| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला नमस्कार असो. ขุทฺทกนิกาเย खुद्दकनिकाय ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถา खुद्दकपाठ-अट्ठकथा คนฺถารมฺภกถา ग्रंथारंभकथा พุทฺธํ [Pg.1] สรณํ คจฺฉามิ; ธมฺมํ สรณํ คจฺฉามิ; สงฺฆํ สรณํ คจฺฉามีติ. मी बुद्धाला शरण जातो; मी धम्माला शरण जातो; मी संघाला शरण जातो. อยํ สรณคมนนิทฺเทโส ขุทฺทกานํ อาทิ. हा शरणगमन निर्देश खुद्दक ग्रंथांचा प्रारंभ आहे. อิมสฺส ทานิ อตฺถํ ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกฏฺฐกถาย วิวริตุํ วิภชิตุํ อุตฺตานีกาตุํ อิทํ วุจฺจติ – आता या खुद्दकपाठाचा अर्थ 'परमत्थजोतिका' नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेद्वारे स्पष्ट करण्यासाठी, त्याचे वर्गीकरण करण्यासाठी आणि तो सुबोध करण्यासाठी हे म्हटले जात आहे – อุตฺตมํ วนฺทเนยฺยานํ, วนฺทิตฺวา รตนตฺตยํ; ขุทฺทกานํ กริสฺสามิ, เกสญฺจิ อตฺถวณฺณนํ. वंदन करण्यास योग्य अशा उत्तम त्रिरत्नांना वंदन करून, मी खुद्दकनिकायाच्या काही भागांचे अर्थ-स्पष्टीकरण करीन. ขุทฺทกานํ คมฺภีรตฺตา, กิญฺจาปิ อติทุกฺกรา; วณฺณนา มาทิเสเนสา, อโพธนฺเตน สาสนํ. खुद्दकनिकायातील विषय अत्यंत गहन असल्यामुळे, शासनाला पूर्णपणे न समजणाऱ्या माझ्यासारख्या व्यक्तीसाठी हे स्पष्टीकरण करणे अत्यंत कठीण काम आहे. อชฺชาปิ ตุ อพฺโพจฺฉินฺโน, ปุพฺพาจริยนิจฺฉโย; ตเถว จ ฐิตํ ยสฺมา, นวงฺคํ สตฺถุสาสนํ. परंतु, आजतागायत पूर्व आचार्यांचे निर्णय अखंडितपणे टिकून आहेत आणि नऊ अंगांनी युक्त असलेले शास्त्यांचे शासन जसेच्या तसे अस्तित्वात आहे. ตสฺมาหํ กาตุมิจฺฉามิ, อตฺถสํวณฺณนํ อิมํ; สาสนญฺเจว นิสฺสาย, โปราณญฺจ วินิจฺฉยํ. म्हणूनच, मी बुद्धांच्या शासनाचा आणि प्राचीन आचार्यांच्या निर्णयांचा आश्रय घेऊन हे अर्थ-स्पष्टीकरण करण्याची इच्छा करतो. สทฺธมฺมพหุมาเนน, นาตฺตุกฺกํสนกมฺยตา; นาญฺเญสํ วมฺภนตฺถาย, ตํ สุณาถ สมาหิตาติ. सद्धम्मावरील आदरापोटी मी हे करत आहे; स्वतःची प्रशंसा करण्यासाठी किंवा इतरांना कमी लेखण्यासाठी नाही. म्हणून, तुम्ही सर्वांनी एकाग्र चित्ताने हे ऐकावे. ขุทฺทกววตฺถานํ खुद्दकनिकायाचे वर्गीकरण ตตฺถ [Pg.2] ‘‘ขุทฺทกานํ กริสฺสามิ, เกสญฺจิ อตฺถวณฺณน’’นฺติ วุตฺตตฺตา ขุทฺทกานิ ตาว ววตฺถเปตฺวา ปจฺฉา อตฺถวณฺณนํ กริสฺสามิ. ขุทฺทกานิ นาม ขุทฺทกนิกายสฺส เอกเทโส, ขุทฺทกนิกาโย นาม ปญฺจนฺนํ นิกายานํ เอกเทโส. ปญฺจ นิกายา นาม – त्यामध्ये, 'मी खुद्दकनिकायाच्या काही भागांचे अर्थ-स्पष्टीकरण करीन' असे मी वचन दिले असल्यामुळे, प्रथम खुद्दक ग्रंथांचे वर्गीकरण करून नंतर मी त्यांचे अर्थ-स्पष्टीकरण करीन. 'खुद्दक' म्हणजे खुद्दकनिकायाचा एक भाग आणि 'खुद्दकनिकाय' म्हणजे पाच निकायांपैकी एक निकाय होय. पाच निकाय खालीलप्रमाणे आहेत – ทีฆมชฺฌิมสํยุตฺต, องฺคุตฺตริกขุทฺทกา; นิกายา ปญฺจ คมฺภีรา, ธมฺมโต อตฺถโต จิเม. दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय, संयुत्तनिकाय, अंगुत्तरनिकाय आणि खुद्दकनिकाय; हे पाच निकाय धम्म आणि अर्थ या दोन्ही दृष्टींनी अत्यंत गंभीर आहेत. ตตฺถ พฺรหฺมชาลสุตฺตาทีนิ จตุตฺตึส สุตฺตานิ ทีฆนิกาโย. มูลปริยายสุตฺตาทีนิ ทิยฑฺฒสตํ ทฺเว จ สุตฺตานิ มชฺฌิมนิกาโย. โอฆตรณสุตฺตาทีนิ สตฺต สุตฺตสหสฺสานิ สตฺต จ สุตฺตสตานิ ทฺวาสฏฺฐิ จ สุตฺตานิ สํยุตฺตนิกาโย. จิตฺตปริยาทานสุตฺตาทีนิ นว สุตฺตสหสฺสานิ ปญฺจ จ สุตฺตสตานิ สตฺตปญฺญาสญฺจ สุตฺตานิ องฺคุตฺตรนิกาโย. ขุทฺทกปาโฐ, ธมฺมปทํ, อุทานํ, อิติวุตฺตกํ, สุตฺตนิปาโต, วิมานวตฺถุ, เปตวตฺถุ, เถรคาถา, เถรีคาถา, ชาตกํ, นิทฺเทโส, ปฏิสมฺภิทา, อปทานํ, พุทฺธวํโส, จริยาปิฏกํ, วินยาภิธมฺมปิฏกานิ, ฐเปตฺวา วา จตฺตาโร นิกาเย อวเสสํ พุทฺธวจนํ ขุทฺทกนิกาโย. त्यापैकी, ब्रह्मजाल सुत्तापासून सुरू होणारी ३४ सुत्ते म्हणजे 'दीघनिकाय' होय. मूलपरियाय सुत्तापासून सुरू होणारी १५२ सुत्ते म्हणजे 'मज्झिमनिकाय' होय. ओघतरण सुत्तापासून सुरू होणारी ७,७६२ सुत्ते म्हणजे 'संयुत्तनिकाय' होय. चित्तपरियादान सुत्तापासून सुरू होणारी ९,५५७ सुत्ते म्हणजे 'अंगुत्तरनिकाय' होय. खुद्दकपाठ, धम्मपद, उदान, इतिवुत्तक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्थु, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक, निद्देस, पटिसम्भिदामग्ग, अपदान, बुद्धवंस, चरियापिटक आणि विनयपिटक व अभिधम्मपिटक; किंवा असे म्हणता येईल की, चार निकाय वगळता उर्वरित सर्व बुद्धवचन म्हणजे 'खुद्दकनिकाय' होय. กสฺมา ปเนส ขุทฺทกนิกาโยติ วุจฺจติ? พหูนํ ขุทฺทกานํ ธมฺมกฺขนฺธานํ สมูหโต นิวาสโต จ. สมูหนิวาสา หิ ‘‘นิกาโย’’ติ วุจฺจนฺติ. ‘‘นาหํ, ภิกฺขเว, อญฺญํ เอกนิกายมฺปิ สมนุปสฺสามิ เอวํ จิตฺตํ, ยถยิทํ, ภิกฺขเว, ติรจฺฉานคตา ปาณา (สํ. นิ. ๓.๑๐๐). โปณิกนิกาโย, จิกฺขลฺลิกนิกาโย’’ติ เอวมาทีนิ เจตฺถ สาธกานิ สาสนโต โลกโต จ. อยมสฺส ขุทฺทกนิกายสฺส เอกเทโส. อิมานิ สุตฺตนฺตปิฏกปริยาปนฺนานิ อตฺถโต วิวริตุํ วิภชิตุํ อุตฺตานีกาตุญฺจ อธิปฺเปตานิ ขุทฺทกานิ, เตสมฺปิ ขุทฺทกานํ สรณสิกฺขาปททฺวตฺตึสาการกุมารปญฺหมงฺคลสุตฺต- รตนสุตฺตติโรกุฏฺฏนิธิกณฺฑเมตฺตสุตฺตานํ วเสน นวปฺปเภโท ขุทฺทกปาโฐ อาทิ อาจริยปรมฺปราย วาจนามคฺคํ อาโรปิตวเสน น ภควตา วุตฺตวเสน. ภควตา หิ วุตฺตวเสน – पण याला 'खुद्दकनिकाय' का म्हटले जाते? कारण हा अनेक लहान लहान धम्मस्कंधांचा समूह आणि निवासस्थान आहे. समूहाला आणि निवासस्थानाला 'निकाय' असे म्हणतात. जसे की, 'भिक्खूंनो, मी इतर कोणताही एक समूह असा पाहत नाही जो प्राण्यांच्या समूहासारखा इतका विविधतेने नटलेला असेल...' तसेच 'पोणिक निकाय', 'चिक्खल्लिक निकाय' इत्यादी उदाहरणे शासनात आणि लोकव्यवहारात याचे पुरावे आहेत. हा या खुद्दकनिकायाचा एक भाग आहे. सुत्तपिटकात समाविष्ट असलेल्या या खुद्दक ग्रंथांचे अर्थ स्पष्ट करणे, त्यांचे वर्गीकरण करणे आणि ते सुबोध करणे अभिप्रेत आहे. त्या खुद्दक ग्रंथांमध्ये शरणगमन, शिखापदे, द्वत्तींसाकार, कुमारपञ्ह, मंगलसुत्त, रतनसुत्त, तिरोकुट्टसुत्त, निधिकण्डसुत्त आणि मेत्तसुत्त या नऊ भागांनी युक्त असलेला 'खुद्दकपाठ' हा पहिला ग्रंथ आहे. हा ग्रंथ आचार्य परंपरेने पठण मार्गावर आणल्यामुळे पहिला ठरतो, भगवंतांनी उपदेशिलेल्या क्रमानुसार नाही. कारण भगवंतांनी उपदेशिलेल्या क्रमानुसार तर – ‘‘อเนกชาติสํสารํ, สนฺธาวิสฺสํ อนิพฺพิสํ; คหการํ คเวสนฺโต, ทุกฺขา ชาติ ปุนปฺปุนํ. अनेक जन्मांच्या संसारात मी धावत राहिलो, पण गृहकारकाला शोधू शकलो नाही; पुन्हा पुन्हा जन्म घेणे हे अत्यंत दुःखद आहे. ‘‘คหการก [Pg.3] ทิฏฺโฐสิ, ปุน เคหํ น กาหสิ; สพฺพา เต ผาสุกา ภคฺคา, คหกูฏํ วิสงฺขตํ; วิสงฺขารคตํ จิตฺตํ, ตณฺหานํ ขยมชฺฌคา’’ติ. (ธ. ป. ๑๕๓-๑๕๔) – हे गृहकारका! आता मी तुला पाहिले आहे. तू पुन्हा हे घर बांधू शकणार नाहीस. तुझ्या सर्व कड्या मी मोडून टाकल्या आहेत आणि घराचे शिखर नष्ट केले आहे. माझे चित्त संस्कारमुक्त झाले आहे आणि मी तृष्णेचा क्षय प्राप्त केला आहे. อิทํ คาถาทฺวยํ สพฺพสฺสาปิ พุทฺธวจนสฺส อาทิ. ตญฺจ มนสาว วุตฺตวเสน, น วจีเภทํ กตฺวา วุตฺตวเสน. วจีเภทํ ปน กตฺวา วุตฺตวเสน – या दोन गाथा संपूर्ण बुद्धवचनाचा प्रारंभ आहेत. आणि हे केवळ मनातल्या मनात म्हटल्यामुळे प्रारंभ मानले जाते, वाणीने उच्चारल्यामुळे नाही. वाणीने उच्चारल्या गेलेल्या वचनानुसार तर – ‘‘ยทา หเว ปาตุภวนฺติ ธมฺมา,อาตาปิโน ฌายโต พฺราหฺมณสฺส; อถสฺส กงฺขา วปยนฺติ สพฺพา,ยโต ปชานาติ สเหตุธมฺม’’นฺติ. (อุทา. ๑; มหาว. ๑) – जेव्हा ध्यानमग्न आणि उद्योगी ब्राह्मणाला धम्म प्रकट होतो, तेव्हा त्याचे सर्व संशय दूर होतात, कारण त्याला सहेतुक धम्माचे ज्ञान होते. อยํ คาถา อาทิ. ตสฺมา ยฺวายํ นวปฺปเภโท ขุทฺทกปาโฐ อิเมสํ ขุทฺทกานํ อาทิ, ตสฺส อาทิโต ปภุติ อตฺถสํวณฺณนํ อารภิสฺสามิ. ही गाथा पहिली आहे. म्हणूनच, नऊ भागांनी युक्त असलेला हा जो खुद्दकपाठ या खुद्दक ग्रंथांमध्ये पहिला आहे, त्याच्या सुरुवातीपासून मी अर्थ-स्पष्टीकरण सुरू करीन. นิทานโสธนํ निदान-शोधन ตสฺส จายมาทิ ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมํ สรณํ คจฺฉามิ, สงฺฆํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ. ตสฺสายํ อตฺถวณฺณนาย มาติกา – आणि त्याचा प्रारंभ 'बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि' असा आहे. त्याच्या अर्थ-स्पष्टीकरणाची ही मातृका आहे – ‘‘เกน กตฺถ กทา กสฺมา, ภาสิตํ สรณตฺตยํ; กสฺมา จิธาทิโต วุตฺต, มวุตฺตมปิ อาทิโต. हे त्रिशरण कोणी, कोठे, केव्हा आणि का उपदेशिले? आणि भगवंतांनी सुरुवातीला न सांगूनही येथे सुरुवातीला का सांगितले गेले? ‘‘นิทานโสธนํ กตฺวา, เอวเมตฺถ ตโต ปรํ; พุทฺธํ สรณคมนํ, คมกญฺจ วิภาวเย. अशा प्रकारे, येथे प्रथम निदानाचे स्पष्टीकरण करून, त्यानंतर बुद्ध, शरणगमन आणि शरण जाणाऱ्या व्यक्तीचे स्वरूप स्पष्ट करावे. ‘‘เภทาเภทํ ผลญฺจาปิ, คมนียญฺจ ทีปเย; ธมฺมํ สรณมิจฺจาทิ, ทฺวเยเปส นโย มโต. शरणगमनाचा भेद व अभेद, त्याचे फळ आणि शरण जाण्याच्या योग्यतेचे स्पष्टीकरण करावे. 'धम्मं सरणं...' इत्यादी उर्वरित दोन पदांच्या बाबतीतही हाच नियम समजावा. ‘‘อนุปุพฺพววตฺถาเน, การณญฺจ วินิทฺทิเส; สรณตฺตยเมตญฺจ, อุปมาหิ ปกาสเย’’ติ. अनुक्रमाने मांडणी करण्याचे कारण स्पष्ट करावे आणि या त्रिशरणाचे महत्त्व विविध उपमांद्वारे प्रकाशित करावे. ตตฺถ ปฐมคาถาย ตาว อิทํ สรณตฺตยํ เกน ภาสิตํ, กตฺถ ภาสิตํ, กทา ภาสิตํ, กสฺมา ภาสิตํ อวุตฺตมปิจาทิโต ตถาคเตน กสฺมา อิธาทิโต วุตฺตนฺติ ปญฺจ ปญฺหา. त्यापैकी, पहिल्या गाथेनुसार – हे त्रिशरण कोणी उपदेशिले, कोठे उपदेशिले, केव्हा उपदेशिले, का उपदेशिले आणि तथागतांनी सुरुवातीला न सांगूनही येथे सुरुवातीला का सांगितले गेले, असे पाच प्रश्न निर्माण होतात. เตสํ [Pg.4] วิสฺสชฺชนา เกน ภาสิตนฺติ ภควตา ภาสิตํ, น สาวเกหิ, น อิสีหิ, น เทวตาหิ. กตฺถาติ พาราณสิยํ อิสิปตเน มิคทาเย. กทาติ อายสฺมนฺเต ยเส สทฺธึ สหายเกหิ อรหตฺตํ ปตฺเต เอกสฏฺฐิยา อรหนฺเตสุ พหุชนหิตาย โลเก ธมฺมเทสนํ กโรนฺเตสุ. กสฺมาติ ปพฺพชฺชตฺถญฺจ อุปสมฺปทตฺถญฺจ. ยถาห – त्यांचे उत्तर असे आहे: 'कोणी उपदेशिले?' – हे भगवंतांनी उपदेशिले आहे, श्रावकांनी नाही, ऋषींनी नाही, देवतेने नाही. 'कोठे?' – वाराणसीतील इसिपतन येथील मिगदाय येथे. 'केव्हा?' – जेव्हा आयुष्यमान यशाने आपल्या मित्रांसह अर्हतपद प्राप्त केले आणि जगात बहुजनांच्या हितासाठी धम्म उपदेश करणाऱ्या अर्हतांची संख्या एकसष्ट झाली, तेव्हा. 'का?' – प्रवज्जा आणि उपसंपदा देण्यासाठी. जसे की म्हटले आहे – ‘‘เอวญฺจ ปน, ภิกฺขเว, ปพฺพาเชตพฺโพ อุปสมฺปาเทตพฺโพ. ปฐมํ เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาทาเปตฺวา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ การาเปตฺวา ภิกฺขูนํ ปาเท วนฺทาเปตฺวา อุกฺกุฏิกํ นิสีทาเปตฺวา อญฺชลึ ปคฺคณฺหาเปตฺวา ‘เอวํ วเทหี’ติ วตฺตพฺโพ ‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามิ, ธมฺมํ สรณํ คจฺฉามิ, สงฺฆํ สรณํ คจฺฉามี’’’ติ (มหาว. ๓๔). भिक्खूंनो, प्रवज्जा आणि उपसंपदा या प्रकारे दिली पाहिजे: प्रथम त्याचे केस व दाढी काढून, त्याला काषाय वस्त्रे परिधान करायला देऊन, एका खांद्यावर उत्तरासंग ठेवून, भिक्खूंच्या चरणांना वंदन करायला लावून, उकिडवे बसवून, हात जोडायला लावून, त्याला 'असे म्हणा' असे सांगावे: 'मी बुद्धाला शरण जातो, मी धम्माला शरण जातो, मी संघाला शरण जातो.' กสฺมา จิธาทิโต วุตฺตนฺติ อิทญฺจ นวงฺคํ สตฺถุสาสนํ ตีหิ ปิฏเกหิ สงฺคณฺหิตฺวา วาจนามคฺคํ อาโรเปนฺเตหิ ปุพฺพาจริเยหิ ยสฺมา อิมินา มคฺเคน เทวมนุสฺสา อุปาสกภาเวน วา ปพฺพชิตภาเวน วา สาสนํ โอตรนฺติ, ตสฺมา สาสโนตารสฺส มคฺคภูตตฺตา อิธ ขุทฺทกปาเฐ อาทิโต วุตฺตนฺติ ญาตพฺพํ. येथे 'हे सुरुवातीलाच का सांगितले आहे?' या प्रश्नाचे उत्तर असे जाणावे: तीन पिटकांच्या द्वारे नऊ अंगांनी युक्त अशा शास्त्यांच्या शासनाला (बुद्धवचनाला) संग्रहित करून वाचनामार्गावर (पाठाच्या परंपरेवर) चढवणाऱ्या पूर्वाचार्यांनी, ज्याअर्थी देव आणि मनुष्य या मार्गाने (उदा. बुद्धं सरणं गच्छामि इत्यादी) उपासकभावाने किंवा प्रवज्जितभावाने (दीक्षित होऊन) शासनात प्रवेश करतात, त्याअर्थी शासनात प्रवेश करण्याचा हा मार्ग (पाया) असल्यामुळे, येथे खुद्दकपाठामध्ये हे सुरुवातीलाच सांगितले आहे, असे जाणावे। กตํ นิทานโสธนํ. प्रस्तावनेचे (निदानाचे) शोधन पूर्ण झाले। ๑. สรณตฺตยวณฺณนา १. त्रिशरण वर्णन พุทฺธวิภาวนา बुद्धविभावना (बुद्ध शब्दाचे स्पष्टीकरण) อิทานิ ยํ วุตฺตํ ‘‘พุทฺธํ สรณคมนํ, คมกญฺจ วิภาวเย’’ติ, ตตฺถ สพฺพธมฺเมสุ อปฺปฏิหตญาณนิมิตฺตานุตฺตรวิโมกฺขาธิคมปริภาวิตํ ขนฺธสนฺตานมุปาทาย, ปญฺญตฺติโต สพฺพญฺญุตญฺญาณปทฏฺฐานํ วา สจฺจาภิสมฺโพธิมุปาทาย ปญฺญตฺติโต สตฺตวิเสโส พุทฺโธ. ยถาห – आता, जे म्हटले आहे की—'बुद्ध, शरणगमन आणि शरण जाणाऱ्याचे स्पष्टीकरण करावे', त्या संदर्भात असा शब्दार्थ जाणावा: सर्व धर्मांमध्ये (गोष्टींमध्ये) अडथळा नसलेल्या सर्वज्ञता-ज्ञानाचा विषय असलेल्या, अनुत्तर विमोक्षाच्या (अर्हतफलाच्या) प्राप्तीने सुवासित अशा स्कंध-संतानाला (पंचस्कंध परंपरेला) ग्रहण करून प्रज्ञप्तीद्वारे (संज्ञेनुसार) 'बुद्ध' म्हटले जाते; किंवा सर्वज्ञता-ज्ञानाचे निकटचे कारण असलेल्या चार आर्यसत्यांच्या अभिसंबोधीला (साक्षात्काराला) ग्रहण करून प्रज्ञप्तीद्वारे प्राण्यांमध्ये श्रेष्ठ असलेल्या विशिष्ट पुरुषाला 'बुद्ध' म्हटले जाते. जसे की म्हटले आहे— ‘‘พุทฺโธติ [Pg.5] โย โส ภควา สยมฺภู อนาจริยโก ปุพฺเพ อนนุสฺสุเตสุ ธมฺเมสุ สามํ สจฺจานิ อภิสมฺพุชฺฌิ, ตตฺถ จ สพฺพญฺญุตํ ปตฺโต, พเลสุ จ วสีภาว’’นฺติ (มหานิ. ๑๙๒; จูฬนิ. ปารายนตฺถุติคาถานิทฺเทส ๙๗; ปฏิ. ม. ๑.๑๖๑). “'बुद्ध' म्हणजे ते भगवान, जे स्वयंभू आहेत, ज्यांना कोणी गुरु नव्हता, ज्यांनी पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये (सत्यांमध्ये) स्वतःच आर्यसत्यांचा अभिसंबोध (साक्षात्कार) केला, आणि त्यामध्ये सर्वज्ञता प्राप्त केली, आणि बलांवर (दशबलांवर) वशीभाव (पूर्ण नियंत्रण) प्राप्त केला।” อยํ ตาว อตฺถโต พุทฺธวิภาวนา. हे सर्वप्रथम अर्थाच्या दृष्टीने 'बुद्ध' शब्दाचे स्पष्टीकरण आहे। พฺยญฺชนโต ปน ‘‘พุชฺฌิตาติ พุทฺโธ, โพเธตาติ พุทฺโธ’’ติ เอวมาทินา นเยน เวทิตพฺโพ. วุตฺตญฺเจตํ – व्यंजनाच्या (शब्दाच्या व्युत्पत्तीच्या) दृष्टीने तर—'जे जाणतात म्हणून बुद्ध, जे इतरांना जाणवून देतात (बोध करतात) म्हणून बुद्ध' इत्यादी पद्धतीने जाणावे. आणि हे म्हटलेच आहे— ‘‘พุทฺโธติ เกนฏฺเฐน พุทฺโธ? พุชฺฌิตา สจฺจานีติ พุทฺโธ, โพเธตา ปชายาติ พุทฺโธ, สพฺพญฺญุตาย พุทฺโธ, สพฺพทสฺสาวิตาย พุทฺโธ, อนญฺญเนยฺยตาย พุทฺโธ, วิกสิตาย พุทฺโธ, ขีณาสวสงฺขาเตน พุทฺโธ, นิรุปกฺกิเลสสงฺขาเตน พุทฺโธ, เอกนฺตวีตราโคติ พุทฺโธ, เอกนฺตวีตโทโสติ พุทฺโธ, เอกนฺตวีตโมโหติ พุทฺโธ, เอกนฺตนิกฺกิเลโสติ พุทฺโธ, เอกายนมคฺคํ คโตติ พุทฺโธ, เอโก อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธติ พุทฺโธ, อพุทฺธิวิหตตฺตา พุทฺธิปฏิลาภา พุทฺโธ. พุทฺโธติ เนตํ นามํ มาตรา กตํ, น ปิตรา กตํ, น ภาตรา กตํ, น ภคินิยา กตํ, น มิตฺตามจฺเจหิ กตํ, น ญาติสาโลหิเตหิ กตํ, น สมณพฺราหฺมเณหิ กตํ, น เทวตาหิ กตํ, วิโมกฺขนฺติกเมตํ พุทฺธานํ ภควนฺตานํ โพธิยา มูเล สห สพฺพญฺญุตญฺญาณสฺส ปฏิลาภา สจฺฉิกา ปญฺญตฺติ ยทิทํ พุทฺโธ’’ติ (มหานิ. ๑๙๒; จูฬนิ. ปารายนตฺถุติคาถานิทฺเทส ๙๗; ปฏิ. ม. ๑.๑๖๒). “'बुद्ध' म्हणजे कोणत्या अर्थाने बुद्ध? (१) आर्यसत्यांचे आकलन केले (जाणले) म्हणून बुद्ध, (२) प्रजेला (प्राण्यांना) आर्यसत्यांचा बोध करून दिला म्हणून बुद्ध, (३) सर्वज्ञतेमुळे बुद्ध, (४) सर्वदर्शित्वामुळे बुद्ध, (५) अनन्यनेयत्वामुळे (इतरांच्या मार्गदर्शनाशिवाय स्वतःच जाणल्यामुळे) बुद्ध, (६) विकसित झाल्यामुळे (विविध गुणांनी प्रफुल्लित झाल्यामुळे) बुद्ध, (७) क्षीणासव (आसव नष्ट झालेले) असल्यामुळे बुद्ध, (८) निरुपक्किलेस (क्लेशरहित) असल्यामुळे बुद्ध, (९) एकांतवीतराग (पूर्णपणे रागरहित) असल्यामुळे बुद्ध, (१०) एकांतवीतदोषाने युक्त (पूर्णपणे द्वेषरहित) असल्यामुळे बुद्ध, (११) एकांतवीतमोहाने युक्त (पूर्णपणे मोहरहित) असल्यामुळे बुद्ध, (१२) एकांतनिष्क्लेश (पूर्णपणे क्लेशरहित) असल्यामुळे बुद्ध, (१३) एकायन मार्गाने (एकमेव कल्याणाच्या मार्गाने) गेले म्हणून बुद्ध, (१४) एकट्यानेच अनुत्तर सम्यक्संबोधीचा अभिसंबोध केला म्हणून बुद्ध, (१५) अज्ञानाचा नाश केल्यामुळे व बुद्धी (ज्ञान) प्राप्त केल्यामुळे बुद्ध. 'बुद्ध' हे नाव आईने ठेवलेले नाही, वडिलांनी ठेवलेले नाही, भावाने ठेवलेले नाही, बहिणीने ठेवलेले नाही, मित्र-अमात्यांनी ठेवलेले नाही, नातेवाईक-सगोत्रांनी ठेवलेले नाही, श्रमण-ब्राह्मणांनी ठेवलेले नाही, देवतेने ठेवलेले नाही. हे 'बुद्ध' नाव म्हणजे विमोक्षाच्या शेवटी (अर्हतफलाच्या प्राप्तीनंतर) बोधिवृक्षाच्या मुळाशी सर्वज्ञता-ज्ञानाच्या प्राप्तीसोबतच बुद्ध भगवंतांनी स्वतः साक्षात केलेली प्रज्ञप्ती (नाव) आहे।” เอตฺถ จ ยถา โลเก อวคนฺตา อวคโตติ วุจฺจติ, เอวํ พุชฺฌิตา สจฺจานีติ พุทฺโธ. ยถา ปณฺณโสสา วาตา ปณฺณสุสาติ วุจฺจนฺติ, เอวํ โพเธตา ปชายาติ พุทฺโธ. สพฺพญฺญุตาย พุทฺโธติ สพฺพธมฺมพุชฺฌนสมตฺถาย พุทฺธิยา พุทฺโธติ วุตฺตํ โหติ. สพฺพทสฺสาวิตาย พุทฺโธติ สพฺพธมฺมโพธนสมตฺถาย พุทฺธิยา พุทฺโธติ วุตฺตํ โหติ. อนญฺญเนยฺยตาย พุทฺโธติ อญฺเญน อโพธิโต สยเมว พุทฺธตฺตา พุทฺโธติ วุตฺตํ โหติ. วิกสิตาย พุทฺโธติ นานาคุณวิกสนโต ปทุมมิว วิกสนฏฺเฐน พุทฺโธติ วุตฺตํ โหติ. ขีณาสวสงฺขาเตน พุทฺโธติ เอวมาทีหิ จิตฺตสงฺโกจกรธมฺมปหานโต [Pg.6] นิทฺทากฺขยวิพุทฺโธ ปุริโส วิย สพฺพกิเลสนิทฺทากฺขยวิพุทฺธตฺตา พุทฺโธติ วุตฺตํ โหติ. เอกายนมคฺคํ คโตติ พุทฺโธติ พุทฺธิยตฺถานํ คมนตฺถปริยายโต ยถา มคฺคํ คโตปิ ปุริโส คโตติ วุจฺจติ, เอวํ เอกายนมคฺคํ คตตฺตาปิ พุทฺโธติ วุจฺจตีติ ทสฺเสตุํ วุตฺตํ. เอโก อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺโธติ พุทฺโธติ น ปเรหิ พุทฺธตฺตา พุทฺโธ, กินฺตุ สยเมว อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุทฺธตฺตา พุทฺโธติ วุตฺตํ โหติ. อพุทฺธิวิหตตฺตา พุทฺธิปฏิลาภา พุทฺโธติ พุทฺธิ พุทฺธํ โพโธติ ปริยายวจนเมตํ. ตตฺถ ยถา นีลรตฺตคุณโยคโต ‘‘นีโล ปโฏ, รตฺโต ปโฏ’’ติ วุจฺจติ, เอวํ พุทฺธิคุณโยคโต พุทฺโธติ ญาเปตุํ วุตฺตํ โหติ. ตโต ปรํ พุทฺโธติ เนตํ นามนฺติ เอวมาทิ อตฺถมนุคตา อยํ ปญฺญตฺตีติ โพธนตฺถํ วุตฺตนฺติ เอวรูเปน นเยน สพฺเพสํ ปทานํ พุทฺธสทฺทสฺส สาธนสมตฺโถ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. येथे, ज्याप्रमाणे लोकव्यवहारात गमन करणाऱ्याला (जाणाऱ्याला) 'गेलेला' (गत) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे आर्यसत्यांचे आकलन करणाऱ्याला (जाणणाऱ्याला) 'बुद्ध' म्हटले जाते. ज्याप्रमाणे पानांना वाळवणारे वारे 'पर्णशुष' (पाने वाळवणारे) म्हटले जातात, त्याचप्रमाणे प्रजेला (प्राण्यांना) बोध करून देणाऱ्याला 'बुद्ध' म्हटले जाते. 'सर्वज्ञतेमुळे बुद्ध' म्हणजे सर्व धर्मांना (गोष्टींना) जाणण्यास समर्थ असलेल्या बुद्धीमुळे (ज्ञानामुळे) 'बुद्ध' म्हटले गेले आहे, असा अर्थ होतो. 'सर्वदर्शित्वामुळे बुद्ध' म्हणजे सर्व धर्मांचा बोध करून देण्यास समर्थ असलेल्या बुद्धीमुळे 'बुद्ध' म्हटले गेले आहे, असा अर्थ होतो. 'अनन्यनेयत्वामुळे बुद्ध' म्हणजे दुसऱ्या कोणाकडूनही बोध न करून घेता स्वतःच जाणल्यामुळे 'बुद्ध' म्हटले गेले आहे, असा अर्थ होतो. 'विकसित झाल्यामुळे बुद्ध' म्हणजे विविध गुणांच्या विकासामुळे कमळाप्रमाणे प्रफुल्लित होण्याच्या अर्थाने 'बुद्ध' म्हटले गेले आहे, असा अर्थ होतो. 'क्षीणासव असल्यामुळे बुद्ध' इत्यादी पदांद्वारे, मनाचा संकोच करणाऱ्या धर्मांचा (अज्ञानाचा) त्याग केल्यामुळे, झोप संपल्यावर जागृत झालेल्या मनुष्याप्रमाणे, सर्व क्लेशांची झोप संपल्यामुळे जागृत झाल्याच्या अर्थाने 'बुद्ध' म्हटले गेले आहे, असा अर्थ होतो. 'एकायन मार्गाने गेले म्हणून बुद्ध' या संदर्भात, 'बुद्ध' शब्दाच्या अर्थांमध्ये गमनाचा (जाण्याचा) अर्थ समाविष्ट असल्यामुळे, ज्याप्रमाणे मार्गाने गेलेल्या मनुष्याला 'गेलेला' (गत) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे एकायन मार्गाने गेल्यामुळेही 'बुद्ध' म्हटले जाते, हे दर्शवण्यासाठी हे म्हटले आहे. 'एकट्यानेच अनुत्तर सम्यक्संबोधीचा अभिसंबोध केला म्हणून बुद्ध' म्हणजे इतरांनी बोध करून दिल्यामुळे ते बुद्ध नाहीत, तर स्वतःच अनुत्तर सम्यक्संबोधीचा अभिसंबोध केल्यामुळे 'बुद्ध' म्हटले गेले आहे, असा अर्थ होतो. 'अज्ञानाचा नाश केल्यामुळे व बुद्धी प्राप्त केल्यामुळे बुद्ध' या वाक्यात बुद्धी, बुद्ध आणि बोध हे समानार्थी शब्द (पर्यायवाचक शब्द) आहेत. तेथे ज्याप्रमाणे निळ्या किंवा तांबड्या गुणाच्या योगाने 'निळे वस्त्र, तांबडे वस्त्र' असे म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे बुद्धीच्या (ज्ञानाच्या) गुणाच्या योगाने 'बुद्ध' म्हटले जाते, हे दर्शवण्यासाठी हे म्हटले आहे. त्यानंतर, 'बुद्ध हे नाव आईने ठेवलेले नाही' इत्यादी विधानांद्वारे, हे नाव अर्थाला अनुसरून असलेली एक प्रज्ञप्ती (संज्ञा) आहे, हे समजण्यासाठी म्हटले आहे. अशा प्रकारे, सर्व पदांच्या संदर्भात 'बुद्ध' शब्दाचा सिद्ध होणारा परिपूर्ण अर्थ जाणावा। อยํ พฺยญฺชนโตปิ พุทฺธวิภาวนา. हे व्यंजनाच्या (शब्दाच्या व्युत्पत्तीच्या) दृष्टीनेही 'बुद्ध' शब्दाचे स्पष्टीकरण आहे। สรณคมนคมกวิภาวนา शरणगमन आणि शरण जाणाऱ्याचे स्पष्टीकरण อิทานิ สรณคมนาทีสุ หึสตีติ สรณํ, สรณคตานํ เตเนว สรณคมเนน ภยํ สนฺตาสํ ทุกฺขํ ทุคฺคตึ ปริกฺกิเลสํ หึสติ วิธมติ นีหรติ นิโรเธตีติ อตฺโถ. อถ วา หิเต ปวตฺตเนน อหิตา จ นิวตฺตเนน สตฺตานํ ภยํ หึสตีติ พุทฺโธ, ภวกนฺตารา อุตฺตรเณน อสฺสาสทาเนน จ ธมฺโม, อปฺปกานมฺปิ การานํ วิปุลผลปฏิลาภกรเณน สงฺโฆ. ตสฺมา อิมินาปิ ปริยาเยน ตํ รตนตฺตยํ สรณํ. ตปฺปสาทตคฺครุตาหิ วิหตวิทฺธํสิตกิเลโส ตปฺปรายณตาการปฺปวตฺโต อปรปฺปจฺจโย วา จิตฺตุปฺปาโท สรณคมนํ. ตํสมงฺคี สตฺโต ตํ สรณํ คจฺฉติ, วุตฺตปฺปกาเรน จิตฺตุปฺปาเทน ‘‘เอส เม สรณํ, เอส เม ปรายณ’’นฺติ เอวเมตํ อุเปตีติ อตฺโถ. อุเปนฺโต จ ‘‘เอเต มยํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ สรณํ คจฺฉาม, ธมฺมญฺจ, อุปาสเก โน ภควา ธาเรตู’’ติ ตปุสฺสภลฺลิกาทโย [Pg.7] วิย สมาทาเนน วา, ‘‘สตฺถา เม, ภนฺเต, ภควา, สาวโกหมสฺมี’’ติ (สํ. นิ. ๒.๑๕๔) มหากสฺสปาทโย วิย สิสฺสภาวูปคมเนน วา, ‘‘เอวํ วุตฺเต พฺรหฺมายุ พฺราหฺมโณ อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ อุตฺตราสงฺคํ กริตฺวา เยน ภควา เตนญฺชลึ ปณาเมตฺวา ติกฺขตฺตุํ อุทานํ อุทาเนสิ ‘นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. นโม ตสฺส…เป… สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’’ติ (ม. นิ. ๒.๓๘๘) พฺรหฺมายุอาทโย วิย ตปฺโปณตฺเตน วา, กมฺมฏฺฐานานุโยคิโน วิย อตฺตสนฺนิยฺยาตเนน วา, อริยปุคฺคลา วิย สรณคมนุปกฺกิเลสสมุจฺเฉเทน วาติ อเนกปฺปการํ วิสยโต กิจฺจโต จ อุเปติ. आता, 'शरणगमन' इत्यादी शब्दांमध्ये—'जे (दुःखाचा) नाश करते, ते शरण होय.' शरण गेलेल्यांना त्याच शरणगमनाने भय, संत्रास (घबराट), दुःख, दुर्गती आणि परिक्लेश नष्ट होतात, विध्वस्त होतात, दूर केले जातात आणि निरुद्ध केले जातात, असा अर्थ आहे. किंवा, प्राण्यांना हितामध्ये प्रवृत्त केल्याने आणि अहितापासून निवृत्त केल्याने जे प्राण्यांचे भय नष्ट करतात, म्हणून ते 'बुद्ध' होत. संसाररूपी अरण्यातून पार पाडल्याने आणि आश्वासन (दिलासा) दिल्यामुळे 'धम्म' (शरण आहे). अल्पशा सत्काराचेही विपुल फळात परिवर्तन करत असल्यामुळे 'संघ' (शरण आहे). म्हणून याही पर्यायाने ते रत्नत्रय 'शरण' आहे. त्या रत्नत्रयावरील प्रसन्नता (श्रद्धा) आणि आदर यामुळे ज्याचे क्लेश नष्ट आणि विध्वस्त झाले आहेत, त्या रत्नत्रयालाच परम आश्रय मानण्याच्या भावनेने प्रवृत्त झालेला आणि इतर कोणत्याही प्रत्ययावर अवलंबून नसलेला चित्तोत्पाद म्हणजे 'शरणगमन' होय. त्या चित्तोत्पादाने युक्त असलेला प्राणी त्या शरणाला जातो. वर सांगितलेल्या प्रकारच्या चित्तोत्पादाने 'हे माझे शरण आहे, हे माझे परायण (परम आश्रय) आहे' अशा प्रकारे या शरणाप्रत पोहोचतो, असा अर्थ आहे. आणि शरण जाणारा पुढील प्रकारे शरण जातो—'भंते, आम्ही भगवंतांना शरण जात आहोत आणि धम्मालाही शरण जात आहोत. भगवंतांनी आम्हाला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' असे तपुस्स आणि भल्लिक इत्यादींप्रमाणे शरण स्वीकारण्याद्वारे (समादानाने) असो; 'भंते, भगवंत माझे शास्ता आहेत, मी त्यांचा श्रावक आहे' असे महाकस्सप इत्यादींप्रमाणे शिष्यत्व पत्करण्याद्वारे असो; 'असे म्हटले असता, ब्रह्मायू ब्राह्मणाने आसनावरून उठून, एका खांद्यावर उत्तरासंग करून, ज्या दिशेला भगवंत होते त्या दिशेला हात जोडून तीन वेळा हा उद्गार काढला: त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला नमस्कार असो...' असे ब्रह्मायू इत्यादींप्रमाणे त्यांच्याप्रत नम्र होण्याद्वारे असो; कर्मठ्ठानी (ध्यान साधना करणाऱ्या) भिक्खूंप्रमाणे आत्म-समर्पण करण्याद्वारे असो; किंवा आर्य पुद्गलांप्रमाणे शरणगमनाच्या उपक्लेशांचा समूळ उच्छेद करण्याद्वारे असो; अशा अनेक प्रकारे विषयाच्या आणि कार्याच्या दृष्टीने तो शरणाप्रत पोहोचतो. อยํ สรณคมนสฺส คมกสฺส จ วิภาวนา. हे शरणगमन आणि शरण जाणाऱ्या व्यक्तीचे (गमकाचे) स्पष्टीकरण आहे. เภทาเภทผลทีปนา शरणगमनाचा भेद (भंग), अभेद आणि फळ यांचे स्पष्टीकरण อิทานิ ‘‘เภทาเภทํ ผลญฺจาปิ, คมนียญฺจ ทีปเย’’ติ วุตฺตานํ เภทาทีนํ อยํ ทีปนา, เอวํ สรณคตสฺส ปุคฺคลสฺส ทุวิโธ สรณคมนเภโท – สาวชฺโช จ อนวชฺโช จ. อนวชฺโช กาลกิริยาย, สาวชฺโช อญฺญสตฺถริ วุตฺตปฺปการปฺปวตฺติยา, ตสฺมิญฺจ วุตฺตปฺปการวิปรีตปฺปวตฺติยา. โส ทุวิโธปิ ปุถุชฺชนานเมว. พุทฺธคุเณสุ อญฺญาณสํสยมิจฺฉาญาณปฺปวตฺติยา อนาทราทิปฺปวตฺติยา จ เตสํ สรณํ สํกิลิฏฺฐํ โหติ. อริยปุคฺคลา ปน อภินฺนสรณา เจว อสํกิลิฏฺฐสรณา จ โหนฺติ. ยถาห ‘‘อฏฺฐานเมตํ, ภิกฺขเว, อนวกาโส, ยํ ทิฏฺฐิสมฺปนฺโน ปุคฺคโล อญฺญํ สตฺถารํ อุทฺทิเสยฺยา’’ติ (อ. นิ. ๑.๒๗๖; ม. นิ. ๓.๑๒๘; วิภ. ๘๐๙). ปุถุชฺชนา ตุ ยาวเทว สรณเภทํ น ปาปุณนฺติ, ตาวเทว อภินฺนสรณา. สาวชฺโชว เนสํ สรณเภโท, สํกิเลโส จ อนิฏฺฐผลโท โหติ. อนวชฺโช อวิปากตฺตา อผโล, อเภโท ปน ผลโต อิฏฺฐเมว ผลํ เทติ. आता, 'भेद, अभेद, फळ आणि शरण जाण्यायोग्य (गमनीय) यांचे स्पष्टीकरण करावे' या वचनानुसार भेद इत्यादींचे हे स्पष्टीकरण आहे. अशा प्रकारे, शरण गेलेल्या व्यक्तीच्या शरणगमनाचा भंग (भेद) दोन प्रकारचा असतो—सावद्य (दोषयुक्त) आणि अनवद्य (दोषरहित). अनवद्य भंग हा कालक्रिया (मृत्यू) झाल्याने होतो. सावद्य भंग हा इतर शास्त्यांच्या बाबतीत वर सांगितलेल्या प्रकारची प्रवृत्ती ठेवल्याने आणि त्या (रत्नत्रयांच्या) बाबतीत वर सांगितलेल्या प्रवृत्तीच्या विपरीत प्रवृत्ती ठेवल्याने होतो. हे दोन्ही प्रकारचे भंग केवळ पृथग्जनांचेच (सामान्य लोकांचेच) होतात. बुद्धगुणांविषयी अज्ञान, संशय, मिथ्याज्ञान आणि अनादर इत्यादी प्रवृत्तींमुळे त्यांचे शरणगमन संक्लिष्ट (मलीन) होते. परंतु, आर्य पुद्गल हे अभिन्नशरण (ज्यांचे शरणगमन कधीही भंग पावत नाही असे) आणि असंक्लिष्टशरण (ज्यांचे शरणगमन मलीन होत नाही असे) असतात. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे—'भिक्खूहो, हे अशक्य आहे, याला वाव नाही की दृष्टीसंपन्न (सोतापन्न) व्यक्तीने इतर कोणास आपले शास्ते म्हणून घोषित करावे.' परंतु पृथग्जन जोपर्यंत शरणभंगाप्रत पोहोचत नाहीत, तोपर्यंतच ते अभिन्नशरण असतात. त्यांचा शरणभंग हा सावद्यच असतो, आणि तो संक्लेशयुक्त व अनिष्ट फळ देणारा असतो. अनवद्य भंग हा विपाक (कर्मफळ) देणारा नसल्यामुळे निष्फळ असतो, परंतु अभेद (शरण न भंगणे) हा फळाच्या दृष्टीने इष्टच फळ देतो. ยถาห – जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे— ‘‘เยเกจิ [Pg.8] พุทฺธํ สรณํ คตาเส, น เต คมิสฺสนฺติ อปายภูมึ; ปหาย มานุสํ เทหํ, เทวกายํ ปริปูเรสฺสนฺตี’’ติ. (ที. นิ. ๒.๓๓๒; สํ. นิ. ๑.๓๗); 'जे कोणी बुद्धाला शरण गेले आहेत, ते अपायभूमीला (दुर्गतीला) जाणार नाहीत; मानवी देहाचा त्याग करून ते देवलोकाची शोभा वाढवतील (देवकाय परिपूर्ण करतील).' ตตฺร จ เย สรณคมนุปกฺกิเลสสมุจฺเฉเทน สรณํ คตา, เต อปายํ น คมิสฺสนฺติ. อิตเร ปน สรณคมเนน น คมิสฺสนฺตีติ เอวํ คาถาย อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ. आणि त्या गाथेमध्ये, जे शरणगमनाच्या उपक्लेशांचा समूळ उच्छेद करून शरण गेले आहेत, ते अपायभूमीला जाणार नाहीत. इतर लोक केवळ शरणगमनानेच (अपायभूमीला) जाणार नाहीत, असा या गाथेचा अभिप्राय समजून घ्यावा. อยํ ตาว เภทาเภทผลทีปนา. हे प्रथम भेद, अभेद आणि फळ यांचे स्पष्टीकरण झाले. คมนียทีปนา गमनीय (शरण जाण्यायोग्य) चे स्पष्टीकरण คมนียทีปนายํ โจทโก อาห – ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ เอตฺถ โย พุทฺธํ สรณํ คจฺฉติ, เอส พุทฺธํ วา คจฺเฉยฺย สรณํ วา, อุภยถาปิ จ เอกสฺส วจนํ นิรตฺถกํ. กสฺมา? คมนกิริยาย กมฺมทฺวยาภาวโต. น เหตฺถ ‘‘อชํ คามํ เนตี’’ติอาทีสุ วิย ทฺวิกมฺมกตฺตํ อกฺขรจินฺตกา อิจฺฉนฺติ. गमनीयाच्या स्पष्टीकरणात आक्षेप घेणारा (चोदक) म्हणतो—'बुद्धं सरणं गच्छामि' (मी बुद्धाला शरण जातो) यामध्ये जो बुद्धाला शरण जातो, तो एकतर बुद्धाप्रत जाईल किंवा शरणाप्रत जाईल; दोन्ही प्रकारे एकाच क्रियेचे वचन निरर्थक ठरते. कशामुळे? कारण गमनक्रियेमध्ये दोन कर्मे असण्याचा अभाव आहे. व्याकरणकार येथे 'शेळीला गावात नेतो' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे द्विकर्मकत्व स्वीकारत नाहीत. ‘‘คจฺฉเตว ปุพฺพํ ทิสํ, คจฺฉติ ปจฺฉิมํ ทิส’’นฺติอาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๑๕๙; ๓.๘๗) วิย สาตฺถกเมวาติ เจ? น, พุทฺธสรณานํ สมานาธิกรณภาวสฺสานธิปฺเปตโต. เอเตสญฺหิ สมานาธิกรณภาเว อธิปฺเปเต ปฏิหตจิตฺโตปิ พุทฺธํ อุปสงฺกมนฺโต พุทฺธํ สรณํ คโต สิยา. ยญฺหิ ตํ พุทฺโธติ วิเสสิตํ สรณํ, ตเมเวส คโตติ. ‘‘เอตํ โข สรณํ เขมํ, เอตํ สรณมุตฺตม’’นฺติ (ธ. ป. ๑๙๒) วจนโต สมานาธิกรณตฺตเมวาติ เจ? น, ตตฺเถว ตพฺภาวโต. ตตฺเถว หิ คาถาปเท เอตํ พุทฺธาทิรตนตฺตยํ สรณคตานํ ภยหรณตฺตสงฺขาเต สรณภาเว อพฺยภิจรณโต ‘‘เขมมุตฺตมญฺจ สรณ’’นฺติ อยํ สมานาธิกรณภาโว อธิปฺเปโต, อญฺญตฺถ ตุ คมิสมฺพนฺเธ สติ สรณคมนสฺส อปฺปสิทฺธิโต อนธิปฺเปโตติ อสาธกเมตํ. ‘‘เอตํ [Pg.9] สรณมาคมฺม, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ เอตฺถ คมิสมฺพนฺเธปิ สรณคมนปสิทฺธิโต สมานาธิกรณตฺตเมวาติ เจ? น ปุพฺเพ วุตฺตโทสปฺปสงฺคโต. ตตฺราปิ หิ สมานาธิกรณภาเว สติ เอตํ พุทฺธธมฺมสงฺฆสรณํ ปฏิหตจิตฺโตปิ อาคมฺม สพฺพทุกฺขา ปมุจฺเจยฺยาติ เอวํ ปุพฺเพ วุตฺตโทสปฺปสงฺโค เอว สิยา, น จ โน โทเสน อตฺถิ อตฺโถติ อสาธกเมตํ. ยถา ‘‘มมญฺหิ, อานนฺท, กลฺยาณมิตฺตํ อาคมฺม ชาติธมฺมา สตฺตา ชาติยา ปริมุจฺจนฺตี’’ติ (สํ. นิ. ๑.๑๒๙) เอตฺถ ภควโต กลฺยาณมิตฺตสฺส อานุภาเวน ปริมุจฺจมานา สตฺตา ‘‘กลฺยาณมิตฺตํ อาคมฺม ปริมุจฺจนฺตี’’ติ วุตฺตา. เอวมิธาปิ พุทฺธธมฺมสงฺฆสฺส สรณสฺสานุภาเวน มุจฺจมาโน ‘‘เอตํ สรณมาคมฺม, สพฺพทุกฺขา ปมุจฺจตี’’ติ วุตฺโตติ เอวเมตฺถ อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ. 'जसे पूर्व दिशेला जातो, पश्चिम दिशेला जातो' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे हे सार्थच आहे, असे म्हटले तर? नाही, कारण बुद्ध आणि शरण या शब्दांचे समानाधिकरणत्व (एकाच अर्थाचे वाचक असणे) येथे अभिप्रेत नाही. जर त्यांचे समानाधिकरणत्व अभिप्रेत मानले, तर बुद्धाविषयी द्वेषयुक्त चित्त असलेला मनुष्यही बुद्धाकडे जात असताना 'बुद्धाला शरण गेला' असे होईल. कारण जे 'बुद्ध' या विशेषणाने युक्त शरण आहे, तिथेच तो गेला आहे. 'हेच शरण क्षेमकारक आहे, हेच शरण उत्तम आहे' या वचनानुसार समानाधिकरणत्वच योग्य आहे, असे म्हटले तर? नाही, कारण केवळ त्याच गाथेत तशी स्थिती आहे. कारण त्याच गाथेच्या चरणात, शरण गेलेल्यांना भय हरण करणारे म्हणून बुद्ध इत्यादी रत्नत्रयांचे शरण असणे हे निश्चित असल्याने 'क्षेमकारक आणि उत्तम शरण' असा हा समानाधिकरण भाव अभिप्रेत आहे. परंतु इतर ठिकाणी गमु धातूशी संबंध असताना शरणगमनाची सिद्धी होत नसल्याने ते अभिप्रेत नाही, म्हणून हे सिद्ध होत नाही. 'या शरणाचा आश्रय घेऊन सर्व दुःखांतून मुक्त होतो' यामध्ये गमु धातूचा संबंध असतानाही शरणगमनाची सिद्धी होत असल्याने समानाधिकरणत्वच योग्य आहे, असे म्हटले तर? नाही, कारण पूर्वी सांगितलेला दोष उद्भवेल. कारण तिथेही समानाधिकरण भाव मानल्यास, बुद्धाविषयी द्वेषयुक्त चित्त असलेला मनुष्यही या बुद्ध-धम्म-संघ रूपी शरणाचा आश्रय घेऊन सर्व दुःखांतून मुक्त होईल, असा पूर्वी सांगितलेला दोषच उद्भवेल. आणि आम्हाला दोषाशी काही देणेघेणे नाही, म्हणून हे सिद्ध होत नाही. जसे की—'आनंदा, माझ्यासारख्या कल्याणमित्राचा आश्रय घेऊन जन्म घेण्याच्या स्वभावाचे प्राणी जन्मापासून मुक्त होतात' येथे भगवंतांच्या (कल्याणमित्राच्या) प्रभावाने मुक्त होणारे प्राणी 'कल्याणमित्राचा आश्रय घेऊन मुक्त होतात' असे म्हटले आहे. त्याचप्रमाणे येथेही बुद्ध, धम्म आणि संघ रूपी शरणाच्या प्रभावाने मुक्त होणाऱ्या प्राण्याला उद्देशून 'या शरणाचा आश्रय घेऊन सर्व दुःखांतून मुक्त होतो' असे म्हटले आहे, असा येथे अभिप्राय समजून घ्यावा. เอวํ สพฺพถาปิ น พุทฺธสฺส คมนียตฺตํ ยุชฺชติ, น สรณสฺส, น อุภเยสํ, อิจฺฉิตพฺพญฺจ คจฺฉามีติ นิทฺทิฏฺฐสฺส คมกสฺส คมนียํ, ตโต วตฺตพฺพา เอตฺถ ยุตฺตีติ. วุจฺจเต – अशा प्रकारे सर्वथा बुद्धाचे गमनीयत्व (शरण जाण्यायोग्य असणे) योग्य ठरत नाही, शरणाचेही नाही आणि दोघांचेही नाही. परंतु 'गच्छामि' (मी जातो) असे म्हणणाऱ्या कर्त्याचे जे गमनीय (ध्येय) आहे, ते स्वीकारणे आवश्यक आहे, म्हणून याविषयी योग्य युक्ती सांगितली पाहिजे. ती सांगितली जात आहे— พุทฺโธเยเวตฺถ คมนีโย, คมนาการทสฺสนตฺถํ ตุ ตํ สรณวจนํ, พุทฺธํ สรณนฺติ คจฺฉามิ. เอส เม สรณํ, เอส เม ปรายณํ, อฆสฺส, ตาตา, หิตสฺส จ วิธาตาติ อิมินา อธิปฺปาเยน เอตํ คจฺฉามิ ภชามิ เสวามิ ปยิรุปาสามิ, เอวํ วา ชานามิ พุชฺฌามีติ. เยสญฺหิ ธาตูนํ คติอตฺโถ พุทฺธิปิ เตสํ อตฺโถติ. อิติ-สทฺทสฺส อปฺปโยคา อยุตฺตมิติ เจ? ตํ น. ตตฺถ สิยา – ยทิ เจตฺถ เอวมตฺโถ ภเวยฺย, ตโต ‘‘อนิจฺจํ รูปํ อนิจฺจํ รูปนฺติ ยถาภูตํ ปชานาตี’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๓.๕๕, ๘๕) วิย อิติ-สทฺโท ปยุตฺโต สิยา, น จ ปยุตฺโต, ตสฺมา อยุตฺตเมตนฺติ. ตญฺจ น, กสฺมา? ตทตฺถสมฺภวา. ‘‘โย จ พุทฺธญฺจ ธมฺมญฺจ สงฺฆญฺจ สรณํ คโต’’ติ เอวมาทีสุ (ธ. ป. ๑๙๐) วิย อิธาปิ อิติ-สทฺทสฺส อตฺโถ สมฺภวติ, น จ วิชฺชมานตฺถสมฺภวา อิติ-สทฺทา สพฺพตฺถ ปยุชฺชนฺติ, อปฺปยุตฺตสฺสาเปตฺถ ปยุตฺตสฺส วิย อิติ-สทฺทสฺส อตฺโถ วิญฺญาตพฺโพ อญฺเญสุ จ เอวํชาติเกสุ, ตสฺมา อโทโส เอว โสติ. ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ตีหิ สรณคมเนหิ ปพฺพชฺช’’นฺติอาทีสุ (มหาว. ๓๔) สรณสฺเสว คมนียโต ยํ วุตฺตํ ‘‘คมนาการทสฺสนตฺถํ ตุ สรณวจน’’นฺติ, ตํ น ยุตฺตมิติ เจ. ตํ [Pg.10] นายุตฺตํ. กสฺมา? ตทตฺถสมฺภวา เอว. ตตฺราปิ หิ ตสฺส อตฺโถ สมฺภวติ, ยโต ปุพฺพสทิสเมว อปฺปยุตฺโตปิ ปยุตฺโต วิย เวทิตพฺโพ. อิตรถา หิ ปุพฺเพ วุตฺตโทสปฺปสงฺโค เอว สิยา, ตสฺมา ยถานุสิฏฺฐเมว คเหตพฺพํ. या (बुद्धं सरणं गच्छामि या) वाक्यात भगवान बुद्धच शरण जाण्यायोग्य (आश्रय घेण्यायोग्य) म्हटले जातात. परंतु शरण जाण्याचा प्रकार दर्शवण्यासाठी 'शरण' हा शब्द वापरला आहे. 'मी बुद्धाला शरण जातो' याचा अर्थ असा की, 'हेच माझे शरण आहेत, हेच माझे परम आश्रय आहेत, ते दुःखाचा नाश करणारे आणि कल्याणाचे विधान करणारे आहेत' या अभिप्रायाने मी त्यांना शरण जातो, भजतो, सेवा करतो, त्यांची उपासना करतो किंवा अशा प्रकारे मी त्यांना जाणतो, समजतो. कारण ज्या धातूंचा अर्थ 'गती' (जाणे) असा आहे, त्यांचा अर्थ 'बुद्धी' (जाणणे) असाही होतो. जर कोणी असे म्हटले की, 'इति' (iti) या शब्दाचा प्रयोग न केल्यामुळे हे अयोग्य आहे? तर ते तसे नाही. त्यावर आक्षेप घेणारा असे म्हणू शकतो – जर येथे असा अर्थ असेल, तर 'अनित्य रूप हे अनित्य रूप आहे, असे यथाभूत जाणतो' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे येथेही 'इति' शब्दाचा प्रयोग व्हायला हवा होता, परंतु तो केलेला नाही; म्हणून हे अयोग्य आहे. परंतु ते अयोग्य नाही. का? कारण त्याचा अर्थ येथे संभवतो. 'जो बुद्ध, धम्म आणि संघाला शरण गेला आहे' इत्यादी गाथांप्रमाणे येथेही 'इति' शब्दाचा अर्थ संभवतो. आणि अर्थ संभवत असला तरी सर्वच ठिकाणी 'इति' शब्दाचा प्रत्यक्ष प्रयोग केला जात नाही. येथे 'इति' शब्दाचा प्रयोग केलेला नसला तरी, तो केल्यासारखाच त्याचा अर्थ समजला पाहिजे. इतरही अशाच प्रकारच्या वाक्यांमध्ये हे लागू होते, म्हणून यात कोणताही दोष नाही. 'भिक्खूंनो, मी तीन शरणागमनांद्वारे प्रव्रज्येची अनुमती देतो' इत्यादी सूत्रांमध्ये केवळ शरणाचेच गमन (शरण जाणे) होत असल्यामुळे, 'शरण जाण्याचा प्रकार दर्शवण्यासाठी शरण हा शब्द वापरला आहे' असे जे म्हटले आहे, ते अयोग्य आहे असे जर कोणी म्हटले, तर ते अयोग्य नाही. का? कारण त्याचा अर्थ तेथेही संभवतोच. कारण तेथेही त्याचा अर्थ संभवतो, त्यामुळे पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच 'इति' शब्दाचा प्रयोग केलेला नसला तरी तो केल्यासारखाच समजला पाहिजे. अन्यथा, पूर्वी सांगितलेला दोष निर्माण होईल. म्हणून जसा उपदेश (निर्णय) केला आहे, तसाच तो स्वीकारला पाहिजे. อยํ คมนียทีปนา. हे 'गमनीय' (शरण जाण्यायोग्य) या शब्दाचे स्पष्टीकरण आहे. ธมฺมสงฺฆสรณวิภาวนา धम्म आणि संघ या शरणांचे स्पष्टीकरण อิทานิ ยํ วุตฺตํ ‘‘ธมฺมํ สรณมิจฺจาทิ, ทฺวเยเปส นโย มโต’’ติ เอตฺถ วุจฺจเต – ยฺวายํ ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ เอตฺถ อตฺถวณฺณนานโย วุตฺโต, ‘‘ธมฺมํ สรณํ คจฺฉามิ, สงฺฆํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ เอตสฺมิมฺปิ ปททฺวเย เอโสว เวทิตพฺโพ. ตตฺราปิ หิ ธมฺมสงฺฆานํ อตฺถโต พฺยญฺชนโต จ วิภาวนมตฺตเมว อสทิสํ, เสสํ วุตฺตสทิสเมว. ยโต ยเทเวตฺถ อสทิสํ, ตํ วุจฺจเต – มคฺคผลนิพฺพานานิ ธมฺโมติ เอเก. ภาวิตมคฺคานํ สจฺฉิกตนิพฺพานานญฺจ อปาเยสุ อปตนภาเวน ธารณโต ปรมสฺสาสวิธานโต จ มคฺควิราคา เอว อิมสฺมึ อตฺเถ ธมฺโมติ อมฺหากํ ขนฺติ, อคฺคปฺปสาทสุตฺตญฺเจว สาธกํ. วุตฺตญฺเจตฺถ ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา สงฺขตา, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติ เอวมาทิ (อ. นิ. ๔.๓๔; อิติวุ. ๙๐). आता, 'धम्मं सरणं... इत्यादी दोन्हीमध्ये हाच नियम मानला आहे' असे जे म्हटले आहे, त्याविषयी सांगतो – 'बुद्धं सरणं गच्छामि' यामध्ये अर्थ स्पष्ट करण्याची जी पद्धत सांगितली आहे, तीच पद्धत 'धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि' या दोन्ही पदांच्या बाबतीतही समजली पाहिजे. कारण तेथेही धम्म आणि संघ यांचे अर्थ व व्यंजनांच्या (शब्दांच्या) दृष्टीने केवळ स्पष्टीकरणच वेगळे आहे, उर्वरित सर्व पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. त्यामुळे येथे जे काही वेगळे आहे, ते सांगितले जात आहे – काही आचार्यांच्या मते, मार्ग, फल आणि निर्वाण म्हणजे 'धम्म' होय. ज्यांनी मार्गाची साधना केली आहे आणि निर्वाणाचा साक्षात्कार केला आहे, त्यांना अपाय (दुर्गती) मध्ये पडण्यापासून वाचवून धारण करत असल्यामुळे आणि परम शांती प्रदान करत असल्यामुळे, या अर्थाने 'मार्ग आणि विराग' (रागविरहित अवस्था) हाच धम्म आहे, हे आमचे मत आहे; आणि 'अग्गप्पसाद सुत्त' हेच याचे प्रमाण आहे. याविषयी असे म्हटले आहे – 'भिक्खूंनो, जेवढे काही संस्कृत (उत्पन्न झालेले) धम्म आहेत, त्या सर्वांमध्ये आर्य अष्टांगिक मार्ग हा सर्वश्रेष्ठ सांगितला आहे' इत्यादी. จตุพฺพิธอริยมคฺคสมงฺคีนํ จตุสามญฺญผลสมธิวาสิตขนฺธสนฺตานานญฺจ ปุคฺคลานํ สมูโห ทิฏฺฐิสีลสงฺฆาเตน สํหตตฺตา สงฺโฆ. วุตฺตญฺเจตํ ภควตา – चार प्रकारच्या आर्य मार्गांनी युक्त असलेल्या आणि चार प्रकारच्या श्रामण्यफलांच्या समाधीने सुवासित चित्तसंतती असलेल्या पुद्गलांचा (व्यक्तींचा) समूह, जो सम्यक दृष्टी आणि शील यांच्या ऐक्याने संघटित झालेला आहे, त्याला 'संघ' म्हणतात. भगवंतांनी याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘ตํ กึ มญฺญสิ, อานนฺท, เย โว มยา ธมฺมา อภิญฺญา เทสิตา, เสยฺยถิทํ, จตฺตาโร สติปฏฺฐานา, จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา, จตฺตาโร อิทฺธิปาทา, ปญฺจินฺทฺริยานิ, ปญฺจ พลานิ, สตฺต โพชฺฌงฺคา, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, ปสฺสสิ โน ตฺวํ, อานนฺท, อิเมสุ ธมฺเมสุ ทฺเวปิ ภิกฺขู นานาวาเท’’ติ (ม. นิ. ๓.๔๓). “आनंदा, तुला काय वाटते? मी तुम्हाला जे धम्म विशेष ज्ञानाने (अभिज्ञेने) उपदेशिले आहेत, जसे की – चार स्मृतिप्रस्थान, चार सम्यक प्रधान, चार ऋद्धिपाद, पाच इंद्रिये, पाच बले, सात बोध्यंग आणि आर्य अष्टांगिक मार्ग; हे आनंदा, या धम्मांच्या बाबतीत दोन भिक्खूंमध्येही काही मतभेद असल्याचे तुला दिसते का?” อยญฺหิ ปรมตฺถสงฺโฆ สรณนฺติ คมนีโย. สุตฺเต จ ‘‘อาหุเนยฺโย ปาหุเนยฺโย ทกฺขิเณยฺโย อญฺชลิกรณีโย อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺสา’’ติ [Pg.11] (อิติวุ. ๙๐; อ. นิ. ๔.๓๔, ๑๘๑) วุตฺโต. เอตํ ปน สรณํ คตสฺส อญฺญสฺมิมฺปิ ภิกฺขุสงฺเฆ วา ภิกฺขุนิสงฺเฆ วา พุทฺธปฺปมุเข วา สงฺเฆ สมฺมุติสงฺเฆ วา จตุวคฺคาทิเภเท เอกปุคฺคเลปิ วา ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส ปพฺพชิเต วนฺทนาทิกิริยาย สรณคมนํ เนว ภิชฺชติ น สํกิลิสฺสติ, อยเมตฺถ วิเสโส. วุตฺตาวเสสนฺตุ อิมสฺส ทุติยสฺส จ สรณคมนสฺส เภทาเภทาทิวิธานํ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. อยํ ตาว ‘‘ธมฺมํ สรณมิจฺจาทิ, ทฺวเยเปส นโย มโต’’ติ เอตสฺส วณฺณนา. कारण हा 'परमार्थ संघ'च शरण जाण्यायोग्य आहे. आणि सूत्रांमध्ये 'तो आहुनेय, पाहुनेय, दक्खिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगाचे सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे' असे म्हटले आहे. परंतु या संघाला शरण गेलेल्या व्यक्तीचे, इतर भिक्खू संघात किंवा भिक्खुणी संघात, बुद्धांच्या प्रमुखतेखालील संघात किंवा संमुती संघात (पारंपारिक संघात), चार भिक्खूंच्या समूहादी भेदांमध्ये किंवा भगवंतांच्या उद्देशाने प्रव्रजित झालेल्या एका पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) ठिकाणी वंदनादी क्रिया केल्याने शरणागमन खंडित होत नाही आणि मलीनही होत नाही; हा यातील विशेष फरक आहे. उर्वरित सर्व गोष्टी आणि या दुसऱ्या शरणागमनाचे खंडित होणे किंवा न होणे इत्यादींचे नियम पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावेत. हे 'धम्मं सरणं... इत्यादी दोन्हीमध्ये हाच नियम मानला आहे' याचे स्पष्टीकरण आहे. อนุปุพฺพววตฺถานการณนิทฺเทโส अनुक्रम निश्चितीच्या कारणांचे स्पष्टीकरण อิทานิ อนุปุพฺพววตฺถาเน, การณญฺจ วินิทฺทิเสติ เอตฺถ เอเตสุ จ ตีสุ สรณวจเนสุ สพฺพสตฺตานํ อคฺโคติ กตฺวา ปฐมํ พุทฺโธ, ตปฺปภวโต ตทุปเทสิตโต จ อนนฺตรํ ธมฺโม, ตสฺส ธมฺมสฺส อาธารกโต ตทาเสวนโต จ อนฺเต สงฺโฆ. สพฺพสตฺตานํ วา หิเต นิโยชโกติ กตฺวา ปฐมํ พุทฺโธ, ตปฺปภวโต สพฺพสตฺตหิตตฺตา อนนฺตรํ ธมฺโม, หิตาธิคมาย ปฏิปนฺโน อธิคตหิโต จาติ กตฺวา อนฺเต สงฺโฆ สรณภาเวน ววตฺถเปตฺวา ปกาสิโตติ เอวํ อนุปุพฺพววตฺถาเน การณญฺจ วินิทฺทิเส. आता, 'अनुक्रमाने निश्चित करणे आणि त्याचे कारण स्पष्ट करणे' याविषयी सांगतो – या तिन्ही शरण-वचनांमध्ये, सर्व प्राण्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ असल्यामुळे सर्वप्रथम 'बुद्ध' सांगितले आहेत; त्यांच्यापासूनच उत्पन्न झाल्यामुळे आणि त्यांनीच उपदेशिल्यामुळे त्यानंतर 'धम्म' सांगितला आहे; आणि त्या धम्माचे आधार असल्यामुळे व त्याचे वारंवार सेवन (आचरण) करत असल्यामुळे शेवटी 'संघ' सांगितला आहे. किंवा सर्व प्राण्यांना कल्याणाच्या मार्गावर लावणारे असल्यामुळे सर्वप्रथम 'बुद्ध' सांगितले आहेत; त्यांच्यापासूनच उत्पन्न झाल्यामुळे आणि सर्व प्राण्यांच्या कल्याणासाठी असल्यामुळे त्यानंतर 'धम्म' सांगितला आहे; आणि कल्याणाच्या प्राप्तीसाठी प्रयत्नशील असलेले आणि कल्याण प्राप्त केलेले असल्यामुळे शेवटी 'संघ' हा शरण म्हणून निश्चित करून प्रकाशित केला आहे. अशा प्रकारे अनुक्रमाने निश्चित करण्याचे कारण स्पष्ट करावे. อุปมาปกาสนา उपमांचे प्रकटीकरण อิทานิ ยมฺปิ วุตฺตํ ‘‘สรณตฺตยเมตญฺจ, อุปมาหิ ปกาสเย’’ติ, ตมฺปิ วุจฺจเต – เอตฺถ ปน ปุณฺณจนฺโท วิย พุทฺโธ, จนฺทกิรณนิกโร วิย เตน เทสิโต ธมฺโม, ปุณฺณจนฺทกิรณสมุปฺปาทิตปีณิโต โลโก วิย สงฺโฆ. พาลสูริโย วิย พุทฺโธ, ตสฺส รสฺมิชาลมิว วุตฺตปฺปกาโร ธมฺโม, เตน วิหตนฺธกาโร โลโก วิย สงฺโฆ. วนทาหกปุริโส วิย พุทฺโธ, วนทหนคฺคิ วิย กิเลสวนทหโน ธมฺโม, ทฑฺฒวนตฺตา เขตฺตภูโต วิย ภูมิภาโค ทฑฺฒกิเลสตฺตา ปุญฺญกฺเขตฺตภูโต สงฺโฆ. มหาเมโฆ วิย พุทฺโธ, สลิลวุฏฺฐิ วิย ธมฺโม, วุฏฺฐินิปาตูปสมิตเรณุ วิย ชนปโท อุปสมิตกิเลสเรณุ สงฺโฆ. สุสารถิ [Pg.12] วิย พุทฺโธ, อสฺสาชานียวินยูปาโย วิย ธมฺโม, สุวินีตสฺสาชานียสมูโห วิย สงฺโฆ. สพฺพทิฏฺฐิสลฺลุทฺธรณโต สลฺลกตฺโต วิย พุทฺโธ, สลฺลุทฺธรณูปาโย วิย ธมฺโม, สมุทฺธฏสลฺโล วิย ชโน สมุทฺธฏทิฏฺฐิสลฺโล สงฺโฆ. โมหปฏลสมุปฺปาฏนโต วา สาลากิโย วิย พุทฺโธ, ปฏลสมุปฺปาฏนุปาโย วิย ธมฺโม, สมุปฺปาฏิตปฏโล วิปฺปสนฺนโลจโน วิย ชโน สมุปฺปาฏิตโมหปฏโล วิปฺปสนฺนญาณโลจโน สงฺโฆ. สานุสยกิเลสพฺยาธิหรณสมตฺถตาย วา กุสโล เวชฺโช วิย พุทฺโธ, สมฺมา ปยุตฺตเภสชฺชมิว ธมฺโม, เภสชฺชปโยเคน สมุปสนฺตพฺยาธิ วิย ชนสมุทาโย สมุปสนฺตกิเลสพฺยาธานุสโย สงฺโฆ. आता, जे म्हटले गेले आहे की 'या त्रिरत्नाला उपमांद्वारे प्रकाशित करावे', ते देखील सांगितले जात आहे - येथे पूर्ण चंद्राप्रमाणे बुद्ध आहेत, चंद्रकिरणांच्या समूहाप्रमाणे त्यांनी उपदेशिलेला धम्म आहे, आणि पूर्ण चंद्रकिरणांमुळे उत्पन्न झालेल्या आनंदाने तृप्त झालेल्या लोकांप्रमाणे संघ आहे. बालसूर्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, त्याच्या किरणजालाप्रमाणे पूर्वोक्त धम्म आहे, आणि त्याच्यामुळे अंधकार नष्ट झालेल्या लोकांप्रमाणे संघ आहे. वणवा पेटवणाऱ्या माणसाप्रमाणे बुद्ध आहेत, वणव्याच्या अग्नीप्रमाणे क्लेशांच्या वनाला जाळणारा धम्म आहे, आणि वणवा जळाल्यामुळे शेतजमीन बनलेल्या भूभागाप्रमाणे, क्लेश जळून गेल्यामुळे पुण्यक्षेत्र बनलेला संघ आहे. महामेघाप्रमाणे बुद्ध आहेत, पावसाच्या धारेप्रमाणे धम्म आहे, आणि पावसाच्या वर्षावाने ज्याची धूळ शांत झाली आहे अशा जनपदाप्रमाणे, क्लेशांची धूळ शांत झालेला संघ आहे. उत्कृष्ट सारथ्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, उत्तम घोड्यांना (आजानेय घोड्यांना) वश करण्याच्या उपायाप्रमाणे धम्म आहे, आणि चांगल्या प्रकारे प्रशिक्षित केलेल्या उत्तम घोड्यांच्या समूहाप्रमाणे संघ आहे. सर्व मिथ्या दृष्टीरूपी शल्य उपटून काढणारे असल्यामुळे शल्यचिकित्सकाप्रमाणे बुद्ध आहेत, शल्य उपटून काढण्याच्या उपायाप्रमाणे धम्म आहे, आणि ज्याचे शल्य उपटून काढले आहे अशा माणसाप्रमाणे, दृष्टीरूपी शल्य उपटून काढलेला संघ आहे. किंवा, मोहरूपी पडदा दूर करणाऱ्या नेत्रवैद्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, पडदा दूर करण्याच्या उपायाप्रमाणे धम्म आहे, आणि ज्याचा पडदा दूर झाला आहे व डोळे स्वच्छ झाले आहेत अशा माणसाप्रमाणे, मोहरूपी पडदा दूर झालेला व ज्ञानरूपी नेत्र स्वच्छ झालेला संघ आहे. किंवा, अनुसयांसह क्लेशांच्या रोगाचे निवारण करण्यास समर्थ असल्यामुळे कुशल वैद्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, योग्य प्रकारे योजलेल्या औषधाप्रमाणे धम्म आहे, आणि औषधाच्या उपयोगाने ज्यांचा रोग पूर्णपणे शांत झाला आहे अशा लोकांच्या समूहाप्रमाणे, क्लेशांचे रोग व अनुसय पूर्णपणे शांत झालेला संघ आहे. อถ วา สุเทสโก วิย พุทฺโธ, สุมคฺโค วิย เขมนฺตภูมิ วิย จ ธมฺโม, มคฺคปฺปฏิปนฺโน เขมนฺตภูมิปฺปตฺโต วิย สงฺโฆ. สุนาวิโก วิย พุทฺโธ, นาวา วิย ธมฺโม, ปารปฺปตฺโต สมฺปตฺติโก วิย ชโน สงฺโฆ. หิมวา วิย พุทฺโธ, ตปฺปภโวสธมิว ธมฺโม, โอสธูปโภเคน นิรามโย วิย ชโน สงฺโฆ. ธนโท วิย พุทฺโธ, ธนํ วิย ธมฺโม, ยถาธิปฺปายํ ลทฺธธโน วิย ชโน สมฺมาลทฺธอริยธโน สงฺโฆ. นิธิทสฺสนโก วิย พุทฺโธ, นิธิ วิย ธมฺโม, นิธิปฺปตฺโต วิย ชโน สงฺโฆ. किंवा, चांगल्या मार्गदर्शकाप्रमाणे बुद्ध आहेत, चांगल्या मार्गाप्रमाणे आणि सुरक्षित भूमीप्रमाणे धम्म आहे, आणि मार्गावर चालून सुरक्षित भूमीवर पोहोचलेल्या प्रवाशाप्रमाणे संघ आहे. उत्कृष्ट नावाड्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, नौकेप्रमाणे धम्म आहे, आणि पलीकडच्या तीरावर पोहोचून कल्याण प्राप्त झालेल्या माणसाप्रमाणे संघ आहे. हिमालय पर्वताप्रमाणे बुद्ध आहेत, त्या पर्वतापासून उत्पन्न झालेल्या औषधाप्रमाणे धम्म आहे, आणि औषधाच्या सेवनाने निरोगी झालेल्या माणसाप्रमाणे संघ आहे. धन देणाऱ्या दात्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, धनाप्रमाणे धम्म आहे, आणि इच्छेनुसार धन प्राप्त झालेल्या माणसाप्रमाणे, योग्य प्रकारे आर्यधन प्राप्त केलेला संघ आहे. गुप्त धन दाखवणाऱ्या माणसाप्रमाणे बुद्ध आहेत, गुप्त धनाप्रमाणे धम्म आहे, आणि गुप्त धन प्राप्त झालेल्या माणसाप्रमाणे संघ आहे. อปิจ อภยโท วิย วีรปุริโส พุทฺโธ, อภยมิว ธมฺโม, สมฺปตฺตาภโย วิย ชโน อจฺจนฺตสพฺพภโย สงฺโฆ. อสฺสาสโก วิย พุทฺโธ, อสฺสาโส วิย ธมฺโม, อสฺสตฺถชโน วิย สงฺโฆ. สุมิตฺโต วิย พุทฺโธ, หิตูปเทโส วิย ธมฺโม, หิตูปโยเคน ปตฺตสทตฺโถ วิย ชโน สงฺโฆ. ธนากโร วิย พุทฺโธ, ธนสาโร วิย ธมฺโม, ธนสารูปโภโค วิย ชโน สงฺโฆ. ราชกุมารนฺหาปโก วิย พุทฺโธ, สีสนฺหานสลิลํ วิย ธมฺโม, สุนฺหาตราชกุมารวคฺโค วิย สทฺธมฺมสลิลสุนฺหาโต สงฺโฆ. อลงฺการการโก วิย พุทฺโธ, อลงฺกาโร วิย ธมฺโม, อลงฺกตราชปุตฺตคโณ วิย สทฺธมฺมาลงฺกโต สงฺโฆ. จนฺทนรุกฺโข วิย พุทฺโธ, ตปฺปภวคนฺโธ วิย ธมฺโม, จนฺทนุปโภเคน สนฺตปริฬาโห วิย ชโน สทฺธมฺมูปโภเคน สนฺตปริฬาโห สงฺโฆ. ทายชฺชสมฺปทานโก วิย ปิตา พุทฺโธ, ทายชฺชํ วิย ธมฺโม, ทายชฺชหโร ปุตฺตวคฺโค วิย สทฺธมฺมทายชฺชหโร สงฺโฆ. วิกสิตปทุมํ [Pg.13] วิย พุทฺโธ, ตปฺปภวมธุ วิย ธมฺโม, ตทุปโภคีภมรคโณ วิย สงฺโฆ. เอวํ สรณตฺตยเมตญฺจ, อุปมาหิ ปกาสเย. शिवाय, अभय देणाऱ्या वीर पुरुषाप्रमाणे बुद्ध आहेत, अभयाप्रमाणे धम्म आहे, आणि अभय प्राप्त होऊन शांत झालेल्या माणसाप्रमाणे, अत्यंत सुरक्षित (सर्व भयापासून मुक्त) झालेला संघ आहे. आश्वासन देणाऱ्या माणसाप्रमाणे बुद्ध आहेत, आश्वासनाप्रमाणे धम्म आहे, आणि दिलासा मिळालेल्या लोकांप्रमाणे संघ आहे. सच्च्या मित्राप्रमाणे बुद्ध आहेत, हितेच्छू उपदेशाप्रमाणे धम्म आहे, आणि हिताच्या आचरणाने आपले कल्याण साधलेल्या लोकांप्रमाणे संघ आहे. धनाच्या खाणीप्रमाणे बुद्ध आहेत, धनाच्या साराप्रमाणे धम्म आहे, आणि धनाच्या साराचा उपभोग घेणाऱ्या माणसाप्रमाणे संघ आहे. राजकुमारला स्नान घालणाऱ्या सेवकाप्रमाणे बुद्ध आहेत, डोके धुण्याच्या पाण्याप्रमाणे धम्म आहे, आणि चांगल्या प्रकारे स्नान केलेल्या राजकुमारांच्या समूहाप्रमाणे, सद्धम्मरूपी पाण्याने स्नान केलेला संघ आहे. अलंकार घालणाऱ्या कारागिराप्रमाणे बुद्ध आहेत, अलंकाराप्रमाणे धम्म आहे, आणि अलंकारांनी नटलेल्या राजपुत्रांच्या समूहाप्रमाणे, सद्धम्मरूपी अलंकारांनी विभूषित झालेला संघ आहे. चंदनाच्या वृक्षाप्रमाणे बुद्ध आहेत, त्यापासून उत्पन्न होणाऱ्या सुवासाप्रमाणे धम्म आहे, आणि चंदनाच्या वापराने ज्यांचा दाह शांत झाला आहे अशा लोकांप्रमाणे, सद्धम्माच्या सेवनाने क्लेशांचा दाह शांत झालेला संघ आहे. धम्मरूपी वारसा देणाऱ्या पित्याप्रमाणे बुद्ध आहेत, वारशाप्रमाणे धम्म आहे, आणि वारसा मिळवणाऱ्या पुत्रांच्या समूहाप्रमाणे, सद्धम्मरूपी वारसा मिळवलेला संघ आहे. उमलेल्या कमळाप्रमाणे बुद्ध आहेत, त्यापासून उत्पन्न झालेल्या मधाप्रमाणे धम्म आहे, आणि त्या मधाचा आस्वाद घेणाऱ्या भुंग्यांच्या समूहाप्रमाणे संघ आहे. अशा प्रकारे, या त्रिरत्नाला उपमांद्वारे प्रकाशित करावे. เอตฺตาวตา จ ยา ปุพฺเพ ‘‘เกน กตฺถ กทา กสฺมา, ภาสิตํ สรณตฺตย’’นฺติอาทีหิ จตูหิ คาถาหิ อตฺถวณฺณนาย มาติกา นิกฺขิตฺตา, สา อตฺถโต ปกาสิตา โหตีติ. येथपर्यंत, पूर्वी 'कोणी, कोठे, केव्हा, कशासाठी त्रिशरण सांगितले' इत्यादी चार गाथांद्वारे अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी जी मातृका मांडली होती, ती अर्थासह प्रकाशित झाली आहे. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील สรณตฺตยวณฺณนา นิฏฺฐิตา. त्रिशरण-वर्णन समाप्त झाले. ๒. สิกฺขาปทวณฺณนา २. शिक्षापद-वर्णन สิกฺขาปทปาฐมาติกา शिक्षापद-पाठ-मातृका เอวํ สรณคมเนหิ สาสโนตารํ ทสฺเสตฺวา สาสนํ โอติณฺเณน อุปาสเกน วา ปพฺพชิเตน วา เยสุ สิกฺขาปเทสุ ปฐมํ สิกฺขิตพฺพํ, ตานิ ทสฺเสตุํ นิกฺขิตฺตสฺส สิกฺขาปทปาฐสฺส อิทานิ วณฺณนตฺถํ อยํ มาติกา – अशा प्रकारे शरणगमनाद्वारे शासनात प्रवेश कसा होतो हे दाखवून, शासनात प्रवेश केलेल्या उपासकाने किंवा प्रव्रजिताने ज्या शिक्षापदांचे सर्वप्रथम आचरण केले पाहिजे, ते दर्शवण्यासाठी मांडलेल्या शिक्षापद-पाठाचे आता स्पष्टीकरण करण्यासाठी ही मातृका आहे - ‘‘เยน ยตฺถ ยทา ยสฺมา, วุตฺตาเนตานิ ตํ นยํ; วตฺวา กตฺวา ววตฺถานํ, สาธารณวิเสสโต. “ज्यांच्याद्वारे, जेथे, जेव्हा, ज्या कारणासाठी ही (शिक्षापदे) सांगितली गेली, ती पद्धत सांगून आणि सामान्य व विशेष यानुसार वर्गीकरण करून, ‘‘ปกติยา จ ยํ วชฺชํ, วชฺชํ ปณฺณตฺติยา จ ยํ; ววตฺถเปตฺวา ตํ กตฺวา, ปทานํ พฺยญฺชนตฺถโต. “जे निसर्गतःच निंद्य आहे आणि जे प्रज्ञप्तीमुळे निंद्य आहे, ते निश्चित करून आणि शब्दांच्या व अर्थांच्या दृष्टीने पदांचे विश्लेषण करून, ‘‘สาธารณานํ สพฺเพสํ, สาธารณวิภาวนํ; อถ ปญฺจสุ ปุพฺเพสุ, วิเสสตฺถปฺปกาสโต. “सर्व सामान्य शिक्षापदांचे सामान्य स्पष्टीकरण करून, आणि पहिल्या पाच शिक्षापदांमधील विशेष अर्थ प्रकाशित करून, ‘‘ปาณาติปาตปภุติ-เหกตานานตาทิโต; อารมฺมณาทานเภทา, มหาสาวชฺชโต ตถา. “प्राणातिपात इत्यादींच्या एकत्व व नानात्व इत्यादींद्वारे, आलंबन, ग्रहण व भेद यानुसार, तसेच महा-सावज्ज (मोठे पाप) यानुसार, ‘‘ปโยคงฺคสมุฏฺฐานา, เวทนามูลกมฺมโต; วิรมโต จ ผลโต, วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. “प्रयोग, अंग, समुत्थान, वेदना, मूळ, कर्मपथ, विरती आणि फळ यानुसार निर्णय समजून घ्यावा. ‘‘โยเชตพฺพํ [Pg.14] ตโต ยุตฺตํ, ปจฺฉิเมสฺวปิ ปญฺจสุ; อาเวณิกญฺจ วตฺตพฺพํ, เญยฺยา หีนาทิตาปิ จา’’ติ. “त्यानंतर, नंतरच्या पाच शिक्षापदांमध्येही योग्य ते लागू करावे, त्यांचे विशिष्ट नियम सांगावेत आणि हीन इत्यादी अवस्थाही जाणून घ्याव्यात.” ตตฺถ เอตานิ ปาณาติปาตาเวรมณีติอาทีนิ ทส สิกฺขาปทานิ ภควตา เอว วุตฺตานิ, น สาวกาทีหิ. ตานิ จ สาวตฺถิยํ วุตฺตานิ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม อายสฺมนฺตํ ราหุลํ ปพฺพาเชตฺวา กปิลวตฺถุโต สาวตฺถึ อนุปฺปตฺเตน สามเณรานํ สิกฺขาปทววตฺถาปนตฺถํ. วุตฺตํ เหตํ – त्या मातृकेमध्ये, 'प्राणातिपाता वेरमणी' इत्यादी ही दहा शिक्षापदे भगवंतांनीच सांगितली आहेत, श्रावकांनी वगैरे नाही. आणि ती श्रावस्ती येथे, अनाथपिंडिकांच्या जेतवन आरामात, कपिलवस्तूहून श्रावस्तीला अनुक्रमे आलेल्या भगवंतांनी, आयुष्यमान राहुलाला प्रव्रज्या दिल्यानंतर, सामणेरांसाठी शिक्षापदांची मर्यादा निश्चित करण्यासाठी सांगितली होती. कारण असे म्हटले आहे - ‘‘อถ โข ภควา กปิลวตฺถุสฺมึ ยถาภิรนฺตํ วิหริตฺวา เยน สาวตฺถิ เตน จาริกํ ปกฺกามิ. อนุปุพฺเพน จาริกํ จรมาโน เยน สาวตฺถิ ตทวสริ. ตตฺร สุทํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. เตน โข ปน สมเยน …เป… อถ โข สามเณรานํ เอตทโหสิ – ‘กติ นุ โข อมฺหากํ สิกฺขาปทานิ, กตฺถ จ อมฺเหหิ สิกฺขิตพฺพ’’’นฺติ. ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ – ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, สามเณรานํ ทส สิกฺขาปทานิ, เตสุ จ สามเณเรหิ สิกฺขิตุํ, ปาณาติปาตาเวรมณี…เป… ชาตรูปรชตปฏิคฺคหณา เวรมณี’’ติ (มหาว. ๑๐๕). “त्यानंतर भगवान कपिलवस्तू येथे इच्छेनुसार विहार करून श्रावस्तीच्या दिशेने चारिकेसाठी निघाले. अनुक्रमे चारिका करत ते श्रावस्तीला पोहोचले. तेथे भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकांच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी... पे... सामणेरांच्या मनात असा विचार आला - 'आमची किती शिक्षापदे आहेत आणि आम्ही कशामध्ये आचरण केले पाहिजे?' त्यांनी भगवंतांना ही गोष्ट सांगितली. (भगवान म्हणाले -) 'भिक्खूंनो, मी सामणेरांसाठी दहा शिक्षापदांची अनुमती देतो आणि सामणेरांनी त्यामध्ये आचरण करावे - प्राणातिपाता वेरमणी... पे... जातरूपरजतपटिग्गहणा वेरमणी (सोने-चांदी स्वीकारण्यापासून अलिप्त राहणे).'” ตาเนตานิ ‘‘สมาทาย สิกฺขติ สิกฺขาปเทสู’’ติ (ที. นิ. ๑.๑๙๓; ม. นิ. ๒.๒๔; วิภ. ๕๐๘) สุตฺตานุสาเรน สรณคมเนสุ จ ทสฺสิตปาฐานุสาเรน ‘‘ปาณาติปาตา เวรมณิสิกฺขาปทํ สมาทิยามี’’ติ เอวํ วาจนามคฺคํ อาโรปิตานีติ เวทิตพฺพานิ. เอวํ ตาว ‘‘เยน ยตฺถ ยทา ยสฺมา, วุตฺตาเนตานิ ตํ นยํ วตฺวา’’ติ โส นโย ทฏฺฐพฺโพ. त्या अशा (तीन सरणागमनांना) ग्रहण करून 'शिक्षापदांमध्ये आचरण करावे' या सूत्राच्या अनुषंगाने आणि सरणागमनांमध्ये दर्शविलेल्या पाठाच्या अनुषंगाने 'पाणातिपाता वेरमणीसिक्खापदं समादियामि' (प्राणातिपातापासून विरत राहण्याचे शिक्षापद मी ग्रहण करतो) अशा प्रकारे वाचनाचा मार्ग (उच्चारणाचा क्रम) प्रस्थापित केला गेला आहे, असे जाणावे. अशा प्रकारे प्रथम 'ज्यांच्याद्वारे, जेथे, जेव्हा, ज्या कारणाने हे सांगितले गेले आहेत, ती पद्धत सांगून' तो मार्ग समजून घ्यावा. สาธารณวิเสสววตฺถานํ साधारण आणि विशेष नियमांचे निर्धारण (वर्गीकरण) เอตฺถ จ อาทิโต ทฺเว จตุตฺถปญฺจมานิ อุปาสกานํ สามเณรานญฺจ สาธารณานิ นิจฺจสีลวเสน. อุโปสถสีลวเสน ปน อุปาสกานํ สตฺตมฏฺฐมํ เจกํ องฺคํ กตฺวา สพฺพปจฺฉิมวชฺชานิ สพฺพานิปิ สามเณเรหิ สาธารณานิ, ปจฺฉิมํ ปน สามเณรานเมว วิเสสภูตนฺติ เอวํ สาธารณวิเสสโต ววตฺถานํ กาตพฺพํ. ปุริมานิ เจตฺถ ปญฺจ เอกนฺตอกุสลจิตฺตสมุฏฺฐานตฺตา ปาณาติปาตาทีนํ ปกติวชฺชโต เวรมณิยา, เสสานิ [Pg.15] ปณฺณตฺติวชฺชโตติ เอวํ ปกติยา จ ยํ วชฺชํ, วชฺชํ ปณฺณตฺติยา จ ยํ, ตํ ววตฺถเปตพฺพํ. आणि या (दहा शिक्षापदांमध्ये) सुरुवातीपासून पहिली दोन आणि चौथे व पाचवे शिक्षापद उपासकांसाठी व सामणेरांसाठी नित्यशीलाच्या रूपाने समान (साधारण) आहेत. परंतु उपोसथ शीलाच्या रूपाने उपासकांसाठी सातवे आणि आठवे शिक्षापद एकत्र करून एकच अंग मानल्यास, सर्वात शेवटचे (दहावे) शिक्षापद वगळून इतर सर्व शिक्षापदे सामणेरांसोबत समान आहेत. परंतु शेवटचे शिक्षापद केवळ सामणेरांसाठीच विशेष आहे. अशा प्रकारे साधारण आणि विशेष रूपाने वर्गीकरण केले पाहिजे. येथे पहिली पाच शिक्षापदे एकांततः अकुशल चित्तापासून उत्पन्न होणारी असल्यामुळे प्राणातिपातादींच्या नैसर्गिक दोषांमुळे (प्रकृतीदोषामुळे) विरत होण्याच्या स्वरूपाची आहेत, आणि उरलेली शिक्षापदे प्रज्ञप्ती दोषांमुळे (नियम उल्लंघनाच्या दोषांमुळे) विरत होण्याच्या स्वरूपाची आहेत. अशा प्रकारे प्रकृतीनुसार (नैसर्गिकरीत्या) जे दोषयुक्त आहे ते आणि प्रज्ञप्तीनुसार (नियमानुसार) जे दोषयुक्त आहे ते, याचे वर्गीकरण करून ते लक्षात ठेवले पाहिजे. สาธารณวิภาวนา साधारण स्पष्टीकरण (साधारण अर्थाचे प्रकटीकरण) ยสฺมา เจตฺถ ‘‘เวรมณิสิกฺขาปทํ สมาทิยามี’’ติ เอตานิ สพฺพสาธารณานิ ปทานิ, ตสฺมา เอเตสํ ปทานํ พฺยญฺชนโต จ อตฺถโต จ อยํ สาธารณวิภาวนา เวทิตพฺพา – आणि ज्या कारणाने या दहा शिक्षापदांमध्ये 'वेरमणीसिक्खापदं समादियामि' ही पदे सर्वांसाठी समान आहेत, म्हणून या पदांचे शब्दाच्या (व्यंजनाच्या) दृष्टीने आणि अर्थाच्या दृष्टीने पुढीलप्रमाणे साधारण स्पष्टीकरण जाणावे – ตตฺถ พฺยญฺชนโต ตาว เวรํ มณตีติ เวรมณี, เวรํ ปชหติ, วิโนเทติ, พฺยนฺตีกโรติ, อนภาวํ คเมตีติ อตฺโถ. วิรมติ วา เอตาย กรณภูตาย เวรมฺหา ปุคฺคโลติ, วิการสฺส เวการํ กตฺวา เวรมณี. เตเนว เจตฺถ ‘‘เวรมณิสิกฺขาปทํ วิรมณิสิกฺขาปท’’นฺติ ทฺวิธา สชฺฌายํ กโรนฺติ. สิกฺขิตพฺพาติ สิกฺขา, ปชฺชเต อเนนาติ ปทํ. สิกฺขาย ปทํ สิกฺขาปทํ, สิกฺขาย อธิคมูปาโยติ อตฺโถ. อถ วา มูลํ นิสฺสโย ปติฏฺฐาติ วุตฺตํ โหติ. เวรมณี เอว สิกฺขาปทํ เวรมณิสิกฺขาปทํ, วิรมณิสิกฺขาปทํ วา ทุติเยน นเยน. สมฺมา อาทิยามิ สมาทิยามิ, อวีติกฺกมนาธิปฺปาเยน อขณฺฑการิตาย อจฺฉิทฺทการิตาย อสพลการิตาย จ อาทิยามีติ วุตฺตํ โหติ. त्यामध्ये प्रथम शब्दाच्या (व्यंजनाच्या) दृष्टीने असे जाणावे: जे शिक्षापद अकुशल रूपी शत्रूला (वेर) नष्ट करते (मणाति), ते 'वेरमणी' होय. अकुशल रूपी शत्रूचा त्याग करते, त्याला दूर करते, त्याचा विनाश करते, त्याला अस्तित्वात न राहण्याच्या स्थितीला पोहोचवते, असा याचा अर्थ आहे. अथवा, या साधनभूत (ग्रहण करण्याच्या) क्रियेद्वारे व्यक्ती अकुशल रूपी शत्रूपासून विरत होते, म्हणून 'एताय' या पदाने दर्शविलेला तो शिक्षापदांचा समूह 'वेरमणी' म्हटला जातो. 'वि' या अक्षराचा 'वे' असा बदल करून 'वेरमणी' असे म्हटले जाते. आणि म्हणूनच येथे 'वेरमणीसिक्खापदं' किंवा 'विरमणीसिक्खापदं' असे दोन प्रकारे सज्झाय (पाठ) करतात. ज्या धर्मस्वभावाचे आचरण केले पाहिजे, ती 'सिक्खा' (शिक्षा) होय. या आचरणाद्वारे उपासक शिक्षापदाच्या परिपूर्णतेप्रत पोहोचतो (पज्जते), म्हणून 'अनेन' या पदाने दर्शविलेले ते आचरण 'पद' होय. शिक्षेचे पद म्हणजे शिक्षेच्या प्राप्तीचा उपाय (अधिगमोपाय) होय, असा याचा अर्थ आहे. अथवा मूळ, आश्रय, प्रतिष्ठा (अधिष्ठान) असे म्हटले गेले आहे. विरती (विरत राहणे) म्हणजेच शिक्षापद होय, म्हणून ते 'वेरमणीसिक्खापद' होय. अथवा दुसऱ्या पद्धतीने 'विरमणी' असे म्हटलेले शिक्षापद होय. चांगल्या प्रकारे (सम्मा) ग्रहण करतो (आदियामि), म्हणून 'समादियामि' (मी ग्रहण करतो). शिक्षापदाचे उल्लंघन न करण्याच्या इच्छेने, ते खंडित न करता, त्यात छिद्र न पाडता (अखंडपणे) आणि डाग न लावता (निर्मळपणे) आचरण करण्याच्या भावनेने मी ग्रहण करतो, असे म्हटले गेले आहे. อตฺถโต ปน เวรมณีติ กามาวจรกุสลจิตฺตสมฺปยุตฺตา วิรติ, สา ปาณาติปาตา วิรมนฺตสฺส ‘‘ยา ตสฺมึ สมเย ปาณาติปาตา อารติ วิรติ ปฏิวิรติ เวรมณี อกิริยา อกรณํ อนชฺฌาปตฺติ เวลาอนติกฺกโม เสตุฆาโต’’ติ เอวมาทินา (วิภ. ๗๐๔) นเยน วิภงฺเค วุตฺตา. กามญฺเจสา เวรมณี นาม โลกุตฺตราปิ อตฺถิ, อิธ ปน สมาทิยามีติ วุตฺตตฺตา สมาทานวเสน ปวตฺตารหา, ตสฺมา สา น โหตีติ กามาวจรกุสลจิตฺตสมฺปยุตฺตา วิรตีติ วุตฺตา. परंतु अर्थाच्या दृष्टीने 'वेरमणी' म्हणजे कामावचर कुशल चित्ताशी संप्रयुक्त असलेली विरती (चेतसिक) होय. ती विरती, प्राणातिपातापासून विरत होणाऱ्या व्यक्तीची, 'त्या वेळी प्राणातिपातापासून दूर राहणे, विरत होणे, मागे हटून विरत होणे, त्याग करणे, अक्रिया (कृती न करणे), अकरण (कारण न बनणे), अनापत्ती (गुन्हा न करणे), मर्यादेचे उल्लंघन न करणे, अकुशलाच्या मार्गाचा नाश करणे' अशा प्रकारच्या पद्धतीने विभंग पाळीमध्ये सांगितली गेली आहे. जरी ही 'वेरमणी' नावाची विरती लोकोत्तर सुद्धा असली, तरी येथे 'समादियामि' असे म्हटलेले असल्यामुळे, समादानाच्या (ग्रहण करण्याच्या) सामर्थ्याने प्रवृत्त होण्यास योग्य असलेली विरतीच घेतली जाते; ती (लोकोत्तर विरती) येथे होत नाही. म्हणून 'कामावचर कुशल चित्ताशी संप्रयुक्त असलेली विरती' असे म्हटले गेले आहे. สิกฺขาติ ติสฺโส สิกฺขา อธิสีลสิกฺขา, อธิจิตฺตสิกฺขา, อธิปญฺญาสิกฺขาติ. อิมสฺมึ ปนตฺเถ สมฺปตฺตวิรติสีลํ โลกิกา วิปสฺสนา รูปารูปฌานานิ อริยมคฺโค จ สิกฺขาติ อธิปฺเปตา. ยถาห – 'सिक्खा' (शिक्षा) म्हणजे तीन प्रकारच्या शिक्षा आहेत: अधिशील शिक्षा, अधिचित्त शिक्षा आणि अधिपज्ञा शिक्षा. परंतु या अर्थामध्ये संपत्त-विरती शील, लौकिक विपश्यना, रूपावचर व अरूपावचर ध्यान आणि आर्यमार्ग हे 'सिक्खा' म्हणून अभिप्रेत आहेत. जसे की (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘กตเม ธมฺมา สิกฺขา? ยสฺมึ สมเย กามาวจรํ กุสลํ จิตฺตํ อุปฺปนฺนํ โหติ, โสมนสฺสสหคตํ ญาณสมฺปยุตฺตํ…เป… ตสฺมึ สมเย [Pg.16] ผสฺโส โหติ…เป… อวิกฺเขโป โหติ, อิเม ธมฺมา สิกฺขา. कोणते धर्म 'सिक्खा' (शिक्षा) आहेत? ज्या वेळी सोमनस्यसहगत (आनंदाने युक्त), ज्ञानसंप्रयुक्त... पे... कामावचर कुशल चित्त उत्पन्न होते, त्या वेळी स्पर्श असतो... पे... अविक्षेप (एकाग्रता) असते, हे धर्म 'सिक्खा' आहेत. ‘‘กตเม ธมฺมา สิกฺขา? ยสฺมึ สมเย รูปูปปตฺติยา มคฺคํ ภาเวติ วิวิจฺเจว กาเมหิ วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ…เป… ปฐมํ ฌานํ…เป… ปญฺจมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรติ…เป… อวิกฺเขโป โหติ, อิเม ธมฺมา สิกฺขา. कोणते धर्म 'सिक्खा' (शिक्षा) आहेत? ज्या वेळी रूपावचर भूमीत उत्पन्न होण्यासाठी मार्गाची भावना करतो, कामांपासून विरक्त होऊनच, अकुशल धर्मांपासून विरक्त होऊनच... पे... प्रथम ध्यान... पे... पाचवे ध्यान प्राप्त करून विहरतो... पे... अविक्षेप (एकाग्रता) असते, हे धर्म 'सिक्खा' आहेत. ‘‘กตเม ธมฺมา สิกฺขา? ยสฺมึ สมเย อรูปปตฺติยา…เป… เนวสญฺญานาสญฺญายตนสหคตํ…เป… อวิกฺเขโป โหติ, อิเม ธมฺมา สิกฺขา. कोणते धर्म 'सिक्खा' (शिक्षा) आहेत? ज्या वेळी अरूपावचर भूमीत उत्पन्न होण्यासाठी... पे... नेवसंज्ञानासंज्ञायतनसहगत (ध्यान)... पे... अविक्षेप (एकाग्रता) असते, हे धर्म 'सिक्खा' आहेत. ‘‘กตเม ธมฺมา สิกฺขา? ยสฺมึ สมเย โลกุตฺตรํ ฌานํ ภาเวติ นิยฺยานิกํ…เป… อวิกฺเขโป โหติ, อิเม ธมฺมา สิกฺขา’’ติ (วิภ. ๗๑๒-๗๑๓). कोणते धर्म 'सिक्खा' (शिक्षा) आहेत? ज्या वेळी संसारातून मुक्त करणारे (नैर्याणिक) लोकोत्तर ध्यानाची भावना करतो... पे... अविक्षेप (एकाग्रता) असते, हे धर्म 'सिक्खा' आहेत. เอตาสุ สิกฺขาสุ ยาย กายจิ สิกฺขาย ปทํ อธิคมูปาโย, อถ วา มูลํ นิสฺสโย ปติฏฺฐาติ สิกฺขาปทํ. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘สีลํ นิสฺสาย สีเล ปติฏฺฐาย สตฺต โพชฺฌงฺเค ภาเวนฺโต พหุลีกโรนฺโต’’ติ เอวมาทิ (สํ. นิ. ๕.๑๘๒). เอวเมตฺถ สาธารณานํ ปทานํ สาธารณา พฺยญฺชนโต อตฺถโต จ วิภาวนา กาตพฺพา. या तीन प्रकारच्या शिक्षांमध्ये कोणत्याही एका शिक्षेचे पद म्हणजे प्राप्तीचा उपाय होय, अथवा मूळ, आश्रय, प्रतिष्ठा (अधिष्ठान) होय, म्हणून ते 'सिक्खापद' (शिक्षापद) होय. हे सत्यच आहे, (भगवंतांनी) म्हटले आहे – 'शीलाचा आश्रय घेऊन, शीलावर अधिष्ठित होऊन, सात बोध्यंगांची भावना करत, वारंवार सराव करत...' अशा प्रकारे इत्यादी वचन म्हटले गेले आहे. अशा प्रकारे येथे समान (साधारण) पदांचे समान लक्षणे शब्दाच्या (व्यंजनाच्या) दृष्टीने आणि अर्थाच्या दृष्टीने स्पष्टीकरण केले पाहिजे. ปุริมปญฺจสิกฺขาปทวณฺณนา पहिल्या पाच शिक्षापदांचे वर्णन อิทานิ ยํ วุตฺตํ – ‘‘อถ ปญฺจสุ ปุพฺเพสุ, วิเสสตฺถปฺปกาสโต…เป… วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย’’ติ, ตตฺเถตํ วุจฺจติ – ปาณาติปาโตติ เอตฺถ ตาว ปาโณติ ชีวิตินฺทฺริยปฺปฏิพทฺธา ขนฺธสนฺตติ, ตํ วา อุปาทาย ปญฺญตฺโต สตฺโต. ตสฺมึ ปน ปาเณ ปาณสญฺญิโน ตสฺส ปาณสฺส ชีวิตินฺทฺริยุปจฺเฉทกอุปกฺกมสมุฏฺฐาปิกา กายวจีทฺวารานํ อญฺญตรทฺวารปฺปวตฺตา วธกเจตนา ปาณาติปาโต. อทินฺนาทานนฺติ เอตฺถ อทินฺนนฺติ ปรปริคฺคหิตํ, ยตฺถ ปโร ยถากามการิตํ อาปชฺชนฺโต อทณฺฑารโห อนุปวชฺโช จ โหติ, ตสฺมึ ปรปริคฺคหิเต ปรปริคฺคหิตสญฺญิโน ตทาทายกอุปกฺกมสมุฏฺฐาปิกา กายวจีทฺวารานํ อญฺญตรทฺวารปฺปวตฺตา เอว เถยฺยเจตนา อทินฺนาทานํ. อพฺรหฺมจริยนฺติ อเสฏฺฐจริยํ, ทฺวยํทฺวยสมาปตฺติเมถุนปฺปฏิเสวนา กายทฺวารปฺปวตฺตา อสทฺธมฺมปฺปฏิเสวนฏฺฐานวีติกฺกมเจตนา อพฺรหฺมจริยํ[Pg.17]. มุสาวาโทติ เอตฺถ มุสาติ วิสํวาทนปุเรกฺขารสฺส อตฺถภญฺชนโก วจีปโยโค กายปโยโค วา, วิสํวาทนาธิปฺปาเยน ปนสฺส ปรวิสํวาทกกายวจีปโยคสมุฏฺฐาปิกา กายวจีทฺวารานเมว อญฺญตรทฺวารปฺปวตฺตา มิจฺฉาเจตนา มุสาวาโท. สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานนฺติ เอตฺถ ปน สุราติ ปญฺจ สุรา – ปิฏฺฐสุรา, ปูวสุรา, โอทนสุรา, กิณฺณปกฺขิตฺตา, สมฺภารสํยุตฺตา จาติ. เมรยมฺปิ ปุปฺผาสโว, ผลาสโว, คุฬาสโว, มธฺวาสโว, สมฺภารสํยุตฺโต จาติ ปญฺจวิธํ. มชฺชนฺติ ตทุภยเมว มทนิยฏฺเฐน มชฺชํ, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ กิญฺจิ อตฺถิ มทนิยํ, เยน ปีเตน มตฺโต โหติ ปมตฺโต, อิทํ วุจฺจติ มชฺชํ. ปมาทฏฺฐานนฺติ ยาย เจตนาย ตํ ปิวติ อชฺโฌหรติ, สา เจตนา มทปฺปมาทเหตุโต ปมาทฏฺฐานนฺติ วุจฺจติ, ยโต อชฺโฌหรณาธิปฺปาเยน กายทฺวารปฺปวตฺตา สุราเมรยมชฺชานํ อชฺโฌหรณเจตนา ‘‘สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐาน’’นฺติ เวทิตพฺพา. เอวํ ตาเวตฺถ ปาณาติปาตปฺปภุตีหิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. आता जे म्हटले आहे - 'अथ पञ्चसु पुब्बेसु, विसेसत्थप्पकासतो...पे... विञ्ञातब्बो विनिच्छयो' (पाच पूर्ववर्ती गोष्टींमध्ये, विशेष अर्थाच्या प्रकाशनामुळे... निर्णय जाणावा), त्याविषयी हे म्हटले जाते - येथे 'प्राणातिपात' (pāṇātipāto) यामध्ये प्रथम 'प्राण' (pāṇo) म्हणजे जीवितेंद्रियाशी संबंधित असणारी स्कंध-संतती (khandhasantati) होय, किंवा तिला अनुसरून प्रज्ञप्त केलेला (मानलेला) प्राणी (satto) होय. त्या प्राण्याविषयी 'हा प्राणी आहे' अशी संज्ञा असणाऱ्या व्यक्तीची, त्या प्राण्याच्या जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करणाऱ्या उपक्रमाला (प्रयत्नाला) प्रवृत्त करणारी, काय किंवा वाचेच्या द्वारांपैकी कोणत्याही एका द्वाराने प्रवृत्त होणारी वध करण्याची चेतना (vadhakacetanā) म्हणजे 'प्राणातिपात' होय. 'अदिन्नादान' (adinnādānaṃ) यामध्ये 'अदिन्न' (adinnaṃ) म्हणजे दुसऱ्याच्या मालकीचे (parapariggahitaṃ), ज्यामध्ये दुसरा मालक आपल्या इच्छेनुसार त्याचा उपयोग करू शकतो, जो दंडास पात्र नाही आणि निंदेस पात्र नाही; अशा दुसऱ्याच्या मालकीच्या वस्तूविषयी 'ही दुसऱ्याची वस्तू आहे' अशी संज्ञा असणाऱ्याची, ती वस्तू घेण्याच्या उपक्रमाला प्रवृत्त करणारी, काय किंवा वाचेच्या द्वारांपैकी कोणत्याही एका द्वाराने प्रवृत्त होणारी चोरीची चेतना (theyyacetanā) म्हणजे 'अदिन्नादान' होय. 'अब्रह्मचर्य' (abrahmacariyaṃ) म्हणजे अश्रेष्ठ आचरण (aseṭṭhacariyaṃ). स्त्री-पुरुषांच्या जोडीने मैथुनसेवन करणे, ही कायद्वाराने प्रवृत्त होणारी, असद्धर्माचे सेवन करण्याच्या हेतूने होणारी मर्यादा ओलांडण्याची चेतना म्हणजे 'अब्रह्मचर्य' होय. 'मृषावाद' (musāvādo) यामध्ये 'मृषा' (musā) म्हणजे फसवणुकीचा हेतू असणाऱ्या व्यक्तीचा, दुसऱ्याच्या हिताचा नाश करणारा वाचेचा प्रयोग किंवा कायेचा प्रयोग होय. फसवणुकीच्या हेतूने दुसऱ्याला फसवणाऱ्या कायिक किंवा वाचिक प्रयोगाला प्रवृत्त करणारी, काय किंवा वाचेच्या द्वारांपैकी कोणत्याही एका द्वाराने प्रवृत्त होणारी मिथ्या चेतना म्हणजे 'मृषावाद' होय. 'सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान' (surāmerayamajjapamādaṭṭhānaṃ) यामध्ये 'सुरा' (surā) म्हणजे पाच प्रकारची सुरा - पिष्टसुरा (पिठापासून बनवलेली), पूवसुरा (पिठाच्या गोळ्यांपासून बनवलेली), ओदनसुरा (भातापासून बनवलेली), किण्णपक्खित्ता (किण्व टाकून बनवलेली) आणि संभारसंयुत्ता (मसाले किंवा इतर घटक मिसळून बनवलेली). 'मेरय' (meraya) देखील पाच प्रकारचे आहे - पुष्पासव (फुलांचा आसव), फलासव (फळांचा आसव), गुळासव (गुळाचा आसव), मध्वासव (मधाचा आसव) आणि संभारसंयुत्त (विविध घटक एकत्र करून बनवलेला). 'मज्ज' (majjaṃ) म्हणजे ते दोन्ही (सुरा आणि मेरय) अमली/मद आणणाऱ्या गुणधर्मामुळे 'मज्ज' म्हटले जाते. किंवा इतरही जे काही अमली (मदकारक) द्रव्य आहे, ज्याच्या सेवनाने मनुष्य मत्त आणि प्रमत्त (सावध नसलेला) होतो, त्याला 'मज्ज' म्हटले जाते. 'प्रमादस्थान' (pamādaṭṭhānaṃ) म्हणजे ज्या चेतनेने मनुष्य त्याचे प्राशन करतो किंवा गिळतो, ती चेतना मद आणि प्रमादाचे कारण असल्यामुळे तिला 'प्रमादस्थान' म्हटले जाते. म्हणून, गिळण्याच्या हेतूने कायद्वाराने प्रवृत्त होणारी, सुरा, मेरय आणि मज्ज प्राशन करण्याची जी चेतना आहे, ती 'सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान' म्हणून जाणावी. अशा प्रकारे, येथे प्राणातिपात इत्यादींच्या संदर्भात निर्णय जाणावा. เอกตานานตาทิวินิจฺฉยํ एकत्व, अनेकत्व इत्यादींचा निर्णय. เอกตานานตาทิโตติ เอตฺถ อาห – กึ ปน วชฺฌวธกปฺปโยคเจตนาทีนํ เอกตาย ปาณาติปาตสฺส อญฺญสฺส วา อทินฺนาทานาทิโน เอกตฺตํ, นานตาย นานตฺตํ โหติ, อุทาหุ โนติ. กสฺมา ปเนตํ วุจฺจติ? ยทิ ตาว เอกตาย เอกตฺตํ, อถ ยทา เอกํ วชฺฌํ พหู วธกา วเธนฺติ, เอโก วา วธโก พหุเก วชฺเฌ วเธติ, เอเกน วา สาหตฺถิกาทินา ปโยเคน พหู วชฺฌา วธียนฺติ, เอกา วา เจตนา พหูนํ วชฺฌานํ ชีวิตินฺทฺริยุปจฺเฉทกปโยคํ สมุฏฺฐาเปติ, ตทา เอเกน ปาณาติปาเตน ภวิตพฺพํ. ยทิ ปน นานตาย นานตฺตํ. อถ ยทา เอโก วธโก เอกสฺสตฺถาย เอกํ ปโยคํ กโรนฺโต พหู วชฺเฌ วเธติ, พหู วา วธกา เทวทตฺตยญฺญทตฺตโสมทตฺตาทีนํ พหูนมตฺถาย พหู ปโยเค กโรนฺตา เอกเมว เทวทตฺตํ ยญฺญทตฺตํ โสมทตฺตํ วา วเธนฺติ, พหูหิ วา สาหตฺถิกาทีหิ ปโยเคหิ เอโก วชฺโฌ วธียติ. พหู วา เจตนา เอกสฺเสว วชฺฌสฺส ชีวิตินฺทฺริยุปจฺเฉทกปโยคํ สมุฏฺฐาเปนฺติ, ตทา พหูหิ ปาณาติปาเตหิ ภวิตพฺพํ. อุภยมฺปิ เจตมยุตฺตํ. อถ เนว เอเตสํ วชฺฌาทีนํ เอกตาย เอกตฺตํ, นานตาย นานตฺตํ, อญฺญเถว ตุ เอกตฺตํ นานตฺตญฺจ โหติ, ตํ วตฺตพฺพํ ปาณาติปาตสฺส, เอวํ เสสานมฺปีติ. येथे 'एकत्व, अनेकत्व इत्यादींच्या दृष्टीने' यावर आक्षेप घेणारा विचारतो - काय मारला जाणारा प्राणी (vajjha), मारणारा (vadhaka), प्रयत्न (payoga), चेतना (cetanā) इत्यादींच्या एकत्वामुळे प्राणातिपाताचे किंवा अदिन्नादानादी इतर कर्मांचे एकत्व होते, आणि त्यांच्या अनेकत्वामुळे अनेकत्व होते, की नाही? पण हे कशासाठी म्हटले जाते? जर एकत्वामुळे एकत्व होत असेल, तर जेव्हा एकाच मारल्या जाणाऱ्या प्राण्याला अनेक मारणारे मारतात, किंवा एकच मारणारा अनेक प्राण्यांना मारतो, किंवा स्वतःच्या हाताने केलेल्या एकाच प्रयत्नाने अनेक प्राणी मारले जातात, किंवा एकच चेतना अनेक प्राण्यांच्या जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करणाऱ्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करते, तेव्हा एकच प्राणातिपात झाला पाहिजे. जर अनेकत्वामुळे अनेकत्व होत असेल, तर जेव्हा एक मारणारा एकाच्या उद्देशाने एकच प्रयत्न करत असताना अनेक प्राण्यांना मारतो, किंवा अनेक मारणारे देवदत्त, यज्ञदत्त, सोमदत्त इत्यादी अनेकांच्या उद्देशाने अनेक प्रयत्न करत असताना केवळ एकाच देवदत्ताला, यज्ञदत्ताला किंवा सोमदत्ताला मारतात, किंवा अनेक कायिक इत्यादी प्रयत्नांनी एकच प्राणी मारला जातो, किंवा अनेक चेतना एकाच प्राण्याच्या जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करणाऱ्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करतात, तेव्हा अनेक प्राणातिपात झाले पाहिजेत. परंतु हे दोन्हीही अयोग्य आहे. म्हणून, या मारल्या जाणाऱ्या प्राण्यांच्या इत्यादींच्या एकत्वामुळे एकत्व होत नाही आणि अनेकत्वामुळे अनेकत्व होत नाही, तर दुसऱ्याच प्रकारे एकत्व आणि अनेकत्व होते. ते प्राणातिपाताच्या संदर्भात सांगितले पाहिजे, आणि त्याचप्रमाणे उरलेल्या कर्मांच्या संदर्भातही. วุจฺจเต [Pg.18] – ตตฺถ ตาว ปาณาติปาตสฺส น วชฺฌวธกาทีนํ ปจฺเจกเมกตาย เอกตา, นานตาย นานตา, กินฺตุ วชฺฌวธกาทีนํ ยุคนนฺธเมกตาย เอกตา, ทฺวินฺนมฺปิ ตุ เตสํ, ตโต อญฺญตรสฺส วา นานตาย นานตา. ตถา หิ พหูสุ วธเกสุ พหูหิ สรกฺเขปาทีหิ เอเกน วา โอปาตขณนาทินา ปโยเคน พหู วชฺเฌ วเธนฺเตสุปิ พหู ปาณาติปาตา โหนฺติ. เอกสฺมึ วธเก เอเกน, พหูหิ วา ปโยเคหิ ตปฺปโยคสมุฏฺฐาปิกาย จ เอกาย, พหูหิ วา เจตนาหิ พหู วชฺเฌ วเธนฺเตปิ พหู ปาณาติปาตา โหนฺติ, พหูสุ จ วธเกสุ ยถาวุตฺตปฺปกาเรหิ พหูหิ, เอเกน วา ปโยเคน เอกํ วชฺฌํ วเธนฺเตสุปิ พหู ปาณาติปาตา โหนฺติ. เอส นโย อทินฺนาทานาทีสุปีติ. เอวเมตฺถ เอกตานานตาทิโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. उत्तर दिले जाते - त्यामध्ये प्राणातिपाताच्या बाबतीत, मारला जाणारा प्राणी आणि मारणारा इत्यादींच्या स्वतंत्र एकत्वामुळे एकत्व होत नाही, किंवा स्वतंत्र अनेकत्वामुळे अनेकत्व होत नाही; तर मारला जाणारा प्राणी आणि मारणारा या दोघांच्या जोडीच्या (yuganandha) एकत्वामुळे एकत्व होते, आणि त्या दोघांच्या किंवा त्यांच्यापैकी एकाच्या अनेकत्वामुळे अनेकत्व होते. तसेच, अनेक मारणाऱ्यांनी बाण मारणे इत्यादी अनेक प्रयत्नांनी किंवा खड्डा खणणे इत्यादी एकाच प्रयत्नाने अनेक प्राण्यांना मारले तरी अनेक प्राणातिपात होतात. एका मारणाऱ्याने एका किंवा अनेक प्रयत्नांनी आणि त्या प्रयत्नाला प्रवृत्त करणाऱ्या एका किंवा अनेक चेतनांनी अनेक प्राण्यांना मारले तरी अनेक प्राणातिपात होतात. आणि अनेक मारणाऱ्यांनी वर सांगितलेल्या प्रकारे अनेक किंवा एका प्रयत्नाने एकाच प्राण्याला मारले तरी अनेक प्राणातिपात होतात. हाच नियम अदिन्नादान इत्यादींच्या बाबतीतही जाणावा. अशा प्रकारे, येथे एकत्व आणि अनेकत्व इत्यादींच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. อารมฺมณโตติ ปาณาติปาโต เจตฺถ ชีวิตินฺทฺริยารมฺมโณ. อทินฺนาทานอพฺรหฺมจริยสุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานานิ รูปธมฺเมสุ รูปายตนาทิอญฺญตรสงฺขารารมฺมณานิ. มุสาวาโท ยสฺส มุสา ภณติ, ตมารภิตฺวา ปวตฺตนโต สตฺตารมฺมโณ. อพฺรหฺมจริยมฺปิ สตฺตารมฺมณนฺติ เอเก. อทินฺนาทานญฺจ ยทา สตฺโต หริตพฺโพ โหติ, ตทา สตฺตารมฺมณนฺติ. อปิ เจตฺถ สงฺขารวเสเนว สตฺตารมฺมณํ, น ปณฺณตฺติวเสนาติ. เอวเมตฺถ อารมฺมณโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. आलंबनाच्या (विषयाच्या) दृष्टीने - येथे प्राणातिपात हा जीवितेंद्रिय-आलंबन असणारा (जीवितेंद्रियाला विषय बनवणारा) आहे. अदिन्नादान, अब्रह्मचर्य आणि सुरा-मेरय-मज्ज-प्रमादस्थान हे रूपधर्मांमध्ये रूपायातन इत्यादींपैकी कोणत्याही एका संस्काराला आलंबन बनवणारे (संस्कारालंबन) आहेत. मृषावाद हा ज्याच्याशी खोटे बोलले जाते, त्याला उद्देशून प्रवृत्त होत असल्यामुळे सत्त्वालंबन (प्राण्याला विषय बनवणारा) आहे. अब्रह्मचर्य देखील सत्त्वालंबन आहे, असे काही आचार्य म्हणतात. आणि अदिन्नादान देखील जेव्हा प्राण्याची चोरी करायची असते, तेव्हा सत्त्वालंबन असते, असे काही आचार्य म्हणतात. परंतु येथे संस्काराच्या प्रभावानेच सत्त्वालंबन होते, प्रज्ञप्तीच्या (संज्ञेच्या) प्रभावाने नाही. अशा प्रकारे, येथे आलंबनाच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. อาทานโตติ ปาณาติปาตาเวรมณิสิกฺขาปทาทีนิ เจตานิ สามเณเรน ภิกฺขุสนฺติเก สมาทินฺนาเนว สมาทินฺนานิ โหนฺติ, อุปาสเกน ปน อตฺตนา สมาทิยนฺเตนาปิ สมาทินฺนานิ โหนฺติ, ปรสฺส สนฺติเก สมาทิยนฺเตนาปิ. เอกชฺฌํ สมาทินฺนานิปิ สมาทินฺนานิ โหนฺติ, ปจฺเจกํ สมาทินฺนานิปิ. กินฺตุ นานํ เอกชฺฌํ สมาทิยโต เอกาเยว วิรติ, เอกาว เจตนา โหติ, กิจฺจวเสน ปเนตาสํ ปญฺจวิธตฺตํ วิญฺญายติ. ปจฺเจกํ สมาทิยโต ปน ปญฺเจว วิรติโย, ปญฺจ จ เจตนา โหนฺตีติ เวทิตพฺพา. เอวเมตฺถ อาทานโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. ग्रहण करण्याच्या (समादान करण्याच्या) दृष्टीने - प्राणातिपातापासून विरतीचे शिक्षापद इत्यादी ही शिक्षापदे सामणेराने (श्रामणेराने) भिक्खूच्या सन्निध ग्रहण केली तरच ती ग्रहण केलेली (समादिन्न) होतात. परंतु उपासकाने स्वतः ग्रहण केली तरी ती ग्रहण केलेली होतात, किंवा दुसऱ्याच्या सन्निध ग्रहण केली तरीही. एकत्रितपणे ग्रहण केली तरी ती ग्रहण केलेली होतात, आणि स्वतंत्रपणे (एक-एक करून) ग्रहण केली तरीही. परंतु फरक हा आहे की, एकत्रितपणे ग्रहण करणाऱ्याची विरती एकच असते आणि चेतनाही एकच असते, परंतु कार्याच्या (कृत्याच्या) दृष्टीने तिचे पाच प्रकार जाणले जातात. स्वतंत्रपणे ग्रहण करणाऱ्याच्या बाबतीत मात्र पाच विरती आणि पाच चेतना असतात, असे जाणावे. अशा प्रकारे, येथे ग्रहण करण्याच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. เภทโตติ สามเณรานญฺเจตฺถ เอกสฺมึ ภินฺเน สพฺพานิปิ ภินฺนานิ โหนฺติ. ปาราชิกฏฺฐานิยานิ หิ ตานิ เตสํ, ยํ ตํ วีติกฺกนฺตํ โหติ, เตเนว กมฺมพทฺโธ. คหฏฺฐานํ ปน เอกสฺมึ ภินฺเน เอกเมว ภินฺนํ โหติ, ยโต [Pg.19] เตสํ ตํสมาทาเนเนว ปุน ปญฺจงฺคิกตฺตํ สีลสฺส สมฺปชฺชติ. อปเร ปนาหุ – ‘‘วิสุํ วิสุํ สมาทินฺเนสุ เอกสฺมึ ภินฺเน เอกเมว ภินฺนํ โหติ, ‘ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ สีลํ สมาทิยามี’ติ เอวํ ปน เอกโต สมาทินฺเนสุ เอกสฺมึ ภินฺเน เสสานิปิ สพฺพานิ ภินฺนานิ โหนฺติ. กสฺมา? สมาทินฺนสฺส อภินฺนตฺตา, ยํ ตํ วีติกฺกนฺตํ, เตเนว กมฺมพทฺโธ’’ติ. เอวเมตฺถ เภทโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. भंग होण्याच्या (नष्ट होण्याच्या) दृष्टीने विचार केला असता, सामणेरांच्या बाबतीत या पाच शिकापदांपैकी एक जरी भंग पावले, तरी सर्वच भंग पावतात. कारण त्यांच्यासाठी ती पाराजिकाच्या स्थानी असतात; परंतु ज्याचे उल्लंघन होते, केवळ त्यानेच कर्माचे बंधन होते. गृहस्थांच्या बाबतीत मात्र, एक शिकापद भंग पावले असता एकच भंग पावते; कारण त्यांनी पुन्हा त्याचेच समादान केल्याने त्यांचे शील पुन्हा पाच अंगांनी युक्त (पंचशील) होते. इतर आचार्य म्हणतात— 'वेगवेगळे समादान केलेल्या शिकापदांमध्ये एक भंग पावले असता एकच भंग पावते. परंतु, "मी पाच अंगांनी युक्त शील समादान करतो" अशा प्रकारे एकत्रितपणे समादान केलेल्या शीलांमध्ये एक भंग पावले असता उर्वरित सर्वही भंग पावतात. का? कारण समादानाचा संकल्प अभिन्न (एकच) असतो. परंतु ज्याचे उल्लंघन होते, केवळ त्यानेच कर्माचे बंधन होते.' अशा प्रकारे, येथे भंग होण्याच्या दृष्टीने देखील निर्णय समजून घ्यावा. มหาสาวชฺชโตติ คุณวิรหิเตสุ ติรจฺฉานคตาทีสุ ปาเณสุ ขุทฺทเก ปาเณ ปาณาติปาโต อปฺปสาวชฺโช, มหาสรีเร มหาสาวชฺโช. กสฺมา? ปโยคมหนฺตตาย. ปโยคสมตฺเตปิ วตฺถุมหนฺตตาย. คุณวนฺเตสุ ปน มนุสฺสาทีสุ อปฺปคุเณ ปาณาติปาโต อปฺปสาวชฺโช, มหาคุเณ มหาสาวชฺโช. สรีรคุณานนฺตุ สมภาเว สติ กิเลสานํ อุปกฺกมานญฺจ มุทุตาย อปฺปสาวชฺชตา, ติพฺพตาย มหาสาวชฺชตา จ เวทิตพฺพา. เอส นโย เสเสสุปิ. อปิ เจตฺถ สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานเมว มหาสาวชฺชํ, น ตถา ปาณาติปาตาทโย. กสฺมา? มนุสฺสภูตสฺสาปิ อุมฺมตฺตกภาวสํวตฺตเนน อริยธมฺมนฺตรายกรณโตติ. เอวเมตฺถ มหาสาวชฺชโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. 'महासावज्ज' (मोठा दोष असणे) याविषयी: गुणरहित अशा तिर्यंच (पशू) इत्यादी प्राण्यांमध्ये, लहान प्राण्याचा प्राणघात करणे हा अल्प दोष (अल्पसावज्ज) आहे, तर मोठ्या शरीराच्या प्राण्याचा घात करणे हा मोठा दोष (महासावज्ज) आहे. का? कारण त्यासाठी अधिक प्रयत्न करावा लागतो. प्रयत्न समान असला तरी शरीराच्या मोठेपणामुळे तो मोठा दोष ठरतो. गुणांनी युक्त अशा मनुष्य इत्यादींच्या बाबतीत, अल्प गुण असलेल्या मनुष्याचा प्राणघात करणे हा अल्प दोष आहे, तर महागुणी मनुष्याचा घात करणे हा मोठा दोष आहे. शरीर आणि गुण समान असताना, क्लेश (राग-द्वेष) आणि उपक्रम (प्रयत्न) यांच्या सौम्यतेमुळे अल्प दोष होतो आणि त्यांच्या तीव्रतेमुळे मोठा दोष होतो, असे समजावे. हाच नियम उर्वरित शिकापदांच्या बाबतीतही समजावा. शिवाय, या पाच शिकापदांमध्ये सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठान (मद्यपान) हेच सर्वात मोठे दोषयुक्त आहे, प्राणातिपात इत्यादी तसे नाहीत. का? कारण ते मनुष्य असलेल्या व्यक्तीलाही उन्मत्त (वेडे) बनवणारे आहे आणि आर्य धर्मात (ध्यान, मार्ग, फल यामध्ये) अंतराय (अडथळा) निर्माण करणारे असल्यामुळे ते महासावज्ज आहे. अशा प्रकारे, येथे महासावज्जतेच्या दृष्टीने देखील निर्णय समजून घ्यावा. ปโยคโตติ เอตฺถ จ ปาณาติปาตสฺส สาหตฺถิโก, อาณตฺติโก, นิสฺสคฺคิโย, ถาวโร, วิชฺชามโย, อิทฺธิมโยติ ฉปฺปโยคา. ตตฺถ กาเยน วา กายปฺปฏิพทฺเธน วา ปหรณํ สาหตฺถิโก ปโยโค, โส อุทฺทิสฺสานุทฺทิสฺสเภทโต ทุวิโธ โหติ. ตตฺถ อุทฺทิสฺสเก ยํ อุทฺทิสฺส ปหรติ, ตสฺเสว มรเณน กมฺมุนา พชฺฌติ. ‘‘โย โกจิ มรตู’’ติ เอวํ อนุทฺทิสฺสเก ปหารปจฺจยา ยสฺส กสฺสจิ มรเณน. อุภยถาปิ จ ปหริตมตฺเต วา มรตุ, ปจฺฉา วา เตเนว โรเคน, ปหริตกฺขเณ เอว กมฺมุนา พชฺฌติ. มรณาธิปฺปาเยน จ ปหารํ ทตฺวา เตน อมตสฺส ปุน อญฺเญน จิตฺเตน ปหาเร ทินฺเน ปจฺฉาปิ ยทิ ปฐมปหาเรเนว มรติ, ตทา เอว กมฺมุนา พทฺโธ โหติ. อถ ทุติยปหาเรน, นตฺถิ ปาณาติปาโต. อุภเยหิ มเตปิ ปฐมปหาเรเนว กมฺมุนา พทฺโธ, อุภเยหิปิ อมเต เนวตฺถิ ปาณาติปาโต. เอส นโย พหุเกหิปิ [Pg.20] เอกสฺส ปหาเร ทินฺเน. ตตฺราปิ หิ ยสฺส ปหาเรน มรติ, ตสฺเสว กมฺมพทฺโธ โหติ. प्रयोगाच्या (प्रयत्नाच्या) दृष्टीने विचार केला असता, प्राणातिपाताचे सहा प्रयोग आहेत: साहत्थिक (स्वतःच्या हाताने करणे), आणत्तिक (आज्ञा देणे), निस्सग्गिय (फेकून मारणे), थावर (खड्डा इत्यादी कायमस्वरूपी योजना करणे), विज्जामय (मंत्रविद्येने मारणे) आणि इद्धिमय (ऋद्धीने मारणे). त्यापैकी, शरीराने किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूने प्रहार करणे हा 'साहत्थिक प्रयोग' होय. तो उद्देशून (उद्दिस्सक) आणि न उद्देशता (अनुद्दिस्सक) अशा दोन प्रकारचा असतो. त्यापैकी, उद्देशून केलेल्या प्रहारात ज्याला उद्देशून प्रहार केला जातो, त्याच्याच मृत्यूने कर्माचे बंधन होते. 'कोणीही मरो' अशा प्रकारे न उद्देशता केलेल्या प्रहारात, प्रहारामुळे कोणत्याही व्यक्तीच्या मृत्यूने कर्माचे बंधन होते. दोन्ही प्रकारांत, प्रहार केल्याबरोबर मरो किंवा नंतर त्याच जखमेमुळे मरो, प्रहार केल्याच्या क्षणीच कर्माचे बंधन होते. मारण्याच्या उद्देशाने प्रहार केला, पण तो मेला नाही; नंतर दुसऱ्या चित्ताने पुन्हा प्रहार केला असता, जर तो पहिल्याच प्रहारामुळे मेला, तर पहिल्या प्रहाराच्या वेळीच कर्माचे बंधन होते. जर दुसऱ्या प्रहारामुळे मेला, तर (पहिल्या प्रहाराने) प्राणातिपात होत नाही. दोन्ही प्रहारांमुळे मेला तरी पहिल्या प्रहारामुळेच कर्माचे बंधन होते. दोन्ही प्रहारांनी न मेल्यास प्राणातिपात होतच नाही. अनेकांनी मिळून एकावर प्रहार केला असता हाच नियम लागू होतो. कारण तेथेही ज्याच्या प्रहारामुळे तो मरतो, त्यालाच कर्माचे बंधन होते. อธิฏฺฐหิตฺวา ปน อาณาปนํ อาณตฺติโก ปโยโค. ตตฺถปิ สาหตฺถิเก ปโยเค วุตฺตนเยเนว กมฺมพทฺโธ อนุสฺสริตพฺโพ. ฉพฺพิโธ เจตฺถ นิยโม เวทิตพฺโพ – आज्ञा देऊन मारण्यास सांगणे हा 'आणत्तिक प्रयोग' होय. त्यातही साहत्थिक प्रयोगामध्ये सांगितलेल्या नियमानेच कर्माचे बंधन लक्षात घ्यावे. येथे सहा प्रकारचा नियम समजून घ्यावा - ‘‘วตฺถุ กาโล จ โอกาโส, อาวุธํ อิริยาปโถ; กิริยาวิเสโสติ อิเม, ฉ อาณตฺตินิยามกา’’ติ. (ปาจิ. อฏฺฐ. ๒.๑๗๔); "वस्तू (प्राणी), काळ, जागा, शस्त्र, इरियापथ आणि क्रियाविशेष—हे सहा आणत्तिक प्रयोगाचे नियमन करणारे (मर्यादा ठरवणारे) आहेत." ตตฺถ วตฺถูติ มาเรตพฺโพ ปาโณ. กาโลติ ปุพฺพณฺหสายนฺหาทิกาโล จ, โยพฺพนถาวริยาทิกาโล จ. โอกาโสติ คาโม วา นิคโม วา วนํ วา รจฺฉา วา สิงฺฆาฏกํ วาติ เอวมาทิ. อาวุธนฺติ อสิ วา อุสุ วา สตฺติ วาติ เอวมาทิ. อิริยาปโถติ มาเรตพฺพสฺส มารกสฺส จ ฐานํ วา นิสชฺชา วาติ เอวมาทิ. त्यापैकी, 'वस्तू' म्हणजे मारला जाणारा प्राणी. 'काळ' म्हणजे सकाळ, संध्याकाळ इत्यादी वेळ, आणि तारुण्य, वृद्धत्व इत्यादी अवस्था. 'जागा' म्हणजे गाव, नगर, अरण्य, रस्ता किंवा चौक इत्यादी. 'शस्त्र' म्हणजे तलवार, बाण किंवा भाला इत्यादी. 'इरियापथ' म्हणजे मारल्या जाणाऱ्याचे आणि मारणाऱ्याचे उभे राहणे किंवा बसणे इत्यादी शारीरिक स्थिती. กิริยาวิเสโสติ วิชฺฌนํ วา เฉทนํ วา เภทนํ วา สงฺขมุณฺฑิกํ วาติ เอวมาทิ. ยทิ หิ วตฺถุํ วิสํวาเทตฺวา ‘‘ยํ มาเรหี’’ติ อาณตฺโต, ตโต อญฺญํ มาเรติ, อาณาปกสฺส นตฺถิ กมฺมพทฺโธ. อถ วตฺถุํ อวิสํวาเทตฺวา มาเรติ, อาณาปกสฺส อาณตฺติกฺขเณ อาณตฺตสฺส มารณกฺขเณติ อุภเยสมฺปิ กมฺมพทฺโธ. เอส นโย กาลาทีสุปิ. 'क्रियाविशेष' म्हणजे भोसकणे, कापणे, फोडणे किंवा शंखमुंडिक (डोक्याची कवटी शंखासारखी सोलणे) इत्यादी पद्धती. जर वस्तूमध्ये (प्राण्यामध्ये) बदल करून, ज्याला मारण्याची आज्ञा दिली होती त्याऐवजी दुसऱ्यालाच मारले, तर आज्ञा देणाऱ्याला कर्माचे बंधन होत नाही. परंतु जर वस्तूमध्ये बदल न करता (त्याच प्राण्याला) मारले, तर आज्ञा देणाऱ्याला आज्ञा देण्याच्या क्षणी आणि आज्ञा पाळणाऱ्याला मारण्याच्या क्षणी, अशा दोघांनाही कर्माचे बंधन होते. हाच नियम काळ इत्यादींच्या बाबतीतही लागू होतो. มารณตฺถนฺตุ กาเยน วา กายปฺปฏิพทฺเธน วา ปหรณนิสฺสชฺชนํ นิสฺสคฺคิโย ปโยโค. โสปิ อุทฺทิสฺสานุทฺทิสฺสเภทโต ทุวิโธ เอว, กมฺมพทฺโธ เจตฺถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. मारण्याच्या उद्देशाने शरीराने किंवा शरीराशी संबंधित वस्तूने शस्त्र फेकून मारणे हा 'निस्सग्गिय प्रयोग' होय. तो देखील उद्देशून आणि न उद्देशता अशा दोन प्रकारचाच असतो, आणि येथे कर्माचे बंधन पूर्वी सांगितलेल्या नियमानेच समजून घ्यावे. มารณตฺถเมว โอปาตขณนํ, อปสฺเสนอุปนิกฺขิปนํ, เภสชฺชวิสยนฺตาทิปฺปโยชนํ วา ถาวโร ปโยโค. โสปิ อุทฺทิสฺสานุทฺทิสฺสเภทโต ทุวิโธ, ยโต ตตฺถปิ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว กมฺมพทฺโธ เวทิตพฺโพ. อยนฺตุ วิเสโส – มูลฏฺเฐน โอปาตาทีสุ ปเรสํ มูเลน วา มุธา วา ทินฺเนสุปิ ยทิ ตปฺปจฺจยา โกจิ มรติ, มูลฏฺฐสฺเสว กมฺมพทฺโธ. ยทิปิ จ เตน อญฺเญน วา ตตฺถ โอปาเต วินาเสตฺวา ภูมิสเม กเตปิ ปํสุโธวกา วา ปํสุํ คณฺหนฺตา, มูลขณกา วา มูลานิ ขณนฺตา อาวาฏํ กโรนฺติ[Pg.21], เทเว วา วสฺสนฺเต กทฺทโม ชายติ, ตตฺถ จ โกจิ โอตริตฺวา วา ลคฺคิตฺวา วา มรติ, มูลฏฺฐสฺเสว กมฺมพทฺโธ. ยทิ ปน เยน ลทฺธํ, โส อญฺโญ วา ตํ วิตฺถฏตรํ คมฺภีรตรํ วา กโรติ, ตปฺปจฺจยาว โกจิ มรติ, อุภเยสมฺปิ กมฺมพทฺโธ. ยถา ตุ มูลานิ มูเลหิ สํสนฺทนฺติ, ตถา ตตฺร ถเล กเต มุจฺจติ. เอวํ อปสฺเสนาทีสุปิ ยาว เตสํ ปวตฺติ, ตาว ยถาสมฺภวํ กมฺมพทฺโธ เวทิตพฺโพ. मारण्याच्या उद्देशाने खड्डा खणणे, टेकण्याची फळी जवळ ठेवणे किंवा विषारी औषध, यंत्र इत्यादींची योजना करणे हा 'थावर प्रयोग' होय. तो देखील उद्देशून आणि न उद्देशता अशा दोन प्रकारचा असतो; कारण त्यातही पूर्वी सांगितलेल्या नियमानेच कर्माचे बंधन समजून घ्यावे लागते. परंतु यात हा विशेष फरक आहे— मूळ कर्त्याने तो खड्डा इत्यादी इतरांना विकला किंवा मोफत दिला असला तरी, जर त्या कारणामुळे कोणी मरण पावले, तर मूळ कर्त्यालाच कर्माचे बंधन होते. जरी त्याने किंवा दुसऱ्या कोणी तो खड्डा नष्ट करून जमीन सपाट केली असली, तरी जर माती धुवून काढणारे माती नेत असताना किंवा मुळे खोदणारे मुळे खोदताना पुन्हा खड्डा तयार करतात, किंवा पाऊस पडल्यामुळे तेथे चिखल होतो आणि त्यात कोणी उतरून किंवा अडकून मरण पावले, तर मूळ कर्त्यालाच कर्माचे बंधन होते. परंतु, ज्याला तो खड्डा मिळाला त्याने किंवा दुसऱ्या कोणी तो अधिक रुंद किंवा खोल केला आणि त्या कारणामुळे कोणी मरण पावले, तर दोघांनाही कर्माचे बंधन होते. परंतु ज्याप्रमाणे मुळे मुळांशी जोडली जातात, त्याप्रमाणे तेथे कठीण जमीन (सपाट जमीन) केल्यास तो मुक्त होतो. याचप्रमाणे टेकण्याच्या फळी इत्यादींच्या बाबतीतही, जोपर्यंत त्यांचे अस्तित्व टिकून असते, तोपर्यंत योग्यतेनुसार कर्माचे बंधन समजून घ्यावे. มารณตฺถํ ปน วิชฺชาปริชปฺปนํ วิชฺชามโย ปโยโค. ทาฐาวุธาทีนํ ทาฐาโกฏนาทิมิว มารณตฺถํ กมฺมวิปากชิทฺธิวิการกรณํ อิทฺธิมโย ปโยโคติ. อทินฺนาทานสฺส ตุ เถยฺยปสยฺหปฏิจฺฉนฺนปริกปฺปกุสาวหารวสปฺปวตฺตา สาหตฺถิกาณตฺติกาทโย ปโยคา, เตสมฺปิ วุตฺตานุสาเรเนว ปเภโท เวทิตพฺโพ. อพฺรหฺมจริยาทีนํ ติณฺณมฺปิ สาหตฺถิโก เอว ปโยโค ลพฺภตีติ. เอวเมตฺถ ปโยคโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. मारण्याच्या उद्देशाने मंत्राचा जप करणे हा 'विज्जामय प्रयोग' होय. दाठावूध (ज्यांच्या दातांमध्ये विष असते असे राजे) इत्यादींनी दात खाण्याप्रमाणे, मारण्याच्या उद्देशाने कर्मविपाकामुळे प्राप्त झालेल्या ऋद्धीचा वापर करणे हा 'इद्धिमय प्रयोग' होय. अदिन्नादानाच्या (चोरीच्या) बाबतीत मात्र, थेय्य (चोरीने), पसय्ह (बळजबरीने), पटिच्छन्न (लपवून), परिकप्प (योजना करून) आणि कुसावहार (खोट्या मापाने किंवा शिक्क्याने) इत्यादींच्या स्वरूपात होणारे साहत्थिक, आणत्तिक इत्यादी प्रयोग असतात; त्यांचे देखील वर्गीकरण पूर्वी सांगितलेल्या नियमांनुसारच समजून घ्यावे. अब्रह्मचर्य इत्यादी उर्वरित तीन शिकापदांच्या बाबतीत केवळ साहत्थिक प्रयोगच आढळतो. अशा प्रकारे, येथे प्रयोगाच्या दृष्टीने देखील निर्णय समजून घ्यावा. องฺคโตติ เอตฺถ จ ปาณาติปาตสฺส ปญฺจ องฺคานิ ภวนฺติ – ปาโณ จ โหติ, ปาณสญฺญี จ, วธกจิตฺตญฺจ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ, วายมติ, เตน จ มรตีติ. อทินฺนาทานสฺสาปิ ปญฺเจว – ปรปริคฺคหิตญฺจ โหติ, ปรปริคฺคหิตสญฺญี จ, เถยฺยจิตฺตญฺจ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ, วายมติ, เตน จ อาทาตพฺพํ อาทานํ คจฺฉตีติ. อพฺรหฺมจริยสฺส ปน จตฺตาริ องฺคานิ ภวนฺติ – อชฺฌาจริยวตฺถุ จ โหติ, ตตฺถ จ เสวนจิตฺตํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ, เสวนปจฺจยา ปโยคญฺจ สมาปชฺชติ, สาทิยติ จาติ, ตถา ปเรสํ ทฺวินฺนมฺปิ. ตตฺถ มุสาวาทสฺส ตาว มุสา จ โหติ ตํ วตฺถุ, วิสํวาทนจิตฺตญฺจ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ, ตชฺโช จ วายาโม, ปรวิสํวาทนญฺจ วิญฺญาปยมานา วิญฺญตฺติ ปวตฺตตีติ จตฺตาริ องฺคานิ เวทิตพฺพานิ. สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานสฺส ปน สุราทีนญฺจ อญฺญตรํ โหติ มทนียปาตุกมฺยตาจิตฺตญฺจ ปจฺจุปฏฺฐิตํ โหติ, ตชฺชญฺจ วายามํ อาปชฺชติ, ปีเต จ ปวิสตีติ อิมานิ จตฺตาริ องฺคานีติ. เอวเมตฺถ องฺคโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. अंगांच्या (घटकांच्या) दृष्टीने: येथे प्राणातिपाताचे पाच घटक असतात – प्राणी (जीवंत प्राणी) असावा, तो प्राणी आहे अशी संज्ञा (जाणीव) असावी, मारण्याचा विचार (वधकचित्त) उपस्थित असावा, प्रयत्न करावा आणि त्याने तो प्राणी मरावा. अदिन्नादानाचेही पाचच घटक असतात – ती वस्तू दुसऱ्याच्या मालकीची असावी, ती दुसऱ्याच्या मालकीची आहे अशी संज्ञा असावी, चोरीचे चित्त उपस्थित असावे, प्रयत्न करावा आणि त्याने ती वस्तू हस्तगत केली जावी. अब्रह्मचर्याचे तर चार घटक असतात – अतिक्रमणाची वस्तू (स्थान) असावी, तेथे सेवनाचे चित्त उपस्थित असावे, सेवनाच्या हेतूने प्रयत्न करावा आणि त्याचा आस्वाद घ्यावा. त्याचप्रमाणे इतर दोन शिक्षापदांचे देखील घटक असतात. त्यापैकी प्रथम मुसावादाचे – ती गोष्ट असत्य असावी, फसवणुकीचे चित्त उपस्थित असावे, तदनुरूप प्रयत्न असावा आणि दुसऱ्याला फसवण्यासाठी विज्ञापना (इशारा) प्रवृत्त व्हावी, हे चार घटक जाणावेत. सुरामेरयमज्जपमादट्ठानाचे तर – सुरा इत्यादींपैकी काहीतरी असावे, नशा आणणारे पेय पिण्याची इच्छा असलेले चित्त उपस्थित असावे, तदनुरूप प्रयत्न करावा आणि प्यायल्यावर ते शरीरात प्रवेश करावे, हे चार घटक आहेत. अशा प्रकारे, येथे अंगांच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. สมุฏฺฐานโตติ ปาณาติปาตอทินฺนาทานมุสาวาทา เจตฺถ กายจิตฺตโต, วาจาจิตฺตโต, กายวาจาจิตฺตโต จาติ ติสมุฏฺฐานา โหนฺติ. อพฺรหฺมจริยํ กายจิตฺตวเสน เอกสมุฏฺฐานเมว. สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานํ กายโต จ, กายจิตฺตโต จาติ ทฺวิสมุฏฺฐานนฺติ. เอวเมตฺถ สมุฏฺฐานโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. समुत्थानाच्या (उत्पत्तीच्या कारणांच्या) दृष्टीने: येथे प्राणातिपात, अदिन्नादान आणि मुसावाद हे काय-चित्त (शरीर आणि मन), वाचा-चित्त (वाणी आणि मन) आणि काय-वाचा-चित्त (शरीर, वाणी आणि मन) या तीन समुत्थानांमुळे होतात. अब्रह्मचर्य हे काय-चित्ताच्या प्रभावाने केवळ एकच समुत्थान असणारे आहे. सुरामेरयमज्जपमादट्ठाण हे कायेमुळे (शरीरामुळे) आणि काय-चित्तामुळे (शरीर आणि मनामुळे) असे दोन समुत्थान असणारे आहे. अशा प्रकारे, येथे समुत्थानाच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. เวทนาโตติ [Pg.22] เอตฺถ จ ปาณาติปาโต ทุกฺขเวทนาสมฺปยุตฺโตว. อทินฺนาทานํ ตีสุ เวทนาสุ อญฺญตรเวทนาสมฺปยุตฺตํ, ตถา มุสาวาโท. อิตรานิ ทฺเว สุขาย วา อทุกฺขมสุขาย วา เวทนาย สมฺปยุตฺตานีติ. เอวเมตฺถ เวทนาโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. वेदनेच्या दृष्टीने: येथे प्राणातिपात हा केवळ दुःखवेदनेशीच संप्रयुक्त (युक्त) असतो. अदिन्नादान हे तीन वेदनांपैकी कोणत्याही एका वेदनेशी संप्रयुक्त असते, त्याचप्रमाणे मुसावाद देखील. इतर दोन (अब्रह्मचर्य आणि सुरामेरय) सुखवेदनेशी किंवा अदुःख-असुख वेदनेशी संप्रयुक्त असतात. अशा प्रकारे, येथे वेदनेच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. มูลโตติ ปาณาติปาโต เจตฺถ โทสโมหมูโล. อทินฺนาทานมุสาวาทา โลภโมหมูลา วา โทสโมหมูลา วา. อิตรานิ ทฺเว โลภโมหมูลานีติ. เอวเมตฺถ มูลโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. मुळाच्या (हेतूच्या) दृष्टीने: येथे प्राणातिपात हा द्वेष-मोह-मूलक असतो. अदिन्नादान आणि मुसावाद हे लोभ-मोह-मूलक किंवा द्वेष-मोह-मूलक असतात. इतर दोन (अब्रह्मचर्य आणि सुरामेरय) लोभ-मोह-मूलक असतात. अशा प्रकारे, येथे मुळाच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. กมฺมโตติ ปาณาติปาตอทินฺนาทานอพฺรหฺมจริยานิ เจตฺถ กายกมฺมเมว กมฺมปถปฺปตฺตาเนว จ, มุสาวาโท วจีกมฺมเมว. โย ปน อตฺถภญฺชโก, โส กมฺมปถปฺปตฺโต. อิตโร กมฺมเมว. สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานํ กายกมฺมเมวาติ. เอวเมตฺถ กมฺมโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. कर्माच्या दृष्टीने: येथे प्राणातिपात, अदिन्नादान आणि अब्रह्मचर्य हे केवळ कायकर्मच (शारीरिक कर्मच) आहेत आणि ते कर्मपथाला प्राप्त झालेले आहेत. मुसावाद हा केवळ वचीकर्म (वाचिक कर्म) आहे. परंतु जो मुसावाद दुसऱ्याच्या हिताचा नाश करणारा असतो, तो कर्मपथाला प्राप्त होतो. इतर (साधा मुसावाद) केवळ कर्मच आहे. सुरामेरयमज्जपमादट्ठाण हे केवळ कायकर्मच आहे. अशा प्रकारे, येथे कर्माच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. วิรมโตติ เอตฺถ อาห ‘‘ปาณาติปาตาทีหิ วิรมนฺโต กุโต วิรมตี’’ติ? วุจฺจเต – สมาทานวเสน ตาว วิรมนฺโต อตฺตโน วา ปเรสํ วา ปาณาติปาตาทิอกุสลโต วิรมติ. กิมารภิตฺวา? ยโต วิรมติ, ตเทว. สมฺปตฺตวเสนาปิ วิรมนฺโต วุตฺตปฺปการากุสลโตว. กิมารภิตฺวา? ปาณาติปาตาทีนํ วุตฺตารมฺมณาเนว. เกจิ ปน ภณนฺติ ‘‘สุราเมรยมชฺชสงฺขาเต สงฺขาเร อารภิตฺวา สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา วิรมติ, สตฺตสงฺขาเรสุ ยํ ปน อวหริตพฺพํ ภญฺชิตพฺพญฺจ, ตํ อารภิตฺวา อทินฺนาทานา มุสาวาทา จ, สตฺเตเยวารภิตฺวา ปาณาติปาตา อพฺรหฺมจริยา จา’’ติ. ตทญฺเญ ‘‘เอวํ สนฺเต ‘อญฺญํ จินฺเตนฺโต อญฺญํ กเรยฺย, ยญฺจ ปชหติ, ตํ น ชาเนยฺยา’ติ เอวํทิฏฺฐิกา หุตฺวา อนิจฺฉมานา ยเทว ปชหติ, ตํ อตฺตโน ปาณาติปาตาทิอกุสลเมวารภิตฺวา วิรมตี’’ติ วทนฺติ. ตทยุตฺตํ. กสฺมา? ตสฺส ปจฺจุปฺปนฺนาภาวโต พหิทฺธาภาวโต จ. สิกฺขาปทานญฺหิ วิภงฺคปาเฐ ‘‘ปญฺจนฺนํ สิกฺขาปทานํ กติ กุสลา…เป… กติ อรณา’’ติ ปุจฺฉิตฺวา ‘‘กุสลาเยว, สิยา สุขาย เวทนาย สมฺปยุตฺตา’’ติ (วิภ. ๗๑๖) เอวํ ปวตฺตมาเน วิสฺสชฺชเน ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนารมฺมณา’’ติ จ ‘‘พหิทฺธารมฺมณา’’ติ จ เอวํ ปจฺจุปฺปนฺนพหิทฺธารมฺมณตฺตํ วุตฺตํ, ตํ อตฺตโน ปาณาติปาตาทิอกุสลํ อารภิตฺวา วิรมนฺตสฺส น ยุชฺชติ. ยํ ปน วุตฺตํ – ‘‘อญฺญํ [Pg.23] จินฺเตนฺโต อญฺญํ กเรยฺย, ยญฺจ ปชหติ, ตํ น ชาเนยฺยา’’ติ. ตตฺถ วุจฺจเต – น กิจฺจสาธนวเสน ปวตฺเตนฺโต อญฺญํ จินฺเตนฺโต อญฺญํ กโรตีติ วา, ยญฺจ ปชหติ, ตํ น ชานาตีติ วา วุจฺจติ. विरतीच्या (अलिप्ततेच्या) दृष्टीने: येथे विचारले आहे - "प्राणातिपात इत्यादींपासून विरत होणारा कशापासून विरत होतो?" उत्तर दिले जाते - प्रथम, समादानाच्या (व्रत घेण्याच्या) प्रभावाने विरत होणारा स्वतःच्या किंवा इतरांच्या प्राणातिपात इत्यादी अकुशलापासून विरत होतो. कशाला आलंबन (विषय) करून? ज्याच्यापासून तो विरत होतो, त्यालाच आलंबन करून. प्रसंगाच्या (संपत्तीच्या) प्रभावाने विरत होणारा देखील पूर्वोक्त प्रकारच्या अकुशलापासूनच विरत होतो. कशाला आलंबन करून? प्राणातिपात इत्यादींच्या पूर्वोक्त आलंबनांनाच आलंबन करून. परंतु काही आचार्य म्हणतात - "सुरा, मेरय आणि मद्य संज्ञक संस्कारांना आलंबन करून सुरामेरयमज्जपमादट्ठानापासून विरत होतो; सत्व-संस्कारांपैकी ज्याचे अपहरण केले जावे किंवा ज्याचा नाश केला जावा, त्याला आलंबन करून अदिन्नादान आणि मुसावादापासून विरत होतो; आणि केवळ प्राण्यांनाच आलंबन करून प्राणातिपात आणि अब्रह्मचर्यापासून विरत होतो." इतर आचार्य यावर म्हणतात - "असे असल्यास, 'एक विचार करत असताना दुसरा काहीतरी करेल, आणि ज्याचा तो त्याग करतो, ते त्याला समजणार नाही' अशी दृष्टी असणारे होऊन, अनिच्छेने जो त्याग करतो, तो स्वतःच्या प्राणातिपात इत्यादी अकुशलालाच आलंबन करून विरत होतो." हे अयोग्य आहे. का? कारण ते वर्तमानकालीन (पच्चुप्पन्न) नसल्यामुळे आणि बाह्य (बहिद्धा) नसल्यामुळे. कारण शिक्षापदांच्या विभंगपाठात 'पाच शिक्षापदांपैकी किती कुशल आहेत... इत्यादी... किती अरण आहेत?' असा प्रश्न विचारून, 'कुशलच आहेत, कदाचित सुखवेदनेशी संप्रयुक्त असतात' अशा प्रकारे उत्तर दिले जात असताना, 'वर्तमानकालीन आलंबन असणारे' आणि 'बाह्य आलंबन असणारे' असे वर्तमानकालीन व बाह्य आलंबनत्व सांगितले आहे. ते स्वतःच्या प्राणातिपात इत्यादी अकुशलाला आलंबन करून विरत होणाऱ्या व्यक्तीच्या बाबतीत जुळत नाही. आणि जे म्हटले आहे की - 'एक विचार करत असताना दुसरा काहीतरी करेल, आणि ज्याचा तो त्याग करतो, ते त्याला समजणार नाही.' त्याविषयी सांगितले जाते - कार्य सिद्ध करण्याच्या दृष्टीने प्रवृत्त होणारा मनुष्य एक विचार करत असताना दुसरा काहीतरी करतो असे म्हटले जात नाही, किंवा ज्याचा तो त्याग करतो, ते त्याला समजत नाही असेही म्हटले जात नाही. ‘‘อารภิตฺวาน อมตํ, ชหนฺโต สพฺพปาปเก; นิทสฺสนญฺเจตฺถ ภเว, มคฺคฏฺโฐริยปุคฺคโล’’ติ. "अमृताला (निर्वाणाला) आलंबन करून, सर्व पापांचा त्याग करणारा; मार्गस्थ आर्यपुद्गल हा येथे दृष्टांत (पुरावा) असावा." เอวเมตฺถ วิรมโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. अशा प्रकारे, येथे विरतीच्या दृष्टीने देखील निर्णय जाणावा. ผลโตติ สพฺเพ เอว เจเต ปาณาติปาตาทโย ทุคฺคติผลนิพฺพตฺตกา โหนฺติ, สุคติยญฺจ อนิฏฺฐากนฺตามนาปวิปากนิพฺพตฺตกา โหนฺติ, สมฺปราเย ทิฏฺฐธมฺเม เอว จ อเวสารชฺชาทิผลนิพฺพตฺตกา. อปิจ ‘‘โย สพฺพลหุโส ปาณาติปาตสฺส วิปาโก มนุสฺสภูตสฺส อปฺปายุกสํวตฺตนิโก โหตี’’ติ (อ. นิ. ๘.๔๐) เอวมาทินา นเยเนตฺถ ผลโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. फलाच्या (परिणामाच्या) दृष्टीने: हे सर्व प्राणातिपात इत्यादीुकुशल दुर्गतीचे फल उत्पन्न करणारे असतात, आणि सुगतीमध्ये देखील अनिष्ट, अवांछित आणि अप्रिय विपाक (परिणाम) उत्पन्न करणारे असतात; तसेच परलोकात आणि याच जन्मात (दृष्टधर्मात) भ्याडपणा (अवैशारद्य) इत्यादी फल उत्पन्न करणारे असतात. शिवाय, 'प्राणातिपाताचा जो सर्वात सौम्य विपाक आहे, तो मनुष्य झाल्यावर अल्पायुषी बनवणारा ठरतो' इत्यादी पद्धतीने येथे फलाच्या दृष्टीने देखील निर्णय जाणावा. อปิ เจตฺถ ปาณาติปาตาทิเวรมณีนมฺปิ สมุฏฺฐานเวทนามูลกมฺมผลโต วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. ตตฺถายํ วิญฺญาปนา – สพฺพา เอว เจตา เวรมณิโย จตูหิ สมุฏฺฐหนฺติ กายโต, กายจิตฺตโต, วาจาจิตฺตโต, กายวาจาจิตฺตโต จาติ. สพฺพา เอว จ สุขเวทนาสมฺปยุตฺตา วา, อทุกฺขมสุขเวทนาสมฺปยุตฺตา วา, อโลภาโทสมูลา วา อโลภาโทสาโมหมูลา วา. จตสฺโสปิ เจตฺถ กายกมฺมํ, มุสาวาทาเวรมณี วจีกมฺมํ, มคฺคกฺขเณ จ จิตฺตโตว สมุฏฺฐหนฺติ, สพฺพาปิ มโนกมฺมํ. शिवाय, येथे प्राणातिपात इत्यादींपासून मिळणाऱ्या विरतींचा (अलिप्ततेचा) देखील समुत्थान, वेदना, मूळ, कर्म आणि फल यांच्या दृष्टीने निर्णय जाणावा. त्याविषयी हे स्पष्टीकरण आहे - या सर्व विरती काय (शरीर), काय-चित्त (शरीर आणि मन), वाचा-चित्त (वाणी आणि मन) आणि काय-वाचा-चित्त (शरीर, वाणी आणि मन) या चार समुत्थानांमुळे उत्पन्न होतात. आणि या सर्व विरती सुखवेदनेशी संप्रयुक्त किंवा अदुःख-असुख वेदनेशी संप्रयुक्त असतात; तसेच अलोभ-अद्वेष-मूलक किंवा अलोभ-अद्वेष-अमोह-मूलक असतात. येथे चार विरती कायकर्म आहेत, मुसावादापासून विरती हे वचीकर्म आहे, आणि मार्गक्षणी (मार्गाच्या क्षणी) त्या केवळ चित्तापासूनच उत्पन्न होतात, म्हणून त्या सर्व मनोकर्म आहेत. ปาณาติปาตา เวรมณิยา เจตฺถ องฺคปจฺจงฺคสมฺปนฺนตา อาโรหปริณาหสมฺปตฺติตา ชวสมฺปตฺติตา สุปฺปติฏฺฐิตปาทตา จารุตา มุทุตา สุจิตา สูรตา มหพฺพลตา วิสฺสตฺถวจนตา โลกปิยตา เนลตา อเภชฺชปริสตา อจฺฉมฺภิตา ทุปฺปธํสิตา ปรูปกฺกเมน อมรณตา อนนฺตปริวารตา สุรูปตา สุสณฺฐานตา อปฺปาพาธตา อโสกิตา ปิเยหิ มนาเปหิ สทฺธึ อวิปฺปโยคตา ทีฆายุกตาติ เอวมาทีนิ ผลานิ. येथे प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरत राहण्याचे हे परिणाम जाणावेत: अवयवांची परिपूर्णता (अंगप्रत्यंगसंपन्नता), शरीराची योग्य उंची व रुंदी (आरोहपरिणाहसंपत्ती), वेगवानता (जवसपन्नता), पाय जमिनीवर व्यवस्थित टेकणे (सुप्रतिष्ठितपादता), सौंदर्य (चारुता), कोमलता (मृदुता), स्वच्छता (शुचिता), शूरता (शूरता), महाबलशाली असणे (महाबलता), स्पष्ट व मधुर बोलणे (विसट्ठवचनता), लोकांचे प्रिय असणे (लोकरियता), निर्दोषता (नेलता), अभेद्य परिषद असणे (अभिज्जपरिसता), भयशून्य असणे (अच्छंभिता), इतरांकडून पराभूत न होणे (दुप्पधंसिता), दुसऱ्यांच्या उपक्रमामुळे (प्रयत्नामुळे) मृत्यू न येणे (परूपक्कमेन अमरणता), अनंत परिवार असणे (अनंतपरिवारता), सुंदर रूप असणे (सुरूपता), सुसंस्थानता (सुसंठणता), अल्प आजार असणे (अप्पाबाधता), शोक नसणे (असोकिता), प्रिय व मनासारख्या व्यक्तींशी वियोग न होणे (पियेहि मनापेहि सद्धिं अविप्पयोगता) आणि दीर्घायुष्य असणे (दीर्घायुकता) इत्यादी. อทินฺนาทานา เวรมณิยา มหทฺธนตา ปหูตธนธญฺญตา อนนฺตโภคตา อนุปฺปนฺนโภคุปฺปตฺติตา อุปฺปนฺนโภคถาวรตา อิจฺฉิตานํ โภคานํ ขิปฺปปฺปฏิลาภิตา ราชโจรุทกคฺคิอปฺปิยทายาเทหิ อสาธารณโภคตา [Pg.24] อสาธารณธนปฺปฏิลาภิตา โลกุตฺตมตา นตฺถิกภาวสฺส อชานนตา สุขวิหาริตาติ เอวมาทีนิ. अदिन्नादानापासून (चोरीपासून) विरत राहण्याचे हे परिणाम जाणावेत: महाधनवान असणे (महाधनता), भरपूर धनधान्य असणे (पहूतधनधान्यता), अनंत भोग (उपभोग्य वस्तू) असणे (अनंतभोगता), न मिळालेले भोग प्राप्त होणे (अनुप्पन्नभोगुप्पत्तिता), मिळालेले भोग स्थिर राहणे (उप्पन्नभोगथावरता), इच्छित भोगांची त्वरित प्राप्ती होणे (इच्छितानं भोगानं खिप्पप्पटिलाभिता), राजा, चोर, पाणी, अग्नी आणि अप्रिय वारसदार यांच्याशी सामायिक नसलेले (म्हणजेच त्यांच्यापासून सुरक्षित असलेले) भोग असणे (राजचोरुदकग्गिअप्पियदायादेहि असाधारणभोगता), असाधारण धनप्राप्ती होणे (असाधारणधनप्पटिलाभिता), लोकांमध्ये श्रेष्ठ असणे (लोकुत्तमता), 'काही नाही' (अभाव) ही स्थिती कधीही न अनुभवणे (नत्थिकभावस्स अजाननता) आणि सुखाने विहार करणे (सुखविहारिता) इत्यादी. อพฺรหฺมจริยา เวรมณิยา วิคตปจฺจตฺถิกตา สพฺพชนปิยตา อนฺนปานวตฺถสยนาทีนํ ลาภิตา สุขสยนตา สุขปฺปฏิพุชฺฌนตา อปายภยวินิมุตฺตตา อิตฺถิภาวปฺปฏิลาภสฺส วา นปุํสกภาวปฺปฏิลาภสฺส วา อภพฺพตา อกฺโกธนตา ปจฺจกฺขการิตา อปติตกฺขนฺธตา อนโธมุขตา อิตฺถิปุริสานํ อญฺญมญฺญปิยตา ปริปุณฺณินฺทฺริยตา ปริปุณฺณลกฺขณตา นิราสงฺกตา อปฺโปสฺสุกฺกตา สุขวิหาริตา อกุโตภยตา ปิยวิปฺปโยคาภาวตาติ เอวมาทีนิ. अब्रह्मचर्यापासून (अब्रह्मचर्य किंवा व्यभिचारापासून) विरत राहण्याचे हे परिणाम जाणावेत: शत्रूंचा अभाव असणे (विगतपच्चत्थिकता), सर्व लोकांचे प्रिय असणे (सब्बजनप्रियता), अन्न, पाणी, वस्त्र, शय्या इत्यादींची सहज प्राप्ती होणे (अन्नपानवत्थसयनादीनं लाभिता), सुखाने झोप लागणे (सुखसयनता), सुखाने जागे होणे (सुखप्पटिवुज्झनता), अपाय (नरक इत्यादी) भयापासून मुक्त असणे (अपायभयविनिमुत्तता), स्त्रीभाव किंवा नपुंसकभाव प्राप्त न होणे (इत्थिभावप्पटिलाभस्स वा नपुंसकभावप्पटिलाभस्स वा अभब्बता), क्रोधरहित असणे (अक्कोधनता), प्रत्यक्ष कार्य करणारे असणे (पच्चक्खकारिता), मान खाली न घालणे (अपतितक्खन्धता), अधोमुख न होणे (अनधोमुखता), स्त्री-पुरुषांचे एकमेकांवर प्रेम असणे (इत्थिपुरिसानं अञ्ञमञ्ञप्रियता), परिपूर्ण इंद्रिये असणे (परिपुण्णिन्द्रियता), परिपूर्ण लक्षणे असणे (परिपुण्णलक्खणता), शंकारहित असणे (निरासङ्कता), अल्प-उत्सुकता (चिंतेचा अभाव) असणे (अप्पोस्सुक्कता), सुखाने विहार करणे (सुखविहारिता), कुठूनही भय नसणे (अकुतोभयता) आणि प्रिय व्यक्तींच्या वियोगाचा अभाव असणे (पियविप्पयोगाभावता) इत्यादी. มุสาวาทา เวรมณิยา วิปฺปสนฺนินฺทฺริยตา วิสฺสฏฺฐมธุรภาณิตา สมสิตสุทฺธทนฺตตา นาติถูลตา นาติกิสตา นาติรสฺสตา นาติทีฆตา สุขสมฺผสฺสตา อุปฺปลคนฺธมุขตา สุสฺสูสกปริชนตา อาเทยฺยวจนตา กมลุปฺปลสทิสมุทุโลหิตตนุชิวฺหตา อนุทฺธตตา อจปลตาติ เอวมาทีนิ. मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) विरत राहण्याचे हे परिणाम जाणावेत: अत्यंत प्रसन्न इंद्रिये असणे (विप्पसन्निन्द्रियता), स्पष्ट व मधुर बोलणे (विस्सट्ठमधुरभाणिता), समान, पांढरे व स्वच्छ दात असणे (समसितसुद्धदन्तता), अतिशय स्थूल नसणे (नातिथूलता), अतिशय कृश नसणे (नातिकिसता), अतिशय बुटके नसणे (नातिरस्सता), अतिशय उंच नसणे (नातिदीघता), सुखद स्पर्श असणे (सुखसम्फस्सता), मुखातून कमळासारखा सुगंध येणे (उप्पलसगन्धमुखता), ऐकण्यास उत्सुक असणारा परिवार असणे (सुस्सूसकपरिजनता), स्वीकारार्ह (विश्वासार्ह) बोलणे असणे (आदेय्यवचनता), कमळ किंवा उत्पलासारखी मऊ, लाल व पातळ जीभ असणे (कमलुप्पलसदिसमुदुलोहिततनुजिव्हता), उद्धटपणा नसणे (अनुद्धतता) आणि चंचलता नसणे (अचपलता) इत्यादी. สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานา เวรมณิยา อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺเนสุ สพฺพกิจฺจกรณีเยสุ ขิปฺปํ ปฏิชานนตา สทา อุปฏฺฐิตสติตา อนุมฺมตฺตกตา ญาณวนฺตตา อนลสตา อชฬตา อเนลมูคตา อมตฺตตา อปฺปมตฺตตา อสมฺโมหตา อจฺฉมฺภิตา อสารมฺภิตา อนุสฺสงฺกิตา สจฺจวาทิตา อปิสุณาผรุสาสมฺผปลาปวาทิตา รตฺตินฺทิวมตนฺทิตตา กตญฺญุตา กตเวทิตา อมจฺฉริตา จาควนฺตตา สีลวนฺตตา อุชุตา อกฺโกธนตา หิริมนตา โอตฺตปฺปิตา อุชุทิฏฺฐิกตา มหาปญฺญตา เมธาวิตา ปณฺฑิตตา อตฺถานตฺถกุสลตาติ เอวมาทีนิ ผลานิ. เอวเมตฺถ ปาณาติปาตาทิเวรมณีนํ สมุฏฺฐานเวทนามูลกมฺมผลโตปิ วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโย. सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठानापासून (मद्यपानापासून) विरत राहण्याचे हे परिणाम जाणावेत: भूत, भविष्य आणि वर्तमान काळातील सर्व कर्तव्ये त्वरित समजणे (खिप्पं पटिजाननता), नेहमी स्मृती जागृत असणे (सदा उपट्ठितसतिता), कधीही वेडे न होणे (अनुम्मत्तकता), ज्ञानवान असणे (ञाणवन्तता), आळशी नसणे (अनलसता), जडबुद्धी नसणे (अजळता), मुके-बहिरे नसणे (अनेळमूकता), मद्यधुंद न होणे (अमत्तता), अप्रमत्त (जागृत) असणे (अप्पमत्तता), संभ्रमित न होणे (असम्मोहता), भयशून्य असणे (अच्छंभिता), क्रोधावेश नसणे (असारम्भिता), शंकारहित असणे (अनुस्सङ्किता), सत्यवादी असणे (सच्चवादिता), चहाडी, कठोर व निरर्थक बडबड न करणे (अपिसुणाफरुसासम्फप्पलापवादिता), रात्रंदिवस आळस नसणे (रत्तिन्दिवमतन्दितता), कृतज्ञ असणे (कृतज्ञता), कृतवेदी असणे (कृतवेदिता), मत्सररहित असणे (अमच्छरिता), त्यागशील असणे (चागवन्तता), शीलवान असणे (सीलवन्तता), सरळ (प्रामाणिक) असणे (उजुता), क्रोधरहित असणे (अक्कोधनता), मनात लज्जा (ह्री) असणे (हिरिमन्तता), पापभिरूता (ओत्तप्प) असणे (ओत्तप्पिता), सरळ दृष्टी (सम्यक् दृष्टी) असणे (उजुदिट्ठिकता), महाप्रज्ञावान असणे (महापञ्ञता), मेधावी असणे (मेधाविता), पंडित असणे (पण्डितता), आणि हित-अहित ओळखण्यात कुशळता (अत्थानत्थकुसळता) इत्यादी परिणाम जाणावेत. अशा प्रकारे, येथे प्राणातिपात इत्यादींपासून विरत राहण्याच्या बाबतीत समुत्थान, वेदना, मूळ आणि कर्मफलाच्या आधारे देखील निर्णय (विनिच्छय) समजून घ्यावा. ปจฺฉิมปญฺจสิกฺขาปทวณฺณนา नंतरच्या पाच सिक्खापदांचे स्पष्टीकरण (वर्णन) อิทานิ ยํ วุตฺตํ – आता जे म्हटले आहे – ‘‘โยเชตพฺพํ ตโต ยุตฺตํ, ปจฺฉิเมสฺวปิ ปญฺจสุ; อาเวณิกญฺจ วตฺตพฺพํ, เญยฺยา หีนาทิตาปิ จา’’ติ. “त्यानंतरच्या (शेवटच्या) पाच सिक्खापदांमध्ये देखील जे योग्य आहे ते योजावे; आणि त्यांचे विशिष्ट (आवेणिक) गुण सांगावेत, तसेच हीन इत्यादी अवस्था देखील जाणाव्यात.” ตสฺสายํ [Pg.25] อตฺถวณฺณนา – เอติสฺสา ปุริมปญฺจสิกฺขาปทวณฺณนาย ยํ ยุชฺชติ, ตํ ตโต คเหตฺวา ปจฺฉิเมสฺวปิ ปญฺจสุ สิกฺขาปเทสุ โยเชตพฺพํ. ตตฺถายํ โยชนา – ยเถว หิ ปุริมสิกฺขาปเทสุ อารมฺมณโต จ สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานํ รูปายตนาทิอญฺญตรสงฺขารารมฺมณํ, ตถา อิธ วิกาลโภชนํ. เอเตน นเยน สพฺเพสํ อารมฺมณเภโท เวทิตพฺโพ. อาทานโต จ ยถา ปุริมานิ สามเณเรน วา อุปาสเกน วา สมาทิยนฺเตน สมาทินฺนานิ โหนฺติ, ตถา เอตานิปิ. องฺคโตปิ ยถา ตตฺถ ปาณาติปาตาทีนํ องฺคเภโท วุตฺโต, เอวมิธาปิ วิกาลโภชนสฺส จตฺตาริ องฺคานิ – วิกาโล, ยาวกาลิกํ, อชฺโฌหรณํ, อนุมฺมตฺตกตาติ. เอเตนานุสาเรน เสสานมฺปิ องฺควิภาโค เวทิตพฺโพ. ยถา จ ตตฺถ สมุฏฺฐานโต สุราเมรยมชฺชปมาทฏฺฐานํ กายโต จ กายจิตฺตโต จาติ ทฺวิสมุฏฺฐานํ, เอวมิธ วิกาลโภชนํ. เอเตน นเยน สพฺเพสํ สมุฏฺฐานํ เวทิตพฺพํ. ยถา จ ตตฺถ เวทนาโต อทินฺนาทานํ ตีสุ เวทนาสุ อญฺญตรเวทนาสมฺปยุตฺตํ, ตถา อิธ วิกาลโภชนํ. เอเตน นเยน สพฺเพสํ เวทนาสมฺปโยโค เวทิตพฺโพ. ยถา จ ตตฺถ อพฺรหฺมจริยํ โลภโมหมูลํ, เอวมิธ วิกาลโภชนํ. อปรานิ จ ทฺเว เอเตน นเยน สพฺเพสํ มูลเภโท เวทิตพฺโพ. ยถา จ ตตฺถ ปาณาติปาตาทโย กายกมฺมํ, เอวมิธาปิ วิกาลโภชนาทีนิ. ชาตรูปรชตปฺปฏิคฺคหณํ ปน กายกมฺมํ วา สิยา วจีกมฺมํ วา กายทฺวาราทีหิ ปวตฺติสพฺภาวปริยาเยน, น กมฺมปถวเสน. วิรมโตติ ยถา จ ตตฺถ วิรมนฺโต อตฺตโน วา ปเรสํ วา ปาณาติปาตาทิอกุสลโต วิรมติ, เอวมิธาปิ วิกาลโภชนาทิอกุสลโต, กุสลโตปิ วา เอกโต. ยถา จ ปุริมา ปญฺจ เวรมณิโย จตุสมุฏฺฐานา กายโต, กายจิตฺตโต, วาจาจิตฺตโต, กายวาจาจิตฺตโต จาติ, สพฺพา สุขเวทนาสมฺปยุตฺตา วา อทุกฺขมสุขเวทนาสมฺปยุตฺตา วา, อโลภาโทสมูลา วา อโลภาโทสาโมหมูลา วา, สพฺพา จ นานปฺปการอิฏฺฐผลนิพฺพตฺตกา, ตถา อิธาปีติ. त्या गाथेचे अर्थस्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) खालीलप्रमाणे आहे – पहिल्या पाच सिक्खापदांच्या स्पष्टीकरणात जे काही योग्य आहे, ते तेथून घेऊन नंतरच्या पाच सिक्खापदांमध्ये देखील योजावे. तेथे ही योजना अशी आहे – ज्याप्रमाणे पहिल्या सिक्खापदांमध्ये आलंबनाच्या (आरम्मण) दृष्टीने सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठाण हे रूपायातन इत्यादींपैकी कोणत्याही एका संस्काराचे आलंबन घेणारे आहे, त्याचप्रमाणे येथे विकालभोजन (अवेळी भोजन) देखील आहे. या पद्धतीने सर्वांच्या आलंबनाचा भेद समजून घ्यावा. आणि स्वीकारण्याच्या (आदान) दृष्टीने, ज्याप्रमाणे पूर्वीची सिक्खापदे एखाद्या श्रामणेराने किंवा उपासकाने ग्रहण केली असता ती ग्रहण केलेली (समादिन्न) होतात, त्याचप्रमाणे ही देखील होतात. अंगांच्या दृष्टीने देखील, ज्याप्रमाणे तेथे प्राणातिपात इत्यादींच्या अंगांचे वर्गीकरण सांगितले आहे, त्याचप्रमाणे येथे देखील विकालभोजनाची चार अंगे आहेत – विकाल (अवेळ), यावकालिक (भोजन), गिळणे (अज्झोहरण) आणि वेडे नसणे (अनुम्मत्तकता). यानुसार उर्वरित सिक्खापदांच्या अंगांचे वर्गीकरण देखील समजून घ्यावे. आणि ज्याप्रमाणे तेथे समुत्थानाच्या दृष्टीने सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठाण हे कायिक आणि काय-चित्तजन्य अशा दोन समुत्थानांचे (द्विसमुत्थान) आहे, त्याचप्रमाणे येथे विकालभोजन आहे. या पद्धतीने सर्वांचे समुत्थान समजून घ्यावे. आणि ज्याप्रमाणे तेथे वेदनेच्या दृष्टीने अदिन्नादान हे तीन वेदनांपैकी कोणत्याही एका वेदनेशी संप्रयुक्त (युक्त) असते, त्याचप्रमाणे येथे विकालभोजन आहे. या पद्धतीने सर्वांचा वेदनासंप्रयोग समजून घ्यावा. आणि ज्याप्रमाणे तेथे अब्रह्मचर्य हे लोभ आणि मोह मूळ असणारे आहे, त्याचप्रमाणे येथे विकालभोजन आहे. आणि इतर दोन (नृत्य-गीत आणि माला-गंध इत्यादी सिक्खापदे) देखील याच पद्धतीने सर्वांच्या मुळाचा भेद समजून घ्यावा. आणि ज्याप्रमाणे तेथे प्राणातिपात इत्यादी कायकर्म आहेत, त्याचप्रमाणे येथे विकालभोजन इत्यादी देखील आहेत. परंतु जातरूप-रजत (सोने-चांदी) ग्रहण करणे हे कायिक द्वार इत्यादींद्वारे प्रवृत्तीच्या स्वभावाच्या पर्यायाने कायकर्म किंवा वचीकर्म किंवा मनोकर्म असू शकते, परंतु कर्मपथाच्या दृष्टीने नाही. 'विरमतो' (विरत राहणारा) या शब्दाच्या बाबतीत, ज्याप्रमाणे तेथे विरत राहणारा स्वतःच्या किंवा इतरांच्या प्राणातिपात इत्यादी अकुशलापासून विरत राहतो, त्याचप्रमाणे येथे देखील विकालभोजन इत्यादी अकुशलापासून किंवा कुशलापासून एका बाजूने विरत राहतो. आणि ज्याप्रमाणे पूर्वीची पाच विरती (नियम) हे कायिक, काय-चित्तजन्य, वची-चित्तजन्य आणि काय-वची-चित्तजन्य अशा चार समुत्थानांचे (चतुसमुत्थान) असतात, सर्व सुखवेदनायुक्त किंवा अदुःख-असुखवेदनायुक्त असतात, अलोभ-अदोषमूळ किंवा अलोभ-अदोष-अमोहमूळ असतात, आणि सर्व विविध प्रकारची इष्ट फळे देणारी असतात, त्याचप्रमाणे येथे देखील योजावे. ‘‘โยเชตพฺพํ ตโต ยุตฺตํ, ปจฺฉิเมสฺวปิ ปญฺจสุ; อาเวณิกญฺจ วตฺตพฺพํ, เญยฺยา หีนาทิตาปิ จา’’ติ. – “त्यानंतरच्या (शेवटच्या) पाच सिक्खापदांमध्ये देखील जे योग्य आहे ते योजावे; आणि त्यांचे विशिष्ट (आवेणिक) गुण सांगावेत, तसेच हीन इत्यादी अवस्था देखील जाणाव्यात.” – เอตฺถ ปน วิกาลโภชนนฺติ มชฺฌนฺหิกวีติกฺกเม โภชนํ. เอตญฺหิ อนุญฺญาตกาเล วีติกฺกนฺเต โภชนํ, ตสฺมา ‘‘วิกาลโภชน’’นฺติ วุจฺจติ[Pg.26], ตโต วิกาลโภชนา. นจฺจคีตวาทิตวิสูกทสฺสนนฺติ เอตฺถ นจฺจํ นาม ยํกิญฺจิ นจฺจํ, คีตนฺติ ยํกิญฺจิ คีตํ, วาทิตนฺติ ยํกิญฺจิ วาทิตํ. วิสูกทสฺสนนฺติ กิเลสุปฺปตฺติปจฺจยโต กุสลปกฺขภินฺทเนน วิสูกานํ ทสฺสนํ, วิสูกภูตํ วา ทสฺสนํ วิสูกทสฺสนํ. นจฺจา จ คีตา จ วาทิตา จ วิสูกทสฺสนา จ นจฺจคีตวาทิตวิสูกทสฺสนา. วิสูกทสฺสนญฺเจตฺถ พฺรหฺมชาเล วุตฺตนเยเนว คเหตพฺพํ. วุตฺตญฺหิ ตตฺถ – येथे 'विकालभोजन' म्हणजे दुपारची वेळ टळल्यानंतर (मध्यान्ह उलटून गेल्यानंतर) भोजन करणे. कारण हे भोजन अनुज्ञेय (परवानगी असलेल्या) वेळेचे उल्लंघन करून केले जाते, म्हणून याला 'विकालभोजन' असे म्हणतात, आणि त्या विकालभोजनापासून (विरत राहणे). 'नच्च-गीत-वादित-विसूकदस्सन' यामध्ये 'नृत्य' (नच्च) म्हणजे कोणतेही नृत्य, 'गीत' म्हणजे कोणतेही गाणे, 'वादित' म्हणजे कोणतेही वादन होय. 'विसूकदस्सन' म्हणजे क्लेशांच्या उत्पत्तीला कारणीभूत ठरून कुशल पक्षाचा नाश करणाऱ्या तमाशांचे (विसूकांचे) दर्शन घेणे, किंवा क्लेश वाढवणाऱ्या खेळांचे दर्शन घेणे म्हणजे 'विसूकदस्सन' होय. नृत्य, गीत, वादन आणि विसूकदस्सन म्हणजेच 'नच्च-गीत-वादित-विसूकदस्सन' होय. येथे 'विसूकदस्सन' चे लक्षण ब्रह्मजाल सुत्तात सांगितलेल्या पद्धतीनेच ग्रहण करावे. कारण तेथे म्हटले आहे – ‘‘ยถา วา ปเนเก โภนฺโต สมณพฺราหฺมณา สทฺธาเทยฺยานิ โภชนานิ ภุญฺชิตฺวา เต เอวรูปํ วิสูกทสฺสนมนุยุตฺตา วิหรนฺติ, เสยฺยถิทํ, นจฺจํ คีตํ วาทิตํ เปกฺขํ อกฺขานํ ปาณิสฺสรํ เวตาลํ กุมฺภถูณํ โสภนกํ จณฺฑาลํ วํสํ โธวนํ หตฺถิยุทฺธํ อสฺสยุทฺธํ มหึสยุทฺธํ อุสภยุทฺธํ อชยุทฺธํ เมณฺฑยุทฺธํ กุกฺกุฏยุทฺธํ วฏฺฏกยุทฺธํ ทณฺฑยุทฺธํ มุฏฺฐิยุทฺธํ นิพฺพุทฺธํ อุยฺโยธิกํ พลคฺคํ เสนาพฺยูหํ อนีกทสฺสนํ อิติ วา, อิติ เอวรูปา วิสูกทสฺสนา ปฏิวิรโต สมโณ โคตโม’’ติ (ที. นิ. ๑.๑๒). जसे काही पूजनीय श्रमण आणि ब्राह्मण, श्रद्धेने अर्पण केलेले अन्न ग्रहण करून, अशा प्रकारच्या विदूषक-दर्शनात (चित्त विचलित करणाऱ्या मनोरंजनात) मग्न राहतात; जसे की—नृत्य, गायन, वादन, नाट्य-तमाशा, आख्यान (कथा सांगणे), टाळ्या वाजवणे, वेताळ (काशाचे भांडे वाजवणे), कुंभथूण (घडा वाजवणे), शोभनक (चित्रे किंवा देखावे दाखवणे), चंडाल (लोखंडी गोळ्यांचे खेळ), बांबूवर चढून खेळ करणे, हाडे धुण्याचा खेळ, हत्तींची लढाई, घोड्यांची लढाई, म्हशींची लढाई, बैलांची लढाई, शेळ्यांची लढाई, मेंढ्यांची लढाई, कोंबड्यांची लढाई, लाव्हा पक्ष्यांची लढाई, काठ्यांची लढाई, मुष्टियुद्ध, कुस्ती, युद्ध-क्रीडा, सैन्याची मोजणी, सैन्याची व्यूहरचना आणि सेना-दर्शन; अशा प्रकारच्या विदूषक-दर्शनापासून श्रमण गौतम पूर्णपणे अलिप्त आहेत. อถ วา ยถาวุตฺเตนตฺเถน นจฺจคีตวาทิตานิ เอว วิสูกานิ นจฺจคีตวาทิตวิสูกานิ, เตสํ ทสฺสนํ นจฺจคีตวาทิตวิสูกทสฺสนํ, ตสฺมา นจฺจคีตวาทิตวิสูกทสฺสนา. ‘‘ทสฺสนสวนา’’ติ วตฺตพฺเพ ยถา ‘‘โส จ โหติ มิจฺฉาทิฏฺฐิโก วิปรีตทสฺสโน’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๑.๓๐๘) อจกฺขุทฺวารปฺปวตฺตมฺปิ วิสยคฺคหณํ ‘‘ทสฺสน’’นฺติ วุจฺจติ, เอวํ สวนมฺปิ ‘‘ทสฺสน’’นฺตฺเวว วุตฺตํ. ทสฺสนกมฺยตาย อุปสงฺกมิตฺวา ปสฺสโต เอว เจตฺถ วีติกฺกโม โหติ. ฐิตนิสินฺนสยโนกาเส ปน อาคตํ คจฺฉนฺตสฺส วา อาปาถคตํ ปสฺสโต สิยา สํกิเลโส, น วีติกฺกโม. ธมฺมูปสํหิตมฺปิ เจตฺถ คีตํ น วฏฺฏติ, คีตูปสํหิโต ปน ธมฺโม วฏฺฏตีติ เวทิตพฺโพ. किंवा पूर्वोक्त अर्थानुसार नृत्य, गीत आणि वादन हेच विसूक (क्लेश वाढवणारे) आहेत, म्हणून त्यांना 'नृत्य-गीत-वादन-विसूकी' म्हणतात. त्यांचे दर्शन म्हणजे 'नृत्य-गीत-वादन-विसूकी-दर्शन' होय. म्हणून 'नृत्य-गीत-वादन-विसूकी-दर्शनापासून' असे म्हटले आहे. जरी येथे 'दर्शन आणि श्रवण' (पाहणे आणि ऐकणे) असे म्हणायला हवे होते, तरीही 'तो मिथ्यादृष्टी आणि विपरीत दर्शन (दृष्टी) असलेला असतो' इत्यादी वचनांप्रमाणे, चक्षु-द्वाराशिवाय (डोळ्यांशिवाय इतर इंद्रियांद्वारे) होणाऱ्या विषयाच्या ग्रहणालाही 'दर्शन' म्हटले जाते; त्याचप्रमाणे श्रवणालाही (ऐकण्यालाही) 'दर्शन' असेच म्हटले गेले आहे. येथे पाहण्याच्या इच्छेने जवळ जाऊन पाहणाऱ्यालाच नियमभंग (अतिचार) होतो. परंतु, उभे असताना, बसलेले असताना किंवा झोपलेले असताना स्वतःहून समोर आलेल्या किंवा वाटेने जात असताना दृष्टीस पडलेल्या दृश्याला पाहणाऱ्याला केवळ संक्लेश (चित्त मलीन होणे) होऊ शकतो, नियमभंग होत नाही. येथे धर्माशी संबंधित असलेले गीत गाणे देखील योग्य नाही, परंतु गीताशी संबंधित असलेला धर्म ऐकणे योग्य आहे, असे समजावे. มาลาทีนิ ธารณาทีหิ ยถาสงฺขฺยํ โยเชตพฺพานิ. ตตฺถ มาลาติ ยํกิญฺจิ ปุปฺผชาตํ. วิเลปนนฺติ ยํกิญฺจิ วิเลปนตฺถํ ปิสิตฺวา ปฏิยตฺตํ. อวเสสํ สพฺพมฺปิ วาสจุณฺณธูปนาทิกํ คนฺธชาตํ คนฺโธ. ตํ สพฺพมฺปิ มณฺฑนวิภูสนตฺถํ น วฏฺฏติ, เภสชฺชตฺถนฺตุ วฏฺฏติ, ปูชนตฺถญฺจ อภิหฏํ สาทิยโต น เกนจิ ปริยาเยน น วฏฺฏติ. อุจฺจาสยนนฺติ ปมาณาติกฺกนฺตํ วุจฺจติ. มหาสยนนฺติ อกปฺปิยสยนํ อกปฺปิยตฺถรณญฺจ. ตทุภยมฺปิ สาทิยโต [Pg.27] น เกนจิ ปริยาเยน วฏฺฏติ. ชาตรูปนฺติ สุวณฺณํ. รชตนฺติ กหาปโณ, โลหมาสกทารุมาสกชตุมาสกาทิ ยํ ยํ ตตฺถ ตตฺถ โวหารํ คจฺฉติ, ตทุภยมฺปิ ชาตรูปรชตํ. ตสฺส เยน เกนจิ ปกาเรน สาทิยนํ ปฏิคฺคโห นาม, โส น เยน เกนจิ ปริยาเยน วฏฺฏตีติ เอวํ อาเวณิกํ วตฺตพฺพํ. माला इत्यादी शब्दांचा धारण करणे इत्यादी क्रियांशी यथाक्रम संबंध जोडला पाहिजे. तेथे 'माला' म्हणजे कोणत्याही प्रकारची फुले. 'विलेपन' म्हणजे अंगाला लावण्यासाठी वाटून तयार केलेले कोणतेही सुगंधी द्रव्य. उर्वरित सर्व सुगंधी चूर्ण, धूप इत्यादी सुगंधी पदार्थ म्हणजे 'गंध' होय. हे सर्व शरीर सजवण्यासाठी किंवा सुशोभित करण्यासाठी अयोग्य (निषिद्ध) आहे, परंतु औषधासाठी योग्य आहे. पूजेसाठी आणलेले फूल किंवा गंध स्वीकारणाऱ्याला कोणत्याही प्रकारे ते अयोग्य नाही, तर ते योग्यच आहे. 'उच्चाशयन' म्हणजे प्रमाणाबाहेर (उंच) असलेले आसन किंवा मंचक. 'महाशयन' म्हणजे अयोग्य (अकल्पनीय) बिछाना आणि अयोग्य पांघरूण. या दोन्ही गोष्टींचा स्वीकार करणे कोणत्याही प्रकारे योग्य नाही. 'जातरूप' म्हणजे सोने. 'रजत' म्हणजे कहापण (नाणे), तसेच तांब्याचे माषक, लाकडाचे माषक, लाखाचे माषक इत्यादी जे जे त्या त्या ठिकाणी व्यवहारात चालतात, ते दोन्ही मिळून 'जातरूप-रजत' (सोने-चांदी/धन) म्हटले जाते. त्याचा कोणत्याही प्रकारे स्वीकार करणे किंवा त्यात आनंद मानणे यालाच 'प्रतिग्रह' (स्वीकारणे) म्हणतात. ते कोणत्याही प्रकारे योग्य नाही, असा हा विशेष नियम सांगितला पाहिजे. ทสปิ เจตานิ สิกฺขาปทานิ หีเนน ฉนฺเทน จิตฺตวีริยวีมํสาหิ วา สมาทินฺนานิ หีนานิ, มชฺฌิเมหิ มชฺฌิมานิ, ปณีเตหิ ปณีตานิ. ตณฺหาทิฏฺฐิมาเนหิ วา อุปกฺกิลิฏฺฐานิ หีนานิ, อนุปกฺกิลิฏฺฐานิ มชฺฌิมานิ, ตตฺถ ตตฺถ ปญฺญาย อนุคฺคหิตานิ ปณีตานิ. ญาณวิปฺปยุตฺเตน วา กุสลจิตฺเตน สมาทินฺนานิ หีนานิ, สสงฺขาริกญาณสมฺปยุตฺเตน มชฺฌิมานิ, อสงฺขาริเกน ปณีตานีติ เอวํ เญยฺยา หีนาทิตาปิ จาติ. ही दहाही शिक्षापदे हीन (कनिष्ठ) छंद (इच्छा), चित्त, वीर्य (प्रयत्न) किंवा विमंसा (विचार) यांनी ग्रहण केली असता 'हीन' ठरतात; मध्यम प्रकारच्या इच्छा इत्यादींनी ग्रहण केली असता 'मध्यम' ठरतात; आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) इच्छा इत्यादींनी ग्रहण केली असता 'प्रणीत' ठरतात. किंवा, तृष्णा, दृष्टी आणि मान (अहंकार) यांनी मलीन झालेली शिक्षापदे 'हीन' असतात; मलीन न झालेली 'मध्यम' असतात; आणि त्या त्या शिक्षापदांमध्ये प्रज्ञेने युक्त असलेली 'प्रणीत' असतात. किंवा, ज्ञानविप्रयुक्त (ज्ञानरहित) कुशल चित्ताने ग्रहण केलेली 'हीन' असतात; ससंखारिक ज्ञानसंप्रयुक्त (सप्रयत्न ज्ञानयुक्त) कुशल चित्ताने ग्रहण केलेली 'मध्यम' असतात; आणि असंखारिक (उत्स्फूर्त ज्ञानयुक्त) कुशल चित्ताने ग्रहण केलेली 'प्रणीत' असतात. अशा प्रकारे त्यांची हीनता, मध्यमत्व आणि प्रणीतत्व समजून घ्यावे. เอตฺตาวตา จ ยา ปุพฺเพ ‘‘เยน ยตฺถ ยทา ยสฺมา’’ติอาทีหิ ฉหิ คาถาหิ สิกฺขาปทปาฐสฺส วณฺณนตฺถํ มาติกา นิกฺขิตฺตา, สา อตฺถโต ปกาสิตา โหตีติ. येथपर्यंत, पूर्वी 'येन यत्थ यदा यस्मा' इत्यादी सहा गाथांद्वारे शिक्षापद-पाठाच्या स्पष्टीकरणासाठी जी मातृका (रूपरेषा) मांडली होती, ती अर्थासह स्पष्ट झाली आहे. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील... สิกฺขาปทวณฺณนา นิฏฺฐิตา. शिक्षापद-वर्णन (स्पष्टीकरण) समाप्त झाले. ๓. ทฺวตฺตึสาการวณฺณนา ३. द्वत्तिंसाकार-वर्णन (शरीराच्या बत्तीस भागांचे स्पष्टीकरण) ปทสมฺพนฺธวณฺณนา पदसंबंध-वर्णन (शब्दांच्या संबंधांचे स्पष्टीकरण) อิทานิ ยทิทํ เอวํ ทสหิ สิกฺขาปเทหิ ปริสุทฺธปโยคสฺส สีเล ปติฏฺฐิตสฺส กุลปุตฺตสฺส อาสยปริสุทฺธตฺถํ จิตฺตภาวนตฺถญฺจ อญฺญตฺร พุทฺธุปฺปาทา อปฺปวตฺตปุพฺพํ สพฺพติตฺถิยานํ อวิสยภูตํ เตสุ เตสุ สุตฺตนฺเตสุ – आता, अशा प्रकारे दहा शिक्षापदांद्वारे शुद्ध आचरण करणाऱ्या आणि शीलामध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या कुलपुत्राच्या आशय-शुद्धीसाठी (उद्देशाच्या शुद्धीसाठी) आणि चित्त-भावनेसाठी, बुद्ध-उत्पत्तीचा काळ वगळता इतर वेळी कधीही न उद्भवलेली, सर्व तीर्थकरांच्या (पाखंडी लोकांच्या) कक्षेबाहेर असलेली, आणि त्या त्या सूत्तांमध्ये सांगितलेली— ‘‘เอกธมฺโม, ภิกฺขเว, ภาวิโต พหุลีกโต มหโต สํเวคาย สํวตฺตติ. มหโต อตฺถาย สํวตฺตติ. มหโต โยคกฺเขมาย สํวตฺตติ. มหโต สติสมฺปชญฺญาย สํวตฺตติ. ญาณทสฺสนปฺปฏิลาภาย สํวตฺตติ. ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหาราย สํวตฺตติ. วิชฺชาวิมุตฺติผลสจฺฉิกิริยาย สํวตฺตติ. กตโม [Pg.28] เอกธมฺโม? กายคตา สติ. อมตํ เต, ภิกฺขเว, น ปริภุญฺชนฺติ, เย กายคตาสตึ น ปริภุญฺชนฺติ. อมตํ เต, ภิกฺขเว, ปริภุญฺชนฺติ, เย กายคตาสตึ ปริภุญฺชนฺติ. อมตํ เตสํ, ภิกฺขเว, อปริภุตฺตํ ปริภุตฺตํ, ปริหีนํ อปริหีนํ, วิรทฺธํ อารทฺธํ, เยสํ กายคตา สติ อารทฺธา’’ติ. (อ. นิ. ๑.๕๖๔-๕๗๐) – “भिक्खूहो, एक धर्म असा आहे, ज्याची भावना (अभ्यास) केली असता, वारंवार सराव केला असता, तो मोठ्या संवेगाला (वैराग्याला) कारणीभूत ठरतो. मोठ्या कल्याणाला कारणीभूत ठरतो. मोठ्या योगक्षेमाला (निर्वाणाला) कारणीभूत ठरतो. मोठ्या स्मृति-संप्रजन्याला (जागरूकता आणि स्पष्ट आकलनाला) कारणीभूत ठरतो. ज्ञान-दर्शन प्राप्तीला कारणीभूत ठरतो. याच जन्मात सुखपूर्वक विहाराला कारणीभूत ठरतो. विद्या आणि विमुक्तीच्या फळाच्या साक्षात्काराला कारणीभूत ठरतो. तो एक धर्म कोणता? तो म्हणजे 'कायगता सती' (शरीरावर केंद्रित असलेली स्मृती) होय. भिक्खूहो, जे कायगता सतीचा उपभोग घेत नाहीत (सराव करत नाहीत), ते अमृताचा (निर्वाणाचा) उपभोग घेत नाहीत. भिक्खूहो, जे कायगता सतीचा उपभोग घेतात, ते अमृताचा उपभोग घेतात. भिक्खूहो, ज्यांनी कायगता सतीचा सराव केला नाही, त्यांनी अमृताचा आस्वाद घेतला नाही; ज्यांनी सराव केला, त्यांनी अमृताचा आस्वाद घेतला; ज्यांची कायगता सती नष्ट झाली, त्यांचे अमृत नष्ट झाले; ज्यांची कायगता सती नष्ट झाली नाही, त्यांचे अमृत नष्ट झाले नाही; ज्यांची कायगता सती चुकली, त्यांचे अमृत चुकले; ज्यांनी कायगता सतीचा आरंभ केला, त्यांनी अमृताचा लाभ घेतला.” เอวํ ภควตา อเนกากาเรน ปสํสิตฺวา – अशा प्रकारे भगवंतांनी अनेक प्रकारे (कायगता सतीची) प्रशंसा करून— ‘‘กถํ ภาวิตา, ภิกฺขเว, กายคตาสติ กถํ พหุลีกตา มหพฺพลา โหติ มหานิสํสา? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อรญฺญคโต วา’’ติ (ม. นิ. ๓.๑๕๔) – “भिक्खूहो, कायगता सतीची भावना कशी करावी, तिचा वारंवार सराव कसा करावा, जेणेकरून ती महाबलाढ्य आणि महाकल्याणकारी ठरेल? येथे, भिक्खूहो, एखादा भिक्खू अरण्यात गेलेला असतो...” อาทินา นเยน อานาปานปพฺพํ อิริยาปถปพฺพํ จตุสมฺปชญฺญปพฺพํ ปฏิกูลมนสิการปพฺพํ ธาตุมนสิการปพฺพํ นว สิวถิกปพฺพานีติ อิเมสํ จุทฺทสนฺนํ ปพฺพานํ วเสน กายคตาสติกมฺมฏฺฐานํ นิทฺทิฏฺฐํ. ตสฺส ภาวนานิทฺเทโส อนุปฺปตฺโต. ตตฺถ ยสฺมา อิริยาปถปพฺพํ จตุสมฺปชญฺญปพฺพํ ธาตุมนสิการปพฺพนฺติ อิมานิ ตีณิ วิปสฺสนาวเสน วุตฺตานิ. นว สิวถิกปพฺพานิ วิปสฺสนาญาเณสุเยว อาทีนวานุปสฺสนาวเสน วุตฺตานิ. ยาปิ เจตฺถ อุทฺธุมาตกาทีสุ สมาธิภาวนา อิจฺเฉยฺย, สา วิสุทฺธิมคฺเค วิตฺถารโต อสุภภาวนานิทฺเทเส ปกาสิตา เอว. อานาปานปพฺพํ ปน ปฏิกูลมนสิการปพฺพญฺเจติ อิมาเนตฺถ ทฺเว สมาธิวเสน วุตฺตานิ. เตสุ อานาปานปพฺพํ อานาปานสฺสติวเสน วิสุํ กมฺมฏฺฐานํเยว. ยํ ปเนตํ – या आधीच्या पद्धतीने (नयाने) आनापानपब्ब (आनापान विभाग), इरियापथपब्ब (इर्यापथ विभाग), चतुसम्पजञ्ञपब्ब (चतु-संपजन्य विभाग), पटिकूलमनसिकारपब्ब (प्रतिकूल-मनसिकार विभाग), धातुमनसिकारपब्ब (धातु-मनसिकार विभाग) आणि नऊ सिवथिकपब्ब (स्मशान विभाग) अशा या चौदा विभागांच्या (पब्बांच्या) आधारे कायगतासती कम्मट्ठान (कायानुपश्यना कर्मस्थान) निर्दिष्ट केले आहे. त्याच्या भावनेचा निर्देश (सराव करण्याची पद्धत) आता प्राप्त झाला आहे. त्यामध्ये, कारण इरियापथपब्ब, चतुसम्पजञ्ञपब्ब आणि धातुमनसिकारपब्ब हे तीन विभाग विपस्सना (विपश्यना) च्या दृष्टीने सांगितले आहेत. नऊ सिवथिकपब्ब हे विपस्सना ज्ञानामध्येच आदीनवानुपस्सना (दोषांचे अनुदर्शन) च्या दृष्टीने सांगितले आहेत. आणि येथे फुगलेले प्रेत (उद्धुमातक) इत्यादींवर जी समाधी भावना करण्याची इच्छा असेल, ती विसुद्धिमग्ग (विशुद्धिमार्ग) मध्ये अशुभभावना निर्देशात सविस्तरपणे स्पष्ट केलीच आहे. परंतु आनापानपब्ब आणि पटिकूलमनसिकारपब्ब हे दोन विभाग येथे समाधीच्या दृष्टीने सांगितले आहेत. त्यापैकी आनापानपब्ब हे आनापानसती (आनापानस्मृती) च्या दृष्टीने एक स्वतंत्र कम्मट्ठानच आहे. आणि जे हे - ‘‘ปุน จปรํ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อิมเมว กายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺตํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ ‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา, โลมา…เป… มุตฺต’’นฺติ (ม. นิ. ๓.๑๕๔). “पुन्हा, भिक्खूहो, भिक्खू याच शरीराचे, पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या टोकापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या शरीराचे असे निरीक्षण करतो: 'या शरीरात डोक्याचे केस आहेत, अंगावरील केस आहेत... (इत्यादी)... मूत्र आहे'.” เอวํ ตตฺถ ตตฺถ มตฺถลุงฺคํ อฏฺฐิมิญฺเชน สงฺคเหตฺวา เทสิตํ กายคตาสติโกฏฺฐาสภาวนาปริยายํ ทฺวตฺตึสาการกมฺมฏฺฐานํ อารทฺธํ, ตสฺสายํ อตฺถวณฺณนา – अशा प्रकारे, त्या त्या पाठांमध्ये 'अट्ठिमिञ्ज' (अस्थिमज्जा) या शब्दाने 'मत्थलुङ्ग' (मेंदू) चा समावेश करून उपदेशिलेल्या, कायगतासतीचा (शरीरावर आधारित स्मृतीचा) भाग असणाऱ्या, बत्तीस अवयवांच्या (द्वात्तीसाकार) कम्मट्ठानाची (कर्मस्थानाची) भावना सुरू केली आहे. त्याचे अर्थस्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) खालीलप्रमाणे आहे – ตตฺถ อตฺถีติ สํวิชฺชนฺติ. อิมสฺมินฺติ ยฺวายํ อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา ตจปริยนฺโต ปูโร นานปฺปการสฺส อสุจิโนติ วุจฺจติ, ตสฺมึ[Pg.29]. กาเยติ สรีเร. สรีรญฺหิ อสุจิสญฺจยโต, กุจฺฉิตานํ วา เกสาทีนญฺเจว จกฺขุโรคาทีนญฺจ โรคสตานํ อายภูตโต กาโยติ วุจฺจติ. เกสา…เป… มุตฺตนฺติ เอเต เกสาทโย ทฺวตฺตึสาการา, ตตฺถ ‘‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา อตฺถิ โลมา’’ติ เอวํ สมฺพนฺโธ เวทิตพฺโพ. เตน กึ กถิตํ โหติ? อิมสฺมึ ปาทตลา ปฏฺฐาย อุปริ, เกสมตฺถกา ปฏฺฐาย เหฏฺฐา, ตจโต ปฏฺฐาย ปริโตติ เอตฺตเก พฺยามมตฺเต กเฬวเร สพฺพากาเรนาปิ วิจินนฺโต น โกจิ กิญฺจิ มุตฺตํ วา มณึ วา เวฬุริยํ วา อครุํ วา จนฺทนํ วา กุงฺกุมํ วา กปฺปูรํ วา วาสจุณฺณาทึ วา อณุมตฺตมฺปิ สุจิภาวํ ปสฺสติ, อถ โข ปรมทุคฺคนฺธเชคุจฺฉํ อสฺสิริกทสฺสนํ นานปฺปการํ เกสโลมาทิเภทํ อสุจิเมว ปสฺสตีติ. त्यामध्ये, 'अत्थि' म्हणजे अस्तित्वात आहेत (आढळतात). 'इमस्मिं' म्हणजे ज्याला 'पावलांच्या तळव्यापासून वर, डोक्याच्या केसांपासून खाली, त्वचेने वेढलेले आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेले' असे म्हटले जाते, त्या (शरीरात). 'काये' म्हणजे शरीरात. कारण, अशुद्धीचा संचय असल्यामुळे किंवा केस इत्यादी निंद्य गोष्टींचे आणि डोळ्यांचे आजार इत्यादी शेकडो रोगांचे आश्रयस्थान असल्यामुळे याला 'काय' (शरीर) म्हटले जाते. 'केसा... पे... मुत्तं' (केस... इत्यादी... मूत्र) हे केस इत्यादी बत्तीस प्रकार आहेत. त्यामध्ये, "या शरीरात केस आहेत, रोम (अंगावरील केस्) आहेत" असा संबंध समजून घ्यावा. याने काय सांगितले आहे? या पावलांच्या तळव्यापासून वर, डोक्याच्या केसांपासून खाली, त्वचेपासून चहूबाजूंनी वेढलेल्या, या एवढ्याशा व्याम (एक हात पसरल्याएवढ्या) शरीरात सर्व प्रकारे शोध घेतला तरी कोणालाही मोती, मणी, वैडूर्य, अगरू, चंदन, केशर, कापूर किंवा सुगंधी चूर्ण इत्यादींपैकी अणुमात्रही शुद्धता आढळत नाही; उलट अत्यंत दुर्गंधीयुक्त, घृणास्पद, अमंगल दिसणारे, केस, रोम इत्यादी विविध प्रकारचे अशुद्ध पदार्थच केवळ दिसतात. อยํ ตาเวตฺถ ปทสมฺพนฺธโต วณฺณนา. हे प्रथम या (द्वात्तीसाकार कम्मट्ठानात) पदांच्या संबंधानुसार केलेले स्पष्टीकरण (वण्णना) आहे. อสุภภาวนา अशुभाची भावना (असुभभावना) อสุภภาวนาวเสน ปนสฺส เอวํ วณฺณนา เวทิตพฺพา – เอวเมตสฺมึ ปาณาติปาตาเวรมณิสิกฺขาปทาทิเภเท สีเล ปติฏฺฐิเตน ปโยคสุทฺเธน อาทิกมฺมิเกน กุลปุตฺเตน อาสยสุทฺธิยา อธิคมนตฺถํ ทฺวตฺตึสาการกมฺมฏฺฐานภาวนานุโยคมนุยุญฺชิตุกาเมน ปฐมํ ตาวสฺส อาวาสกุลลาภคณกมฺมทฺธานญาติคนฺถโรคอิทฺธิปลิโพเธน กิตฺติปลิโพเธน วา สห ทส ปลิโพธา โหนฺติ. อถาเนน อาวาสกุลลาภคณญาติกิตฺตีสุ สงฺคปฺปหาเนน, กมฺมทฺธานคนฺเถสุ อพฺยาปาเรน, โรคสฺส ติกิจฺฉายาติ เอวํ เต ทส ปลิโพธา อุปจฺฉินฺทิตพฺพา, อถาเนน อุปจฺฉินฺนปลิโพเธน อนุปจฺฉินฺนเนกฺขมฺมาภิลาเสน โกฏิปฺปตฺตสลฺเลขวุตฺติตํ ปริคฺคเหตฺวา ขุทฺทานุขุทฺทกมฺปิ วินยาจารํ อปฺปชหนฺเตน อาคมาธิคมสมนฺนาคโต ตโต อญฺญตรงฺคสมนฺนาคโต วา กมฺมฏฺฐานทายโก อาจริโย วินยานุรูเปน วิธินา อุปคนฺตพฺโพ, วตฺตสมฺปทาย จ อาราธิตจิตฺตสฺส ตสฺส อตฺตโน อธิปฺปาโย นิเวเทตพฺโพ. เตน ตสฺส นิมิตฺตชฺฌาสยจริยาธิมุตฺติเภทํ ญตฺวา ยทิ เอตํ กมฺมฏฺฐานมนุรูปํ, อถ [Pg.30] ยสฺมึ วิหาเร อตฺตนา วสติ, ยทิ ตสฺมึเยว โสปิ วสิตุกาโม โหติ, ตโต สงฺเขปโต กมฺมฏฺฐานํ ทาตพฺพํ. อถ อญฺญตฺร วสิตุกาโม โหติ, ตโต ปหาตพฺพปริคฺคเหตพฺพาทิกถนวเสน สปุเรกฺขารํ ราคจริตานุกุลาทิกถนวเสน สปฺปเภทํ วิตฺถาเรน กเถตพฺพํ. เตน ตํ สปุเรกฺขารํ สปฺปเภทํ กมฺมฏฺฐานํ อุคฺคเหตฺวา อาจริยํ อาปุจฺฉิตฺวา ยานิ ตานิ – परंतु, अशुभाच्या भावनेच्या (असुभभावना) दृष्टीने याचे स्पष्टीकरण याप्रमाणे समजून घ्यावे – अशा प्रकारे, प्राणातिपातापासून विरती (प्राणघात न करणे) इत्यादी शील नियमांमध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या, शुद्ध प्रयत्न करणाऱ्या, नवशिक्या (आदिकम्मिक) कुलपुत्राने, आशय शुद्धीसाठी आणि (मार्ग-फल) प्राप्तीसाठी द्वात्तीसाकार कम्मट्ठानाच्या भावनेचा अभ्यास करण्याची इच्छा धरल्यास, सर्वप्रथम त्याला – आवास (निवासस्थान), कुल (दाते), लाभ, गण (संघ), कम्म (नवीन बांधकाम), अद्धान (प्रवास), ज्ञाती (नातेवाईक), गंथ (ग्रंथ अभ्यास), रोग (आजारपण) आणि इद्धि (ऋद्धी/अलौकिक शक्ती) किंवा कीर्ती या अडथळ्यांसह दहा प्रकारचे अडथळे (पलिबोध) असतात. त्यानंतर, त्याने आवास, कुल, लाभ, गण, ज्ञाती आणि कीर्ती यांमधील आसक्तीचा त्याग करून; कम्म, अद्धान आणि गंथ यांमध्ये व्यस्त न राहता; आणि रोगाचा उपचार करून, अशा प्रकारे ते दहा अडथळे दूर केले पाहिजेत. त्यानंतर, अडथळे दूर केलेल्या आणि नैष्क्रम्याची (नेक्खम्म - संन्यास) तीव्र इच्छा असणाऱ्या, अत्यंत संलेखाचे (खोटिप्पत्तसल्लेख - क्लेश कमी करण्याचे) जीवन स्वीकारलेल्या, अगदी लहान-सहान (खुद्दानुखुद्दरक) विनय नियमांचाही त्याग न करणाऱ्या, आगम (त्रिपिटक) आणि अधिगम (साक्षात्कार) यांनी युक्त असलेल्या किंवा त्यांपैकी कोणत्याही एका गुणाने युक्त असलेल्या कम्मट्ठान देणाऱ्या आचार्यांकडे विनयाला अनुसरून योग्य पद्धतीने जावे. आपल्या योग्य आचरणाने (वत्तसंपदा) आचार्यांचे मन प्रसन्न करून त्यांना आपला हेतू सांगावा. आचार्यांनी त्याचे निमित्त, आशय, चर्या आणि अधिमुक्ती (कल) जाणून घेऊन, जर हे कम्मट्ठान त्याच्यासाठी योग्य असेल, आणि जर तो साधक आचार्यांच्याच विहारात राहू इच्छित असेल, तर त्याला संक्षेपात (थोडक्यात) कम्मट्ठान द्यावे. जर तो दुसऱ्या ठिकाणी राहू इच्छित असेल, तर काय सोडावे आणि काय स्वीकारावे इत्यादी सांगून, तसेच रागचरिताला (आसक्तीच्या स्वभावाला) अनुकूल असे सर्व प्रकार सविस्तरपणे सांगावेत. साधकाने ते सविस्तर कम्मट्ठान ग्रहण करून, आचार्यांची अनुमती घेऊन, खालील ठिकाणे सोडून द्यावीत – ‘‘มหาวาสํ นวาวาสํ, ชราวาสญฺจ ปนฺถนึ; โสณฺฑึ ปณฺณญฺจ ปุปฺผญฺจ, ผลํ ปตฺถิตเมว จ. "मोठा विहार, नवीन विहार, जुना (जीर्ण) विहार, रस्त्यावरील (चौकातील) विहार, पाण्याचे तळे असलेला विहार, पालेभाज्यांच्या बागेजवळचा विहार, फुलांच्या बागेजवळचा विहार, फळांच्या बागेजवळचा विहार आणि लोकांनी इच्छा केलेला (प्रसिद्ध) विहार; ‘‘นครํ ทารุนา เขตฺตํ, วิสภาเคน ปฏฺฏนํ; ปจฺจนฺตสีมาสปฺปายํ, ยตฺถ มิตฺโต น ลพฺภติ. "शहर, लाकूड (जंगल) आणि शेताजवळचा विहार, प्रतिकूल (विसभागा) लोकांचा विहार, बंदर (व्यापारी केंद्र) जवळील विहार, सीमावर्ती भागातील विहार, अयोग्य (असाप्पाय) विहार आणि जेथे कल्याणमित्र मिळत नाही असा विहार; ‘‘อฏฺฐารเสตานิ ฐานานิ, อิติ วิญฺญาย ปณฺฑิโต; อารกา ปริวชฺเชยฺย, มคฺคํ สปฺปฏิภยํ ยถา’’ติ. (วิสุทฺธิ. ๑.๕๒) – "या अठरा जागा आहेत, असे जाणून सुज्ञ साधकाने, ज्याप्रमाणे भययुक्त मार्गाचा त्याग केला जातो, त्याप्रमाणे या जागांचा दुरूनच त्याग करावा." เอวํ อฏฺฐารส เสนาสนานิ ปริวชฺเชตพฺพานีติ วุจฺจนฺติ. ตานิ วชฺเชตฺวา, ยํ ตํ – अशा प्रकारे ही अठरा सेनासने (निवासस्थाने) वर्ज्य करावीत असे म्हटले आहे. त्यांचा त्याग करून, जे – ‘‘กถญฺจ, ภิกฺขเว, เสนาสนํ ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ โหติ? อิธ, ภิกฺขเว, เสนาสนํ นาติทูรํ โหติ, นจฺจาสนฺนํ, คมนาคมนสมฺปนฺนํ, ทิวา อปฺปากิณฺณํ, รตฺตึ อปฺปสทฺทํ อปฺปนิคฺโฆสํ อปฺปฑํสมกสวาตาตปสรีสปสมฺผสฺสํ. ตสฺมึ โข ปน เสนาสเน วิหรนฺตสฺส อปฺปกสิเรน อุปฺปชฺชนฺติ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปจฺจยเภสชฺชปริกฺขารา. ตสฺมึ โข ปน เสนาสเน เถรา ภิกฺขู วิหรนฺติ พหุสฺสุตา อาคตาคมา ธมฺมธรา วินยธรา มาติกาธรา, เต กาเลน กาลํ อุปสงฺกมิตฺวา ปริปุจฺฉติ ปริปญฺหติ ‘อิทํ, ภนฺเต, กถํ, อิมสฺส โก อตฺโถ’ติ? ตสฺส, เต อายสฺมนฺโต อวิวฏญฺเจว วิวรนฺติ, อนุตฺตานีกตญฺจ อุตฺตานึ กโรนฺติ, อเนกวิหิเตสุ จ กงฺขาฐานิเยสุ ธมฺเมสุ กงฺขํ ปฏิวิโนเทนฺติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, เสนาสนํ ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ โหตี’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๑๑). – "भिक्खूंनो, सेनासन पाच अंगांनी युक्त कसे असते? भिक्खूंनो, येथे सेनासन (गावापासून) फार दूर नसते आणि फार जवळही नसते, येण्या-जाण्यास सोयीचे असते, दिवसा गर्दी नसलेले आणि रात्री शांत व गोंगाट नसलेले असते. तसेच डास, माश्या, वारा, ऊन आणि सरपटणारे प्राणी यांच्या त्रासापासून मुक्त असते. त्या सेनासनात राहणाऱ्या साधकाला चीवर, पिंडपात, सेनासन आणि ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिकार (औषधोपचार) विनासायास (सहजतेने) प्राप्त होतात. त्या सेनासनात बहुश्रुत, आगम (त्रिपिटक) जाणणारे, धम्मधर, विनयधर आणि मातिकाधर असे थेर भिक्खू निवास करतात. साधक वेळोवेळी त्यांच्याकडे जाऊन विचारतो, प्रश्न करतो – 'भंते, हे कसे आहे? याचा अर्थ काय आहे?' ते आयुष्यमान भिक्खू त्याला न समजलेला अर्थ स्पष्ट करून सांगतात, कठीण गोष्टी सुलभ करून सांगतात आणि अनेक प्रकारच्या शंकास्पद गोष्टींमधील शंका दूर करतात. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे सेनासन पाच अंगांनी युक्त असते." เอวํ ปญฺจงฺคสมนฺนาคตํ เสนาสนํ วุตฺตํ. ตถารูปํ เสนาสนํ อุปคมฺม กตสพฺพกิจฺเจน กาเมสุ อาทีนวํ, เนกฺขมฺเม จ อานิสํสํ ปจฺจเวกฺขิตฺวา พุทฺธสุพุทฺธตาย [Pg.31] ธมฺมสุธมฺมตาย สงฺฆสุปฺปฏิปนฺนตาย จ อนุสฺสรเณน จิตฺตํ ปสาเทตฺวา ยํ ตํ – अशा प्रकारे पाच अंगांनी युक्त सेनासन सांगितले आहे. अशा प्रकारच्या सेनासनात जाऊन, आपली सर्व कर्तव्ये पूर्ण केलेल्या साधकाने, कामांमधील (इंद्रियभोगांमधील) दोष आणि नैष्क्रम्यामधील (नेक्खम्म - संन्यासातील) फायदे ओळखून, तसेच बुद्धांचे सम्यक् बुद्धत्व, धम्माचे सुधम्मत्व आणि संघाचे सुप्रतिपन्नत्व (योग्य आचरण) यांचे वारंवार स्मरण करून आपले चित्त प्रसन्न करावे, आणि जे – ‘‘วจสา มนสา เจว, วณฺณสณฺฐานโต ทิสา; โอกาสโต ปริจฺเฉทา, สตฺตธุคฺคหณํ วิทู’’ติ. – "बुद्धिमान साधकाने (विदू) वाणीने (वाचेने), मनाने, रंगाने (वण्ण), आकाराने (सण्ठान), दिशेने, स्थानाने (ओकास) आणि मर्यादेने (परिच्छेद) अशा सात प्रकारे (कम्मट्ठानाचे) ग्रहण करावे." เอวํ สตฺตวิธํ อุคฺคหโกสลฺลํ; อนุปุพฺพโต, นาติสีฆโต, นาติสณิกโต, วิกฺเขปปฺปฏิพาหนโต, ปณฺณตฺติสมติกฺกมโต, อนุปุพฺพมุญฺจนโต, อปฺปนาโต, ตโย จ สุตฺตนฺตาติ เอวํ ทสวิธํ มนสิการโกสลฺลญฺจ วุตฺตํ. ตํ อปริจฺจชนฺเตน ทฺวตฺตึสาการภาวนา อารภิตพฺพา. เอวญฺหิ อารภโต สพฺพากาเรน ทฺวตฺตึสาการภาวนา สมฺปชฺชติ โน อญฺญถา. अशा प्रकारे सात प्रकारचे ग्रहण-कौशल्य (उग्गहकोसल्ल); आणि अनुक्रमाने (अनुपुब्बतो), फार वेगाने नाही (नातिसीघतो), फार हळूहळू नाही (नातिसणिकतो), विक्षेप दूर करून (विक्खेपप्पटिबाहनतो), प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन करून (पण्णत्तिसमतिक्कमतो), अनुक्रमाने सोडत जाऊन (अनुपुब्बमुञ्चनतो), अप्पनावस्थेद्वारे (अप्पनातो) आणि तीन सुत्तांचे (अधिचित्त सुत्त, सीतिभाव सुत्त, बोज्झङ्गकोसल्ल सुत्त) मनन करून, अशा प्रकारे दहा प्रकारचे मनसिकार-कौशल्य (मनसिकारकोसल्ल) सांगितले आहे. त्याचा त्याग न करता साधकाने द्वात्तीसाकार भावनेला प्रारंभ करावा. कारण अशा प्रकारे प्रारंभ करणाऱ्या साधकाची द्वात्तीसाकार भावना सर्व प्रकारे यशस्वी होते, अन्यथा नाही. ตตฺถ อาทิโตว ตจปญฺจกํ ตาว คเหตฺวา อปิ เตปิฏเกน ‘‘เกสา โลมา’’ติอาทินา นเยน อนุโลมโต, ตสฺมึ ปคุณีภูเต ‘‘ตโจ ทนฺตา’’ติ เอวมาทินา นเยน ปฏิโลมโต, ตสฺมิมฺปิ ปคุณีภูเต ตทุภยนเยเนว อนุโลมปฺปฏิโลมโต พหิ วิสฏวิตกฺกวิจฺเฉทนตฺถํ ปาฬิปคุณีภาวตฺถญฺจ วจสา โกฏฺฐาสสภาวปริคฺคหตฺถํ มนสา จ อทฺธมาสํ ภาเวตพฺพํ. วจสา หิสฺส ภาวนา พหิ วิสฏวิตกฺเก วิจฺฉินฺทิตฺวา มนสา ภาวนาย ปาฬิปคุณตาย จ ปจฺจโย โหติ, มนสา ภาวนา อสุภวณฺณลกฺขณานํ อญฺญตรวเสน ปริคฺคหสฺส, อถ เตเนว นเยน วกฺกปญฺจกํ อทฺธมาสํ, ตโต ตทุภยมทฺธมาสํ, ตโต ปปฺผาสปญฺจกมทฺธมาสํ, ตโต ตํ ปญฺจกตฺตยมฺปิ อทฺธมาสํ, อถ อนฺเต อวุตฺตมฺปิ มตฺถลุงฺคํ ปถวีธาตุอากาเรหิ สทฺธึ เอกโต ภาวนตฺถํ อิธ ปกฺขิปิตฺวา มตฺถลุงฺคปญฺจกํ อทฺธมาสํ, ตโต ปญฺจกจตุกฺกมฺปิ อทฺธมาสํ, อถ เมทฉกฺกมทฺธมาสํ, ตโต เมทฉกฺเกน สห ปญฺจกจตุกฺกมฺปิ อทฺธมาสํ, อถ มุตฺตฉกฺกมทฺธมาสํ, ตโต สพฺพเมว ทฺวตฺตึสาการมทฺธมาสนฺติ เอวํ ฉ มาเส วณฺณสณฺฐานทิโสกาสปริจฺเฉทโต ววตฺถเปนฺเตน ภาเวตพฺพํ. เอตํ มชฺฌิมปญฺญํ ปุคฺคลํ สนฺธาย วุตฺตํ. มนฺทปญฺเญน ตุ ยาวชีวํ ภาเวตพฺพํ ติกฺขปญฺญสฺส น จิเรเนว ภาวนา สมฺปชฺชตีติ. त्या (भावनारत) अभ्यासात अगदी सुरुवातीपासूनच प्रथम त्वचा-पंचक ग्रहण करून, त्रिपिटकधारी भिक्खूने 'केस, रोम' इत्यादी पद्धतीने अनुलोम क्रमाने, आणि तो क्रम चांगला अभ्यस्त झाल्यावर 'त्वचा, दात' इत्यादी पद्धतीने प्रतिलोम क्रमाने, आणि तो देखील अभ्यस्त झाल्यावर त्या दोन्ही पद्धतींनीच अनुलोम-प्रतिलोम क्रमाने, बाहेर भटकणाऱ्या वितर्कांना रोखण्यासाठी आणि पाळी पाठ कंठस्थ होण्यासाठी वाचेने, तसेच भागांच्या स्वभावाचे आकलन करण्यासाठी मनाने पंधरवडाभर भावना करावी. कारण वाचेने केलेली भावना बाहेर भटकणाऱ्या वितर्कांना तोडून, मनाने करावयाच्या भावनेसाठी आणि पाळी पाठाच्या परिचयासाठी साहाय्यक ठरते. मनाने केलेली भावना ही अशुभाचे वर्ण आणि लक्षणे यांपैकी कोणत्याही एका प्रकारे आकलन करण्यासाठी साहाय्यक ठरते. त्यानंतर त्याच पद्धतीने वक्क-पंचक पंधरवडाभर भावावे. त्यानंतर त्या दोन्हीचे पंधरवडाभर भावन करावे. त्यानंतर पप्फास-पंचक पंधरवडाभर भावावे. त्यानंतर त्या तिन्ही पंचकांचे पंधरवडाभर भावन करावे. त्यानंतर शेवटी न सांगितलेले देखील मथ्थलुंग (मेंदू) हे पृथ्वीधातूच्या लक्षणांसह एकत्र भावन करण्यासाठी येथे समाविष्ट करून, मथ्थलुंग-पंचक पंधरवडाभर भावावे. त्यानंतर चारही पंचकांचे पंधरवडाभर भावन करावे. त्यानंतर मेद-षट्क पंधरवडाभर भावावे. त्यानंतर मेद-षट्कासह चारही पंचकांचे पंधरवडाभर भावन करावे. त्यानंतर मुत्त-षट्क पंधरवडाभर भावावे. त्यानंतर सर्वच बत्तीस भागांचे पंधरवडाभर भावन करावे. अशा प्रकारे सहा महिने वर्ण, आकार, दिशा, स्थान आणि मर्यादा यांद्वारे निश्चित करत भावना करावी. हे मध्यम प्रज्ञा असलेल्या व्यक्तीला उद्देशून सांगितले आहे. मंद प्रज्ञा असलेल्या व्यक्तीने मात्र आयुष्यभर भावना करावी. तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्या व्यक्तीची भावना लवकरच यशस्वी होते, असे जाणावे. เอตฺถาห [Pg.32] – ‘‘กถํ ปนายมิมํ ทฺวตฺตึสาการํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปตี’’ติ? อยญฺหิ ‘‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย เกสา’’ติ เอวมาทินา นเยน ตจปญฺจกาทิวิภาคโต ทฺวตฺตึสาการํ ภาเวนฺโต เกสา ตาว วณฺณโต กาฬกาติ ววตฺถเปติ, ยาทิสกา วาเนน ทิฏฺฐา โหนฺติ. สณฺฐานโต ทีฆวฏฺฏลิกา ตุลาทณฺฑมิวาติ ววตฺถเปติ. ทิสโต ปน ยสฺมา อิมสฺมึ กาเย นาภิโต อุทฺธํ อุปริมา ทิสา อโธ เหฏฺฐิมาติ วุจฺจติ, ตสฺมา อิมสฺส กายสฺส อุปริมาย ทิสาย ชาตาติ ววตฺถเปติ. โอกาสโต นลาฏนฺตกณฺณจูฬิกคลวาฏกปริจฺฉินฺเน สีสจมฺเม ชาตาติ. ตตฺถ ยถา วมฺมิกมตฺถเก ชาตานิ กุณฺฐติณานิ น ชานนฺติ ‘‘มยํ วมฺมิกมตฺถเก ชาตานี’’ติ; นปิ วมฺมิกมตฺถโก ชานาติ ‘‘มยิ กุณฺฐติณานิ ชาตานี’’ติ; เอวเมว น เกสา ชานนฺติ ‘‘มยํ สีสจมฺเม ชาตา’’ติ, นปิ สีสจมฺมํ ชานาติ ‘‘มยิ เกสา ชาตา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา อเจตนา อพฺยากตา สุญฺญา ปรมทุคฺคนฺธเชคุจฺฉปฺปฏิกูลา, น สตฺโต น ปุคฺคโลติ ววตฺถเปติ. ปริจฺเฉทโตติ ทุวิโธ ปริจฺเฉโท สภาควิสภาควเสน. ตตฺถ เกสา เหฏฺฐา ปติฏฺฐิตจมฺมตเลน ตตฺถ วีหคฺคมตฺตํ ปวิสิตฺวา ปติฏฺฐิเตน อตฺตโน มูลตเลน จ อุปริ อากาเสน ติริยํ อญฺญมญฺเญน ปริจฺฉินฺนาติ เอวํ สภาคปริจฺเฉทโต, เกสา น อวเสสเอกตึสาการา. อวเสสา เอกตึสา น เกสาติ เอวํ วิสภาคปริจฺเฉทโต จ ววตฺถเปติ. เอวํ ตาว เกเส วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. येथे विचारले आहे – 'पण हा साधक या बत्तीस भागांचे वर्ण इत्यादींद्वारे कसे निर्धारण करतो?' कारण हा साधक 'या शरीरात केस आहेत' इत्यादी पद्धतीने त्वचा-पंचक इत्यादी विभागांद्वारे बत्तीस भागांची भावना करताना, केस हे वर्णाने काळे आहेत असे निश्चित करतो, किंवा त्याने जसे पाहिले असतील तसे निश्चित करतो. आकाराने ते लांब व गोल असून कापसाच्या पिंजलेल्या वातीसारखे आहेत, असे निश्चित करतो. दिशेच्या बाबतीत, कारण या शरीरात नाभीच्या वरच्या भागाला 'वरची दिशा' आणि नाभीच्या खालच्या भागाला 'खालची दिशा' म्हटले जाते, म्हणून ते या शरीराच्या वरच्या दिशेला उत्पन्न झाले आहेत, असे निश्चित करतो. स्थानाने ते कपाळाचा शेवट, कानांच्या पाळ्या आणि मानेचा खळगा यांनी मर्यादित असलेल्या डोक्याच्या त्वचेवर उत्पन्न झाले आहेत, असे निश्चित करतो. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे वारुळाच्या माथ्यावर उगवलेले कुंठ-गवत हे जाणत नाही की 'आम्ही वारुळाच्या माथ्यावर उगवलो आहोत'; आणि वारुळाचा माथाही जाणत नाही की 'माझ्यावर कुंठ-गवत उगवले आहे'; त्याचप्रमाणे केस जाणत नाहीत की 'आम्ही डोक्याच्या त्वचेवर उत्पन्न झालो आहोत', आणि डोक्याची त्वचाही जाणत नाही की 'माझ्यावर केस उत्पन्न झाले आहेत'. कारण हे घटक इच्छा आणि प्रत्यवेक्षण यांनी रहित, अचेतन, अव्याकृत, शून्य, अत्यंत दुर्गंधीयुक्त, घृणास्पद व प्रतिकूल आहेत; ते सत्व नाहीत आणि पुद्गल नाहीत, असे तो निश्चित करतो. मर्यादेने विचार केला तर सभाग आणि विसभाग अशा दोन प्रकारच्या मर्यादा आहेत. त्यामध्ये, केस हे खाली डोक्याच्या त्वचेच्या थराने—जिथे ते तांदळाच्या दाण्याइतके आत शिरून स्थिर झाले आहेत अशा स्वतःच्या मुळाच्या भागाने—वर आकाशाने आणि बाजूला एकमेकांशी मर्यादित आहेत, हा त्यांचा सभाग-परिच्छेद होय. केस हे उर्वरित एकतीस भाग नव्हेत आणि उर्वरित एकतीस भाग हे केस नव्हेत, हा त्यांचा विसभाग-परिच्छेद होय, असे तो निश्चित करतो. अशा प्रकारे तो प्रथम केसांचे वर्ण इत्यादींद्वारे निर्धारण करतो. อวเสเสสุ โลมา วณฺณโต เยภุยฺเยน นีลวณฺณาติ ววตฺถเปติ, ยาทิสกา วาเนน ทิฏฺฐา โหนฺติ. สณฺฐานโต โอณตจาปสณฺฐานา, อุปริ วงฺกตาลหีรสณฺฐานา วา, ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตา, โอกาสโต หตฺถตลปาทตเล ฐเปตฺวา เยภุยฺเยน อวเสสสรีรจมฺเม ชาตาติ. उर्वरित भागांमध्ये, रोम (अंगावरील लव) हे वर्णाने बहुतांश करून निळसर-काळे असतात, किंवा त्याने जसे पाहिले असतील तसे तो निश्चित करतो. आकाराने ते वाकलेल्या धनुष्यासारखे असतात, किंवा वरच्या बाजूला वाकलेल्या ताडाच्या पानांच्या शिरेसारखे असतात. दिशेने ते दोन्ही दिशांमध्ये उत्पन्न झालेले असतात. स्थानाने तळहात आणि तळपाय वगळता बहुतांश करून उर्वरित शरीराच्या त्वचेवर उत्पन्न झालेले असतात, असे तो निश्चित करतो. ตตฺถ ยถา ปุราณคามฏฺฐาเน ชาตานิ ทพฺพติณานิ น ชานนฺติ ‘‘มยํ ปุราณคามฏฺฐาเน ชาตานี’’ติ, น จ ปุราณคามฏฺฐานํ ชานาติ ‘‘มยิ ทพฺพติณานิ ชาตานี’’ติ, เอวเมว น โลมา ชานนฺติ ‘‘มยํ สรีรจมฺเม ชาตา’’ติ, นปิ สรีรจมฺมํ ชานาติ ‘‘มยิ โลมา ชาตา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา อเจตนา อพฺยากตา สุญฺญา [Pg.33] ปรมทุคฺคนฺธเชคุจฺฉปฏิกูลา, น สตฺโต น ปุคฺคโลติ ววตฺถเปติ. ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา ปติฏฺฐิตจมฺมตเลน ตตฺถ ลิกฺขามตฺตํ ปวิสิตฺวา ปติฏฺฐิเตน อตฺตโน มูเลน จ อุปริ อากาเสน ติริยํ อญฺญมญฺเญน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมเตสํ สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ โลเม วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे जुन्या पडक्या गावाच्या जागी उगवलेले दब्ब-गवत हे जाणत नाही की 'आम्ही जुन्या गावाच्या जागी उगवलो आहोत'; आणि ते जुने गावही जाणत नाही की 'माझ्यामध्ये दब्ब-गवत उगवले आहे'; त्याचप्रमाणे रोम जाणत नाहीत की 'आम्ही शरीराच्या त्वचेवर उत्पन्न झालो आहोत', आणि शरीराची त्वचाही जाणत नाही की 'माझ्यावर रोम उत्पन्न झाले आहेत'. कारण हे घटक इच्छा आणि प्रत्यवेक्षण यांनी रहित, अचेतन, अव्याकृत, शून्य, अत्यंत दुर्गंधीयुक्त, घृणास्पद व प्रतिकूल आहेत; ते सत्व नाहीत आणि पुद्गल नाहीत, असे तो निश्चित करतो. मर्यादेने ते खाली त्वचेच्या थराने—जिथे ते एका उवेच्या अंड्याइतक्या सूक्ष्म भागात आत शिरून स्थिर झाले आहेत अशा स्वतःच्या मुळाने—वर आकाशाने आणि बाजूला एकमेकांशी मर्यादित आहेत, असे तो निश्चित करतो. हा त्यांचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे; अशा प्रकारे तो रोमांचे वर्ण इत्यादींद्वारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ นขา ยสฺส ปริปุณฺณา, ตสฺส วีสติ. เต สพฺเพปิ วณฺณโต มํสวินิมุตฺโตกาเส เสตา, มํสสมฺพนฺเธ ตมฺพวณฺณาติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต ยถาสกปติฏฺฐิโตกาสสณฺฐานา, เยภุยฺเยน มธุกผลฏฺฐิกสณฺฐานา, มจฺฉสกลิกสณฺฐานา วาติ ววตฺถเปติ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตา, โอกาสโต องฺคุลีนํ อคฺเคสุ ปติฏฺฐิตาติ. त्यानंतर नखे; ज्याचे सर्व अवयव पूर्ण आहेत, त्याला वीस नखे असतात. ती सर्व वर्णाने मांसापासून सुटलेल्या भागात पांढरी असतात, आणि मांसाशी जोडलेल्या भागात तांबूस रंगाची असतात, असे तो निश्चित करतो. आकाराने ती आपापल्या स्थानाच्या आकारानुसार असतात; बहुतांश करून ती महुआच्या फळाच्या बीच्या आकाराची किंवा माशाच्या खवल्यांसारख्या आकाराची असतात, असे तो निश्चित करतो. दिशेने ती दोन्ही दिशांमध्ये उत्पन्न झालेली असतात, आणि स्थानाने ती बोटांच्या टोकांवर स्थित असतात. ตตฺถ ยถา นาม คามทารเกหิ ทณฺฑกคฺเคสุ มธุกผลฏฺฐิกา ฐปิตา น ชานนฺติ ‘‘มยํ ทณฺฑกคฺเคสุ ฐปิตา’’ติ, นปิ ทณฺฑกา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหสุ มธุกผลฏฺฐิกา ฐปิตา’’ติ; เอวเมว นขา น ชานนฺติ ‘‘มยํ องฺคุลีนํ อคฺเคสุ ปติฏฺฐิตา’’ติ, นปิ องฺคุลิโย ชานนฺติ ‘‘อมฺหากํ อคฺเคสุ นขา ปติฏฺฐิตา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา อเจตนา…เป… น ปุคฺคโลติ ววตฺถเปติ. ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา มูเล จ องฺคุลิมํเสน, ตตฺถ ปติฏฺฐิตตเลน วา อุปริ อคฺเค จ อากาเสน, อุภโตปสฺเสสุ องฺคุลีนํ อุภโตโกฏิจมฺเมน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมเตสํ สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ นเข วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे गावातील मुलांनी काठ्यांच्या टोकांवर ठेवलेल्या महुआच्या बिया जाणत नाहीत की 'आम्हाला काठ्यांच्या टोकांवर ठेवले आहे'; आणि काठ्याही जाणत नाहीत की 'आमच्यावर महुआच्या बिया ठेवल्या आहेत'; त्याचप्रमाणे नखे जाणत नाहीत की 'आम्ही बोटांच्या टोकांवर स्थित आहोत', आणि बोटेही जाणत नाहीत की 'आमच्या टोकांवर नखे स्थित आहेत'. कारण हे घटक इच्छा आणि प्रत्यवेक्षण यांनी रहित, अचेतन... (पेय्याल)... पुद्गल नाहीत, असे तो निश्चित करतो. मर्यादेने ती खाली मुळाशी बोटांच्या मांसाने आणि तिथे असलेल्या त्वचेच्या थराने, वर टोकाकडे आकाशाने आणि दोन्ही बाजूंना बोटांच्या दोन्ही कडांच्या त्वचेने मर्यादित आहेत, असे तो निश्चित करतो. हा त्यांचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे; अशा प्रकारे तो नखांचे वर्ण इत्यादींद्वारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ ทนฺตา ยสฺส ปริปุณฺณา, ตสฺส ทฺวตฺตึส. เต สพฺเพปิ วณฺณโต เสตวณฺณาติ ววตฺถเปติ. ยสฺส สมสณฺฐิตา โหนฺติ, ตสฺส ขรปตฺตจฺฉินฺนสงฺขปฏลมิว สมคนฺถิตเสตกุสุมมกุฬมาลา วิย จ ขายนฺติ. ยสฺส วิสมสณฺฐิตา, ตสฺส ชิณฺณอาสนสาลาปีฐกปฏิปาฏิ วิย นานาสณฺฐานาติ สณฺฐานโต ววตฺถเปติ. เตสญฺหิ อุภยทนฺตปนฺติปริโยสาเนสุ เหฏฺฐโต อุปริโต จ ทฺเว ทฺเว กตฺวา อฏฺฐ ทนฺตา จตุโกฏิกา จตุมูลิกา อาสนฺทิกสณฺฐานา, เตสํ โอรโต เตเนว [Pg.34] กเมน สนฺนิวิฏฺฐา อฏฺฐ ทนฺตา ติโกฏิกา ติมูลิกา สิงฺฆาฏกสณฺฐานา. เตสมฺปิ โอรโต เตเนว กเมน เหฏฺฐโต อุปริโต จ เอกเมกํ กตฺวา จตฺตาโร ทนฺตา ทฺวิโกฏิกา ทฺวิมูลิกา ยานกูปตฺถมฺภินีสณฺฐานา. เตสมฺปิ โอรโต เตเนว กเมน สนฺนิวิฏฺฐา จตฺตาโร ทาฐาทนฺตา เอกโกฏิกา เอกมูลิกา มลฺลิกามกุฬสณฺฐานา. ตโต อุภยทนฺตปนฺติเวมชฺเฌ เหฏฺฐา จตฺตาโร อุปริ จตฺตาโร กตฺวา อฏฺฐ ทนฺตา เอกโกฏิกา เอกมูลิกา ตุมฺพพีชสณฺฐานา. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตา. โอกาสโต อุปริมา อุปริมหนุกฏฺฐิเก อโธโกฏิกา, เหฏฺฐิมา เหฏฺฐิมหนุกฏฺฐิเก อุทฺธํโกฏิกา หุตฺวา ปติฏฺฐิตาติ. त्यानंतर, ज्याचे दात पूर्ण आहेत, त्याचे बत्तीस दात असतात. ते सर्व रंगाने पांढरे आहेत, असे तो निश्चित करतो. ज्याचे दात समप्रमाणात स्थित असतात, त्याचे दात करवतीने कापलेल्या शंखाच्या तुकड्याप्रमाणे किंवा व्यवस्थित गुंफलेल्या पांढऱ्या मोगऱ्याच्या कळ्यांच्या माळेप्रमाणे दिसतात. ज्याचे दात विषम स्थित असतात, त्याचे दात जुन्या धर्मशाळेत ठेवलेल्या लाकडी पाटांच्या रांगेप्रमाणे वेगवेगळ्या आकाराचे दिसतात, असे आकारावरून निश्चित करतो. त्या बत्तीस दातांपैकी दोन्ही बाजूंच्या दातांच्या रांगांच्या शेवटी, खालील आणि वरील बाजूला दोन-दोन मिळून आठ दात (दाढा) चार कोपरे व चार मुळे असणारे आणि आसंदीच्या (खुर्चीच्या) आकाराचे असतात. त्यांच्या आतल्या बाजूला त्याच क्रमाने असलेले आठ दात तीन कोपरे व तीन मुळे असणारे आणि शिंगाड्याच्या आकाराचे असतात. त्यांच्याही आतल्या बाजूला त्याच क्रमाने खाली आणि वर प्रत्येकी एक-एक मिळून चार दात दोन कोपरे व दोन मुळे असणारे आणि गाडीच्या खांबाच्या आकाराचे असतात. त्यांच्याही आतल्या बाजूला त्याच क्रमाने असलेले चार सुळे दात एक कोपरा व एक मूळ असणारे आणि मोगऱ्याच्या कळीच्या आकाराचे असतात. त्यानंतर दोन्ही दातांच्या रांगांच्या मध्यभागी खाली चार आणि वर चार मिळून आठ दात एक कोपरा व एक मूळ असणारे आणि भोपळ्याच्या बीच्या आकाराचे असतात. दिशेच्या दृष्टीने ते शरीराच्या वरील भागात उत्पन्न झालेले असतात. स्थानाच्या दृष्टीने, वरचे दात वरच्या जबड्याच्या हाडात खालच्या दिशेने टोक असणारे आणि खालचे दात खालच्या जबड्याच्या हाडात वरच्या दिशेने टोक असणारे होऊन स्थित असतात, असे निश्चित करतो. ตตฺถ ยถา นวกมฺมิกปุริเสน เหฏฺฐา สิลาตเล ปติฏฺฐาปิตา อุปริมตเล ปเวสิตา ถมฺภา น ชานนฺติ ‘‘มยํ เหฏฺฐาสิลาตเล ปติฏฺฐาปิตา, อุปริมตเล ปเวสิตา’’ติ, น เหฏฺฐาสิลาตลํ ชานาติ ‘‘มยิ ถมฺภา ปติฏฺฐาปิตา’’ติ, น อุปริมตลํ ชานาติ ‘‘มยิ ถมฺภา ปวิฏฺฐา’’ติ; เอวเมว ทนฺตา น ชานนฺติ ‘‘มยํ เหฏฺฐาหนุกฏฺฐิเก ปติฏฺฐิตา, อุปริมหนุกฏฺฐิเก ปวิฏฺฐา’’ติ, นาปิ เหฏฺฐาหนุกฏฺฐิกํ ชานาติ ‘‘มยิ ทนฺตา ปติฏฺฐิตา’’ติ, น อุปริมหนุกฏฺฐิกํ ชานาติ ‘‘มยิ ทนฺตา ปวิฏฺฐา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา หนุกฏฺฐิกูเปน หนุกฏฺฐิกํ ปวิสิตฺวา ปติฏฺฐิเตน อตฺตโน มูลตเลน จ อุปริ อากาเสน ติริยํ อญฺญมญฺเญน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมเตสํ สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ทนฺเต วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. तेथे, ज्याप्रमाणे एखाद्या नवीन बांधकाम करणाऱ्या माणसाने खालच्या शिलातळावर उभे केलेले आणि वरच्या छतामध्ये बसवलेले खांब हे जाणत नाहीत की, 'आम्ही खालच्या शिलातळावर उभे केले गेलो आहोत आणि वरच्या छतामध्ये बसवले गेलो आहोत'; तसेच खालचा शिलातळही जाणत नाही की, 'माझ्यावर खांब उभे केले गेले आहेत'; आणि वरचे छतही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये खांब बसवले गेले आहेत'; त्याचप्रमाणे दातही जाणत नाहीत की, 'आम्ही खालच्या जबड्याच्या हाडात स्थित आहोत आणि वरच्या जबड्याच्या हाडात बसवलेले आहोत'; तसेच खालचा जबडाही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये दात स्थित आहेत'; आणि वरचा जबडाही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये दात बसवलेले आहेत'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि चिंतनाने रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे निश्चित करतो. मर्यादेच्या दृष्टीने, खाली जबड्याच्या हाडाच्या छिद्रातून जबड्याच्या हाडात प्रवेश करून स्थित असलेल्या स्वतःच्या मुळाच्या भागाने, वर पोकळीने आणि बाजूला एकमेकांशी मर्यादित आहेत, असे निश्चित करतो. हा त्यांचा सजातीय विभाग आहे; आणि विजातीय विभाग तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे दातांना रंग इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ อนฺโตสรีเร นานากุณปสญฺจยปฺปฏิจฺฉาทกํ ตโจ วณฺณโต เสโตติ ววตฺถเปติ. โส หิ ยทิปิ ฉวิราครญฺชิตตฺตา กาฬโกทาตาทิวณฺณวเสน นานาวณฺโณ วิย ทิสฺสติ, ตถาปิ สภาควณฺเณน เสโต เอว. โส ปนสฺส เสตภาโว อคฺคิชาลาภิฆาตปหรณปหาราทีหิ วิทฺธํสิตาย ฉวิยา ปากโฏ โหติ. สณฺฐานโต สงฺเขเปน กญฺจุกสณฺฐาโน, วิตฺถาเรน นานาสณฺฐาโนติ. ตถา หิ ปาทงฺคุลิตฺตโจ โกสการกโกสสณฺฐาโน, ปิฏฺฐิปาทตฺตโจ ปุฏพทฺธูปาหนสณฺฐาโน, ชงฺฆตฺตโจ ภตฺตปุฏกตาลปณฺณสณฺฐาโน[Pg.35], อูรุตฺตโจ ตณฺฑุลภริตทีฆตฺถวิกสณฺฐาโน, อานิสทตฺตโจ อุทกปูริตปฏปริสฺสาวนสณฺฐาโน, ปิฏฺฐิตฺตโจ ผลโกนทฺธจมฺมสณฺฐาโน, กุจฺฉิตฺตโจ วีณาโทณิโกนทฺธจมฺมสณฺฐาโน, อุรตฺตโจ เยภุยฺเยน จตุรสฺสสณฺฐาโน, ทฺวิพาหุตฺตโจ ตูณีโรนทฺธจมฺมสณฺฐาโน, ปิฏฺฐิหตฺถตฺตโจ ขุรโกสสณฺฐาโน ผณกตฺถวิกสณฺฐาโน วา, หตฺถงฺคุลิตฺตโจ กุญฺจิกาโกสสณฺฐาโน, คีวตฺตโจ คลกญฺจุกสณฺฐาโน, มุขตฺตโจ ฉิทฺทาวฉิทฺทกิมิกุลาวกสณฺฐาโน, สีสตฺตโจ ปตฺตตฺถวิกสณฺฐาโนติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत विविध प्रकारच्या अशुद्ध संचयाला झाकणारी त्वचा रंगाने पांढरी आहे, असे निश्चित करतो. जरी ती त्वचा बाह्य त्वचेच्या रंगाच्या आसक्तीमुळे काळ्या, पांढऱ्या इत्यादी रंगांच्या प्रभावाने विविध रंगांची असल्यासारखी दिसते, तरीही तिच्या नैसर्गिक रंगाने ती पांढरीच असते. तिचा तो पांढरेपणा आगीच्या ज्वाळांचा दाह, प्रहार किंवा जखम इत्यादींमुळे बाह्य त्वचा नष्ट झाल्यावर स्पष्टपणे दिसून येतो. आकाराच्या दृष्टीने, संक्षेपाने ती चिलखताच्या आकाराची असते आणि विस्ताराने विविध आकारांची असते. जसे की, पायाच्या बोटांची त्वचा रेशमाच्या कीटकाच्या कोशाच्या आकाराची असते; पायाच्या पाठीची त्वचा बांधलेल्या पादत्राणाच्या आकाराची असते; पिंढरीची त्वचा पानांच्या द्रोणात बांधलेल्या भातासारखी किंवा ताडाच्या पानाच्या आकाराची असते; मांडीची त्वचा तांदळाने भरलेल्या लांब पिशवीच्या आकाराची असते; नितंबाची त्वचा पाण्याने भरलेल्या कापडी गाळणीच्या आकाराची असते; पाठीची त्वचा लाकडी पाटावर ताणून बसवलेल्या चामड्याच्या आकाराची असते; पोटाची त्वचा विणेच्या पोकळीवर ताणून बसवलेल्या चामड्याच्या आकाराची असते; छातीची त्वचा बहुतांश करून चौकोनी आकाराची असते; दोन्ही हातांची त्वचा भात्यावर ताणून बसवलेल्या चामड्याच्या आकाराची असते; हाताच्या पाठीची त्वचा वस्तऱ्याच्या कोशाच्या आकाराची किंवा कंगव्याच्या पिशवीच्या आकाराची असते; हाताच्या बोटांची त्वचा किल्लीच्या कोशाच्या आकाराची असते; मानेची त्वचा गळ्याच्या अंगरख्याच्या आकाराची असते; चेहऱ्याची त्वचा छिद्रेच छिद्रे असलेल्या कीटकांच्या घरट्यासारखी असते; आणि डोक्याची त्वचा भिक्षापात्राच्या पिशवीच्या आकाराची असते. ตจปริคฺคณฺหเกน จ โยคาวจเรน อุตฺตโรฏฺฐโต ปฏฺฐาย ตจสฺส มํสสฺส จ อนฺตเรน จิตฺตํ เปเสนฺเตน ปฐมํ ตาว มุขตฺตโจ ววตฺถเปตพฺโพ, ตโต สีสตฺตโจ, อถ พหิคีวตฺตโจ, ตโต อนุโลเมน ปฏิโลเมน จ ทกฺขิณหตฺถตฺตโจ. อถ เตเนว กเมน วามหตฺถตฺตโจ, ตโต ปิฏฺฐิตฺตโจ, อถ อานิสทตฺตโจ, ตโต อนุโลเมน ปฏิโลเมน จ ทกฺขิณปาทตฺตโจ, อถ วามปาทตฺตโจ, ตโต วตฺถิอุทรหทยอพฺภนฺตรคีวตฺตโจ, ตโต เหฏฺฐิมหนุกตฺตโจ, อถ อธโรฏฺฐตฺตโจ. เอวํ ยาว ปุน อุปริ โอฏฺฐตฺตโจติ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาโต. โอกาสโต สกลสรีรํ ปริโยนนฺธิตฺวา ฐิโตติ. त्वचेचे आकलन करणाऱ्या योगावाचराने वरच्या ओठापासून सुरुवात करून, त्वचा आणि मांस यांच्या मध्यभागातून आपले चित्त फिरवत, सर्वप्रथम चेहऱ्याची त्वचा निश्चित करावी; त्यानंतर डोक्याची त्वचा, मग मानेच्या बाहेरील भागाची त्वचा, त्यानंतर अनुलोम आणि प्रतिलोम क्रमाने उजव्या हाताची त्वचा निश्चित करावी. त्यानंतर त्याच क्रमाने डाव्या हाताची त्वचा, मग पाठीची त्वचा, त्यानंतर नितंबाची त्वचा, त्यानंतर अनुलोम आणि प्रतिलोम क्रमाने उजव्या पायाची त्वचा, मग डाव्या पायाची त्वचा, त्यानंतर मूत्राशय, पोट, हृदय आणि गळ्याच्या आतील भागाची त्वचा, त्यानंतर खालच्या जबड्याची त्वचा आणि मग खालच्या ओठाची त्वचा निश्चित करावी. अशा प्रकारे पुन्हा वरच्या ओठाच्या त्वचेपर्यंत निश्चित करावे. दिशेच्या दृष्टीने, ती दोन्ही दिशांना उत्पन्न झालेली असते. स्थानाच्या दृष्टीने, ती संपूर्ण शरीराला वेढून स्थित असते. ตตฺถ ยถา อลฺลจมฺมปริโยนทฺธาย เปฬาย น อลฺลจมฺมํ ชานาติ ‘‘มยา เปฬา ปริโยนทฺธา’’ติ, นปิ เปฬา ชานาติ ‘‘อหํ อลฺลจมฺเมน ปริโยนทฺธา’’ติ; เอวเมว น ตโจ ชานาติ ‘‘มยา อิทํ จาตุมหาภูติกํ สรีรํ โอนทฺธ’’นฺติ, นปิ อิทํ จาตุมหาภูติกํ สรีรํ ชานาติ ‘‘อหํ ตเจน โอนทฺธ’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. เกวลํ ตุ – तेथे, ज्याप्रमाणे ओल्या चामड्याने वेढलेल्या पेटीला हे माहीत नसते की, 'मी पेटीला वेढले आहे', आणि पेटीलाही हे माहीत नसते की, 'मी ओल्या चामड्याने वेढलेली आहे'; त्याचप्रमाणे त्वचेलाही हे माहीत नसते की, 'मी या चार महाभूतांनी बनलेल्या शरीराला वेढले आहे', आणि या चार महाभूतांनी बनलेल्या शरीरालाही हे माहीत नसते की, 'मी त्वचेने वेढलेले आहे'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि चिंतनाने रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही. केवळ - ‘‘อลฺลจมฺมปฏิจฺฉนฺโน, นวทฺวาโร มหาวโณ; สมนฺตโต ปคฺฆรติ, อสุจิปูติคนฺธิโย’’ติ. ओल्या चामड्याने झाकलेले, नऊ द्वारे असलेले हे शरीर एक मोठी जखम आहे; ज्यातून चहूबाजूंनी अशुद्ध आणि दुर्गंधीयुक्त स्राव वाहत असतो. ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา มํเสน ตตฺถ ปติฏฺฐิตตเลน วา อุปริ ฉวิยา ปริจฺฉินฺโนติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ตจํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. मर्यादेच्या दृष्टीने, खाली मांसाने किंवा त्यावर स्थित असलेल्या मांसभागाने आणि वर बाह्य त्वचेने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा तिचा सजातीय विभाग आहे; आणि विजातीय विभाग तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे त्वचेला रंग इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो. ตโต [Pg.36] ปรํ สรีเร นวเปสิสตปฺปเภทํ มํสํ วณฺณโต รตฺตํ ปาลิภทฺทกปุปฺผสนฺนิภนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต นานาสณฺฐานนฺติ. ตถา หิ ตตฺถ ชงฺฆมํสํ ตาลปตฺตปุฏภตฺตสณฺฐานํ, อวิกสิตเกตกีมกุฬสณฺฐานนฺติปิ เกจิ. อูรุมํสํ สุธาปิสนนิสทโปตกสณฺฐานํ, อานิสทมํสํ อุทฺธนโกฏิสณฺฐานํ, ปิฏฺฐิมํสํ ตาลคุฬปฏลสณฺฐานํ, ผาสุกทฺวยมํสํ วํสมยโกฏฺฐกุจฺฉิปเทสมฺหิ ตนุมตฺติกาเลปสณฺฐานํ, ถนมํสํ วฏฺเฏตฺวา อวกฺขิตฺตทฺธมตฺติกาปิณฺฑสณฺฐานํ, ทฺเวพาหุมํสํ นงฺคุฏฺฐสีสปาเท เฉตฺวา นิจฺจมฺมํ กตฺวา ฐปิตมหามูสิกสณฺฐานํ, มํสสูนกสณฺฐานนฺติปิ เอเก. คณฺฑมํสํ คณฺฑปฺปเทเส ฐปิตกรญฺชพีชสณฺฐานํ, มณฺฑูกสณฺฐานนฺติปิ เอเก. ชิวฺหามํสํ นุหีปตฺตสณฺฐานํ, นาสามํสํ โอมุขนิกฺขิตฺตปณฺณโกสสณฺฐานํ, ๐.อกฺขิกูปมํสํ อทฺธปกฺกอุทุมฺพรสณฺฐานํ, สีสมํสํ ปตฺตปจนกฏาหตนุเลปสณฺฐานนฺติ. มํสปริคฺคณฺหเกน จ โยคาวจเรน เอตาเนว โอฬาริกมํสานิ สณฺฐานโต ววตฺถเปตพฺพานิ. เอวญฺหิ ววตฺถาปยโต สุขุมานิ มํสานิ ญาณสฺส อาปาถํ อาคจฺฉนฺตีติ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตํ. โอกาสโต สาธิกานิ ตีณิ อฏฺฐิสตานิ อนุลิมฺปิตฺวา ฐิตนฺติ. त्यानंतर शरीरातील नऊशे मांसखंडांचे बनलेले मांस रंगाने तांबडे, पारिभद्रकाच्या (पळसाच्या) फुलासारखे आहे, असे तो निश्चित करतो. आकाराने ते विविध आकारांचे आहे, असे निश्चित करतो. कारण की, त्यामध्ये पोटरीचे मांस हे ताडाच्या पानाच्या द्रोणात ठेवलेल्या भाताच्या आकाराचे असते; काही आचार्य म्हणतात की ते न उमललेल्या केवड्याच्या कळीच्या आकाराचे असते. मांडीचे मांस हे चुना वाटण्याच्या पाटा-वरवंट्यासारखे असते; नितंबाचे मांस हे चुलीच्या कोपऱ्यासारखे असते; पाठीचे मांस हे ताडाच्या फळाच्या अर्ध्या भागाच्या थरासारखे असते; दोन्ही बाजूंच्या बरगड्यांचे मांस हे बांबूच्या कोठाराच्या भिंतीवर लावलेल्या मातीच्या पातळ लेपासारखे असते; स्तनांचे मांस हे गोल करून ठेवलेल्या ओल्या मातीच्या गोळ्यासारखे असते; दोन्ही हातांचे मांस हे शेपूट, डोके आणि पाय कापून, कातडी सोलून ठेवलेल्या मोठ्या उंदरासारखे असते; काही आचार्य म्हणतात की ते सुळावर टांगलेल्या मांसाच्या तुकड्यासारखे असते. गालाचे मांस हे गालाच्या भागात ठेवलेल्या करंजाच्या बीसारखे असते; काही आचार्य म्हणतात की ते बेडकाच्या आकाराचे असते. जिभेचे मांस हे निवडुंगाच्या पानाच्या आकाराचे असते; नाकाचे मांस हे खाली तोंड करून ठेवलेल्या पानाच्या द्रोणासारखे असते; डोळ्यांच्या खोबणीतील मांस हे अर्धवट पिकलेल्या उंबराच्या फळासारखे असते; डोक्याचे मांस हे भिक्षापात्र भाजण्याच्या कढईवर लावलेल्या मातीच्या लेपासारखे असते, असे तो निश्चित करतो. मांस ग्रहण करणाऱ्या योगावकराने या स्थूल मांसाचे आकाराने अशा प्रकारे निर्धारण केले पाहिजे. अशा प्रकारे निर्धारण करणाऱ्याच्या ज्ञानाच्या कक्षेत सूक्ष्म मांस देखील स्पष्ट होते. दिशेच्या दृष्टीने ते दोन्ही दिशांमध्ये (वरच्या आणि खालच्या भागात) उत्पन्न झालेले असते. स्थानाच्या दृष्टीने ते तीनशेहून अधिक हाडांना लिंपून राहिलेले असते, असे तो निश्चित करतो। ตตฺถ ยถา ถูลมตฺติกานุลิตฺตาย ภิตฺติยา น ถูลมตฺติกา ชานาติ ‘‘มยา ภิตฺติ อนุลิตฺตา’’ติ, นปิ ภิตฺติ ชานาติ ‘‘อหํ ถูลมตฺติกาย อนุลิตฺตา’’ติ, เอวเมวํ น นวเปสิสตปฺปเภทํ มํสํ ชานาติ ‘‘มยา อฏฺฐิสตตฺตยํ อนุลิตฺต’’นฺติ, นปิ อฏฺฐิสตตฺตยํ ชานาติ ‘‘อหํ นวเปสิสตปฺปเภเทน มํเสน อนุลิตฺต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. เกวลํ ตุ – त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे जाड मातीच्या लेपाने लिंपलेल्या भिंतीच्या बाबतीत, तो जाड मातीचा लेप जाणत नाही की, 'माझ्याद्वारे भिंत लिंपली गेली आहे', आणि भिंतही जाणत नाही की, 'मला जाड मातीच्या लेपाने लिंपले गेले आहे'; त्याचप्रमाणे, नऊशे मांसखंडांचे बनलेले मांस जाणत नाही की, 'माझ्याद्वारे तीनशे हाडे लिंपली गेली आहेत', आणि ती तीनशे हाडेही जाणत नाहीत की, 'आम्हाला नऊशे मांसखंडांच्या मांसाने लिंपले गेले आहे'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. केवळ - ‘‘นวเปสิสตา มํสา, อนุลิตฺตา กเฬวรํ; นานากิมิกุลากิณฺณํ, มีฬฺหฏฺฐานํว ปูติก’’นฺติ. “नऊशे मांसखंडांच्या मांसाने हे शरीर लिंपलेले आहे; विविध प्रकारच्या जंतूंच्या समूहाने भरलेले हे शरीर विष्ठेच्या जागेसारखे दुर्गंधीयुक्त आहे.” ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา อฏฺฐิสงฺฆาเฏน ตตฺถ ปติฏฺฐิตตเลน วา อุปริ ตเจน ติริยํ อญฺญมญฺเญน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ มํสํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. मर्यादेच्या दृष्टीने, खाली हाडांच्या सांगाड्याने किंवा त्यावर आधारलेल्या पृष्ठभागाने, वर त्वचेने आणि आडवे एकमेकांशी मर्यादित झालेले आहे, असे तो निश्चित करतो. ही याची समान मर्यादा (सभाग-परिच्छेद) आहे, तर असमान मर्यादा (विसभाग-परिच्छेद) केसांसारखीच आहे. अशा प्रकारे तो मांसाचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो। ตโต ปรํ สรีเร นวสตปฺปเภทา นฺหารู วณฺณโต เสตาติ ววตฺถเปติ, มธุวณฺณาติปิ เอเก. สณฺฐานโต นานาสณฺฐานาติ. ตถา [Pg.37] หิ ตตฺถ มหนฺตา มหนฺตา นฺหารู กนฺทลมกุฬสณฺฐานา, ตโต สุขุมตรา สูกรวาคุรรชฺชุสณฺฐานา, ตโต อณุกตรา ปูติลตาสณฺฐานา, ตโต อณุกตรา สีหฬมหาวีณาตนฺติสณฺฐานา, ตโต อณุกตรา ถูลสุตฺตกสณฺฐานา, หตฺถปิฏฺฐิปาทปิฏฺฐีสุ นฺหารู สกุณปาทสณฺฐานา, สีเส นฺหารู คามทารกานํ สีเส ฐปิตวิรฬตรทุกูลสณฺฐานา, ปิฏฺฐิยา นฺหารู เตเมตฺวา อาตเป ปสาริตมจฺฉชาลสณฺฐานา, อวเสสา อิมสฺมึ สรีเร ตํตํองฺคปจฺจงฺคานุคตา นฺหารู สรีเร ปฏิมุกฺกชาลกญฺจุกสณฺฐานาติ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตา. เตสุ จ ทกฺขิณกณฺณจูฬิกโต ปฏฺฐาย ปญฺจ กณฺฑรนามกา มหานฺหารู ปุรโต จ ปจฺฉโต จ วินนฺธมานา วามปสฺสํ คตา, วามกณฺณจูฬิกโต ปฏฺฐาย ปญฺจ ปุรโต จ ปจฺฉโต จ วินนฺธมานา ทกฺขิณปสฺสํ คตา, ทกฺขิณคลวาฏกโต ปฏฺฐาย ปญฺจ ปุรโต จ ปจฺฉโต จ วินนฺธมานา วามปสฺสํ คตา, วามคลวาฏกโต ปฏฺฐาย ปญฺจ ปุรโต จ ปจฺฉโต จ วินนฺธมานา ทกฺขิณปสฺสํ คตา, ทกฺขิณหตฺถํ วินนฺธมานา ปุรโต จ ปจฺฉโต จ ปญฺจ ปญฺจาติ ทส กณฺฑรนามกา เอว มหานฺหารู อารุฬฺหา. ตถา วามหตฺถํ, ทกฺขิณปาทํ, วามปาทญฺจาติ เอวเมเต สฏฺฐิ มหานฺหารู สรีรธารกา สรีรนิยามกาติปิ ววตฺถเปติ. โอกาสโต สกลสรีเร อฏฺฐิจมฺมานํ อฏฺฐิมํสานญฺจ อนฺตเร อฏฺฐีนิ อาพนฺธมานา ฐิตาติ. त्यानंतर शरीरातील नऊशे प्रकारच्या शिरा रंगाने पांढऱ्या आहेत, असे तो निश्चित करतो; काही आचार्य म्हणतात की त्या मधाच्या रंगाच्या आहेत. आकाराने त्या विविध आकारांच्या आहेत. कारण की, त्यामध्ये मोठ्या मोठ्या शिरा या कुंदाच्या कळीच्या आकाराच्या असतात; त्यापेक्षा सूक्ष्म शिरा या डुकरांना बांधण्याच्या दोरीसारख्या असतात; त्यापेक्षा लहान शिरा या गुळवेलीच्या आकाराच्या असतात; त्यापेक्षा लहान शिरा या सिंहली मोठ्या विणेच्या तारेसारख्या असतात; त्यापेक्षा लहान शिरा या जाड्या सुतासारख्या असतात; हाताच्या पाठीवर आणि पायाच्या पाठीवर असलेल्या शिरा या पक्षाच्या पायाच्या आकाराच्या असतात; डोक्यावरील शिरा या गावातील मुलांच्या डोक्यावर ठेवलेल्या विरळ पांढऱ्या वस्त्रासारख्या असतात; पाठीवरील शिरा या ओल्या करून उन्हात पसरवलेल्या मासे पकडण्याच्या जाळ्यासारख्या असतात; या शरीरातील इतर उरलेल्या विविध अंगावयवांमध्ये पसरलेल्या शिरा या शरीरावर चढवलेल्या जाळीदार अंगरख्यासारख्या असतात, असे तो निश्चित करतो. दिशेच्या दृष्टीने त्या दोन्ही दिशांमध्ये उत्पन्न झालेल्या असतात. आणि त्यामध्ये, उजव्या कानाच्या पाळीपासून सुरू होऊन पाच 'कंडरा' नावाच्या मोठ्या शिरा पुढे आणि मागे वेढत डाव्या बाजूला जातात; डाव्या कानाच्या पाळीपासून सुरू होऊन पाच मोठ्या शिरा पुढे आणि मागे वेढत उजव्या बाजूला जातात; उजव्या गळ्यापासून सुरू होऊन पाच मोठ्या शिरा पुढे आणि मागे वेढत डाव्या बाजूला जातात; डाव्या गळ्यापासून सुरू होऊन पाच मोठ्या शिरा पुढे आणि मागे वेढत उजव्या बाजूला जातात; उजव्या हाताला वेढत पुढे पाच आणि मागे पाच अशा दहा 'कंडरा' नावाच्या मोठ्या शिरा वर चढतात. त्याचप्रमाणे डाव्या हाताला, उजव्या पायाला आणि डाव्या पायाला वेढत वर चढतात; अशा प्रकारे या साठ मोठ्या शिरा शरीराला धारण करणाऱ्या आणि शरीराचे नियंत्रण करणाऱ्या आहेत, असेही तो निश्चित करतो. स्थानाच्या दृष्टीने त्या संपूर्ण शरीरात हाडे व त्वचा आणि हाडे व मांस यांच्या दरम्यान हाडांना एकत्र बांधून राहिलेल्या असतात, असे तो निश्चित करतो। ตตฺถ ยถา วลฺลิสนฺตานพทฺเธสุ กุฏฺฏทารูสุ น วลฺลิสนฺตานา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหหิ กุฏฺฏทารูนิ อาพทฺธานี’’ติ, นปิ กุฏฺฏทารูนิ ชานนฺติ ‘‘มยํ วลฺลิสนฺตาเนหิ อาพทฺธานี’’ติ; เอวเมว น นฺหารู ชานนฺติ ‘‘อมฺเหหิ ตีณิ อฏฺฐิสตานิ อาพทฺธานี’’ติ, นปิ ตีณิ อฏฺฐิสตานิ ชานนฺติ ‘‘มยํ นฺหารูหิ อาพทฺธานี’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. เกวลํ ตุ – त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे वेलींच्या बंधनाने बांधलेल्या भिंतीच्या लाकडांच्या बाबतीत, त्या वेली जाणत नाहीत की, 'आमच्याद्वारे भिंतीची लाकडे बांधली गेली आहेत', आणि ती भिंतीची लाकडेही जाणत नाहीत की, 'आम्ही वेलींद्वारे बांधली गेलो आहोत'; त्याचप्रमाणे, शिरा जाणत नाहीत की, 'आमच्याद्वारे तीनशे हाडे बांधली गेली आहेत', आणि ती तीनशे हाडेही जाणत नाहीत की, 'आम्ही शिरांद्वारे बांधली गेलो आहोत'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. केवळ - ‘‘นวนฺหารุสตา โหนฺติ, พฺยามมตฺเต กเฬวเร; พนฺธนฺติ อฏฺฐิสงฺฆาฏํ, อคารมิว วลฺลิโย’’ติ. “एक व्याम प्रमाणाच्या या शरीरात नऊशे शिरा असतात; ज्याप्रमाणे वेली घराला बांधून ठेवतात, त्याचप्रमाणे या शिरा हाडांच्या सांगाड्याला बांधून ठेवतात.” ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา ตีหิ อฏฺฐิสเตหิ ตตฺถ ปติฏฺฐิตตเลหิ วา อุปริ ตจมํเสหิ ติริยํ อญฺญมญฺเญน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมเตสํ สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ นฺหารู วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. मर्यादेच्या दृष्टीने, खाली तीनशे हाडांनी किंवा त्यावर आधारलेल्या पृष्ठभागांनी, वर त्वचा आणि मांसाने आणि आडवे एकमेकांशी मर्यादित झालेल्या आहेत, असे तो निश्चित करतो. ही याची समान मर्यादा (सभाग-परिच्छेद) आहे, तर असमान मर्यादा (विसभाग-परिच्छेद) केसांसारखीच आहे. अशा प्रकारे तो नऊशे शिरांचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो। ตโต [Pg.38] ปรํ สรีเร ทฺวตฺตึสทนฺตฏฺฐิกานํ วิสุํ คหิตตฺตา เสสานิ จตุสฏฺฐิ หตฺถฏฺฐิกานิ จตุสฏฺฐิ ปาทฏฺฐิกานิ จตุสฏฺฐิ มุทุกฏฺฐิกานิ มํสนิสฺสิตานิ ทฺเว ปณฺหิกฏฺฐีนิ เอเกกสฺมึ ปาเท ทฺเว ทฺเว โคปฺผกฏฺฐิกานิ ทฺเว ชงฺฆฏฺฐิกานิ เอกํ ชณฺณุกฏฺฐิ เอกํ อูรุฏฺฐิ ทฺเว กฏิฏฺฐีนิ อฏฺฐารส ปิฏฺฐิกณฺฏกฏฺฐีนิ จตุวีสติ ผาสุกฏฺฐีนิ จุทฺทส อุรฏฺฐีนิ เอกํ หทยฏฺฐิ ทฺเว อกฺขกฏฺฐีนิ ทฺเว ปิฏฺฐิพาหฏฺฐีนิ ทฺเว พาหฏฺฐีนิ ทฺเว ทฺเว อคฺคพาหฏฺฐีนิ สตฺต คีวฏฺฐีนิ ทฺเว หนุกฏฺฐีนิ เอกํ นาสิกฏฺฐิ ทฺเว อกฺขิฏฺฐีนิ ทฺเว กณฺณฏฺฐีนิ เอกํ นลาฏฏฺฐิ เอกํ มุทฺธฏฺฐิ นว สีสกปาลฏฺฐีนีติ เอวมาทินา นเยน วุตฺตปฺปเภทานิ อฏฺฐีนิ สพฺพาเนว วณฺณโต เสตานีติ ววตฺถเปติ. त्यानंतर शरीरात, बत्तीस दातांच्या हाडांचे स्वतंत्रपणे ग्रहण केल्यामुळे उरलेली चौसष्ट हातांची हाडे, चौसष्ट पायांची हाडे, मांसावर आधारित असलेली चौसष्ट मऊ हाडे (तरुण अस्थी), दोन टाचांची हाडे, प्रत्येक पायात दोन-दोन घोट्यांची हाडे, दोन नडगीची हाडे, एक गुडघ्याचे हाड, एक मांडीचे हाड, दोन कंबरची हाडे, अठरा पाठीच्या कण्याचे हाडे, चोवीस बरगड्यांची हाडे, चौदा छातीची हाडे, एक छातीच्या मध्यभागाचे हाड, दोन जत्रू (कॉलर बोन), दोन खांद्यांच्या पाठीमागील हाडे (खांद्याचे पाते), दोन दंडांची हाडे, दोन-दोन अग्रबाहूची हाडे, सात मानेची हाडे, दोन जबड्यांची हाडे, एक नाकाचे हाड, दोन डोळ्यांच्या खोबणीची हाडे, दोन कानांची हाडे, एक कपाळाचे हाड, एक टाळूचे हाड आणि नऊ कवटीची हाडे; अशा प्रकारे आधी सांगितलेल्या विविध प्रकारची सर्वच हाडे रंगाने पांढरी आहेत, असे तो निश्चित करतो। สณฺฐานโต นานาสณฺฐานานิ. ตถา หิ ตตฺถ อคฺคปาทงฺคุลิยฏฺฐีนิ กตกพีชสณฺฐานานิ, ตทนนฺตรานิ องฺคุลีนํ มชฺฌปพฺพฏฺฐีนิ อปริปุณฺณปนสฏฺฐิสณฺฐานานิ, มูลปพฺพฏฺฐีนิ ปณวสณฺฐานานิ, โมรสกลิสณฺฐานานีติปิ เอเก. ปิฏฺฐิปาทฏฺฐีนิ โกฏฺฏิตกนฺทลกนฺทราสิสณฺฐานานิ ปณฺหิกฏฺฐีนิ เอกฏฺฐิตาลผลพีชสณฺฐานานิ, โคปฺผกฏฺฐีนิ เอกโตพทฺธกีฬาโคฬกสณฺฐานานิ, ชงฺฆฏฺฐิเกสุ ขุทฺทกํ ธนุทณฺฑสณฺฐานํ, มหนฺตํ ขุปฺปิปาสามิลาตธมนิปิฏฺฐิสณฺฐานํ, ชงฺฆฏฺฐิกสฺส โคปฺผกฏฺฐิเกสุ ปติฏฺฐิตฏฺฐานํ อปนีตตจขชฺชูรีกฬีรสณฺฐานํ, ชงฺฆฏฺฐิกสฺส ชณฺณุกฏฺฐิเก ปติฏฺฐิตฏฺฐานํ มุทิงฺคมตฺถกสณฺฐานํ ชณฺณุกฏฺฐิ เอกปสฺสโต ฆฏฺฏิตเผณสณฺฐานํ, อูรุฏฺฐีนิ ทุตฺตจฺฉิตวาสิผรสุทณฺฑสณฺฐานานิ, อูรุฏฺฐิกสฺส กฏฏฺฐิเก ปติฏฺฐิตฏฺฐานํ สุวณฺณการานํ อคฺคิชาลนกสลากาพุนฺทิสณฺฐานํ, ตปฺปติฏฺฐิโตกาโส อคฺคจฺฉินฺนปุนฺนาคผลสณฺฐาโน, กฏิฏฺฐีนิ ทฺเวปิ เอกาพทฺธานิ หุตฺวา กุมฺภกาเรหิ กตจุลฺลิสณฺฐานานิ, ตาปสภิสิกาสณฺฐานานีติปิ เอเก. อานิสทฏฺฐีนิ เหฏฺฐามุขฐปิตสปฺปผณสณฺฐานานิ, สตฺตฏฺฐฏฺฐาเนสุ ฉิทฺทาวฉิทฺทานิ อฏฺฐารส ปิฏฺฐิกณฺฏกฏฺฐีนิ อพฺภนฺตรโต อุปรูปริ ฐปิตสีสกปฏฺฏเวฐกสณฺฐานานิ, พาหิรโต วฏฺฏนาวลิสณฺฐานานิ, เตสํ อนฺตรนฺตรา กกจทนฺตสทิสานิ ทฺเว ตีณิ กณฺฏกานิ โหนฺติ, จตุวีสติยา [Pg.39] ผาสุกฏฺฐีสุ ปริปุณฺณานิ ปริปุณฺณสีหฬทาตฺตสณฺฐานานิ, อปริปุณฺณานิ อปริปุณฺณสีหฬทาตฺตสณฺฐานานิ, สพฺพาเนว โอทาตกุกฺกุฏสฺส ปสาริตปกฺขทฺวยสณฺฐานานีติปิ เอเก. จุทฺทส อุรฏฺฐีนิ ชิณฺณสนฺทมานิกผลกปนฺติสณฺฐานานิ, หทยฏฺฐิ ทพฺพิผณสณฺฐานํ, อกฺขกฏฺฐีนิ ขุทฺทกโลหวาสิทณฺฑสณฺฐานานิ, เตสํ เหฏฺฐา อฏฺฐิ อทฺธจนฺทสณฺฐานํ, ปิฏฺฐิพาหฏฺฐีนิ ผรสุผณสณฺฐานานิ, อุปฑฺฒจฺฉินฺนสีหฬกุทาลสณฺฐานานีติปิ เอเก. พาหฏฺฐีนิ อาทาสทณฺฑสณฺฐานานิ, มหาวาสิทณฺฑสณฺฐานานีติปิ เอเก. อคฺคพาหฏฺฐีนิ ยมกตาลกนฺทสณฺฐานานิ, มณิพนฺธฏฺฐีนิ เอกโต อลฺลิยาเปตฺวา ฐปิตสีสกปฏฺฏเวฐกสณฺฐานานิ, ปิฏฺฐิหตฺถฏฺฐีนิ โกฏฺฏิตกนฺทลกนฺทราสิสณฺฐานานิ, หตฺถงฺคุลิมูลปพฺพฏฺฐีนิ ปณวสณฺฐานานิ, มชฺฌปพฺพฏฺฐีนิ อปริปุณฺณปนสฏฺฐิสณฺฐานานิ, อคฺคปพฺพฏฺฐีนิ กตกพีชสณฺฐานานิ, สตฺต คีวฏฺฐีนิ ทณฺเฑ วิชฺฌิตฺวา ปฏิปาฏิยา ฐปิตวํสกฬีรขณฺฑสณฺฐานานิ, เหฏฺฐิมหนุกฏฺฐิ กมฺมารานํ อโยกูฏโยตฺตกสณฺฐานํ, อุปริมหนุกฏฺฐิ อวเลขนสตฺถกสณฺฐานํ, อกฺขินาสกูปฏฺฐีนิ อปนีตมิญฺชตรุณตาลฏฺฐิสณฺฐานานิ, นลาฏฏฺฐิ อโธมุขฐปิตภินฺนสงฺขกปาลสณฺฐานํ, กณฺณจูฬิกฏฺฐีนิ นฺหาปิตขุรโกสสณฺฐานานิ, นลาฏกณฺณจูฬิกานํ อุปริ ปฏฺฏพนฺธโนกาเส อฏฺฐิพหลฆฏปุณฺณปฏปิโลติกขณฺฑสณฺฐานํ, มุทฺธนฏฺฐิ มุขจฺฉินฺนวงฺกนาฬิเกรสณฺฐานํ, สีสฏฺฐีนิ สิพฺเพตฺวา ฐปิตชชฺชราลาพุกฏาหสณฺฐานานีติ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตานิ. आकाराच्या दृष्टीने (हाडे) विविध आकारांची असतात. तसेच, त्यामध्ये पायांच्या बोटांच्या टोकांची हाडे निर्मळीच्या बीच्या आकाराची असतात, त्यांच्या लगतची बोटांच्या मधल्या पेरकांची हाडे अपूर्ण फणसाच्या बियांच्या आकाराची असतात, मुळाकडील पेरकांची हाडे लहान ढोलकीच्या (पणव) आकाराची असतात; काही आचार्य म्हणतात की ती मोराच्या मानेच्या मणक्याच्या आकाराची असतात. पायाच्या पाठीची हाडे ठेचलेल्या कंदाच्या तंतूंच्या समूहासारखी असतात, टाचेची हाडे एकाच बी असलेल्या ताडफळाच्या बीच्या आकाराची असतात, घोट्याची हाडे एकत्र बांधलेल्या खेळण्याच्या गोट्यांच्या आकाराची असतात. नडगीच्या हाडांमध्ये लहान हाड धनुष्याच्या दांड्यासारखे असते, मोठे हाड भूक आणि तहानेने सुकलेल्या अजगराच्या पाठीसारखे असते. नडगीच्या हाडाचा घोट्याच्या हाडावर टेकलेला भाग साल काढलेल्या खजुराच्या कोंबासारखा असतो, नडगीच्या हाडाचा गुडघ्याच्या हाडावर टेकलेला भाग मृदंगाच्या वरच्या भागासारखा असतो, गुडघ्याचे हाड एका बाजूने घासलेल्या फेसाच्या आकाराचे असते. मांड्यांची हाडे नीट न तासलेल्या वासल्याच्या किंवा कुऱ्हाडीच्या दांड्यासारखी असतात. मांडीच्या हाडाचा कंबरेच्या हाडावर टेकलेला भाग सोनारांच्या फुंकणीच्या टोकासारखा असतो, तो टेकलेला भाग शेंडा कापलेल्या उंडीच्या फळासारखा असतो. कंबरेची दोन्ही हाडे एकत्र जोडून कुंभाराने बनवलेल्या चुलीच्या आकाराची असतात; काही आचार्य म्हणतात की ती तपस्वी लोकांच्या आसनाच्या आकाराची असतात. नितंबाची हाडे खाली तोंड करून ठेवलेल्या नागाच्या फण्यासारखी असतात. सात-आठ ठिकाणी छिद्रे असलेली पाठीच्या कण्याची अठरा हाडे आतल्या बाजूने एकमेकांवर रचलेल्या शिसे कापण्याच्या हत्यारांसारखी असतात, बाहेरून ती गोल बांबूच्या पेरांसारखी असतात, त्यांच्यामध्ये करवतीच्या दातांसारखे दोन किंवा तीन काटेरी भाग असतात. चोवीस बरगड्यांच्या हाडांमध्ये पूर्ण वाढलेली हाडे सिंहली विळ्याच्या आकाराची असतात, अपूर्ण वाढलेली हाडे अपूर्ण सिंहली विळ्याच्या आकाराची असतात; काही आचार्य म्हणतात की ती सर्व हाडे पांढऱ्या कोंबड्याच्या पसरलेल्या दोन पंखांसारखी असतात. छातीची चौदा हाडे जुन्या पालखीच्या फळ्यांच्या रांगेसारखी असतात, छातीचे मध्यभागी असलेले हाड पळीच्या पात्यासारखे असते, जत्रूची हाडे लहान लोखंडी वासल्याच्या दांड्यासारखी असतात, त्यांच्या खालील हाड अर्धचंद्राकृती असते. खांद्याची हाडे कुऱ्हाडीच्या पात्यासारखी असतात; काही आचार्य म्हणतात की ती अर्ध्या कापलेल्या सिंहली कुदळीसारखी असतात. दंडाची हाडे आरशाच्या दांड्यासारखी असतात; काही आचार्य म्हणतात की ती मोठ्या वासल्याच्या दांड्यासारखी असतात. हाताच्या पुढच्या भागाची हाडे जोड ताडफळाच्या गाभ्यासारखी असतात, मनगटाची हाडे एकमेकांना जोडून ठेवलेल्या शिशाच्या वलयांसारखी असतात, हाताच्या पाठीची हाडे ठेचलेल्या कंदाच्या तंतूंच्या समूहासारखी असतात. हाताच्या बोटांच्या मुळाकडील पेरकांची हाडे लहान ढोलकीच्या आकाराची असतात, मधल्या पेरकांची हाडे अपूर्ण फणसाच्या बियांच्या आकाराची असतात, बोटांच्या टोकांची हाडे निर्मळीच्या बीच्या आकाराची असतात. मानेचे सात मणके काठीने मधोमध टोचून एकापाठोपाठ एक रचून ठेवलेल्या बांबूच्या कोंबांच्या चकत्यांसारखे असतात. खालचा जबडा लोहाराच्या हातोड्याच्या दांड्यासारखा असतो, वरचा जबडा साल काढण्याच्या लहान सुरीसारखा असतो. डोळे आणि नाकाच्या खोबणीची हाडे गर काढलेल्या कोवळ्या ताडफळाच्या बियांसारखी असतात, कपाळाचे हाड पालथे घातलेल्या फुटलेल्या शंखाच्या तुकड्यासारखे असते, कानाच्या मागची हाडे न्हाव्याच्या वस्तऱ्याच्या कोशासारखी असतात. कपाळ आणि कानाच्या वरच्या भागात, जेथे पट्टी बांधली जाते, तेथील हाड जाड पाण्याच्या घागरीवर झाकलेल्या जुन्या कापडाच्या तुकड्यासारखे असते, टाळूचे हाड तोंड कापलेल्या वाकड्या नारळासारखे असते, कवटीची हाडे एकत्र शिवून ठेवलेल्या जुन्या जीर्ण भोपळ्याच्या पात्रासारखी असतात. दिशेच्या दृष्टीने ती दोन दिशांमध्ये (वरच्या आणि खालच्या भागात) विभागलेली असतात. โอกาสโต อวิเสเสน สกลสรีเร ฐิตานิ, วิเสเสน ตุ สีสฏฺฐีนิ คีวฏฺฐิเกสุ ปติฏฺฐิตานิ, คีวฏฺฐีนิ ปิฏฺฐิกณฺฏกฏฺฐีสุ ปติฏฺฐิตานิ, ปิฏฺฐิกณฺฏกฏฺฐีนิ กฏิฏฺฐีสุ ปติฏฺฐิตานิ, กฏิฏฺฐีนิ อูรุฏฺฐิเกสุ ปติฏฺฐิตานิ, อุรุฏฺฐีนิ ชณฺณุกฏฺฐิเกสุ, ชณฺณุกฏฺฐีนิ ชงฺฆฏฺฐิเกสุ, ชงฺฆฏฺฐีนิ โคปฺผกฏฺฐิเกสุ, โคปฺผกฏฺฐีนิ ปิฏฺฐิปาทฏฺฐิเกสุ ปติฏฺฐิตานิ, ปิฏฺฐิปาทฏฺฐิกานิ จ โคปฺผกฏฺฐีนิ อุกฺขิปิตฺวา ฐิตานิ, โคปฺผกฏฺฐีนิ ชงฺฆฏฺฐีนิ…เป… คีวฏฺฐีนิ สีสฏฺฐีนิ อุกฺขิปิตฺวา ฐิตานีติ เอเตนานุสาเรน อวเสสานิปิ อฏฺฐีนิ เวทิตพฺพานิ. स्थानाच्या दृष्टीने, सामान्यतः ती संपूर्ण शरीरात पसरलेली असतात. विशेषतः, डोक्याची हाडे मानेच्या मणक्यांवर आधारलेली असतात, मानेची हाडे पाठीच्या कण्यावर आधारलेली असतात, पाठीच्या कण्याची हाडे कंबरेच्या हाडांवर आधारलेली असतात, कंबरेची हाडे मांड्यांच्या हाडांवर आधारलेली असतात, मांड्यांची हाडे गुडघ्यांच्या हाडांवर, गुडघ्यांची हाडे नडगीच्या हाडांवर, नडगीची हाडे घोट्याच्या हाडांवर, घोट्याची हाडे पायाच्या पाठीच्या हाडांवर आधारलेली असतात. आणि पायाच्या पाठीची हाडे घोट्याच्या हाडांना उचलून धरतात, घोट्याची हाडे नडगीच्या हाडांना... (पेयाळ)... मानेची हाडे डोक्याच्या हाडांना उचलून धरतात. या पद्धतीने इतर उरलेली हाडे देखील समजून घ्यावीत. ตตฺถ ยถา อิฏฺฐกโคปานสิจยาทีสุ น อุปริมา อิฏฺฐกาทโย ชานนฺติ ‘‘มยํ เหฏฺฐิเมสุ ปติฏฺฐิตา’’ติ, นปิ เหฏฺฐิมา ชานนฺติ ‘‘มยํ อุปริมานิ อุกฺขิปิตฺวา ฐิตา’’ติ; เอวเมว น สีสฏฺฐิกานิ ชานนฺติ ‘‘มยํ คีวฏฺฐิเกสุ [Pg.40] ปติฏฺฐิตานี’’ติ…เป… น โคปฺผกฏฺฐิกานิ ชานนฺติ ‘‘มยํ ปิฏฺฐิปาทฏฺฐิเกสุ ปติฏฺฐิตานี’’ติ, นปิ ปิฏฺฐิปาทฏฺฐิกานิ ชานนฺติ ‘‘มยํ โคปฺผกฏฺฐีนิ อุกฺขิปิตฺวา ฐิตานี’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. เกวลํ ตุ อิมานิ สาธิกานิ ตีณิ อฏฺฐิสตานิ นวหิ นฺหารุสเตหิ นวหิ จ มํสเปสิสเตหิ อาพทฺธานุลิตฺตานิ, เอกฆนจมฺมปริโยนทฺธานิ, สตฺตรสหรณีสหสฺสานุคตสิเนหสิเนหิตานิ, นวนวุติโลมกูปสหสฺสปริสฺสวมานเสทชลฺลิกานิ อสีติกิมิกุลานิ, กาโยตฺเวว สงฺขฺยํ คตานิ, ยํ สภาวโต อุปปริกฺขนฺโต โยคาวจโร น กิญฺจิ คยฺหูปคํ ปสฺสติ, เกวลํ ตุ นฺหารุสมฺพนฺธํ นานากุณปสงฺกิณฺณํ อฏฺฐิสงฺฆาฏเมว ปสฺสติ. ยํ ทิสฺวา ทสพลสฺส ปุตฺตภาวํ อุเปติ. ยถาห – त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे विटांच्या रचनेत किंवा घराच्या छपराच्या रचनेत वरच्या विटांना हे माहीत नसते की, 'आम्ही खालच्या विटांवर आधारलेल्या आहोत', आणि खालच्या विटांनाही हे माहीत नसते की, 'आम्ही वरच्या विटांना उचलून धरले आहे'; त्याचप्रमाणे डोक्याच्या हाडांना हे माहीत नसते की, 'आम्ही मानेच्या हाडांवर आधारलो आहोत'... (पेयाळ)... घोट्याच्या हाडांना हे माहीत नसते की, 'आम्ही पायाच्या पाठीच्या हाडांवर आधारलो आहोत', आणि पायाच्या पाठीच्या हाडांनाही हे माहीत नसते की, 'आम्ही घोट्याच्या हाडांना उचलून धरले आहे'. कारण हे सर्व घटक (धर्म) जाणीव आणि विचार करण्यापासून रहित आहेत... (पेयाळ)... हा कोणी 'पुद्गल' (व्यक्ती) नाही. केवळ ही तीनशेहून अधिक हाडे नऊशे शिरांनी आणि नऊशे मांसपेशांनी बांधलेली व लिंपलेली आहेत, एका अखंड त्वचेने वेढलेली आहेत, सतरा हजार वाहिन्यांमध्ये वाहणाऱ्या रसाने ओलसर आहेत, नव्व्याण्णव हजार रोमकूपांमधून वाहणाऱ्या घामाने आणि मळाने माखलेली आहेत, ऐंशी हजार जंतूंच्या कुळांचे निवासस्थान आहेत, आणि केवळ 'शरीर' या संज्ञेस प्राप्त झाली आहेत. या शरीराचे स्वभावतः निरीक्षण करणारा योगाvacar (साधक) त्यात आसक्ती ठेवण्यासारखे काहीही पाहत नाही, तर केवळ शिरांनी बांधलेला, विविध प्रकारच्या अशुद्धींनी भरलेला हाडांचा सांगाडाच पाहतो. ज्याला पाहून तो दशबलांचा (बुद्धांचा) पुत्र बनतो. जसे म्हटले आहे – ‘‘ปฏิปาฏิยฏฺฐีนิ ฐิตานิ โกฏิยา,อเนกสนฺธิยมิโต น เกหิจิ; พทฺโธ นหารูหิ ชราย โจทิโต,อเจตโน กฏฺฐกลิงฺครูปโม. "हाडे एकापाठोपाठ एक रचलेली आहेत, अनेक सांध्यांनी जोडलेली आहेत, पण ती कोणत्याही (बाह्य) दोरीने बांधलेली नाहीत; ती केवळ शिरांनी बांधलेली आहेत. जरेने (वृद्धत्वाकडून) ढकलले जाणारे हे शरीर अचेतन असून लाकडाच्या ओंडक्यासारखे किंवा कचऱ्यासारखे आहे." ‘‘กุณปํ กุณเป ชาตํ, อสุจิมฺหิ จ ปูตินิ; ทุคฺคนฺเธ จาปิ ทุคฺคนฺธํ, เภทนมฺหิ จ วยธมฺมํ. "हे अशुद्ध शरीर अशुद्धतेतूनच जन्माला आले आहे, घाणेरड्या आणि कुजलेल्या वस्तूंपासून निर्माण झाले आहे; दुर्गंधीयुक्त वस्तूंपासून दुर्गंधीच निर्माण होते, आणि ते नष्ट होणे व क्षय पावणे हाच त्याचा स्वभाव आहे." ‘‘อฏฺฐิปุเฏ อฏฺฐิปุโฏ, นิพฺพตฺโต ปูตินิ ปูติกายมฺหิ; ตมฺหิ จ วิเนถ ฉนฺทํ, เหสฺสถ ปุตฺตา ทสพลสฺสา’’ติ จ. "या हाडांच्या सांगाड्यात हाडांचा सांगाडाच उत्पन्न झाला आहे, या कुजलेल्या शरीरात कुजलेलेच निर्माण झाले आहे. म्हणून या शरीरावरील आपली तृष्णा (आसक्ती) नष्ट करा, म्हणजे तुम्ही दशबलांचे (बुद्धांचे) पुत्र व्हाल, असे भगवंतांनी म्हटले आहे." ปริจฺเฉทโต อนฺโต อฏฺฐิมิญฺเชน อุปริโต มํเสน อคฺเค มูเล จ อญฺญมญฺเญน ปริจฺฉินฺนานีติ ววตฺถเปติ. อยเมเตสํ สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ อฏฺฐีนิ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. मर्यादेच्या (सीमांकनाच्या) दृष्टीने, आतून हाडांच्या मज्जेने, वरून मांसाने, आणि टोकावर व मुळाशी एकमेकांपासून ते विभक्त (मर्यादित) आहेत, असे तो निश्चित करतो. हा त्यांचा समान सीमाभाग (सभाग-परिच्छेद) आहे; परंतु असमान सीमाभाग (विसभाग-परिच्छेद) तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो हाडांचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีเร ยถาวุตฺตปฺปเภทานํ อฏฺฐีนํ อพฺภนฺตรคตํ อฏฺฐิมิญฺชํ วณฺณโต เสตนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต อตฺตโน โอกาสสณฺฐานนฺติ. เสยฺยถิทํ – มหนฺตมหนฺตานํ อฏฺฐีนํ อพฺภนฺตรคตํ เสเทตฺวา วฏฺเฏตฺวา มหนฺเตสุ วํสนฬกปพฺเพสุ ปกฺขิตฺตมหาเวตฺตงฺกุรสณฺฐานํ, ขุทฺทานุขุทฺทกานํ [Pg.41] อพฺภนฺตรคตํ เสเทตฺวา วฏฺเฏตฺวา ขุทฺทานุขุทฺทเกสุ วํสนฬกปพฺเพสุ ปกฺขิตฺตตนุเวตฺตงฺกุรสณฺฐานนฺติ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตํ. โอกาสโต อฏฺฐีนํ อพฺภนฺตเร ปติฏฺฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीरातील वर सांगितलेल्या प्रकारच्या हाडांच्या आत असलेली हाडांची मज्जा रंगाने पांढरी असते, असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, ती स्वतःच्या स्थानाच्या आकारासारखी असते. जसे की—मोठमोठ्या हाडांच्या आत असलेली मज्जा ही उकळून व गोल करून मोठ्या बांबूच्या कांड्यांमध्ये टाकलेल्या मोठ्या वेताच्या कोंबासारख्या आकाराची असते; आणि लहान-सहान हाडांच्या आत असलेली मज्जा ही उकळून व गोल करून लहान-सहान बांबूच्या कांड्यांमध्ये टाकलेल्या बारीक वेताच्या कोंबासारख्या आकाराची असते. दिशेच्या दृष्टीने, ती दोन्ही दिशांना उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, ती हाडांच्या आत स्थित असते. ตตฺถ ยถา เวฬุนฬกาทีนํ อนฺโตคตานิ ทธิผาณิตานิ น ชานนฺติ ‘‘มยํ เวฬุนฬกาทีนํ อนฺโตคตานี’’ติ, นปิ เวฬุนฬกาทโย ชานนฺติ ‘‘ทธิผาณิตานิ อมฺหากํ อนฺโตคตานี’’ติ; เอวเมว น อฏฺฐิมิญฺชํ ชานาติ ‘‘อหํ อฏฺฐีนํ อนฺโตคต’’นฺติ, นปิ อฏฺฐีนิ ชานนฺติ ‘‘อฏฺฐิมิญฺชํ อมฺหากํ อนฺโตคต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต อฏฺฐีนํ อพฺภนฺตรตเลหิ อฏฺฐิมิญฺชภาเคน จ ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ อฏฺฐิมิญฺชํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे बांबूच्या नळ्या इत्यादींच्या आत असलेले दही आणि काकवी हे जाणत नाहीत की, 'आम्ही बांबूच्या नळ्यांच्या आत आहोत', आणि बांबूच्या नळ्या इत्यादी देखील जाणत नाहीत की, 'दही आणि काकवी आमच्या आत आहेत'; त्याचप्रमाणे हाडांची मज्जा जाणत नाही की, 'मी हाडांच्या आत आहे', आणि हाडेही जाणत नाहीत की, 'मज्जा आमच्या आत आहे'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनाने रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (व्यक्ती) नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमांकनाच्या दृष्टीने, हाडांच्या आतील पृष्ठभागाने आणि मज्जेच्या स्वतःच्या भागाने ती मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा तिचा समान सीमाभाग आहे; परंतु असमान सीमाभाग तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो हाडांच्या मज्जेचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีรสฺส อพฺภนฺตเร ทฺวิโคฬกปฺปเภทํ วกฺกํ วณฺณโต มนฺทรตฺตํ ปาฬิภทฺทกฏฺฐิวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต คามทารกานํ สุตฺตาวุตกีฬาโคฬกสณฺฐานํ, เอกวณฺฏสหการทฺวยสณฺฐานนฺติปิ เอเก. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต คลวาฏกา วินิกฺขนฺเตน เอกมูเลน โถกํ คนฺตฺวา ทฺวิธา ภินฺเนน ถูลนฺหารุนา วินิพทฺธํ หุตฺวา หทยมํสํ ปริกฺขิปิตฺวา ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत दोन गोलांच्या आकाराचे असलेले मूत्रपिंड (वक्क) रंगाने फिकट लाल, पारिभद्राच्या (पळसाच्या) बीच्या रंगासारखे असते, असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, ते गावातील मुलांच्या दोऱ्याने बांधलेल्या खेळण्याच्या चेंडूच्या आकाराचे असते; किंवा एकाच देठाला लागलेल्या दोन आंब्यांच्या आकाराचे असते, असेही काही आचार्य म्हणतात. दिशेच्या दृष्टीने, ते वरच्या दिशेला उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, कंठातून निघालेल्या एकाच मुळाने थोडे पुढे जाऊन दोन भागांत विभागलेल्या जाड शिरेने बांधलेले होऊन, हृदयाच्या मांसाला वेढून राहिलेले असते, असे तो निश्चित करतो. ตตฺถ ยถา วณฺฏูปนิพทฺธํ สหการทฺวยํ น ชานาติ ‘‘อหํ วณฺเฏน อุปนิพทฺธ’’นฺติ, นปิ วณฺฏํ ชานาติ ‘‘มยา สหการทฺวยํ อุปนิพทฺธ’’นฺติ; เอวเมว น วกฺกํ ชานาติ ‘‘อหํ ถูลนฺหารุนา อุปนิพทฺธ’’นฺติ, นปิ ถูลนฺหารุ ชานาติ ‘‘มยา วกฺกํ อุปนิพทฺธ’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต วกฺกํ วกฺกภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ วกฺกํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे देठाने बांधलेले दोन आंबे हे जाणत नाहीत की, 'आम्ही देठाने बांधलेले आहोत', आणि देठही जाणत नाही की, 'माझ्याद्वारे दोन आंबे बांधले गेले आहेत'; त्याचप्रमाणे मूत्रपिंड जाणत नाही की, 'मी जाड शिरेने बांधलेला आहे', आणि ती जाड शिरही जाणत नाही की, 'माझ्याद्वारे मूत्रपिंड बांधले गेले आहे'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनाने रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (व्यक्ती) नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमांकनाच्या दृष्टीने, मूत्रपिंड हे मूत्रपिंडाच्या स्वतःच्या भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा समान सीमाभाग आहे; परंतु असमान सीमाभाग तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो मूत्रपिंडाचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีรสฺส อพฺภนฺตเร หทยํ วณฺณโต รตฺตํ รตฺตปทุมปตฺตปิฏฺฐิวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต พาหิรปตฺตานิ อปเนตฺวา อโธมุขฐปิตปทุมมกุฬสณฺฐานํ, ตญฺจ อคฺคจฺฉินฺนปุนฺนาคผลมิว วิวเฏกปสฺสํ พหิ มฏฺฐํ อนฺโต โกสาตกีผลสฺส อพฺภนฺตรสทิสํ. ปญฺญาพหุลานํ โถกํ [Pg.42] วิกสิตํ, มนฺทปญฺญานํ มกุฬิตเมว. ยํ รูปํ นิสฺสาย มโนธาตุ จ มโนวิญฺญาณธาตุ จ ปวตฺตนฺติ, ตํ อปเนตฺวา อวเสสมํสปิณฺฑสงฺขาตหทยพฺภนฺตเร อทฺธปสตมตฺตํ โลหิตํ สณฺฐาติ, ตํ ราคจริตสฺส รตฺตํ, โทสจริตสฺส กาฬกํ, โมหจริตสฺส มํสโธวโนทกสทิสํ, วิตกฺกจริตสฺส กุลตฺถยูสวณฺณํ, สทฺธาจริตสฺส กณิการปุปฺผวณฺณํ, ปญฺญาจริตสฺส อจฺฉํ วิปฺปสนฺนมนาวิลํ, นิทฺโธตชาติมณิ วิย ชุติมนฺตํ ขายติ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต สรีรพฺภนฺตเร ทฺวินฺนํ ถนานํ มชฺเฌ ปติฏฺฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत असलेले हृदय रंगाने लाल, म्हणजे लाल कमळाच्या पाकळीच्या बाहेरील रंगासारखे असते, असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, ते बाहेरील पाकळ्या काढून खाली तोंड करून ठेवलेल्या कमळाच्या कळीच्या आकाराचे असते; आणि ते टोक कापलेल्या पुन्नाग (सुरंगी) फळासारखे एका बाजूने उघडे, बाहेरून गुळगुळीत आणि आतून दोडक्याच्या फळाच्या आतील भागासारखे असते. प्रज्ञावान (बुद्धिमान) लोकांचे हृदय थोडे उमललेले असते, तर मंदबुद्धी लोकांचे हृदय कळीसारखे मिटलेलेच असते. ज्या रूपाचा आश्रय घेऊन मनोधातू आणि मनोविज्ञानधातू प्रवृत्त होतात, ते (हृदयवस्तू रूप) वगळून उरलेल्या मांसपिंड नावाच्या हृदयाच्या आत सुमारे दीड पसाभर रक्त असते; ते रक्त रागचरित व्यक्तीचे लाल असते, द्वेषचरित व्यक्तीचे काळे असते, मोहचरित व्यक्तीचे मांस धुतलेल्या पाण्यासारखे असते, वितर्कचरित व्यक्तीचे कुळीथाच्या काढ्यासारख्या रंगाचे असते, श्रद्धाचरित व्यक्तीचे कर्णिकार (बहावा) फुलाच्या रंगासारखे असते, आणि प्रज्ञाचरित व्यक्तीचे स्वच्छ, अत्यंत निर्मळ, गढूळ नसलेले आणि घासून स्वच्छ केलेल्या अस्सल रत्नासारखे तेजस्वी दिसते. दिशेच्या दृष्टीने, ते वरच्या दिशेला उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, ते शरीराच्या आत दोन्ही स्तनाच्या मध्यभागी स्थित असते. ตตฺถ ยถา ทฺวินฺนํ วาตปานกวาฏกานํ มชฺเฌ ฐิโต อคฺคฬตฺถมฺภโก น ชานาติ ‘‘อหํ ทฺวินฺนํ วาตปานกวาฏกานํ มชฺเฌ ฐิโต’’ติ, นปิ วาตปานกวาฏกานิ ชานนฺติ ‘‘อมฺหากํ มชฺเฌ อคฺคฬตฺถมฺภโก ฐิโต’’ติ; เอวเมวํ น หทยํ ชานาติ ‘‘อหํ ทฺวินฺนํ ถนานํ มชฺเฌ ฐิต’’นฺติ, นปิ ถนานิ ชานนฺติ ‘‘หทยํ อมฺหากํ มชฺเฌ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต หทยํ หทยภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ หทยํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे दोन खिडक्यांच्या दारांच्या मध्यभागी असलेला अडसर (खांब) हा जाणत नाही की, 'मी दोन खिडक्यांच्या दारांच्या मध्यभागी उभा आहे', आणि खिडकीची दारेही जाणत नाहीत की, 'आमच्या मध्यभागी अडसर उभा आहे'; त्याचप्रमाणे हृदय जाणत नाही की, 'मी दोन स्तनांच्या मध्यभागी स्थित आहे', आणि स्तनही जाणत नाहीत की, 'हृदय आमच्या मध्यभागी स्थित आहे'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनाने रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (व्यक्ती) नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमांकनाच्या दृष्टीने, हृदय हे हृदयाच्या स्वतःच्या भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा समान सीमाभाग आहे; परंतु असमान सीमाभाग तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो हृदयाचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีรสฺส อพฺภนฺตเร ยกนสญฺญิตํ ยมกมํสปิณฺฑํ วณฺณโต รตฺตํ รตฺตกุมุทพาหิรปตฺตปิฏฺฐิวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต เอกมูลํ หุตฺวา อคฺเค ยมกํ โกวิฬารปตฺตสณฺฐานํ, ตญฺจ ทนฺธานํ เอกํเยว โหติ มหนฺตํ, ปญฺญวนฺตานํ ทฺเว วา ตีณิ วา ขุทฺทกานีติ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต ทฺวินฺนํ ถนานํ อพฺภนฺตเร ทกฺขิณปสฺสํ นิสฺสาย ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत यकृत (यकन) नावाचा जोड मांसपिंड रंगाने लाल, म्हणजे लाल कुमुदाच्या (कमळाच्या) बाहेरील पाकळीच्या रंगासारखा असतो, असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, तो एकच मूळ असलेला होऊन टोकावर जोडलेला, कांचनाच्या (कोविळार) पानाच्या आकाराचा असतो; आणि तो मंदबुद्धी लोकांमध्ये एकच व मोठा असतो, तर प्रज्ञावान लोकांमध्ये दोन किंवा तीन लहान लहान असतात, असे तो निश्चित करतो. दिशेच्या दृष्टीने, तो वरच्या दिशेला उत्पन्न होतो. स्थानाच्या दृष्टीने, तो दोन स्तनांच्या आत उजव्या बाजूचा आश्रय घेऊन स्थित असतो, असे तो निश्चित करतो. ตตฺถ ยถา ปิฐรกปสฺเส ลคฺคา มํสเปสิ น ชานาติ ‘‘อหํ ปิฐรกปสฺเส ลคฺคา’’ติ, นปิ ปิฐรกปสฺสํ ชานาติ ‘‘มยิ มํสเปสิ ลคฺคา’’ติ; เอวเมว น ยกนํ ชานาติ ‘‘อหํ ทฺวินฺนํ ถนานํ อพฺภนฺตเร ทกฺขิณปสฺสํ นิสฺสาย ฐิต’’นฺติ, นปิ ถนานํ อพฺภนฺตเร ทกฺขิณปสฺสํ ชานาติ ‘‘มํ นิสฺสาย ยกนํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต ปน ยกนํ ยกนภาเคน [Pg.43] ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ยกนํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे मडक्याच्या कुशीला चिकटलेला मांसाचा तुकडा हा जाणत नाही की, 'मी मडक्याच्या कुशीला चिकटलेला आहे', and मडकेही जाणत नाही की, 'माझ्यावर मांसाचा तुकडा चिकटलेला आहे'; त्याचप्रमाणे यकृत जाणत नाही की, 'मी दोन स्तनांच्या आत उजव्या बाजूचा आश्रय घेऊन स्थित आहे', आणि दोन स्तनांच्या आतील उजवी बाजूही जाणत नाही की, 'माझा आश्रय घेऊन यकृत स्थित आहे'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनाने रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (व्यक्ती) नाही, असे तो निश्चित करतो. परंतु सीमांकनाच्या दृष्टीने, यकृत हे यकृताच्या स्वतःच्या भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा समान सीमाभाग आहे; परंतु असमान सीमाभाग तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो यकृताचे रंग इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีเร ปฏิจฺฉนฺนาปฏิจฺฉนฺนเภทโต ทุวิธํ กิโลมกํ วณฺณโต เสตํ ทุกูลปิโลติกวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต อตฺตโน โอกาสสณฺฐานํ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตํ. โอกาสโต ปฏิจฺฉนฺนกิโลมกํ หทยญฺจ วกฺกญฺจ ปริวาเรตฺวา, อปฺปฏิจฺฉนฺนกิโลมกํ สกลสรีเร จมฺมสฺส เหฏฺฐโต มํสํ ปริโยนนฺธิตฺวา ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीरातील झाकलेले आणि न झाकलेले अशा दोन प्रकारच्या क्लोमकाला (पटलाला) रंगाने पांढरे, मळकट पांढऱ्या वस्त्राच्या रंगासारखे म्हणून निश्चित करतो. आकाराने ते स्वतःच्या स्थानाच्या आकारासारखे असते. दिशेने ते दोन्ही दिशांना उत्पन्न झालेले असते. स्थानाने, झाकलेले क्लोमक हृदय आणि वृक्क (किडनी) यांना वेढून स्थित असते, आणि न झाकलेले क्लोमक संपूर्ण शरीरात त्वचेच्या खाली मांसाला आच्छादित करून स्थित असते. ตตฺถ ยถา ปิโลติกาย ปลิเวฐิเต มํเส น ปิโลติกา ชานาติ ‘‘มยา มํสํ ปลิเวฐิต’’นฺติ, นปิ มํสํ ชานาติ ‘‘อหํ ปิโลติกาย ปลิเวฐิต’’นฺติ; เอวเมว น กิโลมกํ ชานาติ ‘‘มยา หทยวกฺกานิ สกลสรีเร จ จมฺมสฺส เหฏฺฐโต มํสํ ปลิเวฐิต’’นฺติ. นปิ หทยวกฺกานิ สกลสรีเร จ มํสํ ชานาติ ‘‘อหํ กิโลมเกน ปลิเวฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต เหฏฺฐา มํเสน อุปริ จมฺเมน ติริยํ กิโลมกภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ กิโลมกํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या क्लोमकाविषयी, जसे मळकट कपड्याने मांस वेढलेले असताना, तो कपडा जाणत नाही की, "माझ्याद्वारे मांस वेढले गेले आहे", आणि मांसही जाणत नाही की, "मी कपड्याने वेढले गेलो आहे"; त्याचप्रमाणे क्लोमक जाणत नाही की, "माझ्याद्वारे हृदय, वृक्क आणि संपूर्ण शरीरात त्वचेच्या खालील मांस वेढले गेले आहे". तसेच हृदय, वृक्क आणि संपूर्ण शरीरातील मांसही जाणत नाही की, "मी क्लोमकाने वेढले गेलो आहे". कारण हे धर्म विचार आणि प्रत्यवेक्षणाने रहित आहेत... (पेय्याल)... हा कोणी पुद्गल (जीव किंवा व्यक्ती) नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, खाली मांसाने, वर त्वचेने आणि तिरपे स्वतःच्या क्लोमकाच्या भागाने ते मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग्य-परिच्छेद (समान सीमा) आहे, आणि विसभाग्य-परिच्छेद (असमान सीमा) तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे क्लोमकाला वर्णादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ สรีรสฺส อพฺภนฺตเร ปิหกํ วณฺณโต นีลํ มีลาตนิคฺคุณฺฑีปุปฺผวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต เยภุยฺเยน สตฺตงฺคุลปฺปมาณํ อพนฺธนํ กาฬวจฺฉกชิวฺหาสณฺฐานํ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต หทยสฺส วามปสฺเส อุทรปฏลสฺส มตฺถกปสฺสํ นิสฺสาย ฐิตํ, ยมฺหิ ปหรณปหาเรน พหิ นิกฺขนฺเต สตฺตานํ ชีวิตกฺขโย โหตีติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत असलेल्या प्लीहेला (पानथरीला) रंगाने निळी, कोमेजलेल्या निर्गुडीच्या फुलाच्या रंगासारखी म्हणून निश्चित करतो. आकाराने ती बहुतेक करून सात बोटे प्रमाणाची, बंधन नसलेली आणि काळ्या वासराच्या जिभेच्या आकाराची असते. दिशेने ती वरच्या दिशेला उत्पन्न झालेली असते. स्थानाने ती हृदयाच्या डाव्या बाजूला, उदरपटलाच्या वरच्या भागाला आश्रय करून स्थित असते; ज्या प्लीहेवर शस्त्राचा आघात होऊन ती बाहेर आल्यास प्राण्यांचा मृत्यू होतो. ตตฺถ ยถา โกฏฺฐกมตฺถกปสฺสํ นิสฺสาย ฐิตา น โคมยปิณฺฑิ ชานาติ ‘‘อหํ โกฏฺฐกมตฺถกปสฺสํ นิสฺสาย ฐิตา’’ติ, นปิ โกฏฺฐกมตฺถกปสฺสํ ชานาติ ‘‘โคมยปิณฺฑิ มํ นิสฺสาย ฐิตา’’ติ; เอวเมว น ปิหกํ ชานาติ ‘‘อหํ อุทรปฏลสฺส มตฺถกปสฺสํ นิสฺสาย ฐิต’’นฺติ, นปิ อุทรปฏลสฺส มตฺถกปสฺสํ ชานาติ ‘‘ปิหกํ มํ นิสฺสาย ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต [Pg.44] ปิหกํ ปิหกภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ปิหกํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या प्लीहेविषयी, जसे धान्याच्या कोठाराच्या भिंतीच्या वरच्या भागाला आश्रय करून असलेला शेणाचा गोळा जाणत नाही की, "मी कोठाराच्या भिंतीच्या वरच्या भागाला आश्रय करून स्थित आहे", आणि कोठाराच्या भिंतीचा वरचा भागही जाणत नाही की, "शेणाचा गोळा माझा आश्रय करून स्थित आहे"; त्याचप्रमाणे प्लीहा जाणत नाही की, "मी उदरपटलाच्या वरच्या भागाला आश्रय करून स्थित आहे", आणि उदरपटलाचा वरचा भागही जाणत नाही की, "प्लीहा माझा आश्रय करून स्थित आहे". कारण हे धर्म विचार आणि प्रत्यवेक्षणाने रहित आहेत... (पेय्याल)... हा कोणी पुद्गल नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, प्लीहा स्वतःच्या प्लीहा-भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग्य-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग्य-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे प्लीहेला वर्णादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ สรีรสฺส อพฺภนฺตเร ทฺวตฺตึสมํสขณฺฑปฺปเภทํ ปปฺผาสํ วณฺณโต รตฺตํ นาติปริปกฺกอุทุมฺพรวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต วิสมจฺฉินฺนปูวสณฺฐานํ, ฉทนิฏฺฐกขณฺฑปุญฺชสณฺฐานนฺติปิ เอเก. ตเทตํ อพฺภนฺตเร อสิตปีตาทีนํ อภาเว อุคฺคเตน กมฺมชเตชุสฺมนา อพฺภาหตตฺตา สงฺขาทิตปลาลปิณฺฑมิว นิรสํ นิโรชํ โหติ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต สรีรพฺภนฺตเร ทฺวินฺนํ ถนานํ อพฺภนฺตเร หทยญฺจ ยกนญฺจ อุปริ ฉาเทตฺวา โอลมฺพนฺตํ ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत बत्तीस मांसाच्या तुकड्यांच्या भेदाने युक्त असलेल्या फुफ्फुसाला रंगाने लाल, फार न पिकलेल्या उंबराच्या फळाच्या रंगासारखे म्हणून निश्चित करतो. आकाराने ते विषम कापलेल्या पुऱ्यांच्या (केकच्या) आकाराचे असते; काही आचार्य म्हणतात की ते छपराच्या कौलारांच्या तुकड्यांच्या ढिगाऱ्याच्या आकाराचे असते. शरीराच्या आत खाल्लेल्या, पिलेल्या इत्यादी अन्नाच्या अभावामुळे वर चढलेल्या कर्मजन्य तेजोधातूच्या उष्णतेने तप्त झाल्यामुळे ते चघळलेल्या पेंढ्याच्या गोळ्यासारखे रसहीन व ओजहीन असते. दिशेने ते वरच्या दिशेला उत्पन्न झालेले असते. स्थानाने ते शरीराच्या आत दोन्ही स्तनाच्या मध्ये हृदय आणि यकृत यांना वरून आच्छादित करून लटकत स्थित असते. ตตฺถ ยถา ชิณฺณโกฏฺฐพฺภนฺตเร ลมฺพมาโน สกุณกุลาวโก น ชานาติ ‘‘อหํ ชิณฺณโกฏฺฐพฺภนฺตเร ลมฺพมาโน ฐิโต’’ติ, นปิ ชิณฺณโกฏฺฐพฺภนฺตรํ ชานาติ ‘‘สกุณกุลาวโก มยิ ลมฺพมาโน ฐิโต’’ติ; เอวเมว น ปปฺผาสํ ชานาติ ‘‘อหํ สรีรพฺภนฺตเร ทฺวินฺนํ ถนานํ อนฺตเร ลมฺพมานํ ฐิต’’นฺติ, นปิ สรีรพฺภนฺตเร ทฺวินฺนํ ถนานํ อนฺตรํ ชานาติ ‘‘มยิ ปปฺผาสํ ลมฺพมานํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต ปปฺผาสํ ปปฺผาสภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ปปฺผาสํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या फुफ्फुसाविषयी, जसे जुन्या कोठाराच्या आत लटकणारे पक्ष्याचे घरटे जाणत नाही की, "मी जुन्या कोठाराच्या आत लटकत स्थित आहे", आणि जुन्या कोठाराचा आतील भागही जाणत नाही की, "माझ्यामध्ये पक्ष्याचे घरटे लटकत स्थित आहे"; त्याचप्रमाणे फुफ्फुस जाणत नाही की, "मी शरीराच्या आत दोन्ही स्तनाच्या मध्ये लटकत स्थित आहे", आणि शरीराच्या आतील दोन्ही स्तनाचा मध्यभागही जाणत नाही की, "माझ्यामध्ये फुफ्फुस लटकत स्थित आहे". कारण हे धर्म विचार आणि प्रत्यवेक्षणाने रहित आहेत... (पेय्याल)... हा कोणी पुद्गल नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, फुफ्फुस स्वतःच्या फुफ्फुस-भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग्य-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग्य-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे फुफ्फुसाला वर्णादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ อนฺโตสรีเร ปุริสสฺส ทฺวตฺตึสหตฺถํ, อิตฺถิยา อฏฺฐวีสติหตฺถํ, เอกวีสติยา ฐาเนสุ โอภคฺคํ อนฺตํ วณฺณโต เสตํ สกฺขรสุธาวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต สีสํ ฉินฺทิตฺวา โลหิตโทณิยํ สํเวลฺเลตฺวา ฐปิตธมฺมนิสณฺฐานํ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตํ. โอกาสโต อุปริ คลวาฏเก เหฏฺฐา จ กรีสมคฺเค วินิพนฺธตฺตา คลวาฏกกรีสมคฺคปริยนฺเต สรีรพฺภนฺตเร ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत पुरुषाचे बत्तीस हात लांब आणि स्त्रीचे अठ्ठावीस हात लांब असलेले, एकवीस ठिकाणी वळलेले मोठे आतडे रंगाने पांढरे, चुन्याच्या रंगासारखे म्हणून निश्चित करतो. आकाराने ते डोके कापून रक्ताच्या कुंडीत गुंडाळून ठेवलेल्या अजगराच्या शरीरासारखे असते. दिशेने ते दोन्ही दिशांना उत्पन्न झालेले असते. स्थानाने ते वर कंठद्वाराशी आणि खाली मलमार्गाशी बांधलेले असल्यामुळे कंठद्वारापासून मलमार्गापर्यंत शरीराच्या आत स्थित असते. ตตฺถ ยถา โลหิตโทณิยํ ฐปิตํ ฉินฺนสีสํ ธมฺมนิกเฬวรํ น ชานาติ ‘‘อหํ โลหิตโทณิยํ ฐิต’’นฺติ, นปิ โลหิตโทณิ ชานาติ ‘‘มยิ ฉินฺนสีสํ ธมฺมนิกเฬวรํ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น อนฺตํ ชานาติ ‘‘อหํ สรีรพฺภนฺตเร ฐิต’’นฺติ, นปิ สรีรพฺภนฺตรํ ชานาติ ‘‘มยิ อนฺตํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา [Pg.45] หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต อนฺตํ อนฺตภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ อนฺตํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या मोठ्या आतड्याविषयी, जसे रक्ताच्या कुंडीत ठेवलेले, कापलेले डोके असलेले अजगराचे शरीर जाणत नाही की, "मी रक्ताच्या कुंडीत स्थित आहे", आणि रक्ताची कुंडीही जाणत नाही की, "माझ्यामध्ये कापलेले डोके असलेले अजगराचे शरीर स्थित आहे"; त्याचप्रमाणे मोठे आतडे जाणत नाही की, "मी शरीराच्या आत स्थित आहे", आणि शरीराचा आतील भागही जाणत नाही की, "माझ्यामध्ये मोठे आतडे स्थित आहे". कारण हे धर्म विचार आणि प्रत्यवेक्षणाने रहित आहेत... (पेय्याल)... हा कोणी पुद्गल नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, मोठे आतडे स्वतःच्या मोठ्या आतड्याच्या भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग्य-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग्य-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे मोठ्या आतड्याला वर्णादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ อนฺโตสรีเร อนฺตนฺตเร อนฺตคุณํ วณฺณโต เสตํ ทกสีตลิกมูลวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต ทกสีตลิกมูลสณฺฐานเมวาติ, โคมุตฺตสณฺฐานนฺติปิ เอเก. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตํ. โอกาสโต กุทาลผรสุกมฺมาทีนิ กโรนฺตานํ ยนฺตากฑฺฒนกาเล ยนฺตสุตฺตกมิว ยนฺตผลกานิ อนฺตโภเค เอกโต อคฺคฬนฺเต อาพนฺธิตฺวา ปาทปุญฺฉนรชฺชุมณฺฑลกสฺส อนฺตรา ตํ สิพฺพิตฺวา ฐิตรชฺชุกา วิย เอกวีสติยา อนฺตโภคานํ อนฺตรา ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत मोठ्या आतड्याच्या वळणांच्या मध्ये असलेल्या लहान आतड्याला (आतड्याच्या बंधनाला) रंगाने पांढरे, पाणकणसाच्या मुळाच्या रंगासारखे म्हणून निश्चित करतो. आकाराने ते पाणकणसाच्या मुळाच्या आकारासारखेच असते; काही आचार्य म्हणतात की ते गोमूत्राच्या धारेच्या आकारासारखे असते. दिशेने ते दोन्ही दिशांना उत्पन्न झालेले असते. स्थानाने, कुदळ, कुऱ्हाड इत्यादींचे काम करणाऱ्या लोकांच्या यंत्र ओढण्याच्या वेळी यंत्राच्या दोरीप्रमाणे यंत्राच्या फळ्यांना जोडणाऱ्या, एका बाजूने खीळ घालून बांधलेल्या आणि पायपुसण्याच्या दोरीच्या वर्तुळात शिवून ठेवलेल्या दोरीप्रमाणे, ते मोठ्या आतड्याच्या एकवीस वळणांच्या मध्ये स्थित असते. ตตฺถ ยถา ปาทปุญฺฉนรชฺชุมณฺฑลกํ สิพฺพิตฺวา ฐิตรชฺชุกา น ชานาติ ‘‘มยา ปาทปุญฺฉนรชฺชุมณฺฑลกํ สิพฺพิต’’นฺติ, นปิ ปาทปุญฺฉนรชฺชุมณฺฑลกํ ชานาติ ‘‘รชฺชุกา มํ สิพฺพิตฺวา ฐิตา’’ติ, เอวเมว อนฺตคุณํ น ชานาติ ‘‘อหํ อนฺตํ เอกวีสติโภคพฺภนฺตเร อาพนฺธิตฺวา ฐิต’’นฺติ, นปิ อนฺตํ ชานาติ ‘‘อนฺตคุณํ มํ อาพนฺธิตฺวา ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต อนฺตคุณํ อนฺตคุณภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ อนฺตคุณํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे पायपुसण्याच्या दोरीचे वर्तुळ शिवून ठेवलेली दोरी हे जाणत नाही की, 'मी पायपुसण्याच्या दोरीचे वर्तुळ शिवले आहे', आणि पायपुसण्याचे दोरीचे वर्तुळही हे जाणत नाही की, 'दोरीने मला शिवून ठेवले आहे'; त्याचप्रमाणे लहान आतडे (अंतगुण) हे जाणत नाही की, 'मी मोठ्या आतड्याला एकवीस वेढ्यांच्या आत बांधून राहिले आहे', आणि मोठे आतडेही हे जाणत नाही की, 'लहान आतड्याने मला बांधून ठेवले आहे'. कारण हे धर्म (घटक) आभोग (चेतना) आणि प्रत्यवेक्षण (विचार) यांनी रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या (मर्यादेच्या) दृष्टीने, लहान आतडे हे लहान आतड्याच्या भागानेच मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा याचा सभाग-परिच्छेद (समान सीमा) आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद (असमान सीमा) तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो लहान आतड्याला वर्ण (रंग) इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो। ตโต ปรํ อนฺโตสรีเร อุทริยํ วณฺณโต อชฺโฌหฏาหารวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต ปริสฺสาวเน สิถิลพทฺธตณฺฑุลสณฺฐานํ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต อุทเร ฐิตนฺติ. อุทรํ นาม อุภโต นิปฺปีฬิยมานสฺส อลฺลสาฏกสฺส มชฺเฌ สญฺชาตโผฏกสทิสํ อนฺตปฏลํ, พหิ มฏฺฐํ, อนฺโต มํสกสมฺพุปลิเวฐิตํ, กิลิฏฺฐปาวารปุปฺผสทิสํ, กุถิตปนสผลสฺส อพฺภนฺตรสทิสนฺติปิ เอเก. ตตฺถ ตกฺโกลกา คณฺฑุปฺปาทกาตาลหีรกาสูจิมุขกาปฏตนฺตุสุตฺตกาติ เอวมาทิทฺวตฺตึสกุลปฺปเภทา กิมโย อากุลพฺยากุลา สณฺฑสณฺฑจาริโน หุตฺวา นิวสนฺติ, เย ปานโภชนาทิมฺหิ อวิชฺชมาเน อุลฺลงฺฆิตฺวา วิรวนฺตา [Pg.46] หทยมํสํ อภิตุทนฺติ ปานโภชนาทีนิ อชฺโฌหรณเวลายญฺจ อุทฺธํมุขา หุตฺวา ปฐมชฺโฌหเฏ ทฺเว ตโย อาโลเป ตุริตตุริตา วิลุมฺปนฺติ. ยํ เอเตสํ กิมีนํ ปสูติฆรํ วจฺจกุฏิ คิลานสาลา สุสานญฺจ โหติ, ยตฺถ เสยฺยถาปิ นาม จณฺฑาลคามทฺวาเร จนฺทนิกาย สรทสมเย ถูลผุสิตเก เทเว วสฺสนฺเต อุทเกน อาวูฬฺหํ มุตฺตกรีสจมฺมฏฺฐินฺหารุขณฺฑเขฬสิงฺฆาณิกาโลหิตปฺปภุตินานากุณปชาตํ นิปติตฺวา กทฺทโมทกาลุฬิตํ สญฺชาตกิมิกุลากุลํ หุตฺวา ทฺวีหตีหจฺจเยน สูริยาตปสนฺตาปเวคกุถิตํ อุปริ เผณปุปฺผุฬเก มุญฺจนฺตํ อภินีลวณฺณํ ปรมทุคฺคนฺธเชคุจฺฉํ อุปคนฺตุํ วา ทฏฺฐุํ วา อนรหรูปตํ อาปชฺชิตฺวา ติฏฺฐติ, ปเคว ฆายิตุํ วา สายิตุํ วา; เอวเมว นานปฺปการปานโภชนาทิ ทนฺตมุสลสํจุณฺณิตํ ชิวฺหาหตฺถสมฺปริวตฺติตํ เขฬลาลาปลิพุทฺธํ ตงฺขณวิคตวณฺณคนฺธรสาทิสมฺปทํ โกลิยขลิสุวานวมถุสทิสํ นิปติตฺวา ปิตฺตเสมฺหวาตปลิเวฐิตํ หุตฺวา อุทรคฺคิสนฺตาปเวคกุถิตํ กิมิกุลากุลํ อุปรูปริ เผณปุปฺผุฬกานิ มุญฺจนฺตํ ปรมกสมฺพุทุคฺคนฺธเชคุจฺฉภาวมาปชฺชิตฺวา ติฏฺฐติ. ยํ สุตฺวาปิ ปานโภชนาทีสุ อมนุญฺญตา สณฺฐาติ, ปเคว ปญฺญาจกฺขุนา โอโลเกตฺวา. ยตฺถ จ ปติตํ ปานโภชนาทิ ปญฺจธา วิเวกํ คจฺฉติ, เอกํ ภาคํ ปาณกา ขาทนฺติ, เอกํ ภาคํ อุทรคฺคิ ฌาเปติ, เอโก ภาโค มุตฺตํ โหติ, เอโก ภาโค กรีสํ โหติ, เอโก ภาโค รสภาวํ อาปชฺชิตฺวา โสณิตมํสาทีนิ อุปพฺรูหยตีติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत असलेल्या जठरातील अन्नाला (आमाशयातील अन्नाला) वर्णाच्या (रंगाच्या) दृष्टीने, 'ते गिळलेल्या अन्नाच्या रंगाचे असते' असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, गाळण्याच्या कपड्यात सैलसर बांधलेल्या तांदळाच्या पुडक्यासारखा त्याचा आकार असतो. दिशेच्या दृष्टीने, ते वरच्या भागात उत्पन्न झालेले असते. स्थानाच्या दृष्टीने, ते आमाशयात (उदरात) राहिलेले असते. आमाशय (उदर) म्हणजे दोन्ही बाजूंनी पिळल्या जाणाऱ्या ओल्या वस्त्राच्या मध्यभागी निर्माण झालेल्या फुग्यासारखा आतड्याचा पडदा (अंतपटल) होय; जो बाहेरून गुळगुळीत असतो आणि आतून शिंपल्याच्या मांसाप्रमाणे लिंपलेल्या मांसाने युक्त असतो, जो मळलेल्या पांढऱ्या चादरीवरील फुलांच्या नक्षीसारखा असतो; काही आचार्य म्हणतात की तो सडलेल्या फणसाच्या आतील भागासारखा असतो. त्या आमाशयात तक्कोलक, गंडुपादक, तालहीरक, सुचीमुख, पटतंतु-सूत्रक इत्यादी बत्तीस प्रकारच्या कुळांतील जंतू अत्यंत अस्वस्थपणे घोळक्या-घोळक्याने फिरत राहतात. जेव्हा खाण्यापिण्याचे पदार्थ नसतात, तेव्हा ते उड्या मारून आणि ओरडत हृदयाच्या मांसाला टोचतात (चावतात); आणि खाण्यापिण्याचे पदार्थ गिळताना ते वर तोंड करून, आधी गिळलेले दोन-तीन घास घाईघाईने लुटून खातात. जे या जंतूंचे प्रसूतीगृह, शौचालय, रुग्णालय आणि स्मशान असते. जेथे, जसे की चांडाळांच्या वस्तीच्या दाराशी असलेल्या नाल्यात, शरद ऋतूत मोठे थेंब असलेला पाऊस पडत असताना, पाण्याने वाहून आलेले मूत्र, मल, चामडे, हाडे, शिरांचे तुकडे, लाळ, शेंबूड, रक्त इत्यादी विविध प्रकारचे कुजलेले मृतदेह पडून, चिखलाच्या पाण्याने गढूळ होऊन, निर्माण झालेल्या जंतूंच्या समूहाने गजबजलेले होते; आणि दोन-तीन दिवसांनंतर सूर्याच्या उन्हाच्या उष्णतेने उकळून, वर फेस आणि बुडबुडे सोडत, अतिशय गडद निळ्या रंगाचे, अत्यंत दुर्गंधीयुक्त व किळसवाणे होऊन, जवळ जाण्यास किंवा पाहण्यासही अयोग्य अशा अवस्थेत राहते, मग त्याचा वास घेणे किंवा चव घेणे तर दूरच राहिले! त्याचप्रमाणे, विविध प्रकारचे खाण्यापिण्याचे पदार्थ दातांच्या मुसळाने बारीक वाटलेले, जिभेच्या हाताने इकडेतिकडे फिरवलेले, लाळ आणि थुंकीने माखलेले, त्याच क्षणी ज्यांचा रंग, गंध, चव इत्यादींची उत्तमता नष्ट झाली आहे असे होऊन, कुत्र्याच्या ओकारीसारखे आमाशयात पडते; आणि पित्त, कफ व वायूने वेढलेले होऊन, जठराग्नीच्या उष्णतेने उकळत, जंतूंच्या समूहाने गजबजलेले, वरच्या वर फेस आणि बुडबुडे सोडत, अत्यंत दुर्गंधीयुक्त आणि किळसवाणे होऊन राहते. ज्याच्याविषयी केवळ ऐकूनही खाण्यापिण्याच्या पदार्थांबद्दल अरुची निर्माण होते, मग प्रज्ञाचक्षूने पाहिल्यावर तर काय सांगावे! आणि जेथे पडलेले खाण्यापिण्याचे पदार्थ पाच प्रकारे विभागले जातात—एक भाग जंतू खातात, एक भाग जठराग्नी पचवतो, एक भाग मूत्र बनतो, एक भाग मल बनतो आणि एक भाग रस रूपाला प्राप्त होऊन रक्त, मांस इत्यादींचे पोषण करतो, असे तो निश्चित करतो। ตตฺถ ยถา ปรมเชคุจฺฉาย สุวานโทณิยา ฐิโต สุวานวมถุ น ชานาติ ‘‘อหํ สุวานโทณิยา ฐิโต’’ติ; นปิ สุวานโทณิ ชานาติ ‘‘มยิ สุวานวมถุ ฐิโต’’ติ. เอวเมว น อุทริยํ ชานาติ ‘‘อหํ อิมสฺมึ ปรมทุคฺคนฺธเชคุจฺเฉ อุทเร ฐิต’’นฺติ; นปิ อุทรํ ชานาติ ‘‘มยิ อุทริยํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต อุทริยํ อุทริยภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ อุทริยํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे अत्यंत किळसवाण्या कुत्र्याच्या खाण्याच्या पात्रात असलेली कुत्र्याची ओकारी हे जाणत नाही की, 'मी कुत्र्याच्या पात्रात राहिली आहे', आणि कुत्र्याचे पात्रही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये कुत्र्याची ओकारी राहिली आहे'; त्याचप्रमाणे जठरातील अन्नही हे जाणत नाही की, 'मी या अत्यंत दुर्गंधीयुक्त व किळसवाण्या आमाशयात राहिले आहे', आणि आमाशयही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये जठरातील अन्न राहिले आहे'. कारण हे धर्म (घटक) आभोग (चेतना) आणि प्रत्यवेक्षण (विचार) यांनी रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, जठरातील अन्न हे जठरातील अन्नाच्या भागानेच मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा याचा सभाग-परिच्छेद (समान सीमा) आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद (असमान सीमा) तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो जठरातील अन्नाला वर्ण इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो। ตโต [Pg.47] ปรํ อนฺโตสรีเร กรีสํ วณฺณโต เยภุยฺเยน อชฺโฌหฏาหารวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานํ, ทิสโต เหฏฺฐิมาย ทิสาย ชาตํ, โอกาสโต ปกฺกาสเย ฐิตนฺติ. ปกฺกาสโย นาม เหฏฺฐา นาภิปิฏฺฐิกณฺฏกมูลานํ อนฺตเร อนฺตาวสาเน อุพฺเพเธน อฏฺฐงฺคุลมตฺโต วํสนฬกพฺภนฺตรสทิโส ปเทโส, ยตฺถ เสยฺยถาปิ นาม อุปริภูมิภาเค ปติตํ วสฺโสทกํ โอคฬิตฺวา เหฏฺฐาภูมิภาคํ ปูเรตฺวา ติฏฺฐติ, เอวเมว ยํกิญฺจิ อามาสเย ปติตํ ปานโภชนาทิกํ อุทรคฺคินา เผณุทฺเทหกํ ปกฺกํ ปกฺกํ สณฺหกรณิยา ปิฏฺฐมิว สณฺหภาวํ อาปชฺชิตฺวา อนฺตพิเลน โอคฬิตฺวา โอมทฺทิตฺวา วํสนฬเก ปกฺขิตฺตปณฺฑุมตฺติกา วิย สนฺนิจิตํ หุตฺวา ติฏฺฐติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत असलेल्या मलाला (विष्ठेला) वर्णाच्या (रंगाच्या) दृष्टीने, 'ते बहुधा गिळलेल्या अन्नाच्या रंगाचे असते' असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, ते ज्या स्थानात राहते त्या स्थानाचा आकार त्याला प्राप्त होतो. दिशेच्या दृष्टीने, ते खालच्या भागात उत्पन्न झालेले असते. स्थानाच्या दृष्टीने, ते पक्वाशयात राहिलेले असते. पक्वाशय म्हणजे खाली नाभी आणि पाठीच्या कण्याच्या मुळाच्या मध्यभागी, मोठ्या आतड्याच्या शेवटी, उंचीने सुमारे आठ बोटे असलेला आणि बांबूच्या नळीच्या आतील भागासारखा असलेला प्रदेश होय; जेथे, जसे की वरच्या जमिनीवर पडलेले पावसाचे पाणी खाली वाहून जाऊन खालच्या जमिनीचा भाग भरून राहते, त्याचप्रमाणे आमाशयात पडलेले जे काही खाण्यापिण्याचे पदार्थ असतात, ते जठराग्नीद्वारे फेस निर्माण करत जसे जसे पचतात, तसे तसे ते बारीक दळल्याप्रमाणे पिठासारखे मऊ होऊन, आतड्याच्या छिद्रातून खाली वाहून व दाबले जाऊन, बांबूच्या नळीत दाबून भरलेल्या पिवळसर मातीच्या गोळ्याप्रमाणे गोळा होऊन राहतात। ตตฺถ ยถา วํสนฬเก โอมทฺทิตฺวา ปกฺขิตฺตปณฺฑุมตฺติกา น ชานาติ ‘‘อหํ วํสนฬเก ฐิตา’’ติ, นปิ วํสนฬโก ชานาติ ‘‘มยิ ปณฺฑุมตฺติกา ฐิตา’’ติ; เอวเมว น กรีสํ ชานาติ ‘‘อหํ ปกฺกาสเย ฐิต’’นฺติ, นปิ ปกฺกาสโย ชานาติ ‘‘มยิ กรีสํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต กรีสํ กรีสภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ กรีสํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे बांबूच्या नळीत दाबून भरलेला पिवळसर मातीचा गोळा हे जाणत नाही की, 'मी बांबूच्या नळीत राहिला आहे', आणि बांबूची नळीही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये पिवळसर मातीचा गोळा राहिला आहे'; त्याचप्रमाणे मलही हे जाणत नाही की, 'मी पक्वाशयात राहिलो आहे', आणि पक्वाशयही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये मल राहिला आहे'. कारण हे धर्म (घटक) आभोग (चेतना) आणि प्रत्यवेक्षण (विचार) यांनी रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, मल हा मलाच्या भागानेच मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा याचा सभाग-परिच्छेद (समान सीमा) आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद (असमान सीमा) तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो मलाला वर्ण इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो। ตโต ปรํ สรีเร สีสกฏาหพฺภนฺตเร มตฺถลุงฺคํ วณฺณโต เสตํ อหิฉตฺตกปิณฺฑิวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. ปกฺกุถิตทุทฺธวณฺณนฺติปิ เอเก. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานํ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต สีสกฏาหสฺส อพฺภนฺตเร จตฺตาโร สิพฺพินิมคฺเค นิสฺสาย สโมธาย ฐปิตา จตฺตาโร ปิฏฺฐปิณฺฑิกา วิย สโมหิตํ จตุมตฺถลุงฺคปิณฺฑปฺปเภทํ หุตฺวา ฐิตนฺติ. त्यानंतर, शरीरात डोक्याच्या कवटीच्या आत असलेल्या मेंदूला (मस्तुलुंगाला) वर्णाच्या (रंगाच्या) दृष्टीने, 'तो पांढरा आणि भूछत्राच्या (मशरूमच्या) ढिगासारख्या रंगाचा असतो' असे तो निश्चित करतो. काही आचार्य म्हणतात की तो नासलेल्या दुधाच्या रंगाचा असतो. आकाराच्या दृष्टीने, तो ज्या स्थानात राहते त्या स्थानाचा आकार त्याला प्राप्त होतो. दिशेच्या दृष्टीने, तो वरच्या भागात उत्पन्न झालेला असतो. स्थानाच्या दृष्टीने, तो डोक्याच्या कवटीच्या आत चार शिवण-मार्गांचा (कवटीच्या सांध्यांचा) आश्रय घेऊन, एकत्र करून ठेवलेल्या पिठाच्या चार गोळ्यांप्रमाणे, एकत्र येऊन चार मेंदूच्या गोळ्यांच्या रूपात विभागलेला होऊन राहिलेला असतो। ตตฺถ ยถา ปุราณลาพุกฏาเห ปกฺขิตฺตปิฏฺฐปิณฺฑิ ปกฺกุถิตทุทฺธํ วา น ชานาติ ‘‘อหํ ปุราณลาพุกฏาเห ฐิต’’นฺติ, นปิ ปุราณลาพุกฏาหํ ชานาติ ‘‘มยิ ปิฏฺฐปิณฺฑิ ปกฺกุถิตทุทฺธํ วา ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น มตฺถลุงฺคํ ชานาติ ‘‘อหํ สีสกฏาหพฺภนฺตเร ฐิต’’นฺติ, นปิ สีสกฏาหพฺภนฺตรํ ชานาติ ‘‘มยิ มตฺถลุงฺคํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต มตฺถลุงฺคํ มตฺถลุงฺคภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ มตฺถลุงฺคํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे जुन्या भोपळ्याच्या कवचात टाकलेला पिठाचा गोळा किंवा नासलेले दूध (फेस) हे जाणत नाही की, 'मी जुन्या भोपळ्याच्या कवचात स्थित आहे', आणि ते जुने भोपळ्याचे कवचही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये पिठाचा गोळा किंवा नासलेले दूध स्थित आहे'; त्याचप्रमाणे मेंदू (मस्तुलुंग) जाणत नाही की, 'मी कवटीच्या आत स्थित आहे', आणि कवटीचा आतील भागही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये मेंदू स्थित आहे'. कारण हे सर्व धर्म (घटक) विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (व्यक्ती) नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, मेंदू हा मेंदूच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद (समान घटकांशी असलेली सीमा) आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद (भिन्न घटकांशी असलेली सीमा) केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो मेंदूचे वर्ण (रंग) इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต [Pg.48] ปรํ สรีเร พทฺธาพทฺธเภทโต ทุวิธมฺปิ ปิตฺตํ วณฺณโต พหลมธุกเตลวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. อพทฺธปิตฺตํ มิลาตพกุลปุปฺผวณฺณนฺติปิ เอเก. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานํ. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตํ. โอกาสโต อพทฺธปิตฺตํ เกสโลมนขทนฺตานํ มํสวินิมุตฺตฏฺฐานํ ถทฺธสุกฺขจมฺมญฺจ วชฺเชตฺวา อุทกมิว เตลพินฺทุ อวเสสสรีรํ พฺยาเปตฺวา ฐิตํ, ยมฺหิ กุปิเต อกฺขีนิ ปีตกานิ โหนฺติ ภมนฺติ, คตฺตํ กมฺปติ กณฺฑูยติ. พทฺธปิตฺตํ หทยปปฺผาสานมนฺตเร ยกนมํสํ นิสฺสาย ปติฏฺฐิเต มหาโกสาตกิโกสกสทิเส ปิตฺตโกสเก ฐิตํ, ยมฺหิ กุปิเต สตฺตา อุมฺมตฺตกา โหนฺติ, วิปลฺลตฺถจิตฺตา หิโรตฺตปฺปํ ฉฑฺเฑตฺวา อกตฺตพฺพํ กโรนฺติ, อภาสิตพฺพํ ภาสนฺติ, อจินฺติตพฺพํ จินฺเตนฺติ. त्यानंतर, शरीरातील बद्ध (बद्ध) आणि अबद्ध (मुक्त) अशा दोन प्रकारच्या पित्ताचे, वर्णाच्या (रंगाच्या) दृष्टीने, 'ते दाट मोहाच्या तेलासारख्या रंगाचे आहे' असे तो निर्धारण करतो. काही आचार्य म्हणतात की, अबद्ध पित्त हे कोमेजलेल्या बकुळीच्या फुलाच्या रंगाचे असते. आकाराच्या दृष्टीने, ते ज्या ठिकाणी असते तसाच त्याचा आकार असतो. दिशेच्या दृष्टीने, ते दोन्ही दिशांमध्ये (वरच्या आणि खालच्या शरीरात) उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, अबद्ध पित्त हे केस, रोम, नखे, दात, मांस नसलेली जागा आणि कडक कोरडी त्वचा वगळून, पाण्यावर पसरलेल्या तेलाच्या थेंबाप्रमाणे उर्वरित संपूर्ण शरीरात पसरून राहिलेले असते; ज्याच्या प्रकोपाने डोळे पिवळे होतात व फिरतात (चक्कर येते), शरीर थरथर कापते आणि खाज सुटते. बद्ध पित्त हे हृदय आणि फुफ्फुस यांच्या दरम्यान, यकृताच्या मांसाचा आश्रय घेऊन राहिलेल्या, मोठ्या दोडक्याच्या कोशासारख्या पित्ताशयात स्थित असते; ज्याच्या प्रकोपाने प्राणी वेडे होतात, विचलित चित्त होऊन ह्री (लाज) आणि ओत्तप्प (भय) सोडून न करण्यासारखे कर्म करतात, न बोलण्यासारखे बोलतात आणि न विचार करण्यासारखा विचार करतात. ตตฺถ ยถา อุทกํ พฺยาเปตฺวา ฐิตํ เตลํ น ชานาติ ‘‘อหํ อุทกํ พฺยาเปตฺวา ฐิต’’นฺติ, นปิ อุทกํ ชานาติ ‘‘เตลํ มํ พฺยาเปตฺวา ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น อพทฺธปิตฺตํ ชานาติ ‘‘อหํ สรีรํ พฺยาเปตฺวา ฐิต’’นฺติ, นปิ สรีรํ ชานาติ ‘‘อพทฺธปิตฺตํ มํ พฺยาเปตฺวา ฐิต’’นฺติ. ยถา จ โกสาตกิโกสเก ฐิตํ วสฺโสทกํ น ชานาติ ‘‘อหํ โกสาตกิโกสเก ฐิต’’นฺติ, นปิ โกสาตกิโกสโก ชานาติ ‘‘มยิ วสฺโสทกํ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น พทฺธปิตฺตํ ชานาติ ‘‘อหํ ปิตฺตโกสเก ฐิต’’นฺติ, นปิ ปิตฺตโกสโก ชานาติ ‘‘มยิ พทฺธปิตฺตํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต ปิตฺตํ ปิตฺตภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ปิตฺตํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे पाण्याला व्यापून राहिलेले तेल हे जाणत नाही की, 'मी पाण्याला व्यापून राहिले आहे', आणि पाणीही जाणत नाही की, 'तेलाने मला व्यापून ठेवले आहे'; त्याचप्रमाणे अबद्ध पित्तही जाणत नाही की, 'मी शरीराला व्यापून राहिले आहे', आणि शरीरही जाणत नाही की, 'अबद्ध पित्ताने मला व्यापून ठेवले आहे'. आणि ज्याप्रमाणे दोडक्याच्या कोशात असलेले पावसाचे पाणी जाणत नाही की, 'मी दोडक्याच्या कोशात स्थित आहे', आणि तो दोडक्याचा कोशही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये पावसाचे पाणी स्थित आहे'; त्याचप्रमाणे बद्ध पित्तही जाणत नाही की, 'मी पित्ताशयात स्थित आहे', आणि पित्ताशयही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये बद्ध पित्त स्थित आहे'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, पित्त हे पित्ताच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो पित्ताचे वर्ण इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีรพฺภนฺตเร เอกปตฺตปูรปฺปมาณํ เสมฺหํ วณฺณโต เสตํ กจฺฉกปณฺณรสวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานํ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต อุทรปฏเล ฐิตนฺติ. ยํ [Pg.49] ปานโภชนาทิอชฺโฌหรณกาเล เสยฺยถาปิ นาม อุทเก เสวาลปณกํ กฏฺเฐ วา กถเล วา ปตนฺเต ฉิชฺชิตฺวา ทฺวิธา หุตฺวา ปุน อชฺโฌตฺถริตฺวา ติฏฺฐติ, เอวเมว ปานโภชนาทิมฺหิ นิปตนฺเต ฉิชฺชิตฺวา ทฺวิธา หุตฺวา ปุน อชฺโฌตฺถริตฺวา ติฏฺฐติ, ยมฺหิ จ มนฺทีภูเต ปกฺกมิว คณฺฑํ ปูติกมิว กุกฺกุฏณฺฑํ อุทรปฏลํ ปรมเชคุจฺฉกุณปคนฺธํ โหติ. ตโต อุคฺคเตน จ คนฺเธน อุคฺคาโรปิ มุขมฺปิ ทุคฺคนฺธํ ปูติกุณปสทิสํ โหติ, โส จ ปุริโส ‘‘อเปหิ ทุคฺคนฺธํ วายสี’’ติ วตฺตพฺพตํ อาปชฺชติ, ยญฺจ อภิวฑฺฒิตํ พหลตฺตมาปนฺนํ ปฏิกุชฺชนผลกมิว วจฺจกุฏิยา อุทรปฏลพฺภนฺตเร เอว กุณปคนฺธํ สนฺนิรุมฺภิตฺวา ติฏฺฐติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत एका पात्रात मावेल एवढ्या प्रमाणातील कफ (श्लेष्मा), वर्णाच्या दृष्टीने, 'तो पांढरा आणि कच्छक पानाच्या रसासारख्या रंगाचा आहे' असे तो निर्धारण करतो. आकाराच्या दृष्टीने, ते ज्या ठिकाणी असते तसाच त्याचा आकार असतो. दिशेच्या दृष्टीने, ते वरच्या दिशेला उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, ते जठराच्या पटलावर (पोटाच्या अस्तरावर) स्थित असते. जे पेय आणि अन्न इत्यादी गिळताना—ज्याप्रमाणे पाण्यात शेवाळ असताना, त्यात लाकूड किंवा खापर पडल्यास ते बाजूला होऊन दोन भाग होते आणि पुन्हा एकत्र येऊन पाण्याला झाकून टाकते; त्याचप्रमाणे पेय आणि अन्न इत्यादी पोटात पडताना ते बाजूला होऊन दोन भाग होते आणि पुन्हा एकत्र येऊन जठराला झाकून टाकते. आणि ज्या कफाचे प्रमाण कमी झाल्यावर, पिकलेल्या गळवाप्रमाणे किंवा सडलेल्या कोंबडीच्या अंड्याप्रमाणे जठराचे पटल अत्यंत घृणास्पद अशा सडलेल्या शवासारखा दुर्गंध देणारे होते. त्यातून निघणाऱ्या दुर्गंधीमुळे ढेकर आणि तोंडही सडलेल्या शवासारखे दुर्गंधीयुक्त होते, आणि त्या माणसाला 'दूर हो, तुझ्याकडून दुर्गंध येत आहे' असे बोलले जाण्याची पाळी येते. आणि जेव्हा तो कफ वाढतो आणि दाट होतो, तेव्हा शौचालयाच्या खड्ड्यावर झाकलेल्या लाकडी पाटाप्रमाणे, जठराच्या पटलाच्या आतच तो सडलेला दुर्गंध दाबून ठेवतो. ตตฺถ ยถา จนฺทนิกาย อุปริเผณปฏลํ น ชานาติ ‘‘อหํ จนฺทนิกาย ฐิต’’นฺติ, นปิ จนฺทนิกา ชานาติ ‘‘มยิ เผณปฏลํ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น เสมฺหํ ชานาติ ‘‘อหํ อุทรปฏเล ฐิต’’นฺติ, นปิ อุทรปฏลํ ชานาติ ‘‘มยิ เสมฺหํ ฐิตนฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต เสมฺหํ เสมฺหภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ เสมฺหํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे सांडपाण्याच्या नाल्यावरील फेसाचा थर जाणत नाही की, 'मी सांडपाण्याच्या नाल्यावर स्थित आहे', आणि तो सांडपाण्याचा नालाही जाणत नाही की, 'माझ्यावर फेसाचा थर स्थित आहे'; त्याचप्रमाणे कफही जाणत नाही की, 'मी जठराच्या पटलावर स्थित आहे', आणि जठराचे पटलही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये कफ स्थित आहे'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, कफ हा कफाच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो कफाचे वर्ण इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีเร ปุพฺโพ วณฺณโต ปณฺฑุปลาสวณฺโณติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐาโน. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาโต. โอกาสโต ปุพฺพสฺส โอกาโส นาม นิพทฺโธ นตฺถิ. ยตฺถ ปุพฺโพ สนฺนิจิโต ติฏฺเฐยฺย, ยตฺร ยตฺร ขาณุกณฺฏกปฺปหรณคฺคิชาลาทีหิ อภิหเต สรีรปฺปเทเส โลหิตํ สณฺฐหิตฺวา ปจฺจติ, คณฺฑปิฬกาทโย วา อุปฺปชฺชนฺติ, ตตฺร ตตฺร ติฏฺฐติ. त्यानंतर, शरीरातील पू, वर्णाच्या दृष्टीने, 'तो पिवळसर पानाच्या रंगाचा आहे' असे तो निर्धारण करतो. आकाराच्या दृष्टीने, तो ज्या ठिकाणी असतो तसाच त्याचा आकार असतो. दिशेच्या दृष्टीने, तो दोन्ही दिशांमध्ये उत्पन्न होतो. स्थानाच्या दृष्टीने, पू साठण्यासाठी शरीरात कोणतीही निश्चित जागा नसते. परंतु शरीराच्या ज्या ज्या भागात खुंट, काटे, जखम किंवा आगीची झळ इत्यादींमुळे इजा होते, तिथे रक्त साठून सडते, किंवा गळू, पुरळ इत्यादी उत्पन्न होतात, तिथे तिथे तो स्थित असतो. ตตฺถ ยถา รุกฺขสฺส ตตฺถ ตตฺถ ผรสุธาราทีหิ ปหตปฺปเทเส อวคฬิตฺวา ฐิโต นิยฺยาโส น ชานาติ ‘‘อหํ รุกฺขสฺส ปหตปฺปเทเส ฐิโต’’ติ, นปิ รุกฺขสฺส ปหตปฺปเทโส ชานาติ ‘‘มยิ นิยฺยาโส ฐิโต’’ติ; เอวเมว น ปุพฺโพ ชานาติ ‘‘อหํ สรีรสฺส ตตฺถ ตตฺถ ขาณุกณฺฏกาทีหิ อภิหตปฺปเทเส คณฺฑปิฬกาทีนํ อุฏฺฐิตปฺปเทเส วา ฐิโต’’ติ, นปิ สรีรปฺปเทโส ชานาติ ‘‘มยิ ปุพฺโพ ฐิโต’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา [Pg.50] หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต ปุพฺโพ ปุพฺพภาเคน ปริจฺฉินฺโนติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ปุพฺพํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यात, ज्याप्रमाणे झाडाच्या ज्या ज्या भागावर कुऱ्हाडीच्या धारेने इत्यादींनी जखम झाली असेल, तिथून पाझरून राहिलेला डिंक (अर्क) जाणत नाही की, 'मी झाडाच्या जखम झालेल्या भागावर स्थित आहे', आणि झाडाचा तो जखम झालेला भागही जाणत नाही की, 'माझ्यावर डिंक स्थित आहे'; त्याचप्रमाणे पू देखील जाणत नाही की, 'मी शरीराच्या ज्या ज्या भागात खुंट, काटे इत्यादींमुळे इजा झालेल्या जागी किंवा गळू, पुरळ इत्यादी उठलेल्या जागी स्थित आहे', आणि शरीराचा तो भागही जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये पू स्थित आहे'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, पू हा पूच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो पूचे वर्ण इत्यादींच्या आधारे निर्धारण करतो. ตโต ปรํ สรีเร สนฺนิจิตโลหิตํ สํสรณโลหิตนฺติ เอวํ ทุวิเธ โลหิเต สนฺนิจิตโลหิตํ ตาว วณฺณโต พหลกุถิตลาขารสวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ, สํสรณโลหิตํ อจฺฉลาขารสวณฺณนฺติ. สณฺฐานโต สพฺพมฺปิ อตฺตโน โอกาสสณฺฐานํ. ทิสโต สนฺนิจิตโลหิตํ อุปริมาย ทิสาย ชาตํ, สํสรณโลหิตํ ทฺวีสุปีติ. โอกาสโต สํสรณโลหิตํ เกสโลมนขทนฺตานํ มํสวินิมุตฺตฏฺฐานญฺเจว ถทฺธสุกฺขจมฺมญฺจ วชฺเชตฺวา ธมนิชาลานุสาเรน สพฺพํ อุปาทินฺนกสรีรํ ผริตฺวา ฐิตํ. สนฺนิจิตโลหิตํ ยกนสฺส เหฏฺฐาภาคํ ปูเรตฺวา เอกปตฺตปูรณมตฺตํ วกฺกหทยปปฺผาสานํ อุปริ โถกํ โถกํ พินฺทุํ ปาเตนฺตํ วกฺกหทยยกนปปฺผาเส เตเมนฺตํ ฐิตํ, ยมฺหิ วกฺกหทยาทีนิ อเตเมนฺเต สตฺตา ปิปาสิตา โหนฺติ. त्यानंतर शरीरात साठलेले रक्त (संचित रक्त) आणि संचार करणारे रक्त (प्रवहणशील रक्त) अशा दोन प्रकारच्या रक्तात, साठलेले रक्त रंगाने दाट, उकळलेल्या लाखेच्या रसासारख्या रंगाचे असते, असे निश्चित करतो; आणि संचार करणारे रक्त स्वच्छ लाखेच्या रसासारख्या रंगाचे असते, असे निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने, सर्वच रक्त आपल्या स्थानाच्या आकाराचे असते. दिशेच्या दृष्टीने, साठलेले रक्त शरीराच्या वरच्या भागात उत्पन्न होते, आणि संचार करणारे रक्त दोन्ही भागांत (वरच्या व खालच्या) उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, संचार करणारे रक्त हे केस, रोम (लव), नखे, दात, मांस नसलेली ठिकाणे आणि कडक व कोरडी त्वचा वगळून, रक्तवाहिन्यांच्या जाळ्याद्वारे (धमनीजालाने) संपूर्ण उपादिन्नक शरीराला (कर्मजन्य शरीराला) व्यापून राहिलेले असते. साठलेले रक्त यकृताचा खालचा भाग भरून, सुमारे एक पात्र भरेल एवढ्या प्रमाणात राहून, वृक्क (किडनी), हृदय आणि फुफ्फुस यांच्यावर थोडे थोडे थेंब पाडत, वृक्क, हृदय, यकृत आणि फुफ्फुसांना ओले करत राहते; ज्या रक्ताने वृक्क, हृदय इत्यादी ओले न झाल्यास प्राणी तहानलेले (व्याकुळ) होतात. ตตฺถ ยถา ชชฺชรกปาเล ฐิตํ อุทกํ เหฏฺฐา เลฑฺฑุขณฺฑาทีนิ เตเมนฺตํ น ชานาติ ‘‘อหํ ชชฺชรกปาเล ฐิตํ เหฏฺฐา เลฑฺฑุขณฺฑาทีนิ เตเมมี’’ติ, นปิ ชชฺชรกปาลํ เหฏฺฐา เลฑฺฑุขณฺฑาทีนิ วา ชานนฺติ ‘‘มยิ อุทกํ ฐิตํ, อมฺเห วา เตเมนฺตํ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น โลหิตํ ชานาติ ‘‘อหํ ยกนสฺส เหฏฺฐาภาเค วกฺกหทยาทีนิ เตเมนฺตํ ฐิต’’นฺติ, นปิ ยกนสฺส เหฏฺฐาภาคฏฺฐานํ วกฺกหทยาทีนิ วา ชานนฺติ ‘‘มยิ โลหิตํ ฐิตํ, อมฺเห วา เตเมนฺตํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต โลหิตํ โลหิตภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ โลหิตํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, जसे एखाद्या फुटलेल्या मातीच्या खापरात (भांड्यात) असलेले पाणी खाली असलेल्या ढेकळांना ओले करताना हे जाणत नाही की, 'मी फुटलेल्या खापरात राहून खालील ढेकळांना ओले करत आहे', आणि ते फुटलेले खापर किंवा खालील ढेकूळ इत्यादीही हे जाणत नाहीत की, 'माझ्यामध्ये पाणी राहिले आहे किंवा आम्हाला ओले करत राहिले आहे'; त्याचप्रमाणे रक्तही हे जाणत नाही की, 'मी यकृताच्या खालच्या भागात राहून वृक्क, हृदय इत्यादींना ओले करत राहिले आहे', आणि यकृताचा खालचा भाग किंवा वृक्क, हृदय इत्यादीही हे जाणत नाहीत की, 'माझ्यामध्ये रक्त राहिले आहे किंवा आम्हाला ओले करत राहिले आहे'. कारण हे सर्व धर्म (घटक) विचार आणि प्रत्यवेक्षण (जाणीव) यांनी रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (जीव/व्यक्ती) नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, रक्त हे रक्ताच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद (समान घटकांशी असणारी सीमा) आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद (असामान्य घटकांशी असणारी सीमा) तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे रक्ताला रंग इत्यादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ สรีเร เสโท วณฺณโต ปสนฺนติลเตลวณฺโณติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐาโน. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาโต. โอกาสโต เสทสฺส โอกาโส นาม นิพทฺโธ นตฺถิ, ยตฺถ เสโท โลหิตํ วิย สทา ติฏฺเฐยฺย. ยสฺมา วา ยทา อคฺคิสนฺตาปสูริยสนฺตาปอุตุวิการาทีหิ [Pg.51] สรีรํ สนฺตปติ, อถ อุทกโต อพฺพูฬฺหมตฺตวิสมจฺฉินฺนภิสมุฬาลกุมุทนาลกลาปอุทกมิว สพฺพเกสโลมกูปวิวเรหิ ปคฺฆรติ. ตสฺมา เตสํ เกสโลมกูปวิวรานํ วเสน ตํ สณฺฐานโต ววตฺถเปติ. ‘‘เสทปริคฺคณฺหเกน จ โยคาวจเรน เกสโลมกูปวิวเร ปูเรตฺวา ฐิตวเสเนว เสโท มนสิกาตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ ปุพฺพาจริเยหิ. त्यानंतर शरीरातील घाम (स्वेद) रंगाने स्वच्छ तिळाच्या तेलासारख्या रंगाचा असतो, असे निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने तो आपल्या स्थानाच्या आकाराचा असतो. दिशेच्या दृष्टीने तो दोन्ही दिशांना (वरच्या व खालच्या भागात) उत्पन्न होतो. स्थानाच्या दृष्टीने, घामाचे असे कोणतेही निश्चित स्थान नाही, जिथे घाम रक्ताप्रमाणे नेहमी टिकून राहील. कारण जेव्हा अग्नीच्या उष्णतेने, सूर्याच्या उष्णतेने किंवा ऋतूच्या बदलांमुळे शरीर तापते, तेव्हा पाण्यातून नुकत्याच उपटलेल्या, असमान कापलेल्या कमळाच्या देठांच्या आणि मुळांच्या जुडीतून पाझरणाऱ्या पाण्याप्रमाणे, तो सर्व केसांच्या आणि रोमांच्या छिद्रांमधून पाझरतो. म्हणून, त्या केसांच्या व रोमांच्या छिद्रांच्या आधारे त्याला आकाराने निश्चित करतो. 'घामाचे ग्रहण करणाऱ्या योगावकराने (साधकाने) केसांच्या व रोमांच्या छिद्रांना भरून राहिलेल्या घामाच्या रूपानेच त्याचे मनसिकार (चिंतन) करावे', असे पूर्वाचार्यांनी म्हटले आहे. ตตฺถ ยถา ภิสมุฬาลกุมุทนาลกลาปวิวเรหิ ปคฺฆรนฺตํ อุทกํ น ชานาติ ‘‘อหํ ภิสมุฬาลกุมุทนาลกลาปวิวเรหิ ปคฺฆรามี’’ติ, นปิ ภิสมุฬาลกุมุทนาลกลาปวิวรา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหหิ อุทกํ ปคฺฆรตี’’ติ; เอวเมว น เสโท ชานาติ ‘‘อหํ เกสโลมกูปวิวเรหิ ปคฺฆรามี’’ติ, นปิ เกสโลมกูปวิวรา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหหิ เสโท ปคฺฆรตี’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต เสโท เสทภาเคน ปริจฺฉินฺโนติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ เสทํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, जसे कमळाच्या देठांच्या आणि मुळांच्या जुडीच्या छिद्रांमधून पाझरणारे पाणी हे जाणत नाही की, 'मी कमळाच्या देठांच्या आणि मुळांच्या जुडीच्या छिद्रांमधून पाझरत आहे', आणि ती कमळाच्या देठांची व मुळांची छिद्रेही हे जाणत नाहीत की, 'आमच्यामधून पाणी पाझरत आहे'; उसीप्रमाणे घामही हे जाणत नाही की, 'मी केसांच्या व रोमांच्या छिद्रांमधून पाझरत आहे', आणि केसांची व रोमांची छिद्रेही हे जाणत नाहीत की, 'आमच्यामधून घाम पाझरत आहे'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि प्रत्यवेक्षण यांनी रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, घाम हा घामाच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे घामाला रंग इत्यादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ สรีเร จมฺมมํสนฺตเร เมโท วณฺณโต ผาลิตหลิทฺทิวณฺโณติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐาโน. ตถา หิ สุขิโน ถูลสรีรสฺส จมฺมมํสนฺตเร ผริตฺวา ฐิโต หลิทฺทิรตฺตทุกูลปิโลติกสณฺฐาโน, กิสสรีรสฺส ชงฺฆมํสอูรุมํสปิฏฺฐิกณฺฏกนิสฺสิตปิฏฺฐิมํสอุทรปฏลมํสานิ นิสฺสาย สํเวลฺลิตฺวา ฐปิตหลิทฺทิรตฺตทุกูลปิโลติกขณฺฑสณฺฐาโน. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาโต. โอกาสโต ถูลสรีรสฺส สกลสรีรํ ผริตฺวา กิสสฺส ชงฺฆามํสาทีนิ นิสฺสาย ฐิโต, โย สิเนหสงฺขาโตปิ หุตฺวา ปรมเชคุจฺฉตฺตา น มตฺถกเตลตฺถํ น คณฺฑูสเตลตฺถํ น ทีปชาลนตฺถํ สงฺคยฺหติ. त्यानंतर शरीरात त्वचा आणि मांस यांच्या दरम्यान असलेली चरबी (मेद) रंगाने कापलेल्या हळदीसारख्या पिवळ्या रंगाची असते, असे निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने ती आपल्या स्थानाच्या आकाराची असते. कारण सुखी आणि स्थूल (लठ्ठ) शरीराच्या व्यक्तीच्या त्वचा आणि मांस यांच्या दरम्यान पसरून राहिलेली चरबी ही हळदीने रंगवलेल्या पिवळ्या रेशमी वस्त्राच्या तुकड्यासारखी दिसते; तर कृश (बारीक) शरीराच्या व्यक्तीच्या पोटरीचे मांस, मांडीचे मांस, पाठीच्या कण्याला लागून असलेले पाठीचे मांस आणि पोटाच्या थराचे मांस यांचा आश्रय घेऊन, घड्या घालून ठेवलेल्या हळदीने रंगवलेल्या पिवळ्या रेशमी वस्त्राच्या तुकड्यासारखी दिसते. दिशेच्या दृष्टीने ती दोन्ही दिशांना (वरच्या व खालच्या भागात) उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने, स्थूल शरीराच्या व्यक्तीच्या संपूर्ण शरीरात पसरून राहते, तर कृश व्यक्तीच्या पोटरीचे मांस इत्यादींचा आश्रय घेऊन राहते; जी चरबी तेलकट (स्निग्ध) असूनही, अत्यंत घृणास्पद (जुगुप्सित) असल्यामुळे डोक्याला लावण्याच्या तेलासाठी, गुळण्या करण्याच्या तेलासाठी किंवा दिवा लावण्यासाठी वापरली जात नाही. ตตฺถ ยถา มํสปุญฺชํ นิสฺสาย ฐิตา หลิทฺทิรตฺตทุกูลปิโลติกา น ชานาติ ‘‘อหํ มํสปุญฺชํ นิสฺสาย ฐิตา’’ติ, นปิ มํสปุญฺโช ชานาติ ‘‘หลิทฺทิรตฺตทุกูลปิโลติกา มํ นิสฺสาย ฐิตา’’ติ; เอวเมว น เมโท ชานาติ ‘‘อหํ สกลสรีรํ ชงฺฆาทีสุ วา มํสํ นิสฺสาย ฐิโต’’ติ, นปิ สกลสรีรํ ชานาติ ชงฺฆาทีสุ วา มํสํ ‘‘เมโท มํ นิสฺสาย ฐิโต’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต เมโท เหฏฺฐา มํเสน, อุปริ จมฺเมน, สมนฺตโต เมทภาเคน [Pg.52] ปริจฺฉินฺโนติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ เมทํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, जसे मांसाच्या गोळ्याचा आश्रय घेऊन राहिलेले हळदीने रंगवलेले पिवळे वस्त्र हे जाणत नाही की, 'मी मांसाच्या गोळ्याचा आश्रय घेऊन राहिले आहे', आणि तो मांसाचा गोळाही हे जाणत नाही की, 'हळदीने रंगवलेले पिवळे वस्त्र माझा आश्रय घेऊन राहिले आहे'; उसीप्रमाणे चरबीही हे जाणत नाही की, 'मी संपूर्ण शरीराचा किंवा पोटरी इत्यादींमधील मांसाचा आश्रय घेऊन राहिले आहे', आणि संपूर्ण शरीर किंवा पोटरी इत्यादींमधील मांसही हे जाणत नाही की, 'चरबी माझा आश्रय घेऊन राहिली आहे'. कारण हे सर्व धर्म विचार आणि प्रत्यवेक्षण यांनी रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे निश्चित करतो. सीमेच्या दृष्टीने, चरबी खाली मांसाने, वर त्वचेने आणि सभोवताली चरबीच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग-परिच्छेद तर केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे चरबीला रंग इत्यादींच्या द्वारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ สรีเร อสฺสุ วณฺณโต ปสนฺนติลเตลวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานํ. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต อกฺขิกูปเกสุ ฐิตนฺติ. น เจตํ ปิตฺตโกสเก ปิตฺตมิว อกฺขิกูปเกสุ สทา สนฺนิจิตํ หุตฺวา ติฏฺฐติ, กินฺตุ ยทา โสมนสฺสชาตา สตฺตา มหาหสิตํ หสนฺติ, โทมนสฺสชาตา โรทนฺติ ปริเทวนฺติ, ตถารูปํ วิสมาหารํ วา หรนฺติ, ยทา จ เตสํ อกฺขีนิ ธูมรชปํสุกาทีหิ อภิหญฺญนฺติ, ตทา เอเตหิ โสมนสฺสโทมนสฺสวิสมาหาราทีหิ สมุฏฺฐหิตฺวา อสฺสุ อกฺขิกูปเกสุ ปูเรตฺวา ติฏฺฐติ ปคฺฆรติ จ. ‘‘อสฺสุปริคฺคณฺหเกน จ โยคาวจเรน อกฺขิกูปเก ปูเรตฺวา ฐิตวเสเนว ตํ มนสิกาตพฺพ’’นฺติ ปุพฺพาจริยา วณฺณยนฺติ. त्यानंतर शरीरातील अश्रूंचे रंगाच्या दृष्टीने 'ते स्वच्छ तिळाच्या तेलाच्या रंगासारखे आहेत' असे निर्धारण करतो. आकाराच्या दृष्टीने ते ज्या ठिकाणी राहतात त्या जागेच्या आकाराचे असतात. दिशेच्या दृष्टीने ते शरीराच्या वरच्या भागात उत्पन्न होतात. स्थानाच्या दृष्टीने ते डोळ्यांच्या खोबणीत (नेत्रकोशात) राहिलेले असतात. हे अश्रू पित्ताशयातील पित्ताप्रमाणे डोळ्यांच्या खोबणीत नेहमी साठून राहत नाहीत; परंतु जेव्हा प्राणी अत्यंत आनंदित होऊन मोठ्याने हसतात, किंवा दुःखी होऊन रडतात व विलाप करतात, किंवा अयोग्य (विषम) आहार घेतात, आणि जेव्हा त्यांचे डोळे धूर, धूळ, माती इत्यादींनी बाधित होतात, तेव्हा या आनंद, दुःख, विषम आहार इत्यादींमुळे उत्पन्न होऊन अश्रू डोळ्यांच्या खोबणीत भरून राहतात आणि वाहू लागतात. 'अश्रूंचे ध्यान करणाऱ्या योगावकराने (साधकाने) डोळ्यांच्या खोबणीत भरून राहिलेल्या अवस्थेतच त्याचे मनन करावे,' असे प्राचीन आचार्य वर्णन करतात। ตตฺถ ยถา มตฺถกจฺฉินฺนตรุณตาลฏฺฐิกูปเกสุ ฐิตํ อุทกํ น ชานาติ ‘‘อหํ มตฺถกจฺฉินฺนตรุณตาลฏฺฐิกูปเกสุ ฐิต’’นฺติ, นปิ มตฺถกจฺฉินฺนตรุณตาลฏฺฐิกูปกา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหสุ อุทกํ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น อสฺสุ ชานาติ ‘‘อหํ อกฺขิกูปเกสุ ฐิต’’นฺติ, นปิ อกฺขิกูปกา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหสุ อสฺสุ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต อสฺสุ อสฺสุภาเคน ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ อสฺสุํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या अश्रूंच्या बाबतीत, ज्याप्रमाणे शेंडा कापलेल्या कोवळ्या ताडफळाच्या छिद्रांमध्ये राहिलेले पाणी हे जाणत नाही की, 'मी शेंडा कापलेल्या कोवळ्या ताडफळाच्या छिद्रांमध्ये राहिले आहे', आणि ते शेंडा कापलेले कोवळे ताडफळही हे जाणत नाही की, 'आमच्यामध्ये पाणी राहिले आहे'; त्याचप्रमाणे अश्रूही हे जाणत नाहीत की, 'मी डोळ्यांच्या खोबणीत राहिले आहे', आणि डोळ्यांच्या खोबण्याही हे जाणत नाहीत की, 'आमच्यामध्ये अश्रू राहिले आहेत'. कारण हे सर्व धर्म (घटक) विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (जीव) नाही, असे निर्धारण करतो. सीमेच्या दृष्टीने, अश्रू हे अश्रूंच्या भागाने मर्यादित आहेत, असे निर्धारण करतो. हा त्याचा सजातीय परिच्छेद आहे, आणि विजातीय परिच्छेद मात्र केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे अश्रूंचे रंग इत्यादींच्या दृष्टीने निर्धारण करतो। ตโต ปรํ สรีเร วิลีนสิเนหสงฺขาตา วสา วณฺณโต อาจาเม อาสิตฺตเตลวณฺณาติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานา. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตา. โอกาสโต หตฺถตลหตฺถปิฏฺฐิปาทตลปาทปิฏฺฐินาสาปุฏนลาฏอํสกูเฏสุ ฐิตาติ. น เจสา เอเตสุ โอกาเสสุ สทา วิลีนา เอว หุตฺวา ติฏฺฐติ, กินฺตุ ยทา อคฺคิสนฺตาปสูริยสนฺตาปอุตุวิสภาคธาตุวิสภาเคหิ เต ปเทสา อุสฺมาชาตา โหนฺติ, ตทา ตตฺถ วิลีนาว หุตฺวา ปสนฺนสลิลาสุ อุทกโสณฺฑิกาสุ นีหาโร วิย สรติ. त्यानंतर शरीरातील वितळलेली चरबी, जिला 'वसा' (मेद) म्हणतात, रंगाच्या दृष्टीने 'ती भाताच्या पेजेवर ओतलेल्या तेलाच्या रंगासारखी आहे' असे निर्धारण करतो. आकाराच्या दृष्टीने ती ज्या ठिकाणी राहते त्या जागेच्या आकाराची असते. दिशेच्या दृष्टीने ती दोन्ही दिशांमध्ये (वरच्या आणि खालच्या) उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने ती तळहात, हाताची पाठ, तळपाय, पायाची पाठ, नाकपुड्या, कपाळ आणि खांदे यांवर राहिलेली असते. ही वसा या ठिकाणी नेहमी वितळलेल्या अवस्थेतच राहत नाही; परंतु जेव्हा अग्नीची उष्णता, सूर्याची उष्णता, ऋतूंचा बिघाड किंवा शरीरातील धातूंचा बिघाड यांमुळे ते अवयव उष्ण होतात, तेव्हा तिथे ती वितळते आणि स्वच्छ पाणी असलेल्या पाण्याच्या डबक्यांवर पसरणाऱ्या धुक्याप्रमाणे (किंवा वाफेप्रमाणे) पसरते। ตตฺถ [Pg.53] ยถา อุทกโสณฺฑิโย อชฺโฌตฺถริตฺวา ฐิโต นีหาโร น ชานาติ ‘‘อหํ อุทกโสณฺฑิโย อชฺโฌตฺถริตฺวา ฐิโต’’ติ, นปิ อุทกโสณฺฑิโย ชานนฺติ ‘‘นีหาโร อมฺเห อชฺโฌตฺถริตฺวา ฐิโต’’ติ; เอวเมว น วสา ชานาติ ‘‘อหํ หตฺถตลาทีนิ อชฺโฌตฺถริตฺวา ฐิตา’’ติ, นปิ หตฺถตลาทีนิ ชานนฺติ ‘‘วสา อมฺเห อชฺโฌตฺถริตฺวา ฐิตา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต วสา วสาภาเคน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมติสฺสา สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ วสํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या वसेच्या बाबतीत, ज्याप्रमाणे पाण्याच्या डबक्यांना व्यापून राहिलेले धुके हे जाणत नाही की, 'मी पाण्याच्या डबक्यांना व्यापून राहिले आहे', आणि ती पाण्याची डबकीही हे जाणत नाहीत की, 'धुक्याने आम्हाला व्यापून ठेवले आहे'; त्याचप्रमाणे वसाही हे जाणत नाही की, 'मी तळहात इत्यादींना व्यापून राहिले आहे', आणि तळहात इत्यादी अवयवही हे जाणत नाहीत की, 'वसेने आम्हाला व्यापून ठेवले आहे'. कारण हे सर्व धर्म (घटक) विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (जीव) नाही, असे निर्धारण करतो. सीमेच्या दृष्टीने, वसा ही वसेच्या भागाने मर्यादित आहे, असे निर्धारण करतो. हा तिचा सजातीय परिच्छेद आहे, आणि विजातीय परिच्छेद मात्र केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे वसेचे रंग इत्यादींच्या दृष्टीने निर्धारण करतो। ตโต ปรํ สรีเร มุขสฺสพฺภนฺตเร เขโฬ วณฺณโต เสโต เผณวณฺโณติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐาโนติ, สมุทฺทเผณสณฺฐาโนติปิ เอเก. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาโต. โอกาสโต อุโภหิ กโปลปสฺเสหิ โอโรหิตฺวา ชิวฺหาย ฐิโตติ. น เจโส เอตฺถ สทา สนฺนิจิโต หุตฺวา ติฏฺฐติ, กินฺตุ ยทา สตฺตา ตถารูปํ อาหารํ ปสฺสนฺติ วา สรนฺติ วา, อุณฺหติตฺตกฏุกโลณมฺพิลานํ วา กิญฺจิ มุเข ฐเปนฺติ. ยทา จ เตสํ หทยํ อาคิลายติ, กิสฺมิญฺจิเทว วา ชิคุจฺฉา อุปฺปชฺชติ, ตทา เขโฬ อุปฺปชฺชิตฺวา อุโภหิ กโปลปสฺเสหิ โอโรหิตฺวา ชิวฺหาย สณฺฐาติ. อคฺคชิวฺหาย เจส เขโฬ ตนุโก โหติ, มูลชิวฺหาย พหโล, มุเข ปกฺขิตฺตญฺจ ปุถุกํ วา ตณฺฑุลํ วา อญฺญํ วา กิญฺจิ ขาทนียํ นทิปุลิเน ขตกูปสลิลมิว ปริกฺขยมคจฺฉนฺโตว สทา เตมนสมตฺโถ โหติ. त्यानंतर शरीरातील तोंडाच्या आतील लाळेचे (थुंकीचे) रंगाच्या दृष्टीने 'ती पांढरी आणि फेसाच्या रंगासारखी आहे' असे निर्धारण करतो. आकाराच्या दृष्टीने ती ज्या ठिकाणी राहते त्या जागेच्या आकाराची असते; काही आचार्य म्हणतात की ती समुद्राच्या फेसाच्या आकाराची असते. दिशेच्या दृष्टीने ती शरीराच्या वरच्या भागात उत्पन्न होते. स्थानाच्या दृष्टीने ती दोन्ही गालांच्या बाजूने खाली उतरून जिभेवर राहिलेली असते. ही लाळ येथे नेहमी साठून राहत नाही; परंतु जेव्हा प्राणी त्या प्रकारचा आहार पाहतात किंवा त्याचे स्मरण करतात, किंवा गरम, कडू, तिखट, खारट, आंबट यांपैकी काही तोंडात ठेवतात, आणि जेव्हा त्यांचे हृदय व्याकुळ होते (मळमळते), किंवा एखाद्या गोष्टीबद्दल घृणा उत्पन्न होते, तेव्हा लाळ उत्पन्न होऊन दोन्ही गालांच्या बाजूने खाली उतरून जिभेवर स्थिर होते. जिभेच्या शेंड्यावर ही लाळ पातळ असते आणि जिभेच्या मुळाशी ती दाट असते. तोंडात टाकलेले पोहे, तांदूळ किंवा इतर कोणतेही खाण्याचे पदार्थ, नदीच्या वाळवंटात खणलेल्या झऱ्यातील पाण्याप्रमाणे कधीही न संपता नेहमी ओले करण्यास ती समर्थ असते। ตตฺถ ยถา นทิปุลิเน ขตกูปตเล สณฺฐิตํ อุทกํ น ชานาติ ‘‘อหํ กูปตเล สณฺฐิต’’นฺติ, นปิ กูปตลํ ชานาติ ‘‘มยิ อุทกํ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น เขโฬ ชานาติ ‘‘อหํ อุโภหิ กโปลปสฺเสหิ โอโรหิตฺวา ชิวฺหาตเล สณฺฐิโต’’ติ, นปิ ชิวฺหาตลํ ชานาติ ‘‘มยิ อุโภหิ กโปลปสฺเสหิ โอโรหิตฺวา เขโฬ สณฺฐิโต’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต เขโฬ เขฬภาเคน ปริจฺฉินฺโนติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ เขฬํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्या लाळेच्या बाबतीत, ज्याप्रमाणे नदीच्या वाळवंटात खणलेल्या विहिरीच्या तळाशी राहिलेले पाणी हे जाणत नाही की, 'मी विहिरीच्या तळाशी राहिले आहे', आणि विहिरीचा तळही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये पाणी राहिले आहे'; त्याचप्रमाणे लाळही हे जाणत नाही की, 'मी दोन्ही गालांच्या बाजूने खाली उतरून जिभेच्या पृष्ठभागावर राहिले आहे', आणि जिभेचा पृष्ठभागही हे जाणत नाही की, 'माझ्यावर दोन्ही गालांच्या बाजूने खाली उतरून लाळ राहिली आहे'. कारण हे सर्व धर्म (घटक) विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (जीव) नाही, असे निर्धारण करतो. सीमेच्या दृष्टीने, लाळ ही लाळेच्या भागाने मर्यादित आहे, असे निर्धारण करतो. हा त्याचा सजातीय परिच्छेद आहे, आणि विजातीय परिच्छेद मात्र केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे लाळेचे रंग इत्यादींच्या दृष्टीने निर्धारण करतो। ตโต [Pg.54] ปรํ สรีเร สิงฺฆาณิกา วณฺณโต เสตา ตรุณตาลมิญฺชวณฺณาติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานา, เสเทตฺวา เสเทตฺวา นาสาปุเฏ นิรนฺตรํ ปกฺขิตฺตเวตฺตงฺกุรสณฺฐานาติปิ เอเก. ทิสโต อุปริมาย ทิสาย ชาตา. โอกาสโต นาสาปุเฏ ปูเรตฺวา ฐิตาติ. น เจสา เอตฺถ สทา สนฺนิจิตา หุตฺวา ติฏฺฐติ, กินฺตุ เสยฺยถาปิ นาม ปุริโส ปทุมินิปตฺเต ทธึ พนฺธิตฺวา เหฏฺฐา ปทุมินิปตฺตํ กณฺฏเกน วิชฺเฌยฺย, อถ เตน ฉิทฺเทน ทธิปิณฺฑํ คฬิตฺวา พหิ ปปเตยฺย; เอวเมว ยทา สตฺตา โรทนฺติ, วิสภาคาหารอุตุวเสน วา สญฺชาตธาตุกฺโขภา โหนฺติ, ตทา อนฺโตสีสโต ปูติเสมฺหภาวํ อาปนฺนํ มตฺถลุงฺคํ คฬิตฺวา ตาลุมตฺถกวิวเรน โอตริตฺวา นาสาปุเฏ ปูเรตฺวา ติฏฺฐติ. त्यानंतर शरीरातील शेंबडाचे रंगाच्या दृष्टीने 'तो पांढरा आणि कोवळ्या ताडफळाच्या गराच्या रंगासारखा आहे' असे निर्धारण करतो. आकाराच्या दृष्टीने तो ज्या ठिकाणी राहतो त्या जागेच्या आकाराचा असतो; काही आचार्य म्हणतात की, 'तो उकळून उकळून नाकपुडीत सतत टाकलेल्या वेताच्या कोंबाच्या आकाराचा असतो'. दिशेच्या दृष्टीने तो शरीराच्या वरच्या भागात उत्पन्न होतो. स्थानाच्या दृष्टीने तो नाकपुड्यांमध्ये भरून राहिलेला असतो. हा शेंबूड येथे नेहमी साठून राहत नाही; परंतु ज्याप्रमाणे एखाद्या माणसाने कमळाच्या पानात दही बांधून खालच्या बाजूने कमळाचे पान काट्याने टोचले, तर त्या छिद्रातून दह्याचा गोळा गळून बाहेर पडेल; त्याचप्रमाणे जेव्हा प्राणी रडतात, किंवा अयोग्य आहार व ऋतूंच्या प्रभावामुळे त्यांच्या शरीरातील धातू क्षुब्ध होतात, तेव्हा डोक्याच्या आतून कुजलेल्या कफाच्या अवस्थेला प्राप्त झालेला मेंदू वितळून टाळूच्या वरच्या छिद्रातून खाली उतरतो आणि नाकपुड्यांमध्ये भरून राहतो। ตตฺถ ยถา สิปฺปิกาย ปกฺขิตฺตํ ปูติทธิ น ชานาติ ‘‘อหํ สิปฺปิกาย ฐิต’’นฺติ, นปิ สิปฺปิกา ชานาติ ‘‘มยิ ปูติกํ ทธิ ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น สิงฺฆาณิกา ชานาติ ‘‘อหํ นาสาปุเฏสุ ฐิตา’’ติ, นปิ นาสาปุฏา ชานนฺติ ‘‘อมฺเหสุ สิงฺฆาณิกา ฐิตา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต สิงฺฆาณิกา สิงฺฆาณิกภาเคน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมติสฺสา สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ สิงฺฆาณิกํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. तेथे, ज्याप्रमाणे शिंपल्यात ठेवलेले कुजलेले दही हे जाणत नाही की, 'मी शिंपल्यात राहिले आहे', आणि शिंपलाही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये कुजलेले दही राहिले आहे'; त्याचप्रमाणे, शेंबूड हे जाणत नाही की, 'मी नाकपुड्यांमध्ये राहिला आहे', आणि नाकपुड्याही हे जाणत नाहीत की, 'आमच्यामध्ये शेंबूड राहिला आहे'. कारण हे धर्म विचार आणि चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही. मर्यादेच्या दृष्टीने, शेंबूड हा शेंबडाच्याच भागाने मर्यादित आहे, असे निश्चित केले जाते. हा त्याचा सजातीय सीमाभाग (सभाग-परिच्छेद) आहे, तर विजातीय सीमाभाग (विसभाग-परिच्छेद) मात्र केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे रंगादींच्या द्वारे शेंबडाचे निर्धारण केले जाते. ตโต ปรํ อนฺโตสรีเร ลสิกาติ สรีรสนฺธีนํ อพฺภนฺตเร ปิจฺฉิลกุณปํ. สา วณฺณโต กณิการนิยฺยาสวณฺณาติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต โอกาสสณฺฐานา. ทิสโต ทฺวีสุ ทิสาสุ ชาตา. โอกาสโต อฏฺฐิสนฺธีนํ อพฺภญฺชนกิจฺจํ สาธยมานา อสีติสตสนฺธีนํ อพฺภนฺตเร ฐิตาติ. ยสฺส เจสา มนฺทา โหติ, ตสฺส อุฏฺฐหนฺตสฺส นิสีทนฺตสฺส อภิกฺกมนฺตสฺส ปฏิกฺกมนฺตสฺส สมิญฺชนฺตสฺส ปสาเรนฺตสฺส อฏฺฐิกานิ กฏกฏายนฺติ, อจฺฉริกาสทฺทํ กโรนฺโต วิย วิจรติ, เอกโยชนทฺวิโยชนมตฺตมฺปิ อทฺธานํ คตสฺส วาโยธาตุ กุปฺปติ, คตฺตานิ ทุกฺขนฺติ ยสฺส ปน เจสา พหุกา โหติ, ตสฺส อุฏฺฐานนิสชฺชาทีสุ น อฏฺฐีนิ กฏกฏายนฺติ, ทีฆมฺปิ อทฺธานํ คตสฺส น วาโยธาตุ กุปฺปติ, น คตฺตานิ ทุกฺขนฺติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत असणारी 'लसिका' (सांध्यांमधील द्रव) म्हणजे शरीराच्या सांध्यांच्या आत असणारा एक बुळबुळीत व दुर्गंधीयुक्त द्रव होय. रंगाच्या दृष्टीने ती कण्णिकार वृक्षाच्या डिंकाच्या रंगासारखी असते, असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने ती ज्या ठिकाणी असते, तशाच आकाराची असते, असे तो निश्चित करतो. दिशेच्या दृष्टीने ती दोन्ही दिशांमध्ये (वरच्या आणि खालच्या भागात) उत्पन्न होते, असे तो निश्चित करतो. स्थानाच्या दृष्टीने, हाडांच्या सांध्यांना वंगण लावण्याचे कार्य पूर्ण करत ती एकशे ऐंशी (१८०) सांध्यांच्या आत स्थित असते, असे तो निश्चित करतो. ज्या व्यक्तीमध्ये ही लसिका कमी असते, ती व्यक्ती उठताना, बसताना, पुढे जाताना, मागे जाताना, हातपाय आकुंचन करताना आणि पसरताना तिची हाडे कडकड वाजतात; जणू काही चुटकी वाजवल्यासारखा आवाज करत ती हालचाल करतात. एक किंवा दोन योजन एवढा लांबचा मार्ग चालून गेल्यावर त्याची वायुधातू कुपित होते आणि त्याचे अवयव दुखू लागतात. परंतु, ज्या व्यक्तीमध्ये ही लसिका मुबलक प्रमाणात असते, तिची उठताना, बसताना इत्यादी क्रियांमध्ये हाडे कडकड वाजत नाहीत; आणि लांबचा मार्ग चालून गेल्यासही तिची वायुधातू कुपित होत नाही व तिचे अवयव दुखत नाहीत. ตตฺถ [Pg.55] ยถา อพฺภญฺชนเตลํ น ชานาติ ‘‘อหํ อกฺขํ อพฺภญฺชิตฺวา ฐิต’’นฺติ, นปิ อกฺโข ชานาติ ‘‘มํ เตลํ อพฺภญฺชิตฺวา ฐิต’’นฺติ; เอวเมว น ลสิกา ชานาติ ‘‘อหํ อสีติสตสนฺธิโย อพฺภญฺชิตฺวา ฐิตา’’ติ, นปิ อสีติสตสนฺธิโย ชานนฺติ ‘‘ลสิกา อมฺเห อพฺภญฺชิตฺวา ฐิตา’’ติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต ลสิกา ลสิกภาเคน ปริจฺฉินฺนาติ ววตฺถเปติ. อยเมติสฺสา สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ ลสิกํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे वंगणाचे तेल हे जाणत नाही की, 'मी आसाला वंगण लावून स्थित आहे', आणि आसही हे जाणत नाही की, 'मला तेलाने वंगण लावले आहे'; त्याचप्रमाणे, लसिका हे जाणत नाही की, 'मी एकशे ऐंशी सांध्यांना वंगण लावून स्थित आहे', आणि ते एकशे ऐंशी सांधेही हे जाणत नाहीत की, 'लसिकेने आम्हाला वंगण लावले आहे'. कारण हे सर्व धर्म (घटक) जाणीव व चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल (जीव) नाही, असे तो निश्चित करतो. मर्यादेच्या दृष्टीने, लसिका ही लसिकेच्या भागानेच मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा तिचा सभाग्य-परिच्छेद (समान घटकांशी असणारी मर्यादा) आहे; आणि विसभाग्य-परिच्छेद (असामान्य घटकांशी असणारी मर्यादा) मात्र केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो लसिकेला रंग इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो. ตโต ปรํ อนฺโตสรีเร มุตฺตํ วณฺณโต มาสขาโรทกวณฺณนฺติ ววตฺถเปติ. สณฺฐานโต อุทกํ ปูเรตฺวา อโธมุขฐปิตอุทกกุมฺภอนฺตรคตอุทกสณฺฐานํ. ทิสโต เหฏฺฐิมาย ทิสาย ชาตํ. โอกาสโต วตฺถิสฺสพฺภนฺตเร ฐิตนฺติ. วตฺถิ นาม วตฺถิปุโฏ วุจฺจติ, ยตฺถ เสยฺยถาปิ นาม จนฺทนิกาย ปกฺขิตฺเต อมุเข เปฬาฆเฏ จนฺทนิการโส ปวิสติ, น จสฺส ปวิสนมคฺโค ปญฺญายติ; เอวเมว สรีรโต มุตฺตํ ปวิสติ, น จสฺส ปวิสนมคฺโค ปญฺญายติ นิกฺขมนมคฺโค เอว ตุ ปากโฏ โหติ, ยมฺหิ จ มุตฺตสฺส ภริเต ‘‘ปสฺสาวํ กโรมา’’ติ สตฺตานํ อายูหนํ โหติ. ตตฺถ ยถา จนฺทนิกาย ปกฺขิตฺเต อมุเข เปฬาฆเฏ ฐิโต จนฺทนิการโส น ชานาติ ‘‘อหํ อมุเข เปฬาฆเฏ ฐิโต’’ติ, นปิ เปฬาฆโฏ ชานาติ ‘‘มยิ จนฺทนิการโส ฐิโต’’ติ; เอวเมว มุตฺตํ น ชานาติ ‘‘อหํ วตฺถิมฺหิ ฐิต’’นฺติ, นปิ วตฺถิ ชานาติ ‘‘มยิ มุตฺตํ ฐิต’’นฺติ. อาโภคปจฺจเวกฺขณวิรหิตา หิ เอเต ธมฺมา…เป… น ปุคฺคโลติ. ปริจฺเฉทโต วตฺถิอพฺภนฺตเรน เจว มุตฺตภาเคน จ ปริจฺฉินฺนนฺติ ววตฺถเปติ. อยเมตสฺส สภาคปริจฺเฉโท, วิสภาคปริจฺเฉโท ปน เกสสทิโส เอวาติ เอวํ มุตฺตํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. เอวมยํ อิมํ ทฺวตฺตึสาการํ วณฺณาทิโต ววตฺถเปติ. त्यानंतर, शरीराच्या आत असणारे 'मूत्र' रंगाच्या दृष्टीने उडदाच्या डाळीच्या पाण्याच्या किंवा साबणाच्या पाण्याच्या रंगासारखे असते, असे तो निश्चित करतो. आकाराच्या दृष्टीने ते पाण्याने भरून उपड्या ठेवलेल्या पाण्याच्या घागरीतील पाण्याच्या आकारासारखे असते, असे तो निश्चित करतो. दिशेच्या दृष्टीने ते खालच्या दिशेला उत्पन्न होते, असे तो निश्चित करतो. स्थानाच्या दृष्टीने ते मूत्राशयाच्या आत स्थित असते, असे तो निश्चित करतो. 'वत्थि' म्हणजे मूत्राशयाची पिशवी (मूत्राशय) असे म्हटले जाते. ज्याप्रमाणे सांडपाण्याच्या खड्ड्यात टाकलेल्या तोंड नसलेल्या मातीच्या मडक्यात सांडपाणी आत शिरते, पण त्याचा आत शिरण्याचा मार्ग दिसत नाही; त्याचप्रमाणे शरीरातून मूत्र मूत्राशयात प्रवेश करते, पण त्याचा प्रवेश करण्याचा मार्ग दिसत नाही, केवळ बाहेर पडण्याचा मार्गच स्पष्ट दिसतो. आणि जेव्हा ते मूत्राने भरते, तेव्हा प्राण्यांना 'आम्ही लघवी करूया' अशी प्रेरणा (प्रवृत्ती) होते. त्यामध्ये, ज्याप्रमाणे सांडपाण्याच्या खड्ड्यात टाकलेल्या तोंड नसलेल्या मातीच्या मडक्यात असलेले सांडपाणी हे जाणत नाही की, 'मी तोंड नसलेल्या मातीच्या मडक्यात स्थित आहे', आणि ते मडकेही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये सांडपाणी स्थित आहे'; त्याचप्रमाणे, मूत्र हे जाणत नाही की, 'मी मूत्राशयात स्थित आहे', आणि मूत्राशयही हे जाणत नाही की, 'माझ्यामध्ये मूत्र स्थित आहे'. कारण हे धर्म विचार व चिंतनापासून रहित आहेत... पे... हा कोणी पुद्गल नाही, असे तो निश्चित करतो. मर्यादेच्या दृष्टीने, ते मूत्राशयाच्या आतील भागाने आणि मूत्राच्या भागाने मर्यादित आहे, असे तो निश्चित करतो. हा त्याचा सभाग्य-परिच्छेद आहे, आणि विसभाग्य-परिच्छेद मात्र केसांसारखाच आहे. अशा प्रकारे तो मूत्राला रंग इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो. अशा प्रकारे हा योगसाधक या बत्तीस प्रकारच्या अवयवांना रंग इत्यादींच्या आधारे निश्चित करतो. ตสฺเสวํ อิมํ ทฺวตฺตึสาการํ วณฺณาทิวเสน ววตฺถเปนฺตสฺส ตํ ตํ ภาวนานุโยคํ อาคมฺม เกสาทโย ปคุณา โหนฺติ, โกฏฺฐาสภาเวน อุปฏฺฐหนฺติ. ตโต ปภุติ เสยฺยถาปิ นาม จกฺขุมโต ปุริสสฺส ทฺวตฺตึสวณฺณานํ ปุปฺผานํ เอกสุตฺตคนฺถิตํ มาลํ โอโลเกนฺตสฺส สพฺพปุปฺผานิ อปุพฺพาปริยมิว ปากฏานิ โหนฺติ; เอวเมว ‘‘อตฺถิ อิมสฺมึ กาเย [Pg.56] เกสา’’ติ อิมํ กายํ สติยา โอโลเกนฺตสฺส สพฺเพ เต ธมฺมา อปุพฺพาปริยมิว ปากฏา โหนฺติ. เกเสสุ อาวชฺชิเตสุ อสณฺฐหมานาว สติ ยาว มุตฺตํ, ตาว ปวตฺตติ. ตโต ปภุติ ตสฺส อาหิณฺฑนฺตา มนุสฺสติรจฺฉานาทโย จ สตฺตาการํ วิชหิตฺวา โกฏฺฐาสราสิวเสเนว อุปฏฺฐหนฺติ, เตหิ จ อชฺโฌหริยมานํ ปานโภชนาทิ โกฏฺฐาสราสิมฺหิ ปกฺขิปฺปมานมิว อุปฏฺฐาตีติ. अशा प्रकारे या बत्तीस प्रकारच्या अवयवांना रंग इत्यादींच्या आधारे निश्चित करणाऱ्या त्या योगसाधकाला, त्या त्या भावनेच्या अभ्यासाच्या बळावर, केस इत्यादी अवयव चांगले परिचयाचे होतात आणि ते अवयवांच्या समूहाच्या रूपाने प्रकट होतात. तेव्हापासून, ज्याप्रमाणे दृष्टी असलेल्या एखाद्या माणसाने बत्तीस वेगवेगळ्या रंगांच्या फुलांची एकाच दोऱ्यात गुंफलेली माळ पाहिली असता, त्याला सर्व फुले एकाच वेळी स्पष्ट दिसतात; त्याचप्रमाणे, 'या शरीरात केस आहेत...' अशा प्रकारे या शरीराकडे स्मृतीपूर्वक पाहणाऱ्या साधकाला ते सर्व धर्म (अवयव) एकाच वेळी स्पष्ट दिसतात. केसांवर लक्ष केंद्रित केले असता, स्मृती तिथेच न थांबता थेट मूत्रापर्यंत सर्व अवयवांवरून फिरते. तेव्हापासून, त्याला इकडेतिकडे फिरणारे मनुष्य, प्राणी इत्यादी जीव हे 'सत्त्व' (प्राणी) या रूपाने न दिसता (सत्त्व-भाव सोडून), केवळ अवयवांच्या समूहाच्या रूपानेच दिसू लागतात; आणि त्यांनी ग्रहण केलेले अन्न-पाणी इत्यादी देखील जणू काही अवयवांच्या समूहातच टाकले जात आहे, असे त्याला भासते. เอตฺถาห ‘‘อถาเนน ตโต ปรํ กึ กาตพฺพ’’นฺติ? วุจฺจเต – ตเทว นิมิตฺตํ อาเสวิตพฺพํ ภาเวตพฺพํ พหุลีกาตพฺพํ สุววตฺถิตํ ววตฺถเปตพฺพํ. กถํ ปนายํ ตํ นิมิตฺตํ อาเสวติ ภาเวติ พหุลีกโรติ สุววตฺถิตํ ววตฺถเปตีติ? อยญฺหิ ตํ เกสาทีนํ โกฏฺฐาสภาเวน อุปฏฺฐานนิมิตฺตํ อาเสวติ, สติยา อลฺลิยติ ภชติ อุปคจฺฉติ, สติคพฺภํ คณฺหาเปติ. ตตฺถ ลทฺธํ วา สตึ วฑฺเฒนฺโต ตํ ภาเวตีติ วุจฺจติ. พหุลีกโรตีติ ปุนปฺปุนํ สติสมฺปยุตฺตํ วิตกฺกวิจารพฺภาหตํ กโรติ. สุววตฺถิตํ ววตฺถเปตีติ ยถา สุฏฺฐุ ววตฺถิตํ โหติ, น ปุน อนฺตรธานํ คจฺฉติ, ตถา ตํ สติยา ววตฺถเปติ, อุปธาเรติ อุปนิพนฺธติ. येथे शंकाकार विचारतो, 'त्यानंतर या योगसाधकाने काय करावे?' उत्तर दिले जाते – त्याने त्याच निमित्ताचे (ध्यानाच्या आळंबनाचे) सेवन करावे, त्याची भावना करावी, त्याचा वारंवार सराव करावा आणि ते चांगल्या प्रकारे निश्चित करावे. पण हा साधक त्या निमित्ताचे सेवन कसे करतो, त्याची भावना कशी करतो, त्याचा वारंवार सराव कसा करतो आणि ते चांगल्या प्रकारे निश्चित कसे करतो? हा साधक केस इत्यादींच्या अवयव-रूपाने प्रकट होणाऱ्या त्या निमित्ताचे सेवन करतो, म्हणजेच स्मृतीच्या साहाय्याने त्याच्याशी जोडला जातो, त्याचे सेवन करतो, त्याच्या जवळ जातो आणि स्मृतीच्या कोशात ते साठवतो. तिथे प्राप्त झालेल्या स्मृतीला वाढवत राहणे, यालाच 'भावना करणे' असे म्हटले जाते. 'वारंवार सराव करणे' म्हणजे पुन्हा पुन्हा स्मृतीयुक्त होऊन वितर्क आणि विचाराने त्यावर मनन करणे होय. 'चांगल्या प्रकारे निश्चित करणे' म्हणजे ते निमित्त चांगल्या प्रकारे स्थिर व्हावे आणि पुन्हा नाहीसे होऊ नये, अशा प्रकारे त्याला स्मृतीच्या साहाय्याने निश्चित करणे, मनात धारण करणे आणि घट्ट बांधून ठेवणे होय. อถ วา ยํ ปุพฺเพ อนุปุพฺพโต, นาติสีฆโต, นาติสณิกโต, วิกฺเขปปฺปหานโต, ปณฺณตฺติสมติกฺกมนโต, อนุปุพฺพมุญฺจนโต, ลกฺขณโต, ตโย จ สุตฺตนฺตาติ เอวํ ทสวิธํ มนสิการโกสลฺลํ วุตฺตํ. ตตฺถ อนุปุพฺพโต มนสิกโรนฺโต อาเสวติ, นาติสีฆโต นาติสณิกโต จ มนสิกโรนฺโต ภาเวติ, วิกฺเขปปฺปหานโต มนสิกโรนฺโต พหุลี กโรติ, ปณฺณตฺติสมติกฺกมนาทิโต มนสิกโรนฺโต สุววตฺถิตํ ววตฺถเปตีติ เวทิตพฺโพ. किंवा, जे पूर्वी सांगितले आहे – (१) अनुक्रमाने, (२) फार वेगाने नाही, (३) फार हळूहळू नाही, (४) विक्षेप दूर करून, (५) प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन करून, (६) अनुक्रमाने सोडत जाऊन, (७) लक्षणांच्या आधारे, आणि तीन सुत्ते (अनित्य, दुःख आणि अनात्म यासंबंधीची तीन सुत्ते) – अशा प्रकारे जे दहा प्रकारचे मनस्कार-कौशल्य (मनन करण्याचेु कौशल्य) सांगितले आहे; त्यामध्ये, अनुक्रमाने मनन करत तो त्याचे 'सेवन करतो'; फार वेगाने नाही आणि फार हळूहळू नाही अशा प्रकारे मनन करत तो त्याची 'भावना करतो'; विक्षेप दूर करून मनन करत तो त्याचा 'वारंवार सराव करतो'; आणि प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन इत्यादी प्रकारे मनन करत तो ते 'चांगल्या प्रकारे निश्चित करतो', असे समजावे. เอตฺถาห ‘‘กถํ ปนายํ อนุปุพฺพาทิวเสน เอเต ธมฺเม มนสิ กโรตี’’ติ? วุจฺจเต – อยญฺหิ เกเส มนสิ กริตฺวา ตทนนฺตรํ โลเม มนสิ กโรติ, น นเข. ตถา โลเม มนสิ กริตฺวา ตทนนฺตรํ นเข มนสิ กโรติ, น ทนฺเต. เอส นโย สพฺพตฺถ. กสฺมา? อุปฺปฏิปาฏิยา หิ มนสิกโรนฺโต เสยฺยถาปิ นาม อกุสโล ปุริโส ทฺวตฺตึสปทํ นิสฺเสณึ อุปฺปฏิปาฏิยา อาโรหนฺโต กิลนฺตกาโย ตโต นิสฺเสณิโต [Pg.57] ปปตติ, น อาโรหนํ สมฺปาเทติ; เอวเมว ภาวนาสมฺปตฺติวเสน อธิคนฺตพฺพสฺส อสฺสาทสฺส อนธิคมนโต กิลนฺตจิตฺโต ทฺวตฺตึสาการภาวนาโต ปปตติ, น ภาวนํ สมฺปาเทตีติ. येथे शंकाकार विचारतो – 'पण हा योगावचर अनुक्रमाने इत्यादींच्या द्वारे या धर्मांचे मनन कसे करतो?' उत्तर दिले जाते – हा योगावचर केसांचे मनन करून, त्यानंतर लगेचच रोमांचे (अंगावरील केसांचे) मनन करतो, नखांचे नाही. तसेच रोमांचे मनन करून, त्यानंतर लगेचच नखांचे मनन करतो, दातांचे नाही. हाच नियम सर्वत्र समजावा. असे का? कारण, जो अनुक्रम सोडून अस्ताव्यस्तपणे मनन करतो, तो जणू काही एखादा अकुशल माणूस बत्तीस पायऱ्यांच्या शिडीवर अनुक्रम सोडून चढताना, शरीर थकल्यामुळे त्या शिडीवरून खाली पडतो आणि वर चढण्याचे काम पूर्ण करू शकत नाही; त्याचप्रमाणे, भावनेच्या (ध्यानाच्या) यशाने प्राप्त होणाऱ्या समाधानाचा लाभ न झाल्यामुळे, मन थकल्याने तो बत्तीस प्रकारच्या आकारांच्या भावनेपासून च्युत होतो आणि ध्यानाची पूर्तता करू शकत नाही. อนุปุพฺพโต มนสิกโรนฺโตปิ จ เกสา โลมาติ นาติสีฆโตปิ มนสิ กโรติ. อติสีฆโต หิ มนสิกโรนฺโต เสยฺยถาปิ นาม อทฺธานํ คจฺฉนฺโต ปุริโส สมวิสมรุกฺขถลนินฺนทฺเวธาปถาทีนิ มคฺคนิมิตฺตานิ อุปลกฺเขตุํ น สกฺโกติ, ตโต น มคฺคกุสโล โหติ, อทฺธานญฺจ ปริกฺขยํ เนติ; เอวเมว วณฺณสณฺฐานาทีนิ ทฺวตฺตึสาการนิมิตฺตานิ อุปลกฺเขตุํ น สกฺโกติ, ตโต น ทฺวตฺตึสากาเร กุสโล โหติ, กมฺมฏฺฐานญฺจ ปริกฺขยํ เนติ. आणि अनुक्रमाने मनन करताना देखील, 'केस, रोम' इत्यादींचे अतिशय वेगाने मनन करू नये. कारण, अतिशय वेगाने मनन करणारा मनुष्य, जणू काही लांबच्या प्रवासाला निघालेला माणूस रस्ता सम-विषम आहे की काय, झाडे, उंचवटे, सखल भाग, दुभंगलेले रस्ते इत्यादी मार्गावरील चिन्हे लक्षात ठेवू शकत नाही, त्यामुळे तो मार्गामध्ये कुशल होत नाही आणि आपला प्रवास व्यर्थ घालवतो; त्याचप्रमाणे, तो वर्ण (रंग), संस्थाण (आकार) इत्यादी बत्तीस प्रकारच्या आकारांच्या लक्षणांना लक्षात ठेवू शकत नाही, त्यामुळे तो बत्तीस आकारांच्या भावनेत कुशल होत नाही आणि आपल्या कर्मास्थानाला (ध्यानविषयाला) नष्ट करतो. ยถา จ นาติสีฆโต, เอวํ นาติสณิกโตปิ มนสิ กโรติ. อติสณิกโต หิ มนสิกโรนฺโต เสยฺยถาปิ นาม ปุริโส อทฺธานมคฺคํ ปฏิปนฺโน อนฺตรามคฺเค รุกฺขปพฺพตตฬากาทีสุ วิลมฺพมาโน อิจฺฉิตปฺปเทสํ อปาปุณนฺโต อนฺตรามคฺเคเยว สีหพฺยคฺฆาทีหิ อนยพฺยสนํ ปาปุณาติ; เอวเมว ทฺวตฺตึสาการภาวนาสมฺปทํ อปาปุณนฺโต ภาวนาวิจฺเฉเทน อนฺตราเยว กามวิตกฺกาทีหิ อนยพฺยสนํ ปาปุณาติ. जसे अतिशय वेगाने नाही, तसेच अतिशय हळूहळू देखील मनन करू नये. कारण, अतिशय हळूहळू मनन करणारा मनुष्य, जणू काही लांबच्या प्रवासाला निघालेला एखादा माणूस वाटेत झाडे, पर्वत, तलाव इत्यादी ठिकाणी रेंगाळत राहिल्यामुळे इच्छित स्थळी पोहोचू शकत नाही आणि वाटेतच सिंह, वाघ इत्यादी हिंस्त्र श्वापदांमुळे विनाशाला प्राप्त होतो; त्याचप्रमाणे, बत्तीस आकारांच्या भावनेच्या समृद्धीला प्राप्त न होता, ध्यानात खंड पडल्यामुळे वाटेतच कामवितर्क इत्यादींमुळे विनाशाला प्राप्त होतो. นาติสณิกโต มนสิกโรนฺโตปิ จ วิกฺเขปปฺปหานโตปิ มนสิ กโรติ. วิกฺเขปปฺปหานโต นาม ยถา อญฺเญสุ นวกมฺมาทีสุ จิตฺตํ น วิกฺขิปติ, ตถา มนสิ กโรติ. พหิทฺธา วิกฺเขปมานจิตฺโต หิ เกสาทีสฺเวว อสมาหิตเจโตวิตกฺโก ภาวนาสมฺปทํ อปาปุณิตฺวา อนฺตราว อนยพฺยสนํ อาปชฺชติ ตกฺกสิลาคมเน โพธิสตฺตสฺส สหายกา วิย. อวิกฺขิปมานจิตฺโต ปน เกสาทีสฺเวว สมาหิตเจโตวิตกฺโก ภาวนาสมฺปทํ ปาปุณาติ โพธิสตฺโต วิย ตกฺกสิลรชฺชสมฺปทนฺติ. ตสฺเสวํ วิกฺเขปปฺปหานโต มนสิกโรโต อธิการจริยาธิมุตฺตีนํ วเสน เต ธมฺมา อสุภโต วา วณฺณโต วา สุญฺญโต วา อุปฏฺฐหนฺติ. अतिशय हळूहळू मनन न करता, विक्षेपाचा (चित्ताच्या विचलनाचा) त्याग करून देखील मनन करावे. 'विक्षेपाचा त्याग करून मनन करणे' म्हणजे इतर नवीन कामांमध्ये चित्त विचलित होणार नाही अशा प्रकारे मनन करणे होय. कारण, ज्याचे चित्त बाहेर विचलित होते, तो केस इत्यादींच्या बाबतीत असंयत चित्त आणि वितर्क असलेला बनून, ध्यानाच्या समृद्धीला प्राप्त न करता, तक्षशिलेला जाणाऱ्या बोधिसत्वाच्या सोबत्यांप्रमाणे वाटेतच विनाशाला प्राप्त होतो. परंतु, विचलित न होणारे चित्त असलेला मनुष्य केस इत्यादींच्या बाबतीतच समाहित चित्त आणि वितर्क ठेवून, बोधिसत्वाप्रमाणे तक्षशिलेच्या राज्यसमृद्धीला प्राप्त करतो. अशा प्रकारे विक्षेपाचा त्याग करून मनन करणाऱ्या योगावकराला, त्याच्या विशेष साधना, आचरण आणि अधिमुक्तीच्या प्रभावाने ते धर्म एकतर अशुद्ध (अशुभ) रूपाने, किंवा वर्णाच्या रूपाने, किंवा शून्यतेच्या रूपाने भासू लागतात. อถ ปณฺณตฺติสมติกฺกมนโต เต ธมฺเม มนสิ กโรติ. ปณฺณตฺติสมติกฺกมนโตติ เกสา โลมาติ เอวมาทิโวหารํ สมติกฺกมิตฺวา วิสฺสชฺเชตฺวา ยถูปฏฺฐิตานํ อสุภาทีนํเยว วเสน มนสิ กโรติ. กถํ[Pg.58]? ยถา อรญฺญนิวาสูปคตา มนุสฺสา อปริจิตภูมิภาคตฺตา อุทกฏฺฐานสญฺชานนตฺถํ สาขาภงฺคาทินิมิตฺตํ กตฺวา ตทนุสาเรน คนฺตฺวา อุทกํ ปริภุญฺชนฺติ, ยทา ปน ปริจิตภูมิภาคา โหนฺติ, อถ ตํ นิมิตฺตํ วิสฺสชฺเชตฺวา อมนสิกตฺวาว อุทกฏฺฐานํ อุปสงฺกมิตฺวา อุทกํ ปริภุญฺชนฺติ, เอวเมวายํ เกสา โลมาติอาทินา ตํตํโวหารสฺส วเสน ปฐมํ เต ธมฺเม มนสากาสิ, เตสุ ธมฺเมสุ อสุภาทีนํ อญฺญตรวเสน อุปฏฺฐหนฺเตสุ ตํ โวหารํ สมติกฺกมิตฺวา วิสฺสชฺเชตฺวา อสุภาทิโตว มนสิ กโรติ. त्यानंतर, तो प्रज्ञप्तीचे (नावाचे) उल्लंघन करून त्या धर्मांचे मनन करतो. 'प्रज्ञप्तीचे उल्लंघन करून' म्हणजे 'केस, रोम' इत्यादी व्यावहारिक संज्ञांचे उल्लंघन करून, त्यांचा त्याग करून, जसे ते भासतात तशा केवळ अशुभत्वाच्या इत्यादींच्या रूपानेच मनन करतो. कसे? जसे अरण्यात राहण्यास गेलेले लोक, ती जमीन अपरिचित असल्यामुळे, पाण्याचे ठिकाण ओळखण्यासाठी झाडांच्या फांद्या मोडणे इत्यादी खुणा करतात आणि त्या खुणांच्या आधारे जाऊन पाण्याचा उपभोग घेतात; परंतु जेव्हा ते त्या जमिनीशी परिचित होतात, तेव्हा त्या खुणेचा त्याग करून, तिचा विचार न करताच पाण्याच्या ठिकाणी जाऊन पाण्याचा उपभोग घेतात; त्याचप्रमाणे, या योगावकराने सुरुवातीला 'केस, रोम' इत्यादी त्या त्या व्यावहारिक संज्ञांच्या आधारे प्रथम त्या धर्मांचे मनात चिंतन केले; परंतु जेव्हा त्या धर्मांमध्ये अशुभत्व इत्यादींपैकी कोणत्याही एका रूपाने प्रचिती येऊ लागते, तेव्हा तो त्या व्यावहारिक संज्ञेचे उल्लंघन करून, तिचा त्याग करून, केवळ अशुभत्वाच्याच रूपाने मनन करतो. เอตฺถาห ‘‘กถํ ปนสฺส เอเต ธมฺมา อสุภาทิโต อุปฏฺฐหนฺติ, กถํ วณฺณโต, กถํ สุญฺญโต วา, กถญฺจายเมเต อสุภโต มนสิ กโรติ, กถํ วณฺณโต, กถํ สุญฺญโต วา’’ติ? เกสา ตาวสฺส วณฺณสณฺฐานคนฺธาสโยกาสวเสน ปญฺจธา อสุภโต อุปฏฺฐหนฺติ, ปญฺจธา เอว อยเมเต อสุภโต มนสิ กโรติ. เสยฺยถิทํ – เกสา นาเมเต วณฺณโต อสุภา ปรมปฺปฏิกูลเชคุจฺฉา. ตถา หิ มนุสฺสา ทิวา ปานโภชเน ปติตํ เกสวณฺณํ วากํ วา สุตฺตํ วา ทิสฺวา เกสสญฺญาย มโนรมมฺปิ ปานโภชนํ ฉฑฺเฑนฺติ วา ชิคุจฺฉนฺติ วา. สณฺฐานโตปิ อสุภา. ตถา หิ รตฺตึ ปานโภชเน ปติตํ เกสสณฺฐานํ วากํ วา สุตฺตํ วา ผุสิตฺวา เกสสญฺญาย มโนรมมฺปิ ปานโภชนํ ฉฑฺเฑนฺติ วา ชิคุจฺฉนฺติ วา. คนฺธโตปิ อสุภา. ตถา หิ เตลมกฺขนปุปฺผธูมาทิสงฺขาเรหิ วิรหิตานํ เกสานํ คนฺโธ ปรมเชคุจฺโฉ โหติ, อคฺคีสุ ปกฺขิตฺตสฺส เกสสฺส คนฺธํ ฆายิตฺวา สตฺตา นาสิกํ ปิเธนฺติ, มุขมฺปิ วิกุชฺเชนฺติ. อาสยโตปิ อสุภา. ตถา หิ นานาวิเธน มนุสฺสาสุจินิสฺสนฺเทน สงฺการฏฺฐาเน ตณฺฑุเลยฺยกาทีนิ วิย ปิตฺตเสมฺหปุพฺพโลหิตนิสฺสนฺเทน เต อาจิตา วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ คมิตาติ. โอกาสโตปิ อสุภา. ตถา หิ สงฺการฏฺฐาเน วิย ตณฺฑุเลยฺยกาทีนิ ปรมเชคุจฺเฉ โลมาทิเอกตึสกุณปราสิมตฺถเก มนุสฺสานํ สีสปลิเวฐเก อลฺลจมฺเม ชาตาติ. เอส นโย โลมาทีสุ. เอวํ ตาว อยเมเต ธมฺเม อสุภโต อุปฏฺฐหนฺเต อสุภโต มนสิ กโรติ. येथे शंकाकार विचारतो – 'पण त्याला हे धर्म अशुभत्वाच्या रूपाने कसे भासतात? वर्णाच्या रूपाने कसे भासतात? शून्यतेच्या रूपाने कसे भासतात? आणि तो यांचे अशुभत्वाच्या रूपाने कसे मनन करतो? वर्णाच्या रूपाने कसे करतो? शून्यतेच्या रूपाने कसे करतो?' प्रथम, त्याला केस हे वर्ण (रंग), संस्थाण (आकार), गंध (वास), आशय (पोषक घटक) आणि अवकाश (उत्पत्तीचे स्थान) या पाच कारणांमुळे अशुभ रूपाने भासतात; आणि तो या पाच प्रकारेच त्यांचे अशुभ रूपाने मनन करतो. ते खालीलप्रमाणे आहे – हे केस वर्णाच्या दृष्टीने अशुभ, अत्यंत प्रतिकूल आणि घृणास्पद आहेत. कारण, लोक दिवसा खाण्यापिण्याच्या पदार्थात पडलेला केसाच्या रंगाचा एखादा दोरा किंवा झाडाची साल पाहून, 'हा केस आहे' या कल्पनेने अत्यंत स्वादिष्ट अन्न-पेय देखील फेकून देतात किंवा त्याचा तिरस्कार करतात. आकाराच्या दृष्टीनेही ते अशुभ आहेत. कारण, रात्रीच्या वेळी खाण्यापिण्याच्या पदार्थात पडलेला केसाच्या आकाराचा एखादा दोरा किंवा झाडाची साल स्पर्शल्यास, 'हा केस आहे' या कल्पनेने अत्यंत स्वादिष्ट अन्न-पेय देखील फेकून देतात किंवा त्याचा तिरस्कार करतात. गंधाच्या दृष्टीनेही ते अशुभ आहेत. कारण, तेल लावणे, फुले माळणे, धूप देणे इत्यादी संस्कारांशिवाय केसांचा वास अत्यंत घृणास्पद असतो. अग्नीमध्ये टाकलेल्या केसांचा वास आल्यावर प्राणी आपले नाक बंद करतात आणि तोंड वाकडे करतात. आशयाच्या दृष्टीनेही ते अशुभ आहेत. कारण, ज्याप्रमाणे कचऱ्याच्या ढिगाऱ्यावर मानवी विष्ठेच्या विविध अशुद्ध प्रवाहाने माठ इत्यादी वनस्पती वाढतात, त्याचप्रमाणे पित्त, कफ, पू आणि रक्त यांच्या अशुद्ध प्रवाहाने पोषित होऊन हे केस वाढतात, विस्तारतात आणि वृद्धीला प्राप्त होतात. अवकाशाच्या दृष्टीनेही ते अशुभ आहेत. कारण, कचऱ्याच्या ढिगाऱ्याप्रमाणेच, अत्यंत घृणास्पद अशा रोम इत्यादी इतर एकतीस प्रकारच्या कुजलेल्या अवयवांच्या ढिगाऱ्याच्या वर असलेल्या, मानवी कवटीला वेढणाऱ्या ओल्या त्वचेवर ते निर्माण होतात. हाच नियम रोम इत्यादींच्या बाबतीतही समजावा. अशा प्रकारे, प्रथम हे धर्म अशुभ रूपाने भासत असताना, तो त्यांचे अशुभ रूपाने मनन करतो. ยทิ ปนสฺส วณฺณโต อุปฏฺฐหนฺติ, อถ เกสา นีลกสิณวเสน อุปฏฺฐหนฺติ. ตถา โลมา ทนฺตา โอทาตกสิณวเสนาติ. เอส นโย สพฺพตฺถ[Pg.59]. ตํตํกสิณวเสเนว อยเมเต มนสิ กโรติ, เอวํ วณฺณโต อุปฏฺฐหนฺเต วณฺณโต มนสิ กโรติ. ยทิ ปนสฺส สุญฺญโต อุปฏฺฐหนฺติ, อถ เกสา ฆนวินิพฺโภคววตฺถาเนน โอชฏฺฐมกสมูหวเสน อุปฏฺฐหนฺติ. ตถา โลมาทโย, ยถา อุปฏฺฐหนฺติ. อยเมเต ตเถว มนสิ กโรติ. เอวํ สุญฺญโต อุปฏฺฐหนฺเต สุญฺญโต มนสิ กโรติ. परंतु, जर त्याला ते वर्णाच्या रूपाने भासले, तर केस हे 'नील-कसिण' च्या रूपाने भासतात. तसेच रोम देखील आणि दात हे 'ओदात-कसिण' च्या रूपाने भासतात. हाच नियम सर्वत्र समजावा. त्या त्या कसिणाच्या रूपानेच तो त्यांचे मनन करतो. अशा प्रकारे वर्णाच्या रूपाने भासत असताना, तो वर्णाच्या रूपाने मनन करतो. परंतु, जर त्याला ते शून्यतेच्या रूपाने भासले, तर केस हे 'घन-विनिब्भोग-व्यवस्थान' च्या द्वारे 'ओजठ्ठमक-समूह' च्या रूपाने भासतात. तसेच रोम इत्यादी देखील भासतात. जसे ते भासतात, तशाच प्रकारे तो त्यांचे मनन करतो. अशा प्रकारे शून्यतेच्या रूपाने भासत असताना, तो शून्यतेच्या रूपाने मनन करतो. เอวํ มนสิกโรนฺโต อยเมเต ธมฺเม อนุปุพฺพมุญฺจนโต มนสิ กโรติ. อนุปุพฺพมุญฺจนโตติ อสุภาทีนํ อญฺญตรวเสน อุปฏฺฐิเต เกเส มุญฺจิตฺวา โลเม มนสิกโรนฺโต เสยฺยถาปิ นาม ชลูกา นงฺคุฏฺเฐน คหิตปฺปเทเส สาเปกฺขาว หุตฺวา ตุณฺเฑน อญฺญํ ปเทสํ คณฺหาติ, คหิเต จ ตสฺมึ อิตรํ มุญฺจติ, เอวเมว เกเสสุ สาเปกฺโขว หุตฺวา โลเม มนสิ กโรติ, โลเมสุ จ ปติฏฺฐิเต มนสิกาเร เกเส มุญฺจติ. เอส นโย สพฺพตฺถ. เอวํ หิสฺส อนุปุพฺพมุญฺจนโต มนสิกโรโต อสุภาทีสุ อญฺญตรวเสน เต ธมฺมา อุปฏฺฐหนฺตา อนวเสสโต อุปฏฺฐหนฺติ, ปากฏตรูปฏฺฐานา จ โหนฺติ. अशा प्रकारे मनसिकार करत असताना हा साधक या धर्मांना (केस, रोम इत्यादींना) अनुक्रमाने सोडत मनसिकार करतो. 'अनुक्रमाने सोडणे' म्हणजे अशुभादींपैकी कोणत्याही एका रूपाने प्रकट झालेल्या केसांचे मनन सोडून, रोमांवर (अंगावरील केसांवर) मनसिकार करणे होय. हे कशासारखे आहे? ज्याप्रमाणे एखादी जळू आपल्या शेपटीने पकडलेल्या जागेबद्दल सापेक्ष (आसक्त) राहूनच आपल्या तोंडाने दुसऱ्या जागेला पकडते, आणि ती दुसरी जागा पकडल्यावर पहिल्या जागेला सोडते; त्याचप्रमाणे केसांवर सापेक्ष राहूनच रोमांवर मनसिकार करतो, आणि रोमांवर मनसिकार प्रस्थापित झाल्यावर केसांचे मनन सोडतो. हाच नियम सर्व ठिकाणी समजावा. कारण अशा प्रकारे अनुक्रमाने सोडत मनसिकार करणाऱ्या साधकाला अशुभादींपैकी कोणत्याही एका रूपाने ते धर्म (शरीराचे भाग) पूर्णपणे प्रकट होतात आणि अधिक स्पष्टपणे भासतात. อถ ยสฺส เต ธมฺมา อสุภโต อุปฏฺฐหนฺติ, ปากฏตรูปฏฺฐานา จ โหนฺติ, ตสฺส เสยฺยถาปิ นาม มกฺกโฏ ทฺวตฺตึสตาลเก ตาลวเน พฺยาเธน ปริปาติยมาโน เอกรุกฺเขปิ อสณฺฐหนฺโต ปริธาวิตฺวา ยทา นิวตฺโต โหติ กิลนฺโต, อถ เอกเมว ฆนตาลปณฺณปริเวฐิตํ ตาลสุจึ นิสฺสาย ติฏฺฐติ; เอวเมว จิตฺตมกฺกโฏ ทฺวตฺตึสโกฏฺฐาสเก อิมสฺมึ กาเย เตเนว โยคินา ปริปาติยมาโน เอกโกฏฺฐาสเกปิ อสณฺฐหนฺโต ปริธาวิตฺวา ยทา อเนการมฺมณวิธาวเน อภิลาสาภาเวน นิวตฺโต โหติ กิลนฺโต. อถ ยฺวาสฺส เกสาทีสุ ธมฺโม ปคุณตโร จริตานุรูปตโร วา, ยตฺถ วา ปุพฺเพ กตาธิกาโร โหติ, ตํ นิสฺสาย อุปจารวเสน ติฏฺฐติ. อถ ตเมว นิมิตฺตํ ปุนปฺปุนํ ตกฺกาหตํ วิตกฺกาหตํ กริตฺวา ยถากฺกมํ ปฐมํ ฌานํ อุปฺปาเทติ, ตตฺถ ปติฏฺฐาย วิปสฺสนมารภิตฺวา อริยภูมึ ปาปุณาติ. त्यानंतर ज्या साधकाला ते धर्म अशुभरूपाने प्रकट होतात आणि अधिक स्पष्टपणे भासतात, त्याच्यासाठी उदाहरण असे: ज्याप्रमाणे एखादा माकड बत्तीस ताडाची झाडे असलेल्या ताडवनात शिकाऱ्याने पाठलाग केला असता, एकाही झाडावर स्थिर न राहता इकडेतिकडे पळतो आणि जेव्हा तो थकतो व शांत होतो, तेव्हा तो दाट ताडपत्रांनी वेढलेल्या एकाच ताडाच्या शेंड्याचा आश्रय घेऊन स्थिर राहतो; त्याचप्रमाणे हा चित्तरूपी माकड बत्तीस भागांनी युक्त असलेल्या या शरीरात त्या योग्याद्वारे पाठलाग केला जात असताना, एकाही भागात स्थिर न राहता इकडेतिकडे धावतो आणि जेव्हा अनेक आलंबनांमध्ये धावण्याची इच्छा नसल्यामुळे तो थकतो व शांत होतो, तेव्हा केस इत्यादींपैकी जो धर्म त्याच्यासाठी अधिक परिचयाचा किंवा त्याच्या चरित्राला अधिक अनुकूल असतो, किंवा ज्याच्यावर त्याने पूर्वजन्मात अभ्यास केलेला असतो, त्याचा आश्रय घेऊन तो उपचाराच्या रूपाने स्थिर होतो. त्यानंतर त्याच निमित्ताला वारंवार वितर्काने आहत (मनन) करून अनुक्रमाने प्रथम ध्यान उत्पन्न करतो, आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विपश्यनेचा आरंभ करून आर्यभूमीला प्राप्त होतो. ยสฺส ปน เต ธมฺมา วณฺณโต อุปฏฺฐหนฺติ, ตสฺสาปิ เสยฺยถาปิ นาม มกฺกโฏ…เป… อถ ยฺวาสฺส เกสาทีสุ ธมฺโม ปคุณตโร จริตานุรูปตโร [Pg.60] วา, ยตฺถ วา ปุพฺเพ กตาธิกาโร โหติ, ตํ นิสฺสาย อุปจารวเสน ติฏฺฐติ. อถ ตเมว นิมิตฺตํ ปุนปฺปุนํ ตกฺกาหตํ วิตกฺกาหตํ กริตฺวา ยถากฺกมํ นีลกสิณวเสน ปีตกสิณวเสน วา ปญฺจปิ รูปาวจรชฺฌานานิ อุปฺปาเทติ, เตสญฺจ ยตฺถ กตฺถจิ ปติฏฺฐาย วิปสฺสนํ อารภิตฺวา อริยภูมึ ปาปุณาติ. परंतु ज्या साधकाला ते धर्म रंगाच्या (वर्णाच्या) रूपाने प्रकट होतात, त्याच्यासाठी देखील ज्याप्रमाणे माकड... (इत्यादी पूर्ववत समजावे). त्यानंतर केस इत्यादींपैकी जो धर्म त्याच्यासाठी अधिक परिचयाचा किंवा त्याच्या चरित्राला अधिक अनुकूल असतो, किंवा ज्याच्यावर त्याने पूर्वजन्मात अभ्यास केलेला असतो, त्याचा आश्रय घेऊन तो उपचाराच्या रूपाने स्थिर होतो. त्यानंतर त्याच निमित्ताला वारंवार वितर्काने आहत करून अनुक्रमाने नील-कसिण किंवा पीत-कसिणच्या रूपाने पाचही रूपावचर ध्यानांना उत्पन्न करतो, आणि त्या ध्यानांपैकी कोणत्याही एका ध्यानात प्रतिष्ठित होऊन विपश्यनेचा आरंभ करून आर्यभूमीला प्राप्त होतो. ยสฺส ปน เต ธมฺมา สุญฺญโต อุปฏฺฐหนฺติ, โส ลกฺขณโต มนสิ กโรติ, ลกฺขณโต มนสิกโรนฺโต ตตฺถ จตุธาตุววตฺถานวเสน อุปจารชฺฌานํ ปาปุณาติ. อถ มนสิกโรนฺโต เต ธมฺเม อนิจฺจทุกฺขานตฺตสุตฺตตฺตยวเสน มนสิ กโรติ. อยมสฺส วิปสฺสนานโย. โส อิมํ วิปสฺสนํ อารภิตฺวา ยถากฺกมญฺจ ปฏิปชฺชิตฺวา อริยภูมึ ปาปุณาตีติ. परंतु ज्या साधकाला ते धर्म शून्यतेच्या (आत्मभावापासून रहित) रूपाने प्रकट होतात, तो लक्षणांच्या द्वारे मनसिकार करतो. लक्षणांच्या द्वारे मनसिकार करत असताना तो त्या बत्तीस भागांमध्ये चार धातूंच्या विश्लेषणाच्या (चतुधातुव्यवस्थान) द्वारे उपचार ध्यानाला प्राप्त होतो. त्यानंतर मनसिकार करत असताना तो त्या धर्मांना अनित्य, दुःख आणि अनात्म या तीन सूत्तांच्या पद्धतीने मनात आणतो. हा त्याचा विपश्यनेचा मार्ग आहे. तो या विपश्यनेचा आरंभ करून आणि अनुक्रमाने आचरण करून आर्यभूमीला प्राप्त होतो. เอตฺตาวตา จ ยํ วุตฺตํ – ‘‘กถํ ปนายํ อนุปุพฺพาทิวเสน เอเต ธมฺเม มนสิ กโรตี’’ติ, ตํ พฺยากตํ โหติ. ยญฺจาปิ วุตฺตํ – ‘‘ภาวนาวเสน ปนสฺส เอวํ วณฺณนา เวทิตพฺพา’’ติ, ตสฺสตฺโถ ปกาสิโต โหตีติ. एवढ्याने जे म्हटले गेले आहे की—'हा साधक अनुक्रमादींच्या द्वारे या धर्मांना मनात कसा आणतो?', त्याचे स्पष्टीकरण झाले आहे. आणि जे हे देखील म्हटले गेले आहे की—'भावनेच्या दृष्टीने त्याचे असे वर्णन समजावे', त्याचा अर्थ प्रकट झाला आहे. ปกิณฺณกนโย प्रकीर्णक पद्धत อิทานิ อิมสฺมึเยว ทฺวตฺตึสากาเร วณฺณนาปริจยปาฏวตฺถํ อยํ ปกิณฺณกนโย เวทิตพฺโพ – आता याच बत्तीस प्रकारच्या आकारांमध्ये वर्णनाचा परिचय आणि नैपुण्य मिळवण्यासाठी ही प्रकीर्णक पद्धत समजून घेतली पाहिजे— ‘‘นิมิตฺตโต ลกฺขณโต, ธาตุโต สุญฺญโตปิ จ; ขนฺธาทิโต จ วิญฺเญยฺโย, ทฺวตฺตึสาการนิจฺฉโย’’ติ. “निमित्ताने, लक्षणाने, धातूने, शून्यतेने आणि स्कंधादींच्या द्वारे देखील बत्तीस आकारांचा निश्चय जाणला पाहिजे.” ตตฺถ นิมิตฺตโตติ เอวํ วุตฺตปฺปกาเร อิมสฺมึ ทฺวตฺตึสากาเร สฏฺฐิสตํ นิมิตฺตานิ โหนฺติ, เยสํ วเสน โยคาวจโร ทฺวตฺตึสาการํ โกฏฺฐาสโต ปริคฺคณฺหาติ. เสยฺยถิทํ – เกสสฺส วณฺณนิมิตฺตํ, สณฺฐานนิมิตฺตํ, ทิสานิมิตฺตํ, โอกาสนิมิตฺตํ, ปริจฺเฉทนิมิตฺตนฺติ ปญฺจ นิมิตฺตานิ โหนฺติ. เอวํ โลมาทีสุ. त्यामध्ये 'निमित्ताने' म्हणजे अशा प्रकारे सांगितलेल्या या बत्तीस आकारांमध्ये एकशे साठ (१६०) निमित्त असतात, ज्यांच्या आधारे योगावचर साधक बत्तीस आकारांना भागांच्या रूपाने ग्रहण करतो. ते खालीलप्रमाणे आहेत: केसांचे वर्ण-निमित्त (रंग), संस्थान-निमित्त (आकार), दिशा-निमित्त, अवकाश-निमित्त (स्थान) आणि परिच्छेद-निमित्त (मर्यादा) अशी पाच निमित्त असतात. याचप्रमाणे रोम इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. ลกฺขณโตติ ทฺวตฺตึสากาเร อฏฺฐวีสติสตํ ลกฺขณานิ โหนฺติ, เยสํ วเสน โยคาวจโร ทฺวตฺตึสาการํ ลกฺขณโต มนสิ กโรติ[Pg.61]. เสยฺยถิทํ – เกสสฺส ถทฺธลกฺขณํ, อาพนฺธนลกฺขณํ, อุณฺหตฺตลกฺขณํ, สมุทีรณลกฺขณนฺติ จตฺตาริ ลกฺขณานิ โหนฺติ. เอวํ โลมาทีสุ. लक्षणाने म्हणजे बत्तीस आकारांमध्ये एकशे अठ्ठावीस (१२८) लक्षणे असतात, ज्यांच्या आधारे योगावचर साधक बत्तीस आकारांवर लक्षणांच्या द्वारे मनसिकार करतो. ते खालीलप्रमाणे आहेत: केसांचे कठीणपणाचे लक्षण, बांधणीचे लक्षण, उष्णतेचे लक्षण आणि कंपनाचे लक्षण अशी चार लक्षणे असतात. याचप्रमाणे रोम इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. ธาตุโตติ ทฺวตฺตึสากาเร ‘‘ฉธาตุโร, ภิกฺขเว, อยํ ปุริสปุคฺคโล’’ติ (ม. นิ. ๓.๓๔๓-๓๔๔) เอตฺถ วุตฺตาสุ ธาตูสุ อฏฺฐวีสติสตํ ธาตุโย โหนฺติ, ยาสํ วเสน โยคาวจโร ทฺวตฺตึสาการํ ธาตุโต ปริคฺคณฺหาติ. เสยฺยถิทํ – ยา เกเส ถทฺธตา, สา ปถวีธาตุ; ยา อาพนฺธนตา, สา อาโปธาตุ; ยา ปริปาจนตา, สา เตโชธาตุ; ยา วิตฺถมฺภนตา, สา วาโยธาตูติ จตสฺโส ธาตุโย โหนฺติ. เอวํ โลมาทีสุ. धातूने म्हणजे बत्तीस आकारांमध्ये, 'भिक्खूहो, हा पुरुष-पुद्गल सहा धातूंचा बनलेला आहे' या सूत्रात सांगितलेल्या धातूंमध्ये एकशे अठ्ठावीस (१२८) धातू असतात, ज्यांच्या आधारे योगावचर साधक बत्तीस आकारांना धातूंच्या रूपाने ग्रहण करतो. ते खालीलप्रमाणे आहेत: केसांमध्ये जो कठीणपणा आहे, ती पृथ्वीधातू आहे; जी बांधणी आहे, ती आपोधातू आहे; जे परिपक्व करणे आहे, ती तेजोधातू आहे; आणि जे आधार देणे आहे, ती वायूधातू आहे; अशा चार धातू असतात. याचप्रमाणे रोम इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. สุญฺญโตติ ทฺวตฺตึสากาเร อฏฺฐวีสติสตํ สุญฺญตา โหนฺติ, ยาสํ วเสน โยคาวจโร ทฺวตฺตึสาการํ สุญฺญโต วิปสฺสติ. เสยฺยถิทํ – เกเส ตาว ปถวีธาตุ อาโปธาตฺวาทีหิ สุญฺญา, ตถา อาโปธาตฺวาทโย ปถวีธาตฺวาทีหีติ จตสฺโส สุญฺญตา โหนฺติ. เอวํ โลมาทีสุ. शून्यतेने म्हणजे बत्तीस आकारांमध्ये एकशे अठ्ठावीस शून्यतेचे प्रकार असतात, ज्यांच्या आधारे योगावचर साधक बत्तीस आकारांना शून्यतेच्या रूपाने पाहतो. ते खालीलप्रमाणे आहेत: केसांमध्ये प्रथम पृथ्वीधातू ही आपोधातू इत्यादींनी शून्य (रहित) आहे, आणि त्याचप्रमाणे आपोधातू इत्यादी हे पृथ्वीधातू इत्यादींनी शून्य आहेत; अशा चार शून्यतेच्या अवस्था असतात. याचप्रमाणे रोम इत्यादींच्या बाबतीतही समजावे. ขนฺธาทิโตติ ทฺวตฺตึสากาเร เกสาทีสุ ขนฺธาทิวเสน สงฺคยฺหมาเนสุ ‘‘เกสา กติ ขนฺธา โหนฺติ, กติ อายตนานิ, กติ ธาตุโย, กติ สจฺจานิ, กติ สติปฏฺฐานานี’’ติ เอวมาทินา นเยน วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. เอวญฺจสฺส วิชานโต ติณกฏฺฐสมูโห วิย กาโย ขายติ. ยถาห – स्कंधादींच्या द्वारे म्हणजे बत्तीस आकारांमध्ये केस इत्यादींना स्कंधादींच्या रूपाने ग्रहण केले असता—'केस हे किती स्कंध आहेत, किती आयतने आहेत, किती धातू आहेत, किती सत्ये आहेत, किती स्मृतिप्रस्थान आहेत?' अशा प्रकारे निर्णय समजून घेतला पाहिजे. आणि अशा प्रकारे जाणणाऱ्या साधकाला हे शरीर गवत आणि लाकडाच्या ढिगाऱ्यासारखे भासते. जसे की म्हटले आहे— ‘‘นตฺถิ สตฺโต นโร โปโส, ปุคฺคโล นูปลพฺภติ; สุญฺญภูโต อยํ กาโย, ติณกฏฺฐสมูปโม’’ติ. “परमार्थतः कोणताही प्राणी, मनुष्य किंवा पुरुष नाही, पुद्गल देखील आढळत नाही; हे शरीर शून्यमय आहे आणि गवत व लाकडाच्या ढिगाऱ्यासारखे आहे.” อถสฺส ยา สา – त्यानंतर त्याची जी ती— ‘‘สุญฺญาคารํ ปวิฏฺฐสฺส, สนฺตจิตฺตสฺส ตาทิโน; อมานุสี รติ โหติ, สมฺมา ธมฺมํ วิปสฺสโต’’ติ. – “शून्य घरात (एकांतात) प्रवेश केलेल्या, शांत चित्त असलेल्या, समता बाळगणाऱ्या आणि योग्य प्रकारे धर्माची विपश्यना करणाऱ्या साधकाला अलौकिक आनंद मिळतो.” เอวํ อมานุสี รติ วุตฺตา, สา อทูรตรา โหติ. ตโต ยํ ตํ – अशा प्रकारे जो अलौकिक आनंद सांगितला आहे, तो त्याच्या अगदी जवळ असतो. त्यानंतर जे हे— ‘‘ยโต ยโต สมฺมสติ, ขนฺธานํ อุทยพฺพยํ; ลภตี ปีติปาโมชฺชํ, อมตํ ตํ วิชานต’’นฺติ. (ธ. ป. ๓๗๓-๓๗๔) – “जेव्हा जेव्हा तो स्कंधांच्या उदय आणि व्ययाचे (उत्पत्ती आणि विनाशाचे) मनन करतो, तेव्हा तो प्रीती आणि प्रमोद प्राप्त करतो; जाणणाऱ्यांसाठी ते अमृतासारखे आहे.” เอวํ [Pg.62] วิปสฺสนามยํ ปีติปาโมชฺชามตํ วุตฺตํ. ตํ อนุภวนฺโต น จิเรเนว อริยชนเสวิตํ อชรามรํ นิพฺพานามตํ สจฺฉิกโรตีติ. अशा प्रकारे विपश्यनामय प्रीती, प्रमोद आणि अमृत सांगितले आहे. त्याचा अनुभव घेत असताना तो लवकरच आर्य जनांनी सेवन केलेल्या, अजर आणि अमर अशा निर्वाणरूपी अमृताचा साक्षात्कार करतो. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेमध्ये. ทฺวตฺตึสาการวณฺณนา นิฏฺฐิตา. द्वत्तिंसाकारवण्णना (बत्तीस शरीरावयवांचे वर्णन) समाप्त झाली. ๔. กุมารปญฺหวณฺณนา ४. कुमारपञ्हवण्णना (कुमार-प्रश्नांचे स्पष्टीकरण) อฏฺฐุปฺปตฺติ अट्ठुप्पत्ति (प्रसंगाची पार्श्वभूमी) อิทานิ เอกํ นาม กินฺติ เอวมาทีนํ กุมารปญฺหานํ อตฺถวณฺณนากฺกโม อนุปฺปตฺโต. เตสํ อฏฺฐุปฺปตฺตึ อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนญฺจ วตฺวา วณฺณนํ กริสฺสาม – आता, 'एकं नाम किं' (एक म्हणजे काय) इत्यादी कुमारप्रश्नांच्या अर्थ-स्पष्टीकरणाचा (अत्थवण्णना) क्रम प्राप्त झाला आहे. येथे त्यांची पार्श्वभूमी (अट्ठुप्पत्ति) आणि या ग्रंथात त्यांचे संकलन करण्याचे प्रयोजन सांगून, आम्ही त्यांचे स्पष्टीकरण करू. อฏฺฐุปฺปตฺติ ตาว เนสํ โสปาโก นาม ภควโต มหาสาวโก อโหสิ. เตนายสฺมตา ชาติยา สตฺตวสฺเสเนว อญฺญา อาราธิตา, ตสฺส ภควา ปญฺหพฺยากรเณน อุปสมฺปทํ อนุญฺญาตุกาโม อตฺตนา อธิปฺเปตตฺถานํ ปญฺหานํ พฺยากรณสมตฺถตํ ปสฺสนฺโต ‘‘เอกํ นาม กิ’’นฺติ เอวมาทินา ปญฺเห ปุจฺฉิ. โส พฺยากาสิ. เตน จ พฺยากรเณน ภควโต จิตฺตํ อาราเธสิ. สาว ตสฺสายสฺมโต อุปสมฺปทา อโหสิ. त्यांची पार्श्वभूमी (अट्ठुप्पत्ति) अशी आहे: सर्वप्रथम, सोपाक नावाचे भगवंतांचे एक महान श्रावक (महासावक) होते. त्या आयुष्यमानांनी जन्मापासून अवघ्या सातव्या वर्षीच अर्हत्त्व (अञ्ञा) प्राप्त केले होते. भगवंतांनी त्यांना प्रश्नांच्या उत्तरांद्वारे उपसंपदा (भिक्खू दीक्षा) देण्याची इच्छा केली. भगवंतांनी स्वतःला अभिप्रेत असलेल्या प्रश्नांची उत्तरे देण्याची त्यांची क्षमता पाहून, 'एकं नाम किं' (एक म्हणजे काय) इत्यादी प्रश्न विचारले. त्यांनी (सोपाकांनी) उत्तरे दिली. आणि त्या उत्तरांनी त्यांनी भगवंतांचे चित्त प्रसन्न केले. तीच त्या आयुष्यमानांची उपसंपदा झाली. อยํ เตสํ อฏฺฐุปฺปตฺติ. ही त्यांची पार्श्वभूमी (अट्ठुप्पत्ति) आहे. นิกฺเขปปฺปโยชนํ निक्खेपप्पयोजन (संकलनाचे प्रयोजन) ยสฺมา ปน สรณคมเนหิ พุทฺธธมฺมสงฺฆานุสฺสติวเสน จิตฺตภาวนา, สิกฺขาปเทหิ สีลภาวนา, ทฺวตฺตึสากาเรน จ กายภาวนา ปกาสิตา, ตสฺมา อิทานิ นานปฺปการโต ปญฺญาภาวนามุขทสฺสนตฺถํ อิเม ปญฺหพฺยากรณา อิธ นิกฺขิตฺตา. ยสฺมา วา สีลปทฏฺฐาโน สมาธิ, สมาธิปทฏฺฐานา จ ปญฺญา; ยถาห – ‘‘สีเล ปติฏฺฐาย นโร สปญฺโญ, จิตฺตํ [Pg.63] ปญฺญญฺจ ภาวย’’นฺติ (สํ. นิ. ๑.๒๓, ๑๙๒), ตสฺมา สิกฺขาปเทหิ สีลํ ทฺวตฺตึสากาเรน ตํโคจรํ สมาธิญฺจ ทสฺเสตฺวา สมาหิตจิตฺตสฺส นานาธมฺมปริกฺขาราย ปญฺญาย ปเภททสฺสนตฺถํ อิธ นิกฺขิตฺตาติปิ วิญฺญาตพฺพา. कारण, शरणगमनांद्वारे बुद्ध, धम्म आणि संघ यांच्या अनुस्मृतीच्या प्रभावाने चित्तभावना (चित्ताची भावना) प्रकाशित केली गेली आहे; शीलपदांद्वारे (सिक्खापदे) शीलभावना प्रकाशित केली गेली आहे; आणि द्वत्तिंसाकाराद्वारे कायभावना (शरीराची भावना) प्रकाशित केली गेली आहे. म्हणून, आता विविध प्रकारे प्रज्ञाभावनेचे (पञ्ञाभावना) मुखदर्शन घडवण्यासाठी हे प्रश्न आणि त्यांची उत्तरे येथे संकलित केली आहेत. किंवा, शील हे समाधीचे निकटचे कारण (पदट्ठान) आहे आणि समाधी हे प्रज्ञेचे निकटचे कारण आहे; जसे की म्हटले आहे – 'शीलावर प्रतिष्ठित होऊन प्रज्ञावान मनुष्य चित्त आणि प्रज्ञेची भावना करतो' (सं. नि. १.२३). म्हणून, सिक्खापदांद्वारे शील आणि द्वत्तिंसाकाराद्वारे त्यावर आधारित समाधी दर्शवून, समाहित चित्त असलेल्या व्यक्तीच्या विविध धम्म-परिकारांद्वारे प्रज्ञेचे भेद दाखवण्यासाठी हे येथे संकलित केले आहे, असेही समजावे. อิทํ เตสํ อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ. हे त्यांचे येथे संकलन करण्याचे प्रयोजन आहे. ปญฺหวณฺณนา पञ्हवण्णना (प्रश्नांचे स्पष्टीकरण) เอกํ นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'एकं नाम किं' (एक म्हणजे काय) या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण อิทานิ เตสํ อตฺถวณฺณนา โหติ – เอกํ นาม กินฺติ ภควา ยสฺมึ เอกธมฺมสฺมึ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, ยสฺมึ จายมายสฺมา นิพฺพินฺทมาโน อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตมกาสิ, ตํ ธมฺมํ สนฺธาย ปญฺหํ ปุจฺฉติ. ‘‘สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา’’ติ เถโร ปุคฺคลาธิฏฺฐานาย เทสนาย วิสฺสชฺเชติ. ‘‘กตมา จ, ภิกฺขเว, สมฺมาสติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ กาเย กายานุปสฺสี วิหรตี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๘) เอวมาทีนิ เจตฺถ สุตฺตานิ เอวํ วิสฺสชฺชนยุตฺติสมฺภเว สาธกานิ. เอตฺถ เยนาหาเรน สพฺเพ สตฺตา ‘‘อาหารฏฺฐิติกา’’ติ วุจฺจนฺติ, โส อาหาโร ตํ วา เนสํ อาหารฏฺฐิติกตฺตํ ‘‘เอกํ นาม กิ’’นฺติ ปุฏฺเฐน เถเรน นิทฺทิฏฺฐนฺติ เวทิตพฺพํ. ตญฺหิ ภควตา อิธ เอกนฺติ อธิปฺเปตํ, น ตุ สาสเน โลเก วา อญฺญํ เอกํ นาม นตฺถีติ ญาเปตุํ วุตฺตํ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – आता त्यांच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण केले जात आहे – 'एकं नाम किं' (एक म्हणजे काय) या प्रश्नाद्वारे भगवंत अशा एका धर्माचा (नियमाचा/तत्वाचा) निर्देश करत आहेत, ज्याच्याविषयी भिक्खूने योग्य प्रकारे विरक्त (निब्बिन्दमानो) होऊन अनुक्रमाने दुःखाचा अंत केला आहे, आणि ज्याच्याविषयी या आयुष्यमानांनी (सोपाकांनी) विरक्त होऊन अनुक्रमाने दुःखाचा अंत केला होता; त्या धर्माला उद्देशून भगवंत हा प्रश्न विचारतात. 'सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका' (सर्व प्राणी आहारावर टिकून आहेत) असे थेरांनी (सोपाक थेरांनी) पुग्गलाधिट्ठान (व्यक्ति-सापेक्ष) देशनेद्वारे उत्तर दिले. 'भिक्खूंनो, सम्मासती म्हणजे काय? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू कायेमध्ये कायानुपस्सी होऊन विहरतो' इत्यादी सुत्ते येथे अशा प्रकारच्या उत्तराच्या योग्यतेचे समर्थन करणारे पुरावे आहेत. येथे ज्या आहाराने सर्व प्राण्यांना 'आहारट्ठितिका' म्हटले जाते, तो आहार किंवा त्यांचे आहारावर टिकून असणे हेच 'एकं नाम किं' असे विचारले असता थेरांनी स्पष्ट केले आहे, असे समजावे. कारण भगवंतांना येथे 'एक' म्हणून हेच अभिप्रेत होते; परंतु शासनात (बुद्ध शासनात) किंवा जगात दुसरे काही 'एक' नावाचे नाही, असे दर्शवण्यासाठी हे म्हटलेलेले नाही. भगवंतांनी असे म्हटलेच आहे – ‘‘เอกธมฺเม, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน สมฺมา วิรชฺชมาโน สมฺมา วิมุจฺจมาโน สมฺมา ปริยนฺตทสฺสาวี สมฺมตฺตํ อภิสเมจฺจ ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตมสฺมึ เอกธมฺเม? สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา. อิมสฺมึ โข, ภิกฺขเว, เอกธมฺเม ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘เอโก ปญฺโห เอโก อุทฺเทโส เอกํ เวยฺยากรณ’นฺติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो, एका धर्मामध्ये (तत्वामध्ये) भिक्खू योग्य प्रकारे विरक्त होऊन, योग्य प्रकारे विराग प्राप्त करून, योग्य प्रकारे विमुक्त होऊन, योग्य प्रकारे अंत पाहणारा बनून, शांतता (सम्मतं) प्राप्त करून याच जन्मात दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या एका धर्मामध्ये? 'सर्व प्राणी आहारावर टिकून आहेत' (सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका). भिक्खूंनो, या एका धर्मामध्ये भिक्खू योग्य प्रकारे विरक्त होऊन... (पे)... दुःखाचा अंत करतो. 'एक प्रश्न, एक उद्देश, एक व्याकरण (स्पष्टीकरण)' असे जे म्हटले गेले आहे, ते यालाच अनुसरून म्हटले गेले आहे.” อาหารฏฺฐิติกาติ เจตฺถ ยถา ‘‘อตฺถิ, ภิกฺขเว, สุภนิมิตฺตํ. ตตฺถ อโยนิโส มนสิการพหุลีกาโร, อยมาหาโร อนุปฺปนฺนสฺส วา กามจฺฉนฺทสฺส อุปฺปาทายา’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๕.๒๓๒) ปจฺจโย อาหาโรติ วุจฺจติ, เอวํ [Pg.64] ปจฺจยํ อาหารสทฺเทน คเหตฺวา ปจฺจยฏฺฐิติกา ‘‘อาหารฏฺฐิติกา’’ติ วุตฺตา. จตฺตาโร ปน อาหาเร สนฺธาย – ‘‘อาหารฏฺฐิติกา’’ติ วุจฺจมาเน ‘‘อสญฺญสตฺตา เทวา อเหตุกา อนาหารา อผสฺสกา อเวทนกา’’ติ วจนโต (วิภ. ๑๐๑๗) ‘‘สพฺเพ’’ติ วจนมยุตฺตํ ภเวยฺย. येथे 'आहारट्ठितिका' या संदर्भात, जसे की – 'भिक्खूंनो, शुभ निमित्त (सुभनिमित्तं) आहे. तेथे अयोग्य मनस्कार (अयोनिसो मनसिकार) वारंवार करणे, हा न उत्पन्न झालेल्या कामच्छंदाच्या उत्पत्तीसाठी आहार (कारण) आहे' इत्यादी वचनांमध्ये प्रत्ययाला (कारणाला/पच्चयाला) 'आहार' म्हटले गेले आहे; त्याचप्रमाणे येथे 'आहार' या शब्दाने 'प्रत्यय' (कारण) ग्रहण करून, प्रत्ययावर टिकून असणाऱ्यांना (पच्चयट्ठितिका) 'आहारट्ठितिका' म्हटले गेले आहे. परंतु, जर चार आहारांना उद्देशून 'आहारट्ठितिका' म्हटले गेले, तर 'असंज्ञसत्त देव अहेतुक, अनाहार, अफस्सक आणि अवेदनक असतात' या वचनानुसार (विभंग १०१७), 'सब्बे' (सर्व) हा शब्द अयोग्य ठरेल. ตตฺถ สิยา – เอวมฺปิ วุจฺจมาเน ‘‘กตเม ธมฺมา สปจฺจยา? ปญฺจกฺขนฺธา – รูปกฺขนฺโธ…เป… วิญฺญาณกฺขนฺโธ’’ติ (ธ. ส. ๑๐๘๙) วจนโต ขนฺธานํเยว ปจฺจยฏฺฐิติกตฺตํ ยุตฺตํ, สตฺตานนฺตุ อยุตฺตเมเวตํ วจนํ ภเวยฺยาติ. น โข ปเนตํ เอวํ ทฏฺฐพฺพํ. กสฺมา? สตฺเตสุ ขนฺโธปจารสิทฺธิโต. สตฺเตสุ หิ ขนฺโธปจาโร สิทฺโธ. กสฺมา? ขนฺเธ อุปาทาย ปญฺญาเปตพฺพโต. กถํ? เคเห คาโมปจาโร วิย. เสยฺยถาปิ หิ เคหานิ อุปาทาย ปญฺญาเปตพฺพตฺตา คามสฺส เอกสฺมิมฺปิ ทฺวีสุ ตีสุปิ วา เคเหสุ ทฑฺเฒสุ ‘‘คาโม ทฑฺโฒ’’ติ เอวํ เคเห คาโมปจาโร สิทฺโธ, เอวเมว ขนฺเธสุ ปจฺจยฏฺเฐน อาหารฏฺฐิติเกสุ ‘‘สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา’’ติ อยํ อุปจาโร สิทฺโธติ เวทิตพฺโพ. ปรมตฺถโต จ ขนฺเธสุ ชายมาเนสุ ชียมาเนสุ มียมาเนสุ จ ‘‘ขเณ ขเณ ตฺวํ ภิกฺขุ ชายเส จ ชียเส จ มียเส จา’’ติ วทตา ภควตา เตสุ สตฺเตสุ ขนฺโธปจาโร สิทฺโธติ ทสฺสิโต เอวาติ เวทิตพฺโพ. ยโต เยน ปจฺจยาขฺเยน อาหาเรน สพฺเพ สตฺตา ติฏฺฐนฺติ, โส อาหาโร ตํ วา เนสํ อาหารฏฺฐิติกตฺตํ เอกนฺติ เวทิตพฺพํ. อาหาโร หิ อาหารฏฺฐิติกตฺตํ วา อนิจฺจตาการณโต นิพฺพิทาฏฺฐานํ โหติ. อถ เตสุ สพฺพสตฺตสญฺญิเตสุ สงฺขาเรสุ อนิจฺจตาทสฺสเนน นิพฺพินฺทมาโน อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, ปรมตฺถวิสุทฺธึ ปาปุณาติ. ยถาห – येथे आक्षेपकाचा असा आक्षेप असू शकतो – 'जरी असे म्हटले तरी, कोणते धर्म सप्रत्यय (सपच्चया - कारणासह असणारे) आहेत? पाच स्कंध – रूपस्कंध... (पे)... विज्ञानस्कंध' या वचनानुसार (धम्मसंगणी १०८९) केवळ स्कंधांचेच प्रत्ययावर टिकून असणे (पच्चयट्ठितिकत्तं) योग्य ठरते, प्राण्यांच्या (सत्ता) बाबतीत हे म्हणणे अयोग्य ठरेल. परंतु, याकडे अशा प्रकारे पाहिले जाऊ नये. का? कारण प्राण्यांच्या बाबतीत 'स्कंधोपचार' (स्कंधांचा उपचार/लाक्षणिक प्रयोग) सिद्ध होतो. प्राण्यांच्या बाबतीत स्कंधोपचार सिद्ध आहे. का? कारण स्कंधांना धरूनच (उपादाय) प्राण्यांची संज्ञा दिली जाते. कसे? जसे घरांच्या अस्तित्वामुळे गावाचा उपचार (गामोपचार) होतो. ज्याप्रमाणे घरांना धरूनच गावाची संज्ञा दिली जात असल्याने, गावातील एका, दोन किंवा तीन घरांना आग लागली तरी 'गाव जळाला' असे म्हटले जाते, आणि अशा प्रकारे घरांच्या आधारे गावाचा उपचार सिद्ध होतो; त्याचप्रमाणे स्कंध हे प्रत्ययाच्या अर्थाने (पच्चयट्ठेन) आहारावर टिकून असणारे (आहारट्ठितिक) असताना, 'प्राणी आहारावर टिकून आहेत' (सत्ता आहारट्ठितिका) हा उपचार सिद्ध होतो, असे समजावे. आणि परमार्थतः स्कंधांच्या उत्पत्ती, जरा आणि मृत्यूच्या वेळी 'हे भिक्खू, क्षणाक्षणाला तू जन्मतोस, वृद्ध होतोस आणि मरतोस' असे म्हणणाऱ्या भगवंतांनी त्या प्राण्यांच्या बाबतीत स्कंधोपचार सिद्ध असल्याचेच दर्शवले आहे, असे समजावे. म्हणून, ज्या प्रत्यय नावाच्या आहाराने (कारणाने) सर्व प्राणी टिकून राहतात, तो आहार किंवा त्यांचे आहारावर टिकून असणे हेच 'एक' म्हणून समजावे. कारण आहार किंवा आहारावर टिकून असणे हे अनित्यता दर्शवत असल्याने विरक्तीचे (निब्बिदा) स्थान बनते. त्यानंतर, 'सर्व प्राणी' अशी संज्ञा असलेल्या त्या संस्कारांमध्ये (संखारांमध्ये) अनित्यता पाहून विरक्त होणारा मनुष्य अनुक्रमाने दुःखाचा अंत करतो आणि परमार्थ विशुद्धीला प्राप्त होतो. जसे की म्हटले आहे – ‘‘สพฺเพ สงฺขารา อนิจฺจาติ, ยทา ปญฺญาย ปสฺสติ; อถ นิพฺพินฺทติ ทุกฺเข, เอส มคฺโค วิสุทฺธิยา’’ติ. (ธ. ป. ๒๗๗); “जेव्हा मनुष्य प्रज्ञेने पाहतो की, 'सर्व संस्कार अनित्य आहेत' (सब्बे संखारा अनिच्चा), तेव्हा तो दुःखापासून विरक्त होतो. हाच विशुद्धीचा (पवित्रतेचा/मुक्तीचा) मार्ग आहे.” เอตฺถ จ ‘‘เอกํ นาม กิ’’นฺติ จ ‘‘กิหา’’ติ จ ทุวิโธ ปาโฐ, ตตฺถ สีหฬานํ กิหาติ ปาโฐ. เต หิ ‘‘กิ’’นฺติ วตฺตพฺเพ ‘‘กิหา’’ติ วทนฺติ. เกจิ ภณนฺติ ‘‘ห-อิติ นิปาโต, เถริยานมฺปิ อยเมว ปาโฐ’’ติ อุภยถาปิ ปน เอโกว อตฺโถ. ยถา รุจฺจติ, ตถา ปฐิตพฺพํ. ยถา ปน ‘‘สุเขน ผุฏฺโฐ อถ วา ทุเขน (ธ. ป. ๘๓), ทุกฺขํ โทมนสฺสํ ปฏิสํเวเทตี’’ติ เอวมาทีสุ [Pg.65] กตฺถจิ ทุขนฺติ จ กตฺถจิ ทุกฺขนฺติ จ วุจฺจติ, เอวํ กตฺถจิ เอกนฺติ, กตฺถจิ เอกฺกนฺติ วุจฺจติ. อิธ ปน เอกํ นามาติ อยเมว ปาโฐ. आणि येथे (या खुद्दकपाठामध्ये) 'एकं नाम किम्' (ekaṃ nāma kiṃ) आणि 'किहा' (kihā) असा दोन प्रकारचा पाठ आढळतो. त्यापैकी सिंहली लोकांचा पाठ 'किहा' असा आहे. कारण जेव्हा 'किम्' असे म्हणावयाचे असते, तेव्हा ते 'किहा' असे म्हणतात. काही आचार्य म्हणतात की, 'ह' हा निपात (अव्यय) आहे आणि थेरींच्या गाथांमध्येही हाच पाठ आहे. परंतु दोन्ही प्रकारे अर्थ एकच होतो. जसे आवडेल (योग्य वाटेल) तसे पठण करावे. परंतु, जसे 'सुखाने स्पर्श झालेला किंवा दुःखाने' (धम्मपद ८३), 'दुःख आणि दौर्मनस्य अनुभवतो' इत्यादी ठिकाणी काही पाठांमध्ये 'दुख' (dukha) आणि काही पाठांमध्ये 'दुःख' (dukkha) असे म्हटले जाते; त्याचप्रमाणे काही ठिकाणी 'एकं' (ekaṃ) आणि काही ठिकाणी 'एक्कं' (ekkaṃ) असे म्हटले जाते. परंतु येथे 'एकं नाम' (ekaṃ nāma) हाच पाठ योग्य आहे. ทฺเว นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'द्वे नाम किम्' (दोन काय आहे?) या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण. เอวํ อิมินา ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา ปุริมนเยเนว อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ ทฺเว นาม กินฺติ? เถโร ทฺเวติ ปจฺจนุภาสิตฺวา ‘‘นามญฺจ รูปญฺจา’’ติ ธมฺมาธิฏฺฐานาย เทสนาย วิสฺสชฺเชติ. ตตฺถ อารมฺมณาภิมุขํ นมนโต, จิตฺตสฺส จ นติเหตุโต สพฺพมฺปิ อรูปํ ‘‘นาม’’นฺติ วุจฺจติ. อิธ ปน นิพฺพิทาเหตุตฺตา สาสวธมฺมเมว อธิปฺเปตํ รุปฺปนฏฺเฐน จตฺตาโร จ มหาภูตา, สพฺพญฺจ ตทุปาทาย ปวตฺตมานํ รูปํ ‘‘รูป’’นฺติ วุจฺจติ, ตํ สพฺพมฺปิ อิธาธิปฺเปตํ. อธิปฺปายวเสเนว เจตฺถ ‘‘ทฺเว นาม นามญฺจ รูปญฺจา’’ติ วุตฺตํ, น อญฺเญสํ ทฺวินฺนมภาวโต. ยถาห – अशा प्रकारे, या प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट होऊन शास्त्यांनी (भगवंतांनी) पूर्वीच्याच पद्धतीने पुढील प्रश्न विचारला—'दोन काय आहे?' (dve nāma kinti?). स्थविरांनी 'दोन' असे पुन्हा म्हणून 'नाम आणि रूप' (nāmañca rūpañca) असे धर्माधिष्ठित देशनेद्वारे उत्तर दिले. त्यामध्ये, आलंबनाकडे (विषयाकडे) झुकण्याच्या (नमण्याच्या) स्वभावामुळे आणि चित्ताच्या प्रवृत्तीचे कारण असल्यामुळे सर्व अरूपात्मक (अभौतिक) धर्मांना 'नाम' असे म्हटले जाते. परंतु येथे, वैराग्याचे (निर्वेदाचे) कारण असल्यामुळे केवळ सासव (आसवांसह असलेले) धर्मच अभिप्रेत आहेत. पीडित होण्याच्या (विकार पावण्याच्या) अर्थाने चार महाभूत आणि त्यांच्यावर अवलंबून असणारे सर्व रूप यांना 'रूप' असे म्हटले जाते; ते सर्व येथे अभिप्रेत आहे. आणि येथे अभिप्रायाच्या (विवक्षित अर्थाच्या) बळावरच 'दोन म्हणजे नाम आणि रूप' असे म्हटले आहे, इतर कोणत्याही दोन गोष्टींच्या अभावामुळे नाही. जसे की म्हटले आहे— ‘‘ทฺวีสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ ทฺวีสุ? นาเม จ รูเป จ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, ทฺวีสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘ทฺเว ปญฺหา, ทฺเว อุทฺเทสา, ทฺเว เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो, दोन धर्मांविषयी योग्य प्रकारे वैराग्य (निर्वेद) प्राप्त करून भिक्खू...पे... दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या दोन धर्मांविषयी? नाम आणि रूप यांविषयी. भिक्खूंनो, या दोन धर्मांविषयी योग्य प्रकारे वैराग्य प्राप्त करून भिक्खू...पे... दुःखाचा अंत करतो. 'दोन प्रश्न, दोन उद्देश (विषय) आणि दोन व्याकरणे (उत्तरे)' असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच संदर्भात म्हटले गेले आहे.” (अंगुत्तर निकाय १०.२७) เอตฺถ จ นามรูปมตฺตทสฺสเนน อตฺตทิฏฺฐึ ปหาย อนตฺตานุปสฺสนามุเขเนว นิพฺพินฺทมาโน อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, ปรมตฺถวิสุทฺธึ ปาปุณาตีติ เวทิตพฺโพ. ยถาห – आणि येथे केवळ नाम-रूपाचे दर्शन घेऊन, आत्मदृष्टीचा (अहंभावाचा) त्याग करून, अनात्मानुपश्यनेच्या (अनात्मभावाच्या अनुप्रेक्षेच्या) माध्यमातूनच वैराग्य प्राप्त करून मनुष्य अनुक्रमाने दुःखाचा अंत करतो आणि परमार्थ विशुद्धीला (परम शुद्धीला) प्राप्त होतो, असे समजावे. जसे की म्हटले आहे— ‘‘สพฺเพ ธมฺมา อนตฺตาติ, ยทา ปญฺญาย ปสฺสติ; อถ นิพฺพินฺทติ ทุกฺเข, เอส มคฺโค วิสุทฺธิยา’’ติ. (ธ. ป. ๒๗๙); “जेव्हा प्रज्ञेने पाहतो की, 'सर्व धर्म अनात्म आहेत', तेव्हा तो दुःखापासून विरक्त होतो (वैराग्य प्राप्त करतो). हाच विशुद्धीचा (शुद्धीचा) मार्ग आहे.” (धम्मपद २७९) ตีณิ นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'तीणि नाम किम्' (तीन काय आहे?) या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण. อิทานิ อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา ปุริมนเยเนว อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ ตีณิ นาม กินฺติ? เถโร ตีณีติ ปจฺจนุภาสิตฺวา ปุน พฺยากริตพฺพสฺส อตฺถสฺส ลิงฺคานุรูปํ สงฺขฺยํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ติสฺโส เวทนา’’ติ วิสฺสชฺเชติ. อถ วา ‘‘ยา ภควตา ‘ติสฺโส เวทนา’ติ วุตฺตา, อิมาสมตฺถมหํ [Pg.66] ตีณีติ ปจฺเจมี’’ติ ทสฺเสนฺโต อาหาติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. อเนกมุขา หิ เทสนา ปฏิสมฺภิทาปเภเทน เทสนาวิลาสปฺปตฺตานํ. เกจิ ปนาหุ ‘‘ตีณีติ อธิกปทมิท’’นฺติ. ปุริมนเยเนว เจตฺถ ‘‘ติสฺโส เวทนา’’ติ วุตฺตํ, น อญฺเญสํ ติณฺณมภาวโต. ยถาห – आता, याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट होऊन शास्त्यांनी (भगवंतांनी) पूर्वीच्याच पद्धतीने पुढील प्रश्न विचारला—'तीन काय आहे?' (tīṇi nāma kinti?). स्थविरांनी 'तीन' असे पुन्हा म्हणून, स्पष्ट करावयाच्या अर्थाच्या लिंगानुसार (व्याकरणिक लिंगानुसार) संख्या दर्शवण्यासाठी 'तिस्रो वेदना' (tisso vedanā - तीन वेदना) असे उत्तर दिले. किंवा, 'भगवंतांनी ज्या तीन वेदना सांगितल्या आहेत, त्या अर्थाला मी तीन असे समजतो' हे दर्शवण्यासाठी त्यांनी असे म्हटले, असाही येथे अर्थ समजला पाहिजे. कारण प्रतिसंभिदांच्या (ज्ञानप्रभेदांच्या) वर्गीकरणानुसार देशनेचे सौंदर्य प्राप्त केलेल्यांची देशना अनेक प्रकारची (विविध पैलू असलेली) असते. परंतु काही आचार्य म्हणतात की, 'तीणि' (tīṇi) हा शब्द अधिक (अनावश्यक) आहे. येथेही पूर्वीच्याच पद्धतीने 'तिस्रो वेदना' असे म्हटले आहे, इतर कोणत्याही तीन गोष्टींच्या अभावामुळे नाही. जसे की म्हटले आहे— ‘‘ตีสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ ตีสุ? ตีสุ เวทนาสุ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, ตีสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘ตโย ปญฺหา, ตโย อุทฺเทสา, ตีณิ เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो, तीन धर्मांविषयी योग्य प्रकारे वैराग्य (निर्वेद) प्राप्त करून भिक्खू...पे... दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या तीन धर्मांविषयी? तीन वेदनांविषयी. भिक्खूंनो, या तीन धर्मांविषयी योग्य प्रकारे वैराग्य प्राप्त करून भिक्खू...पे... दुःखाचा अंत करतो. 'तीन प्रश्न, तीन उद्देश आणि तीन व्याकरणे (उत्तरे)' असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच संदर्भात म्हटले गेले आहे.” (अंगुत्तर निकाय १०.२७) เอตฺถ จ ‘‘ยํกิญฺจิ เวทยิตํ, สพฺพํ ตํ ทุกฺขสฺมินฺติ วทามี’’ติ (สํ. นิ. ๔.๒๕๙) วุตฺตสุตฺตานุสาเรน วา. – आणि येथे, “जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखातच समाविष्ट आहे, असे मी म्हणतो” (संयुत्त निकाय ४.२५९) या सांगितलेल्या सुत्ताच्या अनुषंगाने किंवा— ‘‘โย สุขํ ทุกฺขโต อทฺท, ทุกฺขมทฺทกฺขิ สลฺลโต; อทุกฺขมสุขํ สนฺตํ, อทฺทกฺขิ นํ อนิจฺจโต’’ติ. (อิติวุ. ๕๓) – “ज्याने सुखाला दुःख म्हणून पाहिले, दुःखाला शल्य (काटा) म्हणून पाहिले, आणि शांत असलेल्या अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदनेला अनित्य म्हणून पाहिले.” (इतिवृत्तक ५३) — เอวํ ทุกฺขทุกฺขตาวิปริณามทุกฺขตาสงฺขารทุกฺขตานุสาเรน วา ติสฺสนฺนํ เวทนานํ ทุกฺขภาวทสฺสเนน สุขสญฺญํ ปหาย ทุกฺขานุปสฺสนามุเขน นิพฺพินฺทมาโน อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, ปรมตฺถวิสุทฺธึ ปาปุณาตีติ เวทิตพฺโพ. ยถาห – अशा प्रकारे, दुःख-दुःखता (दुःखाचे दुःख असणे), विपरिणाम-दुःखता (बदलाचे दुःख असणे) आणि संस्कार-दुःखता (संस्कारांचे दुःख असणे) यांच्या अनुषंगाने तिन्ही वेदनांचे दुःखत्व पाहून, सुखसंज्ञेचा (सुख वाटण्याच्या कल्पनेचा) त्याग करून, दुःखानुपश्यनेच्या (दुःखाच्या अनुप्रेक्षेच्या) माध्यमातून वैराग्य प्राप्त करून मनुष्य अनुक्रमाने दुःखाचा अंत करतो आणि परमार्थ विशुद्धीला प्राप्त होतो, असे समजावे. जसे की म्हटले आहे— ‘‘สพฺเพ สงฺขารา ทุกฺขาติ, ยทา ปญฺญาย ปสฺสติ; อถ นิพฺพินฺทติ ทุกฺเข, เอส มคฺโค วิสุทฺธิยา’’ติ. (ธ. ป. ๒๗๘); “जेव्हा प्रज्ञेने पाहतो की, 'सर्व संस्कार दुःखद आहेत', तेव्हा तो दुःखापासून विरक्त होतो. हाच विशुद्धीचा मार्ग आहे.” (धम्मपद २७८) จตฺตาริ นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'चत्तारि नाम किम्' (चार काय आहे?) या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण. เอวํ อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา ปุริมนเยเนว อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ จตฺตาริ นาม กินฺติ? ตตฺถ อิมสฺส ปญฺหสฺส พฺยากรณปกฺเข กตฺถจิ ปุริมนเยเนว จตฺตาโร อาหารา อธิปฺเปตา. ยถาห – अशा प्रकारे, याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट होऊन शास्त्यांनी (भगवंतांनी) पूर्वीच्याच पद्धतीने पुढील प्रश्न विचारला—'चार काय आहे?' (cattāri nāma kinti?). तेथे या प्रश्नाच्या उत्तराच्या संदर्भात, काही ठिकाणी पूर्वीच्याच पद्धतीने 'चार आहार' अभिप्रेत आहेत. जसे की म्हटले आहे— ‘‘จตูสุ[Pg.67], ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ จตูสุ? จตูสุ อาหาเรสุ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, จตูสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘จตฺตาโร ปญฺหา จตฺตาโร อุทฺเทสา จตฺตาริ เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो, चार धर्मांविषयी योग्य प्रकारे वैराग्य (निर्वेद) प्राप्त करून भिक्खू...पे... दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या चार धर्मांविषयी? चार आहारांविषयी. भिक्खूंनो, या चार धर्मांविषयी योग्य प्रकारे वैराग्य प्राप्त करून भिक्खू...पे... दुःखाचा अंत करतो. 'चार प्रश्न, चार उद्देश आणि चार व्याकरणे (उत्तरे)' असे जे म्हटले गेले आहे, ते याच संदर्भात म्हटले गेले आहे.” (अंगुत्तर निकाय १०.२७) กตฺถจิ เยสุ สุภาวิตจิตฺโต อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, ตานิ จตฺตาริ สติปฏฺฐานานิ. ยถาห กชงฺคลา ภิกฺขุนี – काही ठिकाणी, ज्यांच्यामध्ये चित्त चांगल्या प्रकारे भावनायुक्त (विकसित) केल्याने मनुष्य अनुक्रमाने दुःखाचा अंत करतो, ते 'चार सतिपट्ठान' (स्मृतिप्रस्थान) आहेत. जसे की कजंगला भिक्खुणीने म्हटले आहे— ‘‘จตูสุ, อาวุโส, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา สุภาวิตจิตฺโต สมฺมา ปริยนฺตทสฺสาวี สมฺมตฺตํ อภิสเมจฺจ ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ จตูสุ? จตูสุ สติปฏฺฐาเนสุ. อิเมสุ โข, อาวุโส, จตูสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา สุภาวิตจิตฺโต…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘จตฺตาโร ปญฺหา จตฺตาโร อุทฺเทสา จตฺตาริ เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ ภควตา, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๘). “आवुसो (मित्रांनो), चार धर्मांविषयी ज्या भिक्खूचे चित्त योग्य प्रकारे भावनायुक्त (विकसित) झाले आहे, जो योग्य प्रकारे अंत पाहणारा (मर्यादा पाहणारा) आहे, तो सम्यक्त्व (निर्वाण) प्राप्त करून याच जन्मात दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या चार धर्मांविषयी? चार सतिपट्ठानांविषयी (स्मृतिप्रस्थानांविषयी). आवुसो, या चार धर्मांविषयी ज्या भिक्खूचे चित्त योग्य प्रकारे भावनायुक्त झाले आहे...पे... तो दुःखाचा अंत करतो. 'चार प्रश्न, चार उद्देश आणि चार व्याकरणे (उत्तरे)' असे भगवंतांनी जे म्हटले आहे, ते याच संदर्भात म्हटले गेले आहे.” (अंगुत्तर निकाय १०.२८) อิธ ปน เยสํ จตุนฺนํ อนุโพธปฺปฏิเวธโต ภวตณฺหาเฉโท โหติ, ยสฺมา ตานิ จตฺตาริ อริยสจฺจานิ อธิปฺเปตานิ. ยสฺมา วา อิมินา ปริยาเยน พฺยากตํ สุพฺยากตเมว โหติ, ตสฺมา เถโร จตฺตารีติ ปจฺจนุภาสิตฺวา ‘‘อริยสจฺจานี’’ติ วิสฺสชฺเชติ. ตตฺถ จตฺตารีติ คณนปริจฺเฉโท. อริยสจฺจานีติ อริยานิ สจฺจานิ, อวิตถานิ อวิสํวาทกานีติ อตฺโถ. ยถาห – येथे (या संदर्भात) ज्या चार आर्यसत्यांच्या अनुबोध (क्रमशः ज्ञान) आणि प्रतिवेध (पूर्ण आकलन) मुळे भवतण्हा (अस्तित्वाची तृष्णा) नष्ट होते, त्या चार आर्यसत्यांचे येथे ग्रहण अभिप्रेत आहे. किंवा, ज्या अर्थी या पर्यायाने (पद्धतीने) दिलेले उत्तर हे सुस्पष्ट (उत्कृष्ट) उत्तर ठरते, म्हणूनच स्थविरांनी (सोपाक स्थविरांनी) 'चार' असे पुन्हा म्हणून 'आर्यसत्ये' असे उत्तर दिले. त्यामध्ये 'चार' (चत्तारि) हा संख्यावाचक शब्द आहे. 'आर्यसत्ये' (अरियसच्चानि) म्हणजे श्रेष्ठ सत्ये, जे यथार्थ (अवितथ) आणि विसंवादरहित (अविसंवादक - अचूक) आहेत, असा अर्थ आहे. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘อิมานิ โข, ภิกฺขเว, จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ตถานิ อวิตถานิ อนญฺญถานิ, ตสฺมา อริยสจฺจานีติ วุจฺจนฺตี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๑๐๙๗). “भिक्खूहो! ही चार आर्यसत्ये यथार्थ (तथ), अवितथ (अपरिवर्तनीय) आणि अनन्यथा (दुसऱ्या कोणत्याही प्रकारे नसलेली) आहेत, म्हणूनच त्यांना 'आर्यसत्ये' असे म्हटले जाते.” ยสฺมา วา สเทวเกน โลเกน อรณียโต อภิคมนียโตติ วุตฺตํ โหติ, วายมิตพฺพฏฺฐานสญฺญิเต อเย วา อิริยนโต, อนเย วา น อิริยนโต, สตฺตตึสโพธิปกฺขิยอริยธมฺมสมาโยคโต วา อริยสมฺมตา พุทฺธปจฺเจกพุทฺธพุทฺธสาวกา เอตานิ ปฏิวิชฺฌนฺติ, ตสฺมาปิ ‘‘อริยสจฺจานี’’ติ วุจฺจนฺติ. ยถาห – किंवा, देवलोकासह संपूर्ण जगाने जाणण्यायोग्य (अरणीय) आणि प्राप्त करण्यायोग्य (अभिगमनीय) असल्यामुळे त्यांना 'आर्य' म्हटले जाते; किंवा प्रयत्न करण्यायोग्य स्थानांमध्ये कल्याणाची (अय) प्राप्ती करून देणारे असल्यामुळे, किंवा अकल्याणाची (अनय) प्राप्ती न करून देणारे असल्यामुळे त्यांना 'आर्य' म्हटले जाते; किंवा सदतीस बोधिपक्खिय आर्यधम्मांशी उत्तम प्रकारे युक्त असल्यामुळे 'आर्य' मानले गेलेले बुद्ध, पच्चेकबुद्ध आणि बुद्धश्रावक या सत्यांचा प्रतिवेध (साक्षात्कार) करतात, म्हणूनही त्यांना 'आर्यसत्ये' असे म्हटले जाते. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘จตฺตาริมานิ[Pg.68], ภิกฺขเว, อริยสจฺจานิ…เป… อิมานิ โข, ภิกฺขเว, จตฺตาริ อริยสจฺจานิ, อริยา อิมานิ ปฏิวิชฺฌนฺติ, ตสฺมา อริยสจฺจานีติ วุจฺจนฺตี’’ติ. “भिक्खूहो! ही चार आर्यसत्ये आहेत... पे... भिक्खूहो! ही चार आर्यसत्ये आहेत, आर्य (श्रेष्ठ जन) या सत्यांचा प्रतिवेध करतात, म्हणूनच त्यांना 'आर्यसत्ये' असे म्हटले जाते.” อปิจ อริยสฺส ภควโต สจฺจานีติปิ อริยสจฺจานิ. ยถาห – शिवाय, आर्य (श्रेष्ठ) अशा भगवंतांची ही सत्ये आहेत, म्हणूनही ती 'आर्यसत्ये' आहेत. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘สเทวเก, ภิกฺขเว…เป… สเทวมนุสฺสาย ตถาคโต อริโย, ตสฺมา อริยสจฺจานีติ วุจฺจนฺตี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๑๐๙๘). “भिक्खूहो! देवलोकासह... पे... देव आणि मनुष्यांसह या संपूर्ण जगात तथागत हे 'आर्य' (श्रेष्ठ) आहेत, म्हणूनच यांना 'आर्यसत्ये' असे म्हटले जाते.” อถ วา เอเตสํ อภิสมฺพุทฺธตฺตา อริยภาวสิทฺธิโตปิ อริยสจฺจานิ. ยถาห – किंवा, या सत्यांचा पूर्णपणे बोध झाल्यामुळे आर्यत्वाची सिद्धी होत असल्यामुळेही ही 'आर्यसत्ये' आहेत. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘อิเมสํ โข, ภิกฺขเว, จตุนฺนํ อริยสจฺจานํ ยถาภูตํ อภิสมฺพุทฺธตฺตา ตถาคโต อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธติ วุจฺจตี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๑๐๙๓). “भिक्खूहो! या चार आर्यसत्यांचा यथार्थपणे पूर्ण बोध (अभिसंबोध) झाल्यामुळेच तथागतांना 'अरहंत सम्मासम्बुद्ध' असे म्हटले जाते.” อยเมเตสํ ปทตฺโถ. เอเตสํ ปน อริยสจฺจานํ อนุโพธปฺปฏิเวธโต ภวตณฺหาเฉโท โหติ. ยถาห – हा या पदांचा अर्थ आहे. या आर्यसत्यांच्या अनुबोध आणि प्रतिवेधामुळे भवतण्हा (अस्तित्वाची तृष्णा) नष्ट होते. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘ตยิทํ, ภิกฺขเว, ทุกฺขํ อริยสจฺจํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ…เป… ทุกฺขนิโรธคามินิปฏิปทา อริยสจฺจํ อนุพุทฺธํ ปฏิวิทฺธํ, อุจฺฉินฺนา ภวตณฺหา, ขีณา ภวเนตฺติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’ติ (สํ. นิ. ๕.๑๐๙๑). “भिक्खूहो! ते हे दुःख आर्यसत्य अनुबुद्ध (अनुक्रमे जाणले गेले) आणि प्रतिविद्ध (साक्षात्कृत केले गेले) आहे... पे... दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य अनुबुद्ध आणि प्रतिविद्ध आहे. भवतण्हा समूळ नष्ट झाली आहे, भवनेत्ती (पुनर्जन्माचे बंधन) क्षीण झाली आहे, आता पुनर्जन्म नाही.” ปญฺจ นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'पाच म्हणजे काय?' या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण. อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา ปุริมนเยเนว อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ ปญฺจ นาม กินฺติ? เถโร ปญฺจาติ ปจฺจนุภาสิตฺวา ‘‘อุปาทานกฺขนฺธา’’ติ วิสฺสชฺเชติ. ตตฺถ ปญฺจาติ คณนปริจฺเฉโท. อุปาทานชนิตา อุปาทานชนกา วา ขนฺธา อุปาทานกฺขนฺธา. ยํกิญฺจิ รูปํ, เวทนา, สญฺญา, สงฺขารา, วิญฺญาณญฺจ สาสวา อุปาทานิยา, เอเตสเมตํ อธิวจนํ. ปุพฺพนเยเนว เจตฺถ ‘‘ปญฺจุปาทานกฺขนฺธา’’ติ วุตฺตํ, น อญฺเญสํ ปญฺจนฺนมภาวโต. ยถาห – याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट झालेल्या शास्त्यांनी (बुद्धांनी) पूर्वीच्याच पद्धतीने पुढील प्रश्न विचारला, "पाच म्हणजे काय?" स्थविरांनी 'पाच' असे पुन्हा म्हणून "उपादानक्खंध" (उपादान स्कंध) असे उत्तर दिले. त्यामध्ये 'पाच' (पञ्च) हा संख्यावाचक शब्द आहे. उपादानाद्वारे उत्पन्न झालेले किंवा उपादानाला जन्म देणारे स्कंध म्हणजे 'उपादानक्खंध' होत. जे काही रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान हे सास्रव (आसवांसह असलेले) आणि उपादानयोग्य आहेत, हे त्यांचेच नाव आहे. पूर्वीच्याच पद्धतीने येथे 'पंचोपादानक्खंध' असे म्हटले आहे, कारण या पाच उपादानस्कंधांशिवाय इतर कोणतेही पाच (असे धर्म) अस्तित्वात नाहीत. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘ปญฺจสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ ปญฺจสุ? ปญฺจสุ อุปาทานกฺขนฺเธสุ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, ปญฺจสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘ปญฺจ ปญฺหา, ปญฺจ อุทฺเทสา[Pg.69], ปญฺจ เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूहो! पाच धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळलेला (निर्वेद प्राप्त झालेला) होऊन... पे... दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या पाच धर्मांविषयी? पाच उपादानस्कंधांविषयी. भिक्खूहो! या पाच धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळलेला होऊन... पे... दुःखाचा अंत करतो. 'पाच प्रश्न, पाच उद्देश (विषय) आणि पाच व्याकरणे (उत्तरे)' असे जे म्हटले गेले आहे, ते यालाच अनुसरून म्हटले आहे.” เอตฺถ จ ปญฺจกฺขนฺเธ อุทยพฺพยวเสน สมฺมสนฺโต วิปสฺสนามตํ ลทฺธา อนุปุพฺเพน นิพฺพานามตํ สจฺฉิกโรติ. ยถาห – आणि येथे पाच स्कंधांच्या उदय आणि व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) या स्वरूपाचे चिंतन करणारा साधक विपश्यना-अमृताला प्राप्त करून घेऊन, अनुक्रमे निर्वाण-अमृताचा साक्षात्कार करतो. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘ยโต ยโต สมฺมสติ, ขนฺธานํ อุทยพฺพยํ; ลภตี ปีติปาโมชฺชํ, อมตํ ตํ วิชานต’’นฺติ. (ธ. ป. ๓๗๔); “ज्या ज्या वेळी तो स्कंधांच्या उदय आणि व्ययाचे चिंतन करतो, त्या त्या वेळी त्याला प्रीती आणि प्रमोद प्राप्त होतो; जाणणाऱ्यांसाठी तेच अमृत (निर्वाण) आहे.” ฉ นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'सहा म्हणजे काय?' या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण. เอวํ อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา ปุริมนเยเนว อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ ‘‘ฉ นาม กิ’’นฺติ? เถโร ฉอิติ ปจฺจนุภาสิตฺวา ‘อชฺฌตฺติกานิ อายตนานี’ติ วิสฺสชฺเชติ. ตตฺถ ฉอิติ คณนปริจฺเฉโท, อชฺฌตฺเต นิยุตฺตานิ, อตฺตานํ วา อธิกตฺวา ปวตฺตานิ อชฺฌตฺติกานิ. อายตนโต, อายสฺส วา ตนนโต, อายตสฺส วา สํสารทุกฺขสฺส นยนโต อายตนานิ, จกฺขุโสตฆานชิวฺหากายมนานเมตํ อธิวจนํ. ปุพฺพนเยน เจตฺถ ‘‘ฉ อชฺฌตฺติกานิ อายตนานี’’ติ วุตฺตํ, น อญฺเญสํ ฉนฺนมภาวโต. ยถาห – अशा प्रकारे याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट झालेल्या शास्त्यांनी (बुद्धांनी) पूर्वीच्याच पद्धतीने पुढील प्रश्न विचारला, "सहा म्हणजे काय?" स्थविरांनी 'सहा' असे पुन्हा म्हणून "अध्यात्मिक आयतने" (अज्झत्तिकानि आयतनानि) असे उत्तर दिले. त्यामध्ये 'सहा' (छ) हा संख्यावाचक शब्द आहे. अध्यात्माशी (अंतर्गत स्वरूपाशी) जोडलेले किंवा स्वतःला मुख्य करून प्रवृत्त होणारे ते 'अध्यात्मिक' होय. आय (संसारचक्र) वाढवणारे असल्यामुळे, किंवा आयाचा विस्तार करणारे असल्यामुळे, किंवा दीर्घकालीन संसारदुःखाला वाहून आणणारे असल्यामुळे त्यांना 'आयतने' म्हणतात. हे चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिव्हा, काय आणि मन यांचे नाव आहे. पूर्वीच्याच पद्धतीने येथे 'सहा अध्यात्मिक आयतने' असे म्हटले आहे, कारण या सहा आयतनांशिवाय इतर कोणतेही सहा (असे धर्म) अस्तित्वात नाहीत. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘ฉสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ ฉสุ? ฉสุ อชฺฌตฺติเกสุ อายตเนสุ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, ฉสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘ฉ ปญฺหา ฉ อุทฺเทสา ฉ เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूहो! सहा धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळलेला (निर्वेद प्राप्त झालेला) होऊन... पे... दुःखाचा अंत करतो. कोणत्या सहा धर्मांविषयी? सहा अध्यात्मिक आयतनांविषयी. भिक्खूहो! या सहा धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळलेला होऊन... पे... दुःखाचा अंत करतो. 'सहा प्रश्न, सहा उद्देश आणि सहा व्याकरणे' असे जे म्हटले गेले आहे, ते यालाच अनुसरून म्हटले आहे.” เอตฺถ จ ฉ อชฺฌตฺติกานิ อายตนานิ, ‘‘สุญฺโญ คาโมติ โข, ภิกฺขเว, ฉนฺเนตํ อชฺฌตฺติกานํ อายตนานํ อธิวจน’’นฺติ (สํ. นิ. ๔.๒๓๘) วจนโต สุญฺญโต ปุพฺพุฬกมรีจิกาทีนิ วิย อจิรฏฺฐิติกโต ตุจฺฉโต วญฺจนโต จ สมนุปสฺสํ นิพฺพินฺทมาโน อนุปุพฺเพน ทุกฺขสฺสนฺตํ กตฺวา มจฺจุราชสฺส อทสฺสนํ อุเปติ. ยถาห – आणि येथे सहा अध्यात्मिक आयतने म्हणजे, "भिक्खूहो! 'शून्य गाव' हे या सहा अध्यात्मिक आयतनांचेच नाव आहे" या वचनानुसार, ती शून्य (रिकामी) आहेत, पाण्याचे बुडबुडे किंवा मृगजळ यांसारखी क्षणभंगुर आहेत, तुच्छ (असार) आहेत आणि फसवी आहेत, असे योग्य प्रकारे पाहणारा साधक त्यांच्याविषयी विरक्त होतो आणि अनुक्रमे दुःखाचा अंत करून मृत्यूराजाला न दिसणाऱ्या (निर्वाण) पदाला प्राप्त होतो. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘ยถา [Pg.70] ปุพฺพุฬกํ ปสฺเส, ยถา ปสฺเส มรีจิกํ; เอวํ โลกํ อเวกฺขนฺตํ, มจฺจุราชา น ปสฺสตี’’ติ. (ธ. ป. ๑๗๐); “ज्याप्रमाणे पाण्याचा बुडबुडा पाहावा, ज्याप्रमाणे मृगजळ पाहावे; त्याप्रमाणे या जगाकडे पाहणाऱ्या माणसाला मृत्यूराजा पाहू शकत नाही (तो मृत्यूच्या पलीकडे जातो).” สตฺต นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา 'सात म्हणजे काय?' या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण. อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ สตฺต นาม กินฺติ? เถโร กิญฺจาปิ มหาปญฺหพฺยากรเณ สตฺต วิญฺญาณฏฺฐิติโย วุตฺตา, อปิจ โข ปน เยสุ ธมฺเมสุ สุภาวิตจิตฺโต ภิกฺขุ ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, เต ทสฺเสนฺโต ‘‘สตฺต โพชฺฌงฺคา’’ติ วิสฺสชฺเชติ. อยมฺปิ จตฺโถ ภควตา อนุมโต เอว. ยถาห – याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट झालेल्या शास्त्यांनी (बुद्धांनी) पुढील प्रश्न विचारला, "सात म्हणजे काय?" स्थविरांनी, जरी महाप्रश्नांच्या स्पष्टीकरणात 'सात विज्ञानस्थिती' (सत्त विञ्ञाणट्ठितियो) सांगितल्या असल्या, तरीही ज्या धर्मांची उत्तम प्रकारे भावना (विकास) केल्याने भिक्खू दुःखाचा अंत करतो, ते धर्म दर्शवण्यासाठी "सात बोज्झंग" (सत्त बोज्झङ्गा - सात बोध्यंग) असे उत्तर दिले. हा अर्थ देखील भगवंतांना संमतच होता. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘ปณฺฑิตา คหปตโย กชงฺคลิกา ภิกฺขุนี, มหาปญฺญา คหปตโย กชงฺคลิกา ภิกฺขุนี, มญฺเจปิ ตุมฺเห คหปตโย อุปสงฺกมิตฺวา เอตมตฺถํ ปฏิปุจฺเฉยฺยาถ, อหมฺปิ เจตํ เอวเมว พฺยากเรยฺยํ, ยถา ตํ กชงฺคลิกาย ภิกฺขุนิยา พฺยากต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๘). “गृहपतींनो, कजंगला येथील भिक्खुनी पंडित (विद्वान) आहे. गृहपतींनो, कजंगला येथील भिक्खुनी महाप्रज्ञ (मोठ्या बुद्धीची) आहे. गृहपतींनो, जर तुम्ही माझ्याकडे येऊन हाच अर्थ विचारला असता, तर मीसुद्धा त्याचे तसेच उत्तर दिले असते, जसे कजंगला येथील भिक्खुनीने दिले आहे.” ตาย จ เอวํ พฺยากตํ – आणि तिने (त्या भिक्खुनीने) याप्रमाणे उत्तर दिले – ‘‘สตฺตสุ, อาวุโส, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา สุภาวิตจิตฺโต…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ สตฺตสุ? สตฺตสุ โพชฺฌงฺเคสุ. อิเมสุ โข, อาวุโส, สตฺตสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา สุภาวิตจิตฺโต…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘สตฺต ปญฺหา สตฺต อุทฺเทสา สตฺต เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ ภควตา, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๘). “आवुसो (बंधूंनो), सात धर्मांमध्ये ज्या भिक्खूचे चित्त चांगल्या प्रकारे सुभावित (विकसित) झाले आहे... पे... तो दुःखाचा अंत करणारा होतो. कोणत्या सात धर्मांमध्ये? सात बोज्झंगांमध्ये (बोध्यंगांमध्ये). आवुसो, या सात धर्मांमध्ये ज्या भिक्खूचे चित्त चांगल्या प्रकारे सुभावित झाले आहे... पे... तो दुःखाचा अंत करणारा होतो. ‘सात प्रश्न, सात उद्देश, सात व्याकरणे (स्पष्टीकरणे)’ असे जे भगवंतांनी म्हटले होते, ते यालाच अनुसरून म्हटले होते.” เอวมยมตฺโถ ภควตา อนุมโต เอวาติ เวทิตพฺโพ. यावरून, हा अर्थ भगवंतांना संमतच होता, असे जाणावे. ตตฺถ สตฺตาติ อูนาธิกนิวารณคณนปริจฺเฉโท. โพชฺฌงฺคาติ สติอาทีนํ ธมฺมานเมตํ อธิวจนํ. ตตฺรายํ ปทตฺโถ – เอตาย โลกิยโลกุตฺตรมคฺคกฺขเณ อุปฺปชฺชมานาย ลีนุทฺธจฺจปติฏฺฐานายูหนกามสุขตฺตกิลมถานุโยคอุจฺเฉทสสฺสตาภินิเวสาทิ- อเนกุปทฺทวปฺปฏิปกฺขภูตาย สติธมฺมวิจยวีริยปีติปฺปสฺสทฺธิสมาธุเปกฺขาสงฺขาตาย ธมฺมสามคฺคิยา อริยสาวโก พุชฺฌตีติ กตฺวา โพธิ, กิเลสสนฺตานนิทฺทาย อุฏฺฐหติ, จตฺตาริ วา อริยสจฺจานิ ปฏิวิชฺฌติ, นิพฺพานเมว วา สจฺฉิกโรตีติ วุตฺตํ โหติ. ยถาห – ‘‘สตฺต โพชฺฌงฺเค ภาเวตฺวา อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ [Pg.71] อภิสมฺพุทฺโธ’’ติ. ยถาวุตฺตปฺปการาย วา เอตาย ธมฺมสามคฺคิยา พุชฺฌตีติ กตฺวา อริยสาวโกปิ โพธิ. อิติ ตสฺสา ธมฺมสามคฺคิสงฺขาตาย โพธิยา องฺคภูตตฺตา โพชฺฌงฺคา ฌานงฺคมคฺคงฺคานิ วิย, ตสฺส วา โพธีติ ลทฺธโวหารสฺส อริยสาวกสฺส องฺคภูตตฺตาปิ โพชฺฌงฺคา เสนงฺครถงฺคาทโย วิย. तेथे ‘सत्त’ (सात) म्हणजे कमी किंवा जास्त संख्या असण्याचे निवारण करणारी संख्यात्मक मर्यादा होय. ‘बोज्झंग’ (बोध्यंग) हे सती (स्मृती) इत्यादी धर्मांचे नाव आहे. तेथे हा पदाचा अर्थ आहे – लौकिक व लोकोत्तर मार्गक्षणी उत्पन्न होणाऱ्या, थिन-मिद्ध (आळस व डुलकी) आणि उद्धच्च (उद्धतपणा/चंचलता) यांच्या आश्रयाचा प्रयत्न, कामसुख आणि आत्मक्लेश यांच्यात गुंतणे, उच्छेदवाद व शाश्वतवाद यांसारख्या अनेक उपद्रवांच्या विरोधी असणाऱ्या, सती (स्मृती), धम्मविचय (धर्मविचय), विरिय (वीर्य), पीती (प्रीती), पस्सद्धि (प्रश्रब्धी), समाधी आणि उपेक्खा (उपेक्षा) या नावांच्या धर्मसामग्रीने (धर्मांच्या समूहाने) आर्यश्रावक जाणतो (बुज्झति), म्हणून याला ‘बोधी’ म्हणतात; किंवा क्लेशांच्या परंपरेच्या निद्रेतून उठतो, किंवा चार आर्यसत्यांचा वेध घेतो (जाणतो), किंवा निर्वाणाचाच साक्षात्कार करतो, असा याचा अर्थ होतो. जसे म्हटले आहे – ‘सात बोज्झंगांची भावना करून अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली.’ किंवा पूर्वोक्त प्रकारच्या या धर्मसामग्रीने जाणतो म्हणून आर्यश्रावकसुद्धा ‘बोधी’ आहे. अशा प्रकारे, धर्मसामग्री नावाच्या या बोधीचे अंग असल्यामुळे, झानांग (ध्यानांग) व मग्गांग (मार्गांग) प्रमाणे हे ‘बोज्झंग’ होतात; किंवा ‘बोधी’ अशी संज्ञा प्राप्त झालेल्या त्या आर्यश्रावकाचे अंग असल्यामुळे, सेनांग (सेनेचे अंग) व रथांग (रथाचे अंग) इत्यादींप्रमाणे हे ‘बोज्झंग’ होतात. อปิจ ‘‘โพชฺฌงฺคาติ เกนฏฺเฐน โพชฺฌงฺคา? โพธาย สํวตฺตนฺตีติ โพชฺฌงฺคา, พุชฺฌนฺตีติ โพชฺฌงฺคา, อนุพุชฺฌนฺตีติ โพชฺฌงฺคา, ปฏิพุชฺฌนฺตีติ โพชฺฌงฺคา, สมฺพุชฺฌนฺตีติ โพชฺฌงฺคา’’ติ (ปฏิ. ม. ๒.๑๗) อิมินาปิ ปฏิสมฺภิทายํ วุตฺเตน วิธินา โพชฺฌงฺคานํ โพชฺฌงฺคฏฺโฐ เวทิตพฺโพ. เอวมิเม สตฺต โพชฺฌงฺเค ภาเวนฺโต พหุลีกโรนฺโต น จิรสฺเสว เอกนฺตนิพฺพิทาทิคุณปฏิลาภี โหติ, เตน ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหตีติ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเจตํ ภควตา – शिवाय, “बोज्झंग हे कोणत्या अर्थाने बोज्झंग आहेत? बोधीसाठी (निर्वाण जाणण्यासाठी) संवर्तित होतात (प्रवृत्त होतात) म्हणून बोज्झंग आहेत; जाणतात म्हणून बोज्झंग आहेत; अनुबोध करतात (मागून जाणतात) म्हणून बोज्झंग आहेत; प्रतिबोध करतात (वेध घेऊन जाणतात) म्हणून बोज्झंग आहेत; संबोध करतात (चांगल्या प्रकारे जाणतात) म्हणून बोज्झंग आहेत” – या पटिसंभिदामग्ग मधील वचनानुसार सुद्धा बोज्झंगांचा ‘बोज्झंग’ हा अर्थ जाणावा. अशा प्रकारे, या सात बोज्झंगांची भावना करणारा व त्यांचा बहुलीकार (पुनःपुन्हा सराव) करणारा मनुष्य लवकरच एकांत-निर्वेदादी (संसाराविषयी पूर्ण विरक्ती इत्यादी) गुणांचा लाभ घेणारा होतो, म्हणूनच त्याला ‘याच जन्मात दुःखाचा अंत करणारा होतो’ असे म्हटले जाते. भगवंतांनी असे म्हटलेच आहे – ‘‘สตฺติเม, ภิกฺขเว, โพชฺฌงฺคา ภาวิตา พหุลีกตา เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย นิโรธาย อุปสมาย อภิญฺญาย สมฺโพธาย นิพฺพานาย สํวตฺตนฺตี’’ติ (สํ. นิ. ๕.๒๐๑). “भिक्खूंनो, हे सात बोज्झंग भावित केले असता, बहुलीकृत (पुनःपुन्हा सराव) केले असता, एकांत-निर्वेदासाठी (पूर्ण विरक्तीसाठी), विरागासाठी, निरोधासाठी, उपशमासाठी, अभिज्ञासाठी (विशेष ज्ञानासाठी), संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी संवर्तित होतात (प्रवृत्त होतात).” อฏฺฐ นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา ‘आठ म्हणजे काय?’ या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण เอวํ อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ อฏฺฐ นาม กินฺติ? เถโร กิญฺจาปิ มหาปญฺหพฺยากรเณ อฏฺฐ โลกธมฺมา วุตฺตา, อปิจ โข ปน เยสุ ธมฺเมสุ สุภาวิตจิตฺโต ภิกฺขุ ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ, เต ทสฺเสนฺโต ‘‘อริยานิ อฏฺฐ มคฺคงฺคานี’’ติ อวตฺวา ยสฺมา อฏฺฐงฺควินิมุตฺโต มคฺโค นาม นตฺถิ, อฏฺฐงฺคมตฺตเมว ตุ มคฺโค, ตสฺมา ตมตฺถํ สาเธนฺโต เทสนาวิลาเสน อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโคติ วิสฺสชฺเชติ. ภควตาปิ จายมตฺโถ เทสนานโย จ อนุมโต เอว. ยถาห – अशा प्रकारे, याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट झालेले शास्ता (बुद्ध) पुढील प्रश्न विचारतात – ‘आठ म्हणजे काय?’ महाप्रश्नांच्या स्पष्टीकरणात जरी आठ लोकधर्म सांगितले गेले असले, तरी ज्या धर्मांमध्ये चित्त सुभावित केलेला भिक्खू दुःखाचा अंत करणारा होतो, ते दर्शवण्यासाठी थेरांनी ‘आठ आर्य मार्गांगे’ असे न म्हणता, कारण की आठ अंगांशिवाय दुसरा कोणताही मार्ग नाही आणि आठ अंगे म्हणजेच मार्ग आहे, म्हणून तोच अर्थ सिद्ध करण्यासाठी देशनेच्या सौंदर्याने ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ असे उत्तर दिले. भगवंतांनाही हा अर्थ आणि देशनेची पद्धत संमतच होती. जसे म्हटले आहे – ‘‘ปณฺฑิตา คหปตโย กชงฺคลิกา ภิกฺขุนี…เป… อหมฺปิ เอวเมว พฺยากเรยฺยํ, ยถา ตํ กชงฺคลิกาย ภิกฺขุนิยา พฺยากต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๘). “गृहपतींनो, कजंगला येथील भिक्खुनी पंडित आहे... पे... मीसुद्धा त्याचे तसेच उत्तर दिले असते, जसे कजंगला येथील भिक्खुनीने दिले आहे.” ตาย [Pg.72] จ เอวํ พฺยากตํ – आणि तिने याप्रमाणे उत्तर दिले – ‘‘อฏฺฐสุ, อาวุโส, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา สุภาวิตจิตฺโต…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘อฏฺฐ ปญฺหา, อฏฺฐ อุทฺเทสา, อฏฺฐ เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ ภควตา, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๘). “आवुसो, आठ धर्मांमध्ये ज्या भिक्खूचे चित्त चांगल्या प्रकारे सुभावित झाले आहे... पे... तो दुःखाचा अंत करणारा होतो. ‘आठ प्रश्न, आठ उद्देश, आठ व्याकरणे’ असे जे भगवंतांनी म्हटले होते, ते यालाच अनुसरून म्हटले होते.” เอวมยํ อตฺโถ จ เทสนานโย จ ภควตา อนุมโต เอวาติ เวทิตพฺโพ. यावरून, हा अर्थ आणि देशनेची पद्धत भगवंतांना संमतच होती, असे जाणावे. ตตฺถ อริโยติ นิพฺพานตฺถิเกหิ อภิคนฺตพฺโพ, อปิจ อารกา กิเลเสหิ วตฺตนโต, อริยภาวกรณโต, อริยผลปฏิลาภโต จาปิ อริโยติ เวทิตพฺโพ. อฏฺฐ องฺคานิ อสฺสาติ อฏฺฐงฺคิโก. สฺวายํ จตุรงฺคิกา วิย เสนา, ปญฺจงฺคิกํ วิย จ ตูริยํ องฺควินิพฺโภเคน อนุปลพฺภสภาวโต องฺคมตฺตเมวาติ เวทิตพฺโพ. มคฺคติ อิมินา นิพฺพานํ, สยํ วา มคฺคติ, กิเลเส มาเรนฺโต วา คจฺฉตีติ มคฺโค. तेथे ‘अरियो’ (आर्य) म्हणजे निर्वाणाची इच्छा करणाऱ्यांनी प्राप्त करण्यायोग्य; शिवाय, क्लेशांपासून दूर राहून प्रवृत्त होत असल्यामुळे, आर्यभाव निर्माण करत असल्यामुळे आणि आर्यफलाची प्राप्ती करून देत असल्यामुळेही तो ‘आर्य’ आहे असे जाणावे. ज्याला आठ अंगे आहेत तो ‘अट्ठांगिक’ (अष्टांगिक) होय. तो जसा चार अंगे असलेली सेना किंवा पाच अंगे असलेले वाद्य (तूर्य) यांच्याप्रमाणे अंगांच्या विभाजनाने स्वतंत्र अस्तित्व नसलेला, केवळ अंगांचा समूहच आहे, असे जाणावे. याने (मार्गाने) मनुष्य निर्वाणाचा शोध घेतो (मग्गति), किंवा तो स्वतःच निर्वाणाचा शोध घेतो, किंवा क्लेशांना मारत निर्वाणाकडे जातो, म्हणून तो ‘मग्ग’ (मार्ग) होय. เอวมฏฺฐปฺปเภทญฺจิมํ อฏฺฐงฺคิกํ มคฺคํ ภาเวนฺโต ภิกฺขุ อวิชฺชํ ภินฺทติ, วิชฺชํ อุปฺปาเทติ, นิพฺพานํ สจฺฉิกโรติ, เตน ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหตีติ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ – अशा प्रकारे, विविध अर्थांनी युक्त असलेल्या या अष्टांगिक मार्गाची भावना करणारा भिक्खू अविज्जेचा (अविद्येचा) नाश करतो, विज्जेला (विद्येला) उत्पन्न करतो, निर्वाणाचा साक्षात्कार करतो, म्हणूनच त्याला ‘याच जन्मात दुःखाचा अंत करणारा होतो’ असे म्हटले जाते. कारण असे म्हटले आहे – ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, สาลิสูกํ วา ยวสูกํ วา สมฺมา ปณิหิตํ หตฺเถน วา ปาเทน วา อกฺกนฺตํ หตฺถํ วา ปาทํ วา เภจฺฉติ, โลหิตํ วา อุปฺปาเทสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชติ. ตํ กิสฺส เหตุ? สมฺมา ปณิหิตตฺตา, ภิกฺขเว, สูกสฺส, เอวเมว โข, ภิกฺขเว, โส วต ภิกฺขุ สมฺมา ปณิหิตาย ทิฏฺฐิยา สมฺมา ปณิหิตาย มคฺคภาวนาย อวิชฺชํ เภจฺฉติ, วิชฺชํ อุปฺปาเทสฺสติ, นิพฺพานํ สจฺฉิกริสฺสตีติ ฐานเมตํ วิชฺชตี’’ติ (อ. นิ. ๑.๔๒). “भिक्खूंनो, जसे सम्यक प्रकारे (सरळ) ठेवलेले शालीचे (तांदळाचे) किंवा यवाचे (जवाचे) टोक जर हाताने किंवा पायाने दाबले गेले, तर ते हाताला किंवा पायाला टोचेल आणि रक्त काढेल, अशी शक्यता असते. त्याचे कारण काय? भिक्खूंनो, कारण ते टोक सम्यक प्रकारे ठेवलेले होते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, तो भिक्खू सम्यक प्रकारे प्रस्थापित केलेल्या दृष्टीने आणि सम्यक प्रकारे प्रस्थापित केलेल्या मार्गभावनेने अविज्जेचा नाश करेल, विज्जेला उत्पन्न करेल आणि निर्वाणाचा साक्षात्कार करेल, अशी शक्यता असते.” นว นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา ‘नऊ म्हणजे काय?’ या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ นว นาม กินฺติ? เถโร นวอิติ ปจฺจนุภาสิตฺวา ‘‘สตฺตาวาสา’’ติ วิสฺสชฺเชติ. ตตฺถ นวาติ คณนปริจฺเฉโท. สตฺตาติ ชีวิตินฺทฺริยปฺปฏิพทฺเธ ขนฺเธ [Pg.73] อุปาทาย ปญฺญตฺตา ปาณิโน ปณฺณตฺติ วา. อาวาสาติ อาวสนฺติ เอเตสูติ อาวาสา, สตฺตานํ อาวาสา สตฺตาวาสา. เอส เทสนามคฺโค, อตฺถโต ปน นววิธานํ สตฺตานเมตํ อธิวจนํ. ยถาห – याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट झालेले शास्ता पुढील प्रश्न विचारतात – ‘नऊ म्हणजे काय?’ थेरांनी ‘नऊ’ असे पुन्हा म्हणून ‘सत्तावास’ (सत्त्वावास - प्राण्यांचे निवासस्थान) असे उत्तर दिले. तेथे ‘नव’ (नऊ) ही संख्यात्मक मर्यादा आहे. ‘सत्त’ (सत्त्व/प्राणी) म्हणजे जीवितेन्द्रियाशी संबंधित असलेल्या स्कंधांना अनुसरून प्रज्ञप्त केलेले प्राणी किंवा ती प्रज्ञप्ती होय. ‘आवास’ म्हणजे ज्या ठिकाणी प्राणी राहतात (आवास करतात), प्राण्यांचे निवासस्थान म्हणजे ‘सत्तावास’. हा देशनेचा मार्ग आहे, परंतु अर्थाच्या दृष्टीने हे नऊ प्रकारच्या प्राण्यांचे नाव आहे. जसे म्हटले आहे – ‘‘สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ มนุสฺสา เอกจฺเจ จ เทวา เอกจฺเจ จ วินิปาติกา, อยํ ปฐโม สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา นานตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ, เทวา พฺรหฺมกายิกา, ปฐมาภินิพฺพตฺตา, อยํ ทุติโย สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา นานตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ, เทวา อาภสฺสรา, อยํ ตติโย สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา เอกตฺตกายา เอกตฺตสญฺญิโน, เสยฺยถาปิ, เทวา สุภกิณฺหา, อยํ จตุตฺโถ สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา อสญฺญิโน อปฺปฏิสํเวทิโน, เสยฺยถาปิ, เทวา อสญฺญสตฺตา, อยํ ปญฺจโม สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา สพฺพโส รูปสญฺญานํ…เป… อากาสานญฺจายตนูปคา, อยํ ฉฏฺโฐ สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา…เป… วิญฺญาณญฺจายตนูปคา, อยํ สตฺตโม สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา…เป… อากิญฺจญฺญายตนูปคา, อยํ อฏฺฐโม สตฺตาวาโส. สนฺตาวุโส, สตฺตา…เป… เนวสญฺญานาสญฺญายตนูปคา, อยํ นวโม สตฺตาวาโส’’ติ (ที. นิ. ๓.๓๔๑). “बंधूंनो! असे प्राणी आहेत जे भिन्न शरीर आणि भिन्न संज्ञा असलेले आहेत, जसे की मनुष्य, काही देव आणि काही विनिपातिक देव; हा पहिला सत्त्वावास (प्राण्यांचे निवासस्थान) आहे. बंधूंनो! असे प्राणी आहेत जे भिन्न शरीर आणि एकच संज्ञा असलेले आहेत, जसे की प्रथम ध्यानाच्या भूमीत उत्पन्न झालेले ब्रह्मकायिक देव; हा दुसरा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! असे प्राणी आहेत जे एकच शरीर आणि भिन्न संज्ञा असलेले आहेत, जसे की आभास्सर देव; हा तिसरा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! असे प्राणी आहेत जे एकच शरीर आणि एकच संज्ञा असलेले आहेत, जसे की सुभकिण्ह देव; हा चौथा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! असे प्राणी आहेत जे संज्ञा नसलेले आणि संवेदन नसलेले आहेत, जसे की असञ्ञसत्त (असंज्ञी) देव; हा पाचवा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे अतिक्रमण करून...पे... आकासानञ्चायतनात पोहोचलेले प्राणी आहेत; हा सहावा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! ...पे... विञ्ञाणञ्चायतनात पोहोचलेले प्राणी आहेत; हा सातवा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! ...पे... आकिञ्चञ्ञायतनात पोहोचलेले प्राणी आहेत; हा आठवा सत्त्वावास आहे. बंधूंनो! ...पे... नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात पोहोचलेले प्राणी आहेत; हा नववा सत्त्वावास आहे.” ปุริมนเยเนว เจตฺถ ‘‘นว สตฺตาวาสา’’ติ วุตฺตํ, น อญฺเญสํ นวนฺนมภาวโต. ยถาห – आणि येथे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच 'नऊ सत्त्वावास' असे म्हटले आहे, इतर नऊ धर्मांच्या अभावामुळे असे म्हटलेले नाही. जसे की म्हटले आहे – ‘‘นวสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ นวสุ? นวสุ สตฺตาวาเสสุ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, นวสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘นว ปญฺหา, นว อุทฺเทสา, นว เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो! नऊ धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळा (निर्वेद) प्राप्त करून...पे... दुःखाचा अंत करणारा होतो. कोणत्या नऊ धर्मांविषयी? नऊ सत्त्वावासांविषयी. भिक्खूंनो! या नऊ धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळा प्राप्त करून...पे... दुःखाचा अंत करणारा होतो. 'नऊ प्रश्न, नऊ उद्देश, नऊ व्याकरणे (उत्तरे)' असे जे म्हटले गेले आहे, ते यालाच अनुसरून म्हटले गेले आहे.” เอตฺถ [Pg.74] จ ‘‘นว ธมฺมา ปริญฺเญยฺยา. กตเม นว? นว สตฺตาวาสา’’ติ (ที. นิ. ๓.๓๕๙) วจนโต นวสุ สตฺตาวาเสสุ ญาตปริญฺญาย ธุวสุภสุขตฺตภาวทสฺสนํ ปหาย สุทฺธสงฺขารปุญฺชมตฺตทสฺสเนน นิพฺพินฺทมาโน ตีรณปริญฺญาย อนิจฺจานุปสฺสเนน วิรชฺชมาโน ทุกฺขานุปสฺสเนน วิมุจฺจมาโน อนตฺตานุปสฺสเนน สมฺมา ปริยนฺตทสฺสาวี ปหานปริญฺญาย สมฺมตฺตมภิสเมจฺจ ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. เตเนตํ วุตฺตํ – आणि येथे “नऊ धर्म परिज्ञेय (पूर्णपणे जाणण्याजोगे) आहेत. कोणते नऊ? नऊ सत्त्वावास” या वचनानुसार, नऊ सत्त्वावासांमध्ये 'ज्ञातपरिज्ञा' द्वारे नित्य, शुभ, सुख आणि आत्मा अशा स्वरूपाचे दर्शन सोडून देऊन, केवळ शुद्ध संस्कारांचा समूह अशा दर्शनाने कंटाळा (निर्वेद) प्राप्त करून; 'तीरणपरिज्ञा' द्वारे अनित्यानुपश्यनेने विराग प्राप्त करून, दुःखानुपश्यनेने विमुक्त होऊन, अनात्मानुपश्यनेने योग्य प्रकारे अंत पाहणारा (संसाराचा अंत पाहणारा) होऊन; 'प्रहाणपरिज्ञा' द्वारे सम्यक्त्व (निर्वाण) प्राप्त करून याच जन्मात दुःखाचा अंत करणारा होतो. म्हणूनच असे म्हटले आहे – ‘‘นวสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทิฏฺเฐว ธมฺเม ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ นวสุ? นวสุ สตฺตาวาเสสู’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो! नऊ धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळा प्राप्त करून...पे... याच जन्मात दुःखाचा अंत करणारा होतो. कोणत्या नऊ धर्मांविषयी? नऊ सत्त्वावासांविषयी.” ทส นาม กินฺติปญฺหวณฺณนา दहा म्हणजे काय? या प्रश्नाचे स्पष्टीकरण เอวํ อิมินาปิ ปญฺหพฺยากรเณน อารทฺธจิตฺโต สตฺถา อุตฺตรึ ปญฺหํ ปุจฺฉติ ทส นาม กินฺติ? ตตฺถ กิญฺจาปิ อิมสฺส ปญฺหสฺส อิโต อญฺญตฺร เวยฺยากรเณสุ ทส อกุสลกมฺมปถา วุตฺตา. ยถาห – अशा प्रकारे याही प्रश्नाच्या उत्तराने संतुष्ट झालेले शास्ता (बुद्ध) पुढील प्रश्न विचारतात – 'दहा म्हणजे काय?' त्या प्रश्नाच्या उत्तरांमध्ये, जरी या व्यतिरिक्त इतर ठिकाणी दहा अकुशल कर्मपथ सांगितले आहेत. जसे की म्हटले आहे – ‘‘ทสสุ, ภิกฺขเว, ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป… ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. กตเมสุ ทสสุ? ทสสุ อกุสลกมฺมปเถสุ. อิเมสุ โข, ภิกฺขเว, ทสสุ ธมฺเมสุ ภิกฺขุ สมฺมา นิพฺพินฺทมาโน…เป. … ทุกฺขสฺสนฺตกโร โหติ. ‘ทส ปญฺหา ทส อุทฺเทสา ทส เวยฺยากรณานี’ติ อิติ ยํ ตํ วุตฺตํ, อิทเมตํ ปฏิจฺจ วุตฺต’’นฺติ (อ. นิ. ๑๐.๒๗). “भिक्खूंनो! दहा धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळा प्राप्त करून...पे... दुःखाचा अंत करणारा होतो. कोणत्या दहा धर्मांविषयी? दहा अकुशल कर्मपथांविषयी. भिक्खूंनो! या दहा धर्मांविषयी भिक्खू योग्य प्रकारे कंटाळा प्राप्त करून...पे... दुःखाचा अंत करणारा होतो. 'दहा प्रश्न, दहा उद्देश, दहा व्याकरणे' असे जे म्हटले गेले आहे, ते यालाच अनुसरून म्हटले गेले आहे.” อิธ ปน ยสฺมา อยมายสฺมา อตฺตานํ อนุปเนตฺวา อญฺญํ พฺยากาตุกาโม, ยสฺมา วา อิมินา ปริยาเยน พฺยากตํ สุพฺยากตเมว โหติ, ตสฺมา เยหิ ทสหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต อรหาติ ปวุจฺจติ, เตสํ อธิคมํ ทีเปนฺโต ทสหงฺเคหิ สมนฺนาคโต อรหาติ ปวุจฺจตีติ ปุคฺคลาธิฏฺฐานาย เทสนาย วิสฺสชฺเชติ. ยโต เอตฺถ เยหิ ทสหิ องฺเคหิ สมนฺนาคโต อรหาติ ปวุจฺจติ, ตานิ ทสงฺคานิ ‘‘ทส นาม กิ’’นฺติ ปุฏฺเฐน เถเรน นิทฺทิฏฺฐานีติ เวทิตพฺพานิ. ตานิ จ ทส – परंतु येथे, ज्याअर्थी हे आयुष्यमान (सोपाक थेर) स्वतःचा उल्लेख न करता इतरांचे (अर्हत्त्व) स्पष्ट करू इच्छितात, किंवा ज्याअर्थी या पद्धतीने दिलेले उत्तर अतिशय योग्य उत्तर ठरते, म्हणून ज्या दहा अंगांनी युक्त असलेल्या व्यक्तीला 'अर्हत' म्हटले जाते, त्यांच्या प्राप्तीला दर्शवण्यासाठी 'दहा अंगांनी युक्त असलेल्याला अर्हत म्हटले जाते' अशा पुद्गलाधिष्ठित देशनेने उत्तर देतात. म्हणूनच येथे ज्या दहा अंगांनी युक्त असलेल्याला अर्हत म्हटले जाते, ती दहा अंगे 'दहा म्हणजे काय?' असे विचारले असता थेरांनी स्पष्ट केली आहेत, असे समजावे. आणि ती दहा अंगे म्हणजे – ‘‘อเสโข อเสโขติ, ภนฺเต, วุจฺจติ, กิตฺตาวตา นุ โข, ภนฺเต, ภิกฺขุ อเสโข โหตีติ? อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อเสขาย [Pg.75] สมฺมาทิฏฺฐิยา สมนฺนาคโต โหติ, อเสเขน สมฺมาสงฺกปฺเปน สมนฺนาคโต โหติ, อเสขาย สมฺมาวาจาย สมนฺนาคโต โหติ, อเสเขน สมฺมากมฺมนฺเตน สมนฺนาคโต โหติ, อเสเขน สมฺมาอาชีเวน สมนฺนาคโต โหติ, อเสเขน สมฺมาวายาเมน สมนฺนาคโต โหติ, อเสขาย สมฺมาสติยา สมนฺนาคโต โหติ, อเสเขน สมฺมาสมาธินา สมนฺนาคโต โหติ, อเสเขน สมฺมาญาเณน สมนฺนาคโต โหติ, อเสขาย สมฺมาวิมุตฺติยา สมนฺนาคโต โหติ. เอวํ โข, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ อเสโข โหตี’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๑๑๑). – “भंते! 'अशेख, अशेख' असे म्हटले जाते. भंते! किती गुणांनी युक्त झाल्यावर भिक्खू अशेख होतो? भिक्खूंनो! येथे भिक्खू अशेख सम्यक् दृष्टीने युक्त असतो, अशेख सम्यक् संकल्पाने युक्त असतो, अशेख सम्यक् वाचेने युक्त असतो, अशेख सम्यक् कर्मांताने युक्त असतो, अशेख सम्यक् आजीविकेने युक्त असतो, अशेख सम्यक् व्यायामाने युक्त असतो, अशेख सम्यक् स्मृतीने युक्त असतो, अशेख सम्यक् समाधीने युक्त असतो, अशेख सम्यक् ज्ञानाने युक्त असतो, आणि अशेख सम्यक् विमुक्तीने युक्त असतो. भिक्खूंनो! अशा प्रकारे भिक्खू अशेख होतो.” เอวมาทีสุ สุตฺเตสุ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพานีติ. अशा प्रकारे इत्यादी सूत्तांमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच हे जाणून घ्यावे. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील กุมารปญฺหวณฺณนา นิฏฺฐิตา. कुमारप्रश्न-वर्णन समाप्त झाले। ๕. มงฺคลสุตฺตวณฺณนา ५. मंगलसुत्त-वर्णन นิกฺเขปปฺปโยชนํ सुत्ताच्या मांडणीचे (निक्षेपाचे) प्रयोजन อิทานิ กุมารปญฺหานนฺตรํ นิกฺขิตฺตสฺส มงฺคลสุตฺตสฺส อตฺถวณฺณนากฺกโม อนุปฺปตฺโต, ตสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ วตฺวา อตฺถวณฺณนํ กริสฺสาม. เสยฺยถิทํ – อิทญฺหิ สุตฺตํ อิมินา อนุกฺกเมน ภควตา อวุตฺตมฺปิ ยฺวายํ สรณคมเนหิ สาสโนตาโร, สิกฺขาปททฺวตฺตึสาการกุมารปญฺเหหิ จ สีลสมาธิปญฺญาปฺปเภทนโย ทสฺสิโต, สพฺโพเปส ปรมมงฺคลภูโต, ยโต มงฺคลตฺถิเกน เอตฺเถว อภิโยโค กาตพฺโพ, โส จสฺส มงฺคลภาโว อิมินา สุตฺตานุสาเรน เวทิตพฺโพติ ทสฺสนตฺถํ วุตฺตํ. आता कुमारप्रश्नानंतर ठेवलेल्या मंगलसुत्ताच्या अर्थ-स्पष्टीकरणाचा क्रम प्राप्त झाला आहे, त्याचे येथे मांडणीचे प्रयोजन सांगून अर्थ-स्पष्टीकरण करू. ते असे – जरी हे सुत्त या क्रमाने भगवंतांनी स्वतः सांगितले नसले, तरी शरणगमनाद्वारे शासनात (धम्मात) प्रवेश करणे, आणि शील, समाधी व प्रज्ञा यांचे वर्गीकरण जे शिक्षापदे, द्वत्तींसाकार (बत्तीस अवयव) आणि कुमारप्रश्नांद्वारे दर्शवले गेले आहे, ते सर्व परम मंगलकारक आहे. म्हणूनच, मङ्गलाची (कल्याणाची) इच्छा करणाऱ्याने यातच विशेष प्रयत्न केला पाहिजे, आणि त्याचे हे मंगलत्व या सुत्ताच्या अनुषंगाने जाणून घ्यावे, हे दर्शवण्यासाठी हे म्हटले आहे। อิทมสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ. हे येथे या सुत्ताच्या मांडणीचे प्रयोजन आहे। ปฐมมหาสงฺคีติกถา प्रथम महासंगीतीची कथा เอวํ [Pg.76] นิกฺขิตฺตสฺส ปนสฺส อตฺถวณฺณนตฺถํ อยํ มาติกา – अशा प्रकारे मांडलेल्या या सुत्ताच्या अर्थ-स्पष्टीकरणासाठी ही मातृका (विषयसूची) आहे – ‘‘วุตฺตํ เยน ยทา ยสฺมา, เจตํ วตฺวา อิมํ วิธึ; เอวมิจฺจาทิปาฐสฺส, อตฺถํ นานปฺปการโต. “हे सुत्त कोणी, केव्हा आणि का सांगितले, हे सांगून आणि या विधीचे स्पष्टीकरण करून, 'एवं मे सुतं' इत्यादी पाठाचा अर्थ विविध प्रकारे... ‘‘วณฺณยนฺโต สมุฏฺฐานํ, วตฺวา ยํ ยตฺถ มงฺคลํ; ววตฺถเปตฺวา ตํ ตสฺส, มงฺคลตฺตํ วิภาวเย’’ติ. ...स्पष्ट करणाऱ्या आचार्यांनी त्याचे समुत्थान (उत्पत्तीचे कारण) सांगून, ज्या सुत्तात जे मंगल सांगितले आहे, त्याचे वर्गीकरण करून त्याचे मंगलत्व स्पष्ट करावे.” ตตฺถ ‘‘วุตฺตํ เยน ยทา ยสฺมา, เจตํ วตฺวา อิมํ วิธิ’’นฺติ อยํ ตาว อทฺธคาถา ยทิทํ ‘‘เอวํ เม สุตํ เอกํ สมยํ ภควา…เป… ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสี’’ติ, อิทํ วจนํ สนฺธาย วุตฺตา. อิทญฺหิ อนุสฺสววเสน วุตฺตํ, โส จ ภควา สยมฺภู อนาจริยโก, ตสฺมา เนทํ ตสฺส ภควโต วจนํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. ยโต วตฺตพฺพเมตํ ‘‘อิทํ วจนํ เกน วุตฺตํ, กทา, กสฺมา จ วุตฺต’’นฺติ. วุจฺจเต – อายสฺมตา อานนฺเทน วุตฺตํ, ตญฺจ ปฐมมหาสงฺคีติกาเล. त्या (अट्ठकथे)मध्ये, 'कोणी, कधी, कशासाठी हे बोलून हा विधी सांगितला' ही अर्धी गाथा, प्रथम 'असे मी ऐकले आहे, एका समयी भगवान... भगवंतांना गाथेने संबोधित करते झाले' या वचनाला उद्देशून म्हटली आहे. कारण हे सत्य आहे की, हे वचन ऐकीव परंपरेच्या (अनुश्रवाच्या) आधारे म्हटले गेले आहे. आणि ते भगवान स्वयंभू व विनागुरूचे (अनाचार्यक) होते; म्हणून हे वचन त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांचे स्वतःचे वचन नाही. आणि ज्याअर्थी हे सांगणे आवश्यक आहे, त्यामुळे 'हे वचन कोणी म्हटले, कधी म्हटले आणि कशासाठी म्हटले?' असा हा प्रश्न उपस्थित होतो. याचे उत्तर दिले जात आहे—हे आयुष्यमान आनंदांनी म्हटले आहे, आणि ते पहिल्या महासंगीतीच्या वेळी म्हटले गेले. ปฐมมหาสงฺคีติ เจสา สพฺพสุตฺตนิทานโกสลฺลตฺถมาทิโต ปภุติ เอวํ เวทิตพฺพา. ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนญฺหิ อาทึ กตฺวา ยาว สุภทฺทปริพฺพาชกวินยนา, กตพุทฺธกิจฺเจ กุสินารายํ อุปวตฺตเน มลฺลานํ สาลวเน ยมกสาลานมนฺตเร วิสาขปุณฺณมทิวเส ปจฺจูสสมเย อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพุเต, ภควติ โลกนาเถ ภควโต ปรินิพฺพาเน สนฺนิปติตานํ สตฺตนฺนํ ภิกฺขุสตสหสฺสานํ สงฺฆตฺเถโร อายสฺมา มหากสฺสโป สตฺตาหปรินิพฺพุเต ภควติ สุภทฺเทน วุฑฺฒปพฺพชิเตน ‘‘อลํ, อาวุโส, มา โสจิตฺถ, มา ปริเทวิตฺถ, สุมุตฺตา มยํ เตน มหาสมเณน, อุปทฺทุตา จ โหม ‘อิทํ โว กปฺปติ อิทํ โว น กปฺปตี’ติ, อิทานิ ปน มยํ ยํ อิจฺฉิสฺสาม ตํ กริสฺสาม, ยํ น อิจฺฉิสฺสาม น ตํ กริสฺสามา’’ติ (จูฬว. ๔๓๗; ที. นิ. ๒.๒๓๒) วุตฺตวจนมนุสฺสรนฺโต ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ ยํ ปาปภิกฺขู ‘อตีตสตฺถุกํ ปาวจน’นฺติ มญฺญมานา ปกฺขํ ลภิตฺวา น จิรสฺเสว สทฺธมฺมํ อนฺตรธาเปยฺยุํ. ยาว จ ธมฺมวินโย ติฏฺฐติ, ตาว อนตีตสตฺถุกเมว ปาวจนํ โหติ. ยถาห ภควา – आणि ही पहिली संगीती सर्व सूत्रांच्या निदानामध्ये (प्रस्तावनेत) कौशल्य प्राप्त होण्यासाठी सुरुवातीपासून याप्रमाणे समजून घ्यावी. मी याचा विस्तार करतो. धम्मचक्रप्रवर्तनापासून सुरुवात करून सुभद्द परिव्राजकाच्या दीक्षेपर्यंत बुद्धकृत्ये पूर्ण झाल्यावर, कुसिनारा येथील मल्लांच्या उपवर्तन नावाच्या शालवनात, दोन शालवृक्षांच्या मध्ये, वैशाख पौर्णिमेच्या दिवशी, पहाटेच्या वेळी, अनुपधिशेष निर्वाणधातूने लोकनाथ भगवान परिनिर्वाण पावले असता, भगवंतांच्या परिनिर्वाणानंतर (धातू-विभाजनाच्या दिवशी) एकत्र आलेल्या सात लाख भिक्खूंपैकी, संघस्थेवर आयुष्यमान महाकस्सप यांनी, भगवंतांच्या परिनिर्वाणानंतर सातव्या दिवशी, सुभद्द नावाच्या वृद्धपणी प्रव्रजित झालेल्याने म्हटलेले हे वचन आठवले: 'बस करा, बंधूंनो! शोक करू नका, विलाप करू नका. आपण त्या महाश्रमणापासून चांगल्या प्रकारे मुक्त झालो आहोत. 'हे तुम्हांला योग्य आहे, हे तुम्हांला अयोग्य आहे' असे सांगून त्यांनी आपल्याला त्रास दिला होता. आता मात्र आपण जे इच्छू ते करू, आणि जे इच्छिणार नाही ते करणार नाही.' या वचनाचे स्मरण करत, आणि अशा प्रकारच्या भिक्खूंच्या महासंघाची पुन्हा दुर्लभता लक्षात घेऊन, 'ज्या कारणाने पापी भिक्खू 'आपला शास्ता आता निघून गेला आहे' असे मानून, स्वतःचा गट तयार करून लवकरच सद्धम्माचा लोप करतील, अशी शक्यता नक्कीच आहे. आणि जोपर्यंत धम्म आणि विनय टिकून आहे, तोपर्यंत शास्ता निघून गेलेला नाही असेच हे प्रवचन (बुद्धवचन) असते.' जसे भगवंतांनी म्हटले आहे - ‘‘โย [Pg.77] โว, อานนฺท, มยา ธมฺโม จ วินโย จ เทสิโต ปญฺญตฺโต, โส โว มมจฺจเยน สตฺถา’’ติ (ที. นิ. ๒.๒๑๖). "हे आनंदा, मी जो धम्म आणि विनय तुम्हांला उपदेशिला आहे व प्रज्ञप्त केला आहे, माझ्या पश्चात तोच तुमचा शास्ता (गुरू) असेल." ‘‘ยํนูนาหํ ธมฺมญฺจ วินยญฺจ สงฺคาเยยฺยํ, ยถยิทํ สาสนํ อทฺธนิยํ อสฺส จิรฏฺฐิติกํ’’. "मी धम्म आणि विनयाची संगीती का करू नये, जेणेकरून हे शासन दीर्घकाळ टिकणारे आणि चिरस्थायी होईल?" ยญฺจาหํ ภควตา – "आणि मला भगवंतांनी -" ‘‘ธาเรสฺสสิ ปน เม ตฺวํ, กสฺสป, สาณานิ ปํสุกูลานิ นิพฺพสนานี’’ติ วตฺวา จีวเร สาธารณปริโภเคน เจว – "हे कस्सपा, तू माझी तागाची, जीर्ण झालेली पांसुकूल चीवरे परिधान करशील का? असे म्हणून चीवराच्या सामायिक वापराने सन्मानित केले होते, तसेच -" ‘‘อหํ, ภิกฺขเว, ยาวเท อากงฺขามิ วิวิจฺเจว กาเมหิ…เป… ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรามิ, กสฺสโปปิ, ภิกฺขเว, ยาวเทว อากงฺขติ วิวิจฺเจว กาเมหิ…เป… ปฐมํ ฌานํ อุปสมฺปชฺช วิหรตี’’ติ – "भिक्खूंनो, मी जितकी इच्छा करतो, तितका काळ कामांपासून अलिप्त राहून... पहिल्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. भिक्खूंनो, कस्सप देखील जितकी इच्छा करतो, तितका काळ कामांपासून अलिप्त राहून... पहिल्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो -" เอวมาทินา นเยน นวานุปุพฺพวิหารฉฬภิญฺญาปฺปเภเท อุตฺตริมนุสฺสธมฺเม อตฺตนา สมสมฏฺฐปเนน จ อนุคฺคหิโต, ตสฺส เม กิมญฺญํ อาณณฺยํ ภวิสฺสติ? ‘‘นนุ มํ ภควา ราชา วิย สกกวจอิสฺสริยานุปฺปทาเนน อตฺตโน กุลวํสปฺปติฏฺฐาปกํ ปุตฺตํ ‘สทฺธมฺมวํสปฺปติฏฺฐาปโก เม อยํ ภวิสฺสตี’ติ มนฺตฺวา อิมินา อสาธารเณน อนุคฺคเหน อนุคฺคเหสี’’ติ จินฺตยนฺโต ธมฺมวินยสงฺคายนตฺถํ ภิกฺขูนํ อุสฺสาหํ ชเนสิ? ยถาห – "या आणि अशा इतर मार्गांनी, नऊ अनुपूर्वविहार आणि सहा अभिज्ञांच्या प्रकारांसारख्या उत्तरमनुष्यधम्मामध्ये स्वतःच्या बरोबरीचे स्थान देऊन भगवंतांनी मला अनुग्रहित केले आहे. अशा माझ्यासाठी (या संगीतीशिवाय) ऋणमुक्त होण्याचा दुसरा कोणता मार्ग असेल? 'ज्याप्रमाणे एखादा राजा आपले स्वतःचे चिलखत आणि ऐश्वर्य देऊन आपल्या कुळवंशाची प्रतिष्ठापना करणाऱ्या पुत्राला अनुग्रहित करतो, त्याप्रमाणे भगवंतांनी "हा माझा कस्सप सद्धम्मवंशाची प्रतिष्ठापना करणारा होईल" असा विचार करून मला या असाधारण अनुग्रहाने अनुग्रहित केले आहे,' असा विचार करत त्यांनी धम्म आणि विनयाच्या संगीतीसाठी भिक्खूंमध्ये उत्साह निर्माण केला. जसे त्यांनी म्हटले आहे -" ‘‘อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป ภิกฺขู อามนฺเตสิ – เอกมิทาหํ, อาวุโส, สมยํ ปาวาย กุสินารํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺโน มหตา ภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหี’’ติ (ที. นิ. ๒.๒๓๑; จูฬว. ๔๓๗) สพฺพํ สุภทฺทกณฺฑํ วิตฺถาเรตพฺพํ. "तेव्हा आयुष्यमान महाकस्सपांनी भिक्खूंना संबोधित केले - 'बंधूंनो, एकदा मी पावा येथून कुसिनाराला जाणाऱ्या मार्गावर पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासह चाललो होतो...' याप्रमाणे संपूर्ण सुभद्द-कांड सविस्तरपणे जाणावे." ตโต ปรํ อาห – त्यानंतर ते म्हणाले - ‘‘หนฺท มยํ, อาวุโส, ธมฺมญฺจ วินยญฺจ สงฺคาเยยฺยาม, ปุเร อธมฺโม ทิปฺปติ, ธมฺโม ปฏิพาหิยฺยติ, อวินโย ทิปฺปติ, วินโย ปฏิพาหิยฺยติ, ปุเร อธมฺมวาทิโน พลวนฺโต โหนฺติ, ธมฺมวาทิโน ทุพฺพลา โหนฺติ, อวินยวาทิโน พลวนฺโต โหนฺติ, วินยวาทิโน ทุพฺพลา โหนฺตี’’ติ (จูฬว. ๔๓๗). "चला बंधूंनो, आपण धम्म आणि विनयाची संगीती करू या. अधम्म प्रबळ होण्यापूर्वी आणि धम्म मागे पडण्यापूर्वी, अविनय प्रबळ होण्यापूर्वी आणि विनय मागे पडण्यापूर्वी; अधम्मवादी बलवान होण्यापूर्वी आणि धम्मवादी दुर्बळ होण्यापूर्वी; अविनयवादी बलवान होण्यापूर्वी आणि विनयवादी दुर्बळ होण्यापूर्वी आपण हे केले पाहिजे." ภิกฺขู [Pg.78] อาหํสุ ‘‘เตน หิ, ภนฺเต, เถโร ภิกฺขู อุจฺจินตู’’ติ. เถโร สกลนวงฺคสตฺถุสาสนปริยตฺติธเร ปุถุชฺชนโสตาปนฺนสกทาคามิอนาคามิสุกฺขวิปสฺสกขีณาสวภิกฺขู อเนกสเต อเนกสหสฺเส จ วชฺเชตฺวา ติปิฏกสพฺพปริยตฺติปฺปเภทธเร ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺเต มหานุภาเว เยภุยฺเยน ภควตา เอตทคฺคํ อาโรปิเต เตวิชฺชาทิเภเท ขีณาสวภิกฺขูเยว เอกูนปญฺจสเต ปริคฺคเหสิ. เย สนฺธาย อิทํ วุตฺตํ ‘‘อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป เอเกนูนปญฺจอรหนฺตสตานิ อุจฺจินี’’ติ (จูฬว. ๔๓๗). भिक्खूंनी म्हटले, "तर मग, भंते, स्थविरांनी भिक्खूंची निवड करावी." स्थविरांनी संपूर्ण नऊ अंगांच्या बुद्धशासनाच्या परियत्तीचे धारण करणाऱ्या, अनेक शेकडो आणि हजारो पृथग्जन, स्रोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी आणि शुष्कविपश्यक अर्हत भिक्खूंना वगळून, त्रिपिटकाच्या सर्व परियत्तीच्या प्रकारांचे धारण करणाऱ्या, प्रतिसंभिदा प्राप्त, महानुभाव आणि बहुतांश भगवंतांनी एतदग्र (सर्वोच्च) पदावर नियुक्त केलेल्या, त्रिविद्या इत्यादी प्रकारांनी युक्त अशा केवळ अर्हत भिक्खूंमधूनच चारशे नव्व्याण्णव (एक कमी पाचशे) भिक्खूंची निवड केली. ज्यांना उद्देशून हे म्हटले गेले आहे: "तेव्हा आयुष्यमान महाकस्सपांनी एक कमी पाचशे अर्हतांची निवड केली." กิสฺส ปน เถโร เอเกนูนมกาสีติ? อายสฺมโต อานนฺทตฺเถรสฺส โอกาสกรณตฺถํ. เตน หายสฺมตา สหาปิ วินาปิ น สกฺกา ธมฺมสงฺคีติ กาตุํ. โส หายสฺมา เสโข สกรณีโย, ตสฺมา สห น สกฺกา, ยสฺมา ปนสฺส กิญฺจิ ทสพลเทสิตํ สุตฺตเคยฺยาทิกํ ภควโต อสมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ นาม นตฺถิ, ตสฺมา วินาปิ น สกฺกา. ยทิ เอวํ เสโขปิ สมาโน ธมฺมสงฺคีติยา พหูการตฺตา เถเรน อุจฺจินิตพฺโพ อสฺส, อถ กสฺมา น อุจฺจินิโตติ? ปรูปวาทวิวชฺชนโต. เถโร หิ อายสฺมนฺเต อานนฺเท อติวิย วิสฺสตฺโถ อโหสิ. ตถา หิ นํ สิรสฺมึ ปลิเตสุ ชาเตสุปิ ‘‘น วายํ กุมารโก มตฺตมญฺญาสี’’ติ (สํ. นิ. ๒.๑๕๔) กุมารกวาเทน โอวทติ. สกฺยกุลปฺปสุโต จายํ อายสฺมา ตถาคตสฺส ภาตา จูฬปิตุ ปุตฺโต, ตตฺร ภิกฺขู ฉนฺทาคมนํ วิย มญฺญมานา ‘‘พหู อเสขปฏิสมฺภิทาปฺปตฺเต ภิกฺขู ฐเปตฺวา อานนฺทํ เสขปฏิสมฺภิทาปฺปตฺตํ เถโร อุจฺจินี’’ติ อุปวเทยฺยุํ. ตํ ปรูปวาทํ ปริวิวชฺเชนฺโต ‘‘อานนฺทํ วินา สงฺคีติ น สกฺกา กาตุํ, ภิกฺขูนํเยว อนุมติยา คเหสฺสามี’’ติ น อุจฺจินิ. पण स्थविरांनी एक कमी (४९९) का केले? आयुष्यमान आनंद स्थविरांसाठी जागा ठेवण्यासाठी. कारण त्या आयुष्यमानांच्या सोबत किंवा त्यांच्याशिवाय धम्मसंगीती करणे शक्य नव्हते. ते आयुष्यमान 'शैक्ष' (अजून अर्हत न झालेले) होते आणि त्यांचे कर्तव्य शिल्लक होते, म्हणून त्यांच्यासह (सुरुवातीलाच निवडणे) शक्य नव्हते. परंतु, दशबलांनी (बुद्धांनी) उपदेशिलेले सूत्र, गेय इत्यादी असे कोणतेही वचन नव्हते जे त्यांनी भगवंतांच्या सन्मुख ग्रहण केले नव्हते, म्हणून त्यांच्याशिवाय संगीती करणे शक्य नव्हते. जर असे होते, तर शैक्ष असूनही धम्मसंगीतीसाठी अत्यंत उपकारक असल्यामुळे स्थविरांनी त्यांची निवड करायला हवी होती, मग त्यांची निवड का केली नाही? लोकांच्या अपवादापासून (निंदेपासून) वाचण्यासाठी. कारण स्थविरांचा आयुष्यमान आनंदांवर अत्यंत विश्वास होता. म्हणूनच, त्यांच्या डोक्यावर पांढरे केस आलेले असतानाही, 'हा तरुण मुलगा अजूनही मर्यादा जाणत नाही' अशा शब्दांत ते त्यांना उपदेश करत असत. आणि हे आयुष्यमान शाक्य कुळात जन्मलेले, तथागतांचे बंधू आणि चुलत भाऊ होते. अशा स्थितीत, भिक्खू पक्षपाताचा संशय घेऊन अशी निंदा करू शकले असते की, 'अनेक अशैक्ष (अर्हत) आणि प्रतिसंभिदा प्राप्त भिक्खूंना सोडून स्थविरांनी शैक्ष व प्रतिसंभिदा प्राप्त आनंदांची निवड केली.' तो लोकापवाद टाळण्यासाठी, 'आनंदांशिवाय संगीती करणे शक्य नाही, परंतु मी भिक्खूंच्या संमतीनेच त्यांना समाविष्ट करेन,' असा विचार करून त्यांनी स्वतः त्यांची निवड केली नाही. อถ สยเมว ภิกฺขู อานนฺทสฺสตฺถาย เถรํ ยาจึสุ. ยถาห – त्यानंतर भिक्खूंनी स्वतःहूनच आनंद स्थविरांच्यासाठी स्थविरांना विनंती केली. जसे त्यांनी म्हटले आहे - ‘‘ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ มหากสฺสปํ เอตทโวจุํ – ‘อยํ, ภนฺเต, อายสฺมา อานนฺโท กิญฺจาปิ เสโข, อภพฺโพ ฉนฺทา โทสา โมหา ภยา อคตึ คนฺตุํ, พหุ จาเนน ภควโต สนฺติเก ธมฺโม จ วินโย จ ปริยตฺโต, เตน หิ, ภนฺเต, เถโร [Pg.79] อายสฺมนฺตมฺปิ อานนฺทํ อุจฺจินตู’ติ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป อายสฺมนฺตมฺปิ อานนฺทํ อุจฺจินี’’ติ (จูฬว. ๔๓๗). भिक्खूंनी आयुष्यमान महाकस्सपांना असे म्हटले— "भंते, हे आयुष्यमान आनंद जरी अजून 'सेख' (शैक्ष - पूर्णत्व न पावलेले) असले, तरी ते राग, द्वेष, मोह आणि भय यांच्या प्रभावाखाली येऊन चुकीच्या मार्गाने (अगतिला) जाण्यास असमर्थ आहेत. तसेच त्यांनी भगवंतांच्या सन्निध राहून विपुल धर्म आणि विनय यांचे अध्ययन केले आहे. म्हणूनच, भंते, थेरांनी आयुष्यमान आनंदांचीही निवड करावी." त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सपांनी आयुष्यमान आनंदांची निवड केली. เอวํ ภิกฺขูนํ อนุมติยา อุจฺจินิเตน เตนายสฺมตา สทฺธึ ปญฺจเถรสตานิ อเหสุํ. अशा प्रकारे भिक्खूंच्या संमतीने निवडलेल्या त्या आयुष्यमानांसह (आनंदांसह) एकूण पाचशे थेर झाले. อถ โข เถรานํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ – ‘‘กตฺถ นุ โข มยํ ธมฺมญฺจ วินยญฺจ สงฺคาเยยฺยามา’’ติ. อถ โข เถรานํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ ‘‘ราชคหํ โข มหาโคจรํ ปหูตเสนาสนํ, ยํนูน มยํ ราชคเห วสฺสํ วสนฺตา ธมฺมญฺจ วินยญฺจ สงฺคาเยยฺยาม, นญฺเญ ภิกฺขู ราชคเห วสฺสํ อุปคจฺเฉยฺยุ’’นฺติ. กสฺมา ปน เนสํ เอตทโหสิ? อิทํ อมฺหากํ ถาวรกมฺมํ, โกจิ วิสภาคปุคฺคโล สงฺฆมชฺฌํ ปวิสิตฺวา อุกฺโกเฏยฺยาติ. อถายสฺมา มหากสฺสโป ญตฺติทุติเยน กมฺเมน สาเวสิ. ตํ สงฺคีติกฺขนฺธเก (จูฬว. ๔๓๗) วุตฺตนเยเนว ญาตพฺพํ. त्यानंतर थेर भिक्खूंच्या मनात असा विचार आला— "आम्ही धर्म आणि विनय यांचे संगायन (संगीती) कोठे करावी?" त्यानंतर थेर भिक्खूंच्या मनात विचार आला— "राजगृह हे मोठे भिक्षाटन क्षेत्र असून तेथे पुरेशी निवासस्थाने (सेनासने) आहेत. तर मग आम्ही राजगृहात वर्षावास घालवत धर्म आणि विनय यांचे संगायन करावे आणि इतर कोणत्याही भिक्खूंनी राजगृहात वर्षावास करू नये." पण त्यांच्या मनात असा विचार का आला? "हे आमचे अत्यंत महत्त्वाचे कार्य आहे, कोणी विरोधी विचारसरणीचा व्यक्ती संघामध्ये प्रवेश करून यात विघ्न आणू नये" म्हणून. त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सपांनी 'ज्ञप्ति-द्वितीय' कर्माद्वारे संघाला सूचित केले. ते संगीतिखंधकात (चुळवग्ग) सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावे. อถ ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานโต สตฺตสุ สาธุกีฬนทิวเสสุ สตฺตสุ จ ธาตุปูชาทิวเสสุ วีติวตฺเตสุ ‘‘อฑฺฒมาโส อติกฺกนฺโต, อิทานิ คิมฺหานํ ทิยฑฺโฒ มาโส เสโส, อุปกฏฺฐา วสฺสูปนายิกา’’ติ มนฺตฺวา มหากสฺสปตฺเถโร ‘‘ราชคหํ, อาวุโส, คจฺฉามา’’ติ อุปฑฺฒํ ภิกฺขุสงฺฆํ คเหตฺวา เอกํ มคฺคํ คโต. อนุรุทฺธตฺเถโรปิ อุปฑฺฒํ คเหตฺวา เอกํ มคฺคํ คโต, อานนฺทตฺเถโร ปน ภควโต ปตฺตจีวรํ คเหตฺวา ภิกฺขุสงฺฆปริวุโต สาวตฺถึ คนฺตฺวา ราชคหํ คนฺตุกาโม เยน สาวตฺถิ, เตน จาริกํ ปกฺกามิ. อานนฺทตฺเถเรน คตคตฏฺฐาเน มหาปริเทโว อโหสิ, ‘‘ภนฺเต อานนฺท, กุหึ สตฺถารํ ฐเปตฺวา อาคโตสี’’ติ? อนุปุพฺเพน สาวตฺถึ อนุปฺปตฺเต เถเร ภควโต ปรินิพฺพานสมเย วิย มหาปริเทโว อโหสิ. त्यानंतर तथागतांच्या परिनिर्वाणानंतर सात दिवसांचे अंत्यसंस्कार विधी आणि सात दिवसांचे धातू-पूजा विधी व्यतीत झाल्यावर, "अर्धा महिना निघून गेला आहे, आता उन्हाळ्याचा दीड महिना शिल्लक आहे आणि वर्षावास जवळ आला आहे," असा विचार करून महाकस्सप थेरांनी "मित्रांनो, आपण राजगृहाला जाऊ या," असे सांगून अर्ध्या भिक्खू संघाला सोबत घेऊन एका मार्गाने प्रयाण केले. अनुरुद्ध थेरांनीही अर्ध्या संघाला सोबत घेऊन एका मार्गाने प्रयाण केले. परंतु आनंद थेरांनी भगवंतांचे पात्र व चीवर घेतले आणि भिक्खू संघासह श्रावस्तीला जाऊन, पुढे राजगृहाला जाण्याच्या इच्छेने श्रावस्तीच्या दिशेने चारिका सुरू केली. आनंद थेर ज्या ज्या ठिकाणी गेले, तेथे लोकांनी मोठा शोक केला— "भंते आनंद, शास्त्यांना कोठे सोडून आपण आलात?" क्रमाने थेर श्रावस्तीला पोहोचले तेव्हा भगवंतांच्या परिनिर्वाणाच्या वेळच्या सारखाच मोठा शोक झाला. ตตฺร สุทํ อายสฺมา อานนฺโท อนิจฺจตาทิปฏิสํยุตฺตาย ธมฺมิยา กถาย ตํ มหาชนํ สญฺญาเปตฺวา เชตวนํ ปวิสิตฺวา ทสพเลน วสิตคนฺธกุฏิยา ทฺวารํ วิวริตฺวา มญฺจปีฐํ นีหริตฺวา ปปฺโผเฏตฺวา คนฺธกุฏึ สมฺมชฺชิตฺวา มิลาตมาลากจวรํ ฉฑฺเฑตฺวา มญฺจปีฐํ อติหริตฺวา ปุน ยถาฐาเน ฐเปตฺวา ภควโต ฐิตกาเล กรณียํ วตฺตํ สพฺพมกาสิ. อถ [Pg.80] เถโร ภควโต ปรินิพฺพานโต ปภุติ ฐานนิสชฺชพหุลตฺตา อุสฺสนฺนธาตุกํ กายํ สมสฺสาเสตุํ ทุติยทิวเส ขีรวิเรจนํ ปิวิตฺวา วิหาเรเยว นิสีทิ, ยํ สนฺธาย สุเภน มาณเวน ปหิตํ มาณวกํ เอตทโวจ – तेथे आयुष्यमान आनंदांनी अनित्यतेशी संबंधित धर्मोपदेशाने त्या जनसमुदायाची समजूत काढली. त्यानंतर जेतवनात प्रवेश करून त्यांनी दशबलांनी (भगवंतांनी) वास्तव्य केलेल्या गंधकुटीचे दार उघडले, पलंग व आसने बाहेर काढून ती झाडून-झटकली, गंधकुटी झाडून स्वच्छ केली, सुकलेली फुले व कचरा दूर केला आणि पलंग व आसने पुन्हा आत आणून पूर्ववत जागी ठेवून भगवंत हयात असताना करायची ती सर्व दैनंदिन कर्तव्ये केली. त्यानंतर, भगवंतांच्या परिनिर्वाणापासून सतत उभे राहिल्याने व बसून राहिल्याने थकलेल्या शरीराला विश्रांती देण्यासाठी थेरांनी दुसऱ्या दिवशी दुधासोबत घेतलेले रेचक औषध पिऊन विहारातच विश्रांती घेतली. याच संदर्भात, सुभ माणवकाने (तरुणाने) पाठवलेल्या सेवकाला त्यांनी असे म्हटले— ‘‘อกาโล โข, มาณวก, อตฺถิ เม อชฺช เภสชฺชมตฺตา ปีตา, อปฺเปว นาม สฺเวปิ อุปสงฺกเมยฺยามา’’ติ (ที. นิ. ๑.๔๔๗). "हे माणवका, आज वेळ योग्य नाही. आज मी औषध घेतले आहे. कदाचित उद्या आम्ही येऊ शकू." ทุติยทิวเส เจตกตฺเถเรน ปจฺฉาสมเณน คนฺตฺวา สุเภน มาณเวน ปุฏฺโฐ ทีฆนิกาเย สุภสุตฺตํ นาม ทสมํ สุตฺตมภาสิ. दुसऱ्या दिवशी चेतक थेर या आपल्या अनुचर भिक्खूसोबत जाऊन, सुभ माणवकाने विचारलेल्या प्रश्नांची उत्तरे देत त्यांनी दीघनिकाय मधील 'सुभसुत्त' नावाच्या दहाव्या सुत्ताचा उपदेश केला. อถ โข เถโร เชตวเน วิหาเร ขณฺฑผุลฺลปฺปฏิสงฺขรณํ การาเปตฺวา อุปกฏฺฐาย วสฺสูปนายิกาย ราชคหํ คโต. ตถา มหากสฺสปตฺเถโร อนุรุทฺธตฺเถโร จ สพฺพํ ภิกฺขุสงฺฆํ คเหตฺวา ราชคหเมว คตา. त्यानंतर थेरांनी जेतवन विहारातील पडझड व दुरुस्तीची कामे करून घेतली आणि वर्षावास जवळ आल्यावर ते राजगृहाला गेले. त्याचप्रमाणे महाकस्सप थेर आणि अनुरुद्ध थेर देखील सर्व भिक्खू संघाला सोबत घेऊन राजगृहालाच गेले. เตน โข ปน สมเยน ราชคเห อฏฺฐารส มหาวิหารา โหนฺติ. เต สพฺเพปิ ฉฑฺฑิตปติตอุกฺลาปา อเหสุํ. ภควโต หิ ปรินิพฺพาเน สพฺเพ ภิกฺขู อตฺตโน อตฺตโน ปตฺตจีวรํ คเหตฺวา วิหาเร จ ปริเวเณ จ ฉฑฺเฑตฺวา อคมํสุ. ตตฺถ เถรา ภควโต วจนปูชนตฺถํ ติตฺถิยวาทปริโมจนตฺถญฺจ ‘‘ปฐมํ มาสํ ขณฺฑผุลฺลปฺปฏิสงฺขรณํ กโรมา’’ติ จินฺเตสุํ. ติตฺถิยา หิ วเทยฺยุํ ‘‘สมณสฺส โคตมสฺส สาวกา สตฺถริ ฐิเตเยว วิหาเร ปฏิชคฺคึสุ, ปรินิพฺพุเต ฉฑฺเฑสุ’’นฺติ. เตสํ วาทปริโมจนตฺถญฺจ จินฺเตสุนฺติ วุตฺตํ โหติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – त्या वेळी राजगृहात अठरा मोठे विहार होते. ते सर्व दुर्लक्षित, पडझड झालेले आणि अस्वच्छ झाले होते. कारण भगवंतांच्या परिनिर्वाणानंतर सर्व भिक्खू आपले पात्र व चीवर घेऊन विहार आणि परिसर सोडून निघून गेले होते. तेथे थेरांनी भगवंतांच्या वचनाचा आदर करण्यासाठी आणि इतर पंथीयांच्या (तीर्थिकांच्या) टीकेपासून वाचण्यासाठी "पहिल्या महिन्यात आपण पडझड व दुरुस्तीची कामे करू या," असा विचार केला. कारण तीर्थिक असे म्हणू शकले असते की— "श्रमण गोतमांचे श्रावक त्यांचे शास्ते हयात असेपर्यंतच विहारांची काळजी घेत होते, त्यांच्या परिनिर्वाणानंतर त्यांनी ते सोडून दिले." त्यांच्या या टीकेपासून वाचण्यासाठी त्यांनी असा विचार केला, असे म्हटले आहे. तसेच हे देखील म्हटले आहे— ‘‘อถ โข เถรานํ ภิกฺขูนํ เอตทโหสิ – ภควตา โข, อาวุโส, ขณฺฑผุลฺลปฺปฏิสงฺขรณํ วณฺณิตํ, หนฺท มยํ, อาวุโส, ปฐมํ มาสํ ขณฺฑผุลฺลปฺปฏิสงฺขรณํ กโรม, มชฺฌิมํ มาสํ สนฺนิปติตฺวา ธมฺมญฺจ วินยญฺจ สงฺคายิสฺสามา’’ติ (จูฬว. ๔๓๘). "त्यानंतर थेर भिक्खूंच्या मनात असा विचार आला— 'मित्रांनो, भगवंतांनी विहारांच्या पडझडीची दुरुस्ती करण्याच्या कामाची प्रशंसा केली आहे. चला तर मित्रांनो, आपण पहिल्या महिन्यात पडझड व दुरुस्तीची कामे करू या आणि दुसऱ्या महिन्यात एकत्र येऊन धर्म आणि विनय यांचे संगायन करू या.'" เต ทุติยทิวเส คนฺตฺวา ราชทฺวาเร อฏฺฐํสุ. อชาตสตฺตุ ราชา อาคนฺตฺวา วนฺทิตฺวา ‘‘อหํ, ภนฺเต, กึ กโรมิ, เกนตฺโถ’’ติ ปวาเรสิ. เถรา อฏฺฐารสมหาวิหารปฺปฏิสงฺขรณตฺถาย หตฺถกมฺมํ ปฏิเวเทสุํ. ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ ราชา หตฺถกมฺมการเก มนุสฺเส อทาสิ. เถรา ปฐมํ มาสํ สพฺพวิหาเร ปฏิสงฺขราเปสุํ. ते दुसऱ्या दिवशी जाऊन राजवाड्याच्या दाराशी उभे राहिले. राजा अजातशत्रूने तेथे येऊन वंदन केले आणि विचारले— "भंते, मी काय करू? आपल्याला कशाची आवश्यकता आहे?" थेरांनी अठरा मोठ्या विहारांच्या दुरुस्तीसाठी कामगारांची आवश्यकता असल्याचे सांगितले. राजा "खूप चांगले, भंते" असे म्हणाला आणि त्याने कामगार उपलब्ध करून दिले. थेरांनी पहिल्या महिन्यात सर्व विहारांची दुरुस्ती करून घेतली. อถ [Pg.81] รญฺโญ อาโรเจสุํ – ‘‘นิฏฺฐิตํ, มหาราช, วิหารปฺปฏิสงฺขรณํ, อิทานิ ธมฺมวินยสงฺคหํ กโรมา’’ติ. ‘‘สาธุ, ภนฺเต, วิสฺสตฺถา กโรถ, มยฺหํ อาณาจกฺกํ, ตุมฺหากํ ธมฺมจกฺกํ โหตุ. อาณาเปถ, ภนฺเต, กึ กโรมี’’ติ? ‘‘ธมฺมสงฺคหํ กโรนฺตานํ ภิกฺขูนํ สนฺนิสชฺชฏฺฐานํ มหาราชา’’ติ. ‘‘กตฺถ กโรมิ, ภนฺเต’’ติ? ‘‘เวภารปพฺพตปสฺเส สตฺตปณฺณิคุหาทฺวาเร กาตุํ ยุตฺตํ มหาราชา’’ติ. ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ โข, ราชา อชาตสตฺตุ, วิสฺสกมฺมุนา นิมฺมิตสทิสํ สุวิภตฺตภิตฺติถมฺภโสปานํ นานาวิธมาลากมฺมลตากมฺมวิจิตฺรํ มหามณฺฑปํ การาเปตฺวา วิวิธกุสุมทามโอลมฺพกวินิคฺคลนฺตจารุวิตานํ รตนวิจิตฺรมณิโกฏฺฏิมตลมิว จ นํ นานาปุปฺผูปหารวิจิตฺรํ สุปรินิฏฺฐิตภูมิกมฺมํ พฺรหฺมวิมานสทิสํ อลงฺกริตฺวา ตสฺมึ มหามณฺฑเป ปญฺจสตานํ ภิกฺขูนํ อนคฺฆานิ ปญฺจกปฺปิยปจฺจตฺถรณสตานิ ปญฺญาเปตฺวา ทกฺขิณภาคํ นิสฺสาย อุตฺตราภิมุขํ เถราสนํ, มณฺฑปมชฺเฌ ปุรตฺถาภิมุขํ พุทฺธสฺส ภควโต อาสนารหํ ธมฺมาสนํ ปญฺญาเปตฺวา ทนฺตขจิตํ จิตฺตพีชนิญฺเจตฺถ ฐเปตฺวา ภิกฺขุสงฺฆสฺส อาโรจาเปสิ ‘‘นิฏฺฐิตํ, ภนฺเต, กิจฺจ’’นฺติ. त्यानंतर स्थविरांनी राजाला कळवले, "महाराज, विहाराची दुरुस्ती पूर्ण झाली आहे. आता आम्ही धम्म आणि विनयाची संगीती करू." राजा म्हणाला, "उत्तम, भंते! आपण निःशंकपणे ते करावे. माझे आज्ञाचक्र असो आणि आपले धम्मचक्र असो. भंते, आज्ञा द्यावी, मी काय करू?" स्थवीर म्हणाले, "महाराज, धम्मसंगीती करणाऱ्या भिक्खूंच्या एकत्र बसण्यासाठी योग्य जागा तयार करावी." राजाने विचारले, "भंते, मी ती कोठे तयार करू?" स्थवीर म्हणाले, "महाराज, वेभार पर्वताच्या कुशीत सप्तपर्णी गुहेच्या दाराशी ते करणे योग्य होईल." "उत्तम, भंते!" असे म्हणून राजा अजातशत्रूने विश्वकर्म्याने निर्माण केल्यासारखा, सुविभक्त भिंती, खांब आणि पायऱ्या असलेला, विविध प्रकारच्या पुष्पमाला आणि लतावेलींच्या नक्षीकामाने सुशोभित केलेला एक भव्य मंडप उभारला. विविध फुलांच्या माळा आणि लटकन यांनी सुशोभित केलेले सुंदर छत असलेला, रत्नांनी जडवलेल्या जमिनीसारखा आणि विविध फुलांच्या सजावटीने नटलेला, उत्तम प्रकारे तयार केलेल्या जमिनीचे काम असलेला, ब्रह्मविमानासारखा सुशोभित करून, त्या महामंडपात पाचशे भिक्खूंच्यासाठी अमूल्य अशी पाचशे कल्पिय आसने मांडली. दक्षिण दिशेचा आश्रय घेऊन उत्तरेकडे तोंड करून मुख्य स्थविरांचे आसन मांडले, आणि मंडपाच्या मध्यभागी पूर्वेकडे तोंड करून बुद्ध भगवंतांच्या योग्य असे धम्मासन मांडले. त्यावर हस्तिदंताने जडवलेला सुंदर पंखा ठेवून भिक्खू संघाला निरोप पाठवला की, "भंते, सर्व तयारी पूर्ण झाली आहे." ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อาหํสุ ‘‘สฺเว, อาวุโส อานนฺท, สงฺฆสนฺนิปาโต, ตฺวญฺจ เสโข สกรณีโย, เตน เต น ยุตฺตํ สนฺนิปาตํ คนฺตุํ, อปฺปมตฺโต โหหี’’ติ. อถ โข อายสฺมา อานนฺโท ‘‘สฺเว สนฺนิปาโต, น โข ปน เมตํ ปติรูปํ, ยฺวาหํ เสโข สมาโน สนฺนิปาตํ คจฺเฉยฺย’’นฺติ พหุเทว รตฺตึ กายคตาย สติยา วีตินาเมตฺวา รตฺติยา ปจฺจูสสมเย จงฺกมา โอโรหิตฺวา วิหารํ ปวิสิตฺวา ‘‘นิปชฺชิสฺสามี’’ติ กายํ อาวชฺเชสิ. ทฺเว ปาทา ภูมิโต มุตฺตา, อปฺปตฺตญฺจ สีสํ พิมฺโพหนํ, เอตสฺมึ อนฺตเร อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจิ. อยญฺหิ อายสฺมา จงฺกเมน พหิ วีตินาเมตฺวา วิเสสํ นิพฺพตฺเตตุํ อสกฺโกนฺโต จินฺเตสิ ‘‘นนุ มํ ภควา เอตทโวจ – ‘กตปุญฺโญสิ ตฺวํ, อานนฺท, ปธานมนุยุญฺช, ขิปฺปํ โหหิสิ อนาสโว’ติ (ที. นิ. ๒.๒๐๗). พุทฺธานญฺจ กถาโทโส นาม นตฺถิ, มม ปน อจฺจารทฺธํ วีริยํ, เตน เม จิตฺตํ อุทฺธจฺจาย สํวตฺตติ, หนฺทาหํ วีริยสมตํ โยเชมี’’ติ จงฺกมา โอโรหิตฺวา ปาทโธวนฏฺฐาเน ฐตฺวา ปาเท โธวิตฺวา วิหารํ ปวิสิตฺวา มญฺจเก นิสีทิตฺวา ‘‘โถกํ วิสฺสมิสฺสามี’’ติ กายํ มญฺจเก อุปนาเมสิ. ทฺเว ปาทา [Pg.82] ภูมิโต มุตฺตา, สีสญฺจ พิมฺโพหนมสมฺปตฺตํ, เอตสฺมึ อนฺตเร อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจิ. จตุอิริยาปถวิรหิตํ เถรสฺส อรหตฺตํ. เตน ‘‘อิมสฺมึ สาสเน อนิสินฺโน อนิปนฺโน อฏฺฐิโต อจงฺกมนฺโต โก ภิกฺขุ อรหตฺตํ ปตฺโต’’ติ วุตฺเต ‘‘อานนฺทตฺเถโร’’ติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना म्हटले, "आयुष्यमान आनंद, उद्या संघाची सभा होणार आहे. आपण अजूनही 'सेख' (अपूर्ण-साधक) आहात, ज्यांचे कर्तव्य अजून शिल्लक आहे. त्यामुळे आपले या सभेत जाणे योग्य नाही. आपण अप्रमत्त राहावे." त्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी विचार केला, "उद्या सभा आहे, आणि मी सेख असताना या सभेत जाणे मला मुळीच शोभणारे नाही." त्यांनी रात्रीचा बराचसा वेळ कायगतासतीमध्ये घालवला. रात्रीच्या पहाटेच्या वेळी चंक्रमणावरून उतरून, विहारात प्रवेश करून, "मी आता झोपतो" असा विचार करून त्यांनी आपले शरीर झुकवले. दोन्ही पाय जमिनीपासून वर उचलले गेले होते आणि डोके अजून उशीला टेकले नव्हते, याच दरम्यान, कोणत्याही उपादानाशिवाय त्यांचे चित्त आसवांपासून मुक्त झाले. हे आयुष्यमान चंक्रमणात बाहेर वेळ घालवूनही विशेष ज्ञान प्राप्त करू न शकल्याने विचार करू लागले, "भगवंतांनी मला असे म्हटले नव्हते का - 'आनंद, तू पुण्यवान आहेस, तू ध्यानाचा अभ्यास कर, तू लवकरच अनासव होशील'? बुद्धांचे वचन कधीही असत्य असू शकत नाही. परंतु माझे वीर्य अतिशय तीव्र आहे, त्यामुळे माझे चित्त चंचलतेकडे वळत आहे. चला, मी आता वीर्याची समता साधतो." असे विचार करून चंक्रमणावरून उतरून, पाय धुण्याच्या ठिकाणी उभे राहून पाय धुवून, विहारात प्रवेश करून, पलंगावर बसून, "मी थोडी विश्रांती घेतो" असे म्हणून त्यांनी आपले शरीर पलंगावर आडवे केले. दोन्ही पाय जमिनीपासून वर उचलले गेले होते आणि डोके अजून उशीला टेकले नव्हते, याच दरम्यान, उपादानरहित होऊन त्यांचे चित्त आसवांपासून मुक्त झाले. स्थविरांचे हे अर्हतपद चारही इरियापथांपासून विरहित अवस्थेत प्राप्त झाले. म्हणूनच, "या शासनात न बसता, न झोपता, न उभे राहता आणि चंक्रमन न करता कोणता भिक्खू अर्हतपदाला प्राप्त झाला?" असे विचारल्यास, "स्थवीर आनंद" असे उत्तर देणे योग्य ठरते. อถ เถรา ภิกฺขู ทุติยทิวเส ภตฺตกิจฺจํ กตฺวา ปตฺตจีวรํ ปฏิสาเมตฺวา ธมฺมสภายํ สนฺนิปติตา. อานนฺทตฺเถโร ปน อตฺตโน อรหตฺตปฺปตฺตึ ญาเปตุกาโม ภิกฺขูหิ สทฺธึ น คโต. ภิกฺขู ยถาวุฑฺฒํ อตฺตโน อตฺตโน ปตฺตาสเน นิสีทนฺตา อานนฺทตฺเถรสฺส อาสนํ ฐเปตฺวา นิสินฺนา. ตตฺถ เกหิจิ ‘‘เอตมาสนํ กสฺสา’’ติ วุตฺเต อานนฺทสฺสาติ. ‘‘อานนฺโท ปน กุหึ คโต’’ติ. ตสฺมึ สมเย เถโร จินฺเตสิ ‘‘อิทานิ มยฺหํ คมนกาโล’’ติ. ตโต อตฺตโน อานุภาวํ ทสฺเสนฺโต ปถวิยํ นิมุชฺชิตฺวา อตฺตโน อาสเนเยว อตฺตานํ ทสฺเสสิ. อากาเสนาคนฺตฺวา นิสีทีติปิ เอเก. त्यानंतर दुसऱ्या दिवशी स्थवीर भिक्खूंनी भोजनविधी आटोपून, पात्र व चीवर व्यवस्थित ठेवून धम्मसभेत एकत्र आले. परंतु स्थवीर आनंदांना स्वतःची अर्हतपदाची प्राप्ती इतरांना कळावी अशी इच्छा असल्याने ते भिक्खूंच्या सोबत गेले नाहीत. भिक्खू आपापल्या ज्येष्ठतेनुसार आपापल्या आसनांवर बसले आणि स्थवीर आनंदांचे आसन रिकामे ठेवून बसले. तेथे काहींनी विचारले, "हे आसन कोणाचे आहे?" तेव्हा उत्तर मिळाले, "आनंदांचे." "पण आनंद कोठे गेले आहेत?" त्या वेळी स्थविरांनी विचार केला, "आता माझी जाण्याची वेळ झाली आहे." त्यानंतर स्वतःचा प्रभाव दाखवण्यासाठी त्यांनी जमिनीत बुडी मारून थेट आपल्या आसनावरच स्वतःला प्रकट केले. काही आचार्यांच्या मते, ते आकाशातून उडत येऊन आसनावर बसले. เอวํ นิสินฺเน ตสฺมึ อายสฺมนฺเต มหากสฺสปตฺเถโร ภิกฺขู อามนฺเตสิ, ‘‘อาวุโส, กึ ปฐมํ สงฺคายาม ธมฺมํ วา วินยํ วา’’ติ? ภิกฺขู อาหํสุ, ‘‘ภนฺเต มหากสฺสป, วินโยนามพุทฺธสาสนสฺส อายุ, วินเย ฐิเต สาสนํ ฐิตํ โหติ, ตสฺมา ปฐมํ วินยํ สงฺคายามา’’ติ. ‘‘กํ ธุรํ กตฺวา วินโย สงฺคายิตพฺโพ’’ติ? ‘‘อายสฺมนฺตํ อุปาลิ’’นฺติ. ‘‘กึ อานนฺโท นปฺปโหตี’’ติ? ‘‘โน นปฺปโหติ, อปิจ โข ปน สมฺมาสมฺพุทฺโธ ธรมาโนเยว วินยปริยตฺตึ นิสฺสาย อายสฺมนฺตํ อุปาลึ เอตทคฺเค ฐเปสิ – ‘เอตทคฺคํ, ภิกฺขเว, มม สาวกานํ ภิกฺขูนํ วินยธรานํ ยทิทํ อุปาลี’’’ติ (อ. นิ. ๑.๒๒๘). ตสฺมา อุปาลิตฺเถรํ ปุจฺฉิตฺวา วินยํ สงฺคายามาติ. ตโต เถโร วินยํ ปุจฺฉนตฺถาย อตฺตนาว อตฺตานํ สมฺมนฺนิ. อุปาลิตฺเถโรปิ วิสฺสชฺชนตฺถาย สมฺมนฺนิ. ตตฺรายํ ปาฬิ – ते असे बसल्यावर, आयुष्यमान महाकस्सप स्थविरांनी भिक्खूंना संबोधित केले, "आयुष्यमानहो, आपण आधी कशाची संगीती करावी - धम्माची की विनयाची?" भिक्खू म्हणाले, "भंते महाकस्सप, विनय हा बुद्धशासनाचा प्राण आहे. विनय टिकून राहिला तरच शासन टिकून राहते. त्यामुळे आपण आधी विनयाची संगीती करूया." "कोणाला प्रमुख करून विनयाची संगीती करावी?" "आयुष्यमान उपालींना." "काय, आनंद समर्थ नाहीत का?" "असे नाही की ते समर्थ नाहीत, ते नक्कीच समर्थ आहेत. परंतु सम्यक संबुद्धांनी हयात असतानाच विनयपिटकाच्या ज्ञानाच्या आधारे आयुष्यमान उपालींना एतदग्ग प्रदान केले होते की - 'भिक्खूंनो, माझ्या विनयधर भिक्खू श्रावकांमध्ये उपाली हा सर्वश्रेष्ठ आहे.' म्हणून स्थवीर उपालींना विचारून आपण विनयाची संगीती करूया." त्यानंतर स्थविरांनी विनय विचारण्यासाठी स्वतःचीच नियुक्ती केली. स्थवीर उपालींनीही उत्तरे देण्यासाठी स्वतःची नियुक्ती केली. या संदर्भातील पाळी खालीलप्रमाणे आहे - อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป สงฺฆํ ญาเปสิ – त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सपांनी संघाला सूचित केले - ‘‘สุณาตุ เม, อาวุโส, สงฺโฆ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, อหํ อุปาลึ วินยํ ปุจฺเฉยฺย’’นฺติ. "आयुष्यमानहो, संघाने माझे ऐकावे. जर संघाची संमती असेल, तर मी उपालींना विनयाबद्दल प्रश्न विचारीन." อายสฺมาปิ [Pg.83] อุปาลิ สงฺฆํ ญาเปสิ – आयुष्यमान उपालींनीही संघाला सूचित केले - ‘‘สุณาตุ เม, ภนฺเต, สงฺโฆ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, อหํ อายสฺมตา มหากสฺสเปน วินยํ ปุฏฺโฐ วิสฺสชฺเชยฺย’’นฺติ. "भंते, संघाने माझे ऐकावे. जर संघाची संमती असेल, तर आयुष्यमान महाकस्सपांनी विनयाबद्दल विचारलेल्या प्रश्नांची मी उत्तरे देईन." เอวํ อตฺตนาว อตฺตานํ สมฺมนฺนิตฺวา อายสฺมา, อุปาลิ, อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ จีวรํ กตฺวา เถเร ภิกฺขู วนฺทิตฺวา ธมฺมาสเน นิสีทิ ทนฺตขจิตํ พีชนึ คเหตฺวา. ตโต มหากสฺสปตฺเถโร อุปาลิตฺเถรํ ปฐมปาราชิกํ อาทึ กตฺวา สพฺพํ วินยํ ปุจฺฉิ, อุปาลิตฺเถโร วิสฺสชฺเชสิ. สพฺเพ ปญฺจสตา ภิกฺขู ปฐมปาราชิกสิกฺขาปทํ สนิทานํ กตฺวา เอกโต คณสชฺฌายมกํสุ. เอวํ เสสานิปีติ สพฺพํ วินยฏฺฐกถาย คเหตพฺพํ. เอเตน นเยน สอุภโตวิภงฺคํ สขนฺธกปริวารํ สกลํ วินยปิฏกํ สงฺคายิตฺวา อุปาลิตฺเถโร ทนฺตขจิตํ พีชนึ นิกฺขิปิตฺวา ธมฺมาสนา โอโรหิตฺวา วุฑฺเฒ ภิกฺขู วนฺทิตฺวา อตฺตโน ปตฺตาสเน นิสีทิ. अशा प्रकारे स्वतःचीच नियुक्ती करून, आयुष्यमान उपाली आसनावरून उठले, एका खांद्यावर चीवर परिधान करून स्थवीर भिक्खूंना वंदन करून, हस्तिदंताने जडवलेला पंखा हातात घेऊन धम्मासनावर बसले. त्यानंतर स्थवीर महाकस्सपांनी स्थवीर उपालींना पहिल्या पाराजिकापासून सुरुवात करून संपूर्ण विनयाबद्दल विचारले, आणि स्थवीर उपालींनी त्याची उत्तरे दिली. सर्व पाचशे भिक्खूंनी पहिल्या पाराजिकाच्या शिक्षापदाचे त्याच्या निदानासह एकत्र मिळून सामूहिक पठण केले. याचप्रमाणे उर्वरित शिक्षापदांचेही पठण केले, हे सर्व विनय अट्ठकथेतून समजून घ्यावे. या पद्धतीने दोन्ही विभंग, खंधक आणि परिवारासह संपूर्ण विनयपिटकाची संगीती करून, स्थवीर उपालींनी हस्तिदंताचा पंखा खाली ठेवला, धम्मासनावरून खाली उतरले, ज्येष्ठ भिक्खूंना वंदन केले आणि आपल्या नियोजित आसनावर जाऊन बसले. วินยํ สงฺคายิตฺวา ธมฺมํ สงฺคายิตุกาโม อายสฺมา มหากสฺสปตฺเถโร ภิกฺขู ปุจฺฉิ – ‘‘ธมฺมํ สงฺคายนฺเตหิ กํ ปุคฺคลํ ธุรํ กตฺวา ธมฺโม สงฺคายิตพฺโพ’’ติ? ภิกฺขู ‘‘อานนฺทตฺเถรํ ธุรํ กตฺวา’’ติ อาหํสุ. विनयाचे संगायन केल्यानंतर, धम्माचे संगायन करण्याची इच्छा असणाऱ्या आयुष्यमान महाकस्सप स्थवीरांनी भिक्खूंना विचारले – "धम्माचे संगायन करणाऱ्यांनी कोणत्या व्यक्तीला प्रमुख करून धम्माचे संगायन करावे?" भिक्खू म्हणाले, "स्थवीर आनंदांना प्रमुख करून." อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป สงฺฆํ ญาเปสิ – त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सपांनी संघाला निवेदित केले – ‘‘สุณาตุ เม, อาวุโส, สงฺโฆ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, อหํ อานนฺทํ ธมฺมํ ปุจฺเฉยฺย’’นฺติ. "हे आवुसो, संघाने माझे ऐकावे. जर संघासाठी ही योग्य वेळ असेल, तर मी आनंदांना धम्माविषयी प्रश्न विचारेन." อถ โข อายสฺมา อานนฺโท สงฺฆํ ญาเปสิ – त्यानंतर आयुष्यमान आनंदांनी संघाला निवेदित केले – ‘‘สุณาตุ เม, ภนฺเต, สงฺโฆ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ, อหํ อายสฺมตา มหากสฺสเปน ธมฺมํ ปุฏฺโฐ วิสฺสชฺเชยฺย’’นฺติ. "भंते, संघाने माझे ऐकावे. जर संघासाठी ही योग्य वेळ असेल, तर आयुष्यमान महाकस्सपांनी धम्माविषयी विचारलेल्या प्रश्नांची मी उत्तरे देईन." อถ โข อายสฺมา อานนฺโท อุฏฺฐายาสนา เอกํสํ จีวรํ กตฺวา เถเร ภิกฺขู วนฺทิตฺวา ธมฺมาสเน นิสีทิ ทนฺตขจิตํ พีชนึ คเหตฺวา. อถ มหากสฺสปตฺเถโร อานนฺทตฺเถรํ ธมฺมํ ปุจฺฉิ – ‘‘พฺรหฺมชาลํ, อาวุโส อานนฺท, กตฺถ ภาสิต’’นฺติ? ‘‘อนฺตรา จ, ภนฺเต, ราชคหํ อนฺตรา จ นาฬนฺทํ ราชาคารเก อมฺพลฏฺฐิกาย’’นฺติ. ‘‘กํ อารพฺภา’’ติ? ‘‘สุปฺปิยญฺจ ปริพฺพาชกํ พฺรหฺมทตฺตญฺจ มาณวก’’นฺติ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ พฺรหฺมชาลสฺส นิทานมฺปิ ปุจฺฉิ, ปุคฺคลมฺปิ ปุจฺฉิ. ‘‘สามญฺญผลํ; ปนาวุโส อานนฺท, กตฺถ ภาสิต’’นฺติ? ‘‘ราชคเห, ภนฺเต, ชีวกมฺพวเน’’ติ. ‘‘เกน สทฺธิ’’นฺติ? ‘‘อชาตสตฺตุนา [Pg.84] เวเทหิปุตฺเตน สทฺธิ’’นฺติ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ สามญฺญผลสฺส นิทานมฺปิ ปุจฺฉิ, ปุคฺคลมฺปิ ปุจฺฉิ. เอเตเนว อุปาเยน ปญฺจปิ นิกาเย ปุจฺฉิ, ปุฏฺโฐ ปุฏฺโฐ อายสฺมา อานนฺโท วิสฺสชฺเชสิ. อยํ ปฐมมหาสงฺคีติ ปญฺจหิ เถรสเตหิ กตา – त्यानंतर आयुष्यमान आनंद आसनावरून उठले, एका खांद्यावर चीवर परिधान केले, स्थवीर भिक्खूंना वंदन केले आणि हस्तिदंती पंखा हातात घेऊन धम्मासनावर बसले. त्यानंतर महाकस्सप स्थवीरांनी आनंद स्थवीरांना धम्माविषयी विचारले – "हे आवुसो आनंद, भगवंतांनी ब्रह्मजाल सुत्त कोठे उपदेशिले होते?" "भंते, राजगृह आणि नाळंदा यांच्या दरम्यान अम्बलट्ठिका येथील राजकीय विश्रामगृहात उपदेशिले होते." "कोणाला उद्देशून?" "सुप्पिय परिव्राजक आणि ब्रह्मदत्त माणवक यांना उद्देशून." त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सपांनी आयुष्यमान आनंदांना ब्रह्मजाल सुत्ताची पार्श्वभूमी (निदान) आणि संबंधित व्यक्तींविषयी देखील विचारले. "हे आवुसो आनंद, सामञ्ञफल सुत्त कोठे उपदेशिले होते?" "भंते, राजगृहातील जीवक आंबवनात." "कोणासोबत?" "वैदेहीपुत्र अजातशत्रू राजासोबत." त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सपांनी आयुष्यमान आनंदांना सामञ्ञफल सुत्ताची पार्श्वभूमी आणि संबंधित व्यक्तींविषयी देखील विचारले. याच पद्धतीने त्यांनी पाचही निकाळांविषयी विचारले आणि विचारलेल्या प्रत्येक प्रश्नाचे आयुष्यमान आनंदांनी उत्तर दिले. ही पहिली महासंगीती पाचशे स्थवीरांनी केली – ‘‘สเตหิ ปญฺจหิ กตา, เตน ปญฺจสตาติ จ; เถเรเหว กตตฺตา จ, เถริกาติ ปวุจฺจตี’’ติ. "पाचशे स्थवीरांनी ही संगीती केली, म्हणून तिला 'पञ्चसतिका' म्हणतात; आणि केवळ स्थवीरांनीच ती केल्यामुळे तिला 'थेरिका' असेही म्हटले जाते." อิมิสฺสา ปฐมมหาสงฺคีติยา วตฺตมานาย สพฺพํ ทีฆนิกายํ มชฺฌิมนิกายาทิญฺจ ปุจฺฉิตฺวา อนุปุพฺเพน ขุทฺทกนิกายํ ปุจฺฉนฺเตน อายสฺมตา มหากสฺสเปน ‘‘มงฺคลสุตฺตํ, อาวุโส อานนฺท, กตฺถ ภาสิต’’นฺติ เอวมาทิวจนาวสาเน ‘‘นิทานมฺปิ ปุจฺฉิ, ปุคฺคลมฺปิ ปุจฺฉี’’ติ เอตฺถ นิทาเน ปุจฺฉิเต ตํ นิทานํ วิตฺถาเรตฺวา ยถา จ ภาสิตํ, เยน จ สุตํ, ยทา จ สุตํ, เยน จ ภาสิตํ, ยตฺถ จ ภาสิตํ, ยสฺส จ ภาสิตํ, ตํ สพฺพํ กเถตุกาเมน ‘‘เอวํ ภาสิตํ มยา สุตํ, เอกํ สมยํ สุตํ, ภควตา ภาสิตํ, สาวตฺถิยํ ภาสิตํ, เทวตาย ภาสิต’’นฺติ เอตมตฺถํ ทสฺเสนฺเตน อายสฺมตา อานนฺเทน วุตฺตํ ‘‘เอวํ เม สุตํ – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม…เป… ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสี’’ติ. เอวมิทํ อายสฺมตา อานนฺเทน วุตฺตํ, ตญฺจ ปน ปฐมมหาสงฺคีติกาเล วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. ही पहिली महासंगीती चालू असताना, संपूर्ण दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय इत्यादींविषयी विचारल्यानंतर, क्रमाने खुद्दकनिकायाविषयी विचारू इच्छिणाऱ्या आयुष्यमान महाकस्सपांनी "हे आवुसो आनंद, मंगळसुत्त कोठे उपदेशिले होते?" असे विचारले. या संवादाच्या शेवटी "पार्श्वभूमी आणि व्यक्तींविषयी विचारले" या संदर्भात पार्श्वभूमी विचारली असता, ती पार्श्वभूमी सविस्तर सांगून – ते कसे उपदेशिले गेले, कोणी ऐकले, कधी ऐकले, कोणी उपदेशिले, कोठे उपदेशिले आणि कोणासाठी उपदेशिले, हे सर्व सांगण्याची इच्छा असणाऱ्या आणि "अशा प्रकारे उपदेशिलेले मी ऐकले, एका समयी ऐकले, भगवंतांनी उपदेशिले, श्रावस्तीमध्ये उपदेशिले, देवतेसाठी उपदेशिले" हा अर्थ दर्शविणाऱ्या आयुष्यमान आनंदांनी म्हटले – "असे मी ऐकले आहे – एका समयी भगवान श्रावस्ती येथील अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते... पे... देवतेने भगवंतांना गाथेने संबोधित केले." अशा प्रकारे हे आयुष्यमान आनंदांनी म्हटले आहे आणि हे पहिल्या महासंगीतीच्या वेळी म्हटले गेले होते, असे जाणावे. อิทานิ ‘‘กสฺมา วุตฺต’’นฺติ เอตฺถ วุจฺจเต – ยสฺมา อยมายสฺมา มหากสฺสปตฺเถเรน นิทานํ ปุฏฺโฐ, ตสฺมาเนน ตํ นิทานํ อาทิโต ปภุติ วิตฺถาเรตุํ วุตฺตํ. ยสฺมา วา อานนฺทํ ธมฺมาสเน นิสินฺนํ วสีคณปริวุตํ ทิสฺวา เอกจฺจานํ เทวตานํ จิตฺตมุปฺปนฺนํ ‘‘อยมายสฺมา เวเทหมุนิ ปกติยาปิ สกฺยกุลมนฺวโย ภควโต ทายาโท, ภควตาปิ ปญฺจกฺขตฺตุํ เอตทคฺเค นิทฺทิฏฺโฐ, จตูหิ อจฺฉริยอพฺภุตธมฺเมหิ สมนฺนาคโต, จตุนฺนํ ปริสานํ ปิโย มนาโป, อิทานิ มญฺเญ ภควโต ธมฺมรชฺชทายชฺชํ ปตฺวา พุทฺโธ ชาโต’’ติ. ตสฺมา อายสฺมา อานนฺโท ตาสํ เทวตานํ เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย ตํ อภูตคุณสมฺภาวนํ อนธิวาเสนฺโต อตฺตโน สาวกภาวเมว ทีเปตุํ อาห ‘‘เอวํ เม สุตํ เอกํ สมยํ ภควา [Pg.85] …เป… อชฺฌภาสี’’ติ. เอตฺถนฺตเร ปญฺจ อรหนฺตสตานิ อเนกานิ จ เทวตาสหสฺสานิ ‘‘สาธุ สาธู’’ติ อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อภินนฺทึสุ, มหาภูมิจาโล อโหสิ, นานาวิธกุสุมวสฺสํ อนฺตลิกฺขโต ปปติ, อญฺญานิ จ พหูนิ อจฺฉริยานิ ปาตุรเหสุํ, พหูนญฺจ เทวตานํ สํเวโค อุปฺปชฺชิ ‘‘ยํ อมฺเหหิ ภควโต สมฺมุขา สุตํ, อิทาเนว ตํ ปโรกฺขา ชาต’’นฺติ. เอวมิทํ อายสฺมตา อานนฺเทน ปฐมมหาสงฺคีติกาเล วทนฺเตนาปิ อิมินา การเณน วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. เอตฺตาวตา จ ‘‘วุตฺตํ เยน ยทา ยสฺมา, เจตํ วตฺวา อิมํ วิธิ’’นฺติ อิมิสฺสา อทฺธคาถาย อตฺโถ ปกาสิโต โหติ. आता "का म्हटले गेले" याविषयी उत्तर दिले जात आहे – ज्या अर्थी या आयुष्यमानांना महाकस्सप स्थवीरांनी पार्श्वभूमी विचारली होती, त्या अर्थी त्यांनी ती पार्श्वभूमी सुरुवातीपासून सविस्तर सांगण्यासाठी असे म्हटले. किंवा, ज्या अर्थी आनंदांना धम्मासनावर बसलेले आणि अर्हतांच्या समूहाने वेढलेले पाहून काही देवतांच्या मनात असा विचार आला – "हे आयुष्यमान विदेहमुनी मूळचेच शाक्य कुळातील असून भगवंतांचे वारसदार आहेत. भगवंतांनी देखील आयुष्यमान आनंदांना पाच वेळा एतदग्ग पदावर घोषित केले आहे. ते चार आश्चर्यकारक व अद्भुत गुणांनी युक्त आहेत आणि चारही परिषदांचे प्रिय व मनपसंत आहेत. आता बहुधा भगवंतांच्या धम्मराज्याचे दायित्व मिळवून ते बुद्ध झाले आहेत." म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी त्या देवतांच्या मनातील विचार स्वतःच्या चित्ताने जाणून, त्या अभूतपूर्व गुणांच्या गौरवाचा स्वीकार न करता, स्वतःचे श्रावकत्वच प्रकट करण्यासाठी म्हटले – "असे मी ऐकले आहे – एका समयी भगवान... पे... संबोधित केले." या दरम्यान पाचशे अर्हतांनी आणि हजारो देवतांनी "साधू, साधू!" असे म्हणून आयुष्यमान आनंदांचे कौतुक केले. मोठा भूकंप झाला, आकाशातून विविध प्रकारच्या फुलांचा वर्षाव झाला आणि इतरही अनेक आश्चर्यकारक घटना प्रकट झाल्या. तसेच अनेक देवतांच्या मनात संवेग उत्पन्न झाला – "जे आम्ही भगवंतांच्या समक्ष ऐकले होते, ते आता परोक्ष झाले आहे (भगवंतांच्या अनुपस्थितीत ऐकावे लागत आहे)." अशा प्रकारे हे आयुष्यमान आनंदांनी पहिल्या महासंगीतीच्या वेळी सांगताना देखील याच कारणाने म्हटले गेले होते, असे जाणावे. आणि एवढ्याने "कोणी, कधी, का म्हटले, आणि हा विधी सांगून" या अर्ध्या गाथेचा अर्थ स्पष्ट होतो. เอวมิจฺจาทิปาฐวณฺณนา अशा प्रकारे 'एवम्' इत्यादी पाठाचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ๑. อิทานิ ‘‘เอวมิจฺจาทิปาฐสฺส, อตฺถํ นานปฺปการโต’’ติ เอวมาทิมาติกาย สงฺคหิตตฺถปฺปกาสนตฺถํ วุจฺจเต – เอวนฺติ อยํ สทฺโท อุปมูปเทสสมฺปหํสนครหณวจนสมฺปฏิคฺคหาการนิทสฺสนาวธารณาทีสุ อตฺเถสุ ทฏฺฐพฺโพ. ตถา เหส ‘‘เอวํ ชาเตน มจฺเจน, กตฺตพฺพํ กุสลํ พหุ’’นฺติ เอวมาทีสุ (ธ. ป. ๕๓) อุปมายํ ทิสฺสติ. ‘‘เอวํ เต อภิกฺกมิตพฺพํ, เอวํ เต ปฏิกฺกมิตพฺพ’’นฺติอาทีสุ (อ. นิ. ๔.๑๒๒) อุปเทเส. ‘‘เอวเมตํ ภควา, เอวเมตํ สุคตา’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๓.๖๖) สมฺปหํสเน. ‘‘เอวเมวํ ปนายํ วสลี ยสฺมึ วา ตสฺมึ วา ตสฺส มุณฺฑกสฺส สมณกสฺส วณฺณํ ภาสตี’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๑๘๗) ครหเณ. ‘‘เอวํ, ภนฺเตติ โข เต ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุ’’นฺติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๑) วจนสมฺปฏิคฺคเห. ‘‘เอวํ พฺยา โข อหํ, ภนฺเต, ภควตา ธมฺมํ เทสิตํ อาชานามี’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓๙๘) อากาเร. ‘‘เอหิ ตฺวํ, มาณวก, เยน สมโณ อานนฺโท เตนุปสงฺกม, อุปสงฺกมิตฺวา มม วจเนน สมณํ อานนฺทํ อปฺปาพาธํ อปฺปาตงฺกํ ลหุฏฺฐานํ พลํ ผาสุวิหารํ ปุจฺฉ. ‘สุโภ มาณโว โตเทยฺยปุตฺโต ภวนฺตํ อานนฺทํ อปฺปาพาธํ อปฺปาตงฺกํ ลหุฏฺฐานํ พลํ ผาสุวิหารํ ปุจฺฉตี’ติ, เอวญฺจ วเทหิ สาธุ กิร ภวํ อานนฺโท เยน สุภสฺส มาณวสฺส โตเทยฺยปุตฺตสฺส นิเวสนํ, เตนุปสงฺกมตุ อนุกมฺปํ อุปาทายา’’ติ เอวมาทีสุ (ที. นิ. ๑.๔๔๕) นิทสฺสเน. ‘‘ตํ กึ มญฺญถ กาลามา, อิเม ธมฺมา กุสลา วา อกุสลา วาติ? อกุสลา, ภนฺเต. สาวชฺชา วา อนวชฺชา วาติ? สาวชฺชา, ภนฺเต. วิญฺญุครหิตา วา วิญฺญุปฺปสตฺถา [Pg.86] วาติ? วิญฺญุครหิตา, ภนฺเต. สมตฺตา สมาทินฺนา อหิตาย ทุกฺขาย สํวตฺตนฺติ โน วา, กถํ โว เอตฺถ โหตีติ? สมตฺตา, ภนฺเต, สมาทินฺนา อหิตาย ทุกฺขาย สํวตฺตนฺติ, เอวํ โน เอตฺถ โหตี’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๓.๖๖) อวธารเณ. อิธ ปน อาการนิทสฺสนาวธารเณสุ ทฏฺฐพฺโพ. १. आता “एवमिच्चादिपाठाचा अर्थ विविध प्रकारे स्पष्ट करण्यासाठी” अशा प्रकारे “नानाप्पकारतो” इत्यादी मातृकेद्वारे संग्रहित अर्थाचे प्रकाशन करण्यासाठी म्हटले जाते – “एवम्” हा शब्द उपमा (सादृश्य), उपदेश (निर्देश), संप्रहंसन (प्रशंसा), गरहण (निंदा), वचनसंपटिग्गह (वचन स्वीकारणे), आकार (पद्धत/प्रकार), निदस्सन (निर्देश/उदाहरणाने दाखवणे), अवधारण (निश्चय) इत्यादी अर्थांमध्ये समजला पाहिजे. तसेच हा “एवम्” शब्द “एवं जातेन मच्चेन, कातब्बं कुसलं बहुं” (अशा प्रकारे जन्मलेल्या मानवाने पुष्कळ कुशल कर्म केले पाहिजे) इत्यादींमध्ये ‘उपमा’ या अर्थात दिसतो. “एवं ते अभिक्कमितब्बं, एवं ते पटिक्कमितब्बं” (तुला अशा प्रकारे पुढे गेले पाहिजे, अशा प्रकारे मागे सरकले पाहिजे) इत्यादींमध्ये ‘उपदेश’ या अर्थात. “एवमेतं भगवा, एवमेतं सुगता” (हे भगवन्, हे असेच आहे; हे सुगत, हे असेच आहे) इत्यादींमध्ये ‘संप्रहंसन’ या अर्थात. “एवमेवं पनायं वसली यस्मिं वा तस्मिं वा तस्स मुण्डकस्स समणकस्स वण्णं भासती” (परंतु ही हलकी स्त्री अशा प्रकारे त्या मुंडक श्रमणाचे गुणगान गाते) इत्यादींमध्ये ‘गरहण’ (निंदा) या अर्थात. “एवं, भन्तेति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं” (होय, भन्ते! असे म्हणून त्या भिक्खूंनी भगवंतांचे वचन स्वीकारले) इत्यादींमध्ये ‘वचनसंपटिग्गह’ या अर्थात. “एवं ब्या खो अहं, भन्ते, भगवता धम्मं देसितं आजानामी” (भन्ते, भगवंतांनी देशना केलेला धम्म मी अशा प्रकारे समजतो) इत्यादींमध्ये ‘आकार’ या अर्थात. “Ehi tvaṃ, māṇavaka, yena samaṇo ānando tenupasaṅkama, upasaṅkamitvā mama vacanena samaṇaṃ ānandaṃ appābādhaṃ appātaṅkaṃ lahuṭṭhānaṃ balaṃ phāsuvihāraṃ pucchassu. Todeyyaputto subho māṇavo bhavantaṃ ānandaṃ appābādhaṃ appātaṅkaṃ lahuṭṭhānaṃ balaṃ phāsuvihāraṃ pucchati, evañca vadehi sādhu kira bhavaṃ ānando yena subhassa māṇavassa todeyyaputtassa nivesanaṃ, tenupasaṅkamatu anukampaṃ upādāyā” (ये तरुणा, जिथे श्रमण आनंद आहेत तिथे जा. तिथे जाऊन माझ्या वतीने श्रमण आनंदांना निरोगीपणा, आजार नसणे, हलकेपणा, बल आणि सुखविहार याबद्दल विचार. ‘तोदेय्यपुत्र सुभ माणवक आयुष्यमान आनंदांना निरोगीपणा, आजार नसणे, हलकेपणा, बल आणि सुखविहार विचारत आहे’ आणि असे सांग की, ‘चांगले होईल जर आयुष्यमान आनंद तोदेय्यपुत्र सुभ माणवकाच्या घरी अनुकंपा करून येतील’) इत्यादींमध्ये ‘निदस्सन’ या अर्थात. “तं किं मञ्ञथ कालामा, इमे धम्मा कुसला वा अकुसला वाति? अकुसला, भन्ते. सावज्जा वा अनवज्जा वाति? सावज्जा, भन्ते. विञ्ञूगरहिता वा विञ्ञूप्पसत्था वाति? विञ्ञूगरहिता, भन्ते. समत्ता समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्ति नो वा, कथं वो एत्थ होतीति? समत्ता, भन्ते, समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्ति, एवं नो एत्थ होती” (कालामांनो, तुम्हाला काय वाटते? हे धम्म कुशल आहेत की अकुशल? भन्ते, अकुशल आहेत. सदोष आहेत की निर्दोष? भन्ते, सदोष आहेत. सुज्ञांनी निंदिलेले आहेत की सुज्ञांनी प्रशंसिलेले? भन्ते, सुज्ञांनी निंदिलेले आहेत. पूर्णपणे स्वीकारल्यास आणि आचरणात आणल्यास ते अहितासाठी आणि दुःखासाठी कारणीभूत ठरतात की नाही? यावर तुमचे काय मत आहे? भन्ते, पूर्णपणे स्वीकारल्यास आणि आचरणात आणल्यास ते अहितासाठी आणि दुःखासाठी कारणीभूत ठरतात, असे आमचे मत आहे) इत्यादींमध्ये ‘अवधारण’ या अर्थात. परंतु येथे (या मंगळसुत्तात) तो ‘आकार’, ‘निदस्सन’ आणि ‘अवधारण’ या अर्थांमध्ये समजला पाहिजे. ตตฺถ อาการตฺเถน เอวํ-สทฺเทน เอตมตฺถํ ทีเปติ – นานานยนิปุณมเนกชฺฌาสยสมุฏฺฐานํ อตฺถพฺยญฺชนสมฺปนฺนํ วิวิธปาฏิหาริยํ ธมฺมตฺถเทสนาปฏิเวธคมฺภีรํ สพฺพสตฺตานํ สกสกภาสานุรูปโต โสตปถมาคจฺฉนฺตํ ตสฺส ภควโต วจนํ สพฺพปฺปกาเรน โก สมตฺโถ วิญฺญาตุํ, สพฺพถาเมน ปน โสตุกามตํ ชเนตฺวาปิ เอวํ เม สุตํ, มยาปิ เอเกนากาเรน สุตนฺติ. त्यापैकी, ‘आकार’ या अर्थातील ‘एवम्’ शब्दाने हा अर्थ स्पष्ट होतो – विविध नयांनी निपुण असलेले, अनेक आशयांतून उत्पन्न झालेले, अर्थ आणि व्यंजनाने संपन्न असलेले, विविध प्रातिहार्यांनी युक्त असलेले, धम्म, अर्थ, देशना आणि प्रतिवेध या दृष्टीने गंभीर असलेले, आणि सर्व प्राण्यांच्या आपापल्या भाषेनुसार त्यांच्या श्रवणपथावर पडणारे त्या भगवंतांचे वचन सर्व प्रकारे जाणण्यास कोण समर्थ आहे? परंतु, सर्व शक्तीनिशी ऐकण्याची इच्छा निर्माण करूनही, ‘मी असे ऐकले आहे, माझ्याद्वारे देखील एका प्रकारे ऐकले गेले आहे’ हे दर्शवतो. นิทสฺสนตฺเถน ‘‘นาหํ สยมฺภู, น มยา อิทํ สจฺฉิกต’’นฺติ อตฺตานํ ปริโมเจนฺโต ‘‘เอวํ เม สุตํ, มยาปิ เอวํ สุต’’นฺติ อิทานิ วตฺตพฺพํ สกลสุตฺตํ นิทสฺเสติ. ‘निदस्सन’ या अर्थाने, “मी स्वयंभू नाही, मी स्वतः याचा साक्षात्कार केलेला नाही” असे सांगून स्वतःला मुक्त करत, “अशा प्रकारे मी ऐकले आहे, माझ्याद्वारे देखील अशा प्रकारे ऐकले गेले आहे” असे म्हणून आता सांगायचे असलेले संपूर्ण सुत्त निर्देशित करतो. อวธารณตฺเถน ‘‘เอตทคฺคํ, ภิกฺขเว, มม สาวกานํ ภิกฺขูนํ พหุสฺสุตานํ ยทิทํ อานนฺโท, คติมนฺตานํ, สติมนฺตานํ, ธิติมนฺตานํ, อุปฏฺฐากานํ ยทิทํ อานนฺโท’’ติ (อ. นิ. ๑.๒๑๙-๒๒๓) เอวํ ภควตา ปสตฺถภาวานุรูปํ อตฺตโน ธารณพลํ ทสฺเสนฺโต สตฺตานํ โสตุกมฺยตํ ชเนติ ‘‘เอวํ เม สุตํ, ตญฺจ โข อตฺถโต วา พฺยญฺชนโต วา อนูนมนธิกํ, เอวเมว, น อญฺญถา ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ. ‘अवधारण’ या अर्थाने, “भिक्खूंनो, माझ्या बहुश्रुत भिक्खू श्रावकांमध्ये हा आनंद सर्वश्रेष्ठ आहे; गतीमान, स्मृतीमान, धृतीमान आणि उपस्थायक भिक्खूंमध्ये हा आनंद सर्वश्रेष्ठ आहे” अशा प्रकारे भगवंतांनी केलेल्या प्रशंसेला अनुरूप आपली धारणशक्ती दाखवत, प्राण्यांमध्ये ऐकण्याची इच्छा निर्माण करतो की, “मी अशा प्रकारे ऐकले आहे, आणि ते अर्थाच्या दृष्टीने किंवा व्यंजनाच्या दृष्टीने कमीही नाही आणि जास्तही नाही, ते अगदी तसेच आहे, अन्यथा समजले जाऊ नये.” เม-สทฺโท ตีสุ อตฺเถสุ ทิสฺสติ. ตถา หิสฺส ‘‘คาถาภิคีตํ เม อโภชเนยฺย’’นฺติ เอวมาทีสุ (สุ. นิ. ๘๑) มยาติ อตฺโถ. ‘‘สาธุ เม, ภนฺเต, ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตู’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๔.๘๘) มยฺหนฺติ อตฺโถ. ‘‘ธมฺมทายาทา เม, ภิกฺขเว, ภวถา’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๒๙) มมาติ อตฺโถ. อิธ ปน ‘‘มยา สุต’’นฺติ จ ‘‘มม สุต’’นฺติ จ อตฺถทฺวเย ยุชฺชติ. ‘मे’ हा शब्द तीन अर्थांमध्ये दिसतो. जसे की, “गाथाभिगीतं मे अभोजनेय्यं” (गाथा म्हणून मिळवलेले अन्न माझ्यासाठी अभोजनीय आहे) इत्यादींमध्ये ‘मया’ (माझ्याद्वारे) हा अर्थ योग्य ठरतो. “साधु मे, भन्ते, भगवा संखित्तेन धम्मं देसेतु” (भन्ते, भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म देशना करावी, हे उत्तम होईल) इत्यादींमध्ये ‘मय्हं’ (माझ्यासाठी) हा अर्थ योग्य ठरतो. “धम्मदायादा मे, भिक्खवे, भवथ” (भिक्खूंनो, तुम्ही माझे धम्मदायद व्हा) इत्यादींमध्ये ‘मम’ (माझे) हा अर्थ योग्य ठरतो. परंतु येथे “माझ्याद्वारे ऐकले गेले” आणि “माझे ऐकणे” या दोन्ही अर्थांमध्ये तो योग्य ठरतो. สุตนฺติ อยํ สุตสทฺโท สอุปสคฺโค อนุปสคฺโค จ คมนขฺยาตราคาภิภูตูปจิตานุโยคโสตวิญฺเญยฺยโสตทฺวารวิญฺญาตาทิอเนกตฺถปฺปเภโท. ตถา หิสฺส ‘‘เสนาย ปสุโต’’ติ เอวมาทีสุ คจฺฉนฺโตติ [Pg.87] อตฺโถ. ‘‘สุตธมฺมสฺส ปสฺสโต’’ติ เอวมาทีสุ ขฺยาตธมฺมสฺสาติ อตฺโถ. ‘‘อวสฺสุตา อวสฺสุตสฺสา’’ติ เอวมาทีสุ (ปาจิ. ๖๕๗) ราคาภิภูตา ราคาภิภูตสฺสาติ อตฺโถ. ‘‘ตุมฺเหหิ ปุญฺญํ ปสุตํ อนปฺปก’’นฺติ เอวมาทีสุ (ขุ. ปา. ๗.๑๒) อุปจิตนฺติ อตฺโถ. ‘‘เย ฌานปฺปสุตา ธีรา’’ติ เอวมาทีสุ (ธ. ป. ๑๘๑) ฌานานุยุตฺตาติ อตฺโถ. ‘‘ทิฏฺฐํ สุตํ มุต’’นฺติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๒๔๑) โสตวิญฺเญยฺยนฺติ อตฺโถ. ‘‘สุตธโร สุตสนฺนิจโย’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓๓๙) โสตทฺวารานุสารวิญฺญาตธโรติ อตฺโถ. อิธ ปน สุตนฺติ โสตวิญฺญาณปุพฺพงฺคมาย วิญฺญาณวีถิยา อุปธาริตนฺติ วา อุปธารณนฺติ วาติ อตฺโถ. ตตฺถ ยทา เม-สทฺทสฺส มยาติ อตฺโถ, ตทา ‘‘เอวํ มยา สุตํ, โสตวิญฺญาณปุพฺพงฺคมาย วิญฺญาณวีถิยา อุปธาริต’’นฺติ ยุชฺชติ. ยทา เม-สทฺทสฺส มมาติ อตฺโถ, ตทา ‘‘เอวํ มม สุตํ โสตวิญฺญาณปุพฺพงฺคมาย วิญฺญาณวีถิยา อุปธารณ’’นฺติ ยุชฺชติ. ‘सुतं’ या पदातील ‘सुत’ हा शब्द उपसर्गासह किंवा उपसर्गाशिवाय गमन (जाणे), ख्यात (प्रसिद्ध), रागाभिभूत (रागाने ग्रासलेला), उपचित (संचित केलेले), अनुयोग (मग्न असणे), सोतविज्ञेय (कानाने जाणण्याजोगे), सोतद्वाराने जाणलेले इत्यादी अनेक अर्थांचे प्रकार असलेला आहे. जसे की, “सेनाय पसुतो” (सैन्यासह जाणारा) इत्यादींमध्ये ‘जाणारा’ हा अर्थ योग्य ठरतो. “सुतधम्मस्स पस्सतो” (ज्याने धम्म ऐकला आहे आणि जो पाहतो) इत्यादींमध्ये ‘सांगितलेला धम्म असलेला’ हा अर्थ योग्य ठरतो. “अवस्सुता अवस्सुतस्स” (रागाने ग्रासलेली स्त्री रागाने ग्रासलेल्या पुरुषाशी) इत्यादींमध्ये ‘रागाभिभूत’ हा अर्थ योग्य ठरतो. “तुम्हेहि पुञ्ञं पसुतं अनप्पकं” (तुम्ही भरपूर पुण्य संचित केले आहे) इत्यादींमध्ये ‘उपचित’ (संचित केलेले) हा अर्थ योग्य ठरतो. “ये झानप्पसुता धीरा” (जे ध्यानमग्न धीर पुरुष आहेत) इत्यादींमध्ये ‘ध्यानात मग्न असलेले’ हा अर्थ योग्य ठरतो. “दिट्ठं सुतं मुतं” (पाहिलेले, ऐकलेले, जाणलेले) इत्यादींमध्ये ‘सोतविज्ञेय’ हा अर्थ योग्य ठरतो. “सुतधरो सुतसन्निचयो” (श्रुतधर, श्रुतसंचय करणारा) इत्यादींमध्ये ‘सोतद्वाराने जाणलेला धम्म धारण करणारा’ हा अर्थ योग्य ठरतो. परंतु येथे ‘सुतं’ या पदाने ‘सोतविज्ञान’ पूर्वगामी असलेल्या ‘विज्ञानवीथी’द्वारे ‘धारण केले गेले’ किंवा ‘धारण करणे’ असा अर्थ होतो. त्यामध्ये, जेव्हा ‘मे’ या शब्दाचा अर्थ ‘मया’ (माझ्याद्वारे) असा होतो, तेव्हा “अशा प्रकारे माझ्याद्वारे ऐकले गेले, जे सोतविज्ञान-पूर्वगामी विज्ञानवीथीद्वारे धारण केले गेले आहे” असा अर्थ योग्य ठरतो. जेव्हा ‘मे’ या शब्दाचा अर्थ ‘मम’ (माझे) असा होतो, तेव्हा “अशा प्रकारे माझे ऐकणे, जे सोतविज्ञान-पूर्वगामी विज्ञानवीथीद्वारे धारण करणे आहे” असा अर्थ योग्य ठरतो. เอวเมเตสุ ตีสุ ปเทสุ เอวนฺติ โสตวิญฺญาณกิจฺจนิทสฺสนํ. เมติ วุตฺตวิญฺญาณสมงฺคีปุคฺคลนิทสฺสนํ. สุตนฺติ อสฺสวนภาวปฺปฏิกฺเขปโต อนูนานธิกาวิปรีตคฺคหณนิทสฺสนํ. ตถา เอวนฺติ สวนาทิจิตฺตานํ นานปฺปกาเรน อารมฺมเณ ปวตฺตภาวนิทสฺสนํ. เมติ อตฺตนิทสฺสนํ. สุตนฺติ ธมฺมนิทสฺสนํ. अशा प्रकारे, या तीन पदांमध्ये ‘एवम्’ हे सोतविज्ञानाच्या (ऐकण्याच्या) कार्याचे दिग्दर्शन आहे. ‘मे’ हे वर सांगितलेल्या विज्ञानाने युक्त असलेल्या पुद्गलाचे दिग्दर्शन आहे. ‘सुतं’ हे ‘न ऐकल्याच्या’ भावाचे खंडन करून, कमी किंवा जास्त न करता, जसेच्या तसे ग्रहण करण्याचे दिग्दर्शन आहे. तसेच, ‘एवम्’ हे श्रवणादी चित्तांच्या विविध प्रकारे आलंबनात प्रवृत्त होण्याच्या भावाचे दिग्दर्शन आहे. ‘मे’ हे स्वतःचे दिग्दर्शन आहे. ‘सुतं’ हे धम्माचे दिग्दर्शन आहे. ตถา เอวนฺติ นิทฺทิสิตพฺพธมฺมนิทสฺสนํ. เมติ ปุคฺคลนิทสฺสนํ. สุตนฺติ ปุคฺคลกิจฺจนิทสฺสนํ. तसेच, ‘एवम्’ हे निर्देशित करायच्या धम्माचे दिग्दर्शन आहे. ‘मे’ हे पुद्गलाचे दिग्दर्शन आहे. ‘सुतं’ हे पुद्गलाच्या कार्याचे दिग्दर्शन आहे. ตถา เอวนฺติ วีถิจิตฺตานํ อาการปญฺญตฺติวเสน นานปฺปการนิทฺเทโส. เมติ กตฺตารนิทฺเทโส. สุตนฺติ วิสยนิทฺเทโส. तसेच, ‘एवम्’ हा शब्द वीथीचित्तांच्या आकाराच्या प्रज्ञप्तीनुसार विविध प्रकारचा निर्देश आहे. ‘मे’ हा शब्द कर्त्याचा निर्देश आहे. ‘सुतं’ हा शब्द विषयाचा निर्देश आहे. ตถา เอวนฺติ ปุคฺคลกิจฺจนิทฺเทโส. สุตนฺติ วิญฺญาณกิจฺจนิทฺเทโส. เมติ อุภยกิจฺจยุตฺตปุคฺคลนิทฺเทโส. तसेच, 'एवं' (अशा प्रकारे) हा शब्द पुद्गलाच्या (व्यक्तीच्या) कर्तव्याचा निर्देश करतो. 'सुतं' (ऐकले) हा शब्द विज्ञानाच्या (जाणण्याच्या) क्रियेचा निर्देश करतो. 'मे' (माझ्याद्वारे) हा शब्द दोन्ही क्रियांशी युक्त असलेल्या पुद्गलाचा निर्देश करतो. ตถา เอวนฺติ ภาวนิทฺเทโส. เมติ ปุคฺคลนิทฺเทโส. สุตนฺติ ตสฺส กิจฺจนิทฺเทโส. तसेच, 'एवं' हा शब्द भावाचा (अवस्थेचा) निर्देश करतो. 'मे' हा पुद्गलाचा (व्यक्तीचा) निर्देश करतो. 'सुतं' हा त्या पुद्गलाच्या क्रियेचा (कर्तव्याचा) निर्देश करतो. ตตฺถ เอวนฺติ จ เมติ จ สจฺฉิกฏฺฐปรมตฺถวเสน อวิชฺชมานปญฺญตฺติ. สุตนฺติ วิชฺชมานปญฺญตฺติ. ตถา เอวนฺติ จ เมติ จ ตํ ตํ อุปาทาย วตฺตพฺพโต [Pg.88] อุปาทาปญฺญตฺติ. สุตนฺติ ทิฏฺฐาทีนิ อุปนิธาย วตฺตพฺพโต อุปนิธาปญฺญตฺติ. त्यामध्ये, 'एवं' आणि 'मे' हे दोन्ही शब्द सच्चिकठ्ठ-परमत्थाच्या (वास्तविक आणि परमार्थ सत्याच्या) दृष्टीने 'अविज्जमान-पञ्ञत्ति' (अविद्यमान प्रज्ञप्ती) दर्शवतात. 'सुतं' हा शब्द 'विज्जमान-पञ्ञत्ति' (विद्यमान प्रज्ञप्ती) दर्शवतो. तसेच, 'एवं' आणि 'मे' हे शब्द त्या त्या गोष्टींचा आधार घेऊन (उपादाय) सांगायचे असल्याने 'उपादा-पञ्ञत्ति' (उपादान प्रज्ञप्ती) दर्शवतात. 'सुतं' हा शब्द पाहणे इत्यादी गोष्टींशी तुलना करून (उपनिधाय) सांगायचा असल्याने 'उपनिधा-पञ्ञत्ति' (उपनिधा प्रज्ञप्ती) दर्शवतो. เอตฺถ จ เอวนฺติ วจเนน อสมฺโมหํ ทีเปติ, สุตนฺติ วจเนน สุตสฺส อสมฺโมสํ. ตถา เอวนฺติ วจเนน โยนิโสมนสิการํ ทีเปติ อโยนิโส มนสิกโรโต นานปฺปการปฺปฏิเวธาภาวโต. สุตนฺติ วจเนน อวิกฺเขปํ ทีเปติ วิกฺขิตฺตจิตฺตสฺส สวนาภาวโต. ตถา หิ วิกฺขิตฺตจิตฺโต ปุคฺคโล สพฺพสมฺปตฺติยา วุจฺจมาโนปิ ‘‘น มยา สุตํ, ปุน ภณถา’’ติ ภณติ. โยนิโสมนสิกาเรน เจตฺถ อตฺตสมฺมาปณิธึ ปุพฺเพ กตปุญฺญตญฺจ สาเธติ, อวิกฺเขเปน สทฺธมฺมสฺสวนํ สปฺปุริสูปนิสฺสยญฺจ. เอวนฺติ จ อิมินา ภทฺทเกน อากาเรน ปจฺฉิมจกฺกทฺวยสมฺปตฺตึ อตฺตโน ทีเปติ, สุตนฺติ สวนโยเคน ปุริมจกฺกทฺวยสมฺปตฺตึ. ตถา อาสยสุทฺธึ ปโยคสุทฺธิญฺจ, ตาย จ อาสยสุทฺธิยา อธิคมพฺยตฺตึ, ปโยคสุทฺธิยา อาคมพฺยตฺตึ. आणि येथे, 'एवं' या शब्दाने असंमोह (भ्रमरहितता) दर्शवला जातो, तर 'सुतं' या शब्दाने ऐकलेल्या गोष्टीचा विसर न पडणे (असंमोष) दर्शवला जातो. तसेच, 'एवं' या शब्दाने योनिसोमनसिकार (योग्य विचार) दर्शवला जातो, कारण अयोनिसोमनसिकार (अयोग्य विचार) करणाऱ्या व्यक्तीला विविध प्रकारच्या धम्मांचे आकलन (प्रतिवेध) होत नाही. 'सुतं' या शब्दाने अविक्षेप (चित्ताची एकाग्रता) दर्शवली जाते, कारण विक्षिप्त चित्त असलेल्या व्यक्तीला ऐकणे शक्य नसते. कारण, विक्षिप्त चित्त असलेला मनुष्य सर्व प्रकारे स्पष्ट सांगितले तरीही "मी ऐकले नाही, पुन्हा सांगा" असे म्हणतो. आणि येथे योनिसोमनसिकाराने 'अत्तसम्मापणिधि' (स्वतःची योग्य प्रस्थापना) आणि 'पुब्बेकतपुञ्ञता' (पूर्वी केलेले पुण्य) साध्य होते, तर अविक्षेपाने (एकाग्रतेने) 'सद्धम्मस्सवन' (सद्धम्माचे श्रवण) आणि 'सप्पुरिसूपनिस्सय' (सत्पुरुषांचा आश्रय) साध्य होतो. अशा प्रकारे, 'एवं' या कल्याणकारी मार्गाने तो स्वतःच्या अंतिम दोन चक्रांची समृद्धी (पच्छिमचक्कद्वयसंपत्ती) दर्शवतो, तर 'सुतं' या श्रवणयोगाने पहिल्या दोन चक्रांची समृद्धी (पुरिमचक्कद्वयसंपत्ती) दर्शवतो. तसेच, तो आशयशुद्धी (हेतूची शुद्धता) आणि प्रयोगशुद्धी (प्रयत्नांची शुद्धता) दर्शवतो; आणि त्या आशयशुद्धीने अधिगम-व्यत्ती (मार्गाचे व फळाचे आकलन करण्याची निपुणता) आणि प्रयोगशुद्धीने आगम-व्यत्ती (परियत्ती किंवा ग्रंथांचे आकलन करण्याची निपुणता) दर्शवतो. เอวนฺติ จ อิมินา นานปฺปการปฏิเวธทีปเกน วจเนน อตฺตโน อตฺถปฏิภานปฏิสมฺภิทาสมฺปทํ ทีเปติ. สุตนฺติ อิมินา โสตพฺพเภทปฏิเวธทีปเกน ธมฺมนิรุตฺติปฏิสมฺภิทาสมฺปทํ ทีเปติ. เอวนฺติ จ อิทํ โยนิโสมนสิการทีปกํ วจนํ ภณนฺโต ‘‘เอเต มยา ธมฺมา มนสานุเปกฺขิตา ทิฏฺฐิยา สุปฺปฏิวิทฺธา’’ติ ญาเปติ. สุตนฺติ อิทํ สวนโยคทีปกวจนํ ภณนฺโต ‘‘พหู มยา ธมฺมา สุตา ธาตา วจสา ปริจิตา’’ติ ญาเปติ. ตทุภเยนปิ อตฺถพฺยญฺชนปาริปูรึ ทีเปนฺโต สวเน อาทรํ ชเนติ. आणि 'एवं' या विविध प्रकारच्या आकलनाला (प्रतिवेधाला) दर्शवणाऱ्या शब्दाने तो स्वतःची 'अत्थ-पटिसम्भिदा' (अर्थ-प्रतिसंविदा) आणि 'पटिभान-पटिसम्भिदा' (प्रतिभान-प्रतिसंविदा) यांची समृद्धी दर्शवतो. 'सुतं' या श्रवणाच्या विविध प्रकारच्या आकलनाला दर्शवणाऱ्या शब्दाने तो 'धम्म-पटिसम्भिदा' (धम्म-प्रतिसंविदा) आणि 'निरुत्ति-पटिसम्भिदा' (निरुक्ति-प्रतिसंविदा) यांची समृद्धी दर्शवतो. 'एवं' हे योनिसोमनसिकार दर्शवणारे वचन बोलताना ते (आयुष्यमान आनंद) सुचवतात की, "हे धर्म मी मनाने वारंवार विचारात घेतले आहेत आणि प्रज्ञेने (दृष्टीने) चांगल्या प्रकारे जाणले आहेत." 'सुतं' हे श्रवणयोग दर्शवणारे वचन बोलताना ते सुचवतात की, "मी अनेक धर्म ऐकले आहेत, धारण केले आहेत आणि वाणीने त्यांचा सराव केला आहे." या दोन्ही शब्दांद्वारे अर्थ आणि व्यंजनाची परिपूर्णता दर्शवत ते श्रवणाविषयी आदर निर्माण करतात. เอวํ เม สุตนฺติ อิมินา ปน สกเลนปิ วจเนน อายสฺมา อานนฺโท ตถาคตปฺปเวทิตํ ธมฺมํ อตฺตโน อทหนฺโต อสปฺปุริสภูมึ, อติกฺกมติ, สาวกตฺตํ ปฏิชานนฺโต สปฺปุริสภูมึ โอกฺกมติ. ตถา อสทฺธมฺมา จิตฺตํ วุฏฺฐาเปติ, สทฺธมฺเม จิตฺตํ ปติฏฺฐาเปติ. ‘‘เกวลํ สุตเมเวตํ มยา, ตสฺเสว ตุ ภควโต วจนํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ จ ทีเปนฺโต อตฺตานํ ปริโมเจติ, สตฺถารํ อปทิสติ, ชินวจนํ อปฺเปติ, ธมฺมเนตฺตึ ปติฏฺฐาเปติ. परंतु, 'एवं मे सुतं' या संपूर्ण वचनाद्वारे आयुष्यमान आनंद हे तथागतांनी उपदेशिलेल्या धम्माचे श्रेय स्वतःकडे न घेता, असत्पुरुषांच्या भूमीचे (अयोग्य मार्गाचे) उल्लंघन करतात आणि स्वतःचे श्रावकत्व स्वीकारून सत्पुरुषांच्या भूमीत प्रवेश करतात. तसेच, ते आपले चित्त असद्धम्मापासून दूर करतात आणि सद्धम्मामध्ये प्रस्थापित करतात. "हे माझ्याद्वारे केवळ ऐकले गेले आहे, हे वचन तर त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांचेच आहे," असे दर्शवून ते स्वतःला (अहंकारापासून) मुक्त करतात, शास्त्यांचा (बुद्धांचा) निर्देश करतात, जिनवचनाला (बुद्धवचनाला) प्रस्थापित करतात आणि धम्मनेत्ती (धम्माचा मार्गदर्शक) प्रस्थापित करतात. อปิจ ‘‘เอวํ เม สุต’’นฺติ อตฺตนา อุปฺปาทิตภาวํ อปฺปฏิชานนฺโต ปุริมสฺสวนํ วิวรนฺโต ‘‘สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตมิทํ มยา ตสฺส ภควโต จตุเวสารชฺชวิสารทสฺส [Pg.89] ทสพลธรสฺส อาสภฏฺฐานฏฺฐายิโน สีหนาทนาทิโน สพฺพสตฺตุตฺตมสฺส ธมฺมิสฺสรสฺส ธมฺมราชสฺส ธมฺมาธิปติโน ธมฺมทีปสฺส ธมฺมปฺปฏิสรณสฺส สทฺธมฺมวรจกฺกวตฺติโน สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. น เอตฺถ อตฺเถ วา ธมฺเม วา ปเท วา พฺยญฺชเน วา กงฺขา วา วิมติ วา กาตพฺพา’’ติ สพฺพเทวมนุสฺสานํ อิมสฺมึ ธมฺเม อสฺสทฺธิยํ วินาเสติ, สทฺธาสมฺปทํ อุปฺปาเทตีติ เวทิตพฺโพ. โหติ เจตฺถ – शिवाय, 'एवं मे सुतं' असे म्हणून, हा धम्म स्वतः निर्माण केल्याचा दावा न करता, पूर्वी ऐकलेल्या गोष्टीचा खुलासा करत ते म्हणतात: "मी हे त्या भगवंतांच्या प्रत्यक्ष सन्मुख राहून ग्रहण केले आहे, जे चार वैशारद्यांमध्ये विशारद (निपुण) आहेत, दशबलधारी आहेत, श्रेष्ठ स्थानावर (आसभ-स्थान) विराजमान आहेत, सिंहासारखी गर्जना करणारे आहेत, सर्व प्राण्यांमध्ये उत्तम आहेत, धम्माचे ईश्वर आहेत, धम्मराज आहेत, धम्माचे अधिपती आहेत, धम्मदीप आहेत, धम्मशरण आहेत, सद्धम्मरूपी श्रेष्ठ चक्र फिरवणारे सम्यक्संबुद्ध आहेत. येथे अर्थाविषयी, धम्माविषयी, पदाविषयी किंवा व्यंजनाविषयी कोणतीही शंका किंवा संभ्रम बाळगू नये." अशा प्रकारे, ते सर्व देव आणि मनुष्यांच्या मनातील या धम्माविषयीची अश्रद्धा नष्ट करतात आणि त्यांच्यात श्रद्धा-संपत्ती निर्माण करतात, असे जाणावे. याविषयी येथे (एक गाथा) आहे - ‘‘วินาสยติ อสฺสทฺธํ, สทฺธํ วฑฺเฒติ สาสเน; เอวํ เม สุตมิจฺเจวํ, วทํ โคตมสาวโก’’ติ. "अशा प्रकारे 'एवं मे सुतं' असे म्हणणारे गौतम बुद्धांचे श्रावक (आनंद) शासनात (बुद्धांच्या शासनात) अश्रद्धा नष्ट करतात आणि श्रद्धा वाढवतात." เอกนฺติ คณนปริจฺเฉทนิทฺเทโส. สมยนฺติ ปริจฺฉินฺนนิทฺเทโส. เอกํ สมยนฺติ อนิยมิตปริทีปนํ. ตตฺถ สมยสทฺโท – 'एकं' हा शब्द संख्येच्या मर्यादेचा (परिच्छेदाचा) निर्देश करतो. 'समयं' हा शब्द मर्यादित काळाचा निर्देश करतो. 'एकं समयं' (एका वेळी) हे पद अनिश्चित काळाचे प्रकटीकरण आहे. त्यामध्ये 'समय' हा शब्द - สมวาเย ขเณ กาเล, สมูเห เหตุทิฏฺฐิสุ; ปฏิลาเภ ปหาเน จ, ปฏิเวเธ จ ทิสฺสติ. समवाय (कारणांची अनुकूलता), क्षण (संधी), काळ, समूह, हेतू (कारण), दृष्टी (मत), प्रतिलाभ (प्राप्ती), प्रहाण (त्याग) आणि प्रतिवेध (आकलन) या अर्थांमध्ये 'समय' शब्द दिसून येतो. ตถา หิสฺส ‘‘อปฺเปว นาม สฺเวปิ อุปสงฺกเมยฺยาม กาลญฺจ สมยญฺจ อุปาทายา’’ติ เอวมาทีสุ (ที. นิ. ๑.๔๔๗) สมวาโย อตฺโถ. ‘‘เอโกว โข, ภิกฺขเว, ขโณ จ สมโย จ พฺรหฺมจริยวาสายา’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๘.๒๙) ขโณ. ‘‘อุณฺหสมโย ปริฬาหสมโย’’ติ เอวมาทีสุ (ปาจิ. ๓๕๘) กาโล. ‘‘มหาสมโย ปวนสฺมิ’’นฺติ เอวมาทีสุ สมูโห. ‘‘สมโยปิ โข เต, ภทฺทาลิ, อปฺปฏิวิทฺโธ อโหสิ, ภควา โข สาวตฺถิยํ วิหรติ, โสปิ มํ ชานิสฺสติ, ‘ภทฺทาลิ, นาม ภิกฺขุ สตฺถุสาสเน สิกฺขาย อปริปูรการี’ติ, อยมฺปิ โข เต ภทฺทาลิ สมโย อปฺปฏิวิทฺโธ อโหสี’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๒.๑๓๕) เหตุ. ‘‘เตน โข ปน สมเยน อุคฺคาหมาโน ปริพฺพาชโก สมณมุณฺฑิกาปุตฺโต สมยปฺปวาทเก ตินฺทุกาจีเร เอกสาลเก มลฺลิกาย อาราเม ปฏิวสตี’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๒.๒๖๐) ทิฏฺฐิ. कारण, "कदाचित उद्याही आम्ही योग्य वेळ आणि अनुकूल परिस्थिती (समय) पाहून जवळ जाऊ" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'समवाय' (कारणांची अनुकूलता) हा अर्थ आहे. "भिक्खूहो, ब्रह्मचर्य वासासाठी एकच क्षण आणि एकच संधी (समय) असते" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'क्षण' (संधी) हा अर्थ आहे. "उष्ण काळ (उण्हसमय), दाहक काळ (परिळाहसमय)" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'काळ' हा अर्थ आहे. "महावनात महासमय (मोठा मेळावा/समूह)" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'समूह' हा अर्थ आहे. "हे भद्द्वालि, तुला हे कारण (समय) देखील समजले नाही; भगवान तर श्रावस्तीमध्ये विहार करत आहेत, तेही माझ्याबद्दल जाणतील की, 'भद्द्वालि नावाचा भिक्खू शास्त्यांच्या शासनात शिक्षेमध्ये अपूर्ण आहे'; हे भद्द्वालि, तुला हे कारण (समय) देखील समजले नाही" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'हेतू' (कारण) हा अर्थ आहे. "त्या वेळी (त्या प्रसंगी) उग्गाहमान नावाचा परिव्राजक, जो समणमुंडिकापुत्त होता, तो मल्लिका देवीच्या उद्यानातील तिन्दुकाचीर नावाच्या एका शालेच्या विहारात राहत होता" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'दृष्टी' (मत/सिद्धांत) हा अर्थ आहे. ‘‘ทิฏฺเฐ ธมฺเม จ โย อตฺโถ, โย จตฺโถ สมฺปรายิโก; อตฺถาภิสมยา ธีโร, ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจตี’’ติ. (สํ. นิ. ๑.๑๒๙) – "याच जन्मात (दृष्टधर्मात) जो अर्थ (कल्याण) आहे आणि जो परलोकात (साम्परायिक) अर्थ आहे; त्या अर्थाच्या प्राप्तीमुळे (अत्थाभिसमया) धीर पुरुषाला 'पंडित' म्हटले जाते." เอวมาทีสุ ปฏิลาโภ. ‘‘สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๒๘) ปหานํ. ‘‘ทุกฺขสฺส ปีฬนฏฺโฐ สงฺขตฏฺโฐ สนฺตาปฏฺโฐ [Pg.90] วิปริณามฏฺโฐ อภิสมยฏฺโฐ’’ติ เอวมาทีสุ (ปฏิ. ม. ๒.๘) ปฏิเวโธ. อิธ ปนสฺส กาโล อตฺโถ. เตน เอกํ สมยนฺติ สํวจฺฉรอุตุมาสอฑฺฒมาสรตฺติทิวปุพฺพณฺหมชฺฌนฺหิกสายนฺหปฐมมชฺฌิม- ปจฺฉิมยามมุหุตฺตาทีสุ กาลขฺเยสุ สมเยสุ เอกํ สมยนฺติ ทีเปติ. इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रतिलाभ' (प्राप्ती) हा अर्थ आहे. "मानाचा सम्यक प्रहार केल्याने (मानाभिसमया - मानाचा त्याग केल्याने) त्याने दुःखाचा अंत केला" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रहाण' (त्याग) हा अर्थ आहे. "दुःखाचा पीडनार्थ (पीडा देणारा अर्थ), संखतार्थ (संस्कृत अर्थ), संतापार्थ (दाहक अर्थ), विपरिणामार्थ (बदलणारा अर्थ) आणि अभिसमयार्थ (आकलनाचा अर्थ)" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रतिवेध' (आकलन) हा अर्थ आहे. परंतु येथे (या मङ्गलसुत्तात) 'काळ' हाच त्याचा अर्थ योग्य आहे. त्यामुळे, 'एकं समयं' या पदाने वर्ष, ऋतू, महिना, पंधरवडा, रात्र, दिवस, पूर्वान्ह (सकाळ), मध्यान्ह (दुपार), सायान्ह (संध्याकाळ), रात्रीचा पहिला प्रहर, मध्यम प्रहर, अंतिम प्रहर, मुहूर्त इत्यादी काळाचा निर्देश करणाऱ्या समयांपैकी 'एका काळाचा' निर्देश केला आहे. เย วา อิเม คพฺโภกฺกนฺติสมโย ชาติสมโย สํเวคสมโย อภินิกฺขมนสมโย ทุกฺกรการิกสมโย มารวิชยสมโย อภิสมฺโพธิสมโย ทิฏฺฐธมฺมสุขวิหารสมโย เทสนาสมโย ปรินิพฺพานสมโยติ เอวมาทโย ภควโต เทวมนุสฺเสสุ อติวิย ปกาสา อเนกกาลขฺยา เอว สมยา. เตสุ สมเยสุ เทสนาสมยสงฺขาตํ เอกํ สมยนฺติ วุตฺตํ โหติ. โย จายํ ญาณกรุณากิจฺจสมเยสุ กรุณากิจฺจสมโย, อตฺตหิตปรหิตปฺปฏิปตฺติสมเยสุ ปรหิตปฺปฏิปตฺติสมโย, สนฺนิปติตานํ กรณียทฺวยสมเยสุ ธมฺมีกถาสมโย, เทสนาปฏิปตฺติสมเยสุ เทสนาสมโย, เตสุปิ สมเยสุ ยํ กิญฺจิ สนฺธาย ‘‘เอกํ สมย’’นฺติ วุตฺตํ โหติ. किंवा, भगवंतांचा गर्भावक्रांतीचा (गर्भात प्रवेश करण्याचा) काळ, जन्माचा काळ, संवेगाचा (वैराग्याचा) काळ, महाभिनिष्क्रमणाचा (गृहत्यागाचा) काळ, दुष्करचर्येचा काळ, मारविजयाचा काळ, अभिसंबोधीचा (ज्ञानप्राप्तीचा) काळ, दृष्टधम्मसुखविहाराचा काळ, देशनेचा (धर्मोपदेशाचा) काळ आणि परिनिर्वाणाचा काळ इत्यादी जे काळ देव आणि मनुष्यांमध्ये अत्यंत प्रसिद्ध आहेत, ते अनेक काळांचे वाचक आहेत. त्या काळांपैकी 'देशनाकाळ' म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या एका काळाला उद्देशून 'एका समयाला' (एकं समयं) असे म्हटले आहे. तसेच, ज्ञान आणि करुणेच्या कार्याच्या काळांपैकी जो करुणेच्या कार्याचा काळ आहे; आत्महित आणि परहित प्रतिपत्तीच्या काळांपैकी जो परहित प्रतिपत्तीचा काळ आहे; जमलेल्या परिषदेच्या दोन करणीय काळांपैकी जो धम्मकथेचा काळ आहे; आणि देशना व प्रतिपत्तीच्या काळांपैकी जो देशनेचा काळ आहे; त्या काळांपैकी सुद्धा कोणत्या तरी एका विशिष्ट काळाला उद्देशून 'एका समयाला' (एकं समयं) असे म्हटले आहे. เอตฺถาห – อถ กสฺมา ยถา อภิธมฺเม ‘‘ยสฺมึ สมเย กามาวจร’’นฺติ จ อิโต อญฺเญสุ สุตฺตปเทสุ ‘‘ยสฺมึ สมเย, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ วิวิจฺเจว กาเมหี’’ติ จ ภุมฺมวจเนน นิทฺเทโส กโต, วินเย จ ‘‘เตน สมเยน พุทฺโธ ภควา’’ติ กรณวจเนน, ตถา อกตฺวา อิธ ‘‘เอกํ สมย’’นฺติ อุปโยควจนนิทฺเทโส กโตติ. ตตฺถ ตถา, อิธ จ อญฺญถา อตฺถสมฺภวโต. ตตฺถ หิ อภิธมฺเม อิโต อญฺเญสุ สุตฺตปเทสุ จ อธิกรณตฺโถ ภาเวนภาวลกฺขณตฺโถ จ สมฺภวติ. อธิกรณญฺหิ กาลตฺโถ สมูหตฺโถ จ สมโย, ตตฺถ วุตฺตานํ ผสฺสาทิธมฺมานํ ขณสมวายเหตุสงฺขาตสฺส จ สมยสฺส ภาเวน เตสํ ภาโว ลกฺขียติ, ตสฺมา ตทตฺถโชตนตฺถํ ตตฺถ ภุมฺมวจนนิทฺเทโส กโต. येथे शंकाकार विचारतो – जर काळाचा अर्थ अभिप्रेत आहे, तर मग ज्याप्रमाणे अभिधम्मात 'यस्मिं समये कामावचरं' (ज्या समयाला कामावचर...) असे आणि याहून इतर सुत्तपाठांमध्ये 'यस्मिं समये, भिक्खवे, भिक्खु विविच्चेव कामेहि' (हे भिक्खूंनो, ज्या समयाला भिक्खू कामांपासून अलिप्त होऊन...) असे सप्तमी विभक्तीने निर्देश केला आहे; आणि विनयात 'तेन समयेन बुद्धो भगवा' (त्या समयाला बुद्ध भगवंत...) असे तृतीया विभक्तीने निर्देश केला आहे; त्याप्रमाणे न करता येथे (मंगलसुत्तात) 'एकं समयं' असा द्वितीया विभक्तीने निर्देश का केला आहे? (उत्तर -) कारण तेथे त्या प्रकारे आणि येथे दुसऱ्या प्रकारे अर्थाचा संभव आहे. कारण तेथे अभिधम्मात आणि याहून इतर सुत्तपाठांमध्ये अधिकरण अर्थ आणि 'भावेन भाव लक्षण' अर्थ संभवतो. अधिकरण हे काळाचा अर्थ आणि समूहाचा अर्थ असणारा 'समय' आहे; तेथे सांगितलेल्या स्पर्श इत्यादी धर्मांच्या क्षण-संयोगात्मक कारणरूप समयाच्या अस्तित्वाने त्यांचे अस्तित्व लक्षित होते, म्हणून तो अर्थ प्रकट करण्यासाठी तेथे सप्तमी विभक्तीने निर्देश केला आहे. วินเย จ เหตฺวตฺโถ กรณตฺโถ จ สมฺภวติ. โย หิ โส สิกฺขาปทปญฺญตฺติสมโย สาริปุตฺตาทีหิปิ ทุพฺพิญฺเญยฺโย, เตน สมเยน เหตุภูเตน กรณภูเตน จ สิกฺขาปทานิ ปญฺญเปนฺโต สิกฺขาปทปญฺญตฺติเหตุญฺจ อเปกฺขมาโน ภควา ตตฺถ ตตฺถ วิหาสิ, ตสฺมา ตทตฺถโชตนตฺถํ ตตฺถ กรณวจนนิทฺเทโส กโต. आणि विनयात हेतू अर्थ आणि करण अर्थ संभवतो. कारण जो तो शिखापद (नियम) प्रज्ञप्त करण्याचा काळ आहे, तो सारिपुत्त इत्यादी महास्थविरांना सुद्धा समजण्यास कठीण आहे; त्या हेतूभूत आणि करणभूत समयाने शिखापदे प्रज्ञप्त करत असताना आणि शिखापद प्रज्ञप्तीच्या हेतूची अपेक्षा ठेवून भगवंत त्या त्या ठिकाणी विहार करत होते, म्हणून तो अर्थ प्रकट करण्यासाठी तेथे तृतीया विभक्तीने निर्देश केला आहे. อิธ [Pg.91] ปน อญฺญสฺมิญฺจ เอวํชาติเก สุตฺตนฺตปาเฐ อจฺจนฺตสํโยคตฺโถ สมฺภวติ. ยญฺหิ สมยํ ภควา อิมํ อญฺญํ วา สุตฺตนฺตํ เทเสสิ, อจฺจนฺตเมว ตํ สมยํ กรุณาวิหาเรน วิหาสิ. ตสฺมา ตทตฺถโชตนตฺถํ อิธ อุปโยควจนนิทฺเทโส กโตติ วิญฺเญยฺโย. โหติ เจตฺถ – परंतु येथे आणि इतर अशाच प्रकारच्या सुत्तपाठांमध्ये 'अत्यंतसंयोग' अर्थ (काळाची निरंतरता) संभवतो. कारण ज्या समयाला भगवंत या किंवा इतर सुत्ताची देशना करत होते, त्या संपूर्ण समयापर्यंत निरंतर ते करुणाविहाराने विहार करत होते. म्हणून तो अर्थ प्रकट करण्यासाठी येथे द्वितीया विभक्तीने निर्देश केला आहे, असे समजावे. आणि याविषयी येथे संग्रह गाथा आहे – ‘‘ตํ ตํ อตฺถมเปกฺขิตฺวา, ภุมฺเมน กรเณน จ; อญฺญตฺร สมโย วุตฺโต, อุปโยเคน โส อิธา’’ติ. “त्या त्या अर्थाची अपेक्षा ठेवून, इतर ठिकाणी (अभिधम्म आणि विनयात) 'समय' शब्द सप्तमी आणि तृतीया विभक्तीने वापरला आहे, तर येथे (सुत्तात) तो द्वितीया विभक्तीने वापरला आहे.” ภควาติ คุณวิสิฏฺฐสตฺตุตฺตมครุคารวาธิวจนเมตํ. ยถาห – ‘भगवा’ (भगवान) हा शब्द गुणांनी विशिष्ट अशा सर्वश्रेष्ठ सत्त्वाबद्दल (प्राण्याबद्दल) आदर आणि गौरव व्यक्त करणारे अभिधान (नाव) आहे. ज्याप्रमाणे म्हटले आहे – ‘‘ภควาติ วจนํ เสฏฺฐํ, ภควาติ วจนมุตฺตมํ; ครุ คารวยุตฺโต โส, ภควา เตน วุจฺจตี’’ติ. “‘भगवा’ हा शब्द श्रेष्ठ आहे, ‘भगवा’ हा शब्द उत्तम आहे; ते आदरणीय आणि गौरवाने युक्त आहेत, म्हणून त्यांना ‘भगवा’ म्हटले जाते।” จตุพฺพิธญฺหิ นามํ อาวตฺถิกํ, ลิงฺคิกํ, เนมิตฺตกํ, อธิจฺจสมุปฺปนฺนนฺติ. อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ นาม ‘‘ยทิจฺฉก’’นฺติ วุตฺตํ โหติ. ตตฺถ วจฺโฉ ทมฺโม พลิพทฺโธติ เอวมาทิ อาวตฺถิกํ, ทณฺฑี ฉตฺตี สิขี กรีติ เอวมาทิ ลิงฺคิกํ, เตวิชฺโช ฉฬภิญฺโญติ เอวมาทิ เนมิตฺตกํ, สิริวฑฺฒโก ธนวฑฺฒโกติ เอวมาทิ วจนตฺถมนเปกฺขิตฺวา ปวตฺตํ อธิจฺจสมุปฺปนฺนํ. อิทํ ปน ภควาติ นามํ คุณเนมิตฺตกํ, น มหามายาย, น สุทฺโธทนมหาราเชน, น อสีติยา ญาติสหสฺเสหิ กตํ, น สกฺกสนฺตุสิตาทีหิ เทวตาวิเสเสหิ กตํ. ยถาห อายสฺมา สาริปุตฺตตฺเถโร ‘‘ภควาติ เนตํ นามํ มาตรา กตํ…เป… สจฺฉิกา ปญฺญตฺติ ยทิทํ ภควา’’ติ (มหานิ. ๘๔). कारण नाव चार प्रकारचे असते: आवत्थिक (अवस्थेवर आधारित), लिंगिक (चिन्हावर आधारित), नैमित्तिक (गुणांवर आधारित) आणि अधिच्चसमुपन्न (यदृच्छेने ठेवलेले). अधिच्चसमुपन्न म्हणजे 'यदृच्छेने' (इच्छेनुसार) ठेवलेले नाव असे म्हटले जाते. त्यापैकी वासरू (वच्छ), दम्य (वळवलेला बैल), बैल (बलिबद्द) इत्यादी अवस्थावाचक (आवत्थिक) नावे आहेत; दंडी (काठी असणारा), छत्ती (छत्री असणारा), शिखी (शेंडी असणारा), करी (हात असणारा) इत्यादी लक्षणवाचक (लिंगिक) नावे आहेत; त्रैविद्य (तीन विद्या असणारा), षडभिज्ञ (सहा अभिज्ञा असणारा) इत्यादी निमित्तवाचक (नैमित्तिक) नावे आहेत; आणि श्रीवर्धन (सिरिवड्ढक), धनवर्धन (धनवड्ढक) इत्यादी शब्दाच्या मूळ अर्थाची अपेक्षा न ठेवता प्रवृत्त झालेले नाव अधिच्चसमुपन्न (यदृच्छेने ठेवलेले) नाव आहे. परंतु हे 'भगवा' हे नाव गुणांवर आधारित नैमित्तिक नाव आहे. हे महामाया मातेने ठेवलेले नाही, शुद्धोदन महाराजांनी ठेवलेले नाही, ऐंशी हजार नातेवाईकांनी ठेवलेले नाही आणि शक्र, संतुषित इत्यादी विशिष्ट देवांनीही ठेवलेले नाही. ज्याप्रमाणे आयुष्यमान सारिपुत्त स्थविरांनी म्हटले आहे – '“भगवा” हे नाव मातेने ठेवलेले नाही... (पे)... हे जे “भगवा” नाव आहे, ती साक्षात्काराने (अर्हत्त्वफलाच्या प्राप्तीनंतर) झालेली प्रज्ञप्ती आहे.' ยํ คุณเนมิตฺตกญฺเจตํ นามํ, เตสํ คุณานํ ปกาสนตฺถํ อิมํ คาถํ วทนฺติ – जे हे गुणांवर आधारित नैमित्तिक नाव आहे, त्या गुणांना प्रकट करण्यासाठी ही गाथा म्हणतात – ‘‘ภคี ภชี ภาคี วิภตฺตวา อิติ,อกาสิ ภคฺคนฺติ ครูติ ภาคฺยวา; พหูหิ ญาเยหิ สุภาวิตตฺตโน,ภวนฺตโค โส ภควาติ วุจฺจตี’’ติ. “ते (ऐश्वर्याने) युक्त आहेत (भगी), ते सेवन करण्यायोग्य आहेत (भजी), ते (सुखाचे) वाटेकरी आहेत (भागी), ते (धर्माचे) विभाजन करून सांगणारे आहेत (विभक्तवान), त्यांनी (क्लेशांचा) नाश केला आहे (भग्न), ते आदरणीय (गुरू) व भाग्यवान (भाग्यवान) आहेत; अनेक मार्गांनी त्यांनी स्वतःच्या चित्ताची उत्तम भावना केली आहे आणि ते भवसागराच्या पार गेले आहेत, म्हणून त्यांना ‘भगवा’ म्हटले जाते।” นิทฺเทสาทีสุ (มหานิ. ๘๔; จูฬนิ. อชิตมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๒) วุตฺตนเยเนว จสฺส อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. निर्देश इत्यादी ग्रंथांमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच या शब्दाचा अर्थ समजावा. อยํ ปน อปโร ปริยาโย – आणि हा दुसरा एक पर्याय आहे – ‘‘ภาคฺยวา ภคฺควา ยุตฺโต, ภเคหิ จ วิภตฺตวา; ภตฺตวา วนฺตคมโน, ภเวสุ ภควา ตโต’’ติ. “ते भाग्यवान आहेत, त्यांनी क्लेशांचा नाश केला आहे, ते भग (ऐश्वर्य) गुणांनी युक्त आहेत, ते (धर्माचे) विभाजन करून सांगणारे आहेत, ते (लोकोत्तर धर्माचे) सेवन करणारे आहेत आणि त्यांनी भवांमधील (संसारातील) गतीचा त्याग केला आहे; म्हणून त्यांना ‘भगवा’ म्हटले जाते।” ตตฺถ [Pg.92] ‘‘วณฺณาคโม วณฺณวิปริยาโย’’ติ เอวํ นิรุตฺติลกฺขณํ คเหตฺวา สทฺทนเยน วา ปิโสทราทิปกฺเขปลกฺขณํ คเหตฺวา ยสฺมา โลกิยโลกุตฺตรสุขาภินิพฺพตฺตกํ ทานสีลาทิปารปฺปตฺตํ ภาคฺยมสฺส อตฺถิ, ตสฺมา ภาคฺยวาติ วตฺตพฺเพ ภควาติ วุจฺจตีติ ญาตพฺพํ. ยสฺมา ปน โลภโทสโมหวิปรีตมนสิการอหิริกาโนตฺตปฺปโกธูปนาหมกฺขปลา- อิสฺสามจฺฉริยมายาสาเฐยฺยถมฺภสารมฺภมานาติมานมทปมาทตณฺหาวิชฺชาติวิธากุสลมูลทุจฺจริต- สํกิเลสมลวิสมสญฺญาวิตกฺกปปญฺจจตุพฺพิธวิปริเยสอาสวคนฺถโอฆโยคอคติตณฺหุปาทาน- ปญฺจเจโตขิลวินิพนฺธนีวรณาภินนฺทนฉวิวาทมูลตณฺหากายสตฺตานุสย- อฏฺฐมิจฺฉตฺตนวตณฺหามูลกทสากุสลกมฺมปถทฺวาสฏฺฐิทิฏฺฐิคต- อฏฺฐสตตณฺหาวิจริตปฺปเภทสพฺพทรถปริฬาหกิเลสสตสหสฺสานิ, สงฺเขปโต วา ปญฺจ กิเลสกฺขนฺธอภิสงฺขารมจฺจุเทวปุตฺตมาเร อภญฺชิ, ตสฺมา ภคฺคตฺตา เอเตสํ ปริสฺสยานํ ภคฺควาติ วตฺตพฺเพ ภควาติ วุจฺจติ. อาห เจตฺถ – तेथे 'वर्णागम' (वर्णाचा आगम) आणि 'वर्णविपर्यय' (वर्णाचा बदल) या निरुक्तीच्या नियमांचा स्वीकार करून, किंवा व्याकरण नियमांनुसार 'पिशोदर' इत्यादी शब्दांप्रमाणे वर्णांच्या लोप किंवा आगमाचा नियम स्वीकारून, ज्याअर्थी लौकिक आणि लोकोत्तर सुख उत्पन्न करणारे, दान, शील इत्यादी पारमितांच्या परिपूर्णतेने युक्त असे 'भाग्य' त्यांच्याकडे आहे, म्हणून 'भाग्यवान' (भाप्यवा) असे म्हणण्याऐवजी त्यांना 'भगवा' म्हटले जाते, असे समजावे. आणि ज्याअर्थी त्यांनी लोभ, द्वेष, मोह, विपरीत मनसिकार (अयोग्य विचार), अहीरिक (पापाची लाज न वाटणे), अनोत्तप्प (पापाची भीती न वाटणे), क्रोध, उपनाह (वैर बाळगणे), म्रक्ष (गुण झाकणे), पलास (मत्सर), ईर्ष्या, मात्सर्य, माया (कपट), साठ्य (धूर्तपणा), स्तंभ (ताठरपणा), सारंभ (अहंकार), मान, अतिमान, मद, प्रमाद, तृष्णा, अविद्या; तीन अकुशल मुळे, तीन दुश्चरिते, तीन संक्लेश, तीन मल, तीन विषम संज्ञा, तीन वितर्क, तीन प्रपंच; चार विपर्यास, चार आसव, चार ग्रंथ, चार ओघ, चार योग, चार अगती, चार तृष्णेचे उपादान; पाच चेतोखील (चित्तातील खिळे), पाच विनिबंध (बंधने), पाच नीवरण, पाच अभिनंदन; सहा विवादमुळे, सहा तृष्णाकाय; सात अनुशय; आठ मिथ्यात्व; नऊ तृष्णामूलक धर्म; दहा अकुशल कर्मपथ; बासष्ट (६२) दृष्टीगत (मिथ्या विचार); एकशे आठ (१०८) तृष्णा-विचरित भेद आणि सर्व प्रकारचे परिदाह (ताप) उत्पन्न करणारे लाखो क्लेश; किंवा संक्षेपाने (थोडक्यात) पाच मार – क्लेशमार, स्कंधमार, अभिसंस्कारमार, मृत्युमार आणि devaputtamar (देवपुत्रमार) – यांना भग्न (नष्ट) केले आहे, म्हणून या सर्व उपद्रवांचा (शत्रूंचा) नाश केल्यामुळे (भग्न केल्यामुळे) 'भग्नवान' (भग्गवा) असे म्हणण्याऐवजी त्यांना 'भगवा' म्हटले जाते. आणि याविषयी येथे म्हटले आहे – ‘‘ภคฺคราโค ภคฺคโทโส, ภคฺคโมโห อนาสโว; ภคฺคาสฺส ปาปกา ธมฺมา, ภควา เตน วุจฺจตี’’ติ. “ज्यांनी रागाचा नाश केला आहे, ज्यांनी द्वेषाचा नाश केला आहे, ज्यांनी मोहाचा नाश केला आहे, जे अनासव (आसवविरहित) आहेत आणि ज्यांनी सर्व पापधर्मांचा नाश केला आहे; म्हणून त्यांना ‘भगवा’ म्हटले जाते।” ภาคฺยวตาย จสฺส สตปุญฺญลกฺขณธรสฺส รูปกายสมฺปตฺติ ทีปิตา โหติ, ภคฺคโทสตาย ธมฺมกายสมฺปตฺติ. ตถา โลกิยสริกฺขกานํ พหุมานภาโว, คหฏฺฐปพฺพชิเตหิ อภิคมนียตา. ตถา อภิคตานญฺจ เนสํ กายจิตฺตทุกฺขาปนยเน ปฏิพลภาโว, อามิสทานธมฺมทาเนหิ อุปการิตา. โลกิยโลกุตฺตรสุเขหิ จ สํโยชนสมตฺถตา ทีปิตา โหติ. आणि त्यांच्या भाग्यवान असण्याने, शेकडो पुण्याच्या लक्षणांना धारण करणाऱ्या त्यांच्या रूपकाय संपत्तीचे (शरीर संपत्तीचे) दर्शन घडते, आणि दोषांचा नाश केल्यामुळे त्यांच्या धम्मकाय संपत्तीचे दर्शन घडते. तसेच, संसारी लोकांमध्ये त्यांचा अत्यंत आदर असणे, गृहस्थ आणि प्रव्रजितांनी (भिक्खूंनी) त्यांना शरण जाण्यायोग्य असणे; आणि शरण आलेल्या त्या लोकांच्या कायिक व मानसिक दुःखांचे निवारण करण्याचे त्यांचे सामर्थ्य, आमिषदान (भौतिक दान) आणि धम्मदानाने त्यांचे कल्याण करणे; आणि त्यांना लौकिक व लोकोत्तर सुखांशी जोडण्याचे त्यांचे सामर्थ्य या सर्वांचे दर्शन घडते. ยสฺมา จ โลเก อิสฺสริยธมฺมยสสิริกามปยตฺเตสุ ฉสุ ธมฺเมสุ ภคสทฺโท วตฺตติ, ปรมญฺจสฺส สกจิตฺเต อิสฺสริยํ, อณิมาลฆิมาทิกํ วา โลกิยสมฺมตํ สพฺพาการปริปูรํ อตฺถิ, ตถา โลกุตฺตโร ธมฺโม, โลกตฺตยพฺยาปโก ยถาภุจฺจคุณาธิคโต อติวิย ปริสุทฺโธ ยโส, รูปกายทสฺสนพฺยาวฏชนนยนมนปฺปสาทชนนสมตฺถา สพฺพาการปริปูรา สพฺพงฺคปจฺจงฺคสิรี, ยํ ยํ อเนน อิจฺฉิตํ ปตฺถิตํ อตฺตหิตํ ปรหิตํ วา, ตสฺส ตสฺส ตเถว อภินิปฺผนฺนตฺตา อิจฺฉิตตฺถนิปฺผตฺติสญฺญิโต กาโม, สพฺพโลกครุภาวปฺปตฺติเหตุภูโต สมฺมาวายามสงฺขาโต ปยตฺโต จ อตฺถิ, ตสฺมา อิเมหิ ภเคหิ ยุตฺตตฺตาปิ ภคา อสฺส สนฺตีติ อิมินา อตฺเถน ‘‘ภควา’’ติ วุจฺจติ. ज्याअर्थी जगात ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, काम आणि प्रयत्न या सहा गुणांच्या संदर्भात 'भग' हा शब्द वापरला जातो; आणि ज्याअर्थी त्यांच्या स्वतःच्या चित्तावर अत्यंत श्रेष्ठ असे ऐश्वर्य आहे, जे अणिमा, लघिमा इत्यादी किंवा लौकिकदृष्ट्या संमत असलेले आणि सर्व प्रकारे परिपूर्ण आहे; तसेच लोकोत्तर धर्म त्यांनी धारण केला आहे; तिन्ही लोकांत पसरलेले, यथार्थ गुणांच्या प्राप्तीमुळे मिळालेले आणि अत्यंत परिशुद्ध असे यश त्यांच्याकडे आहे; रूपकायाचे दर्शन घेण्यास उत्सुक असलेल्या लोकांच्या डोळ्यांना व मनाला प्रसन्नता देण्यास समर्थ असलेली, सर्व प्रकारे परिपूर्ण अशी सर्व अंग-प्रत्यंगांची शोभा (श्री) त्यांच्याकडे आहे; त्यांनी स्वतःचे हित किंवा परहित याविषयी जे जे इच्छिलेले किंवा प्रार्थीलेले असते, त्या त्या गोष्टीची तशीच पूर्तता झाल्यामुळे इच्छित अर्थाची निष्पत्ती म्हणून ओळखली जाणारी इच्छा (काम) त्यांच्याकडे आहे; आणि सर्व लोकांकडून आदरणीय भाव प्राप्त होण्यास कारणीभूत असलेला, सम्यक् व्यायाम नावाचा प्रयत्न देखील त्यांच्याकडे आहे; म्हणून या 'भग' (गुणां) शी युक्त असल्यामुळे आणि त्यांच्याकडे हे 'भग' (गुण) असल्यामुळे, या अर्थाने त्यांना 'भगवान' असे म्हटले जाते. ยสฺมา [Pg.93] ปน กุสลาทิเภเทหิ สพฺพธมฺเม, ขนฺธายตนธาตุสจฺจอินฺทฺริยปฏิจฺจสมุปฺปาทาทีหิ วา กุสลาทิธมฺเม, ปีฬนสงฺขตสนฺตาปวิปริณามฏฺเฐน วา ทุกฺขมริยสจฺจํ, อายูหนนิทานสํโยคปลิโพธฏฺเฐน สมุทยํ, นิสฺสรณวิเวกาสงฺขตอมตฏฺเฐน นิโรธํ, นิยฺยานิกเหตุทสฺสนาธิปเตยฺยฏฺเฐน มคฺคํ วิภตฺตวา, วิภชิตฺวา วิวริตฺวา เทสิตวาติ วุตฺตํ โหติ, ตสฺมา วิภตฺตวาติ วตฺตพฺเพ ‘‘ภควา’’ติ วุจฺจติ. परंतु ज्याअर्थी भगवंतांनी कुशल इत्यादी भेदांनी सर्व धर्मांचे, किंवा स्कंध, आयतन, धातू, सत्य, इंद्रिय, प्रतीत्यसमुत्पाद इत्यादींद्वारे कुशल इत्यादी धर्मांचे; तसेच पीडन, संस्कृत, संताप आणि विपरिणाम या अर्थाने दुःख आर्यसत्याचे; आयूहन, निदान, संयोग आणि पलिबोध या अर्थाने समुदय आर्यसत्याचे; निस्सरण, विवेक, असंस्कृत आणि अमृत या अर्थाने निरोध आर्यसत्याचे; आणि नैर्याणिक, हेतू, दर्शन व आधिपत्य या अर्थाने मार्ग आर्यसत्याचे विभाजन केले आहे—म्हणजेच त्यांनी विभागून, स्पष्ट करून आणि उपदेशिले आहे—म्हणून 'विभत्तवा' (विभाजन करणारे) असे म्हणण्याऐवजी त्यांना 'भगवान' असे म्हटले जाते. ยสฺมา จ เอส ทิพฺพพฺรหฺมอริยวิหาเร กายจิตฺตอุปธิวิเวเก สุญฺญตาปฺปณิหิตานิมิตฺตวิโมกฺเข อญฺเญ จ โลกิยโลกุตฺตเร อุตฺตริมนุสฺสธมฺเม ภชิ เสวิ พหุลมกาสิ, ตสฺมา ภตฺตวาติ วตฺตพฺเพ ‘‘ภควา’’ติ วุจฺจติ. आणि ज्याअर्थी त्यांनी दिव्यविहार, ब्रह्मविहार व आर्यविहार; कायविवेक, चित्तविवेक व उपधिविवेक; शून्यताविमोक्ष, अप्रणिहितविमोक्ष व अनिमित्तविमोक्ष; आणि इतर लौकिक व लोकोत्तर उत्तरमनुष्यधर्मांचे सेवन केले, आचरण केले आणि वारंवार अभ्यास केला, म्हणून 'भत्तवा' (सेवन करणारे) असे म्हणण्याऐवजी त्यांना 'भगवान' असे म्हटले जाते. ยสฺมา ปน ตีสุ ภเวสุ ตณฺหาสงฺขาตํ คมนํ อเนน วนฺตํ, ตสฺมา ภเวสุ วนฺตคมโนติ วตฺตพฺเพ ภวสทฺทโต ภการํ คมนสทฺทโต คการํ วนฺตสทฺทโต วการญฺจ ทีฆํ กตฺวา อาทาย ‘‘ภควา’’ติ วุจฺจติ, ยถา โลเก ‘‘เมหนสฺส ขสฺส มาลา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘เมขลา’’ติ. परंतु ज्याअर्थी त्यांनी तिन्ही भावांमध्ये (संसारात) तृष्णारूपी गमन ओकून टाकले आहे (त्यागले आहे), म्हणून 'भवेसु वन्तगमनो' (भावांमध्ये गमन त्यागलेला) असे म्हणण्याऐवजी, 'भव' शब्दातून 'भ' कार, 'गमन' शब्दातून 'ग' कार आणि 'वन्त' शब्दातून 'व' कार घेऊन, त्याला दीर्घ करून 'भगवान' असे म्हटले जाते; ज्याप्रमाणे जगात 'मेहनस्स खस्स माला' (गुह्य भागाची माळ) असे म्हणण्याऐवजी 'मेखला' असे म्हटले जाते. เอตฺตาวตา เจตฺถ เอวํ เม สุตนฺติ วจเนน ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ เทเสนฺโต ปจฺจกฺขํ กตฺวา ภควโต ธมฺมสรีรํ ปกาเสติ, เตน ‘‘นยิทํ อตีตสตฺถุกํ ปาวจนํ, อยํ โว สตฺถา’’ติ ภควโต อทสฺสเนน อุกฺกณฺฐิตชนํ สมสฺสาเสติ. आणि एवढ्यावरूनच, येथे 'एवं मे सुतं' (असे म्या ऐकिले) या वचनाने, जसे ऐकले आहे व जसे शिकले आहे तशा धर्माचा उपदेश करणारे (आयुष्यमान आनंद) भगवंतांच्या धर्मशरीराला प्रत्यक्ष करून प्रकट करतात. त्यामुळे, "हे प्रवचन शास्त्याविनाचे (गुरू नसलेले) नाही, हाच तुमचा शास्ता आहे," असे सांगून भगवंतांच्या अदर्शनाने व्याकुळ झालेल्या लोकांना ते धीर देतात. เอกํ สมยํ ภควาติ วจเนน ตสฺมึ สมเย ภควโต อวิชฺชมานภาวํ ทสฺเสนฺโต รูปกายปรินิพฺพานํ ทสฺเสติ. เตน ‘‘เอวํวิธสฺส อิมสฺส อริยธมฺมสฺส เทเสตา ทสพลธโร วชิรสงฺฆาตกาโย โสปิ ภควา ปรินิพฺพุโต, ตตฺถ เกนญฺเญน ชีวิเต อาสา ชเนตพฺพา’’ติ ชีวิตมทมตฺตํ ชนํ สํเวเชติ, สทฺธมฺเม จสฺส อุสฺสาหํ ชเนติ. 'एकं समयं भगवा' (एका समयी भगवान) या वचनाने, त्या वेळी भगवंतांची अनुपस्थिती दर्शवत ते त्यांच्या रूपकायाचे परिनिर्वाण दर्शवतात. त्यामुळे, "अशा प्रकारच्या या आर्यधर्माचा उपदेश करणारे, वशवर्ती, दशबलधारी आणि वज्रसमान दृढ शरीर असलेले ते भगवान देखील परिनिर्वृत झाले, तर मग इतर कोणी जीवनाची आशा कशी धरावी?" असे सांगून ते जीवनाच्या मदाने धुंद झालेल्या लोकांना संवेगित करतात (सावध करतात) आणि त्यांच्यात सद्धर्माविषयी उत्साह निर्माण करतात. เอวนฺติ จ ภณนฺโต เทสนาสมฺปตฺตึ นิทฺทิสติ, เม สุตนฺติ สาวกสมฺปตฺตึ, เอกํ สมยนฺติ กาลสมฺปตฺตึ, ภควาติ เทสกสมฺปตฺตึ. 'एवं' असे म्हणताना ते देशना-संपत्ती (उपदेशाची परिपूर्णता) दर्शवतात; 'मे सुतं' याने श्रावक-संपत्ती (शिष्याची परिपूर्णता); 'एकं समयं' याने काल-संपत्ती (वेळेची परिपूर्णता); आणि 'भगवा' याने देशक-संपत्ती (उपदेशकाची परिपूर्णता) दर्शवतात. สาวตฺถิยํ วิหรตีติ เอตฺถ สาวตฺถีติ สวตฺถสฺส อิสิโน นิวาสฏฺฐานภูตํ นครํ, ยถา กากนฺที มากนฺทีติ, เอวํ อิตฺถิลิงฺควเสน สาวตฺถีติ วุจฺจติ, เอวํ อกฺขรจินฺตกา. อฏฺฐกถาจริยา ปน ภณนฺติ ‘‘ยํกิญฺจิ [Pg.94] มนุสฺสานํ อุปโภคปริโภคํ สพฺพเมตฺถ อตฺถี’’ติ สาวตฺถี. สตฺถสมาโยเค จ ‘‘กึ ภณฺฑมตฺถี’’ติ ปุจฺฉิเต ‘‘สพฺพมตฺถี’’ติ วจนมุปาทาย สาวตฺถี. 'सावत्थियं विहरति' (श्रावस्तीत विहार करत होते) यामध्ये 'सावत्थी' (श्रावस्ती) म्हणजे 'सवत्थ' नावाच्या ऋषींचे निवासस्थान असलेले नगर होय. ज्याप्रमाणे 'काकंदी' आणि 'माकंदी' शब्द आहेत, त्याचप्रमाणे स्त्रीलिंगी रूपाने याला 'सावत्थी' म्हटले जाते, असे व्याकरणकार म्हणतात. परंतु अट्ठकथाचार्य म्हणतात की, "मनुष्यांच्या उपभोग व वापरासाठी जे काही आवश्यक आहे, ते सर्व येथे आहे," म्हणून हे 'सावत्थी' होय. तसेच, व्यापारी तांड्यांच्या (सार्थ) आगमनाच्या वेळी "काय माल उपलब्ध आहे?" असे विचारले असता, "सर्व काही उपलब्ध आहे" असे जे उत्तर दिले जाई, त्यावरून याला 'सावत्थी' म्हटले जाते. ‘‘สพฺพทา สพฺพูปกรณํ, สาวตฺถิยํ สโมหิตํ; ตสฺมา สพฺพมุปาทาย, สาวตฺถีติ ปวุจฺจติ. "नेहमी सर्व प्रकारची साधने (वस्तू) श्रावस्तीत उपलब्ध असतात; म्हणून सर्व काही उपलब्ध असल्यामुळे याला 'सावत्थी' म्हटले जाते." ‘‘โกสลานํ ปุรํ รมฺมํ, ทสฺสเนยฺยํ มโนรมํ; ทสหิ สทฺเทหิ อวิวิตฺตํ, อนฺนปานสมายุตํ. "कोसल देशाचे हे रमणीय नगर दर्शनीय आणि मनोरम आहे; ते दहा प्रकारच्या आवाजांनी गजबजलेले असून अन्न व पेयांनी परिपूर्ण आहे." ‘‘วุฑฺฒึ เวปุลฺลตํ ปตฺตํ, อิทฺธํ ผีตํ มโนรมํ; อาฬกมนฺทาว เทวานํ, สาวตฺถิปุรมุตฺตม’’นฺติ. (ม. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑๔); "वृद्धी आणि विपुलतेला प्राप्त झालेले, समृद्ध, संपन्न व मनोरम असलेले हे उत्तम श्रावस्ती नगर देवांच्या 'आळकमंदा' नगरीप्रमाणे आहे." ตสฺสํ สาวตฺถิยํ. สมีปตฺเถ ภุมฺมวจนํ. 'तस्सं सावत्थियं' (त्या श्रावस्तीत) यामध्ये सप्तमी विभक्तीचे रूप 'समीप' (जवळ असणे) या अर्थाने वापरले आहे. วิหรตีติ อวิเสเสน อิริยาปถทิพฺพพฺรหฺมอริยวิหาเรสุ อญฺญตรวิหารสมงฺคิปริทีปนเมตํ. อิธ ปน ฐานคมนาสนสยนปฺปเภเทสุ อิริยาปเถสุ อญฺญตรอิริยาปถสมาโยคปริทีปนํ, เตน ฐิโตปิ คจฺฉนฺโตปิ นิสินฺโนปิ สยาโนปิ ภควา วิหรติจฺเจว เวทิตพฺโพ. โส หิ เอกํ อิริยาปถพาธนํ อปเรน อิริยาปเถน วิจฺฉินฺทิตฺวา อปริปตนฺตํ อตฺตภาวํ หรติ ปวตฺเตติ. ตสฺมา วิหรตีติ วุจฺจติ. 'विहरति' (विहार करतात) हा शब्द सामान्यतः ईर्यापथविहार, दिव्यविहार, ब्रह्मविहार आणि आर्यविहार यांपैकी कोणत्याही एका विहाराने युक्त असणे दर्शवणारा आहे. परंतु येथे, उभे राहणे, चालणे, बसणे आणि झोपणे अशा विविध ईर्यापथांपैकी कोणत्याही एका ईर्यापथाशी योग्य प्रकारे युक्त असणे दर्शवणारा हा शब्द आहे. त्यामुळे भगवंत उभे असताना, चालत असताना, बसलेले असताना किंवा झोपलेले असताना देखील 'विहार करत आहेत' असेच समजावे. कारण ते एका ईर्यापथाचा थकवा दुसऱ्या ईर्यापथाने दूर करून, शरीराला कोसळू न देता त्याचे वहन करतात व ते टिकवून ठेवतात. म्हणून 'विहरति' असे म्हटले जाते. เชตวเนติ เอตฺถ อตฺตโน ปจฺจตฺถิกชนํ ชินาตีติ เชโต, รญฺญา วา อตฺตโน ปจฺจตฺถิกชเน ชิเต ชาโตติ เชโต, มงฺคลกมฺยตาย วา ตสฺส เอวํ นามเมว กตนฺติปิ เชโต. วนยตีติ วนํ, อตฺตสมฺปทาย สตฺตานํ ภตฺตึ กาเรติ, อตฺตนิ สิเนหํ อุปฺปาเทตีติ อตฺโถ. วนุเต อิติ วา วนํ, นานาวิธกุสุมคนฺธสมฺโมทมตฺตโกกิลาทิวิหงฺควิรุเตหิ มนฺทมาลุตจลิตรุกฺขสาขาวิฏปปุปฺผผลปลฺลวปลาเสหิ จ ‘‘เอถ มํ ปริภุญฺชถา’’ติ ปาณิโน ยาจติ วิยาติ อตฺโถ. เชตสฺส วนํ เชตวนํ. ตญฺหิ เชเตน ราชกุมาเรน โรปิตํ สํวฑฺฒิตํ ปริปาลิตํ, โส จ ตสฺส สามี อโหสิ, ตสฺมา เชตวนนฺติ วุจฺจติ. ตสฺมึ เชตวเน. 'जेतवने' (जेतवनात) यामध्ये अर्थ असा समजावा: जो आपल्या शत्रूंवर विजय मिळवतो, तो 'जेत'; किंवा राजाने आपल्या शत्रूंवर विजय मिळवल्यानंतर जन्मलेला पुत्र म्हणून 'जेत'; किंवा कल्याणाच्या इच्छेने त्याचे असे नाव ठेवले गेले म्हणून 'जेत'. जे लोकांना आकर्षित करते (सेवन करण्यास प्रवृत्त करते), ते 'वन'; म्हणजेच आपल्या समृद्धीने (फूल-फळांनी) प्राण्यांना आकर्षित करते आणि स्वतःविषयी प्रेम निर्माण करते, असा अर्थ आहे. किंवा ज्याचे सेवन केले जाते, ते 'वन'; जे विविध प्रकारच्या फुलांच्या सुवासाने धुंद झालेल्या कोकिळा इत्यादी पक्ष्यांच्या मंजूळ आवाजाने आणि मंद वाऱ्याने हलणाऱ्या झाडांच्या फांद्या, डहाळ्या, फुले, फळे, पालवी व पानांच्या द्वारे "या आणि माझा उपभोग घ्या" अशी जणू प्राण्यांना विनवणी करत असल्यासारखे वाटते, असा अर्थ आहे. जेत राजकुमाराचे वन म्हणजे 'जेतवन'. कारण ते जेत नावाच्या राजकुमाराने लावले होते, वाढवले होते आणि त्याचे रक्षण केले होते, आणि तोच त्याचा मालक होता; म्हणून याला 'जेतवन' म्हटले जाते. 'तस्मिं जेतवने' म्हणजे त्या जेतवनात. อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเมติ เอตฺถ สุทตฺโต นาม โส คหปติ มาตาปิตูหิ กตนามวเสน, สพฺพกามสมิทฺธิตาย ตุ วิคตมลมจฺเฉรตาย กรุณาทิคุณสมงฺคิตาย จ นิจฺจกาลํ อนาถานํ ปิณฺฑํ [Pg.95] อทาสิ, เตน อนาถปิณฺฑิโกติ สงฺขฺยํ คโต. อารมนฺติ เอตฺถ ปาณิโน, วิเสเสน วา ปพฺพชิตาติ อาราโม, ตสฺส ปุปฺผผลปลฺลวาทิโสภนตาย นาติทูรนาจฺจาสนฺนตาทิปญฺจวิธเสนาสนงฺคสมฺปตฺติยา จ ตโต ตโต อาคมฺม รมนฺติ อภิรมนฺติ อนุกฺกณฺฐิตา หุตฺวา นิวสนฺตีติ อตฺโถ. วุตฺตปฺปการาย วา สมฺปตฺติยา ตตฺถ ตตฺถ คเตปิ อตฺตโน อพฺภนฺตรํเยว อาเนตฺวา รเมตีติ อาราโม. โส หิ อนาถปิณฺฑิเกน คหปตินา เชตสฺส ราชกุมารสฺส หตฺถโต อฏฺฐารสหิรญฺญโกฏิสนฺถาเรน กิณิตฺวา อฏฺฐารสหิรญฺญโกฏีหิ เสนาสนํ การาเปตฺวา อฏฺฐารสหิรญฺญโกฏีหิ วิหารมหํ นิฏฺฐาเปตฺวา เอวํ จตุปญฺญาสาย หิรญฺญโกฏิปริจฺจาเคน พุทฺธปฺปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส นิยฺยาติโต, ตสฺมา ‘‘อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราโม’’ติ วุจฺจติ. ตสฺมึ อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม. "अनाथापिण्डिकस्स आरामे" (अनाथपिंडिकाच्या आरामात) या पाठात अर्थ असा समजावा: तो गृहपती आई-वडिलांनी ठेवलेल्या नावामुळे 'सुदत्त' नावाचा होता. परंतु सर्व इच्छा पूर्ण झाल्यामुळे, लोभ व मत्सर नष्ट झाल्यामुळे आणि करुणा इत्यादी गुणांनी युक्त असल्यामुळे तो नेहमी अनाथ लोकांना अन्न (पिंड) दान देत असे; म्हणून त्याला 'अनाथपिंडिक' या नावाने ओळखले गेले. जेथे प्राणी रममाण होतात, किंवा विशेषतः प्रव्रजित (भिक्खू) रमतात, तो 'आराम' होय. त्याच्या फुले, फळे, पालवी इत्यादींच्या सौंदर्यामुळे आणि फार दूर नाही व फार जवळ नाही अशा पाच प्रकारच्या सेनासन गुणांच्या समृद्धीमुळे वेगवेगळ्या ठिकाणांहून येऊन लोक तेथे रमतात, आनंद घेतात आणि कंटाळा न येता निवास करतात, असा याचा अर्थ आहे. किंवा, पूर्वोक्त समृद्धीमुळे वेगवेगळ्या ठिकाणी गेलेल्या लोकांनाही आपल्याकडे आकर्षित करून घेऊन जो त्यांना रमवतो, तो 'आराम' होय. तो आराम अनाथपिंडिक गृहपतीने राजकुमार जेताच्या हातून अठरा कोटी सुवर्णमुद्रा जमिनीवर पसरवून खरेदी केला, अठरा कोटी सुवर्णमुद्रा खर्च करून तेथे सेनासने (निवासस्थाने) बांधली, आणि अठरा कोटी सुवर्णमुद्रा खर्च करून विहार-महोत्सव (उद्घाटन सोहळा) संपन्न केला. अशा प्रकारे एकूण चोपन्न कोटी सुवर्णमुद्रांचा त्याग करून तो बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला समर्पित केला; म्हणून त्याला "अनाथपिंडिकाचा आराम" असे म्हणतात. त्या अनाथपिंडिकाच्या आरामात. เอตฺถ จ ‘‘เชตวเน’’ติ วจนํ ปุริมสามิปริกิตฺตนํ, ‘‘อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม’’ติ ปจฺฉิมสามิปริกิตฺตนํ. กิเมเตสํ ปริกิตฺตเน ปโยชนนฺติ? วุจฺจเต – อธิการโต ตาว ‘‘กตฺถ ภาสิต’’นฺติ ปุจฺฉานิยามกรณํ อญฺเญสํ ปุญฺญกามานํ ทิฏฺฐานุคติอาปชฺชเน นิโยชนญฺจ. ตตฺถ หิ ทฺวารโกฏฺฐกปาสาทมาปเน ภูมิวิกฺกยลทฺธา อฏฺฐารส หิรญฺญโกฏิโย อเนกโกฏิอคฺฆนกา รุกฺขา จ เชตสฺส ปริจฺจาโค, จตุปญฺญาส โกฏิโย อนาถปิณฺฑิกสฺส. ยโต เตสํ ปริกิตฺตเนน ‘‘เอวํ ปุญฺญกามา ปุญฺญานิ กโรนฺตี’’ติ ทสฺเสนฺโต อายสฺมา อานนฺโท อญฺเญปิ ปุญฺญกาเม เตสํ ทิฏฺฐานุคติอาปชฺชเน นิโยเชติ. เอวเมตฺถ ปุญฺญกามานํ ทิฏฺฐานุคติอาปชฺชเน นิโยชนํ ปโยชนนฺติ เวทิตพฺพํ. येथे "जेतवने" हा शब्द पूर्व मालकाचा उल्लेख करतो, आणि "अनाथापिण्डिकस्स आरामे" हा शब्द नंतरच्या मालकाचा उल्लेख करतो. या मालकांचा उल्लेख करण्याचे काय प्रयोजन आहे? उत्तर दिले जाते – सर्वप्रथम, "हे कोठे सांगितले गेले?" या प्रश्नाचे निश्चित उत्तर देणे आणि इतर पुण्य इच्छिणाऱ्या लोकांना त्यांच्या उदाहरणाचे अनुकरण करण्यासाठी प्रवृत्त करणे हे याचे प्रयोजन आहे. कारण तेथे, प्रवेशद्वार आणि प्रासाद बांधण्यासाठी जमीन विकून मिळालेल्या अठरा कोटी सुवर्णमुद्रा आणि अनेक कोटी मूल्यांचे वृक्ष हे राजकुमार जेताचे दान होते, तर चोपन्न कोटी सुवर्णमुद्रा हे अनाथपिंडिकाचे दान होते. ज्या अर्थी त्यांच्या उल्लेखाने "अशा प्रकारे पुण्य इच्छिणारे लोक पुण्यकर्मे करतात" हे दर्शवत आयुष्यमान आनंद इतर पुण्य इच्छिणाऱ्या लोकांना त्यांच्या उदाहरणाचे अनुकरण करण्यासाठी प्रवृत्त करतात. अशा प्रकारे, येथे पुण्य इच्छिणाऱ्या लोकांना त्यांच्या उदाहरणाचे अनुकरण करण्यासाठी प्रवृत्त करणे हेच प्रयोजन आहे, असे समजावे. เอตฺถาห – ‘‘ยทิ ตาว ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ, ‘เชตวเน อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม’ติ น วตฺตพฺพํ. อถ ตตฺถ วิหรติ, ‘สาวตฺถิย’นฺติ น วตฺตพฺพํ. น หิ สกฺกา อุภยตฺถ เอกํ สมยํ วิหริตุ’’นฺติ. วุจฺจเต – นนุ วุตฺตเมตํ ‘‘สมีปตฺเถ ภุมฺมวจน’’นฺติ, ยโต ยถา คงฺคายมุนาทีนํ สมีเป โคยูถานิ จรนฺตานิ ‘‘คงฺคาย จรนฺติ, ยมุนาย จรนฺตี’’ติ วุจฺจนฺติ, เอวมิธาปิ ยทิทํ สาวตฺถิยา สมีเป เชตวนํ อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราโม, ตตฺถ วิหรนฺโต วุจฺจติ ‘‘สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน [Pg.96] อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม’’ติ เวทิตพฺโพ. โคจรคามนิทสฺสนตฺถํ หิสฺส สาวตฺถิวจนํ, ปพฺพชิตานุรูปนิวาสฏฺฐานนิทสฺสนตฺถํ เสสวจนํ. येथे आक्षेप घेणारा म्हणतो – "जर भगवान श्रावस्तीमध्ये विहार करत होते, तर 'जेतवनात अनाथपिंडिकाच्या आरामात' असे म्हणायला नको होते. आणि जर ते तेथे विहार करत होते, तर 'श्रावस्तीमध्ये' असे म्हणायला नको होते. कारण एकाच वेळी दोन्ही ठिकाणी विहार करणे शक्य नाही." उत्तर दिले जाते – "समीप अर्थामध्ये सप्तमी विभक्तीचा वापर केला आहे" असे आधीच सांगितले आहे ना? ज्याप्रमाणे गंगा, यमुना इत्यादी नद्यांच्या जवळ गाईंचे कळप चरत असताना "गंगेत चरतात, यमुनेत चरतात" असे म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे येथेही श्रावस्तीच्या जवळ जे जेतवन आणि अनाथपिंडिकाचा आराम आहे, तेथे विहार करत असताना "श्रावस्तीमध्ये जेतवनात अनाथपिंडिकाच्या आरामात विहार करत होते" असे म्हटले जाते, हे समजावे. कारण, भगवंतांच्या भिक्षेसाठी जाण्याच्या गावाचा निर्देश करण्यासाठी 'श्रावस्ती' हा शब्द वापरला आहे, आणि प्रव्रजितांना योग्य अशा निवासस्थानाचा निर्देश करण्यासाठी उर्वरित शब्द वापरले आहेत. ตตฺถ สาวตฺถิกิตฺตเนน ภควโต คหฏฺฐานุคฺคหกรณํ ทสฺเสติ, เชตวนาทิกิตฺตเนน ปพฺพชิตานุคฺคหกรณํ. ตถา ปุริเมน ปจฺจยคฺคหณโต อตฺตกิลมถานุโยควิวชฺชนํ, ปจฺฉิเมน วตฺถุกามปฺปหานโต กามสุขลฺลิกานุโยควชฺชนูปายทสฺสนํ. ปุริเมน จ ธมฺมเทสนาภิโยคํ, ปจฺฉิเมน วิเวกาธิมุตฺตึ. ปุริเมน กรุณาย อุปคมนํ, ปจฺฉิเมน จ ปญฺญาย อปคมนํ. ปุริเมน สตฺตานํ หิตสุขนิปฺผาทนาธิมุตฺติตํ, ปจฺฉิเมน ปรหิตสุขกรเณ นิรุปเลปตํ. ปุริเมน ธมฺมิกสุขาปริจฺจาคนิมิตฺตํ ผาสุวิหารํ, ปจฺฉิเมน อุตฺตริมนุสฺสธมฺมานุโยคนิมิตฺตํ. ปุริเมน มนุสฺสานํ อุปการพหุลตํ, ปจฺฉิเมน เทวานํ. ปุริเมน โลเก ชาตสฺส โลเก สํวฑฺฒภาวํ, ปจฺฉิเมน โลเกน อนุปลิตฺตตนฺติ เอวมาทิ. त्यात, 'श्रावस्ती'च्या उल्लेखाने भगवंतांचे गृहस्थांवर अनुग्रह करणे दर्शवले जाते, आणि 'जेतवन' इत्यादींच्या उल्लेखाने प्रव्रजितांवर (भिक्खूंवर) अनुग्रह करणे दर्शवले जाते. तसेच, पहिल्या शब्दाने (श्रावस्ती) प्रत्यय (दान) स्वीकारल्यामुळे आत्मक्लेश अनुयोगाचा त्याग दर्शवला जातो, आणि दुसऱ्या शब्दाने (जेतवन) वस्तूकामाचा त्याग केल्यामुळे कामसुखल्लिकानुयोगाचा त्याग करण्याचा उपाय दर्शवला जातो. पहिल्या शब्दाने धम्मदेशनेतील तत्परता आणि दुसऱ्या शब्दाने विवेकाकडे (एकांतात) कल दर्शवला जातो. पहिल्या शब्दाने करुणेमुळे लोकांकडे जाणे आणि दुसऱ्या शब्दाने प्रज्ञेमुळे लोकांपासून दूर जाणे दर्शवले जाते. पहिल्या शब्दाने प्राण्यांच्या हित-सुखाच्या निर्मितीकडे असलेला कल आणि दुसऱ्या शब्दाने परहित व सुख करताना अलिप्तता दर्शवली जाते. पहिल्या शब्दाने धार्मिक सुखाचा त्याग न करण्याचे कारण असलेला सुखविहार आणि दुसऱ्या शब्दाने उत्तरमनुष्यधर्माच्या अभ्यासाचे कारण दर्शवले जाते. पहिल्या शब्दाने मनुष्यांवर अधिक उपकार करणे आणि दुसऱ्या शब्दाने देवांवर अधिक उपकार करणे दर्शवले जाते. पहिल्या शब्दाने जगात जन्मलेल्या भगवंतांचे जगातच मोठे होणे आणि दुसऱ्या शब्दाने जगापासून अलिप्त राहणे दर्शवले जाते, इत्यादी. อถาติ อวิจฺเฉทตฺเถ, โขติ อธิการนฺตรนิทสฺสนตฺเถ นิปาโต. เตน อวิจฺฉินฺเนเยว ตตฺถ ภควโต วิหาเร อิทมธิการนฺตรํ อุทปาทีติ ทสฺเสติ. กึ ตนฺติ? อญฺญตรา เทวตาติอาทิ. ตตฺถ อญฺญตราติ อนิยมิตนิทฺเทโส. สา หิ นามโคตฺตโต อปากฏา, ตสฺมา ‘‘อญฺญตรา’’ติ วุตฺตา. เทโว เอว เทวตา, อิตฺถิปุริสสาธารณเมตํ. อิธ ปน ปุริโส เอว, โส เทวปุตฺโต กินฺตุ, สาธารณนามวเสน เทวตาติ วุตฺโต. 'अथ' हा शब्द सातत्य (अविच्छेद) दर्शवणारा निपात आहे. 'खो' हा शब्द दुसऱ्या विषयाचा आरंभ दर्शवणारा निपात आहे. त्याद्वारे, भगवंतांच्या विहाराच्या काळात सातत्यानेच हा दुसरा विषय उद्भवला, हे दर्शवले जाते. तो कोणता? 'अञ्ञतरा देवता' (एक देवता) इत्यादी. त्यात 'अञ्ञतरा' हा शब्द अनिश्चितता दर्शवणारा आहे. कारण ती देवता नाव आणि गोत्राने अप्रसिद्ध होती, म्हणून तिला 'अञ्ञतरा' (एक) असे म्हटले आहे. 'देव' म्हणजेच 'देवता' होय. हा शब्द स्त्री आणि पुरुष दोघांसाठी समान आहे. परंतु येथे तो पुरुषच आहे, तो देवपुत्र आहे; परंतु सामान्य नावाच्या वापरामुळे त्याला 'देवता' असे म्हटले आहे. อภิกฺกนฺตาย รตฺติยาติ เอตฺถ อภิกฺกนฺตสทฺโท ขยสุนฺทราภิรูปอพฺภนุโมทนาทีสุ ทิสฺสติ. ตตฺถ ‘‘อภิกฺกนฺตา, ภนฺเต, รตฺติ, นิกฺขนฺโต ปฐโม ยาโม, จิรนิสินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ, อุทฺทิสตุ, ภนฺเต, ภควา ภิกฺขูนํ ปาติโมกฺข’’นฺติ เอวมาทีสุ (จูฬว. ๓๘๓; อ. นิ. ๘.๒๐) ขเย ทิสฺสติ. ‘‘อยํ อิเมสํ จตุนฺนํ ปุคฺคลานํ อภิกฺกนฺตตโร จ ปณีตตโร จา’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๔.๑๐๐) สุนฺทเร. "अभिक्कन्ताय रत्तिया" (रात्र संपत आली असता) या पाठात 'अभिक्कन्त' हा शब्द क्षय (समाप्ती), सुंदर, अभिरूप (अतिशय सुंदर रूप) आणि अभिनुमोदन (अतिशय आनंद) इत्यादी अर्थांमध्ये आढळतो. त्यात, "भंते, रात्र संपली आहे, पहिला प्रहर निघून गेला आहे, भिक्खू संघ बऱ्याच वेळेपासून बसला आहे, भंते, भगवंतांनी भिक्खूंना पातिमोक्खाचा उपदेश करावा" इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'क्षय' (समाप्ती) या अर्थाने आढळतो. "हा या चार पुद्गलांमध्ये (व्यक्तींमध्ये) अधिक श्रेष्ठ आणि अधिक प्रणीत (उत्कृष्ट) आहे" इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'सुंदर' (श्रेष्ठ) या अर्थाने आढळतो. ‘‘โก เม วนฺทติ ปาทานิ, อิทฺธิยา ยสสา ชลํ; อภิกฺกนฺเตน วณฺเณน, สพฺพา โอภาสยํ ทิสา’’ติ. (วิ. ว. ๘๕๗); – “ऋद्धीने आणि यशाने तळपणारा, आणि अतिशय सुंदर रूपाने सर्व दिशा प्रकाशित करत माझ्या चरणांना वंदन करणारा हा कोण आहे?” – เอวมาทีสุ [Pg.97] อภิรูเป. ‘‘อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตม, อภิกฺกนฺตํ, โภ โคตมา’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๒.๑๖; ปารา. ๑๕) อพฺภนุโมทเน. อิธ ปน ขเย. เตน อภิกฺกนฺตาย รตฺติยาติ ปริกฺขีณาย รตฺติยาติ วุตฺตํ โหติ. इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'अभिरूप' (अतिशय सुंदर रूप) या अर्थाने आढळतो. "अतिशय सुंदर (आनंददायी), हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम!" इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'अभिनुमोदन' (अतिशय आनंद/प्रशंसा) या अर्थाने आढळतो. परंतु येथे (प्रस्तुत पाठात) तो 'क्षय' (समाप्ती) या अर्थाने वापरला आहे. त्यामुळे 'अभिक्कन्ताय रत्तिया' म्हणजे 'रात्र संपली असता' (रात्र संपल्यावर) असा अर्थ होतो. อภิกฺกนฺตวณฺณาติ เอตฺถ อภิกฺกนฺตสทฺโท อภิรูเป, วณฺณสทฺโท ปน ฉวิถุติกุลวคฺคการณสณฺฐานปมาณรูปายตนาทีสุ ทิสฺสติ. ตตฺถ ‘‘สุวณฺณวณฺโณสิ ภควา’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๒.๓๙๙; สุ. นิ. ๕๕๓) ฉวิยํ. ‘‘กทา สญฺญูฬฺหา ปน เต คหปติ อิเม สมณสฺส โคตมสฺส วณฺณา’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๒.๗๗) ถุติยํ. ‘‘จตฺตาโรเม, โภ โคตม, วณฺณา’’ติ เอวมาทีสุ (ที. นิ. ๓.๑๑๕) กุลวคฺเค. ‘‘อถ เกน นุ วณฺเณน, คนฺธเถโนติ วุจฺจตี’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๒๓๔) การเณ. ‘‘มหนฺตํ หตฺถิราชวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๑๓๘) สณฺฐาเน. ‘‘ตโย ปตฺตสฺส วณฺณา’’ติ เอวมาทีสุ ปมาเณ. ‘‘วณฺโณ คนฺโธ รโส โอชา’’ติ เอวมาทีสุ รูปายตเน. โส อิธ ฉวิยํ ทฏฺฐพฺโพ. เตน อภิกฺกนฺตวณฺณาติ อภิรูปจฺฉวีติ วุตฺตํ โหติ. ‘अभिक्कन्तवण्णा’ (अभिक्रान्तवर्णा) यामध्ये ‘अभिक्कन्त’ हा शब्द ‘अतिशय सुंदर’ या अर्थी आणि ‘वण्ण’ हा शब्द त्वचा (शरीराचा वर्ण), स्तुती, कुळ (वर्ग), कारण, आकार (संस्थान), प्रमाण आणि रूपायतन इत्यादी अर्थांमध्ये आढळतो. त्यांपैकी, “भगवंत सुवर्णवर्णीय आहेत” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘त्वचा’ (शरीराचा वर्ण) या अर्थाने आला आहे. “हे गृहपती, श्रमण गोतमाची ही स्तुती तुला कधी ऐकायला मिळाली?” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘स्तुती’ या अर्थाने आला आहे. “हे गोतम, हे चार वर्ण (वर्ग) आहेत” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘कुळ किंवा वर्ग’ या अर्थाने आला आहे. “तर मग कोणत्या कारणाने त्याला गंधचोर म्हटले जाते?” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘कारण’ या अर्थाने आला आहे. “मोठ्या हत्तीराजाचा आकार निर्माण करून” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘आकार’ (संस्थान) या अर्थाने आला आहे. “पात्राचे तीन प्रमाण (आकार)” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘प्रमाण’ या अर्थाने आला आहे. “वर्ण, गंध, रस आणि ओज” इत्यादी वाक्यांमध्ये तो ‘रूपायतन’ या अर्थाने आला आहे. येथे तो (वण्ण शब्द) ‘त्वचा’ (शरीराचा वर्ण) या अर्थाने समजला पाहिजे. म्हणून, ‘अभिक्कन्तवण्णा’ म्हणजे ‘अतिशय सुंदर वर्ण (त्वचा) असलेली’ असा अर्थ होतो। เกวลกปฺปนฺติ เอตฺถ เกวลสทฺโท อนวเสสเยภุยฺยอพฺยามิสฺสานติเรกทฬฺหตฺถวิสํโยคาทิอเนกตฺโถ. ตถา หิสฺส ‘‘เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริย’’นฺติ เอวมาทีสุ (ปารา. ๑) อนวเสสตา อตฺโถ. ‘‘เกวลกปฺปา จ องฺคมาคธา ปหูตํ ขาทนียํ โภชนียํ อาทาย อุปสงฺกมิสฺสนฺตี’’ติ เอวมาทีสุ (มหาว. ๔๓) เยภุยฺยตา. ‘‘เกวลสฺส ทุกฺขกฺขนฺธสฺส สมุทโย โหตี’’ติ เอวมาทีสุ (วิภ. ๒๒๕) อพฺยามิสฺสตา. ‘‘เกวลํ สทฺธามตฺตกํ นูน อยมายสฺมา’’ติ เอวมาทีสุ (มหาว. ๒๔๔) อนติเรกตา. ‘‘อายสฺมโต, ภนฺเต, อนุรุทฺธสฺส พาหิโย นาม สทฺธิวิหาริโก เกวลกปฺปํ สงฺฆเภทาย ฐิโต’’ติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๔.๒๔๓) ทฬฺหตฺถตา. ‘‘เกวลี วุสิตวา อุตฺตมปุริโสติ วุจฺจตี’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๓.๕๗) วิสํโยโค. อิธ ปนสฺส อนวเสสตฺตมตฺโถ อธิปฺเปโต. ‘केवलकप्पं’ यामध्ये ‘केवल’ हा शब्द निशेष (संपूर्ण), बहुतांश (प्रायः), अमिश्रित (केवळ), मर्यादित (केवळ तेवढेच), दृढ (निश्चित) आणि विसंयोग (मुक्त) इत्यादी अनेक अर्थांमध्ये आढळतो. जसे की, “संपूर्ण परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्य” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘निशेष’ (संपूर्ण) असा आहे. “बहुतांश अंग आणि मगध देशातील लोक विपुल खाद्य व भोज्य पदार्थ घेऊन जवळ येतील” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘बहुतांश’ असा आहे. “केवळ (अमिश्रित) दुःखसमूहाचा उदय होतो” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘अमिश्रित’ असा आहे. “हे आयुष्यमान केवळ श्रद्धेपुरतेच मर्यादित आहेत काय?” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘मर्यादित’ (केवळ तेवढेच) असा आहे. “भन्ते, आयुष्यमान अनुरुद्धांचे बाहिय नावाचे सार्धविहारी (शिष्य) संघभेदासाठी पूर्णपणे (दृढतेने) उभे राहिले आहेत” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘दृढता’ असा आहे. “जो विसंयुक्त (मुक्त) आहे, ज्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे, त्याला उत्तम पुरुष म्हटले जाते” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘विसंयोग’ (मुक्त) असा आहे. परंतु येथे त्याचा ‘निशेष’ (संपूर्ण) हा अर्थ अभिप्रेत आहे। กปฺปสทฺโท ปนายํ อภิสทฺทหนโวหารกาลปญฺญตฺติเฉทนวิกปฺปเลสสมนฺตภาวาทิอเนกตฺโถ. ตถา หิสฺส ‘‘โอกปฺปนียเมตํ [Pg.98] โภโต โคตมสฺส, ยถา ตํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓๘๗) อภิสทฺทหนมตฺโถ. ‘‘อนุชานามิ, ภิกฺขเว, ปญฺจหิ สมณกปฺเปหิ ผลํ ปริภุญฺชิตุ’’นฺติ เอวมาทีสุ (จูฬว. ๒๕๐) โวหาโร. ‘‘เยน สุทํ นิจฺจกปฺปํ วิหรามี’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓๘๗) กาโล. ‘‘อิจฺจายสฺมา กปฺโป’’ติ เอวมาทีสุ (สุ. นิ. ๑๐๙๘; จูฬนิ. กปฺปมาณวปุจฺฉา ๑๑๗, กปฺปมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๖๑) ปญฺญตฺติ. ‘‘อลงฺกโต กปฺปิตเกสมสฺสู’’ติ เอวมาทีสุ (ชา. ๒.๒๒.๑๓๖๘) เฉทนํ. ‘‘กปฺปติ ทฺวงฺคุลกปฺโป’’ติ เอวมาทีสุ (จูฬว. ๔๔๖) วิกปฺโป. ‘‘อตฺถิ กปฺโป นิปชฺชิตุ’’นฺติ เอวมาทีสุ (อ. นิ. ๘.๘๐) เลโส. ‘‘เกวลกปฺปํ เวฬุวนํ โอภาเสตฺวา’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๙๔) สมนฺตภาโว. อิธ ปนสฺส สมนฺตภาโว อตฺโถ อธิปฺเปโต. ยโต เกวลกปฺปํ เชตวนนฺติ เอตฺถ อนวเสสํ สมนฺตโต เชตวนนฺติ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. तसेच, हा ‘कप्प’ शब्द दृढ विश्वास, व्यवहार (संज्ञा), काळ, प्रज्ञप्ती, छेदने (कापणे), विकल्प (नियम), लेश (किंचित) आणि समंतभाव (सर्व बाजूंनी असणे) इत्यादी अनेक अर्थांमध्ये आढळतो. जसे की, “पूजनीय गोतमांवर हा दृढ विश्वास ठेवण्याजोगा आहे, कारण ते अर्हत, सम्यक्संबुद्ध आहेत” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘दृढ विश्वास’ असा आहे. “भिक्खूंनो, मी तुम्हाला श्रमणांच्या पाच प्रकारच्या व्यवहारांनी (नियमांनी) फळांचे सेवन करण्याची अनुमती देतो” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘व्यवहार’ असा आहे. “ज्या कारणाने मी नेहमी (सर्व काळ) विहरतो” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘काळ’ असा आहे. “असे आयुष्यमान कप्प” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘प्रज्ञप्ती’ (नाव) असा आहे. “केश आणि श्मश्रू (दाढी) कापून सुशोभित झालेला” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘छेदने’ (कापणे) असा आहे. “दोन बोटे सावली गेल्यावर भोजन करणे कल्पते (योग्य आहे)” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘विकल्प’ (नियम) असा आहे. “झोपण्यासाठी काही निमित्त (किंचित कारण) आहे” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘लेश’ (किंचित) असा आहे. “संपूर्ण वेळुवनाला सर्व बाजूंनी प्रकाशित करून” इत्यादी वाक्यांमध्ये त्याचा अर्थ ‘समंतभाव’ (सर्व बाजूंनी असणे) असा आहे. परंतु येथे त्याचा ‘समंतभाव’ हा अर्थ अभिप्रेत आहे. म्हणून ‘केवलकप्पं जेतवनं’ याचा अर्थ ‘संपूर्ण, सर्व बाजूंनी जेतवन’ असा समजावा। โอภาเสตฺวาติ อาภาย ผริตฺวา, จนฺทิมา วิย สูริโย วิย จ เอโกภาสํ เอกปชฺโชตํ กริตฺวาติ อตฺโถ. ‘ओभासेत्वा’ (प्रकाशित करून) म्हणजे आपल्या प्रकाशाने व्यापून, चंद्राप्रमाणे आणि सूर्याप्रमाणे एकाच वेळी प्रकाशमान व प्रदीप्त करून, असा अर्थ आहे। เยน ภควา เตนุปสงฺกมีติ ภุมฺมตฺเถ กรณวจนํ. ยโต ยตฺถ ภควา, ตตฺถ อุปสงฺกมีติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เยน วา การเณน ภควา เทวมนุสฺเสหิ อุปสงฺกมิตพฺโพ, เตเนว การเณน อุปสงฺกมีติ เอวมฺเปตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เกน จ การเณน ภควา อุปสงฺกมิตพฺโพ? นานปฺปการคุณวิเสสาธิคมาธิปฺปาเยน, สาทุรสผลูปโภคาธิปฺปาเยน ทิชคเณหิ นิจฺจผลิตมหารุกฺโข วิย. อุปสงฺกมีติ จ คตาติ วุตฺตํ โหติ. อุปสงฺกมิตฺวาติ อุปสงฺกมนปริโยสานทีปนํ. อถ วา เอวํ คตา ตโต อาสนฺนตรํ ฐานํ ภควโต สมีปสงฺขาตํ คนฺตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวาติ ภควนฺตํ วนฺทิตฺวา ปณมิตฺวา นมสฺสิตฺวา. ‘येन भगवा तेनुपसङ्कमि’ (जिथे भगवंत होते, तिथे तो गेला) यामध्ये सप्तमीच्या अर्थात तृतीया विभक्तीचा प्रयोग आहे. कारण जिथे भगवंत होते, तिथे तो गेला, असा येथे अर्थ समजावा. किंवा ज्या कारणाने देव आणि मनुष्यांनी भगवंतांकडे गेले पाहिजे, त्याच कारणाने तो गेला, असाही येथे अर्थ समजावा. आणि कोणत्या कारणाने भगवंतांकडे गेले पाहिजे? विविध प्रकारच्या विशेष गुणांची प्राप्ती करण्याच्या इच्छेने; जसे गोड आणि रसाळ फळांचा उपभोग घेण्याच्या इच्छेने पक्ष्यांचे थवे नेहमी फळांनी बहरलेल्या मोठ्या वृक्षाकडे जातात, त्याप्रमाणे तो गेला. ‘जवळ गेला’ म्हणजेच ‘गेला’ असे म्हटले आहे. ‘जवळ जाऊन’ (उपसङ्कमित्वा) हा शब्द जवळ जाण्याची क्रिया पूर्ण झाल्याचे दर्शवतो. किंवा अशा प्रकारे जाऊन, त्यानंतर भगवंतांच्या अगदी जवळ असलेल्या ठिकाणी पोहोचून, असे म्हटले आहे. ‘भगवंतांना अभिवादन करून’ म्हणजे भगवंतांना वंदन करून, नतमस्तक होऊन, नमस्कार करून। เอกมนฺตนฺติ ภาวนปุํสกนิทฺเทโส เอโกกาสํ เอกปสฺสนฺติ วุตฺตํ โหติ. ภุมฺมตฺเถ วา อุปโยควจนํ. อฏฺฐาสีติ นิสชฺชาทิปฏิกฺเขโป, ฐานํ กปฺเปสิ, ฐิตา อโหสีติ อตฺโถ. ‘एकमन्तं’ (एका बाजूला) हा क्रियाविशेषण नपुंसकलिंगी निर्देश आहे, ज्याचा अर्थ ‘एका ठिकाणी’ किंवा ‘एका बाजूला’ असा होतो. किंवा सप्तमीच्या अर्थात द्वितीया विभक्तीचा प्रयोग आहे. ‘अट्ठासि’ (उभा राहिला) हे बसणे इत्यादी क्रियांचा निषेध करते; त्याने उभे राहण्याची स्थिती स्वीकारली, म्हणजेच तो उभा राहिला, असा अर्थ आहे। กถํ [Pg.99] ฐิตา ปน สา เอกมนฺตํ ฐิตา อหูติ? पण ती एका बाजूला कशी उभी राहिली? ‘‘น ปจฺฉโต น ปุรโต, นาปิ อาสนฺนทูรโต; น กจฺเฉ โนปิ ปฏิวาเต, น จาปิ โอณตุณฺณเต; อิเม โทเส วิวชฺเชตฺวา, เอกมนฺตํ ฐิตา อหู’’ติ. “मागे नाही, पुढे नाही, तसेच फार जवळ किंवा फार दूर नाही; कुशीत (अतिशय जवळ) नाही, वाऱ्याच्या विरुद्ध दिशेला नाही, आणि खाली किंवा वर नाही; या (आठ) दोषांना टाळून ती एका बाजूला उभी राहिली.” กสฺมา ปนายํ อฏฺฐาสิ เอว, น นิสีทีติ? ลหุํ นิวตฺติตุกามตาย. เทวตาโย หิ กญฺจิเทว อตฺถวสํ ปฏิจฺจ สุจิปุริโส วิย วจฺจฏฺฐานํ มนุสฺสโลกํ อาคจฺฉนฺติ. ปกติยา ปน ตาสํ โยชนสตโต ปภุติ มนุสฺสโลโก ทุคฺคนฺธตาย ปฏิกูโล โหติ, น เอตฺถ อภิรมนฺติ, เตน สา อาคตกิจฺจํ กตฺวา ลหุํ นิวตฺติตุกามตาย น นิสีทิ. ยสฺส จ คมนาทิอิริยาปถปริสฺสมสฺส วิโนทนตฺถํ นิสีทนฺติ, โส เทวานํ ปริสฺสโม นตฺถิ, ตสฺมาปิ น นิสีทิ. เย จ มหาสาวกา ภควนฺตํ ปริวาเรตฺวา ฐิตา, เต ปติมาเนติ, ตสฺมาปิ น นิสีทิ. อปิจ ภควติ คารเวเนว น นิสีทิ. เทวตานญฺหิ นิสีทิตุกามานํ อาสนํ นิพฺพตฺตติ, ตํ อนิจฺฉมานา นิสชฺชาย จิตฺตมฺปิ อกตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. पण तो (देवपुत्र) उभाच का राहिला, बसला का नाही? लवकर परत जाण्याच्या इच्छेने. कारण देवगण एखाद्या विशिष्ट प्रयोजनासाठीच, जसा एखादा स्वच्छ मनुष्य शौचालयात जातो त्याप्रमाणे, मनुष्यलोकात येतात. स्वभावतःच त्यांना शंभर योजनांच्या अंतरापासूनच मनुष्यलोक दुर्गंधीमुळे प्रतिकूल (अप्रिय) वाटतो, ते येथे रमत नाहीत. म्हणून तो देवपुत्र आपले काम करून लवकर परत जाण्याच्या इच्छेने बसला नाही. आणि ज्या चालणे इत्यादी शारीरिक हालचालींचा थकवा दूर करण्यासाठी लोक बसतात, तो थकवा देवांना नसतो, म्हणूनही तो बसला नाही. आणि जे महाश्रावक भगवंतांना वेढून उभे होते, त्यांचा आदर राखण्यासाठीही तो बसला नाही. शिवाय, भगवंतांबद्दल असलेल्या केवळ आदरापोटीच तो बसला नाही. कारण बसण्याची इच्छा असलेल्या देवांना आसन प्राप्त होते, परंतु त्याची इच्छा नसल्यामुळे आणि बसण्याचा विचारही मनात न आणल्यामुळे तो एका बाजूला उभा राहिला। เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตาติ เอวํ อิเมหิ การเณหิ เอกมนฺตํ ฐิตา โข สา เทวตา. ภควนฺตํ คาถาย อชฺฌภาสีติ ภควนฺตํ อกฺขรปทนิยมิตคนฺถิเตน วจเนน อภาสีติ อตฺโถ. กถํ? พหู เทวา มนุสฺสา จ…เป… พฺรูหิ มงฺคลมุตฺตมนฺติ. ‘एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता’ म्हणजे अशा प्रकारे या कारणांमुळे एका बाजूला उभी राहिलेली ती देवता. ‘भगवंतांना गाथेने म्हणाली’ म्हणजे भगवंतांना अक्षरे आणि पदांनी बद्ध असलेल्या शब्दांनी म्हणाली, असा अर्थ आहे. कसे? “बहू देवा मनुस्सा च... (अनेक देव आणि मनुष्य)... सर्वोत्तम मंगल सांगा” अशी गाथा म्हणाली। มงฺคลปญฺหสมุฏฺฐานกถา मंगल-प्रश्नोत्पत्तीची कथा ตตฺถ ยสฺมา ‘‘เอวมิจฺจาทิปาฐสฺส, อตฺถํ นานปฺปการโต. วณฺณยนฺโต สมุฏฺฐานํ, วตฺวา’’ติ มาติกา ฐปิตา, ตสฺส จ สมุฏฺฐานสฺส อยํ วตฺตพฺพตาย โอกาโส, ตสฺมา มงฺคลปญฺหสมุฏฺฐานํ ตาว วตฺวา ปจฺฉา อิเมสํ คาถาปทานมตฺถํ วณฺณยิสฺสามิ. กิญฺจ มงฺคลปญฺหสมุฏฺฐานํ? ชมฺพุทีเป กิร ตตฺถ ตตฺถ นครทฺวารสนฺถาคารสภาทีสุ มหาชโน สนฺนิปติตฺวา หิรญฺญสุวณฺณํ ทตฺวา นานปฺปการํ สีตาหรณาทิกถํ กถาเปติ, เอเกกา กถา จตุมาสจฺจเยน นิฏฺฐาติ. ตตฺถ เอกทิวสํ มงฺคลกถา สมุฏฺฐาสิ ‘‘กึ นุ โข มงฺคลํ, กึ ทิฏฺฐํ มงฺคลํ, สุตํ มงฺคลํ, มุตํ มงฺคลํ, โก มงฺคลํ ชานาตี’’ติ. त्या (मंगलसुत्तात) ज्या कारणाने 'एवम्' इत्यादी पाठाचा अर्थ अनेक प्रकारे स्पष्ट करताना 'समुत्थान (उत्पत्तीची पार्श्वभूमी) सांगून' अशी जी मातृका मांडली आहे, आणि त्या समुत्थानाविषयी सांगण्याची हीच योग्य वेळ असल्याने, मी आधी मंगल-प्रश्नाचे समुत्थान सांगून नंतर या गाथापदांचा अर्थ स्पष्ट करीन. आणि मंगल-प्रश्नाचे समुत्थान काय आहे? असे म्हटले जाते की, जंबुद्विपात ठिकठिकाणी नगरद्वारांवर, संथागारांमध्ये (सभाघरांमध्ये), सभांमध्ये इत्यादी ठिकाणी लोक एकत्र येऊन, सोने-नाणे देऊन सीताहरणासारख्या विविध प्रकारच्या कथा सांगून घेत असत. एकेक कथा चार महिन्यांच्या कालावधीनंतर समाप्त होत असे. तिथे एके दिवशी मंगलाविषयीची चर्चा सुरू झाली की, 'खरोखर मंगल म्हणजे काय? पाहिलेले (दृष्ट) मंगल आहे का? ऐकलेले (श्रुत) मंगल आहे का? की अनुभवलेले (मुत) मंगल आहे? मंगल काय आहे हे कोणाला ठाऊक आहे?' อถ [Pg.100] ทิฏฺฐมงฺคลิโก นาเมโก ปุริโส อาห ‘‘อหํ มงฺคลํ ชานามิ, ทิฏฺฐํ โลเก มงฺคลํ ทิฏฺฐํ นาม อภิมงฺคลสมฺมตํ รูปํ. เสยฺยถิทํ – อิเธกจฺโจ กาลสฺเสว วุฏฺฐาย จาตกสกุณํ วา ปสฺสติ, เพลุวลฏฺฐึ วา คพฺภินึ วา กุมารเก วา อลงฺกตปฏิยตฺเต ปุณฺณฆเฏ วา อลฺลโรหิตมจฺฉํ วา อาชญฺญํ วา อาชญฺญรถํ วา อุสภํ วา คาวึ วา กปิลํ วา, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ กิญฺจิ เอวรูปํ อภิมงฺคลสมฺมตํ รูปํ ปสฺสติ, อิทํ วุจฺจติ ทิฏฺฐมงฺคล’’นฺติ. ตสฺส วจนํ เอกจฺเจ อคฺคเหสุํ, เอกจฺเจ น อคฺคเหสุํ. เย น อคฺคเหสุํ, เต เตน สห วิวทึสุ. तेव्हा 'दृष्टमंगल' (पाहण्यालाच मंगल मानणारा) नावाचा एक माणूस म्हणाला, 'मी मंगल काय आहे ते जाणतो. जगात जे पाहिले जाते तेच मंगल आहे. 'दृष्ट' म्हणजे अत्यंत मंगल मानले गेलेले रूप होय. जसे की – येथे एखादा माणूस सकाळी लवकर उठून चातक पक्षी पाहतो, किंवा बेलफळाची काठी, किंवा गरोदर स्त्रीला, किंवा सुशोभित व नटलेल्या लहान मुलांना, किंवा पाण्याने भरलेले घट, किंवा ओला तांबडा मासा, किंवा उत्तम जातीचा घोडा, किंवा उत्तम घोड्यांचा रथ, किंवा बैल, किंवा गाय, किंवा वानर, किंवा इतर कोणतेही अशा प्रकारचे अत्यंत मंगल मानले गेलेले रूप पाहतो; याला 'दृष्टमंगल' असे म्हणतात.' त्याचे हे बोलणे काहींनी स्वीकारले, तर काहींनी स्वीकारले नाही. ज्यांनी स्वीकारले नाही, त्यांनी त्याच्याशी वाद घातला. อถ สุตมงฺคลิโก นาม เอโก ปุริโส อาห – ‘‘จกฺขุนาเมตํ, โภ, สุจิมฺปิ ปสฺสติ อสุจิมฺปิ, ตถา สุนฺทรมฺปิ, อสุนฺทรมฺปิ, มนาปมฺปิ, อมนาปมฺปิ. ยทิ เตน ทิฏฺฐํ มงฺคลํ สิยา, สพฺพมฺปิ มงฺคลํ สิยา. ตสฺมา น ทิฏฺฐํ มงฺคลํ, อปิจ โข ปน สุตํ มงฺคลํ. สุตํ นาม อภิมงฺคลสมฺมโต สทฺโท. เสยฺยถิทํ? อิเธกจฺโจ กาลสฺเสว วุฏฺฐาย วฑฺฒาติ วา วฑฺฒมานาติ วา ปุณฺณาติ วา ผุสฺสาติ วา สุมนาติ วา สิรีติ วา สิริวฑฺฒาติ วา อชฺช สุนกฺขตฺตํ สุมุหุตฺตํ สุทิวสํ สุมงฺคลนฺติ เอวรูปํ วา ยํกิญฺจิ อภิมงฺคลสมฺมตํ สทฺทํ สุณาติ, อิทํ วุจฺจติ สุตมงฺคล’’นฺติ. ตสฺสาปิ วจนํ เอกจฺเจ อคฺคเหสุํ, เอกจฺเจ น อคฺคเหสุํ. เย น อคฺคเหสุํ, เต เตน สห วิวทึสุ. तेव्हा 'श्रुतमंगल' (ऐकण्यालाच मंगल मानणारा) नावाचा एक माणूस म्हणाला, 'अहो मित्रांनो! डोळ्यांनी तर माणूस पवित्र गोष्टीही पाहतो आणि अपवित्र गोष्टीही पाहतो; तसेच सुंदर आणि असुंदर, प्रिय आणि अप्रिय गोष्टीही पाहतो. जर केवळ पाहण्यानेच मंगल होत असते, तर सर्व काही मंगल झाले असते. म्हणून पाहिलेले हे मंगल नाही, तर ऐकलेले (श्रुत) हेच मंगल आहे. 'श्रुत' म्हणजे अत्यंत मंगल मानला गेलेला शब्द होय. जसे की – येथे एखादा माणूस सकाळी लवकर उठून 'वाढत आहे', 'वर्धमान', 'पूर्ण', 'पुष्य', 'सुमन', 'श्री', 'श्रीवर्धन' असे शब्द ऐकतो, किंवा 'आज शुभ नक्षत्र आहे, शुभ मुहूर्त आहे, चांगला दिवस आहे, शुभ मंगल आहे' अशा प्रकारचे किंवा इतर कोणतेही अत्यंत मंगल मानले गेलेले शब्द ऐकतो; याला 'श्रुतमंगल' असे म्हणतात.' त्याचेही बोलणे काहींनी स्वीकारले, तर काहींनी स्वीकारले नाही. ज्यांनी स्वीकारले नाही, त्यांनी त्याच्याशी वाद घातला. อถ มุตมงฺคลิโก นาเมโก ปุริโส อาห ‘‘โสตมฺปิ หิ นาเมตํ, โภ, สาธุมฺปิ อสาธุมฺปิ มนาปมฺปิ อมนาปมฺปิ สทฺทํ สุณาติ. ยทิ เตน สุตํ มงฺคลํ สิยา, สพฺพมฺปิ มงฺคลํ สิยา. ตสฺมา น สุตํ มงฺคลํ, อปิจ โข ปน มุตํ มงฺคลํ. มุตํ นาม อภิมงฺคลสมฺมตํ คนฺธรสโผฏฺฐพฺพํ. เสยฺยถิทํ – อิเธกจฺโจ กาลสฺเสว วุฏฺฐาย ปทุมคนฺธาทิปุปฺผคนฺธํ วา ฆายติ, ผุสฺสทนฺตกฏฺฐํ วา ขาทติ, ปถวึ วา อามสติ, หริตสสฺสํ วา อลฺลโคมยํ วา กจฺฉปํ วา ติลํ วา ปุปฺผํ วา ผลํ วา อามสติ, ผุสฺสมตฺติกาย วา สมฺมา ลิมฺปติ, ผุสฺสสาฏกํ วา นิวาเสติ, ผุสฺสเวฐนํ วา ธาเรติ. ยํ วา ปนญฺญมฺปิ กิญฺจิ เอวรูปํ อภิมงฺคลสมฺมตํ คนฺธํ วา ฆายติ, รสํ วา สายติ, โผฏฺฐพฺพํ วา ผุสติ, อิทํ วุจฺจติ มุตมงฺคล’’นฺติ. ตสฺสาปิ วจนํ เอกจฺเจ อคฺคเหสุํ, เอกจฺเจ น อคฺคเหสุํ. तेव्हा 'मुतमंगल' (स्पर्श, गंध, रसादींच्या अनुभवाला मंगल मानणारा) नावाचा एक माणूस म्हणाला, 'अहो मित्रांनो! कानाने तर माणूस चांगले आणि वाईट, प्रिय आणि अप्रिय शब्द ऐकतो. जर केवळ ऐकण्यानेच मंगल होत असते, तर सर्व काही मंगल झाले असते. म्हणून ऐकलेले हे मंगल नाही, तर अनुभवलेले (मुत) हेच मंगल आहे. 'मुत' म्हणजे अत्यंत मंगल मानले गेलेले गंध, रस आणि स्पर्श होय. जसे की – येथे एखादा माणूस सकाळी लवकर उठून कमळाच्या सुवासासारखा फुलांचा सुवास घेतो, किंवा स्पर्शसुख देणारी दात घासण्याची काडी वापरतो, किंवा पृथ्वीला स्पर्श करतो, किंवा हिरवेगार पीक, ओले शेण, कासव, तीळ, फुले किंवा फळे यांना स्पर्श करतो, किंवा स्पर्शसुख देणाऱ्या सुगंधी मातीने अंगाला लेप लावतो, किंवा स्पर्शसुख देणारे वस्त्र परिधान करतो, किंवा स्पर्शसुख देणारे पागोटे धारण करतो; किंवा इतर कोणतेही अशा प्रकारचे अत्यंत मंगल मानले गेलेले गंध हुंगतो, रस चाखतो किंवा स्पर्शाचा अनुभव घेतो; याला 'मुतमंगल' असे म्हणतात.' त्याचेही बोलणे काहींनी स्वीकारले, तर काहींनी स्वीकारले नाही. ตตฺถ [Pg.101] น ทิฏฺฐมงฺคลิโก สุตมุตมงฺคลิเก อสกฺขิ ญาเปตุํ, น เตสํ อญฺญตโร อิตเร ทฺเว. เตสุ จ มนุสฺเสสุ เย ทิฏฺฐมงฺคลิกสฺส วจนํ คณฺหึสุ, เต ‘‘ทิฏฺฐํเยว มงฺคล’’นฺติ คตา. เย สุตมุตมงฺคลิกานํ, เต ‘‘สุตํเยว มุตํเยว มงฺคล’’นฺติ คตา. เอวมยํ มงฺคลกถา สกลชมฺพุทีเป ปากฏา ชาตา. त्या तिघांमध्ये, दृष्टमंगल मानणारा माणूस श्रुतमंगल आणि मुतमंगल मानणाऱ्यांना पटवून देऊ शकला नाही, आणि त्यांच्यापैकी इतर कोणीही उरलेल्या दोघांना पटवून देऊ शकला नाही. आणि त्या लोकांमध्ये ज्यांनी दृष्टमंगल मानणाऱ्याचे बोलणे स्वीकारले, त्यांनी 'पाहिलेलेच मंगल आहे' असा दृष्टिकोन स्वीकारला. ज्यांनी श्रुतमंगल आणि मुतमंगल मानणाऱ्यांचे बोलणे स्वीकारले, त्यांनी 'ऐकलेलेच किंवा अनुभवलेलेच मंगल आहे' असा दृष्टिकोन स्वीकारला. अशा प्रकारे ही मंगलाविषयीची चर्चा संपूर्ण जंबुद्विपात प्रसिद्ध झाली. อถ สกลชมฺพุทีเป มนุสฺสา คุมฺพคุมฺพา หุตฺวา ‘‘กึ นุ โข มงฺคล’’นฺติ มงฺคลานิ จินฺตยึสุ. เตสํ มนุสฺสานํ อารกฺขเทวตา ตํ กถํ สุตฺวา ตเถว มงฺคลานิ จินฺตยึสุ. ตาสํ เทวตานํ ภุมฺมเทวตา มิตฺตา โหนฺติ, อถ ตโต สุตฺวา ภุมฺมเทวตาปิ ตเถว มงฺคลานิ จินฺตยึสุ, ตาสํ เทวตานํ อากาสฏฺฐเทวตา มิตฺตา โหนฺติ, อากาสฏฺฐเทวตานํ จตุมหาราชิกา เทวตา มิตฺตา โหนฺติ, เอเตนุปาเยน ยาว สุทสฺสีเทวตานํ อกนิฏฺฐเทวตา มิตฺตา โหนฺติ, อถ ตโต สุตฺวา อกนิฏฺฐเทวตาปิ ตเถว คุมฺพคุมฺพา หุตฺวา มงฺคลานิ จินฺตยึสุ. เอวํ ยาว ทสสหสฺสจกฺกวาเฬสุ สพฺพตฺถ มงฺคลจินฺตา อุทปาทิ. อุปฺปนฺนา จ ‘‘อิทํ มงฺคลํ อิทํ มงฺคล’’นฺติ วินิจฺฉยมานาปิ อปฺปตฺตา เอว วินิจฺฉยํ ทฺวาทส วสฺสานิ อฏฺฐาสิ. สพฺเพ มนุสฺสา จ เทวา จ พฺรหฺมาโน จ ฐเปตฺวา อริยสาวเก ทิฏฺฐสุตมุตวเสน ติธา ภินฺนา. เอโกปิ ‘‘อิทเมว มงฺคล’’นฺติ ยถาภุจฺจโต นิฏฺฐงฺคโต นาโหสิ, มงฺคลโกลาหลํ โลเก อุปฺปชฺชิ. तेव्हा संपूर्ण जंबुद्विपातील लोक घोळके-घोळके करून एकत्र आले आणि 'खरोखर मंगल काय आहे?' असा मंगलांविषयी विचार करू लागले. त्या मनुष्यांच्या रक्षक देवतांनी ती चर्चा ऐकून त्यांच्याप्रमाणेच मंगलांविषयी विचार करण्यास सुरुवात केली. त्या देवतांच्या मित्र असलेल्या भूमदेवता होत्या; तेव्हा त्यांच्याकडून ऐकून भूमदेवतांनीही तसाच मंगलांविषयी विचार केला. त्या देवतांच्या मित्र असलेल्या आकाशस्थ देवता होत्या; आकाशस्थ देवतांच्या मित्र चातुर्महाराजिक देवलोकातील देवता होत्या. या क्रमाने सुदस्सी देवतांच्या मित्र असलेल्या अकनिठ्ठ देवलोकातील देवतांपर्यंत हा संदेश गेला. तेव्हा त्यांच्याकडून ऐकून अकनिठ्ठ देवलोकातील देवतांनीही घोळके करून एकत्र येत मंगलांविषयी विचार केला. अशा प्रकारे दहा हजार चक्रवाळांपर्यंत सर्वत्र मंगलाविषयीच्या विचारांची लाट पसरली. 'हे मंगल आहे, ते मंगल आहे' असा निर्णय घेण्याचा प्रयत्न करूनही, ते कोणत्याही निश्चित निर्णयाप्रत पोहोचू शकले नाहीत आणि ही स्थिती बारा वर्षांपर्यंत तशीच राहिली. आर्यश्रावकांना वगळता सर्व मनुष्य, देव आणि ब्रह्मा हे दृष्ट, श्रुत आणि मुत या तीन मतांनुसार तीन गटांत विभागले गेले. एकही जण 'हेच खरे मंगल आहे' अशा सत्य निर्णयाप्रत पोहोचू शकला नाही आणि जगात 'मंगलाविषयीचा कोलाहल' (गदारोळ) निर्माण झाला. โกลาหลํ นาม ปญฺจวิธํ กปฺปโกลาหลํ, จกฺกวตฺติโกลาหลํ, พุทฺธโกลาหลํ, มงฺคลโกลาหลํ, โมเนยฺยโกลาหลนฺติ. ตตฺถ กามาวจรเทวา มุตฺตสิรา วิกิณฺณเกสา รุทมฺมุขา อสฺสูนิ หตฺเถหิ ปุญฺฉมานา รตฺตวตฺถนิวตฺถา อติวิย วิรูปเวสธาริโน หุตฺวา ‘‘วสฺสสตสหสฺสจฺจเยน กปฺปุฏฺฐานํ โหหิติ, อยํ โลโก วินสฺสิสฺสติ, มหาสมุทฺโท สุสฺสิสฺสติ, อยญฺจ มหาปถวี สิเนรุ จ ปพฺพตราชา อุฑฺฒยฺหิสฺสติ วินสฺสิสฺสติ, ยาว พฺรหฺมโลกา โลกวินาโส ภวิสฺสติ, เมตฺตํ มาริสา ภาเวถ, กรุณํ มุทิตํ อุเปกฺขํ มาริสา ภาเวถ, มาตรํ อุปฏฺฐหถ, ปิตรํ อุปฏฺฐหถ, กุเล เชฏฺฐาปจายิโน โหถ, ชาครถ มา ปมาทตฺถา’’ติ มนุสฺสปเถ วิจริตฺวา อาโรเจนฺติ. อิทํ กปฺปโกลาหลํ นาม. कोलाहल पाच प्रकारचे असते – कल्पकोलाहल, चक्रवर्तीकोलाहल, बुद्धकोलाहल, मंगलकोलाहल आणि मोनेय्यकोलाहल. त्यापैकी (कल्पकोलाहलात) कामावचर देवलोकातील देव डोक्यावरील मुकुट काढून, केस मोकळे सोडून, रडवेला चेहरा करून, हातांनी डोळे पुसत, लाल वस्त्रे परिधान करून आणि अत्यंत विद्रूप वेष धारण करून, 'एक लाख वर्षांनंतर कल्पविनाश होणार आहे; हा लोक नष्ट होईल, महासागर सुकतील, ही महापृथ्वी आणि पर्वतांचा राजा सुमेरू जळून खाक होतील व नष्ट होतील; ब्रह्मलोकापर्यंत सर्व जगाचा विनाश होईल. अहो मित्रांनो! तुम्ही मैत्रीची भावना वाढवा; अहो मित्रांनो! करुणा, मुदिता आणि उपेक्षा यांची भावना वाढवा; आईची सेवा करा, वडिलांची सेवा करा; कुळातील ज्येष्ठ व्यक्तींचा आदर करा; जागृत राहा, प्रमाद करू नका!' असे सांगत मनुष्यलोकात फिरून घोषणा करतात. याला 'कल्पकोलाहल' असे म्हणतात. กามาวจรเทวาเยว ‘‘วสฺสสตสฺสจฺจเยน จกฺกวตฺติราชา โลเก อุปฺปชฺชิสฺสตี’’ติ มนุสฺสปเถ วิจริตฺวา อาโรเจนฺติ. อิทํ จกฺกวตฺติโกลาหลํ นาม. สุทฺธาวาสา ปน เทวา พฺรหฺมาภรเณน อลงฺกริตฺวา พฺรหฺมเวฐนํ [Pg.102] สีเส กตฺวา ปีติโสมนสฺสชาตา พุทฺธคุณวาทิโน ‘‘วสฺสสหสฺสจฺจเยน พุทฺโธ โลเก อุปฺปชฺชิสฺสตี’’ติ มนุสฺสปเถ วิจริตฺวา อาโรเจนฺติ. อิทํ พุทฺธโกลาหลํ นาม. สุทฺธาวาสา เอว เทวา เทวมนุสฺสานํ จิตฺตํ ญตฺวา ‘‘ทฺวาทสนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน สมฺมาสมฺพุทฺโธ มงฺคลํ กเถสฺสตี’’ติ มนุสฺสปเถ วิจริตฺวา อาโรเจนฺติ. อิทํ มงฺคลโกลาหลํ นาม. สุทฺธาวาสา เอว เทวา ‘‘สตฺตนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควตา สทฺธึ สมาคมฺม โมเนยฺยปฺปฏิปทํ ปุจฺฉิสฺสตี’’ติ มนุสฺสปเถ วิจริตฺวา อาโรเจนฺติ. อิทํ โมเนยฺยโกลาหลํ นาม. อิเมสุ ปญฺจสุ โกลาหเลสุ เทวมนุสฺสานํ อิทํ มงฺคลโกลาหลํ โลเก อุปฺปชฺชิ. कामावचर देवच 'शंभर वर्षांच्या समाप्तीनंतर जगात चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होईल' असे मानवी मार्गावर (मनुष्यलोकात) फिरून घोषित करतात. याला 'चक्रवर्ती कोलाहल' असे म्हणतात. परंतु शुद्धावास लोकातील देव (ब्रह्मा) ब्रह्माच्या अलंकारांनी स्वतःला सजवून, डोक्यावर ब्रह्म-मुकुट धारण करून, प्रीती व सोमनस्याने युक्त होऊन आणि बुद्धांच्या गुणांचे वर्णन करत 'एक हजार वर्षांच्या समाप्तीनंतर जगात बुद्ध उत्पन्न होतील' असे मानवी मार्गावर फिरून घोषित करतात. याला 'बुद्ध कोलाहल' असे म्हणतात. शुद्धावास लोकातील देवच देव आणि मनुष्यांचे चित्त जाणून 'बारा वर्षांच्या समाप्तीनंतर सम्यकसबुद्ध मङ्गलाचा उपदेश करतील' असे मानवी मार्गावर फिरून घोषित करतात. याला 'मङ्गल कोलाहल' असे म्हणतात. शुद्धावास लोकातील देवच 'सात वर्षांच्या समाप्तीनंतर कोणी एक भिक्खू भगवंतांना भेटून मोनेय्य-प्रतिपदेविषयी विचारतील' असे मानवी मार्गावर फिरून घोषित करतात. याला 'मोनेय्य कोलाहल' असे म्हणतात. या पाच कोलाहलांपैकी देव आणि मनुष्यांमध्ये हे 'मङ्गल कोलाहल' जगात उत्पन्न झाले. อถ เทเวสุ จ มนุสฺเสสุ จ วิจินิตฺวา วิจินิตฺวา มงฺคลานิ อลภมาเนสุ ทฺวาทสนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน ตาวตึสกายิกา เทวตา สงฺคมฺม สมาคมฺม เอวํ สมจินฺเตสุํ ‘‘เสยฺยถาปิ นาม ฆรสามิโก อนฺโตฆรชนานํ, คามสามิโก คามวาสีนํ, ราชา สพฺพมนุสฺสานํ, เอวเมว อยํ สกฺโก เทวานมินฺโท อมฺหากํ อคฺโค จ เสฏฺโฐ จ ยทิทํ ปุญฺเญน เตเชน อิสฺสริเยน ปญฺญาย ทฺวินฺนํ เทวโลกานํ อธิปติ, ยํนูน มยํ สกฺกํ เทวานมินฺทํ เอตมตฺถํ ปุจฺเฉยฺยามา’’ติ. ตา สกฺกสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา สกฺกํ เทวานมินฺทํ ตงฺขณานุรูปนิวาสนาภรณสสฺสิริกสรีรํ อฑฺฒเตยฺยโกฏิอจฺฉราคณปริวุตํ ปาริจฺฉตฺตกมูเล ปณฺฑุกมฺพลวราสเน นิสินฺนํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ ฐตฺวา เอตทโวจุํ ‘‘ยคฺเฆ, มาริส, ชาเนยฺยาสิ, เอตรหิ มงฺคลปญฺหา สมุฏฺฐิตา, เอเก ‘ทิฏฺฐํ มงฺคล’นฺติ วทนฺติ, เอเก ‘สุตํ มงฺคล’นฺติ, เอเก ‘มุตํ มงฺคล’นฺติ, ตตฺถ มยญฺจ อญฺเญ จ อนิฏฺฐงฺคตา, สาธุ วต โน ตฺวํ ยาถาวโต พฺยากโรหี’’ติ. เทวราชา ปกติยาปิ ปญฺญวา ‘‘อยํ มงฺคลกถา กตฺถ ปฐมํ สมุฏฺฐิตา’’ติ อาห. ‘‘มยํ, เทว, จาตุมหาราชิกานํ อสฺสุมฺหา’’ติ อาหํสุ. ตโต จาตุมหาราชิกา อากาสฏฺฐเทวตานํ, อากาสฏฺฐเทวตา ภุมฺมเทวตานํ, ภุมฺมเทวตา มนุสฺสารกฺขเทวตานํ, มนุสฺสารกฺขเทวตา ‘‘มนุสฺสโลเก สมุฏฺฐิตา’’ติ อาหํสุ. त्यानंतर देव आणि मनुष्यांमध्ये शोध घेऊनही मङ्गल काय आहे हे न समजल्यामुळे, बारा वर्षांच्या समाप्तीनंतर तावतिंस लोकातील देवांनी एकत्र येऊन असा विचार केला, 'ज्याप्रमाणे घराचा मालक घरातील लोकांचा, गावाचा प्रमुख गावकऱ्यांचा आणि राजा सर्व मनुष्यांचा विचार करतो, त्याचप्रमाणे हा देवांचा राजा शक्र आमचा अग्र आणि श्रेष्ठ आहे; जो पुण्य, तेज, ऐश्वर्य आणि प्रज्ञेने दोन देवलोकांचा अधिपती आहे. तर मग आपण देवांचा राजा शक्र याला या विषयाबद्दल का विचारू नये?' ते शक्राच्या जवळ गेले. देवांचा राजा शक्र, ज्यांचे शरीर त्या प्रसंगाला अनुरूप वस्त्र आणि अलंकारांनी सुशोभित व देदीप्यमान होते, जे अडीच कोटी अप्सरांच्या समूहाने वेढलेले होते आणि पारिजात वृक्षाच्या मुळाशी असलेल्या पांडुकंबल नावाच्या श्रेष्ठ आसनावर बसलेले होते, त्यांना अभिवादन करून ते एका बाजूला उभे राहिले आणि असे म्हणाले, 'हे प्रिय शक्र! आपल्याला माहीत असावे की, सध्या मङ्गलाचा प्रश्न उपस्थित झाला आहे. काही जण दृष्ट (पाहिलेले) हे मङ्गल आहे असे म्हणतात, काही जण श्रुत (ऐकलेले) हे मङ्गल आहे असे म्हणतात, तर काही जण मुत (अनुभवलेले) हे मङ्गल आहे असे म्हणतात. त्यामध्ये आम्ही आणि इतर देव संशयात (अनिर्णित अवस्थेत) आहोत. कृपया आपण आम्हाला याचे यथायोग्य स्पष्टीकरण द्यावे.' देवराज शक्र स्वभावतःच प्रज्ञावान असल्यामुळे त्यांनी विचारले, 'ही मङ्गलाची चर्चा सर्वप्रथम कोठे सुरू झाली?' देवांनी उत्तर दिले, 'हे देवराज! आम्ही चातुमहाराजिका देवांकडून हे ऐकले.' त्यानंतर चातुमहाराजिका देवांनी आकाशस्थ देवांकडून, आकाशस्थ देवांनी भूमीवरील देवांकडून, भूमीवरील देवांनी मनुष्यरक्षक देवांकडून आणि मनुष्यरक्षक देवांनी 'हे मनुष्यलोकात सुरू झाले आहे' असे ऐकल्याचे सांगितले. อถ เทวานมินฺโท ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺโธ กตฺถ วสตี’’ติ ปุจฺฉิ. ‘‘มนุสฺสโลเก เทวา’’ติ อาหํสุ. ตํ ภควนฺตํ โกจิ ปุจฺฉีติ, น โกจิ เทวาติ[Pg.103]. กินฺนุ นาม ตุมฺเห มาริสา อคฺคึ ฉฑฺเฑตฺวา ขชฺโชปนกํ อุชฺชาเลถ, เยน ตุมฺเห อนวเสสมงฺคลเทสกํ ตํ ภควนฺตํ อติกฺกมิตฺวา มํ ปุจฺฉิตพฺพํ มญฺญถ, อาคจฺฉถ มาริสา, ตํ ภควนฺตํ ปุจฺฉาม, อทฺธา สสฺสิริกํ ปญฺหเวยฺยากรณํ ลภิสฺสามาติ เอกํ เทวปุตฺตํ อาณาเปสิ ‘‘ตํ ภควนฺตํ ปุจฺฉา’’ติ. โส เทวปุตฺโต ตงฺขณานุรูเปน อลงฺกาเรน อตฺตานํ อลงฺกริตฺวา วิชฺชุริว วิชฺโชตมาโน เทวคณปริวุโต เชตวนมหาวิหารํ คนฺตฺวา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ ฐตฺวา มงฺคลปญฺหํ ปุจฺฉนฺโต คาถาย อชฺฌภาสิ ‘‘พหู เทวา มนุสฺสา จา’’ติ. त्यानंतर देवांचा राजा शक्र याने विचारले, 'सम्यकसबुद्ध कोठे निवास करतात?' देवांनी उत्तर दिले, 'हे देवराज! ते मनुष्यलोकात निवास करतात.' शक्राने विचारले, 'त्या भगवंतांना कोणी हा प्रश्न विचारला आहे का?' देवांनी सांगितले, 'हे देवराज! अद्याप कोणीही विचारलेला नाही.' शक्र म्हणाला, 'हे प्रिय देवांनो! तुम्ही पेटता अग्नी सोडून काजव्याचा उजेड का शोधत आहात? ज्यायोगे तुम्ही संपूर्ण मङ्गलाचा उपदेश करणाऱ्या त्या भगवंतांना सोडून मला विचारणे योग्य समजत आहात? या, प्रिय देवांनो! आपण त्या भगवंतांनाच विचारू या. नक्कीच आपल्याला प्रश्नाचे अत्यंत देदीप्यमान उत्तर मिळेल.' असे म्हणून त्यांनी एका देवपुत्राला आज्ञा दिली, 'तू जाऊन भगवंतांना हा प्रश्न विचार.' त्या देवपुत्राने त्या प्रसंगाला अनुरूप अलंकारांनी स्वतःला सुशोभित केले आणि विजेसारखा चमकत व देवगणांनी वेढलेला होऊन तो जेतवन महाविहारात गेला. तेथे भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला आणि मङ्गलाचा प्रश्न विचारताना त्याने 'बहू देवा मनुस्सा च' या गाथेने भगवंतांना संबोधित केले. อิทํ มงฺคลปญฺหสมุฏฺฐานํ. हे मङ्गल-प्रश्नाचे उगमस्थान होय. พหูเทวาติคาถาวณฺณนา 'बहू देवा' या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๒. อิทานิ คาถาปทานํ อตฺถวณฺณนา โหติ. พหูติ อนิยมิตสงฺขฺยานิทฺเทโส, เตน อเนกสตา อเนกสหสฺสา อเนกสตสหสฺสาติ วุตฺตํ โหติ. ทิพฺพนฺตีติ เทวา, ปญฺจหิ กามคุเณหิ กีฬนฺติ, อตฺตโน วา สิริยา โชเตนฺตีติ อตฺโถ. อปิจ เทวาติ ติวิธา เทวา สมฺมุติอุปปตฺติวิสุทฺธิวเสน. ยถาห – २. आता गाथेतील पदांच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण केले जात आहे. 'बहू' हा शब्द अनिश्चित संख्या दर्शवणारा आहे; त्याद्वारे अनेक शेकडो, अनेक हजारो, अनेक लाखो असा अर्थ अभिप्रेत आहे. जे दिव्य (प्रकाशमान) असतात ते 'देव' होत; जे पाच कामगुणांनी क्रीडा करतात किंवा स्वतःच्या वैभवाने चमकतात, असा याचा अर्थ आहे. तसेच, संमृती-देव, उपपत्ती-देव आणि विशुद्धी-देव या भेदाने देव तीन प्रकारचे असतात. जसे म्हटले आहे - ‘‘เทวาติ ตโย เทวา – สมฺมุติเทวา, อุปปตฺติเทวา, วิสุทฺธิเทวา. ตตฺถ สมฺมุติเทวา นาม ราชาโน เทวิโย ราชกุมารา. อุปปตฺติเทวา นาม จาตุมหาราชิเก เทเว อุปาทาย ตทุตฺตริเทวา. วิสุทฺธิเทวา นาม อรหนฺโต วุจฺจนฺตี’’ติ (จูฬนิ. โธตกมาณวปุจฺฉานิทฺเทส ๓๒, ปารายนานุคีติคาถานิทฺเทส ๑๑๙). 'देव तीन प्रकारचे असतात - संमृती-देव, उपपत्ती-देव आणि विशुद्धी-देव. त्यापैकी, संमृती-देव म्हणजे राजे, राण्या आणि राजकुमार होत. उपपत्ती-देव म्हणजे चातुमहाराजिका लोकांपासून सुरू करून त्यावरील सर्व देव होत. विशुद्धी-देव म्हणजे अर्हत यांना म्हटले जाते.' เตสุ อิธ อุปปตฺติเทวา อธิปฺเปตา. มนุโน อปจฺจาติ มนุสฺสา. โปราณา ปน ภณนฺติ – มนโส อุสฺสนฺนตาย มนุสฺสา. เต ชมฺพุทีปกา, อปรโคยานกา, อุตฺตรกุรุกา, ปุพฺพวิเทหกาติ จตุพฺพิธา, อิธ ชมฺพุทีปกา อธิปฺเปตา. มงฺคลนฺติ มหนฺติ อิเมหิ สตฺตาติ มงฺคลานิ, อิทฺธึ วุทฺธิญฺจ ปาปุณนฺตีติ อตฺโถ. อจินฺตยุนฺติ จินฺเตสุํ อากงฺขมานาติ อิจฺฉมานา ปตฺถยมานา ปิหยมานา. โสตฺถานนฺติ โสตฺถิภาวํ, สพฺเพสํ ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกานํ โสภนานํ สุนฺทรานํ กลฺยาณานํ ธมฺมานมตฺถิตนฺติ วุตฺตํ โหติ. พฺรูหีติ เทเสหิ ปกาเสหิ, อาจิกฺข วิวร [Pg.104] วิภช อุตฺตานีกโรหิ. มงฺคลนฺติ อิทฺธิการณํ วุทฺธิการณํ สพฺพสมฺปตฺติการณํ. อุตฺตมนฺติ วิสิฏฺฐํ ปวรํ สพฺพโลกหิตสุขาวหนฺติ อยํ คาถาย อนุปุพฺพปทวณฺณนา. त्यापैकी येथे 'उपपत्ती-देव' अभिप्रेत आहेत. मनूचे अपत्य म्हणून ते 'मनुष्य' होत. परंतु प्राचीन आचार्य म्हणतात की, मनाच्या प्रगल्भतेमुळे त्यांना 'मनुष्य' म्हटले जाते. ते जम्बुद्वीपवासी, अपरगोयानवासी, उत्तरकुरुवासी आणि पूर्वविदेहवासी अशा चार प्रकारचे असतात; येथे 'जम्बुद्वीपवासी' अभिप्रेत आहेत. 'मङ्गल' म्हणजे ज्यांच्याद्वारे प्राणी समृद्धीला पोहोचतात ते मङ्गल होय; म्हणजेच ते ऋद्धी आणि वृद्धीला प्राप्त होतात, असा याचा अर्थ आहे. 'अचिन्तयुं' म्हणजे विचार केला. 'आकङ्खमाना' म्हणजे इच्छा करणारे, आकांक्षा करणारे, उत्कंठा बाळगणारे. 'सोत्थानं' म्हणजे स्वस्ती-भाव (कल्याणकारी अवस्था); सर्व ऐहिक (दृष्टधार्मिक) आणि पारलौकिक (सांपरायिक) अशा शोभन, सुंदर व कल्याणकारी धर्मांचे अस्तित्व असणे, असा याचा अर्थ आहे. 'ब्रूहि' म्हणजे उपदेश करा, प्रकाशित करा, सांगा, उघडून दाखवा, विभागून स्पष्ट करा, प्रकट करा. 'मङ्गल' म्हणजे ऋद्धीचे कारण, वृद्धीचे कारण आणि सर्व संपत्तीचे कारण. 'उत्तम' म्हणजे विशिष्ट, श्रेष्ठ आणि सर्व जगाला हित व सुख देणारे. हे गाथेतील पदांचे अनुक्रमे केलेले स्पष्टीकरण आहे. อยํ ปน ปิณฺฑตฺโถ – โส เทวปุตฺโต ทสสหสฺสจกฺกวาเฬสุ เทวตา มงฺคลปญฺหํ โสตุกามตาย อิมสฺมึ จกฺกวาเฬ สนฺนิปติตฺวา เอกวาลคฺคโกฏิโอกาสมตฺเต ทสปิ วีสมฺปิ ตึสมฺปิ จตฺตาลีสมฺปิ ปญฺญาสมฺปิ สฏฺฐิปิ สตฺตติปิ อสีติปิ สุขุมตฺตภาเว นิมฺมินิตฺวา สพฺพเทวมารพฺรหฺมาโน สิริยา จ เตชสา จ อธิคฺคยฺห วิโรจมานํ ปญฺญตฺตวรพุทฺธาสเน นิสินฺนํ ภควนฺตํ ปริวาเรตฺวา ฐิตา ทิสฺวา ตสฺมิญฺจ สมเย อนาคตานมฺปิ สกลชมฺพุทีปกานํ มนุสฺสานํ เจตสา เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย สพฺพเทวมนุสฺสานํ วิจิกิจฺฉาสลฺลสมุทฺธรณตฺถํ อาห – हा एकत्रित अर्थ (पिंडार्थ) आहे - दहा हजार चक्रवाळांतील देव मङ्गलाचा प्रश्न ऐकण्याच्या इच्छेने या चक्रवाळात एकत्र आले होते. एका केसाच्या टोकाएवढ्या जागेत दहा, वीस, तीस, चाळीस, पन्नास, साठ, सत्तर किंवा ऐंशी देवांनी स्वतःचे शरीर सूक्ष्म करून स्थान मिळवले होते. सर्व देव, मार आणि ब्रह्मा यांना आपल्या वैभवाने व तेजाने मागे टाकून देदीप्यमान असणाऱ्या आणि मांडलेल्या श्रेष्ठ बुद्धासनावर बसलेल्या भगवंतांना वेढून उभे राहिलेल्या त्या देवांना पाहून, तसेच त्या वेळी तेथे उपस्थित नसलेल्या संपूर्ण जम्बुद्वीपातील मनुष्यांच्या मनातील विचार आपल्या चित्ताने जाणून, सर्व देव आणि मनुष्यांच्या संशयरूपी शल्याचे (काट्याचे) उच्चाटन करण्यासाठी तो देवपुत्र म्हणाला - ‘‘พหู เทวา มนุสฺสา จ, มงฺคลานิ อจินฺตยุํ; อากงฺขมานา โสตฺถานํ, พฺรูหิ มงฺคลมุตฺตม’’นฺติ. अनेक देव आणि मनुष्य स्वतःच्या कल्याणाची (सुखाची) आकांक्षा करत मंगळांचा विचार करत आले आहेत. (हे भगवन्!) आपण सर्वश्रेष्ठ मंगळ कोणते ते सांगावे. ตาสํ เทวตานํ อนุมติยา มนุสฺสานญฺจ อนุคฺคเหน มยา ปุฏฺโฐ สมาโน ยํ สพฺเพสเมว อมฺหากํ เอกนฺตหิตสุขาวหโต อุตฺตมํ มงฺคลํ, ตํ โน อนุกมฺปํ อุปาทาย พฺรูหิ ภควาติ. त्या देवांच्या इच्छेनुसार आणि मनुष्यांवर अनुग्रह करण्यासाठी माझ्याद्वारे विचारले गेलेले आपण, आम्हा सर्वांचे निश्चितपणे हित आणि सुख वाहून आणणारे जे सर्वश्रेष्ठ मंगळ आहे, ते मंगळ आम्हावर अनुकंपा करून सांगावे, हे भगवन्! อเสวนาจาติคาถาวณฺณนา 'असेवना च' इत्यादी गाथेचे स्पष्टीकरण (गाथावर्णना). ๓. เอวเมตํ เทวปุตฺตสฺส วจนํ สุตฺวา ภควา ‘‘อเสวนา จ พาลาน’’นฺติ คาถมาห. ตตฺถ อเสวนาติ อภชนา อปยิรุปาสนา. พาลานนฺติ พลนฺติ อสฺสสนฺตีติ พาลา, อสฺสสิตปสฺสสิตมตฺเตน ชีวนฺติ, น ปญฺญาชีวิเตนาติ อธิปฺปาโย. เตสํ พาลานํ. ปณฺฑิตานนฺติ ปณฺฑนฺตีติ ปณฺฑิตา, สนฺทิฏฺฐิกสมฺปรายิเกสุ อตฺเถสุ ญาณคติยา คจฺฉนฺตีติ อธิปฺปาโย. เตสํ ปณฺฑิตานํ. เสวนาติ ภชนา ปยิรุปาสนา ตํสหายตา ตํสมฺปวงฺกตา ตํสมงฺคิตา ปูชาติ สกฺการครุการมานนวนฺทนา. ปูชเนยฺยานนฺติ ปูชารหานํ. เอตํ มงฺคลมุตฺตมนฺติ ยา จ พาลานํ อเสวนา, ยา จ ปณฺฑิตานํ เสวนา, ยา จ ปูชเนยฺยานํ ปูชา, ตํ สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา อาห ‘‘เอตํ มงฺคลมุตฺตม’’นฺติ. ยํ ตยา ปุฏฺฐํ ‘‘พฺรูหิ มงฺคลมุตฺตม’’นฺติ, เอตฺถ ตาว เอตํ มงฺคลมุตฺตมนฺติ คณฺหาหีติ วุตฺตํ โหติ. อยเมติสฺสา คาถาย ปทวณฺณนา. ३. अशा प्रकारे त्या देवपुत्राचे हे बोलणे ऐकून भगवंतांनी 'असेवना च बालानं' ही गाथा म्हटली. त्या गाथेत 'असेवना' म्हणजे संगत न करणे, सेवा न करणे. 'बालानं' (मूर्ख) म्हणजे जे केवळ श्वासोच्छ्वासाने जगतात, प्रज्ञेच्या (ज्ञानाच्या) जीवनाने जगत नाहीत, असा अभिप्राय आहे. त्या मूर्खांची (संगत न करणे). 'पंडितानं' (बुद्धिमान) म्हणजे ज्यांच्याकडे ज्ञान आहे; जे इहलोकातील आणि परलोकातील हिताच्या गोष्टींकडे ज्ञानाच्या मार्गाने जातात, असा अभिप्राय आहे. त्या पंडितांची (संगत करणे). 'सेवना' म्हणजे संगत करणे, सेवा करणे, त्यांचे मित्र बनणे, त्यांच्याशी जवळीक साधणे आणि त्यांच्याशी एकरूप होणे. 'पूजा' म्हणजे सत्कार, आदर, सन्मान आणि वंदन करणे. 'पूजनेयानं' म्हणजे पूजेस पात्र असलेल्यांची (पूजा करणे). 'एतं मंगलमुत्तमं' म्हणजे मूर्खांची संगत न करणे, पंडितांची संगत करणे आणि पूजनीय व्यक्तींची पूजा करणे, या सर्वांना एकत्रित करून भगवंतांनी 'हेच सर्वश्रेष्ठ मंगळ आहे' असे म्हटले आहे. 'तू जे विचारले होतेस की सर्वश्रेष्ठ मंगळ सांगा, त्याविषयी हेच सर्वश्रेष्ठ मंगळ आहे असे तू ग्रहण कर' असे भगवंतांनी म्हटले आहे. हे या गाथेतील पदांचे स्पष्टीकरण (पदवर्णना) आहे. อตฺถวณฺณนา [Pg.105] ปนสฺสา เอวํ เวทิตพฺพา – เอวเมตํ เทวปุตฺตสฺส วจนํ สุตฺวา ภควา ‘‘อเสวนา จ พาลาน’’นฺติ อิมํ คาถมาห. ตตฺถ ยสฺมา จตุพฺพิธา คาถา ปุจฺฉิตคาถา, อปุจฺฉิตคาถา, สานุสนฺธิกคาถา, อนนุสนฺธิกคาถาติ. ตตฺถ ‘‘ปุจฺฉามิ ตํ, โคตม, ภูริปญฺญ, กถงฺกโร สาวโก สาธุ โหตี’’ติ (สุ. นิ. ๓๗๘) จ ‘‘กถํ นุ ตฺวํ, มาริส, โอฆมตรี’’ติ (สํ. นิ. ๑.๑) จ เอวมาทีสุ ปุจฺฉิเตน กถิตา ปุจฺฉิตคาถา. ‘‘ยํ ปเร สุขโต อาหุ, ตทริยา อาหุ ทุกฺขโต’’ติ เอวมาทีสุ (สุ. นิ. ๗๖๗) อปุจฺฉิเตน อตฺตชฺฌาสยวเสน กถิตา อปุจฺฉิตคาถา. สพฺพาปิ พุทฺธานํ คาถา ‘‘สนิทานาหํ, ภิกฺขเว, ธมฺมํ เทเสสฺสามี’’ติ (อ. นิ. ๓.๑๒๖; กถา. ๘๐๖) วจนโต สานุสนฺธิกคาถา. อนนุสนฺธิกคาถา อิมสฺมึ สาสเน นตฺถิ. เอวเมตาสุ คาถาสุ อยํ เทวปุตฺเตน ปุจฺฉิเตน ภควตา กถิตตฺตา ปุจฺฉิตคาถา. อยญฺจ ยถา เฉโก ปุริโส กุสโล มคฺคสฺส กุสโล อมคฺคสฺส มคฺคํ ปุฏฺโฐ ปฐมํ วิชหิตพฺพํ อาจิกฺขิตฺวา ปจฺฉา คเหตพฺพํ อาจิกฺขติ ‘‘อสุกสฺมึ นาม ฐาเน ทฺเวธาปโถ โหติ, ตตฺถ วามํ มุญฺจิตฺวา ทกฺขิณํ คณฺหถา’’ติ, เอวํ เสวิตพฺพาเสวิตพฺเพสุ อเสวิตพฺพํ อาจิกฺขิตฺวา เสวิตพฺพํ อาจิกฺขติ. ภควา จ มคฺคกุสลปุริสสทิโส. ยถาห – या गाथेचा अर्थाचा विस्तार (अर्थवर्णना) याप्रमाणे समजून घ्यावा – अशा प्रकारे त्या देवपुत्राचे हे बोलणे ऐकून भगवंतांनी 'असेवना च बालानं' ही गाथा म्हटली. तेथे गाथा चार प्रकारच्या असतात – पृच्छितगाथा (विचारलेली गाथा), अपृच्छितगाथा (न विचारलेली गाथा), सानुसंधिकगाथा (संदर्भयुक्त गाथा) आणि अननुसंधिकगाथा (संदर्भहीन गाथा). त्यापैकी, 'हे विपुल प्रज्ञा असलेले गौतम! मी आपल्याला विचारतो, कोणता आचार असलेला श्रावक चांगला होतो?' आणि 'हे महाशय, आपण ओघ (संसारपूर) कसा पार केला?' इत्यादींमध्ये विचारल्यामुळे जी गाथा म्हटली गेली, तिला 'पृच्छितगाथा' म्हणतात. 'ज्याला इतर लोक सुख म्हणतात, त्याला आर्य दुःख म्हणतात' इत्यादींमध्ये न विचारता स्वतःच्या इच्छेने (अध्याशयाने) जी गाथा म्हटली गेली, तिला 'अपृच्छितगाथा' म्हणतात. बुद्धांच्या सर्वच गाथा 'हे भिक्खूंनो, मी कारणासहित (सनिदान) धम्माचा उपदेश करीन' या वचनानुसार 'सानुसंधिकगाथा' आहेत. या बुद्ध शासनात अननुसंधिकगाथा नाहीच. अशा प्रकारे, या गाथांमध्ये ही गाथा देवपुत्राने विचारल्यामुळे भगवंतांनी म्हटली असल्याने ती 'पृच्छितगाथा' आहे. आणि हे कशासारखे आहे? जसा एखादा चतुर माणूस, जो योग्य मार्गाचा आणि अयोग्य मार्गाचा जाणकार आहे, त्याला मार्गाविषयी विचारले असता, तो आधी सोडायचा मार्ग सांगतो आणि नंतर स्वीकारायचा मार्ग सांगतो की, 'अमुक ठिकाणी दुहेरी रस्ता आहे, तेथे डावा रस्ता सोडून उजवा रस्ता धरा.' त्याचप्रमाणे, संगत करण्यायोग्य आणि संगत न करण्यायोग्य लोकांमध्ये, आधी संगत न करण्यायोग्य लोकांबद्दल सांगून नंतर संगत करण्यायोग्य लोकांबद्दल सांगितले जाते. आणि भगवंत हे मार्ग जाणणाऱ्या चतुर माणसासारखे आहेत. जसे म्हटले आहे – ‘‘ปุริโส มคฺคกุสโลติ โข, ติสฺส, ตถาคตสฺเสตํ อธิวจนํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. โส หิ กุสโล อิมสฺส โลกสฺส, กุสโล ปรสฺส โลกสฺส, กุสโล มจฺจุเธยฺยสฺส, กุสโล อมจฺจุเธยฺยสฺส, กุสโล มารเธยฺยสฺส, กุสโล อมารเธยฺยสฺสา’’ติ. 'हे तिस्स, मार्ग जाणणारा चतुर माणूस हे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागतांचेच नाव (अधिवाचन) आहे. कारण ते या इहलोकाचे जाणकार आहेत, परलोकाचे जाणकार आहेत, मृत्यूच्या क्षेत्राचे जाणकार आहेत, मृत्यू नसलेल्या क्षेत्राचे जाणकार आहेत, माराच्या क्षेत्राचे जाणकार आहेत आणि मार नसलेल्या क्षेत्राचे जाणकार आहेत.' ตสฺมา ปฐมํ อเสวิตพฺพํ อาจิกฺขนฺโต อาห – ‘‘อเสวนา จ พาลานํ, ปณฺฑิตานญฺจ เสวนา’’ติ. วิชหิตพฺพมคฺโค วิย หิ ปฐมํ พาลา น เสวิตพฺพา น ปยิรุปาสิตพฺพา, ตโต คเหตพฺพมคฺโค วิย ปณฺฑิตา เสวิตพฺพา ปยิรุปาสิตพฺพาติ. กสฺมา ปน ภควตา มงฺคลํ กเถนฺเตน ปฐมํ พาลานมเสวนา ปณฺฑิตานญฺจ เสวนา กถิตาติ? วุจฺจเต – ยสฺมา อิมํ ทิฏฺฐาทีสุ มงฺคลทิฏฺฐึ พาลเสวนาย เทวมนุสฺสา คณฺหึสุ, สา จ อมงฺคลํ, ตสฺมา เตสํ ตํ อิธโลกปรโลกตฺถภญฺชกํ อกลฺยาณมิตฺตสํสคฺคํ ครหนฺเตน อุภยโลกตฺถสาธกญฺจ กลฺยาณมิตฺตสํสคฺคํ [Pg.106] ปสํสนฺเตน ภควตา ปฐมํ พาลานมเสวนา ปณฺฑิตานญฺจ เสวนา กถิตาติ. म्हणून आधी संगत न करण्यायोग्य गोष्टींविषयी सांगताना भगवंतांनी म्हटले – 'मूर्खांची संगत न करणे आणि पंडितांची संगत करणे.' कारण सोडायच्या मार्गाप्रमाणे आधी मूर्खांची संगत करू नये, त्यांची सेवा करू नये; आणि नंतर स्वीकारायच्या मार्गाप्रमाणे पंडितांची संगत करावी, त्यांची सेवा करावी. पण भगवंतांनी मंगलाचा उपदेश करताना आधी मूर्खांची संगत न करणे आणि पंडितांची संगत करणे हे का सांगितले? उत्तर दिले जाते – कारण रूप पाहणे इत्यादी गोष्टींमध्ये जी 'मंगलाविषयीची चुकीची धारणा' (मंगलदृष्टी) देव आणि मनुष्यांनी स्वीकारली होती, ती मूर्खांच्या संगतीमुळेच स्वीकारली होती, आणि ती अमंगल होती. म्हणून, त्यांचा तो इहलोक आणि परलोकातील हिताचा नाश करणारा अमित्र-संसर्ग (वाईट मित्रांची संगत) निंद्य ठरवण्यासाठी आणि दोन्ही लोकांतील हित साधणारा कल्याणमित्र-संसर्ग (चांगल्या मित्रांची संगत) प्रशंसनीय ठरवण्यासाठी भगवंतांनी आधी मूर्खांची संगत न करणे आणि पंडितांची संगत करणे हे सांगितले. ตตฺถ พาลา นาม เย เกจิ ปาณาติปาตาทิอกุสลกมฺมปถสมนฺนาคตา สตฺตา, เต ตีหากาเรหิ ชานิตพฺพา. ยถาห ‘‘ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, พาลสฺส พาลลกฺขณานี’’ติ สุตฺตํ (อ. นิ. ๓.๓; ม. นิ. ๓.๒๔๖). อปิจ ปูรณกสฺสปาทโย ฉ สตฺถาโร, เทวทตฺตโกกาลิกกฏโมทกติสฺสขณฺฑเทวิยาปุตฺตสมุทฺททตฺตจิญฺจมาณวิกาทโย อตีตกาเล จ ทีฆวิทสฺส ภาตาติ อิเม อญฺเญ จ เอวรูปา สตฺตา พาลาติ เวทิตพฺพา. तेथे 'मूर्ख' (बाल) म्हणजे जे कोणी प्राणातिपात (जीवहिंसा) इत्यादी अकुशल कर्मपथांनी युक्त असलेले प्राणी आहेत. ते तीन लक्षणांनी ओळखावेत. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे – 'हे भिक्खूंनो, मूर्खांची ही तीन मूर्ख-लक्षणे आहेत...' (बाल सुत्त). शिवाय, पूरणकस्सप इत्यादी सहा शास्ते (गुरु), देवदत्त, कोकालिक, कटमोदकतिस्स, खंडदेवीचा पुत्र समुद्रदत्त, चिंचामाणविका इत्यादी आणि भूतकाळात दीर्घविनाचा भाऊ – हे आणि इतर अशाच प्रकारचे प्राणी 'मूर्ख' म्हणून जाणावेत. เต อคฺคิปทิตฺตมิว อคารํ อตฺตนา ทุคฺคหิเตน อตฺตานญฺเจว อตฺตโน วจนการเก จ วินาเสนฺติ. ยถา ทีฆวิทสฺส ภาตา จตุพุทฺธนฺตรํ สฏฺฐิโยชนมตฺเตน อตฺตภาเวน อุตฺตาโน ปติโต มหานิรเย ปจฺจติ, ยถา จ ตสฺส ทิฏฺฐึ อภิรุจนกานิ ปญฺจ กุลสตานิ ตสฺเสว สหพฺยตํ อุปปนฺนานิ มหานิรเย ปจฺจนฺติ. วุตฺตญฺเจตํ ภควตา – ते पेटलेल्या घराला लागलेल्या आगीप्रमाणे, स्वतःच्या चुकीच्या धारणेमुळे (दुग्गृहीत दृष्टीमुळे) स्वतःचा आणि स्वतःचे ऐकणाऱ्यांचा (वचन पाळणाऱ्यांचा) नाश करतात. जसा दीर्घविनाचा भाऊ चार बुद्धांच्या अंतरापर्यंत (काळापर्यंत) साठ योजन आकाराच्या शरीराने उताणा पडून महानरकात शिजत आहे, आणि जशी त्याच्या दृष्टीला पसंत करणारी पाचशे कुळे त्याच्याच संगतीला प्राप्त होऊन महानरकात शिजत आहेत. आणि हे भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, นฬาคารา วา ติณาคารา วา อคฺคิ มุตฺโต กูฏาคารานิปิ ฑหติ อุลฺลิตฺตาวลิตฺตานิ นิวาตานิ ผุสิตคฺคฬานิ ปิหิตวาตปานานิ, เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ยานิ กานิจิ ภยานิ อุปฺปชฺชนฺติ, สพฺพานิ ตานิ พาลโต อุปฺปชฺชนฺติ, โน ปณฺฑิตโต. เย เกจิ อุปทฺทวา อุปฺปชฺชนฺติ…เป… เย เกจิ อุปสคฺคา…เป… โน ปณฺฑิตโต. อิติ โข, ภิกฺขเว, สปฺปฏิภโย พาโล, อปฺปฏิภโย ปณฺฑิโต. สอุปทฺทโว พาโล, อนุปทฺทโว ปณฺฑิโต, สอุปสคฺโค พาโล, อนุปสคฺโค ปณฺฑิโต’’ติ (อ. นิ. ๓.๑). 'हे भिक्खूंनो, जसे वेळूच्या किंवा गवताच्या घराला लागलेली आग, आतून-बाहेरून लिंपलेल्या, वारा न येणाऱ्या, घट्ट कड्या-कुलपे लावलेल्या आणि खिडक्या बंद केलेल्या प्रासादांनाही (कूटगारांना) जाळून टाकते. तसेच, हे भिक्खूंनो, जी काही भये निर्माण होतात, ती सर्व मूर्खामुळे निर्माण होतात, पंडितामुळे नाही. जे काही उपद्रव निर्माण होतात... जे काही अडथळे निर्माण होतात... ते मूर्खामुळे निर्माण होतात, पंडितामुळे नाही. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, मूर्ख हा भययुक्त असतो, पंडित हा भयरहित असतो. मूर्ख हा उपद्रवयुक्त असतो, पंडित हा उपद्रवरहित असतो. मूर्ख हा अडथळ्यांनी युक्त असतो, पंडित हा अडथळारहित असतो.' อปิจ ปูติมจฺฉสทิโส พาโล, ปูติมจฺฉพนฺธปตฺตปุฏสทิโส โหติ ตทุปเสวี, ฉฑฺฑนียตํ ชิคุจฺฉนียตญฺจ ปาปุณาติ วิญฺญูนํ. วุตฺตญฺเจตํ – शिवाय, मूर्ख हा सडलेल्या माशासारखा असतो. त्याची संगत करणारा हा सडलेला मासा गुंडाळलेल्या पानासारखा होतो. तो सुज्ञांच्या त्यागाला आणि घृणेला पात्र ठरतो. आणि हे म्हटले आहे – ‘‘ปูติมจฺฉํ กุสคฺเคน, โย นโร อุปนยฺหติ; กุสาปิ ปูตี วายนฺติ, เอวํ พาลูปเสวนา’’ติ. (ชา. ๑.๑๕.๑๘๓; ๒.๒๒.๑๒๕๗); 'जो माणूस सडलेला मासा कुशाच्या (गवताच्या) टोकाने बांधतो, ते कुशा गवतही सडलेला वास देऊ लागते; अशीच मूर्खांची संगत असते.' อกิตฺติปณฺฑิโต จาปิ สกฺเกน เทวานมินฺเทน วเร ทิยฺยมาเน เอวมาห – अकित्ति पंडिताला देखील देवांचा राजा शक्राने वर दिला असता, त्याने असे म्हटले - ‘‘พาลํ [Pg.107] น ปสฺเส น สุเณ, น จ พาเลน สํวเส; พาเลนลฺลาปสลฺลาปํ, น กเร น จ โรจเย. “हे शक्रा! मी मूर्खाला पाहू नये, त्याचे ऐकू नये, मूर्खासोबत राहू नये. मूर्खासोबत संभाषण करू नये आणि त्याला पसंत करू नये.” ‘‘กินฺนุ เต อกรํ พาโล, วท กสฺสป การณํ; เกน กสฺสป พาลสฺส, ทสฺสนํ นาภิกงฺขสิ. “हे कश्यप! मूर्खाने तुमचे काय नुकसान केले आहे? कारण सांगा. हे कश्यप! तुम्ही मूर्खाचे दर्शन का इच्छित नाही?” ‘‘อนยํ นยติ ทุมฺเมโธ, อธุรายํ นิยุญฺชติ; ทุนฺนโย เสยฺยโส โหติ, สมฺมา วุตฺโต ปกุปฺปติ; วินยํ โส น ชานาติ, สาธุ ตสฺส อทสฺสน’’นฺติ. (ชา. ๑.๑๓.๙๐-๙๒); “हे शक्रा! मतिमंद मनुष्य अहितकारक मार्गाकडे नेतो, अयोग्य कार्यात नियुक्त करतो. त्याचे मार्गदर्शन वाईट असते आणि तो स्वतःला श्रेष्ठ समजतो. योग्य उपदेश केला असता तो संतापतो. तो शिस्त (विनय) जाणत नाही, म्हणून त्याचे दर्शन न होणेच श्रेयस्कर आहे.” เอวํ ภควา สพฺพากาเรน พาลูปเสวนํ ครหนฺโต ‘‘พาลานมเสวนา มงฺคล’’นฺติ วตฺวา อิทานิ ปณฺฑิตเสวนํ ปสํสนฺโต ‘‘ปณฺฑิตานญฺจ เสวนา มงฺคล’’นฺติ อาห. ตตฺถ ปณฺฑิตา นาม เย เกจิ ปาณาติปาตาเวรมณิอาทิทสกุสลกมฺมปถสมนฺนาคตา สตฺตา, เต ตีหากาเรหิ ชานิตพฺพา. ยถาห ‘‘ตีณิมานิ, ภิกฺขเว, ปณฺฑิตสฺส ปณฺฑิตลกฺขณานี’’ติ (อ. นิ. ๓.๓; ม. นิ. ๓.๒๕๓) สุตฺตํ. อปิจ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธอสีติมหาสาวกา อญฺเญ จ ตถาคตสฺส สาวกา สุเนตฺตมหาโควินฺทวิธุรสรภงฺคมโหสธสุตโสมนิมิราช- อโยฆรกุมารอกิตฺติปณฺฑิตาทโย จ ปณฺฑิตาติ เวทิตพฺพา. अशा प्रकारे भगवंतांनी सर्व प्रकारे मूर्खांच्या संगतीची निंदा करत “मूर्खांची संगती न करणे हे मंगल आहे” असे सांगून, आता पंडितांच्या संगतीची प्रशंसा करताना “पंडितांची संगती करणे हे मंगल आहे” असे म्हटले. तेथे ‘पंडित’ म्हणजे जे कोणी प्राणातिपातापासून अलिप्त राहणे इत्यादी दहा कुशल कर्मपथांनी युक्त असलेले प्राणी आहेत, त्यांना तीन लक्षणांवरून ओळखावे. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे - “हे भिक्खूंनो, पंडिताची ही तीन पंडित-लक्षणे आहेत” (अंगुत्तर निकाय सूत्त). तसेच बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध, ऐंशी महाश्रावक आणि तथागतांचे इतर श्रावक, तसेच सुनेत्त, महागोविंद, विधुर, सरभंग, महोसध, सुतसोम, निमिराज, अयोग्घरकुमार, अकित्ति पंडित इत्यादींना ‘पंडित’ समजावे. เต ภเย วิย รกฺขา อนฺธกาเร วิย ปทีโป ขุปฺปิปาสาทิทุกฺขาภิภเว วิย อนฺนปานาทิปฺปฏิลาโภ อตฺตโน วจนกรานํ สพฺพภยุปทฺทวูปสคฺควิทฺธํสนสมตฺถา โหนฺติ. ตถา หิ ตถาคตํ อาคมฺม อสงฺขฺเยยฺยา อปริมาณา เทวมนุสฺสา อาสวกฺขยํ ปตฺตา, พฺรหฺมโลเก ปติฏฺฐิตา, เทวโลเก ปติฏฺฐิตา, สุคติโลเก อุปฺปนฺนา, สาริปุตฺตตฺเถเร จิตฺตํ ปสาเทตฺวา จตูหิ จ ปจฺจเยหิ เถรํ อุปฏฺฐหิตฺวา อสีติ กุลสหสฺสานิ สคฺเค นิพฺพตฺตานิ. ตถา มหาโมคฺคลฺลานมหากสฺสปปฺปภุตีสุ สพฺพมหาสาวเกสุ, สุเนตฺตสฺส สตฺถุโน สาวกา อปฺเปกจฺเจ พฺรหฺมโลเก อุปฺปชฺชึสุ, อปฺเปกจฺเจ ปรนิมฺมิตวสวตฺตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ…เป… อปฺเปกจฺเจ คหปติมหาสาลานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – ते भीतीमध्ये रक्षकाप्रमाणे, अंधारात दिव्याप्रमाणे, आणि भूक-तहान इत्यादी दुःखांनी पीडित असताना अन्न-पाणी मिळण्याप्रमाणे, आपल्या वचनांचे पालन करणाऱ्यांचे सर्व भय, उपद्रव आणि संकटांचा नाश करण्यास समर्थ असतात. तसेच, तथागतांचा आश्रय घेऊन असंख्य आणि अपरिमित देव व मनुष्य आसवक्षयाला प्राप्त झाले, ब्रह्मलोकात प्रतिष्ठित झाले, देवलोकात प्रतिष्ठित झाले आणि सुगती लोकात उत्पन्न झाले. सारिपुत्त थेरांच्या ठिकाणी चित्त प्रसन्न करून आणि चार प्रत्ययांनी थेरांची सेवा करून ऐंशी हजार कुटुंबे स्वर्गात उत्पन्न झाली. त्याचप्रमाणे महामोग्गल्लान, महाकस्सप इत्यादी सर्व महाश्रावकांची सेवा करून (ऐंशी हजार कुटुंबे स्वर्गात उत्पन्न झाली). सुनेत्त शास्त्याचे काही श्रावक ब्रह्मलोकात उत्पन्न झाले, काही परनिर्मितवसवत्ती देवांच्या सहवासात...पे... काही महाशाल गृहपतींच्या सहवासात उत्पन्न झाले. हे असेही म्हटले आहे - ‘‘นตฺถิ, ภิกฺขเว, ปณฺฑิตโต ภยํ, นตฺถิ ปณฺฑิตโต อุปทฺทโว, นตฺถิ ปณฺฑิตโต อุปสคฺโค’’ติ (อ. นิ. ๓.๑). “हे भिक्खूंनो, पंडितापासून कोणतेही भय नसते, पंडितापासून कोणताही उपद्रव नसतो, पंडितापासून कोणतेही संकट नसते.” อปิจ [Pg.108] ตครมาลาทิคนฺธสทิโส ปณฺฑิโต, ตครมาลาทิคนฺธพนฺธปลิเวฐนปตฺตสทิโส โหติ ตทุปเสวี, ภาวนียตํ มนุญฺญตญฺจ อาปชฺชติ วิญฺญูนํ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – शिवाय, पंडित हा तगरपुष्पांच्या माळेसारख्या सुगंधी वस्तूंसारखा असतो. त्याची सेवा करणारा मनुष्य हा त्या सुगंधी तगरपुष्पांच्या माळेला गुंडाळणाऱ्या पानासारखा होतो, आणि तो सुज्ञांच्या आदरास व प्रेमास पात्र ठरतो. हे असेही म्हटले आहे - ‘‘ตครญฺจ ปลาเสน, โย นโร อุปนยฺหติ; ปตฺตาปิ สุรภี วายนฺติ, เอวํ ธีรูปเสวนา’’ติ. (อิติวุ. ๗๖; ชา. ๑.๑๕.๑๘๔; ๒.๒๒.๑๒๕๘); “जो मनुष्य पळसाच्या पानात तगरपुष्प बांधतो, ती पाने देखील सुगंधी होऊन सुवास पसरवतात; अशीच पंडितांची संगती असते.” อกิตฺติปณฺฑิโต จาปิ สกฺเกน เทวานมินฺเทน วเร ทิยฺยมาเน เอวมาห – अकित्ति पंडिताला देखील देवांचा राजा शक्राने वर दिला असता, त्याने असे म्हटले - ‘‘ธีรํ ปสฺเส สุเณ ธีรํ, ธีเรน สห สํวเส; ธีเรนลฺลาปสลฺลาปํ, ตํ กเร ตญฺจ โรจเย. “हे शक्रा! मी पंडिताला पाहावे, पंडिताचे ऐकावे, पंडितासोबत राहावे. पंडितासोबत संभाषण करावे आणि त्यालाच पसंत करावे.” ‘‘กินฺนุ เต อกรํ ธีโร, วท กสฺสป การณํ; เกน กสฺสป ธีรสฺส, ทสฺสนํ อภิกงฺขสิ. “हे कश्यप! पंडिताने तुमचे काय केले आहे? कारण सांगा. हे कश्यप! तुम्ही पंडिताचे दर्शन का इच्छिता?” ‘‘นยํ นยติ เมธาวี, อธุรายํ น ยุญฺชติ; สุนโย เสยฺยโส โหติ, สมฺมา วุตฺโต น กุปฺปติ; วินยํ โส ปชานาติ, สาธุ เตน สมาคโม’’ติ. (ชา. ๑.๑๓.๙๔-๙๖); “हे शक्रा! बुद्धिमान मनुष्य योग्य मार्गाकडे नेतो, अयोग्य कार्यात नियुक्त करत नाही. त्याचे मार्गदर्शन चांगले असते आणि तो उत्तरोत्तर प्रगती करतो. योग्य उपदेश केला असता तो संतापत नाही. तो शिस्त (विनय) जाणतो, म्हणून अशा पंडिताची संगती कल्याणकारी असते.” เอวํ ภควา สพฺพากาเรน ปณฺฑิตเสวนํ ปสํสนฺโต ‘‘ปณฺฑิตานํ เสวนา มงฺคล’’นฺติ วตฺวา อิทานิ ตาย พาลานํ อเสวนาย ปณฺฑิตานํ เสวนาย จ อนุปุพฺเพน ปูชเนยฺยภาวํ อุปคตานํ ปูชํ ปสํสนฺโต ‘‘ปูชา จ ปูชเนยฺยานํ มงฺคล’’นฺติ อาห. ตตฺถ ปูชเนยฺยา นาม สพฺพโทสวิรหิตตฺตา สพฺพคุณสมนฺนาคตตฺตา จ พุทฺธา ภควนฺโต, ตโต ปจฺฉา ปจฺเจกพุทฺธา, อริยสาวกา จ. เตสญฺหิ ปูชา อปฺปกาปิ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย โหติ, สุมนมาลาการมลฺลิกาทโย เจตฺถ นิทสฺสนํ. अशा प्रकारे भगवंतांनी सर्व प्रकारे पंडितांच्या संगतीची प्रशंसा करत “पंडितांची संगती करणे हे मंगल आहे” असे सांगून, आता मूर्खांच्या असंगतीने आणि पंडितांच्या संगतीने अनुक्रमे पूजनीय पदाला प्राप्त झालेल्यांच्या पूजेची प्रशंसा करताना “पूजनीयांची पूजा करणे हे मंगल आहे” असे म्हटले. तेथे ‘पूजनीय’ म्हणजे सर्व दोषांपासून मुक्त असल्यामुळे आणि सर्व गुणांनी संपन्न असल्यामुळे बुद्ध भगवंत, त्यानंतर प्रत्येकबुद्ध आणि आर्यश्रावक होत. कारण त्यांची केलेली थोडीशीही पूजा दीर्घकाळापर्यंत हित व सुखासाठी कारणीभूत ठरते, आणि सुमन मालाकार व मल्लिका इत्यादी या गोष्टीची उदाहरणे आहेत. ตตฺเถกํ นิทสฺสนมตฺตํ ภณาม – ภควา หิ เอกทิวสํ ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย ราชคหํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. อถ โข สุมนมาลากาโร รญฺโญ มาคธสฺส เสนิยสฺส พิมฺพิสารสฺส ปุปฺผานิ คเหตฺวา คจฺฉนฺโต อทฺทส ภควนฺตํ นครทฺวารมนุปฺปตฺตํ ปาสาทิกํ ปสาทนียํ ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขณาสีตานุพฺยญฺชนปฺปฏิมณฺฑิตํ พุทฺธสิริยา ชลนฺตํ, ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ ‘‘ราชา ปุปฺผานิ คเหตฺวา สตํ วา สหสฺสํ วา ทเทยฺย[Pg.109], ตญฺจ อิธโลกมตฺตเมว สุขํ ภเวยฺย, ภควโต ปน ปูชา อปฺปเมยฺยอสงฺขฺเยยฺยผลา ทีฆรตฺตํ หิตสุขาวหา โหติ, หนฺทาหํ อิเมหิ ปุปฺเผหิ ภควนฺตํ ปูเชมี’’ติ ปสนฺนจิตฺโต เอกํ ปุปฺผมุฏฺฐึ คเหตฺวา ภควโต ปฏิมุขํ ขิปิ, ปุปฺผานิ อากาเสน คนฺตฺวา ภควโต อุปริ มาลาวิตานํ หุตฺวา อฏฺฐํสุ. มาลากาโร ตมานุภาวํ ทิสฺวา ปสนฺนตรจิตฺโต ปุน เอกํ ปุปฺผมุฏฺฐึ ขิปิ, ตานิปิ คนฺตฺวา มาลากญฺจุโก หุตฺวา อฏฺฐํสุ. เอวํ อฏฺฐ ปุปฺผมุฏฺฐิโย ขิปิ, ตานิ คนฺตฺวา ปุปฺผกูฏาคารํ หุตฺวา อฏฺฐํสุ. त्यापैकी आम्ही एक उदाहरण सांगतो - एक दिवस सकाळी भगवंतांनी चिवर परिधान करून आणि पात्र-चिवर घेऊन राजगृहात पिंडपातासाठी प्रवेश केला. तेव्हा मगधचा राजा सेनीय बिंबिसार याच्यासाठी फुले घेऊन जाणारा सुमन मालाकार याने नगराच्या दारापाशी पोहोचलेल्या, अत्यंत प्रसन्न व शांत रूप असलेल्या, बत्तीस महापुरुष लक्षणे आणि ऐंशी अनुव्यंजनांनी सुशोभित असलेल्या, बुद्धतेजाने तळपणाऱ्या भगवंतांना पाहिले. त्यांना पाहून त्याच्या मनात असा विचार आला - “राजाने ही फुले घेतली तर तो मला शंभर किंवा हजार कार्षापण देईल, परंतु ते सुख केवळ याच लोकापुरते मर्यादित असेल. पण भगवंतांची पूजा केल्यास त्याचे अमर्याद व असंख्य फळ मिळेल, जे दीर्घकाळापर्यंत हित व सुख देणारे ठरेल. चला, मी या फुलांनी भगवंतांची पूजा करतो.” अशा प्रसन्न चित्ताने त्याने फुलांची एक मूठ घेतली आणि भगवंतांच्या दिशेने फेकली. ती फुले आकाशातून जाऊन भगवंतांच्या डोक्यावर फुलांचे चांदवे बनून राहिली. मालाकाराने हा प्रभाव पाहून अधिक प्रसन्न चित्ताने पुन्हा फुलांची एक मूठ फेकली, ती देखील जाऊन फुलांचे कवच बनून राहिली. अशा प्रकारे त्याने फुलांच्या आठ मुठी फेकल्या, त्या सर्व जाऊन फुलांचे कुटागार बनून राहिल्या. ภควา อนฺโตกูฏาคาเร อโหสิ, มหาชนกาโย สนฺนิปติ. ภควา มาลาการํ ปสฺสนฺโต สิตํ ปาตฺวากาสิ. อานนฺทตฺเถโร ‘‘น พุทฺธา อเหตู อปจฺจยา สิตํ ปาตุกโรนฺตี’’ติ สิตการณํ ปุจฺฉิ. ภควา อาห ‘‘เอโส, อานนฺท, มาลากาโร อิมิสฺสา ปูชาย อานุภาเวน สตสหสฺสกปฺเป เทเวสุ จ มนุสฺเสสุ จ สํสริตฺวา ปริโยสาเน สุมนิสฺสโร นาม ปจฺเจกพุทฺโธ ภวิสฺสตี’’ติ. วจนปริโยสาเน ธมฺมเทสนตฺถํ อิมํ คาถํ อภาสิ – भगवंत त्या फुलांच्या कुटागाराच्या आत होते, आणि मोठा जनसमुदाय तेथे गोळा झाला. भगवंतांनी मालाकाराकडे पाहत स्मितहास्य केले. थेर आनंदांनी “बुद्ध विनाकारण किंवा विनाहेतू स्मितहास्य करत नाहीत” असा विचार करून स्मितहास्याचे कारण विचारले. भगवंत म्हणाले, “हे आनंदा! हा मालाकार या पूजेच्या प्रभावाने एक लाख कल्प देवलोकात आणि मनुष्यलोकात संसरण करून, शेवटी सुमनिसर नावाचा प्रत्येकबुद्ध होईल.” संभाषणाच्या शेवटी धम्मदेशना करण्यासाठी त्यांनी ही गाथा म्हटली - ‘‘ตญฺจ กมฺมํ กตํ สาธุ, ยํ กตฺวา นานุตปฺปติ; ยสฺส ปตีโต สุมโน, วิปากํ ปฏิเสวตี’’ติ. (ธ. ป. ๖๘); “तेच कर्म केलेले चांगले, जे केल्यावर पश्चात्ताप होत नाही; आणि ज्या कर्माचे फळ मनुष्य प्रसन्न व आनंदित चित्ताने भोगतो.” คาถาวสาเน จตุราสีติยา ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. เอวํ อปฺปกาปิ เตสํ ปูชา ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขาย โหตีติ เวทิตพฺพา. สา จ อามิสปูชาว, โก ปน วาโท ปฏิปตฺติปูชาย? ยโต เย กุลปุตฺตา สรณคมนสิกฺขาปทปฺปฏิคฺคหเณน อุโปสถงฺคสมาทาเนน จตุปาริสุทฺธิสีลาทีหิ จ อตฺตโน คุเณหิ ภควนฺตํ ปูเชนฺติ, โก เตสํ ปูชาผลํ วณฺณยิสฺสติ? เต หิ ตถาคตํ ปรมาย ปูชาย ปูเชนฺตีติ วุตฺตา. ยถาห – गाथेच्या शेवटी चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना धम्माभिसमय (धर्माची प्राप्ती) झाला. अशा प्रकारे, त्या पूजनीय व्यक्तींची केलेली अल्पशी देखील पूजा दीर्घकाळापर्यंत हितासाठी व सुखासाठी होते, असे जाणावे. आणि ती तर केवळ आमिष-पूजा (भौतिक पूजा) आहे; मग प्रतिपत्ती-पूजेबद्दल (आचरण पूजेबद्दल) काय सांगावे? जे कुलपुत्र शरणगमन व शिक्षापदांचे ग्रहण करून, उपोसथ अंगांचे समादान करून आणि चतुपारिसुद्धिसील इत्यादी स्वतःच्या गुणांनी भगवंतांची पूजा करतात, त्यांच्या पूजेच्या फळाचे वर्णन कोण करू शकेल? कारण ते तथागतांची परम पूजेने पूजा करतात, असे म्हटले आहे. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘โย โข, อานนฺท, ภิกฺขุ วา ภิกฺขุนี วา อุปาสโก วา อุปาสิกา วา ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปนฺโน วิหรติ สามีจิปฺปฏิปนฺโน อนุธมฺมจารี, โส ตถาคตํ สกฺกโรติ ครุํ กโรติ มาเนติ ปูเชติ อปจิยติ ปรมาย ปูชายา’’ติ (ที. นิ. ๒.๑๙๙). “हे आनंदा! जो कोणी भिक्षू किंवा भिक्षुणी, किंवा उपासक किंवा उपासिका धम्मानुधम्म प्रतिपन्न (धर्माला अनुकूल आचरण करणारा) होऊन विहरतो, योग्य आचरण करतो आणि धम्मानुसार चालतो; तो तथागतांचा सत्कार करतो, आदर करतो, मान देतो आणि परम पूजेने त्यांची पूजा करतो.” เอเตนานุสาเรน ปจฺเจกพุทฺธอริยสาวกานมฺปิ ปูชาย หิตสุขาวหตา เวทิตพฺพา. याच नियमाने, प्रत्येकबुद्ध आणि आर्यश्रावकांची केलेली पूजा देखील हित आणि सुख प्राप्त करून देणारी ठरते, असे जाणावे. อปิจ [Pg.110] คหฏฺฐานํ กนิฏฺฐสฺส เชฏฺโฐ ภาตาปิ ภคินีปิ ปูชเนยฺยา, ปุตฺตสฺส มาตาปิตโร, กุลวธูนํ สามิกสสฺสุสสุราติ เอวเมตฺถ ปูชเนยฺยา เวทิตพฺพา. เอเตสมฺปิ หิ ปูชา กุสลธมฺมสงฺขาตตฺตา อายุอาทิวุฑฺฒิเหตุตฺตา จ มงฺคลเมว. วุตฺตญฺเหตํ – शिवाय, गृहस्थांमध्ये धाकट्या भावासाठी मोठा भाऊ आणि मोठी बहीण देखील पूजनीय आहेत; पुत्रासाठी माता-पिता पूजनीय आहेत; कुलवधूंसाठी पती, सासू आणि सासरे पूजनीय आहेत. अशा प्रकारे येथे पूजनीय व्यक्ती जाणाव्यात. कारण त्यांची पूजा करणे हा कुशलधम्म मानला गेल्यामुळे आणि आयुष्य इत्यादींच्या वृद्धीचे कारण असल्यामुळे ते मंगलच आहे. कारण असे म्हटले आहे – ‘‘เต มตฺเตยฺยา ภวิสฺสนฺติ เปตฺเตยฺยา สามญฺญา พฺรหฺมญฺญา กุเล เชฏฺฐาปจายิโน, อิทํ กุสลํ ธมฺมํ สมาทาย วตฺติสฺสนฺติ, เต เตสํ กุสลานํ ธมฺมานํ สมาทานเหตุ อายุนาปิ วฑฺฒิสฺสนฺติ, วณฺเณนปิ วฑฺฒิสฺสนฺตี’’ติอาทิ (ที. นิ. ๓.๑๐๕). “ते मातेचा आदर करणारे होतील, पित्याचा आदर करणारे होतील, श्रमणांचा आदर करणारे होतील, श्रेष्ठांचा आदर करणारे होतील, कुळातील ज्येष्ठांचा आदर करणारे होतील. या कुशल धम्माचे समादान करून ते आचरण करतील. त्या कुशल धम्मांच्या समादानाच्या कारणामुळे ते आयुष्याने देखील वाढतील आणि वर्णाने (सौंदर्याने) देखील वाढतील” इत्यादी भगवंतांनी सांगितले आहे. อิทานิ ยสฺมา ‘‘ยํ ยตฺถ มงฺคลํ. ววตฺถเปตฺวา ตํ ตสฺส, มงฺคลตฺตํ วิภาวเย’’ติ อิติ มาติกา นิกฺขิตฺตา, ตสฺมา อิทํ วุจฺจติ – เอวเมติสฺสา คาถาย พาลานํ อเสวนา, ปณฺฑิตานํ เสวนา, ปูชเนยฺยานญฺจ ปูชาติ ตีณิ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. ตตฺถ พาลานํ อเสวนา พาลเสวนปจฺจยภยาทิปริตฺตาเณน อุภยโลกตฺถเหตุตฺตา, ปณฺฑิตานํ เสวนา ปูชเนยฺยานํ ปูชา จ ตาสํ ผลวิภูติวณฺณนายํ วุตฺตนเยเนว นิพฺพานสุคติเหตุตฺตา มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพา. อิโต ปรํ ตุ มาติกํ อทสฺเสตฺวา เอว ยํ ยตฺถ มงฺคลํ, ตํ ววตฺถเปตฺวา ตสฺส มงฺคลตฺตํ วิภาวยิสฺสามาติ. आता ज्याअर्थी “जेथे जे मंगल आहे, त्याचे वर्गीकरण करून, त्याचे मंगलत्व स्पष्ट करावे” अशी मातृका मांडली आहे, म्हणून हे म्हटले जाते – अशा प्रकारे या गाथेत 'मूर्खांची संगत न करणे', 'पंडितांची संगत करणे' आणि 'पूजनीयांची पूजा करणे' अशी तीन मंगले सांगितली आहेत. त्यामध्ये, मूर्खांची संगत न करणे हे मूर्खांच्या संगतीमुळे निर्माण होणाऱ्या भयादींपासून रक्षण करणारे असल्यामुळे आणि दोन्ही लोकांच्या (इहलोक आणि परलोक) हिताचे कारण असल्यामुळे; तसेच पंडितांची संगत करणे आणि पूजनीयांची पूजा करणे हे त्यांच्या फळाच्या वैभवाचे वर्णन करताना सांगितलेल्या पद्धतीनेच निर्वाण आणि सुगतीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. यानंतर मात्र मातृका न दाखवताच, जेथे जे मंगल आहे, त्याचे वर्गीकरण करून त्याचे मंगलत्व आम्ही स्पष्ट करू. นิฏฺฐิตา อเสวนา จ พาลานนฺติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. ‘असेवना च बालानं’ या गाथेचे अर्थस्पष्टीकरण समाप्त झाले. ปติรูปเทสวาโสจาติคาถาวณฺณนา ‘पतिरूपदेसवासो च’ या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๔. เอวํ ภควา ‘‘พฺรูหิ มงฺคลมุตฺตม’’นฺติ เอกํ อชฺเฌสิโตปิ อปฺปํ ยาจิโต พหุทายโก อุฬารปุริโส วิย เอกาย คาถาย ตีณิ มงฺคลานิ วตฺวา ตโต อุตฺตริปิ เทวตานํ โสตุกามตาย มงฺคลานมตฺถิตาย เยสํ เยสํ ยํ ยํ อนุกุลํ, เต เต สตฺเต ตตฺถ ตตฺถ มงฺคเล นิโยเชตุกามตาย จ ‘‘ปติรูปเทสวาโส จา’’ติอาทีหิ คาถาหิ ปุนปิ อเนกานิ มงฺคลานิ วตฺตุมารทฺโธ. ตตฺถ ปฐมคาถาย ตาว ปติรูโปติ อนุจฺฉวิโก. เทโสติ คาโมปิ นิคโมปิ นครมฺปิ ชนปโทปิ โย โกจิ สตฺตานํ นิวาโส โอกาโส. วาโสติ ตตฺถ [Pg.111] นิวาโส. ปุพฺเพติ ปุรา อตีตาสุ ชาตีสุ. กตปุญฺญตาติ อุปจิตกุสลตา. อตฺตาติ จิตฺตํ วุจฺจติ สกโล วา อตฺตภาโว, สมฺมาปณิธีติ ตสฺส อตฺตโน สมฺมา ปณิธานํ นิยุญฺชนํ, ฐปนนฺติ วุตฺตํ โหติ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ. อยเมตฺถ ปทวณฺณนา. ४. अशा प्रकारे भगवंतांनी “उत्तम मंगल सांगा” अशी केवळ एकाच मंगलाची याचना केली असताना देखील, थोडी याचना केली असता पुष्कळ देणाऱ्या एखाद्या उदार पुरुषाप्रमाणे, एकाच गाथेने तीन मंगले सांगून, त्याहूनही पुढे देवतांच्या ऐकण्याच्या इच्छेमुळे, मंगलांचे अस्तित्व असल्यामुळे आणि ज्या ज्या प्राण्यांना जे जे अनुकूल आहे, त्या त्या प्राण्यांना त्या त्या मंगलामध्ये प्रवृत्त करण्याच्या इच्छेने “पतिरूपदेसवासो च” इत्यादी गाथांद्वारे पुन्हा अनेक मंगले सांगण्यास प्रारंभ केला. त्या पहिल्या गाथेत सर्वप्रथम 'पतिरूपो' म्हणजे योग्य किंवा अनुकूल. 'देसो' म्हणजे गाव, निगम (कस्बा), नगर किंवा जनपद, जे काही प्राण्यांचे निवासस्थान किंवा जागा आहे. 'वासो' म्हणजे तेथे राहणे. 'पुब्बे' म्हणजे पूर्वीच्या, भूतकाळातील जन्मांमध्ये. 'कतपुञ्ञता' म्हणजे साठवलेले कुशल कर्म. 'अत्ता' म्हणजे चित्त (मन) म्हटले जाते किंवा संपूर्ण आत्मभाव (शरीर व मन) याला 'अत्ता' म्हटले जाते. 'सम्मापणिधि' म्हणजे स्वतःला योग्य मार्गावर प्रवृत्त करणे, स्थिर करणे, असे अभिप्रेत आहे. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. हे येथील पदांचे स्पष्टीकरण आहे. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – ปติรูปเทสวาโส นาม ยตฺถ จตสฺโส ปริสา วิจรนฺติ, ทานาทีนิ ปุญฺญกิริยวตฺถูนิ วตฺตนฺติ, นวงฺคํ สตฺถุ สาสนํ ทิพฺพติ, ตตฺถ นิวาโส สตฺตานํ ปุญฺญกิริยาย ปจฺจยตฺตา มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. สีหฬทีปปวิฏฺฐเกวฏฺฏาทโย เจตฺถ นิทสฺสนํ. अर्थाचे स्पष्टीकरण याप्रमाणे जाणावे – 'पतिरूपदेसवासो' (अनुकूल देशात राहणे) म्हणजे जेथे चार परिषदा (भिक्षू, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका) वावरतात, दान इत्यादी पुण्यक्रियांचे प्रसंग घडतात आणि शास्त्यांचे (बुद्धांचे) नवअंगयुक्त शासन प्रकाशमान होते; अशा ठिकाणी राहणे हे प्राण्यांच्या पुण्यकर्माचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' म्हटले जाते. सिंहळद्वीपामध्ये (श्रीलंकेत) प्रवेश केलेले कोळी (केवट) इत्यादी याचे उदाहरण आहेत. อปโร นโย – ปติรูปเทสวาโส นาม ภควโต โพธิมณฺฑปฺปเทโส ธมฺมจกฺกวตฺติตปฺปเทโส ทฺวาทสโยชนาย ปริสาย มชฺเฌ สพฺพติตฺถิยมตํ ภินฺทิตฺวา ยมกปาฏิหาริยทสฺสิตกณฺฑมฺพ รุกฺขมูลปฺปเทโส เทโวโรหณปฺปเทโส, โย วา ปนญฺโญปิ สาวตฺถิราชคหาทิ พุทฺธาธิวาสปฺปเทโส, ตตฺถ นิวาโส สตฺตานํ ฉอนุตฺตริยปฺปฏิลาภปจฺจยโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. दुसरा अर्थ असा – 'पतिरूपदेसवासो' म्हणजे भगवंतांचे बोधिमंडळ, धम्मचक्रप्रवर्तन झालेली जागा, बारा योजन पसरलेल्या परिषदेच्या मध्ये सर्व तीर्थिकांच्या मतांचे खंडन करून यमकप्रातिहार्य दाखविलेले कण्डम्ब आंब्याच्या झाडाचे मूळ, देवोरोहण (स्वर्गातून अवतरण) झाली जागा, किंवा श्रावस्ती, राजगृह इत्यादी बुद्धांच्या वास्तव्याची इतर कोणतीही जागा; अशा ठिकाणी राहणे हे प्राण्यांना सहा अनुत्तरियांची (सर्वश्रेष्ठ गोष्टींची) प्राप्ती होण्याचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' म्हटले जाते. อปโร นโย (มหาว. ๒๕๙) – ปุรตฺถิมาย ทิสาย คชงฺคลํ นาม นิคโม, ตสฺส ปเรน มหาสาลา, ตโต ปรํ ปจฺจนฺติมา ชนปทา, โอรโต มชฺเฌ. ทกฺขิณปุรตฺถิมาย ทิสาย สลฺลวตี นาม นที, ตโต ปรํ ปจฺจนฺติมา ชนปทา, โอรโต มชฺเฌ. ทกฺขิณาย ทิสาย เสตกณฺณิกํ นาม นิคโม, ตโต ปรํ ปจฺจนฺติมา ชนปทา, โอรโต มชฺเฌ. ปจฺฉิมาย ทิสาย ถูณํ นาม พฺราหฺมณคาโม, ตโต ปรํ ปจฺจนฺติมา ชนปทา, โอรโต มชฺเฌ. อุตฺตราย ทิสาย อุสีรทฺธโช นาม ปพฺพโต, ตโต ปรํ ปจฺจนฺติมา ชนปทา, โอรโต มชฺเฌ. อยํ มชฺฌิมเทโส อายาเมน ตีณิ โยชนสตานิ, วิตฺถาเรน อฑฺฒเตยฺยานิ, ปริกฺเขเปน นว โยชนสตานิ โหนฺติ. เอโส ปติรูปเทโส นาม. आणखी एक अर्थ असा – पूर्व दिशेला 'गजंगल' नावाचा निगम आहे, त्याच्या पलीकडे महाशाल (मोठी साल वने) आहेत, त्याच्या पलीकडे प्रत्यंत (सीमावर्ती) जनपद आहेत आणि अलीकडे मध्यदेश आहे. आग्नेय दिशेला 'सल्लावती' नावाची नदी आहे, तिच्या पलीकडे प्रत्यंत जनपद आहेत आणि अलीकडे मध्यदेश आहे. दक्षिण दिशेला 'सेतकण्णिक' नावाचा निगम आहे, त्याच्या पलीकडे प्रत्यंत जनपद आहेत आणि अलीकडे मध्यदेश आहे. पश्चिम दिशेला 'थूण' नावाचे ब्राह्मण गाव आहे, त्याच्या पलीकडे प्रत्यंत जनपद आहेत आणि अलीकडे मध्यदेश आहे. उत्तर दिशेला 'उसीरद्धज' नावाचा पर्वत आहे, त्याच्या पलीकडे प्रत्यंत जनपद आहेत आणि अलीकडे मध्यदेश आहे. हा मध्यदेश लांबीने तीनशे योजने, रुंदीने अडीचशे (२५०) योजने आणि घेराने नऊशे योजने आहे. याला 'पतिरूपदेस' (अनुकूल देश) म्हटले जाते. เอตฺถ จตุนฺนํ มหาทีปานํ ทฺวิสหสฺสานํ ปริตฺตทีปานญฺจ อิสฺสริยาธิปจฺจการกา จกฺกวตฺตี อุปฺปชฺชนฺติ, เอกํ อสงฺขฺเยยฺยํ กปฺปสตสหสฺสญฺจ ปารมิโย ปูเรตฺวา สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานาทโย มหาสาวกา อุปฺปชฺชนฺติ, ทฺเว อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ ปารมิโย ปูเรตฺวา ปจฺเจกพุทฺธา, จตฺตาริ อฏฺฐ โสฬส วา อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ ปารมิโย ปูเรตฺวา [Pg.112] สมฺมาสมฺพุทฺธา อุปฺปชฺชนฺติ. ตตฺถ สตฺตา จกฺกวตฺติรญฺโญ โอวาทํ คเหตฺวา ปญฺจสุ สีเลสุ ปติฏฺฐาย สคฺคปรายณา โหนฺติ. ตถา ปจฺเจกพุทฺธานํ โอวาเท ปติฏฺฐาย, สมฺมาสมฺพุทฺธานํ ปน พุทฺธสาวกานํ โอวาเท ปติฏฺฐาย สคฺคปรายณา นิพฺพานปรายณา จ โหนฺติ. ตสฺมา ตตฺถ วาโส อิมาสํ สมฺปตฺตีนํ ปจฺจยโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. येथे (या मध्यदेशात) चार महाद्वीप आणि दोन हजार लहान बेटांवर ऐश्वर्य व अधिपत्य गाजवणारे चक्रवर्ती राजे उत्पन्न होतात; एक असंख्येय आणि एक लाख कल्पपर्यंत पारमिता पूर्ण करून सारिपुत्त, मोग्गल्लान इत्यादी महाश्रावक उत्पन्न होतात; दोन असंख्येय आणि एक लाख कल्पपर्यंत पारमिता पूर्ण करून प्रत्येकबुद्ध उत्पन्न होतात; किंवा चार, आठ, सोळा असंख्येय आणि एक लाख कल्पपर्यंत पारमिता पूर्ण करून सम्यक्संबुद्ध उत्पन्न होतात. तेथे प्राणी चक्रवर्ती राजाचा उपदेश ग्रहण करून, पंचशीलांमध्ये प्रतिष्ठित होऊन स्वर्गपरायण होतात. तसेच प्रत्येकबुद्धांच्या उपदेशात प्रतिष्ठित होऊन स्वर्गपरायण होतात; परंतु सम्यक्संबुद्धांच्या आणि त्यांच्या श्रावकांच्या उपदेशात प्रतिष्ठित होऊन ते स्वर्गपरायण आणि निर्वाणपरायण देखील होतात. म्हणून तेथे राहणे हे या सर्व समृद्धीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' म्हटले जाते. ปุพฺเพ กตปุญฺญตา นาม อตีตชาติยํ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธขีณาสเว อารพฺภ อุปจิตกุสลตา, สาปิ มงฺคลํ. กสฺมา? พุทฺธปจฺเจกพุทฺธสมฺมุขโต ทสฺเสตฺวา พุทฺธานํ พุทฺธสาวกานํ วา สมฺมุขา สุตาย จตุปฺปทิกายปิ คาถาย ปริโยสาเน อรหตฺตํ ปาเปตีติ กตฺวา. โย จ มนุสฺโส ปุพฺเพ กตาธิกาโร อุสฺสนฺนกุสลมูโล โหติ, โส เตเนว กุสลมูเลน วิปสฺสนํ อุปฺปาเทตฺวา อาสวกฺขยํ ปาปุณาติ ยถา ราชา มหากปฺปิโน อคฺคมเหสี จ. เตน วุตฺตํ ‘‘ปุพฺเพ จ กตปุญฺญตา มงฺคล’’นฺติ. ‘पूर्वकृतपुण्यता’ (पूर्वी केलेले पुण्य) म्हणजे मागील जन्मांमध्ये बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि क्षीणास्रव (अर्हत) यांना उद्देशून साठवलेले कुशल कर्म होय; ते देखील मंगल आहे. कशामुळे? कारण बुद्ध किंवा प्रत्येकबुद्धांच्या समक्ष दर्शन घेऊन, किंवा बुद्ध अथवा बुद्धश्रावकांच्या समक्ष ऐकलेल्या केवळ चार चरणांच्या गाथेच्या शेवटीही ते अर्हत्त्व प्राप्त करून देते. तसेच, ज्या मनुष्याने पूर्वी (संसारात) पुण्यकर्म केले आहे आणि ज्याचे कुशलमूळ प्रबळ आहे, तो त्याच कुशलमुळाच्या आधारे विपश्यना उत्पन्न करून आसवांचा क्षय (अर्हत्त्व) प्राप्त करतो; जसे की राजा महाकप्पिन आणि त्यांची अग्रमहिषी (अनोला) यांनी प्राप्त केले. म्हणूनच असे म्हटले आहे— ‘पूर्वी केलेले पुण्य हे मंगल आहे’. อตฺตสมฺมาปณิธิ นาม อิเธกจฺโจ อตฺตานํ ทุสฺสีลํ สีเล ปติฏฺฐาเปติ, อสฺสทฺธํ สทฺธาสมฺปทาย ปติฏฺฐาเปติ, มจฺฉรึ จาคสมฺปทาย ปติฏฺฐาเปติ. อยํ วุจฺจติ ‘‘อตฺตสมฺมาปณิธี’’ติ, เอโส จ มงฺคลํ. กสฺมา? ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกเวรปฺปหานวิวิธานิสํสาธิคมเหตุโตติ. ‘आत्मसम्यक्प्रणिधी’ (स्वतःला योग्य मार्गावर ठेवणे) म्हणजे या लोकात एखाद्या व्यक्तीने स्वतः दुःशील असताना स्वतःला शीलामध्ये प्रस्थापित करणे, अश्रद्ध असताना श्रद्धासंपदेमध्ये प्रस्थापित करणे आणि कृपण (कंजूष) असताना त्यागसंपदेमध्ये (उदारतेमध्ये) प्रस्थापित करणे होय. याला ‘आत्मसम्यक्प्रणिधी’ असे म्हटले जाते आणि हे देखील मंगल आहे. कशामुळे? कारण हे इहलोकातील व परलोकातील वैराचा नाश करण्याचे आणि विविध प्रकारच्या लाभांच्या प्राप्तीचे कारण आहे. เอวํ อิมิสฺสาปิ คาถาย ปติรูปเทสวาโส จ, ปุพฺเพ จ กตปุญฺญตา, อตฺตสมฺมาปณิธี จาติ ตีณิเยว มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे, या गाथेत देखील ‘योग्य देशात निवास करणे’, ‘पूर्वी केलेले पुण्य’ आणि ‘स्वतःला योग्य मार्गावर ठेवणे’ अशी तीनच मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา ปติรูปเทสวาโส จาติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. ‘प्रतिरूपदेशवासो च’ (योग्य देशात निवास करणे) या गाथेचे अर्थस्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) समाप्त झाले. พาหุสจฺจญฺจาติคาถาวณฺณนา ‘बाहुसच्चञ्च’ (बहुश्रुतपणा) या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๕. อิทานิ พาหุสจฺจญฺจาติ เอตฺถ พาหุสจฺจนฺติ พหุสฺสุตภาโว. สิปฺปนฺติ ยํ กิญฺจิ หตฺถโกสลฺลํ. วินโยติ กายวาจาจิตฺตวินยนํ. สุสิกฺขิโตติ สุฏฺฐุ สิกฺขิโต. สุภาสิตาติ สุฏฺฐุ ภาสิตา. ยาติ อนิยตนิทฺเทโส. วาจาติ คิรา พฺยปฺปโถ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ. อยเมตฺถ ปทวณฺณนา. ५. आता, ‘बाहुसच्चञ्च’ या गाथेत ‘बाहुसच्चं’ (बहुश्रुतपणा) म्हणजे बहुश्रुत असणे (पुष्कळ ऐकलेले किंवा शिकलेले असणे). ‘सिप्पं’ (शिल्प/कला) म्हणजे कोणतेही हस्तकौशल्याचे काम. ‘विनयो’ म्हणजे काय (शरीर), वाचा आणि चित्त यांचा संयम (शिस्त). ‘सुसिक्खितो’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे शिकलेला (प्रशिक्षित). ‘सुभासिता’ म्हणजे चांगल्या प्रकारे बोललेली. ‘या’ हा शब्द अनिश्चित निर्देश करणारा आहे. ‘वाचा’ म्हणजे वाणी किंवा उच्चारलेली भाषा. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. हे येथील पद-स्पष्टीकरण (पदवण्णना) होय. อตฺถวณฺณนา [Pg.113] ปน เอวํ เวทิตพฺพา – พาหุสจฺจํ นาม ยํ ตํ ‘‘สุตธโร โหติ สุตสนฺนิจโย’’ติ (ม. นิ. ๑.๓๓๙; อ. นิ. ๔.๒๒) จ ‘‘อิเธกจฺจสฺส พหุกํ สุตํ โหติ, สุตฺตํ เคยฺยํ เวยฺยากรณ’’นฺติ จ (อ. นิ. ๔.๖) เอวมาทินา นเยน สตฺถุสาสนธรตฺตํ วณฺณิตํ, ตํ อกุสลปฺปหานกุสลาธิคมเหตุโต อนุปุพฺเพน ปรมตฺถสจฺจสจฺฉิกิริยาเหตุโต จ มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – अर्थस्पष्टीकरण तर या प्रकारे जाणावे— ‘बाहुसच्चं’ (बहुश्रुतपणा) म्हणजे, “तो श्रुतधर (ऐकलेले लक्षात ठेवणारा) आणि श्रुतसंचयी (ज्ञानाचा संचय करणारा) असतो” आणि “या जगात एखाद्याचे पुष्कळ ऐकणे (ज्ञान) असते, जसे की सुत्त, गेय्य, वेय्याकरण” इत्यादी पद्धतीने शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनाला धारण करण्याचे जे वर्णन केले आहे, ते अकुशलाचा त्याग व कुशलाच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे आणि अनुक्रमे परमार्थ सत्याच्या साक्षात्काराचे कारण असल्यामुळे ‘मंगल’ म्हटले जाते. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे— ‘‘สุตวา จ โข, ภิกฺขเว, อริยสาวโก อกุสลํ ปชหติ, กุสลํ ภาเวติ, สาวชฺชํ ปชหติ, อนวชฺชํ ภาเวติ, สุทฺธมตฺตานํ ปริหรตี’’ติ (อ. นิ. ๗.๖๗). “भिक्खूंनो, बहुश्रुत असलेला आर्यश्रावक अकुशलाचा त्याग करतो, कुशलाची भावना करतो; सदोष गोष्टींचा त्याग करतो, निर्दोष गोष्टींची भावना करतो आणि स्वतःला शुद्ध ठेवून जीवन जगतो.” อปรมฺปิ วุตฺตํ – दुसरेही असे म्हटले आहे— ‘‘ธตานํ ธมฺมานํ อตฺถมุปปริกฺขติ, อตฺถํ อุปปริกฺขโต ธมฺมา นิชฺฌานํ ขมนฺติ, ธมฺมนิชฺฌานกฺขนฺติยา สติ ฉนฺโท ชายติ, ฉนฺทชาโต อุสฺสหติ, อุสฺสหนฺโต ตุลยติ, ตุลยนฺโต ปทหติ ปทหนฺโต กาเยน เจว ปรมตฺถสจฺจํ สจฺฉิกโรติ, ปญฺญาย จ อติวิชฺฌ ปสฺสตี’’ติ (ม. นิ. ๒.๔๓๒). “तो धारण केलेल्या धम्मांच्या अर्थाची परीक्षा करतो. अर्थाची परीक्षा करणाऱ्याला ते धम्म चिंतनास अनुकूल वाटतात (बुद्धीला पटतात). धम्माचे चिंतन करण्याची क्षमता निर्माण झाली असता छंद (इच्छा) उत्पन्न होतो. छंद उत्पन्न झालेला मनुष्य प्रयत्न करतो. प्रयत्न करणारा मनुष्य तोलून-मापून विचार करतो. विचार करणारा मनुष्य साधना करतो आणि साधना करणारा मनुष्य शरीराने परमार्थ सत्याचा साक्षात्कार करतो आणि प्रज्ञेने ते भेदून पाहतो.” อปิจ อคาริกพาหุสจฺจมฺปิ ยํ อนวชฺชํ, ตํ อุภยโลกหิตสุขาวหนโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. शिवाय, गृहस्थांचे बहुश्रुतपण देखील, जे निर्दोष आहे, ते दोन्ही लोकांत हित आणि सुख देणारे असल्यामुळे ‘मंगल’ आहे असे जाणावे. สิปฺปํ นาม อคาริกสิปฺปญฺจ อนคาริกสิปฺปญฺจ. ตตฺถ อคาริกสิปฺปํ นาม ยํ ปรูปโรธวิรหิตํ อกุสลวิวชฺชิตํ มณิการสุวณฺณการกมฺมาทิกํ, ตํ อิธโลกตฺถาวหนโต มงฺคลํ. อนคาริกสิปฺปํ นาม จีวรวิจารณสิพฺพนาทิสมณปริกฺขาราภิสงฺขรณํ, ยํ ตํ ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยานิ ตานิ สพฺรหฺมจารีนํ อุจฺจาวจานิ กึ กรณียานิ, ตตฺถ ทกฺโข โหตี’’ติอาทินา (ที. นิ. ๓.๓๔๕; ๓๖๐; อ. นิ. ๑๐.๑๗) นเยน ตตฺถ ตตฺถ สํวณฺณิตํ, ยํ ‘‘นาถกโร ธมฺโม’’ติ จ วุตฺตํ, ตํ อตฺตโน จ ปเรสญฺจ อุภยโลกหิตสุขาวหนโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. ‘शिल्प’ (कला/कौशल्य) म्हणजे गृहस्थांचे शिल्प आणि भिक्खूंचे शिल्प होय. त्यामध्ये, गृहस्थांचे शिल्प म्हणजे जे शिल्प दुसऱ्यांना पीडा न देणारे, अकुशलापासून मुक्त असलेले, जसे की मणिकार (रत्नपारखी), सुवर्णकार (सोनार) यांचे काम इत्यादी होय; ते या लोकात हितकारक असल्यामुळे ‘मंगल’ आहे. भिक्खूंचे शिल्प म्हणजे चीवर तयार करणे, शिवणे इत्यादी श्रमण-परिकारांची (साहित्याची) जुळवाजुळव व दुरुस्ती करणे होय; ज्याचे वर्णन “येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू आपल्या सब्रह्मचाऱ्यांच्या लहान-मोठ्या कामांमध्ये कुशल असतो” इत्यादी पद्धतीने त्या त्या ठिकाणी केले आहे, आणि ज्याला “नाथकरण धम्म” (संरक्षक धम्म) असेही म्हटले आहे; ते स्वतःसाठी आणि इतरांसाठी दोन्ही लोकांत हित आणि सुख देणारे असल्यामुळे ‘मंगल’ आहे असे जाणावे. วินโย นาม อคาริกวินโย จ อนคาริกวินโย จ. ตตฺถ อคาริกวินโย นาม ทสอกุสลกมฺมปถวิรมณํ, โส ตตฺถ สุสิกฺขิโต อสํกิเลสาปชฺชเนน อาจารคุณววตฺถาเนน จ อุภยโลกหิตสุขาวหนโต [Pg.114] มงฺคลํ. อนคาริกวินโย นาม สตฺตาปตฺติกฺขนฺธอนาปชฺชนํ, โสปิ วุตฺตนเยเนว สุสิกฺขิโต, จตุปาริสุทฺธิสีลํ วา อนคาริกวินโย, โส ยถา ตตฺถ ปติฏฺฐาย อรหตฺตํ ปาปุณาติ, เอวํ สิกฺขเนน สุสิกฺขิโต โลกิยโลกุตฺตรสุขาธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺโพ. ‘विनय’ (शिस्त) म्हणजे गृहस्थांचा विनय आणि भिक्खूंचा विनय होय. त्यामध्ये, गृहस्थांचा विनय म्हणजे दहा अकुशल कर्मपथांपासून अलिप्त राहणे; तो त्यामध्ये चांगल्या प्रकारे प्रशिक्षित झाला असता, क्लेशांना प्राप्त न झाल्यामुळे आणि आचारगुणांच्या प्रस्थापनेमुळे दोन्ही लोकांत हित आणि सुख देणारा असल्यामुळे ‘मंगल’ आहे. भिक्खूंचा विनय म्हणजे सात प्रकारच्या आपत्तींच्या समूहात (गुन्ह्यांत) न पडणे; तो देखील पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच चांगल्या प्रकारे आचरला असता मंगल आहे. किंवा चतुपारिसुद्धिशील (चार प्रकारची परिशुद्ध शिले) हा भिक्खूंचा विनय होय; भिक्खू ज्या प्रकारे त्यामध्ये प्रस्थापित होऊन अर्हत्त्व प्राप्त करतो, अशा आचरणाने चांगल्या प्रकारे आचरलेला हा विनय लौकिक आणि लोकोत्तर सुखाच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे ‘मंगल’ आहे असे जाणावे. สุภาสิตา วาจา นาม มุสาวาทาทิโทสวิรหิตา. ยถาห ‘‘จตูหิ, ภิกฺขเว, องฺเคหิ สมนฺนาคโต วาจา สุภาสิตา โหตี’’ติ (สุ. นิ. สุภาสิตสุตฺตํ). อสมฺผปฺปลาปา วาจา เอว วา สุภาสิตา. ยถาห – ‘सुभाषित वाचा’ (सुभाषित वाणी) म्हणजे असत्य (खोटे बोलणे) इत्यादी दोषांपासून मुक्त असलेली वाणी होय. जसे की म्हटले आहे— “भिक्खूंनो, चार अंगांनी युक्त असलेली वाणी सुभाषित असते.” किंवा निरर्थक बडबडीपासून मुक्त असलेली वाणीच सुभाषित होय. जसे की म्हटले आहे— ‘‘สุภาสิตํ อุตฺตมมาหุ สนฺโต,ธมฺมํ ภเณ นาธมฺมํ ตํ ทุติยํ; ปิยํ ภเณ นาปฺปิยํ ตํ ตติยํ,สจฺจํ ภเณ นาลิกํ ตํ จตุตฺถ’’นฺติ. (สุ. นิ. ๔๕๒); “सत्पुरुष सुभाषित वाणीला सर्वोत्तम म्हणतात; धम्माला धरून बोलावे, अधम्माचे बोलू नये—हे दुसरे अंग आहे; प्रिय बोलावे, अप्रिय बोलू नये—हे तिसरे अंग आहे; सत्य बोलावे, असत्य बोलू नये—हे चौथे अंग आहे.” อยมฺปิ อุภยโลกหิตสุขาวหนโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพา. ยสฺมา จ อยํ วินยปริยาปนฺนา เอว, ตสฺมา วินยคฺคหเณน เอตํ อสงฺคณฺหิตฺวา วินโย สงฺคเหตพฺโพ. อถ วา กึ อิมินา ปริสฺสเมน ปเรสํ ธมฺมเทสนาทิวาจา อิธ สุภาสิตา วาจาติ เวทิตพฺพา. สา หิ ยถา ปติรูปเทสวาโส, เอวํ สตฺตานํ อุภยโลกหิตสุขนิพฺพานาธิคมปจฺจยโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. อาห จ – ही देखील दोन्ही लोकांत हित आणि सुख देणारी असल्यामुळे ‘मंगल’ आहे असे जाणावे. आणि ज्या अर्थी ही (सुभाषित वाचा) विनयातच समाविष्ट आहे, म्हणून ‘विनय’ या शब्दाच्या ग्रहणाने हिला वेगळे न मोजता विनयातच समाविष्ट करावे. किंवा या परिश्रमाची काय गरज? इतरांना धम्मोपदेश इत्यादी करणारी वाणी येथे ‘सुभाषित वाचा’ म्हणून जाणावी. कारण ती, ज्या प्रकारे योग्य देशात निवास करणे मंगल आहे, त्याच प्रकारे प्राण्यांच्या दोन्ही लोकांत हित, सुख आणि निर्वाण प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे ‘मंगल’ म्हटले जाते. आणि म्हटले देखील आहे— ‘‘ยํ พุทฺโธ ภาสติ วาจํ, เขมํ นิพฺพานปตฺติยา; ทุกฺขสฺสนฺตกิริยาย, สา เว วาจานมุตฺตมา’’ติ. (สุ. นิ. ๔๕๖); “बुद्ध निर्वाण प्राप्तीसाठी आणि दुःखाचा अंत करण्यासाठी जी क्षेमकारक वाणी बोलतात, तीच खरोखर सर्व वाणींमध्ये सर्वोत्तम आहे.” เอวํ อิมิสฺสา คาถาย พาหุสจฺจํ, สิปฺปํ, วินโย สุสิกฺขิโต, สุภาสิตา วาจาติ จตฺตาริ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे, या गाथेत ‘बहुश्रुतपणा’, ‘शिल्प’ (कला), ‘चांगल्या प्रकारे आचरलेला विनय’ आणि ‘सुभाषित वाचा’ अशी चार मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา พาหุสจฺจญฺจาติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. ‘बाहुसच्चञ्च’ (बहुश्रुतपणा) या गाथेचे अर्थस्पष्टीकरण समाप्त झाले. มาตาปิตุอุปฏฺฐานนฺติคาถาวณฺณนา ‘मातापितुउपट्ठानं’ (माता-पित्यांची सेवा) या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๖. อิทานิ [Pg.115] มาตาปิตุอุปฏฺฐานนฺติ เอตฺถ มาตุ จ ปิตุ จาติ มาตาปิตุ. อุปฏฺฐานนฺติ อุปฏฺฐหนํ. ปุตฺตานญฺจ ทารานญฺจาติ ปุตฺตทารสฺส สงฺคณฺหนํ สงฺคโห. น อากุลา อนากุลา. กมฺมานิ เอว กมฺมนฺตา. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ อยํ ปทวณฺณนา. ६. आता, ‘मातापितुउपट्ठानं’ या गाथेत ‘मातापितु’ म्हणजे माता आणि पिता. ‘उपट्ठानं’ म्हणजे सेवा करणे (पालनपोषण करणे). ‘पुत्तदारस्स’ म्हणजे मुले आणि पत्नी यांचा सांभाळ करणे (पालनपोषण करणे). जे व्याकुळ (अडचणीचे किंवा गुंतागुंतीचे) नाही ते ‘अनाकुला’ (अनाकुल). कर्मे (कामे) म्हणजेच ‘कम्मन्ता’ (उद्योग/व्यवसाय). उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. हे पद-स्पष्टीकरण (पदवण्णना) होय. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – มาตา นาม ชนิกา วุจฺจติ, ตถา ปิตา. อุปฏฺฐานํ นาม ปาทโธวนสมฺพาหนุจฺฉาทนนฺหาปเนหิ จตุปจฺจยสมฺปทาเนน จ อุปการกรณํ. ตตฺถ ยสฺมา มาตาปิตโร พหูปการา ปุตฺตานํ อตฺถกามา อนุกมฺปกา, เย ปุตฺตเก พหิ กีฬิตฺวา ปํสุมกฺขิตสรีรเก อาคเต ทิสฺวา ปํสุํ ปุญฺฉิตฺวา มตฺถกํ อุปสิงฺฆายนฺตา ปริจุมฺพนฺตา จ สิเนหํ อุปฺปาเทนฺติ, วสฺสสตมฺปิ มาตาปิตโร สีเสน ปริหรนฺตา ปุตฺตา เตสํ ปติการํ กาตุํ อสมตฺถา. ยสฺมา จ เต อาปาทกา โปสกา อิมสฺส โลกสฺส ทสฺเสตาโร, พฺรหฺมสมฺมตา ปุพฺพาจริยสมฺมตา, ตสฺมา เตสํ อุปฏฺฐานํ อิธ ปสํสํ, เปจฺจ สคฺคสุขญฺจ อาวหติ. เตน มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – अर्थाचे स्पष्टीकरण याप्रमाणे जाणावे – जन्म देणाऱ्या स्त्रीला 'माता' म्हटले जाते आणि त्याचप्रमाणे जन्म देणाऱ्या पुरुषाला 'पिता' म्हटले जाते. सेवा-शुश्रूषा (उपठ्ठान) म्हणजे पाय धुणे, अंग रगडणे, उटणे लावणे, आंघोळ घालणे आणि चार प्रत्यय (चतुपच्चय) प्रदान करून साहाय्य करणे होय. त्यामध्ये, कारण माता-पिता हे मुलांचे मोठे उपकारकर्ते, त्यांचे कल्याण इच्छिणारे आणि त्यांच्यावर अनुकंपा करणारे असतात; जेव्हा लहान मुले बाहेर खेळून धुळीने माखलेल्या शरीराने घरी येतात, तेव्हा त्यांना पाहून, त्यांची धूळ पुसून, त्यांच्या डोक्याचा मुका घेऊन आणि त्यांचे चुंबन घेऊन ते त्यांच्यावर प्रेम करतात. शंभर वर्षे जरी मुलांनी आपल्या माता-पित्यांना डोक्यावर वाहून नेले, तरी ते त्यांच्या उपकारांची परतफेड करण्यास असमर्थ ठरतात. आणि कारण ते (माता-पिता) जन्मदाते, पालनपोषण करणारे, या जगाची ओळख करून देणारे, 'ब्रह्मा' समान मानलेले आणि 'प्रथम आचार्य' मानलेले आहेत, म्हणून त्यांची सेवा-शुश्रूषा करणे या लोकात प्रशंसा मिळवून देते आणि परलोकात स्वर्गसुख प्रदान करते. म्हणून याला 'मंगल' असे म्हटले जाते. भगवंतांनी याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘พฺรหฺมาติ มาตาปิตโร, ปุพฺพาจริยาติ วุจฺจเร; อาหุเนยฺยา จ ปุตฺตานํ, ปชาย อนุกมฺปกา. “माता-पित्यांना 'ब्रह्मा' म्हटले जाते आणि त्यांना 'प्रथम आचार्य' देखील म्हटले जाते. ते मुलांचे पूजनीय (आहुनेय्य) आहेत, कारण ते आपल्या अपत्यांवर अनुकंपा करणारे असतात. ‘‘ตสฺมา หิ เน นมสฺเสยฺย, สกฺกเรยฺย จ ปณฺฑิโต; อนฺเนน อถ ปาเนน, วตฺเถน สยเนน จ; อุจฺฉาทเนน นฺหาปเนน, ปาทานํ โธวเนน จ. म्हणूनच, सुज्ञ माणसाने त्यांची वंदना करावी आणि त्यांचा आदर-सत्कार करावा; त्यांना अन्न, पेय, वस्त्र आणि शय्या (बिछाना) देऊन, तसेच उटणे लावून, आंघोळ घालून आणि त्यांचे पाय धुवून त्यांची सेवा करावी. ‘‘ตาย นํ ปาริจริยาย, มาตาปิตูสุ ปณฺฑิตา; อิเธว นํ ปสํสนฺติ, เปจฺจ สคฺเค ปโมทตี’’ติ. (อิติวุ. ๑๐๖; ชา. ๒.๒๐.๑๘๑-๑๘๓); माता-पित्यांच्या अशा सेवेमुळे, सुज्ञ लोक याच जन्मात त्या मुलाची प्रशंसा करतात आणि मृत्यूनंतर तो स्वर्गात आनंदित होतो.” อปโร นโย – อุปฏฺฐานํ นาม ภรณกิจฺจกรณกุลวํสฏฺฐปนาทิปญฺจวิธํ, ตํ ปาปนิวารณาทิปญฺจวิธทิฏฺฐธมฺมิกหิตสุขเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – दुसरा प्रकार असा आहे – सेवा-शुश्रूषा म्हणजे पालनपोषण करणे, त्यांचे कार्य करणे, कुळपरंपरा टिकवून ठेवणे इत्यादी पाच प्रकारची कर्तव्ये होय. ती सेवा, पापापासून परावृत्त करणे इत्यादी पाच प्रकारच्या ऐहिक हित आणि सुखाचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. भगवंतांनी याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ ปุตฺเตน ปุรตฺถิมา ทิสา มาตาปิตโร ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา ภโต เน ภริสฺสามิ, กิจฺจํ เนสํ กริสฺสามิ[Pg.116], กุลวํสํ ฐเปสฺสามิ, ทายชฺชํ ปฏิปชฺชิสฺสามิ, อถ วา ปน เปตานํ กาลกตานํ ทกฺขิณํ อนุปฺปทสฺสามี’ติ. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ ปุตฺเตน ปุรตฺถิมา ทิสา มาตาปิตโร ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ ปุตฺตํ อนุกมฺปนฺติ, ปาปา นิวาเรนฺติ, กลฺยาเณ นิเวเสนฺติ, สิปฺปํ สิกฺขาเปนฺติ, ปติรูเปน ทาเรน สํโยเชนฺติ, สมเย ทายชฺชํ นิยฺยาเทนฺตี’’ติ (ที. นิ. ๓.๒๖๗). “'हे गृहपतीपुत्रा! पाच कारणांनी मुलाने पूर्व दिशा मानल्या गेलेल्या माता-पित्यांची सेवा केली पाहिजे: १) त्यांनी माझे पालनपोषण केले, म्हणून मी त्यांचे पालनपोषण करीन, २) मी त्यांची कामे करीन, ३) मी कुळपरंपरा टिकवून ठेवीन, ४) मी वारसा हक्काने मिळालेल्या संपत्तीचे रक्षण करीन, आणि ५) मृत्यूनंतर परलोकात गेलेल्या माता-पित्यांच्या उद्देशाने दानधर्म (दक्षिणा) करीन.' हे गृहपतीपुत्रा! या पाच कारणांनी मुलाने पूर्व दिशा असलेल्या माता-पित्यांची सेवा केली असता, माता-पिता देखील पाच कारणांनी मुलावर अनुकंपा करतात: १) पापापासून परावृत्त करतात, २) कल्याणाच्या कार्यात प्रवृत्त करतात, ३) कला-कौशल्य (शिक्षण) शिकवतात, ४) योग्य जोडीदाराशी विवाह करून देतात, आणि ५) योग्य वेळी वारसाहक्क (संपत्ती) सोपवतात.” อปิจ โย มาตาปิตโร ตีสุ วตฺถูสุ ปสาทุปฺปาทเนน, สีลสมาทาปเนน, ปพฺพชฺชาย วา อุปฏฺฐหติ, อยํ มาตาปิตุอุปฏฺฐากานํ อคฺโค. ตสฺส ตํ มาตาปิตุอุปฏฺฐานํ มาตาปิตูหิ กตสฺส อุปการสฺส ปจฺจุปการภูตํ อเนเกสํ ทิฏฺฐธมฺมิกานํ สมฺปรายิกานญฺจ อตฺถานํ ปทฏฺฐานโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. शिवाय, जो कोणी आपल्या माता-पित्यांना त्रिरत्नांवर श्रद्धा निर्माण करून, शील ग्रहण करायला लावून किंवा प्रव्रज्या (दीक्षा) मिळवून देऊन त्यांची सेवा करतो, ही सेवा माता-पित्यांची सेवा करणाऱ्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ असते. त्या मुलाची ती माता-पित्यांची सेवा म्हणजे माता-पित्यांनी केलेल्या उपकारांची परतफेड (प्रत्युपकार) ठरेल आणि अनेक ऐहिक व पारलौकिक कल्याणाचे मुख्य कारण असल्यामुळे तिला 'मंगल' असे म्हटले जाते. ปุตฺตทารสฺสาติ เอตฺถ อตฺตโต ชาตา ปุตฺตาปิ ธีตโรปิ ปุตฺตาอิจฺเจว สงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ. ทาราติ วีสติยา ภริยานํ ยา กาจิ ภริยา. ปุตฺตา จ ทารา จ ปุตฺตทารํ, ตสฺส ปุตฺตทารสฺส. สงฺคโหติ สมฺมานนาทีหิ อุปการกรณํ. ตํ สุสํวิหิตกมฺมนฺตตาทิทิฏฺฐธมฺมิกหิตสุขเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – ‘‘ปจฺฉิมา ทิสา ปุตฺตทารา เวทิตพฺพา’’ติ เอตฺถ อุทฺทิฏฺฐํ ปุตฺตทารํ ภริยาสทฺเทน สงฺคณฺหิตฺวา ‘‘ปญฺจหิ โข, คหปติปุตฺต, ฐาเนหิ สามิเกน ปจฺฉิมา ทิสา ภริยา ปจฺจุปฏฺฐาตพฺพา สมฺมานนาย, อนวมานนาย, อนติ จริยาย, อิสฺสริยโวสฺสคฺเคน, อลงฺการานุปฺปทาเนน. อิเมหิ โข, คหปติปุตฺต, ปญฺจหิ ฐาเนหิ สามิเกน ปจฺฉิมา ทิสา ภริยา ปจฺจุปฏฺฐิตา ปญฺจหิ ฐาเนหิ สามิกํ อนุกมฺปติ, สุสํวิหิตกมฺมนฺตา จ โหติ, สงฺคหิตปริชนา จ, อนติจารินี จ, สมฺภตญฺจ อนุรกฺขติ ทกฺขา จ โหติ อนลสา สพฺพกิจฺเจสู’’ติ (ที. นิ. ๓.๒๖๙). 'पुत्तدارस्स' (पुत्र आणि पत्नी) या पदात स्वतःपासून जन्मलेले पुत्र आणि कन्या देखील 'पुत्र' या संज्ञेत समाविष्ट होतात. 'दारा' म्हणजे वीस प्रकारच्या पत्नींपैकी कोणतीही एक पत्नी. पुत्र आणि पत्नी मिळून 'पुत्तदार' (पुत्र-पत्नी) बनते, त्या पुत्र-पत्नीचे. 'संगहो' (साहाय्य) म्हणजे आदर-सन्मान इत्यादींद्वारे साहाय्य करणे होय. ते साहाय्य, योग्य प्रकारे कामे पार पाडणे इत्यादी ऐहिक हित आणि सुखाचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. भगवंतांनी याविषयी असे म्हटले आहे – “पश्चिम दिशा म्हणजे पुत्र आणि पत्नी असे जाणावे.” येथे उल्लेखिलेल्या 'पुत्र-पत्नी' या शब्दातील 'पत्नी' या शब्दाचा अर्थ घेऊन – “हे गृहपतीपुत्रा! पाच कारणांनी पतीने पश्चिम दिशा असलेल्या पत्नीची काळजी घेतली पाहिजे: १) तिचा सन्मान करून, २) तिचा अनादर न करून, ३) तिच्याशी एकनिष्ठ राहून, ४) घराचे अधिकार तिच्याकडे सोपवून, आणि ५) तिला अलंकार देऊन. या पाच कारणांनी पतीने पश्चिम दिशा असलेल्या पत्नीची काळजी घेतली असता, पत्नी देखील पाच कारणांनी पतीवर अनुकंपा करते: १) ती आपली कामे उत्तम प्रकारे पार पाडते, २) कुटुंबियांचा व नोकरचाकरांचा चांगला सायबाळ करते, ३) पतीशी एकनिष्ठ राहते, ४) पतीने कमावलेल्या संपत्तीचे रक्षण करते, आणि ५) सर्व कामांमध्ये आळस न करता चतुर व कुशल असते.” อยํ วา อปโร นโย – สงฺคโหติ ธมฺมิกาหิ ทานปิยวาจาตฺถจริยาหิ สงฺคณฺหนํ. เสยฺยถิทํ – อุโปสถทิวเสสุ ปริพฺพยทานํ, นกฺขตฺตทิวเสสุ นกฺขตฺตทสฺสาปนํ, มงฺคลทิวเสสุ มงฺคลกรณํ, ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิเกสุ อตฺเถสุ โอวาทานุสาสนนฺติ. ตํ วุตฺตนเยเนว ทิฏฺฐธมฺมิกหิตเหตุโต สมฺปรายิกหิตเหตุโต เทวตาหิปิ นมสฺสนียภาวเหตุโต จ มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. ยถาห สกฺโก เทวานมินฺโท – किंवा हा दुसरा प्रकार आहे – 'संग्रह' (साहाय्य) म्हणजे धार्मिक मार्गाने दान देणे, प्रिय बोलणे आणि परोपकार करणे यांद्वारे साहाय्य करणे होय. जसे की – उपोसथ दिवशी अन्न-सामग्री देणे, उत्सवाच्या दिवशी उत्सव पाहण्याची सोय करणे, मंगल प्रसंगी मंगल कार्य करणे, आणि ऐहिक व पारलौकिक कल्याणासाठी उपदेश व मार्गदर्शन करणे. तो संग्रह (साहाय्य), पूर्वोक्त पद्धतीनेच ऐहिक कल्याणाचे कारण असल्यामुळे, पारलौकिक कल्याणाचे कारण असल्यामुळे आणि देवतांद्वारे देखील वंदनीय ठरत असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. जसे की देवांचा राजा शक्राने म्हटले आहे – ‘‘เย [Pg.117] คหฏฺฐา ปุญฺญกรา, สีลวนฺโต อุปาสกา; ธมฺเมน ทารํ โปเสนฺติ, เต นมสฺสามิ มาตลี’’ติ. (สํ.นิ.๑.๑.๒๖๔); “हे मातली! जे गृहस्थ पुण्यकर्म करणारे, शीलवान आणि उपासक आहेत, जे धार्मिक मार्गाने आपल्या पत्नीचे (कुटुंबाचे) पालनपोषण करतात, त्यांना मी वंदन करतो.” อนากุลา กมฺมนฺตา นาม กาลญฺญุตาย ปติรูปการิตาย อนลสตาย อุฏฺฐานวีริยสมฺปทาย, อพฺยสนียตาย จ กาลาติกฺกมนอปฺปติรูปกรณสิถิลกรณาทิอากุลภาววิรหิตา กสิโครกฺขวาณิชฺชาทโย กมฺมนฺตา. เอเต อตฺตโน วา ปุตฺตทารสฺส วา ทาสกมฺมกรานํ วา พฺยตฺตตาย เอวํ ปโยชิตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ธนธญฺญวุทฺธิปฏิลาภเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจนฺติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – 'अनाकुला कम्मन्ता' (व्याकुळता नसलेले उद्योग) म्हणजे काळाचे भान ठेवून, योग्य प्रकारे काम करण्याची सवय ठेवून, आळस न करता, उद्योगी व प्रयत्नशील राहून आणि व्यसनाधीन न होता; वेळ निघून गेल्यावर काम करणे, अयोग्य काम करणे, ढिलेपणाने काम करणे इत्यादी व्याकुळतेने विरहित असलेले शेती, गोपालन, व्यापार इत्यादी उद्योग होय. हे उद्योग स्वतःच्या, किंवा पुत्र-पत्नीच्या, किंवा दास-कामगारांच्या कौशल्यामुळे अशा प्रकारे योजिले असता, याच जन्मात धनधान्याची वृद्धी आणि प्राप्तीचे कारण ठरत असल्यामुळे त्यांना 'मंगल' म्हटले जाते. भगवंतांनी याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘ปติรูปการี ธุรวา, อุฏฺฐาตา วินฺทเต ธน’’นฺติ จ (สุ. นิ. ๑๘๕; สํ. นิ. ๑.๒๔๖). “योग्य काम करणारा, बुद्धिमान आणि उद्योगी मनुष्य धन प्राप्त करतो.” ‘‘น ทิวา โสปฺปสีเลน, รตฺติมุฏฺฐานเทสฺสินา; นิจฺจํ มตฺเตน โสณฺเฑน, สกฺกา อาวสิตุํ ฆรํ. “दिवसा झोपण्याची सवय असलेला, रात्री उठण्याचा कंटाळा करणारा, नेहमी मद्यधुंद राहणारा आणि व्यसनी असलेला मनुष्य गृहस्थाश्रम चालवण्यास समर्थ नसतो. ‘‘อติสีตํ อติอุณฺหํ, อติสายมิทํ อหุ; อิติ วิสฺสฏฺฐกมฺมนฺเต, อตฺถา อจฺเจนฺติ มาณเว. 'खूप थंडी आहे, खूप उष्णता आहे, आता खूप संध्याकाळ झाली आहे' असे म्हणून जो तरुण आपले काम सोडून देतो, त्याचे हित (संधी) निघून जाते. ‘‘โยธ สีตญฺจ อุณฺหญฺจ, ติณา ภิยฺโย น มญฺญติ; กรํ ปุริสกิจฺจานิ, โส สุขํ น วิหายตี’’ติ. (ที. นิ. ๓.๒๕๓); परंतु जो मनुष्य थंडी आणि उष्णतेला गवताच्या काडीपेक्षा अधिक मानत नाही आणि आपली कर्तव्ये पार पाडतो, तो सुखापासून कधीही वंचित होत नाही.” ‘‘โภเค สํหรมานสฺส, ภมรสฺเสว อิรียโต; โภคา สนฺนิจยํ ยนฺติ, วมฺมิโกวูปจียตี’’ติ. จ เอวมาทิ (ที. นิ. ๓.๒๖๕); “फुलांमधून मध गोळा करणाऱ्या मधमाशीप्रमाणे संपत्ती गोळा करणाऱ्या माणसाची संपत्ती वाढत जाते, जसे मुंग्यांचे वारूळ हळूहळू वाढत जाते.” इत्यादी उपदेश केले आहेत. เอวํ อิมิสฺสา คาถาย มาตุอุปฏฺฐานํ, ปิตุอุปฏฺฐานํ, ปุตฺตทารสฺส สงฺคโห, อนากุลา จ กมฺมนฺตาติ จตฺตาริ มงฺคลานิ วุตฺตานิ, ปุตฺตทารสฺส สงฺคหํ วา ทฺวิธา กตฺวา ปญฺจ, มาตาปิตุอุปฏฺฐานํ วา เอกเมว กตฺวา ตีณิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. याप्रमाणे, या गाथेमध्ये मातेची सेवा, पित्याची सेवा, पुत्र आणि पत्नीचे साहाय्य, आणि व्याकुळता नसलेले उद्योग अशी चार मंगले सांगितली आहेत; किंवा 'पुत्तدارस्स' या पदाचे दोन भाग करून पाच मंगले सांगितली आहेत; किंवा 'मातापितुउपठ्ठानं' हे पद एकच मानून तीन मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา มาตาปิตุอุปฏฺฐานนฺติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'मातापितुउपठ्ठानं' या गाथेचे अर्थाचे स्पष्टीकरण समाप्त झाले. ทานญฺจาติคาถาวณฺณนา 'दानञ्च' (दान आणि) या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๗. อิทานิ ทานญฺจาติ เอตฺถ ทียเต อิมินาติ ทานํ, อตฺตโน สนฺตกํ ปรสฺส ปฏิปาทียตีติ วุตฺตํ โหติ. ธมฺมสฺส จริยา, ธมฺมา วา อนเปตา จริยา [Pg.118] ธมฺมจริยา. ญายนฺเต ‘‘อมฺหากํ อิเม’’ติ ญาตกา. น อวชฺชานิ อนวชฺชานิ, อนินฺทิตานิ อครหิตานีติ วุตฺตํ โหติ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ อยํ ปทวณฺณนา. ७. आता, 'दानञ्च' (दान आणि) यामध्ये—ज्याद्वारे दिले जाते ते 'दान' होय; स्वतःची वस्तू दुसऱ्याला सुपूर्द करणे असा याचा अर्थ आहे. धम्माचे आचरण म्हणजे 'धम्मचरिया' (धम्मचारित्र्य), किंवा धम्मापासून विलग नसलेले आचरण म्हणजे धम्मचरिया होय. "हे आमचे आहेत" असे जे ओळखले जातात ते 'नातलग' (ञातका) होत. जे दोषयुक्त नाहीत ते 'अनवज्ज' (निर्दोष/अनवद्य) होत, म्हणजेच जे निंदनीय किंवा गर्हणीय नाहीत असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. हे शब्दांचे स्पष्टीकरण (पदवर्णन) आहे. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – ทานํ นาม ปรํ อุทฺทิสฺส สุพุทฺธิปุพฺพิกา อนฺนาทิทสทานวตฺถุปริจฺจาคเจตนา, ตํสมฺปยุตฺโต วา อโลโภ. อโลเภน หิ ตํ วตฺถุํ ปรสฺส ปฏิปาเทติ, เตน วุตฺตํ ‘‘ทียเต อิมินาติ ทาน’’นฺติ. ตํ พหุชนปิยมนาปตาทีนํ ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกานํ ผลวิเสสานํ อธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. ‘‘ทายโก, สีห ทานปติ, พหุโน ชนสฺส ปิโย โหติ มนาโป’’ติ เอวมาทีนิ (อ. นิ. ๕.๓๔) เจตฺถ สุตฺตานิ อนุสฺสริตพฺพานิ. अर्थाचे स्पष्टीकरण (अर्थवर्णन) याप्रमाणे समजून घ्यावे—'दान' म्हणजे दुसऱ्याला उद्देशून, चांगल्या बुद्धीने (सम्यक ज्ञानाने) प्रेरित होऊन अन्न इत्यादी दहा प्रकारच्या दानवस्तूंचा त्याग करण्याची चेतना (इच्छा); किंवा त्या चेतनेशी संप्रयुक्त असलेला 'अलोभ' (लोभ नसणे) होय. कारण अलोभानेच मनुष्य ती वस्तू दुसऱ्याला देतो, म्हणूनच "ज्याद्वारे दिले जाते ते दान" असे म्हटले आहे. ते दान, बहुसंख्याकांना प्रिय व आवडते होणे इत्यादी या लोकातील आणि परलोकातील विशेष फळांच्या प्राप्तीचे कारण असल्याने, त्याला 'मंगल' असे म्हटले जाते. "हे सीह, दानशूर दाता बहुसंख्य लोकांना प्रिय आणि आवडता असतो" इत्यादी सुत्तांचे (अंगुत्तर निकाय ५.३४) येथे स्मरण करावे. อปโร นโย – ทานํ นาม ทุวิธํ อามิสทานํ, ธมฺมทานญฺจ, ตตฺถ อามิสทานํ วุตฺตปฺปการเมว. อิธโลกปรโลกทุกฺขกฺขยสุขาวหสฺส ปน สมฺมาสมฺพุทฺธปฺปเวทิตสฺส ธมฺมสฺส ปเรสํ หิตกามตาย เทสนา ธมฺมทานํ , อิเมสญฺจ ทฺวินฺนํ ทานานํ เอตเทว อคฺคํ. ยถาห – दुसरा प्रकार असा—दान हे दोन प्रकारचे असते: आमिषदान (भौतिक वस्तूंचे दान) आणि धम्मदान. त्यापैकी आमिषदान हे वर सांगितलेल्या प्रकाराचेच आहे. परंतु, या लोकातील आणि परलोकातील दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व सुख देणाऱ्या, सम्यक संबुद्धांनी उपदेशिलेल्या धम्माचा इतरांच्या कल्याणाच्या इच्छेने उपदेश करणे म्हणजे 'धम्मदान' होय. आणि या दोन्ही दानांमध्ये हेच (धम्मदान) सर्वश्रेष्ठ आहे. जसे की म्हटले आहे— ‘‘สพฺพทานํ ธมฺมทานํ ชินาติ,สพฺพรสํ ธมฺมรโส ชินาติ; สพฺพรตึ ธมฺมรติ ชินาติ,ตณฺหกฺขโย สพฺพทุกฺขํ ชินาตี’’ติ. (ธ. ป. ๓๕๔); "सर्व दानांमध्ये धम्मदान श्रेष्ठ (विजयी) ठरते; सर्व रसांमध्ये धम्मरस श्रेष्ठ ठरतो; सर्व रतींमध्ये (आनंदात) धम्मरती श्रेष्ठ ठरते; आणि तृष्णेचा क्षय सर्व दुःखांवर विजय मिळवतो." (धम्मपद ३५४) ตตฺถ อามิสทานสฺส มงฺคลตฺตํ วุตฺตเมว. ธมฺมทานํ ปน ยสฺมา อตฺถปฏิสํเวทิตาทีนํ คุณานํ ปทฏฺฐานํ, ตสฺมา มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – त्यापैकी, आमिषदानाचे मंगलत्व आधीच सांगितले आहे. परंतु धम्मदान हे अर्थ-संवेदन (अर्थाचा अनुभव घेणे) इत्यादी गुणांचे मूळ कारण (पदस्थान) असल्याने त्याला 'मंगल' असे म्हटले जाते. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे— ‘‘ยถา ยถา, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ ยถาสุตํ ยถาปริยตฺตํ ธมฺมํ วิตฺถาเรน ปเรสํ เทเสติ, ตถา ตถา โส ตสฺมึ ธมฺเม อตฺถปฏิสํเวที จ โหติ ธมฺมปฏิสํเวที จา’’ติ เอวมาทิ (อ. นิ. ๕.๒๖). "भिक्खूहो! ज्या ज्या प्रकारे भिक्खूने ऐकलेला आणि अभ्यासलेला धम्म विस्ताराने इतरांना उपदेशितो, त्या त्या प्रकारे त्याला त्या धम्मातील अर्थाचा अनुभव (अर्थप्रतिसंवेदी) आणि धम्माचा अनुभव (धम्मप्रतिसंवेदी) होतो..." इत्यादी (अंगुत्तर निकाय ५.२६). ธมฺมจริยา นาม ทสกุสลกมฺมปถจริยา. ยถาห – ‘‘ติวิธา โข คหปตโย กาเยน ธมฺมจริยา สมจริยา โหตี’’ติ เอวมาทิ. สา ปเนสา ธมฺมจริยา สคฺคโลกูปปตฺติเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพา. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – ‘‘ธมฺมจริยาสมจริยาเหตุ โข คหปตโย เอวมิเธกจฺเจ สตฺตา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชนฺตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๔๓๙). 'धम्मचरिया' (धम्माचरण) म्हणजे दहा कुशल कर्मपथांचे आचरण करणे होय. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे— "गृहपतींनो! कायेने (शरीराने) केले जाणारे धम्माचरण आणि समचरण (योग्य आचरण) तीन प्रकारचे असते..." इत्यादी. हे धम्माचरण स्वर्गलोकात उत्पन्न होण्याचे कारण असल्याने ते 'मंगल' आहे असे समजावे. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे— "गृहपतींनो! धम्माचरण आणि समचरण यामुळेच काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, सुगती अशा स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात." (मज्झिम निकाय १.४३९) ญาตกา [Pg.119] นาม มาติโต วา ปิติโต วา ยาว สตฺตมา ปิตามหยุคา สมฺพนฺธา. เตสํ โภคปาริชุญฺเญน วา พฺยาธิปาริชุญฺเญน วา อภิหตานํ อตฺตโน สมีปํ อาคตานํ ยถาพลํ ฆาสจฺฉาทนธนธญฺญาทีหิ สงฺคโห ปสํสาทีนํ ทิฏฺฐธมฺมิกานํ สุคติคมนาทีนญฺจ สมฺปรายิกานํ วิเสสาธิคมานํ เหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. 'नातलग' (ञातक) म्हणजे आईच्या किंवा वडिलांच्या बाजूने सातव्या पिढीपर्यंतचे संबंधित लोक होत. संपत्तीचा नाश किंवा आजारपणामुळे पीडित होऊन जे आपल्याकडे आले आहेत, अशा नातलगांना आपल्या क्षमतेनुसार अन्न, वस्त्र, धन, धान्य इत्यादी देऊन साहाय्य (संग्रह) करणे, हे या लोकात प्रशंसा इत्यादी मिळण्याचे आणि परलोकात सुगती मिळणे व विशेष गुणांची प्राप्ती होण्याचे कारण असल्याने, त्याला 'मंगल' असे म्हटले जाते. อนวชฺชานิ กมฺมานิ นาม อุโปสถงฺคสมาทานเวยฺยาวจฺจกรณอารามวนโรปนเสตุกรณาทีนิ กายวจีมโนสุจริตกมฺมานิ. ตานิ หิ นานปฺปการหิตสุขาธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจนฺติ. ‘‘ฐานํ โข ปเนตํ, วิสาเข, วิชฺชติ ยํ อิเธกจฺโจ อิตฺถี วา ปุริโส วา อฏฺฐงฺคสมนฺนาคตํ อุโปสถํ อุปวสิตฺวา กายสฺส เภทา ปรํ มรณา จาตุมหาราชิกานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺยา’’ติ เอวมาทีนิ เจตฺถ สุตฺตานิ (อ. นิ. ๘.๔๓) อนุสฺสริตพฺพานิ. 'अनवज्ज कम्म' (निर्दोष कर्मे) म्हणजे उपोसथ अंगांचे ग्रहण करणे, वैयावृत्य (सेवाकार्य) करणे, बागबगीचे व वन लावणे, पूल बांधणे इत्यादी काया, वाचा आणि मनाची सुचरित कर्मे होत. विविध प्रकारच्या हित आणि सुखाच्या प्राप्तीचे कारण असल्याने त्यांना 'मंगल' असे म्हटले जाते. "विशाखे! अशी शक्यता आहे की, एखादी स्त्री किंवा पुरुष अष्टांगयुक्त उपोसथाचे पालन करून, शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, चातुमहाराजिका देवलोकातील देवांच्या सहवासात उत्पन्न होईल" इत्यादी सुत्तांचे (अंगुत्तर निकाय ८.४३) येथे स्मरण करावे. เอวํ อิมิสฺสา คาถาย ทานญฺจ, ธมฺมจริยา จ, ญาตกานญฺจ สงฺคโห, อนวชฺชานิ กมฺมานีติ จตฺตาริ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे, या गाथेमध्ये दान, धम्माचरण, नातलगांचे साहाय्य (संग्रह) आणि निर्दोष कर्मे अशी चार मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา ทานญฺจาติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'दानञ्च' या गाथेचे अर्थवर्णन समाप्त झाले. อารตีติคาถาวณฺณนา 'आरती' या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๘. อิทานิ อารตี วิรตีติ เอตฺถ อารตีติ อารมณํ, วิรตีติ วิรมณํ, วิรมนฺติ วา เอตาย สตฺตาติ วิรติ. ปาปาติ อกุสลา. มทนียฏฺเฐน มชฺชํ, มชฺชสฺส ปานํ มชฺชปานํ, ตโต มชฺชปานา. สํยมนํ สํยโม อปฺปมชฺชนํ อปฺปมาโท. ธมฺเมสูติ กุสเลสุ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ อยํ ปทวณฺณนา. ८. आता, 'आरती विरती' यामध्ये—'आरती' म्हणजे दूर राहणे (वर्जन करणे), 'विरती' म्हणजे अलिप्त राहणे (विरमण करणे), किंवा ज्याद्वारे प्राणी अकुशलापासून अलिप्त राहतात ती 'विरती' होय. 'पाप' म्हणजे अकुशल धर्म. मद आणणाऱ्या (नशा चढवणाऱ्या) गुणधर्मामुळे त्याला 'मज्ज' (मद्य/अमली पदार्थ) म्हणतात, मद्याचे प्राशन करणे म्हणजे 'मज्जपान' होय, आणि 'ततो मज्जपाना' म्हणजे त्या मद्यपानापासून. 'संयमन' म्हणजे संयम होय. 'अपमज्जन' (प्रमाद न करणे) म्हणजे 'अप्पमाद' (अप्रमाद/जागरूकता) होय. 'धम्मेसु' म्हणजे कुशल धर्मांमध्ये. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. हे शब्दांचे स्पष्टीकरण (पदवर्णन) आहे. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – อารติ นาม ปาเป อาทีนวทสฺสาวิโน มนสา เอว อนภิรติ. วิรติ นาม กมฺมทฺวารวเสน กายวาจาหิ วิรมณํ, สา เจสา วิรติ นาม สมฺปตฺตวิรติ, สมาทานวิรติ, สมุจฺเฉทวิรตีติ ติวิธา โหติ, ตตฺถ ยา กุลปุตฺตสฺส อตฺตโน ชาตึ วา กุลํ วา โคตฺตํ วา ปฏิจฺจ ‘‘น เม เอตํ ปติรูปํ, ยฺวาหํ [Pg.120] อิมํ ปาณํ หเนยฺยํ, อทินฺนํ อาทิเยยฺย’’นฺติอาทินา นเยน สมฺปตฺตวตฺถุโต วิรติ, อยํ สมฺปตฺตวิรติ นาม. สิกฺขาปทสมาทานวเสน ปวตฺตา สมาทานวิรติ นาม, ยสฺสา ปวตฺติโต ปภุติ กุลปุตฺโต ปาณาติปาตาทีนิ น กโรติ. อริยมคฺคสมฺปยุตฺตา สมุจฺเฉทวิรติ นาม, ยสฺสา ปวตฺติโต ปภุติ อริยสาวกสฺส ปญฺจ ภยานิ เวรานิ วูปสนฺตานิ โหนฺติ. ปาปํ นาม ยํ ตํ ‘‘ปาณาติปาโต โข, คหปติปุตฺต, กมฺมกิเลโส, อทินฺนาทานํ…เป… กาเมสุมิจฺฉาจาโร…เป… มุสาวาโท’’ติ เอวํ วิตฺถาเรตฺวา – अर्थाचे स्पष्टीकरण (अर्थवर्णन) याप्रमाणे समजून घ्यावे—'आरती' म्हणजे पाशवी कर्मांमधील दोष पाहणाऱ्या व्यक्तीची केवळ मनानेच पापाविषयी असणारी अरुची (अनासक्ती). 'विरती' म्हणजे कर्मद्वारांच्या (काया आणि वाचेच्या) माध्यमातून पापापासून अलिप्त राहणे. ही 'विरती' तीन प्रकारची असते: संपत्तविरती (प्रसंगोपात आलेली विरती), समादानविरती (नियम ग्रहण केल्याने झालेली विरती) आणि समुच्छेदविरती (पूर्णपणे नष्ट करणारी विरती). त्यापैकी, जेव्हा एखादा कुलपुत्र स्वतःची जात, कूळ किंवा गोत्र यांचा विचार करून, "मी प्राण्याची हत्या करणे किंवा न दिलेली वस्तू घेणे मला योग्य नाही" अशा विचाराने समोर आलेल्या प्रसंगातून अलिप्त राहतो, त्याला 'संपत्तविरती' म्हणतात. शील किंवा शिक्षापदांचे ग्रहण केल्याने जी विरती निर्माण होते, तिला 'समादानविरती' म्हणतात, जिच्या प्रभावामुळे कुलपुत्र प्राणातिपात (जीवहत्या) इत्यादी कर्मे करत नाही. आर्यमार्गाशी संप्रयुक्त असणाऱ्या विरतीला 'समुच्छेदविरती' म्हणतात, जिच्या उत्पत्तीपासून आर्यश्रावकाची पाच प्रकारची भये आणि वेरे (शत्रुत्व) शांत होतात. 'पाप' म्हणजे काय, तर "हे गृहपतीपुत्रा! प्राणातिपात (जीवहत्या) हा कर्मक्लेश (अपवित्र कर्म) आहे, अदत्तादान (चोरी)... तसेच कामेसू मिच्छाचार (व्यभिचार)... आणि मुसावाद (असत्य बोलणे)..." अशा प्रकारे विस्ताराने सांगितले आहे— ‘‘ปาณาติปาโต อทินฺนาทานํ, มุสาวาโท จ วุจฺจติ; ปรทารคมนญฺเจว, นปฺปสํสนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ. (ที. นิ. ๓.๒๔๕) – "प्राणातिपात (जीवहत्या), अदत्तादान (चोरी), muसावाद (असत्य बोलणे) आणि परदारगमन (व्यभिचार) यांची सुज्ञ लोक कधीही प्रशंसा करत नाहीत." (दीघ निकाय ३.२४५) เอวํ คาถาย สงฺคหิตํ กมฺมกิเลสสงฺขาตํ จตุพฺพิธํ อกุสลํ, ตโต ปาปา. สพฺพาเปสา อารติ จ วิรติ จ ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกภยเวรปฺปหานาทินานปฺปการวิเสสาธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. ‘‘ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โข, คหปติปุตฺต, อริยสาวโก’’ติอาทีนิ เจตฺถ สุตฺตานิ อนุสฺสริตพฺพานิ. अशा प्रकारे, गाथेत समाविष्ट केलेले आणि कर्मक्लेश म्हणून ओळखले जाणारे चार प्रकारचे अकुशल कर्म म्हणजेच 'पाप' होय. या सर्व पापांपासून दूर राहणे (आरती) आणि अलिप्त राहणे (विरती) हे या लोकात आणि परलोकात निर्माण होणारी भये व वेरे (शत्रुत्व) नष्ट करण्याचे आणि विविध प्रकारच्या विशेष गुणांच्या प्राप्तीचे कारण असल्याने, त्याला 'मंगल' असे म्हटले जाते. "हे गृहपतीपुत्रा! आर्यश्रावक प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो..." इत्यादी सुत्तांचे येथे स्मरण करावे. มชฺชปานา สํยโม นาม ปุพฺเพ วุตฺตสุราเมรยมชฺชปฺปมาทฏฺฐานา เวรมณิยา เอเวตํ อธิวจนํ. ยสฺมา ปน มชฺชปายี อตฺถํ น ชานาติ, ธมฺมํ น ชานาติ, มาตุ อนฺตรายํ กโรติ, ปิตุ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธตถาคตสาวกานมฺปิ อนฺตรายํ กโรติ, ทิฏฺเฐว ธมฺเม ครหํ สมฺปราเย ทุคฺคตึ อปราปริเย อุมฺมาทญฺจ ปาปุณาติ. มชฺชปานา ปน สํยโม เตสํ โทสานํ วูปสมํ ตพฺพิปรีตคุณสมฺปทญฺจ ปาปุณาติ. ตสฺมา อยํ มชฺชปานา สํยโม มงฺคลนฺติ เวทิตพฺโพ. मद्यपानापासून संयम म्हणजे पूर्वी सांगितलेल्या 'सुरामेरयमज्जपमादट्ठाना वेरमणी' (मद्य व मादक पदार्थांच्या सेवनापासून अलिप्त राहणे) याचेच हे दुसरे नाव (अधिवचन) आहे. कारण मद्यपी मनुष्य आपले हित जाणत नाही, धर्म जाणत नाही; तो माता, पिता तसेच बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि तथागतांच्या श्रावकांनाही उपद्रव (धोका) पोहोचवतो. तो याच जन्मात निंदेला प्राप्त होतो, परलोकात दुर्गतीला प्राप्त होतो आणि पुढील जन्मांमध्ये वेडेपणाला (उन्मादाला) प्राप्त होतो. परंतु, मद्यपानापासून संयम राखल्याने या सर्व दोषांचे शमन होते आणि त्याच्या उलट असणाऱ्या सद्गुणांची प्राप्ती होते. म्हणून, हा मद्यपानाचा संयम 'मंगल' आहे असे जाणावे. กุสเลสุ ธมฺเมสุ อปฺปมาโท นาม ‘‘กุสลานํ วา ธมฺมานํ ภาวนาย อสกฺกจฺจกิริยตา, อสาตจฺจกิริยตา, อนฏฺฐิตกิริยตา, โอลีนวุตฺติตา, นิกฺขิตฺตฉนฺทตา, นิกฺขิตฺตธุรตา, อนาเสวนา, อภาวนา, อพหุลีกมฺมํ, อนธิฏฺฐานํ, อนนุโยโค, ปมาโท. โย เอวรูโป ปมาโท ปมชฺชนา ปมชฺชิตตฺตํ, อยํ วุจฺจติ ปมาโท’’ติ (วิภ. ๘๔๖). เอตฺถ วุตฺตสฺส ปมาทสฺส ปฏิปกฺขวเสน อตฺถโต กุสเลสุ ธมฺเมสุ สติยา อวิปฺปวาโส เวทิตพฺโพ. โส นานปฺปการกุสลาธิคมเหตุโต อมตาธิคมเหตุโต จ มงฺคลนฺติ วุจฺจติ[Pg.121]. ตตฺถ ‘‘อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน’’ติ จ (ม. นิ. ๒.๑๘; อ. นิ. ๕.๒๖), ‘‘อปฺปมาโท อมตํ ปท’’นฺติ จ, เอวมาทิ (ธ. ป. ๒๑) สตฺถุ สาสนํ อนุสฺสริตพฺพํ. कुशल धर्मांमध्ये अप्रमाद (जागरूकता) म्हणजे: 'कुशल धर्मांच्या भावनेमध्ये (विकासात) आदरपूर्वक न वागणे, सातत्य न राखणे, दृढतेने न करणे, शिथिल वृत्ती ठेवणे, उत्साह सोडून देणे, जबाबदारी सोडून देणे, सेवन न करणे, भावना न करणे, वारंवार अभ्यास न करणे, अधिष्ठान न ठेवणे आणि अनुयोग (सतत प्रयत्न) न करणे म्हणजे प्रमाद होय. असा जो प्रमाद, प्रमाद करण्याची पद्धत आणि प्रमादयुक्त अवस्था आहे, त्याला 'प्रमाद' म्हटले जाते.' येथे सांगितलेल्या प्रमादाच्या विरुद्ध अर्थाने, कुशल धर्मांमध्ये स्मृतीचा (सतीचा) विप्रवास न होणे (म्हणजेच स्मृती सतत जागरूक ठेवणे) हा अप्रमादाचा खरा अर्थ जाणावा. तो विविध प्रकारच्या कुशल धर्मांच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे आणि अमृतपदाच्या (निर्वाणाच्या) प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे त्याला 'मंगल' म्हटले जाते. त्याविषयी, 'अप्रमत्त आणि उद्योगी माणसाचे...' आणि 'अप्रमाद हे अमृतपद आहे...' इत्यादी शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) उपदेशांचे वारंवार स्मरण करावे. เอวํ อิมิสฺสา คาถาย ปาปา วิรติ, มชฺชปานา สํยโม, กุสเลสุ ธมฺเมสุ อปฺปมาโทติ ตีณิ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे, या गाथेत 'पापापासून विरती', 'मद्यपानापासून संयम' आणि 'कुशल धर्मांमध्ये अप्रमाद' अशी तीन मंगले सांगितली आहेत. त्यांचे मंगल असणे त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา อารตีติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'आरती' (पापापासून विरती) इत्यादी शब्दांनी सुरू होणाऱ्या या गाथेचे अर्थस्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) समाप्त झाले. คารโวจาติคาถาวณฺณนา 'गारवो च' (आदर असणे) या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๙. อิทานิ คารโว จาติ เอตฺถ คารโวติ ครุภาโว. นิวาโตติ นีจวุตฺติตา. สนฺตุฏฺฐีติ สนฺโตโส. กตสฺส ชานนตา กตญฺญุตา. กาเลนาติ ขเณน สมเยน. ธมฺมสฺส สวนํ ธมฺมสฺสวนํ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ อยํ ปทวณฺณนา. ९. आता, 'गारवो च' या गाथेत 'गारवो' म्हणजे आदरभाव (पूज्य व्यक्तींबद्दल आदर असणे). 'निवातो' म्हणजे नम्रता (विनम्र वृत्ती). 'सन्तुट्ठी' म्हणजे संतोष (समाधान). दुसऱ्याने केलेल्या उपकाराची जाणीव असणे म्हणजे 'कृतज्ञता' (कतञ्ञुता) होय. 'कालेन' म्हणजे योग्य वेळी किंवा प्रसंगी. धर्माचे श्रवण करणे म्हणजे 'धर्मश्रवण' होय. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. हे पदांचे स्पष्टीकरण (पदवण्णना) आहे. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – คารโว นาม ครุการปฺปโยคารเหสุ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธตถาคตสาวกอาจริยุปชฺฌายมาตาปิตุเชฏฺฐกภาติกภคินีอาทีสุ ยถานุรูปํ ครุกาโร ครุกรณํ สคารวตา. ส จายํ คารโว ยสฺมา สุคติคมนาทีนํ เหตุ. ยถาห – अर्थाचे स्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) याप्रमाणे जाणावे: 'गारव' (आदर) म्हणजे जे आदरास पात्र आहेत अशा बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध, तथागतांचे श्रावक, आचार्य, उपाध्याय, माता, पिता, मोठे भाऊ, मोठी बहीण इत्यादींच्या ठिकाणी योग्यतेनुसार आदर करणे, सन्मान करणे आणि आदरयुक्त भाव ठेवणे होय. आणि हा आदरभाव सुगतीला जाणे इत्यादींचे कारण ठरतो. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: ‘‘ครุกาตพฺพํ ครุํ กโรติ, มาเนตพฺพํ มาเนติ, ปูเชตพฺพํ ปูเชติ. โส เตน กมฺเมน เอวํ สมตฺเตน เอวํ สมาทินฺเนน กายสฺส เภทา ปรํ มรณา สุคตึ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ. โน เจ กายสฺส…เป… อุปปชฺชติ, สเจ มนุสฺสตฺตํ อาคจฺฉติ, ยตฺถ ยตฺถ ปจฺจาชายติ, อุจฺจากุลีโน โหตี’’ติ (ม. นิ. ๓.๒๙๕). जो आदरास पात्र आहे त्याचा तो आदर करतो, जो मान देण्यास पात्र आहे त्याला मान देतो, जो पूजेस पात्र आहे त्याचा सन्मान करतो. अशा प्रकारे परिपूर्ण केलेल्या आणि आचरणात आणलेल्या त्या कर्मामुळे, कायाचा भेद झाल्यानंतर मृत्यूनंतर तो सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतो. जर तो मृत्यूनंतर स्वर्गलोकात जन्मला नाही आणि मनुष्यलोकात परत आला, तर तो ज्या ज्या ठिकाणी जन्म घेईल, तेथे तो उच्च कुळात जन्म घेतो. ยถา จาห – ‘‘สตฺติเม, ภิกฺขเว, อปริหานิยา ธมฺมา. กตเม สตฺต? สตฺถุคารวตา’’ติอาทิ (อ. นิ. ๗.๓๓), ตสฺมา มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. आणि जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूंनो, हे सात अपरिहानीय (ऱ्हास न घडवून आणणारे) धर्म आहेत. ते सात कोणते? शास्त्यांबद्दल (बुद्धांबद्दल) आदर असणे...' इत्यादी. म्हणून याला 'मंगल' म्हटले जाते. นิวาโต นาม นีจมนตา นิวาตวุตฺติตา, ยาย สมนฺนาคโต ปุคฺคโล นิหตมาโน นิหตทปฺโป ปาทปุญฺฉนกโจฬสทิโส ฉินฺนวิสาณอุสภสโม อุทฺธฏทาฐสปฺปสโม จ หุตฺวา สณฺโห สขิโล สุขสมฺภาโส [Pg.122] โหติ, อยํ นิวาโต. สฺวายํ ยสาทิคุณปฺปฏิลาภเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. อาห จ ‘‘นิวาตวุตฺติ อตฺถทฺโธ, ตาทิโส ลภเต ยส’’นฺติ เอวมาทิ (ที. นิ. ๓.๒๗๓). 'निवात' (नम्रता) म्हणजे नम्र मन आणि नम्र वर्तन असणे. ज्याने युक्त असलेला मनुष्य आपला अहंकार आणि गर्व नष्ट करून, पाय पुसण्याच्या कापडासारखा, शिंगे तुटलेल्या बैलासारखा आणि विषारी दात काढलेल्या सापासारखा होऊन मृदू, प्रेमळ आणि सुखद संभाषण करणारा बनतो, याला 'निवात' म्हणतात. हा निवात कीर्ती इत्यादी गुणांच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे याला 'मंगल' म्हटले जाते. आणि म्हटले देखील आहे: 'जो नम्र वर्तनाचा आहे, ताठर (अहंकारी) नाही, असा मनुष्य कीर्ती प्राप्त करतो...' इत्यादी. สนฺตุฏฺฐิ นาม อิตรีตรปจฺจยสนฺโตโส, โส ทฺวาทสวิโธ โหติ. เสยฺยถิทํ – จีวเร ยถาลาภสนฺโตโส, ยถาพลสนฺโตโส, ยถาสารุปฺปสนฺโตโสติ ติวิโธ. เอวํ ปิณฺฑปาตาทีสุ. 'संतुष्टी' (संतोष) म्हणजे जे काही मिळेल त्या साधनाने (वस्तूने) संतुष्ट असणे. तो बारा प्रकारचा असतो. जसे की, चीवराच्या बाबतीत: यथालाभ संतोष, यथाबल संतोष आणि यथासारूप्य संतोष असे तीन प्रकार आहेत. याचप्रमाणे पिंडपात (भिक्षा) इत्यादींच्या बाबतीतही (तीन-तीन प्रकार आहेत). ตสฺสายํ ปเภทวณฺณนา – อิธ ภิกฺขุ จีวรํ ลภติ สุนฺทรํ วา อสุนฺทรํ วา. โส เตเนว ยาเปติ, อญฺญํ น ปตฺเถติ, ลภนฺโตปิ น คณฺหาติ, อยมสฺส จีวเร ยถาลาภสนฺโตโส. อถ ปน ภิกฺขุ อาพาธิโก โหติ, ครุํ จีวรํ ปารุปนฺโต โอณมติ วา กิลมติ วา, โส สภาเคน ภิกฺขุนา สทฺธึ ตํ ปริวตฺเตตฺวา ลหุเกน ยาเปนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส จีวเร ยถาพลสนฺโตโส. อปโร ภิกฺขุ ปณีตปจฺจยลาภี โหติ, โส ปฏฺฏจีวราทีนํ อญฺญตรํ มหคฺฆํ จีวรํ ลภิตฺวา ‘‘อิทํ เถรานํ จิรปพฺพชิตานํ พหุสฺสุตานญฺจ อนุรูป’’นฺติ เตสํ ทตฺวา อตฺตนา สงฺการกูฏา วา อญฺญโต วา กุโตจิ นนฺตกานิ อุจฺจินิตฺวา สงฺฆาฏึ กริตฺวา ธาเรนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส จีวเร ยถาสารุปฺปสนฺโตโส. त्याचे सविस्तर वर्गीकरण याप्रमाणे आहे: येथे भिक्खूला चांगले किंवा वाईट चीवर मिळते. तो त्याच चीवराने आपला निर्वाह करतो, दुसऱ्या चीवराची इच्छा करत नाही आणि मिळाले तरी ते स्वीकारत नाही; हा त्याचा चीवराच्या बाबतीत 'यथालाभ संतोष' होय. परंतु जर भिक्खू आजारी असेल आणि जड चीवर पांघरल्यामुळे तो वाकत असेल किंवा थकून जात असेल, तर तो अनुकूल भिक्खूशी ते चीवर बदलून घेऊन हलक्या चीवराने निर्वाह करत असतानाही संतुष्टच राहतो; हा त्याचा चीवराच्या बाबतीत 'यथाबल संतोष' होय. दुसरा एखादा भिक्खू उत्तम दर्जाच्या वस्तू मिळवणारा असतो. तो मौल्यवान चीवर मिळवून, 'हे चीवर वृद्ध (स्थवीर), दीर्घकाळ प्रव्रजित राहिलेल्या आणि बहुश्रुत भिक्खूंनाच योग्य आहे' असे म्हणून ते त्यांना देऊन टाकतो आणि स्वतः कचऱ्याच्या ढिगाऱ्यातून किंवा इतर कुठूनही चिंध्या गोळा करून, त्याचे संघात (चीवर) तयार करून ते परिधान करत असतानाही संतुष्टच राहतो; हा त्याचा चीवराच्या बाबतीत 'यथासारूप्य संतोष' होय. อิธ ปน ภิกฺขุ ปิณฺฑปาตํ ลภติ ลูขํ วา ปณีตํ วา, โส เตเนว ยาเปติ, อญฺญํ น ปตฺเถติ, ลภนฺโตปิ น คณฺหาติ, อยมสฺส ปิณฺฑปาเต ยถาลาภสนฺโตโส. อถ ปน ภิกฺขุ อาพาธิโก โหติ, ลูขํ ปิณฺฑปาตํ ภุญฺชิตฺวา คาฬฺหํ โรคาตงฺกํ ปาปุณาติ, โส ตํ สภาคสฺส ภิกฺขุโน ทตฺวา ตสฺส หตฺถโต สปฺปิมธุขีราทีนิ ภุญฺชิตฺวา สมณธมฺมํ กโรนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส ปิณฺฑปาเต ยถาพลสนฺโตโส. อปโร ภิกฺขุ ปณีตํ ปิณฺฑปาตํ ลภติ, โส ‘‘อยํ ปิณฺฑปาโต เถรานํ จิรปพฺพชิตานํ อญฺเญสญฺจ ปณีตปิณฺฑปาตํ วินา อยาเปนฺตานํ สพฺรหฺมจารีนํ อนุรูโป’’ติ เตสํ ทตฺวา อตฺตนา ปิณฺฑาย จริตฺวา มิสฺสกาหารํ ภุญฺชนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส ปิณฺฑปาเต ยถาสารุปฺปสนฺโตโส. येथे भिक्खूला साधा किंवा उत्तम पिंडपात (भोजन) मिळतो. तो त्याच भोजनाने आपला निर्वाह करतो, दुसऱ्या भोजनाची इच्छा करत नाही आणि मिळाले तरी ते स्वीकारत नाही; हा त्याचा पिंडपाताच्या बाबतीत 'यथालाभ संतोष' होय. परंतु जर भिक्खू आजारी असेल आणि साधा पिंडपात खाल्ल्यामुळे त्याचा आजार बळावत असेल, तर तो ते अन्न अनुकूल भिक्खूला देऊन त्याच्याकडून तूप, मध, दूध इत्यादी घेऊन ते ग्रहण करतो आणि श्रमणधर्माचे आचरण करत असतानाही संतुष्टच राहतो; हा त्याचा पिंडपाताच्या बाबतीत 'यथाबल संतोष' होय. दुसरा एखादा भिक्खू उत्तम पिंडपात मिळवतो. तो 'हा पिंडपात वृद्ध (स्थवीर), दीर्घकाळ प्रव्रजित राहिलेल्या आणि उत्तम भोजनाशिवाय निर्वाह करू न शकणाऱ्या इतर सब्रह्मचाऱ्यांनाच योग्य आहे' असे म्हणून ते त्यांना देऊन टाकतो आणि स्वतः भिक्षेसाठी फिरून मिश्र अन्न ग्रहण करत असतानाही संतुष्टच राहतो; हा त्याचा पिंडपाताच्या बाबतीत 'यथासारूप्य संतोष' होय. อิธ [Pg.123] ปน ภิกฺขุโน เสนาสนํ ปาปุณาติ. โส เตเนว สนฺตุสฺสติ, ปุน อญฺญํ สุนฺทรตรมฺปิ ปาปุณนฺตํ น คณฺหาติ, อยมสฺส เสนาสเน ยถาลาภสนฺโตโส. อถ ปน ภิกฺขุ อาพาธิโก โหติ, นิวาตเสนาสเน วสนฺโต อติวิย ปิตฺตโรคาทีหิ อาตุรียติ. โส ตํ สภาคสฺส ภิกฺขุโน ทตฺวา ตสฺส ปาปุณเน สวาเต สีตลเสนาสเน วสิตฺวา สมณธมฺมํ กโรนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส เสนาสเน ยถาพลสนฺโตโส. อปโร ภิกฺขุ สุนฺทรํ เสนาสนํ ปตฺตมฺปิ น สมฺปฏิจฺฉติ ‘‘สุนฺทรเสนาสนํ ปมาทฏฺฐานํ, ตตฺร นิสินฺนสฺส ถินมิทฺธํ โอกฺกมติ, นิทฺทาภิภูตสฺส จ ปุน ปฏิพุชฺฌโต กามวิตกฺโก สมุทาจรตี’’ติ. โส ตํ ปฏิกฺขิปิตฺวา อชฺโฌกาสรุกฺขมูลปณฺณกุฏีสุ ยตฺถ กตฺถจิ นิวสนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส เสนาสเน ยถาสารุปฺปสนฺโตโส. येथे (या शासनात) भिक्खूला जे शयनासन (निवासस्थान) प्राप्त होते, तो त्याच शयनासनाने संतुष्ट राहतो; पुन्हा दुसरे अधिक चांगले शयनासन प्राप्त झाले तरी तो त्याचा स्वीकार करत नाही. हा त्याचा शयनासनाच्या बाबतीत 'यथालाभ संतोष' (यथालाभसंतुष्टी) होय. परंतु, जर भिक्खू आजारी असेल आणि वारा नसलेल्या (बंदिस्त) शयनासनात राहिल्याने पित्तविकार इत्यादींमुळे अत्यंत पीडित होत असेल, तर तो ते शयनासन दुसऱ्या एका अनुकूल भिक्खूला देऊन, त्याला प्राप्त झालेल्या मोकळी हवा असलेल्या व थंड शयनासनात राहून श्रमणधर्माचे आचरण करत असतानाही संतुष्टच राहतो. हा त्याचा शयनासनाच्या बाबतीत 'यथाबल संतोष' होय. दुसरा एखादा भिक्खू उत्तम शयनासन प्राप्त झाले तरी त्याचा स्वीकार करत नाही आणि विचार करतो की, 'उत्तम शयनासन हे प्रमादाचे (आळसाचे) स्थान आहे, तेथे बसलेल्या भिक्खूला स्त्यान-मृद्ध (आळस व डुलकी) ग्रासते, आणि झोपेने ग्रासलेल्या भिक्खूला पुन्हा जागे झाल्यावर कामवितर्क (वासनांचे विचार) सतावतात.' तो अशा उत्तम शयनासनाचा अस्वीकार करून उघड्या जागेत, वृक्षाच्या मुळाशी किंवा पर्णकुटीत कोठेही राहत असतानाही संतुष्टच राहतो. हा त्याचा शयनासनाच्या बाबतीत 'यथासारूप्य संतोष' होय. อิธ ปน ภิกฺขุ เภสชฺชํ ลภติ หรีตกํ วา อามลกํ วา. โส เตเนว ยาเปติ, อญฺเญหิ ลทฺธสปฺปิมธุผาณิตาทิมฺปิ น ปตฺเถติ, ลภนฺโตปิ น คณฺหาติ, อยมสฺส คิลานปจฺจเย ยถาลาภสนฺโตโส. อถ ปน ภิกฺขุ อาพาธิโก โหติ, เตเลนตฺถิโก ผาณิตํ ลภติ, โส ตํ สภาคสฺส ภิกฺขุโน ทตฺวา ตสฺส หตฺถโต เตเลน เภสชฺชํ กตฺวา สมณธมฺมํ กโรนฺโตปิ สนฺตุฏฺโฐว โหติ, อยมสฺส คิลานปจฺจเย ยถาพลสนฺโตโส. อปโร ภิกฺขุ เอกสฺมึ ภาชเน ปูติมุตฺตหรีตกํ ฐเปตฺวา เอกสฺมึ จตุมธุรํ ‘‘คณฺหถ, ภนฺเต, ยทิจฺฉสี’’ติ วุจฺจมาโน สจสฺส เตสํ ทฺวินฺนมญฺญตเรนปิ พฺยาธิ วูปสมฺมติ, อถ ‘‘ปูติมุตฺตหรีตกํ นาม พุทฺธาทีหิ วณฺณิต’’นฺติ จ ‘‘ปูติมุตฺตเภสชฺชํ นิสฺสาย ปพฺพชฺชา, ตตฺถ เต ยาวชีวํ อุสฺสาโห กรณีโยติ วุตฺต’’นฺติ (มหาว. ๑๒๘) จ จินฺเตนฺโต จตุมธุรเภสชฺชํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ปูติมุตฺตหรีตเกน เภสชฺชํ กโรนฺโตปิ ปรมสนฺตุฏฺโฐว โหติ. อยมสฺส คิลานปจฺจเย ยถาสารุปฺปสนฺโตโส. येथे (या शासनात) भिक्खूला औषध म्हणून हिरडा किंवा आवळा मिळतो. तो त्याच औषधाने आपली उपजीविका भागवतो; इतरांना मिळालेल्या तूप, मध, गूळ इत्यादींची तो इच्छा करत नाही आणि ते मिळाले तरी तो घेत नाही. हा त्याचा ग्लान-प्रत्यय (औषधोपचार) बाबतीत 'यथालाभ संतोष' होय. परंतु, जर भिक्खू आजारी असेल आणि त्याला तेलाची गरज असताना गूळ मिळतो, तर तो तो गूळ दुसऱ्या एका अनुकूल भिक्खूला देऊन, त्याच्याकडून तेल घेऊन औषध तयार करतो आणि श्रमणधर्माचे आचरण करत असतानाही संतुष्टच राहतो. हा त्याचा ग्लान-प्रत्यय बाबतीत 'यथाबल संतोष' होय. दुसरा एखादा भिक्खू, ज्याला एका पात्रात गोमूत्रात भिजवलेला हिरडा आणि दुसऱ्या पात्रात चतुमधुर ठेवून, 'भंते, आपल्याला जे हवे असेल ते घ्यावे' असे सांगितले जाते; जर त्या दोन्हीपैकी कोणत्याही एका औषधाने त्याचा आजार बरा होणार असेल, तरीही 'गोमूत्रात भिजवलेला हिरडा हा बुद्ध इत्यादी महापुरुषांनी प्रशंसिला आहे' आणि 'गोमूत्र-औषधाचा आश्रय घेऊनच प्रव्रज्या आहे, आणि त्यात तू आयुष्यभर प्रयत्न केला पाहिजे, असे सांगितले आहे' असा विचार करून, तो चतुमधुर औषधाचा अस्वीकार करतो आणि गोमूत्रात भिजवलेल्या हिरड्यानेच औषधोपचार करतो, तरीही तो परम संतुष्टच राहतो. हा त्याचा ग्लान-प्रत्यय बाबतीत 'यथासारूप्य संतोष' होय. เอวํปเภโท สพฺโพเปโส สนฺโตโส สนฺตุฏฺฐีติ วุจฺจติ. สา อตฺริจฺฉตามหิจฺฉตาปาปิจฺฉตาทีนํ ปาปธมฺมานํ ปหานาธิคมเหตุโต, สุคติเหตุโต, อริยมคฺคสมฺภารภาวโต, จาตุทฺทิสาทิภาวเหตุโต จ มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพา. อาห จ – अशा प्रकारे विविध प्रकारचा हा सर्व संतोष 'संतुष्टी' (संतुट्ठी) असे म्हटले जाते. ती संतुष्टी अति-इच्छा, महा-इच्छा, पाप-इच्छा इत्यादी पापी धर्मांचा त्याग करण्याचे कारण असल्यामुळे, सुगतीचे कारण असल्यामुळे, आर्यमार्गाची सामग्री (आधार) असल्यामुळे आणि चारही दिशांना अडथळ्याशिवाय विरणे सुलभ करण्याचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. आणि भगवंतांनी म्हटले आहे - ‘‘จาตุทฺทิโส [Pg.124] อปฺปฏิโฆ จ โหติ,สนฺตุสฺสมาโน อิตรีตเรนา’’ติ. เอวมาทิ (สุ. นิ. ๔๒); जो जे काही मिळेल त्याने संतुष्ट राहतो, तो चारही दिशांना मुक्तपणे वावरणारा आणि द्वेषरहित (शत्रू नसलेला) होतो. इत्यादी. กตญฺญุตา นาม อปฺปสฺส วา พหุสฺส วา เยน เกนจิ กตสฺส อุปการสฺส ปุนปฺปุนํ อนุสฺสรณภาเวน ชานนตา. อปิจ เนรยิกาทิทุกฺขปริตฺตาณโต ปุญฺญานิ เอว ปาณีนํ พหูปการานิ, ตโต เตสมฺปิ อุปการานุสฺสรณตา กตญฺญุตาติ เวทิตพฺพา. สา สปฺปุริเสหิ ปสํสนียาทินานปฺปการวิเสสาธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. อาห จ ‘‘ทฺเวเม, ภิกฺขเว, ปุคฺคลา ทุลฺลภา โลกสฺมึ. กตเม ทฺเว? โย จ ปุพฺพการี โย จ กตญฺญู กตเวที’’ติ (อ. นิ. ๒.๑๒๐). कृतज्ञता म्हणजे कोणत्याही व्यक्तीने केलेला उपकार, मग तो लहान असो वा मोठा, त्याचे वारंवार स्मरण करून जाणीव ठेवणे होय. शिवाय, नरक इत्यादी दुःखांपासून रक्षण करत असल्यामुळे पुण्यकर्मेच प्राण्यांसाठी अत्यंत उपकारक ठरतात; म्हणून त्या पुण्याच्या उपकारांचे स्मरण ठेवणे ही देखील 'कृतज्ञता' आहे असे जाणावे. ती कृतज्ञता सत्पुरुषांद्वारे प्रशंसनीय असणे इत्यादी विविध प्रकारच्या विशेष गुणाщих प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे म्हटले आहे. आणि भगवंतांनी म्हटले आहे - 'भिक्खूंनो, या जगात हे दोन व्यक्ती मिळणे कठीण आहे. कोणते दोन? जो प्रथम उपकार करतो (पूर्वकारी) आणि जो केलेल्या उपकाराची जाणीव ठेवून कृतज्ञ राहतो (कृतज्ञ-कृतवेदी).' กาเลน ธมฺมสฺสวนํ นาม ยสฺมึ กาเล อุทฺธจฺจสหคตํ จิตฺตํ โหติ, กามวิตกฺกาทีนํ วา อญฺญตเรน อภิภูตํ, ตสฺมึ กาเล เตสํ วิโนทนตฺถํ ธมฺมสฺสวนํ. อปเร อาหุ ‘‘ปญฺจเม ปญฺจเม ทิวเส ธมฺมสฺสวนํ กาเลน ธมฺมสฺสวนํ นาม. ยถาห อายสฺมา อนุรุทฺโธ ‘ปญฺจาหิกํ โข ปน มยํ, ภนฺเต, สพฺพรตฺตึ ธมฺมิยา กถาย สนฺนิสีทามา’’’ติ (ม. นิ. ๑.๓๒๗; มหาว. ๔๖๖). योग्य वेळी धम्मश्रवण करणे म्हणजे ज्या वेळी चित्त उद्धच्च (चंचलता/उद्वेग) युक्त असते किंवा कामवितर्क इत्यादींपैकी एखाद्या वितर्काने ग्रासलेले असते, त्या वेळी त्यांचे निवारण करण्यासाठी धम्म ऐकणे होय. इतर आचार्य म्हणतात की, दर पाचव्या दिवशी धम्म ऐकणे म्हणजे 'योग्य वेळी धम्मश्रवण' होय. जसे की आयुष्यमान अनुरुद्धांनी म्हटले आहे - 'भंते, आम्ही दर पाचव्या दिवशी संपूर्ण रात्र धम्मचर्चेसाठी एकत्र बसतो.' อปิจ ยสฺมึ กาเล กลฺยาณมิตฺเต อุปสงฺกมิตฺวา สกฺกา โหติ อตฺตโน กงฺขาวิโนทกํ ธมฺมํ โสตุํ, ตสฺมึ กาเลปิ ธมฺมสฺสวนํ กาเลน ธมฺมสฺสวนนฺติ เวทิตพฺพํ. ยถาห ‘‘เต กาเลน กาลํ อุปสงฺกมิตฺวา ปริปุจฺฉติ ปริปญฺหตี’’ติอาทิ (ที. นิ. ๓.๓๕๘). ตเทตํ กาเลน ธมฺมสฺสวนํ นีวรณปฺปหานจตุรานิสํสอาสวกฺขยาทินานปฺปการวิเสสาธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. วุตฺตญฺเหตํ – शिवाय, ज्या वेळी कल्याणमित्रांकडे जाऊन आपल्या शंकांचे निरसन करणारा धम्म ऐकणे शक्य होते, त्या वेळच्या धम्मश्रवणाला देखील 'योग्य वेळी धम्मश्रवण' असे जाणावे. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे - 'ते वेळोवेळी (कल्याणमित्रांकडे) जाऊन विचारपूस करतात आणि चर्चा करतात' इत्यादी. ते हे योग्य वेळचे धम्मश्रवण नीवरणांचा त्याग करणे, चार प्रकारचे लाभ मिळणे, आसवांचा क्षय होणे इत्यादी विविध प्रकारच्या विशेष गुणांच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. कारण असे म्हटले आहे - ‘‘ยสฺมึ, ภิกฺขเว, สมเย อริยสาวโก อฏฺฐึ กตฺวา มนสิ กตฺวา สพฺพํ เจตสา สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสโต ธมฺมํ สุณาติ, ปญฺจสฺส นีวรณา ตสฺมึ สมเย น โหนฺตี’’ติ จ (สํ. นิ. ๕.๒๑๙). 'भिक्खूंनो, ज्या वेळी आर्यश्रावक आदरपूर्वक मन लावून, सर्व चित्त एकाग्र करून आणि कान देऊन धम्म ऐकतो, त्या वेळी त्याचे पाच नीवरण नष्ट होतात (उत्पन्न होत नाहीत).' ‘‘โสตานุคตานํ, ภิกฺขเว, ธมฺมานํ…เป… สุปฺปฏิวิทฺธานํ จตฺตาโร อานิสํสา ปาฏิกงฺขา’’ติ จ (อ. นิ. ๔.๑๙๑). 'भिक्खूंनो, कानावर पडलेल्या आणि... चांगल्या प्रकारे समजून घेतलेल्या धम्माचे चार लाभ अपेक्षित असतात.' ‘‘จตฺตาโรเม, ภิกฺขเว, ธมฺมา กาเลน กาลํ สมฺมา ภาวิยมานา สมฺมา อนุปริวตฺติยมานา อนุปุพฺเพน อาสวานํ ขยํ ปาเปนฺติ. กตเม จตฺตาโร? กาเลน ธมฺมสฺสวน’’นฺติ จ เอวมาทิ (อ. นิ. ๔.๑๔๗). 'भिक्खूंनो, हे चार धर्म वेळोवेळी चांगल्या प्रकारे आचरणात आणले असता आणि योग्य प्रकारे अनुसरले असता, अनुक्रमाने आसवांच्या क्षयाप्रत (नाशाप्रत) नेतात. कोणते चार? योग्य वेळी धम्मश्रवण करणे.' इत्यादी वचन आहे. เอวํ [Pg.125] อิมิสฺสา คาถาย คารโว, นิวาโต, สนฺตุฏฺฐิ, กตญฺญุตา, กาเลน ธมฺมสฺสวนนฺติ ปญฺจ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे या गाथेत आदर (गौरव), नम्रता, संतुष्टी, कृतज्ञता आणि योग्य वेळी धम्मश्रवण हे पाच मंगल सांगितले आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา คารโว จาติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'गारवो च' या गाथेची अर्थ-स्पष्टता (अट्टकथा) समाप्त झाली. ขนฺตีจาติคาถาวณฺณนา 'खन्ती च' गाथेची स्पष्टता (व्याख्या) ๑๐. อิทานิ ขนฺตี จาติ เอตฺถ ขมนํ ขนฺติ. ปทกฺขิณคฺคาหิตาย สุขํ วโจ อสฺมินฺติ สุวโจ, สุวจสฺส กมฺมํ โสวจสฺสํ, โสวจสฺสสฺส ภาโว โสวจสฺสตา. กิเลสานํ สมิตตฺตา สมณา. ทสฺสนนฺติ เปกฺขนํ. ธมฺมสฺส สากจฺฉา ธมฺมสากจฺฉา. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ. อยํ ปทวณฺณนา. १०. आता 'खन्ती च' या गाथेत: सहन करणे म्हणजे 'खंती' (क्षमा/सहनशीलता) होय. आदराने ऐकणे व ग्रहण करणे सुलभ असल्यामुळे ज्याचे बोलणे सुलभ (सौम्य) आहे तो 'सुवच' होय. सुवच व्यक्तीचे कर्म म्हणजे 'सोवचस्स' होय आणि त्याचा भाव म्हणजे 'सोवचस्सता' (सुवचता/सौम्यता) होय. क्लेशांचे शमन केल्यामुळे ते 'श्रमण' होत. 'दस्सनं' म्हणजे दर्शन (पाहणे/भेटणे). धम्माची चर्चा करणे म्हणजे 'धम्मसाकच्छा' (धम्मचर्चा) होय. उर्वरित भाग आधी सांगितल्याप्रमाणेच जाणावा. ही झाली पदांची व्याख्या (पदवर्णना). อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – ขนฺติ นาม อธิวาสนกฺขนฺติ, ตาย สมนฺนาคโต ภิกฺขุ ทสหิ อกฺโกสวตฺถูหิ อกฺโกสนฺเต วธพนฺธาทีหิ วา วิเหสนฺเต ปุคฺคเล อสุณนฺโต วิย อปสฺสนฺโต วิย จ นิพฺพิกาโร โหติ ขนฺติวาที วิย. ยถาห – अर्थाची स्पष्टता (अर्थवर्णना) याप्रमाणे जाणावी: 'खंती' म्हणजे अधिवासन-क्षमा (सहनशीलता) होय. तिने युक्त असलेला भिक्खू, दहा प्रकारच्या शिवीगाळीच्या कारणांनी शिवीगाळ करणाऱ्या व्यक्तींना किंवा मारहाण, बंधन (तुरुंगवास) इत्यादींनी छळ करणाऱ्या व्यक्तींना, न ऐकल्यासारखा आणि न पाहिल्यासारखा, खंतीवादी ऋषीप्रमाणे विकाररहित (शांत) राहतो. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे - ‘‘อหุ อตีตมทฺธานํ, สมโณ ขนฺติทีปโน; ตํ ขนฺติยาเยว ฐิตํ, กาสิราชา อเฉทยี’’ติ. (ชา. ๑.๔.๕๑); 'भूतकाळात (फार पूर्वी) सहनशीलतेचा (क्षमेचा) उपदेश करणारे एक श्रमण होते. त्या क्षमेवरच दृढ राहिलेल्या श्रमणाला काशीच्या राजाने (त्याचे अवयव) कापून टाकले होते.' ภทฺรกโต วา มนสิ กโรติ ตโต อุตฺตริ อปราธาภาเวน อายสฺมา ปุณฺณตฺเถโร วิย. ยถาห โส – किंवा त्या (सहनशीलतेच्या) पलीकडे जाऊन, इतरांना दोष देण्यास वाव न ठेवता, आयुष्मान पुण्ण थेरांप्रमाणे 'हे चांगलेच झाले' असा मनात विचार करतो. जसे त्यांनी म्हटले आहे - ‘‘สเจ มํ, ภนฺเต, สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา อกฺโกสิสฺสนฺติ ปริภาสิสฺสนฺติ, ตตฺถ เม เอวํ ภวิสฺสติ ‘ภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, สุภทฺทกา วติเม สุนาปรนฺตกา มนุสฺสา, ยํ เม นยิเม ปาณินา ปหารํ เทนฺตี’’’ติอาทิ (ม. นิ. ๓.๓๙๖; สํ. นิ. ๔.๘๘). 'भन्ते, जर सुनापरान्तक देशातील लोकांनी मला शिवीगाळ केली, माझा अपमान केला, तर माझ्या मनात असा विचार येईल: 'हे सुनापरान्तक देशातील लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरान्तक देशातील लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला हाताने मारत नाहीत.'' इत्यादी. ยาย จ สมนฺนาคโต อิสีนมฺปิ ปสํสนีโย โหติ. ยถาห สรภงฺโค อิสิ – आणि ज्या सहनशीलतेने युक्त असलेला मनुष्य ऋषींनाही प्रशंसनीय वाटतो. जसे सरभंग ऋषींनी म्हटले आहे - ‘‘โกธํ [Pg.126] วธิตฺวา น กทาจิ โสจติ,มกฺขปฺปหานํ อิสโย วณฺณยนฺติ; สพฺเพสํ วุตฺตํ ผรุสํ ขเมถ,เอตํ ขนฺตึ อุตฺตมมาหุ สนฺโต’’ติ. (ชา. ๒.๑๗.๖๔); 'क्रोधाचा नाश करून मनुष्य कधीही शोक करत नाही; गुणनाशक वृत्तीचा (मक्ख) त्याग करण्याची ऋषी प्रशंसा करतात. सर्वांच्या कठोर शब्दांचे सहन करावे; अशा सहनशीलतेला (खंतीला) सत्पुरुष सर्वोत्तम म्हणतात.' เทวตานมฺปิ ปสํสนีโย โหติ. ยถาห สกฺโก เทวานมินฺโท – तो देवांनाही प्रशंसनीय वाटतो. जसे देवांचा राजा सक्क याने म्हटले आहे - ‘‘โย หเว พลวา สนฺโต, ทุพฺพลสฺส ติติกฺขติ; ตมาหุ ปรมํ ขนฺตึ, นิจฺจํ ขมติ ทุพฺพโล’’ติ. (สํ. นิ. ๑.๒๕๐-๒๕๑); 'जो खरोखर बलवान असूनही दुर्बलाचे सहन करतो, त्यालाच सत्पुरुष परम सहनशीलता (उत्कृष्ट खंती) म्हणतात; दुर्बल तर नेहमीच सहन करतो.' พุทฺธานมฺปิ ปสํสนีโย โหติ. ยถาห ภควา – तो बुद्धांनाही प्रशंसनीय वाटतो. जसे भगवान म्हणाले आहेत - ‘‘อกฺโกสํ วธพนฺธญฺจ, อทุฏฺโฐ โย ติติกฺขติ; ขนฺตีพลํ พลาณีกํ, ตมหํ พฺรูมิ พฺราหฺมณ’’นฺติ. (ธ. ป. ๓๙๙); 'जो मनुष्य द्वेष न बाळगता शिवीगाळ, मारहाण आणि बंधन सहन करतो; ज्याचे सहनशीलतेचे बल हेच त्याचे सैन्य आहे, त्याला मी 'ब्राह्मण' म्हणतो.' สา ปเนสา ขนฺติ เอเตสญฺจ อิธ วณฺณิตานํ อญฺเญสญฺจ คุณานํ อธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพา. येथे वर्णन केलेल्या आणि इतर गुणांच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे ही सहनशीलता (खंती) 'मंगल' आहे असे समजावे. โสวจสฺสตา นาม สหธมฺมิกํ วุจฺจมาเน วิกฺเขปํ วา ตุณฺหีภาวํ วา คุณโทสจินฺตนํ วา อนาปชฺชิตฺวา อติวิย อาทรญฺจ คารวญฺจ นีจมนตญฺจ ปุรกฺขตฺวา สาธูติ วจนกรณตา. สา สพฺรหฺมจารีนํ สนฺติกา โอวาทานุสาสนิปฺปฏิลาภเหตุโต โทสปฺปหานคุณาธิคมเหตุโต จ มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. 'सोवचस्सता' (सुवचनता) म्हणजे सहधार्मिकाने उपदेश केला असता, विक्षेप (टाळाटाळ), मौन किंवा त्याचे गुणदोष शोधणे यात न पडता, अत्यंत आदर, गौरव आणि नम्रता बाळगून 'फार चांगले' असे म्हणून त्याचे वचन पाळणे होय. ती सब्रह्मचाऱ्यांकडून उपदेश आणि अनुशासनाचा लाभ होण्याचे कारण असल्यामुळे, तसेच दोषांचा त्याग व गुणांच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' म्हटली जाते. สมณานํ ทสฺสนํ นาม อุปสมิตกิเลสานํ ภาวิตกายวจีจิตฺตปญฺญานํ อุตฺตมทมถสมถสมนฺนาคตานํ ปพฺพชิตานํ อุปสงฺกมนุปฏฺฐานานุสฺสรณสฺสวนทสฺสนํ, สพฺพมฺปิ โอมกเทสนาย ทสฺสนนฺติ วุตฺตํ, ตํ มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. กสฺมา? พหูปการตฺตา. อาห จ ‘‘ทสฺสนมฺปหํ, ภิกฺขเว, เตสํ ภิกฺขูนํ พหูปการํ วทามี’’ติอาทิ (อิติวุ. ๑๐๔). ยโต หิตกาเมน กุลปุตฺเตน สีลวนฺเต ภิกฺขู ฆรทฺวารํ สมฺปตฺเต ทิสฺวา ยทิ เทยฺยธมฺโม อตฺถิ, ยถาพลํ เทยฺยธมฺเมน ปติมาเนตพฺพา. ยทิ นตฺถิ, ปญฺจปติฏฺฐิตํ กตฺวา วนฺทิตพฺพา. ตสฺมิมฺปิ อสมฺปชฺชมาเน อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา นมสฺสิตพฺพา, ตสฺมิมฺปิ อสมฺปชฺชมาเน ปสนฺนจิตฺเตน ปิยจกฺขูหิ สมฺปสฺสิตพฺพา. เอวํ ทสฺสนมูลเกนปิ หิ ปุญฺเญน อเนกานิ ชาติสหสฺสานิ จกฺขุมฺหิ โรโค วา ทาโห [Pg.127] วา อุสฺสทา วา ปิฬกา วา น โหนฺติ, วิปฺปสนฺนปญฺจวณฺณสสฺสิริกานิ โหนฺติ จกฺขูนิ รตนวิมาเน อุคฺฆาฏิตมณิกวาฏสทิสานิ, สตสหสฺสกปฺปมตฺตํ เทเวสุ จ มนุสฺเสสุ จ สมฺปตฺตีนํ ลาภี โหติ. อนจฺฉริยญฺเจตํ, ยํ มนุสฺสภูโต สปฺปญฺญชาติโก สมฺมา ปวตฺติเตน สมณทสฺสนมเยน ปุญฺเญน เอวรูปํ วิปากสมฺปตฺตึ อนุภเวยฺย, ยตฺถ ติรจฺฉานคตานมฺปิ เกวลํ สทฺธามตฺตเกน กตสฺส สมณทสฺสนสฺส เอวํ วิปากสมฺปตฺตึ วณฺณยนฺติ. 'श्रमणांचे दर्शन' म्हणजे ज्यांचे क्लेश शांत झाले आहेत, ज्यांचे शरीर, वाणी, मन आणि प्रज्ञा विकसित झाली आहे, जे उत्तम इंद्रियसंयम आणि शम (शांती) यांनी युक्त आहेत, अशा प्रव्रजितांकडे जाणे, त्यांची सेवा करणे, त्यांचे स्मरण करणे, त्यांचे प्रवचन ऐकणे आणि त्यांचे दर्शन घेणे होय. या सर्वांनाच संक्षिप्त उपदेशाच्या दृष्टीने 'दर्शन' म्हटले आहे. ते 'मंगल' आहे असे समजावे. का? कारण ते अत्यंत उपकारक आहे. भगवान म्हणाले आहेत - 'भिक्खूंनो, मी त्या भिक्खूंचे दर्शन घेणे अत्यंत उपकारक मानतो' इत्यादी. म्हणूनच, कल्याणाची इच्छा करणाऱ्या कुलपुत्राने जेव्हा शीलवान भिक्खू आपल्या घराच्या दाराशी आलेले पाहावे, तेव्हा जर दान देण्यासारखी वस्तू (देय्यधम्म) असेल, तर आपल्या शक्तीनुसार दानाने त्यांचा सत्कार करावा. जर नसेल, तर पंचांग प्रणाम (पंचपतिट्ठित) करून वंदन करावे. तेही शक्य नसेल, तर हात जोडून नमस्कार करावा. तेही शक्य नसेल, तर प्रसन्न चित्ताने आणि प्रेमळ नजरेने त्यांच्याकडे पाहावे. कारण अशा दर्शनमूलक पुण्याच्या प्रभावाने अनेक हजार जन्मांपर्यंत डोळ्यांचे रोग, जळजळ, सूज किंवा मोतीबिंदू इत्यादी होत नाहीत. डोळे अत्यंत स्वच्छ, पंचरंगी कांतीने युक्त आणि रत्नविमानातील उघडलेल्या मणिकपाटासारखे तेजस्वी होतात. तसेच तो मनुष्य एक लाख कल्पपर्यंत देवलोकात आणि मनुष्यलोकात सर्व प्रकारच्या संपत्तीचा लाभ घेणारा होतो. शहाणा मनुष्य असलेल्या मानवाने योग्य प्रकारे केलेल्या श्रमणदर्शनाच्या पुण्यामुळे अशा प्रकारच्या विपाक-संपत्तीचा अनुभव घेणे यात काही आश्चर्य नाही, कारण केवळ श्रद्धेने प्राण्यांनी घेतलेल्या श्रमणदर्शनाच्या विपाक-संपत्तीचीही अशी प्रशंसा केली जाते. ‘‘อุลูโก มณฺฑลกฺขิโก, เวทิยเก จิรทีฆวาสิโก; สุขิโต วต โกสิโย อยํ, กาลุฏฺฐิตํ ปสฺสติ พุทฺธวรํ. 'गोल डोळे असलेला, वेदियक पर्वतावर दीर्घकाळ राहणारा, सुखी असलेला हा कोसीय (घूळ पक्षी) पहाटे उठलेल्या श्रेष्ठ बुद्धांचे दर्शन घेत आहे.' ‘‘มยิ จิตฺตํ ปสาเทตฺวา, ภิกฺขุสงฺเฆ อนุตฺตเร; กปฺปานํ สตสหสฺสานิ, ทุคฺคเตโส น คจฺฉติ. 'माझ्यावर आणि अनुत्तर भिक्खू संघावर चित्त प्रसन्न करून, हा पक्षी एक लाख कल्पपर्यंत दुर्गतीला जाणार नाही.' ‘‘ส เทวโลกา จวิตฺวา, กุสลกมฺเมน โจทิโต; ภวิสฺสติ อนนฺตญาโณ, โสมนสฺโสติ วิสฺสุโต’’ติ. (ม. นิ. อฏฺฐ. ๑.๑๔๔); 'तो देवलोकातून च्युत होऊन, कुशल कर्माने प्रेरित होऊन, अनंत ज्ञानी आणि सोमनस्स या नावाने प्रसिद्ध असलेला प्रत्येकबुद्ध होईल.' अशी त्यांनी भविष्यवाणी केली. กาเลน ธมฺมสากจฺฉา นาม ปโทเส วา ปจฺจูเส วา ทฺเว สุตฺตนฺติกา ภิกฺขู อญฺญมญฺญํ สุตฺตนฺตํ สากจฺฉนฺติ, วินยธรา วินยํ, อาภิธมฺมิกา อภิธมฺมํ, ชาตกภาณกา ชาตกํ, อฏฺฐกถิกา อฏฺฐกถํ, ลีนุทฺธตวิจิกิจฺฉาปเรตจิตฺตวิโสธนตฺถํ วา ตมฺหิ ตมฺหิ กาเล สากจฺฉนฺติ, อยํ กาเลน ธมฺมสากจฺฉา. สา อาคมพฺยตฺติอาทีนํ คุณานํ เหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจตีติ. 'योग्य वेळी धर्मचर्चा' (कालेन धम्मसाकच्छा) म्हणजे रात्रीच्या वेळी किंवा पहाटेच्या वेळी दोन सुत्तंतिक भिक्खू आपापसात सूत्रांवर चर्चा करतात, विनयधर विनयावर, आभिधम्मिक अभिधम्मावर, जातकभाणक जातकावर, अट्ठकथाकार अट्ठकथेवर चर्चा करतात; किंवा आळस, चंचलता आणि संशय यांनी ग्रासलेल्या चित्ताच्या शुद्धीसाठी त्या त्या वेळी चर्चा करतात, याला 'योग्य वेळी धर्मचर्चा' म्हणतात. ती आगम-व्युत्पत्ती इत्यादी गुणांचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' म्हटली जाते. เอวํ อิมิสฺสา คาถาย ขนฺติ, โสวจสฺสตา, สมณทสฺสนํ, กาเลน ธมฺมสากจฺฉาติ จตฺตาริ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे, या गाथेमध्ये खंती (सहनशीलता), सोवचस्सता (सुवचनता), श्रमणदर्शन आणि योग्य वेळी धर्मचर्चा अशी चार मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา ขนฺตี จาติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'खंती च' या गाथेचे अर्थस्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) समाप्त झाले. ตโปจาติคาถาวณฺณนา 'तपो च' गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๑. อิทานิ [Pg.128] ตโป จาติ เอตฺถ ปาปเก ธมฺเม ตปตีติ ตโป. พฺรหฺมํ จริยํ, พฺรหฺมานํ วา จริยํ พฺรหฺมจริยํ, เสฏฺฐจริยนฺติ วุตฺตํ โหติ. อริยสจฺจานํ ทสฺสนํ อริยสจฺจานทสฺสนํ, อริยสจฺจานิ ทสฺสนนฺติปิ เอเก, ตํ น สุนฺทรํ. นิกฺขนฺตํ วานโตติ นิพฺพานํ, สจฺฉิกรณํ สจฺฉิกิริยา, นิพฺพานสฺส สจฺฉิกิริยา นิพฺพานสจฺฉิกิริยา. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ อยํ ปทวณฺณนา. ११. आता 'तपो च' या पदाविषयी: जे पापधर्मांना (अकुशल धर्मांना) तप्त करते, ते 'तप' होय. 'ब्रह्म चर्य' किंवा 'ब्रह्मांचे (श्रेष्ठांचे) आचरण' म्हणजे 'ब्रह्मचर्य' होय, ज्याला श्रेष्ठ आचरण असे म्हटले आहे. आर्य सत्यांचे दर्शन म्हणजे 'अरियसच्चानदस्सन' (आर्यसत्यदर्शन) होय. काही आचार्य 'अरियसच्चानि दस्सनं' असा पाठ वाचतात, पण तो योग्य नाही. 'वान' (तृष्णा) पासून मुक्त होणे म्हणजे 'निब्बान' (निर्वाण) होय. प्रत्यक्ष अनुभवणे म्हणजे 'सच्छिकिरिया' (साक्षात्कार) होय. निर्वाणाचा साक्षात्कार म्हणजे 'निब्बानसच्छिकिरिया' होय. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. हे पदांचे स्पष्टीकरण (पदवण्णना) आहे. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – ตโป นาม อภิชฺฌาโทมนสฺสาทีนํ ตปนโต อินฺทฺริยสํวโร, โกสชฺชสฺส วา ตปนโต วีริยํ, เตหิ สมนฺนาคโต ปุคฺคโล อาตาปีติ วุจฺจติ. สฺวายํ อภิชฺฌาทิปฺปหานฌานาทิปฺปฏิลาภเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺโพ. अर्थाचे स्पष्टीकरण (अत्थवण्णना) याप्रमाणे समजावे - 'तप' म्हणजे अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य) इत्यादी अकुशल धर्मांना तप्त (नष्ट) करत असल्यामुळे 'इंद्रियसंवर' होय; किंवा आळसाला तप्त करत असल्यामुळे 'वीर्य' (उत्साह) होय. या गुणांनी युक्त असलेल्या व्यक्तीला 'आतापी' (उद्योगी) म्हटले जाते. हे तप अभिज्झा इत्यादींचा त्याग करून ध्यान इत्यादींच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे समजावे. พฺรหฺมจริยํ นาม เมถุนวิรติสมณธมฺมสาสนมคฺคานมธิวจนํ. ตถา หิ ‘‘อพฺรหฺมจริยํ ปหาย พฺรหฺมจารี โหตี’’ติ เอวมาทีสุ (ที. นิ. ๑.๑๙๔; ม. นิ. ๑.๒๙๒) เมถุนวิรติ พฺรหฺมจริยนฺติ วุจฺจติ. ‘‘ภควติ โน, อาวุโส, พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตีติ? เอวมาวุโส’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๒๕๗) สมณธมฺโม. ‘‘น ตาวาหํ, ปาปิม, ปรินิพฺพายิสฺสามิ, ยาว เม อิทํ พฺรหฺมจริยํ น อิทฺธญฺเจว ภวิสฺสติ ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญ’’นฺติ เอวมาทีสุ (ที. นิ. ๒.๑๖๘; สํ. นิ. ๕.๘๒๒; อุทา. ๕๑) สาสนํ. ‘‘อยเมว โข, ภิกฺขุ, อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค พฺรหฺมจริยํ. เสยฺยถิทํ, สมฺมาทิฏฺฐี’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๕.๖) มคฺโค. อิธ ปน อริยสจฺจทสฺสเนน ปรโต มคฺคสฺส สงฺคหิตตฺตา อวเสสํ สพฺพมฺปิ วฏฺฏติ. ตญฺเจตํ อุปรูปริ นานปฺปการวิเสสาธิคมเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. ब्रह्मचर्य हे मैथुनविरती (मैथुनापासून दूर राहणे), श्रमणधर्म, बुद्धशासन आणि आर्य अष्टांगिक मार्ग यांचे नाव आहे. कारण की, 'अब्रह्मचर्य त्यागून मनुष्य ब्रह्मचारी होतो' इत्यादी उपदेशांमध्ये मैथुनविरतीला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले जाते. 'हे आवुसो, भगवंतांच्या सन्निध ब्रह्मचर्य आचरले जाते का? होय, आवुसो' इत्यादी संवादांमध्ये श्रमणधर्माला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले जाते. 'हे पापी मार! जोपर्यंत माझे हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत आणि बहुजनमान्य होत नाही, तोपर्यंत मी परिनिर्वाण प्राप्त करणार नाही' इत्यादी वचनांमध्ये बुद्धशासनाला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले जाते. 'भिक्खूंनो, हा आर्य अष्टांगिक मार्ग म्हणजेच ब्रह्मचर्य होय, जसे की सम्यक् दृष्टी...' इत्यादी सूत्रांमध्ये मार्गाला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले जाते. परंतु येथे (या गाथेत) आर्यसत्यांच्या दर्शनाद्वारे शैक्ष (साधकासाठी) मार्गाचा अंतर्भाव होत असल्यामुळे उर्वरित सर्व प्रकारच्या ब्रह्मचर्याचा स्वीकार करणे योग्य ठरते. आणि ते ब्रह्मचर्य उत्तरोत्तर विविध प्रकारच्या विशेष गुणांच्या प्राप्तीचे कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. อริยสจฺจาน ทสฺสนํ นาม กุมารปญฺเห วุตฺตานํ จตุนฺนํ อริยสจฺจานํ อภิสมยวเสน มคฺคทสฺสนํ, ตํ สํสารทุกฺขวีติกฺกมเหตุโต มงฺคลนฺติ วุจฺจติ. आर्यसत्यांचे दर्शन म्हणजे 'कुमारप्रश्ना'मध्ये सांगितलेल्या चार आर्यसत्यांचा अभिसमय (साक्षात्कार) करण्याच्या दृष्टीने होणारे मार्गदर्शन (मार्गज्ञान) होय. ते संसारदुःखातून पार पडण्याचे कारण असल्यामुळे त्याला 'मंगल' म्हटले जाते. นิพฺพานสจฺฉิกิริยา นาม อิธ อรหตฺตผลํ นิพฺพานนฺติ อธิปฺเปตํ. ตมฺปิ หิ ปญฺจคติวานเนน วานสญฺญิตาย ตณฺหาย นิกฺขนฺตตฺตา นิพฺพานนฺติ วุจฺจติ. ตสฺส [Pg.129] ปตฺติ วา ปจฺจเวกฺขณา วา สจฺฉิกิริยาติ วุจฺจติ. อิตรสฺส ปน นิพฺพานสฺส อริยสจฺจานํ ทสฺสเนเนว สจฺฉิกิริยา สิทฺธา, เตเนตํ อิธ นาธิปฺเปตํ. เอวเมสา นิพฺพานสจฺฉิกิริยา ทิฏฺฐธมฺมิกสุขวิหาราทิเหตุโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพา. निर्वाणसाक्षात्कार म्हणजे येथे अर्हतफलाला 'निर्वाण' म्हणून अभिप्रेत आहे. कारण ते (अर्हतफल) देखील पाच गतींमध्ये बांधून ठेवणाऱ्या 'वाण' नावाच्या तृष्णेपासून मुक्त झाल्यामुळे 'निर्वाण' म्हटले जाते. त्याची प्राप्ती किंवा त्याचे प्रत्यवेक्षण (पुनरावलोकन) करणे याला 'साक्षात्कार' (सच्छिकिरिया) म्हटले जाते. इतर (मुख्य) निर्वाणाचा साक्षात्कार तर आर्यसत्यांच्या दर्शनानेच सिद्ध होतो, म्हणून तो येथे अभिप्रेत नाही. अशा प्रकारे, हा निर्वाणसाक्षात्कार याच जन्मात सुखाने विहरण्याचे (दृष्टधार्मिक सुखविहार) कारण असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. เอวํ อิมิสฺสา คาถาย ตโป พฺรหฺมจริยํ, อริยสจฺจานํ ทสฺสนํ, นิพฺพานสจฺฉิกิริยาติ จตฺตาริ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे या गाथेत तप, ब्रह्मचर्य, आर्यसत्यांचे दर्शन आणि निर्वाणसाक्षात्कार अशी चार मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา ตโป จาติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'तपो च' या गाथेची अर्थवर्णना समाप्त झाली. ผุฏฺฐสฺสโลกธมฺเมหีติคาถาวณฺณนา 'फुट्ठस्स लोकधम्मेहि' या गाथेची अर्थवर्णना. ๑๒. อิทานิ ผุฏฺฐสฺส โลกธมฺเมหีติ เอตฺถ ผุฏฺฐสฺสาติ ผุสิตสฺส ฉุปิตสฺส สมฺปตฺตสฺส. โลเก ธมฺมา โลกธมฺมา, ยาว โลกปฺปวตฺติ, ตาว อนิวตฺตกา ธมฺมาติ วุตฺตํ โหติ. จิตฺตนฺติ มโน มานสํ. ยสฺสาติ นวสฺส วา มชฺฌิมสฺส วา เถรสฺส วา. น กมฺปตีติ น จลติ น เวธติ. อโสกนฺติ นิสฺโสกํ อพฺพูฬฺหโสกสลฺลํ. วิรชนฺติ วิคตรชํ วิทฺธํสิตรชํ. เขมนฺติ อภยํ นิรุปทฺทวํ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ อยํ ปทวณฺณนา. १२. आता 'फुट्ठस्स लोकधम्मेहि' या गाथेत—'फुट्ठस्स' म्हणजे स्पर्श झालेल्या, प्राप्त झालेल्या. लोकात उत्पन्न होणारे धर्म म्हणजे 'लोकधर्म'; जोपर्यंत जगाचे अस्तित्व आहे, तोपर्यंत न टाळता येणारे हे धर्म आहेत, असा याचा अर्थ आहे. 'चित्त' म्हणजे मन किंवा मानस. 'यस्स' म्हणजे ज्याचे (नवशिक्या भिक्खूचे, मध्यम भिक्खूचे किंवा स्थवीर भिक्खूचे). 'न कम्पति' म्हणजे डळमळीत होत नाही, कंप पावत नाही. 'असोकं' म्हणजे शोकरहित, ज्याच्यातील शोकरूपी शल्य उपटून टाकले आहे असे. 'विरजं' म्हणजे रागादी क्लेशांची धूळ नष्ट झालेली. 'खेमं' म्हणजे भयमुक्त, उपद्रवरहित. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावा. ही पदवर्णना (शब्दांचा अर्थ) आहे. อตฺถวณฺณนา ปน เอวํ เวทิตพฺพา – ผุฏฺฐสฺส โลกธมฺเมหิ จิตฺตํ ยสฺส น กมฺปติ นาม ยสฺส ลาภาลาภาทีหิ อฏฺฐหิ โลกธมฺเมหิ ผุฏฺฐสฺส อชฺโฌตฺถฏสฺส จิตฺตํ น กมฺปติ น จลติ น เวธติ, ตสฺส ตํ จิตฺตํ เกนจิ อกมฺปนียโลกุตฺตมภาวาวหนโต มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. अर्थवर्णना याप्रमाणे जाणावी—'लोकधर्मांनी स्पर्श केला असता ज्याचे चित्त कंप पावत नाही' म्हणजे लाभ-अलाभ इत्यादी आठ लोकधर्मांनी स्पर्श केला असता किंवा प्रभावित केले असता ज्या अर्हताचे चित्त कंप पावत नाही, डळमळीत होत नाही, विचलित होत नाही; त्याचे ते चित्त कशानेही कंपित न होणारे असल्यामुळे आणि लोकोत्तर अवस्था प्राप्त करून देणारे असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. กสฺส จ เอเตหิ ผุฏฺฐสฺส จิตฺตํ น กมฺปตีติ? อรหโต ขีณาสวสฺส, น อญฺญสฺส กสฺสจิ. วุตฺตญฺเหตํ – आणि या लोकधर्मांनी स्पर्श केला असता कोणाचे चित्त कंप पावत नाही? अर्हत, क्षीणासवाचे (ज्याचे आसव नष्ट झाले आहेत अशाचे) चित्त कंप पावत नाही, इतर कोणाचेही नाही. कारण असे म्हटले आहे— ‘‘เสโล ยถา เอกคฺฆโน, วาเตน น สมีรติ; เอวํ รูปา รสา สทฺทา, คนฺธา ผสฺสา จ เกวลา. ज्याप्रमाणे एकसंध भक्कम पाषाण पर्वत वाऱ्याने हलत नाही, त्याचप्रमाणे सर्व प्रकारचे रूप, रस, शब्द, गंध आणि स्पर्श, ‘‘อิฏฺฐา ธมฺมา อนิฏฺฐา จ, น ปเวเธนฺติ ตาทิโน; ฐิตํ จิตฺตํ วิปฺปมุตฺตํ, วยญฺจสฺสานุปสฺสตี’’ติ. (มหาว. ๒๔๔); तसेच इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टी, अशा तादी (समता बाळगणाऱ्या अर्हताच्या) चित्ताला विचलित करू शकत नाहीत. त्याचे चित्त स्थिर आणि विमुक्त असते, आणि तो (सर्व संस्कारांच्या) व्ययाचे (नाशवंततेचे) अनुदर्शन करत असतो. อโสกํ [Pg.130] นาม ขีณาสวสฺเสว จิตฺตํ. ตญฺหิ ยฺวายํ ‘‘โสโก โสจนา โสจิตตฺตํ อนฺโตโสโก อนฺโตปริโสโก เจตโส ปรินิชฺฌายิตตฺต’’นฺติอาทินา (วิภ. ๒๓๗) นเยน วุจฺจติ โสโก, ตสฺส อภาวโต อโสกํ. เกจิ นิพฺพานํ วทนฺติ, ตํ ปุริมปเทน นานุสนฺธิยติ. ยถา จ อโสกํ, เอวํ วิรชํ เขมนฺติปิ ขีณาสวสฺเสว จิตฺตํ. ตญฺหิ ราคโทสโมหรชานํ วิคตตฺตา วิรชํ, จตูหิ จ โยเคหิ เขมตฺตา เขมํ, ยโต เอตํ เตน เตนากาเรน ตมฺหิ ตมฺหิ ปวตฺติกฺขเณ คเหตฺวา นิทฺทิฏฺฐวเสน ติวิธมฺปิ อปฺปวตฺตกฺขนฺธตาทิโลกุตฺตมภาวาวหนโต อาหุเนยฺยาทิภาวาวหนโต จ มงฺคลนฺติ เวทิตพฺพํ. 'अशोक' म्हणजे क्षीणासव अर्हताचेच चित्त होय. कारण त्याचे ते चित्त, 'शोक, शोकाकुलता, शोकावस्था, अंतःशोक, तीव्र अंतःशोक, मनाचे जळणे' इत्यादी प्रकारे ज्याला शोक म्हटले जाते, त्या शोकाचा अभाव असल्यामुळे 'अशोक' आहे. काही आचार्य निर्वाणाला 'अशोक' म्हणतात, परंतु त्याचा पूर्वपदाशी मेळ बसत नाही. आणि ज्याप्रमाणे 'अशोक' हे क्षीणासवाचेच चित्त असते, त्याचप्रमाणे 'विरज' आणि 'खेम' (क्षेम) देखील क्षीणासवाचेच चित्त असते. कारण ते चित्त राग, द्वेष आणि मोह रूपी धुळीपासून मुक्त असल्यामुळे 'विरज' (धुळीरहित) आहे, आणि चार योगांपासून मुक्त असल्यामुळे 'खेम' (सुरक्षित) आहे. ज्या कारणाने, त्या त्या प्रकारे, त्या त्या प्रवृत्तीच्या क्षणी ग्रहण करून निर्देश केल्यानुसार, हे 'अशोक', 'विरज' आणि 'खेम' हे तिन्ही शब्द, पुन्हा उत्पन्न न होणारे स्कंध इत्यादी लोकोत्तर अवस्था प्राप्त करून देणारे असल्यामुळे आणि आहुनेय (पूजेस पात्र) इत्यादी भाव प्राप्त करून देणारे असल्यामुळे 'मंगल' आहे असे जाणावे. เอวํ อิมิสฺสา คาถาย อฏฺฐโลกธมฺเมหิ อกมฺปิตจิตฺตํ, อโสกจิตฺตํ, วิรชจิตฺตํ, เขมจิตฺตนฺติ จตฺตาริ มงฺคลานิ วุตฺตานิ. มงฺคลตฺตญฺจ เนสํ ตตฺถ ตตฺถ วิภาวิตเมวาติ. अशा प्रकारे या गाथेत आठ लोकधर्मांनी कंपित न होणारे चित्त, शोकरहित चित्त, क्लेशधुळीरहित चित्त आणि सुरक्षित (भयमुक्त) चित्त अशी चार मंगले सांगितली आहेत. आणि त्यांचे मंगलत्व त्या त्या ठिकाणी स्पष्ट केलेच आहे. นิฏฺฐิตา ผุฏฺฐสฺส โลกธมฺเมหีติ อิมิสฺสา คาถาย อตฺถวณฺณนา. 'फुट्ठस्स लोकधम्मेहि' या गाथेची अर्थवर्णना समाप्त झाली. เอตาทิสานีติคาถาวณฺณนา 'एतादिसाने' या गाथेची अर्थवर्णना. ๑๓. เอวํ ภควา อเสวนา จ พาลานนฺติอาทีหิ ทสหิ คาถาหิ อฏฺฐตึส มหามงฺคลานิ กเถตฺวา อิทานิ เอตาเนว อตฺตนา วุตฺตมงฺคลานิ ถุนนฺโต ‘‘เอตาทิสานิ กตฺวานา’’ติ อวสานคาถมภาสิ. १३. अशा प्रकारे भगवंतांनी 'असेवना च बालानां' इत्यादी दहा गाथांद्वारे अडतीस महामंगले सांगितल्यानंतर, आता स्वतः सांगितलेल्या या मंगलांची प्रशंसा करत 'एतादिसाने कत्वान' ही अंतिम गाथा म्हटली. ตสฺสายมตฺถวณฺณนา – เอตาทิสานีติ เอตานิ อีทิสานิ มยา วุตฺตปฺปการานิ พาลานํ อเสวนาทีนิ. กตฺวานาติ กตฺวา. กตฺวาน กตฺวา กริตฺวาติ หิ อตฺถโต อนญฺญํ. สพฺพตฺถมปราชิตาติ สพฺพตฺถ ขนฺธกิเลสาภิสงฺขารเทวปุตฺตมารปฺปเภเทสุ จตูสุ ปจฺจตฺถิเกสุ เอเกนาปิ อปราชิตา หุตฺวา, สยเมว เต จตฺตาโร มาเร ปราเชตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. มกาโร เจตฺถ ปทสนฺธิกรมตฺโตติ วิญฺญาตพฺโพ. तिची अर्थवर्णना याप्रमाणे आहे—'एतादिसाने' म्हणजे माझ्याद्वारे सांगितलेल्या या प्रकारची, मूर्खांची संगत न करणे इत्यादी (मंगले). 'कत्वान' म्हणजे करून; कारण 'कत्वान', 'कत्वा' आणि 'करित्वा' या शब्दांचा अर्थ एकच आहे. 'सब्बत्थमप्पराजिता' म्हणजे सर्व ठिकाणी स्कंधमार, क्लेशमार, अभिसंस्कारमार आणि देवपुत्रमार या चार शत्रूंपैकी एकाकडूनही पराभूत न होता, स्वतःच त्या चारही मारांना पराभूत करून, असा याचा अर्थ आहे. आणि येथील 'म' हा वर्ण केवळ पदसंधी जोडण्यासाठी आला आहे, असे जाणावे. สพฺพตฺถ โสตฺถึ คจฺฉนฺตีติ เอตาทิสานิ มงฺคลานิ กตฺวา จตูหิ มาเรหิ อปราชิตา หุตฺวา สพฺพตฺถ อิธโลกปรโลเกสุ ฐานจงฺกมนาทีสุ จ โสตฺถึ คจฺฉนฺติ, พาลเสวนาทีหิ เย อุปฺปชฺเชยฺยุํ อาสวา [Pg.131] วิฆาตปริฬาหา, เตสํ อภาวา โสตฺถึ คจฺฉนฺติ, อนุปทฺทุตา อนุปสฏฺฐา เขมิโน อปฺปฏิภยา คจฺฉนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. อนุนาสิโก เจตฺถ คาถาพนฺธสุขตฺถํ วุตฺโตติ เวทิตพฺโพ. 'सब्बत्थ सोत्थिं गच्छन्ति' म्हणजे अशी मंगले आचरून, चारही मारांकडून अपराजित राहून, सर्व ठिकाणी, या लोकात आणि परलोकात, तसेच उभे राहणे, चंक्रमण करणे इत्यादी सर्व अवस्थांमध्ये कल्याणाला (सुखाला) प्राप्त होतात. मूर्खांची संगत इत्यादींमुळे जे त्रास आणि परिदाह (जळजळ) उत्पन्न होऊ शकले असते, त्यांच्या अभावामुळे ते सुखाला प्राप्त होतात. ते उपद्रवरहित, निंदारहित, सुरक्षित आणि भयरहित होऊन मार्गक्रमण करतात, असा याचा अर्थ आहे. आणि येथील अनुनासिक गाथेच्या रचनेच्या सुलभतेसाठी वापरला आहे, असे जाणावे. ตํ เตสํ มงฺคลมุตฺตมนฺติ อิมินา คาถาปเทน ภควา เทสนํ นิฏฺฐาเปสิ. กถํ? เอวํ, เทวปุตฺต, เย เอตาทิสานิ กโรนฺติ, เต ยสฺมา สพฺพตฺถ โสตฺถึ คจฺฉนฺติ, ตสฺมา ตํ พาลานํ อเสวนาทิอฏฺฐตึสวิธมฺปิ เตสํ เอตาทิสการกานํ มงฺคลมุตฺตมํ เสฏฺฐํ ปวรนฺติ คณฺหาหีติ. ‘तं तेसं मङ्गलमुत्तमं’ (ते त्यांचे उत्तम मंगल आहे) या गाथापदाने भगवंतांनी देशनेची समाप्ती केली. कशी? 'हे देवपुत्रा, जे लोक अशा प्रकारची (मंगले) करतात, ते सर्व ठिकाणी सुखरूप जातात; म्हणून मूर्खांची असंगतता (असेवना) इत्यादी ३८ प्रकारची ती मंगले अशा करणाऱ्यांसाठी उत्तम, श्रेष्ठ आणि प्रवर आहेत, असे तू ग्रहण कर (समजून घे).' เอวญฺจ ภควตา นิฏฺฐาปิตาย เทสนาย ปริโยสาเน โกฏิสตสหสฺสเทวตาโย อรหตฺตํ ปาปุณึสุ, โสตาปตฺติสกทาคามิอนาคามิผลสมฺปตฺตานํ คณนา อสงฺขฺเยยฺยา อโหสิ. อถ ภควา ทุติยทิวเส อานนฺทตฺเถรํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิมํ ปน, อานนฺท, รตฺตึ อญฺญตรา เทวตา มํ อุปสงฺกมิตฺวา มงฺคลปญฺหํ ปุจฺฉิ, อถสฺสาหํ อฏฺฐตึส มงฺคลานิ อภาสึ, อุคฺคณฺหาหิ, อานนฺท, อิมํ มงฺคลปริยายํ, อุคฺคเหตฺวา ภิกฺขู วาเจหี’’ติ. เถโร อุคฺคเหตฺวา ภิกฺขู วาเจสิ. ตยิทํ อาจริยปรมฺปราย อาภตํ ยาวชฺชตนา ปวตฺตติ, ‘‘เอวมิทํ พฺรหฺมจริยํ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาว เทวมนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิต’’นฺติ เวทิตพฺพํ. अशा प्रकारे भगवंतांनी देशना समाप्त केली असता, तिच्या शेवटी एक लाख कोटी देवतांनी अर्हत्त्व प्राप्त केले; आणि स्रोतापत्ती, सकदागामी व अनागामी फल प्राप्त करणाऱ्यांची गणना असंख्य होती. त्यानंतर भगवंतांनी दुसऱ्या दिवशी आयुष्मान आनंदांना आमंत्रित केले (आणि म्हणाले) – “आनंदा, काल रात्री एका देवतेने माझ्याकडे येऊन मंगलाविषयी प्रश्न विचारला. तेव्हा मी तिला अडतीस मंगले सांगितली. आनंदा, तू या मंगल उपदेशाचे ग्रहण कर आणि ग्रहण करून तो भिक्खूंना शिकव.” स्थविरांनी (आनंदांनी) तो ग्रहण करून भिक्खूंना शिकवला. आचार्य परंपरेने चालत आलेला हा मंगलसुत्त आजतागायत प्रवर्तित आहे. “अशा प्रकारे हे ब्रह्मचर्य (शासन) समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनमान्य, विशाल आणि देव-मनुष्यांमध्ये उत्तम प्रकारे प्रकाशित झाले आहे,” असे समजावे. อิทานิ เอเตสฺเวว มงฺคเลสุ ญาณปริจยปาฏวตฺถํ อยมาทิโต ปภุติ โยชนา – เอวมิเม อิธโลกปรโลกโลกุตฺตรสุขกามา สตฺตา พาลชนเสวนํ ปหาย, ปณฺฑิเต นิสฺสาย, ปูชเนยฺเย ปูเชตฺวา, ปติรูปเทสวาเสน ปุพฺเพ จ กตปุญฺญตาย กุสลปฺปวตฺติยํ โจทิยมานา อตฺตานํ สมฺมา ปณิธาย, พาหุสจฺจสิปฺปวินเยหิ อลงฺกตตฺตภาวา, วินยานุรูปํ สุภาสิตํ ภาสมานา, ยาว คิหิภาวํ น วิชหนฺติ, ตาว มาตาปิตูปฏฺฐาเนน โปราณํ อิณมูลํ วิโสธยมานา, ปุตฺตทารสงฺคเหน นวํ อิณมูลํ ปโยชยมานา, อนากุลกมฺมนฺตตาย ธนธญฺญาทิสมิทฺธึ ปาปุณนฺตา, ทาเนน โภคสารํ ธมฺมจริยาย ชีวิตสารญฺจ คเหตฺวา, ญาติสงฺคเหน สกชนหิตํ อนวชฺชกมฺมนฺตตาย ปรชนหิตญฺจ กโรนฺตา, ปาปวิรติยา ปรูปฆาตํ มชฺชปานสํยเมน อตฺตูปฆาตญฺจ วิวชฺเชตฺวา, ธมฺเมสุ อปฺปมาเทน กุสลปกฺขํ วฑฺเฒตฺวา, วฑฺฒิตกุสลตาย คิหิพฺยญฺชนํ โอหาย ปพฺพชิตภาเว ฐิตาปิ พุทฺธพุทฺธสาวกูปชฺฌายาจริยาทีสุ คารเวน นิวาเตน จ วตฺตสมฺปทํ อาราเธตฺวา, สนฺตุฏฺฐิยา [Pg.132] ปจฺจยเคธํ ปหาย, กตญฺญุตาย สปฺปุริสภูมิยํ ฐตฺวา, ธมฺมสฺสวเนน จิตฺตลีนตํ ปหาย, ขนฺติยา สพฺพปริสฺสเย อภิภวิตฺวา, โสวจสฺสตาย สนาถํ อตฺตานํ กตฺวา, สมณทสฺสเนน ปฏิปตฺติปโยคํ ปสฺสนฺตา, ธมฺมสากจฺฉาย กงฺขาฏฺฐานิเยสุ ธมฺเมสุ กงฺขํ วิโนเทตฺวา, อินฺทฺริยสํวรตเปน สีลวิสุทฺธึ สมณธมฺมพฺรหฺมจริเยน จิตฺตวิสุทฺธึ ตโต ปรา จ จตสฺโส วิสุทฺธิโย สมฺปาเทนฺตา, อิมาย ปฏิปทาย อริยสจฺจทสฺสนปริยายํ ญาณทสฺสนวิสุทฺธึ ปตฺวา อรหตฺตผลสงฺขฺยํ นิพฺพานํ สจฺฉิกโรนฺติ, ยํ สจฺฉิกริตฺวา สิเนรุปพฺพโต วิย วาตวุฏฺฐีหิ อฏฺฐหิ โลกธมฺเมหิ อวิกมฺปมานจิตฺตา อโสกา วิรชา เขมิโน โหนฺติ. เย จ เขมิโน โหนฺติ, เต สพฺพตฺถ เอเกนปิ อปราชิตา โหนฺติ, สพฺพตฺถ โสตฺถึ คจฺฉนฺติ. เตนาห ภควา – आता या मंगलांमध्ये ज्ञानाचा सराव व नैपुण्य मिळवण्यासाठी सुरुवातीपासूनचा संबंध (योजना) असा आहे – अशा प्रकारे, या लोकात, परलोकात आणि लोकोत्तर सुखाची इच्छा करणारे हे प्राणी मूर्ख लोकांची संगत सोडून, पंडितांचा आश्रय घेऊन, पूजनीयांची पूजा करून, योग्य देशात वास्तव्य केल्याने आणि पूर्वपुण्यामुळे कुशल प्रवृत्तीत प्रेरित होऊन स्वतःला योग्य मार्गावर प्रस्थापित करतात. बहुश्रुतता, शिल्प आणि विनय यांनी स्वतःला सुशोभित करून, विनयानुरूप सुभाषित बोलत, जोपर्यंत ते गृहस्थभाव सोडत नाहीत, तोपर्यंत मातापित्यांची सेवा करून जुने ऋण फेडतात, आणि पुत्रांचे व पत्नीचे संगोपन करून नवीन ऋण (कर्तव्य) जोडतात. व्याकुळता नसलेल्या (अनाकुल) कर्माने धनधान्य इत्यादी समृद्धी प्राप्त करत, दानाने भोगाचे सार आणि धम्मचरणाने जीवनाचे सार ग्रहण करून, नातेवाईकांचे कल्याण करून स्वतःच्या लोकांचे हित आणि निष्पाप कर्माने इतरांचे हित साधतात. पापापासून विरत राहून पर-पीडा वर्ज्य करतात, आणि मद्यपानाच्या संयमाने आत्म-पीडा वर्ज्य करतात. धम्मामध्ये अप्रमाद ठेवून कुशल पक्षाची वृद्धी करतात. वृद्धिंगत झालेल्या कुशलतेमुळे गृहस्थाचे रूप सोडून प्रव्रजित अवस्थेत स्थित झाल्यावरही बुद्ध, बुद्धश्रावक, उपाध्याय, आचार्य इत्यादींबद्दल आदर आणि नम्रतेने युक्त होऊन आचारसंपन्नता प्राप्त करतात. संतोषाने प्रत्ययांची (साधनांची) आसक्ती सोडून, कृतज्ञतेने सत्पुरुषांच्या भूमीवर स्थित राहून, धम्मश्रवणाने चित्ताचा आळस सोडून, क्षमेने सर्व संकटांवर मात करून, सुवचतेने (ऐकण्याच्या वृत्तीने) स्वतःला सनाथ करून, श्रमणांच्या दर्शनाने प्रतिपत्तीचा (साधनेचा) प्रयोग पाहत, धम्मचर्चेने संशयास्पद बाबींमधील संशय दूर करून, इंद्रियसंयम रूपी तपाने शीलविशुद्धी, श्रमणधम्म व ब्रह्मचर्याने चित्तविशुद्धी आणि त्यानंतरच्या इतर चार विशुद्धी प्राप्त करत, या प्रतिपदेने (मार्गाने) या अरीयसत्य दर्शनाच्या रूपाने ज्ञानदर्शनविशुद्धी प्राप्त करून अर्हत्त्वफल संज्ञक निर्वाणाचा साक्षातकार करतात. ज्याचा साक्षातकार केल्यावर, महामेरू पर्वत जसा वादळ-वाऱ्याने कंपित होत नाही, तसे आठ लोकधम्मांनी त्यांचे चित्त कंपित होत नाही; ते शोकरहित, विरज (रागरहित) आणि क्षेमयुक्त (सुरक्षित) होतात. आणि जे क्षेमयुक्त होतात, ते सर्व ठिकाणी एकाही शत्रूकडून पराभूत होत नाहीत, सर्व ठिकाणी सुखरूप जातात. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘เอตาทิสานิ กตฺวาน, สพฺพตฺถมปราชิตา; สพฺพตฺถ โสตฺถึ คจฺฉนฺติ, ตํ เตสํ มงฺคลมุตฺตม’’นฺติ. “अशी मंगले करून, सर्व ठिकाणी अपराजित राहून, ते सर्व ठिकाणी सुखरूप जातात; हे त्यांचे उत्तम मंगल आहे.” ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील มงฺคลสุตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. मंगलसुत्ताची वर्णना (टीका) समाप्त झाली. ๖. รตนสุตฺตวณฺณนา ६. रतनसुत्त वर्णना นิกฺเขปปฺปโยชนํ मांडणीचे प्रयोजन (निक्खेप-प्रयोजन) อิทานิ ยานีธ ภูตานีติเอวมาทินา มงฺคลสุตฺตานนฺตรํ นิกฺขิตฺตสฺส รตนสุตฺตสฺส อตฺถวณฺณนากฺกโม อนุปฺปตฺโต. ตสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ วตฺวา ตโต ปรํ สุปริสุทฺเธน ติตฺเถน นทิตฬากาทีสุ สลิลชฺโฌคาหณมิว สุปริสุทฺเธน นิทาเนน อิมสฺส สุตฺตสฺส อตฺถชฺโฌคาหณํ ทสฺเสตุํ – आता, ‘यानीध भूतानि’ इत्यादी शब्दांनी सुरू होणाऱ्या आणि मंगलसुत्तानंतर ठेवलेल्या रतनसुत्ताच्या अर्थवर्णनाचा क्रम प्राप्त झाला आहे. त्याचे येथे मांडणीचे प्रयोजन सांगून, त्यानंतर अत्यंत स्वच्छ घाटावरून नदी, तलाव इत्यादींमध्ये उतरून पाणी घेण्याप्रमाणे, अत्यंत शुद्ध अशा निदानाने (प्रस्तावनेने) या सुत्ताच्या अर्थाचे अवगाहन (प्रवेश) दाखवण्यासाठी – ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจตํ อิมํ นยํ; ปกาเสตฺวาน เอตสฺส, กริสฺสามตฺถวณฺณนํ’’. “ज्यांनी (ज्या भगवंतांनी), जेव्हा, ज्या ठिकाणी आणि ज्या कारणासाठी हे (सुत्त) सांगितले, ती पद्धत स्पष्ट करून आम्ही या (रतनसुत्ताची) अर्थवर्णना करू.” ตตฺถ [Pg.133] ยสฺมา มงฺคลสุตฺเตน อตฺตรกฺขา อกลฺยาณกรณกลฺยาณากรณปจฺจยานญฺจ อาสวานํ ปฏิฆาโต ทสฺสิโต, อิมญฺจ สุตฺตํ ปรารกฺขํ อมนุสฺสาทิปจฺจยานญฺจ อาสวานํ ปฏิฆาตํ สาเธติ, ตสฺมา ตทนนฺตรํ นิกฺขิตฺตํ สิยาติ. त्यामध्ये, कारण मंगलसुत्ताद्वारे स्वतःचे रक्षण आणि अकल्याणकारी व कल्याणकारी कारणांमुळे होणाऱ्या आसवांचा नाश दाखवला आहे; आणि हे (रतन) सुत्त इतरांचे रक्षण साधते तसेच अमनुष्य (भूत-प्रेत) इत्यादी कारणांमुळे होणाऱ्या आसवांचा नाश साधते, म्हणून यानंतर (रतनसुत्त) ठेवले असावे. อิทํ ตาวสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ. हे तर याचे येथे मांडणीचे प्रयोजन आहे. เวสาลิวตฺถุ वैशालीची कथा (वेसालीवत्थु) อิทานิ ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจต’’นฺติ เอตฺถาห ‘‘เกน ปเนตํ สุตฺตํ วุตฺตํ, กทา กตฺถ, กสฺมา จ วุตฺต’’นฺติ. วุจฺจเต – อิทญฺหิ ภควตา เอว วุตฺตํ, น สาวกาทีหิ. ตญฺจ ยทา ทุพฺภิกฺขาทีหิ อุปทฺทเวหิ อุปทฺทุตาย เวสาลิยา ลิจฺฉวีหิ ราชคหโต ยาจิตฺวา ภควา เวสาลึ อานีโต, ตทา เวสาลิยํ เตสํ อุปทฺทวานํ ปฏิฆาตตฺถาย วุตฺตนฺติ. อยํ เตสํ ปญฺหานํ สงฺเขปวิสฺสชฺชนา. วิตฺถารโต ปน เวสาลิวตฺถุโต ปภุติ โปราเณหิ วณฺณียติ. आता, “कोणी सांगितले, कधी, कोठे आणि का सांगितले” यावर विचारले जाते – “हे सुत्त कोणी सांगितले, कधी, कोठे आणि का सांगितले?” उत्तर दिले जाते – हे सुत्त भगवंतांनीच सांगितले आहे, श्रावकांनी (शिष्यांनी) नाही. आणि जेव्हा दुष्काळ इत्यादी उपद्रवांनी ग्रस्त झालेल्या वैशालीतील लिच्छवींनी राजगृहाहून भगवंतांना प्रार्थना करून वैशालीत आणले, तेव्हा वैशालीमध्ये त्या उपद्रवांचे निवारण करण्यासाठी हे सांगितले गेले. हे त्या प्रश्नांचे संक्षिप्त उत्तर आहे. विस्ताराने मात्र, वैशालीच्या कथेपासून प्राचीन आचार्यांनी याचे वर्णन केले आहे. ตตฺรายํ วณฺณนา – พาราณสิรญฺโญ กิร อคฺคมเหสิยา กุจฺฉิมฺหิ คพฺโภ สณฺฐาสิ, สา ตํ ญตฺวา รญฺโญ นิเวเทสิ, ราชา คพฺภปริหารํ อทาสิ. สา สมฺมา ปริหริยมานคพฺภา คพฺภปริปากกาเล วิชายนฆรํ ปาวิสิ. ปุญฺญวตีนํ ปจฺจูสสมเย คพฺภวุฏฺฐานํ โหติ. สา จ ตาสํ อญฺญตรา, เตน ปจฺจูสสมเย อลตฺตกปฏลพนฺธุชีวกปุปฺผสทิสํ มํสเปสึ วิชายิ. ตโต ‘‘อญฺญา เทวิโย สุวณฺณพิมฺพสทิเส ปุตฺเต วิชายนฺติ, อคฺคมเหสี มํสเปสินฺติ รญฺโญ ปุรโต มม อวณฺโณ อุปฺปชฺเชยฺยา’’ติ จินฺเตตฺวา เตน อวณฺณภเยน ตํ มํสเปสึ เอกสฺมึ ภาชเน ปกฺขิปิตฺวา อญฺญตเรน ปฏิกุชฺชิตฺวา ราชมุทฺทิกาย ลญฺฉิตฺวา คงฺคาย โสเต ปกฺขิปาเปสิ. มนุสฺเสหิ ฉฑฺฑิตมตฺเต เทวตา อารกฺขํ สํวิทหึสุ. สุวณฺณปฏฺฏกญฺเจตฺถ ชาติหิงฺคุลเกน ‘‘พาราณสิรญฺโญ อคฺคมเหสิยา ปชา’’ติ ลิขิตฺวา พนฺธึสุ. ตโต ตํ ภาชนํ อูมิภยาทีหิ อนุปทฺทุตํ คงฺคาโสเตน ปายาสิ. त्यासंबंधी हे स्पष्टीकरण आहे – असे म्हणतात की, वाराणसीच्या राजाच्या पट्टराणीच्या उदरात गर्भ राहिला. तिने ते जाणून राजाला कळवले आणि राजाने गर्भाच्या संरक्षणाची व्यवस्था केली. तिने गर्भाचे चांगल्या प्रकारे संगोपन केले आणि गर्भ परिपक्व होण्याच्या वेळी ती प्रसूतिगृहात प्रविष्ट झाली. पुण्यवान स्त्रियांची प्रसूती पहाटेच्या वेळी होते. ती देखील त्यांच्यापैकीच एक होती, त्यामुळे पहाटेच्या वेळी तिने लाक्षारसाने माखलेल्या कापडासारख्या किंवा दुपारीच्या (बंधुजीवक) फुलासारख्या लाल रंगाच्या मांसपिंडाला जन्म दिला. त्यानंतर, 'इतर राण्या सोन्याच्या मूर्तीसारख्या पुत्रांना जन्म देतात, आणि पट्टराणीने मांसपिंडाला जन्म दिला, असे राजासमोर आल्यास माझी अपकीर्ती होईल,' असा विचार करून, त्या अपकीर्तीच्या भयाने तिने तो मांसपिंड एका पात्रात ठेवला, दुसऱ्या पात्राने ते झाकले, राजमुद्रेने ते सीलबंद केले आणि गंगेच्या प्रवाहात फेकून दिले. माणसांनी ते फेकून देताच देवतांनी त्याचे रक्षण केले. त्यांनी तिथे एका सुवर्णपत्रावर शुद्ध हिंगुळाने 'वाराणसीच्या राजाच्या पट्टराणीचे अपत्य' असे लिहून ते पात्राला बांधले. त्यानंतर ते पात्र लाटा इत्यादींच्या भयापासून सुरक्षित राहून गंगेच्या प्रवाहाबरोबर वाहू लागले। เตน จ สมเยน อญฺญตโร ตาปโส โคปาลกุลํ นิสฺสาย คงฺคาตีเร วิหรติ. โส ปาโตว คงฺคํ โอตรนฺโต ภาชนํ อาคจฺฉนฺตํ ทิสฺวา [Pg.134] ปํสุกูลสญฺญาย อคฺคเหสิ. ตโต ตตฺถ ตํ อกฺขรปฏฺฏกํ ราชมุทฺทิกาลญฺฉนญฺจ ทิสฺวา มุญฺจิตฺวา ตํ มํสเปสึ อทฺทส, ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ ‘‘สิยา คพฺโภ, ตถา หิสฺส ทุคฺคนฺธปูติภาโว นตฺถี’’ติ. ตํ อสฺสมํ เนตฺวา สุทฺเธ โอกาเส ฐเปสิ. อถ อฑฺฒมาสจฺจเยน ทฺเว มํสเปสิโย อเหสุํ. ตาปโส ทิสฺวา สาธุตรํ ฐเปสิ, ตโต ปุน อฑฺฒมาสจฺจเยน เอกเมกิสฺสา เปสิยา หตฺถปาทสีสานมตฺถาย ปญฺจ ปญฺจ ปิฬกา อุฏฺฐหึสุ. ตาปโส ทิสฺวา ปุน สาธุตรํ ฐเปสิ. อถ อฑฺฒมาสจฺจเยน เอกา มํสเปสิ สุวณฺณพิมฺพสทิโส ทารโก, เอกา ทาริกา อโหสิ. เตสุ ตาปสสฺส ปุตฺตสิเนโห อุปฺปชฺชิ. องฺคุฏฺฐกโต จสฺส ขีรํ นิพฺพตฺติ. ตโต ปภุติ จ ขีรภตฺตํ ลภติ, โส ภตฺตํ ภุญฺชิตฺวา ขีรํ ทารกานํ มุเข อาสิญฺจติ. เตสํ ยํ ยํ อุทรํ ปวิฏฺฐํ, ตํ สพฺพํ มณิภาชนคตํ วิย ทิสฺสติ. เอวํ ลิจฺฉวี อเหสุํ. อปเร ปนาหุ ‘‘สิพฺเพตฺวา ฐปิตา วิย เนสํ อญฺญมญฺญํ ลีนา ฉวิ อโหสี’’ติ. เอวํ เต นิจฺฉวิตาย วา ลีนจฺฉวิตาย วา ลิจฺฉวีติ ปญฺญายึสุ. त्या वेळी एक तपस्वी गोपाळांच्या वस्तीचा आश्रय घेऊन गंगेच्या काठावर राहत होता. तो सकाळीच गंगेत उतरत असताना, त्याने एक पात्र वाहून येत असलेले पाहिले आणि पांसुकूल (टाकून दिलेली वस्तू) समजून ते घेतले. त्यानंतर त्यावर ते अक्षरे लिहिलेले सुवर्णपत्र आणि राजमुद्रेचे सील पाहून, त्याने ते उघडले आणि तो मांसपिंड पाहिला. ते पाहून त्याच्या मनात असा विचार आला – 'हा गर्भ असावा, कारण याला कोणताही दुर्गंध किंवा कुजल्याचा वास नाही.' त्याने ते आपल्या आश्रमात नेऊन एका स्वच्छ ठिकाणी ठेवले. त्यानंतर पंधरवड्यानंतर त्याचे दोन मांसपिंड झाले. तपस्व्याने ते पाहून अधिक चांगल्या प्रकारे ठेवले. त्यानंतर पुन्हा पंधरवड्यानंतर प्रत्येक मांसपिंडात हात, पाय आणि डोके यांच्यासाठी पाच-पाच अंकुरवजा उंचवटे निर्माण झाले. तपस्व्याने ते पाहून पुन्हा अधिक चांगल्या प्रकारे ठेवले. त्यानंतर पंधरवड्यानंतर एका मांसपिंडापासून सोन्याच्या मूर्तीसारखा मुलगा आणि दुसऱ्यापासून एक मुलगी झाली. त्यांच्याविषयी तपस्व्याच्या मनात पुत्रासारखे प्रेम निर्माण झाले आणि त्याच्या अंगठ्यातून दूध पाझरू लागले. तेव्हापासून तो स्वतः दुग्धयुक्त अन्न खात असे आणि ते दूध त्या बालकांच्या तोंडात घालत असे. त्यांच्या पोटात जे काही अन्न जात असे, ते सर्व एखाद्या मण्याच्या पात्रात ठेवल्याप्रमाणे बाहेरून दिसत असे. अशा प्रकारे ते 'लिच्छवी' झाले. परंतु इतर आचार्य म्हणतात की, 'त्यांची त्वचा एकमेकांना शिवून ठेवल्यासारखी जोडलेली होती.' अशा प्रकारे, त्वचा नसण्यामुळे किंवा त्वचा जोडलेली असल्यामुळे त्यांना 'लिच्छवी' म्हणून ओळखले जाऊ लागले। ตาปโส ทารเก โปเสนฺโต อุสฺสูเร คามํ ปิณฺฑาย ปวิสติ, อติทิวา ปฏิกฺกมติ. ตสฺส ตํ พฺยาปารํ ญตฺวา โคปาลกา อาหํสุ, ‘‘ภนฺเต, ปพฺพชิตานํ ทารกโปสนํ ปลิโพโธ, อมฺหากํ ทารเก เทถ, มยํ โปเสสฺสาม, ตุมฺเห อตฺตโน กมฺมํ กโรถา’’ติ. ตาปโส ‘‘สาธู’’ติ ปฏิสฺสุณิ. โคปาลกา ทุติยทิวเส มคฺคํ สมํ กตฺวา ปุปฺเผหิ โอกิริตฺวา ธชปฏากํ อุสฺสาเปตฺวา ตูริเยหิ วชฺชมาเนหิ อสฺสมํ อาคตา. ตาปโส ‘‘มหาปุญฺญา ทารกา, อปฺปมาเทน วฑฺเฒถ, วฑฺเฒตฺวา จ อญฺญมญฺญํ อาวาหวิวาหํ กโรถ, ปญฺจโครเสน ราชานํ โตเสตฺวา ภูมิภาคํ คเหตฺวา นครํ มาเปถ, ตตฺถ กุมารํ อภิสิญฺจถา’’ติ วตฺวา ทารเก อทาสิ. เต ‘‘สาธู’’ติ ปฏิสฺสุณิตฺวา ทารเก เนตฺวา โปเสสุํ. तपस्वी त्या बालकांचे संगोपन करत असताना, उशिरा गावात भिक्षेसाठी जात असे आणि खूप उशिरा परत येत असे. त्यांची ही धावपळ पाहून गोपाळ म्हणाले, "भंते! प्रव्रजितांना बालकांचे संगोपन करणे हा एक अडथळा आहे. ही बालके आम्हाला द्या, आम्ही त्यांचे संगोपन करू. आपण आपले कार्य करावे." तपस्व्याने "ठीक आहे" असे म्हणून संमती दिली. दुसऱ्या दिवशी गोपाळांनी रस्ता समतल केला, त्यावर फुले विखुरली, ध्वज आणि पताका उभारल्या आणि वाद्ये वाजवत ते आश्रमात आले. तपस्वी म्हणाला, "ही बालके महापुण्यवान आहेत. अप्रमादाने त्यांचे संगोपन करा. ती मोठी झाल्यावर त्यांचा आपापसात विवाह करा. पंचगोरसाने राजाला संतुष्ट करून भूभाग मिळवा आणि तिथे नगर वसवून त्या राजकुमाराचा राज्याभिषेक करा." असे सांगून त्यांनी ती बालके त्यांच्या स्वाधीन केली. त्यांनी "ठीक आहे" असे म्हणून संमती दिली आणि बालकांना नेऊन त्यांचे संगोपन केले। ทารกา วุฑฺฒิมนฺวาย กีฬนฺตา วิวาทฏฺฐาเนสุ อญฺเญ โคปาลทารเก หตฺเถนปิ ปาเทนปิ ปหรนฺติ, เต โรทนฺติ. ‘‘กิสฺส โรทถา’’ติ จ มาตาปิตูหิ วุตฺตา ‘‘อิเม นิมฺมาตาปิติกา ตาปสโปสิตา อมฺเห อตีว ปหรนฺตี’’ติ วทนฺติ. ตโต เตสํ มาตาปิตโร ‘‘อิเม ทารกา อญฺเญ ทารเก วิเหเฐนฺติ ทุกฺขาเปนฺติ, น อิเม สงฺคเหตพฺพา, วชฺชิตพฺพา อิเม’’ติ อาหํสุ. ตโต ปภุติ กิร โส ปเทโส ‘‘วชฺชี’’ติ [Pg.135] วุจฺจติ, ติโยชนสตํ ปริมาเณน. อถ ตํ ปเทสํ โคปาลกา ราชานํ โตเสตฺวา อคฺคเหสุํ. ตตฺเถว นครํ มาเปตฺวา โสฬสวสฺสุทฺเทสิกํ กุมารํ อภิสิญฺจิตฺวา ราชานํ อกํสุ. ตาย จสฺส ทาริกาย สทฺธึ วาเรยฺยํ กตฺวา กติกํ อกํสุ ‘‘น พาหิรโต ทาริกา อาเนตพฺพา, อิโต ทาริกา น กสฺสจิ ทาตพฺพา’’ติ. เตสํ ปฐมสํวาเสน ทฺเว ทารกา ชาตา ธีตา จ ปุตฺโต จ, เอวํ โสฬสกฺขตฺตุํ ทฺเว ทฺเว ชาตา. ตโต เตสํ ทารกานํ ยถากฺกมํ วฑฺฒนฺตานํ อารามุยฺยานนิวาสฏฺฐานปริวารสมฺปตฺตึ คเหตุํ อปฺปโหนฺตํ ตํ นครํ ติกฺขตฺตุํ คาวุตนฺตเรน คาวุตนฺตเรน ปากาเรน ปริกฺขิปึสุ, ตสฺส ปุนปฺปุนํ วิสาลีกตตฺตา เวสาลีตฺเวว นามํ ชาตํ. อิทํ เวสาลิวตฺถุ. ती बालके मोठी झाल्यावर खेळताना, भांडणाच्या वेळी इतर गोपाळ बालकांना हाताने व पायाने मारत असत, त्यामुळे ती बालके रडत असत. "का रडत आहात?" असे त्यांच्या मातापित्यांनी विचारले असता, ती म्हणाली, "हे आई-वडील नसलेले, तपस्व्याने सांभाळलेले मुलगे आम्हाला खूप मारतात." त्यानंतर त्यांच्या मातापित्यांनी म्हटले, "ही मुले इतर मुलांना त्रास देतात, त्यांना दुःख देतात. यांचा स्वीकार करता कामा नये, यांना वर्ज्य केले पाहिजे." तेव्हापासून तो प्रदेश 'वज्जी' म्हणून ओळखला जाऊ लागला, ज्याचा विस्तार तीनशे योजने होता. त्यानंतर गोपाळांनी राजाला संतुष्ट करून तो प्रदेश आपल्या ताब्यात घेतला. तिथेच त्यांनी एक नगर वसवले आणि सोळा वर्षांच्या राजकुमाराचा राज्याभिषेक करून त्याला राजा बनवले. आणि त्या राजकुमारीशी त्याचा विवाह करून त्यांनी असा करार केला की, "बाहेरून कोणतीही मुलगी आणली जाणार नाही आणि येथील कोणतीही मुलगी बाहेर कोणालाही दिली जाणार नाही." त्यांच्या पहिल्या समागमातून दोन बालके जन्माला आली – एक मुलगी आणि एक मुलगा. अशा प्रकारे सोळा वेळा दोन-दोन बालके जन्माला आली. त्यानंतर ती मुले जसजशी मोठी होऊ लागली, तसतसे त्यांचे आराम (उद्याने), निवासस्थाने आणि सेवकवर्ग यांच्यासाठी ते नगर अपुरे पडू लागले. म्हणून त्यांनी तीन वेळा, प्रत्येक वेळी एक-एक गाऊत अंतराने तटबंदीने ते नगर वेढले. ते नगर वारंवार विस्तीर्ण केल्यामुळे त्याचे नाव 'वैशाली' असे पडले. ही वैशालीची कथा आहे। ภควโต นิมนฺตนํ भगवंतांना निमंत्रण อยํ ปน เวสาลี ภควโต อุปฺปนฺนกาเล อิทฺธา เวปุลฺลปฺปตฺตา อโหสิ. ตตฺถ หิ ราชูนํเยว สตฺต สหสฺสานิ สตฺต สตานิ สตฺต จ ราชาโน อเหสุํ. ตถา ยุวราชเสนาปติภณฺฑาคาริกปฺปภุตีนํ. ยถาห – आणि ही वैशाली भगवंतांच्या उत्पत्तीच्या वेळी अत्यंत समृद्ध आणि वैभवशाली झाली होती. कारण तिथे सात हजार सातशे सात राजे होते. त्याचप्रमाणे उपराजे, सेनापती, कोषाध्यक्ष इत्यादी देखील तितकेच होते. जसे म्हटले आहे – ‘‘เตน โข ปน สมเยน เวสาลี อิทฺธา เจว โหติ ผีตา จ พหุชนา อากิณฺณมนุสฺสา สุภิกฺขา จ, สตฺต จ ปาสาทสหสฺสานิ สตฺต จ ปาสาทสตานิ สตฺต จ ปาสาทา, สตฺต จ กูฏาคารสหสฺสานิ สตฺต จ กูฏาคารสตานิ สตฺต จ กูฏาคารานิ, สตฺต จ อารามสหสฺสานิ สตฺต จ อารามสตานิ สตฺต จ อารามา, สตฺต จ โปกฺขรณิสหสฺสานิ สตฺต จ โปกฺขรณิสตานิ สตฺต จ โปกฺขรณิโย’’ติ (มหาว. ๓๒๖). "त्या वेळी वैशाली समृद्ध, संपन्न, दाट लोकवस्तीची, माणसांनी गजबजलेली आणि सुभिक्ष होती. तिथे सात हजार सातशे सात प्रासाद, सात हजार सातशे सात कूटगार, सात हजार सातशे सात आराम आणि सात हजार सातशे सात पुष्करणी होत्या." สา อปเรน สมเยน ทุพฺภิกฺขา อโหสิ ทุพฺพุฏฺฐิกา ทุสฺสสฺสา. ปฐมํ ทุคฺคตมนุสฺสา มรนฺติ, เต พหิทฺธา ฉฑฺเฑนฺติ. มตมนุสฺสานํ กุณปคนฺเธน อมนุสฺสา นครํ ปวิสึสุ, ตโต พหุตรา มรนฺติ. ตาย ปฏิกูลตาย สตฺตานํ อหิวาตโรโค อุปฺปชฺชิ. อิติ ตีหิ ทุพฺภิกฺขอมนุสฺสโรคภเยหิ อุปทฺทุตา เวสาลินครวาสิโน อุปสงฺกมิตฺวา ราชานํ อาหํสุ, ‘‘มหาราช, อิมสฺมึ นคเร ติวิธํ ภยมุปฺปนฺนํ, อิโต ปุพฺเพ ยาว สตฺตมา ราชกุลปริวฏฺฏา เอวรูปํ อนุปฺปนฺนปุพฺพํ, ตุมฺหากํ มญฺเญ อธมฺมิกตฺเตน [Pg.136] ตํ เอตรหิ อุปฺปนฺน’’นฺติ. ราชา สพฺเพ สนฺถาคาเร สนฺนิปาตาเปตฺวา ‘‘มยฺหํ อธมฺมิกภาวํ วิจินถา’’ติ อาห. เต สพฺพํ ปเวณึ วิจินนฺตา น กิญฺจิ อทฺทสํสุ. त्यानंतरच्या काळात, त्या वेसाळी नगरीत दुष्काळ पडला, पाऊस पडला नाही आणि धान्य मिळणे कठीण झाले. सर्वप्रथम गरीब लोक मरण पावले आणि लोकांनी त्यांचे मृतदेह शहराबाहेर टाकून दिले. मृत माणसांच्या कुजलेल्या शरीरांच्या दुर्गंधीमुळे अमानुषांनी (भूत-पिशाचांनी) शहरात प्रवेश केला, ज्यामुळे आणखी बरेच लोक मरण पावले. त्या घाणीमुळे आणि प्रतिकूलतेमुळे लोकांमध्ये 'अहिवातक' नावाचा महामारीचा रोग पसरला. अशा प्रकारे दुष्काळ, अमानुष आणि रोग या तीन भयांनी त्रस्त झालेल्या वेसाळीच्या नगरवासीयांनी राजाकडे जाऊन म्हटले, "महाराज! या नगरात तीन प्रकारचे भय निर्माण झाले आहे. यापूर्वी सात राजवंशांच्या पिढ्यांपर्यंत असे कधीही घडले नव्हते. आम्हाला वाटते की आपल्या अधार्मिकतेमुळेच हे संकट आता ओढवले आहे." तेव्हा राजाने सर्व लोकांना संथागारात (सभागृहात) एकत्र बोलावून म्हटले, "माझ्या अधार्मिकतेचा शोध घ्या (माझ्यात काही अधर्म आहे का ते तपासा)." त्यांनी संपूर्ण परंपरेचा आणि इतिहासाचा शोध घेतला, परंतु त्यांना राजाचा कोणताही दोष आढळला नाही। ตโต รญฺโญ โทสมทิสฺวา ‘‘อิทํ ภยํ อมฺหากํ กถํ วูปสเมยฺยา’’ติ จินฺเตสุํ. ตตฺถ เอกจฺเจ ฉ สตฺถาเร อปทิสึสุ ‘‘เอเตหิ โอกฺกนฺตมตฺเต วูปสเมสฺสตี’’ติ. เอกจฺเจ อาหํสุ – ‘‘พุทฺโธ กิร โลเก อุปฺปนฺโน, โส ภควา สพฺพสตฺตหิตาย ธมฺมํ เทเสติ มหิทฺธิโก มหานุภาโว, เตน โอกฺกนฺตมตฺเต สพฺพภยานิ วูปสเมยฺยุ’’นฺติ. เตน เต อตฺตมนา หุตฺวา ‘‘กหํ ปน โส ภควา เอตรหิ วิหรติ, อมฺเหหิ เปสิโต น อาคจฺเฉยฺยา’’ติ อาหํสุ. อถาปเร อาหํสุ – ‘‘พุทฺธา นาม อนุกมฺปกา, กิสฺส นาคจฺเฉยฺยุํ, โส ปน ภควา เอตรหิ ราชคเห วิหรติ, ราชา พิมฺพิสาโร ตํ อุปฏฺฐหติ, โส อาคนฺตุํ น ทเทยฺยา’’ติ. ‘‘เตน หิ ราชานํ สญฺญาเปตฺวา อาเนยฺยามา’’ติ ทฺเว ลิจฺฉวิราชาโน มหตา พลกาเยน ปหูตํ ปณฺณาการํ ทตฺวา รญฺโญ สนฺติกํ เปสึสุ ‘‘พิมฺพิสารํ สญฺญาเปตฺวา ภควนฺตํ อาเนถา’’ติ. เต คนฺตฺวา รญฺโญ ปณฺณาการํ ทตฺวา ตํ ปวตฺตึ นิเวเทตฺวา, ‘‘มหาราช, ภควนฺตํ อมฺหากํ นครํ เปเสหี’’ติ อาหํสุ. ราชา น สมฺปฏิจฺฉิ, ‘‘ตุมฺเหเยว ชานาถา’’ติ อาห. เต ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา วนฺทิตฺวา เอวมาหํสุ – ‘‘ภนฺเต, อมฺหากํ นคเร ตีณิ ภยานิ อุปฺปนฺนานิ, สเจ ภควา อาคจฺเฉยฺย, โสตฺถิ โน ภเวยฺยา’’ติ. ภควา อาวชฺเชตฺวา ‘‘เวสาลิยํ รตนสุตฺเต วุตฺเต สา รกฺขา โกฏิสตสหสฺสํ จกฺกวาฬานํ ผริสฺสติ, สุตฺตปริโยสาเน จตุราสีติยา ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย ภวิสฺสตี’’ติ อธิวาเสสิ. อถ ราชา พิมฺพิสาโร ภควโต อธิวาสนํ สุตฺวา ‘‘ภควตา เวสาลิคมนํ อธิวาสิต’’นฺติ นคเร โฆสนํ การาเปตฺวา ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา อาห – ‘‘กึ, ภนฺเต, สมฺปฏิจฺฉถ เวสาลิคมน’’นฺติ? อาม, มหาราชาติ. เตน หิ, ภนฺเต, ตาว อาคเมถ, ยาว มคฺคํ ปฏิยาเทมีติ. त्यानंतर राजाचा कोणताही दोष न आढळल्याने त्यांनी विचार केला, "आपले हे भय कसे शांत होईल?" तेव्हा काही लोकांनी सहा तीर्थंकरांचा (सहा शास्त्यांचा) उल्लेख केला की, "त्यांच्या आगमनानेच हे भय शांत होईल." तर काही जण म्हणाले, "जगात बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत असे ऐकिवात आहे. ते भगवान सर्व प्राण्यांच्या कल्याणासाठी धम्माचा उपदेश करतात. ते महा-ऋद्धीवान आणि महा-प्रतापी आहेत. त्यांच्या आगमनानेच सर्व भये शांत होतील." हे ऐकून ते अत्यंत आनंदित झाले आणि म्हणाले, "परंतु ते भगवान सध्या कोठे विहार करत आहेत? आपण निमंत्रण पाठवले तर ते येतील का?" त्यावर इतर काही जण म्हणाले, "बुद्ध हे अत्यंत कारुणिक असतात, ते का बरे येणार नाहीत? परंतु ते भगवान सध्या राजगीर (राजगृह) येथे विहार करत आहेत आणि राजा बिंबिसार त्यांची सेवा करत आहे. तो त्यांना येऊ देणार नाही." तेव्हा त्यांनी विचार केला, "असे असेल तर आपण राजा बिंबिसाराची समजूत काढून भगवंतांना घेऊन येऊ या." त्यांनी दोन लिच्छवी राजांना मोठ्या सैन्यासह आणि भरपूर भेटी देऊन राजा बिंबिसाराकडे पाठवले आणि सांगितले, "बिंबिसाराची समजूत काढून भगवंतांना घेऊन या." त्यांनी जाऊन राजाला भेटी दिल्या, सर्व परिस्थिती सांगितली आणि म्हणाले, "महाराज, भगवंतांना आमच्या नगरात पाठवावे." राजाने थेट संमती दिली नाही आणि म्हटले, "तुम्ही स्वतःच भगवंतांना विनंती करा." तेव्हा त्यांनी भगवंतांकडे जाऊन त्यांना वंदन केले आणि म्हटले, "भंते! आमच्या नगरात तीन प्रकारची भये निर्माण झाली आहेत. जर भगवान तेथे आले, तर आमचे कल्याण होईल." भगवंतांनी विचार केला की, "वेसाळीमध्ये 'रतन सुत्त' (रत्न सूत्र) उपदेशिले गेल्यास, त्याचे संरक्षण एक लाख कोटी चक्कवाळांमध्ये (विश्वप्रणालींमध्ये) पसरले जाईल आणि सुत्ताच्या समाप्तीनंतर चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना धम्माचा साक्षात्कार होईल." असे विचार करून त्यांनी जाण्यास संमती दिली. त्यानंतर राजा बिंबिसाराने भगवंतांच्या संमतीबद्दल ऐकले आणि नगरात दवंडी पिटवून जाहीर केले की, "भगवंतांनी वेसाळीला जाण्यास संमती दिली आहे." मग त्याने भगवंताकडे जाऊन विचारले, "भंते! आपण वेसाळीला जाण्यास संमती दिली आहे का?" भगवंतांनी उत्तर दिले, "होय, महाराज." त्यावर राजा म्हणाला, "तर मग भंते, मी मार्ग तयार करेपर्यंत कृपया प्रतीक्षा करावी." อถ โข ราชา พิมฺพิสาโร ราชคหสฺส จ คงฺคาย จ อนฺตรา ปญฺจโยชนภูมึ สมํ กตฺวา โยชเน โยชเน วิหารํ มาเปตฺวา ภควโต คมนกาลํ ปฏิเวเทสิ. ภควา ปญฺจหิ ภิกฺขุสเตหิ ปริวุโต [Pg.137] ปายาสิ. ราชา ปญฺจโยชนํ มคฺคํ ปญฺจวณฺเณหิ ปุปฺเผหิ ชาณุมตฺตํ โอกิราเปตฺวา ธชปฏากปุณฺณฆฏกทลิอาทีนิ อุสฺสาเปตฺวา ภควโต ทฺเว เสตจฺฉตฺตานิ เอกเมกสฺส จ ภิกฺขุสฺส เอกเมกํ อุกฺขิปาเปตฺวา สทฺธึ อตฺตโน ปริวาเรน ปุปฺผคนฺธาทีหิ ปูชํ กโรนฺโต เอเกกสฺมึ วิหาเร ภควนฺตํ วสาเปตฺวา มหาทานานิ ทตฺวา ปญฺจหิ ทิวเสหิ คงฺคาตีรํ เนสิ. ตตฺถ สพฺพาลงฺกาเรหิ นาวํ อลงฺกโรนฺโต เวสาลิกานํ สาสนํ เปเสสิ ‘‘อาคโต ภควา, มคฺคํ ปฏิยาเทตฺวา สพฺเพ ภควโต ปจฺจุคฺคมนํ กโรถา’’ติ. เต ‘‘ทิคุณํ ปูชํ กริสฺสามา’’ติ เวสาลิยา จ คงฺคาย จ อนฺตรา ติโยชนภูมึ สมํ กตฺวา ภควโต จตฺตาริ เอกเมกสฺส จ ภิกฺขุสฺส ทฺเว ทฺเว เสตจฺฉตฺตานิ สชฺเชตฺวา ปูชํ กุรุมานา คงฺคาตีรํ อาคนฺตฺวา อฏฺฐํสุ. त्यानंतर राजा बिंबिसाराने राजगीर आणि गंगा नदीच्या दरम्यानची पाच योजने जमीन सपाट केली आणि प्रत्येक योजनेवर एक विहार बांधून भगवंतांना प्रस्थानाच्या वेळेची माहिती दिली. भगवान पाचशे भिक्खूंच्या परिवारासह निघाले. राजाने पाच योजने लांबीच्या मार्गावर गुडघाभर उंचीपर्यंत पाच रंगांची फुले पसरवली; ध्वज, पताका, पूर्णघट (पाण्याचे भरलेले कलश) आणि केळीची झाडे इत्यादी उभी केली. भगवंतांच्या सन्मानार्थ दोन पांढरी छत्रे आणि प्रत्येक भिक्खूसाठी एक-एक पांढरे छत्र धरण्याची व्यवस्था केली. आपल्या परिवारासह फुले, गंध इत्यादींनी पूजा करत, प्रत्येक विहारात भगवंतांना मुक्काम देत आणि महादान देत, राजाने पाच दिवसांत त्यांना गंगा नदीच्या तीरावर आणले. तेथे सर्व प्रकारच्या अलंकारांनी नौका सजवून त्याने वेसाळीच्या लोकांना निरोप पाठवला, "भगवान आले आहेत, तुम्ही मार्ग तयार करून भगवंतांच्या स्वागतासाठी सामोरे या." त्यांनी "आम्ही दुप्पट पूजा करू" असे म्हणून वेसाळी आणि गंगा नदीच्या दरम्यानची तीन योजने जमीन सपाट केली. त्यांनी भगवंतांसाठी चार पांढरी छत्रे आणि प्रत्येक भिक्खूसाठी दोन-दोन पांढरी छत्रे तयार केली आणि पूजा करत ते गंगा नदीच्या तीरावर येऊन उभे राहिले। อถ พิมฺพิสาโร ทฺเว นาวาโย สงฺฆเฏตฺวา มณฺฑปํ กตฺวา ปุปฺผทามาทีหิ อลงฺกริตฺวา ตตฺถ สพฺพรตนมยํ พุทฺธาสนํ ปญฺญเปสิ, ภควา ตตฺถ นิสีทิ. ปญฺจ สตา ภิกฺขูปิ นาวํ อารุหิตฺวา ยถานุรูปํ นิสีทึสุ. ราชา ภควนฺตํ อนุคจฺฉนฺโต คลปฺปมาณํ อุทกํ โอคาเหตฺวา ‘‘ยาว, ภนฺเต, ภควา อาคจฺฉติ, ตาวาหํ อิเธว คงฺคาตีเร วสิสฺสามี’’ติ วตฺวา นิวตฺโต. อุปริ เทวตา ยาว อกนิฏฺฐภวนา ปูชํ อกํสุ. เหฏฺฐาคงฺคานิวาสิโน กมฺพลสฺสตราทโย นาคราชาโน ปูชํ อกํสุ. เอวํ มหติยา ปูชาย ภควา โยชนมตฺตํ อทฺธานํ คงฺคาย คนฺตฺวา เวสาลิกานํ สีมนฺตรํ ปวิฏฺโฐ. त्यानंतर बिंबिसाराने दोन नौका एकत्र जोडून त्यावर एक मण्डप तयार केला आणि तो फुलांच्या माळा इत्यादींनी सजवून तेथे सर्व प्रकारच्या रत्नांनी जडलेले बुद्धासन मांडले. भगवान त्यावर विराजमान झाले. पाचशे भिक्खूही नौकेवर चढून आपापल्या योग्य जागेवर बसले. राजा बिंबिसार भगवंतांना निरोप देण्यासाठी गळ्यापर्यंत पाण्यात उतरला आणि म्हणाला, "भंते! जोपर्यंत भगवान परत येत नाहीत, तोपर्यंत मी येथेच गंगा नदीच्या तीरावर थांबेन." असे म्हणून तो मागे फिरला. वर आकाशात अकनिठ्ठ ब्रह्मलोकापर्यंतच्या देवतांनी पूजा केली. खाली गंगेच्या पात्रात राहणाऱ्या कंबळ आणि अस्सतर इत्यादी नागराजांनी पूजा केली. अशा प्रकारे मोठ्या आदराने आणि पूजेने भगवान गंगेतून एक योजनेचा प्रवास करून वेसाळीच्या हद्दीत दाखल झाले। ตโต ลิจฺฉวิราชาโน พิมฺพิสาเรน กตปูชาย ทิคุณํ กโรนฺตา คลปฺปมาเณ อุทเก ภควนฺตํ ปจฺจุคฺคจฺฉึสุ. เตเนว ขเณน เตน มุหุตฺเตน วิชฺชุปฺปภาวินทฺธนฺธการวิสฏกูโฏ คฬคฬายนฺโต จตูสุ ทิสาสุ มหาเมโฆ วุฏฺฐาสิ. อถ ภควตา ปฐมปาเท คงฺคาตีเร นิกฺขิตฺตมตฺเต โปกฺขรวสฺสํ วสฺสิ. เย เตเมตุกามา, เต เอว เตเมนฺติ, อเตเมตุกามา น เตเมนฺติ. สพฺพตฺถ ชาณุมตฺตํ อูรุมตฺตํ กฏิมตฺตํ คลปฺปมาณํ อุทกํ วหติ, สพฺพกุณปานิ อุทเกน คงฺคํ ปเวสิตานิ, ปริสุทฺโธ ภูมิภาโค อโหสิ. त्यानंतर लिच्छवी राजांनी बिंबिसाराने केलेल्या पूजेपेक्षा दुप्पट आदर दाखवत, गळ्यापर्यंत पाण्यात उतरून भगवंतांचे स्वागत केले. त्याच क्षणी, त्याच मुहूर्तावर, विजेच्या चमचमाटासह अंधकारमय ढगांचा गडगडाट करत चारही दिशांना मोठा मेघ दाटून आला. त्यानंतर भगवंतांनी गंगा नदीच्या तीरावर आपले पहिले पाऊल ठेवताच 'पोक्खर' (कमळ-पाऊस) पाऊस पडू लागला. ज्यांना भिजण्याची इच्छा होती, तेच भिजले; ज्यांना भिजण्याची इच्छा नव्हती, ते भिजले नाहीत. सर्वत्र गुडघाभर, मांडीभर, कंबरभर आणि गळ्यापर्यंत पाणी वाहू लागले. सर्व मृतदेह वाहत्या पाण्याने वाहून गंगेत गेले आणि संपूर्ण जमीन स्वच्छ व पवित्र झाली। ลิจฺฉวิราชาโน ภควนฺตํ อนฺตรา โยชเน โยชเน วาสาเปตฺวา มหาทานานิ ทตฺวา ตีหิ ทิวเสหิ ทิคุณํ ปูชํ กโรนฺตา เวสาลึ นยึสุ[Pg.138]. เวสาลึ สมฺปตฺเต ภควติ สกฺโก เทวานมินฺโท เทวสงฺฆปุรกฺขโต อาคจฺฉิ. มเหสกฺขานํ เทวตานํ สนฺนิปาเตน อมนุสฺสา เยภุยฺเยน ปลายึสุ. ภควา นครทฺวาเร ฐตฺวา อานนฺทตฺเถรํ อามนฺเตสิ – ‘‘อิมํ, อานนฺท, รตนสุตฺตํ อุคฺคเหตฺวา พลิกมฺมูปกรณานิ คเหตฺวา ลิจฺฉวิราชกุมาเรหิ สทฺธึ เวสาลิยา ติปาการนฺตเร วิจรนฺโต ปริตฺตํ กโรหี’’ติ รตนสุตฺตํ อภาสิ. ‘‘เอวํ เกน ปเนตํ สุตฺตํ วุตฺตํ, กทา, กตฺถ, กสฺมา จ วุตฺต’’นฺติ เอเตสํ ปญฺหานํ วิสฺสชฺชนา วิตฺถาเรน เวสาลิวตฺถุโต ปภุติ โปราเณหิ วณฺณียติ. लिच्छवी राजांनी भगवंतांना वाटेत प्रत्येक योजनेवर मुक्काम करायला लावून, महादान देऊन, तीन दिवसांत दुप्पट सत्कार करत वैशालीला आणले. भगवान वैशालीला पोहोचले असता, देवांचा राजा शक्र देवगणांनी वेढलेला आला. महान प्रभावशाली देवतांच्या एकत्र येण्याने अमणुष्य बहुतांश पळून गेले. भगवान नगरद्वारावर उभे राहून आनंद स्थविरांना म्हणाले – "हे आनंदा, हे रतनसुत्त शिकून घेऊन, बलीकर्माचे साहित्य घेऊन, लिच्छवी राजकुमारांसह वैशालीच्या तिन्ही तटबंदींच्या दरम्यान फिरत परित्राण कर." असे सांगून त्यांनी रतनसुत्त भाषिले. "अशा प्रकारे हे सुत्त कोणी म्हटले, कधी, कोठे आणि का म्हटले?" या प्रश्नांचे उत्तर प्राचीन आचार्यांनी वैशालीच्या कथेपासून सविस्तरपणे वर्णन केले आहे. เอวํ ภควโต เวสาลึ อนุปฺปตฺตทิวเสเยว เวสาลินครทฺวาเร เตสํ อุปทฺทวานํ ปฏิฆาตตฺถาย วุตฺตมิทํ รตนสุตฺตํ อุคฺคเหตฺวา อายสฺมา อานนฺโท ปริตฺตตฺถาย ภาสมาโน ภควโต ปตฺเตน อุทกมาทาย สพฺพนครํ อพฺภุกฺกิรนฺโต อนุวิจริ. ยํ กิญฺจีติ วุตฺตมตฺเต เอว เถเรน เย ปุพฺเพ อปลาตา สงฺการกูฏภิตฺติปฺปเทสาทินิสฺสิตา อมนุสฺสา, เต จตูหิ ทฺวาเรหิ ปลายึสุ, ทฺวารานิ อโนกาสานิ อเหสุํ. ตโต เอกจฺเจ ทฺวาเรสุ โอกาสํ อลภมานา ปาการํ ภินฺทิตฺวา ปลาตา. อมนุสฺเสสุ คตมตฺเตสุ มนุสฺสานํ คตฺเตสุ โรโค วูปสนฺโต. เต นิกฺขมิตฺวา สพฺพปุปฺผคนฺธาทีหิ เถรํ ปูเชสุํ. มหาชโน นครมชฺเฌ สนฺถาคารํ สพฺพคนฺเธหิ ลิมฺปิตฺวา วิตานํ กตฺวา สพฺพาลงฺกาเรหิ อลงฺกริตฺวา ตตฺถ พุทฺธาสนํ ปญฺญเปตฺวา ภควนฺตํ อาเนสิ. अशा प्रकारे, भगवान वैशालीला पोहोचले त्याच दिवशी वैशालीच्या नगरद्वारावर त्या उपद्रवांच्या शमनासाठी म्हटलेले हे रतनसुत्त शिकून घेऊन, आयुष्यमान आनंदांनी परित्राणासाठी त्याचे पठण करत, भगवंतांच्या पात्रात पाणी घेऊन संपूर्ण नगरात शिंपडत प्रदक्षिणा केली. स्थविरांनी "यं किंचि" असे म्हणताच, जे अमणुष्य पूर्वी पळून गेले नव्हते आणि जे कचऱ्याचे ढीग, भिंतींचे कोपरे इत्यादींच्या आश्रयाने राहिले होते, ते चारही दारांतून पळून गेले; दारे गर्दीमुळे अरुंद झाली. त्यामुळे काही अमणुष्य दारांमध्ये जागा न मिळाल्याने तटबंदी तोडून पळून गेले. अमणुष्य निघून गेल्यावर माणसांच्या शरीरातील रोग शांत झाला. ते बाहेर पडून सर्व प्रकारच्या फुले, सुगंधी द्रव्ये इत्यादींनी स्थविरांची पूजा करू लागले. महाजनांनी नगराच्या मध्यभागी असलेल्या संथागाराला सर्व प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांनी लिंपून, छत बांधून, सर्व अलंकारांनी सजवून, तेथे बुद्धांचे आसन मांडून भगवंतांना तेथे आणले. ภควา สนฺถาคารํ ปวิสิตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ. ภิกฺขุสงฺโฆปิ โข ราชาโน มนุสฺสา จ ปติรูเป ปติรูเป อาสเน นิสีทึสุ. สกฺโกปิ เทวานมินฺโท ทฺวีสุ เทวโลเกสุ เทวปริสาย สทฺธึ อุปนิสีทิ อญฺเญ จ เทวา, อานนฺทตฺเถโรปิ สพฺพํ เวสาลึ อนุวิจรนฺโต รกฺขํ กตฺวา เวสาลินครวาสีหิ สทฺธึ อาคนฺตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. ตตฺถ ภควา สพฺเพสํ ตเทว รตนสุตฺตํ อภาสีติ. भगवान संथागारात प्रवेश करून मांडलेल्या आसनावर बसले. भिक्खू संघ, राजे आणि लोकही आपापल्या योग्य आसनांवर बसले. देवांचा राजा शक्र देखील दोन्ही देवलोकांतील देवपरिषदेसह जवळच बसला आणि इतर देवही बसले. आनंद स्थविर देखील संपूर्ण वैशालीत फिरून संरक्षण करून वैशालीच्या नगरवासीयांसह परत येऊन एका बाजूला बसले. तेथे भगवंतांनी सर्वांना तेच रतनसुत्त सांगितले. เอตฺตาวตา จ ยา ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจตํ อิมํ นยํ. ปกาเสตฺวานา’’ติ มาติกา นิกฺขิตฺตา, สา สพฺพปฺปกาเรน วิตฺถาริตา โหติ. येथपर्यंत, "कोणी म्हटले, कधी, कोठे आणि कोणत्या कारणाने हा मार्ग प्रकाशित केला" अशी जी मातृका मांडली होती, ती सर्व प्रकारे सविस्तर स्पष्ट झाली आहे. ยานีธาติคาถาวณฺณนา "यानीध" या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑. อิทานิ [Pg.139] ‘‘เอตสฺส กริสฺสามตฺถวณฺณน’’นฺติ วุตฺตตฺตา อตฺถวณฺณนา อารพฺภเต. อปเร ปน วทนฺติ ‘‘อาทิโต ปญฺเจว คาถา ภควตา วุตฺตา, เสสา ปริตฺตกรณสมเย อานนฺทตฺเถเรนา’’ติ. ยถา วา ตถา วา โหตุ, กึ โน อิมาย ปริกฺขาย, สพฺพถาปิ เอตสฺส รตนสุตฺตสฺส กริสฺสามตฺถวณฺณนํ. १. आता, "याचे अर्थ-स्पष्टीकरण करू" असे म्हटल्यामुळे अर्थ-स्पष्टीकरण सुरू केले जात आहे. परंतु इतर काही आचार्य म्हणतात की, "सुरुवातीच्या पाचच गाथा भगवंतांनी म्हटल्या होत्या, आणि उर्वरित गाथा परित्राण करण्याच्या वेळी आनंद स्थविरांनी म्हटल्या होत्या." ते काहीही असो, या परीक्षेशी आपल्याला काय करायचे आहे? आपण सर्व प्रकारे या रतनसुत्ताचे अर्थ-स्पष्टीकरण करू. ยานีธ ภูตานีติ ปฐมคาถา. ตตฺถ ยานีติ ยาทิสานิ อปฺเปสกฺขานิ วา มเหสกฺขานิ วา. อิธาติ อิมสฺมึ ปเทเส, ตสฺมึ ขเณ สนฺนิปาตฏฺฐานํ สนฺธายาห. ภูตานีติ กิญฺจาปิ ภูตสทฺโท ‘‘ภูตสฺมึ ปาจิตฺติย’’นฺติ เอวมาทีสุ (ปาจิ. ๖๙) วิชฺชมาเน. ‘‘ภูตมิทนฺติ, ภิกฺขเว, สมนุปสฺสถา’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๔๐๑) ขนฺธปญฺจเก. ‘‘จตฺตาโร โข, ภิกฺขุ, มหาภูตา เหตู’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๓.๘๖) จตุพฺพิเธ ปถวีธาตฺวาทิรูเป. ‘‘โย จ กาลฆโส ภูโต’’ติ เอวมาทีสุ (ชา. ๑.๒.๑๙๐) ขีณาสเว. ‘‘สพฺเพว นิกฺขิปิสฺสนฺติ, ภูตา โลเก สมุสฺสย’’นฺติ เอวมาทีสุ (ที. นิ. ๒.๒๒๐) สพฺพสตฺเต. ‘‘ภูตคามปาตพฺยตายา’’ติ เอวมาทีสุ (ปาจิ. ๙๐) รุกฺขาทิเก. ‘‘ภูตํ ภูตโต สญฺชานาตี’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓) จาตุมหาราชิกานํ เหฏฺฐา สตฺตนิกายํ อุปาทาย วตฺตติ. อิธ ปน อวิเสสโต อมนุสฺเสสุ ทฏฺฐพฺโพ. "यानीध भूतानि" ही पहिली गाथा आहे. तेथे ‘यानि’ म्हणजे ज्या प्रकारचे, कमी प्रभाव असलेले किंवा जास्त प्रभाव असलेले. ‘इध’ म्हणजे या ठिकाणी, त्या क्षणी एकत्र येण्याच्या स्थानाचा संदर्भ देऊन म्हटले आहे. ‘भूतानि’ या संदर्भात, जरी ‘भूत’ हा शब्द "भूतस्मिं पाचित्तियं" इत्यादींमध्ये ‘विद्यमान’ अर्थाने आढळतो; "भिक्खूहो, हे भूत असे नीट पाहा" इत्यादींमध्ये ‘पंचस्कंधां’साठी आढळतो; "भिक्खूहो, चार महाभूते हे हेतू आहेत" इत्यादींमध्ये पृथ्वीधातू इत्यादी चार प्रकारच्या ‘रूपां’साठी आढळतो; "जो काळाला गिळणारा भूत आहे" इत्यादींमध्ये ‘क्षीणास्रव’ (अर्हत) साठी आढळतो; "जगातील सर्व भूत आपला देह सोडून देतील" इत्यादींमध्ये ‘सर्व प्राण्यां’साठी आढळतो; "भूतगाम नष्ट केल्याबद्दल" इत्यादींमध्ये ‘झाडेझुडपे’ इत्यादींसाठी आढळतो; "भूताला भूत म्हणून जाणतो" इत्यादींमध्ये चातुर्महाराजिक देवलोकाच्या खालील प्राण्यांच्या समूहासाठी वापरला जातो. परंतु येथे सामान्यतः ‘अमणुष्य’ या अर्थाने घेतला पाहिजे. สมาคตานีติ สนฺนิปติตานิ. ภุมฺมานีติ ภูมิยํ นิพฺพตฺตานิ. วา-อิติ วิกปฺปเน. เตน ยานีธ ภุมฺมานิ วา ภูตานิ สมาคตานีติ อิมเมกํ วิกปฺปํ กตฺวา ปุน ทุติยวิกปฺปํ กาตุํ ‘‘ยานิ ว อนฺตลิกฺเข’’ติ อาห. อนฺตลิกฺเข วา ยานิ ภูตานิ นิพฺพตฺตานิ, ตานิ สพฺพานิ อิธ สมาคตานีติ อตฺโถ. เอตฺถ จ ยามโต ยาว อกนิฏฺฐํ, ตาว นิพฺพตฺตานิ ภูตานิ อากาเส ปาตุภูตวิมาเนสุ นิพฺพตฺตตฺตา ‘‘อนฺตลิกฺเข ภูตานี’’ติ เวทิตพฺพานิ. ตโต เหฏฺฐา สิเนรุโต ปภุติ ยาว ภูมิยํ รุกฺขลตาทีสุ อธิวตฺถานิ ปถวิยญฺจ นิพฺพตฺตานิ ภูตานิ, ตานิ สพฺพานิ ภูมิยํ ภูมิปฏิพทฺเธสุ จ รุกฺขลตาปพฺพตาทีสุ นิพฺพตฺตตฺตา ‘‘ภุมฺมานิ ภูตานี’’ติ เวทิตพฺพานิ. ‘समागतानं’ म्हणजे एकत्र आलेले. ‘भुम्मानि’ म्हणजे भूमीवर उत्पन्न झालेले. ‘वा’ हा शब्द विकल्पासाठी आहे. त्यामुळे "यानीध भुम्मानि वा भूतानि समागतानि" हा एक विकल्प करून, पुन्हा दुसरा विकल्प करण्यासाठी "यानि व अन्तलिक्खे" असे म्हटले आहे. अंतरीक्षात जे भूत उत्पन्न झाले आहेत, ते सर्व येथे एकत्र आले आहेत, असा याचा अर्थ आहे. आणि येथे याम देवलोकापासून अकनिठ्ठ देवलोकापर्यंत जे भूत उत्पन्न झाले आहेत, ते आकाशात प्रकट झालेल्या विमानांमध्ये उत्पन्न झाल्यामुळे त्यांना "अन्तलिक्खे भूतानि" असे समजावे. त्याच्या खाली सुमेरू पर्वतापासून भूमीवरील झाडे, वेली इत्यादींवर राहणारे आणि पृथ्वीवर उत्पन्न झालेले जे भूत आहेत, ते सर्व भूमीवर आणि भूमीशी संबंधित झाडे, वेली, पर्वत इत्यादींवर उत्पन्न झाल्यामुळे त्यांना "भुम्मानि भूतानि" असे समजावे. เอวํ [Pg.140] ภควา สพฺพาเนว อมนุสฺสภูตานิ ‘‘ภุมฺมานิ วา ยานิ ว อนฺตลิกฺเข’’ติ ทฺวีหิ ปเทหิ วิกปฺเปตฺวา ปุน เอเกน ปเทน ปริคฺคเหตฺวา ทสฺเสตุํ ‘‘สพฺเพว ภูตา สุมนา ภวนฺตู’’ติ อาห. สพฺเพติ อนวเสสา. เอวาติ อวธารเณ, เอกมฺปิ อนปเนตฺวาติ อธิปฺปาโย. ภูตาติ อมนุสฺสา. สุมนา ภวนฺตูติ สุขิตมนา ปีติโสมนสฺสชาตา ภวนฺตุ. อโถปีติ กิจฺจนฺตรสนฺนิโยชนตฺถํ วากฺโยปาทาเน นิปาตทฺวยํ. สกฺกจฺจ สุณนฺตุ ภาสิตนฺติ อฏฺฐึ กตฺวา มนสิกตฺวา สพฺพํ เจตสา สมนฺนาหริตฺวา ทิพฺพสมฺปตฺติโลกุตฺตรสุขาวหํ มม เทสนํ สุณนฺตุ. अशा प्रकारे भगवंतांनी सर्वच अमणुष्य भूतांना "भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे" या दोन पदांनी विभागून, पुन्हा एकाच पदाने एकत्रित करून दाखवण्यासाठी "सब्बेव भूता सुमना भवन्तु" असे म्हटले. ‘सब्बे’ म्हणजे सर्वच्या सर्व. ‘एव’ हा शब्द अवधारण दर्शवण्यासाठी आहे, म्हणजे एकालाही वगळता कामा नये असा अभिप्राय आहे. ‘भूता’ म्हणजे अमणुष्य. ‘सुमना भवन्तु’ म्हणजे सुखी मनाचे, प्रीती आणि सौमनस्य निर्माण झालेले होवोत. ‘अथोपि’ हे दुसऱ्या कार्याची जोड देण्यासाठी वाक्यात वापरलेले दोन निपात आहेत. ‘सक्कच्च सुणन्तु भासितं’ म्हणजे आदरपूर्वक, मन लावून, संपूर्ण चित्त एकाग्र करून, दिव्य संपत्ती आणि लोकोत्तर सुख देणाऱ्या माझ्या उपदेशाचे श्रवण करावे. เอวเมตฺถ ภควา ‘‘ยานีธ ภูตานิ สมาคตานี’’ติ อนิยมิตวจเนน ภูตานิ ปริคฺคเหตฺวา ปุน ‘‘ภุมฺมานิ วา ยานิ ว อนฺตลิกฺเข’’ติ ทฺวิธา วิกปฺเปตฺวา ตโต ‘‘สพฺเพว ภูตา’’ติ ปุน เอกชฺฌํ กตฺวา ‘‘สุมนา ภวนฺตู’’ติ อิมินา วจเนน อาสยสมฺปตฺติยํ นิโยเชนฺโต ‘‘สกฺกจฺจ สุณนฺตุ ภาสิต’’นฺติ ปโยคสมฺปตฺติยํ, ตถา โยนิโสมนสิการสมฺปตฺติยํ ปรโตโฆสสมฺปตฺติยญฺจ, ตถา อตฺตสมฺมาปณิธิสปฺปุริสูปนิสฺสยสมฺปตฺตีสุ สมาธิปญฺญาเหตุสมฺปตฺตีสุ จ นิโยเชนฺโต คาถํ สมาเปสิ. अशा प्रकारे, येथे भगवंतांनी 'यानीध भूतानि समागतानि' या अनिश्चित शब्दाने सर्व भूतांना (देवतांना) एकत्रित करून, पुन्हा 'भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे' असे दोन प्रकारे वर्गीकरण करून, त्यानंतर 'सब्बेव भूता' असे पुन्हा एकत्र करून, 'सुमना भवन्तु' या शब्दाने त्यांच्या आशयसंपत्तीमध्ये (इच्छापूर्तीमध्ये) प्रवृत्त करत, 'सक्कच्च सुणन्तु भासितं' या शब्दाने प्रयोगसंपत्तीमध्ये, तसेच योनिसोमनसिकारसंपत्ती आणि परतोघोससंपत्तीमध्ये, तसेच अत्तसम्मापणिधिसप्पुरिसूपनिस्सयसंपत्ती आणि समाधिप्रज्ञाहेतुसंपत्तीमध्ये प्रवृत्त करत ही गाथा पूर्ण केली. ตสฺมา หีติคาถาวณฺณนา 'तस्मा हि' या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๒. ตสฺมา หิ ภูตาติ ทุติยคาถา. ตตฺถ ตสฺมาติ การณวจนํ. ภูตาติ อามนฺตนวจนํ. นิสาเมถาติ สุณาถ. สพฺเพติ อนวเสสา. กึ วุตฺตํ โหติ? ยสฺมา ตุมฺเห ทิพฺพฏฺฐานานิ ตตฺถ อุปโภคปริโภคสมฺปทญฺจ ปหาย ธมฺมสฺสวนตฺถํ อิธ สมาคตา, น นฏนจฺจนาทิทสฺสนตฺถํ, ตสฺมา หิ ภูตา นิสาเมถ สพฺเพติ. อถ วา ‘‘สุมนา ภวนฺตุ, สกฺกจฺจ สุณนฺตู’’ติ วจเนน เตสํ สุมนภาวํ สกฺกจฺจํ โสตุกมฺยตญฺจ ทิสฺวา อาห ‘‘ยสฺมา ตุมฺเห สุมนภาเวน อตฺตสมฺมาปณิธิโยนิโสมนสิการาสยสุทฺธีหิ สกฺกจฺจํ โสตุกมฺยตาย สปฺปุริสูปนิสฺสยปรโตโฆสปทฏฺฐานโต ปโยคสุทฺธีหิ จ ยุตฺตา, ตสฺมา หิ ภูตา นิสาเมถ สพฺเพ’’ติ. อถ วา ยํ [Pg.141] ปุริมคาถาย อนฺเต ‘‘ภาสิต’’นฺติ วุตฺตํ, ตํ การณภาเวน อปทิสนฺโต อาห ‘‘ยสฺมา มม ภาสิตํ นาม อติทุลฺลภํ อฏฺฐกฺขณปริวชฺชิตสฺส ขณสฺส ทุลฺลภตฺตา, อเนกานิสํสญฺจ ปญฺญากรุณาคุเณน ปวตฺตตฺตา, ตญฺจาหํ วตฺตุกาโม ‘สุณนฺตุ ภาสิต’นฺติ อโวจํ, ตสฺมา หิ ภูตา นิสาเมถ สพฺเพ’’ติ. อิทํ อิมินา คาถาปเทน วุตฺตํ โหติ. २. 'तस्मा हि भूता' ही दुसरी गाथा आहे. त्यामध्ये 'तस्मा' हा शब्द कारणवाचक आहे. 'भूता' हा संबोधनवाचक शब्द आहे. 'निसामेथ' म्हणजे ऐका. 'सब्बे' म्हणजे सर्व (काहीही न उरता). काय सांगितले आहे? ज्याअर्थी तुम्ही आपली दिव्य स्थाने आणि तेथील उपभोग-परिभोगाची संपत्ती सोडून येथे धम्मश्रवणासाठी एकत्र आला आहात, नट-नर्तक इत्यादींचे खेळ पाहण्यासाठी नाही; म्हणूनच, 'हे भूतांनो, तुम्ही सर्वजण लक्षपूर्वक ऐका.' अथवा, 'सुमना भवन्तु, सक्कच्च सुणन्तु' या शब्दांनी त्यांचा सुप्रसन्न भाव आणि आदरपूर्वक ऐकण्याची इच्छा पाहून भगवंत म्हणाले: 'ज्याअर्थी तुम्ही सुप्रसन्न भावाने, अत्तसम्मापणिधि, योनिसोमनसिकार आणि आशयशुद्धीने युक्त आहात, तसेच आदरपूर्वक ऐकण्याच्या इच्छेने, सप्पुरिसूपनिस्सय आणि परतोघोस या कारणांमुळे प्रयोगशुद्धीने युक्त आहात; म्हणूनच, हे भूतांनो, तुम्ही सर्वजण लक्षपूर्वक ऐका.' अथवा, मागील गाथेच्या शेवटी जे 'भासितं' म्हटले आहे, त्यालाच कारण म्हणून दर्शवत भगवंत म्हणाले: 'ज्याअर्थी माझे भाषण अत्यंत दुर्मिळ आहे, कारण आठ अयोग्य क्षणांनी रहित असलेला योग्य क्षण मिळणे दुर्मिळ आहे, आणि प्रज्ञा व करुणेच्या गुणामुळे ते अनेक फायदे (आनिशंस) देणारे आहे; आणि मला ते सांगण्याची इच्छा असल्याने मी 'सुणन्तु भासितं' असे म्हटले; म्हणूनच, हे भूतांनो, तुम्ही सर्वजण लक्षपूर्वक ऐका.' या गाथापदाने हेच सांगितले आहे. เอวเมตํ การณํ นิโรเปนฺโต อตฺตโน ภาสิตนิสามเน นิโยเชตฺวา นิสาเมตพฺพํ วตฺตุมารทฺโธ ‘‘เมตฺตํ กโรถ มานุสิยา ปชายา’’ติ. ตสฺสตฺโถ – ยายํ ตีหิ อุปทฺทเวหิ อุปทฺทุตา มานุสี ปชา, ตสฺสา มานุสิยา ปชาย เมตฺตํ มิตฺตภาวํ หิตชฺฌาสยตํ ปจฺจุปฏฺฐเปถาติ. เกจิ ปน ‘‘มานุสิกํ ปช’’นฺติ ปฐนฺติ, ตํ ภุมฺมตฺถาสมฺภวา น ยุชฺชติ. ยมฺปิ อญฺเญ อตฺถํ วณฺณยนฺติ, โสปิ น ยุชฺชติ. อธิปฺปาโย ปเนตฺถ – นาหํ พุทฺโธติ อิสฺสริยพเลน วทามิ, อปิ ตุ ยํ ตุมฺหากญฺจ อิมิสฺสา จ มานุสิยา ปชาย หิตตฺถํ วทามิ ‘‘เมตฺตํ กโรถ มานุสิยา ปชายา’’ติ. เอตฺถ จ – अशा प्रकारे हे कारण प्रस्थापित करत, स्वतःचे भाषण ऐकण्यामध्ये त्यांना प्रवृत्त करून, ऐकण्यायोग्य गोष्टी सांगण्यासाठी भगवंतांनी 'मेत्तं करोथ मानुसिया पजाय' असे सांगण्यास सुरुवात केली. त्याचा अर्थ असा आहे – जी ही मनुष्य प्रजाती तीन उपद्रवांनी पीडित आहे, त्या मनुष्य प्रजातीवर तुम्ही मैत्री (मित्रभाव) आणि कल्याणकारी भावना प्रस्थापित करा. काही लोक 'मानुसिकं पजं' असा पाठ वाचतात, परंतु ते पृथ्वीवर राहणारे असल्याने योग्य ठरत नाही. इतर जे काही अर्थ सांगतात, तेही योग्य ठरत नाही. येथे अभिप्राय असा आहे – 'मी बुद्ध आहे' म्हणून मी ऐश्वर्यबलाने सांगत नाही, तर जे तुमच्यासाठी आणि या मनुष्य प्रजातीसाठी कल्याणकारी आहे, तेच मी सांगत आहे की, 'मनुष्यांवर मैत्री करा.' आणि येथे – ‘‘เย สตฺตสณฺฑํ ปถวึ วิเชตฺวา,ราชิสโย ยชมานานุปริยคา; อสฺสเมธํ ปุริสเมธํ,สมฺมาปาสํ วาชเปยฺยํ นิรคฺคฬํ. ज्या राजर्षींनी शत्रूंच्या समूहाने युक्त असलेल्या पृथ्वीवर विजय मिळवून, अश्वमेध, पुरुषमेध, सम्मापास, वाजपेय आणि निरग्गल यज्ञ करून पृथ्वीवर संचार केला; ‘‘เมตฺตสฺส จิตฺตสฺส สุภาวิตสฺส,กลมฺปิ เต นานุภวนฺติ โสฬสึ; เอกมฺปิ เจ ปาณมทุฏฺฐจิตฺโต,เมตฺตายติ กุสโล เตน โหติ. ते चांगल्या प्रकारे विकसित केलेल्या मैत्रीपूर्ण चित्ताच्या सोळाव्या भागाच्या एका कलेइतकेही सुख अनुभवू शकत नाहीत. जर एखादा अदुष्टचित्त सत्पुरुष एका जरी प्राण्यावर मैत्रीभाव ठेवतो, तर तो त्यामुळे कुशल होतो. ‘‘สพฺเพ จ ปาเณ มนสานุกมฺปี, ปหูตมริโย ปกโรติ ปุญฺญ’’นฺติ. (อิติวุ. ๒๗; อ. นิ. ๘.๑) – आणि सर्व प्राण्यांबद्दल मनात अनुकंपा ठेवून तो आर्य मुबलक पुण्य संपादन करतो. เอวมาทีนํ สุตฺตานํ เอกาทสานิสํสานญฺจ วเสน เย เมตฺตํ กโรนฺติ, เอเตสํ เมตฺตา หิตาติ เวทิตพฺพา. अशा प्रकारच्या सूत्रांच्या आणि अकरा फायद्यांच्या आधारे जे लोक मैत्री करतात, त्यांची ती मैत्री त्यांच्यासाठी हितकारक आहे, असे समजावे. ‘‘เทวตานุกมฺปิโต โปโส, สทา ภทฺรานิ ปสฺสตี’’ติ. (อุทา. ๗๖; มหาว. ๒๘๖) – देवतांनी अनुकंपित केलेला मनुष्य नेहमी कल्याणकारी गोष्टी पाहतो. เอวมาทีนํ [Pg.142] สุตฺตานํ วเสน เยสุ กยิรติ, เตสมฺปิ หิตาติ เวทิตพฺพา. अशा प्रकारच्या सूत्रांच्या आधारे, ज्यांच्यावर मैत्री केली जाते, त्यांच्यासाठीही ती हितकारक आहे, असे समजावे. เอวํ อุภเยสมฺปิ หิตภาวํ ทสฺเสนฺโต ‘‘เมตฺตํ กโรถ มานุสิยา’’ติ วตฺวา อิทานิ อุปการมฺปิ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ทิวา จ รตฺโต จ หรนฺติ เย พลึ, ตสฺมา หิ เน รกฺขถ อปฺปมตฺตา’’ติ. ตสฺสตฺโถ – เย มนุสฺสา จิตฺตกมฺมกฏฺฐกมฺมาทีหิปิ เทวตา กตฺวา เจติยรุกฺขาทีนิ จ อุปสงฺกมิตฺวา เทวตา อุทฺทิสฺส ทิวา พลึ กโรนฺติ, กาลปกฺขาทีสุ จ รตฺตึ พลึ กโรนฺติ, สลากภตฺตาทีนิ วา ทตฺวา อารกฺขเทวตา อุปาทาย ยาว พฺรหฺมเทวตานํ ปตฺติทานนิยฺยาตเนน ทิวา พลึ กโรนฺติ, ฉตฺตาโรปนทีปมาลาย สพฺพรตฺติกธมฺมสฺสวนาทีนิ การาเปตฺวา ปตฺติทานนิยฺยาตเนน จ รตฺตึ พลึ กโรนฺติ, เต กถํ น รกฺขิตพฺพา? ยโต เอวํ ทิวา จ รตฺโต จ ตุมฺเห อุทฺทิสฺส กโรนฺติ เย พลึ, ตสฺมา หิ เน รกฺขถ; ตสฺมา พลิกมฺมกรณาปิ เต มนุสฺเส รกฺขถ โคปยถ, อหิตํ เนสํ อปเนถ, หิตํ อุปเนถ อปฺปมตฺตา หุตฺวา ตํ กตญฺญุภาวํ หทเย กตฺวา นิจฺจมนุสฺสรนฺตาติ. अशा प्रकारे दोघांचेही हित दर्शवत, 'मनुष्यांवर मैत्री करा' असे सांगून, आता उपकारही दर्शवण्यासाठी भगवंत म्हणाले – 'जे दिवसा आणि रात्री पूजाभाग अर्पण करतात, म्हणून तुम्ही अप्रमत्त होऊन त्यांचे रक्षण करा.' त्याचा अर्थ असा आहे – जे मनुष्य चित्रकाम, लाकूडकाम इत्यादींद्वारे देवतांच्या प्रतिमा बनवून, चैत्य आणि वृक्षांजवळ जाऊन, देवतांच्या उद्देशाने दिवसा पूजाभाग अर्पण करतात; आणि कृष्णपक्ष इत्यादींमध्ये रात्री पूजाभाग अर्पण करतात; किंवा शलाका-भक्त इत्यादी दान देऊन, रक्षक देवतांपासून ते ब्रह्मलोकातील देवतांपर्यंत सर्वांना पुण्यदान करून दिवसा पूजाभाग अर्पण करतात; तसेच छत्र चढवणे, दीपमाळा लावणे, रात्रभर धम्मश्रवण आयोजित करणे इत्यादी करवून आणि पुण्यदान करून रात्री पूजाभाग अर्पण करतात; त्यांचे रक्षण का केले जाऊ नये? ज्याअर्थी ते दिवसा आणि रात्री तुमच्या उद्देशाने पूजाभाग अर्पण करतात, म्हणूनच तुम्ही त्यांचे रक्षण करा. त्यांच्या या पूजाभाग अर्पण करण्याच्या कृतीमुळे तुम्ही त्या मनुष्यांचे रक्षण व संगोपन करा, त्यांचे अहित दूर करा आणि अप्रमत्त होऊन, मनात कृतज्ञता बाळगून व त्याचे निरंतर स्मरण करत त्यांचे हित करा. ยํกิญฺจีติคาถาวณฺณนา 'यंकिंचि' या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๓. เอวํ เทวตาสุ มนุสฺสานํ อุปการกภาวํ ทสฺเสตฺวา เตสํ อุปทฺทววูปสมนตฺถํ พุทฺธาทิคุณปฺปกาสเนน จ เทวมนุสฺสานํ ธมฺมสฺสวนตฺถํ ‘‘ยํกิญฺจิ วิตฺต’’นฺติอาทินา นเยน สจฺจวจนํ ปยุญฺชิตุมารทฺโธ. ตตฺถ ยํกิญฺจีติ อนิยมิตวเสน อนวเสสํ ปริยาทิยติ ยํกิญฺจิ ตตฺถ ตตฺถ โวหารูปคํ. วิตฺตนฺติ ธนํ. ตญฺหิ วิตฺตึ ชเนตีติ วิตฺตํ. อิธ วาติ มนุสฺสโลกํ นิทฺทิสติ. หุรํ วาติ ตโต ปรํ อวเสสโลกํ, เตน จ ฐเปตฺวา มนุสฺเส สพฺพโลกคฺคหเณ ปตฺเต ‘‘สคฺเคสุ วา’’ติ ปรโต วุตฺตตฺตา ฐเปตฺวา มนุสฺเส จ สคฺเค จ อวเสสานํ นาคสุปณฺณาทีนํ คหณํ เวทิตพฺพํ. ३. अशा प्रकारे देवतांवर मनुष्यांचे उपकार दर्शवून, त्यांच्या उपद्रवांचे शमन करण्यासाठी आणि बुद्ध इत्यादींच्या गुणांचे प्रकटीकरण करून देव व मनुष्यांना धम्मश्रवण घडवण्यासाठी भगवंतांनी 'यंकिंचि वित्तं' इत्यादी पद्धतीने सत्यवचन सांगण्यास सुरुवात केली. त्यामध्ये 'यंकिंचि' या अनिश्चित शब्दाने विविध ठिकाणी व्यवहारात येणारे सर्व काही (काहीही न उरता) घेतले जाते. 'वित्तं' म्हणजे धन; कारण ते आनंद निर्माण करते, म्हणून त्याला 'वित्त' म्हणतात. 'इध वा' हा शब्द मनुष्यलोकाचा निर्देश करतो. 'हुरं वा' म्हणजे त्यापुढील उर्वरित लोक; या शब्दाने मनुष्यलोक वगळता संपूर्ण जगाचा ग्रहण होत असताना, पुढे 'सग्गेसु वा' असे म्हटल्यामुळे, मनुष्यलोक आणि स्वर्गलोक दोन्ही वगळून उर्वरित नाग, गरुड इत्यादी प्राण्यांचे ग्रहण करावे, असे समजावे. เอวํ อิเมหิ ทฺวีหิ ปเทหิ ยํ มนุสฺสานํ โวหารูปคํ อลงฺการปริโภคูปคญฺจ ชาตรูปรชตมุตฺตามณิเวฬุริยปวาฬโลหิตงฺกมสารคลฺลาทิกํ, ยญฺจ มุตฺตามณิวาลุกตฺถตาย ภูมิยา รตนมยวิมาเนสุ อเนกโยชนสตวิตฺถเตสุ ภวเนสุ อุปฺปนฺนานํ นาคสุปณฺณาทีนํ วิตฺตํ, ตํ นิทฺทิฏฺฐํ โหติ. สคฺเคสุ วาติ กามาวจรรูปาวจรเทวโลเกสุ. เต [Pg.143] หิ โสภเนน กมฺเมน อชียนฺตีติ สคฺคา. สุฏฺฐุ อคฺคาติปิ สคฺคา. ยนฺติ ยํ สสามิกํ วา อสามิกํ วา. รตนนฺติ รตึ นยติ วหติ ชนยติ วฑฺเฒตีติ รตนํ. ยํกิญฺจิ จิตฺตีกตํ มหคฺฆํ อตุลํ ทุลฺลภทสฺสนํ อโนมสตฺตปริโภคญฺจ, ตสฺเสตํ อธิวจนํ. ยถาห – अशा प्रकारे, या दोन पदांद्वारे ('इध वा हुरं वा' - येथे किंवा परलोकात) मनुष्यांच्या व्यवहारासाठी आणि अलंकार-उपभोगासाठी योग्य असलेले सुवर्ण, चांदी, मोती, मणी, वैडूर्य, प्रवाळ, लोहितांग (तांबडा मणी), मसारगल्ल इत्यादी जे काही धन आहे; तसेच मोती आणि मण्यांची वाळू पसरलेली असलेल्या भूमीवर, अनेक शेकडो योजने विस्तीर्ण असलेल्या रत्नमय विमानांमध्ये (भवनांमध्ये) उत्पन्न झालेल्या नाग, सुपर्ण (गरुड) इत्यादींचे जे काही धन आहे, ते दर्शविले गेले आहे. 'सग्गेसु वा' (किंवा स्वर्गात) म्हणजे कामावचर आणि रूपावचर देवलोकांमध्ये. ते देव आपल्या शोभन (कुशल) कर्माने तेथे उत्पन्न होतात, म्हणून त्यांना 'सग्ग' (स्वर्ग) म्हणतात. किंवा ते अत्यंत श्रेष्ठ असतात, म्हणूनही त्यांना 'सग्ग' म्हणतात. 'यं' (जे) म्हणजे स्वामी असलेले किंवा स्वामी नसलेले. 'रतनं' (रत्न) म्हणजे जे प्रीती (आनंद) प्राप्त करून देते, वहन करते, उत्पन्न करते आणि वाढवते, त्याला 'रत्न' म्हणतात. जे काही आदरपूर्वक पूजिलेले, बहुमूल्य, अतुलनीय, दुर्मीळ दर्शन असलेले आणि श्रेष्ठ सत्त्वांद्वारेच उपभोग घेण्यायोग्य असते, हे त्याचेच अधिवाचन (नाव) आहे. जसे की म्हटले आहे – ‘‘จิตฺตีกตํ มหคฺฆญฺจ, อตุลํ ทุลฺลภทสฺสนํ; อโนมสตฺตปริโภคํ, รตนํ เตน วุจฺจตี’’ติ. “जे आदरपूर्वक पूजिलेले असते, बहुमूल्य असते, अतुलनीय असते, ज्याचे दर्शन दुर्मीळ असते आणि जे श्रेष्ठ सत्त्वांद्वारेच उपभोग घेण्यायोग्य असते, म्हणूनच त्याला 'रत्न' म्हटले जाते.” ปณีตนฺติ อุตฺตมํ เสฏฺฐํ อตปฺปกํ. เอวํ อิมินา คาถาปเทน ยํ สคฺเคสุ อเนกโยชนสตปฺปมาณสพฺพรตนมยวิมานสุธมฺมเวชยนฺตปฺปภุตีสุ สสามิกํ, ยญฺจ พุทฺธุปฺปาทวิรเหน อปายเมว ปริปูเรนฺเตสุ สตฺเตสุ สุญฺญวิมานปฺปฏิพทฺธํ อสามิกํ, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ ปถวิมหาสมุทฺทหิมวนฺตาทินิสฺสิตมสามิกํ รตนํ, ตํ นิทฺทิฏฺฐํ โหติ. ‘पणीतं’ (प्रणीत) म्हणजे उत्तम, श्रेष्ठ आणि अमूल्य. अशा प्रकारे, या गाथापदाने स्वर्गामध्ये अनेक शेकडो योजने प्रमाणाच्या सर्व-रत्नमय विमानांमध्ये, सुधम्मा आणि वेजयंत इत्यादी प्रासादांमध्ये जे स्वामी असलेले रत्न आहे; तसेच बुद्धांच्या उत्पत्तीच्या अभावामुळे केवळ अपाय (दुर्गती) भूमीच भरून काढणाऱ्या प्राण्यांमुळे रिकाम्या (देवपुत्र व देवकन्या नसलेल्या) विमानांशी संबंधित असलेले जे स्वामी नसलेले रत्न आहे; किंवा पृथ्वी, महासागर, हिमालय इत्यादींवर आश्रित असलेले जे स्वामी नसलेले रत्न आहे, ते सर्व दर्शविले गेले आहे. น โน สมํ อตฺถิ ตถาคเตนาติ น-อิติ ปฏิเสเธ. โน-อิติ อวธารเณ. สมนฺติ ตุลฺยํ. อตฺถีติ วิชฺชติ. ตถาคเตนาติ พุทฺเธน. กึ วุตฺตํ โหติ? ยํ เอตํ วิตฺตญฺจ รตนญฺจ ปกาสิตํ, เอตฺถ เอกมฺปิ พุทฺธรตเนน สทิสํ รตนํ เนวตฺถิ. ยมฺปิ หิ ตํ จิตฺตีกตฏฺเฐน รตนํ, เสยฺยถิทํ – รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส จกฺกรตนํ มณิรตนญฺจ, ยมฺหิ อุปฺปนฺเน มหาชโน น อญฺญตฺถ จิตฺตีการํ กโรติ, น โกจิ ปุปฺผคนฺธาทีนิ คเหตฺวา ยกฺขฏฺฐานํ วา ภูตฏฺฐานํ วา คจฺฉติ, สพฺโพปิ ชโน จกฺกรตนมณิรตนเมว จิตฺตีการํ กโรติ ปูเชติ, ตํ ตํ วรํ ปตฺเถติ, ปตฺถิตปตฺถิตญฺจสฺส เอกจฺจํ สมิชฺฌติ, ตมฺปิ รตนํ พุทฺธรตเนน สมํ นตฺถิ. ยทิ หิ จิตฺตีกตฏฺเฐน รตนํ, ตถาคโตว รตนํ. ตถาคเต หิ อุปฺปนฺเน เย เกจิ มเหสกฺขา เทวมนุสฺสา น เต อญฺญตฺร จิตฺตีการํ กโรนฺติ, น กญฺจิ อญฺญํ ปูเชนฺติ. ตถา หิ พฺรหฺมา สหมฺปติ สิเนรุมตฺเตน รตนทาเมน ตถาคตํ ปูเชสิ, ยถาพลญฺจ อญฺเญ เทวา มนุสฺสา จ พิมฺพิสารโกสลราชอนาถปิณฺฑิกาทโย. ปรินิพฺพุตมฺปิ ภควนฺตํ อุทฺทิสฺส ฉนฺนวุติโกฏิธนํ วิสฺสชฺเชตฺวา อโสกมหาราชา สกลชมฺพุทีเป จตุราสีติ วิหารสหสฺสานิ ปติฏฺฐาเปสิ, โก ปน วาโท อญฺเญสํ จิตฺตีการานํ. อปิจ กสฺสญฺญสฺส ปรินิพฺพุตสฺสาปิ ชาติโพธิธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนปรินิพฺพานฏฺฐานานิ ปฏิมาเจติยาทีนิ วา อุทฺทิสฺส เอวํ จิตฺตีการครุกาโร ปวตฺตติ ยถา ภควโต. เอวํจิตฺตีกตฏฺเฐนาปิ ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถิ. ‘न नो समं अत्थि तथागतेन’ या पदांमध्ये, ‘न’ हा शब्द निषेधार्थक निपात आहे. ‘नो’ हा शब्द अवधारण (निश्चयवाचक) निपात आहे. ‘समं’ म्हणजे समान किंवा तुल्य. ‘अत्थि’ म्हणजे विद्यमान आहे. ‘तथागतेन’ म्हणजे बुद्धांशी. याचा काय अर्थ होतो? जे हे धन आणि जे हे रत्न प्रकाशित केले गेले आहे, यांमध्ये एकही रत्न बुद्धरत्नाशी समान नाही. जे काही रत्न आदरपूर्वक पूजिले जाण्याच्या अर्थाने रत्न म्हटले जाते, जसे की – चक्रवर्ती राजाचे चक्ररत्न आणि मणिरत्न उत्पन्न होते, जे उत्पन्न झाले असता जनसमुदाय इतर कुठेही आदर-सत्कार करत नाही, कोणीही फुले, सुगंधी द्रव्ये इत्यादी घेऊन यक्षाच्या किंवा भूताच्या स्थानी जात नाही, तर सर्व लोक चक्ररत्न आणि मणिरत्नाचाच आदर करतात, त्याची पूजा करतात, त्या त्या श्रेष्ठ वराची प्रार्थना करतात आणि त्यांची प्रत्येक प्रार्थना पूर्ण होते; ते रत्न देखील बुद्धरत्नाशी समान नाही. जर आदरपूर्वक पूजिले जाण्याच्या अर्थाने रत्न मानले, तर तथागतच खरे रत्न आहेत. कारण तथागत उत्पन्न झाले असता, जे कोणी महान प्रभावशाली देव आणि मनुष्य आहेत, ते बुद्धांशिवाय इतर कोणाचाही आदर करत नाहीत, इतर कोणाचीही पूजा करत नाहीत. तसेच, सहम्पती ब्रह्माने सुमेरु पर्वताएवढ्या रत्नांच्या माळेने तथागतांची पूजा केली आणि इतर देवांनी व बिंबिसार राजा, कोसल राजा, अनाथपिंडिक इत्यादी मनुष्यांनी आपापल्या शक्तीनुसार पूजा केली. परिनिर्वाण पावलेल्या भगवंतांच्या उद्देशाने ९६ कोटी धन खर्च करून सम्राट अशोकांनी संपूर्ण जंबुद्विपात ८४,००० विहार स्थापन केले, मग इतरांच्या आदराविषयी काय सांगावे! शिवाय, परिनिर्वाण पावलेल्या इतर कोणत्या व्यक्तीच्या जन्मस्थान, बोधिवृक्ष, धम्मचक्रप्रवर्तन स्थान आणि परिनिर्वाण स्थान किंवा प्रतिमा, चैत्य इत्यादींच्या उद्देशाने भगवंतांच्या बाबतीत होतो तसा आदर आणि सत्कार होतो का? अशा प्रकारे, आदरपूर्वक पूजिले जाण्याच्या अर्थाने देखील तथागतांशी समान असणारे कोणतेही रत्न नाही. ตถา [Pg.144] ยมฺปิ ตํ มหคฺฆฏฺเฐน รตนํ. เสยฺยถิทํ – กาสิกํ วตฺถํ. ยถาห – ‘‘ชิณฺณมฺปิ, ภิกฺขเว, กาสิกํ วตฺถํ วณฺณวนฺตญฺเจว โหติ สุขสมฺผสฺสญฺจ มหคฺฆญฺจา’’ติ (อ. นิ. ๓.๑๐๐), ตมฺปิ พุทฺธรตเนน สมํ นตฺถิ. ยทิ หิ มหคฺฆฏฺเฐน รตนํ, ตถาคโตว รตนํ. ตถาคโต หิ เยสํ ปํสุกมฺปิ ปฏิคฺคณฺหาติ, เตสํ ตํ มหปฺผลํ โหติ มหานิสํสํ เสยฺยถาปิ อโสกรญฺโญ, อิทมสฺส มหคฺฆตาย. เอวํ มหคฺฆตาวจเนน เจตฺถ โทสาภาวสาธกํ อิทํ สุตฺตปทํ เวทิตพฺพํ – त्याचप्रमाणे, जे काही रत्न बहुमूल्य असण्याच्या अर्थाने रत्न आहे, जसे की – काशीचे वस्त्र. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – “भिक्खूंनो, काशीचे वस्त्र जुने झाले तरी देखील ते सुंदर रंगाचे असते, स्पर्शाला सुखद असते आणि बहुमूल्य असते.” ते देखील बुद्धरत्नाशी समान नाही. जर बहुमूल्य असण्याच्या अर्थाने रत्न मानले, तर तथागतच खरे रत्न आहेत. कारण तथागत ज्यांच्या मातीचा (धुळीचा) देखील स्वीकार करतात, त्यांचे ते दान महाफळ देणारे आणि महा-अनुशंस देणारे ठरते, जसे की सम्राट अशोकांच्या बाबतीत झाले. हे त्यांच्या बहुमूल्यतेमुळे आहे. अशा प्रकारे, बहुमूल्यतेच्या वचनाद्वारे येथे दोषरहितता सिद्ध करणारे हे सुत्तपद समजून घ्यावे – ‘‘เยสํ โข ปน โส ปฏิคฺคณฺหาติ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปจฺจยเภสชฺชปริกฺขารํ, เตสํ ตํ มหปฺผลํ โหติ มหานิสํสํ. อิทมสฺส มหคฺฆตาย วทามิ. เสยฺยถาปิ ตํ, ภิกฺขเว, กาสิกํ วตฺถํ มหคฺฆํ, ตถูปมาหํ, ภิกฺขเว, อิมํ ปุคฺคลํ วทามี’’ติ (อ. นิ. ๓.๑๐๐). “ज्यांच्या चिवर, पिंडपात, सेनासन आणि ग्लानप्रत्यय-भेषज्य-परिकाराचा (औषधोपचाराचा) ते स्वीकार करतात, त्यांचे ते दान महाफळ देणारे आणि महा-अनुशंस देणारे ठरते. हे मी त्यांच्या बहुमूल्यतेमुळे सांगतो. भिक्खूंनो, ज्याप्रमाणे काशीचे वस्त्र बहुमूल्य असते, त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, मी या पुद्गलाला (व्यक्तीला) बहुमूल्य म्हणतो.” เอวํ มหคฺฆฏฺเฐนปิ ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถิ. अशा प्रकारे, बहुमूल्य असण्याच्या अर्थाने देखील तथागतांशी समान असणारे कोणतेही रत्न नाही. ตถา ยมฺปิ ตํ อตุลฏฺเฐน รตนํ. เสยฺยถิทํ – รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส จกฺกรตนํ อุปฺปชฺชติ อินฺทนีลมณิมยนาภิ สตฺตรตนมยสหสฺสารํ ปวาฬมยเนมิ รตฺตสุวณฺณมยสนฺธิ, ยสฺส ทสนฺนํ ทสนฺนํ อรานมุปริ เอกํ มุณฺฑารํ โหติ วาตํ คเหตฺวา สทฺทกรณตฺถํ, เยน กโต สทฺโท สุกุสลปฺปตาฬิตปญฺจงฺคิกตูริยสทฺโท วิย โหติ, ยสฺส นาภิยา อุโภสุ ปสฺเสสุ ทฺเว สีหมุขานิ โหนฺติ, อพฺภนฺตรํ สกฏจกฺกสฺเสว สุสิรํ. ตสฺส กตฺตา วา กาเรตา วา นตฺถิ, กมฺมปจฺจเยน อุตุโต สมุฏฺฐาติ. ยํ ราชา ทสวิธํ จกฺกวตฺติวตฺตํ ปูเรตฺวา ตทหุโปสเถ ปุณฺณมทิวเส สีสํนฺหาโต อุโปสถิโก อุปริปาสาทวรคโต สีลานิ โสเธนฺโต นิสินฺโน ปุณฺณจนฺทํ วิย สูริยํ วิย จ อุฏฺเฐนฺตํ ปสฺสติ, ยสฺส ทฺวาทสโยชนโต สทฺโท สุยฺยติ, โยชนโต วณฺโณ ทิสฺสติ, ยํ มหาชเนน ‘‘ทุติโย มญฺเญ จนฺโท สูริโย วา อุฏฺฐิโต’’ติ อติวิย โกตูหลชาเตน ทิสฺสมานํ นครสฺส อุปริ อาคนฺตฺวา รญฺโญ อนฺเตปุรสฺส ปาจีนปสฺเส นาติอุจฺจํ นาตินีจํ หุตฺวา มหาชนสฺส คนฺธปุปฺผาทีหิ ปูเชตุํ, ยุตฺตฏฺฐาเน อกฺขาหตํ วิย ติฏฺฐติ. त्याचप्रमाणे, जे काही रत्न अतुलनीय असण्याच्या अर्थाने रत्न आहे, जसे की – चक्रवर्ती राजाचे चक्ररत्न उत्पन्न होते, ज्याची नाभी (मध्यभाग) इंद्रनील मण्याने बनलेली असते, ज्याचे एक हजार आरे सात रत्नांनी बनलेले असतात, ज्याची नेमी (चाकाचा घेर) प्रवाळाची असते, ज्याचे सांधे तांबड्या सोन्याचे असतात; ज्याच्या प्रत्येक दहा-दहा आऱ्यांच्या वर वारा पकडून आवाज करण्यासाठी एक-एक घुंगरू असते, ज्याच्याद्वारे केलेला आवाज अत्यंत कुशल वादकाने वाजवलेल्या पंचांगिक वाद्याच्या आवाजासारखा मधुर असतो; ज्याच्या नाभीच्या दोन्ही बाजूंना दोन सिंहमुखे असतात आणि ज्याचा आतील भाग गाडीच्या चाकाप्रमाणे पोकळ असतो. त्याचा कोणी कर्ता किंवा बनवून घेणारा नसतो, ते कर्माच्या प्रभावाने ऋतूद्वारे उत्पन्न होते. ज्या चक्ररत्नाला, राजाने दहा प्रकारची चक्रवर्ती कर्तव्ये पूर्ण करून, त्या उपोषथाच्या दिवशी, पौर्णिमेला, डोक्यावरून स्नान करून, उपोषथ व्रत धारण करून, प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर जाऊन, शील शुद्ध करत बसलेला असताना, पूर्ण चंद्राप्रमाणे किंवा सूर्याप्रमाणे उगवताना पाहतो; ज्याचा आवाज बारा योजने अंतरावरून ऐकू येतो, एक योजने अंतरावरून त्याचा रंग दिसतो; ज्याला पाहून जनसमुदाय अत्यंत कुतूहलाने “दुसरा चंद्र किंवा सूर्य उगवला आहे काय!” असे समजतो, ते नगराच्या वर येऊन, राजाच्या अंतःपुराच्या पूर्व दिशेला फार उंच नाही आणि फार सखल नाही अशा बेताच्या उंचीवर राहून, जनसमुदायाला गंध, फुले इत्यादींनी पूजा करण्यासाठी योग्य अशा ठिकाणी गाडीचा आस अडकल्याप्रमाणे स्थिर राहते. ตเทว [Pg.145] อนุพนฺธมานํ หตฺถิรตนํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพเสโต รตฺตปาโท สตฺตปฺปติฏฺโฐ อิทฺธิมา เวหาสงฺคโม อุโปสถกุลา วา ฉทฺทนฺตกุลา วา อาคจฺฉติ, อุโปสถกุลา จ อาคจฺฉนฺโต สพฺพเชฏฺโฐ อาคจฺฉติ, ฉทฺทนฺตกุลา สพฺพกนิฏฺโฐ สิกฺขิตสิกฺโข ทมถูเปโต, โส ทฺวาทสโยชนํ ปริสํ คเหตฺวา สกลชมฺพุทีปํ อนุสํยายิตฺวา ปุเรปาตราสเมว สกํ ราชธานึ อาคจฺฉติ. त्याच (चक्ररत्नाच्या) पाठोपाठ हत्तीरत्न उत्पन्न होते. ते पूर्णपणे पांढरे, लाल पाय असलेले, सात ठिकाणी सुप्रतिष्ठित (जमिनीला स्पर्श करणारे), ऋद्धियुक्त, आकाशातून गमन करू शकणारे असते. ते उपोसथ कुळातून किंवा छद्दन्त कुळातून येते. जर ते उपोसथ कुळातून येत असेल, तर ते सर्वात ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) असते; आणि जर ते छद्दन्त कुळातून येत असेल, तर ते सर्वात कनिष्ठ असले तरी सुशिक्षित (प्रशिक्षित) व उत्तम प्रकारे दमन केलेले (वश केलेले) असते. ते बारा योजनांच्या परिवाराला सोबत घेऊन संपूर्ण जम्बुद्वीपाची प्रदक्षिणा करून सकाळच्या भोजनापूर्वीच आपल्या राजधानीत परत येते. ตมฺปิ อนุพนฺธมานํ อสฺสรตนํ อุปฺปชฺชติ, สพฺพเสโต รตฺตปาโท กาฬสีโส มุญฺชเกโส วลาหกสฺสราชกุลา อาคจฺฉติ. เสสเมตฺถ หตฺถิรตนสทิสเมว. त्याच्याही (हत्तीरत्नाच्या) पाठोपाठ अश्वरत्न उत्पन्न होते. ते पूर्णपणे पांढरे, लाल पाय असलेले, काळे डोके असलेले आणि मुंज गवतासारखी (लांब) आयाळ असलेले असते. ते वलाहक अश्वराज कुळातून येते. उर्वरित सर्व वर्णन येथे हत्तीरत्नासारखेच आहे. ตมฺปิ อนุพนฺธมานํ มณิรตนํ อุปฺปชฺชติ. โส โหติ มณิ เวฬุริโย สุโภ ชาติมา อฏฺฐํโส สุปริกมฺมกโต อายามโต จกฺกนาภิสทิโส, เวปุลฺลปพฺพตา อาคจฺฉติ. โส จตุรงฺคสมนฺนาคเตปิ อนฺธกาเร รญฺโญ ธชคฺคํ คโต โยชนํ โอภาเสติ, ยสฺโสภาเสน มนุสฺสา ‘‘ทิวา’’ติ มญฺญมานา กมฺมนฺเต ปโยเชนฺติ, อนฺตมโส กุนฺถกิปิลฺลิกํ อุปาทาย ปสฺสนฺติ. त्याच्याही (अश्वरत्नाच्या) पाठोपाठ मणिरत्न उत्पन्न होते. तो मणी वैडूर्य असतो, जो सुंदर, उत्तम जातीचा, आठ पैलू असलेला, उत्तम प्रकारे पैलू पाडलेला आणि लांबीने चाकाच्या नाभीसारखा असतो. तो वेपुल्ल पर्वतावरून येतो. तो चतुरंग (घनघोर) अंधारातही राजाच्या ध्वजाच्या टोकावर ठेवला असता एक योजनभर प्रकाश पसरवतो. ज्याच्या प्रकाशाने लोक 'दिवस झाला आहे' असे मानून आपली कामे करू लागतात, अगदी लहान मुंग्यांसारखे कीटकही स्पष्ट पाहू शकतात. ตมฺปิ อนุพนฺธมานํ อิตฺถิรตนํ อุปฺปชฺชติ, ปกติอคฺคมเหสี วา โหติ, อุตฺตรกุรุโต วา อาคจฺฉติ มทฺทราชกุลโต วา, อติทีฆตาทิฉโทสวิวชฺชิตา อติกฺกนฺตา มานุสวณฺณํ อปฺปตฺตา ทิพฺพวณฺณํ, ยสฺสา รญฺโญ สีตกาเล อุณฺหานิ คตฺตานิ โหนฺติ, อุณฺหกาเล สีตานิ, สตธา โผฏิต ตูลปิจุโน วิย สมฺผสฺโส โหติ, กายโต จนฺทนคนฺโธ วายติ, มุขโต อุปฺปลคนฺโธ, ปุพฺพุฏฺฐายินิตาทิอเนกคุณสมนฺนาคตา จ โหติ. त्याच्याही पाठोपाठ स्त्रीरत्न उत्पन्न होते. ती एकतर मूळची पट्टराणी असते किंवा उत्तरकुरु देशातून अथवा मद्र राजाच्या कुळातून येते. ती अति-उंच असणे इत्यादी सहा दोषांनी विरहित असते; मानवी सौंदर्याच्या पलीकडे गेलेली, परंतु दिव्य सौंदर्यापर्यंत न पोहोचलेली अशी ती असते. जिचे शरीर राजासाठी हिवाळ्यात उबदार आणि उन्हाळ्यात थंड असते. जिचा स्पर्श शंभर वेळा पिंजलेल्या कापसासारखा मऊ असतो. जिच्या शरीरातून चंदनाचा सुगंध आणि मुखातून उत्पलाचा (निळ्या कमळाचा) सुगंध दरवळतो. ती पतीच्या आधी उठणे इत्यादी अनेक गुणांनी संपन्न असते. ตมฺปิ อนุพนฺธมานํ คหปติรตนํ อุปฺปชฺชติ รญฺโญ ปกติกมฺมกาโร เสฏฺฐิ, ยสฺส จกฺกรตเน อุปฺปนฺนมตฺเต ทิพฺพํ จกฺขุ ปาตุภวติ, เยน สมนฺตโต โยชนมตฺเต นิธึ ปสฺสติ อสามิกมฺปิ สสามิกมฺปิ, โส ราชานํ อุปสงฺกมิตฺวา ปวาเรติ ‘‘อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ, เทว, โหหิ, อหํ เต ธเนน ธนกรณียํ กริสฺสามี’’ติ. त्याच्याही पाठोपाठ गृहपतीरत्न उत्पन्न होते, जो राजाचा नेहमीचा कारभारी असलेला श्रेष्ठी असतो. चक्ररत्न उत्पन्न होताच ज्याला दिव्य चक्षु प्राप्त होतात, ज्याच्याद्वारे तो चहूबाजूला एक योजन अंतरावरील मालक असलेले व मालक नसलेले सर्व गुप्त धन पाहू शकतो. तो राजाकडे जाऊन विनंती करतो, 'हे देवा (महाराज), आपण निश्चिंत राहा, मी आपल्या धनाने आपले धनविषयक सर्व कार्य करीन.' ตมฺปิ [Pg.146] อนุพนฺธมานํ ปริณายกรตนํ อุปฺปชฺชติ รญฺโญ ปกติเชฏฺฐปุตฺโต. จกฺกรตเน อุปฺปนฺนมตฺเต อติเรกปญฺญาเวยฺยตฺติเยน สมนฺนาคโต โหติ, ทฺวาทสโยชนาย ปริสาย เจตสา จิตฺตํ ปริชานิตฺวา นิคฺคหปคฺคหสมตฺโถ โหติ, โส ราชานํ อุปสงฺกมิตฺวา ปวาเรติ ‘‘อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ, เทว, โหหิ, อหํ เต รชฺชํ อนุสาสิสฺสามี’’ติ. ยํ วา ปนญฺญมฺปิ เอวรูปํ อตุลฏฺเฐน รตนํ, ยสฺส น สกฺกา ตุลยิตฺวา ตีรยิตฺวา อคฺโฆ กาตุํ ‘‘สตํ วา สหสฺสํ วา อคฺฆติ โกฏึ วา’’ติ. ตตฺถ เอกรตนมฺปิ พุทฺธรตเนน สมํ นตฺถิ. ยทิ หิ อตุลฏฺเฐน รตนํ, ตถาคโตว รตนํ. ตถาคโต หิ น สกฺกา สีลโต วา สมาธิโต วา ปญฺญาทีนํ วา อญฺญตรโต เกนจิ ตุลยิตฺวา ตีรยิตฺวา ‘‘เอตฺตกคุโณ วา อิมินา สโม วา สปฺปฏิภาโค วา’’ติ ปริจฺฉินฺทิตุํ. เอวํ อตุลฏฺเฐนปิ ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถิ. त्याच्याही पाठोपाठ परिणायकरत्न उत्पन्न होते, जो राजाचा नेहमीचा ज्येष्ठ पुत्र असतो. चक्ररत्न उत्पन्न होताच तो अत्यंत कुशाग्र बुद्धिमत्ता आणि कौशल्याने संपन्न होतो. तो बारा योजनांच्या परिषदेतील लोकांचे विचार आपल्या मनाने जाणून घेऊन, त्यांचे निग्रह (दमन) आणि प्रग्रह (अनुग्रह) करण्यास समर्थ असतो. तो राजाकडे जाऊन विनंती करतो, 'हे देवा (महाराज), आपण निश्चिंत राहा, मी आपल्या राज्याचे शासन चालवीन.' किंवा इतर कोणतेही असे रत्न जे अतुलनीय मूल्याचे आहे, ज्याचे मूल्य मोजून किंवा ठरवून 'हे शंभर, हजार किंवा कोटी मूल्याचे आहे' असे सांगणे शक्य नाही; त्या रत्नांपैकी एकही रत्न बुद्धरत्नाच्या समान नाही. कारण जर अतुलनीय मूल्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले, तर तथागतच खरे रत्न आहेत. कारण तथागतांचे शील, समाधी, प्रज्ञा किंवा इतर कोणत्याही गुणांच्या बाबतीत कोणाशीही तुलना करून 'त्यांचे गुण एवढे आहेत, किंवा ते याच्या समान आहेत, किंवा त्यांच्याशी तुलना करता येईल असे कोणी आहे' असे मर्यादित करणे शक्य नाही. अशा प्रकारे, अतुलनीयतेच्या अर्थानेही तथागतांच्या समान कोणतेही रत्न नाही. ตถา ยมฺปิ ตํ ทุลฺลภทสฺสนฏฺเฐน รตนํ, เสยฺยถิทํ ทุลฺลภปาตุภาโว ราชา จกฺกวตฺติ, จกฺกาทีนิ จ ตสฺส รตนานิ, ตมฺปิ พุทฺธรตเนน สมํ นตฺถิ. ยทิ หิ ทุลฺลภทสฺสนฏฺเฐน รตนํ, ตถาคโตว รตนํ, กุโต จกฺกวตฺติอาทีนํ รตนตฺตํ. ตานิ หิ เอกสฺมึเยว กปฺเป อเนกานิ อุปฺปชฺชนฺติ. ยสฺมา ปน อสงฺขฺเยยฺเยปิ กปฺเป ตถาคตสุญฺโญ โลโก โหติ, ตสฺมา ตถาคโตว กทาจิ กรหจิ อุปฺปชฺชนโต ทุลฺลภทสฺสโน. วุตฺตมฺปิ เจตํ ภควตา ปรินิพฺพานสมเย – तसेच, जे दर्शन दुर्मिळ असण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले जाते, जसे की चक्रवर्ती राजाचा प्रादुर्भाव दुर्मिळ असतो आणि त्याचे चक्र इत्यादी रत्नेही दुर्मिळ असतात, ते देखील बुद्धरत्नाच्या समान नाही. कारण जर दर्शन दुर्मिळ असण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले, तर तथागतच खरे रत्न आहेत; चक्रवर्ती इत्यादींच्या रत्नांचे रत्नत्व कोठून असणार? कारण ती (चक्रवर्तीची रत्ने) एकाच कल्पामध्ये अनेक वेळा उत्पन्न होतात. परंतु असंख्य कल्प उलटून गेले तरी हा लोक तथागतांशिवाय शून्य असतो, म्हणून तथागतच कधीतरी क्वचितच उत्पन्न होत असल्यामुळे त्यांचे दर्शन अत्यंत दुर्मिळ असते. भगवान बुद्ध यांनी परिनिर्वाण समयी देखील असे म्हटले आहे - ‘‘เทวตา, อานนฺท, อุชฺฌายนฺติ ‘ทูรา จ วตมฺห อาคตา ตถาคตํ ทสฺสนาย, กทาจิ กรหจิ ตถาคตา โลเก อุปฺปชฺชนฺติ อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา, อชฺเชว รตฺติยา ปจฺฉิเม ยาเม ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานํ ภวิสฺสติ, อยญฺจ มเหสกฺโข ภิกฺขุ ภควโต ปุรโต ฐิโต โอวาเรนฺโต, น มยํ ลภาม ปจฺฉิเม กาเล ตถาคตํ ทสฺสนายา’’’ติ (ที. นิ. ๒.๒๐๐). ‘हे आनंदा, देवता खंत व्यक्त करत आहेत की, “आम्ही तथागतांच्या दर्शनासाठी खरोखरच दूरवरून आलो आहोत. जगात अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत कधीतरी क्वचितच उत्पन्न होतात. आज रात्रीच्या अंतिम प्रहरात तथागतांचे परिनिर्वाण होणार आहे; आणि हा महातेजस्वी भिक्खू भगवंतांच्या समोर उभा राहून आमची दृष्टी अडवत आहे, त्यामुळे अंतिम समयी आम्हाला तथागतांचे दर्शन मिळत नाहीये.”’ เอวํ ทุลฺลภทสฺสนฏฺเฐนาปิ ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถิ. अशा प्रकारे, दर्शन दुर्मिळ असण्याच्या अर्थानेही तथागतांच्या समान कोणतेही रत्न नाही. ตถา ยมฺปิ ตํ อโนมสตฺตปริโภคฏฺเฐน รตนํ. เสยฺยถิทํ – รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส จกฺกรตนาทิ ตญฺหิ โกฏิสตสหสฺสธนานมฺปิ สตฺตภูมิกปาสาทวรตเล [Pg.147] วสนฺตานมฺปิ จณฺฑาลเวนเนสาทรถการปุกฺกุสาทีนํ นีจกุลิกานํ โอมกปุริสานํ สุปินนฺเตปิ ปริโภคตฺถาย น นิพฺพตฺตติ. อุภโต สุชาตสฺส ปน รญฺโญ ขตฺติยสฺเสว ปริปูริตทสวิธจกฺกวตฺติวตฺตสฺส ปริโภคตฺถาย นิพฺพตฺตนโต อโนมสตฺตปริโภคํเยว โหติ, ตมฺปิ พุทฺธรตนสมํ นตฺถิ. ยทิ หิ อโนมสตฺตปริโภคฏฺเฐน รตนํ, ตถาคโตว รตนํ. ตถาคโต หิ โลเก โอมกสตฺตสมฺมตานํ อนุปนิสฺสยสมฺปนฺนานํ วิปรีตทสฺสนานํ ปูรณกสฺสปาทีนํ ฉนฺนํ สตฺถารานํ อญฺเญสญฺจ เอวรูปานํ สุปินนฺเตปิ อปริโภโค. อุปนิสฺสยสมฺปนฺนานํ ปน จตุปฺปทายปิ คาถาย ปริโยสาเน อรหตฺตมธิคนฺตุํ สมตฺถานํ นิพฺเพธิกญาณทสฺสนานํ พาหิยทารุจีริยปฺปภุตีนํ อญฺเญสญฺจ มหากุลปฺปสุตานํ มหาสาวกานํ ปริโภโค, เต หิ ตํ ทสฺสนานุตฺตริยสวนานุตฺตริยปาริจริยานุตฺตริยาทีนิ สาเธนฺตา ตถาคตํ ปริภุญฺชนฺติ. เอวํ อโนมสตฺตปริโภคฏฺเฐนาปิ ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถิ. तसेच, जे श्रेष्ठ (अ-हीन) पुरुषांद्वारेच उपभोगले जाण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले जाते, जसे की चक्रवर्ती राजाचे चक्र इत्यादी रत्ने; कारण ती रत्ने अब्जावधी संपत्ती असलेल्या आणि सात मजली श्रेष्ठ प्रासादांमध्ये राहणाऱ्या राजांसाठी देखील, किंवा चांडाल, वेणूकार, निषाद, रथकार, पुक्कस इत्यादी नीच कुळातील हीन पुरुषांना स्वप्नातही उपभोगण्यासाठी प्राप्त होत नाहीत. परंतु दोन्ही बाजूंनी शुद्ध कुळात जन्मलेल्या, दहा प्रकारच्या चक्रवर्ती कर्तव्यांचे पालन करणाऱ्या क्षत्रिय राजाच्याच उपभोगासाठी ती उत्पन्न होत असल्यामुळे, ती केवळ श्रेष्ठ पुरुषांद्वारेच उपभोगली जातात. ते देखील बुद्धरत्नाच्या समान नाही. कारण जर श्रेष्ठ पुरुषांद्वारेच उपभोगले जाण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले, तर तथागतच खरे रत्न आहेत. कारण तथागत हे जगात हीन प्राणी मानल्या गेलेल्या, उपनिषय (अध्यात्मिक पात्रता) नसलेल्या, मिथ्या दृष्टी असलेल्या पूरणकस्सप इत्यादी सहा तीर्थकरांसाठी (शिक्षकांसाठी) आणि त्यांच्यासारख्या इतरांसाठी स्वप्नातही अनुपभोग्य आहेत. परंतु ज्यांच्याकडे उपनिषय आहे, जे केवळ चार चरणांच्या गाथेच्या शेवटी देखील अर्हतपद प्राप्त करण्यास समर्थ आहेत, ज्यांच्याकडे भेदक ज्ञानदर्शन आहे, अशा बाहिय दारुचीरिय इत्यादी आणि उच्च कुळात जन्मलेल्या इतर महाश्रावकांसाठीच ते उपभोग्य आहेत; कारण ते दर्शन-अनुत्तरिय, श्रवण-अनुत्तरिय, परिचर्या-अनुत्तरिय इत्यादी साध्य करत तथागतांचा आश्रय घेतात (त्यांच्या गुणांचे सेवन करतात). अशा प्रकारे, श्रेष्ठ पुरुषांद्वारेच उपभोगले जाण्याच्या अर्थानेही तथागतांच्या समान कोणतेही रत्न नाही. ยมฺปิ ตํ อวิเสสโต รติชนนฏฺเฐน รตนํ. เสยฺยถิทํ – รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส จกฺกรตนํ. ตญฺหิ ทิสฺวาว ราชา จกฺกวตฺติ อตฺตมโน โหติ, เอวมฺปิ ตํ รญฺโญ รตึ ชเนติ. ปุน จปรํ ราชา จกฺกวตฺติ วาเมน หตฺเถน สุวณฺณภิงฺการํ คเหตฺวา ทกฺขิเณน หตฺเถน จกฺกรตนํ อพฺภุกฺกิรติ ‘‘ปวตฺตตุ ภวํ จกฺกรตนํ, อภิวิชินาตุ ภวํ จกฺกรตน’’นฺติ. ตโต จกฺกรตนํ ปญฺจงฺคิกํ วิย ตูริยํ มธุรสฺสรํ นิจฺฉรนฺตํ อากาเสน ปุรตฺถิมํ ทิสํ คจฺฉติ, อนฺวเทว ราชา, จกฺกวตฺติ จกฺกานุภาเวน ทฺวาทสโยชนวิตฺถิณฺณาย จตุรงฺคินิยา เสนาย นาติอุจฺจํ นาตินีจํ อุจฺจรุกฺขานํ เหฏฺฐาภาเคน, นีจรุกฺขานํ อุปริภาเคน, รุกฺเขสุ ปุปฺผผลปลฺลวาทิปณฺณาการํ คเหตฺวา อาคตานํ หตฺถโต ปณฺณาการญฺจ คณฺหนฺโต ‘‘เอหิ โข, มหาราชา’’ติ เอวมาทินา ปรมนิปจฺจกาเรน อาคเต ปฏิราชาโน ‘‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ’’ติอาทินา นเยน อนุสาสนฺโต คจฺฉติ. ยตฺถ ปน ราชา ภุญฺชิตุกาโม วา ทิวาเสยฺยํ วา กปฺเปตุกาโม โหติ, ตตฺถ จกฺกรตนํ อากาสา โอโรหิตฺวา อุทกาทิสพฺพกิจฺจกฺขเม สเม ภูมิภาเค อกฺขาหตํ วิย ติฏฺฐติ. ปุน รญฺโญ คมนจิตฺเต อุปฺปนฺเน ปุริมนเยเนว สทฺทํ กโรนฺตํ คจฺฉติ, ตํ สุตฺวา ทฺวาทสโยชนิกาปิ ปริสา อากาเสน คจฺฉติ[Pg.148]. จกฺกรตนํ อนุปุพฺเพน ปุรตฺถิมํ สมุทฺทํ อชฺโฌคาหติ, ตสฺมึ อชฺโฌคาหนฺเต อุทกํ โยชนปฺปมาณํ อปคนฺตฺวา ภิตฺตีกตํ วิย ติฏฺฐติ. มหาชโน ยถากามํ สตฺต รตนานิ คณฺหาติ. ปุน ราชา สุวณฺณภิงฺการํ คเหตฺวา ‘‘อิโต ปฏฺฐาย มม รชฺช’’นฺติ อุทเกน อพฺภุกฺกิริตฺวา นิวตฺตติ. เสนา ปุรโต โหติ, จกฺกรตนํ ปจฺฉโต, ราชา มชฺเฌ. จกฺกรตเนน โอสกฺกิโตสกฺกิตฏฺฐานํ อุทกํ ปริปูรติ. เอเตเนว อุปาเยน ทกฺขิณปจฺฉิมุตฺตเรปิ สมุทฺเท คจฺฉติ. जे काही सामान्यतः आनंद निर्माण करण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले जाते, जसे की – चक्रवर्ती राजाचे चक्ररत्न. कारण त्याला पाहताच चक्रवर्ती राजा अत्यंत प्रसन्न होतो, अशा प्रकारे ते राजाच्या ठिकाणी आनंद निर्माण करते. आणखी असे की, चक्रवर्ती राजा डाव्या हाताने सोन्याची झारी धरून आणि उजव्या हाताने चक्ररत्नावर पाणी शिंपडतो आणि म्हणतो: 'पूजनीय चक्ररत्न फिरू दे, पूजनीय चक्ररत्न विजय मिळवू दे.' त्यानंतर ते चक्ररत्न पाच प्रकारच्या वाद्यांच्या संगीतासारखा मधुर आवाज काढत आकाशातून पूर्व दिशेकडे जाते. त्याच्या मागोमाग चक्रवर्ती राजा चक्राच्या प्रभावाने बारा योजन विस्तीर्ण अशा चतुरंग सेनेसह, फार उंचही नाही आणि फार सखलही नाही अशा बेताने, उंच झाडांच्या खालून आणि ठेंगण्या झाडांच्या वरून प्रवास करतो. झाडांची फुले, फळे, पालवी इत्यादी नजराणे घेऊन आलेल्या लोकांच्या हातांतून तो नजराणा स्वीकारत, 'यावे, महाराज!' अशा प्रकारे अत्यंत नम्रतेने शरण आलेल्या शत्रूराजांना 'प्राण्यांची हिंसा करू नये' इत्यादी उपदेश करत तो पुढे जातो. आणि ज्या ठिकाणी राजाला भोजन करण्याची किंवा दिवसा विश्रांती घेण्याची इच्छा होते, तिथे ते चक्ररत्न आकाशातून खाली उतरून, पाणी इत्यादी सर्व गोष्टींसाठी सोयीस्कर अशा सपाट जमिनीवर जणू काही रथाचा कणा रोवल्यासारखे स्थिर उभे राहते. पुन्हा जेव्हा राजाच्या मनात जाण्याचा विचार येतो, तेव्हा ते पूर्वीप्रमाणेच आवाज करत पुढे जाते; तो आवाज ऐकून बारा योजन पसरलेला जनसमुदायही आकाशातून मार्गक्रमण करतो. चक्ररत्न क्रमशः पूर्व समुद्रात प्रवेश करते. ते समुद्रात शिरताच पाणी एक योजन मागे सरकून भिंतीसारखे उभे राहते. लोक आपल्या इच्छेनुसार सात रत्ने गोळा करतात. पुन्हा राजा सोन्याची झारी घेऊन 'आजपासून हे माझे राज्य आहे' असे म्हणून पाण्याने अभिषेक करतो आणि मागे फिरतो. सेना पुढे असते, चक्ररत्न मागे असते आणि राजा मध्ये असतो. चक्ररत्न जसे जसे मागे सरकते, तसे तसे त्या जागेवर पाणी पुन्हा भरून जाते. याच पद्धतीने तो दक्षिण, पश्चिम आणि उत्तर समुद्रातही जातो. เอวํ จตุทฺทิสํ อนุสํยายิตฺวา จกฺกรตนํ ติโยชนปฺปมาณํ อากาสํ อาโรหติ. ตตฺถ ฐิโต ราชา จกฺกรตนานุภาเวน วิชิตวิชโย ปญฺจสตปริตฺตทีปปฏิมณฺฑิตํ สตฺตโยชนสหสฺสปริมณฺฑลํ ปุพฺพวิเทหํ, ตถา อฏฺฐโยชนสหสฺสปริมณฺฑลํ อุตฺตรกุรุํ, สตฺตโยชนสหสฺสปริมณฺฑลํเยว อปรโคยานํ, ทสโยชนสหสฺสปริมณฺฑลํ ชมฺพุทีปญฺจาติ เอวํ จตุมหาทีปทฺวิสหสฺสปริตฺตทีปปฏิมณฺฑิตํ เอกํ จกฺกวาฬํ สุผุลฺลปุณฺฑรีกวนํ วิย โอโลเกติ. เอวํ โอโลกยโต จสฺส อนปฺปกา รติ อุปฺปชฺชติ. เอวมฺปิ ตํ จกฺกรตนํ รญฺโญ รตึ ชเนติ, ตมฺปิ พุทฺธรตนสมํ นตฺถิ. ยทิ หิ รติชนนฏฺเฐน รตนํ, ตถาคโตว รตนํ, กึ กริสฺสติ เอตํ จกฺกรตนํ? ตถาคโต หิ ยสฺสา ทิพฺพาย รติยา จกฺกรตนาทีหิ สพฺเพหิปิ ชนิตา จกฺกวตฺติรติ สงฺขมฺปิ กลมฺปิ กลภาคมฺปิ น อุเปติ, ตโตปิ รติโต อุตฺตริตรญฺจ ปณีตตรญฺจ อตฺตโน โอวาทปฺปฏิกรานํ อสงฺขฺเยยฺยานมฺปิ เทวมนุสฺสานํ ปฐมชฺฌานรตึ ทุติยตติยจตุตฺถปญฺจมชฺฌานรตึ, อากาสานญฺจายตนรตึ, วิญฺญาณญฺจายตนอากิญฺจญฺญายตนเนวสญฺญานาสญฺญายตนรตึ, โสตาปตฺติมคฺครตึ, โสตาปตฺติผลรตึ, สกทาคามิอนาคามิอรหตฺตมคฺคผลรติญฺจ ชเนติ. เอวํ รติชนนฏฺเฐนาปิ ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถีติ. अशा प्रकारे चारही दिशांना फिरून आल्यावर चक्ररत्न तीनशे योजन उंचीवर आकाशात चढते. तिथे स्थित असलेला राजा चक्ररत्नाच्या प्रभावाने सर्व शत्रूंवर विजय मिळवून, पाचशे लहान बेटांनी सुशोभित आणि सात हजार योजन परिघाच्या पूर्वविदेह द्वीपाला, तसेच आठ हजार योजन परिघाच्या उत्तरकुरु द्वीपाला, सात हजार योजन परिघाच्याच अपरगोयान द्वीपाला आणि दहा हजार योजन परिघाच्या जंबुद्वीपाला – अशा प्रकारे चार महाद्वीप आणि दोन हजार लहान बेटांनी सुशोभित असलेल्या या संपूर्ण चक्रवाळाला एखाद्या पूर्ण उमललेल्या पांढऱ्या कमळांच्या वनाप्रमाणे पाहतो. याप्रमाणे पाहत असताना त्याच्या मनात अपार आनंद निर्माण होतो. अशा प्रकारे ते चक्ररत्न राजाच्या मनात आनंद निर्माण करते, तरीही ते बुद्धरत्नाच्या समान नाही. कारण जर आनंद निर्माण करण्याच्या अर्थाने 'रत्न' म्हटले जात असेल, तर तथागतच खरे रत्न आहेत; हे चक्ररत्न काय करू शकणार? कारण तथागत ज्या दिव्य आनंदाची निर्मिती करतात, त्या आनंदाच्या तुलनेत चक्ररत्न इत्यादी सर्व रत्नांद्वारे निर्माण होणारा चक्रवर्तीचा आनंद हा एका अंशाच्या किंवा कलाभागाच्या बरोबरीचाही ठरत नाही. त्या आनंदापेक्षा तथागतरूपी रत्न हे अत्यंत श्रेष्ठ आणि अतिशय प्रणीत आहे. ते आपल्या उपदेशाचे पालन करणाऱ्या असंख्य देव आणि मनुष्यांच्या ठिकाणी प्रथम ध्यान, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ आणि पाचवे ध्यान; आकाशानंत्यायतनाचा आनंद, विज्ञानानंत्यायतनाचा, आकिंचन्यायतनाचा आणि नैवसंज्ञानासंज्ञायतनाचा आनंद; तसेच सोतापत्ती-मार्ग व फल, सकदागामी-मार्ग व फल, अनागामी-मार्ग व फल आणि अर्हत्त्व-मार्ग व फल यांचा आनंद निर्माण करतात. अशा प्रकारे, आनंद निर्माण करण्याच्या अर्थानेही तथागतांच्या समान दुसरे कोणतेही रत्न नाही. อปิจ รตนํ นาเมตํ ทุวิธํ โหติ สวิญฺญาณกมวิญฺญาณกญฺจ. ตตฺถ อวิญฺญาณกํ จกฺกรตนํ มณิรตนญฺจ, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ อนินฺทฺริยพทฺธสุวณฺณรชตาทิ, สวิญฺญาณกํ หตฺถิรตนาทิปริณายกรตนปริโยสานํ, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ เอวรูปํ อินฺทฺริยพทฺธํ. เอวํ ทุวิเธ เจตฺถ สวิญฺญาณกรตนํ อคฺคมกฺขายติ[Pg.149]. กสฺมา? ยสฺมา อวิญฺญาณกํ สุวณฺณรชตมณิมุตฺตาทิรตนํ สวิญฺญาณกานํ หตฺถิรตนาทีนํ อลงฺการตฺถาย อุปนียติ. शिवाय, 'रत्न' हे दोन प्रकारचे असते: सजीव (सविज्ञाणक) आणि निर्जीव (अविज्ञाणक). त्यापैकी निर्जीव रत्नांमध्ये चक्ररत्न, मणिरत्न किंवा इंद्रियांशी न जोडलेले इतर सोने-चांदी इत्यादींचा समावेश होतो. सजीव रत्नांमध्ये हत्तीरत्नापासून सुरू होऊन परिणायकरत्नापर्यंत किंवा इंद्रियांशी जोडलेल्या इतर सजीव गोष्टींचा समावेश होतो. या दोन्ही प्रकारांमध्ये सजीव रत्नालाच श्रेष्ठ मानले गेले आहे. का? कारण सोने, चांदी, मणी, मोती इत्यादी निर्जीव रत्ने ही हत्तीरत्न इत्यादी सजीव रत्नांच्या सुशोभिकरणासाठी वापरली जातात. สวิญฺญาณกรตนมฺปิ ทุวิธํ ติรจฺฉานคตรตนํ, มนุสฺสรตนญฺจ. ตตฺถ มนุสฺสรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา? ยสฺมา ติรจฺฉานคตรตนํ มนุสฺสรตนสฺส โอปวยฺหํ โหติ. มนุสฺสรตนมฺปิ ทุวิธํ อิตฺถิรตนํ, ปุริสรตนญฺจ. ตตฺถ ปุริสรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา? ยสฺมา อิตฺถิรตนํ ปุริสรตนสฺส ปริจาริกตฺตํ อาปชฺชติ. ปุริสรตนมฺปิ ทุวิธํ อคาริกรตนํ, อนคาริกรตนญฺจ. ตตฺถ อนคาริกรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา? ยสฺมา อคาริกรตเนสุ อคฺโค จกฺกวตฺติปิ สีลาทิคุณยุตฺตํ อนคาริกรตนํ ปญฺจปติฏฺฐิเตน วนฺทิตฺวา อุปฏฺฐหิตฺวา ปยิรุปาสิตฺวา ทิพฺพมานุสิกา สมฺปตฺติโย ปาปุณิตฺวา อนฺเต นิพฺพานสมฺปตฺตึ ปาปุณาติ. सजीव रत्ने देखील दोन प्रकारची असतात: प्राण्यांमधील रत्ने आणि मनुष्यांमधील रत्ने. त्यापैकी मनुष्यरत्नाला श्रेष्ठ म्हटले गेले आहे. का? कारण प्राण्यांमधील रत्ने ही मनुष्यरत्नासाठी वाहनासारखी असतात. मनुष्यरत्न देखील दोन प्रकारचे असते: स्त्रीरत्न आणि पुरुषरत्न. त्यापैकी पुरुषरत्नाला श्रेष्ठ म्हटले गेले आहे. का? कारण स्त्रीरत्न हे पुरुषरत्नाची सेवा करणारे बनते. पुरुषरत्न देखील दोन प्रकारचे असते: गृहस्थरत्न (आगारिक) आणि गृहत्यागीरत्न (अनागारिक). त्यापैकी गृहत्यागी रत्नाला श्रेष्ठ म्हटले गेले आहे. का? कारण गृहस्थरत्नांमध्ये सर्वश्रेष्ठ असलेला चक्रवर्ती राजा देखील शील इत्यादी गुणांनी युक्त असलेल्या गृहत्यागी रत्नाला साष्टांग नमस्कार करून, त्यांची सेवा करून, त्यांच्या सन्निध राहून दिव्य आणि मानवी संपत्ती प्राप्त करतो आणि शेवटी निर्वाण संपत्ती मिळवतो. เอวํ อนคาริกรตนมฺปิ ทุวิธํ อริยปุถุชฺชนวเสน. อริยรตนมฺปิ ทุวิธํ เสขาเสขวเสน. อเสขรตนมฺปิ ทุวิธํ สุกฺขวิปสฺสกสมถยานิกวเสน. สมถยานิกรตนมฺปิ ทุวิธํ สาวกปารมิปฺปตฺตมปฺปตฺตญฺจ. ตตฺถ สาวกปารมิปฺปตฺตํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา? คุณมหนฺตตาย. สาวกปารมิปฺปตฺตรตนโตปิ ปจฺเจกพุทฺธรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา? คุณมหนฺตตาย. สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานสทิสาปิ หิ อเนกสตา สาวกา เอกสฺส ปจฺเจกพุทฺธสฺส คุณานํ สตภาคมฺปิ น อุเปนฺติ. ปจฺเจกพุทฺธรตนโตปิ สมฺมาสมฺพุทฺธรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา? คุณมหนฺตตาย. สกลมฺปิ หิ ชมฺพุทีปํ ปูเรตฺวา ปลฺลงฺเกน ปลฺลงฺกํ ฆเฏนฺตา นิสินฺนา ปจฺเจกพุทฺธา เอกสฺส สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส คุณานํ เนว สงฺขํ น กลํ น กลภาคํ อุเปนฺติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, สตฺตา อปทา วา…เป… ตถาคโต เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติอาทิ (อ. นิ. ๔.๓๔; ๕.๓๒; อิติวุ. ๙๐). เอวํ เกนจิ ปริยาเยน ตถาคตสมํ รตนํ นตฺถิ. เตนาห ภควา – ‘‘น โน สมํ อตฺถิ ตถาคเตนา’’ติ. अशा प्रकारे, अनागारिक रत्न (गृहत्यागी रत्न) देखील आर्य आणि पृथग्जन यांच्या भेदाने दोन प्रकारचे आहे. आर्य रत्न देखील शैक्ष आणि अशैक्ष यांच्या भेदाने दोन प्रकारचे आहे. अशैक्ष रत्न देखील शुष्कविपश्यक आणि शमथयानिक यांच्या भेदाने दोन प्रकारचे आहे. शमथयानिक रत्न देखील श्रावकपारमी प्राप्त केलेले आणि प्राप्त न केलेले अशा दोन प्रकारचे आहे. त्यामध्ये, श्रावकपारमी प्राप्त रत्नाला श्रेष्ठ म्हटले जाते. का? गुणांच्या महानतेमुळे (गुणाधिक्यामुळे). श्रावकपारमी प्राप्त रत्नापेक्षाही प्रत्येकबुद्ध रत्न श्रेष्ठ म्हटले जाते. का? गुणांच्या महानतेमुळे. हे सत्य आहे की, सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान यांच्यासारखे शेकडो श्रावक देखील एका प्रत्येकबुद्धाच्या गुणांच्या शंभराव्या भागालाही पोहोचू शकत नाहीत. प्रत्येकबुद्ध रत्नापेक्षाही सम्यक्संबुद्ध रत्न श्रेष्ठ म्हटले जाते. का? गुणांच्या महानतेमुळे. हे सत्य आहे की, संपूर्ण जम्बुद्वीप भरून, मांडीला मांडी लावून (पद्मासनाने एकमेकांना स्पर्श करत) बसलेले प्रत्येकबुद्ध देखील एका सम्यक्संबुद्धाच्या गुणांच्या संख्येस, कलेस किंवा कलाभागास (अंशास) पोहोचू शकत नाहीत. भगवंतांनी हे म्हटलेच आहे – “भिक्खूहो, जितके काही अपाद (पाय नसलेले) प्राणी आहेत...पे... तथागत त्या सर्वांमध्ये श्रेष्ठ म्हटले जातात” इत्यादी. अशा प्रकारे, कोणत्याही मार्गाने तथागतांच्या समान दुसरे कोणतेही रत्न नाही. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – “तथागतांच्या समान दुसरे कोणीही नाही.” เอวํ ภควา พุทฺธรตนสฺส อญฺเญหิ รตเนหิ อสมตํ วตฺวา อิทานิ เตสํ สตฺตานํ อุปฺปนฺนอุปทฺทววูปสมตฺถํ เนว ชาตึ น โคตฺตํ น โกลปุตฺติยํ น วณฺณโปกฺขรตาทึ นิสฺสาย, อปิจ โข อวีจิมุปาทาย ภวคฺคปริยนฺเต [Pg.150] โลเก สีลสมาธิกฺขนฺธาทีหิ คุเณหิ พุทฺธรตนสฺส อสทิสภาวํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ พุทฺเธ รตนํ ปณีตํ, เอเตน สจฺเจน สุวตฺถิ โหตู’’ติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी बुद्धरत्नाची इतर रत्नांशी असमानता (तुलना न होऊ शकणे) सांगून, आता त्या प्राण्यांच्या उद्भवलेल्या उपद्रवांच्या शमनासाठी, जन्म, गोत्र, कुलीनता किंवा रूप-सौंदर्य इत्यादींवर अवलंबून न राहता, तर उलट अवीची नरकापासून ते भवाग्रापर्यंतच्या लोकात शील, समाधी इत्यादी स्कंधांच्या गुणांमुळे बुद्धरत्नाच्या अतुलनीयतेवर अवलंबून राहून सत्यवचन उच्चारतात – “बुद्धामध्ये हे देखील एक उत्तम रत्न आहे, या सत्याने (सर्वांचे) कल्याण असो.” ตสฺสตฺโถ – อิทมฺปิ อิธ วา หุรํ วา สคฺเคสุ วา ยํกิญฺจิ อตฺถิ วิตฺตํ วา รตนํ วา, เตน สทฺธึ เตหิ เตหิ คุเณหิ อสมตฺตา พุทฺเธ รตนํ ปณีตํ. ยทิ หิ เอตํ สจฺจํ, อถ เอเตน สจฺเจน อิเมสํ ปาณีนํ สุวตฺถิ โหตุ, โสภนานํ อตฺถิตา โหตุ อโรคตา นิรุปทฺทวตาติ. เอตฺถ จ ยถา ‘‘จกฺขุ โข, อานนฺท, สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา’’ติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๔.๘๕) อตฺตภาเวน วา อตฺตนิยภาเวน วาติ อตฺโถ. อิตรถา หิ จกฺขุ อตฺตา วา อตฺตนิยํ วาติ อปฺปฏิสิทฺธเมว สิยา. เอวํ รตนํ ปณีตนฺติ รตนตฺตํ ปณีตํ, รตนภาโว ปณีโตติ อยมตฺโถ เวทิตพฺโพ. อิตรถา หิ พุทฺโธ เนว รตนนฺติ สิชฺเฌยฺย. น หิ ยตฺถ รตนํ อตฺถิ, ตํ รตนนฺติ น สิชฺฌติ. ยตฺถ ปน จิตฺตีกตาทิอตฺถสงฺขาตํ เยน วา เตน วา วิธินา สมฺพนฺธคตํ รตนํ อตฺถิ, ยสฺมา ตํ รตนตฺตมุปาทาย รตนนฺติ ปญฺญาปียติ, ตสฺมา ตสฺส รตนสฺส อตฺถิตาย รตนนฺติ สิชฺฌติ. อถ วา อิทมฺปิ พุทฺเธ รตนนฺติ อิมินาปิ ปกาเรน พุทฺโธว รตนนฺติ เอวมตฺโถ เวทิตพฺโพ. วุตฺตมตฺตาย จ ภควตา อิมาย คาถาย ราชกุลสฺส โสตฺถิ ชาตา, ภยํ วูปสนฺตํ. อิมิสฺสา คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. त्याचा अर्थ असा समजावा – या मनुष्यलोकात किंवा परलोकात किंवा स्वर्गात जे काही धन किंवा रत्न आहे, त्या लौकिक रत्नांशी त्या त्या गुणांमुळे तुलना होऊ शकत नसल्याने, बुद्धामध्ये हे रत्न श्रेष्ठ आहे. जर हे सत्य असेल, तर या सत्याने या प्राण्यांचे कल्याण असो, त्यांना मंगल, निरोगित्व आणि उपद्रवरहितता प्राप्त होवो. आणि येथे जसे – “हे आनंदा, चक्षू हे आत्मा किंवा आत्मीय यांनी शून्य आहे” इत्यादींमध्ये आत्मभावाने किंवा आत्मीयभावाने शून्य आहे असा अर्थ होतो. अन्यथा, चक्षू हा आत्मा किंवा आत्मीय आहे हे प्रतिषिद्ध (अमान्य) होणार नाही. त्याचप्रमाणे, “रत्न श्रेष्ठ आहे” (रतनं प्रणीतं) यामध्ये रत्नत्व श्रेष्ठ आहे किंवा रत्नभाव श्रेष्ठ आहे असा अर्थ समजावा. अन्यथा, बुद्ध हे रत्न आहेत हे सिद्ध होणार नाही. कारण ज्याच्यामध्ये रत्न नाही, त्याला रत्न म्हणून सिद्ध करता येत नाही. परंतु ज्या बुद्धरत्नामध्ये आदर-सत्कार इत्यादी अर्थांनी युक्त, कोणत्याही विधीने चांगल्या प्रकारे जोडलेले रत्नत्व आहे, ज्या अर्थी त्या रत्नत्वाचा आश्रय घेऊन 'रत्न' असे म्हटले जाते, म्हणून त्या रत्नत्वाच्या अस्तित्वामुळे 'रत्न' हे सिद्ध होते. किंवा “बुद्धामध्ये हे देखील रत्न आहे” या प्रकारे “बुद्धच रत्न आहेत” असा अर्थ समजावा. भगवंतांनी ही गाथा म्हटल्याबरोबरच राजकुलाचे कल्याण झाले, भय शांत झाले. या गाथेची आज्ञा (प्रताप) एक लाख कोटी चक्रवाळांमध्ये अमनुष्यांनी स्वीकारली. ขยํ วิราคนฺติคาถาวณฺณนา ‘खयं विरागं’ गाथेचे वर्णन. ๔. เอวํ พุทฺธคุเณน สจฺจํ วตฺวา อิทานิ นิพฺพานธมฺมคุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘ขยํ วิราค’’นฺติ. ตตฺถ ยสฺมา นิพฺพานสจฺฉิกิริยาย ราคาทโย ขีณา โหนฺติ ปริกฺขีณา, ยสฺมา วา ตํ เตสํ อนุปฺปาทนิโรธกฺขยมตฺตํ, ยสฺมา จ ตํ ราคาทิวิปฺปยุตฺตํ สมฺปโยคโต จ อารมฺมณโต จ, ยสฺมา วา ตมฺหิ สจฺฉิกเต ราคาทโย อจฺจนฺตํ วิรตฺตา โหนฺติ วิคตา วิทฺธสฺตา, ตสฺมา ขยนฺติ จ วิราคนฺติ จ วุจฺจติ. ยสฺมา ปนสฺส น อุปฺปาโท ปญฺญายติ, น วโย, น ฐิตสฺส อญฺญถตฺตํ ตสฺมา ตํ น ชายติ น ชียติ น มียตีติ กตฺวา อมตนฺติ วุจฺจติ. อุตฺตมตฺเถน ปน อตปฺปกฏฺเฐน จ ปณีตนฺติ. ยทชฺฌคาติ ยํ อชฺฌคา วินฺทิ ปฏิลภิ, อตฺตโน ญาณพเลน สจฺฉากาสิ. สกฺยมุนีติ [Pg.151] สกฺยกุลปฺปสุตตฺตา สกฺโย, โมเนยฺยธมฺมสมนฺนาคตตฺตา มุนิ, สกฺโย เอว มุนิ สกฺยมุนิ. สมาหิโตติ อริยมคฺคสมาธินา สมาหิตจิตฺโต. น เตน ธมฺเมน สมตฺถิ กิญฺจีติ เตน ขยาทินามเกน สกฺยมุนินา อธิคเตน ธมฺเมน สมํ กิญฺจิ ธมฺมชาตํ นตฺถิ. ตสฺมา สุตฺตนฺตเรปิ วุตฺตํ – ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา สงฺขตา วา อสงฺขตา วา, วิราโค เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติอาทิ (อ. นิ. ๔.๓๔; อิติวุ. ๙๐). ४. अशा प्रकारे बुद्धगुणांद्वारे सत्यवचन बोलून, आता निर्वाणधर्माच्या गुणांद्वारे सत्य सांगण्यासाठी “खयं विरागं” (क्षय विराग) इत्यादी गाथा सुरू केली. त्यामध्ये, ज्या अर्थी निर्वाणाचा साक्षात्कार केल्याने राग (आसक्ती) इत्यादी अकुशल धर्म क्षीण होतात, पूर्णपणे नष्ट होतात; किंवा ज्या अर्थी ते (निर्वाण) त्यांच्यासाठी पुन्हा उत्पन्न न होणे, निरोध आणि क्षय होणे आहे; आणि ज्या अर्थी ते संप्रयोग (संयोग) आणि आलंबन (विषय) या दोन्ही दृष्टींनी राग इत्यादींपासून विमुक्त आहे; किंवा ज्या अर्थी त्याचा साक्षात्कार झाल्यावर राग इत्यादी अत्यंत विरक्त (नष्ट), गत आणि विध्वस्त होतात, म्हणून त्याला ‘क्षय’ आणि ‘विराग’ असे म्हटले जाते. परंतु ज्या अर्थी त्याची उत्पत्ती दिसत नाही, विनाश दिसत नाही आणि स्थितीमध्ये बदल (अन्यथात्व) दिसत नाही, म्हणून ते जन्मत नाही, जीर्ण (वृद्ध) होत नाही आणि मरत नाही, या कारणाने त्याला ‘अमृत’ (अमत) असे म्हटले जाते. श्रेष्ठ अर्थाने आणि संतापरहित (ताप न देणाऱ्या) अर्थाने त्याला ‘प्रणीत’ (पाणीतं) असे म्हणतात. ‘यदज्झगा’ म्हणजे – जे (निर्वाण) प्राप्त केले, मिळवले, स्वतःच्या ज्ञानबलाने साक्षात्कृत केले. ‘सक्यमुनि’ म्हणजे – शाक्य कुळात जन्मल्यामुळे ‘शाक्य’, मौनेय धर्माने (मुनीच्या आचरणाने) युक्त असल्यामुळे ‘मुनी’; शाक्यच जो मुनी तो ‘शाक्यमुनी’. ‘समाहितो’ म्हणजे – आर्यमार्ग रूपी समाधीने एकाग्र चित्त झालेले. “त्या धर्माच्या समान काहीही नाही” म्हणजे – शाक्यमुनींनी प्राप्त केलेल्या त्या ‘क्षय’ इत्यादी नावाच्या धर्माच्या (निर्वाणाच्या) समान दुसरा कोणताही धर्म नाही. म्हणूनच दुसऱ्या सूत्तातही म्हटले आहे – “भिक्खूहो, जितके काही संस्कृत किंवा असंस्कृत धर्म आहेत, त्या सर्वांमध्ये विराग (निर्वाण) श्रेष्ठ म्हटला जातो” इत्यादी. เอวํ ภควา นิพฺพานธมฺมสฺส อญฺเญหิ ธมฺเมหิ อสมตํ วตฺวา อิทานิ เตสํ สตฺตานํ อุปฺปนฺนอุปทฺทววูปสมตฺถํ ขยวิราคามตปณีตตาคุเณหิ นิพฺพานธมฺมรตนสฺส อสทิสภาวํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ ธมฺเม รตนํ ปณีตํ, เอเตน สจฺเจน สุวตฺถิ โหตู’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุริมคาถาย วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी निर्वाणधर्माची इतर धर्मांशी असमानता सांगून, आता त्या प्राण्यांच्या उद्भवलेल्या उपद्रवांच्या शमनासाठी क्षय, विराग, अमृतत्व आणि प्रणीतत्व या गुणांमुळे निर्वाणधर्मरूपी रत्नाच्या अतुलनीयतेवर अवलंबून राहून सत्यवचन उच्चारतात – “धम्मामध्ये हे देखील एक उत्तम रत्न आहे, या सत्याने (सर्वांचे) कल्याण असो.” त्याचा अर्थ पूर्वीच्या गाथेत सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमध्ये अमनुष्यांनी स्वीकारली आहे. ยํ พุทฺธเสฏฺโฐติคาถาวณฺณนา ‘यं बुद्धसेट्ठो’ गाथेचे वर्णन. ๕. เอวํ นิพฺพานธมฺมคุเณน สจฺจํ วตฺวา อิทานิ มคฺคธมฺมคุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘ยํ พุทฺธเสฏฺโฐ’’ติ. ตตฺถ ‘‘พุชฺฌิตา สจฺจานี’’ติอาทินา นเยน พุทฺโธ, อุตฺตโม ปสํสนีโย จาติ เสฏฺโฐ, พุทฺโธ จ โส เสฏฺโฐ จาติ พุทฺธเสฏฺโฐ, อนุพุทฺธปจฺเจกพุทฺธสุตพุทฺธขฺเยสุ วา พุทฺเธสุ เสฏฺโฐติ พุทฺธเสฏฺโฐ. โส พุทฺธเสฏฺโฐ ยํ ปริวณฺณยี ‘‘อฏฺฐงฺคิโกว มคฺคานํ, เขมํ นิพฺพานปตฺติยา’’ติ (ม. นิ. ๒.๒๑๕) จ ‘‘อริยํ โว, ภิกฺขเว, สมฺมาสมาธึ เทสิสฺสามิ สอุปนิสํ สปริกฺขาร’’นฺติ (ม. นิ. ๓.๑๓๖) จ เอวมาทินา นเยน ตตฺถ ตตฺถ ปสํสิ ปกาสยิ. สุจินฺติ กิเลสมลสมุจฺเฉทกรณโต อจฺจนฺตโวทานํ. สมาธิมานนฺตริกญฺญมาหูติ ยญฺจ อตฺตโน ปวตฺติสมนนฺตรํ นิยเมเนว ผลปทานโต ‘‘อานนฺตริกสมาธี’’ติ อาหุ. น หิ มคฺคสมาธิมฺหิ อุปฺปนฺเน ตสฺส ผลุปฺปตฺตินิเสธโก โกจิ อนฺตราโย อตฺถิ. ยถาห – ५. अशा प्रकारे, निर्वाण धर्माच्या गुणाने सत्य वचन सांगून, आता मार्गधर्माच्या गुणाने सांगण्यासाठी "यं बुद्धसेट्ठो" (ज्या बुद्धश्रेष्ठांनी) या गाथेचा आरंभ केला आहे. त्या गाथेत, "बुज्झिता सच्चानि" (ज्यांनी सत्यांचे आकलन केले) इत्यादी पद्धतीने ते 'बुद्ध' आहेत; ते उत्तम आणि प्रशंसनीय असल्यामुळे 'सेट्ठ' (श्रेष्ठ) आहेत; जे बुद्ध आहेत आणि श्रेष्ठ आहेत ते 'बुद्धसेट्ठ' (बुद्धश्रेष्ठ) आहेत; किंवा अनुबुद्ध, पच्चेकबुद्ध आणि सुतबुद्ध म्हटल्या जाणाऱ्या बुद्धांमध्ये जे श्रेष्ठ आहेत ते 'बुद्धसेट्ठ' होत. त्या बुद्धश्रेष्ठांनी ज्याची वारंवार प्रशंसा केली, जसे की "मार्गांमध्ये अष्टांगिक मार्ग हाच निर्वाण प्राप्तीसाठी क्षेमकारक (सुरक्षित) आहे" आणि "भिक्खूहो, मी तुम्हांला उपनिषद् (कारण) आणि परिक्खार (साधनां) सहित आर्य सम्यक समाधीचा उपदेश करीन" इत्यादी पद्धतीने त्या त्या ठिकाणी प्रशंसा केली व स्पष्ट केले. 'सुचि' (शुद्ध) म्हणजे क्लेशरूपी मळाचा समूळ उच्छेद करत असल्यामुळे अत्यंत निर्मळ. 'समाधिमानन्तरिकञ्ञमाहू' म्हणजे ज्या मार्ग-समाधीला स्वतःच्या उत्पत्तीनंतर लगेचच निश्चितपणे फल प्रदान करत असल्यामुळे 'आनन्तरिक समाधी' (तात्काळ फल देणारी समाधी) असे म्हणतात. कारण मार्ग-समाधी उत्पन्न झाल्यावर त्या व्यक्तीला फल प्राप्ती होण्यापासून रोखणारा कोणताही अडथळा (अंतराय) नसतो. जसे की त्यांनी म्हटले आहे – ‘‘อยญฺจ ปุคฺคโล โสตาปตฺติผลสจฺฉิกิริยาย ปฏิปนฺโน อสฺส, กปฺปสฺส จ อุฑฺฑยฺหนเวลา อสฺส, เนว ตาว กปฺโป อุฑฺฑยฺเหยฺย, ยาวายํ ปุคฺคโล น โสตาปตฺติผลํ สจฺฉิกโรติ, อยํ [Pg.152] วุจฺจติ ปุคฺคโล ฐิตกปฺปี. สพฺเพปิ มคฺคสมงฺคิโน ปุคฺคลา ฐิตกปฺปิโน’’ติ (ปุ. ป. ๑๗). "आणि जर हा पुद्गल (व्यक्ती) सोतापत्ति-फल साक्षात्कारासाठी मार्गस्थ झालेला असेल, आणि कल्प विनाशाची (कल्प जळण्याची) वेळ आलेली असेल, तरीही जोपर्यंत हा पुद्गल सोतापत्ति-फलाचा साक्षात्कार करत नाही, तोपर्यंत कल्प जळणार नाही. या पुद्गलाला 'ठितकप्पी' (कल्पापर्यंत टिकून राहणारा) असे म्हटले जाते. मार्गाने युक्त असलेले सर्वच पुद्गल 'ठितकप्पी' असतात." สมาธินา เตน สโม น วิชฺชตีติ เตน พุทฺธเสฏฺฐปริวณฺณิเตน สุจินา อานนฺตริกสมาธินา สโม รูปาวจรสมาธิ วา อรูปาวจรสมาธิ วา โกจิ น วิชฺชติ. กสฺมา? เตสํ ภาวิตตฺตา ตตฺถ ตตฺถ พฺรหฺมโลเก อุปปนฺนสฺสาปิ ปุน นิรยาทีสุปิ อุปปตฺติสมฺภวโต, อิมสฺส จ อรหตฺตสมาธิสฺส ภาวิตตฺตา อริยปุคฺคลสฺส สพฺพูปปตฺติสมุคฺฆาตสมฺภวโต. ตสฺมา สุตฺตนฺตเรปิ วุตฺตํ – ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, ธมฺมา สงฺขตา…เป… อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค, เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติอาทิ (อ. นิ. ๔.๓๔; อิติวุ. ๙๐). "त्या समाधीच्या समान दुसरी कोणतीही समाधी नाही" म्हणजे त्या बुद्धश्रेष्ठांनी प्रशंसिलेल्या, शुद्ध अशा आनन्तरिक समाधीच्या समान रूपावचर समाधी किंवा अरूपावचर समाधी यांपैकी कोणतीही समाधी अस्तित्वात नाही. कशामुळे? कारण त्या रूपावचर व अरूपावचर समाधीच्या भावनेमुळे त्या त्या ब्रह्मलोकात उत्पन्न झालेल्या व्यक्तीचा देखील पुन्हा नरक इत्यादी गतींमध्ये जन्म होणे शक्य असते; परंतु या अरहत्त-मार्ग समाधीच्या भावनेमुळे आर्य पुद्गलाच्या सर्व प्रकारच्या जन्मांचा समूळ नाश (उच्छेद) होतो. म्हणून इतर सूत्रांमध्येही म्हटले आहे – "भिक्खूहो, जितके काही संस्कृत (संस्कारित) धर्म आहेत... त्या सर्वांमध्ये आर्य अष्टांगिक मार्ग हाच सर्वश्रेष्ठ म्हटला गेला आहे" इत्यादी. เอวํ ภควา อานนฺตริกสมาธิสฺส อญฺเญหิ สมาธีหิ อสมตํ วตฺวา อิทานิ ปุริมนเยเนว มคฺคธมฺมรตนสฺส อสทิสภาวํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ ธมฺเม…เป… โหตู’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे, भगवंतांनी आनन्तरिक समाधीची इतर समाधींशी असलेली असमानता (अतुलनीयता) सांगून, आता पूर्वीच्याच पद्धतीने मार्ग-धम्मरत्नाच्या अद्वितीयतेचा आश्रय घेऊन "इदम्पि धम्मे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु" (या धम्मातही हे उत्तम रत्न आहे, या सत्याने कल्याण होवो) या सत्य वचनाचा प्रयोग केला आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी (देव-यक्षांनी) स्वीकारली आहे. เย ปุคฺคลาติคาถาวณฺณนา "ये पुग्गला" (जे पुद्गल) या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन). ๖. เอวํ มคฺคธมฺมคุเณนาปิ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ สงฺฆคุเณนาปิ วตฺตุมารทฺโธ ‘‘เย ปุคฺคลา’’ติ. ตตฺถ เยติ อนิยเมตฺวา อุทฺเทโส. ปุคฺคลาติ สตฺตา. อฏฺฐาติ เตสํ คณนปริจฺเฉโท. เต หิ จตฺตาโร จ ปฏิปนฺนา จตฺตาโร จ ผเล ฐิตาติ อฏฺฐ โหนฺติ. สตํ ปสตฺถาติ สปฺปุริเสหิ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธพุทฺธสาวเกหิ อญฺเญหิ จ เทวมนุสฺเสหิ ปสตฺถา. กสฺมา? สหชาตสีลาทิคุณโยคา. เตสญฺหิ จมฺปกวกุลกุสุมาทีนํ สหชาตวณฺณคนฺธาทโย วิย สหชาตา สีลสมาธิอาทโย คุณา, เตน เต วณฺณคนฺธาทิสมฺปนฺนานิ วิย ปุปฺผานิ เทวมนุสฺสานํ สตํ ปิยา มนาปา ปสํสนียา จ โหนฺติ. เตน วุตฺตํ ‘‘เย ปุคฺคลา อฏฺฐสตํ ปสตฺถา’’ติ. ६. अशा प्रकारे, मार्गधर्माच्या गुणाने देखील सत्य वचन सांगून, आता संघगुणाने देखील सांगण्यासाठी "ये पुग्गला" (जे पुद्गल) या गाथेचा आरंभ केला आहे. त्या गाथेत, 'ये' (जे) हा अनिश्चितपणे निर्देश करणारा शब्द आहे. 'पुग्गला' म्हणजे प्राणी (जीव). 'अट्ठ' (आठ) ही त्यांची संख्या निश्चित करणारी मर्यादा आहे. कारण ते चार मार्गस्थ (प्रतिपन्न) आणि चार फलामध्ये स्थित असे आठ होतात. 'सतं पसत्था' (सत्पुरुषांनी प्रशंसिलेले) म्हणजे सत्पुरुष असलेल्या बुद्ध, पच्चेकबुद्ध, बुद्धश्रावक आणि इतर देव व मनुष्यांद्वारे प्रशंसिलेले. कशामुळे? त्यांच्यामध्ये उपजत असलेल्या शील इत्यादी गुणांच्या योगामुळे. कारण त्यांच्यामध्ये, चाफा, बकुळ इत्यादी फुलांच्या उपजत रंग आणि सुगंधाप्रमाणे, उपजत शील, समाधी इत्यादी गुण असतात. त्यामुळे ते, रंग आणि सुगंधाने युक्त असलेल्या फुलांप्रमाणे, देव आणि मनुष्यांपैकी सत्पुरुषांना प्रिय, मनपसंत आणि प्रशंसनीय असतात. म्हणून म्हटले आहे – "ये पुग्गला अट्ठ सतं पसत्था" (जे आठ पुद्गल सत्पुरुषांद्वारे प्रशंसिले गेले आहेत). อถ วา เยติ อนิยเมตฺวา อุทฺเทโส. ปุคฺคลาติ สตฺตา. อฏฺฐสตนฺติ เตสํ คณนปริจฺเฉโท. เต หิ เอกพีชี โกลํโกโล สตฺตกฺขตฺตุปรโมติ ตโย โสตาปนฺนา. กามรูปารูปภเวสุ อธิคตผลา [Pg.153] ตโย สกทาคามิโน. เต สพฺเพปิ จตุนฺนํ ปฏิปทานํ วเสน จตุวีสติ. อนฺตราปรินิพฺพายี, อุปหจฺจปรินิพฺพายี, สสงฺขารปรินิพฺพายี, อสงฺขารปรินิพฺพายี, อุทฺธํโสโต, อกนิฏฺฐคามีติ อวิเหสุ ปญฺจ. ตถา อตปฺปสุทสฺสสุทสฺสีสุ. อกนิฏฺเฐสุ ปน อุทฺธํโสตวชฺชา จตฺตาโรติ จตุวีสติ อนาคามิโน. สุกฺขวิปสฺสโก สมถยานิโกติ ทฺเว อรหนฺโต. จตฺตาโร มคฺคฏฺฐาติ จตุปญฺญาส. เต สพฺเพปิ สทฺธาธุรปญฺญาธุรานํ วเสน ทิคุณา หุตฺวา อฏฺฐสตํ โหนฺติ. เสสํ วุตฺตนยเมว. किंवा, 'ये' (जे) हा अनिश्चितपणे निर्देश करणारा शब्द आहे. 'पुग्गला' म्हणजे प्राणी (जीव). 'अट्ठसतं' (एकशे आठ) ही त्यांची संख्या निश्चित करणारी मर्यादा आहे. कारण ते एकबीजी, कोलङ्कोल आणि सत्तक्खत्तुपरम असे तीन प्रकारचे सोतापन्न असतात. कामभव, रूपभव आणि अरूपभवामध्ये फल प्राप्त केलेले three प्रकारचे सकदागामी असतात. ते सर्व मिळून चार प्रतिपदांच्या (मार्गांच्या) आधारे चोवीस (२४) होतात. अंतरापरिनिब्बायी, उपहच्चपरिनिब्बायी, ससंखारपरिनिब्बायी, असंखारपरिनिब्बायी आणि उद्धंसोत-अकनिट्ठगामी असे अविह भूमीमध्ये पाच अनागामी असतात. तसेच अतप्प, सुदस्स आणि सुदस्सी भूमीमध्ये प्रत्येकी पाच असतात. परंतु अकनिट्ठ भूमीमध्ये उद्धंसोत वगळून चार असतात. अशा प्रकारे अनागामी चोवीस (२४) होतात. सुक्खविपस्सक (शुष्कविपश्यक) आणि समथयानिक असे दोन प्रकारचे अरहंत असतात. चार मार्गस्थ असतात. अशा प्रकारे एकूण चोपन्न (५४) होतात. ते सर्व मिळून श्रद्धाधुर (श्रद्धाप्रधान) आणि प्रज्ञाधुर (प्रज्ञाप्रधान) यांच्या आधारे दुप्पट होऊन एकशे आठ (१०८) होतात. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच आहे. จตฺตาริ เอตานิ ยุคานิ โหนฺตีติ เต สพฺเพปิ อฏฺฐ วา อฏฺฐสตํ วาติ วิตฺถารวเสน อุทฺทิฏฺฐปุคฺคลา สงฺเขปวเสน โสตาปตฺติมคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกํ ยุคํ, เอวํ ยาว อรหตฺตมคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกํ ยุคนฺติ จตฺตาริ ยุคานิ โหนฺติ. เต ทกฺขิเณยฺยาติ เอตฺถ เตติ ปุพฺเพ อนิยเมตฺวา อุทฺทิฏฺฐานํ นิยเมตฺวา นิทฺเทโส. เย ปุคฺคลา วิตฺถารวเสน อฏฺฐ วา, อฏฺฐสตํ วา, สงฺเขปวเสน จตฺตาริ ยุคานิ โหนฺตีติ วุตฺตา, สพฺเพปิ เต ทกฺขิณํ อรหนฺตีติ ทกฺขิเณยฺยา. ทกฺขิณา นาม กมฺมญฺจ กมฺมวิปากญฺจ สทฺทหิตฺวา ‘‘เอส เม อิทํ เวชฺชกมฺมํ วา ชงฺฆเปสนิกํ วา กริสฺสตี’’ติ เอวมาทีนิ อนเปกฺขิตฺวา ทิยฺยมาโน เทยฺยธมฺโม, ตํ อรหนฺติ นาม สีลาทิคุณยุตฺตา ปุคฺคลา, อิเม จ ตาทิสา, เตน วุจฺจนฺติ ‘‘เต ทกฺขิเณยฺยา’’ติ. "यांच्या चार जोड्या होतात" म्हणजे ते सर्व मिळून विस्ताराने आठ किंवा एकशे आठ दर्शविलेले पुद्गल संक्षेपाने – सोतापत्तिमार्गस्थ आणि फलस्थ मिळून एक जोडी, अशा प्रकारे अरहत्तमार्गस्थ आणि फलस्थ मिळेपर्यंत एक एक जोडी करून अशा चार जोड्या होतात. "ते दक्खिणेय्या" (ते दक्षिणेस पात्र आहेत) या पदात, 'ते' हा शब्द पूर्वी अनिश्चितपणे दर्शविलेल्या पुद्गलांना निश्चित करून निर्देश करणारा आहे. जे पुद्गल विस्ताराने आठ किंवा एकशे आठ, आणि संक्षेपाने चार जोड्या होतात असे म्हटले आहे, ते सर्व मिळून दक्षिणेस (दानास) पात्र आहेत म्हणून 'दक्खिणेय्य' (दक्षिणेय) होत. 'दक्षिणा' म्हणजे कर्म आणि कर्माच्या विपाकावर (फलावर) श्रद्धा ठेवून, "हा माझ्यासाठी वैद्यकीय काम करेल किंवा निरोप पोहोचवण्याचे काम करेल" इत्यादी गोष्टींची अपेक्षा न ठेवता दिले जाणारे दान. त्याला शील इत्यादी गुणांनी युक्त असलेले पुद्गलच पात्र असतात, आणि हे पुद्गल तसेच आहेत, म्हणून त्यांना "ते दक्खिणेय्या" असे म्हटले जाते. สุคตสฺส สาวกาติ ภควา โสภเนน คมเนน ยุตฺตตฺตา, โสภนญฺจ ฐานํ คตตฺตา, สุฏฺฐุ จ คตตฺตา, สุฏฺฐุ เอว จ คทตฺตา สุคโต, ตสฺส สุคตสฺส. สพฺเพปิ เต วจนํ สุณนฺตีติ สาวกา. กามญฺจ อญฺเญปิ สุณนฺติ, น ปน สุตฺวา กตฺตพฺพกิจฺจํ กโรนฺติ, อิเม ปน สุตฺวา กตฺตพฺพํ ธมฺมานุธมฺมปฺปฏิปตฺตึ กตฺวา มคฺคผลานิ ปตฺตา, ตสฺมา ‘‘สาวกา’’ติ วุจฺจนฺติ. เอเตสุ ทินฺนานิ มหปฺผลานีติ เอเตสุ สุคตสาวเกสุ อปฺปกานิปิ ทานานิ ทินฺนานิ ปฏิคฺคาหกโต ทกฺขิณาวิสุทฺธิภาวํ อุปคตตฺตา มหปฺผลานิ โหนฺติ. ตสฺมา สุตฺตนฺตเรปิ วุตฺตํ – "सुगतस्स सावका" (सुगताचे श्रावक) म्हणजे भगवंत शोभनीय गमनाने युक्त असल्यामुळे, शोभनीय अशा स्थानाला (निर्वाणाला) प्राप्त झाल्यामुळे, चांगल्या प्रकारे गेल्यामुळे आणि चांगल्या प्रकारेच बोलल्यामुळे 'सुगत' होत; त्या सुगताचे. ते सर्व त्यांचे वचन ऐकतात म्हणून 'श्रावक' होत. इतर लोक देखील वचन ऐकतात, परंतु ते ऐकून कर्तव्य कर्म करत नाहीत; परंतु हे (आर्य श्रावक) ऐकून कर्तव्य असलेली धम्मानुधम्म प्रतिपत्ती (धर्माला अनुकूल आचरण) करून मार्ग आणि फलाला प्राप्त झाले आहेत, म्हणून त्यांना 'श्रावक' असे म्हटले जाते. "एतेसु दिन्नानि mahapphalāni" (यांना दिलेले दान महाफलदायी होते) म्हणजे या सुगतश्रावकांना थोडेसे देखील दान दिले असता, प्रतिग्राहकामुळे (स्वीकारणाऱ्यामुळे) दक्षिणेची शुद्धता प्राप्त होत असल्यामुळे ते महाफलदायी होते. म्हणून इतर सूत्रांमध्येही म्हटले आहे – ‘‘ยาวตา, ภิกฺขเว, สงฺฆา วา คณา วา ตถาคตสาวกสงฺโฆ, เตสํ อคฺคมกฺขายติ, ยทิทํ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา, เอส ภควโต สาวกสงฺโฆ…เป… อคฺโค วิปาโก โหตี’’ติ (อ. นิ. ๔.๓๔; ๕.๓๒; อิติวุ. ๙๐). “हे भिक्षूंनो, जितके काही संघ किंवा गण आहेत, त्या सर्वांमध्ये तथागतांचा श्रावकसंघ हा सर्वश्रेष्ठ म्हटला जातो. म्हणजेच जे चार पुरुषयुग (जोड्या) आणि आठ पुरुषपुद्गल (व्यक्ती) आहेत, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहे...पे... हा सर्वश्रेष्ठ विपाक (फळ) देणारा आहे.” เอวํ [Pg.154] ภควา สพฺเพสมฺปิ มคฺคฏฺฐผลฏฺฐานํ วเสน สงฺฆรตนสฺส คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी मार्गस्थ आणि फलस्थ असलेल्या सर्वच पुद्गलांच्या द्वारे संघरत्नाचे गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन 'इदम्पि सङ्घे' (हे संघातील देखील सत्य आहे) हे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी (देवांनी) स्वीकारली आहे. เย สุปฺปยุตฺตาติคาถาวณฺณนา 'ये सुप्पयुत्ता' या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन) ๗. เอวํ มคฺคฏฺฐผลฏฺฐานํ วเสน สงฺฆคุเณน สจฺจํ วตฺวา อิทานิ ตโต เอกจฺจานํ ผลสมาปตฺติสุขมนุภวนฺตานํ ขีณาสวปุคฺคลานํเยว คุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘เย สุปฺปยุตฺตา’’ติ. ตตฺถ เยติ อนิยมิตุทฺเทสวจนํ. สุปฺปยุตฺตาติ สุฏฺฐุ ปยุตฺตา, อเนกวิหิตํ อเนสนํ ปหาย สุทฺธาชีวิตํ นิสฺสาย วิปสฺสนาย อตฺตานํ ปยุญฺชิตุมารทฺธาติ อตฺโถ. อถ วา สุปฺปยุตฺตาติ สุวิสุทฺธกายวจีปโยคสมนฺนาคตา, เตน เตสํ สีลกฺขนฺธํ ทสฺเสติ. มนสา ทฬฺเหนาติ ทฬฺเหน มนสา, ถิรสมาธิยุตฺเตน เจตสาติ อตฺโถ. เตน เตสํ สมาธิกฺขนฺธํ ทสฺเสติ. นิกฺกามิโนติ กาเย จ ชีวิเต จ อนเปกฺขา หุตฺวา ปญฺญาธุเรน วีริเยน สพฺพกิเลเสหิ กตนิกฺกมนา. เตน เตสํ วีริยสมฺปนฺนํ ปญฺญกฺขนฺธํ ทสฺเสติ. ७. अशा प्रकारे मार्गस्थ आणि फलस्थ पुद्गलांच्या द्वारे संघाच्या गुणाने सत्यवचन सांगून, आता त्यानंतर काही फलसमापत्तीच्या सुखाचा अनुभव घेणाऱ्या क्षीणास्रव (अर्हत) पुद्गलांच्याच गुणाने सांगण्यासाठी 'ये सुप्पयुत्ता' ही गाथा सुरू केली आहे. त्यामध्ये 'ये' हा शब्द अनिश्चित निर्देश करणारा शब्द आहे. 'सुप्पयुत्ता' म्हणजे चांगल्या प्रकारे प्रयुक्त झालेले; अनेक प्रकारच्या अयोग्य उपजीविकेचा (अनेसना) त्याग करून, शुद्ध आजीविकेचा आश्रय घेऊन, विपश्यनेमध्ये स्वतःला प्रयुक्त करण्यास प्रवृत्त झालेले, असा अर्थ आहे. अथवा 'सुप्पयुत्ता' म्हणजे अत्यंत शुद्ध कायिक व वाचिक प्रयोगाने (वर्तनाने) युक्त असलेले; या शब्दाने त्यांच्या 'शीलस्कंधा'चे दर्शन घडवले आहे. 'मनसा दळ्हेन' म्हणजे दृढ मनाने, स्थिर समाधीने युक्त अशा चित्ताने, असा अर्थ आहे. या शब्दाने त्यांच्या 'समाधिस्कंधा'चे दर्शन घडवले आहे. 'निक्कामिनो' म्हणजे शरीराची व जीवाची कोणतीही आसक्ती न ठेवता, प्रज्ञेला अग्रभागी ठेवून वीर्याने (प्रयत्नाने) सर्व क्लेशांमधून बाहेर पडलेले. या शब्दाने त्यांच्या वीर्यसंपन्न 'प्रज्ञास्कंधा'चे दर्शन घडवले आहे. โคตมสาสนมฺหีติ โคตฺตโต โคตมสฺส ตถาคตสฺเสว สาสนมฺหิ. เตน อิโต พหิทฺธา นานปฺปการมฺปิ อมรตปํ กโรนฺตานํ สุปฺปโยคาทิคุณาภาวโต กิเลเสหิ นิกฺกมนาภาวํ ทสฺเสติ. เตติ ปุพฺเพ อุทฺทิฏฺฐานํ นิทฺเทสวจนํ. ปตฺติปตฺตาติ เอตฺถ ปตฺตพฺพาติ ปตฺติ, ปตฺตพฺพา นาม ปตฺตุํ อรหา, ยํ ปตฺวา อจฺจนฺตโยคกฺเขมิโน โหนฺติ, อรหตฺตผลสฺเสตํ อธิวจนํ, ตํ ปตฺตึ ปตฺตาติ ปตฺติปตฺตา. อมตนฺติ นิพฺพานํ. วิคยฺหาติ อารมฺมณวเสน วิคาหิตฺวา. ลทฺธาติ ลภิตฺวา. มุธาติ อพฺยเยน กากณิกมตฺตมฺปิ พฺยยํ อกตฺวา. นิพฺพุตินฺติ ปฏิปฺปสฺสทฺธกิเลสทรถํ ผลสมาปตฺตึ. ภุญฺชมานาติ อนุภวมานา. กึ วุตฺตํ โหติ? เย อิมสฺมึ โคตมสาสนมฺหิ สีลสมฺปนฺนตฺตา สุปฺปยุตฺตา, สมาธิสมฺปนฺนตฺตา มนสา ทฬฺเหน, ปญฺญาสมฺปนฺนตฺตา นิกฺกามิโน, เต อิมาย สมฺมาปฏิปทาย อมตํ วิคยฺห มุธา ลทฺธา ผลสมาปตฺติสญฺญิตํ นิพฺพุตึ ภุญฺชมานา ปตฺติปตฺตา นาม โหนฺตีติ. 'गोतमसासनिम्हि' म्हणजे गोत्राने गौतम असलेल्या तथागतांच्याच शासनात (शिकवणुकीत). या शब्दाने या शासनाबाहेर विविध प्रकारची आत्मपीडादायक (अपरंतप) तपे करणाऱ्या लोकांमध्ये योग्य प्रयत्नादी गुणांच्या अभावामुळे क्लेशांमधून मुक्तता न होणे दर्शवले आहे. 'ते' हा शब्द पूर्वी उल्लेखिलेल्या पुद्गलांचा निर्देश करणारा शब्द आहे. 'पत्तिपत्ता' यामध्ये जे प्राप्त करण्यायोग्य आहे ते 'पत्ति' होय. प्राप्त करण्यायोग्य म्हणजे जे प्राप्त करण्यास योग्य आहे, जे प्राप्त केल्यावर मनुष्य अत्यंत योगक्षेम (सर्व बंधनांतून मुक्त) होतो; हे अर्हत्त्वाचेच नाव आहे. त्या प्राप्तीला (पत्ति) जे प्राप्त झाले आहेत ते 'पत्तिपत्ता' होत. 'अमतं' म्हणजे निर्वाण. 'विगय्ह' म्हणजे आलंबन (विषय) करण्याच्या रूपाने प्रवेश करून. 'लद्धा' म्हणजे प्राप्त करून. 'मुधा' म्हणजे कोणत्याही मोबदल्याशिवाय, कवडीचेही नुकसान न करता (सहजपणे). 'निब्बुतिं' म्हणजे क्लेशांचा दाह शांत करणाऱ्या फलसमापत्तीला. 'भुञ्जमाना' म्हणजे अनुभव घेत असताना. काय सांगितले आहे? जे या गौतम शासनात शीलसंपन्न असल्यामुळे चांगल्या प्रकारे प्रयुक्त आहेत, समाधिसंपन्न असल्यामुळे दृढ मनाने युक्त आहेत, प्रज्ञासंपन्न असल्यामुळे निष्काम (क्लेशांमधून मुक्त) आहेत, ते या सम्यक प्रतिपदेने (मार्गाने) अमृताचा (निर्वाणाचा) अनुभव घेऊन, तो विनामूल्य प्राप्त करून, फलसमापत्ती नावाच्या शांततेचा (निर्वाणाचा) उपभोग घेत 'पत्तिपत्ता' (अर्हत्त्व प्राप्त झालेले) होतात, असा अर्थ आहे. เอวํ [Pg.155] ภควา ผลสมาปตฺติสุขมนุภวนฺตานํ ขีณาสวปุคฺคลานเมว วเสน สงฺฆรตนสฺส คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी फलसमापत्तीच्या सुखाचा अनुभव घेणाऱ्या क्षीणास्रव (अर्हत) पुद्गलांच्याच द्वारे संघरत्नाचे गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन 'इदम्पि सङ्घे' हे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी स्वीकारली आहे. ยถินฺทขีโลติคาถาวณฺณนา 'यथिन्दखीलो' या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन) ๘. เอวํ ขีณาสวปุคฺคลานํ คุเณน สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ พหุชนปจฺจกฺเขน โสตาปนฺนสฺเสว คุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘ยถินฺทขีโล’’ติ. ตตฺถ ยถาติ อุปมาวจนํ. อินฺทขีโลติ นครทฺวารวินิวารณตฺถํ อุมฺมารพฺภนฺตเร อฏฺฐ วา ทส วา หตฺเถ ปถวึ ขณิตฺวา อาโกฏิตสฺส สารทารุมยถมฺภสฺเสตํ อธิวจนํ. ปถวินฺติ ภูมึ. สิโตติ อนฺโต ปวิสิตฺวา นิสฺสิโต. สิยาติ ภเวยฺย. จตุพฺภิ วาเตหีติ จตูหิ ทิสาหิ อาคเตหิ วาเตหิ. อสมฺปกมฺปิโยติ กมฺเปตุํ วา จาเลตุํ วา อสกฺกุเณยฺโย. ตถูปมนฺติ ตถาวิธํ. สปฺปุริสนฺติ อุตฺตมปุริสํ. วทามีติ ภณามิ. โย อริยสจฺจานิ อเวจฺจ ปสฺสตีติ โย จตฺตาริ อริยสจฺจานิ ปญฺญาย อชฺโฌคาเหตฺวา ปสฺสติ. ตตฺถ อริยสจฺจานิ กุมารปญฺเห วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพานิ. ८. अशा प्रकारे क्षीणास्रव पुद्गलांच्या गुणाने संघावर अधिष्ठित असलेले सत्य सांगून, आता बहुजनसमुदायाला प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या स्रोतापन्नाच्याच गुणाने सांगण्यासाठी 'यथिन्दखीलो' ही गाथा सुरू केली आहे. त्यामध्ये 'यथा' हा शब्द उपमा दर्शवणारा शब्द आहे. 'इन्दखीलो' (इंद्रकील) हे शहराच्या दरवाजाचे रक्षण करण्यासाठी उंबरठ्याच्या आत आठ किंवा दहा हात जमीन खणून रोवलेल्या मजबूत लाकडाच्या खांबाचे नाव आहे. 'पथविं' म्हणजे भूमीला. 'सितो' म्हणजे आत प्रवेश करून आश्रित असलेला. 'सिया' म्हणजे असावा. 'चतुब्भि वातेहि' म्हणजे चारही दिशांनी आलेल्या वाऱ्यांनी. 'असम्पकम्पियो' म्हणजे जो हलवला किंवा डळमळीत केला जाऊ शकत नाही. 'तथूपमं' म्हणजे त्या प्रकारचा. 'सप्पुरिसं' म्हणजे उत्तम पुरुषाला. 'वदामि' म्हणजे मी सांगतो. 'यो अरियसच्चानि अवेच्च पस्सति' म्हणजे जो चार आर्यसत्यांना प्रज्ञेने खोलवर जाऊन पाहतो. त्यामध्ये 'आर्यसत्ये' ही कुमारप्रश्नामध्ये सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावीत. อยํ ปเนตฺถ สงฺเขปตฺโถ – ยถา หิ อินฺทขีโล คมฺภีรเนมตาย ปถวิสฺสิโต จตุพฺภิ วาเตหิ อสมฺปกมฺปิโย สิยา, อิมมฺปิ สปฺปุริสํ ตถูปมเมว วทามิ, โย อริยสจฺจานิ อเวจฺจ ปสฺสติ. กสฺมา? ยสฺมา โสปิ อินฺทขีโล วิย จตูหิ วาเตหิ สพฺพติตฺถิยวาทวาเตหิ อสมฺปกมฺปิโย โหติ, ตมฺหา ทสฺสนา เกนจิ กมฺเปตุํ วา จาเลตุํ วา อสกฺกุเณยฺโย. ตสฺมา สุตฺตนฺตเรปิ วุตฺตํ – या गाथेचा संक्षिप्त अर्थ असा आहे – ज्याप्रमाणे खोल पाया असल्यामुळे भूमीत घट्ट रोवलेला इंद्रकील चारही दिशांच्या वाऱ्यांनी डळमळीत होत नाही, त्याचप्रमाणे जो आर्यसत्यांना खोलवर जाऊन पाहतो, त्या सत्पुरुषाला (स्रोतापन्नाला) मी इंद्रकीलासारखाच म्हणतो. का? कारण तो देखील इंद्रकीलाप्रमाणे चारही दिशांच्या वाऱ्यांनी, म्हणजेच सर्व इतर पंथांच्या (तीर्थिकांच्या) मतप्रवाहांनी डळमळीत होत नाही. त्या दर्शनापासून (आर्यसत्यांच्या साक्षात्कारापासून) त्याला कोणीही विचलित किंवा डळमळीत करू शकत नाही. म्हणूनच दुसऱ्या एका सूत्तात देखील म्हटले आहे – ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, อโยขีโล วา อินฺทขีโล วา คมฺภีรเนโม สุนิขาโต อจโล อสมฺปกมฺปี, ปุรตฺถิมาย เจปิ ทิสาย อาคจฺเฉยฺย ภุสา วาตวุฏฺฐิ, เนว นํ สงฺกมฺเปยฺย น สมฺปกมฺเปยฺย น สมฺปจาเลยฺย. ปจฺฉิมาย…เป… ทกฺขิณาย, อุตฺตรายปิ เจ…เป… น สมฺปจาเลยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? คมฺภีรตฺตา, ภิกฺขเว, เนมสฺส[Pg.156], สุนิขาตตฺตา อินฺทขีลสฺส. เอวเมว โข, ภิกฺขเว, เย จ โข เกจิ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ‘อิทํ ทุกฺขนฺติ…เป… ปฏิปทา’ติ ยถาภูตํ ปชานนฺติ, เต น อญฺญสฺส สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา มุขํ โอโลเกนฺติ ‘อยํ นูน ภวํ ชานํ ชานาติ, ปสฺสํ ปสฺสตี’ติ. ตํ กิสฺส เหตุ? สุทิฏฺฐตฺตา, ภิกฺขเว, จตุนฺนํ อริยสจฺจาน’’นฺติ (สํ. นิ. ๕.๑๑๐๙). “भिक्षूंनो, ज्याप्रमाणे एखादा लोखंडी खांब किंवा इंद्रकील खोल पाया असलेला, चांगल्या प्रकारे रोवलेला, अचल आणि अकंपित असावा; आणि पूर्व दिशेकडून जरी प्रचंड वादळ-वारा आला, तरी तो त्याला हलवू शकत नाही, डळमळीत करू शकत नाही, विचलित करू शकत नाही. पश्चिम दिशेकडून...पे... दक्षिण दिशेकडून, उत्तर दिशेकडून जरी आला...पे... तरी तो त्याला विचलित करू शकत नाही. त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, पाया खोल असल्यामुळे आणि इंद्रकील चांगल्या प्रकारे रोवलेला असल्यामुळे तो विचलित होत नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण 'हे दुःख आहे'...पे... 'ही दुःख निरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा (मार्ग) आहे' असे यथाभूत (आहे तसे) जाणतात, ते दुसऱ्या कोणत्याही श्रमणाच्या किंवा ब्राह्मणाच्या तोंडाकडे पाहत नाहीत की, 'हे आदरणीय गृहस्थ खरोखरच जाणत असून जाणतात, पाहत असून पाहतात.' त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, त्यांनी चार आर्यसत्यांना चांगल्या प्रकारे पाहिलेले (साक्षात्कार केलेले) असल्यामुळे.” เอวํ ภควา พหุชนปจฺจกฺขสฺส โสตาปนฺนสฺเสว วเสน สงฺฆรตนสฺส คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी बहुजनसमुदायाला प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या स्रोतापन्नाच्याच द्वारे संघरत्नाचे गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन 'इदम्पि सङ्घे' हे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. या गाथेची आज्ञा देखील एकux लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी स्वीकारली आहे. เย อริยสจฺจานีติคาถาวณฺณนา 'ये अरियसच्चानि' या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन) ๙. เอวํ อวิเสสโต โสตาปนฺนสฺส คุเณน สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ เย เต ตโย โสตาปนฺนา เอกพีชี โกลํโกโล สตฺตกฺขตฺตุปรโมติ. ยถาห – ९. अशा प्रकारे सामान्यतः स्रोतापन्नाच्या गुणाने संघावर अधिष्ठित असलेले सत्य सांगून, आता जे तीन प्रकारचे स्रोतापन्न आहेत – एकबीजी, कोलङ्कोल आणि सत्तक्खत्तुपरम. जसे की त्यांनी (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘อิเธกจฺโจ ปุคฺคโล ติณฺณํ สํโยชนานํ ปริกฺขยา โสตาปนฺโน โหติ…เป… โส เอกํเยว ภวํ นิพฺพตฺติตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ, อยํ เอกพีชี. ตถา ทฺเว วา ตีณิ วา กุลานิ สนฺธาวิตฺวา สํสริตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ, อยํ โกลํโกโล. ตถา สตฺตกฺขตฺตุํ เทเวสุ จ มนุสฺเสสุ จ สนฺธาวิตฺวา สํสริตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กโรติ, อยํ สตฺตกฺขตฺตุปรโม’’ติ (ปุ. ป. ๓๑-๓๓). “येथे एखादा पुद्गल तीन संयोजनांच्या क्षयामुळे सोतापन्न होतो... तो केवळ एकच जन्म घेऊन दुःखाचा अंत करतो, याला 'एकबीजी' म्हणतात. तसेच दोन किंवा तीन कुलांमध्ये जन्म घेऊन व संसार करून दुःखाचा अंत करतो, याला 'कोलंकोल' म्हणतात. तसेच देवलोकात आणि मनुष्यलोकात सात वेळा जन्म घेऊन व संसार करून दुःखाचा अंत करतो, याला 'सत्तक्खत्तुपरम' म्हणतात.” เตสํ สพฺพกนิฏฺฐสฺส สตฺตกฺขตฺตุปรมสฺส คุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘เย อริยสจฺจานี’’ติ. ตตฺถ เย อริยสจฺจานีติ เอตํ วุตฺตนยเมว. วิภาวยนฺตีติ ปญฺญาโอภาเสน สจฺจปฺปฏิจฺฉาทกํ กิเลสนฺธการํ วิธมิตฺวา อตฺตโน ปกาสานิ ปากฏานิ กโรนฺติ. คมฺภีรปญฺเญนาติ อปฺปเมยฺยปญฺญตาย สเทวกสฺส โลกสฺส ญาเณน อลพฺภเนยฺยปฺปติฏฺฐปญฺเญน, สพฺพญฺญุนาติ วุตฺตํ โหติ. สุเทสิตานีติ สมาสพฺยาสสากลฺยเวกลฺยาทีหิ เตหิ เตหิ นเยหิ สุฏฺฐุ เทสิตานิ. กิญฺจาปิ เต โหนฺติ [Pg.157] ภุสํ ปมตฺตาติ เต วิภาวิตอริยสจฺจา ปุคฺคลา กิญฺจาปิ เทวรชฺชจกฺกวตฺติรชฺชาทิปฺปมาทฏฺฐานํ อาคมฺม ภุสํ ปมตฺตา โหนฺติ, ตถาปิ โสตาปตฺติมคฺคญาเณน อภิสงฺขารวิญฺญาณสฺส นิโรเธน ฐเปตฺวา สตฺต ภเว อนมตคฺเค สํสาเร เย อุปฺปชฺเชยฺยุํ นามญฺจ รูปญฺจ, เตสํ นิรุทฺธตฺตา อตฺถงฺคตตฺตา น อฏฺฐมํ ภวํ อาทิยนฺติ, สตฺตมภเว เอว ปน วิปสฺสนํ อารภิตฺวา อรหตฺตํ ปาปุณนฺติ. त्या तिघांमध्ये सर्वात कनिष्ठ असलेल्या 'सत्तक्खत्तुपरम' पुद्गलाच्या गुणांचे वर्णन करण्यासाठी 'ये अरियसच्चानि' (जे आर्यसत्य) या गाथेचा आरंभ केला आहे. तेथे 'ये अरियसच्चानि' हे पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावे. 'विभावयन्ति' म्हणजे प्रज्ञेच्या प्रकाशाने सत्याला झाकून टाकणाऱ्या क्लेशांच्या अंधकाराचा नाश करून, स्वतःचे प्रकाशमान स्वरूप स्पष्ट करतात. 'गंभीरपञ्ञेन' म्हणजे अपार प्रज्ञेमुळे, देवलोकासह सर्व जगाच्या ज्ञानाने प्राप्त न होऊ शकणाऱ्या प्रज्ञेचे स्वामी असलेल्या, 'सर्वज्ञ' (बुद्धां) द्वारे असे म्हटले आहे. 'सुदेसितानि' म्हणजे संक्षेप, विस्तार, संपूर्णता, अपूर्णता इत्यादी विविध पद्धतींनी चांगल्या प्रकारे उपदेशिलेले. 'किञ्चापि ते होन्ति भुसं पमत्ता' म्हणजे ज्यांनी आर्यसत्यांचे आकलन केले आहे असे ते पुद्गल, जरी देवराज किंवा चक्रवर्ती राजा इत्यादींच्या प्रमाद स्थानांना प्राप्त होऊन अत्यंत प्रमादी झाले तरी, सोतापत्तिमार्गज्ञानाने अभिसंस्कार विज्ञानाचा निरोध झाल्यामुळे, अनादी संसारात सात जन्मांच्या पलीकडे जे नाम आणि रूप उत्पन्न झाले असते, त्यांचा निरोध झाल्यामुळे व ते अस्त पावल्यामुळे ते आठवा जन्म घेत नाहीत, तर सातव्या जन्मातच विपश्यनेचा आरंभ करून अर्हत्त्व प्राप्त करतात. เอวํ ภควา สตฺตกฺขตฺตุปรมวเสน สงฺฆรตนสฺส คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी 'सत्तक्खत्तुपरम' पुद्गलाच्या द्वारे संघरत्नाचे गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन 'इदम्पि सङ्घे' (हे देखील संघात...) असे सत्यवचन योजले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी स्वीकारली आहे. สหาวสฺสาติคาถาวณฺณนา 'सहावस्स' गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๐. เอวํ สตฺตกฺขตฺตุปรมสฺส อฏฺฐมํ ภวํ อนาทิยนคุเณน สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ ตสฺเสว สตฺต ภเว อาทิยโตปิ อญฺเญหิ อปฺปหีนภวาทาเนหิ ปุคฺคเลหิ วิสิฏฺเฐน คุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘สหาวสฺสา’’ติ. ตตฺถ สหาวาติ สทฺธึเยว. อสฺสาติ ‘‘น เต ภวํ อฏฺฐมมาทิยนฺตี’’ติ วุตฺเตสุ อญฺญตรสฺส. ทสฺสนสมฺปทายาติ โสตาปตฺติมคฺคสมฺปตฺติยา. โสตาปตฺติมคฺโค หิ นิพฺพานํ ทิสฺวา กตฺตพฺพกิจฺจสมฺปทาย สพฺพปฐมํ นิพฺพานทสฺสนโต ‘‘ทสฺสน’’นฺติ วุจฺจติ, ตสฺส อตฺตนิ ปาตุภาโว ทสฺสนสมฺปทา, ตาย ทสฺสนสมฺปทาย สห เอว. ตยสฺสุ ธมฺมา ชหิตา ภวนฺตีติ เอตฺถ อสฺสุ-อิติ ปทปูรณมตฺเต นิปาโต ‘‘อิทํ สุ เม, สาริปุตฺต, มหาวิกฏโภชนสฺมึ โหตี’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๑.๑๕๖) วิย. ยโต สหาวสฺส ทสฺสนสมฺปทาย ตโย ธมฺมา ชหิตา ภวนฺติ ปหีนา โหนฺตีติ อยเมตฺถ อตฺโถ. १०. अशा प्रकारे सत्तक्खत्तुपरम पुद्गलाच्या आठवा जन्म न घेण्याच्या गुणाद्वारे संघावर आधारित सत्य सांगून, आता तो सात जन्म घेत असला तरी, ज्यांनी जन्म घेण्याचे (भव-उपादान) सोडलेले नाही अशा इतर पुद्गलांपेक्षा त्याच्या विशिष्ट गुणाचे वर्णन करण्यासाठी 'सहावस्स' या गाथेचा आरंभ केला आहे. तेथे 'सहाव' म्हणजे सोबतच. 'अस्स' म्हणजे 'ते आठवा जन्म घेत नाहीत' असे म्हटलेल्या पुद्गलांपैकी एकाला. 'दस्सनसम्पदाय' म्हणजे सोतापत्तिमार्गज्ञानाच्या प्राप्तीने. कारण सोतापत्तिमार्ग हा निर्वाण पाहून कर्तव्य कर्माच्या पूर्ततेमुळे सर्वात आधी निर्वाण पाहत असल्यामुळे त्याला 'दस्सन' (दर्शन) असे म्हणतात. त्याचा स्वतःमध्ये प्रकट होणे म्हणजे 'दर्शनसंपदा' होय, त्या दर्शनसंपदेच्या सोबतच. 'तयस्सु धम्मा जहिता भवन्ति' यामध्ये 'स्सु' (अस्सु) हा केवळ पदपूर्तीसाठी आलेला निपात आहे, जसे 'इदं सु मे, सारिपुत्त, महाविकटभोजनस्मिं होति' इत्यादींमध्ये आहे. म्हणून, दर्शनसंपदेच्या प्राप्तीसोबतच त्याचे तीन धर्म (क्लेश) नष्ट होतात (त्यागले जातात), हा येथे अर्थ आहे. อิทานิ ชหิตธมฺมทสฺสนตฺถมาห ‘‘สกฺกายทิฏฺฐี วิจิกิจฺฉิตญฺจ, สีลพฺพตํ วาปิ ยทตฺถิ กิญฺจี’’ติ. ตตฺถ สติ กาเย วิชฺชมาเน อุปาทานกฺขนฺธปญฺจกาขฺเย กาเย วีสติวตฺถุกา ทิฏฺฐิ สกฺกายทิฏฺฐิ, สตี วา ตตฺถ กาเย ทิฏฺฐีติปิ สกฺกายทิฏฺฐิ, ยถาวุตฺตปฺปกาเร กาเย วิชฺชมานา ทิฏฺฐีติ อตฺโถ. สติเยว วา กาเย ทิฏฺฐีติปิ สกฺกายทิฏฺฐิ, ยถาวุตฺตปฺปกาเร กาเย วิชฺชมาเน [Pg.158] รูปาทิสงฺขาโต อตฺตาติ เอวํ ปวตฺตา ทิฏฺฐีติ อตฺโถ. ตสฺสา จ ปหีนตฺตา สพฺพทิฏฺฐิคตานิ ปหีนาเนว โหนฺติ. สา หิ เนสํ มูลํ. สพฺพกิเลสพฺยาธิวูปสมนโต ปญฺญา‘‘จิกิจฺฉิต’’นฺติ วุจฺจติ, ตํ ปญฺญาจิกิจฺฉิตํ อิโต วิคตํ, ตโต วา ปญฺญาจิกิจฺฉิตา อิทํ วิคตนฺติ วิจิกิจฺฉิตํ. ‘‘สตฺถริ กงฺขตี’’ติอาทินา (ธ. ส. ๑๐๐๘; วิภ. ๙๑๕) นเยน วุตฺตาย อฏฺฐวตฺถุกาย วิมติยา เอตํ อธิวจนํ. ตสฺสา ปหีนตฺตา สพฺพานิปิ วิจิกิจฺฉิตานิ ปหีนานิ โหนฺติ. ตญฺหิ เนสํ มูลํ. ‘‘อิโต พหิทฺธา สมณพฺราหฺมณานํ สีเลน สุทฺธิ วเตน สุทฺธี’’ติ เอวมาทีสุ (ธ. ส. ๑๒๒๒; วิภ. ๙๓๘) อาคตํ โคสีลกุกฺกุรสีลาทิกํ สีลํ โควตกุกฺกุรวตาทิกญฺจ วตํ สีลพฺพตนฺติ วุจฺจติ, ตสฺส ปหีนตฺตา สพฺพมฺปิ นคฺคิยมุณฺฑิกาทิอมรตปํ ปหีนํ โหติ. ตญฺหิ ตสฺส มูลํ, เตเนว สพฺพาวสาเน วุตฺตํ ‘‘ยทตฺถิ กิญฺจี’’ติ. ทุกฺขทสฺสนสมฺปทาย เจตฺถ สกฺกายทิฏฺฐิ สมุทยทสฺสนสมฺปทาย วิจิกิจฺฉิตํ, มคฺคทสฺสนนิพฺพานทสฺสนสมฺปทาย สีลพฺพตํ ปหียตีติ วิญฺญาตพฺพํ. आता त्यागलेल्या धर्मांचे दर्शन घडवण्यासाठी म्हणाले: 'सक्कायदिट्ठी विचिकिच्छितञ्च, सीलब्बतं वापि यदत्थि किञ्ची' (सत्कायदृष्टी, विचिकित्सा आणि शीलव्रत-परामर्श जे काही असेल ते). तेथे, विद्यमान असलेल्या शरीरात, ज्याला पाच उपादानस्कंध म्हणतात, त्या शरीरात वीस प्रकारची दृष्टी असणे म्हणजे 'सत्कायदृष्टी' (सक्कायदिट्ठी) होय. किंवा त्या शरीरात असणारी दृष्टी म्हणजे सत्कायदृष्टी, म्हणजेच वर सांगितलेल्या शरीरात विद्यमान असणारी दृष्टी असा अर्थ आहे. किंवा विद्यमान शरीरातच असणारी दृष्टी म्हणजे सत्कायदृष्टी, म्हणजेच वर सांगितलेल्या शरीरात विद्यमान असलेल्या रूप इत्यादींना 'आत्मा' मानून प्रवृत्त झालेली दृष्टी असा अर्थ आहे. आणि तिचा नाश झाल्यामुळे सर्व प्रकारच्या चुकीच्या दृष्टी (मिथ्यादृष्टी) नष्ट होतात. कारण तीच त्यांची मूळ आहे. सर्व क्लेशरूपी रोगांचे शमन करत असल्यामुळे प्रज्ञेला 'चिकित्सक' म्हटले जाते. त्या प्रज्ञारूपी चिकित्सेपासून जे दूर गेले आहे, किंवा ज्याच्यापासून प्रज्ञारूपी चिकित्सा दूर गेली आहे, ते 'विचिकिच्छित' (विचिकित्सा/शंका) होय. 'शास्त्याविषयी शंका घेतो' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेल्या आठ वस्तूंशी संबंधित संशयाचे हे नाव आहे. तिचा नाश झाल्यामुळे सर्व संशय नष्ट होतात. कारण तीच त्यांची मूळ आहे. 'या शासनाबाहेर श्रमण-ब्राह्मणांची शीलाने शुद्धी होते, व्रताने शुद्धी होते' इत्यादींमध्ये आलेले गो-शील, कुक्कुर-शील इत्यादी शील आणि गो-व्रत, कुक्कुर-व्रत इत्यादी व्रतांना 'शीलव्रत' (सीलब्बत) म्हटले जाते. त्याचा नाश झाल्यामुळे नग्न राहणे, मुंडण करणे इत्यादी सर्व प्रकारचे स्वतःला क्लेश देणारे तप नष्ट होते. कारण तेच त्याचे मूळ आहे. म्हणूनच शेवटी 'yadatthi kiñcī' (जे काही असेल ते) असे म्हटले आहे. येथे दुःखदर्शनसंपदेने सत्कायदृष्टी नष्ट होते, समुदायदर्शनसंपदेने विचिकित्सा नष्ट होते, आणि मार्गदर्शन व निर्वाणदर्शनसंपदेने शीलव्रत नष्ट होते, असे जाणावे. จตูหปาเยหีติคาถาวณฺณนา 'चतूहपायेहि' गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๑. เอวมสฺส กิเลสวฏฺฏปฺปหานํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตสฺมึ กิเลสวฏฺเฏ สติ เยน วิปากวฏฺเฏน ภวิตพฺพํ, ตปฺปหานา ตสฺสาปิ ปหานํ ทีเปนฺโต อาห ‘‘จตูหปาเยหิ จ วิปฺปมุตฺโต’’ติ. ตตฺถ จตฺตาโร อปายา นาม นิรยติรจฺฉานเปตฺติวิสยอสุรกายา. เตหิ เอส สตฺต ภเว อาทิยนฺโตปิ วิปฺปมุตฺโตติ อตฺโถ. ११. अशा प्रकारे त्याच्या क्लेशवट्टाचा (क्लेशचक्राचा) नाश दाखवून, आता तो क्लेशवट्ट असताना ज्या विपाकवट्टाची (विपाकचक्राची) उत्पत्ती झाली असती, त्याचा नाश झाल्यामुळे त्या विपाकवट्टाचाही नाश दर्शवण्यासाठी 'चतूहपायेहि च विप्पमुत्तो' (आणि चार अपायांपासून मुक्त झालेला) असे म्हणाले. तेथे चार अपाय म्हणजे नरक, तिर्यंच, प्रेतलोक आणि असुरकाय हे होत. तो सात जन्म घेत असला तरी या चार अपायांपासून पूर्णपणे मुक्त आहे, असा अर्थ आहे. เอวมสฺส วิปากวฏฺฏปฺปหานํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ยมสฺส วิปากวฏฺฏสฺส มูลภูตํ กมฺมวฏฺฏํ, ตสฺสาปิ ปหานํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ฉจฺจาภิฐานานิ อภพฺพ กาตุ’’นฺติ. ตตฺถ อภิฐานานีติ โอฬาริกฏฺฐานานิ, ตานิ เอส ฉ อภพฺโพ กาตุํ. ตานิ จ ‘‘อฏฺฐานเมตํ, ภิกฺขเว, อนวกาโส, ยํ ทิฏฺฐิสมฺปนฺโน ปุคฺคโล มาตรํ ชีวิตา โวโรเปยฺยา’’ติอาทินา (อ. นิ. ๑.๒๗๑; ม. นิ. ๓.๑๒๘; วิภ. ๘๐๙) นเยน เอกกนิปาเต วุตฺตานิ มาตุฆาตปิตุฆาตอรหนฺตฆาตโลหิตุปฺปาทสงฺฆเภทอญฺญสตฺถารุทฺเทสกมฺมานีติ เวทิตพฺพานิ. ตานิ หิ กิญฺจาปิ ทิฏฺฐิสมฺปนฺโน อริยสาวโก กุนฺถกิปิลฺลิกมฺปิ ชีวิตา น โวโรเปติ, อปิจ [Pg.159] โข ปน ปุถุชฺชนภาวสฺส วิครหณตฺถํ วุตฺตานิ. ปุถุชฺชโน หิ อทิฏฺฐิสมฺปนฺนตฺตา เอวํมหาสาวชฺชานิ อภิฐานานิปิ กโรติ, ทสฺสนสมฺปนฺโน ปน อภพฺโพ ตานิ กาตุนฺติ. อภพฺพคฺคหณญฺเจตฺถ ภวนฺตเรปิ อกรณทสฺสนตฺถํ. ภวนฺตเรปิ หิ เอส อตฺตโน อริยสาวกภาวํ อชานนฺโตปิ ธมฺมตาย เอว เอตานิ วา ฉ ปกติปาณาติปาตาทีนิ วา ปญฺจ เวรานิ อญฺญสตฺถารุทฺเทเสน สห ฉ ฐานานิ น กโรติ, ยานิ สนฺธาย เอกจฺเจ ‘‘ฉ ฉาภิฐานานี’’ติปิ ปฐนฺติ. มตมจฺฉคฺคาหาทโย เจตฺถ อริยสาวกคามทารกานํ นิทสฺสนํ. अशा प्रकारे त्या (सोतापन्न) पुद्गलाच्या विपाकवट्टाचा (विपाक-चक्राचा) नाश दाखवून, आता त्या विपाकवट्टाचे मूळ कारण असलेल्या कम्मवट्टाचा (कर्म-चक्राचा) देखील नाश दाखवताना भगवान म्हणाले— 'छच्चाभिठानानि अभब्ब कातुं' (तो सहा महापापे करण्यास असमर्थ असतो). तेथे 'अभिठानानि' म्हणजे स्थूल (गंभीर) अपराध; ती सहा कृत्ये करण्यास हा (सोतापन्न) असमर्थ असतो. आणि ती कृत्ये 'हे भिक्खूहो, हे अशक्य आहे, असा कोणताही प्रसंग नाही की दृष्टीसंपन्न पुद्गलाने आपल्या मातेला जीवे मारावे' इत्यादी पद्धतीने एककनिपातात सांगितलेली मातृघात, पितृघात, अरहंतघात, लोहितुप्पाद (बुद्धांच्या शरीरातून रक्त काढणे), संघभेद आणि अन्य शास्त्याला गुरु मानणे (अञ्ञसत्थारुद्देस) ही कर्मे आहेत असे जाणावे. कारण, जरी दृष्टीसंपन्न आर्यश्रावक लहानशा मुंगीला किंवा कीटकालाही जीवे मारत नाही, तरीही हे वचन पृथग्जनभावाची (सामान्य माणसाच्या स्थितीची) निंदा करण्यासाठी सांगितले आहे. पृथग्जन हा दृष्टीसंपन्न नसल्यामुळे अशी महादोषयुक्त गंभीर कृत्येही करतो, परंतु दर्शनसंपन्न पुद्गल ती करण्यास असमर्थ असतो. येथे 'अभब्ब' (असमर्थ) हा शब्द दुसऱ्या जन्मातही ती कृत्ये न करणे दर्शवण्यासाठी वापरला आहे. कारण दुसऱ्या जन्मातही हा पुद्गल स्वतःचा आर्यश्रावकभाव जाणत नसला तरीही, स्वभावानेच (धम्मतया) ही कृत्ये किंवा सामान्य प्राणातिपातादी पाच वेरे (पाच पापे) आणि अन्य शास्त्याला गुरु मानणे यासह सहा कृत्ये करत नाही, ज्यांना उद्देशून काही आचार्य 'छ च्छाभिठानानि' असाही पाठ वाचतात. येथे मृत मासे पकडणाऱ्या आर्यश्रावक असलेल्या गावातील मुलींचे उदाहरण हे याचे प्रमाण आहे। เอวํ ภควา สตฺต ภเว อาทิยโตปิ อริยสาวกสฺส อญฺเญหิ อปฺปหีนภวาทาเนหิ ปุคฺคเลหิ วิสิฏฺฐคุณวเสน สงฺฆรตนสฺส คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे, भगवंतांनी सातवेळा जन्म घेणाऱ्या आर्यश्रावकाचे, ज्यांनी जन्म घेण्याचे चक्र नष्ट केलेले नाही अशा इतर पुद्गलांपेक्षा असलेल्या विशिष्ट गुणांच्या आधारे संघरत्नाचा गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन 'इदम्पि सङ्घे' हे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी (देवांनी) स्वीकारली आहे। กิญฺจาปิ โสติคาถาวณฺณนา ‘किञ्चापि सो’ गाथेचे स्पष्टीकरण। ๑๒. เอวํ สตฺต ภเว อาทิยโตปิ อญฺเญหิ อปฺปหีนภวาทาเนหิ ปุคฺคเลหิ วิสิฏฺฐคุเณน สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ น เกวลํ ทสฺสนสมฺปนฺโน ฉ อภิฐานานิ อภพฺโพ กาตุํ, กินฺตุ อปฺปมตฺตกมฺปิ ปาปกมฺมํ กตฺวา ตสฺส ปฏิจฺฉาทนายปิ อภพฺโพติ ปมาทวิหาริโนปิ ทสฺสนสมฺปนฺนสฺส กตปฺปฏิจฺฉาทนาภาวคุเณน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘กิญฺจาปิ โส กมฺม กโรติ ปาปก’’นฺติ. १२. अशा प्रकारे, सातवेळा जन्म घेणाऱ्या (आर्यश्रावकाचे) इतर जन्म न संपवलेल्या पुद्गलांपेक्षा असलेल्या विशिष्ट गुणाने संघात अधिष्ठित असलेले सत्य सांगून, आता केवळ दर्शनसंपन्न पुद्गल सहा महापापे करण्यास असमर्थ असतो असे नाही, तर लहानसे पापकृत्य करूनही ते लपवण्यास तो असमर्थ असतो, हे दाखवण्यासाठी—प्रमादविहारी (सावध नसलेल्या) दर्शनसंपन्न पुद्गलाच्या केलेल्या पापाला न लपवण्याच्या गुणाचे वर्णन करण्यासाठी—'किञ्चापि सो कम्म करोति पापकं' ही गाथा सुरू केली आहे। ตสฺสตฺโถ – โส ทสฺสนสมฺปนฺโน กิญฺจาปิ สติสมฺโมเสน ปมาทวิหารํ อาคมฺม ยํ ตํ ภควตา โลกวชฺชํ สญฺจิจฺจาติกฺกมนํ สนฺธาย วุตฺตํ ‘‘ยํ มยา สาวกานํ สิกฺขาปทํ ปญฺญตฺตํ, ตํ มม สาวกา ชีวิตเหตุปิ นาติกฺกมนฺตี’’ติ (จูฬว. ๓๘๕; อุทา. ๔๕) ตํ ฐเปตฺวา อญฺญํ กุฏิการสหเสยฺยาทึ ปณฺณตฺติวชฺชวีติกฺกมสงฺขาตํ พุทฺธปฺปติกุฏฺฐํ กาเยน ปาปกมฺมํ กโรติ, ปทโสธมฺมอุตฺตริฉปฺปญฺจวาจาธมฺมเทสนสมฺผปฺปลาปผรุสวจนาทึ วา วาจาย , อุท เจตสา วา กตฺถจิ โลภโทสุปฺปาทนํ ชาตรูปาทิสาทิยนํ จีวราทิปริโภเคสุ อปจฺจเวกฺขณาทึ วา ปาปกมฺมํ กโรติ. อภพฺโพ โส ตสฺส [Pg.160] ปฏิจฺฉทาย น โส ตํ ‘‘อิทํ อกปฺปิยมกรณีย’’นฺติ ชานิตฺวา มุหุตฺตมฺปิ ปฏิจฺฉาเทติ, ตํขณํ เอว ปน สตฺถริ วา วิญฺญูสุ วา สพฺรหฺมจารีสุ อาวิ กตฺวา ยถาธมฺมํ ปฏิกโรติ, ‘‘น ปุน กริสฺสามี’’ติ เอวํ สํวริตพฺพํ วา สํวรติ. กสฺมา? ยสฺมา อภพฺพตา ทิฏฺฐปทสฺส วุตฺตา, เอวรูปมฺปิ ปาปกมฺมํ กตฺวา ตสฺส ปฏิจฺฉาทาย ทิฏฺฐนิพฺพานปทสฺส ทสฺสนสมฺปนฺนสฺส ปุคฺคลสฺส อภพฺพตา วุตฺตาติ อตฺโถ. त्याचा अर्थ असा—तो दर्शनसंपन्न पुद्गल जरी स्मृतिभ्रंशामुळे (स्मृतीच्या विस्मरणामुळे) प्रमादविहाराला (असावधपणाला) प्राप्त होऊन, भगवंतांनी ज्या लोकवज्ज (लोकापवादकारक) नियमांचे जाणूनबुजून उल्लंघन करण्याला उद्देशून म्हटले आहे की, 'मी माझ्या श्रावकांसाठी जे शिक्षापद प्रज्ञप्त केले आहे, त्याचे माझे श्रावक प्राणाच्या भयानेही उल्लंघन करत नाहीत', ते वगळून, इतर कुटिका (कुटी बनवणे), सहशय्या (एकत्र झोपणे) इत्यादी प्रज्ञप्तिवज्ज (केवळ नियमांचे उल्लंघन असणारे) आणि बुद्धांनी निषिद्ध मानलेले पापकृत्य शरीराने करतो; किंवा पदसोधम्म, उत्त रिछपञ्चवाचा, धर्मदेशना, संफप्पलाप (व्यर्थ बडबड), परुषवचन (कठोर बोलणे) इत्यादी पाप वाणीने करतो; किंवा मनाने कधी लोभ-द्वेषाची उत्पत्ती, सोने-चांदी इत्यादींचा स्वीकार करणे, चीवर इत्यादींच्या उपभोगात प्रत्यवेक्षण (चिंतन) न करणे इत्यादी पापकृत्य करतो. तरीही तो ते लपवण्यास असमर्थ असतो. 'हे अकल्पनीय (अयोग्य) आणि न करण्याजोगे आहे' असे समजल्यावर तो क्षणभरही ते लपवून ठेवत नाही, उलट त्याच क्षणी शास्त्यांजवळ किंवा सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांजवळ ते उघड करून धर्मानुसार त्याचे प्रायश्चित्त घेतो आणि 'पुन्हा असे करणार नाही' अशा प्रकारे संवर (संयम) धारण करतो. का? कारण ज्याने निर्वाणपद पाहिले आहे, त्याची असमर्थता सांगितली आहे. म्हणजेच, अशा प्रकारचे पापकृत्य करूनही ते लपवण्याबाबत, ज्याने निर्वाणपद पाहिले आहे अशा दर्शनसंपन्न पुद्गलाची असमर्थता सांगितली आहे, असा अर्थ आहे। กถํ? कसे? ‘‘เสยฺยถาปิ, ภิกฺขเว, ทหโร กุมาโร มนฺโท อุตฺตานเสยฺยโก หตฺเถน วา ปาเทน วา องฺคารํ อกฺกมิตฺวา ขิปฺปเมว ปฏิสํหรติ, เอวเมว โข, ภิกฺขเว, ธมฺมตา เอสา ทิฏฺฐิสมฺปนฺนสฺส ปุคฺคลสฺส, กิญฺจาปิ ตถารูปึ อาปตฺตึ อาปชฺชติ, ยถารูปาย อาปตฺติยา วุฏฺฐานํ ปญฺญายติ. อถ โข นํ ขิปฺปเมว สตฺถริ วา วิญฺญูสุ วา สพฺรหฺมจารีสุ เทเสติ วิวรติ อุตฺตานีกโรติ, เทเสตฺวา วิวริตฺวา อุตฺตานีกตฺวา อายตึ สํวรํ อาปชฺชตี’’ติ (ม. นิ. ๑.๔๙๖). जसे, हे भिक्खूहो, एखादा लहान, अज्ञानी आणि पाळण्यात पाठीवर झोपलेला बालक हाताने किंवा पायाने जळत्या कोळशावर पाय ठेवताच लगेचच तो मागे घेतो; तसेच, हे भिक्खूहो, दृष्टीसंपन्न पुद्गलाचा हा स्वभाव (धम्मतया) असतो की, जरी तो तशा प्रकारच्या आपत्तीला (दोषाला) प्राप्त झाला, ज्या आपत्तीतून बाहेर पडण्याचा मार्ग स्पष्ट आहे, तरी तो लगेचच शास्त्यांजवळ किंवा सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांजवळ ती प्रकट करतो, उघड करतो आणि स्पष्ट करतो. ती प्रकट करून, उघड करून आणि स्पष्ट करून तो भविष्यात संवर (संयम) धारण करतो। เอวํ ภควา ปมาทวิหาริโนปิ ทสฺสนสมฺปนฺนสฺส กตปฺปฏิจฺฉาทนาภาวคุเณน สงฺฆรตนสฺส คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे, भगवंतांनी प्रमादविहारी (असावध) असलेल्या दर्शनसंपन्न पुद्गलाच्या केलेल्या पापाला न लपवण्याच्या गुणाद्वारे संघरत्नाचा गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन 'इदम्पि सङ्घे' हे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावा. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी (देवांनी) स्वीकारली आहे। วนปฺปคุมฺเพติคาถาวณฺณนา ‘वनप्पगुम्बे’ गाथेचे स्पष्टीकरण। ๑๓. เอวํ สงฺฆปริยาปนฺนานํ ปุคฺคลานํ เตน เตน คุณปฺปกาเรน สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ ยฺวายํ ภควตา รตนตฺตยคุณํ ทีเปนฺเตน อิธ สงฺเขเปน อญฺญตฺร จ วิตฺถาเรน ปริยตฺติธมฺโม เทสิโต, ตมฺปิ นิสฺสาย ปุน พุทฺธาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺตุมารทฺโธ ‘‘วนปฺปคุมฺเพ ยถา ผุสฺสิตคฺเค’’ติ. ตตฺถ อาสนฺนสนฺนิเวสววตฺถิตานํ รุกฺขานํ สมูโห วนํ, มูลสารเผคฺคุตจสาขาปลาเสหิ ปวุทฺโธ คุมฺโพ ปคุมฺโพ, วนสฺส, วเน วา ปคุมฺโพ วนปฺปคุมฺโพ. สฺวายํ ‘‘วนปฺปคุมฺเพ’’ติ วุตฺโต, เอวมฺปิ หิ วตฺตุํ ลพฺภติ ‘‘อตฺถิ สวิตกฺกสวิจาเร[Pg.161], อตฺถิ อวิตกฺกวิจารมตฺเต, สุเข ทุกฺเข ชีเว’’ติอาทีสุ (ที. นิ. ๑.๑๗๔; ม. นิ. ๒.๒๒๘) วิย. ยถาติ อุปมาวจนํ. ผุสฺสิตานิ อคฺคานิ อสฺสาติ ผุสฺสิตคฺโค, สพฺพสาขาปสาขาสุ สญฺชาตปุปฺโผติ อตฺโถ. โส ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว ‘‘ผุสฺสิตคฺเค’’ติ วุตฺโต. คิมฺหานมาเส ปฐมสฺมึ คิมฺเหติ เย จตฺตาโร คิมฺหานํ มาสา, เตสํ จตุนฺนํ คิมฺหมาสานํ เอกสฺมึ มาเส. กตรสฺมึ มาเส อิติ เจ? ปฐมสฺมึ คิมฺเห, จิตฺรมาเสติ อตฺโถ. โส หิ ‘‘ปฐมคิมฺโห’’ติ จ ‘‘พาลวสนฺโต’’ติ จ วุจฺจติ. ตโต ปรํ ปทตฺถโต ปากฏเมว. १३. अशा प्रकारे संघात समाविष्ट असलेल्या पुद्गलांच्या त्या त्या गुणांच्या प्रकारांनी संघाला अधिष्ठान करून सत्य बोलून, आता जो हा त्रिरत्नांचे गुण प्रकाशित करणाऱ्या भगवंतांनी येथे संक्षेपाने आणि इतर ठिकाणी विस्ताराने परियत्तिधम्म देशित केला आहे, त्याचाच आश्रय घेऊन पुन्हा बुद्धाला अधिष्ठान करून सत्य बोलण्यासाठी “वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे” या गाथेचा आरंभ केला. तेथे जवळजवळ वाढलेल्या वृक्षांचा समूह म्हणजे 'वन' होय. मूळ, गाभा, साल, फांद्या आणि पानांनी वाढलेला झुडूप म्हणजे 'पगुम्ब' होय. वनाचा किंवा वनातील झुडूप म्हणजे 'वनप्पगुम्ब' होय. तोच हा 'वनप्पगुम्बे' असा म्हटला आहे. असेही म्हणता येते, जसे की “अत्थि सवितक्कसविचारे, अत्थि अवितक्कविचारमत्ते, सुखे दुक्खे जीवे” इत्यादींमध्ये म्हटले आहे. 'यथा' हा उपमावाचक शब्द आहे. ज्याची टोके फुललेली आहेत तो 'फुस्सितग्गो' होय, म्हणजेच सर्व फांद्या आणि उपफांद्यांवर फुले उमललेली आहेत असा अर्थ आहे. तो पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच 'फुस्सितग्गे' असा म्हटला आहे. 'गिम्हानमासे पठमस्मिं गिम्हे' म्हणजे उन्हाळ्याचे जे चार महिने आहेत, त्या चार उन्हाळ्याच्या महिन्यांपैकी एका महिन्यात. कोणत्या महिन्यात? असे विचारल्यास, पहिल्या उन्हाळ्याच्या महिन्यात, म्हणजेच चैत्र महिन्यात, असा अर्थ आहे. कारण त्याला 'पहिला उन्हाळा' आणि 'बालवसंत' असेही म्हटले जाते. त्यानंतर शब्दांच्या अर्थावरून ते स्पष्टच आहे. อยํ ปเนตฺถ ปิณฺฑตฺโถ – ยถา ปฐมคิมฺหนามเก พาลวสนฺเต นานาวิธรุกฺขคหเน วเน สุปุปฺผิตคฺคสาโข ตรุณรุกฺขคจฺฉปริยายนาโม ปคุมฺโพ อติวิย สสฺสิริโก โหติ, เอวเมว ขนฺธายตนาทีหิ สติปฏฺฐานสมฺมปฺปธานาทีหิ สีลสมาธิกฺขนฺธาทีหิ วา นานปฺปกาเรหิ อตฺถปฺปเภทปุปฺเผหิ อติวิย สสฺสิริกตฺตา ตถูปมํ นิพฺพานคามิมคฺคทีปนโต นิพฺพานคามึ ปริยตฺติธมฺมวรํ เนว ลาภเหตุ น สกฺการาทิเหตุ, เกวลนฺตุ มหากรุณาย อพฺภุสฺสาหิตหทโย สตฺตานํ ปรมหิตาย อเทสยีติ. ปรมํ หิตายาติ เอตฺถ จ คาถาพนฺธสุขตฺถํ อนุนาสิโก. อยํ ปนตฺโถ – ปรมหิตาย นิพฺพานาย อเทสยีติ. येथे हा एकत्रित अर्थ (पिंडार्थ) आहे – ज्याप्रमाणे पहिल्या उन्हाळ्याच्या 'बालवसंत' नावाच्या ऋतूत, विविध प्रकारच्या वृक्षांनी दाट असलेल्या वनात, ज्याच्या फांद्यांची टोके उत्तम प्रकारे फुललेली आहेत असा तरुण वृक्ष आणि झुडपांचा समूह (पगुम्ब) अत्यंत शोभायमान दिसतो; त्याचप्रमाणे स्कंध, आयतन इत्यादींनी, किंवा सतिपट्ठान, सम्मप्पधान इत्यादींनी, किंवा शील, समाधी इत्यादी स्कंधांनी, विविध प्रकारच्या अर्थ-भेदांच्या फुलांमुळे अत्यंत शोभायमान असल्यामुळे, त्या वनासारखी उपमा असलेला, निर्वाणाकडे जाणाऱ्या मार्गाला प्रकाशित करणारा आणि निर्वाणाकडे नेणारा हा श्रेष्ठ परियत्तिधम्म भगवंतांनी लाभाच्या हेतूने किंवा सत्कार इत्यादींच्या हेतूने उपदेशिला नाही; तर केवळ महाकरुणेने प्रेरित अंतःकरणाने प्राण्यांच्या परम कल्याणासाठी (परम हितासाठी) उपदेशिला आहे. 'परमं हिताय' यामध्ये गाथेच्या रचनेच्या सुलभतेसाठी अनुनासिक (अनुस्वार) वापरला आहे असे समजावे. याचा अर्थ असा आहे – परम हितासाठी, म्हणजेच निर्वाणासाठी उपदेशिला आहे. เอวํ ภควา อิมํ สุปุปฺผิตคฺควนปฺปคุมฺพสทิสํ ปริยตฺติธมฺมํ วตฺวา อิทานิ ตเมว นิสฺสาย พุทฺธาธิฏฺฐานํ สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ พุทฺเธ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. เกวลํ ปน อิทมฺปิ ยถาวุตฺตปการปริยตฺติธมฺมสงฺขาตํ พุทฺเธ รตนํ ปณีตนฺติ เอวํ โยเชตพฺพํ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी या फुलांनी बहरलेल्या वनाच्या झुडपासारख्या परियत्तिधम्माचे वर्णन करून, आता त्याचाच आश्रय घेऊन बुद्धाला अधिष्ठान करून "इदम्पि बुद्धे" असे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. केवळ एवढेच की, "हा देखील पूर्वोक्त प्रकारच्या परियत्तिधम्म नावाचा बुद्धांमधील श्रेष्ठ रत्न आहे" अशा प्रकारे संबंध जोडला पाहिजे. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमध्ये अमनुष्यांनी (देवतांनी) स्वीकारली आहे. วโร วรญฺญูติคาถาวณฺณนา 'वरो वरञ्ञू' या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๔. เอวํ ภควา ปริยตฺติธมฺเมน พุทฺธาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ โลกุตฺตรธมฺเมน วตฺตุมารทฺโธ ‘‘วโร วรญฺญู’’ติ. ตตฺถ วโรติ ปณีตาธิมุตฺติเกหิ อิจฺฉิโต ‘‘อโห วต มยมฺปิ เอวรูปา อสฺสามา’’ติ, วรคุณโยคโต วา วโร อุตฺตโม เสฏฺโฐติ อตฺโถ. วรญฺญูติ [Pg.162] นิพฺพานญฺญู. นิพฺพานญฺหิ สพฺพธมฺมานํ อุตฺตมฏฺเฐน วรํ, ตญฺเจส โพธิมูเล สยํ ปฏิวิชฺฌิตฺวา อญฺญาสิ. วรโทติ ปญฺจวคฺคิยภทฺทวคฺคิยชฏิลาทีนํ อญฺเญสญฺจ เทวมนุสฺสานํ นิพฺเพธภาคิยวาสนาภาคิยวรธมฺมทายีติ อตฺโถ. วราหโรติ วรสฺส มคฺคสฺส อาหฏตฺตา วราหโรติ วุจฺจติ. โส หิ ภควา ทีปงฺกรโต ปภุติ สมตึส ปารมิโย ปูเรนฺโต ปุพฺพเกหิ สมฺมาสมฺพุทฺเธหิ อนุยาตํ ปุราณมคฺควรมาหริ, เตน ‘‘วราหโร’’ติ วุจฺจติ. १४. अशा प्रकारे भगवंतांनी परियत्तिधम्माद्वारे बुद्धाला अधिष्ठान करून सत्य बोलून, आता लोकोत्तर धम्माद्वारे बोलण्यासाठी "वरो वरञ्ञू" या गाथेचा आरंभ केला. तेथे 'वरो' म्हणजे श्रेष्ठ गोष्टींकडे कल असलेल्या लोकांकडून "अहो! आम्ही देखील असेच व्हावे" अशी इच्छा केली गेलेली, किंवा श्रेष्ठ गुणांच्या योगाने 'वर' म्हणजे उत्तम, श्रेष्ठ असा अर्थ आहे. 'वरञ्ञू' म्हणजे निर्वाणाला जाणणारे. कारण निर्वाण हे सर्व धम्मांमध्ये श्रेष्ठत्वाच्या अर्थाने 'वर' (श्रेष्ठ) आहे, आणि ते निर्वाण या भगवंतांनी बोधिवृक्षाच्या मुळाशी स्वतः साक्षात करून जाणले. 'वरदो' म्हणजे पंचवर्गीय, भद्रवर्गीय, जटिला इत्यादींना आणि इतर देव-मनुष्यांना निर्वेधभागीय आणि वासनाभागीय श्रेष्ठ धम्म देणारे, असा अर्थ आहे. 'वरāहरो' (वराहर) म्हणजे श्रेष्ठ मार्ग आणल्यामुळे त्यांना 'वराहर' असे म्हटले जाते. कारण त्या भगवंतांनी दीपंकर बुद्धांपासून सुरू करून तीस पारमिता पूर्ण करत, पूर्वीच्या सम्यक्संबुद्धांनी अनुसरलेला तो प्राचीन श्रेष्ठ मार्ग आणला, म्हणून त्यांना 'वराहर' म्हटले जाते. อปิจ สพฺพญฺญุตญฺญาณปฺปฏิลาเภน วโร, นิพฺพานสจฺฉิกิริยาย วรญฺญู, สตฺตานํ วิมุตฺติสุขทาเนน วรโท, อุตฺตมปฏิปทาหรเณน วราหโร. เอเตหิ โลกุตฺตรคุเณหิ อธิกสฺส กสฺสจิ คุณสฺส อภาวโต อนุตฺตโร. शिवाय, सर्वज्ञता-ज्ञान प्राप्त केल्यामुळे 'वर', निर्वाणाचा साक्षात साक्षात्कारी असल्यामुळे 'वरञ्ञू', प्राण्यांना विमुक्तीचे सुख देणारे असल्यामुळे 'वरदो', आणि उत्तम प्रतिपदेचे (आचरणाचे) वहन केल्यामुळे 'वराहर' म्हटले जाते. या लोकोत्तर गुणांमुळे, त्यांच्यापेक्षा अधिक असा इतर कोणाचाही गुण अस्तित्वात नसल्यामुळे ते 'अनुत्तर' (सर्वश्रेष्ठ) आहेत. อปโร นโย – วโร อุปสมาธิฏฺฐานปริปูรเณน, วรญฺญู ปญฺญาธิฏฺฐานปริปูรเณน, วรโท จาคาธิฏฺฐานปริปูรเณน, วราหโร สจฺจาธิฏฺฐานปริปูรเณน, วรํ มคฺคสจฺจมาหรีติ. ตถา วโร ปุญฺญุสฺสเยน, วรญฺญู ปญฺญุสฺสเยน, วรโท พุทฺธภาวตฺถิกานํ ตทุปายสมฺปทาเนน, วราหโร ปจฺเจกพุทฺธภาวตฺถิกานํ ตทุปายาหรเณน, อนุตฺตโร ตตฺถ ตตฺถ อสทิสตาย, อตฺตนา วา อนาจริยโก หุตฺวา ปเรสํ อาจริยภาเวน, ธมฺมวรํ อเทสยิ สาวกภาวตฺถิกานํ ตทตฺถาย สฺวากฺขาตตาทิคุณยุตฺตสฺส ธมฺมวรสฺส เทสนโต. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ. दुसरी पद्धत अशी – उपशम-अधिष्ठानाच्या परिपूर्णतेमुळे 'वर', प्रज्ञा-अधिष्ठानाच्या परिपूर्णतेमुळे 'वरञ्ञू', त्याग-अधिष्ठानाच्या परिपूर्णतेमुळे 'वरदो', सत्य-अधिष्ठानाच्या परिपूर्णतेमुळे 'वराहर' म्हटले जाते, कारण त्यांनी श्रेष्ठ मार्गसत्य आणले. तसेच, पुण्यसंचयाने 'वर', प्रज्ञेच्या उत्कर्षाने 'वरञ्ञू', बुद्धत्व इच्छिणाऱ्यांना त्यासाठीचे उपाय योग्य प्रकारे प्रदान केल्यामुळे 'वरदो', प्रत्येकबुद्धत्व इच्छिणाऱ्यांना त्यासाठीचे उपाय आणून दिल्यामुळे 'वराहर' म्हटले जाते. त्या त्या गुणांमध्ये अतुलनीय असल्यामुळे ते 'अनुत्तर' आहेत, किंवा स्वतः गुरुविना (स्वयंभू) होऊन इतरांचे गुरु बनल्यामुळे 'अनुत्तर' आहेत. श्रावकत्व इच्छिणाऱ्यांच्या कल्याणासाठी, स्वाख्यात (सुव्याख्यात) इत्यादी गुणांनी युक्त अशा श्रेष्ठ धम्माचा उपदेश केल्यामुळे 'धम्मवरं अदेसयि' (श्रेष्ठ धम्माचा उपदेश केला) असे म्हटले जाते. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच आहे. เอวํ ภควา นววิเธน โลกุตฺตรธมฺเมน อตฺตโน คุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย พุทฺธาธิฏฺฐานํ สจฺจวจนํ ปยุญฺชติ ‘‘อิทมฺปิ พุทฺเธ’’ติ. ตสฺสตฺโถ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. เกวลํ ปน ยํ วรํ โลกุตฺตรธมฺมํ เอส อญฺญาสิ, ยญฺจ อทาสิ, ยญฺจ อาหริ, ยญฺจ เทเสสิ, อิทมฺปิ พุทฺเธ รตนํ ปณีตนฺติ เอวํ โยเชตพฺพํ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी नऊ प्रकारच्या लोकोत्तर धम्माद्वारे स्वतःचे गुण सांगून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन बुद्धाला अधिष्ठान करून "इदम्पि बुद्धे" असे सत्यवचन प्रयुक्त केले आहे. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजावा. केवळ एवढेच की, "जो श्रेष्ठ लोकोत्तर धम्म त्यांनी जाणला, जो दिला, जो आणला आणि ज्याचा उपदेश केला, तो देखील बुद्धांमधील श्रेष्ठ रत्न आहे" अशा प्रकारे संबंध जोडला पाहिजे. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमध्ये अमनुष्यांनी (देवतांनी) स्वीकारली आहे. ขีณนฺติคาถาวณฺณนา 'खीणं' या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๕. เอวํ ภควา ปริยตฺติธมฺมญฺจ นวโลกุตฺตรธมฺมญฺจ นิสฺสาย ทฺวีหิ คาถาหิ พุทฺธาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺวา อิทานิ เย ตํ ปริยตฺติธมฺมํ อสฺโสสุํ, สุตานุสาเรน [Pg.163] จ ปฏิปชฺชิตฺวา นวปฺปการมฺปิ โลกุตฺตรธมฺมํ อธิคมึสุ, เตสํ อนุปาทิเสสนิพฺพานปตฺติคุณํ นิสฺสาย ปุน สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจํ วตฺตุมารทฺโธ ‘‘ขีณํ ปุราณ’’นฺติ. ตตฺถ ขีณนฺติ สมุจฺฉินฺนํ. ปุราณนฺติ ปุราตนํ. นวนฺติ สมฺปติ วตฺตมานํ. นตฺถิ สมฺภวนฺติ อวิชฺชมานปาตุภาวํ. วิรตฺตจิตฺตาติ วีตราคจิตฺตา. อายติเก ภวสฺมินฺติ อนาคตมทฺธานํ ปุนพฺภเว. เตติ เยสํ ขีณํ ปุราณํ นวํ นตฺถิ สมฺภวํ, เย จ อายติเก ภวสฺมึ วิรตฺตจิตฺตา, เต ขีณาสวา ภิกฺขู. ขีณพีชาติ อุจฺฉินฺนพีชา. อวิรูฬฺหิฉนฺทาติ วิรูฬฺหิฉนฺทวิรหิตา. นิพฺพนฺตีติ วิชฺฌายนฺติ. ธีราติ ธิติสมฺปนฺนา. ยถายํ ปทีโปติ อยํ ปทีโป วิย. १५. अशा प्रकारे भगवंतांनी परियत्तिधम्म आणि नऊ प्रकारच्या लोकोत्तर धम्माचा आश्रय घेऊन, दोन गाथांद्वारे बुद्धाधिष्ठित सत्याचे कथन केले. आता ज्यांनी त्या परियत्तिधम्माचे श्रवण केले आणि श्रवणानुसार आचरण करून नऊ प्रकारचा लोकोत्तर धम्म प्राप्त केला, त्यांच्या अनुपधिशेष निर्वाण प्राप्तीच्या गुणाचा आश्रय घेऊन, पुन्हा संघाधिष्ठित सत्याचे कथन करण्यासाठी "खीणं पुराणं" ही गाथा सुरू केली. तेथे 'खीणं' म्हणजे समूळ नष्ट झालेले. 'पुराणं' म्हणजे जुने (कर्म). 'नवं' म्हणजे सध्याचे वर्तमान (कर्म). 'नत्थि सम्भवं' म्हणजे पुनर्जन्म घडवून आणण्याची क्षमता नसलेले (उत्पत्तीचा अभाव). 'विरत्तचित्ता' म्हणजे जिचे चित्त रागापासून (आसक्तीपासून) मुक्त झाले आहे असे (वीतरागचित्त). 'आयतिके भवस्मिं' म्हणजे भविष्यातील पुनर्जन्मामध्ये. 'ते' म्हणजे ज्यांचे जुने कर्म नष्ट झाले आहे, नवीन कर्माची उत्पत्ती नाही आणि जे भविष्यातील जन्माविषयी अनासक्त चित्त असणारे आहेत, ते क्षीणासव भिक्खू होत. 'खीणबीजा' म्हणजे ज्यांचे (पुनर्जन्माचे) बीज नष्ट झाले आहे. 'अविरूळ्हिछन्दा' म्हणजे पुन्हा उत्पन्न होण्याची (वाढण्याची) इच्छा नसलेले. 'निब्बन्ति' म्हणजे विझून जातात (शांत होतात). 'धीरा' म्हणजे धैर्याने (किंवा प्रज्ञेने) संपन्न असलेले. 'यथायं पदीपो' म्हणजे ज्याप्रमाणे हा दिवा (विझतो) त्याप्रमाणे। กึ วุตฺตํ โหติ? ยํ ตํ สตฺตานํ อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุทฺธมฺปิ ปุราณํ อตีตกาลิกํ กมฺมํ ตณฺหาสิเนหสฺส อปฺปหีนตฺตา ปฏิสนฺธิอาหรณสมตฺถตาย อขีณํเยว โหติ, ตํ ปุราณํ กมฺมํ เยสํ อรหตฺตมคฺเคน ตณฺหาสิเนหสฺส โสสิตตฺตา อคฺคินา ทฑฺฒพีชมิว อายตึ วิปากทานาสมตฺถตาย ขีณํ. ยญฺจ เนสํ พุทฺธปูชาทิวเสน อิทานิ ปวตฺตมานํ กมฺมํ นวนฺติ วุจฺจติ, ตญฺจ ตณฺหาปหาเนเนว ฉินฺนมูลปาทปปุปฺผมิว อายตึ ผลทานาสมตฺถตาย เยสํ นตฺถิ สมฺภวํ, เย จ ตณฺหาปหาเนเนว อายติเก ภวสฺมึ วิรตฺตจิตฺตา, เต ขีณาสวา ภิกฺขู ‘‘กมฺมํ เขตฺตํ วิญฺญาณํ พีช’’นฺติ (อ. นิ. ๓.๗๗) เอตฺถ วุตฺตสฺส ปฏิสนฺธิวิญฺญาณสฺส กมฺมกฺขเยเนว ขีณตฺตา ขีณพีชา. โยปิ ปุพฺเพ ปุนพฺภวสงฺขาตาย วิรูฬฺหิยา ฉนฺโท อโหสิ. ตสฺสปิ สมุทยปฺปหาเนเนว ปหีนตฺตา ปุพฺเพ วิย จุติกาเล อสมฺภเวน อวิรูฬฺหิฉนฺทา ธิติสมฺปนฺนตฺตา ธีรา จริมวิญฺญาณนิโรเธน ยถายํ ปทีโป นิพฺพุโต, เอวํ นิพฺพนฺติ, ปุน ‘‘รูปิโน วา อรูปิโน วา’’ติ เอวมาทึ ปญฺญตฺติปถํ อจฺเจนฺตีติ. ตสฺมึ กิร สมเย นครเทวตานํ ปูชนตฺถาย ชาลิเตสุ ปทีเปสุ เอโก ปทีโป วิชฺฌายิ, ตํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ยถายํ ปทีโป’’ติ. याचा काय अर्थ आहे? प्राण्यांचे जे जुने, भूतकाळातील कर्म उत्पन्न होऊन निरुद्ध (नष्ट) झाले असले, तरी तृष्णारूपी स्नेहाचा (आसक्तीचा) त्याग न केल्यामुळे पुनर्जन्म घडवून आणण्याच्या क्षमतेमुळे ते नष्ट झालेले नसते. परंतु ज्यांचे ते जुने कर्म, अर्हतमार्गाद्वारे तृष्णारूपी स्नेह सुकवून टाकल्यामुळे, अग्नीने जळलेल्या बीजाप्रमाणे भविष्यात विपाक (फळ) देण्यास असमर्थ झाल्याने नष्ट झाले आहे. आणि बुद्धपूजा इत्यादींच्या माध्यमातून त्यांचे जे सध्याचे वर्तमान कर्म आहे, त्याला 'नवीन कर्म' म्हटले जाते. ते कर्म देखील तृष्णेचा प्रहाण केल्यामुळेच, मुळापासून कापलेल्या झाडाच्या फुलाप्रमाणे भविष्यात फळ देण्यास असमर्थ झाल्याने, ज्यांच्यासाठी नवीन जन्माची उत्पत्ती (संभव) उरलेली नाही. आणि जे तृष्णेचा प्रहाण केल्यामुळेच भविष्यातील जन्माविषयी अनासक्त चित्त असणारे आहेत, ते क्षीणासव भिक्खू होत. "कर्म हे शेत आहे, विज्ञाण हे बीज आहे" या वचनानुसार, येथे सांगितलेले प्रतिसंधी-विज्ञाण (पुनर्जन्म घेणारे विज्ञाण) कर्माच्या क्षयामुळेच नष्ट झाल्याने ते 'खीणबीजा' (नष्टबीज) आहेत. पूर्वी पुनर्जन्म नावाच्या वाढीसाठी (वृद्धीसाठी) जी इच्छा (छंद) होती, ती इच्छा देखील समुदय-सत्याचा (तृष्णेचा) प्रहाण केल्यामुळेच नष्ट झाल्याने, पूर्वीप्रमाणे मृत्यूसमयी पुनर्जन्म न झाल्यामुळे ते 'अविरूळ्हिछन्दा' (पुन्हा न वाढण्याची इच्छा असणारे) आहेत. धैर्याने (प्रज्ञेने) संपन्न असल्यामुळे ते 'धीरा' (ज्ञानी) आहेत. अंतिम विज्ञाणाच्या निरोधाने (अंतिम चित्ताच्या समाप्तीने), ज्याप्रमाणे हा दिवा विझतो, त्याप्रमाणे ते निर्वाण पावतात (शांत होतात). पुन्हा "रूपी किंवा अरूपी" इत्यादी संज्ञांच्या (प्रज्ञप्तींच्या) मार्गाच्या पलीकडे जातात. असे म्हटले जाते की, त्या वेळी नगरदेवतांच्या पूजेसाठी लावलेल्या दिव्यांपैकी एक दिवा विझला होता; ते दर्शवत भगवंतांनी "यथायं पदीपो" (ज्याप्रमाणे हा दिवा) असे म्हटले। เอวํ ภควา เย ตํ ปุริมาหิ ทฺวีหิ คาถาหิ วุตฺตํ ปริยตฺติธมฺมํ อสฺโสสุํ, สุตานุสาเรน จ ปฏิปชฺชิตฺวา นวปฺปการมฺปิ โลกุตฺตรธมฺมํ อธิคมึสุ, เตสํ อนุปาทิเสสนิพฺพานปตฺติคุณํ วตฺวา อิทานิ ตเมว คุณํ นิสฺสาย สงฺฆาธิฏฺฐานํ สจฺจวจนํ ปยุญฺชนฺโต เทสนํ สมาเปสิ ‘‘อิทมฺปิ สงฺเฆ’’ติ. ตสฺสตฺโถ [Pg.164] ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺโพ. เกวลํ ปน อิทมฺปิ ยถาวุตฺเตน ปกาเรน ขีณาสวภิกฺขูนํ นิพฺพานสงฺขาตํ สงฺเฆ รตนํ ปณีตนฺติ เอวํ โยเชตพฺพํ. อิมิสฺสาปิ คาถาย อาณา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ อมนุสฺเสหิ ปฏิคฺคหิตาติ. अशा प्रकारे भगवंतांनी, ज्यांनी पूर्वीच्या दोन गाथांमध्ये सांगितलेल्या परियत्तिधम्माचे श्रवण केले आणि श्रवणानुसार आचरण करून नऊ प्रकारचा लोकोत्तर धम्म प्राप्त केला, त्यांच्या अनुपधिशेष निर्वाण प्राप्तीच्या गुणाचे कथन करून, आता त्याच गुणाचा आश्रय घेऊन संघाधिष्ठित सत्यवचनाचा प्रयोग करत "इदम्पि सङ्घे" असे म्हणून देशनेची समाप्ती केली. त्याचा अर्थ पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा. केवळ एवढेच की, येथेही वर सांगितलेल्या प्रकारे क्षीणासव भिक्खूंच्या निर्वाण नावाच्या संघामधील श्रेष्ठ रत्नाचा संबंध जोडला पाहिजे. या गाथेची आज्ञा देखील एक लाख कोटी चक्रवाळांमधील अमनुष्यांनी (देव-यक्षांनी) स्वीकारली आहे। เทสนาปริโยสาเน ราชกุลสฺส โสตฺถิ อโหสิ, สพฺพูปทฺทวา วูปสมึสุ, จตุราสีติยา ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. उपदेशाच्या (देशनेच्या) शेवटी राजघराण्याचे कल्याण झाले, सर्व उपद्रव शांत झाले आणि चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना धम्माचा साक्षात्कार (धम्माभिसमय) झाला। ยานีธาติคาถาตฺตยวณฺณนา "यानीध" इत्यादी तीन गाथांचे वर्णन (टीका)। ๑๖. อถ สกฺโก เทวานมินฺโท ‘‘ภควตา รตนตฺตยคุณํ นิสฺสาย สจฺจวจนํ ปยุญฺชมาเนน นาครสฺส โสตฺถิ กตา, มยาปิ นาครสฺส โสตฺถิตฺถํ รตนตฺตยคุณํ นิสฺสาย กิญฺจิ วตฺตพฺพ’’นฺติ จินฺเตตฺวา อวสาเน คาถาตฺตยํ อภาสิ ‘‘ยานีธ ภูตานี’’ติ ตตฺถ ยสฺมา พุทฺโธ ยถา โลกหิตตฺถาย อุสฺสุกฺกํ อาปนฺเนหิ อาคนฺตพฺพํ, ตถา อาคตโต ยถา จ เตหิ คนฺตพฺพํ, ตถา คตโต ยถา จ เตหิ อาชานิตพฺพํ, ตถา อาชานนโต, ยถา จ ชานิตพฺพํ, ตถา ชานนโต, ยญฺจ ตเถว โหติ, ตสฺส คทนโต จ ‘‘ตถาคโต’’ติ วุจฺจติ. ยสฺมา จ โส เทวมนุสฺเสหิ ปุปฺผคนฺธาทินา พหิ นิพฺพตฺเตน อุปการเกน, ธมฺมานุธมฺมปฏิปตฺตาทินา จ อตฺตนิ นิพฺพตฺเตน อติวิย ปูชิโต, ตสฺมา สกฺโก เทวานมินฺโท สพฺพํ เทวปริสํ อตฺตนา สทฺธึ สมฺปิณฺเฑตฺวา อาห ‘‘ตถาคตํ เทวมนุสฺสปูชิตํ, พุทฺธํ นมสฺสาม สุวตฺถิ โหตู’’ติ. १६. त्यानंतर देवांचा राजा शक्राने विचार केला की, "भगवंतांनी त्रिरत्नांच्या गुणांचा आश्रय घेऊन सत्यवचनाचा प्रयोग करत नगराचे कल्याण केले आहे, म्हणून मी देखील नगराच्या कल्याणासाठी त्रिरत्नांच्या गुणांचा आश्रय घेऊन काहीतरी बोलले पाहिजे." असा विचार करून त्याने शेवटी "यानीध भूतानि" या तीन गाथांचे पठण केले. तेथे, ज्या अर्थी बुद्ध हे जगाच्या कल्याणासाठी उत्सुक असलेल्यांनी ज्या प्रकारे यावे, त्या प्रकारे आलेले आहेत; आणि ज्या प्रकारे त्यांनी जावे (प्राप्त करावे), त्या प्रकारे गेलेले (प्राप्त केलेले) आहेत; आणि ज्या प्रकारे त्यांनी जाणावे, त्या प्रकारे जाणणारे आहेत; आणि ज्या प्रकारे जाणले पाहिजे, त्या प्रकारे जाणणारे आहेत; आणि जे जसे आहे तसेच सांगणारे असल्यामुळे त्यांना "तथागत" म्हटले जाते. आणि ज्या अर्थी ते देव आणि मनुष्यांद्वारे बाह्य साधनांनी जसे की फुले, सुगंधी द्रव्ये इत्यादींनी आणि स्वतःमध्ये उत्पन्न झालेल्या धम्मानुधम्म प्रतिपत्ती (धम्माचरण) इत्यादींनी अत्यंत पूजनीय ठरले आहेत; म्हणूनच देवांचा राजा शक्राने सर्व देवसमुदायाला स्वतःसोबत एकत्र करून म्हटले: "देव आणि मनुष्यांद्वारे पूजनीय अशा तथागत बुद्धांना आम्ही नमन करतो, सर्वांचे कल्याण असो!" ๑๗. ยสฺมา ปน ธมฺเม มคฺคธมฺโม ยถา ยุคนทฺธสมถวิปสฺสนาพเลน คนฺตพฺพํ กิเลสปกฺขํ สมุจฺฉินฺทนฺเตน, ตถา คโตติ ตถาคโต. นิพฺพานธมฺโมปิ ยถา คโต ปญฺญาย ปฏิวิทฺโธ สพฺพทุกฺขปฺปฏิวิฆาตาย สมฺปชฺชติ, พุทฺธาทีหิ ตถา อวคโต, ตสฺมา ‘‘ตถาคโต’’ตฺเวว วุจฺจติ. ยสฺมา จ สงฺโฆปิ ยถา อตฺตหิตาย ปฏิปนฺเนหิ คนฺตพฺพํ เตน เตน มคฺเคน, ตถา คโตติ ‘‘ตถาคโต’’ตฺเวว วุจฺจติ. ตสฺมา อวเสสคาถาทฺวเยปิ ตถาคตํ ธมฺมํ นมสฺสาม สุวตฺถิ โหตุ, ตถาคตํ สงฺฆํ นมสฺสาม สุวตฺถิ โหตูติ วุตฺตํ. เสสํ วุตฺตนยเมวาติ. १७. परंतु, धम्मामध्ये मार्गधम्म हा ज्या प्रकारे युगनद्ध-शमथ-विपश्यनेच्या बलाने क्लेशांच्या पक्षाचा समूळ नाश करत जावयाचा असतो, त्या प्रकारे गेलेला (प्राप्त झालेला) असल्यामुळे त्याला "तथागत" म्हटले जाते. निर्वाणधम्म देखील ज्या प्रकारे प्रज्ञेने जाणला जाऊन सर्व दुःखांच्या नाशासाठी कारणीभूत ठरतो, आणि बुद्धादी महापुरुषांनी ज्या प्रकारे तो जाणला आहे, म्हणून त्याला "तथागत" असेच म्हटले जाते. आणि ज्या अर्थी संघ देखील स्वतःच्या कल्याणासाठी आचरण करणाऱ्यांनी ज्या प्रकारे त्या त्या मार्गाने जावे, त्या प्रकारे गेलेला आहे, म्हणून त्यालाही "तथागत" असेच म्हटले जाते. म्हणूनच उरलेल्या दोन गाथांमध्ये देखील "तथागत धम्माला आम्ही नमन करतो, सर्वांचे कल्याण असो" आणि "तथागत संघाला आम्ही नमन करतो, सर्वांचे कल्याण असो" असे म्हटले आहे. उर्वरित भाग पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच समजून घ्यावा। เอวํ [Pg.165] สกฺโก เทวานมินฺโท อิมํ คาถาตฺตยํ ภาสิตฺวา ภควนฺตํ ปทกฺขิณํ กตฺวา เทวปุรเมว คโต สทฺธึ เทวปริสาย. ภควา ปน ตเทว รตนสุตฺตํ ทุติยทิวเสปิ เทเสสิ, ปุน จตุราสีติยา ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ, เอวํ ยาว สตฺตมทิวสํ เทเสสิ, ทิวเส ทิวเส ตเถว ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. ภควา อฑฺฒมาสเมว เวสาลิยํ วิหริตฺวา ราชูนํ ‘‘คจฺฉามา’’ติ ปฏิเวเทสิ. ตโต ราชาโน ทิคุเณน สกฺกาเรน ปุน ตีหิ ทิวเสหิ ภควนฺตํ คงฺคาตีรํ นยึสุ. คงฺคาย นิพฺพตฺตา นาคราชาโน จินฺเตสุํ ‘‘มนุสฺสา ตถาคตสฺส สกฺการํ กโรนฺติ, มยํ กึ น กริสฺสามา’’ติ สุวณฺณรชตมณิมยา นาวาโย มาเปตฺวา สุวณฺณรชตมณิมเย เอว ปลฺลงฺเก ปญฺญเปตฺวา ปญฺจวณฺณปทุมสญฺฉนฺนํ อุทกํ กริตฺวา ‘‘อมฺหากํ อนุคฺคหํ กโรถา’’ติ ภควนฺตํ ยาจึสุ. ภควา อธิวาเสตฺวา รตนนาวมารูฬฺโห, ปญฺจ จ ภิกฺขุสตานิ ปญฺจสตํ นาวาโย อภิรูฬฺหา. นาคราชาโน ภควนฺตํ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน นาคภวนํ ปเวเสสุํ. ตตฺร สุทํ ภควา สพฺพรตฺตึ นาคปริสาย ธมฺมํ เทเสสิ. ทุติยทิวเส ทิพฺเพหิ ขาทนียโภชนีเยหิ มหาทานํ อกํสุ, ภควา อนุโมทิตฺวา นาคภวนา นิกฺขมิ. अशा प्रकारे देवांचा राजा शक्र या तीन गाथा बोलून, भगवंतांना प्रदक्षिणा घालून, देवसमुदायासोबत देवलोकातच निघून गेला. परंतु भगवंतांनी तेच रतनसुत्त दुसऱ्या दिवशीही देशना केले. पुन्हा चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना धम्माभिसमय झाला. अशा प्रकारे सातव्या दिवसापर्यंत त्यांनी देशना केली. दररोज त्याचप्रमाणे धम्माभिसमय होत गेला. भगवंतांनी अर्धा महिनाच वैशालीमध्ये वास्तव्य करून राजांना 'आम्ही जात आहोत' असे कळवले. त्यानंतर राजांनी दुप्पट आदराने पुन्हा तीन दिवसांत भगवंतांना गंगा नदीच्या तीरावर आणले. गंगेमध्ये उत्पन्न झालेल्या नागराजांनी विचार केला, 'मनुष्य तथागतांचा सत्कार करत आहेत, मग आम्ही का करू नये?' असा विचार करून त्यांनी सोन्या-चांदीच्या आणि रत्नांच्या नौका तयार केल्या, त्यावर सोन्या-चांदीचे आणि रत्नांचेच पलंग मांडले, पाण्याचा पृष्ठभाग पाच रंगांच्या कमळांनी झाकून टाकला आणि 'आमच्यावर अनुग्रह करा' अशी भगवंतांना याचना केली. भगवंतांनी त्यांची विनंती स्वीकारून रत्नमय नौकेवर आरोहण केले आणि पाचशे भिक्खू पाचशे नौकांवर आरूढ झाले. नागराजांनी भगवंतांना भिक्खू संघासह नागलोकात नेले. तेथे भगवंतांनी संपूर्ण रात्र नागसमुदायाला धम्मदेशना केली. दुसऱ्या दिवशी त्यांनी दिव्य खाद्यपेयांचे महादान दिले. भगवंतांनी अनुमोदन देऊन नागलोकातून प्रस्थान केले. ภูมฏฺฐา เทวา ‘‘มนุสฺสา จ นาคา จ ตถาคตสฺส สกฺการํ กโรนฺติ, มยํ กึ น กริสฺสามา’’ติ จินฺเตตฺวา วนปฺปคุมฺพรุกฺขปพฺพตาทีสุ ฉตฺตาติฉตฺตานิ อุกฺขิปึสุ. เอเตเนว อุปาเยน ยาว อกนิฏฺฐพฺรหฺมภวนํ, ตาว มหาสกฺการวิเสโส นิพฺพตฺติ. พิมฺพิสาโรปิ ลิจฺฉวีหิ อาคตกาเล กตสกฺการโต ทิคุณมกาสิ. ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว ปญฺจหิ ทิวเสหิ ภควนฺตํ ราชคหํ อาเนสิ. भूमीवर राहणाऱ्या देवांनी 'मनुष्य आणि नाग तथागतांचा सत्कार करत आहेत, मग आम्ही का करू नये?' असा विचार करून वने, झुडपे, वृक्ष, पर्वत इत्यादींवर छत्र्यांवर छत्र्या उभारल्या. याच पद्धतीने थेट अकनिष्ठ ब्रह्मलोकापर्यंत एक महान आणि विशेष सत्कार प्रकट झाला. राजा बिंबिसाराने सुद्धा लिच्छवींनी भगवंतांच्या आगमनसमयी केलेल्या सत्कारापेक्षा दुप्पट सत्कार केला. पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच पाच दिवसांत त्यांनी भगवंतांना राजगृहात आणले. ราชคหมนุปฺปตฺเต ภควติ ปจฺฉาภตฺตํ มณฺฑลมาเฬ สนฺนิปติตานํ ภิกฺขูนํ อยมนฺตรกถา อุทปาทิ ‘‘อโห พุทฺธสฺส ภควโต อานุภาโว, ยํ อุทฺทิสฺส คงฺคาย โอรโต จ ปารโต จ อฏฺฐโยชโน ภูมิภาโค นินฺนญฺจ ถลญฺจ สมํ กตฺวา วาลุกาย โอกิริตฺวา ปุปฺเผหิ สญฺฉนฺโน, โยชนปฺปมาณํ คงฺคาย อุทกํ นานาวณฺเณหิ ปทุเมหิ สญฺฉนฺนํ, ยาว อกนิฏฺฐภวนํ, ตาว ฉตฺตาติฉตฺตานิ อุสฺสิตานี’’ติ. ภควา ตํ ปวตฺตึ ญตฺวา คนฺธกุฏิโต นิกฺขมิตฺวา ตงฺขณานุรูเปน ปาฏิหาริเยน คนฺตฺวา มณฺฑลมาเฬ ปญฺญตฺตวรพุทฺธาสเน นิสีทิ. นิสชฺช โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ – ‘‘กาย นุตฺถ, ภิกฺขเว, เอตรหิ กถาย สนฺนิสินฺนา’’ติ. ภิกฺขู สพฺพํ [Pg.166] อาโรเจสุํ ภควา เอตทโวจ – ‘‘น, ภิกฺขเว, อยํ ปูชาวิเสโส มยฺหํ พุทฺธานุภาเวน นิพฺพตฺโต, น นาคเทวพฺรหฺมานุภาเวน, อปิจ โข ปุพฺเพ อปฺปมตฺตกปริจฺจาคานุภาเวน นิพฺพตฺโต’’ติ. ภิกฺขู อาหํสุ ‘‘น มยํ, ภนฺเต, ตํ อปฺปมตฺตกํ ปริจฺจาคํ ชานาม, สาธุ โน ภควา ตถา กเถตุ, ยถา มยํ ตํ ชาเนยฺยามา’’ติ. भगवंत राजगृहात पोहोचल्यावर, भोजनानंतर मंडळमाळात एकत्र आलेल्या भिक्खूंच्या मनात ही चर्चा सुरू झाली, 'अहो! बुद्ध भगवंतांचा काय हा प्रभाव! ज्यांच्यासाठी गंगेच्या या तीरावर आणि त्या तीरावर आठ योजनेचा भूभाग सखल आणि उंच भाग सपाट करून, वाळू पसरून फुलांनी आच्छादित केला गेला आहे; गंगेचे एक योजन पसरलेले पाणी विविध रंगांच्या कमळांनी झाकून गेले आहे; आणि थेट अकनिष्ठ लोकापर्यंत छत्र्यांवर छत्र्या उभारल्या गेल्या आहेत!' भगवंतांनी ही गोष्ट जाणून गंधकुटीतून बाहेर पडले आणि त्या क्षणाला अनुरूप अशा प्रातिहार्याने जाऊन मंडळमाळात मांडलेल्या श्रेष्ठ बुद्ध आसनावर विराजमान झाले. आसनस्थ झाल्यावर भगवंतांनी भिक्खूंना विचारले, 'भिक्खूंनो, तुम्ही आता कोणत्या चर्चेत मग्न होता?' भिक्खूंनी सर्व काही सांगितले. भगवंतांनी त्यांना असे म्हटले, 'भिक्खूंनो, हा विशेष सत्कार माझ्या बुद्ध-प्रभावामुळे झालेला नाही, नाग, देव किंवा ब्रह्मा यांच्या प्रभावामुळेही झालेला नाही, तर हा भूतकाळात केलेल्या एका लहानशा त्यागाच्या प्रभावामुळे झाला आहे.' भिक्खू म्हणाले, 'भंते, आम्हाला त्या लहानशा त्यागाविषयी माहिती नाही. कृपा करून भगवंतांनी आम्हाला ते सांगावे, जेणेकरून आम्हाला ते समजेल.' ภควา อาห – ภูตปุพฺพํ, ภิกฺขเว, ตกฺกสิลายํ สงฺโข นาม พฺราหฺมโณ อโหสิ. ตสฺส ปุตฺโต สุสีโม นาม มาณโว โสฬสวสฺสุทฺเทสิโก วเยน. โส เอกทิวสํ ปิตรํ อุปสงฺกมิตฺวา อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ. อถ ตํ ปิตา อาห ‘‘กึ, ตาต, สุสีมา’’ติ? โส อาห ‘‘อิจฺฉามหํ, ตาต, พาราณสึ คนฺตฺวา สิปฺปํ อุคฺคเหตุ’’นฺติ. ‘‘เตน หิ, ตาต, สุสีม, อสุโก นาม พฺราหฺมโณ มม สหายโก, ตสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา อุคฺคณฺหาหี’’ติ กหาปณสหสฺสํ อทาสิ. โส ตํ คเหตฺวา มาตาปิตโร อภิวาเทตฺวา อนุปุพฺเพน พาราณสึ คนฺตฺวา อุปจารยุตฺเตน วิธินา อาจริยํ อุปสงฺกมิตฺวา อภิวาเทตฺวา อตฺตานํ นิเวเทสิ. อาจริโย ‘‘มม สหายกสฺส ปุตฺโต’’ติ มาณวํ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา สพฺพํ ปาหุเนยฺยวตฺตมกาสิ. โส อทฺธานกิลมถํ วิโนเทตฺวา ตํ กหาปณสหสฺสํ อาจริยสฺส ปาทมูเล ฐเปตฺวา สิปฺปํ อุคฺคเหตุํ โอกาสํ ยาจิ. อาจริโย โอกาสํ กตฺวา อุคฺคณฺหาเปสิ. भगवंत म्हणाले, 'भिक्खूंनो, प्राचीन काळी तक्षशिलेमध्ये शंख नावाचा एक ब्राह्मण राहत होता. त्याला सुसीम नावाचा एक मुलगा होता, जो वयाने सोळा वर्षांचा होता. एके दिवशी तो आपल्या वडिलांजवळ गेला, त्यांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. तेव्हा वडिलांनी त्याला विचारले, 'बाळ सुसीमा, काय गोष्ट आहे?' तो म्हणाला, 'बाबा, मला वाराणसीला जाऊन विद्या ग्रहण करण्याची इच्छा आहे.' 'तसे असेल तर बाळ सुसीमा, अमुक नावाचा एक ब्राह्मण माझा मित्र आहे, तू त्याच्याकडे जाऊन विद्या शिक,' असे सांगून त्यांनी त्याला एक हजार कहापण दिले. त्याने ते घेऊन आई-वडिलांना अभिवादन केले आणि क्रमशः प्रवास करत तो वाराणसीला पोहोचला. योग्य शिष्टाचाराचे पालन करून तो आचार्यांकडे गेला, त्यांना अभिवादन केले आणि स्वतःची ओळख करून दिली. आचार्यांनी 'हा माझ्या मित्राचा मुलगा आहे' असे म्हणून त्या तरुणाचा स्वीकार केला आणि त्याचे आदरातिथ्य केले. त्याने प्रवासाचा थकवा दूर केल्यावर, ती एक हजार कहापणांची थैली आचार्यांच्या चरणांशी ठेवली आणि विद्या शिकण्याची परवानगी मागितली. आचार्यांनी परवानगी देऊन त्याला शिकवण्यास सुरुवात केली.' โส ลหุญฺจ คณฺหนฺโต, พหุญฺจ คณฺหนฺโต, คหิตคหิตญฺจ สุวณฺณภาชเน ปกฺขิตฺตเตลมิว อวินสฺสมานํ ธาเรนฺโต, ทฺวาทสวสฺสิกํ สิปฺปํ กติปยมาเสเนว ปริโยสาเปสิ. โส สชฺฌายํ กโรนฺโต อาทิมชฺฌํเยว ปสฺสติ, โน ปริโยสานํ. อถ อาจริยํ อุปสงฺกมิตฺวา อาห ‘‘อิมสฺส สิปฺปสฺส อาทิมชฺฌเมว ปสฺสามิ, โน ปริโยสาน’’นฺติ. อาจริโย อาห ‘‘อหมฺปิ, ตาต, เอวเมวา’’ติ. อถ โก, อาจริย, อิมสฺส สิปฺปสฺส ปริโยสานํ ชานาตีติ? อิสิปตเน, ตาต, อิสโย อตฺถิ, เต ชาเนยฺยุนฺติ. เต อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺฉามิ, อาจริยาติ? ปุจฺฉ, ตาต, ยถาสุขนฺติ. โส อิสิปตนํ คนฺตฺวา ปจฺเจกพุทฺเธ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺฉิ ‘‘อปิ, ภนฺเต, ปริโยสานํ ชานาถา’’ติ? อาม, อาวุโส, ชานามาติ. ตํ มมฺปิ สิกฺขาเปถาติ. เตน หาวุโส, ปพฺพชาหิ, น สกฺกา อปพฺพชิเตน สิกฺขาเปตุนฺติ. สาธุ, ภนฺเต, ปพฺพาเชถ วา มํ, ยํ วา อิจฺฉถ, ตํ กตฺวา ปริโยสานํ [Pg.167] ชานาเปถาติ. เต ตํ ปพฺพาเชตฺวา กมฺมฏฺฐาเน นิโยเชตุํ อสมตฺถา ‘‘เอวํ เต นิวาเสตพฺพํ, เอวํ ปารุปิตพฺพ’’นฺติอาทินา นเยน อาภิสมาจาริกํ สิกฺขาเปสุํ. โส ตตฺถ สิกฺขนฺโต อุปนิสฺสยสมฺปนฺนตฺตา น จิเรเนว ปจฺเจกโพธึ อภิสมฺพุชฺฌิ. สกลพาราณสิยํ ‘‘สุสีมปจฺเจกพุทฺโธ’’ติ ปากโฏ อโหสิ ลาภคฺคยสคฺคปฺปตฺโต สมฺปนฺนปริวาโร. โส อปฺปายุกสํวตฺตนิกสฺส กมฺมสฺส กตตฺตา น จิเรเนว ปรินิพฺพายิ. ตสฺส ปจฺเจกพุทฺธา จ มหาชนกาโย จ สรีรกิจฺจํ กตฺวา ธาตุโย คเหตฺวา นครทฺวาเร ถูปํ ปติฏฺฐาเปสุํ. तो वेगाने आणि भरपूर शिकत गेला, आणि जे काही तो शिकत असे, ते सोन्याच्या पात्रात ठेवलेल्या तेलाप्रमाणे नष्ट न होऊ देता मनात साठवून ठेवत असे. बारा वर्षांत शिकायची विद्या त्याने अवघ्या काही महिन्यांतच पूर्ण केली. जेव्हा तो पाठांतर करत असे, तेव्हा त्याला केवळ प्रारंभ आणि मध्यच दिसत असे, अंत दिसत नसे. तेव्हा तो आचार्यांकडे गेला आणि म्हणाला, 'या विद्येचा मला केवळ प्रारंभ आणि मध्यच दिसतो, अंत दिसत नाही.' आचार्य म्हणाले, 'बाळा, माझीही तीच स्थिती आहे.' 'तर मग आचार्य, या विद्येचा अंत कोणाला ठाऊक आहे?' 'बाळा, इसिपतनमध्ये ऋषी राहतात, त्यांना हे ठाऊक असावे.' 'आचार्य, मी त्यांच्याकडे जाऊन विचारू का?' 'बाळा, तुझ्या इच्छेनुसार अवश्य विचार.' तो इसिपतनला गेला आणि पच्चेकबुद्धांकडे जाऊन त्याने विचारले, 'भंते, आपल्याला अंत ठाऊक आहे का?' 'होय आवुसो, आम्हाला ठाऊक आहे.' 'तर मग मलाही ते शिकवा.' 'तसे असेल तर आवुसो, तू प्रव्रज्या घे. गृहस्थाश्रमात राहून हे शिकवणे शक्य नाही.' 'ठीक आहे भंते, मला प्रव्रज्या द्या किंवा तुमची जी काही इच्छा असेल ते करून मला या विद्येचा अंत शिकवा.' त्यांनी त्याला प्रव्रज्या दिली, परंतु त्याला कम्मट्ठानात नियुक्त करण्यास असमर्थ असल्याने 'तू असे वस्त्र परिधान केले पाहिजेस, असे पांघरले पाहिजेस' इत्यादी नियमांद्वारे त्याला आभिसमाचारिक नियम शिकवले. तेथे शिकत असताना, पूर्वपुण्याईच्या बळामुळे त्याने लवकरच पच्चेकबोधी प्राप्त केली. संपूर्ण वाराणसीमध्ये तो 'सुसीम पच्चेकबुद्ध' म्हणून प्रसिद्ध झाला. त्याला विपुल लाभ आणि यश मिळाले आणि त्याचा मोठा परिवार निर्माण झाला. परंतु अल्पायुषी करणाऱ्या कर्माच्या प्रभावामुळे वो लवकरच परिनिर्वाण पावला. इतर पच्चेकबुद्धांनी आणि जनसमुदायाने त्याचे अंत्यसंस्कार केले आणि त्याचे धातू घेऊन नगराच्या प्रवेशद्वारावर एक स्तूप उभारला.' อถ โข สงฺโข พฺราหฺมโณ ‘‘ปุตฺโต เม จิรคโต, น จสฺส ปวตฺตึ ชานามี’’ติ ปุตฺตํ ทฏฺฐุกาโม ตกฺกสิลาย นิกฺขมิตฺวา อนุปุพฺเพน พาราณสึ คนฺตฺวา มหาชนกายํ สนฺนิปติตํ ทิสฺวา ‘‘อทฺธา พหูสุ เอโกปิ เม ปุตฺตสฺส ปวตฺตึ ชานิสฺสตี’’ติ จินฺเตนฺโต อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺฉิ ‘‘สุสีโม นาม มาณโว อิธ อาคโต อตฺถิ, อปิ นุ ตสฺส ปวตฺตึ ชานาถา’’ติ? เต ‘‘อาม, พฺราหฺมณ, ชานาม, อิมสฺมึ นคเร พฺราหฺมณสฺส สนฺติเก ติณฺณํ เวทานํ ปารคู หุตฺวา ปจฺเจกพุทฺธานํ สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา ปจฺเจกพุทฺโธ หุตฺวา อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายิ, อยมสฺส ถูโป ปติฏฺฐาปิโต’’ติ อาหํสุ. โส ภูมึ หตฺเถน ปหริตฺวา โรทิตฺวา จ ปริเทวิตฺวา จ ตํ เจติยงฺคณํ คนฺตฺวา ติณานิ อุทฺธริตฺวา อุตฺตรสาฏเกน วาลุกํ อาเนตฺวา ปจฺเจกพุทฺธเจติยงฺคเณ โอกิริตฺวา กมณฺฑลุโต อุทเกน สมนฺตโต ภูมึ ปริปฺโผสิตฺวา วนปุปฺเผหิ ปูชํ กตฺวา อุตฺตรสาฏเกน ปฏากํ อาโรเปตฺวา ถูปสฺส อุปริ อตฺตโน ฉตฺตํ พนฺธิตฺวา ปกฺกามีติ. तेव्हा संख नावाच्या ब्राह्मणाने विचार केला, "माझा मुलगा निघून गेलेला खूप काळ झाला आहे, आणि मला त्याची काहीच बातमी माहीत नाही." मुलाला पाहण्याची इच्छा धरून तो तक्षशिलेहून निघाला आणि क्रमशः वाराणसीला पोहोचला. तेथे लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र आलेला पाहून त्याने विचार केला, "नक्कीच या अनेक लोकांपैकी कोणीतरी एक तरी माझ्या मुलाची बातमी जाणत असेल." असा विचार करत त्याने जवळ जाऊन विचारले, "सुसीम नावाचा तरुण येथे आला आहे काय? तुम्हाला त्याची काही बातमी माहीत आहे का?" ते म्हणाले, "होय, ब्राह्मणा, आम्हाला माहीत आहे. या नगरात एका ब्राह्मणाजवळ तीन वेदांमध्ये पारंगत होऊन, (नंतर) प्रत्येकबुद्धांच्या सन्निध प्रव्रजित होऊन, प्रत्येकबुद्ध बनून, तो अनुपधिशेष निर्वाणधातूने परिनिर्वाण पावला. हा त्याचाच स्तूप उभारला गेला आहे." त्याने हाताने जमिनीवर मारून, रडून आणि विलाप करून त्या चैत्य-अंगणात जाऊन गवत उपटले, आपल्या उत्तरीय वस्त्राने वाळू आणून प्रत्येकबुद्धाच्या चैत्य-अंगणात पसरवली, कमंडलूमधील पाण्याने सर्व बाजूंनी जमिनीवर शिंपडले, रानफुलांनी पूजा केली, उत्तरीय वस्त्राची पताका उभारली आणि स्तूपाच्या वर स्वतःचे छत्र बांधून तो निघून गेला. เอวํ อตีตํ เทเสตฺวา ชาตกํ ปจฺจุปฺปนฺเนน อนุสนฺเธนฺโต ภิกฺขูนํ ธมฺมกถํ กเถสิ. ‘‘สิยา โข ปน โว, ภิกฺขเว, เอวมสฺส ‘อญฺโญ นูน เตน สมเยน สงฺโข พฺราหฺมโณ อโหสี’ติ, น โข ปเนตํ เอวํ ทฏฺฐพฺพํ, อหํ เตน สมเยน สงฺโข พฺราหฺมโณ อโหสึ, มยา สุสีมสฺส ปจฺเจกพุทฺธสฺส เจติยงฺคเณ ติณานิ อุทฺธฏานิ, ตสฺส เม กมฺมสฺส นิสฺสนฺเทน อฏฺฐโยชนมคฺคํ วิคตขาณุกณฺฏกํ กตฺวา สมํ สุทฺธมกํสุ. มยา ตตฺถ วาลุกา โอกิณฺณา, ตสฺส เม นิสฺสนฺเทน อฏฺฐโยชนมคฺเค วาลุกํ โอกิรึสุ. มยา ตตฺถ วนกุสุเมหิ ปูชา กตา, ตสฺส เม นิสฺสนฺเทน นวโยชเน มคฺเค ถเล จ อุทเก จ นานาปุปฺเผหิ [Pg.168] ปุปฺผสนฺถรมกํสุ. มยา ตตฺถ กมณฺฑลุทเกน ภูมิ ปริปฺโผสิตา, ตสฺส เม นิสฺสนฺเทน เวสาลิยํ โปกฺขรวสฺสํ วสฺสิ. มยา ตสฺมึ เจติเย ปฏากา อาโรปิตา, ฉตฺตญฺจ พทฺธํ, ตสฺส เม นิสฺสนฺเทน ยาว อกนิฏฺฐภวนา ปฏากา จ อาโรปิตา, ฉตฺตาติฉตฺตานิ จ อุสฺสิตานิ. อิติ โข, ภิกฺขเว, อยํ มยฺหํ ปูชาวิเสโส เนว พุทฺธานุภาเวน นิพฺพตฺโต, น นาคเทวพฺรหฺมานุภาเวน, อปิจ โข อปฺปมตฺตกปริจฺจาคานุภาเวน นิพฺพตฺโต’’ติ. ธมฺมกถาปริโยสาเน อิมํ คาถมภาสิ – अशा प्रकारे भूतकाळातील कथा सांगून, जातकाचा वर्तमानकाळाशी मेळ घालत त्यांनी भिक्खूंना धम्मकथा सांगितली. "हे भिक्खूंनो, तुम्हाला कदाचित असे वाटेल की, 'त्या काळी संख नावाचा ब्राह्मण कोणी दुसराच होता.' परंतु असे मानू नका. मीच त्या काळी संख नावाचा ब्राह्मण होतो. मी सुसीम प्रत्येकबुद्धाच्या चैत्य-अंगणातील गवत उपटले होते, त्या कर्माच्या विपाकाने त्यांनी आठ योजन लांबीचा मार्ग काटेकुटे व अडथळे दूर करून समतल आणि स्वच्छ केला. मी तेथे वाळू पसरवली होती, त्या कर्माच्या विपाकाने त्यांनी आठ योजन लांबीच्या मार्गावर वाळू पसरवली. मी तेथे रानफुलांनी पूजा केली होती, त्या कर्माच्या विपाकाने त्यांनी नऊ योजन लांबीच्या मार्गावर जमिनीवर आणि पाण्यावर विविध फुलांचे आस्तरण तयार केले. मी तेथे कमंडलूमधील पाण्याने जमीन शिंपडली होती, त्या कर्माच्या विपाकाने वैशालीमध्ये पोक्खरवस्स (पुष्करवृष्टी) पडला. मी त्या चैत्यावर पताका उभारली होती आणि छत्र बांधले होते, त्या कर्माच्या विपाकाने अकनिठ्ठ भवनापर्यंत पताका उभारल्या गेल्या आणि छत्रावर छत्रे उभारली गेली. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, माझा हा विशेष पूजा-सत्कार केवळ बुद्धांच्या प्रभावाने उत्पन्न झाला नाही, ना नाग, देव किंवा ब्रह्माच्या प्रभावाने; तर तो अल्पशा त्यागाच्या प्रभावाने उत्पन्न झाला आहे." धम्मकथेच्या शेवटी त्यांनी ही गाथा म्हटली - ‘‘มตฺตาสุขปริจฺจาคา, ปสฺเส เจ วิปุลํ สุขํ; จเช มตฺตาสุขํ ธีโร, สมฺปสฺสํ วิปุลํ สุข’’นฺติ. (ธ. ป. ๒๙๐); "जर अल्प सुखाचा त्याग केल्याने विपुल (मोठे) सुख मिळत असल्याचे दिसत असेल, तर बुद्धिमान माणसाने विपुल सुखाचा विचार करून अल्प सुखाचा त्याग करावा." ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील รตนสุตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. रतनसुत्त-वर्णन समाप्त झाले. ๗. ติโรกุฏฺฏสุตฺตวณฺณนา ७. तिरोकुट्टसुत्त-वर्णन นิกฺเขปปฺปโยชนํ प्रस्तावना किंवा सूत्र मांडण्याचे प्रयोजन อิทานิ ‘‘ติโรกุฏฺเฏสุ ติฏฺฐนฺตี’’ติอาทินา รตนสุตฺตานนฺตรํ นิกฺขิตฺตสฺส ติโรกุฏฺฏสุตฺตสฺส อตฺถวณฺณนากฺกโม อนุปฺปตฺโต, ตสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ วตฺวา อตฺถวณฺณนํ กริสฺสาม. आता "तिरोकुट्टेसु तिट्ठन्ति" इत्यादी शब्दांनी सुरू होणाऱ्या आणि रतनसुत्तानंतर ठेवलेल्या तिरोकुट्टसुत्ताच्या अर्थ-वर्णनाचा क्रम प्राप्त झाला आहे. त्याचे येथे सूत्र मांडण्याचे प्रयोजन सांगून आम्ही त्याचे अर्थ-वर्णन करू. ตตฺถ อิทญฺหิ ติโรกุฏฺฏํ อิมินา อนุกฺกเมน ภควตา อวุตฺตมฺปิ ยายํ อิโต ปุพฺเพ นานปฺปกาเรน กุสลกมฺมปฏิปตฺติ ทสฺสิตา, ตตฺถ ปมาทํ อาปชฺชมาโน นิรยติรจฺฉานโยนีหิ วิสิฏฺฐตเรปิ ฐาเน อุปฺปชฺชมาโน ยสฺมา เอวรูเปสุ เปเตสุ อุปฺปชฺชติ, ตสฺมา น เอตฺถ ปมาโท กรณีโยติ ทสฺสนตฺถํ, เยหิ จ ภูเตหิ อุปทฺทุตาย เวสาลิยา อุปทฺทววูปสมนตฺถํ รตนสุตฺตํ วุตฺตํ, เตสุ เอกจฺจานิ เอวรูปานีติ ทสฺสนตฺถํ วา วุตฺตนฺติ. त्यामध्ये, हे तिरोकुट्टसुत्त जरी भगवंतांनी या क्रमाने सांगितले नसले तरी, यापूर्वी विविध प्रकारे जी कुशल कर्माची प्रतिपत्ती (आचरण) दाखवली आहे, त्यामध्ये जो प्रमाद करतो, तो नरक आणि तिर्यक योनीपेक्षा काहीशा चांगल्या स्थानात उत्पन्न झाला तरी, ज्या अर्थी तो अशा प्रकारच्या प्रेतांमध्ये (प्रेतयोनीत) उत्पन्न होतो, म्हणून येथे प्रमाद करू नये, हे दर्शवण्यासाठी हे सांगितले आहे; अथवा ज्या भूतांनी पीडित केलेल्या वैशालीच्या उपद्रवाच्या शमनासाठी रतनसुत्त सांगितले गेले होते, त्यांच्यापैकी काही अशा स्वरूपाचे (प्रेत) होते, हे दर्शवण्यासाठी देखील हे सांगितले आहे. อิทมสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ เวทิตพฺพํ. हे याचे येथे सूत्र मांडण्याचे प्रयोजन समजावे. อนุโมทนากถา अनुमोदन-कथा ยสฺมา [Pg.169] ปนสฺส อตฺถวณฺณนา – परंतु ज्या अर्थी याचे अर्थ-वर्णन - ‘‘เยน ยตฺถ ยทา ยสฺมา, ติโรกุฏฺฏํ ปกาสิตํ; ปกาเสตฺวาน ตํ สพฺพํ, กยิรมานา ยถากฺกมํ; สุกตา โหติ ตสฺมาหํ, กริสฺสามิ ตเถว ตํ’’. "ज्याने, जेथे, जेव्हा आणि ज्या कारणासाठी तिरोकुट्टसुत्त प्रकाशित केले, ते सर्व अनुक्रमाने स्पष्ट केले असता ते सुबोध होते, म्हणून मी देखील तसेच त्याचे वर्णन करीन." เกน ปเนตํ ปกาสิตํ, กตฺถ กทา กสฺมา จาติ? วุจฺจเต – ภควตา ปกาสิตํ, ตํ โข ปน ราชคเห ทุติยทิวเส รญฺโญ มาคธสฺส อนุโมทนตฺถํ. อิมสฺส จตฺถสฺส วิภาวนตฺถํ อยเมตฺถ วิตฺถารกถา กเถตพฺพา – "हे कोणी प्रकाशित केले, कोठे, कधी आणि का?" उत्तर दिले जाते - भगवंतांनी हे प्रकाशित केले. ते राजगृह येथे पोहोचल्याच्या दुसऱ्या दिवशी मगधचा राजा (बिंबिसार) याच्या अनुमोदनासाठी सांगितले गेले. हाच अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी येथे ही सविस्तर कथा सांगितली पाहिजे - อิโต ทฺวานวุติกปฺเป กาสิ นาม นครํ อโหสิ. ตตฺถ ชยเสโน นาม ราชา. ตสฺส สิริมา นาม เทวี, ตสฺสา กุจฺฉิยํ ผุสฺโส นาม โพธิสตฺโต นิพฺพตฺติตฺวา อนุปุพฺเพน สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌิ. ชยเสโน ราชา ‘‘มม ปุตฺโต อภินิกฺขมิตฺวา พุทฺโธ ชาโต, มยฺหเมว พุทฺโธ, มยฺหํ ธมฺโม, มยฺหํ สงฺโฆ’’ติ มมตฺตํ อุปฺปาเทตฺวา สพฺพกาลํ สยเมว อุปฏฺฐหติ, น อญฺเญสํ โอกาสํ เทติ. या कल्पाहून ९२ कल्प मागे कासी नावाचे नगर होते. तेथे जयसेन नावाचा राजा होता. त्याची सिरीमा नावाची राणी होती. तिच्या कुशीत फुस्स नावाचा बोधिसत्व उत्पन्न झाला आणि त्याने अनुक्रमाने सम्यक्संबोधी प्राप्त केली. जयसेन राजाने "माझा मुलगा गृहत्याग करून बुद्ध झाला आहे, म्हणून बुद्ध केवळ माझेच आहेत, धम्म माझाच आहे, संघ माझाच आहे" अशी ममत्वाची भावना निर्माण करून सर्वकाळ स्वतःच त्यांची सेवा-शुश्रूषा केली, इतरांना संधी दिली नाही. ภควโต กนิฏฺฐภาตโร เวมาติกา ตโย ภาตโร จินฺเตสุํ – ‘‘พุทฺธา นาม สพฺพโลกหิตาย อุปฺปชฺชนฺติ, น เจกสฺเสวตฺถาย, อมฺหากญฺจ ปิตา อญฺเญสํ โอกาสํ น เทติ, กถํ นุ มยํ ลเภยฺยาม ภควนฺตํ อุปฏฺฐาตุ’’นฺติ. เตสํ เอตทโหสิ – ‘‘หนฺท มยํ กิญฺจิ อุปายํ กโรมา’’ติ. เต ปจฺจนฺตํ กุปิตํ วิย การาเปสุํ. ตโต ราชา ‘‘ปจฺจนฺโต กุปิโต’’ติ สุตฺวา ตโยปิ ปุตฺเต ปจฺจนฺตวูปสมนตฺถํ เปเสสิ. เต วูปสเมตฺวา อาคตา, ราชา ตุฏฺโฐ วรํ อทาสิ ‘‘ยํ อิจฺฉถ, ตํ คณฺหถา’’ติ. เต ‘‘มยํ ภควนฺตํ อุปฏฺฐาตุํ อิจฺฉามา’’ติ อาหํสุ. ราชา ‘‘เอตํ ฐเปตฺวา อญฺญํ คณฺหถา’’ติ อาห. เต ‘‘มยํ อญฺเญน อนตฺถิกา’’ติ อาหํสุ. เตน หิ ปริจฺเฉทํ กตฺวา คณฺหถาติ. เต สตฺต วสฺสานิ ยาจึสุ, ราชา น อทาสิ. เอวํ ฉ, ปญฺจ, จตฺตาริ, ตีณิ, ทฺเว, เอกํ, สตฺต มาสานิ, ฉ, ปญฺจ, จตฺตารีติ ยาว เตมาสํ ยาจึสุ. ราชา ‘‘คณฺหถา’’ติ อทาสิ. भगवंतांचे सावत्र लहान भाऊ असलेल्या तीन भावांनी विचार केला - "बुद्ध हे सर्व जगाच्या कल्याणासाठी उत्पन्न होतात, केवळ एकाच्या कल्याणासाठी नाही. आणि आमचे वडील इतरांना संधी देत नाहीत. मग आम्हाला भगवंतांची सेवा करण्याची संधी कशी मिळेल?" त्यांना असे वाटले - "चला, आपण काहीतरी उपाय करूया." त्यांनी सीमावर्ती भागात बंड झाल्यासारखे घडवून आणले. त्यानंतर राजाने "सीमावर्ती भागात बंड झाले आहे" असे ऐकून त्या तिन्ही पुत्रांना बंड शमवण्यासाठी पाठवले. त्यांनी बंड शमवून परत आल्यावर राजाने प्रसन्न होऊन त्यांना वर दिला, "तुम्हाला जे हवे असेल ते मागून घ्या." ते म्हणाले, "आम्हाला भगवंतांची सेवा-शुश्रूषा करण्याची इच्छा आहे." राजा म्हणाला, "हे सोडून दुसरे काहीतरी मागून घ्या." ते म्हणाले, "आम्हाला दुसऱ्या कशाचीही गरज नाही." (राजा म्हणाला) "तर मग कालावधी निश्चित करून मागून घ्या." त्यांनी सात वर्षांची मागणी केली, राजाने दिली नाही. अशा प्रकारे सहा, पाच, चार, तीन, दोन, एक वर्ष, सात महिने, सहा, पाच, चार महिने करत त्यांनी तीन महिन्यांपर्यंत मागणी केली. राजाने "घ्या (करा सेवा)" असे म्हणून परवानगी दिली. เต วรํ ลภิตฺวา ปรมตุฏฺฐา ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา วนฺทิตฺวา อาหํสุ – ‘‘อิจฺฉาม มยํ, ภนฺเต, ภควนฺตํ เตมาสํ อุปฏฺฐาตุํ, อธิวาเสตุ โน, ภนฺเต[Pg.170], ภควา อิมํ เตมาสํ วสฺสาวาส’’นฺติ. อธิวาเสสิ ภควา ตุณฺหีภาเวน. ตโต เต อตฺตโน ชนปเท นิยุตฺตกปุริสสฺส เลขํ เปเสสุํ ‘‘อิมํ เตมาสํ อมฺเหหิ ภควา อุปฏฺฐาตพฺโพ, วิหารํ อาทึ กตฺวา สพฺพํ ภควโต อุปฏฺฐานสมฺภารํ กโรหี’’ติ. โส ตํ สพฺพํ สมฺปาเทตฺวา ปฏินิเวเทสิ. เต กาสายวตฺถนิวตฺถา หุตฺวา อฑฺฒเตยฺเยหิ ปุริสสหสฺเสหิ เวยฺยาวจฺจกเรหิ ภควนฺตํ สกฺกจฺจํ อุปฏฺฐหมานา ชนปทํ เนตฺวา วิหารํ นิยฺยาเตตฺวา วสาเปสุํ. ते वर मिळवून अत्यंत आनंदी झाले आणि भगवंतांकडे जाऊन, त्यांना वंदन करून म्हणाले – “भंते, आम्ही तीन महिने भगवंतांची सेवा करू इच्छितो. भंते, भगवंतांनी या तीन महिन्यांच्या वर्षावासाचा स्वीकार करावा.” भगवंतांनी मौन राहून संमती दिली. त्यानंतर त्यांनी आपल्या जनपदातील नियुक्त अधिकाऱ्याला पत्र पाठवले – “या तीन महिन्यांत आम्ही भगवंतांची सेवा करणार आहोत. विहारापासून सुरुवात करून भगवंतांच्या सेवेसाठी आवश्यक असलेले सर्व साहित्य तयार कर.” त्याने ते सर्व तयार करून त्यांना कळवले. ते काषाय वस्त्र परिधान करून अडीच हजार सेवकांसह भगवंतांची आदरपूर्वक सेवा करत त्यांना जनपदात घेऊन गेले आणि विहार दान करून त्यांना तेथे निवास करायला लावला. เตสํ ภณฺฑาคาริโก เอโก คหปติปุตฺโต สปชาปติโก สทฺโธ อโหสิ ปสนฺโน. โส พุทฺธปฺปมุขสฺส สงฺฆสฺส ทานวตฺตํ สกฺกจฺจํ อทาสิ. ชนปเท นิยุตฺตกปุริโส ตํ คเหตฺวา ชานปเทหิ เอกาทสมตฺเตหิ ปุริสสหสฺเสหิ สทฺธึ สกฺกจฺจเมว ทานํ ปวตฺตาเปสิ. ตตฺถ เกจิ ชานปทา ปฏิหตจิตฺตา อเหสุํ. เต ทานสฺส อนฺตรายํ กตฺวา เทยฺยธมฺเม อตฺตนา ขาทึสุ, ภตฺตสาลญฺจ อคฺคินา ทหึสุ. ปวาริเต ราชปุตฺตา ภควโต มหนฺตํ สกฺการํ กตฺวา ภควนฺตํ ปุรกฺขตฺวา ปิตุโน สกาสเมว อคมํสุ. ตตฺถ คนฺตฺวา เอว ภควา ปรินิพฺพายิ. ราชา จ ราชปุตฺตา จ ชนปเท นิยุตฺตกปุริโส จ ภณฺฑาคาริโก จ อนุปุพฺเพน กาลํ กตฺวา สทฺธึ ปริสาย สคฺเค อุปฺปชฺชึสุ, ปฏิหตจิตฺตชนา นิรเยสุ นิพฺพตฺตึสุ. เอวํ เตสํ ทฺวินฺนํ คณานํ สคฺคโต สคฺคํ, นิรยโต นิรยํ อุปปชฺชนฺตานํ ทฺวานวุติกปฺปา วีติวตฺตา. त्यांच्यामध्ये एक कोशाध्यक्ष असलेला गृहपतीपुत्र आपल्या पत्नीसह श्रद्धावान व प्रसन्न चित्ताचा होता. त्याने बुद्धप्रमुख संघाला आदरपूर्वक दानधर्म केला. जनपदातील नियुक्त अधिकाऱ्याने त्याला सोबत घेऊन जनपदातील सुमारे अकरा हजार पुरुषांसह आदरपूर्वक दान दिले. तेथे काही जनपदवासी द्वेषयुक्त मनाचे झाले. त्यांनी दानात अडथळा आणून दानवस्तू स्वतःच खाल्ल्या आणि भोजनशाळेला आग लावून ती जाळून टाकली. वर्षावास संपल्यावर (पवारणा झाल्यावर) राजपुत्रांनी भगवंतांचा मोठा सत्कार केला आणि भगवंतांना पुढे करून ते आपल्या पित्याकडे गेले. तेथे गेल्यावरच भगवंतांचे परिनिर्वाण झाले. राजा, राजपुत्र, जनपदातील नियुक्त अधिकारी आणि कोशाध्यक्ष हे सर्वजण अनुक्रमे काळाच्या पडद्याआड जाऊन आपल्या परिवारासह स्वर्गात उत्पन्न झाले, तर द्वेषयुक्त मनाचे लोक नरकात उत्पन्न झाले. अशा प्रकारे, त्या दोन्ही समूहांचे स्वर्गातून स्वर्गात आणि नरकातून नरकात उत्पन्न होत असताना ब्याण्णव कल्प निघून गेले. อถ อิมสฺมึ ภทฺทกปฺเป กสฺสปพุทฺธสฺส กาเล เต ปฏิหตจิตฺตชนา เปเตสุ อุปฺปนฺนา. ตทา มนุสฺสา อตฺตโน ญาตกานํ เปตานํ อตฺถาย ทานํ ทตฺวา อุทฺทิสนฺติ ‘‘อิทํ อมฺหากํ ญาตีนํ โหตู’’ติ. เต สมฺปตฺตึ ลภนฺติ. อถ อิเมปิ เปตา ตํ ทิสฺวา ภควนฺตํ กสฺสปํ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺฉึสุ – ‘‘กึ นุ โข, ภนฺเต, มยมฺปิ เอวรูปํ สมฺปตฺตึ ลเภยฺยามา’’ติ? ภควา อาห – ‘‘อิทานิ น ลภถ, อปิจ อนาคเต โคตโม นาม พุทฺโธ ภวิสฺสติ, ตสฺส ภควโต กาเล พิมฺพิสาโร นาม ราชา ภวิสฺสติ, โส ตุมฺหากํ อิโต ทฺวานวุติกปฺเป ญาติ อโหสิ, โส พุทฺธสฺส ทานํ ทตฺวา ตุมฺหากํ อุทฺทิสิสฺสติ, ตทา ลภิสฺสถา’’ติ. เอวํ วุตฺเต กิร เตสํ เปตานํ ตํ วจนํ ‘‘สฺเว ลภิสฺสถา’’ติ วุตฺตํ วิย อโหสิ. त्यानंतर या भद्रकल्पात, कश्यप बुद्धांच्या काळात ते द्वेषयुक्त मनाचे लोक प्रेतयोनीत उत्पन्न झाले. तेव्हा लोक आपल्या प्रेत झालेल्या नातेवाईकांच्या कल्याणासाठी दान देऊन असे समर्पित करत असत – “हे आमच्या नातेवाईकांना लाभो.” त्यांना ती संपत्ती (सुख) मिळत असे. तेव्हा या प्रेतांनीही ते पाहून भगवान कश्यपांकडे जाऊन विचारले – “भंते, आम्हालाही अशी संपत्ती मिळेल का?” भगवान म्हणाले – “आता तुम्हाला ती मिळणार नाही. परंतु भविष्यात गौतम नावाचे बुद्ध होतील. त्या भगवंतांच्या काळात बिंबिसार नावाचा राजा होईल. तो या भद्रकल्पापासून ब्याण्णव कल्प मागे तुमचा नातेवाईक होता. तो बुद्धांना दान देऊन तुमच्यासाठी समर्पित करेल, तेव्हा तुम्हाला ते मिळेल.” असे म्हटले असता, त्या प्रेतांना ते शब्द “उद्याच तुम्हाला मिळेल” असे म्हटल्यासारखे वाटले. อถ เอกสฺมึ พุทฺธนฺตเร วีติวตฺเต อมฺหากํ ภควา โลเก อุปฺปชฺชิ. เตปิ ตโย ราชปุตฺตา เตหิ อฑฺฒเตยฺเยหิ ปุริสสหสฺเสหิ สทฺธึ [Pg.171] เทวโลกา จวิตฺวา มคธรฏฺเฐ พฺราหฺมณกุเล อุปฺปชฺชิตฺวา อนุปุพฺเพน อิสิปพฺพชฺชํ ปพฺพชิตฺวา คยาสีเส ตโย ชฏิลา อเหสุํ, ชนปเท นิยุตฺตกปุริโส, ราชา อโหสิ พิมฺพิสาโร, ภณฺฑาคาริโก, คหปติ วิสาโข นาม มหาเสฏฺฐิ อโหสิ, ตสฺส ปชาปติ ธมฺมทินฺนา นาม เสฏฺฐิธีตา อโหสิ. เอวํ สพฺพาปิ อวเสสา ปริสา รญฺโญ เอว ปริวารา หุตฺวา นิพฺพตฺตา. त्यानंतर एक बुद्ध-अंतराल निघून गेल्यावर आमचे भगवान जगात उत्पन्न झाले. ते तिन्ही राजपुत्रही त्या अडीच हजार पुरुषांसह देवलोकातून च्युत होऊन मगध देशात ब्राह्मण कुळात उत्पन्न झाले आणि अनुक्रमे ऋषी-प्रव्रज्या ग्रहण करून गयाशीर्ष येथे तीन जटिल झाले. जनपदातील नियुक्त अधिकारी राजा बिंबिसार झाला. कोशाध्यक्ष असलेला गृहपती विशाख नावाचा महाश्रेष्ठ झाला आणि त्याची पत्नी धम्मदिन्ना नावाची श्रेष्ठीची कन्या झाली. अशा प्रकारे उर्वरित सर्व परिवारही राजा बिंबिसारचाच परिवार म्हणून उत्पन्न झाला. อมฺหากํ ภควา โลเก อุปฺปชฺชิตฺวา สตฺตสตฺตาหํ อติกฺกมิตฺวา อนุปุพฺเพน พาราณสึ อาคมฺม ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตตฺวา ปญฺจวคฺคิเย อาทึ กตฺวา ยาว อฑฺฒเตยฺยสหสฺสปริวาเร ตโย ชฏิเล วิเนตฺวา ราชคหํ อคมาสิ. ตตฺถ จ ตทหุปสงฺกมนฺตํเยว ราชานํ พิมฺพิสารํ โสตาปตฺติผเล ปติฏฺฐาเปสิ เอกาทสนวุเตหิ มาคธเกหิ พฺราหฺมณคหปติเกหิ สทฺธึ. อถ รญฺญา สฺวาตนาย ภตฺเตน นิมนฺติโต ภควา อธิวาเสตฺวา ทุติยทิวเส สกฺเกน เทวานมินฺเทน ปุรโต ปุรโต คจฺฉนฺเตน – आमचे भगवान जगात उत्पन्न झाल्यावर, सात आठवडे व्यतीत करून अनुक्रमे वाराणसीला आले. त्यांनी धम्मचक्र प्रवर्तन करून पंचवर्गीय भिक्खूंपासून सुरुवात करत अडीच हजार अनुयायांसह त्या तीन जटिलांना सन्मार्गावर आणले आणि ते राजगृहाला गेले. तेथे त्यांनी राजगृहात आल्याच्या पहिल्याच दिवशी राजा बिंबिसाराला एक लाख दहा हजार मगध देशातील ब्राह्मण व गृहपतींसह स्रोतापत्ती फलावर प्रतिष्ठित केले. त्यानंतर राजाने दुसऱ्या दिवशीच्या भोजनासाठी आमंत्रित केले असता भगवंतांनी त्याचा स्वीकार केला आणि दुसऱ्या दिवशी देवराज शक्राने पुढे पुढे चालत – ‘‘ทนฺโต ทนฺเตหิ สห ปุราณชฏิเลหิ, วิปฺปมุตฺโต วิปฺปมุตฺเตหิ; สิงฺคีนิกฺขสวณฺโณ, ราชคหํ ปาวิสิ ภควา’’ติ. (มหาว. ๕๘) – “स्वतः दमित (इंद्रियसंयम केलेले) असलेले, सुवर्णालंकारासारखी कांती असलेले भगवान, दमित झालेल्या माजी जटिलांसह आणि मुक्त असलेले भगवान, मुक्त झालेल्यांसह राजगृहात प्रविष्ट झाले.” เอวมาทีหิ คาถาหิ อภิตฺถวิยมาโน ราชคหํ ปวิสิตฺวา รญฺโญ นิเวสเน มหาทานํ สมฺปฏิจฺฉิ. เต เปตา ‘‘อิทานิ ราชา อมฺหากํ ทานํ อุทฺทิสิสฺสติ, อิทานิ อุทฺทิสิสฺสตี’’ติ อาสาย ปริวาเรตฺวา อฏฺฐํสุ. अशा प्रकारच्या गाथांनी स्तुती केली जात असताना, भगवंतांनी राजगृहात प्रवेश करून राजाच्या महालात महादानाचा स्वीकार केला. ते प्रेत “आता राजा आमच्यासाठी दान समर्पित करेल, आता समर्पित करेल” या आशेने त्यांना वेढून उभे राहिले. ราชา ทานํ ทตฺวา ‘‘กตฺถ นุ โข ภควา วิหเรยฺยา’’ติ ภควโต วิหารฏฺฐานเมว จินฺเตสิ, น ตํ ทานํ กสฺสจิ อุทฺทิสิ. เปตา ฉินฺนาสา หุตฺวา รตฺตึ รญฺโญ นิเวสเน อติวิย ภึสนกํ วิสฺสรมกํสุ. ราชา ภยสํเวคสนฺตาสมาปชฺชิ, ตโต ปภาตาย รตฺติยา ภควโต อาโรเจสิ – ‘‘เอวรูปํ สทฺทมสฺโสสึ, กึ นุ โข เม, ภนฺเต, ภวิสฺสตี’’ติ. ภควา อาห – ‘‘มา ภายิ, มหาราช, น เต กิญฺจิ ปาปกํ ภวิสฺสติ, อปิจ โข เต ปุราณญาตกา เปเตสุ อุปฺปนฺนา สนฺติ, เต เอกํ พุทฺธนฺตรํ ตเมว ปจฺจาสีสมานา วิจรนฺติ ‘พุทฺธสฺส ทานํ ทตฺวา อมฺหากํ อุทฺทิสิสฺสตี’ติ[Pg.172], น เตสํ ตฺวํ หิยฺโย อุทฺทิสิ, เต ฉินฺนาสา ตถารูปํ วิสฺสรมกํสู’’ติ. राजाने दान दिल्यावर, “भगवान कोठे निवास करतील?” असा केवळ भगवंतांच्या निवासस्थानाचाच विचार केला, त्याने ते दान कोणालाही समर्पित केले नाही. प्रेत निराश होऊन रात्री राजाच्या महालात अत्यंत भयानक आक्रोश करू लागले. राजाला अत्यंत भय, संवेग आणि घबराट झाली. त्यानंतर रात्र संपून सकाळ झाल्यावर त्याने भगवंतांना सांगितले – “मी असा आवाज ऐकला. भंते, माझ्या बाबतीत काय बरे घडणार आहे?” भगवान म्हणाले – “महाराज, घाबरू नका. तुमचे काहीही वाईट होणार नाही. परंतु तुमचे पूर्वजन्मीचे नातेवाईक प्रेतयोनीत उत्पन्न झाले आहेत. ते एका बुद्ध-अंतरालापासून केवळ तुमच्याकडूनच आशेने वाट पाहत फिरत आहेत की, ‘बुद्धांना दान देऊन तो आमच्यासाठी समर्पित करेल.’ काल तुम्ही त्यांच्यासाठी ते समर्पित केले नाही. त्यामुळे निराश होऊन त्यांनी तसा भयानक आक्रोश केला.” โส อาห ‘‘อิทานิ ปน, ภนฺเต, ทินฺเน ลเภยฺยุ’’นฺติ? ‘‘อาม, มหาราชา’’ติ. ‘‘เตน หิ เม, ภนฺเต, อธิวาเสตุ ภควา อชฺชตนาย ทานํ, เตสํ อุทฺทิสิสฺสามี’’ติ? ภควา อธิวาเสสิ. ราชา นิเวสนํ คนฺตฺวา มหาทานํ ปฏิยาเทตฺวา ภควโต กาลํ อาโรจาเปสิ. ภควา ราชนฺเตปุรํ คนฺตฺวา ปญฺญตฺเต อาสเน นิสีทิ สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน. เตปิ โข เปตา ‘‘อปิ นาม อชฺช ลเภยฺยามา’’ติ คนฺตฺวา ติโรกุฏฺฏาทีสุ อฏฺฐํสุ. ภควา ตถา อกาสิ, ยถา เต สพฺเพว รญฺโญ ปากฏา อเหสุํ. ราชา ทกฺขิโณทกํ เทนฺโต ‘‘อิทํ เม ญาตีนํ โหตู’’ติ อุทฺทิสิ, ตงฺขณญฺเญว เตสํ เปตานํ ปทุมสญฺฉนฺนา โปกฺขรณิโย นิพฺพตฺตึสุ. เต ตตฺถ นฺหตฺวา จ ปิวิตฺวา จ ปฏิปฺปสฺสทฺธทรถกิลมถปิปาสา สุวณฺณวณฺณา อเหสุํ. ราชา ยาคุขชฺชกโภชนานิ ทตฺวา อุทฺทิสิ, ตงฺขณญฺเญว เตสํ ทิพฺพยาคุขชฺชกโภชนานิ นิพฺพตฺตึสุ. เต ตานิ ปริภุญฺชิตฺวา ปีณินฺทฺริยา อเหสุํ. อถ วตฺถเสนาสนานิ ทตฺวา อุทฺทิสิ. เตสํ ทิพฺพวตฺถทิพฺพยานทิพฺพปาสาททิพฺพปจฺจตฺถรณทิพฺพเสยฺยาทิอลงฺการวิธโย นิพฺพตฺตึสุ. สาปิ เตสํ สมฺปตฺติ ยถา สพฺพาว ปากฏา โหติ, ตถา ภควา อธิฏฺฐาสิ. ราชา อติวิย อตฺตมโน อโหสิ. ตโต ภควา ภุตฺตาวี ปวาริโต รญฺโญ มาคธสฺส อนุโมทนตฺถํ ‘‘ติโรกุฏฺเฏสุ ติฏฺฐนฺตี’’ติ อิมา คาถา อภาสิ. तो (बिंबिसार राजा) म्हणाला, "भंते, आता या वेळी दान दिले असता, त्या (माझ्या मृत नातेवाईक) प्रेतांना ते मिळेल का?" "होय, महाराज (मिळेल)," असे भगवान म्हणाले. "तर मग भंते, भगवंतांनी आजच्या दिवसासाठी माझे दान स्वीकारावे, मी त्यांच्यासाठी (त्या प्रेतांच्या कल्याणासाठी) दान समर्पित करीन." भगवंतांनी (मौन राहून) संमती दिली. राजाने राजवाड्यात जाऊन महादान तयार केले आणि भगवंतांना भोजनाची वेळ झाल्याचे कळवले. भगवान राजवाड्यात गेले आणि भिक्खू संघासह मांडलेल्या आसनांवर बसले. ते प्रेतसुद्धा "कदाचित आज आपल्याला काहीतरी मिळेल" असे म्हणून तिथे आले आणि भिंतींच्या पलीकडे इत्यादी ठिकाणी उभे राहिले. भगवंतांनी अशी योजना (अधिष्ठान) केली की जेणेकरून ते सर्व प्रेत राजाला स्पष्टपणे दिसू लागले. राजाने दानजल (दक्षिणेचे पाणी) अर्पण करताना "हे दान माझ्या नातेवाईकांना मिळो" असा संकल्प केला. त्याच क्षणी त्या प्रेतांसाठी कमळांनी झाकलेली तळी (पुष्करणी) निर्माण झाली. त्यांनी तिथे स्नान केले आणि पाणी प्यायले, ज्यामुळे त्यांची जळजळ, थकवा आणि तहान शांत झाली आणि ते सुवर्णवर्णाचे (सोन्यासारख्या रंगाचे) झाले. राजाने पेज (यागु), खाद्य आणि भोज्य पदार्थ देऊन संकल्प केला, त्याच क्षणी त्यांच्यासाठी दिव्य पेज, खाद्य आणि भोज्य पदार्थ उत्पन्न झाले. त्यांनी त्याचे सेवन केले आणि त्यांची इंद्रिये तृप्त व पुष्ट झाली. त्यानंतर राजाने वस्त्रे आणि शय्या-आसने देऊन संकल्प केला. त्यांच्यासाठी दिव्य वस्त्रे, दिव्य वाहने, दिव्य प्रासाद (महाल), दिव्य बिछाने, दिव्य शय्या इत्यादी अलंकार आणि सुखसोयी उत्पन्न झाल्या. ती त्यांची सर्व संपत्ती राजाला स्पष्टपणे दिसावी, असे भगवंतांनी अधिष्ठान केले. राजा अत्यंत आनंदित झाला. त्यानंतर भोजन करून पात्र बाजूला ठेवलेल्या भगवंतांनी मगधचा राजा बिंबिसार याच्या अनुमोदनासाठी "तिरोकुट्टेषु तिठ्ठन्ति" (भिंतींच्या पलीकडे उभे राहतात) ही गाथा म्हटली. เอตฺตาวตา จ ‘‘เยน ยตฺถ ยทา ยสฺมา, ติโรกุฏฺฏํ ปกาสิตํ, ปกาเสตฺวาน ตํ สพฺพ’’นฺติ อยํ มาติกา สงฺเขปโต วิตฺถารโต จ วิภตฺตา โหติ. आणि एवढ्या विवेचनाने, "कोणी, कुठे, कधी आणि का 'तिरोकुट्ट सुत्त' प्रकाशित केले, ते सर्व स्पष्ट करून सांगतो" ही जी मातृका (विषयसूची) आहे, ती संक्षेपाने आणि विस्ताराने विभागून स्पष्ट केली गेली आहे. ปฐมคาถาวณฺณนา पहिल्या गाथेचे स्पष्टीकरण (प्रथम गाथा वर्णना). ๑. อิทานิ อิมสฺส ติโรกุฏฺฏสฺส ยถากฺกมํ อตฺถวณฺณนํ กริสฺสาม. เสยฺยถิทํ – ปฐมคาถาย ตาว ติโรกุฏฺฏาติ กุฏฺฏานํ ปรภาคา วุจฺจนฺติ. ติฏฺฐนฺตีติ นิสชฺชาทิปฺปฏิกฺเขปโต ฐานกปฺปนวจนเมตํ. เตน ยถา ปาการปรภาคํ ปพฺพตปรภาคญฺจ คจฺฉนฺตํ ‘‘ติโรปาการํ ติโรปพฺพตํ อสชฺชมาโน คจฺฉตี’’ติ วทนฺติ, เอวมิธาปิ กุฏฺฏสฺส ปรภาเคสุ ติฏฺฐนฺเต ‘‘ติโรกุฏฺเฏสุ [Pg.173] ติฏฺฐนฺตี’’ติ อาห. สนฺธิสิงฺฆาฏเกสุ จาติ เอตฺถ สนฺธิโยติ จตุกฺโกณรจฺฉา วุจฺจนฺติ ฆรสนฺธิภิตฺติสนฺธิอาโลกสนฺธิโย จาปิ. สิงฺฆาฏกาติ ติโกณรจฺฉา วุจฺจนฺติ, ตเทกชฺฌํ กตฺวา ปุริเมน สทฺธึ สงฺฆเฏนฺโต ‘‘สนฺธิสิงฺฆาฏเกสุ จา’’ติ อาห. ทฺวารพาหาสุ ติฏฺฐนฺตีติ นครทฺวารฆรทฺวารานํ พาหา นิสฺสาย ติฏฺฐนฺติ. อาคนฺตฺวาน สกํ ฆรนฺติ เอตฺถ สกํ ฆรํ นาม ปุพฺพญาติฆรมฺปิ อตฺตนา สามิกภาเวน อชฺฌาวุตฺถปุพฺพฆรมฺปิ. ตทุภยมฺปิ ยสฺมา เต สกฆรสญฺญาย อาคจฺฉนฺติ, ตสฺมา ‘‘อาคนฺตฺวาน สกํ ฆร’’นฺติ อาห. १. आता आपण या 'तिरोकुट्ट सुत्ता'च्या अर्थाचे अनुक्रमे स्पष्टीकरण करू. ते खालीलप्रमाणे आहे – पहिल्या गाथेमध्ये 'तिरोकुट्टा' म्हणजे भिंतींच्या पलीकडचा भाग असे म्हटले जाते. 'तिठ्ठन्ति' (उभे राहतात) हा शब्द बसणे इत्यादी क्रियांचा निषेध करून उभे राहण्याची स्थिती दर्शवतो. त्यामुळे, ज्याप्रमाणे तटबंदीच्या पलीकडे किंवा पर्वताच्या पलीकडे जाताना "तटबंदीच्या पलीकडे, पर्वताच्या पलीकडे न अडखळता जातो" असे म्हणतात, त्याचप्रमाणे येथेही भिंतींच्या बाहेरील बाजूस उभे राहणाऱ्यांना "तिरोकुट्टेषु तिठ्ठन्ति" (भिंतींच्या पलीकडे उभे राहतात) असे म्हटले आहे. 'सन्धिसिङ्घाटकेसु च' यामध्ये 'सन्धि' म्हणजे चार रस्त्यांचे चौक (चौफुटा) म्हटले जाते, तसेच घरांचे सांधे, भिंतींचे सांधे आणि खिडक्यांचे (प्रकाशाचे) सांधे यांनाही 'सन्धि' म्हणतात. 'सिङ्घाटक' म्हणजे तिठा (तीन रस्त्यांचा संगम) म्हटले जाते. या दोन्ही शब्दांना एकत्र करून, मागील शब्दाशी जोडताना "सन्धिसिङ्घाटकेसु च" असे म्हटले आहे. 'द्वारबाहासु तिठ्ठन्ति' म्हणजे नगरद्वारांच्या आणि घरांच्या द्वारांच्या चौकटींचा (बाजूंचा) आश्रय घेऊन उभे राहतात. 'आगन्त्वान सकं घरं' यामध्ये 'सकं घरं' (स्वतःचे घर) म्हणजे पूर्वजन्मीच्या नातेवाईकांचे घर किंवा स्वतः मालक म्हणून पूर्वी वास्तव्य केलेले घर होय. या दोन्ही प्रकारच्या घरांकडे ते "हे माझे स्वतःचे घर आहे" या भावनेने येतात, म्हणून "आगन्त्वान सकं घरं" (आपल्या स्वतःच्या घरी येऊन) असे म्हटले आहे. ทุติยคาถาวณฺณนา दुसऱ्या गाथेचे स्पष्टीकरण (द्वितीय गाथा वर्णना). ๒. เอวํ ภควา ปุพฺเพ อนชฺฌาวุตฺถปุพฺพมฺปิ ปุพฺพญาติฆรํ พิมฺพิสารนิเวสนํ สกฆรสญฺญาย อาคนฺตฺวา ติโรกุฏฺฏสนฺธิสิงฺฆาฏกทฺวารพาหาสุ ฐิเต อิสฺสามจฺฉริยผลํ อนุภวนฺเต, อปฺเปกจฺเจ ทีฆมสฺสุเกสวิการธเร อนฺธการมุเข สิถิลพนฺธนวิลมฺพมานกิสผรุสกาฬกงฺคปจฺจงฺเค ตตฺถ ตตฺถ ฐิตวนทาหทฑฺฒตาลรุกฺขสทิเส, อปฺเปกจฺเจ ชิฆจฺฉาปิปาสารณินิมฺมถเนน อุทรโต อุฏฺฐาย มุขโต วินิจฺฉรนฺตาย อคฺคิชาลาย ปริฑยฺหมานสรีเร, อปฺเปกจฺเจ สูจิฉิทฺทาณุมตฺตกณฺฐพิลตาย ปพฺพตาการกุจฺฉิตาย จ ลทฺธมฺปิ ปานโภชนํ ยาวทตฺถํ ภุญฺชิตุํ อสมตฺถตาย ขุปฺปิปาสาปเรเต อญฺญํ รสมวินฺทมาเน, อปฺเปกจฺเจ อญฺญมญฺญสฺส อญฺเญสํ วา สตฺตานํ ปภินฺนคณฺฑปิฬกมุขา ปคฺฆริตรุธิรปุพฺพลสิกาทึ ลทฺธา อมตมิว สายมาเน อติวิย ทุทฺทสิกวิรูปภยานกสรีเร พหู เปเต รญฺโญ นิทสฺเสนฺโต – २. अशा प्रकारे, भगवंतांनी – पूर्वी कधीही वास्तव्य न केलेल्या, परंतु पूर्वजन्मीच्या नातेवाईकांचे घर असलेल्या बिंबिसार राजाच्या राजवाड्यात "हे आपलेच घर आहे" या भावनेने येऊन भिंतींच्या पलीकडे, चौकांमध्ये, तिठ्यांवर आणि द्वारांच्या चौकटींवर उभे राहिलेल्या; मत्सर आणि कंजूषपणाचे (अकुशल कर्माचे) फळ भोगत असलेल्या; काही लांब दाढी-मिशा असलेले, विकृत रूप धारण केलेले, अंधकारमय मुख असलेले, सैल सांध्यांमुळे लोंबकळणारे, कृश, खडबडीत आणि काळेकुट्ट अवयव असलेले; ठिकठिकाणी वणव्यात जळालेल्या ताडाच्या झाडासारखे दिसणारे; काही भूक आणि तहानेच्या तीव्र त्रासामुळे पोटातून निघून मुखातून बाहेर पडणाऱ्या अग्नीच्या ज्वाळांनी होरपळणारे शरीर असलेले; काही सुईच्या छिद्रासारखा लहान गळा (कंठ) आणि पर्वतासारखे मोठे पोट असल्यामुळे, अन्न-पाणी मिळाले तरी ते पोटभर खाण्यास असमर्थ असलेले, भूक आणि तहानेने व्याकुळ झालेले व इतर कोणत्याही रसाचा आस्वाद घेऊ न शकणारे; काही एकमेकांच्या किंवा इतर प्राण्यांच्या फुटलेल्या गळू व फोडांमधून वाहणारे रक्त, पू आणि पूय-द्रव इत्यादी मिळाल्यास ते अमृतासारखे चाटणारे; अत्यंत कुरूप, विकृत आणि भयानक शरीर असलेल्या अनेक प्रेतांना राजाला दाखवू इच्छिणारे होऊन – ‘‘ติโรกุฏฺเฏสุ ติฏฺฐนฺติ, สนฺธิสิงฺฆาฏเกสุ จ; ทฺวารพาหาสุ ติฏฺฐนฺติ, อาคนฺตฺวาน สกํ ฆร’’นฺติ. – "ते भिंतींच्या पलीकडे उभे राहतात, चौकांमध्ये आणि तिठ्यांवर उभे राहतात; आपल्या स्वतःच्या घरी येऊन द्वारांच्या चौकटींवर उभे राहतात." – วตฺวา ปุน เตหิ กตสฺส กมฺมสฺส ทารุณภาวํ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปหูเต อนฺนปานมฺหี’’ติ ทุติยคาถมาห. असे म्हणून, पुन्हा त्यांनी केलेल्या (अकुशल) कर्माची भयानकता दर्शवण्यासाठी, "पहूته अन्नपानम्हि" (प्रचंड अन्न आणि पाणी असतानाही) ही दुसरी गाथा भगवंतांनी म्हटली. ตตฺถ ปหูเตติ อนปฺปเก พหุมฺหิ, ยาวทตฺถิเกติ วุตฺตํ โหติ. ภ-การสฺส หิ ห-กาโร ลพฺภติ ‘‘ปหุ สนฺโต น ภรตี’’ติอาทีสุ (สุ. นิ. ๙๘) วิย. เกจิ ปน ‘‘พหูเต’’ อิติ จ ‘‘พหูเก’’ อิติ จ ปฐนฺติ. ปมาทปาฐา เอเต[Pg.174]. อนฺเน จ ปานมฺหิ จ อนฺนปานมฺหิ. ขชฺเช จ โภชฺเช จ ขชฺชโภชฺเช, เอเตน อสิตปีตขายิตสายิตวเสน จตุพฺพิธํ อาหารํ ทสฺเสติ. อุปฏฺฐิเตติ อุปคมฺม ฐิเต, สชฺชิเต ปฏิยตฺเต สโมหิเตติ วุตฺตํ โหติ. น เตสํ โกจิ สรติ, สตฺตานนฺติ เตสํ เปตฺติวิสเย อุปฺปนฺนานํ สตฺตานํ โกจิ มาตา วา ปิตา วา ปุตฺโต วา น สรติ. กึ การณา? กมฺมปจฺจยา, อตฺตนา กตสฺส อทานทานปฺปฏิเสธนาทิเภทสฺส กทริยกมฺมสฺส ปจฺจยา. ตญฺหิ เตสํ กมฺมํ ญาตีนํ สริตุํ น เทติ. त्या गाथेत 'पहूत' म्हणजे भरपूर, विपुल किंवा आवश्यकतेनुसार असा अर्थ आहे. कारण 'भ' काराचा 'ह' कार होतो, ज्याप्रमाणे "पहु सन्तो न भरति" इत्यादींमध्ये होतो. काही लोक 'बहूते' किंवा 'बहूके' असा पाठ वाचतात, परंतु हे प्रमादामुळे (लेखनदोषामुळे) झालेले चुकीचे पाठ आहेत. 'अन्न' आणि 'पान' म्हणजे अन्नपान. 'खाद्य' आणि 'भोज्य' म्हणजे खाद्यभोज्य. याद्वारे खाणे, पिणे, चघळणे आणि चाटणे या चार प्रकारच्या आहाराचे दर्शन घडवले आहे. 'उपठ्ठिते' म्हणजे जवळ आणून ठेवलेले, तयार केलेले किंवा मांडलेले असा अर्थ आहे. "न तेसं कोचि सरति सत्तानं" म्हणजे त्या प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्या प्राण्यांची आई, वडील किंवा मुलगा यांपैकी कोणीही त्यांची आठवण काढत नाही. याचे कारण काय? 'कम्मपच्चया' म्हणजे स्वतः केलेल्या दान न देणे, इतरांच्या दानात अडथळा आणणे इत्यादी स्वरूपाच्या कंजूषपणाच्या (अकुशल) कर्माच्या प्रभावामुळे. ते कर्म त्यांच्या नातेवाईकांना त्यांची आठवण करू देत नाही. ตติยคาถาวณฺณนา तिसऱ्या गाथेचे स्पष्टीकरण (तृतीय गाथा वर्णना). ๓. เอวํ ภควา อนปฺปเกปิ อนฺนปานาทิมฺหิ ปจฺจุปฏฺฐิเต ‘‘อปิ นาม อมฺเห อุทฺทิสฺส กิญฺจิ ทเทยฺยุ’’นฺติ ญาตี ปจฺจาสีสนฺตานํ วิจรตํ เตสํ เปตานํ เตหิ กตสฺส อติกฏุกวิปากกรสฺส กมฺมสฺส ปจฺจเยน กสฺสจิ ญาติโน อนุสฺสรณมตฺตาภาวํ ทสฺเสนฺโต – ३. अशा प्रकारे, भगवंतांनी – विपुल अन्न-पाणी समोर मांडलेले असतानाही, "कदाचित आमचे नातेवाईक आमच्या उद्देशाने काहीतरी दान देतील" अशी आशा बाळगून इकडेतिकडे फिरणाऱ्या त्या प्रेतांना, त्यांनी केलेल्या अत्यंत कडू फळ देणाऱ्या कर्माच्या प्रभावामुळे त्यांच्या कोणत्याही नातेवाईकाला त्यांची साधी आठवणही होत नाही, हे दर्शवण्यासाठी – ‘‘ปหูเต อนฺนปานมฺหิ, ขชฺชโภชฺเช อุปฏฺฐิเต; น เตสํ โกจิ สรติ, สตฺตานํ กมฺมปจฺจยา’’ติ. – "विपुल अन्न आणि पाणी समोर मांडलेले असताना, तसेच खाद्य आणि भोज्य पदार्थ हजर असतानाही, स्वतःच्या कर्माच्या प्रभावामुळे त्या प्राण्यांची (प्रेतांची) कोणीही आठवण काढत नाही." – วตฺวา ปุน รญฺโญ เปตฺติวิสยูปปนฺเน ญาตเก อุทฺทิสฺส ทินฺนํ ทานํ ปสํสนฺโต ‘‘เอวํ ททนฺติ ญาตีน’’นฺติ ตติยคาถมาห. असे म्हणून, पुन्हा राजाने प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्या आपल्या नातेवाईकांच्या उद्देशाने दिलेल्या दानाची प्रशंसा करताना, "एवं ददन्ति ज्ञातीनं" (अशा प्रकारे नातेवाईकांना दान देतात) ही तिसरी गाथा भगवंतांनी म्हटली. ตตฺถ เอวนฺติ อุปมาวจนํ. ตสฺส ทฺวิธา สมฺพนฺโธ – เตสํ สตฺตานํ กมฺมปจฺจยา อสรนฺเตปิ กิสฺมิญฺจิ ททนฺติ, ญาตีนํ, เย เอวํ อนุกมฺปกา โหนฺตีติ จ ยถา ตยา, มหาราช, ทินฺนํ, เอวํ สุจึ ปณีตํ กาเลน กปฺปิยํ ปานโภชนํ ททนฺติ ญาตีนํ, เย โหนฺติ อนุกมฺปกาติ จ. ททนฺตีติ เทนฺติ อุทฺทิสนฺติ นิยฺยาเตนฺติ. ญาตีนนฺติ มาติโต จ ปิติโต จ สมฺพนฺธานํ. เยติ เย เกจิ ปุตฺตา วา ธีตโร วา ภาตโร วา โหนฺตีติ ภวนฺติ. อนุกมฺปกาติ อตฺถกามา หิเตสิโน. สุจินฺติ วิมลํ ทสฺสเนยฺยํ มโนรมํ ธมฺมิกํ ธมฺมลทฺธํ. ปณีตนฺติ อุตฺตมํ เสฏฺฐํ. กาเลนาติ ญาติเปตานํ ติโรกุฏฺฏาทีสุ อาคนฺตฺวา ฐิตกาเลน. กปฺปิยนฺติ อนุจฺฉวิกํ ปติรูปํ อริยานํ ปริโภคารหํ. ปานโภชนนฺติ ปานญฺจ โภชนญฺจ. อิธ ปานโภชนมุเขน สพฺโพปิ เทยฺยธมฺโม อธิปฺเปโต. त्यामध्ये 'एवम्' हा उपमा दर्शवणारा शब्द आहे. त्याचा दोन प्रकारे संबंध समजून घ्यावा – त्या प्राण्यांच्या (प्रेतांच्या) अकुशल कर्माच्या कारणामुळे ते आठवण करू शकत नसले तरीही, जे नातेवाईक आपल्या प्रेत नातेवाईकांबद्दल असे दयाळू असतात, ते कोणत्या तरी कारणाने दान देतात, असा एक संबंध जाणावा. आणि 'हे महाराज! आपण जसे दान दिले आहे, त्याचप्रमाणे जे नातेवाईक आपल्या प्रेत नातेवाईकांबद्दल दयाळू असतात, ते योग्य वेळी स्वच्छ, उत्कृष्ट, कप्पिय (योग्य) असे पेय व भोजन दान देतात', असा दुसरा संबंध जाणावा. 'ददन्ति' म्हणजे देतात, उद्देशून देतात, समर्पित करतात. 'ज्ञातीनं' म्हणजे आईच्या व वडिलांच्या बाजूचे नातेवाईक. 'ये' म्हणजे जे कोणी मुलगे, मुली किंवा भाऊ इत्यादी असतात. 'होन्ति' म्हणजे असतात. 'अनुकम्पका' म्हणजे कल्याण इच्छिणारे, हित शोधणारे. 'सुचिं' म्हणजे निर्मळ, दर्शनीय, मनमोहक, धार्मिक मार्गाने मिळवलेले. 'पणीतं' म्हणजे उत्तम, श्रेष्ठ. 'कालेन' म्हणजे प्रेत झालेले नातेवाईक भिंतींच्या पलीकडे इत्यादी ठिकाणी येऊन उभे राहतात त्या वेळी. 'कप्पियं' म्हणजे योग्य, अनुरूप, आर्यांच्या उपभोगासाठी योग्य असलेले. 'पानभोजनं' म्हणजे पेय आणि भोजन. येथे पेय आणि भोजनाच्या माध्यमातून सर्वच देय्यधम्म (दानवस्तू) अभिप्रेत आहेत. จตุตฺถคาถาปุพฺพทฺธวณฺณนา चौथ्या गाथेच्या पूर्वार्धाचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๔. เอวํ [Pg.175] ภควา รญฺญา มาคเธน เปตภูตานํ ญาตีนํ อนุกมฺปาย ทินฺนํ ปานโภชนํ ปสํสนฺโต – ४. अशा प्रकारे, भगवान मगधराज बिंबिसारांनी प्रेत झालेल्या नातेवाईकांबद्दलच्या दयेपोटी दिलेल्या पेय आणि भोजनाची प्रशंसा करताना म्हणाले – ‘‘เอวํ ททนฺติ ญาตีนํ, เย โหนฺติ อนุกมฺปกา; สุจึ ปณีตํ กาเลน, กปฺปิยํ ปานโภชน’’นฺติ. – “जे दयाळू असतात, ते आपल्या (प्रेत झालेल्या) नातेवाईकांना योग्य वेळी असे स्वच्छ, उत्कृष्ट, कप्पिय (योग्य) पेय आणि भोजन दान देतात.” วตฺวา ปุน เยน ปกาเรน ทินฺนํ เตสํ โหติ, ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิทํ โว ญาตีนํ โหตู’’ติ จตุตฺถคาถาย ปุพฺพทฺธมาห ตํ ตติยคาถาย ปุพฺพทฺเธน สมฺพนฺธิตพฺพํ – असे बोलून, पुन्हा ज्या प्रकारे दिलेले दान त्यांना प्राप्त होते, ते दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी “इदं वो ज्ञातीनं होतु” (हे दान तुमच्या नातेवाईकांना मिळो) ही चौथ्या गाथेची पहिली ओळ (पूर्वार्ध) म्हटली. तिचा संबंध तिसऱ्या गाथेच्या पूर्वार्धाशी जोडला पाहिजे – ‘‘เอวํ ททนฺติ ญาตีนํ, เย โหนฺติ อนุกมฺปกา; อิทํ โว ญาตีนํ โหตุ, สุขิตา โหนฺตุ ญาตโย’’ติ. “जे दयाळू असतात, ते आपल्या नातेवाईकांना अशा प्रकारे दान देतात: 'हे दान आमच्या (प्रेत झालेल्या) नातेवाईकांना मिळो, आमचे नातेवाईक सुखी होवोत!'” เตน ‘‘อิทํ โว ญาตีนํ โหตูติ เอวํ ททนฺติ, โน อญฺญถา’’ติ เอตฺถ อาการตฺเถน เอวํสทฺเทน ทาตพฺพาการนิทสฺสนํ กตํ โหติ. त्यामुळे, “हे दान आमच्या नातेवाईकांना मिळो, अशा प्रकारे ते दान देतात, इतर कोणत्याही प्रकारे नाही” – येथे प्रकार (रीत) दर्शवणाऱ्या 'एवम्' या शब्दाने दान देण्याच्या पद्धतीचे दिग्दर्शन केले आहे. ตตฺถ อิทนฺติ เทยฺยธมฺมนิทสฺสนํ. โวติ ‘‘กจฺจิ ปน โว อนุรุทฺธา สมคฺคา สมฺโมทมานา’’ติ จ (ม. นิ. ๑.๓๒๖; มหาว. ๔๖๖), ‘‘เยหิ โว อริยา’’ติ จ เอวมาทีสุ วิย เกวลํ นิปาตมตฺตํ, น สามิวจนํ. ญาตีนํ โหตูติ เปตฺติวิสเย อุปฺปนฺนานํ ญาตกานํ โหตุ. สุขิตา โหนฺตุ ญาตโยติ เต เปตฺติวิสยูปปนฺนา ญาตโย อิทํ ปจฺจนุภวนฺตา สุขิตา โหนฺตูติ. त्यामध्ये, 'इदं' हा शब्द देय्यधम्माचे (दानवस्तूचे) दिग्दर्शन करतो. 'वो' हा शब्द “कच्चि पन वो अनुरुद्धा समग्गा सम्मोदमाना” आणि “येहि वो अरिया” इत्यादी वाक्यांप्रमाणे केवळ एक निपात (अव्यय) आहे, तो षष्ठी विभक्तीचा (मालकी दर्शवणारा) शब्द नाही. 'ज्ञातीनं होतु' म्हणजे प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्या नातेवाईकांना हे प्राप्त होवो. 'सुखिता होन्तु ज्ञातयो' म्हणजे प्रेतलोकात उत्पन्न झालेले ते नातेवाईक या दानाचा उपभोग घेत सुखी होवोत. จตุตฺถคาถาปรทฺธปญฺจมคาถาปุพฺพทฺธวณฺณนา चौथ्या गाथेच्या उत्तरार्धाचे आणि पाचव्या गाथेच्या पूर्वार्धाचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๔-๕. เอวํ ภควา เยน ปกาเรน เปตฺติวิสยูปปนฺนานํ ญาตีนํ ทาตพฺพํ, ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อิทํ โว ญาตีนํ โหตุ, สุขิตา โหนฺตุ ญาตโย’’ติ วตฺวา ปุน ยสฺมา ‘‘อิทํ โว ญาตีนํ โหตู’’ติ วุตฺเตปิ น อญฺเญน กตํ กมฺมํ อญฺญสฺส ผลทํ โหติ, เกวลนฺตุ ตถา อุทฺทิสฺส ทิยฺยมานํ ตํ วตฺถุ ญาตีนํ กุสลกมฺมสฺส ปจฺจโย โหติ. ตสฺมา ยถา เตสํ ตสฺมึเยว วตฺถุสฺมึ ตงฺขเณ ผลนิพฺพตฺตกํ กุสลกมฺมํ โหติ, ตํ ทสฺเสนฺโต ‘‘เต จ ตตฺถา’’ติ จตุตฺถคาถาย ปจฺฉิมทฺธํ ‘‘ปหูเต อนฺนปานมฺหี’’ติ ปญฺจมคาถาย ปุพฺพทฺธญฺจ อาห. ४-५. अशा प्रकारे, भगवान प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्या नातेवाईकांना ज्या पद्धतीने दान दिले पाहिजे, ते दर्शवत “इदं वो ज्ञातीनं होतु, सुखिता होन्तु ज्ञातयो” असे बोलले. परंतु, “हे दान तुमच्या नातेवाईकांना मिळो” असे म्हटले तरी दुसऱ्याने केलेले कर्म दुसऱ्याला फळ देणारे ठरत नाही, तर केवळ त्या प्रकारे उद्देशून दिले जाणारे ते दान प्रेत नातेवाईकांच्या कुशल कर्मासाठी प्रत्यय (साहाय्यक कारण) बनते. म्हणून, ज्या प्रकारे त्यांना त्याच दानवस्तूच्या आधारे त्याच क्षणी फळ देणारे कुशल कर्म प्राप्त होते, ते दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी “ते च तत्थ” हा चौथ्या गाथेचा उत्तरार्ध आणि “पहूते अन्नपानम्हि” हा पाचव्या गाथेचा पूर्वार्ध सांगितला. เตสํ [Pg.176] อตฺโถ – เต ญาติเปตา ยตฺถ ตํ ทานํ ทียติ, ตตฺถ สมนฺตโต อาคนฺตฺวา สมาคนฺตฺวา, สโมธาย วา เอกชฺฌํ หุตฺวาติ วุตฺตํ โหติ, สมฺมา อาคตา สมาคตา ‘‘อิเม โน ญาตโย อมฺหากํ อตฺถาย ทานํ อุทฺทิสิสฺสนฺตี’’ติ เอตทตฺถํ สมฺมา อาคตา หุตฺวาติ วุตฺตํ โหติ. ปหูเต อนฺนปานมฺหีติ ตสฺมึ อตฺตโน อุทฺทิสฺสมาเน ปหูเต อนฺนปานมฺหิ. สกฺกจฺจํ อนุโมทเรติ อภิสทฺทหนฺตา กมฺมผลํ อวิชหนฺตา จิตฺตีการํ อวิกฺขิตฺตจิตฺตา หุตฺวา ‘‘อิทํ โน ทานํ หิตาย สุขาย โหตู’’ติ โมทนฺติ อนุโมทนฺติ, ปีติโสมนสฺสชาตา โหนฺตีติ. त्यांचा अर्थ असा आहे – ते प्रेत झालेले नातेवाईक जेथे ते दान दिले जात आहे, तेथे चहूबाजूंनी येऊन, एकत्र जमून किंवा एकत्र होऊन राहतात, असा अर्थ आहे. 'समागत' म्हणजे चांगल्या प्रकारे आलेले, “आमचे हे नातेवाईक आमच्यासाठी दान उद्देशून देतील” या हेतूने चांगल्या प्रकारे एकत्र आलेले, असा अर्थ आहे. 'पहूते अन्नपानम्हि' म्हणजे स्वतःसाठी उद्देशून दिलेल्या विपुल अन्न आणि पेयाच्या प्रसंगी. 'सक्कच्चं अनुमोदरे' म्हणजे कर्माच्या फळावर पूर्ण विश्वास ठेवून, कर्माचे फळ न सोडता, आदरपूर्वक आणि एकाग्र चित्ताने “हे दान आमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी कारण ठरो” असे म्हणून ते आनंदित होतात, अनुमोदन देतात, आणि प्रीती व सोमनस्य (प्रसन्नता) युक्त होतात. ปญฺจมคาถาปรทฺธฉฏฺฐคาถาปุพฺพทฺธวณฺณนา पाचव्या गाथेच्या उत्तरार्धाचे आणि सहाव्या गाथेच्या पूर्वार्धाचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๕-๖. เอวํ ภควา ยถา เปตฺติวิสยูปปนฺนานํ ตงฺขเณ ผลนิพฺพตฺตกํ กุสลํ กมฺมํ โหติ, ตํ ทสฺเสนฺโต – ५-६. अशा प्रकारे, भगवान प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्यांना त्याच क्षणी फळ देणारे कुशल कर्म कसे प्राप्त होते, ते दर्शवताना म्हणाले – ‘‘เต จ ตตฺถ สมาคนฺตฺวา, ญาติเปตา สมาคตา; ปหูเต อนฺนปานมฺหิ, สกฺกจฺจํ อนุโมทเร’’ติ. – “आणि ते प्रेत झालेले नातेवाईक तेथे एकत्र येऊन, विपुल अन्न आणि पेय उपलब्ध असताना आदरपूर्वक अनुमोदन देतात.” วตฺวา ปุน ญาตเก นิสฺสาย นิพฺพตฺตกุสลกมฺมผลํ ปจฺจนุโภนฺตานํ เตสํ ญาตี อารพฺภ โถมนาการํ ทสฺเสนฺโต ‘‘จิรํ ชีวนฺตู’’ติ ปญฺจมคาถาย ปจฺฉิมทฺธํ ‘‘อมฺหากญฺจ กตา ปูชา’’ติ ฉฏฺฐคาถาย ปุพฺพทฺธญฺจ อาห. असे बोलून, पुन्हा नातेवाईकांच्या आधारे उत्पन्न झालेल्या कुशल कर्माच्या फळाचा उपभोग घेणाऱ्या त्या प्रेत नातेवाईकांबद्दलची प्रशंसा दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी “चिरं जीवन्तु” हा पाचव्या गाथेचा उत्तरार्ध आणि “अम्हाकञ्च कता पूजा” हा सहाव्या गाथेचा पूर्वार्ध सांगितला. เตสํ อตฺโถ – จิรํ ชีวนฺตูติ จิรชีวิโน ทีฆายุกา โหนฺตุ. โน ญาตีติ อมฺหากํ ญาตกา. เยสํ เหตูติ เย นิสฺสาย เยสํ การณา. ลภามเสติ ลภาม. อตฺตนา ตงฺขณํ ปฏิลทฺธสมฺปตฺตึ อปทิสนฺตา ภณนฺติ. เปตานญฺหิ อตฺตโน อนุโมทเนน, ทายกานํ อุทฺเทเสน, ทกฺขิเณยฺยสมฺปทาย จาติ ตีหิ องฺเคหิ ทกฺขิณา สมิชฺฌติ, ตงฺขเณ ผลนิพฺพตฺติกา โหติ. ตตฺถ ทายกา วิเสสเหตุ. เตนาหํสุ ‘‘เยสํ เหตุ ลภามเส’’ติ. อมฺหากญฺจ กตา ปูชาติ ‘‘อิทํ โว ญาตีนํ โหตู’’ติ เอวํ อิมํ ทานํ อุทฺทิสนฺเตหิ อมฺหากญฺจ ปูชา กตา. ทายกา จ อนิปฺผลาติ ยมฺหิ สนฺตาเน ปริจฺจาคมยํ กมฺมํ กตํ, ตสฺส ตตฺเถว ผลทานโต ทายกา จ อนิปฺผลาติ. त्यांचा अर्थ असा आहे – 'चिरं जीवन्तु' म्हणजे ते दीर्घायुषी होवोत. 'नो ज्ञाती' म्हणजे आमचे नातेवाईक. 'येसं हेतु' म्हणजे ज्यांच्या आधारे, ज्यांच्यामुळे. 'लभा मसे' म्हणजे आम्हाला प्राप्त होते. स्वतःला त्याच क्षणी मिळालेल्या संपत्तीचा निर्देश करत ते असे म्हणतात. कारण प्रेतांना स्वतःचे अनुमोदन, दान देणाऱ्यांचा उद्देश (संकल्प) आणि सुपात्र दान स्वीकारणारे (दक्खिणेय्य संपदा) या तीन अंगांमुळे दक्षिणा (दान) यशस्वी होते आणि त्याच क्षणी फळ देणारी ठरते. त्यामध्ये दान देणारे हे विशेष कारण असतात. म्हणूनच ते म्हणाले, “येसं हेतु लभामसे” (ज्यांच्यामुळे आम्हाला हे प्राप्त झाले). 'अम्हाकञ्च कता पूजा' म्हणजे “हे दान आमच्या नातेवाईकांना मिळो” अशा प्रकारे हे दान उद्देशून देणाऱ्यांनी आमची देखील पूजा (आदर-सत्कार) केली आहे. 'दायका च अनिप्फला' म्हणजे ज्या चित्तसंततीमध्ये त्यागाचे कर्म केले गेले आहे, त्याला तेथेच फळ मिळत असल्यामुळे दान देणारे देखील निष्फळ ठरत नाहीत, असे जाणावे. เอตฺถาห [Pg.177] – ‘‘กึ ปน เปตฺติวิสยูปปนฺนา เอว ญาตโย ลภนฺติ, อุทาหุ อญฺเญปิ ลภนฺตี’’ติ? วุจฺจเต – ภควตา เอเวตํ พฺยากตํ ชาณุสฺโสณินา พฺราหฺมเณน ปุฏฺเฐน, กิเมตฺถ อมฺเหหิ วตฺตพฺพํ อตฺถิ. วุตฺตํ เหตํ – येथे शंकाकार विचारतो – “काय केवळ प्रेतलोकात उत्पन्न झालेले नातेवाईकच हे दान मिळवतात, की इतरही मिळवतात?” यावर उत्तर दिले जाते – जाणुस्सोणी ब्राह्मणाने “भंते! या बाबतीत आम्ही काय करावे?” असा प्रश्न विचारला असता, भगवंतांनीच याचे स्पष्टीकरण दिले आहे. ते असे सांगितले आहे – ‘‘มยมสฺสุ, โภ โคตม, พฺราหฺมณา นาม ทานานิ เทม, สทฺธานิ กโรม ‘อิทํ ทานํ เปตานํ ญาติสาโลหิตานํ อุปกปฺปตุ, อิทํ ทานํ เปตา ญาติสาโลหิตา ปริภุญฺชนฺตู’ติ, กจฺจิ ตํ, โภ โคตม, ทานํ เปตานํ ญาติสาโลหิตานํ อุปกปฺปติ, กจฺจิ เต เปตา ญาติสาโลหิตา ตํ ทานํ ปริภุญฺชนฺตีติ. ฐาเน โข, พฺราหฺมณ, อุปกปฺปติ, โน อฏฺฐาเนติ. “हे गौतम! आम्ही ब्राह्मण दान देतो, श्राद्ध करतो आणि 'हे दान आमच्या प्रेत झालेल्या नातेवाईकांना मिळो, प्रेत झालेले नातेवाईक या दानाचा उपभोग घेवोत' असा संकल्प करतो. हे गौतम! ते दान प्रेत झालेल्या नातेवाईकांना खरोखर मिळते का? ते प्रेत झालेले नातेवाईक खरोखर त्या दानाचा उपभोग घेतात का?” असे विचारले असता, भगवंत म्हणाले, “हे ब्राह्मणा! योग्य स्थानी (पात्रतेच्या ठिकाणी) असलेल्यांना ते मिळते, अयोग्य स्थानी (अपात्रतेच्या ठिकाणी) असलेल्यांना मिळत नाही.” ‘‘กตมํ ปน ตํ, โภ โคตม, ฐานํ, กตมํ อฏฺฐานนฺติ? อิธ, พฺราหฺมณ, เอกจฺโจ ปาณาติปาตี โหติ…เป… มิจฺฉาทิฏฺฐิโก โหติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา นิรยํ อุปปชฺชติ. โย เนรยิกานํ สตฺตานํ อาหาโร, เตน โส ตตฺถ ยาเปติ, เตน โส ตตฺถ ติฏฺฐติ. อิทํ โข, พฺราหฺมณ, อฏฺฐานํ, ยตฺถ ฐิตสฺส ตํ ทานํ น อุปกปฺปติ. “हे गौतम, मग ते कोणते स्थान (योग्य परिस्थिती) आहे आणि कोणते अस्थान (अयोग्य परिस्थिती) आहे?” “हे ब्राह्मणा, या जगात एखादी व्यक्ती प्राणातिपाती (जीवहिंसा करणारी) असते...पे... मिथ्यादृष्टी (चुकीची धारणा ठेवणारी) असते. ती व्यक्ती शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर) नरकात उत्पन्न होते. नरकातील प्राण्यांचा जो आहार असतो, त्यावर ती तेथे जगते आणि त्यावरच ती तेथे टिकून राहते. हे ब्राह्मणा, हे ते अस्थान (अयोग्य स्थान) आहे, जेथे राहणाऱ्या व्यक्तीला ते दान लाभत नाही (उपयोगाचे ठरत नाही).” ‘‘อิธ ปน, พฺราหฺมณ, เอกจฺโจ ปาณาติปาตี โหติ…เป… มิจฺฉาทิฏฺฐิโก โหติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ติรจฺฉานโยนึ อุปปชฺชติ. โย ติรจฺฉานโยนิกานํ สตฺตานํ อาหาโร, เตน โส ตตฺถ ยาเปติ, เตน โส ตตฺถ ติฏฺฐติ. อิทมฺปิ โข, พฺราหฺมณ, อฏฺฐานํ, ยตฺถ ฐิตสฺส ตํ ทานํ น อุปกปฺปติ. “तसेच हे ब्राह्मणा, या जगात एखादी व्यक्ती प्राणातिपाती असते...पे... मिथ्यादृष्टी असते. ती शरीराच्या भेदानंतर मृत्यूनंतर तिर्यक योनीत (पशू-पक्षांच्या योनीत) उत्पन्न होते. तिर्यक योनीतील प्राण्यांचा जो आहार असतो, त्यावर ती तेथे जगते आणि त्यावरच ती तेथे टिकून राहते. हे ब्राह्मणा, हे देखील ते अस्थान आहे, जेथे राहणाऱ्या व्यक्तीला ते दान लाभत नाही.” ‘‘อิธ ปน, พฺราหฺมณ, เอกจฺโจ ปาณาติปาตา ปฏิวิรโต โหติ…เป… สมฺมาทิฏฺฐิโก โหติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา มนุสฺสานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชติ…เป… เทวานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชติ. โย เทวานํ อาหาโร, เตน โส ตตฺถ ยาเปติ, เตน โส ตตฺถ ติฏฺฐติ. อิทมฺปิ โข, พฺราหฺมณ, อฏฺฐานํ, ยตฺถ ฐิตสฺส ตํ ทานํ น อุปกปฺปติ. “तसेच हे ब्राह्मणा, या जगात एखादी व्यक्ती प्राणातिपातापासून अलिप्त (विरत) असते...पे... सम्यग्दृष्टी असते. ती शरीराच्या भेदानंतर मृत्यूनंतर मनुष्यांच्या सहवासात (मनुष्यलोकात) उत्पन्न होते...पे... देवांच्या सहवासात (देवलोकात) उत्पन्न होते. देवांचा जो आहार असतो, त्यावर ती तेथे जगते आणि त्यावरच ती तेथे टिकून राहते. हे ब्राह्मणा, हे देखील ते अस्थान आहे, जेथे राहणाऱ्या व्यक्तीला ते दान लाभत नाही.” ‘‘อิธ ปน, พฺราหฺมณ, เอกจฺโจ ปาณาติปาตี โหติ…เป… มิจฺฉาทิฏฺฐิโก โหติ, โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา เปตฺติวิสยํ อุปปชฺชติ. โย เปตฺติเวสยิกานํ สตฺตานํ อาหาโร, เตน [Pg.178] โส ตตฺถ ยาเปติ, เตน โส ตตฺถ ติฏฺฐติ. ยํ วา ปนสฺส อิโต อนุปเวจฺฉนฺติ มิตฺตามจฺจา วา ญาติสาโลหิตา วา, เตน โส ตตฺถ ยาเปติ, เตน โส ตตฺถ ติฏฺฐติ. อิทํ โข, พฺราหฺมณ, ฐานํ, ยตฺถ ฐิตสฺส ตํ ทานํ อุปกปฺปตีติ. “परंतु हे ब्राह्मणा, या जगात एखादी व्यक्ती प्राणातिपाती असते...पे... मिथ्यादृष्टी असते. ती शरीराच्या भेदानंतर मृत्यूनंतर प्रेतलोकात (पेत्तिविसय) उत्पन्न होते. प्रेतलोकातील प्राण्यांचा जो आहार असतो, त्यावर ती तेथे जगते आणि त्यावरच ती तेथे टिकून राहते. किंवा मग तिचे जे मित्र, स्नेही किंवा नातेवाईक-सगेसोयरे या जगातून (मनुष्यलोकातून) तिच्या उद्देशाने जे दान देतात, त्यावर ती तेथे जगते आणि त्यावरच ती तेथे टिकून राहते. हे ब्राह्मणा, हे ते स्थान (योग्य स्थान) आहे, जेथे राहणाऱ्या व्यक्तीला ते दान लाभते.” ‘‘สเจ ปน, โภ โคตม, โส เปโต ญาติสาโลหิโต ตํ ฐานํ อนุปปนฺโน โหติ, โก ตํ ทานํ ปริภุญฺชตีติ? อญฺเญปิสฺส, พฺราหฺมณ, เปตา ญาติสาโลหิตา ตํ ฐานํ อุปปนฺนา โหนฺติ, เต ตํ ทานํ ปริภุญฺชนฺตีติ. “पण हे गौतम, जर तो मृत नातेवाईक किंवा सगासोयरा त्या स्थानात (प्रेतलोकात) उत्पन्न झालेला नसेल, तर त्या दानाचा उपभोग कोण घेते?” “हे ब्राह्मणा, त्याचे इतरही मृत नातेवाईक आणि सगेसोयरे त्या स्थानात (प्रेतलोकात) उत्पन्न झालेले असतात, ते त्या दानाचा उपभोग घेतात.” ‘‘สเจ ปน, โภ โคตม, โส เจว เปโต ญาติสาโลหิโต ตํ ฐานํ อนุปปนฺโน โหติ, อญฺเญปิสฺส เปตา ญาติสาโลหิตา ตํ ฐานํ อนุปปนฺนา โหนฺติ, โก ตํ ทานํ ปริภุญฺชตีติ? อฏฺฐานํ โข เอตํ พฺราหฺมณ อนวกาโส, ยํ ตํ ฐานํ วิวิตฺตํ อสฺส อิมินา ทีเฆน อทฺธุนา ยทิทํ เปเตหิ ญาติสาโลหิเตหิ. อปิจ พฺราหฺมณ ทายโกปิ อนิปฺผโล’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๑๗๗). “पण हे गौतम, जर तो मृत नातेवाईक देखील त्या स्थानात उत्पन्न झालेला नसेल आणि त्याचे इतर मृत नातेवाईक व सगेसोयरे देखील त्या स्थानात उत्पन्न झालेले नसतील, तर त्या दानाचा उपभोग कोण घेते?” “हे ब्राह्मणा, या दीर्घ काळात ते स्थान मृत नातेवाईक किंवा सगेसोयऱ्यांशिवाय रिकामे (शून्य) असेल, हे अशक्य आहे, याला कोणताही वाव नाही. शिवाय, हे ब्राह्मणा, दान देणारा देखील निष्फळ ठरत नाही.” ฉฏฺฐคาถาปรทฺธสตฺตมคาถาวณฺณนา सहाव्या गाथेचा उत्तरार्ध आणि सातव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन). ๖-๗. เอวํ ภควา รญฺโญ มาคธสฺส เปตฺติวิสยูปปนฺนานํ ปุพฺพญาตีนํ สมฺปตฺตึ นิสฺสาย โถเมนฺโต ‘‘เอเต เต, มหาราช, ญาตี อิมาย ทานสมฺปทาย อตฺตมนา เอวํ โถเมนฺตี’’ติ ทสฺเสนฺโต – ६-७. अशा प्रकारे भगवान, मगधचा राजा बिंबिसार यांच्या प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्या पूर्व-नातेवाईकांच्या समृद्धीचा (संपत्तीचा) आधार घेऊन त्यांची प्रशंसा करत, “हे महाराजा, तुमचे हे नातेवाईक या दान-संपदेने संतुष्ट होऊन अशी प्रशंसा करत आहेत,” हे दर्शवताना म्हणाले – ‘‘จิรํ ชีวนฺตุ โน ญาตี, เยสํ เหตุ ลภามเส; อมฺหากญฺจ กตา ปูชา, ทายกา จ อนิปฺผลา’’ติ. – “आमचे नातेवाईक दीर्घायुषी होवोत, ज्यांच्यामुळे आम्हाला (हे दान) मिळाले आहे; आमची पूजा (आदर) केली गेली आहे आणि दान देणारे देखील निष्फळ ठरले नाहीत.” วตฺวา ปุน เตสํ เปตฺติวิสยูปปนฺนานํ อญฺญสฺส กสิโครกฺขาทิโน สมฺปตฺติปฏิลาภการณสฺส อภาวํ อิโต ทินฺเนน ยาปนภาวญฺจ ทสฺเสนฺโต ‘‘น หิ ตตฺถ กสี อตฺถี’’ติ ฉฏฺฐคาถาย ปจฺฉิมทฺธํ ‘‘วณิชฺชา ตาทิสี’’ติ อิมํ สตฺตมคาถญฺจ อาห. असे बोलून, पुन्हा त्या प्रेतलोकात उत्पन्न झालेल्या प्राण्यांसाठी शेती, पशुपालन इत्यादींसारख्या संपत्ती मिळवण्याच्या इतर साधनांचा अभाव असल्याचे आणि या जगातून दिलेल्या दानावरच त्यांचे जीवन चालत असल्याचे दर्शवण्यासाठी, “तेथे शेती नाही” अशा सहाव्या गाथेचा उत्तरार्ध आणि “तसा व्यापार नाही” ही सातवी गाथा त्यांनी (भगवंतांनी) सांगितली. ตตฺรายํ อตฺถวณฺณนา – น หิ, มหาราช, ตตฺถ เปตฺติวิสเย กสิ อตฺถิ, ยํ นิสฺสาย เต เปตา สมฺปตฺตึ ปฏิลเภยฺยุํ. โครกฺเขตฺถ น วิชฺชตีติ น เกวลํ กสิ เอว, โครกฺขาปิ เอตฺถ เปตฺติวิสเย น วิชฺชติ, ยํ [Pg.179] นิสฺสาย เต สมฺปตฺตึ ปฏิลเภยฺยุํ. วณิชฺชา ตาทิสี นตฺถีติ วาณิชฺชาปิ ตาทิสี นตฺถิ, ยา เตสํ สมฺปตฺติปฏิลาภเหตุ ภเวยฺย. หิรญฺเญน กยากยนฺติ หิรญฺเญน กยวิกฺกยมฺปิ ตตฺถ ตาทิสํ นตฺถิ, ยํ เตสํ สมฺปตฺติปฏิลาภเหตุ ภเวยฺย. อิโต ทินฺเนน ยาเปนฺติ, เปตา กาลคตา ตหินฺติ เกวลํ ปน อิโต ญาตีหิ วา มิตฺตามจฺเจหิ วา ทินฺเนน ยาเปนฺติ, อตฺตภาวํ คเมนฺติ. เปตาติ เปตฺติวิสยูปปนฺนา สตฺตา. กาลคตาติ อตฺตโน มรณกาเลน คตา, ‘‘กาลกตา’’ติ วา ปาโฐ, กตกาลา กตมรณาติ อตฺโถ. ตหินฺติ ตสฺมึ เปตฺติวิสเย. तेथे हा अर्थ स्पष्ट केला आहे – हे महाराजा, त्या प्रेतलोकात शेती अस्तित्वात नाही, जिचा आधार घेऊन ते प्रेत संपत्ती मिळवू शकतील. ‘गोरक्खेत न विज्जति’ (पशुपालन येथे आढळत नाही) याचा अर्थ केवळ शेतीच नाही, तर त्या प्रेतलोकात पशुपालन देखील अस्तित्वात नाही, जिचा आधार घेऊन ते संपत्ती मिळवू शकतील. ‘वाणिज्जा तादिसी नत्थि’ याचा अर्थ असा की, तेथे तसा व्यापार देखील नाही, जो त्यांच्या संपत्ती प्राप्तीचे कारण ठरेल. ‘हिरञ्ञेन कयाकयं’ याचा अर्थ असा की, तेथे सोन्या-नाण्याने (पैशाने) खरेदी-विक्री देखील अस्तित्वात नाही, जी त्यांच्या संपत्ती प्राप्तीचे कारण ठरेल. ‘इतो दिन्नेन यापेन्ति, पेता कालगता तहिं’ याचा अर्थ असा की, केवळ या जगातून नातेवाईकांनी किंवा मित्र-स्नेह्यांनी दिलेल्या दानावरच ते जगतात, आपले अस्तित्व टिकवून ठेवतात. ‘पेता’ म्हणजे प्रेतलोकात उत्पन्न झालेले प्राणी. ‘कालगता’ म्हणजे आपल्या मृत्यूच्या वेळेनुसार गेलेले; ‘कालकता’ असाही पाठ आढळतो, ज्याचा अर्थ ‘मृत्यू पावलेले’ असा आहे. ‘तहिं’ म्हणजे त्या प्रेतलोकात. อฏฺฐมนวมคาถาทฺวยวณฺณนา आठव्या आणि नवव्या या दोन्ही गाथांचे स्पष्टीकरण (वर्णन). ๘-๙. เอวํ ‘‘อิโต ทินฺเนน ยาเปนฺติ, เปตา กาลคตา ตหิ’’นฺติ วตฺวา อิทานิ อุปมาหิ ตมตฺถํ ปกาเสนฺโต ‘‘อุนฺนเม อุทกํ วุฏฺฐ’’นฺติ อิทํ คาถาทฺวยมาห. ८-९. अशा प्रकारे “या जगातून दिलेल्या दानावरच ते जगतात, जे प्रेत तेथे मृत्यू पावून गेले आहेत” असे सांगून, आता उपमांच्या साहाय्याने तो अर्थ प्रकट करण्यासाठी त्यांनी (भगवंतांनी) “उन्नमे उदकं वुट्ठं” या दोन गाथा सांगितल्या. ตสฺสตฺโถ – ยถา อุนฺนเต ถเล อุสฺสาเท ภูมิภาเค เมเฆหิ อภิวุฏฺฐํ อุทกํ นินฺนํ ปวตฺตติ, โย โย ภูมิภาโค นินฺโน โอณโต, ตํ ตํ ปวตฺตติ คจฺฉติ ปาปุณาติ, เอวเมว อิโต ทินฺนํ ทานํ เปตานํ อุปกปฺปติ นิพฺพตฺตติ, ปาตุภวตีติ อตฺโถ. นินฺนมิว หิ อุทกปฺปวตฺติยา ฐานํ เปตโลโก ทานุปกปฺปนาย. ยถาห – ‘‘อิทํ โข, พฺราหฺมณ, ฐานํ, ยตฺถ ฐิตสฺส ตํ ทานํ อุปกปฺปตี’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๑๗๗). ยถา จ กนฺทรปทรสาขาปสาขกุโสพฺภมหาโสพฺภสนฺนิปาเตหิ วาริวหา มหานชฺโช ปูรา หุตฺวา สาครํ ปริปูเรนฺติ, เอวมฺปิ อิโต ทินฺนทานํ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว เปตานํ อุปกปฺปตีติ. त्याचा अर्थ असा आहे – ज्याप्रमाणे उंच जमिनीवर किंवा कोरड्या भूभागावर ढगांतून बरसलेले पाणी सखल भागाकडे वाहून जाते, जो जो भूभाग सखल आणि खोल असतो, त्या त्या भागाकडे ते पाणी वाहते, जाते आणि पोहोचते; त्याचप्रमाणे या जगातून दिलेले दान प्रेतांना लाभते, फलद्रूप होते आणि प्रकट होते, असा याचा अर्थ आहे. ज्याप्रमाणे सखल भाग हा पाणी वाहून जाण्याचे स्थान आहे, त्याचप्रमाणे प्रेतलोक हा दानाच्या प्राप्तीचे स्थान समजला पाहिजे. जसे भगवंतांनी म्हटले आहे – “हे ब्राह्मणा, हे ते स्थान आहे, जेथे राहणाऱ्या व्यक्तीला ते दान लाभते.” आणि ज्याप्रमाणे डोंगरदऱ्या, ओढे, नाले, लहान-मोठ्या नद्या यांमधून वाहणारे पाणी एकत्र येऊन मोठ्या नद्या पूर्ण भरून समुद्राला भरून टाकतात; त्याचप्रमाणे या जगातून दिलेले दान पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच प्रेतांना लाभते, असा याचा अर्थ आहे. ทสมคาถาวณฺณนา दहाव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वर्णन). ๑๐. เอวํ ภควา ‘‘อิโต ทินฺเนน ยาเปนฺติ, เปตา กาลคตา ตหิ’’นฺติ อิมํ อตฺถํ อุปมาหิ ปกาเสตฺวา ปุน ยสฺมา เต เปตา ‘‘อิโต กิญฺจิ ลจฺฉามา’’ติ อาสาภิภูตา ญาติฆรํ อาคนฺตฺวาปิ ‘‘อิทํ นาม โน เทถา’’ติ ยาจิตุํ อสมตฺถา, ตสฺมา เตสํ อิมานิ อนุสฺสรณวตฺถูนิ อนุสฺสรนฺโต [Pg.180] กุลปุตฺโต ทกฺขิณํ ทชฺชาติ ทสฺเสนฺโต ‘‘อทาสิ เม’’ติ อิมํ คาถมาห. १०. अशा प्रकारे भगवंतांनी “या जगातून दिलेल्या दानावरच ते जगतात, जे प्रेत तेथे मृत्यू पावून गेले आहेत” हा अर्थ उपमांच्या साहाय्याने स्पष्ट करून, पुन्हा ज्या अर्थी ते प्रेत “या जगातून आपल्याला काहीतरी मिळेल” या आशेने व्याकुळ होऊन आपल्या नातेवाईकांच्या घरी येऊन देखील “आम्हाला अमुक गोष्ट द्या” अशी याचना करण्यास असमर्थ असतात; म्हणूनच त्यांच्या जिवंत नातेवाईकांनी या स्मरण करण्यायोग्य गोष्टींचे स्मरण करून कुलपुत्राने (सत्पुत्राने) दान (दक्षिणा) दिले पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी “अदासि मे” ही गाथा त्यांनी (भगवंतांनी) सांगितली. ตสฺสตฺโถ – ‘‘อิทํ นาม เม ธนํ วา ธญฺญํ วา อทาสี’’ติ จ, ‘‘อิทํ นาม เม กิจฺจํ อตฺตนา อุยฺโยคมาปชฺชนฺโต อกาสี’’ติ จ, ‘‘อมุ เม มาติโต วา ปิติโต วา สมฺพนฺธตฺตา ญาตี’’ติ จ สิเนหวเสน ตาณสมตฺถตาย ‘‘มิตฺตา’’ติ จ, ‘‘อสุโก เม สห ปํสุกีฬโก สขา’’ติ จ เอวํ สพฺพมนุสฺสรนฺโต เปตานํ ทกฺขิณํ ทชฺชา, ทานํ นิยฺยาเตยฺยาติ. อปโร ปาโฐ ‘‘เปตานํ ทกฺขิณา ทชฺชา’’ติ. ตสฺสตฺโถ – ทาตพฺพาติ ทชฺชา. กา สา? เปตานํ ทกฺขิณา, เตเนว ‘‘อทาสิ เม’’ติอาทินา นเยน ปุพฺเพ กตมนุสฺสรํ อนุสฺสรตาติ วุตฺตํ โหติ. กรณวจนปฺปสงฺเค ปจฺจตฺตวจนํ เวทิตพฺพํ. त्याचा अर्थ असा समजावा – 'त्याने मला हे धन किंवा धान्य दिले होते' आणि 'त्याने स्वतः प्रयत्न करून माझे हे काम केले होते' आणि 'हा माझ्या आईच्या किंवा वडिलांच्या बाजूने नातेसंबंध असल्यामुळे माझा नातेवाईक (ज्ञाती) आहे' आणि स्नेहामुळे व संरक्षण करण्यास समर्थ असल्यामुळे 'तो माझा मित्र आहे' आणि 'हा अमका माझा लहानपणी धुळीत एकत्र खेळलेला सखा आहे' अशा प्रकारे सर्वांचे स्मरण करत प्रेतांना (मृत पूर्वजांना) दक्षिणा (दान) द्यावी, दान समर्पित करावे. दुसरा पाठ 'पेतानं दक्खिणा दज्जा' असा आहे. त्याचा अर्थ – 'द्यावी' म्हणजे 'दज्जा'. ती कोणती? प्रेतांसाठी दिलेली दक्षिणा. म्हणूनच 'अदासि मे' इत्यादी पद्धतीने 'पूर्वी केलेल्या उपकारांचे वारंवार स्मरण करत' असे म्हटले आहे. तृतीया विभक्तीच्या प्रसंगी प्रथमा विभक्ती समजावी. เอกาทสมคาถาวณฺณนา अकराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๑๑. เอวํ ภควา เปตานํ ทกฺขิณานิยฺยาตเน การณภูตานิ อนุสฺสรณวตฺถูนิ ทสฺเสนฺโต – ११. अशा प्रकारे भगवान प्रेतांना दक्षिणा समर्पित करण्यामागील कारणीभूत असलेल्या स्मरणाच्या विषयांना दर्शविताना – ‘‘อทาสิ เม อกาสิ เม, ญาติมิตฺตา สขา จ เม; เปตานํ ทกฺขิณํ ทชฺชา, ปุพฺเพ กตมนุสฺสร’’นฺติ. – 'त्याने मला दिले, त्याने माझ्यासाठी केले, तो माझा नातेवाईक, मित्र आणि सखा होता; पूर्वी केलेल्या उपकारांचे स्मरण करून प्रेतांना दक्षिणा द्यावी.' วตฺวา ปุน เย ญาติมรเณน รุณฺณโสกาทิปรา เอว หุตฺวา ติฏฺฐนฺติ, น เตสํ อตฺถาย กิญฺจิ เทนฺติ, เตสํ ตํ รุณฺณโสกาทิ เกวลํ อตฺตปริตาปนเมว โหติ, น เปตานํ กิญฺจิ อตฺถํ นิปฺผาเทตีติ ทสฺเสนฺโต ‘‘น หิ รุณฺณํ วา’’ติ อิมํ คาถมาห. असे बोलून, पुन्हा जे लोक नातेवाईकांच्या मृत्यूमुळे केवळ रडणे, शोक करणे इत्यादींमध्येच मग्न राहतात, त्यांच्या कल्याणासाठी काहीही दान करत नाहीत, त्यांचे ते रडणे, शोक करणे इत्यादी केवळ स्वतःलाच त्रास देणारे ठरते, प्रेतांना त्यापासून कोणताही लाभ मिळत नाही, हे दर्शविताना 'न हि रुण्णं वा' ही गाथा म्हणाले. ตตฺถ รุณฺณนฺติ โรทนา โรทิตตฺตํ อสฺสุปาตนํ, เอเตน กายปริสฺสมํ ทสฺเสติ. โสโกติ โสจนา โสจิตตฺตํ, เอเตน จิตฺตปริสฺสมํ ทสฺเสติ. ยา จญฺญาติ ยา จ รุณฺณโสเกหิ อญฺญา. ปริเทวนาติ ญาติพฺยสเนน ผุฏฺฐสฺส ลาลปฺปนา, ‘‘กหํ เอกปุตฺตก ปิย มนาปา’’ติ เอวมาทินา นเยน คุณสํวณฺณนา, เอเตน วจีปริสฺสมํ ทสฺเสติ. तेथे 'रुण्णं' म्हणजे रडणे, रडण्याची क्रिया, अश्रू ढाळणे; याद्वारे शारीरिक कष्ट (कायपरिसम) दर्शवितात. 'सोको' म्हणजे शोक करणे, शोकाकुल अवस्था; याद्वारे मानसिक कष्ट (चित्तपरिसम) दर्शवितात. 'या चञ्ञा' म्हणजे जी रडणे आणि शोकाव्यतिरिक्त इतर आहे. 'परिदेवना' म्हणजे नातेवाईकांच्या विनाशाने (मृत्यूने) ग्रस्त झालेल्या व्यक्तीचे विलाप करणे, जसे की 'माझा एकुलता एक प्रिय व आवडता मुलगा कोठे गेला?' इत्यादी प्रकारे गुणांचे वर्णन करत विलाप करणे; याद्वारे वाणीचे कष्ट (वचीपरिसम) दर्शवितात. ทฺวาทสมคาถาวณฺณนา बाराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๒. เอวํ [Pg.181] ภควา ‘‘รุณฺณํ วา โสโก วา ยา จญฺญา ปริเทวนา, สพฺพมฺปิ ตํ เปตานํ อตฺถาย น โหติ, เกวลนฺตุ อตฺตานํ ปริตาปนมตฺตเมว, เอวํ ติฏฺฐนฺติ ญาตโย’’ติ รุณฺณาทีนํ นิรตฺถกภาวํ ทสฺเสตฺวา ปุน มาคธราเชน ยา ทกฺขิณา ทินฺนา, ตสฺสา สาตฺถกภาวํ ทสฺเสนฺโต ‘‘อยญฺจ โข ทกฺขิณา’’ติ อิมํ คาถมาห. १२. अशा प्रकारे भगवान 'रडणे, शोक किंवा इतर विलाप, हे सर्व प्रेतांच्या कल्याणासाठी होत नाही, तर केवळ स्वतःलाच तापदायक ठरते, नातेवाईक तसेच उभे राहतात (त्यांना काही मिळत नाही)' असे रडणे इत्यादींचे निरर्थकत्व दर्शवून, पुन्हा मगधराज (बिंबिसार) यांनी जे दान दिले होते, त्याचे सार्थकत्व दर्शविताना 'अयञ्च खो दक्खिणा' ही गाथा म्हणाले. ตสฺสตฺโถ – อยญฺจ โข, มหาราช, ทกฺขิณา ตยา อชฺช อตฺตโน ญาติคณํ อุทฺทิสฺส ทินฺนา, สา ยสฺมา สงฺโฆ อนุตฺตรํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ โลกสฺส, ตสฺมา สงฺฆมฺหิ สุปฺปติฏฺฐิตา อสฺส เปตชนสฺส ทีฆรตฺตํ หิตาย อุปกปฺปติ สมฺปชฺชติ ผลตีติ วุตฺตํ โหติ. อุปกปฺปตีติ จ ฐานโส อุปกปฺปติ, ตํขณํเยว อุปกปฺปติ, น จิเรน. ยถา หิ ตํขณญฺเญว ปฏิภนฺตํ ‘‘ฐานโสเวตํ ตถาคตํ ปฏิภาตี’’ติ วุจฺจติ, เอวมิธาปิ ตํขณํเยว อุปกปฺปนฺตา ‘‘ฐานโส อุปกปฺปตี’’ติ วุตฺตา. ยํ วา ตํ ‘‘อิทํ โข, พฺราหฺมณ, ฐานํ, ยตฺถ ฐิตสฺส ตํ ทานํ อุปกปฺปตี’’ติ (อ. นิ. ๑๐.๑๗๗) วุตฺตํ, ตตฺถ ขุปฺปิปาสิกวนฺตาสปรทตฺตูปชีวินิชฺฌามตณฺหิกาทิเภทภินฺเน ฐาเน อุปกปฺปตีติ วุตฺตํ ยถา กหาปณํ เทนฺโต ‘‘กหาปณโส เทตี’’ติ โลเก วุจฺจติ. อิมสฺมิญฺจ อตฺถวิกปฺเป อุปกปฺปตีติ ปาตุภวติ, นิพฺพตฺตตีติ วุตฺตํ โหติ. त्याचा अर्थ असा – 'हे महाराज! ही जी दक्षिणा तुम्ही आज आपल्या नातेवाईकांच्या उद्देशाने दिली आहे, ती संघ हा जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र असल्यामुळे, संघामध्ये चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होऊन त्या प्रेत झालेल्या व्यक्तीला दीर्घकाळापर्यंत हितासाठी उपकारक ठरते, प्राप्त होते, फलदायी होते' असा आहे. 'उपकप्पति' (उपकारक ठरते) म्हणजे तात्काळ (ठाणसो) उपकारक ठरते, त्याच क्षणी प्राप्त होते, विलंबाने नाही. जसे की त्याच क्षणी सुचलेल्या गोष्टीला 'तात्काळ हे तथागतांना सुचले' असे म्हटले जाते, तसेच येथेही त्याच क्षणी प्राप्त होणाऱ्या दानाला 'तात्काळ उपकारक ठरते' असे म्हटले आहे. किंवा जे 'हे ब्राह्मणा! हेच ते स्थान आहे, जेथे राहिलेल्याला ते दान प्राप्त होते' असे म्हटले आहे, तेथे क्षुत्पिपासिक (भूक-तहान लागलेले), वंतास (उलटी खाणारे), परदत्तूपजीवी (दुसऱ्यांनी दिलेल्यावर जगणारे), निज्झामतण्हिक (तृष्णेने जळणारे) इत्यादी भेदांनी युक्त अशा योनीमध्ये (स्थानात) असलेल्या प्रेतांना ते प्राप्त होते, असे म्हटले आहे. जसे की नाणे देताना 'नाण्यांच्या स्वरूपात देतो' असे जगात म्हटले जाते. आणि या अर्थाच्या पर्यायामध्ये 'उपकप्पति' म्हणजे प्रकट होते, निष्पन्न होते, असा अर्थ होतो. เตรสมคาถาวณฺณนา तेराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑๓. เอวํ ภควา รญฺญา ทินฺนาย ทกฺขิณาย สาตฺถกภาวํ ทสฺเสนฺโต – १३. अशा प्रकारे भगवान राजाने दिलेल्या दक्षिणेचे सार्थकत्व दर्शविताना – ‘‘อยญฺจ โข ทกฺขิณา ทินฺนา, สงฺฆมฺหิ สุปฺปติฏฺฐิตา; ทีฆรตฺตํ หิตายสฺส, ฐานโส อุปกปฺปตี’’ติ. – 'आणि ही दिलेली दक्षिणा, संघामध्ये चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होऊन, त्या प्रेताला दीर्घकाळापर्यंत हितासाठी तात्काळ उपकारक ठरते.' วตฺวา ปุน ยสฺมา อิมํ ทกฺขิณํ เทนฺเตน ญาตีนํ ญาตีหิ กตฺตพฺพกิจฺจกรณวเสน ญาติธมฺโม นิทสฺสิโต, พหุชนสฺส ปากฏีกโต, นิทสฺสนํ วา กโต, ตุมฺเหหิปิ ญาตีนํ เอวเมว ญาตีหิ กตฺตพฺพกิจฺจกรณวเสน ญาติธมฺโม ปริปูเรตพฺโพ, น นิรตฺถเกหิ รุณฺณาทีหิ อตฺตา ปริตาเปตพฺโพติ จ เปเต ทิพฺพสมฺปตฺตึ อธิคเมนฺเตน เปตานํ ปูชา กตา อุฬารา, พุทฺธปฺปมุขญฺจ ภิกฺขุสงฺฆํ อนฺนปานาทีหิ สนฺตปฺเปนฺเตน ภิกฺขูนํ พลํ อนุปทินฺนํ, อนุกมฺปาทิคุณปริวารญฺจ จาคเจตนํ นิพฺพตฺเตนฺเตน อนปฺปกํ ปุญฺญํ [Pg.182] ปสุตํ, ตสฺมา ภควา อิเมหิ ยถาภุจฺจคุเณหิ ราชานํ สมฺปหํเสนฺโต – असे बोलून, पुन्हा ज्याअर्थी हे दान देणाऱ्याने नातेवाईकांसाठी नातेवाईकांनी करावयाच्या कर्तव्याच्या रूपाने 'ज्ञातीधर्म' (नातेवाईकांचे कर्तव्य) दर्शविला आहे, बहुसंख्य लोकांसाठी तो प्रकट केला आहे किंवा त्याचे उदाहरण घालून दिले आहे, म्हणून 'तुम्ही सुद्धा नातेवाईकांसाठी अशाच प्रकारे नातेवाईकांनी करावयाच्या कर्तव्याच्या रूपाने ज्ञातीधर्म पूर्ण केला पाहिजे, निरर्थक रडणे इत्यादींनी स्वतःला त्रास करून घेऊ नये' आणि 'त्या प्रेतांना दिव्य संपत्ती प्राप्त करून देण्याच्या इच्छेने प्रेतांची ही मोठी पूजा (आदर) केली आहे, बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला अन्न-पानादींनी तृप्त करून भिक्खूंचे बल वाढवले आहे, आणि अनुकंपा इत्यादी गुणांनी युक्त अशी त्याग-चेतना (चागचेतना) उत्पन्न करून विपुल पुण्य संपादन केले आहे', म्हणून भगवान या यथार्थ गुणांनी राजाची प्रशंसा करत – ‘‘โส ญาติธมฺโม จ อยํ นิทสฺสิโต,เปตาน ปูชา จ กตา อุฬารา; พลญฺจ ภิกฺขูนมนุปฺปทินฺนํ,ตุมฺเหหิ ปุญฺญํ ปสุตํ อนปฺปก’’นฺติ. – 'तो हा ज्ञातीधर्म दर्शविला गेला आहे, प्रेतांची ही मोठी पूजा केली गेली आहे, भिक्खूंचे बल वाढवले गेले आहे आणि तुम्ही विपुल पुण्य संपादन केले आहे.' อิมาย คาถาย เทสนํ ปริโยสาเปติ. या गाथेने उपदेशाची (देसनेची) समाप्ती करतात. อถ วา ‘‘โส ญาติธมฺโม จ อยํ นิทสฺสิโต’’ติ อิมินา คาถาปเทน ภควา ราชานํ ธมฺมิยา กถาย สนฺทสฺเสติ. ญาติธมฺมนิทสฺสนเมว หิ เอตฺถ สนฺทสฺสนํ เปตาน ปูชา จ กตา อุฬาราติ อิมินา สมาทเปติ. อุฬาราติ ปสํสนเมว หิ เอตฺถ ปุนปฺปุนํ ปูชากรเณ สมาทปนํ. พลญฺจ ภิกฺขูนมนุปฺปทินฺนนฺติ อิมินา สมุตฺเตเชติ. พลานุปฺปทานเมว หิ เอตฺถ เอวํ ทานํ, พลานุปฺปทานตาติ ตสฺส อุสฺสาหวฑฺฒเนน สมุตฺเตชนํ. ตุมฺเหหิ ปุญฺญํ ปสุตํ อนปฺปกนฺติ อิมินา สมฺปหํเสติ. ปุญฺญปฺปสุตกิตฺตนเมว หิ เอตฺถ ตสฺส ยถาภุจฺจคุณสํวณฺณนภาเวน สมฺปหํสนชนนโต สมฺปหํสนนฺติ เวทิตพฺพํ. अथवा, 'तो हा ज्ञातीधर्म दर्शविला गेला आहे' या गाथेच्या पदाने भगवान राजाला धम्मकथेने चांगल्या प्रकारे उपदेशित करतात (संदस्सेति). येथे ज्ञातीधर्म दर्शविणे म्हणजेच 'संदस्सन' (चांगल्या प्रकारे दर्शविणे) होय. 'प्रेतांची ही मोठी पूजा केली गेली आहे' याद्वारे ते प्रेरित करतात (समादपेति). येथे 'मोठी' (उळारा) ही केवळ प्रशंसाच आहे, जी वारंवार पूजा करण्यासाठी प्रेरित करणारी (समादपन) आहे. 'भिक्खूंचे बल वाढवले गेले आहे' याद्वारे ते उत्साहित करतात (समुत्तेजेति). येथे अशा प्रकारचे दान देणे म्हणजेच बल प्रदान करणे होय, आणि बल प्रदान करणे हे त्याच्या उत्साहाची वृद्धी करून उत्साहित करणे (समुत्तेजन) आहे. 'तुम्ही विपुल पुण्य संपादन केले आहे' याद्वारे ते अत्यंत आनंदित करतात (सम्पहंसेति). येथे पुण्याच्या संपादनाचे कीर्तन करणे हेच त्याच्या यथार्थ गुणांच्या वर्णनाच्या रूपाने आनंद उत्पन्न करणारे असल्यामुळे 'सम्पहंसन' (अत्यंत आनंदित करणे) समजावे. เทสนาปริโยสาเน จ เปตฺติวิสยูปปตฺติอาทีนวสํวณฺณเนน สํวิคฺคานํ โยนิโส ปทหตํ จตุราสีติยา ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. ทุติยทิวเสปิ ภควา เทวมนุสฺสานํ อิทเมว ติโรกุฏฺฏํ เทเสสิ, เอวํ ยาว สตฺตมทิวสา ตาทิโส เอว ธมฺมาภิสมโย อโหสีติ. आणि उपदेशाच्या शेवटी, प्रेतलोकातील उत्पत्तीच्या दोषांचे (आदीनव) वर्णन ऐकून संविग्न (भयभीत) झालेल्या आणि योग्य प्रकारे (योनिसो) प्रयत्न करणाऱ्या चौऱ्याऐंशी हजार प्राण्यांना धम्माभिसमय (धम्मज्ञान प्राप्ती) झाला. दुसऱ्या दिवशीही भगवंतांनी देव आणि मनुष्यांना हेच तिरोकुट्ट सुत्त उपदेशिले. अशा प्रकारे सातव्या दिवसापर्यंत तशाच प्रकारचा धम्माभिसमय होत राहिला. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील ติโรกุฏฺฏสุตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. तिरोकुट्टसुत्त-वण्णना (स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ๘. นิธิกณฺฑสุตฺตวณฺณนา ८. निधिकण्डसुत्त-वण्णना (स्पष्टीकरण) นิกฺเขปการณํ प्रस्तुत करण्याचे कारण (निक्खेपकारण) อิทานิ ยทิทํ ติโรกุฏฺฏานนฺตรํ ‘‘นิธึ นิเธติ ปุริโส’’ติอาทินา นิธิกณฺฑํ นิกฺขิตฺตํ, ตสฺส – आता, तिरोकुट्ट सुत्तानंतर जे 'निधिं निधेति पुरिसो' इत्यादी शब्दांनी सुरू होणारे निधिकण्ड सुत्त प्रस्तुत केले आहे, त्याचे – ‘‘ภาสิตฺวา [Pg.183] นิธิกณฺฑสฺส, อิธ นิกฺเขปการณํ; อฏฺฐุปฺปตฺติญฺจ ทีเปตฺวา, กริสฺสามตฺถวณฺณนํ’’. 'निधिकण्ड सुत्त येथे प्रस्तुत करण्याचे कारण सांगून आणि त्याची उत्पत्ती (अट्ठुप्पत्ति) दर्शवून, आम्ही त्याच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण (वण्णना) करू.' ตตฺถ อิธ นิกฺเขปการณํ ตาวสฺส เอวํ เวทิตพฺพํ. อิทญฺหิ นิธิกณฺฑํ ภควตา อิมินา อนุกฺกเมน อวุตฺตมฺปิ ยสฺมา อนุโมทนวเสน วุตฺตสฺส ติโรกุฏฺฏสฺส มิถุนภูตํ, ตสฺมา อิธ นิกฺขิตฺตํ. ติโรกุฏฺเฏน วา ปุญฺญวิรหิตานํ วิปตฺตึ ทสฺเสตฺวา อิมินา กตปุญฺญานํ สมฺปตฺติทสฺสนตฺถมฺปิ อิทํ อิธ นิกฺขิตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. อิทมสฺส อิธ นิกฺเขปการณํ. येथे, सर्वप्रथम या (निधिकण्ड सुत्ताच्या) येथे ठेवण्याचे (क्रमबद्ध करण्याचे) कारण अशा प्रकारे समजून घ्यावे. कारण, जरी हे निधिकण्ड सुत्त भगवंतांनी या अनुक्रमाने सांगितले नसले, तरी अनुमोदनाच्या रूपाने सांगितलेल्या 'तिरोकुट्ट सुत्ताचा' हा जोडीदार (प्रतिरूप) असल्यामुळे ते येथे ठेवले गेले आहे. किंवा, तिरोकुट्ट सुत्ताद्वारे पुण्यविरहित लोकांची विपत्ती दाखवून, या सुत्ताद्वारे पुण्यवान लोकांची संपत्ती (समृद्धी) दर्शवण्यासाठी देखील हे येथे ठेवले गेले आहे, असे समजावे. हेच याचे येथे ठेवण्याचे कारण आहे। สุตฺตฏฺฐุปฺปตฺติ सुत्ताच्या उत्पत्तीची पार्श्वभूमी (सुत्त-उत्पत्ती) อฏฺฐุปฺปตฺติ ปนสฺส – สาวตฺถิยํ กิร อญฺญตโร กุฏุมฺพิโก อฑฺโฒ มหทฺธโน มหาโภโค. โส จ สทฺโธ โหติ ปสนฺโน, วิคตมลมจฺเฉเรน เจตสา อคารํ อชฺฌาวสติ. โส เอกสฺมึ ทิวเส พุทฺธปฺปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส ทานํ เทติ. เตน จ สมเยน ราชา ธนตฺถิโก โหติ, โส ตสฺส สนฺติเก ปุริสํ เปเสสิ ‘‘คจฺฉ, ภเณ, อิตฺถนฺนามํ กุฏุมฺพิกํ อาเนหี’’ติ. โส คนฺตฺวา ตํ กุฏุมฺพิกํ อาห ‘‘ราชา ตํ คหปติ อามนฺเตตี’’ติ. กุฏุมฺพิโก สทฺธาทิคุณสมนฺนาคเตน เจตสา พุทฺธปฺปมุขํ ภิกฺขุสงฺฆํ ปริวิสนฺโต อาห ‘‘คจฺฉ, โภ ปุริส, ปจฺฉา อาคมิสฺสามิ, อิทานิ ตาวมฺหิ นิธึ นิเธนฺโต ฐิโต’’ติ. อถ ภควา ภุตฺตาวี ปวาริโต ตเมว ปุญฺญสมฺปทํ ปรมตฺถโต นิธีติ ทสฺเสตุํ ตสฺส กุฏุมฺพิกสฺส อนุโมทนตฺถํ ‘‘นิธึ นิเธติ ปุริโส’’ติ อิมา คาถาโย อภาสิ. อยมสฺส อฏฺฐุปฺปตฺติ. या सुत्ताची उत्पत्ती (पार्श्वभूमी) अशी आहे – असे ऐकिवात आहे की, श्रावस्तीमध्ये एक श्रीमंत, महाधनी आणि महाभोगी गृहस्थ राहत होता. तो श्रद्धावान आणि प्रसन्न चित्ताचा होता, आणि लोभ व मत्सराचा मळ दूर करून उदार अंतःकरणाने गृहस्थाश्रम चालवत असे. एका दिवशी त्याने बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला दान दिले. त्याच वेळी राजाला (कोसल राजाला) धनाची आवश्यकता भासली. त्याने त्या गृहस्थाकडे एका माणसाला पाठवले आणि सांगितले, 'अरे माणसा, जा आणि अमुक नावाच्या गृहस्थाला घेऊन ये।' तो माणूस तिथे गेला आणि त्या गृहस्थाला म्हणाला, 'गृहपती, राजा तुम्हाला बोलवत आहे।' तो गृहस्थ श्रद्धा इत्यादी गुणांनी युक्त अशा चित्ताने बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला भोजन वाढण्यात (सेवा करण्यात) मग्न होता. तो म्हणाला, 'हे भल्या माणसा, तू जा, मी नंतर येईन. सध्या मी एक मोठा ठेवा (निधी) ठेवण्यात व्यस्त आहे।' त्यानंतर, भगवंतांनी भोजन ग्रहण केल्यानंतर आणि भोजन समाप्त झाल्यावर, त्या गृहस्थाच्या अनुमोदनासाठी, तीच पुण्यसंपदा हीच परमार्थतः खरी 'निधी' (ठेवा) आहे हे दर्शवण्यासाठी 'निधिं निधेति पुरिसो' (माणूस ठेवा ठेवतो) इत्यादी गाथा म्हटल्या. ही या सुत्ताची उत्पत्ती आहे। เอวมสฺส – या प्रकारे याचे – ‘‘ภาสิตฺวา นิธิกณฺฑสฺส, อิธ นิกฺเขปการณํ; อฏฺฐุปฺปตฺติญฺจ ทีเปตฺวา, กริสฺสามตฺถวณฺณนํ’’. “निधिकण्ड सुत्ताचे येथे ठेवण्याचे कारण सांगून आणि त्याची उत्पत्ती स्पष्ट करून, आता आम्ही अर्थाचे स्पष्टीकरण (अर्थवर्णन) करू.” ปฐมคาถาวณฺณนา पहिल्या गाथेचे स्पष्टीकरण (प्रथम गाथा वर्णन) ๑. ตตฺถ นิธึ นิเธติ ปุริโสติ นิธียตีติ นิธิ, ฐปียติ รกฺขียติ โคปียตีติ อตฺโถ. โส จตุพฺพิโธ ถาวโร, ชงฺคโม, องฺคสโม, อนุคามิโกติ. ตตฺถ ถาวโร นาม ภูมิคตํ วา เวหาสฏฺฐํ วา หิรญฺญํ วา [Pg.184] สุวณฺณํ วา เขตฺตํ วา วตฺถุ วา, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ เอวรูปํ อิริยาปถวิรหิตํ, อยํ ถาวโร นิธิ. ชงฺคโม นาม ทาสิทาสํ หตฺถิควสฺสวฬวํ อเชฬกํ กุกฺกุฏสูกรํ ยํ วา ปนญฺญมฺปิ เอวรูปํ อิริยาปถปฏิสํยุตฺตํ. อยํ ชงฺคโม นิธิ องฺคสโม นาม กมฺมายตนํ, สิปฺปายตนํ, วิชฺชาฏฺฐานํ, พาหุสจฺจํ, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ เอวรูปํ สิกฺขิตฺวา คหิตํ องฺคปจฺจงฺคมิว อตฺตภาวปฺปฏิพทฺธํ, อยํ องฺคสโม นิธิ. อนุคามิโก นาม ทานมยํ ปุญฺญํ สีลมยํ ภาวนามยํ ธมฺมสฺสวนมยํ ธมฺมเทสนามยํ, ยํ วา ปนญฺญมฺปิ เอวรูปํ ปุญฺญํ ตตฺถ ตตฺถ อนุคนฺตฺวา วิย อิฏฺฐผลมนุปฺปเทติ, อยํ อนุคามิโก นิธิ. อิมสฺมึ ปน ฐาเน ถาวโร อธิปฺเปโต. १. त्यात, 'निधिं निधेति पुरिसो' (माणूस ठेवा ठेवतो) या वाक्यात – जो साठवला जातो तो 'निधी' (ठेवा) होय. तो ठेवला जातो, त्याचे रक्षण केले जाते आणि तो सुरक्षित राखला जातो, असा याचा अर्थ आहे. तो (निधी) चार प्रकारचा असतो: स्थावर (अचल), जंगम (चल), अंगसम (शरीराच्या अवयवांसारखा) आणि अनुगामी (सोबत जाणारा). त्यापैकी, 'स्थावर' म्हणजे जमिनीत पुरलेले किंवा वर (इमारती इत्यादींमध्ये) ठेवलेले चांदी-नाणे, सोने, शेत, जमीन किंवा यांसारखी इतर कोणतीही हालचाल न करणारी (अचेतन) संपत्ती; हा 'स्थावर निधी' होय. 'जंगम' म्हणजे दासी-दास, हत्ती, गायी, घोडे, घोडी, शेळ्या-मेंढ्या, कोंबड्या-डुकरे किंवा यांसारखी हालचाल करणारी (सचेतन) संपत्ती; हा 'जंगम निधी' होय. 'अंगसम' म्हणजे कर्म-कौशल्य (काम करण्याचे कौशल्य), शिल्प-कौशल्य (कला), विद्यास्थान (ज्ञान), बहुश्रुतता (विद्वत्ता) किंवा यांसारखी शिकून आत्मसात केलेली कोणतीही गोष्ट, जी एखाद्याच्या शरीराच्या लहान-मोठ्या अवयवांप्रमाणे स्वतःच्या अस्तित्वाशी जोडलेली असते; हा 'अंगसम निधी' होय. 'अनुगामी' म्हणजे दानमय पुण्य, शीलमय पुण्य, भावनामय (ध्यानमय) पुण्य, धम्मश्रवणमय (धम्म ऐकणे) पुण्य, धम्मदेशनामय (धम्म शिकवणे) पुण्य किंवा यांसारखे इतर कोणतेही पुण्य, जे त्या त्या जन्मात सोबत जाऊन इच्छित फळ प्रदान करते; हा 'अनुगामी निधी' होय. परंतु, या ठिकाणी 'स्थावर निधी' अभिप्रेत आहे। นิเธตีติ ฐเปติ ปฏิสาเมติ โคเปติ. ปุริโสติ มนุสฺโส. กามญฺจ ปุริโสปิ อิตฺถีปิ ปณฺฑโกปิ นิธึ นิเธติ, อิธ ปน ปุริสสีเสน เทสนา กตา, อตฺถโต ปน เตสมฺปิ อิธ สโมธานํ ทฏฺฐพฺพํ. คมฺภีเร โอทกนฺติเกติ โอคาเหตพฺพฏฺเฐน คมฺภีรํ, อุทกสฺส อนฺติกภาเวน โอทกนฺติกํ. อตฺถิ คมฺภีรํ น โอทกนฺติกํ ชงฺคเล ภูมิภาเค สติกโปริโส อาวาโฏ วิย, อตฺถิ โอทกนฺติกํ น คมฺภีรํ นินฺเน ปลฺลเล เอกทฺวิวิทตฺถิโก อาวาโฏ วิย, อตฺถิ คมฺภีรญฺเจว โอทกนฺติกญฺจ ชงฺคเล ภูมิภาเค ยาว อิทานิ อุทกํ อาคมิสฺสตีติ, ตาว ขโต อาวาโฏ วิย. ตํ สนฺธาย อิทํ วุตฺตํ ‘‘คมฺภีเร โอทกนฺติเก’’ติ. อตฺเถ กิจฺเจ สมุปฺปนฺเนติ อตฺถา อนเปตนฺติ อตฺถํ, อตฺถาวหํ หิตาวหนฺติ วุตฺตํ โหติ. กาตพฺพนฺติ กิจฺจํ, กิญฺจิเทว กรณียนฺติ วุตฺตํ โหติ. อุปฺปนฺนํ เอว สมุปฺปนฺนํ, กตฺตพฺพภาเวน อุปฏฺฐิตนฺติ วุตฺตํ โหติ. ตสฺมึ อตฺเถ กิจฺเจ สมุปฺปนฺเน. อตฺถาย เม ภวิสฺสตีติ นิธานปฺปโยชนนิทสฺสนเมตํ. เอตทตฺถญฺหิ โส นิเธติ ‘‘อตฺถาวเห กิสฺมิญฺจิเทว กรณีเย สมุปฺปนฺเน อตฺถาย เม ภวิสฺสติ, ตสฺส เม กิจฺจสฺส นิปฺผตฺติยา ภวิสฺสตี’’ติ. กิจฺจนิปฺผตฺติเยว หิ ตสฺส กิจฺเจ สมุปฺปนฺเน อตฺโถติ เวทิตพฺโพ. 'निधेति' म्हणजे ठेवतो, साठवतो, रक्षण करतो. 'पुरिसो' म्हणजे मनुष्य. जरी पुरुष, स्त्री किंवा नपुंसक देखील ठेवा ठेवतात, तरी येथे 'पुरुष' या शब्दाला मुख्य मानून उपदेश केला आहे; परंतु अर्थाच्या दृष्टीने त्या सर्वांचाच येथे समावेश समजावा. 'गम्भीरे ओदकन्तिके' म्हणजे खोलवर जावे लागते म्हणून 'गंभीर' (खोल), आणि पाण्याच्या जवळ असल्यामुळे 'ओदकन्तिक' (जलमय/पाण्याजवळ). काही ठिकाणी खोल असते पण पाण्याचा जवळ नसते, जसे की कोरड्या उंचावरील जमिनीत माणसाच्या उंचीपेक्षा जास्त खोल खणलेला खड्डा; काही ठिकाणी पाण्याच्या जवळ असते पण खोल नसते, जसे की सखल दलदलीच्या भागात एक किंवा दोन वीत खोल असलेला खड्डा; आणि काही ठिकाणी खोलही असते आणि पाण्याच्या जवळही असते, जसे की कोरड्या जमिनीत पाणी लागेपर्यंत खणलेला खड्डा. त्याला उद्देशूनच 'गम्भीरे ओदकन्तिके' (खोल आणि पाण्याच्या जवळ) असे म्हटले आहे. 'अत्थे किच्चे समुप्पन्ने' यामध्ये 'अत्थ' म्हणजे कल्याणापासून दूर न जाणारे, म्हणजेच कल्याण करणारे, हित करणारे. 'किच्चं' म्हणजे जे केले पाहिजे, म्हणजेच कोणतेही कर्तव्य किंवा कार्य. 'समुप्पन्नं' म्हणजे उत्पन्न झालेले, म्हणजेच कर्तव्य म्हणून समोर आलेले कार्य. अशा प्रकारे, ते हित किंवा कर्तव्य उत्पन्न झाले असता. 'अत्थाय मे भविस्सति' (ते माझ्या हितासाठी होईल) हे ठेवा ठेवण्याच्या प्रयोजनाचे (उद्देशाचे) दर्शन आहे. कारण या उद्देशानेच तो ठेवा ठेवतो की, 'जेव्हा एखादे हितकारक कार्य समोर येईल, तेव्हा ते माझ्या हितासाठी होईल, माझ्या त्या कार्याच्या पूर्ततेसाठी होईल.' कारण कार्य उत्पन्न झाले असता, त्या कार्याची पूर्तता होणे हेच त्याचे हित आहे, असे समजावे। ทุติยคาถาวณฺณนา दुसऱ्या गाथेचे स्पष्टीकरण (द्वितीय गाथा वर्णन) เอวํ นิธานปฺปโยชนํ ทสฺเสนฺโต อตฺถาธิคมาธิปฺปายํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อนตฺถาปคมาธิปฺปายํ ทสฺเสตุมาห – अशा प्रकारे ठेवा ठेवण्याचे प्रयोजन दर्शवताना, हिताच्या प्राप्तीचा हेतू दाखवून, आता अनिष्टाचे (नुकसानीचे) निवारण करण्याचा हेतू दर्शवण्यासाठी (भगवंत) म्हणाले – ๒. ‘‘ราชโต [Pg.185] วา ทุรุตฺตสฺส, โจรโต ปีฬิตสฺส วา. २. “राजाकडून त्रास दिला गेल्यास, किंवा चोराकडून पीडित केल्यास,” อิณสฺส วา ปโมกฺขาย, ทุพฺภิกฺเข อาปทาสุ วา’’ติ. “कर्जातून मुक्त होण्यासाठी, दुष्काळात किंवा आपत्तीच्या वेळी (हा ठेवा उपयोगी पडेल)।” ตสฺสตฺโถ ‘‘อตฺถาย เม ภวิสฺสตี’’ติ จ ‘‘อิณสฺส วา ปโมกฺขายา’’ติ จ เอตฺถ วุตฺเตหิ ทฺวีหิ ภวิสฺสติปโมกฺขาย-ปเทหิ สทฺธึ ยถาสมฺภวํ โยเชตฺวา เวทิตพฺโพ. याचा अर्थ 'माझ्या हितासाठी होईल' आणि 'कर्जातून मुक्त होण्यासाठी' या येथे सांगितलेल्या दोन पदांना 'भविस्सति' (होईल) आणि 'पमोक्खाय' (मुक्त होण्यासाठी) या शब्दांशी योग्यतेनुसार जोडून समजून घ्यावा। ตตฺถายํ โยชนา – น เกวลํ อตฺถาย เม ภวิสฺสตีติ เอว ปุริโส นิธึ นิเธติ, กินฺตุ ‘‘อยํ โจโร’’ติ วา ‘‘ปารทาริโก’’ติ วา ‘‘สุงฺกฆาตโก’’ติ วา เอวมาทินา นเยน ปจฺจตฺถิเกหิ ปจฺจามิตฺเตหิ ทุรุตฺตสฺส เม สโต ราชโต วา ปโมกฺขาย ภวิสฺสติ, สนฺธิจฺเฉทาทีหิ ธนหรเณน วา, ‘‘เอตฺตกํ หิรญฺญสุวณฺณํ เทหี’’ติ ชีวคฺคาเหน วา โจเรหิ เม ปีฬิตสฺส สโต โจรโต วา ปโมกฺขาย ภวิสฺสติ. สนฺติ เม อิณายิกา, เต มํ ‘‘อิณํ เทหี’’ติ โจเทสฺสนฺติ, เตหิ เม โจทิยมานสฺส อิณสฺส วา ปโมกฺขาย ภวิสฺสติ. โหติ โส สมโย, ยํ ทุพฺภิกฺขํ โหติ ทุสฺสสฺสํ ทุลฺลภปิณฺฑํ, ตตฺถ น สุกรํ อปฺปธเนน ยาเปตุํ, ตถาวิเธ อาคเต ทุพฺภิกฺเข วา เม ภวิสฺสติ. ยถารูปา อาปทา อุปฺปชฺชนฺติ อคฺคิโต วา อุทกโต วา อปฺปิยทายาทโต วา, ตถารูปาสุ วา อุปฺปนฺนาสุ อาปทาสุ เม ภวิสฺสตีติปิ ปุริโส นิธึ นิเธตีติ. येथे संबंध असा आहे – माणूस केवळ 'हे माझ्या हितासाठी होईल' याच विचाराने ठेवा ठेवत नाही, तर 'हा चोर आहे', 'हा परस्त्रीगामी आहे' किंवा 'हा कर चुकवणारा आहे' इत्यादी प्रकारे शत्रूंनी किंवा विरोधकांनी खोटा आरोप केला असता, राजाच्या दंडापासून मुक्त होण्यासाठी तो उपयोगी पडेल; किंवा घरफोडी इत्यादी करून धन चोरणाऱ्या, किंवा 'एवढे सोने-चांदी दे' असे म्हणून जिवंत पकडणाऱ्या चोरांकडून छळ केला जात असताना, चोरांच्या तावडीतून सुटण्यासाठी तो उपयोगी पडेल; किंवा माझे जे धनको (कर्जदार/ऋणदाते) आहेत, ते जेव्हा 'कर्ज परत कर' म्हणून तगादा लावतील, तेव्हा त्यांच्या तगाद्यापासून आणि कर्जातून मुक्त होण्यासाठी तो उपयोगी पडेल; किंवा असा वेळ येतो जेव्हा दुष्काळ पडतो, धान्य पिकत नाही आणि अन्न मिळणे कठीण होते, अशा वेळी थोड्या धनाने जगणे सोपे नसते, अशा प्रकारचा दुष्काळ आला असता तो माझ्या उपयोगाला येईल; किंवा आग, पूर (पाणी) किंवा अप्रिय वारसदार यांच्यामुळे ज्या काही आपत्ती ओढवतात, अशा आपत्ती आल्या असता तो माझ्या हितासाठी होईल, या विचाराने देखील माणूस ठेवा (निधी) ठेवत असतो। เอวํ อตฺถาธิคมาธิปฺปายํ อนตฺถาปคมาธิปฺปายญฺจาติ ทฺวีหิ คาถาหิ ทุวิธํ นิธานปฺปโยชนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตเมว ทุวิธํ ปโยชนํ นิคเมนฺโต อาห – अशा प्रकारे, हिताची प्राप्ती आणि अनिष्टाचे निवारण या दोन गाथांद्वारे ठेवा ठेवण्याचे द्विविध प्रयोजन दर्शवून, आता त्याच द्विविध प्रयोजनाचा उपसंहार (निष्कर्ष) करताना (भगवंत) म्हणाले – ‘‘เอตทตฺถาย โลกสฺมึ, นิธิ นาม นิธียตี’’ติ. याच हेतूसाठी जगात 'निधी' (ठेवा) ठेवला जातो, असे (भगवंतांनी) म्हटले. ตสฺสตฺโถ – ยฺวายํ ‘‘อตฺถาย เม ภวิสฺสตี’’ติ จ ‘‘ราชโต วา ทุรุตฺตสฺสา’’ติ เอวมาทีหิ จ อตฺถาธิคโม อนตฺถาปคโม จ ทสฺสิโต. เอตทตฺถาย เอเตสํ นิปฺผาทนตฺถาย อิมสฺมึ โอกาสโลเก โย โกจิ หิรญฺญสุวณฺณาทิเภโท นิธิ นาม นิธียติ ฐปียติ ปฏิสามียตีติ. त्याचा अर्थ असा समजावा – 'हा माझ्या उपयोगासाठी होईल' आणि 'राजाच्या अन्यायापासून वाचण्यासाठी' इत्यादींद्वारे जो हितप्राप्ती आणि अनर्थाचे निवारण दाखवले आहे, याच हेतूसाठी, हे साध्य करण्यासाठी, या ओकासलोकात (भौतिक जगात) कोणीही व्यक्ती सोने, चांदी इत्यादी स्वरूपातील 'निधी' नावाचा ठेवा पुरून ठेवते, स्थापित करते किंवा सुरक्षित ठेवते. ตติยคาถาวณฺณนา तिसऱ्या गाथेचे स्पष्टीकरण. อิทานิ [Pg.186] ยสฺมา เอวํ นิหิโตปิ โส นิธิ ปุญฺญวตํเยว อธิปฺเปตตฺถสาธโก โหติ, น อญฺเญสํ, ตสฺมา ตมตฺถํ ทีเปนฺโต อาห – आता, ज्याअर्थी अशा प्रकारे पुरून ठेवलेला तो ठेवा केवळ पुण्यवान व्यक्तींच्याच इच्छित हेतूंना पूर्ण करणारा ठरतो, इतरांच्या नाही; म्हणून तोच अर्थ स्पष्ट करताना (भगवंतांनी) म्हटले – ๓. ‘‘ตาวสฺสุนิหิโต สนฺโต, คมฺภีเร โอทกนฺติเก. ३. जरी तो खोलवर, पाण्याच्या पातळीजवळ चांगल्या प्रकारे पुरून ठेवलेला असला, น สพฺโพ สพฺพทา เอว, ตสฺส ตํ อุปกปฺปตี’’ติ. तरी तो सर्व ठेवा सर्वकाळ त्याच्या उपयोगास पडत नाही. ตสฺสตฺโถ – โส นิธิ ตาว สุนิหิโต สนฺโต, ตาว สุฏฺฐุ นิขณิตฺวา ฐปิโต สมาโนติ วุตฺตํ โหติ. กีว สุฏฺฐูติ? คมฺภีเร โอทกนฺติเก, ยาว คมฺภีเร โอทกนฺติเก นิหิโตติ สงฺขํ คจฺฉติ, ตาว สุฏฺฐูติ วุตฺตํ โหติ. น สพฺโพ สพฺพทา เอว, ตสฺส ตํ อุปกปฺปตีติ เยน ปุริเสน นิหิโต, ตสฺส สพฺโพปิ สพฺพกาลํ น อุปกปฺปติ น สมฺปชฺชติ, ยถาวุตฺตกิจฺจกรณสมตฺโถ น โหตีติ วุตฺตํ โหติ. กินฺตุ โกจิเทว กทาจิเทว อุปกปฺปติ, เนว วา อุปกปฺปตีติ. เอตฺถ จ นฺติ ปทปูรณมตฺเต นิปาโต ทฏฺฐพฺโพ ‘‘ยถา ตํ อปฺปมตฺตสฺส อาตาปิโน’’ติ เอวมาทีสุ (ม. นิ. ๒.๑๘-๑๙; ๓.๑๕๔) วิย. ลิงฺคเภทํ วา กตฺวา ‘‘โส’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘ต’’นฺติ วุตฺตํ. เอวํ หิ วุจฺจมาเน โส อตฺโถ สุขํ พุชฺฌตีติ. त्याचा अर्थ असा समजावा – तो ठेवा 'चांगल्या प्रकारे पुरून ठेवलेला' (सुनिहितो संतो) म्हणजेच अतिशय खोलवर पुरून ठेवलेला असतो. किती चांगल्या प्रकारे? 'गंभीरे उदकंतिके' म्हणजे पाण्याच्या पातळीजवळ जितक्या खोलवर पुरता येईल तितक्या खोलवर पुरलेला असतो, त्यालाच 'चांगल्या प्रकारे' पुरलेला म्हटले आहे. 'न सब्बो सब्बदा एव, तस्स तं उपकप्पति' म्हणजे ज्या माणसाने तो पुरला आहे, त्याला तो संपूर्ण ठेवा सर्वकाळ उपयोगास पडत नाही किंवा प्राप्त होत नाही, म्हणजेच वर सांगितलेली कामे पूर्ण करण्यास तो समर्थ ठरत नाही. उलट, एखादाच ठेवा कधीतरी उपयोगास पडतो किंवा मुळीच उपयोगास पडत नाही. आणि येथे 'तं' हा शब्द केवळ पादपूर्तीसाठी (वाक्य पूर्ण करण्यासाठी) आलेला निपात समजावा, जसे की 'यथा तं अप्पमत्तस्स आतापिनो' इत्यादी वाक्यांमध्ये आढळतो. किंवा लिंगभेद करून 'सो' म्हणण्याऐवजी 'तं' असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे म्हटले असता तो अर्थ सहज समजतो. จตุตฺถปญฺจมคาถาวณฺณนา चौथ्या आणि पाचव्या गाथेचे स्पष्टीकरण. เอวํ ‘‘น สพฺโพ สพฺพทา เอว, ตสฺส ตํ อุปกปฺปตี’’ติ วตฺวา อิทานิ เยหิ การเณหิ น อุปกปฺปติ, ตานิ ทสฺเสนฺโต อาห – अशा प्रकारे 'तो सर्व ठेवा सर्वकाळ त्याच्या उपयोगास पडत नाही' असे सांगून, आता तो कोणत्या कारणांमुळे उपयोगास पडत नाही, ती कारणे दर्शवताना (भगवंतांनी) म्हटले – ๔. ‘‘นิธิ วา ฐานา จวติ, สญฺญา วาสฺส วิมุยฺหติ. ४. एकतर तो ठेवा आपल्या जागेवरून सरकतो, किंवा त्याची स्मृती भ्रष्ट होते (तो जागा विसरतो), นาคา วา อปนาเมนฺติ, ยสฺมา วาปิ หรนฺติ นํ. किंवा नाग त्याला दूर हलवतात, किंवा यक्ष त्याला पळवून नेतात, ๕. ‘‘อปฺปิยา วาปิ ทายาทา, อุทฺธรนฺติ อปสฺสโต’’ติ. ५. किंवा त्याचे अप्रिय वारसदार तो पाहत नसताना तो खोदून काढून घेतात. ตสฺสตฺโถ – ยสฺมึ ฐาเน สุนิหิโต โหติ นิธิ, โส วา นิธิ ตมฺหา ฐานา จวติ อเปติ วิคจฺฉติ, อเจตโนปิ สมาโน ปุญฺญกฺขยวเสน อญฺญํ ฐานํ คจฺฉติ. สญฺญา วา อสฺส วิมุยฺหติ, ยสฺมึ ฐาเน นิหิโต นิธิ, ตํ น ชานาติ, อสฺส ปุญฺญกฺขยโจทิตา นาคา วา ตํ นิธึ อปนาเมนฺติ อญฺญํ ฐานํ คเมนฺติ. ยกฺขา วาปิ หรนฺติ เยนิจฺฉกํ อาทาย [Pg.187] คจฺฉนฺติ. อปสฺสโต วา อสฺส อปฺปิยา วา ทายาทา ภูมึ ขณิตฺวา ตํ นิธึ อุทฺธรนฺติ. เอวมสฺส เอเตหิ ฐานา จวนาทีหิ การเณหิ โส นิธิ น อุปกปฺปตีติ. त्याचा अर्थ असा समजावा – ज्या ठिकाणी तो ठेवा चांगल्या प्रकारे पुरून ठेवलेला असतो, तो ठेवा त्या जागेवरून सरकतो, दूर होतो किंवा नाहीसा होतो; अचेतन (निर्जीव) असूनही पुण्याच्या क्षयामुळे तो दुसऱ्या ठिकाणी निघून जातो. किंवा त्याची स्मृती भ्रष्ट होते, म्हणजेच ज्या ठिकाणी ठेवा पुरला आहे ती जागा त्याला आठवत नाही. किंवा त्याच्या पुण्याच्या क्षयामुळे प्रेरित होऊन नाग तो ठेवा तिथून हलवून दुसऱ्या ठिकाणी घेऊन जातात. किंवा यक्ष त्याला उचलून आपल्या इच्छेनुसार घेऊन जातात. किंवा तो पाहत नसताना त्याचे अप्रिय वारसदार जमीन खोदून तो ठेवा काढून घेतात. अशा प्रकारे, जागेवरून सरकणे इत्यादी कारणांमुळे तो ठेवा त्याच्या उपयोगास पडत नाही. เอวํ ฐานา จวนาทีนิ โลกสมฺมตานิ อนุปกปฺปนการณานิ วตฺวา อิทานิ ยํ ตํ เอเตสมฺปิ การณานํ มูลภูตํ เอกญฺเญว ปุญฺญกฺขยสญฺญิตํ การณํ, ตํ ทสฺเสนฺโต อาห – अशा प्रकारे जागेवरून सरकणे इत्यादी लोकमान्य अनुपयुक्ततेची कारणे सांगून, आता या सर्व कारणांचे मूळ असलेले आणि 'पुण्यक्षय' म्हणून ओळखले जाणारे एकमेव मुख्य कारण दर्शवताना (भगवंतांनी) म्हटले – ‘‘ยทา ปุญฺญกฺขโย โหติ, สพฺพเมตํ วินสฺสตี’’ติ. जेव्हा पुण्याचा क्षय होतो, तेव्हा हे सर्व नष्ट होते. ตสฺสตฺโถ – ยสฺมึ สมเย โภคสมฺปตฺตินิปฺผาทกสฺส ปุญฺญสฺส ขโย โหติ, โภคปาริชุญฺญสํวตฺตนิกมปุญฺญโมกาสํ กตฺวา ฐิตํ โหติ, อถ ยํ นิธึ นิเธนฺเตน นิหิตํ หิรญฺญสุวณฺณาทิธนชาตํ, สพฺพเมตํ วินสฺสตีติ. त्याचा अर्थ असा समजावा – ज्या वेळी भोग-संपत्ती निर्माण करणाऱ्या पुण्याचा क्षय होतो आणि संपत्तीचा नाश करणाऱ्या अपुण्याला (पापाला) संधी मिळून ते सक्रिय होते, तेव्हा ठेवा पुरणाऱ्या माणसाने पुरून ठेवलेले सोने, चांदी इत्यादी सर्व प्रकारचे धन नष्ट होते. ฉฏฺฐคาถาวณฺณนา सहाव्या गाथेचे स्पष्टीकरण. เอวํ ภควา เตน เตน อธิปฺปาเยน นิหิตมฺปิ ยถาธิปฺปายํ อนุปกปฺปนฺตํ นานปฺปกาเรหิ นสฺสนธมฺมํ โลกสมฺมตํ นิธึ วตฺวา อิทานิ ยํ ปุญฺญสมฺปทํ ปรมตฺถโต นิธีติ ทสฺเสตุํ ตสฺส กุฏุมฺพิกสฺส อนุโมทนตฺถมิทํ นิธิกณฺฑมารทฺธํ, ตํ ทสฺเสนฺโต อาห – अशा प्रकारे भगवंतांनी वेगवेगळ्या हेतूंनी पुरून ठेवलेल्या, परंतु इच्छेनुसार उपयोगास न पडणाऱ्या आणि विविध प्रकारे नष्ट होणाऱ्या लोकमान्य ठेव्याविषयी सांगून; आता परमार्थतः (खऱ्या अर्थाने) 'पुण्यसंपत्ती' हाच ठेवा आहे हे दर्शवण्यासाठी आणि त्या गृहपतीच्या (कुटुंबिकाच्या) अनुमोदनासाठी हे 'निधिकण्ड' सुरू केले. ते दर्शवताना (भगवंतांनी) म्हटले – ๖. ‘‘ยสฺส ทาเนน สีเลน, สํยเมน ทเมน จ. ६. ज्या स्त्री किंवा पुरुषाने दान, शील, संयम आणि दम (इंद्रियनिग्रह) यांच्याद्वारे, นิธี สุนิหิโต โหติ, อิตฺถิยา ปุริสสฺส วา’’ติ. आपला ठेवा चांगल्या प्रकारे सुरक्षित ठेवला आहे. ตตฺถ ทานนฺติ ‘‘ทานญฺจ ธมฺมจริยา จา’’ติ เอตฺถ วุตฺตนเยเนว คเหตพฺพํ. สีลนฺติ กายิกวาจสิโก อวีติกฺกโม. ปญฺจงฺคทสงฺคปาติโมกฺขสํวราทิ วา สพฺพมฺปิ สีลํ อิธ สีลนฺติ อธิปฺเปตํ. สํยโมติ สํยมนํ สํยโม, เจตโส นานารมฺมณคตินิวารณนฺติ วุตฺตํ โหติ, สมาธิสฺเสตํ อธิวจนํ. เยน สํยเมน สมนฺนาคโต ‘‘หตฺถสํยโต, ปาทสํยโต, วาจาสํยโต, สํยตุตฺตโม’’ติ เอตฺถ สํยตุตฺตโมติ วุตฺโต. อปเร อาหุ ‘‘สํยมนํ สํยโม, สํวรณนฺติ วุตฺตํ โหติ, อินฺทฺริยสํวรสฺเสตํ อธิวจน’’นฺติ. ทโมติ ทมนํ, กิเลสูปสมนนฺติ วุตฺตํ โหติ, ปญฺญาเยตํ อธิวจนํ. ปญฺญา หิ กตฺถจิ ปญฺญาตฺเวว [Pg.188] วุจฺจติ ‘‘สุสฺสูสา ลภเต ปญฺญ’’นฺติ เอวมาทีสุ (สํ. นิ. ๑.๒๔๖; สุ. นิ. ๑๘๘). กตฺถจิ ธมฺโมติ ‘‘สจฺจํ ธมฺโม ธิติ จาโค’’ติ เอวมาทีสุ. กตฺถจิ ทโมติ ‘‘ยทิ สจฺจา ทมา จาคา, ขนฺตฺยา ภิยฺโย น วิชฺชตี’’ติอาทีสุ. त्यामध्ये, 'दान' म्हणजे 'दानञ्च धम्मचरिया च' (मंगल सुत्तात) या ठिकाणी सांगितलेल्या पद्धतीनेच ग्रहण करावे. 'शील' म्हणजे कायिक (शारीरिक) आणि वाचिक (वाणीच्या) दुष्कृत्यांचे उल्लंघन न करणे. किंवा पंचशील, अष्टशील, दशशील, प्रातिमोक्ष संवर इत्यादी सर्व प्रकारच्या शीलांना येथे 'शील' असे अभिप्रेत आहे. 'संयम' म्हणजे मनाला वेगवेगळ्या विषयांकडे जाण्यापासून रोखणे; हा 'समाधी'चाच समानार्थी शब्द आहे. ज्या संयमाने युक्त असलेल्या व्यक्तीला 'हस्तसंयतो, पादसंयतो, वाचासंयतो, संयतुत्तमो' या गाथेत 'संयतुत्तमो' (संयमी लोकांमध्ये श्रेष्ठ) म्हटले आहे. इतर आचार्य म्हणतात – 'संयमन म्हणजे संयम, म्हणजेच इंद्रियांचे रक्षण करणे; हा इंद्रिय संवर शीलाचा समानार्थी शब्द आहे.' 'दम' म्हणजे दमन करणे, क्लेशांचे शमन करणे; हा 'प्रज्ञे'चा (बुद्धीचा) समानार्थी शब्द आहे. कारण प्रज्ञेला काही ठिकाणी केवळ 'प्रज्ञा' म्हटले जाते, जसे की 'सुस्सूसा लभते पञ्ञं' (ऐकण्याची इच्छा असणारा प्रज्ञा प्राप्त करतो) इत्यादींमध्ये. काही ठिकाणी तिला 'धम्म' म्हटले जाते, जसे की 'सच्चं धम्मो धिति चागो' इत्यादींमध्ये. तर काही ठिकाणी तिला 'दम' म्हटले जाते, जसे की 'yadi saccā damā cāgā, khantyā bhiyyo na vijjatī' इत्यादींमध्ये. เอวํ ทานาทีนิ ญตฺวา อิทานิ เอวํ อิมิสฺสา คาถาย สมฺปิณฺเฑตฺวา อตฺโถ เวทิตพฺโพ – ยสฺส อิตฺถิยา วา ปุริสสฺส วา ทาเนน สีเลน สํยเมน ทเมน จาติ อิเมหิ จตูหิ ธมฺเมหิ ยถา หิรญฺเญน สุวณฺเณน มุตฺตาย มณินา วา ธนมโย นิธิ เตสํ สุวณฺณาทีนํ เอกตฺถ ปกฺขิปเนน นิธียติ, เอวํ ปุญฺญมโย นิธิ เตสํ ทานาทีนํ เอกจิตฺตสนฺตาเน เจติยาทิมฺหิ วา วตฺถุมฺหิ สุฏฺฐุ กรเณน สุนิหิโต โหตีติ. अशा प्रकारे दान इत्यादींचा अर्थ जाणून घेऊन, आता या गाथेचा एकत्रित अर्थ असा समजावा – ज्या स्त्री किंवा पुरुषाने दान, शील, संयम आणि दम या चार धर्मांच्या (गुणांच्या) माध्यमातून – ज्याप्रमाणे सोने, चांदी, मोती किंवा रत्नांनी बनलेला धनाचा ठेवा त्या सोन्या-चांदीला एका ठिकाणी ठेवून सुरक्षित केला जातो, त्याचप्रमाणे पुण्याचा ठेवा त्या दान इत्यादी गुणांना स्वतःच्या चित्तसंतानामध्ये (मनःप्रवाहात) किंवा चैत्य (स्तूपादी पूजनीय स्थाने) इत्यादी वस्तूंमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित करून सुरक्षित ठेवलेला असतो. สตฺตมคาถาวณฺณนา सातव्या गाथेचे स्पष्टीकरण. เอวํ ภควา ‘‘ยสฺส ทาเนนา’’ติ อิมาย คาถาย ปุญฺญสมฺปทาย ปรมตฺถโต นิธิภาวํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ยตฺถ นิหิโต, โส นิธิ สุนิหิโต โหติ, ตํ วตฺถุํ ทสฺเสนฺโต อาห – अशा प्रकारे भगवंतांनी 'यस्स दानेन' या गाथेद्वारे पुण्यसंपत्तीचे परमार्थतः ठेवा असणे दर्शवून; आता तो ठेवा ज्या ठिकाणी ठेवला असता चांगल्या प्रकारे सुरक्षित होतो, ते स्थान दर्शवताना (भगवंतांनी) म्हटले – ๗. ‘‘เจติยมฺหิ จ สงฺเฆ วา, ปุคฺคเล อติถีสุ วา. ७. चैत्यामध्ये (स्तूपावर), संघामध्ये, एखाद्या व्यक्तीमध्ये किंवा अतिथींमध्ये (पाहुण्यांमध्ये), มาตริ ปิตริ จาปิ, อโถ เชฏฺฐมฺหิ ภาตรี’’ติ. तसेच आई, वडील आणि मोठ्या भावाच्या ठिकाणी (केलेल्या सेवेद्वारे तो ठेवा चांगल्या प्रकारे सुरक्षित होतो). ตตฺถ จยิตพฺพนฺติ เจติยํ, ปูเชตพฺพนฺติ วุตฺตํ โหติ, จิตตฺตา วา เจติยํ. ตํ ปเนตํ เจติยํ ติวิธํ โหติ ปริโภคเจติยํ, อุทฺทิสฺสกเจติยํ, ธาตุกเจติยนฺติ. ตตฺถ โพธิรุกฺโข ปริโภคเจติยํ, พุทฺธปฏิมา อุทฺทิสฺสกเจติยํ, ธาตุคพฺภถูปา สธาตุกา ธาตุกเจติยํ. สงฺโฆติ พุทฺธปฺปมุขาทีสุ โย โกจิ. ปุคฺคโลติ คหฏฺฐปพฺพชิเตสุ โย โกจิ. นตฺถิ อสฺส ติถิ, ยมฺหิ วา ตมฺหิ ทิวเส อาคจฺฉตีติ อติถิ. ตงฺขเณ อาคตปาหุนกสฺเสตํ อธิวจนํ. เสสํ วุตฺตนยเมว. त्या गाथेमध्ये, 'चयितब्बं' (पूजनीय किंवा संचित करण्यायोग्य) म्हणून ते 'चेतिय' (चैत्य) होय, म्हणजेच पूजनीय आहे असा अर्थ होतो; किंवा (विटा इत्यादींनी) रचलेले (चित) असल्यामुळे ते 'चेतिय' होय. ते चैत्य तीन प्रकारचे असते: परिभोग चैत्य, उद्दीसक (उद्देश्यक) चैत्य आणि धातु चैत्य. त्यापैकी, बोधिवृक्ष हे परिभोग चैत्य आहे, बुद्धमूर्ती हे उद्दीसक चैत्य आहे आणि धातूने युक्त असलेले धातुगर्भ स्तूप हे 'धातु चैत्य' आहे. 'संघ' म्हणजे बुद्धप्रमुख आदि संघांमधील कोणताही सदस्य होय. 'पुद्गल' म्हणजे गृहस्थ किंवा प्रव्रजित (भिक्खू) यांच्यापैकी कोणीही एक व्यक्ती होय. ज्याच्या येण्याची कोणतीही तिथी (निश्चित दिवस) नसते, जो कोणत्याही दिवशी येतो, तो 'अतिथी' होय. हे त्या क्षणी आलेल्या पाहुण्याचे (आगंतुकाचे) नाव आहे. उर्वरित भाग आधी सांगितलेल्या पद्धतीप्रमाणेच समजावा. เอวํ เจติยาทีนิ ญตฺวา อิทานิ เอวํ อิมิสฺสา คาถาย สมฺปิณฺเฑตฺวา อตฺโถ เวทิตพฺโพ – โย โส นิธิ ‘‘สุนิหิโต โหตี’’ติ วุตฺโต, โส อิเมสุ วตฺถูสุ สุนิหิโต โหติ. กสฺมา? ทีฆรตฺตํ อิฏฺฐผลานุปฺปทานสมตฺถตาย. ตถา หิ อปฺปกมฺปิ เจติยมฺหิ ทตฺวา ทีฆรตฺตํ อิฏฺฐผลลาภิโน โหนฺติ. ยถาห – अशा प्रकारे चैत्य इत्यादींना जाणून, आता या गाथेचा एकत्रित अर्थ अशा प्रकारे समजून घ्यावा – जो हा 'सुनिहित (चांगल्या प्रकारे ठेवलेला) निधी' असे म्हटले आहे, तो या (चैत्य आदि) वस्तूंमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित केलेला असतो. कशामुळे? कारण तो दीर्घकाळापर्यंत इच्छित फळ देण्यास समर्थ असतो. तसेच, चैत्याला अगदी थोडे जरी दान दिले, तरी लोक दीर्घकाळापर्यंत इच्छित फळ मिळवणारे होतात. जसे की भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘เอกปุปฺผํ [Pg.189] ยชิตฺวาน, อสีติกปฺปโกฏิโย; ทุคฺคตึ นาภิชานามิ, ปุปฺผทานสฺสิทํ ผล’’นฺติ จ. “केवळ एक फूल अर्पण करून, मी ऐंशी कोटी कल्पपर्यंत दुर्गतीला प्राप्त झालो नाही; हे फुलांच्या दानाचे फळ आहे.” ‘‘มตฺตาสุขปริจฺจาคา, ปสฺเส เจ วิปุลํ สุข’’นฺติ จ. (ธ. ป. ๒๙๐); “अल्प सुखाचा त्याग केल्याने जर विपुल सुख दिसत असेल, तर (पंडित पुरुषाने विपुल सुखाच्या आशेने अल्प सुखाचा त्याग करावा).” เอวํ ทกฺขิณาวิสุทฺธิเวลามสุตฺตาทีสุ วุตฺตนเยน สงฺฆาทิวตฺถูสุปิ ทานผลวิภาโค เวทิตพฺโพ. ยถา จ เจติยาทีสุ ทานสฺส ปวตฺติ ผลวิภูติ จ ทสฺสิตา, เอวํ ยถาโยคํ สพฺพตฺถ ตํ ตํ อารภิตฺวา จาริตฺตวาริตฺตวเสน สีลสฺส, พุทฺธานุสฺสติวเสน สํยมสฺส, ตพฺพตฺถุกวิปสฺสนามนสิการปจฺจเวกฺขณวเสน ทมสฺส จ ปวตฺติ ตสฺส ตสฺส ผลวิภูติ จ เวทิตพฺพา. अशा प्रकारे, दक्खिणाविभंग सुत्त, वेलाम सुत्त इत्यादींमध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने, संघ आदि वस्तूंमध्येही दानफळाचे वर्गीकरण समजून घ्यावे. आणि ज्याप्रमाणे चैत्य इत्यादींच्या ठिकाणी दानाची प्रवृत्ती आणि त्याचे फल-वैभव दाखवले आहे, त्याचप्रमाणे योग्यतेनुसार सर्व ठिकाणी त्या त्या गोष्टीला आलंबन करून, चारित्र्य-वारित्र्य नियमांनुसार शीलाची प्रवृत्ती, बुद्धानुस्मृतीच्या द्वारे संयमाची प्रवृत्ती, आणि त्या वस्तूंवर आधारित विपश्यना, मनसिकार व प्रत्यवेक्षण यांच्याद्वारे दमाची (इंद्रियनिग्रहाची) प्रवृत्ती आणि त्या त्या गुणांचे फल-वैभव समजून घ्यावे. อฏฺฐมคาถาวณฺณนา आठव्या गाथेचे वर्णन समाप्त. เอวํ ภควา ทานาทีหิ นิธียมานสฺส ปุญฺญมยนิธิโน เจติยาทิเภทํ วตฺถุํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ เอเตสุ วตฺถูสุ สุนิหิตสฺส ตสฺส นิธิโน คมฺภีเร โอทกนฺติเก นิหิตนิธิโต วิเสสํ ทสฺเสนฺโต อาห – अशा प्रकारे भगवंतांनी दान इत्यादींद्वारे संचित केल्या जाणाऱ्या पुण्यमय निधीचे चैत्य आदि भेद असलेले स्थान दाखवून, आता या वस्तूंमध्ये चांगल्या प्रकारे ठेवलेल्या त्या पुण्यनिधीचे, खोल पाण्याच्या काठावर पुरून ठेवलेल्या भौतिक निधीपेक्षा असलेले श्रेष्ठत्व दाखवताना पुढील गाथा म्हटली – ๘. ‘‘เอโส นิธิ สุนิหิโต, อเชยฺโย อนุคามิโก. ८. “हा निधी चांगल्या प्रकारे ठेवलेला (सुनिहित), इतरांकडून जिंकला न जाणारा (अजेय) आणि पाठीमागे येणारा (अनुगामी) आहे. ปหาย คมนีเยสุ, เอตํ อาทาย คจฺฉตี’’ติ. सर्व काही सोडून जावे लागणाऱ्या या जगात, मनुष्य हाच निधी सोबत घेऊन जातो.” ตตฺถ ปุพฺพปเทน ตํ ทานาทีหิ สุนิหิตนิธึ นิทฺทิสติ ‘‘เอโส นิธิ สุนิหิโต’’ติ. อเชยฺโยติ ปเรหิ เชตฺวา คเหตุํ น สกฺกา, อจฺเจยฺโยติปิ ปาโฐ, ตสฺส อจฺจิตพฺโพ อจฺจนารโห หิตสุขตฺถิเกน อุปจิตพฺโพติ อตฺโถ. เอตสฺมิญฺจ ปาเฐ เอโส นิธิ อจฺเจยฺโยติ สมฺพนฺธิตฺวา ปุน ‘‘กสฺมา’’ติ อนุโยคํ ทสฺเสตฺวา ‘‘ยสฺมา สุนิหิโต อนุคามิโก’’ติ สมฺพนฺธิตพฺพํ. อิตรถา หิ สุนิหิตสฺส อจฺเจยฺยตฺตํ วุตฺตํ ภเวยฺย, น จ สุนิหิโต อจฺจนีโย. อจฺจิโต เอว หิ โสติ. อนุคจฺฉตีติ อนุคามิโก, ปรโลกํ คจฺฉนฺตมฺปิ ตตฺถ ตตฺถ ผลทาเนน น วิชหตีติ อตฺโถ. त्या गाथेमध्ये, 'एषो निधी सुनिहितो' (हा निधी चांगल्या प्रकारे ठेवलेला आहे) या पहिल्या पदाने दान इत्यादींद्वारे चांगल्या प्रकारे ठेवलेल्या त्या पुण्यनिधीचा निर्देश केला आहे. 'अजेय' म्हणजे इतरांना जिंकून घेता न येणारा. 'अच्चेय्य' असाही पाठ आढळतो; त्याचा अर्थ हित आणि सुख इच्छिणाऱ्या व्यक्तीने संचय करण्यायोग्य, पूजनीय किंवा गोळा करण्यायोग्य असा आहे. या पाठामध्ये 'हा निधी अच्चेय्य (संचय करण्यायोग्य) आहे' असा संबंध जोडून, पुन्हा 'का?' असा प्रश्न उपस्थित करून, 'कारण तो सुनिहित आणि अनुगामी आहे' असा संबंध जोडला पाहिजे. अन्यथा, चांगल्या प्रकारे ठेवलेल्या निधीचे संचय करण्यायोग्यत्व सांगितले गेले असते, परंतु जो आधीच चांगल्या प्रकारे ठेवलेला आहे तो पुन्हा संचय करण्यायोग्य नसतो, कारण तो आधीच संचित केलेला असतो. जो पाठीमागे जातो तो 'अनुगामी' होय; म्हणजेच परलोकात जाणाऱ्या व्यक्तीलाही तो त्या त्या ठिकाणी फळ देऊन कधीही सोडत नाही, असा याचा अर्थ आहे. ปหาย คมนีเยสุ เอตํ อาทาย คจฺฉตีติ มรณกาเล ปจฺจุปฏฺฐิเต สพฺพโภเคสุ ปหาย คมนีเยสุ เอตํ นิธึ อาทาย ปรโลกํ คจฺฉตีติ อยํ กิร เอตสฺส อตฺโถ. โส ปน น ยุชฺชติ. กสฺมา? โภคานํ [Pg.190] อคมนียโต. ปหาตพฺพา เอว หิ เต เต โภคา, น คมนียา, คมนียา ปน เต เต คติวิเสสา. ยโต ยทิ เอส อตฺโถ สิยา, ปหาย โภเค คมนีเยสุ คติวิเสเสสุ อิติ วเทยฺย. ตสฺมา เอวเมตฺถ อตฺโถ เวทิตพฺโพ – ‘‘นิธิ วา ฐานา จวตี’’ติ เอวมาทินา ปกาเรน ปหาย มจฺจํ โภเคสุ คจฺฉนฺเตสุ เอตํ อาทาย คจฺฉตีติ. เอโส หิ อนุคามิกตฺตา ตํ นปฺปชหตีติ. 'पहाय गमनीयेसु एतं आदाय गच्छति' म्हणजे मृत्यूची वेळ जवळ आली असता, सर्व उपभोग्य वस्तू सोडून जावे लागत असताना, हा निधी सोबत घेऊन मनुष्य परलोकात जातो, असा याचा अर्थ सांगितला जातो. परंतु तो अर्थ योग्य वाटत नाही. का? कारण उपभोग्य वस्तू स्वतः कुठे जात नाहीत. ते ते उपभोग केवळ सोडण्यायोग्य आहेत, स्वतः जाणारे नाहीत; जाणारे तर ते ते गतीचे विशेष (पुढील जन्म) आहेत. म्हणून जर हा अर्थ असता, तर 'उपभोगांचा त्याग करून जाण्यायोग्य गतींमध्ये' असे म्हटले गेले असते. म्हणून येथे असा अर्थ समजून घ्यावा – 'निधी आपल्या स्थानावरून नष्ट होतो' इत्यादी प्रकारे, मनुष्याला सोडून उपभोग्य वस्तू निघून जात असताना (नष्ट होत असताना), मनुष्य हा पुण्यनिधी सोबत घेऊन जातो. कारण हा निधी अनुगामी असल्यामुळे त्याला कधीही सोडत नाही. ตตฺถ สิยา ‘‘คมนีเยสูติ เอตฺถ คนฺตพฺเพสูติ อตฺโถ, น คจฺฉนฺเตสู’’ติ. ตํ น เอกํสโต คเหตพฺพํ. ยถา หิ ‘‘อริยา นิยฺยานิกา’’ติ (ที. นิ. ๒.๑๔๑) เอตฺถ นิยฺยนฺตาติ อตฺโถ, น นิยฺยาตพฺพาติ, เอวมิธาปิ คจฺฉนฺเตสูติ อตฺโถ, น คนฺตพฺเพสูติ. येथे अशी शंका उपस्थित होऊ शकते की, 'गमनीयेसु' याचा अर्थ 'जाण्यायोग्य गोष्टींमध्ये' असा आहे, 'जाणाऱ्या गोष्टींमध्ये' असा नाही. परंतु हे पूर्णपणे स्वीकारता येत नाही. कारण ज्याप्रमाणे 'अरिया निय्यानिका' (आर्य मार्ग हा संसारातून बाहेर काढणारा आहे) येथे 'बाहेर काढणारा' असा अर्थ होतो, 'बाहेर काढण्यायोग्य' असा नाही, त्याचप्रमाणे येथेही 'जाणाऱ्या गोष्टींमध्ये' (नष्ट होणाऱ्या गोष्टींमध्ये) असा अर्थ होतो, 'जाण्यायोग्य गोष्टींमध्ये' असा नाही. อถ วา ยสฺมา เอส มรณกาเล กสฺสจิ ทาตุกาโม โภเค อามสิตุมฺปิ น ลภติ, ตสฺมา เตน เต โภคา ปุพฺพํ กาเยน ปหาตพฺพา, ปจฺฉา วิหตาเสน เจตสา คนฺตพฺพา, อติกฺกมิตพฺพาติ วุตฺตํ โหติ. ตสฺมา ปุพฺพํ กาเยน ปหาย ปจฺฉา เจตสา คมนีเยสุ โภเคสูติ เอวเมตฺถ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. ปุริมสฺมึ อตฺเถ นิทฺธารเณ ภุมฺมวจนํ, ปหาย คมนีเยสุ โภเคสุ เอกเมเวตํ ปุญฺญนิธิวิภวํ ตโต นีหริตฺวา อาทาย คจฺฉตีติ. ปจฺฉิเม อตฺเถ ภาเวนภาวลกฺขเณ ภุมฺมวจนํ. โภคานญฺหิ คมนียภาเวน เอตสฺส นิธิสฺส อาทาย คมนียภาโว ลกฺขียตีติ. किंवा, मृत्यूच्या वेळी हा मनुष्य कोणाला काही दान देण्याची इच्छा असूनही आपल्या संपत्तीला स्पर्श देखील करू शकत नाही, म्हणून त्याने त्या उपभोगांचा आधी शरीराने त्याग केला पाहिजे आणि नंतर आशेचा नाश झालेल्या मनाने ते सोडून गेले पाहिजे, असे म्हटले आहे. म्हणून, 'आधी शरीराने त्याग करून आणि नंतर मनाने सोडून जाण्यायोग्य उपभोगांमध्ये' असा अर्थ येथे समजून घ्यावा. पहिल्या अर्थामध्ये 'निर्धारण' अर्थी सप्तमी विभक्ती आहे, म्हणजेच 'सोडून जाण्यायोग्य उपभोगांमधून केवळ हा एकच पुण्यनिधीरूपी वैभव वेगळा काढून तो सोबत घेऊन जातो' असा अर्थ होतो. दुसऱ्या अर्थामध्ये 'भावेन भाव लक्षण' अर्थी सप्तमी विभक्ती आहे. कारण उपभोगांच्या निघून जाण्याने या पुण्यनिधीचे सोबत घेऊन जाणे लक्षित होते. นวมคาถาวณฺณนา नव्या गाथेचे वर्णन समाप्त. เอวํ ภควา อิมสฺส ปุญฺญนิธิโน คมฺภีเร โอทกนฺติเก นิหิตนิธิโต วิเสสํ ทสฺเสตฺวา ปุน อตฺตโน ภณฺฑคุณสํวณฺณเนน กยชนสฺส อุสฺสาหํ ชเนนฺโต อุฬารภณฺฑวาณิโช วิย อตฺตนา เทสิตปุญฺญนิธิคุณสํวณฺณเนน ตสฺมึ ปุญฺญนิธิมฺหิ เทวมนุสฺสานํ อุสฺสาหํ ชเนนฺโต อาห – अशा प्रकारे भगवंतांनी या पुण्यनिधीचे खोल पाण्याच्या काठावर पुरून ठेवलेल्या भौतिक निधीपेक्षा असलेले श्रेष्ठत्व दाखवून, पुन्हा आपल्या मालाच्या गुणांचे वर्णन करून खरेदी करणाऱ्या ग्राहकांमध्ये उत्साह निर्माण करणाऱ्या एखाद्या श्रेष्ठ व्यापाऱ्याप्रमाणे, स्वतः उपदेशिलेल्या पुण्यनिधीच्या गुणांचे वर्णन करून त्या पुण्यनिधीच्या बाबतीत देव आणि मनुष्यांमध्ये उत्साह निर्माण करत पुढील गाथा म्हटली – ๙. ‘‘อสาธารณมญฺเญสํ, อโจราหรโณ นิธิ. ९. “हा निधी इतरांसाठी असाधारण (अनन्यसाधारण) आहे आणि चोरांना चोरून नेता न येणारा आहे. กยิราถ ธีโร ปุญฺญานิ, โย นิธิ อนุคามิโก’’ติ. हा निधी पाठीमागे येणारा (अनुगामी) आहे, म्हणून बुद्धिमान माणसाने पुण्याचा संचय करावा.” ตตฺถ [Pg.191] อสาธารณมญฺเญสนฺติ อสาธารโณ อญฺเญสํ, มกาโร ปทสนฺธิกโร ‘‘อทุกฺขมสุขาย เวทนาย สมฺปยุตฺตา’’ติอาทีสุ วิย. น โจเรหิ อาหรโณ อโจราหรโณ, โจเรหิ อาทาตพฺโพ น โหตีติ อตฺโถ. นิธาตพฺโพติ นิธิ. เอวํ ทฺวีหิ ปเทหิ ปุญฺญนิธิคุณํ สํวณฺเณตฺวา ตโต ทฺวีหิ ตตฺถ อุสฺสาหํ ชเนติ ‘‘กยิราถ ธีโร ปุญฺญานิ, โย นิธิ อนุคามิโก’’ติ. ตสฺสตฺโถ – ยสฺมา ปุญฺญานิ นาม อสาธารโณ อญฺเญสํ, อโจราหรโณ จ นิธิ โหติ. น เกวลญฺจ อสาธารโณ อโจราหรโณ จ นิธิ, อถ โข ปน ‘‘เอโส นิธิ สุนิหิโต, อเชยฺโย อนุคามิโก’’ติ เอตฺถ วุตฺโต โย นิธิ อนุคามิโก. โส จ ยสฺมา ปุญฺญานิเยว, ตสฺมา กยิราถ กเรยฺย ธีโร พุทฺธิสมฺปนฺโน ธิติสมฺปนฺโน จ ปุคฺคโล ปุญฺญานีติ. त्या गाथेमध्ये, 'असाधारणमञ्ञेसं' म्हणजे इतरांसाठी असाधारण (इतरांशी सामायिक नसलेला). येथील 'म' हा वर्ण 'अदुक्खमसुखाय वेदनाय सम्पयुत्ता' इत्यादींप्रमाणे पदसंधी साधणारा आहे. 'अचोराहरणो' म्हणजे चोरांद्वारे हरण न केला जाणारा, म्हणजेच चोरांना तो हिरावून घेता येत नाही असा याचा अर्थ आहे. जो सुरक्षित ठेवला जातो तो 'निधी' होय. अशा प्रकारे दोन पदांनी पुण्यनिधीच्या गुणांचे वर्णन करून, त्यानंतर पुढील दोन पदांनी त्याविषयी उत्साह निर्माण करतात – 'कयिराथ धीरो पुञ्ञानि, यो निधी अनुगामिको'. त्याचा अर्थ असा – कारण पुण्य हे इतरांसाठी असाधारण आणि चोरांना चोरून नेता न येणारा निधी आहे. आणि ते केवळ असाधारण आणि चोरांना चोरून नेता न येणारा निधीच नाही, तर 'हा निधी चांगल्या प्रकारे ठेवलेला, अजेय आणि अनुगामी आहे' असे जे येथे म्हटले आहे, तो अनुगामी निधी देखील आहे. आणि तो निधी म्हणजेच पुण्य असल्यामुळे, बुद्धिमान (प्रज्ञासंपन्न) आणि धैर्यवान (धृतिसंपन्न) व्यक्तीने पुण्याचा संचय करावा (पुण्यकर्मे करावीत). ทสมคาถาวณฺณนา दहाव्या गाथेचे वर्णन समाप्त. เอวํ ภควา คุณสํวณฺณเนน ปุญฺญนิธิมฺหิ เทวมนุสฺสานํ อุสฺสาหํ ชเนตฺวา อิทานิ เย อุสฺสหิตฺวา ปุญฺญนิธิกิริยาย สมฺปาเทนฺติ, เตสํ โส ยํ ผลํ เทติ, ตํ สงฺเขปโต ทสฺเสนฺโต อาห – अशा प्रकारे भगवंतांनी (पुण्याच्या) गुणांचे वर्णन करून, देव आणि मनुष्यांमध्ये पुण्यरुपी ठेवा (पुण्यनिधी) साठवण्याविषयी उत्साह निर्माण केला. आता जे लोक उत्साहाने पुण्यरुपी ठेवा निर्माण करून तो संपन्न करतात, त्यांना तो पुण्यनिधी जे काही फळ देतो, ते थोडक्यात दाखवून देण्यासाठी (भगवान) म्हणाले – ๑๐. १०. ‘‘เอส เทวมนุสฺสานํ, สพฺพกามทโท นิธี’’ติ. “हा देव आणि मनुष्यांची सर्व इच्छा पूर्ण करणारा निधी आहे.” อิทานิ ยสฺมา ปตฺถนาย ปฏิพนฺธิตสฺส สพฺพกามททตฺตํ, น วินา ปตฺถนํ โหติ. ยถาห – आता, कारण सर्व इच्छा पूर्ण करण्याची क्षमता ही आकांक्षेशी (प्रार्थनेशी) जोडलेली असल्यामुळे, आकांक्षेशिवाय ती पूर्ण होत नाही. जसे की (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘อากงฺเขยฺย เจ คหปตโย ธมฺมจารี สมจารี ‘อโห วตาหํ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ขตฺติยมหาสาลานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย’นฺติ, ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ ยํ โส กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ขตฺติยมหาสาลานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ตถา หิ โส ธมฺมจารี สมจารี’’ (ม. นิ. ๑.๔๔๒). “गृहपतींनो, जर एखादा धम्मचारी (धर्माचे आचरण करणारा) आणि समचारी (समतेने आचरण करणारा) अशी आकांक्षा बाळगेल की, 'अहो! शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी क्षत्रिय महासालांच्या (श्रीमंत क्षत्रियांच्या) सहवासात जन्माला यावे', तर हे शक्य आहे की शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो क्षत्रिय महासालांच्या सहवासात जन्माला येईल. त्याचे कारण काय? कारण तो धम्मचारी आणि समचारी आहे.” เอวํ ‘‘อนาสวํ เจโตวิมุตฺตึ ปญฺญาวิมุตฺตึ ทิฏฺเฐว ธมฺเม สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา อุปสมฺปชฺช วิหเรยฺย. ตํ กิสฺส เหตุ? ตถา หิ โส ธมฺมจารี สมจารี’’ติ (ม. นิ. ๑.๔๔๒). तसेच, “अनास्रव (आसवरहित) चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती याच जन्मात स्वतः अभिज्ञा प्राप्त करून, साक्षात करून, त्यात संपन्न होऊन विहार करावा. त्याचे कारण काय? कारण तो धम्मचारी आणि समचारी आहे.” ตถา [Pg.192] จาห – आणि तसेच (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘อิธ, ภิกฺขเว, ภิกฺขุ สทฺธาย สมนฺนาคโต โหติ, สีเลน, สุเตน, จาเคน, ปญฺญาย สมนฺนาคโต โหติ, ตสฺส เอวํ โหติ ‘อโห วตาหํ กายสฺส เภทา ปรํ มรณา ขตฺติยมหาสาลานํ สหพฺยตํ อุปปชฺเชยฺย’นฺติ. โส ตํ จิตฺตํ ปทหติ, ตํ จิตฺตํ อธิฏฺฐาติ, ตํ จิตฺตํ ภาเวติ. ตสฺส เต สงฺขารา จ วิหารา จ เอวํ ภาวิตา เอวํ พหุลีกตา ตตฺรูปปตฺติยา สํวตฺตนฺตี’’ติ (ม. นิ. ๓.๑๖๑) เอวมาทิ. “भिक्खूंनो, या शासनात एखादा भिक्खू श्रद्धेने संपन्न असतो, शील, श्रुत (ज्ञान), त्याग आणि प्रज्ञेने संपन्न असतो. त्याच्या मनात असा विचार येतो, 'अहो! शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी क्षत्रिय महासालांच्या सहवासात जन्माला यावे.' तो त्या चित्ताला दृढ करतो, त्या चित्ताला अधिष्ठित करतो, त्या चित्ताची भावना करतो. त्याचे ते संस्कार आणि विहार अशा प्रकारे भावित व बहुलीकृत (वारंवार अभ्यासलेले) केल्यामुळे तेथे जन्म घेण्यास कारणीभूत ठरतात.” इत्यादी. ตสฺมา ตํ ตถา ตถา อากงฺขปริยายํ จิตฺตปทหนาธิฏฺฐานภาวนาปริกฺขารํ ปตฺถนํ ตสฺส สพฺพกามททตฺเต เหตุํ ทสฺเสนฺโต อาห – म्हणून, त्या त्या प्रकारे 'आकांक्षीय सुत्ता'मध्ये सांगितल्याप्रमाणे चित्ताचे प्रयत्न, अधिष्ठान, भावना आणि परिष्कार यांनी युक्त असलेल्या आकांक्षेला, सर्व इच्छा पूर्ण करण्याचे कारण दाखवून देण्यासाठी (भगवान) म्हणाले – ‘‘ยํ ยเทวาภิปตฺเถนฺติ, สพฺพเมเตน ลพฺภตี’’ติ. “ते ज्या ज्या गोष्टीची आकांक्षा करतात, ते सर्व या (पुण्यनिधी) द्वारे प्राप्त होते.” เอกาทสมคาถาวณฺณนา अकराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण समाप्त. ๑๑. อิทานิ ยํ ตํ สพฺพํ เอเตน ลพฺภติ, ตํ โอธิโส โอธิโส ทสฺเสนฺโต ‘‘สุวณฺณตา สุสรตา’’ติ เอวมาทิคาถาโย อาห. ११. आता, या पुण्यनिधीद्वारे जे काही प्राप्त होते, ते विभागवार (स्पष्टपणे) दाखवून देण्यासाठी “सुवण्णता सुसरता” (सुवर्णवर्ण, सुस्वरता) इत्यादी गाथा (भगवंतांनी) म्हटल्या. ตตฺถ ปฐมคาถาย ตาว สุวณฺณตา นาม สุนฺทรจฺฉวิวณฺณตา กญฺจนสนฺนิภตฺตจตา, สาปิ เอเตน ปุญฺญนิธินา ลพฺภติ. ยถาห – त्यापैकी पहिल्या गाथेत, 'सुवण्णता' (सुवर्णवर्ण) म्हणजे सुंदर त्वचा आणि सोन्यासारखी कांती असलेला वर्ण होय. ती देखील या पुण्यनिधीद्वारे प्राप्त होते. जसे की (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ…เป… ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน อกฺโกธโน อโหสิ อนุปายาสพหุโล, พหุมฺปิ วุตฺโต สมาโน นาภิสชฺชิ น กุปฺปิ น พฺยาปชฺชิ น ปติตฺถียิ, น โกปญฺจ โทสญฺจ อปฺปจฺจยญฺจ ปาตฺวากาสิ, ทาตา จ อโหสิ สุขุมานํ มุทุกานํ อตฺถรณานํ ปาวุรณานํ โขมสุขุมานํ กปฺปาสิก…เป… โกเสยฺย…เป… กมฺพลสุขุมานํ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กตตฺตา อุปจิตตฺตา…เป… อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมํ มหาปุริสลกฺขณํ ปฏิลภติ. สุวณฺณวณฺโณ โหติ กญฺจนสนฺนิภตฺตโจ’’ติ (ที. นิ. ๓.๒๑๘). “भिक्खूंनो, तथागत पूर्वजन्मात...पे... पूर्वी मनुष्य असताना अक्रोधी होते, संताप न करणारे होते. पुष्कळ बोलले गेले तरी ते चिडले नाहीत, रागावले नाहीत, त्यांनी कोणाचा द्वेष केला नाही, मनात आकस धरला नाही आणि राग, द्वेष व अप्रसन्नता प्रकट केली नाही. ते मऊ व सुबक अंथरुणे, पांघरूणे, तलम सुती वस्त्रे...पे... रेशमी वस्त्रे...पे... आणि मऊ घोंगड्या दान करणारे होते. त्या कर्माच्या आचरणामुळे आणि संचयामुळे...पे... या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना हे महापुरुष लक्षण प्राप्त झाले. ते सुवर्णवर्णाचे झाले आणि त्यांची त्वचा सोन्यासारखी कांती असलेली झाली.” สุสรตา นาม พฺรหฺมสฺสรตา กรวีกภาณิตา, สาปิ เอเตน ลพฺภติ. ยถาห – 'सुसरता' (सुस्वरता) म्हणजे ब्रह्मस्वर (ब्रह्मदेवासारखा गंभीर आवाज) आणि करवीक पक्षासारखा मधुर आवाज असणे. ती देखील या पुण्यनिधीद्वारे प्राप्त होते. जसे की (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘ยมฺปิ[Pg.193], ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ…เป… ผรุสํ วาจํ ปหาย ผรุสาย วาจาย ปฏิวิรโต อโหสิ, ยา สา วาจา เนลา กณฺณสุขา…เป… ตถารูปึ วาจํ ภาสิตา อโหสิ. โส ตสฺส กมฺมสฺส กตตฺตา อุปจิตตฺตา…เป… อิตฺถตฺตํ อาคโต สมาโน อิมานิ ทฺเว มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ. ปหุตชิวฺโห จ โหติ พฺรหฺมสฺสโร จ กรวีกภาณี’’ติ (ที. นิ. ๓.๒๓๖). “भिक्खूंनो, तथागत पूर्वजन्मात...पे... कठोर वाणी सोडून कठोर वाणीपासून विरत राहिले होते. जी वाणी निर्दोष, कानाला सुखद...पे... अशी होती, तशीच वाणी ते बोलत असत. त्या कर्माच्या आचरणामुळे आणि संचयामुळे...पे... या मनुष्यलोकात आल्यावर त्यांना ही दोन महापुरुष लक्षणे प्राप्त झाली. त्यांची जीभ लांब (प्रभूतजिव्ह) झाली आणि त्यांचा आवाज ब्रह्मस्वर व करवीक पक्षासारखा मधुर झाला.” สุสณฺฐานาติ สุฏฺฐุ สณฺฐานตา, สมจิตวฏฺฏิตยุตฺตฏฺฐาเนสุ องฺคปจฺจงฺคานํ สมจิตวฏฺฏิตภาเวน สนฺนิเวโสติ วุตฺตํ โหติ. สาปิ เอเตน ลพฺภติ. ยถาห – 'सुसंठाना' (सुसंस्थान) म्हणजे उत्तम शरीररचना. शरीराचे अवयव योग्य ठिकाणी प्रमाणबद्ध आणि सुडौल असणे, असा याचा अर्थ आहे. ती देखील या पुण्यनिधीद्वारे प्राप्त होते. जसे की (भगवंतांनी) म्हटले आहे – ‘‘ยมฺปิ, ภิกฺขเว, ตถาคโต ปุริมํ ชาตึ…เป… ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน พหุชนสฺส อตฺถกาโม อโหสิ หิตกาโม ผาสุกาโม โยคกฺเขมกาโม ‘กินฺติ เม สทฺธาย วฑฺเฒยฺยุํ, สีเลน สุเตน จาเคน ปญฺญาย ธนธญฺเญน เขตฺตวตฺถุนา ทฺวิปทจตุปฺปเทหิ ปุตฺตทาเรหิ ทาสกมฺมกรโปริเสหิ ญาตีหิ มิตฺเตหิ พนฺธเวหิ วฑฺเฒยฺยุ’นฺติ, โส ตสฺส กมฺมสฺส…เป… สมาโน อิมานิ ตีณิ มหาปุริสลกฺขณานิ ปฏิลภติ, สีหปุพฺพฑฺฒกาโย จ โหติ จิตนฺตรํโส จ สมวฏฺฏกฺขนฺโธ จา’’ติ (ที. นิ. ๓.๒๒๔) เอวมาทิ. “भिक्खूंनो, तथागत पूर्वजन्मात...पे... पूर्वी मनुष्य असताना बहुजन हितासाठी, त्यांच्या कल्याणासाठी, सुखासाठी आणि योगक्षेमासाठी उत्सुक होते. 'माझे हे लोक श्रद्धेने, शीलाने, श्रुताने, त्यागाने, प्रज्ञेने, धनधान्याने, शेतजमिनीने, द्विपद व चतुष्पद प्राण्यांनी, स्त्री-पुत्रांनी, दास-कर्मकऱ्यांनी, नातेवाईकांनी, मित्रांनी आणि बांधवांनी वृद्धिंगत व्हावेत' अशी त्यांची इच्छा होती. त्या कर्मामुळे...पे... त्यांना ही तीन महापुरुष लक्षणे प्राप्त झाली – त्यांचे शरीर सिंहाच्या पूर्वार्धासारखे (सिंहपूर्वार्धकाय) झाले, त्यांचे खांदे भरलेले (चितंतरांस) झाले आणि त्यांचे शरीर सुडौल व गोल (समवृत्तस्कंध) झाले.” इत्यादी. อิมินา นเยน อิโต ปเรสมฺปิ อิมินา ปุญฺญนิธินา ปฏิลาภสาธกานิ สุตฺตปทานิ ตโต ตโต อาเนตฺวา วตฺตพฺพานิ. อติวิตฺถารภเยน ตุ สํขิตฺตํ, อิทานิ อวเสสปทานํ วณฺณนํ กริสฺสามิ. या पद्धतीने, या व्यतिरिक्त इतर लक्षणांच्या प्राप्तीसाठी कारणीभूत असणारी सुत्तवचने देखील त्या त्या सुत्तांमधून आणून सांगावीत. परंतु, विस्तार होण्याच्या भीतीने येथे संक्षेप केला आहे. आता मी उर्वरित पदांचे स्पष्टीकरण करेन. สุรูปตาติ เอตฺถ สกลสรีรํ รูปนฺติ เวทิตพฺพํ ‘‘อากาโส ปริวาริโต รูปํตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติอาทีสุ (ม. นิ. ๑.๓๐๖) วิย, ตสฺส รูปสฺส สุนฺทรตา สุรูปตา นาติทีฆตา นาติรสฺสตา นาติกิสตา นาติถูลตา นาติกาฬตา นจฺโจทาตตาติ วุตฺตํ โหติ. อาธิปจฺจนฺติ อธิปติภาโว, ขตฺติยมหาสาลาทิภาเวน สามิกภาโวติ อตฺโถ. ปริวาโรติ อคาริกานํ สชนปริชนสมฺปตฺติ, อนคาริกานํ ปริสสมฺปตฺติ, อาธิปจฺจญฺจ [Pg.194] ปริวาโร จ อาธิปจฺจปริวาโร. เอตฺถ จ สุวณฺณตาทีหิ สรีรสมฺปตฺติ, อาธิปจฺเจน โภคสมฺปตฺติ, ปริวาเรน สชนปริชนสมฺปตฺติ วุตฺตาติ เวทิตพฺพา. สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ ยํ ตํ ‘‘ยํ ยเทวาภิปตฺเถนฺติ, สพฺพเมเตน ลพฺภตี’’ติ วุตฺตํ, ตตฺถ อิทมฺปิ ตาว ปฐมํ โอธิโส วุตฺตสุวณฺณตาทิ สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ เวทิตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. 'सुरूपता' या पदात “आकाश परिवेष्टित झाल्यावर रूपाची संज्ञा प्राप्त होते” या वचनाप्रमाणे संपूर्ण शरीराला 'रूप' समजावे. त्या रूपाचे सौंदर्य म्हणजे सुरूपता होय; म्हणजेच शरीर अतिशय उंच नसणे, अतिशय बुटके नसणे, अतिशय कृश नसणे, अतिशय स्थूल नसणे, अतिशय काळे नसणे आणि अतिशय गोरे नसणे, असा याचा अर्थ आहे. 'आधिपत्य' म्हणजे अधिपती असणे, क्षत्रिय महासाल इत्यादींच्या रूपाने स्वामी असणे, असा याचा अर्थ आहे. 'परिवार' म्हणजे गृहस्थांच्या बाबतीत नातेवाईक आणि सेवक यांची समृद्धी, तर गृहत्यागी (भिक्खू) लोकांच्या बाबतीत परिषदेची (अनुयायांची) समृद्धी होय. आधिपत्य आणि परिवार मिळून 'आधिपत्य-परिवार' होतो. येथे 'सुवर्णता' इत्यादी पदांनी शरीर-संपत्ती, 'आधिपत्य' या पदाने भोग-संपत्ती (वैभव) आणि 'परिवार' या पदाने नातेवाईक व सेवकांची संपत्ती सांगितली आहे, असे समजावे. “ते ज्या ज्या गोष्टीची आकांक्षा करतात, ते सर्व याने प्राप्त होते” या वचनात, सुरुवातीला विभागवार सांगितलेली सुवर्णता इत्यादी सर्व गोष्टी या पुण्यनिधीद्वारे प्राप्त होतात, हे दाखवून दिले आहे. ทฺวาทสมคาถาวณฺณนา बाराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण समाप्त. ๑๒. เอวมิมาย คาถาย ปุญฺญานุภาเวน ลภิตพฺพํ รชฺชสมฺปตฺติโต โอรํ เทวมนุสฺสสมฺปตฺตึ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตทุภยรชฺชสมฺปตฺตึ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปเทสรชฺช’’นฺติ อิมํ คาถมาห. १२. अशा प्रकारे, या गाथेद्वारे पुण्याच्या प्रभावाने प्राप्त होणाऱ्या राज्यवैभवापेक्षा श्रेष्ठ अशी देव आणि मनुष्यांची संपत्ती दाखवून दिल्यानंतर, आता त्या दोन्ही प्रकारच्या राज्यवैभवाला दाखवून देण्यासाठी “पदेसरज्जं” (प्रादेशिक राज्य) ही गाथा (भगवंतांनी) म्हटली. ตตฺถ ปเทสรชฺชนฺติ เอกทีปมฺปิ สกลํ อปาปุณิตฺวา ปถวิยา เอกเมกสฺมึ ปเทเส รชฺชํ. อิสฺสรภาโว อิสฺสริยํ, อิมินา ทีปจกฺกวตฺติรชฺชํ ทสฺเสติ. จกฺกวตฺติสุขํ ปิยนฺติ อิฏฺฐํ กนฺตํ มนาปํ จกฺกวตฺติสุขํ. อิมินา จาตุรนฺตจกฺกวตฺติรชฺชํ ทสฺเสติ. เทเวสุ รชฺชํ เทวรชฺชํ, เอเตน มนฺธาตาทีนมฺปิ มนุสฺสานํ เทวรชฺชํ ทสฺสิตํ โหติ. อปิ ทิพฺเพสูติ อิมินา เย เต ทิวิ ภวตฺตา ‘‘ทิพฺพา’’ติ วุจฺจนฺติ, เตสุ ทิพฺเพสุ กาเยสุ อุปฺปนฺนานมฺปิ เทวรชฺชํ ทสฺเสติ. สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ ยํ ตํ ‘‘ยํ ยเทวาภิปตฺเถนฺติ, สพฺพเมเตน ลพฺภตี’’ติ วุตฺตํ, ตตฺถ อิทมฺปิ ทุติยํ โอธิโส ปเทสรชฺชาทิ สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ เวทิตพฺพนฺติ ทสฺเสติ. त्या गाथेत, 'पदेसरज्जं' (प्रादेशिक राज्य) म्हणजे संपूर्ण जंबुद्वीपासारख्या एका अखंड द्वीपाचे राज्य न मिळवता, पृथ्वीच्या एका विशिष्ट भागात किंवा प्रदेशात राज्य करणे होय. अधिपती असणे म्हणजेच ऐश्वर्य (ईश्वरभाव) होय; याने जंबुद्वीपातील चक्रवर्ती राजाचे सुख दर्शवले आहे. 'पियं' म्हणजे इष्ट, कांत आणि मनाप (प्रिय) असणारे चक्रवर्तीचे सुख होय. याने चारही महाद्वीपांवर राज्य करणाऱ्या चक्रवर्ती राजाचे सुख दर्शवले आहे. देवांचे राज्य म्हणजे 'देवरज्जं' (देवराज्य) होय; याद्वारे मान्धाता इत्यादी मनुष्यांचे देवलोकातील राज्य देखील दर्शवले आहे. 'अपि दिब्बेसु' (दिव्य लोकांमध्येही) या शब्दाने जे देवलोकात उत्पन्न झाले आहेत आणि ज्यांना 'दिव्य' म्हटले जाते, त्या दिव्य शरीरात उत्पन्न झालेल्यांचे देवराज्य देखील दर्शवले आहे. 'सब्बमेतेन लब्भति' (याने सर्व काही प्राप्त होते) म्हणजे 'ते ज्या ज्या गोष्टीची इच्छा करतात, ते सर्व याने प्राप्त होते' असे जे म्हटले आहे, त्या संदर्भात हे दुसरे वर्गीकरण असून, प्रादेशिक राज्यादी सर्व काही या (पुण्यरुपी) सुवर्णपात्राने प्राप्त होते, असे जाणावे हे दर्शवले आहे. เตรสมคาถาวณฺณนา तेराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण ๑๓. เอวมิมาย คาถาย ปุญฺญานุภาเวน ลภิตพฺพํ เทวมนุสฺสรชฺชสมฺปตฺตึ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ทฺวีหิ คาถาหิ วุตฺตํ สมฺปตฺตึ สมาสโต ปุรกฺขตฺวา นิพฺพานสมฺปตฺตึ ทสฺเสนฺโต ‘‘มานุสฺสิกา จ สมฺปตฺตี’’ติ อิมํ คาถมาห. १३. अशा प्रकारे, या गाथेद्वारे पुण्याच्या प्रभावाने प्राप्त होणारी देव आणि मनुष्यांच्या राज्याची संपत्ती दर्शवून, आता दोन गाथांमध्ये सांगितलेली संपत्ती संक्षेपाने समोर ठेवून, निर्वाण संपत्ती दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'मानुसिका च सम्पत्ति' ही गाथा म्हटली. ตสฺสายํ ปทวณฺณนา – มนุสฺสานํ อยนฺติ มานุสฺสี, มานุสฺสี เอว มานุสฺสิกา. สมฺปชฺชนํ สมฺปตฺติ. เทวานํ โลโก เทวโลโก. ตสฺมึ เทวโลเก. ยาติ อนวเสสปริยาทานํ, รมนฺติ เอตาย อชฺฌตฺตํ อุปฺปนฺนาย พหิทฺธา วา อุปกรณภูตายาติ รติ, สุขสฺส สุขวตฺถุโน เจตํ [Pg.195] อธิวจนํ. ยาติ อนิยตวจนํ จสทฺโท ปุพฺพสมฺปตฺติยา สห สมฺปิณฺฑนตฺโถ. นิพฺพานํเยว นิพฺพานสมฺปตฺติ. त्या गाथेचे पद-स्पष्टीकरण याप्रमाणे आहे – मनुष्यांची ती 'मानुस्सी' (मानुषी), मानुषी म्हणजेच 'मानुसिका' (मानुषिका) होय. समृद्ध होणे म्हणजेच 'संपत्ती' होय. देवांचा लोक म्हणजे 'देवलोक' होय. त्या देवलोकात. 'रति' म्हणजे ज्याच्याद्वारे देव पूर्णपणे रममाण होतात; ती रती अंतर्मनात (अध्यात्मत) उत्पन्न झालेली असू शकते किंवा बाह्य उपकरणांच्या स्वरूपात असू शकते. हे सुख आणि सुखाच्या साधनांचे (सुखवस्तूचे) नाव आहे. 'या' हे पद अनिश्चित वाचक आहे. 'च' हा शब्द मागील संपत्तीशी जोडण्याच्या अर्थाने आला आहे. निर्वाण म्हणजेच 'निर्वाण संपत्ती' होय. อยํ ปน อตฺถวณฺณนา – ยา เอสา ‘‘สุวณฺณตา’’ติอาทีหิ ปเทหิ มานุสฺสิกา จ สมฺปตฺติ เทวโลเก จ ยา รติ วุตฺตา, สา จ สพฺพา, ยา จายมปรา สทฺธานุสาริภาวาทิวเสน ปตฺตพฺพา นิพฺพานสมฺปตฺติ, สา จาติ อิทํ ตติยมฺปิ โอธิโส สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ. आणि हे अर्थ-स्पष्टीकरण याप्रमाणे आहे – 'सुवर्णता' इत्यादी पदांनी जी मानुषी संपत्ती आणि देवलोकातील जी रती (आनंद) सांगितली आहे, ती सर्व, आणि ही दुसरी, जी श्रद्धानुसारी अवस्था इत्यादींच्या द्वारे प्राप्त होणारी निर्वाण संपत्ती आहे, ती देखील; हे तिसरे वर्गीकरण असून, हे सर्व काही या (पुण्यरुपी) सुवर्णपात्राने प्राप्त होते. อถ วา ยา ปุพฺเพ สุวณฺณตาทีหิ อวุตฺตา ‘‘สูรา สติมนฺโต อิธ พฺรหฺมจริยวาโส’’ติ เอวมาทินา (อ. นิ. ๙.๒๑) นเยน นิทฺทิฏฺฐา ปญฺญาเวยฺยตฺติยาทิเภทา จ มานุสฺสิกา สมฺปตฺติ, อปรา เทวโลเก จ ยา ฌานาทิรติ, ยา จ ยถาวุตฺตปฺปการา นิพฺพานสมฺปตฺติ จาติ อิทมฺปิ ตติยํ โอธิโส สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ. เอวมฺเปตฺถ อตฺถวณฺณนา เวทิตพฺพา. किंवा दुसऱ्या प्रकारे, जी पूर्वी 'सुवर्णता' इत्यादींद्वारे सांगितली गेली नाही, परंतु 'शूर, स्मृतिमान आणि येथे ब्रह्मचर्यवास' इत्यादी पद्धतीने दर्शवली गेली आहे, अशी प्रज्ञा, नैपुण्य इत्यादी भेदांनी युक्त मानुषी संपत्ती, आणि दुसरी देवलोकातील जी ध्यानादी रती (ध्यानाचा आनंद) आहे, आणि जी वर सांगितलेल्या प्रकारची निर्वाण संपत्ती आहे, ती देखील; हे तिसरे वर्गीकरण असून, हे सर्व काही या (पुण्यरुपी) सुवर्णपात्राने प्राप्त होते. अशा प्रकारे देखील येथील अर्थ-स्पष्टीकरण जाणावे. จุทฺทสมคาถาวณฺณนา चौदाव्या गाथेचे स्पष्टीकरण ๑๔. เอวมิมาย คาถาย ปุญฺญานุภาเวน ลภิตพฺพํ สทฺธานุสารีภาวาทิวเสน ปตฺตพฺพํ นิพฺพานสมฺปตฺติมฺปิ ทสฺเสตฺวา อิทานิ เตวิชฺชอุภโตภาควิมุตฺตภาววเสนปิ ปตฺตพฺพํ ตเมว ตสฺส อุปายญฺจ ทสฺเสนฺโต ‘‘มิตฺตสมฺปทมาคมฺมา’’ติ อิมํ คาถมาห. १४. अशा प्रकारे, या गाथेद्वारे पुण्याच्या प्रभावाने प्राप्त होणारी आणि श्रद्धानुसारी अवस्था इत्यादींच्या द्वारे मिळणारी निर्वाण संपत्ती देखील दर्शवून, आता त्रिविद्या (तेविज्ज) आणि उभतोभागविमुक्त अवस्थेच्या द्वारे प्राप्त होणारी संपत्ती आणि त्याचाच उपाय दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'मित्तसम्पदमागम्म' ही गाथा म्हटली. ตสฺสายํ ปทวณฺณนา – สมฺปชฺชติ เอตาย คุณวิภูตึ ปาปุณาตีติ สมฺปทา, มิตฺโต เอว สมฺปทา มิตฺตสมฺปทา, ตํ มิตฺตสมฺปทํ. อาคมฺมาติ นิสฺสาย. โยนิโสติ อุปาเยน. ปยุญฺชโตติ โยคานุฏฺฐานํ กโรโต. วิชานาติ เอตายาติ วิชฺชา, วิมุจฺจติ เอตาย, สยํ วา วิมุจฺจตีติ วิมุตฺติ, วิชฺชา จ วิมุตฺติ จ วิชฺชาวิมุตฺติโย, วิชฺชาวิมุตฺตีสุ วสีภาโว วิชฺชาวิมุตฺติวสีภาโว. त्या गाथेचे पद-स्पष्टीकरण याप्रमाणे आहे – जिच्याद्वारे गुणांची समृद्धी प्राप्त होते ती 'संपदा' होय. मित्र हाच संपदा म्हणजे 'मित्रसंपदा' (कल्याणमित्र लाभणे) होय, त्या मित्रसंपदेला. 'आगम्म' म्हणजे आश्रय घेऊन. 'योनिसो' म्हणजे योग्य उपायाने. 'पयुञ्जतो' म्हणजे सतत प्रयत्न करणाऱ्यासाठी. 'विज्जा' (विद्या) म्हणजे जिच्याद्वारे जाणले जाते ती होय. 'विमुक्ती' म्हणजे जिच्याद्वारे विमुक्त होते किंवा जी स्वतःच विमुक्त होते ती होय. विद्या आणि विमुक्ती म्हणजे 'विद्या-विमुक्ती' होय. विद्या आणि विमुक्तीमध्ये वशित्व (प्रभुत्व) असणे म्हणजेच 'विद्या-विमुक्ती-वशित्व' होय. อยํ ปน อตฺถวณฺณนา – ยฺวายํ มิตฺตสมฺปทมาคมฺม สตฺถารํ วา อญฺญตรํ วา ครุฏฺฐานิยํ สพฺรหฺมจารึ นิสฺสาย ตโต โอวาทญฺจ อนุสาสนิญฺจ คเหตฺวา ยถานุสิฏฺฐํ ปฏิปตฺติยา โยนิโส ปยุญฺชโต ปุพฺเพนิวาสาทีสุ ตีสุ วิชฺชาสุ ‘‘ตตฺถ กตมา วิมุตฺติ? จิตฺตสฺส จ อธิมุตฺติ นิพฺพานญฺจา’’ติ (ธ. ส. ๑๓๘๑) เอวํ อาคตาย อฏฺฐสมาปตฺตินิพฺพานเภทาย วิมุตฺติยา จ ตถา ตถา อทนฺธายิตตฺเตน [Pg.196] วสีภาโว, อิทมฺปิ จตุตฺถํ โอธิโส สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ. आणि हे अर्थ-स्पष्टीकरण याप्रमाणे आहे – जो कोणी या मित्रसंपदेचा आश्रय घेऊन, शास्त्यांचा (बुद्धांचा) किंवा इतर कोणत्याही आदरणीय सब्रह्मचाऱ्याचा आश्रय घेऊन, त्यांच्याकडून उपदेश आणि अनुशासने ग्रहण करून, उपदेशानुसार आचरण करत योग्य प्रकारे प्रयत्न करतो, त्याला पूर्वनिवासज्ञान इत्यादी तीन विद्यांमध्ये, 'तेथे विमुक्ती कोणती? चित्ताची विमुक्ती आणि निर्वाण' अशा प्रकारे आलेल्या, आठ समापत्ती आणि निर्वाण अशा प्रकारच्या विमुक्तीमध्ये, त्या त्या प्रकारे विनाविलंब वशित्व (प्रभुत्व) प्राप्त होते. हे चौथे वर्गीकरण असून, हे सर्व काही या (पुण्यरुपी) सुवर्णपात्राने प्राप्त होते. ปนฺนรสมคาถาวณฺณนา पंधराव्या गाथेचे स्पष्टीकरण ๑๕. เอวมิมาย คาถาย ปุพฺเพ กถิตวิชฺชาวิมุตฺติวสีภาวภาคิยปุญฺญานุภาเวน ลภิตพฺพํ เตวิชฺชอุภโตภาควิมุตฺตภาววเสนปิ ปตฺตพฺพํ นิพฺพานสมฺปตฺตึ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ยสฺมา วิชฺชาวิมุตฺติวสีภาวปฺปตฺตา เตวิชฺชา อุภโตภาควิมุตฺตาปิ สพฺเพ ปฏิสมฺภิทาทิคุณวิภูตึ ลภนฺติ, อิมาย ปุญฺญสมฺปทาย จ ตสฺสา คุณวิภูติยา ปทฏฺฐานวเสน ตถา ตถา สาปิ ลพฺภติ, ตสฺมา ตมฺปิ ทสฺเสนฺโต ‘‘ปฏิสมฺภิทา วิโมกฺขา จา’’ติ อิมํ คาถมาห. १५. अशा प्रकारे, या गाथेद्वारे पूर्वी सांगितलेल्या विद्या-विमुक्ती-वशित्वाच्या भागातील पुण्याच्या प्रभावाने प्राप्त होणारी, आणि त्रिविद्या व उभतोभागविमुक्त अवस्थेच्या द्वारे देखील प्राप्त होणारी निर्वाण संपत्ती दर्शवून, आता ज्याअर्थी विद्या-विमुक्ती-वशित्व प्राप्त झालेले, त्रिविद्यायुक्त आणि उभतोभागविमुक्त असलेले सर्व जण प्रतिसंभिदा इत्यादी गुणांची समृद्धी प्राप्त करतात, आणि या पुण्यसंपदेमुळे व त्या गुणांच्या समृद्धीच्या जवळच्या कारणामुळे (पदस्थान) त्या त्या प्रकारे ती देखील प्राप्त होते, म्हणून ते देखील दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी 'पटिसम्भिदा विमोक्खा च' ही गाथा म्हटली. ‘‘ยโต สมฺมา กเตน ยา จายํ ธมฺมตฺถนิรุตฺติปฏิภาเนสุ ปเภทคตา ปญฺญา ปฏิสมฺภิทา’’ติ วุจฺจติ, เย จิเม ‘‘รูปี รูปานิ ปสฺสตี’’ติอาทินา (ที. นิ. ๒.๑๒๙; ๓.๓๓๙) นเยน อฏฺฐ วิโมกฺขา, ยา จายํ ภควโต สาวเกหิ ปตฺตพฺพา สาวกสมฺปตฺติสาธิกา สาวกปารมี, ยา จ สยมฺภุภาวสาธิกา ปจฺเจกโพธิ, ยา จ สพฺพสตฺตุตฺตมภาวสาธิกา พุทฺธภูมิ, อิทมฺปิ ปญฺจมํ โอธิโส สพฺพเมเตน ลพฺภตีติ เวทิตพฺพํ. ज्याअर्थी चांगल्या प्रकारे केलेल्या (पुण्यामुळे), धर्म, अर्थ, निरुक्ती आणि प्रतिभान यांमध्ये विभागलेली जी प्रज्ञा आहे, तिला 'प्रतिसंभिदा' (पटिसम्भिदा) म्हटले जाते, आणि जे 'रूपी रूपांना पाहतो' इत्यादी पद्धतीने सांगितलेले आठ विमोक्ष आहेत, आणि भगवंतांच्या श्रावकांद्वारे प्राप्त केली जाणारी, श्रावक-संपत्ती सिद्ध करणारी जी 'श्रावकपारमी' (श्रावक-पारमिता ज्ञान) आहे, आणि स्वयंभू अवस्था सिद्ध करणारी जी 'प्रत्येकबोधी' (पच्चेकबोधी) आहे, आणि सर्व प्राण्यांमध्ये श्रेष्ठ अवस्था सिद्ध करणारी जी 'बुद्धभूमी' (सर्वज्ञता ज्ञान) आहे; हे पाचवे वर्गीकरण असून, हे सर्व काही या (पुण्यरुपी) सुवर्णपात्राने प्राप्त होते, असे जाणावे. โสฬสมคาถาวณฺณนา सोळाव्या गाथेचे स्पष्टीकरण ๑๖. เอวํ ภควา ยํ ตํ ‘‘ยํ ยเทวาภิปตฺเถนฺติ, สพฺพเมเตน ลพฺภตี’’ติ วุตฺตํ, ตํ อิมาหิ ปญฺจหิ คาถาหิ โอธิโส โอธิโส ทสฺเสตฺวา อิทานิ สพฺพเมวิทํ สพฺพกามททนิธิสญฺญิตํ ปุญฺญสมฺปทํ ปสํสนฺโต ‘‘เอวํ มหตฺถิกา เอสา’’ติ อิมาย คาถาย เทสนํ นิฏฺฐเปสิ. १६. अशा प्रकारे भगवंतांनी, 'ते ज्या ज्या गोष्टीची इच्छा करतात, ते सर्व याने प्राप्त होते' असे जे म्हटले होते, ते या पाच गाथांद्वारे वेगवेगळ्या वर्गीकरणानुसार दर्शवून, आता सर्व इच्छा पूर्ण करणारे सुवर्णपात्र (निधी) म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या या सर्व पुण्यसंपदेची प्रशंसा करत, 'एवं महत्थिका एसा' या गाथेने देशनेची समाप्ती केली. ตสฺสายํ ปทวณฺณนา – เอวนฺติ อตีตตฺถนิทสฺสนํ. มหนฺโต อตฺโถ อสฺสาติ มหตฺถิกา, มหโต อตฺถาย สํวตฺตตีติ วุตฺตํ โหติ, มหิทฺธิกาติปิ ปาโฐ. เอสาติ อุทฺเทสวจนํ, เตน ‘‘ยสฺส ทาเนน สีเลนา’’ติ อิโต ปภุติ ยาว ‘‘กยิราถ ธีโร ปุญฺญานี’’ติ วุตฺตํ ปุญฺญสมฺปทํ อุทฺทิสติ. ยทิทนฺติ อภิมุขกรณตฺเถ นิปาโต, เตน เอสาติ อุทฺทิฏฺฐํ นิทฺทิสิตุํ ยา เอสาติ อภิมุขํ กโรติ. ปุญฺญานํ สมฺปทา ปุญฺญสมฺปทา[Pg.197]. ตสฺมาติ การณวจนํ. ธีราติ ธิติมนฺโต. ปสํสนฺตีติ วณฺณยนฺติ. ปณฺฑิตาติ ปญฺญาสมฺปนฺนา. กตปุญฺญตนฺติ กตปุญฺญภาวํ. त्या गाथेचे पद-स्पष्टीकरण याप्रमाणे आहे – 'एवं' हे पद पूर्वी सांगितलेल्या अर्थाला दर्शवणारे आहे. जिचा मोठा लाभ (अर्थ) आहे ती 'महत्यिका' (महत्थिका) होय; मोठ्या कल्याणासाठी ती कारणीभूत ठरते, असा याचा अर्थ आहे. 'महिद्धिका' (महान ऋद्धियुक्त) असाही पाठ आढळतो. 'एसा' हे निर्देश करणारे पद आहे; याद्वारे 'ज्याच्या दानाने, शीलाने' इथपासून ते 'धैर्यवानाने पुण्य करावे' इथपर्यंत सांगितलेल्या पुण्यसंपदेचा निर्देश केला आहे. 'यदिदं' हा संमुख (समोर) करण्याच्या अर्थातील निपात आहे; याद्वारे 'एसा' असे जे निर्देशित केले आहे, ते स्पष्ट करण्यासाठी 'जी ही' असे संमुख केले जाते. पुण्याची समृद्धी म्हणजेच 'पुण्यसंपदा' (पुञ्ञसम्पदा) होय. 'तस्मा' हे कारण दर्शवणारे पद आहे. 'धीरा' म्हणजे धैर्यवान होय. 'पसंसन्ति' म्हणजे प्रशंसा करतात. 'पण्डिता' म्हणजे प्रज्ञासंपन्न होय. 'कतपुञ्ञतं' म्हणजे पुण्य केलेले असण्याची अवस्था (कृतपुण्यता) होय. อยํ ปน อตฺถวณฺณนา – อิติ ภควา สุวณฺณตาทึ พุทฺธภูมิปริโยสานํ ปุญฺญสมฺปทานุภาเวน อธิคนฺตพฺพมตฺถํ วณฺณยิตฺวา อิทานิ ตเมวตฺถํ สมฺปิณฺเฑตฺวา ทสฺเสนฺโต เตเนวตฺเถน ยถาวุตฺตปฺปการาย ปุญฺญสมฺปทาย มหตฺถิกตฺตํ ถุนนฺโต อาห – เอวํ มหโต อตฺถสฺส อาวหเนน มหตฺถิกา เอสา, ยทิทํ มยา ‘‘ยสฺส ทาเนน สีเลนา’’ติอาทินา นเยน เทสิตา ปุญฺญสมฺปทา, ตสฺมา มาทิสา สตฺตานํ หิตสุขาวหาย ธมฺมเทสนาย อกิลาสุตาย ยถาภูตคุเณน จ ธีรา ปณฺฑิตา ‘‘อสาธารณมญฺเญสํ, อโจราหรโณ นิธี’’ติอาทีหิ อิธ วุตฺเตหิ จ, อวุตฺเตหิ จ ‘‘มา, ภิกฺขเว, ปุญฺญานํ ภายิตฺถ, สุขสฺเสตํ, ภิกฺขเว, อธิวจนํ, ยทิทํ ปุญฺญานี’’ติอาทีหิ (อ. นิ. ๗.๖๒; อิติวุ. ๒๒; เนตฺติ. ๑๒๑) วจเนหิ อเนกาการโวการํ กตปุญฺญตํ ปสํสนฺติ, น ปกฺขปาเตนาติ. ही तर अर्थाची स्पष्टीकरण (अर्थवर्णना) आहे – अशा प्रकारे भगवान बुद्धांनी सुवर्णता (सुंदर वर्ण) इत्यादीपासून सुरू होऊन बुद्धत्वाच्या प्राप्तीपर्यंत पुण्यसंपदेच्या प्रभावाने प्राप्त होणाऱ्या कल्याणाची (अर्थाची) प्रशंसा केली. आता तोच अर्थ एकत्रित करून दाखवताना आणि त्याच अर्थाने पूर्वोक्त प्रकारच्या पुण्यसंपदेच्या महान फलदायी असण्याची (महानिधीची) प्रशंसा करताना ते म्हणाले – अशा प्रकारे महान कल्याणाचे वहन करणारी ही पुण्यसंपदा अत्यंत फलदायी आहे, जी माझ्याद्वारे 'यस्स दानेन सीलेन' (ज्याच्या दान आणि शीलाने) इत्यादी पद्धतीने उपदेशिली गेली आहे. म्हणून माझ्यासारखे (बुद्ध) प्राण्यांच्या हित आणि सुखासाठी धम्मदेशना देण्यामध्ये आळस न करता, यथार्थ गुणाने युक्त असलेले धीर आणि पंडित लोक, 'हा इतरांसाठी असाधारण असलेला आणि चोरांना चोरता न येणारा निधी आहे' इत्यादी येथे सांगितलेल्या वचनांद्वारे, तसेच येथे न सांगितलेल्या 'भिक्खूहो, पुण्याचे भय बाळगू नका, कारण पुण्य हे सुखाचेच दुसरे नाव आहे' इत्यादी वचनांद्वारे अनेक प्रकारे केलेल्या पुण्याची प्रशंसा करतात, पक्षपाताने नव्हे. เทสนาปริโยสาเน โส อุปาสโก พหุชเนน สทฺธึ โสตาปตฺติผเล ปติฏฺฐาสิ, รญฺโญ จ ปเสนทิโกสลสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา เอตมตฺถํ อาโรเจสิ, ราชา อติวิย ตุฏฺโฐ หุตฺวา ‘‘สาธุ, คหปติ, สาธุ โข ตฺวํ, คหปติ, มาทิเสหิปิ อนาหรณียํ นิธึ นิเธสี’’ติ สํราเธตฺวา มหตึ ปูชมกาสีติ. देशनेच्या समाप्तीनंतर तो उपासक अनेक लोकांसह सोतापत्ती फलावर प्रतिष्ठित झाला. त्याने राजा प्रसेनजित कोसलाच्या जवळ जाऊन ही गोष्ट सांगितली. राजा अत्यंत संतुष्ट झाला आणि म्हणाला, 'साधू, गृहपती! खूप छान, गृहपती! तू माझ्यासारख्या राजांनाही हिरावून घेता येणार नाही असा (पुण्यरुपी) निधी साठवला आहेस,' असे म्हणून त्याने त्याचा गौरव केला आणि मोठी पूजा (सत्कार) केली. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेमध्ये นิธิกณฺฑสุตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. निधिकण्डसुत्त-वर्णना (स्पष्टीकरण) समाप्त झाली. ๙. เมตฺตสุตฺตวณฺณนา ९. मेत्तसुत्त-वर्णना (मैत्री सूत्राचे स्पष्टीकरण) นิกฺเขปปฺปโยชนํ सूत्राच्या स्थापनेचे (मांडणीचे) प्रयोजन อิทานิ นิธิกณฺฑานนฺตรํ นิกฺขิตฺตสฺส เมตฺตสุตฺตสฺส วณฺณนากฺกโม อนุปฺปตฺโต. ตสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ วตฺวา ตโต ปรํ – आता निधिकण्ड सुत्तानंतर ठेवलेल्या मेत्तसुत्ताच्या (मैत्री सूत्राच्या) स्पष्टीकरणाचा क्रम प्राप्त झाला आहे. त्याचे येथे स्थापनेचे प्रयोजन सांगून त्यानंतर – ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจเตส ทีปนา; นิทานํ โสธยิตฺวาสฺส, กริสฺสามตฺถวณฺณนํ’’. “ज्यांच्याद्वारे, जेव्हा, जेथे आणि ज्या कारणासाठी हे (सुत्त) सांगितले गेले, त्या सर्वांचे स्पष्टीकरण करून, या सूत्राचे निदान (पार्श्वभूमी) शुद्ध करून आम्ही त्याची अर्थवर्णना (स्पष्टीकरण) करू.” ตตฺถ [Pg.198] ยสฺมา นิธิกณฺเฑน ทานสีลาทิปุญฺญสมฺปทา วุตฺตา, สา จ สตฺเตสุ เมตฺตาย กตาย มหปฺผลา โหติ ยาว พุทฺธภูมึ ปาเปตุํ สมตฺถา, ตสฺมา ตสฺสา ปุญฺญสมฺปทาย อุปการทสฺสนตฺถํ, ยสฺมา วา สรเณหิ สาสเน โอตริตฺวา สิกฺขาปเทหิ สีเล ปติฏฺฐิตานํ ทฺวตฺตึสากาเรน ราคปฺปหานสมตฺถํ, กุมารปญฺเหน โมหปฺปหานสมตฺถญฺจ กมฺมฏฺฐานํ ทสฺเสตฺวา, มงฺคลสุตฺเตน ตสฺส ปวตฺติยา มงฺคลภาโว อตฺตรกฺขา จ, รตนสุตฺเตน ตสฺสานุรูปา ปรรกฺขา, ติโรกุฏฺเฏน รตฺตนสุตฺเต วุตฺตภูเตสุ เอกจฺจภูตทสฺสนํ วุตฺตปฺปการาย ปุญฺญสมฺปตฺติยา ปมชฺชนฺตานํ วิปตฺติ จ, นิธิกณฺเฑน ติโรกุฏฺเฏ วุตฺตวิปตฺติปฏิปกฺขภูตา สมฺปตฺติ จ ทสฺสิตา, โทสปฺปหานสมตฺถํ ปน กมฺมฏฺฐานํ อทสฺสิตเมว, ตสฺมา ตํ โทสปฺปหานสมตฺถํ กมฺมฏฺฐานํ ทสฺเสตุํ อิทํ เมตฺตสุตฺตํ อิธ นิกฺขิตฺตํ. เอวญฺหิ สุปริปูโร โหติ ขุทฺทกปาโฐติ อิทมสฺส อิธ นิกฺเขปปฺปโยชนํ. त्यामध्ये, ज्याअर्थी निधिकण्ड सुत्ताद्वारे दान, शील इत्यादी पुण्यसंपदा सांगितली गेली आहे, आणि ती पुण्यसंपदा प्राण्यांवर मैत्री केल्यास बुद्धत्वाच्या प्राप्तीपर्यंत पोहोचवण्यास समर्थ असणारी आणि महाफलदायी ठरते, म्हणून त्या पुण्यसंपदेचे साहाय्य दाखवण्यासाठी; किंवा ज्याअर्थी शरणगमनाद्वारे धम्मामध्ये प्रवेश करून आणि शिक्षापदांद्वारे शीलामध्ये प्रतिष्ठित झालेल्यांना, 'द्वत्तिंसाकार' (३२ शारीरिक अवयवांचे ध्यान) द्वारे रागाचा नाश करण्यास समर्थ असलेले कम्मट्ठान (ध्यानपद्धती) आणि 'कुमारपन्हा' द्वारे मोहाचा नाश करण्यास समर्थ असलेले कम्मट्ठान दाखवून; 'मंगलसुत्ता'द्वारे त्याच्या प्रवृत्तीचा मंगलभाव आणि आत्मरक्षण दाखवले आहे; 'रतनसुत्ता'द्वारे त्याला अनुरूप असे पररक्षण (इतरांचे रक्षण) दाखवले आहे; 'तिरोकुड्डसुत्ता'द्वारे रतनसुत्तात सांगितलेल्या भूतांपैकी (प्राण्यांपैकी) काही भूतांचे दर्शन आणि पूर्वोक्त प्रकारच्या पुण्यसंपत्तीमध्ये प्रमाद करणाऱ्यांची विपत्ती दाखवली आहे; आणि 'निधिकण्डसुत्ता'द्वारे तिरोकुड्ड सुत्तात सांगितलेल्या विपत्तीच्या विरुद्ध असणारी संपत्ती दाखवली आहे; परंतु द्वेषाचा नाश करण्यास समर्थ असलेले कम्मट्ठान मात्र दाखवले गेले नव्हते. म्हणून द्वेषाचा नाश करण्यास समर्थ असलेले ते कम्मट्ठान दाखवण्यासाठी हे 'मेत्तसुत्त' येथे ठेवले गेले आहे. अशा प्रकारे खुद्दकपाठ ग्रंथ पूर्णपणे परिपूर्ण होतो. हेच त्याचे येथे स्थापनेचे प्रयोजन आहे. นิทานโสธนํ निदान-शोधन (पार्श्वभूमीचे स्पष्टीकरण) อิทานิ ยายํ – आता जी ही – ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจเตส ทีปนา; นิทานํ โสธยิตฺวาสฺส, กริสฺสามตฺถวณฺณน’’นฺติ. – “ज्यांच्याद्वारे, जेव्हा, जेथे आणि ज्या कारणासाठी हे सांगितले गेले, त्या सर्वांचे स्पष्टीकरण करून, या सूत्राचे निदान शुद्ध करून आम्ही त्याची अर्थवर्णना करू” – มาติกา นิกฺขิตฺตา, ตตฺถ อิทํ เมตฺตสุตฺตํ ภควตาว วุตฺตํ, น สาวกาทีหิ, ตญฺจ ปน ยทา หิมวนฺตปสฺสโต เทวตาหิ อุพฺพาฬฺหา ภิกฺขู ภควโต สนฺติกํ อาคตา, ตทา สาวตฺถิยํ เตสํ ภิกฺขูนํ ปริตฺตตฺถาย กมฺมฏฺฐานตฺถาย จ วุตฺตนฺติ เอวํ ตาว สงฺเขปโต เอเตสํ ปทานํ ทีปนา นิทานโสธนา เวทิตพฺพา. अशी जी मातृका (उद्देश) मांडली आहे, त्यामध्ये हे मेत्तसुत्त स्वतः भगवंतांनीच सांगितले आहे, श्रावकांनी (शिष्यांनी) इत्यादींनी नाही. आणि जेव्हा हिमालयाच्या पायथ्याशी राहणाऱ्या देवतांकडून त्रास दिले गेलेले भिक्खू भगवंतांच्या जवळ आले, तेव्हा भगवंतांनी सावत्थी येथे त्या भिक्खूंच्या संरक्षणासाठी (परित्तासाठी) आणि कम्मट्ठानासाठी (ध्यानासाठी) हे सुत्त सांगितले. अशा प्रकारे संक्षेपाने या पदांचे स्पष्टीकरण आणि निदान-शोधन समजावे. วิตฺถารโต ปน เอวํ เวทิตพฺพา – เอกํ สมยํ ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ อุปกฏฺฐาย วสฺสูปนายิกาย, เตน โข ปน สมเยน สมฺพหุลา นานาเวรชฺชกา ภิกฺขู ภควโต สนฺติเก กมฺมฏฺฐานํ คเหตฺวา ตตฺถ ตตฺถ วสฺสํ อุปคนฺตุกามา ภควนฺตํ อุปสงฺกมนฺติ. ตตฺร สุทํ ภควา ราคจริตานํ สวิญฺญาณกอวิญฺญาณกวเสน เอกาทสวิธํ อสุภกมฺมฏฺฐานํ, โทสจริตานํ จตุพฺพิธํ เมตฺตาทิกมฺมฏฺฐานํ, โมหจริตานํ มรณสฺสติกมฺมฏฺฐานาทีนิ, วิตกฺกจริตานํ อานาปานสฺสติปถวีกสิณาทีนิ, สทฺธาจริตานํ พุทฺธานุสฺสติกมฺมฏฺฐานาทีนิ, พุทฺธิจริตานํ จตุธาตุววตฺถานาทีนีติ [Pg.199] อิมินา นเยน จตุราสีติสหสฺสปฺปเภทจริตานุกูลานิ กมฺมฏฺฐานานิ กเถติ. विस्ताराने तर ते असे समजावे – एक वेळ भगवान सावत्थी येथे विहार करत होते आणि वर्षावास जवळ आला होता. त्या वेळी वेगवेगळ्या देशांतून आलेले अनेक भिक्खू भगवंतांच्या जवळून कम्मट्ठान (ध्यानपद्धती) शिकून घेऊन, वेगवेगळ्या ठिकाणी वर्षावास घालवण्याच्या इच्छेने भगवंतांकडे आले. तेथे भगवंतांनी रागचरित (कामवासना प्रबळ असलेल्या) व्यक्तींसाठी सचेतन आणि अचेतन अशा दोन प्रकारांनी अकरा प्रकारचे अशुभाचे कम्मट्ठान सांगितले; द्वेषचरित (क्रोध प्रबळ असलेल्या) व्यक्तींसाठी चार प्रकारचे मैत्री इत्यादी कम्मट्ठान सांगितले; मोहचरित (अज्ञान प्रबळ असलेल्या) व्यक्तींसाठी मरणस्सती इत्यादी कम्मट्ठान सांगितले; वितर्कचरित (अतिविचार करणाऱ्या) व्यक्तींसाठी आनापानस्सती आणि पठवीकसिण इत्यादी कम्मट्ठान सांगितले; श्रद्धाचरित (श्रद्धाळू) व्यक्तींसाठी बुद्धानुस्सती इत्यादी कम्मट्ठान सांगितले; आणि बुद्धीचरित (बुद्धिमान) व्यक्तींसाठी चतुधातुववत्थान इत्यादी कम्मट्ठान सांगितले. या पद्धतीने त्यांनी चौऱ्याऐंशी हजार प्रकारच्या मानवी प्रवृत्तींना अनुकूल अशी कम्मट्ठाने सांगितली. อถ โข ปญฺจมตฺตานิ ภิกฺขุสตานิ ภควโต สนฺติเก กมฺมฏฺฐานํ อุคฺคเหตฺวา สปฺปายเสนาสนญฺจ โคจรคามญฺจ ปริเยสมานานิ อนุปุพฺเพน คนฺตฺวา ปจฺจนฺเต หิมวนฺเตน สทฺธึ เอกาพทฺธํ นีลกาจมณิสนฺนิภสิลาตลํ สีตลฆนจฺฉายนีลวนสณฺฑมณฺฑิตํ มุตฺตาชาลรชตปฏฺฏสทิสวาลุกากิณฺณภูมิภาคํ สุจิสาตสีตลชลาสยปริวาริตํ ปพฺพตมทฺทสํสุ. อถ เต ภิกฺขู ตตฺเถกรตฺตึ วสิตฺวา ปภาตาย รตฺติยา สรีรปริกมฺมํ กตฺวา ตสฺส อวิทูเร อญฺญตรํ คามํ ปิณฺฑาย ปวิสึสุ. คาโม ฆนนิเวสนสนฺนิวิฏฺฐกุลสหสฺสยุตฺโต, มนุสฺสา เจตฺถ สทฺธา ปสนฺนา เต ปจฺจนฺเต ปพฺพชิตทสฺสนสฺส ทุลฺลภตาย ภิกฺขู ทิสฺวา เอว ปีติโสมนสฺสชาตา หุตฺวา เต ภิกฺขู โภเชตฺวา ‘‘อิเธว, ภนฺเต, เตมาสํ วสถา’’ติ ยาจิตฺวา ปญฺจ ปธานกุฏิสตานิ กาเรตฺวา ตตฺถ มญฺจปีฐปานียปริโภชนียฆฏาทีนิ สพฺพูปกรณานิ ปฏิยาเทสุํ. त्यानंतर सुमारे पाचशे भिक्खूंनी भगवंतांच्या जवळून कम्मट्ठान शिकून घेतले आणि अनुकूल असे राहण्याचे ठिकाण (सेनासन) व भिक्षेचे गाव (गोचरग्राम) शोधत शोधत, अनुक्रमे पुढे जात सीमावर्ती भागात हिमालयाशी जोडलेला, निळ्या काचमण्यासारखा शिळांचा पृष्ठभाग असलेला, शीतल व दाट सावली असलेल्या हिरव्यागार वनराईने सुशोभित असलेला, मोत्यांच्या जाळीसारख्या आणि चांदीच्या पट्टीसारख्या वाळूने पसरलेला जमिनीचा भाग असलेला, आणि स्वच्छ, मधुर व थंड पाण्याच्या जलाशयांनी वेढलेला एक पर्वत पाहिला. त्यानंतर त्या भिक्खूंनी तेथे एक रात्र मुक्काम केला आणि रात्र संपून सकाळ झाल्यावर प्रातर्विधी आटोपून, त्याच्या जवळच असलेल्या एका गावात भिक्षेसाठी प्रवेश केला. ते गाव दाट वस्ती असलेले आणि सुमारे एक हजार कुटुंबे राहणारे होते. तेथील लोक श्रद्धाळू आणि प्रसन्न मनाचे होते. सीमावर्ती भागात प्रव्रजितांचे दर्शन दुर्मिळ असल्यामुळे, भिक्खूंना पाहताच ते अत्यंत आनंदित व प्रसन्न झाले. त्यांनी त्या भिक्खूंना भोजन दिले आणि 'भंते, आपण येथेच तीन महिने (वर्षावास) राहावे' अशी विनंती केली. त्यांनी पाचशे ध्यानकुटी बांधून दिल्या आणि तेथे खाटा, पाट, पिण्याचे पाणी, वापरण्याचे पाणी, भांडी इत्यादी सर्व आवश्यक साहित्य उपलब्ध करून दिले. ภิกฺขู ทุติยทิวเส อญฺญํ คามํ ปิณฺฑาย ปวิสึสุ. ตตฺถปิ มนุสฺสา ตเถว อุปฏฺฐหิตฺวา วสฺสาวาสํ ยาจึสุ. ภิกฺขู ‘‘อสติ อนฺตราเย’’ติ อธิวาเสตฺวา ตํ วนสณฺฑํ ปวิสิตฺวา สพฺพรตฺตินฺทิวํ อารทฺธวีริยา ยามฆณฺฑิกํ โกฏฺเฏตฺวา โยนิโสมนสิการพหุลา วิหรนฺตา รุกฺขมูลานิ อุปคนฺตฺวา นิสีทึสุ. สีลวนฺตานํ ภิกฺขูนํ เตเชน วิหตเตชา รุกฺขเทวตา อตฺตโน อตฺตโน วิมานา โอรุยฺห ทารเก คเหตฺวา อิโต จิโต วิจรนฺติ. เสยฺยถาปิ นาม ราชูหิ วา ราชมหามตฺเตหิ วา คามกาวาสํ คเตหิ คามวาสีนํ ฆเรสุ โอกาเส คหิเต ฆรมนุสฺสกา ฆรา นิกฺขมิตฺวา อญฺญตฺร วสนฺตา ‘‘กทา นุ คมิสฺสนฺตี’’ติ ทูรโตว โอโลเกนฺติ, เอวเมว เทวตา อตฺตโน อตฺตโน วิมานานิ ฉฑฺเฑตฺวา อิโต จิโต จ วิจรนฺติโย ทูรโตว โอโลเกนฺติ ‘‘กทา นุ ภทนฺตา คมิสฺสนฺตี’’ติ. ตโต เอวํ สมจินฺเตสุํ ‘‘ปฐมวสฺสูปคตา ภิกฺขู อวสฺสํ เตมาสํ วสิสฺสนฺติ, มยํ ปน ตาว จิรํ ทารเก คเหตฺวา โอกฺกมฺม วสิตุํ น สกฺโกม, หนฺท มยํ ภิกฺขูนํ ภยานกํ อารมฺมณํ ทสฺเสมา’’ติ. ตา รตฺตึ ภิกฺขูนํ สมณธมฺมกรณเวลาย ภึสนกานิ ยกฺขรูปานิ นิมฺมินิตฺวา ปุรโต [Pg.200] ปุรโต ติฏฺฐนฺติ, เภรวสทฺทญฺจ กโรนฺติ. ภิกฺขูนํ ตานิ รูปานิ ทิสฺวา ตญฺจ สทฺทํ สุตฺวา หทยํ ผนฺทิ, ทุพฺพณฺณา จ อเหสุํ อุปฺปณฺฑุปฺปณฺฑุกชาตา. เตน เต ภิกฺขู จิตฺตํ เอกคฺคํ กาตุํ นาสกฺขึสุ, เตสํ อเนกคฺคจิตฺตานํ ภเยน จ ปุนปฺปุนํ สํวิคฺคานํ สติ สมฺมุสฺสิ, ตโต เตสํ มุฏฺฐสตีนํ ทุคฺคนฺธานิ อารมฺมณานิ ปโยเชสุํ, เตสํ เตน ทุคฺคนฺเธน นิมฺมถิยมานมิว มตฺถลุงฺคํ อโหสิ, คาฬฺหา สีสเวทนา อุปฺปชฺชึสุ, น จ ตํ ปวตฺตึ อญฺญมญฺญสฺส อาโรเจสุํ. दुसऱ्या दिवशी भिक्खू भिक्षेसाठी दुसऱ्या गावात शिरले. तेथेही लोकांनी त्याचप्रमाणे त्यांची सेवा-शुश्रूषा करून वर्षावासाची विनंती केली. भिक्खूंनी "कोणताही अडथळा नसल्यास राहू" असे म्हणून ती विनंती स्वीकारली आणि त्या वनखंडात प्रवेश केला. तेथे रात्रंदिवस दृढ वीर्य (प्रयत्न) करून, प्रहराची घंटा वाजवून, योग्य प्रकारे मनन (योनिशो मनसिकार) करत विहार करत असताना, ते वृक्षांच्या मुळाशी जाऊन बसले. शीलवान भिक्खूंच्या तेजाने निष्प्रभ झालेल्या वृक्षदेवता आपापल्या विमानांतून (वृक्षांवरील निवासस्थानांतून) खाली उतरल्या आणि आपल्या मुलांना घेऊन इकडेतिकडे फिरू लागल्या. ज्याप्रमाणे राजे किंवा राजमहामात्र (मोठे अधिकारी) एखाद्या लहान गावात आले असता, त्यांनी गावकर्यांच्या घरांमध्ये जागा घेतल्यावर, घरातील लोक घरातून बाहेर पडून दुसऱ्या ठिकाणी राहतात आणि "ते कधी जातील?" असे दुरूनच पाहत राहतात; त्याचप्रमाणे त्या देवता आपापली विमाने सोडून इकडेतिकडे फिरत दुरूनच पाहत राहिल्या की, "हे भदंत (पूजनीय भिक्खू) कधी जातील?" त्यानंतर त्यांनी असा विचार केला, "पहिल्या वर्षावासाला बसलेले हे भिक्खू नक्कीच तीन महिने येथे राहतील. पण आम्ही एवढा मोठा काळ मुलांना घेऊन विमानाबाहेर राहू शकत नाही. चला, आपण भिक्खूंना एखादे भयानक दृश्य (आलंबन) दाखवू या." त्यांनी रात्रीच्या वेळी भिक्खूंच्या श्रमणधर्म (साधना) करण्याच्या वेळी भयानक यक्षांची रूपे निर्माण करून त्यांच्या समोर उभी केली आणि भयानक आवाजही केले. भिक्खूंनी ती रूपे पाहून आणि तो आवाज ऐकून त्यांचे हृदय धडधडू लागले, ते निस्तेज झाले आणि त्यांचे शरीर फिकट पडले. त्यामुळे ते भिक्खू आपले चित्त एकाग्र करू शकले नाहीत. वारंवार भयभीत झालेल्या आणि चित्त विचलित झालेल्या त्या भिक्खूंची स्मृती (सती) नष्ट झाली. त्यानंतर स्मृती गमावलेल्या त्या भिक्खूंच्या समोर त्यांनी दुर्गंधीयुक्त आलंबने निर्माण केली. त्या दुर्गंधीने जणू त्यांचे मेंदू पिळून निघत आहेत असे त्यांना वाटले आणि त्यांना तीव्र डोकेदुखी सुरू झाली. परंतु त्यांनी ही हकीकत एकमेकांना सांगितली नाही. อเถกทิวสํ สงฺฆตฺเถรสฺส อุปฏฺฐานกาเล สพฺเพสุ สนฺนิปติเตสุ สงฺฆตฺเถโร ปุจฺฉิ ‘‘ตุมฺหากํ, อาวุโส, อิมํ วนสณฺฑํ ปวิฏฺฐานํ กติปาหํ อติวิย ปริสุทฺโธ ฉวิวณฺโณ อโหสิ ปริโยทาโต, วิปฺปสนฺนานิ จ อินฺทฺริยานิ, เอตรหิ ปนตฺถ กิสา ทุพฺพณฺณา อุปฺปณฺฑุปฺปณฺฑุกชาตา, กึ โว อิธ อสปฺปาย’’นฺติ. ตโต เอโก ภิกฺขุ อาห – ‘‘อหํ, ภนฺเต, รตฺตึ อีทิสญฺจ อีทิสญฺจ เภรวารมฺมณํ ปสฺสามิ จ สุณามิ จ, อีทิสญฺจ คนฺธํ ฆายามิ, เตน เม จิตฺตํ น สมาธิยตี’’ติ, เอเตเนว อุปาเยน สพฺเพว เต ตํ ปวตฺตึ อาโรเจสุํ. สงฺฆตฺเถโร อาห – ‘‘ภควตา, อาวุโส, ทฺเว วสฺสูปนายิกา ปญฺญตฺตา, อมฺหากญฺจ อิทํ เสนาสนํ อสปฺปายํ, อายามาวุโส, ภควโต สนฺติกํ คนฺตฺวา อญฺญํ สปฺปายเสนาสนํ ปุจฺฉามา’’ติ. ‘‘สาธุ, ภนฺเต’’ติ เต ภิกฺขู เถรสฺส ปฏิสฺสุณิตฺวา สพฺเพว เสนาสนํ สํสาเมตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย อนุปลิตฺตตฺตา กุเลสุ กญฺจิ อนามนฺเตตฺวา เอว เยน สาวตฺถิ เตน จาริกํ ปกฺกมึสุ. อนุปุพฺเพน สาวตฺถึ คนฺตฺวา ภควโต สนฺติกํ อาคมึสุ. त्यानंतर एका दिवशी, संघस्थविरांच्या उपस्थानाच्या (सेवेच्या) वेळी सर्व भिक्खू एकत्र जमले असता संघस्थविरांनी विचारले, "हे आवुसो (बंधूंनो), या वनखंडात प्रवेश केल्यानंतर काही दिवस तुमची त्वचा अत्यंत शुद्ध, उजळ आणि इंद्रिये प्रसन्न होती. परंतु आता तुम्ही कृश, निस्तेज आणि फिकट का पडला आहात? तुम्हाला येथे काही असुविधा आहे का?" तेव्हा एका भिक्खूने सांगितले, "भंते, रात्रीच्या वेळी मी अशा अशा प्रकारची भयानक दृश्ये पाहतो व ऐकतो, आणि अशा प्रकारची दुर्गंधी अनुभवतो. त्यामुळे माझे चित्त समाहित (एकाग्र) होत नाही." याच प्रकारे सर्वच भिक्खूंनी आपापली हकीकत सांगितली. संघस्थवीर म्हणाले, "आवुसो, भगवंतांनी दोन वर्षावास प्रज्ञप्त केले आहेत. आपल्यासाठी हे सेनासन (निवासस्थान) अनुकूल नाही. चला आवुसो, आपण भगवंतांकडे जाऊ या आणि त्यांना दुसऱ्या एखाद्या अनुकूल सेनासनाविषयी विचारू या." "ठीक आहे, भंते," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी स्थविरांचे म्हणणे मान्य केले. सर्वांनी आपले सेनासन आवरले, पात्र-चीवर घेतले आणि कोणाही गृहस्थाला न सांगता श्रावस्तीच्या देशाने चारिका (प्रवास) सुरू केली. अनुक्रमे प्रवास करत ते श्रावस्तीला पोहोचले आणि भगवंतांच्या सन्निध आले. ภควา เต ภิกฺขู ทิสฺวา เอตทโวจ – ‘‘น, ภิกฺขเว, อนฺโตวสฺสํ จาริกา จริตพฺพาติ มยา สิกฺขาปทํ ปญฺญตฺตํ, กิสฺส ตุมฺเห จาริกํ จรถา’’ติ. เต ภควโต สพฺพมาโรเจสุํ. ภควา อาวชฺเชนฺโต สกลชมฺพุทีเป อนฺตมโส จตุปาทปีฐกฏฺฐานมตฺตมฺปิ เตสํ สปฺปายเสนาสนํ นาทฺทส. อถ เต ภิกฺขู อาห – ‘‘น, ภิกฺขเว, ตุมฺหากํ อญฺญํ สปฺปายเสนาสนํ อตฺถิ, ตตฺเถว ตุมฺเห วิหรนฺตา อาสวกฺขยํ ปาปุณิสฺสถ, คจฺฉถ, ภิกฺขเว, ตเมว เสนาสนํ อุปนิสฺสาย วิหรถ, สเจ ปน เทวตาหิ อภยํ อิจฺฉถ, อิมํ ปริตฺตํ อุคฺคณฺหถ. เอตญฺหิ โว ปริตฺตญฺจ กมฺมฏฺฐานญฺจ ภวิสฺสตี’’ติ อิทํ สุตฺตมภาสิ. भगवंतांनी त्या भिक्खूंना पाहून विचारले, "भिक्खूंनो, 'वर्षावासाच्या काळात चारिका करू नये' असा नियम (शिक्षापद) मी प्रज्ञप्त केला आहे, मग तुम्ही चारिका का करत आहात?" त्यांनी भगवंतांना सर्व हकीकत सांगितली. भगवंतांनी आपल्या दिव्य दृष्टीने संपूर्ण जंबुद्विपात पाहिले, परंतु त्यांना त्या भिक्खूंसाठी अगदी चार पायांच्या पाटाएवढी जागा देखील दुसरी कोणतीही अनुकूल जागा दिसली नाही. तेव्हा ते भिक्खूंना म्हणाले, "भिक्खूंनो, तुमच्यासाठी दुसरे कोणतेही अनुकूल सेनासन नाही. तेथेच विहार करत असताना तुम्ही आसवांचा क्षय (अर्हत पद) प्राप्त कराल. जा भिक्खूंनो, त्याच सेनासनाचा आश्रय घेऊन विहार करा. जर तुम्हाला देवतांपासून अभय हवे असेल, तर हे परित्त (संरक्षण सूत्र) ग्रहण करा. हे तुमच्यासाठी परित्त (रक्षण) आणि कर्मस्थान (साधना) दोन्ही ठरेल." असे सांगून त्यांनी हे सुत्त सांगितले. อปเร [Pg.201] ปนาหุ – ‘‘คจฺฉถ, ภิกฺขเว, ตเมว เสนาสนํ อุปนิสฺสาย วิหรถา’’ติ อิทญฺจ วตฺวา ภควา อาห – ‘‘อปิจ โข อารญฺญเกน ปริหรณํ ญาตพฺพํ. เสยฺยถิทํ – สายํ ปาตํ กรณวเสน ทฺเว เมตฺตา ทฺเว ปริตฺตา ทฺเว อสุภา ทฺเว มรณสฺสตี อฏฺฐมหาสํเวควตฺถุสมาวชฺชนญฺจ, อฏฺฐ มหาสํเวควตฺถูนิ นาม ชาติชราพฺยาธิมรณํ จตฺตาริ อปายทุกฺขานีติ, อถ วา ชาติชราพฺยาธิมรณานิ จตฺตาริ, อปายทุกฺขํ ปญฺจมํ, อตีเต วฏฺฏมูลกํ ทุกฺขํ, อนาคเต วฏฺฏมูลกํ ทุกฺขํ, ปจฺจุปฺปนฺเน อาหารปริเยฏฺฐิมูลกํ ทุกฺข’’นฺติ. เอวํ ภควา ปริหรณํ อาจิกฺขิตฺวา เตสํ ภิกฺขูนํ เมตฺตตฺถญฺจ ปริตฺตตฺถญฺจ วิปสฺสนาปาทกชฺฌานตฺถญฺจ อิทํ สุตฺตมภาสีติ. เอวํ วิตฺถารโตปิ ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจ’’ติ เอเตสํ ปทานํ ทีปนา นิทานโสธนา เวทิตพฺพา. इतर आचार्य म्हणतात की, "जा भिक्खूंनो, त्याच सेनासनाचा आश्रय घेऊन विहार करा," असे सांगून भगवान म्हणाले, "तथापि, अरण्यवासी भिक्खूने स्वतःच्या संरक्षणासाठी पाळण्याचे नियम (परिहरण) जाणले पाहिजेत. ते खालीलप्रमाणे आहेत – सकाळी आणि संध्याकाळी करण्याच्या अभ्यासाने दोन वेळा मैत्री भावना, दोन वेळा परित्त, दोन वेळा अशुभाची भावना, दोन वेळा मरणस्मृती आणि आठ महासंवेगवस्तूंचे चिंतन करणे. आठ महासंवेगवस्तू म्हणजे – जन्म, जरा (वृद्धत्व), व्याधी (आजारपण), मरण आणि चार अपायांमधील दुःखे. किंवा जन्म, जरा, व्याधी, मरण ही चार, पाचवे अपायदुःख, भूतकाळातील संसारचक्रावर आधारित दुःख, भविष्यकाळातील संसारचक्रावर आधारित दुःख आणि वर्तमानकाळातील आहाराच्या शोधावर आधारित दुःख." अशा प्रकारे भगवंतांनी संरक्षणाचे उपाय सांगून, त्या भिक्खूंच्या कल्याणासाठी, मैत्रीसाठी, रक्षणासाठी आणि विपश्यनेचा आधार असलेल्या ध्यानाच्या प्राप्तीसाठी हे सुत्त सांगितले. अशा प्रकारे विस्ताराने देखील "कोणी म्हटले, कधी म्हटले, कोठे म्हटले आणि कशासाठी म्हटले" या पदांचे स्पष्टीकरण आणि निदानाचे (पार्श्वभूमीचे) संशोधन समजून घ्यावे. เอตฺตาวตา จ ยา สา ‘‘เยน วุตฺตํ ยทา ยตฺถ, ยสฺมา เจเตส ทีปนา. นิทานํ โสธยิตฺวา’’ติ มาติกา ฐปิตา, สา สพฺพากาเรน วิตฺถาริตา โหติ. अशा प्रकारे, "कोणी म्हटले, कधी म्हटले, कोठे म्हटले आणि कशासाठी म्हटले याचे स्पष्टीकरण करून आणि निदानाचे संशोधन करून" ही जी मातृका (विषयसूची) मांडली होती, ती सर्व प्रकारे सविस्तर स्पष्ट झाली आहे. ปฐมคาถาวณฺณนา पहिल्या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๑. อิทานิ ‘‘อสฺส กริสฺสามตฺถวณฺณน’’นฺติ วุตฺตตฺตา เอวํ กตนิทานโสธนสฺส อสฺส สุตฺตสฺส อตฺถวณฺณนา อารพฺภเต. ตตฺถ กรณียมตฺถกุสเลนาติ อิมิสฺสา ปฐมคาถาย ตาว อยํ ปทวณฺณนา – กรณียนฺติ กาตพฺพํ, กรณารหนฺติ อตฺโถ. อตฺโถติ ปฏิปทา, ยํ วา กิญฺจิ อตฺตโน หิตํ, ตํ สพฺพํ อรณียโต อตฺโถติ วุจฺจติ, อรณียโต นาม อุปคนฺตพฺพโต. อตฺเถ กุสเลน อตฺถกุสเลน อตฺถเฉเกนาติ วุตฺตํ โหติ. ยนฺติ อนิยมิตปจฺจตฺตํ. นฺติ นิยมิตอุปโยคํ, อุภยมฺปิ วา ยํ ตนฺติ ปจฺจตฺตวจนํ. สนฺตํ ปทนฺติ อุปโยควจนํ, ตตฺถ ลกฺขณโต สนฺตํ, ปตฺตพฺพโต ปทํ, นิพฺพานสฺเสตํ อธิวจนํ. อภิสเมจฺจาติ อภิสมาคนฺตฺวา. สกฺโกตีติ สกฺโก, สมตฺโถ ปฏิพโลติ วุตฺตํ โหติ. อุชูติ อชฺชวยุตฺโต. สุฏฺฐุ อุชูติ สุหุชุ. สุขํ วโจ ตสฺมินฺติ สุวโจ. อสฺสาติ ภเวยฺย. มุทูติ มทฺทวยุตฺโต. น อติมานีติ อนติมานิ. १. आता, "मी या सुत्ताची अर्थवर्णना करीन" असे म्हटल्यामुळे, अशा प्रकारे प्रस्तावनेचे (निदानाचे) शोधन केलेल्या या सुत्ताची अर्थवर्णना सुरू केली जात आहे. त्यामध्ये, "करणीयमत्थकुसलेन" या पहिल्या गाथेतील पदांची व्याख्या अशी आहे – "करणीयं" म्हणजे जे केले पाहिजे (कातब्बं), जे करण्यास योग्य आहे (करणारहं) असा अर्थ आहे. "अत्थ" म्हणजे प्रतिपदा (आचरण/मार्ग); किंवा जे काही स्वतःचे हित आहे, ते सर्व प्राप्त करून घेण्याजोगे (अरणीय) असल्यामुळे त्याला "अत्थ" म्हटले जाते; "अरणीय" म्हणजे प्राप्त करण्याजोगे (जवळ जाण्याजोगे). कल्याणामध्ये (अत्थ) कुशल असणारा तो "अत्थकुसल" म्हणजेच कल्याणामध्ये निपुण (अत्थचेक) असा अर्थ होतो. "यं" हे पद अनिश्चित प्रथमा विभक्तीत आहे. "तं" हे पद निश्चित द्वितीया विभक्तीत आहे; किंवा "यं" आणि "तं" ही दोन्ही पदे प्रथमा विभक्तीत आहेत. "सन्तं पदं" हे द्वितीया विभक्तीतील पद आहे; त्यामध्ये लक्षणाने (स्वभावाने) जे शांत आहे ते "सन्तं", आणि जे प्राप्त करण्याजोगे आहे ते "पदं"; हे निर्वाणाचे नाव (अधिवचन) आहे. "अभिसमेच्च" म्हणजे साक्षात् करून (जाणून घेऊन). जो समर्थ आहे तो "सक्को", म्हणजेच तो कार्य करण्यास सक्षम (समत्थ) व बलवान (पटिबल) आहे असा अर्थ होतो. "उजू" म्हणजे सरळपणाने युक्त (प्रामाणिक). जो अत्यंत सरळ आहे तो "सुहुजू". ज्याचे बोलणे सुखद (मृदू) आहे किंवा जो सहजपणे उपदेश ऐकणारा आहे तो "सुवचो". "अस्सा" म्हणजे असावा. "मुदू" म्हणजे मृदूपणाने युक्त. जो अत्यंत अभिमानी (अहंकारी) नाही तो "अनतिमानी". อยํ ปเนตฺถ อตฺถวณฺณนา – กรณียมตฺถกุสเลน, ยนฺตํ สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจาติ เอตฺถ ตาว อตฺถิ กรณียํ, อตฺถิ อกรณียํ. ตตฺถ สงฺเขปโต [Pg.202] สิกฺขตฺตยํ กรณียํ. สีลวิปตฺติ, ทิฏฺฐิวิปตฺติ, อาจารวิปตฺติ, อาชีววิปตฺตีติ เอวมาทิ อกรณียํ. ตถา อตฺถิ อตฺถกุสโล, อตฺถิ อนตฺถกุสโล. ตตฺถ โย อิมสฺมึ สาสเน ปพฺพชิตฺวา น อตฺตานํ สมฺมา ปโยเชติ, ขณฺฑสีโล โหติ, เอกวีสติวิธํ อเนสนํ นิสฺสาย ชีวิกํ กปฺเปติ. เสยฺยถิทํ – เวฬุทานํ ปตฺตทานํ ปุปฺผทานํ ผลทานํ ทนฺตกฏฺฐทานํ มุโขทกทานํ สินานทานํ จุณฺณทานํ มตฺติกาทานํ จาฏุกมฺยตํ มุคฺคสูปฺยตํ ปาริภฏยตํ ชงฺฆเปสนิกํ เวชฺชกมฺมํ ทูตกมฺมํ ปหิณคมนํ ปิณฺฑปฏิปิณฺฑํ ทานานุปฺปทานํ วตฺถุวิชฺชํ นกฺขตฺตวิชฺชํ องฺควิชฺชนฺติ. ฉพฺพิเธ จ อโคจเร จรติ. เสยฺยถิทํ – เวสิยาโคจเร วิธวถุลฺลกุมาริกปณฺฑกภิกฺขุนีปานาคารโคจเรติ. สํสฏฺโฐ จ วิหรติ ราชูหิ ราชมหามตฺเตหิ ติตฺถิเยหิ ติตฺถิยสาวเกหิ อนนุโลมิเกน คิหิสํสคฺเคน, ยานิ วา ปน ตานิ กุลานิ อสฺสทฺธานิ อปฺปสนฺนานิ อโนปานภูตานิ อกฺโกสกปริภาสกานิ อนตฺถกามานิ อหิตอผาสุกโยคกฺเขมกามานิ ภิกฺขูนํ…เป… อุปาสิกานํ, ตถารูปานิ กุลานิ เสวติ ภชติ ปยิรุปาสติ. อยํ อนตฺถกุสโล. आता येथे ही अर्थवर्णना आहे – "करणीयमत्थकुसलेन यन्तं सन्तं पदं अभिसमेच्च" यामध्ये प्रथम, जे केले पाहिजे (करणीय) असेही कार्य आहे, आणि जे करू नये (अकरणीय) असेही कार्य आहे. त्यामध्ये संक्षेपाने त्रिशिक्षा (शील, समाधी, प्रज्ञा) हे करणीय (केले पाहिजे असे) आहे. शील-विपत्ती (शीलाचा नाश), दृष्टी-विपत्ती (चुकीची धारणा), आचार-विपत्ती (चुकीचे वर्तन), आणि आजीव-विपत्ती (चुकीची उपजीविका) इत्यादी अकरणीय (न करण्याजोगे) आहेत. तसेच, कल्याणामध्ये कुशल (अत्थकुसल) असणाराही असतो आणि अकल्याणामध्ये कुशल (अनत्थकुसल) असणाराही असतो. त्यामध्ये जो या शासनात (बुद्ध धर्मात) प्रव्रजित होऊन स्वतःला योग्य मार्गावर लावत नाही, खंडित शील असणारा होतो, आणि एकवीस प्रकारच्या अयोग्य मार्गांचा (अनेसना) अवलंब करून आपली उपजीविका चालवतो. जसे की – बांबू देणे (वेळूदान), पाने देणे (पत्तदान), फुले देणे (पुप्फदान), फळे देणे (फलदान), दंतकाष्ठ देणे (दंतकट्ठदान), मुखप्रक्षालनाचे पाणी देणे (मुखोदकदान), स्नानाचे साहित्य देणे (सिनानदान), चूर्ण देणे (चुण्णदान), माती देणे (मत्तिकादान), खुशामत करणे (चाटुकम्यता), डाळीच्या वरणासारखे गोड बोलणे (मुग्गसूप्यता), मुलांचे संगोपन करणे (पारिभटयता), निरोप घेऊन धावणे (जंघपेसनिक), वैद्यकीय काम करणे (वेज्जकम्म), दूताचे काम करणे (दूतकम्म), निरोप पोहोचवणे (पहिणगमन), पिंडपाताच्या बदल्यात पिंडपात देणे (पिंडपटिपिंड), दान देणे व घेणे (दानानुप्पदान), वास्तूविद्या (वत्थुविज्जा), नक्षत्रविद्या (नक्खत्तविज्जा), आणि अंगविद्या (अंगविज्जा). आणि तो सहा प्रकारच्या अयोग्य ठिकाणी (अगोचर) वावरतो. जसे की – वेश्यांचे ठिकाण, विधवा, प्रौढ कुमारिका, नपुंसक (पंडक), भिक्खुनी, आणि मद्यशाळा या अयोग्य ठिकाणी तो वावरतो. आणि तो राजांशी, राजअमात्यांशी, अन्य पंथीयांशी (तित्थिय), त्यांच्या श्रावकांशी आणि गृहस्थांशी अयोग्य संसर्गाने युक्त होऊन राहतो; किंवा जी कुटुंबे भिक्खूंच्या... आणि उपासकांच्या प्रति अश्रद्धाळू, अप्रसन्न, विहिरीसारखी परोपकारी नसलेली, शिवीगाळ व निंदा करणारी, अकल्याण इच्छिणारी, अहित, असुख आणि योगक्षेम न इच्छिणारी आहेत, अशा कुटुंबांची तो सेवा करतो, त्यांच्याशी संगत करतो आणि त्यांची उपासना करतो. याला "अनत्थकुसल" (अकल्याणात कुशल/अकुशल) म्हटले जाते. โย ปน อิมสฺมึ สาสเน ปพฺพชิตฺวา อตฺตานํ สมฺมา ปโยเชติ, อเนสนํ ปหาย จตุปาริสุทฺธิสีเล ปติฏฺฐาตุกาโม สทฺธาสีเสน ปาติโมกฺขสํวรํ สติสีเสน อินฺทฺริยสํวรํ วีริยสีเสน อาชีวปาริสุทฺธึ, ปญฺญาสีเสน ปจฺจยปฏิเสวนํ ปูเรติ. อยํ อตฺถกุสโล. परंतु जो या शासनात (बुद्ध धर्मात) प्रव्रजित होऊन स्वतःला योग्य मार्गावर लावतो, अयोग्य मार्गांचा (अनेसना) त्याग करून चतुपारिसुद्धि शीलामध्ये प्रतिष्ठित होण्याची इच्छा धरून, श्रद्धेला मुख्य करून पातिमोक्ख संवर शील, स्मृतीला (सतीला) मुख्य करून इंद्रिय संवर शील, वीर्याला (प्रयत्नाला) मुख्य करून आजीव पारिसुद्धि शील, आणि प्रज्ञेला मुख्य करून प्रत्यय-पटिसेवन (चार प्रत्ययांचा योग्य वापर) शील पूर्ण करतो. याला "अत्थकुसल" (कल्याणामध्ये कुशल) म्हटले जाते. โย วา สตฺตาปตฺติกฺขนฺธโสธนวเสน ปาติโมกฺขสํวรํ, ฉทฺวาเร ฆฏฺฏิตารมฺมเณสุ อภิชฺฌาทีนํ อนุปฺปตฺติวเสน อินฺทฺริสํวรํ, อเนสนปริวชฺชนวเสน วิญฺญุปฺปสตฺถพุทฺธพุทฺธสาวกวณฺณิตปจฺจยปฏิเสวเนน จ อาชีวปาริสุทฺธึ, ยถาวุตฺตปจฺจเวกฺขณวเสน ปจฺจยปฏิเสวนํ, จตุอิริยาปถปริวตฺตเน สาตฺถกตาทิปจฺจเวกฺขณวเสน สมฺปชญฺญญฺจ โสเธติ. อยมฺปิ อตฺถกุสโล. किंवा जो सात प्रकारच्या आपत्तींच्या समूहाचे शोधन करण्याद्वारे पातिमोक्ख संवर शीलाचे शोधन करतो; सहा इंद्रियद्वारांवर आदळणाऱ्या विषयांमध्ये अभिज्झा (लोभ) इत्यादी उत्पन्न न होऊ देण्याद्वारे इंद्रिय संवर शीलाचे शोधन करतो; अयोग्य मार्गांचा (अनेसना) त्याग करण्याद्वारे आणि विद्वानांनी प्रशंसिलेल्या, बुद्ध व बुद्धश्रावकांनी वर्णन केलेल्या प्रत्ययांचे सेवन करण्याद्वारे आजीव पारिसुद्धि शीलाचे शोधन करतो; वर सांगितल्याप्रमाणे प्रत्यवेक्षण (विचार) करण्याद्वारे प्रत्यय-पटिसेवन शीलाचे शोधन करतो; आणि चारही इरियापथांमध्ये (चालणे, उभे राहणे, बसणे, झोपणे) सार्थकता इत्यादींचे प्रत्यवेक्षण करण्याद्वारे संपजन्य (जागरूकता) शुद्ध करतो. तोसुद्धा "अत्थकुसल" (कल्याणामध्ये कुशल) म्हटला जातो. โย วา ยถา อูโสทกํ ปฏิจฺจ สํกิลิฏฺฐํ วตฺถํ ปริโยทาปยติ, ฉาริกํ ปฏิจฺจ อาทาโส, อุกฺกามุขํ ปฏิจฺจ ชาตรูปํ, ตถา ญาณํ ปฏิจฺจ สีลํ โวทายตีติ ญตฺวา ญาโณทเกน โธวนฺโต สีลํ ปริโยทาเปติ. ยถา จ กิกี สกุณิกา อณฺฑํ, จมรี มิโค วาลธึ, เอกปุตฺติกา นารี [Pg.203] ปิยํ เอกปุตฺตกํ, เอกนยโน ปุริโส ตํ เอกนยนญฺจ รกฺขติ, ตถา อติวิย อปฺปมตฺโต อตฺตโน สีลกฺขนฺธํ รกฺขติ, สายํ ปาตํ ปจฺจเวกฺขมาโน อณุมตฺตมฺปิ วชฺชํ น ปสฺสติ. อยมฺปิ อตฺถกุสโล. किंवा जो ज्याप्रमाणे खारट पाण्याचा (साबणाचा) आश्रय घेऊन मळलेले वस्त्र स्वच्छ केले जाते, राखेचा आश्रय घेऊन आरसा स्वच्छ केला जातो, मुशीचा (भट्टीचा) आश्रय घेऊन सोने शुद्ध केले जाते; त्याचप्रमाणे ज्ञानाचा आश्रय घेऊन शील शुद्ध होते, असे जाणून ज्ञानरूपी पाण्याने धुऊन शीलाला अत्यंत शुद्ध करतो. आणि ज्याप्रमाणे टिटवी पक्षीण आपल्या अंड्याचे रक्षण करते, चमरी मृग आपल्या शेपटीचे रक्षण करतो, एकुलता एक मुलगा असलेली माता आपल्या प्रिय पुत्राचे रक्षण करते, आणि एका डोळ्याचा माणूस आपल्या त्या एकाच डोळ्याचे रक्षण करतो; त्याचप्रमाणे अत्यंत अप्रमत्त (सावध) राहून स्वतःच्या शीलस्कंधाचे रक्षण करतो, सकाळी आणि संध्याकाळी आत्मपरीक्षण (प्रत्यवेक्षण) करताना त्याला अणुमात्रही दोष दिसत नाही. तोसुद्धा "अत्थकुसल" (कल्याणामध्ये कुशल) म्हटला जातो. โย วา ปน อวิปฺปฏิสารกเร สีเล ปติฏฺฐาย กิเลสวิกฺขมฺภนปฏิปทํ ปคฺคณฺหาติ, ตํ ปคฺคณฺหิตฺวา กสิณปริกมฺมํ กโรติ, กสิณปริกมฺมํ กตฺวา สมาปตฺติโย นิพฺพตฺเตติ. อยมฺปิ อตฺถกุสโล. किंवा जो पश्चात्ताप न देणाऱ्या (चित्त प्रसन्न ठेवणाऱ्या) शीलामध्ये प्रतिष्ठित होऊन क्लेशांचे दमन करणाऱ्या प्रतिपदेचा (मार्गाचा) स्वीकार करतो, तिचा स्वीकार करून कसिण-परिकर्म (ध्यानसाधनेची पूर्वतयारी) करतो, आणि कसिण-परिकर्म करून समापत्ती (ध्यान अवस्था) प्राप्त करतो. तोसुद्धा "अत्थकुसल" (कल्याणामध्ये कुशल) म्हटला जातो. โย วา ปน สมาปตฺติโต วุฏฺฐาย สงฺขาเร สมฺมสิตฺวา อรหตฺตํ ปาปุณาติ, อยํ อตฺถกุสลานํ อคฺโค. ตตฺถ เย อิเม ยาว อวิปฺปฏิสารกเร สีเล ปติฏฺฐาเนน ยาว วา กิเลสวิกฺขมฺภนปฏิปทายปคฺคหเณน วณฺณิตา อตฺถกุสลา, เต อิมสฺมึ อตฺเถ อตฺถกุสลาติ อธิปฺเปตา. ตถา วิธา จ เต ภิกฺขู. เตน ภควา เต ภิกฺขู สนฺธาย เอกปุคฺคลาธิฏฺฐานาย เทสนาย ‘‘กรณียมตฺถกุสเลนา’’ติ อาห. किंवा जो समापत्तीमधून उठून संस्कारांचे (संखारांचे) विपश्यनेद्वारे परीक्षण करून अर्हतपद प्राप्त करतो, तो कल्याणामध्ये कुशल असणाऱ्यांमध्ये सर्वश्रेष्ठ (अग्र) आहे. त्यामध्ये, जे पश्चात्ताप न देणाऱ्या शीलामध्ये प्रतिष्ठित होण्यापासून ते क्लेशांचे दमन करणाऱ्या प्रतिपदेचा स्वीकार करण्यापर्यंतचे वर्णन केलेले "अत्थकुसल" आहेत, ते या अर्थामध्ये "अत्थकुसल" म्हणून अभिप्रेत आहेत. आणि ते भिक्खू तसेच होते. म्हणूनच भगवंतांनी त्या भिक्खूंना उद्देशून, एका व्यक्तीला उद्देशून केलेल्या उपदेशाच्या (एकपुग्गलाधिट्ठान देसना) रूपाने "करणीयमत्थकुसलेन" असे म्हटले. ตโต ‘‘กึ กรณีย’’นฺติ เตสํ สญฺชาตกงฺขานํ อาห ‘‘ยนฺตํ สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจา’’ติ. อยเมตฺถ อธิปฺปาโย – ตํ พุทฺธานุพุทฺเธหิ วณฺณิตํ สนฺตํ นิพฺพานปทํ ปฏิเวธวเสน อภิสเมจฺจ วิหริตุกาเมน ยํ กรณียนฺติ. เอตฺถ จ ยนฺติ อิมสฺส คาถาปทสฺส อาทิโต วุตฺตเมว กรณียนฺติ อธิการโต อนุวตฺตติ, ตํ สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจาติ. อยํ ปน ยสฺมา สาวเสสปาโฐ อตฺโถ, ตสฺมา วิหริตุกาเมนาติ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. त्यानंतर, "काय केले पाहिजे?" अशी शंका निर्माण झालेल्या त्या भिक्खूंना भगवंतांनी "यन्तं सन्तं पदं अभिसमेच्च" असे म्हटले. येथे हा अभिप्राय आहे – बुद्ध आणि बुद्धश्रावकांनी प्रशंसिलेल्या त्या शांत निर्वाणपदाचा प्रतिवेध (साक्षात्कार) करून राहण्याची इच्छा असणाऱ्याने जे केले पाहिजे. आणि येथे "यं" हे पद या गाथेच्या सुरुवातीलाच म्हटलेले आहे; "करणीयं" हे पद अधिकाराने (पुढील वाक्यात) अनुवृत्त होते, म्हणजेच "तं सन्तं पदं अभिसमेच्च". परंतु हा अर्थ अपूर्ण पाठ असल्यामुळे, "विहरितुकामेन" (राहण्याची इच्छा असणाऱ्याने) असे म्हटले आहे, हे जाणावे. อถ วา สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจาติ อนุสฺสวาทิวเสน โลกิยปญฺญาย นิพฺพานปทํ ‘‘สนฺต’’นฺติ ญตฺวา ตํ อธิคนฺตุกาเมน ยนฺตํ กรณียนฺติ อธิการโต อนุวตฺตติ, ตํ กรณียมตฺถกุสเลนาติ เอวมฺเปตฺถ อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ. อถ วา ‘‘กรณียมตฺถกุสเลนา’’ติ วุตฺเต ‘‘กิ’’นฺติ จินฺเตนฺตานํ อาห ‘‘ยนฺตํ สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจา’’ติ. ตสฺเสวํ อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ – โลกิยปญฺญาย สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจ ยํ กรณียํ กาตพฺพํ, ตํ กรณียํ, กรณารหเมว ตนฺติ วุตฺตํ โหติ. किंवा 'शांत पदाला जाणून' (अभि समेच्च) म्हणजे ऐकीव माहिती इत्यादींच्या आधारे लौकिक प्रज्ञेने निर्वाणपद हे 'शांत' आहे असे जाणून, ते प्राप्त करण्याची इच्छा असणाऱ्याने जे काही कर्तव्य करायचे आहे, ते अधिकाराने अनुसरते; ते कर्तव्य हितकुशलाने करावे, असा येथे अभिप्राय समजावा. किंवा 'हितकुशलाने कर्तव्य करावे' असे म्हटले असता, 'काय करावे?' असा विचार करणाऱ्यांसाठी भगवंतांनी 'जे शांत पदाला जाणून...' असे म्हटले आहे. त्याचा असा अभिप्राय समजावा – लौकिक प्रज्ञेने शांत पदाला (निर्वाणाला) जाणून जे कर्तव्य केले पाहिजे, तेच कर्तव्य आहे, तेच करण्यायोग्य आहे, असा याचा अर्थ आहे. กึ ปน ตนฺติ? กิมญฺญํ สิยา อญฺญตฺร ตทธิคมุปายโต, กามญฺเจตํ กรณารหฏฺเฐน สิกฺขตฺตยทีปเกน อาทิปเทเนว วุตฺตํ. ตถา หิ ตสฺส อตฺถวณฺณนายํ อโวจุมฺหา ‘‘อตฺถิ กรณียํ, อตฺถิ อกรณียํ. ตตฺถ [Pg.204] สงฺเขปโต สิกฺขตฺตยํ กรณีย’’นฺติ. อติสงฺเขเปน เทสิตตฺตา ปน เตสํ ภิกฺขูนํ เกหิจิ วิญฺญาตํ, เกหิจิ น วิญฺญาตํ. ตโต เยหิ น วิญฺญาตํ, เตสํ วิญฺญาปนตฺถํ ยํ วิเสสโต อารญฺญเกน ภิกฺขุนา กาตพฺพํ, ตํ วิตฺถาเรนฺโต ‘‘สกฺโก อุชู จ สุหุชู จ, สุวโจ จสฺส มุทุ อนติมานี’’ติ อิมํ ตาว อุปฑฺฒคาถมาห. पण ते कर्तव्य काय आहे? ते निर्वाण प्राप्त करण्याच्या उपायाव्यतिरिक्त दुसरे काय असू शकते? आणि हे करण्यायोग्य असल्याच्या अर्थाने, त्रिशिक्षेचे (शील, समाधी, प्रज्ञा) प्रकाशन करणाऱ्या पहिल्या पदानेच (कऱणीयमत्थकुसलेन) सांगितले आहे. कारण त्याच्या अर्थविवरणात आम्ही म्हटले आहे – 'कर्तव्यही आहे आणि अकर्तव्यही आहे. त्यामध्ये संक्षेपाने त्रिशिक्षा हेच कर्तव्य आहे.' परंतु अत्यंत संक्षेपाने उपदेश केल्यामुळे, त्या भिक्खूंपैकी काहींना ते समजले आणि काहींना समजले नाही. त्यामुळे ज्यांना समजले नाही, त्यांना समजावून सांगण्यासाठी, जे विशेषतः आरण्यक (अरण्यात राहणाऱ्या) भिक्खूने केले पाहिजे, त्याचे सविस्तर वर्णन करताना भगवंतांनी 'तो समर्थ, सरळ, सुसरळ, सुवचनी, मृदू आणि निरहंकारी असावा' (सक्को उजू च सुहजू च, सुवचो चस्स मुदु अनतिमानी) ही अर्धी गाथा सर्वप्रथम सांगितली. กึ วุตฺตํ โหติ? สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจ วิหริตุกาโม, โลกิยปญฺญาย วา ตํ อภิสเมจฺจ ตทธิคมาย ปฏิปชฺชมาโน อารญฺญโก ภิกฺขุ ทุติยจตุตฺถปธานิยงฺคสมนฺนาคเมน กาเย จ ชีวิเต จ อนเปกฺโข หุตฺวา สจฺจปฺปฏิเวธาย ปฏิปชฺชิตุํ สกฺโก อสฺส, ตถา กสิณปริกมฺมวตฺตสมาทานาทีสุ อตฺตโน ปตฺตจีวรปฺปฏิสงฺขรณาทีสุ จ ยานิ ตานิ สพฺรหฺมจารีนํ อุจฺจาวจานิ กึ กรณียานิ, เตสุ อญฺเญสุ จ เอวรูเปสุ สกฺโก อสฺส ทกฺโข อนลโส สมตฺโถ. สกฺโก โหนฺโตปิ จ ตติยปธานิยงฺคสมนฺนาคเมน อุชุ อสฺส. อุชุ โหนฺโตปิ จ สกึ อุชุภาเวน ทหรกาเล วา อุชุภาเวน สนฺโตสํ อนาปชฺชิตฺวา ยาวชีวํ ปุนปฺปุนํ อสิถิลกรเณน สุฏฺฐุตรํ อุชุ อสฺส. อสฐตาย วา อุชุ, อมายาวิตาย สุหุชุ. กายวจีวงฺกปฺปหาเนน วา อุชุ, มโนวงฺกปฺปหาเนน สุหุชุ. อสนฺตคุณสฺส วา อนาวิกรเณน อุชุ, อสนฺตคุเณน อุปฺปนฺนสฺส ลาภสฺส อนธิวาสเนน สุหุชุ. เอวํ อารมฺมณลกฺขณูปนิชฺฌาเนหิ ปุริมทฺวยตติยสิกฺขาหิ ปโยคาสยสุทฺธีหิ จ อุชุ จ สุหุชุ จ อสฺส. याचा काय अर्थ आहे? शांत पदाचा (निर्वाणाचा) साक्षात्कार करून विहरण्याची इच्छा असणारा, किंवा लौकिक प्रज्ञेने ते जाणून त्याच्या प्राप्तीसाठी प्रयत्नशील असणारा आरण्यक भिक्खू, दुसऱ्या आणि चौथ्या प्रधान अंगांनी (प्रयत्न अंगांनी) युक्त होऊन, शरीर आणि जीवनाची अपेक्षा न ठेवता, सत्य साक्षात्कारासाठी प्रतिपन्न होण्यास समर्थ असावा. तसेच कसिण परिकर्म, व्रत-समादान इत्यादींमध्ये, स्वतःचे पात्र आणि चीवर दुरुस्त करणे इत्यादींमध्ये, आणि सब्रह्मचाऱ्यांची जी काही लहान-मोठी कर्तव्ये आहेत, त्यांमध्ये आणि इतर अशाच प्रकारच्या कामांमध्ये तो समर्थ, दक्ष, आळस नसलेला आणि कार्यक्षम असावा. समर्थ असूनही तो तिसऱ्या प्रधान अंगाने युक्त होऊन सरळ असावा. सरळ असूनही, केवळ एकदाच सरळ असण्याने किंवा तरुण वयातच सरळ असण्याने समाधान न मानता, जीवनभर वारंवार शिथिलता न आणता अधिक चांगल्या प्रकारे सरळ असावा. किंवा कपटीपणा नसण्याने तो 'सरळ' आणि ढोंगीपणा नसण्याने 'सुसरळ' असावा. किंवा कायिक आणि वाचिक वक्रतेचा त्याग केल्याने 'सरळ' आणि मानसिक वक्रतेचा त्याग केल्याने 'सुसरळ' असावा. किंवा स्वतःमध्ये नसलेले गुण प्रकट न केल्याने 'सरळ' आणि नसलेल्या गुणांमुळे मिळालेल्या लाभाचा स्वीकार न केल्याने 'सुसरळ' असावा. अशा प्रकारे, आलंबन आणि लक्षणाच्या उपनिध्यान (ध्यान) द्वारे, पहिल्या दोन आणि तिसऱ्या शिक्षेच्या द्वारे, आणि प्रयोग व आशयाच्या शुद्धीद्वारे तो सरळ आणि सुसरळ असावा. น เกวลญฺจ อุชุ จ สุหุชุ จ, อปิจ ปน สุวโจ จ อสฺส. โย หิ ปุคฺคโล ‘‘อิทํ น กตฺตพฺพ’’นฺติ วุตฺโต ‘‘กึ เต ทิฏฺฐํ, กึ เต สุตํ, โก เม สุตฺวา วทสิ, กึ อุปชฺฌาโย อาจริโย สนฺทิฏฺโฐ สมฺภตฺโต วา’’ติ วเทติ, ตุณฺหีภาเวน วา ตํ วิเหเสติ, สมฺปฏิจฺฉิตฺวา วา น ตถา กโรติ, โส วิเสสาธิคมสฺส ทูเร โหติ. โย ปน โอวทิยมาโน ‘‘สาธุ, ภนฺเต สุฏฺฐุ วุตฺตํ, อตฺตโน วชฺชํ นาม ทุทฺทสํ โหติ, ปุนปิ มํ เอวรูปํ ทิสฺวา วเทยฺยาถ อนุกมฺปํ อุปาทาย, จิรสฺสํ เม ตุมฺหากํ สนฺติกา โอวาโท ลทฺโธ’’ติ วทติ, ยถานุสิฏฺฐญฺจ ปฏิปชฺชติ, โส วิเสสาธิคมสฺส อวิทูเร โหติ. ตสฺมา เอวํ ปรสฺส วจนํ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา กโรนฺโต สุวโจ จ อสฺส. आणि केवळ सरळ आणि सुसरळच नाही, तर तो सुवचनी (नम्रपणे ऐकणारा) देखील असावा. कारण ज्या व्यक्तीला 'हे करू नये' असे सांगितले असता, ती म्हणते, 'तुम्ही काय पाहिले आहे? तुम्ही काय ऐकले आहे? तुम्ही कोण आहात जे मला सांगत आहात? तुम्ही माझे उपाध्याय आहात का, आचार्य आहात का, की परिचित किंवा स्नेही आहात?' किंवा मौन राहून सांगणाऱ्याला त्रास देते, किंवा होकार देऊनही त्याप्रमाणे वागत नाही, ती व्यक्ती विशेष गुणांच्या (ध्यान, मार्ग, फल यांच्या) प्राप्तीपासून दूर असते. परंतु ज्याला उपदेश केला असता तो म्हणतो, 'भन्ते, साधू! खूप चांगले सांगितले. स्वतःचे दोष दिसणे कठीण असते. पुन्हा कधी माझ्यात असा दोष दिसल्यास अनुकंपा करून मला सांगा. मला बऱ्याच दिवसांनी आपल्याकडून उपदेश मिळाला आहे,' आणि उपदेश केल्याप्रमाणे आचरण करतो, तो विशेष गुणांच्या प्राप्तीच्या जवळ असतो. म्हणून, इतरांचे सांगणे स्वीकारून त्याप्रमाणे करणारा भिक्खू सुवचनी असावा. ยถา [Pg.205] จ สุวโจ, เอวํ มุทุ อสฺส. มุทูติ คหฏฺเฐหิ ทูตคมนปหิณคมนาทีสุ นิยุชฺชมาโน ตตฺถ มุทุภาวํ อกตฺวา ถทฺโธ หุตฺวา วตฺตปฏิปตฺติยํ สกลพฺรหฺมจริเย จ มุทุ อสฺส สุปริกมฺมกตสุวณฺณํ วิย ตตฺถ ตตฺถ วินิโยคกฺขโม. อถ วา มุทูติ อภากุฏิโก อุตฺตานมุโข สุขสมฺภาโส ปฏิสนฺถารวุตฺติ สุติตฺถํ วิย สุขาวคาโห อสฺส. น เกวลญฺจ มุทุ, อปิจ ปน อนติมานี อสฺส, ชาติโคตฺตาทีหิ อติมานวตฺถูหิ ปเร นาติมญฺเญยฺย, สาริปุตฺตตฺเถโร วิย จณฺฑาลกุมารกสเมน เจตสา วิหเรยฺยาติ. आणि ज्याप्रमाणे तो सुवचनी असावा, त्याचप्रमाणे तो मृदू असावा. 'मृदू' म्हणजे गृहस्थांनी निरोप पोहोचवणे, दूत म्हणून जाणे इत्यादी कामांमध्ये लावल्यास, तिथे मृदूपणा न दाखवता ताठर राहून, मात्र कर्तव्याच्या पालनात आणि संपूर्ण ब्रह्मचर्यात मृदू असावा; ज्याप्रमाणे उत्तम प्रकारे शुद्ध केलेले सोने विविध आभूषणांसाठी योग्य असते, त्याप्रमाणे तो त्या त्या कर्तव्यात योग्य असावा. किंवा 'मृदू' म्हणजे कपाळावर आट्या न आणणारा (प्रसन्न चेहरा असलेला), सहज बोलता येण्याजोगा, आदरातिथ्य करणारा आणि चांगल्या घाटासारखा सहज प्रवेश करण्याजोगा असावा. आणि केवळ मृदूच नाही, तर तो निरहंकारी असावा. जात, गोत्र इत्यादी अभिमानाच्या कारणांमुळे इतरांना तुच्छ लेखू नये, आणि स्थवीर सारिपुत्तांप्रमाणे चांडाळ बालकासमान नम्र चित्ताने विहरावे. ทุติยคาถาวณฺณนา दुसऱ्या गाथेचे विवरण ๒. เอวํ ภควา สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจ วิหริตุกามสฺส ตทธิคมาย วา ปฏิปชฺชมานสฺส วิเสสโต อารญฺญกสฺส ภิกฺขุโน เอกจฺจํ กรณียํ วตฺวา ปุน ตตุตฺตริปิ วตฺตุกาโม ‘‘สนฺตุสฺสโก จา’’ติ ทุติยคาถมาห. २. अशा प्रकारे भगवंतांनी शांत पदाचा (निर्वाणाचा) साक्षात्कार करून विहरण्याची इच्छा असणाऱ्या, किंवा त्याच्या प्राप्तीसाठी प्रतिपन्न असणाऱ्या, विशेषतः आरण्यक भिक्खूच्या काही कर्तव्यांचे कथन करून, पुन्हा त्याहूनही अधिक सांगण्याची इच्छा धरून 'सन्तुस्सको च' (आणि संतुष्ट असणारा) अशी दुसरी गाथा सांगितली. ตตฺถ ‘‘สนฺตุฏฺฐี จ กตญฺญุตา’’ติ เอตฺถ วุตฺตปฺปเภเทน ทฺวาทสวิเธน สนฺโตเสน สนฺตุสฺสตีติ สนฺตุสฺสโก. อถ วา ตุสฺสตีติ ตุสฺสโก, สเกน ตุสฺสโก, สนฺเตน ตุสฺสโก, สเมน ตุสฺสโกติ สนฺตุสฺสโก. ตตฺถ สกํ นาม ‘‘ปิณฺฑิยาโลปโภชนํ นิสฺสายา’’ติ เอวํ อุปสมฺปทมณฺฑเล อุทฺทิฏฺฐํ อตฺตนา จ สมฺปฏิจฺฉิตํ จตุปจฺจยชาตํ, เตน สุนฺทเรน วา อสุนฺทเรน วา สกฺกจฺจํ วา อสกฺกจฺจํ วา ทินฺเนน ปฏิคฺคหณกาเล ปริโภคกาเล จ วิการํ อทสฺเสตฺวา ยาเปนฺโต ‘‘สเกน ตุสฺสโก’’ติ วุจฺจติ. สนฺตํ นาม ยํ ลทฺธํ โหติ อตฺตโน ‘วิชฺชมานํ, เตน สนฺเตเนว ตุสฺสนฺโต ตโต ปรํ น ปตฺเถนฺโต อตฺริจฺฉตํ ปชหนฺโต ‘‘สนฺเตน ตุสฺสโก’’ติ วุจฺจติ. สมํ นาม อิฏฺฐานิฏฺเฐสุ อนุนยปฏิฆปฺปหานํ, เตน สเมน สพฺพารมฺมเณสุ ตุสฺสนฺโต ‘‘สเมน ตุสฺสโก’’ติ วุจฺจติ. त्यामध्ये 'संतुष्टी आणि कृतज्ञता' या संदर्भात, सांगितलेल्या प्रकारांनुसार बारा प्रकारच्या संतोषाने जो संतुष्ट होतो, तो 'संतुस्सको' (संतुष्ट) होय. किंवा जो आनंदित होतो तो 'तुस्सको'; स्वतःच्या वस्तूने संतुष्ट होणारा, प्राप्त वस्तूने संतुष्ट होणारा, आणि समभावाने संतुष्ट होणारा तो 'संतुस्सको' होय. त्यामध्ये 'स्वतःचे' (सक) म्हणजे, 'पिंडपात भोजनाचा आश्रय घेऊन' अशा प्रकारे उपसंपदा मंडलात निर्दिष्ट केलेले आणि स्वतः स्वीकारलेले चार प्रत्यय होय. ते उत्तम असो वा अनुत्तम, आदराने दिलेले असो वा अनादराने दिलेले असो, ते स्वीकारताना आणि त्याचा उपभोग घेताना कोणताही विकार न दाखवता जीवन कंठणाऱ्याला 'स्वतःच्या वस्तूने संतुष्ट होणारा' असे म्हटले जाते. 'प्राप्त' (संत) म्हणजे जे काही मिळाले आहे आणि स्वतःजवळ विद्यमान आहे, त्या प्राप्त झालेल्या वस्तूनेच संतुष्ट राहून, त्याहून अधिकची इच्छा न करता, अति-इच्छेचा (लोभाचा) त्याग करणाऱ्याला 'प्राप्त वस्तूने संतुष्ट होणारा' असे म्हटले जाते. 'सम' (समभाव) म्हणजे इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये राग आणि प्रतिघ यांचा त्याग करणे होय, त्या समभावाने सर्व आलंबनांमध्ये संतुष्ट राहणाऱ्याला 'समभावाने संतुष्ट होणारा' असे म्हटले जाते। สุเขน ภรียตีติ สุภโร, สุโปโสติ วุตฺตํ โหติ. โย หิ ภิกฺขุ มนุสฺเสหิ สาลิมํโสทนาทีนํ ปตฺเต ปูเรตฺวา ทินฺเนปิ ทุมฺมุขภาวํ อนตฺตมนภาวเมว จ ทสฺเสติ, เตสํ วา สมฺมุขาว ตํ ปิณฺฑปาตํ ‘‘กึ ตุมฺเหหิ ทินฺน’’นฺติ อปสาเทนฺโต สามเณรคหฏฺฐาทีนํ เทติ, เอส ทุพฺภโร. เอตํ ทิสฺวา มนุสฺสา ทูรโตว ปริวชฺเชนฺติ ‘‘ทุพฺภโร ภิกฺขุ น สกฺกา โปเสตุ’’นฺติ[Pg.206]. โย ปน ยํ กิญฺจิ ลูขํ วา ปณีตํ วา อปฺปํ วา พหุํ วา ลภิตฺวา อตฺตมโน วิปฺปสนฺนมุโข หุตฺวา ยาเปติ, เอส สุภโร. เอตํ ทิสฺวา มนุสฺสา อติวิย วิสฺสตฺถา โหนฺติ, ‘‘อมฺหากํ ภทนฺโต สุภโร, โถกโถเกนาปิ ตุสฺสติ, มยเมว นํ โปเสสฺสามา’’ติ ปฏิญฺญํ กตฺวา โปเสนฺติ. เอวรูโป อิธ สุภโรติ อธิปฺเปโต. सहजतेने पोषण केले जाते म्हणून तो 'सुभर' (पोषण्यास सोपा) होय, म्हणजेच तो 'सुपोष' आहे, असे म्हटले आहे. जो भिक्खू लोकांनी पात्र भरून शालिभात, मांस इत्यादी अन्न दिले तरीही चेहऱ्यावर नाराजी आणि असमाधानच दर्शवतो, किंवा त्यांच्या समोरच त्या पिंडपाताचा 'तुम्ही हे काय दिले आहे?' असे म्हणून अनादर करत तो सामणेर किंवा गृहस्थांना देऊन टाकतो, तो 'दुभर' (पोषण्यास कठीण) होय. हे पाहून लोक 'हा भिक्खू दुभर आहे, याचे पोषण करणे शक्य नाही' असे म्हणून लांबूनच त्याला टाळतात. परंतु, जो भिक्खू जे काही कोरडे-रुक्ष किंवा स्वादिष्ट, थोडे किंवा जास्त मिळवून संतुष्ट मनाने आणि प्रसन्न चेहऱ्याने जीवनयापन करतो, तो 'सुभर' होय. हे पाहून लोक अत्यंत निशंक होतात आणि 'आमचे भदंत सुभर आहेत, थोड्याशानेही संतुष्ट होतात, आम्हीच त्यांचे पोषण करू' अशी प्रतिज्ञा करून त्यांचे पोषण करतात. अशा प्रकारचा भिक्खू येथे 'सुभर' म्हणून अभिप्रेत आहे. อปฺปํ กิจฺจมสฺสาติ อปฺปกิจฺโจ, น กมฺมารามตาภสฺสารามตาสงฺคณิการามตาทิอเนกกิจฺจพฺยาวโฏ, อถ วา สกลวิหาเร นวกมฺมสงฺฆปริโภคสามเณรอารามิกโวสาสนาทิกิจฺจวิรหิโต, อตฺตโน เกสนขจฺเฉทนปตฺตจีวรกมฺมาทึ กตฺวา สมณธมฺมกิจฺจปโร โหตีติ วุตฺตํ โหติ. ज्याला अल्प कर्तव्ये आहेत तो 'अप्पकिच्च' (अल्पकृत्य) होय. जो नवीन कामात रममाण होणे (कम्मारामता), गप्पागोष्टीत रममाण होणे (भस्सारामता), समूहात रममाण होणे (संगणिकारामता) इत्यादी अनेक कामांमध्ये गुंतलेला नसतो. किंवा संपूर्ण विहारात नवीन बांधकाम (नवकम्म), संघ-परिभोग, सामणेर आणि आरामिक (विहार सेवक) यांच्या व्यवस्थापनाच्या इत्यादी कर्तव्यांपासून मुक्त राहून, स्वतःचे केसं कापणे, नखे काढणे, पात्र व चीवर दुरुस्ती इत्यादी कामे करून, श्रमणधर्माच्या कर्तव्यांमध्ये तत्पर असतो, असे म्हटले आहे. สลฺลหุกา วุตฺติ อสฺสาติ สลฺลหุกวุตฺติ. ยถา เอกจฺโจ พหุภณฺโฑ ภิกฺขุ ทิสาปกฺกมนกาเล พหุํ ปตฺตจีวรปจฺจตฺถรณเตลคุฬาทึ มหาชเนน สีสภารกฏิภาราทีหิ อุพฺพหาเปตฺวา ปกฺกมติ, เอวํ อหุตฺวา โย อปฺปปริกฺขาโร โหติ, ปตฺตจีวราทิอฏฺฐสมณปริกฺขารมตฺตเมว ปริหรติ, ทิสาปกฺกมนกาเล ปกฺขี สกุโณ วิย สมาทาเยว ปกฺกมติ, เอวรูโป อิธ สลฺลหุกวุตฺตีติ อธิปฺเปโต. สนฺตานิ อินฺทฺริยานิ อสฺสาติ สนฺตินฺทฺริโย, อิฏฺฐารมฺมณาทีสุ ราคาทิวเสน อนุทฺธตินฺทฺริโยติ วุตฺตํ โหติ. นิปโกติ วิญฺญู วิภาวี ปญฺญวา, สีลานุรกฺขณปญฺญาย จีวราทิวิจารณปญฺญาย อาวาสาทิสตฺตสปฺปายปริชานนปญฺญาย จ สมนฺนาคโตติ อธิปฺปาโย. ज्याची उपजीविका हलकी (साधी) आहे तो 'सल्लहुकवुत्ती' (लघुवृत्ती) होय. ज्याप्रमाणे एखादा पुष्कळ सामान असलेला भिक्खू दुसऱ्या दिशेला प्रवासाला निघताना पुष्कळ पात्र, चीवर, बिछाना, तेल, गूळ इत्यादी वस्तू लोकांकडून डोक्यावर किंवा कंबरेवर ओझे म्हणून वाहून घेऊन प्रवास करतो, तसे न करता जो अल्प-परिष्कार (कमी वस्तू असलेला) असतो, केवळ पात्र, चीवर इत्यादी आठ श्रमण-परिष्कारांचेच वहन करतो, आणि प्रवासाला निघताना जसा पक्षी आपले पंख घेऊनच उडतो, तसाच तो केवळ आपले परिष्कार घेऊन निघतो; अशा प्रकारचा भिक्खू येथे 'सल्लहुकवुत्ती' म्हणून अभिप्रेत आहे. ज्याची इंद्रिये शांत आहेत तो 'सन्तिन्द्रिय' (शांतेंद्रिय) होय, म्हणजेच इष्ट आलंबनांमध्ये रागादी विकारांमुळे ज्याची इंद्रिये चंचल होत नाहीत, असे म्हटले आहे. 'निपक' म्हणजे सुज्ञ, विवेकी आणि प्रज्ञावान; जो शील-रक्षणाची प्रज्ञा, चीवर इत्यादींच्या व्यवस्थापनाची प्रज्ञा आणि निवास इत्यादी सात प्रकारच्या सप्पाय (अनुकूल गोष्टी) जाणण्याची प्रज्ञा यांनी युक्त असतो, असा याचा अभिप्राय आहे. น ปคพฺโภติ อปฺปคพฺโภ, อฏฺฐฏฺฐาเนน กายปาคพฺภิเยน จตุฏฺฐาเนน วจีปาคพฺภิเยน อเนเกน ฐาเนน มโนปาคพฺภิเยน จ วิรหิโตติ อตฺโถ. जो उद्धट नाही तो 'अप्पगब्भ' (अनुद्धट) होय. याचा अर्थ असा की, जो आठ प्रकारच्या कायिक उद्धटपणापासून, चार प्रकारच्या वाचिक उद्धटपणापासून आणि अनेक प्रकारच्या मानसिक उद्धटपणापासून मुक्त आहे. อฏฺฐฏฺฐานํ กายปาคพฺภิยํ (มหานิ. ๘๗) นาม สงฺฆคณปุคฺคลโภชนสาลาชนฺตาฆรนฺหานติตฺถภิกฺขาจารมคฺคอนฺตรฆรปฺปเวสเนสุ กาเยน อปฺปติรูปกรณํ. เสยฺยถิทํ – อิเธกจฺโจ สงฺฆมชฺเฌ ปลฺลตฺถิกาย วา นิสีทติ ปาเท ปาทโมทหิตฺวา วาติ เอวมาทิ. ตถา คณมชฺเฌ จตุปริสสนฺนิปาเต, ตถา วุฑฺฒตเร ปุคฺคเล. โภชนสาลายํ ปน วุฑฺฒานํ อาสนํ [Pg.207] น เทติ, นวานํ อาสนํ ปฏิพาหติ. ตถา ชนฺตาฆเร, วุฑฺเฒ เจตฺถ อนาปุจฺฉา อคฺคิชาลนาทีนิ กโรติ. นฺหานติตฺเถ จ ยทิทํ ‘‘ทหโร วุฑฺโฒติ ปมาณํ อกตฺวา อาคตปฏิปาฏิยา นฺหายิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ, ตมฺปิ อนาทิยนฺโต ปจฺฉา อาคนฺตฺวา อุทกํ โอตริตฺวา วุฑฺเฒ จ นเว จ พาเธติ. ภิกฺขาจารมคฺเค ปน อคฺคาสนอคฺโคทกอคฺคปิณฺฑตฺถํ วุฑฺฒานํ ปุรโต ปุรโต ยาติ, พาหาย พาหํ ปหรนฺโต. อนฺตรฆรปฺปเวสเน วุฑฺฒานํ ปฐมตรํ ปวิสติ, ทหเรหิ กายกีฬนํ กโรตีติ เอวมาทิ. आठ प्रकारचा कायिक उद्धटपणा म्हणजे संघ, गण, पुद्गल (व्यक्ती), भोजनशाळा, जंताघर (उष्ण पाण्याचे स्नानगृह), स्नानघाट, भिक्षाटन मार्ग आणि घरांमध्ये प्रवेश करताना शरीराने अयोग्य वर्तन करणे होय. जसे की – येथे एखादा भिक्खू संघाच्या मध्यभागी गुडघे बांधून बसतो किंवा पायावर पाय ठेवून बसतो इत्यादी. तसेच गणाच्या मध्यभागी, चार प्रकारच्या परिषदेच्या सभेत, आणि ज्येष्ठ व्यक्तींच्या समोर (असे वर्तन करतो). भोजनशाळेत तर ज्येष्ठांना आसन देत नाही आणि कनिष्ठांना आसन मिळण्यापासून रोखतो. तसेच जंताघरात ज्येष्ठांना न विचारता अग्नी प्रज्वलित करणे इत्यादी कामे करतो. स्नानघाटावर 'लहान किंवा मोठा असा विचार न करता, आलेल्या क्रमानेच स्नान करावे' असे जे सांगितले आहे, त्याचा अनादर करून, उशिरा येऊनही पाण्यात उतरतो आणि ज्येष्ठ व कनिष्ठ भिक्खूंना त्रास देतो. भिक्षाटन मार्गावर तर मुख्य आसन, मुख्य पाणी आणि मुख्य पिंडपात मिळवण्यासाठी ज्येष्ठांच्या पुढे पुढे चालतो, आणि हाताने हात घासून (धक्के मारत) चालतो. घरांमध्ये प्रवेश करताना ज्येष्ठांच्या आधी प्रवेश करतो, आणि कनिष्ठांसोबत शारीरिक खेळ खेळतो इत्यादी. จตุฏฺฐานํ วจีปาคพฺภิยํ (มหานิ. ๘๗) นาม สงฺฆคณปุคฺคลอนฺตรฆเรสุ อปฺปติรูปวาจานิจฺฉารณํ. เสยฺยถิทํ – อิเธกจฺโจ สงฺฆมชฺเฌ อนาปุจฺฉา ธมฺมํ ภาสติ, ตถา ปุพฺเพ วุตฺตปฺปกาเร คเณ วุฑฺฒตเร ปุคฺคเล จ, ตตฺถ มนุสฺเสหิ ปญฺหํ ปุฏฺโฐ วุฑฺฒตรํ อนาปุจฺฉา วิสฺสชฺเชติ, อนฺตรฆเร ปน ‘‘อิตฺถนฺนาเม กึ อตฺถิ, กึ ยาคุ อุทาหุ ขาทนียํ วา โภชนียํ วา, กึ เม ทสฺสสิ, กึ อชฺช ขาทิสฺสามิ, กึ ภุญฺชิสฺสามิ, กึ ปิวิสฺสามี’’ติ เอวมาทึ ภาสติ. चार प्रकारचा वाचिक उद्धटपणा म्हणजे संघ, गण, पुद्गल आणि घरांमध्ये अयोग्य शब्द बोलणे होय. जसे की – येथे एखादा भिक्खू संघाच्या मध्यभागी ज्येष्ठांना न विचारता धम्म उपदेश करतो, तसेच पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे गणात आणि ज्येष्ठ व्यक्तींच्या समोर (न विचारता बोलतो), तेथे लोकांनी प्रश्न विचारला असता, ज्येष्ठ भिक्खूंना न विचारता स्वतःच उत्तर देतो. घरांमध्ये तर – 'अमुक व्यक्तीच्या घरी काय आहे? पेज आहे की खाण्याचे पदार्थ किंवा भोजन आहे? मला काय द्याल? आज मी काय खाणार? काय जेवणार? काय पिणार?' इत्यादी गोष्टी बोलतो. อเนกฏฺฐานํ มโนปาคพฺภิยํ (มหานิ. ๘๗) นาม เตสุ เตสุ ฐาเนสุ กายวาจาหิ อชฺฌาจารํ อนาปชฺชิตฺวาปิ มนสา เอว กามวิตกฺกาทินานปฺปการํ อปฺปติรูปวิตกฺกนํ. अनेक प्रकारचा मानसिक उद्धटपणा म्हणजे त्या त्या ठिकाणी काय आणि वाचेने अतिचार (उल्लंघन) न करताही, केवळ मनानेच कामवितर्क इत्यादी विविध प्रकारचे अयोग्य विचार करणे होय. กุเลสฺวนนุคิทฺโธติ ยานิ ตานิ กุลานิ อุปสงฺกมติ, เตสุ ปจฺจยตณฺหาย วา อนนุโลมิกคิหิสํสคฺควเสน วา อนนุคิทฺโธ, น สหโสกี, น สหนนฺที, น สุขิเตสุ สุขิโต, น ทุกฺขิเตสุ ทุกฺขิโต, น อุปฺปนฺเนสุ กิจฺจกรณีเยสุ อตฺตนา วา อุยฺโยคมาปชฺชิตาติ วุตฺตํ โหติ. อิมิสฺสาย จ คาถาย ยํ ‘‘สุวโจ จสฺสา’’ติ เอตฺถ วุตฺตํ อสฺสาติ วจนํ, ตํ สพฺพปเทหิ สทฺธึ สนฺตุสฺสโก จ อสฺส, สุภโร จ อสฺสาติ เอวํ โยเชตพฺพํ. 'कुलेसु अननुगिद्धो' (कुळांमध्ये अनासक्त) म्हणजे ज्या ज्या कुळांमध्ये तो जातो, त्यांच्यामध्ये प्रत्ययांच्या (गरजांच्या) तृष्णेमुळे किंवा गृहस्थांशी अयोग्य संसर्गामुळे आसक्त न होणारा. तो त्यांच्या दुःखात दुःखी होत नाही, त्यांच्या आनंदात हर्षोन्मत्त होत नाही, ते सुखी असताना स्वतः सुखी होत नाही, ते दुःखी असताना स्वतः दुःखी होत नाही, आणि त्यांच्यावर काही कामे किंवा कर्तव्ये उद्भवली असता स्वतः त्यात गुंतून पडत नाही, असे म्हटले आहे. आणि या गाथेमध्ये जे 'सुवचो चस्स' येथे 'अस्स' (असावा) हा शब्द आला आहे, तो सर्व पदांशी जोडून 'संतुष्ट असावा', 'सुभर असावा' अशा प्रकारे त्याचा संबंध जोडला पाहिजे. ตติยคาถาวณฺณนา तिसऱ्या गाथेचे स्पष्टीकरण. ๓. เอวํ ภควา สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจ วิหริตุกามสฺส ตทธิคมาย วา ปฏิปชฺชิตุกามสฺส วิเสสโต อารญฺญกสฺส ภิกฺขุโน ตทุตฺตริปิ กรณียํ อาจิกฺขิตฺวา อิทานิ อกรณียมฺปิ อาจิกฺขิตุกาโม ‘‘น จ ขุทฺทมาจเร กิญฺจิ, เยน วิญฺญู ปเร อุปวเทยฺยุ’’นฺติ อิมํ อุปฑฺฒคาถมาห. ३. अशा प्रकारे भगवंतांनी शांत पदाचा (निर्वाणाचा) साक्षात्कार करून विहरण्याची इच्छा असणाऱ्या, किंवा ते पद प्राप्त करण्यासाठी साधना करण्याची इच्छा असणाऱ्या, विशेषतः अरण्यवासी भिक्खूसाठी, त्याहून अधिक काय करावे (करणीय) हे सांगून, आता काय करू नये (अकरणीय) हे सांगण्याची इच्छा धरून, 'असे कोणतेही क्षुद्र आचरण करू नये, ज्यामुळे इतर सुज्ञ लोक दोष देतील' ही अर्धी गाथा म्हटली आहे. ตสฺสตฺโถ [Pg.208] – เอวมิมํ กรณียํ กโรนฺโต ยํ ตํ กายวจีมโนทุจฺจริตํ ขุทฺทํ ลามกนฺติ วุจฺจติ, ตํ น จ ขุทฺทํ สมาจเร, อสมาจรนฺโต จ น เกวลํ โอฬาริกํ, กินฺตุ กิญฺจิ น สมาจเร, อปฺปมตฺตกมฺปิ อณุมตฺตกมฺปิ น สมาจเรติ วุตฺตํ โหติ. त्याचा अर्थ असा – अशा प्रकारे या करणीयांचे आचरण करत असताना, जे कायिक, वाचिक आणि मानसिक दुश्चरित आहे, ज्याला 'क्षुद्र' किंवा 'हीन' म्हटले जाते, त्या क्षुद्र कर्माचे आचरण करू नये. आणि आचरण न करताना केवळ स्थूल (मोठ्या) पापांचेच नव्हे, तर कोणतेही (क्षुद्र पाप) आचरू नये. अगदी थोडे किंवा अणुमात्रही पाप आचरू नये, असे म्हटले आहे. ตโต ตสฺส สมาจาเร สนฺทิฏฺฐิกเมวาทีนวํ ทสฺเสติ ‘‘เยน วิญฺญู ปเร อุปวเทยฺยุ’’นฺติ. เอตฺถ จ ยสฺมา อวิญฺญู ปเร อปฺปมาณํ. เต หิ อนวชฺชํ วา สาวชฺชํ กโรนฺติ, อปฺปสาวชฺชํ วา มหาสาวชฺชํ. วิญฺญู เอว ปน ปมาณํ. เต หิ อนุวิจฺจ ปริโยคาเหตฺวา อวณฺณารหสฺส อวณฺณํ ภาสนฺติ, วณฺณารหสฺส วณฺณํ ภาสนฺติ. ตสฺมา ‘‘วิญฺญู ปเร’’ติ วุตฺตํ. त्यानंतर, त्या अयोग्य आचरणामध्ये असणारा प्रत्यक्ष (ऐहिक) दोष दाखवण्यासाठी 'ज्यामुळे इतर सुज्ञ लोक दोष देतील' असे म्हटले आहे. आणि येथे कारण असे की, जे अज्ञानी लोक आहेत ते प्रमाण मानले जात नाहीत. कारण ते निर्दोष गोष्टीला सदोष ठरवतात, किंवा लहान दोषाला मोठा दोष ठरवतात. परंतु सुज्ञ लोकच प्रमाण आहेत. कारण ते नीट विचार करून आणि पडताळून पाहून, निंदेला पात्र असणाऱ्याची निंदा करतात आणि स्तुतीला पात्र असणाऱ्याची स्तुती करतात. म्हणूनच 'इतर सुज्ञ लोक' असे म्हटले आहे. เอวํ ภควา อิมาหิ อฑฺฒเตยฺยาหิ คาถาหิ สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจ วิหริตุกามสฺส ตทธิคมาย วา ปฏิปชฺชิตุกามสฺส วิเสสโต อารญฺญกสฺส, อารญฺญกสีเสน จ สพฺเพสมฺปิ กมฺมฏฺฐานํ คเหตฺวา วิหริตุกามานํ กรณียากรณียเภทํ กมฺมฏฺฐานูปจารํ วตฺวา อิทานิ เตสํ ภิกฺขูนํ ตสฺส เทวตาภยสฺส ปฏิฆาตาย ปริตฺตตฺถํ วิปสฺสนาปาทกชฺฌานวเสน กมฺมฏฺฐานตฺถญฺจ ‘‘สุขิโนว เขมิโน โหนฺตู’’ติอาทินา นเยน เมตฺตกถํ กเถตุมารทฺโธ. अशा प्रकारे भगवंतांनी या अडीच गाथांद्वारे, शांत पदाचा (निर्वाणाचा) साक्षात करून विहरण्याची इच्छा असणाऱ्या किंवा ते प्राप्त करण्यासाठी प्रतिपन्न (साधना) करण्याची इच्छा असणाऱ्या, विशेषतः आरण्यक (अरण्यात राहणाऱ्या) भिक्खूसाठी आणि आरण्यक जीवनपद्धतीला मुख्य मानून सर्वच कम्मट्ठान (कर्मस्थान) ग्रहण करून विहरण्याची इच्छा असणाऱ्या भिक्खूंसाठी काय करावे आणि काय करू नये या भेदासह कम्मट्ठानाच्या उपचाराचे (पद्धतीचे) कथन केले. आता त्या भिक्खूंच्या मनात उत्पन्न झालेल्या देवतांच्या भयाचे निवारण करण्यासाठी, त्यांच्या संरक्षणासाठी, व विपस्सना-पादक (विपश्यनेचा पाया असलेल्या) ध्यानाच्या द्वारे आणि कम्मट्ठानाच्या उद्देशासाठी “सुखिनो वा खेमिनो होन्तु” (सर्व प्राणी सुखी व सुरक्षित होवोत) इत्यादी पद्धतीने मेत्ता-कथा (मैत्रीची देशना) सांगण्यास प्रारंभ केला आहे. ตตฺถ สุขิโนติ สุขสมฺปนฺนา. เขมิโนติ เขมวนฺโต, อภยา นิรุปทฺทวาติ วุตฺตํ โหติ. สพฺเพติ อนวเสสา. สตฺตาติ ปาณิโน. สุขิตตฺตาติ สุขิตจิตฺตา. เอตฺถ จ กายิเกน สุเขน สุขิโน, มานเสน สุขิตตฺตา, ตทุภเยนาปิ สพฺพภยุปทฺทววิคเมน วา เขมิโนติ เวทิตพฺโพ. กสฺมา ปน เอวํ วุตฺตํ? เมตฺตาภาวนาการทสฺสนตฺถํ. เอวญฺหิ เมตฺตา ภาเวตพฺพา ‘‘สพฺเพ สตฺตา สุขิโน โหนฺตู’’ติ วา, ‘‘เขมิโน โหนฺตู’’ติ วา, ‘‘สุขิตตฺตา โหนฺตู’’ติ วา. त्यामध्ये, 'सुखिनो' म्हणजे सुखाने संपन्न असलेले. 'खेमिनो' म्हणजे क्षेमयुक्त (सुरक्षित), भयमुक्त आणि उपद्रवरहित असणे, असा अर्थ आहे. 'सब्बे' म्हणजे निरवशेष (सर्व). 'सत्ता' म्हणजे प्राणी. 'sukhitattā' म्हणजे सुखी चित्त असलेले. आणि येथे, शारीरिक सुखाने सुखी असणाऱ्यांना 'सुखिनो', मानसिक सुखाने सुखी चित्त असणाऱ्यांना 'सुखितत्ता' आणि त्या दोन्ही प्रकारच्या सुखाने युक्त असणाऱ्यांना किंवा सर्व भय व उपद्रव दूर झाल्यामुळे त्यांना 'खेमिनो' (सुरक्षित) असे समजावे. पण असे का म्हटले आहे? मेत्ता-भावनेचा (मैत्री भावनेचा) प्रकार दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे. हे सत्य आहे, अशा प्रकारे मेत्ता भावना वाढवावी की, “सर्व प्राणी सुखी होवोत” किंवा “सुरक्षित होवोत” किंवा “सुखी चित्त असलेले होवोत”. จตุตฺถคาถาวณฺณนา चौथ्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना) ๔. เอวํ ยาว อุปจารโต อปฺปนาโกฏิ, ตาว สงฺเขเปน เมตฺตาภาวนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ วิตฺถารโตปิ ตํ ทสฺเสตุํ ‘‘เย เกจี’’ติ คาถาทฺวยมาห. อถ วา ยสฺมา ปุถุตฺตารมฺมเณ ปริจิตํ จิตฺตํ น อาทิเกเนว เอกตฺเต สณฺฐาติ อารมฺมณปฺปเภทํ ปน อนุคนฺตฺวา อนุคนฺตฺวา กเมน [Pg.209] สณฺฐาติ, ตสฺมา ตสฺส ตสถาวราทิทุกติกปฺปเภเท อารมฺมเณ อนุคนฺตฺวา อนุคนฺตฺวา สณฺฐานตฺถมฺปิ ‘‘เย เกจี’’ติ คาถาทฺวยมาห. อถ วา ยสฺมา ยสฺส ยํ อารมฺมณํ วิภูตํ โหติ, ตสฺส ตตฺถ จิตฺตํ สุขํ ติฏฺฐติ, ตสฺมา เตสํ ภิกฺขูนํ ยสฺส ยํ วิภูตํ อารมฺมณํ, ตสฺส ตตฺถ จิตฺตํ สณฺฐาเปตุกาโม ตสถาวราทิทุกติการมฺมณเภททีปกํ ‘‘เย เกจี’’ติ อิมํ คาถาทฺวยมาห. ४. अशा प्रकारे उपचारापासून अप्पनाच्या (अर्पणा ध्यानाच्या) सीमेपर्यंत संक्षेपाने मेत्ता-भावना दर्शवून, आता विस्ताराने देखील ती दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी “ये केचि” इत्यादी दोन गाथा म्हटल्या आहेत. किंवा, ज्या अर्थी विविध आलंबनांवर सरावलेले चित्त सुरुवातीलाच एकाच आलंबनावर स्थिर होत नाही, परंतु आलंबनांच्या विविधतेचे अनुकरण करत करत हळूहळू स्थिर होते; म्हणून त्या भिक्खूच्या चित्ताला तस (भयभीत होणारे) व थावर (स्थिर असणारे) इत्यादी द्विक आणि त्रिक रूपातील विविध आलंबनांचे अनुकरण करत करत स्थिर करण्यासाठी देखील भगवंतांनी “ये केचि” इत्यादी दोन गाथा म्हटल्या आहेत. किंवा, ज्या अर्थी ज्या भिक्खूला जे आलंबन स्पष्ट (प्रकट) होते, त्याचे चित्त तेथे सहजपणे स्थिर होते; म्हणून त्या भिक्खूंपैकी ज्याला जे आलंबन स्पष्ट होते, त्याचे चित्त तेथे स्थिर करण्याची इच्छा धरून भगवंतांनी तस व थावर इत्यादी द्विक व त्रिक आलंबनांचे भेद स्पष्ट करणाऱ्या “ये केचि” या दोन गाथा म्हटल्या आहेत. เอตฺถ หิ ตสถาวรทุกํ ทิฏฺฐาทิฏฺฐทุกํ ทูรสนฺติกทุกํ ภูตสมฺภเวสิทุกนฺติ จตฺตาโร ทุเก, ทีฆาทีหิ จ ฉหิ ปเทหิ มชฺฌิมปทสฺส ตีสุ อณุกปทสฺส จ ทฺวีสุ ติเกสุ อตฺถสมฺภวโต ทีฆรสฺสมชฺฌิมติกํ มหนฺตาณุกมชฺฌิมติกํ ถูลาณุกมชฺฌิมติกนฺติ ตโย ติเก จ ทีเปติ. ตตฺถ เย เกจีติ อนวเสสวจนํ. ปาณา เอว ภูตา ปาณภูตา. อถ วา ปาณนฺตีติ ปาณา, เอเตน อสฺสาสปสฺสาสปฺปฏิพทฺเธ ปญฺจโวการสตฺเต คณฺหาติ. ภวนฺตีติ ภูตา, เอเตน เอกโวการจตุโวการสตฺเต คณฺหาติ. อตฺถีติ สนฺติ สํวิชฺชนฺติ. येथे तस-थावर द्विक, दिठ्ठ-अदिठ्ठ (दृष्ट-अदृष्ट) द्विक, दूर-संतिक (दूर व जवळ) द्विक आणि भूत-संभवेसी द्विक असे चार द्विक दर्शवले आहेत; आणि 'दीघ' (दीर्घ) इत्यादी सहा पदांद्वारे, अर्थाच्या शक्यतेनुसार 'मज्झिम' (मध्यम) पदाचा तीन त्रिकांमध्ये आणि 'अणुक' (सूक्ष्म) पदाचा दोन त्रिकांमध्ये समावेश करून, दीघ-रस्स-मज्झिम (दीर्घ, र्हस्व, मध्यम) त्रिक, महंत-अणुक-मज्झिम (महान, सूक्ष्म, मध्यम) त्रिक आणि थूल-अणुक-मज्झिम (स्थूल, सूक्ष्म, मध्यम) त्रिक असे तीन त्रिक देखील दर्शवले आहेत. त्यामध्ये 'ये केचि' हा निरवशेष (सर्वसमावेशक) शब्द आहे. जे प्राणी आहेत तेच भूत आहेत, म्हणून 'पाणभूत'. किंवा जे श्वास घेतात ते 'पाण' (प्राणी); या शब्दाने श्वासोच्छ्वासाशी संबंधित असलेल्या पंचवोकार (पाच स्कंध असलेल्या) प्राण्यांचे ग्रहण होते. जे उत्पन्न होतात ते 'भूत'; या शब्दाने एकवोकार (एक स्कंध असलेले) आणि चतुवोकार (चार स्कंध असलेले) प्राण्यांचे ग्रहण होते. 'अत्थि' म्हणजे आहेत, अस्तित्वात आहेत. เอวํ ‘‘เย เกจิ ปาณภูตตฺถี’’ติ อิมินา วจเนน ทุกติเกหิ สงฺคเหตพฺเพ สพฺพสตฺเต เอกโต ทสฺเสตฺวา อิทานิ สพฺเพปิ เต ตสา วา ถาวรา ว นวเสสาติ อิมินา ทุเกน สงฺคเหตฺวา ทสฺเสติ. अशा प्रकारे, “ये केचि पाणभूतत्थि” या शब्दांद्वारे द्विक आणि त्रिकांमध्ये समाविष्ट होणाऱ्या सर्व प्राण्यांना एकत्रितपणे दर्शवून, आता त्या सर्व प्राण्यांना “तसा वा थावरा वा अनवसेसा” या द्विकाद्वारे समाविष्ट करून दर्शवले आहे. ตตฺถ ตสนฺตีติ ตสา, สตณฺหานํ สภยานญฺเจตํ อธิวจนํ. ติฏฺฐนฺตีติ ถาวรา, ปหีนตณฺหาภยานํ อรหตํ เอตํ อธิวจนํ. นตฺถิ เตสํ อวเสสนฺติ อนวเสสา, สพฺเพปีติ วุตฺตํ โหติ. ยญฺจ ทุติยคาถาย อนฺเต วุตฺตํ, ตํ สพฺพทุกติเกหิ สมฺพนฺธิตพฺพํ ‘‘เย เกจิ ปาณภูตตฺถิ ตสา วา ถาวรา วา อนวเสสา, อิเมปิ สพฺเพ สตฺตา ภวนฺตุ สุขิตตฺตา. เอวํ ยาว ภูตา วา สมฺภเวสี วา, อิเมปิ สพฺเพ สตฺตา ภวนฺตุ สุขิตตฺตา’’ติ. त्यामध्ये, जे भयभीत होतात (थरथर कापतात) ते 'तस'; हे तृष्णा आणि भय असणाऱ्या प्राण्यांचे नाव (पर्यायवाची शब्द) आहे. जे स्थिर राहतात ते 'थावर'; हे तृष्णा आणि भय नष्ट झालेल्या अरहंतांचे नाव आहे. ज्यांचा काहीही अंश शिल्लक राहत नाही ते 'अनवसेस'; म्हणजेच सर्व प्राणी, असा अर्थ आहे. आणि जे दुसऱ्या गाथेच्या शेवटी म्हटले आहे, ते सर्व द्विक आणि त्रिकांशी जोडले पाहिजे, जसे की: “ये केचि पाणभूतत्थि तसा वा थावरा वा अनवसेसा, इमेपि सब्वे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता” (जे काही प्राणी आहेत, भयभीत होणारे असोत वा स्थिर असोत, ते सर्व प्राणी सुखी चित्त असलेले होवोत). अशा प्रकारे “भूता वा संभवेसी वा, इमेपि सब्वे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता” (जे उत्पन्न झाले आहेत किंवा जे उत्पत्तीच्या शोधात आहेत, ते सर्व प्राणी सुखी चित्त असलेले होवोत) इथपर्यंत जोडले पाहिजे. อิทานิ ทีฆรสฺสมชฺฌิมาทิติกตฺตยทีปเกสุ ทีฆา วาติอาทีสุ ฉสุ ปเทสุ ทีฆาติ ทีฆตฺตภาวา นาคมจฺฉโคธาทโย. อเนกพฺยามสตปฺปมาณาปิ หิ มหาสมุทฺเท นาคานํ อตฺตภาวา อเนกโยชนปฺปมาณา จ มจฺฉโคธาทีนํ อตฺตภาวา โหนฺติ. มหนฺตาติ มหนฺตตฺตภาวา ชเล มจฺฉกจฺฉปาทโย, ถเล หตฺถินาคาทโย, อมนุสฺเสสุ ทานวาทโย[Pg.210]. อาห จ ‘‘ราหุคฺคํ อตฺตภาวีน’’นฺติ (อ. นิ. ๔.๑๕). ตสฺส หิ อตฺตภาโว อุพฺเพเธน จตฺตาริ โยชนสหสฺสานิ อฏฺฐ จ โยชนสตานิ, พาหู ทฺวาทสโยชนสตปริมาณา, ปญฺญาสโยชนํ ภมุกนฺตรํ, ตถา องฺคุลนฺตริกา, หตฺถตลานิ ทฺเว โยชนสตานีติ. มชฺฌิมาติ อสฺสโคณมหึสสูกราทีนํ อตฺตภาวา. รสฺสกาติ ตาสุ ตาสุ ชาตีสุ วามนาทโย ทีฆมชฺฌิเมหิ โอมกปฺปมาณา สตฺตา. อณุกาติ มํสจกฺขุสฺส อโคจรา ทิพฺพจกฺขุวิสยา อุทกาทีสุ นิพฺพตฺตา สุขุมตฺตภาวา สตฺตา อูกาทโย วา. อปิจ เย ตาสุ ตาสุ ชาตีสุ มหนฺตมชฺฌิเมหิ ถูลมชฺฌิเมหิ จ โอมกปฺปมาณา สตฺตา, เต อณุกาติ เวทิตพฺพา. ถูลาติ ปริมณฺฑลตฺตภาวา สิปฺปิกสมฺพุกาทโย สตฺตา. आता दीर्घ, र्हस्व, मध्यम इत्यादी तीन त्रिक दर्शवणाऱ्या “दीघा वा” इत्यादी सहा पदांमध्ये, 'दीघा' म्हणजे दीर्घ शरीर असणारे नाग, मासे, घोरपडी इत्यादी प्राणी. कारण महासागरातील नागांचे शरीर अनेकशे व्याम (हात) प्रमाणाचे देखील असते आणि मासे, घोरपडी इत्यादींचे शरीर अनेक योजन प्रमाणाचे असते. 'महन्ता' म्हणजे मोठे शरीर असलेले, पाण्यात राहणारे मासे, कासव इत्यादी, जमिनीवर राहणारे हत्ती इत्यादी आणि अमनुष्यांमध्ये दानव इत्यादी प्राणी. भगवंतांनी म्हटले देखील आहे: “राहू हा शरीरधाऱ्यांमध्ये श्रेष्ठ आहे” (अङ्गुत्तर निकाय ४.१५). कारण त्याचे शरीर उंचीने चार हजार आठशे योजन आहे, त्याचे बाहू बाराशे योजन प्रमाणाचे आहेत, दोन्ही भुवयांमधील अंतर पन्नास योजन आहे, तसेच बोटांमधील अंतर पन्नास योजन आहे आणि हाताचे तळवे दोनशे योजन प्रमाणाचे आहेत. 'मज्झिमा' म्हणजे घोडा, गाय, म्हैस, डुक्कर इत्यादींचे मध्यम आकाराचे शरीर. 'रस्सका' म्हणजे त्या त्या जातींमध्ये बुटके इत्यादी असणारे प्राणी, जे दीर्घ व मध्यम शरीराच्या प्राण्यांपेक्षा लहान आकाराचे असतात. 'अणुका' म्हणजे चर्मचक्षूंना न दिसणारे, परंतु दिव्यचक्षूंचे विषय असणारे, पाण्यात इत्यादी ठिकाणी उत्पन्न होणारे सूक्ष्म शरीराचे प्राणी किंवा उवा इत्यादी. शिवाय, जे प्राणी त्या त्या जातींमध्ये महान व मध्यम किंवा स्थूल व मध्यम प्राण्यांपेक्षा लहान आकाराचे असतात, त्यांना 'अणुक' असे समजावे. 'थूला' म्हणजे गोल शरीर असणारे शिंपले, गोगलगाई इत्यादी प्राणी. ปญฺจมคาถาวณฺณนา पाचव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना) ๕. เอวํ ตีหิ ติเกหิ อนวเสสโต สตฺเต ทสฺเสตฺวา อิทานิ ‘‘ทิฏฺฐา วา เย ว อทิฏฺฐา’’ติอาทีหิ ตีหิ ทุเกหิปิ เต สงฺคเหตฺวา ทสฺเสติ. ५. अशा प्रकारे तीन त्रिकांद्वारे निरवशेषपणे प्राण्यांना दर्शवून, आता “दिठ्ठा वा ये व अदिठ्ठा” इत्यादी तीन द्विकांद्वारे देखील त्यांना समाविष्ट करून दर्शवले आहे. ตตฺถ ทิฏฺฐาติ เย อตฺตโน จกฺขุสฺส อาปาถมาคตวเสน ทิฏฺฐปุพฺพา. อทิฏฺฐาติ เย ปรสมุทฺทปรเสลปรจกฺกวาฬาทีสุ ฐิตา. ‘‘เย วา ทูเร วสนฺติ อวิทูเร’’ติ อิมินา ปน ทุเกน อตฺตโน อตฺตภาวสฺส ทูเร จ อวิทูเร จ วสนฺเต สตฺเต ทสฺเสติ, เต อปททฺวิปทวเสน เวทิตพฺพา. อตฺตโน หิ กาเย วสนฺตา สตฺตา อวิทูเร, พหิกาเย วสนฺตา สตฺตา ทูเร. ตถา อนฺโตอุปจาเร วสนฺตา อวิทูเร, พหิอุปจาเร วสนฺตา ทูเร. อตฺตโน วิหาเร คาเม ชนปเท ทีเป จกฺกวาเฬ วสนฺตา อวิทูเร, ปรจกฺกวาเฬ วสนฺตา ทูเร วสนฺตีติ วุจฺจนฺติ. त्यामध्ये, 'दिठ्ठा' म्हणजे जे स्वतःच्या डोळ्यांसमोर आल्यामुळे पूर्वी पाहिलेले आहेत. 'अदिठ्ठा' म्हणजे जे दुसऱ्या समुद्राच्या पलीकडे, पर्वताच्या पलीकडे किंवा दुसऱ्या चक्रवाळाच्या (ब्रह्मांडाच्या) पलीकडे राहतात. “ये वा दूरे वसन्ति अविदूरे” या द्विकाद्वारे स्वतःच्या शरीरापासून दूर आणि जवळ राहणाऱ्या प्राण्यांना दर्शवले आहे; त्यांना अपद (पाय नसलेले), द्विपद (दोन पाय असलेले) इत्यादींच्या स्वरूपात समजावे. कारण स्वतःच्या शरीरात राहणारे प्राणी 'जवळ' आहेत, शरीराच्या बाहेर राहणारे प्राणी 'दूर' आहेत. तसेच स्वतःच्या उपचारात (परिसरात) राहणारे प्राणी 'जवळ' आहेत, उपचाराच्या बाहेर राहणारे प्राणी 'दूर' आहेत. स्वतःच्या विहारात, गावात, जनपदात, द्वीपात किंवा चक्रवाळात राहणारे प्राणी 'जवळ' आहेत आणि दुसऱ्या चक्रवाळात राहणाऱ्या प्राण्यांना 'दूर राहणारे' असे म्हटले जाते. ภูตาติ ชาตา อภินิพฺพตฺตา. เย ภูตา เอว, น ปุน ภวิสฺสนฺตีติ สงฺขฺยํ คจฺฉนฺติ, เตสํ ขีณาสวานํ เอตํ อธิวจนํ. สมฺภวเมสนฺตีติ สมฺภเวสี. อปฺปหีนภวสํโยชนตฺตา อายติมฺปิ สมฺภวํ เอสนฺตานํ เสขปุถุชฺชนานเมตํ อธิวจนํ. อถ วา จตูสุ โยนีสุ อณฺฑชชลาพุชา สตฺตา ยาว อณฺฑโกสํ วตฺถิโกสญฺจ น ภินฺทนฺติ, ตาว สมฺภเวสี นาม, อณฺฑโกสํ วตฺถิโกสญฺจ ภินฺทิตฺวา พหิ นิกฺขนฺตา ภูตา นาม[Pg.211]. สํเสทชา โอปปาติกา จ ปฐมจิตฺตกฺขเณ สมฺภเวสี นาม, ทุติยจิตฺตกฺขณโต ปภุติ ภูตา นาม. เยน วา อิริยาปเถน ชายนฺติ, ยาว ตโต อญฺญํ น ปาปุณนฺติ, ตาว สมฺภเวสี นาม, ตโต ปรํ ภูตาติ. ‘भूत’ म्हणजे उत्पन्न झालेले, प्रकट झालेले. जे केवळ उत्पन्न झाले आहेत आणि ‘पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत’ या संख्येस प्राप्त होतात, हे त्या क्षीणासवांचे (अर्हतांचे) अधिवाचन (नाव) आहे. ‘संभव’ (पुनर्जन्म) शोधणारे ते ‘संभवेसी’ होत. भव-संयोजने नष्ट न झाल्यामुळे भविष्यातही संभवाचा शोध घेणाऱ्या शैक्ष (सेख) आणि पृथग्जनांचे (पुथुज्जनांचे) हे अधिवाचन आहे. किंवा, चार योनींपैकी अंडज आणि जरायुज प्राणी जोपर्यंत अंड्याचे कवच आणि गर्भाशय फोडत नाहीत, तोपर्यंत त्यांना ‘संभवेसी’ म्हटले जाते; आणि अंड्याचे कवच व गर्भाशय फोडून बाहेर पडल्यावर त्यांना ‘भूत’ म्हटले जाते. संसेदज आणि ओपपातिक प्राणी पहिल्या चित्तक्षणी ‘संभवेसी’ आणि दुसऱ्या चित्तक्षणापासून ‘भूत’ म्हटले जातात. किंवा, ज्या इरियापथाने (शारीरिक स्थितीने) ते उत्पन्न होतात, जोपर्यंत ते त्यातून दुसऱ्या इरियापथात पोहोचत नाहीत, तोपर्यंत त्यांना ‘संभवेसी’ म्हटले जाते आणि त्यानंतर त्यांना ‘भूत’ म्हटले जाते। ฉฏฺฐคาถาวณฺณนา सहाव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๖. เอวํ ภควา ‘‘สุขิโน วา’’ติอาทีหิ อฑฺฒเตยฺยาหิ คาถาหิ นานปฺปการโต เตสํ ภิกฺขูนํ หิตสุขาคมปตฺถนาวเสน สตฺเตสุ เมตฺตาภาวนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ อหิตทุกฺขานาคมปตฺถนาวเสนาปิ ตํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘น ปโร ปรํ นิกุพฺเพถา’’ติ. เอส โปราโณ ปาโฐ, อิทานิ ปน ‘‘ปรํ หี’’ติปิ ปฐนฺติ, อยํ น โสภโน. ६. अशा प्रकारे भगवंतांनी “सुखिनो वा” इत्यादी अडीच गाथांद्वारे विविध प्रकारे त्या भिक्खूंच्या हित आणि सुखाच्या प्राप्तीची आकांक्षा करण्याच्या हेतूने प्राण्यांविषयी मेत्ताभावनेची (मैत्रीभावनेची) जोपासना दर्शवून, आता अहित आणि दुःखाचे आगमन न व्हावे या आकांक्षेने देखील ती मेत्ताभावना दर्शवताना “न परो परं निकुब्बेथ” (कोणीही दुसऱ्याची फसवणूक करू नये) असे म्हटले. हा प्राचीन पाठ आहे, परंतु आता काही जण “परं ही” असाही पाठ वाचतात, जो शोभनीय नाही. ตตฺถ ปโรติ ปรชโน. ปรนฺติ ปรชนํ. น นิกุพฺเพถาติ น วญฺเจยฺย. นาติมญฺเญถาติ น อติกฺกมิตฺวา มญฺเญยฺย. กตฺถจีติ กตฺถจิ โอกาเส, คาเม วา คามเขตฺเต วา ญาติมชฺเฌ วา ปูคมชฺเฌ วาติอาทิ. นนฺติ เอตํ. กญฺจีติ ยํ กญฺจิ ขตฺติยํ วา พฺราหฺมณํ วา คหฏฺฐํ วา ปพฺพชิตํ วา สุขิตํ วา ทุกฺขิตํ วาติอาทิ. พฺยาโรสนา ปฏิฆสญฺญาติ กายวจีวิกาเรหิ พฺยาโรสนาย จ มโนวิกาเรน ปฏิฆสญฺญาย จ. ‘‘พฺยาโรสนาย ปฏิฆสญฺญายา’’ติ หิ วตฺตพฺเพ ‘‘พฺยาโรสนา ปฏิฆสญฺญา’’ติ วุจฺจติ, ยถา ‘‘สมฺมทญฺญาย วิมุตฺตา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘สมฺมทญฺญา วิมุตฺตา’’ติ, ยถา จ ‘‘อนุปุพฺพสิกฺขาย อนุปุพฺพกิริยาย อนุปุพฺพปฏิปทายา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘อนุปุพฺพสิกฺขา อนุปุพฺพกิริยา อนุปุพฺพปฏิปทา’’ติ. นาญฺญมญฺญสฺส ทุกฺขมิจฺเฉยฺยาติ อญฺญมญฺญสฺส ทุกฺขํ น อิจฺเฉยฺย. กึ วุตฺตํ โหติ? น เกวลํ ‘‘สุขิโน วา เขมิโน วา โหนฺตู’’ติอาทิมนสิการวเสเนว เมตฺตํ ภาเวยฺย, กินฺตุ ‘‘อโหวต โย โกจิ ปรปุคฺคโล ยํ กญฺจิ ปรปุคฺคลํ วญฺจนาทีหิ นิกตีหิ น นิกุพฺเพถ, ชาติอาทีหิ จ นวหิ มานวตฺถูหิ กตฺถจิ ปเทเส กญฺจิ ปรปุคฺคลํ นาติมญฺเญยฺย, อญฺญมญฺญสฺส จ พฺยาโรสนาย วา ปฏิฆสญฺญาย วา ทุกฺขํ น อิจฺเฉยฺยา’’ติ เอวมฺปิ มนสิกโรนฺโต ภาเวยฺยาติ. त्यामध्ये, ‘परो’ म्हणजे दुसरा मनुष्य. ‘परं’ म्हणजे दुसऱ्या मनुष्याला. ‘न निकुब्बेथ’ म्हणजे फसवणूक करू नये. ‘नातिमञ्ञेथ’ म्हणजे तुच्छ लेखू नये (अतिक्रमण करून मानू नये). ‘कत्थचि’ म्हणजे कोणत्याही ठिकाणी, जसे की गावात, शेतात, नातेवाईकांमध्ये किंवा समूहामध्ये इत्यादी. ‘नं’ म्हणजे त्याला. ‘कंचि’ म्हणजे कोणताही क्षत्रिय, ब्राह्मण, गृहस्थ, प्रव्रजित, सुखी किंवा दुःखी इत्यादी व्यक्तीला. ‘ब्यारोसना पटिघसञ्ञा’ म्हणजे कायिक व वाचिक विकारांद्वारे होणारा विरोध (ब्यारोसना) आणि मानसिक विकाराने निर्माण होणारी प्रतिघ-संज्ञा (द्वेषयुक्त विचार). वास्तविक पाहता “ब्यारोसनाय पटिघसञ्ञाय” असे म्हणायला हवे होते, परंतु येथे “ब्यारोसना पटिघसञ्ञा” असे म्हटले आहे; ज्याप्रमाणे “सम्मदञ्ञाय विमुत्ता” म्हणण्याऐवजी “सम्मदञ्ञा विमुत्ता” म्हटले जाते, आणि ज्याप्रमाणे “अनुपुब्बसिक्खाय अनुपुब्बकिरियाय अनुपुubbपटिपदाय” म्हणण्याऐवजी “अनुपुब्बसिक्खा अनुपुब्बकिरिया अनुपुब्बपटिपदा” असे म्हटले जाते. ‘नाञ्ञमञ्ञस्स दुक्खमिच्छेय्य’ म्हणजे एकमेकांच्या दुःखाची इच्छा करू नये. याचा काय अर्थ होतो? केवळ “सर्व प्राणी सुखी आणि सुरक्षित होवोत” इत्यादी मनसिकारानेच (विचारानेच) मेत्ताभावना वाढवू नये, तर “अहो! कोणत्याही व्यक्तीने दुसऱ्या कोणत्याही व्यक्तीला फसवणूक इत्यादी कपटाने फसवू नये; जात इत्यादी नऊ प्रकारच्या मान-वस्तूंच्या (अहंकाराच्या कारणांच्या) आधारे कोणत्याही ठिकाणी दुसऱ्या व्यक्तीला तुच्छ लेखू नये; आणि एकमेकांबद्दलच्या विरोधाने किंवा प्रतिघ-संज्ञेने (द्वेषाने) कोणाच्याही दुःखाची इच्छा करू नये,” असा विचार करूनही मेत्ताभावना वाढवावी. สตฺตมคาถาวณฺณนา सातव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๗. เอวํ [Pg.212] อหิตทุกฺขานาคมปตฺถนาวเสน อตฺถโต เมตฺตาภาวนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตเมว อุปมาย ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘มาตา ยถา นิยํปุตฺต’’นฺติ. ७. अशा प्रकारे अहित आणि दुःखाचे आगमन न व्हावे या आकांक्षेने अर्थतः मेत्ताभावनेची जोपासना दर्शवून, आता तीच भावना उपमेद्वारे दर्शवताना भगवंतांनी “माता यथा नियं पुत्तं” असे म्हटले. ตสฺสตฺโถ – ยถา มาตา นิยํ ปุตฺตํ อตฺตนิ ชาตํ โอรสํ ปุตฺตํ, ตญฺจ เอกปุตฺตเมว อายุสา อนุรกฺเข, ตสฺส ทุกฺขาคมปฺปฏิพาหนตฺถํ อตฺตโน อายุมฺปิ จชิตฺวา ตํ อนุรกฺเข, เอวมฺปิ สพฺพภูเตสุ อิทํ เมตฺตาขฺยํ มานสํ ภาวเย, ปุนปฺปุนํ ชนเย วฑฺฒเย, ตญฺจ อปริมาณสตฺตารมฺมณวเสน เอกสฺมึ วา สตฺเต อนวเสสผรณวเสน อปริมาณํ ภาวเยติ. त्याचा अर्थ असा आहे – ज्याप्रमाणे माता स्वतःच्या पोटी जन्मलेल्या औरस पुत्राचे, आणि तोही एकुलता एक मुलगा असल्यास, स्वतःच्या प्राणापलीकडे जाऊन रक्षण करते; त्याला दुःख येण्यापासून रोखण्यासाठी स्वतःच्या प्राणाचाही त्याग करून त्याचे रक्षण करते; त्याचप्रमाणे सर्व प्राण्यांविषयी हे ‘मेत्ता’ नावाचे मन (चित्त) विकसित करावे, पुन्हा पुन्हा उत्पन्न करावे आणि वाढवावे. तसेच ते अपरिमित प्राण्यांना आलंबन बनवून किंवा एका प्राण्यामध्येही संपूर्णपणे व्यापून टाकण्याच्या हेतूने अपरिमितपणे विकसित करावे. อฏฺฐมคาถาวณฺณนา आठव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๘. เอวํ สพฺพากาเรน เมตฺตาภาวนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตสฺเสว วฑฺฒนํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘เมตฺตญฺจ สพฺพโลกสฺมี’’ติ. ८. अशा प्रकारे सर्व प्रकारे मेत्ताभावनेची जोपासना दर्शवून, आता तिचीच वृद्धी दर्शवताना भगवंतांनी “मेत्तञ्च सब्बलोकस्मिं” असे म्हटले. ตตฺถ มิชฺชติ ตายติ จาติ มิตฺโต, หิตชฺฌาสยตาย สินิยฺหติ, อหิตาคมโต รกฺขติ จาติ อตฺโถ. มิตฺตสฺส ภาโว เมตฺตํ. สพฺพโลกสฺมีติ อนวเสเส สตฺตโลเก. มนสิ ภวนฺติ มานสํ. ตญฺหิ จิตฺตสมฺปยุตฺตตฺตา เอวํ วุตฺตํ. ภาวเยติ วฑฺฒเย. น อสฺส ปริมาณนฺติ อปริมาณํ, อปฺปมาณสตฺตารมฺมณตาย เอวํ วุตฺตํ. อุทฺธนฺติ อุปริ, เตน อรูปภวํ คณฺหาติ. อโธติ เหฏฺฐา, เตน กามภวํ คณฺหาติ. ติริยนฺติ เวมชฺฌํ, เตน รูปภวํ คณฺหาติ. อสมฺพาธนฺติ สมฺพาธวิรหิตํ, ภินฺนสีมนฺติ วุตฺตํ โหติ. สีมา นาม ปจฺจตฺถิโก วุจฺจติ, ตสฺมิมฺปิ ปวตฺตนฺติ อตฺโถ. อเวรนฺติ เวรวิรหิตํ, อนฺตรนฺตราปิ เวรเจตนาปาตุภาววิรหิตนฺติ อตฺโถ. อสปตฺตนฺติ วิคตปจฺจตฺถิกํ. เมตฺตาวิหารี หิ ปุคฺคโล มนุสฺสานํ ปิโย โหติ, อมนุสฺสานํ ปิโย โหติ, นาสฺส โกจิ ปจฺจตฺถิโก โหติ, เตนสฺส ตํ มานสํ วิคตปจฺจตฺถิกตฺตา อสปตฺตนฺติ วุจฺจติ. ปริยายวจนญฺหิ เอตํ, ยทิทํ ปจฺจตฺถิโก สปตฺโตติ. อยํ อนุปทโต อตฺถวณฺณนา. त्यामध्ये, जो स्नेह करतो आणि रक्षण करतो तो ‘मित्र’ होय; हिताच्या इच्छेने स्नेह करतो आणि अहिताच्या आगमनापासून रक्षण करतो, असा याचा अर्थ आहे. मित्राचा भाव म्हणजे ‘मेत्ता’ (मैत्री). ‘सब्बलोकस्मिं’ म्हणजे संपूर्ण सत्त्वलोकात. मनात उत्पन्न होणारे ते ‘मानसं’ (मन/चित्त). ते चित्ताशी संप्रयुक्त असल्यामुळे असे म्हटले आहे. ‘भावये’ म्हणजे वाढवावे. ज्याला मर्यादा (परिमाण) नाही ते ‘अपरिमित’ होय; अपरिमित प्राण्यांना आलंबन बनवल्यामुळे असे म्हटले आहे. ‘उद्धं’ म्हणजे वर, याद्वारे अरूपभवाचे ग्रहण होते. ‘अधो’ म्हणजे खाली, याद्वारे कामभवाचे ग्रहण होते. ‘तिरियं’ म्हणजे मध्ये (आडवे), याद्वारे रूपभवाचे ग्रहण होते. ‘असंबाधं’ म्हणजे संकोचविरहित (अडथळामुक्त); ज्याने सीमा ओलांडली आहे, असा याचा अर्थ होतो. ‘सीमा’ म्हणजे शत्रू असे म्हटले जाते, त्याच्यावरही मेत्ताभावना प्रवृत्त होते, असा याचा अर्थ आहे. ‘अवेरं’ म्हणजे वैररहित; वेळोवेळी वैरभावनेचा उदय न होणे, असा याचा अर्थ आहे. ‘असपत्तं’ म्हणजे शत्रुरहित. कारण मेत्ताविहारी (मैत्रीत विहार करणारा) मनुष्य मनुष्यांना प्रिय असतो, अमनुष्यांना प्रिय असतो, त्याचा कोणीही शत्रू नसतो; म्हणून त्याच्या त्या मनाला शत्रुरहित असल्यामुळे ‘असपत्तं’ असे म्हटले जाते. कारण ‘पच्चत्थिक’ आणि ‘सपत्त’ हे समानार्थी शब्द आहेत. हे शब्दांनुसार अर्थाचे स्पष्टीकरण आहे. อยํ [Pg.213] ปเนตฺถ อธิปฺเปตตฺถทีปนา – ยทิทํ ‘‘เอวมฺปิ สพฺพภูเตสุ มานสํ ภาวเย อปริมาณ’’นฺติ วุตฺตํ, ตญฺเจตํ อปริมาณํ เมตฺตํ มานสํ สพฺพโลกสฺมึ ภาวเย วฑฺฒเย, วุฑฺฒึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ คมเย ปาปเย. กถํ? อุทฺธํ อโธ จ ติริยญฺจ, อุทฺธํ ยาว ภวคฺคา, อโธ ยาว อวีจิโต, ติริยํ ยาว อวเสสทิสา. อุทฺธํ วา อารุปฺปํ, อโธ กามธาตุํ, ติริยํ รูปธาตุํ อนวเสสํ ผรนฺโต. เอวํ ภาเวนฺโตปิ จ ตํ ยถา อสมฺพาธํ อเวรํ อสปตฺตญฺจ โหติ, ตถา สมฺพาธเวรสปตฺตานํ อภาวํ กโรนฺโต ภาวเย. ยํ วา ตํ ภาวนาสมฺปทํ ปตฺตํ สพฺพตฺถ โอกาสโลกวเสน อสมฺพาธํ, อตฺตโน ปเรสุ อาฆาตปฺปฏิวินยเนน อเวรํ, อตฺตนิ จ ปเรสํ อาฆาตวินยเนน อสปตฺตํ โหติ. ตํ อสมฺพาธมเวรมสปตฺตํ อปริมาณํ เมตฺตํ มานสํ อุทฺธํ อโธ ติริยญฺจาติ ติวิธปริจฺเฉเท สพฺพโลกสฺมึ ภาวเย วฑฺฒเยติ. परंतु येथे अभिप्रेत असलेल्या अर्थाचे प्रकटीकरण खालीलप्रमाणे आहे – “अशा प्रकारे सर्व प्राण्यांविषयी अपरिमित मन विकसित करावे” असे जे म्हटले आहे, ते हे अपरिमित मेत्तायुक्त मन संपूर्ण लोकात विकसित करावे, वाढवावे; वृद्धी, प्रगती आणि विशालतेला प्राप्त करून द्यावे. कसे? वर, खाली आणि मध्ये (आडवे). वर भवाग्र (अस्तित्वाच्या सर्वोच्च शिखरा) पर्यंत, खाली अवीची नरकापर्यंत आणि मध्ये इतर सर्व दिशांपर्यंत. किंवा वर अरूपधातू, खाली कामधातू आणि मध्ये रूपधातू या संपूर्ण विश्वाला व्यापून टाकताना. अशा प्रकारे भावना करत असतानाही, ते जसे अडथळामुक्त, वैररहित आणि शत्रुरहित होईल, तशा प्रकारे अडथळा, वैर आणि शत्रू यांचा अभाव करत (ते नष्ट करत) भावना करावी. किंवा जी ही भावना-संपत्ती प्राप्त झाली आहे, ती सर्व ठिकाणी ओकासलोकाच्या (अवकाशलोकाच्या) दृष्टीने अडथळामुक्त असते; इतरांबद्दलचा स्वतःचा राग (आघात) दूर केल्यामुळे वैररहित असते; आणि स्वतःबद्दलचा इतरांचा राग दूर केल्यामुळे शत्रुरहित असते. त्या अडथळामुक्त, वैररहित, शत्रुरहित आणि अपरिमित मेत्तायुक्त मनाला वर, खाली आणि मध्ये अशा तीन प्रकारच्या विभागांनी युक्त संपूर्ण लोकात विकसित करावे, वाढवावे. นวมคาถาวณฺณนา नवव्या गाथेचे स्पष्टीकरण (वण्णना). ๙. เอวํ เมตฺตาภาวนาย วฑฺฒนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ตํ ภาวนมนุยุตฺตสฺส วิหรโต อิริยาปถนิยมาภาวํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ติฏฺฐํ จรํ…เป… อธิฏฺเฐยฺยา’’ติ. ९. अशा प्रकारे मैत्रीभावनेची वृद्धी दाखवून, आता त्या भावनेचा अभ्यास करत राहणाऱ्या व्यक्तीसाठी शारीरिक स्थितीचा (इरियापथ) कोणताही नियम नसतो हे दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी "तिट्ठं चरं...पे... अधिट्ठेय्य" (उभे असताना, चालताना... इत्यादी) असे म्हटले. ตสฺสตฺโถ – เอวเมตํ เมตฺตํ มานสํ ภาเวนฺโต โส ‘‘นิสีทติ ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา อุชุํ กายํ ปณิธายา’’ติอาทีสุ วิย อิริยาปถนิยมํ อกตฺวา ยถาสุขํ อญฺญตรญฺญตรอิริยาปถพาธนวิโนทนํ กโรนฺโต ติฏฺฐํ วา จรํ วา นิสินฺโน วา สยาโน วา ยาวตา วิคตมิทฺโธ อสฺส, อถ เอตํ เมตฺตาฌานสตึ อธิฏฺเฐยฺย. त्याचा अर्थ असा आहे – अशा प्रकारे या मैत्रीपूर्ण मनाची भावना करणारा तो साधक, "मांडी घालून आणि शरीर सरळ ठेवून बसतो" इत्यादी सूत्रांमध्ये सांगितल्याप्रमाणे शारीरिक स्थितीचा (इरियापथ) कोणताही कडक नियम न पाळता, आपल्या सुखाप्रमाणे कोणत्याही एका शारीरिक स्थितीच्या त्रासाचे निवारण करत, उभा असताना, चालताना, बसलेला असताना किंवा झोपलेला असताना, जोपर्यंत तो ग्लानी किंवा झोपेपासून मुक्त (विगतमिद्ध) असेल, तोपर्यंत त्याने या मैत्री-ध्यान-स्मृतीची (मेत्ताझानसती) स्थापना करावी. อถ วา เอวํ เมตฺตาภาวนาย วฑฺฒนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ วสีภาวํ ทสฺเสนฺโต อาห ‘‘ติฏฺฐํ จร’’นฺติ. วสิปฺปตฺโต หิ ติฏฺฐํ วา จรํ วา นิสินฺโน วา สยาโน วา ยาวตา อิริยาปเถน เอตํ เมตฺตาฌานสตึ อธิฏฺฐาตุกาโม โหติ, อถ วา ติฏฺฐํ วา จรํ วา…เป… สยาโน วาติ น ตสฺส ฐานาทีนิ อนฺตรายกรานิ โหนฺติ, อปิจ โข ยาวตา เอตํ เมตฺตาฌานสตึ อธิฏฺฐาตุกาโม โหติ, ตาวตา วิคตมิทฺโธ หุตฺวา อธิฏฺฐาติ, นตฺถิ ตสฺส ตตฺถ ทนฺธายิตตฺตํ. เตนาห ‘‘ติฏฺฐํ จรํ นิสินฺโน ว, สยาโน ยาวตาสฺส วิตมิทฺโธ. เอตํ สตึ อธิฏฺเฐยฺยา’’ติ. किंवा दुसऱ्या प्रकारे, अशा रीतीने मैत्रीभावनेची वृद्धी दाखवून, आता वशीभाव (नियंत्रण/प्रभुत्व) दर्शवण्यासाठी भगवंतांनी "तिट्ठं चरं" असे म्हटले. कारण ज्याने वशीभाव प्राप्त केला आहे, तो उभा असताना, चालताना, बसलेला असताना किंवा झोपलेला असताना, ज्या शारीरिक स्थितीमध्ये या मैत्री-ध्यान-स्मृतीची स्थापना करण्याची इच्छा करतो, तेव्हा उभे राहणे, चालणे इत्यादी शारीरिक स्थिती त्याच्यासाठी अडथळा ठरत नाहीत. उलटपक्षी, जोपर्यंत तो या मैत्री-ध्यान-स्मृतीची स्थापना करण्याची इच्छा करतो, तोपर्यंत तो ग्लानीपासून मुक्त होऊनच तिची स्थापना करतो; तिथे त्याच्या मनात कोणतीही सुस्ती किंवा मंदता नसते. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे – "तिट्ठं चरं निसिन्नो वा, सयानो यावतास्स विगतामिद्धो। एतं सतिं अधिट्ठेय्य" (उभा असताना, चालताना, बसलेला असताना किंवा झोपलेला असताना, जोपर्यंत ग्लानीपासून मुक्त असेल, तोपर्यंत या स्मृतीची स्थापना करावी). ตสฺสายมธิปฺปาโย [Pg.214] – ยํ ตํ ‘‘เมตฺตญฺจ สพฺพโลกสฺมิ, มานสํ ภาวเย’’ติ วุตฺตํ, ตํ ยถา ภาเวยฺย, ยถา ฐานาทีสุ ยาวตา อิริยาปเถน ฐานาทีนิ วา อนาทิยิตฺวา ยาวตา เอตํ เมตฺตาฌานสตึ อธิฏฺฐาตุกาโม อสฺส, ตาวตา วิคตมิทฺโธว หุตฺวา เอตํ สตึ อธิฏฺเฐยฺยาติ. याचा अभिप्राय असा आहे – "मेत्तञ्च सब्बलोकस्मिं, मानसं भावये" (सर्व लोकांमध्ये मैत्रीपूर्ण मनाची भावना करावी) असे जे म्हटले आहे, त्याची अशा प्रकारे भावना करावी की, उभे राहणे इत्यादी शारीरिक स्थितींमध्ये, कोणत्याही विशिष्ट शारीरिक स्थितीचा आग्रह न धरता, जोपर्यंत या मैत्री-ध्यान-स्मृतीची स्थापना करण्याची इच्छा असेल, तोपर्यंत ग्लानीपासून पूर्णपणे मुक्त होऊन या स्मृतीची स्थापना करावी. เอวํ เมตฺตาภาวนาย วสีภาวํ ทสฺเสนฺโต ‘‘เอตํ สตึ อธิฏฺเฐยฺยา’’ติ ตสฺมึ เมตฺตาวิหาเร นิโยเชตฺวา อิทานิ ตํ วิหารํ ถุนนฺโต อาห ‘‘พฺรหฺมเมตํ วิหารมิธมาหู’’ติ. अशा प्रकारे मैत्रीभावनेतील वशीभाव दर्शवत "एतं सतिं अधिट्ठेय्य" असे म्हणून त्या मैत्रीविहारात (मैत्रीच्या अवस्थेत) प्रवृत्त करून, आता त्या विहाराची प्रशंसा करण्यासाठी भगवंतांनी "ब्रह्ममेतं विहारमिधमाहू" (यालाच येथे ब्रह्मविहार म्हणतात) असे म्हटले. ตสฺสตฺโถ – ยฺวายํ ‘‘สุขิโน วา เขมิโน วา โหนฺตู’’ติอาทิ กตฺวา ยาว ‘‘เอตํ สตึ อธิฏฺเฐยฺยา’’ติ วณฺณิโต เมตฺตาวิหาโร. เอตํ จตูสุ ทิพฺพพฺรหฺมอริยอิริยาปถวิหาเรสุ นิทฺโทสตฺตา อตฺตโนปิ ปเรสมฺปิ อตฺถกรตฺตา จ อิธ อริยสฺส ธมฺมวินเย พฺรหฺมวิหารมาหุ เสฏฺฐวิหารมาหูติ, ยโต สตตํ สมิตํ อพฺโพกิณฺณํ ติฏฺฐํ จรํ นิสินฺโน วา สยาโน วา ยาวตาสฺส วิคตมิทฺโธ, เอตํ สตึ อธิฏฺเฐยฺยาติ. त्याचा अर्थ असा आहे – "सुखिनो वा खेमिनो वा होन्तु" (सर्व प्राणी सुखी व सुरक्षित असोत) इथपासून ते "एतं सतिं अधिट्ठेय्य" पर्यंत ज्या मैत्रीविहाराचे वर्णन केले आहे, त्या मैत्रीविहाराला दिव्यविहार, ब्रह्मविहार, आर्यविहार आणि इरियापथविहार या चार विहारांमध्ये दोषरहित असल्यामुळे आणि स्वतःसाठी तसेच इतरांसाठीही कल्याणकारी असल्यामुळे, या आर्यांच्या धम्म-विनयामध्ये 'ब्रह्मविहार' (श्रेष्ठ विहार) किंवा 'उत्कृष्ट विहार' असे म्हटले आहे. कारण जेव्हा मनुष्य सतत, निरंतर आणि अखंडपणे उभा असताना, चालताना, बसलेला असताना किंवा झोपलेला असताना, जोपर्यंत तो ग्लानीपासून मुक्त असेल, तोपर्यंत या स्मृतीची स्थापना करतो. ทสมคาถาวณฺณนา दहाव्या गाथेचे स्पष्टीकरण समाप्त। ๑๐. เอวํ ภควา เตสํ ภิกฺขูนํ นานปฺปการโต เมตฺตาภาวนํ ทสฺเสตฺวา อิทานิ ยสฺมา เมตฺตา สตฺตารมฺมณตฺตา อตฺตทิฏฺฐิยา อาสนฺนา โหติ, ตสฺมา ทิฏฺฐิคหนนิเสธนมุเขน เตสํ ภิกฺขูนํ ตเทว เมตฺตาฌานํ ปาทกํ กตฺวา อริยภูมิปฺปตฺตึ ทสฺเสนฺโต ‘‘ทิฏฺฐิญฺจ อนุปคฺคมฺมา’’ติ อิมาย คาถาย เทสนํ สมาเปสิ. १०. अशा प्रकारे भगवंतांनी त्या भिक्खूंना विविध प्रकारे मैत्रीभावनेचा उपदेश करून, आता मैत्री ही प्राण्यांना (सत्त्वांना) आलंबन बनवणारी असल्यामुळे ती आत्मदृष्टीच्या (अहं-भावाच्या) जवळ असते, म्हणून चुकीच्या दृष्टीचे (मिथ्या दृष्टीचे) ग्रहण नाकारण्याच्या उद्देशाने, त्या भिक्खूंना त्याच मैत्री-ध्यानाला आधार (पादक) बनवून आर्यभूमीची प्राप्ती दर्शवण्यासाठी "दिट्ठिञ्च अनुपगम्म" या गाथेने उपदेशाची सांगता केली। ตสฺสตฺโถ – ยฺวายํ ‘‘พฺรหฺมเมตํ วิหารมิธมาหู’’ติ สํวณฺณิโต เมตฺตาฌานวิหาโร, ตโต วุฏฺฐาย เย ตตฺถ วิตกฺกวิจาราทโย ธมฺมา, เต เตสญฺจ วตฺถาทิอนุสาเรน รูปธมฺเม ปริคฺคเหตฺวา อิมินา นามรูปปริจฺเฉเทน ‘‘สุทฺธสงฺขารปุญฺโชยํ, นยิธ สตฺตูปลพฺภตี’’ติ (สํ. นิ. ๑.๑๗๑; มหานิ. ๑๘๖) เอวํ ทิฏฺฐิญฺจ อนุปคฺคมฺม อนุปุพฺเพน โลกุตฺตรสีเลน สีลวา หุตฺวา โลกุตฺตรสีลสมฺปยุตฺเตเนว โสตาปตฺติมคฺคสมฺมาทิฏฺฐิสญฺญิเตน ทสฺสเนน สมฺปนฺโน, ตโต ปรํ โยปายํ วตฺถุกาเมสุ เคโธ กิเลสกาโม อปฺปหีโน โหติ, ตมฺปิ สกทาคามิอนาคามิมคฺเคหิ ตนุภาเวน อนวเสสปฺปหาเนน [Pg.215] จ กาเมสุ เคธํ วิเนยฺย วินยิตฺวา วูปสเมตฺวา น หิ ชาตุ คพฺภเสยฺยํ ปุน เรติ เอกํเสเนว ปุน คพฺภเสยฺยํ น เอติ. สุทฺธาวาเสสุ นิพฺพตฺติตฺวา ตตฺเถว อรหตฺตํ ปาปุณิตฺวา ปรินิพฺพาตีติ. त्याचा अर्थ असा आहे – "ब्रह्ममेतं विहारमिधमाहू" या शब्दांनी ज्या मैत्री-ध्यान-विहाराची प्रशंसा केली आहे, त्या ध्यानातून उठून, तिथे जे वितर्क-विचार इत्यादी धर्म (मानसिक अवस्था) आहेत, त्यांचे आणि हृदयवस्तू इत्यादींच्या आधारे रूपधर्मांचे ग्रहण करून, नाम-रूपाच्या या विभाजनाद्वारे "हा केवळ शुद्ध संस्कारांचा समूह आहे, यात कोणताही प्राणी (सत्त्व) आढळत नाही" अशा प्रकारे मिथ्या दृष्टीचा स्वीकार न करता, अनुक्रमाने लोकोत्तर शीलाने युक्त होऊन शीलवान बनतो; आणि लोकोत्तर शीलाशी संबंधित असलेल्या, सोतापत्तिमग्ग (स्रोतापत्ती मार्ग) मधील सम्यक् दृष्टी म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या ज्ञानाने (दर्शनाने) संपन्न होतो। त्यानंतर, भौतिक कामवस्तूंमध्ये जी आसक्ती (किलेसकाम) अजून नष्ट झालेली नाही, ती आसक्ती सकदागामी मार्ग आणि अनागामी मार्गाच्या ज्ञानाने क्षीण करून आणि पूर्णपणे नष्ट करून, कामभोगांमधील आसक्ती दूर करतो। ती दूर करून व शांत करून, तो "न हि जातु गब्भसेय्यं पुन रेति" म्हणजेच निश्चितपणे पुन्हा गर्भावासात (पुनर्जन्मात) येत नाही। तो सुद्धावास (शुद्धावास) लोकांमध्ये जन्म घेऊन, तिथेच अरहंतपद प्राप्त करून परिनिर्वाण पावतो। เอวํ ภควา เทสนํ สมาเปตฺวา เต ภิกฺขู อาห – ‘‘คจฺฉถ, ภิกฺขเว, ตสฺมึเยว วนสณฺเฑ วิหรถ, อิมญฺจ สุตฺตํ มาสสฺส อฏฺฐสุ ธมฺมสฺสวนทิวเสสุ ฆณฺฑึ อาโกเฏตฺวา อุสฺสาเรถ, ธมฺมกถํ กโรถ สากจฺฉถ อนุโมทถ, อิทเมว กมฺมฏฺฐานํ อาเสวถ ภาเวถ พหุลีกโรถ, เตปิ โว อมนุสฺสา ตํ เภรวารมฺมณํ น ทสฺเสสฺสนฺติ, อญฺญทตฺถุ อตฺถกามา หิตกามา ภวิสฺสนฺตี’’ติ. เต ‘‘สาธู’’ติ ภควโต ปฏิสฺสุณิตฺวา อุฏฺฐายาสนา ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ตตฺถ คนฺตฺวา ตถา อกํสุ. เทวตาโย จ ‘‘ภทนฺตา อมฺหากํ อตฺถกามา หิตกามา’’ติ ปีติโสมนสฺสชาตา หุตฺวา สยเมว เสนาสนํ สมฺมชฺชนฺติ, อุณฺโหทกํ ปฏิยาเทนฺติ, ปิฏฺฐิปริกมฺมํ ปาทปริกมฺมํ กโรนฺติ, อารกฺขํ สํวิทหนฺติ. เตปิ ภิกฺขู ตเมว เมตฺตํ ภาเวตฺวา ตเมว จ ปาทกํ กตฺวา วิปสฺสนํ อารภิตฺวา สพฺเพ ตสฺมึเยว อนฺโตเตมาเส อคฺคผลํ อรหตฺตํ ปาปุณิตฺวา มหาปวารณาย วิสุทฺธิปวารณํ ปวาเรสุนฺติ. अशा प्रकारे उपदेश पूर्ण करून भगवंतांनी त्या भिक्खूंना म्हटले – "भिक्खूंनो, तुम्ही जा आणि त्याच वनखंडात राहा। महिन्यातील धम्मश्रवणाच्या आठ दिवसांमध्ये घंटा वाजवून या सुत्ताचे पठण करा, धम्मचर्चा करा, संवाद साधा आणि अनुमोदन करा। याच कम्मट्ठानाचा (कर्मस्थानाचा) अभ्यास करा, त्याची भावना करा आणि त्याचा वारंवार सराव करा। ते अमनुष्य (यक्ष/देवता) तुम्हाला ते भयानक दृश्य दाखवणार नाहीत; उलट ते तुमचे हित आणि कल्याण इच्छिणारे बनतील।" त्यांनी "साधू" (फार चांगले) असे म्हणून भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला, आपल्या आसनावरून उठून भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि त्या वनात जाऊन भगवंतांनी सांगितल्याप्रमाणे केले। तेव्हा देवता "हे पूजनीय भिक्खू आमचे हित आणि कल्याण इच्छिणारे आहेत" असे समजून अत्यंत आनंदित व प्रसन्न झाल्या। त्यांनी स्वतःहून भिक्खूंच्या निवासस्थानाची (सेनासनाचा) झाडलोट केली, गरम पाण्याची व्यवस्था केली, पाठीची व पायांची मालिश केली आणि त्यांच्या संरक्षणाची व्यवस्था केली। त्या भिक्खूंनीही त्याच मैत्रीची भावना केली आणि तिलाच आधार बनवून विपना (विपश्यना) सुरू केली। त्या सर्वांनी त्याच तीन महिन्यांच्या वर्षावासाच्या आत परम फल अरहंतपद प्राप्त केले आणि महाप्रवारणेच्या दिवशी अत्यंत शुद्ध प्रवारणा केली। เอวมฺปิ อตฺถกุสเลน ตถาคเตน,ธมฺมิสฺสเรน กถิตํ กรณียมตฺถํ; กตฺวานุภุยฺย ปรมํ หทยสฺส สนฺตึ,สนฺตํ ปทํ อภิสเมนฺติ สมตฺตปญฺญา. अशा प्रकारे, कल्याणामध्ये निपुण असलेल्या आणि धम्माचे स्वामी असलेल्या तथागतांनी उपदेशिलेल्या कर्तव्यकर्माचे आचरण करून, मनाची परम शांती अनुभवून, ते परिपूर्ण प्रज्ञा असलेले भिक्खू त्या शांत पदाला (निर्वाणाला) प्राप्त झाले। ตสฺมา หิ ตํ อมตมพฺภุตมริยกนฺตํ,สนฺตํ ปทํ อภิสเมจฺจ วิหริตุกาโม; วิญฺญู ชโน วิมลสีลสมาธิปญฺญา-เภทํ กเรยฺย สตตํ กรณียมตฺถนฺติ. म्हणूनच, त्या अमृतमय, अद्भुत, आर्यांना प्रिय असलेल्या आणि शांत अशा निर्वाणपदाचा साक्षात्कार करून घेऊन राहण्याची इच्छा करणाऱ्या सुज्ञ व्यक्तीने, निर्मळ शील, समाधी आणि प्रज्ञा यांनी युक्त असलेल्या आपल्या कर्तव्यकर्माचे सतत आचरण करावे। ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทกปาฐ-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दकपाठ-अट्ठकथेतील, เมตฺตสุตฺตวณฺณนา นิฏฺฐิตา. मेत्तसुत्त-वर्णन (मैत्री सुत्ताचे स्पष्टीकरण) समाप्त झाले। นิคมนกถา उपसंहार (निगमनकथा)। เอตฺตาวตา [Pg.216] จ ยํ วุตฺตํ – आणि आतापर्यंत जे म्हटले गेले आहे – ‘‘อุตฺตมํ วนฺทเนยฺยานํ, วนฺทิตฺวา รตนตฺตยํ; ขุทฺทกานํ กริสฺสามิ, เกสญฺจิ อตฺถวณฺณน’’นฺติ. "वंदनीय असलेल्यांमध्ये उत्तम अशा रत्नत्रयाला वंदन करून, मी काही खुद्दकपाठांचे (लहान ग्रंथांचे) अर्थ स्पष्टीकरण (अट्ठकथा) करेन।" ตตฺถ สรณสิกฺขาปททฺวตฺตึสาการกุมารปญฺหมงฺคลสุตฺตรตนสุตฺตติโรกุฏฺฏนิธิกณฺฑเมตฺตสุตฺตวเสน นวปฺปเภทสฺส ขุทฺทกปาฐสฺส ตาว อตฺถวณฺณนา กตา โหติ. เตเนตํ วุจฺจติ – त्यामध्ये सरण (शरणगमन), सिक्खापद (शिखापदे), द्वत्तिंसाकार (बत्तीस अवयव), कुमारपञ्ह (कुमार प्रश्न), मङ्गलसुत्त (मंगल सुत्त), रतनसुत्त (रतन सुत्त), तिरोकुट्टसुत्त (तिरोकुट्ट सुत्त), निधिकण्डसुत्त (निधिकण्ड सुत्त) आणि मेत्तसुत्त (मैत्री सुत्त) या नऊ भागांनी युक्त असलेल्या खुद्दकपाठाचे अर्थ स्पष्टीकरण पूर्ण झाले आहे। म्हणूनच असे म्हटले आहे – ‘‘อิมํ ขุทฺทกปาฐสฺส, กโรนฺเตนตฺถวณฺณนํ; สทฺธมฺมฏฺฐิติกาเมน, ยํ ปตฺตํ กุสลํ มยา.ตสฺสานุภาวโต ขิปฺปํ, ธมฺเม อริยปฺปเวทิเต; วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ, ปาปุณาตุ อยํ ชโน’’ติ. सद्धम्माच्या चिरस्थायी अस्तित्वाची इच्छा धरणाऱ्या माझ्याद्वारे, या खुद्दकपाठाचे अर्थवर्णन करताना जे काही कुशल (पुण्य) प्राप्त झाले आहे, त्याच्या प्रभावाने हा जनसमूह अरियांद्वारे उपदेशिलेल्या धम्मामध्ये शीघ्रच वृद्धी, समृद्धी आणि विपुलतेला प्राप्त होवो. ปรมวิสุทฺธสทฺธาพุทฺธิวีริยคุณปฺปฏิมณฺฑิเตน สีลาจารชฺชวมทฺทวาทิคุณสมุทยสมุทิเตน สกสมยสมยนฺตรคหนชฺโฌคาหณสมตฺเถน ปญฺญาเวยฺยตฺติยสมนฺนาคเตน ติปิฏกปริยตฺติธมฺมปฺปเภเท สาฏฺฐกเถ สตฺถุสาสเน อปฺปฏิหตญาณปฺปภาเวน ฉมหาเวยฺยากรเณนฉมหาเวยฺยากรเณน กรณสมฺปตฺติชนิตสุขวินิคฺคตมธุโรทารวจนลาวณฺณยุตฺเตน ยุตฺตมุตฺตวาทินา วาทีวเรน มหากวินา ฉฬภิญฺญาปฏิสมฺภิทาทิปฺปเภทคุณปฺปฏิมณฺฑิเต อุตฺตริมนุสฺสธมฺเม สุปฺปติฏฺฐิตพุทฺธีนํ เถรวํสปฺปทีปานํ เถรานํ มหาวิหารวาสีนํ วํสาลงฺการภูเตน วิปุลวิสุทฺธพุทฺธินา พุทฺธโฆโสติ ครูหิ คหิตนามเธยฺเยน เถเรน กตา อยํ ปรมตฺถโชติกา นาม ขุทฺทกปาฐวณฺณนา – अत्यंत शुद्ध श्रद्धा, बुद्धी आणि वीर्य या गुणांनी विभूषित असलेल्या; शील, सदाचार, आर्जव, मार्दव इत्यादी गुणांच्या समूहाने युक्त असलेल्या; स्वतःच्या आणि इतरांच्या सिद्धांतांच्या गहनतेचे अवगाहन करण्यास समर्थ असलेल्या; प्रज्ञा आणि नैपुण्याने युक्त असलेल्या; अठ्ठकथांसह त्रिपिटक परियत्ति धम्माच्या विविधतेने युक्त अशा शास्त्यांच्या शासनात अप्रतिहत ज्ञानप्रकाश असलेल्या; महान व्याकरणकार असलेल्या; वाणीच्या समृद्धीमुळे सहजपणे प्रगट होणाऱ्या मधुर, उदात्त आणि लावण्ययुक्त वचनांनी युक्त असलेल्या; योग्य आणि युक्त बोलणाऱ्या; श्रेष्ठ वक्त्या असलेल्या; महाकवी असलेल्या; सहा अभिज्ञा, चार पटिसम्भिदा इत्यादी गुणांनी विभूषित अशा उत्तरिमनुस्सधम्मामध्ये सुप्रतिष्ठित बुद्धी असलेल्या आणि महाविहारवासी थेरांच्या वंशाचे प्रदीप असलेल्या थेरांच्या वंशाचे अलंकार स्वरूप असलेल्या; अत्यंत विशाल आणि शुद्ध बुद्धी असलेल्या, पूज्य गुरूंनी ज्यांना 'बुद्धघोष' असे नाव दिले आहे, अशा थेरांनी रचलेली ही 'परमत्थजोतिका' नावाची खुद्दकपाठ-वण्णना — ตาว ติฏฺฐตุ โลกสฺมึ, โลกนิตฺถรเณสินํ; ทสฺเสนฺตี กุลปุตฺตานํ, นยํ สีลาทิสุทฺธิยา. संसारातून पार जाऊ इच्छिणाऱ्या कुलपुत्रांना शील इत्यादींच्या शुद्धीचा मार्ग दाखवणारी ही अठ्ठकथा या जगात तोपर्यंत टिकून राहो, ยาว พุทฺโธติ นามมฺปิ, สุทฺธจิตฺตสฺส ตาทิโน; โลกมฺหิ โลกเชฏฺฐสฺส, ปวตฺตติ มเหสิโนติ. जोपर्यंत या जगात शुद्ध चित्त असलेल्या, तादी (समतायुक्त), लोकज्येष्ठ आणि महर्षी अशा बुद्धांचे 'बुद्ध' हे नाव देखील अस्तित्वात राहील. ปรมตฺถโชติกาย ขุทฺทก-อฏฺฐกถาย परमत्थजोतिका नावाच्या खुद्दक-अठ्ठकथेतील ขุทฺทกปาฐวณฺณนา นิฏฺฐิตา. खुद्दकपाठ-वण्णना समाप्त झाली। | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |