෙසතො විහනෙය්ය සමුච්ඡින්දෙය්ය. समय से—अनुकूल आवास आदि प्राप्त होने के समय से। 'सो'—यह मात्र एक निपात है। 'धर्म का सम्यक् प्रकार से विचार करते हुए'—विपश्यना के विषय भूत तीनों लोकों के धर्मों का सम्यक् विधि से, जिससे वैराग्य आदि उत्पन्न हों, इस प्रकार सब ओर से विचार करते हुए, सब प्रकार से विपश्यना करते हुए—यह अर्थ है। 'एकोदिभूतो'—एक (श्रेष्ठ) होकर उदय होता है, इसलिए 'एकोदि' अर्थात् समाधि। वह एकोदि जिसमें उत्पन्न हुई है, वह 'एकोदिभूतो' है। यहाँ 'भूत' शब्द का प्रयोग बाद में समझना चाहिए। अथवा एकोदि को प्राप्त हुआ 'एकोदिभूतो' है। और यहाँ 'एकोदि' से मार्ग-समाधि अभिप्रेत है, किन्तु 'समाहितो' यहाँ पादक-ध्यान-समाधि के साथ विपश्यना-समाधि अभिप्रेत है। अथवा 'समय से' का अर्थ मार्ग-साक्षात्कार के समय से है। 'धर्म का सम्यक् प्रकार से विचार करते हुए' का अर्थ है सम्यक् प्रकार से चतुःसत्य धर्म का पूर्ण परिज्ञान आदि के वश से विचार करते हुए, एक-अभिसमय से साक्षात्कार करते हुए। 'एकोदिभूतो' का अर्थ है एक, श्रेष्ठ या अद्वितीय होकर उदय होता है, इसलिए 'एकोदि' अर्थात् चार कृत्यों को सिद्ध करने वाला सम्यक् प्रधान। वह एकोदि उत्पन्न हुआ—यह सब पूर्व के समान ही है। 'वह अन्धकार को नष्ट कर दे'—वह इस प्रकार का आर्य श्रावक अर्हत् मार्ग के द्वारा अविद्या रूपी अन्धकार को पूर्णतः नष्ट कर दे, समूल उखाड़ दे। ඉති භගවා පටිපත්තියා අමොඝභාවං දස්සෙත්වා ඉදානි තත්ථ දළ්හං නියොජෙන්තො ‘‘තස්මා හවෙ’’ති ඔසානගාථමාහ. තත්ථ තස්මාති යස්මා ජාගරතො සතිඅවිප්පවාසාදිනා සමථවිපස්සනාභාවනා පාරිපූරිං ගච්ඡති, අනුක්කමෙන අරියමග්ගො පාතුභවති, තතො චස්ස සබ්බං වට්ටභයං නත්ථි, තස්මා. හවෙති එකංසෙන දළ්හං වා. භජෙථාති භජෙය්ය. එවං ජාගරියං භජන්තො ච ආතාපිභාවාදිගුණයුත්තො භික්ඛු සංයොජනානි භින්දිත්වා අග්ගඵලඤාණසඞ්ඛාතං අනුත්තරං උත්තරරහිතං සම්බොධිං ඵුසෙ පාපුණෙය්ය. සෙසං වුත්තනයමෙව. इस प्रकार भगवान ने साधना की सफलता को दिखाकर, अब उसमें दृढ़ता से नियोजित करते हुए 'तस्मा हवे' (इसलिए निश्चित ही) यह अन्तिम गाथा कही। वहाँ 'तस्मा'—चूँकि जागने वाले की स्मृति की निरन्तरता आदि से शमथ और विपश्यना भावना पूर्ण होती है, क्रमशः आर्यमार्ग प्रकट होता है, और उससे उसका सारा संसार-भय समाप्त हो जाता है, इसलिए। 'हवे' का अर्थ निश्चित रूप से या दृढ़ता से है। 'भजेथ' का अर्थ सेवन करे। इस प्रकार जागृति का सेवन करते हुए और उद्यमी आदि गुणों से युक्त भिक्षु संयोजनों को तोड़कर, अर्हत्-फल-ज्ञान रूपी अनुत्तर सम्बोधि को प्राप्त करे। शेष सब पूर्वोक्त रीति से ही है। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 11. ආපායිකසුත්තවණ්ණනා ११. आपायिक सूत्र की व्याख्या। 48. එකාදසමෙ ආපායිකාති අපායෙ නිබ්බත්තිස්සන්තීති ආපායිකා. තත්ථාපි නිරයෙ නිබ්බත්තිස්සන්තීති නෙරයිකා. ඉදමප්පහායාති ඉදං ඉදානි වක්ඛමානං දුවිධං පාපසමාචාරං අප්පජහිත්වා, තථාපටිපත්තිතථාපග්ගහණවසෙන පවත්තං වාචං චිත්තං දිට්ඨිඤ්ච අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වාති අත්ථො. අබ්රහ්මචාරීති [Pg.168] බ්රහ්මසෙට්ඨං චරතීති බ්රහ්මචාරී, බ්රහ්මා වා සෙට්ඨො ආචාරො එතස්ස අත්ථීති බ්රහ්මචාරී, න බ්රහ්මචාරීති අබ්රහ්මචාරී, බ්රහ්මචාරිපටිරූපකො දුස්සීලොති අත්ථො. බ්රහ්මචාරිපටිඤ්ඤොති ‘‘බ්රහ්මචාරී අහ’’න්ති එවංපටිඤ්ඤො. පරිපුණ්ණන්ති අඛණ්ඩාදිභාවෙන අවිකලං. පරිසුද්ධන්ති උපක්කිලෙසාභාවෙන පරිසුද්ධං. අමූලකෙනාති දිට්ඨාදිමූලවිරහිතෙන, දිට්ඨං සුතං පරිසඞ්කිතන්ති ඉමෙහි චොදනාමූලෙහි වජ්ජිතෙන. අබ්රහ්මචරියෙන අසෙට්ඨචරියෙන. අනුද්ධංසෙතීති ‘‘පරිසුද්ධො අය’’න්ති ජානන්තොව පාරාජිකවත්ථුනා ධංසෙති පධංසෙති, චොදෙති අක්කොසති වා. ४८. ग्यारहवें (सुत्त) में—'आपायिका' का अर्थ है जो अपाय में उत्पन्न होंगे। वहाँ भी जो नरक में उत्पन्न होंगे, वे 'नेरयिका' हैं। 'इदमप्पहाय' का अर्थ है—यहाँ अब कहे जाने वाले दो प्रकार के पाप-आचरण को न छोड़कर, अर्थात् उस प्रकार की प्रतिपत्ति और उस प्रकार के ग्रहण के वश में प्रवृत्त वाणी, चित्त और दृष्टि का परित्याग न करके। 'अब्रह्मचारी'—जो श्रेष्ठ (ब्रह्म) आचरण करता है वह ब्रह्मचारी है, अथवा जिसका आचरण श्रेष्ठ है वह ब्रह्मचारी है; जो ब्रह्मचारी नहीं है वह अब्रह्मचारी है, अर्थात् ब्रह्मचारी का रूप धारण करने वाला दुःशील। 'ब्रह्मचारिपटिञ्ञो'—'मैं ब्रह्मचारी हूँ' ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला। 'परिपुण्णं'—अखण्डता आदि के कारण अविकल। 'परिसुद्धं'—उपक्लेशों के अभाव के कारण शुद्ध। 'अमूलकेन'—दृष्ट आदि मूलों से रहित, अर्थात् देखे हुए, सुने हुए या शंका किए हुए—इन चोदना-मूलों (आरोप के आधारों) से वर्जित। 'अब्रह्मचरियेन'—अश्रेष्ठ आचरण से। 'अनुद्धंसेति'—'यह शुद्ध है' जानते हुए भी पाराजिक वस्तु (अपराध) से उसे नष्ट करता है, गिराता है, या आरोपित करता है अथवा गाली देता है। ගාථාසු අභූතවාදීති පරස්ස දොසං අදිස්වාව අභූතෙන තුච්ඡෙන මුසාවාදං කත්වා පරං අබ්භාචික්ඛන්තො. කත්වාති යො වා පන පාපකම්මං කත්වා ‘‘නාහං එතං කරොමී’’ති ආහ. උභොපි තෙ පෙච්ච සමා භවන්තීති තෙ උභොපි ජනා ඉතො පරලොකං ගන්ත්වා නිරයං උපගමනතො ගතියා සමානා භවන්ති. තත්ථ ගතියෙව නෙසං පරිච්ඡින්නා, න පන ආයු. බහුඤ්හි පාපං කත්වා චිරං නිරයෙ පච්චති, පරිත්තං කත්වා අප්පමත්තකමෙව කාලං. යස්මා පන තෙසං උභින්නම්පි කම්මං ලාමකමෙව. තෙන වුත්තං ‘‘නිහීනකම්මා මනුජා පරත්ථා’’ති. ‘‘පරත්ථා’’ති පන පදස්ස පුරතො ‘‘පෙච්චා’’ති පදෙන සම්බන්ධො – පරත්ථ පෙච්ච ඉතො ගන්ත්වා තෙ නිහීනකම්මා සමා භවන්තීති. गाथाओं में—'अभूतवादी' का अर्थ है दूसरे के दोष को देखे बिना ही असत्य और तुच्छ मृषावाद करके दूसरे पर झूठा आरोप लगाने वाला। 'कत्वा'—अथवा जो पाप कर्म करके कहता है कि 'मैंने यह नहीं किया'। 'उभोपि ते पेच्च समा भवन्तीति'—वे दोनों ही लोग इस लोक से परलोक जाकर नरक जाने के कारण गति की दृष्टि से समान होते हैं। वहाँ केवल उनकी गति ही निश्चित है, आयु नहीं। क्योंकि बहुत पाप करके व्यक्ति लंबे समय तक नरक में पकता है, और थोड़ा (पाप) करके अल्प समय तक। क्योंकि उन दोनों का ही कर्म नीच (बुरा) है। इसीलिए कहा गया है—'निहीनकम्मा मनुजा परत्था' (परलोक में नीच कर्म वाले मनुष्य)। 'परत्था' पद का आगे 'पेच्च' पद के साथ सम्बन्ध है—परलोक में जाकर (पेच्च) वे नीच कर्म वाले समान होते हैं। එවං භගවා අභූතබ්භක්ඛානවසෙන භූතදොසපටිච්ඡාදනවසෙන ච පවත්තස්ස මුසාවාදස්ස විපාකං දස්සෙත්වා ඉදානි තස්මිං ඨානෙ නිසින්නානං බහූනං පාපභික්ඛූනං දුච්චරිතකම්මස්ස විපාකදස්සනෙන සංවෙජනත්ථං ද්වෙ ගාථා අභාසි. තත්ථ කාසාවකණ්ඨාති කසාවරසපීතත්තා කාසාවෙන වත්ථෙන පලිවෙඨිතකණ්ඨා. පාපධම්මාති ලාමකධම්මා. අසඤ්ඤතාති කායාදීහි සඤ්ඤමරහිතා. පාපාති තථාරූපා පාපපුග්ගලා, පාපෙහි කම්මෙහි උපපජ්ජිත්වා ‘‘තස්ස කායොපි ආදිත්තො සම්පජ්ජලිතො සජොතිභූතො, සඞ්ඝාටිපි ආදිත්තා’’තිආදිනා (සං. නි. 2.218-219; පාරා. 230) ලක්ඛණසංයුත්තෙ වුත්තනයෙන මහාදුක්ඛං අනුභවන්තියෙව. इस प्रकार भगवान् ने झूठे आरोप और वास्तविक दोषों को छिपाने के कारण होने वाले मृषावाद के विपाक को दिखाकर, अब उस स्थान पर बैठे हुए बहुत से पापी भिक्षुओं के दुश्चरित कर्म के विपाक को दिखाने के माध्यम से संवेग उत्पन्न करने के लिए दो गाथाएँ कहीं। वहाँ 'कासावकण्ठा' का अर्थ है—काषाय रस से रंगे होने के कारण काषाय वस्त्र से लिपटे हुए कण्ठ वाले। 'पापधम्मा'—नीच स्वभाव वाले। 'असञ्ञता'—काया आदि से संयम रहित। 'पापा'—उस प्रकार के पापी पुद्गल, पाप कर्मों के कारण उत्पन्न होकर 'उसका शरीर भी प्रज्वलित, संप्रज्वलित और ज्योतिर्मय है, संघाटी भी प्रज्वलित है' इत्यादि लक्षणसंयुत्त में कहे गए तरीके से महान दुःख का अनुभव करते ही हैं। තතියගාථාය අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – යඤ්චෙ භුඤ්ජෙය්ය දුස්සීලො නිස්සීලපුග්ගලො කායාදීහි අසඤ්ඤතො රට්ඨවාසීහි සද්ධාය දින්නං යං රට්ඨපිණ්ඩං ‘‘සමණොම්හී’’ති පටිජානන්තො ගහෙත්වා භුඤ්ජෙය්ය, තතො ආදිත්තො අග්ගිවණ්ණො අයොගුළොව භුත්තො සෙය්යො සුන්දරතරො. කිංකාරණා? තප්පච්චයා [Pg.169] හිස්ස එකොව අත්තභාවො ඣායෙය්ය, දුස්සීලො පන හුත්වා සද්ධාදෙය්යං භුඤ්ජිත්වා අනෙකානිපි ජාතිසතානි නිරයෙ උප්පජ්ජෙය්යාති. तीसरी गाथा का संक्षिप्त अर्थ यह है—जो दुःशील, शील रहित पुद्गल, काया आदि से असंयत होकर, राष्ट्रवासियों द्वारा श्रद्धा से दिए गए जिस राष्ट्रपिण्ड (भोजन) को 'मैं श्रमण हूँ' ऐसी प्रतिज्ञा करते हुए ग्रहण करके खाए, उससे तो जलता हुआ अग्नि के समान लाल लोहे का गोला खाना ही श्रेयस्कर (बेहतर) है। किस कारण से? क्योंकि उसके कारण तो उसका केवल एक ही आत्मभाव (शरीर) जलेगा, किन्तु दुःशील होकर श्रद्धादेय (दान) को खाकर वह अनेक सौ जन्मों तक नरक में उत्पन्न होगा। එකාදසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. ग्यारहवें सुत्त की व्याख्या समाप्त। 12. දිට්ඨිගතසුත්තවණ්ණනා १२. दिठ्ठिगतसुत्त की व्याख्या। 49. ද්වාදසමෙ ද්වීහි දිට්ඨිගතෙහීති එත්ථ දිට්ඨියොව දිට්ඨිගතානි ‘‘ගූථගතං මුත්තගත’’න්තිආදීසු (අ. නි. 9.11) විය. ගහිතාකාරසුඤ්ඤතාය වා දිට්ඨීනං ගතමත්තානීති දිට්ඨිගතානි, තෙහි දිට්ඨිගතෙහි. පරියුට්ඨිතාති අභිභූතා පලිබුද්ධා වා. පලිබොධත්ථො වාපි හි පරියුට්ඨානසද්දො ‘‘චොරා මග්ගෙ පරියුට්ඨිංසූ’’තිආදීසු (චූළව. 430) විය. දෙවාති උපපත්තිදෙවා. තෙ හි දිබ්බන්ති උළාරතමෙහි කාමගුණෙහි ඣානාදීහි ච කීළන්ති, ඉද්ධානුභාවෙන වා යථිච්ඡිතමත්ථං ගච්ඡන්ති අධිගච්ඡන්තීති ච දෙවාති වුච්චන්ති. මනස්ස උස්සන්නත්තා මනුස්සා, උක්කට්ඨනිද්දෙසවසෙන චෙතං වුත්තං යථා ‘‘සත්ථා දෙවමනුස්සාන’’න්ති. ඔලීයන්ති එකෙති ‘‘සස්සතො අත්තා ච ලොකො චා’’ති භවෙසු ඔලීයනාභිනිවෙසභූතෙන සස්සතභාවෙන එකච්චෙ දෙවා මනුස්සා ච අවලීයන්ති අල්ලීයන්ති සඞ්කොචං ආපජ්ජන්ති, න තතො නිස්සරන්ති. අතිධාවන්තීති පරමත්ථතො භින්නසභාවානම්පි සභාවධම්මානං ය්වායං හෙතුඵලභාවෙන සම්බන්ධො, තං අග්ගහෙත්වා නානත්තනයස්සපි ගහණෙන තත්ථ තත්ථෙව ධාවන්ති, තස්මා ‘‘උච්ඡිජ්ජති අත්තා ච ලොකො ච, න හොති පරං මරණා’’ති උච්ඡෙදෙ වා භවනිරොධපටිපත්තියා පටික්ඛෙපධම්මතං අතිධාවන්ති අතික්කමන්ති. චක්ඛුමන්තො ච පස්සන්තීති චසද්දො බ්යතිරෙකෙ. පුබ්බයොගසම්පත්තියා ඤාණපරිපාකෙන පඤ්ඤාචක්ඛුමන්තො පන දෙවමනුස්සා තෙනෙව පඤ්ඤාචක්ඛුනා සස්සතං උච්ඡෙදඤ්ච අන්තද්වයං අනුපගම්ම මජ්ඣිමපටිපත්තිදස්සනෙන පච්චක්ඛං කරොන්ති. තෙ හි ‘‘නාමරූපමත්තමිදං පටිච්චසමුප්පන්නං, තස්මා න සස්සතං, නාපි උච්ඡිජ්ජතී’’ති අවිපරීතතො පස්සන්ති. ४९. बारहवें (सुत्त) में—'द्वीहि दिठ्ठिगतेहि' यहाँ 'गूथगतं मुत्तगतं' आदि की तरह दृष्टियाँ ही 'दृष्टिगत' हैं। अथवा ग्रहण करने के आकार की शून्यता के कारण दृष्टियों के जाने मात्र को 'दृष्टिगत' कहते हैं, उन दृष्टिगतों के द्वारा। 'परियुट्ठिता'—अभिभूत या घिरे हुए। 'परियुट्ठान' शब्द का अर्थ 'चोरा मग्गे परियुट्ठिंसु' आदि की तरह 'बाधा' भी है। 'देवा'—उपपत्ति देव। वे दिव्य क्रीड़ा करते हैं, अत्यंत उदार कामगुणों और ध्यान आदि से क्रीड़ा करते हैं, अथवा ऋद्धि के प्रभाव से इच्छित अर्थ को प्राप्त करते हैं या पहुँचते हैं, इसलिए 'देव' कहे जाते हैं। मन की प्रधानता के कारण 'मनुष्य' (कहे जाते हैं), उत्कृष्ट निर्देश के वश से यह कहा गया है जैसे 'सत्था देवमनुस्सानं'। 'ओलीयन्ति एके'—'आत्मा और लोक शाश्वत हैं' इस प्रकार भवों में चिपकने (अभिनिवेश) रूप शाश्वत भाव के कारण कुछ देव और मनुष्य रुक जाते हैं, चिपक जाते हैं, संकुचित हो जाते हैं, उससे बाहर नहीं निकलते। 'अतिधावन्ति'—परमार्थतः भिन्न स्वभाव वाले स्वभाव-धर्मों का भी जो यह हेतु-फल भाव से सम्बन्ध है, उसे ग्रहण न करके नानात्व के नय को ग्रहण करने से वहीं-वहीं दौड़ते हैं, इसलिए 'आत्मा और लोक उच्छिन्न हो जाते हैं, मरने के बाद कुछ नहीं होता' इस प्रकार उच्छेद में अथवा भव-निरोध की प्रतिपत्ति के प्रतिषेध की धर्मता में आगे दौड़ जाते हैं, अतिक्रमण कर जाते हैं। 'चक्खुमन्तो च पस्सन्ति'—यहाँ 'च' शब्द व्यतिरेक (भेद) के लिए है। पूर्व योग की सम्पत्ति और ज्ञान की परिपक्वता के कारण प्रज्ञा-चक्षु वाले देव और मनुष्य उसी प्रज्ञा-चक्षु से शाश्वत और उच्छेद—इन दोनों अन्तों (छोरों) के पास न जाकर मध्यम प्रतिपदा के दर्शन से प्रत्यक्ष करते हैं। वे 'यह केवल नाम-रूप मात्र प्रतीत्यसमुत्पन्न है, इसलिए न शाश्वत है और न ही उच्छिन्न होता है'—ऐसा यथार्थ रूप से देखते हैं। එවං ඔලීයනාදිකෙ පුග්ගලාධිට්ඨානෙන උද්දිසිතුං ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ භවාති කාමභවො, රූපභවො, අරූපභවො. අපරෙපි තයො [Pg.170] භවා සඤ්ඤීභවො, අසඤ්ඤීභවො, නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤීභවො. අපරෙපි තයො භවා එකවොකාරභවො, චතුවොකාරභවො, පඤ්චවොකාරභවොති. එතෙහි භවෙහි ආරමන්ති අභිනන්දන්තීති භවාරාමා. භවෙසු රතා අභිරතාති භවරතා. භවෙසු සුට්ඨු මුදිතාති භවසම්මුදිතා. භවනිරොධායාති තෙසං භවානං අච්චන්තනිරොධාය අනුප්පාදනත්ථාය. ධම්මෙ දෙසියමානෙති තථාගතප්පවෙදිතෙ නිය්යානිකධම්මෙ වුච්චමානෙ. න පක්ඛන්දතීති සස්සතාභිනිවිට්ඨත්තා සංඛිත්තධම්මත්තා න පවිසති න ඔගාහති. න පසීදතීති පසාදං නාපජ්ජති න තං සද්දහති. න සන්තිට්ඨතීති තස්සං දෙසනායං න තිට්ඨති නාධිමුච්චති. එවං සස්සතතො අභිනිවිසනෙන භවෙසු ඔලීයන්ති. इस प्रकार 'ओलीयन' (पीछे हटना/चिपकना) आदि को पुद्गल के अधिष्ठान से निर्दिष्ट करने के लिए 'कथञ्च, भिक्खवे' आदि कहा गया है। वहाँ 'भव' का अर्थ है—कामभव, रूपभव और अरूपभव। अन्य भी तीन भव हैं—संज्ञीभव, असंज्ञीभव और नैवसंज्ञानासंज्ञाभव। अन्य भी तीन भव हैं—एकवोकारभव, चतुवोकारभव और पञ्चवोकारभव। इन भवों में जो रमण करते हैं, अभिनन्दन करते हैं, वे 'भवारामा' हैं। भवों में जो रत हैं, अभिरत हैं, वे 'भवरता' हैं। भवों में जो भली-भांति मुदित हैं, वे 'भवसम्मुदिता' हैं। 'भव निरोधाय' का अर्थ है—उन भवों के आत्यन्तिक निरोध के लिए, अनुत्पाद के लिए। 'धम्मे देसियमाने' का अर्थ है—तथागत द्वारा प्रवेदित निर्याणिक धर्म के कहे जाने पर। 'न पक्खन्दति' का अर्थ है—शाश्वत (दृष्टि) में अभिनिविष्ट होने के कारण और संकुचित धर्म वाला होने के कारण वह प्रवेश नहीं करता, अवगाहन नहीं करता। 'न पसीदति' का अर्थ है—प्रसन्नता को प्राप्त नहीं होता, उसमें श्रद्धा नहीं करता। 'न सन्तिट्ठति' का अर्थ है—उस देशना में स्थित नहीं होता, अधिमुक्त नहीं होता। इस प्रकार शाश्वत रूप से अभिनिवेश करने से वे भवों में 'ओलीयन्ति' (पीछे हटते/चिपकते) हैं। අට්ටීයමානාති භවෙ ජරාරොගමරණාදීනි වධබන්ධනච්ඡෙදනාදීනි ච දිස්වා සංවිජ්ජනෙන තෙහි සමඞ්ගිභාවෙන භවෙන පීළියමානා දුක්ඛාපියමානා. හරායමානාති ලජ්ජමානා ජිගුච්ඡමානාති පටිකූලතො දහන්තා. විභවන්ති උච්ඡෙදං. අභිනන්දන්තීති තණ්හාදිට්ඨාභිනන්දනාහි අජ්ඣොසාය නන්දන්ති. යතො කිර භොතිආදි තෙසං අභිනන්දනාකාරදස්සනං. තත්ථ යතොති යදා. භොති ආලපනං. අයං අත්තාති කාරකාදිභාවෙන අත්තනා පරිකප්පිතං සන්ධාය වදති. උච්ඡිජ්ජතීති උපච්ඡිජ්ජති. විනස්සතීති න දිස්සති, විනාසං අභාවං ගච්ඡති. න හොති පරං මරණාති මරණෙන උද්ධං න භවති. එතං සන්තන්ති යදෙතං අත්තනො උච්ඡෙදාදි, එතං සබ්බභවවූපසමතො සබ්බසන්තාපවූපසමතො ච සන්තං, සන්තත්තා එව පණීතං, තච්ඡාවිපරීතභාවතො යාථාවං. තත්ථ ‘‘සන්තං පණීත’’න්ති ඉදං ද්වයං තණ්හාභිනන්දනාය වදන්ති, ‘‘යාථාව’’න්ති දිට්ඨාභිනන්දනාය. එවන්ති එවං යථාවුත්තඋච්ඡෙදාභිනිවෙසනෙන. 'अट्टीयमाना' का अर्थ है—भव में जरा, रोग, मरण आदि तथा वध, बन्धन, छेदन आदि को देखकर संविग्न होने से, उनके साथ सम्बद्ध होने से, भव द्वारा पीड़ित और दुखी होना। 'हरायमाना' का अर्थ है—लज्जित होना। 'जिगुच्छमाना' का अर्थ है—प्रतिकूल मानकर घृणा करना। 'विभव' का अर्थ है—उच्छेद। 'अभिनन्दन्ति' का अर्थ है—तृष्णा और दृष्टि के अभिनन्दन से आसक्त होकर नन्दित होना। 'यतो किर भोति' आदि उनके अभिनन्दन के प्रकार का दर्शन है। वहाँ 'यतो' का अर्थ है—जब। 'भो' सम्बोधन है। 'अयं अत्ता'—यह कर्ता आदि भाव से स्वयं के द्वारा कल्पित आत्मा के विषय में कहता है। 'उच्छिज्जति' का अर्थ है—कट जाता है। 'विनस्सति' का अर्थ है—दिखाई नहीं देता, विनाश या अभाव को प्राप्त होता है। 'न होति परं मरणा' का अर्थ है—मरण के बाद नहीं होता। 'एतं सन्तं' का अर्थ है—जो यह अपना उच्छेद आदि है, यह समस्त भवों के उपशम और समस्त सन्तापों के उपशम होने से शान्त है; शान्त होने के कारण ही 'प्रणीत' है; यथार्थ और अविपरीत होने के कारण 'याथाव' (सत्य) है। वहाँ 'सन्तं' और 'पणीतं'—ये दो शब्द तृष्णा-अभिनन्दन के लिए कहते हैं, और 'याथावं' दृष्टि-अभिनन्दन के लिए। 'एवं' का अर्थ है—इस प्रकार पूर्वोक्त उच्छेद के अभिनिवेश से। භූතන්ති ඛන්ධපඤ්චකං. තඤ්හි පච්චයසම්භූතත්තා පරමත්ථතො විජ්ජමානත්තා ච භූතන්ති වුච්චති. තෙනාහ ‘‘භූතමිදං, භික්ඛවෙ, සමනුපස්සථා’’ති (ම. නි. 1.401). භූතතො අවිපරීතසභාවතො සලක්ඛණතො සාමඤ්ඤලක්ඛණතො ච පස්සති. ඉදඤ්හි ඛන්ධපඤ්චකං නාමරූපමත්තං. තත්ථ ‘‘ඉමෙ පථවීආදයො ධම්මා රූපං, ඉමෙ ඵස්සාදයො ධම්මා නාමං, ඉමානි නෙසං ලක්ඛණාදීනි, ඉමෙ නෙසං අවිජ්ජාදයො පච්චයා’’ති එවං සපච්චයනාමරූපදස්සනවසෙන චෙව, ‘‘සබ්බෙපිමෙ ධම්මා අහුත්වා සම්භොන්ති, හුත්වා පටිවෙන්ති, තස්මා අනිච්චා, අනිච්චත්තා දුක්ඛා, දුක්ඛත්තා අනත්තා’’ති එවං අනිච්චානුපස්සනාදිවසෙන ච පස්සතීති [Pg.171] අත්ථො. එත්තාවතා තරුණවිපස්සනාපරියොසානා විපස්සනාභූමි දස්සිතා. නිබ්බිදායාති භූතසඞ්ඛාතස්ස තෙභූමකධම්මජාතස්ස නිබ්බින්දනත්ථාය, එතෙන බලවවිපස්සනං දස්සෙති. විරාගායාති විරාගත්ථං විරජ්ජනත්ථං, ඉමිනා මග්ගං දස්සෙති. නිරොධායාති නිරුජ්ඣනත්ථං, ඉමිනාපි මග්ගමෙව දස්සෙති. නිරොධායාති වා පටිප්පස්සද්ධිනිරොධෙන සද්ධිං අනුපාදිසෙසනිබ්බානං දස්සෙති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුමන්තො පස්සන්තීති එවං පඤ්ඤාචක්ඛුමන්තො සපුබ්බභාගෙන මග්ගපඤ්ඤාචක්ඛුනා චතුසච්චධම්මං පස්සන්ති. 'भूत' का अर्थ है—पाँच स्कन्ध। वे प्रत्ययों से उत्पन्न होने के कारण और परमार्थतः विद्यमान होने के कारण 'भूत' कहे जाते हैं। इसीलिए कहा गया है—'हे भिक्षुओं! इस भूत को देखो' (म. नि. 1.401)। 'भूततः' का अर्थ है—अविपरीत स्वभाव से, स्वलक्षण से और सामान्य लक्षण से देखता है। यह पाँच स्कन्ध मात्र नाम-रूप हैं। वहाँ 'ये पृथ्वी आदि धर्म रूप हैं, ये स्पर्श आदि धर्म नाम हैं, ये इनके लक्षण आदि हैं, ये इनके अविद्या आदि प्रत्यय हैं'—इस प्रकार सप्रत्यय नाम-रूप के दर्शन के वश से, तथा 'ये सभी धर्म न होकर उत्पन्न होते हैं, होकर विलीन हो जाते हैं, इसलिए अनित्य हैं, अनित्य होने से दुःख हैं, दुःख होने से अनात्मा हैं'—इस प्रकार अनित्यानुपश्यना आदि के वश से देखता है, यह अर्थ है। यहाँ तक तरुण विपश्यना की समाप्ति तक विपश्यना की भूमि दिखाई गई है। 'निब्बिदाय' का अर्थ है—भूत संज्ञक उन त्रैभूमिक धर्मों के निर्वेद (वैराग्य) के लिए; इससे बलवती विपश्यना को दर्शाया गया है। 'विरागाय' का अर्थ है—विराग के लिए, विरक्त होने के लिए; इससे मार्ग को दर्शाया गया है। 'निरोधाय' का अर्थ है—निरुद्ध होने के लिए; इससे भी मार्ग को ही दर्शाया गया है। अथवा 'निरोधाय' से प्रतिप्रश्रब्धि-निरोध के साथ अनुपधिशेष निर्वाण को दर्शाया गया है। 'एवं खो, भिक्खवे, चक्खुमन्तो पस्सन्ति'—इस प्रकार प्रज्ञा-चक्षु वाले पूर्वभाग की मार्ग-प्रज्ञा रूपी चक्षु से चतुःसत्य धर्म को देखते हैं। ගාථාසු යෙ භූතං භූතතො දිස්වාති යෙ අරියසාවකා භූතං ඛන්ධපඤ්චකං භූතතො අවිපරීතසභාවතො විපස්සනාපඤ්ඤාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය දිස්වා. එතෙන පරිඤ්ඤාභිසමයං දස්සෙති. භූතස්ස ච අතික්කමන්ති භාවනාභිසමයං. අරියමග්ගො හි භූතං අතික්කමති එතෙනාති ‘‘භූතස්ස අතික්කමො’’ති වුත්තො. යථාභූතෙති අවිපරීතසච්චසභාවෙ නිබ්බානෙ. විමුච්චන්ති අධිමුච්චන්ති, එතෙන සච්ඡිකිරියාභිසමයං දස්සෙති. භවතණ්හාපරික්ඛයාති භවතණ්හාය සබ්බසො ඛෙපනා සමුච්ඡින්දනතො, එතෙන සමුදයප්පහානං දස්සෙති. गाथाओं में 'ये भूतं भूततो दिस्वा' का अर्थ है—जो आर्य श्रावक भूत (पाँच स्कन्धों) को भूततः (अविपरीत स्वभाव से) विपश्यना-प्रज्ञा सहित मार्ग-प्रज्ञा से देखकर। इससे 'परिज्ञा-अभिसमय' को दर्शाया गया है। 'भूतस्स च अतिक्कमन्ति' का अर्थ है—भावना-अभिसमय। आर्य मार्ग ही भूत का अतिक्रमण करता है, इसके द्वारा, इसलिए 'भूत का अतिक्रमण' कहा गया है। 'यथाभूते' का अर्थ है—अविपरीत सत्य स्वभाव वाले निर्वाण में। 'विमुच्चन्ति' का अर्थ है—अधिमुक्त होते हैं; इससे 'साक्षात्क्रिया-अभिसमय' को दर्शाया गया है। 'भवतण्हापरिक्खया' का अर्थ है—भव-तृष्णा के सर्वथा क्षय होने से, समूच्छेद होने से; इससे 'समुदय-प्रहाण' को दर्शाया गया है। සවෙ භූතපරිඤ්ඤො සොති එත්ථ පන සවෙති නිපාතමත්තං. සො භූතපරිඤ්ඤො භූතස්ස අතික්කමනූපායෙන මග්ගෙන භවතණ්හාපරික්ඛයා පරිඤ්ඤාතක්ඛන්ධො තතො එව යථාභූතෙ නිබ්බානෙ අධිමුත්තො. භවාභවෙති ඛුද්දකෙ චෙව මහන්තෙ ච, උච්ඡෙදාදිදස්සනෙ වා වීතතණ්හො භින්නකිලෙසො. භික්ඛු භූතස්ස උපාදානක්ඛන්ධසඞ්ඛාතස්ස අත්තභාවස්ස විභවා, ආයතිං අනුප්පාදා පුනබ්භවං නාගච්ඡති, අපඤ්ඤත්තිකභාවමෙව ගච්ඡතීති අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා දෙසනං නිට්ඨාපෙසි. 'सवे भूतपरिञ्ञो सो' यहाँ 'सवे' मात्र एक निपात है। वह 'भूत-परिज्ञ' (भूत को जानने वाला) भूत के अतिक्रमण के उपाय रूपी मार्ग से, भव-तृष्णा के परिक्षय से, परिज्ञात-स्कन्ध होकर, उसके कारण ही यथार्थ निर्वाण में अधिमुक्त है। 'भवाभवे' का अर्थ है—छोटे और बड़े (भवों) में, अथवा उच्छेद आदि दर्शन में, जो तृष्णा-रहित है और जिसके क्लेश नष्ट हो चुके हैं। वह भिक्षु 'भूत' (उपादान स्कन्ध संज्ञक आत्मभाव) के विभव (विनाश) से, भविष्य में अनुत्पाद के कारण पुनः जन्म को प्राप्त नहीं होता, 'अपञ्ञत्तिक' (अप्रज्ञप्तिक) भाव को ही प्राप्त होता है—इस प्रकार अनुपधिशेष निर्वाण धातु की देशना को समाप्त किया। ඉති ඉමස්මිං වග්ගෙ එකාදසමෙ වට්ටං කථිතං, තතියචතුත්ථපඤ්චමෙසු පරියොසානසුත්තෙ ච වට්ටවිවට්ටං කථිතං, සෙසෙසු විවට්ටමෙවාති වෙදිතබ්බං. इस प्रकार इस ग्यारहवें वर्ग में 'वट्ट' (संसार चक्र) कहा गया है, तीसरे, चौथे और पाँचवें तथा अन्तिम सूत्र में 'वट्ट-विवट्ट' (संसार और निर्वाण) कहा गया है, शेष में केवल 'विवट्ट' (निर्वाण) ही कहा गया है—ऐसा जानना चाहिए। ද්වාදසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. बारहवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। පරමත්ථදීපනියා ඛුද්දකනිකාය-අට්ඨකථාය परमत्थदीपनी खुद्दकनिकाय-अट्ठकथा में। ඉතිවුත්තකස්ස දුකනිපාතවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इतिवुत्तक की दुकनिपात-व्याख्या समाप्त हुई। 3. තිකනිපාතො ३. तिकनिपात। 1. පඨමවග්ගො १. प्रथम वर्ग। 1. මූලසුත්තවණ්ණනා १. मूलसूत्र-व्याख्या। 50. තිකනිපාතස්ස [Pg.172] පඨමෙ තීණීති ගණනපරිච්ඡෙදො. ඉමානීති අභිමුඛීකරණං. අකුසලමූලානීති පරිච්ඡින්නධම්මනිදස්සනං. තත්ථ අකුසලානි ච තානි මූලානි චාති අකුසලමූලානි. අථ වා අකුසලානං හෙතුපච්චයපභවජනකසමුට්ඨාපකනිබ්බත්තකට්ඨෙන මූලානි චාති අකුසලමූලානි, අකුසලධම්මානං කාරණානීති අත්ථො. කාරණඤ්හි යථා හිනොති එතස්මා ඵලං පවත්තතීති හෙතු, පටිච්ච එතස්මා එතීති පච්චයො, පභවති එතස්මාති පභවො, අත්තනො ඵලං ජනෙතීති ජනකං, සමුට්ඨාපෙතීති සමුට්ඨාපකං, නිබ්බත්තෙතීති නිබ්බත්තකන්ති ච වුච්චති. එවං පතිට්ඨට්ඨෙන මූලන්ති, තස්මා අකුසලමූලානීති අකුසලානං සුප්පතිට්ඨිතභාවසාධනානි, කාරණානීති වුත්තං හොති. ५०. तिकनिपात के प्रथम (सूत्र) में 'तीणि' (तीन) यह गणना का परिच्छेद (सीमा) है। 'इमानि' (ये) यह अभिमुखीकरण (सामने करना) है। 'अकुसलमूलानि' (अकुशल मूल) यह परिच्छिन्न धर्मों का निदर्शन है। वहाँ, जो अकुशल भी हैं और मूल भी हैं, वे 'अकुशलमूल' हैं। अथवा, अकुशल धर्मों के हेतु, प्रत्यय, प्रभव, जनक, समुत्थापक और निर्वर्तक होने के अर्थ में जो मूल हैं, वे 'अकुशलमूल' हैं; अर्थात् अकुशल धर्मों के कारण। क्योंकि कारण को ही 'हेतु' कहा जाता है क्योंकि उससे फल प्रवृत्त होता है, 'प्रत्यय' क्योंकि इसके आश्रित होकर वह आता है, 'प्रभव' क्योंकि उससे उत्पन्न होता है, 'जनक' क्योंकि वह अपने फल को जन्म देता है, 'समुत्थापक' क्योंकि वह उसे खड़ा करता है, और 'निर्वर्तक' क्योंकि वह उसे निष्पन्न करता है। इसी प्रकार प्रतिष्ठित होने के अर्थ में 'मूल' है, इसलिए 'अकुशलमूल' का अर्थ अकुशल धर्मों की सुप्रतिष्ठित अवस्था को सिद्ध करने वाले कारण है, ऐसा कहा गया है। කෙචි පන ‘‘සාලිආදීනං සාලිබීජාදීනි විය මණිප්පභාදීනං මණිවණ්ණාදයො විය ච අකුසලානං අකුසලභාවසාධකො ලොභාදීනං මූලට්ඨො’’ති වදන්ති. එවං සන්තෙ අකුසලචිත්තසමුට්ඨානරූපෙසු තෙසං හෙතුපච්චයභාවො න සියා. න හි තානි තෙසං අකුසලභාවං සාධෙන්ති, න ච පච්චයා න හොන්ති. වුත්තඤ්හෙතං – किन्तु कुछ लोग कहते हैं कि 'जैसे शालि आदि के लिए शालि-बीज आदि होते हैं और जैसे मणियों की प्रभा आदि के लिए मणियों के वर्ण आदि होते हैं, वैसे ही लोभ आदि का मूल होना अकुशल धर्मों के अकुशल-भाव को सिद्ध करने वाला है।' ऐसा होने पर, अकुशल चित्त से उत्पन्न होने वाले रूपों के प्रति उनका हेतु-प्रत्यय भाव नहीं होगा। क्योंकि वे (मूल) उन (रूपों) के अकुशल-भाव को सिद्ध नहीं करते, और न ही वे प्रत्यय नहीं होते। जैसा कि कहा गया है - ‘‘හෙතූ හෙතුසම්පයුත්තකානං ධම්මානං තංසමුට්ඨානානඤ්ච රූපානං හෙතුපච්චයෙන පච්චයො’’ති (පට්ඨා. 1.පච්චයනිද්දෙස.1). 'हेतु, हेतु-संप्रयुक्त धर्मों और उनसे समुत्थित होने वाले रूपों के लिए हेतु-प्रत्यय के द्वारा प्रत्यय है' (पट्ठान १.१)। අහෙතුකස්ස ච මොහස්ස අකුසලභාවො න සියා අකුසලභාවසාධකස්ස මූලන්තරස්ස අභාවතො. අථාපි සියා ලොභාදීනං සභාවසිද්ධො අකුසලාදිභාවො, තංසම්පයුත්තානං පන ලොභාදිපටිබද්ධොති. එවම්පි යථා ලොභාදීනං, එවං අලොභාදීනම්පි සභාවසිද්ධො කුසලාදිභාවොති අලොභාදයො කුසලා එව සියුං, න අබ්යාකතා, න ච හොන්ති. තස්මා යථා සම්පයුත්තෙසු, එවං මූලෙසුපි කුසලාදිභාවො පරියෙසිතබ්බො. යොනිසොමනසිකාරාදිකො විය හි කුසලභාවස්ස, අයොනිසොමනසිකාරාදිකො [Pg.173] අකුසලභාවස්ස කාරණන්ති ගහෙතබ්බං. එවං අකුසලභාවසාධනවසෙන ලොභාදීනං මූලට්ඨං අග්ගහෙත්වා සුප්පතිට්ඨිතභාවසාධනවසෙන ගය්හමානෙ න කොචි දොසො. ලද්ධහෙතුපච්චයා හි ධම්මා විරූළ්හමූලා විය පාදපා ථිරා හොන්ති සුප්පතිට්ඨිතා, හෙතුරහිතා පන තිලබීජකාදිසෙවාලා විය න සුප්පතිට්ඨිතාති හෙතුආදිඅත්ථෙන අකුසලානං උපකාරකත්තා මූලානීති අකුසලමූලානි. යස්මා පන මූලෙන මුත්තො අකුසලචිත්තුප්පාදො නත්ථි, තස්මා තීහි මූලෙහි සබ්බො අකුසලරාසි පරියාදියිත්වා දස්සිතොති දට්ඨබ්බං. और अहेतुक मोह का अकुशल-भाव नहीं होगा क्योंकि अकुशल-भाव को सिद्ध करने वाले किसी अन्य मूल का अभाव है। यदि यह कहा जाए कि लोभ आदि का अकुशल आदि भाव स्वभाव-सिद्ध है, किन्तु उनके संप्रयुक्त धर्मों का अकुशल-भाव लोभ आदि पर आश्रित है। तो भी, जैसे लोभ आदि का, वैसे ही अलोभ आदि का भी स्वभाव-सिद्ध कुशल आदि भाव होने से अलोभ आदि केवल कुशल ही होंगे, अव्याकृत नहीं, जबकि वे होते हैं। इसलिए जैसे संप्रयुक्त धर्मों में, वैसे ही मूलों में भी कुशल आदि भाव की खोज करनी चाहिए। क्योंकि जैसे योनिमनसिकार आदि कुशल-भाव के कारण हैं, वैसे ही अयोनिमनसिकार आदि अकुशल-भाव के कारण हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार अकुशल-भाव को सिद्ध करने के रूप में लोभ आदि के मूल-अर्थ को न लेकर, सुप्रतिष्ठित-भाव को सिद्ध करने के रूप में ग्रहण करने पर कोई दोष नहीं है। क्योंकि हेतु-प्रत्यय प्राप्त धर्म जड़ पकड़े हुए वृक्षों के समान स्थिर और सुप्रतिष्ठित होते हैं, किन्तु हेतु-रहित धर्म तिल के बीज या काई के समान सुप्रतिष्ठित नहीं होते; अतः हेतु आदि के अर्थ में अकुशल धर्मों के उपकारक होने से वे 'मूल' अर्थात् 'अकुशलमूल' हैं। चूँकि मूल से मुक्त कोई अकुशल चित्तोत्पाद नहीं है, इसलिए इन तीन मूलों के द्वारा समस्त अकुशल राशि को पूर्णतः दिखाया गया है, ऐसा समझना चाहिए। තානි අකුසලමූලානි සරූපතො දස්සෙතුං ‘‘ලොභො අකුසලමූල’’න්තිආදි වුත්තං. තත්ථ ලොභාදීසු යං වත්තබ්බං, තං හෙට්ඨා වුත්තමෙව. තත්ථ පන තතියමග්ගවජ්ඣා ලොභාදයො ආගතා, ඉධ පන අනවසෙසාති අයමෙව විසෙසො. उन अकुशल मूलों को उनके स्वरूप से दिखाने के लिए 'लोभ अकुशल मूल है' आदि कहा गया है। वहाँ लोभ आदि के विषय में जो कहना चाहिए, वह पहले ही कहा जा चुका है। विशेष केवल इतना है कि वहाँ तीसरे मार्ग (अनागामी) द्वारा वध्य लोभ आदि आए थे, किन्तु यहाँ वे बिना किसी शेष के (पूर्णतः) आए हैं। ගාථායං පාපචෙතසන්ති අකුසලධම්මසමායොගතො ලාමකචිත්තං. හිංසන්තීති අත්තනො පවත්තික්ඛණෙ ආයතිං විපාකක්ඛණෙ ච විබාධෙන්ති. අත්තසම්භූතාති අත්තනි ජාතා. තචසාරන්ති ගණ්ඨිතං, වෙළුන්ති අත්ථො. සම්ඵලන්ති අත්තනො ඵලං. ඉදං වුත්තං හොති – ඛදිරසීසපාදයො විය අන්තොසාරො අහුත්වා බහිසාරතාය තචසාරන්ති ලද්ධනාමං වෙළුආදිං යථා අත්තසම්භූතමෙව ඵලං හිංසති විනාසෙති, එවමෙව අන්තො සීලාදිසාරරහිතං ලාමකචිත්තං පුග්ගලං අත්තසම්භූතායෙව ලොභාදයො විනාසෙන්තීති. गाथा में 'पापचेतसं' का अर्थ है अकुशल धर्मों के संयोग से निकृष्ट चित्त वाला। 'हिंसन्ति' का अर्थ है अपने प्रवृत्ति-क्षण में और भविष्य में विपाक-क्षण में बाधा पहुँचाते हैं। 'अत्तसम्भुता' का अर्थ है अपने आप में उत्पन्न। 'तचसारं' का अर्थ है गाँठदार, अर्थात् वेणु (बाँस)। 'सम्फलं' का अर्थ है अपने फल के साथ। यह कहा गया है - जैसे खदिर और शीशम आदि के समान आंतरिक सार न होकर बाहरी सार होने के कारण 'त्वक्सार' नाम पाने वाले बाँस आदि को स्वयं से उत्पन्न फल ही नष्ट कर देता है, वैसे ही भीतर शील आदि सार से रहित निकृष्ट चित्त वाले व्यक्ति को स्वयं से उत्पन्न लोभ आदि ही नष्ट कर देते हैं। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 2. ධාතුසුත්තවණ්ණනා २. धातु-सूत्र की व्याख्या 51. දුතියෙ ධාතුයොති අත්තනො ඵලස්ස සභාවස්ස ච ධාරණට්ඨෙන ධාතුයො. යඤ්චෙත්ථ ඵලනිබ්බත්තකං, තං අත්තනො ඵලස්ස සභාවස්ස ච, ඉතරං සභාවස්සෙව ධාරණට්ඨෙන ධාතු. රූපධාතූති රූපභවො. ධාතුයා ආගතට්ඨානෙ භවෙන පරිච්ඡින්දිතබ්බං, භවස්ස ආගතට්ඨානෙ ධාතුයා පරිච්ඡින්දිතබ්බන්ති ඉධ භවෙන පරිච්ඡෙදො කථිතො. තස්මා – ५१. दूसरे (सूत्र) में 'धातुलयो' का अर्थ है अपने फल और स्वभाव को धारण करने के अर्थ में धातुएँ। और यहाँ जो फल को उत्पन्न करने वाला है, वह अपने फल और स्वभाव को धारण करने के कारण धातु है, और दूसरा केवल स्वभाव को धारण करने के अर्थ में धातु है। 'रूपधातु' का अर्थ है रूप-भव। जहाँ धातु शब्द आया हो वहाँ भव से परिच्छेद (सीमांकन) करना चाहिए, और जहाँ भव शब्द आया हो वहाँ धातु से परिच्छेद करना चाहिए, इसलिए यहाँ भव के द्वारा परिच्छेद कहा गया है। इसलिए - ‘‘කතමෙ [Pg.174] ධම්මා රූපාවචරා? හෙට්ඨතො බ්රහ්මලොකං පරියන්තං කරිත්වා උපරිතො අකනිට්ඨෙ දෙවෙ අන්තො කරිත්වා එත්ථාවචරා එත්ථ පරියාපන්නා ඛන්ධධාතුආයතනා, ඉමෙ ධම්මා රූපාවචරා’’ති (ධ. ස. 1289) – 'कौन से धर्म रूपावचर हैं? नीचे ब्रह्मलोक की सीमा से लेकर ऊपर अकनिठ्ठ देवों तक, इसके भीतर विचरने वाले, इसमें सम्मिलित स्कन्ध, धातु और आयतन - ये धर्म रूपावचर हैं' (धम्मसंगणि १२८९) - එවං වුත්තා රූපාවචරධම්මා රූපධාතු. අරූපධාතූති අරූපභවො. ඉධාපි භවෙන පරිච්ඡෙදො කථිතොති – इस प्रकार कहे गए रूपावचर धर्म 'रूपधातु' हैं। 'अरूपधातु' का अर्थ है अरूप-भव। यहाँ भी भव के द्वारा परिच्छेद कहा गया है - ‘‘කතමෙ ධම්මා අරූපාවචරා? හෙට්ඨතො ආකාසානඤ්චායතනූපගෙ දෙවෙ අන්තො කරිත්වා, උපරිතො නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනූපගෙ දෙවෙ අන්තො කරිත්වා, එත්ථාවචරා එත්ථ පරියාපන්නා ඛන්ධධාතුආයතනා, ඉමෙ ධම්මා අරූපාවචරා’’ති (ධ. ස. 1291) – 'कौन से धर्म अरूपावचर हैं? नीचे आकाशानञ्चायतन के देवताओं से लेकर ऊपर नेवसञ्ञानासञ्ञायतन के देवताओं तक, इसके भीतर विचरने वाले, इसमें सम्मिलित स्कन्ध, धातु और आयतन - ये धर्म अरूपावचर हैं' (धम्मसंगणि १२९१) - එවං වුත්තා අරූපාවචරධම්මා අරූපධාතු. නිරොධධාතූති නිබ්බානං වෙදිතබ්බං. इस प्रकार कहे गए अरूपावचर धर्म 'अरूपधातु' हैं। 'निरोधधातु' का अर्थ निर्वाण समझना चाहिए। අපරො නයො – රූපසහිතා, රූපපටිබද්ධා, ධම්මප්පවත්ති රූපධාතු, පඤ්චවොකාරභවො, එකවොකාරභවො ච, තෙන සකලො කාමභවො රූපභවො ච සඞ්ගහිතො. රූපරහිතා ධම්මප්පවත්ති අරූපධාතු, චතුවොකාරභවො, තෙන අරූපභවො සඞ්ගහිතො. ඉති ද්වීහි පදෙහි තයො භවා සබ්බා සංසාරප්පවත්ති දස්සිතා. තතියපදෙන පන අසඞ්ඛතධාතුයෙව සඞ්ගහිතාති මග්ගඵලානි ඉධ තිකවිනිමුත්තධම්මා නාම ජාතා. කෙචි පන ‘‘රූපධාතූති රූපසභාවා ධම්මා, අරූපධාතූති අරූපසභාවා ධම්මාති පදද්වයෙන අනවසෙසතො පඤ්චක්ඛන්ධා ගහිතා’’ති. ‘‘රූපතණ්හාය විසයභූතා ධම්මා රූපධාතු, අරූපතණ්හාය විසයභූතා අරූපධාතූ’’ති ච වදන්ති, තං සබ්බං ඉධ නාධිප්පෙතං. තස්මා වුත්තනයෙනෙව අත්ථො වෙදිතබ්බො. दूसरा तरीका - रूप सहित, रूप से संबद्ध धर्मों की प्रवृत्ति 'रूपधातु' है, जो पञ्चवोकार भव और एकवोकार भव है; इससे समस्त कामभव और रूपभव संगृहीत हैं। रूप रहित धर्मों की प्रवृत्ति 'अरूपधातु' है, जो चतुवोकार भव है; इससे अरूपभव संगृहीत है। इस प्रकार इन दो पदों से तीनों भव और समस्त संसार की प्रवृत्ति दिखाई गई है। तीसरे पद से केवल असंस्कृत धातु (असंखतधातु) ही संगृहीत है, इसलिए मार्ग और फल यहाँ 'त्रिक-विनिर्मुक्त' (तीन श्रेणियों से मुक्त) धर्म कहलाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि 'रूपधातु' का अर्थ रूप-स्वभाव वाले धर्म हैं और 'अरूपधातु' का अर्थ अरूप-स्वभाव वाले धर्म हैं, और इन दो पदों से बिना किसी शेष के पाँचों स्कन्ध ग्रहण किए गए हैं। वे यह भी कहते हैं कि 'रूप-तृष्णा के विषयभूत धर्म रूपधातु हैं और अरूप-तृष्णा के विषयभूत धर्म अरूपधातु हैं', लेकिन यहाँ वह सब अभिप्रेत नहीं है। इसलिए, बताए गए तरीके से ही अर्थ समझना चाहिए। ගාථාසු රූපධාතුං පරිඤ්ඤායාති රූපපටිබද්ධධම්මපවත්තිං ඤාතපරිඤ්ඤාදීහි තීහි පරිඤ්ඤාහි පරිජානිත්වා. ආරුප්පෙසු අසණ්ඨිතාති අරූපාවචරධම්මෙසු භවරාගවසෙන භවදිට්ඨිවසෙන ච න පතිට්ඨිතා අනල්ලීනා. ‘‘අරූපෙසු අසණ්ඨිතා’’ති ච පඨන්ති, සො එව අත්ථො. එත්තාවතා තෙභූමකධම්මානං පරිඤ්ඤා වුත්තා. නිරොධෙ යෙ විමුච්චන්තීති යෙ නිබ්බානෙ ආරම්මණභූතෙ අග්ගමග්ගඵලවසෙන [Pg.175] සමුච්ඡෙදපටිප්පස්සද්ධීහි අනවසෙසකිලෙසතො විමුච්චන්ති. තෙ ජනා මච්චුහායිනොති තෙ ඛීණාසවජනා මරණං සමතීතා. गाथाओं में 'रूपधातुं परिञ्ञाय' (रूपधातु को जानकर) का अर्थ है - रूप से संबद्ध धर्मों की प्रवृत्ति को ज्ञात-परिज्ञा आदि तीन परिज्ञाओं द्वारा भली-भांति जानकर। 'आरुप्पेसु असण्ठिता' (अरूपों में प्रतिष्ठित न होना) का अर्थ है - अरूप-लोक के धर्मों में भव-राग और भव-दृष्टि के कारण प्रतिष्ठित न होना, उनमें आसक्त न होना। 'अरूपेसु असण्ठिता' ऐसा भी पाठ मिलता है, उसका भी वही अर्थ है। यहाँ तक तीनों भूमियों के धर्मों की परिज्ञा (पूर्ण ज्ञान) कही गई है। 'निरोधे ये विमुच्चन्ति' (जो निरोध में मुक्त होते हैं) का अर्थ है - जो निर्वाण के आलम्बन होने पर अग्र-मार्ग और फल के द्वारा समुच्छेद और प्रतिप्रश्रब्धि (शांति) के माध्यम से समस्त क्लेशों से मुक्त हो जाते हैं। वे लोग 'मच्चुहायिनो' (मृत्यु को छोड़ने वाले) हैं, इसका अर्थ है कि वे क्षीणास्रव व्यक्ति मृत्यु को पार कर चुके हैं। එවං ධාතුත්තයසමතික්කමෙන අමතාධිගමං දස්සෙත්වා ‘‘අයඤ්ච පටිපදා මයා ගතමග්ගො ච තුම්හාකං දස්සිතො’’ති තත්ථ නෙසං උස්සාහං ජනෙන්තො දුතියං ගාථමාහ. තත්ථ කායෙනාති නාමකායෙන මග්ගඵලෙහි. ඵුසයිත්වාති පත්වා. නිරූපධින්ති ඛන්ධාදිසබ්බූපධිරහිතං. උපධිප්පටිනිස්සග්ගන්ති තෙසංයෙව ච උපධීනං පටිනිස්සජ්ජනකාරණං. නිබ්බානස්ස හි මග්ගඤාණෙන සච්ඡිකිරියාය සබ්බෙ උපධයො පටිනිස්සට්ඨා හොන්තීති තං තෙසං පටිනිස්සජ්ජනකාරණං. සච්ඡිකත්වාති කාලෙන කාලං ඵලසමාපත්තිසමාපජ්ජනෙන අත්තපච්චක්ඛං කත්වා අනාසවො සම්මාසම්බුද්ධො තමෙව අසොකං විරජං නිබ්බානපදං දෙසෙති. තස්මා තදධිගමාය උස්සුක්කං කාතබ්බන්ති. इस प्रकार तीनों धातुओं के अतिक्रमण से अमृत (निर्वाण) की प्राप्ति को दिखाकर, 'यह प्रतिपदा और मेरे द्वारा प्राप्त मार्ग तुम्हें दिखाया गया है' - ऐसा कहकर उनमें उत्साह जगाते हुए दूसरी गाथा कही। वहाँ 'कायेन' (काया से) का अर्थ नाम-काया (चित्त-चैतसिक) द्वारा मार्ग-फलों से है। 'फुसयित्वा' (स्पर्श करके) का अर्थ प्राप्त करके है। 'निरूपधिं' का अर्थ स्कन्ध आदि सभी उपधियों (आसक्तियों/उपादानों) से रहित है। 'उपधिप्पटिनिस्सग्गं' का अर्थ उन्हीं उपधियों के त्याग का कारण है। निर्वाण का मार्ग-ज्ञान द्वारा साक्षात्कार होने पर सभी उपधियाँ त्याग दी जाती हैं, इसलिए वह उनके त्याग का कारण है। 'सच्छिकत्वा' (साक्षात्कार करके) का अर्थ समय-समय पर फल-समापत्ति में समापन्न होकर स्वयं प्रत्यक्ष करके, अनास्रव सम्यक्सम्बुद्ध उसी अशोक, विरज निर्वाण-पद का उपदेश देते हैं। इसलिए, उसकी प्राप्ति के लिए उद्योग करना चाहिए। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. පඨමවෙදනාසුත්තවණ්ණනා ३. प्रथम वेदना सूत्र की व्याख्या। 52. තතියෙ වෙදනාති ආරම්මණරසං වෙදියන්ති අනුභවන්තීති වෙදනා. තා විභාගතො දස්සෙතුං ‘‘සුඛා වෙදනා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ සුඛ-සද්දො අත්ථුද්ධාරවසෙන හෙට්ඨා වුත්තොයෙව. දුක්ඛ-සද්දො පන ‘‘ජාතිපි දුක්ඛා’’තිආදීසු (දී. නි. 2.387; විභ. 190) දුක්ඛවත්ථුස්මිං ආගතො. ‘‘යස්මා ච ඛො, මහාලි, රූපං දුක්ඛං දුක්ඛානුපතිතං දුක්ඛාවක්කන්ත’’න්තිආදීසු (සං. නි. 3.60) දුක්ඛාරම්මණෙ. ‘‘දුක්ඛො පාපස්ස උච්චයො’’තිආදීසු (ධ. ප. 117) දුක්ඛපච්චයෙ. ‘‘යාවඤ්චිදං, භික්ඛවෙ, න සුකරා අක්ඛානෙන පාපුණිතුං, යාව දුක්ඛා නිරයා’’තිආදීසු (ම. නි. 3.250) දුක්ඛපච්චයට්ඨානෙ. ‘‘සුඛස්ස ච පහානා දුක්ඛස්ස ච පහානා’’තිආදීසු (දී. නි. 1.232; ධ. ස. 165) දුක්ඛවෙදනායං. ඉධාපි දුක්ඛවෙදනායමෙව. ५२. तीसरे (सूत्र) में 'वेदना' का अर्थ है - जो आलम्बन के रस का वेदन (अनुभव) करते हैं, वे वेदनाएँ हैं। उन्हें विभाग से दिखाने के लिए 'सुखा वेदना' आदि कहा गया है। वहाँ 'सुख' शब्द का अर्थ-विस्तार नीचे (पहले) कहा ही गया है। 'दुःख' शब्द 'जाति भी दुःख है' आदि में दुःख के विषयों (आधारों) के अर्थ में आया है। 'हे महालि! क्योंकि रूप दुःख है, दुःख से अनुगत है, दुःख में गिरा हुआ है' आदि में दुःख के आलम्बन के अर्थ में आया है। 'पाप का संचय दुःख है' आदि में दुःख के प्रत्यय (कारण) के अर्थ में आया है। 'भिक्षुओं! नरक के दुखों को शब्दों में बताना आसान नहीं है' आदि में दुःख के प्रत्यय के स्थान (नरक) के अर्थ में आया है। 'सुख के प्रहाण और दुःख के प्रहाण से' आदि में दुःख-वेदना के अर्थ में आया है। यहाँ भी दुःख-वेदना के अर्थ में ही है। වචනත්ථතො පන සුඛයතීති සුඛා. දුක්ඛයතීති දුක්ඛා. න දුක්ඛා න සුඛාති අදුක්ඛමසුඛා, මකාරො පදසන්ධිවසෙන වුත්තො. තාසු ඉට්ඨානුභවනලක්ඛණා සුඛා, අනිට්ඨානුභවනලක්ඛණා දුක්ඛා, උභයවිපරීතානුභවනලක්ඛණා අදුක්ඛමසුඛා. තස්මා සුඛදුක්ඛවෙදනානං උප්පත්ති පාකටා, [Pg.176] න අදුක්ඛමසුඛාය. යදා හි සුඛං උප්පජ්ජති, සකලසරීරං භෙන්තං මද්දන්තං ඵරමානං සතධොතසප්පිං ඛාදාපෙන්තං විය, සතපාකතෙලං මක්ඛෙන්තං විය, ඝටසහස්සෙන පරිළාහං නිබ්බාපයමානං විය ච ‘‘අහො සුඛං, අහො සුඛ’’න්ති වාචං නිච්ඡාරයමානමෙව උප්පජ්ජති. යදා දුක්ඛං උප්පජ්ජති, සකලසරීරං ඛොභෙන්තං මද්දන්තං ඵරමානං තත්තඵාලං පවෙසෙන්තං විය විලීනතම්බලොහං ආසිඤ්චන්තං විය ච ‘‘අහො දුක්ඛං, අහො දුක්ඛ’’න්ති විප්පලාපෙන්තමෙව උප්පජ්ජති. ඉති සුඛදුක්ඛවෙදනානං උප්පත්ති පාකටා. व्युत्पत्ति के अर्थ में, जो सुख देती है वह 'सुखा' है। जो दुःख देती है वह 'दुक्खा' है। जो न दुःख है न सुख, वह 'अदुक्खमसुखा' है; यहाँ 'म' कार पद-सन्धि के कारण है। उनमें, इष्ट (प्रिय) के अनुभव के लक्षण वाली सुख-वेदना है, अनिष्ट (अप्रिय) के अनुभव के लक्षण वाली दुःख-वेदना है, और दोनों से विपरीत अनुभव के लक्षण वाली अदुक्खमसुखा वेदना है। सुख और दुःख वेदनाओं की उत्पत्ति स्पष्ट होती है, अदुक्खमसुखा की नहीं। जब सुख उत्पन्न होता है, तो वह पूरे शरीर को भिगोते हुए, मर्दन करते हुए, व्याप्त होते हुए, जैसे सौ बार धोया हुआ घी खिलाया जा रहा हो, या सौ बार पकाए गए तेल की मालिश की जा रही हो, या हजार घड़ों से जलन को शांत किया जा रहा हो, 'अहो सुख! अहो सुख!' ऐसी वाणी निकालते हुए ही उत्पन्न होता है। जब दुःख उत्पन्न होता है, तो वह पूरे शरीर को क्षुब्ध करते हुए, मर्दन करते हुए, व्याप्त होते हुए, जैसे गर्म लोहे का फाल प्रवेश कराया जा रहा हो या पिघला हुआ तांबा उड़ेला जा रहा हो, 'अहो दुःख! अहो दुःख!' ऐसा विलाप कराते हुए ही उत्पन्न होता है। इस प्रकार सुख और दुःख वेदनाओं की उत्पत्ति स्पष्ट है। අදුක්ඛමසුඛා පන දුබ්බිජානා දුද්දීපනා අන්ධකාරා අවිභූතා. සා සුඛදුක්ඛානං අපගමෙ සාතාසාතපටිපක්ඛවසෙන මජ්ඣත්තාකාරභූතා නයතො ගණ්හන්තස්සෙව පාකටා හොති. යථා කිං? යථා පුබ්බාපරං සපංසුකෙ පදෙසෙ උපචරිතමග්ගවසෙන පිට්ඨිපාසාණෙ මිගෙන ගතමග්ගො, එවං ඉට්ඨානිට්ඨාරම්මණෙසු සුඛදුක්ඛානුභවනෙනපි මජ්ඣත්තාරම්මණානුභවනභාවෙන විඤ්ඤායති. මජ්ඣත්තාරම්මණග්ගහණං පිට්ඨිපාසාණගමනං විය ඉට්ඨානිට්ඨාරම්මණග්ගහණාභාවතො. යඤ්ච තත්රානුභවනං, සා අදුක්ඛමසුඛාති. किन्तु अदुक्खमसुखा वेदना दुर्विज्ञेय (कठिनता से जानने योग्य), कठिनता से समझाने योग्य, अंधकारमय और अस्पष्ट है। वह सुख और दुःख के दूर होने पर, प्रिय और अप्रिय के प्रतिपक्ष के रूप में मध्यस्थ भाव (तटस्थता) वाली होती है, और वह युक्ति से ग्रहण करने वाले को ही स्पष्ट होती है। जैसे क्या? जैसे धूल भरे स्थान में आगे और पीछे के मार्ग के आधार पर पत्थर की चट्टान पर हिरण के जाने का मार्ग (पहचाना जाता है), वैसे ही इष्ट और अनिष्ट आलम्बनों में सुख और दुःख के अनुभव के द्वारा मध्यस्थ आलम्बन के अनुभव के रूप में इसे जाना जाता है। मध्यस्थ आलम्बन का ग्रहण पत्थर की चट्टान पर चलने के समान है, क्योंकि वहाँ इष्ट या अनिष्ट आलम्बन का ग्रहण नहीं होता। और वहाँ जो अनुभव है, वह अदुक्खमसुखा है। එවමෙත්ථ සුඛදුක්ඛඅදුක්ඛමසුඛභාවෙන තිධා වුත්තාපි කත්ථචි සුඛදුක්ඛභාවෙන ද්විධා වුත්තා. යථාහ – ‘‘ද්වෙපි මයා, ආනන්ද, වෙදනා වුත්තා, පරියායෙන සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා’’ති (ම. නි. 2.89). කත්ථචි තිස්සොපි විසුං විසුං සුඛදුක්ඛඅදුක්ඛමසුඛභාවෙන ‘‘සුඛා වෙදනා ඨිතිසුඛා විපරිණාමදුක්ඛා, දුක්ඛා වෙදනා ඨිතිදුක්ඛා විපරිණාමසුඛා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා ඤාණසුඛා අඤ්ඤාණදුක්ඛා’’ති (ම. නි. 1.465). කත්ථචි සබ්බාපි දුක්ඛභාවෙන. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං, සබ්බං තං දුක්ඛස්මින්ති වදාමී’’ති (සං. නි. 4.259). इस प्रकार यहाँ सुख, दुःख और अदुःखमसुख के रूप में तीन प्रकार से कहे जाने पर भी, कहीं-कहीं सुख और दुःख के रूप में दो प्रकार से कहे गए हैं। जैसा कि कहा गया है - "आनन्द! मेरे द्वारा दो वेदनाएँ भी कही गई हैं, पर्याय (विशेष दृष्टिकोण) से सुख वेदना और दुःख वेदना" (म. नि. 2.89)। कहीं-कहीं तीनों को अलग-अलग सुख, दुःख और अदुःखमसुख के रूप में - "सुख वेदना स्थिति में सुखद और विपरिणाम (परिवर्तन) में दुःखद है; दुःख वेदना स्थिति में दुःखद और विपरिणाम में सुखद है; अदुःखमसुख वेदना ज्ञान में सुखद और अज्ञान में दुःखद है" (म. नि. 1.465)। कहीं-कहीं सभी को दुःख के रूप में। यह कहा गया है - "जो कुछ भी वेदित (अनुभव) किया जाता है, वह सब दुःख में है, ऐसा मैं कहता हूँ" (सं. नि. 4.259)। තත්ථ සියා – යදි තිස්සො වෙදනා යථා ඉධ වුත්තා, අඤ්ඤෙසු ච එදිසෙසු සුත්තෙසු අභිධම්මෙ ච එවං අවත්වා කස්මා එවං වුත්තං ‘‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං, සබ්බං තං දුක්ඛස්මින්ති වදාමී’’ති, ‘‘ද්වෙපි මයා, ආනන්ද, වෙදනා වුත්තා’’ති ච? සන්ධායභාසිතමෙතං, තස්මා සා පරියායදෙසනා. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – वहाँ यह शंका हो सकती है - यदि तीन वेदनाएँ वैसी ही हैं जैसी यहाँ कही गई हैं, और अन्य ऐसे सूत्रों तथा अभिधर्म में वैसा न कहकर ऐसा क्यों कहा गया है कि "जो कुछ भी वेदित किया जाता है, वह सब दुःख में है" और "आनन्द! मेरे द्वारा दो वेदनाएँ भी कही गई हैं"? यह सन्धि (अभिप्राय) को ध्यान में रखकर कहा गया है, इसलिए वह पर्याय-देशना (सापेक्ष उपदेश) है। भगवान द्वारा यह कहा गया है - ‘‘සඞ්ඛාරානිච්චතං, ආනන්ද, මයා සන්ධාය භාසිතං සඞ්ඛාරවිපරිණාමතං, ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං, සබ්බං තං දුක්ඛස්මි’’’න්ති (සං. නි. 4.259). "आनन्द! संस्कारों की अनित्यता और संस्कारों के विपरिणाम (परिवर्तनशीलता) को ध्यान में रखकर मेरे द्वारा यह कहा गया है कि 'जो कुछ भी वेदित किया जाता है, वह सब दुःख में है'" (सं. नि. 4.259)। ‘‘ද්වෙපි [Pg.177] මයා, ආනන්ද, වෙදනා වුත්තා පරියායෙනා’’ති ච (සං. නි. 4.259). "और आनन्द! मेरे द्वारा पर्याय (विशेष दृष्टिकोण) से दो वेदनाएँ भी कही गई हैं" (सं. नि. 4.259)। එත්ථ හි සුඛා අදුක්ඛමසුඛාති ඉමාසං ද්වින්නං වෙදනානං නිප්පරියායෙන දුක්ඛභාවො නත්ථි, වෙනෙය්යජ්ඣාසයෙන පන තත්ථ නිච්ඡන්දදස්සනත්ථං පරියායෙන දුක්ඛභාවො වුත්තොති සා තාදිසී පරියායදෙසනා. අයං පන වෙදනත්තයදෙසනා සභාවකථාති කත්වා නිප්පරියායදෙසනාති අයමෙත්ථ ආචරියානං සමානකථා. यहाँ सुख और अदुःखमसुख - इन दो वेदनाओं का मुख्य रूप (निप्परियाय) से दुःख भाव नहीं है, किन्तु विनेय (शिष्य) के आशय के अनुसार वहाँ वैराग्य दिखाने के लिए पर्याय (गौण रूप) से दुःख भाव कहा गया है, इसलिए वह वैसी पर्याय-देशना है। किन्तु यह तीन वेदनाओं की देशना स्वभाव-कथा होने के कारण मुख्य देशना (निप्परियाय-देशना) है - यह यहाँ आचार्यों का समान कथन है। විතණ්ඩවාදී පනාහ ‘‘දුක්ඛතාද්වයවචනතො පරියායදෙසනාව වෙදනත්තයදෙසනා’’ති. සො ‘‘මා හෙව’’න්තිස්ස වචනීයො, යස්මා භගවතා සබ්බාසං වෙදනානං දුක්ඛභාවො අධිප්පායවසෙන වුත්තො ‘‘සඞ්ඛාරානිච්චතං, ආනන්ද, මයා සන්ධාය භාසිතං සඞ්ඛාරවිපරිණාමතං ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං, සබ්බං තං දුක්ඛස්මි’’’න්ති. යදි පනෙත්ථ වෙදනත්තයදෙසනා පරියායදෙසනා සියා, ‘‘ඉදං මයා සන්ධාය භාසිතං තිස්සො වෙදනා’’ති වත්තබ්බං සියා, න පනෙතං වුත්තං. किन्तु वितण्डावादी कहता है - "दो प्रकार की दुःखता के वचन के कारण तीन वेदनाओं की देशना पर्याय-देशना ही है।" उसे "ऐसा नहीं है" कहना चाहिए, क्योंकि भगवान द्वारा सभी वेदनाओं का दुःख भाव अभिप्राय के वश से कहा गया है - "आनन्द! संस्कारों की अनित्यता... को ध्यान में रखकर मेरे द्वारा यह कहा गया है कि 'जो कुछ भी वेदित किया जाता है, वह सब दुःख में है'"। यदि यहाँ तीन वेदनाओं की देशना पर्याय-देशना होती, तो "इसे ध्यान में रखकर मेरे द्वारा तीन वेदनाएँ कही गई हैं" ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं कहा गया है। අපිචායමෙව වත්තබ්බො ‘‘කො, පනාවුසො, වෙදනත්තයදෙසනාය අධිප්පායො’’ති? සචෙ වදෙය්ය ‘‘මුදුකා දුක්ඛා වෙදනා සුඛා, අධිමත්තා දුක්ඛා, මජ්ඣිමා අදුක්ඛමසුඛාති වෙනෙය්යජ්ඣාසයෙන වුත්තා. තාසු හි න සත්තානං සුඛාදිවඩ්ඪී’’ති. සො වත්තබ්බො – කො පනාවුසො දුක්ඛවෙදනාය සභාවො, යෙන ‘‘සබ්බා වෙදනා දුක්ඛා’’ති වුච්චෙය්යුං? යදි යාය උප්පන්නාය සත්තා වියොගමෙව ඉච්ඡන්ති, සො දුක්ඛවෙදනාය සභාවො. යාය ච පන උප්පන්නාය සත්තා අවියොගමෙව ඉච්ඡන්ති, යාය න උභයං ඉච්ඡන්ති, සා කථං දුක්ඛවෙදනා සියා? අථ යා අත්තනො නිස්සයස්ස උපඝාතකාරී, සා දුක්ඛා. යා අනුග්ගහකාරී, සා කථං දුක්ඛා සියා. අථ පන යදරියා දුක්ඛතො පස්සන්ති, සො දුක්ඛවෙදනාය සභාවො, සඞ්ඛාරදුක්ඛතාය වෙදනං අරියා දුක්ඛතො පස්සන්ති, සා ච අභිණ්හසභාවාති කථං තාසං වෙදනානං මුදුමජ්ඣිමාධිමත්තදුක්ඛභාවො සියා? යදි ච සඞ්ඛාරදුක්ඛතාය එව වෙදනානං දුක්ඛභාවො සියා, ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛතායො දුක්ඛදුක්ඛතා, විපරිණාමදුක්ඛතා, සඞ්ඛාරදුක්ඛතා’’ති (දී. නි. 3.305) අයං දුක්ඛතානං විභාගදෙසනා නිප්පයොජනා සියා. තථා ච සති සුත්තමෙව පටිබාහිතං සියා, පුරිමෙසු ච තීසු රූපාවචරජ්ඣානෙසු [Pg.178] මුදුකා දුක්ඛා වෙදනාති ආපජ්ජති සුඛවෙදනාවචනතො. චතුත්ථජ්ඣානෙ අරූපජ්ඣානෙසු ච මජ්ඣිමා, අදුක්ඛමසුඛවෙදනාවචනතො. එවං සන්තෙ පුරිමා තිස්සො රූපාවචරසමාපත්තියො චතුත්ථජ්ඣානසමාපත්තියා අරූපසමාපත්තීහි ච සන්තතරාති ආපජ්ජති. කථං වා සන්තතරප්පණීතතරාසු සමාපත්තීසු දුක්ඛවෙදනාය අධිකභාවො යුජ්ජති? තස්මා වෙදනත්තයදෙසනාය පරියායදෙසනාභාවො න යුත්තොති. इसके अतिरिक्त उससे यह भी पूछा जाना चाहिए - "हे आयुष्मान्! तीन वेदनाओं की देशना का क्या अभिप्राय है?" यदि वह कहे - "मृदु दुःख वेदना सुख है, अत्यधिक दुःख है, और मध्यम अदुःखमसुख है - ऐसा विनेय (शिष्य) के आशय के अनुसार कहा गया है। उनमें प्राणियों के सुख आदि की वृद्धि नहीं होती।" तो उससे कहना चाहिए - हे आयुष्मान्! दुःख वेदना का वह स्वभाव क्या है, जिससे "सभी वेदनाएँ दुःख हैं" ऐसा कहा जाए? यदि जिसके उत्पन्न होने पर प्राणी वियोग (अलग होना) ही चाहते हैं, वह दुःख वेदना का स्वभाव है; तो जिसके उत्पन्न होने पर प्राणी अवियोग (जुड़े रहना) ही चाहते हैं, और जिसके प्रति दोनों की इच्छा नहीं करते, वह दुःख वेदना कैसे हो सकती है? फिर यदि जो अपने आश्रय का उपघात (विनाश) करने वाली है, वह दुःख है; तो जो अनुग्रह (उपकार) करने वाली है, वह दुःख कैसे हो सकती है? और यदि जिसे आर्य दुःख के रूप में देखते हैं, वह दुःख वेदना का स्वभाव है, और आर्य संस्कार-दुःखता के कारण वेदना को दुःख के रूप में देखते हैं, और वह (संस्कार-दुःखता) निरन्तर स्वभाव वाली है, तो उन वेदनाओं में मृदु, मध्यम और अधिमात्र (तीव्र) दुःख भाव कैसे हो सकता है? और यदि संस्कार-दुःखता के कारण ही वेदनाओं का दुःख भाव हो, तो "भिक्षुओं! ये तीन दुःखताएँ हैं - दुःख-दुःखता, विपरिणाम-दुःखता और संस्कार-दुःखता" (दी. नि. 3.305) - यह दुःखताओं का विभाग-देशना निष्प्रयोजन हो जाएगी। और ऐसा होने पर सूत्र का ही विरोध होगा, और पहले के तीन रूपावचर ध्यानों में सुख वेदना कहे जाने के कारण "मृदु दुःख वेदना" होने का प्रसंग आएगा। चौथे ध्यान और अरूपावचर ध्यानों में अदुःखमसुख वेदना कहे जाने के कारण "मध्यम (दुःख)" होने का प्रसंग आएगा। ऐसा होने पर पहले की तीन रूपावचर समापत्तियाँ चौथे ध्यान की समापत्ति और अरूप समापत्तियों से अधिक शान्त हैं, ऐसा प्रसंग आएगा। अथवा अधिक शान्त और प्रणीत (उत्कृष्ट) समापत्तियों में दुःख वेदना की अधिकता कैसे युक्त हो सकती है? इसलिए तीन वेदनाओं की देशना का पर्याय-देशना होना युक्त नहीं है। යං පන වුත්තං ‘‘දුක්ඛෙ සුඛන්ති සඤ්ඤාවිපල්ලාසො’’ති (අ. නි. 4.49; පටි. ම. 1.236), තං කථන්ති? විපරිණාමදුක්ඛතාය සඞ්ඛාරදුක්ඛතාය ච යථාභූතානවබොධෙන යා එකන්තතො සුඛසඤ්ඤා, යා ච දුක්ඛනිමිත්තෙ සුඛනිමිත්තසඤ්ඤා, තං සන්ධාය වුත්තං. එවම්පි ‘‘සුඛා, භික්ඛවෙ, වෙදනා දුක්ඛතො දට්ඨබ්බා’’ති (ඉතිවු. 53) ඉදං පන කථන්ති? ඉදං පන විපරිණාමදස්සනෙ සන්නියොජනත්ථං වුත්තං තස්ස තත්ථ විරාගුප්පත්තියා උපායභාවතො සුඛවෙදනාය බහුදුක්ඛානුගතභාවතො ච. තථා හි දුක්ඛස්ස හෙතුභාවතො අනෙකෙහි දුක්ඛධම්මෙහි අනුබද්ධත්තා ච පණ්ඩිතා සුඛම්පි දුක්ඛමිච්චෙව පටිපන්නා. जो यह कहा गया है कि "दुःख में सुख (मानना) संज्ञा-विपर्यास (भ्रम) है" (अ. नि. 4.49), वह कैसे है? विपरिणाम-दुःखता और संस्कार-दुःखता के द्वारा यथार्थ बोध न होने से जो एकान्ततः सुख-संज्ञा है, और जो दुःख के निमित्त में सुख-निमित्त की संज्ञा है, उसे ध्यान में रखकर यह कहा गया है। इसी प्रकार "भिक्षुओं! सुख वेदना को दुःख के रूप में देखना चाहिए" (इतिवु. 53), यह कैसे है? यह विपरिणाम (परिवर्तन) को देखने में प्रवृत्त करने के लिए कहा गया है, क्योंकि वह वहाँ वैराग्य की उत्पत्ति का उपाय है और सुख वेदना बहुत से दुखों से अनुगत (जुड़ी हुई) है। इसी प्रकार दुःख का हेतु होने से और अनेक दुःखद धर्मों से सम्बद्ध होने के कारण पण्डित जन सुख को भी दुःख ही मानते हैं। එවම්පි නත්ථෙව සුඛා වෙදනා, සුඛහෙතූනං නියමාභාවතො. යෙ හි සුඛවෙදනාය හෙතුසම්මතා ඝාසච්ඡාදනාදයො, තෙ එව අධිමත්තං අකාලෙ ච පටිසෙවියමානා දුක්ඛවෙදනාය හෙතුභාවමාපජ්ජන්ති. න ච යෙනෙව හෙතුනා සුඛං, තෙනෙව දුක්ඛන්ති යුත්තං වත්තුං. තස්මා න තෙ සුඛහෙතූ, දුක්ඛන්තරාපගමෙ පන අවිඤ්ඤූනං සුඛසඤ්ඤා යථා චිරතරං ඨානාදිඉරියාපථසමඞ්ගී හුත්වා තදඤ්ඤඉරියාපථසමායොගෙ මහන්තඤ්ච භාරං වහතො භාරනික්ඛෙපෙ චෙව වූපසමෙ ච, තස්මා නත්ථෙව සුඛන්ති? තයිදං සම්මදෙව සුඛහෙතුං අපරිඤ්ඤාය තස්ස නියමාභාවපරිකප්පනං. ආරම්මණමත්තමෙව හි කෙවලං සුඛහෙතුං මනසිකත්වා එවං වුත්තං, අජ්ඣත්තිකසරීරස්ස අවත්ථාවිසෙසං සමුදිතං පන එකජ්ඣං තදුභයං සුඛාදිහෙතූති වෙදිතබ්බං. යාදිසඤ්ච තදුභයං සුඛවෙදනාය හෙතු, තාදිසං න කදාචිපි දුක්ඛවෙදනාය හෙතු හොතීති වවත්ථිතා එව සුඛාදිහෙතු. යථා නාම තෙජොධාතු සාලියවඩාකසස්සාදීනං යාදිසමවත්ථන්තරං පත්වා සාතමධුරභාවහෙතු හොති, න තාදිසමෙව පත්වා කදාචිපි අසාතඅමධුරභාවහෙතු හොති, එවංසම්පදමිදං දට්ඨබ්බං. इस प्रकार भी सुखद वेदना नहीं है, क्योंकि सुख के हेतुओं का कोई नियम नहीं है। जो सुखद वेदना के हेतु माने जाते हैं जैसे भोजन और वस्त्र आदि, वे ही अत्यधिक मात्रा में और असमय सेवन किए जाने पर दुखद वेदना के हेतु बन जाते हैं। और यह कहना उचित नहीं है कि जिस हेतु से सुख होता है, उसी से दुख होता है। इसलिए वे सुख के हेतु नहीं हैं, बल्कि दुख के दूर होने पर अज्ञानियों को सुख की संज्ञा होती है, जैसे बहुत समय तक खड़े रहने आदि की मुद्रा (ईर्यापथ) में रहने के बाद दूसरी मुद्रा में आने पर और भारी बोझ ढोने वाले के बोझ उतारने और शांत होने पर; इसलिए क्या सुख नहीं है? यह सुख के हेतु को ठीक से न जानकर उसके नियम के अभाव की कल्पना है। केवल आलम्बन मात्र को ही सुख के हेतु के रूप में मन में रखकर ऐसा कहा गया है, परंतु आंतरिक शरीर की विशेष अवस्था और आलम्बन दोनों के सम्मिलित होने को ही सुख आदि का हेतु समझना चाहिए। और जिस प्रकार का वह दोनों (आलम्बन और अवस्था) सुखद वेदना का हेतु है, वैसा कभी भी दुखद वेदना का हेतु नहीं होता, इस प्रकार सुख आदि के हेतु निश्चित ही हैं। जैसे तेजोधातु (अग्नि तत्व) शाली और जौ आदि की फसलों की जिस विशेष अवस्था को प्राप्त कर सुखद मिठास का हेतु होती है, वैसी ही अवस्था को प्राप्त कर कभी भी कड़वाहट का हेतु नहीं होती, इसे इसी प्रकार देखा जाना चाहिए। දුක්ඛාපගමෙව [Pg.179] කදාචි සුඛවෙදනන්තරං උපලබ්භති. තත්ථ සුඛෙයෙව සුඛසඤ්ඤා, න දුක්ඛාපගමමත්තෙ යථා අද්ධානගමනපරිස්සමකිලන්තස්ස සම්බාහනෙ ඉරියාපථපරිවත්තනෙ ච, අඤ්ඤථා කාලන්තරෙපි පරිස්සමාපගමෙ තාදිසී සුඛසඤ්ඤා සියා. දුක්ඛාපගමමත්තෙ පන සුඛන්ති පරිකප්පනා වෙදනාවිසෙසස්ස අනුපලබ්භමානත්තා. එකන්තෙනෙව චෙතං එවං සම්පටිච්ඡිතබ්බං, යතො පණීතප්පණීතානියෙව ආරම්මණානි මහතා ආයාසෙන සත්තා අභිපත්ථයන්ති, න ච නෙසං යෙන කෙනචි යථාලද්ධමත්තෙන පච්චයෙන පතිකාරං කාතුං සක්කා තණ්හුප්පාදෙනාති. වෙදනාපච්චයා හි තණ්හාඋපාදි, තථාභාවෙ ච සුගන්ධමධුරසුඛසම්ඵස්සාදිවත්ථූනං ඉතරීතරභාවෙන සුඛවිසෙසසඤ්ඤා ජායමානා කතමස්ස දුක්ඛවිසෙසස්ස අපගමනෙ ඝානජිව්හාකායද්වාරෙසු, සොතද්වාරෙ ච දිබ්බසඞ්ගීතසදිසපඤ්චඞ්ගිකතූරියසද්දාවධාරණෙ. තස්මා න දුක්ඛවෙදනායමෙව දුක්ඛන්තරාපගමෙ සුඛසඤ්ඤා, නාපි කෙවලෙ දුක්ඛාපගමමත්තෙති ආගමතො යුත්තිතොපි වවත්ථිතා තිස්සො වෙදනාති භගවතො වෙදනත්තයදෙසනා නීතත්ථායෙව, න නෙය්යත්ථාති සඤ්ඤාපෙතබ්බං. එවඤ්චෙතං උපෙති, ඉච්චෙතං කුසලං, නො චෙ, කම්මං කත්වා උය්යොජෙතබ්බො ‘‘ගච්ඡ යථාසුඛ’’න්ති. कभी-कभी दुख के दूर होने के बाद सुखद वेदना का अनुभव होता है। वहाँ सुख में ही सुख की संज्ञा होती है, न कि केवल दुख के दूर होने मात्र में, जैसे मार्ग चलने की थकान से थके हुए व्यक्ति के अंगों के मर्दन और मुद्रा परिवर्तन में; अन्यथा किसी अन्य समय में भी थकान दूर होने पर वैसी ही सुख की संज्ञा होती। केवल दुख के दूर होने मात्र को सुख मानना एक कल्पना है क्योंकि वहाँ विशेष वेदना उपलब्ध नहीं होती। इसे निश्चित रूप से इस प्रकार स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि प्राणी बड़े प्रयास से उत्तम से उत्तम आलम्बनों की इच्छा करते हैं, और उनकी तृष्णा की उत्पत्ति को किसी भी प्राप्त साधन मात्र से शांत नहीं किया जा सकता। वेदना के प्रत्यय से ही तृष्णा उत्पन्न होती है, और ऐसी स्थिति में सुगंधित, मधुर और सुखद स्पर्श वाली वस्तुओं के अलग-अलग होने से उत्पन्न होने वाली विशेष सुख की संज्ञा, घ्राण, जिह्वा और काय द्वारों में, तथा श्रोत्र द्वार में दिव्य संगीत के समान पांच अंगों वाले वाद्यों के शब्द सुनने में, किस विशेष दुख के दूर होने पर होती है? इसलिए न केवल दुखद वेदना में दुख के दूर होने पर सुख की संज्ञा होती है, और न ही केवल दुख के दूर होने मात्र में, बल्कि आगम और युक्ति से भी तीन वेदनाएँ निश्चित हैं, अतः भगवान की तीन वेदनाओं की देशना नीतार्थ ही है, नेयार्थ नहीं, ऐसा समझना चाहिए। यदि यह इस प्रकार स्वीकार्य है, तो यह अच्छा है, यदि नहीं, तो उसे अपना कर्म करके विदा कर देना चाहिए कि 'अपनी इच्छानुसार जाओ'। එවමෙතා අඤ්ඤමඤ්ඤපටිපක්ඛසභාවවවත්ථිතලක්ඛණා එව තිස්සො වෙදනා භගවතා දෙසිතා. තඤ්ච ඛො විපස්සනාකම්මිකානං යොගාවචරානං වෙදනාමුඛෙන අරූපකම්මට්ඨානදස්සනත්ථං. දුවිධඤ්හි කම්මට්ඨානං රූපකම්මට්ඨානං, අරූපකම්මට්ඨානන්ති. තත්ථ භගවා රූපකම්මට්ඨානං කථෙන්තො සඞ්ඛෙපමනසිකාරවසෙන වා විත්ථාරමනසිකාරවසෙන වා චතුධාතුවවත්ථානාදිවසෙන වා කථෙති. අරූපකම්මට්ඨානං පන කථෙන්තො ඵස්සවසෙන වා වෙදනාවසෙන වා චිත්තවසෙන වා කථෙති. එකච්චස්ස හි ආපාථගතෙ ආරම්මණෙ ආවජ්ජතො තත්ථ චිත්තචෙතසිකානං පඨමාභිනිපාතො ඵස්සො තං ආරම්මණං ඵුසන්තො උප්පජ්ජමානො පාකටො හොති, එකච්චස්ස තං ආරම්මණං අනුභවන්තී උප්පජ්ජමානා වෙදනා පාකටා හොති, එකච්චස්ස තං ආරම්මණං විජානන්තං උප්පජ්ජමානං විඤ්ඤාණං පාකටං හොති. ඉති තෙසං තෙසං පුග්ගලානං අජ්ඣාසයෙන යථාපාකටං ඵස්සාදිමුඛෙන තිධා අරූපකම්මට්ඨානං කථෙති. इस प्रकार भगवान ने एक-दूसरे के विपरीत स्वभाव और निश्चित लक्षणों वाली इन तीन वेदनाओं का उपदेश दिया है। और वह विपश्यना करने वाले योगियों को वेदना के माध्यम से अरूप कर्मस्थान दिखाने के लिए है। कर्मस्थान दो प्रकार के होते हैं - रूप कर्मस्थान और अरूप कर्मस्थान। वहाँ भगवान रूप कर्मस्थान का वर्णन करते हुए संक्षेप मनसिकार के वश से, या विस्तार मनसिकार के वश से, या चार धातुओं के निर्धारण आदि के वश से कहते हैं। परंतु अरूप कर्मस्थान का वर्णन करते हुए स्पर्श के वश से, या वेदना के वश से, या चित्त के वश से कहते हैं। किसी व्यक्ति के लिए इन्द्रिय पथ में आए हुए आलम्बन का आवर्जन करते समय वहाँ चित्त और चैतसिकों का प्रथम सम्पात 'स्पर्श', उस आलम्बन को स्पर्श करते हुए उत्पन्न होता हुआ प्रकट होता है; किसी के लिए उस आलम्बन का अनुभव करती हुई उत्पन्न होती हुई 'वेदना' प्रकट होती है; किसी के लिए उस आलम्बन को जानती हुई उत्पन्न होती हुई 'विज्ञान' प्रकट होती है। इस प्रकार उन-उन व्यक्तियों के आशय के अनुसार, जो प्रकट हो, उस स्पर्श आदि के माध्यम से तीन प्रकार से अरूप कर्मस्थान का उपदेश देते हैं। තත්ථ [Pg.180] යස්ස ඵස්සො පාකටො හොති, සොපි ‘‘න කෙවලං ඵස්සොව උප්පජ්ජති, තෙන සද්ධිං තදෙව ආරම්මණං අනුභවමානා වෙදනාපි උප්පජ්ජති, සඤ්ජානමානා සඤ්ඤාපි, චෙතයමානා චෙතනාපි, විජානමානං විඤ්ඤාණම්පි උප්පජ්ජතී’’ති ඵස්සපඤ්චමකෙයෙව පරිග්ගණ්හාති. යස්ස වෙදනා පාකටා හොති, සොපි ‘‘න කෙවලං වෙදනාව උප්පජ්ජති, තාය සද්ධිං ඵුසමානො ඵස්සොපි උප්පජ්ජති, සඤ්ජානමානා සඤ්ඤාපි, චෙතයමානා චෙතනාපි, විජානමානං විඤ්ඤාණම්පි උප්පජ්ජතී’’ති ඵස්සපඤ්චමකෙයෙව පරිග්ගණ්හාති. යස්ස විඤ්ඤාණං පාකටං හොති, සොපි ‘‘න කෙවලං විඤ්ඤාණමෙව උප්පජ්ජති, තෙන සද්ධිං තදෙවාරම්මණං ඵුසමානො ඵස්සොපි උප්පජ්ජති, අනුභවමානා වෙදනාපි, සඤ්ජානමානා සඤ්ඤාපි, චෙතයමානා චෙතනාපි උප්පජ්ජතී’’ති ඵස්සපඤ්චමකෙයෙව පරිග්ගණ්හාති. वहाँ जिसके लिए स्पर्श प्रकट होता है, वह भी यह परिग्रह करता है कि 'न केवल स्पर्श ही उत्पन्न होता है, उसके साथ उसी आलम्बन का अनुभव करती हुई वेदना भी उत्पन्न होती है, संज्ञा भी, चेतना भी और विज्ञान भी उत्पन्न होता है' - इस प्रकार वह स्पर्श-पंचक का ही परिग्रह करता है। जिसके लिए वेदना प्रकट होती है, वह भी यह परिग्रह करता है कि 'न केवल वेदना ही उत्पन्न होती है, उसके साथ स्पर्श करता हुआ स्पर्श भी उत्पन्न होता है, संज्ञा भी, चेतना भी और विज्ञान भी उत्पन्न होता है' - इस प्रकार वह स्पर्श-पंचक का ही परिग्रह करता है। जिसके लिए विज्ञान प्रकट होता है, वह भी यह परिग्रह करता है कि 'न केवल विज्ञान ही उत्पन्न होता है, उसके साथ उसी आलम्बन को स्पर्श करता हुआ स्पर्श भी उत्पन्न होता है, अनुभव करती हुई वेदना भी, संज्ञा भी और चेतना भी उत्पन्न होती है' - इस प्रकार वह स्पर्श-पंचक का ही परिग्रह करता है। සො ‘‘ඉමෙ ඵස්සපඤ්චමකා ධම්මා කිංනිස්සිතා’’ති උපධාරෙන්තො ‘‘වත්ථුනිස්සිතා’’ති පජානාති. වත්ථු නාම කරජකායො. යං සන්ධාය වුත්තං ‘‘ඉදඤ්ච පන මෙ විඤ්ඤාණං එත්ථසිතං එත්ථපටිබද්ධ’’න්ති (දී. නි. 1.235; ම. නි. 2.252). සො අත්ථතො භූතා චෙව උපාදාරූපානි ච, එවමෙත්ථ වත්ථු රූපං, ඵස්සපඤ්චමකා නාමන්ති නාමරූපමත්තමෙව පස්සති. රූපඤ්චෙත්ථ රූපක්ඛන්ධො, නාමං චත්තාරො අරූපිනො ඛන්ධාති පඤ්චක්ඛන්ධමත්තං හොති. නාමරූපවිනිමුත්තා හි පඤ්චක්ඛන්ධා, පඤ්චක්ඛන්ධවිනිමුත්තං වා නාමරූපං නත්ථි. සො ‘‘ඉමෙ පඤ්චක්ඛන්ධා කිංහෙතුකා’’ති උපපරික්ඛන්තො ‘‘අවිජ්ජාදිහෙතුකා’’ති, තතො ‘‘පච්චයො චෙව පච්චයුප්පන්නඤ්ච ඉදං, අඤ්ඤො සත්තො වා පුග්ගලො වා නත්ථි, සුද්ධසඞ්ඛාරපුඤ්ජමත්තමෙවා’’ති සප්පච්චයනාමරූපවසෙන තිලක්ඛණං ආරොපෙත්වා විපස්සනාපටිපාටියා ‘‘අනිච්චං දුක්ඛමනත්තා’’ති සම්මසන්තො විචරති. සො ‘‘අජ්ජ අජ්ජා’’ති පටිවෙධං ආකඞ්ඛමානො තථාරූපෙ සමයෙ උතුසප්පායං, පුග්ගලසප්පායං, භොජනසප්පායං, ධම්මස්සවනසප්පායං වා ලභිත්වා එකපල්ලඞ්කෙන නිසින්නොව විපස්සනං මත්ථකං පාපෙත්වා අරහත්තෙ පතිට්ඨාති. එවං ඉමෙසං තිණ්ණං ජනානං යාව අරහත්තා කම්මට්ඨානං වෙදිතබ්බං. ඉධ පන භගවා වෙදනාවසෙන බුජ්ඣනකානං අජ්ඣාසයෙන අරූපකම්මට්ඨානං කථෙන්තො වෙදනාවසෙන කථෙසි. තත්ථ – वह 'ये स्पर्श-पंचमक धर्म किस पर आश्रित हैं?' ऐसा विचार करते हुए 'वस्तु (आधार) पर आश्रित हैं' ऐसा जानता है। वस्तु का अर्थ है करज-काय (शरीर)। जिसके संदर्भ में कहा गया है— 'और मेरा यह विज्ञान यहाँ आश्रित है, यहाँ बद्ध है' (दी. नि. 1.235; म. नि. 2.252)। वह परमार्थतः भूतों और उपादा-रूपों को देखता है, इस प्रकार यहाँ वस्तु 'रूप' है और स्पर्श-पंचमक 'नाम' हैं—वह केवल नाम-रूप को ही देखता है। यहाँ रूप 'रूपस्कन्ध' है और नाम 'चार अरूप स्कन्ध' हैं, इस प्रकार केवल पाँच स्कन्ध ही होते हैं। नाम-रूप से अलग पाँच स्कन्ध नहीं हैं, और पाँच स्कन्धों से अलग नाम-रूप नहीं है। वह 'इन पाँच स्कन्धों का हेतु क्या है?' ऐसा विचार करते हुए 'अविद्या आदि हेतु हैं' ऐसा जानता है, उसके बाद 'यह केवल प्रत्यय और प्रत्ययोत्पन्न है, अन्य कोई सत्त्व या पुद्गल नहीं है, केवल शुद्ध संस्कारों का समूह मात्र है'—ऐसा सप्रत्यय नाम-रूप के द्वारा त्रिलक्षणों का आरोपण कर विपश्यना के क्रम से 'अनित्य, दुःख, अनात्मा' का सम्मर्शन करते हुए विचरता है। वह 'आज ही, आज ही' प्रतिवेध (साक्षात्कार) की आकांक्षा करते हुए, उस समय अनुकूल ऋतु, अनुकूल पुद्गल, अनुकूल भोजन या अनुकूल धर्म-श्रवण प्राप्त कर, एक ही आसन (पल्लङ्क) में बैठे हुए विपश्यना को शिखर तक पहुँचाकर अर्हत्त्व में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस प्रकार इन तीन व्यक्तियों के लिए अर्हत्त्व तक कर्मस्थान समझना चाहिए। किन्तु यहाँ भगवान् ने वेदना के माध्यम से समझने वालों के आशय के अनुसार अरूप-कर्मस्थान का वर्णन करते हुए वेदना के माध्यम से कहा। वहाँ— ‘‘ලක්ඛණඤ්ච අධිට්ඨානං, උප්පත්ති අනුසයො තථා; ඨානං පවත්තිකාලො ච, ඉන්ද්රියඤ්ච ද්විධාදිතා’’ති. – 'लक्षण, अधिष्ठान, उत्पत्ति तथा अनुशय; स्थान, प्रवृत्तिकाल, इन्द्रिय और द्विधा-आदि (दो प्रकार आदि)।' ඉදං [Pg.181] පකිණ්ණකං වෙදිතබ්බං – තත්ථ ලක්ඛණං හෙට්ඨා වුත්තමෙව. අධිට්ඨානන්ති ඵස්සො. ‘‘ඵස්සපච්චයා වෙදනා’’ති හි වචනතො ඵස්සො වෙදනාය අධිට්ඨානං. තථා හි සො වෙදනාධිට්ඨානභාවතො නිච්චම්මගාවීඋපමාය උපමිතො. තත්ථ සුඛවෙදනීයො ඵස්සො සුඛාය වෙදනාය අධිට්ඨානං, දුක්ඛවෙදනීයො ඵස්සො දුක්ඛාය වෙදනාය, අදුක්ඛමසුඛවෙදනීයො ඵස්සො අදුක්ඛමසුඛාය වෙදනාය අධිට්ඨානං, ආසන්නකාරණන්ති අත්ථො. වෙදනා කස්ස පදට්ඨානං? ‘‘වෙදනාපච්චයා තණ්හා’’ති වචනතො තණ්හාය පදට්ඨානං අභිපත්ථනීයභාවතො. සුඛා වෙදනා තාව තණ්හාය පදට්ඨානං හොතු, ඉතරා පන කථන්ති? වුච්චතෙ සුඛසමඞ්ගීපි තාව තංසදිසං තතො වා උත්තරිතරං සුඛං අභිපත්ථෙති, කිමඞ්ග පන දුක්ඛසමඞ්ගීභූතො. අදුක්ඛමසුඛා ච සන්තභාවෙන සුඛමිච්චෙව වුච්චතීති තිස්සොපි වෙදනා තණ්හාය පදට්ඨානං. यह प्रकीर्णक (विविध) समझना चाहिए—वहाँ लक्षण पहले ही कहा जा चुका है। 'अधिष्ठान' का अर्थ है स्पर्श। 'स्पर्श-प्रत्यया वेदना' इस वचन के कारण स्पर्श वेदना का अधिष्ठान है। क्योंकि वह वेदना का अधिष्ठान होने के कारण 'बिना खाल वाली गाय' (निच्चम्मगावी) की उपमा से उपमित है। वहाँ सुख-वेदनीय स्पर्श सुखद वेदना का अधिष्ठान है, दुःख-वेदनीय स्पर्श दुःखद वेदना का, और अदुःख-असुख-वेदनीय स्पर्श अदुःख-असुख वेदना का अधिष्ठान है; इसका अर्थ 'आसन्न कारण' है। वेदना किसका पदस्थान (निकटतम कारण) है? 'वेदना-प्रत्यया तण्हा' इस वचन के कारण, अभिलाषा के योग्य होने से यह तृष्णा का पदस्थान है। सुखद वेदना तो तृष्णा का पदस्थान हो सकती है, किन्तु अन्य कैसे? कहा जाता है—सुख से युक्त व्यक्ति भी उसी के समान या उससे भी श्रेष्ठ सुख की अभिलाषा करता है, तो फिर दुःख से युक्त व्यक्ति की तो बात ही क्या। और अदुःख-असुख वेदना भी शान्त होने के कारण 'सुख' ही कही जाती है, इसलिए तीनों ही वेदनाएँ तृष्णा का पदस्थान हैं। උප්පත්තීති උප්පත්තිකාරණං. ඉට්ඨාරම්මණභූතා හි සත්තසඞ්ඛාරා සුඛවෙදනාය උප්පත්තිකාරණං, තෙ එව අනිට්ඨාරම්මණභූතා දුක්ඛවෙදනාය, මජ්ඣත්තාරම්මණභූතා අදුක්ඛමසුඛාය. විපාකතො තදාකාරග්ගහණතො චෙත්ථ ඉට්ඨානිට්ඨතා වෙදිතබ්බා. 'उत्पत्ति' का अर्थ है उत्पत्ति का कारण। इष्ट-आरम्बन (प्रिय विषय) बने हुए सत्त्व और संस्कार सुखद वेदना की उत्पत्ति के कारण हैं, वही अनिष्ट-आरम्बन (अप्रिय विषय) होने पर दुःखद वेदना के, और मध्यस्थ-आरम्बन (तटस्थ विषय) होने पर अदुःख-असुख वेदना के कारण होते हैं। यहाँ विपाक (फल) से और उस आकार के ग्रहण करने से इष्टता और अनिष्टता समझनी चाहिए। අනුසයොති ඉමාසු තීසු වෙදනාසු සුඛාය වෙදනාය රාගානුසයො අනුසෙති, දුක්ඛාය වෙදනාය පටිඝානුසයො, අදුක්ඛමසුඛාය වෙදනාය අවිජ්ජානුසයො අනුසෙති. වුත්තඤ්හෙතං – 'अनुशय' का अर्थ है—इन तीन वेदनाओं में सुखद वेदना में राग-अनुशय अनुशयित (सुप्त) रहता है, दुःखद वेदना में प्रतिघ-अनुशय, और अदुःख-असुख वेदना में अविद्या-अनुशय अनुशयित रहता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘සුඛාය ඛො, ආවුසො විසාඛ, වෙදනාය රාගානුසයො අනුසෙතී’’තිආදි (ම. නි. 1.465). 'हे आयुष्मान् विशाख! सुखद वेदना में राग-अनुशय अनुशयित रहता है' आदि (म. नि. 1.465)। දිට්ඨිමානානුසයා චෙත්ථ රාගපක්ඛියා කාතබ්බා. සුඛාභිනන්දනෙන හි දිට්ඨිගතිකා ‘‘සස්සත’’න්තිආදිනා සක්කායෙ අභිනිවිසන්ති, මානජාතිකා ච මානං ජප්පෙන්ති ‘‘සෙය්යොහමස්මී’’තිආදිනා. විචිකිච්ඡානුසයො පන අවිජ්ජාපක්ඛිකො කාතබ්බො. තථා හි වුත්තං පටිච්චසමුප්පාදවිභඞ්ගෙ (විභ. 288-289) ‘‘වෙදනාපච්චයා විචිකිච්ඡා’’ති. අනුසයානඤ්ච තත්ථ තත්ථ සන්තානෙ අප්පහීනභාවෙන ථාමගමනං. තස්මා ‘‘සුඛාය වෙදනාය රාගානුසයො අනුසෙතී’’ති මග්ගෙන අප්පහීනත්තා අනුරූපකාරණලාභෙ උප්පජ්ජනාරහො රාගො, තත්ථ සයිතො විය හොතීති අත්ථො. එස නයො සෙසෙසුපි. यहाँ दृष्टि और मान के अनुशयों को राग के पक्ष में रखना चाहिए। सुख के अभिनन्दन से दृष्टि-सम्पन्न लोग 'शाश्वत' आदि के रूप में सत्काय (आत्म-भाव) में अभिनिवेश करते हैं, और मान-स्वभाव वाले 'मैं श्रेष्ठ हूँ' आदि के रूप में मान करते हैं। किन्तु विचिकित्सा (संदेह) अनुशय को अविद्या के पक्ष में रखना चाहिए। जैसा कि प्रतीत्यसमुत्पाद-विभंग (विभं. 288-289) में कहा गया है— 'वेदना-प्रत्यया विचिकित्सा'। और अनुशयों का उस-उस सन्तान (प्रवाह) में प्रहीण न होने के कारण शक्तिशाली हो जाना ही अनुशय है। इसलिए 'सुखद वेदना में राग-अनुशय अनुशयित रहता है' का अर्थ है कि मार्ग के द्वारा प्रहीण न होने के कारण, अनुरूप कारण मिलने पर उत्पन्न होने योग्य राग वहाँ सोया हुआ सा रहता है। यही नियम शेष में भी है। ඨානන්ති [Pg.182] කායො චිත්තඤ්ච වෙදනාය ඨානං. වුත්තඤ්හෙතං – ‘‘යං තස්මිං සමයෙ කායිකං සුඛං කායසම්ඵස්සජං සාතං සුඛං වෙදයිතං (ධ. ස. 449). යං තස්මිං සමයෙ චෙතසිකං සුඛං චෙතොසම්ඵස්සජං සාතං සුඛං වෙදයිත’’න්ති (ධ. ස. 471) ච. 'स्थान' का अर्थ है—काया और चित्त वेदना के स्थान हैं। जैसा कि कहा गया है— 'उस समय जो कायिक सुख, काय-संस्पर्श से उत्पन्न साता (सुखद) सुखद वेदित है' (ध. सं. 449)। और 'उस समय जो चैतसिक सुख, चित्त-संस्पर्श से उत्पन्न साता सुखद वेदित है' (ध. सं. 471)। පවත්තිකාලොති පවත්තික්ඛණො, පවත්තනාකලනඤ්ච. පවත්තික්ඛණෙන හි සුඛදුක්ඛවෙදනානං සුඛදුක්ඛභාවො වවත්ථිතො. යථාහ – 'प्रवृत्तिकाल' का अर्थ है—प्रवृत्ति का क्षण और प्रवृत्ति का आकलन (समझना)। प्रवृत्ति के क्षण से ही सुख-दुःख वेदनाओं का सुख-दुःख भाव व्यवस्थित होता है। जैसा कि कहा है— ‘‘සුඛා ඛො, ආවුසො විසාඛ, වෙදනා ඨිතිසුඛා විපරිණාමදුක්ඛා, දුක්ඛා ඛො, ආවුසො විසාඛ, වෙදනා ඨිතිදුක්ඛා විපරිණාමසුඛා’’ති (ම. නි. 1.465). 'हे आयुष्मान् विशाख! सुखद वेदना स्थिति (बने रहने) में सुखद है और विपरिणाम (बदलने) में दुःखद है; दुःखद वेदना स्थिति में दुःखद है और विपरिणाम में सुखद है' (म. नि. 1.465)। සුඛාය වෙදනාය අත්ථිභාවො සුඛං, නත්ථිභාවො දුක්ඛං. දුක්ඛාය වෙදනාය අත්ථිභාවො දුක්ඛං, නත්ථිභාවො සුඛන්ති අත්ථො. අදුක්ඛමසුඛාය වෙදනාය පවත්තනාකලනං පවත්තියා ආකලනං අනාකලනඤ්ච ජානනං අජානනඤ්ච සුඛදුක්ඛභාවවවත්ථානං. වුත්තම්පි චෙතං – सुखद वेदना का होना सुख है, न होना दुःख है। दुःखद वेदना का होना दुःख है, न होना सुख है—यह अर्थ है। अदुःख-असुख वेदना के लिए प्रवृत्ति का आकलन, उसकी प्रवृत्ति का जानना और न जानना ही सुख-दुःख भाव की व्यवस्था है। यह कहा भी गया है— ‘‘අදුක්ඛමසුඛා ඛො, ආවුසො විසාඛ, වෙදනා ඤාණසුඛා අඤ්ඤාණදුක්ඛා’’ති. 'हे आयुष्मान् विशाख! अदुःख-असुख वेदना ज्ञान (जानने) में सुखद है और अज्ञान (न जानने) में दुःखद है।' ඉන්ද්රියන්ති එතා හි සුඛාදයො තිස්සො වෙදනා සුඛින්ද්රියං, දුක්ඛින්ද්රියං, සොමනස්සින්ද්රියං, දොමනස්සින්ද්රියං, උපෙක්ඛින්ද්රියන්ති අධිපතෙය්යට්ඨෙන ඉන්ද්රියතො පඤ්චධා විභත්තා. කායිකඤ්හි සාතං සුඛින්ද්රියන්ති වුත්තං, අසාතං දුක්ඛින්ද්රියන්ති. මානසං පන සාතං සොමනස්සින්ද්රියන්ති වුත්තං, අසාතං දොමනස්සින්ද්රියන්ති. දුවිධම්පි නෙව සාතං නාසාතං උපෙක්ඛින්ද්රියන්ති. කිං පනෙත්ථ කාරණං – යථා කායිකචෙතසිකා සුඛදුක්ඛවෙදනා ‘‘සුඛින්ද්රියං සොමනස්සින්ද්රියං, දුක්ඛින්ද්රියං දොමනස්සින්ද්රිය’’න්ති විභජිත්වා වුත්තා, න එවං අදුක්ඛමසුඛාති? භෙදාභාවතො. යථෙව හි අනුග්ගහසභාවා බාධකසභාවා ච සුඛදුක්ඛවෙදනා අඤ්ඤථා කායස්ස අනුග්ගහං බාධකඤ්ච කරොන්ති, චිත්තස්ස ච අඤ්ඤථා, න එවං අදුක්ඛමසුඛා, තස්මා භෙදාභාවතො විභජිත්වා න වුත්තා. "इन्द्रिय" - ये सुख आदि तीन वेदनाएँ सुखेन्द्रिय, दुक्खेन्द्रिय, सोमनस्सेन्द्रिय, दोमनस्सेन्द्रिय और उपेक्खेन्द्रिय के रूप में आधिपत्य के अर्थ में इन्द्रिय के रूप में पाँच प्रकार से विभाजित हैं। शारीरिक सुख को 'सुखेन्द्रिय' कहा गया है, और शारीरिक दुःख को 'दुक्खेन्द्रिय'। मानसिक सुख को 'सोमनस्सेन्द्रिय' कहा गया है, और मानसिक दुःख को 'दोमनस्सेन्द्रिय'। दोनों प्रकार का न सुख और न दुःख 'उपेक्खेन्द्रिय' है। यहाँ क्या कारण है कि जैसे शारीरिक और मानसिक सुख-दुःख वेदनाओं को 'सुखेन्द्रिय, सोमनस्सेन्द्रिय, दुक्खेन्द्रिय, दोमनस्सेन्द्रिय' के रूप में विभाजित करके कहा गया है, वैसे 'अदुक्खमसुख' (उपेक्षा) को नहीं? भेद के अभाव के कारण। जैसे अनुग्रह (सहायता) करने के स्वभाव वाली और बाधा पहुँचाने के स्वभाव वाली सुख-दुःख वेदनाएँ शरीर और चित्त के लिए अलग-अलग अनुग्रह और बाधा पहुँचाती हैं, वैसे अदुक्खमसुख वेदना नहीं करती, इसलिए भेद के अभाव के कारण उसे विभाजित करके नहीं कहा गया है। ද්විධාදිතාති සබ්බාපි හි වෙදනා වෙදයිතට්ඨෙන එකවිධාපි නිස්සයභෙදෙන දුවිධා – කායිකා චෙතසිකාති, සුඛා, දුක්ඛා, අදුක්ඛමසුඛාති තිවිධා, චතුයොනිවසෙන [Pg.183] චතුබ්බිධා, ඉන්ද්රියවසෙන, ගතිවසෙන ච පඤ්චවිධා, ද්වාරවසෙන ච ආරම්මණවසෙන ච ඡබ්බිධා, සත්තවිඤ්ඤාණධාතුයොගෙන සත්තවිධා, අට්ඨලොකධම්මපච්චයතාය අට්ඨවිධා, සුඛාදීනං පච්චෙකං අතීතාදිවිභාගෙන නවවිධා, තා එව අජ්ඣත්තබහිද්ධාභෙදෙන අට්ඨාරසවිධා, තථා රූපාදීසු ඡසු ආරම්මණෙසු එකෙකස්මිං සුඛාදිවසෙන තිස්සො තිස්සො කත්වා. රූපාරම්මණස්මිඤ්හි සුඛාපි උප්පජ්ජති, දුක්ඛාපි, අදුක්ඛමසුඛාපි, එවං ඉතරෙසුපි. අථ වා අට්ඨාරසමනොපවිචාරවසෙන අට්ඨාරස. වුත්තඤ්හි – "द्विधादिता" (दो प्रकार आदि) - सभी वेदनाएँ अनुभव करने के अर्थ में एक प्रकार की होने पर भी, आश्रय के भेद से दो प्रकार की हैं - शारीरिक और मानसिक; सुख, दुःख और अदुक्खमसुख के भेद से तीन प्रकार की; चार योनियों के वश से चार प्रकार की; इन्द्रिय और गति के वश से पाँच प्रकार की; द्वार और आलम्बन के वश से छह प्रकार की; सात विज्ञान-धातुओं के योग से सात प्रकार की; आठ लोक-धर्मों के प्रत्यय होने से आठ प्रकार की; सुख आदि के प्रत्येक के अतीत आदि विभाग से नौ प्रकार की; वे ही आध्यात्मिक और बाह्य के भेद से अठारह प्रकार की, तथा रूपादि छह आलम्बनों में से प्रत्येक में सुख आदि के वश से तीन-तीन करके। रूप आलम्बन में सुख भी उत्पन्न होता है, दुःख भी और अदुक्खमसुख भी, इसी प्रकार अन्यों में भी। अथवा अठारह मनोपविचार के वश से अठारह। जैसा कि कहा गया है - ‘‘චක්ඛුනා රූපං දිස්වා සොමනස්සට්ඨානියං රූපං උපවිචරති, දොමනස්සට්ඨානියං, උපෙක්ඛාට්ඨානියං රූපං උපවිචරති, සොතෙන සද්දං…පෙ… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය සොමනස්සට්ඨානියං ධම්මං උපවිචරති, දොමනස්සට්ඨානියං, උපෙක්ඛාට්ඨානියං ධම්මං උපවිචරතී’’ති (අ. නි. 3.62). "चक्षु से रूप को देखकर सोमनस्य के स्थान वाले रूप का उपविचार करता है, दोमनस्य के स्थान वाले, उपेक्षा के स्थान वाले रूप का उपविचार करता है; श्रोत्र से शब्द को... मन से धर्म को जानकर सोमनस्य के स्थान वाले धर्म का उपविचार करता है, दोमनस्य के स्थान वाले, उपेक्षा के स्थान वाले धर्म का उपविचार करता है।" (अं. नि. 3.62) එවං අට්ඨාරසවිධා හොන්ති. තථා ඡ ගෙහස්සිතානි සොමනස්සානි, ඡ ගෙහස්සිතානි දොමනස්සානි, ඡ ගෙහස්සිතා උපෙක්ඛා, තථා නෙක්ඛම්මස්සිතා සොමනස්සාදයොති එවං ඡත්තිංසවිධා. අතීතෙ ඡත්තිංස, අනාගතෙ ඡත්තිංස, පච්චුප්පන්නෙ ඡත්තිංසාති අට්ඨුත්තරසතම්පි භවන්ති. එවමෙත්ථ ද්විධාදිතා වෙදිතබ්බාති. इस प्रकार अठारह प्रकार की होती हैं। उसी प्रकार छह गृहश्रित सोमनस्य, छह गृहश्रित दोमनस्य, छह गृहश्रित उपेक्षा, तथा नैष्क्रम्यश्रित सोमनस्य आदि - इस प्रकार छत्तीस प्रकार की। अतीत में छत्तीस, अनागत में छत्तीस, प्रत्युत्पन्न में छत्तीस - इस प्रकार एक सौ आठ भी होती हैं। इस प्रकार यहाँ 'दो प्रकार आदि' को जानना चाहिए। පකිණ්ණකකථා නිට්ඨිතා. प्रकीर्णक कथा समाप्त हुई। ගාථාසු සමාහිතොති උපචාරප්පනාභෙදෙන සමාධිනා සමාහිතො. තෙන සමථභාවනානුයොගං දස්සෙති. සම්පජානොති සාත්ථකසම්පජඤ්ඤාදිනා චතුබ්බිධෙන සම්පජඤ්ඤෙන සම්පජානො. තෙන විපස්සනානුයොගං දස්සෙති. සතොති සතොකාරී. තෙන සමථවිපස්සනානයෙන ධම්මා භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති. තෙන සමන්නාගතත්තං දස්සෙති. වෙදනා ච පජානාතීති ‘‘ඉමා වෙදනා, එත්තකා වෙදනා’’ති සභාවතො විභාගතො ‘‘අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා’’ති අනිච්චාදිලක්ඛණතො ච පුබ්බභාගෙ තීහි පරිඤ්ඤාහි පරිජානන්තො විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අරියමග්ගෙන පරිඤ්ඤාපටිවෙධෙන පජානාති. වෙදනානඤ්ච සම්භවන්ති සමුදයසච්චං. යත්ථ චෙතා නිරුජ්ඣන්තීති එත්තාවතා වෙදනා යත්ථ නිරුජ්ඣන්ති, තං නිරොධසච්චං. ඛයගාමිනන්ති වෙදනානං ඛයගාමිනං අරියමග්ගඤ්ච පජානාතීති සම්බන්ධො. වෙදනානං ඛයාති එවං චත්තාරි සච්චානි [Pg.184] පටිවිජ්ඣන්තෙන අරියමග්ගෙන වෙදනානං අනුප්පාදනිරොධා. නිච්ඡාතො පරිනිබ්බුතොති නිත්තණ්හො, පහීනතණ්හො, කිලෙසපරිනිබ්බානෙන, ඛන්ධපරිනිබ්බානෙන ච පරිනිබ්බුතො හොති. गाथाओं में 'समाहित' का अर्थ है - उपचार और अप्पणा के भेद से समाधि द्वारा समाहित। उससे शमथ-भावना के अभ्यास को दिखाते हैं। 'सम्प्रजान' का अर्थ है - सार्थकता-सम्प्रजन्य आदि चार प्रकार के सम्प्रजन्य से युक्त। उससे विपश्यना के अभ्यास को दिखाते हैं। 'स्मृतिमान' (सतो) का अर्थ है - स्मृति करने वाला। उससे शमथ और विपश्यना की विधि से धर्म भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं। उससे समन्वित होने को दिखाते हैं। 'वेदनाओं को जानता है' का अर्थ है - 'ये वेदनाएँ हैं, इतनी वेदनाएँ हैं' - इस प्रकार स्वभाव और विभाग से, तथा 'अनित्य, दुःख, विपरिणामधर्मा' - इस प्रकार अनित्य आदि लक्षणों से पूर्वभाग में तीन परिज्ञाओं द्वारा भली-भाँति जानते हुए, विपश्यना को बढ़ाकर आर्यमार्ग द्वारा परिज्ञा-प्रतिवेध से जानता है। 'वेदनाओं का सम्भव' अर्थात् समुदाय सत्य। 'जहाँ ये निरुद्ध होती हैं' - यहाँ तक जहाँ वेदनाएँ निरुद्ध होती हैं, वह निरोध सत्य है। 'क्षयगामी' का अर्थ है - वेदनाओं के क्षय की ओर ले जाने वाले आर्यमार्ग को भी जानता है - ऐसा सम्बन्ध है। 'वेदनाओं का क्षय' - इस प्रकार चार सत्यों का प्रतिवेध करने वाले आर्यमार्ग द्वारा वेदनाओं का अनुत्पाद-निरोध होता है। 'तृष्णारहित (निच्छातो) परिनिर्वृत' का अर्थ है - तृष्णारहित, प्रहीण-तृष्णा वाला, क्लेश-परिनिर्वाण और स्कन्ध-परिनिर्वाण द्वारा परिनिर्वृत होता है। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. දුතියවෙදනාසුත්තවණ්ණනා ४. द्वितीय वेदना सूत्र की व्याख्या। 53. චතුත්ථෙ දුක්ඛතො දට්ඨබ්බාති සුඛවෙදනා විපරිණාමදුක්ඛවසෙන දුක්ඛාති ඤාණචක්ඛුනා පස්සිතබ්බා. සල්ලතො දට්ඨබ්බාති දුන්නීහරණට්ඨෙන අන්තොතුදනට්ඨෙන පීළනට්ඨෙන දුක්ඛදුක්ඛභාවෙන දුක්ඛවෙදනා සල්ලන්ති පස්සිතබ්බා. අනිච්චතොති හුත්වා අභාවතො උදයබ්බයවන්තතො තාවකාලිකතො නිච්චපටිපක්ඛතො ච අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා අනිච්චාති පස්සිතබ්බා. කාමඤ්චෙත්ථ සබ්බාපි වෙදනා අනිච්චතො පස්සිතබ්බා, අනිච්චදස්සනතො පන සාතිසයං විරාගනිමිත්තං දුක්ඛදස්සනන්ති ඉමමත්ථං දස්සෙන්තො සත්ථා ‘‘සුඛා, භික්ඛවෙ, වෙදනා දුක්ඛතො දට්ඨබ්බා, දුක්ඛා වෙදනා සල්ලතො දට්ඨබ්බා’’ති ආහ. අථ වා යත්ථ පුථුජ්ජනා සුඛාභිනිවෙසිනො, තත්ථ නිබ්බෙදජනනත්ථං තථා වුත්තං. තෙනස්සා සඞ්ඛාරදුක්ඛතාය දුක්ඛභාවො දස්සිතො. යදනිච්චං, තං දුක්ඛන්ති විපරිණාමදුක්ඛතාය ‘‘සුඛා, භික්ඛවෙ, වෙදනා දුක්ඛතො දට්ඨබ්බා’’ති වත්වා ‘‘සුඛාපි තාව එදිසී, දුක්ඛා නු ඛො කීදිසී’’ති චින්තෙන්තානං දුක්ඛදුක්ඛතාය ‘‘දුක්ඛා වෙදනා සල්ලතො දට්ඨබ්බා’’ති ආහ, ඉතරා පන සඞ්ඛාරදුක්ඛතාය එව දුක්ඛාති දස්සෙන්තො ‘‘අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා අනිච්චතො දට්ඨබ්බා’’ති අවොච. ५३. चौथे (सूत्र) में 'दुःख के रूप में देखना चाहिए' का अर्थ है - सुख वेदना को विपरिणाम-दुःख के कारण दुःख के रूप में ज्ञान-चक्षु से देखना चाहिए। 'शल्य (काँटे) के रूप में देखना चाहिए' का अर्थ है - निकालने में कठिन होने के कारण, भीतर चुभने के कारण, पीड़ित करने के कारण और दुःख-दुःख भाव के कारण दुःख वेदना को शल्य के रूप में देखना चाहिए। 'अनित्य के रूप में' का अर्थ है - होकर न रहने के कारण, उदय-व्यय वाली होने के कारण, तात्कालिक होने के कारण और नित्य के प्रतिपक्ष होने के कारण अदुक्खमसुख वेदना को अनित्य के रूप में देखना चाहिए। यद्यपि यहाँ सभी वेदनाओं को अनित्य के रूप में देखना चाहिए, फिर भी अनित्य-दर्शन की अपेक्षा दुःख-दर्शन वैराग्य का विशेष निमित्त है - इस अर्थ को दिखाते हुए शास्ता ने कहा - "भिक्षुओं! सुख वेदना को दुःख के रूप में देखना चाहिए, दुःख वेदना को शल्य के रूप में देखना चाहिए।" अथवा जहाँ पृथग्जन सुख में अभिनिवेश (आसक्ति) रखते हैं, वहाँ निर्वेद (वैराग्य) उत्पन्न करने के लिए वैसा कहा गया है। उससे उसका संस्कार-दुःखता के कारण दुःख भाव दिखाया गया है। "जो अनित्य है, वह दुःख है" - इस प्रकार विपरिणाम-दुःखता के कारण "भिक्षुओं! सुख वेदना को दुःख के रूप में देखना चाहिए" ऐसा कहकर, "सुख ही जब ऐसा है, तो दुःख कैसा होगा" - ऐसा सोचने वालों के लिए दुःख-दुःखता के कारण "दुःख वेदना को शल्य के रूप में देखना चाहिए" ऐसा कहा, और दूसरी (उपेक्षा) को संस्कार-दुःखता के कारण ही दुःख है - यह दिखाते हुए "अदुक्खमसुख वेदना को अनित्य के रूप में देखना चाहिए" ऐसा कहा। එත්ථ ච ‘‘සුඛා වෙදනා දුක්ඛතො දට්ඨබ්බා’’ති එතෙන රාගස්ස සමුග්ඝාතනූපායො දස්සිතො. සුඛවෙදනාය හි රාගානුසයො අනුසෙති. ‘‘දුක්ඛා වෙදනා සල්ලතො දට්ඨබ්බා’’ති එතෙන දොසස්ස සමුග්ඝාතනූපායො දස්සිතො. දුක්ඛවෙදනාය හි පටිඝානුසයො අනුසෙති. ‘‘අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා අනිච්චතො දට්ඨබ්බා’’ති එතෙන මොහස්ස සමුග්ඝාතනූපායො දස්සිතො. අදුක්ඛමසුඛවෙදනාය හි අවිජ්ජානුසයො අනුසෙති. और यहाँ 'सुखद वेदना को दुःख के रूप में देखा जाना चाहिए' - इसके द्वारा राग के उन्मूलन का उपाय दिखाया गया है। क्योंकि सुखद वेदना में रागानुशय (राग का अनुशय) सुप्त रहता है। 'दुःखद वेदना को शल्य (काँटे) के रूप में देखा जाना चाहिए' - इसके द्वारा द्वेष के उन्मूलन का उपाय दिखाया गया है। क्योंकि दुःखद वेदना में प्रतिघानुशय (द्वेष का अनुशय) सुप्त रहता है। 'अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदना को अनित्य के रूप में देखा जाना चाहिए' - इसके द्वारा मोह के उन्मूलन का उपाय दिखाया गया है। क्योंकि अदुःख-असुख वेदना में अविद्यानुशय (अविद्या का अनुशय) सुप्त रहता है। තථා [Pg.185] පඨමෙන තණ්හාසංකිලෙසස්ස පහානං දස්සිතං තස්ස සුඛස්සාදහෙතුකත්තා, දුතියෙන දුච්චරිතසංකිලෙසස්ස පහානං. යථාභූතඤ්හි දුක්ඛං අපරිජානන්තා තස්ස පරිහරණත්ථං දුච්චරිතං චරන්ති. තතියෙන දිට්ඨිසංකිලෙසස්ස පහානං අනිච්චතො පස්සන්තස්ස දිට්ඨිසංකිලෙසාභාවතො අවිජ්ජානිමිත්තත්තා දිට්ඨිසංකිලෙසස්ස, අවිජ්ජානිමිත්තඤ්ච අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. පඨමෙන වා විපරිණාමදුක්ඛපරිඤ්ඤා, දුතියෙන දුක්ඛදුක්ඛපරිඤ්ඤා, තතියෙන සඞ්ඛාරදුක්ඛපරිඤ්ඤා. පඨමෙන වා ඉට්ඨාරම්මණපරිඤ්ඤා, දුතියෙන අනිට්ඨාරම්මණපරිඤ්ඤා, තතියෙන මජ්ඣත්තාරම්මණපරිඤ්ඤා. විරත්තෙසු හි තදාරම්මණධම්මෙසු ආරම්මණානිපි විරත්තානෙව හොන්තීති. පඨමෙන වා රාගප්පහානපරිකිත්තනෙන දුක්ඛානුපස්සනාය අප්පණිහිතවිමොක්ඛො දීපිතො හොති, දුතියෙන දොසප්පහානපරිකිත්තනෙන අනිච්චානුපස්සනාය අනිමිත්තවිමොක්ඛො, තතියෙන මොහප්පහානපරිකිත්තනෙන අනත්තානුපස්සනාය සුඤ්ඤතවිමොක්ඛො දීපිතො හොතීති වෙදිතබ්බං. उसी प्रकार, पहले (वाक्य) द्वारा तृष्णा-संक्लेश का प्रहाण दिखाया गया है क्योंकि वह सुख के आस्वाद के कारण होता है; दूसरे द्वारा दुश्चरित-संक्लेश का प्रहाण (दिखाया गया है)। क्योंकि दुःख को यथार्थ रूप में न जानते हुए, उसके निवारण के लिए लोग दुश्चरित करते हैं। तीसरे द्वारा दृष्टि-संक्लेश का प्रहाण (दिखाया गया है), क्योंकि अनित्य के रूप में देखने वाले के लिए दृष्टि-संक्लेश का अभाव होता है, क्योंकि दृष्टि-संक्लेश अविद्या के कारण होता है, और अविद्या का निमित्त अदुःख-असुख वेदना है। अथवा, पहले द्वारा विपरिणाम-दुःख की परिज्ञा, दूसरे द्वारा दुःख-दुःख की परिज्ञा, और तीसरे द्वारा संस्कार-दुःख की परिज्ञा (दिखाई गई है)। अथवा, पहले द्वारा इष्ट-आलम्बन की परिज्ञा, दूसरे द्वारा अनिष्ट-आलम्बन की परिज्ञा, और तीसरे द्वारा मध्यस्थ-आलम्बन की परिज्ञा (दिखाई गई है)। क्योंकि उन आलम्बन-धर्मों से विरक्त होने पर आलम्बन भी विरक्त ही हो जाते हैं। अथवा, यह समझना चाहिए कि पहले द्वारा राग-प्रहाण के कीर्तन से दुःखानुपश्यना द्वारा अप्रणिहित-विमोक्ष प्रकाशित होता है, दूसरे द्वारा द्वेष-प्रहाण के कीर्तन से अनित्यानुपश्यना द्वारा अनिमित्त-विमोक्ष, और तीसरे द्वारा मोह-प्रहाण के कीर्तन से अनत्तानुपश्यना द्वारा शून्यता-विमोक्ष प्रकाशित होता है। යතොති යදා, යස්මා වා. අරියොති කිලෙසෙහි ආරකා ඨිතො පරිසුද්ධො. සම්මද්දසොති සබ්බාසං වෙදනානං චතුන්නම්පි වා සච්චානං අවිපරීතදස්සාවී. අච්ඡෙච්ඡි තණ්හන්ති වෙදනාමූලකං තණ්හං අග්ගමග්ගෙන ඡින්දි, අනවසෙසතො සමුච්ඡින්දි. විවත්තයි සංයොජනන්ති දසවිධං සංයොජනං පරිවත්තයි, නිම්මූලමකාසි. සම්මාති හෙතුනා කාරණෙන. මානාභිසමයාති මානස්ස දස්සනාභිසමයා, පහානාභිසමයා වා. අරහත්තමග්ගො හි කිච්චවසෙන මානං පස්සති, අයමස්ස දස්සනාභිසමයො. තෙන දිට්ඨො පන සො තාවදෙව පහීයති දිට්ඨවිසෙන දිට්ඨසත්තානං ජීවිතං විය, අයමස්ස පහානාභිසමයො. අන්තමකාසි දුක්ඛස්සාති එවං අරහත්තමග්ගෙන මානස්ස දිට්ඨත්තා පහීනත්තා ච සබ්බස්සෙව වට්ටදුක්ඛස්ස කොටිසඞ්ඛාතං අන්තං පරිච්ඡෙදං පරිවටුමං අකාසි, අන්තිමසමුස්සයමත්තාවසෙසං දුක්ඛමකාසීති වුත්තං හොති. 'यतो' का अर्थ है जब, या जिससे। 'अरिओ' (आर्य) का अर्थ है क्लेशों से दूर स्थित, परिशुद्ध। 'सम्मदसो' (सम्यग्दर्शी) का अर्थ है सभी वेदनाओं का या चारों सत्यों का यथार्थ दर्शन करने वाला। 'अच्छेच्छि तण्हं' (तृष्णा को काट दिया) का अर्थ है वेदना-मूलक तृष्णा को अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) से काट दिया, पूर्णतः समूलोच्छेद कर दिया। 'विवत्तयि संयोजनं' (संयोजन को उलट दिया) का अर्थ है दस प्रकार के संयोजनों को उलट दिया, निर्मूल कर दिया। 'सम्मा' का अर्थ है हेतु से, कारण से। 'मानाभिसमया' का अर्थ है मान के दर्शन-अभिसमय से, या प्रहाण-अभिसमय से। अर्हत् मार्ग कृत्य के वश से मान को देखता है, यह इसका दर्शन-अभिसमय है। उसके द्वारा देखे जाने पर वह (मान) तुरंत ही नष्ट हो जाता है, जैसे विषैली दृष्टि वाले प्राणियों की दृष्टि से जीवन (नष्ट हो जाता है), यह इसका प्रहाण-अभिसमय है। 'अन्तमकासि दुक्खस्स' (दुःख का अंत कर दिया) का अर्थ है इस प्रकार अर्हत् मार्ग द्वारा मान के देखे जाने और प्रहीण होने से, समस्त वट्ट-दुःख (संसार-दुःख) की कोटि-संज्ञक सीमा, परिच्छेद या घेरे को समाप्त कर दिया, केवल अंतिम शरीर मात्र शेष दुःख रह गया - यह कहा गया है। ගාථාසු යොති යො අරියසාවකො. අද්දාති අද්දස, සුඛවෙදනං දුක්ඛතො පස්සීති අත්ථො. සුඛවෙදනා හි විසමිස්සං විය භොජනං පරිභොගකාලෙ අස්සාදං දදමානා විපරිණාමකාලෙ දුක්ඛායෙවාති. දුක්ඛමද්දක්ඛි සල්ලතොති යථා සල්ලං සරීරං අනුපවිසන්තම්පි පවිට්ඨම්පි උද්ධරියමානම්පි පීළමෙව ජනෙති, එවං දුක්ඛවෙදනා උප්පජ්ජමානාපි ඨිතිප්පත්තාපි භිජ්ජමානාපි විබාධතියෙවාති තං සල්ලතො විපස්සීති වුත්තං. අද්දක්ඛි [Pg.186] නං අනිච්චතොති සුඛදුක්ඛතො සන්තසභාවතාය සන්තතරජාතිකම්පි නං අදුක්ඛමසුඛං අනිච්චන්තිකතාය අනිච්චතො පස්සි. गाथाओं में 'यो' का अर्थ है जो आर्यश्रावक। 'अद्दा' का अर्थ है देखा, सुखद वेदना को दुःख के रूप में देखा - यह अर्थ है। क्योंकि सुखद वेदना विष-मिश्रित भोजन की तरह उपभोग के समय स्वाद देती हुई भी विपरिणाम (बदलने) के समय दुःख ही है। 'दुक्खमद्दक्खि सल्लतो' (दुःख को शल्य के रूप में देखा) का अर्थ है जैसे शल्य (काँटा) शरीर में प्रवेश करते समय, प्रविष्ट होने पर और निकाले जाते समय भी पीड़ा ही उत्पन्न करता है, वैसे ही दुःखद वेदना उत्पन्न होते समय, स्थित होने पर और नष्ट होते समय भी बाधा ही पहुँचाती है - इसलिए उसे 'शल्य' के रूप में विपश्यना की, यह कहा गया है। 'अद्दक्खि नं अनिच्चतो' (उसे अनित्य के रूप में देखा) का अर्थ है सुख-दुःख से शांत स्वभाव होने के कारण अधिक शांत प्रकृति वाली उस अदुःख-असुख (वेदना) को भी अनित्यता के कारण अनित्य के रूप में देखा। ස වෙ සම්මද්දසොති සො එවං තිස්සන්නං වෙදනානං සම්මදෙව දුක්ඛාදිතො දස්සාවී. යතොති යස්මා. තත්ථාති වෙදනායං. විමුච්චතීති සමුච්ඡෙදවිමුත්තිවසෙන විමුච්චති. ඉදං වුත්තං හොති – යස්මා සුඛාදීනි දුක්ඛාදිතො අද්දස, තස්මා තත්ථ වෙදනාය තප්පටිබද්ධඡන්දරාගප්පහානෙන සමුච්ඡෙදවසෙන විමුච්චති. යංසද්දෙ හි වුත්තෙ තංසද්දො ආහරිත්වා වත්තබ්බො. අථ වා යතොති කායවාචාචිත්තෙහි සංයතො යතත්තො, යතති පදහතීති වා යතො, ආයතතීති අත්ථො. අභිඤ්ඤාවොසිතොති වෙදනාමුඛෙන චතුසච්චකම්මට්ඨානං භාවෙත්වා ඡට්ඨාභිඤ්ඤාය පරියොසිතො කතකිච්චො. සන්තොති රාගාදිකිලෙසවූපසමෙන සන්තො. යොගාතිගොති කාමයොගාදිං චතුබ්බිධම්පි යොගං අතික්කන්තො. උභයහිතමුනනතො මුනීති. 'स वे सम्मदसो' का अर्थ है वह इस प्रकार तीनों वेदनाओं को दुःख आदि के रूप में सम्यक् प्रकार से देखने वाला। 'यतो' का अर्थ है जिससे। 'तत्थ' का अर्थ है उस वेदना में। 'विमुच्चति' का अर्थ है समुच्छेद-विमुक्ति के वश से मुक्त होता है। यह कहा गया है - चूँकि उसने सुख आदि को दुःख आदि के रूप में देखा, इसलिए वहाँ वेदना में उससे सम्बद्ध छन्द-राग के प्रहाण द्वारा समुच्छेद के वश से मुक्त होता है। जहाँ 'य' शब्द कहा जाता है, वहाँ 'त' शब्द लाकर कहना चाहिए। अथवा 'यतो' का अर्थ है काया, वाणी और चित्त से संयत, यतात्मा; अथवा 'यतति' (प्रयत्न करता है) इसलिए 'यतो', इसका अर्थ है उद्योग करता है। 'अभिञ्ञावोसितो' का अर्थ है वेदना के माध्यम से चतुःसत्य-कर्मस्थान की भावना करके छठी अभिज्ञा (अर्हत्त्व) द्वारा कृतकृत्य हुआ। 'सन्तो' का अर्थ है राग आदि क्लेशों के उपशम से शांत। 'योगातिगो' का अर्थ है काम-योग आदि चारों प्रकार के योगों को पार किया हुआ। दोनों (लोक-परलोक) के हित का मनन करने के कारण 'मुनि' है। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. පඨමඑසනාසුත්තවණ්ණනා ५. प्रथम एषणा सूत्र की व्याख्या 54. පඤ්චමෙ එසනාති ගවෙසනා පරියෙසනා මග්ගනා. තා විභාගතො දස්සෙතුං ‘‘කාමෙසනා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ කාමෙසනාති කාමානං එසනා, කාමසඞ්ඛාතා වා එසනා කාමෙසනා. වුත්තඤ්හෙතං – ५४. पाँचवें (सूत्र) में 'एषणा' का अर्थ है गवेषणा, पर्येषणा, खोजना। उन्हें विभागपूर्वक दिखाने के लिए 'काम-एषणा' आदि कहा गया है। वहाँ 'काम-एषणा' का अर्थ है काम की एषणा, अथवा काम-संज्ञक एषणा ही काम-एषणा है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘තත්ථ කතමා කාමෙසනා? යො කාමෙසු කාමච්ඡන්දො, කාමරාගො, කාමනන්දී, කාමස්නෙහො, කාමපිපාසා, කාමමුච්ඡා, කාමජ්ඣොසානං, අයං වුච්චති කාමෙසනා’’ති (විභ. 919). 'वहाँ काम-एषणा क्या है? जो काम (विषयों) में काम-छन्द, काम-राग, काम-नन्दी, काम-स्नेह, काम-पिपासा, काम-मूर्च्छा, काम-अध्यवसान है, इसे काम-एषणा कहा जाता है' (विभंग ९१९)। තස්මා කාමරාගො කාමෙසනාති වෙදිතබ්බො. භවෙසනායපි එසෙව නයො. වුත්තම්පි චෙතං – इसलिए काम-राग को काम-एषणा समझना चाहिए। भव-एषणा में भी यही नियम है। यह भी कहा गया है - ‘‘තත්ථ කතමා භවෙසනා? යො භවෙසු භවච්ඡන්දො…පෙ… භවජ්ඣොසානං, අයං වුච්චති භවෙසනා’’ති (විභ. 919). 'वहाँ भव-एषणा क्या है? जो भवों में भव-छन्द... पे... भव-अध्यवसान है, इसे भव-एषणा कहा जाता है' (विभंग ९१९)। තස්මා භවෙසනරාගො රූපාරූපභවපත්ථනා භවෙසනාති වෙදිතබ්බා. බ්රහ්මචරියස්ස එසනා බ්රහ්මචරියෙසනා. යථාහ – इसलिए भव-एषणा का राग, रूप और अरूप भवों की प्रार्थना ही भव-एषणा समझनी चाहिए। ब्रह्मचर्य की एषणा ब्रह्मचर्य-एषणा है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘තත්ථ [Pg.187] කතමා බ්රහ්මචරියෙසනා? සස්සතො ලොකොති වා, අසස්සතො ලොකොති වා, අන්තවා ලොකොති වා, අනන්තවා ලොකොති වා, තං ජීවං තං සරීරන්ති වා, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීරන්ති වා, හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, යා එවරූපා දිට්ඨි දිට්ඨිගතං දිට්ඨිගහනං දිට්ඨිකන්තාරො දිට්ඨිවිසූකායිකං දිට්ඨිවිප්ඵන්දිතං දිට්ඨිසඤ්ඤොජනං ගාහො පතිට්ඨාහො අභිනිවෙසො පරාමාසො කුම්මග්ගො මිච්ඡාපථො මිච්ඡත්තං තිත්ථායතනං විපරියෙසග්ගාහො, අයං වුච්චති බ්රහ්මචරියෙසනා’’ති (විභ. 919). ‘‘वहाँ ब्रह्मचर्येषणा क्या है? ‘लोक शाश्वत है’ अथवा ‘लोक अशाश्वत है’, ‘लोक अन्तवान है’ अथवा ‘लोक अनन्त है’, ‘जो जीव है वही शरीर है’ अथवा ‘जीव अन्य है और शरीर अन्य है’, ‘तथागत मृत्यु के पश्चात होते हैं’ अथवा ‘तथागत मृत्यु के पश्चात नहीं होते हैं’, ‘तथागत मृत्यु के पश्चात होते भी हैं और नहीं भी होते हैं’, ‘तथागत मृत्यु के पश्चात न होते हैं और न ही नहीं होते हैं’ - इस प्रकार की जो दृष्टि, दृष्टिगत, दृष्टि-गहन, दृष्टि-कान्तार, दृष्टि-विशूकायिक (दृष्टि का तमाशा), दृष्टि-विप्फन्दित (दृष्टि का फड़कना), दृष्टि-संयोजन, ग्राह, प्रतिष्ठा, अभिनिवेश, परामर्श, कुमार्ग, मिथ्यापथ, मिथ्यात्व, तीर्थायतन, विपर्यास-ग्राह है, इसे ‘ब्रह्मचर्येषणा’ कहा जाता है’’ (विभङ्ग. 919)। තස්මා දිට්ඨිගතසම්මතස්ස බ්රහ්මචරියස්ස එසනා දිට්ඨිබ්රහ්මචරියෙසනාති වෙදිතබ්බාති. එත්තාවතා රාගදිට්ඨියො එසනාති දස්සිතා හොන්ති. න කෙවලඤ්ච රාගදිට්ඨියොව එසනා, තදෙකට්ඨං කම්මම්පි. වුත්තම්පි චෙතං – इसलिए दृष्टिगत-सम्मत ब्रह्मचर्य की एषणा (खोज) को ‘दृष्टि-ब्रह्मचर्येषणा’ समझना चाहिए। इतने से राग और दृष्टि ‘एषणा’ हैं, यह दिखाया गया है। और न केवल राग और दृष्टि ही एषणा हैं, बल्कि उनके साथ रहने वाला (तदेकस्थ) कर्म भी (एषणा है)। यह कहा भी गया है - ‘‘තත්ථ කතමා කාමෙසනා? කාමරාගො තදෙකට්ඨං අකුසලං කායකම්මං වචීකම්මං මනොකම්මං, අයං වුච්චති කාමෙසනා. තත්ථ කතමා භවෙසනා? භවරාගො තදෙකට්ඨං අකුසලං කායකම්මං වචීකම්මං මනොකම්මං, අයං වුච්චති භවෙසනා. තත්ථ කතමා බ්රහ්මචරියෙසනා? අන්තග්ගාහිකා දිට්ඨි තදෙකට්ඨං අකුසලං කායකම්මං, වචීකම්මං, මනොකම්මං, අයං වුච්චති බ්රහ්මචරියෙසනා’’ති (විභ. 919) – ‘‘वहाँ कामैषणा क्या है? कामराग और उसके साथ रहने वाला अकुशल काय-कर्म, वची-कर्म, मन-कर्म - यह ‘कामैषणा’ कही जाती है। वहाँ भवैषणा क्या है? भवराग और उसके साथ रहने वाला अकुशल काय-कर्म, वची-कर्म, मन-कर्म - यह ‘भवैषणा’ कही जाती है। वहाँ ब्रह्मचर्येषणा क्या है? अन्तग्राहिका दृष्टि और उसके साथ रहने वाला अकुशल काय-कर्म, वची-कर्म, मन-कर्म - यह ‘ब्रह्मचर्येषणा’ कही जाती है’’ (विभङ्ग. 919) - එවමෙතා තිස්සො එසනා වෙදිතබ්බා. इस प्रकार ये तीन एषणाएँ जाननी चाहिए। ගාථාසු සම්භවන්ති එත්ථ එසනානං උප්පත්තිහෙතුභූතා අවිජ්ජාදයො තණ්හා චාති සම්භවො, සමුදයොති අත්ථො. යත්ථ චෙතා නිරුජ්ඣන්තීති බ්රහ්මචරියෙසනා පඨමමග්ගෙන නිරුජ්ඣති, කාමෙසනා අනාගාමිමග්ගෙන, භවෙසනා අරහත්තමග්ගෙන නිරුජ්ඣතීති වෙදිතබ්බං. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथाओं में ‘सम्भव’ का अर्थ है - इन एषणाओं की उत्पत्ति के हेतुभूत अविद्या आदि और तृष्णा; अर्थात् ‘समुदय’। जहाँ ये निरुद्ध होती हैं - वहाँ ब्रह्मचर्येषणा प्रथम मार्ग (स्रोतआपत्ति मार्ग) से निरुद्ध होती है, कामैषणा अनागामी मार्ग से, और भवैषणा अर्हत् मार्ग से निरुद्ध होती है - ऐसा समझना चाहिए। शेष (व्याख्या) पूर्वोक्त रीति से ही है। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सुत्त की वर्णना (व्याख्या) समाप्त हुई। 6. දුතියඑසනාසුත්තවණ්ණනා ६. द्वितीय एषणा सुत्त की वर्णना। 55. ඡට්ඨෙ [Pg.188] බ්රහ්මචරියෙසනා සහාති බ්රහ්මචරියෙසනාය සද්ධිං. විභත්තිලොපෙන හි අයං නිද්දෙසො, කරණත්ථෙ වා එතං පච්චත්තවචනං. ඉදං වුත්තං හොති ‘‘බ්රහ්මචරියෙසනාය සද්ධිං කාමෙසනා, භවෙසනාති තිස්සො එසනා’’ති. තාසු බ්රහ්මචරියෙසනං සරූපතො දස්සෙතුං ‘‘ඉතිසච්චපරාමාසො, දිට්ඨිට්ඨානා සමුස්සයා’’ති වුත්තං. තස්සත්ථො – ඉති එවං සච්චන්ති පරාමාසො ඉතිසච්චපරාමාසො. ඉදමෙව සච්චං, මොඝමඤ්ඤන්ති දිට්ඨියා පවත්තිආකාරං දස්සෙති. දිට්ඨියො එව සබ්බානත්ථහෙතුභාවතො දිට්ඨිට්ඨානා. වුත්තඤ්හෙතං – ‘‘මිච්ඡාදිට්ඨිපරමාහං, භික්ඛවෙ, වජ්ජං වදාමී’’ති (අ. නි. 1.310). තා එව ච උපරූපරි වඩ්ඪමානා ලොභාදිකිලෙසසමුස්සයෙන ච සමුස්සයා, ‘‘ඉදමෙව සච්චං, මොඝමඤ්ඤ’’න්ති මිච්ඡාභිනිවිසමානා සබ්බානත්ථහෙතුභූතා කිලෙසදුක්ඛූපචයහෙතුභූතා ච දිට්ඨියො බ්රහ්මචරියෙසනාති වුත්තං හොති. එතෙන පවත්තිආකාරතො නිබ්බත්තිතො ච බ්රහ්මචරියෙසනා දස්සිතාති වෙදිතබ්බා. ५५. छठे (सुत्त) में ‘ब्रह्मचर्येषना सहा’ का अर्थ है - ब्रह्मचर्येषणा के साथ। विभक्ति-लोप के कारण यह निर्देश है, अथवा यह करण अर्थ में प्रथमा विभक्ति है। इसका अर्थ यह है - ‘ब्रह्मचर्येषणा के साथ कामैषणा और भवैषणा - ये तीन एषणाएँ हैं’। उनमें ब्रह्मचर्येषणा को उसके स्वरूप से दिखाने के लिए ‘इतिसच्चपरामसो, दिट्ठिट्ठाना समुस्सया’ कहा गया है। उसका अर्थ है - ‘यह इस प्रकार सत्य है’ - ऐसा परामर्श (पकड़ना) ‘इति-सत्य-परामर्श’ है। ‘यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है’ - इस प्रकार यह दृष्टि की प्रवृत्ति के आकार को दर्शाता है। सभी अनर्थों का हेतु होने के कारण दृष्टियाँ ही ‘दृष्टि-स्थान’ हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘भिक्षुओं! मैं मिथ्यादृष्टि से बढ़कर अन्य कोई दोष नहीं कहता हूँ’ (अं. नि. 1.310)। और वे ही ऊपर-ऊपर बढ़ती हुई लोभ आदि क्लेशों के संचय से ‘समुच्चय’ (समूच्छ्रय) हैं; ‘यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है’ - इस प्रकार मिथ्या अभिनिवेश करने वाली, सभी अनर्थों की हेतुभूत और क्लेश-दुःख के संचय की हेतुभूत दृष्टियाँ ही ‘ब्रह्मचर्येषणा’ कही गई हैं। इससे प्रवृत्ति के आकार और उत्पत्ति के कारण से ब्रह्मचर्येषणा दिखाई गई है - ऐसा समझना चाहिए। සබ්බරාගවිරත්තස්සාති සබ්බෙහි කාමරාගභවරාගෙහි විරත්තස්ස. තතො එව තණ්හක්ඛයසඞ්ඛාතෙ නිබ්බානෙ විමුත්තත්තා තණ්හක්ඛයවිමුත්තිනො අරහතො. එසනා පටිනිස්සට්ඨාති කාමෙසනා, භවෙසනා ච සබ්බසො නිස්සට්ඨා පහීනා. දිට්ඨිට්ඨානා සමූහතාති බ්රහ්මචරියෙසනාසඞ්ඛාතා දිට්ඨිට්ඨානා ච පඨමමග්ගෙනෙව සමුග්ඝාතිතා. එසනානං ඛයාති එවමෙතාසං තිස්සන්නං එසනානං ඛයා අනුප්පාදනිරොධා භින්නකිලෙසත්තා. භික්ඛූති ච සබ්බසො ආසාභා වා. නිරාසොති ච දිට්ඨෙකට්ඨස්ස විචිකිච්ඡාකථංකථාසල්ලස්ස පහීනත්තා අකථංකථීති ච වුච්චතීති. ‘सब्बरागविरत्तस्स’ का अर्थ है - सभी कामराग और भवराग से विरक्त। उसी कारण से तृष्णा-क्षय संज्ञक निर्वाण में विमुक्त होने के कारण तृष्णा-क्षय-विमुक्त अर्हत् के लिए। ‘एषणा पटिनिस्सट्ठा’ का अर्थ है - कामैषणा और भवैषणा पूरी तरह से त्याग दी गई हैं, प्रहीण हो गई हैं। ‘दिट्ठिट्ठाना समुहता’ का अर्थ है - ब्रह्मचर्येषणा संज्ञक दृष्टि-स्थान प्रथम मार्ग से ही समूल नष्ट कर दिए गए हैं। ‘एषणानां खया’ का अर्थ है - इस प्रकार इन तीनों एषणाओं के क्षय से, अनुत्पाद-निरोध से, क्लेशों के छिन्न हो जाने के कारण। ‘भिक्खु’ का अर्थ है - सभी प्रकार से आशा का अभाव। ‘निरासो’ और ‘अकथंकथी’ का अर्थ है - दृष्टि के साथ रहने वाले विचिकित्सा (संदेह) रूपी शल्य के प्रहीण हो जाने के कारण वह ‘अकथंकथी’ (संदेह-रहित) कहा जाता है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सुत्त की वर्णना समाप्त हुई। 7-8. ආසවසුත්තද්වයවණ්ණනා ७-८. आसव सुत्त द्वय की वर्णना। 56-57. සත්තමෙ කාමාසවොති කාමෙසු ආසවො, කාමසඞ්ඛාතො වා ආසවො කාමාසවො, අත්ථතො පන කාමරාගො රූපාදිඅභිරති ච කාමාසවො. රූපාරූපභවෙසු ඡන්දරාගො ඣානනිකන්ති සස්සතදිට්ඨිසහගතො [Pg.189] රාගො භවපත්ථනා ච භවාසවො. අවිජ්ජාව අවිජ්ජාසවො. ५६-५७. सातवें (सुत्त) में ‘कामासव’ का अर्थ है - कामों में आसव, अथवा काम संज्ञक आसव ही कामासव है; अर्थतः कामराग और रूपादि में अभिरति ही कामासव है। रूप और अरूप भवों में छन्दराग, ध्यान की आसक्ति, शाश्वत-दृष्टि के साथ रहने वाला राग और भव की प्रार्थना ‘भवासव’ है। अविद्या ही ‘अविद्यासव’ है। ආසවානඤ්ච සම්භවන්ති එත්ථ අයොනිසොමනසිකාරො අවිජ්ජාදයො ච කිලෙසා ආසවානං සම්භවො. වුත්තඤ්හෙතං – आसवों का ‘सम्भव’ यहाँ अयोनिशो मनसिकार और अविद्या आदि क्लेश ही आसवों का सम्भव (उत्पत्ति स्थान) है। यह कहा भी गया है - ‘‘අයොනිසො, භික්ඛවෙ, මනසිකරොතො අනුප්පන්නා චෙව ආසවා උප්පජ්ජන්ති, උප්පන්නා ච ආසවා පවඩ්ඪන්තී’’ති (ම. නි. 1.15). ‘‘भिक्षुओं! अयोनिशो मनसिकार करने वाले के अनुत्पन्न आसव उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न आसव बढ़ते हैं’’ (म. नि. 1.15)। ‘‘අවිජ්ජා, භික්ඛවෙ, පුබ්බඞ්ගමා අකුසලානං ධම්මානං සමාපත්තියා අන්වදෙව අහිරිකං අනොත්තප්ප’’න්ති (ඉතිවු. 40) ච. ‘‘भिक्षुओं! अकुशल धर्मों की प्राप्ति में अविद्या पूर्वगामी है, और उसके पीछे-पीछे अहीरिकता (निर्लज्जता) और अनोत्तप्प (भयहीनता) आते हैं’’ (इतिवु. 40) च। මග්ගඤ්ච ඛයගාමිනන්ති ආසවානං ඛයගාමිනං අරියමග්ගඤ්ච. තත්ථ කාමාසවො අනාගාමිමග්ගෙන පහීයති, භවාසවො අවිජ්ජාසවො ච අරහත්තමග්ගෙන. කාමුපාදානං විය කාමාසවොපි අග්ගමග්ගවජ්ඣොති ච වදන්ති. සෙසං වුත්තනයමෙව. අට්ඨමෙ අපුබ්බං නත්ථි. ‘मग्गञ्च खयगामिनन्ति’ का अर्थ है - आसवों के क्षय की ओर ले जाने वाला आर्य मार्ग। वहाँ कामासव अनागामी मार्ग से प्रहीण होता है, भवासव और अविद्यासव अर्हत् मार्ग से। काम-उपादान की तरह कामासव भी अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) द्वारा त्याज्य है, ऐसा भी (कुछ आचार्य) कहते हैं। शेष पूर्वोक्त रीति से ही है। आठवें (सुत्त) में कुछ भी नया नहीं है। සත්තමඅට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें और आठवें सुत्त की वर्णना समाप्त हुई। 9. තණ්හාසුත්තවණ්ණනා ९. तण्हा (तृष्णा) सुत्त की वर्णना। 58. නවමෙ තණ්හායනට්ඨෙන තණ්හා, රූපාදිවිසයං තසතීති වා තණ්හා. ඉදානි තං විභජිත්වා දස්සෙතුං ‘‘කාමතණ්හා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ පඤ්චකාමගුණිකො රාගො කාමතණ්හා. රූපාරූපභවෙසු ඡන්දරාගො ඣානනිකන්ති සස්සතදිට්ඨිසහගතො රාගො භවවසෙන පත්ථනා ච භවතණ්හා. උච්ඡෙදදිට්ඨිසහගතො රාගො විභවතණ්හා. අපිච පච්ඡිමතණ්හාද්වයං ඨපෙත්වා සෙසා සබ්බාපි තණ්හා කාමතණ්හා එව. යථාහ – ५८. नौवें (सुत्त) में, तृष्णा करने के अर्थ में 'तृष्णा' है, अथवा रूपादि विषयों की प्यास (तसति) होने के कारण 'तृष्णा' है। अब उसे विभाजित कर दिखाने के लिए 'काम-तृष्णा' आदि कहा गया है। वहाँ पाँच काम-गुणों वाला राग 'काम-तृष्णा' है। रूप और अरूप भवों में छन्द-राग, ध्यान के प्रति आसक्ति, शाश्वत-दृष्टि के साथ रहने वाला राग और भव के वश में प्रार्थना 'भव-तृष्णा' है। उच्छेद-दृष्टि के साथ रहने वाला राग 'विभव-तृष्णा' है। इसके अतिरिक्त, पिछली दो तृष्णाओं को छोड़कर शेष सभी तृष्णाएँ 'काम-तृष्णा' ही हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘තත්ථ කතමා භවතණ්හා? සස්සතදිට්ඨිසහගතො රාගො සාරාගො චිත්තස්ස සාරාගො – අයං වුච්චති භවතණ්හා. තත්ථ කතමා විභවතණ්හා? උච්ඡෙදදිට්ඨිසහගතො රාගො සාරාගො චිත්තස්ස සාරාගො, අයං වුච්චති විභවතණ්හා. අවසෙසා තණ්හා කාමතණ්හා’’ති (විභ. 916). ''वहाँ भव-तृष्णा कौन सी है? शाश्वत-दृष्टि के साथ रहने वाला राग, साराग, चित्त का साराग - यह भव-तृष्णा कही जाती है। वहाँ विभव-तृष्णा कौन सी है? उच्छेद-दृष्टि के साथ रहने वाला राग, साराग, चित्त का साराग, यह विभव-तृष्णा कही जाती है। शेष तृष्णा काम-तृष्णा है'' (विभङ्ग ९१६)। ඉමා [Pg.190] ච තිස්සො තණ්හා රූපතණ්හා…පෙ… ධම්මතණ්හාති විසයභෙදතො පච්චෙකං ඡබ්බිධාති කත්වා අට්ඨාරස හොන්ති. තා අජ්ඣත්තරූපාදීසු අට්ඨාරස, බහිද්ධාරූපාදීසු අට්ඨාරසාති ඡත්තිංස, ඉති අතීතා ඡත්තිංස, අනාගතා ඡත්තිංස, පච්චුප්පන්නා ඡත්තිංසාති විභාගතො අට්ඨසතං හොන්ති. පුන සඞ්ගහෙ කරියමානෙ කාලභෙදං අනාමසිත්වා ගය්හමානා ඡත්තිංසෙව හොන්ති, රූපාදීනං අජ්ඣත්තිකබාහිරවිභාගෙ අකරියමානෙ අට්ඨාරසෙව, රූපාදිආරම්මණවිභාගමත්තෙ ගය්හමානෙ ඡළෙව, ආරම්මණවිභාගම්පි අකත්වා ගය්හමානා තිස්සොයෙව හොන්තීති. ये तीन तृष्णाएँ रूप-तृष्णा...पे... धम्म-तृष्णा, इस प्रकार विषय-भेद से प्रत्येक छह प्रकार की होकर अठारह होती हैं। वे आध्यात्मिक (आन्तरिक) रूपादि में अठारह और बाह्य रूपादि में अठारह होकर छत्तीस होती हैं। इस प्रकार अतीत की छत्तीस, अनागत की छत्तीस और वर्तमान की छत्तीस, इस विभाजन से एक सौ आठ (१०८) होती हैं। पुनः संग्रह करने पर, काल-भेद का विचार न करते हुए छत्तीस ही होती हैं; रूपादि के आध्यात्मिक और बाह्य विभाग न करने पर अठारह ही; केवल रूपादि आलम्बन के विभाग से ग्रहण करने पर छह ही; और आलम्बन का विभाग भी न करके ग्रहण करने पर तीन ही होती हैं। ගාථාසු තණ්හායොගෙනාති තණ්හාසඞ්ඛාතෙන යොගෙන, කාමයොගෙන, භවයොගෙන ච. සංයුත්තාති සම්බන්ධා, භවාදීසු සංයොජිතා වා. තෙනෙවාහ ‘‘රත්තචිත්තා භවාභවෙ’’ති. ඛුද්දකෙ චෙව මහන්තෙ ච භවෙ ලග්ගචිත්තාති අත්ථො. අථ වා භවොති සස්සතදිට්ඨි, අභවොති උච්ඡෙදදිට්ඨි. තස්මා භවාභවෙ සස්සතුච්ඡෙදදිට්ඨීසු සත්තවිසත්තචිත්තාති. එතෙන භවතණ්හා, විභවතණ්හා ච දස්සිතා. ඉමස්මිං පක්ඛෙ ‘‘තණ්හායොගෙනා’’ති ඉමිනා කාමතණ්හාව දස්සිතාති වෙදිතබ්බා. තෙ යොගයුත්තා මාරස්සාති තෙ එවංභූතා පුග්ගලා මාරස්ස පාසසඞ්ඛාතෙන යොගෙන යුත්තා බද්ධා. රාගො හි මාරයොගො මාරපාසොති වුච්චති. යථාහ – गाथाओं में 'तण्हायोगेन' (तृष्णा-योग से) का अर्थ है तृष्णा नामक योग से, काम-योग से और भव-योग से। 'संयुत्ता' का अर्थ है सम्बद्ध, अथवा भवादि में संयोजित। इसीलिए कहा गया है - 'रत्तचित्ता भवाभवे' (भव और अभाव में आसक्त चित्त वाले)। छोटे और बड़े भवों में आसक्त चित्त वाले, यह अर्थ है। अथवा 'भव' का अर्थ शाश्वत-दृष्टि है और 'अभव' का अर्थ उच्छेद-दृष्टि है। इसलिए 'भवाभवे' का अर्थ शाश्वत और उच्छेद दृष्टियों में अत्यन्त आसक्त चित्त वाले है। इससे भव-तृष्णा और विभव-तृष्णा दिखाई गई है। इस पक्ष में 'तण्हायोगेन' इससे काम-तृष्णा ही दिखाई गई है, ऐसा समझना चाहिए। वे 'योगयुत्ता मारस्स' (मार के योग से युक्त) का अर्थ है कि वे इस प्रकार के पुद्गल मार के पाश रूपी योग से युक्त (बँधे हुए) हैं। क्योंकि राग को ही मार-योग या मार-पाश कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘අන්තලික්ඛචරො පාසො, ය්වායං චරති මානසො; තෙන තං බාධයිස්සාමි, න මෙ සමණ මොක්ඛසී’’ති. (සං. නි. 1.151; මහාව. 33); ''अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला पाश, जो यह मन में विचरण करता है; उससे मैं तुझे बाँधूँगा, हे श्रमण! तू मुझसे मुक्त नहीं होगा।'' (सं. नि. १.१५१; महाव. ३३); චතූහි යොගෙහි අනුපද්දුතත්තා යොගක්ඛෙමං, නිබ්බානං අරහත්තඤ්ච, තස්ස අනධිගමෙන අයොගක්ඛෙමිනො. උපරූපරි කිලෙසාභිසඞ්ඛාරානං ජනනතො ජනා, පාණිනො. රූපාදීසු සත්තා විසත්තාති සත්තා. चार योगों से उपद्रव-रहित होने के कारण 'योगक्षेम' निर्वाण और अर्हत्त्व है, उसकी प्राप्ति न होने से 'अयोगक्षेमी' हैं। ऊपर-ऊपर क्लेशों और अभिसंस्कारों को उत्पन्न करने के कारण 'जना' (जन/प्राणी) हैं। रूपादि में आसक्त (विसत्ता) होने के कारण 'सत्ता' (सत्त्व) हैं। ‘‘ඛන්ධානඤ්ච පටිපාටි, ධාතුආයතනාන ච; අබ්බොච්ඡින්නං වත්තමානා, සංසාරොති පවුච්චතී’’ති. – ''स्कन्धों, धातुओं और आयतनों की अविच्छिन्न रूप से चलने वाली परम्परा ही 'संसार' कही जाती है।'' - එවං වුත්තං ඛන්ධාදීනං අපරාපරුප්පත්තිසඞ්ඛාතං සංසාරං ගච්ඡන්ති, තතො න මුච්චන්ති. කස්මා? තණ්හායොගයුත්තත්තා. ජාතිමරණගාමිනො පුනප්පුනං ජනනමරණස්සෙව උපගමනසීලාති. එත්තාවතා වට්ටං දස්සෙත්වා ඉදානි විවට්ටං දස්සෙතුං [Pg.191] ‘‘යෙ ච තණ්හං පහන්ත්වානා’’ති ගාථමාහ. සා හෙට්ඨා වුත්තනයත්තා සුවිඤ්ඤෙය්යාව. इस प्रकार कहे गए स्कन्धादि की बार-बार उत्पत्ति रूप संसार में वे जाते हैं, उससे मुक्त नहीं होते। किसलिए? तृष्णा-योग से युक्त होने के कारण। 'जातिमरणगामिनो' का अर्थ है बार-बार जन्म और मरण को ही प्राप्त होने के स्वभाव वाले। इतने से 'वट्ट' (संसार-चक्र) को दिखाकर अब 'विवट्ट' (निर्वाण) को दिखाने के लिए ''ये च तण्हं पहन्त्वान'' (जो तृष्णा को छोड़कर) गाथा कही। वह पहले कहे गए तरीके से ही सुविज्ञेय (समझने में सरल) है। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सुत्त की व्याख्या समाप्त। 10. මාරධෙය්යසුත්තවණ්ණනා १०. मारधेय-सुत्त की व्याख्या 59. දසමස්ස කා උප්පත්ති? එකදිවසං කිර සත්ථා සෙක්ඛබහුලාය පරිසාය පරිවුතො නිසින්නො තෙසං අජ්ඣාසයං ඔලොකෙත්වා උපරි විසෙසාධිගමාය උස්සාහං ජනෙතුං අසෙක්ඛභූමිං ථොමෙන්තො ඉදං සුත්තං අභාසි. තත්ථ අතික්කම්මාතිආදීසු අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – අතික්කම්ම අතික්කමිත්වා අභිභවිත්වා. මාරධෙය්යං මාරස්ස විසයං ඉස්සරියට්ඨානං. ආදිච්චොව යථා ආදිච්චො අබ්භාදිඋපක්කිලෙසවිමුත්තො අත්තනො ඉද්ධියා ආනුභාවෙන තෙජසාති තීහි ගුණෙහි සමන්නාගතො නභං අබ්භුස්සක්කමානො සබ්බං ආකාසගතං තමං අතික්කම්ම අතික්කමිත්වා අභිභවිත්වා විධමිත්වා විරොචති, ඔභාසති, තපති; එවමෙව ඛීණාසවො භික්ඛු තීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො සබ්බුපක්කිලෙසවිමුත්තො මාරධෙය්යසඞ්ඛාතං තෙභූමකධම්මප්පවත්තං අභිභවිත්වා විරොචතීති. ५९. दसवें (सुत्त) की उत्पत्ति क्या है? कहा जाता है कि एक दिन शास्ता (बुद्ध) बहुत से शैक्षों (शिक्षार्थियों) की परिषद् से घिरे हुए बैठे थे, उनके आशय को देखकर ऊपर के विशेष अधिगम (अर्हत्त्व) के लिए उत्साह जगाने हेतु अशैक्ष-भूमि की प्रशंसा करते हुए यह सुत्त कहा। वहाँ 'अतिक्कम्म' आदि में यह संक्षिप्त अर्थ है - 'अतिक्कम्म' का अर्थ है अतिक्रमण करके, अभिभूत करके। 'मारधेय्य' का अर्थ है मार का विषय, ऐश्वर्य का स्थान। जैसे सूर्य बादलों आदि उपक्लेशों से मुक्त होकर अपनी ऋद्धि, अनुभाव और तेज - इन तीन गुणों से युक्त होकर आकाश में ऊपर चढ़ते हुए समस्त आकाशगत अन्धकार का अतिक्रमण करके, उसे अभिभूत करके और नष्ट करके विरोचित होता है, प्रकाशित होता है, तपता है; वैसे ही क्षीणास्रव भिक्षु तीन (अशैक्ष) धर्मों से युक्त होकर, सभी उपक्लेशों से मुक्त होकर, मारधेय संज्ञक त्रिभूमिक धर्म-प्रवृत्ति को अभिभूत करके विरोचित होता है। අසෙක්ඛෙනාති එත්ථ සික්ඛාසු ජාතාති සෙක්ඛා, සත්තන්නං සෙක්ඛානං එතෙති වා සෙක්ඛා, අපරියොසිතසික්ඛත්තා සයමෙව සික්ඛන්තීති වා සෙක්ඛා මග්ගධම්මා හෙට්ඨිමඵලත්තයධම්මා ච. අග්ගඵලධම්මා පන උපරි සික්ඛිතබ්බාභාවෙන න සෙක්ඛාති අසෙක්ඛා. යත්ථ හි සෙක්ඛභාවාසඞ්කා අත්ථි, තත්ථායං පටිසෙධොති ලොකියධම්මෙසු නිබ්බානෙ ච අසෙක්ඛභාවානාපත්ති දට්ඨබ්බා. සීලසමාධිපඤ්ඤාසඞ්ඛාතා හි සික්ඛා අත්තනො පටිපක්ඛකිලෙසෙහි විප්පයුත්තා පරිසුද්ධා උපක්කිලෙසානං ආරම්මණභාවම්පි අනුපගමනතො සාතිසයං සික්ඛාති වත්තුං යුත්තා, අට්ඨසුපි මග්ගඵලෙසු විජ්ජන්ති; තස්මා චතුමග්ගහෙට්ඨිමඵලත්තයධම්මා විය අරහත්තඵලධම්මාපි ‘‘තාසු සික්ඛාසු ජාතා’’ති ච, තංසික්ඛාසමඞ්ගිනො අරහතො ඉතරෙසං විය සෙක්ඛත්තෙ සති ‘‘සෙක්ඛස්ස එතෙ’’ති ච ‘‘සික්ඛා සීලං එතෙස’’න්ති ච සෙක්ඛාති ආසඞ්කා සියුන්ති තදාසඞ්කානිවත්තනත්ථං අසෙක්ඛාති යථාවුත්තසෙක්ඛභාවප්පටිසෙධං කත්වා වුත්තං. අරහත්තඵලෙ පවත්තමානා හි සික්ඛා පරිනිට්ඨිතකිච්චත්තා [Pg.192] න සික්ඛාකිච්චං කරොන්ති, කෙවලං සික්ඛාඵලභාවෙන පවත්තන්ති. තස්මා තා න සික්ඛාවචනං අරහන්ති, නාපි තංසමඞ්ගිනො සෙක්ඛවචනං, න ච තංසම්පයුත්තධම්මා සික්ඛනසීලා. ‘‘සික්ඛාසු ජාතා’’ති එවමාදිඅත්ථෙහි අග්ගඵලධම්මා සෙක්ඛා න හොන්ති. හෙට්ඨිමඵලෙසු පන සික්ඛා සකදාගාමිමග්ගවිපස්සනාදීනං උපනිස්සයභාවතො සික්ඛාකිච්චං කරොන්තීති සික්ඛාවචනං අරහන්ති, තංසමඞ්ගිනො ච සෙක්ඛවචනං, තංසම්පයුත්තා ධම්මා ච සික්ඛනසීලා. සෙක්ඛධම්මා යථාවුත්තෙහි අත්ථෙහි සෙක්ඛා හොන්තියෙව. असेक्खेन (अशैक्ष्य) - यहाँ शिक्षाओं में उत्पन्न होने के कारण 'सेक्ख' (शैक्ष्य) कहलाते हैं, अथवा सात प्रकार के शैक्षों के ये धर्म हैं इसलिए 'सेक्ख' हैं, अथवा शिक्षा पूरी न होने के कारण स्वयं ही शिक्षा ग्रहण करते हैं इसलिए मार्ग-धर्म और नीचे के तीन फल-धर्म 'सेक्ख' हैं। परन्तु अग्रफल (अर्हत्त्व फल) के धर्मों में ऊपर और अधिक सीखने योग्य कुछ न होने के कारण वे 'सेक्ख' नहीं हैं, बल्कि 'असेक्ख' हैं। जहाँ 'सेक्ख' होने की आशंका हो, वहाँ यह निषेध है; लौकिक धर्मों और निर्वाण में 'असेक्ख' भाव की प्राप्ति नहीं देखनी चाहिए। शील, समाधि और प्रज्ञा रूपी शिक्षाएँ अपने प्रतिपक्ष क्लेशों से विप्रयुक्त (मुक्त), परिशुद्ध और उपक्लेशों के आलम्बन न होने के कारण 'अतिशय शिक्षा' कही जाने योग्य हैं, और वे आठों मार्ग-फलों में विद्यमान हैं; इसलिए चार मार्ग और नीचे के तीन फल-धर्मों के समान अर्हत्त्व फल के धर्म भी 'उन शिक्षाओं में उत्पन्न' होने के कारण, और उन शिक्षाओं से युक्त अर्हत् के भी दूसरों के समान 'सेक्ख' होने पर 'ये सेक्ख के हैं' और 'इनकी शिक्षा शील है' ऐसी 'सेक्ख' होने की आशंका हो सकती है, अतः उस आशंका को दूर करने के लिए 'असेक्ख' कहकर पूर्वोक्त 'सेक्ख' भाव का निषेध किया गया है। अर्हत्त्व फल में प्रवर्तमान शिक्षाएँ कृतकृत्य (कार्य पूर्ण) होने के कारण शिक्षा का कार्य नहीं करतीं, केवल शिक्षा के फल रूप में प्रवर्तमान होती हैं। इसलिए वे 'शिक्षा' शब्द के योग्य नहीं हैं, न ही उससे युक्त व्यक्ति 'सेक्ख' शब्द के योग्य है, और न ही उससे सम्प्रयुक्त धर्म 'शिक्षणशील' हैं। 'शिक्षाओं में उत्पन्न' इत्यादि अर्थों से अग्रफल के धर्म 'सेक्ख' नहीं होते। परन्तु नीचे के फलों में शिक्षाएँ सकदागामी मार्ग की विपश्यना आदि के उपनिश्रय (आधार) होने के कारण शिक्षा का कार्य करती हैं, इसलिए वे 'शिक्षा' शब्द के योग्य हैं, और उससे युक्त व्यक्ति 'सेक्ख' शब्द के, तथा उससे सम्प्रयुक्त धर्म 'शिक्षणशील' हैं। सेक्ख धर्म पूर्वोक्त अर्थों से 'सेक्ख' ही होते हैं। අථ වා සෙක්ඛාති අපරියොසිතසික්ඛානං වචනන්ති, අසෙක්ඛාති පදං පරියොසිතසික්ඛානං දස්සනන්ති න ලොකියධම්මනිබ්බානානං අසෙක්ඛභාවාපත්ති. වුඩ්ඪිප්පත්තා සෙක්ඛා අසෙක්ඛා ච සෙක්ඛධම්මෙසු එව කෙසඤ්චි වුඩ්ඪිප්පත්තානං අසෙක්ඛතා ආපජ්ජතීති අරහත්තමග්ගධම්මා වුඩ්ඪිප්පත්තා. යථාවුත්තෙහි ච අත්ථෙහි සෙක්ඛාති කත්වා අසෙක්ඛා ආපන්නාති චෙ? තං න, සදිසෙසු තබ්බොහාරතො. අරහත්තමග්ගතො හි නින්නානාකරණං අරහත්තඵලං ඨපෙත්වා පරිඤ්ඤාදිකිච්චකරණං විපාකභාවඤ්ච, තස්මා තෙ එව සෙක්ඛා ධම්මා අරහත්තඵලභාවං ආපන්නාති සක්කා වත්තුං. කුසලසුඛතො ච විපාකසුඛං සන්තතරතාය පණීතතරන්ති වුඩ්ඪිප්පත්තාව තෙ ධම්මා හොන්තීති ‘‘අසෙක්ඛා’’ති වුච්චන්ති. अथवा 'सेक्ख' अपूर्ण शिक्षा वालों का वाचक है, और 'असेक्ख' पद पूर्ण शिक्षा वालों का प्रदर्शन है, न कि लौकिक धर्मों और निर्वाण की 'असेक्ख' भाव की प्राप्ति। वृद्धि को प्राप्त 'सेक्ख' और 'असेक्ख' में, कुछ वृद्धि को प्राप्त धर्मों में ही 'असेक्ख' भाव घटित होता है, इसलिए अर्हत्त्व मार्ग के धर्म वृद्धि को प्राप्त हैं। यदि कहा जाए कि पूर्वोक्त अर्थों के अनुसार 'सेक्ख' होने के कारण वे 'असेक्ख' हो गए हैं? तो ऐसा नहीं है, क्योंकि सदृश होने पर वैसा व्यवहार होता है। अर्हत्त्व मार्ग से अर्हत्त्व फल में परिज्ञा आदि कार्यों को करने और विपाक भाव के होने के अतिरिक्त कोई अन्तर नहीं है, इसलिए उन 'सेक्ख' धर्मों को ही अर्हत्त्व फल भाव को प्राप्त कहा जा सकता है। और कुशल सुख की अपेक्षा विपाक सुख के अधिक शान्त होने के कारण वे धर्म प्रणीततर (श्रेष्ठतर) होते हैं, इसलिए वे 'असेक्ख' कहे जाते हैं। තෙ පන අසෙක්ඛධම්මෙ ඛන්ධවසෙන ඉධ තිධා විභජිත්වා තෙහි සමන්නාගමෙන ඛීණාසවස්ස ආනුභාවං විභාවෙන්තො භගවා ‘‘අසෙක්ඛෙන සීලක්ඛන්ධෙනා’’තිආදිමාහ. තත්ථ සීලසද්දස්ස අත්ථො හෙට්ඨා වුත්තො. ඛන්ධසද්දො පන රාසිම්හි පඤ්ඤත්තියං රුළ්හියං ගුණෙති බහූසු අත්ථෙසු දිට්ඨප්පයොගො. තථා හි ‘‘අසඞ්ඛෙය්යො අප්පමෙය්යො මහාඋදකක්ඛන්ධොත්වෙව සඞ්ඛ්යං ගච්ඡතී’’තිආදීසු (අ. නි. 4.51; 6.37) රාසිම්හි ආගතො. ‘‘අද්දසා ඛො භගවා මහන්තං දාරුක්ඛන්ධං ගඞ්ගාය නදියා සොතෙන වුය්හමාන’’න්තිආදීසු (සං. නි. 4.241) පඤ්ඤත්තියං. ‘‘චිත්තං මනො මානසං හදයං පණ්ඩරං මනො මනායතනං විඤ්ඤාණං විඤ්ඤාණක්ඛන්ධො’’තිආදීසු (ධ. ස. 63, 65) රුළ්හියං. ‘‘න ඛො, ආවුසො විසාඛ, අරියෙන අට්ඨඞ්ගිකෙන මග්ගෙන තයො ඛන්ධා සඞ්ගහිතා, තීහි ච ඛො, ආවුසො [Pg.193] විසාඛ, ඛන්ධෙහි අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො සඞ්ගහිතො’’තිආදීසු (ම. නි. 1.462) ගුණෙ. ඉධාපි ගුණෙයෙව දට්ඨබ්බො. තස්මා අසෙක්ඛෙන සීලසඞ්ඛාතෙන ගුණෙනාති අත්ථො. සමන්නාගතොති සම්පයුත්තො සමඞ්ගීභූතො. සමාදහති එතෙන, සයං වා සමාදහති, සමාධානමෙව වාති සමාධි. පකාරෙහි ජානාති යථාසභාවං පටිවිජ්ඣතීති පඤ්ඤා. සීලමෙව ඛන්ධො සීලක්ඛන්ධො. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. उन असेक्ख धर्मों को यहाँ स्कन्ध के वश से तीन प्रकार से विभाजित कर, उनसे युक्त क्षीणास्त्रव (अर्हत्) के अनुभाव को विभक्त करते हुए भगवान ने 'असेक्खेन सीलक्खन्धेन' (असेक्ख शीलस्कन्ध से) इत्यादि कहा। वहाँ 'शील' शब्द का अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'स्कन्ध' शब्द राशि (ढेर), प्रज्ञप्ति (संज्ञा), रूढ़ि और गुण जैसे अनेक अर्थों में प्रयुक्त देखा जाता है। जैसे 'असंख्येय, अप्रमेय महा-उदक-स्कन्ध (जलराशि) की संख्या को प्राप्त होता है' इत्यादि में 'राशि' के अर्थ में आया है। 'भगवान ने गंगा नदी के स्रोत में बहते हुए एक महान दारु-स्कन्ध (लकड़ी के लट्ठे) को देखा' इत्यादि में 'प्रज्ञप्ति' (संज्ञा) के अर्थ में। 'चित्त, मन, मानस, हृदय, पण्डर, मन, मनायतन, विज्ञान, विज्ञान-स्कन्ध' इत्यादि में 'रूढ़ि' के अर्थ में। 'हे आयुष्मान विशाख, आर्य अष्टांगिक मार्ग में तीन स्कन्ध संगृहीत नहीं हैं, बल्कि तीन स्कन्धों में आर्य अष्टांगिक मार्ग संगृहीत है' इत्यादि में 'गुण' के अर्थ में। यहाँ भी इसे 'गुण' के अर्थ में ही देखना चाहिए। इसलिए 'असेक्ख शील नामक गुण से' यह अर्थ है। 'समन्नागतो' का अर्थ है सम्प्रयुक्त या युक्त होना। जिससे समाहित होता है, या स्वयं समाहित होता है, अथवा समाहित होना ही 'समाधि' है। अनेक प्रकार से जानता है, यथास्वभाव साक्षात्कार करता है, वह 'प्रज्ञा' है। शील ही स्कन्ध है, वह 'शीलस्कन्ध' है। शेष में भी यही विधि है। තත්ථ අග්ගඵලභූතා සම්මාවාචා, සම්මාකම්මන්තො, සම්මාආජීවො ච සභාවෙනෙව අසෙක්ඛො සීලක්ඛන්ධො නාම, තථා සම්මාසමාධි අසෙක්ඛො සමාධික්ඛන්ධො. තදුපකාරකතො පන සම්මාවායාමසම්මාසතියො සමාධික්ඛන්ධෙ සඞ්ගහං ගච්ඡන්ති. තථා සම්මාදිට්ඨි අසෙක්ඛො පඤ්ඤාක්ඛන්ධො. තදුපකාරකතො සම්මාසඞ්කප්පො පඤ්ඤාක්ඛන්ධෙ සඞ්ගහං ගච්ඡතීති එවමෙත්ථ අට්ඨපි අරහත්තඵලධම්මා තීහි ඛන්ධෙහි සඞ්ගහෙත්වා දස්සිතාති වෙදිතබ්බං. वहाँ अग्रफल (अर्हत्त्व फल) स्वरूप सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त और सम्यक् आजीव स्वभाव से ही 'असेक्ख शीलस्कन्ध' कहलाते हैं; वैसे ही सम्यक् समाधि 'असेक्ख समाधिस्कन्ध' है। उसके उपकारक होने के कारण सम्यक् व्यायाम और सम्यक् स्मृति 'समाधिस्कन्ध' में संगृहीत होते हैं। वैसे ही सम्यक् दृष्टि 'असेक्ख प्रज्ञास्कन्ध' है। उसके उपकारक होने के कारण सम्यक् संकल्प 'प्रज्ञास्कन्ध' में संगृहीत होता है—इस प्रकार यहाँ आठों अर्हत्त्व फल के धर्मों को तीन स्कन्धों में संगृहीत करके दिखाया गया है, ऐसा जानना चाहिए। යස්ස එතෙ සුභාවිතාති යෙන අරහතා එතෙ සීලාදයො අසෙක්ඛධම්මක්ඛන්ධා සුභාවිතා සුට්ඨු වඩ්ඪිතා, සො ආදිච්චොව විරොචතීති සම්බන්ධො. ‘‘යස්ස චෙතෙ’’තිපි පඨන්ති. තෙසඤ්ච සද්දො නිපාතමත්තං. එවමෙතස්මිං වග්ගෙ පඨමසුත්තෙ වට්ටං, පරියොසානසුත්තෙ විවට්ටං, ඉතරෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතං. 'यस्स एते सुभाविता' अर्थात् जिस अर्हत् के द्वारा ये शील आदि असेक्ख धर्म-स्कन्ध भली-भाँति भावित (विकसित) किए गए हैं, 'वह सूर्य के समान सुशोभित होता है' यह सम्बन्ध है। 'यस्स चेते' ऐसा भी पाठ मिलता है। उनमें 'च' शब्द केवल निपात है। इस प्रकार इस वर्ग के प्रथम सूत्र में 'वट्ट' (संसार चक्र), अन्तिम सूत्र में 'विवट्ट' (निर्वाण), और शेष सूत्रों में 'वट्ट-विवट्ट' का वर्णन किया गया है। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। පඨමවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। 2. දුතියවග්ගො २. द्वितीय वर्ग। 1. පුඤ්ඤකිරියවත්ථුසුත්තවණ්ණනා १. पुण्यक्रियावस्तु सूत्र की व्याख्या। 60. දුතියවග්ගස්ස පඨමෙ පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනීති පුජ්ජභවඵලං නිබ්බත්තෙන්ති, අත්තනො සන්තානං පුනන්තීති වා පුඤ්ඤානි, පුඤ්ඤානි ච තානි හෙතුපච්චයෙහි කත්තබ්බතො කිරියා චාති පුඤ්ඤකිරියා. තා එව ච තෙසං තෙසං ආනිසංසානං [Pg.194] වත්ථුභාවතො පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි. දානමයන්ති අනුපච්ඡින්නභවමූලස්ස අනුග්ගහවසෙන පූජාවසෙන වා අත්තනො දෙය්යධම්මස්ස පරෙසං පරිච්චාගචෙතනා දීයති එතායාති දානං, දානමෙව දානමයං. චීවරාදීසු හි චතූසු පච්චයෙසු අන්නාදීසු වා දසසු දානවත්ථූසු රූපාදීසු වා ඡසු ආරම්මණෙසු තං තං දෙන්තස්ස තෙසං උප්පාදනතො පට්ඨාය පුබ්බභාගෙ පරිච්චාගකාලෙ පච්ඡා සොමනස්සචිත්තෙන අනුස්සරණෙ චාති තීසු කාලෙසු වුත්තනයෙන පවත්තචෙතනා දානමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු නාම. ६०. द्वितीय वर्ग के प्रथम (सूत्र) में 'पुण्यक्रियावस्तु' का अर्थ है - जो पूजनीय फल उत्पन्न करते हैं, अथवा जो अपनी संतान (चित्त-संतति) को पवित्र करते हैं, वे 'पुण्य' हैं; और वे पुण्य हेतु-प्रत्ययों द्वारा किए जाने के कारण 'क्रिया' हैं, इसलिए 'पुण्यक्रिया' कहलाते हैं। वे ही उन-उन लाभों (आनृशंसों) के आधार होने के कारण 'पुण्यक्रियावस्तु' हैं। 'दानमय' का अर्थ है - संसार के मूल को न काटने वाले (सांसारिक) व्यक्ति के लिए अनुग्रह के वश से या पूजा के वश से अपनी देय वस्तु का दूसरों के लिए त्याग करने की चेतना; जिसके द्वारा दिया जाता है वह 'दान' है, दान ही 'दानमय' है। चीवर आदि चार प्रत्ययों में, या अन्न आदि दस दान-वस्तुओं में, या रूप आदि छह आलम्बनों में, उन-उन वस्तुओं को देते समय, उनके उत्पादन से लेकर पूर्व भाग में, त्याग के समय और बाद में सौमनस्य चित्त से अनुस्मरण करने के समय - इन तीनों कालों में उक्त विधि से प्रवृत्त चेतना 'दानमय पुण्यक्रियावस्तु' कहलाती है। සීලමයන්ති නිච්චසීලඋපොසථනියමාදිවසෙන පඤ්ච, අට්ඨ, දස වා සීලානි සමාදියන්තස්ස සීලපූරණත්ථං පබ්බජිස්සාමීති විහාරං ගච්ඡන්තස්ස පබ්බජන්තස්ස මනොරථං මත්ථකං පාපෙත්වා ‘‘පබ්බජිතො වතම්හි සාධු සුට්ඨූ’’ති ආවජ්ජෙන්තස්ස සද්ධාය පාතිමොක්ඛං පරිපූරෙන්තස්ස පඤ්ඤාය චීවරාදිකෙ පච්චවෙක්ඛන්තස්ස සතියා ආපාථගතෙසු රූපාදීසු චක්ඛුද්වාරාදීනි සංවරන්තස්ස වීරියෙන ආජීවං සොධෙන්තස්ස ච පවත්තා චෙතනා සීලතීති සීලමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු නාම. 'शीलमय' का अर्थ है - नित्यशील, उपोसथ नियम आदि के वश से पाँच, आठ या दस शीलों को ग्रहण करने वाले की, शील की पूर्ति के लिए 'मैं प्रव्रजित होऊँगा' ऐसा सोचकर विहार जाने वाले की, प्रव्रजित होने वाले की, मनोरथ पूर्ण होने पर 'मैं प्रव्रजित हो गया हूँ, यह बहुत अच्छा हुआ' ऐसा विचार करने वाले की, श्रद्धा से पातिमोक्ख को पूर्ण करने वाले की, प्रज्ञा से चीवर आदि का प्रत्यवेक्षण करने वाले की, स्मृति से इन्द्रिय-गोचर हुए रूप आदि विषयों में चक्षु-द्वार आदि का संवर करने वाले की और वीर्य से आजीविका को शुद्ध करने वाले की जो चेतना प्रवृत्त होती है, वह 'शीलमय पुण्यक्रियावस्तु' कहलाती है। තථා පටිසම්භිදායං (පටි. ම. 1.48) වුත්තෙන විපස්සනාමග්ගෙන චක්ඛුං අනිච්චතො දුක්ඛතො අනත්තතො විපස්සන්තස්ස සොතං, ඝානං, ජිව්හං, කායං, මනං. රූපෙ…පෙ… ධම්මෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනොවිඤ්ඤාණං. චක්ඛුසම්ඵස්සං…පෙ… මනොසම්ඵස්සං, චක්ඛුසම්ඵස්සජං වෙදනං…පෙ… මනොසම්ඵස්සජං වෙදනං. රූපසඤ්ඤං…පෙ… ධම්මසඤ්ඤං. ජරාමරණං අනිච්චතො දුක්ඛතො අනත්තතො විපස්සන්තස්ස යා චෙතනා, යා ච පථවීකසිණාදීසු අට්ඨතිංසාය ආරම්මණෙසු පවත්තා ඣානචෙතනා, යා ච අනවජ්ජෙසු කම්මායතනසිප්පායතනවිජ්ජාට්ඨානෙසු පරිචයමනසිකාරාදිවසෙන පවත්තා චෙතනා, සබ්බා භාවෙති එතායාති භාවනාමයං වුත්තනයෙන පුඤ්ඤකිරියවත්ථු චාති. उसी प्रकार प्रतिसम्भिदामग्ग में कहे गए विपश्यना मार्ग के अनुसार चक्षु को अनित्य, दुःख और अनात्म के रूप में देखने वाले की; श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय, मन; रूप... पे... धर्म; चक्षु-विज्ञान... पे... मनो-विज्ञान; चक्षु-स्पर्श... पे... मन-स्पर्श; चक्षु-स्पर्श से उत्पन्न वेदना... पे... मन-स्पर्श से उत्पन्न वेदना; रूप-संज्ञा... पे... धर्म-संज्ञा; जरामरण को अनित्य, दुःख और अनात्म के रूप में देखने वाले की जो चेतना है; और जो पृथ्वी-कृत्स्न आदि अड़तीस आलम्बनों में प्रवृत्त ध्यान-चेतना है; और जो निर्दोष कर्मायतन, शिल्पायातन और विद्या-स्थानों में अभ्यास और मनसिकार आदि के वश से प्रवृत्त चेतना है - वह सब जिसके द्वारा भावित की जाती है, वह 'भावनामय' है और उक्त विधि से 'पुण्यक्रियावस्तु' भी है। එකමෙකඤ්චෙත්ථ යථාරහං පුබ්බභාගතො පට්ඨාය කායෙන කරොන්තස්ස කායකම්මං හොති, තදත්ථං වාචං නිච්ඡාරෙන්තස්ස වචීකම්මං, කායඞ්ගං වාචඞ්ගඤ්ච අචොපෙත්වා මනසා චින්තෙන්තස්ස මනොකම්මං. අන්නාදීනි දෙන්තස්ස චාපි ‘‘අන්නදානාදීනි දෙමී’’ති වා දානපාරමිං ආවජ්ජෙත්වා වා දානකාලෙ දානමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු හොති. වත්තසීසෙ ඨත්වා දදතො සීලමයං, ඛයතො [Pg.195] වයතො කම්මතො සම්මසනං පට්ඨපෙත්වා දදතො භාවනාමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු හොති. यहाँ इनमें से प्रत्येक को यथायोग्य पूर्व भाग से लेकर शरीर से करने वाले का 'काय-कर्म' होता है, उसके लिए वाणी निकालने वाले का 'वची-कर्म' होता है, और शरीर के अंगों तथा वाणी के अंगों को हिलाए बिना मन से सोचने वाले का 'मनो-कर्म' होता है। अन्न आदि देते समय भी 'मैं अन्न-दान आदि देता हूँ' अथवा दान-पारमी का विचार करके दान देने के समय 'दानमय पुण्यक्रियावस्तु' होती है। व्रत (कर्तव्य) के रूप में स्थित होकर देने वाले की 'शीलमय' और क्षय, व्यय तथा कर्म के रूप में सम्मर्शन (परीक्षण) आरम्भ करके देने वाले की 'भावनामय पुण्यक्रियावस्तु' होती है। අපරානිපි සත්ත පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි – අපචිතිසහගතං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු වෙය්යාවච්චසහගතං පත්තිඅනුප්පදානං අබ්භනුමොදනං දෙසනාමයං සවනමයං දිට්ඨිජුගතං පුඤ්ඤකිරියවත්ථූති. සරණගමනම්පි හි දිට්ඨිජුගතෙනෙව සඞ්ගය්හති. යං පනෙත්ථ වත්තබ්බං, තං පරතො ආවි භවිස්සති. अन्य सात पुण्यक्रियावस्तुएँ भी हैं - अपचिति-सहगत (आदरयुक्त) पुण्यक्रियावस्तु, वैयावृत्य-सहगत (सेवायुक्त), पत्ति-अनुप्रदान (पुण्य-दान), अनुमोदन, देशनामय, श्रवणमय और दृष्टि-ऋजुकरण पुण्यक्रियावस्तु। शरणगमन भी दृष्टि-ऋजुकरण में ही संगृहीत होता है। यहाँ जो कुछ कहना शेष है, वह आगे स्पष्ट होगा। තත්ථ වුඩ්ඪතරං දිස්වා පච්චුග්ගමනපත්තචීවරපටිග්ගහණාභිවාදනමග්ගසම්පදානාදිවසෙන අපචායනසහගතං වෙදිතබ්බං. වුඩ්ඪතරානං වත්තපටිපත්තිකරණවසෙන, ගාමං පිණ්ඩාය පවිට්ඨං භික්ඛුං දිස්වා පත්තං ගහෙත්වා ගාමෙ භික්ඛං සම්පාදෙත්වා උපසංහරණවසෙන ‘‘ගච්ඡ භික්ඛූනං පත්තං ආහරා’’ති සුත්වා වෙගෙන ගන්ත්වා පත්තාහරණාදිවසෙන ච වෙය්යාවච්චසහගතං වෙදිතබ්බං. චත්තාරො පච්චයෙ දත්වා පුප්ඵගන්ධාදීහි රතනත්තයස්ස පූජං කත්වා අඤ්ඤං වා තාදිසං පුඤ්ඤං කත්වා ‘‘සබ්බසත්තානං පත්ති හොතූ’’ති පරිණාමවසෙන පත්තිඅනුප්පදානං වෙදිතබ්බං. තථා පරෙහි දින්නාය පත්තියා කෙවලං වා පරෙහි කතං පුඤ්ඤං ‘‘සාධු, සුට්ඨූ’’ති අනුමොදනවසෙන අබ්භනුමොදනං වෙදිතබ්බං. අත්තනො පගුණධම්මං අපච්චාසීසන්තො හිතජ්ඣාසයෙන පරෙසං දෙසෙති – ඉදං දෙසනාමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු නාම. යං පන එකො ‘‘එවං මං ධම්මකථිකොති ජානිස්සන්තී’’ති ඉච්ඡාය ඨත්වා ලාභසක්කාරසිලොකසන්නිස්සිතො ධම්මං දෙසෙති, තං න මහප්ඵලං හොති. ‘‘අද්ධා අයං අත්තහිතපරහිතානං පටිපජ්ජනූපායො’’ති යොනිසොමනසිකාරපුරෙචාරිකහිතඵරණෙන මුදුචිත්තෙන ධම්මං සුණාති, ඉදං සවනමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථු හොති. යං පනෙකො ‘‘ඉති මං සද්ධොති ජානිස්සන්තී’’ති සුණාති, තං න මහප්ඵලං හොති. දිට්ඨියා උජුගමනං දිට්ඨිජුගතං, ‘‘අත්ථි දින්න’’න්තිආදිනයප්පවත්තස්ස සම්මාදස්සනස්ස එතං අධිවචනං. ඉදඤ්හි පුබ්බභාගෙ වා පච්ඡාභාගෙ වා ඤාණවිප්පයුත්තම්පි උජුකරණකාලෙ ඤාණසම්පයුත්තමෙව හොති. අපරෙ පනාහු ‘‘විජානනපජානනවසෙන දස්සනං දිට්ඨි කුසලඤ්ච විඤ්ඤාණං කම්මස්සකතාඤාණාදි ච සම්මාදස්සන’’න්ති. තත්ථ කුසලෙන විඤ්ඤාණෙන ඤාණස්ස අනුප්පාදෙපි අත්තනා කතපුඤ්ඤානුස්සරණවණ්ණාරහවණ්ණනාදීනං සඞ්ගහො, කම්මස්සකතාඤාණෙන කම්මපථසම්මාදිට්ඨියා[Pg.196]. ඉතරං පන දිට්ඨිජුගතං සබ්බෙසං නියමලක්ඛණං. යඤ්හි කිඤ්චි පුඤ්ඤං කරොන්තස්ස දිට්ඨියා උජුභාවෙනෙව තං මහප්ඵලං හොති. वहाँ (अपचायन के विषय में), वृद्धों को देखकर उनके सामने जाना, उनके पात्र-चीवर ग्रहण करना, अभिवादन करना, मार्ग देना आदि के द्वारा होने वाले आदर-सत्कार को समझना चाहिए। वृद्धों के प्रति कर्तव्यों का पालन करने के रूप में, गाँव में भिक्षा के लिए प्रविष्ट भिक्षु को देखकर पात्र ग्रहण कर गाँव में भिक्षा दिलाकर पास लाने के रूप में, और 'जाओ, भिक्षुओं का पात्र ले आओ' ऐसा सुनकर वेग से जाकर पात्र लाने आदि के रूप में वैयावृत्य (सेवा) को समझना चाहिए। चार प्रत्यय देकर, पुष्प-गन्ध आदि से रत्नत्रय की पूजा कर या अन्य वैसा ही पुण्य कर 'सभी सत्त्वों को इसका भाग मिले' इस प्रकार परिणाम (समर्पण) करने के रूप में पत्तिअनुप्पदान (पुण्य-दान) को समझना चाहिए। उसी प्रकार दूसरों द्वारा दिए गए पुण्य-भाग को या केवल दूसरों द्वारा किए गए पुण्य को 'साधु, बहुत अच्छा' इस प्रकार अनुमोदन करने के रूप में अब्भनुमोदन (पुण्यानुमोदन) को समझना चाहिए। अपने अभ्यस्त धर्म की (बदले में) आशा न करते हुए हित की भावना से दूसरों को उपदेश देना - यह देसनामय पुण्यक्रियावस्तु है। जो कोई 'इस प्रकार लोग मुझे धर्मकथक जानेंगे' ऐसी इच्छा से लाभ-सत्कार-यश के आश्रित होकर धर्म उपदेश देता है, वह महाफलदायी नहीं होता। 'निश्चित ही यह स्वहित और परहित के प्रतिपत्ति का उपाय है' इस प्रकार योनिसो मनसिकार को आगे रखकर हित-भावना से युक्त कोमल चित्त से धर्म सुनता है, यह सवनमय पुण्यक्रियावस्तु है। जो कोई 'इस प्रकार लोग मुझे श्रद्धालु जानेंगे' ऐसा (सोचकर) सुनता है, वह महाफलदायी नहीं होता। दृष्टि का सीधा होना दिट्ठिजुगत है, 'दान (का फल) है' आदि प्रकार से प्रवृत्त सम्यक्-दर्शन का यह अधिवाचन (नाम) है। यह (दृष्टि) पूर्व भाग में या पश्चात् भाग में ज्ञान-विप्रयुक्त होने पर भी, सीधा करने के समय ज्ञान-सम्प्रयुक्त ही होती है। दूसरे (आचार्य) कहते हैं - 'विजानन और प्रजानन के रूप में दर्शन दृष्टि है, और कुशल विज्ञान तथा कम्मस्सकता-ज्ञान आदि सम्यक्-दर्शन है'। वहाँ कुशल विज्ञान के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति न होने पर भी अपने द्वारा किए गए पुण्यों के अनुस्मरण और प्रशंसा-योग्य की प्रशंसा आदि का संग्रह होता है, कम्मस्सकता-ज्ञान के द्वारा कर्मपथ-सम्यग्दृष्टि का। दूसरा दिट्ठिजुगत सभी (पुण्यों) का नियम-लक्षण है। क्योंकि जो कोई भी पुण्य करते हुए व्यक्ति की दृष्टि के सीधे होने से ही वह महाफलदायी होता है। ඉමෙසං පන සත්තන්නං පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනං පුරිමෙහි තීහි දානමයාදීහි පුඤ්ඤකිරියවත්ථූහි සඞ්ගහො. තත්ථ හි අපචායනවෙය්යාවච්චානි සීලමයෙ, පත්තිඅනුප්පදානඅබ්භනුමොදනානි දානමයෙ, ධම්මදෙසනාසවනානි භාවනාමයෙ, දිට්ඨිජුගතං තීසුපි. තෙනාහ භගවා – इन सात पुण्यक्रियावस्तुओं का पहले की तीन दानमय आदि पुण्यक्रियावस्तुओं में संग्रह होता है। वहाँ अपचायन और वैयावृत्य शीलमय में, पत्तिअनुप्पदान और अब्भनुमोदन दानमय में, धर्मदेशना और धर्मश्रवण भावनामय में, और दिट्ठिजुगत तीनों में (समाहित है)। इसीलिए भगवान ने कहा है - ‘‘තීණිමානි, භික්ඛවෙ, පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනි. කතමානි තීණි? දානමයං…පෙ… භාවනාමයං පුඤ්ඤකිරියවත්ථූ’’ති (අ. නි. 8.36). “भिक्षुओं, ये तीन पुण्यक्रियावस्तुएँ हैं। कौन सी तीन? दानमय... पे... भावनामय पुण्यक्रियावस्तु” (अं. नि. 8.36)। එත්ථ ච අට්ඨන්නං කාමාවචරකුසලචෙතනානං වසෙන තිණ්ණම්පි පුඤ්ඤකිරියවත්ථූනං පවත්ති හොති. යථා හි පගුණං ධම්මං පරිවත්තෙන්තස්ස එකච්චෙ අනුසන්ධිං අසල්ලක්ඛෙන්තස්සෙව ගච්ඡන්ති, එවං පගුණං සමථවිපස්සනාභාවනං අනුයුඤ්ජන්තස්ස අන්තරන්තරා ඤාණවිප්පයුත්තචිත්තෙනාපි මනසිකාරො පවත්තති. සබ්බං තං පන මහග්ගතකුසලචෙතනානං වසෙන භාවනාමයමෙව පුඤ්ඤකිරියවත්ථු හොති, න ඉතරානි. ගාථාය අත්ථො හෙට්ඨා වුත්තොයෙව. यहाँ आठ कामावचर कुशल चेतनाओं के द्वारा तीनों ही पुण्यक्रियावस्तुओं की प्रवृत्ति होती है। जैसे अभ्यस्त धर्म का पुनरावर्तन (पाठ) करने वाले की (चेतना) कभी-कभी सन्धि (जुड़ाव) का ध्यान न रखते हुए ही चलती है, वैसे ही अभ्यस्त शमथ-विपश्यना भावना में लगे हुए व्यक्ति का बीच-बीच में ज्ञान-विप्रयुक्त चित्त से भी मनसिकार प्रवृत्त होता है। वह सब महग्गत कुशल चेतनाओं के कारण भावनामय ही पुण्यक्रियावस्तु होती है, अन्य नहीं। गाथा का अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सुत्त की व्याख्या समाप्त। 2. චක්ඛුසුත්තවණ්ණනා २. चक्खुसुत्त की व्याख्या 61. දුතියෙ චක්ඛූනීති චක්ඛන්තීති චක්ඛූනි, සමවිසමං ආචික්ඛන්තානි විය පවත්තන්තීති අත්ථො. අථ වා චක්ඛනට්ඨෙන චක්ඛූනි. කිමිදං චක්ඛනං නාම? අස්සාදනං, තථා හි වදන්ති ‘‘මධුං චක්ඛති බ්යඤ්ජනං චක්ඛතී’’ති ඉමානි ච ආරම්මණරසං අනුභවන්තානි අස්සාදෙන්තානි විය හොන්තීති චක්ඛනට්ඨෙන චක්ඛූනි. තානි පන සඞ්ඛෙපතො ද්වෙ චක්ඛූනි – ඤාණචක්ඛු, මංසචක්ඛු චාති. තෙසු මංසචක්ඛු හෙට්ඨා වුත්තමෙව. ඤාණචක්ඛු දිබ්බචක්ඛු, පඤ්ඤාචක්ඛූති ඉධ ද්විධා කත්වා වුත්තං. ६१. दूसरे (सुत्त) में 'चक्खूनी' (आँखें) - जो देखती हैं वे चक्षु हैं, जो सम और विषम को बताने वाले की तरह प्रवृत्त होती हैं, यह अर्थ है। अथवा चक्खन (आस्वादन) के अर्थ में चक्षु हैं। यह चक्खन क्या है? आस्वादन (चखना), जैसे लोग कहते हैं 'शहद चखता है, व्यंजन चखता है', और ये (आँखें) भी आलम्बन के रस का अनुभव करती हुई आस्वादन करने वाली जैसी होती हैं, इसलिए चक्खन के अर्थ में चक्षु हैं। वे संक्षेप में दो चक्षु हैं - ज्ञानचक्षु और मांसचक्षु। उनमें मांसचक्षु पहले ही कहा जा चुका है। ज्ञानचक्षु को यहाँ दिव्यचक्षु और प्रज्ञाचक्षु के रूप में दो प्रकार से कहा गया है। තත්ථ [Pg.197] දිබ්බචක්ඛූති දිබ්බසදිසත්තා දිබ්බං. දෙවතානඤ්හි සුචරිතකම්මනිබ්බත්තං පිත්තසෙම්හරුහිරාදීහි අපලිබුද්ධං උපක්කිලෙසවිමුත්තතාය දූරෙපි ආරම්මණග්ගහණසමත්ථං දිබ්බං පසාදචක්ඛු හොති. ඉදඤ්චාපි වීරියභාවනාබලනිබ්බත්තං ඤාණචක්ඛු තාදිසමෙවාති දිබ්බසදිසත්තා දිබ්බං, දිබ්බවිහාරවසෙන පටිලද්ධත්තා අත්තනො ච දිබ්බවිහාරසන්නිස්සිතත්තා ආලොකපරිග්ගහෙන මහාජුතිකත්තා. තිරොකුට්ටාදිගතරූපදස්සනෙන මහාගතිකත්තාපි දිබ්බං. තං සබ්බං සද්දසත්ථානුසාරෙන වෙදිතබ්බං. දස්සනට්ඨෙන චක්ඛුකිච්චකරණෙන චක්ඛුමිවාතිපි චක්ඛු, දිබ්බඤ්ච තං චක්ඛු චාති දිබ්බචක්ඛු. वहाँ दिव्यचक्षु - दिव्य के समान होने के कारण दिव्य है। देवताओं का सुचरित कर्म से उत्पन्न, पित्त-कफ-रक्त आदि से अवरुद्ध न होने वाला, उपक्क्लेशों से मुक्त होने के कारण दूर के आलम्बन को भी ग्रहण करने में समर्थ दिव्य प्रसाद-चक्षु होता है। और यह वीर्य-भावना के बल से उत्पन्न ज्ञानचक्षु भी वैसा ही है, इसलिए दिव्य के समान होने के कारण दिव्य है; दिव्य विहार के द्वारा प्राप्त होने के कारण और स्वयं दिव्य विहार के आश्रित होने के कारण, आलोक के परिग्रह से महाज्योति वाला होने के कारण। दीवार आदि के पार के रूपों को देखने से महागतिक होने के कारण भी दिव्य है। वह सब शब्दशास्त्र (व्याकरण) के अनुसार समझना चाहिए। देखने के अर्थ में चक्षु का कार्य करने के कारण चक्षु के समान होने से भी चक्षु है, और वह दिव्य भी है और चक्षु भी, इसलिए दिव्यचक्षु है। පජානාතීති පඤ්ඤා. කිං පජානාති? චත්තාරි අරියසච්චානි ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්තිආදිනා. වුත්තඤ්හෙතං – प्रजानन (विशेष रूप से जानना) करती है इसलिए प्रज्ञा है। क्या प्रजानन करती है? 'यह दुःख है' आदि के द्वारा चार आर्य सत्यों को। जैसा कि कहा गया है - ‘‘පජානාතීති ඛො, ආවුසො, තස්මා පඤ්ඤාති වුච්චති. කිඤ්ච පජානාති? ඉදං දුක්ඛ’’න්තිආදි (ම. නි. 1.449). “हे आयुष्मान, प्रजानन करती है, इसलिए प्रज्ञा कही जाती है। क्या प्रजानन करती है? यह दुःख है... आदि” (म. नि. 1.449)। අට්ඨකථායං පන ‘‘පඤ්ඤාපනවසෙන පඤ්ඤා. කින්ති පඤ්ඤාපෙති? අනිච්චන්ති පඤ්ඤාපෙති, දුක්ඛන්ති පඤ්ඤාපෙති, අනත්තාති පඤ්ඤාපෙතී’’ති වුත්තං. සා පනායං ලක්ඛණාදිතො යථාසභාවපටිවෙධලක්ඛණා, අක්ඛලිතපටිවෙධලක්ඛණා වා කුසලිස්සාසඛිත්තඋසුපටිවෙධො විය, විසයොභාසනරසා පදීපො විය, අසම්මොහපච්චුපට්ඨානා අරඤ්ඤගතසුදෙසකො විය. විසෙසතො පනෙත්ථ ආසවක්ඛයඤාණසඞ්ඛාතා පඤ්ඤා චතුසච්චදස්සනට්ඨෙන පඤ්ඤාචක්ඛූති අධිප්පෙතා. යං සන්ධාය වුත්තං ‘‘චක්ඛුං උදපාදි, ඤාණං උදපාදි, පඤ්ඤා උදපාදි, විජ්ජා උදපාදි, ආලොකො උදපාදී’’ති (සං. නි. 5.1081; මහාව. 15). अट्ठकथा में तो यह कहा गया है— "प्रज्ञापन (प्रकट करने) के कारण प्रज्ञा है। वह क्या प्रज्ञापित करती है? 'अनित्य है' ऐसा प्रज्ञापित करती है, 'दुःख है' ऐसा प्रज्ञापित करती है, 'अनात्म है' ऐसा प्रज्ञापित करती है।" वह यह (प्रज्ञा) लक्षणों आदि के द्वारा यथास्वभाव प्रतिवेध (साक्षात्कार) के लक्षण वाली है, अथवा कुशल धनुर्धर द्वारा छोड़े गए बाण के प्रतिवेध (भेदन) के समान अस्खलित (अचूक) प्रतिवेध के लक्षण वाली है; दीपक के समान विषयों को प्रकाशित करने के रस (कार्य) वाली है; और जंगल में गए हुए श्रेष्ठ मार्गदर्शक के समान असंमोह (मोह-रहित) उपस्थान (प्रकटीकरण) वाली है। विशेष रूप से यहाँ आस्रवक्षय-ज्ञान कही जाने वाली प्रज्ञा को चार सत्यों के दर्शन के अर्थ में 'प्रज्ञा-चक्षु' कहा गया है। जिसके संदर्भ में कहा गया है— "चक्षु उत्पन्न हुआ, ज्ञान उत्पन्न हुआ, प्रज्ञा उत्पन्न हुई, विद्या उत्पन्न हुई, आलोक उत्पन्न हुआ।" එතෙසු ච මංසචක්ඛු පරිත්තං, දිබ්බචක්ඛු මහග්ගතං, ඉතරං අප්පමාණං. මංසචක්ඛු රූපං, ඉතරානි අරූපානි. මංසචක්ඛු දිබ්බචක්ඛු ච ලොකියානි සාසවානි රූපවිසයානි, ඉතරං ලොකුත්තරං අනාසවං චතුසච්චවිසයං. මංසචක්ඛු අබ්යාකතං, දිබ්බචක්ඛු සියා කුසලං සියා අබ්යාකතං, තථා පඤ්ඤාචක්ඛු. මංසචක්ඛු කාමාවචරං, දිබ්බචක්ඛු රූපාවචරං, ඉතරං ලොකුත්තරන්ති එවමාදි විභාගා වෙදිතබ්බා. इनमें मांस-चक्षु 'परित्त' (सीमित) है, दिव्य-चक्षु 'महग्गत' (विस्तृत) है, और अन्य (प्रज्ञा-चक्षु) 'अप्रमाण' (असीमित) है। मांस-चक्षु रूप है, अन्य अरूप हैं। मांस-चक्षु और दिव्य-चक्षु लौकिक, सास्रव और रूप-विषयक हैं; अन्य (प्रज्ञा-चक्षु) लोकोत्तर, अनास्रव और चार सत्यों के विषय वाला है। मांस-चक्षु अव्याकृत है, दिव्य-चक्षु कुशल हो सकता है या अव्याकृत हो सकता है, वैसे ही प्रज्ञा-चक्षु भी। मांस-चक्षु कामावचर है, दिव्य-चक्षु रूपावचर है, और अन्य लोकोत्तर है— इस प्रकार के विभाग समझने चाहिए। ගාථාසු අනුත්තරන්ති පඤ්ඤාචක්ඛුං සන්ධාය වුත්තං. තඤ්හි ආසවක්ඛයඤාණභාවතො අනුත්තරං. අක්ඛාසි පුරිසුත්තමොති පුරිසානං උත්තමො අග්ගො [Pg.198] සම්මාසම්බුද්ධො දෙසෙසි. උප්පාදොති මංසචක්ඛුස්ස පවත්ති. මග්ගොති උපායො, දිබ්බචක්ඛුස්ස කාරණං. පකතිචක්ඛුමතො එව හි දිබ්බචක්ඛු උප්පජ්ජති, යස්මා කසිණාලොකං වඩ්ඪෙත්වා දිබ්බචක්ඛුඤාණස්ස උප්පාදනං, සො ච කසිණමණ්ඩලෙ උග්ගහනිමිත්තෙන විනා නත්ථීති. යතොති යදා. ඤාණන්ති ආසවක්ඛයඤාණං. තෙනෙවාහ ‘‘පඤ්ඤාචක්ඛු අනුත්තර’’න්ති. යස්ස චක්ඛුස්ස පටිලාභාති යස්ස අරියස්ස පඤ්ඤාචක්ඛුස්ස උප්පත්තියා භාවනාය සබ්බස්මා වට්ටදුක්ඛතො පමුච්චති පරිමුච්චතීති. गाथाओं में 'अनुत्तर' शब्द प्रज्ञा-चक्षु के संदर्भ में कहा गया है। क्योंकि वह आस्रवक्षय-ज्ञान होने के कारण अनुत्तर (सर्वश्रेष्ठ) है। 'अक्खासि पुरिसुत्तमो' (पुरुषोत्तम ने कहा) का अर्थ है— पुरुषों में उत्तम, श्रेष्ठ सम्यक्सम्बुद्ध ने उपदेश दिया। 'उत्पाद' मांस-चक्षु की प्रवृत्ति है। 'मार्ग' उपाय है, दिव्य-चक्षु का कारण है। क्योंकि प्राकृतिक चक्षु वाले को ही दिव्य-चक्षु उत्पन्न होता है, क्योंकि कृत्स्न-आलोक (कसिण-आलोक) को बढ़ाकर दिव्य-चक्षु ज्ञान की उत्पत्ति होती है, और वह कृत्स्न-मण्डल में उद्ग्रह-निमित्त के बिना नहीं होता। 'यतो' का अर्थ है— जब। 'ज्ञान' आस्रवक्षय-ज्ञान है। इसीलिए कहा— "प्रज्ञा-चक्षु अनुत्तर है।" 'जिस चक्षु की प्राप्ति से' का अर्थ है— जिस आर्य को प्रज्ञा-चक्षु की उत्पत्ति और भावना से समस्त संसार-दुःख से मुक्ति मिलती है, वह पूर्णतः मुक्त हो जाता है। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. ඉන්ද්රියසුත්තවණ්ණනා ३. इन्द्रिय सूत्र की व्याख्या। 62. තතියෙ ඉන්ද්රියානීති අධිපතෙය්යට්ඨෙන ඉන්ද්රියානි. යානි හි සහජාතධම්මෙසු ඉස්සරා විය හුත්වා තෙහි අනුවත්තිතබ්බානි, තානි ඉන්ද්රියානි නාම. අපිච ඉන්දො භගවා ධම්මිස්සරො පරමෙන චිත්තිස්සරියෙන සමන්නාගතො. තෙන ඉන්දෙන සබ්බපඨමං දිට්ඨත්තා අධිගතත්තා පරෙසඤ්ච දිට්ඨත්තා දෙසිතත්තා විහිතත්තා ගොචරභාවනාසෙවනාහි දිට්ඨත්තා ච ඉන්ද්රියානි. ඉන්දං වා මග්ගාධිගමස්ස උපනිස්සයභූතං පුඤ්ඤකම්මං, තස්ස ලිඞ්ගානීතිපි ඉන්ද්රියානි. අනඤ්ඤාතඤ්ඤස්සාමීතින්ද්රියන්ති ‘‘අනමතග්ගෙ සංසාරෙ අනඤ්ඤාතං අනධිගතං අමතපදං චතුසච්චධම්මමෙව වා ජානිස්සාමී’’ති පටිපන්නස්ස ඉමිනා පුබ්බභාගෙන උප්පන්නං ඉන්ද්රියං, සොතාපත්තිමග්ගපඤ්ඤායෙතං අධිවචනං. අඤ්ඤින්ද්රියන්ති ආජානනඉන්ද්රියං. තත්රායං වචනත්ථො – ආජානාති පඨමමග්ගඤාණෙන දිට්ඨමරියාදං අනතික්කමිත්වාව ජානාතීති අඤ්ඤා. යථෙව හි පඨමමග්ගපඤ්ඤා දුක්ඛාදීසු පරිඤ්ඤාභිසමයාදිවසෙන පවත්තති, තථෙව අයම්පි පවත්තතීති අඤ්ඤා ච සා යථාවුත්තෙනට්ඨෙන ඉන්ද්රියං චාති අඤ්ඤින්ද්රියං. ආජානනට්ඨෙනෙව අඤ්ඤස්ස වා අරියපුග්ගලස්ස ඉන්ද්රියන්ති අඤ්ඤින්ද්රියං, සොතාපත්තිඵලතො පට්ඨාය ඡසු ඨානෙසු ඤාණස්සෙතං අධිවචනං. අඤ්ඤාතාවින්ද්රියන්ති අඤ්ඤාතාවිනො චතූසු සච්චෙසු නිට්ඨිතඤාණකිච්චස්ස ඛීණාසවස්ස උප්පජ්ජනතො ඉන්ද්රියට්ඨසම්භවතො ච අඤ්ඤාතාවින්ද්රියං. එත්ථ ච පඨමපච්ඡිමානි පඨමමග්ගචතුත්ථඵලවසෙන එකට්ඨානිකානි, ඉතරං ඉතරමග්ගඵලවසෙන ඡට්ඨානිකන්ති වෙදිතබ්බං. ६२. तीसरे (सूत्र) में 'इन्द्रियाँ' आधिपत्य के अर्थ में इन्द्रियाँ हैं। जो सहजात धर्मों में ईश्वर (स्वामी) के समान होकर उनके द्वारा अनुवर्तन करने योग्य होती हैं, वे इन्द्रियाँ कहलाती हैं। इसके अतिरिक्त, 'इन्द्र' भगवान् हैं, जो धर्म के स्वामी और परम चित्त-ऐश्वर्य से संपन्न हैं। उस इन्द्र (भगवान्) द्वारा सर्वप्रथम देखे जाने, प्राप्त किए जाने के कारण, और दूसरों के लिए दिखाए जाने, उपदिष्ट किए जाने, विहित किए जाने के कारण, तथा गोचर-भावना-सेवन द्वारा देखे जाने के कारण ये 'इन्द्रियाँ' हैं। अथवा 'इन्द्र' मार्ग-प्राप्ति का उपनिश्रय (आधार) भूत पुण्यकर्म है, उसके लिंग (चिह्न) होने के कारण भी ये 'इन्द्रियाँ' हैं। 'अनज्ञातं-ज्ञास्यामीति-इन्द्रिय' (अज्ञात को जानूँगा—ऐसी इन्द्रिय) का अर्थ है— "अनादि संसार में अज्ञात, अप्राप्त अमृत-पद अथवा चतुःसत्य धर्म को ही जानूँगा"—इस प्रकार प्रतिपन्न (साधना में लगे) व्यक्ति की इस पूर्वभाग में उत्पन्न इन्द्रिय; यह स्रोतापत्ति-मार्ग-प्रज्ञा का पर्यायवाची है। 'अज्ञिन्द्रिय' का अर्थ है— आज्ञान-इन्द्रिय (जानने वाली इन्द्रिय)। यहाँ यह शब्दार्थ है— 'आज्ञानाति' अर्थात् प्रथम मार्ग-ज्ञान द्वारा देखी गई मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए ही जानता है, इसलिए 'अज्ञा' है। जैसे प्रथम मार्ग-प्रज्ञा दुःख आदि में परिज्ञा-अभिसमय आदि के वश से प्रवृत्त होती है, वैसे ही यह भी प्रवृत्त होती है, इसलिए वह 'अज्ञा' है और पूर्वोक्त अर्थ में 'इन्द्रिय' है, अतः 'अज्ञिन्द्रिय' है। जानने के अर्थ में ही, अथवा 'अज्ञ' (जानने वाले) आर्य पुद्गल की इन्द्रिय होने के कारण 'अज्ञिन्द्रिय' है; यह स्रोतापत्ति-फल से लेकर छह स्थानों में होने वाले ज्ञान का पर्यायवाची है। 'अज्ञातावी-इन्द्रिय' का अर्थ है— चार सत्यों में ज्ञान-कृत्य को पूर्ण कर चुके 'अज्ञातावी' (कृतकृत्य) क्षीणास्रव (अर्हत्) में उत्पन्न होने के कारण और इन्द्रिय-भाव के संभव होने के कारण 'अज्ञातावी-इन्द्रिय' है। यहाँ प्रथम और अंतिम (इन्द्रियाँ) क्रमशः प्रथम मार्ग और चतुर्थ फल के कारण एक-स्थानिक हैं, और दूसरी (इन्द्रिय) अन्य मार्गों और फलों के कारण छह-स्थानिक है—ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු [Pg.199] සික්ඛමානස්සාති අධිසීලසික්ඛාදයො සික්ඛමානස්ස භාවෙන්තස්ස. උජුමග්ගානුසාරිනොති උජුමග්ගො වුච්චති අරියමග්ගො, අන්තද්වයවිවජ්ජිතත්තා තස්ස අනුස්සරණතො උජුමග්ගානුසාරිනො, පටිපාටියා මග්ගෙ උප්පාදෙන්තස්සාති අත්ථො. ඛයස්මින්ති අනවසෙසකිලෙසානං ඛෙපනතො ඛයසඞ්ඛාතෙ අග්ගමග්ගෙ ඤාණං පඨමං පුරෙයෙව උප්පජ්ජති. තතො අඤ්ඤා අනන්තරාති තතො මග්ගඤාණතො අනන්තරා අරහත්තං උප්පජ්ජති. අථ වා උජුමග්ගානුසාරිනොති ලීනුද්ධච්චපතිට්ඨානායූහනාදිකෙ වජ්ජෙත්වා සමථවිපස්සනං යුගනද්ධං කත්වා භාවනාවසෙන පවත්තං පුබ්බභාගමග්ගං අනුස්සරන්තස්ස අනුගච්ඡන්තස්ස පටිපජ්ජන්තස්ස ගොත්රභුඤාණානන්තරං දිට්ඨෙකට්ඨානං කිලෙසානං ඛෙපනතො ඛයස්මිං සොතාපත්තිමග්ගෙ පඨමං ඤාණං අනඤ්ඤාතඤ්ඤස්සාමීතින්ද්රියං උප්පජ්ජති. තතො අඤ්ඤා අනන්තරාති තතො පඨමඤාණතො අනන්තරා අනන්තරතො පට්ඨාය යාව අග්ගමග්ගා අඤ්ඤා අඤ්ඤින්ද්රියං උප්පජ්ජති. गाथाओं में 'सिक्खमानस्स' (सीखते हुए का) का अर्थ है— अधिशील-शिक्षा आदि को सीखते हुए, भावना करते हुए का। 'ऋजुमार्ग-अनुसारी' का अर्थ है— ऋजुमार्ग आर्यमार्ग को कहा जाता है, दो अंतों (अतिवादों) से वर्जित होने के कारण उसका अनुसरण करने से 'ऋजुमार्ग-अनुसारी' है, अर्थात् क्रम से मार्ग को उत्पन्न करने वाले का। 'क्षय में' का अर्थ है— अवशेष-रहित क्लेशों के क्षय होने के कारण 'क्षय' संज्ञक अग्र-मार्ग में ज्ञान सबसे पहले उत्पन्न होता है। 'उसके बाद अनन्तर अज्ञा' का अर्थ है— उस मार्ग-ज्ञान के ठीक बाद अर्हत्त्व उत्पन्न होता है। अथवा 'ऋजुमार्ग-अनुसारी' का अर्थ है— लीनता, उद्धत्य, प्रतिष्ठान, आयूहण आदि को त्यागकर, शमथ-विपश्यना को युगनद्ध (संयुक्त) कर भावना के वश से प्रवृत्त पूर्वभाग-मार्ग का अनुसरण करने वाले, पीछे चलने वाले, प्रतिपन्न व्यक्ति के गोत्रभू-ज्ञान के अनन्तर, दृष्ट-एकस्थानिक क्लेशों के क्षय होने के कारण 'क्षय' (स्रोतापत्ति-मार्ग) में प्रथम ज्ञान 'अनज्ञातं-ज्ञास्यामीति-इन्द्रिय' उत्पन्न होता है। 'उसके बाद अनन्तर अज्ञा' का अर्थ है— उस प्रथम ज्ञान के अनन्तर, अनन्तर से लेकर अग्र-मार्ग तक 'अज्ञा' अर्थात् 'अज्ञिन्द्रिय' उत्पन्न होती है। තතො අඤ්ඤා විමුත්තස්සාති තතො අඤ්ඤා අඤ්ඤින්ද්රියතො පච්ඡා අරහත්තමග්ගඤාණානන්තරා අරහත්තඵලෙන පඤ්ඤාවිමුත්තියා අඤ්ඤාතාවින්ද්රියෙන විමුත්තස්ස. ඤාණං වෙ හොති තාදිනොති අරහත්තඵලුප්පත්තිතො උත්තරකාලෙ ඉට්ඨානිට්ඨාදීසු තාදිලක්ඛණප්පත්තස්ස ඛීණාසවස්ස පච්චවෙක්ඛණඤාණං උප්පජ්ජති. කථං උප්පජ්ජතීති ආහ ‘‘අකුප්පා මෙ විමුත්තී’’ති. තස්ස අකුප්පභාවස්ස කාරණං දස්සෙති ‘‘භවසංයොජනක්ඛයා’’ති. ‘ततो अञ्ञा विमुत्तस्स’ (उससे अन्य विमुक्त का) का अर्थ है—उस अञ्ञिन्द्रिय (ज्ञान-इन्द्रिय) के बाद, अर्हत्-मार्ग-ज्ञान के अनन्तर, अर्हत्-फल के द्वारा प्रज्ञा-विमुक्ति से युक्त, अञ्ञाताविन्द्रिय (ज्ञात-इन्द्रिय) से विमुक्त पुरुष का। ‘ञाणं वे होति तादिनो’ (उस तादी पुरुष को ज्ञान होता है) का अर्थ है—अर्हत्-फल की उत्पत्ति के उत्तरकाल में, इष्ट-अनिष्ट आदि विषयों में तादी-लक्षण (अविकारी भाव) को प्राप्त क्षीणासव को प्रत्यवेक्षण-ज्ञान उत्पन्न होता है। वह कैसे उत्पन्न होता है? इसके लिए कहा—‘अकुप्पा मे विमुत्ती’ (मेरी विमुक्ति अकुप्य/अक्षय है)। उस अकुप्य भाव का कारण दिखाते हैं—‘भवसंयोजनक्खया’ (भव-संयोजनों के क्षय से)। ඉදානි තාදිසං ඛීණාසවං ථොමෙන්තො ‘‘ස වෙ ඉන්ද්රියසම්පන්නො’’ති තතියං ගාථමාහ. තත්ථ ඉන්ද්රියසම්පන්නොති යථාවුත්තෙහි තීහි ලොකුත්තරින්ද්රියෙහි සමන්නාගතො, සුද්ධෙහිපි වා පටිප්පස්සද්ධිලද්ධෙහි සද්ධාදීහි ඉන්ද්රියෙහි සමන්නාගතො පරිපුණ්ණො, තතො එව චක්ඛාදීහි සුට්ඨු වූපසන්තෙහි නිබ්බිසෙවනෙහි ඉන්ද්රියෙහි සමන්නාගතො. තෙනාහ ‘‘සන්තො’’ති, සබ්බකිලෙසපරිළාහවූපසමෙන උපසන්තොති අත්ථො. සන්තිපදෙ රතොති නිබ්බානෙ අභිරතො අධිමුත්තො. එත්ථ ච ‘‘ඉන්ද්රියසම්පන්නො’’ති එතෙන භාවිතමග්ගතා, පරිඤ්ඤාතක්ඛන්ධතා චස්ස දස්සිතා. ‘‘සන්තො’’ති එතෙන පහීනකිලෙසතා, ‘‘සන්තිපදෙ රතො’’ති එතෙන සච්ඡිකතනිරොධතාති. සෙසං වුත්තනයමෙව. अब वैसे क्षीणासव की प्रशंसा करते हुए ‘स वे इन्द्रियसम्पन्नो’ (वह निश्चय ही इन्द्रिय-सम्पन्न है) यह तीसरी गाथा कही। वहाँ ‘इन्द्रियसम्पन्नो’ का अर्थ है—यथोक्त तीन लोकोत्तर इन्द्रियों से समन्वित, अथवा परिशुद्ध और प्रतिप्रश्रब्धि (शान्ति) को प्राप्त श्रद्धा आदि इन्द्रियों से समन्वित एवं परिपूर्ण, और इसी कारण चक्षु आदि भली-भाँति उपशान्त और निर्विषय इन्द्रियों से समन्वित। इसीलिए कहा—‘सन्तो’ (शान्त), अर्थात् सभी क्लेशों के परिदाह के उपशमन से उपशान्त। ‘सन्तिपदे रतो’ का अर्थ है—निर्वाण में अभिरत और अधिमुक्त। यहाँ ‘इन्द्रियसम्पन्नो’ से उसकी भावित-मार्गता और परिज्ञात-स्कन्धता दिखाई गई है। ‘सन्तो’ से उसकी प्रहीण-क्लेशता और ‘सन्तिपदे रतो’ से उसकी साक्षात्कृत-निरोधता दिखाई गई है। शेष अर्थ पूर्वोक्त ही है। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तीसरे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. අද්ධාසුත්තවණ්ණනා ४. अद्धा-सुत्त की व्याख्या 63. චතුත්ථෙ [Pg.200] අද්ධාති කාලා. අතීතො අද්ධාතිආදීසු ද්වෙ පරියායා – සුත්තන්තපරියායො, අභිධම්මපරියායො ච. තත්ථ සුත්තන්තපරියායෙන පටිසන්ධිතො පුබ්බෙ අතීතො අද්ධා නාම, චුතිතො පච්ඡා අනාගතො අද්ධා නාම, සහ චුතිපටිසන්ධීහි තදනන්තරං පච්චුප්පන්නො අද්ධා නාම. අභිධම්මපරියායෙන උප්පාදො, ඨිති, භඞ්ගොති ඉමෙ තයො ඛණෙ පත්වා නිරුද්ධධම්මා අතීතො අද්ධා නාම, තයොපි ඛණෙ අසම්පත්තා අනාගතො අද්ධා නාම, ඛණත්තයසමඞ්ගිනො පච්චුප්පන්නො අද්ධා නාම. ६३. चौथे सूत्र में ‘अद्धा’ का अर्थ काल है। ‘अतीतो अद्धा’ (अतीत काल) आदि में दो प्रणालियाँ (नय) हैं—सुत्तन्त-प्रणाली और अभिधम्म-प्रणाली। वहाँ सुत्तन्त-प्रणाली के अनुसार प्रतिसन्धि से पूर्व का समय ‘अतीत काल’ है, च्युति (मृत्यु) के बाद का समय ‘अनागत काल’ है, और च्युति-प्रतिसन्धि के साथ उनके बीच का समय ‘प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) काल’ है। अभिधम्म-प्रणाली के अनुसार उत्पाद, स्थिति और भंग—इन तीन क्षणों को प्राप्त होकर निरुद्ध हुए धर्म ‘अतीत काल’ कहलाते हैं, इन तीनों क्षणों को अप्राप्त धर्म ‘अनागत काल’ कहलाते हैं, और तीनों क्षणों से युक्त धर्म ‘प्रत्युत्पन्न काल’ कहलाते हैं। අපරො නයො – අයඤ්හි අතීතාදිවිභාගො අද්ධාසන්තතිසමයඛණවසෙන චතුධා වෙදිතබ්බො. තෙසු අද්ධාවිභාගො වුත්තො. සන්තතිවසෙන සභාගා එකඋතුසමුට්ඨානා, එකාහාරසමුට්ඨානා ච පුබ්බාපරියවසෙන වත්තමානාපි පච්චුප්පන්නා. තතො පුබ්බෙ විසභාගඋතුආහාරසමුට්ඨානා අතීතා පච්ඡා අනාගතා. චිත්තජා එකවීථිඑකජවනඑකසමාපත්තිසමුට්ඨානා පච්චුප්පන්නා නාම, තතො පුබ්බෙ අතීතා, පච්ඡා අනාගතා. කම්මසමුට්ඨානානං පාටියෙක්කං සන්තතිවසෙන අතීතාදිභෙදො නත්ථි, තෙසංයෙව පන උතුආහාරචිත්තසමුට්ඨානානං උපත්ථම්භකවසෙන තස්ස අතීතාදිභාවො වෙදිතබ්බො. සමයවසෙන එකමුහුත්තපුබ්බණ්හසායන්හරත්තිදිවාදීසු සමයෙසු සන්තානවසෙන පවත්තමානා තංතංසමයෙ පච්චුප්පන්නා නාම, තතො පුබ්බෙ අතීතා, පච්ඡා අනාගතා. අයං තාව රූපධම්මෙසු නයො. අරූපධම්මෙසු පන ඛණවසෙන උප්පාදාදික්ඛණත්තයපරියාපන්නා පච්චුප්පන්නා, තතො පුබ්බෙ අතීතා, පච්ඡා අනාගතා. අපිච අතික්කන්තහෙතුපච්චයකිච්චා අතීතා, නිට්ඨිතහෙතුකිච්චා අනිට්ඨිතපච්චයකිච්චා පච්චුප්පන්නා, උභයකිච්චං අසම්පත්තා අනාගතා. අත්තනො වා කිච්චක්ඛණෙ පච්චුප්පන්නා, තතො පුබ්බෙ අතීතා, පච්ඡා අනාගතා. එත්ථ ච ඛණාදිකථාව නිප්පරියායා, සෙසා පරියායා. අයඤ්හි අතීතාදිභෙදො නාම ධම්මානං හොති, න කාලස්ස. අතීතාදිභෙදෙ පන ධම්මෙ උපාදාය පරමත්ථතො අවිජ්ජමානොපි කාලො ඉධ තෙනෙව වොහාරෙන අතීතොතිආදිනා වුත්තොති වෙදිතබ්බො. दूसरा नय—यह अतीत आदि का विभाग अद्धा (काल), सन्तति (प्रवाह), समय और क्षण के वश से चार प्रकार का समझना चाहिए। उनमें अद्धा-विभाग कहा जा चुका है। सन्तति के वश से—एक ही ऋतु से उत्पन्न और एक ही आहार से उत्पन्न, पूर्वापर क्रम से विद्यमान होने पर भी ‘प्रत्युत्पन्न’ हैं। उनसे पूर्व के विजातीय ऋतु और आहार से उत्पन्न ‘अतीत’ हैं और बाद के ‘अनागत’ हैं। चित्त से उत्पन्न—एक ही वीथि, एक ही जवन और एक ही समापत्ति से उत्पन्न ‘प्रत्युत्पन्न’ कहलाते हैं, उनसे पूर्व के ‘अतीत’ और बाद के ‘अनागत’ हैं। कर्म से उत्पन्न धर्मों का अलग से सन्तति-वश अतीत आदि भेद नहीं है, किन्तु उन्हीं ऋतु, आहार और चित्त से उत्पन्न धर्मों के उपष्टम्भक (सहायक) होने के कारण उनका अतीत आदि भाव समझना चाहिए। समय के वश से—एक मुहूर्त, पूर्वाह्न, सायाह्न, रात्रि, दिन आदि समयों में सन्तति के रूप में प्रवर्तमान धर्म उस-उस समय में ‘प्रत्युत्पन्न’ कहलाते हैं, उनसे पूर्व के ‘अतीत’ और बाद के ‘अनागत’ हैं। यह तो रूप-धर्मों के विषय में नय है। अरूप-धर्मों (चित्त-चैतसिक) में तो क्षण के वश से उत्पाद आदि तीन क्षणों के अन्तर्गत धर्म ‘प्रत्युत्पन्न’ हैं, उससे पूर्व के ‘अतीत’ और बाद के ‘अनागत’ हैं। इसके अतिरिक्त, जिनके हेतु और प्रत्यय का कार्य समाप्त हो चुका है वे ‘अतीत’ हैं, जिनका हेतु-कार्य समाप्त हो गया है किन्तु प्रत्यय-कार्य समाप्त नहीं हुआ वे ‘प्रत्युत्पन्न’ हैं, और जिन्होंने दोनों कार्यों को प्राप्त नहीं किया वे ‘अनागत’ हैं। अथवा अपने कार्य के क्षण में ‘प्रत्युत्पन्न’, उससे पूर्व ‘अतीत’ और बाद में ‘अनागत’ हैं। यहाँ क्षण आदि की कथा ही मुख्य (निप्परियाय) है, शेष गौण (परियाय) हैं। यह अतीत आदि भेद धर्मों का होता है, काल का नहीं। किन्तु अतीत आदि भेदों वाले धर्मों को उपादान बनाकर, परमार्थतः अविद्यमान होने पर भी काल को यहाँ उसी व्यवहार से ‘अतीत’ आदि कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු [Pg.201] අක්ඛෙය්යසඤ්ඤිනොති එත්ථ අක්ඛායති, කථීයති, පඤ්ඤාපීයතීති අක්ඛෙය්යං, කථාවත්ථු, අත්ථතො රූපාදයො පඤ්චක්ඛන්ධා. වුත්තඤ්හෙතං – गाथाओं में ‘अक्खेय्यसञ्ञिनो’ यहाँ ‘अक्खेय्य’ का अर्थ है—जो कहा जाता है, बोला जाता है, प्रज्ञापित किया जाता है, अर्थात् कथावस्तु; अर्थतः रूप आदि पाँच स्कन्ध। जैसा कि कहा गया है— ‘‘අතීතං වා අද්ධානං ආරබ්භ කථං කථෙය්ය, අනාගතං වා…පෙ… පච්චුප්පන්නං වා අද්ධානං ආරබ්භ කථං කථෙය්යා’’ති (දී. නි. 3.305). “चाहे अतीत काल को आरम्भ कर कथा कहे, या अनागत... या प्रत्युत्पन्न काल को आरम्भ कर कथा कहे।” (दी. नि. 3.305) තථා – तथा— ‘‘යං, භික්ඛවෙ, රූපං අතීතං නිරුද්ධං විපරිණතං, ‘අහොසී’ති තස්ස සඞ්ඛා, ‘අහොසී’ති තස්ස සමඤ්ඤා, ‘අහොසී’ති තස්ස පඤ්ඤත්ති; න තස්ස සඞ්ඛා අත්ථීති, න තස්ස සඞ්ඛා භවිස්සතී’’ති (සං. නි. 3.62) – “भिक्षुओं, जो रूप अतीत है, निरुद्ध है, विपरिणत है, उसकी संज्ञा ‘था’ है, उसका नाम ‘था’ है, उसकी प्रज्ञप्ति ‘था’ है; उसकी संज्ञा ‘है’ नहीं है, उसकी संज्ञा ‘होगा’ नहीं है।” (सं. नि. 3.62) එවං වුත්තෙන නිරුත්තිපථසුත්තෙනපි එත්ථ අත්ථො දීපෙතබ්බො. එවං කථාවත්ථුභාවෙන අක්ඛෙය්යසඞ්ඛාතෙ ඛන්ධපඤ්චකෙ අහන්ති ච මමන්ති ච දෙවොති ච මනුස්සොති ච ඉත්ථීති ච පුරිසොති ච ආදිනා පවත්තසඤ්ඤාවසෙන අක්ඛෙය්යසඤ්ඤිනො, පඤ්චසු උපාදානක්ඛන්ධෙසු සත්තපුග්ගලාදිසඤ්ඤිනොති අත්ථො. අක්ඛෙය්යස්මිං තණ්හාදිට්ඨිග්ගාහවසෙන පතිට්ඨිතා, රාගාදිවසෙන වා අට්ඨහාකාරෙහි පතිට්ඨිතා. රත්තො හි රාගවසෙන පතිට්ඨිතො හොති, දුට්ඨො දොසවසෙන, මූළ්හො මොහවසෙන, පරාමට්ඨො දිට්ඨිවසෙන, ථාමගතො අනුසයවසෙන, විනිබද්ධො මානවසෙන, අනිට්ඨඞ්ගතො විචිකිච්ඡාවසෙන, වික්ඛෙපගතො උද්ධච්චවසෙන පතිට්ඨිතො හොතීති. इस प्रकार कहे गए निरुत्तिपथ-सुत्त के द्वारा भी यहाँ अर्थ स्पष्ट करना चाहिए। इस प्रकार कथावस्तु होने के कारण ‘अक्खेय्य’ संज्ञक पाँच स्कन्धों में ‘मैं’, ‘मेरा’, ‘देव’, ‘मनुष्य’, ‘स्त्री’, ‘पुरुष’ आदि के रूप में प्रवृत्त संज्ञा के कारण वे ‘अक्खेय्यसञ्ञिनो’ हैं, अर्थात् पाँच उपादान-स्कन्धों में सत्त्व-पुद्गल आदि की संज्ञा वाले हैं। वे अक्खेय्य (स्कन्धों) में तृष्णा और दृष्टि के ग्रहण के कारण प्रतिष्ठित हैं, अथवा राग आदि के वश से आठ प्रकारों से प्रतिष्ठित हैं। क्योंकि रागी पुरुष राग के वश से प्रतिष्ठित होता है, द्वेषी द्वेष के वश से, मूढ़ मोह के वश से, परामृष्ट (मिथ्यादृष्टि वाला) दृष्टि के वश से, दृढ़ग्राही अनुशय के वश से, विनिबद्ध मान के वश से, अनिश्चयी विचिकित्सा के वश से, और विक्षिप्त पुरुष औद्धत्य के वश से प्रतिष्ठित होता है। අක්ඛෙය්යං අපරිඤ්ඤායාති තං අක්ඛෙය්යං තෙභූමකධම්මෙ තීහි පරිඤ්ඤාහි අපරිජානිත්වා තස්ස අපරිජානනහෙතු. යොගමායන්ති මච්චුනොති මරණස්ස යොගං තෙන සංයොගං උපගච්ඡන්ති, න විසංයොගන්ති අත්ථො. ‘अक्खेय्यं अपरिञ्ञाय’ का अर्थ है—उस अक्खेय्य (कथनीय) त्रैभूमिक धर्मों को तीन परिज्ञाओं से न जानकर, उस अज्ञान के कारण। ‘योगमायन्ति मच्चुनो’ का अर्थ है—वे मृत्यु के योग (बन्धन) को, उसके साथ संयोग को प्राप्त होते हैं, विसंयोग (मुक्ति) को नहीं। අථ වා යොගන්ති උපායං, තෙන යොජිතං පසාරිතං මාරසෙනට්ඨානියං අනත්ථජාලං කිලෙසජාලඤ්ච උපගච්ඡන්තීති වුත්තං හොති. තථා හි වුත්තං – अथवा 'योग' का अर्थ उपाय है, उसके द्वारा योजित (लगाया गया), फैलाया गया, मार-सेना के समान अनर्थ-जाल और क्लेश-जाल के पास वे जाते हैं, ऐसा कहा गया है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘න හි නො සඞ්ගරං තෙන, මහාසෙනෙන මච්චුනා’’ති. (ම. නි. 3.272; ජා. 2.22.121; නෙත්ති. 103); "निश्चित ही उस महासेना वाले मृत्यु (मार) के साथ हमारा कोई समझौता नहीं है।" එත්තාවතා වට්ටං දස්සෙත්වා ඉදානි විවට්ටං දස්සෙතුං ‘‘අක්ඛෙය්යඤ්ච පරිඤ්ඤායා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ ච-සද්දො බ්යතිරෙකෙ, තෙන අක්ඛෙය්යපරිජානනෙන ලද්ධබ්බං වක්ඛමානමෙව විසෙසං ජොතෙති. පරිඤ්ඤායාති විපස්සනාසහිතාය [Pg.202] මග්ගපඤ්ඤාය දුක්ඛන්ති පරිච්ඡිජ්ජ ජානිත්වා, තප්පටිබද්ධකිලෙසප්පහානෙන වා තං සමතික්කමිත්වා තිස්සන්නම්පි පරිඤ්ඤානං කිච්චං මත්ථකං පාපෙත්වා. අක්ඛාතාරං න මඤ්ඤතීති සබ්බසො මඤ්ඤනානං පහීනත්තා ඛීණාසවො අක්ඛාතාරං න මඤ්ඤති, කාරකාදිසභාවං කිඤ්චි අත්තානං න පච්චෙතීති අත්ථො. ඵුට්ඨො විමොක්ඛො මනසා, සන්තිපදමනුත්තරන්ති යස්මා සබ්බසඞ්ඛතවිමුත්තත්තා ‘‘විමොක්ඛො’’ති සබ්බකිලෙසසන්තාපවූපසමනට්ඨානතාය ‘‘සන්තිපද’’න්ති ලද්ධනාමො නිබ්බානධම්මො ඵුට්ඨො ඵුසිතො පත්තො, තස්මා අක්ඛාතාරං න මඤ්ඤතීති. අථ වා ‘‘පරිඤ්ඤායා’’ති පදෙන දුක්ඛසච්චස්ස පරිඤ්ඤාභිසමයං සමුදයසච්චස්ස පහානාභිසමයඤ්ච වත්වා ඉදානි ‘‘ඵුට්ඨො විමොක්ඛො මනසා, සන්තිපදමනුත්තර’’න්ති ඉමිනා මග්ගනිරොධානං භාවනාසච්ඡිකිරියාභිසමයං වදති. තස්සත්ථො – සමුච්ඡෙදවසෙන සබ්බකිලෙසෙහි විමුච්චතීති විමොක්ඛො, අරියමග්ගො. සො පනස්ස මග්ගචිත්තෙන ඵුට්ඨො ඵුසිතො භාවිතො, තෙනෙව අනුත්තරං සන්තිපදං නිබ්බානං ඵුට්ඨං ඵුසිතං සච්ඡිකතන්ති. यहाँ तक 'वट्ट' (संसार-चक्र) को दिखाकर अब 'विवट्ट' (निर्वाण) को दिखाने के लिए "अक्खेय्यञ्च परिञ्ञाय" (कथनीय को जानकर) आदि कहा गया है। वहाँ 'च' शब्द व्यतिरेक (भेद) के अर्थ में है, उससे कथनीय के परिज्ञान द्वारा प्राप्त होने वाली कही जाने वाली विशेषता को ही प्रकाशित करता है। 'परिञ्ञाय' का अर्थ है - विपश्यना युक्त मार्ग-प्रज्ञा से 'यह दुःख है' ऐसा परिच्छेद करके जानकर, अथवा उससे सम्बद्ध क्लेशों के प्रहाण से उसे पार करके, तीनों ही परिज्ञाओं के कृत्य को पूर्णता (शिखर) तक पहुँचाकर। 'अक्खातारं न मञ्ञति' का अर्थ है - सभी प्रकार की मान्यताओं (अभिमानों) के प्रहीण हो जाने के कारण क्षीणास्त्रव (अर्हत्) स्वयं को 'कहने वाला' नहीं मानता, वह कर्ता आदि स्वभाव वाले किसी 'आत्मा' को स्वीकार नहीं करता - यह अर्थ है। 'फुट्ठो विमोक्खो मनसा, सन्तिपदमनुत्तरं' क्योंकि सभी संस्कृत (संस्कारों) से विमुक्त होने के कारण 'विमोक्ष' और सभी क्लेशों के संताप के उपशमन का स्थान होने के कारण 'शान्तिपद' नाम प्राप्त निर्वाण-धर्म का स्पर्श किया है, प्राप्त किया है, इसलिए वह स्वयं को 'कहने वाला' नहीं मानता। अथवा 'परिञ्ञाय' पद से दुःख-सत्य का परिज्ञा-अभिसमय और समुदाय-सत्य का प्रहाण-अभिसमय कहकर, अब "फुट्ठो विमोक्खो मनसा, सन्तिपदमनुत्तरं" इसके द्वारा मार्ग और निरोध के भावना-साक्षात्क्रिया-अभिसमय को कहते हैं। उसका अर्थ है - समुच्छेद के द्वारा सभी क्लेशों से विमुक्त होता है, इसलिए 'विमोक्ष' आर्यमार्ग है। वह उसके मार्ग-चित्त द्वारा स्पृष्ट (अनुभूत), भावित है, उसी से अनुत्तर शान्तिपद निर्वाण स्पृष्ट (साक्षात्कृत) है। අක්ඛෙය්යසම්පන්නොති අක්ඛෙය්යනිමිත්තං විවිධාහි විපත්තීහි උපද්දුතෙ ලොකෙ පහීනවිපල්ලාසතාය තතො සුපරිමුත්තො අක්ඛෙය්යපරිඤ්ඤාභිනිබ්බත්තාහි සම්පත්තීහි සම්පන්නො සමන්නාගතො. සඞ්ඛාය සෙවීති පඤ්ඤාවෙපුල්ලප්පත්තියා චීවරාදිපච්චයෙ සඞ්ඛාය පරිතුලෙත්වාව සෙවනසීලො, සඞ්ඛාතධම්මත්තා ච ආපාථගතං සබ්බම්පි විසයං ඡළඞ්ගුපෙක්ඛාවසෙන සඞ්ඛාය සෙවනසීලො. ධම්මට්ඨොති අසෙක්ඛධම්මෙසු නිබ්බානධම්මෙ එව වා ඨිතො. වෙදගූති වෙදිතබ්බස්ස චතුසච්චස්ස පාරඞ්ගතත්තා වෙදගූ. එවංගුණො අරහා භවාදීසු කත්ථචි ආයතිං පුනබ්භවාභාවතො මනුස්සදෙවාති සඞ්ඛ්යං න උපෙති, අපඤ්ඤත්තිකභාවමෙව ගච්ඡතීති අනුපාදාපරිනිබ්බානෙන දෙසනං නිට්ඨාපෙසි. 'अक्खेय्यसम्पन्नो' का अर्थ है - कथनीय के निमित्त विविध विपत्तियों से उपद्रुत लोक में, विपर्यासों के प्रहीण हो जाने के कारण उससे भली-भाँति मुक्त, कथनीय की परिज्ञा से उत्पन्न सम्पत्तियों से सम्पन्न, युक्त। 'सङ्खाय सेवी' का अर्थ है - प्रज्ञा की विपुलता प्राप्त होने के कारण चीवर आदि प्रत्ययों का संख्यान (विचार) करके, तुलना करके ही सेवन करने के स्वभाव वाला, और धर्मों का संख्यान (सम्यक् ज्ञान) कर लेने के कारण इन्द्रिय-पथ में आए हुए सभी विषयों का षडङ्ग-उपेक्षा के वश से संख्यान करके सेवन करने के स्वभाव वाला। 'धम्मट्ठो' का अर्थ है - अशैक्ष धर्मों में अथवा निर्वाण धर्म में ही स्थित। 'वेदगू' का अर्थ है - जानने योग्य चार सत्यों के पारगामी होने के कारण वेदगू। ऐसे गुणों वाला अर्हत् भव आदि में कहीं भी भविष्य में पुनर्जन्म न होने के कारण 'मनुष्य' या 'देव' जैसी संज्ञा को प्राप्त नहीं होता, वह प्रज्ञप्ति-रहित भाव को ही प्राप्त होता है - इस प्रकार अनुपादा-परिनिर्वाण के साथ देशना समाप्त की। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. දුච්චරිතසුත්තවණ්ණනා ५. दुच्चरित (दुश्चरित) सूत्र की व्याख्या। 64. පඤ්චමෙ දුට්ඨු චරිතානි, දුට්ඨානි වා චරිතානි දුච්චරිතානි. කායෙන දුච්චරිතං, කායතො වා පවත්තං දුච්චරිතං කායදුච්චරිතං. සෙසෙසුපි එසෙව නයො[Pg.203]. ඉමානි ච දුච්චරිතානි පඤ්ඤත්තියා වා කථෙතබ්බානි කම්මපථෙහි වා. තත්ථ පඤ්ඤත්තියා තාව කායද්වාරෙ පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදස්ස වීතික්කමො කායදුච්චරිතං, වචීද්වාරෙ පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදස්ස වීතික්කමො වචීදුච්චරිතං, උභයත්ථ පඤ්ඤත්තස්ස වීතික්කමො මනොදුච්චරිතන්ති අයං පඤ්ඤත්තිකථා. පාණාතිපාතාදයො පන තිස්සො චෙතනා කායද්වාරෙපි, වචීද්වාරෙපි, උප්පන්නා කායදුච්චරිතං, තථා චතස්සො මුසාවාදාදිචෙතනා වචීදුච්චරිතං, අභිජ්ඣා, බ්යාපාදො, මිච්ඡාදිට්ඨීති තයො චෙතනාසම්පයුත්තධම්මා මනොදුච්චරිතන්ති අයං කම්මපථකථා. ६४. पाँचवें (सूत्र) में, जो बुरी तरह आचरित हैं, अथवा जो दुष्ट आचरण हैं, वे 'दुच्चरित' (दुश्चरित) हैं। काय (शरीर) द्वारा किया गया दुश्चरित, अथवा काय से प्रवृत्त दुश्चरित 'काय-दुश्चरित' है। शेष में भी यही नियम है। और ये दुश्चरित प्रज्ञप्ति के वश से अथवा कर्मपथों के वश से कहे जाने चाहिए। वहाँ प्रज्ञप्ति के वश से - काय-द्वार में प्रज्ञप्त (निर्धारित) शिक्षापद का उल्लंघन 'काय-दुश्चरित' है, वाणी-द्वार में प्रज्ञप्त शिक्षापद का उल्लंघन 'वची-दुश्चरित' है, दोनों स्थानों पर प्रज्ञप्त (शिक्षापद) का उल्लंघन 'मनो-दुश्चरित' है - यह प्रज्ञप्ति-कथा है। किन्तु प्राणातिपात आदि तीन चेतनाएँ काय-द्वार में भी और वाणी-द्वार में भी उत्पन्न होने पर 'काय-दुश्चरित' हैं, वैसे ही मृषावाद आदि चार चेतनाएँ 'वची-दुश्चरित' हैं, और अभिध्या, व्यापाद, मिथ्यादृष्टि - ये तीन चेतना-सम्प्रयुक्त धर्म 'मनो-दुश्चरित' हैं - यह कर्मपथ-कथा है। ගාථායං කම්මපථප්පත්තොයෙව පාපධම්මො කායදුච්චරිතාදිභාවෙන වුත්තොති තදඤ්ඤං පාපධම්මං සඞ්ගණ්හිතුං ‘‘යඤ්චඤ්ඤං දොසසඤ්හිත’’න්ති වුත්තං. තත්ථ දොසසඤ්හිතන්ති රාගාදිකිලෙසසංහිතං. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. गाथा में कर्मपथ को प्राप्त पाप-धर्म ही काय-दुश्चरित आदि के रूप में कहा गया है, इसलिए उससे अन्य पाप-धर्मों का संग्रह करने के लिए "यञ्चञ्ञं दोससञ्हितं" (और जो अन्य दोष-युक्त है) कहा गया है। वहाँ 'दोससञ्हितं' का अर्थ है - राग आदि क्लेशों से युक्त। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. සුචරිතසුත්තවණ්ණනා ६. सुचरित सूत्र की व्याख्या। 65. ඡට්ඨෙ සුට්ඨු චරිතානි, සුන්දරානි වා චරිතානි සුචරිතානි. කායෙන සුචරිතං, කායතො වා පවත්තං සුචරිතං කායසුචරිතං. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. ඉධාපි පන පඤ්ඤත්තිවසෙන, කම්මපථවසෙන චාති දුවිධා කථා. තත්ථ කායද්වාරෙ පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදස්ස අවීතික්කමො කායසුචරිතං, වචීද්වාරෙ පඤ්ඤත්තසික්ඛාපදස්ස අවීතික්කමො වචීසුචරිතං, උභයත්ථ පඤ්ඤත්තස්ස අවීතික්කමො මනොසුචරිතන්ති අයං පඤ්ඤත්තිකථා. පාණාතිපාතාදීහි පන විරමන්තස්ස උප්පන්නා තිස්සො චෙතනාපි විරතියොපි කායසුචරිතං, මුසාවාදාදීහි විරමන්තස්ස චතස්සො චෙතනාපි විරතියොපි වචීසුචරිතං, අනභිජ්ඣා, අබ්යාපාදො, සම්මාදිට්ඨීති තයො චෙතනාසම්පයුත්තධම්මා මනොසුචරිතන්ති අයං කම්මපථකථා. සෙසං වුත්තනයමෙව. ६५. छठे (सूत्र) में, जो अच्छी तरह आचरित हैं, अथवा जो सुन्दर आचरण हैं, वे 'सुचरित' हैं। काय द्वारा किया गया सुचरित, अथवा काय से प्रवृत्त सुचरित 'काय-सुचरित' है। शेष में भी यही नियम है। यहाँ भी प्रज्ञप्ति के वश से और कर्मपथ के वश से - इस प्रकार दो प्रकार की कथा है। वहाँ काय-द्वार में प्रज्ञप्त शिक्षापद का उल्लंघन न करना 'काय-सुचरित' है, वाणी-द्वार में प्रज्ञप्त शिक्षापद का उल्लंघन न करना 'वची-सुचरित' है, दोनों स्थानों पर प्रज्ञप्त (शिक्षापद) का उल्लंघन न करना 'मनो-सुचरित' है - यह प्रज्ञप्ति-कथा है। किन्तु प्राणातिपात आदि से विरत होने वाले की उत्पन्न हुई तीन चेतनाएँ और विरतियाँ 'काय-सुचरित' हैं, मृषावाद आदि से विरत होने वाले की चार चेतनाएँ और विरतियाँ 'वची-सुचरित' हैं, और अनभिध्या, अव्यापाद, सम्यग्दृष्टि - ये तीन चेतना-सम्प्रयुक्त धर्म 'मनो-सुचरित' हैं - यह कर्मपथ-कथा है। शेष पूर्वोक्त रीति से ही है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. සොචෙය්යසුත්තවණ්ණනා ७. सोचेय्य (शौच) सूत्र की व्याख्या। 66. සත්තමෙ [Pg.204] සොචෙය්යානීති සුචිභාවා. කායසොචෙය්යන්ති කායසුචරිතං, වචීමනොසොචෙය්යානිපි වචීමනොසුචරිතානෙව. තථා හි වුත්තං ‘‘තත්ථ කතමං කායසොචෙය්යං? පාණාතිපාතා වෙරමණී’’තිආදි (අ. නි. 3.121-122). ६६. सातवें (सूत्र) में, 'सोचेय्यानि' का अर्थ है - शुचि-भाव (पवित्रता)। 'काय-सोचेय्य' का अर्थ है काय-सुचरित, 'वची-मनो-सोचेय्य' भी वची-मनो-सुचरित ही हैं। जैसा कि कहा गया है - "वहाँ काय-शौच क्या है? प्राणातिपात से विरति" आदि। ගාථායං සමුච්ඡෙදවසෙන පහීනසබ්බකායදුච්චරිතත්තා කායෙන සුචීති කායසුචි. සොචෙය්යසම්පන්නන්ති පටිප්පස්සද්ධකිලෙසත්තා සුපරිසුද්ධාය සොචෙය්යසම්පත්තියා උපෙතං. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथा में, समुच्छेद (पूर्ण उन्मूलन) के माध्यम से सभी शारीरिक दुराचारों के प्रहाण (त्याग) के कारण शरीर से जो शुद्ध है, वह 'कायशुचि' है। 'शौचेयसम्पन्न' का अर्थ है प्रतिप्रश्रब्ध (शांत) क्लेशों के कारण अत्यंत परिशुद्ध शौच-सम्पत्ति (पवित्रता) से युक्त। शेष पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 8. මොනෙය්යසුත්තවණ්ණනා ८. मोनेय्य सुत्त की व्याख्या। 67. අට්ඨමෙ මොනෙය්යානීති එත්ථ ඉධලොකපරලොකං අත්තහිතපරහිතඤ්ච මුනාතීති මුනි, කල්යාණපුථුජ්ජනෙන සද්ධිං සත්ත සෙක්ඛා අරහා ච. ඉධ පන අරහාව අධිප්පෙතො. මුනිනො භාවාති මොනෙය්යානි, අරහතො කායවචීමනොසමාචාරා. ६७. आठवें (सुत्त) में 'मोनेय्यानि' (मुनि-भाव) के विषय में: यहाँ जो इस लोक और परलोक को तथा आत्म-हित और पर-हित को जानता है, वह 'मुनि' है; इसमें कल्याण-पृथग्जन के साथ सात शैक्ष और अर्हत् सम्मिलित हैं। किन्तु यहाँ अर्हत् ही अभिप्रेत है। मुनि के भाव को 'मोनेय्य' कहते हैं, जो अर्हत् के कायिक, वाचिक और मानसिक सदाचार हैं। අථ වා මුනිභාවකරා මොනෙය්යපටිපදාධම්මා මොනෙය්යානි. තෙසමයං විත්ථාරො – अथवा मुनि-भाव को उत्पन्न करने वाले मोनेय्य-प्रतिपदा धर्म 'मोनेय्य' हैं। उनका विस्तार इस प्रकार है – ‘‘තත්ථ කතමං කායමොනෙය්යං? තිවිධකායදුච්චරිතස්ස පහානං කායමොනෙය්යං, තිවිධං කායසුචරිතං කායමොනෙය්යං, කායාරම්මණෙ ඤාණං කායමොනෙය්යං, කායපරිඤ්ඤා කායමොනෙය්යං, පරිඤ්ඤාසහගතො මග්ගො කායමොනෙය්යං, කායස්මිං ඡන්දරාගප්පහානං කායමොනෙය්යං, කායසඞ්ඛාරනිරොධා චතුත්ථජ්ඣානසමාපත්ති කායමොනෙය්යං. "वहाँ काय-मोनेय्य क्या है? तीन प्रकार के काय-दुश्चरित का प्रहाण काय-मोनेय्य है, तीन प्रकार का काय-सुचरित काय-मोनेय्य है, काय-आरम्बन (शरीर रूपी आलम्बन) में ज्ञान काय-मोनेय्य है, काय-परिज्ञा काय-मोनेय्य है, परिज्ञा-सहगत मार्ग काय-मोनेय्य है, काय में छन्द-राग का प्रहाण काय-मोनेय्य है, काय-संस्कारों के निरोध वाली चतुर्थ ध्यान समापत्ति काय-मोनेय्य है।" ‘‘තත්ථ කතමං වචීමොනෙය්යං? චතුබ්බිධවචීදුච්චරිතස්ස පහානං වචීමොනෙය්යං, චතුබ්බිධං වචීසුචරිතං, වාචාරම්මණෙ ඤාණං, වාචාපරිඤ්ඤා, පරිඤ්ඤාසහගතො මග්ගො, වාචාය ඡන්දරාගප්පහානං, වචීසඞ්ඛාරනිරොධා දුතියජ්ඣානසමාපත්ති වචීමොනෙය්යං. "वहाँ वची-मोनेय्य क्या है? चार प्रकार के वची-दुश्चरित का प्रहाण वची-मोनेय्य है, चार प्रकार का वची-सुचरित, वाणी-आरम्बन में ज्ञान, वाणी-परिज्ञा, परिज्ञा-सहगत मार्ग, वाणी में छन्द-राग का प्रहाण, वची-संस्कारों के निरोध वाली द्वितीय ध्यान समापत्ति वची-मोनेय्य है।" ‘‘තත්ථ [Pg.205] කතමං මනොමොනෙය්යං? තිවිධමනොදුච්චරිතස්ස පහානං මනොමොනෙය්යං, තිවිධං මනොසුචරිතං, මනාරම්මණෙ ඤාණං, මනොපරිඤ්ඤා, පරිඤ්ඤාසහගතො මග්ගො, මනස්මිං ඡන්දරාගප්පහානං, චිත්තසඞ්ඛාරනිරොධා සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්ති මනොමොනෙය්ය’’න්ති (මහානි. 14; චූළනි. මෙත්තගූමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 21). "वहाँ मनो-मोनेय्य क्या है? तीन प्रकार के मनो-दुश्चरित का प्रहाण मनो-मोनेय्य है, तीन प्रकार का मनो-सुचरित, मन-आरम्बन में ज्ञान, मन-परिज्ञा, परिज्ञा-सहगत मार्ग, मन में छन्द-राग का प्रहाण, चित्त-संस्कारों के निरोध वाली संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्ति मनो-मोनेय्य है।" (महानिद्देस १४; चुलनिद्देस, मेत्तगूमाणवपुच्छानिद्देस २१)। නින්හාතපාපකන්ති අග්ගමග්ගජලෙන සුට්ඨු වික්ඛාලිතපාපමලං. 'निन्हातपापकं' का अर्थ है अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) रूपी जल से भली-भाँति धोया हुआ पाप-मल। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 9. පඨමරාගසුත්තවණ්ණනා ९. प्रथम राग सुत्त की व्याख्या। 68. නවමෙ යස්ස කස්සචීති අනියමිතවචනං, තස්මා යස්ස කස්සචි පුග්ගලස්ස ගහට්ඨස්ස වා පබ්බජිතස්ස වා. රාගො අප්පහීනොති රඤ්ජනට්ඨෙන රාගො සමුච්ඡෙදවසෙන න පහීනො, මග්ගෙන අනුප්පත්තිධම්මතං න ආපාදිතො. දොසමොහෙසුපි එසෙව නයො. තත්ථ අපායගමනීයා රාගදොසමොහා පඨමමග්ගෙන, ඔළාරිකා කාමරාගදොසා දුතියමග්ගෙන, තෙයෙව අනවසෙසා තතියමග්ගෙන, භවරාගො අවසිට්ඨමොහො ච චතුත්ථමග්ගෙන පහීයන්ති. එවමෙතෙසු පහීයන්තෙසු තදෙකට්ඨතො සබ්බෙපි කිලෙසා පහීයන්තෙව. එවමෙතෙ රාගාදයො යස්ස කස්සචි භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා උපාසකස්ස වා උපාසිකාය වා මග්ගෙන අප්පහීනා. බද්ධො මාරස්සාති කිලෙසමාරෙන බද්ධොති වුච්චති. යදග්ගෙන ච කිලෙසමාරෙන බද්ධො, තදග්ගෙන අභිසඞ්ඛාරමාරාදීහිපි බද්ධොයෙව හොති. පටිමුක්කස්ස මාරපාසොති පටිමුක්කො අස්ස අනෙන අප්පහීනකිලෙසෙන පුග්ගලෙන තායෙව අප්පහීනකිලෙසතාය මාරපාසසඞ්ඛාතො කිලෙසො අත්තනො චිත්තසන්තානෙ පටිමුක්කො පවෙසිතො, තෙන සයං බන්ධාපිතොති අත්ථො. අථ වා පටිමුක්කො අස්ස භවෙය්ය මාරපාසො. සුක්කපක්ඛෙ ඔමුක්කස්සාති අවමුක්කො මොචිතො අපනීතො අස්ස. සෙසං වුත්තවිපරියායෙන වෙදිතබ්බං. ६८. नौवें (सुत्त) में 'यस्स कस्सचि' (जिस किसी का) यह अनियत (अनिश्चित) वचन है, इसलिए जिस किसी पुद्गल का, चाहे वह गृहस्थ हो या प्रव्रजित। 'रागो अप्पहीनो' का अर्थ है—रंजन के अर्थ में राग, जो समुच्छेद (पूर्ण उन्मूलन) के द्वारा प्रहीण नहीं हुआ है, मार्ग के द्वारा अनुत्पत्ति-धर्मिता (पुनः उत्पन्न न होने की अवस्था) को प्राप्त नहीं कराया गया है। द्वेष और मोह के विषय में भी यही नियम है। वहाँ अपाय-गामी राग, द्वेष और मोह प्रथम मार्ग (सोतापत्ति मार्ग) द्वारा; ओदारिक (स्थूल) काम-राग और द्वेष द्वितीय मार्ग द्वारा; वे ही पूर्णतः तृतीय मार्ग द्वारा; और भव-राग तथा शेष मोह चतुर्थ मार्ग द्वारा प्रहीण होते हैं। इस प्रकार इनके प्रहीण होने पर, उनके साथ रहने वाले सभी क्लेश भी प्रहीण हो ही जाते हैं। इस प्रकार ये राग आदि जिस किसी भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक या उपासिका के मार्ग द्वारा प्रहीण नहीं हुए हैं। 'बद्धो मारस्स' का अर्थ है—क्लेश-मार द्वारा बँधा हुआ कहा जाता है। और जिस सीमा तक वह क्लेश-मार द्वारा बँधा है, उसी सीमा तक वह अभिसंस्कार-मार आदि के द्वारा भी बँधा ही होता है। 'पटिमुक्कस्स मारपासो' का अर्थ है—उस प्रहीण न हुए क्लेशों वाले पुद्गल द्वारा उन प्रहीण न हुए क्लेशों के कारण ही मार-पाश संज्ञक क्लेश अपने चित्त-सन्तान में प्रतिमुक्त (पहनाया हुआ) या प्रविष्ट कराया गया है, जिससे वह स्वयं बँध गया है—यह अर्थ है। अथवा, उसके लिए मार-पाश प्रतिमुक्त (लगा हुआ) हो। शुक्ल पक्ष (सकारात्मक पक्ष) में 'ओमुक्कस्स' का अर्थ है—मुक्त किया हुआ, छुड़ाया हुआ, हटाया हुआ। शेष को पूर्वोक्त के विपरीत क्रम से समझना चाहिए। ඉධ ගාථා සුක්කපක්ඛවසෙනෙව ආගතා. තත්රායං සඞ්ඛෙපත්ථො – යස්ස අරියපුග්ගලස්ස රාගදොසාවිජ්ජා විරාජිතා අග්ගමග්ගෙන නිරොධිතා, තං භාවිතකායසීලචිත්තපඤ්ඤතාය [Pg.206] භාවිතත්තෙසු අරහන්තෙසු අඤ්ඤතරං අබ්භන්තරං එකං බ්රහ්මභූතං බ්රහ්මං වා සෙට්ඨං අරහත්තඵලං පත්තං. යථා අඤ්ඤෙ ඛීණාසවා පුබ්බූපනිස්සයසම්පත්තිසමන්නාගතා හුත්වා ආගතා, යථා ච තෙ අන්තද්වයරහිතාය සීලසමාධිපඤ්ඤාක්ඛන්ධසහගතාය මජ්ඣිමාය පටිපදාය නිබ්බානං ගතා අධිගතා. යථා වා තෙ ඛන්ධාදීනං තථලක්ඛණං යාථාවතො පටිවිජ්ඣිංසු, යථා ච තෙ තථධම්මෙ දුක්ඛාදයො අවිපරීතතො අබ්භඤ්ඤිංසු, රූපාදිකෙ ච විසයෙ යථා තෙ දිට්ඨමත්තාදිවසෙනෙව පස්සිංසු, යථා වා පන තෙ අට්ඨ අනරියවොහාරෙ වජ්ජෙත්වා අරියවොහාරවසෙනෙව පවත්තවාචා, වාචානුරූපඤ්ච පවත්තකායා, කායානුරූපඤ්ච පවත්තවාචා, තථා අයම්පි අරියපුග්ගලොති තථාගතං, චතුසච්චබුද්ධතාය බුද්ධං, පුග්ගලවෙරං කිලෙසවෙරං අත්තානුවාදාදිභයඤ්ච අතික්කන්තන්ති වෙරභයාතීතං. සබ්බෙසං කිලෙසාභිසඞ්ඛාරාදීනං පහීනත්තා සබ්බප්පහායිනං බුද්ධාදයො අරියා ආහු කථෙන්ති කිත්තෙන්තීති. यहाँ गाथा शुक्ल-पक्ष के अनुसार ही आई है। वहाँ यह संक्षिप्त अर्थ है—जिस आर्य पुद्गल के राग, द्वेष और अविद्या अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) द्वारा विरजित (नष्ट) और निरुद्ध कर दिए गए हैं, उसे भावित-काय, भावित-शील, भावित-चित्त और भावित-प्रज्ञा होने के कारण 'भावित-आत्मा' अर्हन्तों में से एक, अभ्यन्तर (भीतर से शुद्ध), ब्रह्मभूत अथवा श्रेष्ठ अर्हत्-फल को प्राप्त (कहा जाता है)। जैसे अन्य क्षीणास्त्रव पूर्व उपनिश्रय-सम्पत्ति (पूर्व पुण्य) से युक्त होकर आए हैं, और जैसे वे दो अन्तों (अतिवादों) से रहित शील-समाधि-प्रज्ञा स्कन्धों से युक्त मध्यम प्रतिपदा के द्वारा निर्वाण को प्राप्त हुए हैं। अथवा जैसे उन्होंने स्कन्धों आदि के यथार्थ लक्षण का यथावत भेदन (साक्षात्कार) किया, और जैसे उन्होंने दुःख आदि सत्य धर्मों को अविपरीत (सही) रूप से जाना, और रूपादि विषयों को जैसे उन्होंने 'दृष्ट-मात्र' आदि के वश से ही देखा, अथवा जैसे वे आठ अनार्य-व्यवहारों को त्याग कर आर्य-व्यवहारों के अनुसार ही वाणी प्रवृत्त करने वाले, वाणी के अनुरूप शरीर को प्रवृत्त करने वाले और शरीर के अनुरूप वाणी को प्रवृत्त करने वाले हैं, वैसे ही यह आर्य पुद्गल भी है, इसलिए इसे 'तथागत' (तथा-गत), चार सत्यों को जानने के कारण 'बुद्ध', पुद्गल-वैर, क्लेश-वैर और आत्म-अनुवाद (आत्म-निन्दा) आदि के भय को पार कर लेने के कारण 'वैर-भयातीत' कहा गया है। सभी क्लेशों और अभिसंस्कारों आदि के प्रहीण होने के कारण इसे 'सर्व-प्रहायी' (सब कुछ त्याग देने वाला) बुद्ध आदि आर्य कहते हैं, वर्णन करते हैं, कीर्तन करते हैं। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 10. දුතියරාගසුත්තවණ්ණනා १०. द्वितीय राग सुत्त की व्याख्या। 69. දසමෙ අතරීති තිණ්ණො, න තිණ්ණො අතිණ්ණො. සමුද්දන්ති සංසාරසමුද්දං, චක්ඛායතනාදිසමුද්දං වා. තදුභයම්පි දුප්පූරණට්ඨෙන සමුද්දො වියාති සමුද්දං. අථ වා සමුද්දනට්ඨෙන සමුද්දං, කිලෙසවස්සනෙන සත්තසන්තානස්ස කිලෙසසදනතොති අත්ථො. සවීචින්ති කොධූපායාසවීචීහි සවීචිං. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘වීචිභයන්ති ඛො, භික්ඛු, කොධූපායාසස්සෙතං අධිවචන’’න්ති (ඉතිවු. 109; ම. නි. 2.162). සාවට්ටන්ති පඤ්චකාමගුණාවට්ටෙහි සහ ආවට්ටං. වුත්තම්පි චෙතං ‘‘ආවට්ටභයන්ති ඛො, භික්ඛු, පඤ්චන්නෙතං කාමගුණානං අධිවචන’’න්ති (ඉතිවු. 109; ම. නි. 2.164; අ. නි. 4.122). සගහං සරක්ඛසන්ති අත්තනො ගොචරගතානං අනත්ථජනනතො චණ්ඩමකරමච්ඡකච්ඡපරක්ඛසසදිසෙහි විසභාගපුග්ගලෙහි සහිතං. තථා චාහ ‘‘සගහං සරක්ඛසන්ති ඛො, භික්ඛු, මාතුගාමස්සෙතං අධිවචන’’න්ති (ඉතිවු. 109). අතරීති මග්ගපඤ්ඤානාවාය යථාවුත්තං සමුද්දං උත්තරි. තිණ්ණොති නිත්තිණ්ණො. පාරඞ්ගතොති [Pg.207] තස්ස සමුද්දස්ස පාරං පරතීරං නිරොධං උපගතො. ථලෙ තිට්ඨතීති තතො එව සංසාරමහොඝං කාමාදිමහොඝඤ්ච අතික්කමිත්වා ථලෙ පරතීරෙ නිබ්බානෙ බාහිතපාපබ්රාහ්මණො තිට්ඨතීති වුච්චති. ६९. दसवीं (गाथा) में 'अतरी' (पार कर लिया) का अर्थ है 'तीर्ण' (पार किया हुआ), जो पार नहीं किया वह 'अतीर्ण' है। 'समुद्र' का अर्थ है संसार-समुद्र, अथवा चक्षु-आयतन आदि समुद्र। वे दोनों ही दुष्पूरणीय होने के कारण समुद्र के समान होने से 'समुद्र' कहलाते हैं। अथवा 'समुद्दन' (क्लेशों के वर्षण) के अर्थ में समुद्र है, क्लेशों के वर्षण से सत्त्वों की संतान में क्लेशों के बैठने (सदन) के कारण यह अर्थ है। 'सवीचि' (लहरों सहित) का अर्थ है क्रोध और उपायास रूपी लहरों के साथ। जैसा कि कहा गया है— "भिक्षु! 'वीचिभय' यह क्रोध और उपायास का ही पर्यायवाची है।" 'सावट्टं' (भँवरों सहित) का अर्थ है पाँच कामगुण रूपी भँवरों के साथ। यह भी कहा गया है— "भिक्षु! 'आवृत्तभय' यह पाँच कामगुणों का ही पर्यायवाची है।" 'सगहं सरक्खसं' (ग्राहों और राक्षसों सहित) का अर्थ है अपने गोचर में आए हुए लोगों का अनर्थ करने के कारण क्रूर मगरमच्छ, मछली, कछुआ और राक्षसों के समान विजातीय (विपरीत स्वभाव वाले) व्यक्तियों के साथ। जैसा कि कहा गया है— "भिक्षु! 'सगहं सरक्खसं' यह मातृग्राम (स्त्री) का ही पर्यायवाची है।" 'अतरी' का अर्थ है मार्ग-प्रज्ञा रूपी नौका से यथाकथित समुद्र को पार कर लिया। 'तिण्णो' का अर्थ है निस्तीर्ण (पूरी तरह पार किया हुआ)। 'पारङ्गतो' का अर्थ है उस समुद्र के पार, दूसरे तट अर्थात् निरोध (निर्वाण) को प्राप्त। 'थले तिट्ठति' का अर्थ है वहीं से संसार के महाओघ और काम आदि महाओघ को पार कर स्थल पर, दूसरे तट निर्वाण में 'बाहितपाप' (पापों को दूर करने वाला) ब्राह्मण स्थित है, ऐसा कहा जाता है। ඉධාපි ගාථා සුක්කපක්ඛවසෙනෙව ආගතා. තත්ථ ඌමිභයන්ති යථාවුත්තඌමිභයං, භායිතබ්බං එතස්මාති තං ඌමි භයං. දුත්තරන්ති දුරතික්කමං. අච්චතාරීති අතික්කමි. यहाँ भी गाथा शुक्लपक्ष (कुशल पक्ष) के वश से ही आई है। वहाँ 'ऊमिभय' का अर्थ है यथाकथित लहरों का भय, जिससे डरना चाहिए वह 'ऊमि भय' है। 'दुत्तरं' का अर्थ है जिसे पार करना कठिन हो (दुरतिक्रम)। 'अच्चतारी' का अर्थ है पार कर लिया (अतिक्रमण किया)। සඞ්ගාතිගොති රාගාදීනං පඤ්චන්නං සඞ්ගානං අතික්කන්තත්තා පහීනත්තා සඞ්ගාතිගො. අත්ථඞ්ගතො සො න පමාණමෙතීති සො එවංභූතො අරහා රාගාදීනං පමාණකරධම්මානං අච්චන්තමෙව අත්ථං ගතත්තා අත්ථඞ්ගතො, තතො එව සීලාදිධම්මක්ඛන්ධපාරිපූරියා ච ‘‘එදිසො සීලෙන සමාධිනා පඤ්ඤායා’’ති කෙනචි පමිණිතුං අසක්කුණෙය්යො පමාණං න එති, අථ වා අනුපාදිසෙසනිබ්බානසඞ්ඛාතං අත්ථං ගතො සො අරහා ‘‘ඉමාය නාම ගතියා ඨිතො, එදිසො ච නාමගොත්තෙනා’’ති පමිණිතුං අසක්කුණෙය්යතාය පමාණං න එති න උපගච්ඡති. තතො එව අමොහයි මච්චුරාජං, තෙන අනුබන්ධිතුං අසක්කුණෙය්යොති වදාමීති අනුපාදිසෙසනිබ්බානධාතුයාව දෙසනං නිට්ඨාපෙසි. ඉති ඉමස්මිං වග්ගෙ පඨමපඤ්චමඡට්ඨෙසු වට්ටං කථිතං, දුතියසත්තමඅට්ඨමෙසු විවට්ටං, සෙසෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතන්ති වෙදිතබ්බං. 'सङ्गातिगो' का अर्थ है राग आदि पाँच संगों (आसक्तियों) को पार कर लेने के कारण, त्याग देने के कारण 'सङ्गातिगो' है। 'अत्थङ्गतो सो न पमाणमेति' का अर्थ है वह इस प्रकार का अर्हत् राग आदि प्रमाण-कारक धर्मों के अत्यंत अस्त हो जाने के कारण 'अस्तंगत' है, और उसी कारण शील आदि धर्मस्कन्धों की परिपूर्णता से "यह शील, समाधि और प्रज्ञा में ऐसा है" इस प्रकार किसी के द्वारा मापे जाने में असमर्थ होने से 'प्रमाण' को प्राप्त नहीं होता; अथवा अनुपधिशेष निर्वाण संज्ञक 'अर्थ' (लक्ष्य) को प्राप्त वह अर्हत् "इस नाम की गति में स्थित है, और इस नाम-गोत्र वाला है" इस प्रकार मापे जाने में असमर्थ होने के कारण प्रमाण को प्राप्त नहीं होता, नहीं पहुँचता। उसी कारण 'मृत्युराज को मोहित कर दिया', उसके द्वारा पीछा किए जाने में असमर्थ है, ऐसा मैं कहता हूँ—इस प्रकार अनुपधिशेष निर्वाण धातु तक देशना समाप्त की। इस प्रकार इस वर्ग में पहले, पाँचवें और छठे (सूत्रों) में 'वट्ट' (संसार) कहा गया है, दूसरे, सातवें और आठवें में 'विवट्ट' (निर्वाण) कहा गया है, और शेष में 'वट्ट-विवट्ट' कहा गया है, ऐसा जानना चाहिए। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। දුතියවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दूसरे वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। 3. තතියවග්ගො ३. तृतीय वर्ग 1. මිච්ඡාදිට්ඨිකසුත්තවණ්ණනා १. मिथ्यादृष्टिक सूत्र की व्याख्या 70. තතියවග්ගස්ස පඨමෙ දිට්ඨා මයාති මයා දිට්ඨා, මම සමන්තචක්ඛුනා දිබ්බචක්ඛුනා චාති ද්වීහිපි චක්ඛූහි දිට්ඨා පච්චක්ඛතො විදිතා. තෙන අනුස්සවාදිං පටික්ඛිපති, අයඤ්ච අත්ථො ඉදානෙව පාළියං ආගමිස්සති. කායදුච්චරිතෙන සමන්නාගතාති කායදුච්චරිතෙන සමඞ්ගීභූතා. අරියානං උපවාදකාති බුද්ධාදීනං අරියානං අන්තමසො ගිහිසොතාපන්නානම්පි ගුණපරිධංසනෙන අභූතබ්භක්ඛානෙන උපවාදකා අක්කොසකා ගරහකා. මිච්ඡාදිට්ඨිකාති [Pg.208] විපරීතදස්සනා. මිච්ඡාදිට්ඨිකම්මසමාදානාති මිච්ඡාදස්සනහෙතු සමාදින්නනානාවිධකම්මා යෙ ච, මිච්ඡාදිට්ඨිමූලකෙසු කායකම්මාදීසු අඤ්ඤෙපි සමාදපෙන්ති. එත්ථ ච වචීමනොදුච්චරිතග්ගහණෙනෙව අරියූපවාදමිච්ඡාදිට්ඨීසු ගහිතාසු පුනවචනං මහාසාවජ්ජභාවදස්සනත්ථං නෙසං. මහාසාවජ්ජො හි අරියූපවාදො ආනන්තරියසදිසො. යථාහ – ७०. तीसरे वर्ग के पहले (सूत्र) में 'दिट्ठा मया' का अर्थ है मेरे द्वारा देखा गया, मेरे समन्तचक्षु और दिव्यचक्षु—इन दोनों ही चक्षुओं से देखा गया, प्रत्यक्ष रूप से जाना गया। इससे अनुश्रव (सुनी-सुनाई बात) आदि का निषेध करते हैं, और यह अर्थ अभी पालि में आएगा। 'कायदुच्चरितेन समन्नागता' का अर्थ है काय-दुश्चरित से युक्त। 'अरियानं उपवादका' का अर्थ है बुद्ध आदि आर्यों की, यहाँ तक कि गृहस्थ स्रोतआपन्नों की भी, गुणों के विनाश (निंदा) और असत्य दोषारोपण द्वारा उपवाद (निंदा) करने वाले, कोसने वाले, गर्हा करने वाले। 'मिच्छादिट्ठिका' का अर्थ है विपरीत दर्शन वाले। 'मिच्छादिट्ठिकम्मसमादाना' का अर्थ है मिथ्या दर्शन के कारण ग्रहण किए गए नाना प्रकार के कर्म, और जो मिथ्यादृष्टि मूलक काय-कर्म आदि में दूसरों को भी प्रवृत्त करते हैं। यहाँ वचन और मन के दुश्चरित के ग्रहण से ही आर्य-उपवाद और मिथ्यादृष्टि के गृहीत होने पर भी, उनका पुनः कथन उनके महा-सावद्य (अत्यधिक दोषपूर्ण) होने को दिखाने के लिए है। क्योंकि आर्य-उपवाद आनन्तर्य (कर्म) के समान महा-सावद्य है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘සෙය්යථාපි, සාරිපුත්ත, භික්ඛු සීලසම්පන්නො, සමාධිසම්පන්නො, පඤ්ඤාසම්පන්නො, දිට්ඨෙව ධම්මෙ අඤ්ඤං ආරාධෙය්ය; එවංසම්පදමිදං, සාරිපුත්ත, වදාමි තං වාචං අප්පහාය, තං චිත්තං අප්පහාය, තං දිට්ඨිං අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වා යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙ’’ති (ම. නි. 1.149). "जैसे कि, सारिपुत्र! कोई भिक्षु शील-सम्पन्न, समाधि-सम्पन्न, प्रज्ञा-सम्पन्न हो और इसी जन्म में अर्हत्त्व प्राप्त कर ले; सारिपुत्र! मैं कहता हूँ कि उस (आर्य-निंदा रूपी) वाणी को न छोड़कर, उस चित्त को न छोड़कर, उस (मिथ्या) दृष्टि का परित्याग न कर, वह यथा-लाया हुआ (बोझ) के समान नरक में डाल दिया जाता है।" මිච්ඡාදිට්ඨිතො ච මහාසාවජ්ජතරං නාම අඤ්ඤං නත්ථි. යථාහ – और मिथ्यादृष्टि से बढ़कर दूसरा कोई महा-सावद्य (बड़ा पाप) नहीं है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘නාහං, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤං එකධම්මම්පි සමනුපස්සාමි, යං එවං මහාසාවජ්ජතරං යථයිදං, භික්ඛවෙ, මිච්ඡාදිට්ඨි. මිච්ඡාදිට්ඨිපරමානි, භික්ඛවෙ, වජ්ජානී’’ති (අ. නි. 1.310). "भिक्षुओं! मैं किसी एक भी अन्य धर्म को नहीं देखता जो इस प्रकार महा-सावद्य हो जैसा कि यह मिथ्यादृष्टि है। भिक्षुओं! दोषों में मिथ्यादृष्टि परम (सबसे बड़ा) है।" තං ඛො පනාතිආදි යථාවුත්තස්ස අත්ථස්ස අත්තපච්චක්ඛභාවං දළ්හතරං කත්වා දස්සෙතුං ආරද්ධං. තම්පි සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. 'तं खो पन' इत्यादि यथाकथित अर्थ के आत्म-प्रत्यक्ष भाव को और अधिक दृढ़ करके दिखाने के लिए आरम्भ किया गया है। वह भी सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ගාථාසු මිච්ඡා මනං පණිධායාති අභිජ්ඣාදීනං වසෙන චිත්තං අයොනිසො ඨපෙත්වා. මිච්ඡා වාචඤ්ච භාසියාති මිච්ඡා මුසාවාදාදිවසෙන වාචං භාසිත්වා. මිච්ඡා කම්මානි කත්වානාති පාණාතිපාතාදිවසෙන කායකම්මානි කත්වා. අථ වා මිච්ඡා මනං පණිධායාති මිච්ඡාදිට්ඨිවසෙන චිත්තං විපරීතං ඨපෙත්වා. සෙසපදද්වයෙපි එසෙව නයො. ඉදානිස්ස තථා දුච්චරිතචරණෙ කාරණං දස්සෙති අප්පස්සුතොති, අත්තනො පරෙසඤ්ච හිතාවහෙන සුතෙන විරහිතොති අත්ථො. අපුඤ්ඤකරොති තතො එව අරියධම්මස්ස අකොවිදතාය කිබ්බිසකාරී පාපධම්මො. අප්පස්මිං ඉධ ජීවිතෙති ඉධ මනුස්සලොකෙ ජීවිතෙ අතිපරිත්තෙ. තථා චාහ ‘‘යො චිරං ජීවති, සො වස්සසතං අප්පං වා භිය්යො’’ති (දී. නි. 2.93; සං. නි. 1.145), ‘‘අප්පමායු මනුස්සාන’’න්ති (සං. නි. 1.145; මහානි. 10) ච. තස්මා බහුස්සුතො සප්පඤ්ඤො සීඝං පුඤ්ඤානි කත්වා සග්ගූපගො නිබ්බානපතිට්ඨො [Pg.209] වා හොති. යො පන අප්පස්සුතො අපුඤ්ඤකරො, කායස්ස භෙදා දුප්පඤ්ඤො නිරයං සො උපපජ්ජතීති. गाथाओं में 'मिथ्या मन को प्रणिधान कर' (micchā manaṃ paṇidhāya) का अर्थ है अभिध्या आदि के वश में होकर चित्त को अयोनिशः (अनुचित रूप से) स्थापित करना। 'मिथ्या वाणी बोलकर' का अर्थ है मृषावाद (झूठ) आदि के वश में होकर वाणी बोलना। 'मिथ्या कर्म करके' का अर्थ है प्राणातिपात (हिंसा) आदि के वश में होकर कायिक कर्म करना। अथवा 'मिथ्या मन को प्रणिधान कर' का अर्थ है मिथ्या दृष्टि के वश में होकर चित्त को विपरीत रूप से स्थापित करना। शेष दो पदों में भी यही न्याय (विधि) है। अब उसके इस प्रकार के दुश्चरित आचरण का कारण बताते हैं—'अल्पश्रुत' (appassuto), जिसका अर्थ है अपने और दूसरों के हितकारी श्रुत (ज्ञान) से रहित होना। 'अपुण्यकारी' का अर्थ है उसी कारण से आर्य धर्म में अकुशल होने के कारण पाप करने वाला, पापधर्मी। 'यहाँ अल्प जीवन में' का अर्थ है इस मनुष्य लोक में अत्यंत अल्प जीवन में। जैसा कि कहा गया है— "जो दीर्घजीवी होता है, वह सौ वर्ष या उससे कुछ अधिक जीता है" और "मनुष्यों की आयु अल्प है"। इसलिए बहुश्रुत और प्रज्ञावान व्यक्ति शीघ्र ही पुण्य कर्म करके स्वर्गगामी होता है या निर्वाण में प्रतिष्ठित होता है। किन्तु जो अल्पश्रुत और अपुण्यकारी है, वह दुर्बुद्धि शरीर के भेद (मृत्यु) के बाद नरक में उत्पन्न होता है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 2. සම්මාදිට්ඨිකසුත්තවණ්ණනා २. सम्यग्दृष्टि सूत्र की व्याख्या। 71. දුතියෙ පඨමසුත්තෙ වුත්තවිපරියායෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. ७१. दूसरे (सूत्र) में प्रथम सूत्र में कहे गए के विपरीत अर्थ समझना चाहिए। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. නිස්සරණියසුත්තවණ්ණනා ३. निःसरणीय सूत्र की व्याख्या। 72. තතියෙ නිස්සරණියාති නිස්සරණපටිසංයුත්තා. ධාතුයොති සත්තසුඤ්ඤසභාවා. කාමානන්ති කිලෙසකාමානඤ්චෙව වත්ථුකාමානඤ්ච. අථ වා කාමානන්ති කිලෙසකාමානං. කිලෙසකාමතො හි නිස්සරණා වත්ථුකාමෙහිපි නිස්සරණංයෙව හොති, න අඤ්ඤථා. වුත්තඤ්හෙතං – ७२. तीसरे (सूत्र) में 'निःसरणीय' का अर्थ है निःसरण (मुक्ति) से संबंधित। 'धातु' का अर्थ है सत्व-शून्य स्वभाव। 'कामों का' का अर्थ है क्लेश-काम और वस्तु-काम दोनों का। अथवा 'कामों का' का अर्थ है क्लेश-कामों का। क्योंकि क्लेश-काम से निःसरण होने पर वस्तु-कामों से भी निःसरण ही होता है, अन्यथा नहीं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘න තෙ කාමා යානි චිත්රානි ලොකෙ,සඞ්කප්පරාගො පුරිසස්ස කාමො; තිට්ඨන්ති චිත්රානි තථෙව ලොකෙ,අථෙත්ථ ධීරා විනයන්ති ඡන්ද’’න්ති. (අ. නි. 6.63); "वे काम नहीं हैं जो लोक में विचित्र (सुंदर वस्तुएँ) हैं, मनुष्य का काम तो संकल्प-राग है; लोक में वे विचित्र वस्तुएँ वैसी ही रहती हैं, किन्तु धीर पुरुष उनमें अपनी इच्छा (छंद) का दमन करते हैं।" නිස්සරණන්ති අපගමො. නෙක්ඛම්මන්ති පඨමජ්ඣානං, විසෙසතො තං අසුභාරම්මණං දට්ඨබ්බං. යො පන තං ඣානං පාදකං කත්වා සඞ්ඛාරෙ සම්මසිත්වා තතියමග්ගං පත්වා අනාගාමිමග්ගෙන නිබ්බානං සච්ඡිකරොති, තස්ස චිත්තං අච්චන්තමෙව කාමෙහි නිස්සටන්ති ඉදං උක්කට්ඨතො කාමානං නිස්සරණං වෙදිතබ්බං. රූපානන්ති රූපධම්මානං, විසෙසෙන සද්ධිං ආරම්මණෙහි කුසලවිපාකකිරියාභෙදතො සබ්බෙසං රූපාවචරධම්මානං. ආරුප්පන්ති අරූපාවචරජ්ඣානං. කෙචි පන ‘‘කාමාන’’න්ති පදස්ස ‘‘සබ්බෙසං කාමාවචරධම්මාන’’න්ති අත්ථං වදන්ති. ‘‘නෙක්ඛම්ම’’න්ති ච ‘‘පඤ්ච රූපාවචරජ්ඣානානී’’ති. තං අට්ඨකථාසු [Pg.210] නත්ථි, න යුජ්ජති ච. භූතන්ති ජාතං. සඞ්ඛතන්ති සමෙච්ච සම්භුය්ය පච්චයෙහි කතං. පටිච්චසමුප්පන්නන්ති කාරණතො නිබ්බත්තං. තීහිපි පදෙහි තෙභූමකෙ ධම්මෙ අනවසෙසතො පරියාදියති. නිරොධොති නිබ්බානං. එත්ථ ච පඨමාය ධාතුයා කාමපරිඤ්ඤා වුත්තා, දුතියාය රූපපරිඤ්ඤා, තතියාය සබ්බසඞ්ඛතපරිඤ්ඤා සබ්බභවසමතික්කමො වුත්තො. 'निःसरण' का अर्थ है दूर होना। 'नैष्क्रम्य' का अर्थ है प्रथम ध्यान, विशेष रूप से उसे अशुभ-आरम्बन वाला समझना चाहिए। जो उस ध्यान को पादक (आधार) बनाकर संस्कारों का सम्मर्शन (परीक्षण) कर तृतीय मार्ग (अनागामी मार्ग) को प्राप्त कर अनागामी मार्ग से निर्वाण का साक्षात्कार करता है, उसका चित्त अत्यंत रूप से कामों से निःसृत (मुक्त) हो जाता है—यह कामों का उत्कृष्ट निःसरण समझना चाहिए। 'रूपों का' का अर्थ है रूप धर्मों का, विशेष रूप से आरम्बनों के साथ कुशल-विपाक-क्रिया के भेद से सभी रूपावचर धर्मों का। 'आरूप्य' का अर्थ है अरूपावचर ध्यान। कुछ लोग 'कामों का' पद का अर्थ 'सभी कामावचर धर्मों का' कहते हैं और 'नैष्क्रम्य' का अर्थ 'पाँच रूपावचर ध्यान' कहते हैं। वह अट्ठकथाओं में नहीं है और उचित भी नहीं है। 'भूत' का अर्थ है उत्पन्न। 'संस्कृत' का अर्थ है प्रत्ययों द्वारा मिलकर बनाया गया। 'प्रतीत्यसमुत्पन्न' का अर्थ है कारण से उत्पन्न। इन तीनों पदों से तीनों भूमियों के धर्मों का पूर्णतः समावेश हो जाता है। 'निरोध' का अर्थ है निर्वाण। यहाँ प्रथम धातु द्वारा काम-परिज्ञा कही गई है, द्वितीय द्वारा रूप-परिज्ञा, और तृतीय द्वारा सभी संस्कृत-परिज्ञा तथा सभी भवों का अतिक्रमण कहा गया है। ගාථාසු කාමනිස්සරණං ඤත්වාති ‘‘ඉදං කාමනිස්සරණං – එවඤ්ච කාමතො නිස්සරණ’’න්ති ජානිත්වා. අතික්කමති එතෙනාති අතික්කමො, අතික්කමනූපායො, තං අතික්කමං ආරුප්පං ඤත්වා. සබ්බෙ සඞ්ඛාරා සමන්ති වූපසමන්ති එත්ථාති සබ්බසඞ්ඛාරසමථො, නිබ්බානං, තං ඵුසං ඵුසන්තො. සෙසං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. गाथाओं में 'काम-निःसरण को जानकर' का अर्थ है "यह काम-निःसरण है और इस प्रकार काम से निःसरण होता है"—ऐसा जानकर। 'जिसके द्वारा अतिक्रमण करता है' वह 'अतिक्रम' है, अर्थात् अतिक्रमण का उपाय; उस अतिक्रम रूप आरूप्य को जानकर। 'सभी संस्कार जहाँ शांत होते हैं' वह 'सर्वसंस्कार-शमथ' है, अर्थात् निर्वाण; उसका स्पर्श करते हुए। शेष पहले कहे गए न्याय के अनुसार ही है। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. සන්තතරසුත්තවණ්ණනා ४. शांततर सूत्र की व्याख्या। 73. චතුත්ථෙ රූපෙහීති රූපාවචරධම්මෙහි. සන්තතරාති අතිසයෙන සන්තා. රූපාවචරධම්මා හි කිලෙසවික්ඛම්භනතො විතක්කාදිඔළාරිකඞ්ගප්පහානතො සමාධිභූමිභාවතො ච සන්තා නාම, ආරුප්පා පන තෙහිපි අඞ්ගසන්තතාය චෙව ආරම්මණසන්තතාය ච අතිසයෙන සන්තවුත්තිකා, තෙන සන්තතරාති වුත්තා. නිරොධොති නිබ්බානං. සඞ්ඛාරාවසෙසසුඛුමභාවප්පත්තිතොපි හි චතුත්ථාරුප්පතො ඵලසමාපත්තියොව සන්තතරා කිලෙසදරථපටිපස්සද්ධිතො නිබ්බානාරම්මණතො ච, කිමඞ්ගං පන සබ්බසඞ්ඛාරසමථො නිබ්බානං. තෙන වුත්තං ‘‘ආරුප්පෙහි නිරොධො සන්තතරො’’ති. ७३. चौठे (सूत्र) में 'रूपों से' का अर्थ है रूपावचर धर्मों से। 'शांततर' का अर्थ है अत्यंत शांत। रूपावचर धर्म क्लेशों के विष्कम्भन (दबाने) के कारण, वितर्क आदि ओदारिक अंगों के प्रहाण के कारण और समाधि-भूमि होने के कारण 'शांत' कहलाते हैं, किन्तु आरूप्य (अरूप ध्यान) उनसे भी अंगों की शांति और आरम्बन की शांति के कारण अत्यंत शांत वृत्ति वाले होते हैं, इसलिए उन्हें 'शांततर' कहा गया है। 'निरोध' का अर्थ है निर्वाण। संस्कारों के अवशेष सूक्ष्म भाव को प्राप्त होने के कारण चौथे आरूप्य से फल-समापत्तियाँ ही अधिक शांत हैं, और क्लेशों की थकावट की शांति तथा निर्वाण-आरम्बन होने के कारण (वे शांत हैं ही), फिर सभी संस्कारों के शमन रूप निर्वाण के बारे में तो कहना ही क्या! इसलिए कहा गया है— "आरूप्यों से निरोध शांततर है"। ගාථාසු රූපූපගාති රූපභවූපගා. රූපභවො හි ඉධ රූපන්ති වුත්තො, ‘‘රූපූපපත්තියා මග්ගං භාවෙතී’’තිආදීසු විය. අරූපට්ඨායිනොති අරූපාවචරා. නිරොධං අප්පජානන්තා, ආගන්තාරො පුනබ්භවන්ති එතෙන රූපාරූපාවචරධම්මෙහි නිරොධස්ස සන්තභාවමෙව දස්සෙති. අරූපෙසු අසණ්ඨිතාති අරූපරාගෙන අරූපභවෙසු අප්පතිට්ඨහන්තා, තෙපි පරිජානන්තාති අත්ථො. නිරොධෙ යෙ විමුච්චන්තීති එත්ථ යෙති නිපාතමත්තං. සෙසං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. गाथाओं में 'रूपोपगा' का अर्थ है रूप-भव में जाने वाले। यहाँ रूप-भव को ही 'रूप' कहा गया है, जैसे "रूपोपपत्ति के लिए मार्ग की भावना करता है" आदि में। 'अरूपस्थायी' का अर्थ है अरूपावचर। 'निरोध को न जानते हुए, वे पुनः जन्म को प्राप्त होते हैं'—इसके द्वारा रूप और अरूपावचर धर्मों से निरोध की शांतता ही प्रदर्शित की गई है। 'अरूपों में प्रतिष्ठित न होने वाले' का अर्थ है अरूप-राग के कारण अरूप-भवों में न ठहरने वाले, अर्थात् उन्हें भी पूर्णतः जानने वाले। 'जो निरोध में विमुक्त होते हैं'—यहाँ 'ये' (ye) मात्र एक निपात है। शेष पहले कहे गए न्याय के अनुसार ही है। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. පුත්තසුත්තවණ්ණනා ५. पुत्र सूत्र की व्याख्या। 74. පඤ්චමෙ [Pg.211] පුත්තාති අත්රජා ඔරසපුත්තා, දින්නකාදයොපි වා. සන්තොති භවන්තා සංවිජ්ජමානා ලොකස්මින්ති ඉමස්මිං ලොකෙ උපලබ්භමානා. අත්ථිභාවෙන සන්තො, පාකටභාවෙන විජ්ජමානා. අතිජාතොති අත්තනො ගුණෙහි මාතාපිතරො අතික්කමිත්වා ජාතො, තෙහි අධිකගුණොති අත්ථො. අනුජාතොති ගුණෙහි මාතාපිතූනං අනුරූපො හුත්වා ජාතො, තෙහි සමානගුණොති අත්ථො. අවජාතොති ගුණෙහි මාතාපිතූනං අධමො හුත්වා ජාතො, තෙහි හීනගුණොති අත්ථො. යෙහි පන ගුණෙහි යුත්තො මාතාපිතූනං අධිකො සමො හීනොති ච අධිප්පෙතො, තෙ විභජිත්වා දස්සෙතුං ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, පුත්තො අතිජාතො හොතී’’ති කථෙතුකම්යතාය පුච්ඡං කත්වා ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, පුත්තස්සා’’තිආදිනා නිද්දෙසො ආරද්ධො. ७४. पाँचवें (सुत्त) में 'पुत्र' का अर्थ है आत्मज, औरस पुत्र, अथवा दत्तक आदि भी। 'सन्तो' का अर्थ है इस लोक में विद्यमान या उपलब्ध होने वाले। अस्तित्व के कारण 'सन्त' और प्रकट होने के कारण 'विद्यमान'। 'अतिजात' वह है जो अपने गुणों से माता-पिता का अतिक्रमण करके उत्पन्न हुआ हो, अर्थात् उनसे अधिक गुणों वाला। 'अनुजात' वह है जो गुणों में माता-पिता के अनुरूप होकर उत्पन्न हुआ हो, अर्थात् उनके समान गुणों वाला। 'अवजात' वह है जो गुणों में माता-पिता से अधम होकर उत्पन्न हुआ हो, अर्थात् उनसे हीन गुणों वाला। जिन गुणों से युक्त होने पर माता-पिता से अधिक, समान या हीन माना जाता है, उन्हें विभाजित कर दिखाने के लिए 'भिक्षुओं, अतिजात पुत्र कैसा होता है?' इस प्रकार कहने की इच्छा से प्रश्न करके 'यहाँ, भिक्षुओं, पुत्र का...' आदि से निर्देश आरम्भ किया गया है। තත්ථ න බුද්ධං සරණං ගතාතිආදීසු බුද්ධොති සබ්බධම්මෙසු අප්පටිහතඤාණනිමිත්තානුත්තරවිමොක්ඛාධිගමපරිභාවිතං ඛන්ධසන්තානං, සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණපදට්ඨානං වා සච්චාභිසම්බොධිං උපාදාය පඤ්ඤත්තිකො සත්තාතිසයො බුද්ධො. යථාහ – वहाँ 'बुद्ध की शरण में नहीं गए' आदि में 'बुद्ध' का अर्थ है—सभी धर्मों में अप्रतिहत ज्ञान के निमित्त अनुत्तर विमुक्ति की प्राप्ति से भावित स्कन्ध-सन्तान, अथवा सर्वज्ञता-ज्ञान के पदस्थान सत्य-अभिसम्बोधि के आधार पर प्रज्ञप्त सत्त्व-अतिशय बुद्ध हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘බුද්ධොති යො සො භගවා සයම්භූ අනාචරියකො පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු සාමං සච්චානි අභිසම්බුජ්ඣි, තත්ථ ච සබ්බඤ්ඤුතං පත්තො, බලෙසු ච වසීභාව’’න්ති (චූළනි. පාරායනත්ථුතිගාථානිද්දෙස 97; පටි. ම. 1.161) – “बुद्ध वह हैं जो वे भगवान् स्वयंभू हैं, जिन्होंने बिना किसी आचार्य के पहले न सुने हुए धर्मों में स्वयं सत्यों का अभिसम्बोध किया, और वहाँ सर्वज्ञता को प्राप्त किया, और बलों में वशीभाव (वशित्व) प्राप्त किया।” අයං තාව අත්ථතො බුද්ධවිභාවනා. यह तो अर्थ के अनुसार बुद्ध की व्याख्या हुई। බ්යඤ්ජනතො පන සවාසනාය කිලෙසනිද්දාය අච්චන්තවිගමෙන බුද්ධවා පටිබුද්ධවාති බුද්ධො, බුද්ධියා වා විකසිතභාවෙන බුද්ධවා විබුද්ධවාති බුද්ධො, බුජ්ඣිතාති බුද්ධො, බොධෙතාති බුද්ධොති එවමාදිනා නයෙන වෙදිතබ්බො. යථාහ – व्यंजन (शब्द-व्युत्पत्ति) के अनुसार तो—वासना सहित क्लेश-निद्रा के पूर्णतः दूर हो जाने से 'बुद्ध' (जागे हुए) होने के कारण 'प्रतिबुद्ध' के समान बुद्ध हैं; अथवा बुद्धि के विकसित होने के कारण 'बुद्ध' (खिले हुए) होने के कारण 'विबुद्ध' के समान बुद्ध हैं; जानने वाले होने के कारण बुद्ध हैं; बोध कराने वाले होने के कारण बुद्ध हैं—इस प्रकार के नय से समझना चाहिए। जैसा कि कहा गया है— ‘‘බුජ්ඣිතා සච්චානීති බුද්ධො, බොධෙතා පජායාති බුද්ධො, සබ්බඤ්ඤුතාය බුද්ධො, සබ්බදස්සාවිතාය බුද්ධො, අනඤ්ඤනෙය්යතාය බුද්ධො, විසවිතාය බුද්ධො, ඛීණාසවසඞ්ඛාතෙන බුද්ධො, නිරුපක්කිලෙසසඞ්ඛාතෙන බුද්ධො, එකන්තවීතරාගොති බුද්ධො, එකන්තවීතදොසොති [Pg.212] බුද්ධො, එකන්තවීතමොහොති බුද්ධො, එකන්තනික්කිලෙසොති බුද්ධො, එකායනමග්ගං ගතොති බුද්ධො, එකො අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධොති බුද්ධො, අබුද්ධිවිහතත්තා බුද්ධිපටිලාභාති බුද්ධො, බුද්ධොති චෙතං නාමං න මාතරා කතං, න පිතරා කතං, න භාතරා කතං, න භගිනියා කතං, න මිත්තාමච්චෙහි කතං, න ඤාතිසාලොහිතෙහි කතං, න සමණබ්රාහ්මණෙහි කතං, න දෙවතාහි කතං, අථ ඛො විමොක්ඛන්තිකමෙතං බුද්ධානං භගවන්තානං බොධියා මූලෙ සහ සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණස්ස පටිලාභා සච්ඡිකා පඤ්ඤත්ති, යදිදං බුද්ධො’’ති (චූළනි. පාරායනත්ථුතිගාථානිද්දෙස 97; පටි. ම. 1.162). “सत्यों को जानने के कारण बुद्ध हैं, प्रजा को बोध कराने के कारण बुद्ध हैं, सर्वज्ञता के कारण बुद्ध हैं, सर्वदर्शिता के कारण बुद्ध हैं, किसी अन्य द्वारा न ले जाए जाने (स्वयं जानने) के कारण बुद्ध हैं, विकसित होने के कारण बुद्ध हैं, क्षीणासव होने के कारण बुद्ध हैं, निरुपक्क्लेश होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः वीतराग होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः वीतदोष होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः वीतमोह होने के कारण बुद्ध हैं, एकान्ततः निष्क्लेश होने के कारण बुद्ध हैं, एकायन मार्ग पर जाने के कारण बुद्ध हैं, अकेले ही अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि का अभिसम्बोध करने के कारण बुद्ध हैं, अबुद्धि (अज्ञान) के विनाश और बुद्धि की प्राप्ति के कारण बुद्ध हैं। 'बुद्ध' यह नाम न माता द्वारा रखा गया है, न पिता द्वारा, न भाई द्वारा, न बहन द्वारा, न मित्र-अमात्यों द्वारा, न ज्ञाति-रक्तसम्बन्धियों द्वारा, न श्रमण-ब्राह्मणों द्वारा, न देवताओं द्वारा; बल्कि यह भगवान् बुद्धों की विमुक्ति के अन्त में बोधि-मूल में सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ साक्षात्कृत प्रज्ञप्ति है, जो कि 'बुद्ध' है।” හිංසතීති සරණං, සබ්බං අනත්ථං අපායදුක්ඛං සබ්බං සංසාරදුක්ඛං හිංසති විනාසෙති විද්ධංසෙතීති අත්ථො. සරණං ගතාති ‘‘බුද්ධො භගවා අම්හාකං සරණං ගති පරායණං පටිසරණං අඝස්ස හන්තා හිතස්ස විධාතා’’ති ඉමිනා අධිප්පායෙන බුද්ධං භගවන්තං ගච්ඡාම භජාම සෙවාම පයිරුපාසාම. එවං වා ජානාම බුජ්ඣාමාති එවං ගතා උපගතා බුද්ධං සරණං ගතා. තප්පටික්ඛෙපෙන න බුද්ධං සරණං ගතා. जो हिंसा (नाश) करता है वह 'शरण' है; अर्थात् जो सभी अनर्थों, अपाय-दुखों और समस्त संसार-दुखों का हनन करता है, विनाश करता है, विध्वंस करता है। 'शरण गए' का अर्थ है—“बुद्ध भगवान् हमारी शरण, गति, परायण, प्रतिशरण, पाप के हन्ता और हित के विधाता हैं”—इस अभिप्राय से हम बुद्ध भगवान् के पास जाते हैं, उनका भजन करते हैं, सेवन करते हैं, उनकी उपासना करते हैं। अथवा इस प्रकार जानते हैं, समझते हैं—इस प्रकार गए हुए, उपगत हुए 'बुद्ध की शरण गए' कहलाते हैं। इसके विपरीत 'बुद्ध की शरण नहीं गए' हैं। ධම්මං සරණං ගතාති අධිගතමග්ගෙ සච්ඡිකතනිරොධෙ යථානුසිට්ඨං පටිපජ්ජමානෙ චතූසු අපායෙසු අපතමානෙ කත්වා ධාරෙතීති ධම්මො. සො අත්ථතො අරියමග්ගො චෙව නිබ්බානඤ්ච. වුත්තඤ්හෙතං – ‘धम्म की शरण गए’ में—प्राप्त किए गए मार्ग और साक्षात्कृत निरोध (निर्वाण) में यथोपदिष्ट प्रतिपत्ति करने वाले को चारों अपायों में न गिरने देकर जो धारण करता है, वह 'धम्म' है। वह अर्थतः आर्यमार्ग और निर्वाण ही है। क्योंकि यह कहा गया है— ‘‘යාවතා, භික්ඛවෙ, ධම්මා සඞ්ඛතා, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො තෙසං අග්ගමක්ඛායතී’’ති විත්ථාරො (අ. නි. 4.34). “भिक्षुओं, जितने भी संस्कृत धर्म हैं, उनमें आर्य अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ कहा जाता है”—इत्यादि विस्तार से। න කෙවලඤ්ච අරියමග්ගනිබ්බානානි එව, අපිච ඛො අරියඵලෙහි සද්ධිං පරියත්තිධම්මො ච. වුත්තඤ්හෙතං ඡත්තමාණවකවිමානෙ – और न केवल आर्यमार्ग और निर्वाण ही, बल्कि आर्यफलों के साथ-साथ पर्यप्ति धर्म (शास्त्र) भी। छत्तमाणवक विमान में यह कहा गया है— ‘‘රාගවිරාගමනෙජමසොකං,ධම්මමසඞ්ඛතමප්පටිකූලං; මධුරමිමං පගුණං සුවිභත්තං,ධම්මමිමං සරණත්ථමුපෙහී’’ති. (වි. ව. 887); “राग-विराग, अचल (अनेज), अशोक, असंस्कृत, अप्रतिकूल, मधुर, निपुण और सुविभक्त इस धर्म की शरण में जाओ।” තත්ථ හි රාගවිරාගොති මග්ගො කථිතො, අනෙජමසොකන්ති ඵලං, ධම්මසඞ්ඛතන්ති නිබ්බානං, අප්පටිකූලං මධුරමිමං පගුණං සුවිභත්තන්ති පිටකත්තයෙන විභත්තා [Pg.213] සබ්බධම්මක්ඛන්ධා කථිතා. තං ධම්මං වුත්තනයෙන සරණන්ති ගතා ධම්මං සරණං ගතා. තප්පටික්ඛෙපෙන න ධම්මං සරණං ගතා. वहाँ 'राग-विराग' से मार्ग कहा गया है, 'अनेज-अशोक' से फल, 'असंस्कृत धर्म' से निर्वाण, और 'अप्रतिकूल, मधुर, निपुण, सुविभक्त' से त्रिपिटक के रूप में विभक्त सभी धर्म-स्कन्ध कहे गए हैं। उस धर्म की उक्त विधि से शरण में गए हुए 'धम्म की शरण गए' कहलाते हैं। इसके विपरीत 'धम्म की शरण नहीं गए' हैं। දිට්ඨිසීලසඞ්ඝාතෙන සංහතොති සඞ්ඝො. සො අත්ථතො අට්ඨඅරියපුග්ගලසමූහො. වුත්තඤ්හෙතං තස්මිං එව විමානෙ – दृष्टि और शील के संघात (मेल) से जो संहत (जुड़ा हुआ) है, वह 'संघ' है। वह अर्थतः आठ आर्य पुद्गलों का समूह है। उसी विमान में यह कहा गया है— ‘‘යත්ථ ච දින්න මහප්ඵලමාහු,චතූසු සුචීසු පුරිසයුගෙසු; අට්ඨ ච පුග්ගල ධම්මදසා තෙ,සඞ්ඝමිමං සරණත්ථමුපෙහී’’ති. (වි. ව. 888); “जहाँ दिया हुआ दान महाफलदायी कहा गया है, उन चार शुचि पुरुष-युगों और आठ पुद्गलों, जो धर्म के ज्ञाता हैं, उस संघ की शरण में जाओ।” තං සඞ්ඝං වුත්තනයෙන සරණන්ති ගතා සඞ්ඝං සරණං ගතා. තප්පටික්ඛෙපෙන න සඞ්ඝං සරණං ගතාති. उस संघ की उक्त विधि से शरण में गए हुए 'संघ की शरण गए' कहलाते हैं। इसके विपरीत 'संघ की शरण नहीं गए' हैं। එත්ථ ච සරණගමනකොසල්ලත්ථං සරණං සරණගමනං, යො ච සරණං ගච්ඡති සරණගමනප්පභෙදො, ඵලං, සංකිලෙසො, භෙදො, වොදානන්ති අයං විධි වෙදිතබ්බො. यहाँ शरण-गमन में कुशलता के लिए—शरण, शरण-गमन, जो शरण जाता है, शरण-गमन के भेद, फल, संक्लेश (मलिनता), भेद (टूटना) और वोदान (शुद्धि)—इस विधि को समझना चाहिए। තත්ථ පදත්ථතො තාව හිංසතීති සරණං, සරණගතානං තෙනෙව සරණගමනෙන භයං සන්තාසං දුක්ඛං දුග්ගතිං පරිකිලෙසං හනති විනාසෙතීති අත්ථො, රතනත්තයස්සෙතං අධිවචනං. අථ වා හිතෙ පවත්තනෙන අහිතා නිවත්තනෙන ච සත්තානං භයං හිංසතීති බුද්ධො සරණං, භවකන්තාරතො උත්තාරණෙන අස්සාසදානෙන ච ධම්මො, අප්පකානම්පි කාරානං විපුලඵලපටිලාභකරණෙන සඞ්ඝො. තස්මා ඉමිනාපි පරියායෙන රතනත්තයං සරණං. තප්පසාදතග්ගරුතාහි විහතකිලෙසො තප්පරායණතාකාරප්පවත්තො චිත්තුප්පාදො සරණගමනං. තංසමඞ්ගිසත්තො සරණං ගච්ඡති, වුත්තප්පකාරෙන චිත්තුප්පාදෙන ‘‘එතානි මෙ තීණි රතනානි සරණං, එතානි පරායණ’’න්ති එවං උපෙතීති අත්ථො. එවං තාව සරණං සරණගමනං, යො ච සරණං ගච්ඡතීති ඉදං තයං වෙදිතබ්බං. वहाँ शब्दार्थ की दृष्टि से, जो हिंसा (नाश) करता है वह 'शरण' है। जो शरण में आए हुए हैं, उनके उस शरण-गमन से ही भय, संत्रास, दुःख, दुर्गति और क्लेशों का हनन करता है, विनाश करता है - यह अर्थ है। यह त्रिरत्न का ही पर्यायवाची है। अथवा, हित में प्रवृत्त करने और अहित से निवृत्त करने के कारण प्राणियों के भय को नष्ट करता है, इसलिए बुद्ध शरण हैं; भव-कान्तार (संसार रूपी जंगल) से पार उतारने और आश्वासन देने के कारण धर्म शरण है; और अल्प कार्यों का भी विपुल फल प्राप्त कराने के कारण संघ शरण है। इसलिए इस पर्याय से भी त्रिरत्न शरण है। उन (रत्नों) के प्रति प्रसाद (श्रद्धा) और गौरव के कारण क्लेशों का विनाश करने वाली, और उनके परायण होने के रूप में प्रवृत्त चित्तोत्पाद 'शरण-गमन' है। उस (चित्तोत्पाद) से युक्त प्राणी शरण जाता है; उक्त प्रकार के चित्तोत्पाद से 'ये तीन रत्न मेरी शरण हैं, ये ही परम गति हैं' - इस प्रकार प्राप्त होता है, यह अर्थ है। इस प्रकार 'शरण', 'शरण-गमन' और 'जो शरण जाता है' - इन तीनों को जानना चाहिए। පභෙදතො පන දුවිධං සරණගමනං – ලොකියං, ලොකුත්තරඤ්ච. තත්ථ ලොකුත්තරං දිට්ඨසච්චානං මග්ගක්ඛණෙ සරණගමනුපක්කිලෙසසමුච්ඡෙදෙන ආරම්මණතො නිබ්බානාරම්මණං හුත්වා කිච්චතො සකලෙපි රතනත්තයෙ ඉජ්ඣති, ලොකියං පුථුජ්ජනානං සරණගමනුපක්කිලෙසවික්ඛම්භනෙන ආරම්මණතො බුද්ධාදිගුණාරම්මණං හුත්වා ඉජ්ඣති. තං අත්ථතො බුද්ධාදීසු වත්ථූසු සද්ධාපටිලාභො[Pg.214], සද්ධාමූලිකා ච සම්මාදිට්ඨි දසසු පුඤ්ඤකිරියවත්ථූසු දිට්ඨිජුකම්මන්ති වුච්චති. भेद की दृष्टि से शरण-गमन दो प्रकार का है - लौकिक और लोकोत्तर। उनमें से, लोकोत्तर (शरण-गमन) सत्य का दर्शन करने वालों (आर्यों) के मार्ग-क्षण में, शरण-गमन के उपक्लेशों के समूच्छेद (पूर्ण विनाश) द्वारा, आलम्बन की दृष्टि से निर्वाण को आलम्बन बनाकर, कृत्य की दृष्टि से सम्पूर्ण त्रिरत्न में सिद्ध होता है। लौकिक (शरण-गमन) पृथग्जनों के शरण-गमन के उपक्लेशों के विष्कम्भन (दबाने) द्वारा, आलम्बन की दृष्टि से बुद्ध आदि के गुणों को आलम्बन बनाकर सिद्ध होता है। वह अर्थतः बुद्ध आदि वस्तुओं में श्रद्धा की प्राप्ति है, और श्रद्धा-मूलक सम्यग्दृष्टि है, जिसे दस पुण्य-क्रिया-वस्तुओं में 'दृष्टि-ऋजु-कर्म' कहा जाता है। තයිදං චතුධා පවත්තති – අත්තසන්නිය්යාතනෙන, තප්පරායණතාය, සිස්සභාවූපගමනෙන, පණිපාතෙනාති. තත්ථ අත්තසන්නිය්යාතනං නාම ‘‘අජ්ජ ආදිං කත්වා අහං අත්තානං බුද්ධස්ස නිය්යාතෙමි, ධම්මස්ස, සඞ්ඝස්සා’’ති එවං බුද්ධාදීනං අත්තපරිච්චජනං. තප්පරායණං නාම ‘‘අජ්ජ ආදිං කත්වා අහං බුද්ධපරායණො, ධම්මපරායණො, සඞ්ඝපරායණො ඉති මං ධාරෙහී’’ති එවං තප්පටිසරණභාවො තප්පරායණතා. සිස්සභාවූපගමනං නාම ‘‘අජ්ජ ආදිං කත්වා අහං බුද්ධස්ස අන්තෙවාසිකො, ධම්මස්ස, සඞ්ඝස්ස ඉති මං ධාරෙතූ’’ති එවං සිස්සභාවස්ස උපගමනං. පණිපාතො නාම ‘‘අජ්ජ ආදිං කත්වා අහං අභිවාදනපච්චුට්ඨානඅඤ්ජලිකම්මසාමීචිකම්මං බුද්ධාදීනං එව තිණ්ණං වත්ථූනං කරොමි ඉති මං ධාරෙතූ’’ති එවං බුද්ධාදීසු පරමනිපච්චකාරො. ඉමෙසඤ්හි චතුන්නං ආකාරානං අඤ්ඤතරං කරොන්තෙන ගහිතං එව හොති සරණගමනං. वह (लौकिक शरण-गमन) चार प्रकार से प्रवृत्त होता है - आत्म-सन्निय्यातन (स्वयं को समर्पित करना) द्वारा, तत्परायणता द्वारा, शिष्य-भाव के उपगमन द्वारा और प्रणिपात (नमस्कार) द्वारा। वहाँ आत्म-सन्निय्यातन का अर्थ है - 'आज से आरम्भ कर मैं स्वयं को बुद्ध को समर्पित करता हूँ, धर्म को, संघ को' - इस प्रकार बुद्ध आदि के प्रति आत्म-परित्याग। तत्परायणता का अर्थ है - 'आज से आरम्भ कर मैं बुद्ध-परायण, धर्म-परायण, संघ-परायण हूँ, ऐसा मुझे धारण करें' - इस प्रकार उनके प्रति शरण होने का भाव तत्परायणता है। शिष्य-भाव के उपगमन का अर्थ है - 'आज से आरम्भ कर मैं बुद्ध का अन्तेवासी (शिष्य) हूँ, धर्म का, संघ का, ऐसा मुझे धारण करें' - इस प्रकार शिष्य-भाव को स्वीकार करना। प्रणिपात का अर्थ है - 'आज से आरम्भ कर मैं अभिवादन, प्रत्युत्थान, अंजलि-कर्म और सामीचि-कर्म (आदर-सत्कार) बुद्ध आदि इन तीन वस्तुओं के प्रति ही करूँगा, ऐसा मुझे धारण करें' - इस प्रकार बुद्ध आदि के प्रति परम विनम्रता का भाव। इन चार प्रकारों में से किसी एक को भी करने वाले द्वारा शरण-गमन ग्रहण किया हुआ ही होता है। අපිච ‘‘භගවතො අත්තානං පරිච්චජාමි, ධම්මස්ස, සඞ්ඝස්ස අත්තානං පරිච්චජාමි, ජීවිතං පරිච්චජාමි, පරිච්චත්තො එව මෙ අත්තා ජීවිතඤ්ච, ජීවිතපරියන්තිකං බුද්ධං සරණං ගච්ඡාමි, බුද්ධො මෙ සරණං තාණං ලෙණ’’න්ති එවම්පි අත්තසන්නිය්යාතනං වෙදිතබ්බං. ‘‘සත්ථාරඤ්ච වතාහං පස්සෙය්යං, භගවන්තමෙව පස්සෙය්යං; සුගතඤ්ච වතාහං පස්සෙය්යං, භගවන්තමෙව පස්සෙය්යං; සම්මාසම්බුද්ධඤ්ච වතාහං පස්සෙය්යං; භගවන්තමෙව පස්සෙය්ය’’න්ති (සං. නි. 2.154) එවං මහාකස්සපත්ථෙරස්ස සරණගමනං විය සිස්සභාවූපගමනං දට්ඨබ්බං. इसके अतिरिक्त, 'मैं भगवान के प्रति स्वयं का परित्याग करता हूँ, धर्म के प्रति, संघ के प्रति स्वयं का परित्याग करता हूँ, जीवन का परित्याग करता हूँ; मेरा आत्मा और जीवन परित्यक्त ही है; जीवन पर्यन्त बुद्ध की शरण जाता हूँ, बुद्ध मेरी शरण, त्राण और लयण (आश्रय) हैं' - इस प्रकार भी आत्म-सन्निय्यातन जानना चाहिए। 'मैं शास्ता को ही देखूँ, भगवान को ही देखूँ; मैं सुगत को ही देखूँ, भगवान को ही देखूँ; मैं सम्यक्सम्बुद्ध को ही देखूँ, भगवान को ही देखूँ' - इस प्रकार महाकश्यप स्थविर के शरण-गमन के समान शिष्य-भाव का उपगमन देखना चाहिए। ‘‘සො අහං විචරිස්සාමි, ගාමා ගාමං පුරා පුරං; නමස්සමානො සම්බුද්ධං, ධම්මස්ස ච සුධම්මත’’න්ති. (සං. නි. 1.246; සු. නි. 194) – 'वह मैं गाँव-गाँव और नगर-नगर विचरण करूँगा, सम्यक्सम्बुद्ध को और धर्म की सुधर्मता (उत्तमता) को नमस्कार करते हुए।' එවං ආළවකාදීනං සරණගමනං විය තප්පරායණතා වෙදිතබ්බා. ‘‘අථ ඛො, බ්රහ්මායු, බ්රාහ්මණො උට්ඨායාසනා එකංසං උත්තරාසඞ්ගං කරිත්වා භගවතො පාදෙසු සිරසා නිපතිත්වා භගවතො පාදානි මුඛෙන ච පරිචුම්බති, පාණීහි ච පරිසම්බාහති, නාමඤ්ච සාවෙති ‘බ්රහ්මායු අහං, භො ගොතම, බ්රාහ්මණො, බ්රහ්මායු අහං, භො ගොතම, බ්රාහ්මණො’’’ති (ම. නි. 2.394) එවං පණිපාතො දට්ඨබ්බො. इस प्रकार आलवक आदि के शरण-गमन के समान तत्परायणता जाननी चाहिए। 'तब ब्रह्मायु ब्राह्मण आसन से उठकर, एक कंधे पर उत्तरासंग (चादर) कर, भगवान के चरणों में सिर रखकर गिर पड़ा और भगवान के चरणों को मुख से चूमने लगा, हाथों से सहलाने लगा और अपना नाम सुनाने लगा - 'हे गौतम! मैं ब्रह्मायु ब्राह्मण हूँ, हे गौतम! मैं ब्रह्मायु ब्राह्मण हूँ'' - इस प्रकार प्रणिपात देखना चाहिए। සො [Pg.215] පනෙස ඤාතිභයාචරියදක්ඛිණෙය්යවසෙන චතුබ්බිධො හොති. තත්ථ දක්ඛිණෙය්යපණිපාතෙන සරණගමනං හොති, න ඉතරෙහි. සෙට්ඨවසෙනෙව හි සරණං ගය්හති, සෙට්ඨවසෙන භිජ්ජති. තස්මා යො ‘‘අයමෙව ලොකෙ සබ්බසත්තුත්තමො අග්ගදක්ඛිණෙය්යො’’ති වන්දති, තෙනෙව සරණං ගහිතං හොති, න ඤාතිභයාචරියසඤ්ඤාය වන්දන්තෙන. එවං ගහිතසරණස්ස උපාසකස්ස වා උපාසිකාය වා අඤ්ඤතිත්ථියෙසු පබ්බජිතම්පි ‘‘ඤාතකො මෙ අය’’න්ති වන්දතො සරණං න භිජ්ජති, පගෙව අපබ්බජිතං. තථා රාජානං භයෙන වන්දතො. සො හි රට්ඨපූජිතත්තා අවන්දියමානො අනත්ථම්පි කරෙය්යාති. තථා යංකිඤ්චි සිප්පං සික්ඛාපකං තිත්ථියම්පි ‘‘ආචරියො මෙ අය’’න්ති වන්දතොපි න භිජ්ජති. එවං සරණගමනස්ස පභෙදො වෙදිතබ්බො. वह (प्रणिपात) ज्ञाति (रिश्तेदार), भय, आचार्य और दक्षिणीय (पूजनीय) के भेद से चार प्रकार का होता है। उनमें से दक्षिणीय-प्रणिपात से शरण-गमन होता है, अन्यों से नहीं। श्रेष्ठता के कारण ही शरण ग्रहण की जाती है और श्रेष्ठता के कारण ही (शरण) टूटती है। इसलिए जो 'यही लोक में सब प्राणियों में उत्तम और अग्र दक्षिणीय हैं' - ऐसा मानकर वन्दना करता है, उसी के द्वारा शरण ग्रहण की गई होती है, न कि ज्ञाति, भय या आचार्य की संज्ञा से वन्दना करने वाले द्वारा। इस प्रकार शरण ग्रहण किए हुए उपासक या उपासिका द्वारा अन्य तीर्थिकों में प्रव्रजित को भी 'यह मेरा सम्बन्धी है' - ऐसा मानकर वन्दना करने पर शरण नहीं टूटती, गृहस्थ की तो बात ही क्या। उसी प्रकार राजा को भय से वन्दना करने पर (शरण नहीं टूटती)। क्योंकि वह राष्ट्र द्वारा पूजित होने के कारण, वन्दना न किए जाने पर अनर्थ भी कर सकता है। उसी प्रकार किसी शिल्प को सिखाने वाले तीर्थिक को भी 'यह मेरा आचार्य है' - ऐसा मानकर वन्दना करने वाले की भी (शरण) नहीं टूटती। इस प्रकार शरण-गमन का भेद जानना चाहिए। එත්ථ ච ලොකුත්තරස්ස සරණගමනස්ස චත්තාරි සාමඤ්ඤඵලානි විපාකඵලං, සබ්බදුක්ඛක්ඛයො ආනිසංසඵලං. වුත්තඤ්හෙතං – और यहाँ लोकोत्तर शरण-गमन के चार श्रामण्य-फल 'विपाक-फल' हैं, और सब दुखों का क्षय 'आनृशंस-फल' (लाभ) है। क्योंकि यह कहा गया है - ‘‘යො ච බුද්ධඤ්ච ධම්මඤ්ච, සඞ්ඝඤ්ච සරණං ගතො; චත්තාරි අරියසච්චානි, සම්මප්පඤ්ඤාය පස්සති. 'और जो बुद्ध, धर्म और संघ की शरण गया है, वह चार आर्य सत्यों को सम्यक् प्रज्ञा से देखता है।' ‘‘දුක්ඛං දුක්ඛසමුප්පාදං, දුක්ඛස්ස ච අතික්කමං; අරියං චට්ඨඞ්ගිකං මග්ගං, දුක්ඛූපසමගාමිනං. 'दुःख, दुःख का समुत्पाद (उत्पत्ति), दुःख का अतिक्रमण (निरोध) और दुःख की शान्ति की ओर ले जाने वाले आर्य अष्टांगिक मार्ग को।' ‘‘එතං ඛො සරණං ඛෙමං, එතං සරණමුත්තමං; එතං සරණමාගම්ම, සබ්බදුක්ඛා පමුච්චතී’’ති. (ධ. ප. 190-192); “यही क्षेम (सुरक्षित) शरण है, यही उत्तम शरण है; इस शरण को प्राप्त कर (मनुष्य) सब दुखों से मुक्त हो जाता है।” (धम्मपद १९०-१९२); අපිච නිච්චතො අනුපගමනාදීනිපි එතස්ස ආනිසංසඵලං වෙදිතබ්බං. වුත්තඤ්හෙතං – इसके अतिरिक्त, (संस्कारों को) नित्य न मानने आदि के रूप में भी इसके (शरणगमन के) आनृशंस (लाभ) फल को जानना चाहिए। जैसा कि कहा गया है— ‘‘අට්ඨානමෙතං, භික්ඛවෙ, අනවකාසො, යං දිට්ඨිසම්පන්නො පුග්ගලො කඤ්චි සඞ්ඛාරං නිච්චතො උපගච්ඡෙය්ය, සුඛතො උපගච්ඡෙය්ය, කඤ්චි ධම්මං අත්තතො උපගච්ඡෙය්ය, මාතරං ජීවිතා වොරොපෙය්ය, පිතරං ජීවිතා වොරොපෙය්ය, අරහන්තං ජීවිතා වොරොපෙය්ය, දුට්ඨචිත්තො තථාගතස්ස ලොහිතං උප්පාදෙය්ය, සඞ්ඝං භින්දෙය්ය, අඤ්ඤං සත්ථාරං උද්දිසෙය්ය නෙතං ඨානං විජ්ජතී’’ති (ම. නි. 3.127-128; අ. නි. 1.268-276; විභ. 809). “भिक्षुओं, यह असंभव है, ऐसा अवसर नहीं है कि सम्यक् दृष्टि से संपन्न व्यक्ति किसी संस्कार को नित्य माने, सुख माने, किसी धर्म को आत्मा माने, माता की हत्या करे, पिता की हत्या करे, अर्हन्त की हत्या करे, दुष्ट चित्त से तथागत का लोहित (रक्त) निकाले, संघ में भेद डाले, या किसी अन्य शास्ता (गुरु) को निर्दिष्ट करे—यह स्थान (संभव) नहीं है।” (मज्झिम निकाय ३.१२७-१२८; अंगुत्तर निकाय १.२६८-२७६; विभंग ८०९)। ලොකියස්ස [Pg.216] පන සරණගමනස්ස භවසම්පදාපි භොගසම්පදාපි ඵලමෙව. වුත්තඤ්හෙතං – लौकिक शरणगमन का फल भव-संपदा और भोग-संपदा भी है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘යෙ කෙචි බුද්ධං සරණං ගතාසෙ,න තෙ ගමිස්සන්ති අපායභූමිං; පහාය මානුසං දෙහං,දෙවකායං පරිපූරෙස්සන්තී’’ති. (සං. නි. 1.37); “जो कोई भी बुद्ध की शरण में गए हैं, वे अपाय (दुर्गति) भूमि में नहीं जाएँगे; मनुष्य देह को त्याग कर, वे देव-निकाय को परिपूर्ण करेंगे।” (संयुत्त निकाय १.३७); අපරම්පි වුත්තං – अन्यत्र भी कहा गया है— ‘‘අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අසීතියා දෙවතාසහස්සෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – ‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධං සරණගමනං හොති. බුද්ධං සරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි…පෙ… ධම්මං, සඞ්ඝං…පෙ… ඵොට්ඨබ්බෙහී’’’ති (සං. නි. 4.341). “तब देवताओं के इन्द्र शक्र अस्सी हजार देवताओं के साथ जहाँ आयुष्मान महामौद्गल्यायन थे, वहाँ पहुँचे... एक ओर खड़े हुए देवताओं के इन्द्र शक्र से आयुष्मान महामौद्गल्यायन ने यह कहा— ‘हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाना श्रेष्ठ है। बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही, हे देवेन्द्र, यहाँ कुछ प्राणी शरीर के भेद (मृत्यु) के बाद सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों से दस स्थानों में बढ़कर होते हैं— दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से, दिव्य स्पर्शों से... धर्म... संघ... स्पर्शों से’।” (संयुत्त निकाय ४.३४१)। වෙලාමසුත්තාදිවසෙනපි (අ. නි. 9.20) සරණගමනස්ස ඵලවිසෙසො වෙදිතබ්බො. එවං සරණගමනස්ස ඵලං වෙදිතබ්බං. वेलाम सुत्त आदि (अंगुत्तर निकाय ९.२०) के अनुसार भी शरणगमन के विशेष फल को जानना चाहिए। इस प्रकार शरणगमन के फल को समझना चाहिए। ලොකියසරණගමනඤ්චෙත්ථ තීසු වත්ථූසු අඤ්ඤාණසංසයමිච්ඡාඤාණාදීහි සංකිලිස්සති, න මහාජුතිකං හොති න මහාවිප්ඵාරං. ලොකුත්තරස්ස පන සංකිලෙසො නත්ථි. ලොකියස්ස ච සරණගමනස්ස දුවිධො භෙදො – සාවජ්ජො, අනවජ්ජො ච. තත්ථ සාවජ්ජො අඤ්ඤසත්ථාරාදීසු අත්තසන්නිය්යාතනාදීහි හොති, සො අනිට්ඨඵලො. අනවජ්ජො කාලකිරියාය, සො අවිපාකත්තා අඵලො. ලොකුත්තරස්ස පන නෙවත්ථි භෙදො. භවන්තරෙපි හි අරියසාවකො අඤ්ඤං සත්ථාරං න උද්දිසතීති එවං සරණගමනස්ස සංකිලෙසො ච භෙදො ච වෙදිතබ්බො. यहाँ लौकिक शरणगमन तीन वस्तुओं (रत्नों) में अज्ञान, संशय, मिथ्याज्ञान आदि से संक्लिष्ट (मलिन) हो जाता है, वह न तो महान ज्योति वाला होता है और न ही महान विस्तार वाला। परन्तु लोकोत्तर (शरणगमन) में कोई संक्लेश नहीं होता। लौकिक शरणगमन का भेद (टूटना) दो प्रकार का है— सावद्य (दोषपूर्ण) और अनवद्य (दोषरहित)। उनमें से सावद्य अन्य शास्ताओं आदि के प्रति आत्म-समर्पण आदि से होता है, उसका फल अनिष्ट (बुरा) होता है। अनवद्य काल-क्रिया (मृत्यु) से होता है, वह विपाक न होने के कारण अफल (निष्फल) है। परन्तु लोकोत्तर (शरणगमन) का कोई भेद नहीं होता। क्योंकि आर्य श्रावक दूसरे भव में भी किसी अन्य शास्ता को निर्दिष्ट नहीं करता— इस प्रकार शरणगमन के संक्लेश और भेद को समझना चाहिए। වොදානම්පි [Pg.217] ච ලොකියස්සෙව යස්ස හි සංකිලෙසො, තස්සෙව තතො වොදානෙන භවිතබ්බං. ලොකුත්තරං පන නිච්චවොදානමෙවාති. व्यवदान (शुद्धि) भी लौकिक का ही होता है, क्योंकि जिसमें संक्लेश होता है, उसी की उससे शुद्धि होनी चाहिए। परन्तु लोकोत्तर तो सदैव शुद्ध ही है। පාණාතිපාතාති එත්ථ පාණස්ස සරසෙනෙව පතනසභාවස්ස අන්තරා එව අතිපාතනං අතිපාතො, සණිකං පතිතුං අදත්වා සීඝං පාතනන්ති අත්ථො. අතික්කම්ම වා සත්ථාදීහි අභිභවිත්වා පාතනං අතිපාතො, පාණඝාතොති වුත්තං හොති. පාණොති චෙත්ථ ඛන්ධසන්තානො, යො සත්තොති වොහරීයති, පරමත්ථතො රූපාරූපජීවිතින්ද්රියං. රූපජීවිතින්ද්රියෙ හි විකොපිතෙ ඉතරම්පි තංසම්බන්ධතාය විනස්සතීති. තස්මිං පන පාණෙ පාණසඤ්ඤිනො ජීවිතින්ද්රියුපච්ඡෙදකඋපක්කමසමුට්ඨාපිකා කායවචීද්වාරානං අඤ්ඤතරද්වාරප්පවත්තා වධකචෙතනා පාණාතිපාතො. යාය හි චෙතනාය පවත්තමානස්ස ජීවිතින්ද්රියස්ස නිස්සයභූතෙසු උපක්කමකරණහෙතුකමහාභූතපච්චයා උප්පජ්ජනකමහාභූතා පුරිමසදිසා න උප්පජ්ජන්ති, විසදිසා එව උප්පජ්ජන්ති, සා තාදිසප්පයොගසමුට්ඨාපිකා චෙතනා පාණාතිපාතො. ලද්ධූපක්කමානි හි භූතානි පුරිමභූතානි විය න විසදානීති සමානජාතියානං කාරණානි න හොන්තීති. ‘‘කායවචීද්වාරානං අඤ්ඤතරද්වාරප්පවත්තා’’ති ඉදං මනොද්වාරෙ පවත්තාය වධකචෙතනාය පාණාතිපාතතාසම්භවදස්සනං. කුලුම්බසුත්තෙපි හි ‘‘ඉධෙකච්චො සමණො වා බ්රාහ්මණො වා ඉද්ධිමා චෙතො වසිප්පත්තො අඤ්ඤිස්සා කුච්ඡිගතං ගබ්භං පාපකෙන මනසා අනුපෙක්ඛිතා හොතී’’ති විජ්ජාමයිද්ධි අධිප්පෙතා. සා ච වචීද්වාරං මුඤ්චිත්වා න සක්කා නිබ්බත්තෙතුන්ති වචීද්වාරවසෙනෙව නිප්පජ්ජති. යෙ පන ‘‘භාවනාමයිද්ධි තත්ථ අධිප්පෙතා’’ති වදන්ති, තෙසං වාදො කුසලත්තිකවෙදනත්තිකවිතක්කත්තිකභූමන්තරෙහි විරුජ්ඣති. ‘प्राणातिपात’ यहाँ ‘प्राण’ का अर्थ है जो स्वयं ही गिर जाने के स्वभाव वाला है, उसका बीच में ही गिरा देना ‘अतिपात’ है; धीरे-धीरे गिरने न देकर शीघ्र गिरा देना—यह अर्थ है। अथवा शस्त्र आदि से अतिक्रमण कर या अभिभूत कर गिरा देना ‘अतिपात’ है, जिसे ‘प्राणघात’ कहा जाता है। यहाँ ‘प्राण’ का अर्थ स्कन्ध-सन्तान है, जिसे ‘सत्त्व’ कहा जाता है, परमार्थतः यह रूप और अरूप जीवितिन्द्रिय है। रूप-जीवितिन्द्रिय के विकृत होने पर दूसरा (अरूप) भी उससे संबद्ध होने के कारण नष्ट हो जाता है। उस प्राणी में, प्राणी की संज्ञा रखने वाले की जीवितिन्द्रिय का उच्छेद करने वाले उपक्रम (प्रयत्न) को उत्पन्न करने वाली, काय और वाणी के द्वारों में से किसी एक द्वार से प्रवृत्त होने वाली वधक-चेतना ‘प्राणातिपात’ है। जिस चेतना के कारण, प्रवर्तमान जीवितिन्द्रिय के आश्रयभूत महाभूतों में उपक्रम करने के कारण उत्पन्न होने वाले महाभूत पहले के समान उत्पन्न नहीं होते, बल्कि विसदृश (भिन्न) ही उत्पन्न होते हैं, वह उस प्रकार के प्रयोग को उत्पन्न करने वाली चेतना ‘प्राणातिपात’ है। क्योंकि उपक्रम प्राप्त भूत पहले के भूतों के समान स्पष्ट नहीं होते, इसलिए वे समान जाति के कारण नहीं होते। ‘काय और वाणी के द्वारों में से किसी एक द्वार से प्रवृत्त’—यह मन के द्वार में प्रवृत्त वधक-चेतना के प्राणातिपात होने की संभावना दिखाने के लिए है। कुलुम्ब सुत्त में भी ‘यहाँ कोई श्रमण या ब्राह्मण ऋद्धिमान और चित्त पर वश प्राप्त करने वाला होता है, वह किसी अन्य की कोख में स्थित गर्भ को पापपूर्ण मन से देखता है’—यहाँ विद्यामयी ऋद्धि अभिप्रेत है। और वह वाणी के द्वार को छोड़े बिना सिद्ध नहीं की जा सकती, इसलिए वह वाणी के द्वार के वश से ही निष्पन्न होती है। जो लोग कहते हैं कि ‘वहाँ भावनामयी ऋद्धि अभिप्रेत है’, उनका वाद कुशल-त्रिक, वेदना-त्रिक, वितर्क-त्रिक और भूम्यन्तरों से विरुद्ध पड़ता है। ස්වායං පාණාතිපාතො ගුණරහිතෙසු තිරච්ඡානගතාදීසු ඛුද්දකෙ පාණෙ අප්පසාවජ්ජො, මහාසරීරෙ මහාසාවජ්ජො. කස්මා? පයොගමහන්තතාය. පයොගසමත්තෙපි වත්ථුමහන්තතාදීහි මහාසාවජ්ජො, ගුණවන්තෙසු මනුස්සාදීසු අප්පගුණෙ පාණෙ අප්පසාවජ්ජො, මහාගුණෙ මහාසාවජ්ජො. සරීරගුණානං පන සමභාවෙ සති කිලෙසානං උපක්කමානඤ්ච මුදුතාය අප්පසාවජ්ජො, තිබ්බතාය මහාසාවජ්ජො. वह यह प्राणातिपात गुणरहित तिर्यक (पशु) आदि में, छोटे प्राणी के होने पर अल्प-सावद्य (कम पाप वाला) है, और बड़े शरीर वाले में महा-सावद्य (अधिक पाप वाला) है। क्यों? प्रयोग की महानता (अधिक प्रयत्न) के कारण। प्रयोग के समान होने पर भी वस्तु (प्राणी) की विशालता आदि के कारण महा-सावद्य होता है। गुणवान मनुष्यों आदि में, अल्प गुण वाले प्राणी के प्रति अल्प-सावद्य और महागुण वाले के प्रति महा-सावद्य होता है। शरीर और गुणों के समान होने पर, क्लेशों और उपक्रमों की मृदुता (कोमलता) के कारण अल्प-सावद्य और तीव्रता के कारण महा-सावद्य होता है। එත්ථ ච පයොගවත්ථුමහන්තතාදීහි මහාසාවජ්ජතා තෙහි පච්චයෙහි උප්පජ්ජමානාය චෙතනාය බලවභාවතො වෙදිතබ්බා. යථාධිප්පෙතස්ස පයොගස්ස [Pg.218] සහසා නිප්ඵාදනවසෙන සකිච්චසාධිකාය බහුක්ඛත්තුං පවත්තජවනෙහි ලද්ධාසෙවනාය ච සන්නිට්ඨාපකචෙතනාය පයොගස්ස මහන්තභාවො. සතිපි කදාචි ඛුද්දකෙ චෙව මහන්තෙ ච පාණෙ පයොගස්ස සමභාවෙ මහන්තං හනන්තස්ස චෙතනා තිබ්බතරා උප්පජ්ජතීති වත්ථුමහන්තතාපි චෙතනාය බලවභාවස්ස කාරණං. ඉති උභයම්පෙතං චෙතනාබලවභාවෙනෙව මහාසාවජ්ජතාය හෙතු හොති. තථා හන්තබ්බස්ස මහාගුණභාවෙ තත්ථ පවත්තඋපකාරචෙතනා විය ඛෙත්තවිසෙසනිප්ඵත්තියා අපකාරචෙතනාපි බලවතී තිබ්බතරා උප්පජ්ජතීති තස්ස මහාසාවජ්ජතා දට්ඨබ්බා. තස්මා පයොගවත්ථුආදිපච්චයානං අමහත්තෙපි ගුණමහන්තතාදිපච්චයෙහි චෙතනාය බලවභාවවසෙනෙව මහාසාවජ්ජතා වෙදිතබ්බා. यहाँ प्रयोग और वस्तु की महानता आदि के कारण महा-सावद्यता (बड़ा पाप) उन प्रत्ययों से उत्पन्न होने वाली चेतना की प्रबलता से जाननी चाहिए। जैसे अभिप्रेत प्रयोग के शीघ्र निष्पादन के वश से, अपने कार्य को सिद्ध करने वाली, अनेक बार प्रवृत्त जवनों द्वारा प्राप्त सेवन वाली सन्निष्ठापक चेतना के कारण प्रयोग की महानता होती है। यद्यपि कभी छोटे और बड़े प्राणी के प्रति प्रयोग समान होने पर भी, बड़े प्राणी को मारने वाले की चेतना अधिक तीव्र उत्पन्न होती है, इसलिए वस्तु की महानता भी चेतना की प्रबलता का कारण है। इस प्रकार ये दोनों ही चेतना की प्रबलता के कारण ही महा-सावद्यता के हेतु होते हैं। उसी प्रकार वध किए जाने वाले के महान गुणवान होने पर, वहाँ प्रवृत्त उपकार-चेतना के समान, क्षेत्र-विशेष की निष्पत्ति से अपकार-चेतना भी बलवती और तीव्रतर उत्पन्न होती है, इसलिए उसकी महा-सावद्यता देखनी चाहिए। इसलिए प्रयोग और वस्तु आदि प्रत्ययों के महान न होने पर भी, गुणों की महानता आदि प्रत्ययों से चेतना की प्रबलता के वश ही महा-सावद्यता जाननी चाहिए। තස්ස පාණො, පාණසඤ්ඤිතා, වධකචිත්තං, උපක්කමො, තෙන මරණන්ති පඤ්ච සම්භාරා. පඤ්චසම්භාරයුත්තො පාණාතිපාතොති පඤ්චසම්භාරාවිනිමුත්තො දට්ඨබ්බො. තෙසු පාණසඤ්ඤිතාවධකචිත්තානි පුබ්බභාගියානිපි හොන්ති, උපක්කමො වධකචෙතනාසමුට්ඨාපිතො. තස්ස ඡ පයොගා – සාහත්ථිකො, ආණත්තිකො, නිස්සග්ගියො, ථාවරො, විජ්ජාමයො, ඉද්ධිමයොති. තෙසු සහත්ථෙන නිබ්බත්තො සාහත්ථිකො. පරෙසං ආණාපනවසෙන පවත්තො ආණත්තිකො. උසුසත්තිආදීනං නිස්සජ්ජනවසෙන පවත්තො නිස්සග්ගියො. ඔපාතඛණනාදිවසෙන පවත්තො ථාවරො. ආථබ්බණිකාදීනං විය මන්තපරිජප්පනපයොගො විජ්ජාමයො. දාඨාකොට්ටනාදීනං විය කම්මවිපාකජිද්ධිමයො. उसके (प्राणातिपात के) पाँच अंग हैं—प्राणी, प्राणी-संज्ञा, वधक-चित्त, उपक्रम (प्रयत्न), और उससे मरण। पाँच अंगों से युक्त प्राणातिपात है, ऐसा इन पाँच अंगों से अविमुक्त (अभिन्न) समझना चाहिए। उनमें प्राणी-संज्ञा और वधक-चित्त पूर्वभागीय (पहले होने वाले) भी होते हैं, और उपक्रम वधक-चेतना से समुत्थापित होता है। उसके छह प्रयोग हैं—साहत्थिक (स्वयं के हाथ से), आणत्तिक (आज्ञा देकर), निस्सग्गिय (फेंककर), थावर (स्थिर/गड्ढा खोदकर आदि), विज्जामय (विद्या/मंत्र द्वारा), और इद्धिमय (ऋद्धि द्वारा)। उनमें अपने हाथ से किया गया 'साहत्थिक' है। दूसरों को आज्ञा देने के वश से प्रवृत्त 'आणत्तिक' है। बाण, शक्ति आदि को फेंकने के वश से प्रवृत्त 'निस्सग्गिय' है। गड्ढा खोदने आदि के वश से प्रवृत्त 'थावर' है। आथर्वणिकों (तांत्रिकों) के समान मंत्र जपने का प्रयोग 'विज्जामय' है। दाढ़ों को कटकटाने आदि के समान कर्म-विपाकज ऋद्धि वाला 'इद्धिमय' है। එත්ථාහ – ඛණෙ ඛණෙ නිරුජ්ඣනසභාවෙසු සඞ්ඛාරෙසු, කො හන්තා, කො වා හඤ්ඤති? යදි චිත්තචෙතසිකසන්තානො, සො අරූපිතාය න ඡෙදනභෙදනාදිවසෙන විකොපනසමත්ථො, නාපි විකොපනීයො, අථ රූපසන්තානො, සො අචෙතනතාය කට්ඨකලිඞ්ගරූපමොති න තත්ථ ඡෙදනාදිනා පාණාතිපාතො ලබ්භති, යථා මතසරීරෙ. පයොගොපි පාණාතිපාතස්ස යථාවුත්තො පහරණප්පහාරාදිකො අතීතෙසු සඞ්ඛාරෙසු භවෙය්ය අනාගතෙසු පච්චුප්පන්නෙසු වා. තත්ථ න තාව අතීතෙසු අනාගතෙසු ච සම්භවති තෙසං අවිජ්ජමානසභාවත්තා, පච්චුප්පන්නෙසු [Pg.219] ච සඞ්ඛාරානං ඛණිකත්තා සරසෙනෙව නිරුජ්ඣනසභාවතාය විනාසාභිමුඛෙසු නිප්පයොජනො පයොගො සියා, විනාසස්ස ච කාරණරහිතත්තා න පහරණප්පහාරාදිප්පයොගහෙතුකං මරණං, නිරීහත්තා ච සඞ්ඛාරානං කස්ස සො පයොගො, ඛණිකභාවෙන වධාධිප්පායසමකාලමෙව භිජ්ජනකස්ස යාව කිරියාපරියොසානකාලමනවට්ඨානතො කස්ස වා පාණාතිපාතො කම්මබන්ධොති? यहाँ कोई कहता है—क्षण-क्षण में निरुद्ध होने वाले स्वभाव वाले संस्कारों में, कौन मारने वाला है और कौन मारा जाता है? यदि चित्त-चैतसिकों की संतान है, तो वह अरूपी होने के कारण छेदन-भेदन आदि के वश से विकृत करने में समर्थ नहीं है, और न ही विकृत होने योग्य है; और यदि रूप-संतान है, तो वह अचेतन होने के कारण काष्ठ और लोष्ट (मिट्टी के ढेले) के समान है, इसलिए वहाँ छेदन आदि से प्राणातिपात सिद्ध नहीं होता, जैसे मृत शरीर में। प्राणातिपात का प्रयोग भी, जैसा कहा गया है—प्रहार करना आदि, अतीत संस्कारों में होगा, अनागत में या वर्तमान में? वहाँ अतीत और अनागत में तो संभव नहीं है क्योंकि उनका स्वभाव अविद्यमान है; और वर्तमान संस्कारों के क्षणिक होने के कारण, अपने आप ही निरुद्ध होने वाले स्वभाव से विनाश की ओर उन्मुख होने पर प्रयोग निष्प्रयोजन होगा; और विनाश के कारण-रहित होने से प्रहार आदि प्रयोग के कारण मरण नहीं होता; और संस्कारों के निरीह (चेष्टा रहित) होने से वह प्रयोग किसका है? क्षणिक होने के कारण वध के अभिप्राय के समय ही नष्ट हो जाने वाले के, क्रिया की समाप्ति के समय तक न ठहरने से, किसका प्राणातिपात कर्म-बंधन होता है? වුච්චතෙ – යථාවුත්තවධකචෙතනාසමඞ්ගී සඞ්ඛාරානං පුඤ්ජො සත්තසඞ්ඛාතො හන්තා. තෙන පවත්තිතවධප්පයොගනිමිත්තං අපගතුස්මාවිඤ්ඤාණජීවිතින්ද්රියො මතොති වොහාරස්ස වත්ථුභූතො යථාවුත්තවධප්පයොගාකරණෙ පුබ්බෙ විය උද්ධං පවත්තනාරහො රූපාරූපධම්මපුඤ්ජො හඤ්ඤති, චිත්තචෙතසිකසන්තානො එව වා. වධප්පයොගාවිසයභාවෙපි තස්ස පඤ්චවොකාරභවෙ රූපසන්තානාධීනවුත්තිතාය භූතරූපෙසු කතප්පයොගවසෙන ජීවිතින්ද්රියවිච්ඡෙදෙන සොපි විච්ඡිජ්ජතීති න පාණාතිපාතස්ස අසම්භවො, නාපි අහෙතුකො, න ච පයොගො නිප්පයොජනො. පච්චුප්පන්නෙසු සඞ්ඛාරෙසු කතප්පයොගවසෙන තදනන්තරං උප්පජ්ජනාරහස්ස සඞ්ඛාරකලාපස්ස තථා අනුප්පත්තිතො ඛණිකානඤ්ච සඞ්ඛාරානං ඛණිකමරණස්ස ඉධ මරණභාවෙන අනධිප්පෙතත්තා සන්තතිමරණස්ස ච යථාවුත්තනයෙන සහෙතුකභාවතො න අහෙතුකං මරණං, නිරීහකෙසුපි සඞ්ඛාරෙසු යථාපච්චයං උප්පජ්ජිත්වා අත්ථිභාවමත්තෙනෙව අත්තනො අත්තනො අනුරූපඵලුප්පාදනනියතානි කාරණානියෙව කරොන්තීති වුච්චති, යථා පදීපො පකාසෙතීති, තථෙව ඝාතකවොහාරො. න ච කෙවලස්ස වධාධිප්පායසහභුනො චිත්තචෙතසිකකලාපස්ස පාණාතිපාතො ඉච්ඡිතො, සන්තානවසෙන වත්තමානස්සෙව පන ඉච්ඡිතොති අත්ථෙව පාණාතිපාතෙන කම්මබන්ධො. සන්තානවසෙන වත්තමානානඤ්ච පදීපාදීනං අත්ථකිරියාසිද්ධි දිස්සතීති. අයඤ්ච විචාරණා අදින්නාදානාදීසුපි යථාසම්භවං විභාවෙතබ්බා. තස්මා පාණාතිපාතා. න පටිවිරතාති අප්පටිවිරතා. उत्तर दिया जाता है—यथोक्त वधक-चेतना से युक्त संस्कारों का पुंज, जिसे 'सत्त्व' कहा जाता है, वह मारने वाला है। उसके द्वारा प्रवृत्त वध-प्रयोग के कारण जिसकी ऊष्मा, विज्ञान और जीवितिन्द्रिय समाप्त हो गई है, वह 'मर गया' इस व्यवहार का विषयभूत, यथोक्त वध-प्रयोग न करने पर पहले की तरह आगे प्रवृत्त होने योग्य रूप-अरूप धर्मों का पुंज मारा जाता है, अथवा चित्त-चैतसिकों की संतान ही मारी जाती है। वध-प्रयोग का विषय न होने पर भी, पंचवोकार भव में रूप-संतान के अधीन होने के कारण, भूतों (महाभूतों) में किए गए प्रयोग के वश से जीवितिन्द्रिय के विच्छेद होने पर वह भी विच्छिन्न हो जाता है, इसलिए प्राणातिपात असंभव नहीं है, न ही अहेतुक है, और न ही प्रयोग निष्प्रयोजन है। वर्तमान संस्कारों में किए गए प्रयोग के वश से, उसके ठीक बाद उत्पन्न होने योग्य संस्कार-कलाप की वैसी उत्पत्ति न होने से, और क्षणिक संस्कारों के 'क्षणिक मरण' का यहाँ 'मरण' के रूप में अभिप्रेत न होने से, तथा 'संतान-मरण' के यथोक्त रीति से सहेतुक होने से मरण अहेतुक नहीं है। निरीह होने पर भी संस्कार प्रत्ययों के अनुसार उत्पन्न होकर, केवल अपने अस्तित्व मात्र से ही अपने-अपने अनुरूप फल उत्पन्न करने के लिए नियत कारणों को ही करते हैं, ऐसा कहा जाता है—जैसे 'दीपक प्रकाशित करता है', वैसे ही 'घातक' का व्यवहार होता है। और केवल वध के अभिप्राय के साथ होने वाले चित्त-चैतसिक कलाप का प्राणातिपात इष्ट नहीं है, बल्कि संतान के रूप में वर्तमान का ही इष्ट है, इसलिए प्राणातिपात से कर्म-बंधन होता ही है। और संतान के रूप में वर्तमान दीपक आदि की अर्थ-क्रिया की सिद्धि देखी जाती है। और यह विचार अदत्तादान आदि में भी यथासंभव स्पष्ट करना चाहिए। इसलिए प्राणातिपात से जो विरत नहीं हैं, वे 'अप्रतिविरत' हैं। අදින්නස්ස ආදානං අදින්නාදානං, පරස්ස හරණං ථෙය්යං චොරිකාති වුත්තං හොති. තත්ථ අදින්නන්ති පරපරිග්ගහිතං, යත්ථ පරො යථාකාමකාරිතං ආපජ්ජන්තො අදණ්ඩාරහො අනුපවජ්ජො ච හොති. තස්මිං පරපරිග්ගහිතෙ [Pg.220] පරපරිග්ගහිතසඤ්ඤිනො තදාදායකඋපක්කමසමුට්ඨාපිකා ථෙය්යචෙතනා අදින්නාදානං. තං හීනෙ පරසන්තකෙ අප්පසාවජ්ජං, පණීතෙ මහාසාවජ්ජං. කස්මා? වත්ථුපණීතතාය. තථා ඛුද්දකෙ පරසන්තකෙ අප්පසාවජ්ජං, මහන්තෙ මහාසාවජ්ජං. කස්මා? වත්ථුමහන්තතාය පයොගමහන්තතාය ච. වත්ථුසමත්තෙ පන සති ගුණාධිකානං සන්තකෙ වත්ථුස්මිං මහාසාවජ්ජං, තංතංගුණාධිකං උපාදාය තතො තතො හීනගුණස්ස සන්තකෙ වත්ථුස්මිං අප්පසාවජ්ජං. වත්ථුගුණානං පන සමභාවෙ සති කිලෙසානං පයොගස්ස ච මුදුභාවෙ අප්පසාවජ්ජං, තිබ්බභාවෙ මහාසාවජ්ජං. जो दिया नहीं गया है उसे लेना 'अदत्तादान' है, इसे दूसरे की वस्तु का हरण, स्तेय (चोरी) या चोरी कहा जाता है। वहाँ 'अदत्त' का अर्थ है दूसरे के अधिकार में होना, जहाँ दूसरा व्यक्ति अपनी इच्छानुसार कार्य करने पर दण्ड का पात्र या निन्दा का पात्र नहीं होता। उस दूसरे के अधिकार वाली वस्तु में, 'यह दूसरे की है' ऐसी संज्ञा (पहचान) रखते हुए, उसे लेने के उपक्रम (प्रयास) को उत्पन्न करने वाली स्तेय-चेतना (चोरी की इच्छा) 'अदत्तादान' है। वह हीन (कम मूल्य वाली) पराई वस्तु होने पर अल्प-सावद्य (कम पाप वाला) और उत्तम वस्तु होने पर महा-सावद्य (बड़ा पाप) होता है। क्यों? वस्तु की उत्तमता के कारण। उसी प्रकार छोटी पराई वस्तु में अल्प-सावद्य और बड़ी वस्तु में महा-सावद्य होता है। क्यों? वस्तु की विशालता और प्रयास की अधिकता के कारण। वस्तु की समानता होने पर भी, अधिक गुणों वाले व्यक्ति की वस्तु होने पर महा-सावद्य होता है, और उन-उन गुणों की अधिकता की तुलना में उससे कम गुण वाले की वस्तु होने पर अल्प-सावद्य होता है। वस्तु और गुणों की समानता होने पर, क्लेशों और प्रयास की मृदुता (कोमलता) होने पर अल्प-सावद्य और तीव्रता होने पर महा-सावद्य होता है। තස්ස පඤ්ච සම්භාරා – පරපරිග්ගහිතං, පරපරිග්ගහිතසඤ්ඤිතා, ථෙය්යචිත්තං, උපක්කමො, තෙන හරණන්ති. ඡ පයොගා සාහත්ථිකාදයොව. තෙ ච ඛො යථානුරූපං ථෙය්යාවහාරො, පසය්හාවහාරො, පරිකප්පාවහාරො, පටිච්ඡන්නාවහාරො, කුසාවහාරොති ඉමෙසං අවහාරානං වසෙන පවත්තා. එත්ථ ච මන්තපරිජප්පනෙන පරසන්තකහරණං විජ්ජාමයො පයොගො. විනා මන්තෙන තාදිසෙන ඉද්ධානුභාවසිද්ධෙන කායවචීපයොගෙන පරසන්තකස්ස ආකඩ්ඪනං ඉද්ධිමයො පයොගොති වෙදිතබ්බො. उसके पाँच अंग (सम्भार) हैं - दूसरे के अधिकार की वस्तु, दूसरे के अधिकार की वस्तु होने की संज्ञा (ज्ञान), चोरी का चित्त, उपक्रम (प्रयास), और उसके द्वारा हरण करना। छह प्रयोग 'साहत्थिक' (स्वयं के हाथ से करना) आदि ही हैं। और वे यथारूप स्तेयावहार (चोरी से ले जाना), प्रसह्यावहार (बलपूर्वक ले जाना), परिकप्पावहार (कपट से ले जाना), पटिच्छन्नावहार (छिपकर ले जाना), और कुसावहार (नाप-तौल में ठगी) - इन अपहरणों के वश में प्रवृत्त होते हैं। यहाँ मन्त्रों के जप द्वारा पराई वस्तु का हरण करना 'विद्यामय' प्रयोग है। बिना मन्त्र के, वैसी ऋद्धि के प्रभाव से सिद्ध कायिक और वाचिक प्रयोग द्वारा पराई वस्तु को खींचना 'ऋद्धिमय' प्रयोग समझना चाहिए। කාමෙසූති මෙථුනසමාචාරෙසු. මිච්ඡාචාරොති එකන්තනින්දිතො ලාමකාචාරො. ලක්ඛණතො පන අසද්ධම්මාධිප්පායෙන කායද්වාරප්පවත්තා අගමනීයට්ඨානවීතික්කමචෙතනා කාමෙසු මිච්ඡාචාරො. තත්ථ අගමනීයට්ඨානං නාම පුරිසානං තාව මාතුරක්ඛිතාදයො දස, ධනක්කීතාදයො දසාති වීසති ඉත්ථියො, ඉත්ථීසු පන ද්වින්නං සාරක්ඛසපරිදණ්ඩානං, දසන්නඤ්ච ධනක්කීතාදීනන්ති ද්වාදසන්නං ඉත්ථීනං අඤ්ඤපුරිසා. ස්වායං මිච්ඡාචාරො සීලාදිගුණරහිතෙ අගමනීයට්ඨානෙ අප්පසාවජ්ජො, සීලාදිගුණසම්පන්නෙ මහාසාවජ්ජො. ගුණරහිතෙපි ච අභිභවිත්වා මිච්ඡා චරන්තස්ස මහාසාවජ්ජො, උභින්නං සමානච්ඡන්දතාය අප්පසාවජ්ජො. සමානච්ඡන්දභාවෙපි කිලෙසානං උපක්කමානඤ්ච මුදුතාය අප්පසාවජ්ජො, තිබ්බතාය මහාසාවජ්ජො. තස්ස චත්තාරො සම්භාරා – අගමනීයවත්ථු, තස්මිං සෙවනචිත්තං, සෙවනපයොගො, මග්ගෙනමග්ගප්පටිපත්තිඅධිවාසනන්ති. තත්ථ අත්තනො රුචියා පවත්තිතස්ස තයො, බලක්කාරෙන පවත්තිතස්ස තයොති අනවසෙසග්ගහණෙන චත්තාරො දට්ඨබ්බා, අත්ථසිද්ධි පන තීහෙව. එකො පයොගො සාහත්ථිකොව. 'कामों में' अर्थात् मैथुन-समाचारों में। 'मिथ्याचार' अर्थात् एकान्ततः निन्दित नीच आचरण। लक्षण के अनुसार, असद्धर्म के अभिप्राय से काय-द्वार से प्रवृत्त अगमनीय स्थानों (निषिद्ध व्यक्तियों) के उल्लंघन की चेतना 'कामों में मिथ्याचार' है। वहाँ अगमनीय स्थान का अर्थ है - पुरुषों के लिए पहले 'मातृ-रक्षित' आदि दस और 'धन-क्रीत' आदि दस, इस प्रकार बीस स्त्रियाँ; स्त्रियों के लिए दो (संरक्षित और दण्डित) और दस 'धन-क्रीत' आदि, इस प्रकार बारह स्त्रियों के अन्य पुरुष। यह मिथ्याचार शीलादि गुणों से रहित अगमनीय स्थान में अल्प-सावद्य और शीलादि गुणों से सम्पन्न में महा-सावद्य होता है। गुणरहित होने पर भी, बलपूर्वक मिथ्याचार करने वाले का महा-सावद्य और दोनों की समान इच्छा होने पर अल्प-सावद्य होता है। समान इच्छा होने पर भी क्लेशों और उपक्रमों की मृदुता से अल्प-सावद्य और तीव्रता से महा-सावद्य होता है। उसके चार अंग हैं - अगमनीय वस्तु (व्यक्ति), उसमें सेवन का चित्त, सेवन का प्रयोग, और मार्ग से मार्ग के प्रतिपत्ति (प्रवेश) को स्वीकार करना। वहाँ अपनी रुचि से प्रवृत्त होने वाले के तीन, और बलपूर्वक प्रवृत्त होने वाले के तीन - इस प्रकार बिना किसी शेष के ग्रहण करने से चार देखने चाहिए, किन्तु अर्थ की सिद्धि तीन से ही होती है। प्रयोग एक ही है - साहत्थिक (स्वयं के शरीर से)। මුසාති [Pg.221] විසංවාදනපුරෙක්ඛාරස්ස අත්ථභඤ්ජකො කායවචීපයොගො, විසංවාදනාධිප්පායෙන පනස්ස පරවිසංවාදකකායවචීපයොගසමුට්ඨාපිකා චෙතනා මුසාවාදො. අපරො නයො මුසාති අභූතං වත්ථු, වාදොති තස්ස භූතතො තච්ඡතො විඤ්ඤාපනං. තස්මා අතථං වත්ථුං තථතො පරං විඤ්ඤාපෙතුකාමස්ස තථාවිඤ්ඤාපනපයොගසමුට්ඨාපිකා චෙතනා මුසාවාදො. 'मृषा' (झूठ) अर्थात् धोखा देने को आगे रखकर अर्थ का नाश करने वाला कायिक या वाचिक प्रयोग है; धोखा देने के अभिप्राय से दूसरे को धोखा देने वाले कायिक या वाचिक प्रयोग को उत्पन्न करने वाली चेतना 'मृषावाद' है। दूसरा तरीका - 'मृषा' अर्थात् असत्य वस्तु, 'वाद' अर्थात् उसे सत्य या तथ्य के रूप में जनाना। इसलिए, असत्य वस्तु को सत्य के रूप में दूसरे को जनाने की इच्छा रखने वाले की, वैसी जानकारी देने के प्रयोग को उत्पन्न करने वाली चेतना 'मृषावाद' है। සො යමත්ථං භඤ්ජති, තස්ස අප්පතාය අප්පසාවජ්ජො, මහන්තතාය මහාසාවජ්ජො. අපිච ගහට්ඨානං අත්තනො සන්තකං අදාතුකාමතාය නත්ථීති ආදිනයප්පවත්තො අප්පසාවජ්ජො, සක්ඛිනා හුත්වා අත්ථභඤ්ජනවසෙන වුත්තො මහාසාවජ්ජො. පබ්බජිතානං අප්පකම්පි තෙලං වා සප්පිං වා ලභිත්වා හසාධිප්පායෙන ‘‘අජ්ජ ගාමෙ තෙලං නදී මඤ්ඤෙ සන්දතී’’ති පූරණකථානයෙන පවත්තො අප්පසාවජ්ජො, අදිට්ඨංයෙව පන ‘‘දිට්ඨ’’න්තිආදිනා නයෙන වදන්තානං මහාසාවජ්ජො. තථා යස්ස අත්ථං භඤ්ජති, තස්ස අප්පගුණතාය අප්පසාවජ්ජො, මහාගුණතාය මහාසාවජ්ජො. කිලෙසානං මුදුතිබ්බතාවසෙන ච අප්පසාවජ්ජමහාසාවජ්ජතා ලබ්භතෙව. वह जिस अर्थ (प्रयोजन) का नाश करता है, उसके छोटा होने पर अल्प-सावद्य और बड़ा होने पर महा-सावद्य होता है। इसके अतिरिक्त, गृहस्थों के लिए अपनी वस्तु न देने की इच्छा से 'नहीं है' आदि प्रकार से प्रवृत्त (झूठ) अल्प-सावद्य है, किन्तु साक्षी बनकर अर्थ का नाश करने के वश में कहा गया (झूठ) महा-सावद्य है। प्रव्रजितों (भिक्षुओं) के लिए थोड़ा सा तेल या घी प्राप्त करके हँसने के अभिप्राय से 'आज गाँव में तेल की नदी बह रही है' इस प्रकार की अतिशयोक्तिपूर्ण कथा के रूप में प्रवृत्त (झूठ) अल्प-सावद्य है, किन्तु न देखे हुए को ही 'देखा है' आदि प्रकार से कहने वालों का महा-सावद्य है। उसी प्रकार, जिसके अर्थ का नाश करता है, उसके अल्प-गुणी होने पर अल्प-सावद्य और महा-गुणी होने पर महा-सावद्य होता है। क्लेशों की मृदुता और तीव्रता के वश में भी अल्प-सावद्यता और महा-सावद्यता प्राप्त होती ही है। තස්ස චත්තාරො සම්භාරා – අතථං වත්ථු, විසංවාදනචිත්තං, තජ්ජො වායාමො, පරස්ස තදත්ථවිජානනන්ති. විසංවාදනාධිප්පායෙන හි පයොගෙ කතෙපි පරෙන තස්මිං අත්ථෙ අවිඤ්ඤාතෙ විසංවාදනස්ස අසිජ්ඣනතො පරස්ස තදත්ථවිජානනම්පි එකො සම්භාරො වෙදිතබ්බො. කෙචි පන ‘‘අභූතවචනං, විසංවාදනචිත්තං, පරස්ස තදත්ථවිජානනන්ති තයො සම්භාරා’’ති වදන්ති. සචෙ පන පරො දන්ධතාය විචාරෙත්වා තමත්ථං ජානාති, සන්නිට්ඨාපකචෙතනාය පවත්තත්තා කිරියාසමුට්ඨාපකචෙතනාක්ඛණෙයෙව මුසාවාදකම්මුනා බජ්ඣති. उसके चार अंग हैं - असत्य वस्तु, धोखा देने का चित्त, उससे उत्पन्न प्रयास, और दूसरे का उस अर्थ को समझ लेना। क्योंकि धोखा देने के अभिप्राय से प्रयोग किए जाने पर भी, यदि दूसरे द्वारा उस अर्थ को नहीं समझा गया तो धोखा देना सिद्ध नहीं होता, इसलिए 'दूसरे का उस अर्थ को समझ लेना' भी एक अंग समझना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि 'असत्य वचन, धोखा देने का चित्त, और दूसरे का उस अर्थ को समझ लेना - ये तीन अंग हैं'। यदि दूसरा व्यक्ति मन्दबुद्धि होने के कारण विचार करके उस बात को समझता है, तो (झूठ बोलने वाले की) निश्चित करने वाली चेतना के प्रवृत्त होने के कारण, क्रिया को उत्पन्न करने वाली चेतना के क्षण में ही वह मृषावाद के कर्म से बँध जाता है। සුරාති පිට්ඨසුරා, පූවසුරා, ඔදනසුරා, කිණ්ණපක්ඛිත්තා, සම්භාරසංයුත්තාති පඤ්ච සුරා. මෙරයන්ති පුප්ඵාසවො, ඵලාසවො, මධ්වාසවො, ගුළාසවො සම්භාරසංයුත්තොති පඤ්ච ආසවා. තදුභයම්පි මදනීයට්ඨෙන මජ්ජං. යාය චෙතනාය තං පිවති, සා පමාදකාරණත්තා පමාදට්ඨානං. ලක්ඛණතො පන යථාවුත්තස්ස සුරාමෙරයසඞ්ඛාතස්ස මජ්ජස්ස බීජතො පට්ඨාය මදවසෙන කායද්වාරප්පවත්තා පමාදචෙතනා සුරාමෙරයමජ්ජපමාදට්ඨානං. තස්ස මජ්ජභාවො, පාතුකම්යතාචිත්තං, තජ්ජො වායාමො, අජ්ඣොහරණන්ති චත්තාරො සම්භාරා. අකුසලචිත්තෙනෙව චස්ස පාතබ්බතො එකන්තෙන සාවජ්ජභාවො[Pg.222]. අරියසාවකානං පන වත්ථුං අජානන්තානම්පි මුඛං න පවිසති, පගෙව ජානන්තානං. අඩ්ඪපසතමත්තස්ස පානං අප්පසාවජ්ජං, අද්ධාළ්හකමත්තස්ස පානං තතො මහන්තං මහාසාවජ්ජං, කායසඤ්චාලනසමත්ථං බහුං පිවිත්වා ගාමඝාතකාදිකම්මං කරොන්තස්ස මහාසාවජ්ජමෙව. පාපකම්මඤ්හි පාණාතිපාතං පත්වා ඛීණාසවෙ මහාසාවජ්ජං, අදින්නාදානං පත්වා ඛීණාසවස්ස සන්තකෙ මහාසාවජ්ජං, මිච්ඡාචාරං පත්වා ඛීණාසවාය භික්ඛුනියා වීතික්කමෙ, මුසාවාදං පත්වා මුසාවාදෙන සඞ්ඝභෙදෙ, සුරාපානං පත්වා කායසඤ්චාලනසමත්ථං බහුං පිවිත්වා ගාමඝාතකාදිකම්මං මහාසාවජ්ජං. සබ්බෙහිපි චෙතෙහි මුසාවාදෙන සඞ්ඝභෙදොව මහාසාවජ්ජො. තඤ්හි කත්වා කප්පං නිරයෙ පච්චති. सुरा पाँच प्रकार की होती है: पिष्टसुरा (आटे से बनी), पूवसुरा (पकवानों से बनी), ओदनसुरा (चावल से बनी), किण्णपक्खित्ता (खमीर डाली हुई), और सम्भारसंयुत्ता (मसालों से युक्त)। मेरय पाँच प्रकार के आसव हैं: पुष्पासव (फूलों का), फलासव (फलों का), मध्वासव (शहद का), गुडासव (गुड़ का), और सम्भारसंयुत्त (मसालों से युक्त)। ये दोनों ही मदहोश करने के कारण 'मज्ज' (मदिरा) कहलाते हैं। जिस चेतना से व्यक्ति इसे पीता है, वह प्रमाद का कारण होने से 'प्रमादस्थान' है। लक्षण की दृष्टि से, पूर्वोक्त सुरा और मेरय नामक मदिरा के बीज से लेकर मद के वश में होकर काय-द्वार से प्रवृत्त होने वाली प्रमाद-चेतना 'सुरामेरयमज्जप्रमादस्थान' है। इसके चार अंग (सम्भार) हैं: मदिरा का होना, पीने की इच्छा वाला चित्त, उसके लिए किया गया प्रयास, और उसे गले से नीचे उतारना। अकुशल चित्त से ही इसे पिया जाता है, इसलिए यह निश्चित रूप से दोषपूर्ण (सावज्ज) है। आर्य श्रावकों के मुख में तो वस्तु को न जानते हुए भी यह प्रवेश नहीं करती, फिर जानते हुए तो प्रश्न ही नहीं उठता। आधा पसल (एक माप) मात्र पीना अल्प दोषपूर्ण है, आधा आढक (बड़ा माप) पीना उससे अधिक महादोषपूर्ण है, और शरीर को हिला देने वाली अत्यधिक मात्रा में पीकर ग्राम-घातक आदि कर्म करना अत्यंत महादोषपूर्ण है। पाप कर्मों में, प्राणातिपात के संदर्भ में क्षीणास्त्रव (अर्हत) की हत्या महादोषपूर्ण है, अदत्तादान के संदर्भ में क्षीणास्त्रव की वस्तु लेना महादोषपूर्ण है, मिथ्याचार के संदर्भ में क्षीणास्त्रव भिक्षुणी के साथ व्यभिचार महादोषपूर्ण है, मृषावाद के संदर्भ में संघ-भेद करना महादोषपूर्ण है, और सुरापान के संदर्भ में अत्यधिक पीकर ग्राम-घातक आदि कर्म करना महादोषपूर्ण है। इन सबमें मृषावाद द्वारा संघ-भेद करना ही सर्वाधिक महादोषपूर्ण है। उसे करके व्यक्ति कल्प भर नरक में पकता है। ඉදානි එතෙසු සභාවතො, ආරම්මණතො, වෙදනතො, මූලතො, කම්මතො, ඵලතොති ඡහි ආකාරෙහි විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. තත්ථ සභාවතො පාණාතිපාතාදයො සබ්බෙපි චෙතනාසභාවාව. ආරම්මණතො පාණාතිපාතො ජීවිතින්ද්රියාරම්මණතො සඞ්ඛාරාරම්මණො, අදින්නාදානං සත්තාරම්මණං වා සඞ්ඛාරාරම්මණං වා, මිච්ඡාචාරො ඵොට්ඨබ්බවසෙන සඞ්ඛාරාරම්මණො, සත්තාරම්මණොති එකෙ. මුසාවාදො සත්තාරම්මණො වා සඞ්ඛාරාරම්මණො වා, සුරාපානං සඞ්ඛාරාරම්මණං. වෙදනතො පාණාතිපාතො දුක්ඛවෙදනො, අදින්නාදානං තිවෙදනං, මිච්ඡාචාරො සුඛමජ්ඣත්තවසෙන ද්විවෙදනො, තථා සුරාපානං. සන්නිට්ඨාපකචිත්තෙන පන උභයම්පි මජ්ඣත්තවෙදනං න හොති. මුසාවාදො තිවෙදනො. මූලතො පාණාතිපාතො දොසමොහවසෙන ද්විමූලකො, අදින්නාදානං මුසාවාදො ච දොසමොහවසෙන වා ලොභමොහවසෙන වා, මිච්ඡාචාරො සුරාපානඤ්ච ලොභමොහවසෙන ද්විමූලං. කම්මතො මුසාවාදොයෙවෙත්ථ වචීකම්මං, සෙසං චතුබ්බිධම්පි කායකම්මමෙව. ඵලතො සබ්බෙපි අපායූපපත්තිඵලා චෙව සුගතියම්පි අප්පායුකතාදිනානාවිධඅනිට්ඨඵලා චාති එවමෙත්ථ සභාවාදිතො විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. अब इनके विषय में स्वभाव, आलम्बन, वेदना, मूल, कर्म और फल—इन छह प्रकारों से निश्चय समझना चाहिए। वहाँ स्वभाव की दृष्टि से प्राणातिपात आदि सभी चेतना-स्वभाव वाले ही हैं। आलम्बन की दृष्टि से प्राणातिपात जीवितिन्द्रिय आलम्बन होने के कारण संस्कारालम्बन है; अदत्तादान सत्त्वालम्बन या संस्कारालम्बन है; मिथ्याचार स्पर्श के कारण संस्कारालम्बन है, कुछ लोग इसे सत्त्वालम्बन कहते हैं। मृषावाद सत्त्वालम्बन या संस्कारालम्बन है; सुरापान संस्कारालम्बन है। वेदना की दृष्टि से प्राणातिपात दुःख-वेदना वाला है; अदत्तादान तीनों वेदनाओं वाला है; मिथ्याचार सुख और उपेक्षा के भेद से दो वेदनाओं वाला है, वैसे ही सुरापान भी। किंतु निश्चय करने वाले चित्त से दोनों ही उपेक्षा वेदना वाले नहीं होते। मृषावाद तीनों वेदनाओं वाला है। मूल की दृष्टि से प्राणातिपात द्वेष और मोह के कारण द्वि-मूलक है; अदत्तादान और मृषावाद द्वेष-मोह या लोभ-मोह के कारण द्वि-मूलक हैं; मिथ्याचार और सुरापान लोभ-मोह के कारण द्वि-मूलक हैं। कर्म की दृष्टि से यहाँ केवल मृषावाद ही वाक्-कर्म है, शेष चारों काय-कर्म ही हैं। फल की दृष्टि से सभी अपाय में उत्पत्ति रूपी फल वाले हैं और सुगति में भी अल्पायु आदि विभिन्न प्रकार के अनिष्ट फल वाले हैं—इस प्रकार यहाँ स्वभाव आदि से निश्चय समझना चाहिए। අප්පටිවිරතාති සමාදානවිරතියා සම්පත්තවිරතියා ච අභාවෙන න පටිවිරතා. දුස්සීලාති තතො එව පඤ්චසීලමත්තස්සාපි අභාවෙන නිස්සීලා. පාපධම්මාති ලාමකධම්මා, හීනාචාරා. පාණාතිපාතා පටිවිරතොති [Pg.223] සික්ඛාපදසමාදානෙන පාණාතිපාතතො විරතො, ආරකා ඨිතො. එස නයො සෙසෙසුපි. 'अप्रतिविरत' का अर्थ है—समादान-विरति और सम्प्राप्त-विरति के अभाव के कारण विरत न होना। 'दुःशील' का अर्थ है—उसी कारण से पंचशील मात्र के भी अभाव से शीलरहित होना। 'पापधर्मा' का अर्थ है—नीच धर्म वाले, हीन आचरण वाले। 'प्राणातिपात से विरत' का अर्थ है—शिक्षापद के ग्रहण से प्राणातिपात से विरत होना, उससे दूर रहना। यही नियम शेष शिक्षापदों में भी है। ඉධාපි පාණාතිපාතාවෙරමණිආදීනං සභාවතො ආරම්මණතො, වෙදනතො, මූලතො, කම්මතො, සමාදානතො, භෙදතො, ඵලතො ච විඤ්ඤාතබ්බො විනිච්ඡයො. තත්ථ සභාවතො පඤ්චපි චෙතනායොපි හොන්ති විරතියොපි, විරතිවසෙන පන දෙසනා ආගතා. යා පාණාතිපාතා විරමන්තස්ස ‘‘යා තස්මිං සමයෙ පාණාතිපාතා ආරති විරතී’’ති එවං වුත්තා කුසලචිත්තසම්පයුත්තා විරති. සා පභෙදතො තිවිධා – සම්පත්තවිරති, සමාදානවිරති, සමුච්ඡෙදවිරතීති. තත්ථ අසමාදින්නසික්ඛාපදානං අත්තනො ජාතිවයබාහුසච්චාදීනි පච්චවෙක්ඛිත්වා ‘‘අයුත්තමෙතං අම්හාකං කාතු’’න්ති සම්පත්තවත්ථුං අවීතික්කමන්තානං උප්පජ්ජමානා විරති සම්පත්තවිරති නාම. සමාදින්නසික්ඛාපදානං සික්ඛාපදසමාදානෙ තදුත්තරි ච අත්තනො ජීවිතම්පි පරිච්චජිත්වා වත්ථුං අවීතික්කමන්තානං උප්පජ්ජමානා විරති සමාදානවිරති නාම. අරියමග්ගසම්පයුත්තා පන විරති සමුච්ඡෙදවිරති නාම, යස්සා උප්පත්තිතො පට්ඨාය අරියපුග්ගලානං ‘‘පාණං ඝාතෙස්සාමා’’ති චිත්තම්පි න උප්පජ්ජති. තාසු සමාදානවිරති ඉධාධිප්පෙතා. यहाँ भी प्राणातिपात-विरति आदि का स्वभाव, आलम्बन, वेदना, मूल, कर्म, समादान, भेद और फल की दृष्टि से निश्चय समझना चाहिए। वहाँ स्वभाव की दृष्टि से पाँचों चेतनाएँ भी होती हैं और विरतियाँ भी, किंतु यहाँ विरति के रूप में देशना आई है। प्राणातिपात से विरत होने वाले व्यक्ति की 'उस समय जो प्राणातिपात से आरति और विरति है' इस प्रकार कही गई कुशल-चित्त-सम्प्रयुक्त विरति है। वह भेद से तीन प्रकार की है—सम्प्राप्त-विरति, समादान-विरति और समुच्छेद-विरति। उनमें, जिन्होंने शिक्षापदों को ग्रहण नहीं किया है, वे अपनी जाति, आयु, बहुश्रुतता आदि का विचार करके 'हमारे लिए यह करना अनुचित है' ऐसा सोचकर सामने आई वस्तु का उल्लंघन नहीं करते, तब उत्पन्न होने वाली विरति 'सम्प्राप्त-विरति' कहलाती है। जिन्होंने शिक्षापदों को ग्रहण किया है, वे शिक्षापद के समादान के कारण और उससे भी बढ़कर अपने जीवन का भी त्याग करके वस्तु का उल्लंघन नहीं करते, तब उत्पन्न होने वाली विरति 'समादान-विरति' कहलाती है। आर्यमार्ग से सम्प्रयुक्त विरति 'समुच्छेद-विरति' कहलाती है, जिसके उत्पन्न होने के बाद से आर्य पुद्गलों को 'प्राणी की हत्या करेंगे' ऐसा चित्त भी उत्पन्न नहीं होता। इनमें यहाँ 'समादान-विरति' अभिप्रेत है। ආරම්මණතො පාණාතිපාතාදීනං ආරම්මණානෙව එතෙසං ආරම්මණානි. වීතික්කමිතබ්බතොයෙව හි විරති නාම හොති. යථා පන නිබ්බානාරම්මණො අරියමග්ගො කිලෙසෙ පජහති, එවං ජීවිතින්ද්රියාදිආරම්මණායෙව එතෙ කුසලධම්මා පාණාතිපාතාදීනි දුස්සීල්යානි පජහන්ති. වෙදනතො සබ්බාපි සුඛවෙදනාව. आलम्बन की दृष्टि से, प्राणातिपात आदि के जो आलम्बन हैं, वही इनके भी आलम्बन हैं। क्योंकि उल्लंघन करने योग्य वस्तु से ही विरति होती है। जैसे निर्वाण को आलम्बन बनाने वाला आर्यमार्ग क्लेशों का प्रहाण करता है, वैसे ही जीवितिन्द्रिय आदि को आलम्बन बनाने वाले ये कुशल धर्म प्राणातिपात आदि दुःशीलों का प्रहाण करते हैं। वेदना की दृष्टि से सभी सुख-वेदना वाली ही हैं। මූලතො ඤාණසම්පයුත්තචිත්තෙන විරමන්තස්ස අලොභඅදොසඅමොහවසෙන තිමූලා හොන්ති, ඤාණවිප්පයුත්තචිත්තෙන විරමන්තස්ස අලොභඅදොසවසෙන ද්විමූලා. කම්මතො මුසාවාදා වෙරමණි වචීකම්මං, සෙසා කායකම්මං. සමාදානතො අඤ්ඤස්ස ගරුට්ඨානියස්ස සන්තිකෙ තං අලභන්තෙන සයමෙව වා පඤ්ච සීලානි එකජ්ඣං පාටියෙක්කං වා සමාදියන්තෙන සමාදින්නානි හොන්ති. භෙදතො ගහට්ඨානං යං යං වීතික්කන්තං, තං තදෙව භිජ්ජති, ඉතරං න භිජ්ජති. කස්මා? ගහට්ඨා හි අනිබද්ධසීලා හොන්ති, යං යං සක්කොන්ති, තං තදෙව රක්ඛන්ති. පබ්බජිතානං පන එකස්මිං වීතික්කන්තෙ සබ්බානි භිජ්ජන්තීති. मूल से, ज्ञान-संप्रयुक्त चित्त से विरत होने वाले के अलोभ, अदोष और अमोह के वश से तीन मूल होते हैं; ज्ञान-विप्रयुक्त चित्त से विरत होने वाले के अलोभ और अदोष के वश से दो मूल होते हैं। कर्म से, मृषावाद से विरति वाक्-कर्म है, शेष काय-कर्म हैं। समादान से, किसी अन्य गुरु-स्थानीय के पास उसे न प्राप्त करते हुए स्वयं ही पाँच शीलों को एक साथ या अलग-अलग ग्रहण करने वाले के द्वारा वे समादत्त (ग्रहण किए हुए) होते हैं। भेद से, गृहस्थों के लिए जो-जो अतिक्रमित होता है, वही-वही टूटता है, दूसरा नहीं टूटता। क्यों? क्योंकि गृहस्थ अनिबद्ध-शील (नियमबद्ध शील वाले) नहीं होते, वे जो-जो समर्थ होते हैं, उसी-उसी की रक्षा करते हैं। परंतु प्रव्रजितों के लिए एक के अतिक्रमित होने पर सभी टूट जाते हैं। ඵලතොති [Pg.224] පාණාතිපාතා වෙරමණියා චෙත්ථ අඞ්ගපච්චඞ්ගසම්පන්නතා, ආරොහපරිණාහසම්පත්ති, ජවනසම්පත්ති, සුප්පතිට්ඨිතපාදතා, චාරුතා, මුදුතා, සුචිතා, සූරතා, මහබ්බලතා, විස්සට්ඨවචනතා, සත්තානං පියමනාපතා, අභිජ්ජපරිසතා, අච්ඡම්භිතා, දුප්පධංසියතා, පරූපක්කමෙන අමරණතා, මහාපරිවාරතා, සුවණ්ණතා, සුසණ්ඨානතා, අප්පාබාධතා, අසොකතා, පියමනාපෙහි අවිප්පයොගො, දීඝායුකතාති එවමාදීනි ඵලානි. फल से, प्राणातिपात से विरति के यहाँ ये फल हैं: अंगों और प्रत्यंगों की संपन्नता, ऊँचाई और चौड़ाई की संपत्ति (सुडौल शरीर), वेग की संपन्नता, सुप्रतिष्ठित पैर, सुंदरता, कोमलता, पवित्रता, शूरता, महाबल, स्पष्ट वाणी, प्राणियों का प्रिय और मनभावन होना, अविभाज्य परिषद (अनुयायी), निर्भयता, अपराजेयता, दूसरों के उपक्रम (प्रयास) से मृत्यु न होना, महा-परिवार, सुंदर वर्ण, सुगठन, अल्प-रोग, शोक-रहित होना, प्रिय और मनभावन जनों से वियोग न होना, दीर्घायु होना - ये आदि फल हैं। අදින්නාදානා වෙරමණියා මහාධනධඤ්ඤතා, අනන්තභොගතා, ථිරභොගතා, ඉච්ඡිතානං භොගානං ඛිප්පං පටිලාභො, රාජාදීහි අසාධාරණභොගතා, උළාරභොගතා, තත්ථ තත්ථ ජෙට්ඨකභාවො, නත්ථිභාවස්ස අජානනතා, සුඛවිහාරිතාති එවමාදීනි. अदत्तादान से विरति के फल हैं: महा-धन और धान्य का होना, अनंत भोग, स्थिर भोग, इच्छित भोगों की शीघ्र प्राप्ति, राजा आदि के साथ असाधारण (साझा न होने वाला) भोग, उदार भोग, जहाँ-तहाँ श्रेष्ठता (नेतृत्व), अभाव का न जानना (कभी कमी न होना), सुखपूर्वक विहार करना - ये आदि। අබ්රහ්මචරියා වෙරමණියා විගතපච්චත්ථිකතා, සබ්බසත්තානං පියමනාපතා, අන්නපානවත්ථච්ඡාදනාදීනං ලාභිතා, සුඛසුපනතා, සුඛපටිබුජ්ඣනතා, අපායභයවිමොක්ඛො, ඉත්ථිභාවනපුංසකභාවානං අභබ්බතා, අක්කොධනතා, සච්චකාරිතා, අමඞ්කුතා, ආරාධනසුඛතා, පරිපුණ්ණින්ද්රියතා, පරිපුණ්ණලක්ඛණතා, නිරාසඞ්කතා, අප්පොස්සුක්කතා, සුඛවිහාරිතා, අකුතොභයතා, පියවිප්පයොගාභාවොති එවමාදීනි. යස්මා පන මිච්ඡාචාරාවෙරමණියා ඵලානිපි එත්ථෙව අන්තොගධානි, තස්මා (අබ්රහ්මචරියා වෙරමණියා). अब्रह्मचर्य से विरति के फल हैं: शत्रुओं का अभाव, सभी प्राणियों का प्रिय और मनभावन होना, अन्न-पान-वस्त्र-आच्छादन आदि का लाभ होना, सुखपूर्वक सोना, सुखपूर्वक जागना, अपाय के भय से मुक्ति, स्त्री-भाव या नपुंसक-भाव की अयोग्यता (अर्थात पुरुष होना), क्रोध-रहित होना, सत्यवादी होना, संकोच-रहित होना, प्रसन्नता की सुलभता, इंद्रियों की परिपूर्णता, लक्षणों की परिपूर्णता, शंका-रहित होना, अल्प-उत्सुकता (निश्चिंतता), सुखपूर्वक विहार करना, निर्भयता, प्रियजनों के वियोग का अभाव - ये आदि। चूँकि मिथ्याचार से विरति के फल भी इसी में अंतर्निहित हैं, इसलिए (अब्रह्मचर्य से विरति के फल कहे गए हैं)। මුසාවාදා වෙරමණියා විප්පසන්නින්ද්රියතා, විස්සට්ඨමධුරභාණිතා, සමසිතසුද්ධදන්තතා, නාතිථූලතා, නාතිකිසතා, නාතිරස්සතා, නාතිදීඝතා, සුඛසම්ඵස්සතා, උප්පලගන්ධමුඛතා, සුස්සූසකපරිසතා, ආදෙය්යවචනතා, කමලදලසදිසමුදුලොහිතතනුජිව්හතා, අලීනතා, අනුද්ධතතාති එවමාදීනි. मृषावाद से विरति के फल हैं: प्रसन्न इंद्रियाँ, स्पष्ट और मधुर वाणी, समान और शुद्ध दाँत, न बहुत मोटा होना, न बहुत दुबला होना, न बहुत छोटा होना, न बहुत लंबा होना, सुखद स्पर्श, कमल की गंध वाला मुख, सुनने की इच्छुक परिषद, ग्रहण करने योग्य वचन, कमल के दल के समान कोमल, लाल और पतली जिह्वा, आलस्य-रहित होना, चंचलता-रहित होना - ये आदि। සුරාමෙරයමජ්ජපමාදට්ඨානා වෙරමණියා අතීතානාගතපච්චුප්පන්නෙසු කිච්චකරණීයෙසු අප්පමාදතා, ඤාණවන්තතා, සදා උපට්ඨිතස්සතිතා, උප්පන්නෙසු කිච්චකරණීයෙසු ඨානුප්පත්තිකපටිභානවන්තතා, අනලසතා, අජළතා, අනුම්මත්තතා, අච්ඡම්භිතා, අසාරම්භිතා, අනිස්සුකිතා, අමච්ඡරිතා, සච්චවාදිතා, අපිසුණඅඵරුසඅසම්ඵප්පලාපවාදිතා, කතඤ්ඤුතා, කතවෙදිතා, චාගවන්තතා, සීලවන්තතා, උජුකතා, අක්කොධනතා, හිරොත්තප්පසම්පන්නතා[Pg.225], උජුදිට්ඨිතා, මහන්තතා, පණ්ඩිතතා, අත්ථානත්ථකුසලතාති එවමාදීනි ඵලානි. එවමෙත්ථ පාණාතිපාතාවෙරමණිආදීනම්පි සභාවාදිතො විනිච්ඡයො වෙදිතබ්බො. सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान से विरति के फल हैं: अतीत, अनागत और वर्तमान के कर्तव्यों में अप्रमाद, ज्ञानवान होना, सदा उपस्थित स्मृति (जागरूकता), उत्पन्न हुए कर्तव्यों में तत्काल प्रतिभा (सूझबूझ) होना, आलस्य-रहित होना, जड़ता-रहित होना, उन्माद-रहित होना, निर्भयता, अहंकार-रहित होना, ईर्ष्या-रहित होना, मात्सर्य-रहित होना, सत्यवादी होना, चुगली-कठोरता-व्यर्थ प्रलाप से रहित वाणी बोलना, कृतज्ञता, कृतवेदिता (किए हुए उपकार को मानना), त्यागवान होना, शीलवान होना, ऋजुता (सीधापन), क्रोध-रहित होना, ह्री और ओत्तप्प (लज्जा और भय) से संपन्न होना, ऋजु दृष्टि (सम्यक् दृष्टि), महानता, पंडित होना, अर्थ और अनर्थ में कुशल होना - ये आदि फल हैं। इस प्रकार यहाँ प्राणातिपात विरति आदि का भी स्वभाव आदि से निश्चय जानना चाहिए। සීලවාති යථාවුත්තපඤ්චසීලවසෙන සීලවා. කල්යාණධම්මොති සුන්දරධම්මො, සරණගමනපරිදීපිතාය දිට්ඨිසම්පත්තියා සම්පන්නපඤ්ඤොති අත්ථො. යො පන පුත්තො මාතාපිතූසු අස්සද්ධෙසු දුස්සීලෙසු ච සයම්පි තාදිසො, සොපි අවජාතොයෙවාති වෙදිතබ්බො. අස්සද්ධියාදයො හි ඉධ අවජාතභාවස්ස ලක්ඛණං වුත්තා, තෙ ච තස්මිං සංවිජ්ජන්ති. මාතාපිතරො පන උපාදාය පුත්තස්ස අතිජාතාදිභාවො වුච්චතීති. 'शीलवान' का अर्थ है यथाकथित पाँच शीलों के कारण शीलवान। 'कल्याणधम्म' का अर्थ है सुंदर धर्म वाला, शरणगमन द्वारा प्रकाशित दृष्टि-संपत्ति से संपन्न प्रज्ञा वाला। जो पुत्र श्रद्धा-रहित और दुःशील माता-पिता के होने पर स्वयं भी वैसा ही होता है, उसे 'अविजात' ही समझना चाहिए। यहाँ श्रद्धा-रहित आदि को अविजात होने का लक्षण कहा गया है, और वे उसमें पाए जाते हैं। माता-पिता की तुलना में पुत्र का अतिजात आदि होना कहा जाता है। යො හොති කුලගන්ධනොති කුලච්ඡෙදකො කුලවිනාසකො. ඡෙදනත්ථො හි ඉධ ගන්ධසද්දො, ‘‘උප්පලගන්ධපච්චත්ථිකා’’තිආදීසු (පාරා. 65) විය. කෙචි පන ‘‘කුලධංසනො’’ති පඨන්ති, සො එවත්ථො. 'जो कुल-गंधन होता है' का अर्थ है कुल का छेदक (विनाशक), कुल का विनाश करने वाला। यहाँ 'गंध' शब्द का अर्थ 'छेद' (काटना) है, जैसे 'उत्पल-गंध-प्रत्यर्थिक' आदि में। कुछ लोग 'कुल-धंसन' (कुल का ध्वंस करने वाला) पढ़ते हैं, उसका भी वही अर्थ है। එතෙ ඛො පුත්තා ලොකස්මින්ති එතෙ අතිජාතාදයො තයො පුත්තා එව ඉමස්මිං සත්තලොකෙ පුත්තා නාම, න ඉතො විනිමුත්තා අත්ථි. ඉමෙසු පන යෙ භවන්ති උපාසකා යෙ සරණගමනසම්පත්තියා උපාසකා භවන්ති කම්මස්සකතාඤාණෙන කම්මස්ස කොවිදා, තෙ ච පණ්ඩිතා පඤ්ඤවන්තො, පඤ්චසීලදසසීලෙන සම්පන්නා පරිපුණ්ණා. යාචකානං වචනං ජානන්ති, තෙසං මුඛාකාරදස්සනෙනෙව අධිප්පායපූරණතොති වදඤ්ඤූ, තෙසං වා ‘‘දෙහී’’ති වචනං සුත්වා ‘‘ඉමෙ පුබ්බෙ දානං අදත්වා එවංභූතා, මයා පන එවං න භවිතබ්බ’’න්ති තෙසං පරිච්චාගෙන තදත්ථං ජානන්තීති වදඤ්ඤූ, පණ්ඩිතානං වා කම්මස්සකතාදිදීපකං වචනං ජානන්තීති වදඤ්ඤූ. ‘‘පදඤ්ඤූ’’ති ච පඨන්ති, පදානියා පරිච්චාගසීලාති අත්ථො. තතො එව විගතමච්ඡෙරමලත්තා වීතමච්ඡරා. අබ්භඝනාති අබ්භසඞ්ඛාතා ඝනා, ඝනමෙඝපටලා වා මුත්තො චන්දොවිය, උපාසකාදිපරිසාසු ඛත්තියාදිපරිසාසු ච විරොචරෙ විරොචන්ති, සොභන්තීති අත්ථො. 'ये पुत्र लोक में' का अर्थ है ये अतिजात आदि तीन पुत्र ही इस प्राणी-लोक में पुत्र कहलाते हैं, इनसे अलग कोई नहीं है। 'इनमें जो उपासक होते हैं' का अर्थ है जो शरणगमन की संपत्ति से उपासक होते हैं, कर्मस्वकीयता के ज्ञान से कर्म के कोविद (कुशल) होते हैं, और वे पंडित, प्रज्ञावान, पंचशील और दसशील से संपन्न और परिपूर्ण होते हैं। वे याचकों के वचनों को जानते हैं, उनके मुख के आकार को देखने मात्र से ही उनके अभिप्राय को पूर्ण करने के कारण 'वदन्नू' (दानशील) कहलाते हैं, अथवा उनके 'दो' इस वचन को सुनकर 'इन्होंने पहले दान नहीं दिया इसलिए ऐसे हुए, मुझे ऐसा नहीं होना चाहिए' - ऐसा सोचकर उनके त्याग द्वारा उस अर्थ को जानते हैं इसलिए 'वदन्नू' हैं, अथवा पंडितों के कर्मस्वकीयता आदि को दर्शाने वाले वचनों को जानते हैं इसलिए 'वदन्नू' हैं। 'पदन्नू' भी पढ़ते हैं, जिसका अर्थ है त्याग के स्वभाव वाले। उसी कारण से मात्सर्य रूपी मल के निकल जाने से वे 'वीत-मत्सर' (मत्सर-रहित) हैं। 'अभ्रघन' का अर्थ है अभ्र (बादल) रूपी घन, या घने मेघ-पटल से मुक्त चंद्रमा के समान, वे उपासक आदि परिषदों में और क्षत्रिय आदि परिषदों में 'विरोचरे' अर्थात सुशोभित होते हैं, शोभा पाते हैं। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. අවුට්ඨිකසුත්තවණ්ණනා ६. अवृष्टिक सूत्र की व्याख्या। 75. ඡට්ඨෙ [Pg.226] අවුට්ඨිකසමොති අවුට්ඨිකමෙඝසමො. එකච්චො හි මෙඝො සතපටලසහස්සපටලො හුත්වා උට්ඨහිත්වා ථනන්තො ගජ්ජන්තො විජ්ජොතන්තො එකං උදකබින්දුම්පි අපාතෙත්වා විගච්ඡති, තථූපමො එකච්චො පුග්ගලොති දස්සෙන්තො ආහ ‘‘අවුට්ඨිකසමො’’ති. පදෙසවස්සීති එකදෙසවස්සිමෙඝසමො. පදෙසවස්සී වියාති හි පදෙසවස්සී. එකච්චො එකස්මිංයෙව ඨානෙ ඨිතෙසු මනුස්සෙසු යථා එකච්චෙ තෙමෙන්ති, එකච්චෙ න තෙමෙන්ති, එවං මන්දං වස්සති, තථූපමං එකච්චං පුග්ගලං දස්සෙති ‘‘පදෙසවස්සී’’ති. සබ්බත්ථාභිවස්සීති සබ්බස්මිං පථවීපබ්බතසමුද්දාදිකෙ ජගතිප්පදෙසෙ අභිවස්සිමෙඝසමො. එකච්චො හි සකලචක්කවාළගබ්භං පත්ථරිත්වා සබ්බත්ථකමෙව අභිවස්සති, තං චාතුද්දීපිකමහාමෙඝං එකච්චස්ස පුග්ගලස්ස උපමං කත්වා වුත්තං ‘‘සබ්බත්ථාභිවස්සී’’ති. ७५. छठे (सुत्त) में 'अवृष्टिसम' का अर्थ है 'बिना वर्षा वाले मेघ के समान'। जैसे कोई मेघ हजारों परतों वाला होकर, गरजते-तड़कते और बिजली चमकाते हुए भी बिना एक बूंद गिराए चला जाता है, वैसे ही किसी व्यक्ति को दर्शाने के लिए 'अवृष्टिसम' कहा गया है। 'प्रदेशवर्षी' का अर्थ है एक देश (स्थान) में वर्षा करने वाले मेघ के समान। जैसे प्रदेशवर्षी मेघ एक ही स्थान पर स्थित मनुष्यों में से कुछ को भिगोता है और कुछ को नहीं, वैसे ही जो व्यक्ति सीमित दान देता है उसे 'प्रदेशवर्षी' कहा गया है। 'सर्वत्राभिवर्षी' का अर्थ है पृथ्वी, पर्वत, समुद्र आदि सभी क्षेत्रों में वर्षा करने वाले मेघ के समान। जैसे कोई मेघ संपूर्ण चक्रवाल में हर जगह वर्षा करता है, उस चतुर्द्वीपीय महामेघ की उपमा उस व्यक्ति के लिए दी गई है जो 'सर्वत्राभिवर्षी' है। සබ්බෙසානන්ති සබ්බෙසං, අයමෙව වා පාඨො. න දාතා හොතීති අදානසීලො හොති, ථද්ධමච්ඡරිතාය න කස්සචි කිඤ්චි දෙතීති අත්ථො. ඉදානි දානස්ස ඛෙත්තං දෙය්යධම්මඤ්ච විභාගෙන දස්සෙතුං ‘‘සමණබ්රාහ්මණා’’තිආදිමාහ. තත්ථ සමිතපාපසමණා චෙව පබ්බජ්ජමත්තසමණා ච බාහිතපාපබ්රාහ්මණා චෙව ජාතිමත්තබ්රාහ්මණා ච ඉධ ‘‘සමණබ්රාහ්මණා’’ති අධිප්පෙතා. කපණා නාම දුග්ගතා දලිද්දමනුස්සා. අද්ධිකා නාම පථාවිනො පරිබ්බයවිහීනා. වනිබ්බකා නාම යෙ ‘‘ඉට්ඨං දෙථ කන්තං මනාපං කාලෙන අනවජ්ජං උදග්ගචිත්තා පසන්නචිත්තා, එවං දෙන්තා ගච්ඡථ සුගතිං, ගච්ඡථ බ්රහ්මලොක’’න්තිආදිනා නයෙන දානෙ නියොජෙන්තා දානස්ස වණ්ණං ථොමෙන්තා විචරන්ති. යාචකා නාම යෙ කෙවලං ‘‘මුට්ඨිමත්තං දෙථ, පසතමත්තං දෙථ, සරාවමත්තං දෙථා’’ති අප්පකම්පි යාචමානා විචරන්ති. තත්ථ සමණබ්රාහ්මණග්ගහණෙන ගුණඛෙත්තං උපකාරිඛෙත්තඤ්ච දස්සෙති, කපණාදිග්ගහණෙන කරුණාඛෙත්තං. අන්නන්ති යංකිඤ්චි ඛාදනීයං භොජනීයං. පානන්ති අම්බපානාදිපානකං. වත්ථන්ති නිවාසනපාරුපනාදිඅච්ඡාදනං. යානන්ති රථවය්හාදි අන්තමසො උපාහනං උපාදාය ගමනසාධනං. මාලාති ගන්ථිතාගන්ථිතභෙදං සබ්බං පුප්ඵං. ගන්ධන්ති යංකිඤ්චි ගන්ධජාතං පිසිතං අපිසිතං ගන්ධූපකරණඤ්ච. විලෙපනන්ති ඡවිරාගකරණං. සෙය්යාති මඤ්චපීඨාදි චෙව පාවාරකොජවාදි ච සයිතබ්බවත්ථු. සෙය්යග්ගහණෙන චෙත්ථ ආසනම්පි ගහිතන්ති දට්ඨබ්බං. ආවසථන්ති වාතාතපාදිපරිස්සයවිනොදනං පතිස්සයං. පදීපෙය්යන්ති දීපකපල්ලිකාදිපදීපූපකරණං. 'सब्बेसानं' का अर्थ है 'सभी को'। 'न दाता होति' का अर्थ है वह दानशील नहीं होता, अत्यधिक कंजूसी के कारण किसी को कुछ नहीं देता। अब दान के क्षेत्र और देय वस्तुओं का विभाग दिखाने के लिए 'समणब्राह्मणा' आदि कहा गया है। यहाँ 'श्रमण-ब्राह्मण' से तात्पर्य पापों का शमन करने वाले वास्तविक श्रमणों और केवल प्रव्रजितों से है, तथा पापों को बाहर निकालने वाले वास्तविक ब्राह्मणों और केवल जाति-मात्र के ब्राह्मणों से है। 'कृपण' का अर्थ है दुर्गत और दरिद्र मनुष्य। 'अध्विक' का अर्थ है यात्री जिनके पास मार्ग-व्यय नहीं है। 'वणिब्बक' वे हैं जो "इष्ट, कान्त, मनाप, समय पर, निर्दोष और प्रसन्न चित्त से दान दो, ऐसा दान देकर सुगति और ब्रह्मलोक जाओ" आदि कहकर दान की प्रशंसा करते हुए विचरते हैं। 'याचक' वे हैं जो केवल "मुट्ठी भर दो, अंजलि भर दो, सराव (पात्र) भर दो" कहकर अल्प याचना करते हुए विचरते हैं। यहाँ श्रमण-ब्राह्मण के ग्रहण से 'गुण-क्षेत्र' और 'उपकारी-क्षेत्र' को दर्शाया गया है, तथा कृपण आदि के ग्रहण से 'करुणा-क्षेत्र' को। 'अन्न' का अर्थ है कोई भी खाद्य या भोज्य पदार्थ। 'पान' का अर्थ है आम्र-पान आदि पेय। 'वस्त्र' का अर्थ है निवास और प्रावरण (ओढ़ने-बिछाने) के वस्त्र। 'यान' का अर्थ है रथ, पालकी आदि और अंततः जूते आदि गमन के साधन। 'माला' का अर्थ है गुंथी हुई या बिना गुंथी हुई सभी प्रकार की पुष्प-मालाएँ। 'गंध' का अर्थ है पिसा हुआ या बिना पिसा हुआ कोई भी सुगंधित पदार्थ। 'विलेपन' का अर्थ है शरीर पर लगाया जाने वाला लेप। 'शय्या' का अर्थ है मंच, पीठ (कुर्सी) आदि तथा कंबल, कालीन आदि सोने की वस्तुएँ। यहाँ शय्या के ग्रहण से 'आसन' भी ग्रहण किया गया समझना चाहिए। 'आवसथ' का अर्थ है वायु, धूप आदि के कष्ट को दूर करने वाला आश्रय (विश्राम गृह)। 'प्रदीपेय' का अर्थ है दीपक, बत्ती आदि प्रकाश के साधन। එවං [Pg.227] ඛො, භික්ඛවෙති විජ්ජමානෙපි දෙය්යධම්මෙ පටිග්ගාහකානං එවං දාතබ්බවත්ථුං සබ්බෙන සබ්බං අදෙන්තො පුග්ගලො අවස්සිකමෙඝසදිසො හොති. ඉදං වුත්තං හොති – භික්ඛවෙ, යථා සො මෙඝො සතපටලසහස්සපටලො හුත්වා උට්ඨහිත්වා න කිඤ්චි වස්සි විගච්ඡති, එවමෙව යො උළාරං විපුලඤ්ච භොගං සංහරිත්වා ගෙහං ආවසන්තො කස්සචි කටච්ඡුමත්තං භික්ඛං වා උළුඞ්කමත්තං යාගුං වා අදත්වා විගච්ඡති, විවසො මච්චුවසං ගච්ඡති, සො අවුට්ඨිකසමො නාම හොතීති. ඉමිනා නයෙන සෙසෙසුපි නිගමනං වෙදිතබ්බං. ඉමෙසු ච තීසු පුග්ගලෙසු පඨමො එකංසෙනෙව ගරහිතබ්බො, දුතියො පසංසනීයො, තතියො, පසංසනීයතරො. පඨමො වා එකන්තෙනෙව සබ්බනිහීනො, දුතියො මජ්ඣිමො, තතියො උත්තමොති වෙදිතබ්බො. "इस प्रकार, भिक्षुओं" - देय वस्तु के विद्यमान होने पर भी जो प्रतिग्राहकों (लेने वालों) को कुछ भी नहीं देता, वह व्यक्ति 'अवृष्टिसम' (बिना वर्षा वाले मेघ के समान) होता है। इसका अर्थ यह है - हे भिक्षुओं, जैसे वह मेघ हजारों परतों वाला होकर भी बिना कुछ बरसे चला जाता है, वैसे ही जो व्यक्ति प्रचुर भोग-संपत्ति एकत्र कर घर में रहते हुए भी किसी को एक कलछी भर भिक्षा या एक चम्मच भर यवागू (कांजी) भी दिए बिना मर जाता है, वह 'अवृष्टिसम' कहलाता है। इसी पद्धति से शेष (दो प्रकारों) का भी निष्कर्ष समझना चाहिए। इन तीन व्यक्तियों में से पहला सर्वथा निंदनीय है, दूसरा प्रशंसनीय है और तीसरा सर्वाधिक प्रशंसनीय है। अथवा पहला एकांततः सबसे नीच है, दूसरा मध्यम है और तीसरा उत्तम है, ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු සමණෙති උපයොගවසෙන බහුවචනං තථා සෙසෙසුපි. ලද්ධානාති ලභිත්වා, සමණෙ දක්ඛිණෙය්යෙ පවාරෙත්වා පුට්ඨො න සංවිභජති. අන්නං පානඤ්ච භොජනන්ති අන්නං වා පානං වා අඤ්ඤං වා භුඤ්ජිතබ්බයුත්තකං භොජනං, තං න සංවිභජති. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යො අත්ථිකභාවෙන උපගතෙ සම්පටිග්ගාහකෙ ලභිත්වා අන්නාදිනා සංවිභාගමත්තම්පි න කරොති, කිං සො අඤ්ඤං දානං දස්සති, තං එවරූපං ථද්ධමච්ඡරියං පුරිසාධමං නිහීනපුග්ගලං පණ්ඩිතා අවුට්ඨිකසමොති ආහු කථයන්තීති. गाथाओं में 'समणे' शब्द द्वितीया विभक्ति के बहुवचन के अर्थ में है, वैसे ही शेष शब्दों में भी। 'लद्धान' का अर्थ है 'प्राप्त करके'; दक्षिणीय श्रमणों को निमंत्रित करके भी जो उन्हें भोजन आदि नहीं देता। 'अन्नं पानञ्च भोजनं' का अर्थ है अन्न, पान या अन्य कोई भी खाने योग्य भोजन, जिसे वह साझा नहीं करता। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है - जो याचक के रूप में आए हुए प्रतिग्राहकों को पाकर अन्न आदि का थोड़ा भी हिस्सा नहीं देता, वह अन्य दान क्या देगा? ऐसे अत्यंत कंजूस, अधम और नीच व्यक्ति को विद्वान 'अवृष्टिसम' कहते हैं। එකච්චානං න දදාතීති විජ්ජමානෙපි මහති දාතබ්බධම්මෙ එකෙසං සත්තානං තෙසු කොධවසෙන වා, දෙය්යධම්මෙ ලොභවසෙන වා න දදාති. එකච්චානං පවෙච්ඡතීති එකෙසංයෙව පන දදාති. මෙධාවිනොති පඤ්ඤවන්තො පණ්ඩිතා ජනා. 'एकच्चानं न ददाति' का अर्थ है - देने योग्य प्रचुर सामग्री होने पर भी, कुछ प्राणियों को उनके प्रति क्रोध के कारण या देय वस्तु के प्रति लोभ के कारण नहीं देता है। 'एकच्चानं पवेच्छति' का अर्थ है - केवल कुछ को ही देता है। 'मेधाविनो' का अर्थ है प्रज्ञावान, बुद्धिमान लोग। සුභික්ඛවාචොති යො උපගතානං යාචකානං ‘‘අන්නං දෙථ, පානං දෙථා’’තිආදිනා තං තං දාපෙති, සො සුලභභික්ඛතාය සුභික්ඛා වාචා එතස්සාති සුභික්ඛවාචො. ‘‘සුභික්ඛවස්සී’’තිපි පඨන්ති. යථා ලොකො සුභික්ඛො හොති, එවං සබ්බත්ථාභිවස්සිතමහාමෙඝො සුභික්ඛවස්සී නාම හොති. එවමයම්පි මහාදානෙහි සබ්බත්ථාභිවස්සී සුභික්ඛවස්සීති. ආමොදමානො පකිරෙතීති තුට්ඨහට්ඨමානසො සහත්ථෙන දානං දෙන්තො පටිග්ගාහකඛෙත්තෙ දෙය්යධම්මං පකිරෙන්තො විය හොති, වාචායපි ‘‘දෙථ දෙථා’’ති භාසති. 'सुभिक्खवाचो' वह है जो आए हुए याचकों को "अन्न दो, पान दो" आदि कहकर दान दिलवाता है; भिक्षा की सुलभता के कारण उसकी वाणी 'सुभिक्षा वाणी' है, इसलिए वह 'सुभिक्खवाचो' है। 'सुभिक्खवस्सी' (सुभिक्षा-वर्षी) पाठ भी मिलता है। जैसे संसार में सुभिक्ष (अकाल का अभाव) होता है, वैसे ही सब जगह बरसने वाला महामेघ 'सुभिक्खवस्सी' कहलाता है। इसी प्रकार यह व्यक्ति भी महादानों के द्वारा सब जगह वर्षा करने वाला 'सुभिक्खवस्सी' है। 'आमोदमानो पकिरेति' का अर्थ है - प्रसन्न और हर्षित मन से अपने हाथ से दान देते हुए वह प्रतिग्राहक रूपी खेत में देय वस्तु को बिखेरने (बोने) के समान होता है, और वाणी से भी "दो, दो" कहता है। ඉදානි [Pg.228] නං සුභික්ඛවස්සිතභාවං දස්සෙතුං ‘‘යථාපි මෙඝො’’තිආදි වුත්තං. තත්රායං සඞ්ඛෙපත්ථො – යථා මහාමෙඝො පඨමං මන්දනිග්ඝොසෙන ථනයිත්වා පුන සකලනදීකන්දරානි එකනින්නාදං කරොන්තො ගජ්ජයිත්වා පවස්සති, සබ්බත්ථකමෙව වාරිනා උදකෙන ථලං නින්නඤ්ච අභිසන්දන්තො පූරෙති එකොඝං කරොති, එවමෙව ඉධ ඉමස්මිං සත්තලොකෙ එකච්චො උළාරපුග්ගලො සබ්බසමතාය සො මහාමෙඝො විය වස්සිතබ්බත්තා තාදිසො යථා ධනං උට්ඨානාධිගතං අත්තනො උට්ඨානවීරියාභිනිබ්බත්තං හොති, එවං අනලසො හුත්වා තඤ්ච ධම්මෙන ඤායෙන සංහරිත්වා තන්නිබ්බත්තෙන අන්නෙන පානෙන අඤ්ඤෙන ච දෙය්යධම්මෙන පත්තෙ සම්පත්තෙ වනිබ්බකෙ සම්මා සම්මදෙව දෙසකාලානුරූපඤ්චෙව ඉච්ඡානුරූපඤ්ච තප්පෙති සම්පවාරෙතීති. अब उसे सुभिक्ष (प्रचुरता) की वर्षा करने वाले के रूप में दिखाने के लिए 'यथापि मेघो' इत्यादि कहा गया है। वहाँ यह संक्षिप्त अर्थ है - जैसे महामेघ पहले मन्द गर्जना के साथ गरजकर फिर समस्त नदी-कन्दराओं को एक ही नाद से गुंजायमान करते हुए गरजकर बरसता है, और सब जगह जल से स्थल और निम्न (नीचे) स्थानों को आप्लावित करते हुए भर देता है, एक ही प्रवाह बना देता है; वैसे ही यहाँ इस सत्वलोक में कोई उदार पुद्गल, उस महामेघ के समान सब पर समान रूप से बरसने योग्य होने के कारण वैसा ही होता है। जैसे धन उत्थान (परिश्रम) से प्राप्त होता है, अपने उत्थान और वीर्य से निष्पन्न होता है, वैसे ही आलस्य रहित होकर और उसे धर्मपूर्वक न्याय से संग्रह कर, उससे निष्पन्न अन्न, पान और अन्य देयधर्मों से आए हुए याचकों को सम्यक् प्रकार से देश, काल और इच्छा के अनुरूप तृप्त करता है और संतुष्ट करता है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. සුඛපත්ථනාසුත්තවණ්ණනා ७. सुख-प्रार्थना सूत्र की व्याख्या। 76. සත්තමෙ සුඛානීති සුඛනිමිත්තානි. පත්ථයමානොති ඉච්ඡමානො ආකඞ්ඛමානො. සීලන්ති ගහට්ඨසීලං පබ්බජිතසීලඤ්ච. ගහට්ඨො චෙ ගහට්ඨසීලං, පබ්බජිතො චෙ චතුපාරිසුද්ධිසීලන්ති අධිප්පායො. රක්ඛෙය්යාති සමාදියිත්වා අවීතික්කමන්තො සම්මදෙව ගොපෙය්ය. පසංසා මෙ ආගච්ඡතූති ‘‘මම කල්යාණො කිත්තිසද්දො ආගච්ඡතූ’’ති ඉච්ඡන්තො පණ්ඩිතො සප්පඤ්ඤො සීලං රක්ඛෙය්ය. සීලවතො හි ගහට්ඨස්ස තාව ‘‘අසුකො අසුකකුලස්ස පුත්තො සීලවා කල්යාණධම්මො සද්ධො පසන්නො දායකො කාරකො’’තිආදිනා පරිසමජ්ඣෙ කල්යාණො කිත්තිසද්දො අබ්භුග්ගච්ඡති, පබ්බජිතස්ස ‘‘අසුකො නාම භික්ඛු සීලවා වත්තසම්පන්නො සොරතො සුඛසංවාසො සගාරවො සප්පතිස්සො’’තිආදිනා…පෙ… අබ්භුග්ගච්ඡතීති. වුත්තඤ්හෙතං – ७६. सातवें (सूत्र) में 'सुखानि' का अर्थ सुख के निमित्त (कारण) है। 'पत्थयमानो' का अर्थ इच्छा करते हुए, आकांक्षा करते हुए है। 'सीलं' का अर्थ गृहस्थ-शील और प्रव्रजित-शील है। यदि गृहस्थ है तो गृहस्थ-शील, यदि प्रव्रजित है तो चतु-पारिशुद्धि-शील - यह अभिप्राय है। 'रक्खेय्या' का अर्थ है समादान कर (ग्रहण कर) उल्लंघन न करते हुए सम्यक् प्रकार से रक्षा करे। 'प्रशंसा मुझे प्राप्त हो' - इस प्रकार 'मेरा कल्याणकारी कीर्ति-शब्द (यश) फैले' ऐसी इच्छा करते हुए पंडित बुद्धिमान व्यक्ति को शील की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि शीलवान गृहस्थ का तो 'अमुक अमुक कुल का पुत्र शीलवान, कल्याणधर्मी, श्रद्धालु, प्रसन्न, दायक और कर्ता है' इत्यादि रूप में परिषद् के मध्य कल्याणकारी कीर्ति-शब्द ऊपर उठता है (फैलता है); प्रव्रजित का 'अमुक नाम का भिक्षु शीलवान, व्रत-सम्पन्न, विनीत, सुखपूर्वक साथ रहने योग्य, गौरवयुक्त और सत्कारयुक्त है' इत्यादि... पे... ऊपर उठता है। ऐसा कहा भी गया है - ‘‘පුන චපරං, ගහපතයො, සීලවතො සීලසම්පන්නස්ස කල්යාණො කිත්තිසද්දො අබ්භුග්ගච්ඡතී’’ති (අ. නි. 5.213; උදා. 76; මහාව. 285). “पुनः और भी, गृहपतियों! शीलवान, शील-सम्पन्न व्यक्ति का कल्याणकारी कीर्ति-शब्द ऊपर उठता है।” තථා [Pg.229] – तथा - ‘‘ආකඞ්ඛෙය්ය චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු – ‘සබ්රහ්මචාරීනං පියො චස්සං මනාපො, ගරු ච භාවනීයො චා’ති, සීලෙස්වෙවස්ස පරිපූරකාරී’’තිආදි (ම. නි. 1.65). “भिक्षुओं! यदि भिक्षु यह आकांक्षा करे कि - 'मैं सब्रह्मचारियों का प्रिय, मनभावन, गुरु (आदरणीय) और सम्मानीय बनूँ', तो उसे शीलों में ही परिपूर्णता करने वाला होना चाहिए” इत्यादि। භොගා මෙ උප්පජ්ජන්තූති එත්ථ ගහට්ඨස්ස තාව සීලවතො කල්යාණධම්මස්ස යෙන යෙන සිප්පට්ඨානෙන ජීවිකං කප්පෙති – යදි කසියා, යදි වණිජ්ජාය, යදි රාජපොරිසෙන, තං තං යථාකාලං යථාවිධිඤ්ච අතිවිය අප්පමත්තභාවතො අථස්ස අනුප්පන්නා චෙව භොගා උප්පජ්ජන්ති, උප්පන්නා ච භොගා ඵාතිං ගමිස්සන්ති. පබ්බජිතස්ස පන සීලාචාරසම්පන්නස්ස අප්පමාදවිහාරිස්ස සතො සීලසම්පන්නස්ස සීලසම්පදාය අප්පිච්ඡතාදිගුණෙසු ච පසන්නා මනුස්සා උළාරුළාරෙ පච්චයෙ අභිහරන්ති, එවමස්ස අනුප්පන්නා චෙව භොගා උප්පජ්ජන්ති, උප්පන්නා ච ථිරා හොන්ති. තථා හි වුත්තං – 'भोग मुझे उत्पन्न हों' - यहाँ शीलवान और कल्याणधर्मी गृहस्थ जिस-जिस शिल्प-स्थान (व्यवसाय) से जीविका चलाता है - चाहे कृषि से, चाहे वाणिज्य से, चाहे राज-सेवा से, वह उस-उस में यथाकाल और यथाविधि अत्यधिक अप्रमादी होने के कारण उसके अनुत्पन्न भोग उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न भोग वृद्धि को प्राप्त होते हैं। किन्तु शील-आचार सम्पन्न, अप्रमाद-विहारी, स्मृतिमान और शील-सम्पन्न प्रव्रजित की शील-सम्पदा और अल्पेच्छता आदि गुणों में प्रसन्न होकर मनुष्य उदार (श्रेष्ठ) प्रत्यय (दान) लाते हैं, इस प्रकार उसके अनुत्पन्न भोग उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न भोग स्थिर होते हैं। वैसा ही कहा गया है - ‘‘පුන චපරං, ගහපතයො, සීලවා සීලසම්පන්නො අප්පමාදාධිකරණං මහන්තං භොගක්ඛන්ධං අධිගච්ඡතී’’ති (අ. නි. 5.213; උදා. 76; මහාව. 285). “पुनः और भी, गृहपतियों! शीलवान, शील-सम्पन्न व्यक्ति अप्रमाद के कारण महान भोग-स्कन्ध (धन-राशि) प्राप्त करता है।” තථා – तथा - ‘‘ආකඞ්ඛෙය්ය චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු – ‘ලාභී අස්ස චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානපච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරාන’න්ති, සීලෙස්වෙවස්ස පරිපූරකාරී’’ති (ම. නි. 1.65) ච – “भिक्षुओं! यदि भिक्षु यह आकांक्षा करे कि - 'मैं चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार का लाभ पाने वाला बनूँ', तो उसे शीलों में ही परिपूर्णता करने वाला होना चाहिए” और - සෙසං වුත්තනයමෙව. शेष (व्याख्या) कहे गए तरीके के अनुसार ही है। ගාථාසු පත්ථයානොති පත්ථයන්තො. තයො සුඛෙති තීණි සුඛානි. විත්තලාභන්ති ධනලාභං, භොගුප්පත්තින්ති අත්ථො. විසෙසතො චෙත්ථ පසංසාය චෙතසිකසුඛං, භොගෙහි කායිකසුඛං, ඉතරෙන උපපත්තිසුඛං; තථා පඨමෙන දිට්ඨධම්මසුඛං, තතියෙන සම්පරායසුඛං, දුතියෙන උභයසුඛං ගහිතන්ති වෙදිතබ්බං. गाथाओं में 'पत्थयानो' का अर्थ प्रार्थना करते हुए है। 'तयो सुखे' का अर्थ तीन सुख हैं। 'वित्तलाभं' का अर्थ धन का लाभ, भोगों की उत्पत्ति - यह अर्थ है। विशेष रूप से यहाँ प्रशंसा से चैतसिक (मानसिक) सुख, भोगों से कायिक (शारीरिक) सुख, और अन्य (स्वर्ग) से उपपत्ति (पुनर्जन्म) सुख; इसी प्रकार पहले से दृष्टधर्म (वर्तमान जीवन) सुख, तीसरे से साम्परायिक (परलोक) सुख, और दूसरे से दोनों सुख ग्रहण किए गए हैं - ऐसा जानना चाहिए। ඉදානි පසංසාදිකාරණස්ස සීලස්ස විය පසංසාදීනම්පි විසෙසකාරණං පාපමිත්තපරිවජ්ජනං කල්යාණමිත්තසෙවනඤ්ච ආදීනවානිසංසෙහි සද්ධිං දස්සෙන්තො ‘‘අකරොන්තො’’තිආදිමාහ. තත්ථ සඞ්කියොති පාපස්මිං පරිසඞ්කිතබ්බො ‘‘අද්ධා ඉමිනා පාපං කතං වා කරිස්සති වා, තථා හෙස [Pg.230] පාපපුරිසෙහි සද්ධිං සඤ්චරතී’’ති. අස්සාති ඉමස්ස පාපජනසෙවිනො පුග්ගලස්ස උපරි, අස්ස වා පුග්ගලස්ස අවණ්ණො අභූතොපි පාපජනසෙවිතාය රුහති විරූළ්හිං වෙපුල්ලං ආපජ්ජති පත්ථරති. අස්සාති වා භුම්මත්ථෙ සාමිවචනං, තස්මිං පුග්ගලෙති අත්ථො. ස වෙ තාදිසකො හොතීති යො යාදිසං පාපමිත්තං වා කල්යාණමිත්තං වා භජති උපසෙවති ච, සො පුග්ගලො භූමිභාගවසෙන උදකං විය තාදිසොව හොති, පාපධම්මො කල්යාණධම්මො වා හොති. කස්මා? සහවාසො හි තාදිසො; යස්මා සහවාසො සංසග්ගො උපරාගො විය ඵලිකමණීසු පුරිසඋපනිස්සයභූතං පුග්ගලාකාරං ගාහාපෙති, තස්මා පාපපුග්ගලෙන සහ වාසො න කාතබ්බොති අධිප්පායො. अब प्रशंसा आदि के कारण शील के समान ही, प्रशंसा आदि के विशेष कारण पाप-मित्रों के वर्जन (त्याग) और कल्याण-मित्रों के सेवन को दोषों और लाभों के साथ दिखाते हुए 'अकरन्तो' इत्यादि कहा। वहाँ 'सङ्कियो' का अर्थ पाप में आशंकित होने योग्य है - 'निश्चित ही इसके द्वारा पाप किया गया है या किया जाएगा, क्योंकि यह पाप-पुरुषों के साथ विचरण करता है'। 'अस्स' का अर्थ इस पाप-जन का सेवन करने वाले पुद्गल के ऊपर है, अथवा इस पुद्गल का अवर्ण (अपयश) अभूत (असत्य) होने पर भी पाप-जन के सेवन के कारण बढ़ता है, वृद्धि और विस्तार को प्राप्त होता है, फैलता है। अथवा 'अस्स' यह भूम्यर्थ (सप्तमी विभक्ति) में षष्ठी वचन है, 'उस पुद्गल में' यह अर्थ है। 'स वे तादिसको होति' का अर्थ है कि जो जैसे पाप-मित्र या कल्याण-मित्र को भजता है और सेवन करता है, वह पुद्गल भूमि के अनुसार जल के समान वैसा ही हो जाता है, पापधर्मी या कल्याणधर्मी होता है। क्यों? क्योंकि सहवास वैसा ही होता है; क्योंकि सहवास और संसर्ग, स्फटिक मणियों में रंग के चढ़ने के समान, पुरुष के आश्रयभूत पुद्गल के आकार को ग्रहण करा देता है, इसलिए पाप-पुद्गल के साथ वास नहीं करना चाहिए - यह अभिप्राय है। සෙවමානො සෙවමානන්ති පරං පකතිසුද්ධං පුග්ගලං කාලෙන කාලං අත්තානං සෙවමානං සෙවමානො භජමානො පාපපුග්ගලො, තෙන වා සෙවියමානො. සම්ඵුට්ඨො සම්ඵුසන්ති තෙන පකතිසුද්ධෙන පුග්ගලෙන සහවාසෙන සංසග්ගෙන සම්ඵුට්ඨො පාපපුග්ගලො සයම්පි, තථා තං ඵුසන්තො. සරො දිද්ධො කලාපං වාති යථා නාම සරො විසෙන දිද්ධො ලිත්තො සරකලාපගතො සරසමූහසඞ්ඛාතං සරකලාපං අත්තනා ඵුට්ඨං අලිත්තම්පි උපලිම්පති, එවං පාපෙන උපලෙපභයා ධීරොති ධිතිසම්පන්නත්තා ධීරො පණ්ඩිතපුරිසො පාපසහායො න භවෙය්ය. ‘सेवमानो सेवमानन्ति’ - एक पापी व्यक्ति जो समय-समय पर स्वभाव से शुद्ध व्यक्ति की संगति करता है, या उसके द्वारा सेवित होता है। ‘सरो दिद्धो कलापं वा’ - जैसे विष से बुझा हुआ बाण तरकश में रखे हुए अन्य बिना बुझे बाणों को भी दूषित कर देता है, वैसे ही पाप के लेप के भय से ‘धीर’ (धैर्यवान और बुद्धिमान) व्यक्ति को पापी का साथी नहीं होना चाहिए। පූතිමච්ඡං කුසග්ගෙනාති යථා කුච්ඡිතභාවෙන පූතිභූතං මච්ඡං කුසතිණග්ගෙන යො පුරිසො උපනය්හති පුටබන්ධවසෙන බන්ධති, තස්ස තෙ කුසා අපූතිකාපි පූතිමච්ඡසම්බන්ධෙන පූති දුග්ගන්ධමෙව වායන්ති. එවං බාලූපසෙවනාති එවංසම්පදා බාලජනූපසෙවනා දට්ඨබ්බා. එවං ධීරූපසෙවනාති යථා අසුරභිනොපි පත්තා තගරසම්බන්ධෙන සුරභිං වායන්ති, එවං පණ්ඩිතූපසෙවනා පකතියා අසීලවතො සීලසමාදානාදිවසෙන සීලගන්ධවායනස්ස කාරණං හොති. ‘पूतिमच्छं कुसग्गेनाति’ - जैसे कोई व्यक्ति सड़ी हुई मछली को कुश के अग्रभाग से बाँधता है, तो वे कुश भी सड़ी मछली के संपर्क से दुर्गंधयुक्त हो जाते हैं। इसी प्रकार मूर्खों की संगति को समझना चाहिए। ‘एवं धीरूपसेवनाति’ - जैसे सुगंधित तगर के पत्तों के संपर्क से साधारण पत्ते भी सुगंधित हो जाते हैं, वैसे ही बुद्धिमानों की संगति शीलवान न होने वाले व्यक्ति के लिए भी शील-ग्रहण आदि के माध्यम से शील की सुगंध का कारण बनती है। තස්මාති යස්මා අකල්යාණමිත්තසෙවනාය කල්යාණමිත්තසෙවනාය ච අයං එදිසො ආදීනවො ආනිසංසො ච, තස්මා පත්තපුටස්සෙව පලාසපුටස්ස විය දුග්ගන්ධසුගන්ධවත්ථුසංසග්ගෙන අසාධුසාධුජනසන්නිස්සයෙන ච. ඤත්වා සම්පාකමත්තනොති අත්තනො දුක්ඛුද්රයං සුඛුද්රයඤ්ච ඵලනිප්ඵත්තිං [Pg.231] ඤත්වා ජානිත්වා අසන්තෙ පාපමිත්තෙ න උපසෙවෙය්ය, සන්තෙ උපසන්තෙ වන්තදොසෙ පසත්ථෙ වා පණ්ඩිතෙ සෙවෙය්ය. තථා හි අසන්තො නිරයං නෙන්ති, සන්තො පාපෙන්ති සුග්ගතින්ති. ඉති භගවා පඨමගාථාය යථාවුත්තානි තීණි සුඛනිමිත්තානි දස්සෙත්වා තතො පරාහි පඤ්චහි ගාථාහි පටිපක්ඛපරිවජ්ජනෙන සද්ධිං පසංසාසුඛස්ස ආගමනං දස්සෙත්වා ඔසානගාථාය තිණ්ණම්පි සුඛානං ආගමනකාරණෙන සද්ධිං ඔසානසුඛං දස්සෙති. ‘तस्माति’ - क्योंकि कुमित्र की संगति और कल्याणमित्र की संगति के ऐसे दोष और लाभ हैं, इसलिए जैसे पत्तों के दोने में रखी दुर्गंधित या सुगंधित वस्तु के संपर्क से वह दोना भी वैसा ही हो जाता है, वैसे ही असज्जन और सज्जन व्यक्तियों के आश्रय को जानकर, अपने दुःख और सुख के परिणाम को समझते हुए, असंत (पापी मित्रों) का सेवन नहीं करना चाहिए। शांत, दोषरहित और प्रशंसित विद्वानों का सेवन करना चाहिए। क्योंकि असंत नरक की ओर ले जाते हैं और संत सुगति तक पहुँचाते हैं। इस प्रकार भगवान ने पहली गाथा से सुख के तीन निमित्तों को दिखाकर, अगली पाँच गाथाओं से विपक्ष के वर्जन के साथ प्रशंसा-सुख के आगमन को दिखाया और अंतिम गाथा में तीनों सुखों के आगमन के कारण के साथ अंतिम सुख को दर्शाया है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र का वर्णन समाप्त हुआ। 8. භිදුරසුත්තවණ්ණනා ८. भिदुर-सूत्र का वर्णन। 77. අට්ඨමෙ භිදුරායන්ති භිදුරො අයං. කායොති රූපකායො. සො හි අඞ්ගපච්චඞ්ගානං කෙසාදීනඤ්ච සමූහට්ඨෙන, එවං කුච්ඡිතානං ජෙගුච්ඡානං ආයො උප්පත්තිදෙසොතිපි කායො. තත්රායං වචනත්ථො – ආයන්ති එත්ථාති ආයො. කෙ ආයන්ති? කුච්ඡිතා කෙසාදයො. ඉති කුච්ඡිතානං ආයොතිපි කායො. අත්ථතො පන චතුසන්තතිවසෙන පවත්තමානානං භූතුපාදායධම්මානං පුඤ්ජො. ඉදං වුත්තං හොති – භික්ඛවෙ, අයං චතුමහාභූතමයො රූපකායො භිදුරො භෙදනසීලො භෙදනසභාවො ඛණෙ ඛණෙ විද්ධංසනසභාවොති. ‘‘භින්දරාය’’න්තිපි පාඨො, සො එවත්ථො. විඤ්ඤාණන්ති තෙභූමකං කුසලාදිචිත්තං. වචනත්ථො පන – තං තං ආරම්මණං විජානාතීති විඤ්ඤාණං. යඤ්හි සඤ්ජානනපජානනවිධුරං ආරම්මණවිජානනං උපලද්ධි, තං විඤ්ඤාණං. විරාගධම්මන්ති විරජ්ජනධම්මං, පලුජ්ජනසභාවන්ති අත්ථො. සබ්බෙ උපධීති ඛන්ධූපධි, කිලෙසූපධි, අභිසඞ්ඛාරූපධි, පඤ්චකාමගුණූපධීති එතෙ ‘‘උපධීයති එත්ථ දුක්ඛ’’න්ති උපධිසඤ්ඤිතා සබ්බෙපි උපාදානක්ඛන්ධකිලෙසාභිසඞ්ඛාරපඤ්චකාමගුණධම්මා හුත්වා අභාවට්ඨෙන අනිච්චා, උදයබ්බයප්පටිපීළනට්ඨෙන දුක්ඛා, ජරාය මරණෙන චාති ද්විධා විපරිණාමෙතබ්බසභාවතාය පකතිවිජහනට්ඨෙන විපරිණාමධම්මා. එවමෙත්ථ අනිච්චදස්සනසුඛතාය රූපධම්මෙ විඤ්ඤාණඤ්ච විසුං ගහෙත්වා පුන උපධිවිභාගෙන සබ්බෙපි තෙභූමකධම්මෙ එකජ්ඣං ගහෙත්වා අනිච්චදුක්ඛානුපස්සනාමුඛෙන තථාබුජ්ඣනකානං පුග්ගලානං අජ්ඣාසයෙන සම්මසනචාරො.කථිතො. කාමඤ්චෙත්ථ [Pg.232] ලක්ඛණද්වයමෙව පාළියං ආගතං, ‘‘යං දුක්ඛං, තදනත්තා’’ති (සං. නි. 3.15) පන වචනතො දුක්ඛලක්ඛණෙනෙව අනත්තලක්ඛණම්පි දස්සිතමෙවාති වෙදිතබ්බං. ७७. आठवें सूत्र में ‘भिदुरायन्ति’ का अर्थ है - यह भंगुर है। ‘कायोति’ - रूपकाय। अंगों, प्रत्यंगों और केश आदि का समूह होने के कारण, तथा निंदनीय वस्तुओं की उत्पत्ति का स्थान होने के कारण इसे ‘काय’ कहते हैं। अर्थतः यह चार संततियों के वश में प्रवर्तमान महाभूतों और उपादाय धर्मों का पुंज है। इसका अर्थ यह है - हे भिक्षुओं, यह चार महाभूतों से बना रूपकाय भंगुर है, क्षण-क्षण में नष्ट होने वाला है। ‘विञ्ञाणन्ति’ - तीनों भूमियों का कुशल आदि चित्त। ‘विरागधम्मन्ति’ - नष्ट होने वाला स्वभाव। ‘सब्बे उपधीति’ - स्कन्ध-उपधि, क्लेश-उपधि, अभिसंस्कार-उपधि और पंचकामगुण-उपधि - ये सभी ‘उपधि’ कहलाते हैं क्योंकि इनमें दुःख स्थित होता है। ये अनित्य, दुःख और विपरिणामधर्मी हैं। यहाँ अनित्यता के दर्शन की सुगमता के लिए रूप और विज्ञान को अलग से लेकर, पुनः उपधि के विभाजन से सभी त्रैभूमिक धर्मों को एक साथ लेकर अनित्य-दुःख-अनुपश्यना के माध्यम से बोध प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के आशय के अनुसार विवेचना की गई है। यद्यपि यहाँ पालि में केवल दो लक्षण (अनित्य और दुःख) आए हैं, फिर भी ‘जो दुःख है, वह अनात्मा है’ इस वचन के अनुसार दुःख लक्षण से अनात्म लक्षण भी प्रदर्शित ही समझना चाहिए। ගාථායං උපධීසු භයං දිස්වාති උපධීසු භයතුපට්ඨානඤාණවසෙන භයං දිස්වා, තෙසං භායිතබ්බතං පස්සිත්වා. ඉමිනා බලවවිපස්සනං දස්සෙති. භයතුපට්ඨානඤාණමෙව හි විභජිත්වා විසෙසවසෙන ආදීනවානුපස්සනා නිබ්බිදානුපස්සනාති ච වුච්චති. ජාතිමරණමච්චගාති එවං සම්මසන්තො විපස්සනාඤාණං මග්ගෙන ඝටෙත්වා මග්ගපරම්පරාය අරහත්තං පත්තො ජාතිමරණං අතීතො නාම හොති. කථං? සම්පත්වා පරමං සන්තින්ති පරමං උත්තමං අනුත්තරං සන්තිං සබ්බසඞ්ඛාරූපසමං නිබ්බානං අධිගන්ත්වා. එවංභූතො ච කාලං කඞ්ඛති භාවිතත්තොති චතුන්නං අරියමග්ගානං වසෙන භාවනාභිසමයනිප්ඵත්තියා භාවිතකායසීලචිත්තපඤ්ඤත්තා භාවිතත්තො මරණං ජීවිතඤ්ච අනභිනන්දන්තො කෙවලං අත්තනො ඛන්ධපරිනිබ්බානකාලං කඞ්ඛති උදික්ඛති, න තස්ස කත්ථචි පත්ථනා හොතීති. තෙනාහ – गाथा में ‘उपधीसु भयं दिस्वाति’ - उपधियों में ‘भयतुपस्थान-ज्ञान’ के द्वारा भय को देखकर। इससे बलवती विपश्यना को दर्शाया गया है। भयतुपस्थान-ज्ञान को ही विशेष रूप से ‘आदीनवानुपश्यना’ और ‘निर्विदानुपश्यना’ कहा जाता है। ‘जातिमरणमच्चगा’ - इस प्रकार विवेचना करते हुए विपश्यना ज्ञान को मार्ग से जोड़कर, मार्ग-परम्परा से अर्हत्व प्राप्त कर वह जन्म-मरण से पार हो जाता है। कैसे? ‘सम्पत्वा परमं सन्तिन्ति’ - परम शांति (निर्वाण) को प्राप्त करके। ‘भावितत्तो’ - जिसने चार आर्यमार्गों के द्वारा भावना-अभिसमय की निष्पत्ति कर ली है, वह मरण और जीवन का अभिनन्दन न करते हुए केवल अपने स्कन्ध-परिनिर्वाण के काल की प्रतीक्षा करता है। ‘‘නාභිනන්දාමි මරණං, නාභිනන්දාමි ජීවිතං; කාලඤ්ච පටිකඞ්ඛාමි, නිබ්බිසං භතකො යථා’’ති. (ථෙරගා. 606); ‘न मैं मृत्यु का अभिनन्दन करता हूँ, न मैं जीवन का अभिनन्दन करता हूँ; मैं केवल समय की प्रतीक्षा करता हूँ, जैसे कोई मज़दूर अपनी मज़दूरी की।’ අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9. ධාතුසොසංසන්දනසුත්තවණ්ණනා ९. धातु-संसन्दन सूत्र की व्याख्या 78. නවමෙ ධාතුසොති ධාතුතො. ධාතූති ච අජ්ඣාසයධාතු අජ්ඣාසයසභාවො අධිප්පෙතො, යො අධිමුත්තීතිපි වුච්චති. සංසන්දන්තීති තාය ධාතුසභාගතාය යථාධාතු යථාඅජ්ඣාසයං අල්ලීයන්ති එකතො හොන්ති. සමෙන්තීති තාය එව සමානජ්ඣාසයතාය එකචිත්තා හුත්වා සමාගච්ඡන්ති අඤ්ඤමඤ්ඤං භජන්ති උපසඞ්කමන්ති, අත්තනො රුචිභාවඛන්තිදිට්ඨියො වා තත්ථ තත්ථ සමෙ කරොන්තා පවත්තන්ති. හීනාධිමුත්තිකාති හීනෙ කාමගුණාදිකෙ අධිමුත්ති එතෙසන්ති හීනාධිමුත්තිකා, හීනජ්ඣාසයා. කල්යාණාධිමුත්තිකාති කල්යාණෙ නෙක්ඛම්මාදිකෙ අධිමුත්ති එතෙසන්ති කල්යාණාධිමුත්තිකා, පණීතජ්ඣාසයා. සචෙ හි ආචරියුපජ්ඣායා න සීලවන්තො[Pg.233], අන්තෙවාසිකසද්ධිවිහාරිකා ච සීලවන්තො, තෙ ආචරියුපජ්ඣායෙපි න උපසඞ්කමන්ති, අත්තනො සදිසෙ සාරුප්පභික්ඛූයෙව උපසඞ්කමන්ති. සචෙ පන ආචරියුපජ්ඣායා සීලවන්තො, ඉතරෙ න සීලවන්තො, තෙපි න ආචරියුපජ්ඣායෙ උපසඞ්කමන්ති, අත්තනො සදිසෙ හීනාධිමුත්තිකෙයෙව උපසඞ්කමන්ති. එවං උපසඞ්කමනං පන න කෙවලං එතරහි එව, අථ ඛො අතීතානාගතෙපීති දස්සෙන්තො ‘‘අතීතම්පි, භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. සඞ්ඛෙපතො සංකිලෙසධම්මෙසු අභිනිවිට්ඨා හීනාධිමුත්තිකා, වොදානධම්මෙසු අභිනිවිට්ඨා කල්යාණාධිමුත්තිකා. ७८. नौवें (सूत्र) में 'धातुसो' का अर्थ है 'धातु से'। 'धातु' से आशय 'अध्याशय-धातु' (रुचि/स्वभाव) से है, जिसे 'अधिमुक्ति' भी कहा जाता है। 'संसन्दन्ति' का अर्थ है उस धातु की समानता के कारण अपनी धातु और अध्याशय के अनुसार एक-दूसरे से मिलते हैं, एक साथ होते हैं। 'समेन्ति' का अर्थ है उसी समान अध्याशय के कारण एकचित्त होकर मिलते हैं, एक-दूसरे का सेवन करते हैं, पास जाते हैं, अथवा अपनी रुचि, भाव, क्षान्ति और दृष्टि को उन-उन विषयों में समान करते हुए प्रवृत्त होते हैं। 'हीन-अधिमुक्तिक' वे हैं जिनकी हीन कामगुणों आदि में अधिमुक्ति (रुचि) है, अर्थात् हीन अध्याशय वाले। 'कल्याण-अधिमुक्तिक' वे हैं जिनकी कल्याणकारी नैष्क्रम्य (त्याग) आदि में अधिमुक्ति है, अर्थात् श्रेष्ठ अध्याशय वाले। यदि आचार्य और उपाध्याय शीलवान नहीं हैं, और अन्तेवासी तथा सार्धविहारिक शीलवान हैं, तो वे आचार्य और उपाध्याय के पास भी नहीं जाते, बल्कि अपने समान उपयुक्त भिक्षुओं के पास ही जाते हैं। यदि आचार्य और उपाध्याय शीलवान हैं, और दूसरे (शिष्य) शीलवान नहीं हैं, तो वे भी आचार्य और उपाध्याय के पास नहीं जाते, बल्कि अपने समान हीन-अधिमुक्ति वालों के पास ही जाते हैं। इस प्रकार का मिलना न केवल अभी होता है, बल्कि अतीत और अनागत में भी होता है, यह दिखाने के लिए "भिक्षुओं, अतीत में भी" आदि कहा गया है। संक्षेप में, संक्लेश (मलिन) धर्मों में अभिनिविष्ट (लगे हुए) लोग 'हीन-अधिमुक्तिक' हैं, और व्यवदान (शुद्ध) धर्मों में अभिनिविष्ट लोग 'कल्याण-अधिमुक्तिक' हैं। ඉදං පන දුස්සීලානං දුස්සීලසෙවනමෙව, සීලවන්තානං සීලවන්තසෙවනමෙව, දුප්පඤ්ඤානං දුප්පඤ්ඤසෙවනමෙව, පඤ්ඤවන්තානං පඤ්ඤවන්තසෙවනමෙව කො නියාමෙතීති? අජ්ඣාසයධාතු නියාමෙති. සම්බහුලා කිර භික්ඛූ එකස්මිං ගාමෙ භික්ඛාචාරං චරන්ති. තෙ මනුස්සා බහුං භත්තං ආහරිත්වා පත්තානි පූරෙත්වා ‘‘යථාසභාගං පරිභුඤ්ජථා’’ති වත්වා උය්යොජෙසුං. භික්ඛූ ආහංසු ‘‘ආවුසො, මනුස්සා ධාතුසංයුත්තකම්මෙ පයොජෙන්තී’’ති. එවං අජ්ඣාසයධාතු නියාමෙතීති. ධාතුසංයුත්තෙන අයමත්ථො දීපෙතබ්බො – ගිජ්ඣකූටපබ්බතස්මිඤ්හි ගිලානසෙය්යාය නිපන්නො භගවා ආරක්ඛත්ථාය පරිවාරෙත්වා වසන්තෙසු සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානාදීසු එකමෙකං අත්තනො පරිසාය සද්ධිං චඞ්කමන්තං ඔලොකෙත්වා භික්ඛූ ආමන්තෙසි ‘‘පස්සථ නො තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, සාරිපුත්තං සම්බහුලෙහි භික්ඛූහි සද්ධිං චඞ්කමන්තන්ති. එවං, භන්තෙ. සබ්බෙ ඛො එතෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ මහාපඤ්ඤා’’ති (සං. නි. 2.99) සබ්බං විත්ථාරෙතබ්බං. लेकिन यह कौन निर्धारित करता है कि दुःशील दुःशीलों का ही सेवन करते हैं, शीलवान शीलवानों का ही, दुर्बुद्धि दुर्बुद्धियों का ही, और प्रज्ञावान प्रज्ञावानों का ही? अध्याशय-धातु इसे निर्धारित करती है। सुना जाता है कि बहुत से भिक्षु एक गाँव में भिक्षाटन कर रहे थे। उन मनुष्यों ने बहुत सा भोजन लाकर पात्रों को भर दिया और "अपनी-अपनी समानता (रुचि) के अनुसार उपभोग करें" कहकर विदा किया। भिक्षुओं ने कहा, "आयुष्मन्, मनुष्य धातु-संयुत्त कर्म में लगे हुए हैं।" इस प्रकार अध्याशय-धातु निर्धारित करती है। 'धातु-संयुत्त' के माध्यम से यह अर्थ स्पष्ट किया जाना चाहिए - गृध्रकूट पर्वत पर रुग्ण-शय्या पर लेटे हुए भगवान ने, रक्षा के लिए घेरे हुए सारिपुत्र, मोग्गल्लान आदि में से प्रत्येक को अपनी-अपनी परिषद के साथ चंक्रमण करते हुए देखकर भिक्षुओं को संबोधित किया - "भिक्षुओं, क्या तुम सारिपुत्र को बहुत से भिक्षुओं के साथ चंक्रमण करते हुए देख रहे हो? हाँ, भन्ते। भिक्षुओं, ये सभी भिक्षु महाप्रज्ञावान हैं" (सं. नि. 2.99) - यह सब विस्तार से कहना चाहिए। ගාථාසු සංසග්ගාති සංකිලෙසතො සහවාසාදිවසෙන සමායොගතො, අථ වා දස්සනසංසග්ගො, සවනසංසග්ගො, සමුල්ලාපසංසග්ගො, සම්භොගසංසග්ගො, කායසංසග්ගොති එවං පඤ්චවිධෙ සංසග්ගෙ යතො කුතොචි සංසග්ගතො. වනථො ජාතොති කිලෙසො උප්පන්නො මග්ගෙන අසමූහතො. අසංසග්ගෙන ඡිජ්ජතීති සංසග්ගපටික්ඛෙපෙන කායවිවෙකාදිනා පුබ්බභාගෙ ඡිජ්ජිත්වා පුන අච්චන්තාසංසග්ගෙන සමුච්ඡෙදවිවෙකෙන ඡිජ්ජති පහීයති. එත්තාවතා සඞ්ඛෙපතො හීනාධිමුත්තියා සමුදයො අත්ථඞ්ගමො ච දස්සිතො හොති. गाथाओं में 'संसर्ग' का अर्थ है संक्लेश (मलिनता) के कारण साथ रहने आदि के संयोग से, अथवा दर्शन-संसर्ग, श्रवण-संसर्ग, सम्लाप-संसर्ग, सम्भोग-संसर्ग, और काय-संसर्ग - इन पाँच प्रकार के संसर्गों में से किसी भी संसर्ग से। 'वनथ' उत्पन्न हुआ का अर्थ है क्लेश उत्पन्न हुआ जो मार्ग द्वारा समूल नष्ट नहीं किया गया है। 'असंसर्ग से कटता है' का अर्थ है संसर्ग के परित्याग द्वारा, काय-विवेक आदि के माध्यम से पूर्व भाग में कटकर, फिर अत्यन्त असंसर्ग (समुच्छेद-विवेक) द्वारा कट जाता है, प्रहीण हो जाता है। इतने से संक्षेप में हीन-अधिमुक्ति का उदय और अस्त दिखाया गया है। යස්මා [Pg.234] පන තෙ සංසග්ගා තෙ ච කිලෙසා කොසජ්ජවසෙන උප්පජ්ජන්ති චෙව වඩ්ඪන්ති ච, න වීරියාරම්භවසෙන, තස්මා හීනාධිමුත්තිකෙ කුසීතපුග්ගලෙ වජ්ජෙත්වා කල්යාණාධිමුත්තිකෙ ආරද්ධවීරියෙ සෙවන්තෙන අසංසග්ගෙන සංසග්ගජො වනථො ඡින්දිතබ්බොති යථාවුත්තමත්ථං විත්ථාරතො දස්සෙන්තො කුසීතසෙවනාය තාව ආදීනවං පකාසෙතුං ‘‘පරිත්තං දාරු’’න්තිආදිමාහ. क्योंकि वे संसर्ग और वे क्लेश आलस्य के कारण उत्पन्न और संवर्धित होते हैं, न कि वीर्यारम्भ (पुरुषार्थ) के कारण, इसलिए हीन-अधिमुक्ति वाले आलसी व्यक्तियों को त्यागकर, कल्याण-अधिमुक्ति वाले आरब्ध-वीर्य (उद्यमी) व्यक्तियों का सेवन करते हुए, असंसर्ग के द्वारा संसर्ग-जन्य 'वनथ' (क्लेश) को काट देना चाहिए - इस उक्त अर्थ को विस्तार से दिखाने के लिए, आलसी के सेवन के दोष को प्रकट करने हेतु "छोटा काष्ठ" आदि कहा गया है। තත්ථ පරිත්තං දාරුන්ති ඛුද්දකං කට්ඨමයං කුල්ලං. යථා සීදෙ මහණ්ණවෙති යථා ඛුද්දකං කුල්ලං ආරුහිත්වා මහාසමුද්දං තරිතුකාමො තීරං අප්පත්වා සමුද්දමජ්ඣෙයෙව සීදෙය්ය, පතිත්වා මච්ඡකච්ඡපභක්ඛො භවෙය්ය. එවං කුසීතං ආගම්ම, සාධුජීවීපි සීදතීති එවමෙව කුසීතං වීරියාරම්භරහිතං කිලෙසවසිකං පුග්ගලං නිස්සාය තෙන කතසංසග්ගො සාධුජීවීපි පරිසුද්ධාජීවො පරිසුද්ධසීලොපි සමානො හීනසංසග්ගතො උප්පන්නෙහි කාමවිතක්කාදීහි ඛජ්ජමානො පාරං ගන්තුං අසමත්ථො සංසාරණ්ණවෙයෙව සීදති. තස්මාති යස්මා එවං අනත්ථාවහො කුසීතසංසග්ගො, තස්මා තං ආගම්ම ආලසියානුයොගෙන කුච්ඡිතං සීදතීති කුසීතං. තතො එව හීනවීරියං නිබ්බීරියං අකල්යාණමිත්තං පරිවජ්ජෙය්ය. එකන්තෙනෙව පන කායවිවෙකාදීනඤ්චෙව තදඞ්ගවිවෙකාදීනඤ්ච වසෙන පවිවිත්තෙහි, තතො එව කිලෙසෙහි ආරකත්තා අරියෙහි පරිසුද්ධෙහි නිබ්බානං පටිපෙසිතත්තභාවතො පහිතත්තෙහි ආරම්මණලක්ඛණූපනිජ්ඣානානං වසෙන ඣායනතො ඣායීහි සබ්බකාලං පග්ගහිතවීරියතාය ආරද්ධවීරියෙහි පණ්ඩිතෙහි සප්පඤ්ඤෙහියෙව සහ ආවසෙය්ය සංවසෙය්යාති. वहाँ 'परित्तं दारुं' का अर्थ है छोटी लकड़ी का बेड़ा (कुल्ल)। 'यथा सीदे महण्णवे' का अर्थ है जैसे छोटी लकड़ी के बेड़े पर चढ़कर महासमुद्र को पार करने की इच्छा रखने वाला किनारे तक पहुँचने से पहले ही समुद्र के बीच में डूब जाए, और गिरकर मछली-कछुओं का भोजन बन जाए। 'एवं कुसीतं आगम्म, साधुजीवीपि सीदति' का अर्थ है इसी प्रकार आलसी, वीर्यारम्भ-रहित, क्लेशों के वश में रहने वाले व्यक्ति का आश्रय लेकर, उसके साथ संसर्ग करने वाला साधुजीवी (सदाचारी) भी, जो परिशुद्ध आजीविका और परिशुद्ध शील वाला है, हीन संसर्ग से उत्पन्न काम-वितर्क आदि के द्वारा खाया जाता हुआ, पार जाने में असमर्थ होकर संसार-सागर में ही डूब जाता है। 'तस्मा' (इसलिए) क्योंकि आलसी का संसर्ग इस प्रकार अनर्थकारी है, इसलिए 'कुसीत' (आलसी) वह है जो आलस्य के अभ्यास के कारण कुत्सित रूप से डूबता है। इसलिए हीन-वीर्य, निर्वीर्य और अकल्याण-मित्र का परित्याग करना चाहिए। केवल काय-विवेक आदि और तदङ्ग-विवेक आदि के कारण जो प्रविभक्त (एकान्तवासी) हैं, क्लेशों से दूर होने के कारण जो आर्य और परिशुद्ध हैं, निर्वाण की ओर चित्त लगाने के कारण जो 'प्रहितात्मा' हैं, आलम्बन और लक्षण के उपनिध्यान (ध्यान) के कारण जो ध्यानी हैं, और सदा वीर्य धारण करने के कारण जो आरब्ध-वीर्य हैं, उन पण्डितों और प्रज्ञावानों के साथ ही रहना और संवास करना चाहिए। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. පරිහානසුත්තවණ්ණනා १०. परिहाण सूत्र की व्याख्या। 79. දසමෙ පරිහානාය සංවත්තන්තීති අවුද්ධියා භවන්ති, මග්ගාධිගමස්ස පරිපන්ථාය හොන්ති. අධිගතස්ස පන මග්ගස්ස පරිහානි නාම නත්ථි. ‘‘තයො ධම්මා’’ති ධම්මාධිට්ඨානවසෙන උද්දිට්ඨධම්මෙ පුග්ගලාධිට්ඨානාය දෙසනාය විභජන්තො ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, සෙඛො භික්ඛූ’’තිආදිමාහ. ७९. दसवें (सूत्र) में 'हानि के लिए संवर्तित होते हैं' का अर्थ है कि वे वृद्धि के लिए नहीं होते, मार्ग की प्राप्ति में बाधक होते हैं। प्राप्त किए हुए मार्ग की तो हानि नहीं होती। 'तीन धर्म' इस प्रकार धर्म-अधिष्ठान के वश से निर्दिष्ट धर्मों को पुद्गल-अधिष्ठान वाली देशना से विभाजित करते हुए 'यहाँ, भिक्षुओं, शैक्ष भिक्षु' आदि कहा। තත්ථ කම්මං ආරමිතබ්බතො ආරාමො එතස්සාති කම්මාරාමො. කම්මෙ රතොති කම්මරතො. කම්මාරාමතං කම්මාභිරතිං අනුයුත්තො පයුත්තොති [Pg.235] කම්මාරාමතමනුයුත්තො. තත්ථ කම්මං නාම ඉතිකත්තබ්බං කම්මං, සෙය්යථිදං – චීවරවිචාරණං, චීවරකරණං, උපත්ථම්භනං, පත්තත්ථවිකං, අංසබන්ධනං, කායබන්ධනං, ධමකරණං, ආධාරකං, පාදකථලිකං, සම්මජ්ජනීති එවමාදීනං උපකරණානං කරණං, යඤ්ච විහාරෙ ඛණ්ඩඵුල්ලාදිපටිසඞ්ඛරණං. එකච්චො හි එතානි කරොන්තො සකලදිවසං එතානෙව කරොති. තං සන්ධායෙතං වුත්තං. යො පන එතෙසං කරණවෙලායමෙව එතානි කරොති, උද්දෙසවෙලායං උද්දෙසං ගණ්හාති, සජ්ඣායවෙලායං සජ්ඣායති, චෙතියඞ්ගණවත්තාදිකරණවෙලායං චෙතියඞ්ගණවත්තාදීනි කරොති, මනසිකාරවෙලායං මනසිකාරං කරොති සබ්බත්ථකකම්මට්ඨානෙ වා පාරිහාරියකම්මට්ඨානෙ වා, න සො කම්මාරාමො නාම. තස්ස තං – वहाँ कर्म (कार्य) ही जिसका आराम (विश्राम/क्रीड़ा) है, वह 'कर्माराम' है। कर्म में जो रत है, वह 'कर्मरत' है। कर्मारामता अर्थात् कर्म में अभिरति में जो लगा हुआ है, प्रयुक्त है, वह 'कर्मारामतामनुयुत्त' है। वहाँ 'कर्म' का अर्थ है कर्तव्य कर्म, जैसे कि - चीवर की देखभाल, चीवर बनाना, सहारा देना, पात्र की थैली, अंस-बंधन (कंधे की पट्टी), काय-बंधन (कमरबंद), धम्मकरण (पानी छानने का पात्र), आधारक (स्टैंड), पाद-कथलिक (पैर साफ करने का पत्थर), झाड़ू लगाना आदि उपकरणों का निर्माण, और विहार में टूट-फूट की मरम्मत करना। कोई व्यक्ति इन्हें करते हुए पूरा दिन इन्हीं में लगा रहता है। उसे लक्ष्य कर यह कहा गया है। लेकिन जो इनके करने के समय ही इन्हें करता है, पाठ (उद्देश) के समय पाठ ग्रहण करता है, स्वाध्याय के समय स्वाध्याय करता है, चैत्य-प्रांगण की सेवा आदि के समय चैत्य-प्रांगण की सेवा आदि करता है, मनसिकार के समय सर्वार्थक कर्मस्थान या पारिहारिक कर्मस्थान में मनसिकार करता है, वह 'कर्माराम' नहीं कहलाता। उसके लिए वह— ‘‘යානි ඛො පන තානි සබ්රහ්මචාරීනං උච්චාවචානි කිංකරණීයානි, තත්ථ දක්ඛො හොති අනලසො, තත්රුපායාය වීමංසාය සමන්නාගතො, අලං කාතුං අලං සංවිධාතු’’න්ති (දී. නි. 3.345; අ. නි. 10.18) – "जो सब्रह्मचारियों के ऊँचे-नीचे (विविध) कर्तव्य कार्य हैं, उनमें वह दक्ष होता है, आलस्य रहित होता है, उनके उपायों की मीमांसा (विचार) से युक्त होता है, करने में समर्थ और प्रबंध करने में समर्थ होता है" - ආදිනා සත්ථාරා අනුඤ්ඤාතකරණමෙව හොති. आदि के द्वारा शास्ता द्वारा अनुमत कार्य करना ही होता है। භස්සාරාමොති යො භගවතා පටික්ඛිත්තරාජකථාදිවසෙන රත්තින්දිවං වීතිනාමෙති, අයං භස්සෙ පරියන්තකාරී න හොතීති භස්සාරාමො නාම. යො පන රත්තිම්පි දිවාපි ධම්මං කථෙති, පඤ්හං විස්සජ්ජෙති, අයං අප්පභස්සො භස්සෙ පරියන්තකාරීයෙව. කස්මා? ‘‘සන්නිපතිතානං වො, භික්ඛවෙ, ද්වයං කරණීයං – ධම්මී වා කථා, අරියො වා තුණ්හීභාවො’’ති (ම. නි. 1.273) වුත්තවිධිංයෙව පටිපන්නොති. 'भस्साराम' (गप्पों में रमने वाला) वह है जो भगवान द्वारा निषिद्ध राजकथा आदि के द्वारा रात-दिन बिताता है, यह गप्पों का अंत करने वाला नहीं होता, इसलिए 'भस्साराम' कहलाता है। लेकिन जो रात में भी और दिन में भी धर्म की चर्चा करता है, प्रश्नों का उत्तर देता है, वह 'अल्प-भाषी' और गप्पों का अंत करने वाला ही है। क्यों? क्योंकि "भिक्षुओं, एकत्रित होने पर तुम्हें दो ही कार्य करने चाहिए - धार्मिक चर्चा या आर्य मौन" - इस बताई गई विधि का ही वह पालन करता है। නිද්දාරාමොති යො යාවදත්ථං උදරාවදෙහකං භුඤ්ජිත්වා සෙය්යසුඛං, පස්සසුඛං, මිද්ධසුඛං අනුයුඤ්ජති, යො ච ගච්ඡන්තොපි නිසින්නොපි ඨිතොපි ථිනමිද්ධාභිභූතො නිද්දායති, අයං නිද්දාරාමො නාම. යස්ස පන කරජකායගෙලඤ්ඤෙන චිත්තං භවඞ්ගං ඔතරති, නායං නිද්දාරාමො, තෙනෙවාහ – 'निद्दाराम' (नींद में रमने वाला) वह है जो पेट भरकर भोजन करके शयन-सुख, पार्श्व-सुख (करवट लेकर लेटने का सुख), और मिद्ध-सुख (तंद्रा का सुख) में लगा रहता है, और जो चलते हुए, बैठे हुए या खड़े हुए भी स्त्यान-मिद्ध (आलस्य-तंद्रा) से अभिभूत होकर सोता है, वह 'निद्दाराम' कहलाता है। लेकिन जिसका चित्त शरीर की अस्वस्थता के कारण भवांग में उतर जाता है (नींद आ जाती है), वह 'निद्दाराम' नहीं है, इसीलिए कहा है - ‘‘අභිජානාමි ඛො පනාහං, අග්ගිවෙස්සන, ගිම්හානං පච්ඡිමෙ මාසෙ පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතප්පටික්කන්තො චතුග්ගුණං සඞ්ඝාටිං පඤ්ඤාපෙත්වා දක්ඛිණෙන පස්සෙන සතො සම්පජානො නිද්දං ඔක්කමිතා’’ති (ම. නි. 1.387). "हे अग्निवेश्य! मुझे याद है कि ग्रीष्म ऋतु के अंतिम महीने में, भोजन के पश्चात पिंडपात से लौटकर, चौगुनी संघाटी बिछाकर, दाहिनी करवट लेकर, स्मृतिवान और संप्रजन्य युक्त होकर मैं निद्रा में गया था।" එත්ථ [Pg.236] ච පුථුජ්ජනකල්යාණකොපි සෙඛොත්වෙව වෙදිතබ්බො. තස්මා තස්ස සබ්බස්සපි විසෙසාධිගමස්ස ඉතරෙසං උපරි විසෙසාධිගමස්ස ච පරිහානාය වත්තන්තීති වෙදිතබ්බං. සුක්කපක්ඛස්ස වුත්තවිපරියායෙන අත්ථවිභාවනා වෙදිතබ්බා. यहाँ कल्याणकारी पृथग्जन को भी 'शैक्ष' ही समझना चाहिए। इसलिए, उसके सभी विशेष अधिगमों की और दूसरों से ऊपर के विशेष अधिगमों की हानि के लिए ये (धर्म) संवर्तित होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। शुक्ल पक्ष (कुशल पक्ष) की अर्थ-व्याख्या कहे गए के विपरीत समझनी चाहिए। ගාථාසු උද්ධතොති චිත්තවික්ඛෙපකරෙන උද්ධච්චෙන උද්ධතො අවූපසන්තො. අප්පකිච්චස්සාති අනුඤ්ඤාතස්සපි වුත්තප්පකාරස්ස කිච්චස්ස යුත්තප්පයුත්තකාලෙයෙව කරණතො අප්පකිච්චො අස්ස භවෙය්ය. අප්පමිද්ධොති ‘‘දිවසං චඞ්කමෙන නිසජ්ජායා’’තිආදිනා වුත්තජාගරියානුයොගෙන නිද්දාරහිතො අස්ස. අනුද්ධතොති භස්සාරාමතාය උප්පජ්ජනකචිත්තවික්ඛෙපස්ස අභස්සාරාමො හුත්වා පරිවජ්ජනෙන න උද්ධතො වූපසන්තචිත්තො, සමාහිතොති අත්ථො. සෙසං පුබ්බෙ වුත්තනයත්තා සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. ඉති ඉමස්මිං වග්ගෙ පඨමදුතියපඤ්චමඡට්ඨසත්තමඅට්ඨමනවමෙසු සුත්තෙසු වට්ටං කථිතං, ඉතරෙසු වට්ටවිවට්ටං. गाथाओं में 'उद्धत' का अर्थ है चित्त-विक्षेप करने वाले औद्धत्य (चंचलता) से उद्धत, अशांत। 'अल्पकृत्य' का अर्थ है कि अनुमत किए गए उक्त प्रकार के कार्यों को भी उचित समय पर ही करने के कारण वह अल्पकृत्य वाला हो। 'अल्पमिद्ध' का अर्थ है "दिन में चंक्रमण और बैठने के द्वारा" आदि में कहे गए जागरण के अभ्यास से निद्रा रहित हो। 'अनुद्धत' का अर्थ है भस्सारामता (गप्पों में रमना) से उत्पन्न होने वाले चित्त-विक्षेप का अभस्साराम होकर त्याग करने से जो उद्धत नहीं है, शांत चित्त वाला है, अर्थात् समाहित है। शेष बातें पहले कही गई पद्धति के अनुसार आसानी से समझने योग्य ही हैं। इस प्रकार इस वर्ग के पहले, दूसरे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें और नौवें सूत्रों में 'वट्ट' (संसार चक्र) कहा गया है, और अन्यों में 'वट्ट-विवट्ट' (संसार और निर्वाण)। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। තතියවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तीसरे वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। 4. චතුත්ථවග්ගො ४. चतुर्थ वर्ग 1. විතක්කසුත්තවණ්ණනා १. वितर्क सूत्र की व्याख्या 80. චතුත්ථවග්ගස්ස පඨමෙ අකුසලවිතක්කාති අකොසල්ලසම්භූතා විතක්කා, මිච්ඡාවිතක්කාති අත්ථො. අනවඤ්ඤත්තිපටිසංයුත්තොති එත්ථ අනවඤ්ඤත්තීති අනවඤ්ඤා පරෙහි අත්තනො අහීළිතතා අපරිභූතතා, ‘‘අහො වත මං පරෙ න අවජානෙය්යු’’න්ති එවං පවත්තො ඉච්ඡාචාරො, තාය අනවඤ්ඤත්තියා පටිසංයුත්තො සංසට්ඨො, තං වා ආරබ්භ පවත්තො අනවඤ්ඤත්තිපටිසංයුත්තො විතක්කො. තස්මා ‘‘කථං නු ඛො මං පරෙ ගහට්ඨා චෙව පබ්බජිතා ච න ඔරකතො දහෙය්යු’’න්ති සම්භාවනකම්යතාය ඉච්ඡාචාරෙ, ඨත්වා පවත්තිතවිතක්කස්සෙතං අධිවචනං. ලාභසක්කාරසිලොකපටිසංයුත්තොති චීවරාදිලාභෙන චෙව සක්කාරෙන ච කිත්තිසද්දෙන [Pg.237] ච ආරම්මණකරණවසෙන පටිසංයුත්තො. පරානුද්දයතාපටිසංයුත්තොති පරෙසු අනුද්දයතාපතිරූපකෙන ගෙහසිතපෙමෙන පටිසංයුත්තො. යං සන්ධාය වුත්තං – ८०. चतुर्थ वर्ग के पहले (सूत्र) में 'अकुशल वितर्क' का अर्थ है अकुशलता से उत्पन्न वितर्क, अर्थात् मिथ्या वितर्क। 'अनवज्ञप्ति-प्रतिसंयुक्त' में 'अनवज्ञप्ति' का अर्थ है अनवज्ञा, दूसरों द्वारा अपना तिरस्कार न किया जाना, अपमानित न होना; "अहो! दूसरे मेरा अपमान न करें" इस प्रकार प्रवृत्त इच्छाचार (इच्छा)। उस अनवज्ञप्ति से प्रतिसंयुक्त (जुड़ा हुआ), संसृष्ट, या उसे लेकर प्रवृत्त वितर्क 'अनवज्ञप्ति-प्रतिसंयुक्त वितर्क' है। इसलिए "कैसे दूसरे गृहस्थ और प्रव्रजित मुझे हीन न समझें" इस प्रकार सम्मान की कामना वाले इच्छाचार में स्थित होकर प्रवृत्त वितर्क का यह नाम है। 'लाभ-सत्कार-श्लोक-प्रतिसंयुक्त' का अर्थ है चीवर आदि के लाभ, सत्कार और कीर्ति-शब्द को आलम्बन बनाने के कारण उनसे जुड़ा हुआ। 'परानुदयता-प्रतिसंयुक्त' का अर्थ है दूसरों के प्रति दया के रूप में दिखने वाले गृह-आश्रित प्रेम (मोह) से जुड़ा हुआ। जिसे लक्ष्य कर कहा गया है - ‘‘සංසට්ඨො විහරති රාජූහි රාජමහාමත්තෙහි බ්රාහ්මණෙහි ගහපතිකෙහි තිත්ථියෙහි තිත්ථියසාවකෙහි සහනන්දී සහසොකී, සුඛිතෙසු සුඛිතො, දුක්ඛිතෙසු දුක්ඛිතො, උප්පන්නෙසු කිච්චකරණීයෙසු අත්තනාව යොගං ආපජ්ජතී’’ති (සං. නි. 3.3; 4.241; විභ. 888). "वह राजाओं, राज-महामात्रों, ब्राह्मणों, गृहपतियों, तीर्थिकों और तीर्थिक-श्रावकों के साथ संसृष्ट होकर विहार करता है, उनके साथ ही प्रसन्न होता है, उनके साथ ही दुखी होता है, उनके सुखी होने पर सुखी और दुखी होने पर दुखी होता है, और उनके कार्यों के उपस्थित होने पर स्वयं उनमें लग जाता है।" ගාථාසු අනවඤ්ඤත්තියා පටිසංයුත්තො පුග්ගලො අනවඤ්ඤත්තිසංයුත්තො. ලාභසක්කාරෙ ගාරවො එතස්ස, න ධම්මෙති ලාභසක්කාරගාරවො. සුඛදුක්ඛෙසු අමා සහ භවාති අමච්චා, සහායසදිසා උපට්ඨාකා. තෙහි ගෙහසිතපෙමවසෙන සහ නන්දනසීලො සහනන්දී අමච්චෙහි, ඉමිනා පරානුද්දයතාපටිසංයුත්තං විතක්කං දස්සෙති. ආරා සංයොජනක්ඛයාති ඉමෙහි තීහි විතක්කෙහි අභිභූතො පුග්ගලො සංයොජනක්ඛයතො අරහත්තතො දූරෙ, තස්ස තං දුල්ලභන්ති අත්ථො. गाथाओं में 'अनवज्ञप्ति' (तिरस्कृत न होने) से संबंधित व्यक्ति 'अनवज्ञप्ति-संयुक्त' है। लाभ और सत्कार में इसका गौरव है, धर्म में नहीं, इसलिए यह 'लाभ-सत्कार-गौरव' है। सुख और दुःख में जो साथ रहते हैं वे 'अमात्य' (मित्रों के समान सेवक) हैं। उनके साथ गृहस्थ प्रेम के वश में होकर साथ आनंदित होने वाला 'सह-नन्दी' है; इससे दूसरों के प्रति दया से संबंधित वितर्क को दिखाया गया है। 'संयोजन-क्षय से दूर' का अर्थ है कि इन तीन वितर्कों से अभिभूत व्यक्ति संयोजनों के क्षय रूपी अर्हत्व से दूर है, उसके लिए वह दुर्लभ है। පුත්තපසුන්ති පුත්තෙ ච පසවො ච. පුත්තසද්දෙන චෙත්ථ දාරාදයො; පසුසද්දෙන අස්සමහිංසඛෙත්තවත්ථාදයො ච සඞ්ගහිතා. විවාහෙති විවාහකාරාපනෙ. ඉමිනා ආවාහොපි සඞ්ගහිතො. සංහරානීති පරිග්ගහානි, පරික්ඛාරසඞ්ගහානීති අත්ථො. ‘‘සන්ථවානී’’ති ච පඨන්ති, මිත්තසන්ථවානීති අත්ථො. සබ්බත්ථ හිත්වාති සම්බන්ධො. භබ්බො සො තාදිසො භික්ඛූති සො යථාවුත්තං සබ්බං පපඤ්චං පරිච්චජිත්වා යථා සත්ථාරා වුත්තාය සම්මාපටිපත්තියා, තථා පස්සිතබ්බතො තාදිසො සංසාරෙ භයං ඉක්ඛතීති භික්ඛු උත්තමං සම්බොධිං අරහත්තං පත්තුං අරහති. 'पुत्र-पशु' का अर्थ है पुत्र और पशु। यहाँ 'पुत्र' शब्द से पत्नी आदि और 'पशु' शब्द से घोड़े, भैंस, खेत, वास्तु आदि का संग्रह है। 'विवाह' का अर्थ विवाह कराना है। इससे 'आवाह' (विवाह कर लाना) का भी संग्रह होता है। 'संहरानि' का अर्थ परिग्रह (संग्रह) या परिष्कारों का संग्रह है। 'सन्थवानि' भी पाठ है, जिसका अर्थ मित्रों के साथ संस्तव (परिचय) है। 'सब जगह छोड़कर' यह संबंध है। 'वैसा भिक्षु समर्थ है' का अर्थ है कि वह पूर्वोक्त सभी प्रपंचों को त्यागकर, शास्ता द्वारा बताई गई सम्यक् प्रतिपत्ति के अनुसार, संसार में भय देखने के कारण वैसा भिक्षु उत्तम संबोधि (अर्हत्व) प्राप्त करने के योग्य है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 2. සක්කාරසුත්තවණ්ණනා २. सत्कार सूत्र की व्याख्या 81. දුතියෙ සක්කාරෙනාති සක්කාරෙන හෙතුභූතෙන, අථ වා සක්කාරෙනාති සක්කාරහෙතුනා, සක්කාරහෙතුකෙන වා. සක්කාරඤ්හි නිස්සාය [Pg.238] ඉධෙකච්චෙ පුග්ගලා පාපිච්ඡා ඉච්ඡාපකතා ඉච්ඡාචාරෙ ඨත්වා ‘‘සක්කාරං නිබ්බත්තෙස්සාමා’’ති අනෙකවිහිතං අනෙසනං අප්පතිරූපං ආපජ්ජිත්වා ඉතො චුතා අපායෙසු නිබ්බත්තන්ති, අපරෙ යථාසක්කාරං ලභිත්වා තන්නිමිත්තං මානමදමච්ඡරියාදිවසෙන පමාදං ආපජ්ජිත්වා ඉතො චුතා අපායෙසු නිබ්බත්තන්ති. යං සන්ධාය වුත්තං – ‘‘සක්කාරෙන අභිභූතා පරියාදින්නචිත්තා’’ති. තත්ථ අභිභූතාති අජ්ඣොත්ථටා. පරියාදින්නචිත්තාති ඛෙපිතචිත්තා, ඉච්ඡාචාරෙන මානමදාදිනා ච ඛයං පාපිතකුසලචිත්තා. අථ වා පරියාදින්නචිත්තාති පරිතො ආදින්නචිත්තා, වුත්තප්පකාරෙන අකුසලකොට්ඨාසෙන යථා කුසලචිත්තස්ස උප්පත්තිවාරො න හොති, එවං සමන්තතො ගහිතචිත්තසන්තානාති අත්ථො. අසක්කාරෙනාති හීළෙත්වා පරිභවිත්වා පරෙහි අත්තනි පවත්තිතෙන අසක්කාරෙන හෙතුනා, අසක්කාරහෙතුකෙන වා මානාදිනා. සක්කාරෙන ච අසක්කාරෙන චාති කෙහිචි පවත්තිතෙන සක්කාරෙන කෙහිචි පවත්තිතෙන අසක්කාරෙන ච. යෙ හි කෙහිචි පඨමං සක්කතා හුත්වා තෙහියෙව අසාරභාවං ඤත්වා පච්ඡා අසක්කතා හොන්ති, තාදිසෙ සන්ධාය වුත්තං ‘‘සක්කාරෙන ච අසක්කාරෙන චා’’ති. ८१. दूसरे (सूत्र) में 'सत्कार से' का अर्थ है सत्कार रूपी हेतु से, अथवा सत्कार के कारण से, या सत्कार के निमित्त से। सत्कार के आश्रय से यहाँ कुछ पापी इच्छा वाले, इच्छाओं से दबे हुए और इच्छाचार में स्थित व्यक्ति 'हम सत्कार प्राप्त करेंगे' ऐसा सोचकर अनेक प्रकार की अनुचित और अयोग्य आजीविका (अनेषणा) में पड़कर, यहाँ से च्युत होकर अपायों में उत्पन्न होते हैं; दूसरे यथाविधि सत्कार प्राप्त करके उसके कारण मान, मद, मत्सर आदि के वश में होकर प्रमाद को प्राप्त होते हैं और यहाँ से च्युत होकर अपायों में उत्पन्न होते हैं। जिसे लक्ष्य कर कहा गया है - 'सत्कार से अभिभूत और परियादिन्न-चित्त (अभिभूत चित्त) वाले'। वहाँ 'अभिभूत' का अर्थ है आच्छादित। 'परियादिन्न-चित्त' का अर्थ है क्षीण चित्त, इच्छाचार और मान-मद आदि के द्वारा कुशल चित्त का क्षय कर दिया गया है। अथवा 'परियादिन्न-चित्त' का अर्थ है चारों ओर से जकड़ा हुआ चित्त, उक्त प्रकार के अकुशल अंशों से इस प्रकार कि कुशल चित्त की उत्पत्ति का अवसर न रहे, इस प्रकार चारों ओर से चित्त-संतति को पकड़ लिया गया है। 'असत्कार से' का अर्थ है दूसरों द्वारा किए गए तिरस्कार और परिभव रूपी असत्कार के हेतु से, या असत्कार के कारण उत्पन्न मान आदि से। 'सत्कार और असत्कार से' का अर्थ है कुछ के द्वारा किए गए सत्कार से और कुछ के द्वारा किए गए असत्कार से। जो पहले किन्हीं के द्वारा सत्कृत होकर, उन्हीं के द्वारा (अपने) असार भाव को जानकर बाद में असत्कृत होते हैं, उन्हें लक्ष्य कर कहा गया है 'सत्कार और असत्कार से' । එත්ථ සක්කාරෙන අභිභූතා දෙවදත්තාදයො නිදස්සෙතබ්බා. වුත්තම්පි චෙතං – यहाँ सत्कार से अभिभूत देवदत्त आदि का उदाहरण देना चाहिए। यह कहा भी गया है - ‘‘ඵලං වෙ කදලිං හන්ති, ඵලං වෙළුං ඵලං නළං; සක්කාරො කාපුරිසං හන්ති, ගබ්භො අස්සතරිං යථා’’ති. (සං. නි. 1.183; අ. නි. 4.68; චූළව. 335); "निश्चित ही फल केले को नष्ट कर देता है, फल बाँस को और फल नरकुल को; सत्कार कुपुरुष को नष्ट कर देता है, जैसे गर्भ खच्चरी को।" සාධූනං උපරි කතෙන අසක්කාරෙන අභිභූතා දණ්ඩකීරාජකාලිඞ්ගරාජමජ්ඣරාජාදයො නිදස්සෙතබ්බා. වුත්තම්පි චෙතං – सज्जनों के प्रति किए गए असत्कार से अभिभूत दण्डकी राजा, कालिंग राजा, मझ राजा आदि का उदाहरण देना चाहिए। यह कहा भी गया है - ‘‘කිසඤ්හි වච්ඡං අවකිරිය දණ්ඩකී,උච්ඡින්නමූලො සජනො සරට්ඨො; කුක්කුළනාමෙ නිරයම්හි පච්චති,තස්ස ඵුලිඞ්ගානි පතන්ති කායෙ. "किसवच्छ (ऋषि) का अपमान करके दण्डकी राजा अपने परिजनों और राष्ट्र के साथ समूल नष्ट हो गया; वह कुक्कुल नामक नरक में पक रहा है, जहाँ उसके शरीर पर अंगारे गिरते हैं।" ‘‘යො [Pg.239] සඤ්ඤතෙ පබ්බජිතෙ අවඤ්චයි,ධම්මං භණන්තෙ සමණෙ අදූසකෙ; තං නාළිකෙරං සුනඛා පරත්ථ,සඞ්ගම්ම ඛාදන්ති විඵන්දමානං’’. (ජා. 2.17.70-71); "जो संयमी प्रव्रजितों को, धर्म का उपदेश देने वाले निर्दोष श्रमणों को अपमानित करता है, उसे परलोक में कुत्ते मिलकर खाते हैं, जबकि वह तड़प रहा होता है।" ‘‘උපහච්ච මනං මජ්ඣො, මාතඞ්ගස්මිං යසස්සිනෙ; සපාරිසජ්ජො උච්ඡින්නො, මජ්ඣාරඤ්ඤං තදා අහූ’’ති. (ජා. 2.19.96); "यशस्वी मातंग (ऋषि) के प्रति मन में द्वेष करके मझ राजा अपने परिषद के साथ नष्ट हो गया, तब वह मझ-अरण्य हो गया।" සක්කාරෙන ච අසක්කාරෙන ච අභිභූතා අඤ්ඤතිත්ථියා නාටපුත්තාදයො නිදස්සෙතබ්බා. सत्कार और असत्कार (दोनों) से अभिभूत अन्यतीर्थिक ज्ञातृपुत्र (निगंठ नातपुत्त) आदि का उदाहरण देना चाहिए। ගාථාසු උභයන්ති උභයෙන සක්කාරෙන ච අසක්කාරෙන ච. සමාධි න විකම්පතීති න චලති, එකග්ගභාවෙන තිට්ඨති. කස්ස පන න චලතීති ආහ ‘‘අප්පමාදවිහාරිනො’’ති. යො පමාදකරධම්මානං රාගාදීනං සුට්ඨු පහීනත්තා අප්පමාදවිහාරී අරහා, තස්ස. සො හි ලොකධම්මෙහි න විකම්පති. සුඛුමදිට්ඨිවිපස්සකන්ති ඵලසමාපත්තිඅත්ථං සුඛුමාය දිට්ඨියා පඤ්ඤාය අභිණ්හං පවත්තවිපස්සනත්තා සුඛුමදිට්ඨිවිපස්සකං. උපාදානක්ඛයාරාමන්ති චතුන්නං උපාදානානං ඛයං පරියොසානභූතං අරහත්තඵලං ආරමිතබ්බං එතස්සාති උපාදානක්ඛයාරාමං. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथाओं में 'उभय' का अर्थ है दोनों - सत्कार और असत्कार से। 'समाधि विचलित नहीं होती' का अर्थ है कि वह डगमगाती नहीं है, एकाग्र भाव से स्थित रहती है। किसकी विचलित नहीं होती? तो कहा - 'अप्रमाद-विहारी की'। राग आदि प्रमाद उत्पन्न करने वाले धर्मों के भली-भाँति प्रहीण (नष्ट) हो जाने के कारण जो अप्रमाद-विहारी अर्हत् है, उसकी। वह लोकधर्मों से विचलित नहीं होता। 'सूक्ष्म-दृष्टि-विपश्यक' का अर्थ है फल-समापत्ति के लिए सूक्ष्म दृष्टि (प्रज्ञा) से निरंतर विपश्यना करने के कारण सूक्ष्म-दृष्टि-विपश्यक। 'उपादान-क्षय-आराम' का अर्थ है चारों उपादानों के क्षय रूपी अर्हत्व-फल में रमण करना जिसका स्वभाव है, वह 'उपादान-क्षय-आराम' है। शेष अर्थ पहले बताए गए अनुसार ही है। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. දෙවසද්දසුත්තවණ්ණනා ३. देवसद्द (देवशब्द) सूत्र की व्याख्या 82. තතියෙ දෙවෙසූති ඨපෙත්වා අරූපාවචරදෙවෙ චෙව අසඤ්ඤදෙවෙ ච තදඤ්ඤෙසු උපපත්තිදෙවෙසු. දෙවසද්දාති දෙවානං පීතිසමුදාහාරසද්දා. නිච්ඡරන්තීති අඤ්ඤමඤ්ඤං ආලාපසල්ලාපවසෙන පවත්තන්ති. සමයා සමයං උපාදායාති සමයතො සමයං පටිච්ච. ඉදං වුත්තං හොති – යස්මිං කාලෙ ඨිතා තෙ දෙවා තං කාලං ආගම්ම නං පස්සිස්සන්ති, තතො තං සමයං සම්පත්තං ආගම්මාති. ‘‘සමයං සමයං උපාදායා’’ති ච කෙචි පඨන්ති, තෙසං [Pg.240] තං තං සමයං පටිච්චාති අත්ථො. යස්මිං සමයෙති යදා ‘‘අට්ඨිකඞ්කලූපමා කාමා’’තිආදිනා (ම. නි. 1.234; පාචි. 417), ‘‘සම්බාධො ඝරාවාසො’’තිආදිනා (දී. නි. 1.191; සං. නි. 2.154) ච කාමෙසු ඝරාවාසෙ ච ආදීනවා, තප්පටිපක්ඛතො නෙක්ඛම්මෙ ආනිසංසා ච සුදිට්ඨා හොන්ති, තස්මිං සමයෙ. තදා හිස්ස එකන්තෙන පබ්බජ්ජාය චිත්තං නමති. අරියසාවකොති අරියස්ස බුද්ධස්ස භගවතො සාවකො, සාවකභාවං උපගන්තුකාමො, අරියසාවකො වා අවස්සංභාවී. අන්තිමභවිකං සාවකබොධිසත්තං සන්ධාය අයමාරම්භො. කෙසමස්සුං ඔහාරෙත්වාති කෙසෙ ච මස්සුඤ්ච ඔහාරෙත්වා අපනෙත්වා. කාසායානි වත්ථානි අච්ඡාදෙත්වාති කසායෙන රත්තතාය කාසායානි බ්රහ්මචරියං චරන්තානං අනුච්ඡවිකානි වත්ථානි නිවාසෙත්වා චෙව පාරුපිත්වා ච. අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජ්ජාය චෙතෙතීති අගාරස්මා ඝරා නික්ඛමිත්වා අනගාරියං පබ්බජ්ජං පබ්බජෙය්යන්ති පබ්බජ්ජාය චෙතෙති පකප්පෙති, පබ්බජතීති අත්ථො. එත්ථ ච යස්මා අගාරස්ස හිතං කසිවණිජ්ජාදිකම්මං අගාරියන්ති වුච්චති, තඤ්ච පබ්බජ්ජාය නත්ථි, තස්මා පබ්බජ්ජා අනගාරියන්ති ඤාතබ්බා. ८२. तीसरे (पद) 'देवों में' का अर्थ है—अरूपावचर देवों और असंज्ञी देवों को छोड़कर, उनके अतिरिक्त अन्य उपपत्ति देवों में। 'देव-शब्द' का अर्थ है—देवों के प्रीतिपूर्वक कहे गए शब्द। 'निश्चरन्ति' का अर्थ है—एक-दूसरे से वार्तालाप के रूप में प्रवृत्त होते हैं। 'समय-समय की अपेक्षा से' (समयं समयं उपादाय) का अर्थ है—समय-समय पर निर्भर होकर। इसका यह अर्थ है—जिस समय वे देव स्थित होते हैं, उस समय को प्राप्त कर उसे देखेंगे, इसलिए उस समय के आने पर। कुछ लोग 'समयं समयं उपादाया' ऐसा पाठ करते हैं, उनके अनुसार इसका अर्थ है—उस-उस समय की अपेक्षा से। 'जिस समय' का अर्थ है—जब 'काम हड्डियों के ढाँचे के समान हैं' इत्यादि और 'घर का वास संकीर्ण है' इत्यादि वचनों से काम-भोगों और गृहस्थ जीवन में दोष, तथा उनके विपरीत नैष्क्रम्य (संन्यास) में लाभ भली-भाँति देख लिए जाते हैं, उस समय। तब निश्चित रूप से उसका चित्त प्रव्रज्या की ओर झुकता है। 'आर्य श्रावक' का अर्थ है—आर्य बुद्ध भगवान का श्रावक, या श्रावक भाव को प्राप्त करने का इच्छुक, अथवा जो अवश्यंभावी आर्य श्रावक है। यह आरम्भ अंतिम जन्म वाले श्रावक-बोधिसत्व के संदर्भ में है। 'केश और मूँछ मुँडाकर' का अर्थ है—बालों और मूँछों को हटाकर। 'काषाय वस्त्र धारण कर' का अर्थ है—कषाय (गेरुए रंग) से रंगे होने के कारण काषाय, जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों के योग्य वस्त्र हैं, उन्हें पहनकर और ओढ़कर। 'घर से बेघर होकर प्रव्रज्या के लिए विचार करता है' का अर्थ है—घर से निकलकर अनागारिक प्रव्रज्या ग्रहण करूँ, ऐसा प्रव्रज्या के लिए संकल्प करता है, विचार करता है; अर्थात् प्रव्रजित होता है। यहाँ यह भी जानना चाहिए कि चूँकि घर के हितकारी कृषि-वाणिज्य आदि कर्मों को 'आगारिय' कहा जाता है, और वे प्रव्रज्या में नहीं होते, इसलिए प्रव्रज्या को 'अनागारिय' (अनागारिकता) कहा जाता है। මාරෙනාති කිලෙසමාරෙන. සඞ්ගාමාය චෙතෙතීති යුජ්ඣනත්ථාය චිත්තං උප්පාදෙති, මාරං අභිවිජෙතුං සන්නය්හති. යස්මා පන එවරූපස්ස පටිපජ්ජනකපුග්ගලස්ස දෙවපුත්තමාරොපි අන්තරායාය උපක්කමති, තස්මා තස්සපි වසෙන මාරෙනාති එත්ථ දෙවපුත්තමාරෙනාතිපි අත්ථො වෙදිතබ්බො. තස්සාපි අයං ඉච්ඡාවිඝාතං කරිස්සතෙවාති. යස්මා පන පබ්බජිතදිවසතො පට්ඨාය ඛුරග්ගතො වා පට්ඨාය සීලානි සමාදියන්තො පරිසොධෙන්තො සමථවිපස්සනාසු කම්මං කරොන්තො යථාරහං තදඞ්ගප්පහානවික්ඛම්භනප්පහානානං වසෙන කිලෙසමාරං පරිපාතෙති නාම, න යුජ්ඣති නාම සම්පහාරස්ස අභාවතො, තස්මා වුත්තං ‘‘මාරෙන සද්ධිං සඞ්ගාමාය චෙතෙතී’’ති. 'मार के द्वारा' का अर्थ है—क्लेश-मार के द्वारा। 'संग्राम के लिए विचार करता है' का अर्थ है—युद्ध के लिए चित्त उत्पन्न करता है, मार को जीतने के लिए तैयार होता है। चूँकि इस प्रकार के प्रतिपत्ति-मार्ग पर चलने वाले पुद्गल के लिए देवपुत्र-मार भी बाधा पहुँचाता है, इसलिए यहाँ 'मार के द्वारा' इसमें 'देवपुत्र-मार के द्वारा' भी अर्थ समझना चाहिए। वह भी इसकी इच्छा का विघात (नाश) करेगा ही। चूँकि प्रव्रज्या के दिन से लेकर या क्षुर-कर्म (मुंडन) के समय से ही शीलों को ग्रहण करते हुए, उन्हें शुद्ध करते हुए, शमथ और विपश्यना में कर्म (अभ्यास) करते हुए, यथायोग्य तदङ्ग-प्रहाण और विष्कम्भन-प्रहाण के द्वारा क्लेश-मार को परास्त करता है, (यद्यपि) प्रहार के अभाव के कारण वह (वास्तविक) युद्ध नहीं करता, इसलिए कहा गया है—'मार के साथ संग्राम के लिए विचार करता है'। සත්තන්නන්ති කොට්ඨාසතො සත්තන්නං, පභෙදතො පන තෙ සත්තතිංස හොන්ති. කථං? චත්තාරො සතිපට්ඨානා, චත්තාරො සම්මප්පධානා, චත්තාරො ඉද්ධිපාදා, පඤ්චින්ද්රියානි, පඤ්ච බලානි, සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගොති. එවං පභෙදතො සත්තතිංසවිධාපි සතිපට්ඨානාදිකොට්ඨාසතො සත්තෙව හොන්තීති වුත්තං ‘‘සත්තන්න’’න්ති. බොධිපක්ඛියානන්ති බුජ්ඣනට්ඨෙන බොධීති ලද්ධනාමස්ස අරියපුග්ගලස්ස මග්ගඤාණස්සෙව වා පක්ඛෙ භවානං බොධිපක්ඛියානං[Pg.241], බොධිකොට්ඨාසියානන්ති අත්ථො. ‘‘බොධිපක්ඛිකාන’’න්තිපි පාඨො, බොධිපක්ඛවන්තානං, බොධිපක්ඛෙ වා නියුත්තානන්ති අත්ථො. භාවනානුයොගමනුයුත්තොති විපස්සනං උස්සුක්කාපෙත්වා අරියමග්ගභාවනානුයොගමනුයුත්තො. විපස්සනාක්ඛණෙ හි සතිපට්ඨානාදයො පරියායෙන බොධිපක්ඛියා නාම, මග්ගක්ඛණෙයෙව පන තෙ නිප්පරියායෙන බොධිපක්ඛියා නාම හොන්ති. 'सात' का अर्थ है—वर्गों (कोटि) की दृष्टि से सात, किन्तु प्रभेद (विस्तार) की दृष्टि से वे सैंतीस होते हैं। कैसे? चार स्मृतिप्रस्थान, चार सम्यक् प्रधान, चार ऋद्धिपाद, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच बल, सात बोध्यङ्ग और आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग। इस प्रकार प्रभेद से सैंतीस प्रकार के होने पर भी स्मृतिप्रस्थान आदि वर्गों की दृष्टि से वे सात ही होते हैं, इसलिए 'सात' कहा गया है। 'बोधिपाक्षिकों का' का अर्थ है—बोध (ज्ञान) के अर्थ में 'बोधि' नाम प्राप्त आर्य पुद्गल के, अथवा मार्ग-ज्ञान के ही पक्ष में होने वाले बोधिपाक्षिकों का; अर्थात् बोधि के अंशों का। 'बोधिपाक्षिकानं' ऐसा भी पाठ है, जिसका अर्थ है—बोधि-पक्ष वालों का, अथवा बोधि-पक्ष में नियुक्त धर्मों का। 'भावना के अनुयोग में लगा हुआ' का अर्थ है—विपश्यना में उत्साह बढ़ाकर आर्यमार्ग की भावना के अनुयोग में लगा हुआ। विपश्यना के क्षण में स्मृतिप्रस्थान आदि पर्याय (गौण रूप) से बोधिपाक्षिक कहलाते हैं, किन्तु मार्ग के क्षण में ही वे निष्पर्याय (मुख्य रूप) से बोधिपाक्षिक होते हैं। ආසවානං ඛයාති කාමාසවාදීනං සබ්බෙසං ආසවානං ඛයා. ආසවෙසු හි ඛීණෙසු සබ්බෙ කිලෙසා ඛීණායෙව හොන්ති. තෙන අරහත්තමග්ගො වුත්තො හොති. අනාසවන්ති ආසවවිරහිතං. චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තින්ති එත්ථ චෙතොවචනෙන අරහත්තඵලසමාධි, පඤ්ඤාවචනෙන තංසම්පයුත්තා ච පඤ්ඤා වුත්තා. තත්ථ සමාධි රාගතො විමුත්තත්තා චෙතොවිමුත්ති, පඤ්ඤා අවිජ්ජාය විමුත්තත්තා පඤ්ඤාවිමුත්තීති වෙදිතබ්බා. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – 'आस्रवों के क्षय से' का अर्थ है—कामास्रव आदि सभी आस्रवों के क्षय से। आस्रवों के क्षीण होने पर सभी क्लेश क्षीण ही हो जाते हैं। इससे अर्हत्-मार्ग कहा गया है। 'अनास्रव' का अर्थ है—आस्रवों से रहित। 'चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति' यहाँ 'चेतो' शब्द से अर्हत्फल-समाधि और 'प्रज्ञा' शब्द से उससे सम्प्रयुक्त प्रज्ञा कही गई है। वहाँ समाधि राग से विमुक्त होने के कारण 'चेतोविमुक्ति' है, और प्रज्ञा अविद्या से विमुक्त होने के कारण 'प्रज्ञाविमुक्ति' है, ऐसा समझना चाहिए। भगवान ने कहा भी है— ‘‘යො හිස්ස, භික්ඛවෙ, සමාධි, තදස්ස සමාධින්ද්රියං. යා හිස්ස, භික්ඛවෙ, පඤ්ඤා, තදස්ස පඤ්ඤින්ද්රියං. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, රාගවිරාගා චෙතොවිමුත්ති, අවිජ්ජාවිරාගා පඤ්ඤාවිමුත්තී’’ති (සං. නි. 5.516). 'भिक्षुओं! जो इसकी समाधि है, वह इसकी समाधि-इन्द्रिय है। भिक्षुओं! जो इसकी प्रज्ञा है, वह इसकी प्रज्ञा-इन्द्रिय है। इस प्रकार भिक्षुओं! राग के विराग से चेतोविमुक्ति होती है, अविद्या के विराग से प्रज्ञाविमुक्ति होती है' (सं. नि. 5.516)। අපිචෙත්ථ සමථඵලං චෙතොවිමුත්ති, විපස්සනාඵලං පඤ්ඤාවිමුත්තීති වෙදිතබ්බා. දිට්ඨෙව ධම්මෙති ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ. සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වාති අත්තනායෙව අභිවිසිට්ඨාය පඤ්ඤාය පච්චක්ඛං කත්වා අපරප්පච්චයෙන ඤත්වා. උපසම්පජ්ජ විහරතීති පාපුණිත්වා සම්පාදෙත්වා විහරති. තමෙව සඞ්ගාමසීසං අභිවිජිය අජ්ඣාවසතීති මාරං අභිවිජිනිත්වා විජිතවිජයත්තා තෙන කතසඞ්ගාමසඞ්ඛාතස්ස අරියමග්ගස්ස සීසභූතං අරහත්තඵලසමාපත්තිඉස්සරියට්ඨානං, අභිභවන්තො ආවසති, සමාපජ්ජති ඉච්චෙව අත්ථො. ඉමෙ ච දෙවසද්දා දිට්ඨසච්චෙසු දෙවෙසු පවත්තන්ති, විසෙසතො සුද්ධාවාසදෙවෙසූති වෙදිතබ්බං. इसके अतिरिक्त, यहाँ शमथ का फल चेतोविमुक्ति है और विपश्यना का फल प्रज्ञाविमुक्ति है, ऐसा समझना चाहिए। 'इसी जन्म में' (दृष्टेव धम्मे) का अर्थ है—इसी आत्मभाव (जीवन) में। 'स्वयं अभिज्ञा से साक्षात्कार कर' का अर्थ है—स्वयं ही विशिष्ट प्रज्ञा के द्वारा प्रत्यक्ष करके, बिना किसी दूसरे की सहायता के जानकर। 'उपसम्पन्न होकर विहार करता है' का अर्थ है—प्राप्त कर, सिद्ध कर विहार करता है। 'उसी संग्राम के शीर्ष को जीतकर निवास करता है' का अर्थ है—मार को जीतकर, विजयी होने के कारण, उसके द्वारा किए गए संग्राम रूपी आर्यमार्ग के शिखर स्वरूप अर्हत्फल-समापत्ति के ऐश्वर्यपूर्ण स्थान को अभिभूत करते हुए (अधिकार में रखते हुए) निवास करता है, समापन्न होता है—यही अर्थ है। और ये देव-शब्द सत्य का दर्शन करने वाले (दृष्टसत्य) देवों में प्रवृत्त होते हैं, विशेष रूप से शुद्धावास देवों में, ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු මහන්තන්ති සීලාදිගුණමහත්තෙන මහන්තං. වීතසාරදන්ති සාරජ්ජකරානං කිලෙසානං අභාවෙන විගතසාරජ්ජං අපගතමඞ්කුභාවං. පුරිසාජඤ්ඤාති අස්සාදීසු අස්සාජානීයාදයො විය පුරිසෙසු ආජානීයභූතා [Pg.242] උත්තමපුරිසා. දුජ්ජයමජ්ඣභූති පචුරජනෙහි ජෙතුං අසක්කුණෙය්යං කිලෙසවාහිනිං අභිභවි අජ්ඣොත්ථරි. ‘‘අජ්ජයී’’තිපි පඨන්ති, අජිනීති අත්ථො. ජෙත්වාන මච්චුනො සෙනං, විමොක්ඛෙන අනාවරන්ති ලොකත්තයාභිබ්යාපනතො දියඩ්ඪසහස්සාදිවිභාගතො ච විපුලත්තා අඤ්ඤෙහි ආවරිතුං පටිසෙධෙතුං අසක්කුණෙය්යත්තා ච අනාවරං, මච්චුනො මාරස්ස සෙනං විමොක්ඛෙන අරියමග්ගෙන ජෙත්වා යො ත්වං දුජ්ජයං අජයි, තස්ස නමො, තෙ පුරිසාජඤ්ඤාති සම්බන්ධො. गाथाओं में 'महन्त' का अर्थ शील आदि गुणों की महानता के कारण महान है। 'वीतसारद' का अर्थ लज्जा उत्पन्न करने वाले क्लेशों के अभाव के कारण निर्भयता या संकोचहीनता है। 'पुरिसाजञ्ञा' का अर्थ पुरुषों में उत्तम, जैसे घोड़ों में आजानीय (उत्तम नस्ल के) घोड़े होते हैं। 'दुज्जयमज्झभू' (या 'अजयी') का अर्थ है जिसे सामान्य लोग नहीं जीत सकते, उस क्लेशों की सेना को अभिभूत कर लिया। 'मच्चुनो सेनं' (मृत्यु की सेना) को 'विमोक्खेन' (विमुक्ति/आर्यमार्ग) से जीतकर, जो 'अनावरं' (अनावरण/अप्रतिहत) है क्योंकि यह तीनों लोकों में व्याप्त है और दूसरों द्वारा रोका नहीं जा सकता, उस दुर्जेय सेना को जिसने जीत लिया, उस पुरुषश्रेष्ठ को नमस्कार है—यह संबंध है। ඉතීති වුත්තප්පකාරෙන. හි-ඉති නිපාතමත්තං. එතං පත්තමානසං අධිගතාරහත්තං ඛීණාසවං දෙවතා නමස්සන්තීති වුත්තමෙවත්ථං නිගමනවසෙන දස්සෙති. අථ වා ඉතීති ඉමිනා කාරණෙන. කිං පන එතං කාරණං? නමුචිසෙනාවිජයෙන පත්තමානසත්තං. ඉමිනා කාරණෙන තං දෙවතා නමස්සන්තීති අත්ථො. ඉදානි තං කාරණං ඵලතො දස්සෙතුං ‘‘තඤ්හි තස්ස න පස්සන්ති, යෙන මච්චුවසං වජෙ’’ති වුත්තං. තස්සත්ථො – යස්මා තස්ස පුරිසාජඤ්ඤස්ස පණිධාය ගවෙසන්තාපි දෙවා අණුමත්තම්පි තං කාරණං න පස්සන්ති, යෙන සො මච්චුනො මරණස්ස වසං වජෙ උපගච්ඡෙය්ය. තස්මා තං විසුද්ධිදෙවා නමස්සන්තීති. 'इति' का अर्थ उक्त प्रकार से है। 'हि' केवल एक निपात है। देवता उस अर्हत्व प्राप्त क्षीणास्त्र (क्षीण-आस्रव) को नमस्कार करते हैं, यह बात निष्कर्ष के रूप में दिखाई गई है। अथवा 'इति' का अर्थ 'इस कारण से' है। वह कारण क्या है? नमुचि (मार) की सेना पर विजय प्राप्त कर अर्हत्व प्राप्त करना। इस कारण से देवता उसे नमस्कार करते हैं। अब उस कारण को फल के रूप में दिखाने के लिए कहा गया है— 'तञ्हि तस्स न पस्सन्ति...'। इसका अर्थ है— क्योंकि वे देवता उस पुरुषश्रेष्ठ (पुरिसाजञ्ञ) में खोजते हुए भी वह सूक्ष्म कारण नहीं देखते, जिससे वह मृत्यु के वश में जाए। इसलिए विशुद्ध देवता उसे नमस्कार करते हैं। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 4. පඤ්චපුබ්බනිමිත්තසුත්තවණ්ණනා ४. पञ्चपुब्बनिमित्त (पाँच पूर्व-निमित्त) सूत्र की व्याख्या। 83. චතුත්ථෙ යදාති යස්මිං කාලෙ. දෙවොති උපපත්තිදෙවො. තයො හි දෙවා – සම්මුතිදෙවා, උපපත්තිදෙවා, විසුද්ධිදෙවාති. තෙසු සම්මුතිදෙවා නාම රාජානො ඛත්තියා. උපපත්තිදෙවා නාම චාතුමහාරාජිකතො පට්ඨාය තදුපරිදෙවා. විසුද්ධිදෙවා නාම ඛීණාසවා. ඉධ පන කාමාවචරදෙවො අධිප්පෙතො. තෙන වුත්තං ‘‘දෙවොති උපපත්තිදෙවො’’ති. දෙවකායාති දෙවසමූහතො, දෙවට්ඨානතො වා, දෙවලොකතොති අත්ථො. සමූහනිවාසවාචකො හි අයං කායසද්දො. චවනධම්මොති මරණධම්මො, ආයුක්ඛයෙන වා පුඤ්ඤක්ඛයෙන වා උපට්ඨිතමරණොති අත්ථො. ८३. चौथे (सूत्र) में 'यदा' का अर्थ है जिस समय। 'देवो' का अर्थ उपपत्ति-देव है। तीन प्रकार के देव होते हैं— सम्मति-देव, उपपत्ति-देव और विशुद्धि-देव। उनमें सम्मति-देव राजा और क्षत्रिय हैं। उपपत्ति-देव चातुमहाराजिक से लेकर ऊपर के देव हैं। विशुद्धि-देव क्षीणास्त्र (अर्हन्त) हैं। यहाँ कामावचर देव अभिप्रेत हैं। इसलिए कहा गया 'देवोति उपपत्तिदेवो'। 'देवकाया' का अर्थ देव-समूह से, देव-स्थान से या देवलोक से है। 'काय' शब्द समूह और निवास का वाचक है। 'चवनधम्मो' का अर्थ मृत्युधर्मा है, अर्थात् आयु के क्षय या पुण्य के क्षय से जिसकी मृत्यु उपस्थित हो गई हो। පඤ්චස්ස [Pg.243] පුබ්බනිමිත්තානි පාතුභවන්තීති අස්ස උපට්ඨිතමරණස්ස දෙවපුත්තස්ස පඤ්ච මරණස්ස පුබ්බනිමිත්තානි උප්පජ්ජන්ති, පකාසානි වා හොන්ති. මාලා මිලායන්තීති තෙන පිළන්ධිතමාලා මජ්ඣන්හිකසමයෙ ආතපෙ ඛිත්තා විය මිලාතා විහතසොභා හොන්ති. 'पञ्चस्स पुब्बनिमित्तानि पातुभवन्ति' का अर्थ है कि उस मृत्यु-सन्निकट देवपुत्र के लिए मृत्यु के पाँच पूर्व-निमित्त उत्पन्न होते हैं या प्रकट होते हैं। 'माला मिलायन्ति' का अर्थ है कि उसके द्वारा पहनी गई मालाएँ दोपहर की धूप में फेंकी गई मालाओं की तरह कुम्हला जाती हैं और उनकी शोभा नष्ट हो जाती है। වත්ථානි කිලිස්සන්තීති සරදසමයෙ විගතවලාහකෙ ආකාසෙ අබ්භුස්සක්කමානබාලසූරියසදිසප්පභානි නානාවිරාගවණ්ණානි තෙන නිවත්ථපාරුතවත්ථානි තං ඛණංයෙව කද්දමෙ ඛිපිත්වා මද්දිතානි විය විහතප්පභානි මලිනානි හොන්ති. 'वत्थानि किलिस्सन्ति' का अर्थ है कि शरद ऋतु के मेघ-रहित आकाश में उदय होते बाल-सूर्य के समान प्रभा वाले, अनेक रंगों के उसके द्वारा पहने और ओढ़े हुए वस्त्र उसी क्षण कीचड़ में फेंककर कुचले हुए वस्त्रों की तरह कान्तिहीन और मलिन हो जाते हैं। කච්ඡෙහි සෙදා මුච්චන්තීති සුපරිසුද්ධජාතිමණි විය සුසික්ඛිතසිප්පාචරියරචිතසුවණ්ණපටිමා විය ච පුබ්බෙ සෙදමලජල්ලිකාරහිතසරීරස්ස තස්මිං ඛණෙ උභොහි කච්ඡෙහි සෙදධාරා සන්දන්ති පග්ඝරන්ති. න කෙවලඤ්ච කච්ඡෙහියෙව, සකලසරීරතොපි පනස්ස සෙදජලකණ්ණිකා මුච්චතියෙව, යෙන ආමුත්තමුත්තාජාලගවච්ඡිතො විය තස්ස කායො හොති. 'कच्छेहि सेदा मुच्चन्ति' का अर्थ है कि जैसे अत्यंत शुद्ध जाति-मणि हो या किसी कुशल शिल्पी द्वारा बनाई गई स्वर्ण-प्रतिमा हो, वैसे ही पहले पसीने और मैल से रहित उसके शरीर की दोनों बगलों (कक्षाओं) से उस क्षण पसीने की धाराएँ बहने लगती हैं। न केवल बगलों से, बल्कि उसके पूरे शरीर से पसीने की बूंदें निकलती हैं, जिससे उसका शरीर मोतियों के जाल से ढका हुआ सा प्रतीत होता है। කායෙ දුබ්බණ්ණියං ඔක්කමතීති පුබ්බෙ පටිසන්ධිතො පට්ඨාය යථානුභාවං එකයොජනං ද්වියොජනං යාව ද්වාදසයොජනමත්තම්පි පදෙසං ආභාය ඵරිත්වා විජ්ජොතමානො කායො හොති ඛණ්ඩිච්චපාලිච්චාදිවිරහිතො, න සීතං න උණ්හං උපඝාතකං, දෙවධීතා සොළසවස්සුද්දෙසිකා විය හොති, දෙවපුත්තො වීසතිවස්සුද්දෙසිකො විය, තං ඛණංයෙව නිප්පභෙ නිත්තෙජෙ කායෙ විරූපභාවො අනුපවිසති සණ්ඨාති. 'काये दुब्बण्णियं ओक्कमति' का अर्थ है कि पहले प्रतिसन्धि से लेकर अपने प्रभाव के अनुसार एक योजन, दो योजन या बारह योजन तक के प्रदेश को आभा से भरकर प्रकाशित करने वाला, झुर्रियों और सफेद बालों से रहित, न अधिक ठंडा और न अधिक गर्म, जो देवपुत्री के लिए सोलह वर्ष और देवपुत्र के लिए बीस वर्ष की आयु जैसा प्रतीत होता था, वह शरीर उसी क्षण प्रभाहीन और निस्तेज होकर विरूपता (कुरुपता) को प्राप्त हो जाता है। සකෙ දෙවො දෙවාසනෙ නාභිරමතීති අත්තනො අච්ඡරාගණෙහි සද්ධිං කීළනපරිචරණකදිබ්බාසනෙ න රමති, න චිත්තස්සාදං ලභති. තස්ස කිර මනුස්සගණනාය සත්තහි දිවසෙහි මරණං භවිස්සතීති ඉමානි පුබ්බනිමිත්තානි පාතුභවන්ති. සො තෙසං උප්පත්තියා ‘‘එවරූපාය නාම සම්පත්තියා විනා භවිස්සාමී’’ති බලවසොකාභිභූතො හොති. තෙනස්ස කායෙ මහාපරිළාහො උප්පජ්ජති, තෙන සබ්බතො ගත්තෙහි සෙදා මුච්චන්ති. චිරතරං කාලං අපරිචිතදුක්ඛො තං අධිවාසෙතුං අසක්කොන්තො එකච්චො ‘‘දය්හාමි දය්හාමී’’ති කන්දන්තො පරිදෙවන්තො කත්ථචි අස්සාදං අලභන්තො විජප්පන්තො විලපන්තො තහිං තහිං ආහිණ්ඩති. එකච්චො සතිං උපට්ඨපෙත්වා [Pg.244] කායවාචාහි විකාරං අකරොන්තොපි පියවිප්පයොගදුක්ඛං අසහන්තො විහඤ්ඤමානො විචරති. 'सके देवो देवासने नाभिरमति' का अर्थ है कि वह अपनी अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करने और सेवा प्राप्त करने के दिव्य आसन पर रमण नहीं करता, उसे मानसिक संतोष नहीं मिलता। सुना जाता है कि मनुष्यों की गणना के अनुसार सात दिनों में उसकी मृत्यु होने वाली होती है, तब ये पूर्व-निमित्त प्रकट होते हैं। उनके उत्पन्न होने पर वह 'ऐसी संपत्ति से मैं अलग हो जाऊँगा' इस विचार से भारी शोक से अभिभूत हो जाता है। इस कारण उसके शरीर में भारी जलन (परिदाह) उत्पन्न होती है, जिससे उसके अंगों से पसीना निकलता है। लंबे समय तक दुःख से अपरिचित रहने के कारण उसे सहन न कर पाने वाला कोई देव 'मैं जल रहा हूँ, मैं जल रहा हूँ' चिल्लाता हुआ, विलाप करता हुआ इधर-उधर भटकता है। कोई स्मृति को उपस्थित कर काया और वाणी से विकार न दिखाते हुए भी प्रिय के वियोग के दुःख को न सह पाने के कारण पीड़ित होकर विचरता है। ඉමානි පන පුබ්බනිමිත්තානි යථා ලොකෙ මහාපුඤ්ඤානං රාජරාජමහාමත්තාදීනංයෙව උක්කාපාතභූමිචාලචන්දග්ගාහාදීනි නිමිත්තානි පඤ්ඤායන්ති, න සබ්බෙසං; එවමෙව මහෙසක්ඛදෙවානංයෙව පඤ්ඤායති. උප්පන්නානි ච තානි ‘‘ඉමානි මරණස්ස පුබ්බනිමිත්තානි නාමා’’ති කෙචි දෙවා ජානන්ති, න සබ්බෙ. තත්ථ යො මන්දෙන කුසලකම්මෙන නිබ්බත්තො, සො ‘‘ඉදානි කො ජානාති, ‘කුහිං නිබ්බත්තිස්සාමී’’’ති භායති. යො පන මහාපුඤ්ඤො, සො ‘‘බහුං මයා දානං දින්නං, සීලං රක්ඛිතං, පුඤ්ඤං උපචිතං, ඉතො චුතස්ස මෙ සුගතියෙව පාටිකඞ්ඛා’’ති න භායති න විකම්පති. එවං උපට්ඨිතපුබ්බනිමිත්තං පන තං ගහෙත්වා දෙවතා නන්දනවනං පවෙසෙන්ති සබ්බදෙවලොකෙසු නන්දනවනං අත්ථියෙව. ये पूर्व-निमित्त (मृत्यु के पूर्व संकेत) वैसे ही हैं जैसे लोक में महान पुण्यशाली राजाओं और राज-महामात्यों आदि के लिए उल्कापात, भूकंप, चंद्रग्रहण आदि निमित्त प्रकट होते हैं, सभी के लिए नहीं; इसी प्रकार ये केवल उच्च श्रेणी के देवताओं (महेसक्ख देवों) को ही दिखाई देते हैं। जब ये उत्पन्न होते हैं, तो कुछ देवता जानते हैं कि 'ये मृत्यु के पूर्व-निमित्त हैं', सभी नहीं। वहाँ जो मंद कुशल कर्मों से उत्पन्न हुआ है, वह डरता है कि 'अब कौन जानता है, मैं कहाँ उत्पन्न होऊँगा?'। परंतु जो महान पुण्यशाली है, वह नहीं डरता और न ही विचलित होता है, यह सोचकर कि 'मैंने बहुत दान दिया है, शील की रक्षा की है, पुण्य संचित किया है, यहाँ से च्युत होने पर मुझे सुगति ही प्राप्त होगी'। इस प्रकार उपस्थित पूर्व-निमित्तों को देखकर देवता उसे नंदनवन में ले जाते हैं; सभी देवलोकों में नंदनवन होता ही है। තීහි වාචාහි අනුමොදෙන්තීති ඉදානි වුච්චමානෙහි තීහි වචනෙහි අනුමොදෙන්ති, මොදං පමොදං උප්පාදෙන්ති, අස්සාසෙන්ති, අභිවදනවසෙන වා තංඛණානුරූපං පමොදං කරොන්ති. කෙචි පන ‘‘අනුමොදෙන්තී’’ති පදස්ස ‘‘ඔවදන්තී’’ති වදන්ති. ඉතොති දෙවලොකතො. භොති ආලපනං. සුගතින්ති සුන්දරගතිං, මනුස්සලොකං සන්ධාය වදන්ති. ගච්ඡාති පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන උපෙහි. 'तीन वचनों से अनुमोदना करते हैं' का अर्थ है कि अब कहे जाने वाले तीन वचनों से वे अनुमोदना करते हैं, हर्ष और प्रमोद उत्पन्न करते हैं, आश्वस्त करते हैं, या अभिवादन के रूप में उस क्षण के अनुरूप प्रसन्नता प्रकट करते हैं। कुछ लोग 'अनुमोदन्ति' पद का अर्थ 'उपदेश देते हैं' (ओवदन्ति) कहते हैं। 'इतो' का अर्थ देवलोक से है। 'भो' एक संबोधन है। 'सुगति' से तात्पर्य सुंदर गति अर्थात् मनुष्य लोक से है। 'गच्छ' का अर्थ प्रतिसंधि ग्रहण करने के माध्यम से प्राप्त करो (जाओ) है। එවං වුත්තෙති එවං තදා තෙහි දෙවෙහි තස්ස ‘‘ඉතො භො සුගතිං ගච්ඡා’’තිආදිනා වත්තබ්බවචනෙ භගවතා වුත්තෙ අඤ්ඤතරො නාමගොත්තෙන අපාකටො තස්සං පරිසායං නිසින්නො අනුසන්ධිකුසලො එකො භික්ඛු ‘‘එතෙ සුගතිආදයො භගවතා අවිසෙසතො වුත්තා අවිභූතා, හන්ද තෙ විභූතතරෙ කාරාපෙස්සාමී’’ති එතං ‘‘කිංනු ඛො, භන්තෙ’’තිආදිවචනං අවොච. සද්ධාදිගුණවිසෙසපටිලාභකාරණතො දෙවූපපත්තිහෙතුතො ච මනුස්සත්තං දෙවානං අභිසම්මතන්ති ආහ ‘‘මනුස්සත්තං ඛො භික්ඛු දෙවානං සුගතිගමනසඞ්ඛාත’’න්ති. ऐसा कहे जाने पर, अर्थात् जब उन देवताओं द्वारा उस (मरने वाले देव) से 'हे मित्र! यहाँ से सुगति को जाओ' आदि वचन कहे जाने की बात भगवान ने कही, तब उस सभा में बैठे हुए, नाम और गोत्र से अप्रकट, अनुसंधि (प्रसंग) कुशल एक भिक्षु ने यह सोचा कि 'भगवान ने इन सुगति आदि के विषय में सामान्य रूप से कहा है, स्पष्ट नहीं किया है, तो मैं उन्हें और अधिक स्पष्ट करवाऊँगा', और यह वचन कहा—'भन्ते! वह क्या है?' आदि। श्रद्धा आदि विशेष गुणों की प्राप्ति के कारण और देवत्व की उत्पत्ति का हेतु होने के कारण, मनुष्यत्व को देवताओं द्वारा प्रशंसित माना गया है, इसलिए कहा—'भिक्षु! देवताओं के लिए मनुष्यत्व ही सुगति-गमन माना गया है'। සුගතිගමනසඞ්ඛාතන්ති ‘‘සුගතිගමන’’න්ති සම්මා කථිතං, වණ්ණිතං ථොමිතන්ති අත්ථො. යං මනුස්සභූතොති එත්ථ යන්ති කිරියාපරාමසනං, තෙන පටිලභතීති එත්ථ පටිලභනකිරියා ආමසීයති, යො සද්ධාපටිලාභොති අත්ථො. මනුස්සභූතොති මනුස්සෙසු උප්පන්නො, මනුස්සභාවං වා [Pg.245] පත්තො. යස්මා දෙවලොකෙ උප්පන්නානං තථාගතස්ස ධම්මදෙසනා යෙභුය්යෙන දුල්ලභා සවනාය, න තථා මනුස්සානං, තස්මා වුත්තං ‘‘මනුස්සභූතො’’ති. තථාගතප්පවෙදිතෙ ධම්මවිනයෙති තථාගතෙන භගවතා දෙසිතෙ සික්ඛත්තයසඞ්ගහෙ සාසනෙ. තඤ්හි ධම්මතො අනපෙතත්තා ධම්මො ච, ආසයානුරූපං විනෙය්යානං විනයනතො විනයො චාති ධම්මවිනයො, උපනිස්සයසම්පත්තියා වා ධම්මතො අනපෙතත්තා ධම්මං අප්පරජක්ඛජාතිකං විනෙතීති ධම්මවිනයො. ධම්මෙනෙව වා විනයො, න දණ්ඩසත්ථෙහීති ධම්මවිනයො, ධම්මයුත්තො වා විනයොති ධම්මවිනයො, ධම්මාය වා සහ මග්ගඵලනිබ්බානාය විනයොති ධම්මවිනයො, මහාකරුණාසබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණාදිධම්මතො වා පවත්තො විනයොති ධම්මවිනයො. ධම්මො වා භගවා ධම්මභූතො ධම්මකායො ධම්මස්සාමී, තස්ස ධම්මස්ස විනයො, න තක්කියානන්ති ධම්මවිනයො, ධම්මෙ වා මග්ගඵලෙ නිප්ඵාදෙතබ්බවිසයභූතෙ වා පවත්තො විනයොති ධම්මවිනයොති වුච්චති. තස්මිං ධම්මවිනයෙ. 'सुगति-गमन-संखातं' का अर्थ है 'सुगति-गमन' के रूप में भली-भाँति कहा गया, वर्णित और प्रशंसित। 'यं मनुस्सभूतो' यहाँ 'यं' क्रिया का परामर्श है, जिससे 'प्रतिलभति' (प्राप्त करता है) इस क्रिया का संकेत मिलता है, जिसका अर्थ है 'जो श्रद्धा की प्राप्ति है'। 'मनुस्सभूतो' का अर्थ है मनुष्यों में उत्पन्न हुआ, या मनुष्य भाव को प्राप्त। चूँकि देवलोक में उत्पन्न होने वालों के लिए तथागत के धर्मोपदेश का श्रवण प्रायः दुर्लभ है, मनुष्यों के लिए वैसा नहीं है, इसलिए 'मनुष्य होकर' (मनुस्सभूतो) कहा गया है। 'तथागत-प्रवेदित धर्म-विनय में' अर्थात् तथागत भगवान द्वारा उपदिष्ट तीन शिक्षाओं के संग्रह रूपी शासन में। वह धर्म से विचलित न होने के कारण 'धर्म' है, और आशय के अनुरूप विनेय जनों (शिष्यों) को प्रशिक्षित करने के कारण 'विनय' है, इसलिए 'धर्म-विनय' है। अथवा उपनिसय (उपनिषय) संपत्ति के कारण धर्म से विचलित न होने वाले अल्प-रजस्क प्राणियों को प्रशिक्षित करने के कारण 'धर्म-विनय' है। अथवा धर्म के द्वारा ही विनय (अनुशासन) है, दंड या शस्त्रों से नहीं, इसलिए 'धर्म-विनय' है। अथवा धर्म से युक्त विनय 'धर्म-विनय' है। अथवा धर्म के लिए अर्थात् मार्ग, फल और निर्वाण के लिए विनय 'धर्म-विनय' है। अथवा महाकरुणा और सर्वज्ञता-ज्ञान आदि धर्मों से प्रवृत्त विनय 'धर्म-विनय' है। अथवा भगवान ही धर्म हैं, धर्मभूत हैं, धर्मकाय हैं, धर्मस्वामी हैं, उस धर्म का विनय है, तर्कशास्त्रियों का नहीं, इसलिए 'धर्म-विनय' है। अथवा धर्म में, या मार्ग-फल रूपी साध्य विषयों में प्रवृत्त विनय 'धर्म-विनय' कहलाता है। उस धर्म-विनय में। සද්ධං පටිලභතීති ‘‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො’’තිආදිනා සද්ධං උප්පාදෙති. සද්ධො හි ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ යථානුසිට්ඨං පටිපජ්ජමානො දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකපරමත්ථෙ ආරාධෙස්සති. සුලද්ධලාභසඞ්ඛාතන්ති එත්ථ යථා හිරඤ්ඤසුවණ්ණඛෙත්තවත්ථාදිලාභො සත්තානං උපභොගසුඛං ආවහති, ඛුප්පිපාසාදිදුක්ඛං පටිබාහති, ධනදාලිද්දියං වූපසමෙති, මුත්තාදිරතනපටිලාභහෙතු හොති, ලොකසන්තතිඤ්ච ආවහති; එවං ලොකියලොකුත්තරා සද්ධාපි යථාසම්භවං ලොකියලොකුත්තරං විපාකසුඛමාවහති, සද්ධාධුරෙන පටිපන්නානං ජාතිජරාදිදුක්ඛං පටිබාහති, ගුණදාලිද්දියං වූපසමෙති, සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගාදිරතනපටිලාභහෙතු හොති, ලොකසන්තතිඤ්ච ආවහති. වුත්තඤ්හෙතං – 'श्रद्धा प्राप्त करता है' का अर्थ है 'भगवान द्वारा धर्म स्वाख्यात है' आदि वचनों से श्रद्धा उत्पन्न करता है। इस धर्म-विनय में उपदेशानुसार प्रतिपत्ति (आचरण) करने वाला श्रद्धालु व्यक्ति इहलौकिक, पारलौकिक और परमार्थ (निर्वाण) को सिद्ध करेगा। 'सुलद्धलाभसंखातं' (सुलब्ध लाभ माना गया) यहाँ जैसे स्वर्ण, चाँदी, खेत, वास्तु आदि का लाभ प्राणियों के लिए उपभोग का सुख लाता है, भूख-प्यास आदि के दुख को रोकता है, धन की दरिद्रता को शांत करता है, मोती आदि रत्नों की प्राप्ति का हेतु होता है और लोक-परंपरा को आगे बढ़ाता है; वैसे ही लौकिक और लोकोत्तर श्रद्धा भी यथासंभव लौकिक और लोकोत्तर विपाक-सुख लाती है, श्रद्धा को प्रधान मानकर चलने वालों के लिए जाति-जरा आदि के दुख को रोकती है, गुणों की दरिद्रता को शांत करती है, स्मृति-संबोध्यंग आदि रत्नों की प्राप्ति का हेतु होती है और लोक-परंपरा (कल्याण) को लाती है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘සද්ධො සීලෙන සම්පන්නො, යසො භොගසමප්පිතො; යං යං පදෙසං භජති, තත්ථ තත්ථෙව පූජිතො’’ති. (ධ. ප. 303); 'जो श्रद्धालु है, शीलवान है, यश और भोग से संपन्न है; वह जिस-जिस प्रदेश में जाता है, वहाँ-वहाँ ही पूजित होता है'। එවං සද්ධාපටිලාභස්ස සුලද්ධලාභතා වෙදිතබ්බා. යස්මා පනායං සද්ධාපටිලාභො අනුගාමිකො අනඤ්ඤසාධාරණො සබ්බසම්පත්තිහෙතු, ලොකියස්ස ච හිරඤ්ඤසුවණ්ණාදිධනලාභස්ස කාරණං. සද්ධොයෙව හි දානාදීනි පුඤ්ඤානි කත්වා උළාරුළාරවිත්තූපකරණානි අධිගච්ඡති, තෙහි ච අත්තනො [Pg.246] පරෙසඤ්ච අත්ථමෙව සම්පාදෙති. අස්සද්ධස්ස පන තානි අනත්ථාවහානි හොන්ති, ඉධ චෙව සම්පරායෙ චාති, එවම්පි සද්ධාය සුලද්ධලාභතා වෙදිතබ්බා. තථා හි – इस प्रकार श्रद्धा की प्राप्ति को 'सुलब्ध लाभ' (अच्छी तरह प्राप्त लाभ) समझना चाहिए। चूँकि यह श्रद्धा की प्राप्ति साथ जाने वाली (अनुगामी), दूसरों के साथ साझा न होने वाली (असाधारण) और सभी संपत्तियों का हेतु है, और लौकिक स्वर्ण-चाँदी आदि धन के लाभ का भी कारण है। श्रद्धालु ही दान आदि पुण्य करके महान धन और उपकरण प्राप्त करता है, और उनसे अपना और दूसरों का अर्थ (भला) सिद्ध करता है। परंतु अश्रद्धालु के लिए वे (धन आदि) इस लोक और परलोक में अनर्थकारी होते हैं, इस प्रकार भी श्रद्धा को 'सुलब्ध लाभ' समझना चाहिए। जैसा कि— ‘‘සද්ධා බන්ධති පාථෙය්යං’’. (සං. නි. 1.79). 'श्रद्धा पाथेय (यात्रा का संबल) को बाँधती है'। ‘‘සද්ධා දුතියා පුරිසස්ස හොතී’’ති ච. (සං. නි. 1.36, 59). 'श्रद्धा पुरुष की साथी होती है'। ‘‘සද්ධීධ විත්තං පුරිසස්ස සෙට්ඨ’’න්ති ච. (සං. නි. 1.73; සු. නි. 184). 'इस लोक में श्रद्धा पुरुष का श्रेष्ठ धन है'। ‘‘සද්ධාහත්ථො මහානාගො’’ති ච. (අ. නි. 6.43; ථෙරගා. 694). ‘‘श्रद्धा रूपी हाथ वाला महान नाग (हाथी)’’ भी। (अं. नि. 6.43; थेरगाथा 694)। ‘‘සද්ධා බීජං තපො වුට්ඨී’’ති ච. (සං. නි. 1.197; සු. නි. 77). ‘‘श्रद्धा बीज है, तप वर्षा है’’ भी। (सं. नि. 1.197; सु. नि. 77)। ‘‘සද්ධෙසිකො, භික්ඛවෙ, අරියසාවකො’’ති (අ. නි. 7.67) ච. ‘‘भिक्षुओं, आर्य श्रावक श्रद्धा रूपी खम्भे वाला होता है’’ (अं. नि. 7.67) भी। ‘‘සද්ධාය තරති ඔඝ’’න්ති ච. (සං. නි. 1.246) – ‘‘श्रद्धा से ओघ (संसार सागर) को पार करता है’’ भी। (सं. नि. 1.246) – අනෙකෙසු ඨානෙසු අනෙකෙහි කාරණෙහි සද්ධා සංවණ්ණිතා. अनेक स्थानों पर अनेक कारणों से श्रद्धा की प्रशंसा की गई है। ඉදානි යාය සද්ධාය සාසනෙ කුසලධම්මෙසු සුප්පතිට්ඨිතො නාම හොති නියාමොක්කන්තියා, තං සද්ධං දස්සෙතුං ‘‘සා ඛො පනස්සා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ අස්සාති ඉමස්ස භවෙය්යාති අත්ථො. නිවිට්ඨාති අභිනිවිට්ඨා චිත්තසන්තානං අනුපවිට්ඨා. මූලජාතාති ජාතමූලා. කිං පන සද්ධාය මූලං නාම? සද්ධෙය්යවත්ථුස්මිං ඔකප්පනහෙතුභූතො උපායමනසිකාරො. අපිච සප්පුරිසසෙවනා සද්ධම්මස්සවනං යොනිසොමනසිකාරො ධම්මානුධම්මප්පටිපත්තීති චත්තාරි සොතාපත්තියඞ්ගානි මූලානි වෙදිතබ්බානි. පතිට්ඨිතාති අරියමග්ගාධිගමෙන කෙනචි අකම්පනීයභාවෙන අවට්ඨිතා. තෙනෙවාහ ‘‘දළ්හා අසංහාරියා’’ති. දළ්හාති ථිරා. අසංහාරියාති කෙනචි සංහරිතුං වා හාපෙතුං වා අපනෙතුං වා අසක්කුණෙය්යා. ඉති තෙ දෙවා තස්ස සොතාපත්තිමග්ගසමධිගමං ආසීසන්තා එවං වදන්ති. අත්තනො දෙවලොකෙ කාමසුඛූපභොගාරහමෙව හි අරියපුග්ගලං තෙ ඉච්ඡන්ති. තෙනාහ ‘‘එහි, දෙව, පුනප්පුන’’න්ති. अब जिस श्रद्धा के द्वारा शासन में कुशल धर्मों में सम्यक् रूप से प्रतिष्ठित होकर नियत मार्ग (नियाम) में प्रवेश होता है, उस श्रद्धा को दिखाने के लिए 'सा खो पनस्सा' आदि कहा गया है। वहाँ 'अस्स' का अर्थ 'इसका हो' (इमस्स भवेय्य) है। 'निविट्ठा' का अर्थ है चित्त-संतति में गहराई से प्रविष्ट। 'मूलजाता' का अर्थ है जिसकी जड़ें जम गई हों। श्रद्धा का मूल क्या है? श्रद्धा के योग्य वस्तुओं में विश्वास का हेतुभूत उपाय-मनसिकार। इसके अतिरिक्त, सत्पुरुष-सेवा, सद्धर्म-श्रवण, योनिसो-मनसिकार और धर्मानुधर्म-प्रतिपत्ति—इन चार स्रोतापत्ति के अंगों को मूल समझना चाहिए। 'पतिट्ठिता' का अर्थ है आर्यमार्ग की प्राप्ति से किसी के द्वारा भी न हिलाए जा सकने वाले भाव में स्थित। इसीलिए 'दळ्हा असंहारिया' कहा गया है। 'दळ्हा' का अर्थ है स्थिर। 'असंहारिया' का अर्थ है जिसे किसी के द्वारा हटाया या कम नहीं किया जा सके। इस प्रकार वे देव उसके स्रोतापत्ति-मार्ग की प्राप्ति की आशा करते हुए ऐसा कहते हैं। वे अपने देवलोक में काम-सुख के उपभोग के योग्य आर्य पुद्गल को ही चाहते हैं। इसीलिए कहा गया है— 'हे देव, बार-बार आओ'। ගාථාසු පුඤ්ඤක්ඛයමරණම්පි ජීවිතින්ද්රියුපච්ඡෙදෙනෙව හොතීති ආහ ‘‘චවති ආයුසඞ්ඛයා’’ති. අනුමොදතන්ති අනුමොදන්තානං. මනුස්සානං සහබ්යතන්ති [Pg.247] මනුස්සෙහි සහභාවං. සහ බ්යෙතීති සහබ්යො, සහපවත්තනකො, තස්ස භාවො සහබ්යතා. නිවිට්ඨස්සාති නිවිට්ඨා භවෙය්ය. යාවජීවන්ති යාව ජීවිතප්පවත්තියා, යාව පරිනිබ්බානාති අත්ථො. गाथाओं में पुण्य के क्षय से होने वाली मृत्यु भी जीवितिन्द्रिय के उच्छेद से ही होती है, इसलिए 'चवति आयुसंखया' (आयु के क्षय से च्युत होता है) कहा गया है। 'अनुमोदतं' का अर्थ है अनुमोदन करने वालों का। 'मनुस्सानं सहब्यतं' का अर्थ है मनुष्यों के साथ सह-भाव। 'सहब्यो' का अर्थ है साथ रहने वाला, उसका भाव 'सहब्यता' है। 'निविट्ठस्स' का अर्थ है 'निविष्ट हो'। 'यावजीवं' का अर्थ है जब तक जीवन की प्रवृत्ति है, अर्थात् परिनिर्वाण तक। අප්පමාණන්ති සක්කච්චං බහුං උළාරං බහුක්ඛත්තුඤ්ච කරණවසෙන පමාණරහිතං. නිරූපධින්ති කිලෙසූපධිරහිතං, සුවිසුද්ධං නිම්මලන්ති අත්ථො. යස්මා පන තෙ දෙවා මහග්ගතකුසලං න ඉච්ඡන්ති කාමලොකසමතික්කමනතො, කාමාවචරපුඤ්ඤමෙව ඉච්ඡන්ති, තස්මා එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො – ‘‘ඉතො දෙවලොකතො චුතො මනුස්සෙසු උප්පජ්ජිත්වා විඤ්ඤුතං පත්තො කායදුච්චරිතාදිං සබ්බං දුච්චරිතං පහාය කායසුචරිතාදිං සබ්බං සුචරිතං උළාරං විපුලං උපචිනිත්වා අරියමග්ගෙන ආගතසද්ධො භවාහී’’ති. යස්මා පන ලොකුත්තරෙසු පඨමමග්ගං දුතියමග්ගම්පි වා ඉච්ඡන්ති අත්තනො දෙවලොකූපපත්තියා අනතිවත්තනතො, තස්මා තෙසම්පි වසෙන ‘‘අප්පමාණං නිරූපධි’’න්තිපදානං අත්ථො වෙදිතබ්බො – පමාණකරානං දිට්ඨෙකට්ඨඔළාරිකකාමරාගාදිකිලෙසානං උපච්ඡෙදෙන අප්පමාණං, සත්තමභවතො වා උප්පජ්ජනාරහස්ස ඛන්ධූපධිස්ස තංනිබ්බත්තකඅභිසඞ්ඛාරූපධිස්ස තංතංමග්ගවජ්ඣකිලෙසූපධිස්ස ච පහානෙන තෙසං අනිබ්බත්තනතො නිරුපධිසඞ්ඛාතනිබ්බානසන්නිස්සිතත්තා ච නිරුපධීති. ‘अप्पमाणं’ का अर्थ है सत्कारपूर्वक, बहुत अधिक, उदार और बार-बार करने के कारण प्रमाण-रहित। ‘निरूपधिं’ का अर्थ है क्लेश-उपधि से रहित, अर्थात् सुविशुद्ध और निर्मल। चूँकि वे देव कामलोक के अतिक्रमण के कारण महग्गत कुशल की इच्छा नहीं करते, केवल कामावचर पुण्य की ही इच्छा करते हैं, इसलिए यहाँ इस प्रकार अर्थ समझना चाहिए— ‘इस देवलोक से च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न होकर, समझदार होने पर, काय-दुश्चरित आदि सभी दुश्चरितों को छोड़कर, काय-सुचरित आदि सभी उदार और विपुल सुचरितों का संचय कर, आर्यमार्ग से प्राप्त श्रद्धा वाले बनो’। चूँकि वे लोकोत्तर मार्गों में प्रथम मार्ग या द्वितीय मार्ग की भी इच्छा करते हैं क्योंकि वे उनके देवलोक में उत्पन्न होने में बाधक नहीं हैं, इसलिए उनके वश से भी ‘अप्पमाणं निरूपधिं’ पदों का अर्थ समझना चाहिए— सीमा उत्पन्न करने वाले दृष्टि-सम्बन्धी और ओदारिक काम-राग आदि क्लेशों के उच्छेद के कारण ‘अप्पमाण’ (अप्रमाण), तथा सातवें भव में उत्पन्न होने योग्य स्कन्ध-उपधि, उसे उत्पन्न करने वाले अभिसंस्कार-उपधि और उन-उन मार्गों द्वारा वध्य क्लेश-उपधि के प्रहाण से उनकी अनुत्पत्ति के कारण और ‘निरुपधि’ संज्ञक निर्वाण के आश्रित होने के कारण ‘निरुपधि’ है। එවං අච්චන්තමෙව අපායද්වාරපිධායකං කම්මං දස්සෙත්වා ඉදානි සග්ගසම්පත්තිනිබ්බත්තකකම්මං දස්සෙතුං ‘‘තතො ඔපධික’’න්තිආදි වුත්තං. තත්ථ ඔපධිකන්ති උපධිවෙපක්කං අත්තභාවසම්පත්තියා චෙව භොගසම්පත්තියා ච නිබ්බත්තකන්ති අත්ථො. උපධීති හි අත්තභාවො වුච්චති. යථාහ ‘‘සන්තෙකච්චානි පාපකානි කම්මසමාදානානි උපධිසම්පත්තිපටිබාහිතානි න විපච්චන්තී’’ති (විභ. 810). කාමගුණාපි. යථාහ ‘‘උපධීහි නරස්ස සොචනා’’ති (සං. නි. 1.12; සු. නි. 34). තත්රායං වචනත්ථො – උපධීයති එත්ථ සුඛදුක්ඛන්ති උපධි, අත්තභාවො කාමගුණා ච. උපධිකරණං සීලං එතස්ස, උපධිං වා අරහතීති ඔපධිකං, පුඤ්ඤං, තං බහුං උළාරං කත්වා. කථං? දානෙන. දානඤ්හි ඉතරෙහි සුකරන්ති එවං වුත්තං. දානෙනාති වා පදෙන අභයදානම්පි වුත්තං, න ආමිසදානමෙවාති සීලස්සාපි සඞ්ගහො දට්ඨබ්බො. යස්මා පන තෙ දෙවා අසුරකායහානිං එකන්තෙනෙව දෙවකායපාරිපූරිඤ්ච ඉච්ඡන්ති, තස්මා තස්ස උපායං [Pg.248] දස්සෙන්තා ‘‘අඤ්ඤෙපි මච්චෙ සද්ධම්මෙ, බ්රහ්මචරියෙ නිවෙසයා’’ති ධම්මදානෙ නියොජෙන්ති. යදා විදූති යස්මිං කාලෙ දෙවා දෙවං චවන්තං විදූ විජානෙය්යුං, තදා ඉමාය යථාවුත්තාය අනුකම්පාය දුක්ඛාපනයනකම්යතාය ‘‘දෙව, ඉමෙ දෙවකායෙ පුනප්පුනං උප්පජ්ජනවසෙන එහි ආගච්ඡාහී’’ති ච අනුමොදෙන්තීති. इस प्रकार अपाय के द्वारों को अत्यंत रूप से बंद करने वाले कर्म को दिखाकर, अब स्वर्ग-सम्पत्ति को उत्पन्न करने वाले कर्म को दिखाने के लिए ‘ततो ओपधिकं’ आदि कहा गया है। वहाँ ‘ओपधिकं’ का अर्थ है उपधि-विपाक वाला, जो आत्मभाव-सम्पत्ति और भोग-सम्पत्ति को उत्पन्न करने वाला है। ‘उपधि’ आत्मभाव को कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है— ‘कुछ पापपूर्ण कर्म-समादान उपधि-सम्पत्ति से बाधित होने के कारण विपाक नहीं देते’। कामगुण भी उपधि हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘उपधियों के कारण मनुष्य का शोक होता है’। यहाँ यह शब्द-अर्थ है— जिसमें सुख-दुःख रखे जाते हैं वह ‘उपधि’ है, अर्थात् आत्मभाव और कामगुण। उपधि को करने वाला शील जिसका स्वभाव है, या जो उपधि के योग्य है, वह ‘ओपधिक’ पुण्य है, उसे बहुत और उदार करके। कैसे? दान के द्वारा। दान दूसरों की तुलना में सुकर (आसान) है, इसलिए ऐसा कहा गया है। ‘दानेन’ पद से अभयदान भी कहा गया है, केवल आमिष-दान ही नहीं, अतः इसमें शील का भी संग्रह समझना चाहिए। चूँकि वे देव असुर-निकाय की हानि और देव-निकाय की परिपूर्णता ही चाहते हैं, इसलिए उसका उपाय दिखाते हुए ‘अन्य मनुष्यों को भी सद्धर्म और ब्रह्मचर्य में निवेशित करो’—इस प्रकार धम्म-दान में नियोजित करते हैं। ‘यदा विदू’ का अर्थ है जिस समय देव किसी देव को च्युत होते हुए जानते हैं, तब इस यथोक्त अनुकम्पा से और दुःख दूर करने की इच्छा से ‘हे देव, इन देव-निकायों में बार-बार उत्पन्न होने के लिए आओ’—इस प्रकार अनुमोदन करते हैं। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. බහුජනහිතසුත්තවණ්ණනා ५. बहुजनहित सूत्र की व्याख्या 84. පඤ්චමෙ ලොකෙති එත්ථ තයො ලොකා – සත්තලොකො, සඞ්ඛාරලොකො, ඔකාසලොකොති. තෙසු ඉන්ද්රියබද්ධානං රූපධම්මානං අරූපධම්මානං රූපාරූපධම්මානඤ්ච සන්තානවසෙන වත්තමානානං සමූහො සත්තලොකො, පථවීපබ්බතාදිභෙදො ඔකාසලොකො, උභයෙපි ඛන්ධා සඞ්ඛාරලොකො. තෙසු සත්තලොකො ඉධ අධිප්පෙතො. තස්මා ලොකෙති සත්තලොකෙ. තත්ථාපි න දෙවලොකෙ, න බ්රහ්මලොකෙ, මනුස්සලොකෙ. මනුස්සලොකෙපි න අඤ්ඤස්මිං චක්කවාළෙ, ඉමස්මිංයෙව චක්කවාළෙ. තත්රාපි න සබ්බට්ඨානෙසු, ‘‘පුරත්ථිමාය දිසාය ගජඞ්ගලං නාම නිගමො, තස්ස අපරෙන මහාසාලා, තතො පරං පච්චන්තිමා ජනපදා, ඔරතො මජ්ඣෙ; පුරත්ථිමදක්ඛිණාය දිසාය සල්ලවතී නාම නදී, තතො පරං පච්චන්තිමා ජනපදා, ඔරතො මජ්ඣෙ; දක්ඛිණාය දිසාය සෙතකණ්ණිකං නාම නිගමො, තතො පරං පච්චන්තිමා ජනපදා, ඔරතො මජ්ඣෙ; පච්ඡිමාය දිසාය ථූණං නාම බ්රාහ්මණගාමො, තතො පරං පච්චන්තිමා ජනපදා, ඔරතො මජ්ඣෙ; උත්තරාය දිසාය උසිරද්ධජො නාම පබ්බතො, තතො පරං පච්චන්තිමා ජනපදා, ඔරතො මජ්ඣෙ’’ති (මහාව. 259) එවං පරිච්ඡින්නෙ ආයාමතො තියොජනසතෙ විත්ථාරතො අඩ්ඪතෙය්යයොජනසතෙ පරික්ඛෙපතො නවයොජනසතෙ මජ්ඣිමදෙසෙ උප්පජ්ජති තථාගතො. න කෙවලඤ්ච තථාගතොව පච්චෙකබුද්ධා අග්ගසාවකා අසීතිමහාථෙරා බුද්ධමාතා බුද්ධපිතා චක්කවත්තිරාජා අඤ්ඤෙ ච සාරප්පත්තා බ්රාහ්මණගහපතිකා එත්ථෙව උප්පජ්ජන්ති. ඉධ පන තථාගතවාරෙයෙව සබ්බත්ථකවසෙන අයං නයො ලබ්භති, ඉතරෙසු එකදෙසවසෙන. ८४. पाँचवें (सुत्त) में 'लोके' (लोक में) यहाँ तीन लोक हैं - सत्त्वलोक, संस्कारलोक और अवकाशलोक। उनमें इन्द्रियों से बद्ध रूप धर्मों, अरूप धर्मों और रूप-अरूप धर्मों के सन्तान रूप में विद्यमान समूह को 'सत्त्वलोक' कहते हैं; पृथ्वी, पर्वत आदि के भेद वाला 'अवकाशलोक' है; और दोनों ही स्कन्ध 'संस्कारलोक' हैं। यहाँ 'सत्त्वलोक' अभिप्रेत है। इसलिए 'लोके' का अर्थ सत्त्वलोक में है। वहाँ भी देवलोक में नहीं, ब्रह्मलोक में नहीं, (बल्कि) मनुष्यलोक में। मनुष्यलोक में भी अन्य चक्रवाल में नहीं, इसी चक्रवाल में। वहाँ भी सभी स्थानों पर नहीं, 'पूर्व दिशा में गंजगल नामक निगम है, उसके पश्चिम में महाशाला है, उसके आगे प्रत्यन्त (सीमावर्ती) जनपद हैं, इधर मध्य (देश) है; पूर्व-दक्षिण दिशा में सल्लवती नामक नदी है, उसके आगे प्रत्यन्त जनपद हैं, इधर मध्य है; दक्षिण दिशा में सेतकण्णिक नामक निगम है, उसके आगे प्रत्यन्त जनपद हैं, इधर मध्य है; पश्चिम दिशा में थूण नामक ब्राह्मण गाँव है, उसके आगे प्रत्यन्त जनपद हैं, इधर मध्य है; उत्तर दिशा में उसीरद्धज नामक पर्वत है, उसके आगे प्रत्यन्त जनपद हैं, इधर मध्य है' - इस प्रकार परिच्छिन्न (सीमित) लम्बाई में तीन सौ योजन, चौड़ाई में ढाई सौ योजन और परिधि में नौ सौ योजन वाले 'मध्यदेश' में तथागत उत्पन्न होते हैं। न केवल तथागत ही, बल्कि प्रत्येक बुद्ध, अग्रश्रावक, अस्सी महास्थविर, बुद्ध-माता, बुद्ध-पिता, चक्रवर्ती राजा और अन्य सार-प्राप्त (प्रतिष्ठित) ब्राह्मण एवं गृहपति यहीं उत्पन्न होते हैं। यहाँ तथागत के अधिकार में ही सर्वथा यह नियम प्राप्त होता है, दूसरों के विषय में एकदेश (आंशिक) रूप से। උප්පජ්ජමානා [Pg.249] උප්පජ්ජන්තීති ඉදං පන උභයම්පි විප්පකතවචනමෙව, උප්පජ්ජන්තා බහුජනහිතත්ථාය උප්පජ්ජන්ති, න අඤ්ඤෙන කාරණෙනාති එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. එවරූපඤ්හෙත්ථ සද්දලක්ඛණං න සක්කා අඤ්ඤෙන සද්දලක්ඛණෙන පටිබාහිතුං. 'उत्पन्न होते हुए उत्पन्न होते हैं' (उप्पज्जमाना उप्पज्जन्ति) - यह दोनों ही शब्द अपूर्ण क्रिया (विप्पकतवचन) के ही वाचक हैं। उत्पन्न होते हुए वे बहुजन के हित और सुख के लिए उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी कारण से नहीं - यहाँ ऐसा अर्थ समझना चाहिए। यहाँ इस प्रकार के शब्द-लक्षण को किसी अन्य शब्द-लक्षण से बाधित नहीं किया जा सकता। අපිච උප්පජ්ජමානො නාම උප්පජ්ජති නාම උප්පන්නො නාමාති අයං පභෙදො වෙදිතබ්බො. තථාගතො හි මහාභිනීහාරං කරොන්තො, බුද්ධකරෙ ධම්මෙ පරියෙසන්තො, පාරමියො පූරෙන්තො, පඤ්ච මහාපරිච්චාගෙ පරිච්චජන්තො, ඤාතත්ථචරියං චරන්තො, ලොකත්ථචරියං, බුද්ධත්ථචරියං කොටිං පාපෙන්තො, පාරමියො පූරෙත්වා තුසිතභවනෙ තිට්ඨන්තො, තතො ඔතරිත්වා චරිමභවෙ පටිසන්ධිං ගණ්හන්තො, අගාරමජ්ඣෙ වසන්තො, අභිනික්ඛමන්තො, මහාපධානං පදහන්තො, පරිපක්කඤාණො බොධිමණ්ඩං ආරුය්හ මාරබලං විධමෙන්තො පඨමයාමෙ පුබ්බෙනිවාසං අනුස්සරන්තො, මජ්ඣිමයාමෙ දිබ්බචක්ඛුං විසොධෙන්තො, පච්ඡිමයාමෙ පටිච්චසමුප්පාදෙ ඤාණං ඔතාරෙත්වා අනෙකාකාරං සබ්බසඞ්ඛාරෙ සම්මසිත්වා සොතාපත්තිමග්ගං පටිවිජ්ඣන්තො යාව අනාගාමිඵලං සච්ඡිකරොන්තොපි උප්පජ්ජමානො එව නාම, අරහත්තමග්ගක්ඛණෙ උප්පජ්ජති නාම, අරහත්තඵලක්ඛණෙ පන උප්පන්නො නාම. බුද්ධානඤ්හි සාවකානං විය න පටිපාටියා ඉද්ධිවිධඤාණාදීනං උප්පාදනකිච්චං අත්ථි, සහෙව පන අරහත්තමග්ගෙන සකලොපි බුද්ධගුණරාසි ආගතොව නාම හොති. තස්මා තෙ නිබ්බත්තසබ්බකිච්චත්තා අරහත්තඵලක්ඛණෙ උප්පන්නා නාම හොන්ති. ඉධ අරහත්තඵලක්ඛණං සන්ධාය ‘‘උප්පජ්ජතී’’ති වුත්තො. උප්පන්නො හොතීති අයඤ්හෙත්ථ අත්ථො. इसके अतिरिक्त 'उत्पन्न होता हुआ' (उप्पज्जमानो), 'उत्पन्न होता है' (उप्पज्जति) और 'उत्पन्न हो चुका' (उप्पन्नो) - यह भेद समझना चाहिए। तथागत जब महाभिनिहार (महान संकल्प) करते हैं, बुद्धत्व के लिए आवश्यक धर्मों की खोज करते हैं, पारमिताओं को पूर्ण करते हैं, पाँच महापरित्याग करते हैं, ज्ञातार्थचर्या, लोकार्थचर्या और बुद्धार्थचर्या को पराकाष्ठा तक पहुँचाते हैं, पारमिताओं को पूर्ण कर तुषित भवन में रहते हैं, वहाँ से उतरकर अन्तिम भव में प्रतिसन्धि ग्रहण करते हैं, घर के बीच रहते हैं, अभिनिष्क्रमण करते हैं, महाप्रधान (महान तप) करते हैं, परिपक्व ज्ञान वाले होकर बोधिमण्ड पर आरूढ़ हो मार-सेना का विध्वंस करते हैं, प्रथम याम में पूर्वनिवास का अनुस्मरण करते हैं, मध्यम याम में दिव्यचक्षु को विशुद्ध करते हैं, और पश्चिम याम में प्रतीत्यसमुत्पाद में ज्ञान उतारकर अनेक प्रकार से सभी संस्कारों का सम्मर्शन (चिन्तन) करते हुए स्रोतपत्ति मार्ग का वेधन करते हुए अनागामी फल का साक्षात्कार करने तक 'उत्पन्न होते हुए' (उप्पज्जमानो) ही कहलाते हैं। अर्हत् मार्ग के क्षण में 'उत्पन्न होते हैं' (उप्पज्जति) और अर्हत् फल के क्षण में 'उत्पन्न हो चुके' (उप्पन्नो) कहलाते हैं। बुद्धों के लिए श्रावकों की तरह ऋद्धिविध ज्ञान आदि को क्रम से उत्पन्न करने का कार्य नहीं होता, बल्कि अर्हत् मार्ग के साथ ही बुद्ध-गुणों की सम्पूर्ण राशि आ ही जाती है। इसलिए वे सभी कृत्यों को पूर्ण कर लेने के कारण अर्हत् फल के क्षण में 'उत्पन्न हो चुके' कहलाते हैं। यहाँ अर्हत् फल के क्षण को लक्ष्य कर 'उत्पन्न होते हैं' (उप्पज्जति) कहा गया है। 'उत्पन्न हो चुके होते हैं' - यहाँ यही अर्थ है। සාවකොපි ඛීණාසවො සාවකබොධියා හෙතුභූතෙ පුඤ්ඤසම්භාරෙ සම්භරන්තො පුබ්බයොගං පුබ්බචරියං ගතපච්චාගතවත්තං පූරෙන්තො චරිමභවෙ නිබ්බත්තන්තො අනුක්කමෙන විඤ්ඤුතං පත්වා සංසාරෙ ආදීනවං දිස්වා පබ්බජ්ජාය චෙතයමානො පබ්බජ්ජං මත්ථකං පාපෙත්වා සීලාදීනි පරිපූරෙන්තො ධුතධම්මෙ සමාදාය වත්තමානො ජාගරියං අනුයුඤ්ජන්තො ඤාණානි නිබ්බත්තෙන්තො විපස්සනං පට්ඨපෙත්වා හෙට්ඨිමමග්ගෙ අධිගච්ඡන්තොපි උප්පජ්ජමානො එව නාම, අරහත්තමග්ගක්ඛණෙ උප්පජ්ජති නාම, අරහත්තඵලක්ඛණෙ පන උප්පන්නො නාම. සෙක්ඛො පන පුබ්බූපනිස්සයතො පට්ඨාය යාව ගොත්රභුඤාණා උප්පජ්ජමානො නාම, පඨමමග්ගක්ඛණෙ උප්පජ්ජති නාම, පඨමඵලක්ඛණතො පට්ඨාය උප්පන්නො නාම. එත්තාවතා ‘‘තයොමෙ, භික්ඛවෙ, පුග්ගලා ලොකෙ උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජන්තී’’ති පදානං අත්ථො වුත්තො හොති. श्रावक क्षीणास्रव भी श्रावक-बोधि के हेतुभूत पुण्य-सम्भारों का संचय करते हुए, पूर्व-योग, पूर्व-चर्या और गत-प्रत्यागत व्रत को पूर्ण करते हुए, अन्तिम भव में उत्पन्न होकर क्रमशः विज्ञता (समझदारी) प्राप्त कर संसार में दोष देखकर प्रव्रज्या का विचार करते हुए, प्रव्रज्या को पराकाष्ठा पर पहुँचाकर शील आदि को परिपूर्ण करते हुए, धुत-धर्मों को स्वीकार कर आचरण करते हुए, जागरण (जागरिया) में लगे हुए, ज्ञानों को उत्पन्न करते हुए, विपश्यना आरम्भ कर निचले मार्गों को प्राप्त करते हुए भी 'उत्पन्न होते हुए' (उप्पज्जमानो) ही कहलाते हैं। अर्हत् मार्ग के क्षण में 'उत्पन्न होते हैं' (उप्पज्जति) और अर्हत् फल के क्षण में 'उत्पन्न हो चुके' (उप्पन्नो) कहलाते हैं। शैक्ष (सेक्ख) तो पूर्व उपनिश्रय से लेकर गोत्रभू ज्ञान तक 'उत्पन्न होते हुए' कहलाते हैं, प्रथम मार्ग के क्षण में 'उत्पन्न होते हैं' और प्रथम फल के क्षण से 'उत्पन्न हो चुके' कहलाते हैं। इतने से 'भिक्षुओं! ये तीन पुद्गल लोक में उत्पन्न होते हुए उत्पन्न होते हैं' - इन पदों का अर्थ कह दिया गया है। ඉදානි [Pg.250] බහුජනහිතායාතිආදීසු බහුජනහිතායාති මහාජනස්ස හිතත්ථාය. බහුජනසුඛායාති මහාජනස්ස සුඛත්ථාය. ලොකානුකම්පායාති සත්තලොකස්ස අනුකම්පං පටිච්ච. කතරසත්තලොකස්සාති? යො තථාගතස්ස ධම්මදෙසනං සුත්වා ධම්මං පටිවිජ්ඣති, අමතපානං පිවති, තස්ස. භගවතො හි ධම්මචක්කප්පවත්තනසුත්තන්තදෙසනාය අඤ්ඤාතකොණ්ඩඤ්ඤප්පමුඛා අට්ඨාරස බ්රහ්මකොටියො ධම්මං පටිවිජ්ඣිංසු. එවං යාව සුභද්දපරිබ්බාජකවිනයනා ධම්මං පටිවිද්ධසත්තානං ගණනා නත්ථි, මහාසමයසුත්තන්තදෙසනායං මඞ්ගලසුත්තං, චූළරාහුලොවාදං, සමචිත්තදෙසනායන්ති ඉමෙසු චතූසු ඨානෙසු අභිසමයං පත්තසත්තානං පරිච්ඡෙදො නත්ථි. එවමෙතස්ස අපරිමාණස්ස සත්තලොකස්ස අනුකම්පාය. සාවකස්ස පන අරහතො සෙක්ඛස්ස ච ලොකානුකම්පාය උප්පත්ති ධම්මසෙනාපතිආදීහි ධම්මභණ්ඩාගාරිකාදීහි ච දෙසිතදෙසනාය පටිවෙධප්පත්තසත්තානං වසෙන, අපරභාගෙ ච මහාමහින්දත්ථෙරාදීහි දෙසිතදෙසනාය පටිවිද්ධසච්චානං වසෙන, යාවජ්ජතනා ඉතො පරං අනාගතෙ ච සාසනං නිස්සාය සග්ගමොක්ඛමග්ගෙසු පතිට්ඨහන්තානං වසෙනපි අයමත්ථො විභාවෙතබ්බො. अब 'बहुजनहिताय' आदि में, 'बहुजनहिताय' का अर्थ है महाजनों (बहुसंख्यक लोगों) के हित के लिए। 'बहुजनसुखाय' का अर्थ है महाजनों के सुख के लिए। 'लोकानुकम्पाय' का अर्थ है प्राणी-लोक पर अनुकम्पा (दया) के कारण। किस प्राणी-लोक के लिए? जो तथागत के धर्मोपदेश को सुनकर धर्म का साक्षात्कार करता है, अमृत-पान करता है, उसके लिए। भगवान के धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त के उपदेश से आज्ञातकौण्डिन्य प्रमुख अठारह करोड़ ब्रह्माओं ने धर्म का साक्षात्कार किया। इसी प्रकार सुभद्र परिव्राजक के विनीत होने तक धर्म का साक्षात्कार करने वाले प्राणियों की कोई गणना नहीं है; महासमय सुत्त, मंगल सुत्त, चूलराहुलोवाद सुत्त और समचित्त उपदेश—इन चार स्थानों पर अभिसमय (ज्ञान) प्राप्त करने वाले प्राणियों की कोई सीमा नहीं है। इस प्रकार इस अपरिमित प्राणी-लोक की अनुकम्पा के लिए। किन्तु अर्हत् और शैक्ष श्रावक की लोकानुकम्पा के लिए उत्पत्ति, धर्मसेनापति (सारिपुत्र) आदि और धर्मभाण्डागारिक (आनन्द) आदि द्वारा दिए गए उपदेशों से धर्म-साक्षात्कार प्राप्त प्राणियों के माध्यम से, और बाद के समय में महामहिन्द स्थविर आदि द्वारा दिए गए उपदेशों से सत्यों का साक्षात्कार करने वालों के माध्यम से, और आज तक तथा इसके बाद भविष्य में भी शासन के आश्रय से स्वर्ग और मोक्ष के मार्गों में प्रतिष्ठित होने वालों के माध्यम से भी इस अर्थ को समझना चाहिए। අපිච බහුජනහිතායාති බහුජනස්ස හිතත්ථාය, නෙසං පඤ්ඤාසම්පත්තියා දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකහිතූපදෙසකොති. බහුජනසුඛායාති බහුජනස්ස සුඛත්ථාය, චාගසම්පත්තියා උපකරණසුඛසම්පදායකොති. ලොකානුකම්පායාති ලොකස්ස අනුකම්පනත්ථාය, මෙත්තාකරුණාසම්පත්තියා මාතාපිතරො විය ලොකස්ස රක්ඛිතා ගොපිතාති. අත්ථාය හිතාය සුඛාය දෙවමනුස්සානන්ති ඉධ දෙවමනුස්සග්ගහණෙන භබ්බපුග්ගලෙ වෙනෙය්යසත්තෙ එව ගහෙත්වා තෙසං නිබ්බානමග්ගඵලාධිගමාය තථාගතස්ස උප්පත්ති දස්සිතා පඨමවාරෙ, දුතියතතියවාරෙසු පන අරහතො සෙක්ඛස්ස ච වසෙන යොජෙතබ්බං. තත්ථ අත්ථායාති ඉමිනා පරමත්ථාය, නිබ්බානායාති වුත්තං හොති. හිතායාති තංසම්පාපකමග්ගත්ථායාති වුත්තං හොති. නිබ්බානසම්පාපකමග්ගතො හි උත්තරිං හිතං නාම නත්ථි. සුඛායාති ඵලසමාපත්තිසුඛත්ථායාති වුත්තං හොති, තතො උත්තරි සුඛාභාවතො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘අයං සමාධි පච්චුප්පන්නසුඛො චෙව ආයතිඤ්ච සුඛවිපාකො’’ති (දී. නි. 3.355; අ. නි. 5.27; විභ. 804). इसके अतिरिक्त, 'बहुजनहिताय' का अर्थ है बहुत से लोगों के हित के लिए, उनकी प्रज्ञा-सम्पत्ति के द्वारा दृष्टधार्मिक (इस लोक के) और साम्परायिक (परलोक के) हित का उपदेश देने वाला। 'बहुजनसुखाय' का अर्थ है बहुत से लोगों के सुख के लिए, त्याग-सम्पत्ति के द्वारा उपकरणों के सुख और समृद्धि को प्रदान करने वाला। 'लोकानुकम्पाय' का अर्थ है लोक पर अनुकम्पा करने के लिए, मैत्री और करुणा की सम्पत्ति के कारण माता-पिता के समान लोक का रक्षक और संरक्षक। 'देव-मनुष्यों के अर्थ, हित और सुख के लिए'—यहाँ 'देव-मनुष्य' के ग्रहण से भव्य पुद्गलों (पात्र व्यक्तियों) और विनेय सत्त्वों को ही लेकर, उनके निर्वाण मार्ग और फल की प्राप्ति के लिए तथागत की उत्पत्ति प्रथम बार में दिखाई गई है; किन्तु दूसरी और तीसरी बार में इसे अर्हत् और शैक्ष के सन्दर्भ में जोड़ना चाहिए। वहाँ 'अर्थाय' से परमार्थ (निर्वाण) के लिए कहा गया है। 'हिताय' से उस (निर्वाण) को प्राप्त कराने वाले मार्ग के लिए कहा गया है। क्योंकि निर्वाण प्राप्त कराने वाले मार्ग से बढ़कर अन्य कोई हित नहीं है। 'सुखाय' से फल-समापत्ति के सुख के लिए कहा गया है, क्योंकि उससे बढ़कर अन्य कोई सुख नहीं है। जैसा कि कहा गया है— "यह समाधि वर्तमान में सुखद है और भविष्य में सुखद विपाक वाली है।" තථාගතොතිආදීනං [Pg.251] පදානං අත්ථො හෙට්ඨා වුත්තො. විජ්ජාචරණසම්පන්නොතිආදීසු තිස්සොපි විජ්ජා භයභෙරවෙ (ම. නි. 1.34 ආදයො) ආගතනයෙන, ඡපි විජ්ජා ඡළභිඤ්ඤාවසෙන, අට්ඨපි විජ්ජා අම්බට්ඨසුත්තෙ ආගතාති විජ්ජාහි, සීලසංවරාදීහි, පන්නරසහි චරණධම්මෙහි ච, අනඤ්ඤසාධාරණෙහි සම්පන්නො සමන්නාගතොති විජ්ජාචරණසම්පන්නො. සොභනගමනත්තා, සුන්දරං ඨානං ගතත්තා, සම්මා ගතත්තා, සම්මා ගදත්තා ච සුගතො. සබ්බථා විදිතලොකත්තා ලොකවිදූ. නත්ථි එතස්ස උත්තරොති අනුත්තරො. පුරිසදම්මෙ පුරිසවෙනෙය්යෙ සාරෙති විනෙතීති පුරිසදම්මසාරථි. දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකපරමත්ථෙහි යථාරහං අනුසාසතීති සත්ථා. සබ්බස්සාපි නෙය්යස්ස සබ්බප්පකාරෙන සයම්භුඤාණෙන බුද්ධත්තා බුද්ධොති අයමෙත්ථ සඞ්ඛෙපො, විත්ථාරො පන විසුද්ධිමග්ගතො (විසුද්ධි. 1.132-133) ගහෙතබ්බො. 'तथागत' आदि पदों का अर्थ पहले बताया जा चुका है। 'विद्याचरणसम्पन्न' आदि में, भयभैरव सुत्त में आए तरीके से तीन विद्याएँ, छह अभिज्ञाओं के रूप में छह विद्याएँ, और अम्बट्ठ सुत्त में आई आठ विद्याएँ—इन विद्याओं से, तथा शील-संवर आदि पन्द्रह चरण-धर्मों से, जो दूसरों के लिए असाधारण हैं, युक्त होने के कारण 'विद्याचरणसम्पन्न' हैं। शोभन (सुन्दर) गमन के कारण, सुन्दर स्थान (निर्वाण) को प्राप्त होने के कारण, सम्यक् रूप से जाने के कारण और सम्यक् रूप से बोलने के कारण 'सुगत' हैं। सब प्रकार से लोक को जानने के कारण 'लोकविद्' हैं। इनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है, इसलिए 'अनुत्तर' हैं। दमन योग्य पुरुषों और विनेय पुरुषों को सन्मार्ग पर लाने और शिक्षित करने के कारण 'पुरुषदम्यसारथि' हैं। दृष्टधार्मिक, साम्परायिक और परमार्थ के विषयों में यथायोग्य अनुशासन (शिक्षा) देने के कारण 'शास्ता' हैं। समस्त ज्ञातव्य विषयों को सब प्रकार से स्वयंभू ज्ञान द्वारा जान लेने के कारण 'बुद्ध' हैं—यह यहाँ संक्षेप है, विस्तार तो विशुद्धिमार्ग से ग्रहण करना चाहिए। සො ධම්මං දෙසෙති ආදි…පෙ… පරියොසානකල්යාණන්ති සො භගවා සත්තෙසු කාරුඤ්ඤං පටිච්ච හිත්වාපි අනුත්තරං විවෙකසුඛං ධම්මං දෙසෙති. තඤ්ච ඛො අප්පං වා බහුං වා දෙසෙන්තො ආදිකල්යාණාදිප්පකාරමෙව දෙසෙති. කථං? එකගාථාපි හි සමන්තභද්දකත්තා ධම්මස්ස පඨමපාදෙන ආදිකල්යාණා, දුතියතතියෙහි මජ්ඣෙකල්යාණා, පච්ඡිමෙන පරියොසානකල්යාණා. එකානුසන්ධිකං සුත්තං නිදානෙන ආදිකල්යාණං, නිගමනෙන පරියොසානකල්යාණං, සෙසෙන මජ්ඣෙකල්යාණං. නානානුසන්ධිකං සුත්තං පඨමෙන අනුසන්ධිනා ආදිකල්යාණං, පච්ඡිමෙන පරියොසානකල්යාණං, සෙසෙහි මජ්ඣෙකල්යාණං. සකලොපි වා සාසනධම්මො අත්තනො අත්ථභූතෙන සීලෙන ආදිකල්යාණො, සමථවිපස්සනාමග්ගඵලෙහි මජ්ඣෙකල්යාණො, නිබ්බානෙන පරියොසානකල්යාණො. සීලසමාධීහි වා ආදිකල්යාණො, විපස්සනාමග්ගෙහි මජ්ඣෙකල්යාණො, ඵලනිබ්බානෙහි පරියොසානකල්යාණො. බුද්ධසුබුද්ධතාය වා ආදිකල්යාණො, ධම්මසුධම්මතාය මජ්ඣෙකල්යාණො, සඞ්ඝසුප්පටිපත්තියා පරියොසානකල්යාණො. තං සුත්වා තථත්තාය පටිපන්නෙන අධිගන්තබ්බාය අභිසම්බොධියා වා ආදිකල්යාණො, පච්චෙකබොධියා මජ්ඣෙකල්යාණො, සාවකබොධියා පරියොසානකල්යාණො. සුය්යමානො චෙස නීවරණවික්ඛම්භනතො සවනෙනපි කල්යාණමෙව ආවහතීති ආදිකල්යාණො, පටිපජ්ජියමානො සමථවිපස්සනාසුඛාවහනතො පටිපත්තියාපි [Pg.252] සුඛමෙව ආවහතීති මජ්ඣෙකල්යාණො, තථාපටිපන්නො ච පටිපත්තිඵලෙ නිට්ඨිතෙ තාදිභාවාවහනතො පටිපත්තිඵලෙනපි කල්යාණමෙව ආවහතීති පරියොසානකල්යාණො. නාථප්පභවත්තා ච පභවසුද්ධියා ආදිකල්යාණො, අත්ථසුද්ධියා මජ්ඣෙකල්යාණො, කිච්චසුද්ධියා පරියොසානකල්යාණො. තෙන වුත්තං ‘‘සො ධම්මං දෙසෙති ආදි…පෙ… පරියොසානකල්යාණ’’න්ති. वह धर्म का उपदेश देता है आदि...पे... अंत में कल्याणकारी है - वह भगवान प्राणियों पर करुणा के कारण, अनुत्तर विवेक-सुख को छोड़कर भी धर्म का उपदेश देते हैं। और वह थोड़ा या बहुत उपदेश देते हुए, आदि-कल्याण आदि प्रकार से ही उपदेश देते हैं। कैसे? क्योंकि एक गाथा भी, धर्म की सर्वतोभद्रता के कारण, प्रथम पाद से आदि-कल्याण, दूसरे और तीसरे से मध्य-कल्याण, और अंतिम से अंत-कल्याण होती है। एक अनुसन्धि वाला सूत्र निदान (प्रारंभ) से आदि-कल्याण, निगमन (उपसंहार) से अंत-कल्याण, और शेष से मध्य-कल्याण होता है। अनेक अनुसन्धि वाला सूत्र प्रथम अनुसन्धि से आदि-कल्याण, अंतिम अनुसन्धि से अंत-कल्याण, और शेष से मध्य-कल्याण होता है। अथवा संपूर्ण शासन-धर्म अपने अर्थभूत शील से आदि-कल्याण, शमथ-विपश्यना-मार्ग-फल से मध्य-कल्याण, और निर्वाण से अंत-कल्याण है। अथवा शील और समाधि से आदि-कल्याण, विपश्यना और मार्ग से मध्य-कल्याण, और फल तथा निर्वाण से अंत-कल्याण है। अथवा बुद्ध की सुबुद्धता से आदि-कल्याण, धर्म की सुधर्मता से मध्य-कल्याण, और संघ की सुप्रतिपत्ति से अंत-कल्याण है। उसे सुनकर उसी प्रकार प्रतिपन्न (आचरण करने वाले) द्वारा प्राप्त की जाने वाली अभिसंबोधि से आदि-कल्याण, प्रत्येकबोधि से मध्य-कल्याण, और श्रावकबोधि से अंत-कल्याण है। सुना जाता हुआ यह नीवरणों के विक्षेपण (दबाने) के कारण श्रवण से भी कल्याण ही लाता है, इसलिए आदि-कल्याण है; आचरण किया जाता हुआ शमथ और विपश्यना के सुख को लाने के कारण प्रतिपत्ति (अभ्यास) से भी सुख ही लाता है, इसलिए मध्य-कल्याण है; और उस प्रकार प्रतिपन्न व्यक्ति के लिए प्रतिपत्ति-फल के सिद्ध होने पर तादि-भाव (अचल स्थिति) लाने के कारण प्रतिपत्ति-फल से भी कल्याण ही लाता है, इसलिए अंत-कल्याण है। और नाथ (बुद्ध) से उत्पन्न होने के कारण उद्भव की शुद्धि से आदि-कल्याण, अर्थ की शुद्धि से मध्य-कल्याण, और कृत्य की शुद्धि से अंत-कल्याण है। इसीलिए कहा गया है— 'वह धर्म का उपदेश देता है आदि...पे... अंत में कल्याणकारी है'। යං පන භගවා ධම්මං දෙසෙන්තො සාසනබ්රහ්මචරියං මග්ගබ්රහ්මචරියඤ්ච පකාසෙති, නානානයෙහි දීපෙති, තං යථානුරූපං අත්ථසම්පත්තියා සාත්ථං, බ්යඤ්ජනසම්පත්තියා සබ්යඤ්ජනං. සඞ්කාසන, පකාසන, විවරණ, විභජන, උත්තානීකරණ පඤ්ඤත්තිඅත්ථපදසමායොගතො සාත්ථං, අක්ඛරපදබ්යඤ්ජනාකාරනිරුත්තිනිද්දෙසසම්පත්තියා සබ්යඤ්ජනං, අත්ථගම්භීරතාපටිවෙධගම්භීරතාහි වා සාත්ථං, ධම්මගම්භීරතාදෙසනාගම්භීරතාහි සබ්යඤ්ජනං. අත්ථපටිභානපටිසම්භිදාවිසයතො වා සාත්ථං, ධම්මනිරුත්තිපටිසම්භිදාවිසයතො සබ්යඤ්ජනං. පණ්ඩිතවෙදනීයතො පරික්ඛකජනප්පසාදකන්ති සාත්ථං, සද්ධෙය්යතො ලොකියජනප්පසාදකන්ති සබ්යඤ්ජනං. ගම්භීරාධිප්පායතො සාත්ථං, උත්තානපදතො සබ්යඤ්ජනං. උපනෙතබ්බස්ස අභාවතො සකලපරිපුණ්ණභාවෙන කෙවලපරිපුණ්ණං, අපනෙතබ්බස්ස අභාවතො නිද්දොසභාවෙන පරිසුද්ධං, අපිච පටිපත්තියා අධිගමබ්යත්තිතො සාත්ථං, පරියත්තියා ආගමබ්යත්තිතො සබ්යඤ්ජනං, සීලාදිපඤ්චධම්මක්ඛන්ධපාරිපූරියා පරිපුණ්ණං, නිරුපක්කිලෙසතො නිත්ථරණත්ථාය පවත්තිතො ලොකාමිසනිරපෙක්ඛතො ච පරිසුද්ධං, සික්ඛත්තයපරිග්ගහිතත්තා බ්රහ්මභූතෙහි සෙට්ඨෙහි චරිතබ්බතො තෙසං චරියභාවතො ච බ්රහ්මචරියං. තස්මා ‘‘සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං…පෙ… පකාසෙතී’’ති වුච්චති. පඨමොති ගණනානුපුබ්බතො සබ්බලොකුත්තමභාවතො ච පඨමො පුග්ගලො. भगवान धर्म का उपदेश देते हुए जिस शासन-ब्रह्मचर्य और मार्ग-ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं, अनेक नयों से स्पष्ट करते हैं, वह यथारूप अर्थ-संपत्ति के कारण 'सार्थ' (अर्थ सहित) है और व्यंजन-संपत्ति के कारण 'सब्यंजन' (व्यंजन सहित) है। संकासन (संकेत), प्रकाशन, विवरण, विभाजन, उत्तानीकरण और प्रज्ञप्ति-अर्थ-पद के संयोग से वह 'सार्थ' है; अक्षर, पद, व्यंजन, आकार, निरुक्ति और निर्देश की संपत्ति से वह 'सब्यंजन' है। अथवा अर्थ-गंभीरता और प्रतिवेध-गंभीरता के कारण 'सार्थ' है, और धर्म-गंभीरता तथा देशना-गंभीरता के कारण 'सब्यंजन' है। अथवा अर्थ और प्रतिभान प्रतिसंविदा के विषय से 'सार्थ' है, और धर्म तथा निरुक्ति प्रतिसंविदा के विषय से 'सब्यंजन' है। पंडितों द्वारा जानने योग्य होने से परीक्षकों को प्रसन्न करने वाला होने के कारण 'सार्थ' है, और श्रद्धा करने योग्य होने से लौकिक जनों को प्रसन्न करने वाला होने के कारण 'सब्यंजन' है। गंभीर अभिप्राय के कारण 'सार्थ' है, और स्पष्ट पदों के कारण 'सब्यंजन' है। कुछ भी जोड़ने योग्य न होने के कारण सकल परिपूर्ण भाव से 'केवल परिपूर्ण' है; कुछ भी घटाने योग्य न होने के कारण निर्दोष भाव से 'परिशुद्ध' है। इसके अतिरिक्त, प्रतिपत्ति (अभ्यास) से अधिगम (प्राप्ति) की स्पष्टता के कारण 'सार्थ' है, और पर्यप्ति (अध्ययन) से आगम की स्पष्टता के कारण 'सब्यंजन' है। शील आदि पाँच धर्म-स्कंधों की परिपूर्णता से 'परिपूर्ण' है; क्लेशरहित होने के कारण, (संसार से) पार उतरने के लिए प्रवृत्त होने के कारण और लौकिक आमिष (प्रलोभन) से निरपेक्ष होने के कारण 'परिशुद्ध' है। तीन शिक्षाओं (शील, समाधि, प्रज्ञा) से युक्त होने के कारण, ब्रह्मभूत श्रेष्ठ जनों द्वारा आचरण किए जाने के कारण और उनकी चर्या होने के कारण 'ब्रह्मचर्य' है। इसलिए 'सार्थ सब्यंजन...पे... प्रकाशित करते हैं' ऐसा कहा जाता है। 'प्रथम' का अर्थ है—गणना के क्रम से और समस्त लोक में उत्तम होने के कारण प्रथम पुद्गल। තස්සෙව සත්ථු සාවකොති තස්සෙව යථාවුත්තගුණස්ස සත්ථු සම්මාසම්බුද්ධස්ස ධම්මදෙසනාය සවනන්තෙ ජාතො ධම්මසෙනාපතිසදිසො සාවකො, න පූරණාදි විය පටිඤ්ඤාමත්තෙන සත්ථු සාවකො. පාටිපදොති පටිපදාසඞ්ඛාතෙන අරියමග්ගෙන අරියාය ජාතියා ජාතො භවොති පාටිපදො, අනිට්ඨිතපටිපත්තිකිච්චො පටිපජ්ජමානොති අත්ථො. සුත්තගෙය්යාදි පරියත්තිධම්මො බහුං සුතො එතෙනාති බහුස්සුතො. පාතිමොක්ඛසංවරාදිසීලෙන [Pg.253] චෙව ආරඤ්ඤිකඞ්ගාදිධුතඞ්ගවතෙහි ච උපපන්නො සම්පන්නො සමන්නාගතොති සීලවතූපපන්නො. ඉති භගවා ‘‘ලොකානුකම්පා නාම හිතජ්ඣාසයෙන ධම්මදෙසනා, සා ච ඉමෙසු එව තීසු පුග්ගලෙසු පටිබද්ධා’’ති දස්සෙති. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. उसी शास्ता का श्रावक—उसी यथोक्त गुणों वाले शास्ता सम्यक्सम्बुद्ध की धर्म-देशना सुनने के अंत में उत्पन्न हुआ, धर्मसेनापति (सारिपुत्र) के समान श्रावक है; न कि पूरण (कस्सप) आदि की तरह केवल प्रतिज्ञा मात्र से शास्ता का श्रावक। 'पाटिपद' (प्रतिपन्न)—प्रतिपदा संज्ञक आर्यमार्ग द्वारा आर्य जाति में उत्पन्न हुआ 'पाटिपद' है; जिसका अर्थ है—जिसका प्रतिपत्ति-कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है, ऐसा अभ्यास करने वाला। सुत्त, गेय्य आदि पर्यप्ति-धर्म इसके द्वारा बहुत सुना गया है, इसलिए 'बहुश्रुत' है। पातिमोक्ख-संवर आदि शील से और आरण्यक-अंग आदि धुतंग-व्रतों से युक्त, संपन्न और समन्वित होने के कारण 'शीलवत-उपपन्न' है। इस प्रकार भगवान यह दिखाते हैं कि 'लोक-अनुकम्पा हित की इच्छा से की गई धर्म-देशना है, और वह इन तीन पुद्गलों पर ही आधारित है'। शेष सुविज्ञ ही है। ගාථාසු තස්සන්වයොති තස්සෙව සත්ථු පටිපත්තියා ධම්මදෙසනාය ච අනුගමනෙන තස්සන්වයො අනුජාතො. අවිජ්ජන්ධකාරං විධමිත්වා සපරසන්තානෙසු ධම්මාලොකසඞ්ඛාතාය පභාය කරණතො පභඞ්කරා. ධම්මමුදීරයන්තාති චතුසච්චධම්මං කථෙන්තා. අපාපුරන්තීති උග්ඝාටෙන්ති. අමතස්ස නිබ්බානස්ස. ද්වාරං අරියමග්ගං. යොගාති කාමයොගාදිතො. සත්ථවාහෙනාති වෙනෙය්යසත්ථවාහනතො භවකන්තාරනිත්ථරණතො සත්ථවාහො, භගවා, තෙන සත්ථවාහෙන. සුදෙසිතං මග්ගමනුක්කමන්තීති තෙන සම්මා දෙසිතං අරියමග්ගං තස්ස දෙසනානුසාරෙන අනුගච්ඡන්ති පටිපජ්ජන්ති. ඉධෙවාති ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ. සෙසං උත්තානමෙව. गाथाओं में 'तदन्वय' (तस्सान्वयो)—उसी शास्ता की प्रतिपत्ति और धर्म-देशना के अनुगमन के कारण वह 'तदन्वय' (अनुजात) है। अविद्या रूपी अंधकार को नष्ट कर अपने और दूसरों के चित्त में धर्मालोक संज्ञक प्रभा (प्रकाश) उत्पन्न करने के कारण 'प्रभंकर' हैं। 'धम्ममुदीरयन्ता'—चार आर्य सत्यों के धर्म का कथन करते हुए। 'अपापुरन्ति'—खोलते हैं। 'अमतस्स'—निर्वाण का। 'द्वारं'—आर्य मार्ग। 'योगा'—काम-योग आदि से। 'सत्थवाहेन'—विनेय जनों का सार्थवाह होने के कारण और भव-कान्तार (संसार रूपी जंगल) से पार उतारने के कारण सार्थवाह भगवान हैं, उन सार्थवाह द्वारा। 'सुदेसितं मग्गमनुक्कमन्ति'—उनके द्वारा भली-भांति उपदिष्ट आर्य मार्ग का उनकी देशना के अनुसार अनुगमन करते हैं, आचरण करते हैं। 'इधेव'—इसी आत्मभाव (जीवन) में। शेष स्पष्ट ही है। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. අසුභානුපස්සීසුත්තවණ්ණනා ६. अशुभानुपश्यी सूत्र की व्याख्या 85. ඡට්ඨෙ අසුභානුපස්සීති අසුභං අනුපස්සන්තා ද්වත්තිංසාකාරවසෙන චෙව උද්ධුමාතකාදීසු ගහිතනිමිත්තස්ස උපසංහරණවසෙන ච කායස්මිං අසුභං අසුභාකාරං අනුපස්සකා හුත්වා විහරථ. ආනාපානස්සතීති ආනාපානෙ සති, තං ආරබ්භ පවත්තා සති, අස්සාසපස්සාසපරිග්ගාහිකා සතීති අත්ථො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘ආනන්ති අස්සාසො, නො පස්සාසො. පානන්ති පස්සාසො, නො අස්සාසො’’තිආදි (පටි. ම. 1.160). ८५. छठे (सुत्त) में 'अशुभानुपस्सी' का अर्थ है—अशुभ का अनुदर्शन करते हुए, बत्तीस प्रकारों (द्वत्तिंसाकार) के वश से और उद्धुमातक (फूला हुआ शव) आदि में ग्रहण किए गए निमित्त के उपसंहार के वश से, शरीर में अशुभ को अशुभ आकार में देखते हुए विहार करो। 'आनापानस्सति' का अर्थ है—आनापान (श्वास-प्रश्वास) में स्मृति, उसे आरम्भ कर प्रवृत्त हुई स्मृति, अर्थात् श्वास और प्रश्वास को ग्रहण करने वाली स्मृति। जैसा कि कहा गया है—"आन का अर्थ है श्वास (भीतर आती हवा), प्रश्वास नहीं। पान का अर्थ है प्रश्वास (बाहर जाती हवा), श्वास नहीं" इत्यादि। වොති තුම්හාකං. අජ්ඣත්තන්ති ඉධ ගොචරජ්ඣත්තං අධිප්පෙතං. පරිමුඛන්ති අභිමුඛං. සූපට්ඨිතාති සුට්ඨු උපට්ඨිතා. ඉදං වුත්තං හොති – ආනාපානස්සති ච තුම්හාකං කම්මට්ඨානාභිමුඛං සුට්ඨු උපට්ඨිතා හොතූති. අථ වා පරිමුඛන්ති පරිග්ගහිතනිය්යානං. වුත්තඤ්හෙතං පටිසම්භිදායං – ‘‘පරීති පරිග්ගහට්ඨො, මුඛන්ති නිය්යානට්ඨො[Pg.254], සතීති උපට්ඨානට්ඨො, තෙන වුච්චති පරිමුඛං සති’’න්ති (පටි. ම. 1.164). ඉමිනා චතුසතිපට්ඨානසොළසප්පභෙදා ආනාපානස්සතිකම්මට්ඨානභාවනා දස්සිතාති දට්ඨබ්බා. 'वो' (Vo) का अर्थ है 'तुम्हारा'। 'अज्झत्तं' (अध्यात्म) से यहाँ 'गोचर-अध्यात्म' अभिप्रेत है। 'परिमुखं' का अर्थ है 'सम्मुख'। 'सूपट्ठिता' का अर्थ है 'भली-भाँति उपस्थित'। यह कहा गया है—आनापानस्मृति तुम्हारे कर्मस्थान के सम्मुख भली-भाँति उपस्थित हो। अथवा 'परिमुखं' का अर्थ है 'परिगृहीत निर्याण' (मुक्ति का द्वार)। जैसा कि प्रतिसम्भिदामग्ग में कहा गया है—"परि का अर्थ है परिग्रह (चारों ओर से ग्रहण करना), मुख का अर्थ है निर्याण (निकलना/मुक्ति), स्मृति का अर्थ है उपस्थान (उपस्थित होना), इसलिए इसे 'परिमुखं सति' कहा जाता है।" इसके द्वारा चार स्मृतिप्रस्थानों और सोलह भेदों वाली आनापानस्मृति कर्मस्थान की भावना दिखाई गई है, ऐसा समझना चाहिए। එවං සඞ්ඛෙපෙනෙව රාගචරිතවිතක්කචරිතානං සප්පායං පටිකූලමනසිකාරකායානුපස්සනාවසෙන සමථකම්මට්ඨානං විපස්සනාකම්මට්ඨානඤ්ච උපදිසිත්වා ඉදානි සුද්ධවිපස්සනාකම්මට්ඨානමෙව දස්සෙන්තො ‘‘සබ්බසඞ්ඛාරෙසු අනිච්චානුපස්සිනො විහරථා’’ති ආහ. තත්ථ අනිච්චං, අනිච්චලක්ඛණං, අනිච්චානුපස්සනා, අනිච්චානුපස්සීති ඉදං චතුක්කං වෙදිතබ්බං. හුත්වා, අභාවතො, උදයබ්බයයොගතො, තාවකාලිකතො, නිච්චපටික්ඛෙපතො ච ඛන්ධපඤ්චකං අනිච්චං නාම. තස්ස යො හුත්වා අභාවාකාරො, තං අනිච්චලක්ඛණං නාම. තං ආරබ්භ පවත්තා විපස්සනා අනිච්චානුපස්සනා. තං අනිච්චන්ති විපස්සකො අනිච්චානුපස්සී. එත්ථ ච එකාදසවිධා අසුභකථා පඨමජ්ඣානං පාපෙත්වා, සොළසවත්ථුකා ච ආනාපානකථා චතුත්ථජ්ඣානං පාපෙත්වා, විපස්සනාකථා ච විත්ථාරතො වත්තබ්බා, සා පන සබ්බාකාරතො විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 2.737-740) කථිතාති තත්ථ වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බා. इस प्रकार संक्षेप में ही राग-चरित और वितर्क-चरित वालों के लिए अनुकूल प्रतिकूल-मनसिकार और कायानुपश्यना के वश से शमथ-कर्मस्थान और विपश्यना-कर्मस्थान का उपदेश देकर, अब शुद्ध विपश्यना-कर्मस्थान को ही दिखाते हुए "सभी संस्कारों में अनित्यानुपश्यी होकर विहार करो" ऐसा कहा। वहाँ अनित्य, अनित्य-लक्षण, अनित्यानुपश्यना और अनित्यानुपश्यी—इन चार को समझना चाहिए। होकर (उत्पन्न होकर) अभाव होने से, उदय-व्यय के योग से, तात्कालिक होने से और नित्य का प्रतिषेध होने से पाँचों स्कन्ध 'अनित्य' कहलाते हैं। उनका जो होकर अभाव होने का आकार है, वह 'अनित्य-लक्षण' कहलाता है। उसे आरम्भ कर प्रवृत्त हुई विपश्यना 'अनित्यानुपश्यना' है। उसे 'अनित्य' के रूप में देखने वाला विपश्यक 'अनित्यानुपश्यी' है। यहाँ ग्यारह प्रकार की अशुभ-कथा प्रथम ध्यान तक पहुँचाने वाली, सोलह वस्तुओं वाली आनापान-कथा चतुर्थ ध्यान तक पहुँचाने वाली और विपश्यना-कथा विस्तार से कहनी चाहिए, किन्तु वह सभी प्रकार से विशुद्धिमग्ग में कही गई है, अतः वहाँ बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। ඉදානි අසුභානුපස්සනාදීහි නිප්ඵාදෙතබ්බං ඵලවිසෙසං දස්සෙතුං ‘‘අසුභානුපස්සීන’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ සුභාය ධාතුයාති සුභභාවෙ, සුභනිමිත්තෙති අත්ථො. රාගානුසයොති සුභාරම්මණෙ උප්පජ්ජනාරහො කාමරාගානුසයො. සො කෙසාදීසු උද්ධුමාතකාදීසු වා අසුභානුපස්සීනං අසුභනිමිත්තං ගහෙත්වා තත්ථ පඨමජ්ඣානං නිබ්බත්තෙත්වා තං පාදකං කත්වා විපස්සනං පට්ඨපෙත්වා අධිගතෙන අනාගාමිමග්ගෙන පහීයති, සබ්බසො සමුච්ඡින්දීයතීති අත්ථො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘අසුභා භාවෙතබ්බා කාමරාගස්ස පහානායා’’ති (අ. නි. 9.3; උදා. 31). බාහිරාති බහිද්ධාවත්ථුකත්තා අනත්ථාවහත්තා ච බාහිරා බහිභූතා. විතක්කාසයාති කාමසඞ්කප්පාදිමිච්ඡාවිතක්කා. තෙ හි අප්පහීනා ආසයානුගතා සති පච්චයසමවායෙ උප්පජ්ජනතො විතක්කාසයාති වුත්තා. කාමවිතක්කො චෙත්ථ කාමරාගග්ගහණෙන ගහිතො එවාති තදවසෙසා විතක්කා එව වුත්තාති වෙදිතබ්බා. විඝාතපක්ඛිකාති දුක්ඛභාගියා, ඉච්ඡාවිඝාතනිබ්බත්තනකා වා. තෙ න හොන්තීති [Pg.255] තෙ පහීයන්ති. බ්යාපාදවිතක්කො, විහිංසාවිතක්කො, ඤාතිවිතක්කො, ජනපදවිතක්කො, අමරාවිතක්කො, අනවඤ්ඤත්තිපටිසංයුත්තො විතක්කො, ලාභසක්කාරසිලොකපටිසංයුත්තො විතක්කො, පරානුද්දයතාපටිසංයුත්තො විතක්කොති අට්ඨ, කාමවිතක්කෙන සද්ධිං නවවිධා මහාවිතක්කා ආනාපානස්සතිසමාධිනා තන්නිස්සිතාය ච විපස්සනාය පුබ්බභාගෙ වික්ඛම්භිතා. තං පාදකං කත්වා අධිගතෙන අරියමග්ගෙන යථාරහං අනවසෙසතො පහීයන්ති. වුත්තම්පි චෙතං ‘‘ආනාපානස්සති භාවෙතබ්බා විතක්කුපච්ඡෙදායා’’ති (අ. නි. 9.3; උදා. 31). अब अशुभानुपश्यना आदि के द्वारा निष्पन्न होने वाले फल-विशेष को दिखाने के लिए "अशुभानुपश्यी" इत्यादि कहा। वहाँ 'सुभाय धातुया' का अर्थ है—शुभ भाव में, शुभ निमित्त में। 'रागानुशय' का अर्थ है—शुभ आलम्बन में उत्पन्न होने योग्य कामराग-अनुशय। वह केश आदि में अथवा उद्धुमातक आदि में अशुभानुपश्यना करने वालों के द्वारा अशुभ निमित्त ग्रहण कर, वहाँ प्रथम ध्यान उत्पन्न कर, उसे पादक (आधार) बनाकर विपश्यना स्थापित कर, प्राप्त अनागामी मार्ग द्वारा प्रहीण (नष्ट) हो जाता है, पूर्णतः समूच्छिन्न हो जाता है—यह अर्थ है। जैसा कि कहा गया है—"कामराग के प्रहाण के लिए अशुभ की भावना करनी चाहिए।" 'बाहिरा' का अर्थ है—बाहरी वस्तुओं के कारण और अनर्थकारी होने के कारण बाहरी, बहिर्भूत। 'वितक्कासया' का अर्थ है—काम-संकल्प आदि मिथ्या वितर्क। वे प्रहीण न होने पर आशय में अनुगत रहते हुए प्रत्ययों के मिलने पर उत्पन्न होने के कारण 'वितक्कासय' कहे गए हैं। यहाँ काम-वितर्क तो काम-राग के ग्रहण से ही गृहीत है, अतः शेष वितर्क ही कहे गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। 'विघातपक्खिका' का अर्थ है—दुःख के भागी, अथवा इच्छा के विघात (विनाश) को उत्पन्न करने वाले। 'वे नहीं होते' का अर्थ है—वे प्रहीण हो जाते हैं। व्यापाद-वितर्क, विहिंसा-वितर्क, ज्ञाति-वितर्क, जनपद-वितर्क, अमर-वितर्क, अवज्ञा-प्रतिसंयुक्त वितर्क, लाभ-सत्कार-श्लोक-प्रतिसंयुक्त वितर्क, परानुदयता-प्रतिसंयुक्त वितर्क—ये आठ, और काम-वितर्क के साथ नौ प्रकार के महावितर्क आनापानस्मृति समाधि और उस पर आश्रित विपश्यना के पूर्व भाग में विक्खम्भित (दबा दिए) जाते हैं। उसे पादक बनाकर प्राप्त आर्यमार्ग द्वारा यथाशक्ति पूर्णतः प्रहीण हो जाते हैं। यह भी कहा गया है—"वितर्कों के उच्छेद के लिए आनापानस्मृति की भावना करनी चाहिए।" යා අවිජ්ජා, සා පහීයතීති යා සච්චසභාවපටිච්ඡාදිනී සබ්බානත්ථකාරී සකලස්ස වට්ටදුක්ඛස්ස මූලභූතා අවිජ්ජා, සා අනිච්චානුපස්සීනං විහරතං සමුච්ඡිජ්ජති. ඉදං කිර භගවතා අනිච්චාකාරතො වුට්ඨිතස්ස සුක්ඛවිපස්සකඛීණාසවස්ස වසෙන වුත්තං. තස්සායං සඞ්ඛෙපත්ථො – තෙභූමකෙසු සබ්බසඞ්ඛාරෙසු අනිච්චාදිතො සම්මසනං පට්ඨපෙත්වා විපස්සන්තානං යදා අනිච්චන්ති පවත්තමානා වුට්ඨානගාමිනීවිපස්සනා මග්ගෙන ඝටීයති, අනුක්කමෙන අරහත්තමග්ගො උප්පජ්ජති, තෙසං අනිච්චානුපස්සීනං විහරතං අවිජ්ජා අනවසෙසතො පහීයති, අරහත්තමග්ගවිජ්ජා උප්පජ්ජතීති. අනිච්චානුපස්සීනං විහරතන්ති ඉදං අනිච්චලක්ඛණස්ස තෙසං පාකටභාවතො ඉතරස්ස ලක්ඛණද්වයස්ස ගහණෙ උපායභාවතො වා වුත්තං, න පන එකස්සෙව ලක්ඛණස්ස අනුපස්සිතබ්බතො. වුත්තඤ්හෙතං ‘‘යදනිච්චං තං දුක්ඛං, යං දුක්ඛං තදනත්තා’’ති (සං. නි. 3.15). අපරම්පි වුත්තං ‘‘අනිච්චසඤ්ඤිනො හි, මෙඝිය, අනත්තසඤ්ඤා සණ්ඨාති, අනත්තසඤ්ඤී අස්මිමානසමුග්ඝාතං පාපුණාතී’’ති. "जो अविद्या है, वह प्रहीण हो जाती है" का अर्थ है—जो सत्य के स्वभाव को ढकने वाली, सभी अनर्थों को करने वाली, समस्त संसार-दुःख की मूलभूत अविद्या है, वह अनित्यानुपश्यी होकर विहार करने वालों की समूच्छिन्न हो जाती है। यह भगवान द्वारा अनित्य-आकार से उठे हुए शुद्ध-विपश्यक क्षीणास्त्रव (अर्हत्) के वश से कहा गया है। इसका संक्षिप्त अर्थ यह है—तीनों भूमियों के सभी संस्कारों में अनित्य आदि के रूप में सम्मर्शन (परीक्षण) स्थापित कर विपश्यना करने वालों की जब 'अनित्य' के रूप में प्रवृत्त होती हुई वुत्थानगामिनी-विपश्यना मार्ग से जुड़ती है, तब अनुक्रम से अर्हत्-मार्ग उत्पन्न होता है, उन अनित्यानुपश्यी होकर विहार करने वालों की अविद्या पूर्णतः प्रहीण हो जाती है और अर्हत्-मार्ग की विद्या उत्पन्न होती है। "अनित्यानुपश्यी होकर विहार करने वालों" यह अनित्य-लक्षण के उनके लिए प्रकट होने के कारण अथवा अन्य दो लक्षणों (दुःख और अनात्म) के ग्रहण में उपाय होने के कारण कहा गया है, न कि केवल एक ही लक्षण का अनुदर्शन करने के लिए। जैसा कि कहा गया है—"जो अनित्य है वह दुःख है, जो दुःख है वह अनात्म है।" अन्यत्र भी कहा गया है—"हे मेघिय! अनित्य-संज्ञा वाले की अनात्म-संज्ञा प्रतिष्ठित होती है, अनात्म-संज्ञा वाला 'अस्मि-मान' के समूद्घात (विनाश) को प्राप्त होता है।" ගාථාසු ආනාපානෙ පටිස්සතොති ආනාපානනිමිත්තස්මිං පටි පටි සතො, උපට්ඨිතස්සතීති අත්ථො. පස්සන්ති ආසවක්ඛයඤාණචක්ඛුනා සඞ්ඛාරූපසමං නිබ්බානං පස්සන්තො. ආතාපී සබ්බදාති අන්තරාවොසානං අනාපජ්ජිත්වා අසුභානුපස්සනාදීසු සතතං ආතාපී යුත්තප්පයුත්තො, තතො එව යතො වායමමානො, නියතො වා සම්මත්තනියාමෙන තත්ථ සබ්බසඞ්ඛාරසමථෙ නිබ්බානෙ අරහත්තඵලවිමුත්තියා විමුච්චති. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथाओं में 'आनापान में स्मृतिमान' (ānāpāne paṭissato) का अर्थ है आनापान के निमित्त में बार-बार स्मृतिमान होना, उपस्थित स्मृति वाला होना। 'देखता है' (passanti) का अर्थ है आस्रव-क्षय करने वाले ज्ञान-चक्षु से संस्कारों के उपशम रूप निर्वाण को देखते हुए। 'सदा आतापी' (ātāpī sabbadā) का अर्थ है बीच में रुके बिना अशुभानुपश्यना आदि में निरंतर आतापी (उद्यमी) और प्रयत्नशील रहना; उसी कारण से प्रयत्न करते हुए, सम्यक्त्व-नियम (सम्मत-नियाम) द्वारा उस समस्त संस्कारों के उपशम रूप निर्वाण में अर्हत्फल-विमुक्ति से विमुक्त होता है। शेष पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र का वर्णन समाप्त हुआ। 7. ධම්මානුධම්මපටිපන්නසුත්තවණ්ණනා ७. धर्मानुधर्मप्रतिपन्न सूत्र का वर्णन। 86. සත්තමෙ [Pg.256] ධම්මානුධම්මපටිපන්නස්සාති එත්ථ ධම්මො නාම නවවිධො ලොකුත්තරධම්මො, තස්ස ධම්මස්ස අනුධම්මො සීලවිසුද්ධිආදි පුබ්බභාගපටිපදාධම්මො, තං ධම්මානුධම්මං පටිපන්නස්ස අධිගන්තුං පටිපජ්ජමානස්ස. අයමනුධම්මො හොතීති අයං අනුච්ඡවිකසභාවො පතිරූපසභාවො හොති. වෙය්යාකරණායාති කථනාය. ධම්මානුධම්මපටිපන්නොයන්ති යන්ති කරණත්ථෙ පච්චත්තවචනං. ඉදං වුත්තං හොති – යෙන අනුධම්මෙන තං ධම්මානුධම්මං පටිපන්නොති බ්යාකරමානො සම්මදෙව බ්යාකරොන්තො නාම සියා, න තතොනිදානං විඤ්ඤූහි ගරහිතබ්බො සියාති. යන්ති වා කිරියාපරාමසනං, තෙනෙතං දස්සෙති ‘‘යදිදං ධම්මස්සෙව භාසනං, ධම්මවිතක්කස්සෙව ච විතක්කනං තදුභයාභාවෙ ඤාණුපෙක්ඛාය, අයං ධම්මානුධම්මපටිපන්නස්ස භික්ඛුනො තථාරූපො අයන්ති කථනායානුරූපහෙතු අනුච්ඡවිකකාරණං. භාසමානො ධම්මංයෙව භාසෙය්යාති කථෙන්තො චෙ දසකථාවත්ථුධම්මංයෙව කථෙය්ය, න තප්පටිපක්ඛමහිච්ඡතාදිඅධම්මං. වුත්තඤ්හෙතං – ८६. सातवें (सूत्र) में 'धर्मानुधर्मप्रतिपन्न' (dhammānudhammapaṭipannassa) यहाँ 'धर्म' नाम नौ प्रकार के लोकोत्तर धर्म का है, उस धर्म का 'अनुधर्म' शील-विशुद्धि आदि पूर्वभाग की प्रतिपदा (मार्ग) रूप धर्म है, उस धर्मानुधर्म के प्रतिपन्न (अभ्यासी) के लिए, उसे प्राप्त करने के लिए प्रतिपन्न (प्रयत्नशील) के लिए। 'यह अनुधर्म होता है' (ayamanudhammo hoti) का अर्थ है यह अनुरूप स्वभाव वाला, प्रतिरूप स्वभाव वाला होता है। 'व्याकरण के लिए' (veyyākaraṇāya) का अर्थ है कहने के लिए। 'यह धर्मानुधर्मप्रतिपन्न है' (dhammānudhammapaṭipannoyaṃ) यहाँ 'यम्' (yaṃ) करण अर्थ में प्रथमा विभक्ति है। यह कहा गया है - जिस अनुधर्म के कारण वह 'धर्मानुधर्मप्रतिपन्न' है, ऐसा कहते हुए वह सम्यक् रूप से ही व्याख्या करने वाला होगा, और उस कारण से विद्वानों द्वारा निन्दनीय नहीं होगा। अथवा 'यम्' क्रिया का परामर्श है, उससे यह दिखाता है - 'जो यह धर्म का ही भाषण है, और धर्म-वितर्क का ही वितर्क करना है, उन दोनों के अभाव में ज्ञान-उपेक्षा के द्वारा, यह धर्मानुधर्मप्रतिपन्न भिक्षु का वैसा रूप है' - यह कहने के लिए अनुरूप हेतु और उचित कारण है। 'बोलते हुए धर्म को ही बोले' (bhāsamāno dhammaṃyeva bhāseyya) का अर्थ है यदि वह कहे तो दस कथावस्तु रूप धर्म को ही कहे, उसके विपरीत महाइच्छता (अत्यधिक इच्छा) आदि अधर्म को नहीं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘යායං කථා අභිසල්ලෙඛිකා චෙතොවිවරණසප්පායා එකන්තනිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය උපසමාය අභිඤ්ඤාය සම්බොධාය නිබ්බානාය සංවත්තති. සෙය්යථිදං – අප්පිච්ඡකථා, සන්තුට්ඨිකථා, පවිවෙකකථා, අසංසග්ගකථා, වීරියාරම්භකථා, සීලකථා, සමාධිකථා, පඤ්ඤාකථා, විමුත්තිකථා, විමුත්තිඤාණදස්සනකථා, එවරූපාය කථාය නිකාමලාභී හොති අකිච්ඡලාභී අකසිරලාභී’’ති (අ. නි. 9.3; උදා. 31). "जो यह कथा अभिलेखिक (अत्यधिक संलेख करने वाली), चित्त के आवरणों को खोलने में सहायक, एकांत निर्वेद के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए, उपशम के लिए, अभिज्ञा के लिए, संबोधि के लिए और निर्वाण के लिए संवर्तित होती है। जैसे कि - अल्पेच्छता की कथा, संतुष्टि की कथा, प्रविवेक (एकांत) की कथा, असंसर्ग (मेल-जोल न रखने) की कथा, वीर्यारम्भ (पुरुषार्थ) की कथा, शील की कथा, समाधि की कथा, प्रज्ञा की कथा, विमुक्ति की कथा, विमुक्ति-ज्ञानदर्शन की कथा; इस प्रकार की कथा का वह यथेष्ट लाभ पाने वाला, बिना कठिनाई के लाभ पाने वाला, बिना कष्ट के लाभ पाने वाला होता है।" (अं. नि. 9.3; उदा. 31)। අභිසල්ලෙඛිකාය කථාය ලාභී එව හි තං භාසෙය්ය. එතෙන කල්යාණමිත්තසම්පදා දස්සිතා. अभिलेखिक कथा का लाभ पाने वाला ही उसे कहे। इससे कल्याणमित्र-संपदा दिखाई गई है। ධම්මවිතක්කන්ති නෙක්ඛම්මවිතක්කාදිං ධම්මතො අනපෙතං විතක්කයතො ‘‘සීලාදිපටිපදං පරිපූරෙස්සාමී’’ති උපරූපරි උස්සාහො අභිවඩ්ඪිස්සති. සො පන විතක්කො සීලාදීනං අනුපකාරධම්මෙ වජ්ජෙත්වා උපකාරධම්මෙ අනුබ්රූහනවසෙන හානභාගියභාවං අපනෙත්වා ඨිතිභාගියභාවෙපි අට්ඨත්වා විසෙසභාගියතං නිබ්බෙධභාගියතඤ්ච පාපනවසෙන පවත්තියා අනෙකප්පභෙදො වෙදිතබ්බො. නො අධම්මවිතක්කන්ති කාමවිතක්කං නො විතක්කෙය්යාති [Pg.257] අත්ථො. තදුභයං වා පනාති යදෙතං පරෙසං අනුග්ගහණත්ථං ධම්මභාසනං අත්තනො අනුග්ගහණත්ථං ධම්මවිතක්කනඤ්ච වුත්තං. අථ වා පන තං උභයං අභිනිවජ්ජෙත්වා අප්පටිපජ්ජිත්වා අකත්වා. උපෙක්ඛකොති තථාපටිපත්තියං උදාසීනො සමථවිපස්සනාභාවනමෙව අනුබ්රූහන්තො විහරෙය්ය, සමථපටිපත්තියං උපෙක්ඛකො හුත්වා විපස්සනායමෙව කම්මං කරොන්තො විහරෙය්ය. විපස්සනම්පි උස්සුක්කාපෙත්වා තත්ථපි සඞ්ඛාරුපෙක්ඛාඤාණවසෙන උපෙක්ඛකො යාව විපස්සනාඤාණං මග්ගෙන ඝටීයති, තාව යථා තං තික්ඛං සූරං පසන්නං හුත්වා වහති, තථා විහරෙය්ය සතො සම්පජානොති. 'धर्म-वितर्क' (dhammavitakka) का अर्थ है नैष्क्रम्य-वितर्क आदि धर्म से विमुख न होने वाले वितर्क करते हुए "मैं शील आदि प्रतिपदा को पूर्ण करूँगा" - ऐसा उत्तरोत्तर उत्साह बढ़ेगा। वह वितर्क शील आदि के अनुपकारी धर्मों को त्यागकर उपकारी धर्मों की वृद्धि करने के द्वारा, हानि-भागी भाव को दूर कर, स्थिति-भागी भाव में भी न रुककर, विशेष-भागी और निर्वेध-भागी अवस्था को प्राप्त कराने की प्रवृत्ति के कारण अनेक प्रकार का समझना चाहिए। 'अधर्म-वितर्क नहीं' (no adhammavitakka) का अर्थ है काम-वितर्क का वितर्क न करे। 'अथवा वे दोनों' (tadubhayaṃ vā pana) का अर्थ है जो यह दूसरों के अनुग्रह के लिए धर्म-भाषण और अपने अनुग्रह के लिए धर्म-वितर्क कहा गया है। अथवा उन दोनों को छोड़कर, उनमें प्रवृत्त न होकर, उन्हें न करके। 'उपेक्षावान' (upekkhako) का अर्थ है वैसी प्रतिपत्ति में उदासीन होकर शमथ-विपश्यना भावना की ही वृद्धि करते हुए विहार करे; शमथ की प्रतिपत्ति में उपेक्षावान होकर विपश्यना में ही कर्म (अभ्यास) करते हुए विहार करे। विपश्यना में भी उत्साह बढ़ाकर वहाँ भी संस्कार-उपेक्षा ज्ञान के कारण उपेक्षावान होकर, जब तक विपश्यना-ज्ञान मार्ग से नहीं जुड़ जाता, तब तक जैसे वह तीक्ष्ण, शूर और प्रसन्न होकर वहन करता है, वैसे ही स्मृतिमान और संप्रजन्यवान होकर विहार करे। ගාථාසු සමථවිපස්සනාධම්මො ආරමිතබ්බට්ඨෙන ආරාමො එතස්සාති ධම්මාරාමො. තස්මිංයෙව ධම්මෙ රතොති ධම්මරතො. තස්සෙව ධම්මස්ස පුනප්පුනං විචින්තනතො ධම්මං අනුවිචින්තයං තං ධම්මං ආවජ්ජෙන්තො, මනසි කරොන්තොති අත්ථො. අනුස්සරන්ති තමෙව ධම්මං උපරූපරිභාවනාවසෙන අනුස්සරන්තො. අථ වා විමුත්තායතනසීසෙ ඨත්වා පරෙසං දෙසනාවසෙන සීලාදිධම්මො ආරමිතබ්බට්ඨෙන ආරාමො එතස්සාති ධම්මාරාමො. තථෙව තස්මිං ධම්මෙ රතො අභිරතොති ධම්මරතො. තෙසංයෙව සීලාදිධම්මානං ගතියො සමන්වෙසන්තො කාමවිතක්කාදීනං ඔකාසං අදත්වා නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පාදිධම්මංයෙව අනුවිචින්තනතො ධම්මං අනුවිචින්තයං. තදුභයං වා පන ඔළාරිකතො දහන්තො අජ්ඣුපෙක්ඛිත්වා සමථවිපස්සනාධම්මමෙව උපරූපරි භාවනාවසෙන අනුස්සරන්තො අනුබ්රූහනවසෙන පවත්තෙන්තො. සද්ධම්මාති සත්තතිංසප්පභෙදා බොධිපක්ඛියධම්මා නවවිධලොකුත්තරධම්මා ච න පරිහායති, න චිරස්සෙව තං අධිගච්ඡතීති අත්ථො. गाथाओं में शमथ-विपश्यना रूप धर्म रमण करने योग्य होने के कारण जिसका आराम (क्रीड़ास्थल) है, वह 'धर्माराम' है। उसी धर्म में जो रत है, वह 'धर्मरत' है। उसी धर्म का बार-बार चिंतन करने से 'धर्म का अनुचिंतन' (dhammaṃ anuvicintayaṃ) करते हुए, उस धर्म का आवर्जन (ध्यान) करते हुए, मनसिकार करते हुए - यह अर्थ है। 'अनुस्मरण करता है' (anussaraṃ) का अर्थ है उसी धर्म का उत्तरोत्तर भावना के द्वारा अनुस्मरण करते हुए। अथवा विमुक्ति-आयतन के शीर्ष पर स्थित होकर दूसरों को उपदेश देने के कारण शील आदि धर्म रमण करने योग्य होने से जिसका आराम है, वह 'धर्माराम' है। वैसे ही उस धर्म में रत, अभिरत होने से 'धर्मरत' है। उन्हीं शील आदि धर्मों की गतियों का अन्वेषण करते हुए, काम-वितर्क आदि को अवसर न देकर नैष्क्रम्य-संकल्प आदि धर्म का ही अनुचिंतन करने से 'धर्म का अनुचिंतन' करते हुए। अथवा उन दोनों को स्थूल मानकर उनकी उपेक्षा कर शमथ-विपश्यना धर्म का ही उत्तरोत्तर भावना के द्वारा अनुस्मरण करते हुए और उसकी वृद्धि करते हुए। 'सद्धर्म से' (saddhammā) का अर्थ है सैंतीस प्रकार के बोधिपाक्षिक धर्मों और नौ प्रकार के लोकोत्तर धर्मों से नहीं गिरता है, शीघ्र ही उन्हें प्राप्त कर लेता है - यह अर्थ है। ඉදානි තස්ස අනුස්සරණවිධිං දස්සෙන්තො ‘‘චරං වා’’තිආදිමාහ. තත්ථ චරං වාති භික්ඛාචාරවසෙන චඞ්කමනවසෙන ච චරන්තො වා. යදි වා තිට්ඨන්ති තිට්ඨන්තො වා නිසින්නො වා, උද වා සයන්ති සයන්තො වා. එවං චතූසුපි ඉරියාපථෙසු. අජ්ඣත්තං සමයං චිත්තන්ති යථාවුත්තෙ කම්මට්ඨානසඞ්ඛාතෙ ගොචරජ්ඣත්තෙ අත්තනො චිත්තං රාගාදිකිලෙසානං වූපසමනවසෙන පජහනවසෙන සමයං සමෙන්තො. සන්තිමෙවාධිගච්ඡතීති අච්චන්තසන්තිං නිබ්බානමෙව පාපුණාතීති. अब उसकी अनुस्मरण विधि को दिखाते हुए 'चरं वा' (चलते हुए) आदि कहा। वहाँ 'चरं वा' का अर्थ है भिक्षाटन के वश से या चंक्रमण के वश से चलते हुए। अथवा 'तिट्ठन्ति' का अर्थ है खड़े होते हुए, या बैठे हुए, अथवा 'सयन्ति' का अर्थ है सोते हुए। इस प्रकार चारों ही ईर्यापथों में। 'अज्झत्तं समयं चित्तं' का अर्थ है पूर्वोक्त कर्मस्थान संज्ञक गोचर-अध्यात्म में अपने चित्त को राग आदि क्लेशों के उपशमन और प्रहाण के वश से शान्त करते हुए। 'सन्तिमेवाधिगच्छति' का अर्थ है आत्यन्तिक शान्ति रूप निर्वाण को ही प्राप्त करता है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 8. අන්ධකරණසුත්තවණ්ණනා ८. अन्धकरण सुत्त की व्याख्या। 87. අට්ඨමෙ [Pg.258] අකුසලවිතක්කාති අකොසල්ලසම්භූතා විතක්කා. අන්ධකරණාතිආදීසු යස්ස සයං උප්පජ්ජන්ති, තං යථාභූතදස්සනනිවාරණෙන අන්ධං කරොන්තීති අන්ධකරණා. න පඤ්ඤාචක්ඛුං කරොන්තීති අචක්ඛුකරණා. අඤ්ඤාණං කරොන්තීති අඤ්ඤාණකරණා. පඤ්ඤානිරොධිකාති කම්මස්සකතාපඤ්ඤා, ඣානපඤ්ඤා, විපස්සනාපඤ්ඤාති ඉමා තිස්සො පඤ්ඤා අප්පවත්තිකරණෙන නිරොධෙන්තීති පඤ්ඤානිරොධිකා. අනිට්ඨඵලදායකත්තා දුක්ඛසඞ්ඛාතස්ස විඝාතස්ස පක්ඛෙ වත්තන්තීති විඝාතපක්ඛිකා. කිලෙසනිබ්බානං න සංවත්තයන්තීති අනිබ්බානසංවත්තනිකා. ८७. आठवें (सुत्त) में 'अकुसलवितक्का' का अर्थ है अकुशल से उत्पन्न वितर्क। 'अन्धकरणा' आदि में, जिसके स्वयं में उत्पन्न होते हैं, उसे यथार्थ दर्शन के निवारण द्वारा अन्धा कर देते हैं, इसलिए 'अन्धकरण' हैं। प्रज्ञा-चक्षु को उत्पन्न नहीं करते, इसलिए 'अचक्खुकरणा' हैं। अज्ञान उत्पन्न करते हैं, इसलिए 'अञ्ञाणकरणा' हैं। 'पञ्ञानिरोधिका' का अर्थ है—कर्मस्वकीयता प्रज्ञा, ध्यान प्रज्ञा और विपश्यना प्रज्ञा—इन तीनों प्रज्ञाओं को अप्रवृत्त (नष्ट) करने के कारण प्रज्ञा का निरोध करने वाले हैं। अनिष्ट फल देने वाले होने के कारण दुःख संज्ञक 'विघात' (विनाश) के पक्ष में रहने वाले होने से 'विघातपक्खिका' हैं। क्लेशों के निर्वाण (शमन) की ओर नहीं ले जाते, इसलिए 'अनिब्बानसंवत्तनिका' हैं। කාමවිතක්කොති කාමපටිසංයුත්තො විතක්කො. සො හි කිලෙසකාමසහිතො හුත්වා වත්ථුකාමෙසු පවත්තති. බ්යාපාදපටිසංයුත්තො විතක්කො බ්යාපාදවිතක්කො. විහිංසාපටිසංයුත්තො විතක්කො විහිංසාවිතක්කො. ඉමෙ ද්වෙ ච සත්තෙසුපි සඞ්ඛාරෙසුපි උප්පජ්ජන්ති. කාමවිතක්කො හි පියමනාපෙ සත්තෙ වා සඞ්ඛාරෙ වා විතක්කෙන්තස්ස උප්පජ්ජති, බ්යාපාදවිතක්කො අප්පියෙ අමනාපෙ සත්තෙ වා සඞ්ඛාරෙ වා කුජ්ඣිත්වා ඔලොකනකාලතො පට්ඨාය යාව නාසනා උප්පජ්ජති, විහිංසාවිතක්කො සඞ්ඛාරෙසු න උප්පජ්ජති, සඞ්ඛාරා දුක්ඛාපෙතබ්බා නාම නත්ථි, ‘‘ඉමෙ සත්තා හඤ්ඤන්තු වා බජ්ඣන්තු වා උච්ඡිජ්ජන්තු වා විනස්සන්තු වා මා වා අහෙසු’’න්ති චින්තනකාලෙ පන සත්තෙසු උප්පජ්ජති. 'कामवितक्को' का अर्थ है काम-प्रतिसंयुक्त वितर्क। वह क्लेश-काम से युक्त होकर वस्तु-कामों में प्रवृत्त होता है। व्यापाद (द्वेष) से प्रतिसंयुक्त वितर्क 'व्यापादवितर्क' है। विहिंसा (हिंसा) से प्रतिसंयुक्त वितर्क 'विहिंसावितर्क' है। ये दोनों सत्त्वों और संस्कारों (पदार्थों) दोनों में उत्पन्न होते हैं। कामवितर्क प्रिय और मनभावन सत्त्वों या संस्कारों के बारे में वितर्क करने वाले को उत्पन्न होता है; व्यापादवितर्क अप्रिय और अमनोज्ञ सत्त्वों या संस्कारों पर क्रोधित होकर देखने के समय से लेकर उनके विनाश तक उत्पन्न होता है; विहिंसावितर्क संस्कारों में उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि संस्कार दुःख पहुँचाने योग्य नहीं होते, परन्तु "ये सत्त्व मारे जाएँ, बाँधे जाएँ, उच्छेद किए जाएँ, नष्ट हो जाएँ या न रहें"—ऐसा सोचने के समय सत्त्वों के प्रति उत्पन्न होता है। ඉමෙයෙව පන කාමසඞ්කප්පාදයො. අත්ථතො හි කාමවිතක්කාදීනං කාමසඞ්කප්පාදීනඤ්ච නානාකරණං නත්ථි, තංසම්පයුත්තා පන සඤ්ඤාදයො කාමසඤ්ඤාදයො. කාමධාතුආදීනං පන යස්මා පාළියං – ये ही काम-संकल्प आदि हैं। अर्थ की दृष्टि से काम-वितर्क आदि और काम-संकल्प आदि में कोई भेद नहीं है, परन्तु उनसे सम्प्रयुक्त संज्ञा आदि 'काम-संज्ञा' आदि हैं। काम-धातु आदि के विषय में चूँकि पालि में— ‘‘කාමපටිසංයුත්තො තක්කො විතක්කො…පෙ… මිච්ඡාසඞ්කප්පො, අයං වුච්චති කාමධාතු, සබ්බෙපි අකුසලා ධම්මා කාමධාතු. බ්යාපාදපටිසංයුත්තො තක්කො විතක්කො…පෙ… මිච්ඡාසඞ්කප්පො, අයං වුච්චති බ්යාපාදධාතු. දසසු ආඝාතවත්ථූසු චිත්තස්ස ආඝාතො පටිඝාතො…පෙ… අනත්තමනතා චිත්තස්ස, අයං වුච්චති බ්යාපාදධාතු. විහිංසාපටිසංයුත්තො තක්කො විතක්කො මිච්ඡාසඞ්කප්පො[Pg.259], අයං වුච්චති විහිංසාධාතු. ඉධෙකච්චො පාණිනා වා ලෙඩ්ඩුනා වා දණ්ඩෙන වා සත්ථෙන වා රජ්ජුයා වා අඤ්ඤතරඤ්ඤතරෙන සත්තෙ විහෙඨෙති, අයං විහිංසාධාතූ’’ති (විභ. 182, 910) – "काम-प्रतिसंयुक्त तर्क, वितर्क... पे... मिथ्या संकल्प, यह काम-धातु कही जाती है, सभी अकुशल धर्म काम-धातु हैं। व्यापाद-प्रतिसंयुक्त तर्क, वितर्क... पे... मिथ्या संकल्प, यह व्यापाद-धातु कही जाती है। दस आघात-वस्तुओं में चित्त का आघात, प्रतिघात... पे... चित्त की अप्रसन्नता, यह व्यापाद-धातु कही जाती है। विहिंसा-प्रतिसंयुक्त तर्क, वितर्क, मिथ्या संकल्प, यह विहिंसा-धातु कही जाती है। यहाँ कोई हाथ से, ढेले से, डंडे से, शस्त्र से, रस्सी से या अन्य किसी साधन से सत्त्वों को प्रताड़ित करता है, यह विहिंसा-धातु है"— (विभङ्ग १८२, ९१०) — ආගතත්තා විසෙසො ලබ්භති. ऐसा आने के कारण विशेषता प्राप्त होती है। තත්ථ ද්වෙ කථා සබ්බසඞ්ගාහිකා ච අසම්භින්නා ච. තත්ථ කාමධාතුයා ගහිතාය ඉතරා ද්වෙපි ගහිතා නාම හොන්ති. තතො පන නීහරිත්වා අයං බ්යාපාදධාතු, අයං විහිංසාධාතූති දස්සෙතීති අයං සබ්බසඞ්ගාහිකා නාම. කාමධාතුං කථෙන්තො පන භගවා බ්යාපාදධාතුං බ්යාපාදධාතුට්ඨානෙ, විහිංසාධාතුං විහිංසාධාතුට්ඨානෙ ඨපෙත්වාව අවසෙසං කාමධාතු නාමාති කථෙසීති අයං අසම්භින්නකථා නාම. वहाँ दो प्रकार की कथा (व्याख्या) है—सर्वसंग्राहिका और असंभिन्ना। वहाँ काम-धातु के ग्रहण करने पर शेष दो भी ग्रहण कर ली गई मानी जाती हैं। उसके बाद उनमें से निकालकर "यह व्यापाद-धातु है, यह विहिंसा-धातु है"—ऐसा जो दिखाया जाता है, वह 'सर्वसंग्राहिका' कहलाती है। काम-धातु को कहते हुए भगवान ने व्यापाद-धातु को व्यापाद-धातु के स्थान पर और विहिंसा-धातु को विहिंसा-धातु के स्थान पर रखकर शेष को 'काम-धातु' नाम से कहा, यह 'असंभिन्ना कथा' कहलाती है। සුක්කපක්ඛෙ වුත්තවිපරියායෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. නෙක්ඛම්මපටිසංයුත්තො විතක්කො නෙක්ඛම්මවිතක්කො. සො අසුභපුබ්බභාගෙ කාමාවචරො හොති, අසුභජ්ඣානෙ රූපාවචරො, තං ඣානං පාදකං කත්වා උප්පන්නමග්ගඵලකාලෙ ලොකුත්තරො. අබ්යාපාදපටිසංයුත්තො විතක්කො අබ්යාපාදවිතක්කො. සො මෙත්තාපුබ්බභාගෙ කාමාවචරො හොති, මෙත්තාඣානෙ රූපාවචරො, තං ඣානං පාදකං කත්වා උප්පන්නමග්ගඵලකාලෙ ලොකුත්තරො. අවිහිංසාපටිසංයුත්තො විතක්කො අවිහිංසාවිතක්කො. සො කරුණාපුබ්බභාගෙ කාමාවචරො, කරුණාජ්ඣානෙ රූපාවචරො, තං ඣානං පාදකං කත්වා උප්පන්නමග්ගඵලකාලෙ ලොකුත්තරො. යදා පන අලොභො සීසං හොති, තදා ඉතරෙ ද්වෙ තදන්වායිකා හොන්ති. යදා මෙත්තා සීසං හොති, තදා ඉතරෙ ද්වෙ තදන්වායිකා හොන්ති. යදා කරුණා සීසං හොති, තදා ඉතරෙ ද්වෙ තදන්වායිකා හොන්ති. शुक्ल पक्ष (कुशल पक्ष) में कहे गए के विपरीत अर्थ समझना चाहिए। नैष्क्रम्य (त्याग) से प्रतिसंयुक्त वितर्क 'नेक्खम्मवितक्को' है। वह अशुभ (भावना) के पूर्वभाग में कामावचर होता है, अशुभ-ध्यान में रूपावचर, और उस ध्यान को पादक (आधार) बनाकर उत्पन्न मार्ग-फल के समय लोकोत्तर होता है। अव्यापाद (अद्वेष) से प्रतिसंयुक्त वितर्क 'अब्यापादवितक्को' है। वह मैत्री के पूर्वभाग में कामावचर होता है, मैत्री-ध्यान में रूपावचर, और उस ध्यान को पादक बनाकर उत्पन्न मार्ग-फल के समय लोकोत्तर होता है। अविहिंसा (अहिंसा) से प्रतिसंयुक्त वितर्क 'अविहिंसावितक्को' है। वह करुणा के पूर्वभाग में कामावचर, करुणा-ध्यान में रूपावचर, और उस ध्यान को पादक बनाकर उत्पन्न मार्ग-फल के समय लोकोत्तर होता है। जब अलोभ मुख्य होता है, तब शेष दो उसके अनुगामी होते हैं। जब मैत्री मुख्य होती है, तब शेष दो उसके अनुगामी होते हैं। जब करुणा मुख्य होती है, तब शेष दो उसके अनुगामी होते हैं। ඉමෙයෙව පන නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පාදයො. අත්ථතො හි නෙක්ඛම්මවිතක්කාදීනං නෙක්ඛම්මසඞ්කප්පාදීනඤ්ච නානාකරණං නත්ථි, තංසම්පයුත්තා පන සඤ්ඤාදයො නෙක්ඛම්මසඤ්ඤාදයො. නෙක්ඛම්මධාතුආදීනං පන යස්මා පාළියං – ये ही नैष्क्रम्य-संकल्प आदि हैं। अर्थ की दृष्टि से नैष्क्रम्य-वितर्क आदि और नैष्क्रम्य-संकल्प आदि में कोई भेद नहीं है, परन्तु उनसे सम्प्रयुक्त संज्ञा आदि 'नेक्खम्मसञ्ञा' आदि हैं। नैष्क्रम्य-धातु आदि के विषय में चूँकि पालि में— ‘‘නෙක්ඛම්මපටිසංයුත්තො තක්කො විතක්කො සඞ්කප්පො, අයං වුච්චති නෙක්ඛම්මධාතු, සබ්බෙපි කුසලා ධම්මා නෙක්ඛම්මධාතු. අබ්යාපාදපටිසංයුත්තො තක්කො විතක්කො සඞ්කප්පො, අයං වුච්චති අබ්යාපාදධාතු. යා සත්තෙසු මෙත්ති මෙත්තායනා මෙත්තාචෙතොවිමුත්ති[Pg.260], අයං වුච්චති අබ්යාපාදධාතු. අවිහිංසාපටිසංයුත්තො තක්කො විතක්කො සඞ්කප්පො – අයං වුච්චති අවිහිංසාධාතු. යා සත්තෙසු කරුණා කරුණායනා කරුණාචෙතොවිමුත්ති – අයං වුච්චති අවිහිංසාධාතූ’’ති. (විභ. 182) – “नैष्क्रम्य (त्याग) से संबंधित तर्क, वितर्क और संकल्प, इसे नैष्क्रम्य-धातु कहा जाता है; सभी कुशल धर्म भी नैष्क्रम्य-धातु हैं। अव्यापाद (अद्वेष) से संबंधित तर्क, वितर्क और संकल्प, इसे अव्यापाद-धातु कहा जाता है। सत्त्वों के प्रति जो मैत्री, मैत्रायना (मैत्री भाव) और मैत्री-चेतोविमुक्ति है, इसे अव्यापाद-धातु कहा जाता है। अविहिंसा (अहिंसा) से संबंधित तर्क, वितर्क और संकल्प - इसे अविहिंसा-धातु कहा जाता है। सत्त्वों के प्रति जो करुणा, करुणायना (करुणा भाव) और करुणा-चेतोविमुक्ति है - इसे अविहिंसा-धातु कहा जाता है।” (विभङ्ग १८२) – ආගතත්තා විසෙසො ලබ්භති. ඉධාපි සබ්බසඞ්ගාහිකා, අසම්භින්නාති ද්වෙ කථා වුත්තනයෙනෙව වෙදිතබ්බා. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. आगत होने के कारण विशेषता प्राप्त होती है। यहाँ भी 'सबका संग्रह करने वाली' और 'असंभिन्न' (अभिन्न) - ये दो कथाएँ पूर्वोक्त रीति से ही समझनी चाहिए। शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। ගාථාසු විතක්කයෙති විතක්කෙය්ය. නිරාකරෙති අත්තනො සන්තානතො නීහරෙය්ය විනොදෙය්ය, පජහෙය්යාති අත්ථො. සවෙ විතක්කානි විචාරිතානි, සමෙති වුට්ඨීව රජං සමූහතන්ති යථා නාම ගිම්හානං පච්ඡිමෙ මාසෙ පථවියං සමූහතං සමන්තතො උට්ඨිතං රජං මහතො අකාලමෙඝස්ස වස්සතො වුට්ඨි ඨානසො වූපසමෙති, එවමෙව සො යොගාවචරො විතක්කානි මිච්ඡාවිතක්කෙ ච විචාරිතානි තංසම්පයුත්තවිචාරෙ ච සමෙති වූපසමෙති සමුච්ඡින්දති. තථාභූතො ච විතක්කූපසමෙන චෙතසා සබ්බෙසං මිච්ඡාවිතක්කානං උපසමනතො විතක්කූපසමෙන අරියමග්ගචිත්තෙන. ඉධෙව දිට්ඨෙව ධම්මෙ, සන්තිපදං නිබ්බානං, සමජ්ඣගා සමධිගතො හොතීති. गाथाओं में 'वितक्कये' का अर्थ है 'वितर्क करे'। 'निराकरेति' का अर्थ है अपनी सन्तान (चित्त-परम्परा) से बाहर निकाले, दूर करे, त्याग दे। 'सवे वितक्कानि विचारितानि, समेति वुट्ठीव रजं समूहतं' का अर्थ है - जैसे ग्रीष्म ऋतु के अंतिम महीने में पृथ्वी पर चारों ओर से उठी हुई धूल को एक महान अकाल मेघ की वर्षा तुरंत शांत कर देती है, वैसे ही वह योगावचर वितर्कों को - मिथ्या वितर्कों को और उनके साथ प्रवृत्त विचारों को - शांत करता है, उपशमित करता है, समूच्छेद करता है। और वैसा होकर, वितर्कों के उपशम से युक्त चित्त के द्वारा, सभी मिथ्या वितर्कों के उपशमन होने से, वितर्क-उपशम रूप आर्यमार्ग-चित्त के द्वारा। इसी जन्म में, इसी दृष्ट धर्म में, शान्ति-पद निर्वाण को प्राप्त कर लेता है। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9. අන්තරාමලසුත්තවණ්ණනා ९. अन्तरा-मल सूत्र की व्याख्या। 88. නවමෙ අන්තරාමලාති එත්ථ අන්තරාසද්දො – ८८. नौवें (सूत्र) में 'अन्तरा-मल' यहाँ 'अन्तरा' शब्द - ‘‘නදීතීරෙසු සණ්ඨානෙ, සභාසු රථියාසු ච; ජනා සඞ්ගම්ම මන්තෙන්ති, මඤ්ච තඤ්ච කිමන්තර’’න්ති. – “नदी के तटों पर, विश्राम स्थलों में, सभाओं में और गलियों में; लोग मिलकर मंत्रणा करते हैं, मेरे और तुम्हारे बीच क्या अंतर (कारण) है?” – ආදීසු (සං. නි. 1.228) කාරණෙ ආගතො. ‘‘අද්දසා මං, භන්තෙ, අඤ්ඤතරා ඉත්ථී විජ්ජන්තරිකාය භාජනං ධොවන්තී’’තිආදීසු (ම. නි. 2.149) ඛණෙ. ‘‘අපිචායං තපොදා ද්වින්නං මහානිරයානං අන්තරිකාය ආගච්ඡතී’’තිආදීසු (පාරා. 231) විවරෙ. आदि में (सं. नि. १.२२८) 'कारण' के अर्थ में आया है। “भन्ते, मैंने एक स्त्री को बिजली की चमक के क्षण (विज्जन्तरिकाय) में बर्तन धोते देखा” आदि में (म. नि. २.१४९) 'क्षण' के अर्थ में। “यह तपोदा नदी दो महान नरकों के बीच के अंतराल (अन्तरिकाय) से आती है” आदि में (पारा. २३१) 'विवर' (छिद्र या अंतराल) के अर्थ में। ‘‘පීතවත්ථෙ පීතධජෙ, පීතාලඞ්කාරභූසිතෙ; පීතන්තරාහි වග්ගූහි, අපිළන්ධාව සොභසී’’ති. – “पीले वस्त्रों वाली, पीले ध्वजों वाली, पीले अलंकारों से भूषित; पीले उत्तरीय वस्त्रों (पीतन्तराहि) के समूहों से, तुम आभूषण पहने हुए के समान सुशोभित हो रही हो।” – ආදීසු [Pg.261] (වි. ව. 658) උත්තරිසාටකෙ. ‘‘යස්සන්තරතො න සන්ති කොපා’’තිආදීසු (උදා. 20) චිත්තෙ. ඉධාපි චිත්තෙ එව දට්ඨබ්බො. තස්මා අන්තරෙ චිත්තෙ භවා අන්තරා. යස්මිං සන්තානෙ උප්පන්නා, තස්ස මලිනභාවකරණතො මලා. තත්ථ මලං නාම දුවිධං – සරීරමලං, චිත්තමලන්ති. තෙසු සරීරමලං සෙදජල්ලිකාදි සරීරෙ නිබ්බත්තං, තත්ථ ලග්ගං ආගන්තුකරජඤ්ච, තං උදකෙනපි නීහරණීයං, න තථා සංකිලෙසිකං. චිත්තමලං පන රාගාදිසංකිලෙසිකං, තං අරියමග්ගෙහෙව නීහරණීයං. වුත්තඤ්හෙතං පොරාණෙහි – आदि में (वि. व. ६५८) 'उत्तरीय वस्त्र' के अर्थ में। “जिसके भीतर (अन्तरतो) क्रोध नहीं है” आदि में (उदा. २०) 'चित्त' के अर्थ में। यहाँ भी इसे चित्त के अर्थ में ही देखना चाहिए। इसलिए, 'अन्तरा' का अर्थ है चित्त के भीतर होने वाले। जिस सन्तान (चित्त-धारा) में वे उत्पन्न होते हैं, उसे मलिन करने के कारण वे 'मल' हैं। वहाँ 'मल' दो प्रकार का है - शरीर-मल और चित्त-मल। उनमें शरीर-मल पसीना, मैल आदि है जो शरीर में उत्पन्न होता है, और वहाँ चिपकी हुई आगन्तुक धूल है; उसे जल से भी निकाला जा सकता है, वह उस प्रकार संक्लेशकारी (अपवित्र करने वाला) नहीं है। चित्त-मल तो राग आदि संक्लेशकारी मल है, उसे आर्यमार्गों द्वारा ही निकाला जा सकता है। प्राचीन आचार्यों ने कहा भी है - ‘‘රූපෙන සංකිලිට්ඨෙන, සංකිලිස්සන්ති මාණවා; රූපෙ සුද්ධෙ විසුජ්ඣන්ති, අනක්ඛාතං මහෙසිනා. “रूप के संक्लिष्ट (मलिन) होने से मनुष्य संक्लिष्ट होते हैं; रूप के शुद्ध होने पर वे शुद्ध होते हैं, ऐसा महर्षि द्वारा नहीं कहा गया है। ‘‘චිත්තෙන සංකිලිට්ඨෙන, සංකිලිස්සන්ති මාණවා; චිත්තෙ සුද්ධෙ විසුජ්ඣන්ති, ඉති වුත්තං මහෙසිනා’’ති. (දී. නි. අට්ඨ. 2.373; ම. නි. අට්ඨ. 1.106); “चित्त के संक्लिष्ट होने से मनुष्य संक्लिष्ट होते हैं; चित्त के शुद्ध होने पर वे शुद्ध होते हैं, ऐसा महर्षि द्वारा कहा गया है।” (दी. नि. अट्ठ. २.३७३; म. नि. अट्ठ. १.१०६); තෙනාහ භගවා ‘‘චිත්තසංකිලෙසා, භික්ඛවෙ, සත්තා සංකිලිස්සන්ති, චිත්තවොදානා විසුජ්ඣන්තී’’ති (සං. නි. 3.100). තස්මා භගවා ඉධාපි චිත්තමලවිසොධනාය පටිපජ්ජිතබ්බන්ති දස්සෙන්තො ‘‘තයොමෙ, භික්ඛවෙ, අන්තරාමලා’’ති ආහ. इसीलिए भगवान ने कहा - “भिक्षुओं, चित्त के संक्लेश से सत्त्व संक्लिष्ट होते हैं, चित्त की शुद्धि से वे शुद्ध होते हैं” (सं. नि. ३.१००)। इसलिए भगवान ने यहाँ भी चित्त-मल के शोधन के लिए प्रतिपत्ति (अभ्यास) करनी चाहिए, यह दिखाते हुए कहा - “भिक्षुओं, ये तीन अन्तरा-मल हैं।” යථා චෙතෙ ලොභාදයො සත්තානං චිත්තෙ උප්පජ්ජිත්වා මලිනභාවකරා නානප්පකාරසංකිලෙසවිධායකාති අන්තරාමලා, එවං එකතො භුඤ්ජිත්වා, එකතො සයිත්වා, ඔතාරගවෙසී අමිත්තසත්තු විය චිත්තෙ එව උප්පජ්ජිත්වා සත්තානං නානාවිධඅනත්ථාවහා, නානප්පකාරදුක්ඛනිබ්බත්තකාති දස්සෙන්තො ‘‘අන්තරාඅමිත්තා’’තිආදිමාහ. තත්ථ මිත්තපටිපක්ඛතො අමිත්තා, සපත්තකිච්චකරණතො සපත්තා, හිංසනතො වධකා, උජුවිපච්චනීකතො පච්චත්ථිකා. जैसे ये लोभ आदि सत्त्वों के चित्त में उत्पन्न होकर मलिनता करने वाले और अनेक प्रकार के संक्लेशों को उत्पन्न करने वाले होने के कारण 'अन्तरा-मल' हैं, वैसे ही एक साथ भोजन करने वाले, एक साथ सोने वाले और छिद्र (अवसर) खोजने वाले शत्रु के समान चित्त में ही उत्पन्न होकर सत्त्वों के लिए अनेक प्रकार के अनर्थ लाने वाले और अनेक प्रकार के दुखों को उत्पन्न करने वाले हैं - यह दिखाते हुए 'अन्तरा-अमित्त' (आन्तरिक शत्रु) आदि कहा। वहाँ, मित्र के विपरीत होने से 'अमित्र' हैं, शत्रु का कार्य करने से 'सपत्न' (प्रतिद्वंद्वी) हैं, हिंसा करने से 'वधक' हैं, और सीधे विरोधी होने से 'प्रत्यर्थिक' (विरोधी) हैं। තත්ථ ද්වීහි ආකාරෙහි ලොභාදීනං අමිත්තාදිභාවො වෙදිතබ්බො. වෙරීපුග්ගලො හි අන්තරං ලභමානො අත්තනො වෙරිස්ස සත්ථෙන වා සීසං පාතෙති, උපායෙන වා මහන්තං අනත්ථං උප්පාදෙති. ඉමෙ ච ලොභාදයො පඤ්ඤාසිරපාතනෙන යොනිසම්පටිපාදනෙන ච තාදිසං තතො බලවතරං අනත්ථං නිබ්බත්තෙන්ති. කථං? චක්ඛුද්වාරස්මිඤ්හි ඉට්ඨාදීසු ආරම්මණෙසු ආපාථගතෙසු යථාරහං තානි ආරබ්භ ලොභාදයො උප්පජ්ජන්ති, එත්තාවතාස්ස පඤ්ඤාසිරං [Pg.262] පාතිතං නාම හොති. සොතද්වාරාදීසුපි එසෙව නයො. එවං තාව පඤ්ඤාසිරපාතනතො අමිත්තාදිසදිසතා වෙදිතබ්බා. ලොභාදයො පන කම්මනිදානා හුත්වා අණ්ඩජාදිභෙදා චතස්සො යොනියො උපනෙන්ති. තස්ස යොනිඋපගමනමූලකානි පඤ්චවීසති මහාභයානි ද්වත්තිංස කම්මකරණානි ච ආගතානෙව හොන්ති. එවං යොනිසම්පටිපාදනතොපි නෙසං අමිත්තාදිසදිසතා වෙදිතබ්බා. ඉති ලොභාදයො අමිත්තාදිසදිසතාය චිත්තසම්භූතතාය ච ‘‘අන්තරාඅමිත්තා’’තිආදිනා වුත්තා. අපිච අමිත්තෙහි කාතුං අසක්කුණෙය්යං ලොභාදයො කරොන්ති, අමිත්තාදිභාවො ච ලොභාදීහි ජායතීති තෙසං අමිත්තාදිභාවො වෙදිතබ්බො. වුත්තඤ්හෙතං – वहाँ दो प्रकार से लोभ आदि का अमित्र आदि होना समझना चाहिए। वैरी व्यक्ति अवसर पाकर अपने वैरी का सिर शस्त्र से काट देता है या उपाय से महान अनर्थ उत्पन्न कर देता है। और ये लोभ आदि प्रज्ञा-रूपी सिर को काटने से और (गलत) योनि की प्राप्ति कराने से वैसा ही और उससे भी अधिक बलवान अनर्थ उत्पन्न करते हैं। कैसे? चक्षु-द्वार में इष्ट आदि विषयों के आने पर उनके आधार पर यथासंभव लोभ आदि उत्पन्न होते हैं, इतने मात्र से ही उसका प्रज्ञा-रूपी सिर काट दिया गया होता है। श्रोत्र-द्वार आदि में भी यही विधि है। इस प्रकार पहले प्रज्ञा-रूपी सिर के कटने से अमित्र आदि के साथ समानता समझनी चाहिए। लोभ आदि कर्म के कारण होकर अण्डज आदि भेद वाली चार योनियों में ले जाते हैं। उस योनि-प्राप्ति के मूल वाले पच्चीस महाभय और बत्तीस प्रकार की यातनाएँ (कर्म-करण) प्राप्त ही होती हैं। इस प्रकार योनि की प्राप्ति कराने से भी उनकी अमित्र आदि के साथ समानता समझनी चाहिए। इस प्रकार लोभ आदि अमित्र आदि के समान होने से और चित्त में उत्पन्न होने से 'अन्तरा-अमित्त' आदि कहे गए हैं। इसके अतिरिक्त, जो शत्रु नहीं कर सकते, वह लोभ आदि करते हैं, और अमित्र-भाव लोभ आदि के कारण ही उत्पन्न होता है, इसलिए उनका अमित्र-भाव समझना चाहिए। यह कहा भी गया है - ‘‘දිසො දිසං යන්තං කයිරා, වෙරී වා පන වෙරිනං; මිච්ඡාපණිහිතං චිත්තං, පාපියො නං තතො කරෙ’’ති. (ධ. ප. 42; උදා. 33); ‘‘एक शत्रु दूसरे शत्रु का जो अहित करे, या एक वैरी दूसरे वैरी का; मिथ्या मार्ग पर लगा हुआ चित्त उससे भी अधिक बुरा (अहित) करता है।’’ (ध. प. 42; उदा. 33); ගාථාසු අත්තනො පරෙසඤ්ච අනත්ථං ජනෙතීති අනත්ථජනනො. වුත්තඤ්හෙතං – गाथाओं में अपने और दूसरों के अनर्थ (अहित) को उत्पन्न करने वाला 'अनर्थजनन' है। क्योंकि यह कहा गया है – ‘‘යදපි ලුද්ධො අභිසඞ්ඛරොති කායෙන වාචාය මනසා තදපි අකුසලං; යදපි ලුද්ධො ලොභෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො පරස්ස අසතා දුක්ඛං උප්පාදෙති වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා පබ්බාජනාය වා බලවම්හි බලත්ථො ඉති, තදපි අකුසලං, ඉතිස්සමෙ ලොභජා ලොභනිදානා ලොභසමුදයා ලොභපච්චයා අනෙකෙ පාපකා අකුසලා ධම්මා සම්භවන්තී’’ති (අ. නි. 3.70). ‘‘जो कुछ भी लोभी व्यक्ति काया, वाणी और मन से संस्कारित (करता) है, वह भी अकुशल है; जो कुछ भी लोभी व्यक्ति लोभ से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला होकर, दूसरे को असत्य (अन्याय) से दुःख पहुँचाता है—वध से, बन्धन से, हानि से, निन्दा से या निर्वासन से, यह सोचकर कि 'मैं बलवान हूँ'—वह भी अकुशल है। इस प्रकार, ये लोभ से उत्पन्न, लोभ के कारण, लोभ के समुदय और लोभ के प्रत्यय से अनेक पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न होते हैं।’’ (अं. नि. 3.70) අපරම්පි වුත්තං – अन्य भी कहा गया है – ‘‘රත්තො ඛො, බ්රාහ්මණ, රාගෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො අත්තබ්යාබාධායපි චෙතෙති, පරබ්යාබාධායපි චෙතෙති, උභයබ්යාබාධායපි චෙතෙති, චෙතසිකම්පි දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදෙතී’’තිආදි (අ. නි. 3.54). ‘‘हे ब्राह्मण! राग से रंगा हुआ (रक्त), राग से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला व्यक्ति अपने विनाश (व्याबाध) के लिए भी सोचता है, दूसरे के विनाश के लिए भी सोचता है, दोनों के विनाश के लिए भी सोचता है, और चैतसिक दुःख तथा दौर्मनस्य का अनुभव करता है।’’ इत्यादि (अं. नि. 3.54) චිත්තප්පකොපනොති චිත්තසඞ්ඛොභනො. ලොභො හි ලොභනීයෙ වත්ථුස්මිං උප්පජ්ජමානො චිත්තං ඛොභෙන්තො පකොපෙන්තො විපරිණාමෙන්තො විකාරං [Pg.263] ආපාදෙන්තො උප්පජ්ජති, පසාදාදිවසෙන පවත්තිතුං න දෙති. භයමන්තරතො ජාතං, තං ජනො නාවබුජ්ඣතීති තං ලොභසඞ්ඛාතං අන්තරතො අබ්භන්තරෙ අත්තනො චිත්තෙයෙව ජාතං අනත්ථජනනචිත්තප්පකොපනාදිං භයං භයහෙතුං අයං බාලමහාජනො නාවබුජ්ඣති න ජානාතීති. 'चित्तप्पकोपनो' का अर्थ है चित्त को क्षुब्ध करने वाला। क्योंकि लोभ, लोभनीय वस्तु में उत्पन्न होते समय चित्त को क्षुब्ध करते हुए, कुपित करते हुए, विपरिणामित करते हुए और विकार उत्पन्न करते हुए पैदा होता है, और उसे प्रसन्नता आदि के रूप में प्रवृत्त नहीं होने देता। 'भीतर से उत्पन्न भय को लोग नहीं जानते' का अर्थ है कि यह अज्ञानी जन-समुदाय अपने ही चित्त के भीतर उत्पन्न हुए उस लोभ नामक अनर्थकारी और चित्त-क्षोभक भय या भय के कारण को नहीं समझता, नहीं जानता है। ලුද්ධො අත්ථං න ජානාතීති අත්තත්ථපරත්ථාදිභෙදං අත්ථං හිතං ලුද්ධපුග්ගලො යථාභූතං න ජානාති. ධම්මං න පස්සතීති දසකුසලකම්මපථධම්මම්පි ලුද්ධො ලොභෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො න පස්සති පච්චක්ඛතො න ජානාති, පගෙව උත්තරිමනුස්සධම්මං. වුත්තම්පි චෙතං – 'लोभी अर्थ को नहीं जानता' का अर्थ है कि लोभी व्यक्ति स्वार्थ और परार्थ आदि के भेद वाले अर्थ (हित) को यथार्थ रूप में नहीं जानता। 'धम्म को नहीं देखता' का अर्थ है कि लोभ से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला लोभी व्यक्ति दस कुशल कर्मपथ रूपी धर्म को भी प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखता, नहीं जानता, फिर उत्तर-मनुष्य धर्म की तो बात ही क्या। यह कहा भी गया है – ‘‘රත්තො ඛො, බ්රාහ්මණ, රාගෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො අත්තත්ථම්පි යථාභූතං න පජානාති, පරත්ථම්පි යථාභූතං න පජානාති, උභයත්ථම්පි යථාභූතං න පජානාතී’’තිආදි (අ. නි. 3.55). ‘‘हे ब्राह्मण! राग से रंगा हुआ, राग से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला व्यक्ति न तो स्वार्थ (अपना हित) को यथार्थ रूप में जानता है, न परार्थ (दूसरे का हित) को यथार्थ रूप में जानता है, और न ही दोनों के हित को यथार्थ रूप में जानता है।’’ इत्यादि (अं. नि. 3.55) අන්ධතමන්ති අන්ධභාවකරං තමං. යන්ති යත්ථ. භුම්මත්ථෙ හි එතං පච්චත්තවචනං. යස්මිං කාලෙ ලොභො සහතෙ අභිභවති නරං, අන්ධතමං තදා හොතීති. යන්ති වා කාරණවචනං. යස්මා ලොභො උප්පජ්ජමානො නරං සහතෙ අභිභවති, තස්මා අන්ධතමං තදා හොතීති යොජනා, ය-ත-සද්දානං එකන්තසම්බන්ධභාවතො. අථ වා යන්ති කිරියාපරාමසනං, ‘‘ලොභො සහතෙ’’ති එත්ථ යදෙතං ලොභස්ස සහනං අභිභවනං වුත්තං. එතං අන්ධභාවකරස්ස තමස්ස ගමනං උප්පාදොති අත්ථො. අථ වා යං නරං ලොභො සහතෙ අභිභවති, තස්ස අන්ධතමං තදා හොති, තතො ච ලුද්ධො අත්ථං න ජානාති, ලුද්ධො ධම්මං න පස්සතීති එවමෙත්ථ අත්ථො දට්ඨබ්බො. 'अन्धतम' का अर्थ है अन्धा कर देने वाला अन्धकार। 'यं' का अर्थ है 'जहाँ' (जिस स्थिति में)। यहाँ यह प्रथमा विभक्ति सप्तमी के अर्थ में है। जिस समय लोभ मनुष्य को दबा लेता है, अभिभूत कर लेता है, तब अन्धतम (घोर अन्धकार) होता है। अथवा 'यं' कारणवाचक है। चूँकि लोभ उत्पन्न होकर मनुष्य को दबा लेता है, इसलिए तब अन्धतम होता है—ऐसी योजना है, क्योंकि 'य' और 'त' शब्दों का नित्य सम्बन्ध होता है। अथवा 'यं' क्रिया का परामर्श है, 'लोभ दबा लेता है' यहाँ लोभ का जो यह दबाना या अभिभूत करना कहा गया है, इसका अर्थ अन्धा करने वाले अन्धकार का आना या उत्पन्न होना है। अथवा जिस मनुष्य को लोभ दबा लेता है, उसके लिए तब अन्धतम होता है, और उससे लोभी अर्थ को नहीं जानता, लोभी धर्म को नहीं देखता—इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। යො ච ලොභං පහන්ත්වානාති යො පුබ්බභාගෙ තදඞ්ගවසෙන වික්ඛම්භනවසෙන ච යථාරහං සමථවිපස්සනාහි ලොභං පජහිත්වා තථා පජහනහෙතු ලොභනෙය්යෙ දිබ්බෙපි රූපාදිකෙ උපට්ඨිතෙ න ලුබ්භති, බලවවිපස්සනානුභාවෙන ලොභො පහීයතෙ තම්හාති තස්මා අරියපුග්ගලා අරියමග්ගෙන ලොභො පහීයති පජහීයති, අච්චන්තමෙව පරිච්චජීයති. යථා කිං? උදබින්දූව පොක්ඛරාති පදුමිනිපණ්ණතො උදකබින්දු විය. සෙසගාථානම්පි ඉමිනා නයෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. 'और जो लोभ को त्याग कर' का अर्थ है जिसने पूर्व भाग में तदङ्ग (विपक्ष द्वारा) और विष्कम्भन (दबाने) के द्वारा यथायोग्य शमथ और विपश्यना से लोभ को त्याग दिया है, और उस त्याग के कारण लोभनीय दिव्य रूपादि के उपस्थित होने पर भी वह लोभ नहीं करता; प्रबल विपश्यना के प्रभाव से जिससे लोभ क्षीण हो जाता है, उस आर्य पुद्गल से आर्य मार्ग के द्वारा लोभ क्षीण हो जाता है, त्याग दिया जाता है, अत्यन्त रूप से परित्यक्त हो जाता है। किसके समान? 'जैसे कमल के पत्ते से जल की बूँद'—जैसे कमलिनी के पत्ते से पानी की बूँद (अलग रहती है)। शेष गाथाओं का अर्थ भी इसी पद्धति से समझना चाहिए। තථා [Pg.264] දොසස්ස – उसी प्रकार द्वेष के विषय में – ‘‘යදපි දුට්ඨො අභිසඞ්ඛරොති කායෙන වාචාය මනසා තදපි අකුසලං; යදපි දුට්ඨො දොසෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො පරස්ස අසතා දුක්ඛං උප්පාදෙති වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා පබ්බාජනාය වා බලවම්හි බලත්ථො ඉති, තදපි අකුසලං. ඉතිස්සමෙ දොසජා දොසනිදානා දොසසමුදයා දොසපච්චයා අනෙකෙ පාපකා අකුසලා ධම්මා සම්භවන්තී’’ති (අ. නි. 3.70). ‘‘जो कुछ भी द्वेषी व्यक्ति काया, वाणी और मन से संस्कारित करता है, वह भी अकुशल है; जो कुछ भी द्वेषी व्यक्ति द्वेष से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला होकर, दूसरे को असत्य (अन्याय) से दुःख पहुँचाता है—वध से, बन्धन से, हानि से, निन्दा से या निर्वासन से, यह सोचकर कि 'मैं बलवान हूँ'—वह भी अकुशल है। इस प्रकार, ये द्वेष से उत्पन्न, द्वेष के कारण, द्वेष के समुदय और द्वेष के प्रत्यय से अनेक पापमय अकुशल धर्म उत्पन्न होते हैं।’’ (अं. नि. 3.70) තථා – उसी प्रकार – ‘‘දුට්ඨො ඛො, බ්රාහ්මණ, දොසෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො අත්තබ්යාබාධායපි චෙතෙති, පරබ්යාබාධායපි චෙතෙති, උභයබ්යාබාධායපි චෙතෙති චෙතසිකම්පි දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදෙතී’’ති (අ. නි. 3.55). ‘‘हे ब्राह्मण! द्वेषी व्यक्ति, द्वेष से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला होकर अपने विनाश के लिए भी सोचता है, दूसरे के विनाश के लिए भी सोचता है, दोनों के विनाश के लिए भी सोचता है, और चैतसिक दुःख तथा दौर्मनस्य का अनुभव करता है।’’ (अं. नि. 3.55) තථා – उसी प्रकार – ‘‘දුට්ඨො ඛො, බ්රාහ්මණ, දොසෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො අත්තත්ථම්පි යථාභූතං න පජානාති, පරත්ථම්පි යථාභූතං න පජානාති, උභයත්ථම්පි යථා භූතං න පජානාතී’’ති (අ. නි. 3.55) – ‘‘हे ब्राह्मण! द्वेषी व्यक्ति, द्वेष से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला होकर न तो स्वार्थ को यथार्थ रूप में जानता है, न परार्थ को यथार्थ रूप में जानता है, और न ही दोनों के हित को यथार्थ रूप में जानता है –’’ (अं. नि. 3.55) ආදිසුත්තපදානුසාරෙන අනත්ථජනනතා අත්ථහානිහෙතුතා ච වෙදිතබ්බා. आदि सुत्त पदों के अनुसार अनर्थ का उत्पन्न होना और अर्थ की हानि का कारण समझना चाहिए। තථා මොහස්ස ‘‘යදපි මූළ්හො අභිසඞ්ඛරොති කායෙන වාචාය මනසා’’තිආදිනා (අ. නි. 3.70), ‘‘මූළ්හො ඛො, බ්රාහ්මණ, මොහෙන අභිභූතො පරියාදින්නචිත්තො අත්තබ්යාබාධායපි චෙතෙතී’’තිආදිනා(අ. නි. 3.55), ‘‘අත්තත්ථම්පි යථාභූතං න පජානාතී’’තිආදිනා (අ. නි. 3.55) ච ආගතසුත්තපදානුසාරෙන වෙදිතබ්බා. उसी प्रकार मोह के विषय में 'जो कुछ भी मूढ़ व्यक्ति काया, वाणी और मन से संस्कारित करता है' आदि (अं. नि. 3.70), 'हे ब्राह्मण! मोह से अभिभूत और वशीभूत चित्त वाला मूढ़ व्यक्ति अपने विनाश के लिए भी सोचता है' आदि (अं. नि. 3.55), और 'स्वार्थ को भी यथार्थ रूप में नहीं जानता' आदि (अं. नि. 3.55) के रूप में आए हुए सुत्त पदों के अनुसार समझना चाहिए। තාලපක්කංව බන්ධනාති තාලඵලං විය උසුමුප්පාදෙන වණ්ටතො, තතියමග්ගඤාණුප්පාදෙන තස්ස චිත්තතො දොසො පහීයති, පරිච්චජීයතීති අත්ථො. මොහං විහන්ති සො සබ්බන්ති සො අරියපුග්ගලො සබ්බං [Pg.265] අනවසෙසං මොහං චතුත්ථමග්ගෙන විහන්ති විධමති සමුච්ඡින්දති. ආදිච්චොවුදයං තමන්ති ආදිච්චො විය උදයං උග්ගච්ඡන්තො තමං අන්ධකාරං. 'ताळपक्कं व बन्धना' (ताड़ के पके फल के समान बंधन से) का अर्थ है कि जैसे ताड़ का फल गर्मी के कारण डंठल से अलग हो जाता है, वैसे ही तृतीय मार्ग-ज्ञान (अनागामी मार्ग) के उत्पन्न होने से उसके चित्त से द्वेष प्रहीण हो जाता है, त्याग दिया जाता है। 'मोहं विहन्ति सो सब्बं' (वह समस्त मोह का विनाश करता है) का अर्थ है कि वह आर्य पुद्गल चतुर्थ मार्ग (अर्हत् मार्ग) के द्वारा समस्त शेष मोह का विनाश करता है, उसे नष्ट करता है, समूल उखाड़ देता है। 'आदिच्चोव उदयं तमं' का अर्थ है जैसे उदय होता हुआ सूर्य अंधकार को नष्ट करता है। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. දෙවදත්තසුත්තවණ්ණනා १०. देवदत्त सूत्र की व्याख्या। 89. දසමෙ තීහි, භික්ඛවෙ, අසද්ධම්මෙහි අභිභූතොති කා උප්පත්ති? දෙවදත්තෙ හි අවීචිමහානිරයං පවිට්ඨෙ දෙවදත්තපක්ඛියා අඤ්ඤතිත්ථියා ච ‘‘සමණෙන ගොතමෙන අභිසපිතො දෙවදත්තො පථවිං පවිට්ඨො’’ති අබ්භාචික්ඛිංසු. තං සුත්වා සාසනෙ අනභිප්පසන්නා මනුස්සා ‘‘සියා නු ඛො එතදෙවං, යථා ඉමෙ භණන්තී’’ති ආසඞ්කං උප්පාදෙසුං. තං පවත්තිං භික්ඛූ භගවතො ආරොචෙසුං. අථ භගවා ‘‘න, භික්ඛවෙ, තථාගතා කස්සචි අභිසපං දෙන්ති, තස්මා න දෙවදත්තො මයා අභිසපිතො, අත්තනො කම්මෙනෙව නිරයං පවිට්ඨො’’ති වත්වා තෙසං මිච්ඡාගාහං පටිසෙධෙන්තො ඉමාය අට්ඨුප්පත්තියා ඉදං සුත්තං අභාසි. ८९. दसवें (सूत्र) में 'भिक्षुओं, तीन असद्धर्मों से अभिभूत' - इसकी उत्पत्ति क्या है? जब देवदत्त अवीचि महानरक में प्रविष्ट हुआ, तब देवदत्त के पक्षपातियों और अन्य तीर्थिकों ने यह मिथ्या आरोप लगाया कि "श्रमण गौतम द्वारा अभिशप्त होने के कारण देवदत्त पृथ्वी में समा गया।" इसे सुनकर शासन (बुद्ध धर्म) के प्रति अप्रसन्न मनुष्यों में यह आशंका उत्पन्न हुई कि "क्या यह वैसा ही हो सकता है जैसा ये कह रहे हैं?" भिक्षुओं ने यह वृत्तांत भगवान को बताया। तब भगवान ने "भिक्षुओं, तथागत किसी को शाप नहीं देते, इसलिए देवदत्त मेरे द्वारा अभिशप्त नहीं है, वह अपने ही कर्मों से नरक में प्रविष्ट हुआ है" - ऐसा कहकर उनके मिथ्या ग्रहण का निषेध करते हुए इस घटना के संदर्भ में यह सूत्र कहा। තත්ථ අසද්ධම්මෙහීති අසතං ධම්මෙහි, අසන්තෙහි වා ධම්මෙහි. අතෙකිච්ඡොති බුද්ධෙහිපි අනිවත්තනීයත්තා අවීචිනිබ්බත්තියා තිකිච්ඡාභාවතො අතෙකිච්ඡො, අතිකිච්ඡනීයොති අත්ථො. අසන්තගුණසම්භාවනාධිප්පායෙන පවත්තා පාපා ඉච්ඡා එතස්සාති පාපිච්ඡො, තස්ස භාවො පාපිච්ඡතා, තාය. ‘‘අහං බුද්ධො භවිස්සාමි, සඞ්ඝං පරිහරිස්සාමී’’ති තස්ස ඉච්ඡා උප්පන්නා. කොකාලිකාදයො පාපා ලාමකා මිත්තා එතස්සාති පාපමිත්තො, තස්ස භාවො පාපමිත්තතා, තාය. උත්තරිකරණීයෙති ඣානාභිඤ්ඤාහි උත්තරිකරණීයෙ අධිගන්තබ්බෙ මග්ගඵලෙ අනධිගතෙ සති එව, තං අනධිගන්ත්වාති අත්ථො. ඔරමත්තකෙනාති අප්පමත්තකෙන ඣානාභිඤ්ඤාමත්තෙන. විසෙසාධිගමෙනාති උත්තරිමනුස්සධම්මාධිගමෙන. අන්තරාති වෙමජ්ඣෙ. වොසානං ආපාදීති අකතකිච්චොව සමානො ‘‘කතකිච්චොම්හී’’ති මඤ්ඤමානො සමණධම්මතො විගමං ආපජ්ජි. ඉති භගවා ඉමිනා සුත්තෙන විසෙසතො පුථුජ්ජනභාවෙ ආදීනවං පකාසෙසි භාරියො පුථුජ්ජනභාවො, යත්ර හි නාම ඣානාභිඤ්ඤාපරියොසානා [Pg.266] සම්පත්තියො නිබ්බත්තෙත්වාපි අනෙකානත්ථාවහං නානාවිධං දුක්ඛහෙතුං අසන්තගුණසම්භාවනං අසප්පුරිසසංසග්ගං ආලසියානුයොගඤ්ච අවිජහන්තො අවීචිම්හි කප්පට්ඨියං අතෙකිච්ඡං කිබ්බිසං පසවිස්සතීති. वहाँ 'असद्धर्मों से' का अर्थ है असज्जनों के धर्मों से, या असत्य धर्मों से। 'अतेकिच्छो' (अचिकित्स्य) का अर्थ है कि बुद्धों द्वारा भी न लौटाए जा सकने के कारण और अवीचि में उत्पन्न होने के कारण चिकित्सा (उपचार) के अभाव में वह अचिकित्स्य है, जिसका उपचार नहीं किया जा सकता। असत्य गुणों की संभावना के अभिप्राय से प्रवृत्त पापपूर्ण इच्छा जिसकी है, वह 'पापिच्छ' (पाप-इच्छुक) है, उसका भाव 'पापिच्छता' है, उसके द्वारा। "मैं बुद्ध बनूँगा, संघ का संचालन करूँगा" - ऐसी उसकी इच्छा उत्पन्न हुई। कोकालिक आदि पापपूर्ण नीच मित्र जिसके हैं, वह 'पापमित्र' है, उसका भाव 'पापमित्रता' है, उसके द्वारा। 'उत्तरिकरणीये' का अर्थ है ध्यान और अभिज्ञाओं के माध्यम से प्राप्त किए जाने योग्य मार्ग और फल के अप्राप्त रहने पर ही, उसे प्राप्त न करके। 'ओरमत्तकेन' का अर्थ है अल्पमात्र ध्यान और अभिज्ञा मात्र से। 'विशेषाधिगमेन' का अर्थ है उत्तर-मनुष्य धर्म की प्राप्ति से। 'अन्तरा' का अर्थ है बीच में। 'वोसानं आपादि' का अर्थ है कार्य पूरा न होने पर भी "मैंने कार्य पूरा कर लिया है" ऐसा मानते हुए श्रमण-धर्म से विमुख हो गया। इस प्रकार भगवान ने इस सूत्र के माध्यम से विशेष रूप से पृथग्जन भाव के दोष को प्रकाशित किया कि पृथग्जन भाव भारी है, जिसमें ध्यान और अभिज्ञा की पराकाष्ठा वाली संपत्तियों को उत्पन्न करके भी, अनेक अनर्थों को लाने वाले, नाना प्रकार के दुखों के हेतु, असत्य गुणों की संभावना, असत्पुरुषों की संगति और आलस्य के अभ्यास को न छोड़ते हुए, अवीचि नरक में कल्प भर रहने वाले अचिकित्स्य पाप को उत्पन्न करता है। ගාථාසු මාති පටිසෙධෙ නිපාතො. ජාතූති එකංසෙන. කොචීති සබ්බසඞ්ගාහකවචනං. ලොකස්මින්ති සත්තලොකෙ. ඉදං වුත්තං හොති ‘‘ඉමස්මිං සත්තලොකෙ කොචි පුග්ගලො එකංසෙන පාපිච්ඡො මා හොතූ’’ති. තදමිනාපි ජානාථ, පාපිච්ඡානං යථා ගතීති පාපිච්ඡානං පුග්ගලානං යථා ගති යාදිසී නිප්ඵත්ති, යාදිසො අභිසම්පරායො, තං ඉමිනාපි කාරණෙන ජානාථාති දෙවදත්තං නිදස්සෙන්තො එවමාහ. පණ්ඩිතොති සමඤ්ඤාතොති පරියත්තිබාහුසච්චෙන පණ්ඩිතොති ඤාතො. භාවිතත්තොති සම්මතොති ඣානාභිඤ්ඤාහි භාවිතචිත්තොති සම්භාවිතො. තථා හි සො පුබ්බෙ ‘‘මහිද්ධිකො ගොධිපුත්තො, මහානුභාවො ගොධිපුත්තො’’ති ධම්මසෙනාපතිනාපි පසංසිතො අහොසි. ජලංව යසසා අට්ඨා, දෙවදත්තොති විස්සුතොති අත්තනො කිත්තියා පරිවාරෙන ජලන්තො විය ඔභාසෙන්තො විය ඨිතො දෙවදත්තොති එවං විස්සුතො පාකටො අහොසි. ‘‘මෙ සුත්ත’’න්තිපි පාඨො, මයා සුතං සුතමත්තං, කතිපාහෙනෙව අතථාභූතත්තා තස්ස තං පණ්ඩිච්චාදි සවනමත්තමෙවාති අත්ථො. गाथाओं में 'मा' निषेधार्थक निपात है। 'जातु' का अर्थ है निश्चित रूप से। 'कोचि' शब्द सबको सम्मिलित करने वाला है। 'लोकस्मिं' का अर्थ है सत्त्वलोक में। यह कहा गया है - "इस सत्त्वलोक में कोई भी पुद्गल निश्चित रूप से पापिच्छ (पाप-इच्छुक) न हो।" 'तदमिनापि जानाथ, पापिच्छानं यथा गति' का अर्थ है कि पापिच्छ पुद्गलों की जैसी गति, जैसी निष्पत्ति, जैसा पुनर्जन्म होता है, उसे इस कारण से भी जानो - ऐसा देवदत्त का उदाहरण देते हुए कहा। 'पण्डितो' के रूप में विख्यात का अर्थ है पर्यत्ति और बहुश्रुत होने के कारण 'पण्डित' के रूप में ज्ञात। 'भावितत्तो' के रूप में सम्मत का अर्थ है ध्यान और अभिज्ञाओं से भावित चित्त वाला माना गया। क्योंकि वह पहले धर्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा भी "गोधिपुत्र (देवदत्त) महान ऋद्धिमान है, गोधिपुत्र महान प्रभावशाली है" - इस प्रकार प्रशंसित हुआ था। 'जलंव यससा अठ्ठा, देवदत्तोति विस्सुतो' का अर्थ है अपनी कीर्ति और परिवार के साथ जलते हुए के समान, प्रकाशित होते हुए के समान स्थित देवदत्त इस प्रकार प्रसिद्ध और प्रकट हुआ। 'मे सुत्तं' (मैंने सुना) ऐसा भी पाठ है, जिसका अर्थ है मेरे द्वारा सुना गया, केवल सुना हुआ, क्योंकि कुछ ही दिनों में उसके वैसा न रहने के कारण उसका वह पाण्डित्य आदि केवल सुनने मात्र का ही रह गया। සො සමානමනුචිණ්ණො, ආසජ්ජ නං තථාගතන්ති සො එවංභූතො දෙවදත්තො ‘‘බුද්ධොපි සක්යපුත්තො, අහම්පි සක්යපුත්තො, බුද්ධොපි සමණො, අහම්පි සමණො, බුද්ධොපි ඉද්ධිමා, අහම්පි ඉද්ධිමා, බුද්ධොපි දිබ්බචක්ඛුකො, අහම්පි දිබ්බචක්ඛුකො, බුද්ධොපි දිබ්බසොතකො, අහම්පි දිබ්බසොතකො, බුද්ධොපි චෙතොපරියඤාණලාභී, අහම්පි චෙතොපරියඤාණලාභී, බුද්ධොපි අතීතානාගතපච්චුප්පන්නෙ ධම්මෙ ජානාති, අහම්පි තෙ ජානාමී’’ති අත්තනො පමාණං අජානිත්වා සම්මාසම්බුද්ධං අත්තනා සමසමට්ඨපනෙන සමානං ආපජ්ජන්තො ‘‘ඉදානාහං බුද්ධො භවිස්සාමි, භික්ඛුසඞ්ඝං පරිහරිස්සාමී’’ති අභිමාරපයොජනා තථාගතං ආසජ්ජ ආසාදෙත්වා විහෙඨෙත්වා. ‘‘පමාදමනුජීනො’’තිපි පඨන්ති. තස්සත්ථො ‘‘වුත්තනයෙන පමාදං [Pg.267] ආපජ්ජන්තො පමාදං නිස්සාය භගවතා සද්ධිං යුගග්ගාහචිත්තුප්පාදෙන සහෙව ඣානාභිඤ්ඤාහි අනුජීනො පරිහීනො’’ති. අවීචිනිරයං පත්තො, චතුද්වාරං භයානකන්ති ජාලානං තත්ථ උප්පන්නසත්තානං වා නිරන්තරතාය ‘‘අවීචී’’ති ලද්ධනාමං චතූසු පස්සෙසු චතුමහාද්වාරයොගෙන චතුද්වාරං අතිභයානකං මහානිරයං පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන පත්තො. තථා හි වුත්තං – 'सो समानमनुचिण्णो, आसज्ज नं तथागतं' का अर्थ है कि वह वैसा (अहंकारी) देवदत्त "बुद्ध भी शाक्यपुत्र हैं, मैं भी शाक्यपुत्र हूँ; बुद्ध भी श्रमण हैं, मैं भी श्रमण हूँ; बुद्ध भी ऋद्धिमान हैं, मैं भी ऋद्धिमान हूँ; बुद्ध भी दिव्यचक्षु वाले हैं, मैं भी दिव्यचक्षु वाला हूँ; बुद्ध भी दिव्यश्रोत्र वाले हैं, मैं भी दिव्यश्रोत्र वाला हूँ; बुद्ध भी चेतोपरिय-ज्ञान के लाभकर्ता हैं, मैं भी चेतोपरिय-ज्ञान का लाभकर्ता हूँ; बुद्ध भी अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न धर्मों को जानते हैं, मैं भी उन्हें जानता हूँ" - इस प्रकार अपनी सीमा को न जानकर सम्यक्सम्बुद्ध को अपने समान स्थापित करने की समानता को प्राप्त करते हुए "अब मैं बुद्ध बनूँगा, भिक्षु संघ का संचालन करूँगा" - इस अभिमान और मार के प्रयोजन से तथागत पर आक्रमण करके, उन्हें कष्ट पहुँचाकर। 'पमादमनुजीनो' ऐसा भी पढ़ते हैं। उसका अर्थ है "कहे गए तरीके से प्रमाद को प्राप्त करते हुए, प्रमाद के कारण भगवान के साथ प्रतिस्पर्धा के चित्त के उत्पन्न होने से ध्यान और अभिज्ञाओं के साथ ही वह हीन (भ्रष्ट) हो गया।" 'अवीचिनिरयं पत्तो, चतुद्वारं भयानकं' का अर्थ है ज्वालाओं की या वहाँ उत्पन्न सत्त्वों की निरंतरता के कारण 'अवीचि' नाम प्राप्त, चारों दिशाओं में चार महाद्वारों से युक्त होने के कारण चार द्वारों वाले अत्यंत भयानक महानरक में प्रतिसंधि ग्रहण करने के कारण पहुँचा। जैसा कि कहा गया है - ‘‘චතුක්කණ්ණො චතුද්වාරො, විභත්තො භාගසො මිතො; අයොපාකාරපරියන්තො, අයසා පටිකුජ්ජිතො. "चार कोनों वाला, चार द्वारों वाला, भागों में विभक्त और मापा हुआ; लोहे की प्राचीर (दीवार) से घिरा हुआ और लोहे के ढक्कन से ढका हुआ।" ‘‘තස්ස අයොමයා භූමි, ජලිතා තෙජසා යුතා; සමන්තා යොජනසතං, ඵරිත්වා තිට්ඨති සබ්බදා’’ති. (ම. නි. 3.250; අ. නි. 3.36; පෙ. ව. 693-694; ජා. 2.19.86-87); ‘‘उसकी भूमि लोहे की बनी है, जो तेज (अग्नि) से प्रज्वलित और युक्त है; वह चारों ओर सौ योजन तक फैलकर सदैव स्थित रहती है।’’ අදුට්ඨස්සාති අදුට්ඨචිත්තස්ස. දුබ්භෙති දූසෙය්ය. තමෙව පාපං ඵුසතීති තමෙව අදුට්ඨදුබ්භිං පාපපුග්ගලං පාපං නිහීනං පාපඵලං ඵුසති පාපුණාති අභිභවති. භෙස්මාති විපුලභාවෙන ගම්භීරභාවෙන ච භිංසාපෙන්තො විය, විපුලගම්භීරොති අත්ථො. වාදෙනාති දොසෙන. විහිංසතීති බාධති ආසාදෙති. වාදො තම්හි න රූහතීති තස්මිං තථාගතෙ පරෙන ආරොපියමානො දොසො න රුහති, න තිට්ඨති, විසකුම්භො විය සමුද්දස්ස, න තස්ස විකාරං ජනෙතීති අත්ථො. ‘अदुट्ठस्स’ (अदुष्ट का) का अर्थ है अदुष्ट चित्त वाले का। ‘दुब्भे’ का अर्थ है दूषित करे। ‘तमेव पापं फुसति’ का अर्थ है कि वह पाप (नीच कर्म), उस अदुष्ट के प्रति द्रोह करने वाले पापी व्यक्ति को ही प्राप्त होता है, पहुँचता है, अभिभूत करता है। ‘भेस्मा’ का अर्थ है विशालता और गंभीरता के कारण डराने वाले के समान, अर्थात् विशाल और गंभीर। ‘वादेन’ का अर्थ है दोष से। ‘विहिंसति’ का अर्थ है बाधा पहुँचाता है, आघात करता है। ‘वादो तम्हि न रूहति’ का अर्थ है कि उस तथागत पर दूसरों द्वारा लगाया गया दोष नहीं चढ़ता, नहीं टिकता, जैसे समुद्र में विष का घड़ा; वह उसमें कोई विकार उत्पन्न नहीं करता। එවං ඡහි ගාථාහි පාපිච්ඡතාදිසමන්නාගතස්ස නිරයූපගභාවදස්සනෙන දුක්ඛතො අපරිමුත්තතං දස්සෙත්වා ඉදානි තප්පටිපක්ඛධම්මසමන්නාගතස්ස දුක්ඛක්ඛයං දස්සෙන්තො ‘‘තාදිසං මිත්ත’’න්ති ඔසානගාථමාහ. තස්සත්ථො – යස්ස සම්මා පටිපන්නස්ස මග්ගානුගො පටිපත්තිමග්ගං අනුගතො සම්මා පටිපන්නො අප්පිච්ඡතාදිගුණසමන්නාගමෙන සකලවට්ටදුක්ඛස්ස ඛයං පරියොසානං පාපුණෙය්ය. තාදිසං බුද්ධං වා බුද්ධසාවකං වා පණ්ඩිතො සප්පඤ්ඤො, අත්තනො මිත්තං කුබ්බෙථ තෙන මෙත්තිකං කරෙය්ය, තඤ්ච සෙවෙය්ය තමෙව පයිරුපාසෙය්යාති. इस प्रकार छह गाथाओं द्वारा पापाच्छा (बुरी इच्छा) आदि से युक्त व्यक्ति के नरकगामी होने को दिखाकर दुःख से मुक्ति न होने को दर्शाते हुए, अब उसके विपरीत धर्मों से युक्त व्यक्ति के दुक्ख-क्षय को दर्शाते हुए ‘तादिसं मित्तं’ (वैसा मित्र) यह अंतिम गाथा कही। उसका अर्थ है—जिस सम्यक् प्रतिपन्न (सही मार्ग पर चलने वाले) के मार्ग का अनुगामी, प्रतिपत्ति मार्ग का अनुसरण करने वाला, सम्यक् रूप से प्रतिपन्न व्यक्ति अल्पेच्छा आदि गुणों की प्राप्ति से संपूर्ण वट्ट-दुःख (संसार चक्र के दुःख) के क्षय और अंत को प्राप्त कर ले। वैसे बुद्ध या बुद्ध-श्रावक को पंडित (बुद्धिमान) व्यक्ति अपना मित्र बनाए, उनके साथ मैत्री करे, उनकी सेवा करे और उन्हीं की उपासना करे। ඉති ඉමස්මිං වග්ගෙ ඡට්ඨසත්තමසුත්තෙසු විවට්ටං කථිතං, ඉතරෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතං. इस प्रकार इस वर्ग के छठे और सातवें सूत्रों में विवट्ट (निर्वाण) कहा गया है, और अन्यों में वट्ट-विवट्ट (संसार और निर्वाण) कहा गया है। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। චතුත්ථවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चौथे वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। 5. පඤ්චමවග්ගො ५. पाँचवाँ वर्ग 1. අග්ගප්පසාදසුත්තවණ්ණනා १. अग्गप्पसाद सुत्त की व्याख्या 90. පඤ්චමවග්ගස්ස [Pg.268] පඨමෙ අග්ගප්පසාදාති එත්ථ අයං අග්ගසද්දො ආදිකොටිකොට්ඨාසසෙට්ඨෙසු දිස්සති. තථා හෙස ‘‘අජ්ජතග්ගෙ, සම්ම දොවාරික, ආවරාමි ද්වාරං නිගණ්ඨානං නිගණ්ඨීනං (ම. නි. 2.70). අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති (දී. නි. 1.250; පාරා. 15) ච ආදීසු ආදිම්හි දිස්සති. ‘‘තෙනෙව අඞ්ගුලග්ගෙන තං අඞ්ගුලග්ගං පරාමසෙය්ය (කථා. 441). උච්ඡග්ගං වෙළග්ග’’න්ති ච ආදීසු කොටියං. ‘‘අම්බිලග්ගං වා මධුරග්ගං වා තිත්තකග්ගං වා (සං. නි. 5.374). අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, විහාරග්ගෙන වා පරිවෙණග්ගෙන වා භාජෙතු’’න්ති (චූළව. 318) ච ආදීසු කොට්ඨාසෙ. ‘‘අයං ඉමෙසං චතුන්නං පුග්ගලානං අග්ගො ච සෙට්ඨො ච උත්තමො ච පවරො ච (අ. නි. 4.95). අග්ගොහමස්මි ලොකස්සා’’ති ච ආදීසු (දී. නි. 2.31; ම. නි. 3.207) සෙට්ඨෙ. ස්වායමිධාපි සෙට්ඨෙයෙව දට්ඨබ්බො. තස්මා අග්ගෙසු සෙට්ඨෙසු පසාදා, අග්ගභූතා සෙට්ඨභූතා වා පසාදා අග්ගප්පසාදාති අත්ථො. ९०. पाँचवें वर्ग के पहले (सुत्त) में ‘अग्गप्पसादा’ यहाँ यह ‘अग्ग’ शब्द आदि (शुरुआत), कोटि (सिरा), कोष्ठास (भाग) और श्रेष्ठ के अर्थ में देखा जाता है। जैसे कि यह ‘अज्जतग्गे (आज से लेकर), हे द्वारपाल, मैं निगंठों और निगंठियों के लिए द्वार बंद करता हूँ’ और ‘अज्जतग्गे (आज से लेकर) प्राण रहने तक शरण गया हूँ’ आदि में ‘आदि’ के अर्थ में देखा जाता है। ‘उसी अंगुली के अग्र भाग (सिरे) से उस अंगुली के अग्र भाग का स्पर्श करे’, ‘गन्ने का सिरा’, ‘बाँस का सिरा’ आदि में ‘कोटि’ (सिरे) के अर्थ में। ‘खट्टा भाग या मीठा भाग या कड़वा भाग’, ‘भिक्षुओं, मैं अनुमति देता हूँ कि विहार के हिस्से या आँगन के हिस्से के अनुसार बाँटें’ आदि में ‘कोष्ठास’ (भाग) के अर्थ में। ‘यह इन चार पुद्गलों में अग्र, श्रेष्ठ, उत्तम और प्रवर है’, ‘मैं लोक में अग्र हूँ’ आदि में ‘श्रेष्ठ’ के अर्थ में। यहाँ भी इसे ‘श्रेष्ठ’ के अर्थ में ही देखा जाना चाहिए। इसलिए, अग्रों (श्रेष्ठों) में जो प्रसाद (श्रद्धा) है, अथवा जो अग्रभूत या श्रेष्ठभूत प्रसाद है, वह ‘अग्गप्पसाद’ है—यही अर्थ है। පුරිමස්මිඤ්ච අත්ථෙ අග්ගසද්දෙන බුද්ධාදිරතනත්තයං වුච්චති. තෙසු භගවා තාව අසදිසට්ඨෙන, ගුණවිසිට්ඨට්ඨෙන, අසමසමට්ඨෙන ච අග්ගො. සො හි මහාභිනීහාරං දසන්නං පාරමීනං පවිචයඤ්ච ආදිං කත්වා තෙහි බොධිසම්භාරගුණෙහි චෙව බුද්ධගුණෙහි ච සෙසජනෙහි අසදිසොති අසදිසට්ඨෙන අග්ගො. යෙ චස්ස ගුණා මහාකරුණාදයො, තෙ සෙසසත්තානං ගුණෙහි විසිට්ඨාති ගුණවිසිට්ඨට්ඨෙනපි සබ්බසත්තුත්තමතාය අග්ගො. යෙ පන පුරිමකා සම්මාසම්බුද්ධා සබ්බසත්තෙහි අසමා, තෙහි සද්ධිං අයමෙව රූපකායගුණෙහි චෙව ධම්මකායගුණෙහි ච සමොති අසමසමට්ඨෙනපි අග්ගො. තථා දුල්ලභපාතුභාවතො අච්ඡරියමනුස්සභාවතො බහුජනහිතසුඛාවහතො අදුතියඅසහායාදිභාවතො ච භගවා ලොකෙ අග්ගොති වුච්චති. යථාහ – और पूर्वोक्त अर्थ में ‘अग्ग’ शब्द से बुद्ध आदि रत्नत्रय कहे जाते हैं। उनमें भगवान पहले तो अतुलनीय होने के कारण, गुणों में विशिष्ट होने के कारण और असमसम (जिसके समान कोई न हो उसके समान) होने के कारण ‘अग्र’ हैं। वे महाभिनीहार (महान संकल्प) और दस पारमिताओं के चयन को आदि बनाकर उन बोधिसंभार गुणों और बुद्ध गुणों के कारण अन्य लोगों के सदृश नहीं हैं, इसलिए अतुलनीय होने के कारण ‘अग्र’ हैं। और जो उनके महाकरुणा आदि गुण हैं, वे अन्य सत्त्वों के गुणों से विशिष्ट हैं, इसलिए गुण-विशिष्ट होने के कारण भी सभी सत्त्वों में उत्तम होने से ‘अग्र’ हैं। और जो पूर्ववर्ती सम्यक्सम्बुद्ध सभी सत्त्वों के लिए असमान हैं, उनके साथ यह (भगवान) ही रूपकाय के गुणों और धर्मकाय के गुणों में समान हैं, इसलिए ‘असमसम’ होने के कारण भी ‘अग्र’ हैं। इसी प्रकार दुर्लभ प्रादुर्भाव होने से, आश्चर्यजनक मनुष्य होने से, बहुजन के हित और सुख को लाने वाले होने से, और अद्वितीय एवं असहाय (बिना किसी अन्य की सहायता के स्वयं बुद्ध होने) आदि भावों के कारण भगवान लोक में ‘अग्र’ कहे जाते हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘එකපුග්ගලස්ස, භික්ඛවෙ, පාතුභාවො දුල්ලභො ලොකස්මිං, කතමස්ස එකපුග්ගලස්ස? තථාගතස්ස අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස. ‘‘भिक्षुओं, लोक में एक पुद्गल का प्रादुर्भाव दुर्लभ है। किस एक पुद्गल का? तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध का। ‘‘එකපුග්ගලො[Pg.269], භික්ඛවෙ, ලොකෙ උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති අච්ඡරියමනුස්සො. ‘‘भिक्षुओं, लोक में उत्पन्न होता हुआ एक पुद्गल आश्चर्यजनक मनुष्य के रूप में उत्पन्न होता है। ‘‘එකපුග්ගලො, භික්ඛවෙ, ලොකෙ උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති බහුජන…පෙ… සම්මාසම්බුද්ධො. ‘‘भिक्षुओं, लोक में उत्पन्न होता हुआ एक पुद्गल बहुजन... पे... सम्यक्सम्बुद्ध के रूप में उत्पन्न होता है। ‘‘එකපුග්ගලො, භික්ඛවෙ, ලොකෙ උප්පජ්ජමානො උප්පජ්ජති, අදුතියො අසහායො අප්පටිමො අප්පටිසමො අප්පටිභාගො අප්පටිපුග්ගලො අසමො අසමසමො ද්විපදානං අග්ගො. කතමො එකපුග්ගලො? තථාගතො අරහං සම්මාසම්බුද්ධො’’ති (අ. නි. 1.170-172, 174). ‘‘भिक्षुओं, लोक में उत्पन्न होता हुआ एक पुद्गल अद्वितीय, असहाय (अकेला), अप्रतिम, अप्रतिसम, अप्रतिभाग, अप्रतिपुद्गल, असम, असमसम और द्विपदों (मनुष्यों) में अग्र होकर उत्पन्न होता है। वह एक पुद्गल कौन है? तथागत अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध।’’ ධම්මසඞ්ඝාපි අඤ්ඤධම්මසඞ්ඝෙහි අසදිසට්ඨෙන විසිට්ඨගුණතාය දුල්ලභපාතුභාවාදිනා ච අග්ගා. තථා හි තෙසං ස්වාක්ඛාතතාදිසුප්පටිපන්නතාදිගුණවිසෙසෙහි අඤ්ඤධම්මසඞ්ඝා සදිසා අප්පතරනිහීනා වා නත්ථි, කුතො සෙට්ඨා. සයමෙව ච පන තෙහි විසිට්ඨගුණතාය සෙට්ඨා. තථා දුල්ලභුප්පාදඅච්ඡරියභාවබහුජනහිතසුඛාවහා අදුතියඅසහායාදිසභාවා ච තෙ. යදග්ගෙන හි භගවා දුල්ලභපාතුභාවො, තදග්ගෙන ධම්මසඞ්ඝාපීති. අච්ඡරියාදිභාවෙපි එසෙව නයො. එවං අග්ගෙසු සෙට්ඨෙසු උත්තමෙසු පවරෙසු ගුණවිසිට්ඨෙසු පසාදාති අග්ගප්පසාදා. धर्म और संघ भी अन्य धर्मों और संघों से अतुलनीय होने के कारण, विशिष्ट गुणों के कारण और दुर्लभ प्रादुर्भाव आदि के कारण ‘अग्र’ हैं। क्योंकि उनके स्वाख्यातत्व (भली-भाँति कहे गए) और सुप्रतिपन्नत्व (अच्छी तरह मार्ग पर चलने वाले) आदि गुण-विशेषों के समान अन्य धर्म और संघ सदृश या थोड़े भी हीन नहीं हैं, तो श्रेष्ठ कहाँ से होंगे? वे स्वयं ही उन विशिष्ट गुणों के कारण श्रेष्ठ हैं। इसी प्रकार वे दुर्लभ उत्पत्ति वाले, आश्चर्यजनक, बहुजन के हित और सुख को लाने वाले तथा अद्वितीय एवं असहाय स्वभाव वाले हैं। जिस सीमा तक भगवान का प्रादुर्भाव दुर्लभ है, उसी सीमा तक धर्म और संघ का भी। आश्चर्यजनक आदि होने के विषय में भी यही नियम है। इस प्रकार अग्रों, श्रेष्ठों, उत्तमों, प्रवरों और गुण-विशिष्टों में जो प्रसाद (श्रद्धा) है, वे ‘अग्गप्पसाद’ हैं। දුතියස්මිං පන අත්ථෙ යථාවුත්තෙසු අග්ගෙසු බුද්ධාදීසු උප්පත්තියා අග්ගභූතා පසාදා අග්ගප්පසාදා. යෙ පන අරියමග්ගෙන ආගතා අවෙච්චප්පසාදා, තෙ එකන්තෙනෙව අග්ගභූතා පසාදාති අග්ගප්පසාදා. යථාහ ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, අරියසාවකො බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගතො හොතී’’තිආදි (සං. නි. 5.1027). අග්ගවිපාකත්තාපි චෙතෙ අග්ගප්පසාදා. වුත්තඤ්හි ‘‘අග්ගෙ ඛො පන පසන්නානං අග්ගො විපාකො’’ති. दूसरे अर्थ में, पूर्वोक्त बुद्ध आदि श्रेष्ठों में उत्पन्न होने के कारण जो श्रेष्ठ प्रसाद (श्रद्धा) है, वह 'अग्गप्पसाद' (श्रेष्ठ प्रसाद) है। जो आर्यमार्ग से प्राप्त अचल श्रद्धा (अवेच्चप्पसाद) है, वे निश्चित रूप से श्रेष्ठ प्रसाद होने के कारण 'अग्गप्पसाद' हैं। जैसा कि कहा गया है— 'यहाँ, भिक्षुओं, आर्यश्रावक बुद्ध में अचल श्रद्धा से युक्त होता है' इत्यादि (सं. नि. 5.1027)। श्रेष्ठ विपाक (फल) होने के कारण भी ये 'अग्गप्पसाद' हैं। क्योंकि कहा गया है— 'श्रेष्ठ (बुद्ध आदि) में प्रसन्न होने वालों का विपाक भी श्रेष्ठ होता है'। යාවතාති යත්තකා. සත්තාති පාණිනො. අපදාති අපාදකා. ද්විපදාති ද්විපාදකා. සෙසපදද්වයෙපි එසෙව නයො. වා-සද්දො සමුච්චයත්ථො, න විකප්පත්ථො. යථා ‘‘අනුප්පන්නො වා කාමාසවො උප්පජ්ජති, උප්පන්නො වා කාමාසවො පවඩ්ඪතී’’ති (ම. නි. 1.17) එත්ථ අනුප්පන්නො ච උප්පන්නො චාති අත්ථො. යථා ච ‘‘භූතානං වා සත්තානං ඨිතියා සම්භවෙසීනං වා අනුග්ගහායා’’ති [Pg.270] (ම. නි. 1.402; සං. නි. 2.12) එත්ථ භූතානඤ්ච සම්භවෙසීනඤ්චාති අත්ථො. යථා ච ‘‘අග්ගිතො වා උදකතො වා මිථුභෙදතො වා’’ති (දී. නි. 2.152; උදා. 76; මහාව. 286) එත්ථ අග්ගිතො ච උදකතො ච මිථුභෙදතො චාති අත්ථො, එවං ‘‘අපදා වා…පෙ… අග්ගමක්ඛායතී’’ති එත්ථාපි අපදා ච ද්විපදා චාති සම්පිණ්ඩනවසෙන අත්ථො දට්ඨබ්බො. තෙන වුත්තං ‘‘වා-සද්දො සමුච්චයත්ථො, න විකප්පත්ථො’’ති. 'यावता' का अर्थ है जितने। 'सत्ता' का अर्थ है प्राणी। 'अपदा' का अर्थ है बिना पैर वाले। 'द्विपदा' का अर्थ है दो पैर वाले। शेष दो पदों (चतुष्पद और बहुपद) में भी यही नियम है। यहाँ 'वा' शब्द समुच्चय (और) के अर्थ में है, विकल्प के अर्थ में नहीं। जैसे 'अनुत्पन्न वा कामासव उत्पन्न होता है, या उत्पन्न वा कामासव बढ़ता है' (म. नि. 1.17) यहाँ अर्थ 'अनुत्पन्न और उत्पन्न' है। और जैसे 'भूतों (प्राणियों) की स्थिति के लिए वा सम्भवेषियों (उत्पन्न होने वालों) के अनुग्रह के लिए' (म. नि. 1.402; सं. नि. 2.12) यहाँ अर्थ 'भूतों और सम्भवेषियों' का है। और जैसे 'अग्नि से वा जल से वा आपसी भेद से' (दी. नि. 2.152; उदा. 76; महाव. 286) यहाँ अर्थ 'अग्नि से और जल से और आपसी भेद से' है, वैसे ही 'अपदा वा...पे... अग्गमक्खायती' यहाँ भी 'अपदा और द्विपदा' आदि के संग्रह के रूप में अर्थ समझना चाहिए। इसीलिए कहा गया है— 'वा-शब्द समुच्चय के अर्थ में है, विकल्प के अर्थ में नहीं'। රූපිනොති රූපවන්තො. න රූපිනොති අරූපිනො. සඤ්ඤිනොති සඤ්ඤාවන්තො. න සඤ්ඤිනොති අසඤ්ඤිනො. නෙවසඤ්ඤිනාසඤ්ඤිනො නාම භවග්ගපරියාපන්නා. එත්තාවතා ච කාමභවො, රූපභවො, අරූපභවො, එකවොකාරභවො, චතුවොකාරභවො, පඤ්චවොකාරභවො, සඤ්ඤීභවො, අසඤ්ඤීභවො, නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤීභවොති නවවිධෙපි භවෙ සත්තෙ අනවසෙසතො පරියාදියිත්වා දස්සෙසි ධම්මරාජා. එත්ථ හි රූපිග්ගහණෙන කාමභවො රූපභවො පඤ්චවොකාරභවො එකවොකාරභවො ච දස්සිතො, අරූපිග්ගහණෙන අරූපභවො චතුවොකාරභවො ච දස්සිතො. සඤ්ඤීභවාදයො පන සරූපෙනෙව දස්සිතා. අපදාදිග්ගහණෙන කාමභවපඤ්චවොකාරභවසඤ්ඤීභවානං එකදෙසො දස්සිතොති. 'रूपिनो' का अर्थ है रूपवान। 'न रूपिनो' का अर्थ है अरूप (बिना रूप वाले)। 'सञ्ञिनो' का अर्थ है संज्ञावान। 'न सञ्ञिनो' का अर्थ है असंज्ञी। 'नेवसञ्ञिनासञ्ञिनो' नाम वाले भवाग्र (अस्तित्व की उच्चतम सीमा) में सम्मिलित हैं। इतने से धर्मराज (बुद्ध) ने कामभव, रूपभव, अरूपभव, एकवोकारभव, चतुवोकारभव, पञ्चवोकारभव, संज्ञीभव, असंज्ञीभव और नैवसंज्ञी-नासञ्ञीभव—इन नौ प्रकार के भवों में सभी प्राणियों को बिना किसी शेष के सम्मिलित करके दिखाया है। यहाँ 'रूप' के ग्रहण से कामभव, रूपभव, पञ्चवोकारभव और एकवोकारभव को दिखाया गया है, 'अरूप' के ग्रहण से अरूपभव और चतुवोकारभव को दिखाया गया है। संज्ञीभव आदि को तो उनके अपने स्वरूप से ही दिखाया गया है। 'अपदा' आदि के ग्रहण से कामभव, पञ्चवोकारभव और संज्ञीभव के एक अंश को दिखाया गया है। කස්මා පනෙත්ථ යථා අදුතියසුත්තෙ ‘‘ද්විපදානං අග්ගො’’ති ද්විපදානං ගහණමෙව අකත්වා අපදාදිග්ගහණං කතන්ති? වුච්චතෙ – අදුතියසුත්තෙ තාව සෙට්ඨතරවසෙන ද්විපදග්ගහණමෙව කතං. ඉමස්මිඤ්හි ලොකෙ සෙට්ඨො නාම උප්පජ්ජමානො අපදචතුප්පදබහුප්පදෙසු න උප්පජ්ජති, ද්විපදෙසුයෙව උප්පජ්ජති. කතරෙසු ද්විපදෙසු? මනුස්සෙසු චෙව දෙවෙසු ච. මනුස්සෙසු උප්පජ්ජමානො සකලලොකං වසෙ වත්තෙතුං සමත්ථො බුද්ධො හුත්වා උප්පජ්ජති. අඞ්ගුත්තරට්ඨකථායං පන ‘‘තිසහස්සිමහාසහස්සිලොකධාතුං වසෙ වත්තෙතුං සමත්ථො’’ති (අ. නි. අට්ඨ. 1.1.174) වුත්තං. දෙවෙසු උප්පජ්ජමානො දසසහස්සිලොකධාතුං වසෙ වත්තනකො මහාබ්රහ්මා හුත්වා උප්පජ්ජති, සො තස්ස කප්පියකාරකො වා ආරාමිකො වා සම්පජ්ජති. ඉති තතොපි සෙට්ඨතරවසෙනෙස ‘‘ද්විපදානං අග්ගො’’ති තත්ථ වුත්තො, ඉධ පන අනවසෙසපරියාදානවසෙන එවං වුත්තං. යාවත්තකා හි සත්තා අත්තභාවපරියාපන්නා අපදා වා…පෙ… නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤිනො වා, තථාගතො තෙසං [Pg.271] අග්ගමක්ඛායතීති. නිද්ධාරණෙ චෙතං සාමිවචනං, මකාරො පදසන්ධිකරො. අග්ගො අක්ඛායතීති පදවිභාගො. यहाँ दूसरे सूत्र की तरह 'द्विपदां अग्गो' (दो पैर वालों में श्रेष्ठ) ऐसा केवल द्विपदों का ग्रहण न करके 'अपदा' आदि का ग्रहण क्यों किया गया है? उत्तर है— दूसरे सूत्र में तो श्रेष्ठता के आधार पर केवल द्विपदों का ही ग्रहण किया गया है। क्योंकि इस लोक में जो श्रेष्ठ उत्पन्न होता है, वह बिना पैर वाले, चार पैर वाले या बहुत पैर वालों में उत्पन्न नहीं होता, बल्कि द्विपदों (दो पैर वालों) में ही उत्पन्न होता है। किन द्विपदों में? मनुष्यों और देवों में। मनुष्यों में उत्पन्न होते समय वह समस्त लोक को अपने वश में करने में समर्थ बुद्ध होकर उत्पन्न होता है। अंगुत्तर निकाय की अट्ठकथा में तो 'तीन हजार महाहजार लोकधातुओं को वश में करने में समर्थ' कहा गया है। देवों में उत्पन्न होते समय वह दस हजार लोकधातुओं को वश में करने वाला महाब्रह्मा होकर उत्पन्न होता है, जो उनका सेवक या माली जैसा होता है। इस प्रकार वहाँ उससे भी श्रेष्ठता के कारण 'द्विपदां अग्गो' कहा गया है, किन्तु यहाँ बिना किसी शेष के सभी को सम्मिलित करने के लिए ऐसा कहा गया है। जितने भी प्राणी आत्मभाव (अस्तित्व) में सम्मिलित हैं, चाहे वे बिना पैर वाले हों... या नैवसंज्ञी-नासञ्ञी हों, तथागत उनमें श्रेष्ठ कहे जाते हैं। यहाँ 'सत्तानं' में षष्ठी विभक्ति निर्धारण के अर्थ में है, 'म' कार पद-सन्धि करने वाला है। 'अग्गो अक्खायती' यह पद-विच्छेद है। අග්ගො විපාකො හොතීති අග්ගෙ සම්මාසම්බුද්ධෙ පසන්නානං යො පසාදො, සො අග්ගො සෙට්ඨො උත්තමො කොටිභූතො වා, තස්මා තස්ස විපාකොපි අග්ගො සෙට්ඨො උත්තමො කොටිභූතො උළාරතමො පණීතතමො හොති. සො පන පසාදො දුවිධො ලොකියලොකුත්තරභෙදතො. තෙසු ලොකියස්ස තාව – 'अग्गो विपाको होती' का अर्थ है— श्रेष्ठ सम्यक्सम्बुद्ध में प्रसन्न होने वालों का जो प्रसाद (श्रद्धा) है, वह श्रेष्ठ, उत्तम या सर्वोच्च है, इसलिए उसका विपाक (फल) भी श्रेष्ठ, उत्तम, सर्वोच्च, अत्यधिक विशाल और अत्यधिक प्रणीत होता है। वह प्रसाद लौकिक और लोकोत्तर के भेद से दो प्रकार का है। उनमें से लौकिक के विषय में— ‘‘යෙ කෙචි බුද්ධං සරණං ගතාසෙ, න තෙ ගමිස්සන්ති අපායභූමිං; පහාය මානුසං දෙහං, දෙවකායං පරිපූරෙස්සන්ති. (දී. නි. 2.332; සං. නි. 1.37); जो कोई भी बुद्ध की शरण में गए हैं, वे अपाय (दुर्गति) की भूमि में नहीं जाएँगे; मनुष्य देह को छोड़कर, वे देव-निकाय को परिपूर्ण करेंगे। (दी. नि. 2.332; सं. नि. 1.37); ‘‘බුද්ධොති කිත්තයන්තස්ස, කායෙ භවති යා පීති; වරමෙව හි සා පීති, කසිණෙනපි ජම්බුදීපස්ස. 'बुद्ध' इस प्रकार कीर्तन करने वाले के शरीर में जो प्रीति होती है; वह प्रीति पूरे जम्बुद्वीप के (ऐश्वर्य) से भी श्रेष्ठ है। ‘‘සතං හත්ථී සතං අස්සා, සතං අස්සතරී රථා; සතං කඤ්ඤාසහස්සානි, ආමුක්කමණිකුණ්ඩලා; එකස්ස පදවීතිහාරස්ස, කලං නාග්ඝන්ති සොළසිං’’. (සං. නි. 1.242; චූළව. 305); सौ हाथी, सौ घोड़े, सौ खच्चरों वाले रथ; मणिकुंडल पहने हुए एक लाख कन्याएँ; (बुद्ध की ओर बढ़ाए गए) एक कदम के सोलहवें हिस्से के बराबर भी मूल्यवान नहीं हैं। (सं. नि. 1.242; चूलव. 305); ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධං සරණගමනං හොති, බුද්ධං සරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති (සං. නි. 4.341) – हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाना बहुत भला है। हे देवेन्द्र! बुद्ध की शरण में जाने के कारण ही यहाँ कुछ प्राणी शरीर के भेद के बाद, मृत्यु के उपरान्त सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होते हैं। वे अन्य देवों से दस स्थानों में बढ़कर होते हैं— दिव्य आयु से, दिव्य वर्ण से, दिव्य सुख से, दिव्य यश से, दिव्य आधिपत्य से, दिव्य रूपों से, दिव्य शब्दों से, दिव्य गंधों से, दिव्य रसों से और दिव्य स्पर्शों से। (सं. नि. 4.341)— එවමාදීනං සුත්තපදානං වසෙන පසාදස්ස ඵලවිසෙසයොගො වෙදිතබ්බො. තස්මා සො අපායදුක්ඛවිනිවත්තනෙන සද්ධිං සම්පත්තිභවෙසු සුඛවිපාකදායකොති දට්ඨබ්බො. ලොකුත්තරො පන සාමඤ්ඤඵලවිපාකදායකො වට්ටදුක්ඛවිනිවත්තකො ච. සබ්බොපි චායං පසාදො පරම්පරාය වට්ටදුක්ඛං විනිවත්තෙතියෙව. වුත්තඤ්හෙතං – इस प्रकार के सूत्र-पदों के वश से प्रसाद (श्रद्धा) के फल-विशेष का योग समझना चाहिए। इसलिए वह अपाय-दुखों की निवृत्ति के साथ-साथ संपत्ति-भवों (सुगति) में सुखद विपाक देने वाला है, ऐसा देखना चाहिए। किन्तु लोकोत्तर (प्रसाद) श्रामण्य-फल का विपाक देने वाला और संसार-दुख (वट्ठ-दुख) का निवर्तक है। यह सारा ही प्रसाद परम्परा से संसार-दुख को निवृत्त ही करता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘යස්මිං[Pg.272], භික්ඛවෙ, සමයෙ අරියසාවකො අත්තනො සද්ධං අනුස්සරති, නෙවස්ස තස්මිං සමයෙ රාගපරියුට්ඨිතං චිත්තං හොති, න දොසපරියුට්ඨිතං, න මොහපරියුට්ඨිතං චිත්තං හොති, උජුගතමෙවස්ස තස්මිං සමයෙ චිත්තං හොති. උජුගතචිත්තස්ස පාමොජ්ජං ජායති, පමුදිතස්ස පීති ජායති…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති (අ. නි. 6.10; 26). "भिक्षुओं! जिस समय आर्यश्रावक अपनी श्रद्धा का अनुस्मरण करता है, उस समय उसका चित्त न तो राग से अभिभूत होता है, न द्वेष से अभिभूत होता है, न मोह से अभिभूत होता है; उस समय उसका चित्त ऋजु (सीधा) ही होता है। ऋजु चित्त वाले को प्रमोद उत्पन्न होता है, प्रमुदित को प्रीति उत्पन्न होती है... (पेय्याल)... 'इसके बाद अब यहाँ कुछ और करने को शेष नहीं है' ऐसा वह जान लेता है।" (अं. नि. 6.10; 26)। ධම්මාති සභාවධම්මා. සඞ්ඛතාති සමෙච්ච සම්භුය්ය පච්චයෙහි කතාති සඞ්ඛතා, සප්පච්චයධම්මා. හෙතූහි පච්චයෙහි ච න කෙහිචි කතාති අසඞ්ඛතා, අප්පච්චයනිබ්බානං. සඞ්ඛතානං පටියොගිභාවෙන ‘‘අසඞ්ඛතා’’ති පුථුවචනං. විරාගො තෙසං අග්ගමක්ඛායතීති තෙසං සඞ්ඛතාසඞ්ඛතධම්මානං යො විරාගසඞ්ඛාතො අසඞ්ඛතධම්මො, සො සභාවෙනෙව සණ්හසුඛුමභාවතො සන්තතරපණීතතරභාවතො ගම්භීරාදිභාවතො මදනිම්මදනාදිභාවතො ච අග්ගං සෙට්ඨං උත්තමං පවරන්ති වුච්චති. යදිදන්ති නිපාතො, යො අයන්ති අත්ථො. මදනිම්මදනොතිආදීනි සබ්බානි නිබ්බානවෙවචනානියෙව. තථා හි තං ආගම්ම මානමදපුරිසමදාදිකො සබ්බො මදො නිම්මදීයති පමද්දීයති, කාමපිපාසාදිකා සබ්බා පිපාසා විනීයති, කාමාලයාදිකා සබ්බෙපි ආලයා සමුග්ඝාතීයන්ති, සබ්බෙපි කම්මවට්ටකිලෙසවට්ටවිපාකවට්ටා උපච්ඡිජ්ජන්ති, අට්ඨසතභෙදා සබ්බාපි තණ්හා ඛීයති, සබ්බෙපි කිලෙසා විරජ්ජන්ති, සබ්බං දුක්ඛං නිරුජ්ඣති, තස්මා මදනිම්මදනො…පෙ… නිරොධොති වුච්චති. යා පනෙසා තණ්හා භවෙන භවං, ඵලෙන කම්මං විනති සංසිබ්බතීති කත්වා වානන්ති වුච්චති. තං වානං එත්ථ නත්ථි, එතස්මිං වා අධිගතෙ අරියපුග්ගලස්ස න හොතීති නිබ්බානං. 'धम्म' का अर्थ स्वभाव-धर्म है। 'संखत' (संस्कृत) का अर्थ है जो प्रत्ययों के मिलने और एकत्रित होने से बने हैं, वे संखत हैं, सप्रत्यय धर्म हैं। जो किसी भी हेतु और प्रत्यय से नहीं बने हैं, वे 'असंखत' हैं, अप्रत्यय निर्वाण। संखत धर्मों के प्रतिपक्षी होने के कारण 'असंखत' यह पृथक वचन है। 'विराग उनमें श्रेष्ठ कहा जाता है' - उन संखत और असंखत धर्मों में जो विराग-संज्ञक असंखत धर्म है, वह अपने स्वभाव से ही श्लक्ष्ण (कोमल) और सूक्ष्म होने के कारण, अधिक शान्त और अधिक प्रणीत होने के कारण, गम्भीर आदि होने के कारण और मद-मर्दन आदि होने के कारण 'अग्र', 'श्रेष्ठ', 'उत्तम' और 'प्रवर' कहा जाता है। 'यदिदं' एक निपात है, जिसका अर्थ है 'जो यह'। 'मद-निम्मदन' आदि सभी निर्वाण के ही पर्यायवाची हैं। क्योंकि उसे प्राप्त कर मान-मद, पुरुष-मद आदि सभी मद नष्ट हो जाते हैं, प्रमर्दित हो जाते हैं; काम-पिपासा आदि सभी पिपासाएँ विनष्ट हो जाती हैं; काम-आलय आदि सभी आलय (आसक्तियाँ) समूल नष्ट हो जाते हैं; सभी कर्म-वर्त, क्लेश-वर्त और विपाक-वर्त कट जाते हैं; एक सौ आठ प्रकार की सभी तृष्णाएँ क्षीण हो जाती हैं; सभी क्लेश विरक्त हो जाते हैं; सारा दुख निरुद्ध हो जाता है; इसलिए उसे 'मद-निम्मदन' ... (पेय्याल) ... 'निरोध' कहा जाता है। जो यह तृष्णा भव से भव को, फल से कर्म को बुनती है या सीती है, इसलिए उसे 'वान' कहा जाता है। वह 'वान' यहाँ नहीं है, अथवा इसे प्राप्त करने पर आर्यपुद्गल के लिए वह नहीं रहता, इसलिए यह 'निर्वाण' है। අග්ගො විපාකො හොතීති එත්ථාපි – 'अग्र विपाक होता है' - यहाँ भी - ‘‘යෙ කෙචි ධම්මං සරණං ගතාසෙ…පෙ…. (දී. නි. 2.332; සං. නි. 1.37); "जो कोई धर्म की शरण में गए हैं... (पेय्याल)... (दी. नि. 2.332; सं. नि. 1.37); ‘‘ධම්මොති කිත්තයන්තස්ස, කායෙ භවති යා පීති…පෙ…. "'धर्म' का कीर्तन करने वाले के शरीर में जो प्रीति होती है... (पेय्याल)... ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මං සරණගමනං හොති. ධම්මං සරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති (සං. නි. 4.341) – "देवेन्द्र! धर्म की शरण में जाना साधु (श्रेष्ठ) है। देवेन्द्र! धर्म की शरण में जाने के कारण ही यहाँ कुछ लोग... (पेय्याल)... दिव्य स्पर्शों के द्वारा..." (सं. नि. 4.341) - එවමාදීනං [Pg.273] සුත්තපදානං වසෙන ධම්මෙ පසාදස්ස ඵලවිසෙසයොගො වෙදිතබ්බො. එවමෙත්ථ අසඞ්ඛතධම්මවසෙනෙව අග්ගභාවො ආගතො, සබ්බසඞ්ඛතනිස්සරණදස්සනත්ථං අරියමග්ගවසෙනපි අයමත්ථො ලබ්භතෙව. වුත්තඤ්හෙතං – इस प्रकार के सूत्र-पदों के वश से धर्म में प्रसाद के फल-विशेष का योग समझना चाहिए। इस प्रकार यहाँ असंखत धर्म के वश से ही अग्र-भाव आया है, सभी संखत धर्मों से निस्तरण (मुक्ति) दिखाने के लिए आर्य मार्ग के वश से भी यह अर्थ प्राप्त होता ही है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘යාවතා, භික්ඛවෙ, ධම්මා සඞ්ඛතා, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො තෙසං අග්ගමක්ඛායතී’’ති (අ. නි. 4.34). "भिक्षुओं! जितने भी संखत धर्म हैं, उनमें आर्य अष्टांगिक मार्ग अग्र कहा जाता है।" (अं. नि. 4.34)। ‘‘මග්ගානට්ඨඞ්ගිකො සෙට්ඨො’’ති ච. (ධ. ප. 273). और "मार्गों में अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है"। (ध. प. 273)। සඞ්ඝා වා ගණා වාති ජනසමූහසඞ්ඛාතා යාවතා ලොකෙ සඞ්ඝා වා ගණා වා. තථාගතසාවකසඞ්ඝොති අට්ඨඅරියපුග්ගලසමූහසඞ්ඛාතො දිට්ඨිසීලසාමඤ්ඤෙන සංහතො තථාගතස්ස සාවකසඞ්ඝො. තෙසං අග්ගමක්ඛායතීති අත්තනො සීලසමාධිපඤ්ඤාවිමුත්තිආදිගුණවිසෙසෙන තෙසං සඞ්ඝානං අග්ගො සෙට්ඨො උත්තමො පවරොති වුච්චති. යදිදන්ති යානි ඉමානි. චත්තාරි පුරිසයුගානීති යුගළවසෙන පඨමමග්ගට්ඨො පඨමඵලට්ඨොති ඉදමෙකං යුගළං, යාව චතුත්ථමග්ගට්ඨො චතුත්ථඵලට්ඨොති ඉදමෙකං යුගළන්ති එවං චත්තාරි පුරිසයුගානි. අට්ඨ පුරිසපුග්ගලාති පුරිසපුග්ගලවසෙන එකො පඨමමග්ගට්ඨො එකො පඨමඵලට්ඨොති ඉමිනා නයෙන අට්ඨ පුරිසපුග්ගලා. එත්ථ ච පුරිසොති වා පුග්ගලොති වා එකත්ථානි එතානි පදානි, වෙනෙය්යවසෙන පනෙවං වුත්තං. එස භගවතො සාවකසඞ්ඝොති යානිමානි යුගවසෙන චත්තාරි පුරිසයුගානි, පාටෙක්කතො අට්ඨ පුරිසපුග්ගලා, එස භගවතො සාවකසඞ්ඝො. 'संघ या गण' का अर्थ है जन-समूह संज्ञक जितने भी लोक में संघ या गण हैं। 'तथागत का श्रावक संघ' का अर्थ है आठ आर्य पुद्गलों के समूह संज्ञक, दृष्टि और शील की समानता से संगठित तथागत का श्रावक संघ। 'उनमें अग्र कहा जाता है' - अपने शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति आदि गुण-विशेषों के कारण उन संघों में 'अग्र', 'श्रेष्ठ', 'उत्तम' और 'प्रवर' कहा जाता है। 'यदिदं' का अर्थ है 'जो ये'। 'चार पुरुष-युगल' का अर्थ है जोड़ों के रूप में - प्रथम मार्गस्थ और प्रथम फलस्थ, यह एक जोड़ा; इसी प्रकार चौथे मार्गस्थ और चौथे फलस्थ तक, यह एक जोड़ा - इस प्रकार चार पुरुष-युगल। 'आठ पुरुष-पुद्गल' का अर्थ है पुरुष-पुद्गल के रूप में - एक प्रथम मार्गस्थ, एक प्रथम फलस्थ, इस पद्धति से आठ पुरुष-पुद्गल। यहाँ 'पुरुष' या 'पुद्गल' ये शब्द एक ही अर्थ के हैं, विनेय (शिष्यों) के वश से ऐसा कहा गया है। 'यह भगवान का श्रावक संघ है' - जो ये जोड़ों के रूप में चार पुरुष-युगल हैं और पृथक रूप से आठ पुरुष-पुद्गल हैं, यही भगवान का श्रावक संघ है। ආහුනෙය්යොතිආදීසු ආනෙත්වා හුනිතබ්බන්ති ආහුනං, දූරතොපි ආගන්ත්වා සීලවන්තෙසු දාතබ්බන්ති අත්ථො. චතුන්නං පච්චයානමෙතං අධිවචනං. මහප්ඵලභාවකරණතො තං ආහුනං පටිග්ගහෙතුං යුත්තොති ආහුනෙය්යො. අථ වා දූරතොපි ආගන්ත්වා සබ්බං සාපතෙය්යම්පි එත්ථ හුනිතබ්බං, සක්කාදීනම්පි ආහවනං අරහතීති වා ආහවනීයො. යො චායං බ්රාහ්මණානං ආහවනීයො නාම අග්ගි, යත්ථ හුතං මහප්ඵලන්ති තෙසං ලද්ධි, සො චෙ හුතස්ස මහප්ඵලතාය ආහවනීයො, සඞ්ඝොව ආහවනීයො. සඞ්ඝෙ හුතඤ්හි මහප්ඵලං හොති. යථාහ – 'आहुनेय्य' आदि में, लाकर हवन (दान) करने योग्य 'आहुन' है, जिसका अर्थ है दूर से भी आकर शीलवानों को देने योग्य। यह चार प्रत्ययों (चीवर आदि) का पर्यायवाची है। महाफलदायी होने के कारण उस आहुन को ग्रहण करने के योग्य होने से 'आहुनेय्य' है। अथवा दूर से भी आकर अपनी सारी संपत्ति भी यहाँ हवन (दान) करने योग्य है, शक्र (इन्द्र) आदि के आह्वान के योग्य होने से 'आहवनीय' है। और जो यह ब्राह्मणों की 'आहवनीय' नामक अग्नि है, जिसमें हवन करना महाफलदायी है - ऐसी उनकी मान्यता है, यदि वह हवन के महाफलदायी होने के कारण आहवनीय है, तो संघ ही आहवनीय है। क्योंकि संघ में किया गया हवन (दान) ही महाफलदायी होता है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘යො [Pg.274] ච වස්සසතං ජන්තු, අග්ගිං පරිචරෙ වනෙ; එකඤ්ච භාවිතත්තානං, මුහුත්තමපි පූජයෙ; සා එව පූජනා සෙය්යො, යඤ්චෙ වස්සසතං හුත’’න්ති. (ධ. ප. 107); "जो मनुष्य वन में सौ वर्ष तक अग्नि की परिचर्या (सेवा) करे, और जो एक क्षण मात्र के लिए भी भावित-चित्त (आर्य) की पूजा करे; तो वह पूजा ही उस सौ वर्ष के हवन से श्रेष्ठ है।" (ध. प. 107); තයිදං නිකායන්තරෙ ‘‘ආහවනීයො’’ති පදං ඉධ ‘‘ආහුනෙය්යො’’ති ඉමිනා පදෙන අත්ථතො එකං, බ්යඤ්ජනතො පන කිඤ්චිමත්තමෙව නානං, තස්මා එවමත්ථවණ්ණනා කතා. अन्य निकायों में जो 'आहवनीयो' शब्द है, वह यहाँ 'आहुनेय्यो' इस शब्द के साथ अर्थतः एक ही है, किन्तु व्यञ्जन (शब्द-रचना) की दृष्टि से थोड़ा सा ही अन्तर है, इसलिए इस प्रकार अर्थ-वर्णन किया गया है। පාහුනෙය්යොති එත්ථ පන පාහුනං වුච්චති දිසාවිදිසතො ආගතානං පියමනාපානං ඤාතිමිත්තානං අත්ථාය සක්කාරෙන පටියත්තං ආගන්තුකදානං, තම්පි ඨපෙත්වා තෙ තථාරූපෙ පාහුනකෙ සඞ්ඝස්සෙව දාතුං යුත්තං. තථා හෙස එකබුද්ධන්තරෙපි දිස්සති අබ්බොකිණ්ණඤ්ච. අයං පනෙත්ථ පදත්ථො – ‘‘පියමනාපත්තකරෙහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො’’ති එවං පාහුනමස්ස දාතුං යුත්තං, පාහුනඤ්ච පටිග්ගහෙතුං යුත්තොති පාහුනෙය්යො. යෙසං පන පාහවනීයොති පාළි, තෙසං යස්මා සඞ්ඝො පුබ්බකාරං අරහති, තස්මා සඞ්ඝො සබ්බපඨමං ආනෙත්වා එත්ථ හුනිතබ්බන්ති පාහවනීයො, සබ්බප්පකාරෙන වා ආහවනං අරහතීති පාහවනීයො. ස්වායමිධ තෙනෙව අත්ථෙන පාහුනෙය්යොති වුච්චති. 'पाहुनेय्यो' यहाँ 'पाहुन' उसे कहा जाता है जो दिशाओं-विदिशाओं से आए हुए प्रिय और मनभावन ज्ञाति-मित्रों के लिए सत्कारपूर्वक तैयार किया गया आगन्तुक दान है; उसे भी अलग रखकर, उन वैसे पाहुन (उपहारों) को संघ को ही देना उचित है। वैसा ही यह एक बुद्धान्तर में भी दिखाई देता है और अविच्छिन्न है। यहाँ यह पद का अर्थ है - "प्रिय और मनभावन बनाने वाले धर्मों (गुणों) से युक्त होने के कारण" इस प्रकार वह पाहुन (दान) देने के योग्य है, और पाहुन को ग्रहण करने के योग्य है, इसलिए 'पाहुनेय्यो' है। जिनके पाठ में 'पाहवनीयो' है, उनके लिए चूँकि संघ पूर्वकार (प्रथम सत्कार) का पात्र है, इसलिए संघ को सबसे पहले लाकर यहाँ आहुति देनी चाहिए (दान देना चाहिए), इसलिए 'पाहवनीयो' है; अथवा सब प्रकार से आह्वान (लाने) के योग्य होने के कारण 'पाहवनीयो' है। वही यहाँ उसी अर्थ में 'पाहुनेय्यो' कहा गया है। ‘‘දක්ඛිණා’’ති පරලොකං සද්දහිත්වා දාතබ්බදානං, තං දක්ඛිණං අරහති දක්ඛිණාය වා හිතො මහප්ඵලභාවකරණෙන විසොධනතොති දක්ඛිණෙය්යො. උභො හත්ථෙ සිරසි පතිට්ඨපෙත්වා සබ්බලොකෙන කරියමානං අඤ්ජලිකම්මං අරහතීති අඤ්ජලිකරණීයො. අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සාති සබ්බලොකස්ස අසදිසං පුඤ්ඤවිරූහනට්ඨානං. යථා හි රත්තසාලීනං වා යවානං වා විරූහනට්ඨානං ‘‘රත්තසාලික්ඛෙත්තං යවක්ඛෙත්ත’’න්ති වුච්චති, එවං සඞ්ඝො සදෙවකස්ස ලොකස්ස පුඤ්ඤවිරූහනට්ඨානං. සඞ්ඝං නිස්සාය හි ලොකස්ස නානප්පකාරහිතසුඛනිබ්බත්තකානි පුඤ්ඤානි විරූහන්ති, තස්මා සඞ්ඝො අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්ස. ඉධාපි – 'दक्षिणा' परलोक में श्रद्धा रखकर दिया जाने वाला दान है; वह उस दक्षिणा के योग्य है अथवा दक्षिणा के लिए हितकारी है क्योंकि वह उसे महाफलदायी बनाकर शुद्ध करता है, इसलिए 'दक्षिणेय्यो' है। दोनों हाथों को सिर पर रखकर समस्त लोक द्वारा किए जाने वाले अञ्जलि-कर्म (प्रणाम) के योग्य होने के कारण 'अञ्जलिकरणीयो' है। 'अनुत्तरं पुञ्ञक्खेत्तं लोकस्स' का अर्थ है - समस्त लोक के लिए पुण्य की वृद्धि का अतुलनीय स्थान। जैसे लाल शाली (चावल) या जौ के उगने के स्थान को 'रत्तसालिक्खेत्त' या 'यवक्खेत्त' कहा जाता है, वैसे ही संघ देवलोक सहित समस्त लोक के लिए पुण्य की वृद्धि का स्थान है। संघ के आश्रय से ही लोक के लिए अनेक प्रकार के हित और सुख उत्पन्न करने वाले पुण्य फलते-फूलते हैं, इसलिए संघ लोक का अनुत्तर पुण्य-क्षेत्र है। यहाँ भी - ‘‘යෙ කෙචි සඞ්ඝං සරණං ගතාසෙ…පෙ…. (දී. නි. 2.332; සං. නි. 1.37); "जो कोई भी संघ की शरण में गए हैं... पे... (दी. नि. 2.332; सं. नि. 1.37); ‘‘සඞ්ඝොති කිත්තයන්තස්ස, කායෙ භවති යා පීති…පෙ…’’. "'संघ' ऐसा कीर्तन (गुणगान) करने वाले के शरीर में जो प्रीति होती है... पे...।" ‘‘සාධු [Pg.275] ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝං සරණගමනං හොති, සඞ්ඝං සරණගමනහෙතු ඛො දෙවානමින්ද…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති (සං. නි. 4.341) – "हे देवेन्द्र! संघ की शरण में जाना श्रेष्ठ है, संघ की शरण में जाने के कारण ही हे देवेन्द्र! ...पे... दिव्य स्पर्शों से (युक्त होते हैं)" (सं. नि. 4.341) - ආදීනං සුත්තපදානං වසෙන සඞ්ඝෙ පසාදස්ස ඵලවිසෙසයොගො, තෙනස්ස අග්ගතා අග්ගවිපාකතා ච වෙදිතබ්බා. තථා අනුත්තරියපටිලාභො සත්තමභවාදිතො පට්ඨාය වට්ටදුක්ඛසමුච්ඡෙදො අනුත්තරසුඛාධිගමොති එවමාදිඋළාරඵලනිප්ඵාදනවසෙන අග්ගවිපාකතා වෙදිතබ්බා. इन आदि सुत्त-पदों के माध्यम से संघ में प्रसाद (श्रद्धा) के विशेष फल का योग होता है, उससे इसकी अग्रता (श्रेष्ठता) और अग्र-विपाकता (श्रेष्ठ फल) जाननी चाहिए। उसी प्रकार अनुत्तरता की प्राप्ति, सातवें भव आदि से लेकर संसार-दुःख का उच्छेद, अनुत्तर सुख की प्राप्ति - इस प्रकार के उदार (महान) फलों की निष्पत्ति के कारण अग्र-विपाकता जाननी चाहिए। ගාථාසු අග්ගතොති අග්ගෙ රතනත්තයෙ, අග්ගභාවතො වා පසන්නානං. අග්ගං ධම්මන්ති අග්ගසභාවං බුද්ධසුබුද්ධතං ධම්මසුධම්මතං සඞ්ඝසුප්පටිපත්තිං රතනත්තයස්ස අනඤ්ඤසාධාරණං උත්තමසභාවං, දසබලාදිස්වාක්ඛාතතාදිසුප්පටිපන්නතාදිගුණසභාවං වා විජානතං විජානන්තානං. එවං සාධාරණතො අග්ගප්පසාදවත්ථුං දස්සෙත්වා ඉදානි අසාධාරණතො තං විභාගෙන දස්සෙතුං ‘‘අග්ගෙ බුද්ධෙ’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ පසන්නානන්ති අවෙච්චප්පසාදෙන ඉතරප්පසාදෙන ච පසන්නානං අධිමුත්තානං. විරාගූපසමෙති විරාගෙ උපසමෙ ච, සබ්බස්ස රාගස්ස සබ්බෙසං කිලෙසානං අච්චන්තවිරාගහෙතුභූතෙ අච්චන්තඋපසමහෙතුභූතෙ චාති අත්ථො. සුඛෙති වට්ටදුක්ඛක්ඛයභාවෙන සඞ්ඛාරූපසමසුඛභාවෙන ච සුඛෙ. गाथाओं में 'अग्गतो' का अर्थ है - अग्र (श्रेष्ठ) रत्नत्रय में, अथवा श्रेष्ठ होने के कारण प्रसन्न (श्रद्धालु) लोगों के लिए। 'अग्गं धम्मं' का अर्थ है - अग्र स्वभाव वाली बुद्ध की सुबुद्धता, धर्म की सुधर्मता, संघ की सुप्रतिपत्ति, रत्नत्रय के असाधारण उत्तम स्वभाव, अथवा दशबल आदि, स्वाख्यातता आदि और सुप्रतिपन्नता आदि गुणों के स्वभाव को जानने वालों के लिए। इस प्रकार सामान्य रूप से अग्र-प्रसाद के विषय को दिखाकर अब असाधारण रूप से उसे विभागपूर्वक दिखाने के लिए 'अग्गे बुद्धे' आदि कहा गया है। वहाँ 'पसन्नानं' का अर्थ है - अचल श्रद्धा (अवेच्चप्पसाद) और अन्य श्रद्धा से प्रसन्न और अधिमुक्त (समर्पित) लोगों के लिए। 'विरागूपसमे' का अर्थ है - विराग और उपशम में, अर्थात् जो समस्त राग और समस्त क्लेशों के आत्यन्तिक विराग का हेतु और आत्यन्तिक उपशम का हेतु है। 'सुखे' का अर्थ है - संसार-दुःख के क्षय होने के कारण और संस्कारों के उपशम रूपी सुख होने के कारण सुख में। අග්ගස්මිං දානං දදතන්ති අග්ගෙ රතනත්තයෙ දානං දෙන්තානං දෙය්යධම්මං පරිච්චජන්තානං. තත්ථ ධරමානං භගවන්තං චතූහි පච්චයෙහි උපට්ඨහන්තා පූජෙන්තා සක්කරොන්තා පරිනිබ්බුතඤ්ච භගවන්තං උද්දිස්ස ධාතුචෙතියාදිකෙ උපට්ඨහන්තා පූජෙන්තා සක්කරොන්තා බුද්ධෙ දානං දදන්ති නාම. ‘‘ධම්මං පූජෙස්සාමා’’ති ධම්මධරෙ පුග්ගලෙ චතූහි පච්චයෙහි උපට්ඨහන්තා පූජෙන්තා සක්කරොන්තා ධම්මඤ්ච චිරට්ඨිතිකං කරොන්තා ධම්මෙ දානං දදන්ති නාම. තථා අරියසඞ්ඝං චතූහි පච්චයෙහි උපට්ඨහන්තා පූජෙන්තා සක්කරොන්තා තං උද්දිස්ස ඉතරස්මිම්පි තථා පටිපජ්ජන්තා සඞ්ඝෙ දානං දදන්ති නාම. අග්ගං පුඤ්ඤං පවඩ්ඪතීති එවං රතනත්තයෙ පසන්නෙන චෙතසා උළාරං පරිච්චාගං උළාරඤ්ච පූජාසක්කාරං පවත්තෙන්තානං දිවසෙ දිවසෙ අග්ගං උළාරං කුසලං උපචීයති. ඉදානි තස්ස පුඤ්ඤස්ස අග්ගවිපාකතාය අග්ගභාවං දස්සෙතුං ‘‘අග්ගං ආයූ’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ අග්ගං ආයූති දිබ්බං වා මානුසං වා අග්ගං උළාරතමං ආයු. පවඩ්ඪතීති උපරූපරි බ්රූහති. වණ්ණොති රූපසම්පදා. යසොති [Pg.276] පරිවාරසම්පදා. කිත්තීති ථුතිඝොසො. සුඛන්ති කායිකං චෙතසිකඤ්ච සුඛං. බලන්ති කායබලං ඤාණබලඤ්ච. 'अग्गस्मिं दानं ददतं' का अर्थ है - श्रेष्ठ रत्नत्रय में दान देने वालों के लिए, देय-वस्तुओं का परित्याग करने वालों के लिए। वहाँ वर्तमान (जीवित) भगवान की चार प्रत्ययों (आवश्यकताओं) से सेवा, पूजा और सत्कार करने वाले, तथा परिनिर्वृत्त भगवान के उद्देश्य से धातु-चैत्य आदि की सेवा, पूजा और सत्कार करने वाले 'बुद्ध को दान देते हैं' ऐसा कहा जाता है। "हम धर्म की पूजा करेंगे" ऐसा कहकर धर्मधर व्यक्तियों की चार प्रत्ययों से सेवा, पूजा और सत्कार करने वाले तथा धर्म को चिरस्थायी बनाने वाले 'धर्म को दान देते हैं' ऐसा कहा जाता है। उसी प्रकार आर्य संघ की चार प्रत्ययों से सेवा, पूजा और सत्कार करने वाले तथा उसके उद्देश्य से दूसरों के प्रति भी वैसा ही व्यवहार करने वाले 'संघ को दान देते हैं' ऐसा कहा जाता है। 'अग्गं पुञ्ञं पवड्ढति' का अर्थ है - इस प्रकार रत्नत्रय में प्रसन्न चित्त से उदार परित्याग और उदार पूजा-सत्कार करने वालों का दिन-प्रतिदिन श्रेष्ठ और उदार कुशल (पुण्य) संचित होता है। अब उस पुण्य की अग्र-विपाकता के कारण उसकी श्रेष्ठता दिखाने के लिए 'अग्गं आयू' आदि कहा गया है। वहाँ 'अग्गं आयू' का अर्थ है - दिव्य या मानवीय श्रेष्ठ और अत्यन्त उदार आयु। 'पवड्ढति' का अर्थ है - उत्तरोत्तर बढ़ती है। 'वण्णो' का अर्थ है - रूप-सम्पदा। 'यसो' का अर्थ है - परिवार-सम्पदा (अनुयायियों की सम्पन्नता)। 'कित्ती' का अर्थ है - स्तुति का घोष (यश)। 'सुखं' का अर्थ है - कायिक और चैतसिक सुख। 'बलं' का अर्थ है - काय-बल और ज्ञान-बल। අග්ගස්ස දාතාති අග්ගස්ස රතනත්තයස්ස දාතා, අථ වා අග්ගස්ස දෙය්යධම්මස්ස දානං උළාරං කත්වා තත්ථ පුඤ්ඤං පවත්තෙතා. අග්ගධම්මසමාහිතොති අග්ගෙන පසාදධම්මෙන දානාදිධම්මෙන ච සමාහිතො සමන්නාගතො අචලප්පසාදයුත්තො, තස්ස වා විපාකභූතෙහි බහුජනස්ස පියමනාපතාදිධම්මෙහි යුත්තො. අග්ගප්පත්තො පමොදතීති යත්ථ යත්ථ සත්තනිකායෙ උප්පන්නො, තත්ථ තත්ථ අග්ගභාවං සෙට්ඨභාවං අධිගතො, අග්ගභාවං වා ලොකුත්තරමග්ගඵලං අධිගතො පමොදති අභිරමති පරිතුස්සතීති. 'अग्गस्स दाता' (श्रेष्ठ का दाता) का अर्थ है श्रेष्ठ रत्नत्रय को देने वाला, अथवा श्रेष्ठ देयधर्म का दान उदारतापूर्वक करके उसमें पुण्य को प्रवृत्त करने वाला। 'अग्गधम्मसमाहितो' का अर्थ है श्रेष्ठ प्रसाद-धर्म (श्रद्धा) और दानादि धर्मों से युक्त, अचल प्रसाद से युक्त, अथवा उसके विपाक स्वरूप बहुजन के प्रिय और मनभावन आदि धर्मों से युक्त। 'अग्गप्पत्तो पमोदति' का अर्थ है जहाँ-जहाँ सत्त्व-निकाय में उत्पन्न होता है, वहाँ-वहाँ श्रेष्ठ भाव या प्रधान भाव को प्राप्त करता है, अथवा श्रेष्ठ भाव रूप लोकोत्तर मार्ग-फल को प्राप्त कर प्रसन्न होता है, अभिराम करता है, परितुष्ट होता है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 2. ජීවිකසුත්තවණ්ණනා २. जीविका सूत्र की व्याख्या। 91. දුතියං අට්ඨුප්පත්තිවසෙන දෙසිතං. එකස්මිඤ්හි සමයෙ භගවති කපිලවත්ථුස්මිං නිග්රොධාරාමෙ විහරන්තෙ භික්ඛූ ආගන්තුකභික්ඛූනං සෙනාසනානි පඤ්ඤාපෙන්තා පත්තචීවරානි පටිසාමෙන්තා සාමණෙරා ච ලාභභාජනීයට්ඨානෙ සම්පත්තසම්පත්තානං ලාභං ගණ්හන්තා උච්චාසද්දා මහාසද්දා අහෙසුං. තං සුත්වා භගවා භික්ඛූ පණාමෙසි. තෙ කිර සබ්බෙව නවා අධුනාගතා ඉමං ධම්මවිනයං. තං ඤත්වා මහාබ්රහ්මා ආගන්ත්වා ‘‘අභිනන්දතු, භන්තෙ, භගවා භික්ඛුසඞ්ඝ’’න්ති (ම. නි. 2.158) තෙසං පණාමිතභික්ඛූනං අනුග්ගණ්හනං යාචි. භගවා තස්ස ඔකාසං අකාසි. අථ මහාබ්රහ්මා ‘‘කතාවකාසො ඛොම්හි භගවතා’’ති භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ භගවා ‘‘භික්ඛුසඞ්ඝො ආගච්ඡතූ’’ති ආනන්දත්ථෙරස්ස ආකාරං දස්සෙසි. අථ තෙ භික්ඛූ ආනන්දත්ථෙරෙන පක්කොසිතා භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා සාරජ්ජමානරූපා එකමන්තං නිසීදිංසු. භගවා තෙසං සප්පායදෙසනං වීමංසන්තො ‘‘ඉමෙ ආමිසහෙතු පණාමිතා, පිණ්ඩියාලොපධම්මදෙසනා නෙසං සප්පායා’’ති චින්තෙත්වා ‘‘අන්තමිදං, භික්ඛවෙ’’ති ඉමං දෙසනං දෙසෙසි. ९१. दूसरा (सूत्र) उत्पत्ति के कारण (अट्ठुप्पत्ति) से देशित किया गया है। एक समय जब भगवान कपिलवस्तु के निग्रोधाराम में विहार कर रहे थे, तब भिक्षु आगन्तुक भिक्षुओं के लिए शयनासन बिछाते हुए, पात्र-चीवर व्यवस्थित करते हुए और सामणेर लाभ-भाजन (वितरण) के स्थान पर प्राप्त लाभ को ग्रहण करते हुए ऊँचे शब्द और महाशब्द (शोर) कर रहे थे। उसे सुनकर भगवान ने भिक्षुओं को निकाल दिया (प्रणाशित किया)। वे सभी इस धर्म-विनय में अभी-अभी आए हुए नए थे। यह जानकर महाब्रह्मा ने आकर "भन्ते! भगवान भिक्षु संघ का अभिनन्दन करें" (म. नि. 2.158) - उन निकाले गए भिक्षुओं पर अनुग्रह करने की याचना की। भगवान ने उसे अवसर दिया। तब महाब्रह्मा "भगवान ने मुझे अवसर दिया है" ऐसा सोचकर भगवान का अभिवादन और प्रदक्षिणा कर चले गए। तब भगवान ने "भिक्षु संघ आए" ऐसा आनन्द स्थविर को संकेत दिया। तब वे भिक्षु आनन्द स्थविर द्वारा बुलाए जाने पर भगवान के पास आकर लज्जित भाव से एक ओर बैठ गए। भगवान ने उनके लिए उपयुक्त देशना का विचार करते हुए सोचा - "ये आमिष (भौतिक वस्तुओं) के कारण निकाले गए हैं, इनके लिए पिण्डपात (भिक्षा) के ग्रास सम्बन्धी धर्म-देशना उपयुक्त है", ऐसा सोचकर "अन्तममिदं, भिक्खवे" (भिक्षुओं! यह निकृष्ट है) - यह देशना दी। තත්රායං [Pg.277] අන්තසද්දො ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, එකෙ සමණබ්රාහ්මණා පුබ්බන්තකප්පිකා පුබ්බන්තානුදිට්ඨිනො’’තිආදීසු (දී. නි. 1.29) කොට්ඨාසෙ ආගතො. ‘‘අන්තමකාසි දුක්ඛස්ස, අන්තවා අයං ලොකො පරිවටුමො’’තිආදීසු (දී. නි. 1.55) පරිච්ඡෙදෙ. ‘‘හරිතන්තං වා පථන්තං වා සෙලන්තං වා’’තිආදීසු (ම. නි. 1.304) මරියාදායං. ‘‘අන්තං අන්තගුණ’’න්තිආදීසු (දී. නි. 2.377; ඛු. පා. 3.ද්වත්තිංසාකාර) සරීරාවයවෙ ‘‘චරන්ති ලොකෙ පරිවාරඡන්නා, අන්තො අසුද්ධා බහි සොභමානා’’තිආදීසු (සං. නි. 1.122; මහානි. 191) චිත්තෙ. ‘‘අප්පෙකච්චානි උප්පලානි වා පදුමානි වා පුණ්ඩරීකානි වා උදකෙ ජාතානි උදකෙ සංවඩ්ඪානි උදකානුග්ගතානි අන්තො නිමුග්ගපොසීනී’’තිආදීසු (දී. නි. 2.69; සං. නි. 1.172; මහාව. 9) අබ්භන්තරෙ. वहाँ यह 'अन्त' शब्द - "भिक्षुओं! कुछ श्रमण-ब्राह्मण पूर्वान्त-कल्पित (भूतकाल के बारे में कल्पना करने वाले) और पूर्वान्त-अनुदृष्टि वाले हैं" इत्यादि (दी. नि. 1.29) में 'भाग' (कोष्ठस) के अर्थ में आया है। "दुःख का अन्त किया, यह लोक अन्तवान (सीमित) है" इत्यादि (दी. नि. 1.55) में 'परिच्छेद' (सीमा/समाप्ति) के अर्थ में। "घास की सीमा या मार्ग की सीमा या पत्थर की सीमा" इत्यादि (म. नि. 1.304) में 'मर्यादा' (सीमा) के अर्थ में। "आँत और आँत की झिल्ली" इत्यादि (दी. नि. 2.377; खु. पा. 3.द्वत्तिंसाकार) में 'शरीर के अवयव' के अर्थ में। "लोक में परिवार से ढके हुए विचरते हैं, भीतर (अन्तः) अशुद्ध और बाहर शोभित" इत्यादि (सं. नि. 1.122; महानि. 191) में 'चित्त' के अर्थ में। "कुछ उत्पल, पद्म या पुण्डरीक जल में उत्पन्न, जल में संवर्धित और जल से ऊपर न उठकर भीतर (अन्तः) ही डूबे रहकर पोषित होते हैं" इत्यादि (दी. नि. 2.69; सं. नि. 1.172; महाव. 9) में 'अभ्यन्तर' (भीतर) के अर्थ में। ‘‘මිගානං කොට්ඨුකො අන්තො, පක්ඛීනං පන වායසො; එරණ්ඩො අන්තො රුක්ඛානං, තයො අන්තා සමාගතා’’ති. (ජා. 1.3.135) – "मृगों (पशुओं) में सियार नीच (अन्त) है, पक्षियों में कौआ; वृक्षों में एरण्ड नीच है, ये तीन 'अन्त' (नीच) एक साथ आए हैं।" (जा. 1.3.135) – ආදීසු ලාමකෙ. ඉධාපි ලාමකෙ එව දට්ඨබ්බො. තස්මා අන්තමිදං භික්ඛවෙ ජීවිකානන්ති භික්ඛවෙ ඉදං ජීවිකානං අන්තං පච්ඡිමං ලාමකං, සබ්බනිහීනං ජීවිතන්ති අත්ථො. යදිදං පිණ්ඩොල්යන්ති යං ඉදං පිණ්ඩපරියෙසනෙන භික්ඛාචරියාය ජීවිකං කප්පෙන්තස්ස ජීවිතං. අයං පනෙත්ථ පදත්ථො – පිණ්ඩාය උලතීති පිණ්ඩොලො, තස්ස කම්මං පිණ්ඩොල්යං, පිණ්ඩපරියෙසනෙන ජීවිකාති අත්ථො. इत्यादि में 'नीच' (लामक) के अर्थ में है। यहाँ भी इसे 'नीच' के अर्थ में ही देखना चाहिए। इसलिए "भिक्षुओं! यह जीविकाओं में अन्त (नीच) है" का अर्थ है - भिक्षुओं! यह जीविकाओं में अन्तिम, नीच और सबसे निकृष्ट जीवन है। "यदिदं पिण्डोल्यं" का अर्थ है - जो यह पिण्ड-पर्येषण (भिक्षा-खोज) द्वारा भिक्षाचर्या से जीविका चलाने वाले का जीवन है। यहाँ यह पद-अर्थ है - पिण्ड (भिक्षा) के लिए जो भटकता है वह 'पिण्डोल' है, उसका कर्म 'पिण्डोल्य' है, अर्थात् पिण्ड-पर्येषण द्वारा जीविका। අභිසාපොති අක්කොසො. කුපිතා හි මනුස්සා අත්තනො පච්චත්ථිකං ‘‘පිලොතිකඛණ්ඩං නිවාසෙත්වා කපාලහත්ථො පිණ්ඩං පරියෙසමානො චරෙය්යාසී’’ති අක්කොසන්ති. අථ වා ‘‘කිං තුය්හං අකාතබ්බං අත්ථි, යො ත්වං එවං බලවීරියූපපන්නොපි හිරොත්තප්පං පහාය කපණො පිණ්ඩොලො විචරසි පත්තපාණී’’ති එවම්පි අක්කොසන්තියෙව. තඤ්ච ඛො එතන්ති තං එතං අභිසපම්පි සමානං පිණ්ඩොල්යං. කුලපුත්තා උපෙන්ති අත්ථවසිකාති මම සාසනෙ ජාතිකුලපුත්තා ච ආචාරකුලපුත්තා ච අත්ථවසිකා කාරණවසිකා හුත්වා කාරණවසං පටිච්ච උපෙන්ති උපගච්ඡන්ති. 'अभिसापो' का अर्थ है आक्रोश (गाली/निन्दा)। क्रुद्ध मनुष्य अपने शत्रु को "चिथड़े पहनकर और हाथ में खप्पर लेकर भिक्षा माँगते हुए फिरो" - ऐसा कहकर कोसते हैं। अथवा "तुम्हारे लिए क्या करना शेष है, जो तुम इतने बल-वीर्य से युक्त होकर भी ह्री-ओत्तप्प (लज्जा-भय) को त्यागकर हाथ में पात्र लिए हुए दरिद्र भिक्षुक (पिण्डोल) बनकर विचरते हो" - इस प्रकार भी कोसते ही हैं। "तं च खो एतं" का अर्थ है - वह यह अभिशाप (निन्दा) के समान होते हुए भी पिण्डोल्य (भिक्षाचर्या) है। "कुलपुत्ता उपेन्ति अत्थवसिका" का अर्थ है - मेरे शासन में जाति-कुलपुत्र और आचार-कुलपुत्र 'अर्थवश' (कारणवश) होकर, कारण के आश्रित होकर (प्रव्रज्या को) प्राप्त करते हैं। රාජාභිනීතාතිආදීසු යෙ රඤ්ඤො සන්තකං ඛාදිත්වා රඤ්ඤා බන්ධනාගාරෙ බන්ධාපිතා පලායිත්වා පබ්බජන්ති, තෙ රඤ්ඤා බන්ධනං අභිනීතත්තා රාජාභිනීතා නාම. යෙ පන චොරෙහි අටවියං ගහෙත්වා එකච්චෙසු මාරියමානෙසු [Pg.278] එකච්චෙ ‘‘මයං සාමි තුම්හෙහි විස්සට්ඨා ගෙහං අනජ්ඣාවසිත්වා පබ්බජිස්සාම, තත්ථ තත්ථ යං යං බුද්ධපූජාදිපුඤ්ඤං කරිස්සාම, තතො තතො තුම්හාකං පත්තිං දස්සාමා’’ති තෙහි විස්සට්ඨා පබ්බජන්ති, තෙ චොරාභිනීතා නාම චොරෙහි මාරෙතබ්බතං අභිනීතත්තා. යෙ පන ඉණං ගහෙත්වා පටිදාතුං අසක්කොන්තා පලායිත්වා පබ්බජන්ති, තෙ ඉණට්ටා නාම. තඤ්ච ඛො එතං පිණ්ඩොල්යං කුලපුත්තා මම සාසනෙ නෙව රාජාභිනීතා…පෙ… න ආජීවිකාපකතා උපෙන්ති, අපිච ඛො ‘‘ඔතිණ්ණම්හා ජාතියා…පෙ… පඤ්ඤායෙථා’’ති උපෙන්තීති පදසම්බන්ධො. 'राजाभिनीता' इत्यादि में - जो राजा का धन खाकर राजा द्वारा कारागार में बन्द किए गए और वहाँ से भागकर प्रव्रजित होते हैं, वे राजा द्वारा बन्धन में लाए जाने के कारण 'राजाभिनीत' कहलाते हैं। जो चोरों द्वारा वन में पकड़ लिए गए और कुछ के मारे जाने पर कुछ यह कहकर छोड़ दिए गए कि "स्वामी! हम आपके द्वारा छोड़े जाने पर घर न बसकर प्रव्रजित हो जाएँगे और वहाँ-वहाँ जो बुद्ध-पूजा आदि पुण्य करेंगे, उसका फल आपको देंगे", वे चोरों द्वारा मारे जाने की स्थिति में लाए जाने के कारण 'चोराभिनीत' कहलाते हैं। जो ऋण लेकर उसे चुकाने में असमर्थ होने पर भागकर प्रव्रजित होते हैं, वे 'ऋणार्त' (इणट्टा) कहलाते हैं। और वह यह पिण्डोल्य (भिक्षाचर्या) है जिसे कुलपुत्र मेरे शासन में न तो राजा द्वारा विवश किए जाने पर...पे... न ही आजीविका के लिए अपनाते हैं, बल्कि "हम जाति (जन्म) से घिरे हुए हैं...पे... (दुःख का अन्त) ज्ञात हो सके" - इस कारण से अपनाते हैं, ऐसा पद-सम्बन्ध है। තත්ථ ඔතිණ්ණම්හාති ඔතිණ්ණා අම්හා. ජාතියාතිආදීසු තම්හි තම්හි සත්තනිකායෙ ඛන්ධානං පඨමාභිනිබ්බත්ති ජාති, පරිපාකො ජරා, භෙදො මරණං. ඤාතිරොගභොගසීලදිට්ඨිබ්යසනෙහි ඵුට්ඨස්ස සන්තාපො අන්තො නිජ්ඣානං සොකො, තෙහි ඵුට්ඨස්ස වචීවිප්පලාපො පරිදෙවො. අනිට්ඨඵොට්ඨබ්බපටිහතකායස්ස කායපීළනං දුක්ඛං, ආඝාතවත්ථූසු උපහතචිත්තස්ස චෙතොපීළනං දොමනස්සං. ඤාතිබ්යසනාදීහි එව ඵුට්ඨස්ස පරිදෙවෙනපි අධිවාසෙතුං අසමත්ථස්ස චිත්තසන්තාපසමුට්ඨිතො භුසො ආයාසො උපායාසො. එතෙහි ජාතිආදීහි ඔතිණ්ණා දුක්ඛොතිණ්ණා, තෙහි ජාතිආදිදුක්ඛෙහි අන්තො අනුපවිට්ඨා. දුක්ඛපරෙතාති තෙහි දුක්ඛදුක්ඛවත්ථූහි අභිභූතා. ජාතිආදයො හි දුක්ඛස්ස වත්ථුභාවතො දුක්ඛා, දුක්ඛභාවතො ච සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා දුක්ඛාති. අප්පෙව නාම…පෙ… පඤ්ඤායෙථාති ඉමස්ස සකලස්ස වට්ටදුක්ඛරාසිස්ස පරිච්ඡෙදකරණං ඔසානකිරියා අපි නාම පඤ්ඤායෙය්ය. वहाँ 'ओतिण्णम्हा' का अर्थ है 'हम उतरे हुए हैं'। 'जाति' आदि में, उस-उस सत्त्व-निकाय में स्कन्धों की प्रथम उत्पत्ति 'जाति' है, परिपाक 'जरा' है, और भेद (विनाश) 'मरण' है। ज्ञाति, रोग, भोग, शील और दृष्टि के व्यसनों (विपत्तियों) से प्रभावित व्यक्ति का संताप, जो भीतर ही भीतर जलना है, 'शोक' है; उनसे प्रभावित व्यक्ति का वाणी से विलाप करना 'परिदेव' है। अनिष्ट स्पर्श से आहत शरीर की शारीरिक पीड़ा 'दुःख' है; आघात के विषयों में उपहत चित्त की मानसिक पीड़ा 'दौर्मनस्य' है। ज्ञाति-व्यसन आदि से ही प्रभावित, जो विलाप के द्वारा भी सहन करने में असमर्थ है, उसके चित्त-संताप से उत्पन्न अत्यधिक थकावट 'उपायास' है। इन जाति आदि में उतरे हुए 'दुःखोतिण्ण' हैं, अर्थात् उन जाति आदि दुःखों के भीतर प्रविष्ट हैं। 'दुःखपरेता' का अर्थ है उन दुःख और दुःख के कारणों से अभिभूत। जाति आदि दुःख के आधार होने के कारण दुःख हैं, और शोक, परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास स्वभाव से ही दुःख हैं। 'अप्पेव नाम... पे... पञ्ञायेथा' का अर्थ है कि इस सम्पूर्ण संसार-चक्र के दुःख-राशि का अन्त करना शायद जाना जा सके। සො ච හොති අභිජ්ඣාලූති ඉදං යො කුලපුත්තො ‘‘දුක්ඛස්සන්තං කරිස්සාමී’’ති පුබ්බෙ චිත්තං උප්පාදෙත්වා පබ්බජිතො අපරභාගෙ තං පබ්බජ්ජං තථාරූපං කාතුං න සක්කොති, තං දස්සෙතුං වුත්තං. තත්ථ අභිජ්ඣාලූති පරභණ්ඩානං අභිජ්ඣායිතා. තිබ්බසාරාගොති බලවරාගො. බ්යාපන්නචිත්තොති බ්යාපාදෙන පූතිභූතත්තා විපන්නචිත්තො. පදුට්ඨමනසඞ්කප්පොති තිඛිණසිඞ්ගො විය චණ්ඩගොණො පරෙසං උපඝාතවසෙන දුට්ඨචිත්තො. මුට්ඨස්සතීති භත්තනික්ඛිත්තකාකො විය, මංසනික්ඛිත්තසුනඛො විය ච නට්ඨස්සති, ඉධ කතං එත්ථ න සරති. අසම්පජානොති නිප්පඤ්ඤො ඛන්ධාදිපරිච්ඡෙදරහිතො. අසමාහිතොති චණ්ඩසොතෙ බද්ධනාවා විය අසණ්ඨිතො. විබ්භන්තචිත්තොති පන්ථාරුළ්හමිගො විය භන්තමනො. පාකතින්ද්රියොති යථා ගිහී [Pg.279] සංවරාභාවෙන පරිග්ගහපරිජනෙ ඔලොකෙන්ති අසංවුතින්ද්රියා, එවං අසංවුතින්ද්රියො හොති. वह 'अभिद्धालु' (लोभी) होता है - यह उस कुलपुत्र को दिखाने के लिए कहा गया है, जिसने पहले 'मैं दुःख का अन्त करूँगा' ऐसा चित्त उत्पन्न कर प्रव्रज्या ग्रहण की, किन्तु बाद में उस प्रव्रज्या को वैसा (सार्थक) बनाने में समर्थ नहीं हुआ। वहाँ 'अभिद्धालु' का अर्थ है दूसरों की वस्तुओं का लोभ करने वाला। 'तिब्बसारोगो' का अर्थ है प्रबल राग वाला। 'ब्यापन्नचित्तो' का अर्थ है द्वेष के कारण दूषित चित्त वाला। 'पदुट्ठमनसङ्कप्पो' का अर्थ है तीखे सींग वाले क्रोधी बैल की तरह दूसरों के विनाश की इच्छा से दूषित चित्त वाला। 'मुट्ठस्सती' का अर्थ है भात पर झपटने वाले कौवे की तरह या मांस पर झपटने वाले कुत्ते की तरह नष्ट स्मृति वाला; यहाँ किया हुआ कार्य उसे याद नहीं रहता। 'असम्पजानो' का अर्थ है प्रज्ञाहीन, स्कन्ध आदि के ज्ञान से रहित। 'असमाहितो' का अर्थ है तीव्र धारा में बँधी नाव की तरह अस्थिर। 'विब्भन्तचित्तो' का अर्थ है मार्ग पर आए हिरण की तरह भटके हुए मन वाला। 'पाकतन्द्रियो' का अर्थ है जैसे गृहस्थ संवर के अभाव में परिजनों को देखते हैं, वैसे ही असंयत इन्द्रियों वाला होता है। ඡවාලාතන්ති ඡවානං දඩ්ඪට්ඨානෙ අලාතං. උභතොපදිත්තං මජ්ඣෙ ගූථගතන්ති පමාණෙන අට්ඨඞ්ගුලමත්තං උභතො ද්වීසු කොටීසු ආදිත්තං මජ්ඣෙ ගූථමක්ඛිතං. නෙව ගාමෙති සචෙ හි තං යුගනඞ්ගලගොපානසිපක්ඛපාසකාදීනං අත්ථාය උපනෙතුං සක්කා අස්ස ගාමෙ කට්ඨත්ථං ඵරෙය්ය. සචෙ ඛෙත්තකුටියා කට්ඨත්ථරමඤ්චකාදීනං අත්ථාය උපනෙතුං සක්කා අස්ස, අරඤ්ඤෙ කට්ඨත්ථං ඵරෙය්ය. යස්මා පන උභයත්ථාපි න සක්කා, තස්මා එවං වුත්තං. තථූපමාහන්ති තථූපමං ඡවාලාතසදිසං අහං ඉමං යථාවුත්තපුග්ගලං වදාමි. ගිහිභොගා ච පරිහීනොති යො අගාරෙ වසන්තෙහි ගිහීහි දායජ්ජෙ භාජියමානෙ අඤ්ඤථා ච භොගො ලද්ධබ්බො අස්ස, තතො ච පරිහීනො. සාමඤ්ඤත්ථඤ්චාති ආචරියුපජ්ඣායානං ඔවාදෙ ඨත්වා පරියත්තිපටිවෙධවසෙන පත්තබ්බං සාමඤ්ඤත්ථඤ්ච න පරිපූරෙති. ඉමං පන උපමං සත්ථා න දුස්සීලස්ස වසෙන ආහරි, පරිසුද්ධසීලස්ස පන අලසස්ස අභිජ්ඣාදීහි දොසෙහි දූසිතචිත්තස්ස පුග්ගලස්ස වසෙන ආහරීති වෙදිතබ්බං. 'छवालात' का अर्थ है श्मशान की जलती हुई लकड़ी। 'दोनों ओर से जलती हुई और बीच में विष्ठा से सनी हुई' का अर्थ है लगभग आठ अंगुल की लकड़ी जो दोनों सिरों से जल रही है और बीच में मल से लिपटी है। 'न गाँव में' का अर्थ है कि यदि वह जुआ, हल, बल्ली या खूँटी आदि के काम आ सकती, तो गाँव में लकड़ी के रूप में उपयोग की जाती। यदि वह खेत की कुटिया के लिए बिछौने या मंच आदि के काम आ सकती, तो अरण्य में लकड़ी के रूप में उपयोग की जाती। चूँकि वह दोनों ही जगह काम नहीं आ सकती, इसलिए ऐसा कहा गया है। 'तथूपमाहं' का अर्थ है मैं इस पूर्वोक्त व्यक्ति को उस श्मशान की लकड़ी के समान कहता हूँ। 'गृहस्थ भोगों से वंचित' का अर्थ है जो घर में रहने वाले गृहस्थों को मिलने वाले उत्तराधिकार या अन्य लाभों से वंचित हो गया है। 'श्रमण-फल' का अर्थ है आचार्य और उपाध्याय के उपदेश में स्थित होकर अध्ययन और साक्षात्कार के द्वारा प्राप्त होने वाले फल को भी वह पूरा नहीं करता। यह समझना चाहिए कि बुद्ध ने यह उपमा दुःशील के लिए नहीं, बल्कि शुद्ध शील वाले किन्तु आलसी और लोभ आदि दोषों से दूषित चित्त वाले व्यक्ति के लिए दी है। ගාථාසු ගිහිභොගාති කාමසුඛසම්භොගතො. පරිහීනොති ජීනො. සාමඤ්ඤත්ථන්ති පටිවෙධබාහුසච්චඤ්චෙව පරියත්තිබාහුසච්චඤ්ච. තාදිසො හි අසුතං සොතුං සුතං පරියොදාපෙතුං න සක්කොති අලසභාවතො. දුට්ඨු භගොති දුබ්භගො, අලක්ඛිකො කාළකණ්ණිපුරිසො. පරිධංසමානොති විනස්සමානො. පකිරෙතීති විකිරෙති විද්ධංසෙති. සබ්බමෙතං භාවිනො සාමඤ්ඤත්ථස්ස අනුප්පාදනමෙව සන්ධාය වුත්තං. ඡවාලාතංව නස්සතීති සො තාදිසො පුග්ගලො යථාවුත්තං ඡවාලාතං විය කස්සචි අනුපයුජ්ජමානො එව නස්සති උභතො පරිභට්ඨභාවතො. එවං ‘‘කායවාචාහි අකතවීතික්කමොපි චිත්තං අවිසොධෙන්තො නස්සති, පගෙව කතවීතික්කමො දුස්සීලො’’ති තස්ස අපායදුක්ඛභාගිභාවදස්සනෙන දුස්සීලෙ ආදීනවං දස්සෙත්වා තතො සත්තෙ විවෙචෙතුකාමො ‘‘කාසාවකණ්ඨා’’තිආදිනා ගාථාද්වයමාහ. තස්සත්ථො හෙට්ඨා වුත්තො එව. गाथाओं में 'गिहिभोगा' का अर्थ काम-सुख के उपभोग से है। 'परिहीनो' का अर्थ है वंचित। 'सामञ्ञत्थं' का अर्थ प्रतिवेध और पर्यप्ति की बहुश्रुतता है। ऐसा व्यक्ति आलस्य के कारण न सुने हुए को सुनने में और सुने हुए को शुद्ध करने में समर्थ नहीं होता। 'दुट्ठु भगो' का अर्थ है अभागा, अभागा पुरुष। 'परिधंसमानो' का अर्थ है नष्ट होता हुआ। 'पकिरेति' का अर्थ है नष्ट करता है। यह सब भविष्य में होने वाले श्रमण-फल की अप्राप्ति के सन्दर्भ में कहा गया है। 'छवालातं व नस्सति' का अर्थ है वह व्यक्ति उस श्मशान की लकड़ी की तरह किसी के काम न आते हुए, दोनों ओर से भ्रष्ट होने के कारण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार 'काय और वाणी से अपराध न करने पर भी चित्त को शुद्ध न करने वाला नष्ट हो जाता है, फिर अपराध करने वाले दुःशील का तो कहना ही क्या' - ऐसा कहकर, उसे अपाय के दुःखों का भागी दिखाते हुए, दुःशील के दोषों को बताकर, उससे प्राणियों को अलग करने की इच्छा से 'कासावकण्ठा' आदि दो गाथाएँ कहीं। उनका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. සඞ්ඝාටිකණ්ණසුත්තවණ්ණනා ३. संघाटिकण्ण-सूत्र की व्याख्या। 92. තතියෙ [Pg.280] සඞ්ඝාටිකණ්ණෙති චීවරකොටියං. ගහෙත්වාති පරාමසිත්වා. අනුබන්ධො අස්සාති අනුගතො භවෙය්ය. ඉදං වුත්තං හොති – ‘‘භික්ඛවෙ, ඉධෙකච්චො භික්ඛු අත්තනො හත්ථෙන මයා පාරුතස්ස සුගතමහාචීවරස්ස කණ්ණෙ පරාමසන්තො විය මං අනුගච්ඡෙය්ය, එවං මය්හං ආසන්නතරො හුත්වා විහරෙය්යා’’ති. පාදෙ පාදං නික්ඛිපන්තොති ගච්ඡන්තස්ස මම පාදෙ පාදං නික්ඛිත්තට්ඨානෙ පාදුද්ධාරණානන්තරං අත්තනො පාදං නික්ඛිපන්තො. උභයෙනාපි ‘‘ඨානගමනාදීසු අවිජහන්තො සබ්බකාලං මය්හං සමීපෙ එව විහරෙය්ය චෙපී’’ති දස්සෙති. සො ආරකාව මය්හං, අහඤ්ච තස්සාති සො භික්ඛු මයා වුත්තං පටිපදං අපූරෙන්තො මම දූරෙයෙව, අහඤ්ච තස්ස දූරෙයෙව. එතෙන මංසචක්ඛුනා තථාගතදස්සනං රූපකායසමොධානඤ්ච අකාරණං, ඤාණචක්ඛුනාව දස්සනං ධම්මකායසමොධානමෙව ච පමාණන්ති දස්සෙති. තෙනෙවාහ ‘‘ධම්මඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු න පස්සති, ධම්මං අපස්සන්තො න මං පස්සතී’’ති. තත්ථ ධම්මො නාම නවවිධො ලොකුත්තරධම්මො. සො ච අභිජ්ඣාදීහි දූසිතචිත්තෙන න සක්කා පස්සිතුං, තස්මා ධම්මස්ස අදස්සනතො ධම්මකායඤ්ච න පස්සතීති. තථා හි වුත්තං – ९२. तीसरे (सुत्त) में, 'संघाटि-कण्णे' का अर्थ है चीवर का कोना। 'गहेत्वा' का अर्थ है स्पर्श करके। 'अनुबन्धो अस्स' का अर्थ है पीछे चलने वाला हो। यह कहा गया है - "भिक्षुओं, यहाँ कोई भिक्षु अपने हाथ से मेरे द्वारा पहने हुए सुगत के महाचीवर के कोने को स्पर्श करते हुए मेरे पीछे चले, इस प्रकार मेरे अत्यंत निकट होकर विहार करे।" 'पादे पादं निक्खिपन्तो' का अर्थ है चलते हुए मेरे पैर रखने के स्थान पर पैर उठाने के तुरंत बाद अपना पैर रखना। दोनों के द्वारा यह दिखाया गया है कि "खड़े होने, चलने आदि में न छोड़ते हुए सदा मेरे समीप ही विहार करे तो भी।" "वह मुझसे दूर ही है, और मैं उससे" - वह भिक्षु मेरे द्वारा बताई गई प्रतिपदा (साधना मार्ग) को पूर्ण न करते हुए मुझसे दूर ही है, और मैं उससे दूर ही हूँ। इससे यह दिखाया गया है कि इन मांस-चक्षुओं से तथागत का दर्शन और रूपकाय का साथ होना अकारण (निरर्थक) है, ज्ञान-चक्षु से दर्शन और धर्मकाय का साथ होना ही प्रमाण है। इसीलिए कहा है "भिक्षुओं, वह भिक्षु धर्म को नहीं देखता, धर्म को न देखते हुए वह मुझे नहीं देखता।" वहाँ 'धर्म' नाम नौ प्रकार का लोकोत्तर धर्म है। और वह अभिध्या (लोभ) आदि से दूषित चित्त वाले द्वारा नहीं देखा जा सकता, इसलिए धर्म को न देखने के कारण वह धर्मकाय को भी नहीं देखता। जैसा कि कहा गया है - ‘‘කිං තෙ, වක්කලි, ඉමිනා පූතිකායෙන දිට්ඨෙන? යො ඛො, වක්කලි, ධම්මං පස්සති සො මං පස්සති; යො මං පස්සති, සො ධම්මං පස්සතී’’ති (සං. නි. 3.87). "हे वक्कलि, इस पूति-काय (सड़ने वाले शरीर) को देखने से तुम्हें क्या लाभ? हे वक्कलि, जो धर्म को देखता है, वह मुझे देखता है; जो मुझे देखता है, वह धर्म को देखता है।" (सं. नि. 3.87) ‘‘ධම්මභූතො බ්රහ්මභූතො’’ති (ම. නි. 1.203; පටි. ම. 3.5) ච. "धर्म-भूत, ब्रह्म-भूत" (म. नि. 1.203; पटि. म. 3.5) और। ‘‘ධම්මකායො ඉතිපි, බ්රහ්මකායො ඉතිපී’’ති (දී. නි. 3.118) ච ආදි. "इस प्रकार धर्मकाय भी, इस प्रकार ब्रह्मकाय भी" (दी. नि. 3.118) आदि। යොජනසතෙති යොජනසතෙ පදෙසෙ, යොජනසතමත්ථකෙති අත්ථො. සෙසං වුත්තවිපරියායෙන වෙදිතබ්බං. අරියමග්ගාධිගමවසෙන චස්ස අනභිජ්ඣාලුආදිභාවො දට්ඨබ්බො. 'योजनसते' का अर्थ है सौ योजन के प्रदेश में, सौ योजन की दूरी पर। शेष (व्याख्या) पहले कहे गए के विपरीत समझनी चाहिए। आर्यमार्ग की प्राप्ति के कारण उसकी अनभिध्यालुता (लोभ-रहित अवस्था) आदि देखनी चाहिए। ගාථාසු මහිච්ඡොති කාමෙසු තිබ්බසාරාගතාය මහාඉච්ඡො. විඝාතවාති පදුට්ඨමනසඞ්කප්පතාය සත්තෙසු ආඝාතවසෙන මහිච්ඡතාය ඉච්ඡිතාලාභෙන ච විඝාතවා. එජානුගොති එජාසඞ්ඛාතාය තණ්හාය [Pg.281] දාසො විය හුත්වා තං අනුගච්ඡන්තො. රාගාදිකිලෙසපරිළාහාභිභවෙන අනිබ්බුතො. රූපාදිවිසයානං අභිකඞ්ඛනෙන ගිද්ධො. පස්ස යාවඤ්ච ආරකාති අනෙජස්ස නිබ්බුතස්ස වීතගෙධස්ස සම්මාසම්බුද්ධස්ස ඔකාසවසෙන සමීපෙපි සමානො මහිච්ඡො විඝාතවා එජානුගො අනිබ්බුතො ගිද්ධො බාලපුථුජ්ජනො ධම්මසභාවතො යත්තකං දූරෙ, තස්ස සො දූරභාවො පස්ස, වත්තුම්පි න සුකරන්ති අත්ථො. වුත්තඤ්හෙතං – गाथाओं में 'महिच्छो' का अर्थ है काम-भोगों में तीव्र आसक्ति के कारण बड़ी इच्छा वाला। 'विघातवा' का अर्थ है दूषित मन और संकल्प के कारण प्राणियों के प्रति आघात (द्वेष) के वश में होने से और बड़ी इच्छा के कारण इच्छित वस्तु न मिलने से व्याकुल। 'एजानुगो' का अर्थ है 'एजा' नामक तृष्णा का दास बनकर उसके पीछे चलने वाला। राग आदि क्लेशों के परिदाह (जलन) से अभिभूत होने के कारण 'अनीबुतो' (अशांत)। रूपादि विषयों की आकांक्षा के कारण 'गिद्धो' (लोभी)। 'देखो वह कितनी दूर है' - तृष्णा-रहित, शांत और लोभ-मुक्त सम्यक्सम्बुद्ध के स्थान की दृष्टि से समीप होने पर भी, बड़ी इच्छा वाला, व्याकुल, तृष्णा का अनुगामी, अशांत और लोभी बाल-पृथग्जन धर्म-स्वभाव से जितना दूर है, उसकी वह दूरता देखो, उसे कहना भी सुगम नहीं है। यही कहा गया है - ‘‘නභඤ්ච දූරෙ පථවී ච දූරෙ,පාරං සමුද්දස්ස තථාහු දූරෙ; තතො හවෙ දූරතරං වදන්ති,සතඤ්ච ධම්මො අසතඤ්ච රාජා’’ති. (අ. නි. 4.47; ජා. 2.21.414); "आकाश दूर है और पृथ्वी दूर है, समुद्र का पार (दूसरा तट) भी दूर कहा जाता है; उससे भी अधिक दूर सत्पुरुषों का धर्म और असत्पुरुषों का धर्म (स्वभाव) कहा जाता है।" (अ. नि. 4.47; जा. 2.21.414); ධම්මමභිඤ්ඤායාති චතුසච්චධම්මං අභිඤ්ඤාය අඤ්ඤාය ඤාතතීරණපරිඤ්ඤාහි යථාරහං පුබ්බභාගෙ ජානිත්වා. ධම්මමඤ්ඤායාති තමෙව ධම්මං අපරභාගෙ මග්ගඤාණෙන පරිඤ්ඤාදිවසෙන යථාමරියාදං ජානිත්වා. පණ්ඩිතොති පටිවෙධබාහුසච්චෙන පණ්ඩිතො. රහදොව නිවාතෙ චාති නිවාතට්ඨානෙ රහදො විය අනෙජො කිලෙසචලනරහිතො උපසම්මති, යථා සො රහදො නිවාතට්ඨානෙ වාතෙන අනබ්භාහතො සන්නිසින්නොව හොති, එවං අයම්පි සබ්බථාපි පටිප්පස්සද්ධකිලෙසො කිලෙසචලනරහිතො අරහත්තඵලසමාධිනා වූපසම්මති, සබ්බකාලං උපසන්තසභාවොව හොති. අනෙජොති සො එවං අනෙජාදිසභාවො අරහා අනෙජාදිසභාවස්ස සම්මාසම්බුද්ධස්ස ඔකාසතො දූරෙපි සමානො ධම්මසභාවතො අදූරෙ සන්තිකෙ එවාති. 'धम्ममभिञ्ञाय' का अर्थ है चार आर्य सत्यों के धर्म को जानकर, ज्ञात-परिज्ञा और तीरण-परिज्ञा के द्वारा यथाशक्ति पूर्व भाग में जानकर। 'धम्ममञ्ञाय' का अर्थ है उसी धर्म को बाद में मार्ग-ज्ञान के द्वारा परिज्ञा आदि के वश में मर्यादापूर्वक जानकर। 'पण्डितो' का अर्थ है प्रतिवेध (साक्षात्कार) और बहुश्रुत होने से विद्वान। 'रहदोव निवाते च' का अर्थ है वायु-रहित स्थान में जलाशय के समान 'अनेजो' (तृष्णा-रहित), क्लेशों की चंचलता से रहित होकर शांत होता है; जैसे वह जलाशय वायु-रहित स्थान में वायु से विक्षुब्ध न होकर शांत रहता है, वैसे ही यह (भिक्षु) भी सभी प्रकार से क्लेशों के शांत हो जाने से, क्लेशों की चंचलता से रहित होकर अर्हत्व-फल समाधि के द्वारा शांत होता है, सदा शांत स्वभाव वाला ही होता है। 'अनेजो' - वह इस प्रकार तृष्णा-रहित आदि स्वभाव वाला अर्हत्, तृष्णा-रहित आदि स्वभाव वाले सम्यक्सम्बुद्ध से स्थान की दृष्टि से दूर होने पर भी धर्म-स्वभाव से दूर नहीं, अपितु समीप ही है। තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तीसरे सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 4. අග්ගිසුත්තවණ්ණනා ४. अग्नि-सुत्त की व्याख्या 93. චතුත්ථෙ අනුදහනට්ඨෙන අග්ගි, රාගො එව අග්ගි රාගග්ගි. රාගො හි උප්පජ්ජමානො සත්තෙ අනුදහති ඣාපෙති, තස්මා ‘‘අග්ගී’’ති වුච්චති. ඉතරෙසුපි ද්වීසු එසෙව නයො. තත්ථ යථා අග්ගි යදෙව ඉන්ධනං නිස්සාය උප්පජ්ජති, තං නිදහති, මහාපරිළාහො ච හොති, එවමිමෙපි [Pg.282] රාගාදයො යස්මිං සන්තානෙ සයං උප්පන්නා, තං නිදහන්ති, මහාපරිළාහා ච හොන්ති දුන්නිබ්බාපයා. තෙසු රාගපරිළාහෙන සන්තත්තහදයානං ඉච්ඡිතාලාභදුක්ඛෙන මරණප්පත්තානං සත්තානං පමාණං නත්ථි. අයං තාව රාගස්ස අනුදහනතා. දොසස්ස පන අනුදහනතාය විසෙසතො මනොපදොසිකා දෙවා, මොහස්ස අනුදහනතාය ඛිඩ්ඩාපදොසිකා දෙවා ච නිදස්සනං. මොහවසෙන හි තෙසං සතිසම්මොසො හොති, තස්මා ඛිඩ්ඩාවසෙන ආහාරවෙලං අතිවත්තෙන්තා කාලං කරොන්ති. අයං තාව රාගාදීනං දිට්ඨධම්මිකො අනුදහනභාවො. සම්පරායිකො පන නිරයාදීසු නිබ්බත්තාපනවසෙන ඝොරතරො දුරධිවාසො ච. අයඤ්ච අත්ථො ආදිත්තපරියායෙන විභාවෙතබ්බො. ९३. चौथे (सुत्त) में जलाने के अर्थ में अग्नि है, राग ही अग्नि है - 'रागाग्नि'। राग उत्पन्न होते हुए प्राणियों को जलाता है, भस्म करता है, इसलिए 'अग्नि' कहा जाता है। शेष दो (द्वेष और मोह) में भी यही नियम है। वहाँ जैसे अग्नि जिस ईंधन के आश्रय से उत्पन्न होती है, उसे ही जलाती है और महान परिदाह (जलन) पैदा करती है, वैसे ही ये राग आदि जिस (चित्त-) संतति में स्वयं उत्पन्न होते हैं, उसे ही जलाते हैं और महान परिदाह उत्पन्न करते हैं जिन्हें बुझाना कठिन है। उनमें राग के परिदाह से संतप्त हृदय वाले, इच्छित वस्तु न मिलने के दुःख से मृत्यु को प्राप्त प्राणियों की कोई गणना नहीं है। यह तो राग की दाहकता है। द्वेष की दाहकता के लिए विशेष रूप से 'मनोपदोषिक' देव और मोह की दाहकता के लिए 'खि़ड्डापदोषिक' देव उदाहरण हैं। मोह के कारण उनकी स्मृति लुप्त हो जाती है, इसलिए खेल (क्रीड़ा) के वश में होकर भोजन का समय बीत जाने पर वे काल-कवलित (मृत) हो जाते हैं। यह राग आदि का इसी जन्म में (दृष्ट-धार्मिक) दाहक स्वभाव है। परलोक (साम्परायिक) में तो नरक आदि में उत्पन्न कराने के कारण यह और भी घोर और असह्य है। और इस अर्थ को 'आदित्त-परियाय' के अनुसार स्पष्ट किया जाना चाहिए। ගාථාසු කාමෙසු මුච්ඡිතෙති වත්ථුකාමෙසු පාතබ්යතාවසෙන මුච්ඡං බාල්යං පමාදං මිච්ඡාචාරං ආපන්නෙ. බ්යාපන්නෙති බ්යාපන්නචිත්තෙ දහතීති සම්බන්ධො. නරෙ පාණාතිපාතිනොති ඉදං දොසග්ගිස්ස. අරියධම්මෙ අකොවිදෙති යෙ ඛන්ධායතනාදීසු සබ්බෙන සබ්බං උග්ගහපරිපුච්ඡාය මනසිකාරරහිතා අරියධම්මස්ස අකුසලා, තෙ සම්මොහෙන අභිභූතා විසෙසෙන සම්මූළ්හා නාමාති වුත්තා. එතෙ අග්ගී අජානන්තාති ‘‘එතෙ රාගග්ගිආදයො ඉධ චෙව සම්පරායෙ ච අනුදහන්තී’’ති අජානන්තා පරිඤ්ඤාභිසමයවසෙන පහානාභිසමයවසෙන ච අප්පටිවිජ්ඣන්තා. සක්කායාභිරතාති සක්කායෙ උපාදානක්ඛන්ධපඤ්චකෙ තණ්හාදිට්ඨිමානනන්දනාභිරතා. වඩ්ඪයන්තීති පුනප්පුනං උප්පජ්ජනෙන වඩ්ඪයන්ති ආචිනන්ති. නිරයන්ති අට්ඨවිධං මහානිරයං, සොළසවිධං උස්සදනිරයන්ති සබ්බම්පි නිරයං. තිරච්ඡානඤ්ච යොනියොති තිරච්ඡානයොනියො ච. අසුරන්ති අසුරකායං පෙත්තිවිසයඤ්ච වඩ්ඪයන්තීති සම්බන්ධො. गाथाओं में 'कामों में मूर्च्छित' (कमेसु मुच्छिता) का अर्थ है वस्तु-कामों में आसक्ति के वश में मूर्च्छा, अज्ञान, प्रमाद और मिथ्याचार में पड़े हुए। 'व्यापन्न' (ब्यापन्ने) का अर्थ है व्यापन्न चित्त (द्वेषपूर्ण चित्त) में जलता है, यह संबंध है। 'प्राणातिपाती मनुष्यों में' (नरे पाणातिपातिनो) यह द्वेषाग्नि के लिए है। 'आर्य धर्म में अकोविद' (अरियधम्मे अकोविदे) का अर्थ है जो स्कन्ध, आयतन आदि में पूरी तरह से उद्ग्रह (सीखने) और परिपृच्छा (पूछने) के मनसिकार से रहित आर्य धर्म में अकुशल हैं, वे सम्मोह से अभिभूत होने के कारण विशेष रूप से 'सम्मूढ़' (मूढ़) कहे गए हैं। 'इन अग्नियों को न जानते हुए' (एते अग्गी अजानन्ता) का अर्थ है 'ये रागाग्नि आदि यहाँ और परलोक में जलाते हैं' - ऐसा न जानते हुए, परिज्ञा-अभिसमय और प्रहाण-अभिसमय के द्वारा उन्हें न समझते हुए। 'सत्काय में अभिरत' (सक्कायाभिरता) का अर्थ है सत्काय रूपी पाँच उपादान स्कन्धों में तृष्णा, दृष्टि और मान के आनन्द में लीन। 'बढ़ाते हैं' (वड्ढयन्ति) का अर्थ है बार-बार उत्पन्न होने से बढ़ाते हैं या संचित करते हैं। 'निरय' (निरयं) का अर्थ है आठ प्रकार के महानिरय और सोलह प्रकार के उत्सद निरय, अर्थात् सभी नरक। 'तिर्यक योनि' (तिरच्छानञ्च योनियो) और 'असुर' (असुरं) का अर्थ है असुर काय और प्रेत विषय को बढ़ाते हैं, यह संबंध है। එත්තාවතා රාගග්ගිආදීනං ඉධ චෙව සම්පරායෙ ච අනුදහනභාවදස්සනමුඛෙන වට්ටං දස්සෙත්වා ඉදානි නෙසං නිබ්බාපනෙන විවට්ටං දස්සෙතුං ‘‘යෙ ච රත්තින්දිවා’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ යුත්තාති භාවනානුයොගවසෙන යුත්තා. කත්ථ? සම්මාසම්බුද්ධසාසනෙ. තෙන අඤ්ඤසාසනෙ රාගග්ගිආදීනං නිබ්බාපනාභාවං දස්සෙති. තථා හි අනඤ්ඤසාධාරණං තෙසං නිබ්බාපනවිධිං අසුභකම්මට්ඨානං සඞ්ඛෙපෙනෙව දස්සෙන්තො – यहाँ तक रागाग्नि आदि के इस लोक और परलोक में जलाने के भाव को दिखाने के माध्यम से संसार चक्र (वट्ट) को दिखाकर, अब उनके निर्वापण (बुझाने) के द्वारा संसार-मुक्ति (विवट्ट) को दिखाने के लिए 'ये च रत्तिन्दिवं' आदि कहा गया है। वहाँ 'युक्त' (युत्ता) का अर्थ है भावना के अनुयोग (अभ्यास) के कारण लगे हुए। कहाँ? सम्यक्सम्बुद्ध के शासन में। इससे अन्य शासनों में रागाग्नि आदि के निर्वापण के अभाव को दिखाया गया है। क्योंकि अनन्य-साधारण (जो दूसरों में नहीं है) उनके निर्वापण की विधि को, अशुभ कर्मस्थान को संक्षेप में दिखाते हुए - ‘‘තෙ නිබ්බාපෙන්ති රාගග්ගිං, නිච්චං අසුභසඤ්ඤිනො; දොසග්ගිං පන මෙත්තාය, නිබ්බාපෙන්ති නරුත්තමා; මොහග්ගිං පන පඤ්ඤාය, යායං නිබ්බෙධගාමිනී’’ති. – "वे नित्य अशुभ-संज्ञा वाले रागाग्नि को बुझाते हैं; वे नरोत्तम मैत्री से द्वेषाग्नि को बुझाते हैं; और उस प्रज्ञा से मोहाग्नि को बुझाते हैं, जो निर्वेधगामिनी (भेदन करने वाली) है।" ආහ[Pg.283]. තත්ථ අසුභසඤ්ඤිනොති ද්වත්තිංසාකාරවසෙන චෙව උද්ධුමාතකාදිවසෙන ච අසුභභාවනානුයොගෙන අසුභසඤ්ඤිනො. මෙත්තායාති ‘‘සො මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරතී’’ති (අ. නි. 3.64, 66) වුත්තාය මෙත්තාභාවනාය. එත්ථ ච අසුභජ්ඣානඤ්ච පාදකං කත්වා නිබ්බත්තිතඅනාගාමිමග්ගෙන රාගග්ගිදොසග්ගීනං නිබ්බාපනං වෙදිතබ්බං. පඤ්ඤායාති විපස්සනාපඤ්ඤාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය. තෙනෙවාහ ‘‘යායං නිබ්බෙධගාමිනී’’ති. සා හි කිලෙසක්ඛන්ධං විනිවිජ්ඣන්තී ගච්ඡති පවත්තතීති නිබ්බෙධගාමිනීති වුච්චති. අසෙසං පරිනිබ්බන්තීති අරහත්තමග්ගෙන අසෙසං රාගග්ගිආදිං නිබ්බාපෙත්වා සඋපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා ඨිතා පඤ්ඤාවෙපුල්ලප්පත්තියා නිපකා පුබ්බෙව සම්මප්පධානෙන සබ්බසො කොසජ්ජස්ස සුප්පහීනත්තා ඵලසමාපත්තිසමාපජ්ජනෙන අකිලාසුභාවෙන ච රත්තින්දිවමතන්දිතා චරිමකචිත්තනිරොධෙන අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා අසෙසං පරිනිබ්බන්ති. තතො ච අසෙසං නිස්සෙසං වට්ටදුක්ඛං අච්චගුං අතික්කමංසු. कहा गया है। वहाँ 'अशुभ-संज्ञी' (असुभसञ्ञिनो) का अर्थ है बत्तीस प्रकार के आकारों और उद्धुमातक (सूजा हुआ शव) आदि के द्वारा अशुभ भावना के अभ्यास से अशुभ की संज्ञा वाले। 'मैत्री से' (मेत्ताया) का अर्थ है 'वह मैत्री-युक्त चित्त से एक दिशा को व्याप्त कर विहार करता है' - इस प्रकार कही गई मैत्री भावना से। यहाँ अशुभ-ध्यान को आधार बनाकर उत्पन्न अनागामी मार्ग के द्वारा रागाग्नि और द्वेषाग्नि का निर्वापण समझना चाहिए। 'प्रज्ञा से' (पञ्ञाया) का अर्थ है विपश्यना प्रज्ञा सहित मार्ग प्रज्ञा से। इसीलिए कहा गया है - 'जो यह निर्वेधगामिनी है'। वह क्लेश-स्कन्ध को भेदती हुई चलती है, प्रवर्तित होती है, इसलिए 'निर्वेधगामिनी' कही जाती है। 'पूर्णतः परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं' (असेसं परिनिब्बन्ति) का अर्थ है अर्हत् मार्ग के द्वारा पूर्णतः रागाग्नि आदि को बुझाकर, स-उपादिशेष निर्वाण धातु में स्थित, प्रज्ञा की प्रचुरता को प्राप्त, निपुण, पहले ही सम्यक् प्रधान के द्वारा आलस्य के पूरी तरह प्रहाण हो जाने से, फल-समापत्ति में समापन्न होने के कारण थकावट रहित होकर रात-दिन आलस्य रहित होकर, अन्तिम चित्त के निरोध से अनुपादिशेष निर्वाण धातु में पूर्णतः परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं। और उससे पूर्णतः, निःशेष रूप से संसार-दुःख को पार कर गए, अतिक्रमण कर गए। එවං යෙ රාගග්ගිආදිකෙ නිබ්බාපෙන්ති, තෙසං අනුපාදිසෙසනිබ්බානෙන නිබ්බුතිං දස්සෙත්වා ඉදානි පටිවිද්ධගුණෙහි ථොමෙන්තො ඔසානගාථමාහ. තත්ථ අරියද්දසාති අරියෙහි බුද්ධාදීහි පස්සිතබ්බං කිලෙසෙහි වා ආරකත්තා අරියං නිබ්බානං, අරියං චතුසච්චමෙව වා දිට්ඨවන්තොති අරියද්දසා. වෙදස්ස මග්ගඤාණස්ස, තෙන වා වෙදෙන සංසාරස්ස පරියොසානං ගතාති වෙදගුනො. සම්මදඤ්ඤායාති සම්මදෙව සබ්බං ආජානිතබ්බං කුසලාදිං ඛන්ධාදිඤ්ච ජානිත්වා. සෙසං වුත්තනයමෙව. इस प्रकार जो रागाग्नि आदि को बुझाते हैं, उनके अनुपादिशेष निर्वाण द्वारा शांति (निर्वृति) को दिखाकर, अब प्राप्त किए गए गुणों से उनकी स्तुति करते हुए अंतिम गाथा कही। वहाँ 'आर्यदर्शी' (अरियद्दसा) का अर्थ है आर्यों (बुद्ध आदि) द्वारा देखे जाने योग्य, अथवा क्लेशों से दूर होने के कारण आर्य निर्वाण को, अथवा आर्य चतुःसत्य को ही देखने वाले 'आर्यदर्शी' हैं। 'वेद' (वेदस्स) अर्थात् मार्ग-ज्ञान के, अथवा उस वेद (ज्ञान) के द्वारा संसार के अंत को प्राप्त हुए 'वेदगु' (वेदज्ञ) हैं। 'सम्यक् जानकर' (सम्मदञ्ञाय) का अर्थ है भली-भाँति सब जानने योग्य कुशल आदि और स्कन्ध आदि को जानकर। शेष पूर्वोक्त रीति से ही है। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 5. උපපරික්ඛසුත්තවණ්ණනා ५. उपपरिक्खा सूत्र की व्याख्या। 94. පඤ්චමෙ තථා තථාති තෙන තෙන පකාරෙන. උපපරික්ඛෙය්යාති වීමංසෙය්ය පරිතුලෙය්ය සම්මසෙය්ය වා. යථා යථාස්ස උපපරික්ඛතොති යථා යථා අස්ස භික්ඛුනො උපපරික්ඛන්තස්ස. බහිද්ධා චස්ස විඤ්ඤාණං අවික්ඛිත්තං අවිසටන්ති බහිද්ධා රූපාදිආරම්මණෙ උප්පජ්ජනකවික්ඛෙපාභාවතො අවික්ඛිත්තං සමාහිතං, තතො එව අවිසටං සියා[Pg.284]. ඉදං වුත්තං හොති – භික්ඛවෙ, යෙන යෙන පකාරෙන ඉමස්ස ආරද්ධවිපස්සකස්ස භික්ඛුනො උපපරික්ඛතො සඞ්ඛාරෙ සම්මසන්තස්ස පුබ්බෙ සමාහිතාකාරසල්ලක්ඛණවසෙන සමථනිමිත්තං ගහෙත්වා සක්කච්චං නිරන්තරං සම්මසනඤාණං පවත්තෙන්තස්ස අත්තනො විපස්සනාචිත්තං කම්මට්ඨානතො බහිද්ධා රූපාදිආරම්මණෙ උප්පජ්ජනකං න සියා, අච්චාරද්ධවීරියතාය උද්ධච්චපක්ඛියං න සියා, තෙන තෙන පකාරෙන භික්ඛු උපපරික්ඛෙය්ය පරිතුලෙය්යාති. අජ්ඣත්තං අසණ්ඨිතන්ති යස්මා වීරියෙ මන්දං වහන්තෙ සමාධිස්ස බලවභාවතො කොසජ්ජාභිභවෙන අජ්ඣත්තං ගොචරජ්ඣත්තසඞ්ඛාතෙ කම්මට්ඨානාරම්මණෙ සඞ්කොචවසෙන ඨිතත්තා සණ්ඨිතං නාම හොති, වීරියසමතාය පන යොජිතාය අසණ්ඨිතං හොති වීථිං පටිපන්නං. තස්මා යථා යථාස්ස උපපරික්ඛතො විඤ්ඤාණං අජ්ඣත්තං අසණ්ඨිතං අස්ස, වීථිපටිපන්නං සියා, තථා තථා උපපරික්ඛෙය්ය. අනුපාදාය න පරිතස්සෙය්යාති යථා යථාස්ස උපපරික්ඛතො ‘‘එතං මම, එසො මෙ අත්තා’’ති තණ්හාදිට්ඨිග්ගාහවසෙන රූපාදීසු කඤ්චි සඞ්ඛාරං අග්ගහෙත්වා තතො එව තණ්හාදිට්ඨිග්ගාහවසෙන න පරිතස්සෙය්ය, තථා තථා උපපරික්ඛෙය්යාති සම්බන්ධො. කථං පන උපපරික්ඛතො තිවිධම්පෙතං සියාති? උද්ධච්චපක්ඛියෙ කොසජ්ජපක්ඛියෙ ච ධම්මෙ වජ්ජෙන්තො වීරියසමතං යොජෙත්වා පුබ්බෙව විපස්සනුපක්කිලෙසෙහි චිත්තං විසොධෙත්වා යථා සම්මදෙව විපස්සනාඤාණං විපස්සනාවීථිං පටිපජ්ජති, තථා සම්මසතො. ९४. पाँचवें (सूत्र) में 'तथा तथा' का अर्थ है उस-उस प्रकार से। 'उपपरिक्खेय्य' का अर्थ है मीमांसा करे, तुलना करे या सम्मसन (परीक्षण) करे। 'यथा यथास्स उपपरिक्खतो' का अर्थ है जैसे-जैसे उस भिक्षु के परीक्षण करते हुए। 'बहिद्धा चस्स विञ्ञाणं अविक्खित्तं अवििसटं' का अर्थ है बाहर रूपादि आलम्बनों में उत्पन्न होने वाले विक्षेप के अभाव के कारण विक्षिप्त न होना, समाहित होना, और उसी कारण से विसरित (फैला हुआ) न होना। इसका अर्थ यह है - हे भिक्षुओं, जिस-जिस प्रकार से इस आरब्ध-विपश्यक भिक्षु के परीक्षण करते हुए, संस्कारों का सम्मसन करते हुए, पहले समाहित अवस्था के लक्षण के निर्धारण के वश से शमथ-निमित्त को ग्रहण कर आदरपूर्वक निरंतर सम्मसन-ज्ञान को प्रवृत्त करते हुए, अपना विपश्यना-चित्त कर्मस्थान से बाहर रूपादि आलम्बनों में उत्पन्न न हो, अत्यधिक वीर्य के कारण उद्धच्च (उद्धत) पक्ष का न हो, उस-उस प्रकार से भिक्षु परीक्षण करे, तुलना करे। 'अज्झत्तं असण्ठितं' का अर्थ है - क्योंकि वीर्य के मंद होने पर समाधि के बलवान होने से आलस्य के अभिभव (दबाव) के कारण भीतर गोचर-अध्यात्म संज्ञक कर्मस्थान-आलम्बन में संकोच के कारण स्थित होने से 'सण्ठित' (स्थित) कहलाता है, किन्तु वीर्य की समता के योजित होने पर 'असण्ठित' (अस्थित) होता है, जो वीथि (मार्ग) पर आरूढ़ होता है। इसलिए जैसे-जैसे उसके परीक्षण करते हुए विज्ञान भीतर अस्थित हो, वीथि-प्रतिपन्न (मार्ग पर आरूढ़) हो, वैसे-वैसे परीक्षण करे। 'अनुपादाय न परितस्सेय्या' का अर्थ है - जैसे-जैसे उसके परीक्षण करते हुए 'यह मेरा है, यह मेरा आत्मा है' इस प्रकार तृष्णा और दृष्टि के ग्रहण के वश से रूपादि में किसी भी संस्कार को न ग्रहण कर, उसी कारण से तृष्णा और दृष्टि के ग्रहण के वश से संताप (परित्रास) न करे, वैसे-वैसे परीक्षण करे - यह सम्बन्ध है। परीक्षण करते हुए यह तीनों प्रकार से कैसे हो सकता है? उद्धच्च-पक्षीय और कौसीद्य (आलस्य)-पक्षीय धर्मों को वर्जित करते हुए, वीर्य की समता को योजित कर, पहले ही विपश्यना के उपक्लेशों से चित्त को विशुद्ध कर, जैसे सम्यक् प्रकार से विपश्यना-ज्ञान विपश्यना-वीथि पर आरूढ़ होता है, वैसे सम्मसन (परीक्षण) करते हुए। ඉති භගවා චතුසච්චකම්මට්ඨානිකස්ස භික්ඛුනො අනුක්කමෙන පටිපදාඤාණදස්සනවිසුද්ධියා ආරද්ධාය අච්චාරද්ධවීරියඅතිසිථිලවීරියවිපස්සනුපක්කිලෙසෙහි චිත්තස්ස විසොධනූපායං දස්සෙත්වා ඉදානි තථා විසොධිතෙ විපස්සනාඤාණෙ න චිරස්සෙව විපස්සනං මග්ගෙන ඝටෙත්වා සකලවට්ටදුක්ඛසමතික්කමාය සංවත්තන්තීති දස්සෙන්තො ‘‘බහිද්ධා, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණෙ’’තිආදිමාහ, තං වුත්තනයමෙව. යං පන වුත්තං – ‘‘ආයතිං ජාතිජරාමරණදුක්ඛසමුදයසම්භවො න හොතී’’ති, තස්සත්ථො – එවං විපස්සනං මග්ගෙන ඝටෙත්වා මග්ගපටිපාටියා අග්ගමග්ගෙන අනවසෙසතො කිලෙසෙසු ඛීණෙසු ආයතිං අනාගතෙ ජාතිජරාමරණසකලවට්ටදුක්ඛසමුදයසඞ්ඛාතො සම්භවො උප්පාදො ච න හොති, ජාතිසඞ්ඛාතො වා දුක්ඛසමුදයො ජරාමරණසඞ්ඛාතො දුක්ඛසම්භවො ච න හොති. इस प्रकार भगवान ने चतुःसत्य-कर्मस्थान वाले भिक्षु के लिए अनुक्रम से प्रतिपदा-ज्ञानदर्शन-विशुद्धि के आरम्भ होने पर, अत्यधिक वीर्य और अति-शिथिल वीर्य वाले विपश्यना के उपक्लेशों से चित्त की शुद्धि का उपाय दिखाकर, अब उस प्रकार विशुद्ध हुए विपश्यना-ज्ञान में शीघ्र ही विपश्यना को मार्ग से जोड़कर सम्पूर्ण वट्ट-दुःख (संसार-दुःख) के अतिक्रमण के लिए प्रवृत्त होने को दिखाते हुए 'बहिद्धा, भिक्खवे, विञ्ञाणे' आदि कहा, वह पूर्वोक्त रीति से ही है। जो यह कहा गया है - 'भविष्य में जाति, जरा, मरण रूपी दुःख-समुदय की उत्पत्ति नहीं होती', उसका अर्थ है - इस प्रकार विपश्यना को मार्ग से जोड़कर, मार्ग की परिपाटी से अग्र-मार्ग (अर्हत् मार्ग) द्वारा अवशेषहीन क्लेशों के क्षीण होने पर, भविष्य में जाति, जरा, मरण रूपी सम्पूर्ण वट्ट-दुःख के समुदय संज्ञक सम्भव (उत्पत्ति) और उत्पाद नहीं होता, अथवा जाति संज्ञक दुःख-समुदय और जरा-मरण संज्ञक दुःख-सम्भव नहीं होता। ගාථායං [Pg.285] සත්තසඞ්ගප්පහීනස්සාති තණ්හාසඞ්ගො, දිට්ඨිසඞ්ගො, මානසඞ්ගො, කොධසඞ්ගො, අවිජ්ජාසඞ්ගො, කිලෙසසඞ්ගො, දුච්චරිතසඞ්ගොති ඉමෙසං සත්තන්නං සඞ්ගානං පහීනත්තා සත්තසඞ්ගප්පහීනස්ස. කෙචි පන ‘‘සත්තානුසයා එව සත්ත සඞ්ගා’’ති වදන්ති. නෙත්තිච්ඡින්නස්සාති ඡින්නභවනෙත්තිකස්ස. වික්ඛීණො ජාතිසංසාරොති පුනප්පුනං ජායනවසෙන පවත්තියා ජාතිහෙතුකත්තා ච ජාතිභූතො සංසාරොති ජාතිසංසාරො, සො භවනෙත්තියා ඡින්නත්තා වික්ඛීණො පරික්ඛීණො, තතො එව නත්ථි තස්ස පුනබ්භවොති. गाथा में 'सत्तसङ्गप्पहीनस्स' का अर्थ है - तृष्णा-संग, दृष्टि-संग, मान-संग, क्रोध-संग, अविद्या-संग, क्लेश-संग और दुश्चरित-संग - इन सात संगों (आसक्तियों) के प्रहाण होने से 'सत्तसङ्गप्पहीन' (सात संगों से मुक्त) के लिए। कुछ लोग तो 'सात अनुशय ही सात संग हैं' ऐसा कहते हैं। 'नेत्तिच्छिन्नस्स' का अर्थ है जिसकी भव-नेत्री (तृष्णा) छिन्न हो गई है। 'विक्खीणो जातिसṃस़ारो' का अर्थ है - बार-बार जन्म लेने के रूप में प्रवृत्ति होने से और जाति के हेतु होने से जाति-भूत संसार ही 'जाति-संसार' है, वह भव-नेत्री के छिन्न होने से विक्षिप्त (नष्ट) और परिक्षीण हो गया है, इसलिए उसका पुनर्जन्म नहीं होता। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. කාමූපපත්තිසුත්තවණ්ණනා ६. कामोपपत्ति-सूत्र की व्याख्या 95. ඡට්ඨෙ කාමූපපත්තියොති කාමපටිලාභා කාමපටිසෙවනා වා. පච්චුපට්ඨිතකාමාති නිබද්ධකාමා නිබද්ධාරම්මණා යථා තං මනුස්සා. මනුස්සා හි නිබද්ධවත්ථුස්මිං වසං වත්තෙන්ති. යත්ථ පටිබද්ධචිත්තා හොන්ති, සතම්පි සහස්සම්පි දත්වා තමෙව මාතුගාමං ආනෙත්වා නිබද්ධභොගං භුඤ්ජන්ති. එකච්චෙ ච දෙවා. චාතුමහාරාජිකතො පට්ඨාය හි චතුදෙවලොකවාසිනො නිබද්ධවත්ථුස්මිංයෙව වසං වත්තෙන්ති. පඤ්චසිඛවත්ථු චෙත්ථ නිදස්සනං. තථා එකච්චෙ ආපායිකෙ නෙරයිකෙ ඨපෙත්වා සෙසඅපායසත්තාපි නිබද්ධවත්ථුස්මිංයෙව වසං වත්තෙන්ති. මච්ඡා හි අත්තනො මච්ඡියා, කච්ඡපො කච්ඡපියාති එවං සබ්බෙපි තිරච්ඡානා පෙතා විනිපාතිකා ච. තස්මා නෙරයිකෙ ඨපෙත්වා සෙසඅපායසත්තෙ උපාදාය යාව තුසිතකායා ඉමෙ සත්තා පච්චුපට්ඨිතකාමා නාම, නිම්මානරතිනොති සයං නිම්මිතෙ නිම්මානෙ රති එතෙසන්ති නිම්මානරතිනො. තෙ හි නීලපීතාදිවසෙන යාදිසං යාදිසං රූපං ඉච්ඡන්ති, තාදිසං තාදිසං නිම්මිනිත්වා රමන්ති ආයස්මතො අනුරුද්ධස්ස පුරතො මනාපකායිකා දෙවතා විය. පරනිම්මිතවසවත්තිනොති පරෙහි නිම්මිතෙ කාමෙ වසං වත්තෙන්තීති පරනිම්මිතවසවත්තිනො. තෙසඤ්හි මනං ඤත්වා පරෙ යථාරුචිතං කාමභොගං නිම්මිනන්ති, තෙ තත්ථ වසං වත්තෙන්ති. කථං තෙ පරස්ස මනං ජානන්තීති? පකතිසෙවනාවසෙන. යථා හි කුසලො සූදො රඤ්ඤො භුඤ්ජන්තස්ස යං යං රුච්චති, තං තං ජානාති, එවං පකතියා අභිරුචිතාරම්මණං ඤත්වා තාදිසෙයෙව නිම්මිනන්ති, තෙ තත්ථ වසං [Pg.286] වත්තෙන්ති, මෙථුනසෙවනාදිවසෙන කාමෙ පරිභුඤ්ජන්ති. කෙචි පන ‘‘හසිතමත්තෙන ඔලොකිතමත්තෙන ආලිඞ්ගිතමත්තෙන හත්ථග්ගහණමත්තෙන ච තෙසං කාමකිච්චං ඉජ්ඣතී’’ති වදන්ති, තං අට්ඨකථායං ‘‘එතං පන නත්ථී’’ති පටික්ඛිත්තං. න හි කායෙන අඵුසන්තස්ස ඵොට්ඨබ්බං කාමකිච්චං සාධෙති. ඡන්නම්පි කාමාවචරදෙවානං කාමා පාකතිකා එව. වුත්තඤ්හෙතං – ९५. छठे (सूत्र) में "कामूपपत्तियो" का अर्थ है काम की प्राप्ति या काम का सेवन। "पच्चुपट्ठितकामा" का अर्थ है बद्ध-काम या बद्ध-आलम्बन वाले, जैसे कि मनुष्य। मनुष्य बद्ध-वस्तुओं में वश में रहते हैं। जहाँ उनका चित्त आसक्त होता है, वहाँ सौ या हजार (मुद्राएँ) देकर भी उसी स्त्री को लाकर निरंतर भोग भोगते हैं। और कुछ देवता भी। चातुमहाराजिक से लेकर चार देवलोकों के निवासी बद्ध-वस्तुओं में ही वश में रहते हैं। यहाँ पञ्चसिख की कथा उदाहरण है। उसी प्रकार, कुछ अपायगामी जीवों में, नारकियों को छोड़कर शेष अपाय के प्राणी भी बद्ध-वस्तुओं में ही वश में रहते हैं। जैसे मछली अपनी मादा मछली के प्रति, कछुआ अपनी मादा कछुआ के प्रति, इसी प्रकार सभी तिर्यक, प्रेत और विनिपातिक जीव। इसलिए नारकियों को छोड़कर शेष अपाय के प्राणियों से लेकर तुषित निकाय तक के ये सत्त्व "पच्चुपट्ठितकामा" कहलाते हैं। "निम्मानरतिनो" का अर्थ है—स्वयं के द्वारा निर्मित (कामों) में जिनकी रति (आनन्द) है, वे निम्मानरति हैं। वे नीले, पीले आदि के भेद से जैसा-जैसा रूप चाहते हैं, वैसा-वैसा निर्माण कर रमण करते हैं, जैसे आयुष्मान् अनुरुद्ध के सामने मनापकायिक देवता। "परनिम्मितवसवत्तिनो" का अर्थ है—दूसरों के द्वारा निर्मित कामों में जो वश में रहते हैं, वे परनिम्मितवसवर्ती हैं। उनके मन को जानकर दूसरे उनकी रुचि के अनुसार काम-भोग का निर्माण करते हैं, और वे उनमें वश में रहते हैं। वे दूसरों के मन को कैसे जानते हैं? स्वाभाविक सेवा के द्वारा। जैसे एक कुशल रसोइया राजा के भोजन करते समय जो-जो उसे रुचता है, उसे जान लेता है, वैसे ही स्वभाव से अभिरुचित आलम्बन को जानकर वैसा ही निर्माण करते हैं, वे वहाँ वश में रहते हैं और मैथुन-सेवन आदि के द्वारा कामों का परिभोग करते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि "केवल हँसने मात्र से, देखने मात्र से, आलिंगन मात्र से और हाथ पकड़ने मात्र से ही उनका काम-कृत्य सिद्ध हो जाता है", किन्तु अट्ठकथा में इसे "यह नहीं है" कहकर अस्वीकार किया गया है। क्योंकि शरीर से स्पर्श न करने वाले का स्पर्श-सम्बन्धी काम-कृत्य सिद्ध नहीं होता। छहों कामावचर देवों के काम प्राकृतिक ही हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ඡ එතෙ කාමාවචරා, සබ්බකාමසමිද්ධිනො; සබ්බෙසං එකසඞ්ඛාතං, ආයු භවති කිත්තක’’න්ති. (විභ. 1023); “ये छह कामावचर (देव) सभी कामनाओं से समृद्ध हैं; इन सभी की आयु कितनी होती है, यह एक साथ बताया गया है।” (विभङ्ग १०२३); ගාථාසු යෙ චඤ්ඤෙති යෙ යථාවුත්තදෙවෙහි අඤ්ඤෙ ච කාමභොගිනො මනුස්සා චෙව එකච්චෙ අපායූපගා ච සබ්බෙ තෙ. ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවන්ති ඉමං යථාපටිලද්ධත්තභාවඤ්චෙව, උපපත්තිභවන්තරසඞ්ඛාතං ඉතො අඤ්ඤථාභාවඤ්චාති ද්විප්පභෙදං සංසාරං නාතිවත්තරෙ න අතික්කමන්ති. සබ්බෙ පරිච්චජෙ කාමෙති දිබ්බාදිභෙදෙ සබ්බෙපි කාමෙ වත්ථුකාමෙ ච කිලෙසකාමෙ ච පරිච්චජෙය්ය. කිලෙසකාමෙ අනාගාමිමග්ගෙන පජහන්තොයෙව හි වත්ථුකාමෙ පරිච්චජති නාම. පියරූපසාතගධිතන්ති පියරූපෙසු රූපාදීසු සුඛවෙදනස්සාදෙන ගධිතං ගිද්ධං. ඡෙත්වා සොතං දුරච්චයන්ති අඤ්ඤෙහි දුරච්චයං දුරතික්කමං තණ්හාසොතං අරහත්තමග්ගෙන සමුච්ඡින්දිත්වා. සෙසං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙවාති. गाथाओं में "ये चञ्ञे" (जो अन्य) का अर्थ है—यथोक्त देवों से अन्य जो कामभोगी मनुष्य और कुछ अपायगामी जीव हैं, वे सभी। "इत्थभावञ्ञथाभावं" का अर्थ है—इस प्राप्त आत्मभाव (वर्तमान जीवन) को और पुनर्जन्म रूपी अन्य भाव (भवान्तर) को, इस प्रकार दो प्रकार के संसार का अतिक्रमण नहीं करते हैं। "सब्बे परिच्चजे कामे" का अर्थ है—दिव्य आदि भेदों वाले सभी कामों को, वस्तु-काम और क्लेश-काम दोनों का परित्याग कर देना चाहिए। अनागामी मार्ग से क्लेश-कामों को त्यागते हुए ही वास्तव में वस्तु-कामों का परित्याग होता है। "पियरूपसातगधितं" का अर्थ है—प्रिय रूपों (रूप आदि) में सुख-वेदना के आस्वाद से आसक्त या लुब्ध। "छेत्वा सोतं दुरच्चयं" का अर्थ है—दूसरों के द्वारा पार करने में कठिन तृष्णा-रूपी स्रोत को अर्हत् मार्ग से समूल नष्ट करके। शेष अर्थ पहले बताए गए तरीके के अनुसार ही है। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. කාමයොගසුත්තවණ්ණනා ७. कामयोग सूत्र की व्याख्या 96. සත්තමෙ කාමයොගයුත්තොති පඤ්චකාමගුණිකො රාගො කාමයොගො, තෙන යුත්තො කාමයොගයුත්තො, අසමුච්ඡින්නකාමරාගස්සෙතං අධිවචනං. රූපාරූපභවෙසු ඡන්දරාගො භවයොගො, තථා ඣානනිකන්ති සස්සතදිට්ඨිසහගතො ච රාගො, තෙන යුත්තො භවයොගයුත්තො, අප්පහීනභවරාගොති අත්ථො. ආගාමීති බ්රහ්මලොකෙ ඨිතොපි පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන ඉමං මනුස්සලොකං ආගමනසීලො. තෙනෙවාහ ‘‘ආගන්තා ඉත්ථත්ත’’න්ති. මනුස්සත්තභාවසඞ්ඛාතං ඉත්ථභාවං ආගමනධම්මො[Pg.287], මනුස්සෙසු උපපජ්ජනසීලොති අත්ථො. කාමඤ්චෙත්ථ කාමයොගො ඉත්ථත්තං ආගමනස්ස කාරණං. යො පන කාමයොගයුත්තො, සො එකන්තෙන භවයොගයුත්තොපි හොතීති දස්සනත්ථං ‘‘කාමයොගයුත්තො, භික්ඛවෙ, භවයොගයුත්තො’’ති උභයම්පි එකජ්ඣං කත්වා වුත්තං. ९६. सातवें (सूत्र) में "कामयोगयुत्तो" का अर्थ है—पाँच काम-गुणों के प्रति राग ही काम-योग है, उससे युक्त कामयोग-युक्त है; यह उस व्यक्ति का पर्यायवाची है जिसका काम-राग अभी नष्ट नहीं हुआ है। रूप और अरूप भवों में छन्द-राग "भवयोग" है, उसी प्रकार ध्यान की आसक्ति और शाश्वत-दृष्टि से युक्त राग भी; उससे युक्त "भवयोग-युक्त" है, जिसका अर्थ है जिसका भव-राग प्रहीण नहीं हुआ है। "आगामी" का अर्थ है—ब्रह्मलोक में स्थित होने पर भी प्रतिसन्धि ग्रहण करने के कारण इस मनुष्य लोक में आने वाला। इसीलिए कहा गया है—"आगन्ता इत्थत्तं"। मनुष्य-भाव रूपी इस "इत्थभाव" में आने वाला, अर्थात् मनुष्यों में उत्पन्न होने वाला। और यहाँ कामयोग ही इस "इत्थभाव" में आने का कारण है। जो कामयोग-युक्त है, वह निश्चित रूप से भवयोग-युक्त भी होता है, यह दिखाने के लिए "भिक्षुओं! कामयोग-युक्त भवयोग-युक्त होता है"—इस प्रकार दोनों को एक साथ मिलाकर कहा गया है। කාමයොගවිසංයුත්තොති එත්ථ අසුභජ්ඣානම්පි කාමයොගවිසංයොගො, තං පාදකං කත්වා අධිගතො අනාගාමිමග්ගො එකන්තෙනෙව කාමයොගවිසංයොගො නාම, තස්මා තතියමග්ගඵලෙ ඨිතො අරියපුග්ගලො ‘‘කාමයොගවිසංයුත්තො’’ති වුත්තො. යස්මා පන රූපාරූපභවෙසු ඡන්දරාගො අනාගාමිමග්ගෙන න පහීයති, තස්මා සො අප්පහීනභවයොගත්තා ‘‘භවයොගයුත්තො’’ති වුත්තො. අනාගාමීති කාමලොකං පටිසන්ධිග්ගහණවසෙන අනාගමනතො අනාගාමී. කාමයොගවිසංයොගවසෙනෙව හි සද්ධිං අනවසෙසඔරම්භාගියසංයොජනසමුග්ඝාතෙන අජ්ඣත්තසංයොජනාභාවසිද්ධිතො ඉත්ථත්තං අනාගන්ත්වා හොති, තත්ථ පරිනිබ්බායී අනාවත්තිධම්මො. යස්ස පන අනවසෙසං භවයොගො පහීනො, තස්ස අවිජ්ජායොගාදිඅවසිට්ඨකිලෙසාපි තදෙකට්ඨභාවතො පහීනා එව හොන්තීති, සො පරික්ඛීණභවසංයොජනො ‘‘අරහං ඛීණාසවො’’ති වුච්චති. තෙන වුත්තං ‘‘කාමයොගවිසංයුත්තො, භික්ඛවෙ, භවයොගවිසංයුත්තො අරහං හොති ඛීණාසවො’’ති. එත්ථ ච කාමයොගවිසංයොගො අනාගාමී චතුත්ථජ්ඣානස්ස සුඛදුක්ඛසොමනස්සදොමනස්සප්පහානං විය, තතියමග්ගස්ස දිට්ඨිවිචිකිච්ඡාසීලබ්බතපරාමාසසංයොජනපරික්ඛයො විය ච චතුත්ථමග්ගස්ස වණ්ණභණනත්ථං වුත්තොති දට්ඨබ්බං. පඨමපදෙන සොතාපන්නසකදාගාමීහි සද්ධිං සබ්බො පුථුජ්ජනො ගහිතො, දුතියපදෙන පන සබ්බො අනාගාමී, තතියපදෙන අරහාති අරහත්තනිකූටෙන දෙසනං නිට්ඨාපෙසි. 'कामयोगविसंयुत्तो' यहाँ अशुभ-ध्यान भी कामयोग-विसंयोग है, उसे आधार बनाकर प्राप्त किया गया अनागामी-मार्ग एकान्ततः 'कामयोग-विसंयोग' कहलाता है, इसलिए तृतीय मार्ग के फल में स्थित आर्य पुद्गल को 'कामयोगविसंयुत्तो' कहा गया है। चूँकि रूप और अरूप भवों में छन्द-राग अनागामी-मार्ग द्वारा प्रहीण नहीं होता, इसलिए वह भव-योग के अपहीण होने के कारण 'भवयोगयुत्तो' कहा गया है। अनागामी का अर्थ है—कामलोक में प्रतिसन्धि ग्रहण करने के रूप में न आने के कारण 'अनागामी'। कामयोग-विसंयोग के कारण ही, शेष सभी ओराम्भागीय संयोजनों के समूच्छेदन के साथ, आध्यात्मिक संयोजनों के अभाव की सिद्धि होने से, वह इस लोक में न आने वाला होता है, वहीं परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला और पुनरावृत्ति न होने वाला होता है। जिसके भव-योग पूर्णतः प्रहीण हो चुके हैं, उसके अविद्या-योग आदि अवशिष्ट क्लेश भी उसी के साथ प्रहीण हो जाते हैं, अतः वह प्रहीण-भव-संयोजन वाला 'अर्हत् क्षीणासव' कहलाता है। इसीलिए कहा गया है— 'भिक्षुओं! कामयोग-विसंयुक्त और भवयोग-विसंयुक्त अर्हत् क्षीणासव होता है।' यहाँ कामयोग-विसंयुक्त अनागामी का वर्णन चतुर्थ मार्ग की प्रशंसा के लिए किया गया है, जैसे चतुर्थ ध्यान में सुख-दुःख-सोमनस्य-डोमनस्य का प्रहाण होता है, या तृतीय मार्ग में दृष्टि-विचिकित्सा-शीलव्रतपरामर्श संयोजनों का क्षय होता है। प्रथम पद से स्रोतापन्न और सकदागामी के साथ सभी पृथग्जन लिए गए हैं, द्वितीय पद से सभी अनागामी, और तृतीय पद से अर्हत्—इस प्रकार अर्हत्त्व की पराकाष्ठा के साथ देशना समाप्त की गई है। ගාථාසු උභයන්ති උභයෙන, කාමයොගෙන, භවයොගෙන ච සංයුත්තාති අත්ථො. සත්තා ගච්ඡන්ති සංසාරන්ති පුථුජ්ජනා සොතාපන්නා සකදාගාමිනොති ඉමෙ තිවිධා සත්තා කාමයොගභවයොගානං අප්පහීනත්තා ගච්ඡන්ති සංසාරන්ති. තතො එව ජාතිමරණගාමිනො හොන්ති. එත්ථ එකබීජී, කොලංකොලො, සත්තක්ඛත්තුපරමොති තීසු සොතාපන්නෙසු සබ්බමුදු සත්තක්ඛත්තුපරමො, සො අට්ඨමං භවං න නිබ්බත්තෙති, අත්තනො [Pg.288] පරිච්ඡින්නජාතිවසෙන පන සංසරති, තථා ඉතරෙපි. සකදාගාමීසුපි යො ඉධ සකදාගාමිමග්ගං පත්වා දෙවලොකෙ උප්පජ්ජිත්වා පුන ඉධ නිබ්බත්තති, සො අත්තනො පරිච්ඡින්නජාතිවසෙනෙව සංසරති. යෙ පන සකදාගාමිනො වොමිස්සකනයෙන විනා තත්ථ තත්ථ දෙවෙසුයෙව මනුස්සෙසුයෙව වා නිබ්බත්තන්ති, තෙ උපරිමග්ගාධිගමාය යාව ඉන්ද්රියපරිපාකා පුනප්පුනං උප්පජ්ජනතො සංසරන්තියෙව. පුථුජ්ජනෙ පන වත්තබ්බමෙව නත්ථි සබ්බභවසංයොජනානං අපරික්ඛීණත්තා. තෙන වුත්තං – गाथाओं में 'उभय' का अर्थ है—दोनों से, काम-योग और भव-योग से युक्त। 'सत्त्वाः संसारं गच्छन्ति' (प्राणी संसार में जाते हैं) का अर्थ है—पृथग्जन, स्रोतापन्न और सकदागामी—ये तीन प्रकार के प्राणी काम-योग और भव-योग के प्रहीण न होने के कारण संसार में जाते हैं। उसी कारण वे जन्म-मरण को प्राप्त होते हैं। यहाँ 'एकबीजी', 'कुलंकुल' और 'सत्तक्खत्तुपरम'—इन तीन स्रोतापन्नों में सबसे मृदु 'सत्तक्खत्तुपरम' है, वह आठवें भव को उत्पन्न नहीं करता, अपनी परिच्छिन्न जाति के वश में संसार में विचरण करता है, वैसे ही अन्य भी। सकदागामियों में भी जो यहाँ सकदागामी-मार्ग प्राप्त कर देवलोक में उत्पन्न होकर पुनः यहाँ उत्पन्न होता है, वह अपनी परिच्छिन्न जाति के वश में ही संसार में विचरण करता है। जो सकदागामी मिश्रित न्याय के बिना जहाँ-तहाँ देवों में या मनुष्यों में ही उत्पन्न होते हैं, वे उपरि-मार्ग की प्राप्ति के लिए इन्द्रियों के परिपक्व होने तक बार-बार उत्पन्न होने के कारण संसार में विचरण ही करते हैं। पृथग्जन के विषय में तो कहना ही क्या है, क्योंकि उनके सभी भव-संयोजन अक्षीण हैं। इसीलिए कहा गया है— ‘‘කාමයොගෙන සංයුත්තා, භවයොගෙන චූභයං; සත්තා ගච්ඡන්ති සංසාරං, ජාතිමරණගාමිනො’’ති. 'काम-योग से युक्त और भव-योग—दोनों से (युक्त); प्राणी संसार में जाते हैं, जो जन्म और मृत्यु को प्राप्त होने वाले हैं।' කාමෙ පහන්ත්වානාති කාමරාගසඞ්ඛාතෙ කිලෙසකාමෙ අනාගාමිමග්ගෙන පජහිත්වා. ඡින්නසංසයාති සමුච්ඡින්නකඞ්ඛා, තඤ්ච ඛො සොතාපත්තිමග්ගෙනෙව. වණ්ණභණනත්ථං පන චතුත්ථමග්ගස්ස එවං වුත්තං. අරහන්තො හි ඉධ ‘‘ඡින්නසංසයා’’ති අධිප්පෙතා. තෙනෙවාහ ‘‘ඛීණමානපුනබ්භවා’’ති. සබ්බසො ඛීණො නවවිධොපි මානො ආයතිං පුනබ්භවො ච එතෙසන්ති ඛීණමානපුනබ්භවා. මානග්ගහණෙන චෙත්ථ තදෙකට්ඨතාය ලක්ඛණවසෙන වා සබ්බො චතුත්ථමග්ගවජ්ඣො කිලෙසො ගහිතොති. ඛීණමානතාය ච සඋපාදිසෙසා නිබ්බානධාතු වුත්තා හොති, ඛීණපුනබ්භවතාය අනුපාදිසෙසා. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. 'कामे पहन्त्वान' का अर्थ है—काम-राग संज्ञक क्लेश-कामों को अनागामी-मार्ग द्वारा त्याग कर। 'छिन्नसंशया' का अर्थ है—जिनकी शंकाएँ समूच्छिन्न हो गई हैं, और वह स्रोतापत्ति-मार्ग से ही होता है। किन्तु चतुर्थ मार्ग की प्रशंसा के लिए ऐसा कहा गया है। यहाँ अर्हत् ही 'छिन्नसंशया' के रूप में अभिप्रेत हैं। इसीलिए कहा— 'खीणमानपुनब्भवा' (जिनका मान और पुनर्जन्म क्षीण हो गया है)। नौ प्रकार का मान और भविष्य का पुनर्जन्म जिनका सर्वथा क्षीण हो गया है, वे 'क्षीण-मान-पुनर्भव' हैं। यहाँ 'मान' के ग्रहण से उसके साथ रहने वाले या लक्षण के आधार पर चतुर्थ मार्ग द्वारा वध्य सभी क्लेश ग्रहण किए गए हैं। 'क्षीण-मान' होने से स-उपादिशेष निर्वाण-धातु कही गई है, और 'क्षीण-पुनर्भव' होने से अनुपादिशेष। शेष सुविज्ञेय ही है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 8. කල්යාණසීලසුත්තවණ්ණනා ८. कल्याणशील सूत्र की व्याख्या। 97. අට්ඨමෙ කල්යාණසීලොති සුන්දරසීලො, පසත්ථසීලො, පරිපුණ්ණසීලො. තත්ථ සීලපාරිපූරී ද්වීහි කාරණෙහි හොති සම්මදෙව සීලවිපත්තියා ආදීනවදස්සනෙන, සීලසම්පත්තියා ච ආනිසංසදස්සනෙන. ඉධ පන සබ්බපරිබන්ධවිප්පමුත්තස්ස සබ්බාකාරපරිපුණ්ණස්ස මග්ගසීලස්ස ඵලසීලස්ස ච වසෙන කල්යාණතා වෙදිතබ්බා. කල්යාණධම්මොති සබ්බෙ බොධිපක්ඛියධම්මා අධිප්පෙතා, තස්මා කල්යාණා සතිපට්ඨානාදිබොධිපක්ඛියධම්මා එතස්සාති කල්යාණධම්මො. කල්යාණපඤ්ඤොති ච මග්ගඵලපඤ්ඤාවසෙනෙව [Pg.289] කල්යාණපඤ්ඤො. ලොකුත්තරා එව හි සීලාදිධම්මා එකන්තකල්යාණා නාම අකුප්පසභාවත්තා. කෙචි පන ‘‘චතුපාරිසුද්ධිසීලවසෙන කල්යාණසීලො, විපස්සනාමග්ගධම්මවසෙන කල්යාණධම්මො, මග්ගඵලපඤ්ඤාවසෙන කල්යාණපඤ්ඤො’’ති වදන්ති. අසෙක්ඛා එව තෙ සීලධම්මපඤ්ඤාති එකෙ. අපරෙ පන භණන්ති – සොතාපන්නසකදාගාමීනං මග්ගඵලසීලං කල්යාණසීලං නාම, තස්මා ‘‘කල්යාණසීලො’’ති ඉමිනා සොතාපන්නො සකදාගාමී ච ගහිතා හොන්ති. තෙ හි සීලෙසු පරිපූරකාරිනො නාම. අනාගාමිමග්ගඵලධම්මා අග්ගමග්ගධම්මා ච කල්යාණධම්මා නාම. තත්ථ හි බොධිපක්ඛියධම්මා භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති. තස්මා ‘‘කල්යාණධම්මො’’ති ඉමිනා තතියමග්ගට්ඨතො පට්ඨාය තයො අරියා ගහිතා හොන්ති. පඤ්ඤාකිච්චස්ස මත්ථකප්පත්තියා අග්ගඵලෙ පඤ්ඤා කල්යාණපඤ්ඤා නාම, තස්මා පඤ්ඤාවෙපුල්ලප්පත්තො අරහා ‘‘කල්යාණපඤ්ඤො’’ති වුත්තො. එවමෙව පුග්ගලා ගහිතා හොන්තීති. කිං ඉමිනා පපඤ්චෙන? අග්ගමග්ගඵලධම්මා ඉධ කල්යාණසීලාදයො වුත්තාති අයමම්හාකං ඛන්ති. ධම්මවිභාගෙන හි අයං පුග්ගලවිභාගො, න ධම්මවිභාගොති. ९७. आठवें (पद) में 'कल्याणशील' का अर्थ है सुंदर शील वाला, प्रशंसित शील वाला, परिपूर्ण शील वाला। वहाँ शील की परिपूर्णता दो कारणों से होती है: शील-विपत्ति में दोष देखने से और शील-सम्पत्ति में लाभ देखने से। यहाँ सभी बाधाओं से मुक्त, सभी प्रकार से परिपूर्ण मार्ग-शील और फल-शील के कारण 'कल्याणता' जाननी चाहिए। 'कल्याणधम्म' से सभी बोधिपाक्षिक धर्म अभिप्रेत हैं, इसलिए जिसके ये कल्याणकारी स्मृतिप्रस्थान आदि बोधिपाक्षिक धर्म हैं, वह 'कल्याणधम्म' है। 'कल्याणप्रज्ञ' मार्ग और फल की प्रज्ञा के कारण ही 'कल्याणप्रज्ञ' है। लोकोत्तर शील आदि धर्म ही वास्तव में एकांततः कल्याणकारी हैं क्योंकि वे अक्षोभ्य स्वभाव वाले हैं। कुछ लोग कहते हैं— 'चतुपारिशुद्धि शील के कारण कल्याणशील, विपश्यना और मार्ग धर्मों के कारण कल्याणधम्म, और मार्ग-फल प्रज्ञा के कारण कल्याणप्रज्ञ।' कुछ कहते हैं कि वे शील, धर्म और प्रज्ञा केवल अशैक्ष (अर्हत्) के ही होते हैं। दूसरे कहते हैं— स्रोतआपन्न और सकृदागामी का मार्ग-फल शील 'कल्याणशील' कहलाता है, इसलिए 'कल्याणशील' शब्द से स्रोतआपन्न और सकृदागामी ग्रहण किए जाते हैं। वे शील में परिपूर्णता करने वाले होते हैं। अनागामी मार्ग-फल धर्म और अर्हत् मार्ग धर्म 'कल्याणधम्म' कहलाते हैं। वहाँ बोधिपाक्षिक धर्म भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं। इसलिए 'कल्याणधम्म' शब्द से तृतीय मार्ग से लेकर तीन आर्य ग्रहण किए जाते हैं। प्रज्ञा के कार्य की पराकाष्ठा पर पहुँचने के कारण अर्हत् फल की प्रज्ञा 'कल्याणप्रज्ञा' कहलाती है, इसलिए प्रज्ञा की विपुलता को प्राप्त अर्हत् 'कल्याणप्रज्ञ' कहा गया है। इस प्रकार पुद्गल ग्रहण किए जाते हैं। इस विस्तार से क्या लाभ? यहाँ अर्हत् मार्ग और फल के धर्मों को ही कल्याणशील आदि कहा गया है, यही हमारा मत है। धर्मों के विभाजन से ही यह पुद्गलों का विभाजन है, न कि केवल धर्मों का विभाजन। කෙවලීති එත්ථ කෙවලං වුච්චති කෙනචි අවොමිස්සකතාය සබ්බසඞ්ඛතවිවිත්තං නිබ්බානං, තස්ස අධිගතත්තා අරහා කෙවලී. අථ වා පහානභාවනාපාරිපූරියා පරියොසානඅනවජ්ජධම්මපාරිපූරියා ච කල්යාණකට්ඨෙන අබ්යාසෙකසුඛතාය ච කෙවලං අරහත්තං, තදධිගමෙන කෙවලී ඛීණාසවො. මග්ගබ්රහ්මචරියවාසං වසිත්වා පරියොසාපෙත්වා ඨිතොති වුසිතවා. උත්තමෙහි අග්ගභූතෙහි වා අසෙක්ඛධම්මෙහි සමන්නාගතත්තා ‘‘උත්තමපුරිසො’’ති වුච්චති. 'केवली' यहाँ 'केवल' उसे कहा जाता है जो किसी भी चीज़ से अमिश्रित होने के कारण सभी संस्कृत (संस्कारों) से विविक्त निर्वाण है, उसे प्राप्त करने के कारण अर्हत् 'केवली' है। अथवा, प्रहाण और भावना की परिपूर्णता के कारण, अंततः निर्दोष धर्मों की परिपूर्णता के कारण, कल्याणकारी होने के कारण और निर्बाध सुख के कारण 'अर्हत्त्व' ही 'केवल' है, उसे प्राप्त करने से क्षीणास्त्रव 'केवली' है। मार्ग-ब्रह्मचर्य का वास करके और उसे समाप्त करके स्थित होने के कारण वह 'वुसितवा' है। उत्तम या श्रेष्ठ अशैक्ष धर्मों से युक्त होने के कारण वह 'उत्तम पुरुष' कहा जाता है। සීලවාති එත්ථ කෙනට්ඨෙන සීලං? සීලනට්ඨෙන සීලං. කිමිදං සීලනං නාම? සමාධානං, සුසීල්යවසෙන කායකම්මාදීනං අවිප්පකිණ්ණතාති අත්ථො. අථ වා උපධාරණං, ඣානාදිකුසලධම්මානං පතිට්ඨානවසෙන ආධාරභාවොති අත්ථො. තස්මා සීලති, සීලෙතීති වා සීලං. අයං තාව සද්දලක්ඛණනයෙන සීලට්ඨො. අපරෙ පන ‘‘සිරට්ඨො සීලට්ඨො, සීතලට්ඨො සීලට්ඨො, සිවට්ඨො සීලට්ඨො’’ති නිරුත්තිනයෙන අත්ථං වණ්ණයන්ති. තයිදං පාරිපූරිතො අතිසයතො වා සීලං අස්ස අත්ථීති සීලවා, චතුපාරිසුද්ධිසීලවසෙන සීලසම්පන්නොති අත්ථො. තත්ථ යං ජෙට්ඨකසීලං[Pg.290], තං විත්ථාරෙත්වා දස්සෙතුං ‘‘පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතො’’තිආදි වුත්තන්ති එකච්චානං ආචරියානං අධිප්පායො. 'शीलवान' यहाँ किस अर्थ में 'शील' है? 'शीलन' के अर्थ में शील है। यह 'शीलन' क्या है? इसका अर्थ है 'समाधान', अर्थात् सुशीलता के कारण काय-कर्म आदि का विखराव न होना। अथवा 'उपधारण', अर्थात् ध्यान आदि कुशल धर्मों की प्रतिष्ठा के कारण आधार-भाव होना। इसलिए जो 'शीलन' करता है या जिसमें 'शीलन' होता है, वह शील है। यह तो शब्द-लक्षण की पद्धति से शील का अर्थ हुआ। दूसरे लोग निरुक्ति की पद्धति से अर्थ का वर्णन करते हैं— 'शिर के अर्थ में शील, शीतल के अर्थ में शील, शिव के अर्थ में शील'। वह शील जिसकी परिपूर्णता या अतिशयता के कारण हो, वह 'शीलवान' है, अर्थात् चतुपारिशुद्धि शील के कारण जो शील-सम्पन्न है। वहाँ जो श्रेष्ठ शील है, उसे विस्तार से दिखाने के लिए 'प्रातिमोक्ष-संवर से संवृत' आदि कहा गया है, यह कुछ आचार्यों का अभिप्राय है। අපරෙන පන භණන්ති – උභයත්ථාපි පාතිමොක්ඛසංවරො භගවතා වුත්තො. පාතිමොක්ඛසංවරො එව හි සීලං, ඉතරෙසු ඉන්ද්රියසංවරො ඡද්වාරරක්ඛණමත්තමෙව, ආජීවපාරිසුද්ධි ධම්මෙන පච්චයුප්පාදනමත්තමෙව, පච්චයසන්නිස්සිතං පටිලද්ධපච්චයෙ ‘‘ඉදමත්ථ’’න්ති පච්චවෙක්ඛිත්වා පරිභුඤ්ජනමත්තමෙව. නිප්පරියායෙන පාතිමොක්ඛසංවරොව සීලං. යස්ස සො භින්නො, සො සීසච්ඡින්නො පුරිසො විය හත්ථපාදෙ ‘‘සෙසානි රක්ඛිස්සතී’’ති න වත්තබ්බො. යස්ස පන සො අරොගො, අච්ඡින්නසීසො විය පුරිසො, තානි පුන පාකතිකානි කත්වා රක්ඛිතුං සක්කොති. තස්මා සීලවාති ඉමිනා පාතිමොක්ඛසීලමෙව උද්දිසිත්වා තං විත්ථාරෙතුං ‘‘පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතො’’තිආදි වුත්තන්ති. दूसरे लोग कहते हैं— भगवान ने दोनों ही स्थानों पर प्रातिमोक्ष-संवर ही कहा है। प्रातिमोक्ष-संवर ही वास्तव में शील है; अन्यों में, इन्द्रिय-संवर केवल छह द्वारों की रक्षा मात्र है, आजीव-पारिशुद्धि केवल धर्मपूर्वक प्रत्ययों को उत्पन्न करना मात्र है, और प्रत्यय-सन्निश्रित केवल प्राप्त प्रत्ययों का 'यह इस प्रयोजन के लिए है' ऐसा प्रत्यवेक्षण करके उपभोग करना मात्र है। मुख्य रूप से प्रातिमोक्ष-संवर ही शील है। जिसका वह टूट गया है, वह सिर कटे हुए पुरुष के समान है, उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह हाथ-पैर आदि 'शेष अंगों की रक्षा करेगा'। लेकिन जिसका वह स्वस्थ है, वह बिना कटे सिर वाले पुरुष के समान उन्हें पुनः स्वाभाविक करके रक्षा कर सकता है। इसलिए 'शीलवान' शब्द से प्रातिमोक्ष-शील को ही निर्दिष्ट करके उसे विस्तार से बताने के लिए 'प्रातिमोक्ष-संवर से संवृत' आदि कहा गया है। තත්ථ පාතිමොක්ඛන්ති සික්ඛාපදසීලං. තඤ්හි යො නං පාති රක්ඛති, තං මොක්ඛෙති මොචෙති ආපායිකාදීහි දුක්ඛෙහීති පාතිමොක්ඛං. සංවරණං සංවරො, කායවාචාහි අවීතික්කමො. පාතිමොක්ඛමෙව සංවරො පාතිමොක්ඛසංවරො, තෙන සංවුතො පිහිතකායවාචොති පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතො. ඉදමස්ස තස්මිං සීලෙ පතිට්ඨිතභාවපරිදීපනං. විහරතීති තදනුරූපවිහාරසමඞ්ගිභාවපරිදීපනං. ආචාරගොචරසම්පන්නොති හෙට්ඨා පාතිමොක්ඛසංවරස්ස, උපරි විසෙසානුයොගස්ස ච උපකාරකධම්මපරිදීපනං. අණුමත්තෙසු වජ්ජෙසු භයදස්සාවීති පාතිමොක්ඛසීලතො අචවනධම්මතාපරිදීපනං. සමාදායාති සික්ඛාපදානං අනවසෙසතො ආදානපරිදීපනං. සික්ඛතීති සික්ඛාය සමඞ්ගිභාවපරිදීපනං. සික්ඛාපදෙසූති සික්ඛිතබ්බධම්මපරිදීපනං. वहाँ 'प्रातिमोक्ष' का अर्थ शिक्षापद-शील है। जो इसकी रक्षा करता है, उसे यह अपाय आदि के दुखों से मुक्त करता है, इसलिए यह 'प्रातिमोक्ष' है। संवरण करना 'संवर' है, अर्थात् काया और वाणी से उल्लंघन न करना। प्रातिमोक्ष ही संवर है, वह 'प्रातिमोक्ष-संवर' है; उससे संवृत अर्थात् ढकी हुई काया और वाणी वाला 'प्रातिमोक्ष-संवर-संवृत' है। यह उस शील में उसकी प्रतिष्ठित अवस्था का प्रदर्शन है। 'विहरति' उसके अनुरूप विहार से युक्त होने का प्रदर्शन है। 'आचार-गोचर-सम्पन्न' नीचे प्रातिमोक्ष-संवर के लिए और ऊपर विशेष अनुयोग के लिए उपकारक धर्मों का प्रदर्शन है। 'अणुमात्र दोषों में भी भय देखने वाला' प्रातिमोक्ष-शील से विचलित न होने के स्वभाव का प्रदर्शन है। 'समादाय' शिक्षापदों को पूर्ण रूप से ग्रहण करने का प्रदर्शन है। 'सिक्खति' शिक्षा से युक्त होने का प्रदर्शन है। 'शिक्षापदों में' सीखने योग्य धर्मों का प्रदर्शन है। අපරො නයො – කිලෙසානං බලවභාවතො පාපකිරියාය සුකරභාවතො පුඤ්ඤකිරියාය ච දුක්කරභාවතො බහුක්ඛත්තුං අපායෙසු පතනසීලොති පාතී, පුථුජ්ජනො. අනිච්චතාය වා භවාදීසු කම්මවෙගක්ඛිත්තො ඝටියන්තං විය අනවට්ඨානෙන පරිබ්භමනතො ගමනසීලොති පාතී, මරණවසෙන වා තම්හි තම්හි සත්තනිකායෙ අත්තභාවස්ස පාතනසීලොති පාතී, සත්තසන්තානො, චිත්තමෙව වා. තං පාතිනං සංසාරදුක්ඛතො මොක්ඛෙතීති පාතිමොක්ඛො. චිත්තස්ස හි විමොක්ඛෙන සත්තො විමුත්තො[Pg.291]. ‘‘චිත්තවොදානා විසුජ්ඣන්තී’’ති (සං. නි. 3.100) ‘‘අනුපාදාය ආසවෙහි චිත්තං විමුත්ත’’න්ති (ම. නි. 2.206) ච වුත්තං. අථ වා අවිජ්ජාදිනා හෙතුනා සංසාරෙ පතති ගච්ඡති පවත්තතීති පාති. ‘‘අවිජ්ජානීවරණානං සත්තානං තණ්හාසංයොජනානං සන්ධාවතං සංසරත’’න්ති (සං. නි. 2.124; 5.520) හි වුත්තං. තස්ස පාතිනො සත්තස්ස තණ්හාදිසංකිලෙසත්තයතො මොක්ඛො එතෙනාති පාතිමොක්ඛො. ‘‘කණ්ඨෙකාලො’’තිආදීනං වියස්ස සමාසසිද්ධි වෙදිතබ්බා. दूसरा तरीका - क्लेशों की प्रबलता के कारण पाप करना सुगम होने से और पुण्य करना कठिन होने से, बार-बार अपायों (दुर्गति) में गिरने के स्वभाव वाला होने के कारण 'पाती' (गिरने वाला) पृथग्जन है। अथवा अनित्यता के कारण भवादि में कर्म के वेग से फेंके गए घटीयंत्र (रहट) की तरह अनवस्थान (अस्थिरता) से परिभ्रमण करने के कारण गमनशील होने से 'पाती' है, अथवा मरण के वश से उन-उन सत्त्व-निकायों में आत्मभाव (शरीर) को गिराने के स्वभाव वाला होने से 'पाती' सत्त्व-संतान है, अथवा चित्त ही है। उस 'पाती' को संसार-दुःख से मुक्त करता है, इसलिए 'पातिमोक्ष' है। चित्त की विमुक्ति से ही सत्त्व विमुक्त होता है। कहा भी गया है - 'चित्त की शुद्धि से (सत्त्व) शुद्ध होते हैं' (सं. नि. 3.100) और 'अनुपादान (आसक्ति रहित) होकर आस्रवों से चित्त विमुक्त हो गया' (म. नि. 2.206)। अथवा अविद्या आदि हेतुओं से संसार में गिरता है, जाता है, प्रवृत्त होता है, इसलिए 'पाति' है। कहा भी गया है - 'अविद्या रूपी नीवरण वाले और तृष्णा रूपी संयोजन वाले सत्त्वों का संधावन और संसरण होता है' (सं. नि. 2.124; 5.520)। उस 'पाती' सत्त्व का तृष्णा आदि तीन संक्लेशों से इसके द्वारा मोक्ष होता है, इसलिए 'पातिमोक्ष' है। 'कण्ठेकालो' आदि की तरह इसकी समास-सिद्धि जाननी चाहिए। අථ වා පාතෙති විනිපාතෙති දුක්ඛෙති පාති, චිත්තං. වුත්තඤ්හි ‘‘චිත්තෙන නීයති ලොකො, චිත්තෙන පරිකස්සතී’’ති (සං. නි. 1.62). තස්ස පාතිනො මොක්ඛො එතෙනාති පාතිමොක්ඛො. පතති වා එතෙන අපායදුක්ඛෙ සංසාරදුක්ඛෙ චාති පාති, තණ්හාදිසංකිලෙසො. වුත්තඤ්හි ‘‘තණ්හා ජනෙති පුරිසං (සං. නි. 1.56-57), තණ්හාදුතියො පුරිසො’’ති (ඉතිවු. 15, 105; චූළනි. පාරායනානුගීතිගාථානිද්දෙස 107) ච ආදි. තතො පාතිතො මොක්ඛොති පාතිමොක්ඛො. අථ වා පතති එත්ථාති පාති, ඡ අජ්ඣත්තිකානි බාහිරානි ච ආයතනානි. වුත්තඤ්හි ‘‘ඡසු ලොකො සමුප්පන්නො, ඡසු කුබ්බති සන්ථව’’න්ති (සං. නි. 1.70). තතො ඡඅජ්ඣත්තිකබාහිරායතනසඞ්ඛාතතො පාතිතො මොක්ඛොති පාතිමොක්ඛො. අථ වා පාතො විනිපාතො අස්ස අත්ථීති පාතී, සංසාරො. තතො මොක්ඛොති පාතිමොක්ඛො. අථ වා සබ්බලොකාධිපතිභාවතො ධම්මිස්සරො භගවා පතීති වුච්චති, මුච්චති එතෙනාති මොක්ඛො, පතිනො මොක්ඛො තෙන පඤ්ඤත්තත්තාති පතිමොක්ඛො, පතිමොක්ඛො එව පාතිමොක්ඛො. සබ්බගුණානං වා මූලභාවතො උත්තමට්ඨෙන පති ච සො යථාවුත්තට්ඨෙන මොක්ඛො චාති පතිමොක්ඛො, පතිමොක්ඛො එව පාතිමොක්ඛො. තථා හි වුත්තං ‘‘පාතිමොක්ඛන්ති මුඛමෙතං පමුඛමෙත’’න්ති (මහාව. 135) විත්ථාරො. अथवा जो गिराता है, विनिपातित करता है, दुःखी करता है, वह 'पाति' चित्त है। कहा भी गया है - 'चित्त से लोक ले जाया जाता है, चित्त से ही खींचा जाता है' (सं. नि. 1.62)। उस 'पाती' का इसके द्वारा मोक्ष होता है, इसलिए 'पातिमोक्ष' है। अथवा इसके द्वारा अपाय-दुःख और संसार-दुःख में गिरता है, इसलिए 'पाति' तृष्णा आदि संक्लेश हैं। कहा भी गया है - 'तृष्णा पुरुष को उत्पन्न करती है' (सं. नि. 1.56-57), 'तृष्णा जिसका साथी है ऐसा पुरुष' (इतिवु. 15, 105; चूलनि. पारायणानुगीतिगाथानिद्देस 107) आदि। उस 'पाति' से मोक्ष 'पातिमोक्ष' है। अथवा जिसमें गिरता है वह 'पाति' छह आध्यात्मिक और बाह्य आयतन हैं। कहा भी गया है - 'छह में लोक उत्पन्न हुआ है, छह में ही संसर्ग करता है' (सं. नि. 1.70)। उस छह आध्यात्मिक और बाह्य आयतन रूपी 'पाति' से मोक्ष 'पातिमोक्ष' है। अथवा जिसका 'पात' (पतन) या विनिपात है, वह 'पाती' संसार है। उससे मोक्ष 'पातिमोक्ष' है। अथवा समस्त लोक का अधिपति होने से धर्मेश्वर भगवान को 'पति' कहा जाता है, इसके द्वारा मुक्त होता है इसलिए 'मोक्ष' है, 'पति' (भगवान) द्वारा प्रज्ञप्त होने के कारण 'पतिमोक्ष' है, 'पतिमोक्ष' ही 'पातिमोक्ष' है। अथवा सभी गुणों का मूल होने से उत्तम अर्थ में 'पति' है और वह पूर्वोक्त अर्थ में 'मोक्ष' भी है, इसलिए 'पतिमोक्ष' है, 'पतिमोक्ष' ही 'पातिमोक्ष' है। जैसा कि कहा गया है - 'पातिमोक्ष, यह मुख है, यह प्रमुख है' (महाव. 135) इत्यादि विस्तार से। අථ වා පඉති පකාරෙ, අතීති අච්චන්තත්ථෙ නිපාතො. තස්මා පකාරෙහි අච්චන්තං මොක්ඛෙතීති පාතිමොක්ඛො. ඉදඤ්හි සීලං සයං තදඞ්ගවසෙන, සමාධිසහිතං පඤ්ඤාසහිතඤ්ච වික්ඛම්භනවසෙන සමුච්ඡෙදවසෙන ච අච්චන්තං මොක්ඛෙති මොචෙතීති පාතිමොක්ඛං. පති පති මොක්ඛොති වා [Pg.292] පතිමොක්ඛො, තම්හා තම්හා වීතික්කමිතබ්බදොසතො පති පච්චෙකං මොක්ඛොති අත්ථො. පතිමොක්ඛො එව පාතිමොක්ඛො. මොක්ඛොති වා නිබ්බානං, තස්ස මොක්ඛස්ස පටිබිම්බභූතන්ති පතිමොක්ඛං. පාතිමොක්ඛසීලසංවරො හි සූරියස්ස අරුණුග්ගමනං විය නිබ්බානස්ස උදයභූතො තප්පටිභාගො විය හොති යථාරහං කිලෙසනිබ්බාපනතොති පතිමොක්ඛං, පතිමොක්ඛං එව පාතිමොක්ඛං. අථ වා මොක්ඛං පති වත්තති මොක්ඛාභිමුඛන්ති පතිමොක්ඛං, පතිමොක්ඛමෙව පාතිමොක්ඛන්ති එවං තාවෙත්ථ පාතිමොක්ඛසද්දස්ස අත්ථො වෙදිතබ්බො. अथवा 'पा' इति प्रकार अर्थ में है, 'अति' इति अत्यंत अर्थ में निपात है। इसलिए प्रकारों से अत्यंत मुक्त करता है, इसलिए 'पातिमोक्ष' है। यह शील स्वयं तदंग के वश से, और समाधि तथा प्रज्ञा के साथ विक्खम्भन (दबाने) के वश से और समुच्छेद (उन्मूलन) के वश से अत्यंत मुक्त करता है, इसलिए 'पातिमोक्ष' है। अथवा 'प्रति-प्रति मोक्ष' ही 'पतिमोक्ष' है, उस-उस उल्लंघन करने योग्य दोष से प्रति (प्रत्येक) मोक्ष - यह अर्थ है। 'पतिमोक्ष' ही 'पातिमोक्ष' है। अथवा 'मोक्ष' निर्वाण है, उस मोक्ष का प्रतिबिंब स्वरूप होने के कारण 'पतिमोक्ष' है। पातिमोक्ष-शील-संवर सूर्य के अरुणोदय की तरह निर्वाण के उदय के समान और उसके प्रतिरूप जैसा होता है, क्योंकि यह यथायोग्य क्लेशों को बुझाने वाला है, इसलिए 'पतिमोक्ष' है, 'पतिमोक्ष' ही 'पातिमोक्ष' है। अथवा जो मोक्ष की ओर प्रवृत्त होता है, मोक्ष के अभिमुख है, वह 'पतिमोक्ष' है, 'पतिमोक्ष' ही 'पातिमोक्ष' है - इस प्रकार यहाँ 'पातिमोक्ष' शब्द का अर्थ समझना चाहिए। සංවරති පිදහති එතෙනාති සංවරො, පාතිමොක්ඛමෙව සංවරොති පාතිමොක්ඛසංවරො. අත්ථතො පන තතො තතො වීතික්කමිතබ්බතො විරතියො චෙතනා වා, තෙන පාතිමොක්ඛසංවරෙන උපෙතො සමන්නාගතො පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතොති වුත්තො. වුත්තඤ්හෙතං විභඞ්ගෙ – इसके द्वारा संवरण करता है, ढकता है, इसलिए 'संवर' है; पातिमोक्ष ही संवर है, इसलिए 'पातिमोक्ष-संवर' है। अर्थ की दृष्टि से तो उन-उन उल्लंघन करने योग्य (कार्यों) से विरति या चेतना है; उस पातिमोक्ष-संवर से युक्त, समन्वित 'पातिमोक्ष-संवर-संवृत' कहा गया है। विभंग में यह कहा गया है - ‘‘ඉමිනා පාතිමොක්ඛසංවරෙන උපෙතො හොති සමුපෙතො උපගතො සමුපගතො සම්පන්නො සමන්නාගතො. තෙන වුච්චති පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතො’’ති (විභ. 511). ''इस पातिमोक्ष-संवर से युक्त होता है, समुपेत होता है, उपगत होता है, समुपगत होता है, संपन्न होता है, समन्वित होता है। इसलिए 'पातिमोक्ष-संवर-संवृत' कहा जाता है'' (विभ. 511)। විහරතීති ඉරියාපථවිහාරෙන විහරති, ඉරියති, වත්තති. ආචාරගොචරසම්පන්නොති වෙළුදානාදිමිච්ඡාජීවස්ස කායපාගබ්භියාදීනඤ්ච අකරණෙන, සබ්බසො අනාචාරං වජ්ජෙත්වා ‘‘කායිකො අවීතික්කමො, වාචසිකො අවීතික්කමො’’ති එවං වුත්තභික්ඛුසාරුප්පආචාරසම්පත්තියා වෙසියාදිඅගොචරං වජ්ජෙත්වා පිණ්ඩපාතාදිඅත්ථං උපසඞ්කමිතුං යුත්තට්ඨානසඞ්ඛාතගොචරෙන ච සම්පන්නත්තා ආචාරගොචරසම්පන්නො. අපිච යො භික්ඛු සත්ථරි සගාරවො සප්පතිස්සො සබ්රහ්මචාරීසු සගාරවො සප්පතිස්සො හිරොත්තප්පසම්පන්නො සුනිවත්ථො සුපාරුතො පාසාදිකෙන අභික්කන්තෙන පටික්කන්තෙන ආලොකිතෙන විලොකිතෙන සමිඤ්ජිතෙන පසාරිතෙන ඔක්ඛිත්තචක්ඛු ඉරියාපථසම්පන්නො ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ ජාගරියානුයුත්තො සතිසම්පජඤ්ඤෙන සමන්නාගතො අප්පිච්ඡො සන්තුට්ඨො පවිවිත්තො අසංසට්ඨො ආභිසමාචාරිකෙසු සක්කච්චකාරී ගරුචිත්තීකාරබහුලො විහරති, අයං වුච්චති ආචාරසම්පන්නො. विहरति (विहार करता है) अर्थात् ईर्यापथ-विहार से विहार करता है, ईर्या करता है, वर्तता है। 'आचार-गोचर-संपन्न' - बाँस दान आदि मिथ्या आजीविका और कायिक धृष्टता आदि को न करने से, पूरी तरह से अनाचार को त्याग कर 'कायिक उल्लंघन न करना, वाचिक उल्लंघन न करना' इस प्रकार कहे गए भिक्षु-योग्य आचार की संपत्ति से, और वेश्या आदि अगोचरों को त्याग कर पिण्डपात आदि के लिए जाने योग्य स्थान रूपी गोचर से संपन्न होने के कारण 'आचार-गोचर-संपन्न' है। इसके अतिरिक्त, जो भिक्षु शास्ता के प्रति गौरव और सम्मान रखने वाला, सब्रह्मचारियों के प्रति गौरव और सम्मान रखने वाला, ह्री और ओत्तप्प से संपन्न, अच्छी तरह निवस्त (नीचे का वस्त्र पहने) और अच्छी तरह प्रावृत (ऊपर का वस्त्र पहने), आगे बढ़ने, पीछे हटने, देखने, इधर-उधर देखने, समेटने और फैलाने में प्रासादिक (सौम्य), नीचे दृष्टि रखने वाला, ईर्यापथ से संपन्न, इंद्रियों में गुप्तद्वार (संयमित), भोजन में मात्रा जानने वाला, जागरण में लगा रहने वाला, स्मृति और संप्रजन्य से युक्त, अल्पेच्छ, संतुष्ट, प्रविविक्त (एकांतप्रिय), असंसृष्ट (अनासक्त), आभिसमाचारिक (शिष्टाचार संबंधी) नियमों में आदरपूर्वक कार्य करने वाला और गुरुओं के प्रति बहुत सम्मान रखने वाला होकर विहार करता है, वह 'आचार-संपन्न' कहा जाता है। ගොචරො [Pg.293] පන – උපනිස්සයගොචරො, ආරක්ඛගොචරො, උපනිබන්ධගොචරොති තිවිධො. තත්ථ දසකථාවත්ථුගුණසමන්නාගතො වුත්තලක්ඛණො කල්යාණමිත්තො යං නිස්සාය අසුතං සුණාති, සුතං පරියොදපෙති, කඞ්ඛං විතරති, දිට්ඨිං උජුකං කරොති, චිත්තං පසාදෙති, යස්ස ච අනුසික්ඛන්තො සද්ධාය වඩ්ඪති, සීලෙන, සුතෙන, චාගෙන, පඤ්ඤාය වඩ්ඪති, අයං උපනිස්සයගොචරො. යො භික්ඛු අන්තරඝරං පවිට්ඨො වීථිං පටිපන්නො ඔක්ඛිත්තචක්ඛු යුගමත්තදස්සාවී සංවුතො ගච්ඡති, න හත්ථිං ඔලොකෙන්තො, න අස්සං, න රථං, න පත්තිං, න ඉත්ථිං, න පුරිසං ඔලොකෙන්තො, න උද්ධං ඔලොකෙන්තො, න අධො ඔලොකෙන්තො, න දිසාවිදිසා පෙක්ඛමානො ගච්ඡති, අයං ආරක්ඛගොචරො. උපනිබන්ධගොචරො පන චත්තාරො සතිපට්ඨානා, යත්ථ භික්ඛු අත්තනො චිත්තං උපනිබන්ධති. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – गोचर तीन प्रकार का है - उपनिश्रय-गोचर, आरक्षा-गोचर और उपनिबन्ध-गोचर। वहाँ, दस कथावस्तुओं के गुणों से युक्त, कहे गए लक्षणों वाला कल्याणमित्र, जिसका आश्रय लेकर (भिक्षु) अनसुने को सुनता है, सुने हुए को परिशुद्ध करता है, शंका को दूर करता है, दृष्टि को सीधा करता है, चित्त को प्रसन्न करता है, और जिसका अनुकरण करते हुए श्रद्धा में बढ़ता है, शील, श्रुत, त्याग और प्रज्ञा में बढ़ता है, यह 'उपनिश्रय-गोचर' है। जो भिक्षु गाँव के भीतर प्रविष्ट होकर, मार्ग पर चलते हुए, नीचे दृष्टि किए हुए, युग-मात्र (चार हाथ) देखने वाला, संयमित होकर चलता है, हाथी को नहीं देखता, घोड़े को नहीं, रथ को नहीं, पैदल सैनिक को नहीं, स्त्री को नहीं, पुरुष को नहीं देखता, न ऊपर देखता है, न नीचे देखता है, न दिशाओं-विदिशाओं को देखते हुए चलता है, यह 'आरक्षा-गोचर' है। 'उपनिबन्ध-गोचर' चार स्मृति-प्रस्थान हैं, जहाँ भिक्षु अपने चित्त को बाँधता है। जैसा कि भगवान ने कहा है - ‘‘කො ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො ගොචරො සකො පෙත්තිකො විසයො? යදිදං – චත්තාරො සතිපට්ඨානා’’ති (සං. නි. 5.372). “हे भिक्षुओं, भिक्षु का अपना गोचर, पिता का विषय क्या है? वह यह है - चार स्मृति-प्रस्थान।” (सं. नि. 5.372) ඉති යථාවුත්තාය ආචාරසම්පත්තියා ඉමාය ච ගොචරසම්පත්තියා සමන්නාගතත්තා ආචාරගොචරසම්පන්නො. इस प्रकार पूर्वोक्त आचार-सम्पत्ति और इस गोचर-सम्पत्ति से युक्त होने के कारण वह 'आचार-गोचर-सम्पन्न' है। අණුමත්තෙසු වජ්ජෙසු භයදස්සාවීති අප්පමත්තකෙසු අණුප්පමාණෙසු අසඤ්චිච්ච ආපන්නසෙඛියඅකුසලචිත්තුප්පාදාදිභෙදෙසු වජ්ජෙසු භයදස්සනසීලො. යො හි භික්ඛු පරමාණුමත්තං වජ්ජං අට්ඨසට්ඨියොජනසතසහස්සුබ්බෙධසිනෙරුපබ්බතරාජසදිසං කත්වා පස්සති, යොපි භික්ඛු සබ්බලහුකං දුබ්භාසිතමත්තං පාරාජිකසදිසං කත්වා පස්සති, අයං අණුමත්තෙසු වජ්ජෙසු භයදස්සාවී නාම. සමාදාය සික්ඛති සික්ඛාපදෙසූති යං කිඤ්චි සික්ඛාපදෙසු සික්ඛිතබ්බං, තං සබ්බෙන සබ්බං සබ්බථා සබ්බං අනවසෙසං සමාදියිත්වා සික්ඛති වත්තති, පූරෙතීති අත්ථො. ඉති කල්යාණසීලොති ඉමිනා පකාරෙන කල්යාණසීලො සමානො. පුග්ගලාධිට්ඨානවසෙන හි නිද්දිට්ඨං සීලං ‘‘එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කල්යාණසීලො හොතී’’ති වුත්තපුග්ගලාධිට්ඨානවසෙනෙව නිගමෙත්වා ‘‘කල්යාණධම්මො’’ති එත්ථ වුත්තධම්මෙ නිද්දිසිතුකාමෙන ‘‘තෙසං ධම්මානං ඉදං සීලං අධිට්ඨාන’’න්ති දස්සෙතුං පුන ‘‘ඉති කල්යාණසීලො’’ති වුත්තං. සත්තන්නං බොධිපක්ඛියානන්තිආදි සබ්බං හෙට්ඨා වුත්තත්ථමෙව. පුන කල්යාණසීලොතිආදි නිගමනං. "अणुमात्र दोषों में भय देखने वाला" का अर्थ है अल्प मात्रा वाले, अणु के समान परिमाण वाले, अनजाने में हुए शेखिय (नियमों) के उल्लंघन और अकुशल चित्त के उत्पन्न होने आदि भेदों वाले दोषों में भय देखने के स्वभाव वाला। जो भिक्षु परमाणु मात्र दोष को भी अड़सठ लाख योजन ऊँचे सुमेरु पर्वतराज के समान करके देखता है, और जो भिक्षु अत्यंत लघु 'दुब्भाषित' (अपशब्द) मात्र को भी 'पाराजिक' के समान करके देखता है, वह "अणुमात्र दोषों में भय देखने वाला" कहलाता है। "शिक्षापदों को ग्रहण कर शिक्षा ग्रहण करता है" का अर्थ है कि शिक्षापदों में जो कुछ भी सीखने योग्य है, उसे पूरी तरह से, सब प्रकार से, बिना कुछ शेष छोड़े ग्रहण कर शिक्षा ग्रहण करता है, आचरण करता है, पूर्ण करता है। "इस प्रकार कल्याणशील" का अर्थ है इस प्रकार से कल्याणशील होते हुए। पुद्गलाधिष्ठान (व्यक्ति-परक) के वश से निर्दिष्ट शील को "इस प्रकार, भिक्षुओं, भिक्षु कल्याणशील होता है" - इस प्रकार पुद्गलाधिष्ठान के वश से ही उपसंहार करके, "कल्याणधम्म" यहाँ कहे गए धर्मों को निर्दिष्ट करने की इच्छा से, "उन धर्मों का यह शील आधार है" यह दिखाने के लिए पुनः "इस प्रकार कल्याणशील" कहा गया है। "सात बोधिपाक्षिक" आदि सब पहले कहे गए अर्थ के समान ही है। "पुनः कल्याणशील" आदि उपसंहार है। ගාථාසු [Pg.294] දුක්කටන්ති දුට්ඨු කතං, දුච්චරිතන්ති අත්ථො. හිරිමනන්ති හිරිමන්තං හිරිසම්පන්නං, සබ්බසො පාපපවත්තියා ජිගුච්ඡනසභාවන්ති අත්ථො. හිරිමනන්ති වා හිරිසහිතචිත්තං. හිරිග්ගහණෙනෙව චෙත්ථ ඔත්තප්පම්පි ගහිතන්ති වෙදිතබ්බං. හිරොත්තප්පග්ගහණෙන ච සබ්බසො දුච්චරිතාභාවස්ස හෙතුං දස්සෙන්තො කල්යාණසීලතං හෙතුතො විභාවෙති. සම්බොධීති අරියඤාණං, තං ගච්ඡන්ති භජන්තීති සම්බොධිගාමිනො, බොධිපක්ඛිකාති අත්ථො. අනුස්සදන්ති රාගුස්සදාදිරහිතං. ‘‘තථාවිධ’’න්තිපි පඨන්ති. ‘‘බොධිපක්ඛිකානං ධම්මානං භාවනානුයොගමනුයුත්තො’’ති යථා යථා පුබ්බෙ වුත්තං, තථාවිධං තාදිසන්ති අත්ථො. දුක්ඛස්සාති වට්ටදුක්ඛස්ස, වට්ටදුක්ඛහෙතුනො වා. ඉධෙව ඛයමත්තනොති ආසවක්ඛයාධිගමෙන අත්තනො වට්ටදුක්ඛහෙතුනො සමුදයපක්ඛියස්ස කිලෙසගණස්ස ඉධෙව ඉමස්මිංයෙව අත්තභාවෙ ඛයං අනුප්පාදං පජානාති, වට්ටදුක්ඛස්සෙව වා ඉධෙව චරිමකචිත්තනිරොධෙන ඛයං ඛීණභාවං පජානාති. තෙහි ධම්මෙහි සම්පන්නන්ති තෙහි යථාවුත්තසීලාදිධම්මෙහි සමන්නාගතං. අසිතන්ති තණ්හාදිට්ඨිනිස්සයානං පහීනත්තා අසිතං, කත්ථචි අනිස්සිතං. සබ්බලොකස්සාති සබ්බස්මිං සත්තලොකෙ. සෙසං වුත්තනයමෙව. गाथाओं में "दुक्कट" का अर्थ है बुरा किया हुआ, अर्थात् दुश्चरित। "हिरिमन्तं" का अर्थ है लज्जावान, लज्जा से संपन्न, सब प्रकार से पाप की प्रवृत्ति से घृणा करने के स्वभाव वाला। अथवा "हिरिमन्तं" का अर्थ है लज्जा युक्त चित्त वाला। यहाँ 'हिरि' (लज्जा) के ग्रहण से ही 'ओत्तप्प' (भय) का भी ग्रहण समझना चाहिए। 'हिरि' और 'ओत्तप्प' के ग्रहण से सब प्रकार से दुश्चरित के अभाव के कारण को दिखाते हुए, वह कारण से कल्याणशीलता को स्पष्ट करता है। "संबोधि" का अर्थ है आर्य ज्ञान, उसे प्राप्त करने वाले या भजने वाले "संबोधिगामी" हैं, जिसका अर्थ बोधिपाक्षिक है। "अनुस्सदं" का अर्थ है राग की अधिकता आदि से रहित। "तथाविधं" भी पाठ मिलता है। "बोधिपाक्षिक धर्मों की भावना के अभ्यास में लगा हुआ" - जैसा पहले कहा गया है, वैसा ही, उस प्रकार का, यह अर्थ है। "दुःख का" का अर्थ है वट्ट-दुःख (संसार-दुःख) का, अथवा वट्ट-दुःख के कारण का। "यहीं अपने क्षय को" का अर्थ है आस्रवों के क्षय की प्राप्ति से अपने वट्ट-दुःख के कारण रूप समुदय-पक्षीय क्लेश-समूह के इसी जन्म में, इसी आत्मभाव में क्षय (अनुत्पाद) को जानता है, अथवा वट्ट-दुःख के ही इसी जन्म में अंतिम चित्त के निरोध से क्षय (क्षीण भाव) को जानता है। "उन धर्मों से संपन्न" का अर्थ है उन पूर्वोक्त शील आदि धर्मों से युक्त। "असितं" का अर्थ है तृष्णा और दृष्टि के आश्रयों के प्रहाण के कारण अनाश्रित, कहीं भी आश्रित न होना। "सब लोक का" का अर्थ है समस्त सत्व लोक में। शेष पहले कहे गए तरीके के अनुसार ही है। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9. දානසුත්තවණ්ණනා ९. दान सूत्र की व्याख्या। 98. නවමෙ දානන්ති දාතබ්බං, සවත්ථුකා වා චෙතනා දානං, සම්පත්තිපරිච්චාගස්සෙතං අධිවචනං. ආමිසදානන්ති චත්තාරො පච්චයා දෙය්යභාවවසෙන ආමිසදානං නාම. තෙ හි තණ්හාදීහි ආමසිතබ්බතො ආමිසන්ති වුච්චන්ති. තෙසං වා පරිච්චාගචෙතනා ආමිසදානං. ධම්මදානන්ති ඉධෙකච්චො ‘‘ඉමෙ ධම්මා කුසලා, ඉමෙ ධම්මා අකුසලා, ඉමෙ ධම්මා සාවජ්ජා, ඉමෙ ධම්මා අනවජ්ජා, ඉමෙ විඤ්ඤුගරහිතා, ඉමෙ විඤ්ඤුප්පසත්ථා; ඉමෙ සමත්තා සමාදින්නා අහිතාය දුක්ඛාය සංවත්තන්ති, ඉමෙ හිතාය සුඛාය සංවත්තන්තී’’ති කුසලාකුසලකම්මපථෙ විභජන්තො කම්මකම්මවිපාකෙ ඉධලොකපරලොකෙ පච්චක්ඛතො දස්සෙන්තො විය පාකටං කරොන්තො අකුසලෙහි ධම්මෙහි නිවත්තාපෙන්තො, කුසලෙසු ධම්මෙසු පතිට්ඨාපෙන්තො, ධම්මං දෙසෙති, ඉදං ධම්මදානං. යො පන ‘‘ඉමෙ ධම්මා අභිඤ්ඤෙය්යා[Pg.295], ඉමෙ පරිඤ්ඤෙය්යා, ඉමෙ පහාතබ්බා, ඉමෙ සච්ඡිකාතබ්බා, ඉමෙ භාවෙතබ්බා’’ති සච්චානි විභාවෙන්තො අමතාධිගමාය පටිපත්තිධම්මං දෙසෙති, ඉදං සිඛාප්පත්තං ධම්මදානං නාම. එතදග්ගන්ති එතං අග්ගං. යදිදන්ති යං ඉදං ධම්මදානං වුත්තං, එතං ඉමෙසු ද්වීසු දානෙසු අග්ගං සෙට්ඨං උත්තමං. විවට්ටගාමිධම්මදානඤ්හි නිස්සාය සබ්බානත්ථතො පරිමුච්චති, සකලං වට්ටදුක්ඛං අතික්කමති. ලොකියං පන ධම්මදානං සබ්බෙසං දානානං නිදානං සබ්බසම්පත්තීනං මූලං. තෙනාහ – ९८. नौवें (सूत्र) में "दान" का अर्थ है देने योग्य वस्तु, अथवा वस्तु सहित चेतना दान है; यह संपत्ति के त्याग का पर्यायवाची है। "आमिष दान" का अर्थ है देय भाव के कारण चार प्रत्यय (चीवर आदि) आमिष दान कहलाते हैं। वे तृष्णा आदि के द्वारा स्पर्श किए जाने योग्य होने के कारण 'आमिष' कहे जाते हैं। अथवा उनके त्याग की चेतना आमिष दान है। "धम्म दान" का अर्थ है यहाँ कोई "ये धर्म कुशल हैं, ये धर्म अकुशल हैं, ये धर्म सदोष हैं, ये धर्म निर्दोष हैं, ये विद्वानों द्वारा निन्दित हैं, ये विद्वानों द्वारा प्रशंसित हैं; ये पूर्णतः ग्रहण किए जाने पर अहित और दुःख के लिए होते हैं, ये हित और सुख के लिए होते हैं" - इस प्रकार कुशल और अकुशल कर्मपथों का विभाजन करते हुए, कर्म और कर्म-विपाक को इस लोक और परलोक में प्रत्यक्ष दिखाने के समान स्पष्ट करते हुए, अकुशल धर्मों से निवृत्त कराते हुए, कुशल धर्मों में प्रतिष्ठित करते हुए, धर्म का उपदेश देता है, यह धम्म दान है। और जो "ये धर्म अभिज्ञेय (विशेष रूप से जानने योग्य) हैं, ये परिज्ञेय (पूर्णतः जानने योग्य) हैं, ये प्रहातव्य (त्यागने योग्य) हैं, ये साक्षात्कर्तव्य (साक्षात्कार करने योग्य) हैं, ये भावितव्य (अभ्यास करने योग्य) हैं" - इस प्रकार सत्यों का विभाजन करते हुए अमृत (निर्वाण) की प्राप्ति के लिए प्रतिपत्ति-धर्म का उपदेश देता है, यह 'शिखा-प्राप्त' (सर्वोच्च) धम्म दान कहलाता है। "एतदग्गं" का अर्थ है यह श्रेष्ठ है। "यदिदं" का अर्थ है जो यह धम्म दान कहा गया है, यह इन दो दानों में श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर और उत्तम है। विवर्तगामी (निर्वाणगामी) धम्म दान के आश्रय से ही व्यक्ति सभी अनर्थों से मुक्त होता है और समस्त वट्ट-दुःख (संसार-दुःख) को पार कर जाता है। लौकिक धम्म दान तो सभी दानों का कारण और सभी संपत्तियों का मूल है। इसीलिए कहा गया है - ‘‘සබ්බදානං ධම්මදානං ජිනාති, සබ්බරසං ධම්මරසො ජිනාති; සබ්බරතිං ධම්මරතී ජිනාති, තණ්හක්ඛයො සබ්බදුක්ඛං ජිනාතී’’ති. (ධ. ප. 354) – "धम्म दान सब दानों को जीत लेता है (श्रेष्ठ है), धम्म रस सब रसों को जीत लेता है, धम्म रति सब रतियों को जीत लेता है, तृष्णा का क्षय सब दुखों को जीत लेता है।" (धम्मपद ३५४) - අභයදානමෙත්ථ ධම්මදානෙනෙව සඞ්ගහිතන්ති දට්ඨබ්බං. यहाँ अभय दान को धम्म दान के अंतर्गत ही संगृहीत समझना चाहिए। සාධාරණභොගිතාධිප්පායෙන අත්තනා පරිභුඤ්ජිතබ්බතො චතුපච්චයතො සයමෙව අභුඤ්ජිත්වා පරෙසං සංවිභජනං ආමිසසංවිභාගො. සාධාරණභොගිතාධිප්පායෙනෙව අත්තනා විදිතස්ස අධිගතස්ස ධම්මස්ස අප්පොස්සුක්කො අහුත්වා පරෙසං උපදෙසො ධම්මසංවිභාගො. චතූහි පච්චයෙහි චතූහි ච සඞ්ගහවත්ථූහි පරෙසං අනුග්ගණ්හනං අනුකම්පනං ආමිසානුග්ගහො. වුත්තනයෙනෙව ධම්මෙන පරෙසං අනුග්ගණ්හනං අනුකම්පනං ධම්මානුග්ගහො. සෙසං වුත්තනයමෙව. साधारण भोग की इच्छा से, स्वयं उपभोग करने योग्य चार प्रत्ययों को स्वयं न भोगकर दूसरों में बाँटना "आमिष संविभाग" है। साधारण भोग की ही इच्छा से, स्वयं जाने हुए और प्राप्त किए हुए धर्म के प्रति उदासीन न होकर दूसरों को उपदेश देना "धम्म संविभाग" है। चार प्रत्ययों और चार संग्रह-वस्तुओं के द्वारा दूसरों पर अनुग्रह करना और अनुकम्पा करना "आमिष अनुग्रह" है। पूर्वोक्त विधि से ही धर्म के द्वारा दूसरों पर अनुग्रह करना और अनुकम्पा करना "धम्म अनुग्रह" है। शेष पहले कहे गए तरीके के अनुसार ही है। ගාථාසු යමාහු දානං පරමන්ති යං දානං චිත්තඛෙත්තදෙය්යධම්මානං උළාරභාවෙන පරමං උත්තමං, භොගසම්පත්තිආදීනං වා පූරණතො ඵලනතො, පරස්ස වා ලොභමච්ඡරියාදිකස්ස පටිපක්ඛස්ස මද්දනතො හිංසනතො ‘‘පරම’’න්ති බුද්ධා භගවන්තො ආහු. අනුත්තරන්ති යං දානං චෙතනාදිසම්පත්තියා සාතිසයපවත්තියා අග්ගභාවෙන අග්ගවිපාකත්තා ච උත්තරරහිතං අනුත්තරභාවසාධනං චාති ආහු. යං සංවිභාගන්ති එත්ථාපි ‘‘පරමං අනුත්තර’’න්ති පදද්වයං ආනෙත්වා යොජෙතබ්බං. අවණ්ණයීති කිත්තයි, ‘‘භොජනං, භික්ඛවෙ, දදමානො දායකො පටිග්ගාහකානං පඤ්ච ඨානානි දෙතී’’තිආදිනා (අ. නි. 5.37), ‘‘එවං චෙ, භික්ඛවෙ, සත්තා ජානෙය්යුං දානසංවිභාගස්ස විපාක’’න්තිආදිනා (ඉතිවු. 26) ච පසංසයි. යථා පන දානං සංවිභාගො ච පරමං අනුත්තරඤ්ච හොති, තං දස්සෙතුං ‘‘අග්ගම්හී’’තිආදි වුත්තං. තත්ථ අග්ගම්හීති සීලාදිගුණවිසෙසයොගෙන සෙට්ඨෙ අනුත්තරෙ පුඤ්ඤක්ඛෙත්තෙ සම්මාසම්බුද්ධෙ අරියසඞ්ඝෙ ච. පසන්නචිත්තොති [Pg.296] කම්මඵලසද්ධාය රතනත්තයසද්ධාය ච චිත්තං පසාදෙන්තො ඔකප්පෙන්තො. චිත්තසම්පත්තියා හි ඛෙත්තසම්පත්තියා ච පරිත්තෙපි දෙය්යධම්මෙ දානං මහානුභාවං හොති මහාජුතිකං මහාවිප්ඵාරං. වුත්තඤ්හෙතං – गाथाओं में जिसे 'दानं परमं' (दान परम है) कहा गया है, वह दान चित्त, क्षेत्र और देय वस्तुओं की उदारता के कारण परम और उत्तम है, अथवा भोग-सम्पत्ति आदि की पूर्णता और फल के कारण, अथवा दूसरे के लोभ और मात्सर्य (कंजूसी) आदि प्रतिपक्षों के मर्दन और विनाश के कारण बुद्धों और भगवंतों ने इसे 'परम' कहा है। 'अनुत्तर' वह दान है जो चेतना आदि की सम्पत्ति की अतिशय प्रवृत्ति के कारण श्रेष्ठ होने से और श्रेष्ठ विपाक वाला होने से उत्तर-रहित (जिससे श्रेष्ठ कुछ न हो) और अनुत्तर भाव को सिद्ध करने वाला है। 'यं संविभागं' यहाँ भी 'परमं अनुत्तरं' इन दो पदों को लाकर जोड़ना चाहिए। 'अवण्णयी' का अर्थ है कीर्तन किया, प्रशंसा की, जैसे— "भिक्षुओं, भोजन देते हुए दायक प्रतिग्राहकों (लेने वालों) को पाँच स्थान देता है" इत्यादि (अं. नि. 5.37), और "भिक्षुओं, यदि सत्त्व दान-संविभाग के विपाक को इस प्रकार जानें" इत्यादि (इतिवु. 26) के द्वारा प्रशंसा की। दान और संविभाग कैसे परम और अनुत्तर होते हैं, यह दिखाने के लिए 'अग्गम्हि' आदि कहा गया है। वहाँ 'अग्गम्हि' का अर्थ है— शील आदि गुणों के विशेष योग से श्रेष्ठ और अनुत्तर पुण्यक्षेत्र सम्यक्सम्बुद्ध और आर्यसंघ में। 'पसन्नचित्तो' का अर्थ है— कर्म-फल की श्रद्धा और रत्नत्रय की श्रद्धा से चित्त को प्रसन्न और आश्वस्त करते हुए। चित्त की सम्पत्ति और क्षेत्र की सम्पत्ति से थोड़े से भी देय धर्म (दान की वस्तु) का दान महान अनुभाव वाला, महान ज्योति वाला और महान विस्तार वाला होता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘නත්ථි චිත්තෙ පසන්නම්හි, අප්පකා නාම දක්ඛිණා; තථාගතෙ වා සම්බුද්ධෙ, අථ වා තස්ස සාවකෙ’’ති. (වි. ව. 804; නෙත්ති. 95); "चित्त के प्रसन्न होने पर, तथागत बुद्ध या उनके श्रावकों के प्रति दी गई दक्षिणा कभी अल्प (थोड़ी) नहीं होती।" (वि. व. 804; नेत्ति. 95); විඤ්ඤූති සප්පඤ්ඤො. පජානන්ති සම්මදෙව දානඵලං දානානිසංසං පජානන්තො. කො න යජෙථ කාලෙති යුත්තප්පත්තකාලෙ කො නාම දානං න දදෙය්ය? සද්ධා, දෙය්යධම්මො, පටිග්ගාහකාති ඉමෙසං තිණ්ණං සම්මුඛිභූතකාලෙයෙව හි දානං සම්භවති, න අඤ්ඤථා, පටිග්ගාහකානං වා දාතුං යුත්තකාලෙ. 'विञ्ञू' का अर्थ है प्रज्ञावान। 'पजानन्ति' का अर्थ है दान के फल और दान के नृशंस (लाभ) को भली-भाँति जानते हुए। 'को न यजेथ काले' का अर्थ है— उचित समय प्राप्त होने पर भला कौन दान न दे? श्रद्धा, देय वस्तु और प्रतिग्राहक— इन तीनों के सम्मुख होने के समय ही दान संभव होता है, अन्यथा नहीं, अथवा प्रतिग्राहकों को देने के योग्य समय पर। එවං පඨමගාථාය ආමිසදානසංවිභාගානුග්ගහෙ දස්සෙත්වා ඉදානි ධම්මදානසංවිභාගානුග්ගහෙ දස්සෙතුං ‘‘යෙ චෙව භාසන්තී’’ති දුතියගාථමාහ. තත්ථ උභයන්ති ‘‘භාසන්ති සුණන්තී’’ති වුත්තා දෙසකා පටිග්ගාහකාති උභයං. අයං පනෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යෙ සුගතස්ස භගවතො සාසනෙ සද්ධම්මෙ පසන්නචිත්තා විමුත්තායතනසීසෙ ඨත්වා දෙසෙන්ති පටිග්ගණ්හන්ති ච, තෙසං දෙසකපටිග්ගාහකානං සො ධම්මදානධම්මසංවිභාගධම්මානුග්ගහසඞ්ඛාතො අත්ථො. පරමත්ථසාධනතො පරමො. තණ්හාසංකිලෙසාදිසබ්බසංකිලෙසමලවිසොධනෙන විසුජ්ඣති. කීදිසානං? යෙ අප්පමත්තා සුගතස්ස සාසනෙ. යෙ ච – इस प्रकार पहली गाथा में आमिष-दान और संविभाग के अनुग्रह को दिखाकर, अब धम्म-दान और संविभाग के अनुग्रह को दिखाने के लिए 'ये चेव भासन्ति' इत्यादि दूसरी गाथा कही। वहाँ 'उभयं' का अर्थ है— 'भासन्ति सुणन्ति' (बोलते हैं और सुनते हैं) इस प्रकार कहे गए देशक (उपदेशक) और प्रतिग्राहक (श्रोता) दोनों। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है— जो सुगत भगवंत के शासन में सद्धर्म में प्रसन्न चित्त वाले होकर विमुक्ति-आयतन के शीर्ष पर स्थित होकर उपदेश देते हैं और ग्रहण करते हैं, उन देशक और प्रतिग्राहकों का वह धम्म-दान, धम्म-संविभाग और धम्म-अनुग्रह संज्ञक 'अर्थ' है। परमार्थ की सिद्धि करने के कारण यह 'परम' है। तृष्णा और संक्लेश आदि सभी संक्लेश-मलों के विशोधन से यह विशुद्ध होता है। किनके लिए? जो सुगत के शासन में अप्रमत्त हैं। और जो— ‘‘සබ්බපාපස්ස අකරණං, කුසලස්ස උපසම්පදා; සචිත්තපරියොදපනං, එතං බුද්ධාන සාසන’’න්ති. (දී. නි. 2.90; ධ. ප. 183) – "सभी पापों का न करना, कुशल (पुण्य) का उपार्जन करना और अपने चित्त को पूर्णतः शुद्ध करना—यही बुद्धों का शासन (शिक्षा) है।" (दी. नि. 2.90; ध. प. 183) — සඞ්ඛෙපතො එවං පකාසිතෙ සම්මාසම්බුද්ධස්ස සාසනෙ ඔවාදෙ අනුසිට්ඨියං අප්පමත්තා අධිසීලසික්ඛාදයො සක්කච්චං සම්පාදෙන්ති. තෙසං විසුජ්ඣති, අරහත්තඵලවිසුද්ධියා අතිවිය වොදායතීති. संक्षेप में इस प्रकार प्रकाशित सम्यक्सम्बुद्ध के शासन, उपदेश और अनुशासनी में अप्रमत्त होकर (वे) अधिशील-शिक्षा आदि को आदरपूर्वक सम्पादित करते हैं। उनका (चित्त) विशुद्ध होता है, अर्हत्फल की विशुद्धि से वह अत्यधिक निर्मल हो जाता है। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. තෙවිජ්ජසුත්තවණ්ණනා १०. त्रैविद्य सूत्र की व्याख्या (तेविज्जसुत्तवण्णना) 99. දසමෙ ධම්මෙනාති ඤායෙන, සම්මාපටිපත්තිසඞ්ඛාතෙන හෙතුනා කාරණෙන. යාය හි පටිපදාය තෙවිජ්ජො හොති, සා පටිපදා ඉධ ධම්මොති [Pg.297] වෙදිතබ්බා. කා පන සා පටිපදාති? චරණසම්පදා ච විජ්ජාසම්පදා ච. තෙවිජ්ජන්ති පුබ්බෙනිවාසානුස්සතිඤාණාදීහි තීහි විජ්ජාහි සමන්නාගතං. බ්රාහ්මණන්ති බාහිතපාපබ්රාහ්මණං. පඤ්ඤාපෙමීති ‘‘බ්රාහ්මණො’’ති ජානාපෙමි පතිට්ඨපෙමි. නාඤ්ඤං ලපිතලාපනමත්තෙනාති අඤ්ඤං ජාතිමත්තබ්රාහ්මණං අට්ඨකාදීහි ලපිතමත්තවිප්පලපනමත්තෙන බ්රාහ්මණං න පඤ්ඤාපෙමීති. අථ වා ලපිතලාපනමත්තෙනාති මන්තානං අජ්ඣෙනඅජ්ඣාපනමත්තෙන. උභයථාපි යං පන බ්රාහ්මණා සාමවෙදාදිවෙදත්තයඅජ්ඣෙනෙන තෙවිජ්ජං බ්රාහ්මණං වදන්ති, තං පටික්ඛිපති. භගවතා හි ‘‘පරමත්ථතො අතෙවිජ්ජං බ්රාහ්මණංයෙව චෙතෙ භොවාදිනො අවිජ්ජානිවුතා ‘තෙවිජ්ජො බ්රාහ්මණො’ති වදන්ති, එවං පන තෙවිජ්ජො බ්රාහ්මණො හොතී’’ති දස්සනත්ථං තථා බුජ්ඣනකානං පුග්ගලානං අජ්ඣාසයෙන අයං දෙසනා ආරද්ධා. ९९. दसवें (सूत्र) में 'धम्मेन' (धर्म से) का अर्थ है न्याय से, सम्यक् प्रतिपत्ति (आचरण) नामक हेतु या कारण से। जिस प्रतिपदा (मार्ग) से कोई 'त्रैविद्य' (तेविज्ज) होता है, उस प्रतिपदा को यहाँ 'धर्म' समझना चाहिए। वह प्रतिपदा क्या है? वह चरण-सम्पदा और विद्या-सम्पदा है। 'त्रैविद्य' का अर्थ है पूर्वनिवास-अनुस्मृति-ज्ञान आदि तीन विद्याओं से युक्त। 'ब्राह्मण' का अर्थ है जिसने पापों को बाहर निकाल दिया है (बाहितपाप)। 'प्रज्ञापित करता हूँ' (पञ्ञापेमि) का अर्थ है 'ब्राह्मण' के रूप में जनाता हूँ या प्रतिष्ठित करता हूँ। 'न अन्यं लपितलापनमत्तेन' का अर्थ है कि केवल जाति मात्र के ब्राह्मण को, अष्टक आदि ऋषियों द्वारा कहे गए वचनों के प्रलाप मात्र से मैं ब्राह्मण नहीं कहता हूँ। अथवा 'लपितलापनमत्तेन' का अर्थ है मन्त्रों के अध्ययन और अध्यापन मात्र से। दोनों ही स्थितियों में, ब्राह्मण जो सामवेद आदि तीन वेदों के अध्ययन से जिसे 'त्रैविद्य ब्राह्मण' कहते हैं, उसका (भगवान) निषेध करते हैं। क्योंकि भगवान ने 'परमार्थतः जो त्रैविद्य नहीं है, ऐसे ही ब्राह्मण को ये भोवादी (अहंकारी) अविद्या से ढके हुए 'त्रैविद्य ब्राह्मण' कहते हैं, किन्तु इस प्रकार त्रैविद्य ब्राह्मण होता है'—यह दिखाने के लिए, तथा उस प्रकार समझने वाले व्यक्तियों के आशय के अनुसार यह देशना आरम्भ की है। තත්ථ යස්මා විජ්ජාසම්පන්නො චරණසම්පන්නොයෙව හොති චරණසම්පදාය විනා විජ්ජාසම්පත්තියා අභාවතො, තස්මා චරණසම්පදං අන්තොගධං කත්වා විජ්ජාසීසෙනෙව බ්රාහ්මණං පඤ්ඤාපෙතුකාමො ‘‘ධම්මෙනාහං, භික්ඛවෙ, තෙවිජ්ජං බ්රාහ්මණං පඤ්ඤාපෙමී’’ති දෙසනං සමුට්ඨාපෙත්වා ‘‘කථඤ්චාහං, භික්ඛවෙ, ධම්මෙන තෙවිජ්ජං බ්රාහ්මණං පඤ්ඤාපෙමී’’ති කථෙතුකම්යතාය පුච්ඡං කත්වා පුග්ගලාධිට්ඨානාය දෙසනාය විජ්ජත්තයං විභජන්තො ‘‘ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ’’තිආදිමාහ. वहाँ, क्योंकि जो विद्या-सम्पन्न होता है वह चरण-सम्पन्न ही होता है, क्योंकि चरण-सम्पदा के बिना विद्या-सम्पत्ति का अभाव होता है, इसलिए चरण-सम्पदा को अन्तर्निहित करके विद्या के मुख्यत्व से ही ब्राह्मण को प्रज्ञापित करने की इच्छा से 'भिक्षुओं! मैं धर्म से त्रैविद्य ब्राह्मण को प्रज्ञापित करता हूँ'—इस देशना को आरम्भ कर, 'भिक्षुओं! मैं कैसे धर्म से त्रैविद्य ब्राह्मण को प्रज्ञापित करता हूँ?'—इस प्रकार कहने की इच्छा से प्रश्न करके, पुद्गलाधिष्ठान देशना के द्वारा तीन विद्याओं का विभाजन करते हुए 'यहाँ, भिक्षुओं, भिक्षु...' आदि कहा। තත්ථ අනෙකවිහිතන්ති අනෙකවිධං, අනෙකෙහි වා පකාරෙහි පවත්තිතං, සංවණ්ණිතන්ති අත්ථො. පුබ්බෙනිවාසන්ති සමනන්තරාතීතභවං ආදිං කත්වා තත්ථ තත්ථ නිවුත්ථක්ඛන්ධසන්තානං. නිවුත්ථන්ති අජ්ඣාවුත්ථං අනුභූතං, අත්තනො සන්තානෙ උප්පජ්ජිත්වා නිරුද්ධං, නිවුත්ථධම්මං වා නිවුත්ථං, ගොචරනිවාසෙන නිවුත්ථං, අත්තනො විඤ්ඤාණෙන විඤ්ඤාතං පරවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතම්පි වා ඡින්නවටුමකානුස්සරණාදීසු. අනුස්සරතීති ‘‘එකම්පි ජාතිං ද්වෙපි ජාතියො’’ති එවං ජාතිපටිපාටිවසෙන අනුගන්ත්වා සරති, අනුදෙව වා සරති, චිත්තෙ අභිනින්නාමිතෙ පරිකම්මසමනන්තරං සරති. वहाँ 'अनेकविहित' का अर्थ है अनेक प्रकार का, अथवा अनेक प्रकारों से प्रवृत्त, अर्थात् वर्णित। 'पूर्वनिवास' का अर्थ है ठीक पिछले जन्म से आरम्भ कर उन-उन (जन्मों) में निवास किए हुए स्कन्ध-सन्तान। 'निवुत्थ' (निवास किया हुआ) का अर्थ है अध्याुषित या अनुभूत, जो अपनी सन्तान (प्रवाह) में उत्पन्न होकर निरुद्ध हो गया है, अथवा निवास किए हुए धर्म को 'निवुत्थ' कहते हैं, गोचर-निवास से निवास किया हुआ, अपने विज्ञान से ज्ञात, अथवा छिन्न-मार्ग के अनुस्मरण आदि में दूसरे के विज्ञान से ज्ञात भी। 'अनुस्सरति' (अनुस्मरण करता है) का अर्थ है 'एक भी जाति, दो भी जातियाँ'—इस प्रकार जातियों के क्रम के अनुसार पीछे जाकर स्मरण करता है, अथवा बार-बार स्मरण करता है, चित्त के (अभिज्ञा की ओर) झुकने पर परिकर्म के ठीक बाद स्मरण करता है। සෙය්යථිදන්ති ආරද්ධප්පකාරදස්සනත්ථෙ නිපාතො. තෙනෙව ය්වායං පුබ්බෙනිවාසො ආරද්ධො හොති, තස්ස පකාරං දස්සෙන්තො ‘‘එකම්පි ජාති’’න්තිආදිමාහ. තත්ථ එකම්පි ජාතින්ති එකම්පි පටිසන්ධිමූලකං චුතිපරියොසානං එකභවපරියාපන්නං ඛන්ධසන්තානං. එස නයො ද්වෙපි ජාතියොතිආදීසු. අනෙකෙපි සංවට්ටකප්පෙතිආදීසු පන පරිහායමානො කප්පො සංවට්ටකප්පො[Pg.298], වඩ්ඪමානො විවට්ටකප්පො. තත්ථ සංවට්ටෙන සංවට්ටට්ඨායී ගහිතො හොති තම්මූලකත්තා, විවට්ටෙන ච විවට්ටට්ඨායී. එවඤ්හි සති යානි තානි ‘‘චත්තාරිමානි, භික්ඛවෙ, කප්පස්ස අසඞ්ඛ්යෙය්යානි. කතමානි චත්තාරි? සංවට්ටො, සංවට්ටට්ඨායී, විවට්ටො, විවට්ටට්ඨායී’’ති (අ. නි. 4.156) වුත්තානි චත්තාරි අසඞ්ඛ්යෙය්යානි, තානි පරිග්ගහිතානි හොන්ති. 'सेय्यथिदं' (जैसे कि) आरम्भ किए गए प्रकार को दिखाने के अर्थ में निपात है। इसीलिए जो यह पूर्वनिवास आरम्भ किया गया है, उसका प्रकार दिखाते हुए 'एक भी जाति' आदि कहा। वहाँ 'एक भी जाति' का अर्थ है एक भी प्रतिसन्धि से आरम्भ होकर च्युति (मृत्यु) पर्यन्त एक भव (जन्म) में सम्मिलित स्कन्ध-सन्तान। यही नियम 'दो भी जातियाँ' आदि में भी है। 'अनेक संवर्तकल्प' आदि में, नष्ट होता हुआ कल्प 'संवर्तकल्प' है, और बढ़ता हुआ कल्प 'विवर्तकल्प' है। वहाँ संवर्त के साथ 'संवर्तस्थायी' ग्रहण किया गया है क्योंकि वह उसका मूल है, और विवर्त के साथ 'विवर्तस्थायी'। ऐसा होने पर ही जो वे 'भिक्षुओं! कल्प के ये चार असंख्येय हैं। कौन से चार? संवर्त, संवर्तस्थायी, विवर्त और विवर्तस्थायी' (अं. नि. 4.156) कहे गए चार असंख्येय हैं, वे गृहीत हो जाते हैं। තත්ථ තයො සංවට්ටා – තෙජොසංවට්ටො, ආපොසංවට්ටො, වායොසංවට්ටොති. තිස්සො සංවට්ටසීමා – ආභස්සරා, සුභකිණ්හා, වෙහප්ඵලාති. යදා කප්පො තෙජෙන සංවට්ටති, ආභස්සරතො හෙට්ඨා අග්ගිනා ඩය්හති. යදා උදකෙන සංවට්ටති, සුභකිණ්හතො හෙට්ඨා උදකෙන විලීයති. යදා වාතෙන සංවට්ටති, වෙහප්ඵලතො හෙට්ඨා වාතෙන විද්ධංසියති. විත්ථාරතො පන කොටිසතසහස්සචක්කවාළං එකතො විනස්සති. ඉති එවරූපො අයං පුබ්බෙනිවාසං අනුස්සරන්තො භික්ඛු අනෙකෙපි සංවට්ටකප්පෙ අනෙකෙපි විවට්ටකප්පෙ අනෙකෙපි සංවට්ටවිවට්ටකප්පෙ අනුස්සරති. කථං? අමුත්රාසින්තිආදිනා නයෙන. वहाँ तीन संवर्त हैं—तेज-संवर्त, आप-संवर्त और वायु-संवर्त। तीन संवर्त-सीमाएँ हैं—आभास्वर, शुभकृत्स्न और वेहप्फल। जब कल्प तेज (अग्नि) से संवर्तित (नष्ट) होता है, तब आभास्वर से नीचे अग्नि से जल जाता है। जब जल से संवर्तित होता है, तब शुभकृत्स्न से नीचे जल से विलीन हो जाता है। जब वायु से संवर्तित होता है, तब वेहप्फल से नीचे वायु से विध्वस्त हो जाता है। विस्तार से तो एक सौ हजार करोड़ चक्रवाल एक साथ नष्ट होते हैं। इस प्रकार, इस रूप में पूर्वनिवास का अनुस्मरण करता हुआ भिक्षु अनेक संवर्तकल्पों को, अनेक विवर्तकल्पों को और अनेक संवर्त-विवर्तकल्पों को अनुस्मरण करता है। कैसे? 'वहाँ मैं था' आदि विधि से। තත්ථ අමුත්රාසින්ති අමුම්හි සංවට්ටකප්පෙ අමුම්හි භවෙ වා යොනියා වා ගතියා වා විඤ්ඤාණට්ඨිතියා වා සත්තාවාසෙ වා සත්තනිකායෙ වා අහමහොසිං. එවංනාමොති තිස්සො වා ඵුස්සො වා. එවංගොත්තොති ගොතමො වා කස්සපො වා. එවංවණ්ණොති ඔදාතො වා සාමො වා. එවමාහාරොති සාලිමංසොදනාහාරො වා පවත්තඵලභොජනො වා. එවංසුඛදුක්ඛප්පටිසංවෙදීති අනෙකප්පකාරානං කායිකචෙතසිකානං සාමිසනිරාමිසාදිප්පභෙදානං වා සුඛදුක්ඛානං පටිසංවෙදී. එවමායුපරියන්තොති එවං වස්සසතපරිමාණායුපරියන්තො වා චතුරාසීතිකප්පසතසහස්සපරිමාණායුපරියන්තො වා. සො තතො චුතො අමුත්ර උදපාදින්ති සොහං තතො භවතො යොනිතො ගතිතො විඤ්ඤාණට්ඨිතිතො සත්තාවාසතො සත්තනිකායතො වා චුතො පුන අමුකස්මිං නාම භවෙ යොනියා ගතියා විඤ්ඤාණට්ඨිතියා සත්තාවාසෙ සත්තනිකායෙ වා උදපාදිං. තත්රාපාසින්ති අථ තත්රපි භවෙ යොනියා ගතියා විඤ්ඤාණට්ඨිතියා සත්තාවාසෙ සත්තනිකායෙ වා පුන අහොසිං. එවංනාමොතිආදි වුත්තනයමෙව. वहाँ 'अमुत्रासिं' (मैं वहाँ था) का अर्थ है—उस संवर्तकल्प में, उस भव में, योनि में, गति में, विज्ञान-स्थिति में, सत्त्वावास में या सत्त्व-निकाय में मैं था। 'एवं-नामो' का अर्थ है—तिस्स या फुस्स (जैसा नाम)। 'एवं-गोत्तो' का अर्थ है—गोतम या कस्सप (जैसा गोत्र)। 'एवं-वण्णो' का अर्थ है—गोरा या सांवला (जैसा वर्ण)। 'एवं-आहारो' का अर्थ है—शालि-मांस-ओदन जैसा आहार या प्राकृतिक फलों का भोजन। 'एवं-सुख-दुःख-पटिसंवेदी' का अर्थ है—अनेक प्रकार के कायिक और चैतसिक, सामिष और निरामिष आदि भेदों वाले सुख-दुःख का अनुभव करने वाला। 'एवं-आयुपरियन्तो' का अर्थ है—इस प्रकार सौ वर्ष की आयु की सीमा वाला या चौरासी लाख कल्पों की आयु की सीमा वाला। 'सो ततो चुतो अमुत्र उदपादिं' का अर्थ है—वह मैं उस भव, योनि, गति, विज्ञान-स्थिति, सत्त्वावास या सत्त्व-निकाय से च्युत होकर पुनः अमुक नाम के भव, योनि, गति, विज्ञान-स्थिति, सत्त्वावास या सत्त्व-निकाय में उत्पन्न हुआ। 'तत्रापासिं' का अर्थ है—फिर उस भव, योनि, गति, विज्ञान-स्थिति, सत्त्वावास या सत्त्व-निकाय में पुनः था। 'एवं-नामो' आदि का अर्थ पूर्वोक्त रीति से ही है। අථ [Pg.299] වා යස්මා ‘‘අමුත්රාසි’’න්ති ඉදං අනුපුබ්බෙන ආරොහන්තස්ස අත්තනො අභිනීහාරානුරූපං යථාබලං සරණං, ‘‘සො තතො චුතො’’ති පටිනිවත්තන්තස්ස පච්චවෙක්ඛණං, තස්මා ‘‘ඉධූපපන්නො’’ති ඉමිස්සා ඉධූපපත්තියා අනන්තරං ‘‘අමුත්ර උදපාදි’’න්ති වුත්තං. තත්රාපාසින්ති තත්රපි භවෙ…පෙ… සත්තනිකායෙ වා ආසිං. එවංනාමොති දත්තො වා මිත්තො වා, එවංගොත්තොති වාසෙට්ඨො වා කස්සපො වා. එවංවණ්ණොති කාළො වා ඔදාතො වා. එවමාහාරොති සුධාහාරො වා සාලිඔදනාදිආහාරො වා. එවංසුඛදුක්ඛප්පටිසංවෙදීති දිබ්බසුඛප්පටිසංවෙදී වා මානුසසුඛදුක්ඛප්පටිසංවෙදී වා. එවමායුපරියන්තොති එවං තංතංපරමායුපරියන්තො. සො තතො චුතොති සොහං තතො භවාදිතො චුතො. ඉධූපපන්නොති ඉධ ඉමස්මිං චරිමභවෙ මනුස්සො හුත්වා උපපන්නො නිබ්බත්තො. अथवा, क्योंकि 'अमुत्रासिं' (मैं वहाँ था) यह क्रम से ऊपर चढ़ते हुए अपने संकल्प (अभिनिहार) के अनुरूप यथाशक्ति स्मरण है, 'सो ततो चुतो' (वह वहाँ से च्युत होकर) लौटते हुए का प्रत्यवेक्षण है, इसलिए 'इधूपपन्नो' (यहाँ उत्पन्न हुआ) इस यहाँ की उत्पत्ति के ठीक बाद 'अमुत्र उदपादि' (वहाँ उत्पन्न हुआ) कहा गया है। 'तत्रापासिं' का अर्थ है—वहाँ भी उस भव... पे... या सत्त्व-निकाय में था। 'एवं-नामो' का अर्थ है—दत्त या मित्त, 'एवं-गोत्तो' का अर्थ है—वासेट्ठ या कस्सप। 'एवं-वण्णो' का अर्थ है—काला या गोरा। 'एवं-आहारो' का अर्थ है—सुधा-आहार (अमृत) या शालि-ओदन आदि आहार। 'एवं-सुख-दुःख-पटिसंवेदी' का अर्थ है—दिव्य सुख का अनुभव करने वाला या मानुषी सुख-दुःख का अनुभव करने वाला। 'एवं-आयुपरियन्तो' का अर्थ है—इस प्रकार उस-उस परम आयु की सीमा वाला। 'सो ततो चुतो' का अर्थ है—वह मैं उस भव आदि से च्युत हुआ। 'इधूपपन्नो' का अर्थ है—यहाँ इस अन्तिम भव में मनुष्य होकर उत्पन्न हुआ, पैदा हुआ। ඉතීති එවං. සාකාරං සඋද්දෙසන්ති නාමගොත්තාදිවසෙන සඋද්දෙසං, වණ්ණාදිවසෙන සාකාරං. නාමගොත්තෙන හි සත්තා ‘‘තිස්සො ගොතමො’’ති උද්දිසීයන්ති, වණ්ණාදීහි ‘‘සාමො ඔදාතො’’ති නානත්තතො පඤ්ඤායන්ති. තස්මා නාමගොත්තං උද්දෙසො, ඉතරෙ ආකාරා. අයමස්ස පඨමා විජ්ජා අධිගතාති අයං ඉමිනා භික්ඛුනා පඨමං අධිගමවසෙන පඨමා, විදිතකරණට්ඨෙන විජ්ජා අධිගතා සච්ඡිකතා හොති. කිං පනායං විදිතං කරොති? පුබ්බෙනිවාසං. අවිජ්ජාති තස්සෙව පුබ්බෙනිවාසස්ස අවිදිතකරණට්ඨෙන තස්ස පටිච්ඡාදකමොහො වුච්චති. තමොති ස්වෙව මොහො පටිච්ඡාදකට්ඨෙන තමොති වුච්චති. ආලොකොති සා එව විජ්ජා ඔභාසකරණට්ඨෙන ආලොකො. එත්ථ ච විජ්ජා අධිගතාති අයං අත්ථො, සෙසං පසංසාවචනං. යොජනා පනෙත්ථ – අයං ඛො තෙන භික්ඛුනා විජ්ජා අධිගතා, තස්ස අධිගතවිජ්ජස්ස අවිජ්ජා විහතා, විනට්ඨාති අත්ථො. කස්මා? යස්මා විජ්ජා උප්පන්නාති. සෙසපදද්වයෙපි එසෙව නයො. 'इति' का अर्थ है—इस प्रकार। 'साकारं सउद्देसं' का अर्थ है—नाम-गोत्र आदि के वश से 'सउद्देस' (विवरण सहित) और वर्ण आदि के वश से 'साकार' (आकार सहित)। क्योंकि नाम और गोत्र से सत्त्वों का 'तिस्स, गोतम' इस प्रकार निर्देश (उद्देश) किया जाता है, और वर्ण आदि से 'सांवला, गोरा' इस प्रकार भिन्नता से जाने जाते हैं। इसलिए नाम-गोत्र 'उद्देश' है, और शेष 'आकार' हैं। 'अयमस्स पठमा विज्जा अधिगता' का अर्थ है—यह इस भिक्षु द्वारा प्रथम अधिगम (प्राप्ति) होने के कारण 'प्रथम', और ज्ञात करने के अर्थ में 'विद्या' प्राप्त हुई, साक्षात्कृत हुई। यह क्या ज्ञात कराती है? पूर्व-निवास (पिछले जन्मों) को। 'अविज्जा' (अविद्या) उसी पूर्व-निवास को अज्ञात रखने के कारण उसका आच्छादक मोह कहा जाता है। 'तमो' (अन्धकार) वही मोह आच्छादन करने के अर्थ में 'तम' कहा जाता है। 'आलोको' (प्रकाश) वही विद्या प्रकाशित करने के अर्थ में 'आलोक' है। यहाँ 'विद्या प्राप्त हुई' यही अर्थ है, शेष प्रशंसा के वचन हैं। यहाँ योजना यह है—यह विद्या उस भिक्षु द्वारा प्राप्त की गई, उस विद्या-प्राप्त भिक्षु की अविद्या नष्ट हो गई, विनष्ट हो गई—यही अर्थ है। क्यों? क्योंकि विद्या उत्पन्न हुई। शेष दो पदों में भी यही न्याय (तर्क) है। යථා තන්ති එත්ථ යථාති ඔපම්මත්ථෙ, තන්ති නිපාතමත්තං. සතියා අවිප්පවාසෙන අප්පමත්තස්ස. වීරියාතාපෙන ආතාපිනො. කායෙ ච ජීවිතෙ ච අනපෙක්ඛතාය පහිතත්තස්ස පෙසිතචිත්තස්සාති අත්ථො. ඉදං වුත්තං හොති – යථා අප්පමත්තස්ස ආතාපිනො පහිතත්තස්ස විහරතො අවිජ්ජා විහඤ්ඤෙය්ය, විජ්ජා උප්පජ්ජෙය්ය, තමො විහඤ්ඤෙය්ය, ආලොකො උප්පජ්ජෙය්ය; එවමෙව තස්ස භික්ඛුනො අවිජ්ජා විහතා, විජ්ජා උප්පන්නා[Pg.300], තමො විහතො, ආලොකො උප්පන්නො, තස්ස පධානානුයොගස්ස අනුරූපමෙව ඵලං ලභිත්වා විහරතීති. 'यथा तं' यहाँ 'यथा' उपमा के अर्थ में है, 'तं' मात्र निपात है। स्मृति के न खोने से 'अप्रमत्त' के। वीर्य के ताप से 'आतापी' (तपस्वी) के। शरीर और जीवन की अपेक्षा न रखने से 'पहितत्त' (दृढ़-निश्चयी) अर्थात् प्रेषित-चित्त के—यह अर्थ है। यह कहा गया है—जैसे अप्रमत्त, आतापी और पहितत्त होकर विहार करने वाले की अविद्या नष्ट हो जाए, विद्या उत्पन्न हो जाए, अन्धकार नष्ट हो जाए, प्रकाश उत्पन्न हो जाए; वैसे ही उस भिक्षु की अविद्या नष्ट हुई, विद्या उत्पन्न हुई, अन्धकार नष्ट हुआ, प्रकाश उत्पन्न हुआ, वह उस प्रधान (योग) के अभ्यास के अनुरूप ही फल प्राप्त कर विहार करता है। දිබ්බෙන චක්ඛුනාති එත්ථ යං වත්තබ්බං, තං හෙට්ඨා වුත්තමෙව. විසුද්ධෙනාති චුතූපපාතදස්සනෙන දිට්ඨිවිසුද්ධිහෙතුභාවතො විසුද්ධං. යො හි චුතිමත්තමෙව පස්සති න උපපාතං, සො උච්ඡෙදදිට්ඨිං ගණ්හාති. යො උපපාතමත්තමෙව පස්සති න චුතිං, සො නවසත්තපාතුභාවදිට්ඨිං ගණ්හාති. යො පන තදුභයං පස්සති, සො යස්මා දුවිධම්පි තං දිට්ඨිගතං අතිවත්තති, තස්මාස්ස තං දස්සනං දිට්ඨිවිසුද්ධිහෙතු හොති, තදුභයම්පායං බුද්ධපුත්තො පස්සති. තෙන වුත්තං ‘‘චුතූපපාතදස්සනෙන දිට්ඨිවිසුද්ධිහෙතුභාවතො විසුද්ධ’’න්ති. එකාදසඋපක්කිලෙසවිරහතො වා විසුද්ධං. යථාහ ‘‘විචිකිච්ඡා චිත්තස්ස උපක්කිලෙසොති – ඉති විදිත්වා විචිකිච්ඡං චිත්තස්ස උපක්කිලෙසං පජහිං, අමනසිකාරො…පෙ… ථිනමිද්ධං, ඡම්භිතත්තං, උප්පිල්ලං, දුට්ඨුල්ලං, අච්චාරද්ධවීරියං, අතිලීනවීරියං, අභිජප්පා, නානත්තසඤ්ඤා, අතිනිජ්ඣායිතත්තං රූපානං චිත්තස්ස උපක්කිලෙසො’’ති (ම. නි. 3.242) එවං වුත්තෙහි එකාදසහි උපක්කිලෙසෙහි අනුපක්කිලිට්ඨත්තා විසුද්ධං. මනුස්සූපචාරං අතික්කමිත්වා රූපදස්සනෙන අතික්කන්තමානුසකං, මංසචක්ඛුං වා අතික්කන්තත්තා අතික්කන්තමානුසකං. තෙන දිබ්බෙන චක්ඛුනා විසුද්ධෙන අතික්කන්තමානුසකෙන. සත්තෙ පස්සතීති මනුස්සමංසචක්ඛුනා විය සත්තෙ පස්සති දක්ඛති ආලොකෙති. 'दिब्बेन चक्खुना' (दिव्य चक्षु से) यहाँ जो कहना है, वह पहले ही कहा जा चुका है। 'विसुद्धेन' (विशुद्ध से) का अर्थ है—च्युति और उपपात (मृत्यु और पुनर्जन्म) को देखने से दृष्टि-विशुद्धि का हेतु होने के कारण विशुद्ध। जो केवल च्युति (मृत्यु) को ही देखता है, उपपात को नहीं, वह उच्छेद-दृष्टि ग्रहण करता है। जो केवल उपपात (जन्म) को ही देखता है, च्युति को नहीं, वह नवीन सत्त्व के प्रादुर्भाव की दृष्टि ग्रहण करता है। किन्तु जो उन दोनों को देखता है, वह क्योंकि दोनों ही प्रकार की उन (गलत) दृष्टियों का अतिक्रमण कर जाता है, इसलिए उसका वह दर्शन दृष्टि-विशुद्धि का हेतु होता है, और बुद्ध-पुत्र इन दोनों को ही देखता है। इसीलिए कहा गया है—'च्युति और उपपात को देखने से दृष्टि-विशुद्धि का हेतु होने के कारण विशुद्ध'। अथवा ग्यारह उपक्लेशों से रहित होने के कारण विशुद्ध। जैसा कि कहा गया है—'विचिकित्सा चित्त का उपक्लेश है—ऐसा जानकर चित्त के उपक्लेश विचिकित्सा को त्याग दिया, अमनसिकार... पे... स्त्यान-मृद्ध (आलस्य), चम्भीतत्त्व (घबराहट), उप्पिल्ल (हर्षोन्माद), दुट्ठुल्ल (दुष्टता), अत्यारब्ध-वीर्य (अत्यधिक प्रयास), अतिलीन-वीर्य (अत्यधिक शिथिलता), अभिजप्पा (तृष्णा), नानात्व-संज्ञा, रूपों का अति-निद्ध्यायितत्व (अत्यधिक ध्यान) चित्त का उपक्लेश है'—इस प्रकार कहे गए ग्यारह उपक्लेशों से कलुषित न होने के कारण विशुद्ध। मनुष्यों की पहुँच का अतिक्रमण कर रूपों को देखने के कारण 'अतिक्रान्त-मानुषक', अथवा मांस-चक्षु का अतिक्रमण करने के कारण 'अतिक्रान्त-मानुषक'। उस विशुद्ध और अतिक्रान्त-मानुषक दिव्य चक्षु से। 'सत्ते पस्सति' (सत्त्वों को देखता है) का अर्थ है—मनुष्य के मांस-चक्षु की तरह सत्त्वों को देखता है, निहारता है, अवलोकन करता है। චවමානෙ උපපජ්ජමානෙති එත්ථ චුතික්ඛණෙ උපපත්තික්ඛණෙ වා දිබ්බචක්ඛුනාපි දට්ඨුං න සක්කා. යෙ පන ආසන්නචුතිකා ඉදානි චවිස්සන්ති, තෙ චවමානා. යෙ ච ගහිතපටිසන්ධිකා සම්පතිනිබ්බත්තා වා, තෙ උපපජ්ජමානාති අධිප්පෙතා. තෙ එවරූපෙ චවමානෙ උපපජ්ජමානෙ ච පස්සතීති දස්සෙති. හීනෙති මොහනිස්සන්දයුත්තත්තා හීනානං ජාතිකුලභොගාදීනං වසෙන හීළිතෙ පරිභූතෙ. පණීතෙති අමොහනිස්සන්දයුත්තත්තා තබ්බිපරීතෙ. සුවණ්ණෙති අදොසනිස්සන්දයුත්තත්තා ඉට්ඨකන්තමනාපවණ්ණයුත්තෙ. දුබ්බණ්ණෙති දොසනිස්සන්දයුත්තත්තා අනිට්ඨඅකන්තාමනාපවණ්ණයුත්තෙ. අභිරූපෙ විරූපෙතිපි අත්ථො. සුගතෙති සුගතිගතෙ, අලොභනිස්සන්දයුත්තත්තා වා අඩ්ඪෙ මහද්ධනෙ. දුග්ගතෙති දුග්ගතිගතෙ, ලොභනිස්සන්දයුත්තත්තා වා දලිද්දෙ අප්පන්නපානභොජනෙ. යථාකම්මූපගෙති යං යං කම්මං උපචිතං, තෙන තෙන උපගතෙ[Pg.301]. තත්ථ පුරිමෙහි ‘‘චවමානෙ’’තිආදීහි දිබ්බචක්ඛුකිච්චං වුත්තං, ඉමිනා පන පදෙන යථාකම්මූපගඤාණකිච්චං. "चवमाने उपपज्जमानेति" (च्युत होते हुए और उत्पन्न होते हुए) यहाँ च्युति के क्षण में या उत्पत्ति के क्षण में दिव्यचक्षु से भी देखना संभव नहीं है। जो मरणासन्न हैं और अब मरेंगे, वे 'चवमाना' (च्युत होते हुए) हैं। और जिन्होंने प्रतिसन्धि ग्रहण कर ली है या जो अभी उत्पन्न हुए हैं, वे 'उपपज्जमाना' (उत्पन्न होते हुए) अभिप्रेत हैं। वह इस प्रकार के च्युत होते हुए और उत्पन्न होते हुए प्राणियों को देखता है, यह दिखाया गया है। 'हीने' (हीन) - मोह के प्रभाव से युक्त होने के कारण हीन जाति, कुल, भोग आदि के कारण निन्दित और तिरस्कृत। 'पणीते' (प्रणीत) - मोह रहित होने के कारण इसके विपरीत। 'सुवण्णे' (सुवर्ण) - अद्वेष के प्रभाव से युक्त होने के कारण इष्ट, कान्त और मनभावन वर्ण से युक्त। 'दुब्बण्णे' (दुर्वर्ण) - द्वेष के प्रभाव से युक्त होने के कारण अनिष्ट, अकान्त और अरुचिकर वर्ण से युक्त। इसका अर्थ 'अभिरूप' (सुन्दर) और 'विरूप' (कुरूप) भी है। 'सुगते' - सुगति को प्राप्त, अथवा अलोभ के प्रभाव से युक्त होने के कारण धनी और महाधनी। 'दुग्गते' - दुर्गति को प्राप्त, अथवा लोभ के प्रभाव से युक्त होने के कारण दरिद्र और अल्प अन्न-पान वाले। 'यथाकम्मूपगे' - जो-जो कर्म संचित किया है, उसके अनुसार प्राप्त हुए। वहाँ पहले के 'चवमाने' आदि पदों से दिव्यचक्षु का कार्य कहा गया है, किन्तु इस पद से 'यथाकर्मोपग-ज्ञान' का कार्य कहा गया है। තස්ස ච ඤාණස්ස අයං උප්පත්තික්කමො – ඉධ භික්ඛු හෙට්ඨා නිරයාභිමුඛං ආලොකං වඩ්ඪෙත්වා නෙරයිකෙ සත්තෙ පස්සති මහන්තං දුක්ඛං අනුභවමානෙ, ඉදං දස්සනං දිබ්බචක්ඛුඤාණකිච්චමෙව. සො ච එවං මනසි කරොති ‘‘කිං නු ඛො කම්මං කත්වා ඉමෙ සත්තා එතං දුක්ඛං අනුභවන්තී’’ති, අථස්ස ‘‘ඉදං නාම කත්වා’’ති තංකම්මාරම්මණං ඤාණං උප්පජ්ජති. තථා උපරි දෙවලොකාභිමුඛං ආලොකං වඩ්ඪෙත්වා නන්දනවනමිස්සකවනඵාරුසකවනාදීසු සත්තෙ පස්සති දිබ්බසම්පත්තිං අනුභවමානෙ, ඉදම්පි දස්සනං දිබ්බචක්ඛුඤාණකිච්චමෙව. සො එවං මනසි කරොති ‘‘කිං නු ඛො කම්මං කත්වා ඉමෙ සත්තා එතං සම්පත්තිං අනුභවන්තී’’ති? අථස්ස ‘‘ඉදං නාම කත්වා’’ති තංකම්මාරම්මණං ඤාණං උප්පජ්ජති, ඉදං යථාකම්මූපගඤාණං නාම. ඉමස්ස විසුං පරිකම්මං නාම නත්ථි. යථා චිමස්ස, එවං අනාගතංසඤාණස්සපි. දිබ්බචක්ඛුපාදකානෙව හි ඉමානි දිබ්බචක්ඛුනා සහෙව ඉජ්ඣන්ති. කායදුච්චරිතෙනාතිආදීසු යං වත්තබ්බං, තං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. ඉධ විජ්ජාති දිබ්බචක්ඛුඤාණවිජ්ජා. අවිජ්ජාති සත්තානං චුතිපටිසන්ධිච්ඡාදිකා අවිජ්ජා. සෙසං වුත්තනයමෙව. उस ज्ञान की उत्पत्ति का क्रम यह है - यहाँ भिक्षु नीचे नरक की ओर आलोक (प्रकाश) बढ़ाकर महान दुःख भोगते हुए नारकीय सत्त्वों को देखता है, यह दर्शन दिव्यचक्षु-ज्ञान का ही कार्य है। वह इस प्रकार मनन करता है - "कौन सा कर्म करके ये सत्त्व इस दुःख को भोग रहे हैं?", तब उसे "यह (अमुक कर्म) करके" ऐसा उस कर्म को आलम्बन बनाने वाला ज्ञान उत्पन्न होता है। वैसे ही ऊपर देवलोक की ओर आलोक बढ़ाकर नन्दनवन, मिश्रकवन, पारुषकवन आदि में दिव्य सम्पत्ति का उपभोग करते हुए सत्त्वों को देखता है, यह दर्शन भी दिव्यचक्षु-ज्ञान का ही कार्य है। वह इस प्रकार मनन करता है - "कौन सा कर्म करके ये सत्त्व इस सम्पत्ति का उपभोग कर रहे हैं?" तब उसे "यह (अमुक कर्म) करके" ऐसा उस कर्म को आलम्बन बनाने वाला ज्ञान उत्पन्न होता है, इसे 'यथाकर्मोपग-ज्ञान' कहते हैं। इसके लिए अलग से परिकर्म (तैयारी) नहीं है। जैसे इसके लिए, वैसे ही अनागतवंश-ज्ञान (भविष्य के ज्ञान) के लिए भी। दिव्यचक्षु पर आधारित होने के कारण ये दिव्यचक्षु के साथ ही सिद्ध होते हैं। 'कायदुच्चरितेन' आदि पदों में जो कहना है, वह पहले कहे गए तरीके से ही है। यहाँ 'विज्जा' दिव्यचक्षु-ज्ञान रूपी विद्या है। 'अविज्जा' सत्त्वों की च्युति और प्रतिसन्धि को ढकने वाली अविद्या है। शेष पहले कहे गए तरीके से ही है। තතියවාරෙ විජ්ජාති අරහත්තමග්ගඤාණවිජ්ජා. අවිජ්ජාති චතුසච්චප්පටිච්ඡාදිකා අවිජ්ජා. සෙසං හෙට්ඨා වුත්තනයත්තා සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. එවං ඛොතිආදි නිගමනං. तीसरी बार में 'विज्जा' अर्हत्-मार्ग-ज्ञान रूपी विद्या है। 'अविज्जा' चार सत्यों को ढकने वाली अविद्या है। शेष पहले कहे गए तरीके से होने के कारण सुविज्ञ (आसानी से समझने योग्य) ही है। 'एवं खो' आदि उपसंहार है। ගාථාසු අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – යො යථාවුත්තං පුබ්බෙනිවාසං අවෙති අවගච්ඡති, වුත්තනයෙන පාකටං කත්වා ජානාති. ‘‘යොවෙදී’’තිපි පාඨො, යො අවෙදි විදිතං කත්වා ඨිතොති අත්ථො. ඡබ්බීසතිදෙවලොකසඞ්ඛාතං සග්ගං චතුබ්බිධං අපායඤ්ච වුත්තනයෙනෙව දිබ්බචක්ඛුනා පස්සති. අථොති තතො පරං ජාතික්ඛයසඞ්ඛාතං අරහත්තං නිබ්බානමෙව වා පත්තො අධිගතො. තතො එව අභිඤ්ඤා අභිවිසිට්ඨාය මග්ගපඤ්ඤාය ජානිතබ්බං චතුසච්චධම්මං ජානිත්වා කිච්චවොසානෙන වොසිතො නිට්ඨානප්පත්තො. මොනෙය්යධම්මසමන්නාගමෙන මුනි, ඛීණාසවො යස්මා එතාහි යථාවුත්තාහි තීහි විජ්ජාහි සමන්නාගතත්තා තතො තතියවිජ්ජාය සබ්බථා බාහිතපාපත්තා ච තෙවිජ්ජො බ්රාහ්මණො නාම හොති. තස්මා තමෙව අහං තෙවිජ්ජං බ්රාහ්මණං [Pg.302] වදාමි, අඤ්ඤං පන ලපිතලාපනං යජුආදිමන්තපදානං අජ්ඣාපනපරං තෙවිජ්ජං බ්රාහ්මණං න වදාමි, තෙවිජ්ජොති තං න කථෙමීති. गाथाओं में यह संक्षिप्त अर्थ है - जो पूर्वोक्त 'पुब्बेनिवास' (पूर्व-निवास) को जानता (अवेति/अवगच्छति) है, कहे गए तरीके से स्पष्ट करके जानता है। 'योवेदी' ऐसा भी पाठ है, जिसका अर्थ है जो जानकर स्थित है। वह छब्बीस देवलोकों रूपी स्वर्ग और चार प्रकार के अपायों को कहे गए तरीके से ही दिव्यचक्षु से देखता है। 'अथो' - उसके बाद जन्म के क्षय रूपी अर्हत् पद या निर्वाण को ही प्राप्त (पत्तो/अधिगतो) हुआ। उसके बाद ही अभिज्ञा (विशिष्ट ज्ञान) अर्थात् श्रेष्ठ मार्ग-प्रज्ञा द्वारा जानने योग्य चार आर्य सत्यों को जानकर, कृत्य की समाप्ति से वह 'वसित' (कृतकृत्य) या निष्ठा को प्राप्त है। मौनेय-धर्म (मुनि-भाव) से सम्पन्न होने के कारण वह 'मुनि' है। क्षीणासव (जिसके आस्रव क्षीण हो गए हों), क्योंकि वह इन पूर्वोक्त तीन विद्याओं से सम्पन्न है और तीसरी विद्या द्वारा सभी प्रकार से पापों को दूर कर देने के कारण वह 'तेविज्जो' (त्रिविद्य) ब्राह्मण कहलाता है। इसलिए मैं उसे ही त्रिविद्य ब्राह्मण कहता हूँ, किन्तु दूसरे केवल रटे-रटाए यजुर्वेद आदि मन्त्र पदों के अध्यापन में लगे हुए को त्रिविद्य ब्राह्मण नहीं कहता हूँ, उसे 'तेविज्जो' नहीं कहता हूँ। ඉති ඉමස්මිං වග්ගෙ දුතියසුත්තෙ වට්ටං කථිතං, පඤ්චමඅට්ඨමදසමසුත්තෙසු විවට්ටං කථිතං, ඉතරෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතන්ති වෙදිතබ්බං. इस प्रकार इस वर्ग के दूसरे सुत्त में 'वट्ट' (संसार चक्र) कहा गया है, पाँचवें, आठवें और दसवें सुत्त में 'विवट्ट' (निर्वाण) कहा गया है, और अन्यों में 'वट्ट-विवट्ट' (संसार और निर्वाण) कहा गया है, ऐसा जानना चाहिए। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। පඤ්චමවග්ගවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें वर्ग की व्याख्या समाप्त हुई। පරමත්ථදීපනියා ඛුද්දකනිකාය-අට්ඨකථාය परमत्थदीपनी खुद्दकनिकाय-अट्ठकथा में। ඉතිවුත්තකස්ස තිකනිපාතවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इतिवुत्तक की तिकनिपात-व्याख्या समाप्त हुई। 4. චතුක්කනිපාතො ४. चतुक्कनिपात (चारों का निपात) 1. බ්රාහ්මණධම්මයාගසුත්තවණ්ණනා १. ब्राह्मणधम्मयागसुत्त की व्याख्या। 100. චතුක්කනිපාතස්ස [Pg.303] පඨමෙ අහන්ති අත්තනිද්දෙසො. යො හි පරො න හොති, සො නියකජ්ඣත්තසඞ්ඛාතො අත්තා ‘‘අහ’’න්ති වුච්චති. අස්මීති පටිජානනා. යො පරමත්ථබ්රාහ්මණභාවො ‘‘අහ’’න්ති වුච්චමානො, තස්ස අත්තනි අත්ථිභාවං පටිජානන්තො හි සත්ථා ‘‘අස්මී’’ති අවොච. ‘‘අහමස්මී’’ති ච යථා ‘‘අහමස්මි බ්රහ්මා මහාබ්රහ්මා, සෙය්යොහමස්මී’’ති ච අප්පහීනදිට්ඨිමානානුසයා පුථුජ්ජනා අත්තනො දිට්ඨිමානමඤ්ඤනාභිනිවෙසවසෙන අභිවදන්ති, න එවං වුත්තං. සබ්බසො පන පහීනදිට්ඨිමානානුසයො භගවා සමඤ්ඤං අනතිධාවන්තො ලොකසමඤ්ඤානුරොධෙන වෙනෙය්යසන්තානෙසු ධම්මං පතිට්ඨපෙන්තො කෙවලං තාදිසස්ස ගුණස්ස අත්තනි විජ්ජමානතං පටිජානන්තො ‘‘අහමස්මී’’ති ආහ. බ්රාහ්මණොති බාහිතපාපත්තා බ්රහ්මස්ස ච අණනතො බ්රාහ්මණො. අයඤ්හෙත්ථ අත්ථො – භික්ඛවෙ, අහං පරමත්ථතො බ්රාහ්මණොස්මීති. භගවා සබ්බාකාරපරිපුණ්ණස්ස දානසංයමාදිවතසමාදානස්ස නිරවසෙසාය තපචරියාය පාරං ගතො සම්මදෙව වුසිතබ්රහ්මචරියවාසො සකලවෙදන්තගූ සුවිසුද්ධවිජ්ජාචරණො සබ්බථා නින්හාතපාපමලො අනුත්තරස්ස අරියමග්ගසඞ්ඛාතස්ස බ්රාහ්මණස්ස වත්තා පවත්තා, සුපරිසුද්ධස්ස ච සාසනබ්රහ්මචරියස්ස පවෙදෙතා, තස්මා සබ්බසො බාහිතපාපත්තා බ්රහ්මස්ස ච අණනතො කථනතො පරමත්ථෙන බ්රාහ්මණොති වුච්චති. १००. चतुक्कनिपात के प्रथम (सुत्त) में 'अहं' (मैं) यह आत्म-निर्देश है। जो दूसरा नहीं है, वह अपना आध्यात्मिक स्वरूप 'आत्मा' ही 'अहं' कहा जाता है। 'अस्मि' (हूँ) यह प्रतिज्ञा (स्वीकारोक्ति) है। जो परमार्थ-ब्राह्मण भाव 'अहं' कहा जाता है, उसके अपने आप में होने के भाव को स्वीकार करते हुए शास्ता ने 'अस्मि' कहा। 'अहमस्मि' (मैं हूँ) - जैसे 'मैं ब्रह्मा हूँ, महाब्रह्मा हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' - इस प्रकार अप्रहीण दृष्टि, मान और अनुशय वाले पृथग्जन अपनी दृष्टि, मान, मनन और अभिनिवेश के वश में होकर कहते हैं, वैसा यहाँ नहीं कहा गया है। बल्कि, समस्त दृष्टि, मान और अनुशय को क्षीण कर चुके भगवान्, लोक-संज्ञा का उल्लंघन न करते हुए, लोक-व्यवहार के अनुरूप विनेय जनों के सन्तान (चित्त-परम्परा) में धर्म की प्रतिष्ठा करते हुए, केवल उस प्रकार के गुण की अपने आप में विद्यमानता को स्वीकार करते हुए 'अहमस्मि' कहते हैं। 'ब्राह्मण' का अर्थ है - पापों को बाहर निकाल देने के कारण और ब्रह्म (श्रेष्ठ) को कहने (अणन) के कारण ब्राह्मण। यहाँ यह अर्थ है - भिक्षुओं, मैं परमार्थतः ब्राह्मण हूँ। भगवान् सभी प्रकार से परिपूर्ण दान, संयम आदि व्रतों के समादान की पूर्ण तपश्चर्या के पार पहुँच चुके हैं, भली-भाँति ब्रह्मचर्य का वास कर चुके हैं, सकल वेदान्त (ज्ञान) के पारगामी हैं, सुविशुद्ध विद्या और चरण से युक्त हैं, सर्वथा पाप-मल को धो चुके हैं, अनुत्तर आर्यमार्ग रूपी ब्राह्मण के वक्ता और प्रवर्तक हैं, और सुविशुद्ध शासन-ब्रह्मचर्य के प्रवेदक हैं; इसलिए सर्वथा पापों को बाहर निकाल देने के कारण और ब्रह्म को कहने के कारण परमार्थतः 'ब्राह्मण' कहे जाते हैं। ඉති භගවා සදෙවකෙ ලොකෙ අත්තනො අනුත්තරං බ්රාහ්මණභාවං පවෙදෙත්වා යානි තානි බ්රාහ්මණදානාදීනි ඡ කම්මානි බ්රාහ්මණස්ස පඤ්ඤාපෙන්ති, තෙසම්පි සුපරිසුද්ධානං උක්කංසතො අත්තනි සංවිජ්ජමානතං දස්සෙතුං ‘‘යාචයොගො’’තිආදිමාහ. इस प्रकार भगवान् ने देवलोक सहित इस लोक में अपने अनुत्तर ब्राह्मण-भाव को प्रवेदित कर, ब्राह्मण के जो दान आदि छह कर्म बताए गए हैं, उनकी भी सुविशुद्ध रूप से अपने आप में उत्कृष्टता से विद्यमानता को दिखाने के लिए 'याचयोगो' आदि कहा। තත්ථ යාචයොගොති යාචෙහි යුත්තො. යාචන්තීති යාචා, යාචකා, තෙ පනෙත්ථ වෙනෙය්යා වෙදිතබ්බා. තෙ හි ‘‘දෙසෙතු, භන්තෙ භගවා[Pg.304], ධම්මං; දෙසෙතු, සුගතො, ධම්ම’’න්ති භගවන්තං උපසඞ්කමිත්වා ධම්මදෙසනං යාචන්ති. භගවා ච තෙසං ඉච්ඡාවිඝාතං අකරොන්තො යථාරුචි ධම්මං දෙසෙන්තො ධම්මදානං දෙතීති යාචයොගො, සදා සබ්බකාලං තෙහි අවිරහිතො. අථ වා යාචයොගොති යාචනයොග්ගො, අධිප්පායපූරණතො යාචිතුං යුත්තොති අත්ථො ‘‘යාජයොගො’’තිපි පාඨො. තත්ථ යාජො වුච්චති මහාදානං, යිට්ඨන්ති අත්ථො. ඉධ පන ධම්මදානං වෙදිතබ්බං, යාජෙ නියුත්තොති යාජයොගා. සදාති සබ්බදා, අනවරතප්පවත්තසද්ධම්මමහාදානොති අත්ථො. අථ වා යාජෙන යොජෙතීතිපි යාජයොගො. තිවිධදානසඞ්ඛාතෙන යාජෙන සත්තෙ යථාරහං යොජෙති, තත්ථ දානෙ නියොජෙතීති අත්ථො. ‘‘යාජයොගො සතත’’න්තිපි පඨන්ති. පයතපාණීති පරිසුද්ධහත්ථො. යො හි දානාධිමුත්තො ආමිසදානං දෙන්තො සක්කච්චං සහත්ථෙන දෙය්යධම්මං දාතුං සදා ධොතහත්ථොයෙව හොති, සො ‘‘පයතපාණී’’ති වුච්චති. භගවාපි ධම්මදානාධිමුත්තො සක්කච්චං සබ්බකාලං ධම්මදානෙ යුත්තප්පයුත්තොති කත්වා වුත්තං ‘‘පයතපාණී’’ති. ‘‘සදා’’ති ච පදං ඉමිනාපි සද්ධිං යොජෙතබ්බං ‘‘සදා පයතපාණී’’ති. අවිභාගෙන හි සත්ථා වෙනෙය්යලොකස්ස සද්ධම්මදානං සදා සබ්බකාලං පවත්තෙන්තො තත්ථ යුත්තප්පයුත්තො හුත්වා විහරති. वहाँ 'याचयोगो' का अर्थ है - याचकों से युक्त। जो याचना करते हैं वे 'याचा' अर्थात् याचक हैं, यहाँ उन्हें 'विनेय' (शिक्षा के योग्य) समझना चाहिए। वे "भन्ते भगवान् धर्म का उपदेश दें, सुगत धर्म का उपदेश दें" - इस प्रकार भगवान् के पास आकर धर्म-देशना की याचना करते हैं। और भगवान् उनकी इच्छा का विघात न करते हुए, उनकी रुचि के अनुसार धर्म का उपदेश देते हुए धर्म-दान देते हैं, इसलिए वे 'याचयोग' हैं, सदा सर्वकाल उनसे विरहित नहीं होते। अथवा 'याचयोग' का अर्थ है - याचना के योग्य, अभिप्राय की पूर्ति करने के कारण याचना करने के लिए उपयुक्त। 'याजयोगो' ऐसा भी पाठ है। वहाँ 'याज' महादान को कहा जाता है, जिसका अर्थ 'यज्ञ' (यिष्ट) है। यहाँ धर्म-दान समझना चाहिए, जो याज (दान) में नियुक्त है वह 'याजयोग' है। 'सदा' का अर्थ है - हमेशा, निरन्तर प्रवृत्त सद्धर्म का महादान देने वाला। अथवा 'याज' से जोड़ता है, इसलिए 'याजयोग' है। त्रिविध दान रूपी याज से सत्त्वों को यथायोग्य जोड़ता है, उन्हें दान में नियोजित करता है, यह अर्थ है। 'याजयोगो सततं' ऐसा भी पढ़ते हैं। 'पयतपाणी' का अर्थ है - परिशुद्ध हाथ वाला। जो दान में लगा हुआ आमिष-दान देते समय आदरपूर्वक अपने हाथ से देय वस्तु देने के लिए सदा धुले हुए हाथों वाला ही होता है, वह 'पयतपाणी' कहा जाता है। भगवान् भी धर्म-दान में तत्पर होकर आदरपूर्वक सदा धर्म-दान में संलग्न रहते हैं, इसलिए 'पयतपाणी' कहा गया है। 'सदा' पद को इसके साथ भी जोड़ना चाहिए - 'सदा पयतपाणी'। क्योंकि शास्ता विनेय लोक के लिए सद्धर्म का दान सदा सर्वकाल प्रवृत्त करते हुए उसमें संलग्न होकर विहार करते हैं। අපරො නයො – යොගො වුච්චති භාවනා. යථාහ ‘‘යොගා වෙ ජායතෙ භූරී’’ති (ධ. ප. 282). තස්මා යාජයොගොති යාජභාවනං, පරිච්චාගභාවනං අනුයුත්තොති අත්ථො. භගවා හි අභිසම්බොධිතො පුබ්බෙ බොධිසත්තභූතොපි කරුණාසමුස්සාහිතො අනවසෙසතො දානං පරිබ්රූහෙන්තො තත්ථ උක්කංසපාරමිප්පත්තො හුත්වා අභිසම්බොධිං පාපුණි, බුද්ධො හුත්වාපි තිවිධං දානං පරිබ්රූහෙසි විසෙසතො ධම්මදානං, පරෙපි තත්ථ නියොජෙසි. තථා හි සො වෙනෙය්යයාචකානං කස්සචි සරණානි අදාසි, කස්සචි පඤ්ච සීලානි, කස්සචි දස සීලානි, කස්සචි චතුපාරිසුද්ධිසීලං, කස්සචි ධුතධම්මෙ, කස්සචි චත්තාරි ඣානානි, කස්සචි අට්ඨ සමාපත්තියො, කස්සචි පඤ්චාභිඤ්ඤායො, චත්තාරො මග්ගෙ, චත්තාරි සාමඤ්ඤඵලානි, තිස්සො විජ්ජා, චතස්සො පටිසම්භිදාති එවමාදිලොකියලොකුත්තරභෙදං ගුණධනං ධම්මදානවසෙන යථාධිප්පායං දෙන්තො පරෙ ච ‘‘දෙථා’’ති නියොජෙන්තො පරිච්චාගභාවනං පරිබ්රූහෙසි. තෙන වුත්තං ‘‘පරිච්චාගභාවනං අනුයුත්තො’’ති. दूसरा तरीका - 'योग' भावना को कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है - "योग से ही प्रज्ञा उत्पन्न होती है" (धम्मपद २८२)। इसलिए 'याजयोग' का अर्थ है - याज-भावना, अर्थात् परित्याग-भावना में लगा हुआ। भगवान् ने अभिसंबोधि से पूर्व बोधिसत्त्व रहते हुए भी करुणा से प्रेरित होकर पूर्णतः दान की वृद्धि करते हुए, उसमें पराकाष्ठा (पारमिता) प्राप्त कर अभिसंबोधि प्राप्त की। बुद्ध होकर भी उन्होंने त्रिविध दान की वृद्धि की, विशेष रूप से धर्म-दान की, और दूसरों को भी उसमें नियोजित किया। जैसे उन्होंने विनेय याचकों में से किसी को शरण (त्रिशरण), किसी को पंचशील, किसी को दशशील, किसी को चतुपारिशुद्धि शील, किसी को धुतधर्म, किसी को चार ध्यान, किसी को आठ समापत्तियाँ, किसी को पाँच अभिज्ञाएँ, चार मार्ग, चार श्रामण्य फल, तीन विद्याएँ, चार प्रतिसंविदा - इस प्रकार लौकिक और लोकोत्तर भेद वाले गुण-रूपी धन को धर्म-दान के रूप में इच्छानुसार देते हुए और दूसरों को भी "दो" (दान करो) ऐसा नियोजित करते हुए परित्याग-भावना की वृद्धि की। इसीलिए कहा गया है - "परित्याग-भावना में लगा हुआ"। පයතපාණීති [Pg.305] වා ආයතපාණී, හත්ථගතං කිඤ්චි දාතුං ‘‘එහි ගණ්හා’’ති පසාරිතහත්ථො විය ආචරියමුට්ඨිං අකත්වා සද්ධම්මදානෙ යුත්තප්පයුත්තොති අත්ථො. පයතපාණීති වා උස්සාහිතහත්ථො, ආමිසදානං දාතුං උස්සාහිතහත්ථො විය ධම්මදානෙ කතුස්සාහොති අත්ථො. අන්තිමදෙහධරොති බ්රහ්මචරියවසෙන බ්රාහ්මණකරණානං ධම්මානං පාරිපූරියා පච්ඡිමත්තභාවධාරී. අවුසිතවතො හි වසලකරණානං ධම්මානං අප්පහානෙන වසලාදිසමඤ්ඤා ගති ආයතිං ගබ්භසෙය්යා සියා. තෙන භගවා අත්තනො අච්චන්තවුසිතබ්රාහ්මණභාවං දස්සෙති. අනුත්තරො භිසක්කො සල්ලකත්තොති දුත්තිකිච්ඡස්ස වට්ටදුක්ඛරොගස්ස තිකිච්ඡනතො උත්තමො භිසක්කො, අඤ්ඤෙහි අනුද්ධරණීයානං රාගාදිසල්ලානං කන්තනතො සමුච්ඡෙදවසෙන සමුද්ධරණතො උත්තමො සල්ලකන්තනවෙජ්ජො. ඉමිනා නිප්පරියායතො බ්රාහ්මණකරණානං ධම්මානං අත්තනි පතිට්ඨිතානං පරසන්තතියං පතිට්ඨාපනෙන පරෙසම්පි බ්රාහ්මණකරණමාහ. 'पयतपाणी' (Payatapāṇī) का अर्थ है 'आयत्पाणी' (फैले हुए हाथों वाला), जैसे हाथ में आई हुई किसी वस्तु को देने के लिए "आओ, ग्रहण करो" कहते हुए हाथ फैलाया गया हो, वैसे ही 'आचार्य-मुष्टि' (गुरु की मुट्ठी/गोपनीयता) न रखकर सद्धर्म के दान में पूरी तरह लगा हुआ। अथवा 'पयतपाणी' का अर्थ है 'उत्साहित हाथ वाला', जैसे आमिष दान देने के लिए उत्साहित हाथ वाला होता है, वैसे ही धर्मदान में महान उत्साह वाला। 'अन्तिमदेहधरो' का अर्थ है ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्राह्मण बनाने वाले धर्मों की परिपूर्णता के कारण अन्तिम आत्मभाव (शरीर) को धारण करने वाला। क्योंकि जिसने ब्रह्मचर्य का वास नहीं किया है, उसके 'वृषल' (नीच) बनाने वाले धर्मों का प्रहाण न होने से वृषल आदि संज्ञा, गति और भविष्य में गर्भशैया (पुनर्जन्म) हो सकती है। इसके द्वारा भगवान अपने अत्यन्त विकसित ब्राह्मण-भाव को दिखाते हैं। 'अनुत्तरो भिषक्को सल्लकततो' का अर्थ है—दुश्चिकित्स्य (कठिनता से ठीक होने वाले) संसार-दुःख रूपी रोग की चिकित्सा करने के कारण उत्तम वैद्य, और दूसरों के द्वारा न निकाले जा सकने वाले राग आदि शल्यों को काटने के कारण तथा समूलोच्छेद (जड़ से उखाड़ने) के द्वारा निकालने के कारण उत्तम शल्य-चिकित्सक। इसके द्वारा उन्होंने साक्षात् रूप से अपने भीतर प्रतिष्ठित ब्राह्मण बनाने वाले धर्मों को दूसरों की सन्तान (चित्त-परम्परा) में प्रतिष्ठित करके दूसरों को भी ब्राह्मण बनाना कहा है। තස්ස මෙ තුම්හෙ පුත්තාති තස්ස එවරූපස්ස මම තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, පුත්තා අත්රජා හොථ. ඔරසාති උරසි සම්බන්ධා. යථා හි සත්තානං ඔරසපුත්තා අත්රජා විසෙසෙන පිතුසන්තකස්ස දායජ්ජස්ස භාගිනො හොන්ති, එවමෙතෙපි අරියපුග්ගලා සම්මාසම්බුද්ධස්ස ධම්මස්සවනන්තෙ අරියාය ජාතියා ජාතා. තස්ස සන්තකස්ස විමුත්තිසුඛස්ස අරියධම්මරතනස්ස ච එකංසභාගියතාය ඔරසා. අථ වා භගවතො ධම්මදෙසනානුභාවෙන අරියභූමිං ඔක්කමමානා ඔක්කන්තා ච අරියසාවකා සත්ථු උරෙ වායාමජනිතාභිජාතිතාය නිප්පරියායෙන ‘‘ඔරසපුත්තා’’ති වත්තබ්බතං අරහන්ති. තථා හි තෙ භගවතා ආසයානුසයචරියාධිමුත්තිආදිවොලොකනෙන වජ්ජානුචින්තනෙන ච හදයෙ කත්වා වජ්ජතො නිවාරෙත්වා අනවජ්ජෙ පතිට්ඨපෙන්තෙන සීලාදිධම්මසරීරපොසනෙන සංවඩ්ඪිතා. මුඛතො ජාතාති මුඛතො ජාතාය ධම්මදෙසනාය අරියාය ජාතියා ජාතත්තා මුඛතො ජාතා. අථ වා අනඤ්ඤසාධාරණතො සබ්බස්ස කුසලධම්මස්ස මුඛතො පාතිමොක්ඛතො වුට්ඨානගාමිනිවිපස්සනාසඞ්ඛාතතො විමොක්ඛමුඛතො වා අරියමග්ගජාතියා ජාතාතිපි මුඛතො ජාතා. සික්ඛත්තයසඞ්ගහෙ සාසනධම්මෙ අරියමග්ගධම්මෙ වා ජාතාති ධම්මජා. තෙනෙව ධම්මෙන නිම්මිතා මාපිතාති ධම්මනිම්මිතා. සතිධම්මවිචයාදි ධම්මදායාදා, න ලාභසක්කාරාදි [Pg.306] ආමිසදායාදා, ධම්මදායාදා නො ආමිසදායාදා හොථාති අත්ථො. 'तस्स मे तुम्हे पुत्ता' (उस मेरे तुम पुत्र हो) का अर्थ है—हे भिक्षुओं! उस इस प्रकार के मेरे तुम पुत्र हो, आत्मज (स्वयं से उत्पन्न) हो। 'ओरसा' (औरस) का अर्थ है—हृदय (उर) से सम्बद्ध। जैसे प्राणियों के औरस पुत्र आत्मज होने के कारण विशेष रूप से पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं, वैसे ही ये आर्य पुद्गल भी सम्यक्सम्बुद्ध के धर्म-श्रवण के अन्त में आर्य जाति में उत्पन्न हुए हैं। उस (बुद्ध) की अपनी विमुक्ति-सुख और आर्य-धर्म-रत्न के निश्चित रूप से भागी होने के कारण वे 'औरस' हैं। अथवा, भगवान की धर्म-देशना के प्रभाव से आर्य-भूमि में प्रवेश करने वाले और प्रवेश कर चुके आर्य श्रावक, शास्ता के हृदय में उत्पन्न प्रयास से उत्पन्न होने के कारण साक्षात् रूप से 'औरस पुत्र' कहे जाने के योग्य हैं। क्योंकि वे भगवान द्वारा उनके आशय, अनुशय, चर्या और अधिमुक्ति आदि के अवलोकन और दोषों के विचार के माध्यम से हृदय में धारण कर, दोषों से रोककर और निर्दोष (गुणों) में प्रतिष्ठित करते हुए, शील आदि धर्म-शरीर के पोषण द्वारा संवर्धित किए गए हैं। 'मुखतो जाता' (मुख से उत्पन्न) का अर्थ है—मुख से उत्पन्न धर्म-देशना के द्वारा आर्य जाति में उत्पन्न होने के कारण 'मुख से उत्पन्न'। अथवा, दूसरों के लिए असाधारण होने के कारण, समस्त कुशल धर्मों के मुख (द्वार) रूपी प्रातिमोक्ष से, अथवा 'उत्थानगामिनी विपश्यना' कहे जाने वाले विमोक्ष-मुख से आर्य मार्ग रूपी जाति में उत्पन्न होने के कारण भी 'मुख से उत्पन्न' हैं। तीन शिक्षाओं (शील, समाधि, प्रज्ञा) के संग्रह रूप शासन-धर्म में अथवा आर्य मार्ग रूप धर्म में उत्पन्न होने के कारण 'धम्मजा' (धर्मज) हैं। उसी धर्म के द्वारा निर्मित और रचित होने के कारण 'धम्मनिम्मिता' (धर्म-निर्मित) हैं। स्मृति, धर्म-विचय आदि धर्म के उत्तराधिकारी (दायाद) हैं, न कि लाभ-सत्कार आदि आमिष के उत्तराधिकारी; 'धर्म के उत्तराधिकारी बनो, आमिष के नहीं'—यह अर्थ है। තත්ථ ධම්මො දුවිධො – නිප්පරියායධම්මො, පරියායධම්මොති. ආමිසම්පි දුවිධං – නිප්පරියායාමිසං, පරියායාමිසන්ති. කථං? මග්ගඵලනිබ්බානප්පභෙදො හි නවවිධො ලොකුත්තරධම්මො නිප්පරියායධම්මො, නිබ්බත්තිතධම්මොයෙව, න කෙනචි පරියායෙන කාරණෙන වා ලෙසෙන වා ධම්මො. යං පනිදං විවට්ටූපනිස්සිතං කුසලං, සෙය්යථිදං – ඉධෙකච්චො විවට්ටං පත්ථෙන්තො දානං දෙති, සීලං සමාදියති, උපොසථකම්මං කරොති, ගන්ධමාලාදීහි වත්ථුපූජං කරොති, ධම්මං සුණාති, දෙසෙති, ඣානසමාපත්තියො නිබ්බත්තෙති, එවං කරොන්තො අනුපුබ්බෙන නිප්පරියායං අමතං නිබ්බානං පටිලභති, අයං පරියායධම්මො. තථා චීවරාදයො චත්තාරො පච්චයා නිප්පරියායාමිසමෙව, න අඤ්ඤෙන පරියායෙන වා කාරණෙන වා ලෙසෙන වා ආමිසං. යං පනිදං වට්ටගාමිකුසලං, සෙය්යථිදං – ඉධෙකච්චො වට්ටං පත්ථෙන්තො සම්පත්තිභවං ඉච්ඡමානො දානං දෙති…පෙ… සමාපත්තියො නිබ්බත්තෙති, එවං කරොන්තො අනුපුබ්බෙන දෙවමනුස්සසම්පත්තියො පටිලභති, ඉදං පරියායාමිසං නාම. वहाँ धर्म दो प्रकार का है—निष्पर्याय धर्म और पर्याय धर्म। आमिष भी दो प्रकार का है—निष्पर्याय आमिष और पर्याय आमिष। कैसे? मार्ग, फल और निर्वाण के भेद से नौ प्रकार का लोकोत्तर धर्म 'निष्पर्याय धर्म' है; वह साक्षात् धर्म ही है, किसी पर्याय (विधि), कारण या बहाने से धर्म नहीं है। और जो यह विवर्त (निर्वाण) के आश्रित कुशल है, जैसे—यहाँ कोई विवर्त की प्रार्थना करते हुए दान देता है, शील ग्रहण करता है, उपोसथ कर्म करता है, गन्ध-माला आदि से वस्तुओं की पूजा करता है, धर्म सुनता है, उपदेश देता है, ध्यान-समापत्तियाँ उत्पन्न करता है, और ऐसा करते हुए क्रमशः निष्पर्याय अमृत निर्वाण को प्राप्त करता है, यह 'पर्याय धर्म' है। उसी प्रकार चीवर आदि चार प्रत्यय 'निष्पर्याय आमिष' ही हैं, किसी अन्य पर्याय, कारण या बहाने से आमिष नहीं हैं। और जो यह 'वर्तगामी' (संसार में ले जाने वाला) कुशल है, जैसे—यहाँ कोई संसार की प्रार्थना करते हुए, वैभवशाली जन्म की इच्छा रखते हुए दान देता है... पे... समापत्तियाँ उत्पन्न करता है, और ऐसा करते हुए क्रमशः देव और मनुष्यों की सम्पत्तियों को प्राप्त करता है, यह 'पर्याय आमिष' कहलाता है। තත්ථ නිප්පරියායධම්මොපි භගවතොයෙව සන්තකො. භගවතා හි කථිතත්තා භික්ඛූ මග්ගඵලනිබ්බානානි අධිගච්ඡන්ති. වුත්තඤ්හෙතං – वहाँ निष्पर्याय धर्म भी भगवान का ही अपना है। क्योंकि भगवान द्वारा कहे जाने के कारण ही भिक्षु मार्ग, फल और निर्वाण को प्राप्त करते हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘සො, හි, බ්රාහ්මණ, භගවා අනුප්පන්නස්ස මග්ගස්ස උප්පාදෙතා, අසඤ්ජාතස්ස මග්ගස්ස සඤ්ජනෙතා…පෙ… මග්ගානුගා ච පනෙතරහි සාවකා විහරන්ති පච්ඡා සමන්නාගතා’’ති (ම. නි. 3.79; චූලනි. මොඝරාජමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 85). "हे ब्राह्मण! वे भगवान अनुत्पन्न मार्ग के उत्पादक हैं, अजात मार्ग के जन्मदाता हैं... पे... और अब श्रावक मार्ग का अनुगमन करने वाले होकर विहरते हैं, जो बाद में (उस मार्ग से) युक्त हुए हैं।" ‘‘සො, හාවුසො, භගවා ජානං ජානාති, පස්සං පස්සති, චක්ඛුභූතො ඤාණභූතො ධම්මභූතො බ්රහ්මභූතො, වත්තා පවත්තා, අත්ථස්ස නින්නෙතා, අමතස්ස දාතා, ධම්මස්සාමී තථාගතො’’ති (ම. නි. 1.203; 3.281) ච. "हे आयुष्मानों! वे भगवान जानते हुए जानते हैं, देखते हुए देखते हैं; वे चक्षु-भूत, ज्ञान-भूत, धर्म-भूत, ब्रह्म-भूत हैं; वे वक्ता हैं, प्रवर्तक हैं, अर्थ के ले जाने वाले (स्पष्ट करने वाले) हैं, अमृत के दाता हैं और धर्म के स्वामी तथागत हैं।" පරියායධම්මොපි භගවතොයෙව සන්තකො. භගවතා හි කථිතත්තා එව ජානන්ති ‘‘විවට්ටං පත්ථෙත්වා දානං දෙන්තො…පෙ… සමාපත්තියො නිබ්බත්තෙන්තො අනුක්කමෙන අමතං නිබ්බානං පටිලභතී’’ති. නිප්පරියායාමිසම්පි භගවතොයෙව [Pg.307] සන්තකං. භගවතා හි අනුඤ්ඤාතත්තායෙව භික්ඛූහි ජීවකවත්ථුං ආදිං කත්වා පණීතචීවරං ලද්ධං. යථාහ – पर्याय धर्म भी भगवान का ही अपना है। क्योंकि भगवान द्वारा कहे जाने के कारण ही वे जानते हैं कि "विवर्त (निर्वाण) की प्रार्थना कर दान देते हुए... पे... समापत्तियाँ उत्पन्न करते हुए क्रमशः अमृत निर्वाण को प्राप्त करता है।" निष्पर्याय आमिष भी भगवान का ही अपना है। क्योंकि भगवान द्वारा अनुमति दिए जाने के कारण ही भिक्षुओं द्वारा जीवक के वस्त्र को आदि (आरम्भ) मानकर उत्तम चीवर प्राप्त किए गए। जैसा कि उन्होंने कहा— ‘‘අනුජානාමි, භික්ඛවෙ, ගහපතිචීවරං. යො ඉච්ඡති, පංසුකූලිකො හොතු. යො ඉච්ඡති, ගහපතිචීවරං සාදියතු. ඉතරීතරෙනපාහං, භික්ඛවෙ, සන්තුට්ඨිංයෙව වණ්ණෙමී’’ති (මහාව. 337). "भिक्षुओं! मैं गृहपति-चीवर (गृहस्थों द्वारा दिए गए वस्त्र) की अनुमति देता हूँ। जो चाहता है, वह पांशुकूलिक (फेंके हुए चिथड़ों को धारण करने वाला) हो। जो चाहता है, वह गृहपति-चीवर स्वीकार करे। हे भिक्षुओं! मैं तो जो भी प्राप्त हो जाए, उसी में सन्तुष्ट रहने की ही प्रशंसा करता हूँ।" එවං ඉතරෙපි පච්චයා භගවතා අනුඤ්ඤාතත්තා එව භික්ඛූහි පරිභුඤ්ජිතුං ලද්ධා. පරියායාමිසම්පි භගවතොයෙව සන්තකං. භගවතා හි කථිතත්තා එව ජානන්ති ‘‘සම්පත්තිභවං පත්ථෙන්තො දානං දත්වා සීලං…පෙ… සමාපත්තියො නිබ්බත්තෙත්වා අනුක්කමෙන පරියායාමිසං දිබ්බසම්පත්තිං මනුස්සසම්පත්තිඤ්ච පටිලභතී’’ති. යදෙව යස්මා නිප්පරියායධම්මොපි පරියායධම්මොපි නිප්පරියායාමිසම්පි පරියායාමිසම්පි භගවතොයෙව සන්තකං, තස්මා තත්ථ අත්තනො සාමිභාවං දස්සෙන්තො තත්ථ ච යං සෙට්ඨතරං අච්චන්තහිතසුඛාවහං තත්ථෙව නෙ නියොජෙන්තො එවමාහ ‘‘තස්ස මෙ තුම්හෙ පුත්තා ඔරසා…පෙ… නො ආමිසදායාදා’’ති. इसी प्रकार अन्य प्रत्यय भी भगवान द्वारा अनुमत होने के कारण ही भिक्षुओं द्वारा उपभोग के लिए प्राप्त किए जाते हैं। पर्याय-आमिष (सांसारिक सुख) भी भगवान का ही है। क्योंकि भगवान द्वारा कहे जाने पर ही वे जानते हैं कि "सौभाग्यपूर्ण अस्तित्व की इच्छा करते हुए दान देकर, शील... पे... समापत्तियों को उत्पन्न कर अनुक्रम से पर्याय-आमिष दिव्य संपत्ति और मनुष्य संपत्ति को प्राप्त करता है।" क्योंकि जो निष्पर्याय-धर्म और पर्याय-धर्म है, तथा निष्पर्याय-आमिष और पर्याय-आमिष है, वह भगवान का ही है, इसलिए वहाँ अपना स्वामित्व दिखाते हुए और वहाँ जो श्रेष्ठतर और अत्यंत हित-सुख पहुँचाने वाला है, उसी में उन्हें नियोजित करते हुए ऐसा कहा - "उस मेरे तुम औरस पुत्र हो... पे... आमिष के दायाद नहीं।" ඉති භගවා පරිපුණ්ණවතසමාදානං තපචරියං සම්මදෙව වුසිතබ්රහ්මචරියං සුවිසුද්ධවිජ්ජාචරණසම්පන්නං අනවසෙසවෙදන්තපාරගුං බාහිතසබ්බපාපං සතතං යාචයොගං සදෙවකෙ ලොකෙ අනුත්තරදක්ඛිණෙය්යභාවප්පත්තං අත්තනො පරමත්ථබ්රාහ්මණභාවං අරියසාවකානඤ්ච අත්තනො ඔරසපුත්තාදිභාවං පවෙදෙසි. භගවා හි ‘‘සීහොති ඛො, භික්ඛවෙ, තථාගතස්සෙතං අධිවචනං අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්සා’’ති (අ. නි. 5.99) එත්ථ සීහසදිසං, ‘‘පුරිසො මග්ගකුසලොති ඛො, තිස්ස, තථාගතස්සෙතං අධිවචන’’න්ති (සං. නි. 3.84) එත්ථ මග්ගදෙසකපුරිසසදිසං, ‘‘රාජාහමස්මි සෙලා’’ති (ම. නි. 2.399; සු. නි. 559) එත්ථ රාජසදිසං, ‘‘භිසක්කො සල්ලකත්තොති ඛො, සුනක්ඛත්ත, තථාගතස්සෙතං අධිවචන’’න්ති (ම. නි. 3.65) එත්ථ වෙජ්ජසදිසං, ‘‘බ්රාහ්මණොති ඛො, භික්ඛවෙ, තථාගතස්සෙතං අධිවචන’’න්ති (අ. නි. 8.85) එත්ථ බ්රාහ්මණසදිසං අත්තානං කථෙසි. ඉධාපි බ්රාහ්මණ සදිසං කත්වා කථෙසි. इस प्रकार भगवान ने पूर्ण व्रत-समादान, तपश्चर्या, सम्यक् रूप से चरे गए ब्रह्मचर्य, सुविशुद्ध विद्या-चरण संपन्न, अवशेषरहित वेदान्त-पारगामी, सभी पापों को बाहर निकाल देने वाले, सतत याचना के योग्य, देवलोक सहित संसार में अनुत्तर दक्षिणेय भाव को प्राप्त अपने परमार्थ-ब्राह्मण भाव को और आर्य श्रावकों के अपने औरस-पुत्र आदि होने के भाव को प्रकट किया। क्योंकि भगवान ने - "भिक्षुओं, 'सिंह' यह तथागत, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध का ही नाम है" (अं. नि. 5.99) यहाँ सिंह के समान, "तिस्स, 'मार्ग-कुशल पुरुष' यह तथागत का ही नाम है" (सं. नि. 3.84) यहाँ मार्ग-देशक पुरुष के समान, "सेल, मैं राजा हूँ" (म. नि. 2.399; सु. नि. 559) यहाँ राजा के समान, "सुनक्खत्त, 'भिषक् (वैद्य) शल्यकर्ता' यह तथागत का ही नाम है" (म. नि. 3.65) यहाँ वैद्य के समान, "भिक्षुओं, 'ब्राह्मण' यह तथागत का ही नाम है" (अं. नि. 8.85) यहाँ ब्राह्मण के समान स्वयं को कहा है। यहाँ भी ब्राह्मण के समान होकर कहा है। ඉදානි යෙහි දානාදීහි යුත්තස්ස ඉතො බාහිරකබ්රාහ්මණස්ස බ්රාහ්මණකිච්චං පරිපුණ්ණං මඤ්ඤන්ති, තෙහි අත්තනො දානාදීනං අග්ගසෙට්ඨභාවං පකාසෙතුං ‘‘ද්වෙමානි, භික්ඛවෙ, දානානී’’තිආදි ආරද්ධං. තත්ථ යාගාති මහායඤ්ඤා[Pg.308], මහාදානානීති අත්ථො, යානි ‘‘යිට්ඨානී’’තිපි වුච්චන්ති. තත්ථ වෙලාමදානවෙස්සන්තරදානමහාවිජිතයඤ්ඤසදිසා ආමිසයාගා වෙදිතබ්බා, මහාසමයසුත්තමඞ්ගලසුත්තචූළරාහුලොවාදසුත්තසමචිත්තසුත්තදෙසනාදයො ධම්මයාගා. සෙසං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. अब जिन दानादि से युक्त इस (शासन) से बाहर के ब्राह्मण के ब्राह्मण-कृत्य को पूर्ण मानते हैं, उनके द्वारा अपने दानादि की अग्र-श्रेष्ठता को प्रकाशित करने के लिए "भिक्षुओं, ये दो दान हैं" आदि आरम्भ किया। वहाँ 'यागा' का अर्थ महायज्ञ, महादान है, जिन्हें 'यिट्ठ' भी कहा जाता है। वहाँ वेलाम-दान, वेस्सन्तर-दान, महाविजित-यज्ञ के समान आमिष-याग समझने चाहिए, और महासमय-सुत्त, मंगल-सुत्त, चूलराहुलवाद-सुत्त, समचित्त-सुत्त देशना आदि धर्म-याग हैं। शेष पहले कहे गए नय के अनुसार ही है। ගාථායං අයජීති අදාසි. අමච්ඡරීති සබ්බමච්ඡරියානං බොධිමූලෙයෙව සුප්පහීනත්තා මච්ඡෙරරහිතො. සබ්බභූතානුකම්පීති මහාකරුණාය සබ්බසත්තෙ පියපුත්තං විය අනුග්ගණ්හනසීලො. වුත්තඤ්හෙතං – गाथा में 'अयजी' का अर्थ 'दिया' है। 'अमच्छरी' का अर्थ सभी मात्सर्यों (कंजूसी) का बोधि-मूल में ही भली-भाँति प्रहाण हो जाने के कारण मात्सर्य-रहित है। 'सब्बभूतानुकम्पी' का अर्थ महाकरुणा के कारण सभी प्राणियों पर प्रिय पुत्र के समान अनुग्रह करने के स्वभाव वाला है। क्योंकि यह कहा गया है - ‘‘වධකෙ දෙවදත්තෙ ච, චොරෙ අඞ්ගුලිමාලකෙ; ධනපාලෙ රාහුලෙ චෙව, සමචිත්තො මහාමුනී’’ති. (මි. ප. 6.6.5) – "वधक देवदत्त में, चोर अंगुलिमाल में, धनपाल (हाथी) में और राहुल में, महामुनि समचित्त (समान चित्त वाले) थे।" (मि. प. 6.6.5) - සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. शेष सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही है। පඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. प्रथम सुत्त की वर्णना समाप्त हुई। 2. සුලභසුත්තවණ්ණනා २. सुलभ सुत्त की वर्णना। 101. දුතියෙ අප්පානීති පරිත්තානි. සුලභානීති සුඛෙන ලද්ධබ්බානි, යත්ථ කත්ථචි වා සක්කා හොති ලද්ධුං. අනවජ්ජානීති වජ්ජරහිතානි නිද්දොසානි ආගමනසුද්ධිතො කායමණ්ඩනාදිකිලෙසවත්ථුභාවාභාවතො ච. තත්ථ සුලභතාය පරියෙසනදුක්ඛස්ස අභාවො දස්සිතො, අප්පතාය පරිහරණදුක්ඛස්සපි අභාවො දස්සිතො, අනවජ්ජතාය අගරහිතබ්බතාය භික්ඛුසාරුප්පභාවො දස්සිතො හොති. අප්පතාය වා පරිත්තාසස්ස අවත්ථුතා, සුලභතාය ගෙධාය අවත්ථුතා, අනවජ්ජතාය ආදීනවවසෙන නිස්සරණපඤ්ඤාය වත්ථුතා දස්සිතා හොති. අප්පතාය වා ලාභෙන න සොමනස්සං ජනයන්ති, සුලභතාය අලාභෙන න දොමනස්සං ජනයන්ති, අනවජ්ජතාය විප්පටිසාරනිමිත්තං අඤ්ඤාණුපෙක්ඛං න ජනයන්ති අවිප්පටිසාරවත්ථුභාවතො. १०१. दूसरे (सुत्त) में 'अप्पानि' का अर्थ 'थोड़े' (अल्प) है। 'सुलभानि' का अर्थ सुख से प्राप्त होने योग्य, या जहाँ कहीं भी प्राप्त किए जा सकने वाले हैं। 'अनवज्जानि' का अर्थ दोष-रहित, निर्दोष हैं - आगम की शुद्धि से और शरीर के मंडन आदि क्लेशों की वस्तुओं के अभाव के कारण। वहाँ सुलभ होने से गवेषणा (खोजने) के दुःख का अभाव दिखाया गया है, अल्प होने से परिहार (रख-रखाव) के दुःख का भी अभाव दिखाया गया है, और अनवद्य (निर्दोष) होने से निंदा के अयोग्य होने के कारण भिक्षु के अनुरूप होने का भाव दिखाया गया है। अथवा, अल्प होने से तृष्णा के लिए विषय का अभाव, सुलभ होने से लोभ के लिए विषय का अभाव, और अनवद्य होने से आदिनाथ (दोष) के वश से निस्सरण-प्रज्ञा (मुक्ति की प्रज्ञा) के लिए विषय का होना दिखाया गया है। अथवा, अल्प होने से लाभ होने पर वे सौमनस्य (हर्ष) उत्पन्न नहीं करते, सुलभ होने से लाभ न होने पर वे दौर्मनस्य (दुःख) उत्पन्न नहीं करते, और अनवद्य होने से विप्रतिसार (पछतावा) का कारण न होने से वे अज्ञान-उपेक्षा उत्पन्न नहीं करते, क्योंकि वे अविप्रतिसार (पछतावा रहित) के आधार हैं। පංසුකූලන්ති රථිකාසුසානසඞ්කාරකූටාදීසු යත්ථ කත්ථචි පංසූනං උපරි ඨිතත්තා අබ්භුග්ගතට්ඨෙන පංසුකූලං වියාති පංසුකූලං, පංසු විය කුච්ඡිතභාවං උලති ගච්ඡතීති පංසුකූලන්ති එවං ලද්ධනාමං රථිකාදීසු පතිතනන්තකානි උච්චිනිත්වා කතචීවරං. පිණ්ඩියාලොපොති ජඞ්ඝපිණ්ඩියා බලෙන [Pg.309] චරිත්වා ඝරෙ ඝරෙ ආලොපමත්තං කත්වා ලද්ධභොජනං. රුක්ඛමූලන්ති විවෙකානුරූපං යංකිඤ්චි රුක්ඛසමීපං. පූතිමුත්තන්ති යංකිඤ්චි ගොමුත්තං. යථා හි සුවණ්ණවණ්ණොපි කායො පූතිකායොව එවං අභිනවම්පි මුත්තං පූතිමුත්තමෙව. තත්ථ කෙචි ගොමුත්තභාවිතං හරිතකීඛණ්ඩං ‘‘පූතිමුත්ත’’න්ති වදන්ති, පූතිභාවෙන ආපණාදිතො විස්සට්ඨං ඡඩ්ඩිතං අපරිග්ගහිතං යංකිඤ්චි භෙසජ්ජං පූතිමුත්තන්ති අධිප්පෙතන්ති අපරෙ. 'पांसुकूल' का अर्थ है - रथ्या (गली), श्मशान, कूड़े के ढेर आदि में जहाँ कहीं भी धूल (पांसु) के ऊपर स्थित होने के कारण ऊपर उठे हुए अर्थ में पांसुकूल के समान पांसुकूल है; अथवा धूल के समान कुत्सित भाव को प्राप्त होता है, इसलिए पांसुकूल है - इस प्रकार नाम प्राप्त रथ्या आदि में गिरे हुए चिथड़ों को चुनकर बनाया गया चीवर। 'पिण्डियालोप' का अर्थ है जंघाओं के बल पर चलकर घर-घर से ग्रास मात्र के रूप में प्राप्त भोजन। 'रुक्खमुल' का अर्थ है विवेक (एकान्त) के अनुरूप कोई भी वृक्ष का समीप। 'पूतिमुत्त' का अर्थ है कोई भी गोमूत्र। जैसे सुवर्ण वर्ण वाला शरीर भी पूति-काय (सड़ा हुआ शरीर) ही है, वैसे ही ताजा मूत्र भी पूति-मूत्र ही है। वहाँ कुछ लोग गोमूत्र में भिगोए हुए हरड़ के टुकड़ों को 'पूतिमुत्त' कहते हैं, अन्य कहते हैं कि दुर्गंधयुक्त होने के कारण दुकान आदि से फेंकी हुई, छोड़ी हुई, बिना स्वामित्व वाली कोई भी औषधि 'पूतिमुत्त' के रूप में अभिप्रेत है। යතො ඛොති පච්චත්තෙ නිස්සක්කවචනං, යං ඛොති වුත්තං හොති. තෙන ‘‘තුට්ඨො හොතී’’ති වුත්තකිරියං පරාමසති. තුට්ඨොති සන්තුට්ඨො. ඉදමස්සාහන්ති ය්වායං චතුබ්බිධෙන යථාවුත්තෙන පච්චයෙන අප්පෙන සුලභෙන සන්තොසො, ඉදං ඉමස්ස භික්ඛුනො සීලසංවරාදීසු අඤ්ඤතරං එකං සාමඤ්ඤඞ්ගං සමණභාවකාරණන්ති අහං වදාමි. සන්තුට්ඨස්ස හි චතුපාරිසුද්ධිසීලං සුපරිපුණ්ණං හොති, සමථවිපස්සනා ච භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති. අථ වා සාමඤ්ඤං නාම අරියමග්ගො. තස්ස සඞ්ඛෙපතො ද්වෙ අඞ්ගානි – බාහිරං, අජ්ඣත්තිකන්ති. තත්ථ බාහිරං සප්පුරිසූපනිස්සයො සද්ධම්මස්සවනඤ්ච, අජ්ඣත්තිකං පන යොනිසො මනසිකාරො ධම්මානුධම්මපටිපත්ති ච. තෙසු යස්මා යථාරහං ධම්මානුධම්මපටිපත්තිභූතා තස්සා මූලභූතා චෙතෙ ධම්මා, යදිදං අප්පිච්ඡතා සන්තුට්ඨිතා පවිවිත්තතා අසංසට්ඨතා ආරද්ධවීරියතාති එවමාදයො, තස්මා වුත්තං ‘‘ඉදමස්සාහං අඤ්ඤතරං සාමඤ්ඤඞ්ගන්ති වදාමී’’ති. "यतो खो" यह प्रत्यय (पच्चत्त) में निसर्ग वचन है, जो "यं खो" कहा गया है। उससे "तुट्ठो होति" (संतुष्ट होता है) इस कथित क्रिया का परामर्श होता है। "तुट्ठो" का अर्थ है संतुष्ट। "इदमस्साहं" का अर्थ है कि जो यह चार प्रकार के यथोक्त प्रत्ययों से, अल्प और सुलभ से संतोष है, इसे मैं इस भिक्षु के शील-संवर आदि में से एक श्रमणत्व का अंग (सामञ्ञङ्ग) या श्रमण भाव का कारण कहता हूँ। क्योंकि संतुष्ट व्यक्ति का चतुपारिशुद्धि शील सुपूर्ण होता है, और शमथ-विपश्यना भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होते हैं। अथवा "सामञ्ञ" (श्रमणत्व) नाम आर्यमार्ग का है। संक्षेप में उसके दो अंग हैं - बाह्य और आध्यात्मिक। वहाँ बाह्य सत्पुरुष का आश्रय और सद्धर्म का श्रवण है, और आध्यात्मिक योनिशो मनसिकार और धर्मानुधर्म प्रतिपत्ति है। उनमें से क्योंकि यथायोग्य धर्मानुधर्म प्रतिपत्ति स्वरूप और उसके मूल स्वरूप ये धर्म हैं, जैसे कि अल्पेच्छता, संतुष्टि, प्रविविक्तता (एकान्तप्रियता), असंसृष्टता (मेल-जोल न रखना), आरब्धवीर्यता आदि, इसलिए कहा गया है - "इसे मैं इसका एक श्रमणत्व का अंग कहता हूँ।" ගාථාසු සෙනාසනමාරබ්භාති විහාරාදිං මඤ්චපීඨාදිඤ්ච සෙනාසනං නිස්සාය. චීවරං පානභොජනන්ති නිවාසනාදිචීවරං, අම්බපානකාදිපානං, ඛාදනීයභොජනීයාදිභුඤ්ජිතබ්බවත්ථුඤ්ච ආරබ්භාති සම්බන්ධො. විඝාතො විහතභාවො චෙතොදුක්ඛං න හොතීති යොජනා. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – ‘‘අසුකස්මිං නාම ආවාසෙ පච්චයා සුලභා’’ති ලභිතබ්බට්ඨානගමනෙන වා ‘‘මය්හං පාපුණාති න තුය්හ’’න්ති විවාදාපජ්ජනෙන වා නවකම්මකරණාදිවසෙන වා සෙනාසනාදීනි පරියෙසන්තානං අසන්තුට්ඨානං ඉච්ඡිතලාභාදිනා යො විඝාතො චිත්තස්ස හොති, සො තත්ථ සන්තුට්ඨස්ස න හොතීති. දිසා නප්පටිහඤ්ඤතීති සන්තුට්ඨියා චාතුද්දිසාභාවෙන දිසා නප්පටිහන්ති. වුත්තඤ්හෙතං – गाथाओं में "सेनासनमारब्भ" का अर्थ है विहार आदि और मंच-पीठ आदि शयनासन के आश्रय से। "चीवरं पानभोजनं" का अर्थ है निवास आदि चीवर, आम-पानक आदि पेय, और खादनीय-भोजनीय आदि खाने योग्य वस्तुएँ; "आरब्भ" के साथ इसका संबंध है। "विघातो" का अर्थ है विहत भाव (व्याकुलता) या चित्त का दुःख नहीं होता है - यह योजना है। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है - "अमुक आवास में प्रत्यय सुलभ हैं" इस प्रकार प्राप्त करने योग्य स्थान पर जाने से, या "यह मुझे प्राप्त होता है, तुम्हें नहीं" इस प्रकार विवाद में पड़ने से, या नवनिर्माण (नवकम्म) आदि करने के वश से शयनासन आदि की खोज करने वाले असंतुष्टों को इच्छित लाभ आदि न होने से जो चित्त का विघात (कष्ट) होता है, वह वहाँ संतुष्ट व्यक्ति को नहीं होता है। "दिशो न प्रतिहन्यन्ते" (दिशाएँ बाधित नहीं होतीं) का अर्थ है कि संतुष्टि के चारों दिशाओं में होने के कारण दिशाएँ बाधित नहीं होतीं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘චාතුද්දිසො [Pg.310] අප්පටිඝො ච හොති,සන්තුස්සමානො ඉතරීතරෙනා’’ති. (සු. නි. 42; චූළනි. ඛග්ගවිසාණසුත්තනිද්දෙස 128); "वह चारों दिशाओं वाला और प्रतिघ (बाधा) रहित होता है, जो जैसा भी मिले उसी से संतुष्ट रहता है।" යස්ස හි ‘‘අසුකට්ඨානං නාම ගතො චීවරාදීනි ලභිස්සාමී’’ති චිත්තං උප්පජ්ජති, තස්ස දිසා පටිහඤ්ඤති නාම. යස්ස පන එවං න උප්පජ්ජති, තස්ස දිසා න පටිහඤ්ඤති නාම. ධම්මාති පටිපත්තිධම්මා. සාමඤ්ඤස්සානුලොමිකාති සමණධම්මස්ස සමථවිපස්සනාභාවනාය අරියමග්ගස්සෙව වා අනුච්ඡවිකා අප්පිච්ඡතාදයො. අධිග්ගහිතාති සබ්බෙ තෙ තුට්ඨචිත්තස්ස සන්තුට්ඨචිත්තෙන භික්ඛුනා අධිග්ගහිතා පටිපක්ඛධම්මෙ අභිභවිත්වා ගහිතා හොන්ති අබ්භන්තරගතා, න බාහිරගතාති. जिसके मन में यह विचार उत्पन्न होता है कि "अमुक स्थान पर जाने से मुझे चीवर आदि प्राप्त होंगे", उसकी दिशा बाधित होती है। लेकिन जिसके मन में ऐसा विचार नहीं आता, उसकी दिशा बाधित नहीं होती। "धम्मा" का अर्थ है प्रतिपत्ति धर्म। "सामञ्ञस्सानुलोमिका" का अर्थ है श्रमण धर्म के, शमथ-विपश्यना भावना के या आर्यमार्ग के ही अनुरूप अल्पेच्छता आदि। "अधिग्गहिता" का अर्थ है कि वे सभी संतुष्ट चित्त वाले भिक्षु द्वारा प्रतिपक्ष धर्मों को अभिभूत करके (जीतकर) ग्रहण किए गए होते हैं, वे भीतर समाहित होते हैं, बाहर नहीं। දුතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. द्वितीय सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 3. ආසවක්ඛයසුත්තවණ්ණනා ३. आसवक्खय (आस्रवक्षय) सूत्र की व्याख्या। 102. තතියෙ ජානතොති ජානන්තස්ස. පස්සතොති පස්සන්තස්ස. යදිපි ඉමානි ද්වෙපි පදානි එකත්ථානි, බ්යඤ්ජනමෙව නානං, එවං සන්තෙපි ‘‘ජානතො’’ති ඤාණලක්ඛණං උපාදාය පුග්ගලං නිද්දිසති. ජානනලක්ඛණඤ්හි ඤාණං. ‘‘පස්සතො’’ති ඤාණප්පභාවං උපාදාය. දස්සනප්පභාවඤ්හි උපාදාය ඤාණසමඞ්ගී පුග්ගලො චක්ඛුමා විය පුග්ගලො චක්ඛුනා රූපානි, ඤාණෙන විවටෙ ධම්මෙ පස්සති. අථ වා ජානතොති අනුබොධඤාණෙන ජානතො. පස්සතොති පටිවෙධඤාණෙන පස්සතො. පටිලොමතො වා දස්සනමග්ගෙන පස්සතො, භාවනාමග්ගෙන ජානතො. කෙචි පන ‘‘ඤාතතීරණපහානපරිඤ්ඤාහි ජානතො, සිඛාප්පත්තවිපස්සනාය පස්සතො’’ති වදන්ති. අථ වා දුක්ඛං පරිඤ්ඤාභිසමයෙන ජානතො, නිරොධං සච්ඡිකිරියාභිසමයෙන පස්සතො. තදුභයෙ ච සති පහානභාවනාභිසමයා සිද්ධා එව හොන්තීති චතුසච්චාභිසමයො වුත්තො හොති. යදා චෙත්ථ විපස්සනාඤාණං අධිප්පෙතං, තදා ‘‘ජානතො පස්සතො’’ති පදානං හෙතුඅත්ථදීපනතා දට්ඨබ්බා. යදා පන මග්ගඤාණං අධිප්පෙතං, තදා මග්ගකිච්චත්ථදීපනතා. १०२. तीसरे (सूत्र) में "जानतो" का अर्थ है जानते हुए का। "पस्सतो" का अर्थ है देखते हुए का। यद्यपि ये दोनों पद एक ही अर्थ वाले हैं, केवल व्यंजन (शब्द) भिन्न हैं, फिर भी "जानतो" से ज्ञान के लक्षण को लेकर पुद्गल का निर्देश किया गया है। क्योंकि ज्ञान का लक्षण जानना है। "पस्सतो" से ज्ञान के प्रभाव को लेकर (निर्देश है)। दर्शन के प्रभाव को लेकर ज्ञान से युक्त पुद्गल, चक्षु वाले व्यक्ति द्वारा आँखों से रूपों को देखने के समान, ज्ञान के द्वारा अनावृत धर्मों को देखता है। अथवा "जानतो" का अर्थ है अनुबोध ज्ञान से जानना। "पस्सतो" का अर्थ है प्रतिवेध ज्ञान से देखना। अथवा प्रतिलोम से दर्शन मार्ग से देखना और भावना मार्ग से जानना। कुछ लोग कहते हैं - "ज्ञात-तीरण-प्रहाण परिज्ञाओं से जानना, और शिखर पर पहुँची विपश्यना से देखना।" अथवा दुःख को परिज्ञा अभिसमय से जानना, निरोध को साक्षात्क्रिया अभिसमय से देखना। उन दोनों के होने पर प्रहाण और भावना अभिसमय सिद्ध ही हो जाते हैं, इस प्रकार चतुःसत्य अभिसमय कहा गया है। जब यहाँ विपश्यना ज्ञान अभिप्रेत हो, तब "जानतो पस्सतो" पदों को हेतु-अर्थ का द्योतक समझना चाहिए। और जब मार्ग ज्ञान अभिप्रेत हो, तब मार्ग-कृत्य के अर्थ का द्योतक समझना चाहिए। ආසවානං [Pg.311] ඛයන්ති ‘‘ජානතො, අහං භික්ඛවෙ, පස්සතො ආසවානං ඛයං වදාමී’’ති (ම. නි. 1.15; සං. නි. 3.101; 5.1095) එවමාගතෙ සබ්බාසවසංවරපරියායෙ ‘‘ආසවානං ඛයා අනාසවං චෙතොවිමුත්ති’’න්තිආදීසු (ම. නි. 1.438) ච සුත්තපදෙසු ආසවානං පහානං අච්චන්තක්ඛයො අසමුප්පාදො ඛීණාකාරො නත්ථිභාවො ‘‘ආසවක්ඛයො’’ති වුත්තො. ‘‘ආසවානං ඛයා සමණො හොතී’’තිආදීසු (ම. නි. 1.438) ඵලං. "आसवानं खयं" (आस्रवों का क्षय) - "भिक्षुओं, जानते हुए और देखते हुए के लिए मैं आस्रवों के क्षय को कहता हूँ" इस प्रकार आए हुए सभी आस्रव-संवर के पर्याय में, और "आस्रवों के क्षय से अनास्रव चेतोविमुक्ति" आदि सूत्र पदों में आस्रवों का प्रहाण, अत्यंत क्षय, अनुत्पाद, क्षीण आकार और अभाव "आस्रवक्षय" कहा गया है। "आस्रवों के क्षय से श्रमण होता है" आदि में यह फल है। ‘‘පරවජ්ජානුපස්සිස්ස, නිච්චං උජ්ඣානසඤ්ඤිනො; ආසවා තස්ස වඩ්ඪන්ති, ආරා සො ආසවක්ඛයා’’ති. (ධ. ප. 253); – "जो दूसरों के दोषों को देखता रहता है और सदा दूसरों की निंदा करने का विचार रखता है, उसके आस्रव बढ़ते हैं; वह आस्रवक्षय (निर्वाण) से बहुत दूर है।" ආදීසු නිබ්බානං. आदि में निर्वाण। ‘‘සෙඛස්ස සික්ඛමානස්ස, උජුමග්ගානුසාරිනො; ඛයස්මිං පඨමං ඤාණං, තතො අඤ්ඤා අනන්තරා; තතො අඤ්ඤාවිමුත්තස්ස, ඤාණං වෙ හොති තාදිනො’’ති. (අ. නි. 3.86; ඉතිවු. 62) – "सीखते हुए और सीधे मार्ग का अनुसरण करने वाले शैक्ष (साधक) के लिए, (आस्रवों के) क्षय होने पर प्रथम ज्ञान होता है, उसके तुरंत बाद आज्ञा (पूर्ण ज्ञान) होती है। उसके बाद उस आज्ञा से विमुक्त हुए तादी (स्थितप्रज्ञ) को (विमुक्ति) ज्ञान होता है।" එවමාගතෙ ඉන්ද්රියසුත්තෙ ඉධ ච මග්ගො ‘‘ආසවක්ඛයො’’ති වුත්තො. තස්මා යථාවුත්තනයෙන ජානන්තස්ස පස්සන්තස්ස අහං අරියමග්ගාධිගමං වදාමීති වුත්තං හොති. නො අජානතො නො අපස්සතොති යො පන න ජානාති න පස්සති, තස්ස නො වදාමීති අත්ථො. එතෙන යෙ අජානතො අපස්සතොපි සංසාරසුද්ධිං වදන්ති, තෙ පටික්ඛිපති. පුරිමෙන වා පදද්වයෙන උපායො වුත්තො, ඉමිනා අනුපායපටිසෙධො. සඞ්ඛෙපෙන චෙත්ථ ඤාණං ආසවක්ඛයකරං, සෙසං තස්ස පරික්ඛාරොති දස්සෙති. इस प्रकार आए हुए इन्द्रिय सुत्त में यहाँ मार्ग को 'आसवक्खय' (आस्रवों का क्षय) कहा गया है। इसलिए, पूर्वोक्त विधि से जानने वाले और देखने वाले के लिए मैं आर्य मार्ग की प्राप्ति कहता हूँ - ऐसा कहा गया है। 'न अजानतो न अपस्सतो' का अर्थ है कि जो नहीं जानता और नहीं देखता, उसके लिए मैं (यह) नहीं कहता हूँ। इससे वे लोग जो न जानने वाले और न देखने वाले की भी संसार-शुद्धि कहते हैं, उनका निषेध होता है। अथवा पूर्व के दो पदों द्वारा उपाय बताया गया है, और इसके द्वारा अनुपाय का प्रतिषेध किया गया है। संक्षेप में यहाँ ज्ञान आस्रवों का क्षय करने वाला है, शेष उसके परिकर (सहायक) हैं - यह दिखाया गया है। ඉදානි යං ජානතො යං පස්සතො ආසවක්ඛයො හොති, තං දස්සෙතුං ‘‘කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, ජානතො’’ති පුච්ඡං ආරභි. තත්ථ ජානනා බහුවිධා. දබ්බජාතිකො එව හි කොචි භික්ඛු ඡත්තං කාතුං ජානාති, කොචි චීවරාදීනං අඤ්ඤතරං, තස්ස ඊදිසානි කම්මානි වත්තසීසෙ ඨත්වා කරොන්තස්ස සා ජානනා ‘‘මග්ගඵලානං පදට්ඨානං න හොතී’’ති න වත්තබ්බා. යො පන සාසනෙ පබ්බජිත්වා වෙජ්ජකම්මාදීනි කාතුං ජානාති, තස්සෙවං ජානතො ආසවා වඩ්ඪන්තියෙව. තස්මා යං ජානතො යං පස්සතො ආසවානං ඛයො හොති, තදෙව දස්සෙන්තො ආහ ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්තිආදි. තත්ථ යං වත්තබ්බං චතුසච්චකම්මට්ඨානං, තං හෙට්ඨා යොනිසොමනසිකාරසුත්තෙ සඞ්ඛෙපතො වුත්තමෙව. अब जिसे जानने वाले और जिसे देखने वाले के आस्रवों का क्षय होता है, उसे दिखाने के लिए 'किञ्च, भिक्खवे, जानतो' (भिक्षुओं, क्या जानने वाले के?) यह प्रश्न आरम्भ किया। वहाँ जानना अनेक प्रकार का है। कोई भिक्षु स्वभाव से ही छत्र बनाना जानता है, कोई चीवर आदि में से किसी एक को; ऐसे कार्यों को व्रत के रूप में करने वाले की वह जानकारी 'मार्ग और फलों का पदस्थान नहीं होती' - ऐसा नहीं कहना चाहिए। किन्तु जो शासन में प्रव्रजित होकर वैद्य-कर्म (चिकित्सा) आदि करना जानता है, ऐसे जानने वाले के आस्रव बढ़ते ही हैं। इसलिए जिसे जानने और जिसे देखने वाले के आस्रवों का क्षय होता है, उसे ही दिखाते हुए 'इदं दुक्खं' (यह दुःख है) आदि कहा। वहाँ जो चार सत्यों का कर्मस्थान कहना चाहिए, वह नीचे 'योनिसोमनसिकार सुत्त' में संक्षेप में कहा ही गया है। තත්ථ [Pg.312] පන ‘‘යොනිසො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මනසි කරොන්තො අකුසලං පජහති, කුසලං භාවෙතී’’ති (ඉතිවු. 16) ආගතත්තා ‘‘ඉදං දුක්ඛන්ති යොනිසො මනසි කරොතී’’තිආදිනා අත්ථවිභාවනා කතා. ඉධ ‘‘ඉදං දුක්ඛන්ති, භික්ඛවෙ, ජානතො පස්සතො ආසවානං ඛයො හොතී’’ති (ම. නි. 1.15; සං. නි. 3.101; 5.1095) ආගතත්තා ‘‘ඉදං දුක්ඛන්ති පරිඤ්ඤාපටිවෙධවසෙන පරිඤ්ඤාභිසමයවසෙන මග්ගඤාණෙන ජානතො පස්සතො ආසවානං ඛයො හොතී’’තිආදිනා නයෙන යොජෙතබ්බං. ආසවෙසු ච පඨමමග්ගෙන දිට්ඨාසවො ඛීයති, තතියමග්ගෙන කාමාසවො, චතුත්ථමග්ගෙන භවාසවො අවිජ්ජාසවො ච ඛීයතීති වෙදිතබ්බො. वहाँ 'भिक्षुओं, योनिशः मनसिकार करता हुआ भिक्षु अकुशल को त्यागता है, कुशल की भावना करता है' - ऐसा आने के कारण 'यह दुःख है - ऐसा योनिशः मनसिकार करता है' आदि के द्वारा अर्थ की व्याख्या की गई है। यहाँ 'भिक्षुओं, यह दुःख है - ऐसा जानने वाले और देखने वाले के आस्रवों का क्षय होता है' - ऐसा आने के कारण 'यह दुःख है - इस प्रकार परिज्ञा-प्रतिवेध के वश से, परिज्ञा-अभिसमय के वश से, मार्ग-ज्ञान के द्वारा जानने वाले और देखने वाले के आस्रवों का क्षय होता है' - इस विधि से जोड़ना चाहिए। आस्रवों में, प्रथम मार्ग से दृष्टि-आस्रव क्षीण होता है, तृतीय मार्ग से काम-आस्रव, और चतुर्थ मार्ग से भव-आस्रव और अविद्या-आस्रव क्षीण होते हैं - ऐसा समझना चाहिए। ගාථාසු විමුත්තිඤාණන්ති විමුත්තියං නිබ්බානෙ ඵලෙ ච පච්චවෙක්ඛණඤාණං. උත්තමන්ති උත්තමධම්මාරම්මණත්තා උත්තමං. ඛයෙ ඤාණන්ති ආසවානං සංයොජනානඤ්ච ඛයෙ ඛයකරෙ අරියමග්ගෙ ඤාණං. ‘‘ඛීණා සංයොජනා ඉති ඤාණ’’න්ති ඉධාපි ආනෙත්වා සම්බන්ධිතබ්බං. තෙන පහීනකිලෙසපච්චවෙක්ඛණං දස්සෙති. එවමෙත්ථ චත්තාරිපි පච්චවෙක්ඛණඤාණානි වුත්තානි හොන්ති. අවසිට්ඨකිලෙසපච්චවෙක්ඛණා හි ඉධ නත්ථි අරහත්තඵලාධිගමස්ස අධිප්පෙතත්තා. යථා චෙත්ථ ජානතො පස්සතොති නිබ්බානාධිගමෙන සම්මාදිට්ඨිකිච්චං අධිකං කත්වා වුත්තං, එවං සම්මප්පධානකිච්චම්පි අධිකමෙව ඉච්ඡිතබ්බන්ති දස්සෙන්තො ‘‘න ත්වෙවිදං කුසීතෙනා’’ති ඔසානගාථමාහ. गाथाओं में 'विमुत्तिञाणं' का अर्थ है विमुक्ति में, निर्वाण में और फल में प्रत्यवेक्षण ज्ञान। 'उत्तमं' का अर्थ है उत्तम धर्म आलम्बन होने के कारण उत्तम। 'खये ञाणं' का अर्थ है आस्रवों और संयोजनों के क्षय में, क्षय करने वाले आर्य मार्ग में ज्ञान। 'संयोजन क्षीण हो गए हैं - ऐसा ज्ञान' - यहाँ भी लाकर जोड़ना चाहिए। उससे प्रहीण क्लेशों का प्रत्यवेक्षण दिखाया गया है। इस प्रकार यहाँ चारों ही प्रत्यवेक्षण ज्ञान कहे गए हैं। अवशिष्ट क्लेशों का प्रत्यवेक्षण यहाँ नहीं है क्योंकि यहाँ अर्हत्फल की प्राप्ति अभिप्रेत है। जैसे यहाँ 'जानने वाले और देखने वाले के' - इस प्रकार निर्वाण की प्राप्ति के साथ सम्यक्-दृष्टि के कार्य को प्रमुख करके कहा गया है, वैसे ही सम्यक्-प्रधान के कार्य को भी प्रमुख ही समझना चाहिए - यह दिखाते हुए 'न त्वेविदं कुसीतेन' (यह आलसी के द्वारा नहीं) यह अन्तिम गाथा कही। තත්ථ න ත්වෙවිදන්ති න තු එව ඉදං. තුසද්දො නිපාතමත්තං. බාලෙනමවිජානතාති මකාරො පදසන්ධිකරො. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – ඉදං සෙක්ඛමග්ගෙන අසෙක්ඛමග්ගෙන ච පත්තබ්බං අභිජ්ඣාකායගන්ථාදිසබ්බගන්ථානං පමොචනං පමොචනස්ස නිමිත්තභූතං නිබ්බානං ‘‘ඉදං දුක්ඛ’’න්තිආදිනා චත්තාරි සච්චානි යථාභූතං අවිජානතා තතො එව බාලෙන අවිද්දසුනා යථා අධිගන්තුං න සක්කා, එවං කුසීතෙන නිබ්බීරියෙනාපි, තස්මා තදධිගමාය ආරද්ධවීරියෙන භවිතබ්බන්ති. තෙනාහ භගවා ‘‘ආරද්ධවීරියස්සායං ධම්මො, නො කුසීතස්ස’’ (දී. නි. 3.358). वहाँ 'न त्वेविदं' का अर्थ है 'न तु एव इदं'। 'तु' शब्द मात्र निपात है। 'बालेनमविजानता' में 'म' अक्षर पद-सन्धि करने वाला है। यहाँ यह संक्षिप्त अर्थ है - यह शैक्ष मार्ग और अशैक्ष मार्ग द्वारा प्राप्त होने वाला, अभिध्या-कायग्रन्थ आदि सभी ग्रन्थों से मोक्ष, और मोक्ष का निमित्त-भूत निर्वाण; 'यह दुःख है' आदि के द्वारा चार सत्यों को यथार्थ रूप से न जानने वाले और उसी कारण से अज्ञानी और अविद्वान व्यक्ति द्वारा जैसे प्राप्त नहीं किया जा सकता, वैसे ही आलसी और वीर्यहीन व्यक्ति द्वारा भी नहीं। इसलिए उसकी प्राप्ति के लिए आरब्ध-वीर्य (उद्यमी) होना चाहिए। इसीलिए भगवान ने कहा - 'यह धर्म आरब्ध-वीर्य वाले के लिए है, आलसी के लिए नहीं' । ‘‘ආරම්භථ නික්කමථ, යුඤ්ජථ බුද්ධසාසනෙ; ධුනාථ මච්චුනො සෙනං, නළාගාරංව කුඤ්ජරො’’ති. (සං. නි. 1.185; නෙත්ති. 29; මි. ප. 5.1.4); 'आरम्भ करो, निष्क्रमण करो, बुद्ध-शासन में लग जाओ; मृत्यु की सेना को वैसे ही नष्ट कर दो जैसे हाथी घास के घर को' । තතියසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तृतीय सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 4. සමණබ්රාහ්මණසුත්තවණ්ණනා ४. श्रमण-ब्राह्मण सुत्त की व्याख्या। 103. චතුත්ථෙ [Pg.313] යෙ හි කෙචීති යෙ කෙචි. ඉදං දුක්ඛන්ති යථාභූතං නප්පජානන්තීති ‘‘ඉදං දුක්ඛං, එත්තකං දුක්ඛං, න ඉතො භිය්යො’’ති අවිපරීතං සභාවසරසලක්ඛණතො විපස්සනාපඤ්ඤාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය දුක්ඛසච්චං න ජානන්ති න පටිවිජ්ඣන්ති. සෙසෙසුපි එසෙව නයො. න මෙ තෙ, භික්ඛවෙතිආදීසු අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – භික්ඛවෙ, චතුසච්චකම්මට්ඨානං අනනුයුත්තා පබ්බජ්ජාමත්තසමණා චෙව ජාතිමත්තබ්රාහ්මණා ච න මයා තෙ සමිතපාපසමණෙසු සමණොති, බාහිතපාපබ්රාහ්මණෙසු බ්රාහ්මණොති ච සම්මතා අනුඤ්ඤාතා. කස්මා? සමණකරණානං බ්රාහ්මණකරණානඤ්ච ධම්මානං අභාවතොති. තෙනෙවාහ ‘‘න ච පන තෙ ආයස්මන්තො’’තිආදි. තත්ථ සාමඤ්ඤත්ථන්ති සාමඤ්ඤසඞ්ඛාතං අත්ථං, චත්තාරි සාමඤ්ඤඵලානීති අත්ථො. බ්රහ්මඤ්ඤත්ථන්ති තස්සෙව වෙවචනං. අපරෙ පන ‘‘සාමඤ්ඤත්ථන්ති චත්තාරො අරියමග්ගා, බ්රහ්මඤ්ඤත්ථන්ති චත්තාරි අරියඵලානී’’ති වදන්ති. සෙසං වුත්තනයමෙව. සුක්කපක්ඛො වුත්තවිපරියායෙන වෙදිතබ්බො. ගාථාසු අපුබ්බං නත්ථි. १०३. चौथे में 'ये हि केचि' का अर्थ है 'जो कोई'। 'यह दुःख है' - इसे यथार्थ रूप से नहीं जानते हैं, अर्थात् 'यह दुःख है, इतना दुःख है, इससे अधिक नहीं' - इस प्रकार अविपरीत स्वभाव, रस और लक्षण से विपश्यना-प्रज्ञा सहित मार्ग-प्रज्ञा द्वारा दुःख-सत्य को नहीं जानते, प्रतिवेध नहीं करते। शेष में भी यही विधि है। 'न मे ते, भिक्खवे' आदि में यह संक्षिप्त अर्थ है - भिक्षुओं, चार सत्यों के कर्मस्थान में न लगे हुए, केवल प्रव्रज्या मात्र से श्रमण और केवल जन्म मात्र से ब्राह्मण, मेरे द्वारा वे शान्त-पाप श्रमणों में 'श्रमण' और बाहित-पाप ब्राह्मणों में 'ब्राह्मण' के रूप में स्वीकृत नहीं हैं। किसलिए? श्रमण बनाने वाले और ब्राह्मण बनाने वाले धर्मों के अभाव के कारण। इसीलिए कहा 'न च पन ते आयस्मन्तो' आदि। वहाँ 'सामञ्ञत्थं' का अर्थ है श्रामण्य संज्ञक अर्थ, अर्थात् चार श्रामण्य फल। 'ब्रह्मञ्ञत्थं' उसी का पर्यायवाची है। दूसरे लोग कहते हैं कि 'सामञ्ञत्थं' का अर्थ चार आर्य मार्ग है और 'ब्रह्मञ्ञत्थं' का अर्थ चार आर्य फल है। शेष पूर्वोक्त विधि के समान ही है। शुक्ल पक्ष को इसके विपरीत समझना चाहिए। गाथाओं में कुछ भी नया नहीं है। චතුත්ථසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. चतुर्थ सुत्त की व्याख्या समाप्त हुई। 5. සීලසම්පන්නසුත්තවණ්ණනා ५. शीलसम्पन्न सुत्त की व्याख्या। 104. පඤ්චමෙ සීලසම්පන්නාති එත්ථ සීලං නාම ඛීණාසවානං ලොකියලොකුත්තරසීලං, තෙන සම්පන්නා සමන්නාගතාති සීලසම්පන්නා. සමාධිපඤ්ඤාසුපි එසෙව නයො. විමුත්ති පන ඵලවිමුත්තියෙව, විමුත්තිඤාණදස්සනං පච්චවෙක්ඛණඤාණං. එවමෙත්ථ සීලාදයො තයො ලොකියලොකුත්තරා, විමුත්ති ලොකුත්තරාව, විමුත්තිඤාණදස්සනං ලොකියමෙව. දිට්ඨධම්මිකසම්පරායිකපරමත්ථෙහි යථාරහං පරෙ ඔවදන්ති අනුසාසන්තීති ඔවාදකා. විඤ්ඤාපකාති කම්මානි කම්මඵලානි ච, විඤ්ඤාපකා, තත්ථ ච ‘‘ඉමෙ ධම්මා කුසලා, ඉමෙ ධම්මා අකුසලා. ඉමෙ ධම්මා සාවජ්ජා, ඉමෙ ධම්මා අනවජ්ජා’’තිආදිනා කුසලාදිවිභාගතො ඛන්ධාදිවිභාගතො සලක්ඛණතො සාමඤ්ඤලක්ඛණතොති විවිධෙහි නයෙහි ධම්මානං ඤාපකා අවබොධකා[Pg.314]. සන්දස්සකාති තෙයෙව ධම්මෙ හත්ථෙන ගහෙත්වා විය පරස්ස පච්චක්ඛතො දස්සෙතාරො. සමාදපකාති යං සීලාදි යෙහි අසමාදින්නං, තස්ස සමාදාපෙතාරො, තත්ථ තෙ පතිට්ඨාපෙතාරො. සමුත්තෙජකාති එවං කුසලධම්මෙසු පතිට්ඨිතානං උපරි අධිචිත්තානුයොගෙ නියොජනවසෙන චිත්තස්ස සම්මා උත්තෙජකා, යථා විසෙසාධිගමො හොති, එවං නිසාමනවසෙන තෙජකා. සම්පහංසකාති තෙසං යථාලද්ධෙහි උපරිලද්ධබ්බෙහි ච ගුණවිසෙසෙහි චිත්තස්ස සම්මා පහංසකා, ලද්ධස්සාදවසෙන සුට්ඨු තොසකා. අලංසමක්ඛාතාරොති අලං පරියත්තං යථාවුත්තං අපරිහාපෙත්වා සම්මදෙව අනුග්ගහාධිප්පායෙන අක්ඛාතාරො. १०४. पाँचवें में 'शीलसम्पन्न' यहाँ शील का अर्थ क्षीणास्त्रवों का लौकिक और लोकोत्तर शील है, उससे सम्पन्न (युक्त) होने के कारण 'शीलसम्पन्न' हैं। समाधि और प्रज्ञा में भी यही विधि है। विमुक्ति तो फल-विमुक्ति ही है, विमुक्ति-ज्ञानदर्शन प्रत्यवेक्षण-ज्ञान है। इस प्रकार यहाँ शील आदि तीन लौकिक और लोकोत्तर हैं, विमुक्ति केवल लोकोत्तर है, विमुक्ति-ज्ञानदर्शन केवल लौकिक ही है। दृष्टधार्मिक, साम्परायिक और परमार्थ के अनुसार जो दूसरों को उपदेश और अनुशासन देते हैं, वे 'ओवादक' (उपदेशक) हैं। 'विज्ञापक' वे हैं जो कर्म और कर्मफल का बोध कराते हैं, और वहाँ 'ये धर्म कुशल हैं, ये धर्म अकुशल हैं; ये धर्म सावद्य हैं, ये धर्म अनवद्य हैं' आदि के द्वारा कुशल आदि के विभाग से, स्कन्ध आदि के विभाग से, स्वलक्षण से और सामान्य लक्षण से विविध विधियों से धर्मों को जनाने वाले और बोध कराने वाले हैं। 'सन्दस्सक' (सन्दर्शक) वे हैं जो उन धर्मों को मानो हाथ से पकड़कर दूसरों को प्रत्यक्ष दिखाने वाले हैं। 'समादपक' वे हैं जिन्होंने शील आदि को ग्रहण नहीं किया है, उन्हें ग्रहण कराने वाले और उनमें प्रतिष्ठित करने वाले हैं। 'समुत्तेजक' वे हैं जो इस प्रकार कुशल धर्मों में प्रतिष्ठित लोगों को ऊपर अधिचित्त के अनुयोग में नियोजित करने के द्वारा चित्त को सम्यक् रूप से उत्साहित करने वाले हैं, जिससे विशेष उपलब्धि हो, इस प्रकार ध्यान देने के द्वारा प्रदीप्त करने वाले हैं। 'सम्पहंसक' वे हैं जो उनके यथा-प्राप्त और भविष्य में प्राप्त होने वाले गुण-विशेषों से चित्त को सम्यक् रूप से हर्षित करने वाले और प्राप्त आस्वाद के कारण भली-भाँति संतुष्ट करने वाले हैं। 'अलंसमक्खातारो' (समर्थ व्याख्याता) वे हैं जो पर्याप्त रूप से, जैसा कहा गया है उसे बिना घटाए, सम्यक् रूप से अनुग्रह के अभिप्राय से कहने वाले हैं। අථ වා සන්දස්සකාති ධම්මං දෙසෙන්තා පවත්තිනිවත්තියො සභාවසරසලක්ඛණතො සම්මදෙව දස්සෙතාරො. සමාදපකාති චිත්තෙ පතිට්ඨාපනවසෙන තස්සෙව අත්ථස්ස ගාහාපකා. සමුත්තෙජකාති තදත්ථග්ගහණෙ උස්සාහජනනෙන සම්මදෙව වොදපකා ජොතකා වා. සම්පහංසකාති තදත්ථපටිපත්තියං ආනිසංසදස්සනෙන සම්මදෙව පහංසකා තොසකා. අලංසමක්ඛාතාරොති සමත්ථා හුත්වා වුත්තනයෙන සමක්ඛාතාරො. සද්ධම්මස්සාති පටිවෙධසද්ධම්මස්ස, තිවිධස්සාපි වා සද්ධම්මස්ස දෙසෙතාරො. अथवा 'सन्दस्सक' वे हैं जो धर्म का उपदेश देते हुए प्रवृत्ति और निवृत्ति को स्वभाव, रस और लक्षण के द्वारा सम्यक् रूप से दिखाने वाले हैं। 'समादपक' वे हैं जो चित्त में प्रतिष्ठित करने के द्वारा उसी अर्थ को ग्रहण कराने वाले हैं। 'समुत्तेजक' वे हैं जो उस अर्थ के ग्रहण में उत्साह उत्पन्न करके सम्यक् रूप से निर्मल करने वाले या प्रकाशित करने वाले हैं। 'सम्पहंसक' वे हैं जो उस अर्थ के अभ्यास में लाभ दिखाने के द्वारा सम्यक् रूप से हर्षित और संतुष्ट करने वाले हैं। 'अलंसमक्खातारो' वे हैं जो समर्थ होकर उक्त विधि से व्याख्या करने वाले हैं। 'सद्धम्मस्स' का अर्थ प्रतिवेध-सद्धर्म का, अथवा तीनों प्रकार के सद्धर्म का उपदेश देने वाले हैं। දස්සනම්පහන්ති දස්සනම්පි අහං. තං පනෙතං චක්ඛුදස්සනං ඤාණදස්සනන්ති දුවිධං. තත්ථ පසන්නෙහි චක්ඛූහි අරියානං ඔලොකනං චක්ඛුදස්සනං නාම. අරියභාවකරානං පන ධම්මානං අරියභාවස්ස ච විපස්සනාමග්ගඵලෙහි අධිගමො ඤාණදස්සනං නාම. ඉමස්මිං පනත්ථෙ චක්ඛුදස්සනං අධිප්පෙතං. අරියානඤ්හි පසන්නෙහි චක්ඛූහි ඔලොකනම්පි සත්තානං බහූපකාරමෙව. සවනන්ති ‘‘අසුකො නාම ඛීණාසවො අසුකස්මිං නාම රට්ඨෙ වා ජනපදෙ වා ගාමෙ වා නිගමෙ වා විහාරෙ වා ලෙණෙ වා වසතී’’ති කථෙන්තානං සොතෙන සවනං, එතම්පි බහූපකාරමෙව. උපසඞ්කමනන්ති ‘‘දානං වා දස්සාමි, පඤ්හං වා පුච්ඡිස්සාමි, ධම්මං වා සොස්සාමි, සක්කාරං වා කරිස්සාමී’’ති එවරූපෙන චිත්තෙන අරියානං උපසඞ්කමනං. පයිරුපාසනන්ති පඤ්හපයිරුපාසනං, අරියානං ගුණෙ සුත්වා තෙ උපසඞ්කමිත්වා නිමන්තෙත්වා දානං [Pg.315] වා දත්වා වත්තං වා කත්වා ‘‘කිං, භන්තෙ, කුසල’’න්තිආදිනා නයෙන පඤ්හපුච්ඡනන්ති අත්ථො. වෙය්යාවච්චාදිකරණං පයිරුපාසනංයෙව. අනුස්සරණන්ති රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානෙසු නිසින්නස්ස ‘‘ඉදානි අරියා ගුම්බලෙණමණ්ඩපාදීසු ඣානවිපස්සනාමග්ගඵලසුඛෙහි වීතිනාමෙන්තී’’ති තෙසං දිබ්බවිහාරාදිගුණවිසෙසාරම්මණං අනුස්සරණං. යො වා තෙසං සන්තිකා ඔවාදො ලද්ධො හොති, තං ආවජ්ජිත්වා ‘‘ඉමස්මිං ඨානෙ සීලං කථිතං, ඉමස්මිං සමාධි, ඉමස්මිං විපස්සනා, ඉමස්මිං මග්ගො, ඉමස්මිං ඵල’’න්ති එවං අනුස්සරණං. 'दस्सनम्पहं' का अर्थ है 'दर्शन को भी मैं'। वह यह दर्शन दो प्रकार का है—चक्षु-दर्शन और ज्ञान-दर्शन। वहाँ प्रसन्न नेत्रों से आर्यों का अवलोकन करना 'चक्षु-दर्शन' कहलाता है। आर्य-भाव उत्पन्न करने वाले धर्मों और आर्य-भाव की विपश्यना, मार्ग और फल के द्वारा प्राप्ति 'ज्ञान-दर्शन' कहलाती है। परन्तु इस अर्थ में 'चक्षु-दर्शन' अभिप्रेत है। क्योंकि आर्यों का प्रसन्न नेत्रों से अवलोकन करना भी प्राणियों के लिए बहुत उपकारी है। 'सवनं' (श्रवण) का अर्थ है—'अमुक नाम का क्षीणास्त्रव अमुक राष्ट्र, जनपद, गाँव, निगम, विहार या गुफा में रहता है'—ऐसा कहने वालों को कानों से सुनना; यह भी बहुत उपकारी है। 'उपसंक्रमण' का अर्थ है—'दान दूँगा, या प्रश्न पूछूँगा, या धर्म सुनूँगा, या सत्कार करूँगा'—इस प्रकार के चित्त से आर्यों के पास जाना। 'पयिरुपासनं' (पर्युपासना) का अर्थ है प्रश्नों की पर्युपासना; आर्यों के गुणों को सुनकर, उनके पास जाकर, उन्हें निमंत्रित कर, दान देकर या सेवा करके 'भन्ते! कुशल क्या है?' आदि विधि से प्रश्न पूछना। वैयावृत्य आदि करना पर्युपासना ही है। 'अनुस्मरण' का अर्थ है रात्रि और दिन के निवास-स्थानों में बैठे हुए व्यक्ति का यह सोचना कि 'अब आर्य झाड़ियों, गुफाओं, मण्डपों आदि में ध्यान, विपश्यना, मार्ग और फल के सुखों में समय बिता रहे हैं'—इस प्रकार उनके दिव्य-विहार आदि गुण-विशेषों को आलम्बन बनाकर याद करना। अथवा उनके पास से जो उपदेश प्राप्त हुआ है, उसका चिन्तन करते हुए 'इस स्थान पर शील कहा गया है, यहाँ समाधि, यहाँ विपश्यना, यहाँ मार्ग, यहाँ फल'—इस प्रकार अनुस्मरण करना। අනුපබ්බජ්ජන්ති අරියෙසු චිත්තං පසාදෙත්වා ඝරා නික්ඛම්ම තෙසං සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං. අරියෙසු හි චිත්තං පසාදෙත්වා තෙසංයෙව සන්තිකෙ පබ්බජිත්වා තෙසංයෙව ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතොපි පබ්බජ්ජා අනුපබ්බජ්ජා නාම, අඤ්ඤෙසං සන්තිකෙ ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතොපි පබ්බජ්ජා අනුපබ්බජ්ජා නාම, අරියෙසු පසාදෙන අඤ්ඤත්ථ පබ්බජිත්වා අරියානං සන්තිකෙ ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතොපි පබ්බජ්ජා අනුපබ්බජ්ජාව. අඤ්ඤෙසු පන පසාදෙන අඤ්ඤෙසංයෙව සන්තිකෙ පබ්බජිත්වා අඤ්ඤෙසංයෙව ඔවාදානුසාසනිං පච්චාසීසමානස්ස චරතො පබ්බජ්ජා අනුපබ්බජ්ජා නාම න හොති. වුත්තනයෙන පබ්බජිතෙසු පන මහාකස්සපත්ථෙරස්ස තාව අනුපබ්බජ්ජං පබ්බජිතා සතසහස්සමත්තා අහෙසුං, තථා ථෙරස්සෙව සද්ධිවිහාරිකස්ස චන්දගුත්තත්ථෙරස්ස, තස්සාපි සද්ධිවිහාරිකස්ස සූරියගුත්තත්ථෙරස්ස, තස්සාපි සද්ධිවිහාරිකස්ස අස්සගුත්තත්ථෙරස්ස, තස්සාපි සද්ධිවිහාරිකස්ස යොනකධම්මරක්ඛිතත්ථෙරස්ස. තස්ස පන සද්ධිවිහාරිකො අසොකරඤ්ඤො කනිට්ඨභාතා තිස්සත්ථෙරො නාම අහොසි. තස්ස අනුපබ්බජ්ජං පබ්බජිතා අඩ්ඪතෙය්යකොටිසඞ්ඛා අහෙසුං. දීපප්පසාදකමහාමහින්දත්ථෙරස්ස පන අනුපබ්බජිතානං ගණනපරිච්ඡෙදො නත්ථි. යාවජ්ජදිවසා ලඞ්කාදීපෙ සත්ථරි පසාදෙන පබ්බජන්තා මහාමහින්දත්ථෙරස්සෙව අනුපබ්බජ්ජන්ති නාම. 'अनुपब्बज्जन्ति' का अर्थ है आर्यों में चित्त को प्रसन्न कर, घर से निकलकर उनके समीप प्रव्रज्या लेना। आर्यों में चित्त प्रसन्न कर उनके ही समीप प्रव्रजित होकर उनके ही ओवाद-अनुशासनी की प्रतीक्षा करते हुए विचरण करने वाले की प्रव्रज्या 'अनुपब्बज्जा' कहलाती है; दूसरों के समीप ओवाद-अनुशासनी की प्रतीक्षा करते हुए विचरण करने वाले की प्रव्रज्या भी 'अनुपब्बज्जा' कहलाती है; आर्यों में प्रसन्नता के कारण अन्यत्र प्रव्रजित होकर आर्यों के समीप ओवाद-अनुशासनी की प्रतीक्षा करते हुए विचरण करने वाले की प्रव्रज्या भी 'अनुपब्बज्जा' ही है। किन्तु दूसरों में प्रसन्नता के कारण दूसरों के ही समीप प्रव्रजित होकर दूसरों के ही ओवाद-अनुशासनी की प्रतीक्षा करते हुए विचरण करने वाले की प्रव्रज्या 'अनुपब्बज्जा' नहीं कहलाती। उक्त विधि से प्रव्रजितों में, महाकस्सप थेर के पीछे प्रव्रजित होने वाले (अनुप्रव्रजित) लगभग एक लाख थे; वैसे ही थेर के सार्धविहारक चन्दगुत्त थेर के, उनके सार्धविहारक सूरियगुत्त थेर के, उनके सार्धविहारक अस्सगुत्त थेर के, उनके सार्धविहारक योनकधम्मरक्खित थेर के। उनके सार्धविहारक राजा अशोक के छोटे भाई तिस्स थेर थे। उनके पीछे प्रव्रजित होने वाले (अनुप्रव्रजित) ढाई करोड़ की संख्या में थे। द्वीप को प्रसन्न करने वाले महामहिन्द थेर के अनुप्रव्रजितों की गणना की कोई सीमा नहीं है। आज के दिन तक लंका द्वीप में शास्ता में प्रसन्न होकर प्रव्रजित होने वाले महामहिन्द थेर के ही अनुप्रव्रजित कहलाते हैं। ඉදානි යෙන කාරණෙන තෙසං අරියානං දස්සනාදි බහූපකාරන්ති වුත්තං, තං දස්සෙතුං ‘‘තථාරූපෙ’’තිආදිමාහ. තත්ථ තථාරූපෙති තාදිසෙ සීලාදිගුණසම්පන්නෙ අරියෙ. යස්මා දස්සනසවනානුස්සරණානි උපසඞ්කමනපයිරුපාසනට්ඨානානි, තස්මා තානි අනාමසිත්වා උපසඞ්කමනපයිරුපාසනානියෙව දස්සෙතුං ‘‘සෙවතො භජතො පයිරුපාසතො’’ති වුත්තං[Pg.316]. දස්සනසවනානුස්සරණතො හි අරියෙසු උප්පන්නසද්ධො තෙ උපසඞ්කමිත්වා පයිරුපාසිත්වා පඤ්හං පුච්ඡිත්වා ලද්ධසවනානුත්තරියො අපරිපූරෙ සීලාදිගුණෙ පරිපූරෙස්සතීති. තථා හි වුත්තං ‘‘සද්ධාජාතො උපසඞ්කමති, උපසඞ්කමන්තො පයිරුපාසතී’’තිආදි (ම. නි. 2.183). अब जिस कारण से उन आर्यों का दर्शन आदि बहुत उपकारक कहा गया है, उसे दिखाने के लिए 'तथारूपे' आदि कहा। वहाँ 'तथारूपे' का अर्थ है वैसे शील आदि गुणों से सम्पन्न आर्यों में। चूँकि दर्शन, श्रवण और अनुस्मरण, उपसंक्रमण (पास जाना) और पर्युपासना (सेवा) के स्थान हैं, इसलिए उन्हें अलग से न कहकर उपसंक्रमण और पर्युपासना को ही दिखाने के लिए 'सेवतो भजतो पयिरुपासतो' (सेवन करने वाले, भजन करने वाले, उपासना करने वाले) कहा गया है। क्योंकि दर्शन, श्रवण और अनुस्मरण से आर्यों में उत्पन्न श्रद्धा वाला व्यक्ति उनके पास जाकर, उनकी सेवा कर, प्रश्न पूछकर और श्रवण की उत्तमता प्राप्त कर, अपूर्ण शील आदि गुणों को पूर्ण करेगा। जैसा कि कहा गया है— 'श्रद्धा उत्पन्न होने पर पास जाता है, पास जाकर सेवा करता है' आदि (म. नि. 2.183)। තත්ථ සෙවතොති වත්තපටිවත්තකරණවසෙන කාලෙන කාලං උපසඞ්කමතො. භජතොති සම්පියායනභත්තිවසෙන භජතො. පයිරුපාසතොති පඤ්හපුච්ඡනෙන පටිපත්තිඅනුකරණෙන ච පයිරුපාසතොති තිණ්ණං පදානං අත්ථවිභාගො දීපෙතබ්බො. විමුත්තිඤාණදස්සනස්ස පාරිපූරි එකූනවීසතිමස්ස පච්චවෙක්ඛණඤාණස්ස උප්පත්තියා වෙදිතබ්බා. वहाँ 'सेवतो' का अर्थ है— कर्तव्य और प्रति-कर्तव्य (वत्त-पटिवत्त) करने के माध्यम से समय-समय पर पास जाने वाले का। 'भजतो' का अर्थ है— प्रेम और भक्ति के वश होकर भजन करने वाले का। 'पयिरुपासतो' का अर्थ है— प्रश्न पूछने और प्रतिपत्ति (आचरण) का अनुकरण करने के द्वारा उपासना करने वाले का— इस प्रकार इन तीन पदों का अर्थ-विभाजन समझना चाहिए। विमुक्ति-ज्ञान-दर्शन की परिपूर्णता उन्नीसवें प्रत्यवेक्षण ज्ञान की उत्पत्ति से जाननी चाहिए। එවරූපා ච තෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූතිආදීසු යෙ යථාවුත්තගුණසමන්නාගමෙන එවරූපා එදිසා භින්නසබ්බකිලෙසා භික්ඛූ, තෙ දිට්ඨධම්මිකාදිහිතෙසු සත්තානං නියොජනවසෙන අනුසාසනතො සත්ථාරොතිපි වුච්චන්ති. ජාතිකන්තාරාදිනිත්ථරණතො සත්ථවාහාතිපි, රාගාදිරණානං ජහනතො ජහාපනතො ච රණඤ්ජහාතිපි, අවිජ්ජාතමස්ස විනොදනතො විනොදාපනතො ච තමොනුදාතිපි, සපරසන්තානෙසු පඤ්ඤාආලොකපඤ්ඤාඔභාසපඤ්ඤාපජ්ජොතානං කරණෙන නිබ්බත්තනෙන ආලොකාදිකරාතිපි, තථා ඤාණුක්කාඤාණප්පභාධම්මුක්කාධම්මප්පභානං ධාරණෙන කරණෙන ච උක්කාධාරාතිපි, පභඞ්කරාතිපි, ආරකත්තා කිලෙසෙහි, අනයෙ න ඉරියනතො, අයෙ ච ඉරියනතො පරෙසං තථාභාවහෙතුභාවතො, සදෙවකෙන ලොකෙන අරණීයතො අරියාතිපි, පඤ්ඤාචක්ඛුධම්මචක්ඛූනං සාතිසයපටිලාභෙන චක්ඛුමන්තොතිපි වුච්චන්ති. 'एवरूपा च ते, भिक्खवे, भिक्खू' आदि में, जो यथोक्त गुणों से युक्त होने के कारण इस रूप वाले, ऐसे समस्त क्लेशों को नष्ट करने वाले भिक्षु हैं, वे दृष्टधर्म (इसी जन्म) आदि के हित में प्राणियों को नियुक्त करने के कारण उपदेश देने से 'शास्ता' (गुरु) भी कहे जाते हैं। जन्म रूपी कान्तार (जंगल) आदि से पार उतारने के कारण 'सार्थवाह' भी, राग आदि 'रण' (दोषों) को त्यागने और त्यागवाने के कारण 'रणञ्जह' भी, अविद्या रूपी अन्धकार को दूर करने और दूर करवाने के कारण 'तमोमुद' (अन्धकार नाशक) भी, अपने और दूसरों के सन्तान (चित्त-परम्परा) में प्रज्ञा-आलोक, प्रज्ञा-ओभास और प्रज्ञा-प्रद्योत उत्पन्न करने के कारण 'आलोककर' भी, वैसे ही ज्ञान-उल्का, ज्ञान-प्रभा, धर्म-उल्का और धर्म-प्रभा को धारण करने और करने के कारण 'उल्काधारी' भी, 'प्रभाकर' भी, क्लेशों से दूर होने के कारण, अनय (अकल्याण) में प्रवृत्त न होने के कारण, और अय (कल्याण) में प्रवृत्त होने के कारण तथा दूसरों के लिए वैसा होने में हेतु होने के कारण, और देवों सहित लोक द्वारा पूजनीय होने के कारण 'आर्य' भी, प्रज्ञा-चक्षु और धर्म-चक्षु की अतिशय प्राप्ति के कारण 'चक्षुमान' भी कहे जाते हैं। ගාථාසු පාමොජ්ජකරණං ඨානන්ති නිරාමිසස්ස පමොදස්ස නිබ්බත්තකං ඨානං කාරණං. එතන්ති ඉදානි වත්තබ්බනිදස්සනං සන්ධාය වදති. විජානතන්ති සංකිලෙසවොදානෙ යාථාවතො ජානන්තානං. භාවිතත්තානන්ති භාවිතසභාවානං, කායභාවනාදීහි භාවිතසන්තානානන්ති අත්ථො. ධම්මජීවිනන්ති මිච්ඡාජීවං පහාය ධම්මෙන ඤායෙන ජීවිකකප්පනතො, ධම්මෙන වා ඤායෙන අත්තභාවස්ස පවත්තනතො, සමාපත්තිබහුලතාය වා අග්ගඵලධම්මෙන ජීවනතො ධම්මජීවිනං. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – යදිදං භාවිතත්තානං පරිනිට්ඨිතසමාධිපඤ්ඤාභාවනානං තතො එව ධම්මජීවිනං අරියානං දස්සනං[Pg.317]. එතං අවිප්පටිසාරනිමිත්තානං සීලාදීනං පාරිපූරිහෙතුභාවතො විජානතං සප්පඤ්ඤජාතිකානං එකන්තෙනෙව පීතිපාමොජ්ජකාරණන්ති. गाथाओं में 'पामोज्जकरणं ठानं' का अर्थ है— निरामिष (आध्यात्मिक) प्रमोद को उत्पन्न करने वाला स्थान या कारण। 'एतं' यह अब कहे जाने वाले उदाहरण के सन्दर्भ में कहा गया है। 'विजानतं' का अर्थ है— संक्लेश और व्यवदान (शुद्धि) को यथार्थ रूप से जानने वालों का। 'भावितत्तानं' का अर्थ है— भावित स्वभाव वालों का, अर्थात् काय-भावना आदि के द्वारा जिनके सन्तान (चित्त) भावित हैं। 'धम्मजीविनं' का अर्थ है— मिथ्या आजीविका को त्याग कर धर्म और न्याय से जीविका चलाने के कारण, अथवा धर्म और न्याय से आत्म-भाव (जीवन) के प्रवर्तन के कारण, अथवा समापत्ति की बहुलता के कारण अग्रफल रूपी धर्म से जीवित रहने के कारण 'धम्मजीवी'। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है— जो यह भावित-आत्माओं का, जिनकी समाधि और प्रज्ञा की भावना पूर्ण हो चुकी है, और इसीलिए जो धर्मजीवी हैं, उन आर्यों का दर्शन है। यह विप्रतिसार-रहित (पश्चाताप-रहित) शील आदि की परिपूर्णता का हेतु होने के कारण, जानने वाले प्रज्ञावानों के लिए एकान्त रूप से प्रीति और प्रमोद का कारण है। ඉදානි තං තස්ස කාරණභාවං දස්සෙතුං ‘‘තෙ ජොතයන්තී’’ති ඔසානගාථාද්වයමාහ. තත්ථ තෙති තෙ භාවිතත්තා ධම්මජීවිනො අරියා. ජොතයන්තීති පකාසයන්ති. භාසයන්තීති සද්ධම්මොභාසෙන ලොකං පභාසයන්ති, ධම්මං දෙසෙන්තීති අත්ථො. යෙසන්ති යෙසං අරියානං. සාසනන්ති ඔවාදං. සම්මදඤ්ඤායාති පුබ්බභාගඤාණෙහි සම්මදෙව ජානිත්වා. සෙසං වුත්තනයමෙව. अब उनके उस कारण-भाव को दिखाने के लिए 'ते जोतयन्ति' आदि अन्तिम दो गाथाएँ कहीं। वहाँ 'ते' का अर्थ है— वे भावित-आत्मा धर्मजीवी आर्य। 'जोतयन्ति' का अर्थ है— प्रकाशित करते हैं। 'भासयन्ति' का अर्थ है— सद्धर्म के प्रकाश से लोक को प्रकाशित करते हैं, अर्थात् धर्म का उपदेश देते हैं। 'येसं' का अर्थ है— जिन आर्यों के। 'सासनं' का अर्थ है— उपदेश को। 'सम्मदाञ्ञाय' का अर्थ है— पूर्वभाग के ज्ञानों से सम्यक् प्रकार से जानकर। शेष अर्थ पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही है। පඤ්චමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. पाँचवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 6. තණ්හුප්පාදසුත්තවණ්ණනා ६. तण्होप्पाद (तृष्णोत्पाद) सूत्र की व्याख्या। 105. ඡට්ඨෙ තණ්හුප්පාදාති එත්ථ උප්පජ්ජති එතෙසූති උප්පාදා. කා උප්පජ්ජති? තණ්හා. තණ්හාය උප්පාදා තණ්හුප්පාදා, තණ්හාවත්ථූනි තණ්හාකාරණානීති අත්ථො. යත්ථාති යෙසු නිමිත්තභූතෙසු. උප්පජ්ජමානාති උප්පජ්ජනසීලා. චීවරහෙතූති ‘‘කත්ථ මනාපං චීවරං ලභිස්සාමී’’ති චීවරකාරණා උප්පජ්ජති. සෙසපදෙසුපි එසෙව නයො. ඉතිභවාභවහෙතූති එත්ථ පන ඉතීති නිදස්සනත්ථෙ නිපාතො. යථා චීවරාදිහෙතු, එවං භවාභවහෙතුපීති අත්ථො. භවාභවාති චෙත්ථ පණීතප්පණීතානි සප්පිනවනීතාදීනි අධිප්පෙතානි භවති ආරොග්යං එතෙනාති කත්වා. ‘‘සම්පත්තිභවෙසු පණීතප්පණීතතරො භවාභවො’’තිපි වදන්ති. භවොති වා සම්පත්ති, අභවොති විපත්ති. භවොති වුඩ්ඪි, අභවොති හානි. තං නිමිත්තඤ්ච තණ්හා උප්පජ්ජතීති වුත්තං ‘‘භවාභවහෙතු වා’’ති. १०५. छठे (सूत्र) में 'तण्हूप्पादा' (तृष्णा की उत्पत्ति) के विषय में - जिनमें ये उत्पन्न होती हैं, वे 'उत्पाद' हैं। क्या उत्पन्न होती है? तृष्णा। तृष्णा की उत्पत्ति 'तण्हूप्पादा' है, इसका अर्थ है तृष्णा की वस्तुएँ या तृष्णा के कारण। 'यत्थ' (जहाँ) का अर्थ है जिन निमित्त-भूतों में। 'उप्पज्जमाना' का अर्थ है उत्पन्न होने के स्वभाव वाली। 'चीवरहेतु' का अर्थ है "कहाँ मुझे मनभावन चीवर मिलेगा" - इस प्रकार चीवर के कारण उत्पन्न होती है। शेष पदों में भी यही न्याय (विधि) है। 'इतिभवाभवहेतु' में 'इति' शब्द निदर्शन (उदाहरण) के अर्थ में निपात है। जैसे चीवर आदि के कारण, वैसे ही भवाभव के कारण भी - यह अर्थ है। यहाँ 'भवाभव' से उत्तम और अति-उत्तम घी, मक्खन आदि अभिप्रेत हैं, क्योंकि इनसे आरोग्य (स्वास्थ्य) होता है। "सम्पत्ति-भवों में जो अधिक उत्तम और अति-उत्तम है, वह भवाभव है" - ऐसा भी कहते हैं। अथवा 'भव' का अर्थ सम्पत्ति है और 'अभव' का अर्थ विपत्ति है। 'भव' का अर्थ वृद्धि है और 'अभव' का अर्थ हानि है। उस निमित्त से तृष्णा उत्पन्न होती है, इसलिए 'भवाभवहेतु वा' कहा गया है। ගාථා හෙට්ඨා වුත්තත්ථා එව. අපිච තණ්හාදුතියොති තණ්හාසහායො. අයඤ්හි සත්තො අනමතග්ගෙ සංසාරවට්ටෙ සංසරන්තො න එකකොව සංසරති, තණ්හං පන දුතියිකං සහායිකං ලභිත්වාව සංසරති. තථා හි තං පපාතපාතං අචින්තෙත්වා මධුගණ්හනකලුද්දකං විය අනෙකාදීනවාකුලෙසුපි භවෙසු ආනිසංසමෙව දස්සෙන්තී අනත්ථජාලෙ සා පරිබ්භමාපෙති. එතමාදීනවං ඤත්වාති එතං අතීතානාගතපච්චුප්පන්නෙසු ඛන්ධෙසු [Pg.318] ඉත්ථභාවඤ්ඤථාභාවසඤ්ඤිතං ආදීනවං ජානිත්වා. තණ්හං දුක්ඛස්ස සම්භවන්ති ‘‘තණ්හා චායං වට්ටදුක්ඛස්ස සම්භවො පභවො කාරණ’’න්ති ජානිත්වා. එත්තාවතා ච එකස්ස භික්ඛුනො විපස්සනං වඩ්ඪෙත්වා අරහත්තුප්පත්ති දස්සිතා. ඉදානි තං ඛීණාසවං ථොමෙන්තො ‘‘වීතතණ්හො’’තිආදිමාහ. යං පනෙත්ථ අවුත්තං, තං හෙට්ඨා වුත්තනයමෙව. गाथाओं का अर्थ पहले बताया जा चुका है। इसके अतिरिक्त, 'तण्हादुतियो' का अर्थ है तृष्णा जिसका साथी है। यह प्राणी अनादि संसार-चक्र में संसरण करता हुआ अकेला संसरण नहीं करता, बल्कि तृष्णा को अपनी दूसरी संगिनी या सहायिका बनाकर ही संसरण करता है। क्योंकि वह (तृष्णा) प्रपात (गड्ढे) में गिरने की चिंता न करने वाले शहद इकट्ठा करने वाले शिकारी की तरह, अनेक दोषों से भरे हुए भवों में भी केवल लाभ (आस्वाद) को ही दिखाती हुई, उसे अनर्थ के जाल में भटकाती रहती है। 'एतम आदीनवं ञत्वा' (इस दोष को जानकर) का अर्थ है - अतीत, अनागत और वर्तमान स्कन्धों में इस 'इत्थभाव' (इस प्रकार का होना) और 'अञ्ञथाभाव' (अन्य प्रकार का होना) नामक दोष को जानकर। 'तण्हं दुक्खस्स सम्भवं' (तृष्णा दुःख की उत्पत्ति है) का अर्थ है - "यह तृष्णा ही संसार-दुःख की उत्पत्ति, उद्भव और कारण है" - ऐसा जानकर। यहाँ तक एक भिक्षु की विपश्यना बढ़ाकर अर्हत्व की प्राप्ति दिखाई गई है। अब उस क्षीणास्त्रव (अर्हन्त) की प्रशंसा करते हुए 'वीततण्हो' (तृष्णा रहित) आदि कहा गया है। जो यहाँ नहीं कहा गया है, वह पहले बताए गए तरीके से ही समझना चाहिए। ඡට්ඨසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. छठे सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 7. සබ්රහ්මකසුත්තවණ්ණනා ७. सब्रह्मक सूत्र की व्याख्या। 106. සත්තමෙ සබ්රහ්මකානීති සසෙට්ඨකානි. යෙසන්ති යෙසං කුලානං. පුත්තානන්ති පුත්තෙහි පූජිතසද්දයොගෙන හි ඉදං කරණත්ථෙ සාමිවචනං. අජ්ඣාගාරෙති සකෙ ඝරෙ. පූජිතා හොන්තීති යං ඝරෙ අත්ථි, තෙන පටිජග්ගිතා මනාපෙන චෙව කායිකවාචසිකෙන ච පච්චුපට්ඨිතා හොන්ති. ඉති මාතාපිතුපූජකානි කුලානි ‘‘සබ්රහ්මකානී’’ති පසංසිත්වා උපරිපි නෙසං පසංසනීයතං දස්සෙන්තො ‘‘සපුබ්බදෙවතානී’’තිආදිමාහ. १०६. सातवें (सूत्र) में 'सब्रह्मकानि' का अर्थ है श्रेष्ठता सहित। 'येसं' का अर्थ है जिन कुलों के। 'पुत्तानं' यहाँ 'पुत्रों द्वारा' पूजित शब्द के योग के कारण यह षष्ठी विभक्ति करण अर्थ में है। 'अज्झागारे' का अर्थ है अपने घर में। 'पूजिता होन्ति' का अर्थ है जो घर में है, उससे सेवा की जाती है और प्रिय कायिक तथा वाचिक (सेवा) द्वारा उपस्थित (सेवा की गई) होते हैं। इस प्रकार माता-पिता की पूजा करने वाले कुलों की 'सब्रह्मकानि' कहकर प्रशंसा करके, आगे भी उनकी प्रशंसनीयता दिखाते हुए 'सपुब्बदेवतानि' आदि कहा गया है। තත්ථ බ්රහ්මාතිආදීනි තෙසං බ්රහ්මාදිභාවසාධනත්ථං වුත්තානි. තත්රායමත්ථවිභාවනා – බ්රහ්මාති සෙට්ඨාධිවචනං. යථා හි බ්රහ්මුනො චතස්සො භාවනා අවිජහිතා හොන්ති මෙත්තා, කරුණා, මුදිතා, උපෙක්ඛාති, එවං මාතාපිතූනං පුත්තෙසු චතස්සො භාවනා අවිජහිතා හොන්ති. තා තස්මිං තස්මිං කාලෙ වෙදිතබ්බා – කුච්ඡිගතස්මිඤ්හි දාරකෙ ‘‘කදා න ඛො පුත්තකං අරොගං පරිපුණ්ණඞ්ගපච්චඞ්ගං පස්සිස්සාමා’’ති මාතාපිතූනං මෙත්තචිත්තං උප්පජ්ජති. යදා පනෙස මන්දො උත්තානසෙය්යකො ඌකාහි වා මඞ්කුලෙහි වා දට්ඨො දුක්ඛසෙය්යාය වා පීළිතො පරොදති විරවති, තදාස්ස සද්දං සුත්වා මාතාපිතූනං කාරුඤ්ඤං උප්පජ්ජති. ආධාවිත්වා විධාවිත්වා කීළනකාලෙ පන ලොභනීයවයස්මිං වා ඨිතකාලෙ දාරකං ඔලොකෙත්වා මාතාපිතූනං චිත්තං සප්පිමණ්ඩෙ පක්ඛිත්තසතවිහතකප්පාසපිචුපටලං විය මුදුකං ආමොදිතං පමොදිතං, තදා නෙසං මුදිතා ලබ්භති. යදා පන තෙසං පුත්තො දාරභරණං පච්චුපට්ඨපෙත්වා පාටියෙක්කං අගාරං අජ්ඣාවසති, තදා මාතාපිතූනං ‘‘සක්කොති දානි නො පුත්තකො අත්තනො ධම්මතාය ජීවිතු’’න්ති මජ්ඣත්තභාවො [Pg.319] උප්පජ්ජති. එවං තස්මිං කාලෙ උපෙක්ඛා ලබ්භති. එවං මාතාපිතූනං පුත්තෙසු යථාකාලං චතුබ්බිධස්සපි බ්රහ්මවිහාරස්ස ලබ්භනතො බ්රහ්මසදිසවුත්තිතාය වුත්තං ‘‘බ්රහ්මාති, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං එතං අධිවචන’’න්ති. वहाँ 'ब्रह्मा' आदि शब्द उनके ब्रह्मा आदि होने की सिद्धि के लिए कहे गए हैं। वहाँ यह अर्थ-विस्तार है - 'ब्रह्मा' श्रेष्ठ का पर्यायवाची है। जैसे ब्रह्मा की चार भावनाएँ - मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा - कभी नहीं छूटतीं, वैसे ही माता-पिता की अपने पुत्रों के प्रति ये चार भावनाएँ कभी नहीं छूटतीं। उन्हें उस-उस समय में जानना चाहिए - जब बालक कोख में होता है, तब "कब मैं अपने पुत्र को निरोग और पूर्ण अंगों-प्रत्यंगों वाला देखूँगा" - ऐसा माता-पिता के मन में मैत्री-चित्त उत्पन्न होता है। जब वह छोटा बालक पीठ के बल लेटा हुआ, जुओं या खटमलों द्वारा काटे जाने पर या कष्टदायक शय्या से पीड़ित होकर रोता या चिल्लाता है, तब उसकी आवाज़ सुनकर माता-पिता के मन में करुणा उत्पन्न होती है। इधर-उधर दौड़ते-भागते हुए खेलने के समय या लुभावनी आयु में स्थित बालक को देखकर माता-पिता का चित्त घी के मण्ड (ऊपरी भाग) में डाले गए सौ बार धुने हुए कपास के फाहे की तरह कोमल, हर्षित और प्रमुदित हो जाता है, तब उनमें मुदिता प्राप्त होती है। और जब उनका पुत्र पत्नी का भरण-पोषण करने योग्य होकर अलग घर में रहने लगता है, तब माता-पिता के मन में "अब हमारा पुत्र अपनी सामर्थ्य से जीने में सक्षम है" - ऐसा मध्यस्थ भाव (तटस्थता) उत्पन्न होता है। इस प्रकार उस समय उपेक्षा प्राप्त होती है। इस प्रकार माता-पिता में पुत्रों के प्रति यथासमय चारों प्रकार के ब्रह्मविहारों के पाए जाने के कारण, ब्रह्मा के समान आचरण होने से कहा गया है - "भिक्षुओं! 'ब्रह्मा' यह माता-पिता का ही पर्यायवाची है।" පුබ්බදෙවතාති එත්ථ දෙවා නාම තිවිධා – සම්මුතිදෙවා, උපපත්තිදෙවා, විසුද්ධිදෙවාති. තෙසු සම්මුතිදෙවා නාම රාජානො ඛත්තියා. තෙ හි ‘‘දෙවො, දෙවී’’ති ලොකෙ වොහරීයන්ති, දෙවා විය ලොකස්ස නිග්ගහානුග්ගහසමත්ථා ච හොන්ති. උපපත්තිදෙවා නාම චාතුමහාරාජිකතො පට්ඨාය යාව භවග්ගා උප්පන්නා සත්තා. විසුද්ධිදෙවා නාම ඛීණාසවා සබ්බකිලෙසවිසුද්ධිතො. තත්රායං වචනත්ථො – දිබ්බන්ති, කීළන්ති, ලළන්ති, ජොතන්ති පටිපක්ඛං ජයන්ති වාති දෙවා. තෙසු සබ්බසෙට්ඨා විසුද්ධිදෙවා. යථා තෙ බාලජනෙහි කතං අපරාධං අගණෙත්වා එකන්තෙනෙව තෙසං අනත්ථහානිං අත්ථුප්පත්තිඤ්ච ආකඞ්ඛන්තාව යථාවුත්තබ්රහ්මවිහාරයොගෙන අත්ථාය හිතාය සුඛාය පටිපජ්ජන්ති, දක්ඛිණෙය්යතාය ච තෙසං කාරානං මහප්ඵලතං මහානිසංසතඤ්ච ආවහන්ති; එවමෙව මාතාපිතරොපි පුත්තානං අපරාධං අගණෙත්වා එකන්තෙනෙව තෙසං අනත්ථහානිං අත්ථුප්පත්තිඤ්ච ආකඞ්ඛන්තා වුත්තනයෙනෙව චතුබ්බිධස්සපි බ්රහ්මවිහාරස්ස ලබ්භනතො අත්ථාය හිතාය සුඛාය පටිපජ්ජන්තා පරමදක්ඛිණෙය්යා හුත්වා අත්තනි කතානං කාරානං මහප්ඵලතං මහානිසංසතඤ්ච ආවහන්ති. සබ්බදෙවෙහි ච පඨමං තෙසං උපකාරවන්තතාය තෙ ආදිතොයෙව දෙවා. තෙසඤ්හි වසෙන තෙ පඨමං අඤ්ඤෙ දෙවෙ ‘‘දෙවා’’ති ජානන්ති ආරාධෙන්ති පයිරුපාසන්ති, ආරාධනවිධිං ඤත්වා තථා පටිපජ්ජන්තා තස්සා පටිපත්තියා ඵලං අධිගච්ඡන්ති, තස්මා තෙ පච්ඡාදෙවා නාම. තෙන වුත්තං ‘‘පුබ්බදෙවතාති, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං එතං අධිවචන’’න්ති. ‘पूर्वदेवता’ यहाँ देवता तीन प्रकार के होते हैं - सम्मति-देवता, उपपत्ति-देवता और विशुद्धि-देवता। उनमें सम्मति-देवता राजा और क्षत्रिय हैं। वे लोक में 'देव' और 'देवी' के रूप में व्यवहार किए जाते हैं, और देवताओं की तरह लोक का निग्रह और अनुग्रह करने में समर्थ होते हैं। उपपत्ति-देवता चातुर्महाराजिक से लेकर भवाग्र तक उत्पन्न होने वाले प्राणी हैं। विशुद्धि-देवता सभी क्लेशों की शुद्धि के कारण क्षीणास्त्रव (अर्हन्त) हैं। यहाँ यह शब्दार्थ है - जो दिव्य विहार करते हैं, क्रीड़ा करते हैं, विलास करते हैं, प्रकाशित होते हैं या विपक्ष को जीतते हैं, वे 'देव' हैं। उनमें विशुद्धि-देवता सर्वश्रेष्ठ हैं। जैसे वे अज्ञानी जनों द्वारा किए गए अपराध की गणना न करते हुए, एकांत रूप से उनकी अनर्थ-हानि और अर्थ-उत्पत्ति की आकांक्षा करते हुए, यथाोक्त ब्रह्मविहार के योग से अर्थ, हित और सुख के लिए प्रतिपन्न होते हैं, और दक्षिणेय होने के कारण उनके प्रति किए गए कार्यों को महाफल और महानुशंस वाला बनाते हैं; वैसे ही माता-पिता भी पुत्रों के अपराध की गणना न करते हुए, एकांत रूप से उनकी अनर्थ-हानि और अर्थ-उत्पत्ति की आकांक्षा करते हुए, उक्त रीति से चारों प्रकार के ब्रह्मविहारों के प्राप्त होने से अर्थ, हित और सुख के लिए प्रतिपन्न होते हुए परम दक्षिणेय होकर अपने प्रति किए गए कार्यों को महाफल और महानुशंस वाला बनाते हैं। सभी देवताओं से पहले उनके उपकारी होने के कारण वे आदि से ही देवता हैं। उन्हीं के कारण वे (पुत्र) पहले अन्य देवताओं को 'देव' के रूप में जानते हैं, उनकी आराधना और उपासना करते हैं, आराधना की विधि जानकर वैसा आचरण करते हुए उस प्रतिपत्ति का फल प्राप्त करते हैं, इसलिए वे (अन्य देव) 'पश्चात्-देवता' कहलाते हैं। इसीलिए कहा गया है - 'भिक्षुओं! पूर्वदेवता माता-पिता का ही यह पर्याय है'। පුබ්බාචරියාති පඨමආචරියා. මාතාපිතරො හි පුත්තෙ සික්ඛාපෙන්තා අතිතරුණකාලතො පට්ඨාය ‘‘එවං නිසීද, එවං ගච්ඡ, එවං තිට්ඨ, එවං සය, එවං ඛාද, එවං භුඤ්ජ, අයං තෙ ‘තාතා’ති වත්තබ්බො, අයං ‘භාතිකා’ති, අයං ‘භගිනී’ති, ඉදං නාම කාතුං වට්ටති, ඉදං න වට්ටති, අසුකං නාම උපසඞ්කමිතුං වට්ටති, අසුකං නාම න වට්ටතී’’ති ගාහෙන්ති සික්ඛාපෙන්ති. අපරභාගෙ අඤ්ඤෙ ආචරියාපි සිප්පං මුද්දං ගණනන්ති එවමාදිං සික්ඛාපෙන්ති, අඤ්ඤෙ සරණානි දෙන්ති, සීලෙසු පතිට්ඨාපෙන්ති, පබ්බාජෙන්ති[Pg.320], ධම්මං උග්ගණ්හාපෙන්ති, උපසම්පාදෙන්ති, සොතාපත්තිමග්ගාදීනි පාපෙන්ති. ඉති සබ්බෙපි තෙ පච්ඡාආචරියා නාම. මාතාපිතරො පන සබ්බපඨමං. තෙනාහ ‘‘පුබ්බාචරියාති, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං එතං අධිවචන’’න්ති. ‘पूर्वाचार्य’ का अर्थ है प्रथम आचार्य। माता-पिता ही पुत्रों को बहुत छोटी आयु से ही सिखाते हुए - 'ऐसे बैठो, ऐसे चलो, ऐसे खड़े होओ, ऐसे सोओ, ऐसे खाओ, ऐसे भोजन करो, इसे 'तात' (पिता) कहना चाहिए, इसे 'भाई', इसे 'बहन', यह करना उचित है, यह अनुचित है, अमुक के पास जाना उचित है, अमुक के पास जाना अनुचित है' - ऐसा ग्रहण कराते हैं और सिखाते हैं। बाद के समय में अन्य आचार्य भी शिल्प, मुद्रा, गणना आदि सिखाते हैं, अन्य शरण (त्रिशरण) देते हैं, शीलों में प्रतिष्ठित करते हैं, प्रव्रजित करते हैं, धर्म सिखाते हैं, उपसंपदा देते हैं, स्रोतापत्ति-मार्ग आदि तक पहुँचाते हैं। इस प्रकार वे सभी 'पश्चात्-आचार्य' कहलाते हैं। परंतु माता-पिता सबसे प्रथम हैं। इसीलिए कहा गया है - 'भिक्षुओं! पूर्वाचार्य माता-पिता का ही यह पर्याय है'। ආහුනෙය්යාති ආනෙත්වා හුනිතබ්බන්ති ආහුනං, දූරතොපි ආනෙත්වා ඵලවිසෙසං ආකඞ්ඛන්තෙන ගුණවන්තෙසු දාතබ්බානං අන්නපානවත්ථච්ඡාදනාදීනං එතං නාමං, උපකාරඛෙත්තතාය තං ආහුනං අරහන්තීති ආහුනෙය්යා. තෙන වුත්තං ‘‘ආහුනෙය්යාති, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං එතං අධිවචන’’න්ති. ‘आहुनेय’ का अर्थ है - लाकर जो हवन (अर्पण) किया जाना चाहिए वह 'आहुन' है; दूर से भी लाकर विशेष फल की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति द्वारा गुणवानों को दिए जाने वाले अन्न, पान, वस्त्र, आच्छादन आदि का यह नाम है। उपकारी क्षेत्र होने के कारण वे उस 'आहुन' के योग्य हैं, इसलिए 'आहुनेय' हैं। इसीलिए कहा गया है - 'भिक्षुओं! आहुनेय माता-पिता का ही यह पर्याय है'। ඉදානි තෙසං බ්රහ්මාදිභාවෙ කාරණං දස්සෙතුං ‘‘තං කිස්ස හෙතු? බහුකාරා’’තිආදි වුත්තං. තං කිස්ස හෙතූති තං මාතාපිතූනං බ්රහ්මාදිඅධිවචනං කෙන කාරණෙනාති චෙති අත්ථො. බහුකාරාති බහූපකාරා. ආපාදකාති ජීවිතස්ස ආපාදකා, පාලකා. පුත්තානඤ්හි මාතාපිතූහි ජීවිතං ආපාදිතං පාලිතං ඝටිතං අනුප්පබන්ධෙන පවත්තිතං සම්පාදිතං. පොසකාති හත්ථපාදෙ වඩ්ඪෙත්වා හදයලොහිතං පායෙත්වා පොසෙතාරො. ඉමස්ස ලොකස්ස දස්සෙතාරොති පුත්තානං ඉමස්මිං ලොකෙ ඉට්ඨානිට්ඨාරම්මණදස්සනං නාම මාතාපිතරො නිස්සාය ජාතන්ති තෙ නෙසං ඉමස්ස ලොකස්ස දස්සෙතාරො නාම. ඉති තෙසං බහුකාරත්තං බ්රහ්මාදිභාවස්ස කාරණං දස්සිතං, යෙන පුත්තො මාතාපිතූනං ලොකියෙන උපකාරෙන කෙනචි පරියායෙන පරියන්තං පටිකාරං කාතුං න සමත්ථොයෙව. සචෙ හි පුත්තො ‘‘මාතාපිතූනං උපකාරස්ස පච්චුපකාරං කරිස්සාමී’’ති උට්ඨාය සමුට්ඨාය වායමන්තො දක්ඛිණෙ අංසකූටෙ මාතරං, ඉතරස්මිං පිතරං ඨපෙත්වා වස්සසතායුකො සකලං වස්සසතම්පි පරිහරෙය්ය චතූහි පච්චයෙහි උච්ඡාදනපරිමද්දනන්හාපනසම්බාහනාදීහි ච යථාරුචි උපට්ඨහන්තො තෙසං මුත්තකරීසම්පි අජිගුච්ඡන්තො, න එත්තාවතා පුත්තෙන මාතාපිතූනං පටිකාරො කතො හොති අඤ්ඤත්ර සද්ධාදිගුණවිසෙසෙ පතිට්ඨාපනා. වුත්තඤ්හෙතං භගවතා – अब उनके ब्रह्मा आदि होने का कारण दिखाने के लिए 'वह किस हेतु से? बहुत उपकारी हैं' आदि कहा गया है। 'वह किस हेतु से' का अर्थ है - वह माता-पिता का ब्रह्मा आदि पर्याय किस कारण से है? 'बहुकारा' का अर्थ है बहुत उपकारी। 'आपादका' का अर्थ है जीवन देने वाले, पालक। पुत्रों का जीवन माता-पिता द्वारा ही प्राप्त, पालित, घटित, निरंतर प्रवर्तित और संपादित किया गया है। 'पोसका' का अर्थ है हाथ-पैर बढ़ाकर और हृदय का रक्त (दूध) पिलाकर पोषण करने वाले। 'इस लोक को दिखाने वाले' का अर्थ है - पुत्रों का इस लोक में इष्ट और अनिष्ट आलम्बनों का दर्शन माता-पिता के आश्रय से ही उत्पन्न हुआ है, इसलिए वे उन्हें इस लोक को दिखाने वाले हैं। इस प्रकार उनके बहुत उपकारी होने को ब्रह्मा आदि होने का कारण दिखाया गया है, जिससे पुत्र माता-पिता के लौकिक उपकार का किसी भी प्रकार से पूरी तरह प्रत्युपकार करने में समर्थ नहीं है। यदि पुत्र 'माता-पिता के उपकार का प्रत्युपकार करूँगा' ऐसा सोचकर उठकर और प्रयत्न करके दाहिने कंधे पर माता को और दूसरे पर पिता को रखकर सौ वर्ष की आयु तक, पूरे सौ वर्ष तक उनकी सेवा करे, चारों प्रत्ययों से, उबटन, मालिश, स्नान, संवाहन (दबाना) आदि से इच्छानुसार सेवा करते हुए उनके मलमूत्र से भी घृणा न करे, तो भी इतने मात्र से पुत्र द्वारा माता-पिता का प्रत्युपकार नहीं होता, सिवाय उन्हें श्रद्धा आदि विशेष गुणों में प्रतिष्ठित करने के। भगवान द्वारा यह कहा भी गया है - ‘‘ද්වින්නාහං, භික්ඛවෙ, න සුප්පටිකාරං වදාමි. කතමෙසං ද්වින්නං? මාතු ච පිතු ච. එකෙන, භික්ඛවෙ, අංසෙන මාතරං පරිහරෙය්ය, එකෙන අංසෙන පිතරං පරිහරෙය්ය වස්සසතායුකො වස්සසතජීවී, සො ච නෙසං උච්ඡාදනපරිමද්දනන්හාපනසම්බාහනෙන, තෙ ච තත්ථෙව මුත්තකරීසං චජෙය්යුං, න ත්වෙව, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං කතං [Pg.321] වා හොති පටිකතං වා. ඉමිස්සා ච, භික්ඛවෙ, මහාපථවියා පහූතරත්තරතනාය මාතාපිතරො ඉස්සරියාධිපච්චෙ රජ්ජෙ පතිට්ඨාපෙය්ය, න ත්වෙව, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං කතං වා හොති පටිකතං වා. තං කිස්ස හෙතු? බහුකාරා, භික්ඛවෙ, මාතාපිතරො පුත්තානං ආපාදකා පොසකා ඉමස්ස ලොකස්ස දස්සෙතාරො. ‘भिक्षुओं! मैं दो व्यक्तियों का प्रत्युपकार करना सुगम नहीं कहता हूँ। किन दो का? माता और पिता का। भिक्षुओं! यदि कोई सौ वर्ष की आयु वाला, सौ वर्ष तक जीवित रहने वाला व्यक्ति एक कंधे पर माता को ढोए और एक कंधे पर पिता को ढोए, और वह उबटन, मालिश, स्नान और संवाहन द्वारा उनकी सेवा करे, और वे वहीं मलमूत्र का त्याग करें, तो भी भिक्षुओं! माता-पिता का (उपकार) न तो किया हुआ होता है और न ही प्रत्युपकार किया हुआ होता है। और भिक्षुओं! यदि कोई इस महापृथ्वी पर प्रचुर लाल रत्नों वाले ऐश्वर्य और आधिपत्य के राज्य में माता-पिता को प्रतिष्ठित कर दे, तो भी भिक्षुओं! माता-पिता का (उपकार) न तो किया हुआ होता है और न ही प्रत्युपकार किया हुआ होता है। वह किस हेतु से? भिक्षुओं! माता-पिता पुत्रों के लिए बहुत उपकारी हैं, वे जीवन देने वाले, पोषण करने वाले और इस लोक को दिखाने वाले हैं। ‘‘යො ච ඛො, භික්ඛවෙ, මාතාපිතරො අස්සද්ධෙ සද්ධාසම්පදාය සමාදපෙති නිවෙසෙති පතිට්ඨාපෙති. දුස්සීලෙ සීලසම්පදාය, මච්ඡරිනො චාගසම්පදාය, දුප්පඤ්ඤෙ පඤ්ඤාසම්පදාය සමාදපෙති නිවෙසෙති පතිට්ඨාපෙති. එත්තාවතා ඛො, භික්ඛවෙ, මාතාපිතූනං කතඤ්ච හොති පටිකතඤ්චා’’ති (අ. නි. 2.34). "भिक्षुओं, जो कोई अश्रद्धालु माता-पिता को श्रद्धा-सम्पदा में समाहित करता है, निवेशित करता है और प्रतिष्ठित करता है; दुःशील को शील-सम्पदा में, लोभी को त्याग-सम्पदा में और दुर्बुद्धि को प्रज्ञा-सम्पदा में समाहित करता है, निवेशित करता है और प्रतिष्ठित करता है। भिक्षुओं, इतने से ही माता-पिता का किया हुआ (उपकार) चुकाया जाता है और उनका प्रत्युपकार होता है।" (अं. नि. 2.34) තථා – तथा— ‘‘මාතාපිතුඋපට්ඨානං, පුත්තදාරස්ස සඞ්ගහො’’ති; (ඛු. පා. 5.6); ‘‘මාතාපිතුඋපට්ඨානං, භික්ඛවෙ, පණ්ඩිතපඤ්ඤත්ත’’න්ති ච – "माता-पिता की सेवा करना, पुत्र और पत्नी का संग्रह (भरण-पोषण) करना" (खु. पा. 5.6); "भिक्षुओं, माता-पिता की सेवा करना पंडितों (विद्वानों) द्वारा प्रज्ञप्त है।" එවමාදීනි මාතාපිතූනං පුත්තස්ස බහූපකාරභාවසාධකානි සුත්තානි දට්ඨබ්බානි. इस प्रकार के माता-पिता के प्रति पुत्र के बहु-उपकारी होने को सिद्ध करने वाले सूत्रों को देखना चाहिए। ගාථාසු වුච්චරෙති වුච්චන්ති කථීයන්ති. පජාය අනුකම්පකාති පරෙසං පාණං ඡින්දිත්වාපි අත්තනො සන්තකං යංකිඤ්චි චජිත්වාපි අත්තනො පජං පටිජග්ගන්ති ගොපයන්ති, තස්මා පජාය අත්තනො පුත්තානං අනුකම්පකා අනුග්ගාහකා. गाथाओं में 'वुच्चरे' का अर्थ है—कहे जाते हैं, कहे गए हैं। 'पजाय अनुकम्पका' का अर्थ है—दूसरों के प्राणों को काटकर (कष्ट सहकर) भी अपनी जो कुछ भी संपत्ति है उसे त्याग कर भी अपनी प्रजा (संतान) का पालन-पोषण और रक्षा करते हैं, इसलिए वे अपनी प्रजा अर्थात् अपने पुत्रों के प्रति अनुकम्पा करने वाले और अनुग्रह करने वाले हैं। නමස්සෙය්යාති සායං පාතං උපට්ඨානං ගන්ත්වා ‘‘ඉදං මය්හං උත්තමං පුඤ්ඤක්ඛෙත්ත’’න්ති නමක්කාරං කරෙය්ය. සක්කරෙය්යාති සක්කාරෙන පටිමානෙය්ය. ඉදානි තං සක්කාරං දස්සෙන්තො ‘‘අන්නෙනා’’තිආදිමාහ. තත්ථ අන්නෙනාති යාගුභත්තඛාදනීයෙන. පානෙනාති අට්ඨවිධපානෙන. වත්ථෙනාති නිවාසනපාරුපනෙන. සයනෙනාති මඤ්චපීඨභිසිබිම්බොහනාදිනා සයනෙන. උච්ඡාදනෙනාති දුග්ගන්ධං පටිවිනොදෙත්වා සුගන්ධකරණුච්ඡාදනෙන. න්හානෙනාති සීතකාලෙ උණ්හොදකෙන, උණ්හකාලෙ සීතොදකෙන ගත්තානි පරිසිඤ්චිත්වා න්හාපනෙන. පාදානං ධොවනෙන චාති උණ්හොදකසීතොදකෙහි පාදධොවනෙන චෙව තෙලමක්ඛනෙන ච. 'नमस्सेय्य' का अर्थ है—सुबह और शाम सेवा में जाकर "यह मेरा उत्तम पुण्यक्षेत्र है" ऐसा मानकर नमस्कार करना चाहिए। 'सक्करेय्य' का अर्थ है—सत्कार के साथ सम्मान करना चाहिए। अब उस सत्कार को दिखाते हुए 'अन्नेन' इत्यादि कहा। वहाँ 'अन्नेन' का अर्थ है—यवागू (कांजी), भात और खाद्य पदार्थों के द्वारा। 'पानेन' का अर्थ है—आठ प्रकार के पेयों के द्वारा। 'वत्थेन' का अर्थ है—पहनने और ओढ़ने के वस्त्रों के द्वारा। 'सयनेन' का अर्थ है—मंच (पलंग), पीठ (कुर्सी), गद्दी, तकिया आदि शयन-सामग्री के द्वारा। 'उच्छादनेन' का अर्थ है—दुर्गंध को दूर कर सुगंधित करने वाले उबटन आदि के द्वारा। 'न्हानेन' का अर्थ है—शीतकाल में गर्म जल से और ग्रीष्मकाल में शीतल जल से अंगों को सींचकर स्नान कराने के द्वारा। 'पादानं धोवनेन च' का अर्थ है—गर्म और शीतल जल से पैर धोने और तेल की मालिश करने के द्वारा। තාය [Pg.322] නං පාරිචරියායාති එත්ථ නන්ති නිපාතමත්තං, යථාවුත්තපරිචරණෙන. අථ වා පාරිචරියායාති භරණකිච්චකරණකුලවංසපතිට්ඨාපනාදිනා පඤ්චවිධඋපට්ඨානෙන. වුත්තඤ්හෙතං – 'ताय नं पारिचरियाय' यहाँ 'नं' केवल एक निपात है, यथाविधि परिचर्या (सेवा) के द्वारा। अथवा 'पारिचरियाय' का अर्थ है—भरण-पोषण, उनके कार्यों को करना, कुल-वंश को बनाए रखना आदि पाँच प्रकार की सेवा के द्वारा। जैसा कि कहा गया है— ‘‘පඤ්චහි ඛො, ගහපතිපුත්ත, ඨානෙහි පුත්තෙන පුරත්ථිමා දිසා මාතාපිතරො පච්චුපට්ඨාතබ්බා ‘භතො නෙ භරිස්සාමි, කිච්චං නෙසං කරිස්සාමි, කුලවංසං ඨපෙස්සාමි, දායජ්ජං පටිපජ්ජිස්සාමි. අථ වා පන නෙසං පෙතානං කාලකතානං දක්ඛිණමනුප්පදස්සාමී’ති. ඉමෙහි ඛො, ගහපතිපුත්ත, පඤ්චහි ඨානෙහි පුත්තෙන පුරත්ථිමා දිසා මාතාපිතරො පච්චුපට්ඨිතා පඤ්චහි ඨානෙහි පුත්තං අනුකම්පන්ති – පාපා නිවාරෙන්ති, කල්යාණෙ නිවෙසෙන්ති, සිප්පං සික්ඛාපෙන්ති, පතිරූපෙන දාරෙන සංයොජෙන්ති, සමයෙ දායජ්ජං නිය්යාදෙන්තී’’ති (දී. නි. 3.267). ‘‘हे गृहपतिपुत्र! पाँच स्थानों (बातों) से पुत्र द्वारा पूर्व दिशा के रूप में माता-पिता की सेवा करनी चाहिए— ‘उनके द्वारा पालित-पोषित होने पर मैं उनका भरण-पोषण करूँगा, उनके कार्यों को करूँगा, कुल-वंश को बनाए रखूँगा, दायभाग (उत्तराधिकार) को ग्रहण करूँगा, अथवा उनके मृत होने पर उनके निमित्त दक्षिणा (दान) प्रदान करूँगा।’ हे गृहपतिपुत्र! इन पाँच स्थानों से पुत्र द्वारा पूर्व दिशा के रूप में सेवित माता-पिता पाँच स्थानों से पुत्र पर अनुकम्पा करते हैं— पाप से रोकते हैं, कल्याण में लगाते हैं, शिल्प (विद्या) सिखाते हैं, योग्य जीवनसाथी से जोड़ते हैं और समय पर दायभाग (उत्तराधिकार) सौंपते हैं।’’ අපිච යො මාතාපිතරො තීසු වත්ථූසු අභිප්පසන්නෙ කත්වා සීලෙසු වා පතිට්ඨාපෙත්වා පබ්බජ්ජාය වා නියොජෙත්වා උපට්ඨහති, අයං මාතාපිතුඋපට්ඨාකානං අග්ගොති වෙදිතබ්බො. සා පනායං පාරිචරියා පුත්තස්ස උභයලොකහිතසුඛාවහාති දස්සෙන්තො ‘‘ඉධෙව නං පසංසන්ති, පෙච්ච සග්ගෙ පමොදතී’’ති ආහ. තත්ථ ඉධාති ඉමස්මිං ලොකෙ. මාතාපිතුඋපට්ඨාකඤ්හි පුග්ගලං පණ්ඩිතමනුස්සා තත්ථ පාරිචරියාය පසංසන්ති වණ්ණෙන්ති ථොමෙන්ති, තස්ස ච දිට්ඨානුගතිං ආපජ්ජන්තා සයම්පි අත්තනො මාතාපිතූසු තථා පටිපජ්ජිත්වා මහන්තං පුඤ්ඤං පසවන්ති. පෙච්චාති පරලොකං ගන්ත්වා සග්ගෙ ඨිතො මාතාපිතුපට්ඨාකො දිබ්බසම්පත්තීහි මොදති පමොදති අභිනන්දතීති. इसके अतिरिक्त, जो माता-पिता को तीन वस्तुओं (रत्नों) में प्रसन्न कर, या शीलों में प्रतिष्ठित कर, या प्रव्रज्या में नियोजित कर उनकी सेवा करता है, उसे माता-पिता के सेवकों में श्रेष्ठ समझना चाहिए। वह यह परिचर्या (सेवा) पुत्र के लिए दोनों लोकों में हित और सुख लाने वाली है, यह दिखाते हुए कहा— ‘यहीं (इस लोक में) उसकी प्रशंसा करते हैं, और मरने के बाद स्वर्ग में वह प्रसन्न होता है।’ वहाँ ‘इध’ का अर्थ है इस लोक में। क्योंकि माता-पिता की सेवा करने वाले व्यक्ति की विद्वान लोग उस सेवा के लिए प्रशंसा करते हैं, गुणगान करते हैं, स्तुति करते हैं, और उसके उदाहरण का अनुसरण करते हुए स्वयं भी अपने माता-पिता के प्रति वैसा ही व्यवहार कर महान पुण्य अर्जित करते हैं। ‘पेच्च’ का अर्थ है परलोक जाकर स्वर्ग में स्थित माता-पिता का सेवक दिव्य संपत्तियों से हर्षित होता है, प्रमुदित होता है और आनंदित होता है। සත්තමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. सातवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 8. බහුකාරසුත්තවණ්ණනා ८. बहुकार सूत्र की व्याख्या 107. අට්ඨමෙ බ්රාහ්මණගහපතිකාති බ්රාහ්මණා චෙව ගහපතිකා ච. ඨපෙත්වා බ්රාහ්මණෙ යෙ කෙචි අගාරං අජ්ඣාවසන්තා ඉධ ගහපතිකාති වෙදිතබ්බා[Pg.323]. යෙති අනියමතො නිද්දිට්ඨපරාමසනං. වොති උපයොගබහුවචනං. අයඤ්හෙත්ථ සඞ්ඛෙපත්ථො – භික්ඛවෙ, තුම්හාකං බහූපකාරා බ්රාහ්මණගහපතිකා, යෙ බ්රාහ්මණා චෙව සෙසඅගාරිකා ච ‘‘තුම්හෙ එව අම්හාකං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං, යත්ථ මයං උද්ධග්ගිකං දක්ඛිණං පතිට්ඨාපෙම සොවග්ගිකං සුඛවිපාකං සග්ගසංවත්තනික’’න්ති චීවරාදීහි පච්චයෙහි පතිඋපට්ඨිතාති. १०७. आठवें (सूत्र) में ‘ब्राह्मणगृहपतिक’ का अर्थ है ब्राह्मण और गृहपति। ब्राह्मणों को छोड़कर जो कोई भी घर में रहते हैं, उन्हें यहाँ ‘गृहपतिक’ समझना चाहिए। ‘ये’ अनिश्चित रूप से निर्दिष्ट का परामर्श है। ‘वो’ द्वितीया विभक्ति बहुवचन है। यहाँ संक्षेप में यह अर्थ है— भिक्षुओं! तुम्हारे लिए ब्राह्मण और गृहपति बहुत उपकारी हैं, जो ब्राह्मण और अन्य गृहस्थ ‘आप ही हमारे पुण्यक्षेत्र हैं, जहाँ हम ऊर्ध्वगामी दक्षिणा (दान) प्रतिष्ठित करते हैं, जो स्वर्गदायक, सुखद विपाक वाला और स्वर्ग की ओर ले जाने वाला है’ ऐसा मानकर चीवर आदि प्रत्ययों (आवश्यकताओं) से सेवा करते हैं। එවං ‘‘ආමිසදානෙන ආමිසසංවිභාගෙන ආමිසානුග්ගහෙන ගහට්ඨා භික්ඛූනං උපකාරවන්තො’’ති දස්සෙත්වා ඉදානි ධම්මදානෙන ධම්මසංවිභාගෙන ධම්මානුග්ගහෙන භික්ඛූනම්පි තෙසං උපකාරවන්තතං දස්සෙතුං ‘‘තුම්හෙපි, භික්ඛවෙ,’’තිආදි වුත්තං, තං වුත්තනයමෙව. इस प्रकार ‘आमिष दान, आमिष संविभाग और आमिष अनुग्रह से गृहस्थ भिक्षुओं के उपकारी हैं’ यह दिखाकर, अब धर्म दान, धर्म संविभाग और धर्म अनुग्रह से भिक्षुओं की भी उनके प्रति उपकारिता दिखाने के लिए ‘तुम भी, भिक्षुओं!’ आदि कहा गया है, वह पूर्वोक्त रीति से ही है। ඉමිනා කිං කථිතං? පිණ්ඩාපචායනං නාම කථිතං. අයඤ්හෙත්ථ අධිප්පායො – භික්ඛවෙ, යස්මා ඉමෙ බ්රාහ්මණගහපතිකා නෙව තුම්හාකං ඤාතකා, න මිත්තා, න ඉණං වා ධාරෙන්ති, අථ ඛො ‘‘ඉමෙ සමණා සම්මග්ගතා සම්මා පටිපන්නා, එත්ථ නො කාරා මහප්ඵලා භවිස්සන්ති මහානිසංසා’’ති ඵලවිසෙසං ආකඞ්ඛන්තා තුම්හෙ චීවරාදීහි උපට්ඨහන්ති. තස්මා තං තෙසං අධිප්පායං පරිපූරෙන්තා අප්පමාදෙන සම්පාදෙථ, ධම්මදෙසනාපි වො කාරකානංයෙව සොභති, ආදෙය්යා ච හොති, න ඉතරෙසන්ති එවං සම්මාපටිපත්තියං අප්පමාදො කරණීයොති. इससे क्या कहा गया है? ‘पिण्ड-अपचायन’ (भिक्षा का आदर) कहा गया है। यहाँ यह अभिप्राय है— भिक्षुओं! क्योंकि ये ब्राह्मण और गृहपति न तो तुम्हारे संबंधी हैं, न मित्र हैं, और न ही तुम्हारा ऋण धारण करते हैं, बल्कि ‘ये श्रमण सम्यक् मार्ग पर स्थित हैं, सम्यक् प्रतिपन्न हैं, यहाँ हमारा सत्कार महान फलदायी और महान लाभदायी होगा’ ऐसी फल-विशेष की आकांक्षा करते हुए तुम्हारी चीवर आदि से सेवा करते हैं। इसलिए उनके उस अभिप्राय को पूर्ण करते हुए अप्रमाद के साथ (साधना) संपन्न करो; तुम्हारी धर्म-देशना भी करने वालों को ही सुशोभित करती है और ग्रहण करने योग्य होती है, दूसरों को नहीं; इस प्रकार सम्यक् प्रतिपत्ति (आचरण) में अप्रमाद करना चाहिए। එවමිදං, භික්ඛවෙතිආදීසු අයං සඞ්ඛෙපත්ථො – භික්ඛවෙ, එවං ඉමිනා වුත්තප්පකාරෙන ගහට්ඨපබ්බජිතෙහි ආමිසදානධම්මදානවසෙන අඤ්ඤමඤ්ඤං සන්නිස්සාය කාමාදිවසෙන චතුබ්බිධස්සපි ඔඝස්ස නිත්ථරණත්ථාය සකලස්සපි වට්ටදුක්ඛස්ස සම්මදෙව පරියොසානකරණාය උපොසථසීලනියමාදිවසෙන චතුපාරිසුද්ධිසීලාදිවසෙන වා ඉදං සාසනබ්රහ්මචරියං මග්ගබ්රහ්මචරියඤ්ච වුස්සති චරීයතීති. ‘एवमिदं, भिक्खवे’ इत्यादि में यह संक्षेपार्थ है - भिक्षुओं, इस प्रकार इस बताए गए तरीके से गृहस्थों और प्रव्रजितों द्वारा आमिष-दान और धर्म-दान के माध्यम से एक-दूसरे पर आश्रित होकर, काम आदि के वश से चार प्रकार के ओघों (बाढ़) को पार करने के लिए और संपूर्ण संसार-दुःख का सम्यक रूप से अंत करने के लिए, उपोसथ-शील के नियमों आदि के माध्यम से अथवा चार परिशुद्धि-शीलों आदि के माध्यम से यह शासन-ब्रह्मचर्य और मार्ग-ब्रह्मचर्य जिया जाता है या आचरण किया जाता है। ගාථාසු සාගාරාති ගහට්ඨා. අනගාරාති පරිච්චත්තඅගාරා පබ්බජිතා. උභො අඤ්ඤොඤ්ඤනිස්සිතාති තෙ උභොපි අඤ්ඤමඤ්ඤසන්නිස්සිතා. සාගාරා හි අනගාරානං ධම්මදානසන්නිස්සිතා, අනගාරා ච සාගාරානං පච්චයදානසන්නිස්සිතා. ආරාධයන්තීති සාධෙන්ති සම්පාදෙන්ති. සද්ධම්මන්ති පටිපත්තිසද්ධම්මං පටිවෙධසද්ධම්මඤ්ච. තත්ථ යං උත්තමං, තං දස්සෙන්තො ආහ ‘‘යොගක්ඛෙමං [Pg.324] අනුත්තර’’න්ති අරහත්තං නිබ්බානඤ්ච. සාගාරෙසූති සාගාරෙහි, නිස්සක්කෙ ඉදං භුම්මවචනං, සාගාරානං වා සන්තිකෙ. පච්චයන්ති වුත්තාවසෙසං දුවිධං පච්චයං පිණ්ඩපාතං භෙසජ්ජඤ්ච. පරිස්සයවිනොදනන්ති උතුපරිස්සයාදිපරිස්සයහරණං විහාරාදිආවසථං. සුගතන්ති සම්මා පටිපන්නං කල්යාණපුථුජ්ජනෙන සද්ධිං අට්ඨවිධං අරියපුග්ගලං. සාවකො හි ඉධ සුගතොති අධිප්පෙතො. ඝරමෙසිනොති ඝරං එසිනො, ගෙහෙ ඨත්වා ඝරාවාසං වසන්තා භොගූපකරණානි චෙව ගහට්ඨසීලාදීනි ච එසනසීලාති අත්ථො. සද්දහානො අරහතන්ති අරහන්තානං අරියානං වචනං, තෙසං වා සම්මාපටිපත්තිං සද්දහන්තා. ‘‘අද්ධා ඉමෙ සම්මා පටිපන්නා, යථා ඉමෙ කථෙන්ති, තථා පටිපජ්ජන්තානං සා පටිපත්ති සග්ගමොක්ඛසම්පත්තියා සංවත්තතී’’ති අභිසද්දහන්තාති අත්ථො. ‘‘සද්දහන්තා’’තිපි පාඨො. අරියපඤ්ඤායාති සුවිසුද්ධපඤ්ඤාය. ඣායිනොති ආරම්මණලක්ඛණූපනිජ්ඣානවසෙන දුවිධෙනපි ඣානෙන ඣායිනො. गाथाओं में ‘सागारा’ का अर्थ गृहस्थ है। ‘अनगारा’ का अर्थ घर त्यागने वाले प्रव्रजित हैं। ‘उभो अञ्ञोञ्ञनिस्सिता’ का अर्थ है कि वे दोनों ही एक-दूसरे पर आश्रित हैं। क्योंकि गृहस्थ प्रव्रजितों के धर्म-दान पर आश्रित हैं, और प्रव्रजित गृहस्थों के प्रत्यय-दान पर आश्रित हैं। ‘आराधयन्ति’ का अर्थ है सिद्ध करते हैं या संपादित करते हैं। ‘सद्धम्मं’ का अर्थ प्रतिपत्ति-सद्धर्म और प्रतिवेध-सद्धर्म है। वहाँ जो उत्तम है, उसे दिखाते हुए कहा - ‘योगक्खेमं अनुत्तरं’ अर्थात् अर्हत्व और निर्वाण। ‘सागारेसु’ का अर्थ गृहस्थों से है, यहाँ सप्तमी विभक्ति अपादान के अर्थ में है, अथवा गृहस्थों के पास। ‘पच्चयं’ का अर्थ शेष बचे दो प्रकार के प्रत्यय - पिंडपात और भेषज है। ‘परिसयविनोदनं’ का अर्थ ऋतु-परिसय आदि कष्टों को दूर करने वाला विहार आदि आवास है। ‘सुगतं’ का अर्थ सम्यक रूप से प्रतिपन्न, कल्याणकारी पृथग्जन के साथ आठ प्रकार के आर्य पुद्गल हैं। यहाँ ‘सुगत’ से श्रावक अभिप्रेत है। ‘घरमेसिनो’ का अर्थ घर की इच्छा रखने वाले, घर में रहकर गृहस्थ जीवन जीने वाले, भोग के उपकरणों और गृहस्थ शील आदि की खोज करने वाले हैं। ‘सद्दहानो अरहतं’ का अर्थ अर्हतों (आर्यों) के वचनों पर, या उनकी सम्यक प्रतिपत्ति पर श्रद्धा रखने वाले। ‘निश्चित ही ये सम्यक रूप से प्रतिपन्न हैं, जैसा ये कहते हैं, वैसा आचरण करने वालों के लिए वह प्रतिपत्ति स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति कराने वाली होती है’ - ऐसा विश्वास करने वाले। ‘सद्दहन्ता’ भी पाठ है। ‘अरियपञ्ञाय’ का अर्थ सुविशुद्ध प्रज्ञा से है। ‘झायिनो’ का अर्थ आलम्बन और लक्षण के उपनिध्यान के वश से दोनों प्रकार के ध्यानों से ध्यान करने वाले हैं। ඉධ ධම්මං චරිත්වානාති ඉමස්මිං අත්තභාවෙ, ඉමස්මිං වා සාසනෙ ලොකියලොකුත්තරසුඛස්ස මග්ගභූතං සීලාදිධම්මං පටිපජ්ජිත්වා යාව පරිනිබ්බානං න පාපුණන්ති, තාවදෙව සුගතිගාමිනො. නන්දිනොති පීතිසොමනස්සයොගෙන නන්දනසීලා. කෙචි පන ‘‘ධම්මං චරිත්වාන මග්ගන්ති සොතාපත්තිමග්ගං පාපුණිත්වා’’ති වදන්ති. දෙවලොකස්මින්ති ඡබ්බිධෙපි කාමාවචරදෙවලොකෙ. මොදන්ති කාමකාමිනොති යථිච්ඡිතවත්ථුනිප්ඵත්තිතො කාමකාමිනො කාමවන්තො හුත්වා පමොදන්තීති. ‘इध धम्मं चरित्वान’ का अर्थ है इस आत्मभाव में, या इस शासन में लौकिक और लोकोत्तर सुख के मार्ग स्वरूप शील आदि धर्म का पालन करके जब तक परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करते, तब तक सुगति को प्राप्त करने वाले। ‘नन्दिनो’ का अर्थ प्रीति और सौमनस्य के योग से आनंदित होने के स्वभाव वाले। कुछ लोग तो ‘धम्मं चरित्वान मग्गं’ का अर्थ ‘स्रोतापत्ति मार्ग प्राप्त करके’ ऐसा कहते हैं। ‘देवलोकस्मिं’ का अर्थ छह प्रकार के कामावचर देवलोकों में है। ‘मोदन्ति कामकामिनो’ का अर्थ इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति से कामनाओं वाले होकर प्रसन्न होते हैं। අට්ඨමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. आठवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 9. කුහසුත්තවණ්ණනා ९. कुह-सूत्र की व्याख्या। 108. නවමෙ කුහාති සාමන්තජප්පනාදිනා කුහනවත්ථුනා කුහකා, අසන්තගුණසම්භාවනිච්ඡාය කොහඤ්ඤං කත්වා පරෙසං විම්හාපකාති අත්ථො. ථද්ධාති කොධෙන ච මානෙන ච ථද්ධමානසා. ‘‘කොධනො හොති උපායාසබහුලො, අප්පම්පි වුත්තො සමානො අභිසජ්ජති කුප්පති බ්යාපජ්ජති පතිත්ථීයතී’’ති (අ. නි. 3.25; පු. ප. 101) එවං වුත්තෙන කොධෙන ච, ‘‘දුබ්බචො හොති දොවචස්සකරණෙහි [Pg.325] ධම්මෙහි සමන්නාගතො අක්ඛමො අප්පදක්ඛිණග්ගාහී අනුසාසනි’’න්ති (ම. නි. 1.181) එවං වුත්තෙන දොවචස්සෙන ච, ‘‘ජාතිමදො, ගොත්තමදො, සිප්පමදො, ආරොග්යමදො, යොබ්බනමදො, ජීවිතමදො’’ති (විභ. 832) එවං වුත්තෙන ජාතිමදාදිභෙදෙන මදෙන ච ගරුකාතබ්බෙසු ගරූසු පරමනිපච්චකාරං අකත්වා අයොසලාකං ගිලිත්වා ඨිතා විය අනොනතා හුත්වා විචරණකා. ලපාති උපලාපකා මිච්ඡාජීවවසෙන කුලසඞ්ගාහකා පච්චයත්ථං පයුත්තවාචාවසෙන නිප්පෙසිකතාවසෙන ච ලපකාති වා අත්ථො. १०८. नौवें (सूत्र) में ‘कुहा’ का अर्थ है सामन्त-जप्पन आदि कुहन-वस्तुओं के द्वारा कुहक (धूर्त), असत्य गुणों की संभावना की इच्छा से कुहन (दिखावा) करके दूसरों को विस्मित करने वाले। ‘थद्धा’ का अर्थ क्रोध और मान से कठोर मन वाले। ‘क्रोधी होता है, बहुत क्लेश वाला होता है, थोड़ा सा कहे जाने पर भी चिढ़ जाता है, कुपित होता है, द्वेष करता है, विरोध करता है’ - इस प्रकार कहे गए क्रोध से, और ‘दुर्वाच्य होता है, दुर्वचनीयता उत्पन्न करने वाले धर्मों से युक्त, अक्षम, उपदेश को सही ढंग से ग्रहण न करने वाला’ - इस प्रकार कहे गए दुर्वचनीयता से, तथा ‘जाति-मद, गोत्र-मद, शिल्प-मद, आरोग्य-मद, यौवन-मद, जीवित-मद’ - इस प्रकार कहे गए जाति-मद आदि भेदों वाले मद से, आदरणीय गुरुजनों के प्रति परम विनम्रता न दिखाकर, लोहे की शलाका निगल कर खड़े व्यक्ति की तरह न झुकने वाले होकर विचरण करने वाले। ‘लपा’ का अर्थ है उपलापक, मिथ्या आजीविका के कारण कुलों का संग्रह करने वाले, प्रत्ययों के लिए प्रयुक्त वाणी के कारण और निप्पेशिकता के कारण ‘लपक’ हैं - यह अर्थ है। සිඞ්ගීති ‘‘තත්ථ කතමං සිඞ්ගං? යං සිඞ්ගං සිඞ්ගාරතා චාතුරතා චාතුරියං පරික්ඛත්තතා පාරික්ඛත්තිය’’න්ති (විභ. 852) එවං වුත්තෙහි සිඞ්ගසදිසෙහි පාකටකිලෙසෙහි සමන්නාගතා. උන්නළාති උග්ගතනළා, නළසදිසං තුච්ඡමානං උක්ඛිපිත්වා විචරණකා. අසමාහිතාති චිත්තෙකග්ගතාමත්තස්සාපි අලාභිනො. න මෙ තෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ මාමකාති තෙ මය්හං භික්ඛූ මම සන්තකා න හොන්ති. මෙති ඉදං පදං අත්තානං උද්දිස්ස පබ්බජිතත්තා භගවතා වුත්තං. යස්මා පන තෙ කුහනාදියොගතො න සම්මා පටිපන්නා, තස්මා ‘‘න මාමකා’’ති වුත්තා. අපගතාති යදිපි තෙ මම සාසනෙ පබ්බජිතා, යථානුසිට්ඨං පන අප්පටිපජ්ජනතො අපගතා එව ඉමස්මා ධම්මවිනයා, ඉතො තෙ සුවිදූරවිදූරෙ ඨිතාති දස්සෙති. වුත්තඤ්හෙතං – ‘सिंगी’ का अर्थ है - ‘वहाँ सींग क्या है? जो सींग, शृंगारता, चतुरता, चातुर्य, परिक्खत्तता, पारिक्खत्तिय है’ - इस प्रकार कहे गए सींग के समान प्रकट क्लेशों से युक्त। ‘उन्नळा’ का अर्थ है उठे हुए नल वाले, नल के समान तुच्छ मान को ऊपर उठाकर विचरण करने वाले। ‘असमाहिता’ का अर्थ है चित्त की एकाग्रता मात्र को भी प्राप्त न करने वाले। ‘न मे ते, भिक्खवे, भिक्खू मामका’ का अर्थ है - हे भिक्षुओं, वे भिक्षु मेरे अपने नहीं हैं। ‘मे’ यह पद भगवान ने अपने उद्देश्य से प्रव्रजित होने के कारण कहा है। चूँकि वे कुहन आदि के योग से सम्यक रूप से प्रतिपन्न नहीं हैं, इसलिए ‘न मामका’ कहा गया है। ‘अपगता’ का अर्थ है - यद्यपि वे मेरे शासन में प्रव्रजित हैं, किन्तु उपदेश के अनुसार आचरण न करने के कारण वे इस धर्म-विनय से दूर ही हैं, वे इससे बहुत-बहुत दूर स्थित हैं - यह दर्शाता है। क्योंकि यह कहा गया है - ‘‘නභඤ්ච දූරෙ පථවී ච දූරෙ,පාරං සමුද්දස්ස තදාහු දූරෙ; තතො හවෙ දූරතරං වදන්ති,සතඤ්ච ධම්මං අසතඤ්ච රාජා’’ති. (අ. නි. 4.47; ජා. 2.21.414); ‘आकाश दूर है और पृथ्वी दूर है, समुद्र का पार भी दूर कहा जाता है; हे राजन्! सत्पुरुषों का धर्म और असत्पुरुषों का धर्म उससे भी कहीं अधिक दूर कहा जाता है।’ වුද්ධිං විරූළ්හිං වෙපුල්ලං ආපජ්ජන්තීති සීලාදිගුණෙහි වඩ්ඪනවසෙන වුද්ධිං, තත්ථ නිච්චලභාවෙන විරූළ්හිං, සබ්බත්ථ පත්ථටභාවෙන සීලාදිධම්මක්ඛන්ධපාරිපූරියා වෙපුල්ලං. න ච තෙ කුහාදිසභාවා භික්ඛූ ආපජ්ජන්ති, න ච පාපුණන්තීති අත්ථො. තෙ ඛො මෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ මාමකාති ඉධාපි මෙති අත්තානං උද්දිස්ස පබ්බජිතත්තා වදති, සම්මා පටිපන්නත්තා පන ‘‘මාමකා’’ති ආහ. වුත්තවිපරියායෙන සුක්කපක්ඛො වෙදිතබ්බො. තත්ථ යාව [Pg.326] අරහත්තමග්ගා විරූහන්ති නාම, අරහත්තඵලෙ පන සම්පත්තෙ විරූළ්හිං වෙපුල්ලං ආපන්නා නාම. ගාථා සුවිඤ්ඤෙය්යා එව. 'वृद्धि, विरूढ़ि और विपुलता को प्राप्त होते हैं' - यहाँ शील आदि गुणों की वृद्धि के कारण 'वृद्धि', उनमें स्थिरता के कारण 'विरूढ़ि', और सब ओर फैलने के कारण शील आदि धर्मस्कन्धों की परिपूर्णता से 'विपुलता' है। वे कुहक (धूर्त) आदि स्वभाव वाले भिक्षु इसे प्राप्त नहीं करते, न ही पहुँचते हैं - यह अर्थ है। 'हे भिक्षुओं, वे भिक्षु मेरे हैं' - यहाँ भी 'मेरे' शब्द से अपने उद्देश्य से प्रव्रजित होने के कारण कहते हैं, और सम्यक् प्रतिपन्न (सही मार्ग पर चलने वाले) होने के कारण 'मेरे' कहा है। कहे गए के विपरीत शुक्ल पक्ष (सकारात्मक पक्ष) को समझना चाहिए। वहाँ अर्हत् मार्ग तक 'विरूढ़ि' (बढ़ना) कहलाती है, और अर्हत् फल प्राप्त होने पर 'विरूढ़ि और विपुलता' को प्राप्त हुए कहलाते हैं। गाथाएँ सुविज्ञेय (आसानी से समझने योग्य) ही हैं। නවමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. नौवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 10. නදීසොතසුත්තවණ්ණනා १०. नदीसोत सूत्र की व्याख्या। 109. දසමෙ සෙය්යථාපීති ඔපම්මදස්සනත්ථෙ නිපාතො, යථා නාමාති අත්ථො. නදියා සොතෙන ඔවුය්හෙය්යාති සීඝසොතාය හාරහාරිනියා නදියා උදකවෙගෙන හෙට්ඨතො වුය්හෙය්ය අධො හරියෙථ. පියරූපසාතරූපෙනාති පියසභාවෙන සාතසභාවෙන ච කාරණභූතෙන, තස්සං නදියං තස්සා වා පරතීරෙ මණිසුවණ්ණාදි අඤ්ඤං වා පියවත්ථු විත්තූපකරණං අත්ථි, තං ගහෙස්සාමීති නදියං පතිත්වා සොතෙන අවකඩ්ඪෙය්ය. කිඤ්චාපීති අනුජානනඅසම්භාවනත්ථෙ නිපාතො. කිං අනුජානාති, කිං න සම්භාවෙති? තෙන පුරිසෙන අධිප්පෙතස්ස පියවත්ථුස්ස තත්ථ අත්ථිභාවං අනුජානාති, තථාගමනං පන ආදීනවවන්තතාය න සම්භාවෙති. ඉදං වුත්තං හොති – අම්භො, පුරිස, යදිපි තයා අධිප්පෙතං පියවත්ථු තත්ථ උපලබ්භති, එවං ගමනෙ පන අයමාදීනවො, යං ත්වං හෙට්ඨා රහදං පත්වා මරණං මරණමත්තං වා දුක්ඛං පාපුණෙය්යාසීති. १०९. दसवें (सूत्र) में 'सेय्यथापि' उपमा दिखाने के अर्थ में निपात है, जिसका अर्थ है 'जैसे कि'। 'नदी के स्रोत से बह जाए' का अर्थ है - तीव्र प्रवाह वाली और सब कुछ बहा ले जाने वाली नदी के जल के वेग से नीचे की ओर बह जाए या नीचे ले जाया जाए। 'प्रिय रूप और सात (सुखद) रूप से' का अर्थ है - प्रिय स्वभाव और सुखद स्वभाव के कारण से; उस नदी में या उसके दूसरे किनारे पर मणि, स्वर्ण आदि अन्य कोई प्रिय वस्तु या धन-उपकरण है, 'उसे ग्रहण करूँगा' इस विचार से नदी में गिरकर स्रोत द्वारा खींच लिया जाए। 'किञ्चापि' अनुमति और असंभावना के अर्थ में निपात है। क्या अनुमति देता है, क्या संभावना नहीं करता? उस पुरुष द्वारा अभिप्रेत प्रिय वस्तु के वहाँ होने की अनुमति देता है, किन्तु दोषपूर्ण होने के कारण वैसे जाने की संभावना नहीं करता। यह कहा गया है - 'अरे पुरुष! यद्यपि तुम्हारे द्वारा चाही गई प्रिय वस्तु वहाँ उपलब्ध है, किन्तु इस प्रकार जाने में यह दोष है कि तुम नीचे दह (गहरे जल) में गिरकर मृत्यु या मृत्यु के समान दुःख को प्राप्त होगे।' අත්ථි චෙත්ථ හෙට්ඨා රහදොති එතිස්සා නදියා හෙට්ඨා අනුසොතභාගෙ අතිවිය ගම්භීරවිත්ථතො එකො මහාසරො අත්ථි. සො ච සමන්තතො වාතාභිඝාතසමුට්ඨිතාහි මණිමයපබ්බතකූටසන්නිභාහි මහතීහි ඌමීහි වීචීහි සඌමි, විසමෙසු භූමිප්පදෙසෙසු සවෙගං අනුපක්ඛන්දන්තෙන ඉමිස්සා තාව නදියා මහොඝෙන තහිං තහිං ආවට්ටමානවිපුලජලතාය බලවාමුඛසදිසෙහි සහ ආවට්ටෙහීති සාවට්ටො. තං රහදං ඔතිණ්ණසත්තෙයෙව අත්තනො නිබද්ධාමිසගොචරෙ කත්වා අජ්ඣාවසන්තෙන අතිවිය භයානකදස්සනෙන ඝොරචෙතසා දකරක්ඛසෙන සගහො සරක්ඛසො, චණ්ඩමච්ඡමකරාදිනා වා සගහො, යථාවුත්තරක්ඛසෙන සරක්ඛසො. 'वहाँ नीचे एक दह (गहरा जल) है' - इस नदी के नीचे, धारा की दिशा में, एक अत्यंत गहरा और विस्तृत विशाल सरोवर है। वह चारों ओर से हवा के थपेड़ों से उठी हुई, मणिमय पर्वत की चोटियों के समान विशाल लहरों और तरंगों के कारण 'स-ऊमि' (लहरों वाला) है। ऊबड़-खाबड़ भूमि प्रदेशों में वेग से गिरते हुए इस नदी के महाप्रवाह के कारण जगह-जगह घूमते हुए विशाल जल के कारण, बलवान मुख के समान भँवरों के साथ होने से 'स-आवट्ठो' (भँवरों वाला) है। उस दह में उतरे हुए प्राणियों को ही अपना आहार बनाकर वहाँ रहने वाले, अत्यंत भयानक दिखने वाले और घोर चित्त वाले जल-राक्षस के कारण वह 'स-गाहो' (ग्राह वाला) और 'स-रक्खसो' (राक्षस वाला) है; अथवा चण्ड मछलियों और मगरमच्छों आदि के कारण 'स-गाहो' है, और पूर्वोक्त राक्षस के कारण 'स-रक्खसो' है। යන්ති [Pg.327] එවං සප්පටිභයං යං රහදං. අම්භො පුරිසාති ආලපනං. මරණං වා නිගච්ඡසීති තාහි වා ඌමීහි අජ්ඣොත්ථටො, තෙසු වා ආවට්ටෙසු නිපතිතො සීසං උක්ඛිපිතුං අසක්කොන්තො තෙසං වා චණ්ඩමච්ඡමකරාදීනං මුඛෙ නිපතිතො. තස්ස වා දකරක්ඛසස්ස හත්ථං ගතො මරණං වා ගමිස්සසි, අථ වා පන ආයුසෙසෙ සති තතො මුච්චිත්වා අපගච්ඡන්තො තෙහි ඌමිආදීහි ජනිතඝට්ටිතවසෙන මරණමත්තං මරණප්පමාණං දුක්ඛං නිගච්ඡසි. පටිසොතං වායමෙය්යාති සො පුබ්බෙ අනුසොතං වුය්හමානො තස්ස පුරිසස්ස වචනං සුත්වා ‘‘අනත්ථො කිර මෙ උපට්ඨිතො, මච්චුමුඛෙ කිරාහං පරිවත්තාමී’’ති උප්පන්නබලවභයො සම්භමන්තො දිගුණං කත්වා උස්සාහං හත්ථෙහි ච පාදෙහි ච වායමෙය්ය තරෙය්ය, න චිරෙනෙව තීරං සම්පාපුණෙය්ය. 'यान्ति' - इस प्रकार उस भयानक दह की ओर जाते हैं। 'अरे पुरुष!' - यह संबोधन है। 'मृत्यु को प्राप्त होगे' - उन लहरों से ढँक जाने पर, या उन भँवरों में गिरकर सिर न उठा पाने पर, या उन चण्ड मछलियों और मगरमच्छों आदि के मुख में गिर जाने पर। अथवा उस जल-राक्षस के हाथ में पड़कर मृत्यु को प्राप्त होगे; अथवा यदि आयु शेष है, तो वहाँ से मुक्त होकर निकलते समय उन लहरों आदि के आघात से उत्पन्न मृत्यु के समान दुःख को प्राप्त होगे। 'धारा के विपरीत प्रयास करे' - वह जो पहले धारा के साथ बह रहा था, उस पुरुष के वचन सुनकर 'मुझ पर अनर्थ आ पड़ा है, मैं मृत्यु के मुख में घूम रहा हूँ' - ऐसा सोचकर उत्पन्न हुए प्रबल भय से घबराकर, उत्साह को दोगुना कर हाथों और पैरों से प्रयास करे, तैरे, तो शीघ्र ही किनारे पर पहुँच जाए। අත්ථස්ස විඤ්ඤාපනායාති චතුසච්චපටිවෙධානුකූලස්ස අත්ථස්ස සම්බොධනාය උපමා කතා. අයඤ්චෙත්ථ අත්ථොති අයමෙව ඉදානි වුච්චමානො ඉධ මයා අධිප්පෙතො උපමෙය්යත්ථො, යස්ස විඤ්ඤාපනාය උපමා ආහටා. 'अर्थ को समझाने के लिए' - चार आर्य सत्यों के भेदन (साक्षात्कार) के अनुकूल अर्थ के बोध के लिए उपमा दी गई है। 'और यहाँ यह अर्थ है' - यहाँ मेरे द्वारा अभिप्रेत यह उपमेय अर्थ ही अब कहा जा रहा है, जिसे समझाने के लिए उपमा लाई गई है। තණ්හායෙතං අධිවචනන්ති එත්ථ චතූහි ආකාරෙහි තණ්හාය සොතසදිසතා වෙදිතබ්බා අනුක්කමපරිවුඩ්ඪිතො අනුප්පබන්ධතො ඔසීදාපනතො දුරුත්තරණතො ච. යථා හි උපරි මහාමෙඝෙ අභිප්පවුට්ඨෙ උදකං පබ්බතකන්දරපදරසාඛායො පූරෙත්වා තතො භස්සිත්වා කුසුබ්භෙ පූරෙත්වා තතො භස්සිත්වා කුන්නදියො පූරෙත්වා තතො මහානදියො පක්ඛන්දිත්වා එකොඝං හුත්වා පවත්තමානං ‘‘නදීසොතො’’ති වුච්චති, එවමෙව අජ්ඣත්තිකබාහිරාදිවසෙන අනෙකභෙදෙසු රූපාදීසු ආරම්මණෙසු ලොභො උප්පජ්ජිත්වා අනුක්කමෙන පරිවුඩ්ඪිං ගච්ඡන්තො ‘‘තණ්හාසොතො’’ති වුච්චති, යථා ච නදීසොතො ආගමනතො යාව සමුද්දප්පත්ති, තාව සති විච්ඡෙදපච්චයාභාවෙ අවිච්ඡිජ්ජමානො අනුප්පබන්ධෙන පවත්තති, එවං තණ්හාසොතොපි ආගමනතො පට්ඨාය අසති විච්ඡෙදපච්චයෙ අවිච්ඡිජ්ජමානො අපායසමුද්දාභිමුඛො අනුප්පබන්ධෙන පවත්තති. යථා පන නදීසොතො තදන්තොගධෙ සත්තෙ ඔසීදාපෙති, සීසං උක්ඛිපිතුං න දෙති, මරණං වා මරණමත්තං වා දුක්ඛං පාපෙති, එවං තණ්හාසොතොපි අත්තනො සොතන්තොගතෙ සත්තෙ ඔසීදාපෙති, පඤ්ඤාසීසං [Pg.328] උක්ඛිපිතුං න දෙති, කුසලමූලච්ඡෙදනෙන සංකිලෙසධම්මසමාපජ්ජනෙන ච මරණං වා මරණමත්තං වා දුක්ඛං පාපෙති. 'यह तृष्णा का पर्यायवाची है' - यहाँ चार प्रकार से तृष्णा की स्रोत के साथ समानता समझनी चाहिए: क्रमशः बढ़ने से, निरंतरता से, डुबो देने से और पार करने में कठिन होने से। जैसे ऊपर महामेघ के बरसने पर जल पर्वत की कंदराओं, दरारों और शाखाओं को भरकर, वहाँ से गिरकर छोटे गड्ढों को भरकर, वहाँ से गिरकर छोटी नदियों को भरकर, फिर बड़ी नदियों में गिरकर एक प्रवाह होकर बहता हुआ 'नदी-स्रोत' कहलाता है; वैसे ही आध्यात्मिक और बाह्य आदि के भेद से अनेक प्रकार के रूप आदि आलम्बनों में लोभ उत्पन्न होकर क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होता हुआ 'तृष्णा-स्रोत' कहलाता है। और जैसे नदी का स्रोत उद्गम से लेकर समुद्र तक पहुँचने तक, विच्छेद के कारणों के अभाव में, बिना टूटे निरंतर बहता है; वैसे ही तृष्णा-स्रोत भी आरम्भ से लेकर विच्छेद के कारणों के न होने पर, बिना टूटे अपाय-रूपी समुद्र की ओर निरंतर बहता है। जैसे नदी का स्रोत अपने भीतर आए प्राणियों को डुबो देता है, सिर उठाने नहीं देता, मृत्यु या मृत्यु के समान दुःख पहुँचाता है; वैसे ही तृष्णा-स्रोत भी अपने प्रवाह में आए प्राणियों को डुबो देता है, प्रज्ञा-रूपी सिर को उठाने नहीं देता, कुशल मूलों के छेदन और संक्लेश धर्मों की प्राप्ति से मृत्यु या मृत्यु के समान दुःख पहुँचाता है। යථා ච නදියා සොතො මහොඝභාවෙන පවත්තමානො උළුම්පං වා නාවං වා බන්ධිතුං නෙතුඤ්ච ඡෙකං පුරිසං නිස්සාය පරතීරං ගන්තුං අජ්ඣාසයං කත්වා තජ්ජං වායාමං කරොන්තෙන තරිතබ්බො, න යෙන වා තෙන වාති දුරුත්තරො, එවං තණ්හාසොතොපි කාමොඝභවොඝභූතො සීලසංවරං පූරෙතුං සමථවිපස්සනාසු කම්මං කාතුං ‘‘නිපකෙන අරහත්තං පාපුණිස්සාමී’’ති අජ්ඣාසයං සමුට්ඨාපෙත්වා කල්යාණමිත්තෙ නිස්සාය සමථවිපස්සනානාවං අභිරුහිත්වා සම්මාවායාමං කරොන්තෙන තරිතබ්බො, න යෙන වා තෙන වාති දුරුත්තරො. එවං අනුක්කමපරිවුඩ්ඪිතො අනුප්පබන්ධතො ඔසීදාපනතො දුරුත්තරණතොති චතූහි ආකාරෙහි තණ්හාය නදීසොතසදිසතා වෙදිතබ්බා. जैसे नदी का स्रोत महाबाढ़ के रूप में बहते हुए, बेड़े या नाव को बांधने और ले जाने के लिए कुशल पुरुष का आश्रय लेकर, दूसरे किनारे जाने का संकल्प कर, उसके अनुरूप प्रयास करने वाले द्वारा पार किया जाना चाहिए, न कि जैसे-तैसे, क्योंकि वह दुस्तर है; वैसे ही तृष्णा-स्रोत भी, जो काम-ओघ और भव-ओघ स्वरूप है, शील-संवर को पूर्ण करने के लिए, शमथ-विपश्यना में कर्म करने के लिए, 'प्रज्ञावान होकर अर्हत्व प्राप्त करूँगा' ऐसा संकल्प जगाकर, कल्याणमित्रों का आश्रय लेकर, शमथ-विपश्यना रूपी नाव पर चढ़कर, सम्यक् व्यायाम करने वाले द्वारा पार किया जाना चाहिए, न कि जैसे-तैसे, क्योंकि वह दुस्तर है। इस प्रकार, क्रमिक वृद्धि, निरंतरता, डुबो देने की प्रवृत्ति और दुस्तरता—इन चार आकारों से तृष्णा की नदी-स्रोत के साथ समानता जाननी चाहिए। පියරූපං සාතරූපන්ති පියජාතිකං පියසභාවං පියරූපං, මධුරජාතිකං මධුරසභාවං සාතරූපං, ඉට්ඨසභාවන්ති අත්ථො. ඡන්නෙතන්ති ඡන්නං එතං. අජ්ඣත්තිකානන්ති එත්ථ ‘‘එවං මයං අත්තාති ගහණං ගමිස්සාමා’’ති ඉමිනා විය අධිප්පායෙන අත්තානං අධිකාරං කත්වා පවත්තානීති අජ්ඣත්තිකානි. තත්ථ ගොචරජ්ඣත්තං, නියකජ්ඣත්තං, විසයජ්ඣත්තං, අජ්ඣත්තජ්ඣත්තන්ති චතුබ්බිධං අජ්ඣත්තං. තෙසු ‘‘අජ්ඣත්තරතො සමාහිතො’’ති එවමාදීසු (ධ. ප. 362) වුත්තං ඉදං ගොචරජ්ඣත්තං නාම. ‘‘අජ්ඣත්තං සම්පසාදන’’න්ති (දී. නි. 1.228; ධ. ස. 161) ආගතං ඉදං නියකජ්ඣත්තං නාම. ‘‘සබ්බනිමිත්තානං අමනසිකාරා අජ්ඣත්තං සුඤ්ඤතං උපසම්පජ්ජ විහරතී’’ති (ම. නි. 3.187) එවමාගතං ඉදං විසයජ්ඣත්තං නාම. ‘‘අජ්ඣත්තිකා ධම්මා, බාහිරා ධම්මා’’ති (ධ. ස. තිකමාතිකා 20) එත්ථ වුත්තං අජ්ඣත්තං අජ්ඣත්තජ්ඣත්තං නාම. ඉධාපි එතදෙව අධිප්පෙතං, තස්මා අජ්ඣත්තානියෙව අජ්ඣත්තිකානි. අථ වා යථාවුත්තෙනෙව අත්ථෙන ‘‘අජ්ඣත්තා ධම්මා, බහිද්ධා ධම්මා’’තිආදීසු විය තෙසු අජ්ඣත්තෙසු භවානි අජ්ඣත්තිකානි, චක්ඛාදීනි. තෙසං අජ්ඣත්තිකානං. 'पियरूपं सातरूपं' का अर्थ है—प्रिय जाति वाला, प्रिय स्वभाव वाला 'पियरूप' है; मधुर जाति वाला, मधुर स्वभाव वाला 'सातरूप' है, अर्थात् इष्ट स्वभाव वाला। 'छन्नेतं' का अर्थ है—ये छह। 'अज्झत्तिकानं' के विषय में—यहाँ "इस प्रकार हम 'आत्मा' के रूप में ग्रहण करेंगे" इस अभिप्राय से मानो स्वयं को अधिकार में करके प्रवृत्त होने के कारण 'अध्यात्म' (आंतरिक) हैं। वहाँ गोचर-अध्यात्म, निजक-अध्यात्म, विषय-अध्यात्म और अध्यात्म-अध्यात्म—ये चार प्रकार के अध्यात्म हैं। उनमें से "अध्यात्म में रत, समाहित" (धम्मपद ३६२) आदि में कहा गया यह 'गोचर-अध्यात्म' है। "अध्यात्म में संप्रसाद" (दीघ निकाय १.२२८; धम्मसंगणि १६१) में आया यह 'निजक-अध्यात्म' है। "सभी निमित्तों के अमनसिकार से अध्यात्म में शून्यता को प्राप्त कर विहार करता है" (मज्झिम निकाय ३.१८७) में आया यह 'विषय-अध्यात्म' है। "आंतरिक धर्म, बाह्य धर्म" (धम्मसंगणि त्रिक-मातृका २०) यहाँ कहा गया अध्यात्म 'अध्यात्म-अध्यात्म' है। यहाँ भी यही अभिप्रेत है, इसलिए जो अध्यात्म हैं वे ही 'अध्यात्मिक' हैं। अथवा, पूर्वोक्त अर्थ के अनुसार ही "आंतरिक धर्म, बाह्य धर्म" आदि के समान, उन अध्यात्मों में होने वाले चक्षु आदि 'अध्यात्मिक' हैं। उन अध्यात्मिकों का। ආයතනානන්ති එත්ථ ආයතනතො, ආයානං තනනතො, ආයතස්ස ච නයනතො ආයතනානීති. චක්ඛාදීසු හි තංතංද්වාරවත්ථුකා චිත්තචෙතසිකා ධම්මා සකෙන සකෙන අනුභවනාදිනා කිච්චෙන ආයතන්ති උට්ඨහන්ති ඝටන්ති වායමන්ති, තෙ ච ආයභූතෙ ධම්මෙ එතානි තනොන්ති විත්ථාරෙන්ති[Pg.329], යඤ්ච අනමතග්ගෙ සංසාරෙ පවත්තං අතිවිය ආයතං වට්ටදුක්ඛං, තං නයන්ති පවත්තෙන්ති. ඉති සබ්බථාපිමෙ ධම්මා ආයතනතො, ආයානං තනනතො, ආයතස්ස ච නයනතො ආයතනානීති වුච්චන්ති. අපිච නිවාසට්ඨානට්ඨෙන, ආකරට්ඨෙන, සමොසරණට්ඨානට්ඨෙන, සඤ්ජාතිදෙසට්ඨෙන, කාරණට්ඨෙන ච ආයතනං වෙදිතබ්බං. තථා හි ලොකෙ ‘‘ඉස්සරායතනං දෙවායතන’’න්තිආදීසු නිවාසට්ඨානං ආයතනන්ති වුච්චති. ‘‘සුවණ්ණායතනං රජතායතන’’න්තිආදීසු ආකරො. සාසනෙ පන ‘‘මනොරමෙ ආයතනෙ, සෙවන්ති නං විහඞ්ගමා’’තිආදීසු සමොසරණට්ඨානං. ‘‘දක්ඛිණාපථො ගුන්නං ආයතන’’න්තිආදීසු සඤ්ජාතිදෙසො. ‘‘තත්ර තත්රෙව සක්ඛිභබ්බතං පාපුණාති සති සතිආයතනෙ’’තිආදීසු (ම. නි. 3.158; අ. නි. 3.102) කාරණං ආයතනන්ති වුච්චති. චක්ඛාදීසු ච තෙ තෙ චිත්තචෙතසිකා ධම්මා නිවසන්ති තදායත්තවුත්තිතායාති චක්ඛාදයො තෙසං නිවාසට්ඨානං. තත්ථ ච තෙ ආකිණ්ණා තන්නිස්සිතත්තාති තෙ නෙසං ආකරො, සමොසරණට්ඨානඤ්ච තත්ථ වත්ථුද්වාරභාවෙන සමොසරණතො, සඤ්ජාතිදෙසො ච තන්නිස්සයභාවෙන තෙසං තත්ථෙව උප්පත්තිතො, කාරණඤ්ච තදභාවෙ තෙසං අභාවතොති. ඉති නිවාසට්ඨානට්ඨෙන, ආකරට්ඨෙන, සමොසරණට්ඨානට්ඨෙන, සඤ්ජාතිදෙසට්ඨෙන, කාරණට්ඨෙනාති ඉමෙහි කාරණෙහි චක්ඛාදීනි ආයතනානීති වුච්චන්ති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡන්නෙතං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනාන’’න්ති. 'आयतन' के विषय में—यहाँ आयतन होने से, आय (आगम) को विस्तृत (तनन) करने से, और आयत (दीर्घ) को ले जाने (नयन) से 'आयतन' कहलाते हैं। चक्षु आदि में उन-उन द्वारों और वस्तुओं पर आधारित चित्त-चैतसिक धर्म अपने-अपने अनुभव आदि कार्यों के द्वारा 'आयतन' (प्रयत्न) करते हैं, उठते हैं, घटित होते हैं, प्रयास करते हैं; और वे आय-भूत (उत्पन्न होने वाले) धर्मों को विस्तृत करते हैं; और जो अनादि संसार में प्रवृत्त अत्यंत दीर्घ (आयत) वट्ट-दुःख है, उसे ले जाते हैं, प्रवृत्त करते हैं। इस प्रकार, इन सभी प्रकारों से ये धर्म आयतन होने से, आय को विस्तृत करने से, और आयत को ले जाने से 'आयतन' कहे जाते हैं। इसके अतिरिक्त, निवास-स्थान के अर्थ में, खान (आकर) के अर्थ में, मिलन-स्थान के अर्थ में, उत्पत्ति-स्थान के अर्थ में और कारण के अर्थ में 'आयतन' को जानना चाहिए। जैसे लोक में "ईश्वरायतन, देवायतन" आदि में निवास-स्थान को आयतन कहा जाता है। "सुवर्णायातन, रजतायतन" आदि में खान (आकर) को। शासन (बुद्ध-वचन) में तो "मनोरम आयतन में, पक्षी उसका सेवन करते हैं" आदि में मिलन-स्थान को। "दक्षिणापथ गौओं का आयतन है" आदि में उत्पत्ति-स्थान को। "वहाँ-वहाँ ही साक्षात् करने की योग्यता प्राप्त करता है, आयतन (कारण) के होने पर" आदि में कारण को आयतन कहा जाता है। चक्षु आदि में वे-वे चित्त-चैतसिक धर्म निवास करते हैं क्योंकि उनकी प्रवृत्ति उन पर आश्रित है, इसलिए चक्षु आदि उनके निवास-स्थान हैं। और वहाँ वे व्याप्त हैं क्योंकि वे उन पर आश्रित हैं, इसलिए वे उनकी खान (आकर) हैं; और वहाँ वस्तु-द्वार के रूप में मिलने के कारण वे मिलन-स्थान हैं; और उनके आश्रय होने के कारण उनकी वहीं उत्पत्ति होने से वे उत्पत्ति-स्थान हैं; और उनके अभाव में उनका अभाव होने से वे कारण हैं। इस प्रकार निवास-स्थान, खान, मिलन-स्थान, उत्पत्ति-स्थान और कारण—इन कारणों से चक्षु आदि 'आयतन' कहे जाते हैं। इसीलिए कहा गया है—"ये छह आंतरिक आयतन हैं।" යදිපි රූපාදයොපි ධම්මා ‘‘රූපං ලොකෙ පියරූපං සාතරූපං, එත්ථෙසා තණ්හා උප්පජ්ජමානා උප්පජ්ජතී’’ති තණ්හාවත්ථුභාවතො පියරූපසාතරූපභාවෙන වුත්තා. චක්ඛාදිකෙ පන මුඤ්චිත්වා අත්තභාවපඤ්ඤත්තියා අභාවතො ‘‘මම චක්ඛු මම සොත’’න්තිආදිනා අධිකසිනෙහවත්ථුභාවෙන චක්ඛාදයො සාතිසයං පියරූපං සාතරූපන්ති නිද්දෙසං අරහන්තීති දස්සෙතුං ‘‘පියරූපං සාතරූපන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, ඡන්නෙතං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං අධිවචන’’න්ති වුත්තං. यद्यपि रूप आदि धर्म भी "लोक में रूप पियरूप और सातरूप है, यहाँ यह तृष्णा उत्पन्न होती हुई उत्पन्न होती है" इस प्रकार तृष्णा के वस्तु होने के कारण पियरूप-सातरूप भाव से कहे गए हैं। किंतु चक्षु आदि को छोड़कर आत्मभाव की प्रज्ञप्ति का अभाव होने से, "मेरा चक्षु, मेरा श्रोत्र" आदि के द्वारा अधिक स्नेह के वस्तु होने के कारण, चक्षु आदि विशेष रूप से 'पियरूप' और 'सातरूप' इस निर्देश के योग्य हैं—यह दिखाने के लिए कहा गया है: "भिक्षुओं! 'पियरूप सातरूप' इन छह आंतरिक आयतनों का ही नाम है।" ඔරම්භාගියානන්ති එත්ථ ඔරං වුච්චති කාමධාතු, තප්පරියාපන්නා ඔරම්භාගා, පච්චයභාවෙන තෙසං හිතාති ඔරම්භාගියා. යස්ස සංවිජ්ජන්ති, තං පුග්ගලං වට්ටස්මිං සංයොජෙන්ති බන්ධන්තීති සංයොජනානි. සක්කායදිට්ඨිවිචිකිච්ඡාසීලබ්බතපරාමාසකාමරාගබ්යාපාදානං එතං අධිවචනං. තෙ [Pg.330] හි කාමභවූපගානං සඞ්ඛාරානං පච්චයා හුත්වා රූපාරූපධාතුතො හෙට්ඨාභාවෙන නිහීනභාවෙන ඔරම්භාගභූතෙන කාමභවෙන සත්තෙ සංයොජෙන්ති. එතෙනෙව තෙසං හෙට්ඨාරහදසදිසතා දීපිතාති දට්ඨබ්බා. ඌමිභයන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, කොධුපායාසස්සෙතං අධිවචනන්ති භායති එතස්මාති භයං, ඌමි එව භයන්ති ඌමිභයං. කුජ්ඣනට්ඨෙන කොධො, ස්වෙව චිත්තස්ස සරීරස්ස ච අභිප්පමද්දනපවෙධනුප්පාදනෙන දළ්හං ආයාසනට්ඨෙන උපායාසො. "ओरम्भागीय" (अधोभागीय) के विषय में यहाँ 'ओर' कामधातु को कहा जाता है, उससे सम्बद्ध 'ओरम्भागा' हैं, और उनके लिए प्रत्यय (कारण) होने से 'ओरम्भागीय' हैं। जो विद्यमान होने पर उस पुद्गल को संसार (वट्ट) में संयोजित करते हैं, बाँधते हैं, वे 'संयोजन' हैं। यह सत्कायदृष्टि, विचिकित्सा, शीलव्रतपरामर्श, कामराग और व्यापाद का अधिवाचन (नाम) है। वे कामभव में जाने वाले संस्कारों के प्रत्यय होकर, रूप और अरूप धातु से नीचे होने के कारण, हीन होने के कारण और अधोभागीय होने के कारण कामभव में सत्त्वों को संयोजित करते हैं। इसी से उनकी नीचे रहने वाले दास के समान स्थिति दर्शायी गई है, ऐसा समझना चाहिए। "ऊमिभय" (लहरों का भय), भिक्षुओं! यह क्रोध और उपायास (हताशा) का अधिवाचन है—इससे डरते हैं इसलिए 'भय' है, लहर ही भय है इसलिए 'ऊमिभय' है। क्रोध करने के अर्थ में 'क्रोध' है, और वही चित्त और शरीर को अत्यधिक प्रताड़ित करने, कँपाने और उत्पन्न करने के कारण दृढ़ता से कष्ट देने के अर्थ में 'उपायास' है। එත්ථ ච අනෙකවාරං පවත්තිත්වා අත්තනා සමවෙතං සත්තං අජ්ඣොත්ථරිත්වා සීසං උක්ඛිපිතුං අදත්වා අනයබ්යසනාපාදනෙන කොධුපායාසස්ස ඌමිසදිසතා දට්ඨබ්බා. තථා කාමගුණානං කිලෙසාභිභූතෙ සත්තෙ ඉතො ච එත්තො, එත්තො ච ඉතොති එවං මනාපියරූපාදිවිසයසඞ්ඛාතෙ අත්තනි සංසාරෙත්වා යථා තතො බහිභූතෙ නෙක්ඛම්මෙ චිත්තම්පි න උප්පජ්ජති එවං ආවට්ටෙත්වා බ්යසනාපාදනෙන ආවට්ටසදිසතා දට්ඨබ්බා. යථා පන ගහරක්ඛසොපි ආරක්ඛරහිතං අත්තනො ගොචරභූමිගතං පුරිසං අභිභුය්ය ගහෙත්වා අගොචරෙ ඨිතම්පි රක්ඛසමායාය ගොචරං නෙත්වා භෙරවරූපදස්සනාදිනා අවසං අත්තනො උපකාරං කාතුං අසමත්ථං කත්වා අන්වාවිසිත්වා වණ්ණබලභොගයසසුඛෙහිපි වියොජෙන්තො මහන්තං අනයබ්යසනං ආපාදෙති, එවං මාතුගාමොපි යොනිසොමනසිකාරරහිතං අවීරපුරිසං ඉත්ථිකුත්තභූතෙහි අත්තනො හාවභාවවිලාසෙහි අභිභුය්ය ගහෙත්වා වීරජාතියම්පි අත්තනො රූපාදීහි පලොභනවසෙන ඉත්ථිමායාය අන්වාවිසිත්වා අවසං අත්තනො උපකාරධම්මෙ සීලාදයො සම්පාදෙතුං අසමත්ථං කරොන්තො ගුණවණ්ණාදීහි වියොජෙත්වා මහන්තං අනයබ්යසනං ආපාදෙති, එවං මාතුගාමස්ස ගහරක්ඛසසදිසතා දට්ඨබ්බා. තෙන වුත්තං ‘‘ආවට්ටන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චන්නෙතං කාමගුණානං අධිවචනං, ගහරක්ඛසොති ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්සෙතං අධිවචන’’න්ති. और यहाँ अनेक बार प्रवृत्त होकर, अपने साथ मिले हुए सत्त्व को अभिभूत कर, सिर उठाने न देकर, अनय और व्यसन (विपत्ति) में डालने के कारण क्रोध और उपायास की लहरों के साथ समानता देखनी चाहिए। उसी प्रकार कामगुणों द्वारा क्लेशों से अभिभूत सत्त्वों को इधर-उधर, यहाँ-वहाँ, इस प्रकार मनोज्ञ रूप आदि विषयों में स्वयं को संसार में घुमाकर, जिससे उससे बाहर स्थित नैष्क्रम्य (त्याग) में चित्त भी उत्पन्न न हो, इस प्रकार भँवर में डालकर विपत्ति में डालने के कारण 'आवर्त्त' (भँवर) के साथ समानता देखनी चाहिए। जैसे कोई जल-राक्षस भी रक्षक-रहित, अपने गोचर क्षेत्र में आए हुए पुरुष को अभिभूत कर, पकड़कर, अगोचर में स्थित होने पर भी राक्षस-माया से गोचर में ले जाकर, भयानक रूप दिखाने आदि से उसे विवश कर, अपना उपकार करने में असमर्थ बनाकर, उसमें प्रविष्ट होकर वर्ण, बल, भोग, यश और सुखों से भी वियुक्त कर महान अनय और व्यसन में डाल देता है; वैसे ही मातृग्राम (स्त्री) भी योनिशो मनसिकार से रहित निर्बल पुरुष को स्त्री-स्वभाव वाले अपने हाव-भाव और विलासों से अभिभूत कर, पकड़कर, वीर जाति के होने पर भी अपने रूप आदि के प्रलोभन के वश में कर, स्त्री-माया से प्रविष्ट होकर, उसे अपने उपकारी धर्मों जैसे शील आदि को सम्पादित करने में असमर्थ बनाकर, गुणों और वर्ण आदि से वियुक्त कर महान अनय और व्यसन में डाल देती है; इस प्रकार मातृग्राम की जल-राक्षस के साथ समानता देखनी चाहिए। इसीलिए कहा गया है— "भिक्षुओं! 'आवर्त्त' यह पाँच कामगुणों का अधिवाचन है, 'जल-राक्षस' भिक्षुओं! यह मातृग्राम का अधिवाचन है।" පටිසොතොති ඛො භික්ඛවෙ නෙක්ඛම්මස්සෙතං අධිවචනන්ති එත්ථ පබ්බජ්ජා සහ උපචාරෙන පඨමජ්ඣානං විපස්සනාපඤ්ඤා ච නිබ්බානඤ්ච නෙක්ඛම්මං නාම. සබ්බෙපි කුසලා ධම්මා නෙක්ඛම්මං නාම. වුත්තඤ්හෙතං – "भिक्षुओं! 'प्रतिस्रोत' (धारा के विपरीत) यह नैष्क्रम्य का अधिवाचन है"—यहाँ उपचार सहित प्रव्रज्या, प्रथम ध्यान, विपश्यना-प्रज्ञा और निर्वाण 'नैष्क्रम्य' कहलाते हैं। सभी कुशल धर्म भी 'नैष्क्रम्य' कहलाते हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘පබ්බජ්ජා [Pg.331] පඨමං ඣානං, නිබ්බානඤ්ච විපස්සනා; සබ්බෙපි කුසලා ධම්මා, නෙක්ඛම්මන්ති පවුච්චරෙ’’ති. "प्रव्रज्या, प्रथम ध्यान, निर्वाण और विपश्यना; सभी कुशल धर्मों को 'नैष्क्रम्य' कहा जाता है।" ඉමෙසං පන පබ්බජ්ජාදීනං තණ්හාසොතස්ස පටිලොමතො පටිසොතසදිසතා වෙදිතබ්බා. අවිසෙසෙන හි ධම්මවිනයො නෙක්ඛම්මං, තස්ස අධිට්ඨානං පබ්බජ්ජා ච, ධම්මවිනයො ච තණ්හාසොතස්ස පටිසොතං වුච්චති. වුත්තඤ්හෙතං – इन प्रव्रज्या आदि की तृष्णा-रूपी स्रोत के प्रतिकूल होने के कारण 'प्रतिस्रोत' के साथ समानता जाननी चाहिए। सामान्य रूप से धर्म-विनय ही नैष्क्रम्य है, उसका अधिष्ठान प्रव्रज्या है, और धर्म-विनय को तृष्णा-रूपी स्रोत का 'प्रतिस्रोत' कहा जाता है। जैसा कि कहा गया है— ‘‘පටිසොතගාමිං නිපුණං, ගම්භීරං දුද්දසං අණුං; රාගරත්තා න දක්ඛන්ති, තමොඛන්ධෙන ආවුතා’’ති. (දී. නි. 2.65; ම. නි. 1.281; සං. නි. 1.172); "प्रतिस्रोतगामी, निपुण, गंभीर, दुर्दर्श (कठिनाई से दिखने वाला) और सूक्ष्म (उस धर्म) को राग से रंगे हुए, अज्ञान के अन्धकार से ढके हुए लोग नहीं देख पाते।" වීරියාරම්භස්සාති චතුබ්බිධසම්මප්පධානවීරියස්ස. තස්ස කාමොඝාදිභෙදතණ්හාසොතසන්තරණස්ස හත්ථෙහි පාදෙහි චතුරඞ්ගනදීසොතසන්තරණවායාමස්ස සදිසතා පාකටායෙව. තථා නදීසොතස්ස තීරෙ ඨිතස්ස චක්ඛුමතො පුරිසස්ස කාමාදිං චතුබ්බිධම්පි ඔඝං තරිත්වා තස්ස පරතීරභූතෙ නිබ්බානථලෙ ඨිතස්ස පඤ්චහි චක්ඛූහි චක්ඛුමතො භගවතො සදිසභාවො. තෙන වුත්තං ‘‘චක්ඛුමා පුරිසො…පෙ… සම්මාසම්බුද්ධස්සා’’ති. "वीर्यारम्भ का" अर्थात् चार प्रकार के सम्यक् प्रधान वीर्य का। उसका कामादि भेदों वाले तृष्णा-रूपी स्रोत को पार करना, हाथ और पैरों से चार अंगों वाली नदी के स्रोत को पार करने के प्रयास के समान स्पष्ट ही है। उसी प्रकार नदी के स्रोत के किनारे खड़े चक्षुमान पुरुष की, कामादि चारों प्रकार के ओघों को पार कर उसके पारगामी तट-रूपी निर्वाण-स्थल पर स्थित पाँच चक्षुओं वाले चक्षुमान भगवान के साथ समानता है। इसीलिए कहा गया है— "चक्षुमान पुरुष... पे... सम्यक्सम्बुद्ध का।" තත්රිදං ඔපම්මසංසන්දනං – නදීසොතො විය අනුප්පබන්ධවසෙන පවත්තමානො තණ්හාසොතො, තෙන වුය්හමානො පුරිසො විය අනමතග්ගෙ සංසාරවට්ටෙ පරිබ්භමනතො තණ්හාසොතෙන වුය්හමානො සත්තො, තස්ස තත්ථ පියරූපසාතරූපවත්ථුස්මිං අභිනිවෙසො විය ඉමස්ස චක්ඛාදීසු අභිනිවෙසො, සඌමිසාවට්ටසගහරක්ඛසො හෙට්ඨාරහදො විය කොධුපායාසපඤ්චකාමගුණමාතුගාමසමාකුලො පඤ්චොරම්භාගියසංයොජනසමූහො, තමත්ථං යථාභූතං විදිත්වා තස්ස නදීසොතස්ස පරතීරෙ ඨිතො චක්ඛුමා පුරිසො විය සකලං සංසාරාදීනවං සබ්බඤ්ච ඤෙය්යධම්මං යථාභූතං විදිත්වා තණ්හාසොතස්ස පරතීරභූතෙ නිබ්බානථලෙ ඨිතො සමන්තචක්ඛු භගවා, තස්ස පුරිසස්ස තස්මිං නදියා සොතෙන වුය්හමානෙ පුරිසෙ අනුකම්පාය රහදස්ස රහදාදීනවස්ස ච ආචික්ඛනං විය තණ්හාසොතෙන වුය්හමානස්ස සත්තස්ස මහාකරුණාය භගවතො තණ්හාදීනං තදාදීනවස්ස ච විභාවනා, තස්ස වචනං අසද්දහිත්වා අනුසොතගාමිනො [Pg.332] තස්ස පුරිසස්ස තස්මිං රහදෙ මරණප්පත්තිමරණමත්තදුක්ඛප්පත්තියො විය භගවතො වචනං අසම්පටිච්ඡන්තස්ස අපායුප්පත්ති, සුගතියං දුක්ඛුප්පත්ති ච, තස්ස පන වචනං සද්දහිත්වා හත්ථෙහි ච පාදෙහි ච වායාමකරණං විය තෙන ච වායාමෙන පරතීරං පත්වා සුඛෙන යථිච්ඡිතට්ඨානගමනං විය භගවතො වචනං සම්පටිච්ඡිත්වා තණ්හාදීසු ආදීනවං පස්සිත්වා තණ්හාසොතස්ස පටිසොතපබ්බජ්ජාදිනෙක්ඛම්මවසෙන වීරියාරම්භො, ආරද්ධවීරියස්ස ච තෙනෙව වීරියාරම්භෙන තණ්හාසොතාතික්කමනං නිබ්බානතීරං පත්වා අරහත්තඵලසමාපත්තිවසෙන යථාරුචි සුඛවිහාරොති. यहाँ यह उपमा का मिलान है - नदी के स्रोत की तरह निरंतर बहने वाला तृष्णा-स्रोत है, उसमें बहते हुए पुरुष की तरह अनादि संसार-चक्र में भटकता हुआ तृष्णा-स्रोत से बहता हुआ प्राणी है, उसका वहाँ प्रिय और मधुर वस्तुओं में अभिनिवेश (आसक्ति) की तरह इसका चक्षु आदि में अभिनिवेश है, लहरों, भँवरों, ग्राहों और राक्षसों से युक्त नीचे के दह (गहरे जलाशय) की तरह क्रोध, उपयास, पाँच कामगुण और स्त्रियों से व्याप्त पाँच ओरामभागीय संयोजनों का समूह है, उस अर्थ को यथाभूत जानकर उस नदी-स्रोत के दूसरे तट पर खड़े चक्षुमान पुरुष की तरह संपूर्ण संसार के दोषों और सभी ज्ञेय धर्मों को यथाभूत जानकर तृष्णा-स्रोत के दूसरे तट रूपी निर्वाण-स्थल पर स्थित समन्तचक्षु भगवान हैं, उस पुरुष का उस नदी के स्रोत में बहते हुए पुरुष पर अनुकम्पा से दह और दह के दोषों को बताने की तरह तृष्णा-स्रोत में बहते हुए प्राणी पर महाकरुणा से भगवान द्वारा तृष्णा आदि और उनके दोषों का स्पष्टीकरण है, उसके वचन पर श्रद्धा न कर अनुस्रोत (धारा के साथ) जाने वाले उस पुरुष की उस दह में मृत्यु और मृत्यु-तुल्य दुःख की प्राप्ति की तरह भगवान के वचन को स्वीकार न करने वाले की अपायों में उत्पत्ति और सुगति में दुःख की उत्पत्ति है, परन्तु उसके वचन पर श्रद्धा कर हाथों और पैरों से प्रयत्न करने की तरह और उस प्रयत्न से दूसरे तट पर पहुँचकर सुखपूर्वक इच्छित स्थान पर जाने की तरह भगवान के वचन को स्वीकार कर तृष्णा आदि में दोष देखकर तृष्णा-स्रोत के प्रतिस्रोत (धारा के विपरीत) प्रव्रज्या और नैष्क्रम्य के वश से वीर्य का आरम्भ है, और आरब्ध-वीर्य वाले का उसी वीर्य-आरम्भ से तृष्णा-स्रोत को पार कर निर्वाण-तट पर पहुँचकर अर्हत्फल-समापत्ति के वश से इच्छानुसार सुख-विहार है। ගාථාසු සහාපි දුක්ඛෙන ජහෙය්ය කාමෙති ඣානමග්ගාධිගමත්ථං සමථවිපස්සනානුයොගං කරොන්තො භික්ඛු යදිපි තෙසං පුබ්බභාගපටිපදා කිච්ඡෙන කසිරෙන සම්පජ්ජති, න සුඛෙන වීථිං ඔතරති පුබ්බභාගභාවනාය කිලෙසානං බලවභාවතො, ඉන්ද්රියානං වා අතික්ඛභාවතො. තථා සති සහාපි දුක්ඛෙන ජහෙය්ය කාමෙ, පඨමජ්ඣානෙන වික්ඛම්භෙන්තො තතියමග්ගෙන සමුච්ඡින්දන්තො කිලෙසකාමෙ පජහෙය්ය. එතෙන දුක්ඛපටිපදෙ ඣානමග්ගෙ දස්සෙති. गाथाओं में 'दुःख के साथ भी काम (इच्छाओं) को छोड़ दे' का अर्थ है - ध्यान और मार्ग की प्राप्ति के लिए शमथ और विपश्यना का अभ्यास करने वाला भिक्षु, यद्यपि उनकी पूर्वभाग-प्रतिपदा (प्रारंभिक साधना) कष्ट और कठिनाई से सिद्ध होती है, क्लेशों की प्रबलता के कारण या इन्द्रियों की तीक्ष्णता के कारण पूर्वभाग-भावना में सुखपूर्वक मार्ग पर नहीं उतरता। ऐसा होने पर, दुःख के साथ भी काम (इच्छाओं) को छोड़ दे, प्रथम ध्यान से विक्खम्भन (दबाते) करते हुए और तृतीय मार्ग से समूच्छेद (जड़ से काटते) करते हुए क्लेश-कामों को छोड़ दे। इससे दुःख-प्रतिपदा वाले ध्यान-मार्ग को दिखाते हैं। යොගක්ඛෙමං ආයතිං පත්ථයානොති අනාගාමිතං අරහත්තං ඉච්ඡන්තො ආකඞ්ඛමානො. අයඤ්හෙත්ථ අධිප්පායො – යදිපි එතරහි කිච්ඡෙන කසිරෙන ඣානපුරිමමග්ගෙ අධිගච්ඡාමි, ඉමෙ පන නිස්සාය උපරි අරහත්තං අධිගන්ත්වා කතකිච්චො පහීනසබ්බදුක්ඛො භවිස්සාමීති සහාපි දුක්ඛෙන ඣානාදීහි කාමෙ පජහෙය්යාති. අථ වා යො කාමවිතක්කබහුලො පුග්ගලො කල්යාණමිත්තස්ස වසෙන පබ්බජ්ජං සීලවිසොධනං ඣානාදීනං පුබ්බභාගපටිපත්තිං වා පටිපජ්ජන්තො කිච්ඡෙන කසිරෙන අස්සුමුඛො රොදමානො තං විතක්කං වික්ඛම්භෙති, තං සන්ධාය වුත්තං ‘‘සහාපි දුක්ඛෙන ජහෙය්ය කාමෙ’’ති. සො හි කිච්ඡෙනපි කාමෙ පජහන්තො ඣානං නිබ්බත්තෙත්වා තං ඣානං පාදකං කත්වා විපස්සන්තො අනුක්කමෙන අරහත්තෙ පතිට්ඨහෙය්ය. තෙන වුත්තං ‘‘යොගක්ඛෙමං ආයතිං පත්ථයානො’’ති. 'भविष्य में योगक्षेम की प्रार्थना करता हुआ' का अर्थ है - अनागामीपन और अर्हत्पद की इच्छा और आकांक्षा करता हुआ। यहाँ यह अभिप्राय है - यद्यपि अभी कष्ट और कठिनाई से ध्यान और पूर्व-मार्गों को प्राप्त करता हूँ, परन्तु इनका आश्रय लेकर ऊपर अर्हत्पद प्राप्त कर कृतकृत्य और समस्त दुखों से मुक्त हो जाऊँगा, इस प्रकार दुःख के साथ भी ध्यान आदि के द्वारा काम (इच्छाओं) को छोड़ दे। अथवा, जो काम-वितर्क बहुल व्यक्ति कल्याणमित्र के वश से प्रव्रज्या, शील-विशोधन या ध्यान आदि की पूर्वभाग-प्रतिपत्ति का पालन करते हुए कष्ट और कठिनाई से आँसू भरे मुख से रोते हुए उस वितर्क को दबाता है, उसके सन्दर्भ में कहा गया है - 'दुःख के साथ भी काम (इच्छाओं) को छोड़ दे'। वह कठिनाई से भी काम (इच्छाओं) को छोड़ते हुए ध्यान उत्पन्न कर, उस ध्यान को आधार बनाकर विपश्यना करते हुए क्रमशः अर्हत्पद में प्रतिष्ठित हो जाता है। इसलिए कहा गया है - 'भविष्य में योगक्षेम की प्रार्थना करता हुआ'। සම්මප්පජානොති විපස්සනාසහිතාය මග්ගපඤ්ඤාය සම්මදෙව පජානන්තො. සුවිමුත්තචිත්තොති තස්ස අරියමග්ගාධිගමස්ස අනන්තරං ඵලවිමුත්තියා සුට්ඨු විමුත්තචිත්තො. විමුත්තියා ඵස්සයෙ තත්ථ තත්ථාති තස්මිං තස්මිං මග්ගඵලාධිගමනකාලෙ [Pg.333] විමුත්තිං නිබ්බානං ඵස්සයෙ ඵුසෙය්ය පාපුණෙය්ය අධිගච්ඡෙය්ය සච්ඡිකරෙය්ය. උපයොගත්ථෙ හි ‘‘විමුත්තියා’’ති ඉදං සාමිවචනං. විමුත්තියා වා ආරම්මණභූතාය තත්ථ තත්ථ තංතංඵලසමාපත්තිකාලෙ අත්තනො ඵලචිත්තං ඵස්සයෙ ඵුසෙය්ය පාපුණෙය්ය, නිබ්බානොගධාය ඵලසමාපත්තියා විහරෙය්යාති අත්ථො. ස වෙදගූති සො වෙදසඞ්ඛාතෙන මග්ගඤාණෙන චතුන්නං සච්චානං ගතත්තා පටිවිද්ධත්තා වෙදගූ. ලොකන්තගූති ඛන්ධලොකස්ස පරියන්තං ගතො. සෙසං සුවිඤ්ඤෙය්යමෙව. 'सम्मापजानो' (सम्यक् प्रज्ञावान) का अर्थ है - विपश्यना युक्त मार्ग-प्रज्ञा से भली-भाँति जानने वाला। 'सुविमुक्तचित्त' का अर्थ है - उस आर्यमार्ग की प्राप्ति के अनन्तर फल-विमुक्ति से भली-भाँति मुक्त चित्त वाला। 'विमुत्तिया फस्सये तत्थ तत्थ' का अर्थ है - उस-उस मार्ग-फल की प्राप्ति के समय विमुक्ति (निर्वाण) का स्पर्श करे, उसे प्राप्त करे, उसका साक्षात्कार करे। यहाँ 'विमुत्तिया' यह षष्ठी विभक्ति कर्म के अर्थ में है। अथवा, विमुक्ति के आलम्बन होने पर उस-उस फल-समापत्ति के समय अपने फल-चित्त से स्पर्श करे, प्राप्त करे, निर्वाण में निमग्न फल-समापत्ति से विहार करे - यह अर्थ है। 'स वेदगू' का अर्थ है - वह वेद संज्ञक मार्ग-ज्ञान से चारों सत्यों को प्राप्त करने के कारण, उनका भेदन करने के कारण 'वेदगू' है। 'लोकान्तगू' का अर्थ है - स्कन्ध-लोक के अन्त तक पहुँचा हुआ। शेष सुविज्ञेय ही है। දසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. दसवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 11. චරසුත්තවණ්ණනා ११. चर-सूत्र की व्याख्या। 110. එකාදසමෙ චරතොති ගච්ඡන්තස්ස, චඞ්කමන්තස්ස වා. උප්පජ්ජති කාමවිතක්කො වාති වත්ථුකාමෙසු අවීතරාගතාය තාදිසෙ පච්චයෙ කාමපටිසංයුත්තො වා විතක්කො උප්පජ්ජති චෙ, යදි උප්පජ්ජති. බ්යාපාදවිතක්කො වා විහිංසාවිතක්කො වාති ආඝාතනිමිත්තබ්යාපාදපටිසංයුත්තො වා විතක්කො, ලෙඩ්ඩුදණ්ඩාදීහි පරවිහෙඨනවසෙන විහිංසාපටිසංයුත්තො වා විතක්කො උප්පජ්ජති චෙති සම්බන්ධො. අධිවාසෙතීති තං යථාවුත්තං කාමවිතක්කාදිං යථාපච්චයං අත්තනො චිත්තෙ උප්පන්නං ‘‘ඉතිපායං විතක්කො පාපකො, ඉතිපි අකුසලො, ඉතිපි සාවජ්ජො, සො ච ඛො අත්තබ්යාබාධායපි සංවත්තතී’’තිආදිනා නයෙන පච්චවෙක්ඛණාය අභාවතො අධිවාසෙති අත්තනො චිත්තං ආරොපෙත්වා වාසෙති චෙ. අධිවාසෙන්තොයෙව ච නප්පජහති තදඞ්ගාදිප්පහානවසෙන න පටිනිස්සජ්ජති, තතො එව න විනොදෙති අත්තනො චිත්තසන්තානතො න නුදති න නීහරති, තථා අවිනොදනතො න බ්යන්තීකරොති න විගතන්තං කරොති. ආතාපී පහිතත්තො යථා තෙසං අන්තොපි නාවසිස්සති අන්තමසො භඞ්ගමත්තම්පි එවං කරොති, අයං පන තථා න කරොතීති අත්ථො. තථාභූතොව න අනභාවං ගමෙති අනු අනු අභාවං න ගමෙති. න පජහති චෙ, න විනොදෙති චෙතිආදිනා චෙ-සද්දං යොජෙත්වා අත්ථො වෙදිතබ්බො. ११०. ग्यारहवें (सुत्त) में 'चरतो' का अर्थ है चलते हुए या चंक्रमण करते हुए। 'उप्पज्जति कामवितक्को वा' का अर्थ है कि यदि वस्तु-कामों में राग के क्षीण न होने के कारण, वैसे प्रत्ययों के होने पर काम-सम्बन्धी वितर्क उत्पन्न होता है। 'ब्यापादवितक्को वा विहिंसावितक्को वा' का अर्थ है कि आघात के निमित्त से व्यापाद-सम्बन्धी वितर्क, या ढेले-डंडे आदि से दूसरों को पीड़ित करने के वश से विहिंसा-सम्बन्धी वितर्क उत्पन्न होता है - यह सम्बन्ध है। 'अधिवासेति' का अर्थ है कि उस पूर्वोक्त काम-वितर्क आदि को, जो प्रत्ययों के अनुसार अपने चित्त में उत्पन्न हुए हैं, "यह वितर्क पापमय है, यह अकुशल है, यह सावद्य (दोषयुक्त) है, और यह अपने विनाश के लिए भी प्रवृत्त होता है" - इस प्रकार के प्रत्यवेक्षण के अभाव के कारण उसे स्वीकार कर लेता है, अपने चित्त में आरोपित करके उसे रहने देता है। स्वीकार करते हुए ही वह उसे नहीं छोड़ता है, तदङ्ग-प्रहाण आदि के वश से उसे त्यागता नहीं है, इसलिए उसे अपने चित्त-सन्तान से दूर नहीं करता है, हटाता नहीं है, बाहर नहीं निकालता है, और इस प्रकार दूर न करने से उसे समाप्त नहीं करता है, उसका अंत नहीं करता है। 'आतापी पहितत्तो' का अर्थ है कि जैसे उनका अंत भी शेष न रहे, यहाँ तक कि भंग मात्र भी न रहे, वैसा करता है; किन्तु यह वैसा नहीं करता है - यह अर्थ है। वैसा होते हुए भी वह उसे 'अनभाव' (अस्तित्वहीनता) को प्राप्त नहीं कराता है, बार-बार अभाव को प्राप्त नहीं कराता है। 'न पजहति चे, न विनोदेति चे' आदि में 'चे' (यदि) शब्द को जोड़कर अर्थ समझना चाहिए। චරන්ති චරන්තො. එවංභූතොති එවං කාමවිතක්කාදිපාපවිතක්කෙහි සමඞ්ගීභූතො. අනාතාපී අනොත්තාපීති කිලෙසානං ආතාපනස්ස වීරියස්ස [Pg.334] අභාවෙන අනාතාපී, පාපුත්රාසආතාපනපරිතාපනලක්ඛණස්ස ඔත්තප්පස්ස අභාවෙන අනොත්තාපී. සතතං සමිතන්ති සබ්බකාලං නිරන්තරං. කුසීතො හීනවීරියොති කුසලෙහි ධම්මෙහි පරිහායිත්වා අකුසලපක්ඛෙ කුච්ඡිතං සීදනතො කොසජ්ජසමන්නාගමෙන ච කුසීතො, සම්මප්පධානවීරියාභාවෙන හීනවීරියො වීරියවිරහිතොති වුච්චති කථීයති. ඨිතස්සාති ගමනං උපච්ඡින්දිත්වා තිට්ඨතො. සයනඉරියාපථස්ස විසෙසතො කොසජ්ජපක්ඛිකත්තා යථා තංසමඞ්ගිනො විතක්කා සම්භවන්ති, තං දස්සෙතුං ‘‘ජාගරස්සා’’ති වුත්තං. 'चरन्ति' का अर्थ है चलते हुए। 'एवंभूतो' का अर्थ है इस प्रकार काम-वितर्क आदि पाप-वितर्कों से युक्त। 'अनातापी अनोत्तापी' का अर्थ है क्लेशों को तपाने वाले वीर्य के अभाव के कारण 'अनातापी', और पाप के भय से तपने या संताप करने के लक्षण वाले ओत्तापी (लज्जा/भय) के अभाव के कारण 'अनोत्तापी'। 'सततं समितं' का अर्थ है सब समय, निरंतर। 'कुसीतो हीनवीरियो' का अर्थ है कुशल धर्मों से रहित होकर अकुशल पक्ष में कुत्सित रूप से बैठने (आलस्य) के कारण और कौसीद्य (आलस्य) से युक्त होने के कारण 'कुसीत', तथा सम्यक् प्रधान वीर्य के अभाव के कारण 'हीनवीर्य' या वीर्य-रहित कहा जाता है। 'ठितस्स' का अर्थ है चलना बंद करके खड़े हुए व्यक्ति का। शयन-ईर्यापथ के विशेष रूप से आलस्य के पक्ष में होने के कारण जैसे उससे युक्त वितर्क उत्पन्न होते हैं, उसे दिखाने के लिए 'जागरस्स' (जागते हुए का) कहा गया है। සුක්කපක්ඛෙ තඤ්චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු නාධිවාසෙතීති ආරද්ධවීරියස්සාපි විහරතො අනාදිමති සංසාරෙ චිරකාලභාවිතෙන තථාරූපප්පච්චයසමායොගෙන සතිසම්මොසෙන වා කාමවිතක්කාදි උප්පජ්ජති චෙ, තං භික්ඛු අත්තනො චිත්තං ආරොපෙත්වා න වාසෙති චෙ, අබ්භන්තරෙ න වාසෙති චෙති අත්ථො. අනධිවාසෙන්තො කිං කරොතීති? පජහති ඡඩ්ඩෙති. කිං කචවරං විය පිටකෙන? න හි, අපිච ඛො තං විනොදෙති නුදති නීහරති. කිං බලීබද්දං විය පතොදෙන? න හි, අථ ඛො නං බ්යන්තීකරොති විගතන්තං කරොති. යථා තෙසං අන්තොපි නාවසිස්සති අන්තමසො භඞ්ගමත්තම්පි, තථා තෙ කරොති. කථං පන තෙ තථා කරොති? අනභාවං ගමෙති අනු අනු අභාවං ගමෙති, වික්ඛම්භනප්පහානෙන යථා සුවික්ඛම්භිතා හොන්ති තථා නෙ කරොතීති වුත්තං හොති. शुक्ल पक्ष में 'तञ्चे, भिक्खवे, भिक्खु नाधिवासेति' का अर्थ है कि आरब्ध-वीर्य होकर विहार करते हुए भी, अनादि संसार में चिरकाल तक भावित होने के कारण या वैसे प्रत्ययों के संयोग से अथवा स्मृति के सम्मोह (भूलने) से यदि काम-वितर्क आदि उत्पन्न होते हैं, तो यदि भिक्षु उन्हें अपने चित्त में आरोपित करके नहीं रहने देता है, भीतर नहीं रहने देता है - यह अर्थ है। स्वीकार न करता हुआ वह क्या करता है? त्याग देता है, छोड़ देता है। क्या कूड़े को टोकरी से फेंकने की तरह? नहीं, बल्कि उसे दूर करता है, हटाता है, बाहर निकालता है। क्या बैल को चाबुक से हाँकने की तरह? नहीं, बल्कि उसे समाप्त करता है, उसका अंत करता है। जैसे उनका अंत भी शेष न रहे, यहाँ तक कि भंग मात्र भी न रहे, वैसा उन्हें करता है। वह उन्हें वैसा कैसे करता है? 'अनभाव' को प्राप्त कराता है, बार-बार अभाव को प्राप्त कराता है, विष्कम्भन-प्रहाण के द्वारा जैसे वे भली-भाँति दबा दिए जाते हैं, वैसा उन्हें करता है - यह कहा गया है। එවංභූතොතිආදීසු එවං කාමවිතක්කාදීනං අනධිවාසනෙන සුවිසුද්ධාසයො සමානො තාය ච ආසයසම්පත්තියා තන්නිමිත්තාය ච පයොගසම්පත්තියා පරිසුද්ධසීලො ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ සතිසම්පජඤ්ඤෙන සමන්නාගතො ජාගරියං අනුයුත්තො තදඞ්ගාදිවසෙන කිලෙසානං ආතාපනලක්ඛණෙන වීරියෙන සමන්නාගතත්තා ආතාපී, සබ්බසො පාපුත්රාසෙන සමන්නාගතත්තා. ඔත්තාපී සතතං රත්තින්දිවං, සමිතං නිරන්තරං සමථවිපස්සනාභාවනානුයොගවසෙන චතුබ්බිධසම්මප්පධානසිද්ධියා, ආරද්ධවීරියො පහිතත්තො නිබ්බානං පටිපෙසිතචිත්තොති වුච්චති කථීයතීති අත්ථො. සෙසං වුත්තනයමෙව. 'एवंभूतो' आदि में, इस प्रकार काम-वितर्क आदि को स्वीकार न करने से सुविशुद्ध आशय वाला होकर, उस आशय-सम्पत्ति और उसके निमित्त होने वाली प्रयोग-सम्पत्ति से परिशुद्ध शील वाला, इन्द्रियों में गुप्तद्वार (संयम), भोजन में मात्रा जानने वाला, स्मृति और सम्प्रजन्य से युक्त, जागरण में लगा हुआ, तदङ्ग आदि के वश से क्लेशों को तपाने के लक्षण वाले वीर्य से युक्त होने के कारण 'आतापी', और पूरी तरह से पाप के भय से युक्त होने के कारण 'ओत्तापी', सतत रात-दिन, निरंतर शमथ-विपश्यना भावना के अभ्यास के वश से चार प्रकार के सम्यक् प्रधानों की सिद्धि के कारण 'आरब्ध-वीर्य' और 'पहितत्त' (निर्वाण की ओर प्रेषित चित्त वाला) कहा जाता है - यह अर्थ है। शेष पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही है। ගාථාසු [Pg.335] ගෙහනිස්සිතන්ති එත්ථ ගෙහවාසීහි අපරිච්චත්තත්තා ගෙහවාසීනං සභාවත්තා ගෙහධම්මත්තා වා ගෙහං වුච්චති වත්ථුකාමො. අථ වා ගෙහපටිබද්ධභාවතො කිලෙසකාමානං නිවාසට්ඨානභාවතො තංවත්ථුකත්තා වා කාමවිතක්කාදි ගෙහනිස්සිතං නාම. කුම්මග්ගං පටිපන්නොති යස්මා අරියමග්ගස්ස උප්පථභාවතො අභිජ්ඣාදයො තදෙකට්ඨධම්මා ච කුම්මග්ගො, තස්මා කාමවිතක්කාදිබහුලො පුග්ගලො කුම්මග්ගං පටිපන්නො නාම. මොහනෙය්යෙසු මුච්ඡිතොති මොහසංවත්තනියෙසු රූපාදීසු මුච්ඡිතො සම්මත්තො අජ්ඣොපන්නො. සම්බොධින්ති අරියමග්ගඤාණං. ඵුට්ඨුන්ති ඵුසිතුං පත්තුං, සො තාදිසො මිච්ඡාසඞ්කප්පගොචරො අභබ්බො, න කදාචි තං පාපුණාතීති අත්ථො. गाथाओं में 'गेहनिस्सितं' के विषय में - यहाँ गृहवासियों द्वारा न त्यागे जाने के कारण, गृहवासियों के स्वभाव के कारण या गृह-धर्म होने के कारण 'गेह' (घर) वस्तु-काम को कहा जाता है। अथवा घर से सम्बद्ध होने के कारण, क्लेश-कामों का निवास स्थान होने के कारण या उस वस्तु पर आधारित होने के कारण काम-वितर्क आदि 'गेह-निश्रित' कहलाते हैं। 'कुम्मग्गं पटिपन्नो' का अर्थ है कि चूँकि आर्य मार्ग के कुमार्ग (गलत रास्ता) होने के कारण अभिध्या आदि और उनके साथ रहने वाले धर्म 'कुमार्ग' हैं, इसलिए काम-वितर्क आदि की बहुलता वाला व्यक्ति 'कुमार्ग पर चलने वाला' कहलाता है। 'मोहनेय्येसु मुच्छितो' का अर्थ है मोह उत्पन्न करने वाले रूप आदि में मूर्छित, मत्त या आसक्त। 'संबोधिं' का अर्थ है आर्य मार्ग ज्ञान। 'फुट्टुं' का अर्थ है स्पर्श करने के लिए, प्राप्त करने के लिए; वह वैसा मिथ्या संकल्पों के गोचर वाला (व्यक्ति) अभव्य (अयोग्य) है, वह कभी उसे प्राप्त नहीं करता है - यह अर्थ है। විතක්කං සමයිත්වානාති යථාවුත්තං මිච්ඡාවිතක්කං පටිසඞ්ඛානභාවනාබලෙහි වූපසමෙත්වා. විතක්කූපසමෙ රතොති නවන්නම්පි මහාවිතක්කානං අච්චන්තවූපසමභූතෙ අරහත්තෙ නිබ්බානෙ එව වා අජ්ඣාසයෙන රතො අභිරතො. භබ්බො සො තාදිසොති සො යථාවුත්තො සම්මා පටිපජ්ජමානො පුග්ගලො පුබ්බභාගෙ සමථවිපස්සනාබලෙන සබ්බවිතක්කෙ යථාරහං තදඞ්ගාදිවසෙන වූපසමෙත්වා ඨිතො, විපස්සනං උස්සුක්කාපෙත්වා මග්ගපටිපාටියා අරහත්තමග්ගඤාණසඞ්ඛාතං නිබ්බානසඞ්ඛාතඤ්ච අනුත්තරං සම්බොධිං ඵුට්ඨුං අධිගන්තුං භබ්බො සමත්ථොති. "वितक्कं समयित्वान" का अर्थ है—यथोक्त मिथ्या वितर्कों को प्रतिसंख्यान (विवेक) और भावना के बल से शांत करके। "वितक्कूपसमे रतो" का अर्थ है—नौ प्रकार के महावितर्कों के अत्यंत उपशम स्वरूप अर्हत्व या निर्वाण में ही आशय से रत, अभिरत। "भब्बो सो तादिसो" का अर्थ है—वह यथोक्त सम्यक् प्रतिपन्न पुद्गल, पूर्वभाग में शमथ और विपासना के बल से सभी वितर्कों को यथायोग्य तदंग आदि के वश से शांत करके स्थित होकर, विपासना में उत्साह बढ़ाकर, मार्ग-परम्परा से अर्हत्वमार्ग-ज्ञान संज्ञक और निर्वाण संज्ञक अनुत्तर संबोधि का स्पर्श करने (प्राप्त करने) में समर्थ है। එකාදසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. ग्यारहवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 12. සම්පන්නසීලසුත්තවණ්ණනා १२. सम्पन्नशील सूत्र की व्याख्या। 111. ද්වාදසමෙ සම්පන්නසීලාති එත්ථ තිවිධං සම්පන්නං පරිපුණ්ණසමඞ්ගීමධුරවසෙන. තෙසු – १११. बारहवें (सूत्र) में "सम्पन्नशीलाः" यहाँ 'सम्पन्न' शब्द परिपूर्ण, समंगी (युक्त) और मधुर के भेद से तीन प्रकार का है। उनमें से— ‘‘සම්පන්නං සාලිකෙදාරං, සුවා භුඤ්ජන්ති කොසිය; පටිවෙදෙමි තෙ බ්රහ්මෙ, න නෙ වාරෙතුමුස්සහෙ’’ති. (ජා. 1.14.1) – "हे कोसिय! शालि (धान) का खेत सम्पन्न है, सुग्गे उसे खा रहे हैं; हे ब्राह्मण! मैं तुम्हें सूचित करता हूँ, मैं उन्हें रोकने में समर्थ नहीं हूँ।" (जातक १.१४.१) — එත්ථ පරිපුණ්ණත්ථො සම්පන්නසද්දො. ‘‘ඉමිනා පාතිමොක්ඛසංවරෙන උපෙතො හොති සමුපෙතො උපගතො සමුපගතො සම්පන්නො සමන්නාගතො’’ති (විභ. 511) එත්ථ සමඞ්ගිභාවත්ථො සම්පන්නසද්දො. ‘‘ඉමිස්සා, භන්තෙ, මහාපථවියා හෙට්ඨිමතලං [Pg.336] සම්පන්නං – සෙය්යථාපි ඛුද්දමධුං අනීලකං, එවමස්සාද’’න්ති (පාරා. 17) එත්ථ මධුරත්ථො සම්පන්නසද්දො. ඉධ පන පරිපුණ්ණත්ථෙපි සමඞ්ගිභාවෙපි වට්ටති, තස්මා සම්පන්නසීලාති පරිපුණ්ණසීලා හුත්වාතිපි, සීලසමඞ්ගිනො හුත්වාතිපි එවමෙත්ථ අත්ථො වෙදිතබ්බො. यहाँ 'सम्पन्न' शब्द परिपूर्ण के अर्थ में है। "इस पातिमोक्ख संवर से उपेत होता है, समुपेत... सम्पन्न, समन्वागत होता है" (विभंग ५११) यहाँ 'सम्पन्न' शब्द समंगीभाव (युक्त होने) के अर्थ में है। "भन्ते! इस महापृथ्वी का निचला तल सम्पन्न है—जैसे कि शुद्ध क्षुद्र मधु (शहद), वैसा ही इसका स्वाद है" (पाराजिक १७) यहाँ 'सम्पन्न' शब्द मधुर के अर्थ में है। यहाँ (इस सूत्र में) तो परिपूर्ण अर्थ में भी और समंगीभाव अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, इसलिए 'सम्पन्नशीलाः' का अर्थ 'परिपूर्ण शील वाले होकर' भी और 'शील से युक्त होकर' भी—इस प्रकार यहाँ अर्थ समझना चाहिए। තත්ථ ‘‘පරිපුණ්ණසීලා’’ති ඉමිනා අත්ථෙන ඛෙත්තදොසවිගමෙන ඛෙත්තපාරිපූරි විය පරිපුණ්ණං නාම හොති. තෙන වුත්තං ‘‘ඛෙත්තදොසවිගමෙන ඛෙත්තපාරිපූරි විය සීලදොසවිගමෙන සීලපාරිපූරි වුත්තා’’ති. ‘‘සීලසමඞ්ගිනො’’ති ඉමිනා පන අත්ථෙන සීලෙන සමඞ්ගීභූතා සමොධානගතා සමන්නාගතා හුත්වා විහරථාති වුත්තං හොති. තත්ථ ද්වීහි කාරණෙහි සම්පන්නසීලතා හොති සීලවිපත්තියා ආදීනවදස්සනෙන, සීලසම්පත්තියා ආනිසංසදස්සනෙන ච. තදුභයම්පි විසුද්ධිමග්ගෙ (විසුද්ධි. 1.20-21) වුත්තනයෙන වෙදිතබ්බං. තත්ථ ‘‘සම්පන්නසීලා’’ති එත්තාවතා කිර භගවා චතුපාරිසුද්ධිසීලං උද්දිසිත්වා ‘‘පාතිමොක්ඛසංවරසංවුතා’’ති ඉමිනා ජෙට්ඨකසීලං දස්සෙතීතිආදිනා එත්ථ යං වත්තබ්බං, තං හෙට්ඨා වුත්තමෙව. කිමස්ස උත්තරි කරණීයන්ති එවං සම්පන්නසීලානං විහරතං තුම්හාකං කින්ති සියා උත්තරි කාතබ්බං, පටිපජ්ජිතබ්බන්ති චෙති අත්ථො. वहाँ "परिपूर्णशीलाः" इस अर्थ से, जैसे खेत के दोषों के दूर होने से खेत की परिपूर्णता होती है, वैसे ही परिपूर्ण समझना चाहिए। इसीलिए कहा गया है— "खेत के दोषों के दूर होने से खेत की परिपूर्णता के समान, शील के दोषों के दूर होने से शील की परिपूर्णता कही गई है।" "शीलसमंगिनो" (शील-युक्त) इस अर्थ से—शील के साथ समंगीभूत (युक्त), समवधानगत और समन्वागत होकर विहार करो—यह कहा गया है। वहाँ दो कारणों से सम्पन्नशीलता होती है—शील-विपत्ति में आदिनव (दोष) देखने से और शील-सम्पत्ति में आनृशंस (लाभ) देखने से। वे दोनों ही विशुद्धिमार्ग (विशुद्धि. १.२०-२१) में कहे गए तरीके से जानने चाहिए। वहाँ "सम्पन्नशीलाः" इतने मात्र से भगवान् ने चतुष्पारिशुद्धि शील को उद्दिष्ट कर "पातिमोक्खसंवरसंवृताः" इससे श्रेष्ठ शील को दर्शाया है—इत्यादि जो यहाँ कहना चाहिए, वह पहले ही कहा जा चुका है। "किमस्स उत्तरि करणीयं" (इसके आगे क्या करना चाहिए)—इस प्रकार सम्पन्नशील होकर विहार करते हुए आप लोगों को आगे क्या करना चाहिए, किस मार्ग पर चलना चाहिए—यह अर्थ है। එවං ‘‘සම්පන්නසීලා, භික්ඛවෙ, විහරථා’’තිආදිනා සම්පාදනූපායෙන සද්ධිං සීලසම්පදාය භික්ඛූ නියොජෙන්තො අනෙකපුග්ගලාධිට්ඨානං කත්වා දෙසනං ආරභිත්වා ඉදානි යස්මා එකපුග්ගලාධිට්ඨානවසෙන පවත්තිතාපි භගවතො දෙසනා අනෙකපුග්ගලාධිට්ඨානාව හොති සබ්බසාධාරණත්තා, තස්මා තං එකපුග්ගලාධිට්ඨානවසෙන දස්සෙන්තො ‘‘චරතො චෙපි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො’’තිආදිමාහ. इस प्रकार "भिक्षुओं! सम्पन्नशील होकर विहार करो" इत्यादि के द्वारा सम्पादन के उपाय के साथ शील-सम्पदा में भिक्षुओं को नियोजित करते हुए, अनेक पुद्गलों (व्यक्तियों) को आधार बनाकर देशना आरम्भ करके; अब चूँकि भगवान् की देशना एक पुद्गल के आधार पर प्रवृत्त होने पर भी सर्व-साधारण होने के कारण अनेक पुद्गलों के लिए ही होती है, इसलिए उसे एक पुद्गल के आधार पर दर्शाते हुए "चरतो चेपि, भिक्खवे, भिक्खुनो" (भिक्षुओं! यदि चलते हुए भी भिक्षु के...) इत्यादि कहा। තත්ථ අභිජ්ඣායති එතායාති අභිජ්ඣා, පරභණ්ඩාභිජ්ඣායනලක්ඛණස්ස ලොභස්සෙතං අධිවචනං. බ්යාපජ්ජති පූතිභවති චිත්තං එතෙනාති බ්යාපාදො, ‘‘අනත්ථං මෙ අචරී’’තිආදිනයප්පවත්තස්ස එකූනවීසතිආඝාතවත්ථුවිසයස්ස දොසස්සෙතං අධිවචනං. උභින්නම්පි ‘‘තත්ථ කතමො කාමච්ඡන්දො? යො කාමෙසු කාමච්ඡන්දො කාමස්නෙහො කාමපිපාසා කාමපරිළාහො කාමමුච්ඡා කාමජ්ඣොසාන’’න්ති (ධ. ස. 1159), තථා ‘‘ලොභො ලුබ්භනා ලුබ්භිතත්තං සාරාගො සාරජ්ජනා සාරජ්ජිතත්තං අභිජ්ඣා ලොභො අකුසලමූල’’න්තිආදිනා (ධ. ස. 391), ‘‘දොසො දුස්සනා දුස්සිතත්තං [Pg.337] බ්යාපත්ති බ්යාපජ්ජනා බ්යාපජ්ජිතත්තං විරොධො පටිවිරොධො චණ්ඩික්කං අසුරොපො අනත්තමනතා චිත්තස්සා’’තිආදිනා (ධ. ස. 418, 1237) ච විත්ථාරො වෙදිතබ්බො. විගතො හොතීති අයඤ්ච අභිජ්ඣා, අයඤ්ච බ්යාපාදො විගතො හොති අපගතො, පහීනො හොතීති අත්ථො. එත්තාවතා කාමච්ඡන්දනීවරණස්ස ච බ්යාපාදනීවරණස්ස ච පහානං දස්සිතං හොති. वहाँ जिससे अभिलाषा की जाती है वह "अभिध्या" है, यह दूसरे की वस्तु की अभिलाषा करने के लक्षण वाले लोभ का पर्यायवाची है। जिससे चित्त व्यापादित (विकृत) होता है, दुर्गन्धित होता है, वह "व्यापाद" है; "उसने मेरा अनर्थ किया" इत्यादि रीति से प्रवृत्त उन्नीस आघात-वस्तुओं के विषय वाले द्वेष का यह पर्यायवाची है। दोनों का ही विस्तार— "वहाँ कामच्छन्द क्या है? जो काम-भोगों में कामच्छन्द, काम-स्नेह, काम-पिपासा, काम-परिदाह, काम-मूर्च्छा, काम-अध्यवसान है" (धम्मसंगणि ११५९), तथा "लोभ, लुब्ध होना, लुब्धता, साराग, संराग, संरागत्व, अभिध्या, लोभ अकुशलमूल है" (धम्मसंगणि ३९१), "द्वेष, दूषित होना, दूषितपना, व्यापत्ति, व्यापादन, व्यापादित होना, विरोध, प्रतिविरोध, चण्डिक्क (क्रूरता), असुरोप (अमर्ष), चित्त की अप्रसन्नता" (धम्मसंगणि ४१८, १२३७) इत्यादि के अनुसार समझना चाहिए। "विगतो होति" का अर्थ है—यह अभिध्या और यह व्यापाद विगत (दूर) हो गए हैं, अपगत हो गए हैं, प्रहीण हो गए हैं। इतने से कामच्छन्द-नीवरण और व्यापाद-नीवरण का प्रहाण दर्शाया गया है। ථිනමිද්ධන්ති ථිනඤ්චෙව මිද්ධඤ්ච. තෙසු චිත්තස්ස අකම්මඤ්ඤතා ථිනං, ආලසියස්සෙතං අධිවචනං, වෙදනාදීනං තිණ්ණං ඛන්ධානං අකම්මඤ්ඤතා මිද්ධං, පචලායිකභාවස්සෙතං අධිවචනං. උභින්නම්පි ‘‘තත්ථ කතමං ථිනං? යා චිත්තස්ස අකල්ලතා අකම්මඤ්ඤතා ඔලීයනා සල්ලීයනා. තත්ථ කතමං මිද්ධං? යා කායස්ස අකල්ලතා අකම්මඤ්ඤතා ඔනාහො පරියොනාහො’’තිආදිනා (ධ. ස. 1162-1163) නයෙන විත්ථාරො වෙදිතබ්බො. "थीनमिद्धं" का अर्थ है—थीन (स्त्यान) और मिद्ध। उनमें चित्त की अकर्मण्यता 'थीन' है, यह आलस्य का पर्यायवाची है; वेदना आदि तीन स्कन्धों की अकर्मण्यता 'मिद्ध' है, यह ऊँघने (निद्रावस्था) का पर्यायवाची है। दोनों का ही विस्तार— "वहाँ थीन क्या है? जो चित्त की अस्वस्थता, अकर्मण्यता, लीनता, संलीनता है। वहाँ मिद्ध क्या है? जो काय की अस्वस्थता, अकर्मण्यता, ओनाह (ढकना), परियोनाह (पूरी तरह ढकना) है" (धम्मसंगणि ११६२-११६३) इस पद्धति से समझना चाहिए। උද්ධච්චකුක්කුච්චන්ති උද්ධච්චඤ්චෙව කුක්කුච්චඤ්ච. තත්ථ උද්ධච්චං නාම චිත්තස්ස උද්ධතාකාරො, කුක්කුච්චං නාම අකතකල්යාණස්ස කතපාපස්ස තප්පච්චයා විප්පටිසාරො. උභින්නම්පි ‘‘තත්ථ කතමං උද්ධච්චං? යං චිත්තස්ස උද්ධච්චං අවූපසමො චෙතසො වික්ඛෙපො භන්තත්තං චිත්තස්සා’’තිආදිනා (ධ. ස. 1165) විත්ථාරො. ‘‘අකතං වත මෙ කල්යාණං, අකතං කුසලං, අකතං භීරුත්තානං; කතං පාපං, කතං ලුද්දං, කතං කිබ්බිස’’න්තිආදිනා (ම. නි. 3.248; නෙත්ති. 120) පවත්තිආකාරො වෙදිතබ්බො. ‘उद्धच्च-कुक्कुच्च’ का अर्थ है उद्धच्च (औद्धत्य/उद्दण्डता) और कुक्कुच्च (पछतावा)। वहाँ उद्धच्च का अर्थ है चित्त की चंचलता (उद्धत अवस्था), और कुक्कुच्च का अर्थ है न किए गए कल्याण और किए गए पाप के कारण होने वाला विप्रतिसार (पश्चाताप)। दोनों का विस्तार ‘वहाँ उद्धच्च क्या है? जो चित्त का उद्धच्च है, अशांति है, चित्त का विक्षेप है, चित्त की भ्रान्त अवस्था है’ इत्यादि (ध. सं. 1165) के माध्यम से समझना चाहिए। ‘हाय! मैंने कल्याण नहीं किया, कुशल नहीं किया, भय से रक्षा करने वाला (पुण्य) नहीं किया; पाप किया, क्रूर कर्म किया, दोषपूर्ण कर्म किया’ इत्यादि (म. नि. 3.248; नेत्ति. 120) के माध्यम से इसकी प्रवृत्ति के स्वरूप को समझना चाहिए। විචිකිච්ඡාති බුද්ධාදීසු සංසයො. තස්සා ‘‘සත්ථරි කඞ්ඛති විචිකිච්ඡති, නාධිමුච්චති න සම්පසීදතී’’තිආදිනා (විභ. 915), ‘‘තත්ථ කතමා විචිකිච්ඡා? යා කඞ්ඛා කඞ්ඛායනා කඞ්ඛායිතත්තං විමති විචිකිච්ඡා ද්වෙළ්හකං ද්වෙධාපථො සංසයො අනෙකංසග්ගාහො ආසප්පනා පරිසප්පනා අපරියොගාහනා ඡම්භිතත්තං චිත්තස්ස මනොවිලෙඛො’’තිආදිනා (ධ. ස. 1008) ච නයෙන විත්ථාරො වෙදිතබ්බො. ‘विचिकित्सा’ का अर्थ है बुद्ध आदि के विषय में संशय। इसका विस्तार ‘शास्ता (बुद्ध) में शंका करता है, विचिकित्सा करता है, अधिमुक्त (निश्चय) नहीं होता, प्रसन्न नहीं होता’ इत्यादि (विभ. 915) और ‘वहाँ विचिकित्सा क्या है? जो शंका, शंका करना, शंकित होना, विमति, विचिकित्सा, दुविधा, दोराहा, संशय, अनिश्चित ग्रहण, हिचकिचाहट, डगमगाहट, गहराई तक न पहुँच पाना, चित्त की घबराहट, मन का विक्षोभ है’ इत्यादि (ध. सं. 1008) के माध्यम से समझना चाहिए। එත්ථ ච අභිජ්ඣාබ්යාපාදාදීනං විගමවසෙන ච පහානවසෙන ච තෙසං වික්ඛම්භනමෙව වෙදිතබ්බං. යං සන්ධාය වුත්තං – यहाँ अभिध्या (लोभ), व्यापाद (द्वेष) आदि के दूर होने और प्रहाण (त्याग) के माध्यम से उनके विक्खम्भन (दबाने/विष्कम्भन) को ही समझना चाहिए। जिसके संदर्भ में कहा गया है – ‘‘සො අභිජ්ඣං ලොකෙ පහාය විගතාභිජ්ඣෙන චෙතසා විහරති, අභිජ්ඣාය චිත්තං පරිසොධෙති. බ්යාපාදපදොසං පහාය අබ්යාපන්නචිත්තො විහරති, බ්යාපාදපදොසා චිත්තං පරිසොධෙති. ථිනමිද්ධං පහාය විගතථිනමිද්ධො විහරති ආලොකසඤ්ඤී සතො [Pg.338] සම්පජානො, ථිනමිද්ධා චිත්තං පරිසොධෙති. උද්ධච්චකුක්කුච්චං පහාය අනුද්ධතො විහරති අජ්ඣත්තං උපසන්තචිත්තො උද්ධච්චකුක්කුච්චා චිත්තං පරිසොධෙති. විචිකිච්ඡං පහාය තිණ්ණවිචිකිච්ඡො විහරති අකථංකථී කුසලෙසු ධම්මෙසු, විචිකිච්ඡාය චිත්තං පරිසොධෙතී’’ති (විභ. 508). “वह लोक में अभिध्या (लोभ) को त्यागकर लोभ-रहित चित्त से विहार करता है, अभिध्या से चित्त को परिशुद्ध करता है। व्यापाद-प्रदोष (द्वेष) को त्यागकर द्वेष-रहित चित्त से विहार करता है, व्यापाद-प्रदोष से चित्त को परिशुद्ध करता है। स्त्यान-मृद्ध (आलस्य-तन्द्रा) को त्यागकर स्त्यान-मृद्ध-रहित होकर विहार करता है, आलोक-संज्ञा वाला, स्मृतिमान और सम्प्रजन्य युक्त होकर स्त्यान-मृद्ध से चित्त को परिशुद्ध करता है। उद्धच्च-कुक्कुच्च (उद्दण्डता-पछतावा) को त्यागकर अनुद्धत (शांत) होकर विहार करता है, भीतर से उपशान्त चित्त वाला होकर उद्धच्च-कुक्कुच्च से चित्त को परिशुद्ध करता है। विचिकित्सा (संशय) को त्यागकर विचिकित्सा से पार होकर विहार करता है, कुशल धर्मों में संशय-रहित होकर विचिकित्सा से चित्त को परिशुद्ध करता है” (विभ. 508)। තත්ථ යථා නීවරණානං පහානං හොති, තං වෙදිතබ්බං. කථඤ්ච නෙසං පහානං හොති? කාමච්ඡන්දස්ස තාව අසුභනිමිත්තෙ යොනිසොමනසිකාරෙන පහානං හොති, සුභනිමිත්තෙ අයොනිසොමනසිකාරෙනස්ස උප්පත්ති. තෙනාහ භගවා – वहाँ जिस प्रकार नीवरणों का प्रहाण (त्याग) होता है, उसे समझना चाहिए। उनका प्रहाण कैसे होता है? कामच्छन्द का प्रहाण तो अशुभ-निमित्त में योनिशो मनसिकार (उचित ध्यान) से होता है, और शुभ-निमित्त में अयोनिशो मनसिकार (अनुचित ध्यान) से इसकी उत्पत्ति होती है। इसीलिए भगवान ने कहा है – ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, සුභනිමිත්තං. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා කාමච්ඡන්දස්ස උප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා කාමච්ඡන්දස්ස භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं! शुभ-निमित्त (सुन्दर वस्तु) है। वहाँ अयोनिशो मनसिकार का बाहुल्य (बार-बार अभ्यास), अनुत्पन्न कामच्छन्द की उत्पत्ति के लिए, या उत्पन्न कामच्छन्द की वृद्धि और प्रचुरता के लिए आहार (कारण) है” (सं. नि. 5.232)। එවං සුභනිමිත්තෙ අයොනිසොමනසිකාරෙන උප්පජ්ජන්තස්ස කාමච්ඡන්දස්ස තප්පටිපක්ඛතො අසුභනිමිත්තෙ යොනිසොමනසිකාරෙන පහානං හොති. තත්ථ අසුභනිමිත්තං නාම අසුභම්පි අසුභාරම්මණම්පි, යොනිසොමනසිකාරො නාම උපායමනසිකාරො, පථමනසිකාරො, අනිච්චෙ අනිච්චන්ති වා, දුක්ඛෙ දුක්ඛන්ති වා, අනත්තනි අනත්තාති වා, අසුභෙ අසුභන්ති වා මනසිකාරො. තං තත්ථ බහුලං පවත්තයතො කාමච්ඡන්දො පහීයති. තෙනාහ භගවා – इस प्रकार शुभ-निमित्त में अयोनिशो मनसिकार से उत्पन्न होने वाले कामच्छन्द का, उसके प्रतिपक्ष स्वरूप अशुभ-निमित्त में योनिशो मनसिकार से प्रहाण होता है। वहाँ अशुभ-निमित्त का अर्थ है अशुभ भी और अशुभ-आलम्बन भी। योनिशो मनसिकार का अर्थ है उपाय-मनसिकार (सही विधि से विचार), पथ-मनसिकार (सही मार्ग से विचार), अनित्य में ‘अनित्य’ ऐसा, दुःख में ‘दुःख’ ऐसा, अनात्म में ‘अनात्म’ ऐसा, या अशुभ में ‘अशुभ’ ऐसा मनसिकार। वहाँ उसका बार-बार अभ्यास करने वाले का कामच्छन्द प्रहीण (नष्ट) हो जाता है। इसीलिए भगवान ने कहा है – ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, අසුභනිමිත්තං. තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා කාමච්ඡන්දස්ස අනුප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා කාමච්ඡන්දස්ස පහානායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं! अशुभ-निमित्त है। वहाँ योनिशो मनसिकार का बाहुल्य, अनुत्पन्न कामच्छन्द की अनुत्पत्ति के लिए, या उत्पन्न कामच्छन्द के प्रहाण के लिए आहार है” (सं. नि. 5.232)। අපිච ඡ ධම්මා කාමච්ඡන්දස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – අසුභනිමිත්තස්ස උග්ගහො, අසුභභාවනානුයොගො, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරතා, භොජනෙ මත්තඤ්ඤුතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. දසවිධඤ්හි අසුභනිමිත්තං උග්ගණ්හන්තස්සපි කාමච්ඡන්දො පහීයති, භාවෙන්තස්සපි, ඉන්ද්රියෙසු පිහිතද්වාරස්සපි චතුන්නං පඤ්චන්නං ආලොපානං ඔකාසෙ සති උදකං පිවිත්වා යාපනසීලතාය භොජනෙ මත්තඤ්ඤුනොපි. තෙන වුත්තං – इसके अतिरिक्त छह धर्म कामच्छन्द के प्रहाण के लिए संवर्तित (सहायक) होते हैं – अशुभ-निमित्त का उद्ग्रहण (सीखना), अशुभ-भावना में संलग्न होना, इन्द्रियों में गुप्तद्वारता (संयम), भोजन में मात्रा को जानना (मितहारिता), कल्याण-मित्रता और सप्राय-कथा (उपयुक्त चर्चा)। दस प्रकार के अशुभ-निमित्त को सीखने वाले का भी कामच्छन्द प्रहीण होता है, उसकी भावना करने वाले का भी, इन्द्रियों के द्वारों को बंद रखने वाले का भी, और चार-पाँच ग्रास की गुंजाइश रहने पर पानी पीकर निर्वाह करने के स्वभाव वाले भोजन में मात्रा को जानने वाले का भी। इसीलिए कहा गया है – ‘‘චත්තාරො [Pg.339] පඤ්ච ආලොපෙ, අභුත්වා උදකං පිවෙ; අලං ඵාසුවිහාරාය, පහිතත්තස්ස භික්ඛුනො’’ති. (ථෙරගා. 983); “चार या पाँच ग्रास (की भूख) शेष रहने पर, भोजन न करके पानी पीना चाहिए; यह प्रयत्नशील भिक्षु के सुखपूर्वक विहार के लिए पर्याप्त है” (थेरगाथा 983)। අසුභකම්මිකතිස්සත්ථෙරසදිසෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සපි කාමච්ඡන්දො පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු දසඅසුභනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා කාමච්ඡන්දස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. अशुभ-कर्मिक तिस्स स्थविर जैसे कल्याण-मित्रों की सेवा करने वाले का भी कामच्छन्द प्रहीण होता है, खड़े होने, बैठने आदि के समय दस प्रकार के अशुभ से संबंधित उपयुक्त चर्चा (सप्राय-कथा) से भी यह प्रहीण होता है। इसीलिए कहा गया है “छह धर्म कामच्छन्द के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं”। පටිඝනිමිත්තෙ ආයොනිසොමනසිකාරෙන බ්යාපාදස්ස උප්පාදො හොති. තත්ථ පටිඝම්පි පටිඝනිමිත්තං, පටිඝාරම්මණම්පි පටිඝනිමිත්තං. අයොනිසොමනසිකාරො සබ්බත්ථ එකලක්ඛණො එව. තං තස්මිං නිමිත්තෙ බහුලං පවත්තයතො බ්යාපාදො උප්පජ්ජති. තෙනාහ භගවා – प्रतिघ-निमित्त (क्रोध के कारण) में अयोनिशो मनसिकार से व्यापाद (द्वेष) की उत्पत्ति होती है। वहाँ प्रतिघ भी प्रतिघ-निमित्त है और प्रतिघ-आलम्बन भी प्रतिघ-निमित्त है। अयोनिशो मनसिकार सर्वत्र एक ही लक्षण वाला है। उस निमित्त में उसका बार-बार अभ्यास करने वाले को व्यापाद उत्पन्न होता है। इसीलिए भगवान ने कहा है – ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, පටිඝනිමිත්තං. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා බ්යාපාදස්ස උප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා බ්යාපාදස්ස භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं! प्रतिघ-निमित्त है। वहाँ अयोनिशो मनसिकार का बाहुल्य, अनुत्पन्न व्यापाद की उत्पत्ति के लिए, या उत्पन्न व्यापाद की वृद्धि और प्रचुरता के लिए आहार है” (सं. नि. 5.232)। මෙත්තාය පන චෙතොවිමුත්තියා යොනිසොමනසිකාරෙනස්ස පහානං හොති. තත්ථ ‘‘මෙත්තා’’ති වුත්තෙ අප්පනාපි උපචාරොපි වට්ටති, ‘‘චෙතොවිමුත්තී’’ති පන අප්පනාව. යොනිසොමනසිකාරො වුත්තලක්ඛණොව. තං තත්ථ බහුලං පවත්තයතො බ්යාපාදො පහීයති. තෙනාහ භගවා – किन्तु मैत्री-चेतोविमुक्ति में योनिशो मनसिकार से इसका प्रहाण होता है। वहाँ ‘मैत्री’ कहने पर अर्पणा (समाधि) और उपचार (पहुँच) दोनों ग्रहण किए जाते हैं, किन्तु ‘चेतोविमुक्ति’ तो अर्पणा ही है। योनिशो मनसिकार पूर्वोक्त लक्षण वाला ही है। वहाँ उसका बार-बार अभ्यास करने वाले का व्यापाद प्रहीण हो जाता है। इसीलिए भगवान ने कहा है – ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, මෙත්තාචෙතොවිමුත්ති. තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා බ්යාපාදස්ස අනුප්පාදාය උප්පන්නස්ස වා බ්යාපාදස්ස පහානායා’’ති (සං. නි. 5.232). ‘‘भिक्षुओं! मैत्री-चेतोविमुक्ति है। वहाँ योनिशः मनसिकार का बाहुल्य (अभ्यास), अनुत्पन्न व्यापाद (द्वेष) के उत्पन्न न होने के लिए और उत्पन्न व्यापाद के प्रहाण (त्याग) के लिए आहार (कारण) है।’’ අපිච ඡ ධම්මා බ්යාපාදස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – මෙත්තානිමිත්තස්ස උග්ගහො, මෙත්තාභාවනා, කම්මස්සකතාපච්චවෙක්ඛණා, පටිසඞ්ඛානබහුලතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. ඔධිසකානොධිසකදිසාඵරණානඤ්හි අඤ්ඤතරවසෙන මෙත්තං උග්ගණ්හන්තස්සපි බ්යාපාදො පහීයති, ඔධිසො අනොධිසො දිසාඵරණවසෙන මෙත්තං භාවෙන්තස්සපි බ්යාපාදො පහීයති, ‘‘ත්වං එතස්ස කුද්ධො කිං කරිස්සසි, කිමස්ස සීලාදීනි [Pg.340] විනාසෙතුං සක්ඛිස්සසි නනු ත්වං අත්තනො කම්මෙන ආගන්ත්වා අත්තනො කම්මෙනෙව ගමිස්සසි, පරස්ස කුජ්ඣනං නාම වීතච්චිකඞ්ගාරතත්තඅයසලාකගූථාදීනි ගහෙත්වා පරං පහරිතුකාමතා විය හොති. එසොපි තව කුද්ධො කිං කරිස්සති, කිං තෙ සීලාදීනි විනාසෙතුං සක්ඛිස්සති එස අත්තනො කම්මෙන ආගන්ත්වා අත්තනො කම්මෙනෙව ගමිස්සති, අප්පටිච්ඡිතපහෙණකං විය, පටිවාතං ඛිත්තරජොමුට්ඨි විය ච එතස්සෙව එස කොධො මත්ථකෙ පතිස්සතී’’ති එවං අත්තනො ච පරස්ස චාති උභයෙසං කම්මස්සකතං පච්චවෙක්ඛතොපි, පච්චවෙක්ඛිත්වා පටිසඞ්ඛානෙ ඨිතස්සපි, අස්සගුත්තත්ථෙරසදිසෙ මෙත්තාභාවනාරතෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සාපි බ්යාපාදො පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු මෙත්තානිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා බ්යාපාදස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. इसके अतिरिक्त, छह धर्म व्यापाद के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं— मैत्री-निमित्त का उद्ग्रह (ग्रहण), मैत्री-भावना, कर्मस्वकीयता का प्रत्यवेक्षण, प्रतिसंख्यान (विचार) की बहुलता, कल्याणमित्रता और अनुकूल कथा। ओधिसक (सीमित) और अनोधिसक (असीमित) दिशा-स्फुरण में से किसी एक के वश से मैत्री का ग्रहण करने वाले का भी व्यापाद नष्ट होता है, ओधिसक और अनोधिसक दिशा-स्फुरण के वश से मैत्री की भावना करने वाले का भी व्यापाद नष्ट होता है। ‘तुम इस पर क्रोधित होकर क्या करोगे? क्या तुम इसके शील आदि को नष्ट कर सकोगे? क्या तुम अपने कर्म से आकर अपने ही कर्म से नहीं जाओगे? दूसरे पर क्रोध करना जलते हुए अंगारे, तप्त लोहे की शलाका या विष्ठा आदि को हाथ में लेकर दूसरे को मारने की इच्छा के समान है। यह भी तुम पर क्रोधित होकर क्या करेगा? क्या यह तुम्हारे शील आदि को नष्ट कर सकेगा? यह अपने कर्म से आकर अपने ही कर्म से जाएगा; अस्वीकृत उपहार की तरह और हवा के विपरीत फेंकी गई धूल की मुट्ठी की तरह इसका यह क्रोध इसी के सिर पर गिरेगा’— इस प्रकार अपने और दूसरे के, दोनों के कर्मस्वकीयता का प्रत्यवेक्षण करने वाले का, प्रत्यवेक्षण कर प्रतिसंख्यान में स्थित रहने वाले का, अस्सगुत्त स्थविर के समान मैत्री-भावना में रत कल्याणमित्रों का सेवन करने वाले का भी व्यापाद नष्ट होता है, और खड़े होने या बैठने आदि के समय मैत्री-आश्रित अनुकूल कथा से भी (व्यापाद) नष्ट होता है। इसीलिए कहा गया है— ‘छह धर्म व्यापाद के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं’। අරතිආදීසු අයොනිසොමනසිකාරෙන ථිනමිද්ධස්ස උප්පාදො හොති. අරති නාම උක්කණ්ඨිතතා, තන්දී නාම කායාලසියං, විජම්භිතා නාම කායවිනමනා, භත්තසම්මදො නාම භත්තමුච්ඡා භත්තපරිළාහො, චෙතසො ලීනත්තං නාම චිත්තස්ස ලීනාකාරො. ඉමෙසු අරතිආදීසු අයොනිසොමනසිකාරං බහුලං පවත්තයතො ථිනමිද්ධං උප්පජ්ජති. තෙනාහ භගවා – अरति आदि में अयोनिशः मनसिकार से स्त्यान-मृद्ध (आलस्य और तन्द्रा) की उत्पत्ति होती है। अरति का अर्थ है ऊब जाना, तन्द्री का अर्थ है शारीरिक आलस्य, विजम्भिता का अर्थ है शरीर का अंगड़ाई लेना, भक्तसम्मद का अर्थ है भोजन के बाद की मूर्च्छा या भारीपन, और चित्त की लीनता का अर्थ है चित्त का सुस्त होना। इन अरति आदि में अयोनिशः मनसिकार का बहुत अधिक प्रयोग करने वाले को स्त्यान-मृद्ध उत्पन्न होता है। इसीलिए भगवान ने कहा— ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, අරති තන්දී විජම්භිතා භත්තසම්මදො චෙතසො ලීනත්තං. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා ථිනමිද්ධස්ස උප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා ථිනමිද්ධස්ස භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं, अरति (अरुचि), तन्द्रा (आलस्य), जम्हाई लेना, भोजन के बाद का मद (भोजन-मूर्च्छा) और चित्त की लीनता (सुस्ती) है। वहाँ अयोनिशो मनसिकार की बहुलता—यह अनुत्पन्न स्त्यान-मृद्ध (थीन-मिद्ध) की उत्पत्ति के लिए और उत्पन्न स्त्यान-मृद्ध की वृद्धि और प्रचुरता के लिए आहार (कारण) है।” (सं. नि. 5.232) ආරම්භධාතුආදීසු පන යොනිසොමනසිකාරෙන ථිනමිද්ධස්ස පහානං හොති. ආරම්භධාතු නාම පඨමාරම්භවීරියං, නික්කමධාතු නාම කොසජ්ජතො නික්ඛන්තතාය තතො බලවතරං, පරක්කමධාතු නාම පරං පරං ඨානං අක්කමනතො තතොපි බලවතරං. ඉමස්මිං තිප්පභෙදෙ වීරියෙ යොනිසොමනසිකාරං බහුලං පවත්තයතො ථිනමිද්ධං පහීයති. තෙනාහ – आरम्भ-धातु आदि में योनिशो मनसिकार करने से स्त्यान-मृद्ध का प्रहाण (त्याग) होता है। आरम्भ-धातु का अर्थ है प्रथम आरम्भ किया गया वीर्य (पुरुषार्थ), निष्क्रम-धातु का अर्थ है आलस्य से निकल जाने के कारण उससे अधिक बलवान वीर्य, और पराक्रम-धातु का अर्थ है उत्तरोत्तर उच्च अवस्थाओं को प्राप्त करने के कारण उससे भी अधिक बलवान वीर्य। इस तीन प्रकार के वीर्य में योनिशो मनसिकार को बहुलता से प्रवृत्त करने वाले का स्त्यान-मृद्ध प्रहीण हो जाता है। इसीलिए कहा गया है— ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, ආරම්භධාතු, නික්කමධාතු, පරක්කමධාතු. තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස [Pg.341] වා ථිනමිද්ධස්ස අනුප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා ථිනමිද්ධස්ස පහානායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं, आरम्भ-धातु, निष्क्रम-धातु और पराक्रम-धातु है। वहाँ योनिशो मनसिकार की बहुलता—यह अनुत्पन्न स्त्यान-मृद्ध की अनुत्पत्ति के लिए और उत्पन्न स्त्यान-मृद्ध के प्रहाण के लिए आहार है।” (सं. नि. 5.232) අපිච ඡ ධම්මා ථිනමිද්ධස්ස පහානාය සංවත්තන්ති, අතිභොජනෙ නිමිත්තග්ගාහො – ඉරියාපථසම්පරිවත්තනතා, ආලොකසඤ්ඤාමනසිකාරො, අබ්භොකාසවාසො, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. ආහරහත්ථකභුත්තවමිතකතත්ථවට්ටකඅලංසාටකකාකමාසකභොජනං භුඤ්ජිත්වා රත්තිට්ඨානදිවාට්ඨානෙ නිසින්නස්ස හි සමණධම්මං කරොතො ථිනමිද්ධං මහාහත්ථී විය ඔත්ථරන්තං ආගච්ඡති, චතුපඤ්චආලොපඔකාසං පන ඨපෙත්වා පානීයං පිවිත්වා යාපනසීලස්ස භික්ඛුනො තං න හොති. එවං අතිභොජනෙ නිමිත්තං ගණ්හන්තස්සපි ථිනමිද්ධං පහීයති. යස්මිං ඉරියාපථෙ ථිනමිද්ධං ඔක්කමති, තතො අඤ්ඤං පරිවත්තෙන්තස්සපි, රත්තිං චන්දාලොකං දීපාලොකං උක්කාලොකං දිවා සූරියාලොකං මනසිකරොන්තස්සපි, අබ්භොකාසෙ වසන්තස්සපි මහාකස්සපත්ථෙරසදිසෙ විගතථිනමිද්ධෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සපි ථිනමිද්ධං පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු ධුතඞ්ගනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා ථිනමිද්ධස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. इसके अतिरिक्त, छह धर्म स्त्यान-मृद्ध के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं: अति-भोजन में निमित्त-ग्रहण (भोजन की मात्रा का ज्ञान), ईर्यापथ का परिवर्तन, आलोक-संज्ञा का मनसिकार, खुले आकाश में निवास, कल्याण-मित्रता और उपयुक्त कथा। 'आहरहत्थक' (हाथ से भरकर खाना), 'भुत्तवमितक' (खाकर वमन करना), 'तत्तवट्टक' (पेट भरकर लुढ़कना), 'अलसाटक' (इतना खाना कि हिल न सके) और 'काकभासक' (कौवे की तरह ठूँसकर खाना) जैसा भोजन करके रात्रि-स्थान या दिवा-स्थान में बैठकर श्रमण-धर्म करने वाले को स्त्यान-मृद्ध एक विशाल हाथी की तरह दबाता हुआ आता है; परंतु चार-पाँच ग्रास की जगह छोड़कर पानी पीकर जीवन-यापन करने वाले भिक्षु को वह नहीं होता। इस प्रकार अति-भोजन में निमित्त ग्रहण करने वाले का भी स्त्यान-मृद्ध प्रहीण हो जाता है। जिस ईर्यापथ में स्त्यान-मृद्ध आता है, उससे दूसरे ईर्यापथ में बदलने वाले का, रात्रि में चन्द्रमा के प्रकाश, दीपक के प्रकाश या मशाल के प्रकाश का और दिन में सूर्य के प्रकाश का मनसिकार करने वाले का, खुले आकाश में रहने वाले का, महाकश्यप स्थविर के समान स्त्यान-मृद्ध रहित कल्याण-मित्रों का सेवन करने वाले का भी स्त्यान-मृद्ध प्रहीण हो जाता है; खड़े होने, बैठने आदि के समय धुताङ्ग-आश्रित उपयुक्त कथा से भी वह प्रहीण हो जाता है। इसीलिए कहा गया है— 'छह धर्म स्त्यान-मृद्ध के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं'। චෙතසො අවූපසමෙ අයොනිසොමනසිකාරෙන උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස උප්පාදො හොති. අවූපසමො නාම අවූපසන්තාකාරො, අත්ථතො තං උද්ධච්චකුක්කුච්චමෙව. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරං බහුලං පවත්තයතො උද්ධච්චකුක්කුච්චං උප්පජ්ජති. තෙනාහ – चित्त की अशांति (अव्युपशम) में अयोनिशो मनसिकार से औद्धत्य-कौकृत्य (उद्धच्च-कुक्कुच्च) की उत्पत्ति होती है। अशांति का अर्थ है अशांत अवस्था, अर्थतः वह औद्धत्य-कौकृत्य ही है। वहाँ अयोनिशो मनसिकार को बहुलता से प्रवृत्त करने वाले को औद्धत्य-कौकृत्य उत्पन्न होता है। इसीलिए कहा गया है— ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, චෙතසො අවූපසමො. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස උප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं, चित्त की अशांति है। वहाँ अयोनिशो मनसिकार की बहुलता—यह अनुत्पन्न औद्धत्य-कौकृत्य की उत्पत्ति के लिए और उत्पन्न औद्धत्य-कौकृत्य की वृद्धि और प्रचुरता के लिए आहार है।” (सं. नि. 5.232) සමාධිසඞ්ඛාතෙ පන චෙතසො වූපසමෙ යොනිසොමනසිකාරෙනස්ස පහානං හොති. තෙනාහ – समाधि संज्ञक चित्त की शांति (व्युपशम) में योनिशो मनसिकार से इसका प्रहाण होता है। इसीलिए कहा गया है— ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, චෙතසො වූපසමො. තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නස්ස වා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස අනුප්පාදාය, උප්පන්නස්ස වා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස පහානායා’’ති (සං. නි. 5.232). “भिक्षुओं, चित्त की शांति है। वहाँ योनिशो मनसिकार की बहुलता—यह अनुत्पन्न औद्धत्य-कौकृत्य की अनुत्पत्ति के लिए और उत्पन्न औद्धत्य-कौकृत्य के प्रहाण के लिए आहार है।” (सं. नि. 5.232) අපිච [Pg.342] ඡ ධම්මා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස පහානාය සංවත්තන්ති – බහුස්සුතතා, පරිපුච්ඡකතා, විනයෙ පකතඤ්ඤුතා, වුඩ්ඪසෙවිතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති. බාහුසච්චෙනපි හි එකං වා ද්වෙ වා තයො වා චත්තාරො වා පඤ්ච වා නිකායෙ පාළිවසෙන ච අත්ථවසෙන ච උග්ගණ්හන්තස්සපි උද්ධච්චකුක්කුච්චං පහීයති, කප්පියාකප්පියපරිපුච්ඡාබහුලස්සපි, විනයපඤ්ඤත්තියං චිණ්ණවසීභාවතාය පකතඤ්ඤුනොපි, වුඩ්ඪෙ මහල්ලකත්ථෙරෙ උපසඞ්කමන්තස්සපි, උපාලිත්ථෙරසදිසෙ විනයධරෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සපි උද්ධච්චකුක්කුච්චං පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු කප්පියාකප්පියනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා උද්ධච්චකුක්කුච්චස්ස පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. इसके अतिरिक्त छह धर्म औद्धत्य-कौकृत्य (चंचलता और पछतावा) के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं - बहुश्रुतता, परिपृच्छकता (पूछताछ करना), विनय में दक्षता, वृद्धों की सेवा, कल्याणमित्रता और उपयुक्त कथा। बहुश्रुतता के द्वारा भी, एक या दो या तीन या चार या पाँच निकायों को पालि और अर्थ के साथ सीखने वाले का भी औद्धत्य-कौकृत्य प्रहीण हो जाता है; कल्प्य-अकल्प्य (क्या उचित है क्या नहीं) के विषय में बहुत पूछताछ करने वाले का भी; विनय प्रज्ञप्ति में वशीभाव प्राप्त होने के कारण दक्ष व्यक्ति का भी; वृद्ध और वयोवृद्ध स्थविरों के पास जाने वाले का भी; उपालि स्थविर के समान विनयधर कल्याणमित्रों की सेवा करने वाले का भी औद्धत्य-कौकृत्य प्रहीण हो जाता है; और खड़े होने, बैठने आदि के समय कल्प्य-अकल्प्य से संबंधित उपयुक्त कथा से भी (यह) प्रहीण होता है। इसीलिए कहा गया है - "छह धर्म औद्धत्य-कौकृत्य के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं।" විචිකිච්ඡාට්ඨානියෙසු ධම්මෙසු අයොනිසොමනසිකාරෙන විචිකිච්ඡාය උප්පාදො හොති. විචිකිච්ඡාට්ඨානියා ධම්මා නාම පුනප්පුනං විචිකිච්ඡාය කාරණත්තා විචිකිච්ඡාව. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරං බහුලං පවත්තයතො විචිකිච්ඡා උප්පජ්ජති. තෙනාහ – विचिकित्सा (संदेह) के स्थानों वाले धर्मों में अयोनिशो मनसिकार (अनुचित ध्यान) करने से विचिकित्सा की उत्पत्ति होती है। विचिकित्सा के स्थान वाले धर्मों का अर्थ बार-बार विचिकित्सा के कारण होने से विचिकित्सा ही है। वहाँ अयोनिशो मनसिकार का बहुत अभ्यास करने वाले को विचिकित्सा उत्पन्न होती है। इसीलिए कहा - ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, විචිකිච්ඡාට්ඨානියා ධම්මා. තත්ථ අයොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො – අයමාහාරො අනුප්පන්නාය වා විචිකිච්ඡාය උප්පාදාය, උප්පන්නාය වා විචිකිච්ඡාය භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලායා’’ති (සං. නි. 5.232). "भिक्षुओं! विचिकित्सा के स्थान वाले धर्म हैं। वहाँ अयोनिशो मनसिकार की बहुलता - यह अनुत्पन्न विचिकित्सा की उत्पत्ति के लिए, या उत्पन्न विचिकित्सा की वृद्धि और प्रचुरता के लिए आहार है।" (सं. नि. 5.232) කුසලාදිධම්මෙසු පන යොනිසොමනසිකාරෙන විචිකිච්ඡාය පහානං හොති. තෙනාහ – कुशल आदि धर्मों में योनिशो मनसिकार (उचित ध्यान) करने से विचिकित्सा का प्रहाण होता है। इसीलिए कहा - ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, කුසලාකුසලා ධම්මා, සාවජ්ජානවජ්ජා ධම්මා, සෙවිතබ්බාසෙවිතබ්බා ධම්මා, හීනපණීතා ධම්මා, කණ්හසුක්කසප්පටිභාගා ධම්මා. තත්ථ යොනිසොමනසිකාරබහුලීකාරො අයමාහාරො අනුප්පන්නාය වා විචිකිච්ඡාය අනුප්පාදාය, උප්පන්නාය වා විචිකිච්ඡාය පහානායා’’ති (සං. නි. 5.232). "भिक्षुओं! कुशल और अकुशल धर्म हैं, सदोष और निर्दोष धर्म हैं, सेवनीय और असेवनीय धर्म हैं, हीन और प्रणीत धर्म हैं, कृष्ण और शुक्ल के समान प्रतिपक्ष वाले धर्म हैं। वहाँ योनिशो मनसिकार की बहुलता - यह अनुत्पन्न विचिकित्सा की अनुत्पत्ति के लिए, या उत्पन्न विचिकित्सा के प्रहाण के लिए आहार है।" (सं. नि. 5.232) අපිච ඡ ධම්මා විචිකිච්ඡාය පහානාය සංවත්තන්ති බහුස්සුතතා, පරිපුච්ඡකතා, විනයෙ පකතඤ්ඤුතා, අධිමොක්ඛබහුලතා, කල්යාණමිත්තතා, සප්පායකථාති[Pg.343]. බාහුසච්චවසෙනපි හි එකං වා…පෙ… පඤ්ච වා නිකායෙ පාළිවසෙන ච අත්ථවසෙන ච උග්ගණ්හන්තස්සපි විචිකිච්ඡා පහීයති, තීණි රතනානි ආරබ්භ කුසලාදිභෙදෙසු ධම්මෙසු පරිපුච්ඡාබහුලස්සපි, විනයෙ චිණ්ණවසීභාවස්සපි, තීසු රතනෙසු ඔකප්පනීය, සද්ධාසඞ්ඛාත, අධිමොක්ඛබහුලස්සපි, සද්ධාධිමුත්තෙ වක්කලිත්ථෙරසදිසෙ කල්යාණමිත්තෙ සෙවන්තස්සපි විචිකිච්ඡා පහීයති, ඨානනිසජ්ජාදීසු තිණ්ණං රතනානං ගුණනිස්සිතසප්පායකථායපි පහීයති. තෙන වුත්තං ‘‘ඡ ධම්මා විචිකිච්ඡාය පහානාය සංවත්තන්තී’’ති. इसके अतिरिक्त छह धर्म विचिकित्सा के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं - बहुश्रुतता, परिपृच्छकता, विनय में दक्षता, अधिमोक्ष (दृढ़ निश्चय) की बहुलता, कल्याणमित्रता और उपयुक्त कथा। बहुश्रुतता के वश से भी, एक या... या पाँच निकायों को पालि और अर्थ के साथ सीखने वाले की भी विचिकित्सा प्रहीण हो जाती है; तीन रत्नों के विषय में कुशल आदि भेदों वाले धर्मों में बहुत पूछताछ करने वाले की भी; विनय में वशीभाव प्राप्त करने वाले की भी; तीन रत्नों में दृढ़ श्रद्धा रूपी अधिमोक्ष की बहुलता वाले की भी; श्रद्धा-अधिमुक्त वक्कल स्थविर के समान कल्याणमित्रों की सेवा करने वाले की भी विचिकित्सा प्रहीण हो जाती है; और खड़े होने, बैठने आदि के समय तीन रत्नों के गुणों पर आधारित उपयुक्त कथा से भी (यह) प्रहीण होती है। इसीलिए कहा गया है - "छह धर्म विचिकित्सा के प्रहाण के लिए संवर्तित होते हैं।" එත්ථ ච යථාවුත්තෙහි තෙහි තෙහි ධම්මෙහි වික්ඛම්භනවසෙන පහීනානං ඉමෙසං නීවරණානං කාමච්ඡන්දනීවරණස්ස තාව අරහත්තමග්ගෙන අච්චන්තප්පහානං හොති, තථා ථිනමිද්ධනීවරණස්ස උද්ධච්චනීවරණස්ස ච. බ්යාපාදනීවරණස්ස පන කුක්කුච්චනීවරණස්ස ච අනාගාමිමග්ගෙන, විචිකිච්ඡානීවරණස්ස සොතාපත්තිමග්ගෙන අච්චන්තප්පහානං හොති. තස්මා තෙසං තථා පහානාය උපකාරධම්මෙ දස්සෙතුං ‘‘ආරද්ධං හොති වීරිය’’න්තිආදි ආරද්ධං. ඉදමෙව වා යථාවුත්තං අභිජ්ඣාදීනං නීවරණානං පහානං, යස්මා හීනවීරියතාය කුසීතෙන, අනුපට්ඨිතස්සතිතාය මුට්ඨස්සතිනා, අපටිප්පස්සද්ධදරථතාය සාරද්ධකායෙන, අසමාහිතතාය වික්ඛිත්තචිත්තෙන න කදාචිපි තෙ සක්කා නිබ්බත්තෙතුං, පගෙව ඉතරං, තස්මා යථා පටිපන්නස්ස සො අභිජ්ඣාදීනං විගමො පහානං සම්භවති, තං දස්සෙතුං ‘‘ආරද්ධං හොති වීරිය’’න්තිආදි ආරද්ධං. තස්සත්ථො – තෙසං නීවරණානං පහානාය සබ්බෙසම්පි වා සංකිලෙසධම්මානං සමුච්ඡින්දනත්ථාය වීරියං ආරද්ධං හොති, පග්ගහිතං අසිථිලප්පවත්තන්ති වුත්තං හොති. ආරද්ධත්තා එව ච අන්තරා සඞ්කොචස්ස අනාපජ්ජනතො අසල්ලීනං. और यहाँ, ऊपर कहे गए उन-उन धर्मों के द्वारा विक्षम्भण (दबाने) के वश से प्रहीण हुए इन नीवरणों में से, कामच्छन्द नीवरण का अर्हत् मार्ग से आत्यन्तिक प्रहाण होता है, वैसे ही स्त्यान-मिद्ध नीवरण और औद्धत्य नीवरण का भी। व्यापाद नीवरण और कौकृत्य नीवरण का अनागामी मार्ग से, और विचिकित्सा नीवरण का स्रोतपत्ति मार्ग से आत्यन्तिक प्रहाण होता है। इसलिए उनके उस प्रकार के प्रहाण के लिए उपकारक धर्मों को दिखाने के लिए "वीर्य आरब्ध होता है" आदि आरम्भ किया गया है। अथवा, पूर्वोक्त अभिध्या आदि नीवरणों का यह प्रहाण, क्योंकि हीन वीर्य वाले आलसी व्यक्ति द्वारा, स्मृति के उपस्थित न होने से विस्मृत स्मृति वाले द्वारा, शरीर की व्याकुलता शांत न होने से व्यग्र शरीर वाले द्वारा, और समाहित न होने से विक्षिप्त चित्त वाले द्वारा वे कभी भी सिद्ध नहीं किए जा सकते, अन्य (मार्गों) की तो बात ही क्या, इसलिए जिस प्रकार प्रतिपन्न (साधक) का वह अभिध्या आदि का विगत होना या प्रहाण संभव होता है, उसे दिखाने के लिए "वीर्य आरब्ध होता है" आदि आरम्भ किया गया है। उसका अर्थ है - उन नीवरणों के प्रहाण के लिए या सभी संक्लेश धर्मों के समूच्छेदन (पूर्ण विनाश) के लिए वीर्य आरब्ध होता है, अर्थात् दृढ़ता से पकड़ा हुआ और शिथिलता रहित प्रवृत्त होता है। आरब्ध होने के कारण ही बीच में संकोच (पीछे हटना) न होने से वह असल्लीन है। උපට්ඨිතා සති අසම්මුට්ඨාති න කෙවලඤ්ච වීරියමෙව, සතිපි ආරම්මණාභිමුඛභාවෙන උපට්ඨිතා හොති, තථා උපට්ඨිතත්තා එව ච චිරකතචිරභාසිතානං සරණසමත්ථතාය අසම්මුට්ඨා. පස්සද්ධොති කායචිත්තදරථප්පස්සම්භනෙන කායොපිස්ස පස්සද්ධො හොති. තත්ථ යස්මා නාමකායෙ පස්සද්ධෙ රූපකායොපිස්ස පස්සද්ධො එව හොති, තස්මා ‘‘නාමකායො රූපකායො’’ති අවිසෙසෙත්වා ‘‘පස්සද්ධො කායො’’ති වුත්තං. අසාරද්ධොති සො ච පස්සද්ධත්තා එව අසාරද්ධො, විගතදරථොති වුත්තං හොති. සමාහිතං චිත්තං එකග්ගන්ති චිත්තම්පිස්ස සම්මා ආහිතං සුට්ඨු ඨපිතං අප්පිතං විය හොති, සමාහිතත්තා එව ච එකග්ගං අචලං නිප්ඵන්දනං නිරිඤ්ජනන්ති. "स्मृति उपस्थित है, विस्मृत नहीं है" - न केवल वीर्य ही, बल्कि स्मृति भी आलम्बन के सम्मुख होने के कारण उपस्थित होती है, और इस प्रकार उपस्थित होने के कारण ही बहुत पहले किए गए और बहुत पहले कहे गए को स्मरण करने में समर्थ होने से असंमुट्ठा (विस्मृत न होना) है। "प्रश्रब्ध" का अर्थ है - काय और चित्त की व्याकुलता के शांत होने से उसका शरीर भी प्रश्रब्ध (शांत) होता है। वहाँ क्योंकि नाम-काय के प्रश्रब्ध होने पर उसका रूप-काय भी प्रश्रब्ध ही होता है, इसलिए "नाम-काय रूप-काय" ऐसा विशेष भेद न करके "प्रश्रब्ध काय" कहा गया है। "असारब्ध" का अर्थ है - वह प्रश्रब्ध होने के कारण ही असारब्ध है, अर्थात् व्याकुलता रहित है। "चित्त समाहित और एकाग्र है" - उसका चित्त भी सम्यक् रूप से आहित (स्थित), भली-भाँति स्थापित, अर्पणा के समान होता है, और समाहित होने के कारण ही एकाग्र, अचल, निष्पन्द और निरिंजन (स्थिर) होता है। එත්තාවතා [Pg.344] ඣානමග්ගානං පුබ්බභාගපටිපදා කථිතා. තෙනෙවාහ – यहाँ तक ध्यान-मार्गों की पूर्वभाग-प्रतिपदा (प्रारंभिक साधना) कही गई है। इसीलिए कहा - ‘‘චරම්පි, භික්ඛවෙ, භික්ඛු එවංභූතො ආතාපී ඔත්තාපී සතතං සමිතං ආරද්ධවීරියො පහිතත්තොති වුච්චතී’’ති (ඉතිවු. 110). "भिक्षुओं! इस प्रकार का भिक्षु चलते हुए भी आतापी (उत्साही), ओत्तापी (पापभीरु), सतत और निरंतर आरब्ध-वीर्य और प्रहित-आत्मा (दृढ़निश्चयी) कहा जाता है।" (इतिवृत्तक 110) තස්සත්ථො හෙට්ඨා වුත්තො එව. इसका अर्थ नीचे (पहले ही) कहा गया है। ගාථාසු යතං චරෙති යතමානො චරෙය්ය, චඞ්කමනාදිවසෙන ගමනං කප්පෙන්තොපි ‘‘අනුප්පන්නානං පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං අනුප්පාදාය ඡන්දං ජනෙති වායමතී’’තිආදිනා (සං. නි. 5.651-662; විභ. 390) නයෙන වුත්තසම්මප්පධානවීරියවසෙන යතන්තො ඝටෙන්තො වායමන්තො යථා අකුසලා ධම්මා පහීයන්ති, කුසලා ධම්මා භාවනාපාරිපූරිං ගච්ඡන්ති, එවං ගමනං කප්පෙය්යාති අත්ථො. එස නයො සෙසෙසුපි. කෙචි පන ‘‘යත’’න්ති එතස්ස සංයතොති අත්ථං වදන්ති. තිට්ඨෙති තිට්ඨෙය්ය ඨානං කප්පෙය්ය. අච්ඡෙති නිසීදෙය්ය. සයෙති නිපජ්ජෙය්ය. යතමෙනං පසාරයෙති එතං පසාරෙතබ්බං හත්ථපාදාදිං යතං යතමානො යථාවුත්තවීරියසමඞ්ගීයෙව හුත්වා පසාරෙය්ය, සබ්බත්ථ පමාදං විජහෙය්යාති අධිප්පායො. गाथाओं में 'यतं चरे' का अर्थ है यत्न करते हुए चले; चंक्रमण आदि के माध्यम से गमन करते हुए भी 'अनुत्पन्न पापमय अकुशल धर्मों की अनुत्पत्ति के लिए छन्द (इच्छा) उत्पन्न करता है, व्यायाम (प्रयत्न) करता है' आदि विधि से कहे गए सम्यक् प्रधान वीर्य के वश से यत्न करते हुए, चेष्टा करते हुए, व्यायाम करते हुए, जिससे अकुशल धर्म प्रहीण हो जाएँ और कुशल धर्म भावना की परिपूर्णता को प्राप्त हों, इस प्रकार गमन करना चाहिए—यह अर्थ है। यही विधि शेष (अवस्थाओं) में भी है। कुछ लोग 'यतं' का अर्थ 'संयत' कहते हैं। 'तिट्ठे' का अर्थ है खड़ा रहे, खड़े होने की स्थिति बनाए। 'अच्छे' का अर्थ है बैठे। 'सये' का अर्थ है लेटे। 'यतमेनं पसारये' का अर्थ है इस फैलाए जाने वाले हाथ-पैर आदि को यत्नपूर्वक, यत्न करते हुए, पूर्वोक्त वीर्य से युक्त होकर ही फैलाए; सब जगह प्रमाद का त्याग करे—यह अभिप्राय है। ඉදානි යථා පටිපජ්ජන්තො යතං යතමානො නාම හොති, තං පටිපදං දස්සෙතුං ‘‘උද්ධ’’න්තිආදි වුත්තං. තත්ථ උද්ධන්ති උපරි. තිරියන්ති තිරියතො, පුරත්ථිමදිසාදිවසෙන සමන්තතො දිසාභාගෙසූති අත්ථො. අපාචීනන්ති හෙට්ඨා. යාවතා ජගතො ගතීති යත්තකා සත්තසඞ්ඛාරභෙදස්ස ලොකස්ස පවත්ති, තත්ථ සබ්බත්ථාති අත්ථො. එත්තාවතා අනවසෙසතො සම්මසනඤාණස්ස විසයං සඞ්ගහෙත්වා දස්සෙති. සමවෙක්ඛිතාති සම්මා හෙතුනා ඤායෙන අවෙක්ඛිතා, අනිච්චාදිවසෙන විපස්සකොති වුත්තං හොති. ධම්මානන්ති සත්තසුඤ්ඤානං. ඛන්ධානන්ති රූපාදීනං පඤ්චන්නං ඛන්ධානං. උදයබ්බයන්ති උදයඤ්ච වයඤ්ච. ඉදං වුත්තං හොති – උපරි තිරියං අධොති තිසඞ්ගහෙ සබ්බස්මිං ලොකෙ අතීතාදිභෙදභින්නානං පඤ්චුපාදානක්ඛන්ධසඞ්ඛාතානං සබ්බෙසං රූපාරූපධම්මානං අනිච්චතාදිසම්මසනාධිගතෙන උදයබ්බයඤාණෙන පඤ්චවීසතියා ආකාරෙහි උදයං, පඤ්චවීසතියා ආකාරෙහි වයඤ්ච සමවෙක්ඛිතා සමනුපස්සිතා භවෙය්යාති. अब जिस प्रकार प्रतिपन्न (साधना में लगा हुआ) व्यक्ति 'यतं यतमान' (यत्नशील) कहलाता है, उस प्रतिपदा को दिखाने के लिए 'उद्धं' आदि कहा गया है। वहाँ 'उद्धं' का अर्थ है ऊपर। 'तिरियं' का अर्थ है तिरछा, पूर्व दिशा आदि के क्रम से चारों ओर की दिशाओं के भागों में—यह अर्थ है। 'अपाचीनं' का अर्थ है नीचे। 'यावता जगतो गति' का अर्थ है जहाँ तक सत्त्वों और संस्कारों के भेद वाले लोक की प्रवृत्ति है, वहाँ सर्वत्र—यह अर्थ है। इतने से वह बिना किसी शेष के सम्मसन-ज्ञान (परीक्षण ज्ञान) के विषय को संगृहीत करके दिखाता है। 'समवेक्खिता' का अर्थ है सम्यक् रूप से हेतु और न्याय (युक्ति) से देखा गया, अनित्यता आदि के वश से विपश्यना करने वाला—यह कहा गया है। 'धम्मानं' का अर्थ है सत्त्व-शून्य धर्मों का। 'खन्धानं' का अर्थ है रूप आदि पाँच स्कन्धों का। 'उदयब्बयं' का अर्थ है उदय और व्यय (उत्पत्ति और विनाश)। यह कहा गया है— ऊपर, तिरछा और नीचे, इन तीनों के संग्रह में, सम्पूर्ण लोक में, अतीत आदि के भेद से भिन्न पाँच उपादान स्कन्ध संज्ञक सभी रूप और अरूप धर्मों का, अनित्यता आदि के सम्मसन (परीक्षण) से प्राप्त उदय-व्यय ज्ञान के द्वारा पच्चीस प्रकारों से उदय और पच्चीस प्रकारों से व्यय को सम्यक् रूप से देखने वाला (समवेक्षिता) और अनुदर्शन करने वाला होना चाहिए। චෙතොසමථසාමීචින්ති [Pg.345] චිත්තසංකිලෙසානං අච්චන්තවූපසමනතො චෙතොසමථසඞ්ඛාතස්ස අරියමග්ගස්ස අනුච්ඡවිකපටිපදං ඤාණදස්සනවිසුද්ධිං. සික්ඛමානන්ති පටිපජ්ජමානං භාවෙන්තං ඤාණපරම්පරං නිබ්බත්තෙන්තං. සදාති සබ්බකාලං, රත්තිඤ්චෙව දිවා ච. සතන්ති චතුසම්පජඤ්ඤෙන සමන්නාගතාය සතියා සතොකාරිං. සතතං පහිතත්තොති සබ්බකාලං පහිතත්තො නිබ්බානං පටිපෙසිතත්තොති තථාවිධං භික්ඛුං බුද්ධාදයො අරියා ආහු ආචික්ඛන්ති කථෙන්ති. සෙසං වුත්තනයමෙව. 'चेतोसमथसामीचि' का अर्थ है चित्त के क्लेशों के अत्यंत उपशमन से 'चेतोसमथ' (चित्त की शांति) कहे जाने वाले आर्य मार्ग के अनुरूप प्रतिपदा, जो ज्ञानदर्शनविशुद्धि है। 'सिक्खमानं' का अर्थ है प्रतिपन्न होना, भावना करना, ज्ञान की परंपरा को उत्पन्न करना। 'सदा' का अर्थ है सब काल में, रात और दिन में। 'सतं' का अर्थ है चार सम्प्रजन्य से युक्त स्मृति के साथ स्मृतिवान होना। 'सततं पहितत्तो' का अर्थ है सदा प्रहित-आत्मा (दृढ़ निश्चयी), निर्वाण की ओर चित्त को लगाने वाला; बुद्ध आदि आर्य ऐसे भिक्षु के बारे में कहते हैं, बताते हैं। शेष पहले कहे गए अनुसार ही है। ද්වාදසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. बारहवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। 13. ලොකසුත්තවණ්ණනා १३. लोक सूत्र की व्याख्या। 112. තෙරසමෙ ලොකොති ලුජ්ජනපලුජ්ජනට්ඨෙන ලොකො, අත්ථතො පුරිමං අරියසච්චද්වයං ඉධ පන දුක්ඛං අරියසච්චං වෙදිතබ්බං. ස්වායං සත්තලොකො, සඞ්ඛාරලොකො, ඔකාසලොකොති විභාගතො සරූපතො ච හෙට්ඨා වුත්තොයෙව. අපිච ඛන්ධලොකාදිවසෙන ච අනෙකවිධො ලොකො. යථාහ – ११२. तेरहवें (सूत्र) में 'लोक' का अर्थ है विनाशशील होने के अर्थ में लोक। अर्थतः यह पहले के दो आर्य सत्य हैं, किन्तु यहाँ 'दुःख आर्य सत्य' समझना चाहिए। वह यह सत्त्वलोक, संस्कारलोक और अवकाशलोक के विभाग और स्वरूप से नीचे कहा ही गया है। इसके अतिरिक्त स्कन्धलोक आदि के भेद से लोक अनेक प्रकार का है। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ලොකොති ඛන්ධලොකො, ධාතුලොකො, ආයතනලොකො, විපත්තිභවලොකො, විපත්තිසම්භවලොකො, සම්පත්තිභවලොකො, සම්පත්තිසම්භවලොකො, එකො ලොකො සබ්බෙ සත්තා අහාරට්ඨිතිකා, ද්වෙ ලොකා නාමඤ්ච රූපඤ්ච, තයො ලොකා තිස්සො වෙදනා, චත්තාරො ලොකා චත්තාරො ආහාරා, පඤ්ච ලොකා පඤ්චුපාදානක්ඛන්ධා, ඡ ලොකා ඡ අජ්ඣත්තිකානි ආයතනානි, සත්ත ලොකා සත්ත විඤ්ඤාණට්ඨිතියො, අට්ඨ ලොකා අට්ඨ ලොකධම්මා, නව ලොකා නව සත්තාවාසා, දස ලොකා දසායතනානි, ද්වාදස ලොකා ද්වාදසායතනානි, අට්ඨාරස ලොකා අට්ඨාරස ධාතුයො’’ති (මහානි. 3; චූළනි. අජිතමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 2). "लोक का अर्थ है स्कन्धलोक, धातुलोक, आयतनलोक, विपत्तिभवलोक, विपत्तिसम्भवलोक, सम्पत्तिभवलोक, सम्पत्तिसम्भवलोक; एक लोक - सभी प्राणी आहार पर स्थित हैं; दो लोक - नाम और रूप; तीन लोक - तीन वेदनाएँ; चार लोक - चार आहार; पाँच लोक - पाँच उपादान स्कन्ध; छह लोक - छह आध्यात्मिक आयतन; सात लोक - सात विज्ञान-स्थितियाँ; आठ लोक - आठ लोकधर्म; नौ लोक - नौ सत्त्वावास; दस लोक - दस आयतन; बारह लोक - बारह आयतन; अठारह लोक - अठारह धातुएँ।" (महानिद्देस 3; चूलनिद्देस, अजितमाणवपुच्छा निद्देस 2)। එවමනෙකධා විභත්තොපි ලොකො පඤ්චසු උපාදානක්ඛන්ධෙසු එව සඞ්ගහං සමොසරණං ගච්ඡති, උපාදානක්ඛන්ධා ච දුක්ඛං අරියසච්චං ජාතිපි දුක්ඛා [Pg.346] …පෙ… සංඛිත්තෙන පඤ්චුපාදානක්ඛන්ධාපි දුක්ඛාති. තෙන වුත්තං ‘‘අත්ථතො පුරිමං අරියසච්චද්වයං, ඉධ පන දුක්ඛං අරියසච්චං වෙදිතබ්බ’’න්ති. නනු ච ලුජ්ජනපලුජ්ජනට්ඨො අවිසෙසෙන පඤ්චසු ඛන්ධෙසු සම්භවතීති? සච්චං සම්භවති. යං පන න ලුජ්ජතීති ගහිතං, තං තථා න හොති, එකංසෙනෙව ලුජ්ජති පලුජ්ජතීති සො ලොකොති උපාදානක්ඛන්ධෙස්වෙව ලොකසද්දො නිරූළ්හොති වෙදිතබ්බො. තස්මා ලොකොති දුක්ඛං අරියසච්චං එව. इस प्रकार अनेक प्रकार से विभक्त होने पर भी लोक पाँच उपादान स्कन्धों में ही संगृहीत और समाविष्ट होता है, और उपादान स्कन्ध 'दुःख आर्य सत्य' हैं - 'जाति भी दुःख है... संक्षेप में पाँच उपादान स्कन्ध भी दुःख हैं'। इसीलिए कहा गया है - 'अर्थतः पहले के दो आर्य सत्य हैं, किन्तु यहाँ दुःख आर्य सत्य समझना चाहिए'। क्या विनाशशीलता का अर्थ सामान्य रूप से पाँचों स्कन्धों में संभव नहीं है? सत्य है, संभव है। किन्तु जिसे 'विनाशशील नहीं' ऐसा ग्रहण किया गया है, वह वैसा नहीं होता; वह निश्चित रूप से विनाशशील है, इसलिए वह 'लोक' है - ऐसा 'लोक' शब्द उपादान स्कन्धों में ही रूढ़ समझना चाहिए। इसलिए 'लोक' का अर्थ दुःख आर्य सत्य ही है। යදිපි තථාගත-සද්දස්ස හෙට්ඨා තථාගතසුත්තෙ නානානයෙහි විත්ථාරතො අත්ථො විභත්තො, තථාපි පාළියා අත්ථසංවණ්ණනාමුඛෙන අයමත්ථවිභාවනා – අභිසම්බුද්ධොති ‘‘අභිඤ්ඤෙය්යතො පරිඤ්ඤෙය්යතො’’ති පුබ්බෙ වුත්තවිභාගෙන වා අවිසෙසතො තාව ආසයානුසයචරියාධිමුත්තිආදිභෙදතො කුසලාකුසලාදිවිභාගතො වට්ටප්පමාණසණ්ඨානාදිභෙදතො, විසෙසතො වා පන ‘‘අයං සස්සතාසයො, අයං උච්ඡෙදාසයො’’තිආදිනා ‘‘කක්ඛළලක්ඛණා පථවීධාතු, පග්ඝරණලක්ඛණා ආපොධාතූ’’තිආදිනා ච අභිවිසිට්ඨෙන සයම්භුඤාණෙන සම්මා අවිපරීතං යො යො අත්ථො යථා යථා බුජ්ඣිතබ්බො, තථා තථා බුද්ධො ඤාතො අත්තපච්චක්ඛො කතොති අභිසම්බුද්ධො. यद्यपि 'तथागत' शब्द का अर्थ नीचे तथागत-सूत्र में अनेक नयों से विस्तारपूर्वक विभक्त किया गया है, फिर भी पालि की अर्थ-व्याख्या के माध्यम से यह अर्थ-विभावन है - 'अभिसम्बुद्ध' का अर्थ है 'अभिज्ञेय और परिज्ञेय' के रूप में पहले कहे गए विभाग के अनुसार, अथवा सामान्य रूप से आशय, अनुशय, चर्या, अधिमुक्ति आदि के भेद से, कुशल-अकुशल आदि के विभाग से, संसार के प्रमाण और संस्थान आदि के भेद से; अथवा विशेष रूप से 'यह शाश्वत-आशय है, यह उच्छेद-आशय है' इत्यादि के द्वारा, 'कठोर लक्षण वाली पृथ्वी धातु है, बहने के लक्षण वाली आपो धातु है' इत्यादि के द्वारा, अतिविशिष्ट स्वयंभू ज्ञान से सम्यक् और यथार्थ रूप से जो-जो अर्थ जिस-जिस प्रकार से बोधगम्य है, उस-उस प्रकार से बुद्ध (ज्ञात), जाना गया और स्वयं प्रत्यक्ष किया गया है, इसलिए 'अभिसम्बुद्ध' है। ලොකස්මාති යථාවුත්තලොකතො. විසංයුත්තොති විසංසට්ඨො, තප්පටිබද්ධානං සබ්බෙසං සංයොජනානං සම්මදෙව සමුච්ඡින්නත්තා තතො විප්පමුත්තොති අත්ථො. ලොකසමුදයොති සුත්තන්තනයෙන තණ්හා, අභිධම්මනයෙන පන අභිසඞ්ඛාරෙහි සද්ධිං දියඩ්ඪකිලෙසසහස්සං. පහීනොති බොධිමණ්ඩෙ අරහත්තමග්ගඤාණෙන සමුච්ඡෙදප්පහානවසෙන සවාසනං පහීනො. ලොකනිරොධොති නිබ්බානං. සච්ඡිකතොති අත්තපච්චක්ඛො කතො. ලොකනිරොධගාමිනී පටිපදාති සීලාදික්ඛන්ධත්තයසඞ්ගහො අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො. සො හි ලොකනිරොධං නිබ්බානං ගච්ඡති අධිගච්ඡති, තදත්ථං අරියෙහි පටිපජ්ජීයති චාති ලොකනිරොධගාමිනී පටිපදාති වුච්චති. 'लोकस्मा' (लोक से) का अर्थ है यथाकथित लोक से। 'विसंयुत्तो' (विसंयुक्त) का अर्थ है विसंसृष्ट (अलग), उससे संबद्ध सभी संयोजनों के सम्यक् रूप से उच्छिन्न हो जाने के कारण उससे विप्रमुक्त। 'लोकसमुदय' का अर्थ है सुत्तन्त के अनुसार तृष्णा, और अभिधम्म के अनुसार अभिसंस्कारों के साथ पन्द्रह सौ क्लेश। 'पहीनो' (प्रहीण) का अर्थ है बोधिमण्ड पर अर्हत् मार्ग ज्ञान के द्वारा समुच्छेद-प्रहाण के वश से वासनाओं सहित प्रहीण। 'लोकनिरोध' का अर्थ है निर्वाण। 'सच्छिकतो' (साक्षात्कृत) का अर्थ है स्वयं प्रत्यक्ष किया हुआ। 'लोकनिरोधगामिनी प्रतिपदा' का अर्थ है शील आदि तीन स्कन्धों का संग्रह रूप आर्य अष्टांगिक मार्ग। क्योंकि वह लोकनिरोध रूप निर्वाण को प्राप्त होता है, अधिगत करता है, और उस प्रयोजन के लिए आर्यों द्वारा प्रतिपन्न (आचरण) किया जाता है, इसलिए उसे 'लोकनिरोधगामिनी प्रतिपदा' कहा जाता है। එත්තාවතා තථානි අභිසම්බුද්ධො යාථාවතො ගතොති තථාගතොති අයමත්ථො දස්සිතො හොති. චත්තාරි හි අරියසච්චානි තථානි නාම. යථාහ – इतने से 'तथ्यों (सत्यों) को अभिसंबुद्ध किया और यथार्थ रूप से प्राप्त किया' इस अर्थ में 'तथागत' यह अर्थ प्रदर्शित होता है। क्योंकि चार आर्य सत्य ही 'तथ्य' (सत्य) कहलाते हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘චත්තාරිමානි[Pg.347], භික්ඛවෙ, තථානි අවිතථානි අනඤ්ඤථානි. කතමානි චත්තාරි? ඉදං දුක්ඛන්ති, භික්ඛවෙ, තථමෙතං අවිතථමෙතං, අනඤ්ඤථමෙත’’න්ති (සං. නි. 5.1090) විත්ථාරො. "भिक्षुओं! ये चार तथ्य (सत्य) हैं, जो अवितथ (असत्य नहीं) और अनन्यथा (अन्यथा नहीं) हैं। कौन से चार? 'यह दुःख है', भिक्षुओं! यह तथ्य है, यह अवितथ है, यह अनन्यथा है..." (संयुत्त निकाय 5.1090) विस्तार से। අපිච තථාය ගතොති තථාගතො, තථං ගතොති තථාගතො, ගතොති ච අවගතො අතීතො පත්තො පටිපන්නොති අත්ථො. ඉදං වුත්තං හොති – යස්මා භගවා සකලලොකං තීරණපරිඤ්ඤාය තථාය අවිපරීතාය ගතො අවගතො, තස්මා ලොකො තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධොති තථාගතො. ලොකසමුදයං පහානපරිඤ්ඤාය තථාය ගතො අතීතොති තථාගතො. ලොකනිරොධං සච්ඡිකිරියාය තථාය ගතො පත්තොති තථාගතො. ලොකනිරොධගාමිනිං පටිපදං තථං අවිපරීතං ගතො පටිපන්නොති තථාගතොති. එවං ඉමිස්සා පාළියා භගවතො තථාගතභාවදීපනවසෙන අත්ථො වෙදිතබ්බො. इसके अतिरिक्त, 'तथ्य (सत्य) के अनुसार गए' इसलिए तथागत, 'तथ्य को प्राप्त किया' इसलिए तथागत; और 'गत' का अर्थ अवगत (जाना हुआ), अतीत (पार किया हुआ), प्राप्त और प्रतिपन्न (आचरण किया हुआ) है। यह कहा गया है - चूँकि भगवान् ने सम्पूर्ण लोक को तीरण-परिज्ञा के द्वारा तथ्यपूर्ण और अविपरीत रूप से जाना (अवगत किया), इसलिए लोक तथागत द्वारा अभिसंबुद्ध है, अतः वे 'तथागत' हैं। लोक-समुदय को प्रहाण-परिज्ञा के द्वारा तथ्यपूर्ण रूप से पार किया (अतीत), इसलिए 'तथागत' हैं। लोक-निरोध को साक्षात्कार के द्वारा तथ्यपूर्ण रूप से प्राप्त किया, इसलिए 'तथागत' हैं। लोक-निरोधगामिनी प्रतिपदा को तथ्यपूर्ण और अविपरीत रूप से प्रतिपन्न (आचरण) किया, इसलिए 'तथागत' हैं। इस प्रकार इस पालि के द्वारा भगवान् के 'तथागत-भाव' को प्रकाशित करने के वश से अर्थ समझना चाहिए। ඉති භගවා චතුසච්චාභිසම්බොධනවසෙන අත්තනො තථාගතභාවං පකාසෙත්වා ඉදානි තත්ථ දිට්ඨාදිඅභිසම්බොධිවසෙනපි තං දස්සෙතුං ‘‘යං, භික්ඛවෙ’’තිආදිමාහ. අඞ්ගුත්තරට්ඨකථායං (අ. නි. අට්ඨ. 2.4.23) පන ‘‘චතූහි සච්චෙහි අත්තනො බුද්ධභාවං කථෙත්වා’’තිආදි වුත්තං. තං තථාගතසද්ද-බුද්ධසද්දානං අත්ථතො නින්නානාකරණතං දස්සෙතුං වුත්තං. තථා චෙව හි පාළි පවත්තාති. තත්ථ දිට්ඨන්ති රූපායතනං. සුතන්ති සද්දායතනං. මුතන්ති පත්වා ගහෙතබ්බතො ගන්ධායතනං, රසායතනං, ඵොට්ඨබ්බායතනඤ්ච. විඤ්ඤාතන්ති සුඛදුක්ඛාදිධම්මාරම්මණං. පත්තන්ති පරියෙසිත්වා වා අපරියෙසිත්වා වා පත්තං. පරියෙසිතන්ති පත්තං වා අප්පත්තං වා පරියෙසිතං. අනුවිචරිතං මනසාති චිත්තෙන අනුසඤ්චරිතං. කස්ස පන අනුවිචරිතං මනසාති? සදෙවකස්ස…පෙ… සදෙවමනුස්සායාති සම්බන්ධනීයං. තත්ථ සහ දෙවෙහීති සදෙවකො, තස්ස සදෙවකස්ස. සෙසපදෙසුපි එසෙව නයො. इस प्रकार भगवान् ने चार सत्यों के अभिसंबोधन के वश से अपने 'तथागत-भाव' को प्रकाशित कर, अब वहाँ 'दृष्ट' आदि के अभिसंबोधन के वश से भी उसे दिखाने के लिए "भिक्षुओं! जो कुछ..." आदि कहा। अंगुत्तर निकाय अट्ठकथा में तो "चार सत्यों से अपने बुद्ध-भाव को कहकर" आदि कहा गया है। वह 'तथागत' शब्द और 'बुद्ध' शब्द के अर्थ में भिन्नता न होने को दिखाने के लिए कहा गया है। क्योंकि पालि इसी प्रकार प्रवृत्त है। वहाँ 'दृष्ट' का अर्थ रूपायातन है। 'श्रुत' का अर्थ शब्दायातन है। 'मत' का अर्थ पहुँचकर ग्रहण किए जाने के कारण गन्धायातन, रसायातन और स्प्रष्टव्यायातन है। 'विज्ञात' का अर्थ सुख-दुःख आदि धर्मारम्बन है। 'प्राप्त' का अर्थ खोजकर या बिना खोजे प्राप्त किया हुआ। 'पर्येषित' का अर्थ प्राप्त या अप्राप्त की खोज करना। 'मनसा अनुविचरित' का अर्थ चित्त के द्वारा अनुसंचरण किया हुआ। किसका 'मनसा अनुविचरित'? 'सदेवकस्स... पे... सदेवमनुस्साय' (देवों सहित... मनुष्यों सहित) के साथ संबंध जोड़ना चाहिए। वहाँ 'देवों के साथ' होने से 'सदेवक' है, उस सदेवक का। शेष पदों में भी यही विधि है। සදෙවකවචනෙන චෙත්ථ පඤ්චකාමාවචරදෙවග්ගහණං වෙදිතබ්බං, සමාරකවචනෙන ඡට්ඨකාමාවචරදෙවග්ගහණං, සබ්රහ්මකවචනෙන බ්රහ්මකායිකාදිබ්රහ්මග්ගහණං, සස්සමණබ්රාහ්මණිවචනෙන සාසනස්ස පච්චත්ථිකසමණබ්රාහ්මණග්ගහණඤ්චෙව සමිතපාපබාහිතපාපසමණබ්රාහ්මණග්ගහණඤ්ච, පජාවචනෙන සත්තලොකග්ගහණං[Pg.348], සදෙවමනුස්සවචනෙන සම්මුතිදෙවඅවසෙසමනුස්සග්ගහණං. එවමෙත්ථ තීහි පදෙහි දෙවමාරබ්රහ්මෙහි සද්ධිං සත්තලොකො, ද්වීහි පජාවසෙන සත්තලොකො ගහිතොති වෙදිතබ්බො. यहाँ 'सदेवक' वचन से पाँच कामावचर देवों का ग्रहण समझना चाहिए, 'समारक' वचन से छठे कामावचर देव का ग्रहण, 'सब्रह्मक' वचन से ब्रह्मकायिक आदि ब्रह्मों का ग्रहण, 'सश्रमण-ब्राह्मणी' वचन से शासन के प्रतिपक्षी श्रमण-ब्राह्मणों का और शमित-पाप एवं बाहित-पाप श्रमण-ब्राह्मणों का ग्रहण, 'प्रजा' वचन से सत्त्वलोक का ग्रहण, 'सदेव-मनुष्य' वचन से सम्मति-देवों और शेष मनुष्यों का ग्रहण समझना चाहिए। इस प्रकार यहाँ तीन पदों से देव, मार और ब्रह्म के साथ सत्त्वलोक, और दो पदों से प्रजा के वश से सत्त्वलोक ग्रहण किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। අපරො නයො – සදෙවකග්ගහණෙන අරූපාවචරදෙවලොකො ගහිතො, සමාරකවචනෙන ඡකාමාවචරදෙවලොකො, සබ්රහ්මකවචනෙන රූපීබ්රහ්මලොකො, සස්සමණබ්රාහ්මණාදිවචනෙන සම්මුතිදෙවෙහි සහ අවසෙසසත්තලොකො ගහිතො. අපිචෙත්ථ සදෙවකවචනෙන උක්කට්ඨපරිච්ඡෙදතො සබ්බලොකවිසයස්ස භගවතො අභිසම්බුද්ධභාවෙ පකාසිතෙ යෙසමෙවං සියා ‘‘මාරො නාම මහානුභාවො ඡකාමාවචරිස්සරො වසවත්තී, බ්රහ්මා පන තතොපි මහානුභාවතරො දසහි අඞ්ගුලීහි දසසු චක්කවාළසහස්සෙසු ආලොකං ඵරති, උත්තමජ්ඣානසමාපත්තිසුඛං පටිසංවෙදෙති. පුථූ ච සමණබ්රාහ්මණා ඉද්ධිමන්තො දිබ්බචක්ඛුකා පරචිත්තවිදුනො මහානුභාවා සංවිජ්ජන්ති. අයඤ්ච සත්තකායො අනන්තො අපරිමාණො, කිමෙතෙසං සබ්බෙසංයෙව විසයො අනවසෙසතො භගවතා අභිසම්බුද්ධො’’ති? තෙසං විමතිං විධමෙන්තො භගවා ‘‘සදෙවකස්ස ලොකස්සා’’තිආදිමාහ. दूसरी विधि - 'सदेवक' के ग्रहण से अरूपावचर देवलोक गृहीत है, 'समारक' वचन से छह कामावचर देवलोक, 'सब्रह्मक' वचन से रूपी ब्रह्मलोक, 'सश्रमण-ब्राह्मण' आदि वचन से सम्मति-देवों के साथ शेष सत्त्वलोक गृहीत है। इसके अतिरिक्त, यहाँ 'सदेवक' वचन के द्वारा उत्कृष्ट परिच्छेद से सम्पूर्ण लोक के विषय में भगवान् के अभिसंबुद्ध-भाव के प्रकाशित होने पर, जिन्हें ऐसा लगे कि - "मार नाम का महानुभाव छह कामावचरों का ईश्वर वशवर्ती है, ब्रह्म तो उससे भी अधिक महानुभाव है जो दस अंगुलियों से दस हजार चक्रवातों में प्रकाश फैलाता है, उत्तम ध्यान-समापत्ति के सुख का अनुभव करता है। और बहुत से श्रमण-ब्राह्मण ऋद्धिमान्, दिव्यचक्षु वाले, परचित्तविद् और महानुभाव विद्यमान हैं। और यह सत्त्व-काय अनन्त और अपरिमाण है, क्या इन सबका विषय भगवान् द्वारा पूर्णतः अभिसंबुद्ध है?" उनकी शंका का निवारण करते हुए भगवान् ने "सदेवकस्य लोकस्य" (देवों सहित लोक का) आदि कहा। පොරාණා පනාහු – ‘‘සදෙවකස්සා’’ති දෙවතාහි සද්ධිං අවසෙසලොකං පරියාදියති, ‘‘සමාරකස්සා’’ති මාරෙන සද්ධිං අවසෙසලොකං, ‘‘සබ්රහ්මකස්සා’’ති බ්රහ්මෙහි සද්ධිං අවසෙසලොකං. එවං සබ්බෙපි තිභවූපගෙ සත්තෙ තීසු පදෙසු පක්ඛිපිත්වා පුන ද්වීහි පදෙහි පරියාදියන්තො ‘‘සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සායා’’ති ආහ. එවං පඤ්චහිපි පදෙහි ඛන්ධත්තයපරිච්ඡින්නෙ සබ්බසත්තෙ පරියාදියති. प्राचीन आचार्य तो कहते हैं - 'सदेवकस्स' से देवताओं के साथ शेष लोक को सम्मिलित किया जाता है, 'समारकस्स' से मार के साथ शेष लोक को, 'सब्रह्मकस्स' से ब्रह्मों के साथ शेष लोक को। इस प्रकार तीनों भवों में आने वाले सभी सत्त्वों को तीन पदों में रखकर, पुनः दो पदों से सम्मिलित करते हुए "सश्रमण-ब्राह्मणी प्रजा के, सदेव-मनुष्यों के" कहा। इस प्रकार पाँचों ही पदों से तीन स्कन्धों (भवों) में परिच्छिन्न सभी सत्त्वों को सम्मिलित किया गया है। යස්මා තං තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධන්ති ඉමිනා ඉදං දස්සෙති – යං අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු ඉමස්ස සදෙවකස්ස ලොකස්ස ‘‘නීලං පීතක’’න්තිආදි රූපාරම්මණං චක්ඛුද්වාරෙ ආපාථං ආගච්ඡති, තං සබ්බං ‘‘අයං සත්තො ඉමස්මිං ඛණෙ ඉමං නාම රූපාරම්මණං දිස්වා සුමනො වා දුම්මනො වා මජ්ඣත්තො වා ජාතො’’ති තථාගතස්ස එවං අභිසම්බුද්ධං. තථා යං අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු ඉමස්ස සදෙවකස්ස ලොකස්ස ‘‘භෙරිසද්දො මුදිඞ්ගසද්දො’’තිආදි සද්දාරම්මණං සොතද්වාරෙ ආපාථං ආගච්ඡති, ‘‘මූලගන්ධො තචගන්ධො’’තිආදි ගන්ධාරම්මණං ඝානද්වාරෙ ආපාථමාගච්ඡති, ‘‘මූලරසො ඛන්ධරසො’’තිආදි රසාරම්මණං ජිව්හාද්වාරෙ ආපාථමාගච්ඡති[Pg.349], ‘‘කක්ඛළං මුදුක’’න්තිආදි පථවීධාතුතෙජොධාතුවායොධාතුභෙදං ඵොට්ඨබ්බාරම්මණං කායද්වාරෙ ආපාථමාගච්ඡති, ‘‘අයං සත්තො ඉමස්මිං ඛණෙ ඉමං නාම ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා සුමනො වා දුම්මනො වා මජ්ඣත්තො වා ජාතො’’ති සබ්බං තං තථාගතස්ස එවං අභිසම්බුද්ධං. चूंकि वह तथागत द्वारा अभिसंबुद्ध है, इससे यह प्रदर्शित होता है – कि अपरिमित लोकधातुओं में इस देवलोक सहित संसार के चक्षु-द्वार में जो 'नीला, पीला' आदि रूपावलम्बन (रूप-विषय) आता है, वह सब 'यह प्राणी इस क्षण में इस नाम के रूपावलम्बन को देखकर प्रसन्न या अप्रसन्न या तटस्थ हुआ है' – यह तथागत द्वारा इस प्रकार अभिसंबुद्ध है। उसी प्रकार अपरिमित लोकधातुओं में इस देवलोक सहित संसार के श्रोत्र-द्वार में जो 'भेरी का शब्द, मृदंग का शब्द' आदि शब्दावलम्बन आता है, 'मूल की गंध, छाल की गंध' आदि गंधावलम्बन घ्राण-द्वार में आता है, 'मूल का रस, स्कन्ध का रस' आदि रसावलम्बन जिह्वा-द्वार में आता है, 'कठोर, कोमल' आदि पृथ्वीधातु-तेजोधातु-वायुधातु के भेद वाला स्प्रष्टव्यावलम्बन काय-द्वार में आता है, 'यह प्राणी इस क्षण में इस नाम के स्प्रष्टव्य को स्पर्श कर प्रसन्न या अप्रसन्न या तटस्थ हुआ है' – वह सब तथागत द्वारा इस प्रकार अभिसंबुद्ध है। තථා යං අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු ඉමස්ස සදෙවකස්ස ලොකස්ස සුඛාදිභෙදං ධම්මාරම්මණං මනොද්වාරෙ ආපාථමාගච්ඡති, ‘‘අයං සත්තො ඉමස්මිං ඛණෙ ඉමං නාම ධම්මාරම්මණං ජානිත්වා සුමනො වා දුම්මනො වා මජ්ඣත්තො වා ජාතො’’ති සබ්බං තං තථාගතස්ස එවං අභිසම්බුද්ධං. එවං යං ඉමස්ස සදෙවකස්ස ලොකස්ස දිට්ඨං සුතං මුතං විඤ්ඤාතං, තං තථාගතෙන අදිට්ඨං වා අසුතං වා අමුතං වා අවිඤ්ඤාතං වා නත්ථි. ඉමස්ස පන මහාජනස්ස පරියෙසිත්වා අප්පත්තම්පි අත්ථි, අපරියෙසිත්වා අප්පත්තම්පි අත්ථි, පරියෙසිත්වා පත්තම්පි අත්ථි, අපරියෙසිත්වා පත්තම්පි අත්ථි. සබ්බම්පි තථාගතස්ස අප්පත්තං නාම නත්ථි ඤාණෙන අසච්ඡිකතං. තතො එව යං අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු අපරිමාණානං සත්තානං චක්ඛුද්වාරෙ ආපාථමාගච්ඡන්තං රූපාරම්මණං නාම අත්ථි, තං භගවා සබ්බං සබ්බාකාරෙන ජානාති පස්සති. එවං ජානතා පස්සතා චානෙන තං ඉට්ඨානිට්ඨාදිවසෙන වා දිට්ඨසුතමුතවිඤ්ඤාතෙසු ලබ්භමානපදවසෙන වා ‘‘කතමං තං රූපං රූපායතනං? යං රූපං චතුන්නං මහාභූතානං උපාදාය වණ්ණනිභා සනිදස්සනං සප්පටිඝං නීලං පීතක’’න්තිආදිනා (ධ. ස. 617) නයෙන අනෙකෙහි නාමෙහි තෙරසහි වාරෙහි ද්වෙපඤ්ඤාසාය නයෙහි විභජ්ජමානං තථෙව හොති, විතථං නත්ථි. එස නයො සොතද්වාරාදීසුපි ආපාථමාගච්ඡන්තෙසු සද්දාදීසු. उसी प्रकार अपरिमित लोकधातुओं में इस देवलोक सहित संसार के मनोद्वार में जो सुख आदि के भेद वाला धर्मावलम्बन आता है, 'यह प्राणी इस क्षण में इस नाम के धर्मावलम्बन को जानकर प्रसन्न या अप्रसन्न या तटस्थ हुआ है' – वह सब तथागत द्वारा इस प्रकार अभिसंबुद्ध है। इस प्रकार इस देवलोक सहित संसार का जो कुछ भी दृष्ट, श्रुत, मत और विज्ञात है, वह तथागत द्वारा अदृष्ट, अश्रुत, अमत या अविज्ञात नहीं है। किन्तु इस महाजन (साधारण जन) के लिए खोज कर भी अप्राप्त है, बिना खोजे भी अप्राप्त है, खोज कर प्राप्त भी है, और बिना खोजे प्राप्त भी है। तथागत के लिए ज्ञान द्वारा साक्षात् न किया गया कुछ भी अप्राप्त नहीं है। इसीलिए अपरिमित लोकधातुओं में अपरिमित प्राणियों के चक्षु-द्वार में जो रूपावलम्बन आता है, भगवान उस सबको सब प्रकार से जानते और देखते हैं। इस प्रकार जानते और देखते हुए उनके द्वारा इष्ट-अनिष्ट आदि के वश से अथवा दृष्ट-श्रुत-मत-विज्ञात में प्राप्त होने वाले पदों के वश से 'वह रूप रूपायातन कौन सा है? जो रूप चार महाभूतों के आश्रित वर्ण-आभा वाला, निदर्शन-सहित (दृश्य), सप्रतिघ (प्रतिघात-युक्त), नीला, पीला' आदि (ध. सं. 617) विधि से अनेक नामों से, तेरह बारों से, बावन विधियों से विभाजित किया जाता है, वह वैसा ही होता है, अन्यथा नहीं। यही विधि श्रोत्र-द्वार आदि में आने वाले शब्द आदि के विषय में भी है। තස්මා තථාගතොති වුච්චතීති යං යථා ලොකෙන ගතං, තස්ස තථෙව ගතත්තා තථාගතොති වුච්චති. පාළියං පන ‘‘අභිසම්බුද්ධ’’න්ති වුත්තං, තං තථාගතසද්දෙන සමානත්ථං. ඉමිනා තථාදස්සිභාවතො තථාගතොති අයමත්ථො දස්සිතො හොති. වුත්තඤ්හෙතං ධම්මසෙනාපතිනා – इसलिए 'तथागत' कहे जाते हैं – जो जैसा लोक द्वारा प्राप्त (गत) है, उसे वैसा ही प्राप्त करने के कारण 'तथागत' कहे जाते हैं। पालि में जो 'अभिसंबुद्ध' कहा गया है, वह तथागत शब्द के समान अर्थ वाला है। इससे 'तथा-दर्शी' (यथार्थ देखने वाला) होने के कारण 'तथागत' यह अर्थ प्रदर्शित होता है। धर्मसेनापति द्वारा यह कहा गया है – ‘‘න තස්ස අද්දිට්ඨමිධත්ථි කිඤ්චි,අථො අවිඤ්ඤාතමජානිතබ්බං; සබ්බං අභිඤ්ඤාසි යදත්ථි නෙය්යං,තථාගතො තෙන සමන්තචක්ඛූ’’ති. (මහානි. 156; චූළනි. මොඝරාජමාණවපුච්ඡානිද්දෙස 85; පටි. ම. 1.121); 'उनका यहाँ कुछ भी अदृष्ट नहीं है, और न ही कुछ अविज्ञात या न जानने योग्य है; जो कुछ भी ज्ञेय है, वह सब उन्होंने जान लिया है, इसलिए तथागत समन्तचक्षु (सर्वद्रष्टा) हैं।' සුත්තන්තෙපි [Pg.350] වුත්තං භගවතා – सूत्रान्त में भी भगवान द्वारा कहा गया है – ‘‘යං, භික්ඛවෙ, සදෙවකස්ස ලොකස්ස…පෙ… සදෙවමනුස්සාය පජාය දිට්ඨං සුතං මුතං විඤ්ඤාතං පත්තං පරියෙසිතං අනුවිචරිතං මනසා, තමහං ජානාමි, තමහං අබ්භඤ්ඤාසිං, තං තථාගතස්ස විදිතං, තං තථාගතො න උපට්ඨාසී’’ති (අ. නි. 4.24). 'भिक्षुओं! इस देवलोक सहित संसार का... पे... देव-मनुष्यों सहित प्रजा का जो कुछ भी दृष्ट, श्रुत, मत, विज्ञात, प्राप्त, अन्वेषित और मन द्वारा अनुविचरित है, उसे मैं जानता हूँ, उसे मैंने विशेष रूप से जाना है, वह तथागत द्वारा विदित है, तथागत उसमें स्थित (आसक्त) नहीं हुए।' යඤ්ච, භික්ඛවෙ, රත්තිං තථාගතො අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුජ්ඣතීති යස්සඤ්ච විසාඛපුණ්ණමරත්තියං තථා ආගතාදිඅත්ථෙන තථාගතො භගවා බොධිමණ්ඩෙ අපරාජිතපල්ලඞ්කෙ නිසින්නො තිණ්ණං මාරානං මත්ථකං මද්දිත්වා උත්තරිතරාභාවතො අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං ආසවක්ඛයඤාණෙන සද්ධිං සබ්බඤ්ඤුතඤ්ඤාණං අධිගච්ඡති. යඤ්ච රත්තිං අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා පරිනිබ්බායතීති යස්සඤ්ච විසාඛපුණ්ණමරත්තියංයෙව කුසිනාරායං උපවත්තනෙ මල්ලානං සාලවනෙ යමකසාලානමන්තරෙ අනුපාදිසෙසාය නිබ්බානධාතුයා පරිනිබ්බායති. යං එතස්මිං අන්තරෙති ඉමාසං ද්වින්නං සඋපාදිසෙසඅනුපාදිසෙසනිබ්බානධාතූනං වෙමජ්ඣෙ පඤ්චචත්තාලීසවස්සපරිමාණෙ කාලෙ පඨමබොධියම්පි, මජ්ඣිමබොධියම්පි, පච්ඡිමබොධියම්පි යං සුත්තගෙය්යාදිප්පභෙදං ධම්මං භාසති නිද්දිසනවසෙන, ලපති උද්ධිසනවසෙන, නිද්දිසති පටිනිද්දිසනවසෙන. සබ්බං තං තථෙව හොතීති තං එත්ථන්තරෙ දෙසිතං සබ්බං සුත්තගෙය්යාදිනවඞ්ගං බුද්ධවචනං අත්ථතො බ්යඤ්ජනතො ච අනුපවජ්ජං අනූනං අනධිකං සබ්බාකාරපරිපුණ්ණං රාගමදනිම්මදනං…පෙ… මොහමදනිම්මදනං, නත්ථි තත්ථ වාලග්ගමත්තම්පි අවක්ඛලිතං, එකමුද්දිකාය ලඤ්ඡිතං විය එකනාළියා මිතං විය එකතුලාය තුලිතං විය ච තං තථෙව හොති යස්සත්ථාය භාසිතං, එකන්තෙනෙව තස්ස සාධනතො, නො අඤ්ඤථා. තස්මා තථං, අවිතථං, අනඤ්ඤථං. එතෙන තථාවාදිතාය තථාගතොති දස්සෙති. ගදඅත්ථො අයං ගතසද්දො දකාරස්ස තකාරං කත්වා, තස්මා තථං ගදතීති තථාගතොති අත්ථො. අථ වා ආගදනං ආගදො, වචනන්ති අත්ථො. තථො අවිපරීතො ආගදො යස්සාති දකාරස්ස තකාරං කත්වා තථාගතොති එවමෙත්ථ පදසිද්ධි වෙදිතබ්බා. भिक्षुओं, जिस रात तथागत ने अनुत्तर सम्यक्संबोधि प्राप्त की, अर्थात् जिस वैशाख पूर्णिमा की रात को 'तथा आगत' आदि अर्थों के कारण तथागत भगवान ने बोधिमण्ड में अपराजित पर्यङ्क (आसन) पर बैठकर तीन मारों के मस्तक को कुचलकर, उससे श्रेष्ठ अन्य कुछ न होने के कारण, आस्रवक्षय ज्ञान के साथ सर्वज्ञता ज्ञान रूपी अनुत्तर सम्यक्संबोधि प्राप्त की। और जिस रात वे अनुपधिशेष निर्वाणधातु में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए, अर्थात् जिस वैशाख पूर्णिमा की रात को ही कुशीनारा के उपवर्तन मल्लों के शालवन में यमक शालों के बीच अनुपधिशेष निर्वाणधातु में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। इस बीच के समय में, अर्थात् इन दो सोपधिशेष और अनुपधिशेष निर्वाणधातुओं के मध्य के पैंतालीस वर्षों के समय में, प्रथम बोधि, मध्यम बोधि और पश्चिम बोधि में भी, जो सुत्त-गेय आदि भेदों वाले धर्म को निर्देश के रूप में कहते हैं, उद्दिश के रूप में बोलते हैं, और निर्देश-प्रतिनिर्देश के रूप में व्याख्या करते हैं। वह सब वैसा ही होता है; इस अंतराल में देशित वह सब सुत्त-गेय आदि नौ अंगों वाला बुद्धवचन अर्थ और व्यंजन की दृष्टि से निर्दोष, न कम, न अधिक, सब प्रकार से परिपूर्ण, राग-मद का मर्दन करने वाला... पे... मोह-मद का मर्दन करने वाला है। उसमें बाल के अग्र भाग के बराबर भी स्खलन (चूक) नहीं है। जैसे एक मुद्रा से अंकित, एक नाली से मापा गया, या एक तुला (तराजू) से तोला गया हो, वह वैसा ही होता है जिसके लिए वह कहा गया है, क्योंकि वह एकांततः उसे सिद्ध करता है, अन्यथा नहीं। इसलिए वह तथ्य है, अवितथ है, अनन्यथा है। इस प्रकार 'तथावादी' होने के कारण वे 'तथागत' कहलाते हैं। यहाँ 'गत' शब्द 'गद' (बोलना) के अर्थ में है, 'द' को 'त' करके; इसलिए 'तथ्य बोलने' के कारण वे 'तथागत' हैं। अथवा 'आगदन' (बोलना) ही 'आगद' है, जिसका अर्थ 'वचन' है। 'तथ्य' (अविपरीत) है 'आगद' (वचन) जिनका, वे 'तथागत' हैं—इस प्रकार यहाँ पद-सिद्धि समझनी चाहिए। යථාවාදී තථාකාරීති යෙ ධම්මෙ භගවා ‘‘ඉමෙ ධම්මා අකුසලා සාවජ්ජා විඤ්ඤුගරහිතා සමත්තා සමාදින්නා අහිතාය දුක්ඛාය සංවත්තන්තී’’ති [Pg.351] පරෙසං ධම්මං දෙසෙන්තො වදති, තෙ ධම්මෙ එකන්තෙනෙව සයං පහාසි. යෙ පන ධම්මෙ භගවා ‘‘ඉමෙ ධම්මා කුසලා අනවජ්ජා විඤ්ඤුප්පසත්ථා සමත්තා සමාදින්නා හිතාය සුඛාය සංවත්තන්තී’’ති වදති, තෙ ධම්මෙ එකන්තෙනෙව සයං උපසම්පජ්ජ විහාසි. තස්මා යථාවාදී භගවා, තථාකාරීති වෙදිතබ්බො. යථාකාරී තථාවාදීති සම්මදෙව සීලාදිපරිපූරණවසෙන සම්මා පටිපන්නො සයං යථාකාරී භගවා, තථෙව ධම්මදෙසනාය පරෙසං තත්ථ පතිට්ඨාපනවසෙන තථාවාදී. භගවතො හි වාචාය කායො අනුලොමෙති, කායස්සපි වාචා. තස්මා යථාවාදී තථාකාරී, යථාකාරී තථාවාදී ච හොති. එවංභූතස්ස චස්ස යථා වාචා, කායොපි තථා ගතො පවත්තො. යථා ච කායො, වාචාපි තථා ගතා පවත්තාති අත්ථො. 'यथावादी तथाकारी' का अर्थ है कि भगवान दूसरों को धर्मोपदेश देते हुए जिन धर्मों के बारे में कहते हैं कि 'ये धर्म अकुशल हैं, सदोष हैं, विद्वानों द्वारा निन्दित हैं, पूर्णतः ग्रहण किए जाने पर अहित और दुःख के लिए होते हैं', उन धर्मों का उन्होंने स्वयं एकांततः प्रहाण (त्याग) कर दिया है। और जिन धर्मों के बारे में भगवान कहते हैं कि 'ये धर्म कुशल हैं, निर्दोश हैं, विद्वानों द्वारा प्रशंसित हैं, पूर्णतः ग्रहण किए जाने पर हित और सुख के लिए होते हैं', उन धर्मों को उन्होंने स्वयं एकांततः प्राप्त कर विहार किया है। इसलिए भगवान 'यथावादी तथाकारी' (जैसा बोलते हैं वैसा करते हैं) जानने चाहिए। 'यथाकारी तथावादी' का अर्थ है कि शील आदि की परिपूर्णता के कारण सम्यक् प्रतिपन्न होने से भगवान स्वयं 'यथाकारी' हैं, और वैसे ही धर्मदेशना द्वारा दूसरों को उसमें प्रतिष्ठित करने के कारण 'तथावादी' हैं। भगवान की वाणी के अनुसार उनका काय (शरीर/कर्म) होता है, और काय के अनुसार उनकी वाणी। इसलिए वे 'यथावादी तथाकारी' और 'यथाकारी तथावादी' हैं। ऐसे महापुरुष की जैसी वाणी होती है, वैसा ही उनका काय भी प्रवृत्त (गत) होता है। और जैसा काय होता है, वैसी ही वाणी भी प्रवृत्त (गत) होती है—यही अर्थ है। අභිභූ අනභිභූතොති උපරි භවග්ගං හෙට්ඨා අවීචිනිරයං පරියන්තං කත්වා තිරියං අපරිමාණාසු ලොකධාතූසු භගවා සබ්බසත්තෙ අභිභවති සීලෙනපි සමාධිනාපි පඤ්ඤායපි විමුත්තියාපි විමුත්තිඤාණදස්සනෙනපි, න තස්ස තුලා වා පමාණං වා අත්ථි, අසමො අසමසමො අප්පටිමො අප්පටිභාගො අප්පටිපුග්ගලො අතුලො අප්පමෙය්යො අනුත්තරො ධම්මරාජා දෙවානං අතිදෙවො සක්කානං අතිසක්කො බ්රහ්මානං අතිබ්රහ්මා. තතො එව සයං න කෙනචි අභිභූතොති අනභිභූතො. අඤ්ඤදත්ථූති එකංසත්ථෙ නිපාතො. යඤ්හි කිඤ්චි නෙය්යං නාම, සබ්බං තං හත්ථතලෙ ආමලකං විය පස්සතීති දසො. අවිපරීතං ආසයාදිඅවබොධෙන හිතූපසංහාරාදිනා ච සත්තෙ, භාවඤ්ඤථත්තූපනයවසෙන සඞ්ඛාරෙ සබ්බාකාරෙන සුචිණ්ණවසිතාය සමාපත්තියො චිත්තඤ්ච වසෙ වත්තෙතීති වසවත්තී. එත්තාවතා අභිභවනට්ඨෙන භගවා අත්තනො තථාගතභාවං දස්සෙති. 'अभिभू अनभिभूत' का अर्थ है कि ऊपर भवग्र (ब्रह्मलोक की सीमा) से लेकर नीचे अवीचि निरय तक और तिरछे (चारों ओर) अपरिमित लोकधातुओं में भगवान शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति और विमुक्ति-ज्ञानदर्शन से सभी सत्त्वों को अभिभूत (पराजित/अभिभावी) करते हैं। उनकी कोई तुलना या माप नहीं है; वे असम, असमसम्, अप्रतिम, अप्रतिभाग, अप्रतिपुद्गल, अतुल, अप्रमेय, अनुत्तर धर्मराज, देवों के अतिदेव, शक्रों के अतिशक्र और ब्रह्माओं के अतिब्रह्मा हैं। इसी कारण वे स्वयं किसी से अभिभूत नहीं होते, इसलिए 'अनभिभूत' हैं। 'अञ्ञदत्थु' (निश्चित रूप से) एक एकांत अर्थ वाला निपात है। जो कुछ भी 'ज्ञेय' (जानने योग्य) है, उस सबको वे हथेली पर रखे आँवले के समान देखते हैं, इसलिए 'दृष्टा' (दसो) हैं। आशय आदि के बोध से सत्त्वों को अविपरीत रूप से हित में लगाने आदि के कारण, और भावों के अन्यथा होने (परिवर्तन) के वश में लाने के कारण वे संस्कारों पर और सभी प्रकार से भली-भाँति वश में होने के कारण समापत्तियों और चित्त पर शासन करते हैं, इसलिए 'वशवर्ती' हैं। यहाँ तक 'अभिभूत करने' के अर्थ में भगवान अपने 'तथागत' होने के भाव को दर्शाते हैं। තත්රෙවං පදසිද්ධි වෙදිතබ්බා – අගදො විය අගදො. කො පනෙස? දෙසනාවිලාසො චෙව පුඤ්ඤුස්සයො ච. තෙනෙව හෙස මහානුභාවො භිසක්කො විය දිබ්බාගදෙන සප්පෙ, සබ්බෙ පරප්පවාදිනො සදෙවකඤ්ච ලොකං අභිභවති. ඉති සබ්බලොකාභිභවනෙ තථො අවිපරීතො දෙසනාවිලාසො චෙව පුඤ්ඤුස්සයො ච අගදො අස්සාති දකාරස්ස තකාරං කත්වා [Pg.352] තථාගතොති වෙදිතබ්බො. තෙන වුත්තං ‘‘සදෙවකෙ, භික්ඛවෙ, ලොකෙ…පෙ… වසවත්තී, තස්මා තථාගතොති වුච්චතී’’ති. वहाँ इस प्रकार पद-सिद्धि समझनी चाहिए—'अगद' (औषधि) के समान 'अगद' है। वह क्या है? वह देशना-विलास और पुण्य-समूह है। उसी के कारण वे महानुभाव, जैसे कोई वैद्य दिव्य औषधि से साँपों को वश में कर लेता है, वैसे ही सभी पर-प्रवादियों (दूसरे मत वालों) और देवों सहित संपूर्ण लोक को अभिभूत करते हैं। इस प्रकार संपूर्ण लोक को अभिभूत करने में 'तथ्य' (अविपरीत) देशना-विलास और पुण्य-समूह ही जिनका 'अगद' (अस्त्र/औषधि) है, उनमें 'द' को 'त' करके उन्हें 'तथागत' समझना चाहिए। इसीलिए कहा गया है—'भिक्षुओं, देवों सहित लोक में... पे... वशवर्ती हैं, इसलिए तथागत कहे जाते हैं'। ගාථාසු සබ්බලොකං අභිඤ්ඤායාති තෙධාතුකලොකසන්නිවාසං ජානිත්වා. සබ්බලොකෙ යථාතථන්ති තස්මිං තෙධාතුකලොකසන්නිවාසෙ යංකිඤ්චි නෙය්යං, තං සබ්බං යථාතථං අවිපරීතං ජානිත්වා. සබ්බලොකවිසංයුත්තොති චතුන්නං යොගානං අනවසෙසප්පහානෙන සබ්බෙනපි ලොකෙන විසංයුත්තො විප්පමුත්තො. අනූපයොති සබ්බස්මිම්පි ලොකෙ තණ්හාදිට්ඨිඋපයෙහි අනූපයො තෙහි උපයෙහි විරහිතො. गाथाओं में 'सबलोकं अभिञ्ञाय' (संपूर्ण लोक को जानकर) का अर्थ है—त्रिधातु रूपी लोक-संस्थान को जानकर। 'सबलोके यथातथं' का अर्थ है—उस त्रिधातु रूपी लोक-संस्थान में जो कुछ भी ज्ञेय है, उस सबको यथातथ्य (जैसा है वैसा) और अविपरीत रूप से जानकर। 'सबलोकविसंयुत्तो' का अर्थ है—चारों योगों के पूर्ण प्रहाण से संपूर्ण लोक से विसंयुक्त और विप्रमुक्त। 'अनूपयो' का अर्थ है—संपूर्ण लोक में तृष्णा और दृष्टि रूपी उपादानों (उपाियों) से रहित होना। සබ්බාභිභූති රූපාදීනි සබ්බාරම්මණානි, සබ්බං සඞ්ඛාරගතං, සබ්බෙපි මාරෙ අභිභවිත්වා ඨිතො. ධීරොති ධිතිසම්පන්නො. සබ්බගන්ථප්පමොචනොති සබ්බෙ අභිජ්ඣාකායගන්ථාදිකෙ මොචෙත්වා ඨිතො වෙනෙය්යසන්තානෙපි අත්තනො දෙසනාවිලාසෙන තෙසං පමොචනතො සබ්බගන්ථප්පමොචනො. ඵුට්ඨාස්සාති ඵුට්ඨා අස්ස. කරණත්ථෙ ඉදං සාමිවචනං, ඵුට්ඨා අනෙනාති අත්ථො. පරමා සන්තීති නිබ්බානං. තඤ්හි තෙන ඤාණඵුසනෙන ඵුට්ඨං. තෙනෙවාහ ‘‘නිබ්බානං අකුතොභය’’න්ති. අථ වා පරමා සන්තීති උත්තමා සන්ති. කතරා සාති? නිබ්බානං. යස්මා පන නිබ්බානෙ කුතොචි භයං නත්ථි, තස්මා තං අකුතොභයන්ති වුච්චති. 'सब-अभिभू' (सबको जीतने वाला) का अर्थ है रूप आदि सभी आलम्बनों को, सभी संस्कारों को, और सभी मारों को अभिभूत कर (जीतकर) स्थित। 'धीर' का अर्थ है धृति (धैर्य/संकल्प) से संपन्न। 'सब-ग्रन्थ-प्रमोचन' का अर्थ है सभी अभिध्या-काय-ग्रन्थ आदि से मुक्त होकर स्थित, और विनेय जनों (शिष्यों) के सन्तान में भी अपनी देशना के विलास से उन्हें मुक्त करने के कारण 'सब-ग्रन्थ-प्रमोचन' है। 'फुट्टास्स' का अर्थ है 'फुट्टा अस्स' (उसके द्वारा स्पर्श किया गया)। यहाँ षष्ठी विभक्ति करण अर्थ में है, जिसका अर्थ है 'उसके द्वारा स्पर्श किया गया'। 'परम शान्ति' का अर्थ है निर्वाण। क्योंकि वह उस ज्ञान-स्पर्श द्वारा स्पर्श किया गया है। इसीलिए कहा गया है 'निर्वाण जो कहीं से भी भयमुक्त है'। अथवा 'परम शान्ति' का अर्थ है उत्तम शान्ति। वह कौन सी है? निर्वाण। क्योंकि निर्वाण में कहीं से भी भय नहीं है, इसलिए उसे 'अकुतोभय' (निर्भय) कहा जाता है। අනීඝොති නිද්දුක්ඛො. සබ්බකම්මක්ඛයං පත්තොති සබ්බෙසං කම්මානං ඛයං පරියොසානං අච්චන්තාභාවං පත්තො. විමුත්තො උපධිසඞ්ඛයෙති උපධිසඞ්ඛයසඞ්ඛාතෙ නිබ්බානෙ තදාරම්මණාය ඵලවිමුත්තියා විමුත්තො. එස සොති එසො සො. සීහො අනුත්තරොති පරිස්සයානං සහනට්ඨෙන, කිලෙසානං හනනට්ඨෙන ච, තථාගතො අනුත්තරො සීහො නාම. බ්රහ්මන්ති සෙට්ඨං. චක්කන්ති ධම්මචක්කං. පවත්තයීති තිපරිවට්ටං ද්වාදසාකාරං පවත්තෙසි. 'अनीघ' का अर्थ है दुःख-रहित। 'सब-कर्म-क्षय को प्राप्त' का अर्थ है सभी कर्मों के क्षय, पर्यवसान और अत्यन्त अभाव को प्राप्त। 'उपधि-संक्षय में विमुक्त' का अर्थ है उपधि-संक्षय संज्ञक निर्वाण में उस आलम्बन वाली फल-विमुक्ति से विमुक्त। 'एस सो' का अर्थ है 'वह यह'। 'अनुत्तर सिंह' का अर्थ है संकटों को सहने के अर्थ में और क्लेशों के हनन के अर्थ में, तथागत 'अनुत्तर सिंह' कहलाते हैं। 'ब्रह्म' का अर्थ है श्रेष्ठ। 'चक्र' का अर्थ है धर्मचक्र। 'प्रवर्तित किया' का अर्थ है तीन परिवर्तों और बारह आकारों वाले (धर्मचक्र) को प्रवर्तित किया। ඉතීති [Pg.353] එවං තථාගතස්ස ගුණෙ ජානිත්වා. සඞ්ගම්මාති සමාගන්ත්වා. තං නමස්සන්තීති තං තථාගතං තෙ සරණං ගතා දෙවමනුස්සා නමස්සන්ති. මහන්තෙහි සීලාදිගුණෙහි සමන්නාගතත්තා මහන්තං, චතුවෙසාරජ්ජයොගෙන වීතසාරදං. ඉදානි යං වදන්තා තෙ නමස්සන්ති, තං දස්සෙතුං දන්තොතිආදි වුත්තං. තං උත්තානත්ථමෙව. 'इति' का अर्थ है इस प्रकार तथागत के गुणों को जानकर। 'संगम्म' का अर्थ है मिलकर (समागम कर)। 'उसे नमस्कार करते हैं' का अर्थ है उस तथागत को वे शरण में गए हुए देव और मनुष्य नमस्कार करते हैं। महान शील आदि गुणों से समन्वित होने के कारण 'महान', चार वैशारद्यों के योग से 'वीतसारद' (निर्भय)। अब वे जो कहते हुए नमस्कार करते हैं, उसे दिखाने के लिए 'दान्त' आदि कहा गया है। वह स्पष्ट अर्थ वाला ही है। ඉති ඉමස්මිං චතුක්කනිපාතෙ ඡට්ඨෙ සත්තමෙ ච සුත්තෙ වට්ටං කථිතං, පඨමදුතියතතියද්වාදසමතෙරසමෙසු විවට්ටං කථිතං, සෙසෙසු වට්ටවිවට්ටං කථිතන්ති වෙදිතබ්බං. इस प्रकार इस चतुक्क निपात में छठे और सातवें सूत्र में 'वट्ट' (संसार-चक्र) कहा गया है, पहले, दूसरे, तीसरे, बारहवें और तेरहवें में 'विवट्ट' (निर्वाण) कहा गया है, और शेष में 'वट्ट-विवट्ट' कहा गया है, ऐसा जानना चाहिए। තෙරසමසුත්තවණ්ණනා නිට්ඨිතා. तेरहवें सूत्र की व्याख्या समाप्त हुई। ඉති පරමත්ථදීපනියා इस प्रकार परमत्थदीपनी में। ඛුද්දකනිකාය-අට්ඨකථාය खुद्दकनिकाय की अट्ठकथा में। ඉතිවුත්තකස්ස චතුක්කනිපාතවණ්ණනා නිට්ඨිතා. इतिवुत्तक की चतुक्क निपात व्याख्या समाप्त हुई। නිගමනකථා उपसंहार कथा (निगमन कथा)। එත්තාවතා [Pg.354] ච – और अब तक – ධම්මිස්සරෙන ජගතො, ධම්මාලොකවිධායිනා; ධම්මානං බොධනෙය්යානං, ජානතා දෙසනාවිධිං. जगत के धर्मेश्वर, धर्म-आलोक का विधान करने वाले, बोधगम्य धर्मों की देशना-विधि को जानने वाले। තං තං නිදානමාගම්ම, සබ්බලොකහිතෙසිනා; එකකාදිප්පභෙදෙන, දෙසිතානි මහෙසිනා. उन-उन कारणों (निदानों) को प्राप्त कर, समस्त लोक के हितैषी महर्षि (बुद्ध) द्वारा एकक आदि भेदों से जो देशनाएँ दी गईं। දසුත්තරසතං ද්වෙ ච, සුත්තානි ඉතිවුත්තකං; ඉතිවුත්තප්පභෙදෙන, සඞ්ගායිංසු මහෙසයො. एक सौ बारह सूत्रों वाले इतिवुत्तक को, इतिवुत्तक के भेदों के अनुसार महर्षियों (संगीतकारों) ने संगायन किया। ඡළභිඤ්ඤා වසිප්පත්තා, පභින්නපටිසම්භිදා; යං තං සාසනධොරය්හා, ධම්මසඞ්ගාහකා පුරෙ. जो छह अभिज्ञाओं वाले, वशीभाव को प्राप्त, प्रभिन्न प्रतिसंविदा वाले और शासन के धुरंधर पूर्व धर्म-संग्राहक थे। තස්ස අත්ථං පකාසෙතුං, පොරාණට්ඨකථානයං; නිස්සාය යා සමාරද්ධා, අත්ථසංවණ්ණනා මයා. उसका अर्थ प्रकाशित करने के लिए, पुरानी अट्ठकथा की पद्धति का आश्रय लेकर मेरे द्वारा जो अर्थ-वर्णना आरम्भ की गई थी। සා තත්ථ පරමත්ථානං, සුත්තන්තෙසු යථාරහං; පකාසනා පරමත්ථ-දීපනී නාම නාමතො. वह उन सूत्रों में यथायोग्य परमार्थों का प्रकाशन करने वाली होने के कारण नाम से 'परमत्थदीपनी' है। සම්පත්තා පරිනිට්ඨානං, අනාකුලවිනිච්ඡයා; අට්ඨත්තිංසප්පමාණාය, පාළියා භාණවාරතො. वह व्याकुलता रहित निश्चयों वाली, अड़तीस भाणवारों के परिमाण वाली पालि के साथ पूर्णता को प्राप्त हुई। ඉති තං සඞ්ඛරොන්තෙන, යං තං අධිගතං මයා; පුඤ්ඤං තස්සානුභාවෙන, ලොකනාථස්ස සාසනං. इस प्रकार इसे सम्पादित करते हुए मेरे द्वारा जो पुण्य प्राप्त किया गया है, उसके प्रभाव से लोकनाथ का शासन। ඔගාහෙත්වා විසුද්ධාය, සීලාදිපටිපත්තියා; සබ්බෙපි පාණිනො හොන්තු, විමුත්තිරසභාගිනො. विशुद्ध शील आदि की प्रतिपत्ति में अवगाहन कर, सभी प्राणी विमुक्ति-रस के भागी बनें। චිරං [Pg.355] තිට්ඨතු ලොකස්මිං, සම්මාසම්බුද්ධසාසනං; තස්මිං සගාරවා නිච්චං, හොන්තු සබ්බෙපි පාණිනො. लोक में सम्यक्सम्बुद्ध का शासन चिरकाल तक बना रहे; और सभी प्राणी उसमें नित्य गौरव रखने वाले हों। සම්මා වස්සතු කාලෙන, දෙවොපි ජගතිප්පති; සද්ධම්මනිරතො ලොකං, ධම්මෙනෙව පසාසතූති. समय पर सम्यक वर्षा हो, और पृथ्वी का स्वामी (राजा) सद्धर्म में निरत होकर धर्म के अनुसार ही लोक का शासन करे। ඉති බදරතිත්ථවිහාරවාසිනා ආචරියධම්මපාලෙන කතා इस प्रकार बदरतिथ विहार के निवासी आचार्य धर्मपाल द्वारा रचित। ඉතිවුත්තකස්ස අට්ඨකථා නිට්ඨිතා. इतिवुत्तक की अट्ठकथा समाप्त हुई। | |||
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |